- Joined
- Dec 5, 2013
- Messages
- 74,667
अध्याय - 105
━━━━━━༻♥༺━━━━━━
"फिलहाल तो मैं तुम दोनों की ही तरफ हूं।" भाभी ने कहा____"क्योंकि तुम्हें भी पता है कि मेरे बिना तुम दोनों की नैया पार नहीं लगेगी। इस लिए ज़्यादा उड़ने की कोशिश मत करना। अब जाओ तुम, मैं भी नीचे जा रही हूं।"
कहने के साथ ही भाभी मेरी कोई बात सुने बिना ही सीढ़ियों पर उतरती चली गईं। उनके जाने के बाद मैं भी उनकी बातों के बारे में सोचते हुए और मुस्कुराते हुए अपने कमरे की तरफ चला गया।
अब आगे....
अगली सुबह।
पिता जी और मैं चाय पीने के बाद चंद्रकांत के घर जाने के लिए बाहर निकले ही थे कि तभी सामने से आते शेरा पर हमारी नज़र पड़ी। शेरा के चेहरे पर अजीब से भाव थे जिसे देख पिता जी के चेहरे पर सोचने वाले भाव उभर आए।
"प्रणाम मालिक।" क़रीब आते ही शेरा ने झुक कर पिता जी के पैरों को छू कर कहा।
"क्या बात है?" वो जैसे ही खड़ा हुआ तो पिता जी ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा____"तुम्हारे चेहरे पर मौजूद ये भाव कैसे हैं? कुछ हुआ है क्या?"
"जी मालिक।" शेरा ने नज़रें झुकाए हुए कहा____"परसों रात मैंने सफ़ेदपोश को देखा था...लेकिन।"
"लेकिन??" पिता जी के साथ साथ मैं भी चौंक पड़ा था।
"लेकिन मैं अपनी लाख कोशिश के बाद भी उसे पकड़ नहीं सका।" शेरा ने अपराध भाव से सिर झुकाए हुए कहा।
"पूरी बात बताओ।" पिता जी ने सपाट लहजे से कहा।
शेरा ने पूरी बात बता दी कि कैसे उसने परसों की रात चंद्रकांत और सफ़ेदपोश को आपस में बातें करते सुना और फिर सफ़ेदपोश के जाते ही उसने उसका पीछा किया। पीछा करते हुए वो आमों के बाग तक गया था जहां पर सफ़ेदपोश ने हमारे एक आदमी को गोली मार दी थी।
"हैरानी की बात है कि सफ़ेदपोश तुम्हारी बेवकूफी की वजह से हाथ से निकल गया।" पिता जी ने नाराज़गी जताते हुए कहा____"जब तुमने उसे चंद्रकांत से बात करते हुए देख ही लिया था तो तुम्हें उसी समय उसे दबोच लेना चाहिए था।"
"माफ़ कर दीजिए मालिक।" शेरा ने खेद भरे भाव से कहा____"मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि वो चंद्रकांत के यहां दिख जाएगा। आपके आदेश पर मैं उसे खोज ही रहा था कि अचानक वो मुझे चंद्रकांत के घर के बाहर दिख गया। पहले तो मुझे कुछ समझ ही नहीं आया था कि अंधेरे में वहां पर कोई है भी या नहीं। वो तो रात के सन्नाटे में मुझे हल्की आवाज़ें सुनाई दी थीं। आवाज़ों को सुन कर मैं चौंक गया था कि इतनी रात को कौन हो सकता है? अपनी उत्सुकता को मिटाने के लिए जब मैं आवाज़ की दिशा में गया तो अंधेरे में मुझे दो साए खड़े नज़र आए। ये तो मैं जान चुका था कि वो घर चंद्रकांत का ही है लेकिन मैं ये सोचने पर मजबूर हो गया था कि चंद्रकांत के घर के बाहर उस वक्त कौन हो सकता है। यही देखने के लिए मैं बहुत ही सावधानी से उनके क़रीब बढ़ गया था। जल्दी ही मुझे समझ आ गया कि वो कौन हैं। एक तो चंद्रकांत ही था जोकि उसकी आवाज़ से ही मैं पहचान गया था लेकिन दूसरा कौन था ये मैं थोड़ी ही देर में उसकी पोशाक से पहचान पाया। उसकी आवाज़ भी वैसी ही अजीब सी थी जैसी मैंने तब सुनी थी जब एक बार दरोगा धनंजय के यहां मैंने सफ़ेदपोश के मुख से सुनी थी। मैं ये जान कर चकित रह गया था कि सफ़ेदपोश इतनी रात को चंद्रकांत के पास कैसे है? दोनों की बातें सुनने के लिए मैं चुपचाप अपनी जगह पर खड़ा रहा। मैं जानना चाहता था कि सफ़ेदपोश का चंद्रकांत से यूं रात के उस वक्त मिलने का क्या मतलब था और साथ ही दोनों के बीच क्या संबंध है?"
"तो क्या सुना तुमने?" पिता जी ने पूछा।
पिता जी के पूछने पर शेरा ने वही सब बताया जो परसों की रात चंद्रकांत से सफ़ेदपोश ने बातें की थी। सारी बातें सुनने के बाद पिता जी कुछ पलों तक जाने क्या सोचते रहे फिर बोले_____"उसके बाद क्या हुआ? हमारा मतलब है कि चंद्रकांत से वो सब बातें करने के बाद सफेदपोश कहां गया और तुमने क्या किया?"
"चंद्रकांत को अगली रात मिलने को कह कर जब सफ़ेदपोश वहां से चल दिया तो मैं भी उसके पीछे लग गया।" शेरा ने बताना शुरू किया____"वो अंधेरे में भी बहुत तेज़ी से आगे बढ़ता चला जा रहा था। मैं ये सोच कर हैरान हो उठा था कि वो कच्चे रास्ते और कीचड़ भरी ज़मीन पर भी कैसे इतनी तेज़ी से बढ़ता चला जा रहा था। मुझे लगा कहीं वो मेरी पहुंच से बाहर हो कर अंधेरे में गायब ही न हो जाए इस लिए मैं भी तेज़ी से उसके पीछे चल पड़ा किंतु एक जगह अचानक ही कीचड़ में मेरा पैर फिसल गया और मैं खुद को हज़ार कोशिश के बाद भी सम्हाल न सका। नतीज़ा ये हुआ कि मैं वहीं कीचड़ में गिर गया। किसी तरह जल्दी से उठा और फिर से उसके पीछे दौड़ चला किंतु आगे अंधेरे में वो मुझे नज़र न आया। मुझे याद आया कि पिछली बार वो आमों के बाग की तरफ ही गया था और फिर वो वहीं गायब हो गया था। मैं तेज़ी से आगे की तरफ दौड़ता चला गया। किन्तु शायद उसे शक हो गया था कि उसके पीछे कोई है इस लिए जल्दी ही वो आमों के बाग में दाखिल हो गया। मैंने अपना एक आदमी पहले से ही बाग़ के मकान के पास तैनात कर रखा था। शायद उस आदमी को अंधेरे में सफ़ेदपोश के आने का आभास हो गया था। सन्नाटे में मैंने साफ सुना था कि उसने उस सफ़ेदपोश को आवाज़ दी थी। मैं जानता था कि सफ़ेदपोश ऐसी चीज़ नहीं है जिसे अकेला आदमी अपने काबू में कर सके। अभी मैं बाग के क़रीब पहुंचा ही था कि तभी सन्नाटे में गोली चलने की तेज़ आवाज़ गूंज उठी और साथ ही एक इंसानी चीख भी। मैं समझ गया कि गोली उस सफ़ेदपोश ने ही चलाई थी क्योंकि मेरे आदमी के पास तो बंदूक जैसी कोई चीज़ थी ही नहीं। मैं फ़ौरन ही उस जगह पहुंच गया लेकिन देर हो चुकी थी मुझे। सफ़ेदपोश बाग़ में गायब हो चुका था। अब उसे खोजना व्यर्थ था। मैं फ़ौरन ही दर्द से तड़पते अपने आदमी के पास पहुंचा और उसे ले कर वैद्य जी के पास गया। वैद्य जी ने कहा कि गोली लगी है इस लिए वो इसमें कुछ नहीं कर सकते हैं। तब मैं फ़ौरन ही उसे जीप में लाद कर उसी वक्त शहर चला गया।"
"अब कैसा है वो?" पिता जी ने गहरी सांस लेने के बाद कहा____"समय से उसका उपचार हुआ था कि नहीं?"
"ऊपर वाले की दया से वो बच गया है मालिक।" शेरा ने कहा____"हालाकि खून बहुत बह गया था उसका। लगा नहीं था कि बचेगा किंतु बच गया। अभी थोड़ी देर पहले ही उसको अस्पताल से वापस ला कर उसके घर लाया हूं। सोचा आपको भी इस बारे में ख़बर कर दूं।"
"बड़ी अजीब बात है पिता जी।" मैंने कुछ सोचते हुए कहा____"पहले भी सफ़ेदपोश को हमारे आमों के बाग़ में ही ग़ायब होते देखा गया था और शेरा के अनुसार परसों रात को भी। सोचने वाली बात है कि हमारे आमों के बाग़ में पहुंच कर वो कैसे और कहां गायब हो जाता है? ये तो पक्की बात है कि वो कोई भूत प्रेत नहीं है जो किसी जादू की तरह ग़ायब हो जाता है। अब सवाल ये है कि वो ग़ायब कैसे हो जाता है? वो भी कुछ इस तरह से कि खोजने पर भी किसी को नज़र नहीं आता?"
"सही कहा तुमने।" पिता जी के चेहरे पर गहन सोचो के भाव उभर आए थे____"सफ़ेदपोश अपने काम को अंजाम देने के बाद हमारे आमों के बाग़ की तरफ ही क्यों जाता है और फिर वहां ग़ायब कैसे हो जाता है? आख़िर आमों के उस बाग़ में वो कौन सी जगह है जो एक इंसान को किसी जादू की तरह ग़ायब कर देती है? इस बारे में यकीनन अब पता लगाना पड़ेगा।"
"मेरा भी यही कहना है।" मैंने कहा____"हमारे आमों के बाग़ में कोई तो ख़ास बात ज़रूर है जो हमारे लिए अब रहस्य बन गई है और यकीनन सफ़ेदपोश के लिए एक पनाहगाह। एक ऐसी पनाहगाह जो उसके लिए हर तरह से सुरक्षित प्रतीत होती है। तभी तो वो हर बार वहीं पर जा कर बड़े आराम से हम सबकी नज़रों से ग़ायब हो जाता है। हमें आमों के बाग़ में जा कर वहां की अच्छे तरीके से जांच पड़ताल करनी होगी।"
शेरा को वापस भेजने के बाद मैं और पिता जी जीप में बैठ कर चंद्रकांत के घर की तरफ चल पड़े। सारे रास्ते हम दोनों के बीच ख़ामोशी रही। मेरी तरह शायद पिता जी भी सफ़ेदपोश के ही बारे में सोच रहे थे। ख़ैर कुछ ही देर में हम चंद्रकांत के घर पहुंच गए जहां पर ठाकुर महेंद्र सिंह की जीप पहले से ही खड़ी नज़र आई हमें।
✮✮✮✮
"तो आख़िर वही हुआ जिसका हमें पहले से ही अंदेशा था।" ठाकुर महेंद्र सिंह की सारी बातें सुनने के बाद पिता जी ने कहा____"यानि उस सफ़ेदपोश ने बड़ी ही चालाकी से चंद्रकांत के ही हाथों उसकी बहू की हत्या करवा दी। रजनी के संबंध में उसने चंद्रकांत को जो कुछ बताया था वो सब एक ऐसा झूठ था जिसे पूरी तरह सच मान कर चंद्रकांत ने अपनी ही बहू को जान से मार डाला।"
पिता जी की ये बातें सुन कर इतने लोगों के मौजूद रहते हुए भी सन्नाटा छा गया। ये अलग बात है कि कुछ ही दूरी पर चंद्रकांत दोनों हाथों से अपना सिर पकड़े इस तरह बैठा था जैसे उसका सब कुछ लुट गया हो और वो पूरी तरह से बर्बाद हो गया हो। चेहरे पर अनंत पीड़ा के भाव थे और आंखों में आंसुओं का तैरता हुआ सैलाब। अपनी रुलाई को बड़ी मुश्किल से रोके हुए था वो।
पिता जी के आने से पहले महेंद्र सिंह ने उससे यही पूछा था कि____'क्या कल रात सफ़ेदपोश उससे मिलने आया था?' जवाब में चंद्रकांत ने बड़े ही दुख के साथ इंकार में सिर हिलाया था और फिर लगभग रोते हुए उसने बताया था कि वो सफ़ेदपोश के इंतज़ार में सारी रात घर से बाहर बैठा रहा था किंतु सफ़ेदपोश को तो जैसे न आना था और ना ही वो आया था। उसके न आने का बस यही मतलब था कि पिछले दिन उसके बारे में दादा ठाकुर ने जो कुछ अनुमान के तहत कहा था वो ही सच था।
"कहना तो नहीं चाहिए चंद्रकांत।" महेंद्र सिंह ने सहसा गंभीर हो कर कहा____"लेकिन ये सच है कि तुम्हारे ही दुष्कर्मों की वजह से तुम्हारा बेटा और तुम्हारी बहू आज इस दुनिया में नहीं हैं। तुमने खुद अपने हाथों अपने परिवार का नाश कर डाला। तुमने ये जानते हुए भी कि तुम्हारे घर की औरतों का भी उतना ही कसूर था जितना वैभव का था, उसके लिए अपने घर की औरतों को कुछ न कह के सिर्फ ठाकुर साहब के साथ बुरा करने का क़दम उठाया। चंद्रकांत, अब ये नहीं कहा जा सकता कि उस मामले के चलते तुम बाप बेटों की मनोदशा ठीक नहीं थी क्योंकि अगर ठीक न होती तो तुम दोनों गौरी शंकर के साथ मिल कर ठाकुर साहब के खिलाफ़ ना तो ऐसा करने का षडयंत्र रचते और ना ही वो सब कर पाते। साफ ज़ाहिर होता है कि तुम दोनों बाप बेटों ने अपने पूरे होशो हवास में सब कुछ किया। अपने घर की औरतों को दोष देने की बजाय तुमने ठाकुर साहब के साथ हद से ज़्यादा बुरा कर डालना ज़्यादा बेहतर समझा। शुरू से ही तुम्हारी नीयत और तुम्हारी सोच ग़लत थी। अगर तुम सच में अपने साथ हुए अपमान और अन्याय का इंसाफ़ चाहते तो वैभव वाले मामले को ले कर तुम सीधे ठाकुर साहब के पास जाते और उनसे इंसाफ़ की मांग करते। हम सब जानते हैं कि ठाकुर साहब तुम्हारे साथ इंसाफ़ ज़रूर करते, फिर भले ही चाहे उसके लिए उन्हें अपने बेटे को हमेशा हमेशा के लिए त्याग ही क्यों न देना पड़ता।"
कहने के साथ ही महेंद्र सिंह कुछ पलों के लिए रुके। आस पास ही नहीं बल्कि चौगान के बाहर भी खड़े लोगों की तरफ उन्होंने दृष्टि घुमाई, फिर छा गई ख़ामोशी को चीरते हुए पुनः कहा_____"हमें समझ नहीं आ रहा कि तुम्हारे इस अपराध के लिए हम तुम्हें सज़ा दें अथवा नहीं। इसके पहले भी तुम्हारे अपराधों के लिए तुम दोनों बाप बेटों को ये सोच कर माफ़ कर दिया था कि तुम्हारे बाद तुम्हारे घर की औरतों और तुम्हारी इकलौती बेटी का क्या होगा? किंतु ये जो तुमने किया है उसके लिए क्या फ़ैसला करें हम?"
"मुझे सूली पर चढ़ा दीजिए ठाकुर साहब।" चंद्रकांत असहनीय दुख में आंसू बहाते हुए आर्तनाद सा कर उठा____"अपने हाथों इतना भयंकर अपराध करने के बाद अब मैं खुद भी जीना नहीं चाहता। मुझे शिद्दत से एहसास हो रहा है कि आज के समय में मुझ जैसा अपराधी और मुझ जैसा पापी दुनिया में कोई नहीं होगा। ऊपर वाला भी मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा। मुझे फांसी की सज़ा दे दीजिए ठाकुर साहब। मैं अब जीना नहीं चाहता। अरे! जिसका वंश ही नष्ट हो गया हो, जिसने अपने ही हाथों अपनी बहू को जान से मार डाला हो उसे एक पल भी जीने का हक़ कैसे हो सकता है? मुझे सूली पर चढ़ा दीजिए ठाकुर साहब ताकि ऊपर जा कर अपनी बहू के क़दमों में गिर कर अपने इस जघन्य अपराध के लिए उससे माफ़ी मांग सकूं।"
"नहीं चंद्रकांत।" महेंद्र सिंह सहसा अजीब भाव से कह उठे____"तुमने जो गुनाह किया है उसके लिए तुम्हें सूली पर नहीं चढ़ाया जा सकता। तुम्हें तुम्हारे अपराधों के लिए ऐसी सज़ा हर्गिज़ नहीं दी जा सकती जिसमें एक ही झटके में तुम्हारे जीवन का अंत हो जाए। तुम्हारे अपराधों के लिए तो वो सज़ा ज़्यादा मुनासिब होगी जिसमें तुम हर रोज़ तिल तिल कर मरो....तड़प तड़प कर मरो।"
"नहीं....नहीं।" चंद्रकांत आतंकित सा हो कर चीख पड़ा____"ऐसा मत कहिए ठाकुर साहब। मुझे ऐसी भयानक सज़ा मत दीजिए। आप चाहें तो मुझे भी कुल्हाड़ी से काट काट कर मार डालिए लेकिन जीवन भर तड़प तड़प कर मरने की सज़ा मत दीजिए। मैं जल्द से जल्द मर कर अपने बेटे और बहू के पास पहुंच जाना चाहता हूं। अपनी बहू के पैरों से लिपट कर उससे माफ़ी मांगना चाहता हूं और.....और अपने बेटे के पास जा कर उससे पूछना चाहता हूं कि किसने उसकी हत्या कर के मेरे वंश का नाश किया है?"
चंद्रकांत की बातें ही ऐसी थीं कि सुन कर वहां बैठे लोगों की आंखें नम हो गईं। उसके रुदन से अजीब सी सनसनी फ़ैल गई थी। बाकियों का तो मुझे नहीं पता था किंतु मेरे अंदर एक अजीब सी झुरझुरी हुई थी। उधर उसकी बातें सुनने के बाद महेंद्र सिंह कुछ पलों तक उसकी तरफ देखते रहे। यकीनन उनके अंदर का हाल भी बाकियों से जुदा नहीं रहा होगा किंतु इस वक्त वो पंच के पद पर बैठे हुए थे इस लिए उन्हें अपनी भावनाओं की तरफ ध्यान नहीं देना था।
"हमारा ख़याल है कि इतना जल्दी हमें किसी नतीजे पर नहीं पहुंच जाना चाहिए।" पिता जी ने गंभीर भाव से कहा_____"हमारा मतलब है कि इस मामले में हमें दो तीन दिन का समय और लेना चाहिए।"
"आप कहना क्या चाहते हैं ठाकुर साहब?" महेंद्र सिंह ने न समझने वाले अंदाज़ से पिता जी की तरफ देखा।
"यही कि सफ़ेदपोश अगर कल रात चंद्रकांत से मिलने नहीं आया।" पिता जी ने कहा____"तो इसका मतलब हमें फ़ौरन ही ये नहीं सोच लेना चाहिए कि उसने चंद्रकांत को रजनी के संबंध में जो कुछ बताया वो झूठ था अथवा वो चंद्रकांत के हाथों उसकी अपनी ही बहू की हत्या करवा देना चाहता था। संभव है कि कल रात वो किसी दूसरे कारण की वजह से चंद्रकांत से मिलने न आया हो और यहां हम सब ये समझ बैठे हैं कि वो चंद्रकांत को अपने किसी मकसद से वो सब बताया जिसके चलते चंद्रकांत ने अपनी बहू को मार डाला।"
"मैं दादा ठाकुर की बात से सहमत हूं बड़े भैया।" पास ही कुर्सी पर बैठा ज्ञानेंद्र बोल पड़ा____"मेरा भी यही कहना है कि इस मामले में हमें फ़ौरन ही कोई फ़ैसला नहीं लेना चाहिए। दो तीन दिन का वक्त ले कर हमें सफ़ेदपोश को परख लेना चाहिए। संभव है कि वाकई में वो किसी कारणवश कल रात यहां न आ पाया हो।"
"हालाकि हमें अब भी यही लग रहा है कि उसने चंद्रकांत को अपने किसी मकसद के चलते ही ये सब करने के लिए फंसाया है।" पिता जी ने कहा____"किंतु फिर भी दो तीन दिन परख लेने में कुछ बिगड़ नहीं जाएगा बल्कि दूध का दूध और पानी का पानी ही हो जाएगा। अगर वो अगले दो तीन दिनों के भीतर भी चंद्रकांत से मिलने नहीं आता तो फिर पक्के तौर पर ये समझ लिया जाएगा कि उसने अपने किसी खास मकसद के चलते ही ये सब किया है।"
"आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं।" महेंद्र सिंह ने सिर हिलाते हुए कहा____"हमें यकीनन दो तीन दिनों तक उसे परखना चाहिए। हालाकि सफ़ेदपोश अथवा किसी का कुछ भी मकसद रहा हो लेकिन ये तो सच है ना कि चंद्रकांत ने अपनी बहू की हत्या कर के अपराध किया है। इस लिए इसे इसके उस अपराध के लिए सज़ा तो मिलेगी ही और सज़ा यही है कि ये अपने दिल में अपनी बहू की हत्या का बोझ लिए जीवन पर तड़पे।"
"ऐसा मत कहिए ठाकुर साहब।" चंद्रकांत फिर से गुहार सा लगा उठा____"मैं इतने संगीन अपराध का बोझ लिए एक पल भी नहीं जी सकूंगा।"
"तुम्हें जीना होगा चंद्रकांत।" महेंद्र सिंह ने सख़्त भाव से कहा____"और हां, खुदकुशी करने का ख़याल अपने ज़हन में लाने का सोचना भी मत। इस बात का ख़याल भी रहे कि अगर तुमने ऐसा किया तो तुम्हारे बाद तुम्हारी बीवी और बेटी का क्या होगा?"
चंद्रकांत कुछ कहने के लिए मुंह खोला लेकिन फिर अपने होंठ भींच लिए उसने। कदाचित बीवी और बेटी की बात सुन कर उसे एकदम से एहसास हुआ था कि वाकई में उसके बाद उनका क्या होगा.....ख़ास कर उसकी फूल सी बेटी का?
"क्या चंद्रकांत के बेटे के हत्यारे के बारे में कुछ पता चला?" पिता जी ने सामान्य भाव से महेंद्र सिंह से पूछा____"काफी समय हो गया उसकी हत्या हुए। हम भी अक्सर सोचते रहते हैं कि रघुवीर की हत्या आख़िर किसने और क्यों की होगी?"
"सच कहें तो ये बड़ा ही पेंचीदा मामला लगता है ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"ये सच है कि इतना समय गुज़र जाने के बाद भी अभी तक हमें इस बारे में कुछ भी पता नहीं चल सका है। हमारे आदमी हर उस जगह जांच पड़ताल कर रहे हैं जहां पर ज़रा सा भी रघुवीर का कोई न कोई संबंध था। हर जगह से फिलहाल एक ही ख़बर मिलती है कि रघुवीर की किसी से भी ऐसी दुश्मनी नहीं थी जिसके चलते कोई उसकी इस तरह से हत्या कर देता। हालाकि हम ये भी समझते हैं कि ऐसे मामलों में कोई भी खुल कर कोई बात स्वीकार नहीं करता है लेकिन ऐसा भी नहीं होता है कि किसी पर संदेह ही न हो सके।"
"अगर हत्या करने की वजह का पता चल जाए तो ये समझना भी बेहद आसान हो जाएगा कि रघुवीर का हत्यारा कौन है?" पिता जी ने कहा____"इस दुनिया में बेवजह कुछ नहीं होता इस लिए सबसे पहले हमें उस वजह का पता लगाना होगा जिसके तहत हत्यारे ने रघुवीर की हत्या की। एक बात और, हत्यारे को ये अच्छी तरह पता था कि मौजूदा समय में चंद्रकांत हमें अपना दुश्मन समझता है इस लिए ऐसे समय में अगर रघुवीर की हत्या होगी तो उसका सीधा शक अथवा इल्ज़ाम हम पर लगेगा, जैसा कि चंद्रकांत ने लगाया भी था। इसका फ़ायदा हत्यारे को मिला और अब वो बड़े शान से कहीं न कहीं घूम रहा होगा या ये भी हो सकता है कि हमारे आस पास ही कहीं मौजूद हो कर हमारी हर गतिविधि को देख रहा होगा।"
"पर सवाल तो अब भी वही है कि वो आख़िर है कौन?" ज्ञानेंद्र सिंह ने कहा____"ये तो निश्चित बात है कि उसे रघुवीर की हत्या करने में ये सोच कर बड़ी आसानी रही थी कि रघुवीर की हत्या का इल्ज़ाम सीधा आप पर लगेगा अथवा लगाया जाएगा किंतु खुद वो कौन है और रघुवीर से उसकी क्या दुश्मनी थी?"
"यही तो समझ में नहीं आ रहा ज्ञानेंद्र।" पिता जी ने कहा____"इतना समय गुज़र गया किंतु अभी तक हमें ये समझ नहीं आया कि रघुवीर से उसकी क्या दुश्मनी रही होगी? दूसरी सोचने वाली बात ये भी है कि सफ़ेदपोश को उस हत्यारे के बारे में कैसे पता चला? क्या सच में रजनी ने ही रघुवीर की हत्या की थी?"
"भगवान ही जाने सच क्या है और ये सब किसने किया होगा?" महेंद्र सिंह ने बेचैनी से पहलू बदला____"लेकिन अगर इन दो तीन दिनों के भीतर वो सफ़ेदपोश चंद्रकांत से मिलने आता है तो कदाचित ये समझ आ जाएगा कि सच क्या है? ख़ैर हमें लगता है कि इस बारे में ज़्यादा माथा पच्ची करने से बेहतर यही है कि दो तीन दिनों तक इंतज़ार किया जाए। अब सफ़ेदपोश के चंद्रकांत से मिलने के बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचा जा सकता है।"
उसके बाद पंचायत बर्खास्त कर दी गई। महेंद्र सिंह ने चंद्रकांत को हुकुम दिया कि वो दो तीन दिनों तक हर रात उस सफ़ेदपोश के आने का इंतज़ार करे। चंद्रकांत ने ख़ामोशी से सिर हिला दिया। उसके बाद सबको अपने अपने घर जाने को बोल दिया गया। महेंद्र सिंह भी पिता जी से इजाज़त ले कर अपने भाई और अपने आदमियों के साथ जीप में बैठ कर चले गए।
मैंने पिता जी को हवेली छोड़ा और फिर जीप ले कर खेतों की तरफ चल पड़ा। चंद्रकांत का मामला मेरे ज़हन में बसा हुआ था और साथ ही कई तरह के ख़्यालों के चलते मैं उलझन का शिकार भी होता जा रहा था। समझ में नहीं आ रहा था कि आख़िर सफ़ेदपोश की इस तरह से मौजूदगी का क्या मतलब हो सकता था? कहां तो वो मेरी जान लेने के पीछे पड़ा हुआ था और कहां अब वो चंद्रकांत से मिलता नज़र आने लगा था। अचानक ही मेरे ज़हन में सुबह हवेली में शेरा द्वारा कही गई बातें उभर आईं। सफ़ेदपोश को शेरा ने भी अपनी आंखों से चंद्रकांत से मिलते और बातें करते हुए देखा था। उसके बाद उसने उसका पीछा भी किया था। ये अलग बात है कि वो हमारे आमों के बाग़ में एक बार फिर से ग़ायब हो गया था और शेरा उसको पकड़ न सका था।
मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि आख़िर हमारे आमों के बाग़ में ही सफ़ेदपोश हर बार क्यों ग़ायब हो जाता है? आमों के बाग़ में ऐसी वो कौन सी जगह पहुंच जाता है जिसके बाद में वो किसी को नज़र ही नहीं आता। मतलब साफ है, आमों के बाग़ में कोई तो ऐसा रहस्यमय स्थान ज़रूर है जहां पर सफ़ेदपोश हमारी नज़रों से खुद को छुपा कर ग़ायब हो जाता है। जीप चलाते हुए मैंने फ़ैसला कर लिया कि मुझे आमों के बाग़ की अच्छे से छानबीन करनी होगी। आख़िर पता तो चले कि ये चक्कर क्या है?
━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━
━━━━━━༻♥༺━━━━━━
"फिलहाल तो मैं तुम दोनों की ही तरफ हूं।" भाभी ने कहा____"क्योंकि तुम्हें भी पता है कि मेरे बिना तुम दोनों की नैया पार नहीं लगेगी। इस लिए ज़्यादा उड़ने की कोशिश मत करना। अब जाओ तुम, मैं भी नीचे जा रही हूं।"
कहने के साथ ही भाभी मेरी कोई बात सुने बिना ही सीढ़ियों पर उतरती चली गईं। उनके जाने के बाद मैं भी उनकी बातों के बारे में सोचते हुए और मुस्कुराते हुए अपने कमरे की तरफ चला गया।
अब आगे....
अगली सुबह।
पिता जी और मैं चाय पीने के बाद चंद्रकांत के घर जाने के लिए बाहर निकले ही थे कि तभी सामने से आते शेरा पर हमारी नज़र पड़ी। शेरा के चेहरे पर अजीब से भाव थे जिसे देख पिता जी के चेहरे पर सोचने वाले भाव उभर आए।
"प्रणाम मालिक।" क़रीब आते ही शेरा ने झुक कर पिता जी के पैरों को छू कर कहा।
"क्या बात है?" वो जैसे ही खड़ा हुआ तो पिता जी ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा____"तुम्हारे चेहरे पर मौजूद ये भाव कैसे हैं? कुछ हुआ है क्या?"
"जी मालिक।" शेरा ने नज़रें झुकाए हुए कहा____"परसों रात मैंने सफ़ेदपोश को देखा था...लेकिन।"
"लेकिन??" पिता जी के साथ साथ मैं भी चौंक पड़ा था।
"लेकिन मैं अपनी लाख कोशिश के बाद भी उसे पकड़ नहीं सका।" शेरा ने अपराध भाव से सिर झुकाए हुए कहा।
"पूरी बात बताओ।" पिता जी ने सपाट लहजे से कहा।
शेरा ने पूरी बात बता दी कि कैसे उसने परसों की रात चंद्रकांत और सफ़ेदपोश को आपस में बातें करते सुना और फिर सफ़ेदपोश के जाते ही उसने उसका पीछा किया। पीछा करते हुए वो आमों के बाग तक गया था जहां पर सफ़ेदपोश ने हमारे एक आदमी को गोली मार दी थी।
"हैरानी की बात है कि सफ़ेदपोश तुम्हारी बेवकूफी की वजह से हाथ से निकल गया।" पिता जी ने नाराज़गी जताते हुए कहा____"जब तुमने उसे चंद्रकांत से बात करते हुए देख ही लिया था तो तुम्हें उसी समय उसे दबोच लेना चाहिए था।"
"माफ़ कर दीजिए मालिक।" शेरा ने खेद भरे भाव से कहा____"मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि वो चंद्रकांत के यहां दिख जाएगा। आपके आदेश पर मैं उसे खोज ही रहा था कि अचानक वो मुझे चंद्रकांत के घर के बाहर दिख गया। पहले तो मुझे कुछ समझ ही नहीं आया था कि अंधेरे में वहां पर कोई है भी या नहीं। वो तो रात के सन्नाटे में मुझे हल्की आवाज़ें सुनाई दी थीं। आवाज़ों को सुन कर मैं चौंक गया था कि इतनी रात को कौन हो सकता है? अपनी उत्सुकता को मिटाने के लिए जब मैं आवाज़ की दिशा में गया तो अंधेरे में मुझे दो साए खड़े नज़र आए। ये तो मैं जान चुका था कि वो घर चंद्रकांत का ही है लेकिन मैं ये सोचने पर मजबूर हो गया था कि चंद्रकांत के घर के बाहर उस वक्त कौन हो सकता है। यही देखने के लिए मैं बहुत ही सावधानी से उनके क़रीब बढ़ गया था। जल्दी ही मुझे समझ आ गया कि वो कौन हैं। एक तो चंद्रकांत ही था जोकि उसकी आवाज़ से ही मैं पहचान गया था लेकिन दूसरा कौन था ये मैं थोड़ी ही देर में उसकी पोशाक से पहचान पाया। उसकी आवाज़ भी वैसी ही अजीब सी थी जैसी मैंने तब सुनी थी जब एक बार दरोगा धनंजय के यहां मैंने सफ़ेदपोश के मुख से सुनी थी। मैं ये जान कर चकित रह गया था कि सफ़ेदपोश इतनी रात को चंद्रकांत के पास कैसे है? दोनों की बातें सुनने के लिए मैं चुपचाप अपनी जगह पर खड़ा रहा। मैं जानना चाहता था कि सफ़ेदपोश का चंद्रकांत से यूं रात के उस वक्त मिलने का क्या मतलब था और साथ ही दोनों के बीच क्या संबंध है?"
"तो क्या सुना तुमने?" पिता जी ने पूछा।
पिता जी के पूछने पर शेरा ने वही सब बताया जो परसों की रात चंद्रकांत से सफ़ेदपोश ने बातें की थी। सारी बातें सुनने के बाद पिता जी कुछ पलों तक जाने क्या सोचते रहे फिर बोले_____"उसके बाद क्या हुआ? हमारा मतलब है कि चंद्रकांत से वो सब बातें करने के बाद सफेदपोश कहां गया और तुमने क्या किया?"
"चंद्रकांत को अगली रात मिलने को कह कर जब सफ़ेदपोश वहां से चल दिया तो मैं भी उसके पीछे लग गया।" शेरा ने बताना शुरू किया____"वो अंधेरे में भी बहुत तेज़ी से आगे बढ़ता चला जा रहा था। मैं ये सोच कर हैरान हो उठा था कि वो कच्चे रास्ते और कीचड़ भरी ज़मीन पर भी कैसे इतनी तेज़ी से बढ़ता चला जा रहा था। मुझे लगा कहीं वो मेरी पहुंच से बाहर हो कर अंधेरे में गायब ही न हो जाए इस लिए मैं भी तेज़ी से उसके पीछे चल पड़ा किंतु एक जगह अचानक ही कीचड़ में मेरा पैर फिसल गया और मैं खुद को हज़ार कोशिश के बाद भी सम्हाल न सका। नतीज़ा ये हुआ कि मैं वहीं कीचड़ में गिर गया। किसी तरह जल्दी से उठा और फिर से उसके पीछे दौड़ चला किंतु आगे अंधेरे में वो मुझे नज़र न आया। मुझे याद आया कि पिछली बार वो आमों के बाग की तरफ ही गया था और फिर वो वहीं गायब हो गया था। मैं तेज़ी से आगे की तरफ दौड़ता चला गया। किन्तु शायद उसे शक हो गया था कि उसके पीछे कोई है इस लिए जल्दी ही वो आमों के बाग में दाखिल हो गया। मैंने अपना एक आदमी पहले से ही बाग़ के मकान के पास तैनात कर रखा था। शायद उस आदमी को अंधेरे में सफ़ेदपोश के आने का आभास हो गया था। सन्नाटे में मैंने साफ सुना था कि उसने उस सफ़ेदपोश को आवाज़ दी थी। मैं जानता था कि सफ़ेदपोश ऐसी चीज़ नहीं है जिसे अकेला आदमी अपने काबू में कर सके। अभी मैं बाग के क़रीब पहुंचा ही था कि तभी सन्नाटे में गोली चलने की तेज़ आवाज़ गूंज उठी और साथ ही एक इंसानी चीख भी। मैं समझ गया कि गोली उस सफ़ेदपोश ने ही चलाई थी क्योंकि मेरे आदमी के पास तो बंदूक जैसी कोई चीज़ थी ही नहीं। मैं फ़ौरन ही उस जगह पहुंच गया लेकिन देर हो चुकी थी मुझे। सफ़ेदपोश बाग़ में गायब हो चुका था। अब उसे खोजना व्यर्थ था। मैं फ़ौरन ही दर्द से तड़पते अपने आदमी के पास पहुंचा और उसे ले कर वैद्य जी के पास गया। वैद्य जी ने कहा कि गोली लगी है इस लिए वो इसमें कुछ नहीं कर सकते हैं। तब मैं फ़ौरन ही उसे जीप में लाद कर उसी वक्त शहर चला गया।"
"अब कैसा है वो?" पिता जी ने गहरी सांस लेने के बाद कहा____"समय से उसका उपचार हुआ था कि नहीं?"
"ऊपर वाले की दया से वो बच गया है मालिक।" शेरा ने कहा____"हालाकि खून बहुत बह गया था उसका। लगा नहीं था कि बचेगा किंतु बच गया। अभी थोड़ी देर पहले ही उसको अस्पताल से वापस ला कर उसके घर लाया हूं। सोचा आपको भी इस बारे में ख़बर कर दूं।"
"बड़ी अजीब बात है पिता जी।" मैंने कुछ सोचते हुए कहा____"पहले भी सफ़ेदपोश को हमारे आमों के बाग़ में ही ग़ायब होते देखा गया था और शेरा के अनुसार परसों रात को भी। सोचने वाली बात है कि हमारे आमों के बाग़ में पहुंच कर वो कैसे और कहां गायब हो जाता है? ये तो पक्की बात है कि वो कोई भूत प्रेत नहीं है जो किसी जादू की तरह ग़ायब हो जाता है। अब सवाल ये है कि वो ग़ायब कैसे हो जाता है? वो भी कुछ इस तरह से कि खोजने पर भी किसी को नज़र नहीं आता?"
"सही कहा तुमने।" पिता जी के चेहरे पर गहन सोचो के भाव उभर आए थे____"सफ़ेदपोश अपने काम को अंजाम देने के बाद हमारे आमों के बाग़ की तरफ ही क्यों जाता है और फिर वहां ग़ायब कैसे हो जाता है? आख़िर आमों के उस बाग़ में वो कौन सी जगह है जो एक इंसान को किसी जादू की तरह ग़ायब कर देती है? इस बारे में यकीनन अब पता लगाना पड़ेगा।"
"मेरा भी यही कहना है।" मैंने कहा____"हमारे आमों के बाग़ में कोई तो ख़ास बात ज़रूर है जो हमारे लिए अब रहस्य बन गई है और यकीनन सफ़ेदपोश के लिए एक पनाहगाह। एक ऐसी पनाहगाह जो उसके लिए हर तरह से सुरक्षित प्रतीत होती है। तभी तो वो हर बार वहीं पर जा कर बड़े आराम से हम सबकी नज़रों से ग़ायब हो जाता है। हमें आमों के बाग़ में जा कर वहां की अच्छे तरीके से जांच पड़ताल करनी होगी।"
शेरा को वापस भेजने के बाद मैं और पिता जी जीप में बैठ कर चंद्रकांत के घर की तरफ चल पड़े। सारे रास्ते हम दोनों के बीच ख़ामोशी रही। मेरी तरह शायद पिता जी भी सफ़ेदपोश के ही बारे में सोच रहे थे। ख़ैर कुछ ही देर में हम चंद्रकांत के घर पहुंच गए जहां पर ठाकुर महेंद्र सिंह की जीप पहले से ही खड़ी नज़र आई हमें।
✮✮✮✮
"तो आख़िर वही हुआ जिसका हमें पहले से ही अंदेशा था।" ठाकुर महेंद्र सिंह की सारी बातें सुनने के बाद पिता जी ने कहा____"यानि उस सफ़ेदपोश ने बड़ी ही चालाकी से चंद्रकांत के ही हाथों उसकी बहू की हत्या करवा दी। रजनी के संबंध में उसने चंद्रकांत को जो कुछ बताया था वो सब एक ऐसा झूठ था जिसे पूरी तरह सच मान कर चंद्रकांत ने अपनी ही बहू को जान से मार डाला।"
पिता जी की ये बातें सुन कर इतने लोगों के मौजूद रहते हुए भी सन्नाटा छा गया। ये अलग बात है कि कुछ ही दूरी पर चंद्रकांत दोनों हाथों से अपना सिर पकड़े इस तरह बैठा था जैसे उसका सब कुछ लुट गया हो और वो पूरी तरह से बर्बाद हो गया हो। चेहरे पर अनंत पीड़ा के भाव थे और आंखों में आंसुओं का तैरता हुआ सैलाब। अपनी रुलाई को बड़ी मुश्किल से रोके हुए था वो।
पिता जी के आने से पहले महेंद्र सिंह ने उससे यही पूछा था कि____'क्या कल रात सफ़ेदपोश उससे मिलने आया था?' जवाब में चंद्रकांत ने बड़े ही दुख के साथ इंकार में सिर हिलाया था और फिर लगभग रोते हुए उसने बताया था कि वो सफ़ेदपोश के इंतज़ार में सारी रात घर से बाहर बैठा रहा था किंतु सफ़ेदपोश को तो जैसे न आना था और ना ही वो आया था। उसके न आने का बस यही मतलब था कि पिछले दिन उसके बारे में दादा ठाकुर ने जो कुछ अनुमान के तहत कहा था वो ही सच था।
"कहना तो नहीं चाहिए चंद्रकांत।" महेंद्र सिंह ने सहसा गंभीर हो कर कहा____"लेकिन ये सच है कि तुम्हारे ही दुष्कर्मों की वजह से तुम्हारा बेटा और तुम्हारी बहू आज इस दुनिया में नहीं हैं। तुमने खुद अपने हाथों अपने परिवार का नाश कर डाला। तुमने ये जानते हुए भी कि तुम्हारे घर की औरतों का भी उतना ही कसूर था जितना वैभव का था, उसके लिए अपने घर की औरतों को कुछ न कह के सिर्फ ठाकुर साहब के साथ बुरा करने का क़दम उठाया। चंद्रकांत, अब ये नहीं कहा जा सकता कि उस मामले के चलते तुम बाप बेटों की मनोदशा ठीक नहीं थी क्योंकि अगर ठीक न होती तो तुम दोनों गौरी शंकर के साथ मिल कर ठाकुर साहब के खिलाफ़ ना तो ऐसा करने का षडयंत्र रचते और ना ही वो सब कर पाते। साफ ज़ाहिर होता है कि तुम दोनों बाप बेटों ने अपने पूरे होशो हवास में सब कुछ किया। अपने घर की औरतों को दोष देने की बजाय तुमने ठाकुर साहब के साथ हद से ज़्यादा बुरा कर डालना ज़्यादा बेहतर समझा। शुरू से ही तुम्हारी नीयत और तुम्हारी सोच ग़लत थी। अगर तुम सच में अपने साथ हुए अपमान और अन्याय का इंसाफ़ चाहते तो वैभव वाले मामले को ले कर तुम सीधे ठाकुर साहब के पास जाते और उनसे इंसाफ़ की मांग करते। हम सब जानते हैं कि ठाकुर साहब तुम्हारे साथ इंसाफ़ ज़रूर करते, फिर भले ही चाहे उसके लिए उन्हें अपने बेटे को हमेशा हमेशा के लिए त्याग ही क्यों न देना पड़ता।"
कहने के साथ ही महेंद्र सिंह कुछ पलों के लिए रुके। आस पास ही नहीं बल्कि चौगान के बाहर भी खड़े लोगों की तरफ उन्होंने दृष्टि घुमाई, फिर छा गई ख़ामोशी को चीरते हुए पुनः कहा_____"हमें समझ नहीं आ रहा कि तुम्हारे इस अपराध के लिए हम तुम्हें सज़ा दें अथवा नहीं। इसके पहले भी तुम्हारे अपराधों के लिए तुम दोनों बाप बेटों को ये सोच कर माफ़ कर दिया था कि तुम्हारे बाद तुम्हारे घर की औरतों और तुम्हारी इकलौती बेटी का क्या होगा? किंतु ये जो तुमने किया है उसके लिए क्या फ़ैसला करें हम?"
"मुझे सूली पर चढ़ा दीजिए ठाकुर साहब।" चंद्रकांत असहनीय दुख में आंसू बहाते हुए आर्तनाद सा कर उठा____"अपने हाथों इतना भयंकर अपराध करने के बाद अब मैं खुद भी जीना नहीं चाहता। मुझे शिद्दत से एहसास हो रहा है कि आज के समय में मुझ जैसा अपराधी और मुझ जैसा पापी दुनिया में कोई नहीं होगा। ऊपर वाला भी मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा। मुझे फांसी की सज़ा दे दीजिए ठाकुर साहब। मैं अब जीना नहीं चाहता। अरे! जिसका वंश ही नष्ट हो गया हो, जिसने अपने ही हाथों अपनी बहू को जान से मार डाला हो उसे एक पल भी जीने का हक़ कैसे हो सकता है? मुझे सूली पर चढ़ा दीजिए ठाकुर साहब ताकि ऊपर जा कर अपनी बहू के क़दमों में गिर कर अपने इस जघन्य अपराध के लिए उससे माफ़ी मांग सकूं।"
"नहीं चंद्रकांत।" महेंद्र सिंह सहसा अजीब भाव से कह उठे____"तुमने जो गुनाह किया है उसके लिए तुम्हें सूली पर नहीं चढ़ाया जा सकता। तुम्हें तुम्हारे अपराधों के लिए ऐसी सज़ा हर्गिज़ नहीं दी जा सकती जिसमें एक ही झटके में तुम्हारे जीवन का अंत हो जाए। तुम्हारे अपराधों के लिए तो वो सज़ा ज़्यादा मुनासिब होगी जिसमें तुम हर रोज़ तिल तिल कर मरो....तड़प तड़प कर मरो।"
"नहीं....नहीं।" चंद्रकांत आतंकित सा हो कर चीख पड़ा____"ऐसा मत कहिए ठाकुर साहब। मुझे ऐसी भयानक सज़ा मत दीजिए। आप चाहें तो मुझे भी कुल्हाड़ी से काट काट कर मार डालिए लेकिन जीवन भर तड़प तड़प कर मरने की सज़ा मत दीजिए। मैं जल्द से जल्द मर कर अपने बेटे और बहू के पास पहुंच जाना चाहता हूं। अपनी बहू के पैरों से लिपट कर उससे माफ़ी मांगना चाहता हूं और.....और अपने बेटे के पास जा कर उससे पूछना चाहता हूं कि किसने उसकी हत्या कर के मेरे वंश का नाश किया है?"
चंद्रकांत की बातें ही ऐसी थीं कि सुन कर वहां बैठे लोगों की आंखें नम हो गईं। उसके रुदन से अजीब सी सनसनी फ़ैल गई थी। बाकियों का तो मुझे नहीं पता था किंतु मेरे अंदर एक अजीब सी झुरझुरी हुई थी। उधर उसकी बातें सुनने के बाद महेंद्र सिंह कुछ पलों तक उसकी तरफ देखते रहे। यकीनन उनके अंदर का हाल भी बाकियों से जुदा नहीं रहा होगा किंतु इस वक्त वो पंच के पद पर बैठे हुए थे इस लिए उन्हें अपनी भावनाओं की तरफ ध्यान नहीं देना था।
"हमारा ख़याल है कि इतना जल्दी हमें किसी नतीजे पर नहीं पहुंच जाना चाहिए।" पिता जी ने गंभीर भाव से कहा_____"हमारा मतलब है कि इस मामले में हमें दो तीन दिन का समय और लेना चाहिए।"
"आप कहना क्या चाहते हैं ठाकुर साहब?" महेंद्र सिंह ने न समझने वाले अंदाज़ से पिता जी की तरफ देखा।
"यही कि सफ़ेदपोश अगर कल रात चंद्रकांत से मिलने नहीं आया।" पिता जी ने कहा____"तो इसका मतलब हमें फ़ौरन ही ये नहीं सोच लेना चाहिए कि उसने चंद्रकांत को रजनी के संबंध में जो कुछ बताया वो झूठ था अथवा वो चंद्रकांत के हाथों उसकी अपनी ही बहू की हत्या करवा देना चाहता था। संभव है कि कल रात वो किसी दूसरे कारण की वजह से चंद्रकांत से मिलने न आया हो और यहां हम सब ये समझ बैठे हैं कि वो चंद्रकांत को अपने किसी मकसद से वो सब बताया जिसके चलते चंद्रकांत ने अपनी बहू को मार डाला।"
"मैं दादा ठाकुर की बात से सहमत हूं बड़े भैया।" पास ही कुर्सी पर बैठा ज्ञानेंद्र बोल पड़ा____"मेरा भी यही कहना है कि इस मामले में हमें फ़ौरन ही कोई फ़ैसला नहीं लेना चाहिए। दो तीन दिन का वक्त ले कर हमें सफ़ेदपोश को परख लेना चाहिए। संभव है कि वाकई में वो किसी कारणवश कल रात यहां न आ पाया हो।"
"हालाकि हमें अब भी यही लग रहा है कि उसने चंद्रकांत को अपने किसी मकसद के चलते ही ये सब करने के लिए फंसाया है।" पिता जी ने कहा____"किंतु फिर भी दो तीन दिन परख लेने में कुछ बिगड़ नहीं जाएगा बल्कि दूध का दूध और पानी का पानी ही हो जाएगा। अगर वो अगले दो तीन दिनों के भीतर भी चंद्रकांत से मिलने नहीं आता तो फिर पक्के तौर पर ये समझ लिया जाएगा कि उसने अपने किसी खास मकसद के चलते ही ये सब किया है।"
"आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं।" महेंद्र सिंह ने सिर हिलाते हुए कहा____"हमें यकीनन दो तीन दिनों तक उसे परखना चाहिए। हालाकि सफ़ेदपोश अथवा किसी का कुछ भी मकसद रहा हो लेकिन ये तो सच है ना कि चंद्रकांत ने अपनी बहू की हत्या कर के अपराध किया है। इस लिए इसे इसके उस अपराध के लिए सज़ा तो मिलेगी ही और सज़ा यही है कि ये अपने दिल में अपनी बहू की हत्या का बोझ लिए जीवन पर तड़पे।"
"ऐसा मत कहिए ठाकुर साहब।" चंद्रकांत फिर से गुहार सा लगा उठा____"मैं इतने संगीन अपराध का बोझ लिए एक पल भी नहीं जी सकूंगा।"
"तुम्हें जीना होगा चंद्रकांत।" महेंद्र सिंह ने सख़्त भाव से कहा____"और हां, खुदकुशी करने का ख़याल अपने ज़हन में लाने का सोचना भी मत। इस बात का ख़याल भी रहे कि अगर तुमने ऐसा किया तो तुम्हारे बाद तुम्हारी बीवी और बेटी का क्या होगा?"
चंद्रकांत कुछ कहने के लिए मुंह खोला लेकिन फिर अपने होंठ भींच लिए उसने। कदाचित बीवी और बेटी की बात सुन कर उसे एकदम से एहसास हुआ था कि वाकई में उसके बाद उनका क्या होगा.....ख़ास कर उसकी फूल सी बेटी का?
"क्या चंद्रकांत के बेटे के हत्यारे के बारे में कुछ पता चला?" पिता जी ने सामान्य भाव से महेंद्र सिंह से पूछा____"काफी समय हो गया उसकी हत्या हुए। हम भी अक्सर सोचते रहते हैं कि रघुवीर की हत्या आख़िर किसने और क्यों की होगी?"
"सच कहें तो ये बड़ा ही पेंचीदा मामला लगता है ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"ये सच है कि इतना समय गुज़र जाने के बाद भी अभी तक हमें इस बारे में कुछ भी पता नहीं चल सका है। हमारे आदमी हर उस जगह जांच पड़ताल कर रहे हैं जहां पर ज़रा सा भी रघुवीर का कोई न कोई संबंध था। हर जगह से फिलहाल एक ही ख़बर मिलती है कि रघुवीर की किसी से भी ऐसी दुश्मनी नहीं थी जिसके चलते कोई उसकी इस तरह से हत्या कर देता। हालाकि हम ये भी समझते हैं कि ऐसे मामलों में कोई भी खुल कर कोई बात स्वीकार नहीं करता है लेकिन ऐसा भी नहीं होता है कि किसी पर संदेह ही न हो सके।"
"अगर हत्या करने की वजह का पता चल जाए तो ये समझना भी बेहद आसान हो जाएगा कि रघुवीर का हत्यारा कौन है?" पिता जी ने कहा____"इस दुनिया में बेवजह कुछ नहीं होता इस लिए सबसे पहले हमें उस वजह का पता लगाना होगा जिसके तहत हत्यारे ने रघुवीर की हत्या की। एक बात और, हत्यारे को ये अच्छी तरह पता था कि मौजूदा समय में चंद्रकांत हमें अपना दुश्मन समझता है इस लिए ऐसे समय में अगर रघुवीर की हत्या होगी तो उसका सीधा शक अथवा इल्ज़ाम हम पर लगेगा, जैसा कि चंद्रकांत ने लगाया भी था। इसका फ़ायदा हत्यारे को मिला और अब वो बड़े शान से कहीं न कहीं घूम रहा होगा या ये भी हो सकता है कि हमारे आस पास ही कहीं मौजूद हो कर हमारी हर गतिविधि को देख रहा होगा।"
"पर सवाल तो अब भी वही है कि वो आख़िर है कौन?" ज्ञानेंद्र सिंह ने कहा____"ये तो निश्चित बात है कि उसे रघुवीर की हत्या करने में ये सोच कर बड़ी आसानी रही थी कि रघुवीर की हत्या का इल्ज़ाम सीधा आप पर लगेगा अथवा लगाया जाएगा किंतु खुद वो कौन है और रघुवीर से उसकी क्या दुश्मनी थी?"
"यही तो समझ में नहीं आ रहा ज्ञानेंद्र।" पिता जी ने कहा____"इतना समय गुज़र गया किंतु अभी तक हमें ये समझ नहीं आया कि रघुवीर से उसकी क्या दुश्मनी रही होगी? दूसरी सोचने वाली बात ये भी है कि सफ़ेदपोश को उस हत्यारे के बारे में कैसे पता चला? क्या सच में रजनी ने ही रघुवीर की हत्या की थी?"
"भगवान ही जाने सच क्या है और ये सब किसने किया होगा?" महेंद्र सिंह ने बेचैनी से पहलू बदला____"लेकिन अगर इन दो तीन दिनों के भीतर वो सफ़ेदपोश चंद्रकांत से मिलने आता है तो कदाचित ये समझ आ जाएगा कि सच क्या है? ख़ैर हमें लगता है कि इस बारे में ज़्यादा माथा पच्ची करने से बेहतर यही है कि दो तीन दिनों तक इंतज़ार किया जाए। अब सफ़ेदपोश के चंद्रकांत से मिलने के बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचा जा सकता है।"
उसके बाद पंचायत बर्खास्त कर दी गई। महेंद्र सिंह ने चंद्रकांत को हुकुम दिया कि वो दो तीन दिनों तक हर रात उस सफ़ेदपोश के आने का इंतज़ार करे। चंद्रकांत ने ख़ामोशी से सिर हिला दिया। उसके बाद सबको अपने अपने घर जाने को बोल दिया गया। महेंद्र सिंह भी पिता जी से इजाज़त ले कर अपने भाई और अपने आदमियों के साथ जीप में बैठ कर चले गए।
मैंने पिता जी को हवेली छोड़ा और फिर जीप ले कर खेतों की तरफ चल पड़ा। चंद्रकांत का मामला मेरे ज़हन में बसा हुआ था और साथ ही कई तरह के ख़्यालों के चलते मैं उलझन का शिकार भी होता जा रहा था। समझ में नहीं आ रहा था कि आख़िर सफ़ेदपोश की इस तरह से मौजूदगी का क्या मतलब हो सकता था? कहां तो वो मेरी जान लेने के पीछे पड़ा हुआ था और कहां अब वो चंद्रकांत से मिलता नज़र आने लगा था। अचानक ही मेरे ज़हन में सुबह हवेली में शेरा द्वारा कही गई बातें उभर आईं। सफ़ेदपोश को शेरा ने भी अपनी आंखों से चंद्रकांत से मिलते और बातें करते हुए देखा था। उसके बाद उसने उसका पीछा भी किया था। ये अलग बात है कि वो हमारे आमों के बाग़ में एक बार फिर से ग़ायब हो गया था और शेरा उसको पकड़ न सका था।
मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि आख़िर हमारे आमों के बाग़ में ही सफ़ेदपोश हर बार क्यों ग़ायब हो जाता है? आमों के बाग़ में ऐसी वो कौन सी जगह पहुंच जाता है जिसके बाद में वो किसी को नज़र ही नहीं आता। मतलब साफ है, आमों के बाग़ में कोई तो ऐसा रहस्यमय स्थान ज़रूर है जहां पर सफ़ेदपोश हमारी नज़रों से खुद को छुपा कर ग़ायब हो जाता है। जीप चलाते हुए मैंने फ़ैसला कर लिया कि मुझे आमों के बाग़ की अच्छे से छानबीन करनी होगी। आख़िर पता तो चले कि ये चक्कर क्या है?
━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━