- Joined
- Dec 5, 2013
- Messages
- 74,667
अध्याय - 114
━━━━━━༻♥༺━━━━━━
चंद्रकांत शहर पहुंच ही नहीं पाया था। रास्ते में ही उसने दम तोड़ दिया था जिसके चलते महेंद्र सिंह के आदमी उसे वापस ले आए थे। हर तरफ कोलाहल सा मचा हुआ था। किसी को भी अपने निजी कामों का होश नहीं था। अब तक ये बात हर तरफ फैल गई थी कि जिस लड़की की लाश पेड़ पर रस्सी के सहारे लटकी मिली थी उसकी बड़ी बेरहमी से हत्या करने वाला चंद्रकांत था। उसने सिर्फ अपनी निजी दुश्मनी अथवा ये कहें कि वैभव से बदला लेने के लिए ऐसा किया था। इस मामले के बारे में लगभग सब चंद्रकांत की निंदा कर रहे थे और उसे बुरा भला कह रहे थे। कुछ ऐसे भी लोग थे जो इस मामले के बारे में दबी ज़ुबान में वैभव का भी नाम ले कर दोष दे रहे थे।
लोगों की मदद से अनुराधा की लाश को पेड़ से उतार कर उसके गांव ले आया गया था। वहीं दूसरी तरफ चंद्रकांत के ससुराल वाले आ गए थे इस लिए वो उसके अंतिम संस्कार की तैयारी में लग गए थे।
सरोज का बहुत बुरा हाल था। वो अब तक न जाने कितनी बार बेटी के वियोग में बेहोश हो चुकी थी। उसको सम्हालने के लिए निरंतर मेरी भाभी उसके साथ ही थीं। उन्होंने सरोज को मां कहा था शायद इसी वजह से वो अपना कर्तव्य निभा रहीं थी। उनका चेहरा देख कर कोई भी बता सकता था कि उन्हें इस दुखद घटना के चलते कितना दुख हुआ था और वो कितना रोई थीं। मेरी मां का भी हाल ज़्यादा बेहतर नहीं था इस लिए मेनका चाची और निर्मला काकी उन्हें अपने साथ हवेली ले गईं थी। कुसुम तो मेरे साथ ही थी लेकिन कजरी भाभी के साथ थी।
साहूकार गौरी शंकर भी इस घटना से बेहद दुखी था। उसके घर की बड़ी औरतें भी आई थीं लेकिन अब वो वापस जा चुकीं थी। रूपा को जब ये पता चला था कि जिस लड़की की लाश मिली है वो उसकी होने वाली सौतन है तो वो भागते हुए घटना स्थल पर आई थी। अनुराधा की भयानक लाश देख कर बुरी तरह हिल गई थी वो। उसके बाद वो जाने क्या क्या सोच कर रोने लगी थी। उसका भाई रूपचंद्र उसकी भावनाओं को बखूबी समझता था इस लिए उसने उसे सम्हाले रखे था।
मैं एकदम से गुमसुम सा हो गया था। रह रह कर अनुराधा का चेहरा मेरी आंखों के सामने उजागर हो जाता और मेरी आंखों को रुला देता। पहली बार मुझे एहसास हुआ था कि अपनी चाहत अपनी मोहब्बत से हमेशा के लिए जुदा हो जाना कितना असहनीय होता है। मैं जब भी रोने लगता तो कुसुम एक मां की तरह मुझे अपनी आगोश में ले कर शांत कराने की कोशिश करने लगती। वो खुद भी मेरी हालत से दुखी थी। पहले तो उसे पता ही नहीं था कि मेरा और अनुराधा का क्या रिश्ता है और फिर जब उसे पता चला तो जैसे उसके ऊपर बिजली ही गिर पड़ी थी। वो तभी से मेरे साथ थी और मेरा ख़याल रख रही थी।
पिता जी ने कई बार मुझे हवेली जाने के लिए कहा था। यहां तक कि ज्ञानेंद्र सिंह ज़बरदस्ती मुझे हवेली ले जाने पर भी उतारू हो गया था लेकिन मैंने ये कह कर हवेली जाने से मना कर दिया था कि मैं अंतिम समय तक अपनी अनुराधा के साथ ही रहूंगा। मजबूरन पिता जी को मेरी बात माननी ही पड़ी। गांव के आधे से ज़्यादा लोग मुरारी के गांव आ गए थे। मुरारी के गांव वाले तो पहले से ही वहां मौजूद थे। सरोज काकी की देवरानी और उसकी बेटियां भी थीं जो अनुराधा की मौत से दुखी हो कर रोए जा रहीं थी।
अनुराधा के साथ ऐसा होगा ये किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। मैं तो बार बार हड़बड़ा कर इधर उधर देखने लगता था। मुझे ऐसा लगता था जैसे अनुराधा किसी तरफ से आ रही है। आंखों के सामने उसका वही सांवला सा चेहरा उभर आता, जिस चेहरे में दुनिया भर की मासूमियत और दुनिया भर की सादगी थी। मेरे ठकुराईन कहने पर जब वो एकदम से शर्मा जाती तो मैं उसे मंत्र मुग्ध सा हो कर देखने लगता था। फिर जैसे ही मुझे वर्तमान की वास्तविकता का एहसास होता तो मेरी रुलाई फूट पड़ती। दिल तड़प उठता। अंदर से हूक उठती और मन करता दहाड़े मार कर रो पड़ूं।
मुरारी के घर के बाहर पेड़ पर बने चबूतरे पर मैं बैठा हुआ था। मेरे साथ कुसुम और भुवन थे। कुछ दूरी पर पिता जी और गौरी शंकर खड़े थे। महेंद्र सिंह अपने भाई ज्ञानेंद्र सिंह को यहां रहने को बोल गया था और खुद चंद्रकांत के अंतिम संस्कार में सम्मिलित होने चला गया था।
घर के बाहर ही बगल से कई सारी औरतें अनुराधा को नहला धुला का तैयार कर रहीं थी ताकि उसका अंतिम संस्कार किया जा सके। औरतों ने चारो तरफ से कपड़ों द्वारा एक घेरा बना रखा था जिससे कि बाकी लोग अंदर के मंज़र को देख ना सकें। पिता जी के कहने पर कुछ लोग पहले ही मुरारी की ज़मीन पर उसकी अंतिम क्रिया की तैयारी में लगे हुए थे। उनके इस काम में मुरारी के गांव वाले भी साथ में लगे हुए थे।
"न...नहीं।" औरतों का घेरा जैसे ही हटा और मेरी नज़र अनुराधा पर पड़ी तो मैं हलक फाड़ कर चीख पड़ा।
मेरी चीख सुन कर सब के सब चौंके और मेरी तरफ देखने लगे। पिता जी और गौरी शंकर भी मेरी तरफ देखने लगे थे। इधर मेरी इस चीख से कुसुम और भुवन भी उछल से पड़े।
"देखो अब कोई शोर शराबा मत करना।" पिता जी झट से मेरे पास आ कर बोले____"शांति पूर्वक उसकी अंतिम क्रिया को करने दो।"
"मेरी अनुराधा को ये लोग इस तरह नहीं ले जा सकते पिता जी।" मैं चबूतरे से उतर कर दुखी भाव से बोल पड़ा____"कृपया इनसे कहिए कि ये लोग मेरी अनुराधा को दुल्हन की तरह सजाएं।"
"ये...ये क्या कह रहे हो तुम?" पिता जी के साथ साथ बाकी सब भी बुरी तरह चौंक पड़े।
"मैं बिल्कुल ठीक कह रहा हूं पिता जी।" मेरी आंखें छलक पड़ीं____"वो मेरी होने वाली पत्नी थी। मैं उसे दिलो जान से प्रेम करता था। मैंने उससे ब्याह करने का वचन दिया था। मैं अपनी अनुराधा को दुल्हन बना के ही विदा करूंगा। कृपया इनसे कहिए न कि ये मेरी अनुराधा को दुल्हन की तरह सजाएं।"
पिता जी ही नहीं बल्कि सब के सब दंग रह गए। किसी के मुख से कोई बोल ना फूट सका। इधर मेरी बात सुन कर जहां कुसुम और भुवन रो पड़े वहीं दूर खड़ी औरतें भी रो पड़ीं। सरोज तो दहाड़े मार कर ही रोने लगी। चारो तरफ कोलाहल के बावजूद सनसनी सी फैल गई।
"ठीक है।" कुछ देर सोचने के बाद पिता जी ने गंभीरता से कहा____"अगर तुम यही चाहते हो तो ठीक है।"
कहने के साथ ही पिता जी ने औरतों से मुखातिब हो कर कहा कि वो अनुराधा को दुल्हन के जोड़े में सजाने की तैयारी करें। कुछ लोगों को गांव के बाज़ार में भेजा गया और फ़ौरन ही अनुराधा के लिए सुहागन बनाने का सारा समान मंगाया गया। उसके बाद औरतों ने आंसू बहाते हुए अनुराधा को दुल्हन की तरह सजाना शुरू कर दिया।
उस वक्त मेरा कलेजा फट गया जब मैंने अपनी अनुराधा को दुल्हन की तरह सजा देखा। कितनी सुंदर और मासूम दिख रही थी वो। मेरा दिल किया कि भाग कर जाऊं और झपट कर उसे अपनी आगोश में भर लूं। कदाचित पिता जी को इस बात का अंदेशा था इस लिए उन्होंने भुवन को इशारे से समझा दिया था कि मुझे सम्हाले रखे।
अनुराधा को अर्थी में लिटा कर लोग शमशान की तरफ बढ़ चले। सबकी आंखें नम थीं, औरतें चाह कर भी अपना रोना बंद नहीं कर पा रहीं थी। भुवन और शेरा मुझे सम्हाले चल रहे थे। कुसुम भाभी के पास चली गई थी।
जैसे ही लोग अनुराधा को मुरारी की ज़मीन की तरफ ले जाने लगे तो एक बार फिर मैं चीख पड़ा। किसी को समझ न आया कि अब क्या हुआ? आख़िर अब क्यों मैंने उन्हें रोक दिया? पिता जी ने जब मुझसे सवाल किया तो मैंने कहा कि अनुराधा का अंतिम संस्कार मेरी ज़मीन पर होगा। ऐसा इस लिए क्योंकि अब वो मेरी पत्नी बन चुकी थी और इस नाते उसका अंतिम संस्कार उसके अपने पति की मिट्टी में ही होगा। इतना ही नहीं उसका दाह संस्कार मैं खुद करूंगा।
एक बार फिर से सब दंग रह गए। सब के सब पिता जी की तरफ देखने लगे थे। पिता जी ने बात की गंभीरता को समझा और फ़ौरन ही आदेश दिया कि अर्थी को हमारी ज़मीन पर ले जाया जाए।
जल्दी ही हम सब उस जगह पर पहुंचे जहां से हमारी ज़मीनें शुरू होती थी। मेरा नया मकान भी वहीं पर बना हुआ था। पिता जी के हुकुम पर लोग फ़ौरन ही पास के जंगल में जा कर लकड़ियां ले आए और चिता तैयार करने लगे।
महापंडित के निर्देश पर मैंने सबसे पहले अनुराधा की मांग में सिंदूर भरा और उसे पूर्ण रूप से सुहागन बनाया। उसके बाद सारी रस्मों के बाद मैंने उसकी चिता को अग्नि दी। ये सारे कार्य करते हुए मैं बड़ी मुश्किल से खुद को सम्हाले हुए था। मेरा जी कर रहा था कि लकड़ी की चिता पर लेटी अपनी अनुराधा को एक बार अपने सीने से लगा लूं। एक दो बार मैंने कोशिश भी की लेकिन लोगों ने मुझे ऐसा करने नहीं दिया।
जलती आग ने देखते ही देखते अपना उग्र रूप धारण कर लिया और सम्पूर्ण चिता को अपने लपेटे में ले लिया। भीषण आग की लपटों के बीच अनुराधा का मृत जिस्म धुंधला सा दिखने लगा और फिर एक समय ऐसा आया जब सब कुछ समाप्त हो गया। मैं शेरा और भुवन से घिरा उस धधकती आग को अपलक देखता रहा। मैंने महसूस किया कि जैसे जैसे वो आग धीमी पड़ती जा रही थी वैसे वैसे एक आग मेरे सीने में अपना वजूद बना कर सुलगने लगी थी।
✮✮✮✮
बारह दिन कब और कैसे गुज़र गए मुझे पता ही नहीं चला। मैं तो जैसे अब इस संसार में था ही नहीं। मेरा ज़्यादातर समय उस जगह पर गुज़रता जहां पर अनुराधा की चिता जलाई गई थी। मैं घंटों उसकी चिता के पास बैठा रहता और उससे दुनिया जहान की बातें करता। भुवन मेरी इस हालत को देख कर दुखी होता और मुझे बहलाने की कोशिश करता। जब पिता जी खुद मुझे लेने आते तब उनके ज़ोर देने पर ही मैं वापस हवेली जाता। इस बीच सरोज काकी भी अपने बेटे अनूप के साथ मेरे नए मकान के पास ही बैठी रहती थी। रूपचंद्र हर रोज़ मुझसे मिलने या तो हवेली आता या फिर उस जगह जहां मैं अपनी अनुराधा के पास होता।
तेरहवीं के दिन पिता जी ने पूरी ईमानदारी से हवेली में अनुराधा की तेरहवीं का आयोजन किया। सरोज काकी, उसका बेटा और उसकी देवरानी हवेली आए हुए थे। सबकी मौजूदगी में मैंने पंडित जी के निर्देश पर पूजा की। उसके बाद सबको विधिवत भोजन करवा कर उन्हें दान दक्षिणा दी।
दूसरी तरफ चंद्रकांत के यहां भी यही कार्यक्रम हुआ था। उसके ससुराल वालों ने ही सारी क्रियाएं की थीं।
बड़ी मुश्किल से मैं अपने चाचा और बड़े भैया के सदमे से उबरा था और अब अनुराधा की मौत से मैं एक बार फिर से सदमे में पहुंच गया था। वैसे ये कहना ज़्यादा बेहतर होगा कि इस हादसे ने मुझे अंदर तक तोड़ दिया था। मैं अब मैं नहीं रह गया था। चौबीसों घंटे मैं अनुराधा के ख़यालों में उसकी हत्या क्यों की गई इसके बारे में सोचता रहता था। चंद्रकांत ने उसकी हत्या मेरी वजह से की थी। उसने मुझसे बदला लेने के लिए अनुराधा की हत्या की थी। ज़ाहिर है हत्या भले ही उसने की थी लेकिन अपनी अनुराधा का असल हत्यारा मैं खुद था। अनुराधा मेरे दुष्कर्मों की वजह से आज इस दुनिया में नहीं थी। ये एक ऐसा सच था जिसका एहसास मुझे एक पल के लिए भी चैन से जीने नहीं दे रहा था।
✮✮✮✮
मैं अपना बैग ले कर जैसे ही नीचे आया तो मां ने मुझे पुकारा जिसके चलते मैं अपनी जगह पर ठिठक गया। आज कल मैं किसी से ज़्यादा बात नहीं करता था और ना ही हवेली में रुकता था। पिछले पंद्रह दिन से मैं खेतों की तरफ भी नहीं गया था। सबको इस बात का एहसास था कि मैं अनुराधा की वजह से ही ऐसी हालत में था इस लिए कोई मुझे बेवजह टोंक कर ना तो परेशान करता था और ना ही इस क़दर समझाने की कोशिश करता था कि मैं उनकी बातों से नाराज़ अथवा गुस्सा हो जाऊं। इस बीच भाभी ज़रूर मेरे आस पास ही रहती थीं, वो भी तब जब मैं हवेली में होता। वो मुझे बड़े ही प्यार से समझातीं और दुनिया जहान की बातों के द्वारा मुझे बहलाने की कोशिश करतीं।
"ये हाथ में बैग लिए कहां जा रहा है बेटा?" मां ने मेरे पास आ कर मुझसे पूछा____"क्या कहीं जा रहा है तू?"
"हां।" मैंने संक्षिप्त सा जवाब दिया।
"अरे! कहां जा रहा है तू?" मां के चेहरे पर हैरानी के साथ साथ चिंता के भाव उभर आए।
"जहां मेरा मन लगता है।" मैंने निर्विकार भाव से कहा और आगे बढ़ने ही लगा था कि मां ने हड़बड़ा कर मुझे फिर से रोक लिया।
"क...क्या मतलब है तेरा?" मां एकदम से मेरे सामने ही आ कर खड़ी हो गईं, बोलीं____"कहां मन लगता है तेरा?"
"जहां मेरी अनुराधा है।" मैंने पूर्व की भांति ही निर्विकार भाव से कहा____"अब से मैं वहीं रहूंगा। यहां मेरा दम घुटता है...मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता।"
मां मेरी बात सुन कर सन्न रह गईं। हैरान परेशान सी वो देखती रह गईं मुझे। हम दोनों की बात सुन कर मेनका चाची, भाभी, कुसुम, निर्मला काकी और कजरी भी आ गई।
"ये...ये तू क्या कह रहा है बेटा?" मां ने चिंतित भाव से कहा____"नहीं नहीं, तू कहीं नहीं जाएगा। तू हमें छोड़ कर कहीं नहीं जाएगा। यहीं रहेगा...मेरे पास...अपनी मां के पास।"
"मुझे मजबूर मत कीजिए मां।" मैंने इस बार बेबसी के साथ साथ आवेशयुक्त स्वर में कहा____"मुझे जाने दीजिए वरना....।"
"वरना???" मां की आंखें फैल गईं____"वरना क्या करेगा तू...हां?"
"अगर किसी ने मुझे मजबूर किया।" मैंने निर्णायक भाव से कहा____"तो...तो मैं ज़हर खा कर खुदकुशी कर लूंगा। फिर मेरी लाश को लिए बैठे रहना अपने पास।"
"व..वैभव।।" मां की चीख निकल गई। आगे बढ़ कर उन्होंने एक झन्नाटेदार थप्पड़ जड़ दिया मेरे बाएं गाल पर। थप्पड़ के लगते ही मेरे कान झन्ना गए। पलक झपकते ही गुस्सा तो बहुत आया लेकिन मैंने खुद को सम्हाल लिया, कुछ बोला नहीं।
"तेरी हिम्मत कैसे हुई ऐसा बोलने की?" फिर मां ने चीखते हुए कहा और फिर अचानक ही उनकी रुलाई फूट गई। लपक कर अपनी दोनों हथेलियों में मेरा चेहरा लिया और फिर रोते हुए बोलीं____"तुझे अपनी मां के पास नहीं रहना तो मत रह लेकिन ज़हर खाने की बात कभी मत करना। अब तू ही तो बचा है। अपने बड़े भाई की तरह तू भी मुझे छोड़ कर चला जाएगा तो कैसे जी पाऊंगी मैं?"
कहने के साथ ही उन्होंने झपट कर मुझे अपने कलेजे से लगा लिया और फूट फूट कर रोने लगीं। उन्हें यूं रोता देख बाकी सबकी भी आंखें छलक पड़ीं। मैं खुद भी अपने आपको रोक न सका और मां को जोरों से खुद से छुपका लिया।
"तुझे मेरी क़सम है।" मां ने मुझसे छुपके हुए किंतु रोते हुए कहा____"आज के बाद कभी ऐसी बात मत बोलना वरना तुझसे पहले मैं खुद ज़हर खा कर जान ले लूंगी अपनी।"
"हां मैं कभी ऐसा नहीं बोलूंगा।" मैंने रुंधे गले से कहा____"लेकिन आप भी मुझे मत रोकिए। यहां मेरा मन नहीं लगता। मुझे अपनी अनुराधा के पास रहना है। उसके पास रहता हूं तो दिल को थोड़ा सकून मिलता है मुझे।"
"ठीक है।" मां ने मुझसे अलग हो कर कहा____"अगर तेरी यही इच्छा है तो जा तू लेकिन मुझे वचन दे कि तू अपनी मां से मिलने हर रोज़ आएगा।"
"हां मैं आपको वचन देता हूं।" मैंने कहा और फिर उनके आंसू पोंछ कर बाहर की तरफ बढ़ चला।
बैठक के सामने से गुज़रा ही था कि पिता जी ने आवाज़ दे कर मुझे अपने पास आने को कहा। मन तो नहीं किया लेकिन जाना ही पड़ा। उनके पास किशोरी लाल और अर्जुन सिंह बैठे हुए थे। उन्होंने मुझे कुछ देर तक देखा और फिर पूछा कहां जा रहा हूं मैं? जवाब में मैंने उनसे भी वही कहा जो मां से कह चुका था। ज़हर खाने वाली बात नहीं कही उनसे। मेरी बात सुन कर वो कुछ देर जाने क्या सोचते रहे और फिर इतना ही कहा कि अपना ख़याल रखना।
मैं बैठक से निकल कर हवेली से बाहर आ गया। कुछ ही पलों में मैं मोटर साईकिल में बैठा उड़ा चला जा रहा था। आस पास कौन था मुझे किसी से कोई मतलब नहीं था। बस इस बात की खुशी सी महसूस हो रही थी कि अब से मैं ज़्यादातर अपनी अनुराधा के पास ही रहूंगा। जब तक मेरा मन करेगा उसकी चिता के पास बैठ कर उससे बातें करूंगा।
✮✮✮✮
"वैभव की मानसिक हालत ठीक नहीं लगती है ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने चिंतित भाव से दादा ठाकुर की तरफ देखते हुए कहा____"उस लड़की की मौत से यकीनन उसे गहरा आघात लगा है। आपको जल्द से जल्द कुछ न कुछ करना होगा।"
"हां हम समझते हैं अर्जुन सिंह।" पिता जी ने गहरी सांस ले कर कहा____"असल में दिल और प्रेम के मामले बहुत ही संवेदनशील होते हैं। हमें हाल ही में उस लड़की से उसके प्रेम के बारे में पता चला था किंतु हमें ये बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि वो उस लड़की को इस क़दर प्रेम करता होगा।"
"ये उसके प्रेम की दीवानगी ही थी ठाकुर साहब कि उसने उस दिन उस लड़की को दुल्हन की तरह सजवा कर तथा उसकी मांग में सिंदूर भर कर उसे अपनी पत्नी बनाया और फिर खुद उसका अंतिम संस्कार भी किया।" अर्जुन सिंह ने कहा____"वहां मौजूद लोगों ने भी उस हैरतअंगेज दृश्य को देखा था और अब इतने दिन गुज़र जाने के बाद भी वो उसके सदमे से उबर नहीं पाया है। मुझे डर है कि वो उस अवस्था में न पहुंच जाए जहां से उसको वापस लाना मुश्किल हो जाए।"
"अर्जुन सिंह जी सही कह रहे हैं ठाकुर साहब।" किशोरी लाल ने गंभीरता से कहा____"अगर ऐसा ही हाल रहा तो वाकई छोटे कुंवर की मानसिक अवस्था इससे भी बद्तर हो जाएगी। हमें जल्द से जल्द उन्हें इस हालत से निकालने का कोई उपाय करना होगा।"
"आप लोग ही बताएं कि उसे इस हालत से बाहर निकालने के लिए हमें क्या करना चाहिए?" पिता जी ने चिंतित भाव से कहा____"हमें सिर्फ उसके इस हाल की ही चिंता नहीं है बल्कि इस बात की भी चिंता है कि उसकी जान का दुश्मन वो सफ़ेदपोश अभी भी हमारी पकड़ में नहीं आया है। आज जिस तरह से वो उस जगह पर रहने के लिए गया है उससे उस सफ़ेदपोश को उसकी जान लेने के लिए कोई मुश्किल पेश नहीं आएगी।"
"हां वाकई ये भी एक चिंता का विषय हो गया है।" अर्जुन सिंह ने सिर हिलाते हुए कहा____"आपको उसकी सुरक्षा का बंदोबस्त करना होगा अब। उसे उस वीरान जगह पर अकेला नहीं छोड़ा जा सकता।"
"वो तो हम करेंगे ही।" दादा ठाकुर ने कुछ सोचते हुए कहा____"हम अपने बेटे पर किसी भी तरह का संकट नहीं आने देंगे। चंद्रकांत ने अगर ऐसा न किया होता तो आज हमारे सामने ऐसे हालात न होते। उससे हमें ऐसे कृत्य की सपने में भी उम्मीद नहीं थी। उस दिन अपनी बहू की हत्या के बाद वो पश्चाताप की अग्नि में जलते हुए रो रहा था और कह रह था कि उसने जो अपराध किया है उसके लिए उसे भगवान भी माफ़ नहीं करेगा। मगर अब सोचते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे उसका वो सब कहना महज झूठ था, दिखावा था। असल में तो उसके मन में कुछ और ही था।"
"उस दिन छोटे कुंवर ने उसके साथ जो कुछ किया था।" किशोरी लाल ने जैसे संभावना ब्यक्त करते हुए कहा____"कहीं उसी की वजह से तो नहीं वो छोटे कुंवर से खुंदक खा गया था?"
"हां ऐसा भी हो सकता है।" दादा ठाकुर ने सिर हिलाया____"वैसे भी वो हमारे बेटे को ही अपना असल दुश्मन समझता था। उसके हिसाब से हमारा बेटा ही सबसे बड़ा दोषी था जिसकी वजह से उसकी बीवी और बहू ने उसे धोखा दे कर वैसा संबंध बनाया था।"
"सच तो ये है ठाकुर साहब कि हर इंसान अपनी मर्ज़ी से ही अच्छा या बुरा कर्म करता है।" अर्जुन सिंह ने कहा____"एक सच ये भी है कि ताली हमेशा दोनों हाथों से ही बजती है। चंद्रकांत की बहू का तो समझ में आता है कि वो जवान थी और उसने वैभव जैसे लड़के के व्यक्तित्व से प्रभावित हो कर उससे अनैतिक संबंध बना लेने में कोई संकोच नहीं किया अथवा ये नहीं सोचा कि ये ग़लत है किंतु चंद्रकांत की अपनी बीवी ने ऐसा क्यों किया? अपने बेटे की उमर के लड़के के साथ उसने कैसे संबंध बना लिया? क्या उसे एक बार भी अपनी उमर का ख़याल नहीं आया होगा? क्या उसे ऐसा अनैतिक संबंध बना लेने की बात सोच कर भी शर्म नहीं आई होगी? मुझे पूरा यकीन है ठाकुर साहब कि वैभव भले ही चाहे जैसे चरित्र का रहा हो लेकिन चंद्रकांत की बीवी पर उसने खुद डोरे नहीं डाले होंगे। ज़रूर उसने ही वैभव को ऐसे अनैतिक संबंध के लिए किसी न किसी तरीके से फांसा रहा होगा।"
"इससे क्या फ़र्क पड़ता है अर्जुन सिंह?" दादा ठाकुर ने कहा____"ग़लत तो ग़लत ही होता है चाहे जिसने भी किया हो। हम ये नहीं कहते कि ग़लती किसकी थी बल्कि हम ये कहते हैं कि इस ग़लती के लिए बदले की भावना में जो तरीका अपनाया गया वो ग़लत था। चंद्रकांत और रघुवीर को अगर ऐसे संबंधों का पता चल ही गया था तो उन्हें इस मामले को हमारे सामने रखना चाहिए था। इसके बाद भी अगर हम उनके साथ कोई संतोष जनक न्याय न करते तो उनका ऐसा करना जायज़ होता। क्योंकि तब उनके द्वारा कुछ भी ग़लत करने के ज़िम्मेदार हम खुद भी होते। हम मुखिया थे और मुखिया के रूप में सबके साथ पूरी ईमानदारी से न्याय करना हमारा सबसे पहला फर्ज़ होता। चंद्रकांत ने या उसके बेटे ने ऐसा कुछ नहीं किया बल्कि उन्होंने खुद ही फ़ैसला करने का सोचा। अपने घर की बहू अथवा बीवी को उन्होंने कुछ नहीं कहा और हमारे परिवार को तबाह कर दिया। उन लोगों की हत्या की जिनका कहीं कोई कसूर ही नहीं था। जिसका कसूर था अगर उन्होंने उसकी हत्या की होती तो हमें भी इतना दुख न होता क्योंकि हम ये सोच कर खुद को समझा लेते कि ग़लती हमारे बेटे ने भी की थी।"
"अब छोड़िए इन बातों को ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने गहरी सांस छोड़ते हुए कहा____"इसमें सारा दोष चंद्रकांत और उसके बेटे का ही बस नहीं था बल्कि साहूकारों का भी तो था। वो लोग भी तो उस हत्याकांड के बराबर साझीदार थे।"
"किसी और को क्या दोष दें।" दादा ठाकुर ने कहा____"सारा दोष तो नियति का रहा है और हमारे पिता जी का। साहूकारों के दिल में नफ़रत की भावना को जन्म देने वाले वही तो थे। हमने या हमारे भाई ने तो कभी उनके साथ कुछ ग़लत नहीं किया था। सबसे बड़ी बात ये कि हम गौरी शंकर के पिता चंद्रमणि से उस गुनाह की माफ़ी मांगने भी गए थे जिस गुनाह से हमारा कोई संबंध ही नहीं था। ख़ैर सच तो ये है कि कभी कभी हमें वो मिल जाता है जिसका हक़दार कोई और होता है। हमारे पिता के द्वारा किए गए कर्मों की सज़ा उन्हें नहीं बल्कि हमारे भाई और बेटे को मिली। हमें अब तक समझ नहीं आया कि ईश्वर का ये कैसा विधान है?"
पिता जी की बातें सुन कर अर्जुन सिंह फ़ौरन कुछ ना बोल सके। थोड़ी देर और अलग अलग विषय पर बातचीत हुई उसके बाद अर्जुन सिंह दादा ठाकुर से इजाज़त ले कर चले गए। उनके जाने के बाद दादा ठाकुर ने शेरा को बुला कर उसे कुछ बेहद ज़रूरी कार्य करने के निर्देश दिए।
━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━
━━━━━━༻♥༺━━━━━━
चंद्रकांत शहर पहुंच ही नहीं पाया था। रास्ते में ही उसने दम तोड़ दिया था जिसके चलते महेंद्र सिंह के आदमी उसे वापस ले आए थे। हर तरफ कोलाहल सा मचा हुआ था। किसी को भी अपने निजी कामों का होश नहीं था। अब तक ये बात हर तरफ फैल गई थी कि जिस लड़की की लाश पेड़ पर रस्सी के सहारे लटकी मिली थी उसकी बड़ी बेरहमी से हत्या करने वाला चंद्रकांत था। उसने सिर्फ अपनी निजी दुश्मनी अथवा ये कहें कि वैभव से बदला लेने के लिए ऐसा किया था। इस मामले के बारे में लगभग सब चंद्रकांत की निंदा कर रहे थे और उसे बुरा भला कह रहे थे। कुछ ऐसे भी लोग थे जो इस मामले के बारे में दबी ज़ुबान में वैभव का भी नाम ले कर दोष दे रहे थे।
लोगों की मदद से अनुराधा की लाश को पेड़ से उतार कर उसके गांव ले आया गया था। वहीं दूसरी तरफ चंद्रकांत के ससुराल वाले आ गए थे इस लिए वो उसके अंतिम संस्कार की तैयारी में लग गए थे।
सरोज का बहुत बुरा हाल था। वो अब तक न जाने कितनी बार बेटी के वियोग में बेहोश हो चुकी थी। उसको सम्हालने के लिए निरंतर मेरी भाभी उसके साथ ही थीं। उन्होंने सरोज को मां कहा था शायद इसी वजह से वो अपना कर्तव्य निभा रहीं थी। उनका चेहरा देख कर कोई भी बता सकता था कि उन्हें इस दुखद घटना के चलते कितना दुख हुआ था और वो कितना रोई थीं। मेरी मां का भी हाल ज़्यादा बेहतर नहीं था इस लिए मेनका चाची और निर्मला काकी उन्हें अपने साथ हवेली ले गईं थी। कुसुम तो मेरे साथ ही थी लेकिन कजरी भाभी के साथ थी।
साहूकार गौरी शंकर भी इस घटना से बेहद दुखी था। उसके घर की बड़ी औरतें भी आई थीं लेकिन अब वो वापस जा चुकीं थी। रूपा को जब ये पता चला था कि जिस लड़की की लाश मिली है वो उसकी होने वाली सौतन है तो वो भागते हुए घटना स्थल पर आई थी। अनुराधा की भयानक लाश देख कर बुरी तरह हिल गई थी वो। उसके बाद वो जाने क्या क्या सोच कर रोने लगी थी। उसका भाई रूपचंद्र उसकी भावनाओं को बखूबी समझता था इस लिए उसने उसे सम्हाले रखे था।
मैं एकदम से गुमसुम सा हो गया था। रह रह कर अनुराधा का चेहरा मेरी आंखों के सामने उजागर हो जाता और मेरी आंखों को रुला देता। पहली बार मुझे एहसास हुआ था कि अपनी चाहत अपनी मोहब्बत से हमेशा के लिए जुदा हो जाना कितना असहनीय होता है। मैं जब भी रोने लगता तो कुसुम एक मां की तरह मुझे अपनी आगोश में ले कर शांत कराने की कोशिश करने लगती। वो खुद भी मेरी हालत से दुखी थी। पहले तो उसे पता ही नहीं था कि मेरा और अनुराधा का क्या रिश्ता है और फिर जब उसे पता चला तो जैसे उसके ऊपर बिजली ही गिर पड़ी थी। वो तभी से मेरे साथ थी और मेरा ख़याल रख रही थी।
पिता जी ने कई बार मुझे हवेली जाने के लिए कहा था। यहां तक कि ज्ञानेंद्र सिंह ज़बरदस्ती मुझे हवेली ले जाने पर भी उतारू हो गया था लेकिन मैंने ये कह कर हवेली जाने से मना कर दिया था कि मैं अंतिम समय तक अपनी अनुराधा के साथ ही रहूंगा। मजबूरन पिता जी को मेरी बात माननी ही पड़ी। गांव के आधे से ज़्यादा लोग मुरारी के गांव आ गए थे। मुरारी के गांव वाले तो पहले से ही वहां मौजूद थे। सरोज काकी की देवरानी और उसकी बेटियां भी थीं जो अनुराधा की मौत से दुखी हो कर रोए जा रहीं थी।
अनुराधा के साथ ऐसा होगा ये किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। मैं तो बार बार हड़बड़ा कर इधर उधर देखने लगता था। मुझे ऐसा लगता था जैसे अनुराधा किसी तरफ से आ रही है। आंखों के सामने उसका वही सांवला सा चेहरा उभर आता, जिस चेहरे में दुनिया भर की मासूमियत और दुनिया भर की सादगी थी। मेरे ठकुराईन कहने पर जब वो एकदम से शर्मा जाती तो मैं उसे मंत्र मुग्ध सा हो कर देखने लगता था। फिर जैसे ही मुझे वर्तमान की वास्तविकता का एहसास होता तो मेरी रुलाई फूट पड़ती। दिल तड़प उठता। अंदर से हूक उठती और मन करता दहाड़े मार कर रो पड़ूं।
मुरारी के घर के बाहर पेड़ पर बने चबूतरे पर मैं बैठा हुआ था। मेरे साथ कुसुम और भुवन थे। कुछ दूरी पर पिता जी और गौरी शंकर खड़े थे। महेंद्र सिंह अपने भाई ज्ञानेंद्र सिंह को यहां रहने को बोल गया था और खुद चंद्रकांत के अंतिम संस्कार में सम्मिलित होने चला गया था।
घर के बाहर ही बगल से कई सारी औरतें अनुराधा को नहला धुला का तैयार कर रहीं थी ताकि उसका अंतिम संस्कार किया जा सके। औरतों ने चारो तरफ से कपड़ों द्वारा एक घेरा बना रखा था जिससे कि बाकी लोग अंदर के मंज़र को देख ना सकें। पिता जी के कहने पर कुछ लोग पहले ही मुरारी की ज़मीन पर उसकी अंतिम क्रिया की तैयारी में लगे हुए थे। उनके इस काम में मुरारी के गांव वाले भी साथ में लगे हुए थे।
"न...नहीं।" औरतों का घेरा जैसे ही हटा और मेरी नज़र अनुराधा पर पड़ी तो मैं हलक फाड़ कर चीख पड़ा।
मेरी चीख सुन कर सब के सब चौंके और मेरी तरफ देखने लगे। पिता जी और गौरी शंकर भी मेरी तरफ देखने लगे थे। इधर मेरी इस चीख से कुसुम और भुवन भी उछल से पड़े।
"देखो अब कोई शोर शराबा मत करना।" पिता जी झट से मेरे पास आ कर बोले____"शांति पूर्वक उसकी अंतिम क्रिया को करने दो।"
"मेरी अनुराधा को ये लोग इस तरह नहीं ले जा सकते पिता जी।" मैं चबूतरे से उतर कर दुखी भाव से बोल पड़ा____"कृपया इनसे कहिए कि ये लोग मेरी अनुराधा को दुल्हन की तरह सजाएं।"
"ये...ये क्या कह रहे हो तुम?" पिता जी के साथ साथ बाकी सब भी बुरी तरह चौंक पड़े।
"मैं बिल्कुल ठीक कह रहा हूं पिता जी।" मेरी आंखें छलक पड़ीं____"वो मेरी होने वाली पत्नी थी। मैं उसे दिलो जान से प्रेम करता था। मैंने उससे ब्याह करने का वचन दिया था। मैं अपनी अनुराधा को दुल्हन बना के ही विदा करूंगा। कृपया इनसे कहिए न कि ये मेरी अनुराधा को दुल्हन की तरह सजाएं।"
पिता जी ही नहीं बल्कि सब के सब दंग रह गए। किसी के मुख से कोई बोल ना फूट सका। इधर मेरी बात सुन कर जहां कुसुम और भुवन रो पड़े वहीं दूर खड़ी औरतें भी रो पड़ीं। सरोज तो दहाड़े मार कर ही रोने लगी। चारो तरफ कोलाहल के बावजूद सनसनी सी फैल गई।
"ठीक है।" कुछ देर सोचने के बाद पिता जी ने गंभीरता से कहा____"अगर तुम यही चाहते हो तो ठीक है।"
कहने के साथ ही पिता जी ने औरतों से मुखातिब हो कर कहा कि वो अनुराधा को दुल्हन के जोड़े में सजाने की तैयारी करें। कुछ लोगों को गांव के बाज़ार में भेजा गया और फ़ौरन ही अनुराधा के लिए सुहागन बनाने का सारा समान मंगाया गया। उसके बाद औरतों ने आंसू बहाते हुए अनुराधा को दुल्हन की तरह सजाना शुरू कर दिया।
उस वक्त मेरा कलेजा फट गया जब मैंने अपनी अनुराधा को दुल्हन की तरह सजा देखा। कितनी सुंदर और मासूम दिख रही थी वो। मेरा दिल किया कि भाग कर जाऊं और झपट कर उसे अपनी आगोश में भर लूं। कदाचित पिता जी को इस बात का अंदेशा था इस लिए उन्होंने भुवन को इशारे से समझा दिया था कि मुझे सम्हाले रखे।
अनुराधा को अर्थी में लिटा कर लोग शमशान की तरफ बढ़ चले। सबकी आंखें नम थीं, औरतें चाह कर भी अपना रोना बंद नहीं कर पा रहीं थी। भुवन और शेरा मुझे सम्हाले चल रहे थे। कुसुम भाभी के पास चली गई थी।
जैसे ही लोग अनुराधा को मुरारी की ज़मीन की तरफ ले जाने लगे तो एक बार फिर मैं चीख पड़ा। किसी को समझ न आया कि अब क्या हुआ? आख़िर अब क्यों मैंने उन्हें रोक दिया? पिता जी ने जब मुझसे सवाल किया तो मैंने कहा कि अनुराधा का अंतिम संस्कार मेरी ज़मीन पर होगा। ऐसा इस लिए क्योंकि अब वो मेरी पत्नी बन चुकी थी और इस नाते उसका अंतिम संस्कार उसके अपने पति की मिट्टी में ही होगा। इतना ही नहीं उसका दाह संस्कार मैं खुद करूंगा।
एक बार फिर से सब दंग रह गए। सब के सब पिता जी की तरफ देखने लगे थे। पिता जी ने बात की गंभीरता को समझा और फ़ौरन ही आदेश दिया कि अर्थी को हमारी ज़मीन पर ले जाया जाए।
जल्दी ही हम सब उस जगह पर पहुंचे जहां से हमारी ज़मीनें शुरू होती थी। मेरा नया मकान भी वहीं पर बना हुआ था। पिता जी के हुकुम पर लोग फ़ौरन ही पास के जंगल में जा कर लकड़ियां ले आए और चिता तैयार करने लगे।
महापंडित के निर्देश पर मैंने सबसे पहले अनुराधा की मांग में सिंदूर भरा और उसे पूर्ण रूप से सुहागन बनाया। उसके बाद सारी रस्मों के बाद मैंने उसकी चिता को अग्नि दी। ये सारे कार्य करते हुए मैं बड़ी मुश्किल से खुद को सम्हाले हुए था। मेरा जी कर रहा था कि लकड़ी की चिता पर लेटी अपनी अनुराधा को एक बार अपने सीने से लगा लूं। एक दो बार मैंने कोशिश भी की लेकिन लोगों ने मुझे ऐसा करने नहीं दिया।
जलती आग ने देखते ही देखते अपना उग्र रूप धारण कर लिया और सम्पूर्ण चिता को अपने लपेटे में ले लिया। भीषण आग की लपटों के बीच अनुराधा का मृत जिस्म धुंधला सा दिखने लगा और फिर एक समय ऐसा आया जब सब कुछ समाप्त हो गया। मैं शेरा और भुवन से घिरा उस धधकती आग को अपलक देखता रहा। मैंने महसूस किया कि जैसे जैसे वो आग धीमी पड़ती जा रही थी वैसे वैसे एक आग मेरे सीने में अपना वजूद बना कर सुलगने लगी थी।
✮✮✮✮
बारह दिन कब और कैसे गुज़र गए मुझे पता ही नहीं चला। मैं तो जैसे अब इस संसार में था ही नहीं। मेरा ज़्यादातर समय उस जगह पर गुज़रता जहां पर अनुराधा की चिता जलाई गई थी। मैं घंटों उसकी चिता के पास बैठा रहता और उससे दुनिया जहान की बातें करता। भुवन मेरी इस हालत को देख कर दुखी होता और मुझे बहलाने की कोशिश करता। जब पिता जी खुद मुझे लेने आते तब उनके ज़ोर देने पर ही मैं वापस हवेली जाता। इस बीच सरोज काकी भी अपने बेटे अनूप के साथ मेरे नए मकान के पास ही बैठी रहती थी। रूपचंद्र हर रोज़ मुझसे मिलने या तो हवेली आता या फिर उस जगह जहां मैं अपनी अनुराधा के पास होता।
तेरहवीं के दिन पिता जी ने पूरी ईमानदारी से हवेली में अनुराधा की तेरहवीं का आयोजन किया। सरोज काकी, उसका बेटा और उसकी देवरानी हवेली आए हुए थे। सबकी मौजूदगी में मैंने पंडित जी के निर्देश पर पूजा की। उसके बाद सबको विधिवत भोजन करवा कर उन्हें दान दक्षिणा दी।
दूसरी तरफ चंद्रकांत के यहां भी यही कार्यक्रम हुआ था। उसके ससुराल वालों ने ही सारी क्रियाएं की थीं।
बड़ी मुश्किल से मैं अपने चाचा और बड़े भैया के सदमे से उबरा था और अब अनुराधा की मौत से मैं एक बार फिर से सदमे में पहुंच गया था। वैसे ये कहना ज़्यादा बेहतर होगा कि इस हादसे ने मुझे अंदर तक तोड़ दिया था। मैं अब मैं नहीं रह गया था। चौबीसों घंटे मैं अनुराधा के ख़यालों में उसकी हत्या क्यों की गई इसके बारे में सोचता रहता था। चंद्रकांत ने उसकी हत्या मेरी वजह से की थी। उसने मुझसे बदला लेने के लिए अनुराधा की हत्या की थी। ज़ाहिर है हत्या भले ही उसने की थी लेकिन अपनी अनुराधा का असल हत्यारा मैं खुद था। अनुराधा मेरे दुष्कर्मों की वजह से आज इस दुनिया में नहीं थी। ये एक ऐसा सच था जिसका एहसास मुझे एक पल के लिए भी चैन से जीने नहीं दे रहा था।
✮✮✮✮
मैं अपना बैग ले कर जैसे ही नीचे आया तो मां ने मुझे पुकारा जिसके चलते मैं अपनी जगह पर ठिठक गया। आज कल मैं किसी से ज़्यादा बात नहीं करता था और ना ही हवेली में रुकता था। पिछले पंद्रह दिन से मैं खेतों की तरफ भी नहीं गया था। सबको इस बात का एहसास था कि मैं अनुराधा की वजह से ही ऐसी हालत में था इस लिए कोई मुझे बेवजह टोंक कर ना तो परेशान करता था और ना ही इस क़दर समझाने की कोशिश करता था कि मैं उनकी बातों से नाराज़ अथवा गुस्सा हो जाऊं। इस बीच भाभी ज़रूर मेरे आस पास ही रहती थीं, वो भी तब जब मैं हवेली में होता। वो मुझे बड़े ही प्यार से समझातीं और दुनिया जहान की बातों के द्वारा मुझे बहलाने की कोशिश करतीं।
"ये हाथ में बैग लिए कहां जा रहा है बेटा?" मां ने मेरे पास आ कर मुझसे पूछा____"क्या कहीं जा रहा है तू?"
"हां।" मैंने संक्षिप्त सा जवाब दिया।
"अरे! कहां जा रहा है तू?" मां के चेहरे पर हैरानी के साथ साथ चिंता के भाव उभर आए।
"जहां मेरा मन लगता है।" मैंने निर्विकार भाव से कहा और आगे बढ़ने ही लगा था कि मां ने हड़बड़ा कर मुझे फिर से रोक लिया।
"क...क्या मतलब है तेरा?" मां एकदम से मेरे सामने ही आ कर खड़ी हो गईं, बोलीं____"कहां मन लगता है तेरा?"
"जहां मेरी अनुराधा है।" मैंने पूर्व की भांति ही निर्विकार भाव से कहा____"अब से मैं वहीं रहूंगा। यहां मेरा दम घुटता है...मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता।"
मां मेरी बात सुन कर सन्न रह गईं। हैरान परेशान सी वो देखती रह गईं मुझे। हम दोनों की बात सुन कर मेनका चाची, भाभी, कुसुम, निर्मला काकी और कजरी भी आ गई।
"ये...ये तू क्या कह रहा है बेटा?" मां ने चिंतित भाव से कहा____"नहीं नहीं, तू कहीं नहीं जाएगा। तू हमें छोड़ कर कहीं नहीं जाएगा। यहीं रहेगा...मेरे पास...अपनी मां के पास।"
"मुझे मजबूर मत कीजिए मां।" मैंने इस बार बेबसी के साथ साथ आवेशयुक्त स्वर में कहा____"मुझे जाने दीजिए वरना....।"
"वरना???" मां की आंखें फैल गईं____"वरना क्या करेगा तू...हां?"
"अगर किसी ने मुझे मजबूर किया।" मैंने निर्णायक भाव से कहा____"तो...तो मैं ज़हर खा कर खुदकुशी कर लूंगा। फिर मेरी लाश को लिए बैठे रहना अपने पास।"
"व..वैभव।।" मां की चीख निकल गई। आगे बढ़ कर उन्होंने एक झन्नाटेदार थप्पड़ जड़ दिया मेरे बाएं गाल पर। थप्पड़ के लगते ही मेरे कान झन्ना गए। पलक झपकते ही गुस्सा तो बहुत आया लेकिन मैंने खुद को सम्हाल लिया, कुछ बोला नहीं।
"तेरी हिम्मत कैसे हुई ऐसा बोलने की?" फिर मां ने चीखते हुए कहा और फिर अचानक ही उनकी रुलाई फूट गई। लपक कर अपनी दोनों हथेलियों में मेरा चेहरा लिया और फिर रोते हुए बोलीं____"तुझे अपनी मां के पास नहीं रहना तो मत रह लेकिन ज़हर खाने की बात कभी मत करना। अब तू ही तो बचा है। अपने बड़े भाई की तरह तू भी मुझे छोड़ कर चला जाएगा तो कैसे जी पाऊंगी मैं?"
कहने के साथ ही उन्होंने झपट कर मुझे अपने कलेजे से लगा लिया और फूट फूट कर रोने लगीं। उन्हें यूं रोता देख बाकी सबकी भी आंखें छलक पड़ीं। मैं खुद भी अपने आपको रोक न सका और मां को जोरों से खुद से छुपका लिया।
"तुझे मेरी क़सम है।" मां ने मुझसे छुपके हुए किंतु रोते हुए कहा____"आज के बाद कभी ऐसी बात मत बोलना वरना तुझसे पहले मैं खुद ज़हर खा कर जान ले लूंगी अपनी।"
"हां मैं कभी ऐसा नहीं बोलूंगा।" मैंने रुंधे गले से कहा____"लेकिन आप भी मुझे मत रोकिए। यहां मेरा मन नहीं लगता। मुझे अपनी अनुराधा के पास रहना है। उसके पास रहता हूं तो दिल को थोड़ा सकून मिलता है मुझे।"
"ठीक है।" मां ने मुझसे अलग हो कर कहा____"अगर तेरी यही इच्छा है तो जा तू लेकिन मुझे वचन दे कि तू अपनी मां से मिलने हर रोज़ आएगा।"
"हां मैं आपको वचन देता हूं।" मैंने कहा और फिर उनके आंसू पोंछ कर बाहर की तरफ बढ़ चला।
बैठक के सामने से गुज़रा ही था कि पिता जी ने आवाज़ दे कर मुझे अपने पास आने को कहा। मन तो नहीं किया लेकिन जाना ही पड़ा। उनके पास किशोरी लाल और अर्जुन सिंह बैठे हुए थे। उन्होंने मुझे कुछ देर तक देखा और फिर पूछा कहां जा रहा हूं मैं? जवाब में मैंने उनसे भी वही कहा जो मां से कह चुका था। ज़हर खाने वाली बात नहीं कही उनसे। मेरी बात सुन कर वो कुछ देर जाने क्या सोचते रहे और फिर इतना ही कहा कि अपना ख़याल रखना।
मैं बैठक से निकल कर हवेली से बाहर आ गया। कुछ ही पलों में मैं मोटर साईकिल में बैठा उड़ा चला जा रहा था। आस पास कौन था मुझे किसी से कोई मतलब नहीं था। बस इस बात की खुशी सी महसूस हो रही थी कि अब से मैं ज़्यादातर अपनी अनुराधा के पास ही रहूंगा। जब तक मेरा मन करेगा उसकी चिता के पास बैठ कर उससे बातें करूंगा।
✮✮✮✮
"वैभव की मानसिक हालत ठीक नहीं लगती है ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने चिंतित भाव से दादा ठाकुर की तरफ देखते हुए कहा____"उस लड़की की मौत से यकीनन उसे गहरा आघात लगा है। आपको जल्द से जल्द कुछ न कुछ करना होगा।"
"हां हम समझते हैं अर्जुन सिंह।" पिता जी ने गहरी सांस ले कर कहा____"असल में दिल और प्रेम के मामले बहुत ही संवेदनशील होते हैं। हमें हाल ही में उस लड़की से उसके प्रेम के बारे में पता चला था किंतु हमें ये बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि वो उस लड़की को इस क़दर प्रेम करता होगा।"
"ये उसके प्रेम की दीवानगी ही थी ठाकुर साहब कि उसने उस दिन उस लड़की को दुल्हन की तरह सजवा कर तथा उसकी मांग में सिंदूर भर कर उसे अपनी पत्नी बनाया और फिर खुद उसका अंतिम संस्कार भी किया।" अर्जुन सिंह ने कहा____"वहां मौजूद लोगों ने भी उस हैरतअंगेज दृश्य को देखा था और अब इतने दिन गुज़र जाने के बाद भी वो उसके सदमे से उबर नहीं पाया है। मुझे डर है कि वो उस अवस्था में न पहुंच जाए जहां से उसको वापस लाना मुश्किल हो जाए।"
"अर्जुन सिंह जी सही कह रहे हैं ठाकुर साहब।" किशोरी लाल ने गंभीरता से कहा____"अगर ऐसा ही हाल रहा तो वाकई छोटे कुंवर की मानसिक अवस्था इससे भी बद्तर हो जाएगी। हमें जल्द से जल्द उन्हें इस हालत से निकालने का कोई उपाय करना होगा।"
"आप लोग ही बताएं कि उसे इस हालत से बाहर निकालने के लिए हमें क्या करना चाहिए?" पिता जी ने चिंतित भाव से कहा____"हमें सिर्फ उसके इस हाल की ही चिंता नहीं है बल्कि इस बात की भी चिंता है कि उसकी जान का दुश्मन वो सफ़ेदपोश अभी भी हमारी पकड़ में नहीं आया है। आज जिस तरह से वो उस जगह पर रहने के लिए गया है उससे उस सफ़ेदपोश को उसकी जान लेने के लिए कोई मुश्किल पेश नहीं आएगी।"
"हां वाकई ये भी एक चिंता का विषय हो गया है।" अर्जुन सिंह ने सिर हिलाते हुए कहा____"आपको उसकी सुरक्षा का बंदोबस्त करना होगा अब। उसे उस वीरान जगह पर अकेला नहीं छोड़ा जा सकता।"
"वो तो हम करेंगे ही।" दादा ठाकुर ने कुछ सोचते हुए कहा____"हम अपने बेटे पर किसी भी तरह का संकट नहीं आने देंगे। चंद्रकांत ने अगर ऐसा न किया होता तो आज हमारे सामने ऐसे हालात न होते। उससे हमें ऐसे कृत्य की सपने में भी उम्मीद नहीं थी। उस दिन अपनी बहू की हत्या के बाद वो पश्चाताप की अग्नि में जलते हुए रो रहा था और कह रह था कि उसने जो अपराध किया है उसके लिए उसे भगवान भी माफ़ नहीं करेगा। मगर अब सोचते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे उसका वो सब कहना महज झूठ था, दिखावा था। असल में तो उसके मन में कुछ और ही था।"
"उस दिन छोटे कुंवर ने उसके साथ जो कुछ किया था।" किशोरी लाल ने जैसे संभावना ब्यक्त करते हुए कहा____"कहीं उसी की वजह से तो नहीं वो छोटे कुंवर से खुंदक खा गया था?"
"हां ऐसा भी हो सकता है।" दादा ठाकुर ने सिर हिलाया____"वैसे भी वो हमारे बेटे को ही अपना असल दुश्मन समझता था। उसके हिसाब से हमारा बेटा ही सबसे बड़ा दोषी था जिसकी वजह से उसकी बीवी और बहू ने उसे धोखा दे कर वैसा संबंध बनाया था।"
"सच तो ये है ठाकुर साहब कि हर इंसान अपनी मर्ज़ी से ही अच्छा या बुरा कर्म करता है।" अर्जुन सिंह ने कहा____"एक सच ये भी है कि ताली हमेशा दोनों हाथों से ही बजती है। चंद्रकांत की बहू का तो समझ में आता है कि वो जवान थी और उसने वैभव जैसे लड़के के व्यक्तित्व से प्रभावित हो कर उससे अनैतिक संबंध बना लेने में कोई संकोच नहीं किया अथवा ये नहीं सोचा कि ये ग़लत है किंतु चंद्रकांत की अपनी बीवी ने ऐसा क्यों किया? अपने बेटे की उमर के लड़के के साथ उसने कैसे संबंध बना लिया? क्या उसे एक बार भी अपनी उमर का ख़याल नहीं आया होगा? क्या उसे ऐसा अनैतिक संबंध बना लेने की बात सोच कर भी शर्म नहीं आई होगी? मुझे पूरा यकीन है ठाकुर साहब कि वैभव भले ही चाहे जैसे चरित्र का रहा हो लेकिन चंद्रकांत की बीवी पर उसने खुद डोरे नहीं डाले होंगे। ज़रूर उसने ही वैभव को ऐसे अनैतिक संबंध के लिए किसी न किसी तरीके से फांसा रहा होगा।"
"इससे क्या फ़र्क पड़ता है अर्जुन सिंह?" दादा ठाकुर ने कहा____"ग़लत तो ग़लत ही होता है चाहे जिसने भी किया हो। हम ये नहीं कहते कि ग़लती किसकी थी बल्कि हम ये कहते हैं कि इस ग़लती के लिए बदले की भावना में जो तरीका अपनाया गया वो ग़लत था। चंद्रकांत और रघुवीर को अगर ऐसे संबंधों का पता चल ही गया था तो उन्हें इस मामले को हमारे सामने रखना चाहिए था। इसके बाद भी अगर हम उनके साथ कोई संतोष जनक न्याय न करते तो उनका ऐसा करना जायज़ होता। क्योंकि तब उनके द्वारा कुछ भी ग़लत करने के ज़िम्मेदार हम खुद भी होते। हम मुखिया थे और मुखिया के रूप में सबके साथ पूरी ईमानदारी से न्याय करना हमारा सबसे पहला फर्ज़ होता। चंद्रकांत ने या उसके बेटे ने ऐसा कुछ नहीं किया बल्कि उन्होंने खुद ही फ़ैसला करने का सोचा। अपने घर की बहू अथवा बीवी को उन्होंने कुछ नहीं कहा और हमारे परिवार को तबाह कर दिया। उन लोगों की हत्या की जिनका कहीं कोई कसूर ही नहीं था। जिसका कसूर था अगर उन्होंने उसकी हत्या की होती तो हमें भी इतना दुख न होता क्योंकि हम ये सोच कर खुद को समझा लेते कि ग़लती हमारे बेटे ने भी की थी।"
"अब छोड़िए इन बातों को ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने गहरी सांस छोड़ते हुए कहा____"इसमें सारा दोष चंद्रकांत और उसके बेटे का ही बस नहीं था बल्कि साहूकारों का भी तो था। वो लोग भी तो उस हत्याकांड के बराबर साझीदार थे।"
"किसी और को क्या दोष दें।" दादा ठाकुर ने कहा____"सारा दोष तो नियति का रहा है और हमारे पिता जी का। साहूकारों के दिल में नफ़रत की भावना को जन्म देने वाले वही तो थे। हमने या हमारे भाई ने तो कभी उनके साथ कुछ ग़लत नहीं किया था। सबसे बड़ी बात ये कि हम गौरी शंकर के पिता चंद्रमणि से उस गुनाह की माफ़ी मांगने भी गए थे जिस गुनाह से हमारा कोई संबंध ही नहीं था। ख़ैर सच तो ये है कि कभी कभी हमें वो मिल जाता है जिसका हक़दार कोई और होता है। हमारे पिता के द्वारा किए गए कर्मों की सज़ा उन्हें नहीं बल्कि हमारे भाई और बेटे को मिली। हमें अब तक समझ नहीं आया कि ईश्वर का ये कैसा विधान है?"
पिता जी की बातें सुन कर अर्जुन सिंह फ़ौरन कुछ ना बोल सके। थोड़ी देर और अलग अलग विषय पर बातचीत हुई उसके बाद अर्जुन सिंह दादा ठाकुर से इजाज़त ले कर चले गए। उनके जाने के बाद दादा ठाकुर ने शेरा को बुला कर उसे कुछ बेहद ज़रूरी कार्य करने के निर्देश दिए।
━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━