Horror अनहोनी ( एक प्रेत गाथा ) - Page 3 - SexBaba
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Horror अनहोनी ( एक प्रेत गाथा )

रोशन राय के कमरे की लाईट अभी जल रही थी। लाईट तो उसके कमरे की जलती ही रहती थी क्योंकि अब वह अन्धेरे में नहीं सो पाता था। जब से सांप दिखाई देने का चक्कर चला था.....तब उसे उसकी नीदें और उड़ गई थीं। कुछ उसके कर्म थे और कुछ उम्र का तकाजा था। अब वह पहली सी नींद रही ही नहीं थी।

रौली ने एक विशिष्ट अंदाज में दस्तक दी थी। इस दस्तक को रोशन राय अच्छी तरह पहचानता था। वह अभी सोने की तैयारी में था कि इस दस्तक ने उसे चौंका दिया।

"इस वक्त यह कैसे आ गया? उसके कोई ऐसा खास काम भी न था....जिसे पूरा करके वो यहां पहुंचा हो।" यही सोचते हुए रोशन ने उठकर दरवाजा खोला था।

रौली का चेहरा बता रहा था कि कोई खास बात हुई है।

"हां, क्या हुआ?" रोशन राय ने बड़े इत्मीनान से पूछा-"आओ, अन्दर आओ....."

वह रोशन राय के साथ अन्दर आया और हाथ बांधकर खड़ा हो गया, बोला-"मालिक, कब्रिस्तान से 'गोरकन' पोखर को पकड़कर लाया हूं.....।"

___ "पोखर को....क्यों...?" रोशन राय चौंकर उसकी आंखों में देखने लगा-"बाबा, खैर तो है...?"

"मालिक, खैर नहीं है। उस कुत्ते ने छोटे मालिक को कब्र खोदकर दिखा दी....।" रौली ने धमका किया।

__"हैं, बाबा...।" रोशन राय के चेहरे पर हवाइयों उड़ने लगीं- "अरें, बाबा! यह पोखर ने क्या किया। उसने हमारा सारा खेल ही चौपट कर दिया। बाबा.वो है कहा?"

"हवेली में ही है। अपने साथ ले आया हूं......" रौली ने बताया।

"ओ, बाबा! उसको यहां क्यों ले आए। बाबा, उसे तो कब्रिस्तान ही ले जाओ। पहले उसके बीवी-बच्चों को आग दिखाओ, फिर उस भी भून दो। देखो, उसका घर-बार कुछ न बचे और हां, अब उन कब्रों को भी हमें क्या फायदा। बाबा....उन्हें भी जला दो। आग लगा दो। जाओ, जल्दी जाओ! इससे पहले कि समीर हवेली से बाहर निकले, सब कुछ जल चुका हो। समझ गये बाबा..."

"जी मालिक! अच्छी तरह समझ गया....." शैली ने मुंडी हिलाई।

___ "बस तो बाबा, फिर जाओ.... । अभी इधर क्यों खड़े हो? इस पोखर के बच्चे ने बड़ी बेवकूफी का काम किया...।" वह बेचैनी से अपने हाथ मलने लगा।

रौली फोरन अपने पंजों के बल घूमा था और कमरे से निकल गया था।

फिर उसेन कब्रिस्तान पहुंचकर जो तमाशा किया, वह समीर के सामने था।

समीर कब्रों का हाल देखकर वापिस आया तो उसने रौली को गाड़ी के पास अलर्ट खड़े पाया। वो दूसरे नौकरों को हाथ उठा-उठाकर हिदायतों दे रहा था।

समीर ने उसके पास पहुंचते ही पूछा-"रौली, पोखर कहां है?"

"नहीं मालूम, छोटे मालिक...।" रौली ने धीमे स्वर में जवाब दिया।

"कहीं आग लगाने वाले ने उसे घर समेत ही तो नहीं जला दिया? फिर उस घर में उसके बीवी-बच्चे भी

थे। अगर ऐसा हुआ जो याद रखना, कमायत टूटेगी...।" समीर राय ने गाड़ी में बैठते हुए कहा।

"अब मैं क्या बता सकता हूं, छोटे मालिक!" रौली ने हाथ जोड़ते हुए कहा-"आग बुझे तो कुछ पता चले, छोटे मालिक....."

रौली अच्छी तरह जानता था कि कब्रिस्तान में क्या हुआ था। उसी ने तो रोशन राय का हुक्म पाते ही...सबसे पहले पोखर को उसके घर में लाकर एक चारपाई से बांध दिया था। ऐसा ही उसने उसकी बीवी और बच्चों के साथ भी किया था। इसके बाद उसने पूरे घर में पैट्रोल छिड़कर घर में आग लगा दी थी।

पोखर बेचारा मूक-आंखों से रहम की अपील करता रह गया था। बोल वह सकता नहीं था.....क्योंकि उसक मुंह में कपड़ा ढूंस दिया गया था। आग ने देखते-ही-देखते पूरे घर को अपनी लपेट में ले लिया था।

पोखर....अपनी बीवी-बच्चों सहित जिन्दा जल मरा।

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इस बीच रौली के आदमियों ने पुख्ता सिमेन्टिड कब्रों को तोड़ था। टूटी कब्रों में सूखी लकड़ियां व घास-फूस डालकर और उन पर पैट्रोल डालकर यहां भी रौली ने दियासलाई दिखा दी थी। जलती दियासलाई ने पैट्रोल को छुआ तो जैसे जहन्नुम की आग भड़क उठी।

रौली ने जिन लोगों के साथ मिलकर यह आग लगर्दा थी.....अब वही लोग उस आग को बुझाने की कोशिश कर रहे थे। वह आग कम बुझा रहे थे...शोर ज्यादा मचा रहे थे। इधर-से-उधर खामखां भाग रहे थे

और यह बात समीर राय ने अच्छी तरह नोट कर ली थी। समीर फिर वहां रुका नहीं।

वहा वहां रुककर करता भी क्या....जो कुछ होना था हो चुका था।

दोपहर तक समीर का यह भी मालूम हो गया कि पोखर और उसके बीवी-बच्चे भी इस आग में जल मरे हैं। उसका दिल कटकर रह गया।

आखिर उस गरीब का क्या कसूर था?
 
कसूर तो था ही...उसने अपनी बिसात से आगे जाने की कोशिश की थी। वो शायदा अपनी औकात भूल गया था। वो समीर राय की बातों में आकर गुमराह हो गया था। उसने जाली कब्रों का भेद खोला था...और अपने मालिक का भेद खोलने की उसे ऐसी सजा मिलने ही थी।

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रौशन राय, इस वक्त खाना खाने में मस्त था।

नफीसा बेगम उसके सामने बैठी उसे घूर जा रही थी। रोशन राय रोस्ट-चिकन को झंझोड़ते-झंझोड़ते अचानक रुका और अपनी बीवी की तरफ देखकर बोला

"खाना खाओ। मुझे क्या देख रही हो? क्या नजर लगाओगी....?"

"उसे चुप लग गई है.....।" नफीसा बेगम ने दुखी स्वर में कहा।

___"किसे बाबा....?" रोशन राय 'चिकन' प्लेट में रखते हुए बोला।

__ "अपने समीर को.....मैं और किसी बात करूंगी...?" नफीसा बेगम के लहजे में व्यंग भर आया था।

"कोई बात नहीं....ठीक हो जाएगा।" रोशन रायम लापरवाही से बोला-"चन्द दिन वह परेशान रहेगा ही...."

"उसे कब्रों को हाल मालूम हो गया है....।"

"कब्रों का हाल तो सिर्फ मुर्दा जानता है.....भला उसे कैसे मालूम होगा। खैर, अगर मालूम हो गया है तो उसने कब्रों में दोजख (नक) की आग भड़कती हुई भी देख ली होगी......।"रोशन राय के लहजे में धमकी थी।



___ "वह हस्पताल भी हो आया है। उसे यह भी मालूम हो गई है कि नमीरा और उसकी बच्ची की मौत हस्पताल में नहीं हुई..।" नफीसा बेगम ने भेद खोला।

__"तुमने इस बात की तस्वीक तो नहीं की...?" रोशन राय ने उसे घूरते हुए लापरवाही से पूछा।

"मैं किस तरह तस्दीक कर समी हूं.....।" नफीसा बेगम तेज लहजे में बोली-" बहुत परेशान हैं मुझे अन्देशा हे कि कहीं वह कुछ कर न बैठे....."

"नफीसा बेगम, कुछ नहीं होगा। तुम परेशान मत हुआ करो....।" रोशन राय ने इत्मीनान के साथ कहा-"तुम बस अपना मुंह न खोलना।"

"मुझे पूरी बात बताओ। आखि हमारी बहू नमीरा और उसकी बच्ची कहां है। यह ठीक है मुझे नमीरा का बच्ची को जन्म देना पसन्द नहीं आया था, लेनिक इसका मतलब तो नहीं कि उसका वजूद ही मिटा दिया जाये.....।"

"नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है....।" रोशन राय ने तसल्ली देनी चाही।

'अगर वह दोनों जिन्दा हैं तो फिर कहां हैं.?"

"मुझें नहीं मालूम....देखो, बाबा! मुझे खाना खाने दो। बहुत भूख लगी है। कभी-कभी तो मुझे भुख लगती है....।" रोशन राय फिर से खाने में लग गया।

नफीसा बेगम कुछ देर तो उसे देखती रही... फिर जाने क्यों उसे देखकर कुत्ते की-सी शक्ल बार-बार उसके सामने आने लगी। उससे बर्दाश्त नहीं हो सका। वह एक झटके से उठी व बाहर जोन लगी।

"नफीसा बेगम, अपनी जुबान बन्द ही राना । इसी में इस हवेली की भलाई है।" रोश राय ने सीधे-साफ शब्दों में चेतावनी दी।

नफीसा बेगम ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। बस, तेजी से कमरे से निकल गई।

रोशन राय कुछेक क्षणों तक घूरती नजरों से दरवाजे का देखता रहा। तभी दरवाजे से लोंगसरी, दो दूसरी सेविकाओं के साथ कमरे में दाखिल हुई। नफीसा बेगम ने खाना लग जाने के बाद इन नौकारानियों को बाहर जाने का हुक्म दिया था....ताकि अपने पति से बात कर सके। अब जब नफीसा बेगम बाहर निकल गई थी तो ये तीनों भीतर आ गई थीं।
 
लोंगसरी ने अन्दर आकर जब नफीसा बेगम की प्लेट ब्लिकुल साफ देखी तो उसे बड़ी हैरत हुई, वह बेअख्तियार ही बोल उठी।

"अरे, मालकिन ने खाना नहीं खाया...?"

"पता नहीं.....।" रोशन राय ने सख्त लहजे में जवाब दिया। लोंगसरी ने सहमकर चुप्पी साध ली थी।

"मां, मैं क्या करूं...?" समीर मां के कदमों में बैठा हुआ था।

"सब्र कर बेटा..।" मां ने उसके सिर पर बड़ी मुहब्बत से हाथ फेरा।

"मा..मैं सब्र नहीं कर सकता। मैं नमीरा को तलाश करूंगा। मैं उसे ढंढकर रहूंगा। मां, तुम नहीं जानती कि मुझे मेरी बच्ची कितनी याद आ रही है।

डॉक्टर सहगल ने बताया था कि वह इतनी खूबसूरत थी कि एक बार उस पर नजर पड़ जाए तो देखने वाला उस पर से नजर न हटा सके। मां..मैंने नमीरा से अपनी पसन्द से शादी की थी। मैं जानता हूं, आप दोनों दिल से इस शादी के हक में नहीं थे। तो क्या मां, नमीरा से किसी किस्त का इन्तकाम लिया गया है? मां...कुछ तो बताओ..."

समीर ने मां को हसरत भरी निगाहों से देखा।

"मैं क्या बताऊं बेटा! बहुत कुछ तो तने खूद ही मालूम कर लिया है....।"

नफीसा बेगम ने उसे बेबसी से देखा।

"मां कोई ऐसी बात, कोई ऐसा इशारा जो मुझे मेरी नमीरा तक पहुंचा सके...।" समीर ने मां के सामने हाथ जोड़ दिये थे-"मैं तुमसे वायदा करता हूं मां..अगर वह मुझे मिल गई तो उसे यहां से लेकर चला जाऊंगा..... ।

उसकी तुम कभी सूरत भी न देख पाओगी...''

___ "बेटा.मैं कुछ नहीं जानती...।" नफीसा बेगम की आंखें भीगने लगीं।

"इसका मतलब है कि अब मुझे अब्बू का सामना करना पड़ेगा।" समीर के लहजे में सख्ती भर आई-"मां, तुम समझ सकती हो कि अगर उन्होंने नमीरा के बारे में जुबान ने खोली तो फिर कुछ भी हो सकता है......।" ।

__ "क्या करेगा तू....अपने बाप को कत्ल कर देगा। फिर क्या होगा। तुझे फांसी हो जाएगी। नमीरा तो तुझे फिर भी न मिलेगी....।" नफीसा बेगम ने उसे हौलनाक अंजाम से आगाह किया।

"मैं फिर क्या करूं मां....?" समर तड़पकर बोला-"मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है।"

__ "अपने बाप के सामने जाने की कोशिश न करना, इससे कुद हासिल न होगा। मैं अपेन तौर पर उनसे कुछ मालूम करने की कोशिश करूंगी। तू हौसला रख । जोश में मत आ। बेताबी न दिखा....।" नफीसा बेगम ने समझाया-" मैं कुद करती हूं...।"

___ "मां, जो कुछ करना है, जल्दी करो। मेरे पास वक्त कम है। मुझे वापिस बम्बई भी जाना है।"

"बेटा, मेरी सलाह मान । तू बम्बई लौट जा। तेरा पढ़ाई का हर्ज भी होता होगा। मुझे जैसे ही नमीरा के बारे में कुछ मालूम होगा...मैं तुझे वहां से बुलवा लूंगी। नफीसा बेगम ने उसे एक दूसरा ही रास्ता दिखाने की कोशिश की।

"ठीक है मां! जैसा आप कहें...।" समीर राय की जुबाना पर यह बात आई तो उसक दिल में न थी। दिल में तो उसने कुछ और ही ठान रखा था।

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रौली अभी जीप में बैठ ही रहा था कि पीछे सेकिसे ने उसे पुकारा

रौली साहब....।"

रौली ने मुड़कर देखा। हवेली का एक मुलाजिम शरफू उसकी तरफ दौड़ा चला आ रहा था। रौली इत्मीनान से जीप में बैठ गया और 'इग्नीशन' में चाबी लगाकर शरफू का इन्तजार करने लगा।

शरफू जीप के निकट पहुंचा तो बुरी तरह हांफ रहा था।

"क्या हुआ, शरफू..?" रौली ने पूछा।

"रौली साहब, आपको छोटे मालिक ने बुलाया है।" शरफू ने उतरती-चढ़ती सांसों के बीच बड़ी मुश्किल से कहा।

"छोटे मालिक ने...!" रौली हैरान हुआ, फिर यह सोचकर शायद शरफु से कोई भूल हुई है...उसने तस्दीक चाही-"शरफू, छोटे मालिक ने या बड़े मालिक ने...?"

"छोटे मालिक ने, रौली साहब!” शरफू ने स्पष्ट किया।

"अच्छा...." रौली ने चाबी गाड़ी से निकाल ली

और जीप से कूदकर बाहर आ गया-"कहां हैं वह!"

"अपने कमरे में...।" शरफू, रौली के साथ हवेली की तरफ बढ़ने लगा।

"उनके पास और कौन है?" रौली ने पूछा।

"मुझे नहीं मालूम.....।" शरफू ने बताया-"मुझे उन्होंने दरवाजे से ही आपको बुलाने का हुक्म दिया था।"

"अच्छा ठीह है....।" रौली कुछ सोचते हुए बोला-"शरफू तुम जरा एक काम करो। मैं छोटे मालिक के पास जाता हूं । पता नहीं वहां कितनी देर लगे। मैं इस वक्त बड़े मालिक के काम से जा रहा था। तुम जरा उन्हें जाकर यह बात दो कि मैं अभी हवेली से गया नहीं हूं। मुझे छोटे मालिक ने बुलवाया है...।"

___ "ठीक है, मैं जाकर बड़े मालिक को बता देता हूं। कहां हैं वह इस वक्त ?"

"वह बड़े वाले ड्राइंग रूम में हैं। अपने दोस्तों के साथ ताश खेले रहे हैं। तुम अन्दर चले जाना या दरवाजे पर जो भी बन्दा खड़ा हो, उसे कहलवा देना।" रौली ने समझाया।

"ठीक है जी...।" शरफू यह कहकर दूसरी राहदारी की तरफ चला गया।

रौली इस सोच के साथ और अन्दाजा लगाता हुआ समीर राय के कमरे की तरफ बढ़ा कि 'आखिर उन्होंने उसे क्यों बुलवाय है.?" वह किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सका। जब वह दरवाजे के सामने पहुंचा तो एक क्षण को उसका दिल जोर से धड़का | उसने हिम्मत करके दरवाजे पर आहिस्ता से दस्तक दी।

___ "आ जाओ....." अन्दर से समीर राय की आवाज आई।

वह दरवाजा खोलकर अन्दर गया तो उसे समीर राय सामने सोफे पर बैठा नजर आया। उसके हाथ में रिवाल्वर था और उसका रुख रौली की तरफ था।

रिवाल्वर देखकर रौली एक क्षण के लिए ठिठक गया।

"आ जाओ....डरो मत...।" समीर राय ने रिवाल्वर सोफे रखते हुए कहा।

"जी मालिक! आपने मुझे बुलाया.....।" रौली की आवाज में हल्की-सी कंपकपाहट थी।

___ "ह....मैंने तुम्हें बुलाया है और यह बात तुम अच्छी तरह समझ गए होवोगे कि मैंने तुम्हें क्यों बुलाया

"नहीं मालिक! मैं नहीं समझा.... ।” वह समीर से कुछ कदम के फासले पर पहुंचकर रुक गया।

"देखो, रौली! मुझसे झूठ मत बोलना....।" समीर ने उसे सचेत किया।

"मालिक, मैं आपसे झूठ क्यों बोलूंगा ? मैं आपका नमकख्खार हूं....आपका खादिम हूं...।"

"नमीरा और मेरी बच्ची कहां हैं? समीर ने रिवाल्वर फिर अपने हाथ में उठा लिया।

"मालिक, मुझे नहीं मालूम......."

"रौली, तू यह तो जानता है कि वे दोनों कः खाली थीं?"

"मैं नहीं जानता....।" रौली ने निर्भयता के साथ इंकार किया।

"अच्छा....." समीर राय ने उसे घूरकर देखा-"तू यह तो जानता है कि मेरे हाथ में क्या है...?"

"हां मालिक! आपके हाथ में रिवाल्कर है।" रौली ने सहज भाव से जवाब दिया।

"और यह रिवाल्वर भरा हुआ है रौली । तू जानता होगा कि इसमें छ: गोलियां हैं?"

"हां मालिक! जानता हूं।"

"अगर यह रिवाल्वर चल गया तो फिर तेरे जिस्म को छलनी होने से कोई नहीं बचा सकेगा.....।''

"मालिक, मेरा कसूर तो बताएं....।"

"मैं यह बात अच्छी तरह जानता हूं कि तू सब जानता है। लेनिक तू सच बोलने से कतरा रहा है।"
 
"मालिक, मुझे कुद मालूम होता तो आपको जरूर बता देता..."

"रौली, तू इतना तो बता सकता है कि मेरी नमीरा और मेरी बच्ची जिन्दा हैं?"

"मैं जानता तो जरूर बता देता मालिक.....।"

उसके इस जवाब पर समीर को गुस्सा आ गया। उसने रिवाल्वर सोफे पर फेंका और उठकर रौली के मुंह पर थप्पड़ों की बरसात कर दी। कसकर चार-पांच थप्पड़ लगाए।

रौली ने थप्पड़ खाकर सिर झुका लिया। बोला कुछ नहीं। खामोश रहा, लेकिन भीतर-ही-मीतर खौल रहा था वह।

___"दफा हो जाओ यहां से कुत्ते.....।" समीर राय गुस्से में चीखा-"वरना अभी तुझे भूनकर रखा दूंगा।"

रौली ने शुक्र मनाया। वो बड़ी तेजी से दरवाजे की तरफ भागा और बाहर निकल गया। वो जैसे ही दरवाजे से बहार निकला, उसे अपना जुड़वा भाई होली दिखाई दिया। वो तेजी से इधर ही आ रहा था।

"क्या हुआ...?" उसने रौली के निकट पहुंचकर पूछा।

___ "तुम कैसे आ रहे हो....?" वे दोनों साथ-साथ चलने लगे।

"मुझे मालिक ने भेजा है।" होली ने जवाब दिया-"तुम्हें देखने के लिए।"

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"आओ, फिर मालिक के पास चलें..... ।” रौली उसे साथ ले रोशन राय के कमरे की तरफ बढ़ गया।

जब वे ड्राइंग रूम में पहुंचे तो रोशन राय पत्ते फैंट रहा था। इन्हें देखकर उसने हाथ रोक लिया। फिर रौली के चेहरे पर नजरें टिकाते हुए बोला-"रौली कोई परेशानी वाली बात तो नहीं है...!"

"नहीं, मालिक .....!" रौली मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोला।

___ "जाओ फिर! वह काम निपटा आओ जो मैंने तुम्हें बताया था। फिर इत्मीनान से बात करेंगे....।"

"जी मालिक...!" रौली ने दोनों हाथ जोड़कर कहा और फिर उल्टे कदमों चलता कमरे से निकल गया।

होली, रोशन राय की पीठ पीछे जा खड़ा हुआ था।

सुबह छ: बजे ही नफीसा बेगम ने, समीर राय के कमरे का दरवाजा जो से खटखटा दिया।

समीर रात देर से सोया था। अभी वह गहरी नींद में था कि दरवाजे पर दस्तक की आवाज से उसकी आंख खुल गई। वह गुस्से से झुंझलाता हुआ दरवाजे की तरफ बढ़ा।

उसने दरवाजा खोला तो अपनी मां को समाने पाया। उसने एक तरफ हटते हुए उन्हें अन्दर आने का रास्ता दिया और उनके अन्दर आने के बाद दरवाजा बन्द कर दिया।

___ "मां...खैरियत तो है....?" वह मां के चेहरे को गौर से देखते हुए बोला।

"हां....सब खैरियत है। तुम ऐसा करो, मुंह-हाथ धा लो, तुम्हारा नाश्ता तैयार है।"

"मां.....यह आप क्या कह रही हैं..?" वह बैड पर बैठते हुए बोला। उस पर अभी भी उनींदगी सवार थी।

"तुमको वापिस बम्बई जाना है....." मा। ने जैसे आदेश सुनाया था।

"बम्बई जाना है....लेकिन क्यों.?"

"बाहर गाड़ी तैयार खड़ी है। तुम जल्दी से नाश्ता कर लो....।" मां ने जैसे उसकी सुनी ही नहीं थी।

"मां, साफ-साफ बता करो....।" समीर राय की त्यौरियां चढ़ गईं-"क्या यह अब्बू का हुक्म है..?"

"हो...।" नफीसा बेगम न एक गहरा सांस लेकर कहा।

"और अगर में जाने से इंकार कर दूं तो...?" समीर की उनींदगी जाती रही थी। वह फुफकारा।

___ "मैंने तुमसे मान किया था कि अब्बू से सामना मत करना....."

___ "मां....मैंने अब्बू से कोई समाना नहीं किया है। हां, उस कुत्ते शैली को जरूर थप्पड़ लगाए है।"

"तुमने ऐसा करके गलती की...।" नफीसा बेगम के लहजे में तीखापान था।

"मां...! आप मेरी बात गौर से सुन लें। मैं मुंह-हाथ धो लूं...फिर अब्बू के सामने जाता हूं | उनसे भी बात करनी ही होगी....।"

___ "तुम ऐसा कुछ भी नहीं करोगे..." कहते हुए नफीसा बेगम उने उसके सामने हाथ जोड़ लिये-"तुम्हें खुदा का वास्ता... "

"मां...अब्बू मुझ पर बराकर जुल्म किये जाते हैं। मैं कब तक चुप रहूं....."
 
___ "तू क्या चहाता है कि मैं तेरे कदमों में गिर पडूं..?"

"अल्लाह न करे कि कभी ऐसा वक्त आए...." समीर ने मां के दोनों हाथ पकड़ लिए। वह करीब आया तो उसने देखा कि उसकी मां की आंखें आंसुओं से भरी हुई थीं।

"बेटा, मेरी बात मन ले....तू बम्बई लौट जा....."

"ठीक है मां ....आपकी खातिर चला जाता हूं।" समीर राय मां की आंखों में आंसू न देख सका। उसने हार मान ली–"मैं हाथ-मुंह धोकर आता हूं। आप नाश्ता मंगवाएं....।"

उसने जल्दी ब्रुश किया...हाथ-मुंह धोया और बाथयम से बाहर आ गया। इतनी देर में नाश्ता आ चुका था। नफीसा उसे बाथरूम से निकलते देखकर उसके लिए चाय बनाने लगी।

समीर खामोशी से नाश्ता करने लगा।

"देख, बेटा! तू अपने अब्बू के मिजाज से तो अच्छी तरह वाकिफ है।" मां ने समझाने के अंदाज में कहना शुरू किया, "तू जानता है कि वह अपने अलावा कुछ नहीं सोचते । जो उनके दिल में आता है, कर गुजरते हैं। चाहे वह अच्छा हो या बुरा हो। चाहे उनके सामने अपनी बीवी हो या बेटा हो या कोई गैर शख्स हो। वह तो सबको एक ही पंकित में खड़ा कर देते हैं। बेटा, तू दिल छोटा न करा | मैं मौका देखकर बता कर लूंगी....।"

"नहीं, अम्मी! अब आप कोई बात न करना.... अब क्या बात करनी ह। मुझे हवेली छोड़ने का हुक्म मिल गया है। मैं जा रहा हूं लेकिन एक बात याद रखना, मां। मैं हवेली इसलिए नहीं छोड़ रहा कि यह मेरे बाप का हुक्म है। यह हवेली मैं इसलिए छोड़ रहा हूं क्योंकि मैंने अपनी मां की आंखों देखे हैं। मैं आपकी वजह से, आपके कहने पर यहां से जा रहा हूं....।" कहते हुए समीर राय की आवाज रुंध गई। वह कुछेक क्षणों के लिए रुका। खुद को सम्भाला, फिर आगे बोला-"मां, मैं आपको एक बात बताता हूं...मुझे अपना बाप कभी पसन्द नहीं आया। वह बाप लगता ही नहीं। पता नहीं मां, आप एक पत्थरदिल....हिटलर जैसे शख्स के साथ किस तरह जिन्दगी गुजार रही हैं?"

नफीसा बेगम ने कुद कहने के लिए होंठ खोले...मगर वह बोल नहीं पाई। उसके दिल से घटा-सी उठी और वह बेअख्तियार रोने लगी।

खाना खाते हुए रोशन राय ने अचानक अपने सामने बैठी नफीसा बेगम पर नजर डाली। वह खाली प्लेट अपने सामने रखे अपने ख्यालों में गुम थी।

"खाना खाओ, नफीसा बेगम....!" रोशन राय उसे गहरी नजरों से देखते हुए बोला-"खाना क्यों नहीं खा रही...?"

"खाती हूं, राय साहब।"

"बेटे के जोन का गम हैं मेरी समझ में नहीं आया कि आखिर तुम्हें गम क्यों है? भई, वह बम्बई में पढ़ रहा है। उसे आज नही तो कल जाना ही था। अगर वह आज चला गया तो इसमें परेशानी की क्या बात है?" रोशन राय ने उसे समझाने की कोशिश की।

"उसे जिस तरह भेजा गया है, यह बात आप अच्छी तरह जानते हैं।" नफीसा बेगम ने उसे तीखी निगाहों से देखा।

"तुम नहीं जानती कि वह अपनी मासूनियम में आग से खेलने की कोशिश कर रहा था। वह मेरा बेटा है। मैं आखिर उसे आग से किस तरह खेल लेने देता..?"

___ "आपने...अपने बेटे के साथ बड़ा जुल्म किया है। क्या उसे यह हक भी नहीं कि वह अपनी बीवी और बच्चों के बारे में मालूम कर सके? आखिर आप बता क्यों, नहीं देते कि वह दोनों कहां हैं? आपका ख्याल है कि यह बात उस कभी मालूम नहीं होगी....यह राज हमेशा राज ही रहेगा...।"

___ "मैं अब उसकी जल्दी शादी कर देना चाहता हूं।" रोशन राय लापरवाही से बोला-"वह चन्द दिनों में ही सब कुछ भूल जाएगा.....।"

"मेरा ख्याल है कि समीर की बजाज अपन खुद ही शादी कर लें...।" नफीसा बेगम ने गुस्से से कहा और उसे खाना खाते छोड़कर कमरे से निकल गई।

रोशन राय ने उसके यूं चले जाने की बिल्कुल परवाह नहीं की। वह बदस्तूर इत्मीनान के साथ खाना खाता रहा।

रोशन राय उस दिन भी हमेशा की तरह, सैर के लिए निकला था।

घुड़सवारी उसका शौका था। वह सैर के लिए अधिकतर घोड़े पर ही निकलता था। रौली और होली दोनों उसके पीछे थे।

अभी वह बाब के निकट पहुंच ही था कि उसने आम के एक पेड़ के नीचे एक अजीबो-गरीब शख्स को खड़ा देखा। उसका हुलिया भी अजीब-सा था। दाढ़ी ना मूंछ...सिर धूम में चमकता हुआ...सिर पर एक बाल नहीं....सफेद लिबास पहने हुए...हाथ में जंजीर...जैसे उसकी गया या बकरी जंजीर छोड़कर भाग गई हो...और जंजीर उसके हाथ में रह गई हो।

वो शख्स हालांकि अभी तक फासले पर था, लेकिन बड़ी बेबाकी के साथ, अपलक, रोशन राय पर नजरें जमाये हुए था। वो कुछ इस तरह देख रहा था कि रोशन राय उसकी तेज नजरों को महसूस किए बगैर न रह सका।

उसकी शख्सियत ही क्या किसी की आकर्षित करने के लिए कम थी कि उसका इस तरह घूरकर देखना। रोशन राये ने एक अजीब-सी बेचैनी महसूस की थी। उस शख्स पर नजर पड़ते ही उसने अपना घोड़ा रोक लिया।

__ और रौली-होली भी उसके दायें-बाये आकर रुक गये।

__ "रौली, यह कौन है?" रोशन राय ने आंखों से ही सामने की तरफ इशारा किया था।

रौली उस अजीबो-गरीब शख्स को एक नजर देखकर बोला-"मालिक अपने इलाके का मालूम नहीं होता।"

"मालिक, क्या आगे जाकर उस रास्ते से हटा दूं..?" होली ने कहा।

"नहीं, होली। खड़ा रहने दो....हमारा क्या लेता है...?" रोशन राय ने अप्रत्याशित-सा जवाब दिया था।

दोनों भाइयों ने चोर निगाहों से एक-दूसरे की तरफ देखा।

उन्हें पूरी उम्मीद थी, कि रोशन राय उन्हें एक शस को रास्ते से हटाने का हुक्म देना।

"तुम दोनों आगे चलो.... ।” रोशन राय ने कुछ सोचकर हुक्म दिया।

उसका हुक्म सुनते ही दोनों भाइयों ने अपने घोड़े आगे बढ़ा दिये।
 
वो अजीबो-गरीब रास्ते के किनारे पर खड़ा था। जब रौली और होली उसके सामने से गुजरे तो उसने अपनी आंखे झुका लीं। वे दोनों उसे देखते हुए गुजर गये। रौली के दिल में यह ख्वाहिश भी पैदा हुई कि इस शख्स से यहां खड़े होने का सबब पूछे, लेकिन इस ख्वाहिश के बावजूद वो उससे कोई सवाल न करा सका।

जब वे दोनों आगे निकल गये और रोशन राय उस अजीबो-गरीब शख्स के निकट पहुंचा तो उस शख्स ने फौरन अपनी नजरें उठाकर देखा। उसकी नजरों में जाने ऐसा क्या था कि रोशन राय ने अचानक अपने घोड़े की लगाम खींच ली। उसका घोड़ज्ञ ठीक उस शख्स के सामने रुक गया।

"कैसे हो रोशन राय....?" उस शख्स ने अपनी चमकी आंखों से उसे देखते हुए पूछा।

रोशन राय उसकी बेअदबी पर तिलमिलकार रहा गया। हवेली के बाहर उसे उसके नाम से पुकारने की जुर्रत किसी में न थी, लेकिन इस अजनबी ने यह दुस्साहस कर दिखाया था ।

रोशन राय ने उसे उसकी इस धृष्टता पर सुनाना चाहा, उसने फौरन कहा

"हम ठीक हैं बाबा....।"

और रोशन राय अपनी जुबान पर आने वाले इन शब्दों को सुनकर हैरान रह गया। वह ऐसा तो कुछ नहीं कहना चहाता था। उसकी जुबान ने उसका साथ छोड़ दिया था।

"तुम्हारे घर में कयामत आने वाली है और तुम कह रहे हो, ठीक हो.... "

" हैं....।" रोशन राय हैरत से बोला और बेअख्तियार घोड़े से कूद पड़ा।

रोशन राय को घोड़े से कूदता देख कर रौली-होली भी तेजी से अपने घोड़ों से उतर गये और लम्बे उग भरते हुए रोशन राय की तरफ बढ़े।

"अपने इन नमकहलालों से कहो कि हमसे दूर रहें...मुझे तुमसे कुछ बात करनी है।" उस अजीबो-गरीब शख्स ने उन दोनों की तरफ इशारा किया।

रोशन राय ने ना चाहते हुए भी इशारे से उन दोनों को अपने निकट आने से रोक दिया। वे जहां थे, वहीं रुक गये।

__ "बाबा, अभी तुमने किस कयामत का जिक्र किया...मेरी हवेली में कौन-सी कयामत आने वाली है? भई, कुछ हम भी तो सुनें....।" रोशन राय अपने स्वभाव के विपरीत बेहद कोमलता के साथ बोला था।

रोशन राय भुक्तभोगी था....एक वहमी शख्स था। कयामत की जिक्र सुनकर ही उस पसीना आ गया था।

"परेशान त हो... मैं आ गया हूं.तुम्हें बताने.... रास्ता दिखाने। मेरे कहने पर अमल करोगे तो सुखी रहोगे, वरना एक दिन आएगा कि तुम्हारी हवेली में सांप-ही-सांप होंगे।" उस शख्स ने रोशन राय को अपनी काली चमकती आंखों से देखा।

"सांप...!" रोशन राय ने घबराकर कहा। वह सांप से पहले ही डरा हुआ था। कितनी ही बार उसने अपने बैडरूम में किसी सांप का सरसराते हुए देखा था, वह मुर्दा आवाज में बोला-"एक सांप तो पहले ही मेरे पीछे लगा हुआ है। आप किन सांपों की बात करते हो..?"

"वो तो एक मामूली सांप है। उसको अगर तुम मार भी दोगे तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा।" उस शख्स ने लापरवाही से कहा।

"तुम उसे मामूली सांप कहते हो। उसने मेरी रातों की नींद हराम कर दी है। मैं अब बिना लाइट जलाये सो नहीं सकता ......." रोशन राय ने अपना दुखड़ा रोया।

__ "मैं जिस बात का जिक्र कर रहा हूं....अगर वैसा हो गया तो तुम सूरज की रोशनी में भी चैन नहीं पाओगे....।"

"ओह...!" रोशन राय को अपने दिल की धड़कनों पर नियंत्रण न रहा था-"तुम वह बात बताओं बाबा.....हम जानना चाहते हैं।"

__ "शनिवार के दिन....दोपहर के वकत तुम्हारी हवेली में एक बच्ची जन्म लेगी। अगर वह बच्ची हवेली में रही तो तुम पर कयामत गुजरेगा। बस यूं समझाो कि चन्द ही दिनों में तुम्हारी हवेली सुनसान हो जाएगी। हवेली में सांपों की फुफकार के अलावा कुछ सुनाई न देगा। मैंने तुम्हें दिन और वक्त बता दिया है. झूठ ओर सच का तुम्हें खुद अन्दाज हो जाएगा।" उस शख्स ने बड़ी गम्भीरता के साथ भविष्यवाणी की थी।

रोशन राय कुछ क्षण खामोश रहा, फिर उसने धीरे से पूछा

"तुमने अभ अपना नाम नहीं बताया बाबा...।"

"रोशन राय, मेरा नाम देवांग है....."

"बाबा देवांग....! फिर मैं क्या करूं? इस तबाही से कैसे बचूं.?" रोशन राय के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं।

"इस बात का तुम्हें चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं।

"इस बात का तुम्हें इन्तजाम करना होगा कि वह लड़की हवेली में पैदा न हो और जब वह जन्म ले ले तो उसे हवेली में लाने के बजाय एक ऊंटनी पर डालकर रेगिस्तान में छोड़ देना। बस, तुम्हारा काम खत्म हो जाएगा। तुम्हारे सिर से बला टल जायेगी और जिसकी वह अमानत है, वह वहां तक पहुंच जाएगी.... और जिसकी वह अमानत है, वह वहां तक पहुंच जाएगी... और तुम्हारी जिन्दगी बच जाएगी......।"

"ठीक है, बाबा देवांग.! तुमने जैसा कहा है मैं वेसा ही करूंगा.....।" रोशन राय ने किसी आज्ञाकारी बालक की तरह कहा था।

रोशन राय को अपनी वह आज्ञाकारिता बड़ी ऊपरी-ऊपरी लग रही थी। वह तो सिर्फ आज्ञा देना जानता था..हुक्म सुनना नहीं।

पर इस अजीबो-गरीब शख्स की हस्ती ने ही उस दहलकार रख दिया था। देवांग की भविष्यवाणी ने उसके होश उड़ा दिये थे। देवांग की बातों में दम था। रोशन राय जानता था कि उसकी बहू का प्रसव होने वाला है....और यह बात हवेली से बाहर का कोई व्यक्ति नहीं जान सकता थां यह अजीबो-गरीब शख्स उसका नाम जानता था और उसे सांप वाली त्रासदी का भी इल्म था, फिर उसने बच्ची के जन्म का दिन व वक्त भी बता दिया था।

देवांग की भविष्वाण रोशन राय के दिलो-दिमाग में घर कर गई थी।
 
रोशन राय भीतर से दहल गया था। उसने इस सिलसिले में किसी को कुछ नहीं बताया था, उसने समीर की बहू को निकट के एक छोटे शहर के हस्पताल में एडमिट करा दिया था। देवांग के कथनानुसार अभी बच्ची के जन्म में चार दिन बाकी थे, जबकि डाक्टरों की रिपोर्ट से मुताबिक अभी कम से कम दो हफ्ते बाकी थे।

रोशन राय ने सोचा था कि चलो चार दिन बाद दूध-का-दूध और पानी-का-पानी हो जाएगा।

रोशन राय की नमीरा वैसे ही पसन्द नहीं थी। उसेन हवेली में आकर 'खानदान वाल लड़की के साथ आने वाली जायदाद का रास्ता रोक दिया था । इस बात का रोशन राय को भीतर-ही-भीतर दुख था...लेकिन उसने अपने इकलौते बेटे की वजह से नमीरा को बर्दाश्त कर लिया था, मगर उसका शैतानी जहन उससे मुक्ति पाने को नित नये-नये मन्सूबे तराश रहा था कि देवांग की भविष्यवाणी ने मामला ही साफ कर दिया था।

एक तो मध्यवर्गीय परिवार की बहू, ऊपर से जन्म दे एक बच्ची को और बच्ची भी कैसी? सब कुद तबाह करने वाली....जन्मजली....अशुभ ।

रोशन राय ने तय किर लिया कि बच्ची के साथ उसकी मां को भी लग हाथों ठिकाने लगा देगा।

रहस्यमय देवांग की भविष्यवागी सच साबित हुई। नमीरा ने शानिकवार के दिन ठीक बारह बजे एक बच्ची को जन्म दिया। बच्ची को पैदाइश से इस दिन पहले हवेली के आसपास कई सांपों को देखा गया...जिन्हें रोशनगढ़ी के लोगों ने फौरन मार दिया और जिस दिन बच्ची ने पैदा होने था, उसे सुबह हवेली के अन्दर आठ-दस सांप लहराते हुए नजर आए.जिनमें से कुछेक को हवेली के कारिन्दों ने मार दिया।

उस दिन रोशन राय ने ख्वाब में अपने आसपास बेशुमार सांप देखे। वह घबराकर उठ बैठा। जब वह उठा तो अच्छा-खासा सूरज निकला हुआ था। उसे हवेली में असाधारण शोर सुनाई दिया। बाहर आने पर उस बातया गया था कि हवेली के विभिन्न हिस्सों में सांप नमुदार हुए हैं...जिनमें कुछेक को मार दिया गया है।

वे लक्षण शु। न थे।

और फिर जब रोशन राय सवा बारह बजे हस्पताल पहुंचा मो बच्ची की पैदाइश की खबर उसकी प्रतीक्षक थी।

अचानक ही बच्चे के रोने की आवाज रोशन राय को अपने निकट सुनाई दी। रोशन राय ने चौंककर चारों तरफ देखा। वह अपने बैडरूम में बैड पर था।

बच्ची के रोने की आवाज के साथ ही उस रात का वह सारा दृश्य उसकी आंखों के सामने घूम गया। उसने बारी-बारी दो ऊंटों को विपरीत दिशाओं में जाते देखा।

रोशन राय के मोटे होठों पर एक निर्मम मुस्कुराहट खेलने लगी, फिर वह सोचते-सोचते सो गया। देवांग के कहे पर अमल करके उसने हवेली की तबाही से बचा लिया था।

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रौली गाड़ी चला रहा था।

समीर राय उसके बारबर बैठा था और गाड़ी में पीछे चार सशस्त्र बन्दों के साथ होली विजरामान था। गाड़ी रोशनगढ़ी से दस-बारह किलोमीरटर दूर निकल आई थी। अचानक ही रौली को ब्रेक मारनी पड़ी। सामने सड़क पर एक कालीन किसी पेड़ के तने की तरह रास्ता रोके पड़ा था। यूं लगता था जैसे यह गोल-गोल लिपटा हाअ कालीन किसी टैन्ट हाउस के ट्रक से लुढ़ककर सड़क पर आ रहा हो।

रौली के साथ होली भी गाड़ी से उतरकर कालीन की तरफ बढ़ा । रौली ने कालीन का निरीक्षण किया तो उसे एक तरफ से लम्बे बाल दिखाई दिये। ये बाल यकीनन किसी औरत के थे और जब रौली और होली न तेजी से कालीन को खोला तो उसमें से जो औरत निकली, उसे देखकर समीर राय की सांस रुक गयी।

वह उसकी बीवी नमीरा थी।

समीर गाड़ी से निकला और हवाल के तेज झौंके की तरह कालीन के पास पहुंचा और घुटनों के बल बैठ गया। उसने झुककर नमीरा का चेहरा अपने दोनों हाथों में ले लिया। नमीरा के बाल अब उसके चेहरे पर बिखरे हुए थे। यूं लगता था, जैसे सिरिंगज के जरिये उसके बदन से पूरा खून निकाल लिया गया हो। उसका लिबास सही हालत में था। बस, गले मे दुपट्टा मौजूद नहीं था।

समीर राय ने उसकी नब्ज देखी....सांस चेक की..दिल की धड़कन महसूस की....कहीं कुछ न था।

नमीरा जाने कब की इस दुनिया से कूच कर चुकी थी।

समीरा राय को नमीरा का आखिरी पत्र याद आया। हाय, वह किनती तन्हा, कितनी अकेली थी। उसने उसके अकेलेपन का कोई ख्याल न किया। कितना निर्दयी रहा हवह अपनी नमीरा के प्रति। जोन वह किन हालात से गुजरी....जाने उस पर क्या बीत गई?

नमीरा के लिखे वे शब्द जैसे बिच्छू बनकर समीर को डसने लगे।
 
उसने नमीर के चेहरे से बालों की लटें हटाई और अपलक उसका चेहरा निहारने लगा। उसकी आंखें डबडबा आई थीं। रौली और होली उसके पीछे हाथ बांधे खड़े थे।

नमीरा का चेहरा देखते-देखते रोशन राय के दिन में टीस-सी उठी...पीड़ा की एक लहर सचूचे बदन की तड़पा गई ओर उसने बेअख्तियार ही नमीरा का चेहरा अपने सीने से लगा लिया। धैये-धीरज जाता रहा.....संयम के तमाम बन्द उसके दुख के रेले में बह गये।

वह फूट-फूट कर रो दिया।

तब रौली हिम्मत करके आगे बढ़ा। उसने समीर राय के कन्धे पर धीरे से हाथ रखा व होले से बोला-"उठे मालिक! हवेली चलें....।"

समीर ने जैसे उसकी बात सुनी ही नहीं। वह नमीरा की लाश को सीने से लगाए चीख-चीख कर रोता रहा। रौली ने अब उसके दोनों कन्धों पर हाथ रखकर धीरे से दबाया और दोबारा कहा-"मालिक, हवेली चलें.... "

और अब एकाएक जैसे समीर को होश आया। उसने अपनी हिचकियों पर काबू पाते हुए जैसे-तैसे कहा-"नहीं, रौली! अब मैं हवेली नहीं जाऊंगा....मैं हवेली छोड़ आया हूं।"

"लेकिन मालिक ऐसा हालत में आप कहां जाएंगे...?" रौली बोला-"यह सब बड़े मालिक को बताना जरूरी है।"

"हां, तो बात देना । उन्हें बता देना कि मैंने अपनी बीवी की लाश वसूल कर ली है। अब मैं उसे अपने साथ लेकर जा रहा हूं...।" समीर की आंखों के आंसू अब रोष में बदलने लगे थे। उसेन नमीरा को दोबारा कालीन पर लिटा दिया और एक झटके से खड़ा हो गया।

खड़ा हुआ तो उसकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। उसके कदम डगमगाने लगे, लेकिन वह कदम जमाये खड़ा रहा।

"मालिक ऐसा न करें....हमरे साथ हवेली चलें.....।" रौली ने हाथ जोड़ विनती की।

"तुम मुझे अभी कहां ले जा रहे थे...?" समीर राय ने खोये-खोये अन्दाज में पूछा।

"मालिक...बम्बई....।" रौली ने जवाब दिया।

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"किसके हुक्म पर.?" समीर ने फिर पूछा।

"बड़े मालिक के हुक्म पर....।" उसने जवाब दिया।

"तो फिर अब क्या हुआ....उनके हुक्म पर बम्बई चला। मैं किसी कीमत पर हवेली नहीं जाऊंगा। यह मेरी आखिरी फैसला है..."

"और मालिका....मालकिन...?" रौली न डरते-डरते पूछा-"उन्हें हवेली ले जाऊं..?"

___ "वह मेरी बीवी है, उसका हवेली से क्या नाता? हवेली वालों ने ही तो उसे इस हाल में पहुंचाया है।" समीर ने नमीरा के करीब बैठते हुए कहा।

रौली ने होली को और होली ने रौली को देखा। उनकी समझ में नहीं आया कि क्या करें? समीर राय अपना फैसल नहीं बदलने वाला था...इसका अहसास उन्हें था, लेकिन रोशन राय को जब इन हालात का पता लगेगा तो वह जोन इन दोनों के साथ क्या बर्ताव करे? यह एक ऐसी सूरतेहाल थी, जिसकी तो शायद कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। कालीन में लिपटी लाश आखिर यहां बीच सड़क पर किसने ला रखी थी? यह महज एक संयोज था या किसी प्लानिंग के तहत नमीरा की लाश को समीर राय के रास्ते में रख दिया गया था?

और फिर यह लाश रखी किसने? कौन था वह शख्स?

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वह एक अनूठी रात थी....।

आकाश के माथे पर चांद किसी दुल्हन के टीके की तरह चमक रहा था। पूरे चांद की रात थी। रेत के समुद्र पर चांदनी किसी चादर की तरह फैली हुई थी, फिर भी यह एक भयावह होलनाक रात थी।

ऐसी उजली-रोशन रात और ऐसी भयावह..?

जब दिलों पर बहशत हो। अगले पल की खबर ने हो कि क्या होने वाला है तो चांदनी क्या करेगी? चांद का सौन्दर्य कौन देखेगा? बाहर का मौसम तो उसी वक्त अच्छा लगता है....जब इन्सान के भीतर का मौसम महका हुआ हो। उसके मन-मस्तिष्क में सुकून हो..... ।

दूर क्षितिज तक फैल रेगिस्तान...किसी मोटे कालीन की तरह बिछी रेत। हौले-हौले बहमी हुई ठण्डी हवा। किसी हसी मनमोहक चेहरे की तरह चमकता हुआ उज्जवल चांद, लेकिन मंत्र-मुग्ध कर देने वाली रात से सम्मोहित होने वाला यहां कोई नहीं था।

नमीरा थी.....लेकिन उसे अपना होश नहीं था।

उस पर जो जुल्म हुआ था, उस पर वह हैरतजदा थी। गुमसुम थी। यह अचानक क्या से क्या हो गयाथा। उसकी एक दिन की बच्ची को उससे छीन लिया गया था और उसे एक तेज रफ्तार ऊंट पर डालकर रेगिस्तान में अकेला छोड़ दिया गया था। उस नन्हीं-सी जान से क्या अपराध हो गया था।

खुद उसे भी यही सजा दी गई थी।

ऊंट तेजी से भागा जा रहा था और उसे अपने आपको सम्भालना मुश्किल हो रहा था। उसकी अपनी हाली ठीक नहीं थी। आज ही तो उसने एक बच्ची को जन्म दिया था । अत्यधिक कमजोरी थी...ऐसी औरत का तो बहुत ख्याल रखा जाता है. लेकिन रोशन राय ने उस पर जुल्म की इन्तहा कर दी थी। बच्ची तो उससे छीनी ही थी.....उसे भी हवेली से निकाल बाहर किया था।

आखिर उसका क्या दोष था?

दोष तो था। वह एक गरीब की बेटी थी। हवेली के इकलौते वारिस से शादी की थी और अब उसने एक लड़की को जन्म दे दिया था। अपराध-ही-अपराध थे....कसूर-ही-कसूर थे उसके । प्रसव पीड़ा सु गुजरी थी वह। अब ऊंट की तेज रफ्तारी ने उसे और भी निढाल कर दिया था। उसकी आंखें धुंधलाई जा रही थीं। दिमाग पर गुब्बार-सा छा रहा था। यही महसूस हो रहा था उसे जैसे वो रेत के अन्दर धंसी जा रही हो। ऊंटट ककी दुम से बंधी घन्टी की टन टन धीरे-धीरे मद्धिम पड़ती जा रही थी।

फिर कुछ देर बाद उसे होश न रहा कि वह कहां है और किस हाल में है।

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