Horror अनहोनी ( एक प्रेत गाथा ) - Page 5 - SexBaba
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Horror अनहोनी ( एक प्रेत गाथा )

नमीरा की लाश, रोशन राय की हवाइ जहाज जैसी गाड़ी की पिछली सीट पर आहिस्ता-आहिस्ता हिल रही थी।लाश पर एक सफेद चादर डाल दी गई थी। लाश के लगातार हिलने की वजह से वह चादर अब उसके चेहरे से हट गई थी। उसका एक हाथ फिसलकर नीचे आ गया था , जो अब लाश के साथ झूल रहा था। नमीरा के चेहरे पर कोमलता थी। एक हल्की-सी मुस्कुराहट थी। यह महसूस ही नहीं होता था कि उसको मरे हुए काफी वक्त हो चुका है ।गाड़ी अपनी फुल स्पीड से सफर तय कर रही थी ।रौली कभी -कभी पीछे मुड़कर देख लेता था। यही देखने को कि लाश किस पोजीश्न में हैं। कहीं हिल-हिल कर सीट के नीचे तो नहीं आ रही |वे मुम्बई से काफी दूर निकल आए थे। वो नमीरा को ठिकाने लगाने निकला था। रोशन राय ने बस इतना ही कहा था कि 'इसे ठिकाने लगा दो'-यह नहीं बताया था कि कहां और कैसे? अब यह मामला उसकी अपनी इच्छा पर था और वह सोच रहा था कि इस काम को कहां और कैसे निपटाया जाए?वह सागर तट के साथ -साथ सफर कर रहा था और शहर से बहुत दूर वीरानों में थी। उसने कुछ सोचा व गाड़ी समुद्र के निर्जन रेतीले किनारे की तरफ मोड़ दी। दूर तक रेत ही रेत थी। ऊंचे-नीचे रेत के टीले फैले हुए थे। गाड़ी जब इस रेतीले रास्ते पर काफी आगे आ गई....तो रौली को यकीन हो गया कि इन वीरानों में किसी इंसान का गुजर मुश्किल है तो उसने एक जगह गाड़ी रोक दी ।उसने अपने साथ बैठे हुए दोनों बन्दों को गाड़ी से उतरने का इशारा किया और खुद भी नीचे उतर गया ।उसने रेत पर खड़े होकर अपनी कमर सीधी की। वह काफी देर से ड्राइविंग कर रहा था। फिर उसने चारों तरफ एक निरीक्षणात्मक निगाह डाली। दूर तक वीराना व सन्नाटा था ।रौली को निकट ही एक गड्डा नजर आया। यह गड्डा दो-तीन फुट गहरा था। इस गड्ढे को अपने काम के लिए चुन लिया। उसने अपने एक साथी की मदद से नमीरा की लाश को गाड़ी से निकाला और उसे धीरे से उस गड्ढे में उतार दिया। उस पर चादर डालकर उसके हाथों-पैरों तले दबा दी। उसे एक तैयारशुदा कब्र मिल गई थी। वे तीनों मिलकर अपने हाथों से रेत को उस गड्ढे में गिराने लगे।तभी रौली को ख्याल आया कि एक प्लास्टिक की बाल्टी गाड़ी में है। उसने वह बाल्टी गाड़ी से मंगवा ली और फिर उस बाल्टी से ही रेत भर-भरकर लाश पर । डालने लगा ।यूं तीनों ने मिलकर शीध्र ही गड्ढे को रेत से ढक दिया।

देखते ही देखते वह एक कब्र-सी दिखाई देने लगी।रौली को जब यह इत्मीनान हो गया कि नमीरा की लाश अच्छी तरह सुरक्षित हो गई हैं तो वह हाथ झाड़ता उठ खड़ा हुआ और गाड़ी की तरफ बढ़ गया। रौली के स्टेयरिंग सम्भालते ही उसके दोनों साथी भी उसके साथ बैठे गये। रौली ने दूर से उसे रेत की कब्र पर एक नजर डाली....और फिर गाड़ी स्टार्ट करके स्टेयरिंग को तेजी से घुमाया। फिर गाड़ी अब वापिस हाई-वे की तरफ जा रही थी गाड़ी जब उस रेत की कब्र से बहुत दूर निकल गई तो पश्चिम दिशा से एक ऊंचे कद का व्यक्ति आता नजर आया ।उसका रूख नमीरा की कब्र था। वो हालांकि एक-एक कदम करके चल रहा था.....दौड़ नहीं रहा था....न तेज चल रहा था। इसके बावजूद यूं लगता था, जैसे वो हवा के घोड़ें पर सवार हो । वो देखते ही देखते कबग के निकट आ पहुंचा ।वह करीब आठ फुट ऊंचे आदमी था। एकदम काला भुजंग! चमकता हुआ काला बदल | उसने कवल एक सफेद चादर अपने शरीर पर लपेट रखी थी। ऊपर का बदन नंगा था और यह चादर भी घुटनों से ऊपर थी। नंगे पांव.....बड़ी और सफेद आंखें....चमकती हुई काली पुतलियां....मोटे-मोटे होंठ.....थोड़ा खुला हुआ मुंह और उसमें से झांकते हुए सफेद दाँत....धुंघराले सख्त बाल......चेहरा दाढ़ी-मूछों से साफ....कन्धे पर एक मोटी-सी जंजीर और उसमें बंधी एक घन्टी...यह घन्टी बायें हाथ के निकट लटकी हुई थी। जंजीर लोहे की थी, जबकि घन्टी पीतल की।जब वे कब्र के निकट आ रहा था, तो यह घन्टी टन-टन बज रही थी।यह अजीबो-गरीब शख्स कन के सामने आ खड़ा हुआ। उसने अपनी दोनों टांगें फैलाई। फिर जंजीर में बंधी हुई घन्टी उतारी। सीधे हाथ में घन्टी की जंजीर पकड़कर घन्टी को एक दायरे में घुमाया....और फिर झुककर बड़े जोर से घन्टी को कब्र पर मारा और बोला-"मैं हूं....हूरा..... "एकदम रेत का बादल-सा उठा और वह 'काला-देव' रेत के इस बादल में छिप गया ।

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एक हॉलनुमा कमरा..... |जिसकी चारों दीवारों में छोटे-छोटे ताख बने हुए थे और इन ताखों में बेशुमार बुत खड़े हुए थे। दीवारें सफेद थीं और कमरे की छत लाल-सुर्ख थी, जबकि कमरे का फर्श ईटों का बना हुआ था और ये ईटें भी सुर्ख थीं कमरे के ठीक मध्य में एक छोटा-सा काला गद्दा बिछा हुआ था और इस पर गुलाबी कपड़ों में एक नवजात बच्ची लेटी हुई थी। वह मुश्किल से दस-बारह दिन की होगी। वह तड़प-तड़प कर रो रही थी शायद भूख से बिलख रही थी ।इस कमरे की हर दीवार में एक दरवाजा था। ये चारों दरवाजे सुर्ख रंक के थे। इन चारों दरवाजों पर एक सुरहने सांप की आकृति बनी हुई थी। यह आकृति सोने से बनाई गई थी और इन सोने में ढलें सांपों को कालों से जड़ दिया गया था |जब बच्ची की चीखें ज्यादा ऊंची होने लगी और वह भूख से ज्यादा बेताब नजर आई तो एकाएक चारों दरवाजे एक साथ खुले और इन दरवाजों से जो चीज बरामद हुई, उसकी वजह से बच्ची एकदम खामोश हो गई ।वे तेज हवा के झोंके थे। यह हवा बगोलों की सूरत में कमरे में दाखिला हुई थी। सागर तट पर चलने वाली हवा से भी तेज थी यह हवा। इस हवा में एक महक-सी रची थी। एक विशिष्ट महम.... |कमरे में एकाएक ही तेज हवा के दाखिल हो जाने की वजह से बच्ची भी घबरा गई थी। उसके शरीर के कपड़ें उड़ें जा रहे थे। उसके नीचे बिछे गद्दे का कोना भी हवा के वेग से बार-बार उठ रहा था। तेज हवा बच्ची की आंखो में घुस रही थी...इसलिये वह अपनी आंखों को बार-बार बन्द कर रही थी। बड़ी खूबसूरत....बड़ी प्यारी-सी बच्ची थी.....हवा की वजह से यूं आंखें झपकाती और भी प्यारी लग रही थी हवा की अचानक आमद ने इस बच्ची को चौंका दिया था। इसलिए वह सहमकर खामोश हो गई थी। पर फिर कुछक क्षणों बाद ही उसने दोबारा रोना शुरू कर दिया। दरवाजे खुलते ही हवाएं जिस तेजी से अन्दर दाखिला हुई थी.....उसी तेजी से वह कमरे से निकल गई थी।

चारों दरवाजे अब भी खुले थे, लेकिन अब कमरे में जरा-सी भी हवा महसूस नहीं हो रही थी। बच्चे के कपड़े भी नहीं हिल रहे थे।बच्ची अब फिर बिलख-बिलख कर रोने लगी थी। उसकी नन्हीं चीखें पूरे कमरे में गूंज रही थी। वह भूख से बेहाल थी और कोई पूछने वाला नहीं था। हवा भी बस चक्कर लगाकर चली गई थी। वह और कर भी क्या सकती थी ।फिर सहसा...तीन दरवाजे धाड़-धाड़-धाड़ करके बन्द हो गये। यूं महसूस हुआ जैसे किसी ने इन दरवाजों के भारी किवाड़ों को जोर से धक्का देकर बन्द कर दिया हो।बन्द होते दरवाजों की धमाकेदार आवाजों की वजह से एक बच्ची रोते-रोते एक बार फिर चुप हो गई। दरवाजे बन्द होने की आवाज पर वह मारे डर के लेटे-लेटे उछल-सी जाती थी ।अज आवाजें आनी बन्द हो गई तो उसने फिर रोना शुरू कर दिया।फिर चौथे दरवाजे से, जो अभी तक खुला हुआ था....एक औरत अन्दर आई थी। वह काले लिबास में थी। सांवली रंगत....घने बाल......मुस्कुराती हुई काली आंखें। वह एक मदमाती अदा के साथ कमरे में दाखिल हुई और तेजी से चलती हुई उस बच्ची के पास पहुंची । उसने ईटों के फर्श पर बैठकर उस बच्ची को गद्दे सहित उठाकर अपनी गोद में लिटा लिया ।बच्ची बार-बार मुंह खोल रही थी। हाथ-पांव मार रही थी। उसके नन्हें से प्यारे-प्यारे होंठ कांप रहे थे

उस औरत ने बच्ची को बड़े प्यार से अपने सीने से लगा लिया ।बच्ची बड़ी बेताबी से और हुमक-हुमक कर दूध पीने लगी। वह औरत बच्ची के छोटे-छोटे सुनहरे बालों पर धीरे-धीरे हाथ फेरने लगी। पेट भरती ही बच्ची की खूबसूरत आंखें बन्द होने लगीं। फिर उसने दूध छोड़ दिया और गहरी नींद सो गई ।बच्ची सोते हुए इतनी सुन्दर लग रही थी कि वह औरत उसे प्यार किये बिना नहीं रह सकी। फिर उसने बच्ची को गद्दे सहित पुनः फर्श पर लिटा दिया और एक काली चादर से उसका मुंह ढककर खड़ी हो गई। तभी पीले कपड़े पहने एक औरत उस कमरे में दाखिल हुई और उसने आते ही बच्ची को अपनी गोद में उठाया और एक बन्द दरवाजे की तरफ बढ़ी |वह दरवाजे के निकट पहुंची तो दरवाजा खुद-ब-खुद खुल गया...यह औरत बच्ची को उठाये, उस दरवाजे से निकल गई।उस औरत के निकलते ही दरवाजा खटाकू से बन्द हो गया।अब वह पहले वाली औरत, जिसने बच्ची को दूध पिलाया था, वह खुले दरवाजे की तरफ बढ़ी। उसके चलने का एक खास अन्दाज था । वह बड़ी अदा के साथ लहराकर चल रही थी।इस औरत ने 'उसे दरवाजे से दाखिल होत हुए देख लिया था और उसे देखते ही उसकी आंखों में एक नफरत जाग उठी थी।"वों' और कोई नहीं, एक नाग था। काला नाग। वो बदलखाता हुआ बहुत तेजी के साथ कमरे में दाखिल हुआ और फन फैलाकर उस औरत के सामने खड़ा हो गया। जैसे उसका रास्ता रोक लेना चाहता हो ।वह औरत चलते-चलते रूक गई और उसे सर्द निगाहों से देखते हुए बोली-"क्या चाहता हैं तू....? क्यों बार-बार मेरे रास्ते में आता हैं? क्या तुझे अपनी जिन्दगी प्यारी नहीं..?"

उस काले नाग ने अपने फन को दायें-बायें घुमाया, अपनी जिव्हा लपलपाते हुए अपनी आंखे उस औरत पर जमा दी .....जैसे कहता हों-" इश्क बिना क्या जीना.....?"

"कुछ शर्म कर सोनेता..... तू जानता हैं कि तेरा इस तरह बार-बार मेरे रास्ते में आना....मेरी राह रोककर खड़े हो जाना बेकार है। तू जानता हैं कि मैं कौन हूँ? मैं तबूह हूं....एक ऐसा पत्थर जिस पर किसी चीज का असर नहीं होता। अगर तेरे दिल में मुझे डसने की हसरत हैं तो फिर आ जा....डस लें... ।'"यह कहकर तबूह जमीन पर अपने घुटने टेककर बैठ गई और अपने दोनों हाथ फैला दिये |वो काला नाग जिसे तबूह ने सोनेगा कहकर पुकारा था... वो तेजी से उसकी तरफ बढ़ा और उसके बिल्कुल नजदीक पहुंचकर फिर अपना फन फैलाकर खड़ा हो गया। अत तबूह के हाथ और उसके फन के बीच दो-तीन इंच का फासला था। सोनेता, जरा-सा झुककर ही उसके हाथ को आसानी से काट सकता था ।डाले देख रहे थे। तबूह की आंखों में रोष बढ़ता जा रहा था....जबकि सोनेता की आंखों में चाहत उभरती आ रही थी। वह एक ऐसा प्रेमी दिख रहा था, जिसे अपनी प्रेमिका की बेरूखी बर्दाश्त नहीं हो रही थी और आज जैसे उसने कुछ कर गुजरते का फैसला कर दिया था।
 
“अब इन्तजार किस बात का है? तूने मेरे निकट आने का दुस्साहस कर लिया हैं तो अब शुरू हो जा......" यह कहकर तबूत ने अपना हाथ उसके बिल्कुल करीब कर दिया ।सोनेता ने किसी मदमस्म की तरह उसकी खूबसूरत उंगली पर जोर से फन मारा....और उसकी उंगली में दो दांत गाड़ दिये ।बस, ये चन्द लम्हें ही उसे जैसे मिलन के मिले..... उसने जब पीछे हटकर तबूत के हाथ को दोबारा डसना चाहा तो वह ऐसा नहीं कर सका ।वो झूम-सा गया। उसका वार खाली गया। वह कुछेक क्षण ईटों के फर्श पर लोटता नजर आया और अपनी जान गंवा बैठा।तबूह ने उसे बड़ी नफरत व तिरस्कार से देखा..फिर बड़ी गरिमा पूर्ण अदा के साथ उठी। उसने अपनी उंगली, जहां सोनेता ने दांत मारे थे.....अपने मुंह में ले ली और फिर कमर लहराती, अदा के साथ चलती हुई कमरे से निकल गई ।तबूह के कमरे से निकलते ही वह चौथा दरवाजा भी बन्द हो गया ।

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पीले लिबास वाली औरत उस बच्ची को गोद में उठाये, सीढ़ियां चढ़ती एक दरवाजे पर पहुंची। फिर उसने बच्ची को एक हाथ में सम्भालकर दरवाजे पर जोर से एक हाथ मारा |कुछ ही क्षणों में वह दरवाजा खुल गया। पीले लिबास वाली औरत कमरे में दाखिला हुई। यह एक छोटा कमरा था, मगर इस कमरे में भी चार दरवाजे थे। इस कमरे की दीवारे भी सफेद थीं.....और छत सुर्ख । फर्श लाल ईटों का था। कमरे में मध्य एक चौकी पड़ी हुई थी।जिस औरत ने दरवाजा खोला था, उसने भी पीले कपड़े पहन रखे थे, लेकिन यह औरत जरा प्रौढ़ावस्था की थी।"नैनी, आ गई तू......? लें आई बरहा को...?" उस प्रौढ़ा ने पूछा।

हां, ले आई हूं दरसी! सो रही हैं... नैनी ने बताया ।

"चौकी पर लिटा दें......।" प्रौढ़ा दरसी ने कहा ।

नैनी आगे बढ़ी। उसने बच्ची, जिसका नाम शायद 'बरहा' था.....को कमरे के मध्य में रखी चौकी पर लिटाया और फिर वापिस दरवाजे की तरफ पलट गई। प्रौढ़ा दरसी अभी दरवाजे पर ही खड़ी थी, उसे शायद नैनी के लौटने की इन्तजार थी नैनी ने उसके निकट पहुंचकर कहा-"अच्छा, चलती हूं। तुम दरवाजा अच्छी तरह बन्द कर लो...... ।

'"ठीक हैं..... ।'' प्रौढ़ा ने मुस्कुराकर कहा और नैनी के जाने के बाद व दरवजा अन्दर से बन्द करने के बाद बरहा के पास पहुंची। उसने बरहा के चेहरे से काली चादर हटाई। वह मासूम बच्ची बड़े मजे से सो रही थी। नींद में वह इतनी प्यारी इतनी सुन्दर लग रही थी कि दरसी ने उसे बेअख्तियार चूम लिया ।यूं तो इस प्रौढ़ा दरसी ने अब तक कई बच्चियों की परवरिश की थी और जाने वाली बच्चियां एक से बढ़कर एक होती थी। बरहा इतनी प्यारी थी कि उसके चेहरे पर नजर डालकर बन्दा उस मोहिनी सूरत के जाल में फंस जाता था। उस पर से नजर हटाना मुश्किल हो जाता था ।

बरहा को जब पहली बार उसकी गोद में डाला गया था, तो उसे मंत्र-मुग्ध-सी देखती रह गई थी। उसे बताया गया था कि यह 'परमान' का चुनाव हैं, इसका खास ख्याल रखा जाए। परमान' ही था.......जिसने अपनी रहस्यामय शक्तियों 'बरहा' का पता चलाया थाप और फिर उसी ने देवांग को बच्ची को हासिल करने के लिए रवाना किया था |चमकते सिर बाले देवांग ने रोशन राय को उसके बाग के रास्ते पर रोक लिया था। एक तो पौत्री की पैदाइश......वह भी एक ऐसी अशुभ व खतरनाक पौत्री की, जो पैदा होते ही हवेली को सुनसान कर दे......हवेली में हर तरफ सांपों की फुफकार सुनाई दे। एक सांप तो पहले से ही रोशन राय के पीछे पड़ा हुआ था.....अब अपनी इस पौत्री को हवेली में रखकर अपने आपको तबाह नहीं करना चाहता था रोशन राय को वैसे भी बेटियों-पौत्रियों से नफरत थी, फिर यहां तो उसे उसे अपने बेटे की विवाहिता नमीरा भी पसन्द नहीं थी।

नमीरा को उसने समीर की वजह से ही हवेली में पनाह दे रखी थी। नमीरा उसकी आंखों में खटकती रहती थी और वह नमीरा से छुटकारा पाने के मन्सूबे बनाता रहता था कि कुदरत ने अपना खेल खेला था ।देवांग की भविष्यवाणी ने उसे राह दिखाई थी और उसका सारा मसला ही हल कर दिया था। उसने पौत्री के साथ-साथ मनहूस बहू से भी निजात पा ली थी।इस नवजात बच्ची का नाम बाद में परमान ने ही बरहा रखा था, जिसे एक ऊंट पर डालकर रेगिस्तान में हांक दिया गया था। तब कुछ दूर तक तो रोशन राय का वह वफादार जो घोड़े पर सवार था.......उस ऊंट के पीछे-पीछे गया, फिर जब उसने देखा कि वह ऊंट अपनी दुम में बंधी घन्टी की आवाज पर नाक की सीध में दौड़ा चला जाता हैं तो उसने अपना घोड़ा वापसी के लिए मोड़ लिया था |ऊंट पर पालना बंधा था और बिलख कर रोई थी....पर फिर रोते-रोते उसे नींद आ गई थी।

ऊंट रेगिस्तान में सफर करता रहा। यहां तक कि सुबह हो गई। सूरज अभी नहीं निकला था...लेकिन उजाला अच्छा-खासा फैल गया था |ऊंट ने अब दौडन बन्द कर दिया था। उसकी दुम में बंधी घण्टी खुलकर कहीं गिर गई थी। ऊंट तेज-तेज चला जा रहा था कि अचानक एक घोड़े पर सवार हूरा प्रगट हुआ। इस काली चमड़ी वाले वहशी ने ऊंट की नकेल पकड़कर उसे रोका......पालने में से बरहा को निकाला और फिर घोड़े पर सवार होकर रेत उड़ाता हुआ, पश्चिम दिशा की तरफ रवाना हो गया ।अभी सूरज की पहली किरण ही फूटी थी कि हूरा के सामने एक घना जंगल नमुदार हुआ, वो उस जंगल में प्रवेश कर गया। फिर जंगल के घुमाबदार रास्तों पर घोड़ा दौड़ाता हुआ सुर्ख ईटों से बनी एक ऊंची मायावी इमारत के सामने पहुंच गया। इस किलेनुमा इमारत के भारी दरवाजे के सामने पहुंचकर वह घोड़े से उतरा और झूमता हुआ दरवाजे की तरफ बढ़ा । मैं हूं हूर..... ।”

दरवाजा एकदम खुल गया। इस किलेनुमा इमारत के अन्दर छोटे-बड़े सुर्ख मकान बने हुए थे। इन मकानों के तमाम दरवाजे सफेद थे।हूरा सबसे बड़े एक हवेलीनुमा मकान के सामने आकर रूका था। इस हवेली की दीवारें सफेद व दरवाजे सुर्ख थे।यह इस मायावी लोक के परमान का महल था।

"मैं हूं हूरा......।'' उस अफ्रीका के हब्शीनुमा काले देव ने दरवाजे पर खड़े दरबान को देखकर नारा लगाया।

"जानता हूं....जानता हूं....।" दरबान बेपरवाही से बोला-"काम बताओ.....।''

"जानता है तो फिर यहां खड़ा क्यों हैं? अन्दर जा और परमान को बता कि कौन आया हैं। जरा जल्दी कर, मेरे पास वक्त कम हैं..... ।" हूरा ने उसे डपटकर कहा ।
 
“जानता हूं...जानता हूं....जरा छुरी तले दम तो ले.....।" दरबान ने बदस्तूर लापरवाही से कहा और आराम से चलता हुआ दरवाजे पर पहुंचा और दरवाजा खोलकर अन्दर चला गया ।दरबान के अन्दर जाने के बाद नन्ही बरहा कसमसाई, तब हूरा ने उसके चेहरे पर से कपड़ा हटा दिया। उसने एक उचटती-सी नजर बच्ची पर डाली...वह फिर उसे देखता ही रह गया । उस पर से अपनी नजर हटा नहीं सका। पत्थर दिल हूरा भी बच्ची के मासूम हुस्न से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका था ।बच्ची किसी फूल की तरह नजर आ रही थी। हूरा ने बेअख्तिायार ही अपनी काली और मोटी उंगली से बच्ची के गाल को छुआ।बच्ची एकदम चौंककर रोने लगी

तभी दरबान ने अन्दर से बाहर आकर आवाज लगाई-"जाओ.....हूरा....।"हूरा जल्दी से दरवाजे में दाखिल होकर सीढ़ियां उतरने लगा। ये सीढ़ियां जहां खत्म होती थी, वहां कुछ फासले पर एक कमरा बना हुआ था। इस कमरे का दरवाजा खुला था और जहां तक सूरज की रोशनी जा रही थी.....वहां तक सफेद संगमरमर का फर्श नजर आ रहा था। आगे अंधेरा था ।इस दरवाजे पर एक काला नाग कुण्डली मारे बैठा था। हूरा को निकट आते देखकर उस काले नाग ने अपना फन उठाया और वापिस पलटकर अन्धेरे कमरे में चला गया ।इस दरवाजे पर एक काल नाक कुण्डली मारे बैठा था। हुरा को निकट आते देखकर उस काले नाग ने अपना फन उठाया और वापिस पलटकर अन्धेरे कमरे में चला गया |कुछ क्षणों बाद ही अन्दर से तबूह नमुदार हुई। सांवली रंगत.....कमर पर नीचे तक लहराते बाल...आकर्षक.....नशीली चाल...वह दरवाजे पर आकर रूक गई। हूरा ने हसरत भरी गहरी नजरों से इस मदमति यौवन के ठाठे मारते समुद्र को देखा। तबूह ने इन नजरों को महसूस कर दिया, लेकिन अनजान बन गई। उसने एक आये-खास से अपने हाथ ऊपर उठाये....वह बोली कुछ नहीं हूरा ने बच्ची को उसके हाथों में दे दिया और बोला-"कैसी हो तबूह......?"

तबूह को उसकी यह बेतकल्लुफी बुरी लगी। उसने जलकर कहा-"तेरी आंखें खराब हो गई हैं क्या...?"

"नहीं तो.....।" हरा उसकी बात नहीं समझ सका। बड़ी मासूमियत से बोला।"फिर मैं क्या तुझे भली-चंगी नजर नहीं आ रही..."

तबूह ने उसे घूरा ।"आ तो रही हैं........क्यों नजर नहीं आ रही है.......।

''बस तो फिर जा...अब तेरा काम खत्म हुआ। परमान का यही हुक्म हैं तेरे लिए........।"

तबूह ने तीखे लहजे में कहा।

"ठीक हैं.......चलता हूं मैं........।" हूरा ने कहा व पलट लिया ।उसके जाने के बाद तबूह ने बरहा पर नजर डाली और 'हाय' कहकर उसे अपने सीने से चिपटा लिया व फिर जैसे अपने आपसे बोली-“वाह परमान! तेरा चुनाव लाजवाब हैं............ ।'"वह बरहा को अन्दर ले गई । उसके जाने के बाद एक काला नाग प्रकट हुआ और दरवाजे पर कुण्डली मारकर बैठ गया और अपना फन उठाकर दायें-बायें देखने लगा, जैसे निगरानी कर रहा हो रहस्यमय शक्तियों के मालिक परमान को कुछेक लोगों के सिवाय किसी ने नहीं देखा था। वह अन्धेरों का वासी था। अन्धेरों में गुम रहता था। तबूह ने परमान के हजूर में नन्हीं बरहा को पेश किया.....वहां से हुक्म मिला कि 'बरहा'को दरसी के हवाले कर दो.....वही उसकी परवरिश करेगी और तुम उसे दूध पिलाओगी |इस हुक्म के साथ ही बच्ची का नाम बरहा रख दिया गया ।इस तरह प्रौढ़ा दरसी, बरहा की सरपरस्त बन गई और तबूह, दाई मां... नैनी के जाने के बाद दरसी ने बरहा के कपड़े बदले, उसे साफ-सुथरा करके दोबारा चौकी पर लिटा दिया। बारहा अब दरसी को पहचानने लगी थी। उसने अपनी अपनी चमकती आंखों से दरसी को देखा और हाथ-पांव चलाने लगी। दरसी चौकी पर बैठकर उसे प्यार भरी नजरों से देखने लगी।अचानक दक्षिण दरवाजे पर एक खटका-सा हुआ। दरसी ने फौरन दरवाजे की तरफ देखा। एक फुफकार सुनाई दी। इस फुफकार को सुनकर दरसी सहम गई। वह धीरे-धीरे चलती दरवाजे के करीब आई वे बड़े आदर के साथ बोली-"अभी नहीं, अभी तुम चले जाओ। परमान के हुक्म का इन्तजार करों...... ।"

दरवाजे पर एक हल्का-सा खटका हुआ....जैसे किसी सांप ने अपना फन दरवाजे में मारा हो। उसके बाद फुफकारने की आवाज आई और फिर कुछेक क्षणों बाद सन्नाटा छा गया ।प्रौढ़ा दरसी खतरा टल जाने के बाद दौड़ती हुई, नन्हीं बरहा के पास आई और उससे खेलने लगी।।

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समीर राय अभी हस्पताल ही में था ।उसे सुकूनबख्श दवाएं दी जा रही थीं। उससे उसे इतना फायदा हुआ कि वह अपनी दुनिया में लौट आया, लेकिन उसे अब बोलना छोड़ दिया था। वह बिल्कुल खामोश बैठा शून्य में घूरता रहता। कुछ दिन हस्पतला में रखकर डॉक्टरों ने उसे घर ले जाने का मशवरा दिया, ताकि वह घर में रहकर अपनी सामान्य जिन्दगी की तरफ लौट जाए ।रोशन राय और नफीसा बेगम अपने बेटे को हवेली में ले आए। उसे मुम्बई के बंगले में अकेला नहीं छोड़ा जा सकता था और नफीसा बेगम वहां रहने के लिए तैयार नहीं थी।हवेली में, समीर राय जेसे अपने कमरे में कैद होकर रह गया था। वह अपने कमरे से निकलता ही नहीं था। मां ही उसके कमरे के चक्कर लगाती रहती थी।

उसका खाना-पीना सब कमरे में ही था। समीर राय अपनी मां से भी सिर्फ 'सलाम' कहकर किसी कोने मे जा बैठता.....और अपनी मां को अजनबी व खाली-खाली नजरों से देखता रहता।उसने नमीरा की लाश पाकर भी अपनी मां से किसी प्रकार की शिकायत करने की कोशिश नहीं की थी। मां के साथ यह छूट भी रखी थी कि वह उन्हें 'सलाम' कह दिया करता था.....और उन्हें अपने कमरे में बर्दाश्त भी कर लेता था, लेकिन बाप के साथ उसकी बोल-चाल बन्द थी। शुरू-शुरू में रोशनी राय एक-दो बार उसके कमरे में आया था, तो समीर राय, मुंह फेरकर अपने कमरे से ही निकल गया था और तब तक वापिस नहीं आया था, जब तक कि उसे यकीन न हो गया कि रोशन उसके कमरे से जा चुका है |बेटे का रवैया देखकर रोशन राय ने खुद ही उसके कमरे में आना छोड़ दिया था ।नफीसा बेगम.....अनुरोध...विनय करके समीर को हवेली के बाग में ले जाती थी। वह भी मां की जिद्द पर चला ता जाता था, लेकिन लॉन चेयर पर बैठा नीले आकाश को ही देखता रहता था। ऐसे वक्त में नफीसा बेगम इस बात का ख्याल रखती थी कि रोशन राय बाग में न आ निकले ।रोशन राय को अपने धन्धों से ही फुर्सत न थी, फिर आजकल तो वह नमीरा को कत्ल का इन्तकाम लेने की फिराक में था। नमीरा की कालीन में लिपटी हुई लाश उसकी आन का सवाल बन गई थी।रोशन राय कुछ ऐसे ही मिलाज का व्यक्ति था। यह वही नमीरा थी, जिसे उसने इसलिये वीरान रेगिस्तान में छुडवा दिया था कि वह भूखी-प्यासी चल बसे और रेत के टीले उसकी कब्र बन जाये। उसने अपने हाथा नमीरा की मौत का इन्तजाम किया था, लेकिन वही नमीरा जब उसके लिए कालीन में लिपटी लाश की सूरत में भेजी गई तो उसका इन्तकाम का जज्बा एकाएक भड़क उठा नमीरा उसकी बहू थी और उसके दुश्मन न उसे कत्ल कर दिया था...सो उसके कत्ल का बदला तो उसके लिए बहुत जरूरी हो गया था। वह अब हर वक्त इन्तकाम की ही आग में जलता रहता था....और सोचता रहता था कि राजा सलीम से नमीरा के कत्ल का इन्तकाम किस तरह लिया जाए?सोचते-सोचते अंतत: वह इसी निष्कर्ष पर पहुंचा कि राजा सलीम के बेटे का उपहरण करवा लिया जाये। इससे पहले वह राजा सलीम के बेटे की बहू को डाकुओं से खरीद चुका था और उसे कत्ल करवा चुका था। अब उसने राजा सलीम के बेटे नसीम को किडनैप कराने का मन्सूबा बनाया |

रोशन राय के हाथ बहुत लम्बे थे। उसके हाथ मुम्बई तक फैले हुए थे। मुम्बई के अण्डरवर्ल्ड और गैंगस्टरों तक पहुच थी उसकी। रौली और होली हालांकि बड़े काम के आदमी थे.....लेकिन रोशन राय सिर्फ उन्ही पर ही निर्भर नहीं रहता था। उसने इस बार रौली और होली को हवा भी न लगने दी और अपने मुम्बई के भाड़े के जरायमपेशा लोगों ने नसीम का अपहरण करा लिया ।यह अपहरण किसी फिरौती के लिये नहीं था, बल्कि इन्तकाम की खातिर था |जैसे को तैसा कर दिखाते हुए रोशन राय ने अपहरण के दो दिन बाद ही उसी कालीन में सलीम की लाश लिपटा कर उसकी हवेली के बड़े दरवाजे रखवा दी और मोबाइल पर वैसा ही जहरीला कहकहा राजा सलीम को सुना दिया जैसा उसने नमीरा की लाश भेजकर सुनाया था |रोशन राय के दिल में जैसे ठण्ड पड़ गई थी।वह आज बहुत खुश था। इसी खुशी में झूमता हुआ वह समीर राय के कमरे में चला गया था। नफीसा बेगम उस वक्त कमरे में मौजूद थी। वह अपने पति को बेटे के कमरे में पाकर हैरान रह गई। समीर राय की नजरे भी जैसे अपने बाप पर पड़ी, वह खाना छोड़कर उठ गया....और दरवाजे की तरफ बढ़ा रोशन राय एकदम उसके सामने आ गया और कहकहा लगाकर बोली-"बस बेटा, एक मिनट...... एक खुशी की खबर सुनते जाओ......।"

समीर राय फिर भी न रूका तो रोशन राय ने उसके दोनों हाथ पकड़ लिया जल्दी से बोला-“मैंने नमीरा का इन्तकाम ले लिया हैं। मैंने नमीरा के कातिल के बेटे को कत्ल करवा कर उसी कालीन में उसकी लाश भिजवा दी है। बेटा, अब तो तुम खुश हो ना....... । इस खबर का समीर पर कोई असर न हुआ। रोशन राय ने सोचा था कि शायद वह खुश हो जाएगा और यह सुनकर उससे कम से कम बोलना तो शुरू कर ही देगा। पर यह खबर सुनकर समीर राय ने एक झटके से अपने हाथ छुड़ाये और कमरे से बाहर निकल गया ।हैरान परेशान सा राशन राय नफीसा बेगम की तरफ देखने लगा नफीसा बेगम ने भी उसके इस 'कारनामे' पर कोई तवज्जों नहीं दी। वह भी खामोशी के कमरे से निकल गई ।रोशन राय कमरे में अकेला खड़ा रह गया।

वही हॉलनुमा कमरा ।जिसकी दीवारों में बेशुमार ताख बने हुए थे और इन ताखों में ब्रेशुमार छोटे-छोटे बुत सजे हुए थे। कमरे के ठीक मध्य में काली चादर पर नन्हीं बरहा बैठी थी। उसके कुछ फासले पर दो-चार छोटे-बड़े सांप इधर-उधर लहरा रहे थे ।...... लेकिन उनमें से कोई बच्ची के निकट आने की हिम्मत नहीं कर रहा था नन्ही बरहा बैठी रो रही थी। वह भूखी थी शायद और फिर जब वह रो-रो कर हलकान होने लगी तो उस बड़े कमरे के चारो दरवाजे एकदम खुले और उन दरबाजों से पहले की तरह अचानक तेज हवा अन्दर आई इस हवा में एक महक-सी रची थी....एक खास महक नन्ही बरहा रोते-रोते एकदम चुप हो गई।

फिर हवा एकदम रूक गई। बरहा फिर रोने लगी, तब एकाएक तीन दरवाजे धाड़-धाड़ बन्द हुई और चौथे दरवाजे से तबूह ने अन्दर प्रवेश किया। उसके हाथ में एक छोटी-सी काली ट्रे थी। ट्रे में एक सफेद प्याजा, एक प्लेट से ढका हुआ रखा था ।तबूह अपनी विशिष्ट मदमाती चाल से चलती हुई नन्ही बरहा के पास पहुंची। ट्रे काली चादर पर रखी। तबूह को देखकर बच्ची एकदम चुप हो गई और खुशी से अपने हाथ हिलाने लगी। बरहा की आंखे ट्रे पर जमी हुई थी। उसका बस नहीं चल रहा था कि किस तरह वह इस प्याले पर टूटे पड़े।"सब्र-बरहा-सब.....।' तबूह ने मुस्कुराते हुए उसे अपनी गोद में ले लिया वह सफेद प्याला ट्रे से उठाकर उसके मुंह से लगा दिया |प्याले में कोई शर्बत जैसी चीज थी। बरहा वह शर्बत जल्दी-जल्दी बड़ी बेकरारी से पी गई। इस शर्बत को पीते ही उसे पर नशा-सा छा गया और वह तबूह की गोद में बैठे-बैठे ही सो गई ।बरहा के सोते ही नैनी कमरे में दाखिला हुई। उसने बरहा को तबूत की गोद से उठाया और कन्धे से लगाकर एक बन्द दरवाजे की तरफ बढ़ी। जब वह दरवाजे के करीब पहुंची तो वह दरवाजा खुद-ब-खुद खुल गया और नेनी कमरे से निकल गइ नैनी के कमरे से निकलते ही दरवाजा खटाक से दोबारा बन्द हो गया।

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आज की रात रोशन राय पर बहुत भारी थी।उसका दिल शाम ही से उचाट था। इसलिए अपने दोस्तों में बैठकर ताश खेलता रहा था। पीने-पिलाने का चक्कर भी लचाया था। रात को 'मुजरे' की महफिल भी जताई थी, लेकिन दिल था कि किसी तौर पर बहलता ही नहीं था।दिल पर एक बोझ-सा था। यह नामालूम बोझ उसे एकदम उदास कर देता था ।एक तरफ तो उसके दिल पर उदासी छाई थी..... दूसरी तरफ वह एक दूसरी उलझन का शिकार था। बैठे-बैठे अचानक ही उसे अपनी टांग पर कोई रस्सी-सी लिपटती और रेंगती महसूस होती थी। उसे फौरन सांप का ख्याल आता। वह घबराकर अपनी टांग उठा लेता और उसके दोस्त उसकी इस हरकत पर हैरान होकर उसे देखने लगते ।“क्या हुआ......कोई पूछता।"ओह......कुछ नहीं साई! टांग पर कोई चीज चलती हुई महसूस हुई...'"रोशन राय जवाब देता |बात आई-गई हो जाती, लेकिन रोशन राय अच्छी तहर जानता था कि आज कोई गड़बड़ जरूर है। उसका दिल हौल खाने लगता था । जाने क्या होने वाला था |आज की रात उस पर बहुत भारी थी।

उस बड़े हॉलनुमा कमरे के चारों दरवाजे एक साथ खुले ।हवा के तेज झक्कड़ अन्दर दाखिल हुए। इस तेज हवा में एक महक रची-बसी थी। एक अजीव महक और इस बड़े कमरे में इस वक्त कोई भी नहीं था। हवा के बन्द होने के बाद एक दरवाजे से एक शख्स बड़े ही शहाना अन्दाज मे चलता हुआ अन्दर आया। उसने एक सुनहरी सांप कुण्डली मारे बैठा था। इस सांप की आंखों में हीरों जैसी चमक थी और वह उसके सिर पर कुछ इस अंदाज से लिपटा हुआ था कि वह सिर का ताज मालूम होता था ।इस सुनहरी सांप के अलावा....एक काले रंग का चमकदार सांप उसके गले में थी पड़ा हुआ था, उसके नंगे पांव छोटे व खूबसूत थे ।इस सुनहरी सांप के अलावा....एक काले रंग का चमकदार सांप उसके गले में भी पड़ा हुआ था, उसके नंगे पांव छोटे व खूबसूरत थे ।इस अनूठे शख्स के अन्दर अपने के बाद उसी दरवाजे से उसके पीछे चलती एक खूबसूरत रूपसी अन्दर दाखिल हुई। यह रूपसी भी तड़क-भड़क लिबास में थी। इन दोनों के भीतर आते ही कमरे के तीन दरवाजे एक के बाद एक बन्द हो गये। बस एक दरवाजा ही खुला रह गया था।

वो शख्स बड़ी गरिमा के साथ चलता हुआ......दीवारों में बने ताखों की तरफ बढ़ा । वह इन ताखों में रखी मूर्तियों को बड़ी दिलचस्पी से देखता हुआ आगे बढ़ रहा था।फिर वह एक ताख के सामने रूक गया ।उस शख्स ने ताख में रखी मूर्ति को उठाया। वह किसी नौजवान का बुत था। उसने इस बुत को दो-चार कदम आगे बढ़कर एक दूसरे ताख में रख दिया। इस ताख में पहले ही एक नंदयवुती का बुत मौजूद था।और अब पूरे कमरे में यह इकलौता ताख था, जिसमें अब दो मूर्तियां थी। परमान....! यह तूने बहुत अच्छा किया... तेरे इस फैसले से बहुत खुश हूं...।'' उस रूपसी ने प्रसन्नता दर्शाई।लेकिन रहस्यमयी ताकतों का मालिक, इस मायावी लोक के राजा परमान ने उस रूपसी की बात को अनसुना कर दिया। उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई थी। वह अपने काम में मगन रहा। उसने आगे बढ़कर इसी तरह एक दो मूर्तियों के आले बदल डाले। अभी वह इस काम में व्यस्त था कि अचानक तबूह इस कमरे में दाखिल हुई।

"क्या हैं..." तबूह को देखकर परमान के साथ वाली रूपसी के माथे पर एकदम बल पड़ गये। उसे तबूत का आना बहुत नागवार गुजरा। उसने उसे देखते ही अपनी अप्रसन्नता जाहिर कर दी ।परमान, जो इस वक्त एक ताख से बूत उठा रहा था, एकदम रूक गया। उसने गर्दन घुमाकर पहले अपने साथ आने वाली रूपसी को देखा और फिर तबूत पर नजर डाली ।

"रानी मलायका.... ।” परमान के अन्दाल में सांप की-सा फुफकार थी---तबूह को आने दोऋऋऋ'आ तो गई हैं, और कैसी आएगी....।”

रानी मलायका ने शुष्क स्वर में जवा दिया। हां, तबूह.....

इस वक्त तुम्हें यहां क्या चीज ने आई? तुम जानती हो कि यह वक्त फैसले का हैं......

''जानती हूं, परमान.....क्षमाप्राथी हूं...'तबूह बड़े आदर से बोली।“

जाओ, माफ किया..... ।” राजा परमान ने उसे गहरी नजरो से देखा।

एक 'फैसला' करवाना हैं परमान...।" तबूह की हिम्मत बढ़ी।

अब तेरा इतना हौसला हो गया कि तू अपनी मर्जी के फैसले करवाने के लिए अन्दर आने लगी...... ।' रानी मलायका गुस्से से बाली।

"रानी मलायका.....।" रहस्यमयी ताकतों के मालिक परमान न उसे कठोर नजरों से देखा-" तुम खामोश रहो......।

"रानी मलायका के सामने तबूह की भला औकात ही क्या थी। वह महज एक राज-नर्तकी थी। सो, परमान की चेतावनी ने रानी के दिल में आग लगा दी । वह चुप हो गई कि परमान के सामने कुछ और बोलना, उसे किसी मुसीबत में भी डाल सकता था.........लेकिन उसने दिल-ही दिल में फैसला कर लिया कि वह इस 'नाचने वाली को अपने इस अपमान का मजा जरूर चखा कर रहेगी।

हां, तबूह बोलो...... ।” परमान उसने सम्बोधित हुआ।

“परमान...सलाओं ने मुझे परेशान कर रखा है। उसके आंसू अब मुझसे नहीं देख जाते, परमान तू उसे इजाजत क्यों नही दे देता.....।" तबूह ने अपनी समस्या सामने रखी।

"इज्जत देना या न देना परमान के अधिकार में हैं....तू हद से न बढ़......।' परमान का सुर बदल गया।

"मैं क्षमा चाहती हूं परमान! मेरा मतलब यह न था.... ।''

"तेरा जो मतलब भी होगा......बात संक्षेप में कर. मेरे पास वक्त कम है।"परमान बदस्तू शुष्क स्वर में बोला ।

“सलाओ के साथ एक 'इन्सान' ने बहुत जुल्म किया है |काफी समय पहले 'उसने' उसकी जोड़ी को मार दिया था। सलाओ अपना प्रतिशोध चाहता हैं। वह रो-रोकर हलकान हो चुका है। उसे इत्नकाम की इजाजत दी जाये.....।" तबूह ने बड़ी नम्रता के साथ अपनी बात पूरी की ।

"अच्छा.....।" यह कहकर परमान तेजी से चलता हुआ एक 'ताख' के पास पहुंचा। यहां अधेड़ उम्र की मूर्ति थी। उसने इस मूर्ति को अपने हाथ में उठाकर देखा और फिर उससे सम्बोधित होते हुए बोला-"सलाओ, तुझे इजाजत हैं.....तू जिस तरह चाहे उससे' इन्तकाल ले। अब तक हमने तुझे रोका हुआ था, तो उसके पीछे एक नीतिगत रहस्य था और वस बादशाह ही जानता है। जा, अब तू आजाद हैं.....।"उसने ‘सलाओं का बुत ताख में रखा और तबूत की तरफ रूख करके बोला –"तबूह अब तुम खुश हो.....

''बेहद खुश.....।" तबूह वाकई बहुत खुश हो गई थी और खुशी उसके चेहरे से झलक रही थी। जो फिर.सलाओ को खुशखबरी सुना और मुझे मेरा काम करने दे....

"तबूह फौरन आगे बढ़ी, उसने परमान के दोनों हाथ पकड़कर अपनी आंखों से लगाये और पलटकर दरवाजे की तरफ चली गई।रानी मलायका उसे ईर्ष्याभरी नजरों से देखने लगी।

"क्या हुआ....," परमान ने उसकी आंखों में देखा ।

"मैं देख रही हूं परमान कि राजमहल में नाचने वाली यह राजनर्तकी...तेरे दिल पर कुछ ज्यादा ही छाती जा रही है।

"रानी मलायका....क्या तू नहीं जानती कि वह महज राजनर्तकी ही नहीं, बल्कि किस कद काम की औरत हैं...... ।'"

हां, मैं अच्छी तरह जानती हूं कि वह राजा परमान के कौन-कौन से काम करती हैं...।" रानी का लहजा बड़ा अर्थपूर्ण था।

"रानी मलायका....वह हमारी एक मामूली सेविका हैं....और तुम हमारी रानी हो। तुम्हारा और उसका भला क्या मुकाबला....।" परमान ने उसके दिल पर महरम रखते हुए कहा।

"राजा परमान.....वह सेविका ही रहेगी.....? रानी ने उसे तिरछी नजरों से देखा ।

बेशक...वो सेविका ही रहेगी....।" परमान ने जैसे दृढ़ लहजे में आश्वासन दिया।

"वायदा....'

"वायदा......।" परमान संजीदा था लेकिन यह वो वायदा था जो प्रायः मर्द अपनी बीवियों से बेधड़क कर लिया करते हैं और बीवियां भी अच्छी तरह जानती है। कि यह वायदा कैसा होता है।

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आज की रात रोशन राय पर बहुत भारी थी ।रात का अन्तिम प्रहर था और रोशन राय मुंह खोले बेसुध सो रहा था। वह आज नींद की गोलियां खाकर लेटा था। उसे रासत को नींद वैसे ही नहीं आती थी..नींद की गोलियों का आदी हो चुका था वह । आज की रात उसने हमेशा से ज्यादा ‘डोज' ले ली थी|सलाओं....रोशन राय के कमरे में आने से पहले ही उसके बैड के नीचे आकर छुप गया

था। जब कमरे में रोशन राय के खर्राटे गूंजने लगे तो वह सरसराता हुआ बाहर निकला। वह एक खौफनाक सांप था। उसकी जिव्हा बार-बार अन्दर-बाहर हो रही थी।रोशन राय ने काफी अरसे पहले उसकी नागिन को जंगल में गोली से उड़ा दिया था, तब से सलाओ अपनी नागिन की मौत का इन्तकाम लेने की घात में था, लेकिन परमान से इसकी इजाजत नहीं मिल रही थी। वो बस रोशन राय को खौफजदा करके वापिस चला जाता था। भला हो तबूह का कि आज उसने परमान से उसे इन्तकाम की इजाजत दिला दी थी और...... |वह अपना इन्तकाम लेने आ पहुंचा था। वह एक बेहर जहरीला सांप था...इतना कि उसके जहर की एक ही बूंद रोशन राय को जहन्नुम रसीद कर सकती थी, लेकिन सलाओ ने सोच लिया था कि वो, इस शैतान को एकदम खत्म नहीं करेगा। उससे ऐसा प्रतिशोध लेगा कि रोशन राय जब तक जीयेगा....उसे याद रखेगा..... ।” वह खौफनाक सांप सलाओ बैड पर चढ़कर रोशन राय के तकिये के निकट पहुंच चुका था और अब उसका चेहरा बड़े गौर से देख रहा था। फिर उसने एक रोषपूर्ण फुफकार मारी और इसके साथ ही जल्दी-जल्दी रोशन राय के चेहरे पर अपनी फन मारा गहरी नींद के बावजूद, रोशन राय पीड़ा से बिलबिला उठा। उसने एक भयानक चीख मारी और घबराकर उठ बैठा। सलाओं, बड़ी तेजी के साथ बैड से उतरा और खिड़की के रास्ते बाहर निकलकर अन्धेरों में गुम हो गया। उसने अपना इन्तकाम ले लिया था |

उसने रोशन राय की दुनिया अंधेरी कर दी थी।जब नफीसा बेगम को इस हादसे की इत्तला मिली तो वह भागकर रोशन राय के कमरे में पहुंची और उसने वहां जो मंजर दखा उसने उसके होश उड़ा दिये राशन राय की दो आंखों की जगह दो गड्ढे बने हुए थे और उनसे खून रिस रहा था। किसी ने उसकी दोनों आंखें उधेड़ दी थी रोशन राय को फौरन मुम्बई पहुंचाया गया। उसे एक बहुत बड़े हस्पताल में में पहुंचाया गया था। डॉक्टरों के लिए यह केस बिल्कुल अनोखा था। उनकी समझ में ही नहीं आया कि रोशन राय की आंखे किसी 'इन्सान' ने निकाली हैं या किसी गैर इन्सान' ने।

खैर फिलहाल तो रोशन राय के घावों का उपचार होना था....सो वह शुरू हो गया पैसा पानी की तरह बहाया गया.......लेकिन व्यर्थ रोशन राय की आंखों की रोशनी वापिस न लाई जा सकी। उसकी आंखे होती तो ही तो रोशनी वापिस लाने की कोशिश की जाती। वहां तो आंखे ही नहीं थी। विभिन्न प्रयोगों व टेस्टों के बाद डॉक्टर इस निष्कर्ष पर तो पहुंच गये कि वह किसी सांप की कार्यवाही हैं....लेकिन आज तक किसी सांप को आंखों पर हमला करते न देख गया था, न सुना गया था।लेकिन रोशन राय को तो अच्छी तरह यकीन आ गया था। वह जान गया था कि यह कार्यवाही उसी सांप की थी, जो उसे प्रायः अपने बैडरूप में दिखाई देता था ।वह सांप अंततः अपना इन्तकाम लेने में कामयाब हो गया ।हस्पताल वालों ने उसकी आंखों के घेरों में टांके लगाकर और हाथ में एक सफेद छड़ी देकर अंततः एक उसे रूख्सत कर दिया। रोशन राय को नकली आंखें लगाने के बारे में सोचा गया था, लेकिन आंखों के घेरे कुछ इस तरह जख्मी हुए थे कि नकली आंखें लगाने की गुंजाइश ही नहीं थी। तब मजबूरन आंखों के घेरों को ही सी दिया गया था ।इन सिली हुई आंखों ने उसका चेहरा इस कदर भयानक कर दिया था कि कोई नजर भरकर उसकों देख नहीं सकता था ।नफीसा बेगम ने कए काला चश्मा उसकी आंखों पर लगा दिया, ताकि उसकी भयानक आंखें काले शीशों में छिप जाएं।रोशन राय को अपनी आंखें चली जाने का बहुत अफसोस था। अब ही यह अहसास हो रहा था कि आदमी के चेहरे पर आंखें कितनी महत्त्वपूर्ण होती हैं। आंखों के बिना यह बिल्कुल मोहताज होकर रह गया था |नफीसा बेगम उसे बैडरूप से निकालकर हवेली के बाग में ले आती थी, तो वह चला आता था.....वरना अपने बैड पर बैठा अपने रोशन दिनों की याद रहता था और इन यादों के साथ अपनी बेबसी पर आंसू उसके दिल पर गिरते रहते थे।एक शाम वह ऐसे ही उदास, सोफे पर बैठा था कि मोबाइल फोन की घंटी बजी। रौनी ने फोन उठाकर उसका बटन दबाया और सुना-"कहिये......?"

"रोशन राय साहब से बात कराएं.....।"

"आप कौन साहब बोल रहे हैं...?" रौली ने अदब से पूछा ।मैं

अरबाब खान बोल रहा हूं.......।" भारी आवाज में जवाब मिला ।

“जी! एक मिनट.....।" यह कहकर रौली ने फोन रोशन राय के हाथ में देते हुए बोला-"मालिक, अरबाब खान साहब हैं....आपसे बात करेंगे....।

"हैल्लो...सुनाओ अरबाब खान कैसे हो?" रोशन राय ने अपने लहजे में शाखी लाते हुए पूछा।"

हो....हा....हा....।" जवाब में जहरीजा कहकहा सुनाई दिया ।इस कहकहे को सुनकर रोशन राय की रूह में सन्नाटा उतरने लगा।

"कौन हो तुम.?" उसने तेजी से पूछा।

"रोशन राय.....मैं अरबाब खान नहीं हूं...मैं हूं राजा सलीम.....पहचाना मुझे....?"

"हां, पहचाना....... | क्यों नहीं..?" रोशन राय धीमे लहजे में बोला।

"रोशन राय तूने मेरा बेटा मारा है। वो मेरी आंखें थी....तूने मेरी आंखे छीनी हैं.....ऊपर वाले ने तुम्हारी आंखें छीन ली, लेकिन अभी मेरा इन्तकाम पूरा नहीं हुआ। वह दिन अब ज्यादा दूर नहीं, जब समीर राय की लाश तुम्हारे कदमों में होगी......।" यह कहकर राजा सलीम ने फिर जहरीजा कहकहा उगला और सम्बन्ध-विच्छेद कर लिये।

"नही! रोशन राय तड़पकर रह गया था।

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बुरा वक्त भी क्या चीज हैं....जब किसी पर आता हैं तो तबाही पर तबाही फैलाता चला जाता है। दूसरों को इन्तकाम को निशान बनाने वाला अब खुद निशाने पर आ गया था ।सलाओं अब अपना इन्काम ले चुका था।और अब एक और 'नाग' उसके सामने फन उठाये आ गया था। राजा सलीम की यह धमकी उसका दिल चीर गई थी। वह जानताथा कि यह महज एक धमकी नहीं हैं। राजा सलीम ने जो कहा हैं वह उस पर अमल कर गुजरेगा।और समीर राय में तो रोशन राय की जान थी। वह उसका इकलौता बैटा था। समीर की मौत ने उसे जीते-जी मार देना था। पर यह बात उसकी समझ में तब नहीं आई थी, जब उसने राजा सलीम की बहू और बाद में उसके बेटे नसीमा को मरवाया था ।मोबाइल उसके साथ में था और उसका हाथ कांप रहा था। उसे यूं महसूस हो रहा था जैसे उसका हाथ धीरे-धीरे सुन्न होता जा रहा है। हाथ की गिरफ्त ढीली पड़ने लगी तो रोशन राय ने अनुमान से ही मोबाइल वाला हाथ आगे बढ़ाया ।

रौली रोशन राय की बदली हुई रंगत देख रहा था....उसने फौरन फोन अपने हाथ में ले लिया और घबराकर बोला-“क्या हुआ.....? मालिक, खैर तो है...

'"बाबा...खैर नहीं...राजा सलीम ने समीर राय को मारने की धमकी दी है.....।" रोशन राय असहाय-सा बोला ।

“मालिक आप परेशान न हो...... । हम हैं ना। हम छोटे मालिक की हिफाजत करेंगे। उन पर जान निसार कर देंगे....।" रौली सच्चे दिल से बोला।

"हां, रौली। अब तुम को ही मेरे बेटे की हिफाजत करनी हैं...... ।यह कहते कहते उसकी जुबान लड़खड़ाने लगी और बायां बाजू बेजान होकर एक तरफ गिर गया ।यह पक्षपात का हमला था ।रोशन राय को फौरन ही करीबी हस्पताल में ले जाया गया। वहां डॉक्टरों ने उसका निरीक्षण करने के बाद उसे फौरन मुम्बई ले जाने का मशविरा दिया। उसे मुम्बई ले जाने के इन्तजाम किये गये। पर जब तक रोशन राय मुम्बई के एक हॉस्पिटल में एडमिट हुआ....उस वक्त वत लकवे का असर उसके पूरे शरीर पर हो चुका था।और फिर बेहतरीन उपचार के बावजूद उसकी हालत सम्भलने में नही आई। आंखें पहले ही छिन चुकी थीं और बोलने की ताकत भी गई। हाथ-पांव भी जवाब दें चुके थे, लेकिन उसके सुनने की शक्ति पर कोई असर नहीं पड़ा था। वो शख्स, जिसने लोगों को हमेशा तिरछी नजरों से देखा था...वो शख्स, जिसने जिन्दगी भर लोगों को सताया था। उस शख्स से उसकी तिरछी नजरें छीन ली गइ .....उसकी कड़ती जुबान बन्द कर दी गई थी। अब वो न देख सकता था....ना बोल सकता था.....बस, सुन सकता था। अब वो सुनने के लिए ही रह गया था। यह कैसा श्राप था.....जिसने उसे कहीं का नहीं रखा था?हॉस्पिटल वाले इस जिन्दा लाश को हॉस्पिटल में कब तक रखते। एक दिन उसे वहां से डिस्चार्ज कर दिया गया ।रोशन राय अपनी हवेली में आ गया। उस हवेली में, जो उसके कदमों की धमक से गूंजती थी। अब इसी हवेली की दीवारें उसे हसरत से तकती थीं। पैसे की कमी न थी, सो एक नर्स को उसकी देखभाल के लिए स्थाई रूप से रख लिया गया। डॉक्टर भी अपनी फीस बनाने के लिए उसे देख जाते थे और नफीसा बेगम को तसल्ली दे जाते थे। हालांकि वे अच्छी तरह जानते थे कि रोशन राय एक ऐसी गिरती दीवार हैं.....जिसे अब कोई भी सहारा गिरने से नहीं रोक सकता ।रोशन राय बहुत सख्त जान था या फिर ऊपर वाले ने ही उसकी मौत का दिन तय कर रखा था...वह इस अवस्था में भी छ: माह जीया ।और फिर एक रात बगैर किसी को कुछ बताये....परलोक सिधार गया। सुबह नर्स ने जब उसे उठाकर देखा तो वह जिन्दा लाश अब सचमुच की लाश बन चुकी थी।मौत के बाद रोशन राय की शक्ल ऐसी भयानक हो चुकी थी कि नफीसा बेगम भी उसकी सूरत कुछेक क्षणों से ज्यादा नहीं देख सकी। उसने खौफजदा होकर अपना मुंह फेर लिया था |रोशन राय की लाश से सड़ांध उठने लगी थी। उसे जल्द-अज-जल्द दफना दिया गया। समीर राय ने। आखिरी बार उसे कन्धा दिया। उसे अपने हाथों कब्र में उतारा ....... लेकिन आखिरी बार उसकी सूरत ने देखी ।धरती पर अकड़कर चलाने वाला अंततः धरती के अन्दर चला गया। नाम का रोशन राय, अंधेरा बनकर कब्र के अन्धेरे में गुम हो गया।

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रोशन राय ने जो बीज रखे थे......उनका फल चखने के लिए समीर राय अकेला रह गया था। राजा सलीम अब उसकी जान का दुश्मन बन गया था।उस पर अब तक दो हमले हो चुके थे, लेकिन वह इन दोनो जानलेवा हमलों पर बाल-बाल बच गया था। एक हमले में महज गोली उसके बाजू को मामूली-सी जख्मी करके गुजर गई थी ।नफीसा बेगम परेशान थी |जब पहला हमला हुआ था तो रोशन राय जीवित था। नफीसा बेगम ने रोशन राय को कुछ नहीं बताया। इसलिये भी कि वह भला करता भी क्या, उसने बेटे को चेतावनी दे दी कि वह अकेला हवेली से बाहर ने निकले, लेकिन यह बात समीर राय को मंजूर नहीं थी। आखिर कब तक हवेली में कैद होकर बैठता, बाहर निकलने की सूरत में मां की ख्वाहिश थी कि वह रोली और होली को साथ लेकर निकले लेकिन समीर राय ने उन दोनों को अपने साथ रखने से इंकार कर दिया।

उसने मां से दो-टूक शब्दों में कहा-"मां, मैं इन हराम-सूरतों को अपने साथ नहीं रख सकता। वैसे भी मैं मौत और जिन्दगी को अल्लाह की देन समझता हूं और इस बात पर यकीन रखता हूं कि अगर मेरी मौत आनी हुई तो दुनिया का कोई भी मुहाफिज मुझे नही बचा सकेगा। अम्मी, आप फिक्र न करें.....मैं एहतिहात रखूगा...... । फिर रोशन राय की मौत के बाद उस पर दूसरा हमला हुआ।और इस हमले में उसका बाजू मामली जख्मी हुआ ।इन्तकाम की आग में सुलगते राजा सलीम को जब मालूम हुआ कि समीर राय इस हमले में भी बच निकला हैं, तो वह तिलमिलाकर रह गया। उसे बाबे 'करन्ट' पर सख्त गुस्सा था। उसने बाबू ‘करन्ट' को कब्रिस्तान में बुलवा लिया। बाबू 'करन्ट' जब कब्रों के बीच से गुजरता हुआ उस पेड़ के नीचे पहुंचा जिसके नीचे राजा सलीम उसका प्रतीक्षक था...तो उसने उसके तेवर देखकर अंदाजा लगा लिया कि अगले कुछ क्षणों में उसके साथ क्या होने वाला हैं। क्षणभर को तो उसने सोचा कि वह यहां से भाग निकले...लेकिन वह जानता था कि राजा सलीम के दायें-बायें खड़े राइफलधारी उसे चन्द कदम भी न भागने देंगे।उसने फरार होने का इरादा त्याग दिया...और उसके सामने हाथ बांधकर खड़ा हो गया।“जी मालिक.... | आपने मुझे बुलाया.........

"हां, बुलाया! यह पूछने को बुलाया बाबू 'करन्ट' कि तू जो उड़ते तीतर को मार गिराने का दावा करता हैं.....तुझसे एक छ: फुट का आदमी नहीं गिरा। क्यों, साई तुझे क्या हो गया हैं, लगता हैं, तेरी सारी बैटरियां फेल हो गई है। तेरे में अब कोई करन्ट बाकी नहीं रहा था। हमें मालूम नहीं था कि तेरा निशाना इतना बिगड़ गया हैं....वरना हम तुझे उस काम पर न लगातें...... सच, तूने तो हमें बड़ा मायूस किया.... ।" यह कहकर उसने अपना हाथ बढ़ाया ।और उसके निकट खड़े बन्दे ने फौरन उसके हाथ में रिवाल्वर थमा दिया और राजा सलीम ने फौरन बाबू -करन्ट' के दिल का निशान लिया और घोडा दवा दिया-"किसी बन्दे को मारने के लिए.एक गोली काफी होती हैं.....तूने दर्जनों गोलियां बेकार कर दी...फिर भी समीर राय जिन्दा का जिन्दा..... ।''

उसने बाबू –करन्ट' की लाश को ठोकर लगाई और अपने आदमियों को हुक्म दिया-"इसे जमीन में गाड़ दो....खूब ऐश कर ली इसने हमारी दौलत पर..... । वह अपनी जीप की तरफ बढ़ गया। उसके जीप में बैठते ही जीप फौरन हवेली की तरफ रवाना हो गई।

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उसे बड़े हॉलनुमा कमरे में, जिसकी 'ताखों में बुत सजे हुए थे, तबूह एक चमड़े की गद्दी पर बैठी थी ।कमरे के तीन दरवाजे बन्द थे...एक खूला हुआ था। नन्हीं बरहा, उस कमरे में इधर-से-उधर दौड़ती फिर रही थी। कमरे के फर्श पर जगह-जगह छोटे-बड़ें सांप घूम रहे थे। बरहा, इन्हीं सांपों से खेल रही थी। एक छोटा-सा सांप उसने अपने गले में डाला हुआ था। वह पूर कमरे में दौड़ती फिर रही थी।तबूह एक तरफ खामोश बैठी उसे बड़ी दिलचस्पी से देख रही थी ।बरहा दौड़ते-दौड़त एक जगह रूकी । एक सांप बड़ी तेजी से फर्श पर दौड़ रहा था। बरहा ने उसे दुम से पकड़कर उठा दिया और फिर रस्सी की तरह घुमाकर फेंक दिया ।सांप पट् से ईटों के फर्श पर गिरा! उसे चोट लगी। उसे बरहा की यह हरकत अच्छी न लगी। वो अपना मुंह खोलकर बरहा की तरफ बढ़ा। बरहा ने अब एक दूसरा सांप अपने हाथ में पकड़ लिया था। वह उस मुंह खोले अपनी तरफ बढ़ते सांप से बेखबर थी।वह सांप उसे काट भी सकता था, लेकिन वहां तबूह मौजूद थी......और वह इसीलिये यहां मौजूद थी। इससे पहले कि वो सांप गुस्से में बरहा को कोई क्षति पहुंचाता, तबूह ने उस सांप को डांटते हुए कहा-"खबरदार....होश में नहीं हैं क्या तू....मेरे हाथों क्यों अपने दांत तुडवाना चाहता हैं। तू जानता नहीं कि बरहा, कौन हैं? नहीं जानता तो अब जान ले। यह परमान की पसन्द और उसका चुनाव है। इसे जरा-सा भी नुकसान पहुंचा तो वचह तेरी सात पीढ़ियों को तबाह करके रख देगा। अगर तेरे दात नये-नये आये हैं तो मेरी तरफ आ जा....अपने दांत मुझ पर आजमा। बरहा पर क्या गुस्सा उतारना चाहता हैं..... | वह खेल रही हैं और तू सिर्फ एक खिलौना हैं। बस, एक खिलौना ही रह...... ।'

तबूह की डांट सुनकर उस सांप की सिट्टी गुम हो गई। वह फौरन ही कुण्डली मारकर और सिर झुकाकर एक तरफ बैठ गया ।बरहा इस बात से बेखबर उन छोटे-बड़े सांपों से खेलती रही.....भागती-दौड़ती रही। फिर उन तीन दरवाजों में से एक दरवाजा खुला और नैनी भीतर आई, उसने बरहा की उंगली पकड़ी और उसे अपने साथ लेकर उसी दरवाजे से बाहर निकल गई। दरवाजा खुद-ब-खुद बन्द हो गया ।बरहा इस मायावी लोक में परवान चढ़ रही थी ।बरहा के जाने के बाद तबूह अपनी जगह से उठी। उसने अपने खुले बालों को जूड़ा-सा बनाया और अपने विशिष्ट अदा। भरे अन्दाज से चलती हुई एक ताख के सामने आ रूकी, इस ताख में एक दवकाय मर्द का बुत रखा था।यह बुत काले-भुजंग हूरा का था तबूह उसे गौर से देखने लगी....फिर उसके हीठों पर बरहस ही मुस्कुराहट आ गई। वह धीरे से बोली

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नफीसा बेगम अपने पति की मौत पर दो आंसू भी नही बहा सकी थी।वह रोने बैठती तो रोशन राय का कोई-न-कोइ जुल्म उसके सामने आ जाता और उसकी संगदिली व निर्ममता उसका दिल चीर जाती । उसने अपने ही बेटे समीर राय की बीवी और बच्ची के साथ जो सलूम किया था, वह एक माफ न किये जाने वाला अपराध था।आंखें चली जाने के बाद रोशन राय ने नफीसा को नमीरा और उसकी बच्ची के बारे में एक-एक बात सच बता दी थी, लेकिन उसे अपनी इस करतूत पर कोई शर्मिन्दगी नहीं थी कि वह यह सब हवेली की सलामती के लिए करने को मजबूर था। जुल्म की यह दास्ताना सुनकर नफीसा वेगम के दिल में अपने शौहर के प्रति नफरत और भी गहरी हो गई थी ।नफीसा बेगम ने राज की ये बाते बेटे के कान में डाल दी थीं। यह सब सुनकर समीर राय के दिल में आग लग गई थी। यही दिल चाहा था कि अभी जाकर इस दरिन्दे शख्स के टुकड़े कर दे, लेकिन वह उसका बाप था......समीर राय ऐसा नहीं कर सकता था। वह अपने बाप जैसा नहीं बनना चाहता था। वैसे भी खुदाई इंसाफ शुरू हो चुका था। कुदरत ने हिसाब-किताब शुरू कर दिया था। उसकी दुनिया अंधेरी कर दी गई थी। अब समीर राय को गुनाह करने की क्या जरूरत थी। कुदरत खुद ही रोशन राय की दरिन्दगियों का इन्तकाल लेने पर उतर आई थी।अपनी खोजबीन पूरी करने के बाद एक दिन समीर राय ने इस विषय पर अपनी मां से बात की-"अपनी खोजबीन पूरी करने के बाद एक दिन समीर राय ने इस विषय पर अपनी मां से बात की-"अम्मी जान्! मैं इस हवेली को जरायमपेशा लोगों से पाक करना चाहता हूं......"

"हवेली में जरायमपेशा लोग? मैं समझी नहीं....।" नफीसा बेगम ने सवाल किया।

हां, हवेली में पन्द्रह-बीस ऐसे मुलाजिम हैं जो किसी-न-किसी तरह अब्बू के जुमों में शरीक रहे है।

"बेटा....तुम जैसा चाहों करो-बस इतना याद रखना.....किसी पर जुल्म न हों। अपने अब्बू का हश्र तुमने देखा ही हैं...... ।" खुदा के खौफ से डरी नफीसा बेगम ने हिदायत दी।

"अम्मी..मैं इन लोगों को इसीलिये यहां से निकाल देना चाहता हूं कि अब किसी पर जुल्म ने हो। ये लोग यहां रहेंगे तो मजलूमों और मासूमों को तकलीफ पहुंचाने और मेरी खुशामद के अलावा कुछ न करेंगे.......।" समीर राय ने कहा।"तुम ठीक कहते हो। मेरी तरफ से पूरी इजाजत हैं....जो चाहे करो.......।" नफीसा बेगम ने उसे छूट दे दी ।मां से इजाजत मिलने के बाद अगर समीर राय चाहता तो अन संदिग्ध नौकर-चाकरों को खड़ें-खड़े कान पकड़कर बाहर कर देता, लेकिन उसने जालिमों पर भी जुल्म करना मुनासिब न समझा। उसने उन मुलाजिमों को इतना कुद दे दिया कि वे साल भर तक आराम से घर में बैठकर खा सकें ।हवेली से रूख्सत करते हुई उसने इन मुलाजिमों से बस इतना कहा-"आइन्दा मैं इस इलाके में तुम्हारी शक्ल ने देखू। अगर ऐसा हुआ तो फिर मुझसे बुरा कोई न होगा..... ।"रौली और होली, जो सबसे आगे खड़े थे उन्होंने कुछ कहना चाहा तो समीर राय ने हाथ उठाकर उन्हें रोक दिया-"बस, अब मैं कुछ सुनना नहीं चाहता। तुम लोग जाओ..... ।''
 
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