Horror अनहोनी ( एक प्रेत गाथा ) - Page 6 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Horror अनहोनी ( एक प्रेत गाथा )

इस तरह समीर राय ने हवेली से बुरे लोगों को निकाल बाहर किया और वे सारे लोग अन्धेरों में कहीं गुम हो गये। उन्होंने रोशन गढ़ी को वाकई छोड़ दिया। समीर राय को वह उस इलाके में फिर कहीं नजर नहीं आये यह हवेली में एक खुशगवार परिवर्तन था। उन लोगों के जाने के बाद हवेली में उन लोगों के जुर्म की दास्तानें सुनाई देने लगी। जो लोग अब तक खौफ की वजह से चुप थे.....उन्होंने नई-नई कहानियां सुनाई। बहरहाल, रोशनगढ़ी के वासी अब निश्चित व खुश थे।समीर राय ने अपनी जागीर का काम -काज बड़ी कुशलता के साथ सम्भाल लिया था दिन....महीने.....साल, बीत गये थे। नफीसा बेगम को अब समीर राय की शादी की फिक्र हुई। आस-पास लड़कियों की कमी नहीं थी। खुद नफीसा के भाइयों की लड़कियों की कमी नहीं थी। खुद नफीसा के भाइयों की लड़किया थोक के हिसाब से मौजूद थी। हर तरह की, हर रंग की और हर स्तर की लड़कियां उपलब्ध थीं। बोल-बोल कर कान खा जाने वाली और खामोश रहकर उकता देने वाली लडकियां । हर मिजाज और हर तरह कल लड़कियां सामने थीं....और नफीसा बेगम के बस एक इशारे की देर थी कि उनमे से कोई भी उसकी बहू बन सकती थी।लेकिन वह इशारा किसे करती। इशारा तो ऊपर से होना था। समीर राय को करना था और समीर राय को अपने खानदान की लड़कियों से कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसे तो अब वैसे भी लड़कियों से कोई दिलचस्पी नहीं थी ।नफीसा बेगम के इशारों पर मामों की लड़कियों ने हवेली में आना-जाना शुरू कर दिया था। लड़कियां तो खैर पहले भी आती थी और अपनी फूफी से मिलकर चली जाती थी। अब उन्होंने एक खास सोच के साथ आना शुरू कर दिया था। अब वे नफीसा फूफी से मिलकर वापिस नहीं जाती थीं, बल्कि समीर राय के कमरे का चक्कर भा लगाता था ।इन ढेर सारी लड़कियों में एक लड़की उन सब में नुमायां थी। वह सबसे बड़े मामू की बेटी थी। उसका नाम मायरा था। अच्छी खूबसरत लड़की थी। पढ़ी-लिखी थी। उठने-बैठने का सलीका था। दुबली-पतली व खुशमिजाज थी। यह मामू अरशद की सबसे छोटी बेटी थी। नफीसा बेगम की इस मायरा पर ही नजर थी, लेकिन समीर राय अपनी मां की पसन्द व ख्वाहिश से बेखबर था ।समीर राय को तो अपने ही गमों से फुर्सत नही थी कि वो किसी को नजर उठाकर देखता। नमीरा उसके दिल में बैठी हुई थी। वह नमीरा को अभी तक नहीं भूला था। वह उसे शायद भूला ही नहीं सकता था। उसके दिल पर बड़ी सख्त चोट लगी थी और यह जख्म अब शायद जिन्दगी भर भरने वाला। नहीं था। नमीरा के साथ उसे अपनी बच्ची भी याद आती थी। नमीरा की मौत की तो तस्दीक हो गई थी..... लेकिन अपनी बेटी के बारे में वह आशावान था। उसे जाने यह आशा क्यों थी कि उसकी बेटी एक दिन उसे जरूर मिलेगी ।समीर राय ने पढ़ाई छोड़ दी थी। उसने मुम्बई जाना भी छोड़ दिया था। म्यूजिक भी अब अतीत की बात हो गई थी। वह अपनी मां को अब अकेला नहीं छोड़ सकता था और न नफीसा बेगम उसकी बिना रह सकती थी। यह दूसरी बात थी कभी-कभी मुम्बई से समीर राय के 'म्यूजिक' के दीवारे दोस्त आते रहते थे और तब हवेली में रौनक हो जाती थी। हवेली के बाग में संगीत की महफिल जमती और गाने वाले व बजाने वाले रात गये तक धमाल करते ।इन महफिलों में समीर राय खनदान की लड़कियों को कदापि आमंत्रित नहीं करता था, बस वह होता और उसकी मित्र-मण्डली होती ।समीर राय को मछली के शिकार से भी दिलचस्पी थी। वह एकान्तप्रिय था। शायद इसलिए यह शौक भी पाल लिया था। वह पानी में डोर डाले अपनी कल्पनाओं की दुनिया में गुम हो जाता था....मछली फंसे या न फंसे उसे इसकी परवाह न थी।फिर एक दिन एक अजीब घटना घटी।मायरा की बड़ी बहन सादिया की ‘मेंहदी की रस्म थी। ऐसे समारोह में लड़कियों का इकट्ठा होना जरूरी था और साथ ही बन-सवंर कर आना थी जरूरी था। नफीसा बेगम, समीर राय को अपने साथ बांधकर ले गई। समीर राय अपनी मां के कहने पर चला तो गया, लेकिन एक कोने में बैठा रहा। मेंहदी की रस्म के बाद जब लड़कियों ने एक-दूसरे को उबटन लगाना शुरू किया तो इस खेल में लड़के भी शामिल हो गये और तभी किसी लड़की ने शीशा छेड़ा-“समीर भाई के कोई उबटन लगाये तो जानें........।"

और मायरा को जाने क्या सूझी....उसने यह चैलेंज कबूल कर दिया और हाथ में 'उबटन' लेकर एक तरफ खामोश बैठे समीर राय की तरफ बढ़ी |समीर राय ने जब मायरा को अपनी तरफ आते देखा तो उसने उसका इरादा फौरन भांप लिया। वह एकमद शालीन लहजे में बोला-"देखो, मायरा! मुझे उबटन न लगाना।"\

मायरा तो चैलेंज कबूल करके आई थी, वह समीर राय के अनुराध पर भवा वापिस कैसे जा सकती थी। उसने हाथ बढ़ाकर समीर राय के चेहरे पर उबटन मलना चाही समीर राय ने फौरन उसकी कलाई थाम ली ।मायरा ने अपनी कलाई छुड़ानी चाही तो कट-कट करके उसके हाथ की चूड़ियां मोल गई। एक-दो चूड़ियां मोलकर मायरा की जाजुम कलाई में घुस गई। समीर राय के हाथ में भी चूड़ियां चुभीं। मायरा की कलाई पर गहरा जख्म लगा। भल–भल करके खून बहने लगा दोनों की नजरें मिली। समीर राय शर्मिन्दा था, जबकि मायरा के चेहरे पर जख्मी होने के बावजूद शोखी थी। मैंने मना किया था ना......।" समीर राय ने शिकायतपूर्ण लहजे में जैसे हमदर्दी जतलाई-"जख्म आ गया ना.....।"

मायरा ने कोई जवाब नहीं दिया। बस एक लम्हा गहरी नजरों से उसे देखा और फिर पलटकर लड़कियों में गुम हो गई। तभी लड़कियों ने एकदम शोर मचाया।"मायरा हार गई...मायरा हार गई...।"

समीर राय के कान खड़े हुए। मायरा हार गई। इसका मतलब था कि इन लड़कियों ने आपस में जरूर शर्त लगाई थी। उसे बड़ा दुख हुआ कि अगर वह जरा-सा उबटन लगवा लेता तो उसका कया बिगड़ जाता । यह तो मायरा पर जुल्म हुआ था और उसने तो किसी पर जुल्म करना सीखा ही नहीं था ।वह फौरन उठा।

उसने मायरा को फौरन तलाश किया। वह अभी तक अपनी कलाई पकड़े खड़ी थी......और खून बह रहा था। समीर ने पहले तो अपनी जेब से रूमाल निकालकर उसकी कलाई पर बांधा, फिर मुस्कुराकर बोला-"मायरा हार नहीं सकती। लाओ, लगाओ मुझे उबटन....।"

यह सुनकर मायरा खिल उठी। उसने फौरन समीर राय के चेहरे पर थोड़ा उबटन मल दिया। लड़कियों ने फिर शोर मचाया

"मायरा जीत गई....मायरा जीत गई....।"समीर राय की फितरत में चूंकि किसी को देख देना शामिल ही नहीं था। इसलिये यही सोचकर कि उसने मायरा का दिल दुखाया हैं, उसे पर जुल्म किया है, उससे उबटन लगवा लिया था,

लेकिन मायरा ने इस वाकया को किसी और नजर से लिया और उसकी सहेलियों ने उसकी इस 'जीत' को कुछ का कुछ रंग दे दिया ।समीर राय अब मायरा के ख्वाबों में बस गया......उसके ख्वाबों का शहजादा हो गया |नफीसा बेगम को जब इस घटना का पता चला तो वह बहुत खुश हुई। वह मायरा को अपनी बहू बनाने का सपना देखने लगी। यूं भी मायरा उसकी पहली पसंन्द थी। वह अगर अपनी बहू बनाने का ख्वाब देख रही थी तो कोई बुरा नहीं कर रही थी ।

………………………..
 
बुरा तो इन्तका की आग मे सुलगता राजा सलीम कर रहा था।दो प्रयासों के बावजूद वह समीर राय को ठिकाने नहीं लगा सका था। अपनी नाकामी का बदला उसने बाबू 'करन्ट' को मारकर ले लिया था...लेकिन इन्तकाम की आग अभी तक नहीं बुझी थी। वह समीर राय की मौत का ख्वाहिश मन्द था और इस काम को अब उसने खुद ही करने का इरादा कर दिया था। उसने समीर राय का इर्द-गिर्द अपने 'खबरी' फैलाये हुए थे, जो उस तक समीर राय की गतिविधियों की पल-पल की खबर उसे पहुंचा रहे थे। आज राजा सलीम को मालूम हुआ था कि समीर राय अपने बड़े मामू अरशद के गांव आया हुआ हैं और उस गांव का रास्ता कंगनपुर के करीब से गुजरता था।

राजा सलीम ने अपने साथ चन्द खास आदमी लिये थे और उस रास्ते की तरफ चल दिया था, जहां समीर राय की नाकाबन्दी करके उसे ऊपर पहुंचाया जा सकता था ।मेहन्दी की रस्म के बाद....समीर राय ने अपनी मां को वापिस चलने का इशारा किया तो मामू अरशद की सारी लड़कियां पीछे पड़ गई। उन्होंने नफीसा बेगम से रात को रूकरने की जिद्द की। रात को गीत गाये जाने थे और जब मामू-मामी ने नफीसा के साथ समीर को भी रोकना चाहा तो समीर ने यही उचित समझा कि मां को छोड़ दे और खुद यहां से निकल ले ।नफीसा बेगम हालांकि रूकना नहीं चाहती थी, लेकिन सबकी जिद्द के आगे वह बेबस हो गई। तय यह हुआ कि सुबह को मामू खुद नफीसा बेगम को रोशनगढ़ी छोड आएंगे। इसके बाद समीर राय जीव में रोशनगढ़ी की तरफ रवाना हो गया। उसके साथ दो मुलाजिम थे......जो जीप में पीछे बैठे थे। गाड़ी वह खुद चला रहा था। वे दोनों मुलाजिम हथियारबन्द थे और हथियारबन्द बॉडीगार्ड समीर राय के साथ नफीसा बेगम के हुक्म पर ही रहते थे।समीर राय अधपक्की सड़क पर अपनी जीप को दौड़ाये चला जा रहा था....इस बात से बेखकर कि दुश्मन उसकी घात में बैठा है |

राजा सलीम ने समीर राय पर इस हमले की मन्सूवाबन्दी बड़ी होशियारी से की थी। उसने अपने कई गुर्गे, आमों के पेड़ों पर बैठा दिये थे....जहां से सड़क साफ नजर आती थी। राजा सलीम खुद बाग में, जीप में बैठा था। घने पेड़ों के कारण बाग में अन्धेरा था। सड़क से आने वाला अन्दाजा नहीं लगा सकता था कि कोई अन्दर उसे निशाने पर लिए हुए है।राजा सलीम के पास दूरबीन लगी, टेलीस्कोपिक राइफल थी और उसने अपने आदमियों को सख्त हिदायत कर दी थी कि जब तक वह गोली ने चलाए......कोई गोली नहीं चलाएगा ।सलीम खुद एक माहिर शिकारी था। उसका निशाना बहुत अच्छा था शाम के साये गहरे होते जा रहे थे। वे काफी देर से समीर राय का इन्तजार कर रहे थे। एक मोटरसाइकिल सवार यहां से दो किलोमीटर दूर तैनात था.जिसे समीर राय के गुजरते ही शार्ट-कट से आकर उन्हें सूचित करना था कि शिकार आ रहा है |राजा सलीम को मोटरसाइकिल सवार की इन्तजार बड़ी बेचैनी से थी। उसे यकीन था कि समीर राय आज उसके हाथों बचकर नहीं निकलेगा। उसने अपनी समझ में बड़ी शानदार योजना बना रखी थी।उसके दो बन्दे, पेड़ों पर उसके दाये-बाये बैठे थे, और एक बन्दा उसके पीछे भी था, जबकि वह खुद जीप में इस तरह बैठा था कि मोटरसाइकिल सवार का सिगनल मिलते ही राइफल खुली जीप के शीशे पर रखे और दनादन फायरिंग शुरू कर दे। इसके साथ ही घात लगाये बैठे बन्दे भी फायरिंग में शामिल हो जाएं। समीर राय पर गोलियां की ऐसी बारिश कर दी जाये कि जिन्दा बच निकलने की लेशमात्र भी सम्भावना न रहे राजा सलीम अपनी प्लालिंग से सन्तुष्ट व खुश था, जबकि सबका राजा और इस सृष्टि का मालिक, अपनी मन्सूबेबन्दी में व्यस्त था।

अचानक दूर से मोटरसाकिल की आवाज सुनाई दी।पेड़ों पर बैठे हमलावरों ने अपनी राइफलें सीधी कर ली। राजा सलीम भी मुस्तैद हो गया। वह कोई और मोटरसाइकिल वाला भी हो सकता था...लेकिन हमले के लिए तैयार होना जरूरी था। क्योंकि मोटरसाइकिल वाले के बाग में पहुंचने के बाद समीर राय की जीप के नमुदार होने में ज्यादा देर नहीं लगनी थी।मोटरसाइकिल के सामने आने से पहले ही, एक भारी आम डाल पर से टूटकर, राजा सलीम के पीछे बैठे बन्दे की राइफल की नाल पर गिरा। नाल नीचे को झुकी....लबलबी पर उंगली अचानक दबी...गोली चली और सीधी राजा सलीम की खोपड़ी में गली....जो जीप से समीर राय के लिए मौत का फरिश्ता, खुद मौत का शिकार हो गया था। एक ही गोली ने उसके सिर के चीथड़े उड़ा दिये थे। उसका कहना सच साबित हो गया था......वाकई एक ही गोली बन्दे की जान लेने के लिए काफी होती है।और अब ऊपर वाले को किसी को बचाना होता हैं तो उसे कोई नहीं मार सकता |समीर राय को उस वक्त कुछ पता नही चला कि सड़क के निकट, बाग में उसके लिए क्या जाल बिछाया गया था और उस जाल में खुद जाल बिछाने वाला ही फंस गया था ।वह तो पूरे इत्मीनान के साथ बाग के पास से गुजरकर अपने रोशनगढ़ी पहुंच गया था ।उसे अगले दिन राजा सलीम की मौत का पता चला। गोली चलाने वाला फरार था और यह बात किसी की समझ नहीं आ रही थी कि राजा सलीम के ही एक वफादार ने उसे गोली क्यों चलाई।राजा सलीम की मौत एक पहेली बनकर रह गई।

,,,,,,,,,,,,,,
 
परमान अपनी सिंहाराननुमा भव्य कुर्सी पर विराजमान था ।यह भी एक चार दरवाजों वाला बड़ा कमरा था, जिसमें दीवार से दीवार तक सुर्ख कालीन बिछा हुआ था। इस कमरे के एक कोने में ऊंचा स्टेज था। इस स्टेज पर सीढ़ियों तक कालीन बिछा हुआ था। स्टेज पर एक तरफ दो साजिंदे बैठे हुए थे। एक के हाथ में बीन थी और दूसरे के गले में ढोल ।और बीन की आवाज व ढोल की थाप पर तबूत नाच रही थी। कमरे के चारों दरवाजे बन्द थे तबूह के बदन में जैसे बिजलियां भरी हुई थी। वह स्टेज पर बिजली की मानिन्द ही कौंध रही थी। उसका सांवल, खूबसूरत बदन थिरक रहा था। उसकी आंखों में हीरे की-सी चमक थी। उसके शरीर की थिरकन इतनी तीव्र थी कि उस पर नजर जमाना कठिन हो रहा था ।यह नाच लगभग एक घण्टे तक जारी रहा।नाच समाप्त होने पर तबूह स्टेज से उतरी और परमान के सामने झुक गई। तबूह तेरा कोई जवाब नहीं....." परमान ने खुश होकर कहा-"जब तू नाच रही होती हैं तो हमारे अन्दर की दुनिया में एक भूचाल ला देती है। बोल, क्या मांगती हैं......,"

"मुझे कुछ नहीं चाहिये, परमान। तेरे ये मीठे बोल ही मेरे लिए काफी हैं.... ।' तबूह सीधी होते हुए बोली। तभी......अचानक कमरे का एक दरवाजा खुला और नैनी तेजी से अन्दर दाखिल हुई। परमान व तबूह, दोनों चकित से उसे देखने लगे।

इसे क्या हुआ....?" परमान के लहजे में खिन्नता थी। उसे नैनी का यूं आना नागवार गुजरा था।

पूछती हूं...।“ तबूह जल्दी से एक काली चादर अपने बदन पर डालती हुई नैनी की तरफ बढ़ी। क्या हुआ.......?" उसने नैनी को बीच ही में रोक लिया था।"

रनतारों ने दरसी को परेशान का रखा है। वो बाहर खड़ी है। परमान से मिलना चाहती हैं........।" नैनी ने समस्या बताई ।"

अच्छा, तुम यहीं ठहरों.... | मैं परमान से इजाजत लेती हूं.....!" तबूह ने कहा और पलटकर परमान की तरफ आई-'परमान! दरसी आई है। उसको फौरन बुलाएं.....मामला संगीन हैं...... ।' तबूह ने जैसे सिफारिश की।

.

"अच्छा.... बुला ओं........ ।'" परमान ने इजाजत दे दी।

कुछ क्षणों बाद ही प्रौढ़ी दरसी परमान के सामने थी। सिर झुकाये खड़ी थी। परमान के बोलने की प्रतीक्षक ।"हां.....बोलों। क्या मसला हैं.....?" परमान ने पूछा।

"परमान अब मुझसे बरहा की हिफाजत नहीं हो पा रही.....।'' दरसी ने क्षमा चाहते लहजे में कहा ।

"क्यों? क्या वह सरकशी (विद्रोह) पर उतर आई हैं?" परमान ने पूछा।

"वह बेचारी क्या सरकशी पर उतरेगी। सरकशी पर तो 'वो' उतरा हुआ है.......।" दरसी ने साहस जुटाकर कहा।"

रनतारों की बात करती है......।'' परमान ने बात समझने की कोशिश की।

"हां, परमान! तून सही जाना....

'"गलती हमारी हैं कि हमने बरहा को....वक्त से पहले....उसके नाम से जोड़ दिया और दूसरी गलत यह हुई कि उसे बता भी दिया कि बरहा तेरी है। रतत्तारों हमारा बेटा हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वह हमारी बस्ती की परम्पराओं से बगावत पर उतारू हो जाये। दरसी.....तू फिक्र न कर। हम कल ही बरहा का कोई इन्तजाम कर देंगे। वैसे भी वह अब पांच साल की हो गई है। उसके लिये अब इस बस्ती में रहना दुश्वार हैं....।" परमान ने सोचपूर्ण लहजे में कहा था ।

परमान के बोल सुन दरसी ने सुकून की सांस ली। वह बोली-"परमान! तू बड़ा इन्साफ वाला है.....।"फिर वह उसके सामने आधे कद तक झुकी और वापिस दरवाजे की तरफ चली गई।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
सूरज की पहली किरण उजागर होते ही रहस्यमयी शक्तियों वाले परमान ने हब्शी हूरा को तलब कर दिया ।यह 'बुतों वाला कमरा था और परमान इस वक्त सुर्ख ईटों के फर्श पर काली चमकली खाल पर आसन जमायें बैठा था ।एक दरवाजा खुलते ही देवकाय हूरा नमुदार हुआ। वह झुमता हुआ परमान की तरफ बढ़ा। परमान उसे बड़ी दिलचस्पी से अपनी तरफ आते देख रहा था। निकट आकर हूरा, उसके सम्मान में थोड़ा झुका और फिर सीधा तनते हुए बोला-"परमान, हुक्म कर.... ।'"

"पूरा.......तू कैसा हैं.....?'' कोई हुक्म देने की बजाय परमान ने उसका कुशलक्षेम पूछा ।

"मैं तुझे एक अहम् काम सौंप रहा हूं। तेरी थोड़ी-सी लापरवाही भी तुझे मुश्किल में डाल सकती हैं......।" परमान ने जैसे भूमिका बांधी।

"परमान...तेरी तरफ से कोई कोताही नहीं होगी....तू निश्चित रह...।" हूरा ने विश्वास दिलाया।

"जानता हूं। इसीलिए यह काम तुझे सौंप रहा हूं........।" परमान ने कहा।

"हुक्म कर! क्या करना हैं मुझे?" हूरा ने पूछा।

"बरहा को इस बस्ती से लेकर जाना है....। रनतारों बगावत पर आमादा है। वह कहीं बरहा को नुकसान न पहुंचा दे। उसे सब्र नहीं हो रहा। यह ठीक हैं कि बरहा उसकी हैं, लेकिन बरहा को अभी उसके हवाले करने का वक्त नहीं आया। तुझे बरहा को इस बस्ती की आबो-हवा उसे रास नही। उसका हुस्न मन्द पड़ने लगा है। तू उसे यहां से ले जा और देवांग के हवाले कर आ । बस, तेरा इतना ही काम हैं..... ।" परमान ने आदेश सुनाया |तभी दूसरा दरवाजा खुला और तबूह बरहा का हाथ पकड़े कमरे में दाखिल हुई। बहरा इस वक्त सुनहरी तारों से बना एक अजीबो-गरीब लिबास पहने हुए थी। उसका मासूम हुस्न देखने वाला था।बरहा अपना हाथ छुड़ाकर दौड़ती हुई परमान की तरफ बढ़ी और फिर बेतकल्लुफी से उसके घुटने पर बैठे गई। परमान के सिर पर ताज की तरह बैठे सांप ने सिर झुकाकर बरहा को सलामी दी और फिर पूर्ववतः सीधा होकर बैठ गया ।परमान ने बरहा का एक हाथ पकड़कर चूमा और फिर उसे उठाकर अपने सामने खड़ा कर लिया। उसने गौर से बरहा की तरफ देखा और मुंह-ही-मुंह में कुछ बड़बड़ाया। बरहा पर फौरन ही अचेतना-सी व्याप्त होने लगी, फिर यह एकदम परमान के हाथों पर झूल गई हूरा, बरहा की बजाया तबूह को बड़ी दिलचस्पी से देख रहा था। तबूज ने उसकी नजरों की तपिश अपने चेहरे पर महसूस कर ली..... लेकिन उसने हूरा की तरफ आंखें उठाकर न देखा ।वह बदस्तूर बरहा की तरफ ही देखती रही। बेसुध बरहा वैसे भी इस वक्त बहुत प्यारी लग रही थी तबूह ने बरहा के फूल से गाल पर प्यार किया और उसे हूरा की तरफ बढ़ा दिया। हूरा ने बड़ी कोमलता व सावधानी के साथ बरहा को अपने हाथों में ले लिया और फिर यंत्रवत् ही वापसी के लिए मुड़ गया ।तबूह के दिल में एक कसक-सी उठी। हूरा हर । मुलाकात पर उससे यह जरूर पूछा करता था कि-कैसी हो तबूह?.....और आज उसने कोई बात नहीं की थी। तबूज के दिल में एक टीस-सी उठी और वह ऊंचे लम्बे हूरा को दरवाजे की तरफ बढ़ते देखकर उदासी से मुस्कुरा दी और उसके होठों पर अब एक आह उभरी-"बहशी..... ।"

हूरा बरहा को उठाये दरवाजे से निकल गया। उसको निकलने के बाद जब दरवाजा बन्द हो गया तो तबूह परमान की तरफ पलटी ।परमान ने उसका चेहरा गौर से देखा.....उसके चेहरे पर उदासी की झलक देख उसने पूछा-"क्या हुआ तबूह? तू उदास की झलक देख उसने पूछा-"क्या हुआ तबूह? उदास क्यों हो गई है....?

"दिल मे चोर था। तबूह एकदम परेशान हो गई। वह क्या जवाब दे? क्या परमान को बता दे कि हूरा तो हर मुलाकत पर उसकी खैरियत पूछता था.....आज उसने उससे उसका हाल नही पूछा। पर वह साहस न कर सकी। एकदम बात बनाते हुए बोली-"परमान.....बरहा बस्ती से चली गई। क्या यह उदासी की बात नहीं ?"-

"अच्छा, तो तू बरहा के लिए उदास हैं" परमान ने सिर हिलाते हुए कहा-"हां, तबहू बरहा ऐसी ही है कि उससे जुदाई पर उदास हुआ जाए। रनत्तारों बहुत खुशकिस्मत हैं कि उसकी तकदीर में बरहा लिख दी गई है, मगर वे बेसब्रा सब्र करने के लिए तैयार नही। उसे सब्र करना होगा। तबूह, तुम उसे समझाओं....वरना मेरे हाथों सजा पायेगा... |"

"परमान तू फिक्र न करे.....मैं समझाऊंगी उसें। वैसे भी अब बरहा बस्ती से जा चुकी है। अब किसी खतरे की बात नहीं....।"

"हां, तू ठीक कहती हैं....।" यह कहकर परमान उठ गया । और फिर तेज-तेज चलता हुआ उस बुतों वाले कमरे से बाहर निकल गया

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
यह एक हरा-भरा हरियाली वाला इलाका था।

'देवकाय हूरा बरहा को कन्धे से लगाये, अपने खास अंदाल में चला जा रहा था। उसके कन्धे से लटकी घन्टी टन-टन बोल रही थी। वह न दौड़ रहा था ना तेज चल रहा था, इसके बावजूद धती उसके पैरों से तेजी से खिसक रही थी।

शीघ्र ही 'वृक्ष-द्वार आ गया यह इस मायावी बस्ती की आखिरी सीमा थी यह एक बहुत विशाल चौड़े तने का पेड़ था। इसी में एक दरवाजा बना हुआ था। यह ऐसी खुली जगह थी कि हूरा जैसा देवकाय शख्स भी आसानी से इस तने में प्रवेश पा सकती था। हूरा पेड़ के निकट पहुंचकर रूका। उसने अपने कन्धे पर लटकी जंजीर उतारी। उसमें लगी घन्टी तेजी से बजी। हूरा ने जंजीर घुमाकर जोर से तने पर मारी और कड़कदार आवाजा में बोला-"मैं हूं हूरा..... ।''

ओ हूरा....तुझे कौन नही जानता। आ जा, अन्दर आ जा..... ।'अन्दर से आवाज आई, लेकिन बोलने वाला दिखाई नहीं दिया ।हूरा थोड़ा-सा सिर झुकाकर तने में दाखिल हुआ। अन्दर अन्धेरा था, लेकिन हूरा को मालूम था कि अन्दर किसतरह का रास्ता हैं। यह एक ढलवां रास्ता था। वो रेत पर तेजी से नीचे अतरता चला गया |कुछ ही क्षणों बाद वे अन्धेरे से निकल रोशनी में आ गया। तेजी से रेत पर दौड़ने लगा। जैसे कोई तेज रफ्तार ऊंट। उसके पीछे रेत का बादल उठता जा रहा थ। फिर देखते ही देखते इस रेत के बादल में गुम हो गया ।उधर......... देवांग, दरिया के किनारे, एक पेड़ के नीचे खड़ा हूरा का प्रतीक्षक था। उसे परमान का सन्देश मिल चुका था और परमान ने दिशा-निर्देश उसे भेजे थे,

उसे अब उन्हीं के अनुसार अमल करना था |हूरा ने पहुंचने में देर न लगाई थी।वो ने दौड़ रहा था, ना तेज-तेज चल रहा था। इसके बावजूद धरती उसके पैरों के नीचे से खिसक रही थी। वो कुछी क्षणों में देवांग के सामने आ खड़ा हुआ ।मासूम बरहा अभी तक बेसुध थी और और हूरा के कन्धे से लगी हुई थी। हूरा ने उसे कन्धे से हटाकर अपने दोनों हाथों में सम्भाला और अपने हाथ आगे करते हुए बोला-"मैं हूं हूरा! देवांग, तेरे लिए परमान की अमानत लाया हूं। इसे वसूल कर........।

"देवांग ने बरहा को उसके हाथों से लेकर अपने कन्धे से लगा लिया और बोला-"हूरा, मैं तुझे जानता हूं। मैंने परमान की अमानत वसूल की। मुझे परमान का पैगाम मिल चुका हैं। अब तू लौट जा.... | अब मैं जानूं और मेरा काम.... ।'"

"ठीक हैं देवांग....मैं जाता हूं।"यह कहते हुए हूरा ने कन्धे से जंजीर उतरी और पीतल की घन्टी को जोर से जमीन पर मारा और साथ ही नारा उछाला-"मैं हूं हूरा..... । घन्टी के जमीन से लगते ही, वहां से रेत का बादल-सा उठा और हूरा उसमें गुम हो गया ।हूरा के जाने के बाद देवांग दरिया में उतर गया और पूरी सावधानी के साथ दरिया के दूसरे किनारे की तरफ बढ़ने लगा।

,,,,,,,,,,,,,,

शाम होने को थी ।समीर राय बैड पर लेटा ‘गजलों का कैसेट सुन रहा था। उसकी आंखे बन्द थी।सहसा उसे अहसास हुआ जैसे उसके सिरहाने कोई खड़ा हैं। समीर राय ने आंखे खोली तो अपने सामने मायरा को खड़े देखा। उसे अपने सामने पा वह फौरन उठकर बैठ गया |मायरा का यहां उसके मरे में आना कोई आश्चर्यजनक बात न थी। वह हवेली में आती रहती थी और जब भी आती थी....समीर राय से मिले बिना न जाती। समीर राय भी उससे बड़ी शालीनता से पेश आता था।

"ओह! गजल सुनी जा रही हैं.....।" मारया मुस्कुराकर बोली-"इस गाने वाले की मेरे पास भी दो दो कैसेट्स है।

"अच्छा.....।'' समीर राय ने उसे प्रशसापूर्ण नजरों से देखा ओर रिमोट से ‘डक' की आवाज धीमी कर दी।

यह आप हर वक्त अपने कमरे में ही क्यों सिमटे रहते है....?" मायरा ने उसे निहारते हुए पूछा। मुझे तन्हाई पसन्द हैं...।"

समीर राय बुझी-बुझी मुस्कान के साथ बोला।

"तन्हाई पसन्दी....आहिस्ता-आस्तिा इन्सानों से दूर लो जाती हैं....।'' वह बोली ।

“मैं इन्सानों से दूर ही रहना चाहता हूं....।" समीर खुलकर मुस्कुराया।

"इन्सानों से इस बेजारी की वजह.....?"

"पता नहीं.....।" समीर राय बहस में उलझना नहीं चाहता था...सो उसने संक्षिप्त सा जवाब दिया। आइये, बाहर चलें...........।"

मायरा क्षणिक विलम्ब बाद बोली।"बाहर, कहां.....?"

"हवेली से बाहर। अपनी जीप निकालिये और मुझे मेरे गांव तक छोड़ आइये..... ।' शोख मीठे स्वर में अनुरोध भी था और अपनत्वपूर्ण आदेश भी।"

ओह,तो यह प्राब्लम है। ठीक हैं, मैं चलता हूं.... ।'" समीर राय ने सामने से एक ऊंट आता हुआ देखा। उसने अपनी जीप की रफ्तार धीमी कर दी। फिर जब वह ऊंट जीप के पास से गुजरने लगा तो समीर उसे ऊंट पर बैठी औरत को देखकर चौंक पड़ा।

वह नमीरा थी।

वे दो ऊंट थे। दोनों सड़क के किनारे आगे-पीछे चल रहे थे। सड़क छोटी थी, इसीलिए इन्हें देखकर समीरा राय ने अपनी जीप की रफ्तार कम कर ली थी। यूं जब पहला ऊंट उसकी गाड़ी के सामने से गुजरा तो उसने कयामत ढाह दी। ऊंट की काठी में जो औरत बैठी थी....वह शत-प्रतिश नमीरा थी। उसकी अपनी बीवी नमीरा। हालांकि उसका लिबास देहाती था और उसने कोहनियों तक चूड़िया पहनी हुई थी ।समीर राय ने नमीरा को देखते ही ब्रेक लगायें.....लेकिन तब तक नमीरा का ऊंट आगे बढ़ चुका था। अब दूसरा ऊंट उसके सामने से गुजर रहा था। इस ऊंट पर एक मर्द सवार था, जिसकी दाढ़ी और सिर के बाल बेतहाश बढ़े हुए थे। उसका शरीर एक सफेद चादर से ढका हुआ था। उसकी रंगत सांवली थी और आंखों में जैसे एक खास चमक थी ।यह शख्स भी समीर राय को कुछ जाना-पहचाना लगा ।वह शख्स वाकई जाना-पहचाना था। समीर राय को यह मलंग-फकीर नुमा शख्स अपने पूर्वजों के कब्रिस्तान के रास्ते में मिला था और इसने कहा था-"मूर्ख, कब्रिस्तान क्यों जाना है...खाली कब्रों में क्या रखा है। जाना हैं तो रेगिस्तान में जा.........।"वह इस तरह की बात कहकर फिर पेड़ों के झुण्ड में गायब हो गया था।

“मायरा, तुमने देखा......?" वह आश्चर्यचकित लहजे में बोला था।

"क्या...?" मायरा ने पूछा।

"वह पहला ऊंट....उस पर नमीरा सवार हैं.....।" वह बेताब-सा बोला ।

मैंने नहीं देखा। मैंने इन्हें आम से ऊंट सवार समझकर तवज्जों नहीं दी, लकिन यह कैसे हो कसता हैं । वह नमीरा भाभी कैसे हो कसती है। वह तो मर चुकी है.......।" मायरा ने पीछे मुड़कर देखते हुए कहा ।सड़क इतनी छोटी थी कि गाड़ी बैक करने में वक्त लगता, इसलिए समीर राय जीप से कूद गया और उन ऊंटों के पीछे दौड़ती हुए चीखा-“रूको.....मेरी बात सुनो........।"
 
समीर राय को अपने पीछे आते देखकर उस ऊल-जलूल शख्स ने जिसका नाम आघड़नाथ था, ने अपने मुंह से एक अजीबो-गरीब आवाज निकाली। इस आवाज के साथ ही दोनों ऊंटों ने रफ्तार पकड़ ली ।समीर राय ने जब ऊंटो के दौड़ते हुए देखा तो वह फौरन रूक गया, फिर जल्दी से वापिस पलटा और उछलकर अपनी जीप में आ बैठा। कोशिश कर गाड़ी की व स्पीड बढ़ा दी।आगे एक मोड़ था। वे दोनों ऊंट अब उस मोड़ की वजह से नजर नहीं आ रहे थे। इस सड़क के दोनों तरफ बाग थे |जब जीप सड़क को मोड़ काटकर सीधी सड़क पर पहुंची तो वे दोनों ऊंटे गायब हो चुके थे। सड़क दूर तक सुनसान पड़ी थी। समीर राय ने मावरा की तरफ देखा।

मायरा आश्चर्यचकित थी।“कहां गये.....वह दोनों ऊंट.....इतनी जल्दी तो वें गायब नहीं हो सकते। कहीं वे इन पेड़ों में तो गुम नहीं हो गये......?"

"मायरा तुम सड़क के इस तरफ नजर रखो......मैं इधर देखता हूं..... ।" समीर राय दो-ढाई किलोमीटर तक जीप को लौटा ले । गया....लेकिन उन्हें वे ऊंट कहीं नजर न आये । वे आश्चर्यजनक रूप से गायब हो गये थे। निराश होकर समीर राय फिर जीप बैक की और मायरा के गांव की तरफ बढ़ लिया ।उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब क्या था। उसने पहले ऊंटे पर नमीरा को साफ-साफ देखा था। वह देहाती वेशभूषा में थी, पर वह थी नमीरा ही। वह मलंग-सा शख्स भी उसे याद था...जो पिछले ऊंट पर सवार था ।क्या यह सब उसका भ्रम था? उसने जो कुछ देखा था, क्या नजर का फरेब था? आखिर वे दोनों ऊंट इतनी तेजी से गायब कहां हो गये? वह इन्हीं ख्यालों में उलझा रहा.....खामोश बैठा सोचता रहा। यहा तक कि वे अपनी मजिल पर पहुंच गयें नमीरा की सूरत समीर राय को तड़पा गई थी।

बड़ी मुश्किल से तो उसको करार आया था...लेकिन वह एक झलक दिखाकर......इन कुछ क्षणों में ही उसका करार छीन ले गई थी। वह बेचैन हो गया था ।नमीरा की मौत पर करार इसलिए भी देर से आया था कि नमीरा का विधिवत् कफन-दफन नहीं हो सका था। रोशन राय ने उसकी लाश रौली के जरिये जाने कहां फिकंवा दी थी। सांप के हमले के बाद रोशन राय ने नमीरा वे उसकी बच्ची की सारी कहानी सच-सच सुना दी थी। फिर उसने रौनी से नमीरा की लाश ढूंढ लाने को भी कहा था। रौनी ने उसे सागर तट पर तलाश किया था और ढूंढता-ढूंढता वह उस स्थान पर भी पहुंचा था, जहां नमीरा को रेत में दफनाया गया था, लेकिन उन्हें वहां नमीरा की लाश न मिली थी।रौनी को लाश मिलती भी कैसे? लाश तो उसी दिन और उसी वक्त देवकाय हूरा निकाल ले गया था।हूरा ने नमीरा की लाश दरिया किनारे ले जाकर एक खास जगह रख दी थी। खुद वहां से चला आया था। उसे इस बात से कोई मतलब भी नहीं था कि उसे इस लाश को वहां रखने को क्यों कहा गया है। उसे तो जो हुक्म दिया था....उसने वह काम अंजाम दे डाला था और इतने भर से ही उसका काम खत्म हो गया था ।दरिया किनारे......वहां निकट ही श्मशान घाट था। एक ऊंची जगह बनी झोंपड़ी में ओघड़नाथ मौजूद था। वह आसन लगाय.....आंखे बन्द किये.....ध्यान में मग्न था, जबकि उसकी झोंपड़ी के बाहर बैठे तीन साधू चरस भरी चिलम पीने में मगन थे।जैसे ही लाश नदी किनारे पहुंची........ओघड़नाथ की आंखें फौरन खुल गई। उसने मारे खुशी के नारा लगाया-"आ गई.....आ गई...लाश आ गई..सो पूजा का सामान होगा.....जय काली...उसकी आवाज सुनकर तीनों चरस पीते साधू अन्दर घुस आए।

"क्या हुआ, महाराज......?"

"अरे जाओं.......जल्दी को...ठिकाने पर पहुंच.....'शव-पूजा' का सामान आ गया। आज रात 'शव-पूजा होगी.....।" ओघड़नाथ ने उन्हें जैसे खुशखबरी सुनाई थी ।चरस का नशा तो उन पर पहले ही सवार था....एक औरत की लाश की खबर न उनके नशे को दोगुना कर दिया। वे फौरन ही लाश की तरफ रवाना हो गये। लाश नहीं किनारे एक खास जगह पर मौजूद थी।एक नौजवार व बला की खूबसूरत औरत की लाश देखकर ओघड़नाथ के चेलों के होठों पर मुस्कुराहट आ गई। तीनों मारे खुशी के झूम उठे ।एक चेले ने, जो इन तीनों में कद्दावर व मनहूस सूरत था...नमीरा की लाश को अपने हाथों मे उठाया और वे तेज-तेज चलते वापिस झोंपड़ी में आ गये। ओघड़नाथ के इस चेले ने नमीरा की लाश उसके कदमों में रख दी । ओघड़नाथ ने आंखे खोलकर लाश का जायजा लिया ।वह भी एक खूबसूरज नौजवार औरत की लाश देखकर खिल उठा। उसने एक नारा-मस्ताना उगला-"जय काल...तेरा वार कभी न जाये खाली...ओ दिल वाली..... ।' ओघड़नाथ के तीनों चेले पूजा की तैयारी मे लग गये।

आज की रात एक खास रात थी। अमावस की रात। यह रात ‘शव-पूजा के लिए उपयुक्त भी थी व शुभ भी और संयोग से आज की रात एक शव भी उनके हाथ लग गया था।

रात बाहर बजे 'शव-पूज प्रारम्भ हुआ। लाश की पूजा ।

तीनों चेले एक अर्द्ध-दायरे की शक्ल में लाश के पैरों की तरफ बैठे गये। ओघड़नाथ स्वयं सिरहाने की तरफ था। उसके सामने आग जल रही थी। वह इस आग में श्मशान घाट से जमा की गइ अधजली लकड़ी के टुकडे.....कुछ पढ़-पढ़कर झोंक रहा था और वे तीनों चेले बारी-बारी से लाश पर पानी के छींटे मारते जाते थे और साथ ही समवेश स्वर में समझ में न आने वाले शब्द बोलते जाते थे"शिव शिना की भू–भूला भू..... ।" यह शव शिना में प्राण फूंकने का प्रतिष्ठान था। अजीबो-गरीब हास्यास्पद मंत्र उच्चारण.....ऊल-जलूल हरकतें...ओघड़नाथ के पल-पल रंग बदलते चेहरे व भाव-भंगिमायें....श्मशान का सन्नाटा.....और यह चण्डाल-चौकड़ी। बड़ा ही भयानक मंजर था और फिर.......लगभग दो बजे अंततः लाश में हरकत पैदा हुई। अविश्वसनीय चमत्कार। एक अनहोनी। पहले नमीरा के पांव का अंगूठा हिला। उसके बाद हाथ हिला और फिर....फिर लाश ने अपनी आंखे अचानक खोल दी।आंखे खुली देखकर ओघड़नाथ ने अपना अमल तेज कर दिया। वह जल्दी-जल्दी लकड़ी के टुकड़े अपने सामने जलती आग में झोंकने लगा। उसके मंत्र-उच्चारण में भी बड़ी तेजी आ गई थी-“शिव शिना की भू–भला भू........ ।' एक घन्टा और यह अनुष्ठान इसी तरह जारी रहा इन चारों शैतानों ने खौफजदा होने की बजाय एक नारा मस्ताना लगाया-"जय काली....तेरा बार ने जाये खाली...जो दिल वाली....जल्दी से कर इस लाश को खाली।"उस शैतान के चेलों के ख्याल के अनुसार नमीरा की लाश में काल की रूह प्रवेश कर गई थी और वह उनके इस अमल के मुताबिक और अनुष्ठान के फलस्वरूप लाश की सफाई कर रही थी |सफाई से उनका क्या मतलब था...यह वही समझते थे।कोई आधे घन्टे तक वह लाश बार-बार उठकर बैठती रही, फिर एक वक्त आया कि वह आराम से लेट गई। उसके मुंह से धुआं-सा निकला। मानों लाश की सफाई की कार्यवाही पूरी हो गई थी। काली उस लाश को छोड़कर जा चुकी थी और अब ये वे क्षण थे, जब लाश में अपनी पसन्द की रूह प्रवेश करा दी जाए और यह काम चार बजे से पहले-पहले हो जाना चाहिये था।यही शुभ मुहूर्त था।ओघड़नाथ नमीरा की लाश को देखते ही तय कर चुका था कि शव-पूजा के बाद इसमें किसी आत्मा को प्रवेश दिलायेगा |वह थी शान्ति..... शान्ति उसके मन की रानी थी। वह हाल ही में स्वर्ग सिधारी थी। वह इस श्मशान घाट में इसी झोंपड़ी में और ओघड़नाथ के साथ रहती थी।
 
एक रात उसे तेज बुखार हुआ था...दूसरे दिन वह चल बसी थी। ओघड़नाथ अकेला रह गया था ।वो एक लाश की तलाश में था और यह उसकी खुशकिस्मती थी कि हासिल लाश एक जवान ओर अत्यधिक सुन्दर नारी की थी। उसका 'शव-पूजा' वे सफाई का अनुष्ठान सफलतापूर्वक पूर्ण हुआ था और अब वे क्षण आ गये थे,जब 'खाली' शरीर में किसी की रूह को प्रवेश कराया जाना था।ओघड़नाथ ने अविलम्ब इसका अमल शुरू कर दिया |जब यह प्रक्रिया प्रारम्भ हुई तो कहीं दूर से चीखों-पुकार की आवाजें आने लगीं। यूं महसूस होने लगा जैसे झोंपड़ी के आसपा सैंकड़ों बदरूहों ने चीखो-पुकार मचा रखी हो |ओघड़नाथ ने अपने हाथ में चाकू उठा लिया। पैट्रोमैक्स की रोशनी में चाकू की तेज धार चमक रही थी। उसने हाथ आगे करके चाकू की नोंक को आग पर रख दिया और जल्दी-जल्दी कोई मंत्र पढ़ने लगा।फिर उसने चाकू की आग से हटाया.....सीधा । किया...रूहों के चीखो-पुकार की आवाजें बदस्तूर आ रही थी।ओघड़नाथ ने झोंपड़ी के प्रवेशद्वार की तरफ देखते हुए चाकू को रिवाल्वर की तरह तान लिया और बड़े ही अर्थपूर्ण अंदाल में बोला-"चल, आ जा..... ।" उसके चले, आ जा कहते ही हल्की पीले रंग का एक साया-सा अन्दर दाखिल हुआ। वहा धुआं-धुआं सा था....लेकिन इस धुएं की एक शक्ल-सी थी। गौर से देखने पर वह एक मानवाकृति-सी नजर आती थी। इस आकृति के अन्दर आते ही ओघड़नाथ ने चाकू की नोंक से नमीरा के अंगूठे की तरफ इशारा करके कहा-"चल..घुस जा..बोल जय काली...तेरा वार कभी न जाये खाली.... । इसके साथ ही एक नारी स्वर उभरा-"जय काल.... ।

''चल, शाबाश.....जल्दी कर.... ।' ओघड़नाथ ने बेचैन, लेकिन प्यार भरी आवाज में कहा ।वह आकृति नमीरा के पैरों के पास जाकर रूक गई।ओघड़नाथ अपने चाकू से बराबर उस धुएं को लाश में प्रवेश कर जाने का इशारा कर रहा था। वह बड़बड़ता भी जा रहा था-"जल्दी कर....जल्दी कर.... । वह आकृति सुक्ष्म होने लगी और छोटा होते-होते आखिर लुप्त हो गई। यही लगा था जैसे वह सारा धुआं अंगूठे के जरिये नमीरा के शरीर में प्रवेश कर गया हो।यह प्रक्रिया पूर्ण होते ही ओघड़नाथ ने वह चाकू बेग के साथ जमीन में गाड़ दिया और बोला-हां, शान्ति! तूने बसेरा कर लिया ?"

हो......कर लिया....... ।” नमीरा के होंठे हिले, लेकिन यह नमीरा की आवाज न थी। कोई अजनबी आवाज थी।

"चल, फिर उठकर बैठे जा.....।" ओघड़नाथ ने हर्षित स्वर में कहा ।यह सुनते ही नमीरा उठकर बैठे गई।अब वह नमीरा न रही, शान्ति हो गई थी। शरीर नमीरा का और रूह शान्ति की। देख शान्ति! मैंने तुझे वापिस बुला लिया.... | "ओघड़नाथ ने बड़े गर्व के साथ कहा।

"हां, ओघड़....मैं परेशान थी.....भटक रही थी....तेरी जुदाई मुझसे सही नहीं जा रही थी...... ." शान्ति ने खड़े होते हुए कहा।

"महराज........अब हमें क्या आज्ञा चाही।

हां, तुम लोग जाआ.... | मोज...मेला करों....मैं कुछ देर में तुम्हारी झोंपड़ी मे आता हूं...... ।'

“जो आज्ञा, महाराज..... " यह कहकर वे तीनों झोंपड़ी से निकल गये |उनके जाते ही ओघड़नाथ ने शान्ति का हाथ थाम लिया-"मेरी शान्ति..... ।'' वह हसरत भरे लहजे में बोला था-"आ मेरे गले गल जा।"शान्ति उसके गले लग गई।इस तरह नमीरा जी उठी।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

समीर राय ने अगर अपनी नमीरा को देखा था तो गलत नहीं देखा था। वह उसकी नजर का धोखा नहीं था। वह वाकई नमीरा थी।

नमीरा को देखकर समीर राय तड़प उठा था। वह मायरा के गांव में ज्यादा नहीं रूका था। मायरा को छोड़कर फौरन लौट आया था। मायरा ने भी उसे रोकने की कोशिश नहीं की थी। वह समझ गयी थी कि इस वक्त उसे रोकना व्यर्थ है। नमीरा की झलक पाकर उसे चुप लग गई थी, वह सारे रास्ते खामोशी से ड्राइविंग करता रहा था।

वह इस बात पर हैरान था कि वे दोनों ऊंट अचानक गायब कैसे हो गये?

पर वे ऊंट गायब नहीं हुए थे। यह सब ओघड़नाथ की कारस्तानी थी। जिस तरह समीर राय ने नमीरा और ओघड़नाथ को पहचान लिया था...उसी तरह ओघड़नाथ ने भी समीर राय को एक नजर में पहचान लिया था।

समीर राय को ऊंट के पीछे भागते देखकर ओघड़नाथ घबरा गया था। पहले तो उसने अपने मुंह से एक अजीब-सी आवाज निकालकर ऊंट को दौड़ाया...

फिर जब उसने देखा कि समीर राय गाड़ी में बैठकर पीछे आ रहा है तो उसने मोड़ मुड़ते ही ऊंटों को रोका व उन्हें सड़क से उतार कर पेड़ों में ले गया।

फिर उसने फौरन ही जाने कैसा मंत्र-पाठ किया.फिर "शिन शिला की भू–भला भू" के उच्चारण के साथ ही मुड़कर सड़क पर फूंक दिया।

हालांकि दोनों ऊंट सड़क के किनारे ही पेड़ों में खड़े थे..जो सड़क के साथ नजर आ रहे थे..लेकिन ओघड़नाथ क्योंकि नजरबन्दी का अमल कर चुका था, इसलिए वे दोनों ऊंट समीर राय को और मायरा को नजर नहीं आ सके।

यूं काफी आगे तक जाकर देखने के बाद भी समीर राय को निराशा ही हाथ लगी थी। ओघड़नाथ ने जब देखा कि समीर राय निराश वापिस लौट गया है तो उसने नमीरा उर्फ शान्ति से कहा

“शान्ति, मेरी प्रिया! घुघट निकाल ले री...।"

"क्यों, क्या हुआ?" शान्ति परेशान होकर बोली।

"तेरी मनमोहिनी सूरत देखकर तेरा पति रूक गया था। मैं अगर अमल न करता तो वह तुझे...अभी ले उड़ा था।"

"ओघड़, तू खामखां ही डर गया था। अरे, उसे जरा मेरे पास तो आने देता...यह जानकर कि मैं शान्ति हूं..अपने ओघड़ की शान्ति–तो वो तो जाता न मुंह लटका के...

___ "हां.ऐसा हो सकता था..लेकिन मैंने खतरा मोल लेना उचित न समझा। चल, अब अपने ऊंट को हांककर सड़क पर ले आ। अब वह बहुत दूर जा चुका है...।"

दोनों ऊंट सड़क पर आ गये और फिर पहले की तरह मस्त गति से अपना सफर तय करने लगे।

,,,,,,,,,,,,,
 
देवांग, नन्हीं बरहा के साथ नदी पार कर दूसरे किनारे पहुंचा। वह बरहा को कन्धे से लगाए, तेजी से पश्चिम दिशा में बढ़ता जा रहा था। लगभग आधा मील चलने के बाद एक बस्ती के आसार नजर आने लगे।

यह उसकी अपनी बस्ती थी।

कुछ ही देर बाद वह अपने घर के दरवाजे पर पहुंच गया, इस बस्ती का सबसे बड़ा और पुराना घर था। देवांग ने बड़े जोर से दरवाजा खटखटाया..कुछ देर बाद अंदर से लाठी की ठकठक सुनाई दी।

दरवाजा खोलने वाली नब्बे बरस से कम क्या होगा। सफेद साड़ी पहने, कमर झुकी हुई, सफेद बाल, भौंहे तक सफेद, हाथ में लाठी, सांवली रंगत, चेहरे पर बेशुमार झुर्रियां...वह नब्बे बरस की जो जरूर थी। लेकिन देखने में जानदार बुढ़िया थी।

दरवाजा खोलकर वह एक तरफ हटी, उसने देवांग के कंधे पर किसी बच्ची को देखा तो बहुत हैरान हुई।

"देवांग..यह क्या उठा लाया तू..?"

"माता..यह बरहा है। परमान की अमानत। बहुत बहुमूल्य चीज है। हमें इसे अपने पास रखना है...।" देवांग

ने अंदर आते हुए बताया।

"परमान की अमानत है तो फिर आप ही बहुमूल्य चीज हुई...." बुढ़िया ने, दरवाजे में कुण्डी लगाते हुए सहमति में सिर हिलाया।

वे सहन पार कर एक कमरे में पहुंचे। देवांग ने पूछा-“माता..तुम कर क्या रही थीं?"

"बच्चों को दूध देने जा रही थी...।" देवांग की मां

बोली।

"उर्वशी क्या घर में नहीं है..?" देवांग ने पूछा।

"अंदर है। वह कहां जाएगी....।"

"मैं यहां हूं।" एक अधेड़ उम्र औरत फौरन ही दरवाजे पर आ गई।

"उर्वशी..ले सम्भाल इसे। देख, इसे अपने प्राण से भी ज्यादा प्यारा रखना...।" देवांग ने हिदायत दी।

"तू चिन्ता न कर देवांग। मैं इसे अपने दिल का टुकड़ा समझ कर रखूगी..."

"मुझे तुझसे यही आशा थी।" देवांग ने बरहा को उर्वशी की गोद में दे दिया।

उर्वशी ने बरहा की मोहिनी सूरत पर नजर डीली तो वह मंत्रमुग्ध हो गई-"हाय, इतनी प्यारी... | इतनी सुन्दर...।" वह बरबस बोली थी।

"सुन्दर क्यों न होगी... आखिर परनाक की पसन्द

है...।"

देवांग ने प्रशंसापूर्ण नजरों से बरहा को निहारा।

उर्वशी ने बड़े प्यार से बच्ची का मुंह चूमा।" ऐसी प्यारी बच्ची मैंने आज तक नहीं देखी...।"

फिर वह उसे भीतर के कमरे में ले आई और उसे होश में लाने का यत्न करने लगी।

देवांग कमरे निकल आया। उसने बाहर निकलकर देखा कि पीपल के पेड़ के नीचे दस-बारह मिट्टी के प्याले रखे थे। देवांग की मां एक छोटी बाल्टी से इन प्यालों में दूध डाल रही थीं देवांग दरवाजे की दहलीज पर बैठ गया

और अपनी मां को प्यालों में दूध भरते देखने लगा।

जब सारे प्यालों में दूध भर गया तो देवांग की मां पार्वती ने दूध की खाली बाल्टी रसोई में जाकर रखी और फिर वापिस पेड़ के नीचे आई और अपनी लाठी तीन बार

जोर-जोर से जमीन पर मारी और बड़े प्यार से बोली

"आओ, बच्चों...।"

'आओ, बच्चो' कहना था कि विभिन्न स्थानों से छोटे बड़े सांप निकलकर लहराते हुए उन दूध भरे प्यालों की तरफ लपके और फिर प्यालों में मुंह डालकर दूध पीने लगे।

पार्वती इन सांपों को प्यार भरी नजरों से देख रही थी।

नमीरा की एक झलक ने ही समीर राय के दिल में तूफान ला दिये थे।

वह नमीरा को भूला नहीं था। अब जब उसकी याद आती तो आती चली जाती | उसकी याद आती थी तो उसका दिल तड़पाती थी, लेकिन वह विक्षिप्तता जो नमीरा की लाश देखकर उस पर सवार हुई थी...वैसी जुनूनी अवस्था अब उसकी न रही थी। वह धीरे-धीरे जिन्दगी की तरफ लौट रहा था और अब जिन्दगी की तरफ लौटते-लौटते अचानक जिन्दगी के एक मोड़ पर उसे अपनी जिन्दगी दिखाई दे गई। ऐसे में उसका व्यग्र व बेचैन हो उठना स्वाभाविक था।

वह दूसरे दिन घोड़े पर हवेली से निकला। उसे घुड़सवारी का कोई खास शौक नहीं था, वह तो घोड़े पर इसलिए निकला था कि शायद नमीरा फिर कहीं दिखाई दे जाए।

नमीरा से मिलने की आस में उसने मीलों लम्बा चक्कर काटा... लेकिन नमीरा उसे कहीं दिखाई नहीं दी। निराश होकर वह हवेली लौट आया और कपड़े बदले बिना ही बैड पर औंधे मुंह पड़ गया।

नफीसा बेगम ने जब प्रतिदिन की तहर उसके कमरे का चक्कर लगाया तो बेटे के कमरे में अंधेरा पाया। उसने अंदर आकर लाइट जलाई तो समीर को बेसुध लेटे पाया। उसे बैड पर यूं बिखरा पड़ा देखकर वह तड़प कर आगे बढ़ी।

__ "समीर, बेटे..क्या हुआ..?" उसने, उसका चेहरा अपनी तरफ घुमाते हुए कहा।

"कुछ नहीं, अम्मी...!" समीर राय ने करवट बदली।

समीर राय की पलकें भीगी हुई थीं। नफीसा बेगम ने देखा तो बोली-"तुम रो रहे हो?"

"नहीं मां..तुझसे मेरा क्या छिपा है...।"

और यही हकीकत भी थी कि समीर राय अपनी मां के बहुत करीब था। वह हर छोटी-बड़ी बात जब तक अपनी मां से नहीं कर लेता था..उसे चैन नहीं आता था।

"फिर यह आंसू क्यों छिपाये..?" नफीसा बेगम के लहजे में शिकवा था।

"मा..मैं इस वक्त बहुत परेशान हूं। मेरा दिल बेचैन है।"

समीर ने कबूला-"इसे किसी भी तरह करार नहीं...।"

"पर क्यों..कुछ बता तो सही...।" मां ने सहानुभूति

दर्शाई।

"मा...मैंने कल बड़े मामू के यहां जाते हुए रास्ते में नमीरा को दखा है..।" समीर ने रहस्योद्घाटन किया।

पर यह रहस्योद्घाटन किसी भयंकर विस्फोट से कम नहीं था। नफीसा बेगम सकते में आ गई। वह चिन्तित हो उठी कि समीर बड़ी मुश्किल से तो कुछ

सम्भला है। बड़े यत्नों के बाद जिन्दगी की तरफ वापिस आया है...अब उसने फिर नमीरा का शोशा छोड़ दिया है। जाने उसने किसको देख लिया था?

"समीर बेटे... क्या तू जानता है कि तू क्या कह रहा है।"

मां परेशान होकर उसे घूरने लगी।

"हां, मां! मैं अच्छी तरह जानता हूं कि मैं क्या कह रहा हूं। तुम्हें यकीन नहीं आया न। इसीलिये मैंने अभी तक आपको यह बात नहीं बताई थी... "

"लेकिन बेटे..ऐसा कैसे हो सकता है। मां के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं-" नमीरा मर चुकी है। तुमने उसकी लाश देखी है।"

"मा..आप ठीक कह रही हैं..लेकिन मैं भी ठीक कह रहा हूं...।" समीर राय ने गहरी सांस ली।

"जरा तफसील (सविस्तार) से तो बता मुझे सारी बात..."

मां, अपने बेटे के चेहरे से नजरें नहीं हटा पा रही

थी।
 
समीर राय ने बीती शाम की वह सारी घटना सविस्तार ही मां को सुना डाली।

"वह नमीरा की कोई हमशक्ल होगी...।" सारा वाकया सुनने के बाद नफीसा बेगम ने अपना ख्याल

जाहिर किया।

"नहीं, मां। मेरी आंखें धोखा नहीं खा सकती! मेरा दिल फरेब नहीं खा सकता। वह नमीरा ही थी अम्मी.. वह इसलिये गायब भी हो गई।" समीर राय ने तर्क दिया-'अगर वह नमीरा न होती तो यूं हर्गिज गायब न होती...जरूर कोई राज है अम्मी...।"

___ "बेटे, समीर..मैंने रौली से बात की थी। वह नमीरा को समुद्र किनारे कहीं रेत में दबाकर आया था। फिर वह तेरे अब्बू के हुक्म पर उसे कफन-दफन के लिये हासिल करने गया था। लेकिन नमीरा की लाश उसे उस जगह नहीं मिली थी। जाहिर है...इतने दिनों बाद लाश का मिलना नामुमकिन ही था। लाश, चाहे नहीं मिली थी...पर

यह बात तो तू भी अच्छी तरह जानता है कि वह मर चुकी

नफीसा बेगम ने उसे समझाया।

"पता नहीं मां...।" समीर अविश्वास से बोला-"जाने क्यों करार नहीं आता...।"

"समीर..मेरे बेटे..! अंदेशों में मत पड़ो। यकीन कर ले कि नमीरा मर चुकी है...और यही तेरे हक में बेहतर भी है। मुझे डर है कि कहीं तू फिर बीमार न पड़ जाए...।"

___ "नहीं, अम्मी! आप डरें नहीं। ऐसा कुद नहीं होगा। लेकिन अम्मी, मैं नमीरा को भूलूंगा नहीं..मैं उसे नहीं भुला सकता | मैं उसकी तलाश में रहूंगा। मैं उसे आज भी तलाश करके आया हूं..।"

"उफ, मेरे खुदा...।" नफीसा बेगम ने एक ठण्डी सांस भरी... कुछ देर उसे निहारती रही, फिर बोली-" तुझे मायरा कैसी लगती है..?"

"इस वक्त मायरा का क्या जिक..?" समीर ने खिन्नता दर्शाई।

"वह नमीरा से कहीं खूबसूरत है...।" नफीसा ने मुस्कुरा कर दिखाया।

"होगी...।" समीर राय ने बहस उचित न समझी।

"मैं सोच रही हूं कि...।"

"अम्मी आप जो भी सोच रही हैं..बस सोचती ही रहें। इस बात को जुबान पर मत लाना...।" समीर ने उनकी बात काटते जैसे अपना फैसला सुनाया।

"समीर, बेटे! मैं मां हूं तुम्हारी...मैं तुम्हें इस तरह भटकता नहीं देख सकती। मेरे लिये न सकी..अपनी खातिर तुम्हें मेरी यह बात माननी होगी...।"

"अम्मी...प्लीज...मुझे सुकून से रहने दें।"

"हां, बेटे! मैं भी तो यही चाहती हूं कि तुम सुकून से रहो..।"

नफीसा बेगम उठते हुए बोली।

नमीरा की दास्तान सुना समीर राय ने मां को भी बेचैन कर डाला था।

नफीसा बेगम सपने देखने लगी थी। समीर राय सामान्य हो चला था। मायरा से उसकी घनिष्ठता होती जा रही थी और मायरा ही नफीसा की पसन्द भी थी। वह उन दोनों को साथ बैठे देखती तो बहुत खुश होती। उसने मायरा को अपनी बहू बनाने का फैसला कर लिया था। पर

अब हालात की इस करवट व समीर राय की मौजूदा कैफियत ने नफीसा बेगम की खुशियों पर पानी फेर दिया थां वह चिन्तित हो गई थीं

इस दिन भी नफीसा बेगम ऐसे ही चिन्तित सोचों में डूबी बैठी थी कि मायरा अपनी मां के साथ हवेली आ

गईं नफीसा बेगम उन्हें देखकर खिल उठी। उसने उनका बढ़कर स्वागत किया। उसने अपनी भाभी को गले से लगाया और मायरा को प्यार किया।

मायरा कुछ देर तो उनके पास बैठी रही, फिर उठी व समीर राय के कमरे की तरफ बढ़ गई।

मायरा चली गई तो नफीसा बेगम अपनी भाभी नजमा से बोली-“भाभी, मैं कल से बड़ी परेशान हूं।"

"हाय..क्या हुआ...?" नजमा घबरा गई।

"समीर का दिमाग फिर उलटने लगा है...। वह नमीरा को किसी तौर भूलता ही नहीं....।" नफीसा ने अपना दुखड़ा रोया।

"अब क्या हुआ..?" नजमा उसकी सूरत देखने

लगी।

"वह उस दिन मायरा को छोड़ने गया था तो रास्ते में उसे कहीं नमीरा नजर आ गई...।"

"जानती हूं।" नजमा बोली-"यह बात मायरा ने मुझे बताई थी।"

__ "तो क्या मायरा ने भी नमीरा को देखा था..?" नफीसा बेगम ने पूछा।

"नहीं, उसने नहीं देखा था..।" नजमा ने बताया-"उसने ऊंट पर बैठी औरत की तरफ कोई ध्यान

नहीं दिया था...।"

"बताओ, जो लड़की जीप में बैठी थी...उसने तो देखा नहीं...लेकिन उसने गाड़ी चलाते हुए भी देख लिया...।" नफीसा सोच में पड़ गई थी।

"नफीसा आपा...! समीर को किसी पीर-फकीर को क्यों नहीं दिखा लेती। उसकी झाड़-फूंक करवा लो...सब ठीक हो जाएगा...।" नजमा ने सुझाव दिया।

___ "मैं भी यही सोच रही हूं...।" नफीसा ने सहमति दर्शाई-"पर मैं पीर-फकीर लाऊं कहां से, मैं तो किसी को जानती नहीं...।"

"आपा तुम फिक्र मत करो। मैं जानती हूं एक लड़की को। तुम्हें मेरे साथ चलना होगा...।"नजमा ने एक शहर का नाम बताया था।"चलूंगी...जरूर चलूंगी...।" नफीसा बेगम ने फोरम हामी भर ली-“वहां जाना क्या मुश्किल है। लेकिन तुम तो किसी लड़की की बात कर रही हो। पर एक औरत जात इस मामले में क्या कर सकेगी... |"

"आपा, बस तुम मेरे साथ चलो, वहां चलकर ही देखना कि वह लड़की क्या कर सकती है और क्या नहीं...।" नजमा ने पूरे विश्वास के साथ कहा-"हां, तुम समीर की कोई इस्तेमाल की हुई चीज साथ ले लेना। मसलन, उसका रूमाल, कोई कमीज। उसका कोई पैन–वैन भी साथ ले सकती हो...।

"ठीक है...।" नफीसा बेगम ने ज्यादा बहस में पड़ना उचित न समझा।

वह एक आम-सा इलाका था...जहां अपनी बेशकीमती पैजारों गाड़ी से नफीसा बेगम और रायशा और नफीसा की खास सेविका लोंगसरी पहुंची थी|रायशा ही उस लड़की से वाकिफ थी। रायशा ने आगे बढ़कर कालबैल का बटन दबाया..ओर कुछेक क्षणों बाद ही दरवाजा खुला। एक अधेड़ उम्र की औरत ने इन घरेलू औरतों को हैरत से देखा और बोली-“जी... ''हमें अरूणिमा से मिलना है...।" नजमा बेगम ने नर्म लहजे में कहा। नजमा ने अपनी बहन रायशा को सूरत से अपने साथ ले लिया था।

'अच्छा, मैं उनसे पूछती हूँ। आप थोड़ा इंतजार करें।" कह कर वह अधेड़ उम्र औरत अंदर चली गई, वह अरूणिमा की मां थी|नफीसा बेगम ने परेशानी से नजमा को देखा.. यही अन्देशा जहन में उठा था कि कहीं यह अरूणिमा मिलने से इंकार न कर दे। नजमा ने हाथ के इशारे से उसे तसल्ली दी।कुछ देर बाद बंद दरवाजा फिर खुला और अरूणिमा की मां...रजनी ने दोनों पट खोलते हुये कहा-"अन्दर आ जायें...।"

अरूणिमा की मां ने अपने मेहमानों की सेवा से ड्राइंगरूम में बिछाया व फिर उनसे बोली-"मेरे साथ वह आये प्राब्लम पेश है...।“मजमा ने फौरन नफीसा को इशार किया-"तुम जाओ... "तुम भी चलो...।" नफीसा बेगम
 
उठते हुए हिचकिचाई वह आहिस्ता से नजमा से बोली ।"नहीं आया... आप ही जायेंगे। यही ठीक रहेगा...।

“नजमा की बजाय रायशा ने जवाब दिया ।"अच्छा, ठीक है...।" नफीसा बेगम उठी व अरूणिमा की मां रजनी के साथ ड्राइंगरूम से निकल गई और फिर रजनी जिस कमरे में नफीसा बेगम के साथ पहुंची... उसमें सब्ज रंग का एक सादा-सा कालीन बिछा हुआ था और सफेद कवर चढ़े दो गाव तकिये रखे थे। कमरे में कोई न था! रजनी ने नफीसा बेगम को बैठने का इशारा किया और बोली-"आप तशरीफ रखें...वह अभी आती है...।"यह कहकर वह बाहर चली गई। उसके जाने के बाद नफीसा बेगम ने एक निरीखणात्मक नजर कमरे पर डाली और गाव तकिये का सहार लेकर बैठ गई। उसकी नजरें भीतरी बंद दरवाजे पर थीं।कुछ ही देर बाद एक छोटी-सी लड़की कमरे में दाखिल हुई। उसकी उम्र मुश्किल से पन्द्रह साल की थी। नफीसा बेगम ने उसे देखा...और यही समझा कि कोई पैगाम वगैरह लेकर आई है...कि अरूणिमा कहीं व्यस्त है।लेकिन ऐसा न था। वह खुद ही अरूणिमा थी। इकहरे बदन की बालकटी अरूणिमा। वह पूरे इत्मीनान के साथ दूसरे गांव तकिये का सहारा लेकर बैठ गई।उसमें गहरी नजरों से नफीसा बेगम का जायजा लिया और फिर मुस्कुराते हुये बोली-"रोशनगढ़ी की हवेली की मल्लिका को आखिर हम से क्या काम पड़ गया..?"यह सुनकर नफीसा हैरान रह गई। टी०वी० सीरियलों की रोमांटिक अभिनेत्री-सी दिखती इस लड़की ने कैसे जाना कि वह कौन है और कहां से आई है। तभी उसे नजमा भाभी की यह टिप्पणी याद आई कि 'वहां चलकर देखना कि वह लड़की क्या कर सकती है। अरूणिमा ने मुंह खोलते ही नफीसा को हैरत में डाल दिया था। अब आगे वह न जाने क्या-क्या रहस्योद्घाटन करने वाली थी। मैं अपने बेटे के सिलसिले में आई थी...।"

नफीसा ने फौरन जवाब दिया।"क्या हुआ आपके इकलौते बेटे को..?" अरूणिमा ने उन्हें गहरी नजरों से देखते हुए पूछा नफीसा फिर हैरान हुई । अरूणिमा ने 'इकलौता बेटा कहकर एक और धमाका किया था। नफीसा को यकीन हो चला कि नजमा उसे सही जगह लेकर आई है कि उसकी समस्या जरूर हल हो जाएगी... अब नफीसा बेगम ने हर वह बात बता दी जो जरूरी थीं वह लड़की अरूणिमा पूर्ण एकाग्रता के साथ नफीसा बेगम की विपक्ष सुनली रहीं। नफीसा बेगम खामोश हुई तो अरूणिमा संजीदगी से बोली-"हमें आपके बेटे का पैन-कलम चाहिये होगा...।"अरूणिमा शायद यह भी जानती थी कि नफीसा बेगम समीर राय की 'इस्तेमाल की किसी चीज के तौर पर उसका पैन लेकर आई हैं ।

नफीसा एकदम बोली-“मैं लाई हूं, बोली ।"नफीसा बेगम ने पैन अपने पर्स से निकालकर अरूणिमा के हवाले कर दिया। उस कोमलागी भविष्यवकता और 'आमिल' ने इस बन्द पैन को एक नजर देखा और फिर अपने बांए हाथ में दबा लिया। उसकी हिरणी सी चपल आंखों एक वेषेनी सी दिखने लगी थी।"एक सवाल पूछ सकती हूं.?" नफीसा बेगम ने धीरे से पूछा ।

“जी, पूछिये...।" अरूणिमा ने अनुमति दी।“

क्या समीर राय ने वाकई अपनी नमीरा को देखा है..?"

अरूणिमा ने तत्काल जवाब दिया-"जी हां, यह सच है..।

''क्या नमीरा जिन्दा है..?" नफीसा का यह दूसरा सवाल स्वाभाविक था।

"नहीं. यह गलत है।

"इसका मतलब है कि नमीरा मर चुकी है...?"

"निस्सन्देह... । यकीनन... । अरूणिमा ने दृढ़ शब्दों में कहा।

"नमीर मर चुकी है. इसके बावजूद दिखाई दे रही है। यह सब क्या गोरखधंधा है?"

"आप इस बाल को समझ नहीं सकेंगी।" अरूणिमा की संजीदगी बरकरार थी- "अब आप चाहती क्या हैं..यह बताएं।"

""मैं अपने बेटे को नमीरा की यादों से अलग करना चाहती हूं। ये यादें उसे पागल किये हुये हैं...।

"ऐ बात बताएं...।" अरूणिमा ने नफीसा बेगम की आंखों में झांकते हुए पूछा-"क्या आपको अपनी पौत्री याद नहीं आती..?"

"क्या वह जिन्दा है...।" नफीसा ने चकित हो पूछा।

"हां...वह जिन्दा है और ऐसी प्यारी...ऐसी खूबसूरत बच्ची तो दूर-दूर तक दूसरी नहीं है। उसे आप भूले हुए हैं । पहले हम उस बच्ची के लिए कुछ करते हैं...फिर नमीरा की समस्या देखेंगे... । आपकी बहू नमीरा का मसला जरा टेढ़ा है। यूं उस बच्ची को भी पाना आसान नहीं है । वह बच्ची बड़े 'शैतानों'-'शबीसों के बीच फंसी हुई है...।
 
Back
Top