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भाग 196
विकास (चाय की चुस्की लेते हुए): "देख रहे हो सूरज, तुम्हारी मौसी कैसे घोड़े बेचकर सो रही है? रात की थकान ने इसे बिल्कुल निढाल कर दिया है। वैसे... इस ठंडे मौसम में ऐसी गहरी नींद नसीब वालों को ही मिलती है, है ना?"
विकास की बातों में छिपा वह 'दोहरा अर्थ' सूरज को बेचैन कर रहा था। सूरज का ध्यान अब नैनीताल की वादियों से हटकर पूरी तरह अपनी मौसी के उस मादक बदन पर केंद्रित हो चुका था, जो चादर के भीतर रह-रहकर करवट ले रही थी। विकास ने बड़ी चालाकी से वह मंच तैयार कर दिया था जहाँ अब मौसी और भांजे के बीच की दूरियाँ और भी सिमटने वाली थीं।
अब आगे ..
नैनीताल की वह सुबह अब अपनी मादकता के चरम पर थी। सूरज और विकास सोफे पर बैठकर चाय पी रहे थे और बातें कर रहे थे, तभी बिस्तर पर हलचल हुई। सोनी की नींद खुली और उसने अनजाने में ही एक ऐसी मदहोश कर देने वाली अंगड़ाई ली कि चादर उसके जिस्म से नीचे खिसक गई। उसके गोरे, नग्न कंधे और वक्षों का ऊपरी हिस्सा सुबह की रोशनी में चमक उठा।
जैसे ही उसे अपनी नग्नता और सामने बैठे सूरज और विकास का एहसास हुआ, उसके चेहरे पर शर्म की लाली दौड़ गई। उसने झटके से चादर को अपने गले तक खींच लिया। वह इस समय अपने दो 'आशिकों' के बीच पूरी तरह नग्न, सिर्फ एक सफेद चादर के भीतर कैद थी।
सोनी (हड़बड़ाते हुए): "अरे! ८ बज चुके हैं... मैं तो सोती ही रह गई। आप लोग चाय भी पी रहे हैं और मुझे जगाया तक नहीं?"
उसने अपनी नज़रों को चुराते हुए घड़ी की तरफ देखा और स्थिति को सामान्य करने की कोशिश की।
सोनी: "सूरज, बेटा जा... तू भी जल्दी से तैयार हो जा। नाश्ता करके हमें आज नैनीताल घूमने भी निकलना है। देर हो रही है।"
सूरज ने दबी हुई निगाहों से अपनी मौसी के उस बिखरे हुए हुस्न को देखा और मामा के इशारे पर कमरे से बाहर निकल गया। सूरज के जाते ही सोनी ने चादर को कसकर पकड़ा और विकास की आँखों में आँखें डालते हुए उलाहना दिया।
सोनी: "विकास जी! आप भी न... सूरज को अंदर बुलाने की क्या ज़रूरत थी? मैं यहाँ इस हाल में सो रही थी, उसे कैसा लगा होगा?"
विकास ने अपने दांत दिखाते हुए मुस्कुरा कर बोला अरे इतनी ठंड है कुछ उसे भी तो गर्मी महसूस होनी चाहिए..
सोनी शर्मा गई और बोली आप पूरे पागल हो गए हैं…
नैनीताल की उस मदहोश सुबह में, कमरे के भीतर का तापमान बाहर की बर्फबारी से बिल्कुल उलट था। विकास ने जैसे ही बेडरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद किया, कमरे में एक मादक सन्नाटा छा गया। विकास बिस्तर पर सोनी के करीब बैठ गया और चादर के भीतर हाथ डालकर उसके रेशमी बदन को सहलाने लगा।
तभी साइड टेबल पर रखे होटल के लैंडलाइन फोन की घंटी घनघना उठी। विकास ने झल्लाते हुए रिसीवर उठाया पर जैसे ही उसने रिसीवर पर सुगना की आवाज सुनी उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसने उसे सोनी के कान के पास लगा दिया और खुद भी अपने कान सटा दिए.. ताकि वे दोनों बात सुन सकें। दूसरी तरफ से सुगना की आवाज़ गूँजी।
सुगना: "हेलो
सोनी : हा दीदी
सुगना: सोनी! कैसी है मेरी छोटी? नैनीताल की वादियों में विकास जी की गर्मी का मज़ा ले रही है या ठंड से जम गई है?"
सुगना की आवाज़ में वही शरारत थी, जिसमें हक भी था और बेबाकी भी। सोनी ने विकास की ओर देखा, जो इस समय उसकी मुनिया के साथ खेलते हुए बातचीत का आनंद ले रहा था।
सोनी: "अरे दीदी! बाहर तो ठंड है पर विकास जी में तो आग लगी हुई है । विकास जी ने पिछले दिनों में जो रूप दिखाया है, मैंने सालों में नहीं देखा। यकीन मानिए, इस बार की संतान सप्तमी में तो जैसे उनकी कल्पनाओं को पंख लग गए हैं।"
सुगना (हँसते हुए): "वाह! तो विकास जी अब कुछ नया खेल रहे हैं? सच बता, पहाड़ों की इस हवा में उन्होंने क्या अनोखा तजुर्बा कराया? हम बहनों में तो कोई परदा है नहीं, ज़रा मैं भी तो सुनूँ कि विकास जी की कामुकता कहाँ तक जा रही है।"
सोनी: …लगता है आपने इनको भी कुछ घुट्टी पिलाई है तभी आजकल बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं।
सुगना: …चल अच्छा ही तो है आखिर उनकी गर्मी का आनंद तो तुझे ही भोगना है वैसे ऐसी क्या अनोखी बात हो गई?
सोनी ने एक लंबी साँस ली और सिसकारी दबाते हुए बोलना जारी रखा।
सोनी: "दीदी, आपको क्या बताऊँ... विकास जी आजकल संभोग के दौरान ऐसी-ऐसी 'वर्जित' बातें करते हैं कि मेरा रोम-रोम सिहर जाता है। वो पुरानी यादों को कुरेदते हैं और ऐसी अनोखी कल्पनाओं का जाल बुनते हैं जो सामान्य समाज में अपवित्र मानी जाती हैं। मुझे कभी-कभी डर लगता है कि कहीं मैं उन वर्जित रास्तों पर खो न जाऊँ।"
सुगना (गंभीर और कामुक स्वर में): "पगली, इसमें डरने वाली क्या बात है? देख सोनी, एक मर्द के मन के भीतर इच्छाओं का अथाह समंदर होता है। कई बार वह ऐसी चीज़ों की कल्पना करता है जो दुनिया की नज़रों में 'वर्जित' होती हैं, लेकिन बिस्तर पर पति-पत्नी के बीच कुछ भी गलत नहीं होता। अगर विकास जी तुझे किसी नए रोमांच की ओर ले जा रहे हैं, तो उसे स्वीकार कर।"
सोनी: "पर दीदी, उनकी कल्पनाएँ बहुत कामुक और अजीब होती हैं... वो किसी पराए पौरुष और अदम्य शक्ति की बातें करते हैं जिसे सुनकर मेरा शरीर तो प्यासा हो जाता है, पर मन कांप जाता है।"
सुगना: " तो बड़े रसिक हैं विकास जी देखने में तो सीधे-साधे लगते हैं पर…सुन सोनी, मर्द की कई इच्छाएं होती हैं और उन्हें पूरा करना ही एक समर्पित स्त्री का कर्तव्य है। कामुकता के उस चरम पर सब कुछ संभव है और सब कुछ पवित्र है। अगर उनकी इन वर्जित बातों से तुझे सुख मिल रहा है और उन्हें आनंद आ रहा है, तो उस सुख को पूरी तरह से जी। एक औरत का शरीर उस प्रचंड शक्ति और समर्पण के लिए ही बना है। तू बस उनकी कल्पनाओं की लहरों पर खुद को छोड़ दे।"
सुगना की इन बातों ने विकास के इरादों को जैसे एक सामाजिक और पारिवारिक स्वीकृति दे दी थी। सुगना को बिल्कुल इल्म नहीं था कि विकास की ये 'वर्जित कल्पनाएँ' असल में किस दिशा में मुड़ रही हैं, लेकिन उसकी बातों ने सोनी के मन के संशय को मिटा दिया था।
सोनी: …अरे थोड़ा तो सब्र कीजिए दीदी हैं फोन पर..
सुगना: …क्या हुआ विकास जी पास में ही है क्या?
सोनी: …हां दीदी इनका मन लगता है रात में भी नहीं भरा सुबह-सुबह ही चालू हो गए हैं..
सुगना: "विकास जी के इस बदले हुए रूप का आनंद ले सोनी। संतान सप्तमी का यह अनुष्ठान तभी सफल होगा जब तेरी आत्मा और शरीर पूरी तरह से समर्पित होंगे। अब फोन रख और विकास जी की उन अनोखी कल्पनाओं में खुद को विसर्जित कर दे।"
सोनी: .. अब आपने कहा है तो करना ही होगा..
दोनों बहनें खिलखिलाकर हँसने लगीं।
सुगना: …मेरा प्यारा सूरज कहां है..?
सोनी:…वह अपने कमरे में तैयार हो रहा होगा बात कराऊं क्या…
सुगना…कोई बात नहीं तू अभी विकास जी का ख्याल रख पर सूरज का भी ध्यान रहना… वह मासूम है अकेला है और एक तू ही है जो उसे अच्छे से समझती है। मैं देख रही हूं कि पिछले कई दिनों से वह तुझे बहुत प्यार करने लगा है क्या जादू किया है तूने उस पर..?
सोनी…सकपका गई.. पर बात संभालते हुए बोली दीदी आप फिक्र मत कीजिए दोपहर में जब बात कीजिएगा खुद ही पूछ लीजिएगा..
सुगना: …ठीक है बाबा, जा अब विकास जी का ध्यान रख…
विकास ने एक विजयी मुस्कान के साथ रिसीवर वापस रखा और सोनी को बिस्तर पर पटक दिया। सुगना की बातों ने अब उस कमरे में वर्जित आनंद की कल्पनाओं पर अपनी मोहर लगा दी थी।
सोनी के फोन रखते ही विकास में ने सूरज के बारे में फिर एक बार बातें छेड़ दी…
विकास (सोनी के कान के पास फुसफुसाते हुए): "उसे कैसा लगा होगा, यह तो तुमने उसकी आँखों में देखा ही होगा सोनी। जब तुम वह अंगड़ाई ले रही थी, तो उसकी नज़रें तुम्हारी गर्दन और उन कंधों पर ऐसे गड़ी थीं जैसे वह तुम्हें वहीं कच्चा चबा जाना चाहता हो।"
सोनी (बनावटी गुस्से से): "छि:! कैसी बातें करते हैं आप। वह बच्चा है, मेरा भांजा है। वह ऐसा क्यों सोचेगा?"
विकास (हँसते हुए और सोनी के स्तनों को चादर के ऊपर से ही दबाते हुए): "बच्चा? सोनी, कल मैंने उसकी जो 'मर्दानगी' देखी है, उसके बाद उसे बच्चा कहना खुद को धोखा देना है। यकीन मानो, जब तुम करवट ले रही थी और तुम्हारा बदन चादर से उभर रहा था, तो सूरज की सांसें तेज हो रही थीं। उसके मन में तुम्हें लेकर जबरदस्त उत्तेजना है, मैं एक मर्द होकर दूसरे मर्द की आंखों की भूख पहचानता हूँ।"
सोनी ने अपना सिर झुका लिया, पर विकास की बातें उसके भीतर एक अजीब सी सनसनी पैदा कर रही थीं। वह विकास का साथ नहीं देना चाहती थी, पर उसका शरीर उन बातों पर प्रतिक्रिया दे रहा था।
सोनी (धीमी आवाज में): "आप जानबूझकर यह सब कर रहे हैं... आप चाहते हैं कि मैं भी वैसा ही सोचूँ जैसा आप सोचते हैं।"
विकास (सोनी की गर्दन चूमते हुए): "मैं सिर्फ सच कह रहा हूँ। क्या तुम्हें महसूस नहीं होता कि जब वह तुम्हें देखता है, तो उसकी नज़रों में एक हवस होती है? वह तुम्हें मौसी नहीं, एक 'मादक औरत' की तरह देख रहा है जिसे वह अपनी बाहों में भरना चाहता है।"
सोनी (उत्तेजित होकर): "अच्छा? और अगर ऐसा है भी, तो आप इतने खुश क्यों हो रहे हैं? आपको बुरा नहीं लगता कि आपका भांजा आपकी पत्नी को वैसी नज़रों से देख रहा है?"
विकास ने सोनी की आँखों में गहराई से देखा और उसके होंठों के करीब आकर बोला, "नहीं सोनी... मुझे बुरा नहीं लगता। बल्कि मुझे तो यह सोचकर और भी मज़ा आता है कि जब वह जवान फौलाद तुम्हें देखेगा, तो वह तुम्हें पाने के लिए किस हद तक तड़पेगा। और मैं चाहता हूँ कि तुम उसकी उस तड़प का मज़ा लो।"
सोनी चुप रही, पर उसके चेहरे की मुस्कान और आँखों की चमक बता रही थी कि विकास ने उसे एक बार फिर उस 'वर्जित' रोमांच की गहराई में धकेल दिया है। वह भले ही मुँह से मना कर रही थी, पर उसके मन में अब सूरज की वह 'कामुक निगाहें' एक मीठी खुजली की तरह घर कर रही थीं।
नैनीताल की वह सुबह अब पूरी तरह से वासना के रंग में रंग चुकी थी। इससे पहले कि सोनी खुद को संभालकर बिस्तर से उठ पाती, विकास ने अपनी बातों के तीखे बाणों से उसके भीतर उत्तेजना का एक और ज्वार पैदा कर दिया। विकास के मन में कल रात की वह 'वर्जित कल्पना' अभी भी किसी अंगारे की तरह सुलग रही थी।
विकास ने अचानक एक झटके के साथ सोनी के बदन से वह सफेद चादर खींच ली। सोनी का धवल, नग्न शरीर सुबह की पहली रोशनी में दूध जैसा सफेद चमक रहा था। विकास की नज़रें तुरंत सोनी की जांघों और उसकी 'मुनिया' के पास टिकीं, जहाँ सूरज के वीर्य की चमक अभी भी स्पष्ट दिखाई दे रही थी। विकास उसे अपना ही अंश मान रहा था, जबकि वह चमक उस 'दूसरी आहुति' की गवाह थी जो सोनी ने रात के एक बजे सूरज के साथ पूर्ण की थी।
विकास (सोनी की जांघों के बीच की गीली चमक को देखते हुए): "अरे वाह सोनी! देखो तो... कल रात के हमारे मिलन के निशान अभी भी तुम्हारी इस कोमल देह पर कायम हैं। लग रहा है जैसे कल रात मैंने तुम्हें वाकई पूरी तरह तृप्त कर दिया था।"
सोनी मन ही मन मुस्कुरा रही थी। उसने कुछ नहीं कहा, बस अपनी हथेलियों से अपनी मुनिया को ढकने की नाकाम कोशिश की। उसे पता था कि वह 'निशान' विकास का नहीं, बल्कि उस जवान ज्वालामुखी का है जिसे उसने कुछ घंटों पहले शांत किया था।
विकास: "ढको मत सोनी... इस मादकता को देखने दो। जब सूरज तुम्हें यहाँ देख रहा था, तो उसकी आँखों में यही प्यास थी।"
विकास अब पूरी तरह कामुक हो चुका था। उसने सोनी की हथेलियों को जबरन हटाकर उसकी जांघों को फैला दिया और उसकी मुनिया के उस संवेदनशील हिस्से को चूमने के लिए अपना चेहरा नीचे ले जाने लगा। सोनी को एक पल के लिए संकोच हुआ; वह नहीं चाहती थी कि विकास उस हिस्से को छुए जहाँ अभी-भी सूरज की ऊर्जा समाई थी। उसने विकास के कंधों को पकड़कर उसे ऊपर खींचने की कोशिश की, पर विकास आज किसी भी नियम को मानने के मूड में नहीं था।
सोनी के पास अब कोई चारा नहीं बचा था। विकास की बातों और उसके स्पर्श ने उसे फिर से उस दहलीज पर खड़ा कर दिया था जहाँ विवेक हार जाता है और शरीर जीत जाता है। उसने विकास को रोका नहीं और उसकी मनोदशा को पढ़ते हुए खुद को उसके हवाले कर दिया।
सोनी ने जितनी पवित्रता और शुद्धता अपने भांजे सूरज के लिए बरती थी (जिसके लिए उसने रात में स्नान किया था), उतनी शुद्धता उसने अपने पति के लिए ज़रूरी नहीं समझी। कारण स्पष्ट था—विकास खुद इस गंदी और मादक स्थिति का आनंद लेना चाहता था। उसे अपनी पत्नी के बदन पर 'कल की थकान' और 'निशान' देखना उत्तेजित कर रहा था।
कुछ ही देर में, विकास सोनी की उस चुदी हुई बुर को एक बार फिर अपने छोटे से अंग से भरने लगा। सोनी बिस्तर पर लेटी छत को निहार रही थी, पर उसके दिमाग में विकास के वे शब्द गूँज रहे थे जो वह हर प्रहार के साथ उसके कान में फुसफुसा रहा था।
विकास (हौले-हौले धक्का मारते हुए): "सोनी... सोचो... सूरज बाहर खड़ा है और वह जानता है कि मैं इस समय तुम्हें अंदर क्या दे रहा हूँ। क्या वह अपनी मौसी की इन सिसकियों को सुनकर खुद को रोक पाएगा?"
सोनी ने आँखें मूँद लीं। वह विकास के साथ संभोग तो कर रही थी, पर उसके मन का केंद्र अब भी सूरज ही था। विकास की हर हरकत, हर बात और हर धक्का उसे उसी दिशा में ले जा रहा था जहाँ सूरज का वह अद्भुत लिंग उसका इंतज़ार कर रहा था। सोनी ने विकास की कमर में अपनी टाँगें कस लीं और उस मादक विचार के साथ खुद को झड़ने दिया कि यह केवल विकास नहीं, बल्कि सूरज की ओर बढ़ने वाला एक और कदम है।
जब यह कामुक सत्र समाप्त हुआ, तो दोनों पसीने से लथपथ निढाल पड़े थे। पर इस बार भी चर्चा का अंत सूरज पर ही हुआ। विकास ने सोनी के गाल चूमते हुए कहा, "आज जब हम घूमने निकलेंगे, तो सूरज की आँखों में देखना सोनी... वह आज तुम्हें और भी ज्यादा हसरत से देखेगा।" सोनी बस मुस्कुरा दी, क्योंकि वह जानती थी कि आज का दिन नैनीताल की वादियों में और भी बड़े 'विस्फोट' लेकर आने वाला है।
नैनीताल की वह सुबह किसी जन्नत से कम नहीं थी। धुंध की हल्की चादर को चीरते हुए सूरज की किरणें झील के पानी पर सुनहरी आभा बिखेर रही थीं। सूरज, सोनी और विकास तीनों नैनीताल की वादियों में सुबह-सुबह भ्रमण के लिए निकले थे। तीनों के बीच हंसी-मजाक का दौर चल रहा था और वे नैनीताल की खूबसूरती व पहाड़ों की ठंडी हवा का आनंद ले रहे थे। सैर के दौरान सोनी की सुंदरता वाकई देखने लायक थी; गुलाबी ठंड के कारण उसके गाल सुर्ख हो रहे थे और फिटिंग वाले कपड़ों में उसका बदन किसी मूरत जैसा लग रहा था। सूरज की नज़रें बार-बार भटककर अपनी मौसी के उस कामुक और सुडौल बदन पर टिक जाती थीं, जिसे वह चाहकर भी नज़रअंदाज़ नहीं कर पा रहा था। विकास यह सब देख रहा था, पर उसके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान थी।
दोपहर होते-होते जब वे वापस लौटे, तो वादियों की वह मादकता कमरे के भीतर भी सिमट आई। सुइट में सन्नाटा था और बाहर की ठंडी हवा खिड़कियों से टकरा रही थी। विकास और सोनी बिस्तर पर लेटे हुए थे। सोनी दोपहर की एक छोटी सी नींद लेने की कोशिश कर रही थी, पर विकास के मन में चल रहा तूफ़ान थमा नहीं था।
वह रह-रहकर सुबह की उस घटना और सैर के दौरान सूरज की उन प्यासी निगाहों का जिक्र करने लगा। विकास का बार-बार उकसाना आखिरकार अपना काम कर गया। सोनी, जो अब तक खामोश लेटी थी।
विकास उसके बदन से खेलते हुए एक बार फिर सूरज के बारे में कामुक बातें करने लगा।
सोनी अचानक उठकर बैठ गई। उसने बिखरे हुए बालों को पीछे किया और विकास की आँखों में सीधे झांकते हुए उस संजीदगी से सवाल किया जिसने कमरे की शांति को एक भारी तनाव में बदल दिया।
सोनी: "विकास जी, आखिर आप चाहते क्या हैं? अब बस कीजिए यह पहेलियाँ बुझाना और खुलकर बताइए कि आपके मन में क्या चल रहा है।"
विकास एक पल के लिए सकपका गया। उसने उम्मीद नहीं की थी कि आराम के इन पलों में सोनी उसे इतनी सीधे तरीके से कटघरे में खड़ा कर देगी। कुछ देर सन्नाटा रहा, फिर विकास ने धीरे से सोनी के हाथों को अपने हाथों में लिया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव और गहराई थी।
विकास (गहरी आवाज़ में): "सोनी... तुम जानती हो कि मेरी मेडिकल रिपोर्ट क्या कहती है। मेरे वीर्य में शुक्राणुओं की कमी एक कड़वा सच है। हम यह 'संतान सप्तमी' का अनुष्ठान कर रहे हैं, पर वैज्ञानिक तरीके से मेरी कोख भरने की संभावना बहुत कम है। मुझे लगता है विधाता ने ही यह संयोग रचा है कि सूरज हमारे साथ यहाँ है।"
सोनी की सांसें थम सी गईं। विकास ने उसकी हथेलियों को सहलाते हुए आगे कहा।
विकास: "उसका वह विशाल और अद्भुत लिंग उसे एक विशेष पौरुष का स्वामी बनाता है। सोनी, यदि तुम मेरा साथ दो... तो इस अनुष्ठान की असली पूर्णाहूति सूरज के साथ संभोग से हो सकती है। हो सकता है, उसका वह प्रचंड और जीवंत वीर्य तुम्हारी कोख में उस नए जीवन का सृजन कर दे जिसके लिए हम तरस रहे हैं।"
सोनी यह सुनकर हतप्रभ रह गई। उसके भीतर एक जबरदस्त द्वंद्व शुरू हो गया। जिस कार्य को वह पिछले चार पांच दिनों से छिपकर, अपनी मर्यादा और विवशता के बीच कर रही थी, आज उसका पति खुद उसे वही 'आहुति' देने के लिए कह रहा था। उसके मन में एक शोर मचा— 'हे भगवान! यह कैसा न्याय है? मेरा पति खुद मुझे अपने ही भांजे की बाहों में सौंपने की बात कर रहा है!'
सोनी का चेहरा भावनाओं के भंवर में फंस गया था। एक तरफ वह पुराना राज था और दूसरी तरफ विकास का यह 'प्रस्ताव' जिसने अब सारे बंधनों को मानसिक रूप से तोड़ दिया था। वह अंदर से कांप उठी, पर उसने खुद को संभाला।
सोनी (धीमी और भारी आवाज़ में): "विकास जी... आपने आज वह बात कह दी है जिसकी कल्पना भी मेरे लिए असंभव थी। मुझे... मुझे सोचने का समय चाहिए। मेरा सर बहुत भारी हो रहा है, मुझे कुछ देर अकेले छोड़ दीजिए।"
सोनी ने करवट ले ली और आँखें मूंद लीं। कमरे की उस दोपहर वाली खामोशी में अब सूरज का वह 'विशाल साया' और गहरा हो गया था। विकास उसे अकेला छोड़कर बाहर चला गया, पर सोनी की बंद आँखों के सामने अब 'संतान सप्तमी' का पांचवां दिन एक नई और वैधानिक कामुकता की ओर बढ़ने को तैयार था। अब उसे छिपना नहीं था, क्योंकि अब यह खेल उसके पति की रजामंदी का हिस्सा बन चुका था।
सोनी ने अपने और सूरज के रिश्ते को एक नया रूप देने की ठान ली पर ठीक वैसे ही जैसे विकास चाहता था। वह अदभुत मिलन जो वह सूरज के साथ घूमती आई थी उसे स्वाभाविक तौर पर घटित होते दिखाना था।
शाम की ढलती रोशनी में नैनीताल का माल रोड किसी सजी हुई दुल्हन की तरह चमक रहा था। ठंडी हवाओं के बीच सूरज, सोनी और विकास एक बार फिर सैर पर निकले। माल रोड की एक आलीशान दुकान पर विकास की नजर एक बेहद खूबसूरत और पारभासी नाइटी पर पड़ी। विकास ने बिना देर किए वह नाइटी सोनी के लिए खरीद ली। सोनी ने उसे हाथ में तो ले लिया, पर उसके दिमाग में अभी भी दोपहर वाली विकास की बातें किसी चक्रवात की तरह घूम रही थीं।
वह मन ही मन तरह-तरह की संभावनाओं पर विचार कर रही थी। एक तरफ उसका पति था जो खुद उसे आगे बढ़ा रहा था, और दूसरी तरफ उसका वह जवान भांजा जिसका पौरुष किसी ज्वालामुखी जैसा था। आखिरकार, मॉल रोड की भीड़ और वादियों की मादकता के बीच उसने अपना मन बना लिया—इस 'कामुक अनुष्ठान' को अब एक निर्णायक मोड़ देना ही होगा।
रात को डिनर के बाद, होटल के सुइट में माहौल बिल्कुल बदल चुका था। सोनी ने वही मादक नाइटी पहनी, जो उसके बदन के हर उतार-चढ़ाव को बड़ी बेरहमी से नुमायां कर रही थी। बेडरूम की बड़ी टीवी पर एक सुंदर फिल्म शुरू हुई, जो इत्तेफाक से सूरज की पसंदीदा थी।
सोनी (कमरे से आवाज देते हुए): "सूरज! आजा बेटा... देख तेरी फेवरेट फिल्म चल रही है, साथ मिलकर देखते हैं।"
सोनी इस मादक नाइटी में थी सूरज के कमरे में आने से पहले उसने लिखा ओढ़ लिया और सिरहाने सर लगा कर बैठ गई।
सूरज दअंदर आया और सोनी के बिस्तर के बगल में लगे सोफे पर बैठ गया, पर विकास ने बड़ी सहजता से उसे इशारा किया।
विकास: "अरे वहाँ क्यों खड़ा है? यहाँ बिस्तर पर आराम से टेक लगाकर बैठ जा, साथ में फिल्म का मजा लेंगे।"
सोनी की रूह कांप गई। लिहाफ के अंदर लगभग नग्न थी। उसकी मादक जांघें नाइटी से बाहर थी उसने अपने हाथ से नाइटी को नीचे खिसकाकर उसे ढकने की कोशिश की पर नाकाम रही।
सूरज बिस्तर पर आ चुका था…उसने बरमूडा पहना हुआ था।
बिस्तर का भूगोल अब किसी गहरी साजिश का हिस्सा लग रहा था। एक तरफ विकास, बीच में सोनी और दूसरी तरफ सूरज। तीनों ने बिस्तर के सिरहाने (Headboard) पर अपने सिर टिकाए और फिल्म देखने लगे। बिस्तर के खूबसूरत लिहाफ ने तीनों के कामुक बदनों को ढक लिया था। पर आग सुलग रही थी।
शेष अगले भाग में
विकास (चाय की चुस्की लेते हुए): "देख रहे हो सूरज, तुम्हारी मौसी कैसे घोड़े बेचकर सो रही है? रात की थकान ने इसे बिल्कुल निढाल कर दिया है। वैसे... इस ठंडे मौसम में ऐसी गहरी नींद नसीब वालों को ही मिलती है, है ना?"
विकास की बातों में छिपा वह 'दोहरा अर्थ' सूरज को बेचैन कर रहा था। सूरज का ध्यान अब नैनीताल की वादियों से हटकर पूरी तरह अपनी मौसी के उस मादक बदन पर केंद्रित हो चुका था, जो चादर के भीतर रह-रहकर करवट ले रही थी। विकास ने बड़ी चालाकी से वह मंच तैयार कर दिया था जहाँ अब मौसी और भांजे के बीच की दूरियाँ और भी सिमटने वाली थीं।
अब आगे ..
नैनीताल की वह सुबह अब अपनी मादकता के चरम पर थी। सूरज और विकास सोफे पर बैठकर चाय पी रहे थे और बातें कर रहे थे, तभी बिस्तर पर हलचल हुई। सोनी की नींद खुली और उसने अनजाने में ही एक ऐसी मदहोश कर देने वाली अंगड़ाई ली कि चादर उसके जिस्म से नीचे खिसक गई। उसके गोरे, नग्न कंधे और वक्षों का ऊपरी हिस्सा सुबह की रोशनी में चमक उठा।
जैसे ही उसे अपनी नग्नता और सामने बैठे सूरज और विकास का एहसास हुआ, उसके चेहरे पर शर्म की लाली दौड़ गई। उसने झटके से चादर को अपने गले तक खींच लिया। वह इस समय अपने दो 'आशिकों' के बीच पूरी तरह नग्न, सिर्फ एक सफेद चादर के भीतर कैद थी।
सोनी (हड़बड़ाते हुए): "अरे! ८ बज चुके हैं... मैं तो सोती ही रह गई। आप लोग चाय भी पी रहे हैं और मुझे जगाया तक नहीं?"
उसने अपनी नज़रों को चुराते हुए घड़ी की तरफ देखा और स्थिति को सामान्य करने की कोशिश की।
सोनी: "सूरज, बेटा जा... तू भी जल्दी से तैयार हो जा। नाश्ता करके हमें आज नैनीताल घूमने भी निकलना है। देर हो रही है।"
सूरज ने दबी हुई निगाहों से अपनी मौसी के उस बिखरे हुए हुस्न को देखा और मामा के इशारे पर कमरे से बाहर निकल गया। सूरज के जाते ही सोनी ने चादर को कसकर पकड़ा और विकास की आँखों में आँखें डालते हुए उलाहना दिया।
सोनी: "विकास जी! आप भी न... सूरज को अंदर बुलाने की क्या ज़रूरत थी? मैं यहाँ इस हाल में सो रही थी, उसे कैसा लगा होगा?"
विकास ने अपने दांत दिखाते हुए मुस्कुरा कर बोला अरे इतनी ठंड है कुछ उसे भी तो गर्मी महसूस होनी चाहिए..
सोनी शर्मा गई और बोली आप पूरे पागल हो गए हैं…
नैनीताल की उस मदहोश सुबह में, कमरे के भीतर का तापमान बाहर की बर्फबारी से बिल्कुल उलट था। विकास ने जैसे ही बेडरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद किया, कमरे में एक मादक सन्नाटा छा गया। विकास बिस्तर पर सोनी के करीब बैठ गया और चादर के भीतर हाथ डालकर उसके रेशमी बदन को सहलाने लगा।
तभी साइड टेबल पर रखे होटल के लैंडलाइन फोन की घंटी घनघना उठी। विकास ने झल्लाते हुए रिसीवर उठाया पर जैसे ही उसने रिसीवर पर सुगना की आवाज सुनी उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसने उसे सोनी के कान के पास लगा दिया और खुद भी अपने कान सटा दिए.. ताकि वे दोनों बात सुन सकें। दूसरी तरफ से सुगना की आवाज़ गूँजी।
सुगना: "हेलो
सोनी : हा दीदी
सुगना: सोनी! कैसी है मेरी छोटी? नैनीताल की वादियों में विकास जी की गर्मी का मज़ा ले रही है या ठंड से जम गई है?"
सुगना की आवाज़ में वही शरारत थी, जिसमें हक भी था और बेबाकी भी। सोनी ने विकास की ओर देखा, जो इस समय उसकी मुनिया के साथ खेलते हुए बातचीत का आनंद ले रहा था।
सोनी: "अरे दीदी! बाहर तो ठंड है पर विकास जी में तो आग लगी हुई है । विकास जी ने पिछले दिनों में जो रूप दिखाया है, मैंने सालों में नहीं देखा। यकीन मानिए, इस बार की संतान सप्तमी में तो जैसे उनकी कल्पनाओं को पंख लग गए हैं।"
सुगना (हँसते हुए): "वाह! तो विकास जी अब कुछ नया खेल रहे हैं? सच बता, पहाड़ों की इस हवा में उन्होंने क्या अनोखा तजुर्बा कराया? हम बहनों में तो कोई परदा है नहीं, ज़रा मैं भी तो सुनूँ कि विकास जी की कामुकता कहाँ तक जा रही है।"
सोनी: …लगता है आपने इनको भी कुछ घुट्टी पिलाई है तभी आजकल बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं।
सुगना: …चल अच्छा ही तो है आखिर उनकी गर्मी का आनंद तो तुझे ही भोगना है वैसे ऐसी क्या अनोखी बात हो गई?
सोनी ने एक लंबी साँस ली और सिसकारी दबाते हुए बोलना जारी रखा।
सोनी: "दीदी, आपको क्या बताऊँ... विकास जी आजकल संभोग के दौरान ऐसी-ऐसी 'वर्जित' बातें करते हैं कि मेरा रोम-रोम सिहर जाता है। वो पुरानी यादों को कुरेदते हैं और ऐसी अनोखी कल्पनाओं का जाल बुनते हैं जो सामान्य समाज में अपवित्र मानी जाती हैं। मुझे कभी-कभी डर लगता है कि कहीं मैं उन वर्जित रास्तों पर खो न जाऊँ।"
सुगना (गंभीर और कामुक स्वर में): "पगली, इसमें डरने वाली क्या बात है? देख सोनी, एक मर्द के मन के भीतर इच्छाओं का अथाह समंदर होता है। कई बार वह ऐसी चीज़ों की कल्पना करता है जो दुनिया की नज़रों में 'वर्जित' होती हैं, लेकिन बिस्तर पर पति-पत्नी के बीच कुछ भी गलत नहीं होता। अगर विकास जी तुझे किसी नए रोमांच की ओर ले जा रहे हैं, तो उसे स्वीकार कर।"
सोनी: "पर दीदी, उनकी कल्पनाएँ बहुत कामुक और अजीब होती हैं... वो किसी पराए पौरुष और अदम्य शक्ति की बातें करते हैं जिसे सुनकर मेरा शरीर तो प्यासा हो जाता है, पर मन कांप जाता है।"
सुगना: " तो बड़े रसिक हैं विकास जी देखने में तो सीधे-साधे लगते हैं पर…सुन सोनी, मर्द की कई इच्छाएं होती हैं और उन्हें पूरा करना ही एक समर्पित स्त्री का कर्तव्य है। कामुकता के उस चरम पर सब कुछ संभव है और सब कुछ पवित्र है। अगर उनकी इन वर्जित बातों से तुझे सुख मिल रहा है और उन्हें आनंद आ रहा है, तो उस सुख को पूरी तरह से जी। एक औरत का शरीर उस प्रचंड शक्ति और समर्पण के लिए ही बना है। तू बस उनकी कल्पनाओं की लहरों पर खुद को छोड़ दे।"
सुगना की इन बातों ने विकास के इरादों को जैसे एक सामाजिक और पारिवारिक स्वीकृति दे दी थी। सुगना को बिल्कुल इल्म नहीं था कि विकास की ये 'वर्जित कल्पनाएँ' असल में किस दिशा में मुड़ रही हैं, लेकिन उसकी बातों ने सोनी के मन के संशय को मिटा दिया था।
सोनी: …अरे थोड़ा तो सब्र कीजिए दीदी हैं फोन पर..
सुगना: …क्या हुआ विकास जी पास में ही है क्या?
सोनी: …हां दीदी इनका मन लगता है रात में भी नहीं भरा सुबह-सुबह ही चालू हो गए हैं..
सुगना: "विकास जी के इस बदले हुए रूप का आनंद ले सोनी। संतान सप्तमी का यह अनुष्ठान तभी सफल होगा जब तेरी आत्मा और शरीर पूरी तरह से समर्पित होंगे। अब फोन रख और विकास जी की उन अनोखी कल्पनाओं में खुद को विसर्जित कर दे।"
सोनी: .. अब आपने कहा है तो करना ही होगा..
दोनों बहनें खिलखिलाकर हँसने लगीं।
सुगना: …मेरा प्यारा सूरज कहां है..?
सोनी:…वह अपने कमरे में तैयार हो रहा होगा बात कराऊं क्या…
सुगना…कोई बात नहीं तू अभी विकास जी का ख्याल रख पर सूरज का भी ध्यान रहना… वह मासूम है अकेला है और एक तू ही है जो उसे अच्छे से समझती है। मैं देख रही हूं कि पिछले कई दिनों से वह तुझे बहुत प्यार करने लगा है क्या जादू किया है तूने उस पर..?
सोनी…सकपका गई.. पर बात संभालते हुए बोली दीदी आप फिक्र मत कीजिए दोपहर में जब बात कीजिएगा खुद ही पूछ लीजिएगा..
सुगना: …ठीक है बाबा, जा अब विकास जी का ध्यान रख…
विकास ने एक विजयी मुस्कान के साथ रिसीवर वापस रखा और सोनी को बिस्तर पर पटक दिया। सुगना की बातों ने अब उस कमरे में वर्जित आनंद की कल्पनाओं पर अपनी मोहर लगा दी थी।
सोनी के फोन रखते ही विकास में ने सूरज के बारे में फिर एक बार बातें छेड़ दी…
विकास (सोनी के कान के पास फुसफुसाते हुए): "उसे कैसा लगा होगा, यह तो तुमने उसकी आँखों में देखा ही होगा सोनी। जब तुम वह अंगड़ाई ले रही थी, तो उसकी नज़रें तुम्हारी गर्दन और उन कंधों पर ऐसे गड़ी थीं जैसे वह तुम्हें वहीं कच्चा चबा जाना चाहता हो।"
सोनी (बनावटी गुस्से से): "छि:! कैसी बातें करते हैं आप। वह बच्चा है, मेरा भांजा है। वह ऐसा क्यों सोचेगा?"
विकास (हँसते हुए और सोनी के स्तनों को चादर के ऊपर से ही दबाते हुए): "बच्चा? सोनी, कल मैंने उसकी जो 'मर्दानगी' देखी है, उसके बाद उसे बच्चा कहना खुद को धोखा देना है। यकीन मानो, जब तुम करवट ले रही थी और तुम्हारा बदन चादर से उभर रहा था, तो सूरज की सांसें तेज हो रही थीं। उसके मन में तुम्हें लेकर जबरदस्त उत्तेजना है, मैं एक मर्द होकर दूसरे मर्द की आंखों की भूख पहचानता हूँ।"
सोनी ने अपना सिर झुका लिया, पर विकास की बातें उसके भीतर एक अजीब सी सनसनी पैदा कर रही थीं। वह विकास का साथ नहीं देना चाहती थी, पर उसका शरीर उन बातों पर प्रतिक्रिया दे रहा था।
सोनी (धीमी आवाज में): "आप जानबूझकर यह सब कर रहे हैं... आप चाहते हैं कि मैं भी वैसा ही सोचूँ जैसा आप सोचते हैं।"
विकास (सोनी की गर्दन चूमते हुए): "मैं सिर्फ सच कह रहा हूँ। क्या तुम्हें महसूस नहीं होता कि जब वह तुम्हें देखता है, तो उसकी नज़रों में एक हवस होती है? वह तुम्हें मौसी नहीं, एक 'मादक औरत' की तरह देख रहा है जिसे वह अपनी बाहों में भरना चाहता है।"
सोनी (उत्तेजित होकर): "अच्छा? और अगर ऐसा है भी, तो आप इतने खुश क्यों हो रहे हैं? आपको बुरा नहीं लगता कि आपका भांजा आपकी पत्नी को वैसी नज़रों से देख रहा है?"
विकास ने सोनी की आँखों में गहराई से देखा और उसके होंठों के करीब आकर बोला, "नहीं सोनी... मुझे बुरा नहीं लगता। बल्कि मुझे तो यह सोचकर और भी मज़ा आता है कि जब वह जवान फौलाद तुम्हें देखेगा, तो वह तुम्हें पाने के लिए किस हद तक तड़पेगा। और मैं चाहता हूँ कि तुम उसकी उस तड़प का मज़ा लो।"
सोनी चुप रही, पर उसके चेहरे की मुस्कान और आँखों की चमक बता रही थी कि विकास ने उसे एक बार फिर उस 'वर्जित' रोमांच की गहराई में धकेल दिया है। वह भले ही मुँह से मना कर रही थी, पर उसके मन में अब सूरज की वह 'कामुक निगाहें' एक मीठी खुजली की तरह घर कर रही थीं।
नैनीताल की वह सुबह अब पूरी तरह से वासना के रंग में रंग चुकी थी। इससे पहले कि सोनी खुद को संभालकर बिस्तर से उठ पाती, विकास ने अपनी बातों के तीखे बाणों से उसके भीतर उत्तेजना का एक और ज्वार पैदा कर दिया। विकास के मन में कल रात की वह 'वर्जित कल्पना' अभी भी किसी अंगारे की तरह सुलग रही थी।
विकास ने अचानक एक झटके के साथ सोनी के बदन से वह सफेद चादर खींच ली। सोनी का धवल, नग्न शरीर सुबह की पहली रोशनी में दूध जैसा सफेद चमक रहा था। विकास की नज़रें तुरंत सोनी की जांघों और उसकी 'मुनिया' के पास टिकीं, जहाँ सूरज के वीर्य की चमक अभी भी स्पष्ट दिखाई दे रही थी। विकास उसे अपना ही अंश मान रहा था, जबकि वह चमक उस 'दूसरी आहुति' की गवाह थी जो सोनी ने रात के एक बजे सूरज के साथ पूर्ण की थी।
विकास (सोनी की जांघों के बीच की गीली चमक को देखते हुए): "अरे वाह सोनी! देखो तो... कल रात के हमारे मिलन के निशान अभी भी तुम्हारी इस कोमल देह पर कायम हैं। लग रहा है जैसे कल रात मैंने तुम्हें वाकई पूरी तरह तृप्त कर दिया था।"
सोनी मन ही मन मुस्कुरा रही थी। उसने कुछ नहीं कहा, बस अपनी हथेलियों से अपनी मुनिया को ढकने की नाकाम कोशिश की। उसे पता था कि वह 'निशान' विकास का नहीं, बल्कि उस जवान ज्वालामुखी का है जिसे उसने कुछ घंटों पहले शांत किया था।
विकास: "ढको मत सोनी... इस मादकता को देखने दो। जब सूरज तुम्हें यहाँ देख रहा था, तो उसकी आँखों में यही प्यास थी।"
विकास अब पूरी तरह कामुक हो चुका था। उसने सोनी की हथेलियों को जबरन हटाकर उसकी जांघों को फैला दिया और उसकी मुनिया के उस संवेदनशील हिस्से को चूमने के लिए अपना चेहरा नीचे ले जाने लगा। सोनी को एक पल के लिए संकोच हुआ; वह नहीं चाहती थी कि विकास उस हिस्से को छुए जहाँ अभी-भी सूरज की ऊर्जा समाई थी। उसने विकास के कंधों को पकड़कर उसे ऊपर खींचने की कोशिश की, पर विकास आज किसी भी नियम को मानने के मूड में नहीं था।
सोनी के पास अब कोई चारा नहीं बचा था। विकास की बातों और उसके स्पर्श ने उसे फिर से उस दहलीज पर खड़ा कर दिया था जहाँ विवेक हार जाता है और शरीर जीत जाता है। उसने विकास को रोका नहीं और उसकी मनोदशा को पढ़ते हुए खुद को उसके हवाले कर दिया।
सोनी ने जितनी पवित्रता और शुद्धता अपने भांजे सूरज के लिए बरती थी (जिसके लिए उसने रात में स्नान किया था), उतनी शुद्धता उसने अपने पति के लिए ज़रूरी नहीं समझी। कारण स्पष्ट था—विकास खुद इस गंदी और मादक स्थिति का आनंद लेना चाहता था। उसे अपनी पत्नी के बदन पर 'कल की थकान' और 'निशान' देखना उत्तेजित कर रहा था।
कुछ ही देर में, विकास सोनी की उस चुदी हुई बुर को एक बार फिर अपने छोटे से अंग से भरने लगा। सोनी बिस्तर पर लेटी छत को निहार रही थी, पर उसके दिमाग में विकास के वे शब्द गूँज रहे थे जो वह हर प्रहार के साथ उसके कान में फुसफुसा रहा था।
विकास (हौले-हौले धक्का मारते हुए): "सोनी... सोचो... सूरज बाहर खड़ा है और वह जानता है कि मैं इस समय तुम्हें अंदर क्या दे रहा हूँ। क्या वह अपनी मौसी की इन सिसकियों को सुनकर खुद को रोक पाएगा?"
सोनी ने आँखें मूँद लीं। वह विकास के साथ संभोग तो कर रही थी, पर उसके मन का केंद्र अब भी सूरज ही था। विकास की हर हरकत, हर बात और हर धक्का उसे उसी दिशा में ले जा रहा था जहाँ सूरज का वह अद्भुत लिंग उसका इंतज़ार कर रहा था। सोनी ने विकास की कमर में अपनी टाँगें कस लीं और उस मादक विचार के साथ खुद को झड़ने दिया कि यह केवल विकास नहीं, बल्कि सूरज की ओर बढ़ने वाला एक और कदम है।
जब यह कामुक सत्र समाप्त हुआ, तो दोनों पसीने से लथपथ निढाल पड़े थे। पर इस बार भी चर्चा का अंत सूरज पर ही हुआ। विकास ने सोनी के गाल चूमते हुए कहा, "आज जब हम घूमने निकलेंगे, तो सूरज की आँखों में देखना सोनी... वह आज तुम्हें और भी ज्यादा हसरत से देखेगा।" सोनी बस मुस्कुरा दी, क्योंकि वह जानती थी कि आज का दिन नैनीताल की वादियों में और भी बड़े 'विस्फोट' लेकर आने वाला है।
नैनीताल की वह सुबह किसी जन्नत से कम नहीं थी। धुंध की हल्की चादर को चीरते हुए सूरज की किरणें झील के पानी पर सुनहरी आभा बिखेर रही थीं। सूरज, सोनी और विकास तीनों नैनीताल की वादियों में सुबह-सुबह भ्रमण के लिए निकले थे। तीनों के बीच हंसी-मजाक का दौर चल रहा था और वे नैनीताल की खूबसूरती व पहाड़ों की ठंडी हवा का आनंद ले रहे थे। सैर के दौरान सोनी की सुंदरता वाकई देखने लायक थी; गुलाबी ठंड के कारण उसके गाल सुर्ख हो रहे थे और फिटिंग वाले कपड़ों में उसका बदन किसी मूरत जैसा लग रहा था। सूरज की नज़रें बार-बार भटककर अपनी मौसी के उस कामुक और सुडौल बदन पर टिक जाती थीं, जिसे वह चाहकर भी नज़रअंदाज़ नहीं कर पा रहा था। विकास यह सब देख रहा था, पर उसके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान थी।
दोपहर होते-होते जब वे वापस लौटे, तो वादियों की वह मादकता कमरे के भीतर भी सिमट आई। सुइट में सन्नाटा था और बाहर की ठंडी हवा खिड़कियों से टकरा रही थी। विकास और सोनी बिस्तर पर लेटे हुए थे। सोनी दोपहर की एक छोटी सी नींद लेने की कोशिश कर रही थी, पर विकास के मन में चल रहा तूफ़ान थमा नहीं था।
वह रह-रहकर सुबह की उस घटना और सैर के दौरान सूरज की उन प्यासी निगाहों का जिक्र करने लगा। विकास का बार-बार उकसाना आखिरकार अपना काम कर गया। सोनी, जो अब तक खामोश लेटी थी।
विकास उसके बदन से खेलते हुए एक बार फिर सूरज के बारे में कामुक बातें करने लगा।
सोनी अचानक उठकर बैठ गई। उसने बिखरे हुए बालों को पीछे किया और विकास की आँखों में सीधे झांकते हुए उस संजीदगी से सवाल किया जिसने कमरे की शांति को एक भारी तनाव में बदल दिया।
सोनी: "विकास जी, आखिर आप चाहते क्या हैं? अब बस कीजिए यह पहेलियाँ बुझाना और खुलकर बताइए कि आपके मन में क्या चल रहा है।"
विकास एक पल के लिए सकपका गया। उसने उम्मीद नहीं की थी कि आराम के इन पलों में सोनी उसे इतनी सीधे तरीके से कटघरे में खड़ा कर देगी। कुछ देर सन्नाटा रहा, फिर विकास ने धीरे से सोनी के हाथों को अपने हाथों में लिया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव और गहराई थी।
विकास (गहरी आवाज़ में): "सोनी... तुम जानती हो कि मेरी मेडिकल रिपोर्ट क्या कहती है। मेरे वीर्य में शुक्राणुओं की कमी एक कड़वा सच है। हम यह 'संतान सप्तमी' का अनुष्ठान कर रहे हैं, पर वैज्ञानिक तरीके से मेरी कोख भरने की संभावना बहुत कम है। मुझे लगता है विधाता ने ही यह संयोग रचा है कि सूरज हमारे साथ यहाँ है।"
सोनी की सांसें थम सी गईं। विकास ने उसकी हथेलियों को सहलाते हुए आगे कहा।
विकास: "उसका वह विशाल और अद्भुत लिंग उसे एक विशेष पौरुष का स्वामी बनाता है। सोनी, यदि तुम मेरा साथ दो... तो इस अनुष्ठान की असली पूर्णाहूति सूरज के साथ संभोग से हो सकती है। हो सकता है, उसका वह प्रचंड और जीवंत वीर्य तुम्हारी कोख में उस नए जीवन का सृजन कर दे जिसके लिए हम तरस रहे हैं।"
सोनी यह सुनकर हतप्रभ रह गई। उसके भीतर एक जबरदस्त द्वंद्व शुरू हो गया। जिस कार्य को वह पिछले चार पांच दिनों से छिपकर, अपनी मर्यादा और विवशता के बीच कर रही थी, आज उसका पति खुद उसे वही 'आहुति' देने के लिए कह रहा था। उसके मन में एक शोर मचा— 'हे भगवान! यह कैसा न्याय है? मेरा पति खुद मुझे अपने ही भांजे की बाहों में सौंपने की बात कर रहा है!'
सोनी का चेहरा भावनाओं के भंवर में फंस गया था। एक तरफ वह पुराना राज था और दूसरी तरफ विकास का यह 'प्रस्ताव' जिसने अब सारे बंधनों को मानसिक रूप से तोड़ दिया था। वह अंदर से कांप उठी, पर उसने खुद को संभाला।
सोनी (धीमी और भारी आवाज़ में): "विकास जी... आपने आज वह बात कह दी है जिसकी कल्पना भी मेरे लिए असंभव थी। मुझे... मुझे सोचने का समय चाहिए। मेरा सर बहुत भारी हो रहा है, मुझे कुछ देर अकेले छोड़ दीजिए।"
सोनी ने करवट ले ली और आँखें मूंद लीं। कमरे की उस दोपहर वाली खामोशी में अब सूरज का वह 'विशाल साया' और गहरा हो गया था। विकास उसे अकेला छोड़कर बाहर चला गया, पर सोनी की बंद आँखों के सामने अब 'संतान सप्तमी' का पांचवां दिन एक नई और वैधानिक कामुकता की ओर बढ़ने को तैयार था। अब उसे छिपना नहीं था, क्योंकि अब यह खेल उसके पति की रजामंदी का हिस्सा बन चुका था।
सोनी ने अपने और सूरज के रिश्ते को एक नया रूप देने की ठान ली पर ठीक वैसे ही जैसे विकास चाहता था। वह अदभुत मिलन जो वह सूरज के साथ घूमती आई थी उसे स्वाभाविक तौर पर घटित होते दिखाना था।
शाम की ढलती रोशनी में नैनीताल का माल रोड किसी सजी हुई दुल्हन की तरह चमक रहा था। ठंडी हवाओं के बीच सूरज, सोनी और विकास एक बार फिर सैर पर निकले। माल रोड की एक आलीशान दुकान पर विकास की नजर एक बेहद खूबसूरत और पारभासी नाइटी पर पड़ी। विकास ने बिना देर किए वह नाइटी सोनी के लिए खरीद ली। सोनी ने उसे हाथ में तो ले लिया, पर उसके दिमाग में अभी भी दोपहर वाली विकास की बातें किसी चक्रवात की तरह घूम रही थीं।
वह मन ही मन तरह-तरह की संभावनाओं पर विचार कर रही थी। एक तरफ उसका पति था जो खुद उसे आगे बढ़ा रहा था, और दूसरी तरफ उसका वह जवान भांजा जिसका पौरुष किसी ज्वालामुखी जैसा था। आखिरकार, मॉल रोड की भीड़ और वादियों की मादकता के बीच उसने अपना मन बना लिया—इस 'कामुक अनुष्ठान' को अब एक निर्णायक मोड़ देना ही होगा।
रात को डिनर के बाद, होटल के सुइट में माहौल बिल्कुल बदल चुका था। सोनी ने वही मादक नाइटी पहनी, जो उसके बदन के हर उतार-चढ़ाव को बड़ी बेरहमी से नुमायां कर रही थी। बेडरूम की बड़ी टीवी पर एक सुंदर फिल्म शुरू हुई, जो इत्तेफाक से सूरज की पसंदीदा थी।
सोनी (कमरे से आवाज देते हुए): "सूरज! आजा बेटा... देख तेरी फेवरेट फिल्म चल रही है, साथ मिलकर देखते हैं।"
सोनी इस मादक नाइटी में थी सूरज के कमरे में आने से पहले उसने लिखा ओढ़ लिया और सिरहाने सर लगा कर बैठ गई।
सूरज दअंदर आया और सोनी के बिस्तर के बगल में लगे सोफे पर बैठ गया, पर विकास ने बड़ी सहजता से उसे इशारा किया।
विकास: "अरे वहाँ क्यों खड़ा है? यहाँ बिस्तर पर आराम से टेक लगाकर बैठ जा, साथ में फिल्म का मजा लेंगे।"
सोनी की रूह कांप गई। लिहाफ के अंदर लगभग नग्न थी। उसकी मादक जांघें नाइटी से बाहर थी उसने अपने हाथ से नाइटी को नीचे खिसकाकर उसे ढकने की कोशिश की पर नाकाम रही।
सूरज बिस्तर पर आ चुका था…उसने बरमूडा पहना हुआ था।
बिस्तर का भूगोल अब किसी गहरी साजिश का हिस्सा लग रहा था। एक तरफ विकास, बीच में सोनी और दूसरी तरफ सूरज। तीनों ने बिस्तर के सिरहाने (Headboard) पर अपने सिर टिकाए और फिल्म देखने लगे। बिस्तर के खूबसूरत लिहाफ ने तीनों के कामुक बदनों को ढक लिया था। पर आग सुलग रही थी।
शेष अगले भाग में