भाग 199
सूरज ने पास पड़ी सोनी की पतली झीनी काली पैंटी को अपने हाथ में उठाया और सोनी को दिखाते हुए अपनी जेब में रख लिया…
अब समझ आया……. सूरज ने मुस्कुराते हुए कहा और दरवाजे से बाहर निकल गया
बदमाश….सोनी ……इतना हीं कह पाई…
सूरज की बातों ने माहौल को गर्म कर दिया था. उसका लंड कल रात से ही तना हुआ था…नियति सूरज की मनोदशा को पढ़ने का प्रयास कर रही थी पर असफल थी। उसे भी आगे होने वाले घटनाक्रम का इंतजार था…
अब आगे..
होटल के लॉबी से निकलकर जब तीनों नैनीताल की खुली वादियों में आए, तो सुबह की धूप देवदार के पत्तों से छनकर सोनी के बदन पर पड़ रही थी। सफ़ेद घेरदार स्कर्ट और चटक पीले रंग के टॉप में सोनी किसी खिलती हुई कली जैसी लग रही थी उम्र जैसे 5- 6 वर्ष कम हो गई हो। कपड़ों का यह संयोजन उसकी गहुंआ रंगत और सुडौल बदन को और भी ज़्यादा निखार रहा था। सूरज किसी फिल्मी हीरो की तरह सोनी के साथ-साथ चल रहा था। सोनी और सूरज की खूबसूरत जोड़ी को इतना घुला मिला देखकर विकास का शक गहरा दिया साथ ही साथ उसके मन में वह वर्जित इच्छा और कुलांचे मारने लगी।
सूरज की उस आख़िरी हिदायत और उसकी बदमाशी के कारण, सोनी ने आज अपनी पैंटी को पहनने का विचार त्याग दिया था। उसकी मखमली त्वचा और पिछले कुछ दिनों की लगातार चूदाई से संवेदनशील हो चुकी मुनिया पर अब कपड़ों की कोई दीवार नहीं थी।
जैसे ही मॉल रोड पर चलते हुए नैनीताल की वह ठंडी, बर्फीली हवा का झोंका आया, सोनी की सफ़ेद स्कर्ट हवा के वेग से हल्की सी लहराई। वह सर्द हवा बिना किसी रुकावट के सीधे उसकी नंगी जाँघों को छूती हुई ऊपर की ओर बढ़ी और सीधे उस तप्त, रेशमी मुनिया के होंठों से मुहाने से जा टकराई मुनिया के अंदर की नमी ने भी उस बर्फीली छुअन को महसूस किया सोनी के पूरे बदन में करंट सा दौड़ गया। उसके रोंगटे खड़े हो गए और उसने अनजाने में ही अपनी जाँघों को आपस में थोड़ा भींच लिया।
चलते-चलते सोनी का हाथ बार-बार अपनी स्कर्ट के घेर को सँभालने के बहाने नीचे जाता। उसे हर पल यह अहसास रोमांचित कर रहा था कि वह पूरी तरह से मुक्त और नग्न है, और कोई भी तीव्र हवा का झोंका उसके इस गुप्त रहस्य को दुनिया के सामने ला सकता था। इस वर्जित रोमांच ने उसकी आँखों की मादकता को दोगुना कर दिया था और उसके चेहरे पर उत्तेजना की एक हल्की सुर्खी बिखर गई थी।
विकास आगे चल रहा था, लेकिन जब उसने मुड़कर सोनी को देखा, तो वह उसकी बदली हुई चाल और चेहरे के इस अनोखे हाव-भाव को देखकर दंग रह गया।
विकास (मुस्कुराते हुए): "सोनी, इस सफ़ेद स्कर्ट में तुम वाकई अप्सरा लग रही हो। पर तुम बार-बार अपनी स्कर्ट को इस तरह क्यों पकड़ रही हो? क्या हवा से डर लग रहा है?"
सोनी ने एक बार फिर अपनी जाँघों के बीच उठती उस तीव्र सिहरन को दबाया और बगल में चल रहे सूरज की तरफ़ देखा। सूरज की गहरी और जलती हुई नज़रें सीधे सोनी की कमर और स्कर्ट के उस हिस्से पर टिकी थीं, जहाँ उसकी जेब में वह काली पैंटी सुरक्षित रखी थी। सूरज के चेहरे पर एक कुटिल और विजयी मुस्कान थी, मानो वह आँखों ही आँखों में अपनी मौसी के उस बिना कपड़े वाले बदन की बेबसी का लुत्फ़ उठा रहा हो।
सोनी (अपनी सांसों को संभालते हुए, विकास से): "नहीं विकास जी... बस पहाड़ों की हवा थोड़ी तेज़ है ना, इसलिए सँभाल रही हूँ।"
सोनी की आवाज़ में वह कंपन साफ़ था, जिसे विकास ने उसकी सामान्य घबराहट समझा, पर सूरज उस कंपन के पीछे छिपी असली आग को बख़ूबी पहचानता था। उस ठंडी धूप में चलते हुए भी, सोनी का वह बिना पैंटी वाला बदन सूरज की दी हुई इस गुप्त कामुक सज़ा की वजह से अंदर ही अंदर सुलग रहा था, और सोनी अपनी नग्न मुनिया के साथ उस पल की तरफ़ बढ़ रही थी जहाँ यह रोमांच अपनी चरम सीमा को छूने वाला था।
टैक्सी के दरवाज़े पर पहुँचकर विकास ने आगे बढ़कर फ्रंट सीट का दरवाज़ा खोला। वह बिना किसी छिपे हुए इरादे के, बेहद सामान्य तरीके से आगे की सीट पर बैठ गया ताकि रास्ते में ड्राइवर से नैनी पीक के मार्ग और उससे जुड़ी सावधानियों के बारे में बात कर सके। बैठते हुए उसने पीछे मुड़कर सहजता से कहा, "सोनी, सूरज, तुम दोनों पीछे बैठ जाओ।"
विकास के इस सामान्य से कदम ने पीछे की सीट पर एक बेहद विस्फोटक स्थिति की ज़मीन तैयार कर दी।
पहले सूरज अंदर की तरफ़ जाकर बैठ गया। उसके ठीक बाद जैसे ही सोनी ने अपनी सफ़ेद घेरदार स्कर्ट को सँभालते हुए अंदर कदम बढ़ाया और सीट पर बैठने के लिए नीचे झुकी, सूरज ने पलक झपकते ही अपना मज़बूत हाथ सीट पर ठीक उस जगह फैला दिया जहाँ सोनी को बैठना था।
चूँकि स्कर्ट का घेरा बैठने की मुद्रा में स्वाभाविक रूप से थोड़ा ऊपर की तरफ़ खिंच गया था, इसलिए जैसे ही सोनी का बदन नीचे आया, उसके पुष्ट और भरे हुए नितंबों का निचला हिस्सा बिना किसी रुकावट के सीधे सूरज की नग्न, पर गर्म हथेली पर टिक गया। बीच में कपड़े की कोई भी दीवार न होने के कारण सूरज के पोरों को सोनी के जिस्म की वह रेशमी, मखमली कोमलता और अंदरूनी हरारत साक्षात महसूस हुई।
इस अप्रत्याशित और सीधे स्पर्श से सोनी के रीढ़ की हड्डी में एक ज़ोरदार सिहरन दौड़ी। वह पूरी तरह चौंक उठी और उसकी आँखें फैल गईं। उसने झटके से सूरज की तरफ़ देखा, जहाँ सूरज के चेहरे पर एक धीमा, मदहोश कर देने वाला और आक्रामक सम्मोहन था। उसकी उंगलियाँ अब सोनी के नितंबों के निचले हिस्से को अपनी पकड़ में कसने लगी थीं।
सोनी का दिल इतनी तेज़ी से धड़क रहा था कि उसे लगा उसकी आवाज़ बाहर आ जाएगी, पर आगे की सीट पर बैठे विकास की उपस्थिति के कारण वह चाहकर भी न तो चिल्ला सकती थी और न ही कोई कड़ा विरोध दर्ज करा सकती थी। लोक-लाज और पकड़े जाने के उस तीखे डर ने उसकी उत्तेजना को चरम पर पहुँचा दिया।
खुद को इस असहज और कामुक स्थिति से बचाने और अपने इस गुप्त रहस्य को छुपाने के लिए, सोनी ने तुरंत अपनी बगल में रखी पीली शॉल को उठाया और उसे अपने पैरों और जाँघों के ऊपर इस तरह ओढ़कर फैला लिया कि बाहर से कुछ भी दिखाई न दे। शॉल के उस पर्दे के नीचे, विकास की नज़रों से दूर, पहाड़ों के उन घुमावदार रास्तों पर गाड़ी के हर मोड़ के साथ सूरज की उंगलियाँ सोनी के उस तप्त और नग्न मांस को अपने अधिकार के साथ सहला रही थीं, और सोनी अपनी आँखें मूँदकर उस वर्जित सुख के भँवर में डूबती जा रही थी।
शॉल के उस झीने और सुरक्षित पर्दे के नीचे, टैक्सी की सीट पर एक मूक और अत्यंत तीव्र वासना का खेल चल रहा था। जैसे-जैसे गाड़ी नैनीताल के पथरीले और घुमावदार रास्तों पर आगे बढ़ रही थी, मोड़ों के बहाने सूरज का दबाव और उसकी उंगलियों की हरकत सोनी के उस नग्न, मांसल हिस्से पर और गहरी होती जा रही थी।
कपड़ों की किसी भी दीवार के न होने के कारण, सूरज की तपती हुई उंगलियाँ अब सोनी के नितंबों के निचले हिस्से से आगे बढ़कर सीधे उसकी जाँघों के उस सबसे संवेदनशील और गुप्त मुहाने तक पहुँच चुकी थीं।
हवा ओर पानी अपना रास्ता खुद खोज लेते है। सूरज की उंगलियों ने भी मुनिया के द्वार का रास्ता खोज लिया जो स्वयं अपनी लार टपकाते हुए उसी का इंतजार कर रही थी।
शॉल के नीचे, विकास की नज़रों से पूरी तरह छिपकर, सूरज ने अपनी उंगली को सोनी की उस तप्त, कोमल मुनिया के अंदर धीरे से उतार दिया।
जैसे ही सूरज की उंगली ने उस मखमली गहराई को छुआ और उसके भीतर धीरे-धीरे घूमना शुरू किया, सोनी के पूरे वजूद में एक अजब सी, असहनीय बेचैनी दौड़ गई। वह बेचैनी ऐसी थी जो सीधे उसकी रीढ़ से होते हुए उसके दिमाग पर हावी हो रही थी। जब-जब सूरज की उंगली उस नम और बेहद संवेदनशील मुहाने के भीतर एक घेरा बनाती, सोनी के भीतर का तापमान और बढ़ने लगता। उसकी जाँघें खुद-ब-खुद भींचने लगतीं, पर सूरज की मज़बूत पकड़ उसे और आज़ादी देती।
सोनी के अंतर्मन में एक भयानक द्वंद्व और तूफ़ान खड़ा हो गया था। आगे की सीट पर उसका पति विकास बैठा था, जो अनजाने में ही सही, इस पूरे खेल का रचयिता था। पकड़े जाने का वह तीखा, खौफनाक डर और दूसरी तरफ़ जाँघों के बीच से उठती वह अदम्य, आदिम उत्तेजना—दोनों ने मिलकर सोनी की चेतना को सुन्न कर दिया था।
जब भी गाड़ी किसी तीखे मोड़ पर मुड़ती और सूरज की उंगली उस मखमली रस से भीगी गहराई में थोड़ा और जोर से घूमती, सोनी के मुँह से एक सिसकी निकलने को होती। वह तुरंत अपने दाँतों से अपने निचले होंठ को भींच लेती ताकि कोई आवाज़ बाहर न आए। उसकी कजरारी आँखें मूँद जातीं और उसकी सांसें इतनी भारी और तेज़ हो जातीं कि उसका पीला टॉप उसकी छाती के उभारों के साथ तेज़ी से ऊपर-नीचे होने लगता।
वह चाहकर भी सूरज को हटा नहीं पा रही थी, क्योंकि वह बेचैनी अब एक ऐसे मादक नशे में बदल चुकी थी जिसका अंत वह खुद इस चलती गाड़ी में, मर्यादाओं को पूरी तरह भस्म करते हुए देखना चाहती थी। सूरज की उंगलियों की हर हरकत सोनी को उस मुकाम पर धकेल रही थी जहाँ सही और गलत का हर फासला मिट जाता है।
टैक्सी के रुकते ही वासना का वह मूक और तीखा खेल वहीं थम गया। गाड़ी अब नैनी पीक के मुख्य पड़ाव पर खड़ी थी। सोनी ने झटके से अपने बदन को थोड़ा सीधा किया, शॉल को समेटा और अपनी बिखरी हुई सांसों को काबू में करने का प्रयास किया। गाड़ी का दरवाज़ा खुलते ही वह अपनी सफेद स्कर्ट को संभालती हुई तुरंत बाहर उतर आई। पहाड़ों की बर्फीली हवा ने एक बार फिर उसकी नंगी जाँघों को छुआ, जिससे उसकी सिहरन और बढ़ गई।
सूरज भी अपनी मखमली और विजयी मुस्कान के साथ गाड़ी से बाहर आया। विकास अभी आगे बढ़कर ड्राइवर से कुछ बात कर रहा था, इसी का फायदा उठाकर सूरज बिल्कुल सोनी के सामने आकर खड़ा हो गया। उसने अपनी आँखों में गहरे सम्मोहन के साथ सीधे सोनी की कजरारी आँखों में झाँका और अपनी उसी मध्यमा उंगली (middle finger) को, जो कुछ देर पहले तक सोनी की मखमली गहराई का रस चख रही थी, धीरे से अपने होठों से छुआकर चूम लिया।
सूरज की इस बेबाक और कामुक हरकत ने सोनी के भीतर जैसे एक करंट दौड़ा दिया। लज्जा, उत्तेजना और पकड़े जाने के डर से उसने तुरंत अपनी नज़रें सूरज के चेहरे से फेर लीं। उसका दिल अभी भी ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था और जाँघों के बीच का वह गीलापन उसे एक अजब सी बेचैनी दे रहा था।
खुद को सामान्य दिखाने के लिए सोनी तुरंत आगे बढ़ी और विकास के करीब जाकर खड़ी हो गई।
सोनी (थोड़ी कांपती और भारी आवाज़ में): "विकास जी... यहाँ से ऊपर की चढ़ाई कितनी और रह गई है? हवा बहुत तेज़ है, हमें जल्दी चलना चाहिए।"
विकास ने मुड़कर अपनी पत्नी के लाल होते चेहरे और उसकी भारी सांसों को देखा। वह उसकी इस घबराहट के पीछे की असली वज़ह से अनजान, उसकी खूबसूरती पर एक बार फिर मुग्ध हो गया।
विकास: "बस थोड़ी ही दूर है सोनी। चलो, तुम दोनों मेरे साथ आओ, ऊपर चलकर कड़क धूप में चाय पिएंगे तो सारी थकान मिट जाएगी।"
विकास आगे-आगे रास्ते पर चढ़ने लगा। सोनी ने अपनी शॉल को बदन पर और कस लिया, लेकिन उसके पैर अभी भी उस चरम छुअन की वज़ह से काँप रहे थे। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा, पर उसे पता था कि सूरज उसके ठीक पीछे, उसकी बिना पैंटी वाली स्कर्ट के अंदर थिरकते हुए नितम्बों को अपनी आँखों से नापते हुए आगे बढ़ रहा है।
नैनी पीक के मुख्य बिंदु पर हवा का वेग और बढ़ गया था, जिससे चारों तरफ फैली धुंध तेज़ी से तैर रही थी। वहाँ सैलानियों की आवाजाही वाकई बहुत कम थी, जिससे उस शांत और बर्फीले माहौल में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था।
मुख्य चोटी से थोड़ी ही दूरी पर, एक संकरा और पथरीला रास्ता ऊपर की ओर जा रहा था, जहाँ एक अलग व्यू पॉइंट बना हुआ था। वह रास्ता पेड़ों और झाड़ियों के बीच से होकर गुज़रता था, जिसके कारण सामान्यतः आम सैलानी थकान या डर की वजह से वहाँ जाने से बचते थे।
सूरज की युवा आँखों में उस एकांत को देखकर एक अलग ही चमक आ गई। उसने तुरंत ऊपर जाने की इच्छा जताई।
सूरज: "मौसा जी, देखिए वह ऊपर वाला व्यू पॉइंट कितना सही लग रहा है! वहाँ से पूरी घाटी और झील का नज़ारा एकदम साफ़ दिखेगा। चलिए ना, वहाँ चलते हैं।"
विकास ने अपनी भारी सांसों को सँभाला और एक बेंच पर बैठते हुए अपनी दोनों हथेलियों से घुटनों को सहलाया। पहाड़ों की इस तीखी चढ़ाई ने उसके स्टैमिना को पूरी तरह निचोड़ दिया था।
विकास: "अरे नहीं भाई, मेरे बस की तो अब एक कदम भी चलना नहीं है। तुम लोग चाहो तो हो आओ, मैं यहीं बैठकर धूप सेकता हूँ और तस्वीरें खींचता हूँ।"
विकास का मना करना सूरज के लिए किसी मनचाही मुराद के पूरे होने जैसा था। उसने तुरंत सोनी की तरफ़ देखा, जिसकी सफ़ेद स्कर्ट हवा में हल्की-हल्की उड़ रही थी और जाँघों के बीच की वह बिना पैंटी वाली बेबसी उसे अब भी अंदर ही अंदर बेचैन कर रही थी।
सूरज (सोनी की आँखों में आँखें डालते हुए): "मौसी, आप तो चलेंगी ना मेरे साथ? मौसा जी तो थक गए हैं, पर आप इतनी जल्दी हार नहीं मान सकतीं। चलिए, मैं आपको सँभालते हुए ले चलूँगा।"
सोनी ने पहले विकास की तरफ़ देखा, जो पूरी तरह बेफ़िक्र होकर कैमरे के लेंस को साफ़ कर रहा था, और फिर उसने सूरज के उस चौड़े सीने और उसकी आँखों में छिपे उस आमंत्रण को पढ़ा, जो गाड़ी में अधूरी रह गई उस उंगली की हरकत का हिसाब माँग रहा था। सोनी का दिल एक बार फिर ज़ोर से धड़का। उसे पता था कि उस ऊँचे और सुनसान व्यू पॉइंट पर जाने का मतलब क्या है—वहाँ मर्यादा की बची-खुची कसर भी पूरी होनी थी।
सोनी (धीमे से मुस्कुराते हुए और अपनी पीली शॉल को सँभाला): "ठीक है, जब सूरज इतनी ज़िद कर रहा है, तो मैं हो आती हूँ विकास जी। आप यहीं आराम करिए, हम बस दस-पंद्रह मिनट में नज़ारा देखकर वापस आते हैं।"
विकास: "हाँ-हाँ, बिल्कुल जाओ। सूरज, अपनी मौसी का ध्यान रखना, रास्ता थोड़ा संकरा है।"
सूरज (एक कुटिल विजयी मुस्कान के साथ): "आप चिंता मत कीजिए मौसा जी, मौसी को मैं ऐसे सँभालूँगा कि उन्हें कोई शिक़ायत नहीं होगी।"
सोनी ने आगे कदम बढ़ा दिया, और सूरज उसके ठीक पीछे-पीछे उस संकरे रास्ते पर चलने लगा। जैसे ही वे दोनों विकास की नज़रों से ओझल होकर घने देवदार के पेड़ों की ओट में पहुँचे, चारों तरफ़ की धुंध ने उन्हें पूरी तरह अपनी आगोश में ले लिया।
रास्ता पथरीला और चढ़ाई वाला था, जिससे सोनी की सांसें और तेज़ होने लगीं। पैंटी न पहनने के कारण, जब भी वह कदम आगे बढ़ाती, स्कर्ट के भीतर हवा की हर छुअन उसे एक तीखी सिहरन दे रही थी।
सूरज सोनी के ठीक पीछे चल रहा था। उसकी नज़रें सोनी की कमर के लचीले उतार-चढ़ाव और हवा में लहराती सफ़ेद स्कर्ट पर टिकी थीं। कुछ ही मिनटों की चढ़ाई के बाद, वे उस सुनसान व्यू पॉइंट पर पहुँच गए। वहाँ दूर-दूर तक कोई दूसरा सैलानी नहीं था; चारों तरफ केवल ऊंचे पेड़, गहरी खामोशी और धुंध की एक चादर थी।
सोनी ने व्यू पॉइंट की रेलिंग को पकड़कर एक गहरी सांस ली और घाटी के नज़ारे को देखने लगी। तभी सूरज बिल्कुल उसके पीछे आकर खड़ा हो गया। उसने बिना कोई वक़्त गँवाए अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए और सोनी को रेलिंग के सहारे घेरते हुए उसकी पतली कमर को गाउन और स्कर्ट के ऊपर से कसकर पकड़ लिया।
सोनी (चौंकते हुए, पर धीमी आवाज़ में): "सूरज... क्या कर रहा है? यहाँ कोई भी आ सकता है।"
सूरज (सोनी के गले के पास अपनी गर्म सांसें छोड़ते हुए): "कोई नहीं आएगा मौसी। यहाँ सिर्फ हम दोनों हैं। सोनी जहां खड़ी थी वहां से वह रास्ता दिखाई पड़ रहा था जिससे वो दोनों ऊपर आए थे। मतलब साफ था कोई ऊपर आता तो वो उन्हें जरूर दिखाई पड़ता।
सूरज ने अपनी एक हथेली को सोनी की कमर से नीचे सरकाया। सफ़ेद स्कर्ट के घेर को थोड़ा ऊपर उठाते हुए, उसका नग्न और तप्त हाथ सीधे सोनी की रेशमी, नग्न जाँघों से जा टकराया। जब सूरज की उंगलियों ने उस मखमली त्वचा को छुआ।
इस सीधे और बेबाक स्पर्श से सोनी के मुँह से एक दबी हुई कराह निकली। उसने अपनी आँखें मूँद लीं और उसका बदन सूरज के मजबूत सीने से पूरी तरह सट गया। सूरज की उंगलियाँ अब उसकी जाँघों से ऊपर की ओर बढ़ते हुए, उस सबसे संवेदनशील और नम मुहाने की तरफ बढ़ने लगीं, जहाँ सुबह से ही उत्तेजना का एक तूफ़ान सुलग रहा था।
शॉल और स्कर्ट के उस झीने पर्दे के पीछे, सूरज की उंगलियों का स्पर्श सोनी के बदन में बिजली की तरह दौड़ रहा था। जब उसकी उंगलियों ने उस मखमली और पूरी तरह से नग्न गहराई को छुआ, तो सोनी का पूरा वजूद काँप उठा। हवा की ठंडी छुअन और सूरज के हाथ की अदम्य तपिश ने मिलकर उसके भीतर एक ऐसा सैलाब ला दिया था जिसे रोक पाना अब उसके बस में नहीं था।
सूरज ने अपने होठों को सोनी के कान के पास सटाया और बेहद भारी आवाज़ में फुसफुसाया, "मौसी... इस ठंडे पहाड़ पर आपका यह बदन कितना गर्म है। इजाजत हो तो आज की आहुति यहीं दे दी जाए….
सोनी खुद भी गरम हो चुकी थी पर सोनी समझदार थी यहां टूरिस्ट स्पॉट पर इस तरह खुलेआम सेक्स करना संभव नहीं था उसने कहा सूरज यहां यह संभव नहीं..
सूरज ने सोनी की आंखों में आंखें डालते हुए कहा
मौसी अपने ही तो कहा था.. जब चाहे….. जहां चाहे…. जैसे चाहे …..अब आप अपने वादे से पलट रही हो..
सोनी ने रेलिंग पर अपनी पकड़ को और मज़बूत कर लिया। उसके गोरे गोरे गालों पर वासना की लाली फैल गई। उसने अपनी आँखें बंद किए हुए ही अपनी गर्दन को थोड़ा पीछे की तरफ झुकाया, जिससे उसका पूरा बदन सूरज के चौड़े और कसरती सीने में और गहराई से धँस गया।
सोनी (हाँफते हुए, टूटी आवाज़ में): "सूरज... ले कर ले अपने मन की।" इतना कहते हुए सोनी अपने दोनों हाथों से रेलिंग को पकड़ कर सामने झुकती चली गई और उसके नितंब बेहद कामुक तरीके से सूरज को आमंत्रित करने लगे।
सोनी की यह बेबाक और आत्मसमर्पण देखकर सूरज के भीतर का पुरुषार्थ अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया। उसने एक हाथ से सोनी की स्कर्ट को पूरी तरह ऊपर की तरफ समेट दिया, जिससे उसके पुष्ट, गोरे और पूरी तरह से नग्न नितंब उस धुंधली रोशनी में पूरी तरह अनावृत हो गए। दूसरे हाथ से उसने अपनी पैंट की जिप को नीचे सरकाया, और उसका वह विराट, तपा हुआ पौरुष अपनी पूरी कठोरता के साथ बाहर आ गया।
सूरज ने सोनी को थोड़ा और आगे की तरफ झुकाया। सोनी ने रेलिंग को मजबूती से थाम लिया और अपनी जाँघों को थोड़ा फैला दिया, जिससे उसकी वह तप्त और गीली गहराई सूरज के उस कड़े अंग के सामने पूरी तरह से खुल गई।
बिना एक पल की भी देरी किए, सूरज ने अपने पौरुष के शीर्ष भाग को सोनी के उस मखमली मुहाने पर टिकाया और एक ही गहरे, प्रचंड और सधे हुए प्रहार के साथ उसे सोनी के भीतर पूरा उतार दिया।
"आहहह... सूरज...!" सोनी के मुँह से एक तीखी, मादक और दर्दभरी कराह निकली, जो उस एकांत घाटी में गूँज कर रह गई। उसकी जाँघें इस आकस्मिक और गहरे मिलन से थर-थर काँपने लगीं। बीच में कपड़े की कोई भी दीवार न होने के कारण, सूरज का वह तप्त लिंग सोनी की उस अनंत कोमलता को चीरता हुआ उसकी गहराई के अंतिम छोर तक जा टकराया था।
सूरज ने सोनी की पतली कमर को दोनों हाथों से जकड़ लिया और अपनी गति को तीव्र करना शुरू कर दिया। हर अंदरूनी प्रहार के साथ, उन दोनों के जिस्मों के टकराने की एक सोंधी और मादक आवाज़ हवा में तैरने लगी। सोनी की सफ़ेद स्कर्ट हर धक्के के साथ हवा में लहरा रही थी, और उसका पीला टॉप उसकी छाती के भारी उभारों के साथ तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रहा था।
नैनी पीक की उस बर्फीली धुंध के बीच, मर्यादा की हर सीमा पूरी तरह से भस्म हो चुकी थी। विकास नीचे बेंच पर बैठा अनजाने में जिस हकीकत की पटकथा लिख रहा था, उसे सूरज और सोनी उस ऊँचे पॉइंट पर पूरी तरह से सच कर रहे थे।
सूरज के हर एक गहरे प्रहार के साथ सोनी के मुँह से निकलने वाली सिसकियाँ और तेज़ होती जा रही थीं। रेलिंग को थामे हुए उसका पूरा बदन इस प्रचंड वेग के सामने पूरी तरह समर्पित हो चुका था। पहाड़ों की वह ठंडी हवा अब उन दोनों के जिस्मों से उठती गर्मी के सामने बेअसर साबित हो रही थी। सूरज ने अपनी पकड़ सोनी की कमर पर और मज़बूत कर ली, जिससे हर धक्के के साथ दोनों की देह एक-दूसरे से पूरी शिद्दत से टकरा रही थी।
सूरज का उन्माद अब नियंत्रण की हर सीमा को लांघ चुका था। उसने अपनी एक मज़बूत हथेली को आगे बढ़ाकर सोनी के पीले टॉप के भीतर से उसकी भारी और तप्त छाती के उभार को पूरी मर्दानगी और अधिकार के साथ भींच लिया।
बिना एक पल गंवाए, सूरज ने अपने दूसरे हाथ से सोनी की एक सुडौल और नग्न जांघ को ऊपर उठाया और उसे लोहे की ठंडी रेलिंग पर टिका दिया। इस नई मुद्रा ने सोनी के उस मखमली मार्ग को सूरज के पौरुष के सामने पूरी तरह से अनावृत और बेबस कर दिया। अब उनके बीच की दूरी शून्य हो चुकी थी और प्रवेश का रास्ता पूरी तरह सीधा और गहरा हो गया था।
सोनी प्रचंड वासना के आगोश में डूबी सूरज की मर्दानगी को अपने भीतर समाहित कर रही थी।
इस अद्भुत संभोग के दौरान सूरज अपनी हथेली से कभी सोनी की एक चूची को पूरी ताकत से पकड़ता, तो कभी अपनी एक ही हथेली में उसकी दोनों चूचियों को एक साथ जकड़ने की कोशिश करता। पर जितनी बड़ी और मर्दानी सूरज की हथेली थी, सोनी की चूचियाँ शायद आकार में उससे भी कहीं बड़ी और भरी हुई थीं। उसकी हथेलियों से फिसलते उन भारी उभारों को एक साथ मुट्ठी में भींचने का वह अंदाज़ बेहद अनोखा और कामुक था। सोनी के लिए अपने स्त्रीत्व का यह मथना और चूचियों पर सूरज की उंगलियों का वह तीखा दबाव एक ऐसा सुख दे रहा था जो उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था। इस गहरे स्पर्श से सोनी के मुँह से वासना की एक और भारी सिसकी निकली।
आह …सूरज…बस ऐसे ही….
सोने की मादक कराह ने सूरज में उत्साह भर दिया। सूरज ने अपनी कमर को एक ज़ोरदार झटका दिया, जिससे उसका वह कड़ा और नस-नस उभरा हुआ अंग सोनी की उस रस से सराबोर गहराई में जड़ तक धंस गया।
"उफ्फ़... आआह्ह... सूरज... तनी धीरे…. से….....!" सोनी का पूरा वजूद इस गहरे और तीखे प्रहार से थरथरा उठा।
जांघ के रेलिंग पर टिके होने के कारण सूरज के हर धक्के का वेग सीधे उसकी गहराई के अंतिम छोर को मथ रहा था। सूरज ने अब अपनी गति को अत्यंत उग्र और तीव्र कर दिया। हर अंदरूनी प्रहार के साथ दोनों के गुप्तांगों के आपस में भीषण और बेबाक तरीके से टकराने की एक तीखी, चिपचिपी और कामुक आवाज़ उस सन्नाटे में गूँजने लगी। उस तप्त मार्ग से निकलता हुआ कामरस सूरज के कड़े अंग को और भी चिकना बना रहा था, जिससे हर धक्का एक कटीली सनसनी पैदा कर रहा था।
सोनी ने आँखें मीच रखी थीं और वह हवा में बेतरतीब लहराती अपनी सफ़ेद स्कर्ट के बीच पूरी तरह नग्न होकर उस आदिम सुख की पराकाष्ठा पर झूल रही थी। उसकी छाती का वह भारी उभार सूरज की उंगलियों की जकड़ में पूरी तरह से कुचल रहा था, और नैनी पीक की उस बर्फीली धुंध में दोनों मर्यादा और लोक-लाज को पूरी तरह भस्म करते हुए वासना के उस घने भंवर में डूबते चले गए जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था।
सोनी (आँखें बंद किए, हाँफती हुई आवाज़ में): "सूरज... आह्... बस ऐसे ही... रुकना मत...!"
सूरज का पौरुष भी अब अपनी चरम सीमा पर था। उसने गति को और भी तीव्र कर दिया, जिससे सोनी के बदन में एक तीव्र कंपन होने लगा। उस सुनसान व्यू पॉइंट की धुंध में दोनों कामुकता के उस शिखर पर पहुँच चुके थे जहाँ लोक-लाज और मर्यादा पूरी तरह मिट चुकी थी।
तभी, नीचे मुख्य पॉइंट से विकास की आवाज़ गूँजी, "सूरज... सोनी... कहाँ रह गए तुम दोनों? अब वापस आ जाओ, बहुत देर हो रही है!"
विकास की आवाज़ कानों में पड़ते ही सोनी के भीतर पकड़े जाने का डर और उत्तेजना एक साथ चरम पर पहुँच गए। उसी झटके के साथ, सूरज ने एक आखिरी और गहरा प्रहार किया, और संतान सप्तमी की छठी आहुति सोनी के गर्भ को तृप्त कर गई। चरम सुख की पराकाष्ठा पर सूरज सोनी पर पूरी तरह झुक गया और उसकी गर्दन को चूमते हुए अंदर स्खलित होता रहा।
सोनी और सूरज दोनों हाफ रहे थे पर उस हालत में भी सूरज सोनी की सम्हाले हुए था। मौसी आप ठीक हैं ना।
सोनी अपनी उखाड़ता हुई सांसों को काबू में करते हुए बोली…हां मैं ठीक हूं तू ठीक है ना?
सोनी ने अपनी गर्दन घुमाई और सूरज की ओर देखा सूरज ने उसके सूखे हुए अधरों को चूम लिया…
सूरज ने तुरंत खुद को सँभाला और अपनी पैंट ठीक की। सोनी ने भी काँपते हाथों से अपनी सफ़ेद स्कर्ट के घेर को नीचे किया और शॉल को बदन पर लपेट लिया। दोनों के चेहरों पर उस वर्जित मिलन की लाली साफ़ चमक रही थी।
पर जैसे ही सोनी खड़ी हुई उसकी मुनिया से सूरज का वीर्य रिश्ते हुए उसकी जांघों पर आने लगा।
सोनी ने सूरज की तरफ देखते हुए बोला..
अब तो मेरी पैंटी दे दे
सूरज ने मुस्कुराते हुए …अपनी जेब से वह काली पैंटी निकाली और नीचे बैठते हुए पैंटी को फैलाकर सोनी को उसमें अपने पैर डालने के लिए आमंत्रित किया…
सूरज ने पैंटी को सरका कर सोनी की जांघों तक पहुंचा दिया और सोनी ने आगे उसे उसकी जगह पर…सोनी को मुनिया को अब उसकी आहुति और उसका आवरण मिला चुका था।
सूरज (धीमी आवाज़ में मुस्कुराते हुए): "चलिए मौसी, मौसा जी बुला रहे हैं। आज का यह नज़ारा हमेशा याद रहेगा।"
सोनी ने अपनी बिखरी ज़ुल्फ़ों को सँभाला और सूरज को एक गहरी, तृप्त नज़र से देखते हुए आगे बढ़ गई। सोनी की चाल में एक लचक आ चुकी थी जो शायद इस नए आसन में संभोग करने के कारण जन्मी थी।
सूरज..मुस्कुरा रहा था और सोनी उसकी कातिल निगाहों को अपनी बलखाती कमर पर महसूस कर शर्मशार हो रही थी…और इस अद्भुत चूदाई का एहसास और जांघों से रिसते हुए वीर्य को महसूस करते धीरे-धीरे सूरज के पीछे चल रही थी।
जब वे दोनों नीचे पहुँचे, तो विकास कैमरे के साथ उनका इंतज़ार कर रहा था। वह इस बात से पूरी तरह अनजान था कि ऊपर के व्यू पॉइंट पर 'संतान सप्तमी' की छठी आहुति सकुशल संपन्न हो चुकी थी और अब इंतजार था विकास के सपने पूरे होने का और उसे अद्भुत पूर्ण आहुति का जिसकी कल्पना विकास पिछले कुछ दिनों से कर रहा था…
सोनी भी आखिरकार अपने पति की इच्छा का मान रखते हुए उस अनोखी पूर्णाहुति के लिए खुद को तैयार कर रही थी।
शेष अगले भाग में..