Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 146 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

भाग 203

उसने उस मादक, सम्मोहक इत्र की बूंदें अपनी चूचियों के उभारों पर, नाभि के पास, अपनी पीठ की ढलान, कमसिन कमर और विशेष रूप से अपनी जाँघों और मुनिया के आस-पास के हर उस हिस्से पर करीने से लगाई, जहाँ आज रात सूरज के युवा और बेताब हाथ पहुँचने वाले थे। इत्र की वह खुशबू हवा में तैरते ही पूरे कमरे को एक वर्जित कामुकता से महका गई।

इसके तुरंत बाद, सोनी ने सुगना के भेजे उस गाढ़े लाल रंग के सुंदर लहंगे और चोली को धारण कर लिया। बारीक कढ़ाई वाले उस लहंगे और कसी हुई चोली में सोनी इस वक्त किसी साक्षात कामदेवी की तरह लग रही थी, जिसका रूप पहाड़ों की ठंड में भी आग लगाने के लिए पूरी तरह तैयार हो चुका था।

अब आगे..

सोनी और विकास जब मंदिर जाने के लिए कमरे से बाहर निकलने लगे, तभी विकास ने पीछे मुड़कर सूरज से कहा, "सूरज, तू भी हमारे साथ चल। संतान सप्तमी का यह आखिरी दिन है, तेरा साथ होना शुभ होगा।"

सूरज को पहले तो यह थोड़ा असहज और अजीब लगा। उसे लगा कि पति-पत्नी के इस अनुष्ठानिक दर्शन के बीच उसका जाना शायद ठीक नहीं होगा। लेकिन तभी सोनी ने उसकी तरफ देखा और अपनी खनकती आवाज़ में कहा, "चल ना सूरज, सुगना दीदी ने भी तो कहा था कि आज के दिन मेरा पूरा ख्याल रखना है।" मौसी के इस अपनेपन और अधिकार भरे आग्रह को सूरज टाल नहीं सका और वह भी साथ चलने के लिए तैयार हो गया।

जब तीनों होटल की लॉबी में पहुँचे, तो वहाँ का नज़ारा देखने लायक था। लाल चटक लहंगे और कसी हुई चोली में सजी-धजी सोनी जब अपनी मादक चाल से आगे बढ़ रही थी, तो लॉबी और रिसेप्शन पर मौजूद कर्मचारी और अन्य पर्यटक ठगे से रह गए। पहाड़ों के इस दूरदराज टूरिस्ट स्पॉट पर एक पारंपरिक, दुल्हन की तरह सजी इतनी रूपवान और आकर्षक महिला को देखना सबके लिए एक अनोखा और विस्मयकारी अनुभव था। हर कोई अपनी नज़रें हटाए बिना बस सोनी को ही एकटक निहार रहा था। लेकिन सोनी इन सब नज़रों से बेपरवाह और पूरी तरह बिंदास होकर अपने उस गुप्त 'मिशन' की तरफ आगे बढ़ रही थी, जिसकी बिसात सुगना ने बिछाई थी।

कुछ ही देर बाद तीनों पहाड़ों के बीच स्थित एक प्राचीन और शांत मंदिर में पहुँचे। मंदिर का वातावरण शंख, घंटियों की गूंज और कपूर की खुशबू से पूरी तरह दिव्य हो चुका था। सोनी ने गर्भगृह के सामने खड़े होकर अपनी आँखें बंद कीं और पूरी श्रद्धा से ईश्वर से अपनी सूनी गोद को भरने और गर्भवती होने का वरदान मांगा। जैसे ही उसने अपनी पलकें मूँदीं, उसके अंतर्मन में एक सुंदर, सलोने बालक की धुंधली सी छवि तैर गई। उस कल्पना में जो बालक उसे दिखाई दिया, उसकी नैन-नक्श और मासूमियत बिल्कुल सूरज जैसी थी। इस अलौकिक अहसास से सोनी का मन भर आया और वह ईश्वर के सामने नतमस्तक हो गई।

उसी समय, सोनी के दोनों तरफ खड़े विकास और सूरज ने भी हाथ जोड़कर अपनी आँखें बंद कर लीं। दोनों ने ईश्वर से केवल और केवल सोनी की झोली भरने, उसे दुनिया की हर खुशी देने और उसकी गोद हरी करने की सच्चे दिल से प्रार्थना की। उस पावन घड़ी में मंदिर का पूरा माहौल एक पवित्र पारिवारिक भावना में बदल गया। कुछ पलों के लिए देह की भूख, वासना और सारे गुप्त विचार कहीं गहरे गायब हो गए, और उनकी जगह सिर्फ एक निश्छल समर्पण और श्रद्धा ने ले ली।

पर जैसे ही पूजा-अर्चना समाप्त हुई और वे तीनों मंदिर की सीढ़ियाँ उतरकर वापस बाहर आए, पहाड़ों की उस ठंडी हवा ने एक बार फिर उनके बदन को छुआ। मंदिर परिसर से बाहर कदम रखते ही विकास के दिमाग में आज होने वाले उस अंतिम, वर्जित और चरम अनुष्ठान की कल्पनाएँ दोबारा कौंधने लगीं। अपनी पत्नी के इस देवदासी जैसे रूप और सुगना के उस गुप्त विधान के बारे में सोच-सोचकर विकास के भीतर कामुकता का ज्वार इस कदर बढ़ा कि उसकी मर्यादा एक बार फिर ढहने लगी और उसका अंग कपड़ों के भीतर पूरी तरह से तनकर खड़ा हो गया।

मंदिर से निकलकर होटल वापस आने के रास्ते में गाड़ियों के टायरों की आवाज़ और पहाड़ों के सन्नाटे के बीच सोनी का मन विचारों के एक गहरे भंवर में डूबा हुआ था। वह खिड़की के बाहर खिली हुई धूप को देख रही थी, लेकिन उसका दिमाग आने वाले समय के घटनाक्रमों को बहुत बारीकी से बुनने और समझने की कोशिश कर रहा था।

उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि आखिर वह विकास की उस अनोखी और वर्जित इच्छा को कैसे पूरी करेगी, जिसमें उसका पति स्वयं अपनी ही पत्नी को अपने भांजे की बाहों में सौंपकर उस मिलन का साक्षी बनना चाहता था।

इस योजना के बीच सोनी के मन में एक गहरा डर और चिंता बार-बार सिर उठा रही थी। वह जानती थी कि सूरज एक युवा और गरम खून का लड़का है। इस अंतिम अनुष्ठान की वेदी पर, सुगना के दिए इत्र की मादक महक और संतान सप्तमी के उस माहौल में जब सूरज अपनी वासना के अधीन होकर पूरी तरह से उन्मुक्त (बेकाबू) हो जाएगा, तब उसे संभालना बहुत मुश्किल होगा।

सोनी को सबसे बड़ा डर इस बात का था कि यदि संभोग की उस चरम और मदहोश कर देने वाली घड़ी में सूरज अपनी सुध-बुध खो बैठा, और उसने अपने मुँह से बनारस के उन पुराने मिलनों की चर्चा छोड़ दी, या उनके बीच पहले से बने शारीरिक संबंधों की कोई बात अनजाने में कह दी, तो अनर्थ हो जाएगा। सूरज इस समय खेल के इस नए नियम से बिल्कुल अनजान था कि मौसा जी कमरे में ही कहीं छिपकर सब देखने वाले हैं। सोनी सोच रही थी कि यदि सूरज अपनी बेताबी में ज़्यादा बिंदास या बेपरवाह हो गया, तो विकास के सामने यह बात कैसे छुपी रहेगी कि वे दोनों पहली बार एक नहीं हो रहे हैं, बल्कि उनके बीच पहले ही सब कुछ घटित हो चुका है।

अपनी देह पर लगे इत्र की महक और लहंगे की सरसराहट के बीच सोनी ने मन ही मन यह तय कर लिया कि उसे सूरज पर पूरी तरह नियंत्रण रखना होगा। उसे कुछ ऐसी तरकीब निकालनी होगी जिससे सूरज कमरे में आकर भी एक कड़े अनुशासन और मर्यादा के दायरे में बंधा रहे, ताकि विकास के सामने अतीत का वह गुप्त पन्ना कभी न खुल सके।

होटल के करीब पहुँचते-पूँछते सोनी का दिमाग पूरी तरह सक्रिय हो चुका था। उसने अपनी घबराहट पर काबू पाया और एक गहरी सांस लेकर इस उलझन का तोड़ निकाल लिया। वह समझ गई कि सूरज के गरम खून और उसकी उन्मुक्तता को नियंत्रित करने का केवल एक ही तरीका था—अनुष्ठान के नियमों को और अधिक रहस्यमयी और सख्त बना देना। ऐसा करने से सूरज मर्यादा के डर से खुद ही शांत रहेगा और कुछ भी अतिरिक्त बोलने की हिम्मत नहीं करेगा।

जैसे ही गाड़ी होटल के अहाते में रुकी और वे तीनों उतरकर अपने फ्लोर की तरफ बढ़े, सोनी ने विकास की तरफ देखकर हौले से मुस्कुराया। वह विकास को यह मूक संदेश दे रही थी कि अब खेल का समय आ चुका है।

कमरे में पहुँचते ही, विकास ने पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार सूरज की उपस्थिति में सोनी से कहा

मेरा लखनऊ का एक दोस्त नैनीताल आया है मुझे कुछ देर के लिए जाना पड़ेगा।"

सोनी ने आंखें तरेरते हुए कहा …आज के दिन भी आपको जाना है?

सोनी जाना तो नहीं चाहता पर जरूरी है मैं एक-दो घंटे में आ जाऊंगा प्लीज…

विकास का यह कहना असल में एक संकेत था कि वह बाहर जाने का ढोंग कर रहा है, ताकि सूरज को लगे कि वे कमरे में नहीं हैं, जबकि असल में विकास को थोड़ी ही देर में बालकनी के रास्ते वापस आकर छुपना था।

विकास के कमरे से बाहर निकलते ही, सोनी ने बिना समय गंवाए कमरे का भारी दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया पर लॉक नहीं किया। कमरे में सुगना के इत्र की मादक खुशबू पहले से ही तैर रही थी, जिसने सूरज के भीतर एक सिहरन पैदा कर दी थी। वह लाल लहंगे में सजी अपनी मौसी के इस साक्षात कामदेवी जैसे रूप को देखकर सम्मोहित खड़ा था।

सोनी ने अपनी आवाज़ को बेहद धीमा, गंभीर और रहस्यमयी कर लिया। वह सूरज के ठीक सामने आकर खड़ी हो गई, जिससे उसकी चोली के भीतर से आती इत्र की तेज महक सीधे सूरज के नथुनों में समाने लगी।

सोनी (बेहद गंभीर और दबी आवाज़ में): "सूरज, ध्यान से सुन। संतान सप्तमी की यह महा-पूर्णाहुति कोई साधारण मिलन नहीं है। सुगना दीदी ने इस अंतिम रात के लिए दो बहुत कड़े और अटूट नियम बताए हैं, जिनका पालन तुझे हर हाल में करना होगा। यदि तूने इसमें ज़रा भी चूक की, तो यह अनुष्ठान खंडित हो जाएगा और ईश्वर का कोप हम पर बरसेगा।"

सूरज ने अपनी थूक निगलते हुए मौसी की आँखों में देखा। उसकी वासना इस कड़े लहज़े को सुनकर थोड़ी नियंत्रित हुई।

सूरज (धीमे से): "हाँ मौसी, बताइए। क्या नियम हैं? मैं हर नियम मानने को तैयार हूँ।"

सोनी (उसकी आँखों में आँखें डालकर फुसफुसाते हुए): "पहला नियम—आज संभोग के पहले क्षण से लेकर अंतिम आहुति तक, तुझे पूरी तरह 'मौन व्रत' धारण करना होगा। तेरे मुँह से एक भी शब्द, कोई पुरानी चर्चा, या कोई भी बात नहीं निकलनी चाहिए। यहाँ तक कि आहें भी नहीं। जो कुछ भी होगा, वह पूरी तरह खामोशी के साथ संपन्न होगा।"

सोनी ने यह नियम इसलिए बनाया ताकि सूरज भूलकर भी बनारस के पुराने मिलनों का ज़िक्र न कर बैठे और विकास तक कोई बात न पहुँचे।

सोनी ने आगे कहा: "और दूसरा नियम... आज रात मैं ठीक उसी प्रकार से इस अनुष्ठान को सिद्ध करूँगी, जैसा मैंने बनारस में तेरे भीतर के पुरुषत्व को पहली बार जगाने के लिए किया था। याद है न तुझे?"

'पुरुषत्व को जगाने' की बात सुनते ही सूरज के दिमाग में बिजली की तरह वह पूरा दृश्य कौंध गया। उसे तुरंत याद आया कि कैसे उसकी मौसी ने उसकी आँखों पर पट्टी बाँधकर उसे पूरी तरह से अंधकार में रखकर उसके भीतर की मर्दानगी को चरम पर पहुँचाया था।

सूरज (हड़बड़ाई हुई, भारी आवाज़ में): "मौसी... तो क्या आप मेरी आँखों पर आज फिर से वही पट्टी बाँधने जा रही हैं?"

सोनी ने धीरे से मुस्कुराते हुए आगे बढ़कर सूरज के माथे को चूमा। उसके होंठ जब सूरज की त्वचा से अलग हुए, तो उसकी आवाज़ में एक अकाट्य गहराई थी।

सोनी: "हाँ मेरे वीर, यही इस विधान का अंतिम सत्य है। शास्त्र कहते हैं कि संतान प्राप्ति की यह महा-पूर्णाहुति यदि पति के अलावा किसी अन्य पुरुष के अंश से हो रही हो, तो स्त्री की मर्यादा को बचाए रखने के लिए पुरुष की आँखों पर पट्टी बाँधना अनिवार्य होता है। जब तुम्हारी आँखों के सामने अंधेरा होगा, तभी प्रकृति इस पूर्णाहूति को केवल एक अनुष्ठानिक आहुति मानेगी, कोई पाप नहीं।"

इसी बीच क्लिक की आवाज हुई और सूरज ने पूछा मौसी लगता है कोई आया है..

सोनी को पता था यह कोई और नहीं बल्कि विकास ही है उसने सूरज की बात को इग्नोर किया और शांति से बोली

अरे यहां कौन आएगा विकास जी तो बाहर गए और मैंने दरवाजा खुद लॉक किया है।

सोनी के इस तार्किक और रहस्यमयी बातों ने सूरज के मन के सारे संशयों को शांत कर दिया। अब वह पूरी तरह से नियंत्रित भी था और डरा हुआ भी कि उसे एक शब्द भी नहीं बोलना है। उसे रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था कि आँखों पर पट्टी बाँधने का यह विधान असल में सोनी ने इसलिए रचा था ताकि वह अपने मौसा जी को कभी देख न सके।

सोनी ने आगे बढ़कर पलंग के पास रखी अपना लाल दुप्पटा उठाया और बेहद कोमलता से सूरज की आँखों पर बाँध दिया। जैसे ही सूरज की आँखों के सामने पूरी तरह अंधेरा छाया, दृष्टि छिन जाने से उसकी बाकी की इंद्रियाँ दस गुना अधिक संवेदनशील हो चुकी थीं।

इसी बीच बालकनी का झीना परदा धीरे से हटा और विकास बेहद खामोशी से कमरे के भीतर दाखिल हो गया। अपनी पत्नी और भांजे के बीच की उस छुपी हुई, अनोखी केमिस्ट्री और बेताबी को अपनी आँखों से साफ़ देखना उनके भीतर के पौरुष को एक चरम उत्तेजना से भर रहा था। विकास को पूरा आभास हो चुका था कि ये दोनों पहले भी एक हो चुके हैं, लेकिन इस सच को भाँपकर उनके भीतर कोई क्रोध नहीं, बल्कि एक असीम कामुक रोमांच जाग उठा था।

सोनी अब इस त्रिकोणीय खेल के केंद्र में थी। उसने सूरज को पूरी तरह से मौन रहने का निर्देश दे रखा था, इसलिए सूरज बिना कोई शब्द बोले, केवल अपनी भारी होती साँसों के सहारे सोनी के नितंबों को अपनी मजबूत उंगलियों से भींच रहा था।

सूरज की आँखों पर बंधी वह लाल मखमली पट्टी अब उसके लिए केवल एक आवरण नहीं, बल्कि उसकी बाकी सभी इंद्रियों को जगाने का माध्यम बन चुकी थी। दृष्टिहीनता के उस सघन अंधकार में, सूरज की हथेलियाँ बेहद संवेदनशील हो उठी थीं। उसने अपनी उँगलियों और हथेलियों को धीरे-धीरे सोनी के बदन के उतार-चढ़ाव पर फिराना शुरू किया। रेशमी वस्त्रों के ऊपर से भी उसे सोनी के जिस्म की तपिश और उसकी त्वचा की मखमली कोमलता का साफ़ अहसास हो रहा था।

सोनी, जो इस पूरे खेल को अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश कर रही थी, सूरज के इस सधे हुए और गहरे स्पर्श के आगे खुद को रोक नहीं पाई। जैसे-जैसे सूरज की हथेलियाँ उसकी कमसिन कमर और पीठ की ढलान को सहला रही थीं, सोनी आत्मसमर्पण के भाव में उसके आलिंगन में खींचती चली गई। उसका सिर सूरज के गठीले कंधे पर टिक गया और उसकी अपनी साँसें भारी होने लगीं।

सूरज ने बिना कोई शब्द बोले, अपनी मौसी को पूरी शिद्दत से अपने आगोश में भर लिया। वह उसके चेहरे के करीब आया और उसके कानों के पीछे तथा सुगना के इत्र से महकती गोरी गर्दन पर अपने तपते हुए होंठ रख दिए। सूरज जिस दीवानगी और अधिकार के साथ सोनी की गर्दन और कानों को चूम रहा था, वह कोई नौसिखिया प्रयास नहीं था। उसमें एक पुराना ठहराव, एक गहरा अनुभव और एक जानी-पहचानी कशिश साफ़ झलक रही थी।


विकास की साँसें इस दृश्य को देखकर ऊपर-नीचे होने लगीं। उनकी छाती धौंकनी की तरह चल रही थी। एक परिपक्व पुरुष होने के नाते, सूरज के चूमने के अंदाज़ और सोनी के उसके प्रति इस सहज झुकाव को देखकर विकास के मन में यह बात शीशे की तरह साफ़ हो गई कि—निश्चित ही यह इन दोनों का पहली बार का मिलन नहीं था। इस बेताबी और जिस्मानी तालमेल के पीछे निश्चित ही कोई गुप्त इतिहास था, जिसकी गवाही कमरे की हर धड़कन दे रही थी। इस अहसास ने विकास के भीतर ईर्ष्या की जगह एक अजीब, वर्जित उत्तेजना को और बढ़ा दिया।

सोनी और सूरज अभी भी खड़े थे। सूरज की उँगलियाँ अब सोनी के वस्त्रों और चोली (ब्लाउज) की डोरियों से खेलने लगी थीं। मौन व्रत के कड़े अनुशासन में बंधा होने के कारण वह कुछ बोल तो नहीं रहा था, लेकिन उसके हाथों की फुर्ती उसकी बेताबी को बयां कर रही थी। उसने बड़ी ही चतुराई से चोली के बंधनों को ढीला किया।

कुछ ही देर में, सोनी के बदन का ऊपरी हिस्सा पूरी तरह अनावृत और नग्न हो गया। मखमली रोशनी में उसकी सुगठित छाती और कमसिन कमर का पूरा हिस्सा विकास की आँखों के सामने पूरी तरह चमक उठा। सोनी की चूचियां तन चुकी थी और निप्पल मणि की भांति और भी कठोर हो गए थे। अब सोनी का पेटिकोट और उस पर लिपटी हुई लाल चटक साड़ी सरक कर आधी खुली, आधी बंधी अवस्था में आ चुकी थी, जो बस सूरज की उँगलियों के अगले स्पर्श और आदेश का बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी।

विकास के लिए पीछे खड़े होकर इस दृश्य को देखना किसी ऐसी कल्पना के सच होने जैसा था, जिसे उन्होंने हमेशा अपने भीतर कहीं छुपा कर रखा था। ठीक उनकी आँखों के सामने, उनकी अपनी सुंदर पत्नी की नंगी पीठ पर सूरज की वे मजबूत और युवा हथेलियाँ रेंग रही थीं, जो सोनी के गोरे बदन को पूरी शिद्दत से अपने आगोश में भींच रही थीं। सूरज की उँगलियों का वह कड़ा कसाब जब सोनी की त्वचा को दबाता, तो विकास के भीतर उत्तेजना का एक ऐसा प्रचंड तूफान उठता कि उन्हें लगता जैसे उनका अंग कपड़ों के भीतर ही फट जाएगा। इतना तीव्र तनाव और ऐसी चरम उत्तेजना विकास ने अपने जीवन में कई दिनों बाद—या शायद पहली बार इस रूप में महसूस की थी। वे अपनी साँसें पूरी तरह रोककर, बिना हिले-डुले, इस अद्भुत और अत्यधिक कामुक दृश्य को अपनी आँखों में समेट रहे थे।

उधर सोनी इस समय एक बिल्कुल अलग ही दुनिया में तैर रही थी। सुगना के इत्र की मादक महक, और सूरज के युवा जिस्म की तपिश ने मिलकर उसके सोचने-समझने की शक्ति पर एक पर्दा डाल दिया था। वह सब कुछ भूल चुकी थी—वे नियम, वे जतन और वह सारी चिंताएँ जो वह होटल आने के रास्ते में सोच रही थी, इस समय सूरज के प्रचंड आलिंगन के आगे हवा हो चुकी थीं। वह पूरी तरह से सूरज की बाहों में समाई हुई थी, और उसकी गर्दन पर सूरज के होठों की जो छुअन हो रही थी, उसने उसके भीतर की स्त्री को पूरी तरह तृप्त कर दिया था। कुछ जादुई और मदहोश कर देने वाले पलों के लिए उसके मन से यह संशय और डर पूरी तरह मिट गया कि ठीक पीछे उसका पति विकास खड़ा है और इस वर्जित महा-संगम के एक-एक पल को अपनी आँखों से साफ़-साफ़ देख रहा है। वह तो बस इस आदिम सुख के सागर में बिना किसी बाधा के बहती चली जा रही थी।

सोनी उस मखमली अंधकार और सूरज के युवा आलिंगन में पूरी तरह खोई हुई थी, लेकिन तभी उसे अपने ठीक पीछे एक अनजानी मगर बेहद सधी हुई आहट का अहसास हुआ। विकास दबे और सधे हुए कदमों से, बिना कोई आवाज़ किए, सोनी के ठीक पीछे आ चुके थे।

सोनी जो इस समय अर्ध-नग्न अवस्था में खड़ी थी—उसकी चोली पहले ही ढीली होकर सरक चुकी थी—उसे अचानक अपनी कमर पर लिपटी साड़ी की सिलवटें और ढीली होती हुई महसूस हुईं। वह अभी इस स्पर्श को समझ ही रही थी कि उसे साफ़ अहसास हुआ कि कोई बहुत खामोशी से उसके पेटिकोट की डोरी (नाड़ा) को उँगलियों से टटोलकर धीरे-धीरे खोल रहा है। पीछे से आने वाली उस जानी-पहचानी छुअन और साँसों की गर्माहट से सोनी का पूरा बदन सिहर उठा और उसने तुरंत पहचान लिया कि यह विकास हैं।

विकास का यह रूप देखकर सोनी के भीतर एक तीखी घबराहट दौड़ गई। विकास ने तो सिर्फ दूर से देखने की बात कही थी, फिर वह अचानक इस खेल के बीच में आकर यह सब क्या कर रहे हैं? उसे डर था कि कहीं इस अप्रत्याशित हरकत से सूरज को कुछ शक न हो जाए और पूरा खेल बेकाबू हो जाए।

स्थिति को तुरंत संभालने के लिए, सोनी ने बड़ी ही चतुरता से काम लिया। उसने बिना कोई आवाज़ किए, सूरज को बहुत धीरे से खुद से अलग किया। अचानक आए इस ठहराव से आँखों पर पट्टी बांधे खड़ा सूरज थोड़ा सा सकपकाया, लेकिन सोनी ने उसे अपनी योजनाओं में उलझाए रखने के लिए तुरंत अपने कोमल हाथ आगे बढ़ाए और खड़े-खड़े ही सूरज की शर्ट के बटन एक-एक करके खोलने लगी। सूरज इस नए स्पर्श और मौसी की इस अचानक जागी बेताबी में फिर से मग्न हो गया।

सूरज को शर्ट के बटनों में उलझाकर, सोनी ने चुपके से अपनी कमर पीछे कर दी। उधर विकास ने अपनी उत्तेजना में सोनी के पेटिकोट के नाड़े को पूरी तरह से खोल दिया था, जिससे वह वस्त्र नीचे सरकने लगा था।

सोनी के पूरी तरह नग्न होते ही उसकी मुनिया से निकल रहा वह लाल धागा दिखाई पड़ने लगा जिसके एक सिरे पर लगी हुई सुपाड़ी मुनिया के अंदर उसका काम रस सोख रही थी।

सोनी ने बेहद मादक तरीके से अपना एक हाथ नीचे लाया और पहले एक धागे को पड़कर बाहर खींचा।

सोने की बुर की गहराइयों में डूबी वह बड़ी सुपारी धीरे-धीरे बाहर आने लगी और सोने की मुनिया के रस भरे होठों से टुप…. की आवाज के साथ बाहर आ गई।

सुपारी सोनी के कामरस से फूल चुकी थी उसने सुपारी से धागा हटाया और सुपारी को ऊपर उठाकर विकास की तरफ देखा विकास की मौन सहमति पाकर उसने वह सुपारी सूरज के होठों से सटा दी सूरज को वह मादक गंध याद थी उसने बिना कुछ कहे अपने होंठ खोले और उसे मुंह में ले लिया…

सोनी के काम रस का स्वाद सूरज को बखूबी याद था उसे सुपारी का रहस्य भी पता था।

सोनी ने छोटी सुपारी को भी अपनी मुनिया से बाहर निकाला और उसे विकास के होंठों के बीच रख दिया.. विकास ने भी उसे अपने मुंह में ले लिया।

विकास में सोनी की मुनिया को छूने की कोशिश की…

सोनी ने तुरंत पीछे मुड़कर विकास की आँखों में देखा। उसकी आँखें सवाल भी कर रही थीं और समझा भी रही थीं। सोनी ने बिना कोई शब्द बोले, अपनी उँगलियों से विकास को इशारा किया कि वे अपनी तय की हुई जगह पर जाकर बैठ जाएं और वहीं से इस दृश्य का आनंद लें।

विकास भी सोनी की उस सख्त और डरी हुई नज़र के पीछे के खतरे को समझ गए। वे अपनी भारी होती साँसों को रोककर, दबे कदमों से वापस अपनी नियत जगह पर बैठने के लिए पीछे हट गए, जबकि सोनी ने एक बार फिर पूरी तरह से अपनी आँखें बंद किए खड़े सूरज की तरफ ध्यान केंद्रित किया।

कमरे के भीतर की उत्तेजना अब अपने चरम बिंदु को छू रही थी। कुछ ही पलों के भीतर, सोनी ने सूरज को भी दो पूरी तरह से नग्न कर दिया। मखमली और मद्धम रोशनी में उन दोनों के सुगठित बदन साक्षात कामदेव और कामदेवी की तरह दमक रहे थे। आँखों पर पट्टी बंधा सूरज पूरी तरह अपनी मौसी के देह-सुख में डूबा हुआ था, और सोनी भी सब कुछ भूलकर उसके स्पर्श का आनंद ले रही थी।

उधर, अपनी तय जगह पर बैठे विकास की हालत बेकाबू हो रही थी। वो उस अद्भुत, कड़े और गठीले पौरुष (लिंग) को प्रत्यक्ष देखने के लिए पूरी तरह आतुर था, जिसके बारे में उन्होंने केवल कल्पनाएँ की थीं।

परंतु, विकास इस समय जिस कोण और जगह पर बैठे थे, वहाँ से उनकी नज़रें सूरज के उस अद्भुत लिंग तक नहीं पहुँच पा रही थीं। खड़े होने की स्थिति में, सूरज ठीक सोनी के सामने था, जिसके कारण उसका वह लंड सोनी के सुगठित नितंबों के पीछे पूरी तरह छिपा हुआ था। विकास अपनी गर्दन उठा-उठाकर, थोड़ा तिरछा होकर देखने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन सोनी का कामुक बदन बीच में एक ओट की तरह आ रहा था।

अपनी पत्नी और भांजे के इस महा-मिलन के सबसे मुख्य दृश्य को साफ़ न देख पाने की छटपटाहट में विकास के भीतर की कामुक व्याकुलता और भी तीव्र हो गई। वे बिना कोई आवाज़ किए अपनी जगह पर छटपटा रहे थे, और इस बात का इंतज़ार कर रहे थे कि कब उनकी स्थिति या उन दोनों की दिशा बदले, और वे उस वर्जित दृश्य को अपनी आँखों से साफ़ देख सकें।

कमरे की मखमली रोशनी के बीच, जब सोनी और सूरज ने अपनी स्थिति में थोड़ा सा बदलाव किया, तो विकास की व्याकुल आँखें तुरंत उस ओर टिक गईं। सोनी का बदन जैसे ही थोड़ा सा एक तरफ हटा, सूरज का वह मुख्य अंग (लिंग) पहली बार विकास की नज़रों के ठीक सामने पूरी तरह उजागर हो गया।

"हे भगवान! यह क्या..." विकास के मन में एक गहरा धक्का लगा। उन्होंने जिस प्रचंड, सुगठित और सख़्त तने हुए पौरुष की कल्पना अपने दिमाग में पाल रखी थी, उसके उलट वहाँ का नज़ारा बिल्कुल अलग था। सूरज का लिंग इस समय एक मुरझाए हुए केले की तरह पूरी तरह से ढीला और लटका हुआ था।

विकास को अपनी ही आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। सोनी जैसी साक्षात कामदेवी जैसी रूपवान नग्न स्त्री को अपनी बाहों में भरने और उसकी गर्दन को इतनी दीवानगी से चूमने के बाद भी सूरज के अंग में रत्ती भर का तनाव नहीं था। एक युवा पुरुष का अपनी अत्यंत आकर्षक मौसी के पूर्ण नग्न बदन के स्पर्श के बाद भी इस कदर शांत और शिथिल रहना किसी अजूबे से कम नहीं था।

विकास स्तब्ध रह गया। वो आश्चर्य और कौतूहल से इस अजीबोगरीब मिरेकल (चमत्कार) को एकटक देखने लगा। उनके दिमाग में सवालों का बवंडर उठने लगा कि आखिर इस चरम कामुक माहौल के बाद भी सूरज का पौरुष इस तरह सोया हुआ क्यों है? क्या यह मौन व्रत का असर था, या फिर आँखों पर बंधी उस मखमली पट्टी के अंधेरे का कोई मनोवैज्ञानिक प्रभाव? क्या सोनी के गर्भवती होने का सपना धरा का धरा रह जाएगा…


शेष अगले भाग में
 
अपडेट 204 है बीन सेंत तो रीडर्स हूज कमैंट्स अरे रेसिवेद ों प्रीवियस episode.

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व्रिठे फ्यू लाइन्स.
 
भाग 205

अब तक आपने पढ़ा..

जब तुम्हारी आँखों के सामने अंधेरा होगा, तभी प्रकृति इस मिलन को केवल एक अनुष्ठानिक आहुति मानेगी, कोई पाप नहीं।"

सोनी के इस तार्किक और रहस्यमयी दर्शन ने सूरज के मन के सारे संशयों को एक पल में शांत कर दिया। उसे रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था कि आँखों पर पट्टी बाँधने का यह विधान असल में सोनी ने इसलिए रचा था ताकि वह सामने लगी बालकनी के कांच के पीछे छिपे अपने मौसा जी (विकास) को कभी देख न सके, और विकास बिना किसी डर के इस पूरे खेल का पूरा आनंद ले सकें।

अब आगे..

इधर सूरज और सोनी की कामुक यात्रा अंतिम पड़ाव पर थी उधर सूरज की मां सुगना बेचैन थी.

बनारस की हवेली की दीवारों और सुगना की आंखों में अब एक ऐसा गहरा राज़ दफ़्न हो चुका था, जो किसी भी दिन पूरे परिवार को हिला कर रख सकता था। सुगना के लिए रातें अब लंबी और बेचैन करने वाली हो गई थीं। जब भी वह अपनी आँखें मूँदती, उसकी आँखों के सामने वही मंज़र तैर जाता जब उसने अपनी बेटी मालती को राजू के साथ उन्मुक्त तरीके से संभोग करते अपनी नंगी आँखों से देखा था।

मालती को, लाली के बेटे राजू के साथ इस तरह मर्यादा की सारी सीमाएं तोड़कर, खुलकर संभोग करते हुए देखना सुगना के लिए किसी वज्रपात से कम नहीं था। वह बार-बार खुद को कोस रही थी, उसका अंतर्मन उसे कचोट रहा था कि आखिर उस वक्त उसके पैर क्यों जम गए थे? उसने उसी समय आगे बढ़कर उन्हें क्यों नहीं रोका? अगर वह उस पल कड़ा रुख अपनाती, तो शायद इस वर्जित रिश्ते पर वहीं लगाम लग जाती। पर अब वह भी जानती थी कि जो वक्त बीत चुका था, उसे वापस नहीं लाया जा सकता था। कमान से छूटा तीर और हाथ से निकला अवसर कभी लौटकर नहीं आते।

उधर, इस सब से बेखबर मालती और राजू अपनी ही धुन में पूरी तरह बिंदास और निडर बने हुए थे। उन्हें इस बात का कतई इल्म नहीं था कि सुगना ने उन्हें उस आपत्तिजनक और अत्यंत निजी अवस्था में देख लिया है। उनके बीच का गुप्त सिलसिला उसी बेबाकी से चल रहा था, जैसे घर की बंदिशें उनके लिए कोई मायने ही नहीं रखती थीं। जब भी वे सुगना के सामने आते, तो उनके चेहरे पर कोई झिझक नहीं होती थी, जो सुगना के भीतर की घबराहट और आत्मग्लानि को और ज्यादा बढ़ा देती थी।

सुगना इस दोहरे मानसिक तनाव में पिस रही थी—एक तरफ बेटी का यह गुनाह और दूसरी तरफ समाज व परिवार की साख। वह समझ नहीं पा रही थी कि इस सच्चाई के बोझ के साथ वह आगे क्या करे, जबकि मालती और राजू का यह बिंदासपन रिश्तों को किसी बड़े विस्फोट की तरफ ले जा रहा था।

मालती अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर चुकी थी और अब इधर-उधर बेमन से नौकरी करने के लिए फॉर्म भर रही थी पर शायद वह उतनी तेज नहीं थी कि अपने बलबूते कोई नौकरी खोज पाती…कमोबेश यही स्थिति राजू की भी थी.. बात सच भी थी दोनों जब युवावस्था में ही चोदा चोदी के खेल में लग गए थे उनका करियर दांव पर पहले ही आ चुका था

बहरहाल राजू ने अपना शरीर वर्जिश करके एक युवा की भांति बना लिया था और मालती का तो कहना ही क्या उसने अपने कामुक बदन को इस तरह बनाए रखा था जिससे वह किसी भी मर्द को आकर्षित कर पाती और ईश्वर द्वारा दी गई प्रदत्त खूबसूरती से वह किसी भी काबिल मर्द की बीवी बनकर आगे का जीवन काट सकते थी।

बनारस के उस पुराने मकान में बीतने वाली हर रात अब सुगना के लिए एक मानसिक युद्ध जैसी हो गई थी। दिन के उजाले में तो वह काम-काज में खुद को व्यस्त रखकर मालती और राजू के उस दृश्य को दिमाग से निकालने की पुरजोर कोशिश करती थी, लेकिन जैसे ही वह थकान से चूर होकर अपनी आँखें मूँदती, उसका अवचेतन मन उस पर हावी हो जाता।

वह जितना ही उस वर्जित और कामुक मिलन की यादों से दूर भागना चाहती, वे तस्वीरें उतनी ही शिद्दत से उसके सपनों में लौट आतीं। रात के सन्नाटे में उसके सपने अजीब और उलझे हुए रास्तों पर चल पड़ते। कभी वे सपने बहुत विकृत और डरावने रूप ले लेते, जिसमें लोक-लाज और परिवार की बदनामी का खौफ उसे घेर लेता; तो कभी वे कुछ इतने गहरे, तीव्र और कामुक हो जाते कि सुगना का पूरा वजूद सिहर उठता।

उन सपनों में छिपी कामुकता की तीव्रता इतनी अधिक होती थी कि अगली सुबह जब वह सोकर उठती, तो चाहकर भी उनके धुंधले सिरों को याद नहीं कर पाती थी। उसका दिमाग उन वर्जित कल्पनाओं को सचेत मन में लाने से रोक देता था, जैसे कोई अनजाना पर्दा गिर जाता हो।

पर सुबह उठने के बाद भले ही सपने की बारीकियाँ गायब हो जातीं, लेकिन उनके पीछे छूट गई बेचैनी और बदन की भारीपन वहीं रह जाता। अब यह पूरी तरह तय हो चुका था कि सुगना का दिन का चैन और रातों की नींद, दोनों पूरी तरह से उड़ चुके थे। वह अपनी ही बेटी और राजू के उस गुप्त राज़ के बोझ तले दबी जा रही थी, जो उसे अंदर ही अंदर खोखला कर रहा था।

सुगना के मन मस्तिष्क में चल रहे भाव उसके चेहरे पर आने लगे।

आखिर वह सहेली ही क्या, जो अपनी सबसे अज़ीज़ सहेली के दिल की तकलीफ और आँखों के दर्द को बिना कहे न पढ़ ले। सालों की जो दूरी उनके बीच आई थी, वह इस गहरे संकट के क्षण में पिघलकर पूरी तरह खत्म हो चुकी थी। लाली में सुगना के मनोभाव पढ़ लिए और उसकी असहजता भाप ली।

लाली को अच्छी तरह याद था कि जब से सूरज डॉक्टर बना था, तब से सुगना के व्यक्तित्व में एक अभूतपूर्व और आमूलचूल परिवर्तन आया था। पिछले बारह वर्षों से जो सुगना वक्त की थपेड़ों और सरयू सिंह की मृत्यु के बाद पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के नीचे दबकर एकदम शांत, गंभीर और स्थिर हो चुकी थी, वह बेटे की इस कामयाबी के बाद अचानक बदल गई थी। वह एक बार फिर उसी प्रकार चंचल, बेबाक और जीवंत हो उठी थी, जैसी वह अपनी अल्हड़ युवावस्था में हुआ करती थी। सुगना की यह पुरानी चंचलता घर में सबको बेहद प्रिय लग रही थी और सबको अपनी ओर आकर्षित कर रही थी, यहाँ तक कि उसके भाई सोनू को भी।

सुगना सोनू के लिए अजीज थी और इस जहां में उसके लिए सबसे प्यारी थी। उसने हर रूप में सुगना का साथ दिया था। पिछले कई वर्षों से वह ईश्वर से यही प्रार्थना करता था कि सुगना वापस से सामान्य हो जाए पर चाह कर भी वह सुगना को उसकी आत्मग्लानि से बाहर निकलने में नाकाम रहा था पर सूरज की सफलता ने सुगना में एक नई जान फूंक दी थी शायद इसमें सरयू सिंह के स्वप्न का भी योगदान था पर यह बात सिर्फ सुगना ही जानती थी।

लाली के जेहन में वह रात आज भी साफ़ थी, जब सूरज के डॉक्टर बनने का उत्सव खत्म हुआ था। उस रात सुगना को बेहद खुश और चहकते देखकर सोनू का दिल भी पुरानी यादों और एक अनजाने उत्साह से भर उठा था।

अतीत के पन्नों में यह राज़ गहरे दफ़्न था कि सुगना और सोनू भले ही भाई-बहन थे, पर अपनी बेलगाम जवानी के दिनों में उन दोनों ने समाज की नज़रों से छुपकर कई बार एक-दूसरे के साथ बेहद तीव्र और उग्र शारीरिक संबंध बनाए थे। वह एक ऐसा आदिम और गुप्त रिश्ता था जिसने दोनों के वजूद पर अमिट छाप छोड़ी थी। यहाँ तक कि लाली की शादी सोनू से कराने में भी सुगना का ही हाथ था…जिसने अपने मालपुआ (सुगना की बुर) को दहेज स्वरूप सोनू को समर्पित कर दिया था।

सूरज के डॉक्टर बनने के उत्सव की उस रात, सुगना के भीतर जागी उसी चंचल तरंग को देखकर सोनू बेकाबू हो उठा था। देर रात उसने लाली से सुगना की उसी चंचलता और खूबसूरती के बारे में ढेर सारी बातें की थीं। सुगना के उस बदले हुए रूप ने सोनू के भीतर की सोई हुई मर्दानगी और वासना को इस कदर जगा दिया था कि उस रात सोनू और लाली के बीच का संभोग एक बिल्कुल नई और अभूतपूर्व ऊँचाई पर पहुँच गया था। उन दोनों का वह शारीरिक मिलन ठीक वैसा ही उग्र और तृप्त करने वाला था, जैसा उनकी शुरुआती जवानी के दिनों में हुआ करता था। सुगना में आया यह चंचल परिवर्तन अनजाने में ही सही, लाली और सोनू के दांपत्य जीवन में कामुकता का एक नया उत्साह और नया रंग भर गया था।

चंचल सुगना के चेहरे पर आया तनाव देखकर लाली से और रहा नहीं गया, तो उसने शाम को जब दोनों रसोई घर में रात के खाने की तैयारी कर रही थीं, उसने मौका पाकर सुगना से सीधा सवाल कर दिया। लाली ने सुगना के हाथ से सब्जी काटने वाला चाकू धीरे से छीनकर अलग रखा और उसका हाथ पकड़ते हुए पूछा:

लाली (भोजपुरी में, बेहद फिक्रमंद होकर): "सुगना, अब तू सच-सच बतावऽ, तू इतना परेशान काहे रहत बाड़ू?

सुगना : कोनो बात नईखे चाकू दे सब्जी काटे के बा

लाली ने चाकू को किनारे रखकर सुगना की ठंडी पड़ चुकी हथेलियों को अपने हाथों में लेकर दबाया। उसकी आँखों में गहरी चिंता और पुरानी सहेली वाला हक साफ़ झलक रहा था।

लाली (भोजपुरी में, सुगना के चेहरे को एकटक निहारते हुए): "सुगना, अब तू सच-सच बतावऽ, अभी तऽ कुछ दिन पहले ले तू बिल्कुल ठीक रहलू। तोहरे ई हँसत-खिलखिलात चेहरा देख के पूरा घर चहकत रहे, सोनू भी कतना खुश रहन। आज तोहार ई रूप देख के हमार जियरा काँप जात बा। का भइल बा तोके?"

सुगना ने झटके से अपनी नजरें चुराने की कोशिश की। उसके चेहरे पर एक फीकी, बनावटी मुस्कान उभर आई, लेकिन उसकी काँपती पलकें साफ बता रही थीं कि भीतर कोई तूफान चल रहा है। वह अपनी उँगलियों को आपस में भींचने लगी।

सुगना (भोजपुरी में, आवाज़ को सामान्य बनाने की नाकाम कोशिश करते हुए): "अरे, कवनो बात नईखे लाली! तू तऽ अइसे ही फिकर करे लगलू। बस थोड़ा माथा भारी बा और बदन टूटत बा, अउरी का।"

लाली ने सुगना की ठुड्डी को धीरे से ऊपर उठाया और उसकी सीधे आँखों में झाँका। लाली के चेहरे पर एक सख्त लेकिन ममता भरा भाव आ गया, जैसे वह कह रही हो कि मुझसे कुछ नहीं छुप सकता।

लाली (अधिकार भरे लहज़े में, धीमे से सिर हिलाते हुए): "हमसे बात मत बदलऽ सुगना! हम तोहार सहेली बानी, तोहार परछाईं बानी। तोहार ई झूठी मुस्कान और आँखों के ई खौफ हमसे ना छुप पाई। हमके साफ़-साफ़ लौकत बा कि कवनो अइसन नया टेंशन बा जे तोके भीतर ही भीतर घुन नियन खाए जात बा। आखिर अपनी ई चंचल सुगना के हम अइसे उदास ना देख सकब। बोलऽ, का बात बा? तोके हमार कसम बा।"

लाली के मुँह से अपनी कसम सुनते ही सुगना के सब्र का बांध टूट गया। उसके चेहरे का बनावटी संयम पल भर में ढह गया और उसकी आँखों में छपछपाते आँसू रसोई की मद्धम रोशनी में चमक उठे। उसने एक गहरी और काँपती हुई साँस ली, मानो वह कोई भारी बोझ ज़मीन पर रखने जा रही हो।

सुगना ने लाली को उस रात का पूरा वाकया हूबहू सुना दिया—कैसे वह उस कमरे के पास पहुँची, कैसे उसने किवाड़ के झरोखे से उन दोनों को उस आपत्तिजनक और घनिष्ठ अवस्था में देखा। उसने लाली के सामने राजू और मालती के बीच हुए उस वर्जित संबंध को उजागर कर दिया।

परंतु इस सब के बीच सुगना ने अपने अंतर्मन के उस सबसे गुप्त और गहरे राज़ को अपने भीतर ही दफ़्न रखा। उसने लाली को यह कतई नहीं बताया कि उसने उस दृश्य को महज़ एक नजर देखकर अपनी आँखें नहीं फेरी थीं, बल्कि वह चुपचाप वहीं खड़ी रहकर लगातार उस वर्जित मिलन को निहारती रही थी। उसने यह बात भी पूरी तरह छुपा ली कि उस दृश्य को देखने से उसके खुद के भीतर जो आदिम वासना और कामुक तरंग जागी थी, उसने अनजाने में उसका एक मूक आनंद भी लिया था। वह सुख और आत्मग्लानि का जो ज्वार उसके भीतर उठा था, वह उसे किसी भी कीमत पर लाली के सामने जाहिर नहीं होने देना चाहती थी।

सुगना की बात सुनकर लाली का चेहरा एकदम सफेद पड़ गया।

लाली: तू रोकलू काहे ना?

सुगना के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था।

सुगना: हम घबरा गइनी..

लाली (भोजपुरी में, गुस्से और अफ़सोस के मिले-जुले लहज़े में): "सुगना, हमरा तऽ ई सोच के छाती फटा जाता कि मालती हरदम राजू के 'भैया-भैया' कह के बोलावेले। उ राजू के भाई मानेले, और राजू भी ओकरा के अपनी बहिन नियन समझेला। फिर भी उ दुनो अइसन कर गइले सऽ? लाज-सरम सब बेच खइले सऽ का?"

सुगना ने लाली की हाँ में हाँ मिलाते हुए अपना सिर हिला दिया। वह ऊपर से तो लाली के सुर में सुर मिला रही थी, लेकिन भीतर से उसका अंतर्मन उसे कचोट रहा था। वह इस निंदा में इतनी डूब गई थी कि कुछ पलों के लिए वह खुद के और अपने भाई सोनू के अतीत को पूरी तरह भूल चुकी थी—वो अतीत, जिसके संबंध शायद मालती और राजू के इस रिश्ते से भी कहीं ज्यादा गहरे, वर्जित और जटिल थे।

तभी लाली ने सुगना के चेहरे के बदलते रंगों को ताड़ा। उसने सुगना की आँखों में सीधे झाँकते हुए एक ऐसा राज़ छेड़ा, जिसने सुगना के पैरों तले की ज़मीन खिसका दी।

लाली (धीमी और रहस्यमयी आवाज़ में): "सुगना, ई सब देख के हमरा लागत बा कि हमनी के कइले कवनो पुरान गलती के परिणाम अब हमनी के भुगते के पड़त बा..."

सुगना ने चकित होकर, अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से लाली की तरफ देखा और घबराते हुए पूछा।

सुगना (काँपती आवाज़ में): "कवन गलती लाली? तू ई का कहत बाड़ू?"

लाली (एक ठंडी और गहरी साँस लेते हुए): "वही गलती... जब हम खुद सोनू के तोहरे साथ संभोग करे खातिर उकसावाले रहनी। याद बा तोके उ सलेमपुर के रात?"

सलेमपुर की रात' का नाम सुनते ही जैसे रसोई घर का तापमान अचानक गिर गया। सुगना की आँखों के सामने वर्षों पुराना वह पूरा दृश्य एक चलचित्र की तरह हूबहू तैर गया, जिसे वह अपने दिल के किसी कोने में दफ़्न कर चुकी थी।

उसे याद आने लगा कि कैसे उस रात, सोनू ने पहली बार उसकी मर्जी के बिना, ज़बरदस्ती उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए थे। वह दर्द, वह छटपटाहट और वह डर सुगना के बदन में एक बार फिर सिहरन पैदा कर गया। लेकिन उस कड़वे सच का एक पहलू यह भी था, जिसे सुगना खुद से भी छुपाती थी—कि शुरुआत के उस विरोध और ज़बरदस्ती के बाद, संभोग के उन आखिरी पलों में, सोनू के उस उग्र पौरुष की छुअन और उस तप्त अहसास के आगे वह खुद को रोक नहीं पाई थी और स्वयं काम-रस में डूबकर पूरी तरह कामातुर (उत्तेजित) हो गई थी।

अतीत का वह खौफनाक और कामुक सच आज लाली की ज़ुबान से सुनकर सुगना पूरी तरह अवाक रह गई। उसे अहसास हुआ कि जिस मर्यादा की बात वह आज कर रही है, उसकी बुनियाद तो सालों पहले सलेमपुर की उस रात में वह स्वयं हिला चुकी थी।

रसोई घर का वो भारी सन्नाटा अब दोनों सहेलियों के आपसी विश्वास और पुरानी यादों की गर्माहट में बदल चुका था। अतीत के गहरे राज़ सामने आने के बाद, अब वक्त था वर्तमान की इस बड़ी मुसीबत से निपटने का।

लाली और सुगना ने मिलकर एक ठोस फैसला किया कि वे अब मालती और राजू को घर में और भी एकांत (अकेलापन) बिल्कुल नहीं देंगी। वे दोनों अब उन पर पैनी नजर रखेंगी। यह बात दोनों बखूबी समझ रही थीं कि हो सकता है दोनों बच्चों ने नासमझी और कामुकता के वशीभूत होकर एक-दूसरे के साथ शारीरिक संबंध बना लिए हों, लेकिन अब इस सिलसिले को और आगे नहीं बढ़ने दिया जा सकता था।

लाली ने सुगना का हाथ सहलाते हुए उसे पूरा आश्वासन दिया, "सुगना, तू फिकर मत करऽ। हम खुद मालती से अकेले में बात करब। ओकरा के ई वर्जित संबंधन के दुष्परिणाम और समाज के साख के बारे में समझाएब, ताकि उ ई सब से हमेशा खातिर दूर हो जाई।"

लाली यह बात कह तो गई थी पर उसके पास अभी कोई तात्कालिक उपाय नहीं था पर समय सभी घावों को भर देता है उसे विश्वास था की जवानी की आग हो सकता है कुछ दिनों में शांत हो जाए।

आग से ध्यान आया…

विकास के मन में बार-बार यही वर्जित विचार आ रहा था कि वह स्वयं थोड़ा और आगे बढ़े, अपने हाथों से सूरज के उस प्रचंड पौरुष को थामे और सीधे अपनी पत्नी सोनी की बुर के मुहाने पर बिठाकर उसे अंदर धकेल दे। इस कशमकश को अपनी आँखों के सामने घटते देखना उसके धैर्य की परीक्षा ले रहा था और उसका हाथ अपने अंग पर और तेजी से चलने लगा था।

विकास को भली-भाँति अहसास था कि यदि उसने उत्तेजना में आकर सूरज के अंग को ज़रा सा भी हाथ लगाया, तो वह अनपेक्षित इंसानी स्पर्श इस पूरे तिलिस्म और सम्मोहन को एक पल में तोड़ देगा। सूरज तुरंत अपनी सामान्य चेतना में आ जाएगा और यह अद्भुत काम-उत्सव वहीं हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।

अपनी इसी मजबूरी और तीव्र लालसा के बीच पिसता हुआ विकास पलंग के किनारे बैठा रहा। वह अपनी आँखों के सामने सोनी की कमर पर सूरज के हाथों की कसती पकड़ और नीचे दोनों अंगों के बीच चलते उस मदहोश कर देने वाले घर्षण को एकटक निहारता रहा, जहाँ काम-रस की बूंदें अब छलक कर बिस्तर को सराबोर कर रही थीं।

आखिरकार यह बीड़ा सोनी ने ही उठाया। अपनी कामुक व्याकुलता और पति की बेबसी को भांपते हुए उसने अपनी घबराहट पर काबू पाया। उसने अपने शरीर के पूरे भार को एक हाथ के सहारे बिस्तर पर टिकाकर खुद को संतुलित (बैलेंस) किया। फिर, अपने दूसरे खाली हाथ को नीचे ले जाकर उसने सूरज के उस प्रचंड, तने हुए और नीली नसों वाले लंड को मजबूती से अपनी उंगलियों में पकड़ लिया।

सूरज का वह विशाल सुपड़ा जो अब तक ज़रूरत से ज़्यादा फूलकर भारी हो चुका था, सोनी ने उसे सधे हुए हाथों से सीधे अपनी रसीली और गर्म बुर (मुनिया) के मुहाने पर टिकाया। विकास अपनी आँखें फाड़े, सांसें रोके इस ऐतिहासिक पल को देख रहा था।

सोनी ने विकास की आँखों में आँखें डालीं और एक गहरा, धीमा दबाव बनाते हुए अपने पूरे शरीर का भार नीचे की तरफ छोड़ दिया। उस कड़े मांस के भारी घर्षण और अपनी तंग गहराइयों के खिंचाव को सहते हुए, उसने सूरज के उस विशाल सुपड़े को आखिरकार अपनी बुर के भीतर समा लिया।

जैसे ही वह चौड़ा अग्रभाग उसकी तंग दीवारों को चीरता हुआ अंदर गया, सोनी के मुंह से एक तीखी और मदहोश कर देने वाली सिसकारी फूट पड़ी। सूरज के शरीर में भी एक तीव्र लहर दौड़ गई। उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे उसने किसी गीली मखमली गहराई को अपने लंड से चीर दिया हो । और पीछे बैठे विकास का रोम-रोम इस साक्षात मिलन को देखकर पूरी तरह कांप उठा। दीये के जैसी दिखने वाली मुनिया अब पूरी तरह गोल होकर बड़ी मुश्किल से उसे अद्भुत लंड को अपने भीतर समाहित किए हुए थी। खेल का सबसे कठिन चरण अब पूरा हो चुका था और सूरज का पौरुष पूरी तरह अपनी मंज़िल पा चुका था।

सोनी जैसे-जैसे अपनी पतली कमर को ऊपर-नीचे हिलाती गई, सूरज का वह मजबूत और प्रचंड पौरुष उसकी बुर (मुनिया) के भीतर और गहराई तक अपना स्थान बनाता गया। सूरज भी अब पूरी तरह से इस आदिम वेग के वशीभूत हो चुका था। भले ही उसकी आँखों पर पट्टी बंधी थी, लेकिन शरीर के इस जादुई स्पर्श ने उसे पूरी तरह बेकाबू कर दिया था। वह भी नीचे से अपनी कमर को ऊपर की तरफ उठा-उठाकर सोनी के झटकों का पूरा साथ दे रहा था, जिससे दोनों का मिलन और अधिक उग्र हो गया था।

उन दोनों के बीच चल रहे इस भीषण और मदहोश कर देने वाले चोदन का वह जीवंत दृश्य सीधे विकास की भूखी आँखों के सामने था। सोनी की पीठ सूरज की तरफ और उसका सीना विकास की ओर होने के कारण, विकास इस वर्जित त्रिकोण के हर एक पल को साक्षात घटते देख रहा था। यह वही दृश्य था जिसके लिए विकास महीनों से तड़प रहा था, और आज अपनी पत्नी को किसी अन्य पुरुष के साथ इस कदर लीन देखकर उसके मन को एक असीम और अकल्पनीय तृप्ति का अहसास हो रहा था।

उधर सोनी की गीली और रसीली बुर में सूरज का वह तना हुआ लिंग पूरी ताकत से आगे-पीछे हो रहा था, जिससे कमरे में एक मदहोश कर देने वाली धीमी आवाज़ गूँज रही थी। इधर पलंग के किनारे बैठा विकास अब अपनी उत्तेजना के अंतिम छोर पर था। वह अपनी हथेलियों की बंद मुट्ठी में अपने लंड को जकड़कर उसे इस महा-मिलन की लय के साथ लगातार भींचने और सहलाने का प्रयास कर रहा था।

विकास से अब यह प्रचंड आनंद और ज़्यादा देर बर्दाश्त नहीं हुआ। उसका पूरा शरीर कांपने लगा। उसने सीधे सोनी की रसीली और कटीली आँखों में आँखें डालीं। सोनी भी अपने पति को एकटक निहार रही थी। उसी चरम क्षण में, विकास ने एक गहरी आह के साथ अपनी मुट्ठी को और कसा और सोनी के सामने ही अपना गाढ़ा वीर्य पूरी तरह से त्याग कर दिया। उसके अंग से छूटे काम-रस के फव्वारे ने उसकी हथेलियों को पूरी तरह से सराबोर कर दिया।

सोनी ने जब अपने पति को इस तरह चरम सुख पाते और अपनी हथेलियों को वीर्य से सनते देखा, तो उसके चेहरे पर एक अद्भुत संतोष और विजय की मुस्कान तैर गई। उसने सूरज के ऊपर लगातार अपनी कमर को थिरकाते हुए ही, अपने भीगे होठों से विकास की तरफ एक बेहद कामुक फ्लाइंग किस (चुंबन) उछाला। सोनी ने अपनी आँखों के सामने इस महा-कामुक मिलन को सफल होते और अपने पति विकास की उस दबी हुई, वर्जित इच्छा को पूरी तरह साकार होते हुए देखा, जिससे उसका मन अंदर तक बेहद खुश और तृप्त हो गया।

अपने पति विकास की तीव्र इच्छा को पूरी तरह तृप्त करने के बाद, अब बारी उस अंतिम और मुख्य आहुति की थी, जिसके लिए सोनी और सूरज दोनों के भीतर की आदिम तड़प अपने चरम पर पहुँच चुकी थी। अनुष्ठान का यह भाग इस पूरी रात का सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक मोड़ था।

सोनी ने एक गहरी साँस ली और सूरज के उस कड़े, मजबूत लिंग से ऊपर की तरफ उठने लगी। जैसे ही वह ऊपर उठी, एक मधुर पक्क…' की रसीली आवाज़ के साथ सूरज का पौरुष उसकी बुर (मुनिया) से अलग हो गया। वह आवाज़ इतनी मादक और गहरी थी, मानो सोनी के बदन के भीतर का सारा भराव अचानक किसी ने बाहर खींच लिया हो। अलग होने की वह अद्भुत और मनमोहक ध्वनि कमरे के सन्नाटे में गूँज उठी। यह सुनकर विकास के चेहरे पर एक गहरी, तृप्त मुस्कान आ गई और सोनी ने भी अपनी पलके झुका कर नीचे देखते हुए अपने पति को एक रहस्यमयी मुस्कान लौटा दी उसे एहसास था कि विकास क्या सोच रहा था।

शेष अगले भाग में

 
अपडेट सेंत तो आल थे रीडर्स who.have ऐथेर कमेंटेड इन डिटेल और सेंत पिक्स
 
भाग 206

सोनी ने एक गहरी साँस ली और सूरज के उस कड़े, मजबूत लिंग से ऊपर की तरफ उठने लगी। जैसे ही वह ऊपर उठी, एक मधुर पक्क…' की रसीली आवाज़ के साथ सूरज का पौरुष उसकी बुर (मुनिया) से अलग हो गया। वह आवाज़ इतनी मादक और गहरी थी, मानो सोनी के बदन के भीतर का सारा भराव अचानक किसी ने बाहर खींच लिया हो। अलग होने की वह अद्भुत और मनमोहक ध्वनि कमरे के सन्नाटे में गूँज उठी। यह सुनकर विकास के चेहरे पर एक गहरी, तृप्त मुस्कान आ गई और सोनी ने भी अपनी पलके झुका कर नीचे देखते हुए अपने पति को एक रहस्यमयी मुस्कान लौटा दी उसे एहसास था कि विकास क्या सोच रहा था।


अब आगे..

कुछ देर से सूरज के लंड पर उछल रही सोनी थक चुकी थी। जैसे ही सूरज के बगल में बिस्तर पर लेटने का प्रयास करने लगी, विकास तुरंत घुटनों के बल सरकता हुआ उसके बिल्कुल पास आ गया। उत्तेजना में पूरी तरह डूबा विकास अपनी सुध-बुध खो चुका था। उसने अपने एक हाथ से सोनी के सुगठित वक्ष (चूची) को सहलाते हुए, अपने दूसरे हाथ को—जो अभी-अभी उसके अपने वीर्य से पूरी तरह सना हुआ था—सोनी की उसी रसीली और खुली हुई मुनिया पर रख दिया।

विकास की वे वीर्य से सनी हुई उंगलियाँ जैसे ही सोनी की बुर के गीले मुहाने को छूते हुए भीतर प्रवेश करने लगीं, सोनी के पूरे शरीर में एक करंट सा दौड़ गया। विकास की वीर्य से सनी उंगलियाँ जब सोनी की मुनिया (बुर) की गहराइयों में समाईं, तो वह भीतर तक सिहर उठी।

हे भगवान पूर्णाहुति के पहले विकास का वीर्य उसकी मुनिया में आ चुका था।

इस एहसास की आते ही, सोनी ने तुरंत विकास का वह हाथ अपनी उंगलियों से मज़बूती से पकड़ लिया पर तब तक देर हो चुकी थी। उसने लेटे-लेटे ही सीधे विकास की आँखों में आँखें डालीं, उसकी आँखों में एक अजीब सी संजीदगी और मर्यादा की लकीर थी जैसे वह इस आहुति की पवित्रता को बरकरार रखना चाहती हो।

सोनी ने अपनी उंगलियों से इशारा करते हुए विकास को मौन संदेश दिया, "अब आप जाकर बैठ जाइए..."

सोनी का यह अंदाज विकास को उसकी तय की गई सीमा का अहसास करा गया। वह समझ गया कि सूरज के द्वारा दी जाने वाली मुख्य आहुति से पहले उसका इस तरह सीधे शामिल होना खतरे से खाली नहीं था।


विकास पलंग के किनारे अपनी जगह पर वापस जाकर बैठ गया, जहाँ से अब सूरज और सोनी के बीच अंतिम मिलन की शुरुआत होने वाली थी।

विकास पलंग के किनारे बैठा इस नए और अप्रत्याशित बदलाव को पूरी तरह स्तब्ध होकर देख रहा था। कमरे की मद्धम रोशनी में मर्यादा की सारी सीमाएं पहले ही धुंधली हो चुकी थीं, और अब यह कहानी एक और भी अधिक उग्र और आदिम मोड़ ले रही थी।

सूरज की आँखों पर मखमली पट्टी बंधी हुई थी, जिसके कारण वह बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटकर केवल स्पर्श के जादुई और मादक संसार में जी रहा था। उसने अपने हाथों से टटोलते हुए बिस्तर पर लेटी सोनी की स्थिति का अंदाज़ा लगाया। सोनी इस समय थकान से शिथिल होकर शांत लेटी हुई थी और अपनी तेज चल रही सांसों को सामान्य करने की कोशिश कर रही थी, लेकिन सूरज के भीतर का पुरुषत्व इस समय किसी थमे हुए तूफान की तरह उग्र और उन्मादी हो चुका था। वह केवल अपने भीतर सुलगती काम-अग्नि की पूर्णाहुति चाहता था।

उसने अपने मजबूत हाथों से सोनी के नितंबों को थपथपाते हुए उसे पलटने का मूक इशारा किया। सोनी, जो इस अनुष्ठान के नियमों और अपने पति की गुप्त इच्छा की पूर्ति के लिए पूरी तरह समर्पित थी, एक सच्ची दासी की भांति उसके इस आदेश के आगे नतमस्तक हो गई। सूरज ने उसे बिस्तर पर किसी मिट्टी की मूरत की भांति अपनी सुविधानुसार ढाला और मोड़ा। सोनी बिना किसी प्रतिरोध के, उस प्रचंड पौरुष की अंतिम मार को सहने के लिए घुटनों और हथेलियों के बल आते हुए 'डॉगी स्टाइल' की मुद्रा में आ गई।

कमरे के भीतर जहाँ आदिम और अलौकिक मिलन अपनी आखिरी सीमाएं लांघने को तैयार था, वहीं इस पूरी कहानी का दूसरा छोर एक बेहद अद्भुत और जादुई संयोग रच रहा था। इस समय दूरियों की सारी सीमाएं जैसे इस अनोखे अनुष्ठान के सामने घुटने टेक चुकी थीं।

एक तरफ जहाँ यह चरम और उग्र समागम नैनीताल की ठंडी और धुंधली वादियों के एक बंद कमरे में पूरी शिद्दत के साथ घट रहा था, वहीं दूसरी तरफ इस पूरी कहानी का केंद्र बिंदु यानी सूरज की माँ और सोनी की बड़ी बहन, सुगना, इस समय बनारस में बैठी हुई थी। बनारस की ठंडी हवाओं और सांस्कृतिक माहौल के बीच, सुगना वहाँ संतान सप्तमी के व्रत और अपनी विशेष साधना में पूरी तरह लीन थी। आस-पास सुलगती धूप और कपूर की महक के बीच वह अपनी आँखें बंद किए पूरी तरह ध्यानमग्न थी।

बनारस की इस अगाध ध्यान गहराई में सुगना का मन अब केवल विचारों तक सीमित नहीं था, बल्कि उसकी कल्पनाओं में नैनीताल के उस बंद कमरे का पूरा दृश्य जीवंत होकर उभरने लगा था। उसे अपनी छोटी बहन सोनी का वह सुंदर, सुगठित और अनावृत बदन साफ़ दिखाई देने लगा, जो इस समय पूरी तरह से कामुक तरंगों में डूबा हुआ था। सुगना को अपनी कल्पना में सोनी एक विशेष मुद्रा में, घुटनों और हथेलियों के बल आकर पूरी तरह मिलन के तैयार दिखाई देने लगी।

उसकी बंद आँखों के पीछे और दिमाग की गहराइयों में सोनी को लेकर की गई वह अनूठी सिफारिशें और उसके जीवन को संतान सुख से भरने की वो अनोखी सुपारी (संकल्प) बार-बार घूम रही थी, जिसे उसने पूरे विधि-विधान से सोनी को दिया था। सुगना अपनी इस अंतर्दृष्टि में देख रही थी कि सोनी इस समय पूरी तरह से संभोग-रत है, और कोई पौरुष अपनी पूरी ताकत और वेग के साथ उसकी मुनिया को चोद रहा है। शुरुआत में सुगना के मन ने यही माना कि सोनी के साथ इस महा-मिलन को पूर्ण करने वाला उसका पति विकास ही है, जो पूर्णाहुति देने जा रहा है।

परंतु, जैसे-जैसे वह ध्यान की और गहरी परतों में उतरती गई, न जाने क्यों उसका अवचेतन मन इस स्थापित सत्य को स्वीकार करने से इनकार करने लगा। कल्पना की उस मद्धम रोशनी में, सोनी के पीछे खड़े उस पुरुष की आकृति धीरे-धीरे बदलने लगी। सुगना को वहाँ विकास का सामान्य रूप दिखाई देना बंद हो गया; उसकी जगह उसके अवचेतन ने किसी विशाल, गठीले और चौड़े सीने वाले एक 'दिव्य पुरुषोत्तम' की परिकल्पना करनी शुरू कर दी।

यह ठीक उस पूर्णाहुति के पहले का क्षण था, जब उस रहस्यमयी पुरुष का पौरुष अपने चरम उन्माद पर था। जब सोनी उस स्थिति में तैयार खड़ी थी, तब पीछे खड़ा वह दिव्य पुरुषोत्तम अपनी मजबूत कमर को थोड़ा पीछे खींचकर उस रसीली मुनिया के मुहाने पर अपने लोहे जैसे सख़्त लिंग से अंतिम और सबसे भीषण प्रहार करने ही वाला था। उस पुरुष की देह से निकलती आदिम ऊर्जा को महसूस कर बनारस में बैठी सुगना का पूरा शरीर एक अजीब सी सिहरन से कांप उठा।

सुगना की वह मनोकामना, जो अब पूरे परिवार की सबसे बड़ी इच्छा बन चुकी थी, उसे वह दिव्य पुरुष अपने इसी प्रचंड वेग के दम पर सोनी के गर्भ में सीधे स्थापित करने के लिए पूरी तरह से तैयार था।

पलंग के कोने पर बैठा विकास जब नैनीताल के उस कमरे में अपनी पत्नी सोनी की आँखों में आँखें डाले इस उग्र स्थिति को देख रहा था, और दूसरी तरफ उसे दूर बनारस में बैठी सुगना की मानसिक तरंगों और उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति का अहसास हो रहा था, तो उसका पूरा अस्तित्व इस अद्भुत और अनोखे संयोग को देखकर सिहर उठा।

सुगना इस बात का रत्ती भर भी आभास नहीं था कि उसका अवचेतन मन जिसे 'दिव्य पुरुषोत्तम' मानकर पूज रहा था, वह कोई बाहरी शक्ति नहीं, बल्कि उसी का अपना जवान बेटा सूरज था। यह खेल इतना गहरा और अनोखा था कि जहाँ बनारस में बैठी सगी बहन का अटूट संकल्प और नैनीताल में उमड़ता आदिम पौरुष एक साथ मिलकर सोनी के आँचल को खुशियों से भरने की इस अंतिम आहुति को अंजाम देने जा रहे थे।

सोनी के डॉगी स्टाइल में आने के बाद कमरे का पूरा भूगोल विकास के लिए और अधिक उत्तेजक हो गया। सोनी के सुगठित, गोरे नितंब अब पूरी तरह से उभरे हुए विकास की नज़रों के ठीक सामने थे।

विकास आज पहली बार अपनी पत्नी के इस मादक स्वरूप को दूर देख रहा था। कितनी सुंदर और कितनी कामुक थी सोनी। विकास को अपनी बीवी पर गर्व हो रहा था। सूरज ने आगे बढ़कर सोनी की कमर के दोनों सुंदर लव हैंडल्स को अपनी उंगलियों के गहरे कसाव में ले लिया और खुद को उसके ठीक पीछे व्यवस्थित करते हुए अपनी पोजीशन बनाई। वह अपने उस लोहे जैसे कड़े, चमकीले और भारी लंड को पीछे से सोनी की उस काम-रस से सराबोर रसीली मुनिया (योनि) के मुहाने पर रखकर धीरे-धीरे रगड़ने लगा। बीच-बीच में वह अपने हाथ बढ़ाकर सोने की झूलती हुई चुचियों का मुआयना करता कभी उसके कंधे सहलाता..


कोने में बैठा विकास जब अपनी पत्नी के बदन का यह सबसे उन्मुक्त और आदिम रूप देख रहा था, तो उसकी आँखें विस्मय और तीव्र कामुकता से पूरी तरह भर उठीं। वह कुछ ही देर पहले अपना वीर्य त्याग कर पूरी तरह खाली और शिथिल हो चुका था, लेकिन उसकी आँखों के ठीक सामने घटता यह उग्र दृश्य उसके शांत पड़ चुके शरीर में फिर से उत्तेजना का एक नया सैलाब भरने में पूरी तरह कामयाब रहा। यद्यपि उसका अपना छोटा अंग इस समय दोबारा पूरी तरह खड़ा होने की स्थिति में नहीं था, फिर भी उसके भीतर की मानसिक तड़प अपनी आखिरी सीमा पर थी।

उसकी फटी हुई आँखें बिना पलक झपकाए सोनी के उन थिरकते नितंबों और उनके ठीक बीच में लगातार दस्तक दे रहे सूरज के उस विशाल, कड़े और नीली नसों वाले मजबूत लंड पर टिकी हुई थीं।

सूरज के मजबूत पौरुष का वह कड़ा घर्षण जैसे ही सोनी की मुनिया के भीगे मुहाने पर बढ़ने लगा, सोनी के पूरे बदन में एक तीव्र थरथराहट दौड़ गई। पीछे से पड़ते उस कड़े मांस के दबाव को महसूस करते हुए उसने अपने दोनों हाथों को बिस्तर पर और आगे फैलाकर चादर को कसकर पकड़ लिया। सूरज अपनी आँखों पर बंधी पट्टी के अंधेरे में पूरी तरह से बेकाबू हो चुका था; उसके लिए सोनी के इन सुंदर लव हैंडल्स का स्पर्श ही इस समय उसकी उत्तेजना का सबसे बड़ा केंद्र था।

उसने अपनी कमर को थोड़ा और पीछे खींचा और फिर पूरे उन्माद के साथ एक ज़ोरदार धक्का आगे की तरफ मारा। सूरज का वह मोटा, चमकीला और नीली नसों वाला लंड एक ही झटके में सोनी की उस तंग और रसीली बुर को चीरता हुआ आधा समा गया। इस अचानक और तीव्र प्रहार से सोनी के मुंह से एक तीखी, दबी हुई आह निकल गई, जिसे उसने अपने दांतों के बीच भींच लिया। उसकी मुनिया के मखमली होंठ सूरज के उस विशाल आकार को अपने भीतर समाहित करने के लिए पूरी तरह गोल होकर तन गए।

सोनी के मुख से वो कामुक वाक्यांश निकलते निकलते रह गये….सूरज आह तनी धीरे से …दुखाता…

सोनी द्वारा बनाया गया मौन व्रत का नियम अब उसे ही भारी पड़ रहा था। वह चाह कर भी सूरज को अपनी व्यथा बताने में नाकाम थी।

अब सूरज बिना किसी रुकावट के, हर झटके के साथ और अंदर प्रवेश करता गया। जिस सोनी को आने वाले समय में इसी खूबसूरत योनि से बच्चे को जन्म देना था आज ऐसा लग रहा था सूरज उसकी परीक्षा ले रहा था।कुछ ही देर में वो सोनी को बेतहाशा चोदने लगा। डॉगी स्टाइल की इस पोजीशन में हर झटका सोनी की गहराइयों को सीधे और गहराई से मथ रहा था। कमरे में मांस से मांस के टकराने की वह रसीली और थप-थप की आवाज़ अब और तेज़ हो चुकी थी। सूरज ने सोनी की कमर पर अपनी उंगलियों का कसाव और बढ़ा दिया, जिससे उसके गोरे बदन पर उंगलियों के निशान और गहरे होने लगे।

पलंग के कोने पर बैठा विकास अपनी फटी आँखों से अपनी पत्नी के नितंबों के बीच चलते इस उग्र और साक्षात समागम को एकटक निहार रहा था। यद्यपि उसका अपना अंग इस समय पूरी तरह शांत था, लेकिन मानसिक रूप से वह उत्तेजना के उस चरम बिंदु पर था जहाँ उसकी सांसें उखड़ने लगी थीं। सोनी भी इस भीषण युद्ध को सहते हुए बीच-बीच में अपनी तिरछी नज़रों से पलंग के किनारे बैठे विकास को देख लेती, जिससे विकास के भीतर की कामुकता मर्यादा की आखिरी दीवार को भी लांघने के लिए मचल उठती।

कमरे के भीतर बढ़ता हुआ वह आदिम वेग अब अपनी चरम सीमा पर था। पीछे से पड़ते सूरज के उन प्रचंड और अनियंत्रित धक्कों के कारण, सोनी का पूरा शरीर हर प्रहार के साथ कांप उठता था। पलंग के किनारे बैठा विकास जब सोनी के चेहरे की तरफ देखता, तो उसे वहाँ सुख के साथ-साथ एक गहरी कामुक वेदना (पीड़ा) साफ़ दिखाई पड़ती। सूरज की उंगलियों का वह लव हैंडल्स पर कसता हुआ दबाव और नीचे से होने वाला वह अंधाधुंध प्रहार सोनी के बर्दाश्त की आखिरी हद को आज़मा रहा था।

अपनी पत्नी के चेहरे पर उस तीखे खिंचाव और कामुक कशमकश को देखकर विकास के भीतर अचानक एक अजीब सी तड़प और छटपटाहट होने लगी। एक पति होने के नाते उसका रक्षक भाव जाग उठा और वह मन ही मन बुरी तरह कशमकश में फंस गया। उसके दिमाग में बार-बार यह विचार आने लगा कि क्या वह तुरंत अपनी जगह से उठे, पलंग पर आगे बढ़े और सूरज को सीधे जाकर रोक दे? उसके मन में आया कि वह सूरज को सोनी के साथ इस तरह की निर्दयता और उग्रता से व्यवहार करने से मना करे, और उसे समझाए कि वह इस संभोग के कृत्य को कोमलता और प्यार से अंजाम दे।

परंतु, इस विचार के आते ही विकास के मन में कई अजीब-अजीब और परस्पर विरोधी भाव एक साथ उमड़ने लगे। एक तरफ जहाँ अपनी पत्नी के लिए उसके दिल में दर्द उठ रहा था, वहीं दूसरी तरफ इस वर्जित और प्रचंड दृश्य की उग्रता उसके भीतर की सोई हुई कामुकता को एक ऐसे चरम स्तर पर मथ रही थी जैसा उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था। वह समझ नहीं पा रहा था कि वह इस दृश्य को देखकर डर रहा है, या सोनी के प्रति गहरी सहानुभूति महसूस कर रहा है, या फिर इस आदिम और अकल्पनीय स्वरूप को साक्षात घटते देख उसका मानसिक रोमांच और अधिक बेकाबू होता जा रहा है।

वह इसी अजीबोगरीब कशमकश और भावनाओं के बवंडर में पिसता हुआ, अपनी साँसें रोके पलंग के कोने पर जड़वत बैठा रहा, जहाँ मर्यादा और आदिम वेग के बीच का यह मानसिक युद्ध अब उसके धैर्य की अंतिम परीक्षा ले रहा था।

कमरे के भीतर घट रहा वह दृश्य विकास के लिए किसी ऐसी काल्पनिक दुनिया जैसा था, जिसकी थाह पाना आसान नहीं थl। पलंग के कोने पर जड़वत बैठा विकास अपनी फटी आँखों से उस महा-मिलन के एक-एक क्षण को अपने भीतर सोख रहा था। उसने अपने जीवन में कई तरह की कल्पनाएँ की थीं, यहाँ तक कि आधुनिक युग की तमाम ब्लू फिल्मों (वयस्क फिल्मों) में भी उसने कामुकता के कई रूप देखे थे, लेकिन जो साक्षात और जीवंत सत्य आज उसकी आँखों के सामने घट रहा था, वह उन सभी कृत्रिम दृश्यों से कोसों आगे और पूरी तरह अविश्वनीय था।

अपनी खुद की सुंदर और रूपवान पत्नी सोनी को, अपने ही जवान और गठीले भांजे सूरज के द्वारा इस तरह आदिम और उग्र तरीके से मर्दित होते देखना विकास की बंद और गुप्त तमन्नाओं के दायरे में भी कभी इस क्रूरता और स्पष्टता के साथ नहीं आया था। सूरज का वह प्रचंड पौरुष जब-जब पीछे से सोनी की गहराइयों पर प्रहार करता, तो विकास के दिमाग की नसें उत्तेजना के मारे फटने को हो जातीं। वह इस बात से पूरी तरह विस्मित था कि मर्यादा का हर एक बंधन, जो समाज और लोक-लाज ने तय किया था, वह इस मद्धम रोशनी वाले कमरे में सुलगते हुए इत्र और साँसों की गर्माहट के बीच पिघलकर पूरी तरह बह चुका था।

आज वह जो कुछ भी देख रहा था, वह उसके जीवन का सबसे अनोखा, वर्जित और विस्मयकारी अनुभव था। एक तरफ सोनी के चेहरे पर उभरती वह तीखी कामुक वेदना और दूसरी तरफ सूरज का वह निष्ठुर और उन्मादी वेग—इन दोनों के बीच पिसती हुई उसकी अपनी पत्नी का यह आत्मसमर्पण विकास के भीतर के पुरुष को एक अजीब सी मानसिक तृप्ति और सिहरन से भर रहा था, जहाँ से वापसी का अब कोई रास्ता नहीं बचा था।

पीछे से पड़ रहे सूरज के उस प्रचंड और निरंतर प्रहारों का ही यह असर था कि आखिरकार सोनी इस चरम सुख (स्खलन) के मुकाम पर पहुँच गई। उसकी मुनिया (योनि) भीतर से पूरी तरह सक्रिय हो उठी और उसमें से प्रेम-रस की मूसलाधार बारिश होने लगी। काम-रस के इस तीव्र बहाव के साथ ही उसकी मखमली दीवारें एक अद्भुत लय में संकुचित होने और फूलने लगीं। यह अहसास ऐसा था मानो सोनी की बुर के भीतर की अनगिनत कोमल उंगलियां सूरज के उस कड़े लंड को एक साथ पकड़ रही हों और फिर छोड़ रही हों।

सोनी के बदन में उठती इस तीव्र कँपकँपी और दीवारों के इस जादुई खिंचाव से सूरज ने तुरंत महसूस कर लिया कि उसकी मौसी अब पूरी तरह से स्खलित (तृप्त) हो रही है। सूरज का अपना पौरुष यद्यपि अभी पूरी तरह शांत होने के लिए तैयार नहीं था, लेकिन वह शरीर से बेहद सुगठित और संयमी था। इस चरम क्षण के दौरान उसने अपनी कामुक उत्तेजना और अपने आवेग को बहुत ही सधे हुए अंदाज़ में नियंत्रित किया।

उसने अपने धक्कों की हिंसक गति को तुरंत रोक दिया और सोनी की थकी हुई कमर और नितंबों को अपनी हथेलियों से धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया। उसने बेहद प्यार और आत्मीयता के साथ सोनी को इस परम सुख के अहसास में पूरी तरह डूब जाने और शांत हो जाने का समय दिया।

सोनी इस अकल्पनीय और गहरे सुख से पूरी तरह तृप्त होकर निढाल हो गई। उसका शरीर अब और अधिक भार उठाने की स्थिति में नहीं था, इसलिए वह घुटनों के बल से सरकती हुई सीधे पेट के बल बिस्तर पर गिर पड़ी। वह पूरी तरह बेसुध और शांत हो चुकी थी। जैसे ही उसका बदन बिस्तर पर लुढ़क गया और, एक रसीली सरकन के साथ सूरज का वह कड़ा लंड उसकी मुनिया की गहराइयों से बाहर आ गया, और इस महा-युद्ध का यह प्रथम अध्याय इस सोनी की सुखद तृप्ति के साथ संपन्न हुआ।

पलंग के कोने पर बैठा विकास अपनी पत्नी के चेहरे पर आए उस परम संतोष को देखकर गहरे विस्मय और एक अजीब सी तृप्ति से भर उठा।

सूरज, सोनी के ठीक बगल में बिस्तर पर सीधा लेट गया और उसने बेहद प्यार और आत्मीयता से सोनी के उस निढाल शरीर को अपने मजबूत आलिंगन (बाहों) में भर लिया। उसने सोनी को इस कदर पास खींचा कि उसकी दोनों सुगठित चूचियां (वक्ष) सूरज के चौड़े सीने से पूरी तरह सट गईं। इस गहरे स्पर्श के बीच, सूरज अपने भीतर उमड़ते प्रेम को कोमलता से व्यक्त करने लगा।

उसकी उंगलियां कभी सोनी की नाजुक गर्दन को सहलातीं, तो कभी उसकी पूरी पीठ पर मखमली अंदाज़ में रेंगने लगतीं, जिससे सोनी के बदन की बची-खुची थकान भी सुकून में बदलने लगी। बीच-बीच में वह प्यार के अतिरेक में सोनी के सुगठित नितंबों को अपनी हथेलियों में पकड़कर उसे अपनी तरफ और कसकर खींच लेता। वह अपने चेहरे को आगे बढ़ाता और सोनी के गोरे गालों से अपने गाल सटाकर उस शांत माहौल में अपनी धड़कनों को एक कर देता।

मर्यादा और आदिम वेग का यह खूबसूरत और शांत छोर अब पूरी तरह से थमा हुआ था। पलंग के कोने पर बैठा विकास अपनी ही पत्नी को, अपने ही सगे भांजे की बाहों में इस तरह पूरी तरह सुरक्षित और प्यार से पिघलते हुए देख रहा था। सोनी का वह निश्छल आत्मसमर्पण और सूरज का यह दुलार विकास की आँखों के सामने एक ऐसा दृश्य रच रहा था, जिसने उसके मन के भीतर के सारे अंतर्विरोधों को शांत कर उसे एक असीम, मूक और अनोखी तृप्ति से सराबोर कर दिया था।

सूरज के उस गहरे और निश्चल दुलार ने सोनी के भीतर बची-खुची झिझक को भी पूरी तरह से मिटा दिया था। अपनी रीढ़ में दौड़ती उस मीठी सिहरन के बीच, सोनी ने भी सूरज के चेहरे को अपनी हथेलियों में भर लिया। उसने आगे बढ़कर सूरज के भीगे होठों पर अपने होंठ रख दिए और उसे पूरी दीवानगी से चूमने लगी। बंद कमरे के सन्नाटे में दोनों की साँसों की गर्माहट और चुंबन की मदहोश कर देने वाली आवाज़ें गूँजने लगीं।

इस गहरे चुंबन के दौरान ही, सोनी ने अपने बदन में एक नई ऊर्जा महसूस की। उसने अपनी एक गोरी, सुगठित और पूरी तरह से नंगी जांघ को उठाकर सूरज के भारी शरीर के ऊपर रख दिया। उसकी मखमली त्वचा का वह सीधा स्पर्श सूरज के पेट और जाँघों के हिस्से पर थिरकने लगा।

सोनी का यह अंदाज़ इतना नैसर्गिक और प्यार से भरा था कि सूरज ने भी उसके इस अधिकार को सहर्ष स्वीकार किया। वह नीचे लेटा हुआ सोनी की उस भारी और गर्म जाँघ को सहलाने लगा, जिससे दोनों के शरीर एक-दूसरे में और गहराई से गुंथ गए।

सोनी अब पूरी तरह से सूरज के उस निश्छल और प्रगाढ़ प्रेम के वशीभूत हो चुकी थी। सूरज की बाहों का वह मखमली घेरा, उसके सीने की गर्माहट और होठों पर टिका वह गहरा चुंबन सोनी को किसी दूसरी ही दुनिया में ले गया था। उस जादुई और आदिम वातावरण में सुलगते इत्र और साँसों की थिरकन के बीच, सोनी के मन से लोक-लाज और झिझक की आखिरी परत भी पूरी तरह उतर चुकी थी।

वह सूरज के इस असीम समर्पण और प्यार में इस कदर लीन और मदहोश हो गई कि कुछ पलों के लिए उसके दिमाग से यह बात पूरी तरह विस्मृत हो गई कि पलंग के ठीक किनारे उसका अपना पति विकास बैठा है। वह भूल गई कि विकास अपनी खुली और भूखी आँखों से उसके इस बेहद निजी, वर्जित और गहरे प्रेम-कृत्य को एकटक निहार रहा है।

इस समय सोनी के लिए उस बंद कमरे में सूरज के स्पर्श और उसकी धड़कनों के अलावा कोई दूसरा अस्तित्व मायने नहीं रख रहा था। उसने अपनी नंगी जांघ को सूरज के ऊपर और अधिक कस दिया, मानो वह खुद को पूरी तरह से सूरज के भीतर ही विलीन कर देना चाहती हो।

उधर पलंग के कोने पर बैठा विकास अपनी पत्नी के चेहरे पर आए इस चरम उन्माद और विस्मृति के भाव को साक्षात देख रहा था। सोनी का इस तरह किसी अन्य पुरुष के प्यार में पूरी तरह डूब जाना और उसे खुद की उपस्थिति तक का अहसास न रहना, विकास के भीतर छिपी उस अजीब, गुप्त और वर्जित संतुष्टि को उसके अंतिम शिखर पर पहुँचा रहा था। वह बिना हिले-डुले, अपनी साँसें रोके इस अद्भुत और अनोखे त्रिकोण के अंतिम मुकाम की ओर बढ़ने का मूक गवाह बना रहा।

सोनी और सूरज न सिर्फ शरीर से अपितु पूरे तन मन से एक दूसरे में विलीन हो चुके थे विकास अब स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहा था।

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व्रिठे समथिंग और सेंड पिक्स

शामे कमैंट्स जबरदस्त

शो तहत यू अरे रेफुसिंगे माय रिक्वेस्ट.
 
भाग 207

उधर पलंग के कोने पर बैठा विकास अपनी पत्नी के चेहरे पर आए इस चरम उन्माद और विस्मृति के भाव को साक्षात देख रहा था। सोनी का इस तरह किसी अन्य पुरुष के प्यार में पूरी तरह डूब जाना और उसे खुद की उपस्थिति तक का अहसास न रहना, विकास के भीतर छिपी उस अजीब, गुप्त और वर्जित संतुष्टि को उसके अंतिम शिखर पर पहुँचा रहा था। वह बिना हिले-डुले, अपनी साँसें रोके इस अद्भुत और अनोखे त्रिकोण के अंतिम मुकाम की ओर बढ़ने का मूक गवाह बना रहा।

सोनी और सूरज न सिर्फ शरीर से अपितु पूरे तन मन से एक दूसरे में विलीन हो चुके थे विकास अब स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहा था।

अब आगे..

इधर नैनीताल के उस शांत और एकांत कमरे में, सोनी उस तीव्र कामुक मिलन से चरम सुख को प्राप्त कर सूरज की मजबूत बाहों में सिमटी हुई थी। कुछ पल पहले तक जो बदन एक उग्र सैलाब की तरह थिरक रहा था, वह अब सोनी को अपने सीने से सटाकर धीरे-धीरे उसकी साँसों की रफ्तार को सामान्य कर रहा था। सोनी को पता था उसने अपना चरम सुख तो ले लिया है पर अभी उसके गर्भ में बहु प्रतीक्षित वीर्य आहुति बाकी थी। अभी उसे एक बार फिर इस आवेग को अपने कोमल बदन से झेलना था। दोनों एक-दूसरे के आगोश में खामोश लेटे हुए थे और सूरज का लंड अब भी वैसे ही तना हुआ था और सोनी की पेडू और नाभि पर सटा अपनी उपस्थिति का एहसास सोनी को दिला रहा था।

उधर दूसरी तरफ, बनारस की हवेली में सुगना की संतान सप्तमी की विशेष पूजा संपन्न हो चुकी थी। हाथ में जलता हुआ दीया और आरती की थाली लिए वह पूरे घर में उसका धुआँ देने निकली। इसी क्रम में वह मालती और रीमा के कमरे की तरफ पहुँची, लेकिन वहाँ अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। कमरे को खाली देख उसने पीछे की तरफ मुंह करके लाली से पूछा, "अरे लाली! ये दोनों कहाँ गईं? कमरे में कोई नहीं है।"

लाली ने रसोई से ही तेज आवाज में जवाब दिया, " वो दोनों अभी-अभी किसी काम से बाजार की तरफ निकली हैं।"

लाली का जवाब सुनकर सुगना जैसे ही मुड़ने वाली थी, तभी उसकी पारखी नजरें कमरे के कोने में रखी मालती की अलमारी पर जा टिकीं। अलमारी का एक पल्ला हल्का सा खुला हुआ था, जहाँ से कपड़ों की परतों के बीच दबा एक बेहद चमकीला, लाल रंग का कपड़ा बाहर की तरफ झलक रहा था। सुगना चाहकर भी अपने कौतूहल को नहीं रोक पाई। उस दिन सोनी के कमरे में जो दृश्य उसने देखा था, की वजह से मालती को लेकर उसके मन में पहले ही कई सवाल थे। वह दबे कदमों से अलमारी के पास पहुँची और जैसे ही उसने उस लाल कपड़े को खींचकर बाहर निकालना लिया। वो एक बेहद खूबसूरत, लगभग पारदर्शी और आधुनिक डिज़ाइन की ब्रा थी।

यह देखकर सुगना के दिल की धड़कन बढ़ गई। उसने तुरंत आरती की थाली को पास के एक छोटे स्टूल पर टिकाया और उस अद्भुत और कामुक अंतःवस्त्र को अपने हाथों से महसूस करने लगी। उस महीन, रेशमी कपड़े को अपनी उंगलियों से छूते ही सुगना के हाथों में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई। उसने अपनी आँखों से जिस मालती को राजू के प्रचंड वेग के सामने पूरी तरह समर्पित और बेसुध होते देखा था, उस रात के दृश्य की कल्पना सुगना के दिमाग में फिर से ताजा हो गई। मालती की सुगठित और उभरी हुई चुचियो का का मादक आकार, जिसे उस दिन राजू अपने मजबूत हाथों की गिरफ्त में बुरी तरह मथ रहा था, उसे इस छोटे से कपड़े के नाप से जोड़कर सुगना ने महसूस कर लिया कि उसकी बेटी अब मर्यादाओं की दहलीज पार कर कामुकता की अगाध दुनिया में पूरी तरह उतर चुकी है।

उसका मन अब और ज्यादा जानने के लिए बेचैन हो उठा। सुगना ने अलमारी के अन्य खानों और कपड़ों के अलग-अलग भागों को बहुत बारीकी से टटोलना शुरू किया। कपड़ों की परतों को हटाते ही आखिरकार उसकी आँखों के सामने मालती की ब्रा और पैंटी का वह अद्भुत, कामुक और कीमती कलेक्शन आ गया, जिसे देखकर सुगना दंग रह गई। ये कोई साधारण कपड़े नहीं थे; यह वही बेशकीमती और उत्तेजक अंतःवस्त्रों का जखीरा था, जिसे राजू ने मालती की अनमोल छुअन और उसके पूर्ण समर्पण के बदले उसे बेहद प्यार और चाहत से गिफ्ट किया था। अलमारी में छिपा यह राज अब सुगना के सामने पूरी तरह बेपर्दा हो चुका था।

हवेली के उस एकांत कमरे में सुगना मालती के उन आधुनिक और उत्तेजक अंतःवस्त्रों को एक-एक करके अलमारी से निकाल रही थी। उसके हाथों में वे महीन रेशमी कपड़े थे, जिन्हें देखकर उसका मन गहरे अचरज और सोच में डूब गया। वह मन ही मन बुदबुदाई, "हे भगवान! इस उम्र में इतनी कामुकता... आज के युवा न जाने कहाँ जा रहे हैं! यह लड़की अभी कुछ समय पहले तक तो हर बात पर 'मम्मा-मम्मा' करते हुए मेरे पीछे घूमती थी, अचानक यह कब इतनी बड़ी हो गई और कब मर्यादा की दीवारें लांघ गई, मुझे पता ही नहीं चला।"

मालती के इस बदले हुए रूप ने सुगना को भीतर तक झझकोर दिया था। उसे वह खूबसूरत पेंटी भी दिखाई पड़ गई जिससे राजू ने मालती के बदन से अपने हाथों से उतरा था।उस पारदर्शी ब्रा और पैंटी को अपने हाथों में थामा और उस कोमल कपड़े को अपनी उंगलियों से छूकर महसूस करने लगी। उस महीन वस्त्र के नाप और उसकी बनावट को देखते हुए सुगना के दिमाग में मालती के सुगठित बदन और उसकी उभरती तरुणाई की पूरी कल्पना जीवंत हो उठी। वह सोचने पर मजबूर हो गई कि उसकी सीधी-सादी दिखने वाली बेटी अब इस कामुक दुनिया में कितनी गहराई तक उतर चुकी है।

सुगना याद कर रही थी कि कैसे सोनी के कमरे के उस बिस्तर पर मालती पूरी तरह बेसुध और अनावृत होकर 'घोड़ी' बनी हुई थी, और राजू अपने पूरे प्रचंड पौरुष और बेकाबू उन्माद के साथ उसके ठीक पीछे खड़ा था। राजू के मजबूत हाथों की गिरफ्त में मालती के बदन का एक-एक हिस्सा मथ रहा था और वह पूरी तरह उसके वेग के सामने समर्पित थी।

अलमारी के सामने खड़ी सुगना के हाथों में मालती के वे उत्तेजक अंतःवस्त्र थे, लेकिन उसकी बंद आँखों के सामने वही बिस्तर पर चलता संभोग का दृश्य बार-बार घूम रहा था। इस अकाट्य सबूत ने सुगना के मन में यह साफ कर दिया कि राजू और मालती के बीच का यह गुप्त और कामुक रिश्ता अब किसी भी मर्यादा के नियंत्रण में नहीं रहा था।

अलमारी के उन कामुक अंतःवस्त्रों को थामे सुगना के भीतर सिर्फ गुस्सा या अचरज ही नहीं था, बल्कि एक अजीब सी, अनकही कशिश भी धीरे-धीरे सिर उठाने लगी थी। मालती और राजू के उस नग्न और उग्र समागम के दृश्य ने सुगना के अंतर्मन के उन कोनों को छू लिया था, जो बरसों से शांत और सुप्त पड़े थे।

इस कशिश और बेचैनी के पीछे शायद कई वजहें थीं। एक तो यह कि वह खुद पिछले कई वर्षों से संभोग के उस सुख और शारीरिक गर्माहट से पूरी तरह दूर थी, जिससे उसका बदन अंदर ही अंदर एक खामोश प्यास से जूझ रहा था। दूसरी और सबसे गहरी वजह थी उसकी अपनी दबी हुई यादें। अतीत में जिस तरह वह अपने भाई सोनू के साथ अंतरंग हुई थी, मर्यादाओं को भुलाकर उन दोनों ने जो पल जिए थे, उसकी यादें सुगना के जेहन में आज भी कहीं दफन थीं सोनू की याद आते ही सुगना का मालपुआ पसीजने लगा।

तभी अचानक पीछे से दबे कदमों से लाली कमरे के भीतर दाखिल हुई। रसोई का काम निपटाकर वह सुगना को ही ढूंढते हुए वहाँ आई थी। जैसे ही लाली की नजर अलमारी के सामने खड़ी सुगना की उंगलियों में फंसी उस खूबसूरत पैंटी पर गई, वह ठिठक गई।

सुगना के हाथों में मालती का वह अत्यंत निजी और उत्तेजक अंतःवस्त्र था, और सुगना के चेहरे पर फैला वह अजीब सा भाव—जिसमें अचरज, कशिश और एक दबी हुई तड़प साफ झलक रही थी—लाली की तेज नजरों से छुप नहीं सका। लाली ने अपनी आँखों से सुगना को उस हालत में, उस कीमती गुलाबी कपड़े को सहलाते और विचारों में खोए हुए रंगे हाथों देख लिया था।

कमरे में अचानक एक भारी सन्नाटा छा गया। सुगना को जैसे ही पीछे किसी की मौजूदगी का अहसास हुआ, उसकी तंद्रा टूटी। उसने घबराकर पीछे मुड़कर देखा तो सामने लाली खड़ी थी, जिसकी आँखों में इस नजारे को देखकर एक गहरा अचरज और कई अनकहे सवाल तैर रहे थे।

लाली की अचानक मौजूदगी और उसकी नजरों का सीधा प्रहार देख सुगना के पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस खूबसूरत पैंटी को वह कुछ पल पहले तक अपनी उंगलियों से सहला रही थी, वह उसे छिपाने लगी। पकड़े जाने के डर, शर्म और आत्मग्लानि ने उसे इस कदर घेर लिया कि वह हड़बड़ा गई। अपनी इस अजीब स्थिति को छुपाने के लिए, वह बिना लाली के कुछ पूछे ही, अपनी भोजपुरी मातृभाषा में लड़खड़ाती हुई सफाई देने लगी।

"अरे लाली... तू कब अइलू? ऊ... ऊ हम त बस ई अलमारी तनी सम्हारत रहनी। देख न, मालती कइसन कइसन कपड़ा आजकल रखे ले, सब इहवाँ-उहवाँ बिखरल रहे। हम त बस सहेज के रखत रहनी ह, अउर कुछ ना..." सुगना ने कांपती आवाज और उखड़ी साँसों के साथ बात को घुमाने की नाकाम कोशिश की।

पर लाली कहाँ मानने वाली थी। उसने सुगना की आँखों में तैरती उस दबी हुई कामुकता और चेहरे की सुर्खी को बहुत गहराई से ताड़ लिया था। वह सुगना की घबराहट को देखकर हल्के से मुस्कुराई और जानबूझकर उसके और करीब आते हुए, बेहद धीमे लेकिन चुभते हुए लहजे में भोजपुरी में ही बोली:

"ए सुगना, हमसे का छुपावत बाड़ू? दिखाओ हमारो के ई पेंटी तो बहुत सुंदर था। सच बताव, का तोहार इस सब पहिने के मन कभी ना करेला? तोहार ई सुंदर और जवान बदन... अइसन सुघड़ रूप लेके काहे अपन जीवन ऐसे सूखा में बितावत बाड़ू? आख़िर कब तक अपन ई जवानी अइसे ही मार के रखबू? जब से सरयू चाचा गईल बाड़े तू एकदम बदल गइलू"

लाली के इन सीधे और तीखे शब्दों ने सुगना के भीतर जैसे कोई बांध तोड़ दिया। बरसों से संभोग के सुख से महरूम उसका बदन और भाई सोनू के साथ बीती पुरानी अंतरंग यादें, लाली के इस उकसावे से और तेजी से सुलग उठीं। सुगना निरुत्तर खड़ी रह गई, और उस शांत कमरे में दोनों महिलाओं के बीच का सन्नाटा अब एक नए और गहरे राज की गवाही देने लगा था।

लाली के उन सीधे और मर्मभेदी शब्दों ने सुगना के तन-मन में एक अजीब सा करंट दौड़ा दिया था। सुगना का गोरा और दमकता चेहरा शर्म और घबराहट से एकदम लाल हो गया। उसका दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि उसे डर था कहीं लाली उसकी धड़कनें सुन न ले। अपनी इस बेबसी और छिपी हुई तड़प को छुपाने के लिए उसने तुरंत खुद को संभाला और बात बदलने की नाकाम कोशिश करते हुए मजाकिया जुबान में भोजपुरी में पूछा:

"अरे लाली... धीरे बोल, का बकबक करत बाड़े ई सब छोड़, ई बताव कि का तू कभी मालती से एह बारे में कवनो बात कइलू हा? का ओकरा मन के टोह लेवे के कोशिश कइलू?"

लाली ने सुगना के चेहरे पर आई उस सुर्खी और घबराहट को बहुत बारीकी से देखा। वह समझ गई कि सुगना अंदर से कितनी हिल चुकी है। उसने सुगना का कांपता हुआ हाथ अपने हाथ में लिया और उसकी आँखों में झांकते हुए गंभीर लहजे में भोजपुरी में जवाब दिया:

"हा, हम कइले रहनी पर ऊ लड़की बहुत चालाक बिया। हमार बात सुनत ही ऊ बात के इहवाँ-उहवाँ घुमा देलस अउर कवनो सीधा जवाब ना दिहलस।"

लाली की बातें सुनकर सुगना की चिंता और बढ़ गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि एक तरफ जहाँ उसकी बेटी मर्यादा की सारी हदें पार कर चुकी है, वहीं दूसरी तरफ उसके अपने भीतर का सोया हुआ अतीत उसे कमजोर बना रहा था।

सुगना को खामोश और असमंजस में देख लाली ने उसके कंधे पर हाथ रखा। उसकी आँखों में अब हवेली की मर्यादा को बचाने की एक अजीब सी जिद और चिंता साफ झलक रही थी। उसने सुगना को ढांढस बधाते हुए आगे कहा:

"पर , तू चिंता मत करा। हम शब्द रखत बानी कि कवनो न कवनो जुगत, कवनो न कवनो तोड़ हम अइसन निकालब, जेकरा से मालती अउर राजू, दोनों एह अनैतिक अउर पाप के मिलन से हमेशा खातिर दूर हो जास। हवेली के इज्जत पर हम अइसन दाग ना लागे देब।"

इधर वासना सुगना के मन में भी जाग चुकी थी और अब उधर नैनीताल में सूरज के सब्र भी जवाब दे रहा था वह अपनी कमर से हल्का-हल्का दबाव सोनी के पेट पर बढ़ने लगा था सोनी महसूस कर रही थी और अब संतान सप्तमी की पूर्णाहुति के लिए खुद को तैयार कर रही थी।

बिस्तर पर करवट लेटे-लेटे ही, सोनी ने जब अपनी नाजुक उंगलियों से सूरज के उस कड़े और चिपचिपे लंड को थामा और उसे सहलाते हुए अपनी मुनिया (योनि) के गीले मुहाने की तरफ खींचा और सूरज के होंठों को चूमा…वह स्पर्श सूरज के बदन में बिजली की तरह कौंध गया।सोनी की इस मूक और स्पर्शमयी पहल ने कमरे के भीतर छाए उस शांत सन्नाटे को एक बार फिर से जीवंत कर दिया।

सोनी की तरफ से सूरज को दिया गया एक बेहद गहरा, स्पष्ट और अंतिम आमंत्रण था—एक मौन संदेश कि उसका शरीर और मन इस रात की महा-आहुति और अंतिम मिलन के लिए पूरी तरह से तैयार और व्याकुल हैं।

सूरज ने अपनी आँखों पर बंधी पट्टी के पीछे छिपे अंधकार में मौसी के उस कोमल हाथ के दबाव और उसकी उंगलियों की थरथराहट को महसूस किया। सोनी की मुनिया से निकलता वह गर्म काम-रस अभी भी सूरज के अंग को छू रहा था, जिसने उसके पौरुष को एक बार फिर से जागृत कर दिया।

पलंग के कोने पर बैठा विकास, जो अब तक इस शांत दृश्य को निहार रहा था, अपनी पत्नी की जांघों की हरकत और उसके इस कामुक पहल और समर्पित अंदाज़ को देखकर एक बार फिर गहरी उत्तेजना के भंवर में डूबने लगा। वह समझ गया कि खेल का सबसे निर्णायक और अंतिम अध्याय अब शुरू होने वाला है, जहाँ सूरज इस आमंत्रण को स्वीकार कर सोनी को परम सुख के उस अंतिम शिखर पर ले जाएगा जहाँ से तृप्ति की कोई नई गाथा लिखी जानी थी।

कुछ ही पलों में सूरज उठकर पूरी तरह से सोनी के ऊपर आ चुका था। उसकी आँखों पर बंधी पट्टी के पीछे का अंधकार उसकी उत्तेजना को और हिंसक बना रहा था। उसने बिना कोई वक़्त गंवाए अपने दोनों हाथों से सोनी की गोरी और सुगठित जाँघों को पकड़ा और पूरी ताकत से उन्हें अपनी तरफ खींच लिया। सोनी किसी बहती हुई कामुक तरंग की तरह उसकी तरफ खिंचती चली गई। इस कशमकश के बीच भी सोनी की नज़रें पलंग के किनारे बैठे अपने पति विकास पर टिकी थीं। वह अपनी आँखों से विकास को देखते करते हुए इस अंतिम प्रेम-युद्ध के लिए खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार कर रही थी और जैसे अनुमति मांग रही थी। विकास ने भी अपने होठों को गोलकर उसे एक फ्लाइंग किस दिया और उत्सुकता से उसका मुख मिलन को देखने के लिए अधीर हो उठा।

अब सूरज के भीतर कोई कोमलता नहीं बची थी। उसका पौरुष इस समय एक सुलगते हुए हथियार की तरह सख़्त था। उसने अपने मजबूत लिंग को अपने हाथ में लिया और सोनी की रसीली मुनिया के मुहाने पर धीरे-धीरे पटकना (थपथपाना) शुरू कर दिया। मांस से मांस के इस धीमे टकराव से सोनी की धड़कनें बहुत तेज़ी से बढ़ने लगीं। उसके चेहरे के कामुक भाव पल-पल बदलने लगे; उसे अच्छी तरह पता था कि अगले ही पल एक बहुत बड़ा धमाका होने वाला है और वह प्रचंड अंग उसकी गहराइयों को चीरने वाला है।

परंतु सूरज उसे इस चरम सुख के लिए और तड़पा रहा था। वह जानबूझकर अपने लिंग के गर्म सुपड़े को उसकी मुनिया के मुहाने पर छुआता और फिर पीछे खींच लेता। इसी कशमकश के बीच, सूरज ने अपने दोनों बड़े और मजबूत हाथों को आगे बढ़ाया और सोनी की दोनों भरी हुई चूचियों (वक्षों) को अपनी हथेलियों में पूरी तरह भर लिया। वह कभी उन्हें अपनी उंगलियों के दबाव से बेरहमी से भींचता, तो कभी एक हाथ से दोनों को एक साथ पकड़ने का बेताब प्रयास करता। सूरज की उंगलियाँ सोनी के दोनों कड़े और उभरे हुए निप्पलों पर आकर टिक गईं, जिन्हें वह अपनी उंगलियों के बीच लेकर गोल-गोल घुमाते हुए मसलने लगा।

सोनी इस दोहरे प्रहार से पूरी तरह बेहाल हो उठी—ऊपर उसके स्तनों को बुरी तरह मथ जा रहा था और नीचे उस प्रचंड लिंग की मार उसकी मुनिया के द्वार पर लगातार पड़ रही थी, जिससे कमरे का तापमान अपनी आखिरी सीमा लांघने को तैयार था।

सोनी ने अपने हाथ बढ़ाये और सूरज के लंड को पड़कर अपनी मुनिया के भीतर करने की कोशिश की।

और आखिरकार, एक बार फिर नर-नारी का वह आदिम खेल पूरी तरह से शुरू हो गया। बंद कमरे की हवा में उत्तेजना का एक नया ज्वार उमड़ पड़ा था, जिसकी रफ़्तार धीरे-धीरे अपना असली रंग पकड़ने लगी थी। सोनी के बदन में आने वाले हर तीव्र कंपन के साथ उसकी हिलती हुई चूचियां (वक्ष) इस बढ़ते हुए वेग की साफ गवाही दे रही थीं।

इस बार माहौल में एक अनोखा और गहरा ठहराव भी था। पीठ के बल लेटी सोनी का चेहरा पलंग के किनारे बैठे अपने पति विकास की तरफ था। वह अपनी थकी और मदहोश आँखों से विकास को एकटक देखे जा रही थी, जबकि पीछे से सूरज का वह प्रचंड पौरुष उसकी देह की गहराइयों में और गहरे तक, और अंदर तक उतरता जा रहा था।

विकास और सोनी—पति और पत्नी—एक-दूसरे की आँखों में आँखें डाले, बिना पलक झपकाए इस महा-मिलन की अंतिम पूर्णाहुति का इंतजार कर रहे थे। दोनों की नज़रों में अब कोई अपराध बोध नहीं था, बल्कि एक-दूसरे के प्रति एक मूक और गहरा सामंजस्य था। उधर सूरज, जो अपनी ही धुन में पूरी तरह अंधा हो चुका था, कभी आगे झुककर सोनी की उन उभरी हुई चूचियों को अपनी मजबूत हथेलियों से मथने लगता, तो कभी उसकी पतली कमर के लव हैंडल्स को पकड़कर और ज़ोर से दबाता, ताकि हर धक्का सीधे उसकी नाभि के पार जाकर लगे।

कमरे में साँसों की गर्माहट और मांस के टकराने की आवाज़ें अब अपने अंतिम और सबसे तीव्र शिखर की ओर बढ़ रही थीं।

सूरज की रफ्तार अब अपने चरम पर पहुँच चुकी थी। आँखों पर बंधी उस मखमली पट्टी के पीछे का अंधकार उसे पूरी तरह से एक आदिम और मदहोश कर देने वाले वेग में झोंक चुका था। उसका वह प्रचंड, कड़ा पौरुष अब सोनी की मुनिया की तंग गहराइयों को पूरी तरह नापते हुए सीधे उसके गर्भ के द्वार पर निरंतर दस्तक दे रहा था। हर भीषण प्रहार के साथ उसका अंग जैसे मूक भाषा में मौसी से उसके उस आखिरी द्वार को खोलने की मनुहार कर रहा था, ताकि वह अपनी अंतिम आहुति से उस पूरे हिस्से को पूरी तरह सींच सके।

सूरज का बचा-खुचा नियंत्रण अब पूरी तरह से समाप्त हो चुका था। सोनी की मुनिया के उस मखमली और जादुई संकुचन ने उसके भीतर एक ऐसा आदिम उन्माद जगा दिया कि वह सब कुछ भूलकर पूरी तरह से बेकाबू हो गया। आँखों पर बंधी मखमली पट्टी के अंधेरे में उसका पूरा अस्तित्व केवल उस गर्म, रसीली गहराई को महसूस कर रहा रहा था।

सूरज की उंगलियों के निशान सोनी के लव हैंडल्स पर गहरे बैठ चुके थे, जो इस बात का प्रमाण थे कि यह मिलन अब अपनी सबसे उग्र और अंतिम पराकाष्ठा (चरम सुख) के बिल्कुल नजदीक पहुँच रहा था। सूरज के भीतर का आदिम पुरुष अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुका था। उसने अपनी दोनों हथेलियों में सोनी की भरी हुई चूचियों (वक्षों) को एक साथ भींच लिया और अपने धक्कों की रफ़्तार को एक ऐसी हिंसक गति दे दी, जिसे सहना सोनी के लिए लगभग मर्यादा से परे होता जा रहा था।

वह पूरी दीवानगी से कभी आगे झुककर सोनी की उन कटीली चूचियों को अपने मुंह में भरकर चूसने लगता, तो कभी अपनी मजबूत हथेलियों से उन्हें ज़ोर-ज़ोर से मथते हुए सहलाने लगता। ऊपर उसके स्तनों पर यह मदहोश कर देने वाला प्रहार चल रहा था, और नीचे उसका वह कड़ा, प्रचंड लंड सोनी की कोमल मुनिया (बुर) के भीतर एक सुखद अत्याचार ढाए हुए था। गति इतनी तीव्र थी कि मांस से मांस के टकराने की आवाज़ कमरे के सन्नाटे को चीर रही थी।

गर्भ के मुहाने पर होने वाले इस निरंतर और गहरे प्रहार ने सोनी के पूरे वजूद को हिलाकर रख दिया। वह कुछ ही देर पहले चरम सुख पाकर पूरी तरह शिथिल हो चुकी थी, लेकिन सूरज के इस निष्ठुर और बेतहाशा वेग ने उसके भीतर काम-अग्नि को फिर से पूरी तरह सुलगा दिया। उस जादुई दस्तक के अहसास से सोनी के पूरे बदन में एक बार फिर से तीव्र करंट दौड़ गया और वह गहरी उत्तेजना के एक नए भंवर में खिंचती चली गई।

बिस्तर पर लेटी सोनी ने इस नए और प्रचंड वेग को सहने के लिए चादर पर अपनी उंगलियों का कसाव और मज़बूत कर लिया। उसकी आँखें अभी भी पलंग के किनारे बैठे अपने पति विकास की आँखों में पूरी तरह गड़ी हुई थीं। विकास भी अपनी पत्नी के चेहरे पर उभरते इस दोबारा जागृत होते कामुक ज्वार और सूरज के उस बेकाबू होते मर्दन को साक्षात देखकर अपनी रुकी हुई साँसों के साथ इस महा-मिलन की अंतिम पूर्णाहुति का मूक गवाह बना हुआ था।

आखिरकार सूरज के लिंग का वह कड़ा सुपड़ा जब सोनी के गर्भाशय के मुहाने पर जाकर ठहरा, तो सोनी की मुनिया ने उसे अपने आगोश में ले लिया और सूरज अपने आप को रोक नहीं पाया उस परम गहराई के स्पर्श ने दोनों के शरीरों में एक सनसनी फैला दी। इस चरम और निर्णायक क्षण में, सोनी की मुनिया (योनि) के भीतर की मखमली दीवारें और उसके मखमली होंठ पूरी तरह से सक्रिय हो उठे।

सोनी के शरीर के भीतर से स्वतः ही एक अद्भुत, लयबद्ध और तीव्र संकुचन (खिंचाव और भींचने की प्रक्रिया) होने लगा। वह मखमली संकुचन सूरज के उस गर्म, तने हुए लिंग को चारों तरफ से किसी मखमली नली की तरह बेहद मज़बूती और दीवानगी से जकड़ रहा था।

सूरज के लिए यह अहसास किसी अलौकिक सुख से कम नहीं था। सोनी की बुर से निकलने वाला वह गाढ़ा, गर्म काम-रस और उसके भीतर होने वाली यह मूक थरथराहट सूरज के पौरुष को एक ऐसा सुखद अहसास दे रही थी, जिसने उसके भीतर एकत्रित लावा को पूरी तरह से पिघलाना शुरू कर दिया था।

सूरज अपनी बंद आँखों के पीछे इस चरम सुख के आवेग से पूरी तरह कांप रहा था, और उसकी कमर अब पूरी तरह से सोनी के उस जादुई और सम्मोहक खिंचाव के आगे आत्मसमर्पण करने को बेताब हो चुकी थी। पीछे बैठा विकास इस मूक और महा-कामुक संगम को देखकर अपनी रुकी हुई साँसों के साथ इस रात की अंतिम पूर्णाहुति का गवाह बन रहा था।

कुछ ही देर में, इस भीषण और बेतहाशा प्रहार के कारण सोनी का पूरा बदन काम-वेग के उस अंतिम भंवर में फंसकर बुरी तरह से कँपकँपाने लगा। उसकी मुनिया के भीतर होने वाले तीव्र और मखमली संकुचन ने सूरज को साफ़ संदेश दे दिया कि सोनी अब अपने चरम सुख की दहलीज़ लांघ रही है। सोनी की यह हालत देख सूरज का अपना पौरुष भी अपनी अंतिम आहुति छोड़ने के लिए पूरी तरह सुलग उठा, और वह अपनी पूर्णाहुति के लिए तैयार हो गया।

सूरज ने अपनी पूरी ताकत समेटी और एक बार फिर अपने उस प्रचंड अंग को सोनी के गर्भ के मुहाने पर ले जाकर पूरी तरह से टिका दिया। सूरज के नितंब पूरी तरह तन चुके थे उसका सारा ध्यान उस लंड पर केंद्रित हो चुका था। उस परम गहराई के भीतर अब काम-रस का प्रवाह इस कदर तीव्र हो चुका था, मानो आकाश से सुख और आनंद की कोई बारिश हो रही हो। दोनों शरीरों से निकलने वाला वह पवित्र और आदिम रस इस महा-मिलन का साक्षात गवाह बन रहा था।

इस दौरान सूरज और सोनी सुध बुध खोकर एक दूसरे की बाहों में थे ना कोई मौसी थी ना कोई भांजा था।

कमर की वह उग्र और बेतहाशा गति अब धीरे-धीरे थम चुकी थी, लेकिन दोनों शरीरों के बीच जुड़ाव अब भी अपने चरम पर था। सूरज के शांत होते पौरुष में एक धीमा और गहरा स्पंदन अभी भी जारी था, जो इस बात का संकेत था कि अनुष्ठान की अंतिम आहुति अपने मुकाम तक पहुँच रही है। वीर्य की एक-एक बूंद बेहद सधे और जादुई अंदाज़ में सोनी के गर्भ की गहराइयों में उतरती चली गई। जब आहुति का अंतिम कतरा भी उसके भीतर समा गया, तब जाकर सूरज का पूरा शरीर पूरी तरह शांत और शिथिल हो गया पर लंड अब भी तना था।

अब उसके भीतर का वह आदिम और हिंसक उन्माद पूरी तरह विलीन हो चुका था। वह अपनी सारी ऊर्जा और पौरुष सोनी के भीतर समर्पित करके एक मासूम बच्चे की तरह निढाल हो गया और उसका भारी शरीर सोनी के कोमल बदन के ऊपर लगभग गिर सा गया। सूरज का गठीला बदन काफी भारी था, जिसका पूरा भार इस समय सोनी के ऊपर था, परंतु सोनी ने इस पर कोई ऐतराज नहीं किया। इस सफल पूर्णाहुति के बाद उसके मन में एक असीम संतोष और ममता का भाव जाग उठा था। वह बेहद प्यार से सूरज के बालों पर उंगलियां फेर रही थी।

सोनी बड़े ही प्यार और दुलार से सूरज की पीठ और कंधों को सहलाती रही, उसकी उंगलियाँ उसके थके हुए बदन को सुकून दे रही थीं। कुछ पलों तक उसे इसी तरह अपने सीने से भींचे रखने के बाद, सोनी ने अपनी थकी हुई जाँघों और कमर को धीरे से संभाला। उसने बेहद कोमलता और सावधानी से सूरज के भारी शरीर को अपने ऊपर से सरकाया और उसे धीरे-धीरे करवट कर बिस्तर पर एक तरफ लिटा दिया, ताकि वह इस अद्भुत काम सेवा के बाद कुछ आराम कर सके। पर जैसे ही सूरज का तनाव हुआ लंड सोनी की मुनिया से बाहर आया एक बार फिर वही मधुर ..पक्क…..की आवाज आई.


विकास को आश्चर्य हो रहा दो दो बार अद्भुत यौनिमर्दन करने के बाद भी क्या सूरज स्खलित नहीं हुआ था ? क्या सोनी को अभी और चुदना था.. तभी विकास ने सोने की बनिया की तरफ देखा जो फुल कर लाल हो चुकी थी और उसकी होठों से सफेद चमकदार ताड़ी का रस बहार आ रहा था। जो इस बात का गवाह था कि पूर्णाहुति संपन्न हो चुकी है

विकास इस मूक और महा-कामुक संगम के इस अंतिम दृश्य को देखकर अपनी रुकी हुई साँसों के साथ शांत बैठा रहा वह कभी ईश्वर को धन्यवाद देता कभी उनसे सोनी की सोनी गोद को भरने का अनुरोध करता विधाता ने शायद विकास की मनसा और इच्छा दोनों सुन ली..

पर विकास के दिमाग में अब भी सूरज का तनाव हुआ लंड घूम रहा था

पर उसे यकीन हो चला था कि नया मेहमान आने वाला था.
 
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