Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 29 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

HAPPY DEEPAWALI

भाग 60

मेरी बेटी? सरयू सिंह ने डॉक्टर को प्रश्नवाचक निगाहों से देखा...




"हां जी हां…. हमें आप को बचाने के लिए आपके ही पुत्र या पुत्री के रक्त की आवश्यकता थी। यह ऊपर वाले कि कृपा थी की हमें आपकी बेटी का रक्त मिल गया और हम आपकी जान बचा सके..

सरयू सिह जब तक अपना दूसरा प्रश्न करते तब तक दरवाजा खुला सुगना नर्स के साथ अंदर आ रही थी। ..

सरयू सिंह के दिमाग में विचारों की घुड़दौड़ जारी थी और धड़कने तेज... दिमाग डॉक्टर द्वारा कही गई बात को मानने को तैयार न था….



अब आगे..

डॉक्टर ने विदा ली और सुगना की तरफ मुखातिब होते हुए बोला

"अपने बाबूजी का ख्याल रखना और अपना भी". डॉक्टर की बात सुनकर सरयू सिंह अचंभे में थे। उन्हें डॉक्टर की बात पर कतई विश्वास नहीं हो रहा था वह बार-बार यही सोच रहे थे कि शायद सुगना की उम्र की वजह से डॉक्टर ने उसे उनकी बेटी समझा होगा। परंतु उनके मन मे प्रश्न आ चुका था।

दोपहर हो चुकी थी सरयू सिंह हॉस्पिटल के बेड पर पड़े अपने भरे पूरे परिवार को देख रहे थे। डॉक्टर की बात उनके दिमाग में अभी भी गूंज रही थी क्या सुगना उनकी पुत्री थी?

अपने भरे पूरे परिवार के सामने न तो वो डॉक्टर द्वारा कही गई बात की तस्दीक कर सकते थे और न हीं उस पर कोई प्रश्न उठा कर उसे सब की जानकारी मे ला सकते थे। तब यह बातचीत गोपनीय न रहती यह उनके परिवार और लिए अनुचित होता और शायद पदमा के लिए भी.

कजरी, पदमा और सुगना सरयू सिंह की तीनों प्रेमिकाऐं उनके अद्भुत लण्ड का सुख ले चुकी थी पर जितना आनंद उन्होंने सुगना के साथ पाया था वह शायद अनोखा और निराला था।

पर आज डॉक्टर द्वारा कही गई बात को याद कर अब उनका हृदय व्यतीत था। आंनद कष्ट और बेचैनी में बदल चुका था।अपनी ही पुत्री के साथ किये गए व्यभिचार को सोच कर उनका हृदय विह्वल था।

एकांत पाकर उन्होंने पदमा से पूछा…

"एक बात पूछी..?"

"का बात बा?"

"उ कौन महीना रहे जब तू पानी में डूबत रहलू और हम तहरा के बचवले रहनी?" सरयू सिंह ने पदमा से मर्यादा में रहकर उसकी चुदाई के दिन के बारे में जानकारी लेने की कोशिश की।

पद्मा ने अपने दिमाग पर जोर दिया और होली के बाद आई अमावस के दिन की तस्दीक कर दी। पद्मा को आज भी वह अनोखी चुदाई याद थी। सरयू सिंह का दिमाग तेजी से घूमने लगा उन्होंने अपनी उंगलियों पर गड़ना प्रारंभ की और सुगना के जन्मदिन से उसका मिलान करने लगे। डॉक्टर की बात उन्हें सही प्रतीत होने लगी। …...क्यों उनका ध्यान इस बात की तरफ आज तक कभी नहीं गया था?

अब सरयू सिंह को पूरी तरह यकीन आ चुका था कि सुगना उनकी ही पुत्री थी। पढ़े लिखे होने के कारण वह डॉक्टर की बात को नजरअंदाज नहीं कर रहे थे परंतु उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि पदमा के साथ एक बार किए गए संभोग ने हीं उसे गर्भवती कर दिया था। यह बात यकीन के काबिल ना थी परंतु नियति ने सुगना का सृजन ही इसी निमित्त किया था….

मासूम सुगना सरयू सिंह के पैरों में तेल लगा रही थी सरयू सिंह उससे नजरे न मिला पा रहे थे। उनके दिल ने इतनी पीड़ा शायद कभी ना सही थी। अपनी ही पुत्री के साथ कामवासना का जो खेल उन्होंने खेला था आज वह उसे याद कर कर अपनी पीड़ा को और बढ़ा रहे थे। वह सुगना को देख न रहे थे परंतु उनके मन मस्तिष्क में सुगना नाच रही थी..

बरबस ही उन्हें सुगना के कामांगो और नग्न शरीर का ध्यान आता उनकी आत्मा उन्हें और कचोटने लगती। सरयू सिंह को अपना जीवन बोझ जैसा प्रतीत होने लगा।

उधर बनारस महोत्सव समाप्त हो चुका था। विद्यानंद का पांडाल उखड़ रहा था इधर सरयू सिंह की उम्मीदें। वह अपने आने वाले जीवन से ना उम्मीद हो चुके थे कामवासना उनके जीवन का प्रधान अंग थी और उसे पुष्पित पल्लवित करने वाली सुगना अचानक सरयू सिंह ने अविवाहित रहने के बावजूद कामवासना का ऐसा आनंद लिया था जो उस वक्त में विरले लोगों को ही नसीब होता था और तो और पिछले 3-4 वर्षों में सुगना ने तो उनके जीवन में नई खुशियां भर दी थीं। अपनी प्रौढ़ावस्था में सुगना जैसी सुकुमारी का साथ पाकर वह धन्य हो गए थे। सुगना ने उनकी वासना को तृप्त न किया अपितु आग को और भड़का दिया और वह सुगना के दूसरे छेद के पीछे पड़ गए थे।

रतन अपने परिवार का सारा सामान समेटकर मनोरमा द्वारा दी गई गाड़ी में रख कर हॉस्पिटल के बाहर आ चुका था और राजेश इन घटनाओं से अनजान बीती रात की सुनहरी यादे लिए अपनी ड्यूटी पर निकल चुका था।

लाली तक खबर सोनू ने पहुंचाई और उसे लेकर हॉस्पिटल आ गया था। लाली को भी इस बात की खबर हो गई कि सरयू चाचा होटल से सीधा हॉस्पिटल में आए थे। परंतु चाचा जी सुगना को लेकर होटल में क्यों गए थे? लाली का दिमाग इस प्रश्न का उत्तर स्वयं न खोज पा रहा था उसने सुगना के सामने कई प्रश्न रखे पर सुगना निरुत्तर थी।

शाम होते होते सरयू सिंह को हॉस्पिटल से डिस्चार्ज कर दिया गया। उनकी जांच रिपोर्ट और सुगना के खून जांच की रिपोर्ट उनको दे दी गई सरयू सिंह की मन में आया कि वह यह रिपोर्ट फाड़ दें ताकि आने वाले समय में भी यह बात किसी को पता ना चले परंतु वह हॉस्पिटल से आज ही डिस्चार्ज हुए थे रिपोर्ट की आवश्यकता कभी भी पढ़ सकती थी उन्होंने सुगना से कहा

" इकरा के संभाल के रखी ह आगे काम करी"

नियति ने सरयू सिंह का यह उदगार सुन लिया और उसे अपनी कथा में एक नया मोड़ आता दिखाई पड़ गया।

सुगना ने लाल झोले में रखी हुई उस रिपोर्ट को सहेज कर रख लिया। यह लाल झोला बेहद आकर्षक था। बरबस ही ध्यान खींचने वाला। झोले में दफन सुगना और सरयू सिह के रिश्ते कब उजागर होंगे और कौन करेगा यह तो वक्त ही बताएगा परंतु अब हॉस्पिटल की लॉबी में गहमागहमी बढ़ गई थी।

"बाबू जी …..तनी धीरे से…". सुगना की चिर परिचित आवाज एक बार फिर सुनाई दे पर इसमें कामवासना कतई न थी वह अपने बाबू जी को सावधान कर रही थी जो इस वक्त हॉस्पिटल की सीढ़ियां उतर रहे थे।

माथे पर दाग से अब भी रक्तस्राव हो रहा था जिसे डॉक्टरों ने पट्टी और मलहम लगाकर रोक दिया था। पर वह अब साफ साफ नजर आ रहा था..

" सोनू ने पूछा ज्यादा चोट लग गई रहल हा का?

का भईल रहे ? चक्कर आ गईल रहे का""

सरयू सिंह क्या जवाब देते उन्होंने कोई उत्तर न दिया वह शर्मसार थे.. शाम होते होते सरयू सिंह अपने परिवार के साथ सलेमपुर गए।

पदमा भी अपनी दोनों पुत्रियों सोनी और मोनी के साथ सीतापुर पहुंच चुकी थी। उन्हें छोड़ने गया सोनू अब भी सोनी के आकर्षण का केंद्र था।। जब जब वह सोनू को देखती उसे लाली के हाल में बिस्तर पर गिरा वह चिपचिपा द्रव्य याद आ जाता।। क्या सोनू भैया भी अपने हाथों से अपने उसको हिलाते होंगे? क्या वह भी लड़कियों के बारे में सोचते होंगे? सोनी को अपनी सोच पर शर्म आ रही थी ...परंतु जितना वह सोचती उसकी सोच का दायरा बढ़ता जाता।

शर्म और हया का आवरण धीरे-धीरे अपनी मर्यादा तोड़ता है सोनी अपनी सोच में धीरे-धीरे सोनू को और नग्न करती गई जितना ही वह उसके बारे में सोचती सोनू उसे उतना खुलकर दिखाई देता। सोनी शर्म हया त्याग कर पुरुषों के लण्ड की कल्पना करने लगी। विकास और सोनू दोनों ही उसकी कल्पना में आने लगे।

सोनी का युवा शरीर पुरुष संसर्ग का थोड़ा सुख पा चुका था परंतु जांघों के बीच उठ रही हलचल अभी पूरी तरह शांत ना हुई थी विकास की उंगलियों ने उस आग को और दहका दिया था।

बनारस महोत्सव बीत चुका था। कहानी के तीन अलग अलग प्रमुख पात्र लाली, मनोरमा और सुगना के गर्भ में आ चुके थे।

सरयू सिंह अपने दालान की सैया पर पड़े अपने जीवन को याद कर रहे थे। यह जानने के पश्चात की सुगना उनकी अपनी ही पुत्री है वह दर्द में थे।

अपनी ही पुत्री के साथ पिछले चार-पांच वर्षो से उन्होंने यहां वासना का जो खेल खेला था वह अब उनके गले की फांस बन चुका था। अपनी ही पुत्री को लड्डू में गर्भनिरोधक दवाइयां मिलाकर खिलाना तथा उसकी मासूम चाहतों के एवज में उसे कई दिनों बल्कि कई वर्षों तक लगातार चोदना….. ।

सुगना के साथ बिताई सुखद यादें अब कष्ट का कारण बन गई थी। कैसे उन्होंने सुगना को दिखा दिखाकर बछिया की चूची मीसी थी? कैसे होटल के कमरे में उन्होंने सुगना की चुचियों पर जानबूझकर टॉर्च मारा था? और कैसे उसकी जांघों के बीच छुपे मालपुए के दर्शन किए थे?

वह नियति के इशारे को न समझ पाए थे जब उन्होंने पहली बार सुगना की बूर् का दर्शन किया था तब भी उनके इष्टदेव द्वारा भेजे गए कीड़े ने उनके माथे पर दाग दे दिया था। यह उनके द्वारा किए जा रहे पाप को रोकने का एक इशारा था परंतु कुंवारी सुगना की अद्भुत चूत के आकर्षण में खोए सरयू सिंह उस इशारे को न समझ पाए थे।

यह वही कीड़ा था जिसने सरयुसिंह को उसकी माँ पद्मा के साथ संभोग करते देखा था तथा सरयू सिह के अंडकोषों के पास काट कर उन्हें पराई शादी शुदा स्त्री के गर्भ में वीर्य भरने से रोकने की कोशिश की थी।

परंतु निष्ठुर नियति सरयू सिंह की वासना पर लगाम न लगा सकी। वासना में अंधे सरयू सिह को रोक पाने में छोटे से कीड़े की कोशिश कामयाब न हो पायी पर उसने दाग दे दिया...जो सरयू सिह की वासना के अनुपात में बढ़ता रहा और अंततः फूट गया।

सारा घटनाक्रम चाहे वह दीपावली की रात या सुगना का कौमार्य भेदन का या अपनी भाभी कजरी के साथ मिलकर सुगना से त्रिकोणीय संभोग …..सारी सुनहरी यादें अब उनकी पीड़ा का कारण बन चुकी थी।

बनारस के पांच सितारा होटल में जो कृत्य किया था वह शायद उनके इष्ट देव को भी रास ना आया था। अपनी पुत्री के साथ …..हे…. भगवान उन्होंने क्या कर दिया था...

सरयू सिंह का किसी कार्य में मन न लगता । वह सुगना से नजरे ना मिला पाते।

सुगना हमेशा की तरह ही उन्हें वैसा ही प्यार व सेवा करती परंतु अब उसमें कामोत्तेजना की भावना न थी। वह जानती थी यह सरयू सिंह के लिए घातक होता। अपने बाबू जी को इस अवस्था में देखकर उसकी कामोत्तेजना भी कुछ दिनों के लिए शांत हो गई।

सुगना अब भी परेशान थी सरयू सिंह ने उसके साथ संभोग तो अवश्य किया था परंतु वीर्य स्खलन न कर पाए थे। राजेश के साथ बिताई उस रात से सुगना को कोई विशेष उम्मीद न थी वह जानती थी कि उसकी योनि में राजेश के वीर्य का कुछ अंश अवश्य गया था परंतु क्या वह उससे गर्भवती हो पाएगी? यह प्रश्न उसके मन में अब भी कायम था। सरयू सिंह को बिस्तर पर पड़ा देख सुगना ने अपने दिल पर पत्थर रखकर आगे उनसे संभोग करने का विचार कुछ समय के लिए त्याग दिया था।

वैसे भी बनारस महोत्सव बीत चुका था उसके गर्भ में यदि उसकी पुत्री का सृजन होना था तो हो चुका होगा। अन्यथा अब उसकी कोई उपयोगिता भी न रह गई थी। सुगना परेशान थी और मन ही मन अपने इष्ट देव से राजेश के वीर्य से ही सही गर्भधारण के लिए प्रार्थना कर रही थी। उसे अपने आने वाले मासिक धर्म के दिनों के बिना रजस्वला हुए बीतने का इंतजार था।

सरयू सिंह उसके अपने पिता थे। यह बात वह कतई न जानती थी यदि वह जान जाती तो न जाने क्या करती। उसके सरयू सिह की पुत्री होने की खून जांच की रिपोर्ट अटारी पर झोले में दबी धूल चाट रही थी। सुगना उसे कब देखेगी और कब अपने हिस्से का पश्चाताप झलेगी या अभी भविष्य के गर्भ में था। अभी तो इस रिश्ते को जानने का दंश सिर्फ और सिर्फ सरयू सिंह झेल रहे थे।

दिन बीतते देर नहीं लगते। सुगना का भी इंतजार खत्म हुआ और मासिक धर्म के दिन बिना जांघों के बीच कपड़ा फसाये..बीत गए । उसकी इच्छा भगवान ने पूरी कर दी थी।

वह मन ही मन यह सोचती कि आखिरकार इस गर्भ में आए शिशु का पिता कौन है? उसके बाबू जी ने तो स्खलन पूर्ण न किया था परंतु सुगना यह बात भी जानती थी कि लण्ड से रिस रहा वीर्य भी गर्भवती करने के लिए काफी होता है।

जब जब वह अपने गर्भ के बारे में सोचती उसे ऐसा प्रतीत होता है जैसे यह राजेश के वीर्य से ही सृजित हुआ था। सुगना ने इस बात पर ज्यादा तवज्जो न दिया । विद्यानंद की कही बातों के अनुसार सिर्फ उसे सूरज की बहन का सृजन करना था और वह उसकी कोख में आ चुकी थी। यद्यपि नियत ने उस गर्भ का लिंग निर्धारण न किया था परंतु सुगना मन ही मन उस गर्भ को अपनी पुत्री मान चुकी थी। इसके इतर सोचकर वह और दिमागी मुसीबत में नहीं पड़ना चाहती थी।

सुगना पूरे तन मन धन से अपने गर्भ को सुरक्षित और स्वस्थ रखने का प्रयास करने लगी घर में खुशियां व्याप्त थी। कजरी ने पूछा…

"लागा ता कुंवर जी फिर भीतरिया डाल देले हां….जाय दे दु गो रहीहें सो ता अच्छा रही... भगवान एक और लइका दे देस तो दोनों साथ ही खेलहै सो"

"ना मा हमरा ता लईकी चाही…"

कजरी कभी भी लड़कियों की पक्षधर न थी उस जमाने में लड़कियों को लड़कों का दर्जा प्राप्त न था. कजरी ने कुछ कहा नहीं परंतु उसने अपने इष्ट देव से गुहार लगाई जो सुगना की इच्छाओं के विपरीत थी... नियति दोनों की प्रार्थनाएं सुन रही थी... परंतु इस कामगाथा के लिए जिस पात्र की आवश्यकता थी सुगना के गर्भ में उसका ही सृजन होना था। नियति सर्वशक्तिमान थी।

सुगना के गर्भवती होने की खबर सरयू सिंह तक भी पहुंची उन्हें एक बार फिर सुगना की जांघों के बीच लगे वीर्य की याद आ गई। वह यह बात भली-भांति जानते थे कि उस दौरान उन्होंने सुगना के साथ एक भी बार संभोग नहीं किया था और जब यह मौका उन्हें प्राप्त हुआ भी तब वह सुगना की दूसरे छेद के पीछे पड़ गए थे। उन्हें मन ही मन विश्वास हो चला था किस सुगना के गर्भ में आया बच्चा निश्चित ही राजेश का ही है। परंतु सुगना अब उनकी पुत्री थी वह इस बारे में ज्यादा नहीं सोचना चाहते थे ...उन्होंने यथास्थिति स्वीकार कर ली थी एक लिहाज से वह पाप से जन्मे एक और संतान के पिता होने से बच गए थे।

सुगना ने अपने जीवन में एक बार फिर वैसे ही खुश थी जैसे सूरज के गर्भधारण के समय थी। पर इस खुशी में आज वह अकेली थी। सुगना ने राजेश के घर पर बितायी रात के अनुभव को कजरी से भी छुपा लिया था।

उसने कजरी को गर्भ धारण का कारण उसने सरयू सिह से मुलाकात ही बताया था। यह गर्भधारण अकारण हुआ था। कजरी मन ही मन सोचती काश यह न हुआ होता तो कुछ ही दिनों में रतन और सुगना करीब आ जाते और तब यह और उचित होता। परंतु मन की सोच कार्य मे परणित हो शायद यह हमेशा संभव नही होता।

इस गर्भधारण ने सुगना अपनी ही नजरों में गिरने से बचा लिया था। यद्यपि सरयू सिह से सफल संभोग न हो पाने के बाद अपने गर्भधारण की आशंकाओं को सोचते हुए वह मन ही मन प्रण कर चुकी थी कि यदि सूरज को सामान्य करने के लिए उसे कालांतर में अपने ही पुत्र सूरज के साथ निकृष्ट संभोग को करना भी पड़ेगा तो वह अवश्य करेंगी।

निष्ठुर नियति मन की भावनाएं भी पढ़ लेती है। सुगना ने जो बात अपने दिमाग में लाइ थी वह नियति ने न सिर्फ पढ़ लिया अपितु उसे योजना में समाहित करने लगी। वैसे भी न चाहते हुए भी सुगना अब सूरज की माँ भी थी और बहन भी…..विद्यानंद ने सूरज की मुक्ति का जो मार्ग बताया था सुगना सूरज की माँ और बहन होने के कारण विशेष रूप से उपयुक्त थी...

उधर लाली भी गर्भवती हो चुकी थी अपने प्यारे मुंह बोले भाई सोनू से पूरी तन्मयता और आत्मीयता से चुदने के पश्चात लाली के गर्भ ने भी सोनू के वीर्य को उसी प्रकार आत्मसात कर लिया था जिस प्रकार लाली और राजेश ने सोनू को।

जिस गर्भ का सृजन पूरे प्यार और आत्मीयता से हुआ हो उसका मन और भावनाएं कितने कोमल होंगे इस बात का अंदाजा पाठक लगा सकते हैं।

इसी प्रकार एक पात्र का सृजन मनोरमा के गर्भ में भी हुआ था। सरयू सिंह जैसे बलिष्ठ और मजबूत व्यक्ति तथा मनोरमा जैसी काबिल और सुंदर युवती के गर्भ में आने वाला शिशु निश्चित ही अपने माता पिता के गुणों से सुसज्जित होता।

इस बनारस महोत्सव ने मनोरमा के जीवन में भी खुशियां भर दी थी उसके गर्भवती होने की खबर सुनकर सेकेरेट्री साहब फूले नहीं समा रहे थे वह दर-दर मंदिरों में सर पटकते हुए भगवान का शुक्रिया अदा कर रहे थे। सच भी था शायद भगवान ने ही सरयू सिंह को मनोरमा के गर्भधारण के लिए भेज था।

मनोरमा मन ही मन अपने इष्ट देव को याद करती और कभी-कभी उसे सरयू सिंह देवस्वरूप दिखाई पड़ जाते। उसका सर जैसे अपने इष्ट देव के सामने झुकता वैसे ही सरयू सिंह के सामने। वह उनसे बेहद प्रभावित हो गई थी। उसे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास था कि या गर्भ उसे सरयू सिह से ही प्राप्त हुआ है अन्यथा जिस खेत को सेक्रेटरी साहब कई वर्षों से जोत और चोद रहे थे परंतु आज तक एक हरी दूब ने भी जन्म लिया था और आज पहली बार मनोरमा के उस खेत (गर्भ) में अद्भुत जीव का सृजन हो रहा था।

कहानी की तीनों वयस्क महिलाएं गर्भवती थी और अधेड़ अवस्था को प्राप्त कर चुकी सुगना की मां पदमा और सास कजरी दोनों काम सुख को तिलांजलि दे कर घरेलू जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गई थी। कामुकता का जैसे अकाल पड़ गया था।

सारा दारोमदार सोनी पर आ गया था। सोनी की बहन मोनी अभी भी धर्म परायण थी और अपने शरीर में छुपे हुए खजाने से अनजान अपनी मां का हाथ बटाने में लगी रहती थी।

सोनी बिस्तर पर लेटी विकास के साथ बिताए पल याद कर रही थी उसकी हथेलियां स्तनों पर रेंग रही थी और जांघो के बीच फसा तकिया हिल रहा था…

जैसे जैसे तकिए की रगड़ जांघों के जोड़ पर बढ़ती गई सोनी की हथेलियां सूखी चुचियों को छोड़कर रसीली बुर की तरफ बढ़ गई। सोनी को अपनी रसीली बूर् को सहलाने में बेहद आनंद आता था..जैसे ही उंगलियों ने रसीले छेद पर छलके चिपचिपे रस को छुआ .तभी

"सोनी ए सोनी…." सोनू ने आवाज लगाई…

शेष अगले भाग में..

 
धन्यवाद

नियति और कोई नहीं हमारी अपनी सोच है जैसी कहानियों की पाठक अपेक्षा करते हैं लेखक वही कहानियां लिखता है जुड़े रहे धन्यवाद

इस कहानी का पूर्वार्ध पूर्ण हो चुका है अभी मध्यातर है कहानी का उत्तरार्ध अनूठा होगा ऐसा मुझे विश्वास है

धन्यवाद जी

कई पाठकों ने पिछले अपडेट से ही अंदाजा लगा लिया होगा पर हां मुझे इस बात का यकीन है कि पिछले अपडेट से पहले यह अंदाजा शायद ही कुछ पाठक लगा पाए हो

धन्यवाद जुड़े रहे

कहानी यूं ही हिचकोले खाती रहेगी जुड़े रहें और साथ मजबूती से बनाए रखें

आपने सही कहा कहानी मोड़ ले चुकी है जुड़े रहे धन्यवाद
 
आप ने सच कहा मैंने इस संबंध को दिखाने के लिए मेडिकल साइंस का सहारा कम लिया ताकि यह कहानी कहानी ही रहे अन्यथा चंद घंटों में डीएनए टेस्ट की जरूरत और टेस्ट रिपोर्ट आने में लगने वाला समय कहानी को धीमा करता .

इन्सेस्ट मेरे लिए हमेशा से घृणित सब्जेक्ट है पर मैं परिस्थितिजन्य सेक्स पर लिख कर इस कहानी में इन्सेस्ट को कछ हद तक जीवित रहूंगा

आपके इस उद्धरण पर निश्चित ही इस कहानी में कई बार यह प्रश्न आएंगे और उनका समुचित उत्तर भी मैं अपने अनुकूल दूंगा क

मुझे लगता है कहानी के शुरुआती भाग आपने ध्यान से नहीं पड़े हैं यदि समय हो तो भाग 8 पढियेगा। आपके सारे प्रश्नों के उत्तर उसी भाग में उपलब्ध हैं और पहले से ही उपलब्ध है मैंने कोई एडिटिंग नहीं की है।

ऐसा ना कहें पाठकों के प्रश्न और उनके विचार भी इस कहानी को आगे बढ़ाएंगे अन्यथा मेरे लिए इस कहानी में कुछ भी नहीं बचेगा

धन्यवाद इसी तरह अपनी प्रतिक्रियाएं देते हुए और कहानी पर प्रश्न उठा कर मुझे इस कहानी को और प्रमाणित करने का मौका दे तेरे अच्छा लगता है जब कोई प्रश्न उठाता है और कहानी में मैंने उसका उत्तर पहले ही दिया रहता है एक बात ध्यान रखिएगा मैंने कहानी की रूपरेखा पहले ही तय की हुई है पात्रों का सृजन और चरित्र निर्माण उसी दिशा में धीरे-धीरे हो रहा है क्या होना है और क्या नहीं मेरे पाठकों से प्रश्न भी उसी दिशा में रहेंगे परंतु कहानी के मूल स्वरूप में कोई बदलाव नहीं हो सकता क्यों की कहानी आगे बढ़ चुकी है फिलहाल कहानी का मध्यांतर हो चुका है
 
आज इस कहानी पर कोमल जी की पोस्ट पर विस्तृत प्रतिक्रिया देख कर मुझे ऐसा एहसास हो रहा है जैसे आप भी एक पढ़ी लिखी और जागरूक पाठिका हैं..

जुड़े रहे
 
भाग-61

कामुकता का जैसे अकाल पड़ गया था।

सारा दारोमदार सोनी पर आ गया था। सोनी की बहन मोनी अभी भी धर्म परायण थी और अपने शरीर में छुपे हुए खजाने से अनजान अपनी मां का हाथ बटाने में लगी रहती थी।

सोनी बिस्तर पर लेटी विकास के साथ बिताए पल याद कर रही थी उसकी हथेलियां स्तनों पर रेंग रही थी और जांघो के बीच फसा तकिया हिल रहा था…

जैसे जैसे तकिए की रगड़ जांघों के जोड़ पर बढ़ती गई सोनी की हथेलियां सूखी चुचियों को छोड़कर रसीली बुर की तरफ बढ़ गई। सोनी को अपनी रसीली बूर् को सहलाने में बेहद आनंद आता था..जैसे ही उंगलियों ने रसीले छेद पर छलके चिपचिपे रस को छुआ .तभी


"सोनी ए सोनी…." सोनू ने आवाज लगाई

अब आगे..

"आई भैया" सोनी चिल्लाई

जब तक सोनी की आवाज बाहर पहुंचती सोनू कमरे में दाखिल हो चुका था यह तो शुक्र था कि सोनी के हाथ उसके लहंगे से बाहर आ चुके थे परंतु उंगलियों में रस अभी भी लगा हुआ था. सोनी ने उस रस को अपने नितंबों को ढक रहे घागरे में पोछने की कोशिश की और बोली..

"का चाहीं"

"थोड़ा बोरोप्लस लगा दे देख यहां का कटले बा"

सोनी ने देखा सोनू की नाक के नीचे एक कीड़े ने काट लिया था चमड़ी छिली हुई प्रतीत हो रही थी। सोनू के दोनों हाथ भैंसों के चारे से लथपथ थे शायद वह भैंसों के नाद ( जिसमेँ भैसें खाना खाती हैं) में चारा डाल कर उसे मिला रहा था।

सोनी ने दीवाल पर टंगे शीशे के साथ लगी प्लेट में रखा बोरोप्लस उठाया और अपनी उंगलियों में लेकर सोनू की नाक के ठीक नीचे लगे जख्म पर लगाने लगी एक पल के लिए सोनी यह भूल गई की उसकी उंगलियां प्रेम रस से संनी हुई थीं।


यद्यपि उसने उस रस को अपने घागरे में पोंछ लिया था परंतु कुवारी चूत की खुशबू अभी भी उसकी उंगलियों में समाहित थी।

जिस तरह कस्तूरी मृग अपनी नाभि में छुपे सुगंध को नहीं पहचान पाता उसी प्रकार सोनी भी उस खुशबू से अनभिज्ञ थी। परंतु सोनू वह तो इस काम रस की खुशबू से अभी हाल में ही वाकिफ हुआ था और उसकी मादक खुशबू को बखूबी पहचानता था।

अपनी लाली दीदी की चूत में उंगली घुमा कर उसने न जाने कितनी बार अपनी उंगलियों को प्रेम रस से सराबोर किया था और उन पर आई मदन रस को न जाने कितने घंटों तक सहेज कर उसकी मादक खुशबू का आनंद लिया था।


जैसे ही सोनी की उंगलियां सोनू की नाक के नीचे पहुंची सोनू की घ्राणेन्द्रियों ने उन्होंने सोनी की उंगलियों में लगी उसकी कुंवारी चूत की खुशबू बोरोप्लस की खुशबू पर भारी पड़ गयी। सोनू ने उसे अपने संज्ञान में ले लिया वह खुशबू उसे जानी पहचानी लगी ….

बनारस महोत्सव ने सोनू को स्त्रियों के यौन अंगों और उनसे रिसने वाले काम रस से भलीभांति परिचित करा दिया था.

यदि सामने सोनी की जगह लानी होती तो सोनू निश्चित ही यकीन कर लेता की उसके दिमाग में आए खयालात पूरी तरह सच है परंतु चूंकि यह उसकी छोटी बहन सोनी थी, सोनू का दिल यह बात मानने को तैयार न था की वह खुशबू सोनी की नादान चूत की ही थी। सोनू की निगाह में अब भी सोनी एक किशोरी ही थी उसे क्या पता था लड़कियां ज्यादा जल्दी जवान होती हैं और जांघों के बीच भट्टी जल्दी सुलगने लगती है..

सोनू ने उंगलियों को सुघने के लिए कुछ ज्यादा ही प्रयास किया जिसे सोनी ने महसूस कर लिया और उसे यह बात ध्यान आ गई उसने फटाक से अपने हाथ नीचे खींच लीयेऔर बोली

"लग गया…" और शर्माती लजाती तेजी से कोठरी से बाहर निकल गयी…..

सोनू भी वहां से हट गया पर अभी भी उस भीनी भीनी खुश्बू की तस्दीक कर रहा था कि क्या सोनी की उंगलियों पर कुछ और भी लगा था?


यह पहला अवसर था जब सोनू के मन में सोनी की युवा अवस्था का ख्याल आया अन्यथा आज तक तो वह उसकी प्यारी गुड़िया ही थी।

एक-दो दिन बाद सोनू वापस बनारस आ कर अपनी पढ़ाई में लग गया।

बनारस महोत्सव ने कईयों के अरमान पूरे किए थे और कईयों को उनकी किए की सजा भी दी थी एक तरफ सोनू ने इस महोत्सव में लाली की चूत में डुबकी लगाई थी वही विकास ने सोनी के जाँघों के बीच छलकती पहाड़ी नदी और उसकी उष्णता का आनंद लिया था। वहीं दूसरी तरफ सरयू सिंह को इस महोत्सव में ऐसी स्थिति में ला दिया था जहां वह न सिर्फ पश्चाताप की अग्नि में जल रहे थे अपितु अब उन्हें अपना जीवन बोझ लगने लगा था।

सोनू और विकास दोनों ही हॉस्टल के कमरे में अपने बिस्तर पर लेटे छत को देख रहे थे आंखें छत से चिपकी हुई थी पर दिमाग चूत पर टिका था।

कितना अद्भुत सृजन है नियति का एक छोटा पर अद्भुत छेद … लगता है जैसे सारी संवेदनाएं और भावनाएं उस अद्भुत कलाकृति के इर्द-गिर्द ही घूमती है। वही प्रेम का चरम है वही जन्म का स्त्रोत है वही रिश्तो की जनक है वही पवित्र है वही पाप है…..

विकास अपने पहले अनुभव को साझा करना चाहता था। उसने बात शुरू करते हुए से सोनू से कहा...

इस बार तो तू अपनी लाली दीदी से चिपका रहा?

सोनू ने विकास की तरफ देखा परंतु कुछ बोला नहीं

" बेटा मैं जानता हूं कि वह गच्च माल तेरी असली दीदी नहीं है…"


"सच कहूं तो भगवान को ऐसी सुंदर और गदराई माल का कोई भाई नहीं होना चाहिए …तू कैसे उसे अपनी दीदी मां पाता है?" विकास मैं अपनी कही गई बात पर बल देते हुए कहा।

सोनू से अब और बर्दाश्त ना हुआ वह अपनी सफलता अपने दोस्त से साझा करना चाहता था उसने मुस्कुराते हुए कहा..

"दीदी है ना तभी तो दे दी…."

विकास बिस्तर पर उठ कर बैठ गया और उत्सुकता से पूछा…

"तू क्या तूने चोद लिया"

" हां, चोद लिया" सोनू ने शर्माते हुए कहा.. वह भी अपने प्रथम संभोग की बातों को साझा कर अपनी मर्दानगी का बखान करना चाहता था..

" बता...ना कैसे कैसे हुआ?"


सोनू ने लाली के साथ बिताए गए पलों को विकास से पूरी तरह साझा कर लिया जैसे-जैसे सोनू की कहानी संभोग के करीब पहुंची वैसे वैसे उसने अपनी कहानी से राजेश को दूर कर दिया सोनू को यह बात अब भी समझ नहीं आ रही थी कि आखिर राजेश जीजु उसे लाली के समीप आने पर रोक क्यों नहीं रहे थे परंतु सोनू तो लाली का आम चूसने में व्यस्त था उसे गुठलियों से क्या मतलब था।

संभोग का विवरण सुनते सुनाते दोनों युवा एक बार फिर उत्तेजित हो गए और उनके लण्ड एक बार फिर हथेलियों का मर्दन झेलने लगे। यह भी एक विधि का विधान है जब वह अंग सबसे कोमल रहता है तब उसे सख्त हथेलियों के मर्दन का शिकार होना पड़ता है।

अब बारी विकास की थी उसने जैसे-जैसे सोनी के शरीर और उसके कामांगो के बारीक विवरण प्रस्तुत किए सोनू के दिमाग में उस किशोरी की छवि बनती चली गई। जैसे-जैसे विकास के विवरण में उस किशोरी की कुंवारी चूत का अंश आने लगा सोनू भाव विभोर हो गया। उसका लण्ड उसकी कठोर हथेलियों के मर्दन से तंग आ चुका था और शीघ्र स्खलित हो कर अपने कर्तव्य का निर्वहन करना चाहता था।

विकास ने बताया..

"यार चूत की खुशबू क्या नशीली होती है, मैं तो उसे रात तक सूंघता रह गया था…"

सोनू के दिमाग में बरबस सोनी का ख्याल आ गया सोनी की उंगलियों में बसी बुर की खुशबू को सोनू ने अपने दिलो-दिमाग में बसा लिया था।

अपनी लाली दीदी की फूली हुई चूत रूपी ग़ुलाब को छोड़कर अचानक सोनू के दिमाग में गुलाब की कली का ध्यान आ गया। एक पल के लिए सोनू यह भूल गए कि जिस कली को वह मसलने की सोच रहा है वह उसकी अपनी छोटी बहन सोनी थी। उत्तेजना ने पराकाष्ठा प्राप्त की और सोनू के लण्ड ने अपना तनाव त्यागना शुरू कर दिया और अपनी दुग्ध धारा खुले आसमान की तरफ छोड़ दी। उधर विकास में भी अपना स्खलन प्रारंभ कर दिया था।


दोनों ही युवा पुरुषों से निकल रही वीर्य धारा एक दूसरे से होड़ लगा रही थी। परंतु सोनू था गांव का गबरु जवान और सरयू सिंह की प्रतिमूर्ति और विकास शहर का सामान्य युवक …. लण्ड की धार चाहे जैसी भी रही हो तृप्ति का एहसास उन दोनों के चेहरे पर था।

विकास को क्या पता था जिस किशोरी का उसने वर्णन किया था वह सोनू की अपनी बहन सोनी थी।

समय बीतते देर नहीं लगती। उधर सलेमपुर में जैसे ही स्थितियां सामान्य हुई सुगना ने सूरज द्वारा जीते गए पैसों से गंगा नदी के किनारे उसी सोसाइटी में एक मकान खरीदा जिसके काउंटर के बगल में लॉटरी की टिकट बिक रही थी।


उसने लाली और राजेश को भी उसी सोसाइटी में मकान खरीदने के लिए मना लिया। सुगना के समीप रहने की बात सोच कर राजेश बेहद उत्साहित हो गया अपने प्रोविडेंट फंड के पैसे निकालकर वह उस सोसाइटी में मकान खरीदने के लिए तैयार हो गया।

पैसों की तंगी राजेश और लाली के पास भी थी। यह तो सुगना की दरिया दिली थी कि उसने अपने जीते हुए पैसों का कुछ भाग राजेश और लाली को भी दे दिया ताकि वह उसी सोसाइटी में उसके ठीक बगल का मकान खरीद पाए। राजेश ने बाकी पैसे अपने लोन से उठा लिए।

सरयू सिंह सुगना की दूरदर्शिता से पूरी तरह प्रभावित थे। बनारस शहर में मकान खरीदने का निर्णय सुगना ने किया था और वह तुरंत ही उसकी बात मान गए थे। क्योंकि वह पूरी तरह स्वस्थ न थे उन्होंने इस विशेष कार्य के लिए रतन और राजेश पर विश्वास कर लिया था और अपने संचित धन का महत्वपूर्ण हिस्सा उस घर पर लगा दिया। सरयू सिंह अपनी इस आकस्मिक पुत्री के जीवन में खुशियां लाना चाहते थे और उसकी हर इच्छा पूरी करना चाहते थे। राजेश ने भी सुगना को खुश करने के लिए घर के लिए आवश्यक साजो सामान खरीदने में अपने संचित धन का प्रयोग किया और कुछ ही दिनों में घर रहने लायक स्थिति में आ गया।

सुगना ने एक और कार्य किया उसने सोनू की मदद से जीते हुए पैसों से दो मोटरसाइकिल खरीदी और एक राजेश को तथा एक अपने पति रतन को उपहार स्वरूप दे दिया। फटफटिया की अहमियत के बारे में लाली उससे कई बार बातें कर चुकी थी सुगना मन ही मन यह सोच चुकी थी कि लॉटरी में जीते गए पैसे पर लाली का भी उतना ही अधिकार है जितना उसका। आखिर वह टिकट राजेश ने हीं खरीदी थी।

रतन और राजेश फटफटिया देखकर बेहद प्रसन्न हो गए यह अलग बात थी कि वह अपनी इस आकांक्षा को पूरा तो करना चाहते थे परंतु उन्हें कभी कभी यह फिजूलखर्ची लगती थी परंतु जब सुगना ने सामने से ही मोटरसाइकिल खरीदने का निर्णय कर लिया था तो वह उसके निर्णय के साथ हो गए थे और भौतिकता के इस उपहार का आनंद लेने के लिए सहर्ष तैयार हो गए थे ।

वह दोनों न सिर्फ सुगना की कामुकता के कायल थे अपितु उसकी दरियादिली के भी। सच सुगना बेहद समझदार थी और पूरे परिवार को साथ लेकर चलने वाली थी।

कुछ ही दिनों में बनारस का मकान पूरी तरह तैयार हो गया। सुगना और लाली का परिवार बेहद प्रसन्न था।

राजेश की मदद से रतन को भी बनारस में उसी होटल में की नौकरी मिल गई जिसमे सुगना के दूसरे छेद का उदघाटन हुआ था।

नए मकान का गृहप्रवेश था। सलेमपुर गांव से कई सारे लोग सुगना और लाली के गृह प्रवेश में आए हुए थे गृह प्रवेश की पूजा में लाली और राजेश तथा सुगना और रतन जोड़ी बना कर बैठे थे रतन और सुगना को एक साथ बैठे देख कर कजरी का मन फूला नहीं समा रहा था वह बेहद प्रसन्न थी। आखिर भगवान ने उसकी सुन ली थी।

पूजा-पाठ का दौर खत्म होते ही खानपान का कार्यक्रम प्रारंभ हो गया सभी सुगना और सूरज की तारीख करते नहीं थक रहे थे कितना भाग्यशाली था सूरज लाटरी के जीते हुए पैसे ने सुगना और उसके परिवार को एक नई ऊंचाई पर ला दिया था।

अकस्मात आया धन अपने साथ दुश्मन लेकर आता है। घर के बाहर पंगत में बैठे लोग वैसे तो सुगना और उसके परिवार के शुभचिंतक थे परंतु उनमें से कई ऐसे भी थे जो इस इस प्रगति से ज्यादा खुश न थे।

रतन और बबीता की पुत्री मिंकी पंगत में पानी के गिलास रख रही थी मिंकी का चेहरा उसके पिता रतन से मिलता था गांव के ही एक व्यक्ति ने मिंकी को देखकर पूछा..

"ई केकर लईकी ह"

सरयू सिंह जो पास में है खड़े थे और पंगत की व्यवस्था देख रहे थे उन्होंने उत्तर दिया

"मिन्की बेटा जा होने गिलास दे आव"

"रतन के दोस्त के लईकी ह, एकर माई बाबूजी दोनों नई खन"

सरयू सिंह ने अपने परिवार की इज्जत का ख्याल कर रतन की दूसरी शादी की बात को छुपा लिया परंतु मिंकी के चेहरे पर रतन के प्रभाव को वह समझा पाने में नाकाम थे। जाकी रही भावना जैसी... पंगत में बैठे लोगों ने सरयू सिंह की बात को सुना और अपनी अपनी मनोदशा के अनुसार उनकी बात पर यकीन कर लिया।

सरयू सिंह ने उन सभी को यह बातें स्पष्ट कर दी कि अब मिंकी उनके ही परिवार का अंग है और रतन और सुगना ने उसे पुत्री रूप में अपना लिया है।

सुगना बेहद प्रसन्न थी। मिन्की सुगना से पूरी तरह हिल मिल गई थी वह हमेशा सुगना के आसपास ही रहती और छोटी-छोटी मदद करती रहती सुगना उसे अपनी सूज बुझ के अनुसार पढ़ाती तथा प्लेट पर क ख ग घ लिखना सिखाती। सुगना के मृदुल व्यवहार ने मिंकी का मन मोह लिया था वह सुगना को अपने मां के रूप में स्वीकार कर चुकी थी।

सुगना के सारे मनोरथ पूरे हो रहे थे। पेट में आया गर्भ अपना आकार बड़ा रहा था। पूजा की शाम को वह सरयू सिंह के समीप गई और उनके चरण छूने के लिए झुकी...

सरयू सिंह पूरी तरह सुगना को अपनी बेटी मान चुके थे उन्होंने अपनी अंतरात्मा से उसे आशीर्वाद दिया

"खुश रहो बेटी भगवान तोहर मनोकामना पूरा करें और सूरज के जइसन एगो और भाई होखे"

"बाबूजी हमारा लईकी चाहीं…" सुगना ने चहकते हुए कहा..

सुगना उठ कर खड़ी हो चुकी थी और सरयू सिंह के आलिंगन में जाने का इंतजार कर रही थी। पिछले दो-तीन माह से उसे सरयू सिंह की अंतरंगता और आलिंगन का सुख नहीं मिला था। परंतु आज खुशी और एकांत में सुगना की कामुकता जवान हो उठी थी वह स्वयं उठकर अपने बाबुजी के आलिंगन में आ गए अपनी चूचियां उनके सीने से रगड़ ती हुई बोली ..

"हमार पेट फुला के त रहुआ भुला गईनी... लागा ता ई हो बूढा गईल बा…"

सुगना की निगाहें सरयू सिंह के चेहरे से हटकर उनके लण्ड की तरफ बढ़ने लगीं और हाथों ने उन निगाहों का अनुकरण किया । जब तक की सुगना के हाथ सरयू सिंह के लटके हुए लण्ड को छूने का प्रयास करते सरयू सिंह ने सुगना का हाथ पकड़ लिया और उसे उसके गालों पर लाते हुए बोले..

"अब ई सब काम मत कर….बच्चा पर ध्यान द... और एक बात कही..?"

"ना पहले ई बतायी रहुआ हमरा से दूर काहे भाग तानी"

सुगना ने अपनी चुचियों को ब्लाउज से आजाद कर दिया और बोली..

"यह दोनों हमेशा राहुल इंतजार करेले सो डॉक्टर खाली उ सब काम के मना कइले बा ई कुल खातिर नाहीं…"

सुगना ने अपनी चूचियां खोल कर उन्हें मीसने का खुला निमंत्रण सरयू सिंह को दे दिया था।

सरयू सिंह ने अपनी आंखें बंद कर लीं। वह अपनी पुत्री को अपने मन की व्यथा समझा पाने में पूरी तरह नाकाम थे।

सुगना ने अपनी कामकला का पाठ उन से ही सीखा था और उसे सरयू सिंह की यह बेरुखी बिल्कुल रास ना आ रही थी । यद्यपि यह बात वह जानती थी कि सरयू सिंह अभी उस दिन के सदमे से उबर रहे थे परंतु वह उनके कामुक स्पर्श के लिए बेताब और बेचैन थी।


उसे यह बात कतई समझ ना आ रही थी की सरयू सिंह की उत्तेजना को क्या हो गया था? जो व्यक्ति दिन में एक दो नहीं कई बार एकांत में उसे देखकर अपने आलिंगन में भर लेता और यथासंभव अपना स्पर्श सुख देता वह पिछले कई दिनों से उसी से दूर दूर रह रहा था।

सुगना को अचानक अपनी जांघों के बीच गिरे राजेश के वीर्य का ध्यान आया कहीं उसके बाबूजी मैं उसे गलत तो नहीं समझ लिया? सुगना परेशान हो गई उसने अपने मन में सोची हुई बात पर यकीन कर लिया और सरयू सिंह की नाराजगी के कारण को उससे जोड़ लिया।

उसने सरयू सिंह को मनाने की सोची… और घुटनों के बल आने लगी उसकी मुद्रा से सरयू सिंह ने आगे के घटनाक्रम का अंदाजा लगा लिया और वह पलट गए खिड़की की तरफ देखते हुए उन्होंने सुगना से कहा ..

"सुगना बेटा हमार ए गो बात मान ल…"

"बाउजी जी हम तो राउरे बानी आप जैसे कहब हम करब हमरा से नाराज मत होखी.. कौनो गलती भईल होखे तो हमार मजबूरी समझ के माफ कर देब"

सुगना ने अपने मनोदशा के अनुसार उस कृत्य के लिए सरयू सिंह से माफी मांग ली.

सरयू सिंह के मन में कुछ और ही चल रहा था उन्होंने सुगना को अपने सीने से लगा लिया परंतु यह आलिंगन में कामुकता कतई न थी सिर्फ और सिर्फ प्यार था. सुगना उनके आलिंगन में थी परंतु स्तनों ने जैसे अपना आकार सिकोड़ लिया था। उत्तेजना से सुगना के सख्त हो चुके निप्पलों ने भी इस नए प्रेम को पहचान लिया और उन्होंने अपना तनाव त्याग दिया। सुगना अपने पिता के आलिंगन में आ चुकी थी। सरयू सिंह का यह रूप उसे बेहद अलग प्रतीत हो रहा था परंतु भावनाएं प्रबल थी उसे सरयू सिंह के आलिंगन में अद्भुत सुख मिल रहा था।

सुगना ने पुरुष का यह रूप शायद पहली बार देखा था वह भावविभोर थी और आँखों मे अश्रु लिए सरयू सिह से सटती जा रही थी।

सरयू सिंह ने सुगना के कोमल गालों को अपने हाथों में लेते हुए उसके माथे को चूम लिया और बेहद प्यार से बोले ..

"बेटा हमार बात मनबु?

"हा बाबूजी" सुगना ने अपनी पलकों पर छलक आए आंसू को पूछते हुए कहा

"हमरा खातिर रतन के माफ कर द…"

सुगना ने कोई उत्तर न दिया…

सरयू सिंह ने फिर कहा..

"जीवन ने सब कुछ अपना मर्ज़ी से ना होला..हम सब कहीं न कहीं गलती कइले बानी जा… पर अब गलती के ठीक करके बा"

सुगना को अपनी गलती का प्रायश्चित करने का विचार आ चुका था…

"ठीक बा बाबूजी… पर का उ अब हमारा के अपना पइहें"

"बेटा उ सब कुछ छोड़ के तहरे पास आइल बा….उ..अब हमारा सुगना बेटा के तंग करी त लाठी से पीटब"

सुगना के होंठो पर मुस्कुराहट आ गयी। चेहरा कांतिमान ही गया। नियति सुगना को देख रही थी और सुगना के भविष्य का ताना बाना बुन रही थी।


रतन सचमुच सुगना से प्यार करने लगा था उसे पता था कि सूरज और उसके गर्भ में पल रहा दूसरा बच्चा भी उसका नहीं था परंतु वह इन सब बातों से दूर सुगना पर पूरी तरह आसक्त हो चुका था वह एक पति की तरह उसका ख्याल रखता और हर सुख दुख में उसका साथ देता.

कुछ ही दिनों में लाली और सुगना दोनों ही अपने नए घर में पूरी तरह सेट हो गई। उनका गर्भ लगभग 6 माह का हो चुका था। दोनों ही एक साथ गर्भवती हुई थी दोनों साथ बैठती और अपने गर्भ के अनुभव को साझा करती…

एक दिन लाली ने सुगना का फूला हुआ पेट सहलाते हुए पूछा

"ए में केकर बीज बा तोर जीजाजी कि रतन भैया के…?"

"जब होइ त देख लीहे…"

सुगना इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट तौर पर दे सकती थी उसका संशय तो राजेश और बाबूजी के बीच था, रतन तो इस खेल से पूरी तरह बाहर था। निश्चित ही राजेश का पलड़ा भारी था...

सुगना के मन में उस दिन के दृश्य ताजा हो गए जब वह बनारस महोत्सव की आखिरी रात को राजेश के घर पर थी जाने यादों और संवेदनाओं में ऐसी कौन सी ताकत होती है जो दूसरा पक्ष भी पहचान लेता है। राजेश भी रेल की खिड़की से सर टिकाए स्वयं उस दिन की यादों में खोया हुआ निर्विकार भाव से बाहर की काली रात को देख रहा था और उसका अंतर्मन सुगना को याद कर रोशन था रोमांचित हो रहा था …

शेष अगले भाग में...
 
धन्यवाद

Thanks

Thanks

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धन्यवाद अपडेट का सारांश देने के लिए।

कौन और क्या जवाब मांग रहा है???

ऊपर वाली कन्या तो कुछ और मांग रही है
 
अरे आप तो बड़े दिनों बाद दिखाई पड़े आप भी अभी तक इस कहानी को पढ़ रहे हैं जानकर अच्छा लगा.

कहानी का आगे बढ़ना या न बढ़ना पाठकों पर ही निर्भर है प्रतिक्रियाएं धीमी पड़ते हैं लेखन स्वतः ही धीमा हो जाता है...

जुड़े रहे..
 
भाग 62

सुगना के मन में उस दिन के दृश्य ताजा हो गए जब वह बनारस महोत्सव की आखिरी रात को राजेश के घर पर थी। जाने यादों और संवेदनाओं में ऐसी कौन सी ताकत होती है जो दूसरा पक्ष भी पहचान लेता है। राजेश भी रेल की खिड़की से सर टिकाए स्वयं उस दिन की यादों में खोया हुआ निर्विकार भाव से बाहर की काली रात को देख रहा था और उसका अंतर्मन सुगना को याद कर रोशन था रोमांचित हो रहा था …



अब आगे....

लाली के घर मे बनारस महोत्सव की आखिरी रात लाली और सुगना बिस्तर पर सुंदर नाइटी में लिपटी हुई बातें कर रही थी। कुछ वस्त्र तन को इस प्रकार ढकते हैं कि वह उसे और कामुक बना देते हैं वही हाल लाली और सुगना का था। दोनों परियां दीये की रोशनी में कयामत ढा रहीं थीं पर इन पर मार मिटने वाला राजेश बाहर हाल में लेटा हुआ उन्हें ही याद कर रहा था।

लाली में खुश होकर कहा

"आज त ते भाग्यशाली बाड़े"

सुगना को एक पल के लिए सच में एहसास हुआ कि जैसे वह इस दुनिया के सबसे भाग्यशाली औरत हो। भरपूर धन दौलत जो आज राजेश की बदौलत उससे मिल चुकी थी एक खूबसूरत और प्यारा बेटा जो सूरज के रूप में उसके पास था और तीसरा काम सुख.. यह अलग बात थी कि उसे पुरुष संसर्ग का सुख अपने पति के बजाए अपने प्यारे बाबू जी से मिला था पर वह अनुभव अद्भुत और बेहद आनंददायक था।

पिछले 3 -4 वर्षों में न तो उसे कभी अपने पति की कमी कभी महसूस न हुई थी वह दुनिया की सबसे संतुष्ट औरत थी। परंतु पिछले 3-4 दिनों में उसकी अधीरता चरम पर पहुंच चुकी थी। विद्यानंद की बातों पर विश्वास कर गर्भधारण उसके लिए बेहद अहम और एक चुनौती बन गया था।

सुगना जैसे संतुष्ट और खुशहॉल युवती अचानक ही हतभगिनी बन गई थी। जिस स्त्री को अपने ही पुत्र से संभोग करना पड़े निश्चित ही यह मानसिक कष्ट असहनीय होगा और तो और इसके बचाव का तरीका भी कम कष्टकारी न था अपनी ही पुत्री को अपने पुत्र से संभोग कराना यह घृणित और निकृष्ट कार्य सुगना के भाग्य में नियति ने सौंप दिया था। लाली ने फिर कहा

"कहां भुला गइले" सुगना उदास होकर बोली

"लागा ता हमार मनोकामना पूरा ना हो पायी"

"रतन भैया त आ गइल बाड़े" सुगाना के ना तो दिमाग में और ना ही खयालों में कभी रतन का नाम आया था वह कुछ ना बोली और चुप ही रही।

"कह त जीजा जी के बुला दे तानी*

सुगना ने पिछले दो दिनों में मन ही मन कई बार राजेश के बारे में सोचा था अपने अवचेतन मन में में वह स्वयं को राजेश के सामने नग्न तो कर लेती पर अपनी जाँघे खोल कर उनके काले लण्ड को अपनी बुर में…..….छी छी सुगना तड़प उठती। क्या वह सच में राजेश से संभोग करेगी? जिस रसीली चूत को उसके बाबूजी रस ले लेकर चूसते और चाटते हैं और उसमेँ किसी पराये मर्द का….….आह… सुगना की बुर सतर्क हो गयी…परंतु आज राजेश का पलड़ा बेहद भारी था।

सुगना स्वयं को तैयार करने लगी तभी लाली ने कहा "अच्छा हम जा तानी हम कालू मल ( राजेश का लण्ड) के दूह ले आवा तानी. ते आंख बंद करके सुतल रहिये ..बस उनका के आपन दिया (बुर) देखा दीहें ओ में तेल हम गिरवा देब"

उधर सुगनामन ही मन चुदवाने को तैयार हो रही थी परंतु लाली ने यह सुझाव देकर वापस उसे एक सम्मानजनक परिस्थिति में ला दिया। उसने अपनी मूक सहमति दे दी।

उधर राजेश ….जन्नत में सैर कर रहा था..

खूबसूरत पलंग पर लाल चादर बिछी हुई थी। लाली पूर्ण नग्न अवस्था में बिस्तर पर लेटी थी जैसे उसका ही इंतजार कर रही थी। पूरे कमरे में घुप्प अंधेरा था परंतु बिस्तर और उस पर लेटी हुई लाली चमक रही थी।

राजेश बिस्तर पर आ चुका था कुछ ही देर में उसका खड़ा लण्ड लाली की बुर में प्रवेश कर गया। दो सख्त और दो मुलायम जांघों के बीच घर्षण शुरू हो गया। पति-पत्नी की काम क्रीड़ा हमेशा की तरह आगे बढ़ने लगी।

अचानक राजेश को लाली को बगल में किसी के लेटे होने का एहसास हुआ उसने लाली से पूछा

"अरे ई कौन है"

लाली की गूंजती हुई आवाज आयी

"जेकर हमेशा सपना देखेनी उ हे ह आपके सुगना.."

"फेर काहे बुला लेलु हा , जाग गईल त?

"अरे उ घोड़ा बेच के सुतेले उ ना जागी.."

" हमरा ठीक नईखे लागत, चल हाल में चलीजा "

"अरे एहिजे कर लीं उ ना जागी"

राजेश लाली को चोदते चोदते अचानक रुक गया था परंतु लाली के आश्वासन से एक बार फिर उसके कमर की गति ने रफ्तार पकड़ ली लाली ने राजेश को छेड़ा

"आज त कालू मल (राजेश का लण्ड) कुछ ज्यादा ही उछलत बाड़े। लागता आपके दिमाग में सुगना घूमत बिया"

"लाली मत बोल उ जाग जायी" राजेश मन ही मन उत्साहित भी था पर घबरा भी रहा था।

राजेश को लाली के बगल में सोई हुई सुगना की आकृति दिखाई दे रही थी परंतु उसका शरीर पूरी तरह नाइटी से ढका हुआ था.

अचानक लाली ने अपने हाथ बढ़ाए और सुगना की फ्रंट ओपन नाइटी के दोनों भाग दोनों तरफ कर दिए राजेश की निगाहें सुगना की भरी-भरी चुचियों पर टिक गई जो कार की हेडलाइट की तरह चमक रहीं थीं। राजेश की तरसती आंखों ने सुगना की चुचियों के दिव्य दर्शन कर लिए।

उस सुर्ख लाल बिस्तर पर सुगना का गोरा शरीर चमक रहा था पूरे शरीर पर कोई आभूषण न था परंतु सुगना की छातियों पर जो दुग्ध कलश थे सुगना के सबसे बड़े गहने थे। खूबसूरत और कसी हुई चूचियां गुरुत्वाकर्षण को धता बताकर पूरी तरह तनी हुई थी उस पर से निप्पल अकड़ कर खड़े थे जैसे सुगना के नारी स्वाभिमान की दुहाई दे रहे हों। चुचियों में वह आकर्षण था जो युवकों को ही क्या युवतियों को ही अपने मोहपाश में बांध ले।

राजेश जैसे-जैसे सुगना को देखता गया उसका लण्ड और खड़ा होता गया ऐसा लग रहा था जैसे शरीर का सारा रक्त लण्ड में घुसकर उसे फूलने पर मजबूर कर रहा था। राजेश का लण्ड अभी भी लाली के बुर में था पर वह शांत था। राजेश की निगाह छातियों की घाटी पर गई.. सुगना ने मंगलसूत्र क्यों उतारा था राजेश मन ही मन सोचने लगा…

कहीं सुगना संभोग आतुर तो नहीं शायद उसने अपने पति रतन का दिया मंगलसूत्र इसीलिए उतारा था? राजेश के मन में आए प्रश्न का उत्तर स्वयं राजेश ने हीं दिया और उसका मन कुलांचे भरने लगा।

लाली मुस्कुराते हुए राजेश को देख रही थी जिसकी आंखें सुगना की चुचियों से चिपकी हुई थी और होंठ आश्चर्य से खुले हुए थे।

राजेश का कालूमल अब अधीर हो रहा था शांति उसे कतई पसंद न थी उछलना उसका स्वभाव था और वह लाली की बुर में अठखेलियां करने के लिए तत्पर था लाली ने कहा

"लागा ता ओकरा चूँची में भुला गईनी"

राजेश वापस से लाली को चोदने लगा इस बार कमर के धक्कों की रफ़्तार कुछ ज्यादा थी निश्चित ही इसमें सुगना की चुचियों का असर था लाली ने कहा

"अब साध बुता गईल की औरू चाहीं"

सुगना राजेश के लिए एक अप्सरा जैसी थी उसकी चुचियों को देखकर उसके आकांक्षाएं और बढ़ गयीं सबसे प्यारी और पवित्र चीज सुगना की बुर अब भी उसकी निगाहों से दूर थी। सुगना की बुर और जांघों का वह मांसल भाग देखने के लिए राजेश तड़प उठा।

सुगना की जाँघों का पिछला भाग वह पहले देख चुका था परंतु आगे का भाग की कल्पना कर न जाने उसने कितनी बार कालूमल का मान मर्दन किया था राजेश ने लाली से कहा..

" नीचे भी हटा दी का?"

"मन बा तो हटा दी उ ना जागी घोड़ा बेच के सुतेले" लाली ने अपनी बात एक बार फिर दोहराई और राजेश के हौसले को बढ़ाया।

राजेश ने हिम्मत करके नाइटी का निचला भाग भी हटा दिया नाइटी अलमारी के 2 पल्लों की तरह खुलकर बिस्तर पर आ गए और सुगना का कोमल और कमनीय शरीर राजेश की निगाहों के सामने पूर्ण नग्न अवस्था में आ गया। सुगना ने अपने पैर के दोनों पंजे एक दूसरे के ऊपर चढ़ाए हुए थे। दोनों जाँघे एक दूसरे से चिपकी हुई थी।

अलमारी खुल चुकी थी परंतु तिजोरी अब भी बंद थी। जांघों के मांसल भाग ने सुगना की बुर पर आवरण चढ़ा रखा था वह तो उसके बुर् के घुंघराले बाल थे जो खजाने की ओर संकेत कर रहे थे परंतु खजाना देखने के लिए सुगना की मांसल जांघों का अलग होना अनिवार्य था।

राजेश को जांघों के बीच बना अद्भुत और मनमोहक त्रिकोण दिखाई दे रहा था सुगना के चमकते गोरे शरीर पर छोटे छोटे बालों से आच्छादित वह त्रिकोण राजेश को बरमूडा ट्रायंगल जैसा प्रतीत हो रहा था। वह उसके आकर्षण में खोया जा रहा था उसका अंतर्मन उस सुखना की अनजानी और अद्भुत गहराई में उतरता जा रहा था ।

उसने लाली की चुदाई बंद कर दी थी और भाव विभोर होकर बरमूडा ट्रायंगल के केंद्र में बने उस अद्भुत दृश्य को अपनी आंखें बड़ी-बड़ी कर देख रहा था परंतु गुलाबी छेद का दर्शन तब तक संभव न था जब तक सुगना अपनी जांघों के पट ना खोलती और अपने गर्भ द्वार और उसके पहरेदार बुर् के होठों को न खोलती।

लाली ने राजेश का ध्यान भंग किया और बोली

"आप देखते रहीं हम जा तानी सुते" अपना कालूमल के निकाल ली। "

लाली ने यह बात झूठे गुस्से से कही थी राजेश को अपनी गलती का एहसास हुआ और वह सुगना के सुंदर शरीर को देखते हुए लाली को फिर गचगचा कर चोदने लगा। उसने लाली को चूमते हुए कहा ..

"कितना सुंदर बीया सुगना देखा चुचियों कतना फूलन फूलन बा . रतनवा साला के कितना सुंदर माल मिलल बा। एकदम मैदा के जैसन चूची बा"

"अतना पसंद बा त ध लीं"

"जाग जायी त"

"छोड़ देब"

"हट पागल"

राजेश एक बार फिर लाली को चोदने लगा था परंतु उसकी आंखें सुगना के इर्द गिर्द घूम रही थी।

वह चुचियों को छूना चाहता था उसकी मनोदशा जानकर लाली ने एक बार फिर कहा

"जोर से मत दवाईब खाली सहला लीं"

राजेश जैसे अधीर हो गया था उसने सुगना की चुचियों पर अपना हाथ रख दिया. सुगना जैसे निर्विकार भाव से लेटी हुई थी. उसने कोई प्रतिरोध ना किया और राजेश के हाथ सुगना की चुचियों को प्यार से धीरे-धीरे सहलाने लगे। उसकी उंगलियां सुगना के निप्पलों से टकराते ही और राजेश सिहर जाता। एक पल के लिए राजेश के मन में आया कि वह आगे बढ़ कर उसकी चुचियों को मुंह में भर ले पर राजेश इतनी हिम्मत न जुटा पाया। राजेश ने जो प्यार सुगना की चुचियों के साथ दिखाया था उसका असर सुगना के कमर के निचले भाग पर भी हुआ।

सुगना के गर्भ द्वार के पटल खुल गए सुगना की दोनों एड़ियां दूर हो चुकी थी और जाँघे भी उसी अनुपात में अलग हो चुकी थी। सुगना की रानी झुरमुट से बाहर मुंह निकालकर खुली हवा में सांस ले रही थी। राजेश की निगाह इस परिवर्तित अवस्था पर पढ़ते ही वह अधीर हो गया। उसने लाली की बुर से अपना लण्ड बाहर खींच लिया और अपने सर को सुगना की जांघों के ठीक ऊपर ले आया। उसके दोनों पैर लाली और सुगना के बीचो-बीच आ गए.

गोरी सपाट चिकनी और बेदाग चूत को देखकर राजेश मदहोश हो गया उसने लाली की तरफ देख कर बोला "एकदम मक्खन मलाई जैसी बा"

"तो चाट ली."

" जाग गई त"

"तो आप जानी और आपके साली"

राजेश से और बर्दाश्त ना हुआ उसने अपने होंठ सुगना की कोमल बुर से सटा दिए। अपने दोनों होंठो से सुगना के निचले होठों को फैलाते हुए उसने अपनी जीभ उस गहरी सुराही में छोड़ दी जिस पर पानी छलक रहा था । जीभ ने जैसे ही गहरी गुफा में प्रवेश किया सुगना की बुर से रस छलक कर बाहर आ गया और सुगना के दूसरे छेद की तरफ बढ़ चला। राजेश की निगाहें सुगना की सुगना की बुर को ध्यान से न देख पा रही थी वह कभी सर उठा कर सुगना की बुर को देखता और फिर झुक कर अपने होंठ उससे सटा देता।

नयन सुख और स्पर्श सुख दोनों ही राजेश को पसंद आ रहे थे। सुगना के फैले हुए पैर तन रहे थे। सुगना कि मजबूत जांघों की मांसपेशियां तनाव में आ रही थी राजेश के होठों की मेहनत रंग ला रही थी। सुगना की सांसें तेज चलने लगी । लाली ने सुगना की सांसों में आए बदलाव को महसूस कर लिया था उसने सुगना को चूमते हुए कहा

" ए सुगना मान जा"

"हम कहां रोकले बानी"

सुगना ने यह बात फुसफुसाकर कही थी पर राजेश ने सुन ली.

लाली ने सुगना के हाथ को पकड़ कर राजेश के लण्ड पर रख दिया और सुगना की कोमल हथेलियों से कालूमल को सहलाने लगी।

राजेश ने नए स्पर्श को महसूस किया। सुगना के हांथो में अपने लण्ड को देखकर मस्त हो गया। राजेश तृप्त हो गया उसने एक बार फिर सुगना की सुराही में मुंह डाल दिया।

एक अद्भुत तारतम्य बन गया था। सुगना राजेश का लण्ड तब तक सहलाती जब तक उसे अपनी बूर् चटवाने में मजा आता। जैसे जी राजेश उग्र होकर बूर् को खाने लगता वह लण्ड के सुपारे को जोर से दबा देती और राजेश तुरंत ही बुर से अपने होंठ हटा लेता।

लाली तो धीरे-धीरे इस खेल से बाहर हो गई थी थोड़ी ही देर में राजेश लाली को भूलकर सुगना की जांघों के बीच आ गया परंतु सुगना की जाघें अभी भी एक खूबसूरत कृत्रिम डॉल की तरह निर्जीव पड़ी हुई थी राजेश ने उसे अपने दोनों हाथ से अलग किया और घुटने से मोड़ दिया।

अपने काले लण्ड को सुगना की गोरी चूत के मुहाने पर रखकर वह मन ही मन सुगना को चोदने की सोचने लगा तभी लाली की गूंजती हुई आवाज सुनाई दी…

"अपना साली के सूखले चोदब बुर दिखाई ना देब?"

राजेश को शर्म आई और उसने अपने गले की चैन उतार कर सुगना की चूचियो पर रख दिया चैन से 8 का आकार बनाते हुए उसमें सुगना की चुचियों को उसमें भरने की कोशिश की। परंतु अब सुगना की चूचियां बड़ी हो चुकी थी। वह राजेश की छोटी सी चैन में आने को तैयार न थी। फिर भी राजेश ने यथासंभव कोशिश की और सुगना चुचियों को तो ना सही परंतु निप्पलों को अपने प्रेम पास में बांधने में कामयाब हो गया।

सुगना की निर्जीव पड़ी जाँघे अब सजीव हो चुकी थी वह अपने दोनों पैर घुटनों से मोड़ें दोनों तरफ फैलाए हुए थे और जांघों के बीच उसकी गोरी और मदमस्त फूली हुई बुर अपने होठों पर प्रेम रस लिए अपने अद्भुत निषेचन का इंतजार कर रही थी। अंदर का मांसल भाग भी उभरकर झांकने लगा ऐसा लग रहा था जैसे सुगना की उत्तेजना चीख चीख कर अपना एहसास करा रही थी और अपना हक मांग रही थी।

सुगना की जाँघे स्वतः फैली हुई थी राजेश को उन्हें सहारा देने की कोई आवश्यकता नहीं थी। सुगना की अवस्था प्रणय निवेदन को स्पष्ट रूप से दर्शा रही थी। राजेश ने अपने लण्ड का दबाव सुगना की मदमस्त बुर पर लगा दिया और सुगना की कामुक कराह निकल पड़ी..

"जीजा जी तनी धीरे से….. दुखाता…."

राजेश तो मस्त हो गया यह मादक और अतिकामुक कराह उसने पहली बार सुनी थी उसने निर्दयी भाव से अपने लण्ड को सुगना की बुर में ठान्स ने की कोशिश की और यही वक्त था जब उसका स्वप्न भंग हुआ दरअसल उसके लण्ड ने सुगना की कोमल बुर की जगह जगह चौकी में छेद करने की कोशिश की। परंतु वह काठ की चौकी लण्ड से ज्यादा कठोर थी। राजेश का स्वप्न भंग हो गया था.. और उत्तेजना दर्द में तब्दील हो गई थी।

सुगना की बुर लण्ड जड़ तक पहुंचाने के प्रयास में राजेश के पैर पूरी तरह तन गए थे पंजे बाहर की तरफ हो गए और चौकी के कोने में रखा दूध का वह गिलास जिससे सुगना ने अपने हाथों से दिया था जमीन पर गिर पड़ा खनखनाहट की तेज आवाज हुई और कमरे में लेटी बतिया रही सुगना और लाली सचेत हो गयीं।

राजेश ने अपने आपको पेट के बल चौकी पर पाया । नीचे सुगना ना होकर चौकी पर सूखा बिस्तर था। वह तड़प कर रह गया परंतु उसके होठों पर मुस्कुराहट कायम थी अपने स्वप्न में ही सही परंतु उसने अपनी स्वप्न सुंदरी की अंतरंगता का आनंद ले लिया था। वह पलट कर पीठ के बल आ गया और अपने इस खूबसूरत सपने के बारे में सोचने लगा।

गिलास गिरने की आवाज सेकमरे में लाली और सुगना सचेत हो गयीं। सुगना ने कहा

"जा कर देख जीजा जी सपनात बड़े का"

सुगना ने यह बात अंदाज़ पर ही कही थी परंतु उसकी बात अक्षरसः सत्य थी। लाली हाल में कई और राजेश की अवस्था देखकर सारा माजरा समझ गई। राजेश अभी भी अपने तने हुए लण्ड को हाथ से सहला रहा था। राजेश की स्थिति देखकर लाली वापस अंदर आयी हाथों में जैतून का तेल लिए वापस हाल में आने लगी। जाते-जाते उसने अपने हथेलियों को गोलकर सुगना को यह इशारा कर दिया कि वह कालू मल का मान मर्दन करने जा रही है, सुगना मुस्कुरा रही थी।

लाली के जैतून के तेल से सने हाथ राजेश के लण्ड पर तेजी से चलने लगी उसने राजेश से पूछा

"सुगना के बारे में सोचा तानी है नु?"

राजेश ने लाली से अपने स्वप्न को ना छुपाया और उसे अपने स्वप्न का सारा विवरण सुना दिया। लाली राजेश के स्वप्न को सुनती रही और उसके लण्ड को सहला कर स्खलन के लिए तैयार कर दिया।

तभी लाली ने कहा त "चली आज साँचों दर्शन करा दीं, सुगना सुत गईल बिया"

"का कह तारू?"

" उ जागी ना?"

लाली ने वही उत्तर दिया जो राजेश ने अपने स्वप्न में सुना था।

राजेश उस लालच को छोड़ ना पाया और अपने खड़े लण्ड के साथ अंदर के कमरे में आ गया। सुगना किनारे पीठ के बल सोई हुई सोई हुई थी। सुगना की मदमस्त काया को देख कर का लण्ड उछलने लगा। लाली के हाथ अभी भी उसके लण्ड को सहना रहे थे। अचानक लाली ने नाइटी तो दोनों तरफ फैला दिया सुगना का मादक शरीर पूरी तरह नग्न हो गया।

कमरे में बत्ती गुल थी। पर दीए की रोशनी में सुगना का शरीर चमक रहा था। सुगना ने अपना चेहरा ढक रखा था। राजेश सुगना का चेहरा तो ना देख पाया परंतु चेहरे के अलावा सारा शरीर उसकी आंखों के सामने था जो सपने उसने देखा था उसका कुछ अंश आंखों के सामने देख कर वह बाग बाग हो गया।

कालूमल आज उद्दंड हो चला था वह लाली के हाथों से छटक रहा था ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह स्वयं उछलकर सुगना की गोरी बुर में समाहित हो जाना चाहता था।

राजेश उत्तेजना से कांपने लगा लाली के हाथ लगातार कालूमल को रगड़ रहे थे और अंततः कालू मल ने अपना दम तोड़ दिया राजेश के लण्ड से निकल रही वीर्य की धार को नियंत्रित करने का जिम्मा लाली ने बखूबी उठाया और सुगना की बुर पर बालों का झुरमुट राजेश के रस से पूरी तरह भीग गया सुगना अपने होंठ अपने दांतो से दबाए इस कठिन परिस्थिति को झेल रही थी कभी उत्तेजना और कभी घृणा दोनों ही भाव अपने मन में लिए उसने अपनी बुर को राजेश के रस से भीग जाने दिया।

स्खलन उत्तेजना की पराकाष्ठा है और वही उसका अंत है स्खलन पूर्ण होते ही राजेश वापस हॉल में चला गया और लाली की राजेश के वीर्य से सनी उंगलियां सुगना की बुर में। सुगना की बुर पूरी तरह गीली थी। लाली की उंगलियों ने कोई अवरोध ना पाकर लाली में उस मखमली एहसास को अंदर तक महसूस करने की कोशिश की परंतु सुगना ने लाली के हाथ पकड़ लिए और कहा

"अब बस हो गईल"

लाली ने मुस्कुराते हुए कहा

"अतना गरमाइल रहले हा त काहे ना उनकर साधो बुता देले हा"

सुगना अपनी यादों में खोई हुई थी। तभी राजेश के वीर्य के जिस अंश को उसने अपनी गर्भ में स्थान दिया था आज उसने ही अंदर से उसके पेट पर एक मीठी लात मारी और उसे अपनी उपस्थिति का एहसास कराया अपने गर्भ में पल रहे बच्चे के हिलने डुलने का एहसास कर सुगना भाव विभोर हो गई और खुश होकर मुस्कुराते हुए बोली

"ए लाली देख लात मार तिया"

सुगना ने अपने गर्भ में पल रहे लिंग का निर्धारण स्वयं ही कर लिया था उसे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास था कि गर्भ में पल रहा बच्चा एक लड़की की थी..

नियति स्वयं भी सुगना को देखकर उसके भाग्य के बारे में सोच रही थी सुगना जैसी संवेदनशील और प्यारी युवती के लिए उसने ऐसा खेल क्यों रचा था वह स्वयं परेशान थी।

लाली ने कहा..

"हमरा से बाजी लगा ले इ लइका ह"

सुगना सहम गई

"ते कैईसे बोला ता रे"

"हमरो पेट तोरे साथी फूलल रहे हमार त लात नईखे मारत ….लड़की देरी से लात मारेली सो"

सुगना ने लाली की बात का विश्वास न किया वह पूरी तरह आश्वस्त थी की नियति उसके साथ ऐसा क्रूर मजाक नहीं करेगी आखिर जब उसके इष्ट देव ने विषम परिस्थितियों में भी उसे बनारस महोत्सव के दौरान गर्भवती करा ही दिया था तो वह निश्चित ही यह कार्य सूरज की मुक्ति के लिए ही हुआ होगा..

सुगना और लाली की बातें खत्म ना हुई थी कि मिंकी भागती हुई सुगना के पास आई

"माँ सूरज के देख का भइल बा…"

मिंकी ने भी न सिर्फ अपनी माता बदल ली थी अपितु मातृभाषा भी सुगना अपना पेट पकड़कर भागती हुई सूरज के पास गई

"अरे तूने क्या किया…"

मिंकी हतप्रभ खड़ी थी उसने अपने दोनों हाथ जोड़ लीये और कातर निगाहों से सुगना की तरफ देखने लगी...सुगना परेशान हो गई...

शेष अगले भाग में..

 
Thanks.

Nice to see u KHUS

Thanks

आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर अच्छा लगा यूट्यूब जुड़े रहें और चंद लाइने लिखकर कहानी पर अपने विचार व्यक्त करते रहें

मैं बाकी पाठकों से एक बार फिर अनुरोध करूंगा यदि आप इस कहानी को आगे बढ़ते देखना चाहते हैं तो कहानी के बारे में अपनी विचार खुलकर साझा करें यह कहानी तभी आगे बढ़ पाएगी जब पाठकों का साथ मिलेगा अगला अपडेट भी आप सब की प्रतिक्रियाओं के इंतजार में है धन्यवाद
 
सुप्रभात

मेरे लिए पाठक वही है जो कहानी पढ़कर अपने विचार और संवाद लेखक के साथ स्थापित करता है जो लोग शांत रहकर सिर्फ कहानी पढ़ते हैं मेरे लिए उनकी कोई अहमियत नहीं है मेरी कहानी पढ़कर वह मुझ पर जो एहसान कर रहे हैं उनके लिए उनका शुक्रिया.

लगता है इस कहानी को बंद करने का समय आ गया है उन सभी पाठकों का एक बार फिर धन्यवाद जिन्होंने इस कहानी से अपने जुड़ाव दिखाया था मैं यह कहानी तभी आगे बढाउंगा जब समुचित पाठकों का जुड़ाव महसूस करूंगा अन्यथा हम सब अपनी अपनी दुनिया में मस्त रहें और स्वस्थ रहें धन्यवाद।
 
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