Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता. - Page 146 - SexBaba
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Incest आह..तनी धीरे से.....दुखाता.

भाग 202

कुछ ही पलों के तीव्र संघर्ष के बाद, दोनों एक साथ चरम सुख के सागर में डूब गए। दोनों के मुंह से एक लंबी और तृप्त कराह निकली और वे एक-दूसरे के बदन पर ढह गए। सोनी की मुनिया के भीतर विकास का वीर्य पूरी गहराई तक समाहित हो रहा था, जो उनके बरसों पुराने सपने को पूरा करने का प्रयास था। दोनों इस ठंडी रात में एक-दूसरे की बाहों में बंधे, ज़ोर-ज़ोर से हाँफते हुए कल होने वाले उस महा-मिलन की कल्पना में खो गए, जहाँ मर्यादा की आखिरी दीवार भी ढहने वाली थी।

अब आगे..

उधर सूरज खुश था उसके मन में एक गहरा संतोष भी था। आज सबसे अच्छी बात यह हुई थी कि सोनी ने उसे अपने कमरे से विदा करने से पहले, लिहाफ़ के भीतर ही उसके लिंग को चूमकर उसके उग्र और बेचैन कर देने वाले तनाव को पूरी तरह शांत कर दिया था। आज की रात पहाड़ों की उस कड़कड़ाती ठंड में भी उसका बदन एक अजब सी तृप्ति और गर्माहट से भरा हुआ था, जो उसे एक मीठे और मदहोश कर देने वाले अहसास की तरफ ले जा रही थी।

सूरज के तनबदन में लगी आग सोनी तात्कालिक तौर पर शांत कर चुकी थी। सोनी के कमरे से आने के बाद सूरज अपने बिस्तर पर लेट किया। सूरज के दिमाग में एक गहरा शक पैदा होने लगा था। उसे रह-रहकर यह विचार आ रहा था कि क्या यह सब कुछ वाकई विकास मौसा जी की मर्जी या सहमति से हो रहा है? इस बात की संभावना उसे इसलिए भी लग रही थी, क्योंकि सोनी मौसी अभी तक गर्भवती नहीं हो पाई थीं और शादी के इतने साल बाद भी वे संतान सुख से वंचित थे। यह बात खुद मौसी ने भी उसके सामने खुलकर स्वीकार की थी कि वे एक बच्चे के लिए कितनी तड़प रही हैं।

तो क्या इस गुप्त सिलसिले के पीछे विकास मौसा जी की भी मूक सहमति है? क्या वे खुद चाहते हैं कि संतान सप्तमी के इस अनुष्ठान के जरिए उनके घर में खुशियां आएं? या फिर सोनी मौसी उनसे छिपकर, बेहद शातिर तरीके से इस वर्जित अनुष्ठान को अंजाम दे रही हैं ताकि अपने जीवन के उस सूनेपन को भर सकें? सूरज का युवा दिमाग इन दोनों संभावनाओं के बीच झूल रहा था।

पर जो भी हो, इन उलझनों के बीच सूरज के मन में एक गहरा संतोष भी था। आज सबसे अच्छी बात यह हुई थी कि सोनी ने उसे अपने कमरे से विदा करने से पहले, लिहाफ़ के भीतर ही उसके लिंग को चूमकर उसके उग्र और बेचैन कर देने वाले तनाव को पूरी तरह शांत कर दिया था। आज की रात पहाड़ों की उस कड़कड़ाती ठंड में भी उसका बदन एक अजब सी तृप्ति और गर्माहट से भरा हुआ था, जो उसे एक मीठे और मदहोश कर देने वाले अहसास की तरफ ले जा रही थी।

अगली सुबह का इंतजार करते हुए सूरज भी सुखद नींद में सो गया।

संतान सप्तमी का अंतिम दिन बेहद महत्वपूर्ण था सुबह-सुबह जब सूरज विकास और सोनी अपनी सुबह की चाय कंप्लीट कर अपने-अपने कमरों में जाने वाले थे तभी सुगना का फोन आ गया सुगना सोनी से बातें करती है और संतान सप्तमी के पिछले अच्छे दिनों का हाल-चाल पूछती थी सोनी भी इशारों सालों में उसे सारी बात बताती है पर्वत सूरज के साथ अपने संभोग को छुपा ले जाती है दूर बैठे विकास और सूरज एक दूसरे से बातें करते रहते हैं पर उनका ध्यान सोने के उत्तरों पर लगा रहता है और वह हम दोनों की बातचीत को समझने का प्रयास करते हैं

संतान सप्तमी के इस अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दिन की सुबह पहाड़ों की तेज़ ठंड और हल्की धुंध के साथ हुई। कमरे के भीतर गरमा-गरम चाय का दौर चल रहा था। विकास, सोनी और सूरज एक साथ बैठकर चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे, लेकिन माहौल में एक अजीब सी खामोशी और आने वाले पल का रोमांच साफ़ महसूस हो रहा था। तभी अचानक सोनी के फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर सूरज की माँ यानी सुगना का नाम चमक रहा था।

सोनी ने बिना एक पल गंवाए लपककर फोन उठाया और वहीं बिस्तर पर पेट के बल लेटकर सुगना से बात करने लगती है। इस तरह लेटने की वजह से उसकी पीठ और नितंबों का उभार मद्धम रोशनी में और भी आकर्षक लग रहा था। बात करते-करते उसने मस्ती में अपने पैरों को थोड़ा ऊपर उठाया, जिससे उसकी रेशमी नाइटी सरककर घुटनों तक आ गई और उसकी गोरी जाँघों का कुछ हिस्सा साफ़ दिखाई देने लगा।

सोनी अपनी बहन सुगना की बातों में इतनी खोई हुई थी और उससे बात करने के अहसास में इतनी उन्मुक्त और मदहोश थी कि उसे इस बात का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि पीछे बैठे विकास और सूरज एक साथ उसकी इस मादक स्थिति को निहार रहे हैं। पहाड़ों की उस सुबह, सोनी का यह बेबाक और मदहोश अंदाज़ उन दोनों मर्दों की धड़कनों को एक साथ तेज़ कर रहा था।

सूरज विकास के ठीक बगल में बैठा हुआ था और चाहकर भी अपनी नज़रों को काबू में नहीं रख पा रहा था। वह मौसा जी के सामने अपनी मौसी के इस मादक बदन और उभरे हुए नितंबों को देखने से बार-बार कतरा रहा था, उसे लग रहा था कि कहीं उसका यह गुप्त आकर्षण पकड़ा न जाए। लेकिन बिस्तर पर लेटी सोनी की वह मुद्रा इतनी उन्मुक्त और कामुक थी कि उसका युवा मन और उसकी आँखें खुद-ब-खुद उस तरफ खिंची चली जा रही थीं। वह चाय की चुस्की लेने के बहाने बार-बार अपनी पलकें उठाता और नाइटी से बाहर झलकती सोनी की गोरी, चिकनी जाँघों और नंगे घुटनों को एकटक निहारने लगता।

विकास वहीं बैठा सूरज की इस छटपटाहट और उसकी बदलती मनोदशा को बहुत गहराई से समझ रहा था। सूरज की आँखों में अपनी पत्नी के लिए बढ़ती उस बेकाबू वासना और तड़प को भाँपकर विकास के भीतर घृणा के बजाय एक तीव्र उत्तेजना का करंट दौड़ गया। उसे इस बात से गहरा मानसिक और शारीरिक सुख मिल रहा था कि उसका भांजा उसकी पत्नी के अंगों को देखकर अंदर ही अंदर सुलग रहा है। विकास ने जानबूझकर कोई दखल नहीं दिया, बल्कि वह शांत बैठकर इस वर्जित नज़ारे का लुत्फ उठाने लगा।

उधर इन दोनों मर्दों की आंतरिक हलचल से पूरी तरह बेखबर, सोनी एकदम बिंदास और मदहोश होकर फोन पर सुगना से बातें करने में मग्न थी। वह हंसती, मुस्कुराती और बातों-बातों में अपने पैरों को हवा में हिलाती, जिससे उसकी नाइटी का रेशमी कपड़ा बार-बार सरककर उसकी जाँघों को और उजागर कर देता।

सुगना और सोनी के बीच फोन पर बातचीत जारी थी। दोनों बहनें कम और सहेलियाँ ज़्यादा थीं, इसलिए उनके बीच की टोन बेहद अनौपचारिक और खुली हुई थी। हालांकि, सुगना को रत्ती भर भी यह अहसास नहीं था कि सूरज और सोनी के बीच कोई गुप्त संबंध बन चुका है; वह तो बस यही जानती थी कि विकास और सोनी मिलकर संतान सप्तमी का यह पवित्र और कठिन अनुष्ठान पूर्ण कर रहे हैं।

सुगना (फोन पर, धीमी और रसभरी आवाज़ में): "सोनी... छह दिन बीत गए। संतान सप्तमी का यह अनुष्ठान अपनी चरम ऊर्जा पर पहुँच चुका होगा। सच-सच बता, पहाड़ों की इस कड़कड़ाती ठंड में क्या तेरे बदन की तड़प को थोड़ी शांति मिली? अनुष्ठान की वो गुप्त अग्नि क्या तेरे रोम-रोम को जगा पा रही है? विकास जी इस अनुष्ठान को पूरे मन से निभा रहे हैं ना?"

सुगना के इस तीखे और बेबाक सवाल को सुनकर सोनी की रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई। उसने तिरछी नज़रों से बगल के सोफे पर बैठे विकास और सूरज की तरफ देखा। सोनी ने खुद को संभाला और मर्यादा का ध्यान रखते हुए अपनी आवाज़ को बेहद धीमा, मर्यादित लेकिन दोहरा अर्थ रखने वाला बनाया, ताकि सुगना को उसके और विकास के बीच की बात लगे, जबकि पास बैठे सूरज और विकास को उसका असली इशारा समझ आए।

सोनी (धीमे से मुस्कुराते हुए, बेहद रसीली आवाज़ में): "दीदी... आप तो जानती हैं कि यहाँ की हवाओं में कितनी ठंड है, लेकिन इस अनुष्ठान का प्रभाव ऐसा है कि भीतर एक अजब सी गर्माहट बनी हुई है। जो अग्नि आप कह रही हैं, उसकी तपिश इतनी तेज़ है कि यह बदन अब और बर्दाश्त नहीं कर पा रहा। कल रात की आहुति तो इतनी... इतनी गहरी थी कि मैं आपको क्या बताऊँ। जैसे सब कुछ पिघलने ही वाला था।"

सुगना फोन के उस पार खिलखिला कर हँस पड़ी। फिर अचानक उसे अपने बेटे की याद आई।

सुगना (एक माँ वाली ममता के साथ): "चल, यह तो बहुत अच्छी बात है। और सुन, मेरा सूरज कैसा है? पहाड़ों की ठंड उसे लग तो नहीं गई? वो तो पहली बार इतने ठंडे इलाके में गया है। थोड़ा उसका ध्यान रखना, खाने-पीने में बहुत लापरवाही करता है वो।"

सोनी ने फोन को थोड़ा और कसकर पकड़ा और अपनी आँखें सीधे सूरज की नज़रों में डाल दीं, जो उसे ही ताक रहा था।

सोनी (सूरज की आँखों में देखते हुए, शरारत भरी आवाज़ में): "दीदी, आप सूरज की चिंता बिल्कुल मत कीजिए। वो अब बच्चा नहीं रहा, बहुत समझदार और... बहुत 'बड़ा' हो गया है। कल रात भी मैंने उसका पूरा ध्यान रखा था। उसकी हर बेचैनी को शांत करना मुझे अच्छे से आता है। यहाँ तक कि सोने से पहले मैंने खुद पक्का किया कि वो पूरी तरह राहत में सोए।"

सोनी की इस बात का दोहरा मतलब विकास और सूरज को अच्छी तरह समझ आ रहा था। विकास की धड़कनें तेज़ हो गईं, और सूरज ने शरम और उत्तेजना के मारे अपनी नज़रें झुका लीं। सुगना इस गूढ़ इशारे को समझ नहीं पाई और उसने बात का रुख वापस विकास की तरफ मोड़ दिया।

सुगना (फुसफुसाते हुए, सोनी को उकसाते हुए): "अच्छा, यह तो ठीक है। पर ये बता, जीजा जी का क्या हाल है? इस बार के व्रत-त्योहार में उनमें वो पुराना जोश दिख रहा है या नहीं?"

सोनी ने एक गहरी सांस ली, अपने नितंबों को थोड़ा और सहज किया और विकास की तरफ देखते हुए फुसफुसाए अंदाज़ में कहा:

सोनी (इशारों ही इशारों में, बेहद रसीली आवाज़ में): "दीदी, सच कहूँ तो जब से आपने उन्हें वो 'गुरु मंत्र' दिया है ना, तब से तो वो और भी ज़्यादा मादक और बेचैन हो गए हैं। उनके भीतर की तड़प इस कदर बढ़ गई है कि अब वो हर वक्त बस अनुष्ठान को पूर्ण होते देखना चाहते हैं। कल रात भी उनकी वो बेचैनी साफ़ दिख रही थी, और वो इस खेल को और आगे बढ़ाने के लिए बहुत उतावले हैं।"

सोनी की यह बात सुनकर विकास के सीने में गर्व और वासना का एक साथ संचार हुआ। उसे साफ़ समझ आ गया कि सोनी सुगना के सामने ही आज रात होने वाली अंतिम और पूर्ण आहुति की बिसात बिछा रही है, जबकि सुगना इस पूरे सच से पूरी तरह अनजान थी। सूरज का दिल यह सुनकर सीने को चीरकर बाहर आने को बेताब था।

सुगना (एक गहरी सांस लेते हुए): "चलो, आज आखिरी दिन है। अपनी देह के उस पाश को पूरी तरह खोल देना और उस ऊर्जा को खुद में समाहित कर लेना ताकि गोद हरी हो जाए।"

सोनी (धीमे से मुस्कुराते हुए): "जी दीदी, आप निश्चिंत रहिए। आज का अनुष्ठान और आज की पूर्णाहूति ऐसी होगी कि सब कुछ हमेशा के लिए बदल जाएगा और इसे कोई कभी नहीं भूल पाएगा।"

फोन पर सुगना की बातें खत्म होने ही वाली थीं कि अचानक उसे कुछ याद आया और उसने सोनी से कहा, "सोनी, जरा सूरज को फोन देना, मुझे उससे भी थोड़ी बात करनी है।"

सोनी ने तुरंत बिस्तर पर अपनी स्थिति बदली और कमरे के दूसरी तरफ बैठे सूरज को आवाज़ लगाई, "सूरज... इधर आ, तेरी माँ का फोन है, तुझसे बात करना चाहती हैं।"

सूरज ने अपने मौसा जी की तरफ देखा और फिर धड़कते दिल के साथ बिस्तर के करीब आया। सोनी ने मुस्कुराते हुए फोन सूरज के हाथ में थमा दिया, लेकिन वह बिस्तर से उठी नहीं, बल्कि वहीं लेटी रही। सूरज फोन कान से लगाकर सुगना से बात करने लगा।

सुगना (लाड़ भरे अंदाज़ में): "हाँ सूरज, कैसा है रे तू? वहाँ पहाड़ों पर कोई परेशानी तो नहीं हो रही है ना? और सुन... बनारस से निकलते वक्त मैंने जो तुझे एक विशेष पैकेट देकर भेजा था और कहा था कि इसे संतान सप्तमी के अंतिम दिन ही निकालना है, वो याद है ना? आज वो विशेष पैकेट अपनी सोनी मौसी को समर्पित कर देना, उसमें बिल्कुल देरी मत करना।"

सुगना का सीधा मतलब उस धार्मिक पैकेट से था, लेकिन इस माहौल में 'विशेष पैकेट समर्पित करने' की बात सुनते ही सूरज के दिमाग ने मन ही मन सुगना की बातों का एक दूसरा और गुप्त अर्थ निकाल लिया। उसने चुपके से कल रात लिहाफ़ के भीतर के उस नज़ारे को याद किया और इस 'विशेष पैकेट' को अपने युवा अंग और वीर्य के अंश से जोड़ लिया, जिसे आज रात उसे पूरी तरह मौसी को सौंपना था। हालांकि, उसने अपने चेहरे पर इस विचार की एक शिकन भी नहीं आने दी और बेहद सामान्य आवाज़ में जवाब दिया।

सुगना: "और सच-सच बता, तू ठीक है ना वहाँ? तेरी मौसी तेरा ध्यान रख रही है?"

सूरज (बेहद सहज और शांत आवाज़ में): "जी माँ, मैं बिल्कुल ठीक हूँ। आप चिंता मत करो... सोनी मौसी मेरा बहुत ख्याल रख रही हैं। यहाँ मुझे किसी चीज़ की कमी नहीं होने देतीं।"

सूरज की आवाज़ में कहीं भी वासना या उत्तेजना नहीं टपक रही थी, वह अपनी माँ से एक संस्कारी बेटे की तरह ही बात कर रहा था। सुगना उसकी इस सादगी से संतुष्ट होकर आगे बोली।

सुगना (नसीहत देते हुए): "चल, यह तो बहुत अच्छी बात है। लेकिन सुन, सिर्फ मौसी ही तेरा ख्याल रखे, ऐसा नहीं होना चाहिए। तू भी अब बड़ा हो गया है, आज अनुष्ठान का आखिरी और सबसे बड़ा दिन है। मेरी बात गाँठ बांध ले... तुझे भी अपनी सोनी मौसी का बहुत ख्याल रखना है, उन्हें हर हाल में खुश रखना है और इस पावन दिन पर उन्हें बिल्कुल भी परेशान मत करना। जैसा वो कहें, वैसा ही करना।"

माँ की इस नसीहत को सुनकर भी सूरज ने मन ही मन उसका दूसरा, गहरा और कामुक अर्थ निकाला कि आज रात उसे मौसी को शारीरिक रूप से पूरी तरह तृप्त और खुश करना है। लेकिन प्रकट में उसने अपनी आवाज़ को बेहद मर्यादित और गंभीर बनाए रखा।

सूरज (गंभीरता से): "जी माँ, आप बिल्कुल फिक्र मत करो। मौसी कितनी खुश हैं... यह जब आप बनारस वापस आने पर उनसे मिलेंगी, तो खुद उनके चेहरे से ही पूछ लेना। मैं आपकी कही हर बात का पूरा ध्यान रखूँगा।"

सूरज का उत्तर ऊपर से जितना सीधा और मर्यादित था, उसके भीतर छिपा अर्थ उतना ही गहरा था। सूरज ने भले ही अपनी बातों से कुछ भी ज़ाहिर नहीं होने दिया, लेकिन पास ही बिस्तर पर लेटी सोनी उसकी आँखों के ठहराव और इस सयानेपन को देखकर तुरंत सब कुछ समझ गई। सोनी को साफ़ अंदाज़ा हो गया कि सूरज बाहर से जितना शांत दिख रहा है, भीतर से वह आज रात की पूर्णाहूति के लिए उतना ही दृढ़ और तैयार हो चुका है।

यह कहकर सूरज ने फोन रख दिया, और कमरे में फैली खामोशी अब आज के महा-मिलन का इशारा कर रही थी।

विकास जैसे ही फ्रेश होने के लिए बाथरूम में जाता है, कमरे का माहौल एक बार फिर पूरी तरह से बदल जाता है। सूरज बिना कोई देरी किए तुरंत अपनी अटैची के पास पहुँचता है और चैन खोलकर उसमें से अपनी माँ का दिया हुआ वह विशेष पैकेट निकाल लाता है। वह उस पैकेट को लेकर सीधे बिस्तर के पास आता है और मुस्कुराते हुए सोनी मौसी के हाथों में सौंप देता है।

सोनी उस पैकेट को अपने हाथों में लेती है और पलटकर देखते हुए बेहद भावुक और लाड़ भरे लहज़े में कहती है, "तेरी माँ भी ना सूरज... सचमुच सबका कितना ख्याल रखती हैं। बनारस में बैठकर भी उन्हें यहाँ के अनुष्ठान की एक-एक चीज़ की चिंता है।"

सूरज अपनी माँ के इस स्वभाव से अच्छी तरह वाकिफ था। वह गर्व से मुस्कुराते हुए कहता है, "हाँ मौसी, माँ सचमुच अनोखी हैं और हमारे पूरे घर की जान हैं। पर मौसी... आप भी तो कितनी अच्छी हैं, आप भी तो यहाँ हम सबका कितना ध्यान रखती हैं।"

सूरज की आवाज़ में एक गहरा ठहराव और सम्मान था, लेकिन उसकी आँखें सीधे सोनी के बदन और उसके चेहरे की लाली पर टिकी हुई थीं। सोनी भी कोई अनजान नहीं थी, वह सूरज की आँखों में सीधे झाँकती है और उसके दिल में छिपे उस असली आशय को, उस कशिश को बहुत अच्छी तरह समझ रही होती है जो कल रात से उनके बीच पनप रही थी। सोनी के इस सयानेपन और अपनी तारीफ को सुनकर सोनी के भीतर भी एक अजीब सी कामुक उत्तेजना जाग उठती है। वह बेहद रसीले और मादक लहज़े में, आँखें मटकाते हुए कहती है, "और मेरा सूरज भी तो... बिल्कुल अपनी माँ पर ही गया है। दूसरों को खुश रखना और उनका ख्याल रखना इसे भी बहुत अच्छे से आता है।"

सोनी के इस दोहरे और गहरे अर्थ वाले जवाब को सुनकर सूरज के चेहरे पर एक चुलबुली मुस्कान तैर जाती है। दोनों एक-दूसरे की आँखों में छिपे उस मूक आमंत्रण को पढ़ लेते हैं और मद्धम रोशनी में एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराने लगते हैं।

सोनी ने उत्सुकता से उस पैकेट की गाँठ को खोला और उसके भीतर रखी एक-एक चीज़ को निकालकर बेहद सलीके और करीने से बिस्तर पर सजाने लगी। जैसे-जैसे सामान बाहर आ रहा था, कमरे के भीतर का माहौल और भी सम्मोहक होता जा रहा था। पैकेट से सबसे पहले एक बेहद सुंदर, गाढ़े लाल रंग का जोड़ा निकला—एक बेहद खूबसूरत, बारीक कढ़ाई वाला लहंगा और चोली। लेकिन जैसे ही सोनी ने लहंगे के नीचे दबे बाकी कपड़ों को उठाया, उसके गालों पर गहरी लाली छा गई। उस जोड़े के साथ ही उसी से मेल खाते हुए बेहद झीने, पारदर्शी और कामुक अंतर्वस्त्र (अंडरगारमेंट्स) भी रखे थे। सुगना का यह चुनाव इस बात का साफ़ संकेत था कि इस अंतिम दिन की आहुति में देह का समर्पण किस हद तक होना था।

इसके बाद सोनी के हाथ में दो सुपारियाँ आईं। ये आम सुपारियाँ नहीं थीं, बल्कि उन दोनों के बीच में विशेष रूप से छेद करके एक मोटा, मज़बूत धागा पिरोया गया था। इस अजीब सी वस्तु को देखकर सोनी के मन में गहरा कौतूहल और अचरज हुआ। उसने अपने पूरे जीवन में पूजा की ऐसी कोई सामग्री या वस्तु आज तक नहीं देखी थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि संतान सप्तमी के इस गुप्त अनुष्ठान में इन आपस में बंधी सुपारियों का क्या उपयोग होने वाला है।

इनके अलावा, पैकेट में कुछ पारंपरिक पूजन सामग्री थी और सबसे नीचे रखी थी एक छोटी, नक्काशीदार इत्र की शीशी। सोनी ने जैसे ही उस शीशी को अपने हाथों में लिया और उसका ढक्कन थोड़ा ढीला किया, उसकी एक तीखी, maahak खुशबू सीधे सोनी के मर्म (अंतरात्मा) तक पहुँच गई। इस महक के नाक में घुसते ही सोनी के बदन में एक सिहरन दौड़ गई और अतीत का एक गहरा साया उसकी आँखों के सामने घूम गया। यह वही चिर-परिचित, मदहोश कर देने वाली खुशबू थी जिसे उसने सालों पहले बनारस में सुगना के कमरे में महसूस किया था। यह वही इत्र था जो सुगना ने अपने जीवन के उस वर्जित मोड़ पर, सर्वेश जी (सूरज के पिता) के साथ पहली बार पूर्ण संभोग के समय लगाया था। एक पल के लिए सोनी का पूरा वजूद कांप उठा, पुरानी यादें और उस रात का रहस्य उसके सामने सजीव हो उठा। पर सोनी एक पढ़ी-लिखी, समझदार डॉक्टर थी; उसने तुरंत खुद को संभाला। वह जानती थी कि अतीत में जो कुछ भी हुआ, उसमें इस इत्र की कोई गलती नहीं थी, वह तो महज़ एक संयोग था।

तभी उसका ध्यान पैकेट के बिल्कुल खाली हो चुके निचले हिस्से पर गया। वहाँ सब सामान हट जाने के बाद अंत में एक मुड़ा हुआ पत्र निकला। सोनी ने उत्सुकता और थोड़ी सी घबराहट के साथ उस पत्र को अपने हाथों में ले लिया और बिस्तर पर पेट के बल लेटे हुए ही, उसे खोलकर बेहद ध्यान से पढ़ने लगी।

सोनी ने उस पत्र को खोला और उसकी एक-एक पंक्ति को बेहद ध्यान से और डूबकर पढ़ने लगी। सुगना ने उस पत्र में संतान सप्तमी की इस अंतिम और महा-पूर्णाहुति की पूरी गुप्त विधि को विस्तार से समझाया था।

पत्र में सुगना ने लिखा था:

"सोनी, आज का दिन तेरे जीवन का सबसे बड़ा दिन है। मेरी बात ध्यान से सुन, सुबह की चाय के बाद तू सबसे पहले स्नान करके तैयार होना और सीधे मंदिर जाकर देवी माँ का आशीर्वाद लेना। लेकिन तैयार होते समय तुझे एक विशेष काम करना है। मैंने जो इत्र की शीशी भेजी है, उस जादुई सुगंध को तुझे अपने बदन के उन सभी कामुक अंगों पर लगाना है जो किसी भी पुरुष को सबसे प्यारे होते हैं। यहाँ तक कि उस इत्र की कुछ बूंदें तुझे अपनी मुनिया (योनि) के चारों ओर भी लगानी हैं, ताकि उसकी मादकता पुरुष के भीतर की बची-खुची मर्यादा को भी पूरी तरह पिघला दे।

अब बात करती हूँ इन दो सुपारियों की, जिन्हें देखकर तू ज़रूर हैरान हुई होगी। मैंने ये दो अलग-अलग आकार की सुपारियाँ इसलिए भेजी हैं ताकि तू अपनी सुविधा और पसंद के हिसाब से चुन सके। स्नान करने के बाद, इनमें से जो भी सुपारी तेरी मुनिया आसानी से स्वीकार कर पाए, उसे अपनी गहराई के भीतर रख लेना। जब तक तू मंदिर में पूजा करके वापस आएगी, तब तक कई घंटों में तेरी योनि से निकलने वाला वो प्राकृतिक, कामुक अर्क (रस) इस सुपारी के भीतर पूरी तरह समाहित हो चुका होगा।

पूजा से लौटने के बाद, जब महा-मिलन का समय आएगा, तब तुझे यह सिद्ध सुपारी उस पुरुष को खिलानी है जो आज इस अनुष्ठान की पूर्णाहुति करेगा। उससे कहना कि वह इसे चबा-चबाकर इसके भीतर समाए तेरे बदन के उस अमृत रस को पूरी तरह आत्मसात कर ले। छोटा या बड़ा आकार तू खुद तय कर लेना। और हाँ, धागा मैंने इसीलिए पिरोया है ताकि सुपारी अंदर ही न छूट जाए, धागे का एक सिरा बाहर रहेगा जिससे तू उसे बाद में आसानी से निकाल सके।"

पत्र का आखिरी शब्द पढ़ते ही सोनी का पूरा वजूद उत्तेजना और विस्मय से सिहर उठा। वह सुगना की इस अकल्पनीय बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता पर मन ही मन बेहद गर्व कर रही थी। उसे इस बात का अहसास हो गया कि सुगना ने इस अनुष्ठान को सफल बनाने के लिए काम-शास्त्र के कितने गहरे और गुप्त नियमों का सहारा लिया था। अब सोनी के सामने आगे की पूरी तस्वीर बिल्कुल साफ और स्पष्ट हो चुकी थी कि उसे आज के इस विशेष दिन पर क्या और कैसे करना है। उसने बिना किसी देरी के बिस्तर पर सजे उन झीने, कामुक अंतर्वस्त्रों को उठाया और उनके भीतर ही उन सुपारियों को बड़ी चतुराई से लपेटकर अपने पास सुरक्षित रख लिया। अब उसकी धड़कनें तेज़ थीं, और वह बिस्तर पर बैठी हुई बेहद उत्सुकता से विकास के बाथरूम से बाहर आने का इंतज़ार करने लगी, ताकि वह खुद स्नान करने जा सके और सुगना के बताए इस कामुक विधान की शुरुआत कर सके।

बाथरूम के भीतर पहाड़ों की ठंडी हवाओं के बीच गरम पानी की भाप तैर रही थी, जिसने पूरे माहौल को एक रहस्यमयी और मादक कोहरे से भर दिया था। सोनी आज एक अद्भुत मानसिक और शारीरिक ऊर्जा से भरी हुई थी। आज का यह स्नान केवल देह को साफ़ करने के लिए नहीं, बल्कि उस महा-मिलन के लिए खुद को एक पवित्र वेदी की तरह तैयार करने के लिए था, जहाँ सामाजिक वर्जनाएँ और कामुकता दोनों एक दिव्य पवित्रता के साथ एकाकार होने वाले थे। सोनी को साफ़ दिख रहा था कि आज का यह अनुष्ठान इतिहास रचने जा रहा था—एक तरफ वह अपने पति विकास की उस अनोखी, दबी हुई इच्छा को उनके ही सामने पूर्ण करने जा रही थी, और दूसरी तरफ उसी वेदी पर सूरज के साथ उस दिव्य संभोग को अंजाम देने वाली थी, जो संतान सप्तमी की वास्तविक पूर्णाहुति करने वाला था।

सोनी ने दर्पण के सामने खड़े होकर पास पड़े रेज़र को उठाया। पिछले छह-सात दिनों की आपाधापी और पहाड़ों के इस प्रवास में उसकी मुनिया (योनि) के आस-पास हल्के-फुल्के बाल बाहर झांकने लगे थे। उसने बेहद सलीके और बारीकी से उन बालों को साफ़ किया। जब उसकी मुनिया पूरी तरह चिकनी, मखमली और गोरी आभा के साथ चमकने लगी, तो उसने अपने बदन को तौलिये से सुखाया।

अब बारी थी सुगना दीदी के दिए उस गुप्त और कामुक विधान को अमली जामा पहनाने की। सोनी के सामने बिस्तर पर वे दो धागे से बंधी सुपारियाँ रखी थीं। तभी अचानक सोनी के डॉक्टर दिमाग में एक गहरा द्वंद्व और कौतूहल पैदा हुआ। उसने सोचा कि सुगना ने तो एक सुपारी रखने को कहा था जिसे पूर्णाहुति करने वाले पुरुष को खिलाना था। आज का असली योद्धा और उस ऊर्जा का स्रोत निश्चित रूप से सूरज था, इसलिए यह रस सूरज को मिलना अनिवार्य था। लेकिन यदि वह केवल सूरज को ही यह सिद्ध रस पिलाएगी, तो विकास कहीं मन ही मन दुखी या उपेक्षित महसूस न करने लगे, क्योंकि वे भी तो इस अनुष्ठान के साक्षी और उसके पति थे। और यदि बाद में कभी सुगना ने उससे इस बारे में बारीक सवाल पूछ लिया, तो वह क्या जवाब देगी?

इस धर्मसंकट का सोनी ने अपनी बुद्धिमत्ता से एक बेहद कामुक और चमत्कारी हल निकाला। उसने तय किया कि वह किसी को दुखी नहीं करेगी। उसने उन दोनों ही सुपारियों को—छोटी और बड़ी—एक साथ अपने भीतर समाहित करने का फैसला किया। सोनी ने गहरी सांस ली और सुगना की दूरदर्शिता को प्रणाम करते हुए उन दोनों सुपारियों को एक-एक करके अपनी मुनिया की गुलाबी, नम गहराइयों के भीतर धकेल दिया। उसकी रसीली योनि ने उन दोनों सुपारियों को सहर्ष अपनी तड़पती गहराई में स्थान दे दिया।

उन दोनों सुपारियों के बीच पिरोया हुआ वह मोटा, मज़बूत धागा अब उसकी मुनिया के मखमली होठों से बाहर निकलकर नीचे लटक रहा था, जो उसकी योनि की बनावट को और भी ज़्यादा खूबसूरत, उत्तेजक और आमंत्रित बनाने लगा था। धागे के आखिरी छोर पर सुगना ने जो छोटी-छोटी, कलात्मक गांठे बनाई थीं, वे सोनी की गोरी जाँघों के बीच बेहद आकर्षक और किसी गुप्त आभूषण की तरह लग रही थीं। आदमकद आईने में अपनी मुनिया की यह अद्भुत और पूर्ण कामुक तैयारी देखकर सोनी खुद के ही रूप पर मुग्ध हो गई और उसके भीतर रोमांस का एक तीव्र ज्वार उठ गया। उसने तुरंत सुगना के भेजे झीने और कामुक अंतर्वस्त्रों को पहना और बदन पर तौलिया लपेटकर बाथरूम से बाहर आ गई।

बाहर आकर उसने देखा कि विकास इस समय सूरज के कमरे में बैठकर उससे आज की अंतिम पूजा और व्यवस्था के बारे में बातें कर रहा था। कमरे में खुद को अकेला पाकर सोनी ने बिना समय गंवाए सुगना की भेजी इत्र की शीशी उठाई। उसने उस मादक, सम्मोहक इत्र की बूंदें अपनी चूचियों के उभारों पर, नाभि के पास, अपनी पीठ की ढलान, कमसिन कमर और विशेष रूप से अपनी जाँघों और मुनिया के आस-पास के हर उस हिस्से पर करीने से लगाई, जहाँ आज रात सूरज के युवा और बेताब हाथ पहुँचने वाले थे। इत्र की वह खुशबू हवा में तैरते ही पूरे कमरे को एक वर्जित कामुकता से महका गई।

इसके तुरंत बाद, सोनी ने सुगना के भेजे उस गाढ़े लाल रंग के सुंदर लहंगे और चोली को धारण कर लिया। बारीक कढ़ाई वाले उस लहंगे और कसी हुई चोली में सोनी इस वक्त किसी साक्षात कामदेवी की तरह लग रही थी, जिसका रूप पहाड़ों की ठंड में भी आग लगाने के लिए पूरी तरह तैयार हो चुका था।

 
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भाग 203

उसने उस मादक, सम्मोहक इत्र की बूंदें अपनी चूचियों के उभारों पर, नाभि के पास, अपनी पीठ की ढलान, कमसिन कमर और विशेष रूप से अपनी जाँघों और मुनिया के आस-पास के हर उस हिस्से पर करीने से लगाई, जहाँ आज रात सूरज के युवा और बेताब हाथ पहुँचने वाले थे। इत्र की वह खुशबू हवा में तैरते ही पूरे कमरे को एक वर्जित कामुकता से महका गई।

इसके तुरंत बाद, सोनी ने सुगना के भेजे उस गाढ़े लाल रंग के सुंदर लहंगे और चोली को धारण कर लिया। बारीक कढ़ाई वाले उस लहंगे और कसी हुई चोली में सोनी इस वक्त किसी साक्षात कामदेवी की तरह लग रही थी, जिसका रूप पहाड़ों की ठंड में भी आग लगाने के लिए पूरी तरह तैयार हो चुका था।

अब आगे..

सोनी और विकास जब मंदिर जाने के लिए कमरे से बाहर निकलने लगे, तभी विकास ने पीछे मुड़कर सूरज से कहा, "सूरज, तू भी हमारे साथ चल। संतान सप्तमी का यह आखिरी दिन है, तेरा साथ होना शुभ होगा।"

सूरज को पहले तो यह थोड़ा असहज और अजीब लगा। उसे लगा कि पति-पत्नी के इस अनुष्ठानिक दर्शन के बीच उसका जाना शायद ठीक नहीं होगा। लेकिन तभी सोनी ने उसकी तरफ देखा और अपनी खनकती आवाज़ में कहा, "चल ना सूरज, सुगना दीदी ने भी तो कहा था कि आज के दिन मेरा पूरा ख्याल रखना है।" मौसी के इस अपनेपन और अधिकार भरे आग्रह को सूरज टाल नहीं सका और वह भी साथ चलने के लिए तैयार हो गया।

जब तीनों होटल की लॉबी में पहुँचे, तो वहाँ का नज़ारा देखने लायक था। लाल चटक लहंगे और कसी हुई चोली में सजी-धजी सोनी जब अपनी मादक चाल से आगे बढ़ रही थी, तो लॉबी और रिसेप्शन पर मौजूद कर्मचारी और अन्य पर्यटक ठगे से रह गए। पहाड़ों के इस दूरदराज टूरिस्ट स्पॉट पर एक पारंपरिक, दुल्हन की तरह सजी इतनी रूपवान और आकर्षक महिला को देखना सबके लिए एक अनोखा और विस्मयकारी अनुभव था। हर कोई अपनी नज़रें हटाए बिना बस सोनी को ही एकटक निहार रहा था। लेकिन सोनी इन सब नज़रों से बेपरवाह और पूरी तरह बिंदास होकर अपने उस गुप्त 'मिशन' की तरफ आगे बढ़ रही थी, जिसकी बिसात सुगना ने बिछाई थी।

कुछ ही देर बाद तीनों पहाड़ों के बीच स्थित एक प्राचीन और शांत मंदिर में पहुँचे। मंदिर का वातावरण शंख, घंटियों की गूंज और कपूर की खुशबू से पूरी तरह दिव्य हो चुका था। सोनी ने गर्भगृह के सामने खड़े होकर अपनी आँखें बंद कीं और पूरी श्रद्धा से ईश्वर से अपनी सूनी गोद को भरने और गर्भवती होने का वरदान मांगा। जैसे ही उसने अपनी पलकें मूँदीं, उसके अंतर्मन में एक सुंदर, सलोने बालक की धुंधली सी छवि तैर गई। उस कल्पना में जो बालक उसे दिखाई दिया, उसकी नैन-नक्श और मासूमियत बिल्कुल सूरज जैसी थी। इस अलौकिक अहसास से सोनी का मन भर आया और वह ईश्वर के सामने नतमस्तक हो गई।

उसी समय, सोनी के दोनों तरफ खड़े विकास और सूरज ने भी हाथ जोड़कर अपनी आँखें बंद कर लीं। दोनों ने ईश्वर से केवल और केवल सोनी की झोली भरने, उसे दुनिया की हर खुशी देने और उसकी गोद हरी करने की सच्चे दिल से प्रार्थना की। उस पावन घड़ी में मंदिर का पूरा माहौल एक पवित्र पारिवारिक भावना में बदल गया। कुछ पलों के लिए देह की भूख, वासना और सारे गुप्त विचार कहीं गहरे गायब हो गए, और उनकी जगह सिर्फ एक निश्छल समर्पण और श्रद्धा ने ले ली।

पर जैसे ही पूजा-अर्चना समाप्त हुई और वे तीनों मंदिर की सीढ़ियाँ उतरकर वापस बाहर आए, पहाड़ों की उस ठंडी हवा ने एक बार फिर उनके बदन को छुआ। मंदिर परिसर से बाहर कदम रखते ही विकास के दिमाग में आज होने वाले उस अंतिम, वर्जित और चरम अनुष्ठान की कल्पनाएँ दोबारा कौंधने लगीं। अपनी पत्नी के इस देवदासी जैसे रूप और सुगना के उस गुप्त विधान के बारे में सोच-सोचकर विकास के भीतर कामुकता का ज्वार इस कदर बढ़ा कि उसकी मर्यादा एक बार फिर ढहने लगी और उसका अंग कपड़ों के भीतर पूरी तरह से तनकर खड़ा हो गया।

मंदिर से निकलकर होटल वापस आने के रास्ते में गाड़ियों के टायरों की आवाज़ और पहाड़ों के सन्नाटे के बीच सोनी का मन विचारों के एक गहरे भंवर में डूबा हुआ था। वह खिड़की के बाहर खिली हुई धूप को देख रही थी, लेकिन उसका दिमाग आने वाले समय के घटनाक्रमों को बहुत बारीकी से बुनने और समझने की कोशिश कर रहा था।

उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि आखिर वह विकास की उस अनोखी और वर्जित इच्छा को कैसे पूरी करेगी, जिसमें उसका पति स्वयं अपनी ही पत्नी को अपने भांजे की बाहों में सौंपकर उस मिलन का साक्षी बनना चाहता था।

इस योजना के बीच सोनी के मन में एक गहरा डर और चिंता बार-बार सिर उठा रही थी। वह जानती थी कि सूरज एक युवा और गरम खून का लड़का है। इस अंतिम अनुष्ठान की वेदी पर, सुगना के दिए इत्र की मादक महक और संतान सप्तमी के उस माहौल में जब सूरज अपनी वासना के अधीन होकर पूरी तरह से उन्मुक्त (बेकाबू) हो जाएगा, तब उसे संभालना बहुत मुश्किल होगा।

सोनी को सबसे बड़ा डर इस बात का था कि यदि संभोग की उस चरम और मदहोश कर देने वाली घड़ी में सूरज अपनी सुध-बुध खो बैठा, और उसने अपने मुँह से बनारस के उन पुराने मिलनों की चर्चा छोड़ दी, या उनके बीच पहले से बने शारीरिक संबंधों की कोई बात अनजाने में कह दी, तो अनर्थ हो जाएगा। सूरज इस समय खेल के इस नए नियम से बिल्कुल अनजान था कि मौसा जी कमरे में ही कहीं छिपकर सब देखने वाले हैं। सोनी सोच रही थी कि यदि सूरज अपनी बेताबी में ज़्यादा बिंदास या बेपरवाह हो गया, तो विकास के सामने यह बात कैसे छुपी रहेगी कि वे दोनों पहली बार एक नहीं हो रहे हैं, बल्कि उनके बीच पहले ही सब कुछ घटित हो चुका है।

अपनी देह पर लगे इत्र की महक और लहंगे की सरसराहट के बीच सोनी ने मन ही मन यह तय कर लिया कि उसे सूरज पर पूरी तरह नियंत्रण रखना होगा। उसे कुछ ऐसी तरकीब निकालनी होगी जिससे सूरज कमरे में आकर भी एक कड़े अनुशासन और मर्यादा के दायरे में बंधा रहे, ताकि विकास के सामने अतीत का वह गुप्त पन्ना कभी न खुल सके।

होटल के करीब पहुँचते-पूँछते सोनी का दिमाग पूरी तरह सक्रिय हो चुका था। उसने अपनी घबराहट पर काबू पाया और एक गहरी सांस लेकर इस उलझन का तोड़ निकाल लिया। वह समझ गई कि सूरज के गरम खून और उसकी उन्मुक्तता को नियंत्रित करने का केवल एक ही तरीका था—अनुष्ठान के नियमों को और अधिक रहस्यमयी और सख्त बना देना। ऐसा करने से सूरज मर्यादा के डर से खुद ही शांत रहेगा और कुछ भी अतिरिक्त बोलने की हिम्मत नहीं करेगा।

जैसे ही गाड़ी होटल के अहाते में रुकी और वे तीनों उतरकर अपने फ्लोर की तरफ बढ़े, सोनी ने विकास की तरफ देखकर हौले से मुस्कुराया। वह विकास को यह मूक संदेश दे रही थी कि अब खेल का समय आ चुका है।

कमरे में पहुँचते ही, विकास ने पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार सूरज की उपस्थिति में सोनी से कहा

मेरा लखनऊ का एक दोस्त नैनीताल आया है मुझे कुछ देर के लिए जाना पड़ेगा।"

सोनी ने आंखें तरेरते हुए कहा …आज के दिन भी आपको जाना है?

सोनी जाना तो नहीं चाहता पर जरूरी है मैं एक-दो घंटे में आ जाऊंगा प्लीज…

विकास का यह कहना असल में एक संकेत था कि वह बाहर जाने का ढोंग कर रहा है, ताकि सूरज को लगे कि वे कमरे में नहीं हैं, जबकि असल में विकास को थोड़ी ही देर में बालकनी के रास्ते वापस आकर छुपना था।

विकास के कमरे से बाहर निकलते ही, सोनी ने बिना समय गंवाए कमरे का भारी दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया पर लॉक नहीं किया। कमरे में सुगना के इत्र की मादक खुशबू पहले से ही तैर रही थी, जिसने सूरज के भीतर एक सिहरन पैदा कर दी थी। वह लाल लहंगे में सजी अपनी मौसी के इस साक्षात कामदेवी जैसे रूप को देखकर सम्मोहित खड़ा था।

सोनी ने अपनी आवाज़ को बेहद धीमा, गंभीर और रहस्यमयी कर लिया। वह सूरज के ठीक सामने आकर खड़ी हो गई, जिससे उसकी चोली के भीतर से आती इत्र की तेज महक सीधे सूरज के नथुनों में समाने लगी।

सोनी (बेहद गंभीर और दबी आवाज़ में): "सूरज, ध्यान से सुन। संतान सप्तमी की यह महा-पूर्णाहुति कोई साधारण मिलन नहीं है। सुगना दीदी ने इस अंतिम रात के लिए दो बहुत कड़े और अटूट नियम बताए हैं, जिनका पालन तुझे हर हाल में करना होगा। यदि तूने इसमें ज़रा भी चूक की, तो यह अनुष्ठान खंडित हो जाएगा और ईश्वर का कोप हम पर बरसेगा।"

सूरज ने अपनी थूक निगलते हुए मौसी की आँखों में देखा। उसकी वासना इस कड़े लहज़े को सुनकर थोड़ी नियंत्रित हुई।

सूरज (धीमे से): "हाँ मौसी, बताइए। क्या नियम हैं? मैं हर नियम मानने को तैयार हूँ।"

सोनी (उसकी आँखों में आँखें डालकर फुसफुसाते हुए): "पहला नियम—आज संभोग के पहले क्षण से लेकर अंतिम आहुति तक, तुझे पूरी तरह 'मौन व्रत' धारण करना होगा। तेरे मुँह से एक भी शब्द, कोई पुरानी चर्चा, या कोई भी बात नहीं निकलनी चाहिए। यहाँ तक कि आहें भी नहीं। जो कुछ भी होगा, वह पूरी तरह खामोशी के साथ संपन्न होगा।"

सोनी ने यह नियम इसलिए बनाया ताकि सूरज भूलकर भी बनारस के पुराने मिलनों का ज़िक्र न कर बैठे और विकास तक कोई बात न पहुँचे।

सोनी ने आगे कहा: "और दूसरा नियम... आज रात मैं ठीक उसी प्रकार से इस अनुष्ठान को सिद्ध करूँगी, जैसा मैंने बनारस में तेरे भीतर के पुरुषत्व को पहली बार जगाने के लिए किया था। याद है न तुझे?"

'पुरुषत्व को जगाने' की बात सुनते ही सूरज के दिमाग में बिजली की तरह वह पूरा दृश्य कौंध गया। उसे तुरंत याद आया कि कैसे उसकी मौसी ने उसकी आँखों पर पट्टी बाँधकर उसे पूरी तरह से अंधकार में रखकर उसके भीतर की मर्दानगी को चरम पर पहुँचाया था।

सूरज (हड़बड़ाई हुई, भारी आवाज़ में): "मौसी... तो क्या आप मेरी आँखों पर आज फिर से वही पट्टी बाँधने जा रही हैं?"

सोनी ने धीरे से मुस्कुराते हुए आगे बढ़कर सूरज के माथे को चूमा। उसके होंठ जब सूरज की त्वचा से अलग हुए, तो उसकी आवाज़ में एक अकाट्य गहराई थी।

सोनी: "हाँ मेरे वीर, यही इस विधान का अंतिम सत्य है। शास्त्र कहते हैं कि संतान प्राप्ति की यह महा-पूर्णाहुति यदि पति के अलावा किसी अन्य पुरुष के अंश से हो रही हो, तो स्त्री की मर्यादा को बचाए रखने के लिए पुरुष की आँखों पर पट्टी बाँधना अनिवार्य होता है। जब तुम्हारी आँखों के सामने अंधेरा होगा, तभी प्रकृति इस पूर्णाहूति को केवल एक अनुष्ठानिक आहुति मानेगी, कोई पाप नहीं।"

इसी बीच क्लिक की आवाज हुई और सूरज ने पूछा मौसी लगता है कोई आया है..

सोनी को पता था यह कोई और नहीं बल्कि विकास ही है उसने सूरज की बात को इग्नोर किया और शांति से बोली

अरे यहां कौन आएगा विकास जी तो बाहर गए और मैंने दरवाजा खुद लॉक किया है।

सोनी के इस तार्किक और रहस्यमयी बातों ने सूरज के मन के सारे संशयों को शांत कर दिया। अब वह पूरी तरह से नियंत्रित भी था और डरा हुआ भी कि उसे एक शब्द भी नहीं बोलना है। उसे रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था कि आँखों पर पट्टी बाँधने का यह विधान असल में सोनी ने इसलिए रचा था ताकि वह अपने मौसा जी को कभी देख न सके।

सोनी ने आगे बढ़कर पलंग के पास रखी अपना लाल दुप्पटा उठाया और बेहद कोमलता से सूरज की आँखों पर बाँध दिया। जैसे ही सूरज की आँखों के सामने पूरी तरह अंधेरा छाया, दृष्टि छिन जाने से उसकी बाकी की इंद्रियाँ दस गुना अधिक संवेदनशील हो चुकी थीं।

इसी बीच बालकनी का झीना परदा धीरे से हटा और विकास बेहद खामोशी से कमरे के भीतर दाखिल हो गया। अपनी पत्नी और भांजे के बीच की उस छुपी हुई, अनोखी केमिस्ट्री और बेताबी को अपनी आँखों से साफ़ देखना उनके भीतर के पौरुष को एक चरम उत्तेजना से भर रहा था। विकास को पूरा आभास हो चुका था कि ये दोनों पहले भी एक हो चुके हैं, लेकिन इस सच को भाँपकर उनके भीतर कोई क्रोध नहीं, बल्कि एक असीम कामुक रोमांच जाग उठा था।

सोनी अब इस त्रिकोणीय खेल के केंद्र में थी। उसने सूरज को पूरी तरह से मौन रहने का निर्देश दे रखा था, इसलिए सूरज बिना कोई शब्द बोले, केवल अपनी भारी होती साँसों के सहारे सोनी के नितंबों को अपनी मजबूत उंगलियों से भींच रहा था।

सूरज की आँखों पर बंधी वह लाल मखमली पट्टी अब उसके लिए केवल एक आवरण नहीं, बल्कि उसकी बाकी सभी इंद्रियों को जगाने का माध्यम बन चुकी थी। दृष्टिहीनता के उस सघन अंधकार में, सूरज की हथेलियाँ बेहद संवेदनशील हो उठी थीं। उसने अपनी उँगलियों और हथेलियों को धीरे-धीरे सोनी के बदन के उतार-चढ़ाव पर फिराना शुरू किया। रेशमी वस्त्रों के ऊपर से भी उसे सोनी के जिस्म की तपिश और उसकी त्वचा की मखमली कोमलता का साफ़ अहसास हो रहा था।

सोनी, जो इस पूरे खेल को अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश कर रही थी, सूरज के इस सधे हुए और गहरे स्पर्श के आगे खुद को रोक नहीं पाई। जैसे-जैसे सूरज की हथेलियाँ उसकी कमसिन कमर और पीठ की ढलान को सहला रही थीं, सोनी आत्मसमर्पण के भाव में उसके आलिंगन में खींचती चली गई। उसका सिर सूरज के गठीले कंधे पर टिक गया और उसकी अपनी साँसें भारी होने लगीं।

सूरज ने बिना कोई शब्द बोले, अपनी मौसी को पूरी शिद्दत से अपने आगोश में भर लिया। वह उसके चेहरे के करीब आया और उसके कानों के पीछे तथा सुगना के इत्र से महकती गोरी गर्दन पर अपने तपते हुए होंठ रख दिए। सूरज जिस दीवानगी और अधिकार के साथ सोनी की गर्दन और कानों को चूम रहा था, वह कोई नौसिखिया प्रयास नहीं था। उसमें एक पुराना ठहराव, एक गहरा अनुभव और एक जानी-पहचानी कशिश साफ़ झलक रही थी।


विकास की साँसें इस दृश्य को देखकर ऊपर-नीचे होने लगीं। उनकी छाती धौंकनी की तरह चल रही थी। एक परिपक्व पुरुष होने के नाते, सूरज के चूमने के अंदाज़ और सोनी के उसके प्रति इस सहज झुकाव को देखकर विकास के मन में यह बात शीशे की तरह साफ़ हो गई कि—निश्चित ही यह इन दोनों का पहली बार का मिलन नहीं था। इस बेताबी और जिस्मानी तालमेल के पीछे निश्चित ही कोई गुप्त इतिहास था, जिसकी गवाही कमरे की हर धड़कन दे रही थी। इस अहसास ने विकास के भीतर ईर्ष्या की जगह एक अजीब, वर्जित उत्तेजना को और बढ़ा दिया।

सोनी और सूरज अभी भी खड़े थे। सूरज की उँगलियाँ अब सोनी के वस्त्रों और चोली (ब्लाउज) की डोरियों से खेलने लगी थीं। मौन व्रत के कड़े अनुशासन में बंधा होने के कारण वह कुछ बोल तो नहीं रहा था, लेकिन उसके हाथों की फुर्ती उसकी बेताबी को बयां कर रही थी। उसने बड़ी ही चतुराई से चोली के बंधनों को ढीला किया।

कुछ ही देर में, सोनी के बदन का ऊपरी हिस्सा पूरी तरह अनावृत और नग्न हो गया। मखमली रोशनी में उसकी सुगठित छाती और कमसिन कमर का पूरा हिस्सा विकास की आँखों के सामने पूरी तरह चमक उठा। सोनी की चूचियां तन चुकी थी और निप्पल मणि की भांति और भी कठोर हो गए थे। अब सोनी का पेटिकोट और उस पर लिपटी हुई लाल चटक साड़ी सरक कर आधी खुली, आधी बंधी अवस्था में आ चुकी थी, जो बस सूरज की उँगलियों के अगले स्पर्श और आदेश का बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी।

विकास के लिए पीछे खड़े होकर इस दृश्य को देखना किसी ऐसी कल्पना के सच होने जैसा था, जिसे उन्होंने हमेशा अपने भीतर कहीं छुपा कर रखा था। ठीक उनकी आँखों के सामने, उनकी अपनी सुंदर पत्नी की नंगी पीठ पर सूरज की वे मजबूत और युवा हथेलियाँ रेंग रही थीं, जो सोनी के गोरे बदन को पूरी शिद्दत से अपने आगोश में भींच रही थीं। सूरज की उँगलियों का वह कड़ा कसाब जब सोनी की त्वचा को दबाता, तो विकास के भीतर उत्तेजना का एक ऐसा प्रचंड तूफान उठता कि उन्हें लगता जैसे उनका अंग कपड़ों के भीतर ही फट जाएगा। इतना तीव्र तनाव और ऐसी चरम उत्तेजना विकास ने अपने जीवन में कई दिनों बाद—या शायद पहली बार इस रूप में महसूस की थी। वे अपनी साँसें पूरी तरह रोककर, बिना हिले-डुले, इस अद्भुत और अत्यधिक कामुक दृश्य को अपनी आँखों में समेट रहे थे।

उधर सोनी इस समय एक बिल्कुल अलग ही दुनिया में तैर रही थी। सुगना के इत्र की मादक महक, और सूरज के युवा जिस्म की तपिश ने मिलकर उसके सोचने-समझने की शक्ति पर एक पर्दा डाल दिया था। वह सब कुछ भूल चुकी थी—वे नियम, वे जतन और वह सारी चिंताएँ जो वह होटल आने के रास्ते में सोच रही थी, इस समय सूरज के प्रचंड आलिंगन के आगे हवा हो चुकी थीं। वह पूरी तरह से सूरज की बाहों में समाई हुई थी, और उसकी गर्दन पर सूरज के होठों की जो छुअन हो रही थी, उसने उसके भीतर की स्त्री को पूरी तरह तृप्त कर दिया था। कुछ जादुई और मदहोश कर देने वाले पलों के लिए उसके मन से यह संशय और डर पूरी तरह मिट गया कि ठीक पीछे उसका पति विकास खड़ा है और इस वर्जित महा-संगम के एक-एक पल को अपनी आँखों से साफ़-साफ़ देख रहा है। वह तो बस इस आदिम सुख के सागर में बिना किसी बाधा के बहती चली जा रही थी।

सोनी उस मखमली अंधकार और सूरज के युवा आलिंगन में पूरी तरह खोई हुई थी, लेकिन तभी उसे अपने ठीक पीछे एक अनजानी मगर बेहद सधी हुई आहट का अहसास हुआ। विकास दबे और सधे हुए कदमों से, बिना कोई आवाज़ किए, सोनी के ठीक पीछे आ चुके थे।

सोनी जो इस समय अर्ध-नग्न अवस्था में खड़ी थी—उसकी चोली पहले ही ढीली होकर सरक चुकी थी—उसे अचानक अपनी कमर पर लिपटी साड़ी की सिलवटें और ढीली होती हुई महसूस हुईं। वह अभी इस स्पर्श को समझ ही रही थी कि उसे साफ़ अहसास हुआ कि कोई बहुत खामोशी से उसके पेटिकोट की डोरी (नाड़ा) को उँगलियों से टटोलकर धीरे-धीरे खोल रहा है। पीछे से आने वाली उस जानी-पहचानी छुअन और साँसों की गर्माहट से सोनी का पूरा बदन सिहर उठा और उसने तुरंत पहचान लिया कि यह विकास हैं।

विकास का यह रूप देखकर सोनी के भीतर एक तीखी घबराहट दौड़ गई। विकास ने तो सिर्फ दूर से देखने की बात कही थी, फिर वह अचानक इस खेल के बीच में आकर यह सब क्या कर रहे हैं? उसे डर था कि कहीं इस अप्रत्याशित हरकत से सूरज को कुछ शक न हो जाए और पूरा खेल बेकाबू हो जाए।

स्थिति को तुरंत संभालने के लिए, सोनी ने बड़ी ही चतुरता से काम लिया। उसने बिना कोई आवाज़ किए, सूरज को बहुत धीरे से खुद से अलग किया। अचानक आए इस ठहराव से आँखों पर पट्टी बांधे खड़ा सूरज थोड़ा सा सकपकाया, लेकिन सोनी ने उसे अपनी योजनाओं में उलझाए रखने के लिए तुरंत अपने कोमल हाथ आगे बढ़ाए और खड़े-खड़े ही सूरज की शर्ट के बटन एक-एक करके खोलने लगी। सूरज इस नए स्पर्श और मौसी की इस अचानक जागी बेताबी में फिर से मग्न हो गया।

सूरज को शर्ट के बटनों में उलझाकर, सोनी ने चुपके से अपनी कमर पीछे कर दी। उधर विकास ने अपनी उत्तेजना में सोनी के पेटिकोट के नाड़े को पूरी तरह से खोल दिया था, जिससे वह वस्त्र नीचे सरकने लगा था।

सोनी के पूरी तरह नग्न होते ही उसकी मुनिया से निकल रहा वह लाल धागा दिखाई पड़ने लगा जिसके एक सिरे पर लगी हुई सुपाड़ी मुनिया के अंदर उसका काम रस सोख रही थी।

सोनी ने बेहद मादक तरीके से अपना एक हाथ नीचे लाया और पहले एक धागे को पड़कर बाहर खींचा।

सोने की बुर की गहराइयों में डूबी वह बड़ी सुपारी धीरे-धीरे बाहर आने लगी और सोने की मुनिया के रस भरे होठों से टुप…. की आवाज के साथ बाहर आ गई।

सुपारी सोनी के कामरस से फूल चुकी थी उसने सुपारी से धागा हटाया और सुपारी को ऊपर उठाकर विकास की तरफ देखा विकास की मौन सहमति पाकर उसने वह सुपारी सूरज के होठों से सटा दी सूरज को वह मादक गंध याद थी उसने बिना कुछ कहे अपने होंठ खोले और उसे मुंह में ले लिया…

सोनी के काम रस का स्वाद सूरज को बखूबी याद था उसे सुपारी का रहस्य भी पता था।

सोनी ने छोटी सुपारी को भी अपनी मुनिया से बाहर निकाला और उसे विकास के होंठों के बीच रख दिया.. विकास ने भी उसे अपने मुंह में ले लिया।

विकास में सोनी की मुनिया को छूने की कोशिश की…

सोनी ने तुरंत पीछे मुड़कर विकास की आँखों में देखा। उसकी आँखें सवाल भी कर रही थीं और समझा भी रही थीं। सोनी ने बिना कोई शब्द बोले, अपनी उँगलियों से विकास को इशारा किया कि वे अपनी तय की हुई जगह पर जाकर बैठ जाएं और वहीं से इस दृश्य का आनंद लें।

विकास भी सोनी की उस सख्त और डरी हुई नज़र के पीछे के खतरे को समझ गए। वे अपनी भारी होती साँसों को रोककर, दबे कदमों से वापस अपनी नियत जगह पर बैठने के लिए पीछे हट गए, जबकि सोनी ने एक बार फिर पूरी तरह से अपनी आँखें बंद किए खड़े सूरज की तरफ ध्यान केंद्रित किया।

कमरे के भीतर की उत्तेजना अब अपने चरम बिंदु को छू रही थी। कुछ ही पलों के भीतर, सोनी ने सूरज को भी दो पूरी तरह से नग्न कर दिया। मखमली और मद्धम रोशनी में उन दोनों के सुगठित बदन साक्षात कामदेव और कामदेवी की तरह दमक रहे थे। आँखों पर पट्टी बंधा सूरज पूरी तरह अपनी मौसी के देह-सुख में डूबा हुआ था, और सोनी भी सब कुछ भूलकर उसके स्पर्श का आनंद ले रही थी।

उधर, अपनी तय जगह पर बैठे विकास की हालत बेकाबू हो रही थी। वो उस अद्भुत, कड़े और गठीले पौरुष (लिंग) को प्रत्यक्ष देखने के लिए पूरी तरह आतुर था, जिसके बारे में उन्होंने केवल कल्पनाएँ की थीं।

परंतु, विकास इस समय जिस कोण और जगह पर बैठे थे, वहाँ से उनकी नज़रें सूरज के उस अद्भुत लिंग तक नहीं पहुँच पा रही थीं। खड़े होने की स्थिति में, सूरज ठीक सोनी के सामने था, जिसके कारण उसका वह लंड सोनी के सुगठित नितंबों के पीछे पूरी तरह छिपा हुआ था। विकास अपनी गर्दन उठा-उठाकर, थोड़ा तिरछा होकर देखने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन सोनी का कामुक बदन बीच में एक ओट की तरह आ रहा था।

अपनी पत्नी और भांजे के इस महा-मिलन के सबसे मुख्य दृश्य को साफ़ न देख पाने की छटपटाहट में विकास के भीतर की कामुक व्याकुलता और भी तीव्र हो गई। वे बिना कोई आवाज़ किए अपनी जगह पर छटपटा रहे थे, और इस बात का इंतज़ार कर रहे थे कि कब उनकी स्थिति या उन दोनों की दिशा बदले, और वे उस वर्जित दृश्य को अपनी आँखों से साफ़ देख सकें।

कमरे की मखमली रोशनी के बीच, जब सोनी और सूरज ने अपनी स्थिति में थोड़ा सा बदलाव किया, तो विकास की व्याकुल आँखें तुरंत उस ओर टिक गईं। सोनी का बदन जैसे ही थोड़ा सा एक तरफ हटा, सूरज का वह मुख्य अंग (लिंग) पहली बार विकास की नज़रों के ठीक सामने पूरी तरह उजागर हो गया।

"हे भगवान! यह क्या..." विकास के मन में एक गहरा धक्का लगा। उन्होंने जिस प्रचंड, सुगठित और सख़्त तने हुए पौरुष की कल्पना अपने दिमाग में पाल रखी थी, उसके उलट वहाँ का नज़ारा बिल्कुल अलग था। सूरज का लिंग इस समय एक मुरझाए हुए केले की तरह पूरी तरह से ढीला और लटका हुआ था।

विकास को अपनी ही आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। सोनी जैसी साक्षात कामदेवी जैसी रूपवान नग्न स्त्री को अपनी बाहों में भरने और उसकी गर्दन को इतनी दीवानगी से चूमने के बाद भी सूरज के अंग में रत्ती भर का तनाव नहीं था। एक युवा पुरुष का अपनी अत्यंत आकर्षक मौसी के पूर्ण नग्न बदन के स्पर्श के बाद भी इस कदर शांत और शिथिल रहना किसी अजूबे से कम नहीं था।

विकास स्तब्ध रह गया। वो आश्चर्य और कौतूहल से इस अजीबोगरीब मिरेकल (चमत्कार) को एकटक देखने लगा। उनके दिमाग में सवालों का बवंडर उठने लगा कि आखिर इस चरम कामुक माहौल के बाद भी सूरज का पौरुष इस तरह सोया हुआ क्यों है? क्या यह मौन व्रत का असर था, या फिर आँखों पर बंधी उस मखमली पट्टी के अंधेरे का कोई मनोवैज्ञानिक प्रभाव? क्या सोनी के गर्भवती होने का सपना धरा का धरा रह जाएगा…


शेष अगले भाग में
 
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व्रिठे फ्यू लाइन्स.
 
भाग 205

अब तक आपने पढ़ा..

जब तुम्हारी आँखों के सामने अंधेरा होगा, तभी प्रकृति इस मिलन को केवल एक अनुष्ठानिक आहुति मानेगी, कोई पाप नहीं।"

सोनी के इस तार्किक और रहस्यमयी दर्शन ने सूरज के मन के सारे संशयों को एक पल में शांत कर दिया। उसे रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था कि आँखों पर पट्टी बाँधने का यह विधान असल में सोनी ने इसलिए रचा था ताकि वह सामने लगी बालकनी के कांच के पीछे छिपे अपने मौसा जी (विकास) को कभी देख न सके, और विकास बिना किसी डर के इस पूरे खेल का पूरा आनंद ले सकें।

अब आगे..

इधर सूरज और सोनी की कामुक यात्रा अंतिम पड़ाव पर थी उधर सूरज की मां सुगना बेचैन थी.

बनारस की हवेली की दीवारों और सुगना की आंखों में अब एक ऐसा गहरा राज़ दफ़्न हो चुका था, जो किसी भी दिन पूरे परिवार को हिला कर रख सकता था। सुगना के लिए रातें अब लंबी और बेचैन करने वाली हो गई थीं। जब भी वह अपनी आँखें मूँदती, उसकी आँखों के सामने वही मंज़र तैर जाता जब उसने अपनी बेटी मालती को राजू के साथ उन्मुक्त तरीके से संभोग करते अपनी नंगी आँखों से देखा था।

मालती को, लाली के बेटे राजू के साथ इस तरह मर्यादा की सारी सीमाएं तोड़कर, खुलकर संभोग करते हुए देखना सुगना के लिए किसी वज्रपात से कम नहीं था। वह बार-बार खुद को कोस रही थी, उसका अंतर्मन उसे कचोट रहा था कि आखिर उस वक्त उसके पैर क्यों जम गए थे? उसने उसी समय आगे बढ़कर उन्हें क्यों नहीं रोका? अगर वह उस पल कड़ा रुख अपनाती, तो शायद इस वर्जित रिश्ते पर वहीं लगाम लग जाती। पर अब वह भी जानती थी कि जो वक्त बीत चुका था, उसे वापस नहीं लाया जा सकता था। कमान से छूटा तीर और हाथ से निकला अवसर कभी लौटकर नहीं आते।

उधर, इस सब से बेखबर मालती और राजू अपनी ही धुन में पूरी तरह बिंदास और निडर बने हुए थे। उन्हें इस बात का कतई इल्म नहीं था कि सुगना ने उन्हें उस आपत्तिजनक और अत्यंत निजी अवस्था में देख लिया है। उनके बीच का गुप्त सिलसिला उसी बेबाकी से चल रहा था, जैसे घर की बंदिशें उनके लिए कोई मायने ही नहीं रखती थीं। जब भी वे सुगना के सामने आते, तो उनके चेहरे पर कोई झिझक नहीं होती थी, जो सुगना के भीतर की घबराहट और आत्मग्लानि को और ज्यादा बढ़ा देती थी।

सुगना इस दोहरे मानसिक तनाव में पिस रही थी—एक तरफ बेटी का यह गुनाह और दूसरी तरफ समाज व परिवार की साख। वह समझ नहीं पा रही थी कि इस सच्चाई के बोझ के साथ वह आगे क्या करे, जबकि मालती और राजू का यह बिंदासपन रिश्तों को किसी बड़े विस्फोट की तरफ ले जा रहा था।

मालती अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर चुकी थी और अब इधर-उधर बेमन से नौकरी करने के लिए फॉर्म भर रही थी पर शायद वह उतनी तेज नहीं थी कि अपने बलबूते कोई नौकरी खोज पाती…कमोबेश यही स्थिति राजू की भी थी.. बात सच भी थी दोनों जब युवावस्था में ही चोदा चोदी के खेल में लग गए थे उनका करियर दांव पर पहले ही आ चुका था

बहरहाल राजू ने अपना शरीर वर्जिश करके एक युवा की भांति बना लिया था और मालती का तो कहना ही क्या उसने अपने कामुक बदन को इस तरह बनाए रखा था जिससे वह किसी भी मर्द को आकर्षित कर पाती और ईश्वर द्वारा दी गई प्रदत्त खूबसूरती से वह किसी भी काबिल मर्द की बीवी बनकर आगे का जीवन काट सकते थी।

बनारस के उस पुराने मकान में बीतने वाली हर रात अब सुगना के लिए एक मानसिक युद्ध जैसी हो गई थी। दिन के उजाले में तो वह काम-काज में खुद को व्यस्त रखकर मालती और राजू के उस दृश्य को दिमाग से निकालने की पुरजोर कोशिश करती थी, लेकिन जैसे ही वह थकान से चूर होकर अपनी आँखें मूँदती, उसका अवचेतन मन उस पर हावी हो जाता।

वह जितना ही उस वर्जित और कामुक मिलन की यादों से दूर भागना चाहती, वे तस्वीरें उतनी ही शिद्दत से उसके सपनों में लौट आतीं। रात के सन्नाटे में उसके सपने अजीब और उलझे हुए रास्तों पर चल पड़ते। कभी वे सपने बहुत विकृत और डरावने रूप ले लेते, जिसमें लोक-लाज और परिवार की बदनामी का खौफ उसे घेर लेता; तो कभी वे कुछ इतने गहरे, तीव्र और कामुक हो जाते कि सुगना का पूरा वजूद सिहर उठता।

उन सपनों में छिपी कामुकता की तीव्रता इतनी अधिक होती थी कि अगली सुबह जब वह सोकर उठती, तो चाहकर भी उनके धुंधले सिरों को याद नहीं कर पाती थी। उसका दिमाग उन वर्जित कल्पनाओं को सचेत मन में लाने से रोक देता था, जैसे कोई अनजाना पर्दा गिर जाता हो।

पर सुबह उठने के बाद भले ही सपने की बारीकियाँ गायब हो जातीं, लेकिन उनके पीछे छूट गई बेचैनी और बदन की भारीपन वहीं रह जाता। अब यह पूरी तरह तय हो चुका था कि सुगना का दिन का चैन और रातों की नींद, दोनों पूरी तरह से उड़ चुके थे। वह अपनी ही बेटी और राजू के उस गुप्त राज़ के बोझ तले दबी जा रही थी, जो उसे अंदर ही अंदर खोखला कर रहा था।

सुगना के मन मस्तिष्क में चल रहे भाव उसके चेहरे पर आने लगे।

आखिर वह सहेली ही क्या, जो अपनी सबसे अज़ीज़ सहेली के दिल की तकलीफ और आँखों के दर्द को बिना कहे न पढ़ ले। सालों की जो दूरी उनके बीच आई थी, वह इस गहरे संकट के क्षण में पिघलकर पूरी तरह खत्म हो चुकी थी। लाली में सुगना के मनोभाव पढ़ लिए और उसकी असहजता भाप ली।

लाली को अच्छी तरह याद था कि जब से सूरज डॉक्टर बना था, तब से सुगना के व्यक्तित्व में एक अभूतपूर्व और आमूलचूल परिवर्तन आया था। पिछले बारह वर्षों से जो सुगना वक्त की थपेड़ों और सरयू सिंह की मृत्यु के बाद पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के नीचे दबकर एकदम शांत, गंभीर और स्थिर हो चुकी थी, वह बेटे की इस कामयाबी के बाद अचानक बदल गई थी। वह एक बार फिर उसी प्रकार चंचल, बेबाक और जीवंत हो उठी थी, जैसी वह अपनी अल्हड़ युवावस्था में हुआ करती थी। सुगना की यह पुरानी चंचलता घर में सबको बेहद प्रिय लग रही थी और सबको अपनी ओर आकर्षित कर रही थी, यहाँ तक कि उसके भाई सोनू को भी।

सुगना सोनू के लिए अजीज थी और इस जहां में उसके लिए सबसे प्यारी थी। उसने हर रूप में सुगना का साथ दिया था। पिछले कई वर्षों से वह ईश्वर से यही प्रार्थना करता था कि सुगना वापस से सामान्य हो जाए पर चाह कर भी वह सुगना को उसकी आत्मग्लानि से बाहर निकलने में नाकाम रहा था पर सूरज की सफलता ने सुगना में एक नई जान फूंक दी थी शायद इसमें सरयू सिंह के स्वप्न का भी योगदान था पर यह बात सिर्फ सुगना ही जानती थी।

लाली के जेहन में वह रात आज भी साफ़ थी, जब सूरज के डॉक्टर बनने का उत्सव खत्म हुआ था। उस रात सुगना को बेहद खुश और चहकते देखकर सोनू का दिल भी पुरानी यादों और एक अनजाने उत्साह से भर उठा था।

अतीत के पन्नों में यह राज़ गहरे दफ़्न था कि सुगना और सोनू भले ही भाई-बहन थे, पर अपनी बेलगाम जवानी के दिनों में उन दोनों ने समाज की नज़रों से छुपकर कई बार एक-दूसरे के साथ बेहद तीव्र और उग्र शारीरिक संबंध बनाए थे। वह एक ऐसा आदिम और गुप्त रिश्ता था जिसने दोनों के वजूद पर अमिट छाप छोड़ी थी। यहाँ तक कि लाली की शादी सोनू से कराने में भी सुगना का ही हाथ था…जिसने अपने मालपुआ (सुगना की बुर) को दहेज स्वरूप सोनू को समर्पित कर दिया था।

सूरज के डॉक्टर बनने के उत्सव की उस रात, सुगना के भीतर जागी उसी चंचल तरंग को देखकर सोनू बेकाबू हो उठा था। देर रात उसने लाली से सुगना की उसी चंचलता और खूबसूरती के बारे में ढेर सारी बातें की थीं। सुगना के उस बदले हुए रूप ने सोनू के भीतर की सोई हुई मर्दानगी और वासना को इस कदर जगा दिया था कि उस रात सोनू और लाली के बीच का संभोग एक बिल्कुल नई और अभूतपूर्व ऊँचाई पर पहुँच गया था। उन दोनों का वह शारीरिक मिलन ठीक वैसा ही उग्र और तृप्त करने वाला था, जैसा उनकी शुरुआती जवानी के दिनों में हुआ करता था। सुगना में आया यह चंचल परिवर्तन अनजाने में ही सही, लाली और सोनू के दांपत्य जीवन में कामुकता का एक नया उत्साह और नया रंग भर गया था।

चंचल सुगना के चेहरे पर आया तनाव देखकर लाली से और रहा नहीं गया, तो उसने शाम को जब दोनों रसोई घर में रात के खाने की तैयारी कर रही थीं, उसने मौका पाकर सुगना से सीधा सवाल कर दिया। लाली ने सुगना के हाथ से सब्जी काटने वाला चाकू धीरे से छीनकर अलग रखा और उसका हाथ पकड़ते हुए पूछा:

लाली (भोजपुरी में, बेहद फिक्रमंद होकर): "सुगना, अब तू सच-सच बतावऽ, तू इतना परेशान काहे रहत बाड़ू?

सुगना : कोनो बात नईखे चाकू दे सब्जी काटे के बा

लाली ने चाकू को किनारे रखकर सुगना की ठंडी पड़ चुकी हथेलियों को अपने हाथों में लेकर दबाया। उसकी आँखों में गहरी चिंता और पुरानी सहेली वाला हक साफ़ झलक रहा था।

लाली (भोजपुरी में, सुगना के चेहरे को एकटक निहारते हुए): "सुगना, अब तू सच-सच बतावऽ, अभी तऽ कुछ दिन पहले ले तू बिल्कुल ठीक रहलू। तोहरे ई हँसत-खिलखिलात चेहरा देख के पूरा घर चहकत रहे, सोनू भी कतना खुश रहन। आज तोहार ई रूप देख के हमार जियरा काँप जात बा। का भइल बा तोके?"

सुगना ने झटके से अपनी नजरें चुराने की कोशिश की। उसके चेहरे पर एक फीकी, बनावटी मुस्कान उभर आई, लेकिन उसकी काँपती पलकें साफ बता रही थीं कि भीतर कोई तूफान चल रहा है। वह अपनी उँगलियों को आपस में भींचने लगी।

सुगना (भोजपुरी में, आवाज़ को सामान्य बनाने की नाकाम कोशिश करते हुए): "अरे, कवनो बात नईखे लाली! तू तऽ अइसे ही फिकर करे लगलू। बस थोड़ा माथा भारी बा और बदन टूटत बा, अउरी का।"

लाली ने सुगना की ठुड्डी को धीरे से ऊपर उठाया और उसकी सीधे आँखों में झाँका। लाली के चेहरे पर एक सख्त लेकिन ममता भरा भाव आ गया, जैसे वह कह रही हो कि मुझसे कुछ नहीं छुप सकता।

लाली (अधिकार भरे लहज़े में, धीमे से सिर हिलाते हुए): "हमसे बात मत बदलऽ सुगना! हम तोहार सहेली बानी, तोहार परछाईं बानी। तोहार ई झूठी मुस्कान और आँखों के ई खौफ हमसे ना छुप पाई। हमके साफ़-साफ़ लौकत बा कि कवनो अइसन नया टेंशन बा जे तोके भीतर ही भीतर घुन नियन खाए जात बा। आखिर अपनी ई चंचल सुगना के हम अइसे उदास ना देख सकब। बोलऽ, का बात बा? तोके हमार कसम बा।"

लाली के मुँह से अपनी कसम सुनते ही सुगना के सब्र का बांध टूट गया। उसके चेहरे का बनावटी संयम पल भर में ढह गया और उसकी आँखों में छपछपाते आँसू रसोई की मद्धम रोशनी में चमक उठे। उसने एक गहरी और काँपती हुई साँस ली, मानो वह कोई भारी बोझ ज़मीन पर रखने जा रही हो।

सुगना ने लाली को उस रात का पूरा वाकया हूबहू सुना दिया—कैसे वह उस कमरे के पास पहुँची, कैसे उसने किवाड़ के झरोखे से उन दोनों को उस आपत्तिजनक और घनिष्ठ अवस्था में देखा। उसने लाली के सामने राजू और मालती के बीच हुए उस वर्जित संबंध को उजागर कर दिया।

परंतु इस सब के बीच सुगना ने अपने अंतर्मन के उस सबसे गुप्त और गहरे राज़ को अपने भीतर ही दफ़्न रखा। उसने लाली को यह कतई नहीं बताया कि उसने उस दृश्य को महज़ एक नजर देखकर अपनी आँखें नहीं फेरी थीं, बल्कि वह चुपचाप वहीं खड़ी रहकर लगातार उस वर्जित मिलन को निहारती रही थी। उसने यह बात भी पूरी तरह छुपा ली कि उस दृश्य को देखने से उसके खुद के भीतर जो आदिम वासना और कामुक तरंग जागी थी, उसने अनजाने में उसका एक मूक आनंद भी लिया था। वह सुख और आत्मग्लानि का जो ज्वार उसके भीतर उठा था, वह उसे किसी भी कीमत पर लाली के सामने जाहिर नहीं होने देना चाहती थी।

सुगना की बात सुनकर लाली का चेहरा एकदम सफेद पड़ गया।

लाली: तू रोकलू काहे ना?

सुगना के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था।

सुगना: हम घबरा गइनी..

लाली (भोजपुरी में, गुस्से और अफ़सोस के मिले-जुले लहज़े में): "सुगना, हमरा तऽ ई सोच के छाती फटा जाता कि मालती हरदम राजू के 'भैया-भैया' कह के बोलावेले। उ राजू के भाई मानेले, और राजू भी ओकरा के अपनी बहिन नियन समझेला। फिर भी उ दुनो अइसन कर गइले सऽ? लाज-सरम सब बेच खइले सऽ का?"

सुगना ने लाली की हाँ में हाँ मिलाते हुए अपना सिर हिला दिया। वह ऊपर से तो लाली के सुर में सुर मिला रही थी, लेकिन भीतर से उसका अंतर्मन उसे कचोट रहा था। वह इस निंदा में इतनी डूब गई थी कि कुछ पलों के लिए वह खुद के और अपने भाई सोनू के अतीत को पूरी तरह भूल चुकी थी—वो अतीत, जिसके संबंध शायद मालती और राजू के इस रिश्ते से भी कहीं ज्यादा गहरे, वर्जित और जटिल थे।

तभी लाली ने सुगना के चेहरे के बदलते रंगों को ताड़ा। उसने सुगना की आँखों में सीधे झाँकते हुए एक ऐसा राज़ छेड़ा, जिसने सुगना के पैरों तले की ज़मीन खिसका दी।

लाली (धीमी और रहस्यमयी आवाज़ में): "सुगना, ई सब देख के हमरा लागत बा कि हमनी के कइले कवनो पुरान गलती के परिणाम अब हमनी के भुगते के पड़त बा..."

सुगना ने चकित होकर, अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से लाली की तरफ देखा और घबराते हुए पूछा।

सुगना (काँपती आवाज़ में): "कवन गलती लाली? तू ई का कहत बाड़ू?"

लाली (एक ठंडी और गहरी साँस लेते हुए): "वही गलती... जब हम खुद सोनू के तोहरे साथ संभोग करे खातिर उकसावाले रहनी। याद बा तोके उ सलेमपुर के रात?"

सलेमपुर की रात' का नाम सुनते ही जैसे रसोई घर का तापमान अचानक गिर गया। सुगना की आँखों के सामने वर्षों पुराना वह पूरा दृश्य एक चलचित्र की तरह हूबहू तैर गया, जिसे वह अपने दिल के किसी कोने में दफ़्न कर चुकी थी।

उसे याद आने लगा कि कैसे उस रात, सोनू ने पहली बार उसकी मर्जी के बिना, ज़बरदस्ती उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए थे। वह दर्द, वह छटपटाहट और वह डर सुगना के बदन में एक बार फिर सिहरन पैदा कर गया। लेकिन उस कड़वे सच का एक पहलू यह भी था, जिसे सुगना खुद से भी छुपाती थी—कि शुरुआत के उस विरोध और ज़बरदस्ती के बाद, संभोग के उन आखिरी पलों में, सोनू के उस उग्र पौरुष की छुअन और उस तप्त अहसास के आगे वह खुद को रोक नहीं पाई थी और स्वयं काम-रस में डूबकर पूरी तरह कामातुर (उत्तेजित) हो गई थी।

अतीत का वह खौफनाक और कामुक सच आज लाली की ज़ुबान से सुनकर सुगना पूरी तरह अवाक रह गई। उसे अहसास हुआ कि जिस मर्यादा की बात वह आज कर रही है, उसकी बुनियाद तो सालों पहले सलेमपुर की उस रात में वह स्वयं हिला चुकी थी।

रसोई घर का वो भारी सन्नाटा अब दोनों सहेलियों के आपसी विश्वास और पुरानी यादों की गर्माहट में बदल चुका था। अतीत के गहरे राज़ सामने आने के बाद, अब वक्त था वर्तमान की इस बड़ी मुसीबत से निपटने का।

लाली और सुगना ने मिलकर एक ठोस फैसला किया कि वे अब मालती और राजू को घर में और भी एकांत (अकेलापन) बिल्कुल नहीं देंगी। वे दोनों अब उन पर पैनी नजर रखेंगी। यह बात दोनों बखूबी समझ रही थीं कि हो सकता है दोनों बच्चों ने नासमझी और कामुकता के वशीभूत होकर एक-दूसरे के साथ शारीरिक संबंध बना लिए हों, लेकिन अब इस सिलसिले को और आगे नहीं बढ़ने दिया जा सकता था।

लाली ने सुगना का हाथ सहलाते हुए उसे पूरा आश्वासन दिया, "सुगना, तू फिकर मत करऽ। हम खुद मालती से अकेले में बात करब। ओकरा के ई वर्जित संबंधन के दुष्परिणाम और समाज के साख के बारे में समझाएब, ताकि उ ई सब से हमेशा खातिर दूर हो जाई।"

लाली यह बात कह तो गई थी पर उसके पास अभी कोई तात्कालिक उपाय नहीं था पर समय सभी घावों को भर देता है उसे विश्वास था की जवानी की आग हो सकता है कुछ दिनों में शांत हो जाए।

आग से ध्यान आया…

विकास के मन में बार-बार यही वर्जित विचार आ रहा था कि वह स्वयं थोड़ा और आगे बढ़े, अपने हाथों से सूरज के उस प्रचंड पौरुष को थामे और सीधे अपनी पत्नी सोनी की बुर के मुहाने पर बिठाकर उसे अंदर धकेल दे। इस कशमकश को अपनी आँखों के सामने घटते देखना उसके धैर्य की परीक्षा ले रहा था और उसका हाथ अपने अंग पर और तेजी से चलने लगा था।

विकास को भली-भाँति अहसास था कि यदि उसने उत्तेजना में आकर सूरज के अंग को ज़रा सा भी हाथ लगाया, तो वह अनपेक्षित इंसानी स्पर्श इस पूरे तिलिस्म और सम्मोहन को एक पल में तोड़ देगा। सूरज तुरंत अपनी सामान्य चेतना में आ जाएगा और यह अद्भुत काम-उत्सव वहीं हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।

अपनी इसी मजबूरी और तीव्र लालसा के बीच पिसता हुआ विकास पलंग के किनारे बैठा रहा। वह अपनी आँखों के सामने सोनी की कमर पर सूरज के हाथों की कसती पकड़ और नीचे दोनों अंगों के बीच चलते उस मदहोश कर देने वाले घर्षण को एकटक निहारता रहा, जहाँ काम-रस की बूंदें अब छलक कर बिस्तर को सराबोर कर रही थीं।

आखिरकार यह बीड़ा सोनी ने ही उठाया। अपनी कामुक व्याकुलता और पति की बेबसी को भांपते हुए उसने अपनी घबराहट पर काबू पाया। उसने अपने शरीर के पूरे भार को एक हाथ के सहारे बिस्तर पर टिकाकर खुद को संतुलित (बैलेंस) किया। फिर, अपने दूसरे खाली हाथ को नीचे ले जाकर उसने सूरज के उस प्रचंड, तने हुए और नीली नसों वाले लंड को मजबूती से अपनी उंगलियों में पकड़ लिया।

सूरज का वह विशाल सुपड़ा जो अब तक ज़रूरत से ज़्यादा फूलकर भारी हो चुका था, सोनी ने उसे सधे हुए हाथों से सीधे अपनी रसीली और गर्म बुर (मुनिया) के मुहाने पर टिकाया। विकास अपनी आँखें फाड़े, सांसें रोके इस ऐतिहासिक पल को देख रहा था।

सोनी ने विकास की आँखों में आँखें डालीं और एक गहरा, धीमा दबाव बनाते हुए अपने पूरे शरीर का भार नीचे की तरफ छोड़ दिया। उस कड़े मांस के भारी घर्षण और अपनी तंग गहराइयों के खिंचाव को सहते हुए, उसने सूरज के उस विशाल सुपड़े को आखिरकार अपनी बुर के भीतर समा लिया।

जैसे ही वह चौड़ा अग्रभाग उसकी तंग दीवारों को चीरता हुआ अंदर गया, सोनी के मुंह से एक तीखी और मदहोश कर देने वाली सिसकारी फूट पड़ी। सूरज के शरीर में भी एक तीव्र लहर दौड़ गई। उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे उसने किसी गीली मखमली गहराई को अपने लंड से चीर दिया हो । और पीछे बैठे विकास का रोम-रोम इस साक्षात मिलन को देखकर पूरी तरह कांप उठा। दीये के जैसी दिखने वाली मुनिया अब पूरी तरह गोल होकर बड़ी मुश्किल से उसे अद्भुत लंड को अपने भीतर समाहित किए हुए थी। खेल का सबसे कठिन चरण अब पूरा हो चुका था और सूरज का पौरुष पूरी तरह अपनी मंज़िल पा चुका था।

सोनी जैसे-जैसे अपनी पतली कमर को ऊपर-नीचे हिलाती गई, सूरज का वह मजबूत और प्रचंड पौरुष उसकी बुर (मुनिया) के भीतर और गहराई तक अपना स्थान बनाता गया। सूरज भी अब पूरी तरह से इस आदिम वेग के वशीभूत हो चुका था। भले ही उसकी आँखों पर पट्टी बंधी थी, लेकिन शरीर के इस जादुई स्पर्श ने उसे पूरी तरह बेकाबू कर दिया था। वह भी नीचे से अपनी कमर को ऊपर की तरफ उठा-उठाकर सोनी के झटकों का पूरा साथ दे रहा था, जिससे दोनों का मिलन और अधिक उग्र हो गया था।

उन दोनों के बीच चल रहे इस भीषण और मदहोश कर देने वाले चोदन का वह जीवंत दृश्य सीधे विकास की भूखी आँखों के सामने था। सोनी की पीठ सूरज की तरफ और उसका सीना विकास की ओर होने के कारण, विकास इस वर्जित त्रिकोण के हर एक पल को साक्षात घटते देख रहा था। यह वही दृश्य था जिसके लिए विकास महीनों से तड़प रहा था, और आज अपनी पत्नी को किसी अन्य पुरुष के साथ इस कदर लीन देखकर उसके मन को एक असीम और अकल्पनीय तृप्ति का अहसास हो रहा था।

उधर सोनी की गीली और रसीली बुर में सूरज का वह तना हुआ लिंग पूरी ताकत से आगे-पीछे हो रहा था, जिससे कमरे में एक मदहोश कर देने वाली धीमी आवाज़ गूँज रही थी। इधर पलंग के किनारे बैठा विकास अब अपनी उत्तेजना के अंतिम छोर पर था। वह अपनी हथेलियों की बंद मुट्ठी में अपने लंड को जकड़कर उसे इस महा-मिलन की लय के साथ लगातार भींचने और सहलाने का प्रयास कर रहा था।

विकास से अब यह प्रचंड आनंद और ज़्यादा देर बर्दाश्त नहीं हुआ। उसका पूरा शरीर कांपने लगा। उसने सीधे सोनी की रसीली और कटीली आँखों में आँखें डालीं। सोनी भी अपने पति को एकटक निहार रही थी। उसी चरम क्षण में, विकास ने एक गहरी आह के साथ अपनी मुट्ठी को और कसा और सोनी के सामने ही अपना गाढ़ा वीर्य पूरी तरह से त्याग कर दिया। उसके अंग से छूटे काम-रस के फव्वारे ने उसकी हथेलियों को पूरी तरह से सराबोर कर दिया।

सोनी ने जब अपने पति को इस तरह चरम सुख पाते और अपनी हथेलियों को वीर्य से सनते देखा, तो उसके चेहरे पर एक अद्भुत संतोष और विजय की मुस्कान तैर गई। उसने सूरज के ऊपर लगातार अपनी कमर को थिरकाते हुए ही, अपने भीगे होठों से विकास की तरफ एक बेहद कामुक फ्लाइंग किस (चुंबन) उछाला। सोनी ने अपनी आँखों के सामने इस महा-कामुक मिलन को सफल होते और अपने पति विकास की उस दबी हुई, वर्जित इच्छा को पूरी तरह साकार होते हुए देखा, जिससे उसका मन अंदर तक बेहद खुश और तृप्त हो गया।

अपने पति विकास की तीव्र इच्छा को पूरी तरह तृप्त करने के बाद, अब बारी उस अंतिम और मुख्य आहुति की थी, जिसके लिए सोनी और सूरज दोनों के भीतर की आदिम तड़प अपने चरम पर पहुँच चुकी थी। अनुष्ठान का यह भाग इस पूरी रात का सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक मोड़ था।

सोनी ने एक गहरी साँस ली और सूरज के उस कड़े, मजबूत लिंग से ऊपर की तरफ उठने लगी। जैसे ही वह ऊपर उठी, एक मधुर पक्क…' की रसीली आवाज़ के साथ सूरज का पौरुष उसकी बुर (मुनिया) से अलग हो गया। वह आवाज़ इतनी मादक और गहरी थी, मानो सोनी के बदन के भीतर का सारा भराव अचानक किसी ने बाहर खींच लिया हो। अलग होने की वह अद्भुत और मनमोहक ध्वनि कमरे के सन्नाटे में गूँज उठी। यह सुनकर विकास के चेहरे पर एक गहरी, तृप्त मुस्कान आ गई और सोनी ने भी अपनी पलके झुका कर नीचे देखते हुए अपने पति को एक रहस्यमयी मुस्कान लौटा दी उसे एहसास था कि विकास क्या सोच रहा था।

शेष अगले भाग में

 
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भाग 206

सोनी ने एक गहरी साँस ली और सूरज के उस कड़े, मजबूत लिंग से ऊपर की तरफ उठने लगी। जैसे ही वह ऊपर उठी, एक मधुर पक्क…' की रसीली आवाज़ के साथ सूरज का पौरुष उसकी बुर (मुनिया) से अलग हो गया। वह आवाज़ इतनी मादक और गहरी थी, मानो सोनी के बदन के भीतर का सारा भराव अचानक किसी ने बाहर खींच लिया हो। अलग होने की वह अद्भुत और मनमोहक ध्वनि कमरे के सन्नाटे में गूँज उठी। यह सुनकर विकास के चेहरे पर एक गहरी, तृप्त मुस्कान आ गई और सोनी ने भी अपनी पलके झुका कर नीचे देखते हुए अपने पति को एक रहस्यमयी मुस्कान लौटा दी उसे एहसास था कि विकास क्या सोच रहा था।


अब आगे..

कुछ देर से सूरज के लंड पर उछल रही सोनी थक चुकी थी। जैसे ही सूरज के बगल में बिस्तर पर लेटने का प्रयास करने लगी, विकास तुरंत घुटनों के बल सरकता हुआ उसके बिल्कुल पास आ गया। उत्तेजना में पूरी तरह डूबा विकास अपनी सुध-बुध खो चुका था। उसने अपने एक हाथ से सोनी के सुगठित वक्ष (चूची) को सहलाते हुए, अपने दूसरे हाथ को—जो अभी-अभी उसके अपने वीर्य से पूरी तरह सना हुआ था—सोनी की उसी रसीली और खुली हुई मुनिया पर रख दिया।

विकास की वे वीर्य से सनी हुई उंगलियाँ जैसे ही सोनी की बुर के गीले मुहाने को छूते हुए भीतर प्रवेश करने लगीं, सोनी के पूरे शरीर में एक करंट सा दौड़ गया। विकास की वीर्य से सनी उंगलियाँ जब सोनी की मुनिया (बुर) की गहराइयों में समाईं, तो वह भीतर तक सिहर उठी।

हे भगवान पूर्णाहुति के पहले विकास का वीर्य उसकी मुनिया में आ चुका था।

इस एहसास की आते ही, सोनी ने तुरंत विकास का वह हाथ अपनी उंगलियों से मज़बूती से पकड़ लिया पर तब तक देर हो चुकी थी। उसने लेटे-लेटे ही सीधे विकास की आँखों में आँखें डालीं, उसकी आँखों में एक अजीब सी संजीदगी और मर्यादा की लकीर थी जैसे वह इस आहुति की पवित्रता को बरकरार रखना चाहती हो।

सोनी ने अपनी उंगलियों से इशारा करते हुए विकास को मौन संदेश दिया, "अब आप जाकर बैठ जाइए..."

सोनी का यह अंदाज विकास को उसकी तय की गई सीमा का अहसास करा गया। वह समझ गया कि सूरज के द्वारा दी जाने वाली मुख्य आहुति से पहले उसका इस तरह सीधे शामिल होना खतरे से खाली नहीं था।


विकास पलंग के किनारे अपनी जगह पर वापस जाकर बैठ गया, जहाँ से अब सूरज और सोनी के बीच अंतिम मिलन की शुरुआत होने वाली थी।

विकास पलंग के किनारे बैठा इस नए और अप्रत्याशित बदलाव को पूरी तरह स्तब्ध होकर देख रहा था। कमरे की मद्धम रोशनी में मर्यादा की सारी सीमाएं पहले ही धुंधली हो चुकी थीं, और अब यह कहानी एक और भी अधिक उग्र और आदिम मोड़ ले रही थी।

सूरज की आँखों पर मखमली पट्टी बंधी हुई थी, जिसके कारण वह बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटकर केवल स्पर्श के जादुई और मादक संसार में जी रहा था। उसने अपने हाथों से टटोलते हुए बिस्तर पर लेटी सोनी की स्थिति का अंदाज़ा लगाया। सोनी इस समय थकान से शिथिल होकर शांत लेटी हुई थी और अपनी तेज चल रही सांसों को सामान्य करने की कोशिश कर रही थी, लेकिन सूरज के भीतर का पुरुषत्व इस समय किसी थमे हुए तूफान की तरह उग्र और उन्मादी हो चुका था। वह केवल अपने भीतर सुलगती काम-अग्नि की पूर्णाहुति चाहता था।

उसने अपने मजबूत हाथों से सोनी के नितंबों को थपथपाते हुए उसे पलटने का मूक इशारा किया। सोनी, जो इस अनुष्ठान के नियमों और अपने पति की गुप्त इच्छा की पूर्ति के लिए पूरी तरह समर्पित थी, एक सच्ची दासी की भांति उसके इस आदेश के आगे नतमस्तक हो गई। सूरज ने उसे बिस्तर पर किसी मिट्टी की मूरत की भांति अपनी सुविधानुसार ढाला और मोड़ा। सोनी बिना किसी प्रतिरोध के, उस प्रचंड पौरुष की अंतिम मार को सहने के लिए घुटनों और हथेलियों के बल आते हुए 'डॉगी स्टाइल' की मुद्रा में आ गई।

कमरे के भीतर जहाँ आदिम और अलौकिक मिलन अपनी आखिरी सीमाएं लांघने को तैयार था, वहीं इस पूरी कहानी का दूसरा छोर एक बेहद अद्भुत और जादुई संयोग रच रहा था। इस समय दूरियों की सारी सीमाएं जैसे इस अनोखे अनुष्ठान के सामने घुटने टेक चुकी थीं।

एक तरफ जहाँ यह चरम और उग्र समागम नैनीताल की ठंडी और धुंधली वादियों के एक बंद कमरे में पूरी शिद्दत के साथ घट रहा था, वहीं दूसरी तरफ इस पूरी कहानी का केंद्र बिंदु यानी सूरज की माँ और सोनी की बड़ी बहन, सुगना, इस समय बनारस में बैठी हुई थी। बनारस की ठंडी हवाओं और सांस्कृतिक माहौल के बीच, सुगना वहाँ संतान सप्तमी के व्रत और अपनी विशेष साधना में पूरी तरह लीन थी। आस-पास सुलगती धूप और कपूर की महक के बीच वह अपनी आँखें बंद किए पूरी तरह ध्यानमग्न थी।

बनारस की इस अगाध ध्यान गहराई में सुगना का मन अब केवल विचारों तक सीमित नहीं था, बल्कि उसकी कल्पनाओं में नैनीताल के उस बंद कमरे का पूरा दृश्य जीवंत होकर उभरने लगा था। उसे अपनी छोटी बहन सोनी का वह सुंदर, सुगठित और अनावृत बदन साफ़ दिखाई देने लगा, जो इस समय पूरी तरह से कामुक तरंगों में डूबा हुआ था। सुगना को अपनी कल्पना में सोनी एक विशेष मुद्रा में, घुटनों और हथेलियों के बल आकर पूरी तरह मिलन के तैयार दिखाई देने लगी।

उसकी बंद आँखों के पीछे और दिमाग की गहराइयों में सोनी को लेकर की गई वह अनूठी सिफारिशें और उसके जीवन को संतान सुख से भरने की वो अनोखी सुपारी (संकल्प) बार-बार घूम रही थी, जिसे उसने पूरे विधि-विधान से सोनी को दिया था। सुगना अपनी इस अंतर्दृष्टि में देख रही थी कि सोनी इस समय पूरी तरह से संभोग-रत है, और कोई पौरुष अपनी पूरी ताकत और वेग के साथ उसकी मुनिया को चोद रहा है। शुरुआत में सुगना के मन ने यही माना कि सोनी के साथ इस महा-मिलन को पूर्ण करने वाला उसका पति विकास ही है, जो पूर्णाहुति देने जा रहा है।

परंतु, जैसे-जैसे वह ध्यान की और गहरी परतों में उतरती गई, न जाने क्यों उसका अवचेतन मन इस स्थापित सत्य को स्वीकार करने से इनकार करने लगा। कल्पना की उस मद्धम रोशनी में, सोनी के पीछे खड़े उस पुरुष की आकृति धीरे-धीरे बदलने लगी। सुगना को वहाँ विकास का सामान्य रूप दिखाई देना बंद हो गया; उसकी जगह उसके अवचेतन ने किसी विशाल, गठीले और चौड़े सीने वाले एक 'दिव्य पुरुषोत्तम' की परिकल्पना करनी शुरू कर दी।

यह ठीक उस पूर्णाहुति के पहले का क्षण था, जब उस रहस्यमयी पुरुष का पौरुष अपने चरम उन्माद पर था। जब सोनी उस स्थिति में तैयार खड़ी थी, तब पीछे खड़ा वह दिव्य पुरुषोत्तम अपनी मजबूत कमर को थोड़ा पीछे खींचकर उस रसीली मुनिया के मुहाने पर अपने लोहे जैसे सख़्त लिंग से अंतिम और सबसे भीषण प्रहार करने ही वाला था। उस पुरुष की देह से निकलती आदिम ऊर्जा को महसूस कर बनारस में बैठी सुगना का पूरा शरीर एक अजीब सी सिहरन से कांप उठा।

सुगना की वह मनोकामना, जो अब पूरे परिवार की सबसे बड़ी इच्छा बन चुकी थी, उसे वह दिव्य पुरुष अपने इसी प्रचंड वेग के दम पर सोनी के गर्भ में सीधे स्थापित करने के लिए पूरी तरह से तैयार था।

पलंग के कोने पर बैठा विकास जब नैनीताल के उस कमरे में अपनी पत्नी सोनी की आँखों में आँखें डाले इस उग्र स्थिति को देख रहा था, और दूसरी तरफ उसे दूर बनारस में बैठी सुगना की मानसिक तरंगों और उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति का अहसास हो रहा था, तो उसका पूरा अस्तित्व इस अद्भुत और अनोखे संयोग को देखकर सिहर उठा।

सुगना इस बात का रत्ती भर भी आभास नहीं था कि उसका अवचेतन मन जिसे 'दिव्य पुरुषोत्तम' मानकर पूज रहा था, वह कोई बाहरी शक्ति नहीं, बल्कि उसी का अपना जवान बेटा सूरज था। यह खेल इतना गहरा और अनोखा था कि जहाँ बनारस में बैठी सगी बहन का अटूट संकल्प और नैनीताल में उमड़ता आदिम पौरुष एक साथ मिलकर सोनी के आँचल को खुशियों से भरने की इस अंतिम आहुति को अंजाम देने जा रहे थे।

सोनी के डॉगी स्टाइल में आने के बाद कमरे का पूरा भूगोल विकास के लिए और अधिक उत्तेजक हो गया। सोनी के सुगठित, गोरे नितंब अब पूरी तरह से उभरे हुए विकास की नज़रों के ठीक सामने थे।

विकास आज पहली बार अपनी पत्नी के इस मादक स्वरूप को दूर देख रहा था। कितनी सुंदर और कितनी कामुक थी सोनी। विकास को अपनी बीवी पर गर्व हो रहा था। सूरज ने आगे बढ़कर सोनी की कमर के दोनों सुंदर लव हैंडल्स को अपनी उंगलियों के गहरे कसाव में ले लिया और खुद को उसके ठीक पीछे व्यवस्थित करते हुए अपनी पोजीशन बनाई। वह अपने उस लोहे जैसे कड़े, चमकीले और भारी लंड को पीछे से सोनी की उस काम-रस से सराबोर रसीली मुनिया (योनि) के मुहाने पर रखकर धीरे-धीरे रगड़ने लगा। बीच-बीच में वह अपने हाथ बढ़ाकर सोने की झूलती हुई चुचियों का मुआयना करता कभी उसके कंधे सहलाता..


कोने में बैठा विकास जब अपनी पत्नी के बदन का यह सबसे उन्मुक्त और आदिम रूप देख रहा था, तो उसकी आँखें विस्मय और तीव्र कामुकता से पूरी तरह भर उठीं। वह कुछ ही देर पहले अपना वीर्य त्याग कर पूरी तरह खाली और शिथिल हो चुका था, लेकिन उसकी आँखों के ठीक सामने घटता यह उग्र दृश्य उसके शांत पड़ चुके शरीर में फिर से उत्तेजना का एक नया सैलाब भरने में पूरी तरह कामयाब रहा। यद्यपि उसका अपना छोटा अंग इस समय दोबारा पूरी तरह खड़ा होने की स्थिति में नहीं था, फिर भी उसके भीतर की मानसिक तड़प अपनी आखिरी सीमा पर थी।

उसकी फटी हुई आँखें बिना पलक झपकाए सोनी के उन थिरकते नितंबों और उनके ठीक बीच में लगातार दस्तक दे रहे सूरज के उस विशाल, कड़े और नीली नसों वाले मजबूत लंड पर टिकी हुई थीं।

सूरज के मजबूत पौरुष का वह कड़ा घर्षण जैसे ही सोनी की मुनिया के भीगे मुहाने पर बढ़ने लगा, सोनी के पूरे बदन में एक तीव्र थरथराहट दौड़ गई। पीछे से पड़ते उस कड़े मांस के दबाव को महसूस करते हुए उसने अपने दोनों हाथों को बिस्तर पर और आगे फैलाकर चादर को कसकर पकड़ लिया। सूरज अपनी आँखों पर बंधी पट्टी के अंधेरे में पूरी तरह से बेकाबू हो चुका था; उसके लिए सोनी के इन सुंदर लव हैंडल्स का स्पर्श ही इस समय उसकी उत्तेजना का सबसे बड़ा केंद्र था।

उसने अपनी कमर को थोड़ा और पीछे खींचा और फिर पूरे उन्माद के साथ एक ज़ोरदार धक्का आगे की तरफ मारा। सूरज का वह मोटा, चमकीला और नीली नसों वाला लंड एक ही झटके में सोनी की उस तंग और रसीली बुर को चीरता हुआ आधा समा गया। इस अचानक और तीव्र प्रहार से सोनी के मुंह से एक तीखी, दबी हुई आह निकल गई, जिसे उसने अपने दांतों के बीच भींच लिया। उसकी मुनिया के मखमली होंठ सूरज के उस विशाल आकार को अपने भीतर समाहित करने के लिए पूरी तरह गोल होकर तन गए।

सोनी के मुख से वो कामुक वाक्यांश निकलते निकलते रह गये….सूरज आह तनी धीरे से …दुखाता…

सोनी द्वारा बनाया गया मौन व्रत का नियम अब उसे ही भारी पड़ रहा था। वह चाह कर भी सूरज को अपनी व्यथा बताने में नाकाम थी।

अब सूरज बिना किसी रुकावट के, हर झटके के साथ और अंदर प्रवेश करता गया। जिस सोनी को आने वाले समय में इसी खूबसूरत योनि से बच्चे को जन्म देना था आज ऐसा लग रहा था सूरज उसकी परीक्षा ले रहा था।कुछ ही देर में वो सोनी को बेतहाशा चोदने लगा। डॉगी स्टाइल की इस पोजीशन में हर झटका सोनी की गहराइयों को सीधे और गहराई से मथ रहा था। कमरे में मांस से मांस के टकराने की वह रसीली और थप-थप की आवाज़ अब और तेज़ हो चुकी थी। सूरज ने सोनी की कमर पर अपनी उंगलियों का कसाव और बढ़ा दिया, जिससे उसके गोरे बदन पर उंगलियों के निशान और गहरे होने लगे।

पलंग के कोने पर बैठा विकास अपनी फटी आँखों से अपनी पत्नी के नितंबों के बीच चलते इस उग्र और साक्षात समागम को एकटक निहार रहा था। यद्यपि उसका अपना अंग इस समय पूरी तरह शांत था, लेकिन मानसिक रूप से वह उत्तेजना के उस चरम बिंदु पर था जहाँ उसकी सांसें उखड़ने लगी थीं। सोनी भी इस भीषण युद्ध को सहते हुए बीच-बीच में अपनी तिरछी नज़रों से पलंग के किनारे बैठे विकास को देख लेती, जिससे विकास के भीतर की कामुकता मर्यादा की आखिरी दीवार को भी लांघने के लिए मचल उठती।

कमरे के भीतर बढ़ता हुआ वह आदिम वेग अब अपनी चरम सीमा पर था। पीछे से पड़ते सूरज के उन प्रचंड और अनियंत्रित धक्कों के कारण, सोनी का पूरा शरीर हर प्रहार के साथ कांप उठता था। पलंग के किनारे बैठा विकास जब सोनी के चेहरे की तरफ देखता, तो उसे वहाँ सुख के साथ-साथ एक गहरी कामुक वेदना (पीड़ा) साफ़ दिखाई पड़ती। सूरज की उंगलियों का वह लव हैंडल्स पर कसता हुआ दबाव और नीचे से होने वाला वह अंधाधुंध प्रहार सोनी के बर्दाश्त की आखिरी हद को आज़मा रहा था।

अपनी पत्नी के चेहरे पर उस तीखे खिंचाव और कामुक कशमकश को देखकर विकास के भीतर अचानक एक अजीब सी तड़प और छटपटाहट होने लगी। एक पति होने के नाते उसका रक्षक भाव जाग उठा और वह मन ही मन बुरी तरह कशमकश में फंस गया। उसके दिमाग में बार-बार यह विचार आने लगा कि क्या वह तुरंत अपनी जगह से उठे, पलंग पर आगे बढ़े और सूरज को सीधे जाकर रोक दे? उसके मन में आया कि वह सूरज को सोनी के साथ इस तरह की निर्दयता और उग्रता से व्यवहार करने से मना करे, और उसे समझाए कि वह इस संभोग के कृत्य को कोमलता और प्यार से अंजाम दे।

परंतु, इस विचार के आते ही विकास के मन में कई अजीब-अजीब और परस्पर विरोधी भाव एक साथ उमड़ने लगे। एक तरफ जहाँ अपनी पत्नी के लिए उसके दिल में दर्द उठ रहा था, वहीं दूसरी तरफ इस वर्जित और प्रचंड दृश्य की उग्रता उसके भीतर की सोई हुई कामुकता को एक ऐसे चरम स्तर पर मथ रही थी जैसा उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था। वह समझ नहीं पा रहा था कि वह इस दृश्य को देखकर डर रहा है, या सोनी के प्रति गहरी सहानुभूति महसूस कर रहा है, या फिर इस आदिम और अकल्पनीय स्वरूप को साक्षात घटते देख उसका मानसिक रोमांच और अधिक बेकाबू होता जा रहा है।

वह इसी अजीबोगरीब कशमकश और भावनाओं के बवंडर में पिसता हुआ, अपनी साँसें रोके पलंग के कोने पर जड़वत बैठा रहा, जहाँ मर्यादा और आदिम वेग के बीच का यह मानसिक युद्ध अब उसके धैर्य की अंतिम परीक्षा ले रहा था।

कमरे के भीतर घट रहा वह दृश्य विकास के लिए किसी ऐसी काल्पनिक दुनिया जैसा था, जिसकी थाह पाना आसान नहीं थl। पलंग के कोने पर जड़वत बैठा विकास अपनी फटी आँखों से उस महा-मिलन के एक-एक क्षण को अपने भीतर सोख रहा था। उसने अपने जीवन में कई तरह की कल्पनाएँ की थीं, यहाँ तक कि आधुनिक युग की तमाम ब्लू फिल्मों (वयस्क फिल्मों) में भी उसने कामुकता के कई रूप देखे थे, लेकिन जो साक्षात और जीवंत सत्य आज उसकी आँखों के सामने घट रहा था, वह उन सभी कृत्रिम दृश्यों से कोसों आगे और पूरी तरह अविश्वनीय था।

अपनी खुद की सुंदर और रूपवान पत्नी सोनी को, अपने ही जवान और गठीले भांजे सूरज के द्वारा इस तरह आदिम और उग्र तरीके से मर्दित होते देखना विकास की बंद और गुप्त तमन्नाओं के दायरे में भी कभी इस क्रूरता और स्पष्टता के साथ नहीं आया था। सूरज का वह प्रचंड पौरुष जब-जब पीछे से सोनी की गहराइयों पर प्रहार करता, तो विकास के दिमाग की नसें उत्तेजना के मारे फटने को हो जातीं। वह इस बात से पूरी तरह विस्मित था कि मर्यादा का हर एक बंधन, जो समाज और लोक-लाज ने तय किया था, वह इस मद्धम रोशनी वाले कमरे में सुलगते हुए इत्र और साँसों की गर्माहट के बीच पिघलकर पूरी तरह बह चुका था।

आज वह जो कुछ भी देख रहा था, वह उसके जीवन का सबसे अनोखा, वर्जित और विस्मयकारी अनुभव था। एक तरफ सोनी के चेहरे पर उभरती वह तीखी कामुक वेदना और दूसरी तरफ सूरज का वह निष्ठुर और उन्मादी वेग—इन दोनों के बीच पिसती हुई उसकी अपनी पत्नी का यह आत्मसमर्पण विकास के भीतर के पुरुष को एक अजीब सी मानसिक तृप्ति और सिहरन से भर रहा था, जहाँ से वापसी का अब कोई रास्ता नहीं बचा था।

पीछे से पड़ रहे सूरज के उस प्रचंड और निरंतर प्रहारों का ही यह असर था कि आखिरकार सोनी इस चरम सुख (स्खलन) के मुकाम पर पहुँच गई। उसकी मुनिया (योनि) भीतर से पूरी तरह सक्रिय हो उठी और उसमें से प्रेम-रस की मूसलाधार बारिश होने लगी। काम-रस के इस तीव्र बहाव के साथ ही उसकी मखमली दीवारें एक अद्भुत लय में संकुचित होने और फूलने लगीं। यह अहसास ऐसा था मानो सोनी की बुर के भीतर की अनगिनत कोमल उंगलियां सूरज के उस कड़े लंड को एक साथ पकड़ रही हों और फिर छोड़ रही हों।

सोनी के बदन में उठती इस तीव्र कँपकँपी और दीवारों के इस जादुई खिंचाव से सूरज ने तुरंत महसूस कर लिया कि उसकी मौसी अब पूरी तरह से स्खलित (तृप्त) हो रही है। सूरज का अपना पौरुष यद्यपि अभी पूरी तरह शांत होने के लिए तैयार नहीं था, लेकिन वह शरीर से बेहद सुगठित और संयमी था। इस चरम क्षण के दौरान उसने अपनी कामुक उत्तेजना और अपने आवेग को बहुत ही सधे हुए अंदाज़ में नियंत्रित किया।

उसने अपने धक्कों की हिंसक गति को तुरंत रोक दिया और सोनी की थकी हुई कमर और नितंबों को अपनी हथेलियों से धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया। उसने बेहद प्यार और आत्मीयता के साथ सोनी को इस परम सुख के अहसास में पूरी तरह डूब जाने और शांत हो जाने का समय दिया।

सोनी इस अकल्पनीय और गहरे सुख से पूरी तरह तृप्त होकर निढाल हो गई। उसका शरीर अब और अधिक भार उठाने की स्थिति में नहीं था, इसलिए वह घुटनों के बल से सरकती हुई सीधे पेट के बल बिस्तर पर गिर पड़ी। वह पूरी तरह बेसुध और शांत हो चुकी थी। जैसे ही उसका बदन बिस्तर पर लुढ़क गया और, एक रसीली सरकन के साथ सूरज का वह कड़ा लंड उसकी मुनिया की गहराइयों से बाहर आ गया, और इस महा-युद्ध का यह प्रथम अध्याय इस सोनी की सुखद तृप्ति के साथ संपन्न हुआ।

पलंग के कोने पर बैठा विकास अपनी पत्नी के चेहरे पर आए उस परम संतोष को देखकर गहरे विस्मय और एक अजीब सी तृप्ति से भर उठा।

सूरज, सोनी के ठीक बगल में बिस्तर पर सीधा लेट गया और उसने बेहद प्यार और आत्मीयता से सोनी के उस निढाल शरीर को अपने मजबूत आलिंगन (बाहों) में भर लिया। उसने सोनी को इस कदर पास खींचा कि उसकी दोनों सुगठित चूचियां (वक्ष) सूरज के चौड़े सीने से पूरी तरह सट गईं। इस गहरे स्पर्श के बीच, सूरज अपने भीतर उमड़ते प्रेम को कोमलता से व्यक्त करने लगा।

उसकी उंगलियां कभी सोनी की नाजुक गर्दन को सहलातीं, तो कभी उसकी पूरी पीठ पर मखमली अंदाज़ में रेंगने लगतीं, जिससे सोनी के बदन की बची-खुची थकान भी सुकून में बदलने लगी। बीच-बीच में वह प्यार के अतिरेक में सोनी के सुगठित नितंबों को अपनी हथेलियों में पकड़कर उसे अपनी तरफ और कसकर खींच लेता। वह अपने चेहरे को आगे बढ़ाता और सोनी के गोरे गालों से अपने गाल सटाकर उस शांत माहौल में अपनी धड़कनों को एक कर देता।

मर्यादा और आदिम वेग का यह खूबसूरत और शांत छोर अब पूरी तरह से थमा हुआ था। पलंग के कोने पर बैठा विकास अपनी ही पत्नी को, अपने ही सगे भांजे की बाहों में इस तरह पूरी तरह सुरक्षित और प्यार से पिघलते हुए देख रहा था। सोनी का वह निश्छल आत्मसमर्पण और सूरज का यह दुलार विकास की आँखों के सामने एक ऐसा दृश्य रच रहा था, जिसने उसके मन के भीतर के सारे अंतर्विरोधों को शांत कर उसे एक असीम, मूक और अनोखी तृप्ति से सराबोर कर दिया था।

सूरज के उस गहरे और निश्चल दुलार ने सोनी के भीतर बची-खुची झिझक को भी पूरी तरह से मिटा दिया था। अपनी रीढ़ में दौड़ती उस मीठी सिहरन के बीच, सोनी ने भी सूरज के चेहरे को अपनी हथेलियों में भर लिया। उसने आगे बढ़कर सूरज के भीगे होठों पर अपने होंठ रख दिए और उसे पूरी दीवानगी से चूमने लगी। बंद कमरे के सन्नाटे में दोनों की साँसों की गर्माहट और चुंबन की मदहोश कर देने वाली आवाज़ें गूँजने लगीं।

इस गहरे चुंबन के दौरान ही, सोनी ने अपने बदन में एक नई ऊर्जा महसूस की। उसने अपनी एक गोरी, सुगठित और पूरी तरह से नंगी जांघ को उठाकर सूरज के भारी शरीर के ऊपर रख दिया। उसकी मखमली त्वचा का वह सीधा स्पर्श सूरज के पेट और जाँघों के हिस्से पर थिरकने लगा।

सोनी का यह अंदाज़ इतना नैसर्गिक और प्यार से भरा था कि सूरज ने भी उसके इस अधिकार को सहर्ष स्वीकार किया। वह नीचे लेटा हुआ सोनी की उस भारी और गर्म जाँघ को सहलाने लगा, जिससे दोनों के शरीर एक-दूसरे में और गहराई से गुंथ गए।

सोनी अब पूरी तरह से सूरज के उस निश्छल और प्रगाढ़ प्रेम के वशीभूत हो चुकी थी। सूरज की बाहों का वह मखमली घेरा, उसके सीने की गर्माहट और होठों पर टिका वह गहरा चुंबन सोनी को किसी दूसरी ही दुनिया में ले गया था। उस जादुई और आदिम वातावरण में सुलगते इत्र और साँसों की थिरकन के बीच, सोनी के मन से लोक-लाज और झिझक की आखिरी परत भी पूरी तरह उतर चुकी थी।

वह सूरज के इस असीम समर्पण और प्यार में इस कदर लीन और मदहोश हो गई कि कुछ पलों के लिए उसके दिमाग से यह बात पूरी तरह विस्मृत हो गई कि पलंग के ठीक किनारे उसका अपना पति विकास बैठा है। वह भूल गई कि विकास अपनी खुली और भूखी आँखों से उसके इस बेहद निजी, वर्जित और गहरे प्रेम-कृत्य को एकटक निहार रहा है।

इस समय सोनी के लिए उस बंद कमरे में सूरज के स्पर्श और उसकी धड़कनों के अलावा कोई दूसरा अस्तित्व मायने नहीं रख रहा था। उसने अपनी नंगी जांघ को सूरज के ऊपर और अधिक कस दिया, मानो वह खुद को पूरी तरह से सूरज के भीतर ही विलीन कर देना चाहती हो।

उधर पलंग के कोने पर बैठा विकास अपनी पत्नी के चेहरे पर आए इस चरम उन्माद और विस्मृति के भाव को साक्षात देख रहा था। सोनी का इस तरह किसी अन्य पुरुष के प्यार में पूरी तरह डूब जाना और उसे खुद की उपस्थिति तक का अहसास न रहना, विकास के भीतर छिपी उस अजीब, गुप्त और वर्जित संतुष्टि को उसके अंतिम शिखर पर पहुँचा रहा था। वह बिना हिले-डुले, अपनी साँसें रोके इस अद्भुत और अनोखे त्रिकोण के अंतिम मुकाम की ओर बढ़ने का मूक गवाह बना रहा।

सोनी और सूरज न सिर्फ शरीर से अपितु पूरे तन मन से एक दूसरे में विलीन हो चुके थे विकास अब स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहा था।

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