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भाग 207
उधर पलंग के कोने पर बैठा विकास अपनी पत्नी के चेहरे पर आए इस चरम उन्माद और विस्मृति के भाव को साक्षात देख रहा था। सोनी का इस तरह किसी अन्य पुरुष के प्यार में पूरी तरह डूब जाना और उसे खुद की उपस्थिति तक का अहसास न रहना, विकास के भीतर छिपी उस अजीब, गुप्त और वर्जित संतुष्टि को उसके अंतिम शिखर पर पहुँचा रहा था। वह बिना हिले-डुले, अपनी साँसें रोके इस अद्भुत और अनोखे त्रिकोण के अंतिम मुकाम की ओर बढ़ने का मूक गवाह बना रहा।
सोनी और सूरज न सिर्फ शरीर से अपितु पूरे तन मन से एक दूसरे में विलीन हो चुके थे विकास अब स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहा था।
अब आगे..
इधर नैनीताल के उस शांत और एकांत कमरे में, सोनी उस तीव्र कामुक मिलन से चरम सुख को प्राप्त कर सूरज की मजबूत बाहों में सिमटी हुई थी। कुछ पल पहले तक जो बदन एक उग्र सैलाब की तरह थिरक रहा था, वह अब सोनी को अपने सीने से सटाकर धीरे-धीरे उसकी साँसों की रफ्तार को सामान्य कर रहा था। सोनी को पता था उसने अपना चरम सुख तो ले लिया है पर अभी उसके गर्भ में बहु प्रतीक्षित वीर्य आहुति बाकी थी। अभी उसे एक बार फिर इस आवेग को अपने कोमल बदन से झेलना था। दोनों एक-दूसरे के आगोश में खामोश लेटे हुए थे और सूरज का लंड अब भी वैसे ही तना हुआ था और सोनी की पेडू और नाभि पर सटा अपनी उपस्थिति का एहसास सोनी को दिला रहा था।
उधर दूसरी तरफ, बनारस की हवेली में सुगना की संतान सप्तमी की विशेष पूजा संपन्न हो चुकी थी। हाथ में जलता हुआ दीया और आरती की थाली लिए वह पूरे घर में उसका धुआँ देने निकली। इसी क्रम में वह मालती और रीमा के कमरे की तरफ पहुँची, लेकिन वहाँ अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। कमरे को खाली देख उसने पीछे की तरफ मुंह करके लाली से पूछा, "अरे लाली! ये दोनों कहाँ गईं? कमरे में कोई नहीं है।"
लाली ने रसोई से ही तेज आवाज में जवाब दिया, " वो दोनों अभी-अभी किसी काम से बाजार की तरफ निकली हैं।"
लाली का जवाब सुनकर सुगना जैसे ही मुड़ने वाली थी, तभी उसकी पारखी नजरें कमरे के कोने में रखी मालती की अलमारी पर जा टिकीं। अलमारी का एक पल्ला हल्का सा खुला हुआ था, जहाँ से कपड़ों की परतों के बीच दबा एक बेहद चमकीला, लाल रंग का कपड़ा बाहर की तरफ झलक रहा था। सुगना चाहकर भी अपने कौतूहल को नहीं रोक पाई। उस दिन सोनी के कमरे में जो दृश्य उसने देखा था, की वजह से मालती को लेकर उसके मन में पहले ही कई सवाल थे। वह दबे कदमों से अलमारी के पास पहुँची और जैसे ही उसने उस लाल कपड़े को खींचकर बाहर निकालना लिया। वो एक बेहद खूबसूरत, लगभग पारदर्शी और आधुनिक डिज़ाइन की ब्रा थी।
यह देखकर सुगना के दिल की धड़कन बढ़ गई। उसने तुरंत आरती की थाली को पास के एक छोटे स्टूल पर टिकाया और उस अद्भुत और कामुक अंतःवस्त्र को अपने हाथों से महसूस करने लगी। उस महीन, रेशमी कपड़े को अपनी उंगलियों से छूते ही सुगना के हाथों में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई। उसने अपनी आँखों से जिस मालती को राजू के प्रचंड वेग के सामने पूरी तरह समर्पित और बेसुध होते देखा था, उस रात के दृश्य की कल्पना सुगना के दिमाग में फिर से ताजा हो गई। मालती की सुगठित और उभरी हुई चुचियो का का मादक आकार, जिसे उस दिन राजू अपने मजबूत हाथों की गिरफ्त में बुरी तरह मथ रहा था, उसे इस छोटे से कपड़े के नाप से जोड़कर सुगना ने महसूस कर लिया कि उसकी बेटी अब मर्यादाओं की दहलीज पार कर कामुकता की अगाध दुनिया में पूरी तरह उतर चुकी है।
उसका मन अब और ज्यादा जानने के लिए बेचैन हो उठा। सुगना ने अलमारी के अन्य खानों और कपड़ों के अलग-अलग भागों को बहुत बारीकी से टटोलना शुरू किया। कपड़ों की परतों को हटाते ही आखिरकार उसकी आँखों के सामने मालती की ब्रा और पैंटी का वह अद्भुत, कामुक और कीमती कलेक्शन आ गया, जिसे देखकर सुगना दंग रह गई। ये कोई साधारण कपड़े नहीं थे; यह वही बेशकीमती और उत्तेजक अंतःवस्त्रों का जखीरा था, जिसे राजू ने मालती की अनमोल छुअन और उसके पूर्ण समर्पण के बदले उसे बेहद प्यार और चाहत से गिफ्ट किया था। अलमारी में छिपा यह राज अब सुगना के सामने पूरी तरह बेपर्दा हो चुका था।
हवेली के उस एकांत कमरे में सुगना मालती के उन आधुनिक और उत्तेजक अंतःवस्त्रों को एक-एक करके अलमारी से निकाल रही थी। उसके हाथों में वे महीन रेशमी कपड़े थे, जिन्हें देखकर उसका मन गहरे अचरज और सोच में डूब गया। वह मन ही मन बुदबुदाई, "हे भगवान! इस उम्र में इतनी कामुकता... आज के युवा न जाने कहाँ जा रहे हैं! यह लड़की अभी कुछ समय पहले तक तो हर बात पर 'मम्मा-मम्मा' करते हुए मेरे पीछे घूमती थी, अचानक यह कब इतनी बड़ी हो गई और कब मर्यादा की दीवारें लांघ गई, मुझे पता ही नहीं चला।"
मालती के इस बदले हुए रूप ने सुगना को भीतर तक झझकोर दिया था। उसे वह खूबसूरत पेंटी भी दिखाई पड़ गई जिससे राजू ने मालती के बदन से अपने हाथों से उतरा था।उस पारदर्शी ब्रा और पैंटी को अपने हाथों में थामा और उस कोमल कपड़े को अपनी उंगलियों से छूकर महसूस करने लगी। उस महीन वस्त्र के नाप और उसकी बनावट को देखते हुए सुगना के दिमाग में मालती के सुगठित बदन और उसकी उभरती तरुणाई की पूरी कल्पना जीवंत हो उठी। वह सोचने पर मजबूर हो गई कि उसकी सीधी-सादी दिखने वाली बेटी अब इस कामुक दुनिया में कितनी गहराई तक उतर चुकी है।
सुगना याद कर रही थी कि कैसे सोनी के कमरे के उस बिस्तर पर मालती पूरी तरह बेसुध और अनावृत होकर 'घोड़ी' बनी हुई थी, और राजू अपने पूरे प्रचंड पौरुष और बेकाबू उन्माद के साथ उसके ठीक पीछे खड़ा था। राजू के मजबूत हाथों की गिरफ्त में मालती के बदन का एक-एक हिस्सा मथ रहा था और वह पूरी तरह उसके वेग के सामने समर्पित थी।
अलमारी के सामने खड़ी सुगना के हाथों में मालती के वे उत्तेजक अंतःवस्त्र थे, लेकिन उसकी बंद आँखों के सामने वही बिस्तर पर चलता संभोग का दृश्य बार-बार घूम रहा था। इस अकाट्य सबूत ने सुगना के मन में यह साफ कर दिया कि राजू और मालती के बीच का यह गुप्त और कामुक रिश्ता अब किसी भी मर्यादा के नियंत्रण में नहीं रहा था।
अलमारी के उन कामुक अंतःवस्त्रों को थामे सुगना के भीतर सिर्फ गुस्सा या अचरज ही नहीं था, बल्कि एक अजीब सी, अनकही कशिश भी धीरे-धीरे सिर उठाने लगी थी। मालती और राजू के उस नग्न और उग्र समागम के दृश्य ने सुगना के अंतर्मन के उन कोनों को छू लिया था, जो बरसों से शांत और सुप्त पड़े थे।
इस कशिश और बेचैनी के पीछे शायद कई वजहें थीं। एक तो यह कि वह खुद पिछले कई वर्षों से संभोग के उस सुख और शारीरिक गर्माहट से पूरी तरह दूर थी, जिससे उसका बदन अंदर ही अंदर एक खामोश प्यास से जूझ रहा था। दूसरी और सबसे गहरी वजह थी उसकी अपनी दबी हुई यादें। अतीत में जिस तरह वह अपने भाई सोनू के साथ अंतरंग हुई थी, मर्यादाओं को भुलाकर उन दोनों ने जो पल जिए थे, उसकी यादें सुगना के जेहन में आज भी कहीं दफन थीं सोनू की याद आते ही सुगना का मालपुआ पसीजने लगा।
तभी अचानक पीछे से दबे कदमों से लाली कमरे के भीतर दाखिल हुई। रसोई का काम निपटाकर वह सुगना को ही ढूंढते हुए वहाँ आई थी। जैसे ही लाली की नजर अलमारी के सामने खड़ी सुगना की उंगलियों में फंसी उस खूबसूरत पैंटी पर गई, वह ठिठक गई।
सुगना के हाथों में मालती का वह अत्यंत निजी और उत्तेजक अंतःवस्त्र था, और सुगना के चेहरे पर फैला वह अजीब सा भाव—जिसमें अचरज, कशिश और एक दबी हुई तड़प साफ झलक रही थी—लाली की तेज नजरों से छुप नहीं सका। लाली ने अपनी आँखों से सुगना को उस हालत में, उस कीमती गुलाबी कपड़े को सहलाते और विचारों में खोए हुए रंगे हाथों देख लिया था।
कमरे में अचानक एक भारी सन्नाटा छा गया। सुगना को जैसे ही पीछे किसी की मौजूदगी का अहसास हुआ, उसकी तंद्रा टूटी। उसने घबराकर पीछे मुड़कर देखा तो सामने लाली खड़ी थी, जिसकी आँखों में इस नजारे को देखकर एक गहरा अचरज और कई अनकहे सवाल तैर रहे थे।
लाली की अचानक मौजूदगी और उसकी नजरों का सीधा प्रहार देख सुगना के पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस खूबसूरत पैंटी को वह कुछ पल पहले तक अपनी उंगलियों से सहला रही थी, वह उसे छिपाने लगी। पकड़े जाने के डर, शर्म और आत्मग्लानि ने उसे इस कदर घेर लिया कि वह हड़बड़ा गई। अपनी इस अजीब स्थिति को छुपाने के लिए, वह बिना लाली के कुछ पूछे ही, अपनी भोजपुरी मातृभाषा में लड़खड़ाती हुई सफाई देने लगी।
"अरे लाली... तू कब अइलू? ऊ... ऊ हम त बस ई अलमारी तनी सम्हारत रहनी। देख न, मालती कइसन कइसन कपड़ा आजकल रखे ले, सब इहवाँ-उहवाँ बिखरल रहे। हम त बस सहेज के रखत रहनी ह, अउर कुछ ना..." सुगना ने कांपती आवाज और उखड़ी साँसों के साथ बात को घुमाने की नाकाम कोशिश की।
पर लाली कहाँ मानने वाली थी। उसने सुगना की आँखों में तैरती उस दबी हुई कामुकता और चेहरे की सुर्खी को बहुत गहराई से ताड़ लिया था। वह सुगना की घबराहट को देखकर हल्के से मुस्कुराई और जानबूझकर उसके और करीब आते हुए, बेहद धीमे लेकिन चुभते हुए लहजे में भोजपुरी में ही बोली:
"ए सुगना, हमसे का छुपावत बाड़ू? दिखाओ हमारो के ई पेंटी तो बहुत सुंदर था। सच बताव, का तोहार इस सब पहिने के मन कभी ना करेला? तोहार ई सुंदर और जवान बदन... अइसन सुघड़ रूप लेके काहे अपन जीवन ऐसे सूखा में बितावत बाड़ू? आख़िर कब तक अपन ई जवानी अइसे ही मार के रखबू? जब से सरयू चाचा गईल बाड़े तू एकदम बदल गइलू"
लाली के इन सीधे और तीखे शब्दों ने सुगना के भीतर जैसे कोई बांध तोड़ दिया। बरसों से संभोग के सुख से महरूम उसका बदन और भाई सोनू के साथ बीती पुरानी अंतरंग यादें, लाली के इस उकसावे से और तेजी से सुलग उठीं। सुगना निरुत्तर खड़ी रह गई, और उस शांत कमरे में दोनों महिलाओं के बीच का सन्नाटा अब एक नए और गहरे राज की गवाही देने लगा था।
लाली के उन सीधे और मर्मभेदी शब्दों ने सुगना के तन-मन में एक अजीब सा करंट दौड़ा दिया था। सुगना का गोरा और दमकता चेहरा शर्म और घबराहट से एकदम लाल हो गया। उसका दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि उसे डर था कहीं लाली उसकी धड़कनें सुन न ले। अपनी इस बेबसी और छिपी हुई तड़प को छुपाने के लिए उसने तुरंत खुद को संभाला और बात बदलने की नाकाम कोशिश करते हुए मजाकिया जुबान में भोजपुरी में पूछा:
"अरे लाली... धीरे बोल, का बकबक करत बाड़े ई सब छोड़, ई बताव कि का तू कभी मालती से एह बारे में कवनो बात कइलू हा? का ओकरा मन के टोह लेवे के कोशिश कइलू?"
लाली ने सुगना के चेहरे पर आई उस सुर्खी और घबराहट को बहुत बारीकी से देखा। वह समझ गई कि सुगना अंदर से कितनी हिल चुकी है। उसने सुगना का कांपता हुआ हाथ अपने हाथ में लिया और उसकी आँखों में झांकते हुए गंभीर लहजे में भोजपुरी में जवाब दिया:
"हा, हम कइले रहनी पर ऊ लड़की बहुत चालाक बिया। हमार बात सुनत ही ऊ बात के इहवाँ-उहवाँ घुमा देलस अउर कवनो सीधा जवाब ना दिहलस।"
लाली की बातें सुनकर सुगना की चिंता और बढ़ गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि एक तरफ जहाँ उसकी बेटी मर्यादा की सारी हदें पार कर चुकी है, वहीं दूसरी तरफ उसके अपने भीतर का सोया हुआ अतीत उसे कमजोर बना रहा था।
सुगना को खामोश और असमंजस में देख लाली ने उसके कंधे पर हाथ रखा। उसकी आँखों में अब हवेली की मर्यादा को बचाने की एक अजीब सी जिद और चिंता साफ झलक रही थी। उसने सुगना को ढांढस बधाते हुए आगे कहा:
"पर , तू चिंता मत करा। हम शब्द रखत बानी कि कवनो न कवनो जुगत, कवनो न कवनो तोड़ हम अइसन निकालब, जेकरा से मालती अउर राजू, दोनों एह अनैतिक अउर पाप के मिलन से हमेशा खातिर दूर हो जास। हवेली के इज्जत पर हम अइसन दाग ना लागे देब।"
इधर वासना सुगना के मन में भी जाग चुकी थी और अब उधर नैनीताल में सूरज के सब्र भी जवाब दे रहा था वह अपनी कमर से हल्का-हल्का दबाव सोनी के पेट पर बढ़ने लगा था सोनी महसूस कर रही थी और अब संतान सप्तमी की पूर्णाहुति के लिए खुद को तैयार कर रही थी।
बिस्तर पर करवट लेटे-लेटे ही, सोनी ने जब अपनी नाजुक उंगलियों से सूरज के उस कड़े और चिपचिपे लंड को थामा और उसे सहलाते हुए अपनी मुनिया (योनि) के गीले मुहाने की तरफ खींचा और सूरज के होंठों को चूमा…वह स्पर्श सूरज के बदन में बिजली की तरह कौंध गया।सोनी की इस मूक और स्पर्शमयी पहल ने कमरे के भीतर छाए उस शांत सन्नाटे को एक बार फिर से जीवंत कर दिया।
सोनी की तरफ से सूरज को दिया गया एक बेहद गहरा, स्पष्ट और अंतिम आमंत्रण था—एक मौन संदेश कि उसका शरीर और मन इस रात की महा-आहुति और अंतिम मिलन के लिए पूरी तरह से तैयार और व्याकुल हैं।
सूरज ने अपनी आँखों पर बंधी पट्टी के पीछे छिपे अंधकार में मौसी के उस कोमल हाथ के दबाव और उसकी उंगलियों की थरथराहट को महसूस किया। सोनी की मुनिया से निकलता वह गर्म काम-रस अभी भी सूरज के अंग को छू रहा था, जिसने उसके पौरुष को एक बार फिर से जागृत कर दिया।
पलंग के कोने पर बैठा विकास, जो अब तक इस शांत दृश्य को निहार रहा था, अपनी पत्नी की जांघों की हरकत और उसके इस कामुक पहल और समर्पित अंदाज़ को देखकर एक बार फिर गहरी उत्तेजना के भंवर में डूबने लगा। वह समझ गया कि खेल का सबसे निर्णायक और अंतिम अध्याय अब शुरू होने वाला है, जहाँ सूरज इस आमंत्रण को स्वीकार कर सोनी को परम सुख के उस अंतिम शिखर पर ले जाएगा जहाँ से तृप्ति की कोई नई गाथा लिखी जानी थी।
कुछ ही पलों में सूरज उठकर पूरी तरह से सोनी के ऊपर आ चुका था। उसकी आँखों पर बंधी पट्टी के पीछे का अंधकार उसकी उत्तेजना को और हिंसक बना रहा था। उसने बिना कोई वक़्त गंवाए अपने दोनों हाथों से सोनी की गोरी और सुगठित जाँघों को पकड़ा और पूरी ताकत से उन्हें अपनी तरफ खींच लिया। सोनी किसी बहती हुई कामुक तरंग की तरह उसकी तरफ खिंचती चली गई। इस कशमकश के बीच भी सोनी की नज़रें पलंग के किनारे बैठे अपने पति विकास पर टिकी थीं। वह अपनी आँखों से विकास को देखते करते हुए इस अंतिम प्रेम-युद्ध के लिए खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार कर रही थी और जैसे अनुमति मांग रही थी। विकास ने भी अपने होठों को गोलकर उसे एक फ्लाइंग किस दिया और उत्सुकता से उसका मुख मिलन को देखने के लिए अधीर हो उठा।
अब सूरज के भीतर कोई कोमलता नहीं बची थी। उसका पौरुष इस समय एक सुलगते हुए हथियार की तरह सख़्त था। उसने अपने मजबूत लिंग को अपने हाथ में लिया और सोनी की रसीली मुनिया के मुहाने पर धीरे-धीरे पटकना (थपथपाना) शुरू कर दिया। मांस से मांस के इस धीमे टकराव से सोनी की धड़कनें बहुत तेज़ी से बढ़ने लगीं। उसके चेहरे के कामुक भाव पल-पल बदलने लगे; उसे अच्छी तरह पता था कि अगले ही पल एक बहुत बड़ा धमाका होने वाला है और वह प्रचंड अंग उसकी गहराइयों को चीरने वाला है।
परंतु सूरज उसे इस चरम सुख के लिए और तड़पा रहा था। वह जानबूझकर अपने लिंग के गर्म सुपड़े को उसकी मुनिया के मुहाने पर छुआता और फिर पीछे खींच लेता। इसी कशमकश के बीच, सूरज ने अपने दोनों बड़े और मजबूत हाथों को आगे बढ़ाया और सोनी की दोनों भरी हुई चूचियों (वक्षों) को अपनी हथेलियों में पूरी तरह भर लिया। वह कभी उन्हें अपनी उंगलियों के दबाव से बेरहमी से भींचता, तो कभी एक हाथ से दोनों को एक साथ पकड़ने का बेताब प्रयास करता। सूरज की उंगलियाँ सोनी के दोनों कड़े और उभरे हुए निप्पलों पर आकर टिक गईं, जिन्हें वह अपनी उंगलियों के बीच लेकर गोल-गोल घुमाते हुए मसलने लगा।
सोनी इस दोहरे प्रहार से पूरी तरह बेहाल हो उठी—ऊपर उसके स्तनों को बुरी तरह मथ जा रहा था और नीचे उस प्रचंड लिंग की मार उसकी मुनिया के द्वार पर लगातार पड़ रही थी, जिससे कमरे का तापमान अपनी आखिरी सीमा लांघने को तैयार था।
सोनी ने अपने हाथ बढ़ाये और सूरज के लंड को पड़कर अपनी मुनिया के भीतर करने की कोशिश की।
और आखिरकार, एक बार फिर नर-नारी का वह आदिम खेल पूरी तरह से शुरू हो गया। बंद कमरे की हवा में उत्तेजना का एक नया ज्वार उमड़ पड़ा था, जिसकी रफ़्तार धीरे-धीरे अपना असली रंग पकड़ने लगी थी। सोनी के बदन में आने वाले हर तीव्र कंपन के साथ उसकी हिलती हुई चूचियां (वक्ष) इस बढ़ते हुए वेग की साफ गवाही दे रही थीं।
इस बार माहौल में एक अनोखा और गहरा ठहराव भी था। पीठ के बल लेटी सोनी का चेहरा पलंग के किनारे बैठे अपने पति विकास की तरफ था। वह अपनी थकी और मदहोश आँखों से विकास को एकटक देखे जा रही थी, जबकि पीछे से सूरज का वह प्रचंड पौरुष उसकी देह की गहराइयों में और गहरे तक, और अंदर तक उतरता जा रहा था।
विकास और सोनी—पति और पत्नी—एक-दूसरे की आँखों में आँखें डाले, बिना पलक झपकाए इस महा-मिलन की अंतिम पूर्णाहुति का इंतजार कर रहे थे। दोनों की नज़रों में अब कोई अपराध बोध नहीं था, बल्कि एक-दूसरे के प्रति एक मूक और गहरा सामंजस्य था। उधर सूरज, जो अपनी ही धुन में पूरी तरह अंधा हो चुका था, कभी आगे झुककर सोनी की उन उभरी हुई चूचियों को अपनी मजबूत हथेलियों से मथने लगता, तो कभी उसकी पतली कमर के लव हैंडल्स को पकड़कर और ज़ोर से दबाता, ताकि हर धक्का सीधे उसकी नाभि के पार जाकर लगे।
कमरे में साँसों की गर्माहट और मांस के टकराने की आवाज़ें अब अपने अंतिम और सबसे तीव्र शिखर की ओर बढ़ रही थीं।
सूरज की रफ्तार अब अपने चरम पर पहुँच चुकी थी। आँखों पर बंधी उस मखमली पट्टी के पीछे का अंधकार उसे पूरी तरह से एक आदिम और मदहोश कर देने वाले वेग में झोंक चुका था। उसका वह प्रचंड, कड़ा पौरुष अब सोनी की मुनिया की तंग गहराइयों को पूरी तरह नापते हुए सीधे उसके गर्भ के द्वार पर निरंतर दस्तक दे रहा था। हर भीषण प्रहार के साथ उसका अंग जैसे मूक भाषा में मौसी से उसके उस आखिरी द्वार को खोलने की मनुहार कर रहा था, ताकि वह अपनी अंतिम आहुति से उस पूरे हिस्से को पूरी तरह सींच सके।
सूरज का बचा-खुचा नियंत्रण अब पूरी तरह से समाप्त हो चुका था। सोनी की मुनिया के उस मखमली और जादुई संकुचन ने उसके भीतर एक ऐसा आदिम उन्माद जगा दिया कि वह सब कुछ भूलकर पूरी तरह से बेकाबू हो गया। आँखों पर बंधी मखमली पट्टी के अंधेरे में उसका पूरा अस्तित्व केवल उस गर्म, रसीली गहराई को महसूस कर रहा रहा था।
सूरज की उंगलियों के निशान सोनी के लव हैंडल्स पर गहरे बैठ चुके थे, जो इस बात का प्रमाण थे कि यह मिलन अब अपनी सबसे उग्र और अंतिम पराकाष्ठा (चरम सुख) के बिल्कुल नजदीक पहुँच रहा था। सूरज के भीतर का आदिम पुरुष अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुका था। उसने अपनी दोनों हथेलियों में सोनी की भरी हुई चूचियों (वक्षों) को एक साथ भींच लिया और अपने धक्कों की रफ़्तार को एक ऐसी हिंसक गति दे दी, जिसे सहना सोनी के लिए लगभग मर्यादा से परे होता जा रहा था।
वह पूरी दीवानगी से कभी आगे झुककर सोनी की उन कटीली चूचियों को अपने मुंह में भरकर चूसने लगता, तो कभी अपनी मजबूत हथेलियों से उन्हें ज़ोर-ज़ोर से मथते हुए सहलाने लगता। ऊपर उसके स्तनों पर यह मदहोश कर देने वाला प्रहार चल रहा था, और नीचे उसका वह कड़ा, प्रचंड लंड सोनी की कोमल मुनिया (बुर) के भीतर एक सुखद अत्याचार ढाए हुए था। गति इतनी तीव्र थी कि मांस से मांस के टकराने की आवाज़ कमरे के सन्नाटे को चीर रही थी।
गर्भ के मुहाने पर होने वाले इस निरंतर और गहरे प्रहार ने सोनी के पूरे वजूद को हिलाकर रख दिया। वह कुछ ही देर पहले चरम सुख पाकर पूरी तरह शिथिल हो चुकी थी, लेकिन सूरज के इस निष्ठुर और बेतहाशा वेग ने उसके भीतर काम-अग्नि को फिर से पूरी तरह सुलगा दिया। उस जादुई दस्तक के अहसास से सोनी के पूरे बदन में एक बार फिर से तीव्र करंट दौड़ गया और वह गहरी उत्तेजना के एक नए भंवर में खिंचती चली गई।
बिस्तर पर लेटी सोनी ने इस नए और प्रचंड वेग को सहने के लिए चादर पर अपनी उंगलियों का कसाव और मज़बूत कर लिया। उसकी आँखें अभी भी पलंग के किनारे बैठे अपने पति विकास की आँखों में पूरी तरह गड़ी हुई थीं। विकास भी अपनी पत्नी के चेहरे पर उभरते इस दोबारा जागृत होते कामुक ज्वार और सूरज के उस बेकाबू होते मर्दन को साक्षात देखकर अपनी रुकी हुई साँसों के साथ इस महा-मिलन की अंतिम पूर्णाहुति का मूक गवाह बना हुआ था।
आखिरकार सूरज के लिंग का वह कड़ा सुपड़ा जब सोनी के गर्भाशय के मुहाने पर जाकर ठहरा, तो सोनी की मुनिया ने उसे अपने आगोश में ले लिया और सूरज अपने आप को रोक नहीं पाया उस परम गहराई के स्पर्श ने दोनों के शरीरों में एक सनसनी फैला दी। इस चरम और निर्णायक क्षण में, सोनी की मुनिया (योनि) के भीतर की मखमली दीवारें और उसके मखमली होंठ पूरी तरह से सक्रिय हो उठे।
सोनी के शरीर के भीतर से स्वतः ही एक अद्भुत, लयबद्ध और तीव्र संकुचन (खिंचाव और भींचने की प्रक्रिया) होने लगा। वह मखमली संकुचन सूरज के उस गर्म, तने हुए लिंग को चारों तरफ से किसी मखमली नली की तरह बेहद मज़बूती और दीवानगी से जकड़ रहा था।
सूरज के लिए यह अहसास किसी अलौकिक सुख से कम नहीं था। सोनी की बुर से निकलने वाला वह गाढ़ा, गर्म काम-रस और उसके भीतर होने वाली यह मूक थरथराहट सूरज के पौरुष को एक ऐसा सुखद अहसास दे रही थी, जिसने उसके भीतर एकत्रित लावा को पूरी तरह से पिघलाना शुरू कर दिया था।
सूरज अपनी बंद आँखों के पीछे इस चरम सुख के आवेग से पूरी तरह कांप रहा था, और उसकी कमर अब पूरी तरह से सोनी के उस जादुई और सम्मोहक खिंचाव के आगे आत्मसमर्पण करने को बेताब हो चुकी थी। पीछे बैठा विकास इस मूक और महा-कामुक संगम को देखकर अपनी रुकी हुई साँसों के साथ इस रात की अंतिम पूर्णाहुति का गवाह बन रहा था।
कुछ ही देर में, इस भीषण और बेतहाशा प्रहार के कारण सोनी का पूरा बदन काम-वेग के उस अंतिम भंवर में फंसकर बुरी तरह से कँपकँपाने लगा। उसकी मुनिया के भीतर होने वाले तीव्र और मखमली संकुचन ने सूरज को साफ़ संदेश दे दिया कि सोनी अब अपने चरम सुख की दहलीज़ लांघ रही है। सोनी की यह हालत देख सूरज का अपना पौरुष भी अपनी अंतिम आहुति छोड़ने के लिए पूरी तरह सुलग उठा, और वह अपनी पूर्णाहुति के लिए तैयार हो गया।
सूरज ने अपनी पूरी ताकत समेटी और एक बार फिर अपने उस प्रचंड अंग को सोनी के गर्भ के मुहाने पर ले जाकर पूरी तरह से टिका दिया। सूरज के नितंब पूरी तरह तन चुके थे उसका सारा ध्यान उस लंड पर केंद्रित हो चुका था। उस परम गहराई के भीतर अब काम-रस का प्रवाह इस कदर तीव्र हो चुका था, मानो आकाश से सुख और आनंद की कोई बारिश हो रही हो। दोनों शरीरों से निकलने वाला वह पवित्र और आदिम रस इस महा-मिलन का साक्षात गवाह बन रहा था।
इस दौरान सूरज और सोनी सुध बुध खोकर एक दूसरे की बाहों में थे ना कोई मौसी थी ना कोई भांजा था।
कमर की वह उग्र और बेतहाशा गति अब धीरे-धीरे थम चुकी थी, लेकिन दोनों शरीरों के बीच जुड़ाव अब भी अपने चरम पर था। सूरज के शांत होते पौरुष में एक धीमा और गहरा स्पंदन अभी भी जारी था, जो इस बात का संकेत था कि अनुष्ठान की अंतिम आहुति अपने मुकाम तक पहुँच रही है। वीर्य की एक-एक बूंद बेहद सधे और जादुई अंदाज़ में सोनी के गर्भ की गहराइयों में उतरती चली गई। जब आहुति का अंतिम कतरा भी उसके भीतर समा गया, तब जाकर सूरज का पूरा शरीर पूरी तरह शांत और शिथिल हो गया पर लंड अब भी तना था।
अब उसके भीतर का वह आदिम और हिंसक उन्माद पूरी तरह विलीन हो चुका था। वह अपनी सारी ऊर्जा और पौरुष सोनी के भीतर समर्पित करके एक मासूम बच्चे की तरह निढाल हो गया और उसका भारी शरीर सोनी के कोमल बदन के ऊपर लगभग गिर सा गया। सूरज का गठीला बदन काफी भारी था, जिसका पूरा भार इस समय सोनी के ऊपर था, परंतु सोनी ने इस पर कोई ऐतराज नहीं किया। इस सफल पूर्णाहुति के बाद उसके मन में एक असीम संतोष और ममता का भाव जाग उठा था। वह बेहद प्यार से सूरज के बालों पर उंगलियां फेर रही थी।
सोनी बड़े ही प्यार और दुलार से सूरज की पीठ और कंधों को सहलाती रही, उसकी उंगलियाँ उसके थके हुए बदन को सुकून दे रही थीं। कुछ पलों तक उसे इसी तरह अपने सीने से भींचे रखने के बाद, सोनी ने अपनी थकी हुई जाँघों और कमर को धीरे से संभाला। उसने बेहद कोमलता और सावधानी से सूरज के भारी शरीर को अपने ऊपर से सरकाया और उसे धीरे-धीरे करवट कर बिस्तर पर एक तरफ लिटा दिया, ताकि वह इस अद्भुत काम सेवा के बाद कुछ आराम कर सके। पर जैसे ही सूरज का तनाव हुआ लंड सोनी की मुनिया से बाहर आया एक बार फिर वही मधुर ..पक्क…..की आवाज आई.
विकास को आश्चर्य हो रहा दो दो बार अद्भुत यौनिमर्दन करने के बाद भी क्या सूरज स्खलित नहीं हुआ था ? क्या सोनी को अभी और चुदना था.. तभी विकास ने सोने की बनिया की तरफ देखा जो फुल कर लाल हो चुकी थी और उसकी होठों से सफेद चमकदार ताड़ी का रस बहार आ रहा था। जो इस बात का गवाह था कि पूर्णाहुति संपन्न हो चुकी है
विकास इस मूक और महा-कामुक संगम के इस अंतिम दृश्य को देखकर अपनी रुकी हुई साँसों के साथ शांत बैठा रहा वह कभी ईश्वर को धन्यवाद देता कभी उनसे सोनी की सोनी गोद को भरने का अनुरोध करता विधाता ने शायद विकास की मनसा और इच्छा दोनों सुन ली..
पर विकास के दिमाग में अब भी सूरज का तनाव हुआ लंड घूम रहा था
पर उसे यकीन हो चला था कि नया मेहमान आने वाला था.
उधर पलंग के कोने पर बैठा विकास अपनी पत्नी के चेहरे पर आए इस चरम उन्माद और विस्मृति के भाव को साक्षात देख रहा था। सोनी का इस तरह किसी अन्य पुरुष के प्यार में पूरी तरह डूब जाना और उसे खुद की उपस्थिति तक का अहसास न रहना, विकास के भीतर छिपी उस अजीब, गुप्त और वर्जित संतुष्टि को उसके अंतिम शिखर पर पहुँचा रहा था। वह बिना हिले-डुले, अपनी साँसें रोके इस अद्भुत और अनोखे त्रिकोण के अंतिम मुकाम की ओर बढ़ने का मूक गवाह बना रहा।
सोनी और सूरज न सिर्फ शरीर से अपितु पूरे तन मन से एक दूसरे में विलीन हो चुके थे विकास अब स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहा था।
अब आगे..
इधर नैनीताल के उस शांत और एकांत कमरे में, सोनी उस तीव्र कामुक मिलन से चरम सुख को प्राप्त कर सूरज की मजबूत बाहों में सिमटी हुई थी। कुछ पल पहले तक जो बदन एक उग्र सैलाब की तरह थिरक रहा था, वह अब सोनी को अपने सीने से सटाकर धीरे-धीरे उसकी साँसों की रफ्तार को सामान्य कर रहा था। सोनी को पता था उसने अपना चरम सुख तो ले लिया है पर अभी उसके गर्भ में बहु प्रतीक्षित वीर्य आहुति बाकी थी। अभी उसे एक बार फिर इस आवेग को अपने कोमल बदन से झेलना था। दोनों एक-दूसरे के आगोश में खामोश लेटे हुए थे और सूरज का लंड अब भी वैसे ही तना हुआ था और सोनी की पेडू और नाभि पर सटा अपनी उपस्थिति का एहसास सोनी को दिला रहा था।
उधर दूसरी तरफ, बनारस की हवेली में सुगना की संतान सप्तमी की विशेष पूजा संपन्न हो चुकी थी। हाथ में जलता हुआ दीया और आरती की थाली लिए वह पूरे घर में उसका धुआँ देने निकली। इसी क्रम में वह मालती और रीमा के कमरे की तरफ पहुँची, लेकिन वहाँ अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। कमरे को खाली देख उसने पीछे की तरफ मुंह करके लाली से पूछा, "अरे लाली! ये दोनों कहाँ गईं? कमरे में कोई नहीं है।"
लाली ने रसोई से ही तेज आवाज में जवाब दिया, " वो दोनों अभी-अभी किसी काम से बाजार की तरफ निकली हैं।"
लाली का जवाब सुनकर सुगना जैसे ही मुड़ने वाली थी, तभी उसकी पारखी नजरें कमरे के कोने में रखी मालती की अलमारी पर जा टिकीं। अलमारी का एक पल्ला हल्का सा खुला हुआ था, जहाँ से कपड़ों की परतों के बीच दबा एक बेहद चमकीला, लाल रंग का कपड़ा बाहर की तरफ झलक रहा था। सुगना चाहकर भी अपने कौतूहल को नहीं रोक पाई। उस दिन सोनी के कमरे में जो दृश्य उसने देखा था, की वजह से मालती को लेकर उसके मन में पहले ही कई सवाल थे। वह दबे कदमों से अलमारी के पास पहुँची और जैसे ही उसने उस लाल कपड़े को खींचकर बाहर निकालना लिया। वो एक बेहद खूबसूरत, लगभग पारदर्शी और आधुनिक डिज़ाइन की ब्रा थी।
यह देखकर सुगना के दिल की धड़कन बढ़ गई। उसने तुरंत आरती की थाली को पास के एक छोटे स्टूल पर टिकाया और उस अद्भुत और कामुक अंतःवस्त्र को अपने हाथों से महसूस करने लगी। उस महीन, रेशमी कपड़े को अपनी उंगलियों से छूते ही सुगना के हाथों में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई। उसने अपनी आँखों से जिस मालती को राजू के प्रचंड वेग के सामने पूरी तरह समर्पित और बेसुध होते देखा था, उस रात के दृश्य की कल्पना सुगना के दिमाग में फिर से ताजा हो गई। मालती की सुगठित और उभरी हुई चुचियो का का मादक आकार, जिसे उस दिन राजू अपने मजबूत हाथों की गिरफ्त में बुरी तरह मथ रहा था, उसे इस छोटे से कपड़े के नाप से जोड़कर सुगना ने महसूस कर लिया कि उसकी बेटी अब मर्यादाओं की दहलीज पार कर कामुकता की अगाध दुनिया में पूरी तरह उतर चुकी है।
उसका मन अब और ज्यादा जानने के लिए बेचैन हो उठा। सुगना ने अलमारी के अन्य खानों और कपड़ों के अलग-अलग भागों को बहुत बारीकी से टटोलना शुरू किया। कपड़ों की परतों को हटाते ही आखिरकार उसकी आँखों के सामने मालती की ब्रा और पैंटी का वह अद्भुत, कामुक और कीमती कलेक्शन आ गया, जिसे देखकर सुगना दंग रह गई। ये कोई साधारण कपड़े नहीं थे; यह वही बेशकीमती और उत्तेजक अंतःवस्त्रों का जखीरा था, जिसे राजू ने मालती की अनमोल छुअन और उसके पूर्ण समर्पण के बदले उसे बेहद प्यार और चाहत से गिफ्ट किया था। अलमारी में छिपा यह राज अब सुगना के सामने पूरी तरह बेपर्दा हो चुका था।
हवेली के उस एकांत कमरे में सुगना मालती के उन आधुनिक और उत्तेजक अंतःवस्त्रों को एक-एक करके अलमारी से निकाल रही थी। उसके हाथों में वे महीन रेशमी कपड़े थे, जिन्हें देखकर उसका मन गहरे अचरज और सोच में डूब गया। वह मन ही मन बुदबुदाई, "हे भगवान! इस उम्र में इतनी कामुकता... आज के युवा न जाने कहाँ जा रहे हैं! यह लड़की अभी कुछ समय पहले तक तो हर बात पर 'मम्मा-मम्मा' करते हुए मेरे पीछे घूमती थी, अचानक यह कब इतनी बड़ी हो गई और कब मर्यादा की दीवारें लांघ गई, मुझे पता ही नहीं चला।"
मालती के इस बदले हुए रूप ने सुगना को भीतर तक झझकोर दिया था। उसे वह खूबसूरत पेंटी भी दिखाई पड़ गई जिससे राजू ने मालती के बदन से अपने हाथों से उतरा था।उस पारदर्शी ब्रा और पैंटी को अपने हाथों में थामा और उस कोमल कपड़े को अपनी उंगलियों से छूकर महसूस करने लगी। उस महीन वस्त्र के नाप और उसकी बनावट को देखते हुए सुगना के दिमाग में मालती के सुगठित बदन और उसकी उभरती तरुणाई की पूरी कल्पना जीवंत हो उठी। वह सोचने पर मजबूर हो गई कि उसकी सीधी-सादी दिखने वाली बेटी अब इस कामुक दुनिया में कितनी गहराई तक उतर चुकी है।
सुगना याद कर रही थी कि कैसे सोनी के कमरे के उस बिस्तर पर मालती पूरी तरह बेसुध और अनावृत होकर 'घोड़ी' बनी हुई थी, और राजू अपने पूरे प्रचंड पौरुष और बेकाबू उन्माद के साथ उसके ठीक पीछे खड़ा था। राजू के मजबूत हाथों की गिरफ्त में मालती के बदन का एक-एक हिस्सा मथ रहा था और वह पूरी तरह उसके वेग के सामने समर्पित थी।
अलमारी के सामने खड़ी सुगना के हाथों में मालती के वे उत्तेजक अंतःवस्त्र थे, लेकिन उसकी बंद आँखों के सामने वही बिस्तर पर चलता संभोग का दृश्य बार-बार घूम रहा था। इस अकाट्य सबूत ने सुगना के मन में यह साफ कर दिया कि राजू और मालती के बीच का यह गुप्त और कामुक रिश्ता अब किसी भी मर्यादा के नियंत्रण में नहीं रहा था।
अलमारी के उन कामुक अंतःवस्त्रों को थामे सुगना के भीतर सिर्फ गुस्सा या अचरज ही नहीं था, बल्कि एक अजीब सी, अनकही कशिश भी धीरे-धीरे सिर उठाने लगी थी। मालती और राजू के उस नग्न और उग्र समागम के दृश्य ने सुगना के अंतर्मन के उन कोनों को छू लिया था, जो बरसों से शांत और सुप्त पड़े थे।
इस कशिश और बेचैनी के पीछे शायद कई वजहें थीं। एक तो यह कि वह खुद पिछले कई वर्षों से संभोग के उस सुख और शारीरिक गर्माहट से पूरी तरह दूर थी, जिससे उसका बदन अंदर ही अंदर एक खामोश प्यास से जूझ रहा था। दूसरी और सबसे गहरी वजह थी उसकी अपनी दबी हुई यादें। अतीत में जिस तरह वह अपने भाई सोनू के साथ अंतरंग हुई थी, मर्यादाओं को भुलाकर उन दोनों ने जो पल जिए थे, उसकी यादें सुगना के जेहन में आज भी कहीं दफन थीं सोनू की याद आते ही सुगना का मालपुआ पसीजने लगा।
तभी अचानक पीछे से दबे कदमों से लाली कमरे के भीतर दाखिल हुई। रसोई का काम निपटाकर वह सुगना को ही ढूंढते हुए वहाँ आई थी। जैसे ही लाली की नजर अलमारी के सामने खड़ी सुगना की उंगलियों में फंसी उस खूबसूरत पैंटी पर गई, वह ठिठक गई।
सुगना के हाथों में मालती का वह अत्यंत निजी और उत्तेजक अंतःवस्त्र था, और सुगना के चेहरे पर फैला वह अजीब सा भाव—जिसमें अचरज, कशिश और एक दबी हुई तड़प साफ झलक रही थी—लाली की तेज नजरों से छुप नहीं सका। लाली ने अपनी आँखों से सुगना को उस हालत में, उस कीमती गुलाबी कपड़े को सहलाते और विचारों में खोए हुए रंगे हाथों देख लिया था।
कमरे में अचानक एक भारी सन्नाटा छा गया। सुगना को जैसे ही पीछे किसी की मौजूदगी का अहसास हुआ, उसकी तंद्रा टूटी। उसने घबराकर पीछे मुड़कर देखा तो सामने लाली खड़ी थी, जिसकी आँखों में इस नजारे को देखकर एक गहरा अचरज और कई अनकहे सवाल तैर रहे थे।
लाली की अचानक मौजूदगी और उसकी नजरों का सीधा प्रहार देख सुगना के पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस खूबसूरत पैंटी को वह कुछ पल पहले तक अपनी उंगलियों से सहला रही थी, वह उसे छिपाने लगी। पकड़े जाने के डर, शर्म और आत्मग्लानि ने उसे इस कदर घेर लिया कि वह हड़बड़ा गई। अपनी इस अजीब स्थिति को छुपाने के लिए, वह बिना लाली के कुछ पूछे ही, अपनी भोजपुरी मातृभाषा में लड़खड़ाती हुई सफाई देने लगी।
"अरे लाली... तू कब अइलू? ऊ... ऊ हम त बस ई अलमारी तनी सम्हारत रहनी। देख न, मालती कइसन कइसन कपड़ा आजकल रखे ले, सब इहवाँ-उहवाँ बिखरल रहे। हम त बस सहेज के रखत रहनी ह, अउर कुछ ना..." सुगना ने कांपती आवाज और उखड़ी साँसों के साथ बात को घुमाने की नाकाम कोशिश की।
पर लाली कहाँ मानने वाली थी। उसने सुगना की आँखों में तैरती उस दबी हुई कामुकता और चेहरे की सुर्खी को बहुत गहराई से ताड़ लिया था। वह सुगना की घबराहट को देखकर हल्के से मुस्कुराई और जानबूझकर उसके और करीब आते हुए, बेहद धीमे लेकिन चुभते हुए लहजे में भोजपुरी में ही बोली:
"ए सुगना, हमसे का छुपावत बाड़ू? दिखाओ हमारो के ई पेंटी तो बहुत सुंदर था। सच बताव, का तोहार इस सब पहिने के मन कभी ना करेला? तोहार ई सुंदर और जवान बदन... अइसन सुघड़ रूप लेके काहे अपन जीवन ऐसे सूखा में बितावत बाड़ू? आख़िर कब तक अपन ई जवानी अइसे ही मार के रखबू? जब से सरयू चाचा गईल बाड़े तू एकदम बदल गइलू"
लाली के इन सीधे और तीखे शब्दों ने सुगना के भीतर जैसे कोई बांध तोड़ दिया। बरसों से संभोग के सुख से महरूम उसका बदन और भाई सोनू के साथ बीती पुरानी अंतरंग यादें, लाली के इस उकसावे से और तेजी से सुलग उठीं। सुगना निरुत्तर खड़ी रह गई, और उस शांत कमरे में दोनों महिलाओं के बीच का सन्नाटा अब एक नए और गहरे राज की गवाही देने लगा था।
लाली के उन सीधे और मर्मभेदी शब्दों ने सुगना के तन-मन में एक अजीब सा करंट दौड़ा दिया था। सुगना का गोरा और दमकता चेहरा शर्म और घबराहट से एकदम लाल हो गया। उसका दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि उसे डर था कहीं लाली उसकी धड़कनें सुन न ले। अपनी इस बेबसी और छिपी हुई तड़प को छुपाने के लिए उसने तुरंत खुद को संभाला और बात बदलने की नाकाम कोशिश करते हुए मजाकिया जुबान में भोजपुरी में पूछा:
"अरे लाली... धीरे बोल, का बकबक करत बाड़े ई सब छोड़, ई बताव कि का तू कभी मालती से एह बारे में कवनो बात कइलू हा? का ओकरा मन के टोह लेवे के कोशिश कइलू?"
लाली ने सुगना के चेहरे पर आई उस सुर्खी और घबराहट को बहुत बारीकी से देखा। वह समझ गई कि सुगना अंदर से कितनी हिल चुकी है। उसने सुगना का कांपता हुआ हाथ अपने हाथ में लिया और उसकी आँखों में झांकते हुए गंभीर लहजे में भोजपुरी में जवाब दिया:
"हा, हम कइले रहनी पर ऊ लड़की बहुत चालाक बिया। हमार बात सुनत ही ऊ बात के इहवाँ-उहवाँ घुमा देलस अउर कवनो सीधा जवाब ना दिहलस।"
लाली की बातें सुनकर सुगना की चिंता और बढ़ गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि एक तरफ जहाँ उसकी बेटी मर्यादा की सारी हदें पार कर चुकी है, वहीं दूसरी तरफ उसके अपने भीतर का सोया हुआ अतीत उसे कमजोर बना रहा था।
सुगना को खामोश और असमंजस में देख लाली ने उसके कंधे पर हाथ रखा। उसकी आँखों में अब हवेली की मर्यादा को बचाने की एक अजीब सी जिद और चिंता साफ झलक रही थी। उसने सुगना को ढांढस बधाते हुए आगे कहा:
"पर , तू चिंता मत करा। हम शब्द रखत बानी कि कवनो न कवनो जुगत, कवनो न कवनो तोड़ हम अइसन निकालब, जेकरा से मालती अउर राजू, दोनों एह अनैतिक अउर पाप के मिलन से हमेशा खातिर दूर हो जास। हवेली के इज्जत पर हम अइसन दाग ना लागे देब।"
इधर वासना सुगना के मन में भी जाग चुकी थी और अब उधर नैनीताल में सूरज के सब्र भी जवाब दे रहा था वह अपनी कमर से हल्का-हल्का दबाव सोनी के पेट पर बढ़ने लगा था सोनी महसूस कर रही थी और अब संतान सप्तमी की पूर्णाहुति के लिए खुद को तैयार कर रही थी।
बिस्तर पर करवट लेटे-लेटे ही, सोनी ने जब अपनी नाजुक उंगलियों से सूरज के उस कड़े और चिपचिपे लंड को थामा और उसे सहलाते हुए अपनी मुनिया (योनि) के गीले मुहाने की तरफ खींचा और सूरज के होंठों को चूमा…वह स्पर्श सूरज के बदन में बिजली की तरह कौंध गया।सोनी की इस मूक और स्पर्शमयी पहल ने कमरे के भीतर छाए उस शांत सन्नाटे को एक बार फिर से जीवंत कर दिया।
सोनी की तरफ से सूरज को दिया गया एक बेहद गहरा, स्पष्ट और अंतिम आमंत्रण था—एक मौन संदेश कि उसका शरीर और मन इस रात की महा-आहुति और अंतिम मिलन के लिए पूरी तरह से तैयार और व्याकुल हैं।
सूरज ने अपनी आँखों पर बंधी पट्टी के पीछे छिपे अंधकार में मौसी के उस कोमल हाथ के दबाव और उसकी उंगलियों की थरथराहट को महसूस किया। सोनी की मुनिया से निकलता वह गर्म काम-रस अभी भी सूरज के अंग को छू रहा था, जिसने उसके पौरुष को एक बार फिर से जागृत कर दिया।
पलंग के कोने पर बैठा विकास, जो अब तक इस शांत दृश्य को निहार रहा था, अपनी पत्नी की जांघों की हरकत और उसके इस कामुक पहल और समर्पित अंदाज़ को देखकर एक बार फिर गहरी उत्तेजना के भंवर में डूबने लगा। वह समझ गया कि खेल का सबसे निर्णायक और अंतिम अध्याय अब शुरू होने वाला है, जहाँ सूरज इस आमंत्रण को स्वीकार कर सोनी को परम सुख के उस अंतिम शिखर पर ले जाएगा जहाँ से तृप्ति की कोई नई गाथा लिखी जानी थी।
कुछ ही पलों में सूरज उठकर पूरी तरह से सोनी के ऊपर आ चुका था। उसकी आँखों पर बंधी पट्टी के पीछे का अंधकार उसकी उत्तेजना को और हिंसक बना रहा था। उसने बिना कोई वक़्त गंवाए अपने दोनों हाथों से सोनी की गोरी और सुगठित जाँघों को पकड़ा और पूरी ताकत से उन्हें अपनी तरफ खींच लिया। सोनी किसी बहती हुई कामुक तरंग की तरह उसकी तरफ खिंचती चली गई। इस कशमकश के बीच भी सोनी की नज़रें पलंग के किनारे बैठे अपने पति विकास पर टिकी थीं। वह अपनी आँखों से विकास को देखते करते हुए इस अंतिम प्रेम-युद्ध के लिए खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार कर रही थी और जैसे अनुमति मांग रही थी। विकास ने भी अपने होठों को गोलकर उसे एक फ्लाइंग किस दिया और उत्सुकता से उसका मुख मिलन को देखने के लिए अधीर हो उठा।
अब सूरज के भीतर कोई कोमलता नहीं बची थी। उसका पौरुष इस समय एक सुलगते हुए हथियार की तरह सख़्त था। उसने अपने मजबूत लिंग को अपने हाथ में लिया और सोनी की रसीली मुनिया के मुहाने पर धीरे-धीरे पटकना (थपथपाना) शुरू कर दिया। मांस से मांस के इस धीमे टकराव से सोनी की धड़कनें बहुत तेज़ी से बढ़ने लगीं। उसके चेहरे के कामुक भाव पल-पल बदलने लगे; उसे अच्छी तरह पता था कि अगले ही पल एक बहुत बड़ा धमाका होने वाला है और वह प्रचंड अंग उसकी गहराइयों को चीरने वाला है।
परंतु सूरज उसे इस चरम सुख के लिए और तड़पा रहा था। वह जानबूझकर अपने लिंग के गर्म सुपड़े को उसकी मुनिया के मुहाने पर छुआता और फिर पीछे खींच लेता। इसी कशमकश के बीच, सूरज ने अपने दोनों बड़े और मजबूत हाथों को आगे बढ़ाया और सोनी की दोनों भरी हुई चूचियों (वक्षों) को अपनी हथेलियों में पूरी तरह भर लिया। वह कभी उन्हें अपनी उंगलियों के दबाव से बेरहमी से भींचता, तो कभी एक हाथ से दोनों को एक साथ पकड़ने का बेताब प्रयास करता। सूरज की उंगलियाँ सोनी के दोनों कड़े और उभरे हुए निप्पलों पर आकर टिक गईं, जिन्हें वह अपनी उंगलियों के बीच लेकर गोल-गोल घुमाते हुए मसलने लगा।
सोनी इस दोहरे प्रहार से पूरी तरह बेहाल हो उठी—ऊपर उसके स्तनों को बुरी तरह मथ जा रहा था और नीचे उस प्रचंड लिंग की मार उसकी मुनिया के द्वार पर लगातार पड़ रही थी, जिससे कमरे का तापमान अपनी आखिरी सीमा लांघने को तैयार था।
सोनी ने अपने हाथ बढ़ाये और सूरज के लंड को पड़कर अपनी मुनिया के भीतर करने की कोशिश की।
और आखिरकार, एक बार फिर नर-नारी का वह आदिम खेल पूरी तरह से शुरू हो गया। बंद कमरे की हवा में उत्तेजना का एक नया ज्वार उमड़ पड़ा था, जिसकी रफ़्तार धीरे-धीरे अपना असली रंग पकड़ने लगी थी। सोनी के बदन में आने वाले हर तीव्र कंपन के साथ उसकी हिलती हुई चूचियां (वक्ष) इस बढ़ते हुए वेग की साफ गवाही दे रही थीं।
इस बार माहौल में एक अनोखा और गहरा ठहराव भी था। पीठ के बल लेटी सोनी का चेहरा पलंग के किनारे बैठे अपने पति विकास की तरफ था। वह अपनी थकी और मदहोश आँखों से विकास को एकटक देखे जा रही थी, जबकि पीछे से सूरज का वह प्रचंड पौरुष उसकी देह की गहराइयों में और गहरे तक, और अंदर तक उतरता जा रहा था।
विकास और सोनी—पति और पत्नी—एक-दूसरे की आँखों में आँखें डाले, बिना पलक झपकाए इस महा-मिलन की अंतिम पूर्णाहुति का इंतजार कर रहे थे। दोनों की नज़रों में अब कोई अपराध बोध नहीं था, बल्कि एक-दूसरे के प्रति एक मूक और गहरा सामंजस्य था। उधर सूरज, जो अपनी ही धुन में पूरी तरह अंधा हो चुका था, कभी आगे झुककर सोनी की उन उभरी हुई चूचियों को अपनी मजबूत हथेलियों से मथने लगता, तो कभी उसकी पतली कमर के लव हैंडल्स को पकड़कर और ज़ोर से दबाता, ताकि हर धक्का सीधे उसकी नाभि के पार जाकर लगे।
कमरे में साँसों की गर्माहट और मांस के टकराने की आवाज़ें अब अपने अंतिम और सबसे तीव्र शिखर की ओर बढ़ रही थीं।
सूरज की रफ्तार अब अपने चरम पर पहुँच चुकी थी। आँखों पर बंधी उस मखमली पट्टी के पीछे का अंधकार उसे पूरी तरह से एक आदिम और मदहोश कर देने वाले वेग में झोंक चुका था। उसका वह प्रचंड, कड़ा पौरुष अब सोनी की मुनिया की तंग गहराइयों को पूरी तरह नापते हुए सीधे उसके गर्भ के द्वार पर निरंतर दस्तक दे रहा था। हर भीषण प्रहार के साथ उसका अंग जैसे मूक भाषा में मौसी से उसके उस आखिरी द्वार को खोलने की मनुहार कर रहा था, ताकि वह अपनी अंतिम आहुति से उस पूरे हिस्से को पूरी तरह सींच सके।
सूरज का बचा-खुचा नियंत्रण अब पूरी तरह से समाप्त हो चुका था। सोनी की मुनिया के उस मखमली और जादुई संकुचन ने उसके भीतर एक ऐसा आदिम उन्माद जगा दिया कि वह सब कुछ भूलकर पूरी तरह से बेकाबू हो गया। आँखों पर बंधी मखमली पट्टी के अंधेरे में उसका पूरा अस्तित्व केवल उस गर्म, रसीली गहराई को महसूस कर रहा रहा था।
सूरज की उंगलियों के निशान सोनी के लव हैंडल्स पर गहरे बैठ चुके थे, जो इस बात का प्रमाण थे कि यह मिलन अब अपनी सबसे उग्र और अंतिम पराकाष्ठा (चरम सुख) के बिल्कुल नजदीक पहुँच रहा था। सूरज के भीतर का आदिम पुरुष अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुका था। उसने अपनी दोनों हथेलियों में सोनी की भरी हुई चूचियों (वक्षों) को एक साथ भींच लिया और अपने धक्कों की रफ़्तार को एक ऐसी हिंसक गति दे दी, जिसे सहना सोनी के लिए लगभग मर्यादा से परे होता जा रहा था।
वह पूरी दीवानगी से कभी आगे झुककर सोनी की उन कटीली चूचियों को अपने मुंह में भरकर चूसने लगता, तो कभी अपनी मजबूत हथेलियों से उन्हें ज़ोर-ज़ोर से मथते हुए सहलाने लगता। ऊपर उसके स्तनों पर यह मदहोश कर देने वाला प्रहार चल रहा था, और नीचे उसका वह कड़ा, प्रचंड लंड सोनी की कोमल मुनिया (बुर) के भीतर एक सुखद अत्याचार ढाए हुए था। गति इतनी तीव्र थी कि मांस से मांस के टकराने की आवाज़ कमरे के सन्नाटे को चीर रही थी।
गर्भ के मुहाने पर होने वाले इस निरंतर और गहरे प्रहार ने सोनी के पूरे वजूद को हिलाकर रख दिया। वह कुछ ही देर पहले चरम सुख पाकर पूरी तरह शिथिल हो चुकी थी, लेकिन सूरज के इस निष्ठुर और बेतहाशा वेग ने उसके भीतर काम-अग्नि को फिर से पूरी तरह सुलगा दिया। उस जादुई दस्तक के अहसास से सोनी के पूरे बदन में एक बार फिर से तीव्र करंट दौड़ गया और वह गहरी उत्तेजना के एक नए भंवर में खिंचती चली गई।
बिस्तर पर लेटी सोनी ने इस नए और प्रचंड वेग को सहने के लिए चादर पर अपनी उंगलियों का कसाव और मज़बूत कर लिया। उसकी आँखें अभी भी पलंग के किनारे बैठे अपने पति विकास की आँखों में पूरी तरह गड़ी हुई थीं। विकास भी अपनी पत्नी के चेहरे पर उभरते इस दोबारा जागृत होते कामुक ज्वार और सूरज के उस बेकाबू होते मर्दन को साक्षात देखकर अपनी रुकी हुई साँसों के साथ इस महा-मिलन की अंतिम पूर्णाहुति का मूक गवाह बना हुआ था।
आखिरकार सूरज के लिंग का वह कड़ा सुपड़ा जब सोनी के गर्भाशय के मुहाने पर जाकर ठहरा, तो सोनी की मुनिया ने उसे अपने आगोश में ले लिया और सूरज अपने आप को रोक नहीं पाया उस परम गहराई के स्पर्श ने दोनों के शरीरों में एक सनसनी फैला दी। इस चरम और निर्णायक क्षण में, सोनी की मुनिया (योनि) के भीतर की मखमली दीवारें और उसके मखमली होंठ पूरी तरह से सक्रिय हो उठे।
सोनी के शरीर के भीतर से स्वतः ही एक अद्भुत, लयबद्ध और तीव्र संकुचन (खिंचाव और भींचने की प्रक्रिया) होने लगा। वह मखमली संकुचन सूरज के उस गर्म, तने हुए लिंग को चारों तरफ से किसी मखमली नली की तरह बेहद मज़बूती और दीवानगी से जकड़ रहा था।
सूरज के लिए यह अहसास किसी अलौकिक सुख से कम नहीं था। सोनी की बुर से निकलने वाला वह गाढ़ा, गर्म काम-रस और उसके भीतर होने वाली यह मूक थरथराहट सूरज के पौरुष को एक ऐसा सुखद अहसास दे रही थी, जिसने उसके भीतर एकत्रित लावा को पूरी तरह से पिघलाना शुरू कर दिया था।
सूरज अपनी बंद आँखों के पीछे इस चरम सुख के आवेग से पूरी तरह कांप रहा था, और उसकी कमर अब पूरी तरह से सोनी के उस जादुई और सम्मोहक खिंचाव के आगे आत्मसमर्पण करने को बेताब हो चुकी थी। पीछे बैठा विकास इस मूक और महा-कामुक संगम को देखकर अपनी रुकी हुई साँसों के साथ इस रात की अंतिम पूर्णाहुति का गवाह बन रहा था।
कुछ ही देर में, इस भीषण और बेतहाशा प्रहार के कारण सोनी का पूरा बदन काम-वेग के उस अंतिम भंवर में फंसकर बुरी तरह से कँपकँपाने लगा। उसकी मुनिया के भीतर होने वाले तीव्र और मखमली संकुचन ने सूरज को साफ़ संदेश दे दिया कि सोनी अब अपने चरम सुख की दहलीज़ लांघ रही है। सोनी की यह हालत देख सूरज का अपना पौरुष भी अपनी अंतिम आहुति छोड़ने के लिए पूरी तरह सुलग उठा, और वह अपनी पूर्णाहुति के लिए तैयार हो गया।
सूरज ने अपनी पूरी ताकत समेटी और एक बार फिर अपने उस प्रचंड अंग को सोनी के गर्भ के मुहाने पर ले जाकर पूरी तरह से टिका दिया। सूरज के नितंब पूरी तरह तन चुके थे उसका सारा ध्यान उस लंड पर केंद्रित हो चुका था। उस परम गहराई के भीतर अब काम-रस का प्रवाह इस कदर तीव्र हो चुका था, मानो आकाश से सुख और आनंद की कोई बारिश हो रही हो। दोनों शरीरों से निकलने वाला वह पवित्र और आदिम रस इस महा-मिलन का साक्षात गवाह बन रहा था।
इस दौरान सूरज और सोनी सुध बुध खोकर एक दूसरे की बाहों में थे ना कोई मौसी थी ना कोई भांजा था।
कमर की वह उग्र और बेतहाशा गति अब धीरे-धीरे थम चुकी थी, लेकिन दोनों शरीरों के बीच जुड़ाव अब भी अपने चरम पर था। सूरज के शांत होते पौरुष में एक धीमा और गहरा स्पंदन अभी भी जारी था, जो इस बात का संकेत था कि अनुष्ठान की अंतिम आहुति अपने मुकाम तक पहुँच रही है। वीर्य की एक-एक बूंद बेहद सधे और जादुई अंदाज़ में सोनी के गर्भ की गहराइयों में उतरती चली गई। जब आहुति का अंतिम कतरा भी उसके भीतर समा गया, तब जाकर सूरज का पूरा शरीर पूरी तरह शांत और शिथिल हो गया पर लंड अब भी तना था।
अब उसके भीतर का वह आदिम और हिंसक उन्माद पूरी तरह विलीन हो चुका था। वह अपनी सारी ऊर्जा और पौरुष सोनी के भीतर समर्पित करके एक मासूम बच्चे की तरह निढाल हो गया और उसका भारी शरीर सोनी के कोमल बदन के ऊपर लगभग गिर सा गया। सूरज का गठीला बदन काफी भारी था, जिसका पूरा भार इस समय सोनी के ऊपर था, परंतु सोनी ने इस पर कोई ऐतराज नहीं किया। इस सफल पूर्णाहुति के बाद उसके मन में एक असीम संतोष और ममता का भाव जाग उठा था। वह बेहद प्यार से सूरज के बालों पर उंगलियां फेर रही थी।
सोनी बड़े ही प्यार और दुलार से सूरज की पीठ और कंधों को सहलाती रही, उसकी उंगलियाँ उसके थके हुए बदन को सुकून दे रही थीं। कुछ पलों तक उसे इसी तरह अपने सीने से भींचे रखने के बाद, सोनी ने अपनी थकी हुई जाँघों और कमर को धीरे से संभाला। उसने बेहद कोमलता और सावधानी से सूरज के भारी शरीर को अपने ऊपर से सरकाया और उसे धीरे-धीरे करवट कर बिस्तर पर एक तरफ लिटा दिया, ताकि वह इस अद्भुत काम सेवा के बाद कुछ आराम कर सके। पर जैसे ही सूरज का तनाव हुआ लंड सोनी की मुनिया से बाहर आया एक बार फिर वही मधुर ..पक्क…..की आवाज आई.
विकास को आश्चर्य हो रहा दो दो बार अद्भुत यौनिमर्दन करने के बाद भी क्या सूरज स्खलित नहीं हुआ था ? क्या सोनी को अभी और चुदना था.. तभी विकास ने सोने की बनिया की तरफ देखा जो फुल कर लाल हो चुकी थी और उसकी होठों से सफेद चमकदार ताड़ी का रस बहार आ रहा था। जो इस बात का गवाह था कि पूर्णाहुति संपन्न हो चुकी है
विकास इस मूक और महा-कामुक संगम के इस अंतिम दृश्य को देखकर अपनी रुकी हुई साँसों के साथ शांत बैठा रहा वह कभी ईश्वर को धन्यवाद देता कभी उनसे सोनी की सोनी गोद को भरने का अनुरोध करता विधाता ने शायद विकास की मनसा और इच्छा दोनों सुन ली..
पर विकास के दिमाग में अब भी सूरज का तनाव हुआ लंड घूम रहा था
पर उसे यकीन हो चला था कि नया मेहमान आने वाला था.