भाग 203
उसने उस मादक, सम्मोहक इत्र की बूंदें अपनी चूचियों के उभारों पर, नाभि के पास, अपनी पीठ की ढलान, कमसिन कमर और विशेष रूप से अपनी जाँघों और मुनिया के आस-पास के हर उस हिस्से पर करीने से लगाई, जहाँ आज रात सूरज के युवा और बेताब हाथ पहुँचने वाले थे। इत्र की वह खुशबू हवा में तैरते ही पूरे कमरे को एक वर्जित कामुकता से महका गई।
इसके तुरंत बाद, सोनी ने सुगना के भेजे उस गाढ़े लाल रंग के सुंदर लहंगे और चोली को धारण कर लिया। बारीक कढ़ाई वाले उस लहंगे और कसी हुई चोली में सोनी इस वक्त किसी साक्षात कामदेवी की तरह लग रही थी, जिसका रूप पहाड़ों की ठंड में भी आग लगाने के लिए पूरी तरह तैयार हो चुका था।
अब आगे..
सोनी और विकास जब मंदिर जाने के लिए कमरे से बाहर निकलने लगे, तभी विकास ने पीछे मुड़कर सूरज से कहा, "सूरज, तू भी हमारे साथ चल। संतान सप्तमी का यह आखिरी दिन है, तेरा साथ होना शुभ होगा।"
सूरज को पहले तो यह थोड़ा असहज और अजीब लगा। उसे लगा कि पति-पत्नी के इस अनुष्ठानिक दर्शन के बीच उसका जाना शायद ठीक नहीं होगा। लेकिन तभी सोनी ने उसकी तरफ देखा और अपनी खनकती आवाज़ में कहा, "चल ना सूरज, सुगना दीदी ने भी तो कहा था कि आज के दिन मेरा पूरा ख्याल रखना है।" मौसी के इस अपनेपन और अधिकार भरे आग्रह को सूरज टाल नहीं सका और वह भी साथ चलने के लिए तैयार हो गया।
जब तीनों होटल की लॉबी में पहुँचे, तो वहाँ का नज़ारा देखने लायक था। लाल चटक लहंगे और कसी हुई चोली में सजी-धजी सोनी जब अपनी मादक चाल से आगे बढ़ रही थी, तो लॉबी और रिसेप्शन पर मौजूद कर्मचारी और अन्य पर्यटक ठगे से रह गए। पहाड़ों के इस दूरदराज टूरिस्ट स्पॉट पर एक पारंपरिक, दुल्हन की तरह सजी इतनी रूपवान और आकर्षक महिला को देखना सबके लिए एक अनोखा और विस्मयकारी अनुभव था। हर कोई अपनी नज़रें हटाए बिना बस सोनी को ही एकटक निहार रहा था। लेकिन सोनी इन सब नज़रों से बेपरवाह और पूरी तरह बिंदास होकर अपने उस गुप्त 'मिशन' की तरफ आगे बढ़ रही थी, जिसकी बिसात सुगना ने बिछाई थी।
कुछ ही देर बाद तीनों पहाड़ों के बीच स्थित एक प्राचीन और शांत मंदिर में पहुँचे। मंदिर का वातावरण शंख, घंटियों की गूंज और कपूर की खुशबू से पूरी तरह दिव्य हो चुका था। सोनी ने गर्भगृह के सामने खड़े होकर अपनी आँखें बंद कीं और पूरी श्रद्धा से ईश्वर से अपनी सूनी गोद को भरने और गर्भवती होने का वरदान मांगा। जैसे ही उसने अपनी पलकें मूँदीं, उसके अंतर्मन में एक सुंदर, सलोने बालक की धुंधली सी छवि तैर गई। उस कल्पना में जो बालक उसे दिखाई दिया, उसकी नैन-नक्श और मासूमियत बिल्कुल सूरज जैसी थी। इस अलौकिक अहसास से सोनी का मन भर आया और वह ईश्वर के सामने नतमस्तक हो गई।
उसी समय, सोनी के दोनों तरफ खड़े विकास और सूरज ने भी हाथ जोड़कर अपनी आँखें बंद कर लीं। दोनों ने ईश्वर से केवल और केवल सोनी की झोली भरने, उसे दुनिया की हर खुशी देने और उसकी गोद हरी करने की सच्चे दिल से प्रार्थना की। उस पावन घड़ी में मंदिर का पूरा माहौल एक पवित्र पारिवारिक भावना में बदल गया। कुछ पलों के लिए देह की भूख, वासना और सारे गुप्त विचार कहीं गहरे गायब हो गए, और उनकी जगह सिर्फ एक निश्छल समर्पण और श्रद्धा ने ले ली।
पर जैसे ही पूजा-अर्चना समाप्त हुई और वे तीनों मंदिर की सीढ़ियाँ उतरकर वापस बाहर आए, पहाड़ों की उस ठंडी हवा ने एक बार फिर उनके बदन को छुआ। मंदिर परिसर से बाहर कदम रखते ही विकास के दिमाग में आज होने वाले उस अंतिम, वर्जित और चरम अनुष्ठान की कल्पनाएँ दोबारा कौंधने लगीं। अपनी पत्नी के इस देवदासी जैसे रूप और सुगना के उस गुप्त विधान के बारे में सोच-सोचकर विकास के भीतर कामुकता का ज्वार इस कदर बढ़ा कि उसकी मर्यादा एक बार फिर ढहने लगी और उसका अंग कपड़ों के भीतर पूरी तरह से तनकर खड़ा हो गया।
मंदिर से निकलकर होटल वापस आने के रास्ते में गाड़ियों के टायरों की आवाज़ और पहाड़ों के सन्नाटे के बीच सोनी का मन विचारों के एक गहरे भंवर में डूबा हुआ था। वह खिड़की के बाहर खिली हुई धूप को देख रही थी, लेकिन उसका दिमाग आने वाले समय के घटनाक्रमों को बहुत बारीकी से बुनने और समझने की कोशिश कर रहा था।
उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि आखिर वह विकास की उस अनोखी और वर्जित इच्छा को कैसे पूरी करेगी, जिसमें उसका पति स्वयं अपनी ही पत्नी को अपने भांजे की बाहों में सौंपकर उस मिलन का साक्षी बनना चाहता था।
इस योजना के बीच सोनी के मन में एक गहरा डर और चिंता बार-बार सिर उठा रही थी। वह जानती थी कि सूरज एक युवा और गरम खून का लड़का है। इस अंतिम अनुष्ठान की वेदी पर, सुगना के दिए इत्र की मादक महक और संतान सप्तमी के उस माहौल में जब सूरज अपनी वासना के अधीन होकर पूरी तरह से उन्मुक्त (बेकाबू) हो जाएगा, तब उसे संभालना बहुत मुश्किल होगा।
सोनी को सबसे बड़ा डर इस बात का था कि यदि संभोग की उस चरम और मदहोश कर देने वाली घड़ी में सूरज अपनी सुध-बुध खो बैठा, और उसने अपने मुँह से बनारस के उन पुराने मिलनों की चर्चा छोड़ दी, या उनके बीच पहले से बने शारीरिक संबंधों की कोई बात अनजाने में कह दी, तो अनर्थ हो जाएगा। सूरज इस समय खेल के इस नए नियम से बिल्कुल अनजान था कि मौसा जी कमरे में ही कहीं छिपकर सब देखने वाले हैं। सोनी सोच रही थी कि यदि सूरज अपनी बेताबी में ज़्यादा बिंदास या बेपरवाह हो गया, तो विकास के सामने यह बात कैसे छुपी रहेगी कि वे दोनों पहली बार एक नहीं हो रहे हैं, बल्कि उनके बीच पहले ही सब कुछ घटित हो चुका है।
अपनी देह पर लगे इत्र की महक और लहंगे की सरसराहट के बीच सोनी ने मन ही मन यह तय कर लिया कि उसे सूरज पर पूरी तरह नियंत्रण रखना होगा। उसे कुछ ऐसी तरकीब निकालनी होगी जिससे सूरज कमरे में आकर भी एक कड़े अनुशासन और मर्यादा के दायरे में बंधा रहे, ताकि विकास के सामने अतीत का वह गुप्त पन्ना कभी न खुल सके।
होटल के करीब पहुँचते-पूँछते सोनी का दिमाग पूरी तरह सक्रिय हो चुका था। उसने अपनी घबराहट पर काबू पाया और एक गहरी सांस लेकर इस उलझन का तोड़ निकाल लिया। वह समझ गई कि सूरज के गरम खून और उसकी उन्मुक्तता को नियंत्रित करने का केवल एक ही तरीका था—अनुष्ठान के नियमों को और अधिक रहस्यमयी और सख्त बना देना। ऐसा करने से सूरज मर्यादा के डर से खुद ही शांत रहेगा और कुछ भी अतिरिक्त बोलने की हिम्मत नहीं करेगा।
जैसे ही गाड़ी होटल के अहाते में रुकी और वे तीनों उतरकर अपने फ्लोर की तरफ बढ़े, सोनी ने विकास की तरफ देखकर हौले से मुस्कुराया। वह विकास को यह मूक संदेश दे रही थी कि अब खेल का समय आ चुका है।
कमरे में पहुँचते ही, विकास ने पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार सूरज की उपस्थिति में सोनी से कहा
मेरा लखनऊ का एक दोस्त नैनीताल आया है मुझे कुछ देर के लिए जाना पड़ेगा।"
सोनी ने आंखें तरेरते हुए कहा …आज के दिन भी आपको जाना है?
सोनी जाना तो नहीं चाहता पर जरूरी है मैं एक-दो घंटे में आ जाऊंगा प्लीज…
विकास का यह कहना असल में एक संकेत था कि वह बाहर जाने का ढोंग कर रहा है, ताकि सूरज को लगे कि वे कमरे में नहीं हैं, जबकि असल में विकास को थोड़ी ही देर में बालकनी के रास्ते वापस आकर छुपना था।
विकास के कमरे से बाहर निकलते ही, सोनी ने बिना समय गंवाए कमरे का भारी दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया पर लॉक नहीं किया। कमरे में सुगना के इत्र की मादक खुशबू पहले से ही तैर रही थी, जिसने सूरज के भीतर एक सिहरन पैदा कर दी थी। वह लाल लहंगे में सजी अपनी मौसी के इस साक्षात कामदेवी जैसे रूप को देखकर सम्मोहित खड़ा था।
सोनी ने अपनी आवाज़ को बेहद धीमा, गंभीर और रहस्यमयी कर लिया। वह सूरज के ठीक सामने आकर खड़ी हो गई, जिससे उसकी चोली के भीतर से आती इत्र की तेज महक सीधे सूरज के नथुनों में समाने लगी।
सोनी (बेहद गंभीर और दबी आवाज़ में): "सूरज, ध्यान से सुन। संतान सप्तमी की यह महा-पूर्णाहुति कोई साधारण मिलन नहीं है। सुगना दीदी ने इस अंतिम रात के लिए दो बहुत कड़े और अटूट नियम बताए हैं, जिनका पालन तुझे हर हाल में करना होगा। यदि तूने इसमें ज़रा भी चूक की, तो यह अनुष्ठान खंडित हो जाएगा और ईश्वर का कोप हम पर बरसेगा।"
सूरज ने अपनी थूक निगलते हुए मौसी की आँखों में देखा। उसकी वासना इस कड़े लहज़े को सुनकर थोड़ी नियंत्रित हुई।
सूरज (धीमे से): "हाँ मौसी, बताइए। क्या नियम हैं? मैं हर नियम मानने को तैयार हूँ।"
सोनी (उसकी आँखों में आँखें डालकर फुसफुसाते हुए): "पहला नियम—आज संभोग के पहले क्षण से लेकर अंतिम आहुति तक, तुझे पूरी तरह 'मौन व्रत' धारण करना होगा। तेरे मुँह से एक भी शब्द, कोई पुरानी चर्चा, या कोई भी बात नहीं निकलनी चाहिए। यहाँ तक कि आहें भी नहीं। जो कुछ भी होगा, वह पूरी तरह खामोशी के साथ संपन्न होगा।"
सोनी ने यह नियम इसलिए बनाया ताकि सूरज भूलकर भी बनारस के पुराने मिलनों का ज़िक्र न कर बैठे और विकास तक कोई बात न पहुँचे।
सोनी ने आगे कहा: "और दूसरा नियम... आज रात मैं ठीक उसी प्रकार से इस अनुष्ठान को सिद्ध करूँगी, जैसा मैंने बनारस में तेरे भीतर के पुरुषत्व को पहली बार जगाने के लिए किया था। याद है न तुझे?"
'पुरुषत्व को जगाने' की बात सुनते ही सूरज के दिमाग में बिजली की तरह वह पूरा दृश्य कौंध गया। उसे तुरंत याद आया कि कैसे उसकी मौसी ने उसकी आँखों पर पट्टी बाँधकर उसे पूरी तरह से अंधकार में रखकर उसके भीतर की मर्दानगी को चरम पर पहुँचाया था।
सूरज (हड़बड़ाई हुई, भारी आवाज़ में): "मौसी... तो क्या आप मेरी आँखों पर आज फिर से वही पट्टी बाँधने जा रही हैं?"
सोनी ने धीरे से मुस्कुराते हुए आगे बढ़कर सूरज के माथे को चूमा। उसके होंठ जब सूरज की त्वचा से अलग हुए, तो उसकी आवाज़ में एक अकाट्य गहराई थी।
सोनी: "हाँ मेरे वीर, यही इस विधान का अंतिम सत्य है। शास्त्र कहते हैं कि संतान प्राप्ति की यह महा-पूर्णाहुति यदि पति के अलावा किसी अन्य पुरुष के अंश से हो रही हो, तो स्त्री की मर्यादा को बचाए रखने के लिए पुरुष की आँखों पर पट्टी बाँधना अनिवार्य होता है। जब तुम्हारी आँखों के सामने अंधेरा होगा, तभी प्रकृति इस पूर्णाहूति को केवल एक अनुष्ठानिक आहुति मानेगी, कोई पाप नहीं।"
इसी बीच क्लिक की आवाज हुई और सूरज ने पूछा मौसी लगता है कोई आया है..
सोनी को पता था यह कोई और नहीं बल्कि विकास ही है उसने सूरज की बात को इग्नोर किया और शांति से बोली
अरे यहां कौन आएगा विकास जी तो बाहर गए और मैंने दरवाजा खुद लॉक किया है।
सोनी के इस तार्किक और रहस्यमयी बातों ने सूरज के मन के सारे संशयों को शांत कर दिया। अब वह पूरी तरह से नियंत्रित भी था और डरा हुआ भी कि उसे एक शब्द भी नहीं बोलना है। उसे रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था कि आँखों पर पट्टी बाँधने का यह विधान असल में सोनी ने इसलिए रचा था ताकि वह अपने मौसा जी को कभी देख न सके।
सोनी ने आगे बढ़कर पलंग के पास रखी अपना लाल दुप्पटा उठाया और बेहद कोमलता से सूरज की आँखों पर बाँध दिया। जैसे ही सूरज की आँखों के सामने पूरी तरह अंधेरा छाया, दृष्टि छिन जाने से उसकी बाकी की इंद्रियाँ दस गुना अधिक संवेदनशील हो चुकी थीं।
इसी बीच बालकनी का झीना परदा धीरे से हटा और विकास बेहद खामोशी से कमरे के भीतर दाखिल हो गया। अपनी पत्नी और भांजे के बीच की उस छुपी हुई, अनोखी केमिस्ट्री और बेताबी को अपनी आँखों से साफ़ देखना उनके भीतर के पौरुष को एक चरम उत्तेजना से भर रहा था। विकास को पूरा आभास हो चुका था कि ये दोनों पहले भी एक हो चुके हैं, लेकिन इस सच को भाँपकर उनके भीतर कोई क्रोध नहीं, बल्कि एक असीम कामुक रोमांच जाग उठा था।
सोनी अब इस त्रिकोणीय खेल के केंद्र में थी। उसने सूरज को पूरी तरह से मौन रहने का निर्देश दे रखा था, इसलिए सूरज बिना कोई शब्द बोले, केवल अपनी भारी होती साँसों के सहारे सोनी के नितंबों को अपनी मजबूत उंगलियों से भींच रहा था।
सूरज की आँखों पर बंधी वह लाल मखमली पट्टी अब उसके लिए केवल एक आवरण नहीं, बल्कि उसकी बाकी सभी इंद्रियों को जगाने का माध्यम बन चुकी थी। दृष्टिहीनता के उस सघन अंधकार में, सूरज की हथेलियाँ बेहद संवेदनशील हो उठी थीं। उसने अपनी उँगलियों और हथेलियों को धीरे-धीरे सोनी के बदन के उतार-चढ़ाव पर फिराना शुरू किया। रेशमी वस्त्रों के ऊपर से भी उसे सोनी के जिस्म की तपिश और उसकी त्वचा की मखमली कोमलता का साफ़ अहसास हो रहा था।
सोनी, जो इस पूरे खेल को अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश कर रही थी, सूरज के इस सधे हुए और गहरे स्पर्श के आगे खुद को रोक नहीं पाई। जैसे-जैसे सूरज की हथेलियाँ उसकी कमसिन कमर और पीठ की ढलान को सहला रही थीं, सोनी आत्मसमर्पण के भाव में उसके आलिंगन में खींचती चली गई। उसका सिर सूरज के गठीले कंधे पर टिक गया और उसकी अपनी साँसें भारी होने लगीं।
सूरज ने बिना कोई शब्द बोले, अपनी मौसी को पूरी शिद्दत से अपने आगोश में भर लिया। वह उसके चेहरे के करीब आया और उसके कानों के पीछे तथा सुगना के इत्र से महकती गोरी गर्दन पर अपने तपते हुए होंठ रख दिए। सूरज जिस दीवानगी और अधिकार के साथ सोनी की गर्दन और कानों को चूम रहा था, वह कोई नौसिखिया प्रयास नहीं था। उसमें एक पुराना ठहराव, एक गहरा अनुभव और एक जानी-पहचानी कशिश साफ़ झलक रही थी।
विकास की साँसें इस दृश्य को देखकर ऊपर-नीचे होने लगीं। उनकी छाती धौंकनी की तरह चल रही थी। एक परिपक्व पुरुष होने के नाते, सूरज के चूमने के अंदाज़ और सोनी के उसके प्रति इस सहज झुकाव को देखकर विकास के मन में यह बात शीशे की तरह साफ़ हो गई कि—निश्चित ही यह इन दोनों का पहली बार का मिलन नहीं था। इस बेताबी और जिस्मानी तालमेल के पीछे निश्चित ही कोई गुप्त इतिहास था, जिसकी गवाही कमरे की हर धड़कन दे रही थी। इस अहसास ने विकास के भीतर ईर्ष्या की जगह एक अजीब, वर्जित उत्तेजना को और बढ़ा दिया।
सोनी और सूरज अभी भी खड़े थे। सूरज की उँगलियाँ अब सोनी के वस्त्रों और चोली (ब्लाउज) की डोरियों से खेलने लगी थीं। मौन व्रत के कड़े अनुशासन में बंधा होने के कारण वह कुछ बोल तो नहीं रहा था, लेकिन उसके हाथों की फुर्ती उसकी बेताबी को बयां कर रही थी। उसने बड़ी ही चतुराई से चोली के बंधनों को ढीला किया।
कुछ ही देर में, सोनी के बदन का ऊपरी हिस्सा पूरी तरह अनावृत और नग्न हो गया। मखमली रोशनी में उसकी सुगठित छाती और कमसिन कमर का पूरा हिस्सा विकास की आँखों के सामने पूरी तरह चमक उठा। सोनी की चूचियां तन चुकी थी और निप्पल मणि की भांति और भी कठोर हो गए थे। अब सोनी का पेटिकोट और उस पर लिपटी हुई लाल चटक साड़ी सरक कर आधी खुली, आधी बंधी अवस्था में आ चुकी थी, जो बस सूरज की उँगलियों के अगले स्पर्श और आदेश का बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी।
विकास के लिए पीछे खड़े होकर इस दृश्य को देखना किसी ऐसी कल्पना के सच होने जैसा था, जिसे उन्होंने हमेशा अपने भीतर कहीं छुपा कर रखा था। ठीक उनकी आँखों के सामने, उनकी अपनी सुंदर पत्नी की नंगी पीठ पर सूरज की वे मजबूत और युवा हथेलियाँ रेंग रही थीं, जो सोनी के गोरे बदन को पूरी शिद्दत से अपने आगोश में भींच रही थीं। सूरज की उँगलियों का वह कड़ा कसाब जब सोनी की त्वचा को दबाता, तो विकास के भीतर उत्तेजना का एक ऐसा प्रचंड तूफान उठता कि उन्हें लगता जैसे उनका अंग कपड़ों के भीतर ही फट जाएगा। इतना तीव्र तनाव और ऐसी चरम उत्तेजना विकास ने अपने जीवन में कई दिनों बाद—या शायद पहली बार इस रूप में महसूस की थी। वे अपनी साँसें पूरी तरह रोककर, बिना हिले-डुले, इस अद्भुत और अत्यधिक कामुक दृश्य को अपनी आँखों में समेट रहे थे।
उधर सोनी इस समय एक बिल्कुल अलग ही दुनिया में तैर रही थी। सुगना के इत्र की मादक महक, और सूरज के युवा जिस्म की तपिश ने मिलकर उसके सोचने-समझने की शक्ति पर एक पर्दा डाल दिया था। वह सब कुछ भूल चुकी थी—वे नियम, वे जतन और वह सारी चिंताएँ जो वह होटल आने के रास्ते में सोच रही थी, इस समय सूरज के प्रचंड आलिंगन के आगे हवा हो चुकी थीं। वह पूरी तरह से सूरज की बाहों में समाई हुई थी, और उसकी गर्दन पर सूरज के होठों की जो छुअन हो रही थी, उसने उसके भीतर की स्त्री को पूरी तरह तृप्त कर दिया था। कुछ जादुई और मदहोश कर देने वाले पलों के लिए उसके मन से यह संशय और डर पूरी तरह मिट गया कि ठीक पीछे उसका पति विकास खड़ा है और इस वर्जित महा-संगम के एक-एक पल को अपनी आँखों से साफ़-साफ़ देख रहा है। वह तो बस इस आदिम सुख के सागर में बिना किसी बाधा के बहती चली जा रही थी।
सोनी उस मखमली अंधकार और सूरज के युवा आलिंगन में पूरी तरह खोई हुई थी, लेकिन तभी उसे अपने ठीक पीछे एक अनजानी मगर बेहद सधी हुई आहट का अहसास हुआ। विकास दबे और सधे हुए कदमों से, बिना कोई आवाज़ किए, सोनी के ठीक पीछे आ चुके थे।
सोनी जो इस समय अर्ध-नग्न अवस्था में खड़ी थी—उसकी चोली पहले ही ढीली होकर सरक चुकी थी—उसे अचानक अपनी कमर पर लिपटी साड़ी की सिलवटें और ढीली होती हुई महसूस हुईं। वह अभी इस स्पर्श को समझ ही रही थी कि उसे साफ़ अहसास हुआ कि कोई बहुत खामोशी से उसके पेटिकोट की डोरी (नाड़ा) को उँगलियों से टटोलकर धीरे-धीरे खोल रहा है। पीछे से आने वाली उस जानी-पहचानी छुअन और साँसों की गर्माहट से सोनी का पूरा बदन सिहर उठा और उसने तुरंत पहचान लिया कि यह विकास हैं।
विकास का यह रूप देखकर सोनी के भीतर एक तीखी घबराहट दौड़ गई। विकास ने तो सिर्फ दूर से देखने की बात कही थी, फिर वह अचानक इस खेल के बीच में आकर यह सब क्या कर रहे हैं? उसे डर था कि कहीं इस अप्रत्याशित हरकत से सूरज को कुछ शक न हो जाए और पूरा खेल बेकाबू हो जाए।
स्थिति को तुरंत संभालने के लिए, सोनी ने बड़ी ही चतुरता से काम लिया। उसने बिना कोई आवाज़ किए, सूरज को बहुत धीरे से खुद से अलग किया। अचानक आए इस ठहराव से आँखों पर पट्टी बांधे खड़ा सूरज थोड़ा सा सकपकाया, लेकिन सोनी ने उसे अपनी योजनाओं में उलझाए रखने के लिए तुरंत अपने कोमल हाथ आगे बढ़ाए और खड़े-खड़े ही सूरज की शर्ट के बटन एक-एक करके खोलने लगी। सूरज इस नए स्पर्श और मौसी की इस अचानक जागी बेताबी में फिर से मग्न हो गया।
सूरज को शर्ट के बटनों में उलझाकर, सोनी ने चुपके से अपनी कमर पीछे कर दी। उधर विकास ने अपनी उत्तेजना में सोनी के पेटिकोट के नाड़े को पूरी तरह से खोल दिया था, जिससे वह वस्त्र नीचे सरकने लगा था।
सोनी के पूरी तरह नग्न होते ही उसकी मुनिया से निकल रहा वह लाल धागा दिखाई पड़ने लगा जिसके एक सिरे पर लगी हुई सुपाड़ी मुनिया के अंदर उसका काम रस सोख रही थी।
सोनी ने बेहद मादक तरीके से अपना एक हाथ नीचे लाया और पहले एक धागे को पड़कर बाहर खींचा।
सोने की बुर की गहराइयों में डूबी वह बड़ी सुपारी धीरे-धीरे बाहर आने लगी और सोने की मुनिया के रस भरे होठों से टुप…. की आवाज के साथ बाहर आ गई।
सुपारी सोनी के कामरस से फूल चुकी थी उसने सुपारी से धागा हटाया और सुपारी को ऊपर उठाकर विकास की तरफ देखा विकास की मौन सहमति पाकर उसने वह सुपारी सूरज के होठों से सटा दी सूरज को वह मादक गंध याद थी उसने बिना कुछ कहे अपने होंठ खोले और उसे मुंह में ले लिया…
सोनी के काम रस का स्वाद सूरज को बखूबी याद था उसे सुपारी का रहस्य भी पता था।
सोनी ने छोटी सुपारी को भी अपनी मुनिया से बाहर निकाला और उसे विकास के होंठों के बीच रख दिया.. विकास ने भी उसे अपने मुंह में ले लिया।
विकास में सोनी की मुनिया को छूने की कोशिश की…
सोनी ने तुरंत पीछे मुड़कर विकास की आँखों में देखा। उसकी आँखें सवाल भी कर रही थीं और समझा भी रही थीं। सोनी ने बिना कोई शब्द बोले, अपनी उँगलियों से विकास को इशारा किया कि वे अपनी तय की हुई जगह पर जाकर बैठ जाएं और वहीं से इस दृश्य का आनंद लें।
विकास भी सोनी की उस सख्त और डरी हुई नज़र के पीछे के खतरे को समझ गए। वे अपनी भारी होती साँसों को रोककर, दबे कदमों से वापस अपनी नियत जगह पर बैठने के लिए पीछे हट गए, जबकि सोनी ने एक बार फिर पूरी तरह से अपनी आँखें बंद किए खड़े सूरज की तरफ ध्यान केंद्रित किया।
कमरे के भीतर की उत्तेजना अब अपने चरम बिंदु को छू रही थी। कुछ ही पलों के भीतर, सोनी ने सूरज को भी दो पूरी तरह से नग्न कर दिया। मखमली और मद्धम रोशनी में उन दोनों के सुगठित बदन साक्षात कामदेव और कामदेवी की तरह दमक रहे थे। आँखों पर पट्टी बंधा सूरज पूरी तरह अपनी मौसी के देह-सुख में डूबा हुआ था, और सोनी भी सब कुछ भूलकर उसके स्पर्श का आनंद ले रही थी।
उधर, अपनी तय जगह पर बैठे विकास की हालत बेकाबू हो रही थी। वो उस अद्भुत, कड़े और गठीले पौरुष (लिंग) को प्रत्यक्ष देखने के लिए पूरी तरह आतुर था, जिसके बारे में उन्होंने केवल कल्पनाएँ की थीं।
परंतु, विकास इस समय जिस कोण और जगह पर बैठे थे, वहाँ से उनकी नज़रें सूरज के उस अद्भुत लिंग तक नहीं पहुँच पा रही थीं। खड़े होने की स्थिति में, सूरज ठीक सोनी के सामने था, जिसके कारण उसका वह लंड सोनी के सुगठित नितंबों के पीछे पूरी तरह छिपा हुआ था। विकास अपनी गर्दन उठा-उठाकर, थोड़ा तिरछा होकर देखने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन सोनी का कामुक बदन बीच में एक ओट की तरह आ रहा था।
अपनी पत्नी और भांजे के इस महा-मिलन के सबसे मुख्य दृश्य को साफ़ न देख पाने की छटपटाहट में विकास के भीतर की कामुक व्याकुलता और भी तीव्र हो गई। वे बिना कोई आवाज़ किए अपनी जगह पर छटपटा रहे थे, और इस बात का इंतज़ार कर रहे थे कि कब उनकी स्थिति या उन दोनों की दिशा बदले, और वे उस वर्जित दृश्य को अपनी आँखों से साफ़ देख सकें।
कमरे की मखमली रोशनी के बीच, जब सोनी और सूरज ने अपनी स्थिति में थोड़ा सा बदलाव किया, तो विकास की व्याकुल आँखें तुरंत उस ओर टिक गईं। सोनी का बदन जैसे ही थोड़ा सा एक तरफ हटा, सूरज का वह मुख्य अंग (लिंग) पहली बार विकास की नज़रों के ठीक सामने पूरी तरह उजागर हो गया।
"हे भगवान! यह क्या..." विकास के मन में एक गहरा धक्का लगा। उन्होंने जिस प्रचंड, सुगठित और सख़्त तने हुए पौरुष की कल्पना अपने दिमाग में पाल रखी थी, उसके उलट वहाँ का नज़ारा बिल्कुल अलग था। सूरज का लिंग इस समय एक मुरझाए हुए केले की तरह पूरी तरह से ढीला और लटका हुआ था।
विकास को अपनी ही आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। सोनी जैसी साक्षात कामदेवी जैसी रूपवान नग्न स्त्री को अपनी बाहों में भरने और उसकी गर्दन को इतनी दीवानगी से चूमने के बाद भी सूरज के अंग में रत्ती भर का तनाव नहीं था। एक युवा पुरुष का अपनी अत्यंत आकर्षक मौसी के पूर्ण नग्न बदन के स्पर्श के बाद भी इस कदर शांत और शिथिल रहना किसी अजूबे से कम नहीं था।
विकास स्तब्ध रह गया। वो आश्चर्य और कौतूहल से इस अजीबोगरीब मिरेकल (चमत्कार) को एकटक देखने लगा। उनके दिमाग में सवालों का बवंडर उठने लगा कि आखिर इस चरम कामुक माहौल के बाद भी सूरज का पौरुष इस तरह सोया हुआ क्यों है? क्या यह मौन व्रत का असर था, या फिर आँखों पर बंधी उस मखमली पट्टी के अंधेरे का कोई मनोवैज्ञानिक प्रभाव? क्या सोनी के गर्भवती होने का सपना धरा का धरा रह जाएगा…
शेष अगले भाग में