Incest Baadshah ~ The Tales of Debauchery - Page 9 - SexBaba
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Incest Baadshah ~ The Tales of Debauchery

अपडेट - 56 ~ विल्टेड रोज

अब तक...

कारन : रघु मुझसे हर्र डिटेल शेयर करता था. इन्क्लूडिंग डिटेल्स अबाउट यू. मुझे पता चला है की कई बार रघु ने दीदी को तुम्हारे साथ देखा है, वो भी मुस्कुराते हुए. दीदी मुस्कुरा रही थी. वो खुश थी. सो... ी वांट तो तेल्ल यू अबाउट समथिंग. क्या तुम सुनोगे? It's अबाउट हेर.

वीर (फ्रोंस) : ....

कारन : ....

वीर (शिघ्स) : फाइन... टॉक!


अब आगे...



19 इयर्स एगो...

एक बेहद hi ख़ूबसूरत और आलिशान से बंगले के बाहर बने एक पार्क में बेहद hi प्यारी सी बच्ची अपनी दो सहेलियों के संग खेल रही थी.

"करा! ये देख ये वाला फूल, कितना अच्छा है न? कितनी खुशबु आ रही है इस से?"

उसकी एक प्यारी सी सहेली ने मुस्कुराते हुए कहा.

"सच सोनू? मुझे भी दिखा न!"

करा जल्दबाज़ी में नज़दीक आयी और उसने अपनी सहेली के हाथो से वो फूल लिए और उसकी खुशबू सूंघते hi मानो जैसे उसका मैं प्रफुल्लित हो उठा.

"कितना प्यारा फूल है हाहाहा~" वो khil-khilaayi.

उसकी मुस्कान इतनी प्यारी थी की किसी भी कठोर से कठोर आदमी का दिल जीत ले. वो नादानी, वो चंचलता, वो बचपना और ख़ास कर वो चाँद जैसा प्यारा चेहरा जो किसी को भी उस पर प्यार लुटाने पर मजबूर कर दे.


कुछ ऐसी थी करा.

"मुझे भी देखना है." कहते हुए उसकी दूसरी सहेली आगे आयी और फूल की सुगंध का जायज़ा लेने लगी. पर तभी...

"करा!!! करा!!!!"

अचानक आयी अंदर से तेज़्ज़ आवाज़ सुनते hi करा एकदम सचेत हो गयी और पलटी तोह उसने देखा की अंदर से उसके पिता बाहर गार्डन में आ रहे थे.

पर वो अकेले नहीं थे. उसने देखा की उनके साथ साथ उसकी माँ भी आ रही थी. लेकिन और भी चौंका देने वाली बात ये थी की उसके माता पिता के साथ कोई 2 अन्य लोग भी थे जो उनके साथ आ रहे थे. इसके पहले करा ने उन् आदमियों को पहले कभी नहीं देखा था. कौन थे ये लोग भला?

वो नए अनजान आदमी धोती कुरता पहने हुए थे. उनमे से एक जवान था और एक बूढ़ा. जब चारो लोग आके करा के नज़दीक खड़े हुए तोह करा के पिता उससे देख उस बूढ़े आदमी से बोले.

"ये है हमारी लाड़ली गुरु जी! इसका नाम है करा!"

"सुन्दर! बड़ा hi प्यारा नाम है. करा का तोह मतलब hi अनोखा होता है. अनूठा! अद्वितीय!"

वो अनजान बूढ़ा आदमी इतना बोल फिर मुस्कुराते हुए आगे आया और करा के सर्र पर प्यार से हाथ फेर्रा और अपनी आँखें बंद कर लिया.

"अध्भुत! अविश्वसनीय! अलौकिक! एकदम उत्कृष्ट!"

"हँ!? K-Kya हुआ गुरु जी! करा सच में बहुत hi होनहार निकलेगी न?" उसके पिता ने गुरु जी से पूछा.

"होनहार निकलेगी? अरे! करोडो में से एक निकलेगी ये बच्ची! इतना हुनर मेने आज तक किसी बच्ची में नहीं देखा."

बदले में गुरु जी मुस्कुराते हुए बोले और फिर कुछ और बातें भी कही, "ये बच्ची, हीरा है हीरा किशोर! तुम्हारी ये बच्ची, इतना आगे जाएगी की पूछो मत. केवल तेज दिख रहा है मुझे इसकी आँखों में. कभी भी कोई भी इसके रास्ते में आकर इसका अड़ंगा नहीं बन सकता. अपना रास्ता ये लड़की खुद बनाएगी. और सबसे सर्वश्रेष्ठ hi बनेगी."

"K-Kya!? ः~ ये तोह... ये तोह बड़ी hi अच्छी बात है गुरु जी! आपने ऐसा कह के मानो जैसे मेरी साड़ी चिंताए दूर कर दी!"

करा के पिता किशोर खुश होते हुए गुरु जी के पाँव पड़ने लगे तोह गुरु जी ने उन्हें उनकी ब्याह पकड़ उठाया.


"अरे! ठीक है बच्चा! खुश रहो! खुश रहो!"

"सच में गुरु जी! आपकी बातो से मेरा भी मैं अब हल्का हो गया है. धन्यवाद! और इस नन्हे बच्चे का जब जन्म होगा तोह में चाहती हु की आप hi इसका नाम कारन करे." करा की माँ ने अपना उभरा हुआ पेट सहलाते हुए कहा.

तोह गुरु जी भी हाँ में सर्र हिलाये, "ठीक है बेटी! में ज़रूर एक अंतिम बार इस शहर आऊंगा केवल तुम्हारे नवजात शिशु के लिए. मेने तब hi बताया था किशोर को की शहर की ज़िन्दगी मुझे पसंद नहीं. मेरा घर तोह कुदरत में है. फिर भी एक अंतिम बार ज़रूर आ जाऊंगा."

"धन्यवाद गुरु जी! में जानता हु की आप को ये सब क्यों पसंद नहीं है. वो तोह ये मेरी किस्मत थी जो मेरे कहने पर आप यहाँ मेरे घर तक आये. वर्ण उस दिन तोह मेने देखा था की आप किसी के बुलाने पर कही नहीं जाते."

"सही कहा तुमने किशोर! मेने उस दिन hi तुम्हारी आँखों में देख लिया था. की तुम्हे मेरी सख्त ज़रुरत थी."

"जी! धन्यवाद गुरु जी! अरे में भी न... कहा आपको यहाँ बातो में लगा लिया. आइये न भोजन तैयार है!" किशोर ने हाथो से इशारा कर अंदर चलने के लिए कहा. "और बीटा सोनू और अवा बेटी, जाओ अब तुम दोनों घर ठीक!? करा अभी खाना खाएगी."

"Okay अंकल!" और दोनों hi बच्चिया करा को bye बोल अपने घरो की ऑर्डर चली गयी.

"क्या ये दोनों करा बेटी की सहेलिया थी!?" गुरु जी ने पूछा.

"जी हाँ! गुरु जी! वो काले बालो वाली सोनिआ है, प्यार से सोनू कहते है सब उससे. और वो जो विदेशी सी प्रतीत हो रही थी, पीले रंग के बालो वाली, वो अवा है. दोनों hi हमारे दो अच्छे पड़ोसियों की बेटी है. अवा की माँ विदेशी है, और पिता हिंदुस्तानी. इसलिए वो..."

"ओह्ह्ह!! समझा!! पर तुम्हारी ये लड़की बोहत आगे जाएगी किशोर! एकदम अलग स्टारर पे रहेगी ये बच्ची..."

गुरु जी हस्ते हुए बोले तोह उनके बगल से खड़े उस नौजवान व्यक्ति ने उनकी ब्याह खींच उनके कानो में खुसपुसाते हुए कहा, "गुरु जी! कुछ ज़्यादा नहीं हो गया? कही हमने कुछ ज़्यादा झूठ तोह नहीं कह दिया? ये आदमी छोटा मोटा आदमी नहीं है. मुझे तोह डर लग रहा है गुरु जी."

गुरु जी जैसे अपने शिष्य, रमन की बात सुन्न सचेत हो गए. पर फिर मुस्कुराते हुए रमन को देखे और धीरे से बोले, "तुम अभी भी कच्चे खिलाड़ी हो रमन. इसलिए में तुमलोगो का गुरु हु और तुमलोग मेरे चेले."

"पर गुरु जी, आपने इस बच्ची के बारे में बोहत कुछ कह दिया है. यदि ये बच्ची भविष्य में वैसी नहीं निकली जैसा की आपने इसका वर्णन किया है तोह फिर तोह, सब को पता चल जाएगा की हम ढोंगी है."

रमन ज़ाहिर सी बात थी की डर गया था. वो गुरु जी का नया शिष्य था. और गुरु जी को काम करते देख उससे बस इस बात की चिंता सताये जा रही थी की कही गलती से उनकी पोल न खुल जाए. वर्ण सब कुछ धरा का धरा रह जाएगा.

"तुम हमेशा hi मंद बुद्धि रहोगे रमन!" गुरु जी ने मुस्कुराते हुए कहा. वो देख रहे थे की किशोर और उसकी पत्नी अंदर की ऑर्डर जा रहे थे. खाने की तैयारी करने.

और नन्ही करा उन्हें अपनी प्यारी सी आँखों से बड़ी hi जिज्ञासा से घर रही थी.

"M-Mein कुछ समझा नहीं गुरु जी!?"

गुरु जी ने रमन को देखा और फिर दरवाज़े की तरफ जहा एक 40-45 की उम्र का व्यक्ति एक बटलर के कपडे पहने हुए खड़ा था. और उन् दोनों को hi घर के देख रहा था.

वो मुस्कुराते हुए करा के नज़दीक आये और प्यार से उसके सर्र पैट हाथ फेरर रमन से धीरे से बोले,

"अरे! मेरे मंद बुद्धि वाले शिष्य. यदि गधे को भी बार बार, लगातार कोई चीज़ सिखाई जाए तोह गधा भी होशियार बन्न जाता है. फिर ये तोह इंसान की बच्ची है."

"M-Mein कुछ समझा नहीं अभी भी गुरु जी!"

रमन आगे कुछ और कह पाटा की तभी अंदर से किशोर निकल कर बाहर आया और गुरु जी से बोलै,

"अरे!? आप यही है अब तक गुरु जी? खाना लग hi चूका है. अंदर आइये न."

"दरअसल! में कुछ सोच रहा था!" गुरु जी ने जवाब दिया.

"K-Kya सोच रहे थे आप?"

"करा बिटिया के बारे में."

"करा के बारे में? क्या हुआ?"

"तुम्हारी पत्नी साथ में थी इसलिए मेने साड़ी बात नहीं बतायी थी."

"S-Saari बात? गुरु जी साफ़ साफ़ कहिये न."

"हम्म! देखो किशोर! तुम्हारी ये बच्ची निकलेगी तोह बोहत होनहार पर..."

"P-Par? पर क्या गुरु जी?"

"पर ये की... इसके जीवन में कई साड़ी अड़चने आएंगी. और ऐसा भी हो सकता है की उन् अड़चनों के चलते ये अपनी दिशा से भटक जाए और अपनी ज़िन्दगी में कुछ भी हासिल न कर पाए." गुरु जी ने एकदम सीरियस होते हुए कहा तोह बेचारे किशोर के चेहरे का रंग hi उड़द गया.

"M-Mein कुछ समझा नहीं गुरु जी! कृपया कर खुल के समझाइये!"

"सरल भाषा में hi कह रहा हु किशोर. हर्र व्यक्ति के जीवन में परेशानिया आती hi है. में बस इतना कहना चाह रहा हु की... करा बिटिया के जीवन में कुछ ज़्यादा hi अड़चने आएंगी. और यदि करा बिटिया ज़रा भी उन् अड़चनों में फास्सी. तोह वो कुछ भी हासिल न कर पाएगी. उन् परेशानियों का मुअकाबला इससे खुद hi करना होगा."

"ये सब!?? T-Toh में क्या करू गुरु जी? K-Koi हल तोह होगा hi आपके पास!?"

"है न बच्चा! पर... थोड़ा मुश्किल रहेगा."

"आप बताइये बस गुरु जी!"

"तुम्हे इस पर ध्यान देना होगा. बोहत ज़्यादा ध्यान. इसकी अड़चने ज़ाहिर है की तभी आएंगी जब ये कही जाएगी. सरल भाषा में, तुम्हे करा बिटिया से उसकी थोड़ी आज़ादी chheen'ni पड़ेगी. उससे सर्वश्रेष्ठ शिक्षा प्रदान करनी होगी. पर ये सब बाहर न हो. तुम समझ रहे हो न किशोर?"

किशोर तोह जैसे गुरु जी की बात सुन्न स्तब्ध सा मूर्ति बन्न के रह गया था. कुछ देरर मौन रहने के बाद वो बोलै,

"गुरु जी! आइये! अंदर चल के विस्तार से बात करते है. मेरी पत्नी को भी jaan'na ज़रूरी है."

"ठीक है बच्चा! चलो!"

और गुरु जी किशोर के साथ अंदर जाने लगे. बाहर बगीचे में खड़ा रमन गुरु जी को देखता रहा बस और मैं hi मैं सोचने लगा.

'तोह ये मतलब था गुरु जी का. की गधे को भी बार बार सिखाओ तोह वो होशियार बन्न जाता है. मतलब गुरु जी इस नन्ही सी बच्ची को बचपन से hi बाहरी दुनिया से दूर रख के केवल इससे पढ़ाई में लगवा देंगे. और ऐसे में ज़ाहिर है की ये लड़की आगे चल के होशियार hi निकलेगी. वाह! मान गए गुरु जी को! पर अभी किशोर राज़ी नहीं हुआ है. देखते है गुरु जी कैसे करते है ये सब?!'

कुछ देरर तक अंदर सभी लोग भोजन करते रहे. काफी समय गुज़र चूका था. और करा के बारे में सब कुछ गुरु जी ने बता दिया था किशोर और उसकी पत्नी को. अब निर्णय करना किशोर के हाथ में था. क्या वो गुरु जी की बात को मानेगा? या नहीं?

वो अपना फैसला सुनाने hi वाला था जब बाहर बगीचे से करा की एक ज़ोरदार चींख उन् सबको सुनाई दी.

"Aaaaaaaaaaaaaaaa...."

घबराते हुए वो सब उठे और बाहर की ऑर्डर भागे.

जैसे hi किशोर और बाकी सब वह पहुचे तोह जो नज़ारा उन्होंने देखा उससे देख सबकी रूह काँप गयी. उनके रौंगटे खड़े हो गए.

"आआह्ह्ह!"

करा की माँ जो गर्भवती होने के कारण थोड़ा धीरे धीरे चलते हुए वह आयी, उन्होंने सामने का मंज़र देखते hi अपना चेहरा अपने हाथो से धक् लिया.

नीचे ज़मीन पर उनके यहाँ जो माली काम करता था वो खून से लटपट पड़ा हुआ था.

उसके सीने पर चुर्री के गोपने के घाव थे जिनमे से खून निकल कर पूरा उसकी शर्ट को लहू लुहान कर चूका था. उसकी खुली डरावनी आँखें जो अनदेखी और अनकही कुछ घटना के बारे में व्यक्त करना चाह रही थी.

"अर्चना! करा को लेकर अंदर जाओ फौरन...!"

अपने पति की बात सुन्न अर्चना ने करा को पकड़ा और उस नन्ही सी दर्री हुई बच्ची को वो फौरन hi अंदर ले गयी.

"अनर्थ! घोर अनर्थ! बाप रे! हे भगवान्!!! ये आज मेने क्या देख लिया?" गुरु जी दररते हुए बोले.

"माधव!! ू माधव! जल्दी आओ इधर!"

किशोर ने आवाज़ लगाई तोह वही 40-45 वाली उम्र का आदमी जो बटलर की यूनिफार्म में पीछे hi खड़ा था वो सामने आया. और उससे जैसे पता था की क्या करना है.

उसने झुक के उस माली को चेक किया और फिर किशोर से कहा. "साहब! ये तोह मर्डर चूका है."

और ये सुनते hi गुरु जी और रमन की सिटी पित्ती गुल हो गयी.

पर जैसे उन्हें अभी और एक झटका लग्न बाकी था.

जैसे hi सबकी नज़र सामने की दिवार पर गयी तोह सब के सब एक बार फिर मौन रह गए.

सामने सफ़ेद दिवार पर बड़े बड़े अक्षरों में पेंट से लिखा हुआ था.

"किल्ड बी स्लोगन"

ये भूरे पेंट से लिखा हुआ था. वो माली पौधों के गमलो में पेंट कर रहा था. और शायद हत्यारे ने उसी पेंट से ये सब लिखा था.

ये देखने के बाद तोह जैसे किशोर एकदम डर गया.

"देखा तुमने किशोर!?" गुरु जी बोले.

"H-Huh!??"

"मेने तुमसे कहा था न? करा बिटिया के जीवन में अड़चने आएंगी! धेरर साड़ी! और देखो... हे भगवान्! इतना बड़ा घोर अनर्थ! इतना बड़ा अपराध! बेचारी करा बिटिया इतनी सी उम्र में क्या क्या देख बैठी. मेने कहा था न किशोर! तुम्हे बोहत ध्यान देना पड़ेगा. मुझे अब मेरी आँखों की शुद्धि करनी होगी. न जाने क्या देख लिया ये मेने आज. भगवान् रेहम कर!!!"

और किशोर ने फिर एक पल भी नहीं गवाया और बोलै,

"आपने एकदम सही कहा गुरु जी! आज से hi... करा कही नहीं जाएगी. उसकी पढ़ाई के लिए... में सर्वश्रेष्ठ प्रोफेस्सोर्स को घर hi बुलवाऊंगा और उससे घर पर hi पढवाउन्ह. वो अपने एक्साम्स घर से hi देगी. में अपनी बच्ची को खोना नहीं चाहता. आज से उसका खेलना कूदना बंद. केवल उसको ग्रोथ पर hi मेरा पूरा ध्यान होगा. पूरा ध्यान... मेरी करा..."

रमन जो खड़े खड़े सब देख रहा था. वो मैं hi मैं अपने गुरु जी की तारीफों के पल बाँध रहा था.

'मान गए गुरु जी आपको. किसी भी परिस्थिति को अपने फायदे के लिए कैसे उपयोग करना है कोई आपसे सीखे. यहाँ किसी की हत्या हो गयी और आपने अपना काम निकलवा लिया. वाह! मान गए आपको!'

पर वही दूसरी ऑर्डर किशोर सामने स्लोगन लिखे नाम को पढ़ के और भी घबराया हुआ था.

'K-Kaun है ये? मेरी तोह किसी से भी दुश्मनी नहीं है. कौन है ये स्लोगन? कौन हो सकता है ये?'

"माधव! P-police को जल्द से जल्द बुलाओ."

"जी साहब!"

कहते हुए माधव अंदर चला गया टेलीफोन से फ़ोन करने.

"अब में चलता हु किशोर! मुझे जल्द से जल्द मंदिर जाना होगा. वर्ण में अपना ये विचलित मैं शांत नहीं कर पाउँगा."

कहते हुए गुरु जी जाने लगे तोह किशोर ने उन्हें बुलाया. पर वो तोह जैसे किसी की सुने hi नहीं और अपनी hi धुन में आगे बढ़ वह से निकल गए.

अब वह केवल किशोर और रमन hi बचे हुए थे.

"गुरु जी ऐसे hi है. बोहत पवित्र है. उन्हें तोह अब मंदिर का वातावरण और भगवन के भजन hi शांत कर सकते है. न जाने क्या देख लिया आज उन्होंने." रमन बोलै.

"M-Mujhe माफ़ करना. ऐसे मेरे घर पर... गुरु जी को..."

"अरे!? नहीं नहीं! इसमें आपकी कोई गलती नहीं है. ये तोह ज़िन्दगी है. कब कहा पे न जाने किस के साथ क्या हो जाए. अच्छा! अब में चलता हु."

"अरे? पर गुरु जी की दसखीना?"

"दक्षिणा? गुरु जी तोह अपने नाम पर आज तक एक रूपया नहीं लिए. वो तोह वैसे hi कुदरत में रहना पसंद करते है. हाँ! पर कभी कभी कुछ दिलेर लोग उनके शिष्यों को राशि थमा देते है. और बदले में गुरु जी उस राशि को समाज के कामो में लगा देते है. यही है बस हमारा तोह..."

"हाँ! तोह, रुकिए न आप..." कहते हुए किशोर फौरन hi अंदर गया और उसने पैसो की कुछ गद्दी अलमारी से निकाली और ला कर रमन के हाथो में थमा दी.

"ाररीी!? Y-Ye... ये क्या कर रहे है आप? इतने सारे पैसे?"

"देखिये! ये मेरी तरफ से है. गुरु जी को धन्यवाद कहियेगा. और आप इन् राशि का मुझे पता है नेक काम के लिए hi इस्तेमाल करेंगे."

"P-Par...!?!"

"देखिये! ना मत कहियेगा! और माफ़ी चाहता हु में थोड़ा जल्दी में हु. इतना बड़ा हादसा हो गया घर में. घर का मुखिया होने के नाते मुझे hi सब देखना होगा."

और कहते हुए किशोर वह से निकल गया. पुलिस आ चुकी थी और साड़ी जांच पड़ताल करि.

पर उसके पहले hi रमन वह से अपनी थैली में वो पैसे लिए निकल चूका था.

'हाहाहाहा~ मान गए गुरु जी को. ये तोह लाख से भी ज़्यादा है. बाप रे!!! ये इतना रईस आदमी कहा से मिल गया गुरु जी को?'

वो सोचते सोचते बस स्टैंड पोहचा और एक बस में सवार हो गया. और अंदर hi एक सीट पर उसके गुरु जी बैठे हुए थे. जैसे मानो वो उसका hi इंतज़ार कर रहे थे.

वो पैसे, ज़ाहिर है की किसी नेक काम में इस्तेमाल नहीं होने वाले थे. बल्कि उन् पैसो का इस्तेमाल तोह दारू, और अन्य ऐशो आराम के लिए इस्तेमाल होने वाला था. गुरु जी और उनके शिष्य मिल कर कितना बड़ा ढोंग रच रहे थे दुनिया के लोगो के साथ ये बात कोई नहीं जानता था.

शायद, अभी तक किसी ने भी गुरु जी को नहीं पकड़ा था. और ऐसे hi उनकी ज़िन्दगी ऐशो आराम से भर चुकी थी.

पर...

जहा गुरु जी और अन्य लोग मस्ती में लगे थे वही दूसरी ऑर्डर बेचारी नन्ही करा की ज़िन्दगी जैसे उजाड़ के रख दी थी गुरु जी ने.

किशोर ने उसका स्कूल जाना सख्त बंद कर दिया था.

पहले तोह करा को बात समझ नहीं आयी. क्युकी वो काफी छोटी थी. पर जैसे जैसे वो बड़ी हुई, और उससे पता चला की उसकी सहेलिया सभी बाहर निकल के घूमने फिरने स्कूल जाती थी तोह जैसे उससे समझ में आया.

वो ज़िद्द करती, और किशोर उसकी बातें इग्नोर कर देता. वो रोटी, बिलखती, की उससे भी बाहर जाना है. पर कोई फायदा नहीं.

वो एक बंद पिंजरे में किसी चिड़िया की तरह बन्न के रह गयी थी. बेशक! उससे ुच्छ शिक्षा प्रदान की जा रही थी. हर्र एक विषय का होनहार प्रोफेसर आके उससे पढ़ाता था.

पर...

क्या फायदा था ऐसी शीसखा का? जहा उससे कोई आज़ादी तक नहीं थी. वो बस उस आलिशान से बंगले में क़ैद रहके खिड़की के बाहर अन्य बच्चो को रास्ते से हस्ते खेलते हुए गुज़रते देखा करती थी.

उसकी सहेलिया ज़रूर कभी कभी आती थी. सोनू और अवा.

पर जैसे धीरे धीरे उनसे भी उसका टच ख़तम हो रहा था.

दोस्त क्या होते है, शायद ये भी वो अब भूलने लगी थी.

एक समय ऐसा भी आया जब उसकी माँ का देहांत हो गया. और तब से वो जैसे और शांत सी हो गयी.

बाप, जो उसकी बात सुनता hi नहीं था. केवल उसकी पढ़ाई की बात करता था. माँ, जो वक़्त से पहले चल बसी.

और एक छोटा भाई, जो अभी काफी छोटा था इन् सब बातो को समझने के लिए.

जब करा 8तह एसटीडी में थी तब उसकी पडोसी सहेली अवा, वह से चली गयी विदेश. हमेशा के लिए.

और जाने से पहले भी, वो दोनों hi एक दूसरे से केवल एक बार hi मिल पाए.

अवा : I'm गोइंग करा!

करा : हम्म~

अवा : T-Tum... तुम कब तक ऐसे रहोगी? घर में?

करा : जब तक डैड अल्लोव नहीं करते.

अवा : तुम्हे अपने डैड से बात करनी चाहिए. रियली!

करा : ी विल!

अवा आगे बढ़ी और उसने करा के हाथ में एक ब्रेसलेट पहनाया और उसके गले से लग गयी.

अवा (क्रिस) : ी विल नेवर फॉरगेट यू. गुडबाय!

पर करा की आँखों से ासु न निकले. उससे समझ में hi नहीं आ रहा था की उससे रोना चाहिए या नहीं. उससे पता hi नहीं था कुछ. क्युकी वो बचपन से hi इन् सब फीलिंग्स से जैसे वंचित रह गयी थी.

एक छोटे बच्चे को आप बचपन में जो सिखाओगे, बड़े होने के बाद वो उसी को फॉलो करता है. और उसके लक्षण भी देखने को मिलते है.

करा के साथ भी कुछ ऐसा hi था. उससे फीलिंग्स के बारे में कुछ सिखाया hi नहीं गया था. उसका दिन शुरू होता था सुबह 5 बजे. नौकर आके उसके कपडे बदलते थे. नाश्ता होता था डाइनिंग टेबल पर. सुबह सुबह उसकी गुड मैनर्स की एक क्लास लगती. उसके बाद सुबह से रात तक अलग अलग विषय के टीचर्स आके उससे पर्सनली पढ़ाते थे.

बीच बीच में उठ वो अपना लंच करती और रात में डिनर और बस फिर उसका दिन ख़तम हो जाता. और अगले दिन से फिर वही रूटीन शुरू.

उसके दोस्त नहीं थे. जो थे वो भी अब नहीं आते थे. अवा जा चुकी थी. सोनू hi हमेशा बीच बीच में ज़िद्द कर के आ जाती थी और उस से बात करती.

कभी कभी तोह सोनू उसके डैड से भी लड़ गयी थी.

वो करा से सवाल करती की क्यों वो अपने आप को यु क़ैद करके रखे हुए है.

तोह करा बस एक hi जवाब देती, "डैड मुझे कामयाब होते देखना चाहते है."

और बस, वही डिस्कशन ख़तम हो जाय करता था.

वो एक रोबोट की तरह बन चुकी थी. जिससे बस काम करवाने के लिए बनाया जा रहा था.

जब उसका जन्मदिन आता तोह बस एक केक काटा जाता था और बस हो गया उसका जन्मदिन.

अपने भाई कारन से कभी कभी करा को जलन होती थी. क्युकी उसका भाई स्कूल भी जाता था और दोस्तों के साथ खेलने भी. उससे कोई मनाही नहीं थी.

पर जैसे उसका ये इमोशन भी गायब हो गया. एक प्रकार से उससे बस अब बिज़नेस करना आता था. क्युकी वो बिज़नेस संभालने के लिए hi पढ़ रही थी अब तक.

बाकी साड़ी चीज़े जैसे वो भूलती जा रही थी.

जब उसने स्कूल से ग्रेजुएट किया तोह किशोर ने उससे पहली बार विदेश भेजा यूनिवर्सिटी ज्वाइन करने के लिए. पर वह भी, वो एक बंगले में रहती थी. यूनिवर्सिटी नहीं जाती थी. और वही से उसने यूनिवर्सिटी में टॉप भी किया था.

सोनिआ उर्फ़ सोनू, उसकी बचपन की दोस्त उस से जलती थी. क्युकी हमेशा hi करा उस से आगे रहती थी. आखिर इतना नॉलेज कोई व्यक्ति लेगा तोह ज़ाहिर है की वो अन्य लोगो से आगे hi रहेगा.

पर सोनिआ को जब ये बात समझ आयी की उसकी दोस्त उस पर ज़रा भी ध्यान नहीं देती. तोह सोनिआ ने जैसे ये मक़सद बना लिया था अपना.

वो भी शामे यूनिवर्सिटी जाएगी. वो भी शामे प्रतिस्पर्धा में भाग लेगी और करा को हराएगी. ताकि उसकी दोस्त उस पर ध्यान दे.

कभी कभी करा कुछ कॉन्टेस्ट्स में आती थी. पर कॉन्टेस्ट्स ख़तम होते hi वो गायब.

और ऐसे hi उसकी ज़िन्दगी एक नर्क के सामान हो चुकी थी.

एक खिला हुआ गुलाब ऐसे मुरझा के रह गया था.

***

कारन : और ये है... दीदी की सच्चाई.

जब कारन ने साड़ी बातें बता कर अपनी बात ख़तम करि तोह वीर की मुट्ठी गुस्से में कस गयी.

"दमन ितत्तत्त!!!!"

*थुड़*

उसने जोरर से अपना मुट्ठी बेंच पर मारी तोह लोहे की वो बेंच पे एक डेंट पद गया.

कारन उसके गुस्से को देख ताजुब था.

वीर : सो that's थे रीज़न... That's थे रीज़न व्हाई शी... दमन आईटी!!!!

वीर को याद आया की करा की मुलाक़ात उस से पहली बार कब हुई थी. क्लब में...

और उससे जैसे समझ आ चूका था की क्यों करा वाया आयी थी. शी जस्ट वांटेड तो क्नोव थिंग्स आउट...

वो तोह बेचारी बस ये देखने आयी थी की क्लब की लाइफ किसी होती है. क्या होता है वह? अपनी क्यूरोसिटी को ख़तम करने आयी थी वह वो. और उस दिन hi आतिश ने वह हमला कर दिया था. और फिर वीर और उसका यु आपस में इंटरकोर्स करना...

बेचारी! हर्र जगह तोह झेला hi था उसने. ये सब सोचते hi मानो वीर के मैं में करा के प्रति रिस्पांसिबिलिटी और बढ़ चुकी थी.

वीर : तुम्हे कैसे पता चली ये सब बातें!? तुम तोह तब पैदा भी नहीं हुए थे!?

कारन : यदि वफादारी का कोई दूसरा नाम है तोह वह है माधव अंकल! उन्होंने hi मुझे सब कुछ बताया था जब में फॉरेन जाने वाला था. और इसलिए तब से hi में रघु के कांटेक्ट में हु. कुछ भी होता है वो मुझे बताता है.

वीर : हम्म~ तोह माधव अंकल उस गुरु जी के बारे में जानते थे.

कारन : माधव अंकल की नज़र तेज़्ज़ है लोगो को परखने में. उन्हें समझ आ चूका था की वो आदमी ढोंगी था. उन्होंने डैड को बताया भी पर डैड ने विश्वाश नहीं किया. वो इन् सब में कुछ ज़्यादा hi विश्वाश करते है.

वीर : इतने बड़े आदमी होने के बावजूद इन् सब पे...!?

कारन : हर्र बड़ा आदमी किसी न किसी अंधविस्वाश पे यकीन करता hi है वीर. कुछ लोगो नुमेरोलोग्य पर यकीन करते है. की उनका लकी नंबर ये है. वगैरह वगैरह...

वीर : ी सी! वेल!? तोह ये सब क्यों बताया तुमण्ड मुझे!?

कारन : बिकॉज़ ी थिंक यू कैन चेंज हेर.

वीर : हँ!?

कारन : तुम्हे पता है मेने किसी किसी सीटुएशन्स में दी को देखा है? उनका बड़े था लास्ट ईयर. और डैड ने उन्हें विश तक नहीं किआ था. वो काम में इतना बिजी थे. ऊपर से वो दी को मीटिंग्स पर टाइम पर पहुचने के लिए कह रहे थे. और दी ने कोई कंप्लेंट नहीं की. फिर रात में मेने डैड से थोड़ा ुचि आवाज़ में बात की तब जाके उन्हें याद आया और उन्होंने दी को विश किया था. तुम समझ रहे हो न?

वीर : ....

[That's quite sad...]

कारन (शिघ्स) : जब मुझे पता चला की दी ने तुम्हे एप्रोच किया और तुमसे बात करते हुए उनके चेहरे पर स्माइल आ जाती है. तहत मीन्स यू अरे समवन स्पेशल. दीदी फ़ालतू लोगो से कभी इम्प्रेस्सेड नहीं रहती. कोई स्पेशल hi होता है जो उन्हें इम्प्रेस कर सके.

वीर : O-Ohhh!

कारन : सो? कैन यू हेल्प हेर?

वीर (स्माइल्स) : यदि तुमने नहीं भी कहा होता तोह भी में कर रहा होता.

कारन (स्माइल्स) : हम्म~ पर ध्यान रहे, िफ़ ी फंड यू टेकिंग एडवांटेज ऑफ़ हेर. तोह मुझसे बुरा कोई न होगा.

वीर : *स्माइल्स*

और तभी कारन ने अपना हाथ आगे बढ़ाया.

कारन : सो? फ्रेंड्स?

और पल भर के लिए वीर को जैसे कुछ याद आया.

गोलू!!!!

ऐसे hi तोह उसने दोस्ती का हाथ आगे बढ़ाया था. और क्या हुआ था उसके साथ?

ये याद आते hi वीर की नज़रे नीचे झुक गयी और वो पलट गया.

वीर : ी don't मेक फ्रेंड्स...

कहते हुए वो वह से निकल गया. और बेचारा कारन उससे बस प्रश्न भरी निगाहो से जाते हुए देखता रहा.

***

अगली सुबह हुई. आज वीर को अपने फ़ूड ट्रक का बंदोबस्त करना था. और यही सोच आज वो जल्दी उठ गया.

पर तभी...

*नॉक नॉक*

उसके दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी.

उठते हुए उसने जैसे hi दूर खोला तोह सामने सुमन कड़ी हुई थी.

पर...

पर उसके बगल से कोई और भी खड़ा हुआ था.

वीर : ???

सुमन मुस्कुरा रही थी और अपने बगल में खड़े व्यक्ति को उसने धक्का देके अंदर कमरे में धकेला और खुद अंदर आके दरवाज़ा बंद कर ली.

सुमन : मेने कहा था न? कल आपको एक उपहार मिलेगा!?! ये है आपका उपहार!

वीर : ेहठ!?

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आज के लिए इतना hi गाइस!

Don't फॉरगेट तो लिखे एंड शेयर योर थॉट्स!


धन्यवाद! ✨
 
अपडेट 55 के बाद के कमैंट्स के रिलीज इवनिंग तक दे दिए जाएंगे. ✨
 
अपडेट - 57 ~ शॉकिंग डिस्कवरी

अब तक...

वीर : ???

सुमन मुस्कुरा रही थी और अपने बगल में खड़े व्यक्ति को उसने धक्का देके अंदर कमरे में धकेला और खुद अंदर आके दरवाज़ा बंद कर ली.

सुमन : मेने कहा था न? कल आपको एक उपहार मिलेगा!?! ये है आपका उपहार!

वीर : ेहठ!?


अब आगे...

वीर ने सुबह उठ के दरवाज़ा खोला hi था जब सामने कड़ी सुमन ने अचानक hi किसी को धकेल कर उसकी बाहो में फेक दिया.

'व्हाट थे...!?'

स्तब्ध निगाहो से वीर ने जब जायज़ा लिया तोह पाया की उसकी बाहो में आभा लिपटी हुई थी.

उसने सुरप्रीसेड होते हुए जब सुमन को देखा तोह सुमन ने मुस्कुराते हुए गेट लॉक किया और बोली,

सुमन : जी हां मालिक!

वीर : वेट वेट! उपहार से तुम्हारा क्या मतलब है!?

उसके सवाल पर सुमन एक बार फिर मुस्कुरायी और आगे बढ़ते हुए उसने वीर और आभा के हाथ को पकड़ा और उन् दोनों को hi वो खींचते हुए बीएड के पास ले आयी.

सुमन : वही! जो मेने कहा मालिक! आभा आपका उपहार है.

वीर अब भोंदू नहीं था. सुमन की वो मुस्कान और यु आभा का मुँह झुका कर शर्माना सब कुछ एक hi तरफ की ऑर्डर इशारा कर रहा था.

वीर : थिस... No वैयय...

[Hmph! Luck just keeps falling into your hands.]

वीर : इसका मतलब...!?

इस वक़्त वीर ने कोई भी शर्ट नहीं पहनी हुई थी. वो अक्सर शिरट्लेस्स hi सोया करता था. बस एक जोग्गेर hi पहनता था वो नीचे. और इस समय भी वो ऊपर से पूरी नग्न हालत में था.

और ऐसे में आभा उस से लिपटी हुई थी. ज़ाहिर है की वीर की साड़ी कासी हुई मसल्स, आभा भली भाति महसूस कर पा रही थी.

सुमन : बैठिये मालिक! समझाती हु.

उसने उन् दोनों को बीएड पर बैठाया और वीर के हाथ पर हाथ रख के बोली.

सुमन : मालिक! आभा भी अब एक औरत है. और कल जब आप और में सुबह सम्भोग कर रहे थे तोह ये उस वक़्त आपके कमरे के बाहर hi थी. और आपको पता है ये उस वक़्त क्या कर रही थी!?

उसके इतना कहते hi मानो जैसे आभा के चेहरे से उसका रंग hi उतर गया. वो हड़बड़ाई और सुमन के हाथो को अपनी हथेलियों में लेते हुए अपनी सासु माँ को रोकने का प्रयत्न करने लगी.

आभा (ब्लशेस) : M-Maa जीई!???? Y-Ye आप? ये आप क्या कह रही है? M-Mujhe जाने दीजिये यहाँ से. M-Mein अपने किये पर शर्मिंदा हु. अहिंदा से ऐसा... ऐसा कभी नहीं होगा.

पर सुमन ने तोह जैसे अपनी बहु की एक भी न सुनी. उससे हवा की तरह इग्नोर कर वो वीर से बोली.

सुमन : मालिक! एक औरत को जब उसके मर्द से ज़्यादा दिनों तक दूर रखा जाए तोह ज़ाहिर है की उसके अंदर सम्भोग करने की उत्तेजना और इच्छा बढ़ती जाती है. यही मर्दो के साथ भी होता है. कुछ ऐसा hi हाल आभा का भी है. कल ये हमे सम्भोग करते हुए सुन्न रही थी. और सुन्न hi नहीं बल्कि खुद हस्तमैथुन कर रही थी.

और बस, सुमन ने जैसे एक बम फोड़ दिया था ये कहके आभा के लिए.

"नहहीइइइइइइइइ!!"

आभा शर्म के मारे दोनों हाथो से अपना मुँह छुपा ली. तोह वही सुमन केवल मुस्कुरा रही थी.

वीर : एहम... ये सब...

सुमन : मालिक! जितना हक़ आपका मेरे और सोनाली के ऊपर है. उतना hi हक़ आपका आभा के ऊपर भी है. भले hi आभा हमारे साथ खुनी रिश्ते नहीं रखती पर आखिर है तोह वो हमारे hi परिवार का हिस्सा न? मेने तोह शुरू से hi उससे अपना माना है. बिलकुल अपनी बच्ची की तरह. मेरी आपसे ये दरखास्त है की... जैसे आप मुझे तृप्त करते है. वैसे hi... वैसे hi आभा को भी तृप्त कर दीजिये.

वीर ने एक झलक आभा को देखा जो अपना मुँह छिपाए बैठी हुई थी. और फिर सुमन को, जो एक आस लिए उसके उत्तर का इंतज़ार कर रही थी.

वीर : सुमन! माना की... जो हक़ की बात तुमने की वो तुम्हारे नज़रिये से सही हो सकती है. पर ऐसे में भला आभा के साथ ऐसा कैसे कर सकता हु? उसका पति भी है.

सुमन : तोह क्या मेरा पति नहीं था!?

वीर : पर तुम्हारी रज़ामंदी से hi में आगे बढ़ा था.

सुमन : तोह यहाँ भी आभा की रज़ामंदी है.

वीर : हँ!?

सुमन : हम्म~ देखिये न मालिक! उससे इस वक़्त मर्द की सख्त ज़रुरत है. और आपसे बेहतर कौन हो सकता है? मेने आपको कहा है न की में और मेरा परिवार आपकी सेवा में रहेगा. और आभा मेरे परिवार का हिस्सा है. तोह अब बात ख़तम. आप उससे अपनाएंगे.

वीर : P-Par...

सुमन : पर वर कुछ नहीं. देखिये! वो चाहती hi है की आप उससे अपनाये. बस शर्माती है. एक बार अपना के तोह देखिये मालिक. साड़ी ज़िम्मेदारी मेरी.

सुमन ने वीर के हाथ को थामा और उससे खींच कर आभा के स्तनों पर रख दिया जो अभी भी पूरी तरह से नहीं बढे थे. पनप रहे थे.

और उन् स्तनों का एहसास पाते hi सुबह का उसका वो जोश जैसे वापस आ गया. वीर ने रज़ामंदी दी हो या न दी हो, उसके हथियार ने एक झटका मारते हुए अपनी रज़ामंदी ज़रूर दे दी थी.

अपने दूसरे हाथ से सुमन ने आभा के चेहरे से उसके हाथ हटाए जो बड़ी मुश्किल से वो कर पायी.

वीर ने देखा की आभा का पूरा चेहरा गुलाबी हो रहा था. इतना शर्मा रही थी वह. पर साथ hi साथ उसकी आँखों में हलके हलके ासु भी झलक रहे थे. ये ासु डर की वजह से नहीं थे बल्कि शर्म के मारे निकल आये थे.

फिर भी, वीर उन् आसुओ को देख थोड़ा डर गया.

वीर : सुमन ये...

सुमन : डरिये मत! आभा अपने मुँह से नहीं कहेगी. पर में जानती हु. एक बार आप उससे प्यार देंगे न. फिर देखना, सब कुछ समझ आ जाएगा आपकी.

इतना बोल सुमन आगे बढ़ी और उसने आभा का पल्लू हटा के उसका ब्लाउज खोलना चालु कर दिया.

आभा : M-Maa जी!?????

वो मुँह से तोह बोहत विरोध कर रही थी पर अपने हाथो से नहीं. जैसे वो अंदर hi अंदर चाहती थी की वीर का स्पर्श वो महसूस करे.

और कुछ hi पालो में वो केवल एक सफ़ेद ब्रा में थी.

वीर तोह आँखें फाड़े बस सब कुछ होते हुए देख रहा था. ये सब बोहत hi नया था उसके लिए.

[Enjoy! Hmph!!!!!]

[System has entered into the sleep mode.]

और ये लो, पारी भी स्लीप मोड में जा चुकी थी. पर जाते जाते वीर को जैसे आँखें दिखाते हुए गयी थी.

सुमन के हाथो ने इतनी जल्दी सब कुछ किया की पालक झपकते hi आभा के बदन से साड़ी हट चुकी थी. और वो शादी शुदा नयी नवेली औरत केवल ब्रा और पंतय में वीर के सामने लेती हुई थी.

वीर तोह जैसे कुछ करना hi भूल गया था. उसके अंदर की गर्मी बढ़ते बढ़ते एक अलग hi स्टारर पर पहुँच रही थी. बस, उससे एक धक्के की ज़रुरत थी. जो सुमन ने अगले hi पल दे दिया.

पीछे से अचानक hi उसकी नंगी पीठ पर उससे सुमन के नंगे थान महसूस हुए. वो बड़े बड़े, मुलायम दूध जिन पर दो भूरे निप्पल उत्तेजना के मारे खड़े हुए थे. वो सीधा जाकर वीर की पीठ पर डब्ब गए और रगड़ खाने लगे.

बस! ये महसूस करते hi वीर की आँखें पल भर के लिए बंद हुई और उससे अपने कानो के पास सुमन का मुँह महसूस हुआ.

"भोगिए उससे, मालिक! आभा आपकी hi है. देखिये न, कैसे शर्मा रही है. वो अंदर hi अंदर आपका स्पर्श पाना चाहती है मालिक. उससे इस सुख से वंचित न करिये. भोग लीजिये उससे. बिलकुल वैसे hi... जैसे आप मुझे भोगते है. करिये... करिये..."

और जैसे सुमन के बोल वीर पर काम कर गए. वो झुका और उसने सबसे पहले उन् उभरते हुए स्तनों को अपने हथेलियों में जकड़ा.

"आआह्ह्ह्ह!!"

मर्द के हाथो को इतने समय बाद अपने ऊपर महसूस करते hi आभा के मुँह से अपने आप सिसकी निकल पड़ी. वो कसमसाई, पर अभी भी उसके दोनों हाथ अपने चेहरे को hi ढके हुए थे.

और वो बस माँ जी, माँ जी, की ृत्त लगाए अपना सर्र न में हिला रही थी. बस यही मामूली सा विरोध था उसका. जो शायद अपने आप में विरोध नहीं, बल्कि आमंत्रण प्रतीत हो रहा था.

वीर ने अच्छे से जब उन् स्तनों को दबा लिया तोह उसने आभा के हाथ उसके चेहरे से हटाए और उसने उसके होंठो पर ध्यान दिया. होंठो पर लाल लिपस्टिक लगी हुई थी. शायद सुबह सुबह hi सुमन उससे पूरी तैयारी से यहाँ लायी थी.

उन् होंठो को देख, वीर कहा रुकने वाला था. उसने झुकते हुए एक बार में hi अपने होंठ आभा के होंठो से जोड़ दिए.

"मंममपहहहहहह....!??"

इस हमले के लिए आभा बिलकुल भी तैयार नहीं थी. बेशक उसने पहले भी सेक्स किया हुआ था अपने पति के साथ. पर केवल 3 या 4 hi बार. उसका पति अक्सर अपने बाप के साथ दारु में जो लगा रहता था. तोह छोड़ने का डैम कहा से आता? नशे में hi टल्ली होक सो जाय करता था. और जब कभी दिन में मौका मिलता था तब hi आभा के साथ वो सेक्स करता. और वो कब कुछ hi मिनट में समाप्त हो जाता था आभा को पता hi नहीं चलता था.

उसका पहली बार होःट hi दर्दनाक था. उसका पति बस अपनी हवस मिटा के जोरर जोरर से करके जहर के सो चूका था. और इसके बाद तोह जैसे आभा को सेक्स से hi डर लगने लगा था. सही मायनो में उससे सेक्स की परिभासा hi नहीं पता था. वो समझती थी की आदमी अपना लुंड औरत की छूट में दाल कर अपनी प्यास बुझाता है और उससे hi सेक्स कहते है.

वो ये नहीं जानती थी की आदमी और औरत, दोनों को hi एकदूसरे को सम्भोग के समय सुख प्रदान करना होता है. और भला कैसे जानती वो ये सब? उसके पति ने कभी उससे शारीरिक सुख देने का प्रयत्न hi नहीं किया. वो तोह बस छूट में पानी डालता और सो जाता था. और फोरप्ले नाम की चीज़ तोह जैसे उनकी डिक्शनरी में थी hi नहीं.

बेचारी आभा ये भी नहीं जानती थी. शायद इसलिए, अपनी छूट को रगड़ रगड़ के hi वो अब तक काम चलाया करती थी. और उसकी ये हालत जैसे सुमन से देखि न गयी. आखिर...

आखिर वो भी तोह ऐसे hi अपने आपको संतुष्ट करती थी पहले.

पर ये सब आज... आज जैसे आभा के लिए एकदम नया था.

वीर के होंठ उसके होंठो से चिपके हुए थे. ये आभा का पहला किश था. पहला...

उससे पता भी नहीं था की क्या हो रहा है और क्या करना चाहिए. वो तोह बस मूर्ति सी बानी लेती हुई थी.

और वही सुमन, उसकी सासु माँ, अपने हाथो से वीर की नंगी पीठ को अपने हाथो से मॉल उससे और उकसा रही थी.

जब वीर ने अपनी जीभ उसके मुँह में डाली तोह मानो आभा जैसे पागल hi हो गयी. उसकी आँखें हैरानी के मारे फैलती चली गयी. ये क्या था!? ये अजीब सा एहसास!?

'Y-Ye!? ये सब क्या है? ये केसा एहसास है!? मेरे होंठ... वीर जी की... वीर जी की जीभ मेरे मुँह के अंदर है. आआह्ह्ह!!! मेरे अंधरुनि गाल को वो... वो चाट रहे है. मेरी जीभ को अपनी जीभ से टटोल रहे है. ये सब क्या हो रहा है!? मममपहहहह!?? आआह्ह्ह! उनका थूक... मेरे मुँह के अंदर.... अंदर hai....aahhhh!'

वो तोह जैसे अपनी hi दुनिया में खोटी जा रही थी. वीर जहा आभा के होंठो के साथ खेल रहा था तोह वही सुमन उनके और अपने जिस्म के साथ. यानी की अब तक उसके आभा और वीर के बदन से सारे कपडे निकाल दिए थे और खुद भी वो नंगी हो चुकी थी.

वीर तोह आभा के होंठ चूसने में लगा हुआ था. अब सुमन क्या करती? उससे कुछ सूझा तोह वो झुकी...

और तभी,

"आआह्ह्ह्ह! फ़क सुमंन्त्र!!!!"

वीर एक झटके के साथ हल्का सा उठा. उसका पूरा शरीर अकड़ गया. सुमन का मुँह उसकी गांड में था. और ये बताने की ज़रुरत नहीं थी की वो वह क्या कर रही थी.

"ओह्ह्ह्हह्ह!!! फुसक्कक्कककककक....."

बेडशीट को जोरर से भींचते हुए वीर ने अपनी आँखें बंद कर ली. सुमन की ज़बान पूरी आक्रामक थी.

और इसका असर पूरा वीर पर हो रहा था. उसने झुकते hi आभा के होंठो को और बेरहमी से चूसना शुरू कर दिया.

इनका ये खेल कई मिनट्स तक चला. और फाइनली, अपनी सासें दुरुस्त करने जब वीर उठा तोह उसका हथियार पूरे शबाब में था.

सुमन का हाथ अचानक hi पीछे से आया और उसके लुंड को थाम लिया.

बड़ी hi सावधानी से सुमन ने उसके लुंड को आभा की छूट के मुँह पर लगाया जो हलके बालो से भरी हुई थी. और प्यार से वो वीर के कान में बोली,

"डालिये मालिक! चीयर दीजिये... और बना लीजिये इस आभा को अपना."

वीर ने आभा को देखा जिसकी आँखों में वही पहले की तरह ासु थे और उसका चेहरा पूरा लाल हो चूका था. उसने देखा की आभा जोरर जोरर से हाफ रही थी. उसकी छाती ऊपर नीचे हो रही थी.

और सुमन की गरम गरम सासें और वो अश्लील बोल सुनते सुनते वीर की उत्तेजना इतनी बढ़ चुकी थी की अब वो पीछे नहीं हटने वाला था.

उसने एक करारा शॉट मारा और एक बार में hi उसका लुंड करीब पौन गहराई तक अंदर जा कर धस्स गया.

"Aaaaaaaaaaaaahhhhhh! माआआआ... मंममपप्पह"

आभा चिल्लाई, पर उसकी चींख वीर की होंठो में डाब के रह गयी.

और उसके बाद तोह बस धक्के और बीएड की hi आवाज़ कमरे में गूंजती रही. साथ hi साथ आभा की वो मुफ्फलेड नोइसेस जो वो चुड़ते हुए निकाल रही थी.

वीर के धक्को के बाद जैसे उससे समझ आया था आज की सेक्स किस्से कहते है. वो बेचारी इतना झरि, इतना झरि की gin'na भी भूल गयी थी.

और यहाँ सुमन कही वीर के कान मुँह में भर्ती तोह कही, आभा की छूट से निकला लुंड अपने मुँह में ले लेती. तोह कही वीर के किसी भी अंग को चाटने लगती.

जब आभा इतनी आक्रामक चुदाई से होश खो बैठी तोह सुमन ने सब कुछ संभाला.

वीर के धक्के सुबह सुबह तोह जैसे उसके लिए तोहफा थे. जब वीर 4 बार जहर गया तब जाके वो शांत हुआ. दो दो बार आभा और सुमन की छूट में उसका माल निकल चूका था.

और हफ्ते हुए वो लेता हुआ था. बगल से नंगी आभा और नंगी सुमन, दोनों hi उस से लिपटी हुई थी. आज तोह थ्रीसम का चस्का चखा था उसने. जो शायद आगे चलके एक बुरी आदत bann'ne वाला था.

वीर (हफ्ते हुए) : वाओ!!! थे साइड आईटी राइट... तवो इस बेटर थान ओने. ऑलवेज...

सुमन : हम्म?

वीर (स्माइल्स) : और तुम hi कहती थी की सुबह सुबह मालिक आपको सम्भोग नहीं करना चाहिए. और फिर सुबह hi मुझसे ये करवाती हो. हाँ!?

सुमन (स्माइल्स) : क्युकी में जानती हु. आप तंदरुस्त रहते हो. और सुबह के सम्भोग से आपके स्वास्थ पर कोई फरक नहीं पड़ता.

वीर : ये बात तोह है... ः~ पर...

सुमन : पर...!?!

वीर (स्माइल्स) : Don't वोर्री! आभा का में पूरा ध्यान रखूँगा. और आगे से उसकी hi मर्ज़ी से उससे भोगूँगा. आज तोह ठीक है, तुम्हारे रहते उसने कोई विरोध नहीं किया. पर में नहीं चाहता, की में ज़रा भी ज़बरदस्ती करू उसके साथ. यदि उसने ज़रा भी विरोध किया तोह में पीछे हट जाऊंगा.

सुमन (स्माइल्स) : आपकी यही बातें तोह औरतो को पसंद आती है मालिक!

***

सुबह सुबह के उस एक्सोटिक थ्रीसम के बाद, वीर को 100 पॉइंट्स भी अस ा रिवॉर्ड प्राप्त हुए थे. पर अभी उनका उसे करने का समय उसके पास नहीं था. क्युकी वो निकला हुआ था अपने बिज़नेस की शुरुआत करने. बोले तोह एक फ़ूड ट्रक की तलाश में.

दिन में उससे एक आदमी से मिलना था जिसका पता उससे रागिनी की किसी फ्रेंड ने दिया था.

वीर अपना पूरा प्लान रागिनी और बाकी सभी को बता चूका था. रागिनी ने उससे कॉलेज जाने के लिए कहा पर वीर तोह जैसे अपनी बात पर अडिग था.

और अंत में रागिनी भी उसकी भोली सूरत के आगे हार गयी.

वीर : हम्म? जी! चौबे जी से मिलना था.

चौबे : अरे में hi हु. कहो क्या काम है.

वीर : मुझे यहाँ एक फ्रेंड ने भेजा है. आप फ़ूड ट्रक्स और इन्ही सब का बिज़नेस करते है?

चौबे : हाँ! कहो! क्या बात है?

वीर : मुझे एक फ़ूड ट्रक चाहिए था.

चौबे : केसा? नया या सेकंड हैंड?! या कस्टोमीसेड?

वीर : हम्म! इन् सब में रेट्स में क्या अंतर है?

चौबे : देखो भाई! नया लोगे तोह कीमत भी क्वालिटी के हिसाब से बढ़ेगी. मेरे पास एक लाख से शुरू होकर आगे महंगे महंगे वाले है.

वीर : ी सी! और सेकंड हैंड!?

चौबे : देखो! सेकंड हैंड हमारे पास आते है. कोई ओनर जब अपना ट्रक बेच के चला जाए इधर. तोह हम उससे अपने दामों में बेचते है. कई बार ऐसा होता है की वो खराब हालत में हमे दे जाते है तोह उन्हें नया करके भी हम बेचते है कस्टमर्स को.

वीर : ओह्ह्ह! और कस्टोमीसेड का क्या सन है?

चौबे : इसमें कस्टमर अपना मटेरियल बताता है. उसका केसा स्ट्रक्चर रखना है. क्या क्या इनस्टॉल करवाना है. इसमें खर्चा ज़्यादा आता है पर हाँ, प्रोडक्ट बिलकुल वैसा hi डिलीवर होता है जैसा कस्टमर चाहता हो. चौबे की ज़बान है भाई, जैसा बोलोगे वैसा बना के दूंगा.

[So? Kya decide kiya tumne? Wait! Look at that red one! It's so good! Red my favourite colour ehehe~ Take this. I said take this...]

'H-Hey कलम डाउन okay!?'

वीर : ये रेड वाला केसा है!?

चौबे : सेकंड हैंड है. पर एकदम अभी अभी नया होक बाहर आया है. अंदर से चेक कर सकते हो. ये यदि लेना है तोह ये पड़ेगा 83,000 का. न एक रूपया काम न ज़्यादा. एकदम रिज़नेबल रेट लगाता है ये चौबे. और बाकी का बर्नर वगैरह अंदर स्टोव ये सब यदि पूरा सब इनस्टॉल करवाना है तोह कुल मिलाके पहुँच जाएगा 1.5 से 2 लाख के बीच.

वीर : दमन!

[Take itttttttt!!!!!!!]

'व्हाट थे फ़क!? तुमने सुना न? 1.5 से 2 लाख के बीच.'

[Tumhaare paas kareeb 5 lakh hai Suhana ne jo diya tha card usme... Take itttttt!!! Red is so beautiful... I love it. Fucking Take ittttttt....]

'Y-You... दमन आईटी! फाइन!'

वीर : चौबे जी! ये रेड वाला दोने करो.

चौबे : पक्का? देख लो भाई अंदर से सब कुछ. जान समझ लो एक बार फिर...

वीर : नाह! सब चेक कर चूका हु में. सही है वह.

चौबे : चेक कर लिया? कब चेक कर लिया?

वीर : ाहः~ आप डील फाइनल करिये न.

चौबे : ठीक है भाई! तोह लाल वाला दोने...!

*डिंग*

और डील के दोने होते hi वीर के मैं में स्क्रीन पर नया मिशन हाज़िर था.

[Mission : Convince Sonali to join your business.


टाइम लिमिट : 1 वीक.

रिवार्ड्स : ??? पॉइंट्स.

मिशन फेलियर पेनल्टी : 100 पॉइंट्स डिडक्शन.]

'हँ!??'

***

Veer's ओल्ड हाउस...

जहा वीर अपने असली परिवार से दूर रहकर अपना खुद का बिज़नेस स्टार्ट करने की सोच रहा था तोह वही उसके पुराने घर में प्रांजल और विवेक अपने hi दादा जी की जाय्ज़ात को हड़प कर अपने प्लान को कामयाब करने में लगे हुए थे.

पर वही उसी घर में आरोही उन्ही की बहिन किसी गहरे चिंतन में डूबी हुई थी.

रीज़न!? रीज़न ये था की आज विवेक और प्रांजल दोनों hi बड़ा hi अजीब सा बर्ताव कर रहे थे.

जब आरोही, उन् दोनों के साथ सुबह सुबह दादा जी के रूम में थी तोह जो बातें उसके सामने हुई उन्हें लेकर वो सोच में डूबी हुई थी.

विवेक : दादा जी! आपको नहीं लगता की अब आपको फैसला ले लेना चाहिए!?

मनोरथ : किस बात का!?

विवेक : एहम... वो... दादा जी! देखिये! ऊपरवाला न करे की आपकी सेहत को कुछ भी होये. हम सभी तोह यही चाहते है की आप एकदम स्वस्थ रहे. पर... पर एकदम से ये जो हादसा हुआ था. ये बड़ा hi खतरनाक था. और हम नहीं चाहते की ऐसा आपके साथ क्या, किसी के भी साथ होये. तोह...

मनोरथ : हम्म?

विवेक : तोह समय रहते हमे वो चीज़े कर लेनी चाहिए जिनके बारे में हम आगे के लिए सोचते है.

मनोरथ : मतलब!?

प्रांजल : एहम! दादा जी! भैया का कहने का मतलब है की आपको अपनी जाय्ज़ात के बारे में सोच लेना चाहिए. माफ़ करना दादा जी मेने डायरेक्ट कह दिया. पर भैया आपको हर्ट नहीं करना चाहते. उनका इरादा आपको बस याद दिलाना है. और लोगिकालय देखा जाए तोह सही भी है. हादसा कभी भी किसी के साथ भी हो सकता है. इसलिए समय रहते अधूरे काम कर लेने चाहिए. ऑफ़ कोर्स! भला हमे जाय्ज़ात से कोई मतलब नहीं. में तोह वैसे भी कॉलेज में हु. मुझे पैसो की लें दें के बारे में अबकड नहीं आती. पर आपकी भलाई के लिए hi में ये कह रहा हु. यदि बुरा लगा हो तोह माफ़ कर देना दादा जी!

प्रांजल ने अपनी बात इतनी चतुराई से राखी थी की अच्छे से अच्छा चतुर आदमी भी उसके झांसे में आ जाए. और वही हुआ, मनोरथ फौरन hi कुछ देरर सोचने के बाद बोले.

मनोरथ : बिलकुल भी नहीं बच्चो! तुमने कैसे सोच लिया की मुझे तुम्हारी बातें बुरी लगेंगी. में जानता हु की तुम सभी मेरा भला hi चाहते हो. तभी तोह देखो, दिन रात मेरी सेवा में लगे रहते हो. ः~

प्रांजल (स्माइल्स) : J-Jii दादा जी वही तोह हाहाहा~

मनोरथ : हम्म~ तुम लोगो की बात सही है. मुझे जल्द से जल्द फैसला लेना होगा.

प्रांजल : हाँ दादा जी!

मनोरथ : हम्म~ तोह ठीक है. में इसी महीने सब कुछ सोच के फैसला सुनाऊंगा.

विवेक (स्माइल्स) : ये... ये आपने एकदम सही किया दादा जी! हाहाहा~

और इन्ही बातो को याद कर, आरोही एक गहरे चिंतन में थी. पर उस से भी ज़्यादा, उससे कोई और बात सत्ता रही थी.

या कहे की कोई और चीज़ सत्ता रही थी.

जो की उसके सामने राखी हुई थी.

व्हीलचेयर का वही टूटा हुआ पहिया.

जब प्रांजल कॉलेज जा चूका था. तोह आरोही ने पता नहीं क्या सोच के प्रांजल के रूम की तलाशी ली थी. पर जब उसने तलाशी ली तोह उससे अलमारी में से ये मिला था.

और ये देखते hi वो और भी दुविधा में पद चुकी थी. ये पहिया प्रांजल के पास क्या कर रहा था? क्या उसने तोडा था इसलिए उसने इससे रखा हुआ था? पर यदि पहिया तोडा भी तोह उससे रखा क्यों हुआ था? और वो भी अलमारी में?

सोचते सोचते आरोही बस उस पहिये को hi देखे जा रही थी जब अचानक उससे कुछ उनुसुअल सा दिखाई दिया. पहिये के साइड में उसका कुछ भाग खुला हुआ था और अंदर कुछ गियर्स से दिखाई दे रहे थे.

'व्हाट इस तहत थिंग!?'

***

मुंबई...

क्सक्सक्सक्सक्सक्सक्सक्सक्स होटल...

स्लोगन! जो उस दिन भाग निकला था वो होटल में इस वक़्त सामने दीवार पर लगी एक ब्लैक एंड वाइट फोटो को निहार रहा था.

जब स्टीव ने अचानक आकर उसका ध्यान भांग कर दिया.

स्टीव : आगे क्या करना है दादा?

स्लोगन : प्लान के अकॉर्डिंग चलो.

स्टीव : Okay दादा! पर... क्या उस वक़्त वह से भागना सही था?

स्लोगन : स्लोगन कभी किसी से डर के नहीं भागता स्टीव. उधर से निकलना मेरी मजबूरी थी. किशोर...

स्टीव : ??

स्लोगन : किशोर हल्का आदमी नहीं है. उस वक़्त...

स्टीव : क्या दादा!?

स्लोगन (फ्रोंस) : उस वक़्त केवल आदमी की संख्या नहीं थी जिस कारण में वह से निकला था.

स्टीव : !??

स्लोगन : मेरे आदमी पर वो स्निपर्स की लाज़र लाइट... बाहर से आते वो आदमी... और मैं गेट के बाहर कड़ी वो एक्स्ट्रा सिक्योरिटी. और...

स्टीव : हँ!?

स्लोगन : वो हवा में उड़ता कोप्तेर.... जिसकी लाइट मेने बाहर hi देख ली थी. उधर से निकलना बोहत ज़रूरी था.

स्टीव : इतने आदमी लेके आया था वह!?

स्लोगन : किशोर छोटा मोटा आदमी नहीं है. मुंबई में... He's स्ट्रांगर थान में. इसलिए...

स्टीव : ....

स्लोगन : इसलिए बाहर से आधे लोगो को बुलवा लो. थोड़ा समय लगेगा पर अब रिस्क नहीं लेना है.

स्टीव : आधे लोगो को!? दादा पर...

स्लोगन : हम्म! में जानता हु थोड़ी दिक्कत आएगी. पर ये ज़रूरी है स्टीव. अगली बार उस करा को दबोचूँगा तोह सीधा मौत के घात उतारूंगा. उन् असैसिन्स को भी बुलवा लो.

स्टीव : सारे!?

स्लोगन : नाहीइ! 4 से 5 काफी रहेंगे. और भारी तादाद में आदमी काम आसान कर देंगे.

स्टीव : जीई!

कहते हुए स्टीव निकल गया. और रह गया था तोह केवल स्लोगन जो अभी भी उस तस्वीर को देख रहा था.

स्लोगन : इस बार तोह तुम्हारे लिए भी सब कुछ प्लांड है.... वीएररर!!

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आज के लिए इतना hi गाइस!


धन्यवाद!
 
अपडेट - 58 ~ शेफ ों व्हील्स

अब तक...

स्टीव : सारे!?

स्लोगन : नाहीइ! 4 से 5 काफी रहेंगे. और भारी तादाद में आदमी काम आसान कर देंगे.

स्टीव : जीई!

कहते हुए स्टीव निकल गया. और रह गया था तोह केवल स्लोगन जो अभी भी उस तस्वीर को देख रहा था.

स्लोगन : इस बार तोह तुम्हारे लिए भी सब कुछ प्लांड है.... वीएररर!!


अब आगे...

"हाहाहाःहाहा~ आल सेट!!!"

वीर ने एक लम्बी सास लेते हुए कहा. उसके सामने वही रेड फ़ूड ट्रक एकदम टिप टॉप कंडीशन में खड़ा हुआ था.

कुछ दिन गुज़र चुके थे. और इन् गुज़रे हुए दिनों में उसने अपना ट्रक खरीद लिया था वही जिसके पीछे पारी एकदम पागल हुई जा रही थी. और इस वक़्त भी शायद सबसे ज़्यादा खुश वही थी.

[Ehehehe~ Yes! Look at that red color. It's so beautiful. I love it so muchhhh! Hehe~]

वीर ने भी मुस्कुराते हुए हां में सर्र हिलाया.

'हम्म~ हम्म~ आईटी डेफिनिटेली लुक्स गुड!'

शायद पारी का ये फवौरीते कलर था. वीर भी अपने इस नए साधन को देख कर खुश था. क्युकी यही साधन अब उसकी कमाई का नया जरिया जो bann'ne वाला था.

पर साथ hi साथ अगले hi पल उसके फेस का एक्सप्रेशन सॉफ्ट हो गया. पारी के आने से पहले, वो कहा पर था और किन हालातो में था उससे वो सब जैसे याद आने लगा. वो कड़वी यादें...

पर आज...

आज वो भले hi एक छोटे से बिज़नेस से शुरुआत कर रहा था. पर उसके पास अपना फ़ूड ट्रक था. अपना एक कमाई का जरिया. यही सब सोचते हुए पल भर के लिए उसकी आँखें नम्म हो चली.

अपनी मुट्ठी को खोल उसने एक बार अपनी हथेली की लकीरे देखि.

'यू वोउल्ड बे प्राउड, राइट!? माँ!?' एक पल के लिए उससे अपनी माँ याद आ गयी.

अपनी बिछड़ी हुई माँ के बारे में भुला नहीं था वो. और सुहाना से उससे जानकारी पता लगी थी की अभी भी उसकी माँ ेगीपत में hi थी. ज़ाहिर है की अर्चेओलॉजिकल साइट्स पर समय ज़्यादा लगता hi है. महीने महीने यु गुज़र जाते है एक hi इन्वेस्टीगेशन में. और फिर तोह ये ेगीपत था. तोह ये बताने की भी ज़रुरत नहीं थी की वीर की माँ को वह इतना समय क्यों लग रहा था.

खर्र! जो भी था, फिलहाल के लिए तोह उसकी माँ वापस इंडिया नहीं आने वाली थी. अभी काफी समय था.

तोह माँ से मिलने की तालाब को वापस से अंदर दबाते हुए उसने अपने बगल में देखा जिधर सोनाली कड़ी हुई थी.

वीर को कुछ दिन पहले hi ये मिशन मिला था की उससे सोनाली को अपने बिज़नेस में शामिल करना है. इसका मक़सद उससे समझ नहीं आया था पर वो जानता था की सिस्टम जो भी कुछ करवा रहा था वो उसके भले के लिए hi था प्रॉबब्ली.

और इसलिए वीर ने सोनाली को कन्विंस किया जो की अपने आप में थोड़ा मुश्किल था. अपना प्रस्ताव उसने कुछ दिन पहले रखा था जब वो सभी डाइनिंग टेबल पर बैठ के नाश्ता कर रहे थे.

वीर : एहम... सोनाली!?

सोनाली जो वीर से रत्ती भर भी बात नहीं करती थी ुपत के कभी, उसने ब्रेड को मुँह में भरते हुए वीर को पैनी नज़र से देखा पर कुछ न बोली.

वीर : सोनाली!?

उसके दो बार पुकारने के बाद भी वो मौन थी और अपना नाश्ता करने में लगी हुई थी.

'फ़क! She's पिस्सेद.'

[As always!]

पर इस बार सोनाली को बोलना पड़ा.

*थुड़*

क्युकी उसके सर्र पर अगले hi पल एक तपली आके जो पड़ी.

सोनाली (सुरप्रीसेड) : आठ!? M-Maa!????

सुमन उसके बगल में बैठी उससे घूर के देख रही थी. उसके hi सामने कोई उसके मालिक की आवाज़ अनसुना कर दे, भला वो ये कैसे बर्दाश्त कर सकती थी? ऊपर से ये तोह उसकी hi बेटी थी.

सुमन : माली... एहम... वीर जी तुम्हे बुला रहे है न? जवाब क्यों नहीं दे रही हो उन्हें!?

अपनी माँ की बात सुन्न, सोनाली जैसे और गुस्से में मुँह फुलाते हुए वीर को देखने लगी.

सोनाली : क्या है?

उसने बड़े hi रूखे स्वर में पूछा.

*थुड़*

और तभी एक और तपली उसके सर्र पर आकर पड़ी.

सोनाली : M-Maaaa!???

सुमन : ये क्या तरीका है बात करने का? हम्म? कोई ऐसे बात करता है क्या? यही सिखाया है मेने तुम्हे!?

रागिनी : S-Suman जी! मारिये मत! शायद परेशान है सोनाली किसी बात को लेकर.

सुमन : रागिनी जी! इसके नखरे में जानती हु. कुछ परेशां नहीं है. बस, भाव खाना है. चलो! माफ़ी मांगो उनसे.

सोनाली (गुस्से में) : सॉरी!

वीर : ाहः~ It's... It's okay!

सोनाली : बोलो! क्या बात है!?

वीर : वेल! एक ऑफर है तुम्हारे लिए.

सुमन : हम्म? ऑफर का मतलब प्रस्ताव न वीर जी?

वीर : हम्म? हाँ! हाँ!

सुमन (स्माइल्स) : कल hi मुझे रागिनी जी ने इसका मतलब समझाया था फुफु~

सोनाली (कन्फ्यूज्ड) : केसा प्रस्ताव?

वीर : जैसा की मेने कल बताया था. में फ़ूड ट्रक का बिज़नेस शुरू कर रहा हु. उसमे तुम्हारी मदद चाहिए मुझे. तोह बोलो, क्या तुम मदद करोगी? मेरे साथ मेरे बिज़नेस में!?

सोनाली एक पल अपनी माँ की तरफ देखि जो भारी मुस्कान लिए उससे देख रही थी.

सोनाली : M-Mein!?

वीर : हाँ! बोलो? तुम्हे खाना बनाना तोह आता hi है. सुमन जी ने तुम्हे पहले से hi ट्रैन कर दिया होगा.

सुमन : बिलकुल!

वीर : तोह!?

सोनाली : पर... मुझे तोह पढ़ना था...

वीर (स्माइल्स) : वो भी हो जाएगा. जब मेरे पास एनफ एअर्निंग होगी. तोह तुम्हारी पढ़ाई का खर्चा भी में उठाऊंगा.

सोनाली (शॉकेड) : H-Huhhh!?? S-Sach!???

वीर (स्माइल्स) : ऑफ़ कोर्स! एकदम सच!

पढ़ाई करना hi तोह सोनाली का सपना था. और वीर के इस प्रस्ताव ने जैसे उसके लिए एक ओप्पोर्तुनिटी का नया दरवाज़ा खोल दिया था.

सोनाली (स्माइल्स) : ठीक है!

शायद इस वक़्त वो ये भी भूल गयी थी की वीर और उसकी माँ बंद कमरे में क्या क्या करते है.

और कुछ इसी तरह से वीर उससे मनाने में कामयाब था.

रिवॉर्ड के रूप में उससे 200 पॉइंट्स भी प्राप्त हुए थे.

वीर : तोह!? चले!?

सोनाली : K-Kaha?

वीर (स्माइल्स) : अपनी पहली कमाई के लिए! हमे एक अच्छा सा स्पॉट ढूंढ़ना होगा. Let's जो~

कहते हुए वीर अपने रेड ट्रक की तरफ चल पड़ा.

सोनाली : R-Ruko...

तोह पीछे पीछे सोनाली भी भागती हुई आयी और उसके बगल वाली सीट पर बैठ गयी.

उस नए ट्रक में...

जिसमे ऊपर बड़े बड़े शब्दों में लिखा था~

"शेफ ों व्हील्स"

बोले तोह, वीर के नए फ़ूड ट्रक का नाम. ये नाम उसने hi चूसे किया था. उसके पास अब्सोलुटे शेफ स्किल थी. और अब ये फ़ूड ट्रक भी. तोह बस, उन् दोनों को किसी तरह कंबाइन कर उसने ये नाम डीडे किया था. "शेफ ों व्हील्स"

जो की वाक़ई अपने आप में hi काफी यूनिक और काटच्य था.

सोनाली : T-Tumhe चलाते तोह आता है न ये?

कितनी अजीब बात थी. सोनाली की माँ, सुमन वीर को मालिक कहके बुलाती थी तोह वही आभा भी उससे वीर जी कहकर पुकारती थी. पर इधर सोनाली जो वीर से खुद उम्र में छोटी थी वो उससे 'तुम' कहके बुलाती थी.

वीर : ऑफ़ कोर्स~

यदि यही सवाल सोनाली ने कुछ दिन पहले पूछा होता तोह वीर का जवाब न होता. पर उसने 100 पॉइंट्स इन्वेस्ट कर, बेसिक ड्राइविंग स्किल हासिल कर ली थी. ये 100 पॉइंट्स वही थे जो उसने सुमन और आभा के संग रंगरेलिया मनाने पर मिले थे. और अब उसके पास 200 पॉइंट्स बचे हुए थे.

एक अच्छी सी लोकेशन ढूंढ वीर ने अपना ट्रक पार्क किया. अभी शाम का समय था. पर वीर अपने इस नए ट्रक की शुरुआत अपनों के संग hi करना चाहता था.

और इसलिए, कुछ देरर बाद रागिनी समेत सभी उसके साथ मौजूद थे. निधि को भी उसने बताया था जिससे सुन्न वो कुछ ख़ास खुश नहीं थी उसके इस फैसले पर.

उसके अनुसार वीर को फ़ूड ट्रक में नहीं, कॉलेज में अपनी क्लास के अंदर होना चाहिए था. उसकी नज़र में वीर जैसे अपने करियर से खिलवाड़ कर रहा था.

पर वो साथ में hi उसकी खुशियों पर अपनी चिंताओं का दबाव नहीं डालना चाहती थी. और इसलिए उसने यही कहा की वो शाम में hi उस से मिलने आएगी.

यही हाल श्रेया का भी था. जॉब के चलते उससे आज जल्द फुर्सत नहीं मिल पायी थी. रही बात आरोही और काव्य की, तोह वो दोनों भी साथ में मौजूद थी.

और सोनिआ, सुहाना, करा तोह जैसे इस वक़्त काफी बिजी थी. न जाने वो कब आने वाली थी. पर वीर की एक hi ख्वाइश थी. की तीनो साथ में न टपक जाए. वर्ण तोह बवाल हो जाना था.

इधर रागिनी वीर के संग कड़ी हुई थी उसके ट्रक के सामने.

रागिनी : क्याआ!? रियली!?? I-I मैं...!? तुम चाहते हो की में...!?

वीर (स्माइल्स) : यस! में चाहता हु की आप hi इस की शुरुआत करे.

वीर ने ट्रक के पीछे वाले गेट को खोल एक रिबन बाँधा हुआ था. वैसे तोह उद्धगाथान अक्सर जगह की किया जाता था पर वीर रागिनी के शुभ हाथो से शुरुआत करना चाहता था.

बेचारी रागिनी के लिए ये बेहद hi ख़ुशी का मौका था. इसलिए नहीं की वो वीर के ट्रक का उद्धगाथान कर रही थी. बल्कि इसलिए क्युकी वीर चाहता था की उद्धगाथान उसके हाथो से हो. वीर की नज़रो में वो इतनी इम्पोर्टेन्ट फिगर बन्न चुकी थी. ये सोचते hi उसकी आँखों में हलके हलके ासु आ चले.

रागिनी : I'll दो आईटी. थैंक यू!

वीर : थैंक्स तो यू भाभी! प्लीज...

काव्य : तोह भैया अब आप कॉलेज नहीं जाओगे!?

वीर : वेल... नॉट फॉर नाउ ी थिंक.

और फिर रागिनी ने रिबन काटा और तालियों और खुशियों से आज के धंदे की शुरुआत हो चुकी थी.

काव्य : I'm जस्ट लोविंग थिस नाम. शेफ ों व्हील्स. हहै~ सो!? आपके चीफ्स कहा है भैया!?

उसने अपनी क्यूरियस नज़रो से पूछा तोह बाकी सभी भी वीर को देखने लगे. जैसे उसके आंसर का वेट कर रहे हो.

वीर : हँ!? व्हाट दो यू मैं की चीफ्स कहा है!? ी ऍम थे शेफ.

*साइलेंस*

पल भर के लिए वो सभी वीर को ऐसे देख रहे थे जैसे मानो उसने कोई चुटकुला मार दिया हो.

यहाँ तक की उसके बगल में कड़ी सोनाली भी उससे अजीब निगाहो से घर रही थी.

रागिनी (उठाते हुए) : क्याआ!? वीरररर!?

काव्य : भैयाआआआ!??

आभा : V-Veer जी!? और खाना!?

सुमन : !??

वीर : क्या!? अरे ऐसे क्यों देख रहे हो आप सब!? रुको! अभी सभी के मुँह बंद करता हु.

'ऑलराइट! Let's दो थिस. अब्सोलुटे शेफ... मेरी लाज रखना. और नाक मत कटवा देना.'

[It's a Gold Tier skill. Bhulo nahi...]

'हम्म~ देखते है क्या कर सकती है ये स्किल.'

और वीर ने फिर अपने ट्रक के किचन में फटाफट कुछ स्नैक्स बनाने शुरू कर दिए.

'हौली शीट्ट्ट्ट!!!'

उसके हाथ अपने आप चलते जा रहे थे. उसके दिमाग में अपने आप सब बातें आती जा रही थी की किस चीज़ के बाद क्या करना है और कैसे करना है.

'फुसक्कक!!! थिस इस इंसाने!!!'

वो पैन में मौजूद नूडल्स को ऐसे फ्लिप कर रहा था जैसे मानो एक्सपर्ट हो.

सोनाली बगल में कड़ी आँखें फाड़े देखती जा रही थी उससे और उसके हाथो की तकनीक को.

और नीचे कड़ी बाकी महिलाये जैसे बोलने लायक भी नहीं बची थी. वो सभी हक्की बक्की सी वीर के तेज़्ज़ हाथो को चलते देख रही थी बस.

और फिर... खाने की वो गज़ब की सुगंध जब उनकी नाक में पड़ी तोह जैसे उन्हें क्या बोलना था वो भी भूल गयी.

वीर ने फटाफट एक नूडल्स की डिश सबसे पहले बना के अपने सबसे पहले कस्टमर्स यानी की उसके अपने परिवार को दी.

और जैसे hi उन् सभी ने नूडल्स चखे तोह जैसे मानो उन्हें एक और झटका लगा.

तू डिलीशियस!!!

रागिनी (शॉकेड) : V-Veer!?? ये सब तुमने कहा से सीखा? कब? मेने तुम्हे न hi पहले घर में कभी किचन में देखा था और न hi हमारे अपने घर में... तोह ये सब कैसे!??

काव्य (शॉकेड) : भाभी ने एकदम सही कहा भैया! आपने ये सब कहा!?? ये तोह होटल के लेवल का स्वाद है भैया... हाउ दीद यू!?

सुमन : वीर जी! मेने इस से पहले इतना स्वादिष्ट नूडल कभी नहीं खाया. माफ़ करना रागिनी जी, पर ये नूडल आपके वाले से अच्छा है.

रागिनी : नहीं नहीं सुमन जी! बल्कि में खुद आपकी बात से सहमत हु. वीररर!? व्हाट इस थिस? Y-Ye सब कहा से सीखा तुमने. तुम्हे देख के hi में बता सकती हु की तुम काफी समय से कुकिंग करते आ रहे हो. क्युकी ऐसी स्किल्स, वो भी इतनी स्पीड में... मुझे जवाब दो वीर.

[Lag gaye...]

'फुसक्ककककक! अब इन् सभी को कैसे बताऊ की ये अब्सोलुटे शेफ का कमाल है. ी कन्नोत तेल्ल थम तहत. कैन ी? No वे!!! कुछ तोह कहना होगा.'

[Tell them it's a magic. Hahahaha~]

'शट उप!!!'

[Hmph~]

वीर : वो असल में...

काव्य : हम्म!?

वीर : में इतने दिन निधि जी के घर था न तोह वह सीखा था... ाहः~

उसने नकली हस्सी हस्ते हुए बात को घुमाने की कोशिश की पर..

"क्या सीखा था?"

पर तभी वीर के कानो में एक जानी पहचानी सी आवाज़ आयी.

'ओह्ह्ह्हह फूऊउउउक्क्कककककककक!!!!!!!!'

[Hahahahaha~]

बगल में hi अपनी गाडी पार्क कर निधि जूही की ऊँगली पकड़ उसके hi ट्रक की ऑर्डर आ रही थी.

निधि : K-Kya सीखा था मेरे घर!?

रागिनी : हँ!?? वीर ने कहा की ये इतने स्वादिष्ट नूडल्स उसने आपके घर पर सीखे. क्या आपने उससे ट्रैन किया था?

निधि : हँ!? K-Kyaaa?

निधि तोह बेचारी अभी hi आयी थी. वो अचानक के इस सवाल से जैसे एकदम hi कन्फ्यूज्ड हो गयी. पर अगले hi पल उसने देखा की वीर उससे इशारे में आँख मार रहा है.

और ये देखते hi वो थोड़ी सी झेप गयी.

'हाह!?? V-Veer!??'

वो तोह जैसे ये समझने लगी थी की वीर उससे उस वे में आँख मार रहा था. पर जैसे बाद में उससे समझ आया की वीर उससे बात को घुमाने के लिए कह रहा था. और ये समझ आते hi उससे अपने आप पर शर्म आने लगी. न जाने वो क्या सोचने लगी थी.

जूही : माआम्मूउउउ~

वीर : हाहाहा~ आ गयी मेरी जूही! बोलो!? नूडल्स खाओगी? मामू के हाथ के?

जूही (नॉड्स) : हम्म~ हम्म~

वीर : तोह ये लो...

जूही : केचप...

वीर : हां बाबा केचप भी है...

रागिनी ने एक बार फिर निधि को देखा और उसके पास जाते हुए उसने एक स्पून से अपने hi हाथो से निधि को नूडल्स टास्ते करवाए. और नूडल्स टास्ते करते hi निधि का हाल भी वही था जो बाकी सभी का कुछ देरर पहले था.

'Y-Ye वीर ने बनाया!? P-Par वो तोह कभी किचन में नहीं जाता था!? तोह ये!? क्या वो मुझसे बात छुपाने को कह रहा है?'

रागिनी : वीर ने बताया की उसने ये आपके यहाँ सीखा था. क्या ये सच है!?

निधि : वो...

'प्लीज! Ma'am!! Don't तेल्ल हेर... प्लीज...'

निधि (नॉड्स) : J-Jii! वो मेरे घर पर किचन में अक्सर जा के डिशेस बनाया करता था.

'हास्सश्ष्ठ!!! Ma'am ने बचा लिया... ोथेरविसे...'

"हम्म? कौन जाय करता था किचन में!?"

पर जैसे वीर को और झटके लगने बाकी थे.

क्युकी निधि के इतना कहते hi एक और जानी पहचानी सी आवाज़ उसके कानो में पड़ी. और जैसे hi उसने आते हुए शख्स को देखा तोह उसके मैं में बस एक hi आवाज़ गुंजी...

'फूऊक्कककककक मीटी.....!!!!!!!!!!'

श्रेया, अपने बाल सवारते हुए सामने आ रही थी.

श्रेया : Omg थिस लुक्स सो गुड! कोंग्रटुलतिओन्स वीर! और क्या बात हो रही है? कौन हमारे किचन में आया करता था दी!?

निधि : W-Wo...

वीर : अरे वेलकम वेलकम!!! आओ न आप सभी. चेयर्स लगी हुई है. प्लीज! बैठो न!

जैसे तैसे वीर ने बात को घुमा के उससे वही दबाया और एक राहत की सास ली.

'गोष्ठ! ऑलमोस्ट गांड मरते मरते बच गयी. ये मेरी टाइमिंग इतनी गांडू क्यों है? ये क्वेस्ट में अच्छी किस्मत के लिए कोई लीजेंडरी कार्ड्स नहीं है क्या? यदि है तोह बताओ I'll डेफिनिटेली बुय ओने.'

उसके बाद निधि ने भी वीर को कोंग्रटुलते किया. रात के 9:30 हो चुके थे और वीर का बिज़नेस जोरर शोर से चल रहा था. वीर ने फिलहाल के किये सिंपल डिशेस hi राखी हुई थी पर जल्द hi वो अपनी सिग्नेचर डिशेस भी लाने वाला था.

और 9:30 पे वीर ने किचन में सभी सामान को रख सब कुछ बंद कर दिया और बाहर hi आकर चेयर पर बैठ गया जहा सभी बैठे हुए थे.

निधि उसके hi बगल से बैठी हुई थी. सभी बातो में लगे हुए थे पर वीर और निधि hi बस शांत बैठे हुए थे.

काव्य को तोह जैसे अपनी बड़ी क्यूट सी चीज़ मिल गयी थी. जूही!!

वो उसके साथ खेलने में लगी हुई थी. कही उससे उठा के उसके गालो पर पप्पी देती तोह कही उससे बैलून खरीद के लाती और उसके साथ खेलती. श्रेया भी साथ में hi थी उनके.

वही रागिनी सुमन और आरोही अपनी बातो में लगी हुई थी. और आभा और सलोनी अपनी.

बस बचे थे तोह वीर और निधि.

सब कुछ शांत था उन् दोनों के लिए जब अचानक से hi निधि के होंठो से कुछ शब्द निकले.

"क्यों!?"

वीर (ग्लान्सेस) : !??

निधि : वीर! में ये नहीं कह रही की... की फ़ूड ट्रक का बिज़नेस करना कोई बेकार काम है. में तुम्हे यु खुश देख के, तुम्हारी तरक्की देख के बोहत खुश हु... पर...

वीर : ...

निधि : पर... पर क्यों? जब तुम्हारे पास बेटर ओप्तिओंस थे थें व्हाई थिस? तुम्हारी फी आलरेडी पेड है कॉलेज की. तुम्हे इस वक़्त क्लास में उन् सभी बच्चो के बीच होना चाहिए. नॉट हेरे! It's नॉट थे राइट टाइम. अभी तोह तुम्हारी उम्र hi क्या है. Y-You... यू शुड...

वीर : I'll सी!

निधि : हँ!?

वीर : यदि मुझे समय मिला. तोह में जाऊंगा... कॉलेज...

निधि : ....

वीर : फॉर यू...

निधि (ब्लशेस) : ???

वीर : एहम! एंड फॉर में अस वेल.

निधि (नॉड्स) : हम्म~

वो निधि से कुछ और बातें भी कहना चाहता था. जैसे की, आज वो उस लाल साड़ी में बेहद hi ख़ूबसूरत लग रही थी. वीर का फ़ूड ट्रक भी लाल था और आज निधि ने भी लाल पहना हुआ था. व्हाट ा कोइंसिडेन्स.

पर वो ये बात कह न पाया क्युकी तभी जूही उसके पास आयी और उसने बुलबुले के वो खिलोने से फूक मार के धेरर सारे बबल्स उसके मुँह पे उड़ा दिए.

"हाहाहाहाहा~"

"हहहहह~"

पीछे कड़ी काव्य ये देख हस्सी तोह जूही भी खिल खिलाई और दौड़ती हुई काव्य के पास जा कर बैठ गयी. शायद हे शरारत करने के लिए श्रेया ने उन् दोनों को कहा था. क्युकी वो पीछे बैठे अपने मुँह पर हाथ रख अपनी स्माइल छुपाने की कोशिश कर रही थी.

वीर ये देख मुस्कुराया.

'ये नटखट भी...'

[Juhi is too cute~]

'ऑफ़ कोर्स!!!'

वो सभी उठने के लिए हुए जब एक और ट्रक सामने से गुज़रा. उसमे बड़े बड़े बैनर्स लगे हुए थे और अनाउंसमेंट करते हुए वो गुज़र रहा था.

"शहर में पहली बार. मशहूर मिरर गैलरी में आपका स्वागत है. इस हफ्ते... इस हफ्ते... रविवार की शाम 7 बजे से उद्धगाथान. पहले 50 कस्टमर्स की फ्री एंट्री. आइयेगा ज़रूर. पता क्सक्सक्सक्सक्स ग्राउंड."

'मिरर गैलरी!?'

वीर ने बैनर में तस्वीरें देखि तोह उससे पता चला ये वही था.

जहा मिर्रोर्स hi मिर्रोर्स लगे होते है और आप अंदर जा कर एक्स्प्लोर करते हो. कभी कभी ये स्केरी भी रहता है.

काव्य : वाओ!!! लगता है कुछ नई खुल रहा है. ी रियली वांट तो जो! बूत मेरे एक्साम्स आ रहे है. दमन आईटी!

श्रेया : शामे यार! ी मैं में भी बिजी हु. ी होप कोई मिल जाए मुझे साथ में ले चलने को...

श्रेया ने वीर की तरफ एक बार निगाहें करते हुए धीरे से कहा. पर वीर बेचारा तोह जैसे अपने hi खयालो में घूम था.

'शी didn't के... मिस करा!!! शुड ी!? यह! राइट! ी विल टेक हेर तो थिस मिरर गैलरी. होप! वह वो आ जाएंगी!?'

अपने मैं में डीडे कर वो उठा. और सभी को उसने विदा किया. सिवाए आरोही और काव्य के. सोनाली भी उसके साथ hi थी.

काव्य : क्या हुआ भैया!? हम सभी को क्यों रोका है आपने?

वीर : कुछ बात करनी थी अकेले में.

काव्य : हम्म!? कहिये न भैया!

वीर : तुमसे नहीं काव्य. आरोही दी से...

और ये सुनते hi आरोही का बदन एकदम से हिल उठा. वो अपनी हथेलियों को जोरर से मुट्ठी में कैसे बैठी हुई थी. और वीर उससे बस अपने जेब में हाथ डाले घर के देख रहा था.

वीर : दी!? ज़रा आइये मेरे साथ.

कहते हुए वो ट्रक के पीछे साइड चला गया. और आरोही हिम्मत कर उसके पीछे पीछे गयी. इधर काव्य और सोनाली बस कन्फ्यूज्ड थी. न जाने वीर को क्या बात करनी थी!?

आरोही जैसे hi पीछे आयी तोह उसके कदम थम गए.

रात काफी अब हो रही थी. ऑलमोस्ट 10 बज रहे थे. भले hi अभी भी चहल पहल थी सड़को पर लेकिन बढ़ती ठण्ड के चलते अब सड़को पर भीड़ काम हो रही थी. और ट्रक के पीछे तोह जैसे सब कुछ शांत सा था. एकदम अँधेरा सा था.

वीर आरोही के ठीक पीछे खड़ा हुआ था और उससे पैनी नज़रो से देख रहा था. अभी भी उसके हाथ जेब में hi थे. वो जैसे आरोही के कुछ कहने का इंतज़ार कर रहा था.

आरोही : K-Kya हुआ वीर!?

अभी भी आरोही वीर की तरफ पीठ करके hi कड़ी हुई थी. उसकी नज़रे नीचे hi थी.

वीर : क्यों आयी थी आज आप यहाँ!?

आरोही (palat'te हुए) : क्यों आयी थी मतलब!? ी... ी चामे फॉर यू. तो कोंग्रटुलते यू.

वीर : तोह आपके चेहरे पर मुस्कान क्यों नहीं है. ये फीकी सी स्माइल क्यों है?

एक झटका सा लगा आरोही को वीर के मुँह से ये बात सुन्न. वीर ने सब कुछ भांप लिया था.

वीर : आप जब से आयी हो तब से देख रहा हु. शुरू से अंत तक... यू didn't से एनीथिंग. आप बस फीकी सी स्माइल लिए सबसे हाँ या न में hi बात कर रही थी. आईटी फेल्ट लिखे यू वेरे तेरे बूत ात थे शामे टाइम यू वेरे नॉट. समथिंग इस बोथेरिंग यू... राइट!? बताइये!

आरोही : N-No... No... यू shouldn't क्नोव थिस.

वो ना में सर्र हिलाते हुए कुछ खुस पुसाई तोह वीर ने आगे बढ़ उसका कन्धा थाम लिया.

और उसके ऐसा करते hi अगले hi पल आरोही ने उसका हाथ अपने कंधे पर से जोरर से झटकार दिया.

"न्यूऊऊऊ..."

वो पलटी और वह से जाने के लिए हुई पर जैसे hi वो वह से निकल पाती, वीर ने उसकी कलाई जोरर से थाम ली थी.

आरोही : लेट में गोऊ~

आरोही थोड़ा तेज़्ज़ आवाज़ में बोली पर वीर को जैसे पता था की उससे क्या करना है.

वीर : आरोहीईई!!!!!!!

वीर ने भी उससे जोरर से चिल्लाया. और इस बार दी कहके नहीं, सीधा नाम से. वीर के मुँह से अपना नाम डायरेक्ट सुन्न जैसे आरोही का पूरा शरीर काँप उठा. मानो उसका वजूद hi हिल गया था.

ऐसा एक बार पहले भी हुआ था शायद. उस रात, जब वीर ने उससे बचाया था गुंडों से. तब भी...

तब भी वीर ने उसका नाम डायरेक्ट पुकारा था. पता नहीं क्यों, पर जैसे वीर को अपनी बात सही समय पर उस से मनाना आता था. और हर्र बार जब ये होता तोह आरोही अपने आप को एक बड़ी बहिन नहीं बल्कि एक छोटी बहिन महसूस करने लगती वीर की.

वो आगे बढ़ा और उसने पीछे से hi आरोही को अपनी बाहो में जकड लिया. अपने पेट पर वीर का हाथ महसूस कर एक बार फिर आरोही सेहम गयी.

"तेल्ल में!!!!" उसकी आवाज़ आरोही के कान में हौले से पड़ी. पर वही हौले से कही गयी आवाज़ जैसे मानो इतनी तेज़्ज़ थी आरोही के लिए. मानो जैसे वीर पूछ नहीं रहा था. आर्डर दे रहा था.

और अगले hi पल, आरोही की आँखों से ासु छलक उठे.

वो सिसकते हुए रोने लगी. अब उसके पास और कोई उपाय नहीं था.

आरोही (क्रिस) : तेल्ल में... यू won't हेट में!

वीर : ी won't. नाउ तेल्ल में.

आरोही पलटी और उसने वीर को देखा और अपने सीने पर हाथ रख उसने कहना शुरू किया.

आरोही : वो... दादा जी का एक्सीडेंट...

वीर : हम्म...

आरोही (क्रिस) : दादा जी के एक्सीडेंट के पीछे... *स्निफ्फ* मेरे hi... *स्निफ्फ* मेरे hi अपने भाई प्रांजल का हाथ है.

*साइलेंस*

मानो जैसे सही में पूरा सन्नाटा छ गया था वह पर. समय जैसे थम सा गया था. और वीर की आँखें हर्र गुज़रते पल फैलती चली गयी.

[That bastard...]

"व्हाट दीद यू से?" वीर ने एक बार कन्फर्म करने के लिए पूछा. कही उसके कान तोह नहीं बज रहे थे?

आरोही (नॉड्स) : यही सच्चाई है!

उसके बाद आरोही ने सब कुछ बता दिया. कैसे उससे प्रांजल पर शक हुआ था, कैसे उसने उसके कमरे की छान बीन करि. कैसे उससे वो व्हील मिला. उसके अंदर लगे हुए वो गियर्स... वो सेंसर्स... जिन्हे रिमोट कंट्रोलिंग के लिए लगाया जाता है. आरोही ने सब कुछ बता डाला.

आरोही (क्रिस) : मेने कभी नहीं सोचा था मेरा hi सागा भाई इतनी घिनौनी हरकत करेगा. *स्निफ्फ* मुझे सब कुछ पता चल गया है. हे दीद आईटी फॉर थे प्रॉपर्टी. *स्निफ्फ* दादा जी को यु गिरा कर... वो उन्हें ये एहसास दिलाना चाहता था की समय रहते उन्हें जाय्ज़ात का बटवारा कर लेना चाहिए. *स्निफ्फ* H-He... He's ा बास्टर्ड!!! *स्निफ्फ*

वीर कुछ नहीं बोलै. उसका सर्र नीचे झुका हुआ था और अँधेरे में आरोही को ये भी नहीं दिख रहा था की उसके फेस पर क्या एक्सप्रेशंस थे.

उसकी मुट्ठी इतनी जोरर से बंधी हुई थी की फाॅर्स के मारे वो विबरते हो रही थी.

"उस हराम खोर को में चोरडूंगा नहीं!!!"

वो इतना बोल वह से तेज़्ज़ कदमो के साथ पलटा और आगे जाने hi वाला था जब...

"न्यूऊऊओ~"

आरोही ने पीछे से जोरर से उससे जकड लिया.

आरोही (क्रिस) : प्लीज!!!!!! Don't.... Don't... वीएररर!!!! इसलिए... *स्निफ्फ* इसलिए... में तुम्हे नहीं बता रही थी. ी माइसेल्फ don't क्नोव की क्या करू में... *स्निफ्फ* घर पर सिवाए मेरे काव्य और दादा जी के. एवरीवन इस अगेंस्ट यू. Don't जो! प्लीज!!!! ी बेग यू!!! में तुम्हे और परेशानी में नहीं देखना चाहती. प्लीसीईए!!! तुम जल्दबाज़ी में कुछ भी नहीं कर सकते *स्निफ्फ* ोथेरविसे... प्रांजल डेफिनिटेली कुछ करेगा तुम्हारे साथ *स्निफ्फ*

आरोही की बात सच थी. और इसलिए वीर को भले hi इस वक़्त बोहत तेज़्ज़ गुस्सा आ रहा था पर वो जल्दबाज़ी में ऐसे कोई भी डिशन्स नहीं ले सकता था. हे नीडेड ा प्लान.

खुद को शांत कर उसने आरोही को अपने आगे लाया और उससे देखते हुए पूछा,

"आपने ऐसा क्यों कहा था की प्रॉमिस में यू won't हेट में?"

आरोही : M-Mujhe लगा की... में भी प्रांजल की सगी बहिन हु. S-So, you'll हेट में...

वीर : अरे यू स्टुपिड?

आरोही : हँ!??

वीर : व्हाई वोउल्ड ी हेट यू!? में आपको हेट नहीं करता okay? एंड ये बात दिमाग में बैठा लो. ी won't हेट यू फॉर थिस स्टुपिड रीज़न. ी लव यू! ऐसे कोई किसी से हेट करता है क्या?

ये बोल जैसे आरोही के लिए अमृत सामान थे. उसके ासु और जोरर से बहना शुरू हो गए और वो बस वीर की छाती में जाके समां गयी. उस से जोरर से लिपट गयी.

आरोही (क्रिस) : थैंक यू... थैंक यू.... *स्निफ्फ* ी लव यू तू~ थैंक यू!!!!

'तहत बास्टर्ड... हे विल पाय फॉर थिस.'

[He will...]

***

मुंबई...

आतिश' हिडौट...

चेयर पर इस वक़्त आतिश के दूसरे अड्डे पर स्लोगन विराजमान था. वो कुछ सोच रहा था जब स्टीव ने आके उससे खबर दी,

स्टीव : फ्लायर्स बैठत चुके है. अनाउंसमेंट भी करवा दिया है.

स्लोगन : हम्म! काम हुआ!?

स्टीव : जिससे sunn'na था. उस तक खबर पहुँच गयी है.

स्लोगन ने हां में सर्र हिलाते हुए सामने टेबल पर से एक फ्लायर उठाया जिस पर अद्वेर्तिसमेंट था.

और वो अद्वेर्तिसेमेन्ट था~

मिरर गैलरी का...

स्लोगन : गुड!

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आज के लिए इतना hi गाइस!

अपना अपना काम जो लोग करके जाने का. 😁


धन्यवाद!
 
अपडेट - 59 ~ म्यूच्यूअल एक्सचेंज

अब तक...

स्टीव : जिससे sunn'na था. उस तक खबर पहुँच गयी है.

स्लोगन ने हां में सर्र हिलाते हुए सामने टेबल पर से एक फ्लायर उठाया जिस पर अद्वेर्तिसमेंट था.

और वो अद्वेर्तिसेमेन्ट था~

मिरर गैलरी का...

स्लोगन : गुड!


अब आगे...

आज बुधवार का दिन था. रोज़ की hi तरह वीर सुबह उठा और फ्रेश होने के बाद वो नीचे आया. कल रात को उसने सुमन या आभा के संग मिल के बीएड नहीं हिलाया था.

कल वैसे hi वो काफी थका हुआ था. और मेंटली ेक्सहॉस्टेड भी था. रात में सुमन आयी ज़रूर थी उसके कमरे में पर जब उसने देखा की उसके मालिक गहरी नींद में सो रहे है, तोह ये देख वो मुस्कुरा के प्यार से अपने मालिक के सर्र पर हाथ फेरर के वापस अपने कमरे में चली गयी.

कल धंधा तोह वीर का एकदम जोरर शोर से चालु हुआ था. वो बात अलग थी की उसने ज़्यादा देरर तक ट्रक ओपन नहीं रखा. पर आज से उसका सचेडूले बदलने वाला था.

अभी वो नीचे hi मौजूद था और अखबार खोले हुए था अपने चेहरे के सामने. पर वो उससे पढ़ नहीं रहा था. क्युकी उसकी बहस तोह अपने hi मैं में हो रही थी...

पारी से...

[W-What do you mean ki tum sab jaan gaye ho?]

'जैसा की कहा मेने. ी क्नोव व्हाट सिस्टम इस ट्राइंग तो दो.'

[Oh really? Toh zara please mujhe bhi batana toh? Kyuki mein bhi toh sunu kya socha hai mere so called host ne?]

'अब तक जितने भी मिशंस मुझे मिलते गए है. एक बात तोह साफ़ हो गयी है उस से.'

[Kya? Kesi baat?]

'यही की सिस्टम मेरे वेल बीइंग के बारे में सोच कर चल रहा है. वो हर्र उस ओप्पोर्तुनिटी को पकड़ता है जो मेरे लिए फ्यूचर में उसेफुल हो.'

[Of course! Yahi toh system ka kaam hai.]

'हम्म~ मेरा सोनिआ और सुहाना से मिलना, मिस करा से मेरा जुड़ाव, और सबसे लेटेस्ट वाला. सोनाली को बिज़नेस में शामिल करना.'

[Hmm! Toh!?]

'ी क्नोव नाउ! सोनाली को क्यों बिज़नेस में शामिल करवाना चाहता है सिस्टम.'

[K-Kyu bhala?]

'बिकॉज़, सोनाली फ्यूचर में इम्पोर्टेन्ट एसेट बनेगी मय्बे!? ओने, हु विल हैंडल माय फ़ूड बिज़नेस.'

[Hmm~ It might be possible.]

'और में तब तक किसी और बिज़नेस में शिफ्ट हो चूका होऊंगा. बूत... मेरे यहाँ से हटने पर किसी न किसी को तोह जगह लेनी पड़ेगी न मेरी? ी थिंक यही सिस्टम करवा रहा है. सच में! सिस्टम है तोह बड़े काम की चीज़.'

[Haan toh? Halke me le rahe ho kya mujhe?]

'हम्म? येह! तुम्हे हलके में बूत सिस्टम को नहीं.'

[Excuse meee!?? What did you say? M-Mujhe halke me haan? I am the system, okay?]

'उघ! शट उप! कहा गयी मेरी वो पुरानी पारी?'

[Hmph~ :argh:]

'तो तेल्ल यू थे ट्रुथ, ी हैवे आलरेडी डोडेड यू. तुम्हारी सच्चाई... ी क्नोव.'

*साइलेंस*

इस बार वीर के इतना कहते hi पल भर के लिए जैसे शान्ति सी छ गयी उसके दिमाग में. पारी की तरफ से कोई जवाब नहीं आया. फिर कुछ देरर बाद उसकी आवाज़ आयी,

[K-Kya matlab hai tumhara? K-Kesa secret? Don't talk rubbish!]

ये जान के की पारी उसकी बातो से थोड़ा झेप गयी है वीर संतुष्ट होते हुए मुस्कुराया. पर बोलै कुछ नहीं. और उसका ये जेस्चर जैसे पारी को और भी इर्रिटेट कर गया.

[Boloooo!!! Sayyy! What do you mean by mera secret? Haan!?]

'हाहाहाहा~ वेल! रात को बताऊंगा.'

[Y-You... Ughhh!!!!]

खीजते हुए पारी बस खामोश हो के रह गयी. क्या बोलती? वीर और उसकी वैसे hi पटरी नहीं खा रही थी.

वीर ने तोह बस मुस्कुराते हुए पारी की बात को ताल दिया. पर बेचारी पारी की स्थिति इस वक़्त सही नहीं लग रही थी. यहाँ वो हमेशा वीर को टेंशन दिया करती थी पर आज शायद पहली बार वीर ने उससे hi टेंशन दे दिया था. वो भी एक बड़ा टेंशन.

अब वीर भले कुछ सोचे या न सोचे लेकिन पारी अब रात तक इसी बारे में सोचने वाली थी जब तक की उससे वीर के मुँह से जवाब पता नहीं चल जाता.

वीर चाहता तोह अभी hi बता देता. पर...

फिलहाल उससे अभी कुछ और काम करना था. और वो काम था...

रागिनी से तुरंत मिलना.

अभी अभी नाश्ता करने के बाद, किसी और ने गौर किया हो या न किया हो पर रागिनी का कोई भी जेस्चर वीर की नज़रो से नहीं चूका था.

आज रागिनी के होंठो पर फीकी मुस्कान थी. या यु कहे की एक झूठी मुस्कान. जो कल नहीं थी. कल तोह वो कितना खुश थी ये जान के की वीर ने उससे रिबन काटने के लिए चुना था. पर...

अचानक, रात भर में ऐसा क्या हुआ जो कल की वो सच्ची मुस्कान एक झूठी मुस्कान में तब्दील हो गयी? ऐसा क्या बदलाव आ गया एकदम से?

यही jaan'ne के लिए वीर सुमन सहित बाकी सभी को वही डाइनिंग टेबल पर चोरर के आगे बढ़ा और सीधा रागिनी के कमरे की ऑर्डर जाने लगा.

दरवाज़े तक पॅहुचते hi उसने देखा की दरवाज़ा अंदर से लॉक्ड था. वो अभी नॉक करने hi वाला था जब उससे अचानक hi अंदर से रागिनी के बाहर आने की आहात आयी.

और वीर को न जाने क्या सुझा की वो बगल में दीवार के पीछे जाके छुप गया.

*क्लिक*

दरवाज़ा खुला और रागिनी बाहर आयी. वीर ने झांक के देखा की रागिनी जल्दबाज़ी में थी और वाशरूम की ऑर्डर जा रही थी.

कुछ सोच के वीर, रागिनी के कमरे में दाखिल हुआ तोह उससे सब कुछ नार्मल hi लगा.

और फिर उसकी नज़र बीएड पर गयी. जहा रागिनी का फ़ोन रखा हुआ था.

वैसे तोह वीर कभी ऐसे काम नहीं करता था. बिना किसी पेर्मिशन के उनकी प्राइवेसी को छेड़ना. पर शायद आज ये करना ज़रूरी था. और वो खुद भी थोड़ा क्यूरियस था.

रागिनी के फ़ोन का पासवर्ड वीर पहले से hi जानता था. रागिनी ने खुद उससे बता के रखा हुआ था जो की उसका बिरथ ईयर था.

लॉक खोलते hi, वीर ने सबसे पहले मेस्सगेस चेक किये. और वही उससे सारे सवालों के जवाब मिल गए.

सबसे ऊपर hi विवेक की चाट थी. वीर ने वो चाट खोली और कल रात बाहर से आने के बाद के सारे मेस्सगेस वो चेक करने लगा.

उसने पढ़ा की...

विवेक : रागिनी! क्यों कॉल नहीं उठा रही हो हाँ? कब तक रागिनी? कब तक ऐसे hi चलेगा?

रागिनी : Don't टॉक तो में विवेक! में बिलकुल भी मूड में नहीं हु. आज hi वीर ने अपना बिज़नेस स्टार्ट किया है. वह से आने के बाद में काफी लाइट महसूस कर रही हु. जस्ट don't मैसेज में okay?

विवेक : ी सी! तोह ये सिला दे रही हो मुझे तुम हाँ? यहाँ पति को चोरर के वह देवर के साथ हाँ?

रागिनी : व्हाट दीद यू से? तुमने ऐसा...!??? छिईई... मुझे घिन आ रही है विवेक. हाउ कैन यू इवन थिंक लिखे तहत? हाउ डरे यू...??

विवेक : सब समझ रहा हु रागिनी! तोह बोलो न? क्यों मुझे जवाब नहीं देती हो? कॉल करता हु, तोह वो तुम्हे उठाना नहीं है. माँ डैड और में मिलने आये तोह तुम्हे बात नहीं करनी. जस्ट व्हाट थे फ़क यू वांट रागिनी?????? आंसर में!!!

रागिनी : ी फूकिंग don't वांट तो टॉक तो यू. Okay?

विवेक : मुझे आंसर चाहिए रागिनी. तुम्हे पता भी है की कंपनी में क्या क्या sunn'na पड़ता है मुझे? घर में क्या इज़्ज़त रहती है मेरी? आस पड़ोस वाले क्या सोचते है? दो यू इवन क्नोव?

रागिनी : ः~

विवेक : What's सो दमन फनी रागिनी!?

रागिनी : और में सोचती थी... की तुम्हे मेरी परवाह है. पर... पर तुम्हे तोह अपनी इमेज की चिंता सत्ता रही है विवेक. कंपनी में एम्प्लाइज क्या सोचेंगे? घर में क्या इज़्ज़त रहेगी? आस पड़ोस वाले किसी नज़रो से देखेंगे? यही न? तुम मुझे हर्र बार प्रोवे कर देते हो विवेक... की कितने घटिया और कितने सेल्फिश इंसान हो तुम.

विवेक : रागिनीईई!!! Don't जस्ट...

रागिनी : शट उप! और अहिंदा से एक मैसेज मत करना मुझे. ी don't इवन वांट तो सी योर फेस विवेक!

विवेक : रागिनी?????

विवेक : रागिनीईईई... हैययययय!

* ↙️ मिस्ड कॉल ात 3:13 ऍम*

* ↙️ मिस्ड कॉल ात 3:14 ऍम*

* ↙️ मिस्ड वीडियो कॉल ात 3:15 ऍम*

और बस, वीर ने जैसे hi ये चाट पढ़ी वो सब समझ चूका था की क्या हुआ था देरर रात में.

उसने फ़ोन को साइड में रखा और बीएड पर hi बैठ के वो रागिनी के वेट करने लगा.

कुछ सेकण्ड्स के बाद hi रागिनी अपने गीले मुँह को तौलिये से पोछते हुए अपने कमरे में आयी और आते hi जैसे hi उसने अपने बीएड पर वीर को बैठा देखा तोह वो थोड़ा चौंक गयी.

रागिनी : H-Huh!?? V-Veer?

वीर (स्माइल्स) : में आपके रूम में बिना पूछे hi आ गया. माफ़ करना.

रागिनी ने फिरसे वही फीकी मुस्कान दी और बोली.

रागिनी : इसमें... इसमें पूछने की क्या ज़रुरत वीर? पराये थोड़ी हो. यू कैन के.

वीर : कुछ बात करनी थी आपसे.

आगे आते हुए रागिनी उसके बगल से बैठ गयी. वीर ने देखा की रागिनी के चेहरे पर अभी भी कही कही पानी की बूंदे सजी हुई थी, जो उसके आकर्षण को और भी बढ़ा रही थी. वो भीगी भीगी बालो की कुछ लट्टे जिन्हे वो बार बार अपने कानो के पीछे कर उससे देखे जा रही थी.

वीर ये भी देख पा रहा था की रागिनी की आँखें थोड़ी लाल थी.

'शी क्रिएड...'

रागिनी : कहो न वीर! क्या बात करनी है?

वीर : वो... वैसे तोह मेने आलरेडी डीडे कर लिया था. बूत फिर भी आपसे पूछना चाहता था. मुझे क्या करना चाहिए? कॉलेज में एक्साम्स भी देते राहु या बिज़नेस में पूरा फोकस्ड राहु?

रागिनी उससे देखि और फिर बोली.

रागिनी : मेरे ख्याल से तुम्हे एक्साम्स देते रहने चाहिए वीर. आखिर साथ साथ डिग्री भी मिल जाएगी तुम्हे. और इसमें तोह कोई बुराई नहीं है न?

रागिनी की बात सुन्न वीर ने हामी भरी.

वीर : हम्म~ मेरी इस ईयर की फी तोह भरी हुई है. नेक्स्ट दो की बची है. तोह में आसानी से एक्साम्स अटेंड कर सकता हु.

रागिनी ने भी हामी भरी और उसके हाथ ले ऊपर अपना हाथ हौले से रखते हुए बोली,

"Don't वोर्री! में तुम्हारे अगले दो इयर्स की भी फी पाय कर दूंगी वीर. तुम इत्मीनान से अपने एक्साम्स दो. Okay?"

बात ज़रा सी थी. केवल फीस की. और रागिनी के लिए ये तोह चुटकियो का काम था. पर फिर भी...

दुसरो की मदद के लिए आतुर रहना. ये मुश्किल होता है. और यही बात वीर को एकदम छू गयी आज.

वीर (रागिनी का हाथ थामते हुए) : Bh-Bhabhi! बस! कितना करोगी? No! ये फी, में अपनी एअर्निंग से पाय करूँगा. प्लीज! आप समझिये! आप बोहत कर चुकी है. अब मुझे भी कुछ करने दीजिये.

रागिनी : ठीक है बाबा! में समझ गयी हु. Okay? ः~ नहीं करुँगी में पाय. अब ठीक?

वीर (स्माइल्स) : हम्म~ गुड!

*साइलेंस*

और एक बार फिर थोड़ी शान्ति सी छ गयी.

वीर को लगा की अब उससे यहाँ से निकलना चाहिए. और वो उठने hi वाला था जब रागिनी उससे पुकारी,

रागिनी : V-Veer!?

वीर : ??

रागिनी : वो... वैसे तोह मेने आलरेडी डीडे कर लिया था. बूत फिर भी तुमसे पूछना चाहती हु. मुझे क्या करना चाहिए?

इस बार रागिनी ने भी वैसे hi वीर से पूछा जैसे अभी कुछ देरर पहले उसने रागिनी से पूछा था.

रागिनी का सवाल सुनते hi वीर के होंठ पल भर के लिए खुले रह गए.

उसने देखा की रागिनी उससे hi देख रही थी. उसकी आँखों के कोनो पर हलकी हलकी आसुओ की बूंदे सजी हुई थी. गिरने के लिए एकदम आतुर थी जो.

थोड़े kap-kapaate हुए होंठो से फिर वो बोली,

रागिनी : K-Kya करना चाहिए मुझे? बोलो? W-Waapas से उस घर में चली जाऊ y-ya... या विवेक को चोरर दू? बोलो?

वीर एकदम सन्न बस रागिनी के हाल को देख रहा था. वो रो रही थी, बिना कोई आवाज़ किये hi.

ये सवाल ऐसा था की जवाब हां में देना भी गलत था और न में देना भी. क्युकी वीर एक औरत का वो गम्म नहीं समझ पाटा कभी. वो औरत जिसने अपने सामने अपने पति को उसकी बलि चढाने के लिए सुना था.

एक मर्द होने के नाते वीर नहीं जानता था की इस वक़्त रागिनी, एक महिला को केसा फील हो रहा होगा.

पर वो इतना ज़रूर जानता था की... उसकी hi तरह रागिनी ने भी... कुछ खोया था.

आगे बढ़ते हुए वीर ने रागिनी को खींचा और अपने गले से लगा लिया. ये सब कुछ बोहत धीरे हुआ. क्युकी उससे डर था की कही रागिनी उसका हाथ न झटकार दे. पर ऐसा हुआ नहीं. उल्टा रागिनी अपने आप धीरे धीरे रोटी हुई उसके समीप आके उसकी छाती में समां गयी.

वीर : में नहीं जानता की आपको क्या डिसिशन लेना चाहिए भाभी. ी रियली don't क्नोव. और यदि मालुम भी होता, तोह भी शायद में जवाब न देता. पर इतना ज़रूर याद रखना आप...

रागिनी (क्रिस) : *स्निफ्फ.... *स्निफ्फ*...

वीर (स्माइल्स) : की आप जो भी डिसिशन लोगी, में आपके हर्र डिसिशन में साथ रहूँगा. I'll बे तेरे फॉर यू.

बस! रागिनी को तोह जैसे यही sunn'na था. वीर की ब्राइट सी स्माइल देख वो खुद को न रोक पायी और जोरर जोरर से रोने लगी.

वो थोड़ा सा उठी और उसने वीर के गाल को थामा. उससे खींचा और...

*छुऊं*

उसका दूसरे गाल पर एक हौले से चुम्बन कर दिया.

और वापस रट हुए उसके गले से लग गयी. पर इस बार...

पकड़ मज़बूत थी और डेस्पेरशन से भरी हुई भी.

शायद दोनों को hi इस वक़्त एक दूसरे की इस हुग की ज़रुरत थी.

***

शाम का वक़्त था और वीर अपने फ़ूड ट्रक में सोनाली के संग लगा हुआ था. मतलब खाना बनाने में.

सोनाली को नए बर्तनो में थोड़ी परेशानी जा रही थी. ये थे नॉन स्टिक बर्तन जिन्हे स्पैटुला से उसे किया जाता था. स्टील या लोहे के चमचो से नहीं.

और सोनाली बचपन से hi स्टील के बर्तनो में खाना पकाती आयी है. उससे मिटटी के बर्तन भी उसे करना आते थे पर ये नॉन स्टिक बर्तन जैसे उसके लिए नया सर दर्द थे.

मेनू फिलहाल सिंपल सा रखा था वीर ने. पर जल्द hi वो अपनी सिग्नेचर डिशेस भी बनाने वाला था. पर उससे इसका आईडिया नहीं आ रहा था. आखिर बनाये तोह बनाये कैसे अपनी खुद की डिशेस.

वो सोच hi रहा था जब उसने देखा की सोनाली पैन में नूडल्स को फ्लिप करने में स्ट्रगल कर रही थी.

उससे देख के वीर मैं hi मैं मुस्कुराया और उठ के उसके पीछे आ गया.

उसके पीछे आते hi वीर ने सोनाली की कमर के इर्द गिर्द अपने हाथ डालते हुए आगे उसके दोनों हाथो पर अपने हाथ रखे.

पर इस अचानक के हमले से...

"Aaaaaaaaaaaaaaaa...."

बेचारी सोनाली एकदम hi डर गयी.

वीर : इससे ऐसे नहीं. ऐसे करते है...

कहते हुए वीर ने अपने हाथो से उसके हाथ थाम के रखे और फिर पैन को फ्लिप किया.

सोनाली को जैसे यकीन hi नहीं हो रहा था की वीर उसके पीछे चिपक के खड़ा हुआ था. पल भर के लिए तोह उसके ज़ेहन में आया की सीधे वीर की पसली में अपनी कोहनी मार के उसका मुँह नोच ले.

पर जब उसने देखा की वीर उससे सीखा रहा था तोह मैं मार के उसने खुद को शांत कर लिया.

पर क्या यही रीज़न था? हो न हो, कही न कही...

सोनाली को वीर की वो मज़बूत श्रेडेड छथि तोह ज़रूर महसूस हुई होगी?

अभी वो दोनों ऐसे खड़े hi थे जब वीर के कानो में एक जानी पहचानी सी आवाज़ आयी.

"कोंग्रटुलतिओन्स वीर फॉर योर... हँ!?"

उसने जैसे hi पलट के देखा तोह वीर वही मूर्ति बन्न के रह गया.

क्युकी सामने ट्रक के किचन की एंट्रेंस पर करा कड़ी हुई थी. भले hi उसके चेहरे पर मास्क था पर वीर करा को भला कैसे नहीं पहचानता?

वही करा भी कनी लेंथ वाइट स्लीवलेस ड्रेस में वीर को शॉकेड निगाहो से देख रही थी.

और क्यों न देखती? वीर की छाती से लगी एक लड़की कड़ी हुई थी हाथो में हाथ डाले.

'फुककककक माय टाइमिंग.... फुक्कक्कककककक!!!!'

[Hahahahaha~]

'शट उप पारी! Don't यू डरे लाफ!'

[Wahahahahahahahahahaha~]

'फुककक ोूउउ!!!'

करा : A-Are यू...!? अरे यू हैविंग सेक्स?

'फूऊऊऊक्कक्ककककक!'

ये सुनते hi वीर झेपते हुए पीछे हो गया तोह वही सेक्स शब्द सुनते hi सोनाली के गाल लाल से पद गए.

वीर : W-Whaaaattt!? N-No No!!! नॉट ात आल! A-Aap यहाँ?

करा : ी चामे तो कोंग्रटुलते यू!

वीर (पास आते हुए) : N-Nahi नहीं! उस से पहले... हाउ कैन यू से आईटी लिखे तहत? M-Miss करा! यू कन्नोत जस्ट टॉक अबाउट सेक्स सो कसुआलय.

करा : हम्म?

वीर : ारघ्ठ! मेरा मतलब है की ऐसी बातें ऐसे नहीं कही जाती.

करा : O-Ohhh! O-Okay!

वीर (शिघ्स) : अन्य्वयस! आइये न... छोटे सा ट्रक है ये मेरा तोह... ः~ नथिंग मच.

करा (स्माइल्स) : ी लिखे आईटी.

वीर : ओह्ह! Th-Thank यू! ये मुँह पर मास्क?

करा : मीडिया...

वीर : ओह्ह्ह!!!

करा का जवाब सुन्न वीर समझ गया था की करा मास्क क्यों पहनी हुई थी. जगह जगह उससे देख के मीडिया जो पीछे पद जाती थी उसके. कोई न कोई फोटो निकालने hi लगता था.

करा : बूत ी कैन टेक आईटी ऑफ फॉर यू.

कहते हुए उसने अपने मुँह से मास्क जैसे hi हटाया तोह वीर की आँखें हर्र बार की तरह फटी की फटी रह गयी. करा ख़ूबसूरत hi इतनी थी.

पर वो अकेला नहीं था. उसके पीछे कड़ी सोनाली भी करा को पहली बार देख भौचक्की सी वही जम्म गयी थी. और फिर उसने घबरा के अपना सर्र झुका लिया. ऐसी सुंदरता के सामने आँख मिलाना hi मुश्किल था सोनाली के लिए.

करा : हम्म? Hello!

करा सोनाली को देख बोली तोह सोनाली केवल मुंडी hi हिला पायी.

वीर : उम्... क्यों न हम बाहर चले? यहाँ कंजस्टेड है काफी.

करा : Okay!

सोनाली : R-Rukoooo... K-Kaha जा रहे हो तुम?

वीर : बस यही तक. ः~ Don't वोर्री मुझे पता है तुम संभाल लोगी. हाहाहाहाहा~

वीर ने इतना बोल सोनाली की पीठ जोरर जोरर से थप थपाई मानो जैसे उससे पूरा विश्वाश था सोनाली पे? बेचारी हर्र एक थपकी पर पूरी हिल के रह गयी.

और वीर और करा बाहर आ गए. पीछे से सोनाली चिल्लाती रही पर कोई फायदा नहीं. वो दोनों hi जा चुके थे. अब सारे कस्टमर्स सोनाली को hi संभालने थे.

सोनाली (मैं में) : P-Paagal कही का...

***

इधर बाहर करा और वीर जैसे hi बाहर आये तोह साइड में एक जगह दोनों hi खड़े हो गए.

वीर : आप अकेली हो?

करा : No! जस्सी और रघु कार में है.

वीर : ओह्ह्ह!!!

वीर ने कार की ऑर्डर देखा जो की करा की hi कार थी. अब इतनी महंगी गाडी आस पास और भला किसकी हो सकती थी? रघु और जस्सी दोनों अंदर hi थे और उनकी hi तरफ देख रहे थे.

करा : तहत...

वीर : ??

करा : I'm सॉरी!

वीर : किस लिए?

करा : फॉर नॉट किंग तो मीट यू... जब तुम हॉस्पिटल में थे. बिकॉज़ ऑफ़ में... ी couldn't के. सॉरी फॉर तहत. ी हद सम...

वीर (स्माइल्स) : कोई बात नहीं!

करा : O-Okay! हाउ अरे यू फीलिंग नाउ?

वीर : आल गुड!

करा : I'm ग्लैड तो हेअर.

वीर : बस दिक्कत ये है की... मुझे बिज़नेस के लिए कुछ सिग्नेचर डिशेस चाहिए. पर समझ नहीं आ रहा की उन्हें बनाऊ कैसे.

वीर की बात सुन्न करा कुछ सोचते हुए उससे देखती रही, फिर अगले hi पल उसका हाथ थामी और उससे दौड़ाते हुए कार की ऑर्डर ले जाने लगी.

करा : के विथ में...

वीर : हँ?? W-Waaaitt!! कहा? कहा जा रहे है हम?

करा : जस्ट के!

और कुछ hi पालो के अंदर वीर करा की कार में था.

आगे ड्राइविंग सीट पर जस्सी बैठा हुआ था और उसके बगल से रघु और दोनों hi वीर को बस डेड स्तर दे रहे थे.

'फुककक!'

वीर : उम्...

करा : रघु! यू साइड यू फ्रेंड नीडेड हेल्प? उससे टीवी, लेद स्क्रीन का बिज़नेस शुरू करना है न?

रघु : ??? मिस? आपको कैसे पता चला?

करा : जस्ट तेल्ल में.

रघु : वो... हाँ हाँ! उससे नया बिज़नेस शुरू करना है टीवी का. पैसा बोहत है उसके पास बस सही से दिमाग लगा के शुरू करना चाहता है.

करा : थें टेक में तो हिम...

रघु : A-Abhi???

करा : यस!

रघु : J-Jii मिस! जस्सी! वही वो ऑफिस में लगा ले...

जस्सी : ठीक!

वीर : एक मिनट... कोई मेरी सुनेगा? हम कहा जा रहे है?

करा : जस्ट सीट वीर! एंड बी थे वे...

वीर : ??

करा : हु वास् तहत गर्ल?

करा ने वीर को देखते हुए पूछा. पर पता नहीं क्यों वीर को उसकी वो नज़र कुछ पैनी सी महसूस हो रही थी.

'शीट!!!'

[You are dead. Rip!]

'पहले तुम शांत रहो पारी! फ़क!!!!'

वीर : वो? She's...

करा : योर सिस्टर?

वीर : N-Nahi... ाहः... She's...

करा : योर कजिन?

वीर : N-Nahi...

करा : हम्म... थें जस्ट ा नोबडी?

वीर : नूवो! She's... She's माय फ्रेंड.

करा : ा फ्रेंड!??? हँ??

वीर : Y-Yeah!

करा : हम्म~ Okay!

सुर्प्रिसिंगलय, करा उसकी बात सुन्न आगे कुछ न बोली.

'व्हाई वास् शी लिखे तहत?'

[Hmph! Ladkiyo ke maamle me you will be dense as always...]

'ओह्ह शट उप!'

[Hmph~]

कुछ देरर की दुरी तय करने के बाद, वीर करा और बाकी सभी एक ऑफिस के बाहर मौजूद थे.

अंदर जाते hi उन्हें केबिन में एक आदमी जो थोड़ा यंग था वो बैठा हुआ नज़र आया.

और जैसे hi उसने रघु और बाकी सभी को देखा वो जैसे समझ गया और बड़े hi आदर के साथ उन् सभी को अंदर बिठवाया.

करा : तुम्हे टीवी का बिज़नेस करना है न?

लड़का : J-Jii! मुझे एक्चुअली सिर्फ बेचने का बिज़नेस करना है. मेरे भैया है उन्हें मैन्युफैक्चरिंग का करना है. खुद की टवस. एक नया ब्रांड. पर अभी कुछ भी नहीं सोचा है की कैसे क्या शुरुआत करे. क्युकी हम बिज़नेस फील्ड से नहीं है.

करा ने तभी किसी को कॉल लगाया और फिर शांत होक बैठ गयी.

सब उससे प्रश्न जनक निगाहों से घूरते रहे पर वो कुछ न बोली. वीर और बाकी सभी उस से सवाल किये पर वो तोह जैसे कुछ बोल hi नहीं रही थी. वो जैसे किसी का वेट कर रही थी.

और फिर कुछ देरर बाद hi...

*स्क्रीईच्ठ्ह*

बाहर कई साड़ी गाड़ियों के रुकने की आवाज़ आयी. और कई सारे मलेस अथवा फ्रेमलेस वह मौजूद हो गए.

करा : थैंक यू फॉर किंग!

सभी : No प्रॉब्लम मिस!

करा : क्या ये तुम्हारी टीवी ले सकती हु?

लड़के ने हाँ में सर्र हिलाया तोह करा ने फिर टीवी को देखते हुए कहा.

करा : ओपन तहत उप. अंदर हर्र एक part देखो, किस ब्रांड का है, कितनी एफिशिएंसी है, कितने साल चलेगा, कोण सा part किस्से अच्छे से सपोर्ट करता है. अनलयसे एवरीथिंग एंड थें गिव में ा रिपोर्ट.

और बस, उसके कहते hi सभी जुट गए. उस टीवी का जैसे पोस्ट मोर्टेम हो गया था.

बेचारा लड़का बस देखता hi रहा.

और करीब 1 घंटे के बाद...

करा के हाथो में एक रिपोर्ट थी.

और वो सभी लोग वापस चले गए.

करा : इस ब्रांड में ये सारे आइटम्स लगे हुए है. नाउ, यही शामे आइटम्स अपनी टीवी में अस्सेम्ब्ले करवाओ. गिव मोरे वारंटी. जो टीवी ये ब्रांड 50,000 में मार्किट में उतारती है, उससे तुम 40 या उस से भी काम में उतारो. ये तब तक करो जब तक की तुम इस ब्रांड पर हावी न पद जाओ. जब तक की तुम इससे अपने कम्पटीशन से उखाड़ के न फेक दो. और फिर... जब ये ब्रांड हट जाएगा. अपना वही टीवी फिर तुम 80 में उतारो या 90 में... पब्लिक के पास एक hi ऑप्शन रहेगा. तुम्हारा टीवी बुय करना. बस! तहत इस हाउ यू दो बिज़नेस.

करा ने जैसे hi बोलना ख़तम किया, सबकी आँखें एकदम खुली की खुली थी. और उन्हें ये भी समझ आ गया था की ये लड़की चलता फिरता बम थी. कभी भी किसी की भी खटिया कड़ी कर दे.

वीर को तोह जैसे उसका उत्तर मिल गया था. तोह ये बताना चाह रही थी करा उससे. उससे सिग्नेचर डिशेस बनानी है तोह वो किसी और की सिग्नेचर डिशेस बना के उसमे फेरर बदल कर अपनी बना सकता है, जब तक की उससे कोई अच्छा आईडिया नहीं आ जाता.

करा (स्माइल्स) : ी सूपपोसे, यू गोत योर आंसर.

वीर (स्माइल्स) : ी दो! थैंक यू!

करा : एंड नाउ ी वांट समथिंग इन एक्सचेंज.

वीर : तो टीच यू अबाउट लाइफ?

करा (स्माइल्स) : Y-Yes!!!

*ाआशुओ*

पर अचानक hi उससे चींख आ गयी.

'Who's रेमेम्बेरिंग में?'

बेचारे वीर को क्या पता था. की सोनाली उससे वह ट्रक में से गाली दिए जा रही थी. इतने कस्टमर्स जो संभालने पद रहे थे उससे.

***

शाम ढली, और रात के वक़्त वीर अपने बिस्तर पर था अस उसुअल.

पर... कोई था जो उसका सर्र खाये जा रहा था.

[It's fucking night time now! Now tellll meee!!!! Kya secret hai??? What do you mean you know my secret???]

'हाहाहाहाहा~'

[Don't fucking laugh.... Telll meeee!!!! 😠 ]

'यही की...'

[Huh???? :huh: ]

'यू हैवे ा स्प्लिट पर्सनालिटी. जस्ट लिखे सुहाना.'

[...]

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आज के लिए इतना hi गाइस!

लिखे थोक के जाने का और कमेंट करने का. 😁


धन्यवाद!
 
बचे हुए कमैंट्स के जवाब भी जल्द hi दे दिए जाएंगे. तब तक, नए अपडेट की समीसखा रखने का. :डी
 
सॉरी गाइस! ी couldn't गिव अपडेट लास्ट नाईट. आईटी विल अर्रिवे शॉर्टली. बिटवीन 10:30 - 11:30.
 
अपडेट - 60 ~ प्लेअसुरे एंड पार्टीशन

अब तक...

[It's fucking night time now! Now tellll meee!!!! Kya secret hai??? What do you mean you know my secret???]

'हाहाहाहाहा~'

[Don't fucking laugh.... Telll meeee!!!!]

'यही की...'

[Huh????]

'यू हैवे ा स्प्लिट पर्सनालिटी. जस्ट लिखे सुहाना.'

[...]


अब आगे...



"आआह्नन~❤️"

ये आवाज़ थी सुमन की, जो बिस्तर पर कुटिया बन्न के अपने मालिक को सर्वे कर रही थी.

वीर उसके ठीक पीछे था और उसका लुंड सुमन की छूट की गहराइयो में जाकर उसकी बच्चेदानी में ठोकर मार मार के बाहर आ रहा था.

और उन् हर्र धक्को के साथ, सुमन का गदराया बदन पूरा का पूरा हिल रहा था, उसकी सिसकिया पूरे कमरे में बिखरी हुई थी.

ये रात थी गुरूवार की रात. जहा वीर के कमरे में सुमन, उसकी दासी उससे संतुष्ट करने में लगी हुई थी. वो तोह अच्छा था की रागिनी का कमरा नीचे था और सोनाली भी रागिनी के कमरे के बगल वाले कमरे में सोती थी. वर्ण ये सारे मज़्ज़े लेना वीर के लिए नामुमकिन हो जाता.

आज की इस रात वैसे वो अकेला नहीं था सुमन के साथ. बगल में एक और शख्स बैठा हुआ था, जो उन् दोनों के इस चुदाई के खेल को थोड़ा सहमे सहमे सा देख रहा था.

और ये कोई और नहीं, सुमन की अपनी बहु ~ आभा hi थी.

जब से वीर को थ्रीसम का चस्का चढ़ा था, उसके बाद से hi अब उससे थ्रीसम करने का और मैं करता था. वो सही कहते है आखिर, की एक से भले दो. शायद ये बात वीर एकदम सीरियसली लेने लगा था. जब उसके पास दो छूट थी तोह भला वो एक एक करके क्यों स्वाद ले उनका? दोनों का साथ में क्यों नहीं? और यही सोच के आज उसने दोनों hi सुमन और आभा को अपने कमरे में साथ में बुलाया था.

पर रीज़न सिर्फ यही नहीं था. आज वो सुमन के पीछे वाले छेड़ का उदघाटन करने वाला था. उसने कई हफ्ते पहले, उस दिन जब वो बाथरूम में सुमन की छूट के बालो को रेजर से साफ़ कर रहा था तब hi उस से ये बात कही थी की वो जल्द hi उसके दूसरे छेड़ का उदघाटन भी करेगा. पर समय के चलते वीर को ऐसा करने का मौका hi नहीं मिल पाया.

लेकिन आज वीर ने डीडे कर लिया था. वो कई दिनों से सुमन को अपनी गांड ढीली करवाने का प्रयास कर रहा था. उसने सुमन को बता के रखा हुआ था. अनल सेक्स यु hi नहीं किया जाता था. उसका भी एक तरीक़ा होता था. गांड की चमड़ी भी छूट की चमड़ी की तरह hi होती थी जो खुलने के बाद अपने आप सिकुड़ने लगती थी.

पर दिक्कत ये थी की गांड छूट की तरह पानी नहीं चोररटी, जिस कारण से वो लुब्रिकेशन नहीं बन्न पाटा था. और इसलिए, अक्सर बोहत पैन होता अनल सेक्स में. क्युकी एक तोह काम लुब्रिकेशन, ऊपर से चमड़ी का खींचना और फटना.

इसलिए वीर सुमन को अपनी गांड के छेड़ को थोड़ा फैलाने के लिए कह के रखा हुआ था. सुमन अक्सर अपनी गांड में उंगलिया दाल के उससे फैलाने की कोशिश करती थी. वीर ने कोई भी औज़ार उसे करने से मन किया हुआ था. सुमन केवल अपनी उंगलियों का hi इस्तेमाल कर सकती थी.

और कई दिनों की लगातार कोशिश के बाद, सुमन की गांड काम से काम इतनी खुल चुकी थी की दो उंगलिया डाली जा सकती थी. तीसरी में उससे बोहत दर्द होने लगता था पर जैसे तैसे वो भी घुस जाती थी.

बस, अब उसकी गांड छोड़ने के लिए एकदम तैयार थी. बगल में स्टूल पर hi एक गरम तेल की कटोरी राखी हुई थी, जो बोहत काम आने वाले थी.

"ाःनं~ M-Maalik, ऊऊह्ह्ह्हह्ह..."

वो सिसकी तोह वीर ने अपना माल उसकी छूट में पूरा का पूरा चोरर लुंड बाहर निकाला जो सुमन और उसके अपने रस से भीगा हुआ था. सुमन को एक पल नहीं लगा, वो पलटी और अपने मालिक के लुंड को अपने मुँह से साफ़ करने में लग गयी.

आभा आँखें फाड़े सब कुछ देख रही थी. उत्तेजित तोह थी वह पर थोड़ी घबराई हुई भी थी. वो बस अपनी सासु माँ की हरकतों से अचंभव में थी. कैसे उसकी सासु माँ ने वो सना हुआ लुंड इतनी आसानी से अपने मुँह में भर लिया था.

"इधर आओ आभा~" और तभी उसके कानो में उसकी सासु माँ की आवाज़ पड़ी.

आभा : हँ!?

सुमन : मेने कहा इधर आओ.

सुमन उससे बुला रही थी. उसके हाथो में वीर का विशाल लुंड था.

आभा ने सहमे हुए अपना सर्र न में हिलाया तोह सुमन ने आगे बढ़ उसका हाथ पकड़ा और उससे खींच के वीर की टांगो के पास ले आयी.

सुमन : चलो! चाटो इससे आभा~

आभा : मम... N-Nahi...

वो फिर एक बार मन करि तोह सुमन ने उससे आँख दिखाई.

सुमन : देखो! में दिखाती है तुम्हे. इससे ऐसे मुँह में लो...

कहते हुए उसने लुंड को दो बार छाता और फिर अपने गले में पूरा उससे धीरे धीरे उतारने लगी. आभा बेचारी अपनी सासु माँ के गले को देख के hi घबरा रही थी क्युकी हर्र गुज़रते पल, सुमन का गाला उभर के फैलता जा रहा था.

और पालक झपकते hi पूरा लुंड सुमन के मुँह के अंदर था. बस थोड़ा hi बचा हुआ था.

वीर : आठ! फुक्कखकक~

सुमन : मममम~ gwak...gwak...gwak... *स्लुर्प* उम्म्म~ *लीक* *लीक*

उसने कुछ देरर लुंड को यु चूस के दिखाया और आभा को फिरसे आगे आने के लिए कहा.

पर आभा अभी भी मन कर रही थी. वीर का लुंड उसकी सासु माँ के गुप्तांग से सन्न के बाहर आया था. उससे देख के hi घिन आ रही थी. वो भला कैसे इससे अपने मुँह में ले सकती थी?

पर जब तक वो और विरोध कर पाती सुमन ने उसका सर्र पीछे से पकड़ा और उससे धकेल कर सीधे वीर के अंडकोषों में घुसा दिया.

आभा : मंपहहहह!???

सुमन : मुँह में भरो आभा... मुँह में... अपना मुँह खोलो. में भी तुम्हारे साथ हु. ये देखो.

कहते हुए सुमन ने झुक के वीर के दूसरे अंडकोष को अपने मुँह में भर लिया था.

यहाँ पर थोड़ी हिम्मत दिखा के जब आभा ने धीरे से वीर का अंडकोष अपने मुँह में भरा तोह वीर तोह जैसे जन्नत में पहुँच गया था.

वीर : ाःह! शीट्ट्ट्ट!!! हह~ Th-They साइड आईटी राइट. तवो इस बेटर थान o-one... फुक्ककक~

उसकी दोनों दासिया झुक के उसके एक एक अंडकोष को अपने मुँह में भरी हुई थी. जहा आभा केवल मुँह में भर उससे चूस रही थी, तोह वही सुमन उससे अपनी जीभ से भी टटोल रही थी.

और कुछ देरर की इस चुसाई के बाद जब वीर का लुंड फिरसे पूरा तन्न चूका था तोह वो उठा और सुमन को कुटिया bann'ne का इशारा किया.

सुमन इस बार थोड़ा घबराते हुए कुटिया बन्न के बैठ गयी. वो जानती थी, आगे क्या होने वाला था.

वीर ने तेल लिया और अच्छे से सुमन की चौड़ी गांड पर फैला के वो गरम तेल माला और उसके छेड़ में भी अंदर तक ऊँगली दाल के रगड़ा. उसके बाद उसने आभा की ऑर्डर देखा और उससे कटोरी थमा के अपने लुंड की ऑर्डर इशारा किया.

बात को समझते हुए आभा धीरे धीरे आगे बढ़ी और अपने कोमल हाथो से वो वीर के लुंड पर तेल मलने लगी.

सब कुछ तैयार हो जाने के बाद वीर अब रेडी था.

वीर : दर्द तोह होगा सुमन. पर सेह लेना. और आवाज़ नहीं... नीचे भाभी और तुम्हारी बेटी सोई हुई है. यदि आवाज़ गयी तोह हम फस्स जाएंगे. क्या तुम कर पाओगी?

सुमन : आप बेफिक्र होक डालिये मालिक. में संभाल लुंगी. हर्र दर्द को...

वीर (स्माइल्स) : थें गेट रेडी~

और वीर ने सुमन की गांड के पतों को फैलाया तोह उससे भूरा सा वो छेड़ नज़र आया. अपनी उंगलियों से उस छेड़ को और पहला के उसने अपने लुंड के सुपाड़ी को एकदम उसकी सीध में लगाया और अपने हाथ हटा लिए.

और हाथ हटाते hi उसने एक ज़ोरदार धक्का मारा.

"आह्ह्ह्ह!"

पर लुंड फिसल गया. वाक़ई! एक बार में डालना पहली बार में इतना आसान नहीं था.

इस बार वीर ने अपनी दो उंगलिया सुमन की गांड में दाल के जोरर जोरर से उससे आगे पीछे किया ताकि कुछ पल के लिए सुमन की गांड का छेड़ थोड़ा सा खुल जाए.

और ये करने के बाद उसने फिरसे वही प्रक्रिया दोहराई.

छेड़ फैलाया, लुंड लगाया और फिरसे एक करारा शॉट.

"एआईईई Maaaaaaaaaa~ मंपहहह..."

वीर का सुपाड़ा इस बार छेड़ को खोल के अंदर जा चूका था. सुमन की आवाज़ निकली तोह जोरर से थी पर उसने फौरन hi अपना मुँह तकिये में दे दिया था.

वीर जानता था की यहाँ यदि वो ृक्क गया तोह काम और कठिन हो जाएगा. इसलिए फिलहाल बिना सुमन की परवाह किये, उसने और दो करारे शॉट्स मारे.

*गाछ* *घच्च*

और कुछ देरर बाद hi उसका लगभग पौन लुंड सुमन की गांड के अंदर था.

सुमन बेचारी दर्द से बिलबिला रही थी पर अपनी आवाज़ को कण्ट्रोल में राखी हुई थी. आभा उसका हाल देख के डर चुकी थी. वो बस आँखें फाड़ उस हिस्से को देखे जा रही थी जहा वीर और सुमन एक दूसरे से जुड़े हुए थे. उससे विस्वाश hi नहीं हो रहा था की ऐसा भी कुछ होता है. की एक औरत उस छेड़ में भी अंदर ले सकती है. ये सब कुछ नया था उसके लिए.

वीर सुमन की पीठ पर गिर पड़ा और हाफने लगा.

वीर : सीईट्टत्त! आअह्ह्ह!!! It's... It's सो हॉट.... डमनणणन!! इतनी गर्माहट... सुमन... तुम्हारी गांड इतनी जोरर से जकड रही है मुझे... की... दर्द हो रहा है... फुसक्कककककक!

सुमन की गांड डिफेंस कर रही थी. कोई फॉरेन ऑब्जेक्ट अंदर घुस रहा था और ऐसे में चमड़ी खुद को सिकोड़ रही थी. पर इसका असर वीर पर हो रहा था. उससे ऐसा लग रहा था जैसे उसका लुंड सुमन अपने छेड़ से hi काट देगी.

इतनी टाइट कैसा हुआ था सुमन के छेड़ ने उससे.

कुछ देरर तक वीर केवल उसके ऊपर लेता रहा, उसके थानों को मसलता रहा और उसकी पीठ चूमता रहा. जब सुमन की गांड का छेड़ थोड़ा सा ढीला हुआ और कसाव काम हुआ. वीर बिना टाइम वास्ते किये उठा और...

*गाछ* *गाछ*

उसने लुंड से सुमन की गांड मारना शुरू कर दिया.

और पूरे कमरे में बस सुमन की मुफ्फलेड सी नोइसेस फेल गयी. वीर को ऐसा मज़ा कभी नहीं आया था. कितना अलग था सब कुछ. अंदर का स्ट्रक्चर पूरा अलग था. वो सब कुछ फील कर पा रहा था.

और कुछ देरर बाद hi उसने अपना पूरा पानी सुमन की गांड में उड़ेल दिया.

अपने लुंड को बाहर निकाल कर उसने जब आभा को इशारा किया तोह आभा न में सर्र हिलाते हुए सीधे बाहर निकल कर भाग गयी.

शायद वो रेडी नहीं थी. और वीर का लुंड मुरझाने लगा.

जब सुमन को ये पता चला तोह वो कड़ी हुई, उसने हफ्ते हुए दरवाज़ा बंद किया और वापस आकर वीर के लुंड को मुँह में भर साफ़ करने लगी.

और दोनों hi फिर एक दूसरे के बगल से लेत गए. वीर को आज एक नयी बात पता चली थी सेक्स की. वो यह की ज़रूरी नहीं की हर्र सेक्स मज़ेदार हो.

सुमन : अभी वो घबरा गयी है शायद मालिक. आप चिंता मत करिये. में उससे सीखा दूंगी सब. बस थोड़ा समय दीजिये.

वीर : नाह! कोई बात नहीं सुमन.

सुमन : मालिक! सम्भोग में ज़रूरी नहीं की हर्र बार आपके साथी के साथ आप सब कुछ कर पाओ. ऐसा कई बार होता है की जैसा आप चाहो वैसा नहीं हो पाटा. पर... आपकी उस कमी को पूरी करने के लिए, में तोह हु hi आपके पास.

वीर : राइट!

वीर को पता चला था की असल सेक्स पोर्न से कितना अलग होता था. आभा शायद अभी इस के लिए तैयार नहीं थी. भले hi सुमन उसके लिए सब कुछ करने राज़ी थी पर ज़रूरी नहीं था की आभा भी वही करे. इस बात का अब उससे ध्यान आ चूका था.

और अब कुछ देरर बाद hi...

*डिंग*

उससे वो साउंड सुनाई दिया जिसके लिए आज उसने ये सब करने की ठानी थी.

[100 points have been rewarded.]

'सिर्फ 100!? वेल... क्या आभा बीच में चली गयी इसलिए!?'

वीर जल्द से जल्द पॉइंट्स इखट्टा करने की कोशिश कर रहा था. वो जानता था की उससे इस वक़्त केवल पॉइंट्स की ज़रुरत थी. बोहत ज़्यादा ज़रुरत. और इसलिए जब तक कोई मिशन नहीं मिल रहा था उसने इसके ज़रिये hi पॉइंट्स कलेक्ट करने की सोची.

पर, उससे केवल 100 hi प्राप्त हो पाए. और अब उसके पास केवल 300 hi थे.

***

Veer's ओल्ड होम...

वीर के पुराने घर में क्या हो रहा था, वो उन् बातो से बेखबर अपने में लगा हुआ था. पर यहाँ तोह जैसे मामला बोहत hi तेज़्ज़ी से आगे बढ़ रहा था.

मनोरथ ने सभी को अपने कमरे में बुलाया हुआ था. सभी लाइन से खड़े थे और मनोरथ अपने बिस्तर पर बैठे हुए थे.

मनोरथ : मेने इस बारे में बोहत सोचा है. और मेने ये फैसला लिया है की मुझे जल्द से जल्द प्रॉपर्टी का बटवारा कर देना चाहिए.

बृजेश : P-Papa जी? अचानक से ये आप?

मनोरथ : में सही कह रहा हु. समय रहते मुझे ये सब काम कर लेने चाहिए. वर्ण क्या पता फिरसे कब मेरे साथ कोई दुर्घटना हो जाए.

करुणेश : आप ऐसा क्यों कह रहे है पापा जी? आपको कुछ नहीं होगा.

मनोरथ : बृजेश और करुणेश. तुम दोनों के hi पास पर्याप्त संपत्ति है और तुम दोनों hi पेट्रोल पंप के मालिक हो. तोह मेरी ज़मीन के बटवारे में तुम दोनों को कुछ भी नहीं मिलने वाला है. और न hi किसी भी बहुओ को कुछ. ये सब कुछ मेरे पोते और पोतियो में hi बटेगा. क्या इस बात से तुम्हे कोई आपत्ति है?

मनोरथ की ये बात सुनते hi श्वेता के चेहरे से पूरा रंग उड़द गया था. वो बेहद hi टेंशन में आ गयी थी. यदि उससे कुछ नहीं मिलने वाला था तोह ऐसे में तोह केवल उसकी एक hi बेटी है और न जाने कितना उसकी बेटी को मिलेगा? उससे टेंशन खाये जा रही थी.

बृजेश : बिलकुल नहीं पापा जी! आप जो भी करेंगे सोच समझ कर hi करेंगे.

करुणेश : मुझे भी इस बात से कोई आपत्ति नहीं है पापा जी! हमारे बच्चे hi तोह भविष्य है. आपका फैसला हमे मंज़ूर है.

मनोरथ (स्माइल्स) : हम्म~ मुझे यही sunn'na था. जाओ अब सभी. और में चाहता हु... बारी बारी मेरे पोते पोटिया अकेले मुझ से मिलने आये. मुझे उनसे कुछ बातें करनी है. उसके बाद hi में निर्णय लूंगा की किस्से कितनी ज़मीन का हिस्सा मिलना चाहिए.

बृजेश : T-Toh सबको बारबार नहीं बात रहे आप?

मनोरथ : नहीं! बारबार नहीं. किसको कितना हिस्सा मिलेगा ये तोह...

मनोरथ (मैं में) : उनका व्यक्तित्व hi बताएगा.

मनोरथ : जाओ अच्छा!

बृजेश : हँ?

मनोरथ : मेने कहा जाओ! और विवेक तुम यही रुको.

विवेक : J-Jii दादा जी!

और सभी जाने लगते है. सबके hi मैं में टेंशन सी थी. खासकर आरोही के. उससे ऐसा लग रहा था जैसे फिरसे कुछ बुरा होने वाला है.

*थुड़*

दरवाज़ा बंद हुआ और अब रूम में केवल मनोरथ और विवेक hi बाकी थे.

मनोरथ : बैठो विवेक!

विवेक : जी! दादा जी!

मनोरथ : तुम्हे क्या लगता है? मुझे प्रॉपर्टी कितने हिस्सों में, किस्से बॉटनी चाहिए?

विवेक : हँ?

इस सवाल से तोह जैसे विवेक थोड़ा अचंभव में रह गया था.

विवेक (मैं में) : ये दादा जी भला मुझसे क्यों ये सवाल कर रहे है?

विवेक : दादा जी! सच कहु तोह मुझे लगता है आपको सभी को बराबर बॉटनी चाहिए!

मनोरथ : अच्छा? ज़रा अच्छे से सोच के बताओ विवेक! देखो! आरोही, काव्य और भूमिका बिटिया की तोह शादी हो जाएगी. वो यहाँ से चली जाएंगी. भला उनके किस काम आएगी ज़मीन? तोह बचे तुम सब. है न? अब बताओ? किस्से बॉटनी चाहिए मुझे और कितने हिस्सों में?

विवेक (मैं में) : जब इन्हे सब पता है तोह मुझसे क्यों पूछ रहे है? कही ये मेरा टेस्ट तोह नहीं ले रहे?

विवेक : दादा जी! ऐसे में तोह केवल में में और छोटे hi बचे. आप जैसा चाहो वैसा देदो. छोटे को ज़्यादा भी डोज आप तोह मुझे कोई आपत्ति नहीं है.

पर विवेक ने इतना बोलै hi था की तभी उसको कुछ ध्यान आया.

विवेक (मैं में) : सहित!!! वीर के बारे में तोह में भूल hi गया.

और वाक़ई, विवेक की बात sunn'ne के बाद मनोरथ मैं hi मैं मुस्कुरा रहे थे.

मनोरथ (मैं में) : तोह विवेक को अपने hi छोटे भाई की परवाह नहीं है? और न hi अपनी बहनो की? में सही था. रागिनी बिटिया को भी अभी तक विवेक वापस नहीं ला पाया. और इससे प्रॉपर्टी की पड़ी है. वीर के बारे में कैसे भूल सकता है ये? मेने ठान लिया है. प्रॉपर्टी से एक और नाम अब हट चूका है.

मनोरथ : हम्म~ बात तोह सही है. अच्छा अब भूमिका बिटिया को अंदर भेज दो. जाओ!

और विवेक सदा सा मुँह बनाते हुए उठा और बाहर निकल गया. वो मैं hi मैं यही सोच रहा था की काश उसके दादा जी ने उसके बोल पर ज़्यादा ध्यान न दिया हो.

दरवाज़ा खुला और भूमिका अंदर आयी. वो थोड़ी नर्वस सी दिखाई दे रही थी.

मनोरथ : बैठो बीटा!

भूमिका : J-Jii!

मनोरथ : भूमिका बिटिया! बताओ! तुम्हारे हिसाब से मुझे ये प्रॉपर्टी किस्से कितनी बॉटनी चाहिए? और अपना नाम रखने में बिलकुल मत शर्माना. बस अच्छे से सोच के बताओ. जो तुम्हे सही लगता है.

भूमिका : M-Mujhe नहीं पता दादा जी!

मनोरथ : संकोच मत करो बीटा. बताओ!

भूमिका को तभी कुछ देरर पहले उसकी माँ की बात याद आने लगी.

'देखो! कुछ भी हो जाए. यदि पापा जी तुम से पूछे की तुम्हे कुछ चाहिए है तोह बेझिझक कह देना की तुम्हे चाहिए है. ठीक है बीटा? वर्ण हम सब चीज़ो से हाथ धो बैठेंगे.'

और अपनी माँ की बात याद कर भूमिका मनोरथ को देखती है.

भूमिका : W-Wo... दरअसल मुझे लगता है की... यदि आप बटवारा कर रहे है. तोह उसमे... उसमे मेरा नाम भी होना चाहिए.

मनोरथ (मैं में) : लगता है श्वेता बहु ने पट्टी पढ़ा के भेजा है भूमिका को. नादान है कितनी भूमिका बिटिया. देखो तोह ज़रा! अपने सौतेले भाई का कोई ज़िक्र नहीं किया. न हो श्वेता ने कुछ कहलवाया. जबकि दोनों के पास एक होटल मौजूद है. शायद एक और नाम हट चूका है प्रॉपर्टी से.

मनोरथ : बोहत अच्छे बिटिया! ऐसे hi निडर होक बोलै करो. तुम जा सकती हो. और आरोही बिटिया को अंदर भेज देना.

और उसके जाते hi आरोही कुछ देरर में अपने दादा जी के सामने मौजूद थी.

मनोरथ : बताओ बिटिया! अपनी राय बताओ! में किस्से अपनी प्रॉपर्टी कितने हिस्से में बायतु?

आरोही : मुझे नहीं पता दादा जी! और न hi में इंटरेस्टेड हु. पर इतना ज़रूर कहूँगी की आप सोच समझ के फैसला लेना दादा जी!

मनोरथ : यदि में साड़ी प्रॉपर्टी तुम्हे देदू तोह तुम क्या करोगी उस प्रॉपर्टी का?

आरोही : ी... वो... मुझे नहीं पता. मेने कभी बिज़नेस नहीं किया. और न hi में इस फील्ड में जाना चाहती हु. P-Par...

मनोरथ : हम्म?

आरोही : पर यदि आप मुझे कुछ देना चाहते है तोह... आप मेरा वो हिस्सा... वीर के नाम कर देना.

मनोरथ : ओह्ह्ह?

आरोही : जी!

मनोरथ (मैं में) : मेरी आरोही बिटिया कितनी समझदार है. मुझे नहीं लगा था की वो ऐसा कहेगी. वाक़ई! आरोही बोहत समझदार है. पर... उसके अंदर लगन नहीं है. यदि में उसके हवाले ज़मीन करता हु. तोह आरोही बिटिया उसका उपयोग नहीं कर पाएगी सही से.

मनोरथ : ठीक है बिटिया! जाओ प्रांजल को अंदर भेज दो.

और आरोही हां में सर्र हिला के बाहर गयी और प्रांजल को अंदर जाने के लिए कह दी. पर जब प्रांजल अंदर जा रहा था तोह आरोही का दिल जोरर से धड़क रहा था.

प्रांजल : दादा जी!

मनोरथ : आओ बैठो बीटा!

प्रांजल : जी!

मनोरथ : बताओ! बीटा! अपनी राय बताओ! में क्या करू? इस प्रॉपर्टी को किस्से दू और कितनी बायतु?

प्रांजल : ये सवाल आप मुझ से पूछ रहे है दादा जी?

मनोरथ : हां बीटा! बताओ!

प्रांजल : सच कहूंगा दादा जी! मुझे कोई आईडिया नहीं. अरे मेने तोह इस बारे में कभी सोचा hi नहीं. पर यदि आप फिर भी पूछ रहे है तोह में इतना hi कहूंगा की आपको ज़मीन वीर के नाम कर देनी चाहिए.

मनोरथ : ओह्ह्ह? ऐसा क्यों भला?

प्रांजल : दादा जी! वीर बेचारा हमारे घर से ताऊ जी द्वारा निकाल दिया गया. हलाकि हम सभी ताऊ जी को मनाने में लगे हुए है और प्रयास कर रहे है की वो वीर को ले आये. पर ये समय कब आएगा हम नहीं जानते. और वीर बेचारा हम सब का भाई है. मेरा तोह प्यारा छोटा भाई है. ऐसे में यदि उसके पास कोई एसेट होगा अपना फ्यूचर सिक्योर रखने के लिए तोह इस से अच्छी बात क्या हो सकती है?

मनोरथ : ओह्ह! तोह क्या तुम्हे नहीं चाहिए?

प्रांजल : में क्या करूँगा भला? मतलब हाँ, मुझे यदि ज़मीन मिलती है कुछ तोह में उसमे अपना कुछ शुरू करना ज़रूर चाहूंगा क्युकी ये मेरा सपना है. पर फिलहाल के लिए यही कहूंगा की... आप को वीर को दे देनी चाहिए... और कुछ हिस्सा मेरी बहनो को भी.

मनोरथ : वो क्यों भला? उनकी तोह शादी हो जाएगी और वो यहाँ से चली जाएंगी.

प्रांजल : तोह क्या होता दादा जी? भगवान् न करे फ्यूचर में उनके ऊपर कोई मुसीबत ाँ पड़े और फ्यूचर में उन्हें पैसो की ज़रुरत पद जाए. काम से काम उनके नाम कुछ रहेगा तोह वो चिंता से मुक्त रहेंगी न?

मनोरथ (मैं में) : मेरा प्रांजल कितना समझदार है. जो बड़े बड़े न सोच सके, वो प्रांजल सोच के चल रहा है अभी से.

मनोरथ : तोह कितनी बायतु बताओ!

प्रांजल (स्माइल्स) : मेरे हिसाब से आपको... 15%-15% आरोही दी, काव्य और भूमिका दी को दे देनी चाहिए. और बची हुई 55% वीर को.

मनोरथ (मैं में) : इतना बड़ा मौका प्रांजल ने यु हाथ से जाने दिया? ये जानते हुए की ऐसा मौका दुबारा नहीं आएगा. ौड ये भी जानते हुए की उसका सपना है की वो कुछ अपना खोले उस ज़मीन पर. शायद मेने फैसला ले लिया है.

मनोरथ : ठीक है बच्चा! आखिरी काव्य को और भेज दो.

प्रांजल : J-Jii!

प्रांजल उठ के वापस जाने लगा. पर जाते जाते उसके चेहरे पर एक कातिल मुस्कान थी जो उसके दादा जी से छुपी हुई थी.

आखिरी बची हुई सदस्य काव्य जब अंदर आयी. तोह वो दादा जी के बगल से बैठ गयी.

काव्य : दादा जी!!!!

मनोरथ : मेरी बिटिया! बताओ! में इस प्रॉपर्टी को कितने हिस्से में बायतु?

काव्य : ुमु~ मुझे नहीं पता. और मुझे ये बात नहीं करनी दादा जी~ हम कुछ और बात करेंगे. हहै~ कल में और आप पार्क जाएंगे. Okay?

मनोरथ (मैं में) : ये मेरी बिटिया! सबसे नादान! कितनी भोली है. पर इसकी यही चंचलता मुझे बेहद पसंद है. बेशक! मेने फैसला ले लिया है.

दादा जी के रूम के बाहर इस वक़्त विवेक के रूम में श्वेता मौजूद थी.

श्वेता : K-Kya होने वाला है? तुमने कहा था न की कुछ हिस्सा तुम मेरे और भूमि के नाम करोगे?

विवेक : मुझे कैसे पता होगा क्या होने वाला है? ये तोह दादा जी hi बताएंगे. रही बात हिस्से की तोह वो देखा जाएगा बाद में.

श्वेता : देखा जाएगा से क्या मतलब है तुम्हारा?

विवेक : यही की जब बटवारा होगा तब उस बारे में बात करेंगे.

श्वेता : T-Thik है.

और वो बाहर निकल गयी. पर उसके जाते hi विवेक मैं hi मैं हस्सन लगा.

'बात करेंगे माय अस्स. हाहाहा~ फूटी कौड़ी नहीं मिलने वाली आपको तै जी!'

तोह वही प्रांजल जो दादा जी के रूम से निकल अपने कमरे में जा रहा था वो भी मैं hi मैं मुस्कुरा रहा था.

'सब के सब बेवक़ूफ़ है. हाहाहाहाहा~ ी can't वेट! जल्द hi सब सामने आएगा.'

***

रागिनिस होम...

'ऑलराइट! 300 पॉइंट्स! ी don't केयर! में खोल रहा हु. एक hi खुलेगा पर देखा जाएगा.'

वीर सुमन के साथ सेक्स करने के बाद बिस्तर पर hi हाथ फोल्ड किये बैठा हुआ था. बड़ा सोचने के बाद उसने ये डीडे कर लिया था की वो क्वेस्ट हंट से कार्ड्स निकालेगा. पर फिलहाल के लिए वो सिर्फ एक hi कार्ड निकाल सकता था.

क्वेस्ट हंट की कीमत hi थी 200 पॉइंट्स. और उसके पास केवल 300 पॉइंट्स थे. केवल एक hi राउंड पॉसिबल था फिलहाल.

[Acche se soch lo...]

'हम्म! सोच लिया है.'

[Aur mera reward kaha hai?]

'किस बात का?'

[Tumne kal mujhe apne mann ki baat padhne se mana kiya hua tha. So I didn't. Aur uske liye tumne kaha tha na ki reward doge. Ki mein jab chaahu Sleep mode me ek hafte ke liye jaa sakti hu. Toh bolo...]

'वेल! हाँ! Okay फाइन!'

[Yaaaayyyy! Finallyyyyy~]

'अब वो चोर्रो और क्वेस्ट हंट खोलो!'

*डिंग*

और अगले hi पल क्वेस्ट हंट की स्क्रीन उसके सामने मौजूद थी.

'हम्म! उपरवाले! रेहम करना. 15% चान्सेस है लीजेंडरी कार्ड्स के. में जानता हु मेरी किस्मत जहातु है. पर... लास्ट टाइम तुमने लीजेंडरी कार्ड दिया था न? Okay? रेहम करना! ठीक?'

[Open karo bhi ab...]

'हम्म~ ओपन!!!'

और वो त्रैझ चेस्ट खुलने लगा. अंदर से रौशनी आने लगी और तेज़्ज़ रौशनी के बाद वो खुला और उसमे से एक कार्ड निकल कर बाहर आया.








'हँ? व्हाट इस आईटी? लीजेंडरी? ः~ दीद ी गेट लीजेंडरी ओने? वेट! क्लाउन!? हँ? बेटर लक... नेक्स्ट टाइम? हहै??? व्हाट थे फुसक्ककककक??'

[ योर फर्स्ट ट्रैश कार्ड. वेलकम करो... :लाफिंग: ]

'फूऊकक्कककककककक थिस्सस्सस्स सीटीममममममम!!!'

[ :lol1: ]

'Noooooooooo फुक्कक्कककककक ोुउउउउ'

और वीर उठ के अपने बगल में मौजूद तकिये को जोरर जोरर से घुसे मारना लगा.

उसके 200 पॉइंट्स का कबाड़ा जो हो गया था.

'फूऊक्कखकक तिसस्स शहिततटत दमंत्र यू फूकिंग सिस्टम्म....'

[Mujhe bhi tumhara secret pata chal gaya.]

'???'

[You are just like Suhana hehe~ Keep hitting the cushion.]

'फुक्कक्कककककक यू परीईई!!!!!!'

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आज के लिए इतना hi गाइस!

थिंग्स विल स्टार्ट तो हीट उप फ्रॉम थे नेक्स्ट अपडेट. बे रेडी! और हाँ अपना काम कर के जाने का. 😁


धन्यवाद! ✨
 
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