Incest Baadshah ~ The Tales of Debauchery - Page 8 - SexBaba
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Incest Baadshah ~ The Tales of Debauchery

हैप्पी नई ईयर गाइस!

समय से पहले विश कर रहा हु. बिकॉज़ ी won't बे ऑनलाइन इसके बाद कल दिन तक...

सो, एन्जॉय करने का... 😎

कल एक्शन पैक्ड अपडेट के साथ धांसू शुरुआत करेंगे अपन लोग नए साल की. होप ये साल कोरोना का आतंक ख़तम हो जाए.

एन्जॉय योर टाइम! ✨

आल्सो, बे सेफ! ✨
 
अपडेट-47~ ओने इंच पंच

अब तक...

उसने देखा की लिफ्ट में एक आदमी था. उसने एक फ्लोरल शर्ट पहनी हुई थी. और ऊपर एक ब्लेजर. साथ hi साथ और भी आदमी थे उसके साथ.

और लिफ्ट हलके हलके बंद हो रही थी.

पर बंद होने से पहले दोनों की hi नज़रे आपस में टकराई.

और...

*डिंग*


अब आगे...

Ragini's हाउस...

दिन के इस वक़्त रागिनी के माता पिता के घर विवेक के माता पिता विराजमान थे. माहौल बड़ा hi तंग था चारो के बीच. और क्यों नहीं होता!? बात hi ऐसी थी. टॉपिक hi ऐसा था की दोनों hi तरफ वो अपनी बातो को रखने में कटरा रहे थे.

रागिनी की माँ, रोहिणी अपनी बॉहे सिकोड़े सामने बैठे करुणेश और सुमित्रा के बोलो का इंतज़ार कर रही थी, तोह वही रागिनी के पिता, दिनेश दोनों से नज़रे हटाए अपना मुँह फ्री कही और hi देख रहे थे.

करुणेश : देखिये! ये... आप भी जानते hi है की हम क्यों यहाँ आये है. और क्यों हमे आना पड़ा...

रोहिणी : J-Jii! कहिये...

सुमित्रा : दरअसल... में और ये... हम दोनों hi विवेक के साथ गए थे रागिनी बिटिया के पास. उस से मिलने. उस से बात भी हुई हमारी. और काफी दिन हो गए उसके यहाँ से आये हुए हमे.

रोहिणी : हम्म!

सुमित्रा : पर... रागिनी बिटिया ने कहा था की वो जल्द hi कुछ फैसला लेगी और अपनी बात हमारे सामने रखेगी. पर... अभी तक उसकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया है.

रोहिणी : O-Ohhhh!

करुणेश : जी हाँ! और... आप तोह जानती hi है की... एक शादी शुदा औरत, यु अपने ससुराल से अलग होकर अकेले कही पर रहे तोह कितने सवाल उठाते है!

रोहिणी : *फ्रोंस*

करुणेश : मेरा मतलब... आस पास के लोग भी सवाल करते है, पूछते है... की कहा गयी बहु रानी!? कही दिखाई नहीं दे रही आजकल!? जो कुछ भी वारदात हुई उस दिन... उन् बातो को तोह हम सभी चाहेंगे न की वो परिवार के बीच hi रहे!? और बाहर न जाए!?

रोहिणी : जी आप ठीक कह रहे है.

करुणेश : जी! बस वही बात है. रागिनी बिटिया से ज़रा आप बात करिये न. ये मटर वैसे दोनों बच्चो के बीच का है. पर फिर भी मुझे और सुमित्रा को बीच में आना पद रहा है. ताकि कुछ गलत होने से बच जाए. आप समझ रही है न!? में क्या कहना चाह रहा हु!?

रोहिणी : जी!

करुणेश का इशारा रोहिणी समझ चुकी थी. वो ये बतलाना चाह रहा था की अब समय आ गया है की दोनों hi बच्चो के माँ बाप हस्तक्षेप करे. वर्ण कही ऐसा न हो जाए की रागिनी और विवेक तलाक लेले. और ये बंधन धरा का धरा रह जाए.

रोहिणी : सुन्न रहे है न आप!? समधी जी क्या कह रहे है!? हमे...

दिनेश : सुना मेने. में जानता हु सब कुछ उस दिन क्या हुआ था. आखिर सब कुछ मेरी आँखों के सामने हुआ था.

सुमित्रा : ....

करुणेश : ...

दिनेश : और रही बात मेरी बच्ची रागिनी की तोह... में उसके लिए कोई निर्णय नहीं लेने वाला. मेने पूरी तरह से ये निर्णय उसके ऊपर चोरर दिया है. वो बड़ी है, समझदार है, अपना अच्छा भला जानती है. जो भी निर्णय वो लेगी, में उसके उस निर्णय में उसका साथ दूंगा.

दिनेश के मुँह से निकली ये बातें जैसे किसी तीर के सामान थी जो सीधा जाके करुणेश और सुमित्रा को चुभी.

यहाँ वो दोनों hi बड़ी उम्मीद के साथ आये थे की जैसे तैसे रागिनी के माँ बाप मान जाए तोह रागिनी उनकी बात सुन्न घर को वापस लौट आएगी. पर यहाँ तोह दिनेश ने अलग hi घोषणा कर दी थी.

उन्हें समझ आ चूका था की शायद उन्हें धेरर सारे पापड बेलने पड़ेंगे.

सुमित्रा : समधी जी... देखिये... ऐसे आप...

दिनेश : देखिये! में अपने निर्णय में पूरी तरह से दृढ़ता रखता हु और उस पर कायम रहता हु. मुझे अपनी बेटी पर पूरा भरोसा है. वो जो भी डिसिशन लेगी, बोहत hi सोच समझ कर लेगी.

और इतना बोल दिनेश अंदर जाने लगा...

रोहिणी : S-Suniye...! आप!???

पर दिनेश न रुका और वो अंदर की ऑर्डर चल दिया.

अब कमरे में केवल करुणेश, सुमित्रा और रोहिणी hi रह गए थे.

और शायद वो अटपटा सा माहौल...

***

Ragini's ओन हाउस...

वीर इस वक़्त अपने कमरे में फ़ोन पर सवालों के जवाब देने में लगा हुआ था.

वीर : बोलै न... अचानक hi हुआ सब कुछ...

काव्य : ओह्ह अच्छा!? अभी अभी मुझे आरोही दी ने नेवसपपेर की ये फोटो दिखाई है आपकी. और में दावे के साथ कह रही हु की ये आप हो.

वीर : अरे बाबा तोह मेने कब मन किया की में नहीं हु. ी एग्रीड राइट!?

काव्य : वही टोह्हह्ह्ह्ह!!!! क्यूँउउ!? क्यों हो आप वह पर!? एंड who's शी!?? व्हाई she's सो हॉट!? व्हाई इस शी सिटींग बेसीडे यू!??? वो कैसे जानती है आपको? वेट! व्हेन दीद यू गाइस मेट एच इतर!?

वीर (शिघ्स) : कलम डाउन काव्य!

काव्य : No वाययययययय! भैया! में और आरोही दी 4-5 दिन आपसे बात क्या नहीं किये आप बिना बताये हमको दिल्ली भी होक आ गए!? हँ!? और मुझे आपके बारे में नेवसपपेर से पता चल रहा है!? क्यों??? में hi क्यों हमेशा ुपत के कॉल करती हु? आप भी तोह कॉल कर सकते थे न? पता है? में कितना बिजी थी!??? मेरे असाइनमेंट्स और फिर विवा कॉलेज में... फिर वो प्रोजेक्ट और प्रेजेंटेशन अलग... ी वास् सो बिजी... और हर्र बार में hi कॉल करू!? हाँ!?

'फुककककक! She's माध!!'


[:लाफिंग: ]

वीर (प्यार से) : काव्य!

काव्य : ...

वीर : काव्य मेरी प्यारी छोटी बहिन...

काव्य : मम...

वीर : सब कुछ अचानक हुआ बहना... रही बात वो कौन है? तोह नेवसपपेर में तोह दिया hi होगा. ः~ बूत... She's माय फ्रेंड. Okay!? अब मिल गए सवालों के जवाब!?

काव्य : हम्फ!!!

वीर : अरे....! फाइन! तोह तय रहा... वीकेंड में किसी एक दिन... तुम और में. केवल हम दो. कही घूमने चलेंगे. Okay!?

काव्य : प्रॉमिस!?

वीर (स्माइल्स) : प्रॉमिस!

काव्य (स्माइल्स) : एसससस! ी विल वेट. Don't फॉरगेट okay हाँ भैया!?

वीर : ी won't...

काव्य (स्माइल्स) : गुड! B-Bye!

वीर : हम्म...!

और कॉल कट होते hi वीर ने एक राहत की सास ली.

काव्य तोह पूरी चलता फिरता रेडियो थी. एक बार शुरू तोह फिर रुकने का नाम hi नहीं लेना उससे.

वीर कुछ देरर अपनी प्यारी बहना के बारे में सोचने लगा और उसके होंठो पे एक मुस्कान सज गयी.

पर दिमाग में कुछ अन्य बातो का ध्यान आते hi उसकी वो मुस्कान अगले hi पल एकदम से छूमंतर हो गयी.

कारण था...

वो नया मिशन. जो उससे कल मिला था जब वो सुहाना के साथ होटल में मौजूद था.

और वो मिशन था~

[Mission : Stop the vehicle at all costs.


लोकेशन : डे आफ्टर टुमारो ात क्सक्सक्सक्सक्सक्सक्सक्सक्स स्क्वायर.

11:00 पं - 12:00 ऍम.

रिवार्ड्स : ??? पॉइंट्स.

मिशन फेलियर पेनल्टी : 2500 पॉइंट्स डिडक्शन.]

मिशन कितना इम्पोर्टेन्ट था ये तोह उसके फेलियर की पेनल्टी देख के hi अंदाजा लगाया जा सकता था. ऐसा पहली बार हो रहा था की सिस्टम उस से 2500 पॉइंट्स का डिडक्शन मांग रहा था.

यदि मिशन फ़ैल तोह वीर को 2500 पॉइंट्स चुकाने पड़ेंगे. वैसे hi पॉइंट्स की तंगी चल रही है उसके साथ. ऊपर से यदि ये मिशन फ़ैल हुआ तोह वो तोह साड़ी ज़िन्दगी यही चुकाने में लगा रहेगा.

बात सिंपल थी. मिशन वास् दमन इम्पोर्टेन्ट.

'ये कौन सी व्हीकल है बूत...!? जिससे मुझे रोकना है? एंड व्हीकल के बारे में डिटेल्स क्यों नहीं दी गयी है? वेट! राइट! मिशन विल गेट अपडेटेड!'

[Yes!]

'ी मस्ट प्रेपर...'

[Nahi kar sakte...]

'क्यों!?'

[It's the time for your Date! :D ]

'फुक्ककककक! राइट! मेने श्रेया जी को प्रॉमिस किया था उन्हें पार्टी देने का. और ये सब क्या लगा रखा है हाँ!? डेट नहीं है. I'm जस्ट गिविंग हेर माय बर्थडे पार्टी.'

[Kya aap ishaara nahi samjhe master!? Ohh my sweet and innocent master. I really love you so much. ❤️ How can you be so innocent!? Ek ladki aapse party maang rahi hai. Upar se fir kehti hai ki keval hum dono hi chalenge! Fir ye bhi kehti hai ki hotel me khaane ke pehle movie bhi dekhenge saath me. Yaha tak ki Juhi ko bhi usne aane se mana kar diya. And you don't even know ki kya chal raha hai!? Oh! My poor Master! :angrysad: ]

'W-Wait!!!'

पारी की बात सुन्न इस बार वीर की बोलती बंद रह गयी. भले hi उसका इंटेलिजेंस बढ़ गया था. पर लड़कियों के इन् सटल से इशारो को समझने में अभी भी उससे काफी लेसंस लेने बाकी थे.

***

शाम के समय वीर और श्रेया निर्धारित समय पर मिले. दोनों hi मूवी एन्जॉय किये और अब समय था खाने का.

आलरेडी 7:30 बज चुके थे और श्रेया को जल्द hi घर लौटना था इसलिए उसने जल्दी hi डिनर करने को सुग्गेस्ट किया.

घर पर केवल निधि और जूही hi थे और श्रेया नहीं चाहती थी की वो यहाँ अकेले लेट नाईट तक एन्जॉय करती फर्रे.

श्रेया : उम्... तुम्हारे और दी के बीच कुछ झगड़ा हुआ क्या!?

वीर : H-Huh!? N-Nahi तोह!? ऐसा क्यों लगा आपको?

श्रेया : वो... कल जब तुम चले गए थे घर से तोह... मेने उनसे सवाल किया था की वीर कहा गया.

वीर : तोह!?

श्रेया : तोह उन्होंने... थोड़ा रूडली कहा... ी मैं मुझे ऐसा फील हुआ की उन्होंने रूडली कहा... क्युकी में उन्हें जानती हु. उनकी राग राग से वाक़िफ़ हु में. उन्होंने कहा था की... वो चला गया अपने घर. अपनी भाभी के घर.


वीर (फ्रोंस) : ी सी!

श्रेया : मेने फिर पूछा था की... अचानक क्यों चला गया!? कुछ खा के क्यों नहीं गया!? तोह फिरसे उसी टोन में उन्होंने मुझे जवाब दिया की... चला गया! जब उसका मैं होगा तोह आएगा खुद. में कौन होती हु रोकने वाली... अपनी मनमानी तोह शुरू से करता आया है वह.

वीर : शी साइड थिस!?

श्रेया : Y-Yeah! इसीलिए मेने पूछा तुमसे... कल कुछ...

वीर (स्माइल्स) : No! नथिंग हप्पेनेड!

श्रेया : O-Okay! मय्बे शायद फ़्रस्ट्रेशन को लेकर उन्होंने वो सब कहा. ी क्नोव की she's क्लेअर्ल्य ुँहप्पय बिकॉज़ यू डीडेड तो लीव थे हाउस. बी
ुत... वो हमेशा तुम्हारा भला hi चाहेंगी वीर. यू क्नोव आईटी राइट!?

वीर (स्माइल्स) : ऑफ़ कोर्स!

वीर का पॉजिटिव रिस्पांस देख, श्रेया के चेहरे पर जो चिंता थी वो गायब हो गयी और एक राहत भरी मुस्कराहट बिखर गयी.

अगले hi पल उसने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और उसकी हथेली वीर की उंगलियों पर रेंगती हुई चढ़ने लगी.

आहिस्ता से अपना हाथ वीर पर रख वो उसकी आँखों में hi देख रही थी. एक पल के लिए वीर ने अपने हाथ को देखा जिसके ऊपर श्रेया की हथेली राखी हुई थी और फिर उसके चेहरे को. हथेलियों का एक दूसरे से स्पर्श hi दोनों के बदन में एक अलग सी झुरझुरी पैदा कर रहा था.

श्रेया : वीर...!

वीर : हम्म!?

श्रेया : Y-You क्नोव...

वीर : ??

श्रेया : थैंक यू! लिखे... रियली... थैंक यू!

वीर : किस लिए!?

श्रेया : फॉर किंग ईंटो आवर लिव्स...

वीर (सुरप्रीसेड) : ??

श्रेया : यू don't क्नोव... बूत... तुम्हारे आने के बाद से... तुम्हे पता है हमारी लाइफ में कितने चंगेस आये!? और वो भी अच्छे चंगेस... यू चामे... दी कितनी खुश लगने लगी थी. उनका समय चिंता में काम और परिवार के साथ बैठ बातें करने में ज़्यादा व्यतीत होने लगा था. जूही को उसके नए मामू मिले. कितना खिला खिला रहता था उसका चेहरा हमेशा. उन् दोनों को hi जैसे एक अच्छा दोस्त मिल गया था...

वीर : और आपको!?

वीर के पूछते hi श्रेया का बदन सिहर उठा और उसने अपनी नज़रे वीर के चेहरे पर से हटा लिया. शायद... ये शर्म थी!

और बिलकुल... अगले hi पल उसके गाल गुलाबी होना शुरू हो गए. धीरे से उसने ऊपर निगाहें कर वीर को देखा और हौले से बुदबुदायी...

श्रेया (ब्लशेस) : M-Mujhe भी बोहत कुछ मिला. नया दोस्त. या कहु... बोहत ख़ास दोस्त...!?

वीर (स्माइल्स) : शामे हेरे!

श्रेया : यू...

वीर : ??

श्रेया : यू शुड के बैक. राइट!? वीर... दी... वे आल क्नोव की... ध्रुव को वापस लाना इम्पॉसिबल है. तुम्हारे घर पर रहने से ऐसा नहीं होगा की दी की सेविंग्स बढ़ जाएंगी और वो 50 लाख जोड़ लेंगी. ी हेट तो से आईटी बूत it's इम्पॉसिबल फॉर हेर. सो... हम खुशियों के साथ क्यों भेद भाव करे!? यू... तुम्हारे घर में होने से रौनक बढ़ गयी थी वीर. शी रियली मिसेस यू. ी कैन तेल्ल. जूही भी... तोह तुम फिरसे आओगे तोह एटलीस्ट... एटलीस्ट दी फिरसे खुश तोह रहने लगेंगी? कुछ खुशिया तोह रहेंगी... काम से काम उन्हें अक्सर मुस्कुराता हुआ तोह देख पाऊँगी में... ी क्नोव की तुम ये कर सकते हो... वीर!? यू विल के राइट!? R-Right!?

श्रेया थोड़ा बेचैन होने लगी. उसका यु डेस्पेरेट होना एक इशारा था. इशारा की वीर के आने से निधि की ज़िन्दगी में कितना कुछ अंतर आया था.

और एक इशारा ये भी की... श्रेया अपनी बहिन निधि से कितना प्यार करती है.

वीर : ये... पॉसिबल नहीं है श्रेया जी...

पर उसका जवाब जैसे श्रेया के दिल को तोड़ के रख दिया.

श्रेया : K-Kyuuuu!??? आखिर! तुम अपनी भाभी के घर hi तोह रह रहे हो न? यू कैन के बैक थें राइट? नथिंग विल चेंज ात आल... हम सभी वापस से जैसे पहले घर में मस्ती कर एक साथ रह रहे थे वैसे hi फिरसे...

श्रेया किस हद्द तक अपने बिठाये गए उन् दिनों के बारे में सोचा करती थी ये आज उसकी बातो से साफ़ झलक रहा था. शी रियली ट्रेझड़ ठोस डेज. पर शायद उससे एक गलत फेहमी भी हो चुकी थी. या वो एक कुए में थी और ये भूल गयी थी की उस कुए के बाहर भी बोहत बड़ी दुनिया है.

और वीर के मुँह से आये अगले hi कुछ शब्दों ने जैसे उसकी ये नकली दुनिया को उजेड कर रख दिया.

वीर : रियलिटी में आइये श्रेया जी! समय आगे बढ़ता जा रहा है. कभी भी पीछे नहीं जाता समय. निधि ma'am... आज नहीं तोह कल... उनका डाइवोर्स का डिसिशन आ जाएगा... ध्रुव को पाती है या खोटी है... ये वक़्त hi बताएगा... सब कुछ बदल रहा है. It's डेस्टिनेड तो चेंज...

श्रेया : में... में नहीं चाहती...

अपने निचले होंठ को भींच श्रेया मौन हो गयी और उसकी आँखें नाम हो चली.

वो जैसे इन् सब पर पर्दा फेक के अपनी दुनिया में जीना चाह रही थी. जहा उससे एक आस थी... की एक दिन वीर फिरसे लौट आएगा, फिर से वो चारो निधि के फ्लैट में उसी तरह से दिन बिताएंगे... और आगे चलके शायद... कुछ और भी!? वो अपने मैं में hi ख़याली पुलाव पका रही थी. और जब उससे इस बात का एहसास हुआ की गुज़रा समय वापस लौट कर कभी नहीं आने वाला है. ज़ाहिर सी बात थी... वो अपने आसुओ को रोक न पायी.

वीर : वे शुड जो नाउ. निधि ma'am और जूही अकेले है घर पे... और आपको जाना है जल्दी राइट!?

श्रेया केवल एक नोद दी और उठ के कड़ी हो गयी.

ये डेट भले hi उतनी khush-haal न गयी हो पर...

पर श्रेया खुश थी. उसके और वीर के बीच ऐसे कोई भी गीले शिकवे नहीं थे. वो दोनों hi एक दूसरे को काफी अच्छी तरह से अंडरस्टैंड करने लगे थे अब.

जाने से पहले श्रेया ने उससे एक बार फिर देखा. वो दोनों hi सोसाइटी के ठीक बाहर मौजूद थे.

श्रेया : थैंक्स फॉर थे डा... पार्टी!!! थैंक्स फॉर गिविंग में पार्टी.

वो मुस्कुरायी.

वीर (स्माइल्स) : इसमें केसा थैंक्स!? दोस्त को पार्टी मांगने का पूरा हक़ है.

श्रेया (स्माइल्स) : राइट!

वीर : ....

श्रेया : उम्....

वीर : ??

श्रेया : तोह!? तोह कब मिल रहे है हम नेक्स्ट!?

वीर : जब आप और में दोनों hi फ्री रहे!? रेमेम्बेर!? यू अरे नाउ ान एम्प्लोयी. अब जॉब लग चुकी है आपकी...

श्रेया : येह!!! Okay थें... में तुम्हे बता दूंगी ... जब भी में फ्री रहूंगी... वे... वे विल हैंग आउट टुगेदर.

वीर : सूरे!

श्रेया : तुमने...!? तुमने मेरी दी हुई केयरिंग भी लगा ली!?? I'm रियली हैप्पी!

वीर (स्माइल्स) : ऑफ़ कोर्स!

श्रेया : Okay bye!

वीर : bye...

बेचारी श्रेया न जाने कितनी देरर से कुछ करने का या कहना का प्रयास कर रही थी. पर फाइनली शायद उससे मौका मिल hi गया.

वो इतनी तेज़्ज़ी से आगे झुकी और वीर के गाल को चूम कर पलट कर पूरी फुर्ती में भाग गयी.

वीर जाता हुआ उससे देखता रहा और वो केवल एक hi काम कर पाया.

'चेक फवौराबिलिटी'

*डिंग*

[Shreya's favourability : 64]

'पारी!'

[Hmm?]

'क्या तुमने निधि ma'am की फवौराबिलिटी चेक की थी?'

[It's 50!]

कल जो कुछ भी हुआ था. ज़ाहिर सी बात थी की फवौराबिलिटी में अंतर आना hi था.

अपने उदास मैं को ठीक कर वीर लौट चला.

***

नेक्स्ट डे...

ात नाईट...


[Master!]

'हम्म्म!'

[You took everything right!?]

'येह! पॉकेट नाइफ भी रख ली है, लाइटर, माय वाच, वॉलेट, और बस...'

[Mera matlab pocket knife se hi tha.]

'हम्म!'

[Let's go!]

बतायी गयी डेस्टिनेशन पर वीर आलरेडी पहुँच चूका था.

समय रात में लगभग 11 हो रहा था.

उससे नहीं पता था की किस गाडी को रोकना है. बस इतना पता था की ये गाडी रोकना है चाहे कुछ भी हो जाए. और यहाँ तक की अभी तक मिशन अपडेट नहीं हुआ था.

घर पर वो सुमन को बता के आया था की वो किसी काम से जा रहा है और सुमन ने अपने मालिक से फिर कोई सवाल नहीं किये. रागिनी आज थकान के चलते पहले hi काफी थक चुकी थी तोह उसकी कब नींद लग गयी उससे पता hi न चला.

तोह वीर ने सुमन को इन्फॉर्म करना hi ठीक समझा.

'फुक्कखकक! इतनी ठण्ड बहनचोद!!!'

[Hmm... It's really cold!]

'व्हाई थे फ़क मिशन इस नॉट गेटिंग अपडेटेड!?'

[I-I don't know! Sabr rakhiye...]

*डिंग*

[Mission : Follow the black limousine and stop it at


आल कॉस्ट्स.

(वार्निंग : Don't हरम थे ओने प्रेजेंट इनसाइड.)

लोकेशन : क्सक्सक्सक्सक्सक्सक्सक्सक्स स्क्वायर.

रिवार्ड्स : ??? पॉइंट्स.

मिशन फेलियर पेनल्टी : 2500 पॉइंट्स डिडक्शन.]

[Ye lijiye... Master! Ho gaya update.]

'लिमो व्हाट!??? ी हैवे तो फॉलो ा लिमोजीन!? और ऐसे करना है की अंदर व्यक्ति को हानि न पहुचे!? शीट्ट्ट्ट!!! मुझे नहीं पता अंदर कौन है और कितने लोग है. वो अच्छे है या बुरे!?'

[Mask lagaiye!]

'येह!'

और तभी...

अगले hi पल...

चौराहे के एक मोड़ से एक काली लिमोजीन निकली...

ये पहली बार था जब वीर लाइव किसी लिमोजीन को देख रहा था.

ऊपर से रात के 11 बज रहे थे. ट्रैफिक था... पर उतना नहीं.

*वरूँऊऊऊम्मम*

अपनी अपाचे को रेस देकर...

वीर ने अगले hi पल अपनी बाइक लिमोजीन के थोड़ा पीछे लगा दी.

कार की विंडो टिंट एकदम आपके थी. अंदर का कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था.

'वेट!!! थिस इस इललीगल...'

विंडो टिंट की भी एक लिमिट होती है. अब्सोलुटे आपके रखना इललीगल काम है और पुलिस ने देखा तोह पक्के से पकड़ेगी.

ये बात वीर जानता था. पर उसके बावजूद... ये लिमोजीन में... विंडोज टिंट्स पूरी काली थी. अंदर का कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था.

और वीर के अंदर की घबराहट वो अपारदर्शी विंडो टिंट्स बढ़ाते जा रही थी.

जैसे जैसे गाडी सुनसान रास्ते पर जाती जा रही थी. वीर का शक बढ़ता जा रहा था.

उससे लगने लगा था की कार के अंदर बैठा व्यक्ति शायद उसका शुभचिंतक नहीं था.

पर उसका मिशन था कार को रोकना.

जब लिमोजीन एक अनजान से सुनसान अँधेरे रास्ते में घुसी तोह अगले hi पल वीर ने अपाचे को रेस दिया...

*वरूँऊऊऊम्मम्मम*

और वो कार के आगे आया और कुछ hi दुरी पर उसने...

*स्क्रीईईएक्सछहहहहह*

ज़ोरदार ब्रेक मार बाइक का पिछले चका थोड़ा स्किड कराते हुए उसने बाइक एकदम बीच सड़क में आदि कड़ी करदी.

अचानक सामने आये व्यक्ति को देख, कार वाले को भी एकदम से कार रोकनी पद गयी.

और कुछ देरर तक अत्यंत hi सन्नाटा सा छ गया.

वीर की बाज जैसी नज़रे कार पर hi तिकी हुई थी. भले hi उससे कुछ नहीं दिख रहा था पर...

पर वो पूरी तरह से चौकन्ना था.

और एक इंटेंस अट्मॉस्फेरे बन्न गया वह...

रात के अँधेरे में... चाँद की रौशनी पूरी तरह से बरकरार थी जिसके चलते वो रौशनी कार की विंडोज पर रिफ्लेक्ट हो रही थी.

और वीर को जिस बात का डर था... अगले पल वही हुआ.

*क्लिक*

दरवाज़ा खुला... और अंदर से...

करीब 8 से 10 लोग बाहर निकले. सभी काली शर्ट और काली जीन्स पहने हुए थे.

उनको देख वीर अगले hi पल चौकन्ना हो गया. क्या उनके इरादे नेक थे या...!???

*वहूऊऊससस्शह्ह्हह्ह*

अगले hi शान... एक वुडेन स्टिक उसकी तरफ उड़ती हुई आयी और...

*डॉज*

अपना सर्र साइड कर उसने खुद को बचा लिया.

और जो डाउट वीर को था वो दूर हो चूका था. वो उसके शुभचिंतक तोह कतई नहीं थे.

[Get ready to fight!!!!]

'येअहहह!'

वो सभी बिना रुके आगे बढे...

एक कदम... दो कदम... और फिर तोह सीधा दौड़ hi लगा दी उन् सभी ने.

सभी के हाथो में कोई न कोई हथियार था. भले hi गन नहीं थी पर मिली वेपन्स ज़रूर थे. लकड़ी का बात हो या हॉकी हो या स्टिक हो...

सबके हाथ में एक न एक चीज़ थी.

[Here he comes...]

"Haaaaaaaaaaa~"

आदमी चिल्लाते हुए गुस्से में आया और उसने फौरन hi वीर के सर्र पे अपना बात घुमाया.

*वहुवुस्सशहठ*

'हम्फ...!'

*डॉज*

पर... वो अटैक वीर ने साइड लेअन होते हुए डॉज कर लिया. उसको सँभालने का मौका न देने के लिए वीर ने अगले hi पल अपने सर्र के बगल से गुज़रे उसके हाथ से उस बात को थामा और अपने दूसरे हाथ को फिस्ट बना के बैक फिस्ट उसके गाल पर जड़ दी...

"ुघ्हहहह!!"

वो लड़खड़ा के पीछे हुआ पर तब तक वीर अपना काम कर चूका था. उसके हाथो में बात आ चूका था.

"मारो साले को..."

एक चिल्लाया और आगे आया...

*वहुवोष* *स्वीीिस्सस्सशहठ* *वहूउससष्ठ*

*डॉज* *डॉज* *डेफ्लेक्ट*

उसने तीन वार किये पर तीनो वार... वीर ने दो को आसानी से डॉज कर लिया और तीसरे को पूरी तरह से डेफ्लेक्ट कर दिया. बोले तोह वार का निशाना hi बदल दिया. जिस कारण उस बन्दे की हॉकी स्टिक उसके अपने साथी को जा के लग गयी.

और उन् दोनों में खुद की लड़ाई शुरू हो गयी.

एक और आदमी आगे बढ़ा...

जो की पूरा मैडमैन लग रहा था. रोड को इधर से उधर बस जोरर जोरर से घुमाते हुए वो आगे आया.

और लोहे की रोड पास आती देख वीर की आँखें एकदम चौकन्ना हो गयी.

उसने अगले hi शान एक बैकफ्लिप मारी...

और फिर लगातार तीन बैक सोमरसॉल्ट...

ये एक्रोबेटिक्स और ये मूवमेंट्स अपने आप निकल रहे थे. कारण था बेसिक मार्टिकल आर्ट स्किल्स.

जहा वो आदमी वीर को देख सुरप्रीसेड थे. वही वीर खुद सुरप्रीसेड था अपने इन् मूवमेंट्स को लेकर.

बात तोह उसने कबका फेक दिया था. उनके लिए... आज उसकी फ़िस्ट्स hi काफी थी.

उसने एक मार्टिकल आर्ट स्टान्स को होल्ड किया और अपने हाथो को इशारा कर उन्हें बुलाया.

वीर : के नाउ... पुप्पीस...

उसके बाद तोह... उस सुनसान रास्ते पर बस उन् आदमियों की कराह गूंजने लगी.

एक एक करके वीर ने इस बार शातिरता से लड़ाई की.

एक साथ नहीं उलझा... उसने उनको दूर ले जा ले जा कर 2 से 3 तोह कही 3 से 4 लोगो से फाइट ली.

इस बार वो पहले से कही ज़्यादा फोकस्ड था. अपनी गलती को दोहराना नहीं चाहता था.

आखिरी आदमी से भिड़ते वक़्त...

अचानक hi उससे पता नहीं क्या हुआ की...

उसने उस आदमी के अटैक्स स्मूथली डॉज किये और फिर उसका हाथ अजीब तरीक से खुला.

और जाके ठीक उस आदमी के सीने से एक इंच की दुरी पर रुका.

केवल एक शान के लिए...

एक शान के लिए उसकी वो खुली हथेली आदमी के सीने से एक इंच की दुरी पर रुकी...

और अगले hi पल...

उसके मुँह से अपने आप कुछ शब्द निकले...

"ओने इंच पंच..."

और नेक्स्ट मोमेंट hi... उसकी खुली हथेली एक फिस्ट में तब्दील हुई और...

*Poooooowwwwwwwwwwwwww*

वो आदमी इतनी तेज़्ज़ी से उचकते हुए हवा में उड़द पीछे गिरा और इतनी दूर गिरा की वीर की खुद की आँखें आश्चर्य के मारे फटी रह गयी...

[Rambo it... Master!!! Hell yeah!!! That was so good.... Yes! Its here... One inch punch!!!]

'Y-Ye!?? डमनणणणण....!'

बस बाकी था... तोह वीर जो अचरज में वह खड़ा हुआ था अभी भी अपनी फिस्ट होल्ड किये और बाकी आदमी... जो कराहते हुए सड़क पर डेल हुए थे.

वीर ने खुश होते हुए एक राहत की सास ली...

पर ...

*क्लैप* *क्लैप* *क्लैप*

अपने जस्ट पीछे से ये आवाज़ सुन्न उसका शरीर काँप उठा.

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आज के लिए इतना hi गाइस!

धन्यवाद! 😁

Don't फॉरगेट तो लिखे एंड शेयर योर थॉट्स!
 
अपडेट-48~ मिस्ट्री एंड प्लान

अब तक...

'Y-Ye!?? डमनणणणण....!'

बस बाकी था... तोह वीर जो अचरज में वह खड़ा हुआ था अभी भी अपनी फिस्ट होल्ड किये और बाकी आदमी... जो कराहते हुए सड़क पर डेल हुए थे.

वीर ने खुश होते हुए एक राहत की सास ली...

पर ...

*क्लैप* *क्लैप* *क्लैप*

अपने जस्ट पीछे से ये आवाज़ सुन्न उसका शरीर काँप उठा.'


अब आगे...

अचानक आयी उन् तालियों की आवाज़ जैसे उस सुनसान सड़क में गूंजने लगी और वीर के रौंगटे खड़े हो गए. कुछ शान के बाद hi तालियों की गूँज थम गयी और सब कुछ शांत पद गया.

एकदम एकांत सा...

और फिर वीर धीरे धीरे पलटा...

उसने सामने देखा और जैसे hi उसकी नज़रे सामने हुई....

उसकी आंखें फटी की फटी रह गयी.

उस लिमोजीन से एक व्यक्ति निकल के बाहर आया था. फ्लोरल शर्ट, ब्लेजर, ट्रॉउज़र, ब्लैक फॉर्मल शूज और बस. उसके हाथो में कुछ नहीं था. वीर इस व्यक्ति से कभी नहीं मिला था. न hi उससे जानता था. पर उसके सामने खड़ा ये व्यक्ति, पता नहीं क्यों पर वीर को उससे देख के hi खतरे की घंटी सुनाई दे रही थी.

कुछ गड़बड़ थी.

वीर को ऐसा महसूस हुआ जैसे इस वक़्त उसको यहाँ नहीं होना चाहिए था.

ये वही व्यक्ति था. वही व्यक्ति...

जिससे वीर ने उस दिन सुहाना के साथ होटल में देखा था. उस लिफ्ट में. बिलकुल!!!!

वीर की मेमोरी शार्प थी. उससे बखूबी याद था की ये वही इंसान था जो उस दिन लिफ्ट में था. आखिर कैसे वीर उससे भूल सकता था!?

वो फ्लोरल शर्ट... उस आदमी के ड्रेस उप की सबसे eye-catching चीज़ थी. जिससे आदमी एक नज़र में आसानी से भूल hi न पाए.

पर सबसे बड़ा सवाल था. वो आखिर यहाँ कर क्या रहा था!? इन् आदमियों से उसका क्या लेना देना था?

दोनों की निगाहें एक दूसरे को ऐसे स्कैन कर रही थी जैसे मानो एक दूसरे को लड़ने से पहले परख रहे हो.

वीर : T-Tum...!!

आदमी : *स्माइल्स*

वीर के रिस्पांस पर वो आदमी कुछ नहीं बोलै बस मुस्कुराया. पर किसी कारण वश वीर को उस आदमी की मुस्कराहट और भी ज़्यादा खतरे के संकेत दे रही थी.

उसकी बॉहे अपने आप सिकुड़ी... और उसने फिरसे पूछा.

वीर (फ्रोंस) : तुम सब कौन!? एंड यू... यू वेरे तेरे इन थे एलीवेटर तहत नाईट.

आदमी (स्माइल्स) : ओह्ह! बेशक! तोह में याद हु तुम्हे!? गुड! गुड! तोह में भी अपना इंट्रो दे दू. राइट!? सो... वेल! ी जो बी थे नाम ऑफ़...

वीर (गुलप्स) : ...

आदमी (स्माइल्स) : स्लोगन!!!

वीर (फ्रोंस) : स्लोगन!?

वीर ने उससे देख एक शान भी वास्ते नहीं किया और सीधे...

'चेक!'

पर...

[You are not eligible to view this person's status.]

एक और बड़ा झटका लगा उससे.

सामने खड़ा व्यक्ति जो करीब 55-60 साल की उम्र का था पर उतने का प्रतीत नहीं हो रहा था. वो मुस्कुराते हुए वीर को ऐसे देख रहा था जैसे उसकी साड़ी छाले जानता हो.

वीर (फ्रोंस) : ये सब तुम्हारे आदमी है!?

स्लोगन : बिलकुल बिलकुल! पर यहाँ पे सवाल तोह मेरा होना चाहिए न!? तुम मेरी गाडी के सामने आये और गाडी रोकी... तोह ज़ाहिर है की मेरे आदमी तुम्हे दुश्मन hi समझेंगे न?

वीर : T-That...

स्लोगन : तोह क्या में जान सकता हु? एक अनजान लड़का मेरी गाडी को इतनी रात गए फॉलो किया और फिर सामने अपनी बाइक रोक मेरे आदमियों से लड़ा. अब इस पर अपने विचार रखना चाहोगे तुम?

'There's समथिंग रॉंग...!!! ी कैन फील आईटी. ी कन्नोत से की मुझे मिशन मिला था.'

[Ye aadmi mujhe creepy vibes de raha hai Master! Ugh!]

वीर (फ्रोंस) : ी थिंक... तुम और तुम्हारे आदमी कुछ इललीगल काम कर रहे है. गाडी की विंडो टिंट्स इतनी ब्लैक क्यों है!? ट्रांसपेरेंट क्यों नहीं!? थिस इस इललीगल.

वीर ने कुछ सोच के ये जवाब दिया. क्युकी ज़ाहिर सी बात थी. मिशन था की गाडी में अंदर ठहरे व्यक्ति को चोट न आये. मतलब साफ़ था, की गाडी में कोई ऐसा शख्स था जिससे हरम न पहुँच पाए.

और ये लोग गाडी की विंडो टिंट्स एकदम काली रखे हुए थे. वीर इन् सब बातो को परखने के बाद, उसका अनुमान एक hi जगह पर जा रहा था.

तहत...

थिस वास् ा किडनेपिंग!!!!

एंड समवन वास् इनसाइड....

ज़रूर! ज़रूर कुछ गड़बड़ थी. वर्ण ऐसा मिशन में लिख के नहीं आता. वो भी वार्निंग में लिख के आया था.

पक्के से इस आदमी ने किसी को अगवाह किया है और विंडोज का यु काला होना कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं था बल्कि जान बूझ के उनके शीशे काले थे ताकि अंदर क्या हो रहा किसी को भी कुछ पता न चले.

और इतने आदमी शामे ड्रेस पहने हुए!? ज़ाहिर सी बात थी. तेरे वास् समथिंग डेफिनिटेली रॉंग.

बूत व्हाट वास् आईटी!???

ऐसा क्या था जो सेंस नहीं बना रहा था? इसका जवाब jaan'ne के लिए वीर को केवल उस लिमोजीन के अंदर देखना था और बस... सारा का सारा सच एक बार में सामने आ जाता.

स्लोगन : में इललीगल काम कर रहा हु? ये विंडोज सेफ्टी पर्पस के लिए है. और ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट से परमिशन भी है मेरे पास... तोह भला क्यों नहीं!?

वीर की कुछ समझ नहीं आ रहा था. क्या ये व्यक्ति वाक़ई बेगुनाह था!? क्या उसका hi सिस्टम बहक रहा है!?

वीर : मुझे अंदर देखना है... सुरेली! यदि कुछ इललीगल नहीं है अंदर तोह... यू won't मंद राइट!?

स्लोगन : एहम!!! पर क्यों!? क्यों देखने दू भला में? में चाहु तोह अभी तुम्हारे खिलाफ कंप्लेंट कर सकता हु... आखिर देखो! तुमने कितने आदमियों को मारा है यहाँ मेरे...

'थिस doesn't मैक्स सेंस ात आल... दमन ित्त्त!!!!'

[This guy... Master!!!! Iski baato me mat ulajhiye... I can feel it. Ye baato me uljha raha hai.]

'ी क्नोव आईटी पारी!!'

वीर : मुझे बस अंदर देखना है. आखिर में कंसर्नड था और इसलिए फॉलो किया... सो यदि कोई इललीगल काम नहीं है तोह... यू shouldn't मंद राइट!?

स्लोगन : वेल!!! ठीक है... हैवे ा लुक...

और वो लिमोजीन के दरवाज़े से साइड हट गया और वीर को अंदर देखने के लिए परमिशन दे दिया.

आहिस्ता आहिस्ता और सतर्कता से भरे कदम बढ़ाते हुए वीर उन् आदमियों और उस स्लोगन के पास से गुज़रा और उसने जैसे hi अंदर झांक के देखा...

तोह उससे नज़र आया, एक लड़की अच्छी सी ड्रेस पहने हुए बैठी हुई थी. कही से भी वो ऐसी नहीं लग रही थी जो किडनैपेड की गयी हो.

वीर : ???

लड़की : हम्म!?

वीर : आपका नाम!?

लड़की : हँ!? व्हाई शुड ी तेल्ल यू? और तुम्हारे hi कारण कार रुकी है न? तुमने hi अंकल के आदमी को मारा न अभी? गेट लॉस्ट okay!? I'm इन माय वे तो होम...

पर उस लड़की का जवाब सुन्न वीर तोह एकदम हक्का बक्का रह गया था. ये सब चल क्या रहा था!? आखिर सिस्टम ने उससे ये कार रोकने के लिए क्यों कहा!?

वीर : Ma'am! आप सेफ है न!? ऐसा तोह नहीं की... ये सभी आदमी आपको मजबूर कर कही ले जा रहे है!?

लड़की : व्हाट थे हेलल? अरे यू माध और व्हाट? अब इस से पहले की में पुलिस को फ़ोन करू तुम निकल लो यहाँ से समझे!? अंकल चलिए न...! काफी नींद आ रही है मुझे.

वीर को लगा था की शायद उन् आदमियों के डर से ये लड़की सच छुपा रही होगी पर ऐसा तोह कुछ भी नहीं था. वो तोह पूरी तरह से नार्मल लग रही थी. आखिर क्या चल रहा था यहाँ पे!?

और इसलिए एक बार और कन्फर्म करने के लिए, वीर ने वही किया...

'चेक!'

[Name : Priya


आगे : 24

बायो : प्रिय! एक क्सक्सक्सक्सक्सक्सक्स कॉलेज की स्टूडेंट है. शी लव्स तो जो ईंटो थे पार्टीज एंड डांसिंग. थोड़ी सेल्फिश है. पैसो का गुरूर भी है. प्रिय के डैड एक रिच बिज़नेस मन है.

फवौराबिलिटी : 2

रिलेशनशिप : स्ट्रॉन्गेर्स]

पर स्टेटस पढ़ते hi वीर को एक और बड़ा झटका लगा. ये लड़की किसी भी डेंजर में नहीं थी. एवरीथिंग वास् कम्प्लीटली नार्मल.

थें व्हाई थिस मिशन!?

आखिर सिस्टम उस से करवाना क्या चाह रहा था!? यु इतनी रात गए किसी की गाडी रोकना? व्हाट थे हेलल वास् रॉंग विथ थिस सिस्टम!?

वीर ावक्वार्डली दरवाज़े से पीछे हटा.

स्लोगन (स्माइल्स) : अब यकीन हो गया!?

वीर : Y-Yeah... सॉरी फॉर तहत...

स्लोगन : यदि तुम्हारे इंटेंशन्स गलत होते न लड़के तोह तुम भारी मुसीबत में पद सकते थे.

वीर : Y-Yeah!!

और वीर वह से बिना कुछ कहे hi जाने लगा. उससे समझने के लिए अब एकांत माहौल चाहिए था ताकि वो समझ सके की ये सब बहनचोद हुआ क्या उसके साथ.

'पारी! घर पहुँच के... ी नीड ान एक्सप्लनेशन.'

[Even... I... I don't know master. System ne aisa Mission bhala kyu generate kiya hoga!? Jiska koi matlab hi nahi tha!?]

पर ये बात हमारी बेचारी पारी भी नहीं जानती थी. क्या वाक़ई सिस्टम ने एक सही मिशन गेनेराते किया था? या ये कोई इंटरनल मालफंक्शन था सिस्टम में!?

जो कुछ भी हो, इसका आंसर jaan'na वीर के लिए बोहत ज़रूरी था.

अभी वो अपनी बाइक उठा के के घुमा hi रहा था जब पीछे खड़े उन् लोगो की कुछ आवाज़ उसके कानो में पड़ी.

एक आदमी स्लोगन की तरफ मुदा और बोलै,

"उसने सही कहा था दादा... बिलकुल वैसा hi हुआ. ये तोह जादू की तरह है. उसको कैसे...!?"

पर इसके पहले की वो कुछ कह पाटा. स्लोगन का हाथ तेज़्ज़ी से घुमा और एक तमाचा उस आदमी के गाल पर पड़ा. बेचारे के कान में सीटी बजने लगी इतनी जोरर से वो झापड़ पड़ा था उससे और अगले hi पल वो शांत पद गया.

वीर ने एक बार फिर शंका में उन्हें पीछे मुद देखा पर फिर गाडी चालु कर वो निकल गया.

उसके जाने के बाद अब केवल स्लोगन और उसके आदमी hi बचे हुए थे.

स्टीव, स्लोगन का राइट हैंड आदमी जो काफी देरर से चुप था और उसके पीछे खड़ा हुआ था वो आगे आया अपने दादा से कुछ कहने के लिए पर जैसे hi उसने अपने दादा की आग बबूला आँखें देखि तोह उसके शब्द मुँह में hi रह गए.

स्लोगन : स्टीव!!!

स्टीव : J-Jii दादा!

स्लोगन : तैयारियां किसी चल रही है!?

स्टीव : सब तैयार है दादा!

स्लोगन : गुड!

स्लोगन अंदर लिमोजीन में बैठने जा hi रहा था जब स्टीव ने हिम्मत कर पूछ hi लिया.

स्टीव : D-Dada!!

स्लोगन : !??

स्टीव : U-Uss... उसकी बात सही निकली... बिलकुल वैसा hi हुआ... ये सब...!?

स्लोगन : आज तक... आज तक इस स्लोगन को कभी कोई दर्रा नहीं पाया है स्टीव. वो कोई छल किया है. देख लेंगे उससे भी.

और इतना बोल वो घुस गया कार में.

ये सब क्या बातें थी जो ये कर रहे थे!? किसके बारे में बातें थी ये? ये केवल वही जानते थे.

***

फ्यू डेज लेटर...

उस रात उस अजीब से मिशन के बाद, वीर की लाइफ कुछ शांत सी थी. सबसे स्ट्रेंज बात पर उस मिशन की hi थी.

उस रात जब वीर वह से लौटा तोह घर पॅहुचते hi उससे नोटिफिकेशन मिल गया था.

*डिंग*

['मिशन : फॉलो थे ब्लैक लिमोजीन एंड स्टॉप आईटी ात आल कॉस्ट्स' है बीन कम्प्लेटेड.]

*डिंग*

[200 points have been rewarded.]

ये जैसे और भी बड़ा सरप्राइज था उसके लिए. उससे उस मिशन के बारे में तोह कुछ जानकारी नहीं मिल पायी पर ज़रूरी बात ये थी की मिशन कम्पलीट हो चूका था और तोह और...

200 पॉइंट्स एकसाथ.

'उस रात... कुछ ऐसी चीज़ है पारी... जिससे हम देख नहीं पा रहे है. ी don't थिंक ये सिस्टम का कोई मालफंक्शन है. क्युकी इस से पहले कभी सिस्टम ने ऐसे बेहवे नहीं किया है.'

[I agree master! Wait I can do something.]

'क्या!?'

[Mein ek diagnostic run maar sakti hu. Uss se pata chal jaega ki system me kahi kuch kharaabi hai ya nahi!]

'दो आईटी राइट नाउ थें!'

वीर के निर्देश अनुसार पारी लग चुकी थी अपने काम में. सिस्टम को चेक कर रही थी. ताकि यदि कोई भी एरर हो तोह सामने आ जाए.

पर...

[Everything is fine Master. There's nothing wrong!]

'दमन आईटी!!! आईटी doesn't मैक्स अन्य सेंस. सिस्टम वांटेड में तो नॉट हरम तहत गर्ल. इसका मतलब कही मुझे केवल उस से मिलवाना तोह नहीं था!? बूत she's जस्ट ा रिच गर्ल. उसमे कोई ऐसी खासियत नहीं है. ी don't थिंक that's थे केस. वेट! कही... वो किसी ऐसे को जानती हो? जिस से फ्यूचर में मुझे मिलवाये वो!? और हमारी मुलाक़ात हो? इसलिए शायद सिस्टम ने मुझे उससे हरम न पहुचाने के लिए कहा!? बूत no... आखिर मिलवाने का मतलब क्या? ऊपर से मेरा पहला इम्प्रैशन hi बेकार था उसके लिए...'

[Kuch bhi ho master. Aapko ab pehle se zyaada alert rehna padega.]

'येअहहह! और तुम लेवल 5 से कितनी दूर हो?'

[I'm almost there. One more Mission aur mein level 5 pe hehe~]

'हम्म!'

[And you will get surprises then... Hehe~]

'हम्म? ऑफ़ कोर्स! हर्र लेवल उप पे कुछ न कुछ इंटरनल फीचर अनलॉक होता है. राइट!?'

[Yeah! Par iss baar aur bhi boht kuch hai. It will be a great surprise!]

'मेरी उमीदे न जगाओ.'

[I promise Master! You know how much I love you right? Jhooth thodi bolungi.]

'हम्म... ऑलराइट! Let's जो! सुहाना ने बिज़नेस के बारे में डिसकस करने बुलाया है. ी नीड तो ीर्ण मनी फ़ास्ट. मिस करा से मिलना पड़ेगा. She's दमन गुड इन बिज़नेस.'

[Yesssssss!]

***

शामे डे...

ात Veer's ओल्ड हाउस...

रात का वक़्त था. हॉल में hi घर के मुखिया मनोरथ विराजमान थे और एक नौकर उनके पेर्रो में तेल लगा के उनकी मालिश कर रहा था.

उसी हॉल में मौजूद काउच पर दोनों भाई, विवेक और प्रांजल बैठे हुए थे जो इशारो hi इशारो में न जाने क्या बातें किये जा रहे थे.

बृजेश अभी तक घर नहीं लौटा था और करुणेश भी. घर में सुमित्रा, आरोही और काव्य hi मौजूद थी औरतो में.

भूमिका और श्वेता, बोले तोह वीर की सौतेली बहिन और माँ दोनों hi अपनी होटल में थी और वो अक्सर रात में सारा काम काज वह का निपटा के hi घर लौटती थी.

काव्य और आरोही एक hi रूम में अपनी बातो में लगी थी और सुमित्रा घर की माइड के साथ खाने की तैयारी कर रही थी.

जब प्रांजल को मौका सही लगा तोह उसने अपनी बातें रखना चालू किया.

प्रांजल : दादा जी!

मनोरथ : हम्म?

प्रांजल : दादा जी! आप आखिरी बार हमारी कुल देवी के मंदिर कब गए थे?

मनोरथ : हम्म? अच्छा... बीटा कई साल हो गए.

प्रांजल : ये क्या दादा जी!? नया साल आ रहा है. और नए साल की शुरुआत में मेरे ख़याल से आपको उधर जाना चाहिए. में तोह बचपन में गया था. मुझे तोह याद भी नहीं वह का कुछ भी. क्यों न हम लोग वह होक आये!?

विवेक : छोटा सही कह रहा है दादा जी! आखिर... इतने साल हो हाय आपको खुद को गए. और में तोह लास्ट टाइम गया भी नहीं था. नए साल की शुरुआत यदि देवी जी के आशीर्वाद से हो तोह कितना बढ़िया रहेगा.

दोनों ने जब ये बात कही तोह मनोरथ को भी वाक़ई लगा की बात एकदम सही थी. जब नए साल में आदमी अच्छे धन, सुख, समृद्धि प्राप्ति की इच्छा करता है तोह सबसे पहले भगवान् को hi याद करता है. आज मनोरथ के पास भगवन का दिया सब कुछ है. तोह ऐसे में उससे अपनी कुल की देवी का आशीर्वाद लेने वह जाना hi चाहिए और वह पे भी कुछ करवाना चाहिए.

मनोरथ : तुम दोनों की बात बिलकुल सही है. वाक़ई! हमे जाना चाहिए...

प्रांजल (स्माइल्स) : वाक़ई!?

मनोरथ (स्माइल्स) : क्यों नहीं बीटा!? बिलकुल! हम सपरिवार जाएंगे... हमारी तरफ से मंदिर में जो कुछ भी बन पड़ेगा हम करेंगे और उधर भंडारे का आयोजन भी करेंगे. नए साल की ये शुरुआत देवी जी के आशीर्वाद से hi होनी चाहिए. बिलकुल! मुझे ये जान के बेहद ख़ुशी हुई की आज के इस समय में भी मेरे पोते... पूजा पाठ से कितना जुड़े हुए है. वही तुम्हारे पिता को देखो... उन् दोनों भाइयो को... हम्फ! सुबह शाम पैसा पैसा पैसा... आज भोजन के लिए लेट हुए तोह देखना क्या हाल करता हु उनका.

प्रांजल : ये हुई न बात दादा जी! बस तोह फिर तय रहा. हम सभी 31सत को जाएंगे और एक रात वही ठहर के नई ईयर मन के वह से लौटेंगे.

मनोरथ : पर मुझे अब भी विश्वाश नहीं होता. तुम दोनों नया साल मनाने के लिए उधर गांव जाने के लिए रेडी हो गए!?

प्रांजल : हर्र साल तोह हम होटल या कही और पार्टी कर नया साल मनाते hi है न दादा जी? फिर एक साल गांव में जाने से ऐसा थोड़ी है की कोई नुक्सान हो जाएगा हमारा? और हम तोह देवी जी के लिए जा रहे है. वो तोह जहा भी विराजमान हो वो हर्र भूमि शुभ है.

प्रांजल की बात सुन्न मनोरथ की आँखें नम्म हो गयी और वो अपना चश्मा निकाल अपनी आँखें मलने लगे.

मनोरथ : मेरे पोते कितने समझदार है. देवी जी की कृपा है सब.

प्रांजल : और दादा जी...

मनोरथ : ??

प्रांजल : दरअसल मेने ये रिक्वेस्ट इसलिए सामने राखी क्युकी... में देवी जी से एक ख्वाइश माँगना चाहता हु...

मनोरथ : ??

प्रांजल : की जल्द से जल्द वीर और ताऊ जी के बीच जो भी झगड़ा है वो ख़तम हो जाए और मेरा प्यारा भाई घर लौट आये. में उसका पूरा ख़याल रखूँगा. उसके बिना ये घर अधूरा है दादा जी. मुझे यकीन है की देवी जी मेरी बात ज़रूर सुनेंगी और वीर और ताऊ जी को देखना आप एक करवा देंगी...

वीर का ज़िक्र होते hi मनोरथ एकदम शांत पद गए. उन्हें वीर का hi चेहरा अपने मैं में नज़र आने लगा.

मनोरथ (मैं में) : मेरा वीर...

मनोरथ : वीर को भी हम..

विवेक : वो... वीर रागिनी के साथ रुका हुआ है दादा जी. चिंता की कोई बात hi नहीं है. रागिनी की सहेली भी उसके घर में है. तोह ऐसी कोई चिंता की बात hi नहीं. मेरी भी यही ख्वाइश रहेगी देवी जी से... की जल्द से जल्द रागिनी घर लौट आये.

मनोरथ : इसमें गलती साड़ी तुम्हारी थी. हम्फ! फिर भी... देवी जी का नाम लेके सच्चे मैं से इच्छा माँगना और रागिनी बिटिया के पास जा कर माफ़ी भी. देखना वो ज़रूर लौट आएगी.

विवेक : J-Jii दादा जी!

और मनोरथ इतना बोल अपनी आँखें बंद कर अपने चिंतन में डूब गए तोह वही प्रांजल और विवेक एक दूसरे को देख रहे थे. न जाने क्या विचार चल रहे थे उनके मैं में.

कुछ बोहत बड़ा होने वाला था शायद...

***

30तह दिसंबर...

ात नाईट...

Nidhi's हाउस...

निधि अस उसुअल अपने खाना बनाने में व्यस्त थी अंदर किचन में तोह वही श्रेया और जूही हॉल में बैठे हुए थे.

जूही तोह अपने T.V में लगी हुई थी पर श्रेया अपने hi विचारो में लीं थी.

'मेरी जॉब आलरेडी लग चुकी है. और एअर्निंग भी ठीक ठाक है. बूत स्टिल... हमेशा मेरा ध्यान यूटूबेर bann'ne के लिए जाता है. ी वांट तो दो आईटी. बूत उसके लिए मेरे पक को अच्छा ख़ासा बनाना पड़ेगा पहले... उसके बाद एक अच्छा इंटरनेट कनेक्शन. उसके बाद hi कुछ हो पाएगा. मय्बे part टाइम में में स्ट्रीम कर सकती हु. येह! राइट! एंड ी कैन इवन इन्विते वीर तो ज्वाइन माय स्ट्रीम... धीरे धीरे मेरी पॉपुलैरिटी बढ़ती जाएगी. पीपल विल क्नोवा अबाउट में. अबाउट वीर तू... ओह्ह it's सो रोमांटिक. वीर और में साथ में स्ट्रीम करेंगे! पीपल विल कमेंट अबाउट उस की अरे यू बोथ इन रिलेशनशिप!? ः~ वे विल रियेक्ट तो वीडियोस टुगेदर... प्ले गेम्स टुगेदर. It'll बे सो...'

"Shreyaaaaaaaaaaa!!!"

पर इसके पहले की श्रेया अपने मैं में बन्न रहे लड्डू खा पाती, अंदर से निधि की आवाज़ जैसे उससे होश में लायी.

श्रेया : H-Huh!? K-Kya!?

निधि : अंदर आओ थोड़े ये आलू रखे है मेने कुकर में... इन्हे पील कर दो.

श्रेया : ऑलराइट!!!

आज घर में आलू के पराठे बन्न रहे थे जो श्रेया के फवौरीते थे. वो भी निधि के हाथो के. तोह वो मदद करने से पीछे कैसे हट सकती थी? आखिर निधि इतने प्यार से उसके लिए जो बना रही थी.

श्रेया : दी!

निधि : हम्म!?

श्रेया : कल का क्या प्लान है!?

निधि : क्या!?

श्रेया : फॉर god's सके... दी! कल साल का आखिरी दिन है. नया साल आने वाला है... और आपका कोई प्लान नहीं है?

निधि : I-I don't हैवे अन्य... और क्या नया साल? हर्र साल एक जैसे hi गुज़रते है मेरे... मेरे लिए कोई नया साल नहीं है...

उसकी आवाज़ सुन्न श्रेया का मैं मायूस हो गया. इसमें बेचारी निधि की कोई गलती नहीं थी. गलती थी तोह बस उसकी किस्मत की. पर श्रेया नहीं चाहती थी की उसकी बहिन का ये साल का आखिरी दिन इतना साधारण तरीके से बीते...

उसने फटाफट आलू पील किये और निधि को दिए और वो झटपट अपने फ़ोन लेके hi किचन में घुसी और किसी को कॉल करने लगी.

और जैसे hi उधर साइड से किसी ने फ़ोन उठाया तोह श्रेया ने बात करना शुरू की...

श्रेया : हाँ hello वीर!??

और बस...

वीर का नाम सुनते hi निधि एक झटके में पलटी और उसने श्रेया को देखा. जैसे मानो पूछना चाह रही हो की भला वीर को क्यों कॉल करि थी वह.

पर श्रेया ने निधि को देखने के बावजूद उससे इग्नोर कर दिया और अपनी बातें जारी राखी.

श्रेया : वो... कल साल का आखिरी दिन है. तोह तुम्हारा क्या प्लान है!?

वीर : फिलहाल तोह कोई प्लान...

श्रेया : ओह्ह that's सो ग्रेट तोह तुम्हारा कोई प्लान नहीं है!? वंडरफुल!

वीर : H-Huh!?

श्रेया अपने बालो के साथ खेलते हुए वीर से बातें करती जा रही थी और निधि को भी देखती जा रही थी जो पलट पलट के बीच में उससे देख रही थी.

श्रेया : तोह तय रहा... तुम में जूही और दी... हम सभी रात में सेलिब्रेट करने चलेंगे. Okay!?

वीर : ???

वीर तोह सुरप्रीसेड था hi पर सबसे ज़्यादा सुरप्रीसेड थी निधि क्युकी वो एक झटके में पलट गयी.

वीर : उम्... वेल... क्या Ma'am रेडी होएंगी? ी don't थिंक उनके पास टाइम हो...

श्रेया : ऑफ़ कोर्स! दी रेडी है! She's आल प्रेपरेड़...

निधि (शॉकेड) : श्रेया तुम...

श्रेया : ओह्ह! लगता है दी को तुमसे बात करनी है... ये लो दी...

निधि : W-Wait...!

और अगले hi पल श्रेया ने अपने हाथो से फ़ोन सीधा निधि के कानो में लगा के उससे थमा दिया...

निधि : ....

वीर : ....

श्रेया नहीं जानती थी की वीर आखिरी टाइम निधि से जब मिला था तोह थप्पड़ खा के गया था. तोह ऐसे में इस वक़्त निधि से बात करना कितना ावक्वार्ड था उसके लिए ये बात वो नहीं जानती थी.

और न केवल वीर के लिए बल्कि निधि के लिए भी ये उतना hi ावक्वार्ड था.

निधि : ...

वीर : उम्... Hello!?

वीर की आवाज़ सुन्न निधि के होंठ खुले पर फिर अचानक hi बंद हो गए. न जाने क्यों वो इतना कटरा रही थी.

उसने बेबस निगाहो से श्रेया को देखा पर श्रेया तोह जैसे और ेन्सॉरगे करे जा रही थी.

श्रेया : क्या हुआ? ारी बात करिये...!

और मजबूरन निधि को मुँह खोलना hi पड़ा.

निधि : H-Hello!?

वीर : Hello... Ma'am!! वो... श्रेया जी ने कहा... की कल का प्लान है... कुछ...

निधि : उम्...

वीर : ???

निधि : वो...

पर निधि कुछ कह पाती तभी बाहर वाशरूम से जूही की आवाज़ आयी...

"मआएसीईई.... साबुन ख़तम हो गया है..."

श्रेया : आयी जुहीय....

और श्रेया अगले hi पल बाहर निकल गयी.

अब बचे थे तोह केवल निधि और वीर फ़ोन पे. ये अट्मॉस्फेरे और भी ावक्वार्ड हो चूका था उन् दोनों के लिए.

वीर : वो... I'm सॉरी ma'am. Y-Yadi... आप मुझसे बात नहीं करना चाहती थें it's okay. Don't वोर्री! में यहाँ से कॉल कट कर देता हु... श्रेया जी को बोल दूंगा नेटवर्क प्रॉब्लम थी. It's.. it's टोटली फाइन. सो...

निधि : N...Noooooo!!

पर अगले hi पल एक डेस्पेरशन से भरी आवाज़ निधि के मुँह से निकली...

निधि : A-Aisi कोई... कोई भी बात नहीं है.

वीर : ी... ी सी!

निधि : ....

वीर : सो!? उम्... आपने मुझे माफ़ कर दिया!?

निधि : ी... हम्म!

वीर : O-Okay!!! यू क्नोव... मेरे वैसे कोई भी इंटेंशन्स नहीं थे ma'am. ी... ी don't क्नोव... ी जस्ट वांटेड तो होल्ड यू.

निधि बेचारी ये सुनते hi... उसकी आँखें हैरानी के मारे फैलती चली गयी और उसकी सासें भी लम्बी होने लगी...

वीर : ी मैं... जस्ट तो गिव यू... इमोशनल सपोर्ट यू क्नोव. M-Mera कोई भी गलत इरादा नहीं था. S-So... ी जस्ट वांटेड यू तो क्नोव की... में आपकी मायूसी सेहन नहीं कर पाटा... एंड ी ऑलवेज मिस यू. ऐसा नहीं है की में अपनी भाभी के घर में हु तोह अब मुझे आपके घर की याद नहीं आती. ी ऑलवेज थिंक ऑफ़ यू... ी मैं... आल ऑफ़ यू...

श्रेया : हो गयी बात!? लाओ दो मुझे...

श्रेया वाशरूम से आयी और निधि के हाथो से उसने फ़ोन ले लिया और बाहर चली गयी.

बेचारा वीर जवाब के तौर पर कुछ भी नहीं सुन्न पाया.

पर...

निधि न जाने क्या सोच रही थी. पर उसकी नज़रे एक जगह hi तिकी हुई थी. सासें पहले से थोड़ी तेज़्ज़. और उन् आँखों के सामने उसके बाल थे जो उसके एक्सप्रेशन को छुपाये हुए थे.

क्या होने वाला था कल!? इनके इस प्लान में!? तोह वही प्रांजल और विवेक के प्लान में!? और साथ hi साथ... स्लोगन!!!! जिसकी एक्टिविटीज वीर के पल्ले नहीं पद रही थी.

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आज के लिए इतना hi गाइस!

लिखे मारने का और अपने थॉट्स रखने का. 😁

धन्यवाद!
 
अपडेट - 49 ~ थे लास्ट डे ऑफ़ थे ईयर

अब तक...

बेचारा वीर जवाब के तौर पर कुछ भी नहीं सुन्न पाया.

पर...

निधि न जाने क्या सोच रही थी. पर उसकी नज़रे एक जगह hi तिकी हुई थी. सासें पहले से थोड़ी तेज़्ज़. और उन् आँखों के सामने उसके बाल थे जो उसके एक्सप्रेशन को छुपाये हुए थे.

क्या होने वाला था कल!? इनके इस प्लान में!? तोह वही प्रांजल और विवेक के प्लान में!? और साथ hi साथ... स्लोगन!!!! जिसकी एक्टिविटीज वीर के पल्ले नहीं पद रही थी.


अब आगे...

31सत दिसंबर...

ात मॉर्निंग...

कल श्रेया से जब वीर की फ़ोन पर बात हुई थी तोह वीर की हामी लिए बजर्र hi श्रेया ने उससे अपने प्लान में शामिल कर लिया था. और तय हुआ था की आज की रात वीर, श्रेया, निधि और जूही सभी साथ में एन्जॉय करने जाएंगे और लेट नाईट तक नए साल का स्वागत कर थोड़ा सेलिब्रेशन कर के hi घर लौटेंगे.

वीर को उस मिशन के 200 पॉइंट्स मिल चुके थे पर अभी तक उसने उन् पॉइंट्स को स्पेंड नहीं किया था सिवाए 10 पॉइंट्स के. उसने अपीयरेंस में 10 पॉइंट्स कल रात में hi इन्वेस्ट कर दिए थे. और अब उसके स्टैट्स कुछ इस प्रकार से थे.

[ स्टैट्स :

स्ट्रेंथ - 56/100

इंटेलिजेंस - 70/100

अगिलिटी - 50/100

ेंदुराने - 50/100

अपीयरेंस - 50/100]

वीर शायद अपने बचे हुए पॉइंट्स को एकदम एफ्फेक्टिवेली उसे करना चाहता था. शायद शॉप में ऐसी किसी अनोखी स्किल की तलाश थी उससे जो उसके बेहद काम आ सके.

'शो में माय फुल स्टेटस पारी!'

[Sure thing, Master!]

[Name : Veer


आगे : 21

स्टेटस : स्टूडेंट

स्टैट्स :

स्ट्रेंथ - 56/100

इंटेलिजेंस - 70/100

अगिलिटी - 50/100

ेंदुराने - 50/100

अपीयरेंस - 50/100


स्किल्स :

1) सेक्स प्रोटेक्शन : ों (सिल्वर टियर स्किल)

2) बेसिक मार्टिकल आर्ट्स स्किल (ब्रोंज टियर स्किल)

3) हव्कये (डायमंड टियर स्किल)

System's इंटरनल फीचर्स :

Check-I, Check-II, पथ ट्रैकर, पास्ट इलस्ट्रेशन.

रिलेशनशिप्स :

1) सुमन : लॉयल स्लेव (फवौराबिलिटी : 84)

2) आभा : फेमिलिअर (फवौराबिलिटी : 58)

3) सोनाली : फेमिलिअर (फवौराबिलिटी : 30)

4) रागिनी : क्लोज फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 60)

5) निधि : क्लोज फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 52)

6) श्रेया : क्लोज फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 64)

7) जूही : बेस्ट फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 85)

8) सुहाना : क्लोज फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 59)

9) सोनिआ : गुड फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 50)

10) काव्य : वैरी क्लोज फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 80)

11) आरोही : गुड फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 55)

12) भूमिका : फेमिलिअर (फवौराबिलिटी : 20)

13) श्वेता : फेमिलिअर (फवौराबिलिटी : 8)

सिस्टम लेवल : लेवल 4

(56 ऍक्स्प मोरे तो रीच लेवल 5)]

'हम्म!! ी नीड तो ीर्ण मनी एंड नीड मोरे पॉइंट्स. मेरी प्रायोरिटी यही है अभी.'

[Right master!]

'सो!? उम्... मिस करा की फवौराबिलिटी नहीं देख सकता क्या में!?'

[Dekh sakte ho but not now. Yadi kisi ka status nahi dekh sakte toh aap uski Favourability bhi nahi dekh paoge.]

'हम्म! ी सी! ऑलराइट! Let's जो...'

आज वीर के 2 जगह प्लान्स थे. एक तोह वही श्रेया और बाकी सभी के साथ रात का प्लान था और दूसरा रागिनी और बाकी सभी के साथ.

जब वीर ने ये बात बतायी थी की वो रात में फ्री नहीं रहेगा, ये सुन्न के रागिनी काफी उदास हो गयी थी. पर उसने बेहला फुसला के रागिनी को जैसे तैसे मन लिया और दिन में घूमने चलने को कह दिया. यहाँ वीर को एक और बात jaan'ne को मिली की काव्य और बाकी सभी परिवार के साथ कुल देवी के मंदिर के लिए सुबह निकल चुके थे.

बेशक! वीर इस अचानक ट्रिप से उनकी थोड़ा आश्चर्य चकित था पर उसने ज़्यादा नहीं सोचा. काव्य का कहना था की उसके दादा जी ने वीर को साथ ले चलने के लिए भी बोलै था पर विवेक ने बीच में कूद कर दादा जी के कान भर दिए और वो बात वही ताल के रह गयी.

खर्र! आइये, तोह वही चल के देखते है की वह क्या चल रहा था इस वक़्त...

इस समय सुबह के 8 बज रहे थे और सभी घर वाले दो बड़ी बड़ी गाड़ियों में बैठे हुए थे अपनी और अपने गांव की ऑर्डर जा रहे थे.

वीर के परिवार के पूर्वज सालो से उस देवी माता की पूजा करते आये थे और उस मंदिर की स्थापना भी उनके पूर्वजो ने hi की थी पर जैसे जैसे समय गुज़रता गया और आने वाली पीढ़ी शहर से जुड़ती गयी, वो मंदिर धीरे धीरे वह के ट्रस्ट में समर्पित कर दिया गया.

कारण!? कारण था की अब वीर का परिवार शहर में पनप रहा था और घर का कोई सदस्य रोज़ रोज़ मंदिर की देख भाल या चक्कर लगाने के लिए किसी के पास इतना समय नहीं था. तोह उस मंदिर को वही के ट्रस्ट में समर्पित कर दिया गया. अब उस मंदिर की पूरी ज़िम्मेदारी उन् ट्रस्ट वाले लोगो की थी.

पर आज भी, जब भी वीर का परिवार, ख़ास कर मनोरथ जी जब भी वह जाते थे, गांव के सभी लोग उन्हें बड़े hi आदर और सत्कार के साथ उनका स्वागत करते थे. यहाँ तक की वो ये भी कहते थे की अब भी की वो मंदिर उन्ही का है और हमेशा उन्ही का रहेगा. शायद आज भी उनकी अच्छी खातिरदारी होने वाली थी.

उन् दो कार्स में से, एक कार में बृजेश संग भूमिका, श्वेता, काव्य और मनोरथ विराजमान थे.

तोह वही दूसरी में करुणेश संग सुमित्रा, विवेक, आरोही और प्रांजल.

दोनों hi कार में दो ड्राइवर्स थे. शहर से कुछ घंटो की दुरी पर hi उनका गांव था.

काव्य : दादा जी आपने... वीर भैया को नहीं बुलाया!?

मनोरथ : बीटा मेने कहा था पर विवेक बोलै की आज वीर शायद कही और जा रहा है... मेरी तोह कोई सुनता hi नहीं है. जैसे जैसे बूढ़ा होता जा रहा हु, मेरी बातो को अब लोग हवा में उड़ाते जा रहे है.

बृजेश : पापा जी... ऐसी बात क्यों कह रहे हो आप!? हम सब आपकी बात मानते है. अब उस बारे में चर्चा मत करिये आप. मंदिर जा रहे है, अच्छा मूड रख के चलिए.

बृजेश की इस बात पे सभी शांत पद गए. वो आगे ड्राइवर के संग बैठा हुआ था. तोह वही पीछे साइड की सीट पर मनोरथ और उनके बगल से काव्य, फिर भूमिका और फिर श्वेता.

भूमिका : आज साड़ी रिस्पांसिबिलिटी नंदिनी को देके आयी हु माँ.

नंदिनी उनके होटल की मैनेजर थी. जो सब कुछ बड़ी hi अच्छी तरीके से मैनेज कर लेती थी.

श्वेता : हम्म! चिंता की कोई बात नहीं है. वो अच्छे से देख लेगी.

भूमिका : हम्म! बस कोई बड़ा क्लाइंट या गेस्ट न आ जाए. और ऐसा न हो की कुछ प्रॉब्लम हो जाए.

श्वेता : Don't वर्थिंक! जस्ट एन्जॉय थे डे मेरा बच्चा...!

भूमिका (स्माइल्स) : हम्म!

और कुछ घंटो की दूरी तय करने के बाद hi वो पहुँच चुके थे अपने कुलदेवी के मंदिर.

सभी का वह हर्र बात की तरह बड़े hi आदर के साथ स्वागत किया गया. साथ hi साथ वह उनके रुकने और खाने की भी व्यवस्था की गयी.

दर्शन कर लेने के बाद सभी खाना खाने में लगे हुए थे जब विवेक और प्रांजल आपस में बैठ न जाने क्या बातें कर रहे थे.

प्रांजल : सारा प्लान रेडी है भैया... बस देरर है तोह उससे अंजाम देने की...

विवेक : नहीं छोटे... आज नहीं...! हमे वैसे भी कल निकलना है. आज रिस्की है. कल करना... वैसे भी यहाँ से नाश्ता करने के बाद hi निकलेंगे हम.

प्रांजल : ठीक है भैया! कल सही फिर...

न जाने दोनों किस प्लान को अंजाम देने की बात कर रहे थे.

***

इधर वीर दिन में अपने परिवार के साथ हो रही बातो से अनिभिज्ञ रागिनी और बाकी सभी के साथ आज घूमने निकला हुआ था.

पर अचानक hi रास्ते में उससे नज़र आया की कुछ लेडीज किसी कपडे की सेल पर हंगामा कर रही थी.

वीर : क्या हो रहा है उधर!?

रागिनी : विरोध!

वीर : विरोध!? केसा विरोध!?

रागिनी : उम्... वो देखो न... महिला मंडल जमा हो गया पूरा उधर. किसी सेल की पीछे लड़ाई हो गयी है. शायद कुछ घपला किया है सेल वाले ने. इसलिए औरते इतनी आवाज़ें लगा रही है.

और वाक़ई! जब वीर ने ध्यान से देखा तोह उससे समझ आया की नए साल की सेल के बहाने कपड़ो का बिज़नेस करने वाला आदमी कुछ फटे और बेकार पीसेज को निकालने के लिए ये सेल रखा हुआ था. और वो कपड़ो की रैपिंग को खोलने नहीं दे रहा था.

जब कुछ औरतो ने खोल के कपड़ो की जांच की तोह उन्होंने धावा बोल दिया. इत्तेफ़ाक़ से महिला मंडल वही से कही और जा रही थी और ये विरोध देख वो भी उनके साथ जुड़ गयी और पूरी तरह से वात लगा दी उस दूकान दार की.

रागिनी (शिघ्स) : हर्र सेल में कुछ न कुछ होता hi है.

वीर बड़े hi ध्यान से सब कुछ देख रहा था और अचानक hi जैसे उसके दिमाग की घंटी बजी और अगले hi पल उसके होंठो पर एक मुस्कान बिखर गयी.

वीर : भाभी!

रागिनी : हम्म!?

वीर : मेरी आप से एक रिक्वेस्ट है. आप पूरी करोगी!?

रागिनी : हम्म? Okay! क्या बात है!?

वीर : क्या आप... क्या आप सुमन जी को शहर के पूरे तौर तरीके सीखा सकती हो? मेरा मतलब है सारे नियम कायदे, khareed-daari से लेके देवीकेस को ऑपरेट करना सब कुछ. एक मॉडर्न व्यक्ति का पूरा नॉलेज जितना आप दे सकती हो... क्या आप कर सकती हो?

रागिनी (सुरप्रीसेड) : हँ!? P-Par ये एकदम से ऐसे क्यों!?

वीर : सुमन जी ने मुझसे hi खुद कहा था. क्यों है न!? सुमन जी!?

सुमन : E-Ehhh!? ओह्ह्ह! हां हां! मेने कहा था...

सुमन बात को समझ फौरन hi हां में सर्र हिलायी और अपनी रज़ामंदी दी. पर उसकी समझ में नहीं आ रहा था की उसके मालिक के दिमाग में आखिर चल क्या रहा था.

रागिनी : O-Okay! में अपनी पूरी कोशिश करुँगी इन्हे सब कुछ बताने में...

वीर (स्माइल्स) : थैंक यू भाभी!

रागिनी : उम्... It's okay!

लंच के समय, रागिनी और वीर अगल बगल hi बैठे थे जब वीर ने रागिनी के चेहरे पर मायूसी को तुरंत hi भांप लिया...

वीर : आप परेशान लग रही हो भाभी!

रागिनी : हँ!? N-Nahi तोह!? में भला क्यों परेशान होने लगी!?

वीर : झूठ मत बोलिये! मुझसे तोह बिलकुल भी नहीं! विवेक भैया का कॉल आया था न!?

वीर की बात सुन्न रागिनी इस बार धीरे से हां में सर्र हिलायी और अपने निगाहें नीचे कर बैठ गयी.

वीर : क्या कहा उन्होंने!?

रागिनी : वो... वो सभी आज हमारी कुलदेवी के मंदिर गए है.

वीर : उन्होंने आप को भी बुलाया होगा!?

रागिनी (नॉड्स) : उम्...

वीर : तोह!??

रागिनी ने अपनी निगाहें ऊपर कर एक पल के लिए उससे देखा... उन् आँखों में नमी जो पनप रही थी वो वीर आसानी से देख पा रहा था.

रागिनी : ी... में... में कभी भी मंदिर के नाम पर देवी का तिरस्कार नहीं करती मन कर के... पर...

वीर : ....

रागिनी : पर...

वीर : आपका मैं नहीं किया ज़रा भी...

ये वाक्य सुन्न रागिनी चौंकी और वीर को घूरने लगी.

भला उसके मैं की बात वीर ने कैसे भांप ली थी!?

वीर : इतने दिनों से आप के साथ रह रहा हु. थोड़ा बोहत तोह में भी आपको समझने लगा हु.

कहते हुए उसने जैसे hi अपना हाथ रागिनी के हाथ के ऊपर रखा तोह बेचारी रागिनी की इधर हालत hi बिगड़ने लगी. वो फटी आँखों से वीर को घूरे जा रही थी.

उसके गुलाबी होंठ खुले... पर केवल हलकी सी हवा hi बाहर निकली, कोई शब्द नहीं.

और आँखें जो की त्यों वीर पर तिकी थी.

वीर : ी don't क्नोव की आप क्या डिसिशन लोगी. बूत आप जो भी डिसिशन लोगी. हम सब आपके साथ है. बूत िफ़... यदि आपने विवेक भैया से सच में अलग होने का डिसिशन लिया थें... ी वास् वॉन्डरिंग की... क्या हम ऐसे hi रह पाएंगे!? ी मैं... फिर आप उस घर की सदस्य नहीं रहोगी और मेरा और सुमन जी का आपके घर रुकना...

वो अपनी बात आगे रख पाटा की उसके पहले hi रागिनी ने अपना हाथ उसके होठो पर रख उससे रोक दिया.

रागिनी : वीर! में उस परिवार की सदस्य राहु या न राहु. तुम और सुमन जी मेरे अपने सदस्य हो. वो घर मेरा अकेले का नहीं है. तुम सभी का भी है. और क्या करुँगी में इतने बड़े घर में अकेले रह के!? भूलो मत वीर... तुम भी... उस परिवार से अलग हो चुके हो. तोह ऐसे में यदि में भी होती हु... तोह... Aren't वे थे शामे!?

उसने मुस्कुराते हुए कहा पर वीर जानता था. की उस स्माइल के पीछे काफी कुछ छिपा हुआ था. जिससे शायद व्यक्त करना अभी रागिनी के बस में नहीं था.

और बिलकुल वैसा hi हुआ... भावुक होते हुए रागिनी ने फौरन hi अपना चेहरा फेरर लिया और जब उसने देखा की सुमन समेत सभी काउंटर से वापस उसकी और वीर की तरफ आ रही है तोह फौरन hi अपनी आँखें मॉल सीढ़ी होकर बैठ गयी.

अंत में उन् सभी ने थोड़ा एन्जॉय किया जिसके चलते रागिनी का मूड काफी हद्द तक ठीक हो चूका था.

पर अब समस्या थी रात की...

वीर को निधि को जो फेस करना था. वैसे तोह निधि ने उससे माफ़ कर दिया था. पर...

प्रातकयष आमने सामने मिलना एक अलग बात थी.

और ज़ाहिर है की दोनों के बीच ावकवर्डनेस्स बरकरार रहने वाली थी.

***

31सत दिसंबर...

ात नाईट...

वीर अपनी बाइक पर था और वो ठीक निधि की सोसाइटी में hi नीचे खड़ा हुआ था जब निधि समेत जूही और श्रेया नीचे उतरती हुई आयी.

श्रेया : अरे क्या कोई मेहमान हो तुम हाँ!? जो एक मिनट के लिए भी ऊपर नहीं आ...

पर उसके बोल वही थम गए जब उसने पास आते हुए वीर को देखा.

अपीयरेंस में 10 पॉइंट्स डालने का असर था ये!?

श्रेया (ब्लशेस) : यू... यू लुक गुड!

वीर (स्माइल्स) : थैंक्स!

श्रेया (ब्लशेस) : ऐसा... ऐसा क्या लगा रहे हो आजकल हँ!? हमे भी बता दो...

वीर (स्माइल्स) : It's ा सीक्रेट!

"माहाअमूउऊउउउउ!!!"

और बेशक! वीर को देखते hi उसकी प्यारी फुलझड़ी बोले तोह जूही सरपट दौड़ती hi आयी और उसके परर से लिपट गयी. वीर ने फौरन hi उससे गोदी में उठाय और उसका गाल चूम लिया.

वीर : आ गयी जूही!? क्या पहनी हो आप!? ओह्ह्ह्ह! नई जैकेट!??

जूही : हम्म! मासी ने दिलाई!

वीर : क्या बात है!? बोहत खर्चे हो रहे है!?

श्रेया : क्यों न होंगे!? अब में कमाने जो लगी हु.

वीर (स्माइल्स) : हम्म!

श्रेया (ब्लशेस) : वैसे भी... सब तुम्हारी hi वजह से तोह है.

वीर आगे कुछ कह पता की तभी...

*टक* *टक* *टक*

उससे हील्स की आवाज़ सुनाई दी और उसने देखा की निधि एक ख़ूबसूरत सी साड़ी पहने और एक शाल ऊपर डाले नीचे आ रही थी.

आज वो इतनी ख़ूबसूरत दिख रही थी की वीर खुद अपने आप को कुछ देरर यु टकटकी लगाए उससे देखने से न रोक सका.

दोनों की hi नज़रे मिली और पल भर के लिए दोनों hi जैसे भूल गए की वो दोनों अकेले नहीं है. आस पास भी लोग है.

श्रेया : तोह चले!?

वीर : यह! Y-Yeah! राइट!

जूही : में मामू के साथ बैठूंगी... आगे बाइक पे...

श्रेया : हँ!?

निधि : नहीं जूही! मेरे साथ बैठो चलो. मासी को बैठने दो उनके साथ. हम अपनी स्कूटी में चलते है.

वैसे तोह इस बात से श्रेया बोहत खुश थी की उससे वीर के साथ बैठने का मौका मिल रहा था पर फिर भी... वो अपनी बहिन से भी उतना hi प्यार जो करती थी. और उसकी फिक्र भी.

निधि साड़ी में थी. और ऐसे में स्कूटी चलना वो भी जूही को लेकर, रात के वक़्त. ये कितना कठिन था वो जानती थी. और खतरनाक भी हो सकता था.

इसलिए...

श्रेया : नहीं दी! आप और जूही वीर के साथ बैठिये! आपने साड़ी पहनी हुई है दी. दिक्कत जाएगी. और मेरा क्या है? में तोह जीन्स में हु. में स्कूटी से चलती हु.

निधि ने एक पल वीर को देखा जो बिना कुछ कहे hi उसके निर्णय का इंतज़ार कर रहा था और फिर आखिर कार निधि ने फाइनली धीरे से हां में सर्र हिलाया और वीर के ठीक पीछे जाके वो बैठ गयी.

ये पल...

वीर के होंठो पर अपने आप hi मुस्कान ला दिया. ऐसे hi तोह एक साथ बैठ के कॉलेज से लौटा करते थे वो. ऐसे hi तोह निधि उसके पीछे यु बैठा करती थी. आज इतने दिनों बाद उसी अनुभूति को फिरसे महसूस कर पा रहा था वीर. पर सबसे अहम् बात ये थी की इस वक़्त चाँद भी अपने पूरे रंग ढाया हुआ था. पूरा चमक रहा था और अपनी रौशनी बखूबी बिखेरे हुए था.

और फाइनली वीर और बाकी सभी सोसाइटी से निकले.

रात का प्लान सिंपल था. कोई अच्छी सी जगह जाके पहले थोड़ा एंटरटेनमेंट. फिर डिनर और अंत में नई ईयर सेलिब्रेशन के फिरवर्क्स देखने का प्लान.

सबसे पहली जगह वीर और बाकी सभी एम्यूजमेंट पार्क में गए थे. ामसँ पार्क तोह नहीं था, एक प्रदर्शनी लगी हुई थी. भले hi एम्यूजमेंट पार्क से थोड़ा छोटा था पर राइड्स इधर भी थी.

जूही बच्चो वाली राइड्स एन्जॉय कर रही रही, तोह वही श्रेया उसकी फोटोज उतार रही थी. और वही वीर और निधि साइड में खड़े उन्हें देख रहे थे.

जूही : मम्मीयियय! मुझे वो बड़े वाले में बैठना.

उसने इशारा करते हुए कहा. उसका इशारा जायंट व्हील की ऑर्डर था.

निधि : हँ? नहीं जूही! बिलकुल भी नहीं! डर जाओगी बाद में तुम hi. देख रही हो कितनी ऊपर तक जाता है.

श्रेया : जूही! वो देखो! वो ट्रैन वाली में बैठे अपन!? में भी बैठा सकती हु उसमे तोह.

जूही : हां चलो चलो मासी... जल्दी...!

और वो खींच के श्रेया को ले गयी.

अब बचे थे तोह केवल वीर और निधि.

वीर : उम्... क्या आप चलना चाहोगी!? Ma'am!? जायंट व्हील में!?

निधि : हँ? M-Mein!? N-Nahi... में नहीं...

वीर : O-Okay!

वो जवाब देते हुए अपनी नज़रे झुका लिया. पर जैसे निधि ने उसका एक्सप्रेशन देख लिया था तोह वो पूछी,

निधि : उम्... क्या तुम्हे राइड करना है!?

वीर : हम्म? Y-Yeah! में कभी बैठा नहीं हु इन् राइड्स में. कभी कोई लाया hi नहीं...

उसने एक फीकी स्माइल देते हुए कहा तोह निधि को जैसे याद आया की वीर का बचपन कैसे गुज़रा था. और ये याद करते hi वो बॉहे सिकोड़े उससे देखने लगी और एक दुविधा में फस्स गयी.

निधि : O-Okay! िफ़... िफ़ यू वांट थें... हम चल सकते है!

बस फिर क्या था कुछ hi देरर में वीर और निधि दोनों hi जायंट व्हील पर सवार थे. पर...

*डिंग*

[Mission : Hug Nidhi! Let her know you are her support.

Rewards : ?? Points

Time limit : Before 12 A.M

Mission Failure Penalty : 50 Points Deduction.]

'व्हाट थे फुककककककककक!?'

[Hahaha~]

'मज़ाक चल रही है? No सीरियसली!? मज़ाक है? फुकककक! उस दिन hi मेने उनके हाथे से थप्पड़ खाया था और अब ये? झूठे पढ़वाने की प्लानिंग है क्या? Wtf इस थिस मिशन?'

[I cannot help it master! Execute this mission properly. Aur... Haa~ iss Mission ke complete hote hi mein level up ho jaungi. But I'll be in sleep mode for loading your new resources. Toh pehle se hi wish kar deti hu. Happy new year master! Enjoy your time! Hehe~]

'W-Wait व्हाट!??? Wtf??? स्लीप मोड अचानक क्यों?'

[I told you kuch surprise hai right? So wait for it!]

निधि : उम्म्म...

निधि ने उसका ध्यान खींचा तोह वीर होश में आया. जायंट व्हील घुमते हुए ऊपर जा रहा था.

और निधि और वीर अगल बगल बैठे हुए ऊपर से पूरा नज़ारा देख रहे थे.

निधि : It's सो ब्यूटीफुल...

वीर : बिलकुल आप की तरह...

*बेदुम्प*

निधि (गैप्स) H-Huhhhh!?

वीर : मेने कभी इस राइड पे सवारी नहीं की थी. आज आप आयी तोह ये भी हो गया... थैंक्स फॉर अग्रेंज.

निधि : It's... It's फाइन!

निधि : वीर!

वीर : हम्म?

निधि : सच कहु... तोह I'm रियली माध ात यू.

वीर : ??

निधि : कितना कहती रहती हु तुम से. कितना कह चुकी हु पहले भी. Don't लीव योर स्टडीज. पर तुम हो की सुनते hi नहीं. क्या करना चाहते हो आगे!? क्या करोगे!? कुछ प्लान है की नहीं? में तुम्हे दांत नहीं रही हु. तुम्हारी टीचर भी हु. तुम्हारे करियर की चिंता मुझे लगी रहती है. और तुम तोह मेरे ख़ास स्टूडेंट हो. एक तरह से परिवार का हिस्सा भी बन गए थे तुम हाल hi में. तोह किधर जाना चाहते हो, कोई लक्ष्य है की नहीं? क्या कर रहे हो अभी? स्टडी नहीं करते तोह क्या करते हो दिन भर? कुछ सोचा है फ्यूचर के बारे में? क्यों नहीं आते हो कॉलेज!? ये सारे सवालों के जवाब तुम्हे अच्छे से पता होने चाहिए वीर.

वो लगातार बोले जा रही थी. पर वीर चाँद की उस रौशनी में केवल निधि के हुस्न को hi देखता रहा और बस मुस्कुराता रहा.

अभी भी निधि को वीर के भविष्य को लेकर चिंता थी.

वीर (स्माइल्स) : आपकी यही बातें तोह मेरा दिल जीत लेती है.

निधि : हहहहह!??

वीर : M-Mera मतलब है... आपको मेरी इतनी चिंता है?

निधि : क्यों नहीं होएगी? आखिर तुम...

कहते हुए वो रुक गयी.

वीर : आखिर तुम!?? आखिर तुम क्या ma'am!?

व्हील एकदम ऊपर आ चूका था जब निधि ने वीर के चेहरे को देखा और उसका चेहरा अपने एकदम समीप पाया तोह उसके बोल वही थम गए.

निधि : कुछ... कुछ नहीं...!

'फुककक! I'm दोंग आईटी. जो होगा देखा जाएगा. एक थप्पड़ और खा लूंगा.'

और अगले hi पल वीर ने निधि को जोरर से अपनी बाहो में खींच लिया.

इस अचानक हमले की उम्मीद निधि को बिलकुल भी न थी. वो अपनी आँखें फाड़े अभी अभी जो कुछ हुए उससे डाइजेस्ट करने की कोशिश कर रही थी. और जैसे hi उससे आभास हुआ की इस वक़्त वो वीर की बाहो में थी और वीर उससे जोरर से भींचा हुआ था, निधि की सासें तेज़ हो गयी.

उसने अपना हाथ ऊपर ले जाके वीर के सीने पर रखा और उससे धकेलने hi वाली थी जब वीर के शब्द उसके कानो में पड़े,

"सबसे पहले तोह थैंक यू ma'am. मुझे उस दलदल से निकालने के लिए. फिर अपने साथ रखने के लिए, मेरा इतना सपोर्ट करने के लिए ये जानते हुए भी की आप खुद इतनी परेशानी में हो. उसके बाद थैंक यू की आपने हर्र हार्डशिप में मेरा साथ दिया. आज भी आपको मेरी परवाह है, थैंक यू की आप आज आने के लिए तैयार हुई, मेरे साथ राइड में बैठने के लिए तैयार हुई. रही बात मेरे एआईएम की... I'm लीविंग थे कॉलेज ma'am. बिकॉज़ ी क्नोव की मुझे क्या करना है. थैंक यू सो मच! आप हमेशा hi मेरी ma'am रहोगी, चाहे में कॉलेज जाऊ या नहीं. एंड लास्तलय... जैसे आपने मेरा साथ दिया वैसे hi में भी आपका साथ दूंगा. I'm हेरे फॉर यू. ऑलवेज!"

उन् बातो को सुनते hi निधि का हाथ जो वीर को धकेलने के लिए थे वो एकदम से ढीला पद गया.

दोनों के hi चेहरे आपस में बेहद क़रीब थे. दोनों hi एक दूसरे की गरम सासो को बखूबी महसूस कर पा रहे थे.

और न जाने ऐसे क्या हुआ की वीर अपने आप hi निधि की ऑर्डर झुकने लगा.

निधि का अट्रैक्शन जैसे उससे खींच रहा था.

पास आते hi उससे सुनाई दी... निधि के तेज़्ज़ धड़कते हुए दिल की हार्टबीट. कितनी ज़र्रों से धड़क रहा था उसका दिल.

वो बस लम्बी लम्बी सासें लिए जा रही थी.

पर जैसे hi वीर उसके एकदम करीब आ गया, जब वो उसके होंठो से बस कुछ hi केन्टीमेट्रेस की दुरी पर था, निधि ने जोरर से धक्का देके उससे पीछे धकेल दिया.

निधि : N-Nooooooooooo!!!!!!!!

और एक बार फिर दोनों के बीच में वही ावकवर्डनेस्स का माहौल छ गया.

उसके बाद तोह जैसे दोनों में hi कोई बात नहीं हुई.

डिनर के बाद भी वो दोनों एक दूसरे से बात नहीं किये. 12 बजते hi जब फिरवर्क्स का शो शुरू हुआ तोह दोनों hi बैठे ज़रूर थे पर दोनों के बीच में जूही बैठी हुई थी.

और दोनों hi पल दो पल अपनी नज़रो को एक दूसरे से मिलाते पर नतीजा वही, कोई भी कुछ कहने की हालत में नहीं होता.

और तभी...

*डिंग*

[System has reached Level 5.]

*डिंग*

[In-built feature ~ Translator has been unlocked.]

*डिंग*

[In-built feature ~ Slot has been unlocked.]

*डिंग*

[Quest hunt is now accessible.]

'हँ!??!'

.

.

.

.

.

.

.

आज के लिए इतना hi गाइस!

धन्यवाद!
 
अपडेट - 50 ~ नई Year's ब्लास्ट

अब तक...

*डिंग*

[System has reached Level 5.]

*डिंग*

[In-built feature ~ Translator has been unlocked.]

*डिंग*

[In-built feature ~ Slot has been unlocked.]

*डिंग*

[Quest hunt is now accessible.]

'हँ!??!'


अब आगे...

1सत जनुअरी...

नई Year's मॉर्निंग...

आज नए साल का पहला दिन था. जहा वीर के घर में, यानी की रागिनी के घर में इस वक़्त सभी ग्राउंड फ्लोर पर हस्सी मज़ाक कर आज नाश्ते में कुछ स्पेशल बनाने की सोच रहे थे, वही इस वक़्त वीर अपने कमरे में अपने बिस्तर पर बैठे सवालों के चक्रव्यूह में घिरा हुआ था.

वैसे hi वीर उस स्लोगन वाले मिशन को लेकर उलझन में था पहले से hi की भला ऐसा मिशन सिस्टम ने उससे क्यों सौपा था, जिसका कोई सेंस hi नहीं बन्न रहा था!?

ऊपर से अब वीर को कुछ और बातें सत्ता रही थी. और वो थी...

[Oye Itna shaant kyu ho tum!? Huh!? Kuch bolo bhi!?]

पारी का ये फिरसे बदला हुआ रवैय्या.

ज़ाहिर सी बात थी, की कल रात जब वीर ने निधि को हुग किया और वो मिशन कम्पलीट किया, उसके बाद hi पारी लेवल 5 पर पहुँच चुकी थी. और नए फीचर्स भी अनलॉक हो चुके थे. परन्तु उसके बाद से hi पारी का रवैय्या एक बार फिर बदला बदला सा नज़र आ रहा था जिससे लेकर वीर उलझन में फसा हुआ था.

भला क्या है ये सिस्टम!? पारी बार बार यु अपना रवैय्या क्यों बदलती रही है? कभी ऐसा लगता है सब सही है पर कभी अचानक से पारी अजीब ढंग से अपना बेहेवियर पूरा चेंज कर लेती है.

और इस बार भी वही हुआ था. आखिर क्या राज़ छुपा था इसके पीछे!?

'हल्ला मत करो... I'm थिंकिंग!'

[Thinking what!? I can listen to your thoughts you know.]

'जस्ट शट उप!'

[Ugh!!! Hmph...!]

एक गहरी सास लेते हुए वीर ने कल की वारदातों पर एक बार फिरसे प्रकाश डाला और सब कुछ याद किआ.

कल निधि को हुग करने के बाद उससे 50 पॉइंट्स मिले थे. उसके पास पहले hi 190 पॉइंट्स थे. 10 पॉइंट्स वो अपीयरेंस में जो दाल चूका था. तोह अब टोटल 240 पॉइंट्स उसके पास मौजूद थे.

पर अब सवाल आता है नए फीचर्स का...

जो की थे~

In-built फीचर ~ ट्रांसलेटर

In-built फीचर ~ स्लॉट

और वो क्वेस्ट हंट.

'पारी! कल तोह तुम स्लीप मोड में थी. अब मुझे विस्तार से सब कुछ बताओ इनके बारे में.'

[Yeah! Right! So... Basically, Translator ek In-built feature hai. Just like Check and all. Aur jesa ki iska naam hai wesa hi iska kaam hai.]

'हम्म!? Don't तेल्ल में...!?'

[Yes! Tumne sahi samjha. It's a Translator. Chaahe koi bhi vyakti koi bhi bhaasha kyu na bole, tumhe unke bole gaye shabd translate hoke screen par dikh jaenge. Aur ye automatically hoega. So, you don't have to worry at all.]

'ी सी! पर ये 'तुम' कहके कब से बुलाने लगी मुझे तुम? हम्म?'

[Wh-What!? Don't tell me ki tumhe 'aap' hi sunn'na pasand hai.]

'No! बस! तुम्हारा बेहेवियर अचानक से बदल गया इसलिए पूछ रहा हु.'

[W-What!? N-No! It's not like that. Mein toh tumhaari wahi Pari hu. Right!?]

वीर ने कुछ कहा तोह नहीं और वो अपने दिमाग में भी कुछ सोचना नहीं चाहता था. वर्ण पारी उसके थॉट्स पढ़ लेती. इसलिए उसने शांत रहना hi ठीक समझा.

'तेल्ल में अबाउट स्लॉट! ये क्या है!?'

[Yesss! :D Yahi toh hai asli cheez. Slot ka matlab toh jaante hi ho tum right?]

'हम्म! यानी की एक प्रकार की खाली जगह जहा पे कुछ रखा जा सके.'

[Exactly!]

'और ये स्लॉट क्या काम आने वाला है मेरे!?'

[Right! Yahi pe Quest hunt kaam aata hai. Ab tum Quest Hunt ko access kar sakte ho.]

'एक्सप्लेन!'

[Hmm~ Simple bhaasha me... Quest open karo aur card paao.]

'कार्ड!?'

[Yes! Various cards! But ek dikkat hai.]

'किसी दिक्कत!?'

[Quest me se do hi kism ke cards nikalte hai. Ek Legendary Tier Card aur ek Trash Card.]

'हम्म... तोह!?'

[Legendary Tier Cards nikalne ke chances 15% hai. And Trash card nikalne ke chances 85%]

'हम्म! I'm गेटिंग आईटी नाउ.'

[Yes! In simple terms, Quest Hunt me jaa kar Quest kholo, usme se cards pao aur uss card ko Slot par lagao.]

'हम्म! और लीजेंडरी कार्ड्स किस टाइप के होंगे?'

[Good Question! Legendary Cards jesa ki naam hi bataata hai. They will be Legendary. Par harr Legendary card apne aap me alag hota hai aur unki apni khoobi hoti hai. For Example~ Yadi tum Quest open karte ho aur usme se Legendary card nikla toh wo kayi saare Legendary cards me se ek ho sakta hai. Tumko aisa card mil sakta hai jis se kaho tumko 50% kam neend aaegi. Jaldi nahi thakoge. Wagarah wagarah. Par ye kaam tab hi karega jab iss card ko Slot me equip karoge.]

'थिस...!?'

पारी की हर्र एक बात वीर को जैसे नए नए झटके दे रही थी.

[Kyu na isse live try kare!? :D ]

'!??'

[Tumhare paas 240 points hai.]

'क्वेस्ट खोलने का प्राइस कितना है!?'

[200 points!]

'Wtf!???'

[Of course! Tumhe kya laga? 10-12 points me sab ho jaega?]

'फुककककक! 200 पॉइंट्स!? वैसे hi बड़ी मुश्किल से मिशंस के थ्रू पॉइंट्स इखट्टे हो पाते है. और ऊपर से...'

[Bhulo mat ki isme Legendary Card nikalne ke 15% chances hai. Yadi ek bhi Legendary Card haath lag gaya na. Toh tumhe pata bhi nahi hai ki wo kya kar sakta hai.]

'और ट्रैश कार्ड हाथ लगा तोह? आखिर उसके चान्सेस तोह 85% है?'

[Toh kuch nahi, gaye points... :whistle: ]

'Wtf!???'

[Y-Yeah! Ab kuch paane ke liye risk toh lena padega na!?]

'शीट्ट्ट्ट्ट!! सो it's ा गैम्बल...!'

[Exactly!]

वीर समझ गया था की ये पूरे जुए के खेल की तरह था, जिसमे उसके जीतने के चान्सेस 15% थे और हारने के 85%.

दूसरे शब्दों में, 200 पॉइंट्स इन्वेस्ट कर उससे क्वेस्ट खोलने मिलेगा. यदि उससे लीजेंडरी कार्ड मिलता है, तब तोह सब कुछ सही है. पर यदि ट्रैश कार्ड मिलता है, जिसके चान्सेस इतने ज़्यादा है तोह वीर के 200 पॉइंट्स गए समझो. पूरी तरह से बर्बाद एकदम.

'और मेरी किस्मत जानती hi हो तुम राइट!?'

[Yeah! It's trash... :whistle: ]

'!???'

[What!? I'm saying the truth!]

'एहम! राइट!'

[So? Live try karna hai? :D Ho sakta hai tumhe Legendary Card mil jaaye!?]

'फाइन! दो आईटी!'

[What!? Really?]

'येह! दो आईटी! गए तोह गए. पर यदि लीजेंडरी कार्ड मिला... थें... में भी तोह देखु क्या कर सकता है वो कार्ड!?'

[Wow! Mujhe nahi laga tha tum risk loge.]

'ी साइड दो आईटी!'

[Ugh!!! Fine! Fine! Just say Quest Hunt!]

'क्वेस्ट हंट!'

*डिंग*

वीर के कहते hi उसके मैं में एक इमेजिनरी स्क्रीन खुली जिसमे एक त्रैझ चेस्ट जैसा कुछ दिख रहा था उससे.

और नीचे ओपन करने का ऑप्शन था.

पर...

ओपन के hi जस्ट नीचे, वह लिखा था~

कॉस्ट : 200 पॉइंट्स.

बेचारा वीर ये देखते hi अपने डिसिशन के बारे में दुबारा सोचने लगा.

[Bas click karo mann me hi uss option pe. Aur bas. Quest khulega aur kuch na kuch milega. Hehe~]

'फाइन!'

दिल पे हाथ रख, वीर ने एक लम्बी सास लेते हुए ओपन पर क्लिक कर hi दिया और तभी...

उसने देखा की वो क्वेस्ट धीरे धीरे खुला और अंदर से चमकती हुई रौशनी आ रही थी.

और उसके खुलते hi एक कार्ड बाहर आके निकला.

[This... This...!? No waayyyyyyyyy! :shocked: ]

पारी का शॉक होना भी स्वाभाविक था.

आखिर वीर को ऐसी चीज़ जो मिल गयी थी.

उसकी स्क्रीन पर, ये कार्ड मौजूद था~






'वेट! लेट में रीड. इन्क्रेअसेस Bone's रिगिदित्य बी 70%, रिकवरी रेट बी 60%... वेट व्हाआआत्तत्त!??? व्हाट थे फुसक्कककककककक!?????'

[This... Just how lucky you are?]

'ऑलमोस्ट अनब्रेकेबल रिब... रिबकागे गारंटीड!????'

[Yes! Dekha ab. Mene kaha tha na!? Ki ek hi card sab kuch badal sakta hai. Now look at that baby hahaha~ Bone Reaper. Saral bhaasha me, aapki jo bones ki hardness hai. Yaani ki unka thospann. Wo 70% badh jaega. Aur bone ki recovery 60% badh gayi hai. And look at that... Almost Unbreakable Ribcage guaranteed. Matlab aapka ribcage... Almost Unbreakable bann chuka hai. Tootne waala nahi ab. Damnnnnn!]

'थिस...!?'

वीर को शॉकेड होना लाज़मी था. आखिर चीज़ hi ऐसी हाथ लगी थी.

[Now equip it!]

पारी के निर्देश अनुसार वीर ने फौरन hi उस कार्ड को अपने स्लॉट में इक्विप कर लिया.

[Dhyaan rahe. Kisi bhi card ko equip kar lene ke baad aap usse 24 ghante ke pehle nahi hata sakte. Kam se kam 24 ghanto ke baad hi aap unequip kar paoge.]

'गोचा... Let's जो~'

***

वीर का नई ईयर फिलहाल तोह सही जा रहा था. फिलहाल के लिए. पर यही बात शायद अन्य जगह पर नहीं कही जा सकती थी.

जैसे की इस वक़्त...

यहाँ अपने गांव में आये कुलदेवी के दर्शन के लिए मनोरथ और बाकी सभी को आज दिन में घर की ऑर्डर वापस मुंबई को लौटना था.

कल उन्होंने दर्शन किये थे और आज उनकी hi तरफ से भंडारे का आयोजन भी था.

बस खाना ऑलमोस्ट रेडी था और बस लोगो को बाटना बाकी था.

आरोही इस वक़्त एक जगह बैठी हुई थी और सारे खाना बनाने वालो को देख रही थी वही दूर से hi.

ये सब उसके लिए नया था. वो पूजा पाठ में शुरू से hi उतना समर्पित नहीं थी. और यहाँ आके भंडारा करवाना, ये सब उसके लिए एकदम नया था. इस कार्य में वो पहली बार सम्मलित हो रही थी.

अभी वो बैठी hi थी की तभी उसने काव्य को आते हुए देखा. काव्य किसी से मुस्कुराते हुए फ़ोन पर बात कर रही थी.

'काव्य...!? भला किस से बात कर रही है!?'

उसने मैं में सोचा.

काव्य जब नज़दीक आयी तोह उसने खुद hi पूछ लिए.

आरोही : काव्य!? किसका कॉल है!?

काव्य : हम्म? ओह्ह! वीर भैया का... लो न... आप भी उन्हें नई ईयर विश कर दो...

कहते हुए उसने आरोही को अपना फ़ोन थमा दिया. और आरोही बेचारी अब इस सोच में पद गयी थी की बात को कैसे स्टार्ट करे.

वीर : Hello!?

आरोही : H-Hello!?

वीर : आरोही... दी...

आरोही : उम्... H-Happy... हैप्पी नई ईयर वीर!

वीर : हैप्पी नई ईयर तो यू तू!

आरोही : Th-Thank यू!

वीर : ....

आरोही : वो... हम... हम सभी कुलदेवी के मंदिर आये है...

वीर : ी क्नोव तहत...

आरोही : R-Right! वो... दादा जी ने तुम्हे लाने का सोचा था. B-But...

वीर : ी क्नोव तहत तू...

आरोही : O-Ohhh!! Okay! W-Wo...

वीर : !??

आरोही : N-Nothing...

वीर : ओह्ह्ह!

बेचारी आरोही, न तोह समझ पा रही थी की कैसे कन्वर्सेशन को चालु करे और यदि कर भी दे तोह कैसे उस कन्वर्सेशन को बनाये रखे!? आज भला इतना क्यों डर रही थी वो वीर से बात करने में!?

वैसे ये डर नहीं था कुछ और hi था. जिससे वो खुद भी नहीं जान पा रही थी.

उसने काव्य को फ़ोन वापस से थमाया और खुद उठ के चली गयी.

कुछ देरर में hi भंडारे की साड़ी प्रक्रिया पूर्ण हो चुकी थी और सभी ने फिर बाटना भी शुरू कर दिया.

गांव के लोग भारी मात्रा में आये और सभी ने अच्छे से भंडारे का लुत्फ़ उठाया.

काव्य जहा खीर बाटने में लगी हुई थी तोह वही आरोही सब्ज़ी बात रही थी.

भूमिका और श्वेता पूरी बाटने में लगे हुए थे.

और मनोरथ चुप चाप सभी को मुस्कुराते हुए देख रहे थे.

वैसे तोह वो चलने में एकदम स्वस्थ थे पर फिर भी उन्हें ज़्यादा थकान न हो इसलिए उनके लिए एक व्हीलचेयर लेके राखी थी बृजेश ने.

ताकि जब वो थक जाए तोह कोई भी व्हीलचेयर के ज़रिये उन्हें उनकी जगह ले जा सके.

और इस वक़्त भी, सुबह सुबह मन किये जाने लार भी आज वो तैयारियों में अपना हाथ बताये जिसके चलते काफी थकान भर आयी थी अब उनमे.

व्हीलचेयर पर hi बैठे हुए वो आराम फार्मा रहे थे और अपने परिवार को मिल जल के गांव के लोगो के बीच उन् सब को भंडारे का प्रशाद देते हुए वो बड़े hi चाव से देख रहे थे सब कुछ.

तभी उन्होंने देखा की प्रांजल वह से उनकी तरफ आया. आज प्रांजल ने इतना काम किया था की मनोरथ ख़ुशी से फुले नहीं समां पा रहे थे.

प्रांजल (हफ्ते हुए) : दादा जी! बस कुछ देरर का और है... फिर हम सब भी बैठ जाएंगे खाने.

मनोरथ : बीच बीच में आराम भी कर लिया कर 5-10 मिनट बीटा. आज तोह तुमने बोहत काम किया है.

प्रांजल : क्या दादा जी!? देवी के मंदिर में... ये सब काम थोड़ी माना जाता. यही तोह पूजा है. और पूजा जितनी भी करो, काम hi लगती है.

मनोरथ तोह जैसे हर्र एक पल गुज़रते खुशियों के नए स्टारर पर पॅहुचते जा रहे थे.

प्रांजल : आपने आज दर्शन किये!?

मनोरथ : अभी नहीं बीटा.

प्रांजल : ये क्या बात हुई दादा जी!? खर्र! जब सभी खाना खा लेंगे उसके बाद में आपको लेके चलूँगा. ऊपर मंदिर में...

मनोरथ : बिलकुल बीटा. अब तुम आराम करो. सुबह से लगे हो. वर्ण परर बोहत दुखेंगे. थोड़ा सा ृक्क जाय करो.

प्रांजल : अभी नहीं दादा जी! मेरी बहने मेरे रहते हुए अकेले कैसे काम कर सकती है? भैया और में देख लेंगे सब. आप आराम करो.

और इतना बोल, वो चल दिया वापस उन्ही गांव वालो के बीच उन्हें प्रशाद बाटने.

सब कुछ एकदम सही जा रहा था.

ये पल, मनोरथ के लिए सबसे ज़्यादा khush-haal था. क्युकी आज वो अपने परिवार को एक साथ गांव वालो के लिए सेवा करते देख रहे थे.

यही होती है उपरवाले की महिमा, की वो न जाने कब एक साथ सब को ले आये और एकजुट कर दे.

'काश मेरा वीर भी यही होता...!'

सोचते हुए मनोरथ अपने खयालातों में खो गए.

कुछ समय बीत जाने के बाद सब कुछ कुशल मंगल से संपन्न हो चूका था और अब बस घरवालों और मंदिर के ट्रस्ट लोगो का hi खाना बचा हुआ था.

जब गांव वाले लोग धीरे धीरे जाने लगे तोह मनोरथ ने सभी को खाने के लिए हिदायत दी.

और बस, नीचे दरी बिछा के सभी परिवार के सदस्य पत्तल में खाना परोस शुरू हो चुके थे.

प्रांजल : काश... मेरा भाई वीर भी यही होता... और रागिनी भाभी भी!

प्रांजल ने शातिरता से हलकी आवाज़ में कहा. उसके बगल से आरोही और काव्य बैठी हुई थी. और ये वाक्य सुनते hi दोनों की hi बॉहे सिकुड़ने लगी.

वो जानती थी की प्रांजल तोह उल्टा उन्हें वीर से दूर रहने को कहता था तोह भला आज वो यहाँ उसके बारे में कैसे सोच सकता है?

ये ज़रूर ढोंग था. मैं में ये निर्धारित कर, दोनों hi बहनो ने उससे इग्नोर hi करना सही समझा.

वही दूसरी और श्वेता और भूमिका अपनी बातो में लगी हुई थी.

श्वेता : क्या हुआ? बात हो गयी न?

भूमिका : हाँ! सब कुछ सही है होटल में माँ.

श्वेता : मेने कहा था न. तू खामखा टेंशन ले रही थी.

भूमिका : हम्म! वैसे... आपने फिर उसके बारे में क्या सोचा? मतलब? केसा क्या चल रहा है?

श्वेता : बीटा! बस... जल्द hi पापा जी डिसिशन लेंगे ज़मीन का. और फिर देखना, हमारे पास हमारा हिस्सा होगा. फिर उससे हम जैसे चाहे उसे करे.

भूमिका : ओह्ह्ह्ह! पर... आपको कैसे पता दादा जी जल्द hi डिसिशन लेने वाले है!?

श्वेता (खुसपुसाते हुए) : विवेक ने तोह यही कहा था.

भूमिका : हम्म? क्या कहा!? कुछ सुनाई नहीं दिया माँ!

श्वेता : अहह!? अरे नहीं बीटा. मेने कहा की मेरा मैं कहता है की जल्द hi पापा जी डिसिशन लेने वाले है. तुम देखना.

भूमिका : ओह्ह्ह! P-Par... उन्होंने तोह कहा था न की... V-Veer यदि घर में नहीं होगा तोह तब तक कोई भी चर्चा ज़मीन के बारे में नहीं की जाएगी?

श्वेता : हम्म! कहा था उन्होंने. पर तुम देखना मेरी बच्ची, जल्द hi देंगे वो अपना फैसला.

भूमिका : हम्म~

श्वेता अपनी बेटी भूमिका से भी बातें छुपाई हुई थी. वो बातें की वो विवेक के साथ मिली हुई है और वीर को बाहर निकलवाने के प्लान में विवेक का hi हायह था. बेचारी भूमिका ये सोच के चल रही थी की उसकी माँ hi सब कुछ कर रही है.

इधर श्वेता आस लगाए बैठी थी की जल्द hi वो मौका आये जब मनोरथ अपनी जाय्ज़ात और ज़मीन का बटवारा करे और वो अपना हिस्सा लेने में सफल हो जाए. फिर तोह श्वेता को किसी चीज़ से मतलब नहीं होने वाला था. बस अपनी होटल, अपनी ज़मीन, और अपनी बच्ची. बस!

पर उससे क्या पता था. की जिस खायी से उसने वीर को फेका था उसी खायी से फेकने के लिए विवेक उसके पीछे खड़ा हुआ था.

वो ये नहीं जानती थी की विवेक का इरादा उससे सुई के बराबर तक की ज़मीन देने का नहीं है. क्या होगा जब श्वेता अपने कर्मो के फल का परिणाम देखेगी? जब उससे पता चलेगा की जिस ज़मीन के लिए उसने इतने पापड बेले थे, वो तोह उसके हाथ आणि hi नहीं थी.

जब सभी खाना खा के फुर्सत हुए तोह बस अब निकलने का समय हो चूका था. लगभग शाम होने को आ गयी थी.

4 बज रहे थे...

वैसे तोह वो सभी दिन में निकलने वाले थे पर सब कुछ थोड़ा लेट हुआ या यु कहे की सब कुछ होने में समय ज़्यादा लग गया. और इसी कारण वश आज वो थोड़ा लेट थे.

प्रांजल मनोरथ के पास आया और उनसे बोलै,

"दादा जी! दर्शन नहीं हुए न आपके अभी भी?"

मनोरथ : हां बीटा! दर्शन करना बाकी है. एक आखिरी बार जाने से पहले.

प्रांजल : चलिए! में करवाए देता हु दादा जी!

मनोरथ : हां चलो बीटा.

कहते हुए जब मनोरथ उठने लगे तोह प्रांजल ने उन्हें पकड़ के वापस से व्हीलचेयर पर बैठा दिया.

प्रांजल : अरे अरे!? ये क्या!? सुबह से थक गए हो आप. आप इसमें hi बैठो रहो में लेके चलता हु न?

मनोरथ : बीटा इसमें!? अरे वह सीढिया है बीटा. सीढ़ियों में कैसे ले जाओगे ऊपर तक?

प्रांजल : अरे दादा जी साइड में रास्ता भी है. ऊपर जाने का. उधर से चलेंगे न हम.

मनोरथ : बीटा फिर भी चढ़ाई तोह है न. थक गए होंगे तुम भी. रहने दो...

प्रांजल : न मतलब न... मेने कहा न. आप टेंशन मत लो. में नहीं थका हु. बस आप चलिए.

मनोरथ : अच्छा! अच्छा बीटा ठीक है.

और अपने पोते की बात मानते हुए मनोरथ आखिर कार बैठ hi गए. प्रांजल प्यार से मुस्कुराया और ठीक उनके पीछे चला गया और व्हीलचेयर को पकड़ वो ऊपर साइड में बने मंदिर की ऑर्डर ले जाने लगा.

पर इस वक़्त उसकी वो मुस्कान... प्यार भरी मुस्कान से तब्दील होक एक हैवानी कुटिल मुस्कान बन्न चुकी थी.

और उसकी निगाहें विवेक को देख रही थी. वही विवेक की निगाहें भी चुप के से प्रांजल की आँखों से टकराई मानो जैसे मैं hi मैं कुछ बातें कही जा रही थी.

ऊपर साइड के रास्ते से ले जाते हुए प्रांजल धीरे धीरे मनोरथ को मंदिर के द्वार पर ले गया.

और फिर मंदिर के अंदर भी...

अंदर आते hi मनोरथ ने देवी के दर्शन किये और प्रशाद भी लिया.

जब लौटने की बारी आयी तोह प्रांजल ने मनोरथ को सीढ़ियों के पास लाके रोका और बोलै,

प्रांजल : अरे! मेने प्रशाद तोह लिया hi नहीं दादा जी!

मनोरथ : जाओ बीटा ले आओ. फिर चलते है.

प्रांजल : अभी आया दादा जी...

और इतना बोल वो चल दिया मंदिर के पुजारी की ऑर्डर वापस पीछे.

प्रांजल प्रशाद ले hi रहा था की पता नहीं क्या हुआ की मनोरथ को व्हीलचेयर आगे बढ़ी.

मनोरथ ने जब आहात पाते hi पीछे देखा तोह उससे कोई दिखाई नहीं दिया. प्रांजल दूर खड़ा प्रशाद ले रहा था. पर तब तक बोहत देरर हो चुकी थी.

जब तक मनोरथ की कुछ समझ में आता, व्हीलचेयर का एक पहिया सीढ़ी के नीचे जा चूका था.

और फिर...

*क्रआआष्ठहहहहह*

"Aaaaaaaaaaa...."

ऊपर से लुड़कते हुए मनोरथ सीढ़ियों पर गिरते चले गए.

"दादाआआआ जीईईई!!????"

प्रांजल ने जब पीछे मुद के देखा तोह शॉकेड होते जोरर से चिल्लाया और तेज़्ज़ कदमो के साथ सीधे दादा जी की ऑर्डर भागा.

मनोरथ सीढ़ियों पर गिरते पड़ते नीचे जाते जा रहे थे.

सीढिया इतनी भी नहीं थी पर काम भी नहीं थी.

कुछ सीढ़ियों से लगतार गिरने के बाद एक जगह आकर वो रुके और बेहोश हो चुके थे.

प्रांजल घबराया हुआ उनके पास आया और देखा तोह उसके दादा जी का माथा और परर खून से सना हुआ था.

"दादाआआआ जीईईई!!!!"

वो जोरर से चींख और उसकी ये चींख ने आस पास के सभी लोगो को चौकन्ना कर दिया.

और सभी उस ऑर्डर भागे...

***

1सत जनुअरी...

नई Year's ईव...

मुंबई...

एक बड़ी सी होटल के कॉरिडोर में एक आदमी तेज़्ज़ कदमो के साथ चलता हुआ जा रहा था.

उसके पीछे कई सारे हट्टे काटते आदमी चल रहे थे.

कुछ की जेबो में तोह गन्स भी थी. और सभी देखने में इतने भयानक की मानो अभी पकड़ के ज़िंदा मार देंगे.

पर इस वक़्त वो सभी अपने बॉस को फॉलो कर रहे थे जो इस वक़्त तेज़्ज़ कदमो के साथ होटल की लिफ्ट की ऑर्डर जा रहा था.

और ये और कोई नहीं स्लोगन hi था.

"काम हुआ!?"

उसने तेज़्ज़ आवाज़ में पूछा.

स्टीव : सब रेडी है. बस उसके आने की देरर है.

स्लोगन : गुड! सब कुछ फटाफट होना चाहिए. मुझे मुंबई चोर्रे सालो हो चुके है और आतिश अब नहीं है तोह पुलिस गान्दुपना ज़रूर दिखाएगी. साड़ी गाडी रेडी रखना और क्स्टवस सारे बंद करवा दिए है न?

स्टीव : आस पास के सभी बंद है.

स्लोगन (स्माइल्स) : गुड! आज नए साल में नया धमाका होगा...

स्टीव : बस उसके आने की देररि है. और बस फिर...

स्लोगन : हम्म्म~ हमे जल्द निकलना होगा. आतिश के रिसोर्सेज और मन पावर को कल हिडौट पर जमा करवाओ. पुलिस को बिजी रखने में काम आएँगे वो.

इतना बड़ा मौका हाथ से आज चूत नहीं सकता मेरे...

स्टीव : जी दादा!

और स्लोगन स्टीव के साथ नीचे उतर अपनी गाडी में जा चूका था.

न जाने किसका वेट कर रहे थे ये सभी. पर इतना तोह तय था की जिसका भी इंतज़ार हो रहा था. वो इन् सभी के लिए बोहत ज़रूरी था.

***

मुंबई के hi इस शहर में एक अलग अन्य होटल में इस वक़्त नई ईयर की पार्टी चल रही थी.

और पार्टी तोह अभी सही से शुरू हो रही थी. 8 बज चुके थे... पर...

उस होटल से hi एक बेहद hi ख़ूबसूरत सी लड़की एक ब्लैक ड्रेस में बाहर आयी और अपनी गाडी की ऑर्डर जाने लगी.

पर अभी वो गाडी से कुछ hi दूरी पर थी जब...

*Kabooooooooooommmmm*

एक इतनी तेज़्ज़ ब्लास्ट हुआ...

उसकी hi कार में... जो वह कड़ी उसका इंतज़ार कर रही थी.

अंदर मौजूद ड्राइवर के चीथड़े उड़द चुके थे और कार तोह पूरी आग की लपटों में क़ैद थी. चारो और धुँआ hi धुँआ...

और आस पास अफरा तफरी...

लोग चींखते हुए वह से दूर भागने लगे.

तोह वही वो लड़की जो कार की तरफ जा रही थी वो ब्लास्ट के ब्लो से थोड़ा सा दूर जा गिरी और बेहोश हो गयी.

ये सब कुछ इतनी जल्दी हुआ की वह के लोगो को समझ में hi नहीं आया की हुआ क्या अचानक से.

***

कुछ देरर पहले...

वीर इस वक़्त उसी छेत्र में मौजूद था. रागिनी ने उससे कुछ सामान लाने भेजा हुआ था. आज नई ईयर स्पेशल डिनर bann'ne वाला था.

पर...

वो अभी दूकान के अंदर जाने hi वाला था जब अचानक से उससे ये सुनाई दिया.

*Kabooooooooooommmm*

और अगले hi पल उसके रौंगटे खड़े हो गए.

'व्हाट थे...!? व्हाट वास् तहत!? कही आस पास से hi आयी है आवाज़.'

[We must check that out.]

और वो गाडी में बैठने hi वाला था जब उसका फ़ोन बज उठा.

'हँ!? काव्य?'

वीर : Hello??

दूसरी साइड से काव्य की जोरर जोरर से रोने की आवाज़ आ रही थी.

वीर : H-Hello? काव्य क्या हुआ? बोल न कुछ!? रो क्यों रही है?

काव्य की सिसकने की आवाज़ वीर को और भी घबराहट में डालते जा रही थी.

काव्य (रट हुए) : Bh-Bhaiyaaaaaaaa.... *स्निफ्फ*

वीर : काव्य दर्रा मत बोल जल्दी... क्या हुआ?

काव्य : दादा जीई... सीढ़ियों से गिर गए. हम सभी हॉस्पिटल में है. *स्निफ्फ* आप जल्दी से आ जाओ...

और मानो ये खबर सुन्न वीर को सांप सूंघ गया.

काव्य : हम सभी थोड़ा दूर है. क्युकी ये मंदिर में hi हुआ.... *स्निफ्फ* तोह जो हॉस्पिटल अच्छा नज़दीक मिला वही आ गए हम. आप जल्दी आ जाओ भैया... *स्निफ्फ*

वीर : M-Mein अभी आ रहा हु काव्य. Don't वोर्री!

उसने कॉल काटा और के को वो लगाया hi था गाडी में जब...

*डिंग*

[Mission : Rescue Kaera from the hideout.


रिवार्ड्स : ??? पॉइंट्स.

मिशन फेलियर पेनल्टी : 5000 पॉइंट्स.

टाइम लिमिट : 2 डेज.]

और ये पढ़ते hi उसकी आँखें फैलती चली गयी....

'सीईट्टत्तत्त!!!'

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आज के लिए इतना hi गाइस!

लिखे की बटन पर थोक के जाने का. और कमेंट करने का. 😁


धन्यवाद!
 
अपडेट - 51~ ट्रैप्ड

अब तक...

*डिंग*

[Mission : Rescue Kaera from the hideout.


रिवार्ड्स : ??? पॉइंट्स.

मिशन फेलियर पेनल्टी : 5000 पॉइंट्स.

टाइम लिमिट : 2 डेज.]

और ये पढ़ते hi उसकी आँखें फैलती चली गयी....

'सीईट्टत्तत्त!!!'


अब आगे...

आज नए साल का पहला दिन था. एक शुभ दिन. सब कुछ कितना अच्छे से गुज़र रहा था. आज हमारा परिवार काफी सालो के बाद इधर हमारी कुलदेवी के मंदिर में दर्शन करने आया था.

शुरुआत से hi मुझे पूजा पाठ में उतनी दिलचस्पी नहीं रही, पर आज वाक़ई सब के साथ मिलके समय गुज़ारने में मेरा मैं खुश हो गया था. ये सब की मुझे कितनी ज़रुरत थी, ये आज मुझे और अच्छे से समझ में आने लगा था.

हम सब अभी यही थे, बस लौटने की hi देरर थी. में बैठी हुई सोच hi रही थी की सब इखट्टा होये और हम सब लौटे. एक अच्छे नए साल की शुरुआत के बाद एक अच्छी भली शुभ रात्रि. पर शायद ये होना देवी को मंज़ूर नहीं था.

जब अचानक...

"दादाआआ jiiiiiiiiii!!!!!!"

"Aaaaaaaaaaaaaa"

पास में hi मौजूद ऊपर मंदिर की सीढ़ियों से कुछ आवाज़ें आयी.

जैसे hi मेरी नज़रे उस शोर की ऑर्डर गयी...

तोह सामने का नज़ारा देख मेरी रूह काँप गयी.

दादा जी! मंदिर की सीढ़ियों से लुढ़कते हुए नीचे गिरते जा रहे थे. उनके पीछे उनकी व्हीलचेयर भी गिरती हुई बस नीचे की ऑर्डर आती जा रही थी. और मुझे जो सुनाई दे रहा था वो था शोर... दादा जी की दर्द भरी चींख, प्रांजल का बेबसी से चिल्लाना और उस व्हीलचार की गिरने की आवाज़ जो सीढ़ियों से बस टकराती जा रही थी.

तभी उनके पीछे से ऊपर मंदिर से प्रांजल घबराता हुआ दौड़ता हुआ नीचे आने लगा. साथ hi साथ मंदिर में मौजूद बाकी जान भी. उनके चेहरों पर शिकन साफ़ नज़र आ रही थी मुझे.

और हम सब जो मंदिर के निचे साइड भंडारे वाली जगह पर बैठे हुए थे, सब इखट्टे उठे और दादा जी की तरफ दौड़ पड़े.

मेरी छोटी बहिन काव्य...

दादा जी की हालत देख, उनके माथे पर खून सजा देख जोरर जोरर से बिलखने लगी.

में चुप चाप पीछे कड़ी हुई थी. कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या करू. पर इतना ज़रूर आभास हो गया था मुझे की...

मेरी आँखें भी नम्म हो चली थी.

ताऊ जी और मेरे पापा, दोनों hi बोहत घबराये हुए लग रहे थे. उन् दोनों ने दादा जी को उठाया और सबसे पहले एक जगह अच्छे से उन्हें लिटाया.

हर्र तरफ अफरा तफरी सी मची हुई थी. काव्य रो रही थी. ताऊ जी और पापा प्रांजल से सवालों पे सवाल कर रहे थे. भूमिका दी और तै जी... वो भी चिंतित नज़रे लिए बातो में उलझी हुई थी. विवेक भैया ऊपर मंदिर में देखने गए थे की ताऊ जी आखिर गिरे कैसे!?

प्रांजल का कहना था की वो प्रशाद ले रहा था जब अचानक hi उसने पीछे से दादा जी की चींख सुनी तोह वह घबराते हुए दौड़ के फौरन hi नीचे आया. मंदिर के पुजारी जी का भी यही कहना था. वो अपने हाथो से hi प्रांजल को प्रशाद दे रहे थे. जब अचानक hi दादा जी की व्हीलचेयर सीढ़ियों से नीचे चली गयी.

पर ये कैसे हो सकता था?

में इस सवाल में उलझी हुई थी. आखिर दादा जी की कुर्सी अपने आप कैसे नीचे आ गयी!?

मेरे मैं में बस सवाल hi सवाल घूम रहे थे. पहले लगा की शायद प्रांजल से गलती से खिसक गयी होगी, पर प्रांजल तोह पुजारी जी के पास था. फिर एक पल के लिए मेरे मैं में ये ख़याल भी आया की कही ऐसा तोह नहीं की दादा जी को किसी ने पीछे से धक्का दे दिया हो? पर फिर अगले hi पल ये ख़याल मेरे मैं से निकल गया.

नहीं! ऐसा कौन करेगा!? गांव के लोग हमे बड़े hi आदर के साथ कल से रखे हुए थे. हमारी hi सेवा में लगे थे. कोई कर hi नहीं सकता ऐसा. और कर के मिलेगा भी क्या? तोह बस अब एक hi अनुमान बाकी था.

की शायद दादा जी ने hi खुद गलती से चेयर मूव कर ली हो और वो नीचे की ऑर्डर आ गिरे. ये पॉसिबल था. पर ये jaan'ne के लिए उनका होश में आना ज़रूरी था.

पर फिलहाल...

"तोड़ दूंगा... *स्निफ्फ* क्यों लाये आप सब ये कुर्सी!? हाँ!? में तोड़ दूंगा ऐसी कुर्सी को. सब इस कुर्सी के कारण. नहीं बैठेंगे आज से दादा जी इस्पे..."

प्रांजल जोरर जोरर से रट हुए व्हीलचेयर को उठा उठा के फेक के पटक रहा था. उसने एक व्हील भी उखाड़ दिया था व्हीलचेयर का.

जब अचानक विवेक भैया ने आके उससे पीछे से जकड लिया.

"चोरर! छोटे... छोटे चोरर!!! क्या कर रहा है? पागल हो गया है क्या!?"

"चोरर दो मुझे भैया! सब इस कुर्सी के कारण. न ये होती न दादा जी गिरते... *स्निफ्फ* "

में...

कुछ भी कहने लायक नहीं थी. एकदम मौन hi सारे नज़ारे को देख रही थी. शायद घबरा गयी थी में. ऐसा पहली बार मेरी आँखों के सामने हो रहा था. दादा जी की खून से सनी हालत देख मेरे जैसे पाँव जम्म से गए थे.

"जल्दी! नज़दीक में हॉस्पिटल दिखा था न हमे आते वक़्त!? फौरन! पापा जी को कार में लिटाओ और चलो फौरन. जल्दी!"

ताऊ जी की आवाज़ सुन्न हम सब जैसे अब रुकने लायक स्थिति में नहीं थी. गांव वालो को जल्दबाज़ी में hi विदा देकर हम सब जल्द से जल्द नज़दीकी हॉस्पिटल पहुचे.

काव्य! मेरे कंधे पर सर्र रख पूरे टाइम ासु बहाती जा रही थी. मेरी माँ भी, बोहत चिंता में थी.

दादा जी को फौरन hi हॉस्पिटल वालो ने भर्ती कर लिया था.

और हम सब बस उनके वार्ड के बाहर hi गुमसुम से बैठे हुए थे.

आज का इतना अच्छा शुभ दिन, जैसे एक मातम के दिन में बदल गया था. पालक झपकते क्या से क्या हो गया. बस दुआ यही थी, की दादा जी को कुछ न हो.

सबसे ज़्यादा दादा जी का अटैचमेंट काव्य से था और...

हाँ!

जैसे मुझे कोई याद आया.

वीर!

काव्य और वीर से hi दादा जी सबसे ज़्यादा अटैच्ड रहे है. शायद कुछ दिनों से प्रांजल के प्रति भी उनका रुझान बढ़ रहा है.

वीर के बारे सोचते hi... मुझे उसका चेहरा अपने मैं में नज़र आने लगा.

और वो लम्हे...

वो दिवाली की रात...

जब में काव्य को स्कूटी पर बैठा के उन् गुंडों से भाग रही थी. और उस रात वीर हमे बचाने आया था. जब वो एक चट्टान की तरह सामने खड़ा था मुझे उन् गुंडों से बचाने के लिए.

पता नहीं क्यों, पर आज भी उस लम्हे को याद कर, मेरे रौंगटे खड़े जाते है. वो पल में कभी न भूल पाऊँगी.

उसके बाद से समझ आया था मुझे. की में कितनी गलत थी. कितने बड़े अन्धकार में जी रही थी. भला में ऐसा कैसे कर सकती थी!? केवल विवेक भैया और प्रांजल की बातो में आकर में अपने उस प्यारे भाई को नेग्लेक्ट करती आयी जो बिना कुछ सोचे, बिना अपनी जान की परवाह किये एक पल में वह हाज़िर हो गया था मुझे बचाने के लिए.

वही ये विवेक भैया, और प्रांजल. कहने को तोह मेरे सेज भाई है. पर इन् दोनों ने उस दिन मेरा फ़ोन नहीं उठाया था. और में इनकी बात मान रही थी!?

सच में...

मुझे खुद पे अब हस्सी भी आती है और घिन भी. में शायद इसलिए... वीर से नज़रे नहीं मिला पाती. बड़ी मुश्किल से उसके आस पास में कड़ी रह पाती हु. आफ्टर आल, he's तू पुरे.

और वीर के बारे में सोचते सोचते hi मुझे ये भी ख़याल आया की...

दादा जी के बारे में उससे तोह पता hi नहीं.

मेने बगल में बैठी काव्य को देखा और उस से कहा,

"काव्य! वीर को इस बारे में कुछ नहीं पता है. उससे बता दो."

"हँ!?"

काव्य मेरी बात सुन्न आश्चर्य में मुझे देखि पर फिर अगले hi पल वो हाँ में सर्र हिलायी और उठ के बाहर की ऑर्डर चली गयी.

और में यहाँ यही सोच रही थी.

'विल हे के!?'

***

'फ़क! केवल तुम्हारे कहने पर में ये रिस्क ले रहा हु.'

[Wait what!? Mene tumhe force nahi kiya okay!? I only suggested.]

'हाँ! ी क्नोव की कैसे सुग्गेस्ट किया था तुमने. अरे दादा जी के पास बाद में चले जाना. पहले मिशन पे जाओ. उसके बारे में डिटेल्स लो. ब्लाह ब्लाह ब्लाह. कौन था ये कहने वाला!?'

[Wh-!?? Haan toh kya galat kaha!? Hmph! Dada jii ko toh baad me bhi dekhne jaa sakte hai. But Mission ki time limit 2 days ki hi hai. Aur bhulo mat ki mission update hua tha kuch derr pehle hi. Yadi firse hua aur time limit ghat gayi toh!? Fir kya karoge!?]

'उसी को ध्यान में रख के यहाँ आया हु. इवन थौघ, मुझे दादा जी को देखने का मैं कर रहा है. न जाने क्या हुआ है, किस हाल में होंगे वो?'

रात के 9 बज रहे थे और वीर और पारी दोनों hi यहाँ अनजान सी जगह पर अपनी hi बहस में लगे हुए थे.

कारण!?

कारण था की वीर का मिशन आलरेडी अपडेट हो चूका था और उससे लोकेशन मिल गयी थी की हिडौट कहा पर है.

निकला तोह वो रागिनी के लिए सामान लेने था. पर बेचारा आ पहुचा था वो हिडौट. यही थी वीर की ज़िन्दगी. नए साल के पहले दिन hi, उससे आज ऐसे मोड़ पे लाके खड़ा कर दिया था सिस्टम ने. एक तरफ उसके दादा जी तोह एक तरफ करा. उसकी ज़िन्दगी में उथल पुथल तोह होना hi था.

और कब न जाने क्या हो जाए.

खर्र! उसने फ़ोन कर सुमन को बोल दिया था की वो रागिनी के लिए सामान ले आये और रागिनी को जाता भी दे की वो लेट आएगा आज.

पर सबसे बड़ा सवाल अभी उसके मैं में ये था की...

'Wtf इस मिस करा दोंग हेरे!? वो तोह दिल्ली में थी न? यहाँ कब आयी? सहित! कौन है ये लोग जो उन्हें यहाँ ले आये है. ी can't लेट एनीथिंग हैपन तो हेर.'

[I don't know. Par mujhe kuch galat sa mehsoos ho raha hai. Like kuch waqai bura hone waala hai. So beware~]

'हम्म! पर ये किसी अजीब सी जगह है!?'

उसने अपनी बाइक एक जगह दूर लगाई जहा किसी को आसानी से नज़र न आये और वो सुनसान रास्ते को पार कर हिडौट की बाउंड्री पर आया.

उसने देखा की अंदर जाने के लिए साइड में एक बड़ा सा गेट था जो की बंद था अंदर से. और ऐसा भी हो सकता है की गेट के अंदर पहरे दार भी हो.

पर अभी इस वक़्त उससे बाउंड्री पर लगी जालियो से hi अंदर का कुछ नज़ारा दिखाई दे रहा था.

लोहे के बड़े बड़े कंटेनर रखे हुए थे अलग अलग रंग के. न जाने क्या भरा हुआ था उनमे.

'हँ!? ये पुबज में गोएरगोपोल वाली जगह की तरह क्यों दिखाई दे रहा है मुझे. ख़ास कर की वो लोहे के कंटेनर्स.'

[Shut up! Think ki andar kese jaaoge. Game ke baare me baad me sochna.]

'ओह c'mon! I'm योर मास्टर! नॉट यू... ी डोंट क्नोव तुम्हारी डील क्या है बूत ी हैवे आलरेडी फिगुरेद आउट की तुम्हारा बेहेवियर हर्र लेवल पर बदल जाता है.'

[What!? What are you saying!!? It's... It's nothing like...]

'झूठ नहीं बोलो. कोई फायदा नहीं है. ी आलरेडी क्नोव. हर्र लेवल पर... योर बेहेवियर चंगेस. वर्ण मुझे आप कहकर पुकारती तुम. ऐसे रूडली बात ना करती. न जाने मेरी पिछले लेवल की पारी कहा चली गयी. ी मिस हेर.'

[Huh!? W-What the hell? Y-You think I'm rude!? Huh!??? 😠 ]

'ऑफ़ कोर्स यू अरे. और शट उप! लेट में थिंक...'

[Y-You... Y-You... :angry++: ]

'स्लीप मोड में भेजू तुम्हे!?'

[Ehhh!? N-Noo! Ughhh! Dekh lungi... Hmph! :beee:]

'ी कैन हेअर तहत.'

[ :ीक1: ]

'जस्ट व्हाट अरे थी थिंग्स...!?'

बॉहे सिकोड़ते हुए वो धीमी चाल चल के एक बाउंड्री के पास रखे हुए कंटेनर के पास आया और...

'चेक'

[Description : An Iron Container. Contains sedatives and other drugs for smuggling.]

वीर ने उस कंटेनर को जैसे hi चेक किया, उसकी आँखें हैरानी के मारे फैलती चली गयी.

'No वैयय्यी! थिस...!?'

[Drugs... Iska matlab saaf hai. Ye koi gang hai. Andar boht log ho sakte hai. Now I think ki tumhe andar nahi jaana chahiye. It's getting late.]

'वाह! पहले खुद बोलती हो की जल्दी से हिडौट पर चलो, और अब आ गए तोह कह रही हो की वापस चलो.'

[That... That's because Mujhe nahi pata tha ki it will be a gang. Look! In simpler terms, hume nahi pata andar kaun hai, uska kya iraada hai, kyu wo Kaera ko laaya hai. Mere khayaal se hume kuch details leke hi andar jaana chaahiye.]

'नहीं! I'm गोइंग इन. मिस करा अंदर है.'

[B-But...]

'यू won't अंडरस्टैंड! She's माय रिस्पांसिबिलिटी. जब तक वो खुद से मुझे मन नहीं कर देती, वो मेरी ज़िम्मेदारी रहेंगी. ी मस्ट हेल्प हेर. और क्या पता, कहो अंदर काम लोग हो और हम आसानी से उन्हें चुर्रा के बाहर ले आये.'

[I-I don't think so...]

'अस ी साइड... I'm गोइंग इन...'

[W-Wait!]

पर वीर न रुका. शायद उसके अंदर जाने का कारण, भीतर मौजूद करा थी.

वीर को न जाने क्यों, करा अपनी एक ज़िम्मेदारी की तरह प्रतीत होती रही.

आखिर, करा का फर्स्ट टाइम उसने उस से छीना था.

छीना तोह नहीं कहेंगे. पर ये भी नहीं कहेंगे की करा ने अपनी मर्ज़ी से उससे दिया था. आखिर वो तोह नशे में थी. बस! शायद इसलिए, वीर को एक सेंस ऑफ़ रिस्पांसिबिलिटी महसूस होती थी अपने ऊपर.

अंदर जाने के लिए, ज़ाहिर सी बात थी वो मैं गेट से नहीं जाने वाला था. वह से जाना मतलब खुद के परर पर कुल्हाड़ी मारना.

पूरे हिडौट की बाउंड्री का चक्कर लगाने की सोच जब वो आगे बढ़ा तोह एक जगह उससे एक छोटा गेट नज़र आया. ये हिडौट का पिछले हिस्सा था शायद. और यहाँ से केवल ऑटो तक के निकलने जितनी जगह थी. उस से ज़्यादा नहीं.

जैसे hi वीर उस गेट के नज़दीक आया, उसने गेट को हल्का सा धक्का दिया और...

*क्रियाआआअककककक*

'फुककक! It's ओपन!'

[Shor mat karo....]

'यू शट उप फर्स्ट...'

[You.... ]

अंदर आते hi उसके कानो पर एक आवाज़ पड़ी,

"अबे पीछे का गेट बंद कर, और फ़ालतू के जो बल्ब जल रहे है उन्हें भी बंद कर..."

"हाँ! करता हु..."

और एक आदमी गेट की तरफ बढ़ा.

'सहित~!"

मौका देखते hi वीर एक वही रखे कंटेनर के पीछे छुप गया.

ये उसकी किस्मत थी, जो उस आदमी ने उससे नहीं देखा था. वो आदमी आया गेट बंद किया और अंदर चल दिया.

अंदर एक बड़ी सी बिल्डिंग टाइप की थी. कुछ जगह से पुरानी तोह कुछ जगह से नयी प्रतीत हो रही थी.

खुद को सावधान कर, वीर आहिस्ता आहिस्ता लोगो से बच बच के जैसे तैसे अंदर तक पहुचा.

'1, 2, 4.... 16... 22... फुककक! कितने लोग है बहनचोद! दमन आईटी! वेयर इस शी!?? मिस करा!?'

[B-Be... Safe...]

'ी क्नोव! में सोच रहा हु की बिना फाइट लिए hi उन्हें यहाँ से चुर्रा के ले जाऊ. बूत ी don't थिंक ये उतना आसान है.'

[Asaan hai!? It's almost impossible!]

जब वीर थोड़ा और अंदर तक आया तोह उससे जैसे सबसे बड़ा झटका लगा.

उसके परर वही जम्म से गए थे. मुँह एकदम खुला का खुला, आंखें फैली की फैली...

क्युकी सामने...

करा एक कुर्सी पर बैठी हुई थी, रस्सियों से बंधी, शायद बेहोश थी वह.

पर...

उस से भी ज़्यादा झटका देने वाली बात ये थी की करा के सामने जो शख्स खड़ा था...

वो कोई और नहीं बल्कि वही था. जिस से वीर दो बार पथ क्रॉस किया था.

स्लोगन!!!

'N-No वैयय्य! H-He... ये तोह वही है. It's हिम!!!! K-Kya नाम था!? यस!!! स्लोगन!!!! Wh-What इस हे दोंग हेरे!? इसका मतलब... He's थे ओने!??? ी... ी कनेव आईटी. तेरे वास् समथिंग रॉंग विथ हिम.'

[W-Why!?? Ye sab aur ulajhta jaa raha hai. Listen! Let's go back. Kaera ke bodyguards ko hum inform karte hai. Wo usse search karne me lage honge. We will find tgem aur fir unke saath hum waapas yaha...]

"चलो बाहर भी आ जाओ अब!"

पारी की बात अधूरी hi रह गयी जब अचानक hi वीर को अपनी पीठ पर एक गन की नोक महसूस हुई और उसके पीछे से कहे गए वो शब्द.

'सहित!!!!'

वो पलटा और देखा तोह सामने एक हत्ता कट्टा आदमी मौजूद था. उसके हाथ में एक सिल्वर कलर का रिवाल्वर था.

रिवाल्वर से इशारा कर वो वीर को बाहर लाया और वीर और स्लोगन की आँखें एक बार फिर आपस में टकराई.

स्लोगन : स्वागत है! वेलकम! वेलकम! मुझे पता था तुम यहाँ आओगे hi!

'हँ!? हाउ दीद हे..!?'

[Isse kese pata? Is he joking or what!?]

स्लोगन : बैठो! बैठो!

स्लोगन ने इशारा के वीर को करा के बगल में राखी चेयर पर बैठाया. मजबूरन वीर को बैठना पड़ा.

पर उसकी नज़रे एक बाज की तरह स्लोगन पर hi मौजूद थी.

स्लोगन : ज़रा इनका भी तोह स्वागत करो भाई!

और उसके इतना कहते hi स्टीव जो रिवाल्वर लिया था उसने अपना रिवाल्वर खोसा और रस्सिया लाके वीर के हाथ परर दोनों बाँध दिए.

वीर (गुस्से में) : कौन हो तुम असल में!? और ये सब क्या है!?

स्लोगन (स्माइल्स) : अरे बताया तोह था न बच्चे!? I'm स्लोगन!

वीर (गुस्से में) : Don't फ़क विथ में. में आलरेडी इंटरनेट और हर्र जगह सर्च कर चूका हु. स्लोगन नाम का कोई आदमी नहीं है.

स्लोगन (लौघ्स) : ऑफ़ कोर्स! ऑफ़ कोर्स! हाहाहा~ बूत... क्या तुमने अंडरवर्ल्ड में किसी से पूछा!?

वीर : हँ!??

स्लोगन (स्माइल्स) : नहीं न!? तोह कैसे पता चलेगा!?

[Ugh! Ye aadmi boht creepy hai. What the hell is wrong with his smile!?]

स्लोगन : स्टीव!

स्टीव : जी दादा!

स्लोगन (स्माइल्स) : कुर्सी लगाओ भाई! और शो शुरू किया जाए!

*क्लैप* *क्लैप*

और उसके ताली बजाते hi अचानक hi साड़ी लाइट्स बंद हो गयी. बस बाकी था, तोह वीर और करा के ऊपर लगा हुआ उस सफ़ेद L.E.D का जलना जो हवा में तार से लटका हुआ था.

आगे क्या होने वाला था, ये तोह वीर नहीं जानता था. पर इतना ज़रूर जानता था की...

समथिंग बाद वास् अबाउट तो हैपन.

***

वीर जब घर से बाहर सामान लेने निकला हुआ था. उसके कुछ देरर बाद hi उसके घर में एक शख्स आया.

और ये कोई और नहीं उसकी चहीती निधि ma'am थी.

रागिनी : अरे!? A-Aap यहाँ!? इतनी... रात गए!? आइये न!

निधि : हम्म~

रागिनी : J-Jii! कैसे आना हुआ!? सब ठीक तोह है न?

निधि : हँ!? यह! सब... सब ठीक है. वो... V-Veer कहा है!?

रागिनी : वीर को तोह मेने सामान लाने के लिए भेजा था. पर... अभी थोड़ी देरर पहले hi उसका फ़ोन आया की वो किसी काम में बिजी है तोह आने में लेट हो जाएगा.

निधि (फ्रोंस) : इतनी रात गए वो किस काम में बिजी है!?

रागिनी : ये तोह उसने मुझे भी नहीं बताया. पर जब आएगा तोह ज़रूर बता देगा. कुछ आ गया होगा उससे ज़रूरी काम...

निधि : आप उसकी भाभी हो... और आपको ज़रा भी चिंता नहीं की वो कहा गया है इतनी रात गए!? न कॉलेज जाता है वह, न कोई काम धंधा, और न hi उसका कोई दोस्त है. फिर किस काम से गया है वह!? आपने एक बार भी सोचने का प्रयास नहीं किया!?

निधि के एकदम से बोले गए शब्दों को सुन्न रागिनी जैसे हैरत में वही कड़ी रह गयी. और वो बस स्तब्ध निगाहो से निधि को घर रही थी.

फिर जैसे निधि को भी ध्यान आया की भला ये केसा रवैय्या दिखा दिया उसने अपना रागिनी को. न जाने क्या सोच रही होगी वह उसके बारे में.

निधि : यह! वो... माफ़ करना... वो में... ी didn't मैं आईटी लिखे...

रागिनी : It's! It's okay! आप आइये... बैठिये न!

निधि : हम्म~

थोड़ा ेम्बरसेद फील करते हुए निधि सोफे पर बैठी तोह रागिनी ने उससे पानी सर्वे किआ.

रागिनी : अब बताइये!

निधि : एक्चुअली! मुझे वीर से hi मिलना था.

रागिनी : कोई ज़रूरी काम!?

निधि : हम्म~ कल जब हम साथ में जायंट व्हील...

रागिनी : !???

निधि : एहम... मेरा मतलब है... कल जब वो मेरे साथ था तोह उसने बताया था की... वो अब कॉलेज कंटिन्यू नहीं करेगा. कल तोह में उससे कुछ कह न पायी...

और निधि क्यों न कह पायी थी ये बात भी वो जानती थी. आखिर वीर उसके होंठो के करीब जो आ गया था कल.

रागिनी : उसने ऐसा कहा!?

निधि : हम्म~ और इसलिए... एक टीचर होने के नाते ये मेरा फ़र्ज़ है की में अपने स्टूडेंट्स को सही राह दिखाऊ. और वीर तोह फिर भी मेरा फवौरीते स्टूडेंट रहा है. हमारा रिलेशनशिप फ्रेंड्स की तरह भी रहा है. तोह में लौट रही थी... इसलिए सोचा वीर से बात कर उससे फिर से समझौ... कितना ज़रूरी है. करियर!

रागिनी : आपकी बात सही है. वैसे... आप किधर से लौट रही थी? आपका घर तोह यहाँ से थोड़ा सा दूर है. किसी रिलेटिव के यहाँ आयी थी आप!?

निधि : वो...

और इतना बोल निधि बॉहे सिकोड़े एकदम चुप हो गयी.

रागिनी : माफ़ करना. यदि नहीं बताना है तोह कोई बात नहीं.

निधि : ....

रागिनी : पर यदि आपकी ये कॉलेज वाली बात सही है तोह. में वीर से इस विषय पर ज़रूर बात करुँगी. उससे समझाउंगी.

निधि : यू मस्ट...

रागिनी : J-Jii! बिलकुल! ये क्या!? आपने इतनी पतली स्वेटर पहनी हुई है!? बाहर कितनी ठण्ड है.

निधि : No! I'm फाइन~

रागिनी : ऐसे कैसे!? में अभी आपके लिए एक शाल ले आती हु. ठण्ड में laut'te वक़्त काम आएगा. और... आप रुकिए अभी चाय बना के लाती हु.

निधि : नहीं! इसकी कोई ज़रुरत नहीं.

रागिनी : मेने कहा न... रुकिए! वर्ण वीर मुझे चिल्लाएगा फिर... कहेगा की मेरी फवौरीते ma'am को यु hi बिना कुछ खिलाये पिलाये hi कैसे जाने दे दिया!? ः~

निधि (बुदबुदाते हुए) : यदि उससे मेरी बातो की इतनी परवाह होती तोह उन् वादों को नहीं तोड़ता वह...

रागिनी : हम्म!? कुछ कहा क्या आपने!??

निधि : N-Nahi! कुछ भी नहीं!

कुछ देरर बाद दोनों hi बैठ के चाय पी रही थी और बातो में लगी हुई थी.

पर रागिनी को कुछ महसूस ज़रूर हो रहा था.

उसने देखा की बात बात पर कभी वीर का ज़िक्र आते hi निधि जैसे गम शूम सी हो जाती थी तोह कभी कुछ और सोच अपने खयालातों में डूब जाती.

उनकी ये मुलाक़ात ज़्यादा देरर तक की न रही, क्युकी निधि वह से बिना वीर से मिले hi जा चुकी थी.

और इधर रागिनी बेचारी...

वो इस उम्मीद में थी, की वीर कुछ देरर में लौट आएगा. पर उससे क्या पता था, की वीर तोह वह स्लोगन द्वारा कब का उसके चंगुल में फस्स चूका था.

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आज के लिए इतना hi गाइस!


धन्यवाद!
 
मेगा अपडेट

अपडेट - 52 ~ बरुईसेड एंड बैटर्ड

अब तक...

उनकी ये मुलाक़ात ज़्यादा देरर तक की न रही, क्युकी निधि वह से बिना वीर से मिले hi जा चुकी थी.

और इधर रागिनी बेचारी...

वो इस उम्मीद में थी, की वीर कुछ देरर में लौट आएगा. पर उससे क्या पता था, की वीर तोह वह स्लोगन द्वारा कब का उसके चंगुल में फस्स चूका था.


अब आगे...

वीर और करा दोनों hi स्लोगन के चंगुल में फस्स चुके थे. पर ये बात शायद वीर के घर में किसी को न पता थी. अब सवाल ये उठता है की जब करा किडनैप की गयी तब उसके इर्द गिर्द घूमने वाले जस्सी और रघु क्या कर रहे थे? और कहा पर थे?

1सत जनुअरी

नई Year's ईव

************* होटल

फ्यू हॉर्स बैक...

*********** होटल में इस वक़्त पार्टी शुरू हो चुकी थी. विसिटोर्स अपने आप में लगे हुए थे. शाम से चालु हुई ये पार्टी, आज देरर रात तक चलने वाली थी. आखिर नया साल रोज़ रोज़ थोड़ी आता है भला. पर उस से भी ख़ास बात ये थी की यह पार्टी विशेष थी.

क्यों? क्युकी करा जो उन् इन्विते किये गए सदस्यों में से एक थी. और यदि करा जैसी हस्ती पार्टी में हो तोह ये बात जताने की भी ज़रुरत नहीं की पार्टी कितनी ख़ास रही होगी. और बेशक, पार्टी केवल ख़ास लोगो के लिए hi थी. उसके बावजूद करा शाम में थोड़ी देरर के लिए पार्टी अटेंड कर बस वापस लौटने की hi सोच रही थी. शायद इस पार्टी में उसका मैं नहीं लग रहा था.

और जब वो बाहर निकलने hi वाली थी की कुछ आवाज़ों ने उसका ध्यान खींच लिया.

"देखो! में अब भी कहती हु आप गाडी चलाने की हालत में नहीं हो. मेने कहा था ड्राइवर को साथ में ले चलना चाहिए. पर आप हो की..."

"अरे... मेने कहा न *हइच* की में चला लूंगा... *हइच* तुम क्यों खामखा *हइच* टेंशन ले... ले रही हो?"

इन् आवाज़ों को सुन्न जब करा उन् दो व्यक्तियों के नज़दीक आयी तोह उसने देखा की एक एज्ड कपल आपस में बहस कर रहे थे. जो आदमी था वो नशे में था और उसकी पत्नी उससे ऐसी हालत में गाडी चलाने को मन कर रही थी.

करा : ओह्ह्ह!? िफ़ आईटी isn't मिस्टर एंड मिस्ट्रेस बंसल??

और करा की आवाज़ सुन्न जैसे hi उस लेडी ने उससे देखा तोह वो चौंक गयी.

औरत : अरे? K-Kaera बेटी... तुम!?

करा : मुझे नहीं पता था आप भी यहाँ आयी होंगी मिस.

औरत : ओह्ह! बीटा! क्विट थे फॉर्मलिटीज. देखो न तुम्ही, तुम्हारे ये अंकल मेरी बात सुन्न hi नहीं रहे है. आज जम्म के वाइन पी है इन्होने. मेने कहा था इन् से की ड्राइवर रख लेते है पर इन्होने मेरी एक न सुनी और उससे मन कर दिया. अब वो अपने घर चला गया होगा. अब ऐसी हालत में में इन्हे क्या ड्राइव करने दे सकती हु? तुम hi बताओ बीटा!?

करा : ड्रिंक एंड ड्राइव? No वे! आप वही पुरानी लोकेशन में सिचातेड़ हो न अभी भी?

औरत : हाँ बीटा!

करा : थें don't वोर्री! रघु!?

रघु : हाँ! हाँ मिस!?

करा : जो एंड ड्राप मिस्टर एंड मिस्ट्रेस बंसल!

रघु : हँ!? पर? पर मिस!? में आपको चोरर के भला...?

करा : अरे यू क़ुएस्तिओनिंग में रघु? जस्सी है यहाँ पर. यू don't हैवे तो वोर्री!

रघु : J-Jii!

न चाहते हुए भी, अपनी मिस के आर्डर पर रघु को बेमानन एग्री करना पड़ा.

औरत : अरे! बीटा?? इसकी क्या ज़रुरत? अरे, में कॉल कर के किसी को बुला लुंगी. बोहत लोग है बीटा, कोई न कोई आ hi जाएगा.

करा : Don't वोर्री मिस! छोटा सा hi काम है. रघु विल दो आईटी. और करने दीजिये मुझे हेल्प, वर्ण डैड को पता चला तोह बाद में वो मुझे सुनाएंगे. आफ्टर आल वो और अंकल पुराने फ्रेंड्स है.

औरत (स्माइल्स) O-Okay बीटा! सच में, कितनी बड़ी हो गयी हो तुम और कितनी समझदार भी. कितने सालो पहले देखा था मेने तुम्हे. अब तोह बस टीवी और नेव्स्पपेर्स में दिखती हो तुम. और कितना आगे बढ़ चुकी हो तुम और बढ़ती जा रही हो. ऐसे hi जीवन में सक्सेस मिलती रहे तुम्हे बीटा. ब्लेस्स यू!!

करा : थैंक यू मिस!

औरत : बीटा घर ज़रूर आना.

करा : हम्म~

और फिर रघु दोनों मिस्टर और मिस्ट्रेस बंसल को उनकी hi कार को ड्राइव कर उन्हें घर की ऑर्डर ले गया. इधर करा अब केवल जस्सी के साथ hi मौजूद थी.

और दोनों hi निकलने वाले थे जब...

जस्सी : उघ! मिस! में वाशरूम से अभी आता हु. आप कही जाना मत. इधर hi रुकना.

करा : अरे यू okay जस्सी? काफी देरर से नोटिस कर रही हु. तुम तीन से चार बार वाशरूम की ऑर्डर जा चुके हो. इस एवरीथिंग ऑलराइट?

जस्सी : वो... पता नहीं मिस! शायद... नहीं कुछ नहीं! में... में अभी आता हु. बस यु गया और यु आया.

बोलते हुए जस्सी फौरन hi अपना पेट पकड़ के वाशरूम में घुसा और जोरर से दरवाज़ा बंद कर टॉयलेट सीट पर बैठ गया.

'धत्त साला!!! कुछ गड़बड़ है. किस्मे?? एक मिनट!!!! वाइन!!!! हाँ!! इसकी तोह... सहित!!!! अच्छा हुआ रघु ने नहीं ली! मुझे जल्द से जल्द उससे यहाँ बुलाना पड़ेगा.'

इधर बाहर करा की कार के अंदर hi उसका ड्राइवर बैठा हुआ था जब अंदर होटल से एक आदमी सूट पहने आया और हाथ में एक गिफ्ट था उसके एकदम चमकीली गिफ्ट रैपिंग से सजा हुआ.

उसने विंडो पर खत खटाते हुए ड्राइवर से विंडो नीचे करवाई और बोलै.

आदमी : ये मिस करा का गिफ्ट है, इससे अंदर रख लो.

ड्राइवर : N-Nahi! मिस के गिफ्ट्स हमेशा रघु सर और जस्सी सर hi लाते है. में...

आदमी : अरे हाँ बाबा! मुझे पता है, पर अभी वो मिस के साथ उनके साथ खड़े है, वो क्या है न अंदर भीड़ है. और तुम मुझे नहीं जानते? सोच लो! मिस करा ने hi भेजा है मुझे ये गिफ्ट रखवाने. यदि में वापस जा के तुम्हारी शिकायत कर दिया न, तोह तुम्हारी नौकरी गयी समझो.

ड्राइवर : N-Nahi! अच्छा ठीक है! रख दो! मिस का hi है न?

आदमी : हाँ न भाई, अब क्या लिख के दू?

और वो आदमी गिफ्ट को अंदर रख चला गया. ड्राइवर थोड़ी दुविधा में तोह ज़रूर था पर जब उसने देखा की बाँदा अंदर होटल से hi आया था और सूट भी पहने हुए था और साथ hi साथ गिफ्ट एकदम नेअटली पैक्ड था तोह उसने भी फिर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया.

इधर अंदर मौजूद करा को खड़े हुए 5 मिनट हो चुके थे पर अभी तक जस्सी बाहर नहीं आया था और ये सोच उसने कार में बैठने का फैसला लिया.

बाहर क्या हो रहा था उन् बातो से बेखबर इधर अंदर वाशरूम में बैठा हुआ जस्सी इस वक़्त रघु को कॉल लगा रहा था.

*रिंग रिंग*

रघु : बोल जस्सी!

जस्सी : जल्द से जल्द उन्हें चोरर के वापस आ, यहाँ कुछ गड़बड़ है.

रघु : K-Kesi गड़बड़!?

जस्सी : मेरी वाइन में ड्रग मिला हुआ था!

रघु : क्याआ!? तू... तू ठीक तोह है न?

जस्सी : हम्म! कॉन्स्टिपेशन ड्रग!!

रघु : एक मिनट!!! तभी तू...???

जस्सी : हाँ! पहले मुझे लगा था मेरा hi पेट खराब है पर नहीं. किसी ने मेरी वाइन में ड्रग मिलाया था. में दावे के साथ कह सकता हु. उघ!!! तू... तू जल्द से जल्द यहाँ आ, में वाशरूम में हु और मिस बाहर. तू इसका मतलब समझ रहा है न?

रघु : वेट! तू वाशरूम के अंदर से बैठे हुए मुझे कॉल कर रहा है? ः~

जस्सी : गांडू! ुघठ! हस्सन का समय नहीं है.

रघु : राइट! हग्गने का समय है हाहाहा~

जस्सी : इसकी तोह... अबे साले!! उघ!!! में सीरियस हु! जो कोई भी है वो यहाँ पर होटल में मौजूद है. और उसका टारगेट मिस है. और ऐसा करने वाला एक hi इंसान हो सकता है...!

रघु (फ्रोंस) : स्लोगन!!!

जस्सी : राइट... ार्घ!! देख! तुझे जल्द से जल्द यहाँ आना होगा. मेरी हालत सही नहीं है. पेट में दर्द है. मिस बाहर अकेली है. तू समझ रहा है न?

इस बार रघु की बोलती बंद हो गयी. उससे समझ आ चूका था मामला गंभीर है.

जस्सी : तू बस जल्दी...

*Kaboooooooooommmm*

और तभी एक इतनी तेज़्ज़ आवाज़ आयी की अंदर वाशरूम में बैठे जस्सी को विब्रेशन्स तक फील हुए उस धमाके के.

जस्सी : सहित...!!!!

मानो जैसे उसके चेहरे से रंग hi उड़द गया था.

रघु : J-Jassi!?? वो आवाज़ किसी थी!? ोईई! जस्सी!?

पर जस्सी तोह जैसे कोई बात का जवाब देने की हालत में नहीं था. उसने फौरन अपना पंत सही किया और फ़ोन बिना काटे hi जेब में रखा और दूर का नॉब जैसे hi उसने खोलना चाहा तोह पाया की...

दूर लॉक्ड था.

"इसकी माँ की आँख... धत्तत्तत!!!!!"

*थुड़*

गुस्से में उसने जोरर से एक लात दी दूर को पर दूर टास से मास्स न हुआ.

तभी उसकी नज़रे ऊपर को गयी तोह उसने देखा ऊपर ओपनिंग थी. यानी की थोड़ा चढ़ के वह से निकला जा सकता था.

और यही सोच वो लग गया अपने काम में.

पर तब तक बोहत देरर हो चुकी थी.

करा जो बम के ब्लो से गिर कर बेहोश हो चुकी थी, वो स्टीव और उसके साथियो द्वारा एक गाडी में बैठ चुकी थी. और पालक झपकते hi उनकी गाड़ वह से रफू चक्कर हो गयी. बस रह गया तोह...

करा की जलती हुई मेरसेदेज़ का ढांचा जिसमे तेज़्ज़ आग की लपटे अपना काम कर रही थी, लोगो की अफरा तफरी, और उनका शोर.

***

वही यहाँ हॉस्पिटल में भी कुछ सही नहीं चल रहा था. डॉक्टर ने बताया था की दादा जी को चोट ज़रूर आयी थी पर कोई क्रिटिकल चोट नहीं थी.

अब चुकी उनकी आगे के हिसाब से ज़्यादा स्ट्रांग मेडिकेशन्स नहीं दे सकते इसलिए डॉक्टर्स ने स्लो प्रोसेस को अपनाया. वैसे hi दादा जी इस वक़्त कमज़ोरी की स्थिति में थे.

तोह उनका दोसे लाइट रखा गया था. इसमें टाइम ज़्यादा लगने वाला था पर यही सबसे सही रास्ता था.

उनके माथे और घुटनो पर चोट ज़्यादा थी. इसलिए ज़्यादा से ज़्यादा आराम करना hi उनकी बेस्ट मेडिसिन था.

आरोही इधर बैठी हुई सोच रही थी की वीर कब तक आएगा? क्युकी काव्य को उस से बात किये काफी समय हो चूका था.

'मय्बे सुबह आये वह!?'

उसने वीर के बारे में सोचना बंद किया और अपने आस पास मौजूद सभी लोगो को देखा और उनकी बातें sunn'ne लगी.

करुणेश : मेरे ख़याल से, बच्चो को अब घर भेज देना चाहिए. और लेडीज लोगो को भी. हम गेट्स लोग यहाँ रह लेंगे! क्यों भैया!?

बृजेश : हम्म! श्वेता, तुम भूमिका को लेके घर चली जाओ.

श्वेता : पर...!?

बृजेश : हम है न इधर. रात भर हम रह लेंगे यहाँ. और सुबह हम सब फ्रेश होने जाएंगे तोह तुम में से कोई भी यहाँ आ जाना तब तक के लिए.

श्वेता : Th-Thik है!

बृजेश : काव्य, आरोही, विवेक, प्रांजल और सुमित्रा आप भी. आप सब घर जाइये. में और करुणेश है यहाँ पर. रात भर हम देख लेंगे.

काव्य : नाहीईई! में दादा जी को ऐसे अकेले चोरर नहीं जाउंगी.

करुणेश : बीटा ताऊ जी सही कह रहे है. पहले अपनी सेहत देखना भी ज़रूरी है. और हम तोह है न यहाँ पर!?

काव्य : नहीं में नहीं जाउंगी!

आरोही : में भी नहीं!

बृजेश : ???

प्रांजल : और में भी नहीं पापा!

करुणेश : बीटा! ज़िद्द नहीं करते!

विवेक : काव्य और प्रांजल तुम दोनों छोटे जाओ. में और आरोही यहाँ पापा और ताऊ जी के साथ रुकेंगे.

प्रांजल : पर भैया...!?

विवेक : मेने कहा न!

प्रांजल : फाइन!

काव्य : भैया मुझे भी रुकना है...

विवेक : सुबह काव्य! सुबह! सुबह फ्रेश होक आना फिर हिटनी देरर रुकना हो यहाँ रुकना. अब रात भी काफी हो रही है. जाओ! सवेरे से वह मंदिर की भाग दौड़ में थक गयी होगी. चलिए आप सब. में ड्राइवर्स को बोल देता हु.

और न चाहते हुए भी विवेक सभी को गाडी में बैठा कर उन्हें रवाना करवा दिया.

कार में बैठी इस समय श्वेता अपना अंगूठा दातो टेल दबाये चिंता में थी.

'कैसे!? ये सब कैसे हो गया!? दादा जी के साथ आज साल के पहले hi दिन!? मेरी तोह कुछ समझ नहीं आ रहा. उनका स्वस्थ रहना ज़रूरी है.'

तोह वही कार में आगे बैठा प्रांजल मैं hi मैं मुस्कुरा रहा था.

'सब कुछ सही से हुआ. क्या कहने है मेरे भी! ः~'

सोचते हुए उसने अपनी जेब में हाथ सहलाया जिसमे व्हीलचेयर का वही टूटा हुआ पहिया रखा हुआ था.

ये वही पहिया था जो उसने व्हीलचेयर को पटकते वक़्त उखाड़ के अलग कर दिया था. क्यों!??

क्युकी यही तोह सारे राज़ छुपाये हुए था.

'क्या खूब आल्टर करके दिया दिया है ये पहिया उस रोबोटिक्स क्लब वाले ने. हाहाहा~ अंदर इतने छोटे गियर्स हरामी ने फिट कैसे किये!? खर्र जो भी हो, मेने सही टाइम पे रिमोट की बटन दबायी एकदम ः~ मंदिर के पुजारी के सामने तब में अपने हाथ फैलाये प्रशाद ले रहा था.

पर उससे क्या पता था की उसके पहले hi मेने जेब के ऊपर से बटन दबा दी थी. हेहेहे~ अब बस साड़ी जाय्ज़ात हमारी. अब आगे का प्लान आराम से करना है.'

सभी की नज़रो परे, प्रांजल अपना चेहरा छुपाये अपने होंठो पर मुस्कुराहट बिखेरे हुए था.

और इधर हॉस्पिटल में केवल विवेक, आरोही, बृजेश और करुणेश hi बचे थे दादा जी की देखभाल के लिए.

खाने की टेंशन नहीं थी क्युकी भंडारे का कुछ खाना लंचबॉक्स में रखा हुआ था तोह रात आराम से गुज़र जाने वाली थी.

आरोही जो वही बैठी हुई थी वो अभी भी पुरानी वारदात को याद कर उसी बारे में सोच रही थी.

फिर अचानक hi उसका ध्यान उस इंसिडेंट पर गया जब प्रांजल गुस्से में उस व्हीलचेयर को तोड़ रहा था.

'मेने कभी उसको इतना गुस्से में नहीं देखा दादा जी के लिए. और कुर्सी पर क्यों गुस्सा निकाल रहा था वह!? It's नॉट लिखे तहत की कुर्सी...!?????'

पता नहीं उससे क्या सूझा पर आरोही उठी और फौरन hi नीचे कार की तरफ गयी जो उनके लिए रुको हुई थी. और कार में घुसते hi उसने सबसे पहले व्हीलचेयर को देखा जिसकी हालत बोहत hi बिगड़ी हुई नज़र आ रही थी.

उसमे से एक चका भी गायब था. हर्र जगह उसने बड़े hi गौर से चेक किया पर उससे कुछ भी नज़र न आया.

'वेट! इसका एक पहिया कहा गया!?'

आरोही : भैया! ये व्हीलचेयर का पहिया कहा गया एक!?

ड्राइवर : आरोही Ma'am!? ये व्हीलचेयर तोह प्रांजल भैया जब से रख के गए है यहाँ उसके बाद किसी ने उससे नहीं छुआ है. जो कुछ भी होगा उधर hi होगा. बाकी मुझे कोई जानकारी नहीं है.

आरोही : अच्छा!

'न जाने कहा गया होगा!? प्रांजल ने तोह मंदिर के उधर hi इससे पटका था, कही वही तोह नहीं गिर गया!? उधर जाके ढूंढ़ना तोह अब पॉसिबल नहीं. आखिर दादा जी की चेयर अपने आप कैसे नीचे आ सकती है!? मुझे दादा जी के होश में आने का वेट करना चाहिए. वही कुछ बता पाएंगे.'

मैं में अनेको सवाल लिए आरोही खाली हाथ hi वापस से वार्ड के बाहर आ कर बैठ गयी.

और किस्मत से, कुछ देरर बाद hi दादा जी को होश आ चूका था.

डॉक्टर : देखिये! दादा जी को होश आ चूका है. पर आप सभी 5 मिनट बाद hi मिलने जाइएगा अंदर. और हाँ, एक बार में दो से ज़्यादा व्यक्ति नहीं. उन्हें बुलवाना भी मत ज़्यादा. हे नीड्स रेस्ट.

बृजेश : J-Jii डॉक्टर.

और सबसे पहले दोनों करुणेश और बृजेश मनोरथ जी से अंदर मिल के कुछ देरर बाद बाहर आये.

जब विवेक और आरोही की बारी आयी तोह वो भी अंदर गए.

आरोही : D-Dada जी!?

मनोरथ : आरोहीय... विवेक... बीटा!

विवेक : बोलिये मत दादा जी! डॉक्टर ने मन किया है. आप बस लेते रहिये. आप को होश आ गया यही बोहत बड़ी ख़ुशी की बात है हमारे लिए.

आरोही : दादा जी! A-Aap जब मंदिर में ऊपर थे. तोह आपकी चेयर अचानक अपने आप नीचे कैसे आ गयी!?

आरोही का सवाल सुन्न जहा मनोरथ याद करने का प्रयास करने लगे तोह वही विवेक अचानक hi एकदम अलर्ट हो गया.

मनोरथ : बीटा! जहा तक मुझे याद है, मेने पीछे मुद के देखा था तोह कोई नहीं नज़र आया था.

आरोही : क्या!?? P-Par ऐसा कैसे हो सकता है!? भला आपकी चेयर ऐसे कैसे अपने आप...!?

विवेक : अरे मेरी बहिन! आराम से! दादा जी को ज़्यादा जोरर मत लेने दे दिमाग पे.

आरोही : वो... ी... पर ऐसा कैसे आखिर!?

मनोरथ : शायद आज देवी माता की यही िक्षा थी...!? में इतने सालो से उनके दर्शन करने न गया न तोह देखो देवी माँ ने मुझे सजा दी है.

वो मुस्कुराते हुए बोले पर जैसे उनके ये बोल विवेक की आँखों में चमक ला दिए.

विवेक : हाँ! अरे हाँ! ऐसा हो सकता है दादा जी! आज मुझे भी सुबह परर में चोट लग गयी थी मंदिर में hi. शायद देवी माँ बतलाना चाह रही थी की भले hi हमारा घर पनप रहा है पर इसका मतलब ये नहीं की हम उन्हें भूल जाए. हमे ये ध्यान में रखना चाहिए की ये सब उनके आशीर्वाद के कारण hi होता आ रहा है. और शायद देवी माता को पसंद नहीं आया की अब जब हमे फिरसे उनके आशीर्वाद की ज़रुरत पड़ी तोह हम उन्हें याद करने पहुँच गए.

मनोरथ : मुझे भी ऐसा hi लगता है बीटा. क्युकी मेरे पीछे कोई भी नहीं था. एकदम झटका सा लगा था कुर्सी को, मानो जैसे किसी ने धक्का दिया हो. अब तोह ठीक से याद भी नहीं आ रहा. जितना याद कर रहा हु उतना भूलता जा रहा हु.

विवेक : आप दिमाग पर जोरर बिलकुल मत डालिये दादा जी. आराम करिये. और कुछ भी चीज़ की ज़रुरत हो तोह हम सब बाहर hi है. इससे माता की सजा समझ के भूल जाइये और आगे हम कैसे उनकी शरण में हमेशा बने रहे इस बारे में सोच आगे बढिये.

मनोरथ : शायद... शायद तुम सही कह रहे हो बीटा.

विवेक (स्माइल्स) : हम्म दादा जी!

आरोही : पर...

विवेक : चलो आरोही बाहर. दादा जी को आराम करने दो.

और बेमानन आरोही विवेक के साथ बाहर आ गयी.

'H-How!?? थिस doesn't मैक्स अन्य सेंस. ग्रेविटी के कारण भी वो चेयर ऐसे नीचे नहीं आ सकती. दादा जी ने कहा था उन्हें ऐसा लगा की किसी ने धक्का दिया हो!? पर पीछे कोई भी नहीं था. कही दादा जी से देखने में कोई गलती तोह नहीं हो गयी!?? क्या करू? मेरा डिल मान hi नहीं रहा की चेयर अपने आप नीचे आयी होगी.'

उसके सवालों का जवाब शायद आज तोह नहीं मिलने वाला था उससे. पर देखना ये था की क्या होगा जब आरोही वाक़ई गुत्थी सुलझा लेगी. और सुलझा पाएगी भी या नहीं!? या फिर उसके दोनों भाइयो की ये करतूत हमेशा हमेशा के लिए गुप्त हो के रह जाएगी!?

***

मुंबई

11:00 पं

Slogan's हिडौट...

वीर और करा दोनों hi बंधे हुए थे. एकदम निडर आँखें लिए वीर स्लोगन को घर रहा था तोह वही स्लोगन उस लेद की रौशनी से दूर अँधेरे में कुर्सी पर बैठा हुआ चाव से वीर को परख रहा था.

वीर केवल उसके परर hi देख पा रहा था. क्युकी उधर तक रौशनी नहीं जा रही थी.

तभी स्टीव स्लोगन के बगल में आया और बोलै.

स्टीव : वो डील पूरी हो गयी और नेक्स्ट डील के लिए अभी डीलर के आदमी से मिलने जाना है दादा!

कहते हुए उसने एक सूटकेस खोला जिसमे पैसो की गड्डिया भरी हुई थी.

स्लोगन : मेने तुम्हे कितनी बार कहा है स्टीव की इन् छोटी मोती डील्स के बारे में मुझे बार बार नहीं बताया करो. सीधे एक रिपोर्ट तैयार कर बाद में दिखा दिया करो.

स्टीव : मुझे पता है. फिर भी ये मेरी तसल्ली के लिए.

स्लोगन : हम्म~ ठीक है. जाओ और नेक्स्ट डील के लिए जिस से भी मिलना है मिल आओ.

स्टीव : जी दादा!

और इतना बोल स्टीव वह से निकल गया.

उसके जाते hi स्लोगन ने एक बार ताली बजायी और एक आदमी पीछे से आया और उसके पास आके झुक गया.

स्लोगन : स्टीव पर नज़र रखो. यदि ज़रा भी तुम्हे लगता है की पैसो की कोई हेर्र फेरर हुई है और यदि वो किसी से मिला हुआ है. फौरन मुझे बताना.

आदमी : जी दादा!

और वो आदमी भी निकल गया.

उसके जाते hi इस बार स्लोगन ने दो बार ताली बजायी और एक और आदमी पीछे से आया और उसके नज़दीक झुक गया.

स्लोगन : तुम्हे इस्पे नज़र रखनी है जो गया अभी. ध्यान रहे, यदि तुम्हे ज़रा भी लगे की ये मेरा काम करने की बजाये स्टीव के साथ मिल के पेसो की हर्रा फेरी कर रहा है तोह उससे वही उदा देना. पर ध्यान रहे यदि मुझे पता चला की तुमने केवल बेफालतू उससे मारा है, तोह अगला उड़ने वाला सर्र तुम्हारा होगा.

दूसरा आदमी : J-Jii दादा!

और इतना बोल दूसरा आदमी भी जा चूका था.

फाइनली, स्लोगन ने वीर की तरफ अपना फोकस किया और उससे देखा.

*रिंग रिंग*

पर तभी उसका फ़ोन बज उठा.

और नंबर देखते hi स्लोगन की बॉहे सिकुड़ उठी.

स्लोगन : Hello!?

वौइस् : ी टोल्ड यू! Didn't ी!?

*Craasssssssssshhhhhhh*

और अगले hi पल स्लोगन ने जोरर से अपना फ़ोन पटक के फेक दिया. फ़ोन दो टुकड़ो में जाके टूट गया.

"मादरचुदड़द्द!!!"

वो चिल्लाया...

और उसके चिल्लाते hi करा जो अब तक बेहोश पड़ी हुई थी, वो कसमसाई और अपनी पलके झपकाने लगी.

"उम्..."

उससे होश आ चूका था. उसकी आँखों से धुंदलापन्न हटा और जैसे उससे सामने का नज़ारा नज़र आया. उससे कोई भी चोट नहीं आयी थी. वो बस बम के ब्लो से थोड़ा सा दूर जा गिरी थी जिसके चलते वो बेहोश हो गयी थी.

"वेयर...!? वेयर ऍम ी!?"

और अगले hi पल उसके कानो में एक जानी मानी आवाज़ पड़ी.

"Y-You... Okay!?"

उसने बगल में देखा तोह वो थोड़ा चौंक गयी. वीर उसके बगल से रस्सियों से बंधे हुए बैठा था. और उससे अपनी हालत पर ध्यान आया फिर, की वो खुद बुइ तोह बंधी हुई थी.

करा (शॉकेड) : Y-You!??? वीर!!!!?

वीर : हम्म~

करा : वेयर...!? वेयर अरे वे!? और तुम यहाँ!? Y-Ye सब!?

वीर : इन शार्ट, यू गोत किडनैपेड. में इसलिए यहाँ हु बिकॉज़ ी चामे तो सेव यू. बूत अस यू कैन सी, ी गोत सौगत.

करा स्मार्ट थी बोहत. वीर के छोटे से डिस्क्रिप्शन से वो साड़ी बातें समझ चुकी थी. वो ब्लास्ट, वो जस्सी का यु बाथरूम जाना बार बार और उसका यहाँ होना. एवरीथिंग वास् प्लांड. आईटी वास् ा ट्रैप.

वो कुछ कहने के लिए हुई पर तभी...

*टक* *टक*

जूतों की चलने की आवाज़ ने उसका ध्यान खींचा.

और तभी उसकी आँखों के समक्ष एक सूट पहना व्यक्ति सामने आया.

स्लोगन : कितना... कितना भागना पड़ा है तुम्हारे लिए. कितने सालो से... आखिर! आखिर तुम मेरे हाथ आ hi गयी. तुम सोच भी नहीं सकती.

करा : T-Tum कौन!? हु अरे यू!? और यहाँ मुझे ऐसे क्यों...!?

स्लोगन : हु ऍम ी!?? हाहाहा~ में स्लोगन हु.

नाम सुनते hi करा की आँखें हैरानी के मारे फैलती चली गयी.

बेशक! ये नाम उसने जस्सी और रघु के मुँह से कई बार सुना था. वो जानती थी की ये आदमी उसके पीछे पड़ा हुआ है. पर क्यों? इसका जवाब उससे बिलकुल भी नहीं पता था.

करा (निडरता से) : व्हाट दो यू वांट फ्रॉम में!? जो कहना है सीधे मुँह कहो. व्हाई एक्ट लिखे ा कावर्ड!?

वीर करा की निडरता देख खुद आश्चर्य में था. उससे नहीं लगा था की करा इतना स्ट्राइटफॉरवर्ड होक बात करेगी.

स्लोगन : व्हाट दो ी वांट फ्रॉम यू!? अरे सब कुछ तोह तुम्ही से मिलना है मुझे...!

कहते हुए स्लोगन ने जोरर से करा की चीन अपने हातो में जकड ली.

करा : मंपहहहह...

वीर : यौऊ.....!!!!!

अपनी रस्सियों को जोरर से मरोड़ वीर ने खुद को झंझोरा... पर कोशिश बेकार.

रस्सिया बोहत hi मज़बूती से बंधी हुई थी.

वीर : Don't यू डरे टच हेर....!!!

वो गुर्राया. पर स्लोगन तोह जैसे वीर के रवैय्ये को देख और भी खुश हो रहा था. मानो जैसे वो यही चाहता था.

स्लोगन : हाहाहा~ करो गुस्सा! आतिश को तोह बड़ी hi बेरहमी से मारा तुमने है न!?

वीर (शॉकेड) : तुम्हे...!? तुम्हे कैसे!?

ये सुन्न जैसे उससे बोहत बड़ा झटका लगा था. और बिना समय वास्ते किये hi उसने फिर...

'चेक!'

*डिंग*

[Real Name : Sanjeev


अलियास नाम : स्लोगन

आगे : 58

बायो : संजीव एक क्राइम बॉस है. डिफरेंट क्राइम ऑर्गनिज़तिओन्स और अंडरवर्ल्ड में उससे काफी लोग जानते है. उसका एक hi मक़सद है, करा को पाना और उससे ख़तम करना.]

और बायो पढ़ते hi वीर की हालत सही तोह बिलकुल भी नहीं थी. भले hi ज़्यादा डिटेल्स नहीं मिली थी. पर स्लोगन का गोआल स्पष्ट रूप से उसके सामने था.

और अब बस चिंता hi उससे खाये जा रही थी. अत्यंत बेचैनी. थिस मन वास् नॉट समवन विथ व्होम यू कैन डील अलोन.

स्लोगन एक क्राइम बॉस था.

'शीट्ट्ट्ट!!!! No no no no no... ी can't लेट एनीथिंग हैपन तो मिस करा.'

[This is really bad!! Tum... Try to open the knots. Loose karo unhe kheech ke.]

'I'm ट्राइंग... कुछ नहीं हो रहा है. आईटी विल टेक टाइम.'

और स्लोगन अगले hi पल एक चाक़ू लिए आगे बढ़ा.

'No no no.... ुघ्हहह!'

वीर घबराते हुए अपने आप को पूरे फाॅर्स के साथ झंझोरा और उन् रस्सियों को ढीली करने का प्रयोग किया पर कोई फायदा नहीं.

रस्सिया ढीली तोह हो जाती पर टाइम लगता. और वीर के पास टाइम की hi तोह कमी थी.

स्लोगन ने करा का एक हाथ खोला और उसके हाथ में चाक़ू थमाई और उसका हाथ अपने हाथो में पकड़ा रहा.

वीर सवालिया नज़रो से पल भर के लिए उन्हें देखा पर अगले hi पल...

*सप्लरररररररटटटटटटटट*

"Aaaaaaaaaaaaarrrrrrrrrrrrgghhhhhhh"

एक ज़ोरदार चींख उस कमरे में गूँज गयी.

और ये चींख किसी और की नहीं, वीर की थी.

क्युकी इस वक़्त स्लोगन के हाथो में करा का हाथ था जिसमे चाक़ू थी.

और वो चाक़ू वीर के हाथ में धसी हुई थी. वो लाल लाल कूँ बहना शुरू हो चूका था.

"Noooooooooooo....!"

करा खून देखते hi चिल्लाई और अपने हाथो को पीछे खींचने के लिए हुई पर...

स्लोगन के दोनों हाथ और दबाव दाल उस चाक़ू को अंदर घुसेड़ रहे थे.

"अअअअअअरररररररघहहहहहह"

वो चाक़ू ऐसे अंदर बाहर हो रही थी जैसे मानो किसी फल में मार दी हो.

पर वीर की हड्डी को वो पेनेत्रते न कर सकीय. कारण!? कारण था बोन रीपर जो वीर ने इक्विप किया हुआ था. फिर भी... दर्द तोह दर्द होता है. भले hi वीर की हड्डी सही सलामत थी, पर दर्द तोह उतना hi होना था.

वो दर्द से तड़प रहा था. उसके परर जोरर जोरर से ज़मीन पर पटक कर शोर कर रहे थे. उसकी कुर्सी भी डोलने लगी थी आगे पीछे होकर.

और वो चाक़ू की चमड़ी को उजाड़ने की आवाज़ जिसके चलते खून रिस रिस के बाहर आ रहा था और गाढ़ा गाढ़ा एकदम लाल बहते हुए ज़मीन पर गिर रहा था.

आज पहली बार करा की आँखों में ासु आये थे. इतने सालो के बाद.

"न्यूऊऊओ....! D-Don't.... लीव हिम ालुओंनेइए!!!!"

वीर को दर्द में देख पता नहीं क्यों... उसकी आँखें अपना आप नम्म हो चली.

उसने भरपूर प्रयास किया की वो अपना हाथ खींच के उस चाक़ू को बाहर निकाल सके पर स्लोगन के दोनों हाथ उसके फाॅर्स पर भारी पद रहे थे और न चाहते हुए भी वो कुछ नहीं कर पा रही थी.

"पलायआसीईई!!!! लीव हिम ालुओंनेइ!!!!"

शायद आज पहली बार करा ने इतने वर्षो में किसी से प्लीज कहके गुहार लगायी थी. इतना डर तोह उससे तब नहीं लगा था जब स्लोगन उसकी चीन पकडे हुए था.

कुछ भी हो, करा वीर को इस दर्द में नहीं देखना चाहती थी. क्यों!? इसका रीज़न उससे भी नहीं पता था.

[Nooooooo!!!!]

इस बार पारी की भी एक ज़ोरदार बेचैनी भरी चींख वीर को अपने मैं में सुनाई दी. वो समझ चूका था की पारी उसके लिए कितना कंसर्नड थी. भले hi उसका बेहेवियर बदल चूका था. पर वीर ये जान के खुश था की पारी स्टिल करेड़ अबाउट हिम.

'फूऊऊऊक्ककककककक!!!!! अअअअअअअररररह्ह्ह्ह!!!'

अपने निचले होंठ को दातो में दबाये वीर दर्द को सहने की कोशिश कर रहा था तोह वही स्लोगन और जोरर से चाक़ू को घुमा घुमा के वीर की चमड़ी उखाड़ने में लगा हुआ था.

*सप्लरत* *सप्लरत*

बस ऐसी hi आवाज़ आ रही थी खून की रिसने की.

स्लोगन : में इससे थोड़ी मारूंगा... इससे तोह तुम मारोगी. हाहाहा~ और फिर तुमसे में निपटूंगा.

कहते हुए उसने चाक़ू बाहर निकाली और एक बार फिर...

*स्पलऊऊरट्ट्ट्ट*

"Aaaaaaaaaaaaaaaarrrrrrrrrrrrghhhhhhhh"

उसी हमले के ऊपर hi दूसरा प्रहार किया स्लोगन ने. और उसके हाथ की चमड़ी को चीरते हुए चाक़ू एक बार फिर घुस गयी.

"Nooooooooooooooo~"

इस बार करा की ये गुहार जैसे किसी ने सुन्न ली, क्युकी अगले hi पल...

*बंग*

एक गुनशॉट का साउंड बाहर से आया और अंदर मौजूद एक आदमी धड़ाम से ज़मीन पर गिर पड़ा.

स्लोगन के हाथ अपने आप hi वही ृक्क गए और उसने जैसे hi एंट्रेंस में देखा...

उसने पाया की 30 से 35 आदमी सभी गन लिए अंदर आ रहे थे.

"टछहः!"

डाट मीस्ते हुए उसने करा को वही चोर्रा और वो भागा पीछे के गेट की ऑर्डर...

"घेरर लो... एक भी आज भागने न पाए..."

ये आवाज़ सुन्न करा की जान में जान आ गयी थी जैसे. क्युकी ये आवाज़ रघु की थी.

स्लोगन के साथ कुछ आदमी तोह भाग गए थे पर कुछ वही रह गए और नतीजा उनकी मौत.

इतने सारे लोग एक साथ आये थे. रघु ने जैसे hi करा को देखा उसकी जान में जान आयी.

रघु : थैंक गॉड यू अरे सेफ...

पर उसकी नज़र जैसे hi बगल में गयी तोह वो हैरत के मारे वही जम्म सा गया.

वीर का हाथ खून से लटपट था. उसके चेहरे पर पसीना hi पसीना था और उसकी आँखें बंद होने को हो रही थी.

करा (क्रिस) : R-Raghuuuu!!!!

फटाफट समय की पाबंदी को ध्यान में रखते हुए रघु ने रस्सिया खोली और करा और वीर को आज़ाद किया. पर वीर जैसे अपने होश खो रहा था.

ब्लड लोस्स जो हो गया था इतना.

करा : रघुउउउउउ! वीर.... वे...

रघु : ी क्नोव मिस! सुनो तुम सभी, मिस को लेके फौरन घर की ऑर्डर जाओ. में इससे हॉस्पिटल तक चोरर के आता हु.

करा : I'll... I'll के तू...

रघु : नूवो! आप नहीं! प्लीज! घर जाइये! सर वेट कर रहे है आपका.

अपने डैड के बारे में सुन्न करा शांत पद गयी और न चाहते हुए भी उससे वह से जाना पड़ा.

पर जाने से पहले उसने कई दफा पीछे मुद वीर को देखा जो नीचे पड़ा हुआ था. और रघु अपना रुमाल बाँध उसके खून को रोकने की कोशिश कर रहा था.

***

2ंद जनुअरी

*** हॉस्पिटल

10:36 ऍम

वीर को जब होश आया तोह उसने देखा की वो हॉस्पिटल के बीएड पर लेता हुआ था.

उसने कसमसाते हुए अपनी आँखें माली और अपने एक हाथ का जायज़ा लिया जो पत्तियों से बंधा हुआ था.

उसने पारी से बात करने की भी कोशिश की पर पारी स्लीप मोड में थी.

शायद वीर को वो आराम देना चाहती थी इसलिए वो कल रात में hi स्लीप मोड में चली गयी थी.

वीर जानता था की पारी उसकी एनर्जी उसे करती है एक्टिव रहते वक़्त. तोह उसका स्लीप मोड में जाना ये कंसर्न था वीर के प्रति. शी वांटेड हिम तो रिकवर सून.

"ारररह्ह्ह!"

कराहते हुए जैसे वीर ने जैसे hi सामने देखा तोह वो एक बार फिर आश्चर्य चकित रह गया.

सामने तीन बेहद hi परिचित औरते मौजूद थी...

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आज के लिए इतना hi गाइस!

लिखे और कमैंट्स करने का. 😁


धन्यवाद!!
 
अपडेट - 53 ~ सटल हिंट्स

अब तक...

वीर जानता था की पारी उसकी एनर्जी उसे करती है एक्टिव रहते वक़्त. तोह उसका स्लीप मोड में जाना ये कंसर्न था वीर के प्रति. शी वांटेड हिम तो रिकवर सून.

"ारररह्ह्ह!"

कराहते हुए जैसे वीर ने जैसे hi सामने देखा तोह वो एक बार फिर आश्चर्य चकित रह गया.

सामने तीन बेहद hi परिचित औरते मौजूद थी...


अब आगे...

"A-Aap सब!?"

वीर की आवाज़ सुनते hi जो तीनो औरते वह मौजूद थी वो फौरन hi उससे देखि और उससे होश में पाते hi वो तेज़्ज़ कदमो के साथ उसके नज़दीक आयी.

और बेशक! वो तीन औरते कोई और नहीं बल्कि रागिनी, सुमन और निधि hi थी.

रागिनी : वीर!!!???

तीनो उसके नज़दीक आके कड़ी हो गयी. वीर ने नोटिस किया की रागिनी समेत निधि और सुमन की भी आँखें नम्म थी. खासकर निधि की.

वीर को अपनी सिचुएशन का जायज़ा लेने में बिलकुल भी समय नहीं लगा. होश आते hi उससे आभास हो गया था की वो हॉस्पिटल में है. पर सवाल कई सारे थे उसके मैं में.

पहला सवाल तोह यही था की निधि, रागिनी और सुमन को उसकी इस हालत के बारे में किसने बताया!? ज़ाहिर सी बात थी वो तीनो hi यहाँ उसके लिए आयी थी. पर प्रश्न वही था, की बताया किसने उनको इस बारे में!?

वीर : में... यहाँ हॉस्पिटल में!?

उसके इस सवाल पर रागिनी ने पहले निधि को देखा और फिर सुमन को.

और जैसे दोनों hi लेडीज रागिनी का इशारा समझ गयी. वो दोनों hi बाहर को गयी और वीर और रागिनी को उन्होंने अकेला चोरर दिया.

वीर : Bh-Bhabhi!?

रागिनी नम्म आँखें लिए वीर को सबसे पहले कुछ शान तक शान्ति से देखि. जैसे मानो जायज़ा ले रही हो की वीर एकदम सही सलामत है की नहीं, कही उससे कोई तकलीफ तोह नहीं!?

और कुछ देरर बाद उसने अपनी ख़ामोशी तोड़ी,

रागिनी : मुझे कॉल आया था...

वीर : कॉल!? किसका!?

रागिनी : मुझे नहीं पता. तुम्हारे hi फ़ोन से आया था. किसी आदमी का था और उसने सिर्फ इतना बताया था की तुम क्सक्सक्सक्सक्सक्सक्सक्स हॉस्पिटल में हो और जितनी जल्दी हो सके में वह आ जाऊ. यही बात बोली थी उसने. उसके बाद में और सुमन देरर रात से hi यहाँ पर है.

वीर : आदमी का कॉल!? वेट!! M-Mera फ़ोन!?

रागिनी : तुम्हारा फ़ोन वो रखा है वह टेबल पर.

वीर ने देखा तोह पाया की वाक़ई उसका फ़ोन वह मौजूद था. और उससे साड़ी बातो को समझने में देरर न लगी.

उससे याद था की कल रघु उससे बचाने आया था. भले hi वो बेहोशी में जा रहा था पर उसने रघु को अंदर आते ज़रूर देखा था. यहाँ तक की वो तब भी होश में था जब रघु उसकी रस्सियों को टटोल कर उससे चुर्रा रहा था.

स्लोगन ने उसके और करा दोनों के hi फ़ोन्स अपने कब्ज़े में कर लिए थे. तोह ज़ाहिर सी बात थी की रघु ने hi उसके और करा के फ़ोन्स वह से रेट्रिएवे किये थे. और कॉल लिस्ट में से सबसे ऊपर रागिनी का hi नंबर था रीसेंट कॉल्स में. तोह शायद रघु ने रागिनी को ऐसे कॉल लगाया था.

वीर अपने फ़ोन में कोई पासवर्ड नहीं रखता था. उसका फ़ोन मोस्टली बस चैटिंग और कालिंग के लिए hi उसे होता था. खर्र! अच्छा हुआ, की इसी बहाने काम से काम रागिनी को कॉल तोह लगा पाया रघु.

वीर को अब काफी हद्द तक बातें समझ आ चुकी थी. पर अभी भी कई सवाल सेष थे. जैसे की...

करा, मुंबई में क्या कर रही थी!? वो तोह दिल्ली में थी.

और, स्लोगन ने ऐसा क्यों कहा की वो उसका hi इंतज़ार कर रहा था. क्यों ऐसा महसूस हुआ वीर को की स्लोगन प्रेपरेड़ था उसके लिए.

तीसरा सवाल ये की भला स्लोगन करा को मारना क्यों चाहता है!? ऐसी क्या दुश्मनी है उन् दोनों के बीच!?

और आखिरी सवाल, उसके दादा जी कैसे मंदिर से गिर गए!? जहा तक वो जानता था अपने दादा जी को उससे पता था की उसके दादा जी बोहत hi सावधानी बरतने वाले इंसान है. फिर भला ऐसा कैसे हो गया!?

वो अपनी उलझनों में फसा, अपने खयालातों में डूबा हुआ था जब उससे अचानक hi अपने हाथ पर एक नरम सा एहसास हुआ.

रागिनी का हाथ उसके हाथ पर था.

वीर : !??

रागिनी : क्यों करते हो ऐसा!?

इस बार रागिनी की आवाज़ में एक कप कपाहट थी. डर की वजह से नहीं पर उदासी की वजह से.

वीर ने जैसे hi उसकी आँखों में देखा तोह और हैरान रह गया वो. रागिनी की आँखें भीगी हुई थी.

वीर : भाभी!?

रागिनी : में कुछ पूछ रही हु वीर. बोलो! जवाब दो! क्यों करते हो ऐसा!?

वीर : M-Mein...

रागिनी : घर पर फ़ोन लगा के कहते हो की कुछ काम आ गया है जा रहा हु. सुमन जी से कहते हो की सामान वो ले आये और फिर देरर रात को मुझे कोई अनजान आदमी तुम्हारे फ़ोन से कॉल कर के ये बताता है की तुम हॉस्पिटल में हो और बुरी तरह ज़ख़्मी हो. ये सब क्या है वीर!? में तोह समझती थी की तुम मुझसे अपनी बातें शेयर करते हो. में एक दोस्त की तरह हु तुम्हारी. पर तुम तोह जैसे मुझे अपना कुछ मानते hi नहीं.

वीर : N-Nahi! भाभी! ऐसा बिलकुल भी नहीं. आप जो सोच रही है वो एकदम...

रागिनी : गलत है. है न!? सही कहा तुमने. में hi तोह गलत होती हु वीर. में hi गलत हु. तभी तोह देखो न... आज शादी शुदा होक भी अपने पति के साथ नहीं हु. क्युकी में गलत हु न...

वीर : भाभी! मेरा वो मतलब नहीं था. आप कहा की बात कहा ले जा रही हो!? एक मिनट!!! मेरी बाइक!??????

रागिनी : T-Tumhari बाइक नीचे hi परकेड है.

वीर : हँ!? W-Wo कैसे!? ओह्ह्ह! ी सी!

'वो रघु... शायद उसी ने मेरी पॉकेट से के निकाल के अपने किसी आदमी को बाइक को यहाँ लाने के लिए कहा होगा. वाओ! प्रजेंस ऑफ़ मंद बढ़िया है उस बन्दे का. हे इवन थॉट ऑफ़ तहत...!? ी मैं ऑब्वियस्ली, तभी तोह वो मिस करा का बॉडीगार्ड है.'

रागिनी : तुम्हारे साथ इतना सब कुछ हो गया और तुम्हे बाइक की पड़ी है वीर!?

वीर : H-Huh!? नहीं... ी मैं, वो आप ने दी थी न मुझे. क्या आपको टेंशन नहीं हो रही...!?

वीर की इस बात पर जैसे रागिनी एकदम भड़क उठी.

रागिनी : पागल हो गए हो क्या वीर!? तुम्हे बाइक की पड़ी है!? अपनी हालत देखो तुम. अरे ऐसी 100 बाइक्स आ जाएंगी. बाइक ज़रूरी है या तुम वीर!???

वो ुचि आवाज़ में बोली तोह वीर एकदम खामोश होक रह गया. साथ hi स्तब्ध भी.

रागिनी उसके एकदम करीब आ चुकी थी. इतने करीब की उससे रागिनी की गरम सासें तक अपने चेहरे पर महसूस हो रही थी.

और जैसे रागिनी को भी उसी शान इस बात का आभास हुआ तोह उसने फौरन hi अपनी नज़रे वीर पर से फेरर ली और थोड़ा पीछे खसक गयी.

शायद, उन् गोर गालो पे लाली भी छायी हुई थी इस वक़्त.

वीर : उम्... तोह!? निधि ma'am यहाँ...!?

रागिनी : मेने बुलाया था सुबह उन्हें. कल वो घर आयी थी.

वीर : कल!? कब!? मेरे जाने के बाद?? इतनी लेट!?

रागिनी : वो कही से लौट रही थी. मेने पूछा था तोह कुछ बताया नहीं उन्होंने. कल उन्होंने मुझे तोह ऐसे सुनाया था की में तुम्हारा ठीक से ध्यान नहीं रखती, कुछ खबर नहीं लेती तुम्हारी, तुम कॉलेज चोरर रहे हो, वगैरह वगैरह. और वाक़ई, शायद उन्होंने ठीक hi कहा था. अब से तुम्हारे ऊपर ध्यान देना पड़ेगा मुझे.

'Ma'am रात में घर पर!? शी...!? अहह! राइट! वो शायद वही गयी होंगी. अपने हस्बैंड के यहाँ. तहत बास्टर्ड. हे मिगहत हैवे कॉल्ड हेर.'

वीर : एहम! उन्होंने ऐसा कहा!?

रागिनी : हाँ बिलकुल! और ये कॉलेज का क्या सन है हँ!?

वीर : Don't वोर्री में उन्हें...

वीर अपनी बात पूरी रख पाटा की तभी गेट खुला और डॉक्टर अंदर आया नर्स के साथ.

डॉक्टर : वाक़ई! में हैरान हु तुम्हे इतनी जल्दी होश हो गया. नर्स!?

नर्स : यस डॉक्टर!

और नर्स हाँ में सर्र हिलाते हुए वीर के चेक उप में लग गयी.

रागिनी : प्लीज डॉक्टर! वीर ठीक है न!? उससे कोई अंधरुनि चोट का डर तोह नहीं!? कही कुछ ऐसा तोह नहीं जो आप छुपा रहे हो!?

डॉक्टर (लौघ्स) : No no...! हाहाहा~ ऐसा भला क्यों करूँगा में!? हे लुक्स फाइन. मोरे थान फाइन एक्चुअली. में वाक़ई... मुझे ताजुब है इस बात को लेकर. मेरा मतलब है की वोँड एक शताब वोँड था. दो जगह. और दोनों hi जगह आपस में काफी नज़दीक है. खासकर पहला वोँड. वो काफी घातक है. और मुझे लगा था आप को अभी तोह बिलकुल भी होश नहीं आने वाला. एंड I'm रियली रियली सुरप्रीसेड...!

वीर केवल मुस्कुरा hi पाया.

अब वो ये तोह नहीं कह सकता था की भैया उसके अंदर पारी है और साथ hi साथ उसकी रिकवरी स्पीड पहले से कई गुना बढ़ चुकी है. तोह बस चुप रहना hi उचित था यहाँ पे तोह.

रागिनी (शिघ्स) : थैंक यू डॉक्टर!

डॉक्टर : पर इसका मतलब ये नहीं है की आप को लेनिएन्सी बरतनी है. प्रॉपर रेस्ट okay!? और अभी केसा महसूस हो रहा है!?

वीर : ी फील फाइन!

डॉक्टर : मेरा मतलब हाथ से था...!

वीर : ओह्ह्ह! हाथ में... थोड़ी नुंबनेस है.

डॉक्टर : हम्म! वह रहेगी अभी. और दर्द है क्या!?

वीर : हल्का फुल्का!

डॉक्टर : हम्म! नुंबनेस काम होते hi बढ़ेगा दर्द थोड़ा. बाकी तोह सब ठीक है... गुड! गुड! स्ट्रांग बॉय हँ!? अन्य्वयस! कुछ भी हो तोह नर्स को बोल देना. यदि कुछ ज़्यादा लगेगा तोह नर्स मुझे खुद इन्फॉर्म कर देगी.

रागिनी : थैंक यू डॉक्टर!

डॉक्टर (स्माइल्स) : वेलकम!

और नर्स और डॉक्टर दोनों hi वह से चले गए.

रागिनी और बातें करती पर जैसे समय अभी के लिए गुज़र चूका था, क्युकी डॉक्टर के जाते hi सुमन ने गेट खोला और उन् दोनों को देखा और इशारा समझते हुए रागिनी उठी, और बाहर जाने लगी.

पर जाते जाते वो पलट को वीर को देखना न भूली. और वीर भी थोड़ा अपने किये पर पछताते हुए रागिनी को देखता रहा जब तक की वो उसकी आँखों से ओझल न हो गयी. पर वीर जानता था. उसकी और रागिनी की बातें अधूरी थी. वो ज़रूर बाद में आकर इस घटना की पूरी जानकारी लेगी उस से. और सवालों पर सवाल पूछेगी. लगता है वीर को उसके लिए खुदको प्रेपर करना पड़ेगा.

खर्र! रागिनी के जाते hi सुमन दौड़ी भागी सी वीर के पास आयी,

सुमन : मालिक!!!! A-Aap...

वीर (स्माइल्स) : में ठीक हु. बस थोड़ी सी चोट आयी है.

बड़ी hi कोमलता से सुमन ने अपनी उंगलियों को वीर के हाथ में बंधी पत्तियों पर फिराया. जैसे मानो कोई बोहत hi नाज़ुक सी चीज़ को छू रही थी वह.

सुमन : इतना सब कुछ...?? कैसे हुआ!? किसने किया!? K-Kese आप... मंममपहहह!!???

पर इसके पहले की वो कुछ कह पाती उसके होंठ वीर के होंठो की गिरफ्त में थे.

*स्लुर्प*

"मममम...!!!???? ुमंपहहहहह!!!!?"

और कुछ पल के बाद जब दोनों के होंठ आपस में अलग हुए तोह एक थूक की पतली सी डोर उन् दोनों के मुँह के बीच रह गयी.

इस अचानक हुए हमले से सुमन तोह स्तब्ध थी hi पर साथ hi साथ वो शर्मा भी रही थी.

सुमन : M-Maalik!??

वीर : आह! ी रियली मिस्ड थिस.

कहते हुए वीर ने उससे अपने पास खींचा और उसके उन् नरम नरम उरोजों पर अपना सर्र रख वो आँखें बंद कर आराम फरमाने लगा.

सुमन : मालिक!?

बेचारी सुमन! उसकी कुछ समझ में hi नहीं आया की हुआ क्या ये आखिर!? बेशक! उसके होंठ उसके मालिक तोह चूसते hi थे पर ऐसे अचानक से!? ये कुछ नया सा था उसके लिए.

वीर : बस इतना समझ लो सुमन की किसी को बचाने गया था. और उससे बचाने में ये हाल हो गया. अभी के लिए... इतना hi. ठीक है!?

सुमन : J-Jii!

मैं की जिज्ञासा को मारते हुए सुमन ने खुद के जोरर से धड़कते दिल को थोड़ा शांत किया और बड़े hi प्यार से उसने अपने मालिक के सर्र को अपने आलिंगन में ले लिया. अपनी छाती में जैसे समां लेना चाहती थी वो वीर को.

और वीर को भी ये पल बड़ा hi आनंद से भरपूर महसूस हो रहा था. और क्यों न होता!? वीर जितनी भी औरतो से अब तक मिला था उनमे से सुमन के थान अब तक सबसे बड़े थे. एकदम गोल मटोल भरी हुई दूध की थैलिया थी वह. बस दुखद बात ये थी की उनमे कोई दूध नहीं था. वर्ण वीर पक्के से दिन रात अपना मुँह उनमे लगाए रहता जब तक की वो सारा का सारा दूध निचोड़ न लेता.

वीर जैसे सुमन के आलिंगन में अपनी साड़ी थकान मिटा रहा था. वो फ़्रस्ट्रेशन जो इतने दिनों से भरा हुआ था इधर उधर की मारा मारी के चलते वो जैसे काम हो रहा था सुमन से lipat'te hi.

और सुमन भी किसी अमर बेल की तरह वीर से लिपटी हुई थी. पर इस बात का ध्यान रखते हुए की वीर के बाए हाथ पर कोई भी जोरर न पड़े.

वीर : हम्म!? तुमने ब्रा नहीं पहनी!?

ये सवाल सुनते hi सुमन एकदम मौन हो गयी. और अपनी नज़रे उसने झुका ली. साफ़ साफ़ उसके चेहरे पर लाली छायी हुई थी.

वीर : सुमन!?

सुमन (ब्लशेस) : वो... वो... मालिक! दरअसल, बात ये है की... रागिनी जी अपने साइज की लाती है और उनके साइज की hi ब्रा आभा पहनती है. उससे थोड़ी सी बड़ी पड़ती है पर काम चल जाता है. उन्होंने मुझे भी कई साड़ी दी हुई है. पर में संकोच में उनसे न बोली... मुझे... मुझे उनकी ब्रा थोड़ी छोटी और टाइट पड़ती है.

वीर ने एक नज़र सुमन को देखा और फिर उसके थानों को. और वाक़ई, इन् को क़ैद करने के लिए रागिनी की ब्रा तोह क्या निधि की ब्रा भी काम नहीं आने वाली थी.

क्युकी वीर इन् सब से फेमिलिअर था. यदि सुमन के बाद किसी के ब्रेअस्ट्स बड़े थे तोह वो निधि के hi थे. बूत थें अगेन, उसने निधि को कभी उस नज़र से नहीं देखा था. पर फिर भी नज़रे तोह चली hi जाती है. और उससे इस बात का अंदाजा हो चूका था.

वीर : वाक़ई! भला ये कहा उन् ब्रा में समाने वाले है!?

कहते हुए वीर ने अपना एक हाथ आगे बढ़ाते हुए सुमन की एक छुच्छी पर रखा और अगले hi पल उससे ब्लाउज में से खींच के बाहर निकाल दिया.

सुमन (गैप्स) : Ssssss.....aaaahhhh!???

और निप्पल को देख वीर से ज़रा भी सब्र न हुआ तोह उसने अपना मुँह दे मारा और भर लिया सुमन का एक दूध पूरा मुँह में.

सुमन (ब्लशेस) : M-Maalik!?

वीर : उम्...

सुमन (ब्लशेस) : K-Koi आ सकता है!

वीर : अहह! राइट!

कहते हुए उसने अपना मुँह बेमानन हटाया. जगह को देखते हुए उससे पीछे हटना hi पड़ा वर्ण यदि कोई देख लेता तोह लेने के देने पद जाते.

वीर : वैसे...

सुमन (ब्लाउज ठीक करते हुए) : !???

वीर : तुम्हारी ट्रेनिंग किसी चल रही है!? मेरा मतलब है, भाभी ने तुम्हे कुछ शहर के तौर तरीके सिखाने शुरू किये!?

सुमन (खुश होकर) : अरे हाँ! मालिक! कल hi वो मुझे सड़को के नियमो के बारे में बता रही थी. कल बोहत कुछ सीखा मेने. वैसे तोह हरी बत्ती, लाल बत्ती ये सब पता था मुझे. पर पीली बत्ती के बारे में नहीं पता था. यहाँ तक की और भी कितनी साड़ी चीज़ें होती है. में तोह कल हैरान रह गयी थी ये जान के की सड़को के लिए इतने नियम होते है.

वीर (स्माइल्स) : हाहाहा~ बस तुम सब कुछ सीखती जाओ.

सुमन : वो...

वीर : कहो न!?

सुमन : सबसे पहले तोह बोहत बोहत धन्यवाद मालिक! में ये कभी नहीं भूलूंगी. मुझ जैसी औरत को सबसे पहले आपने अपनाया. मुझे उस दलदल से बाहर निकाला और एक रहने के लिए छत दी. मेरे परिवार को भी साथ में रखा. और अब ये... ये जो आपने मुझे नयी चीज़ें सीखने का मौका दिया. पर, मेरा सवाल है आपसे. की आप ऐसा क्यों कर रहे है!? ज़ाहिर है की कुछ शायद और भी कारण है!?

वीर : हम्म! तुमने सही समझा. यदि ऐसा कहु की कुछ मेरा भी स्वार्थ है. तोह क्या तुम नाराज़ हो जाओगी!?

सुमन (ना में सर्र हिलाते हुए) : बिलकुल भी नहीं! बल्कि मुझे तोह ख़ुशी होगी की में अपने मालिक के लिए काम आ सकीय. केवल जिस्मानी रूप से hi नहीं, में अपने मालिक की हर्र तरीके से सेवा कर सकती हु. कहिये मालिक! मुझे क्या करना है!?

वीर (स्माइल्स) : अभी तोह कुछ नहीं सुमन. बस, जितना हो सके उतना सीखो. उतना जानो, नयी चीज़ो के बारे में. हर्र चीज़. चाहे वो सड़को के नियम हो या पुलिस, कोर्ट, कचेहरी के. चाहे वो मोबाइल फ़ोन्स हो या लैपटॉप. सब के बारे में जितना हो सकता है उतना जानो.

सुमन (सुरप्रीसेड) : I-Itna सब कुछ!? मुझे समय लग जाएगा मालिक!

वीर (स्माइल्स) : अभी तुम्हारे पास है समय. लो समय! मुझे यकीन है तुम कर लोगी!

सुमन (ब्लशेस) : इतना भरोसा है आपको मुझपे!?

वीर : ऑफ़ कोर्स! तुम मेरी हो. और अपने लोगो को में पहचानता हु अच्छे से.

सुमन (स्माइल्स) : J-Jii! पर फिर!?

वीर (स्माइल्स) : फिर समय आने पर में बता दूंगा क्या करना है. Okay!? फिलहाल शायद तुम्हे अब जाना पड़ेगा. लगता है कोई आने वाला है.

वीर ने दरवाज़े की ऑर्डर देखते हुए कहा क्युकी दरवाज़े के गिलास के बाहर किसी के खड़े होने की धुंदली सी आकृति नज़र आ रही थी.

और बिलकुल, अगले hi पल दरवाज़ा खुला और वो जिस से मिलने की वीर को खुद भी तालाब लगी हुई थी वो हाज़िर हुआ.

निधि!!!

दरवाज़ा खुलते hi दोनों hi वीर और निधि की नज़रे आपस में जा टकराई. और मानो पल भर के लिए वक़्त सा थम गया.

वीर के होंठ हलके से खुल उठे. पर वो एकदम मौन hi रहा. यही हाल कुछ निधि का भी था. पर वीर से नज़रे हटाते हुए उसने फिर सुमन को देखा जो बात को समझते हुए हाँ में सर्र हिलायी और बाहर जाने लगी.

सुमन के जाते hi निधि ने गेट को लगाया और आहिस्ता आहिस्ता वो वीर के क़रीब आयी. उसकी नज़रे वीर पर न होकर नीचे थी. और इधर वीर केवल अपनी ma'am को अपने पास आता देख रहा था.

निधि बीएड के पास आते हुए, वीर की जांघ के पास बैठी और उसकी तरफ चेहरा करते हुए उसने धीरे से अपने हाथो से एक स्टील का गोल सा लंचबॉक्स बीएड पर सरकाते हुए वीर के पास कर दिया.

पर अभी भी, उसकी नज़रे नीचे hi थी.

वीर ने देखा तोह पाया की वो निधि का लंच बॉक्स था जो वो कॉलेज ले जाय करती थी.

वीर : Y-Ye!??

निधि : Kh-Khaana है इसमें. कुछ खाया नहीं है तुमने.

वीर : उम्! ये तोह आपका लंचबॉक्स है न!? आप कॉलेज नहीं गयी क्या आज!?

निधि (ना में सर्र हिलाते हुए) : N-Nahi! कॉलेज के लिए hi निकल रही थी. पर तभी तुम्हारी भाभी का कॉल आया और उन्होंने जब बताया की तुम हॉस्पिटल में हो. तोह... तोह सीधा यहाँ आ गयी.

'आह! सो that's हाउ आईटी इस!'

वीर ने मैं hi मैं सोचा. शायद रागिनी ने ये सोच के निधि को बताया था क्युकी कल रात निधि इतनी चिंता लेकर उसके घर तक आयी थी. तोह बदले में उससे जताना भी रागिनी ने ठीक समझा. और शायद निधि कॉलेज hi जा रही थी जब ये खबर सुनते hi वो फौरन hi यहाँ आ गयी.

वीर : T-Toh अब कॉलेज!?

निधि : मेने लीव ले ली!

वीर : अहह!? P-Par... रियली!? ी मैं, इस आईटी okay!? लीव लेना...!?

वीर के इस सवाल पर निधि एकदम मौन रही और कुछ न बोली. वीर जानता था की निधि की जॉब एक प्रोफेसर की थी यानी की एक प्राइवेट जॉब. और ज़्यादा लीव लेने पर ज़ाहिर है की पेमेंट कट होता hi था.

वीर : J-Juhi किसी है!?

निधि : ठीक है.

वीर : और श्रेया जी!?

निधि : वो भी... ठीक है!

वीर : क्या आपने उनको भी मेरी इस हालत के बारे में बता दिया!?

निधि (ना में सर्र हिलाते हुए) : नहीं! अभी किसी को नहीं.

वीर (शिघ्स) : गुड!

उसके ऐसा कहते hi निधि एक पल के लिए उससे देखि पर जैसे hi वीर ने उसकी नज़रो को पकड़ा तोह निधि की पलके एक बार फिर नीचे झुक गयी.

निधि : T-Tum अब केसा महसूस कर रहे हो!?

वीर : I'm... I'm गुड एक्चुअली!

निधि : हम्म~

*साइलेंस*

और बस, एक बार फिर ख़ामोशी सी छ गयी.

दोनों में से कोई भी कुछ नहीं बोल रहा था. वीर तोह सोच रहा था की क्या बोले और निधि तोह बस सवालों का जवाब hi दे रही थी.

पर अचानक hi वीर की नज़र निधि के गालो पर गयी और उसने गौर से देखा. उससे नज़र आया की निधि के गालो पर आसुओ के कुछ निशाँ थे.

और ये देखते hi पता नहीं क्यों पर वीर को अंदर hi अंदर अत्यंत hi पीड़ा सी महसूस हुई.

और साथ hi साथ निधि का उस से यु नज़रे न मिलाना जैसे अंदर hi अंदर वीर को कचोट सा रहा था. मानो खाये जा रहा था.

वीर : Ma'am!?

निधि : ....

वीर : Ma'am!???

निधि : ....

दो बार बुलाने पर भी निधि ने कोई जवाब न दिया. वीर को जैसे ये और भी ग्लानि महसूस करवा रहा था. उससे और भी तड़पा रहा था. उससे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मानो उसके सीने में किसी ने हाथ दाल दिया हो और उसका दिल निचोड़ दिया हो.

अजीब सी बेचैनी और एक पीड़ा उससे हो रही थी अपने दिल में.

और अपने हाथ को आगे बढ़ाते हुए उसने निधि की चीन पकड़ उसका चेहरा अपनी तरफ किया.

इस बार निधि की पलके ऊपर हुई और उसने वीर को देखा.

वीर ने भी उससे देखा पर...

अगले hi पल उसने ये भी देखा की...

निधि की पलकों पर आसुओ की बुँदे सजने लगी. कई सारे ासु, मोतियों की तरह उन् नाज़ुक पलकों पर उमड़ते हुए सजते चले गए.

*तप*

और बस, एक ासु की बूँद आँख के कोने से बाहर निकल नीचे एक धार बनते हुए गिर गयी.

वीर एकदम स्तब्ध हुए देखता रहा. उसके होंठ खुले पर कोई भी शब्द बाहर न आया.

इस बार निधि के भी होंठ खुले, पर वो thar-thara रहे थे. काँप रहे थे. ठण्ड की वजह से नहीं, रुलाई की वजह से.

और अगले hi शान निधि की थोड़ी ुचि हुई आवाज़ वीर को sunn'ne मिली. पर साथ hi साथ ये आवाज़ एक रुंधे हुए गले से आयी थी. रट हुई निधि के गले से.

निधि : K-Kya हुआ अब!? और क्या चाहिए!? *स्निफ्फ* ये झूठी केयर मत दिखाया करो वीर.

वीर : Y-Ye!? ये आप!???

निधि : T-Tumhaare वाडे झूठे रहते है. तोह... तोह ज़ाहिर है ये केयर करना भी कोई फॉर्मेलिटी hi होगी. *स्निफ्फ*

वीर : N-No वैयय! ये आप क्या...!?

निधि (क्रिस) : सब समझती हु. न तोह तुम अपनी भाभी को बातें बताते हो की कहा जाते हो क्या करते हो, और न hi किसी और को... Ma'am में पढ़ाई ज़रूर करूँगा. ऐसे न जाने कितने वाडे तुमने लोगो से किये होंगे वीर. पर क्या पता!? शायद इसी की तरह उन्हें भी झूठा...

वीर (ुचि आवाज़ में) : Ma'am!!!

और वीर के थोड़ा जोरर से कहते hi निधि एकदम शांत पद गयी.

मानो जैसे पल भर के लिए वह सन्नाटा सा छ गया था. वो तोह अच्छा हुआ की सुमन और रागिनी वार्ड से शायद दूर थे जिसके चलते बाहर कोई आवाज़ न गयी.

निधि फौरन hi पलटी, और अपने ासु जल्दबाज़ी में पॉच वो वह से उठने के लिए हुई जब...

निधि : !???

उसका हाथ वीर की गिरफ्त में था.

"ाःह!?"

और अगले hi शान एक झटके में वीर ने उससे खींचा तोह निधि उसके सीने की ऑर्डर झुकते हुए उसके पास आ बैठी. एक प्रकार से वो उसके ऊपर झुकी हुई थी. उसका सीना पूरा का पूरा वीर की छाती पर था. और दोनों के hi चेहरे बेहद hi करीब थे.

निधि जैसे इस हरकत से भौचक्की सी रह गयी थी और वो अगले पल hi उठती अगर...

अगर वो सामने का दृश्य नहीं देखती.

क्युकी उसके सामने वीर था, जिसकी आँखों में ासु थे. ये पहली बार नहीं था जो निधि ने उससे रोटा हुआ देखा था. पर इस बार बात कुछ और थी. वो बात वीर की आँखों में थी जिससे निधि शायद भांप पा रही थी.

वीर : यू क्नोव आईटी! Don't यू!? सब कुछ जानती हो फिर भी सताती हो!? क्यों!? आप जानती हो की मेरा ऐसा कोई भी इरादा नहीं रहता है. में कभी किसी को जान बुझ के हर्ट नहीं करता. रही बात भाभी की तोह में उन्हें सब कुछ बता देता हु. मोस्टली! और ये सब कैसे हुआ... ये भी उन्हें में बताने वाला हु बाद में. फिर भी आप ऐसा कहती हो!? इवन थौघ आप मुझे कितने अच्छे से जानती हो... क्यों!? कितनी बार सॉरी कहता आया हु आपको. ऐसा मत किया करो ma'am.

बेचारी निधि. वीर की बातें सुन्न एकदम शांत सी पद गयी. उसके ासु खुद निरंतर बहे जा रहे थे.

और फिर नेक्स्ट मोमेंट hi वीर ने खुद को आगे किया. उसके कानो के एकदम समीप आया और कहा,

"ये टिफ़िन मेरे लिए!? कितना ख़याल रखती हो आप मेरा हँ!? लीव भी लेली मेरी खातिर कॉलेज से!? और!? कल रात में आप घर आयी थी!? मेरे लिए!? मुझे मनाने के लिए!? आपको मेरे फ्यूचर की भी इतनी चिंता है. कितना करती रहोगी!? व्हाई don't यू अंडरस्टैंड यू स्टुपिड Ma'am!?"

निधि (शॉकेड) : H-Huhhh!??

मानो जैसे निधि को अपने कानो पर विश्वाश hi नहीं हुआ. क्या अभी अभी वीर ने सच में उससे स्टुपिड कहा!?

वीर : व्हाई don't यू अंडरस्टैंड!? इतनी परवाह दिखाती रहोगी... िफ़ यू कीप दोंग लिखे तहत... थें... थें... बिवेयर... ी मिगहत फॉल फॉर यू!

*बेदुम्प*

और बस, निधि का दिल ये सुनते hi जैसे मानो एक बीट स्किप कर गया.

वो फटी आँखों से वीर से अलग होते हुए उससे घुरि. पर उसका खुद का दिल इतनी ज़र्रों से धड़क रहा था की वो वह ज़्यादा देरर न कड़ी रह पायी.

और तेज़्ज़ कदमो के साथ वो झटपट बाहर भागते हुए निकल गयी.

वीर, केवल उससे बस जाता देखता रहा जब...

*डिंग*

[System has been activated.]

[Mission~ 'Rescue Kaera from the hideout.' has been completed.]

[400 Points have been rewarded.]

[Hmm!? Your heart rate is high... Something up!?]

वीर (शिघ्स) : कुछ भी नहीं!!!

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आज के लिए इतना hi गाइस!

लिखे करने का और कमेंट भी. 😁


धन्यवाद!!
 
अपडेट - 54 ~ स्कीम्स

अब तक...

वीर, केवल उससे बस देखता रहा जब...

*डिंग*

[System has been activated.]

[Mission~ 'Rescue Kaera from the hideout.' has been completed.]

[400 Points have been rewarded.]

[Hmm!? Your heart rate is high... Something up!?]

वीर (शिघ्स) : कुछ भी नहीं!!!


अब आगे...

नेक्स्ट डे...

कल का दिन बड़ा hi तिरिंग था, वीर के लिए भी और रागिनी और बाकी सभी के लिए भी. विसिटोर्स पे विसिटोर्स जो आ रहे थे वीर से मिलने.

जहा शुरुआत हुई थी रागिनी से तोह फिर सुमन और निधि. और ये सिलसिला फिर चलता गया जब तक की श्रेया को न पता चल गया. बस फिर क्या था? खबर मिलते hi, मैडम जी भी आयी जूही को लेकर और घंटो तक दोनों ने वीर के साथ बाते की. यहाँ तक की सोनाली और आभा भी शाम को मिलने पहुची थी उस से.

शाम के वक़्त, काव्य का फ़ोन आया तोह उससे भी इस बारे में पता चला की वीर खुद हॉस्पिटल में एडमिट है. और इसलिए वो दादा जी को देखने नहीं आ पाया. ये खबर सुनते hi उसके पूरे परिवार में से केवल काव्य खुद और आरोही hi उससे देखने के लिए आयी थी आज.

और कई सारे सवालों के जवाब पाने के बाद hi वो वापस गयी. इवन सोनिआ और सुहाना को भी पता लग चूका था.

और उन् दोनों ने भी एक बार उससे हॉस्पिटल में ज़रूर विजिट किया. जहा सोनिआ उसके लिए 'गेट वेल सून' का एक बुके लेके आयी थी तोह वही सुहाना एकदम खाली हाथ थी और ऊपर से उसपे ताने मार रही थी. ताने ऐसे की...

"लग वाली वात!?" "कहा गए थे जो ये सब करवा बैठे?"

खर्र! ये सब तोह ऊपरी दिखावा था उसका. सुहाना सब कुछ जानती थी. वो जानती थी की वीर कहा गया था और किस से भिड़ने गया था. शायद इस बार वो उसका राज़ खोलने की कोई नयी तरकीब सोच रही थी.

अब ये तोह उसकी पर्सनालिटी थी. वीर यहाँ बेबस था. वो बस फिलहाल के लिए वाक़ई आराम करना चाहता था. काफी भाग दौड़ जो हो चुकी थी उसकी कुछ हाल hi में.

और ऐसे hi समय आगे बढ़ता रहा और कुछ दिन गुज़र चुके थे. वीर वापस अपने घर आ चूका था. हाथ पर अभी भी एक पतली पट्टी बंधी हुई थी उसके. रिकवरी उसकी पहले के मुक़ाबले तेज़्ज़ थी तोह ये चोट उभरने में ज़्यादा समय नहीं लगने वाला था.

स्लोगन शायद अभी के लिए अंडरग्राउंड हो चूका था. और अपनी किसी नयी प्लानिंग में था. पर हैरत की बात जो थी वो ये थी की अभी तक, वीर को करा की तरफ से कोई कॉल या कोई विजिट करने नहीं आया था.

वीर ने कोशिश की थी कांटेक्ट करने की, पर कोई फायदा न हुआ.

आज संडे का दिन था, शाम का वक़्त और वीर नीचे hi लॉन में बैठे हुए था. निगाहें तोह सामने क्यारी में लगे उन् फूलो पर थी पर... मैं hi मैं वो अपनी पारी से बातें कर रहा था.

हॉस्पिटल से आने के बाद से hi उसने पॉइंट्स का कुछ ख़ास उसे नहीं किया था. उसके पास मिशन से मिले 400 पॉइंट्स और पहले के बचे 40 पॉइंट्स मौजूद थे. यानी की टोटल 440. और कल रात hi उसने 40 पॉइंट्स का उपयोग कर लिया था.

उसने 20 पॉइंट्स अपने इंटेलिजेंस में दाल दिए थे. और बाकी के 20 अपनी स्ट्रेंथ में. उसके स्टैट्स अब कुछ इस प्रकार से थे.


[Stats :

Strength - 66/100

Intelligence - 80/100

Agility - 50/100

Endurance - 50/100

Appearance - 50/100]

पर अब सवाल यही था उसके मैं में की, बाकी बचे हुए 400 पॉइंट्स से वह स्किल खरीदे, स्टैट्स में पॉइंट्स लगाए या फिर क्वेस्ट हंट में गैम्बल कर के लीजेंडरी कार्ड निकाले.

'हे!'

[Hmm!?]

'तुम्हे नहीं लगता की 400 पॉइंट्स काम मिले मुझे कुछ?'

[Kam mile!? Tum bhul gaye kya? Mene kaha tha na ki system points ussi hisaab se deta hai jis hisaab se mission complete hua ho. You got your ass whooped there. Tumne Kaera ko indirectly bachaaya ek bali ka bakra bante hue. Aur ye kaho time rehte wo Raghu aa gaya. Yahi kaaran hai ki mission successful hua. Warna jis hisaab se mission complete hua tha, mere hisaab se toh 100 points bhi na milte. You got injured, that's why system gave you 400 points.]

'वेल, स्टिल...'

[You have 400 points remaining. Kahi istemaal karne hai!?]

'ी बिलीव की उस स्लोगन से मेरी मुलाक़ात फिरसे होनी hi है. अब जब वो मिस करा के पीछे है. मेरा और उसका सामना होना hi है. एंड... ी नीड तो गेट स्ट्रांगर. आतिश से भिड़ने के बाद, ी थॉट ी हद कण्ट्रोल. ी कुड विन. बूत... ऐसा महसूस हुआ था उस दिन की कितना छोटा हु में अभी भी उन् लोगो के सामने. ी नीड तो गेट स्ट्रांगर पारी. और वो भी जल्दी...'

[Yes! To become stronger you need more missions. But before that... Pehle samaaj me strong bano.]

'यू मैं...'

[Yes! Apna business establish karo.]

'राइट! बूत उसके लिए मुझे इन्वेस्टमेंट चाहिए!'

[There's a way to easily solve everything. Ek plan hai. Kaho toh sunau!? Wese I know you won't follow this.]

'हम्म!? ओह्ह! मेरी पारी के पास प्लान भी है? मतलब चपर चपर करने के अलावा भी वो कुछ और कर सकती है!? हाँ?'

[Y-You...!! What the...? Don't make it sound like I am stupid. Mera intelligence alag level pe hai you see!?]

'ऑलराइट! हम डेफिनिटेली फिर ये प्लान नहीं sunn'ne वाले.'

[Wh-What!?? Y-You!!! Wait! How can you..? At least suno toh...]

'अहह! फाइन थें. बिना बोले तुम रहने नहीं वाली. तेल्ल में!'

[Ahem!!! See! Ask a huge amount of money from Kaera, Sonia or Suhana. Uss money ko use karo to solve Nidhi's problem. Complete missions and get stronger. Then bache hue paise apne business me lagao. Take help from Kaera in business. Later, jab tumhara business successful ho jaaye then return their money with interest. That's it! Kesa hai?]

'यूप! फैबुलस! नाउ जो तो स्लीप मोड!'

[Wh-Whaaattt!? Wait!!! Itna accha toh hai plan! There's nothing wrong in it. Itna sateek aur simple plan bata rahi hu tumhe aur tum ho ki... Ughh! I hate you so much! Hmph!]

'वोह! रियली नाउ!? लव से हेट पे कब आ गयी तुम? पहले तोह बड़ा कहती थी. ओह्ह मास्टर, ी लोभ यू सू मुक्छःह! हँ!? अब क्या हुआ?'

[Hmph!!!]

'नाउ नाउ... लिसेन! तुम्हारे प्लान में फ्लॉस है. It's नॉट प्रैक्टिकल.'

[What!? Kya galat hai isme?]

'ी कन्नोत टेक मनी फ्रॉम थम. खासकर की उधारी. में ये बिलकुल नहीं कर सकता. और क्यों लू उनसे में इतना बड़ा अमाउंट? और वो क्या लगते है मेरे, मुझे इतना बड़ा अमाउंट देने वाले? मिस सोनिआ केवल मेरी एक फ्रेंड की तरह है. उनके और मेरे बीच बोहत बड़ा गैप है पारी.'

[B-But yadi tum maangoge toh...]

'यहाँ मेरे अपनों ने घर से निकाल दिया. और तुम एक्सपेक्ट कर रही हो की बाहर का आदमी मुझे लाखो रुपये इन्वेस्ट करने देगा? में जो आलरेडी ुनम्पलॉयड हु और अपनी भाभी के घर में रह रहा हु!?'

[But she can really...]

'ी क्नोव वो मुझे दे देंगी पैसे. बूत उनके मैं में कई सवाल ज़रूर रहेंगे पैसे देने से पहले. It's नॉट राइट तो आस्क हेर.'

[Th-Then how about Kaera? Wo toh zaroor...]

'नहीं! वो पहले hi इतना कुछ झेल रही है. आल्सो, She's ब्रोकन. ी जस्ट don't वांट तो आस्क एनीथिंग फ्रॉम हेर. और उनके और मेरे बीच में गैप तोह नापा भी नहीं जा सकता. She's फार ग्रेटर थान में. No कपरिसों पारी!'

[Then Suhana!? Surely, wo toh...]

'आलरेडी 3 फवौर पूरे करने का प्रॉमिस दे चूका हु उससे. जिससे वो ऑब्वियस्ली समय आने पर मांगेगी. आल्सो, She's डेफिनिटेली प्लॉटिंग समथिंग. ी कैन सेंस आईटी.'

[...]

'और इसी के साथ, तुम्हारे सारे ओप्तिओंस ख़तम हुए और प्लान फ्लॉप.'

[B-But...]

'पारी! यू don't अंडरस्टैंड! निधि Ma'am की प्रॉब्लम में अपने पैसो से सोल्वे करूँगा. Don't वोर्री! ी क्नोव की टाइम लिमिट है. अब इस बारे में कोई चर्चा नहीं. Okay?'

[Hmph...!]

'Let's जो!'

[Wh-Where...!?]

वीर अपनी जगह से उठा और अंदर जा कर उसने ऊपर से एक जैकेट डाली.

वीर : भाभी!!!

रागिनी (अंदर किचन से) : हाँ वीर!?

वीर : दादा जी से मिलने जा रहा हु. थोड़ी देरर में आ जाऊंगा.

वीर के इतना कहते hi रागिनी कुछ सेकण्ड्स में hi किचन से बाहर निकल कर आयी.

रागिनी : घर जा रहे हो?

वीर : हम्म! दादा जी घर लौट आये है. में एडमिट था तोह उस वजह से मिलने नहीं जा पाया.

रागिनी : पर तुम्हारा हाथ अभी भी सही नहीं है. तुम बाइक नहीं चलाओगे.

रागिनी को साड़ी बातें वीर बता चूका था. उसने ये सब बताया था की वो करा को बचाने गया था और कुछ गुंडों ने उस पर हमला कर दिया था. उसने स्लोगन या उस से रिलेटेड कोई भी बात रागिनी को नहीं बतायी थी.

वीर : Don't वोर्री में...

रागिनी : मेने कहा न, तुम बाइक से नहीं जाओगे.

वीर (शिघ्स) : अच्छा बाबा! में टैक्सी या ऑटो से चला जाऊंगा. अब तोह जा सकता हु न!?

रागिनी (नॉड्स) : हम्म!

वीर : क्या आप...!?

रागिनी : दादा जी को में भी देखना चाहती हु. पर...

वीर : टेक योर टाइम.

रागिनी : हम्म~

और वीर रागिनी की बात मान कर बाइक को चोरर ऑटो से hi अपने घर की ऑर्डर निकल पड़ा.

उसके मैं में उथल पुथल सी मची हुई थी. अनेको सवालों से घिरा हुआ था वह. क्या होगा जब उसके घरवाले उससे देखेंगे!? केसा रियेक्ट करेंगे वह? क्या उन् आँखों में फिरसे उससे नफरत देखने को मिलेगी? जो भी होने वाला था, वीर इस बार सब के लिए प्रेपरेड़ था.

वो पहले की तरह नहीं था जहा वो भीगी बिल्ली बन के डर जाय करता था. ीेट का जवाब पत्थर से देना आता था अब उससे.

ऑटो वाले को पैसे देने के बाद जैसे hi वो उतरा, उसके सामने वही पुराना और जाना पहचाना बांग्ला मौजूद था. जहा से कभी उससे धक्के मार्के निकाला गया था.

इमोशंस तोह कई सारे बह रहे थे उसके अंदर इस समय. पर उन्हें कण्ट्रोल कर वो आगे बढ़ा.

और बाहर मौजूद सिक्योरिटी गार्ड्स उससे देखते hi वही ृक्क गए. दोनों hi सिक्योरिटी गार्ड्स ने कुछ न कहा. वीर एक नज़र दोनों पर डालते हुए अंदर की ऑर्डर जाने लगा.

अंदर मिनी हॉल में दस्तक देते hi उससे कुछ फेमिलिअर सा महसूस हुआ. यही तोह वो जगह थी न? जिधर उस दिन वो वैसे रखा हुआ था और वीर उठा के अंदर ले गया था, जो बाद में फिसलने के कारण टूट गया था?

उन् कड़वी यादो को भूल वो एक बार फिर आगे बढ़ा और मैं हॉल में एंटर किया. अंदर आते hi उससे कोई भी न दिखाई दिया.

इतना बड़ा हॉल पर बैठने वाला कोई नहीं. एकदम सूना सूना सा था सब.

और फिर तभी अंदर के एक कमरे से एक बड़ा hi परिचित सा चेहरा उसकी आँखों के सामने आया.

उसकी सौतेली माँ!

श्वेता!

श्वेता भी वीर को देख पहले तोह चौंक गयी. एक पल के लिए उससे आभास hi नहीं हुआ की ये वीर है. आखिर पहले से कई गुना स्मार्ट दिखने लगा था अब वह. और जब उससे समझ में आया तोह वो हैरत के मारे उससे घर के देखने लगी.

श्वेता : T-Tum!???

वीर ने न hi कोई जवाब दिया और न hi कोई रिएक्शन. वो बस चुप चाप खड़ा श्वेता को देखता रहा.

श्वेता : तुम यहाँ!? क्या काम है!?

श्वेता की बात सुन्न वीर को मैं hi मैं हस्सी आ गयी. बताओ! उसके hi घर में उस से ये पूछा जा रहा था की वो यहाँ क्या कर रहा है. कितनी अजीब और दुखद बात थी ये.

श्वेता कुछ और कह पाती की उसके पहले hi आरोही सीढ़ियों से नीचे आ पहुची.

आरोही (सुरप्रीसेड) : वीर!

वीर : *स्माइल्स*

आरोही (स्माइल्स) : दादा जी तुम्हे देख कर बोहत खुश हो जाएंगे. वह क्या खड़े हो. के! जल्दी आओ!

और आरोही आगे बढ़ उसका हाथ थाम कर उससे अंदर की ऑर्डर ले जाने लगी.

श्वेता : हँ!? P-Par...

बेचारी श्वेता केवल सामने सब कुछ होता देखते hi रह गयी. कुछ कह hi नहीं पायी. और अंत में वो खुद उन् दोनों के पीछे पीछे चल दी.

मनोरथ अंदर बिस्तर पर hi लेते हुए आराम फार्मा रहे थे और काव्य उनके लिए पीने के लिए गुनगुना पानी लायी हुई थी.

काव्य : ये लीजिये दादा जी! आपका गुनगुना पानी.

मनोरथ : धन्यवाद् बेटी! बस! अब तुम जाओ.

काव्य : क्यों जाऊ? क्या में इधर नहीं बैठ सकती?

मनोरथ : अरे बीटा! तुम्हे भी तोह काम होंगे न? इधर रहोगी तोह बोरियत hi होएगी और...

काव्य : कुछ बोरियत नहीं होएगी दादा जी! कुछ देरर यही बैठूंगी में. और आपको किसी भी चीज़ की ज़रुरत हो तोह बस बोल देना. हहै~

मनोरथ : मेरी पोती कितनी समझदार है.

काव्य : वो तोह में हु hi...

*क्रीक*

इनकी बात समाप्त होते hi, कमरे का दरवाज़ा खुला और वीर का हाथ थामे आरोही और वीर दोनों hi अंदर एंटर किये.

वीर ने अपने दादा जी को देखा और उनकी हालत देखते hi उसकी बॉहे सिकुड़ बैठी.

कितने कमज़ोर नज़र आ रहे थे वह पहले के मुक़ाबले. उनका ढांचा भी कुछ पतला सा हो चूका था. रंग भी काला था पहले के प्रति. ये परिणाम था एक्सीडेंट का. ठीक से खाना न खाना, व्यायाम न करना, सुबह की धुप न लेना. उनकी साड़ी आदतों पर जैसे रोक सी लग गयी थी. और उसका नतीजा सामने था.

उनका गिरता हुआ स्वास्थ.

मनोरथ ने जैसे hi वीर को देखा तोह उनकी आँखों में अचानक hi जैसे चमक सी आ गयी.

मनोरथ : वीएररर!!

कहते हुए वो उठने को हुए तोह वीर ने आगे बढ़ उन्हें वापस लिटा दिया.

"भैयाआआ!!!!"

और इधर काव्य वीर को अचानक देख उसके गले से लिपट गयी. बगल में कड़ी आरोही मुस्कुरा कर दोनों को देख रही थी.

'थिस इस थे रियल फॅमिली...' सोचते हुए वो वही एक चेयर पर बैठ गयी.

वीर : किसी है आपकी तबियत दादा जी!

मनोरथ : मेरा पोता... वीर! आ गया तू...

उन्होंने वीर का हाथ थामा और उससे अपने बिस्तर पर hi बैठा लिया. वीर देख पा रहा था की उसके दादा जी की आँखों में से ासु बहना शुरू हो चुके थे.

वीर : जी! पहले मिलने न आ सका. में हॉस्पिटल में एडमिट था.

मनोरथ : और में भी मेरे बच्चे. क्या हो गया था तुझे? कैसे? कब हुआ ये सब.

वीर (स्माइल्स) : लम्बी कहानी है. फिर कभी...

आरोही : तुम... तुम बाइक से आये हो क्या? तुम्हारा हाथ तोह चोटिल है न? फिर कैसे...!?

काव्य : यह! राइट! भैया आप कैसे...?

वीर : चिल! में ऑटो से आया हु.

काव्य : ओह्ह! हाँ ये सही किया. गुड!

वीर : तोह दादा जी? आपकी सेहत का ख़याल रख रहे है सभी लगता है.

मनोरथ (स्माइल्स) : सबसे ज़्यादा तोह प्रांजल और काव्य hi मेरा ख़याल रख रही है बीटा.

वीर : ओह्ह्ह! काव्य बच्ची ज़रूर है पर है बड़ी hi मेहनती.

वीर ने कहते हुए काव्य के सर्र पर प्यार से हाथ फेर्रा तोह काव्य भी खिल खिला उठी.

काव्य : ेहेहेहेहे~

पर जैसे उससे वीर के बोल कुछ सही न लगे.

काव्य : हँ? वेट! आपने क्या कहा मुझे? बच्ची!?? भैयाआआआ...

"मेरा प्यारा भाआईईई!!!!!"

काव्य अपनी बात पूरी रख पाती की तभी पीछे से एक और जानी पेचानी सी आवाज़ वीर के कानो में पड़ी. इस आवाज़ से तोह वीर हमेशा परिचित रहेगा. कभी भूल नहीं सकता वह.

अपने हाथ फैलाये, प्रांजल कमरे में एंटर हुआ और वीर के पास आते hi जोरर से उसके गले से लग बैठा.

प्रांजल : ओह्ह्ह मेरे भाई!!! मेरे छोटे भऐई! कितने दिनों बाद तुम्हे देख रहा हु. मुझे बेहद ख़ुशी है की तुम यहाँ आये. में तोह सोच hi रहा था की किसी दिन तुम्हे यहाँ ले औ.

वीर : ....

प्रांजल उसके गले से ज़रूर लगा हुआ था. पर वीर जानता था. जानता था की उसका ये भाई प्रांजल आस्तीन का वो सांप था जो बड़ी hi चतुराई से दस्ता था.

वीर जानता था की ये प्रांजल का ज़रूर कोई नया दिखावा था.

'दो आल व्हाट यू वांट बरोथेर! माय आईज... कैन सी थ्रू योर एक्शन्स एवेरीतिमे.'

[True that...]

आरोही ने मंदिर की साड़ी बातें वीर को बतायी हुई थी. और वीर को पता नहीं क्यों पर सबसे ज़्यादा शक प्रांजल पर hi जा रहा था. आखिर प्रांजल hi तोह था जिसने वीर को निकलवाया था और अजय से पिटवाया था.

वीर का इंटेलिजेंस आलरेडी 80 पर था. उससे बातें इतनी खुल कर इसके पहले कभी नहीं समझ में आयी थी जितनी अब आ रही थी.

प्रांजल : ओह्ह्ह भाई! तुम्हे कितना मिस किया मेने. तुमने अच्छा किया यहाँ आकर.

आरोही : ओह्ह रियली? ी डोंट थिंक की तुम इतने भी ज़्यादा क्लोज थे वीर से कभी...!

प्रांजल : C'mon दी! वो कहते है न, आपको उस चीज़ का एहसास तब hi होता है जब आप उससे खो दो. वीर के जाने के बाद घर कितना सूना हो गया है. और मुझे पता लगा की बिना वीर के... में तोह रह hi नहीं सकता. हां माना की उससे आये दिन दांत पड़ती रहती थी पर में हमेशा hi उससे बचाने का प्रयास करता था दी...

आरोही : *फ्रोंस*

[This bastard...]

वीर : *स्माइल्स*

प्रांजल : देखा दादा जी! देवी जी के मंदिर से आने के बाद hi खुशिया जैसे शुरू हो गयी हमारे घर में आना. देखिये न! वीर भी आया आज आप से मिलने. वो दिन दूर नहीं जब वीर को खुद ताऊ जी अपने हाथो से पकड़ के ले आएँगे वापस.

मनोरथ (स्माइल्स) : आज में बेहद खुश हु बीटा.

प्रांजल : मेरा भाई अब आ गया है. अब में आज hi ताऊ जी से बात करूँगा. उन्हें मनाऊंगा...

कहते हुए उसने वीर के हाथ पर एक थपकी दी. पर ये वही हाथ था जो उसका चोटिल था.

वीर : अह्ह्ह!

प्रांजल : अरे!? K-Kya हुआ भाई!

आरोही : क्या कर रहे होऊ!???? उससे चोट लगी है न. इडियट!

प्रांजल : ओह्ह! सो सॉरी मेरे भाई! M-Mujhe वाक़ई कोई ध्यान नहीं था. देखो तोह... दादा जी के चलते तुमसे मिलने तक न आ पाया.

मनोरथ : कहा? कहा लगी है वीर को चोट... बीटा! मुझे दिखाओ.

वीर : It's... It's okay! दादा जी कुछ नहीं है. हलकी सी थी चोट. चिंता मत करिये. ठीक हो जाएगी.

मनोरथ : नहीं! मुझे दिखाओ बीटा. तभी मेरे मैं को शान्ति पहुचेगी.

और दादा जी की बात रखने के लिए आखिर वीर को अपनी जैकेट उतारनी hi पड़ी. उसने सावधानी से जैकेट उतारी तोह हाथो में बंधी हुई पत्तिया उन् सभी को नज़र आयी.

प्रांजल : हे भगवान्! इतने दिनों के बाद भी अभी ये बंधी हुई है. तोह सोचिये ज़रा दादा जी की चोट के वक़्त क्या हालत रही होगी वीर की...

मनोरथ : वीर!??? इतनी ज़्यादा चोट... पूरा हाथ बंधा है तुम्हारा.

वीर : पत्तिया बंधी है दादा जी. अंदर से सब ठीक है अब. चिंता की कोई बात नहीं.

*क्रीक*

और एक बार फिर दरवाज़ा खुला. इस बार अंदर आने वाले दो शख्स थे.

एक तोह थी श्वेता.

और दूसरी थी...

उसकी बेटी, भूमिका जो अभी अभी अपनी होटल से आयी थी.

मनोरथ : बहु! देखो... कौन आया है.

श्वेता : *स्माइल्स*

केवल एक झूठी सी मुस्कान देते हुए श्वेता आगे बढ़ वीर के नज़दीक आयी.

श्वेता : अब किसी है तबियत आपकी पापा जी!?

मनोरथ : मेरा पोता आया है. तोह उसके दादा जी तोह बेहतर hi महसूस करेंगे न?

भूमिका की नज़र जब वीर से मिली तोह एक पल के लिए वो काफी सुरप्रीसेड रह गयी. और फिर अगले hi पल उसने अपनी नज़रे वीर से चुरा के फेरर ली.

कुछ समय गुज़रा. और सभी के सभी लोग दादा जी के कमरे में hi बैठे हुए थे और बातें कर रहे थे.

श्वेता, प्रांजल बाहर से तोह ऐसा hi दिखा रहे थे जैसे वो वीर के आने से खुश थे. पर अंदर hi अंदर न जाने क्या क्या बातें उमड़ रही थी उनके मैं में.

वही भूमिका केवल वीर को देखती और नज़रे आपस में मिलते hi खुद इधर उधर देखने लगती.

न जाने क्या सोच रही थी वो मैं में.

करुणेश और बृजेश दोनों hi घर पर नहीं थे. और विवेक भी. यही कारण था शायद जिसके चलते आज वीर शान्ति से काम से काम अपने दादा जी से मिल पा रहा था.

जब जाने का समय हुआ तोह वीर उन् सब से विदा लेके बाहर जाने लगा.

मनोरथ ने मनाया की वो कही न जाए और उनके साथ hi रुके. पर वीर ने अपने दादा जी को जैसे तैसे मनाया और बाहर आ गया.

काव्य और आरोही तोह बाहर उससे चौररने आयी hi थी. पर सबसे सुर्प्रिसिंग ये था की उनके बगल से भूमिका भी कड़ी हुई थी.

वीर : चलता हु.

आरोही : हम्म~

काव्य : भैया यु आते रहना.

वीर (स्माइल्स) : हम्म~

वीर ने एक अंतिम नज़र भूमिका पर डाली और पलट के वो जाने लगा.

काव्य और आरोही दोनों hi अंदर जाने लगी. पर भूमिका जैसे किसी चीज़ का वेट कर रही थी.

वीर कुछ कदम दूर जा चूका था और इधर काव्य और आरोही के अंदर जाते hi भूमिका आगे की ऑर्डर भागी.

भूमिका : W-Waitttt!!

वो चिल्लाई और तेज़्ज़ कदमो के साथ भागती हुई वो वीर के पास आयी.

वीर : हम्म?

भूमिका : वो... वो...

वीर : !??

भूमिका : उम्... ी... H-How अरे यू? ी मैं... तुम्हारी चोट... अब कैसी है?

वीर ने एक झलक अपने हाथ पर डाली जिसमे पट्टी बंधी हुई थी और फिर भूमिका को देख उसने एक फीकी सी स्माइल दी. उसने अपने कंधे से जैकेट उतारी और उससे पहन कर अपनी चोट को छुपा लिया.

वो पलटा और आगे बढ़ने से पहले उसने सिर्फ इतना hi कहा.

वीर : वो कहते है न... तलवार से दिए गए ज़ख्म एक बार फिर भी भर जाते है. पर कुछ कहे गए शब्दों के ज़ख्म कभी नहीं भरते.

और बस, उन् अल्फाज़ो को रख वो आगे बढ़ गया.

भूमिका केवल उससे अँधेरे में जाता हुआ देखती रही जब तक की वीर उसकी आँखों से ओझल न हो गया.

अपना निचला होंठ दातो टेल दबाये उसका सर्र गिल्ट के मारे झुक गया.

वीर उससे याद दिला रहा था.

वीर के शब्दों का मतलब एक hi था. वो इशारा कर रहा था.

वो पल, जब भूमिका ने उसके सामने होटल में ये कहा था.

'ी... ी don't क्नोव हिम.'

यही शब्द तोह कहे थे उसने सोनिआ के सामने वीर के लिए. और उसके बाद से hi वो गिल्ट महसूस कर रही थी. और आज वीर के उन् शब्दों ने जैसे उसके अंदर गिल्ट का बाँध तोड़ दिया था.

ासु टपकाते हुए वो वह से सीधा अंदर अपने घर में भाग गयी.

***

मुंबई...

******** विला...

"के इन!!!"

एक बेहद hi बड़े से विला में एक कमरे के अंदर से ये आवाज़ आयी.

आवाज़ भारी थी. ज़ाहिर एक मर्द की.

और कमरे के बाहर एक बेहद hi ख़ूबसूरत लड़की कड़ी हुई थी. पर वो कुछ सेहमी सी थी.

और ये कोई और नहीं, करा hi थी.

"Y-Yes फादर!"

अपने आप में hi धीरे से बोल वो गेट खोल के अंदर उस कमरे में चली गयी.

उसी विला में नीचे के फ्लोर पर रघु एक कमरे में मौजूद था और पाँव पर पाँव रखे लेता हुआ था.

"क्या हुआ? अभी भी उस बारे में सोच रहा है?"

कहते हुए जस्सी वाशरूम से बाहर निकला.

रघु : हम्म~

जस्सी : टेंशन मत ले. वैसे hi कई राज़ है. एक ये और सही. कभी न कभी हाथ लग hi जाएगा.

रघु : पर फिर भी...

रघु किसी सोच में पड़ा हुआ था. उस दिन की घटना को लेकर hi. वो वापस से जैसे सब कुछ याद करने लगा.

उस रात...

जब वो मिस्टर एंड मिस्ट्रेस बंसल को चोरर वापस होटल आया था तोह उससे पता लगा था की...

जस्सी वाशरूम में बंद था.

जस्सी को चुर्राटे hi वो दोनों hi होटल के बाहर जब निकले थे तोह उनकी कार पर एक कागज़ चिपका हुआ था.

एक नोट...

जिसपर लिखा था~

"अपनी मिस को बचाना है तोह क्सक्सक्सक्सक्सक्स हिडौट जाओ. एड्रेस - क्सक्सक्सक्सक्सक्सक्सक्स रोड. लेफ्ट हैंड साइड.

~ तुम्हारा शुभ चिंतक."

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आज के लिए इतना hi गाइस!


धन्यवाद!!
 
अपडेट - 55 ~ ा नई फ्रेंड!?

अब तक...

जस्सी को चुर्राटे hi वो दोनों hi होटल बाहर जब निकले थे तोह उनकी कार पर एक कागज़ चिपका हुआ था.

एक नोट...

जिसपर लिखा था~

"अपनी मिस को बचाना है तोह क्सक्सक्सक्सक्सक्स हिडौट जाओ. एड्रेस - क्सक्सक्सक्सक्सक्सक्सक्स रोड. लेफ्ट हैंड साइड.

~ तुम्हारा शुभ चिंतक."


अब आगे...

एक नयी सुबह थी, और लगता है वीर आज कुछ नए जोश में भी था. कल रात में hi उसने सुमन को अपने hi रूम में लिटा लिया था. और फिर देरर रात तक क्या हुआ था ये बताने की ज़रुरत नहीं थी.

इस वक़्त सुबह के 7 हो रहे थे और वीर हमारा रज़ाई के अंदर लेता हुआ था. पर इतना hi नहीं था. उसके ऊपर सुमन अधनंगी उसकी छाती पर अपनी बड़ी बड़ी छुछिया टिकाये लेती हुई थी.

आँख खुलते hi वीर को सबसे पहले सुमन का कोमल सा चेहरा नज़र आया. उन् खुले बालो में वो बड़ी hi प्यारी लग रही थी सोते हुए. साथ hi साथ चेहरे पर वो निखार भी झलकने लगा था सुमन के जो अक्सर शादी शुदा औरतो के चेहरों पर झलकता है.

वीर उससे देख मुस्कुराया और उसने पारी को स्लीप मोड में दाल दिया. शायद कल रात की कसार अभी भी पूरी नहीं हुई थी.

प्यार से उसके सर्र पर हाथ फरते हुए उसने सुमन को जगाने की कोशिश की और कुछ hi देरर में सुमन उठ भी गयी.

सुमन : ममम... मालिक!?

वीर : उठ गयी?

सुमन : हम्म~

वीर ने अपने एक हाथ को धीरे से उसके पीछे ले जाते हुए उसकी कमर पर फिराया. और फिर नीचे की ऑर्डर करते हुए उसके चूतड़ों को जोरर से जकड लिया.

सुमन : न्नन्न~

सहलाते सहलाते वीर का खुद का हथियार भी तन्न चूका था. और सुमन समझ चुकी थी की इसको शांत भी अब उसी को करना होगा.

कल रात वीर ने सारा का सारा पानी अपना सुमन की छूट में hi चोर्रा था. उसकी सेक्स प्रोटेक्शन स्किल ों थी तोह उससे प्रेगनेंसी की बात की कोई परवाह hi नहीं थी. वो जी भर के सुमन की छूट में झाड़ता और उसकी फुद्दी मारता.

अपने मालिक के इशारे समझते हुए सुमन ने फौरन hi झुकते हुए वीर के हथियार को कुछ झटके मारे और उससे अपने मुँह में भर लिया.

ये बताने की ज़रुरत नहीं थी की वीर का लुंड रात भर की चुदाई से पूरा सना हुआ था. वो साफ़ नहीं था. पर उसके बावजूद, सुमन को जैसे कोई परवाह नहीं थी.

वीर : ओह्ह्ह्ह! फुककककक~

वीर की नज़रो में आज तक वो जितनी भी औरतो से मिला था या लड़कियों से, सुमन अब तक की सबसे ज़्यादा किन्कीएस्ट औरत थी. और सबसे बड़े थान वाली भी.

और वही औरत उसकी स्लेव थी. उसकी रांड, उसकी रखेल, उसकी दासी. वो उसकी सब कुछ थी. सिवाए एक पत्नी के.

ये ओहदा कभी भी सुमन को प्राप्त नहीं होने वाला था. ये बात वो खुद जानती भी थी और चाहती भी यही थी. उसका कहना था की मेरी जगह केवल मालिक के पेर्रो में है, उनके बगल से खड़े होने के लिए में नहीं, उनकी आने वाली बीवी होगी.

में तोह हमेशा उनके पेर्रो पर hi रहूंगी.

कई बार तोह वीर भी उसकी बातें नहीं समझ पाटा था.

सुमन : उनमम.... *स्लुर्प* sssssss....nfu... *लीक* नमू... *छू* फूहा...

वीर : अह्ह्ह! शीट्ट्ट्ट!!!

वीर से सुमन के होंठो की ज़ररदार चुसाई और न सही गयी और उसने सुमन को पलटाया और सीधे उसकी छूट पर अपना हथियार लगाते हुए कुछ धक्को में hi अंदर उसकी बच्चेदानी तक पेल दिया.

और कुछ देरर वीर बस इस अध्भुत एहसास में डूब कर सुमन की नंगी छूछीयो पर hi लेत गया.

वीर : यह! It's सो गुड! तुम्हारी छूट इतनी गरम क्यों है सुमन.

सुमन (स्माइल्स) : हर्र छूट अंदर से गरम hi होती है मालिक. आप बुझाइये न इसकी आग. इससे ठंडा करिये न मालिक.

वीर : करता हु, थोड़ा छूट की गर्माहट तोह महसूस करने दो मुझे. भट्टी की तरह ाररर्घः.... एकदम गरम है. दमन!!!

सुमन : आह्हः! सससस~ मालिक!! अब और मत तड़पाइए.

वीर : करता हु. पर पहले ये दूध तोह पी लू.

कहते हुए वीर ने सुमन के थानों को मुँह में भर लिया और उसके निप्पल्स को चबा चबा के उनमे से दूध निकालने की कोशिश करने लगा. सुबह सुबह hi वीर और सुमन का चोदामपट्टी का खेल शुरू हो चूका था.

सुमन ने कई बार मन भी किया था की सुबह सुबह सेक्स न किया जाए. वर्ण ऐसे में सारा दिन वीर को थकान एवम कमज़ोरी hi महसूस होगी.

पर वीर को कोई फिक्र नहीं थी. सिस्टम जो था उसके पास. वैसे hi उसकी रिकवरी तेज़्ज़ थी. और अब उससे इन् छोटी मोती बातो की टेंशन लेने की कोई ज़रुरत नहीं थी. वो जब चाहे सेक्स कर सकता था.

अच्छे से दूध को चूस लेने के बाद जब वीर ने धक्के लगाने शुरू किये तोह सुमन की सिसकियों की आवाज़ उसके कमरे में गूंजने लगी. हर्र धक्के पर उसका बिस्तर चरर मर्डर की आवाज़ें करने लगता . और हर्र धक्के के बाद सुमन सिहर के रह जाती. वो टांगें वीर की कमर पर बांधे अपनी छूट को पूरा जड़ तक वीर के लुंड से चिपकाने की कोशिश करती.

और कुछ hi देरर बाद, वीर ने अपना सुबह का ये पहला लोड सुमन की छूट में खाली कर दिया.

सुमन के जिस्म पर पसीने की बूँदें सजी हुई थी. उसकी बड़ी बड़ी दूध की थैलिया तेज़्ज़ सासे लेने के चलते ऊपर नीचे हो रही थी. और ये बात भी नहीं भुलाई जा सकती थी की वो किसी और की बीवी थी जिससे वीर अपने नीचे लिटा के छोड़ रहा था.

भले hi सुमन ने मैं से और शारीरिक रूप से अपने पति का त्याग कर दिया था पर डाइवोर्स नहीं दिया था अभी भी.

कुछ देरर अपनी सासो को दुरुस्त करने के बाद जैसे hi वो उठने को हुई उसकी नज़र दरवाज़े की देहलीज़ पर गयी और उसने देखा की...

दरवाज़े के नीचे से किसी का साया नज़र आ रहा था. ये देखते hi वो एकदम डर गयी. पर अगले hi पल जैसे बाहर खड़े व्यक्ति ने भी अंदर की ख़ामोशी को महसूस किया और वह से फौरन hi निकल गया.

अपने मालिक के सर्र पर प्यार से हाथ फेरर उसने वीर को साइड में लिटाया और अपना ब्लाउज पेहेनते हुए वो उठी और आहिस्ता आहिस्ता दरवाज़े के पास गयी.

दरवाज़ा खोला तोह उससे कोई भी न दिखाई दिया.

वो आगे बढ़ अपने रूम की तरफ गयी जिसमे वो और आभा सोते थे. और उसने थोड़ा धक्का दिया तोह पाया की दरवाज़ा बंद था.

वो कुछ सोचते हुए जब वापस आयी तोह वीर के रूम के बाहर hi उससे कुछ ज़मीन पर नज़र आया. झुकते हुए उसने उस चीज़ का जायज़ा लिया और जैसे hi उससे पता चला की वो क्या था. उसके होंठो पर एक कुटिल मुस्कान बिखर गयी.

वीर के पास आते हुए उसने अपनी पंतय उठायी और उसके सामने hi पेहेनते हुए बोली,

सुमन (स्माइल्स) : कल आप के लिए एक तोहफा है मालिक.

वीर : हम्म!? केसा तोहफा?

सुमन : ये तोह... कल hi पता चलेगा. फुफु~

वीर : तुम और तुम्हारी ये बातें. खर्र! ये बताओ! भाभी से क्या क्या सीख लिया अभी तक?

सुमन : यह!! हाँ! कल न मेने न मालिक... कल मेने फ़ोन चलना सीखा. वैसे तोह वो टेलीफोन मुझे चलाना आता है. पर ये मोबाइल नहीं. पहले हवेली में बोहत मेने...

वीर : !???

सुमन : वो... K-Kuch नहीं! K-Kal मेने यही फ़ोन चलना सीखा मालिक. कैसे दूसरे व्यक्ति को फ़ोन करते है और कैसे फ़ोन kaat'te है. कैसे नंबर ढूँढ़ते है. यही सब.

वीर (स्माइल्स) : गुड!

सुमन : क्या आप अब भी नहीं बताएंगे की मुझे ये सब क्यों सीखा रहे है आप?

वीर (स्माइल्स) : समय आने पर.

सुमन : तोह!? आप अभी कही जा रहे है क्या?

वीर : हम्म! सुहाना जी से मिलने. सोनिआ जी की बड़ी बहिन. तुम्हे बताया था न.

सुमन : J-Jii!

वीर : वही!

सुमन : कब तक आएँगे आप!?

वीर : कुछ कह नहीं सकता.

सुमन : O-Okay!

कहते हुए सुमन जाने लगी तोह वीर ने...

'फवौराबिलिटी चेक!'

[Suman's Favourability : 90]

'हौली शित्त्त!!!! Y-Ye... Wtf? सेक्स के बाद सुमन की फीलिंग्स बढ़ जाती है क्या? ये तोह... वाक़ई...'

*डिंग*

[System has been activated.]

[Wtf??? Tumne mujhe sleep mode me achanak kyu daala? Huh???]

'आ गयी तुम? एहम! वेल! ी हद सम बिज़नेस!'

[Waah waah waah waah! Business my foot! You were having sex right?]

'हाँ तोह? Can't ी? मेरी भी पर्सनल लाइफ है. और में नहीं चाहता की एक वीयर्ड सी प्रजेंस जो मेरे अंदर है वो मुझे सेक्स करते टाइम मुझे देखे.'

[Whaaaaaattt??? Weird prescence se kya matlab hai tumhara haan!? Bolo? Y-Youuu.... You think I don't know. I hate you so much! Hmph~]

'बकवास बाद में. Let's जो!'

[Huh!? K-Kaha?]

'सुहाना से अपॉइंटमेंट है आज उसके hi घर पर. She's बिजी इसलिए बड़ी मुश्किल से उसने टाइम निकाला है मेरे लिए. बिज़नेस से रिलेटेड बाते करनी है.'

और इतना बोल वीर नाहा धो के कुछ दो घंटो के बाद ब्रेकफास्ट करते हुए घर से निकला. वो सुहाना के घर पहुचा तोह इस बार भी सभी वर्कर्स ने वह के उससे आसानी से अंदर आने दे दिया.

पता नहीं क्यों पर उससे देखते hi वह के वर्कर्स आपस में खुसुर पुसुर करने में लगे हुए थे जिन्हे वीर कुछ कुछ सुन्न पा रहा था.

"अरे! ये तोह वही है न?"

"हाँ हाँ~ अरे ये तोह वही है. जो उस दिन आया था."

"अरे ये लड़का कई बार आ चूका है."

"कई बार? अरे मेने एक बार इससे सुहाना मैडम के साथ होटल में भी देखा था."

"कही सुहाना मैडम और इस लड़के का आपस में कुछ..."

"अरे चुप रहो तुम सब! सुहाना मैडम को खबर लग गयी तोह हमारी खर्र नहीं."

"सही कहा. इन् अमीर लोगो के चोचले हमारे परे है. हमे क्या करना? मैडम जिसके साथ घूमे फिर, हमको क्या? पगार से मतलब रखो बस."

'व्हाट थे हेलल? अरे थी गाइस नट्स?'

[Logo ka toh kaam hi hai baatein banaana.]

*नॉक नॉक*

दरवाज़े पर नॉक करते hi वीर को अंदर से एक आवाज़ आयी,

"के इन..."

और वीर ये सुनते hi उन् वर्कर्स पर एक नज़र दाल अंदर चला गया.

सुहाना अपनी वर्किंग टेबल पर बैठे लैपटॉप में कुछ कर रही थी.

सुहाना : लॉक थे दूर!

वीर : हँ?

सुहाना : ऐसे मुँह क्या बना रहे हो? लॉक थे दूर!

वीर : वेल! िफ़ यू से सो...

*क्लिक*

दूर लॉक कर वो सामने सुहाना के बैठ गया.

सुहाना : हम्म~ तोह? बोलो! केसा क्या प्लान है? हम स्ट्रैट अवे स्टार्ट कर देंगे यदि सही रहा तोह!

वीर : हम्म? वेल! आप ने hi तोह कहा था न? की कपड़ो का बिज़नेस सबसे सही रहेगा मेरे लिए? और आप अपनी कोई जगह भी देने तैयार थे काम रेंट पर?

सुहाना : हाँ कहा था बूत बाकी का क्या? में तुम्हे जगह दे दूंगी और रेंट भी काम कर लुंगी पर फिर क्या? चलो में तुम्हारे एक लीगल बिज़नेस के डाक्यूमेंट्स भी सेट करवा लुंगी. पर... लिखे... शुरुआत कैसे करोगे? किसी से बात की? क्या ब्रांड का नाम रखना है? तुम्हे ब्रांड बनानी भी है या नहीं? या फिर कलब करना है? या नार्मल उन् लोकल कपड़ो वालो की तरह hi शॉप खोलनी है?

'फ़क! इसके बारे में तोह मेने कुछ सोचा hi नहीं!'

[She's right! Tumhe pehle se sochna tha.]

'तुम तोह जानती हो न? स्लोगन और इन् सब में में कितना उलझा हुआ हु. निधि ma'am की प्रॉब्लम, घर पर दादा जी का हादसा, भाभी की प्रॉब्लम, सुहाना के फवोर्स, मिस करा को दिया हुआ वादा. इन् सब से घिरा हुआ हु में. तोह मुझे समय hi नहीं मिला.'

[Umm... Well! Aise kahoge toh yeah. Y-You were quite busy I guess.]

वीर : 5 मिनट मिलेगा सोचने के लिए?

सुहाना : वेल! सोच लो. देखो ज़्यादा टाइम मत लेना. मुझे ुरगेंटली कही जाना भी है. मेने बड़ी मुश्किल से तुम्हारे कहने पर टाइम निकाला है.

'हम्म~ पारी! व्हाट दो यू थिंक?'

[Mere hisaab se... Aisa business karo jiski harr insaan ko need rehti hi hai.]

'इंसान को सर्वाइव करने के लिए केवल तीन hi चीज़े चाहिए होती है. राइट? रोटी, कपडा और मकान.'

वीर के होंठो पर एक मुस्कान बिखर गयी ये सोचते हुए.

'लुक्स लिखे... ी फाउंड थे सलूशन.'

[You mean...!?]

'यस! हम ऐसे hi प्रोसीड करेंगे. व्हाट ा जीनियस ी ऍम. हाहाहा~"

[Ohhh!]

'बिना खाने के तोह कोई भी जीवित नहीं रह सकता. यस! फ़ूड!!! ये मेने पहले क्यों नहीं सोचा! कपड़ो का बिज़नेस इस गुड बूत स्टार्टर के लिए. फ़ूड hi बेस्ट चॉइस है. जब एनफ पैसा हो जाएगा थें में कपड़ो का बिज़नेस भी शुरू कर सकता हु. उसके बाद और जब एनफ हो जाएगा. थें...'

[Then!?]

'रियल एस्टेट का बिज़नेस... मकान से मेरा मतलब यही था.'

[Ohhhh! Are you sure? Ye success hoga?]

'क्यों नहीं होगा? ओपन थे शॉप मेनू'

*डिंग*

वीर के मैं में शॉप खुल चुकी थी और उसने सर्च में एक फ़ूड को लेकर स्किल्स ढूंढ़ने का प्रयास किया तोह उससे कई साड़ी स्किल्स के रिजल्ट्स सामने दिखाई दिए.

[Skills :


अब्सोलुटे शेफ ~ कॉस्ट : 400 पॉइंट्स.

शेफ ात सर्विस ~ कॉस्ट : 400 पॉइंट्स.

मैजिकल हैंड्स ~ कॉस्ट : 200 पॉइंट्स.

फूडपेडिअ ~ कॉस्ट : 400 पॉइंट्स.

.

.

.

.

.]

'दमन! यहाँ तोह कई साड़ी अवेलेबल है.'

[Tell me? Kisse buy karna hai?]

'I'm गेस्सिंग की 200 पॉइंट्स वाली को चोरर कर बाकी सभी गोल्ड टियर स्किल्स है एटलीस्ट.'

[Yes! 200 points waali Silver Tier skill hai.]

'हम्म! उनमे डिफरेंसेस क्या है?'

[Absolute Chef jo hai wo Gold Tier Skill hai. Tumhe sab kuch as a chef knowledge rahega. Behatreen food bana paoge tum. I mean... Bilkul as a chef.]

'होओओओ~ साउंड्स इंटरेस्टिंग!'

[Chef at service jo hai wo bhi Gold Tier hai but... Usme tumhaari cooking ki thodi speed badhegi but taste ki quality thodi ghat jaegi.]

'नौपे! टास्ते मैटर्स!'

[Magical hands is not for cooking but for assisting. Tumhe baaki sab kuch karte banega. Like sabziya kaatna, and all. But you won't be a fine chef.]

'रिजेक्टेड थें.'

[Foodpedia is the encyclopedia about food. Food ka knowledge rahega tumhe bas. Chaahe jaisa bhi food ho.]

'ऑलराइट! ी हैवे डीडेड! हम अब्सोलुटे शेफ बुय कर रहे है.'

[Are you sure?]

'यस! दो आईटी!'

[Okay!]

*डिंग*

[Absolute Chef has been unlocked.]

'दो ी हैवे तो टर्न आईटी ों?'

[Nahi! Already On hai. Yadi band karna ho toh bas bolna hai swich Off Absolute Chef. Aur bas kaam ho jaega.]

वीर : सो ी हैवे डीडेड.

सुहाना : हँ? क्या डीडे किया?

वीर (स्माइल्स) : फ़ूड बिज़नेस!

सुहाना : व्हाआटट!???

वीर : येह!

सुहाना : वेट! व्हाट?? फ़ूड का बिज़नेस? अरे पर अभी तोह... यू वेरे...

वीर : हाँ, बूत ी चेंज्ड माय मंद. और मुझे अब पता है सब आगे कैसे बढ़ना है.

सुहाना : okay! ज़रा बताओ मुझे भी...

वीर : एक फ़ूड ट्रक लूंगा. और में खुद सर्वे करूँगा.

सुहाना ने जैसे hi ये सुना तोह उससे लगा जैसे वीर ने बोहत बड़ा कोई चुटकुला मारा था.

सुहाना : एक मिनट! क्या कहा तुमने? फ़ूड ट्रक? और तुम खुद सर्वे करोगे?

वीर (स्माइल्स) : यस!

सुहाना : M-Matlab तुम खुद खाना बनाओगे?

वीर : ऑफ़ कोर्स~

उसका कॉन्फिडेंस से भरा जवाब सुन्न सुहाना ने अपने माथा पकड़ा कुछ देरर के लिए और उस पर आँखें घुमाते हुए बोली,

सुहाना : देखो वीर! तुम यदि सुबह सुबह सस्ते नशे कर के आये हो न तोह प्लीज किसी और को जाके ये बातें सुनाओ. यहाँ नहीं! क्युकी में आलरेडी पहले से hi काफी फेड उप हु. और मुझे ये बकवास नहीं sunn'ni अभी.

सुहाना ने कह तोह दिए थे ये शब्द पर वीर के चेहरे पर मुस्कराहट गायब होकर एक सीरियस फेस सामने आ चूका था उसके.

वीर : यू थिंक I'm जोकिंग...!?

सुहाना : ऑफ़ कोर्स! बच्चो का खेल थोड़ी है ये. और ये क्या बेकार से बिज़नेस शुरू कर रहे हो हाँ? फ़ूड ट्रक? रियली? पागल हो गए हो क्या? अरे स्टार्ट उप कर लेते कोई अच्छा सा? फ़ूड ट्रक? तुम्हे पता है आये दिन कितने फ़ूड ट्रक खुलते है? न जाने कितने सारे. और उनमे से चलते केवल एक दो hi है. और वो भी इतना hi चलते है की दो वक़्त की रोटी से पेट भर सके वो अपना.

सुहाना तोह जैसे अपनी पूरी बढास निकाल रही थी. उसकी नज़रो में ये जैसे तुच्छ काम था.

सुहाना : अरे तुम एक कॉलेज के स्टूडेंट हो यार. मेने तुमसे बेटर hi एक्सपेक्ट किया था.

वीर (स्माइल्स) : सो आप इसमें इन्वॉल्व नहीं होना चाहोगी?

सुहाना : ऑफ़ कोर्स नॉट! पागल हो क्या? व्हाई वोउल्ड ी? इन् छोटे मोठे मामलो के अलावा मुझे धेरर सारे काम है वीर. मुझे लगा था तुम एक फाइन ब्रांड अपने लिए खोलना चाहते हो सो ी थॉट की में थोड़ी हेल्प कर दूंगी. पर ये फ़ूड ट्रक? रियली? ज़रा इमेजिन करो की सुहाना क्सक्सक्सक्सक्सक्स कंपनी के C.E.O की वाइफ और क्सक्सक्सक्सक्सक्सक्स कंपनी के मालिक की बेटी, एक फ़ूड ट्रक के सामने खड़े होक वादा पाँव खा रही है. रियली? ुघठ! J-Just जो वीर! मुझे और भी काम है. यदि आईडिया चेंज कर रहे हो तभी बात करना इस बारे में नहीं तोह...

कहते हुए सुहाना वापस अपने लैपटॉप में लग गयी. उसने एक नज़र भी फिर वीर पर नहीं डाली. शायद आज वो वाक़ई बिजी थी.

पर वीर को उसका उत्तर मिल चूका था. की सुहाना उसके इस प्लान में कोई मदद नहीं करने वाली थी.

[She... How can she be so rude? Huh!? I mean... Idea wasn't that bad... But itna kya isko irritation ho raha hai?]

वीर वही बैठा हुआ था. उसने कुछ पल तक कुछ नहीं कहा. वो बस एक बड़ी hi हलकी सी मुस्कान लिए सुहाना को देख रहा था.

और कुछ देरर बाद hi वो उठा, उसने अपनी जैकेट हाथ पर लटकाई और वह से जाने लगा.

आहात पाते hi सुहाना ने नज़रे ऊपर कर वीर को देखा तोह पाया की वो जाते जाते एकदम से ृक्क गया.

वीर ने रुकते हुए एक नज़र पीछे मुद सुहाना को देखा और बोलै,

"रेमेम्बेर! काम छोटा या बड़ा नहीं होता. और यदि होता भी है आपकी नज़रों में तोह... एक छोटे काम से शुरुआत करके hi आदमी बड़े मुकामो पर पोहचता है. You'll सून सी... व्हाट ी विल दो."

बस उन् शब्दों को रख वीर वह से निकल गया.

पर...

सुहाना भौचक्की सी वही बैठी दरवाज़े को देख रही थी जहा से वीर निकल के गया था.

ये सब क्या था? ये अजीब सी फीलिंग क्यों आ रही थी उससे? एक डेजा वो वाली फीलिंग. ये... ये तोह बिलकुल वैसा hi था जिस दिन वीर उससे होटल में पैसो के गुरूर के बारे में लेक्चर देके गया था.

और वो याद करते hi सुहाना ने अपना अंगूठा दातो टेल दबा लिया.

'सहित! दीद ी से तू मच!? ी won't रिग्रेट थिस राइट? ऑफ़ कोर्स ी won't! हम्फ~ में भी देखती हु वो कैसे बिज़नेस चलाता है मेरे बिना. उससे क्या पता क्या क्या प्रोब्लेम्स आती है एक बिज़नेस स्टार्ट करने से पहले. रट हुए आएगा खुद मेरे पास. हेहेहे~ फिर में एक और फवौर मांग लुंगी उस से. मार्किट में ढेर्रो फ़ूड ट्रक्स है. पर चलता वही है जिसका शेफ सही हो. और उसने कहा वो खुद बनाएगा हाहाहा~ ी विल वेट तो सी हिज फनी फेस.'

***

सुहाना के कहे गए शब्द कठोर भी थे और वीर को दिल पर भी लगे थे. इसमें गलती सुहाना की नहीं थी. वो वैसे hi इतने बड़े बिज़नेस को बचपन से देखती हुई आयी है और उसमे साथ रही है तोह ये सब फ़ूड ट्रक तोह उससे छोटा लगेगा hi न.

पर वीर के पास वो था जिसके बारे में सुहाना नहीं जानती थी.

पारी!

और अब तोह उससे अब्सोलुटे शेफ स्किल भी मिल चुकी थी.

ये काफी था वीर को अपना बिज़नेस शुरू करने के लिए.

पर अभी दिक्कत वो नहीं थी. दिक्कत थी ये मैसेज.

ये अनजान नंबर से उसके फ़ोन पर आया मैसेज जिस पर लिखा था ~

मीट में ात क्सक्सक्सक्सक्सक्सक्सक्स पार्क @ 2 पं

कौन था ये शख्स जो वीर को यु इस तरह से बुला रहा था मैसेज करके?

ये तोह वह जा के hi पता लगने वाला था.

उसके वह जाते hi उससे फिलहाल ऐसा कोई भी नज़र न आया तोह वीर एक बेंच पर बैठ गया और वेट करने लगा.

और तभी उससे एक मसाज आया.

"कहा पर पोहचुहे तुम?"

उसका रिप्लाई करते हुए वीर ने लिख दिया की वो पहुँच गया है.

और फिरसे... एक मसाज आया.

"हाँ तोह फाउंटेन के बगल में लगी बेंच पर आओ."

'फाउंटेन के बगल में लगी!? हँ?'

सोचते हुए जैसे hi वीर ने फाउंटेन स्पॉट किया तोह उसने उसके बगल में देखा.

[Idiot! Wo aadmi issi bench ki baat kar raha hai.]

'बीआरओ व्हाट!?'

वीर ने फिर एक मैसेज भेजा.

"में उसी बेंच पे बैठा हु तुम कहा हो?"

तोह एक मसाज आया.

"में भी उसी बेंच पे हु. पर तुम नहीं दिख रहे."

'Wtf????'

और जैसे दोनों वीर और उस व्यक्ति को बात समझ में आयी. और दोनों ने hi पलट के पीछे देखा तोह पाया की दोनों hi एक दूसरे के पीछे बैठे हुए थे अब तक.

वीर : Wtf??

लड़का : Y-You...

वीर : तोह इतनी देरर से तुम पीछे बैठे थे? और में सामने धुंध रहा था तुम्हे.

लड़का : व्हाट थे हक? में भी तोह वही कर रहा था.

वीर : बृह! एक कॉल hi कर लिया होता. ये सब क्या मैसेज मैसेज खेल रहे हो.

लड़का : एहम! में ऐसे अनजान लोगो से ऐसे एकदम से फ़ोन पर बात नहीं करता.

वीर : दफक?

लड़का : एहम! वो सब चोर्रो और यहाँ आके बैठो.

उसकी बात मान वीर उसके बगल से आके बैठा.

वीर ने देखा की ये लड़का दिखने में काफी स्मार्ट था. कपडे भी काफी अच्छे पहने हुए थे उसने. यहाँ तक की वीर ने उसकी अक्सेसरीज़ को भी चेक किया तोह पाया की उसकी घडी से लेकर जूते तक सब कुछ टॉप क्लास ब्रांड का था.

'थिस गाए इस रिच!'

[Yeah!]

लड़का : तोह तुम वीर हो राइट!?

वीर : एंड यू अरे थे अननोन गाए राइट?

लड़का (ेम्बरसेद) : एहम! सॉरी! ी फॉरगॉट माय मैनर्स. Hi! I'm कारन!

कहते हुए उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया तोह वीर ने भी उसका हाथ थामा और अपना नाम बताया.

वीर : सो? मेरा नंबर कैसे मिला? क्यों मिलना चाहते हो तुम?

कारन : एहम! सो येह... यू क्नोव मिस करा, राइट?

करा का नाम सुनते hi पल भर के लिए वीर थोड़ा चौकन्ना हो गया.

वीर (फ्रोंस) : तुम्हे कैसे पता?

कारन : Don't मेक तहत फेस. I'm... I'm हेर बरोथेर.

वीर (सुरप्रीसेड) : एहहहह!?

कारन : हम्म~ में... में उनका छोटा भाई हु.

वाक़ई, दिखने में तोह वो एकदम वीर के बारबार का hi लग रहा था उम्र में.

वीर : तोह!?? ी मैं... मुझसे क्या काम?

कारन : सबसे पहले तोह... थैंक यू! थैंक यू फॉर सेविंग हेर ट्वाइस.

वीर : !??

कारन : हाँ! में जानता हु. तुमने hi उन्हें क्लब से और उस दिन स्लोगन के चंगुल से चर्राया था.

वीर : तुम्हे स्लोगन के बारे में...!?

कारन : हम्म! एक्चुअली, में आउट ऑफ़ इंडिया था. स्टडीज के लिए. पर साड़ी डिटेल्स यहाँ की मुझे रघु भेजता है रोज़. अब ये मत पूछना की मुझे स्लोगन के बारे में क्या क्या पता है. मुझे बस यही पता है की वो एक बोहत बड़ा क्राइम बॉस है. कई सारे केसेस में उसका नाम है. और फॉरेन में उसका मैं अड्डा है. वैसे कई और हीडोट्स है उसके. बस! इतना hi पता है मुझे. बाकी ज़्यादा जानकारी इंटेलिजेंस टीम को होगी हमारी.

वीर : इंटेलिजेंस टीम?

कारन : हम्म~ दीदी की सिक्योरिटी के लिए हिरे की है हमने.

वीर : O-Ohhh!

कारन : सो थैंक यू! और... ी वांट तो टॉक अबाउट समथिंग.

वीर : किस बारे में?

कारन : रघु मुझसे हर्र डिटेल शेयर करता था. इन्क्लूडिंग डिटेल्स अबाउट यू. मुझे पता चला है की कई बार रघु ने दीदी को तुम्हारे साथ देखा है, वो भी मुस्कुराते हुए. दीदी मुस्कुरा रही थी. वो खुश थी. सो... ी वांट तो तेल्ल यू अबाउट समथिंग. क्या तुम सुनोगे? It's अबाउट हेर.

वीर (फ्रोंस) : ....

कारन : ....

वीर (शिघ्स) : फाइन... टॉक!

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आज के लिए इतना hi गाइस!

अपना अपना काम कर के जाने का. 😁


धन्यवाद!!!
 
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