Incest Baadshah ~ The Tales of Debauchery - Page 11 - SexBaba
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Incest Baadshah ~ The Tales of Debauchery

अपडेट - 69 ~ थे ग्रैंड बैंक्वेट!

अब तक...

इंटरमीडिएट मार्टिकल आर्ट स्किल!!!

नीचे प्राइस लिखा hi था~

400 पॉइंट्स!

और वीर ने एक बार में hi परचेस के ऑप्शन पे क्लिक किया और...

*डिंग*

[Intermediate Martial Art Skill is now available.]

और ये नोटिफिकेशन सुनते hi वीर मुस्कुराते हुए वापस से अपनी दोनों सेविकाओं के बीच लेत गया.

'प्रांजल! I'm प्रेपरिंग ा सरप्राइज फॉर यू!!!'


अब आगे...

"आउच आउच!!!!"

"बोलो अब? अब कभी करोगे ऐसा? हाँ?"

"N-Nahi! बिलकुल नहीं!"

"हम्म! चलो माफ़ किया! पर अहिंदा से ध्यान रखना. Okay!?"

"ऑफ़ कोर्स!"

ये आवाज़ थी वीर की जो अपने आप को चुर्राने की कोशिश कर रहा था रागिनी के हाथो से. क्युकी रागिनी उसके कान को पकडे हुए आज उसकी खबर ले रही थी.

डॉक्टर मृणाल के घर से तोह ठीक होक आ गया था वीर. पर अब तक उसने अपनी रागिनी भाभी को पूरी बात नहीं बतायी थी. जैसा की रागिनी ने पहले hi उससे कह के रखा था की वो उसके ठीक होने के बाद उसकी अच्छे से परीक्षा लेगी. तोह बस, वही पाठ चल रहा था अभी. वीर की क्लास लग रही थी.

और उसकी ऐसी हालत देख आभा और सोनाली दोनों hi दूर से हस्ते हुए मज़े ले रही थी. वही सुमन बेचारी अपने मालिक को देख बस असहाय वाली मुस्कराहट hi दे पा रही थी. इसमें वो कुछ नहीं कर सकती थी.

अंत में रागिनी ने भी धीरे से मुस्कुराते हुए वीर के कान को चोर्रा और बोली, "अपना ख़याल रखा करो वीर पहले. पहले खुद की जान है, फिर दुसरो की."

रागिनी उससे आज की दुनिया का ज्ञान पढ़ाना चाह रही थी. और ठीक hi तोह कह रही थी वह. आज की इस स्वार्थ सी भरी दुनिया में आदमी पहले अपनी जान की परवाह करता है. बाद में दूसरे की. सोचते हुए उससे जैसे विवेक की हरकत की याद आ गयी.

पर वीर की तोह जैसे अलग hi सोच थी. वो भी मुस्कुराया और बोलै, "में विवेक भैया की तरह नहीं भाभी! मेरे लिए अपने पहले है. फिर में खुद."

*बेदुम्प*

और पल भर के लिए रागिनी का दिल एक धड़कन जैसे फांद गया.

"H-Huh!?" वो जोरर से सांस खींचते हुए वीर को आश्चर्य भरे भाव से देखि.

वीर को भी जैसे ध्यान आया की शायद उससे विवेक का नाम ऐसे बीच में नहीं लाना चाहिए था. तोह उसने अगले hi पल माफ़ी मांगी.

रागिनी : नहीं वीर! इसमें माफ़ी मांगने की कोई ज़रुरत नहीं. और वैसे भी, सही hi तोह कहा तुमने.

इस बार उसकी नज़रे झुक गयी. और आवाज़ में मायूसी भी थी.

रागिनी : सुमन जी! K-Kya आप सब बाहर जा सकते हो? M-Mujhe वीर से अकेले में कुछ बात करनी है.

सुमन : जी रागिनी जी! आभा बेटी, सोनाली, चलो बाहर.

और सुमन उन् दोनों को लेकर बाहर चली गयी.

कमरे में केवल वीर और रागिनी hi थे अब. अभी सुबह के 8:30 बज रहे थे और रागिनी बस नाहा के नाश्ता hi बनाने जा रही थी जब उससे याद आया की वीर से उसने वो बातें पूछी hi नहीं. तोह इसलिए वो आज वीर से साड़ी बात jaan'ne के लिए आयी थी उसके कमरे में.

उसके घने बाल, अभी भी पानी से हलके भीगे हुए थे और खुले हुए थे. क्युकी वो विवेक के साथ उसके घर पे नहीं रहती थी अब तोह उससे सारे कपडे pehn'ne की छूट थी. वो टॉप भी पहनती थी, साड़ी भी, कुरता, सूट, सलवार सब कुछ.

और आज रागिनी एक पिंक और ब्लैक कलर कॉम्बिनेशन की साड़ी पहनी हुई थी जिसमे वो हुस्न की मल्लिका लग रही थी. ये कहना की वीर रागिनी से अत्त्रक्टेड नहीं था जब से वो घर में आयी थी तोह ये गलत था. जब से विवेक की शादी हुई थी, वीर हमेशा से रागिनी के संग बातें करना चाहता था.

कौन नहीं चाहेगा की आपके साथ एक ख़ूबसूरत भाभी हो जो आपसे बातें करे? पर रागिनी उस समय वीर को भाव नहीं देती थी. और आज देखो, आज किस्मत ऐसी थी वीर की, की वो रागिनी के संग रह रहा था, रागिनी खुद उस से ुपत के बातें करती थी, यहाँ तक की उसकी बेहद परवाह और उसका ख़याल भी रखती थी. शायद इसलिए समय को सबसे शक्तिशाली माना गया है.

लेकिन रागिनी के मैं में इधर जैसे अभी भी कुछ बेचैनी थी.

रागिनी : वीर?

वीर : हम्म?

रागिनी : तुम... तुमने सच में माफ़ कर दिया है न मुझे? में तुमसे बात भी नहीं करती थी पहले. फिर धीरे धीरे हम दोनों की बीच सलाह हो गयी. दूरिया हट गयी. पर... पर कही तुम ये तोह नहीं सोचते न की तुम्हारी ये भाभी, मौका देख के पलट गयी और अब तुम्हारे संग अच्छे से पेश आने लगी. कही तुम ऐसा तोह नहीं सोचते न? बोलो?

रागिनी की इन्सेक्युरित्य, वीर देख पा रहा था. वो देख पा रहा था की रागिनी इस बात को लेकर बेहद चिंतित थी. तोह उसने फौरन hi जवाब दिया.

वीर : भाभी! यदि ऐसी बात होती तोह में आपसे कभी इतना फ्रेंडली होक पेश आता hi नहीं. इसलिए आप ये बात मैं से निकाल दीजिये. ऐसी कोई बात नहीं है. और वैसे भी, आपका कोई ज़्यादा दोष था भी नहीं. मेरे दिमाग में उन् लोगो के नाम अच्छे से मौजूद है जिनका सबसे ज़्यादा कसूर था.

वीर की कही गयी बात से रागिनी मुस्कुरायी और एक चेन्न की सास ली. वो शीशे के सामने जाके कड़ी हुई और नज़रे झुकाते हुए बोली,

रागिनी : तुम्हारी यही बात तोह मुझे सबसे अच्छी लगती है वीर. और... कही तुम्हे बुरा तोह नहीं लगता न? मेरी बातो का? मेरी हरकतों का? मेने आज सबके सामने तुम्हारे कान खींचे, तुमसे बातें बुलवाई. कही तुम बुरा तोह नहीं मानते न?

वो वीर का जवाब sunn'ne के लिए इंतज़ार कर hi रही थी की जब अचानक hi उससे अपने नंगे पेट पर किसी का हाथ महसूस हुआ.

"हाआआअह्ह्ह्हह!?"

जोरर से सिसकते हुए रागिनी ने जैसे hi शीशे में देखा तोह पाया की वीर उसके ठीक पीछे था और अपनी ठुड्डी को उसके कंधे पर रख उससे पीछे से अपनी ऑर्डर खींच लिया.

'थिस... थिस...! आह!'

रागिनी बेचारी भौचक्की सी आँखें फाड़े शीशे में देख रही थी, जिसमे उससे खुद की आकृति तोह दिख hi रही थी पर साथ hi साथ उसके पीछे से चिपके हुए वीर की भी आकृत नज़र आ रही थी.

वीर के हाथ का टच अपने नग्न पेट पर पाते hi रागिनी की सासें तेज़्ज़ हो चुकी थी. वीर की हथेली विवेक की हथेली सी कई गुना अलग थी. या यु कहे की बेहतर थी. रागिनी को गर्म सा एहसास हो रहा था अपने पेट पर.

इतनी लड़ाईयों में भिड़ने के बाद वीर की हथेली अब पहले की तरह नरम नहीं थी. उनमे हलकी हलकी खरोंचे थी, कुल मिलाके उसकी त्वचा सख्त, और थोड़ी रफ़ थी. पर यही रफ़ सी स्किन रागिनी को एक प्रोटेक्टिव और मर्दाना फीलिंग दे रही थी आज जो फीलिंग विवेक उससे कभी नहीं दे पाया था.

न चाहते हुए भी, रागिनी का मैं दोल रहा था आज. वो अपनी सासें काबू में hi नहीं कर पा रही थी. ऐसा कुछ तोह उसने आज तक फील नहीं किया था.

वीर के हाथ का टच उससे उस रात को याद दिला रहा था जिस दिन वीर उससे बचाने आया था. उसकी हथेली का मात्र स्पर्श hi रागिनी को सबसे सुरक्षित अनुभूति प्रदान कर रहा था. जैसे मानो दुनिया में इस से सेफ जगह कोई और हो hi नहीं सकती थी.

वीर तोह अनजाने में ये कर रहा था. वो तोह बस सांत्वना देना चाहता था रागिनी को की वो उसकी बात का बुरा नहीं मानता है.

और उसके बाद hi, रागिनी की सासें उनकंट्रोलबले हो गयी जब वीर ने अचानक hi...

*छू~*

रागिनी के गाल को चुम लिया.

"Aaaaaaaaaahhhhhh!"

रागिनी हड़बड़ाते हुए पलटी और वीर को देख वो फटाफट वह से अपने सुर्ख लाल गाल लेते हुए निकल के भाग गयी.

"हम्म?"

वीर बेचारा बस देखता hi रह गया. उससे इस बात का कोई अंदाजा नहीं था की रागिनी अपने मैं में इस वक़्त क्या क्या सोच रही थी उसको लेकर.

***

****** हॉस्पिटल...

"देखिये! हमने X-Ray निकाला है. हम आपकी भलाई के लिए hi कह रहे है. इसका ठीक होना असंभव है. आप बात मानिये और...."

"नहीं!!!!!"

*थुड़*

"!???"

एक बड़ा hi सज्जन डॉक्टर इस वक़्त सामने खड़े आदमी को अपनी बात समझा रहा था. पर सामने खड़े व्यक्ति ने उसकी बात सुनते hi अपने दोनों हाथ उसकी टेबल पर पटक दिए.

जी हाँ! ये व्यक्ति और कोई नहीं, बलहार hi था जो कल वीर के हाथो अपना दाया हाथ खो बैठा था. क्युकी उसका वह हाथ अब किसी काम का नहीं था.

ये चौथा जाना माना डॉक्टर था शहर का जिससे आज बलहार अपना हाथ दिखाने आया था. पर यहाँ भी वही जवाब मिला उससे.

उसका गुस्सा सातवे आसमान पर था.

बलहार : बेवकुफो!!! काहे का डॉक्टर हो सालो? एक हाथ भी पहले जैसा नहीं कर सकते? नहीं करवानी मुझे कोई सर्जरी... मुझे मेरा यही हाथ चाहिए समझे!??? कोई आर्टिफीसियल हाथ नहीं!!

डॉक्टर : देखिये! Y-Ye इम्पॉसिबल है. ये बियॉन्ड रिपेयर है. में आपकी भलाई के लिए hi...

इस से पहले की डॉक्टर कुछ कह पाटा, बलहार ने उसकी कल्लोर पकड़ उससे उसकी चेयर से उठाया और ुचि आवाज़ में चिल्लाया,

बलहार : देख बहनचोद!!! तू कुछ भी कर, जिससे भी बुलाना है बुला पर मेरा ये हाथ ठीक कर. समझा?

डॉक्टर : देखिये! A-Aap तमीज से बात कीजिये! Y-Ye इम्पॉसिबल है. आप... आपकी लिंब इस तरीके से मुड़ी हुई है की इससे वापस से सीधा करना असंभव है. ये... ये कोई रबर नहीं है. ये हाथ है. ज़रा सी भी चूक हुई तोह दर्द तोह होगा hi, साथ hi पूरी तरीके से हड्डी टूट सकती है.

"Aaaaaarrrrghhhhhhhhhh!" बलहार गुस्से में चिल्लाया और उस डॉक्टर को वही धक्का देकर बाहर निकल गया.

मैं में उसके वीर के वही शब्द गूंज रहे थे.

"तेरा जो ये हाथ है न. तू दुनिया के किसी भी डॉक्टर के पास hi क्यों न चला जाए. चाहे उससे कितने भी पैसे क्यों न दे दे. तेरा ये हाथ दुनिया में कोई रिपेयर नहीं कर सकता. सिवाए मेरे!"

अब शायद, बलहार को वीर की बात का विस्वाश हो रहा था. वो चार बड़े से बड़े शहर के डॉक्टर्स के पास हो आया था. पर कभी भी उससे उम्मीद नज़र नहीं आयी. यदि ऐसे hi चलता रहा तोह...!?

"नहीं!!! M-Mein अपना हाथ नहीं खो सकता."

उसने अभी तक स्लोगन या किसी अन्य को वीर के बारे में कोई जानकारी नहीं दी थी. वो इसलिए क्युकी पहले वो कन्फर्म करना चाहता था की वीर की बात सही है भी या नहीं? लेकिन वीर की बात अब उससे सच होती नज़र आ रही थी.

"टछहः!" दातो को मीस्ते हुए उसने अपना निर्णय फौरन hi ले लिया.

और वो था...

वो स्लोगन की साड़ी खबरे वीर को देने वाला था!

***

Veer's ओल्ड हाउस...

11:30 ऍम...

"सब मौजूद है न?" मनोरथ कहते हुए सिंगल सीट सोफे पर विराजमान हो गए.

"जी दादा जी! सब यही है!" मनोरथ के बगल में खड़े प्रांजल ने कहा.

आज मनोरथ अपना फैसला अपनी जायदात को लेकर सुनाने वाले थे.

घर में आज सभी मौजूद थे. वीर चुप चाप अपनी आँखें बंद किये, दोनों हाथ मोड एक सोफे पर बैठा हुआ था. उसके बगल से आरोही और काव्य दोनों hi बैठी हुई थी.

तोह वही बृजेश और करुणेश एक साथ विराजमान थे. विवेक अपनी माँ सुमित्रा के साथ बैठा हुआ था. और भूमिका और श्वेता दोनों माँ बेटी अलग से एक सीट में.

मनोरथ फोर्मल्ली ये डिसों सुना रहे थे. तोह वकील से लेके डाक्यूमेंट्स सब मौजूद थे. सारा काम आज hi शुरू होने वाला था. वो जल्द से जल्द इस जायदात से छुटकारा पाना चाहते थे.

बृजेश ने एक झलक वीर की ऑर्डर देखा और वीर ने भी उससे देखा. पर दोनों में से किसी ने कुछ कहा.

प्रांजल दादा जी के बगल से hi बैठ गया.

और फिर मनोरथ बोलना शुरू किये,

मनोरथ : तोह में बातो को ज़्यादा घुमाऊंगा नहीं. सीधा मुद्दे पर आता हु. मेरी साड़ी जायदात को आज में अपने पोते पोतियो में बाटने जा रहा हु. और हाँ, ये में पूरे होश में रहके सुना रहा हु. जायदात में से कोई भी चीज़ बृजेश, करुणेश और उनकी धर्म पत्नियों को नहीं बाटी जाएगी. ये केवल मेरे पोते पोतियो के लिए hi है. और वो भी उनके लिए जो मुझे लगता है सही तरह से इस जायदात का उपयोग कर पाएंगे.

मनोरथ की बात सुन्न सभी शांत थे. पर सभी के दिल की धड़कन ज़र्रों से धड़क रही थी. खासकर विवेक, और श्वेता की.

मनोरथ : तोह मेरा फैसला तय रहा...

कहते हुए मनोरथ ने हर्र एक वह बैठे शख्स पर नज़रे घुमाई. वीर को कोई मतलब नहीं था. उसके हिसाब से दादा जी को ये काम अभी नहीं करना चाहिए था. इसलिए, वो बस चुप चाप साइड में बैठा रहा.

सब की नज़रे मनोरथ की ऑर्डर hi थी. और तभी मनोरथ ने अपना फैसला सुनाया जिससे सुनके वह मौजूद सभी के होश उड़द गए.

मनोरथ : मेरी 40% जायदात... में वीर के नाम करता हु.

*बूम*

जैसे एक बेम फटा वह बैठे लोगो पर.

वीर : हँ?

[Hahaha~ Ye hui na baat ab! Just look at their faces.]

प्रांजल अभी भी शांत बैठा हुआ था. पर उसके माथे पर पसीना ज़रूर झलक रहा था.

मनोरथ : और 40% जायदात... में अपने पोते प्रांजल के नाम करता हु.

जो पसीना प्रांजल के माथे पर था. ये सुनते hi उसने वो पसीना पॉच लिया. बाकी सब बस अपने गले में अटका हुआ थूक hi गुटक के रह गए.

मनोरथ : बाकी की बची हुई 20% जायदात में से... में 10% अपनी पोती आरोही और बाकी की 10% अपनी सबसे छोटी पोती काव्य के नाम करता हु.

श्वेता : H-Huh!? Y-Ye?

विवेक : !???

मनोरथ : यही है मेरा पूरा फैसला.

श्वेता जिसके चेहरा का रंग hi उड़द चूका था फैसला सुन्न के वो फौरन hi अपनी जगह से उठ कड़ी हुई.

श्वेता : P-Papa जी!? ये... ये आप क्या कह रहे है?

मनोरथ : सही कह रहा हु.

श्वेता : H-Huh? P-Par मेरी बेटी भूमिका. वो... वो भी तोह आपकी पोती है न? और वो भी सबसे बड़ी पोती... T-Toh उसका नाम कहा है? आपने उससे कुछ क्यों नहीं दिया?

मनोरथ : कुछ समय पहले, मेने इन् सभी को अपने कमरे में बुलाया था. तब में इनसे ये नहीं पूछना चाह रहा था की जायदात किस्से दी जाए. में इन् सभी का व्यक्तित्व परख रहा था. जिसकी परीसखा में विवेक और भूमिका दोनों hi फ़ैल हो गए.

भूमिका का ये बात सुन्न अपने आप सर्र झुक गया. वो नाराज़ नहीं थी. न hi गुस्सा थी. उससे जैसे वाक़ई कोई ग़म नहीं था. काफी कलम थी वह.

पर यही बात उसकी माँ श्वेता के लिए नहीं कही जा सकती थी. श्वेता का तोह बेचैनी के चलते पूरा शरीर ठिठुर रहा था.

श्वेता : ये... ये आप!?? ऐसा कैसे कर सकते है? A-Arohi और K-Kavya को तोह दी न आपने? फिर बेचारी मेरी भूमिका hi कई रह गयी?

मनोरथ : में बताता हु की क्यों भूमिका और विवेक को रत्ती भर भी जायदात नहीं मिल पायी. क्युकी जब विवेक से मेने पूछा था की जायदात कितने हिस्सों में किस्से बाटी जाए. तोह विवेक ने सभी का नाम लिया था. सिवाए वीर के. जिस भाई को अपने सबसे छोटे भाई की फिक्र तक न हो उससे भला में ये जायदात कैसे दे सकता हु? यही कारण भूमिका का भी है. भूमिका बिटिया ने एक बार भी अपने भाई वीर का ज़िक्र नहीं किया था.

मनोरथ की बात सुन्न, श्वेता का दिमाग hi सन्न रह गया. उस दिन खुद उसी ने तोह भूमिका को पट्टी पढ़ा के भेजा था की अपने दादा जी से डायरेक्टली अपना हक़ मांग लेना. और देखो क्या हो गया आज. श्वेता को अपनी गलती का आभास होते hi इतना ज़्यादा पछतावा हो रहा था की उसकी मुट्ठी में साड़ी का भाग पूरा निचुड़ के रह गया. यहाँ तक की आँखों के कोनो में हलके हलके ासु भी उत्पन्न हो चुके थे.

विवेक वही बैठे अपने मैं में खुद को hi कोस रहा था. उससे लगा था की शायद वीर का नाम नहीं लेते हुए दादा जी ने उसकी बातो को ज़्यादा ध्यान नहीं दिया होगा. पर वो गलत था. बस मैं में गाली hi निकल रही थी उसके.

मनोरथ : वही दूसरी ऑर्डर, प्रांजल आरोही, और काव्य तीनो ने hi वीर को अपने ध्यान में रख उसका नाम लेते हुए उससे जायदात देने को कहा था. आरोही बिटिया तोह अपना पूरा हिस्सा वीर को देना चाहती थी. तोह वही काव्य को कुछ नहीं चाहिए था. वो भी यही कही थी की जायदात वीर को दे दी जाए. और प्रांजल बेटे का भी यही कहना था.

वीर ने palat'te हुए दोनों hi आरोही और काव्य को देखा तोह दोनों hi बहनो ने उससे एक स्माइल पास की.

मनोरथ : आरोही सही मायनो में हक़दार नहीं थी. क्युकी जायदात उससे hi सही फैलती है जो इसका उपयोग सही से करना जाने और एक इच्छा रखे. आरोही बिटिया के मैं में कोई इच्छा नहीं थी. उससे कोई मतलब नहीं था. यही कारण है की उससे केवल 10% hi जायदात का हिस्सा मिला. वो इसलिए, क्युकी उससे अपने भाई वीर का ध्यान था. ध्यान था की वो इस घर से दूर था.

आरोही : ....

मनोरथ : वही काव्य को ये जायदात का 10% इसलिए दिया गया क्युकी वो घर की सबसे छोटी पोती है मेरी. और सबसे प्यारी. अभी उससे उतनी समझ नहीं. ऐसा हो सकता है की आगे जा के उससे और समझ आये तोह कही उससे पछतावा न हो. इसलिए उसके जेब में कुछ तोह होना चाहिए न? ये 10% की जायदात अब वो जैसे चाहे उपयोग करे, ये उसके ऊपर है.

श्वेता और विवेक दोनों hi मनोरथ की बात विस्तार से sunn'ne के बाद वही जम्म के रह गए. ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उनके मुँह में निम्बू निचोड़ दिया हो. ऐसा मुँह हो गया था दोनों का.

और फिर श्वेता जैसे भड़क उठी,

श्वेता (चिलाते हुए) : ये गलत है. ये सरासर अन्याय है... ये गलत है! आप... आप ऐसा नहीं कर सकते. आपने गलत निर्णय लिया है. ये मेरी बेटी के साथ छल है. सबको आपने कुछ न कुछ दिया पर मेरी बेटी के लिए एक रूपया भी नहीं छूता आपके हाथ से? K-Kya कमी रह है मेरी बेटी में?

क्यों किया आपने ऐसा!? हैं?

श्वेता की लड़खड़ाती हुई आवाज़ सुन्न, वह बैठा बृजेश उससे बॉहे सिकोड़ के देखने लगा. तोह वही भूमिका अपनी माँ के कंधो को थाम उससे रोकने का प्रयत्न करने लगी. पर आज जैसे श्वेता बिलकुल भी नहीं बैठने वाली थी.

श्वेता (स्क्रीम्स) : आपने गलत किया है! आप गलत हो!!!! आपने मेरी बेटी से उसका हक़ छीना है!!!!!

उसकी चींखे पूरे हॉल में गूँज रही थी. और उसका चेहरा पूरा लाल हो चूका था. और आँखों से ासु बहते हुए गाल पर बिखर चुके थे. भूमिका भी सेहमते हुए अपनी माँ को रोकने की कोशिश कर रही थी.

बार बार समझाने पर भी जब श्वेता न चुप हुई तोह इस बार बृजेश नहीं रुका. वो उठा और तेज़्ज़ कदमो के साथ श्वेता के समीप आया.

बृजेश (चिल्लाते हुए) : श्वेताऑ!!!

श्वेता : !!?

बृजेश : मेने तुम्हारे लिए कितना कुछ नहीं किया? अरे इतनी बड़ी होटल तुम्हारे और भूमिका के नाम पर है. फिर तुम पापा जी से ऐसी बातें क्यों कर रही हो? और क्या चाहिए तुम्हे? यहाँ तोह हम सभी घरवाले है न? फिर अब और क्या चाहिए तुम्हे? क्या तुम इतने से भी संतुष्ट नहीं हो? सब कुछ तोह दे hi रहा हु न में तुम्हे!? फिर पापा जी से क्यों ज़बान लड़ा रही हो?

श्वेता (स्क्रीम्स) : क्युकी ये ढोंगी है!!!! ये बस मीठी मीठी बातें करते है! इन्हे मेरी बच्ची की कोई परवाह नहीं!!! ये ढोंगी है....!!!!

बस, श्वेता का इतना चिल्लाना hi था की तभी...

*Chataaaaaaaaaaaaaaak*

एक ज़ोरदार थप्पड़ की गूँज पूरे हॉल में फेल गयी.

श्वेता : !!!?

श्वेता अपने गाल को पकड़ एक तरफ चेहरा झुकाये हैरत के मारे खड़े रह गयी. बृजेश ने उससे एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया था.

और मानो वह जैसे सन्नाटा सा छ गया.

मनोरथ समेत सभी अपनी जगह से हैरत के मारे खड़े हो गए.

भूमिका : M-Mom!!!!!

श्वेता ने फिर बृजेश को वही रोटी हुई सूरत से देखा. आज जैसे उसके अंदर कुछ टूट चूका था.

बृजेश जैसा भी था. वो अपने पिता की बोहत इज़्ज़त करता था. हाँ, कभी कभी उसकी अपने पिता से कहा सुनी हो जाती थी. पर कभी पलट के जवाब नहीं देता था बृजेश. पर आज...

आज उसकी hi पत्नी उसके पिता को सबके सामने ढोंगी कह के बुला रही थी? क्या कमी रह गयी थी उसकी और उसकी बेटी की परवरिश में?

बृजेश : अभी के अभी अंदर जाओ. भूमिका!!!! लेके जाओ अपनी माँ को.

श्वेता तोह जैसे सन्न सी पद गयी थी. वो भूमिका के साथ कब हॉल चोरर के बाहर निकल गयी उससे पता hi नहीं चला.

बृजेश : पापा जी! यदि सब कुछ हो गया हो तोह क्या...

मनोरथ : तुम्हे हाथ नहीं उठाना था बहु पे. औरत पे हाथ उठाना...

बृजेश : M-Mein जानता हु. पर उस समय मुझे वो ज़रूरी लगा.

मनोरथ ने तोह जैसे ये पल पहले hi परख लिया था. इसलिए वो शांत हो गए.

मनोरथ : आज में अपनी साड़ी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो चूका हु. तोह इसलिए, कल मेने इसकी ख़ुशी में एक भव्य दावत राखी है 5 स्टार होटल में. कल सभी को वह टाइम से रात में मौजूद होना है. और... बहु को मन लेना. में नहीं चाहता वो वह पर न मिले.

बृजेश : J-Jii!!

मनोरथ : ये प्रोग्राम मेने इसलिए रखा है. क्युकी में चाहता हु की वीर और प्रांजल दोनों hi वह अपनी काबिलियत दिखाए. अब क्युकी वो दो बड़े हिस्सों के मालिक है. तोह वह धेरर सारे बड़े बड़े लोगो का आगमन होगा. वो सारे मेरे पहचान के है. उनसे अच्छे रिश्ते बनाओगे तोह आगे जल्दी बढ़ोगे. अब देखना ये है की तुम दोनों में से कौन अच्छे से रिश्ते बना पाटा है. समय और जगह रात तक तुम लोगो को मैसेज द्वारा बता दिए जाएंगी. पारिवारिक बैठक यही समाप्त होती है. तुम सब जा सकते हो.

और फिर जो भी डाक्यूमेंट्स के काम थे, उन्हें निपटने के बाद वीर भी अपने घर आ गया.

यहाँ प्रांजल अपने रूम की ऑर्डर जा रहा था जब विवेक ने उससे पीछे से थाम के पलटाया.

विवेक : छोटे!!! ये वार तोह उल्टा hi पद गया मेरे लिए. मुझे नहीं लगा था की...

प्रांजल (स्माइल्स) : अब कुछ नहीं हो सकता भैया! आप ने अपने खुद के परर पर कुल्हाड़ी मार ली.

विवेक : हँ?

प्रांजल : चलता हु.

विवेक : एक... एक मिनट! तुझे 40% मिली है न... तोह...

प्रांजल : हाँ तोह? ये 40% मुझे मिली है. आपको भी मिलती. यदि आपने वीर का ध्यान रखा होता तोह. अब इसमें में कुछ नहीं कर सकता भैया.

विवेक प्रांजल की बात सुनते hi इतना आग बबूला हो गया की उसने फौरन hi अपने छोटे भाई की कल्लोर पकड़ ली. साला इस छोटे भाई के लिए इतना रिस्क उठा रहा था वह? उससे लगा था की 40 काम से काम प्रांजल को तोह मिली hi है. वो आधी तोह दे hi देगा. आखिर वो दोनों पार्टनर्स थे. पर...

देने की तोह बात चोर्रो, प्रांजल ने साफ़ इंकार कर दिया कुछ भी देने से. गुस्सा आना तोह स्वाभाविक था.

विवेक : में तुझे हर्र कदम पर साथ लेके चला. और तूने ये किया? भूल मत छोटे! की मेने hi तुझे इस प्लान में शामिल किया था. यदि में न होता तोह तुझे ये सब...

प्रांजल : हाहाहाहा~

प्रांजल ने हस्ते हुए अपनी कल्लोर से विवेक के हाथ हटाए और मुस्कुराते हुए उससे देखते हुए बोलै,

प्रांजल : कमाल करते हो भैया! इतनी बड़ी कंपनी के मालिक हो. डैड ने आप पे न जाने कितना पैसा फूका होगा. उसके बाद अब जब इतने जीवन में मुझे कुछ मिल रहा है तोह वो भी आपको hi चाहिए? न भैया न! बिलकुल नहीं! आपने न केवल भाभी को खोया, बल्कि खुद के hi परर में कुल्हाड़ी मार आपने ये जायदात भी खो दी. खर्र, जैसा जिसका नसीब... चलता हु!

और वो विवेक से दूर हट अपने कमरे की ऑर्डर निकल गया. इधर विवेक बस अपनी मुट्ठी को गुस्से में कस्ता hi रह गया.

"छोटे!!!"

कमरे में आते hi प्रांजल की जो मुस्कान थी वो गायब हो चुकी थी. वाश बेसिन के पास आते hi उसने अपने चेहरे पर पानी के छीटे मारे और सामने लगाए शीशे में खुद को देखने लगा.

'व्हाट वेंट रॉंग???'

मनोरथ का डिसिशन उसकी प्रेडिक्टिबिलिटी से बिलकुल अलग था. उसने सोचा था की उसके दादा जी 50% उससे, 30% वीर और 10-10% आरोही और काव्य को बाटेंगे.

पर वो गलत था.

वीर भी उतने hi प्रतिशत का मालिक था जितना की वह खुद. और इसी के चलते उसके मैं में ढेर्रो सवाल आ रहे थे. उसका प्लान फ़ैल हो चूका था.

'सब कुछ तोह सही कर रहा था में. गलती कहा रह गयी? दमन आईटी!!! वीर भी मेरा इक्वल का पार्टनर है. मुझे...

हम्म!!! मुझे जल्द से जल्द आरोही दी और काव्य से उनका हिस्सा कैसे भी करके लेना होगा. ात लीस्ट तब में 60% का मालिक तोह कहला पाउँगा. बाकी की जायदात वीर से कैसे हड़पनी है. उसके बारे में बाद में सोचूंगा. कल मेजर गाथेरिंग राखी है दादा जी ने. बड़े बड़े लोग आएँगे. में किसी भी हालत में वीर को उनसे मिलने के चान्सेस नहीं दे सकता. मुझे उसके सारे चान्सेस इंटरसेप्ट करने होंगे. कल! कल में उसकी साड़ी इज़्ज़त का ऐसा फालूदा बनाऊंगा की पराये तोह क्या उसके अपनों के बीच उसकी इज़्ज़त मिटटी में मिलके रह जाएगी!'

वो खुद से इतना सोच चला गया कपडे बदलने.

***

अगली रात आज बैंक्वेट का दिन था. भव्य दावत राखी गयी थी मनोरथ द्वारा 5 स्टार होटल में.

एक से एक लोग आये थे. भले hi वीर की फॅमिली करा या सोनिआ जितने लेवल की नहीं थी. पर काफी लोग उनके hi स्टैण्डर्ड के आये हुए थे. वो इसलिए क्युकी मनोरथ ने अपनी गुज़रती लाइफ में इनसे कांटेक्ट बनाये थे.

मनोरथ को चोरर के उसके घर से सभी होटल में आ चुके थे. वैसे तोह ये प्रोग्राम श्वेता के होटल में hi रखा जा सकता था. पर...

कल की घटना के चलते और साथ hi साथ ये सोचके चलते की श्वेता फिर होटल के कामो में बिजी हो जाएगी. इसलिए, फिर ये बैंक्वेट एक 5 स्टार होटल में आयोजित किया गया.

महंगी से महंगी कार्स की पार्किंग होती जा रही थी. और आदमी औरत महंगे महंगे कपडे पहने हुए अंदर जा रहे थे. मनोरथ ने इस बार कोई कमी नहीं दिखाई थी. लाखो रुपये खर्च किये थे उन्होंने आज की इस दावत में.

बृजेश और करुणेश अंदर hi साथ में सूट पहने खड़े हुए आपस में बातें कर रहे थे.

करुणेश : लो बोलो! पापा जी हमे समझाते थे की पार्टी मत करो, पार्टी मत करो. और अब खुद को देखो. ऐसी पार्टी फेकि उन्होंने की क्या hi कहे अब...

बृजेश : वो पापा जी है. कुछ भी कर सकते है.

वही दूसरी ऑर्डर, आरोही और काव्य हसिनायो जैसी सजी हुई वीर का hi वेट कर रही थी जब एक कार पार्किंग में आकर रुकी. और उसमे से वीर निकला.

शानदार एक टुक्सेडो पहने आज वो भी पूरी तरह से तैयार होक आया था.

क्युकी वो जानता था, की इस बैंक्वेट में उससे कई सारे रिलेशनशिप बनाने है बड़े लोगो से.

और ऊपर से... उसने अपने 200 पॉइंट्स का उपयोग भी स्टैट्स में उसे कर लिया थे. उसने 60 पॉइंट्स स्ट्रेंथ में, 30 पॉइंट्स इंटेलिजेंस में, 30-30 पॉइंट्स अगिलिटी और ेंदुराने में और बाकी के 50 सीधे अपीयरेंस में दाल दिए थे.

'पारी'

[Hmm?]

'शो में माय फुल स्टेटस!'

[Okay!]

*डिंग*

[Name : Veer


आगे : 21

स्टेटस : स्टूडेंट

स्टैट्स :

स्ट्रेंथ - 96/100

इंटेलिजेंस - 95/100

अगिलिटी - 65/100

ेंदुराने - 65/100

अपीयरेंस - 75/100


स्किल्स :

1) सेक्स प्रोटेक्शन : ों (सिल्वर टियर स्किल)

2) बेसिक मार्टिकल आर्ट्स स्किल (ब्रोंज टियर स्किल) अपग्रेडेड तो इंटरमीडिएट मार्टिकल आर्ट्स स्किल (सिल्वर टियर स्किल)

3) हव्कये (डायमंड टियर स्किल)

4) लीम्बो (सिल्वर टियर स्किल)

5) बेसिक एनिमी ट्रैकर (ब्रोंज टियर स्किल)

6) अब्सोलुटे शेफ (गोल्ड टियर स्किल)

7) बेसिक ड्राइविंग स्किल्स (ब्रोंज टियर स्किल)

System's इंटरनल फीचर्स :

Check-I, Check-II, पथ ट्रैकर, अल्फा ट्रेट, पास्ट इलस्ट्रेशन, ट्रांसलेटर, क्वेस्ट हंट, स्लॉट.

रिलेशनशिप्स :

1) सुमन : लॉयल स्लेव (फवौराबिलिटी : 92)

2) आभा : फेमिलिअर (फवौराबिलिटी : 68)

3) सोनाली : फेमिलिअर (फवौराबिलिटी : 45)

4) रागिनी : क्लोज फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 70)

5) निधि : क्लोज फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 54)

6) श्रेया : क्लोज फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 65)

7) जूही : बेस्ट फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 89)

8) सुहाना : क्लोज फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 62)

9) सोनिआ : गुड फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 64)

10) काव्य : वैरी क्लोज फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 85)

11) आरोही : गुड फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 66)

12) भूमिका : फेमिलिअर (फवौराबिलिटी : 30)

13) श्वेता : फेमिलिअर (फवौराबिलिटी : 5)

14) करा : बेस्ट फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 72)

सिस्टम लेवल : लेवल 5

(120 ऍक्स्प मोरे तो रीच लेवल 6)]

और स्टैट्स में अपीयरेंस 75 देखते hi वीर के अंदर काफी कॉन्फिडेंस था आज. क्युकी उससे पता था की अंदर जाते hi क्या होने वाला था.

'Let's जो!'

[Yeah!!!]

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आज के लिए इतना hi गाइस!


धन्यवाद! थिस अपडेट कंटैन्स मोरे थान 4.7क वर्ड्स. मेगा अपडेट के काफी नज़दीक है ये वाला. तोह अपना अपना काम कर के जाने का और अपनी समीक्षा रखने का. 😁
 
मेगा अपडेट

[Yes! Ek aur Mega Update! Enjoy!]

अपडेट - 70 ~ फेस स्लैपिंग!

अब तक...

और स्टैट्स में अपीयरेंस 75 देखते hi वीर के अंदर काफी कॉन्फिडेंस था आज. क्युकी उससे पता था की अंदर जाते hi क्या होने वाला था.

'Let's जो!'

[Yeah!!!]

अब आगे...

आज की ये भव्य दावत, केवल कहने के लिए दावत थी. इसका असली मक़सद तोह कुछ और hi था. वीर जानता था की उसके दादा जी ने ये दावत क्यों राखी थी.

ताकि वो इस दावत में आने वाले बड़े बड़े लोगो से घुल मिल सके और उनसे पहचान बना सके. वीर के दादा जी अब बुज़ुर्ग हो चुके थे. तोह वह हर्र समय उसके लिए किसी बड़ी फॅमिली के पास जा कर उससे इंट्रोडस नहीं करवाने वाले थे. वीर अब बच्चा नहीं था.

इसलिए, आज उन्होंने अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद वीर को मौक़ा दिया था. अब ये वीर के ऊपर था की वह कैसे इस मौके का फायदा उठाता है. और बेशक, वीर अपने सामने गयी इस परोसी हुई थाल को ठुकराने थोड़ी वाला था. भले hi उससे जायदात में कोई इंटरेस्ट नहीं था. पर अब जब जायदात का कुछ हिस्सा उससे मिला था तोह वह उसका पूरा का पूरा इस्तेमाल करने वाला था.

और बिना दादा जी की इच्छा के वो ये जायदात अब किसी के भी हवाले नहीं करने वाला था. जब तक की उसके दादा जी खुद उस से ये जायदात नहीं मांगते, तब तक वीर की ये जायदात, उसकी अपनी थी. किसी और की कतई नहीं.

कार से उतारते hi वीर उस आलिशान 5 स्टार होटल की एंट्रेंस के पास पहुचा. और उधर पॅहुचते hi उससे दो जानी मानी लड़किया वही सीढ़ियों पर कड़ी दिखाई दी. और वो थी...

आरोही और काव्य.

जो आज इतनी ख़ूबसूरत लग रही थी की हर्र अंदर जाता हुआ आदमी एक से दो बार उन्हें ज़रूर देख रहा था मुद मुद के. काव्य मैरून कलर की एक शाइनिंग सी ड्रेस पहने हुए थी तोह वही आरोही सिल्वर कलर की तइस तक आती एक ड्रेस में थी.

वीर की प्रजेंस का आभास होते hi जैसे hi आरोही और काव्य ने उससे देखा तोह दोनों वही जम्म सी गयी.

उन् दोनों को एक बड़ा झटका सा लगा. दोनों hi इतना शॉक में थी की कुछ सेकण्ड्स तक तोह कुछ बोल hi नहीं पायी. क्युकी, आज वीर उन्हें इतना ज़्यादा अट्रैक्टिव लग रहा था की दोनों की hi नज़रे उसके चेहरे पर जमी रही. वीर की हॅंडसमेनेस्स कई गुना बढ़ चुकी थी.

और उसका असर, साफ़ दिख रहा था.

आरोही : V-Veeeer!??

काव्य : भैया???

दोनों के hi मुँह खुले के खुले रह गए थे.

वीर (स्माइल्स) : क्या हुआ? पार्टी अंदर है मेरी प्यारी बहनो. व्हाई अरे यू गाइस वेटिंग आउटसाइड?

आरोही (ब्लशेस) : W-We... वे वेरे वेटिंग फॉर यू.

काव्य (ब्लशेस) : Bh-Bhaiya! A-Aap आज... आज बोहत हैंडसम लग रहे हो.

दोनों hi बहनो की आवाज़ थोड़ा लड़खड़ा गयी. पास से वीर को देख वो बेहद hi शॉक में थी. वीर का अपीयरेंस भला इतना कैसे बदल गया? अरे कल hi तोह मिले थे वो सब. फिर एक रात में इतना बदलाव कैसे आ गया वीर में?

'हे... हे लुक्स सो हैंडसम!'

'Bh-Bhaiya? भैया इतने ज़्यादा हैंडसम कब से हो गए? क्या मेने भैया को ठीक से नहीं देखा था अब तक? K-Kya भैया ने मेकओवर कराया है?'

कुछ ऐसी hi थॉट्स उनके मैं में आ रहे थे.

काव्य : भैया? A-Aapne कुछ लगाया है क्या अपने फेस पे?

वीर : हम्म? नहीं तोह! ः! जस्ट थे उसुअल. तुम तोह जानती hi हो. में अपने फेस पे उतना ध्यान नहीं देता. बस, बाथ लिया था. और नार्मल मॉइस्चराइजर. नथिंग ेल्स.

आरोही (जलते हुए) : उसके बावजूद तुम्हारी स्किन इतनी अच्छी है. और ऊपर से हम लड़किया दिन भर अपनी स्किन पर ध्यान देती है. थें तू, कही पिम्पल्स, तोह कही डार्क सर्कल्स. ी हेट आईटी. सिर्फ मुँह धोके hi यू... यू लुक सो स्मार्ट. It's सो अनफेयर.

काव्य : राइट दीदी!!! भैया~ ी हेट यू!!!

*थुड़*

काव्य : ुघ्होऊ~

पर इसके पहले काव्य वीर से और जल पाती, वीर ने उसके सर्र पर एक तपली दे मारी.

वीर : Let's जो इनसाइड~

काव्य : उहुउउ~ मारा क्यों!? वहा~

इस बार भी बेचारी कुछ न कह पायी क्युकी वीर ने उसके गुलाबी नरम से गाल को खींच जो दिया था. वीर काव्य से बेहद प्यार करता था. और ये छोटी मोती नोक झोक उसके साथ करने में उससे बोहत अच्छा लगता था. ऊपर से, एहम काव्य के गाल भी बोहत सॉफ्ट थे.

वीर : सो? कौन सी फ्लोर पर है?

आरोही : 7तह फ्लोर!

वीर : ऑलराइट!

तीनो hi लिफ्ट में जाते हुए ऊपर होटल की 7तह फ्लोर पर पहुचे और लिफ्ट खुलते hi उसमे से बाहर निकले.

बाहर निकल कर एक राइट टर्न लिया और बस, उन्हें एंट्रेंस दिख गयी थी.

एंट्रेंस के बाहर 4 ख़ूबसूरत लेडीज एक सी ड्रेस पहने हुए गेस्ट्स को वेलकम कर रही थी. 2 लेडीज फूल की पंखुडिया फेकते हुए उनका स्वागत कर रही थी तोह वही आगे दो कड़ी हुई आने वाले गेस्ट्स के कपड़ो पर परफ्यूम छिड़क रही थी.

काव्य वीर की बाज़ू को अपने हाथो में जकड़ी हुई थी. जैसे मानो वो उसका बॉयफ्रेंड हो. ये हरकत देख आरोही के भी मैं में कुछ आया. पर वो वीर की दूसरी साइड hi चलती रही. शायद वो भी वीर का हाथ थामना चाहती थी. बूत शी डीडेड अगेंस्ट आईटी.

जैसे hi उन् लेडीज ने वीर को देखा तोह पल भर के लिए उनकी आँखों में भी चमक आ गयी.

और बड़े hi आदर के साथ मुस्कुराते हुए वीर का स्वागत करने लगी वह.

'ये कितना हैंडसम है.'

'हाय~ ये लड़का!'

न जाने उनके मैं में क्या क्या चल रहा था. पर जैसे आरोही ने उन् साड़ी लड़कियों के देखने के ढंग को महसूस कर लिया. और इस बार...

आरोही : Let's जो फ़ास्ट~

वीर : हम्म?

आरोही वीर का हाथ थाम उससे जल्दबाज़ी में अंदर ले गयी. अंदर जाते जाते वो पलट के उन् लड़कियों को एक लुक देना नहीं भूली.

अंदर आते hi वीर ने देखा की क्या hi शानदार होटल थी ये. वाक़ई! ये 5 स्टार होटल कहलाने लायक hi थी.

ऊपर सीलिंग से लटक रहे बड़े बड़े झूमर इतने महंगे और आकर्षक लग रहे थे की उनकी चमक hi लोगो का ध्यान खींच रही थी. और ज़मीन पर बिछा हुआ वो शानदार कालीन. ऐसा लग रहा था जैसे किसी राजा की सभा का मैं हॉल हो.

100 से भी ऊपर आदमी अंदर घुस चूका था इस वक़्त. और उसके बावजूद, हॉल में इतनी स्पेस थी की लग रहा था की बस कुछ hi आदमी आये है.

वीर आरोही और काव्य जैसे hi अंदर आये, अंदर मौजूद लोगो की भी नज़रे उन् पर पड़ी. और उनमे से जो वीर की आगे की लड़किया थी वो आँखों में चमक लिए उससे देखने लगी.

आज वीर ने पर्सनली कस्टमाइज्ड एक हाई एन्ड टुक्सेडो पहना हुआ था. उसका लम्बा सीधा और लेअन फिगर एक दम परफेक्ट तरीके से उन् कपड़ो के ऊपर से झलक रहा था. एकदम फिट!

काली घनी एएब्रोस, आँखों में तेज, होंठो पे हलकी मुस्कराहट, काले वेवी मध्यम लेंथ बाल, और हलकी बियर्ड में वो किसी सेलिब्रिटी से काम नहीं लग रहा था आज.

हार ख़ूबसूरत लड़कियों से आज उसके ऑय कॉन्टेक्ट्स हो रहे थे. और कई तोह लगातार उससे hi देखे जा रही थी. उसके बगल में कड़ी आरोही और काव्य भी ये नोटिस कर रही थी.

तोह गुस्से में काव्य ने अपना मुँह बिलकुल किसी पुफरफिश की तरह पहला लिया.

"हम्फ~ भैया यहाँ नहीं खड़े होते, चलो कही और." काव्य ने वीर के हाथ को खींचते हुए बोलै.

"हम्म~ हम्म~" और आरोही भी उसकी बात से सहमत होते हुए वीर को खींच के थोड़ा आगे ले गयी.

क्युकी अब केवल लड़किया hi नहीं, कुछ शादी शुदा मिडिल एज्ड औंटीएस तोह वही नेवली मैरिड भाभियाँ भी अब वीर को ताड़ने लगी थी. आरोही और काव्य इसलिए जल्द से जल्द वीर को वह से ले भागी.

अभी वो थोड़ा hi आगे आये थे की इतने में एक काव्य जितनी हाइट की लड़की उनके पास आयी, "काव्य!!!!"

काव्य : अरे!?? कृतिका तुम आ गयी!?

कृतिका : हाँ! ाहः~

ये कृतिका काव्य की क्लासमेट थी. वो भी काव्य के जैसे hi क्यूट थी पर वो थोड़ी और मातुरे थी काव्य से. दोनों hi शायद अगल बगल बैठते थे कॉलेज में. वीर उन् दोनों को देख खुश था. काम से काम उसकी छोटी बहिन अपनी कॉलेज लाइफ अच्छे से व्यतीत तोह कर रही थी. नए दोस्त तोह बना रही थी. उसकी तरह नहीं, जहा उसका कॉलेज में कोई अत पता नहीं था. और न hi कोई दोस्त.

कृतिका (खुसपुसाते हुए) : W-Wow! काव्य! Y-Ye तुम्हारे भैया है? तुम्हारे कजिन भैया तोह बोहत हैंडसम है. M-Mujhe इंट्रोडस करवाओ न.

काव्य : उम्... भैया! ये मेरी फ्रेंड है कृतिका और कृतिका ये मेरे सबसे फवौरीते भैया, वीर!

वीर (स्माइल्स) : नीस तो मीट यू!

कृतिका (ब्लशेस) : N-Nice तो मीट यू t-too!!!!

काव्य : हँ!? कृतिका? तुम इतना क्यों शर्मा रही हो?

कृतिका : उम्... वो... K-Kya आप मुझे अपना इंस्टा अकाउंट बता सकते हो?

वीर : हम्म? वेल सूरे!

और वीर ने अपनी इंस्टा ईद का कर कोड खोल के कृतिका को स्कैन करने दे दिया. उससे स्कैन करते hi अब वो वीर को फॉलो करने लगी थी.

कृतिका : Th-Thank यू!

काव्य : हँ? भैयाआ??

कृतिका : में चलती हु. काव्य! यू एन्जॉय! हम कल मिलते है कॉलेज में.

और कृतिका वह से ख़ुशी में भाग गयी. काव्य बेचारी उससे बस देखती hi रह गयी.

काव्य : भैया??? अपने अपनी ईद उससे क्यों दी?? हाँ? ी हेट यो.... आआआआआ~

एक बार फिर उसका सेंटेंस अधूरा hi रह गया क्युकी उसके गुलाब गाल वीर के हाथो में थे.

वीर : बी थे वे, तुम्हारी फ्रेंड यहाँ कैसे?

काव्य (गाल मलते हुए) : वो... दादा जी ने मुझे परमिशन दे दी थी की में अपनी कुछ फ्रेंड्स को बुला सकती हु. हेहेहे~ स्पेशल ट्रीटमेंट यू क्नोव.

***

वीर आरोही और काव्य को कुछ देरर अकेला चोरर और आगे बढ़ते हुए जब आया तोह उससे एक बड़ा hi परिचित चेहरा देखने को मिला.

वीर ने अपनी बॉहे उससे देख के ऊपर करि.

इस वक़्त, उसके सामने कोई और नहीं नेवी ब्लू सूट पहने वो खड़ा हुआ था.

प्रांजल!!!

वीर ने अपनी नज़रे घुमाई तोह उससे और भी कुछ फेमिलिअर फेसेस देखने को मिले.

विवेक जो साइड में खड़े होक किसी कपल से बात कर रहा था. वीर के चाचा चची जो किसी बुज़ुर्ग अंकल आंटी से बात कर रहे थे.

तोह वही वीर ने देखा की दूर श्वेता बैठी हुई थी एक चेयर पर और उसके बगल से कड़ी भूमिका उस से कुछ कहने की कोशिश कर रही थी. वही वीर के पिता अभी अभी आये थे और एंट्रेंस के पास खड़े होते हुए सभी को वेलकम कर रहे थे.

अभी उसके दादा जी का आना बाकी था. बस कुछ देरर में hi वो यहाँ आने वाले थे.

पर फिलहाल... प्रांजल!!!

वीर ने देखा की उसके बगल में 5 से 6 लोग खड़े हुए थे और सभी बड़ी hi हस्सी ख़ुशी से बात कर रहे थे. शायद प्रांजल ने अपनी भोले भेद की कस्टम पहन ली थी. मीठे बोल फेक रहा था लगता है वो उनपे.

'I'll हैवे तो टेक थे चान्सेस.' वीर ने मैं में सोचा.

[Yeah! You better! Warna wo Pranjal apni meethi meethi chikni chupdi baato se tumhaare future potential business partners tumhare haatho se chhina ke le jaega.]

'Don't वोर्री!'

[Hmm~]

वीर की इंटेलिजेंस आलरेडी 90 पार निकल चुकी थी. इस वक़्त वो बोहत hi कलम था. एकदम शांत. बस शेरर की तरह अपने शिकार को जैसे देख रहा था उस पर हमला करने से पहले.

और तभी...

प्रांजल ने भी उससे मुद के देखा. और जैसे दोनों की नज़रे आपस में भिड़ते hi एक स्पार्किंग सी हुई हो मानो. दोनों hi अपनी नज़रो से एक दूसरे को आज़मा रहे थे. जांच रहे थे.

भले hi प्रांजल एक निहायती कपटी इंसान था. पर उसकी पहचान तोह थी. बोहत पहचान थी. उसके बात करने का ढंग भी अच्छा था.

ऑफ़ कोर्स! ये तोह स्वाभाविक सी बात थी. आफ्टर आल, वो दिखने में भी स्मार्ट था. वीर जितना नहीं पर वो बुरा नहीं दीखता था. तोह लोगो का उसकी वाणी और उसके हाव भाव के पार्टी रुझान रखना, ये स्वाभाविक था.

प्रांजल का चार्म ऐसा था की कुछ देरर अंदर आने के बाद hi उसने 5 से 6 नए लोगो से पहचान भी बना ली थी. ऑब्वियस्ली, वो चार्म झूठा चार्म था. केवल एक दिखावा. पर उसका दिखावा इतना ों पॉइंट रहता था की अच्छे से अच्छा आदमी उससे परख नहीं पाटा था. जब वीर के दादा जी मनोरथ खुद उससे नहीं जान पाए तोह भला कोई और कैसे जान सकता था उसकी असलियत?

कोई मर. भार्गव प्रांजल से बात कर रहे थे. वीर ने पहले hi उन्हें चेक कर लिया था. और उन्होंने जब वीर और प्रांजल को आपस में नज़रे मिलाते देखा तोह वो बोल उठे, "अरे? ये!? मनोरथ जी का पोता है न?"

वीर उनकी बात सुन्न, नैचुरली उससे आगे जाना hi पड़ा.

वीर (स्माइल्स) : जी नमस्ते! में वीर! जी हाँ! आपने सही कहा. में उनका सबसे छोटा पोता हु.

मर. भार्गव (स्माइल्स) : क्या बात है! दोनों पोते कितने स्मार्ट है मनोरथ जी के. वो मेरे पिता के ख़ास दोस्त रहे है. अब मेरे पिता तोह नहीं रहे. पर मेरे भी बोहत अच्छे सम्बन्ध है उनसे. ः~

वीर : जी!

मर. भार्गव : और सुनाओ आप? क्या चल रहा है बीटा आपका? एजुकेशन में?

वीर कुछ कह पाटा की तभी प्रांजल ने उसके गले में हाथ डाला और खुद कह उठा.

प्रांजल : हाहाहा!? ये!? अंकल! वीर तोह साइंस स्टूडेंट है. इसकी इंजीनियरिंग चल रही है. कॉमर्स वाला तोह में हु. में बिज़नेस में एक्टिव रहता हु ज़्यादा. हाहाहा~

वीर मुस्कुराया और उसने अगले hi पल अपने कंधे से प्रांजल का हाथ नीचे किया और बोलै,

वीर : में साइंस से ज़रूर हु अंकल. बूत ात थे शामे टाइम, में अपना खुद का बिज़नेस भी कर रहा हु. दोनों चीज़े पैरेलल में चल रही है.

मर. भार्गव (सुरप्रीसेड) : ओह्ह्ह!? ये तोह अच्छी बात है. अच्छी बात है वाक़ई...

प्रांजल (स्माइल्स) : मेरे छोटे भाई! फ़ूड ट्रक का बिज़नेस भी कोई बिज़नेस होता है?

प्रांजल ने कहते हुए 'फ़ूड ट्रक' पर काफी जोरर देते हुए कहा. जैसे बताना चाह रहा हो की मनोरथ का छोटा पोता किसी काम का नहीं है और इतना छोटा काम कर रहा है वह.

वीर (स्माइल्स) : आदमी छोटे बिज़नेस से hi अपने बिज़नेस को बड़ा बनाता है भाई. क्यों? मर. भार्गव? मेने सही कहा न? आफ्टर आल, आपके पिता जी ने भी तोह टाइल्स का बिज़नेस एक छोटी सी दूकान से शुरू किया था न? यदि आज आपका इतना बड़ा टाइल्स का बिज़नेस है तोह क्या आप उन् दिनों को भुला सकते हो? जहा से आपके इस मज़बूत बिज़नेस की शुरुआत हुई थी.

मर. भार्गव वीर की बात सुनते hi सन्न रह गए थे. उन्हें वीर से मिले अभी कुछ hi सेकण्ड्स हुए थे और उसके बावजूद वीर को इतना सब पता था उनके बारे में. ऑफ़ कोर्स! ये सब तोह वीर को खाली चेक करके पता लग गया था. पर मर. भार्गव ये नहीं जानते थे की वीर के पास कोई सिस्टम है.

मर. भार्गव (सुरप्रीसेड) : हँ?? N-Nahi! बिलकुल नहीं! में आज भी अपने पिता जी के उन् बीते दिनों की म्हणत की डाट देता हु. उन्हें याद करता हु. उन्ही के कारण तोह आज मेरा इतना नाम है. P-Par तुम्हे इतना कुछ पता है मेरे बारे में? हाहाहा~ मनोरथ जी का छोटा पोता वाक़ई बोहत कनौलेजाबले है. तुम बोहत आगे जाओगे बीटा.

वीर (स्माइल्स) : जी थैंक यू अंकल! ी विश यू थे शामे. आपका बिज़नेस भी आगे बढ़ता रहे. बी थे वे, कैन ी हैवे योर बिज़नेस कार्ड मर. भार्गव?

मर. भार्गव : हाहाहा~ अरे अरे व्हाई नॉट? तुम बेझिजक मुझे कांटेक्ट कर सकते हो. कोई भी ज़रुरत पड़े तोह मुझे याद कर लेना. Okay?

वीर (स्माइल्स) : थैंक यू!

बगल में खड़े प्रांजल सामने चल रहे कन्वर्सेशन सुन्न के ऐसा हक्का बक्का हो गया था की उसकी समझ में नहीं आ रहा था की ये सब कैसे हो गया. उसने अपने चेहरे पर तोह कोई भाव नहीं बदले, बस स्माइल करते हुए देखता रहा. पर अंदर मैं में जैसे भूचाल सा आ गया था उसके.

उसके सामने से वीर उसके एक फ्यूचर पार्टनर को जैसे छीन के ले गया था. गुस्सा तोह बेहद आ रहा था उससे.

वीर जैसे hi मुद के जाने के लिए हुआ तोह प्रांजल ने उसके कंधे पर हाथ रखा. और बड़े hi धीरे से स्वर में उसके कान की ऑर्डर झुकते हुए बोलै,

"ज़्यादा खुश नहीं होते वीर! ज़्यादा उड़ते नहीं. क्युकी जो जितना ऊचा उड़ता है न, वो ज़मीन पर भी उतनी hi जोरर से गिरता है."

प्रांजल उससे आगाह करने की कोशिश कर रहा था. की हवा में उड़ना और ख़याली पुलाव पकाना अच्छी बात नहीं. वर्ण बाद में मुँह की खानी पड़ती है.

पर तभी, वीर ने भी उसके कान के पास आते हुए धीरे से कहा, "ड्रैगन्स सोअर ईंटो थे स्काई. नॉट थे इंसेक्ट्स."

और वो प्रांजल को वही चोरर निकल गया.

प्रांजल को जैसे अपने शब्दों से मुँह पर तमाचा मार के गया था वीर. प्रांजल कहना चाह रहा था की वीर हवा में न उड़े वर्ण नीचे आ गिरेगा.

तोह वही वीर ने उससे ये कहा की ड्रैगन्स हवा में hi उड़ते है, कीड़े नहीं. एक प्रकार से वीर प्रांजल को ये बताना चाह रहा था की वो ड्रैगन के भाति था जो आकाश में उचाईयो में उड़ने के लिए पैदा हुआ था. न की उन् तुच्छ कीड़ो की तरह था जो बस निचले स्टारर पर मंडराते रहते थे. दूसरे शब्दों में वो प्रांजल को नीचे मंडराने वाला कीड़ा भी कह के गया था.

और ये बात प्रांजल को समझ आते hi, उसकी मुट्ठी अपने आप गुस्से में कस गयी. दांत मीसने लगा वो पर उसके बावजूद, सबके सामने उसकी स्माइल अभी भी मौजूद थी. खुद के भाव छुपाने का टैलेंट भी कोई प्रांजल से सीखे.

'मुझे लगा hi था तुम कोई न कोई हरकत ज़रूर करोगे वीर. इसलिए, ी चामे प्रेपरेड़. तुम देखते जाओ. क्या हालत करता हु में तुम्हारी अभी.'

सोचते हुए प्रांजल ने अपने जेब में कुछ टटोला और फिर वह से निकल गया.

***

कुछ समय बीता और अब वीर के दादा जी का आगमन हो चूका था. उन्हें ज़्यादा शोर शराबा पसंद नहीं था. इसलिए, वो लेट hi आने वाले थे और कुछ देरर सभी से मिलके वापस लौटने वाले थे. उन्होंने ये पार्टी मैनली वीर और प्रांजल के लिए hi राखी थी.

जैसे hi मनोरथ अंदर आये सभी उनका स्वागत करने लगे. और उनसे घुल मिलकर बातें करने लगे. वीर दूर खड़ा बस सब कुछ देख रहा था की इतने में hi उसके दादा जी ने उससे देखा और उसके पास गए और धीरे से पूछे, "क्या बहु नहीं आयी?"

वीर : जी नहीं दादा जी! मेने कहा भी था की आपने बुलाया है. पर उन्होंने कहा की उनसे नहीं आया जाएगा. कह रही थी की दादा जी से कहना मुझे माफ़ कर दे.

मनोरथ (निराश होते हुए) : कोई बात नहीं! क्या तुम मिले किसी से यहाँ पर?

वीर (स्माइल्स) : जी!

मनोरथ (स्माइल्स) : बोहत अच्छे! ऐसे hi आगे बढ़ते रहो. माता रानी सब कुशल मंगल कर देंगी.

और मनोरथ फिर हॉल के सेण्टर में चले गए जहा सभी से वो बातें करने लगे.

और देखते hi देखते गिफ्ट्स देने का सिलसिला शुरू हो चूका था.

वीर चेयर पर बैठा हुआ कुछ सोच रहा था की इतने में hi उसके बगल से आके प्रांजल दूसरी चेयर पर बैठ गया.

दोनों ने hi एक दूसरे पर एक नज़र मारी और उसके बाद दोनों में से hi कोई कुछ नहीं बोलै.

'जस्ट वेट वीर! I'll शो यू की मेरे से पन्गा लेना क्यों महंगा पड़ेगा तुझे.'

प्रांजल ने सोचते hi अपने जेब में से टटोल के एक पुड़िया निकाली. उसके चेहरे पर एक कपटी मुस्कराहट थी.

प्रांजल : वेटर!!! दो कोल्ड ड्रिंक्स इधर!

वीर : हम्म?

प्रांजल ने एक वेटर को देख बुलाया जो कोल्ड ड्रिंक्स गेस्ट्स को सर्वे कर रहा था और उस से दो गिलास रखवा लिए.

प्रांजल : छोटे भाई! तुम शायद सही थे. ड्रैगन्स रियली सोअर ईंटो थे स्काई. एंड ऑफ़ कोर्स, मेरा भाई भी एक ड्रैगन के सामान है. जो अब आगे बढ़ता रहेगा. और उसकी और कल हमे प्रॉपर्टी मिलने की ख़ुशी में... Here's ा टोस्ट. अब वाइन या बियर तोह नहीं है. तोह ये कोल्ड ड्रिंक से hi काम चलाना पड़ेगा. ः~ हम्म? दादा जी ने गिफ्ट्स एक्सेप्ट करना स्टार्ट कर दिया लगता.

उसने कोल्ड ड्रिंक देने की बात करते हुए, दादा जी की ऑर्डर वीर का ध्यान भटकाया और बड़ी hi चापलूसी से चुपके से वो पुड़िया कोल्ड ड्रिंक में दाल दी.

इतनी भीड़ में घंटा कोई उसके एक्शन्स को नोटिस कर रहा था.

उसके बाद वो वापस से अपने टॉपिक पर आ गया.

प्रांजल : अरे लो वीर!

उसने वीर की साइड वाली ड्रिंक में वो पुड़िया दाल ले वीर से पीने को कहा. वीर क्युकी प्रांजल के एक्शन को नहीं देख पाया था इसलिए उससे नहीं पता था की इसमें क्या मिला हुआ था.

इसमें कॉन्स्टिपेशन का ड्रग मिला हुआ था. वही सहित ड्रग जो जस्सी को दिया गया था जब करा को किडनैप किया गया था. बस, फ़र्क़ ये था की प्रांजल का ये ड्रग और भी स्ट्रांग था. इतना की यदि कोई इससे ले ले, तोह कुछ hi देरर में लम्बी लम्बी शेहनाईया बजना तय था.

पर वीर कौन था? उसका इंटेलिजेंस 95 पे था. प्रांजल का अब वो श्लय इंटेलिजेंस वीर के इंटेलिजेंस के मुक़ाबले कुछ भी नहीं था.

ड्रिंक देखते hi वीर मुस्कुराया और...

'चेक!'

*डिंग*

[Cold drink.

Bio : A cold drink with added constipation drug. Do not consume it.]

बस, इतना सा पढ़ते hi वीर को साड़ी प्लानिंग के बारे में पता लग गया था जो प्रांजल उसके पीठ पीछे कर रहा था.

'I'll शो यू बरोथेर, हाउ it's दोने!'

[Just smack him in the face. This bastard~]

वीर : वाक़ई! गिफ्ट्स तोह देने लगे है लोग. हम्म? पर वो कौन है?

इस बार वीर ने अचरज में दादा जी की ऑर्डर देखते हुए कहा. और बेशक, प्रांजल भी उसकी नज़रो को फॉलो करते हुए वह देखा.

और जैसे hi वो पलटा,

*स्वैप*

वीर ने अगले hi पल वापस से अपनी गिलास प्रांजल के गिलास से एक्सचेंज कर दी.

प्रांजल : ओह्ह! वो लेडी? हम्फ~ इंटीरियर देकर के शोरूम्स है उनके. आलरेडी उनका विजिटिंग कार्ड है मेरे पास.

प्रांजल ने जेब में से एक सफ़ेद कार्ड निकालते हुए वीर को चमकाने की कोशिश की.

पर वीर बस मुस्कुरा रहा था.

वीर (स्माइल्स) : That's सो गुड फॉर यू!

प्रांजल (मैं में) : ऑफ़ कोर्स वीर! बाहर से तू स्माइल कर रहा है. पर अंदर hi अंदर जल रहा होगा तू. हाहाहा~

प्रांजल : अरे ये क्या? तुमने ड्रिंक नहीं ली?

वीर : आप ने एक गूथ नहीं पिया और मुझे ड्रिंक करवा रहे हो?

प्रांजल : अरे इसमें क्या? ये लो!

कहते हुए प्रांजल गटागट साड़ी कोल्ड ड्रिंक पी गया. ये सोच के की द्रुग्गेड वाली ड्रिंक वीर के साइड है. और उसने जो पी वो नार्मल थी. पर उससे क्या पता था की कुछ देरर में hi उसके पेट में भूचाल आने वाला था.

वीर (स्माइल्स) : अब आपने पी है तोह मुझे तोह पीनी hi पड़ेगी.

और फिर...

*गल्प* *गल्प* *गल्प*

वीर धीरे धीरे साड़ी ड्रिंक पी गया. जैसे जैसे गिलास में मौजूद ड्रिंक वीर के पेट में जा रही थी, वैसे वैसे प्रांजल की मुस्कराहट भी फैलती जा रही थी.

प्रांजल : गुड! हाहाहा! ये हुई न बात!

वीर : ये टास्ते कुछ अजीब सा क्यों है?

प्रांजल : H-Huh? N-Nahi तोह? मुझे तोह एकदम सही लगा.

वीर : ऐसा? वेल...

प्रांजल : A-Anyways! अब जल्द hi हमारी बारी है गिफ्ट्स देने की. बे प्रेपरेड़.

और प्रांजल शरारती भरी मुस्कान लेते हुए वह से निकल गया. वीर तोह जैसे बस उससे चोमू बना रहा था. उसने जान बुझ के ऐसा कहा था ताकि प्रांजल को लगे की वाक़ई वीर ने वो द्रुग्गेड ड्रिंक पी ली. जब की ऐसा कोई केस hi नहीं था. वीर तोह पर्फेक्ट्ली फाइन था. पर प्रांजल? नॉट सो मच!

आरोही और काव्य भी इधर उधर सबसे मिलके आ चुकी थी और वीर के साथ hi आके कड़ी हो गयी.

कुछ देरर के बाद जब सभी ने गिफ्ट्स दे दिया. तोह बस अब परिवार वाले hi गिफ्ट्स देने के लिए बचे हुए थे.

पर उसके पहले मनोरथ कुछ कहना चाहते थे.

मिछ के आते hi उन्होंने सभी गेस्ट्स की ऑर्डर देखा और बोलना शुरू किया, "आज!!! आज मेरे लिए... ये बड़ा hi ख़ुशी का मौका है. में... जो अपनी साड़ी ज़िन्दगी में आप जैसे इतने प्रिय लोगो से जुड़ पाया, ये मेरे लिए सौभाग्य की बात है. इन् बीते सालो में... जो कुछ भी... जो कुछ भी मेने कमाया था. उनके दो बड़े हिस्से मेरे पोते वीर और प्रांजल के नाम कर चूका हु में. आज! आज में अपनी इस ज़िम्मेदारी से मुक्त हो चूका हु. आप सभी यहाँ आये, मेरा मान रखा... उसके लिए बोहत बोहत धन्यवाद! और... मेरे पोते... ये मेरे दो पोते, मेरे लिए हीरा है. इनकी राह में आप इनका हो सके तोह ज़रूर साथ देना. बस! यही कहना चाहूंगा. धन्यवाद!!!"

और तालियों से पूरा हॉल गूँज उठा.

आरोही : It's टाइम फॉर आवर गिफ्ट.

काव्य : हम्म हम्म! चलो भैया!

वीर : वेट!

आरोही : हम्म?

वीर : प्रांजल भैया गिफ्ट देने जा रहे है. लुक! ी थिंक उनका गिफ्ट बोहत बड़ा है.

वीर की बात सुन्न दोनों hi बहने स्टेज की तरफ देखने लगी.

प्रांजल वाक़ई काफी कुछ चीज़े लेके आया था.

जैसे hi वो मुस्कुराते हुए स्टेज पर चढ़ा...

*गुड़गुड़गुड़*

"हँ!??"

उसका पेट अंदर से गुड़गुड़ हुआ. शायद ड्रग ने अपना काम करना शुरू कर दिया था.

अंदर से पेट ऐसी मरोड़ मार रहा था उसका की उस से खड़ा नहीं हुआ जा रहा था अचानक से.

वो अपने फेस के एक्सप्रेशंस को छुपाते हुए आगे बढ़ा. क्युकी अब फोटोज भी क्लिक हो रही थी. इतनी लाइट्स में और इतनी भीड़ में आज पहली बार प्रांजल को अंदर से धक् धक् हो रेला था.

"सहित!!"

वो धीरे धीरे आगे आया. और तभी...

उसकी गांड से जैसे कोई चीज़ बाहर निकलने का प्रयास करने लगी. प्रांजल का मुँह ऐसा था जैसे अभी उसने कोई कड़वी दवाई खा ली हो.

अपनी गांड को सिकोड़ के वो आगे बढ़ा और उसने बोलना शुरू किया,

"Y-Ye गिफ्ट... Y-Ye... ुघ्घ! स्पेशल गिफ्ट... ये... में... दादा जी के लिए... दादा... दादा जी के लिए..."

और तभी...

*Phuuuuuuurrrrrrrrrrrrrrrrrrrrr*

"हँ?"

"हम्म?"

एक ज़ोरदार आवाज़ प्रांजल की गांड से आयी.

ऐसा लगा मानो किसी ने चिंघाड़ा बजा दिया हो. या भोपू...

"कुघ कुघ!!! में ये दादा जी के लिए..."

प्रांजल ने खासते हुए अपनी शहनाई की धुन को कवर उप करने की कोशिश की, पर सब बेकार था क्युकी अगले hi पल...

*पहूउउउउउस्सस्स्स्सस्स*

*Phuuuuiiiiiiiiiii*

*फुरुरुरुरुरुउउउउउउउ*

मानो जैसे किसी ने आतिशबाज़ी शुरू कर दी हो. ऊपर से जिधर वो खड़ा था, उसके ठीक पीछे मनोरथ ने अपना मिछ का स्टैंड रखा था. मिछ सीधा प्रांजल की गांड की ऑर्डर फोकस्ड था.

शोर होने के बावजूद सभी ने वो आवाज़ सुनी थी.

सुनी क्या, जो आस पास प्रांजल के खड़े थे, उन्होंने तोह सूंघ भी ली.

"यूउककककक!!! गवाकककक!! छहिएए~"

"ये क्या है??? किसी ने पाड़ा.... छी~"

"अरे... ये... इसने... इसने पाड़ा."

"ऐसे मौके पर... ऐसी हरकत! छी~ युककक!! मुझे वोमिटिंग आ रही है."

"मम्मीयियय बदबू आ रही है... आआआ~"

उसके पीछे खड़े लोग सब उस से दूर भाग गए.

कोई नाक पकड़ के खड़ा था तोह कोई दूर भाग रहा था.

और प्रांजल अपनी रोटी हुई शकल बना के फौरन hi दादा जी को गिफ्ट दिया और सीधा वाशरूम की ऑर्डर भाग गया.

आरोही और काव्य वही कड़ी हैरान और शर्मिंदा रह गयी थी. मनोरथ खुद बेहद शर्मिंदा थे. विवेक खड़े होक मुस्कुरा रहा था. तोह वही करुणेश गुस्से में था. और बृजेश वीर को देख रहा था. शायद आज वो अपने बेटे पर प्राउड था?

उसके बाद वीर की बारी जब आयी तोह वीर ने दादा जी को एक भगवान् जी की मूर्ति गिफ्ट की.

सबके गिफ्ट्स लेने के बाद फाइनली, खाना शुरू हुआ और बैंक्वेट के ख़तम होने के बाद सभी जाने लगे.

पर शुरू से अंत तक प्रांजल कही नज़र नहीं आया.

शायद वो बाथरूम में अलग अलग धुन्न बना रहा था.

***

होटल की hi टेरेस पर इस वक़्त आरोही कड़ी हुई थी.

मंद मंद हवाएं चल रही थी और उसके बालो को हवा में लहरा रही थी.

"यू अरे अलोन हेरे?"

तभी उसके पीछे से एक आवाज़ आयी तोह वह मुड़ी, पाया की वीर खड़ा हुआ था.

आरोही : हम्म! बस कुछ नहीं! तुम यहाँ?

वीर : आपको ढूंढ़ते हुए hi आया.

आरोही : ओह्ह्ह!

वीर : यू लुक तेनसेद!?

आरोही : आज... दादा जी को शर्मिंदा होना पड़ा.

वीर (स्माइल्स) : ओह्ह यू मैं!? प्रांजल वाली बात?

आरोही : हम्म~ बूत...

वीर : ?

आरोही : व्हाई दो ी थिंक की तुम्हे पहले से पता था?

वीर (स्माइल्स) : ऑफ़ कोर्स मुझे पहले से पता था.

आरोही (शॉकेड) : हँ!?

वीर धीरे से आरोही के कान के पास आया और बोलै, "तहत ड्रिंक वास् मेड फॉर में."

आरोही : हम्म?

पर आरोही कुछ समझ नहीं पायी.

वीर : प्रांजल! हे मिक्स्ड ा कॉन्स्टिपेशन ड्रग इन माय ड्रिंक एंड वांटेड तो गिव तहत तो में.

और अब आरोही को जैसे साड़ी बात समझ आयी. हैरत के मारे उसका मुँह खुला का खुला रह गया.

आरोही : हे... हे.. व्हाट!?

वीर (स्माइल्स) : यस! बूत ी एक्सचेंजड माइन विथ हिज ड्रिंक. और उसके बाद... बस पटाखों की आवाज़ थी.

आरोही भौचक्की सी वीर को देख रही थी. उसके बाद वो शांत हुई और मुस्कुरायी.

आरोही : यू दीद हिम गुड! हे डेसेर्वेस आईटी.

पर एक पल के लिए वो घबरा भी गयी. कही ये सब वीर के साथ हुआ होता तोह? वीर को उसने देखा तोह पाया की वीर एकदम कॉंफिडेंट नज़र आ रहा था. और वो नीचे कार्स में जाते हुए गेस्ट्स को देख रहा था.

पता नहीं क्यों, पर आरोही को आज वीर बोहत hi अट्रैक्टिव लग रहा था.

और वो आगे बढ़ी... अपने होंठ लेके... उसके गाल की तरफ...

की तभी...

"उम्... वैसे..."

और वीर मुद गया.

वीर : !????

आरोही : मम!????

वीर और आरोही दोनों की नज़रे फटी की फटी रह गयी थी. क्युकी...

दोनों के होंठ आपस में जुड़े हुए थे. आरोही तोह केवल उसके गाल को चूमना चाहती थी. पर उतने में hi वीर पलट गया था... और नतीजा...

आरोही : आअह्ह्ह!

वो हड़बड़ा के पीछे हटी और बिना वीर को देखे hi भाग गयी.

वीर बेचारा बस अपनी थोड़ी कापति हुई ऊँगली से अपने होंठ पर फिराता रह गया और मैं में बस यही कहता रहा...

'आईटी... आईटी वास् ान एक्सीडेंट!'

.

.

.

.

.

.

.

आज के लिए इतना hi गाइस!

धन्यवाद!

ये मेगा अपडेट है. 5क वर्ड्स भाईलोग.


लिखे थोक के जाने का और रेवोस रखने का.
 
अपडेट विल के लेट ात नाईट.

Don't वेट! स्लीप!

रीड आईटी इन थे मॉर्निंग. ✨
 
अपडेट - 71 ~ रेअलिज़तिओन!

अब तक...

दोनों के होंठ आपस में जुड़े हुए थे. आरोही तोह केवल उसके गाल को चूमना चाहती थी. पर उतने में hi वीर पलट गया था... और नतीजा...

आरोही : आअह्ह्ह!

वो हड़बड़ा के पीछे हटी और बिना वीर को देखे hi भाग गयी.

वीर बेचारा बस अपनी थोड़ी कापति हुई ऊँगली से अपने होंठ पर फिराता रह गया और मैं में बस यही कहता रहा...

'आईटी... आईटी वास् ान एक्सीडेंट!'


अब आगे...

कल की रात तोह क्या hi रात थी. वीर न केवल कई सारे बड़े लोगो से अपनी पहचान कर पाया था बल्कि उसने प्रांजल को भी एक मुँह तोड़ जवाब दिया था.

रागिनी ने तोह पहले hi प्रांजल के सारे राज़ खोल दिए थे वीर के सामने. की कैसे प्रांजल ने वीर को घर से बाहर निकलवाया था. और कैसे वह उसके खिलाफ षड़यंत्र रचता था.

ऐसे कपटी इंसान की कल वीर ने अच्छे से वात लगाई थी. पूरे बैंक्वेट में फिर प्रांजल नज़र नहीं आया था. न जाने कितनी देरर तक वाशरूम में वो धुन बना रहा था. वो कहते है न, जैसी करनी, वैसी भरनी. प्रांजल जिस गलत उद्देश्य से वीर का मज़ाक बनाने आया था, वीर ने उसका hi मज़ाक बना के रख दिया था.

घर आके जब वीर ने साड़ी बात रागिनी को बतायी तोह रागिनी भी उसके संग हस्सी के ठहाके लगाने लगी.

वीर अब पहले जैसा वीर नहीं था. दादा जी की 40% जायदात मिलने के बाद अब उसके अंडर इतना कुछ था की वो इस जायदात से बोहत कुछ कर सकता था. करोडो का मालिक था अब वह.

वो इसलिए, क्युकी जायदात में केवल ज़मीन hi नहीं थी. मनोरथ के पास जितने भी मकान, फ्लैट्स, दुकाने, ट्रांसपोर्ट के साधन, अथवा जहा जहा मनोरथ ने इन्वेस्ट किया था. उन् सब का हिस्सा हुआ था. और वो हिस्सा इन्हे सब में था.

वीर के पास इस वक़्त धेरर साड़ी ज़मीन तोह थी hi, साथ hi साथ उसके पास 2 फ्लैट्स भी थे अब. 1 दूकान, 2 कार्स, और काफी सारा कॅश भी उसके अकाउंट में आ चूका था.

दूकान तोह पहले से hi रेंट पर डाली हुई थी तोह फिलहाल वीर उससे वैसे hi रहने देने वाला था. रही बात कार्स की तोह वो भी कोई न कोई आके घर पर चोरर के जाने वाला था. उसकी टेंशन नहीं थी.

और 2 फ्लैट्स जो थे, इनके बारे में कुछ किया जा सकता था. ओरिजिनल प्लान वीर का यही था की वो सुमन समेत दूसरे फ्लैट में शिफ्ट हो जाए. पर रागिनी भला ऐसा कहा होने देने वाली थी? वह तोह वीर और बाकी सब को कही भी नहीं जाने दे सकती थी. इतना लगाव जो हो गया था इन् सब से उसको.

अभी वो अपने रूम में लेता hi हुआ था जब अचानक hi...

*पिंग*

उसका फ़ोन बज उठा. कोई नोटिफिकेशन आया था.

'हँ?'

फ़ोन चेक करते hi उसने देखा की काव्य की कॉलेज फ्रेंड कृतिका का मैसेज था इंस्टा पर. वही, जो कल उसकी इंस्टा ईद मांग कर ले गयी थी.

चाट खोलते hi वीर को मैसेज दिखाई दिया.

कृतिका : Hello भैया!

तोह वीर ने भी फौरन टाइप करते hi मैसेज भेज दिया.

वीर : Hello!

कृतिका : कैसे हो आप?

वीर : I'm गुड! तुम बताओ!? नीड अन्य हेल्प?

कृतिका : No भैया! में तोह बस ऐसे hi... 😅

वीर : Okay!

कृतिका : वैसे! क्या आपने पढ़ लिया?

वीर : पढ़ लिया? क्या पढ़ लिया?

कृतिका : हँ? कल से सीनियर्स के एक्साम्स है न!?

वीर : ेहः!?

मैसेज पढ़ते hi, वीर जो शान्ति से आराम फार्मा रहा था वो एक झटके में बिस्तर से कूदते हुए उठ के बैठ गया.

'फुक्कककककककक! कल से एग्जाम!? सहित! आरोही दी ने तोह बताया था काफी दिन पहले. मेरे दिमाग से hi निकल गया.'

वीर : Okay! कल किस का पेपर है!?

कृतिका : यह!? भैया!? क्या आपको अपना टाइम टेबल नहीं पता? कल शायद मैथ्स है आपका.

'ओह्ह्ह्ह फुकककककक!!!'

[Haha~]

मैथ्स नाम सुनते hi वीर के मैं में दो ख़याल आये. पहला, की उसने इन् बीते दिनों घंटा कुछ पढ़ा था. पढ़ा तोह दूर, वह तोह अपने कॉलेज की शकल hi भूल गया था. और दूसरा...

निधि ma'am! जो मैथ्स की टीचर थी. और इस साल उसकी क्लास टीचर भी. लग गयी वात.

खतरे की घंटी बज रही थी जैसे उसके मैं में.

वीर : Okay थैंक्स! गुडबाय!

और वीर ने इतना टाइप कर के भेजते हुए इंस्टा बंद कर दिया.

अपने घर के बिस्तर पर लेती कृतिका ने जैसे hi ये देखा तोह वो हैरत में रह गयी. कुछ देरर पहले hi वो इतना खुश थी की वीर भैया ने उससे फौरन hi रिप्लाई दे दिया. और अब...!? ये तोह खड़े लुंड पे लात मारने जैसा था.

कृतिका : वह-!? वीर भैयाआ!? हैंण्ण्ण्ण्न!????

पर उसका जवाब देखे बजर्र hi, वीर ऑफ लाइन हो चूका था. उसने डीडे कर लिया था. की आज वो पूरा टाइम पढ़ेगा. यदि उसके मार्क्स काम आये, तोह निधि ma'am पक्के से और नाराज़ हो जाएंगी.

अपनी बुक शेल्फ से मैथ्स बुक निकालते हुए वो फौरन hi प्रश्न लगाने लगा. इंटेलिजेंस उसकी आलरेडी 95 पर थी तोह क़ुएस्तिओन्स के हल उससे यु चुटकियो में समझ आ रहे थे.

पर ये इंटेलिजेंस उससे पेपर में बिना पढ़े अच्छे मार्क्स नहीं दिलवा सकती थी. काम से काम क़ुएस्तिओन्स के वे ऑफ़ सॉल्विंग और फ़ॉर्मूलाइस को तोह देखना hi होगा ताकि एग्जाम में स्पीड बरकरार रहे और क़ुएस्तिओन्स भी आसानी से सोल्वे हो जाए.

तोह बस, वीर किताब उठा के लग चूका था पढ़ाई में.

थैंक्स तो सुमन, जो उसका रूम हर्र रोज़ज साफ़ करती थी. उस वजह से उसके बुक शेल्फ में ज़रा भी धुल नहीं थी. वर्ण उसकी बुक में अब तक मकड़ी के जले लग जाने थे, इतने महीनो से जो नहीं खुली हुई थी.

रागिनी जो वीर के रूम में उससे देखने आयी थी, उससे पढता देख थोड़ा चौंक गयी, फिर मुस्कुरायी और बाहर निकल गयी.

जब वो कुछ देरर बाद लौटी तोह उसके हाथ में एक दूध का ग्लास था.

ट्रे लेते हुए वो वीर के बगल से बैठ गयी. और उससे hi निहार रही थी. वो सच कहते है की एक आदमी जब फोकस्ड होता है या किसी काम में लीं होता है तोह उस वक़्त वो सबसे ज़्यादा अट्रैक्टिव लगता है. रागिनी को भी इस समय वीर बोहत ज़्यादा अट्रैक्टिव लग रहा था. ऊपर से उसके 75 अपीयरेंस के पॉइंट्स.

रागिनी (स्माइल्स) : वीर! ये लो! दूध!

वीर : हम्म? क्या भाभी!? बच्चा थोड़ी हु अब.

रागिनी : तोह क्या बच्चे hi बस दूध पीते है!?

वीर : और नहीं तोह क्या... हँ????

वीर जो सर्र झुकाये जवाब देता जा रहा था, अचानक से उससे जैसे रागिनी के बोल का मतलब समझ आया. बच्चे hi दूध पीते है? बड़े भी तोह पीते है. पर बड़े लोग वो दूध... सीधा जड़ से पीते है. इन इतर वर्ड्स... एहम!

रागिनी बेचारी तोह ऐसे hi बोल दी थी. पर अगले hi पल जब वीर ने हैरत में उससे देखा तोह जैसे उससे भी अपनी कही गयी बात का डबल मीनिंग समझ में आया. और अगले hi पल उसके गाल गुलाबी हो गए.

रागिनी : M-Mera मतलब था. तुम्हारे एक्साम्स है न वीर? तोह तुम... *ब्लशेस* रोज़ दूध पी के जाओगे.

वीर (ब्लशेस) : O-Okay!

फटाफट दूध ख़तम करने के बाद, वीर एक बार फिर लग चूका था अपनी पढ़ाई में जब उससे सडनली अपने निचले होंठ पर रागिनी का हाथ महसूस हुआ.

'!???'

उसके निचले होंठ पर दूध की अभी भी कुछ बूंदे सजी हुई थी. तोह रागिनी अपने अंगूठे से उससे साफ़ कर रही थी. और दोनों की hi नज़रे आपस में जैसे hi मिली...

*साइलेंस*

मानो पल भर के लिए वक़्त सा थम गया.

वीर : Bh-Bhabhi!?

रागिनी : ....

रागिनी के हाथ अभी भी उसके होंठ पर थे. सेहला रहे थे उन्हें. और न चाहते हुए भी अपनी भाभी के हाथो hi वीर का हथियार टाइट होने लगा था.

रागिनी ने जैसे hi वीर के पंत के उठाते उभार को नोटिस किया वो थोड़ा झेप गयी.

"अहह!" अचानक से वो पीछे हटी और तेज़्ज़ कदमो के साथ बाहर निकल भाग गयी.

'दमन ित्तत्त!!!!'

वीर बस खुद को कोस्टा रह गया. ये लुंड भी साला गलत टाइम पे खड़ा होता था. अब न जाने रागिनी उसके बारे में क्या सोच रही होगी!?

उससे jaan'ne का एक hi तरीक़ा था.

'पारी!!!!'

[Hmm?]

'भाभी की फवौराबिलिटी शो करो.'

*डिंग*

[Ragini's favourability : 78]

'व्हाट थे!?? फवौराबिलिटी बढ़ गयी!?? हाउ!????'

अभी भी औरतो को समझने में वीर का एक लम्बा रास्ता था. आज के इस दिन फिर वीर ने और कुछ न किया. रात को बस सुमन की गांड पेली और आभा की छूट में वो दो बार झरा. कल एग्जाम में उससे किसी भी प्रकार का फ़्रस्ट्रेशन नहीं चाहिए था.

***

नेक्स्ट डे...

सुबह सुबह hi रागिनी वीर की ड्रेस में उसकी टाई सही करने में लगी हुई थी. और वीर बस शर्माते हुए साइड मुँह करके खड़ा हुआ था.

'क्या विवेक भैया के साथ भी भाभी पहले ऐसे hi...!?'

[Of course!]

आज वीर को समझ आ रहा था की एक प्यार करने वाली का होना कितना अच्छा होता था जीवन में. कल न केवल रागिनी उससे दूध देने आयी थी बल्कि आज उसकी टाई भी सही कर रही थी. बिलकुल वैसे hi जैसे एक पत्नी पति की टाई एडजस्ट करती है उसके ड्यूटी जाते टाइम. वीर को एक पति पत्नी वाली फीलिंग आ रही थी. एक बेहद hi अच्छी फीलिंग जिससे वो अपनाना चाहता था.

इसमें बस यदि किसी चीज़ की कमी थी तोह वह थी...

एक किश की...

वीर ने मुस्कुराते हुए उन् थॉट्स को अपने मैं से बाहर निकाला और वो मुड़ने के लिए अभी हुआ hi था जब...

रागिनी ने अचानक से उसकी चीन पकड़ी और...

*छू~*

"हहहहहह!!!!?"

वीर हक्का बक्का होक रागिनी को घर रहा था. अभी अभी जिस किश के बारे में सोच रहा था. वो किश उससे मिल चुकी थी. भले hi ये किश गाल पर थी पर...

उसकी अपनी भाभी ने दी थी. वो भी सबके सामने.

दूर कड़ी सुमन भी अपनी आँखों में चमक लिए इस दृश्य को देख रही थी.

रागिनी (ब्लशेस) : G-Good लक!

वीर (ब्लशेस) : थैंक... यू!!!

और वीर वह से फटाफट निकल लिया. आज सुबह सुबह hi उसके दिल की धड़कन बढ़ चुकी थी.

कॉलेज आते hi उसने अपनी अपाचे पार्क की और चल दिया कॉलेज के मैं एंट्रेंस की ऑर्डर.

क्युकी लिस्ट तोह वही लगी होगी. कौन कहा बैठेगा ये पता करना ज़रूरी था.

अपना रोल no. ढूंढ़ने के बाद वीर लिस्ट में लिखे गए रूम no. में गया.

और दरवाज़े की देहलीज़ पर पॅहुचते hi जैसे hi उसने कहा, "मई ी के इन... हँ!??"

अंदर एक जाना माना शख्स मौजूद था. कोई और नहीं...

निधि!!!

निधि खुद वीर को स्तब्ध निगाहो से घर रही थी. एक पल के लिए दोनों एक दूसरे को देखने के बाद जैसे जम्म से गए.

निधि तोह और ज़्यादा शॉक में थी. सबसे पहला शॉक तोह ये की... वीर टेस्ट देने आया था. वीर ने उसकी बात का मान रखा. और दूसरा शॉक...

वो था उसका अपीयरेंस... पहले से बोहत ज़्यादा हैंडसम था अब वह.

'हे... हे चामे!!!!!' अपने मैं में सोचते हुए निधि ने हां में गर्दन हिला दी.


आज निधि एक नेवी ब्लू कलर की साड़ी में थी.





और उसमे वो इतनी ख़ूबसूरत लग रही थी की चाह कर भी वीर अपनी आँखें हटा नहीं पा रहा था.

अपनी सीट पर आने के बाद बैठते hi वीर ने मैं को शांत किया. रूम में दो इंविगिलटर्स होते थे. तोह उसके रूम में एक निधि ma'am थी. और दूसरी निधि ma'am की hi एक जूनियर प्रोफेसर थी जिसका नाम था आयुषी. ये दोनों hi क्लास की आज की इंविजिलेटर थी.

*त्रीनगगगगगग*

घंटी बजी और पेपर स्टार्ट हुआ.

वीर फटाफट क़ुएस्तिओन्स को सोल्वे कर सलूशन लिखता जा रहा था.

निधि जो सामने कड़ी थी वो बड़ी hi बेचैनी में उससे देख रही थी.

'क्या इसने पढ़ाई करि!? लिख तोह रहा है वह... कही सब गलत सलत तोह नहीं सोल्वे कर दिया!? यदि सब गलत कर रहा होगा तोह...!? हे विल फ़ैल... नहीं!!'

निधि इतना बेचैन थी की वो अपने मैं की बातें शांत hi न कर पायी. और आखिर वो अपनी बेचैनी के आगे हार गयी.

वो धीरे से वीर की रौ की तरफ आगे बढ़ी, ये देखने की वीर सही कर भी रहा है या नहीं?

वो हर्र बार आगे जाती तोह फिर पीछे से निकलती, और वीर की आंसर शीट पर नज़र मारते हुए सलूशन देखने की कोशिश करती. पर चाँद सेकंड में वो कुछ भी ठीक से देख नहीं पा रही थी.

'ओह no....!'

फिर जैसे उसका दिमाग चला और वो आंसर शीट में सिग्न करने लगी बारी बारी.

इसके ज़रिये अब वो वीर की आंसर शीट देख सकती थी. जैसे hi वो वीर के पास आयी. वीर ने आंसर शीट सीढ़ी कर फ्रंट पेज खोल के दे दी. ताकि निधि को आसानी जाए और फटाफट वो सिग्न कर दे.

पर इधर उससे क्या पता था की उसकी ये हरकत निधि के दिमाग को और भी ठनका देगी.

'थिस... थिस स्टुपिड ब्रैट... थिस इडियट... हे... ाररघ्ठ!! वीइरररररर!!!!' वो मैं में hi चिल्लाई. पहली बार वो इतना इर्रिटेट हो रही थी वीर को लेकर.

फिर भी हिम्मत कर निधि ने उसके सारे पैन चेक किये.

वीर : M-Ma'am!??

निधि : एहम... P-Paper इजी है न?

वीर : वेल, इजी तोह नहीं है. मॉडरेट है. न ज़्यादा इजी, न ज़्यादा टफ.

निधि : O-Okay!

निधि देख पा रही थी की शुरू के कुछ स्टेप्स तोह सही किये थे वीर ने. पर वो पूरा नहीं चेक कर पा रही थी. क्युकी...

"ये लीजिये ma'am!" वीर के बगल वाला जो दूसरी ब्रांच का था, उसने अपनी शीट सिग्न करवाने आगे कर दी थी.

और इस बार निधि ने प्यारी सी मुस्कान देते हुए उस लड़के की शीट को सिग्न किया. जो शायद मुस्कान तोह कही से भी नहीं थी. ऐसा लग रहा था की किसी विच को एक आम इंसान ने गाली बक दी हो और विच बस मुस्कुरा रही है.

'एक मिनट रुक जाता तोह क्या उखड जाता इस लड़के का? ी couldn't इवन...'

मजबूरन निधि को वह से आगे बढ़ना पड़ा.

वीर : ुहम्म... Ma'am!?

निधि : H-Huh!?? K-Kyaa?

निधि ने देखा की वीर अपनी मुट्ठी कैसे उसकी ऑर्डर किया हुआ था.

'हँ!?'

फिर जैसे उसकी समझ आया की वीर क्या कहना चाह रहा था. वो फिस्ट बुम्प करना चाह रहा था. 🤜🤛

'थिस... थिस इडियट!!!! इससे... इससे फिस्ट बुम्प की पड़ी है...!??? एग्जाम टाइम में!?'

निधि का गुस्सा बढ़ता hi जा रहा था. फिर भी, दुसरो की नज़रो से छुपके उसने वीर की फिस्ट पर अपनी फिस्ट हलके से मारी...

और उसके ऐसा करते hi वीर ने अपनी मुट्ठी खोल दी.

उसके हाथ में एक कैंडी थी.

निधि : ????

वीर (स्माइल्स) : फॉर यू!!!

*बेदुम्प*

निधि जो मैं hi मैं वीर को कोस रही थी. एक बार में hi जैसे उसका सारा गुस्सा छूमंतर हो गया.

दिल जोरर से धड़का. वीर के चेहरे की मुस्कान देख वो जैसे खो गयी उसमे.

ऊपर से वो जब से वीर को दांत लगा रही थी मैं में पर वीर के एक जेस्चर ने उससे शांत कर दिया.

और अगले hi पल, उसके गाल सुर्ख लाल पड़ने लगे.

बड़े hi हौले से उसने वीर की हथेली से वो चॉकलेट ली और फिरसे बनावटी गुस्सा करते हुए मैं hi मैं वीर को कोसते हुए आगे बढ़ गयी.

'थिस... स्टुपिड! He's एंड इडियट! वक़्त की कोई परवाह hi नहीं है. भरी क्लास में... हे दरद तो... Ma'am को चॉकलेट देनी है. मुझे चॉकलेट देने से एग्जाम में सोलूशन्स बन जाएंगे क्या!? हाँ? क्या सोच के दी उसने मुझे ये? की ma'am उसकी फिर मदद कर देंगी एग्जाम में? ी won't हेल्प हिम. पता चलने दो ज़रा उससे भी. He'll के तो क्नोव की बिना पढ़े कुछ भी हासिल नहीं होता... इडियट!!! चॉकलेट देनी है...'

बनावटी गुस्सा कर तोह रही थी निधि. पर...

पर उसका दिल अंदर से बोहत खुश था. वो इसलिए क्युकी,

*डिंग*

[Nidhi's favourability : 59]

***

समय जब बोहत hi काम बचा हुआ था तोह वीर ने रफ़्तार बधाई. निधि वापस से बेचैन होने लगी थी. भले hi ये फाइनल नहीं थे. पर ये कोई असाइनमेंट टेस्ट भी नहीं था. इनके मार्क्स काउंट होने थे. एक प्रकार से ये टर्म 1 थे.

*त्रीीिंगगगगगगगग*

घंटी बजी और निधि और आयुषी सभी से उनके पेपर्स लेने लगी.

वीर का पेपर लेते हुए निधि ने एक नज़र उस पर डाली तोह देखा वीर अपनी बत्तीसी दिखाते हुए उससे hi देख रहा था.

'इडियट!!!!'

उसका इर्रिटेशन और बढ़ गया.

'यदि वीर के मार्क्स काम आये... थें... I'll...'

पेपर लेते हुए उसने वीर को देखते हुए बोलै, "मीट में इन माय केबिन आफ्टर थिस."

और वो आगे बढ़ गयी.

'हँ!? अब ये ma'am को क्या हो गया?'

[She will lecture you! Be prepared!]

'हम्म'

पेपर के बाद, वीर जब क्लास से बाहर निकल रहा था तोह उसके बैग में रखा फ़ोन बज उठा.

फ़ोन उठाते hi,

"में तैयार हु! तुम्हारी मदद करने के लिए."

ये आवाज़ थी बलहार की. और उसका रिस्पांस सुनते hi वीर के होंठो पर मुस्कान आ चुकी थी. ऑफ़ कोर्स! वीर तोह पहले से hi जानता था की बलहार घूम फिरके अंत में उसी के पास आएगा. और वही हुआ.

वीर : हम्म! ठीक है! तोह फिर लग जाओ काम पर. ध्यान रहे! किसी को भी पता न चले. और मुझसे शानीपंती करने की ज़रुरत नहीं. क्युकी मुझे फौरन hi पता लग जाएगा. काम सही होगा तोह तुम्हारा हाथ बगी सही होगा.

बलहार : M-Mein समझ गया. तुम उसकी टेंशन मत लो. मुझे स्लोगन की जो भी इनफार्मेशन पता लगेगी, में वो भेज दूंगा.

वीर : हम्म! गुड! फ़ोन ट्रैकिंग का ध्यान रखना. स्लोगन तेज़्ज़ है. कही तुम्हारे पीछे आदमी न लगा के रखा हो.

बलहार : नहीं नहीं! टेंशन मत लो. में फ़ोन का बोहत ध्यान रखूँगा. और रही बात आदमी की तोह... स्लोगन हमसे डायरेक्टली बात नहीं करता. वो बस स्टीव को कहता है. और स्टीव हम सबको आर्डर देता है. और फिर हम अपने आदमियों को लेकर काम करते है उसके लिए.

वीर : ओह्ह्ह्ह! ी सी! अन्य्वयस! तुम जैसे hi खबर मिले मुझे भेज देना.

बलहार : Th-Theek है. वो... मेरा हाथ!?

वीर (स्माइल्स) : काम होते hi तुम्हारा हाथ भी सही कर दूंगा. और यदि स्लोगन को मेने हंट किया... तोह फिर उसका पूरा एरिया तुम्हारा. उसकी सत्ता तुम्हारी. पर ध्यान रहे... तुम मेरे अंदर में hi काम करोगे तब भी...

बलहार : यदि... यदि तुमने जो कहा वो सच होता है तोह... तोह मुझे कोई आपत्ति नहीं.

वीर (स्माइल्स) : गुड थें! खबर का इंतज़ार रहेगा मुझे....

*कॉल एंड्स*

वीर ने कॉल कट किया और सामने की ऑर्डर चल दिया. जहा निधि ma'am का केबिन था.

***

*बंग*

निधि ने अपनी टेबल पर दोनों हाथ पटकते हुए वीर को देखा.

"वीर क्या है ये सब!? हाउ कैन यू बे सो कारेफ़री? भरी क्लास में मुझे चॉकलेट दे रहे हो? तुम उस वक़्त मुझसे कोई हिंट भी मांग सकते थे. ी कुड हैवे टोल्ड यू. थोड़ी बोहत हिंट सभी टीचर्स दे देते है. मुझे तोह पता भी नहीं तुमने सोलूशन्स सही किये है या नहीं? यदि तुम फ़ैल हुए तोह क्या जवाब दूंगी में तुम्हारी भाभी को? अरे में खुद को क्या जवाब दूंगी? व्हाई don't यू लिसेन...!?"

वो बोलती जा रही थी लेकिन...

लेकिन वीर शर्माते हुए अपना चेहरा साइड किये हुए था.

निधि : हँ??

निधि ने जैसे hi फिर नीचे देखा तोह उसके खुद के गाल गुलाबी हो गए. टेबल पर झुकने से उसकी साड़ी का पल्लू नीचे गिर चूका था. और उसका आधे से ज़्यादा क्लीवेज उस नीले ब्लाउज के बाहर नज़र आ रहा था.

चूडियो की khan-khan हुई तोह वीर समझ गया की निधि ma'am अपना पल्लू सही कर रही है. और khan-khan के ख़तम हो जाने के बाद वापस से वीर ने अपना चेहरा सामने कर लिया.

वीर : मेने पेपर अच्छे से hi दिया है ma'am. Don't वोर्री!

निधि कुछ न बोली वो बस मुद के कड़ी हो गयी. शायद अपना चेहरा छुपाना चाह रही थी. और शायद ये भी कहना चाह रही थी की वीर अब यहाँ से जा सकता है. उससे और कोई बात नहीं करनी.

पर अगले hi पल...

"आअह्हह्ह्ह्ह!!!!!" निधि पूरी तरह भौचक्की रह गयी जब वीर ने उससे पीछे से अपने आलिंगन में ले लिया. उसके मज़बूत हाथ जोरर से उसके नग्न पेट पर कैसे थे.

छटपटाते हुए उसने वीर की पकड़ चुर्राने की कोशिश की पर उसका विरोध तब रुक गया जब वीर ने उसके कान में कहना शुरू किया,

"ी क्नोव एवरीथिंग. आप जान बुझ के मेरे बगल से आ रही थी और जा रही थी. ये देखने के लिए की हाउ ी वास् दोंग. राइट? फिर आयुषी ma'am को आपने रोक दिया, और खुद hi सिग्न करने लगी. इन ा होप की आप मेरा पेपर देख पाओगी. की कही में कुछ गलत तोह नहीं कर रहा, राइट? Ma'am..."

निधि की सासें तेज़्ज़ चल रही थी. वीर की गिरफ्त में उसका सीना तेज़्ज़ी से ऊपर नीचे हो रहा था. और इस बार, वीर को पीछे से निधि का पूरा क्लीवेज नज़र आ रहा था. पर इस बार उसने अपनी नज़रे नहीं हटाई. उल्टा अपनी पकड़ और मज़बूत कर दी.

वीर : व्हाई दो यू केयर सो मच? तेल्ल में!!! मेरे लिए इतनी परवाह क्यों??? आंसर में!!!!

वीर ने ुचि आवाज़ में पूछा तोह निधि हिल के रह गयी. और उसके मैं में जैसे सन्नाटा सा छ गया. सब कुछ शुन्य हो गया.

क्यों? वीर की इतनी परवाह क्यों करती है वह? हाँ सही hi तोह पूछा वीर ने. आखिर इतनी परवाह क्यों करती है वो एक स्टूडेंट के लिए?

वीर : यू क्नोव थिस राइट? की ये बिलकुल भी नार्मल नहीं है. ऐसा कोई टीचर नहीं करता. ेस्पेशलय ा फीमेल टीचर... की किसी मेल स्टूडेंट की इतनी परवाह करे. तेल्ल में! इतनी केयर क्यों करती हो आप मेरी? हाँ!? घर पे रुकवाना, कॉलेज में साथ में एक hi गाडी में आना बिना अपनी इमेज की परवाह किये, मेरे हर्र बार ज़ख़्मी होने पर मुझसे मिलने आना, कई बार तोह कॉलेज से hi लीव लेना, बार बार मुझे पढ़ाई को लेकर आगाह कराना, सुख दुःख सबमे शामिल होना... क्यूँउउउउ??? आंसर में!!!!!

निधि का शरीर thar-thara के काँप रहा था अब.

वीर : यू don't वांनै आंसर? तोह मुझे बताने दीजिये... बिकॉज़ ी क्नोव थे आंसर.

*बेदुम्प* *बेदुम्प*

हर्र गुज़रते पल, निधि का सीना ऐसे ऊपर नीचे हो रहा था जैसे मानो अभी सीने में से उसका दिल बाहर आ जाएगा. न जाने वीर के शब्द क्या होंगे? क्या मतलब उससे उत्तर पता hi की क्यों वो वीर की इतनी परवाह करती है!? जब उससे खुद नहीं पता इसका जवाब तोह भला वीर को कैसे पता होगा?

वीर : It's बिकॉज़... यू!!!!!! यू लिखे में!!!!

*बोओओओओओओममममम*

और ये वाक्य एक बेम की तरह फटा निधि के कानो में.

वीर : एंड लेट में तेल्ल यू ओने मोरे थिंग... वो ये की... ी लिखे यू अस वेल!!!

पहले का शॉक काम था क्या जो वीर ने अपनी अगली बात रख उससे और एक बड़ा झटका दे दिया.

वीर इस से पहले की आगे कुछ कह पाटा, निधि ने उससे जोरर से धक्का दे दिया...

"लीव में ालुओंणनी!!!!" वो चिल्लाई.

"Ma'am!????"

"ी साइड लीव में अलोन!!!! गेट ोूउऊउत्तत!!! गेट ऊऊउत्तत!!!"

वीर भौचक्का सा वही जम्म गया था.

'No... no वे!!'

वीर तोह बस एक टेस्ट कर रहा था. वो ये बात जानता था की उससे निधि ma'am पसंद है. और शायद निधि ma'am भी उससे पसंद करती थी. पर वीर सूरे नहीं था. इसलिए, आज उसने अपने दिल की बात तोह कही hi, पर साथ hi...

उसने ये भी कह दिया की निधि ma'am भी उससे पसंद करती है. और जैसे hi निधि ने उससे धकेला, निधि का वो ोुतबुरसत, उसका विरोध करना, उससे भगाना और रोना...

वीर समझ चूका था.

की वो सही था.

'No वैयय्यी!!! इसका मतलब... Ma'am मुझसे!??'

वो आँखें फाड़े निधि को घूरता रहा.

"ी साइड गेट ोुत्तत्त! राइट नौवव्व!!!"

और इस बार मजबूरन उससे बाहर जाना hi पड़ा.

निधि, वीर के जाने के तुरंत बाद वाशरूम में गयी और दूर बंद कर... फूट फूट कर रोने लगी.

'He's लाइंग!!! सब झूठ है. There's नथिंग बिटवीन उस!!!!! ी don't लव हिम... नेवर!! ी don't लिखे हिम! ी don't लव हिम ात आल! He's लाइंग!!!! कुछ भी कह रहा है वह... कभी नहीं हो सकता ऐसा... I'm आलरेडी मैरिड... There's नथिंग...!!!!'

वो खुद को सांत्वना देने की कोशिश करने लगी.

पर, हर्र बार वो मैं hi मैं खुद से hi हार रही थी. क्युकी बार बार वीर के संग गुज़ारे पल उसके दिमाग में आ रहे थे.

'न्यूऊऊ!!!! ी DON'T लव हिम!!!!!!'

वो फिर मैं में चींखी...

पर कोई फायदा नहीं.

वीर से मिलना, उसके संग रहना, बातें करना, कॉलेज जाना, शॉपिंग करना, उसकी परवाह करना, उसके लिए कपडे लेना, दूसरी लड़कियों को उसके संग देख दिल में पीड़ा होना...

ये सब जैसे जैसे निधि को याद आता जा रहा था. उसके ासु और भी तेज़्ज़ बहते जा रहे थे.

बिकॉज़ शी कनेव...

वीर वास् राइट!!!

शी लव्स हिम!!!!

'Noooooooooo!!!!!!!'

अपने हाथ को दूर पर मारते हुए वो सर्र झुकाये कड़ी रही.

ासु बहते हुए ज़मीन पर गिर रहे थे.

वो एक शादीशुदा महिला थी. दो बच्चो की माँ थी. 30 साल की उम्र थी उसकी. और वीर मात्र 21 का. 9 साल का गैप. वो उसकी टीचर थी. वीर बस उसका स्टूडेंट. उन् दोनों के बीच ऐसा कही से भी कुछ नहीं होना चाहिए था.

उसके बावजूद...

आईटी हप्पेनेड!

चाह के भी निधि उससे अपने दिमाग से नहीं निकाल पाती थी. उसका हस्ता मुस्कुराता चेहरा हर्र बार उसके दिमाग में आ जाता था.

'नहीं!!!! ी कन्नोत... ी don't लव हिम! वो मेरा बस एक स्टूडेंट है. आम स्टूडेंट्स की तरह. और में एक टीचर. हमारे बीच एक प्रोफेशनल रिश्ता है. फॉर्मल रिलेशनशिप. नथिंग ेल्स. There's नथिंग बिटवीन उस. फ्रॉम नाउ ों... ी विल ट्रीट हिम जस्ट लिखे अन्य इतर स्टूडेंट. That's राइट! ऐसा hi होना चाहिए! यस! I'm राइट! ऑफ़ कोर्स!!!!'

अपने आसुओ को पॉच वो कुछ देरर बाद वाशरूम से बाहर निकल गयी.

और वीर के मैं में तभी फिरसे एक घंटी बजी,

*डिंग*

[Nidhi's favourability has been reduced to 40.]

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आज के लिए इतना hi गाइस!

धन्यवाद!

नाउ थे रीज़न क्यों नाईट में नहीं आया अपडेट. वो इसलिए बिकॉज़ रात में टाइप करते वक़्त, माय आईज वेरे हर्टिंग, सो ी डीडेड तो टेक माय स्लीप फर्स्ट. एंड थें तो पोस्ट थे अपडेट इन थे मॉर्निंग.
बस, यही रीज़न था.

अन्य्वयस, अपना अपना काम करके जाने का. और कमैंट्स रखने का. ✨
 
अपडेट - 72 ~ डाइवोर्स!

अब तक...

'नहीं!!!! ी कन्नोत... ी don't लव हिम! वो मेरा बस एक स्टूडेंट है. आम स्टूडेंट्स की तरह. और में एक टीचर. हमारे बीच एक प्रोफेशनल रिश्ता है. फॉर्मल रिलेशनशिप. नथिंग ेल्स. There's नथिंग बिटवीन उस. फ्रॉम नाउ ों... ी विल ट्रीट हिम जस्ट लिखे अन्य इतर स्टूडेंट. That's राइट! ऐसा hi होना चाहिए! यस! I'm राइट! ऑफ़ कोर्स!!!!'

अपने आसुओ को पॉच वो कुछ देरर बाद वाशरूम से बाहर निकल गयी.

और वीर के मैं में तभी फिरसे एक घंटी बजी,

*डिंग*

[Nidhi's favourability has been reduced to 40.]


अब आगे...

कल निधि ma'am से मुलाक़ात के बाद, वीर के लिए कुछ भी फलदायक नहीं था. न केवल वीर निधि ma'am के संग अपना रिश्ता सुधारने में नाकाम था. बल्कि, निधि ma'am की फवौराबिलिटी उसके प्रति और भी गिर चुकी थी. 58 से सीधा 40 पर आ चुकी थी फवौराबिलिटी. वो और उदास थी उस से.

निधि ने डीडे कर लिया था की वो वीर से अब ज़्यादा मतलब नहीं रखेगी, न hi ज़्यादा मिलेगी और न hi ज़्यादा बात करेगी. एक प्रोफेशनल रिश्ता hi बना के रखेगी वो खुद के और उसके बीच.

वीर जानता था सब कुछ. वो जानता था की निधि ma'am के मैं में उसके लिए कुछ तोह है. पर वो उन् फीलिंग्स को एक्सेप्ट नहीं करना चाहती. वो ये भी जानता था की अब निधि ma'am उस से दूर भागेंगी. उस से काम बात करेंगी. ये बहाना देंगी की वो एक स्टूडेंट टीचर है और उन्हें इतना फ्रेंडली नहीं होना चाहिए. उसने तोह पहले hi आने वाले इन्सिडेंट्स के बारे में इमेजिन कर लिया था.

पर ये सब जानते हुए भी वीर अभी पिस्सेद था.

वो पिस्सेद था इसलिए क्युकी निधि अपने इमोशंस को एक्सेप्ट नहीं कर रही थी. एक तरफ करा थी जो अपने इमोशंस को फील करने के लिए अथक प्रयास कर रही थी. तोह वही निधि थी जिसके पास इमोशंस होते हुए भी, वो उन्हें धाक कर अपनी फीलिंग्स को छुपा रही थी. और यही बात वीर को डिसअप्पोइंट कर रही थी.

स्टिल, वो शांत था. हे वास् कलम. थैंक्स तो हिज 95 इंटेलिजेंस. उसने साड़ी बातें परख ली थी. और उन्हें कैसे डील करना था ये भी सोच लिया था. निधि ma'am भले hi उस से दूर भागे. वीर ने डीडे कर लिया था की एक दिन वो उन्हें उनके इमोशंस के आगे हवा के रहेगा. और वो दिन दूर नहीं जिस दिन निधि खुद आके उस से अपने दिल की बात कहेगी.

पर फिलहाल, उसका अटेंशन इस वक़्त कही और ज़रूरी था. नाहा धोने के बाद वो अपने रूम से निकला और मैं हॉल में आया जहा सुमन, रागिनी, आभा और सोनाली सभी उसका hi इंतज़ार कर रही थी.

रागिनी : बैठो वीर!

रागिनी ने उससे इशारे करते हुए बैठने को कहा.

वीर बैठा. वो तोह पहले से hi जानता था की रागिनी ने यहाँ सभी को सुबह सुबह क्यों बुलाया था. बस वो इंतज़ार कर रहा था.

रागिनी : जैसे दादा जी ने अपना निर्णय लिया और वो अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हो गए...

कहते हुए उसने एक नज़र सब पर डाली फिर एक लम्बी सास लेते हुए कंटिन्यू की,

रागिनी : वैसे hi मेने भी अपने जीवन का फैसला ले लिया है. आप सब को में अपना मानती हु. अपना परिवार मानती हु. इस घर के सदस्य है आप सब. और इसलिए, में आज आप सब के साथ अपना निर्णय साझा करना चाहती हु.

सुमन ने एक नोद देते हुए रागिनी को इशारा किया की हम सब सुन्न रहे है. आप कहते जाइये.

रागिनी (नॉड्स) : काफी कुछ सोच विचार करने के बाद, खुद से लाख बार सवाल करने के बाद, में फाइनली इस निर्णय पर पहुँच चुकी हु की...

सबकी नज़रे उसके ऊपर hi तिकी हुई थी इस वक़्त. रागिनी भी बारी बारी सभी को देख रही थी. उसके बाद बिना कोई संकोच किये वो बोली,

रागिनी : की... में विवेक को डाइवोर्स दे रही हु!!!

*साइलेंस*

और कुछ देरर तक बस खामोशी छायी रही. कोई कुछ नहीं बोलै. वीर बस मुस्कुराया जैसे उससे पता था की रागिनी यही फैसला लेगी.

न जाने कितनी रातो को वो जब जब अपने कमरे की ऑर्डर जाता था तब तब रागिनी के कमरे के अंदर से उसकी रोने की आवाज़ उससे अक्सर सुनाई दे जाय करती थी. कमरे में सिकुड़ कर न जाने कितनी रातें रोके गुज़ारी थी रागिनी ने. पर अब और नहीं. ज़िन्दगी में आगे भी बढ़ना था उससे.

और वीर जानता था की रागिनी इसी क़दम को चुनेगी. स्टिल, यदि वो इसका उल्टा फैसला भी लेती तोह भी वीर उसका साथ देता. क्युकी अब तक रागिनी उसके संग उसके हर्र कदम पर साथ दे रही थी. बदले में इतना तोह करना बनता hi था.

सुमन आँखों में चमक लिए फौरन hi उठ के आयी और रागिनी के कंधे पर हाथ रख उसके बगल से बैठ गयी,

"आपने एकदम सही निर्णय लिया है रागिनी जी! में बोहत खुश हु आपके इस फैसले से. अब आप खुल के अपना जीवन व्यतीत कर सकती है. आपको अब कोई बंदिश नहीं. यदि आप वापस जाती तोह ज़ाहिर है की आप उस निराशा से कभी बाहर नहीं निकल पाती. पर अब... अब सब कुछ बेहतर हो सकता है."

सुमन की बात सुन्न रागिनी मुस्कुरायी पर उसके चेहरे पे वापस से मायूसी छ गयी थी. उसकी उदासी को महसूस करते हुए सुमन फिर बोली,

"और... और मुझे विशवास है की कोई आपसे बेहद प्यार करने वाला आपके जीवन में जल्द hi खुशियों के रंग भर देगा. देखना..."

सुमन ने वीर को देखते हुए ये बात बोली.

'हम्म?'

सुमन : क्यों है न? वीर जी!?

वीर : !?? हाँ! O-Of कोर्स!

रागिनी स्तब्ध निगाहो से वीर को देखि और फिर हलकी मुस्कान लिए नीचे देखने लगी. उसके गाल हलके गुलाबी थे, न जाने क्या सोच रही थी.

पर इतना ज़रूर था की वो पहले से काफी बेहतर महसूस कर रही थी.

आभा और सोनाली तोह बस चुप चाप बैठी रही शुरू से अंत तक. उनके कहने या न कहने से वैसे भी कुछ नहीं होने वाला था. और न hi वो इतनी एक्सपेरिएंस्ड थी इन् मामलो में.

***

Veer's ओल्ड होम...

वीर के पुराने घर में इस वक़्त अपने कमरे में प्रांजल बैठे हुए था. डायरी में न जाने क्या लिख रहा था.

पर उसके चेहरे के भाव बड़े hi खौफनाक थे इस वक़्त.

'वीएररर!!!! हाउ डरे यू...!!!!? हम्म~ नीस... नीस... ी सी!! तोह ऐसा है सब कुछ हाँ? वीर!!!! तुम्हे ऐसा नहीं करना चाहिए था. न केवल तुमने मेरा मज़ाक बनाया बल्कि, मेरी पूरी प्लानिंग पर तुमने पानी फेर के रख दिया... दमन ोूउउ वीरररर!!! में तुझे चोरडूंगा नाहीई!!!'

प्रांजल जो अपने गुस्से को काबू में करने की कोशिश कर रहा था, उसका गुस्सा हर्र गुज़रते पल बढ़ता hi जा रहा था. जैसे hi वो आँखें बंद करता, उसके सामने वही बैंक्वेट में हुआ शर्मिंदगी वाला नज़ारा सामने आ जाता. कितना ेम्बरसेद होना पड़ा था उससे वह. आज तक अपनी पूरी ज़िन्दगी में प्रांजल ने कभी इतनी शर्मिंदगी महसूस नहीं की थी.

और ये सब किसकी वजह से हुआ था? खाली एक वीर की वजह से. वो वीर, जिससे प्रांजल बचपन से उल्लू बनाता आया था, आज उसमे इतनी हिम्मत आ गयी थी की वो पलट के उसका मज़ाक बना सके? वो भी सब के सामने?

प्रांजल का खून खौल रहा था उस मंज़र को याद कर कर के.

पर प्रांजल भी कोई कच्चा खिलाड़ी नहीं था. वो ऐसा सांप था जो अपने अंडे एक hi बिल में कभी नहीं रखता था. दूसरे शब्दों में, उसके पास कई पैतरे थे. यदि वीर ने उसके प्लान का पर्दाफाश भी कर दिया था तोह भी उसके पास कई उपाय थे.

इन फैक्ट, प्रांजल अब और चौकन्ना हो गया था. उससे पता लग चूका था की वीर एक्टिव है इन् मामलो में और अब बोहत hi बारीकी से जाल बिछाना पड़ेगा.

'हम्म~ बदला तोह में लूंगा वीर! तुमने ये वैसे अच्छा किया जो मुझे आगाह कर दिया. हर्र एक बेइज़्ज़ती का बदला लूंगा में. अब तक में छोटी मछलियों को पकड़ने में लगा हुआ था. पर अब मुझे सबसे पहले बड़ी मछली पकड़ के उससे पानी में से निकालना पड़ेगा. उसके बाद... I'll डील विथ यू!!! क्युकी, पहले पैसा ज़रूरी है. वन्स I'll हैवे तहत... तुमसे निपटना फिर चुटकियो का खेल होगा मेरे लिए.'

सोचते हुए उसने डायरी में जोरर से अपना पेन पन्नो में खास दिया.

***

आतिश' हिडौट 5...

टाइम : 8:13 पं

"क्या सब आ गए?"

ये आवाज़ थी स्लोगन की जो कुर्सी पर बैठे हुए था. चेहरे की चिंता साफ़ बता रही थी की वो यहाँ कुछ सीरियस डिसकस करने hi आया था.

वेयरहाउस था ये आतिश का एक प्रकार से. उसका अड्डा नंबर 5. अक्सर वो बड़ी डील्स यही किया करता था. क्युकी, ये जगह काफी सेफ थी.

स्लोगन के समक्ष बैठे स्टीव ने हां में गर्दन हिलायी और अपनी बात राखी,

"आ गए है सब दादा. आप बताइये. जो भी ऑर्डर्स होंगे में वो सब आदमियों को समझा दूंगा."

स्लोगन : हम्म! उसके पहले... ये गिलास भरवाओ पहले.

स्टीव : जी! बलहार, इधर आओ!!!!!

स्टीव ने बलहार को जोरर से चिल्लाया तोह वो पीछे से आया और उसके हाथ में एक जग था.

स्टीव और स्लोगन दोनों hi बातें कर रहे थे. और बलहार नज़रे नीचे किये गिलास में बियर भर रहा था.

पर तभी जैसे जिस बात का उससे डर था वही हुआ,

स्टीव : हम्म? तुम तोह राइट हैंडेड थे न? ये बाए हाथ से क्यों सर्वे कर रहे हो?

ये सुनते hi बलहार के चेहरे से उसका रंग उड़द गया. वाक़ई! स्टीव बोहत शार्प था. ऐसे hi नहीं उसको अपना राइट हैंड बना के रखा हुआ था स्लोगन ने. स्टीव की बात सुन्न इस बार स्लोगन ने भी उससे देखा. और दोनों की नज़रो को अपने ऊपर महसूस कर, बलहार के पसीने छूटने लगे थे.

बूत थैंक्स तो वीर, की उसने पहले hi उससे इस बारे में आगाह कर दिया था. सो हे चामे प्रेपरेड़. उससे पता था की उससे क्या बोलना था.

बलहार : स्टीव भाई! जिस दिन हम सभी उस वीर को पकड़ के लाये थे. और, फिर बाद में उनकी गैंग आ गयी थी. तब अड्डे से भागते टाइम में और मेरे आदमी उनके आदमियों से भीड़ गए थे. और... उसी लड़ाई में... ये सब हो गया. मेरा हाथ मुद गया.

स्टीव : ओह्ह्ह! तोह अब तक ट्रीटमेंट क्यों नहीं लिया?

बलहार : जब तक उस वीर की खटिया न कड़ी कर दू तब तक मुझे चेन्न नहीं आएगा स्टीव भाई. उसी के कारण ये सब हुआ है.

स्लोगन : ठीक है! तुम जा सकते हो.

बलहार : जी!

और बलहार पीछे जा के खड़ा हो गया. स्लोगन को पता नहीं क्यों, पर कुछ ठीक नहीं लगा.

स्लोगन : स्टीव! हमे कुछ करना होगा. जल्द hi.

स्टीव : कहिये दादा!

स्लोगन : वो जगह...

स्लोगन ने सीधा स्टीव की आँखों में देखते हुए कहा. स्टीव बस दो शब्द सुनते hi मौन रह चूका था.

स्टीव : क्या वही पर...!?

स्लोगन : हां वही पर...

स्टीव : समझ गया दादा! पर आप वह पर सारा इंतज़ाम करोगे कैसे? उस लड़की को...!?

स्लोगन : प्लान ऐसा है की...

स्लोगन अपनी साड़ी बातें रखता जा रहा था पर उससे नहीं पता था की बलहार वही पीछे खड़ा हुआ क्या कुछ नहीं कर रहा था.

स्लोगन अपने जीवन काल में इतनी डॉट्स को एस्केप किया हुआ था की उससे खतरे का आभास हो जाता था. ऐसे hi नहीं वो इतने साल तक ज़िंदा था. इतने बड़े खतरों से लड़ने के बावजूद वो हर्र बार ज़िंदा बच जाता था. क्युकी उससे एक्सपीरियंस था. वो खतरे को भांप लेता था.

आज भी स्टीव से बातें करते हुए, उससे कुछ अजीब लगा. तोह उसने फौरन hi कहा,

स्लोगन : स्टीव!!

स्टीव : जी दादा!

स्लोगन : इस बलहार को बाहर जाने को कहो.

स्टीव : बल्हाअररर!!! बाहर जाओ!

बलहार : जी स्टीव भाई!

वो बिना कुछ कहे बाहर निकल गया. जैसे उससे जो चाहिए था, वो उससे मिल चूका था. उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी.

स्टीव : क्या हुआ दादा? कुछ बात है क्या?

स्लोगन : नहीं! ये बलहार...

स्टीव : बलहार अपना hi आदमी है दादा. आतिश भौ के अंदर hi वो सालो से काम करता आया है. वो गद्दारी नहीं करेगा, जहा तक मुझे लगता है. पर क्या आपको कुछ डाउट है?

स्लोगन : हम्म! इस बलहार की पूरी जानकारी लो. मोबाइल फ़ोन से लेके सब कुछ. मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा.

स्टीव : जैसा आप कहे!

और इसी के साथ स्लोगन ने वो मीटिंग वही समाप्त कर दी. आज उससे कुछ गड़बड़ महसूस हो रही थी. और इसलिए उसने स्टीव को भी उस बलहार की इन्फो निकालने का काम सौप दिया.

पर किस जगह की बात कर रहे थे ये स्टीव और स्लोगन? हो न हो, स्लोगन कुछ बड़ा hi सोच के आगे बढ़ रहा था. कुछ ऐसा जो इस बार उससे उसके मक़सद तक पहुचा सकता था.

***

Ragini's पोव...

आज! आज मेने अपने जीवन का एक बोहत hi अहम् फैसला लिया था. विवेक से तलाक!

में हर्र रात जागती और मेरे खयालो में वो मज़ार मंडराता रहता था.

"M-Mujhe चोरर दो... मुझे मत मारो!"

विवेक के वो शब्द जो उसने उस गुंडे से कहे थे जब उस गुंडे ने ये पूछा था की किसकी जान लू? तोह विवेक मेरा अपना पति अपनी जान की भीख मांग रहा था. बिना मेरी कोई परवाह किये.

क्या कुछ नहीं किया था मेने उसके लिए? उस से प्यार किया. उसके कहने hi पे में दो साल तक रुकी रही हमारी शादी के लिए. मेरे डैड T.V.S के शोरूम्स के मालिक थे तोह मेने उसकी ऑटोमोबाइल्स की कंपनी में कितनी मदद करवाई थी उन् से.

ऑफ़ कोर्स में ये सब बातो को गिनती थोड़ी थी. क्युकी में सब कुछ हमारे लिए hi तोह कर रही थी. शादी हुए अभी हमे कुछ hi महीने तोह हुए थे. उसके कहने पर में अभी माँ भी नहीं बानी थी.

क्युकी वो चाहता था की अभी हम लाइफ को और एन्जॉय करे थोड़ा. और में भी मान गयी थी.

उससे चाहिए थी प्रॉपर्टी. तोह देवर प्रांजल के साथ मिलकर वो दोनों कुछ खिचड़ी पकाते रहते थे और मुझे बिना बताये hi हर्र बार प्लान में शामिल कर लेते थे. में भी यही समझती थी की ये जो भी मटर है जल्द hi निपट जाएगा और में अपना प्यारा जीवन उसके संग व्यतीत करुँगी.

वीर! मेरा देवर! उसके खिलाफ hi हम सब षडियंत्र रचते थे. में तोह बस नाम के लिए उनके प्लान में हुआ करती थी. मुझे तोह सब कुछ अक्सर बाद में पता चलता था की ये सब आखिर करते क्या थे. शुरू में मुझे ऐसा लगता था की शायद वीर वाक़ई एक भोंदू इंसान है. पर में गलत थी.

उस रात जब मेने साड़ी उम्मीद चोरर दी थी. उस रात वही वीर किसी फ़रिश्ते की तरह मुझे बचाने आया था. में... जो उसके खिलाफ रहती थी. मुझे बचाने आया था वह. उस रात मुझे पता लग चूका था की एक सच्चा असली इंसान केसा होता है. वो था वीर! विवेक नहीं! विवेक ने तोह मेरे दिल को चूर चूर कर के रख दिया था. सारे अरमान मेरे, मेरे सपने, सब कुछ एक hi झटके में उसने बिखेर के रख दिए थे.

और में कठपुतली की तरह उसके हाथो में नाचती रही. काश मुझे ये बातें पहले समझ आ जाती. खर्र! गलती तोह इंसान से hi होती है न? मुझसे भी हुई. और अब में उससे सुधारूंगी.

आज hi न केवल मेने वकील को बुला लिया था बल्कि में वीर और बाकी सभी के संग सीधा अपने माता पिता को लेके विवेक के घर भी गयी थी.

इतनी कहा सुनी हुई, काफी देरर तक मुझे उसके घरवाले मनाते रहे. मेरे माँ डैड बोहत सपोर्टिंग थे. उन्होंने पूरा डिसिशन मेरे पे चोरर दिया था. आज वो विवेक गुस्से में मुझे चिल्लाता रहा, तोह कभी रट हुए गिड़गिड़ाता रहा. पर में टास से मास्स न हुई. साला ऐसे इंसान पे कैसे भरोसा कर सकती थी में.

पता नहीं क्यों, पर मेरी नज़रे विवेक को चोरर आज वीर पे ज़्यादा जा रही थी. वो खामोश सा बस मेरे हर्र फैसले में मेरा साथ दे रहा था. ये होती है मातुरित्य. सच कहु तोह वीर एक जेंटलमैन था.

हाँ थोड़ा नटखट था, अक्सर वो बातें भी कह देता था जो औरतो के लिए एप्रोप्रियेट नहीं होती थी. पर... धीरे धीरे उसमे चेंज आ रहा था. और बोहत hi बेहतर चेंज आ रहा था. आल इन आल, हे कनेव हाउ तो ट्रीट ा वुमन.

विवेक के परिवार के लाख मनाने पर भी में न मानी और मेने डाइवोर्स के पेपर पर सिग्न कर दिए थे. शायद विवेक को भी पता था की अब वो मुझे कभी नहीं मन सकता, तोह उसने भी बेमानन पेपर्स पर सिग्न कर दिए.

अब तोह बस फॉर्मलिटीज hi बची थी. जो कुछ दिन में hi हो जाने वाली थी. मैं चीज़ तोह सिग्न hi थे और दोनों तरफ की रज़ामंदी.

उस घर में तोह जैसे मातम सा छ गया था. घर के दो सदस्य घर जो चोरर चुके थे. में और वीर. दो भी नहीं, तीन. वीर की असली माँ भी तोह नहीं थी. मुझे उनके बारे में कोई जानकारी नहीं थी. कितनी hi अजीब बात थी. उनसे रिलेटेड कोई भी चीज़ नहीं थी घर में. न कोई फोटो, न कोई ज़िक्र उनका. न जाने बेचारे वीर को कितनी तड़पन होती होगी अपनी माँ को लेकर. बेचारे को कभी माँ का प्यार नहीं मिल पाया था. माँ का क्या कभी ठीक से उससे परिवार का प्यार नहीं मिला.

इसलिए मेने उससे अपने संग रखने की सोची थी. I'll गिव हिम ा फेमिलियल लव.

आज में बेहद खुश थी. थोड़ा मायूस भी थी पर उस से भी ज़्यादा ख़ुशी थी. ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने दिल से काफी वजनी भार को उठा लिया हो.

अब में आज़ाद थी. अब में उन् रातो को हमेशा हमेशा के लिए भूलना चाहती थी.

और इसलिए, आज मेने सब कुछ हटा दिया. साड़ी उतार दी, मंगल सूत्र हटा दिया, मांग में से सिन्दूर हटा दिया, अपने हाथो से चूडिया निकाल दी. आज में बस एक शाइनिंग ब्लैक टॉप और ब्लू जीन्स में थी.

में बिलकुल कॉलेज की लड़की लग रही थी. ऐसा लग रहा था की में आरोही और काव्य की कॉलेज की सहेली हु. जैसे hi में इस रूप में बाहर आयी, मेरी नज़रे वीर के चेहरे पर hi थी. केसा रिएक्शन होगा उसका?

और जैसे hi उसने मुझे देखा...

'हाहाहाःहाहा~' मेरी मैं hi मैं हस्सी चूत गयी. हे वास् सो क्यूट. फुफु~

उसका मुँह खुला हुआ था. वो आँखें फाड़े मुझे देख रहा था. में भी जैसे नेज नवेली गर्लफ्रेंड की तरह पूरा घूमते हुए उससे अपना लुक दिखा रही थी.

'जस्ट स्टॉप आईटी! व्हाट वास् ी इवन दोंग!?'

"K-Kaisi लग रही हु में?" मेरे सवाल पर वो मौन रह गया था. फिर तकदा हड़बड़ाते हुए जवाब दिया था उसने.

"B-Bhabhi!?? यू लुक वंडरफुल!!!"

"इस तहत सो?? फुफु~"

उसने मेरी तारीफ की थी. पता नहीं क्यों, पर उसके मुँह से तारीफ सुनते hi मेरा मैं प्रफुल्लित हो उठा था. विवेक को जब भी में ऐसे दिखाया करती थी अपना लुक तोह वह बस एक लुक देता था और बस यही कहता था, 'यू लुक गुड!'

हर्र बार उसका शामे डायलाग रहता था. पर वीर!? ी कुड फील की उसने दिल से कहा था.

"वीर!!! आज में क्सक्सक्सक्सक्सक्सक्स कैफ़े जाना चाहती हु. विल यू टेक में?"

मेने उस से पूछा. मेरा वह जाने का एक hi मक़सद था.

"O-Okay! चलिए!"

वो राज़ी भी हो गया. कितना स्वीट था वीर. कभी मुझे मन नहीं करता था. हहै~

वो कार की ऑर्डर जा hi रहा था तोह मेने उससे मन कर दिया.

"नहीं वीर! हम बाइक पे चलेंगे!"

"ेहठ!?"

"बाइक पे! तुम जल्दी बाइक निकालो."

"उम्... वेल! Okay!"

उसने फिरसे मुझे मन नहीं किया. ी रियली वांटेड तो गिव हिम ा हुग. हाउ कैन हे बे सो स्वीट?

वही विवेक... तो बे ऑनेस्ट उससे बाइक चलाना hi नहीं आता था. आज तक में उसके साथ बाइक पर कभी नहीं बैठी थी. हमेशा कार में hi रहता था वह.

आज में वीर के ठीक पीछे बैठी हुई थी उसकी बाइक में. आह! बाइक से याद आया, ये बाइक मेने hi तोह उससे गिफ्ट की थी. हे लव्स थिस बाइक सो मच. भले hi उतनी महंगी नहीं थी पर वीर बोहत केयर करता था बाइक की.

में उसके पीछे बैठी, और पता नहीं क्यों पर मेने अपने दोनों हाथ आज उसके सीने में दाल दिए. और उस से भी बड़ी बात की मुझे ऐसा करते वक़्त कुछ भी गलत नहीं लगा.

वीर शायद मेरी इस हरकत से थोड़ा हड़बड़ा गया था पर बोलै कुछ नहीं.

कुछ hi देरर में हम उस कैफ़े के सामने थे. मेरे यहाँ आने के दो hi कारण थे. पहला ये की यहाँ कॉकटेल्स और मॉकटेल्स दोनों hi बोहत अच्छी मिलती थी. दूसरा... वेल! दूसरा कारण भी जल्द hi आने वाला था.

अंदर आने से पहले hi वीर ने मेरे लिए दूर खोला.

'ओह वीर!!! हाउ कन्सिडराते ऑफ़ यू!'

उसने मेरे लिए दूर खोला. विवेक तोह इन् बातो पर कभी ध्यान hi नहीं देता था.

अंदर आते hi हमने देखा. कैफ़े में हर्र जगह कपल्स hi कपल्स थे. हाथो में हाथ लिए वो एक दूसरे से बातें करने में लगे हुए थे. मंद मंद म्यूजिक बज रहा रहा. कैफ़े का अम्बिएंस एकदम रोमांटिक था.

और अपनी टेबल पर आते hi...

'हँ!?? दीद हे जस्ट...!?'

वीर ने मेरे लिए कुर्सी खींची. ताकि पहले में बैठ सकू.

'Don't दो थिस वीर. और कितना स्वीट बनोगे!??' में मैं में चिल्लाई.

वीर मेरे जस्ट सामने बैठा हुआ था और वो थोड़ा उनकंफर्टबले लग रहा था. पर मेरी खातिर वो ये सब कर रहा था. रियली! हे वास् तू स्वीट.

उसके बाद वो उठा और आर्डर देने गया. वो मेरी पसंद जानता था. उससे पूछने की भी ज़रुरत नहीं पड़ी. वही विवेक, मुझ से hi आर्डर देने को कह देता था. उससे फ़र्क़ नहीं पड़ता था की में क्या पी रही हु, मेरी चोइसस क्या है. सच में, दोनों में कितना डिफरेंस था. वीर वास् लिखे ा हस्बैंड फिगर. रियली, कितनी लकी होगी वो लड़की जिससे वीर जैसा लड़का मिलेगा.

*सिघ*

मेने एक आह भरी. यंग होना कितना अच्छा था. सडली, में अपने कॉलेज के दिनों से कई साल आगे आ चुकी थी. िफ़ ओनली ी कुड जो बैक इन टाइम...

थें!?

थें व्हाट?

हु वोउल्ड ी हैवे चूसें?

इस सवाल को सोचते hi मेरी नज़र वीर पे चली गयी जो वह खड़े होक आर्डर दे रहा था.

और उससे देख उसके बारे में सोचते hi मेरे गाल सुर्ख लाल पद गए.

'रागिनी!?? व्हाट अरे यू इवन थिंकिंग?'

उन् बातो को मेने दिमाग से निकाल दिया. वीर आर्डर देके आया और सामने बैठ गया. में उससे hi निहार रही थी. और वो मेरी नज़रो से बच कर इधर उधर देख रहा था. हेहेहे~ शायद शर्मा रहा था.

आईटी वास् सो फन तो तैसे हिम.

जल्द hi हमारा आर्डर भी आ गया. उसने वाटरमैलों फ्लेवर की एक मॉकटेल मंगवाई थी. No अल्कोहल!

और मेने कॉकटेल! माय फवौरीते... सेक्स ों थे बीच!

नहीं नहीं! ये कॉकटेल का नाम था. कुछ और नहीं! इसका फ्लेवर मुझे पर्सनली पसंद था.

वीर जानता था. मेने उससे बताया था पहले, मुझे याद है. और उससे अब तक याद था.

सिप सिप करते हुए हम अपनी अपनी ड्रिंक्स पी रहे थे. पर बेचारा वीर मुझसे नज़रे hi नहीं मिला पा रहा था. हहै~

उसका एक और कारण था. क्युकी, आज मेने ब्लैक क्रॉप टॉप पहना हुआ था. मेरा पूरा नंगा पेट खुले आम नज़र आ रहा था. वीर ने मुझे कभी ऐसे नहीं देखता था. ऑफ़ कोर्स, हे वास् डूम्बफॉउण्डेड.

पता नहीं क्यों, मुझे उससे और सताने का मैं करने लगा.

"वीर~ इधर आओ न! मेरे बगल से बैठो न!"

ी कॉल्ड हिम. और वो मुझे देखने के बाद फिरसे मुझे इंकार किये बिना hi आके बैठ गया. ओह गॉड! व्हाई वास् हे सो क्यूट?

"A-Aaj आप खुश हो भाभी?" उसने पूछा.

"हम्म~ बेहद! आज मेरे दिल से एक बोझ जैसे काम हो गया." मेने जवाब दिया.

पर अब समय आ गया था. मेरे दूसरे मक़सद का...

जिस मक़सद से में यहाँ आयी थी.

मेने कैफ़े के बाहर देखा. रोड के उस साइड hi बोहत बड़ी शराब की दूकान थी. मुझे पता था कोई वह आने वाला था. उसका hi इंतज़ार था मुझे...

और जैसे में सही थी.

उसकी कार आके वह रुकी और वो बाहर निकला.

कौन? कोई और नहीं, मेरी वही पति... पति नहीं, ex-pati... विवेक!!!

और दूकान में जाके उसने एक बड़ी बोतल शराब की ली और कार के पास आके बोनट पे टिक के वो पूरी बोतल गटकने लगा.

ी कनेव आईटी!!! मुझे पता था वो आएगा.

और तभी...

"वीर!" ी कॉल्ड हिम.

"हँ!?"

"अपना हाथ दो." मेने उस से डिमांड किया.

"ेहः!? मेरा हाथ!?"

"हम्म~"

उसने अपना हाथ टेबल के ऊपर रखा और उसके ऐसा करते hi...

मेने उसका हाथ थामा और अपने पीछे से ले जाते हुए सीधे अपनी नंगी कमर पर उसका हाथ रख दिया.

"Bh-Bhabhiiiiiiii!!????" वो हड़बड़ाया. पर मेने उसका हाथ एक पल के लिए भी अपने से जुड़ा नहीं होने दिया.

'एससससससस!!! थिस वास् थे टच ी मिस्ड.. ी वास् राइट!!!!'

और तभी, जिस चीज़ के घटित होने का मुझे इंतज़ार था. वो हो गयी.

विवेक की नज़र हमारे कैफ़े की विंडो पर पड़ी. और हमे देखते hi...

*क्रआआस्स्स्शह्ह्ह्हह्ह*

उसकी आँखें आग बबूला हो चुकी थी. हेहेहे~

एसससससस!!! ी वांटेड तो सी हिम लिखे तहत.

मेने वीर का हाथ और जोरर से कस के अपनी कमर में लगा लिया और विवेक को देखने लगी.

वीर तोह सबसे अनजान था. वो शर्मा रहा था. तोह वही विवेक... उसका सीना गुस्से में ऊपर नीचे हो रहा था.

और वो अगले hi पल वह से भाग के निकल गया.

'एससससससस!!! ओह्ह्ह गॉड! थिस फीलिंग!!! हिज फेस.... ी फील सो गुड!!!!!'

ी अचीवेद व्हाट ी वांटेड तो अचीव.

और यहाँ ये बुद्धू वीर... हहै~ कितना शर्मा रहा था.

ये बुद्धू सोचता था की में अपने कमरे में उस विवेक के लिए रोटी थी. अरे शुरू में ज़रूर रोटी थी. पर केवल विवेक hi एक कारण नहीं था. में तोह इस पगले के लिए रोटी थी.

बिकॉज़ ी कनेव...

ी फेल फॉर हिम!!

इसलिए रोटी थी. की ये गलत है, वगैरह वगैरह. विवेक के वो गंदे लांछन मुझे याद आ जाते. पर उसके बावजूद... ी फेल फॉर थिस गाए.

और यदि विवेक इतना क्लेम मारता hi था. तहत ी वास् हैविंग सम िल्लीकित रिलेशनशिप विथ वीर.

सो व्हाई नॉट!??

I'll शो हिम... थिस टाइम!

फिर मेने वीर को देखा और उसकी चीन पकड़ अपनी ऑर्डर आगे करि.

और उसके गाल पर अपनी लिपस्टिक के निशाँ लगा दिए.

नॉट ों ठोस दमन जूसी लिप्स. उन्हें भी चखूंगी. पर एक एक सीढ़ी चढूँगी में...

आफ्टर आल, वीर कही भागे थोड़ी जा रहा था.

"राइट वीर?"

"हम्म? क्या?"

"फुफु~ नथिंग!"

.

.

.

.

.

.

.

आज के लिए इतना hi गाइस!

कुछ 3 से 4 उपदटेस कहानी में मेल्लो सीन्स चलेंगे. रोमांटिक सीन्स, समवेयर इरोटिका एंड सम डिफरेंट पावस. बूत बोहत hi जल्द एक्शन आने वाला है. I'm दोंग सम वर्क. सम हार्ड वर्क ों ठोस. प्रेपर रहने का एक्शन के लिए. इसलिए अभी इन् मेल्लो सीन्स को एन्जॉय करिये. क्युकी पालक झपकते hi थ्रिल स्टार्ट हो जाएगा.

अन्य्वयस! लिखे करने का और रेवोस रखने का. ✨


धन्यवाद!
 
It's ऑलमोस्ट कम्प्लेटेड. वेट फॉर फ्यू मोरे मिनट्स.
 
अपडेट - 73 ~ हु डरेस तो टच माय प्रॉपर्टी?

अब तक...

I'll शो हिम... थिस टाइम!

फिर मेने वीर को देखा और उसकी चीन पकड़ अपनी ऑर्डर आगे करि.

और उसके गाल पर अपनी लिपस्टिक के निशाँ लगा दिए.

नॉट ों ठोस दमन जूसी लिप्स. उन्हें भी चखूंगी. पर एक एक सीढ़ी चढूँगी में...

आफ्टर आल, वीर कही भागे थोड़ी जा रहा था.

"राइट वीर?"

"हम्म? क्या?"

"फुफु~ नथिंग!"


अब आगे...

वीर जो अधिकतर अनजाने में रागिनी को अक्सर शर्माने पर मजबूर कर देता था, कल रागिनी ने hi उसके होश उदा दिए थे.

वो बदला हुआ रंग रूप, उसका बोल्ड स्टाइल, छोटे कपडे, और बातें करते वक़्त आँखों hi आँखों में देखना और बीच बीच में उसका फ़्लर्ट करना.

वो तोह जैसे कोई और hi लड़की बन्न गयी थी. एकदम से ऐसा बदलाव आ गया था उसमे.

वीर, खुद अल्फा मेल था. पहल वो करता था इन् मामलो में. वो शर्माने वालो में से नहीं था. पर कल हालात hi कुछ ऐसे थे. जिस भाभी को वो हमेशा साड़ी में देखते हुए आया था, वो कल अचानक से छोटे कपड़ो में उसके इतना क़रीब आ गयी थी की उसके अंतर्मनन में हलचल सी मच गयी थी.

कल रात के उन् मोमेंट्स के बाद से वीर को रागिनी की फवौराबिलिटी में भी सिग्नीफिकेंट राइज देखने को मिला था. 70 से सीधा 80 पर आ चुकी थी रागिनी की फवौराबिलिटी.

और यही बात वीर को चिंता में दाल रही थी. कल रागिनी के हाव भाव, बिलकुल अलग hi थे. ऐसे थे जैसे वो मानो वीर की अर्धांगिनी हो.

मैं में भला कौन खुश नहीं होगा की आपकी भाभी आपके क़रीब रहे. पर असल में? क्या आप सबकी नज़रो का सामना कर पाएंगे जब आपकी भाभी ऐसे आपके क़रीब आ जाए? शायद नहीं!

वीर का भी यही हाल था. रागिनी वास् गेटिंग तू क्लोज. ये एब्नार्मल लगने लगा था अब उससे.

अगले दिन भी वही हुआ, वीर नेक्स्ट पेपर के लिए जब रेडी होक जा रहा था तोह, रागिनी उसकी टाई बांधती, एकदम पास में उसके खड़े होक. उससे रुमाल देती रखने को जो नेअटली फोल्डेड होता था. उसके सॉक्स निकाल के रखती थी. वाच से लेके वाटर बोतल तक. सब चीज़ वो प्रेपर करके रखती वीर के लिए.

अनजाने में रागिनी जो काम विवेक के लिए करती थी वही काम वो अब अपने hi देवर, वीर के लिए करने लगी थी. और इन् साड़ी हरकतों को सुमन बड़े hi ध्यान से गौर करती थी. उसके चेहरे पर बस एक हलकी मुस्कान सजी होती थी ये देखते वक़्त.

आज भी वीर गया हुआ था अपने लास्ट पेपर के लिए कॉलेज. रागिनी आज उसके लिए स्पेशल खाना बनाने में लगी हुई थी. डाइवोर्स की फॉर्मलिटीज भी काफी कुछ कम्पलीट हो चुकी थी. और वो अब पूरी तरह से आज़ाद पंक्षी की तरह थी.

सुमन और आभा मंदिर गयी हुई थी आज. रही बात सोनाली की, तोह वो वीर का फ़ूड ट्रक रन करती थी. कारन की मदद से वीर ने एक ड्राइवर और एक सोनाली के साथ काम करने के लिए फीमेल एम्प्लोयी हिरे कर ली थी.

वो ड्राइवर फ़ूड ट्रक को ड्राइव करता था और सोनाली, अपनी नई एम्प्लोयी के साथ मिलकर कुक करती थी. वीर ने उससे अपनी साड़ी डिशेस समझा दी थी. धंधा वापस से सही चलने लगा था.

वीर सही था. सिस्टम ने उससे सोनाली को बिज़नेस में इन्क्लुडे करने का मिशन शायद इसलिए दिया था. सिस्टम केवल उससे hi नहीं, उसके आस पास के लोगो को भी आगे बढ़ा रहा था इंदिरेक्ट्ली. क्युकी, फ्यूचर में यही सब तोह उसकी मदद करेंगे.

वीर जानता था की सोनाली बिज़नेस संभल तोह लेगी पर अभी इस शेफ ों व्हील्स को और हिट बनाने की ज़रुरत थी. और उसकी प्लानिंग भी वीर कर चूका था.

नार्मल फ़ूड ट्रक से, वो पहले नंबर ऑफ़ फ़ूड ट्रक्स बढ़ाएगा. ताकि इससे एक चैन के रूप में एस्टब्लिश किया जा सके. फिर सिस्टम की शॉप से वो कुछ सीक्रेट डिशेस बुय करेगा, ताकि उसकी डिशेस कोई भी कॉपी न कर सके. वो एंडोर्समेंट्स करवाएगा, अद्वेर्तिसेमेन्ट्स भी. स्पोंसर्स ढूंढेगा ताकि ये और बड़ा बन सके. उसके बाद क्रिकेटर्स की टी शर्ट्स में अपने बिज़नेस का अद्वेर्तिसमेंट. धीरे धीरे वो अपने इस बिज़नेस को एक फ्रैंचाइज़ी के रूप में एस्टब्लिश कर देगा. और फाइनली, उसकी इतर ब्रांचेज दूसरे शहरों में खुलने लगेंगी. और बिज़नेस बस बढ़ता hi जाएगा. यही था वीर का प्लान यदि रोगलय पूत किया जाए तोह.

निधि की प्रॉब्लम के बारे में भी उसने सोच लिया था की क्या करना है. अब तोह बस जल्द hi निधि को वो एक बड़ा सरप्राइज देने वाला था.

***

इस दौरान, सुमन और आभा मंदिर आयी हुई थी भगवान् जी के दर्शन के लिए. घर में वही दोनों hi सबसे ज़्यादा पूजा पाठ वाली औरते थी.

रागिनी भी करती थी, पर सुमन और आभा जितनी नहीं.

जब दोनों दर्शन कर रही थी, तब उन्हें नहीं पता था की कोई था, जो उन्हें देख के उनके hi बारे में बात कर रहा था.

आदमी 1 : वो रही दोनों!

आदमी : 2 : में चोरडूंगा नहीं इससे.

आदमी 1 : में भी... हमारी क्या हालत हो गयी थी इनके कारण. सबक तोह मिलेगा इन्हे. कोड़े से मारूंगा इससे में.

आदमी 2 : अब तक मेने इतनी चूत दी थी, अब तोह क़ैद करके रखूँगा.

जी हाँ, ये आपस में बात कर रहे दोनों लोग कोई और नहीं बल्कि, पुष्पेंद्र और अमित थे.

बोले तोह, सुमन और आभा के पति.

दोनों बाप बेटे, जब से सुमन और सोनाली के कारण हवालात में जेल में सद्द के आये थे. तब से hi दोनों को अपनी अपनी पत्नियों की तलाश थी. सुमन तोह बिना कोई सुराग चोर्रे निकल गयी थी. पर सुमन से बस एक गलती हो गयी थी.

उसने जाते समय घर की छवि पड़ोस में दे दी थी. और ये खबर चोरर दी थी की वो किस शहर में पलायन कर रही है. और उस कारण, पुष्पेंद्र ने साड़ी बातें वह से पता लगा ली थी. अपने hi पड़ोसियों को दर्रा धमका के पुष्पेंद्र ने ये पता लगा लिया था की इस वक़्त सुमन मुंबई में थी.

अपने बेटे के साथ मुंबई आते hi उसने सुमन की तलाश शुरू कर दी थी. बिना सुमन के गुज़ारा कैसे होता वर्ण उसका? वही तोह थी जो घर संभालती थी. एक प्रकार से काम वाली बाई थी वो उसकी. पुष्पेंद्र का गुस्सा सातवे आसमान पर था.

जिस गाय जैसी औरत को वो दर्रा धमका के रखता था, वो उससे वह जेल में बंद करवा के घर से भागकर, यहाँ ऐशो आराम की ज़िन्दगी जी रही थी. गुस्सा तोह आना hi था.

मुंबई में आने के बाद बस, फिर दोनों बाप बेटे ने तलाश शुरू कर दी. हालांकि इतने दिन गुज़र जाने पर भी उन्हें कोई खबर न मिली. मुंबई शहर कोई हलुआ थोड़ी था. इतना बड़ा शहर था. सुमन को ढूंढ़ना घास के धेरर में सुई ढूंढ़ने जैसा था.

पर आज जैसे किस्मत उनका साथ दे गयी. जब दोनों hi मंदिर के बाहर दूकान में चाय पी रहे थे तब hi उनकी नज़र सुमन और आभा पर गयी जो मंदिर के अंदर जा रही थी. किस्मत हो तोह ऐसी.

ये दोनों बाप बेटे बस इंतज़ार कर रहे थे सुमन और आभा के बाहर आने का.

वही यहाँ मंदिर के अंदर, सुमन और आभा दर्शन के बाद लौटने की तैयारी कर रही थी. इस बात से बेखबर, की दो दरिंदे बाहर hi उनका इंतज़ार कर रहे थे.

सुमन : चले बीटा?

आभा : हाँ माँ जी!

सुमन : हम्म!

दोनों hi मंदिर से बाहर निकली और पैदल hi घर की ऑर्डर जाने लगी.

पर वो सब बातो से परे की उनके पीछे कौन दो लोग आ रहे थे, सुमन और आभा अपनी बातो में मगन आगे बढ़ रही थी.

एक मोड़ ऐसा आया जो मैं रोड के लिए निकलता था. बस, ये मोड़ सोसाइटी का एक मोड़ था. कोई मैं रोड नहीं. यानी कोई चहल पहल नहीं. सुमन और आभा

दोनों hi इसी रास्ते से आयी थी क्युकी ये सीधा मंदिर को निकलता था. और वापस से इसी रास्ते से जाती थी तोह सीधा मैं रोड में उन्हें ऑटो रिक्शा मिल जाता था. ये रास्ता उनके लिए एकदम कनविनिएंट था.

लेकिन अभी दोनों hi मुड़ने के बाद कुछ hi कदम चली होंगी जब उनके पीछे से एक आवाज़ आयी.

"बहुत मौज हो रही है तुम दोनों की हाँ?"

और ये आवाज़ सुनते hi सुमन के शरीर के रौंगटे खड़े हो गए.

वो और आभा अगले hi पल पीछे मुड़ी और मुड़ते hi दोनों को एक ज़ोरदार झटका लगा. जिनसे इतने सालो के बाद बड़ी मुश्किल से पीछा चुर्रा के वो अपने गांव से भाग के आयी थी. वही दो कमीने उनके सामने थे. उन् पर अत्याचार करने वाले एक बार फिर, उन्हें धुंध चुके थे.

अपने सीने में हाथ रख, सुमन गहरी सास लेते हुए घबरा के पीछे हो गयी.

सुमन : तुमममम???

पुष्पेंद्र : हाँ में! अपने पति को देख कर तुझे तोह खुश होना चाहिए न? तोह तू घबरा क्यों रही है?

आभा की भी हालत पतली हो चुकी थी. अपने पति अमित को देख उसके चेहरे से रंग hi उड़द चूका था. अमित उससे गुस्से में खा जाने वाली नज़रो से घर रहा था. उसके हाथो में जैसे खुजली हो रही थी किसी पर हाथ साफ़ करने की. वो घबराते हुए सुमन के पीछे जा कर उसका हाथ थाम ली.

अमित : क्यों बी साली? अपने पति को चोरर यहाँ बड़े शहर में मौज कर रही है हाँ? तुझे रख किसने लिया? किसके बिस्तर गरम कर रही है टूउउ???

उसकी ुचि आवाज़ सुन्न जहा आभा घबरा गयी तोह वही सुमन बॉहे सिकोड़ते हुए विरोध की,

सुमन : अमित्तत्त!!!

पुष्पेंद्र : ठीक hi तोह कह रहा है वह. तुम दोनों, आखिर इतने बड़े शहर में गुज़ारा कैसे कर ली? खाली हाथ आयी थी तुम दोनों तोह. उस लड़के के साथ hi न? तोह उसके साथ रह रही हो तुम? रंडियोओओओ!!!!

वो अचानक hi जोरर से चिल्लाया और आगे बढ़ सुमन के हाथ को जोरर से पकड़ लिया.

सुमन : आह्हः!

आभा जल्दबाज़ी में अपना फ़ोन निकाली और उसने सीधा वीर को फ़ोन डायल कर दिया.

पर जब तक वो कान में फ़ोन लगा पाती, अमित आगे बढ़ा,

अमित : तेरी तोह... हरामज़ादी!!!!

और उसके बाल खींच उसके हाथ से फ़ोन छीनने लगा.

आभा : आह्हः! चोर्रो... चोर्रो... माँ~

छीना झपटी में आभा फ़ोन में कोई जवाब न दे पायी. उधर वीर ने फ़ोन उठाया hi था और उसने बस इतना hi सुना था,

"चोर्रो... माँ~"

की अमित ने आभा के हाथ से फ़ोन छिना कर सीधा कॉल कट कर दिया.

अमित : वीर हाँ? इससे लगाई थी फ़ोन? बोल कौन है ये? बोलल!!!

*चाताआआअआककककककक*

"आअह्ह्ह्ह!"

और उसने एक जोरर का छाता सीधा आभा के गुलाबी गाल पर दे मारा.

आभा दर्द से चींखी और तभी दोनों बाप बेटे ने मिलके उनके मुँह पर हाथ रख उनकी आवाज़ दबायी. तभी एक ऑटो उनके पास आके ृक्क गया और दोनों hi सुमन और आभा को उसमे दाल वो सभी वह से रफू चक्कर हो गए.

समय 12 बजके 10 मिनट हो रहा था और वीर उस वक़्त बस निकला hi था एग्जाम देके जब उससे आभा का कॉल आया था.

पुष्पेंद्र और अमित दोनों hi कई महीनो से मुंबई में गुज़ारा कर रहे थे. तोह ज़ाहिर सी बात थी की उनकी कुछ न कुछ पहचान तोह बन्न hi गयी होगी और उन्होंने अपना ठिकाना भी ढून्ढ hi लिया होगा. वो ऑटो उनकी hi पहचान का था.

और इस समय, वो आके एक छोटे से घर के बाहर रुके हुए थे.

सुमन और आभा रास्ते भर विरोध करती रही, पर कितना hi विरोध क्यों न कर ले, मर्द का शारीरिक बल उनके औरतो वाले शारीरिक बल पर भारी पद रहा था. ये तोह क़ुदरत का निर्माण था. इसमें वो दोनों क्या hi कर सकती थी. मजबूरन, वो कुछ न कर पायी सिवाए छटपटाने के.

उन् दोनों को अंदर लाते hi ज़मीन पर पटकते हुए पुष्पेंद्र ने अंदर से किवाड़ बंद कर दिए.

पुष्पेंद्र : साली चिनार!!! तेरी हिम्मत कैसे हुई हाँ? मुझे धोका देने की? मैं तोह कर रहा है तेरे टुकड़े टुकड़े कर दू. इतना मारु की तू कभी मुझे धोका देने की सोचे भी न. पर अभी नहीं. तुझे तोह घर ले जा कर अच्छे से खबर लूंगा तेरी. सोनाली किधर है? बोल!!!!

पर सुमन कुछ न बोली. उसकी आँख एकदम गुस्से से लाल थी और वो पुष्पेंद्र को घर रही थी.

की तभी...

*चाताआआअआककककककक*

"आआह्ह्ह्हह!"

एक तेज़्ज़ तर्रार झापड़ सीधा आके सुमन के नरम गाल पर पड़ा. और उसका चेहरा उलटी तरफ घूम गया.

आभा : मायआ जीई!!!!

आभा रट हुए क़रीब आयी और सुमन को थामी.

पर अभी ये तोह कुछ भी नहीं था, जिस बात का सुमन को डर था, वही हो गया.

पुष्पेंद्र अचानक hi अपनी शर्ट उतारने लगा. बटन पे बटन खुलने लगे और सुमन के शरीर के रुए खड़े हो गए ये देख. वो कापने लगी. आँखें फटी की फटी रह गयी.

पुष्पेंद्र : बोहत धर्म पत्नी bann'ne के शौक है न तुझे. अभी निकालता हु तेरी साड़ी गर्मी. आज ऐसा छोडूंगा साली को....

पुष्पेंद्र क्या कर रहा था उससे इस बात की कोई शर्म नहीं थी अब. वो अपने hi बेटे के सामने अपनी पत्नी को छोड़ने की बात कह रहा था.

सुमन इधर पूरी तरह से घबराई हुई थी. उससे अपनी चिंता नहीं थी. डर और अफ़सोस था. डर इसका की यदि इस मर्द ने उससे आज छुआ, तोह वह अपने मालिक को क्या मुँह दिखाएगी? क्या उसके मालिक उससे फिरसे स्वीकार करेंगे? यदि कर भी लिए तोह क्या उनके दिल में फिरसे वही स्थान रहेगा उसके लिए? और यदि स्वीकार नहीं किये तोह? क्या होगा उसका? कहा जाएगी वह? इस से अच्छा तोह मार्र्ण hi बेहतर था.

इस दरिंदे ने यदि उससे आज लूटा, तोह सबसे सरल उपाय अपनी जान देना hi था. मालिक के सामने अपना लूटा हुआ जिस्म दिखाने से अच्छा तोह ये है की वो मर्डर hi जाए. हाँ, यही सही उपाय था. इस से उससे मालिक द्वारा धुत्कार जाने का भी डर नहीं रहेगा. यही सही निर्णय था. खुद की जान दे देना.

कुछ ऐसे hi सवाल और विचार उसके मैं में आ रहे थे.

सुमन ने तय कर लिया था. यदि ये आदमी आज उसके जिस्म को भोगता है, तोह सुमन अपनी जान दे देगी.

अपनी कमीज उतार के जैसे hi पुष्पेंद्र आगे बढ़ा तभी अमित ने उससे रोका,

अमित : ऐसे नहीं बाबा... अभी नहीं! जिस वीर के घर ये दोनों रुकी हुई थी. मेरे ख़याल से वो अमीर है. उस से पैसा ैठते है, फिर यहाँ से रफू चक्कर होक घर में इन् दोनों को देखेंगे.

पुष्पेंद्र : हम्म? बात तोह सही है. पैसा ऐठना बोहत ज़रूरी है. तंगी हो गयी है पैसो की. पर पैसे कैसे हड़पना है?

अमित : वही तोह दिक्कत है. सोचना पड़ेगा. पर पहले इन्हे बाँध के रखो. ये भागने न पाए.

और फौरन hi दोनों सुमन आभा को उन् लोगो ने रस्सी से बाँध दिया.

अमित : हम्म! अब ठीक है.

पुष्पेंद्र : अब बताओ! कुछ सोचा?

अमित : हम्म! एक काम कर सकते है.

पुष्पेंद्र : क्या?

अमित : इन् दोनों से पूछिए तोह ज़रा की क्या इन् लोगो ने हमारे अलावा किसी और के साथ रातें रंगीन की है क्या? बोल आभा!!! बोल!!!

पुष्पेंद्र : जवाब दे सुमन!!!

तोह सुमन जोरर से चिल्लाई,

सुमन : हाआअन्न!! हाँ!! हरामी!! मेने अपने मालिक का बिस्तर गरम किया है, और हमेशा करती रहूंगी. तू कौन होता है मुझसे पूछने वाला?!??

सुमन के बात maan'ne पर पुष्पेंद्र का खून खौल उठा. उसकी बीवी किसी और से छुड़वा रही थी? ऊपर से मालिक कह रही थी उससे? आज तोह पुष्पेंद्र जैसे कुछ करने hi वाला था.

अमित : तोह बस फिर... हम उसी वीर को बुलाएंगे और उस से ये कहेंगे की यदि इन्हे सही सलामत चाहते हो तोह पैसे लेके आओ. उसके आने के बाद हम पैसे भी हड़पेंगे, उसपे हाथ भी साफ़ करेंगे और फिर यहाँ से भागेंगे भी.

आईडिया सुन्न के पुष्पेंद्र भी हामी भरा पर उसके अलावा सुमन की आँखों में भी चमक थी. उससे जैसे अपना उपाय मिल चूका था. वो तभी जोरर से हस्सन लगी,

सुमन : हहहहहहह~

पुष्पेंद्र : हस्स क्यों रही है तू???

सुमन : ः~ हस्सू नहीं तोह क्या करू? अच्छा हुआ जो तूने मुझे नहीं छिया. वर्ण...

पुष्पेंद्र : वर्ण क्या?

सुमन : वर्ण तुझे एक फूटी कोड़ी न मिलती. हाहाहाहा~ तुझे क्या लगता है? मेरे मालिक इस औरत के शरीर के लिए पागल बैठे है क्या? उनके पास एक से एक हसीनाएं है. में क्या hi हु उनकी? यदि तूने मुझे छी लिया होता, तोह वो मुझे धुत्कार कर हटा देते. और तुझे घंटा कुछ मिलता. उनके पास लड़कियों की कमी नहीं. मुझ जैसी दासी की क्या परवाह उन्हें?

सुमन की बात सुन्न, दोनों hi छुप रह गए. और अपने निर्णय पर गर्व करने लगे. अच्छा हुआ जो उन्होंने अभी तक सुमन के साथ कुछ नहीं किया था. काम से काम अभी उनका प्लान कामयाब होने में कोई तोह उम्मीद थी.

सुमन इधर अपना निचला होंठ दबाये सर्र झुकाये बैठी थी. उसने सब कुछ झूठ बोलै था.

केवल समय बचाने के लिए. इससे और टालने के लिए. इस आस में की शायद, उसके मालिक जल्द hi आ जाएंगे.

पर... पर सवाल था की...

क्या वीर आएगा? क्या उसके मालिक आएँगे? जहा उससे थोड़ी ख़ुशी थी की कुछ पालो के लिए उसने अपने जिस्म को बचा लिया था तोह वही एक मायूसी भी थी. वो नहीं जानती थी की उसके मालिक के दिल में उसकी क्या जगह है. क्या वो अपनी इस तुच्छ सी दासी के लिए यहाँ तक उससे बचाने आएँगे? कही इनका प्लान कामयाब हो गया तोह? फिर क्या हो गया?

यही सब सोच वो चिंता में डूब गयी.

की तभी...

*थूऊडड़ड़ड़ड़ड़*

एक ज़ररदार आवाज़ आयी और जो किवाड़ बंद था. वो धड़ल्ले से खुला और उसका एक किवाड़ तोह टूट के इतनी दूर जा के गिरा की सामने की दीवार से hi भीड़ गया.

दरवाज़े के बाहर...

वो खड़ा था.

वीर!!!

उसके हाथ जेब में थे. चेहरे पर कोई एक्सप्रेशन नहीं. क्युकी वो इतना पिस्सेद ऑफ था की गुस्सा भी अब उसके चेहरे से जा चूका था.

आभा के कॉल में उसकी पुकार सुन्न के hi वीर को आभास हो गया था की कुछ गड़बड़ है.

और उसने एक hi चीज़ करि,

एनिमी ट्रैकर!!!!

बेसिक एनिमी ट्रैकिंग स्किल का उसे करते hi उससे इन् दो नमूनों की लोकेशन मिल चुकी थी. ये दोनों कोई बॉस एनिमी नहीं थे, इसलिए आराम से स्किल ने काम कर दिया.

इन् दो चुतियो की हिम्मत कैसे हुई उसकी औरतो पर हाथ लगाने की. थे वेरे हिज बेलोंगिंग्स.

वीर बस यही बात मैं में चिल्ला रहा था.

'हु डरेस तो टच माय प्रॉपर्टी?'

सुमन और आभा उसकी प्रॉपर्टी थी. उसका पूरा हक़ था उन् दोनों पर. और उसके सिवा कोई और उन्हें हाथ लगाए? सवाल hi पैदा नहीं होता. थोक के न रख देगा उन्हें वो?

वीर ने बस एक नज़र सुमन और आभा पर मारी. और फिर वो धीरे धीरे जेब में हाथ डाले hi आगे बढ़ा.

किवाड़ का टुकड़ा उड़ते देख, अमित थोड़ा डर गया. पर फिर भी वो खुद को संभालते हुए आगे बढ़ा,

"तेरी तोह...."

पर तभी...

*Chataaaaaaaaaakkkkkk*

*Sunnnnnnnnnnnnnnnn*

एक उल्टा कंटाप अमित की कनपटी पे पड़ा और कान hi सन्ना गया.

कान में आवाज़ गूंजने लगी उसके. मुँह से एक दो खून से साणे दांत निकल कर तोह गिरे hi, साथ में वो खुद भी नीचे धड़ाम से गिर पड़ा. आँखें भी चौंधिया गयी थी उसकी. तारे दिखने लगे थे उससे एक कंटाप में.

पुष्पेंद्र, ये देख गुस्से में आगे बढ़ा और हमला किया.

पर... पर क्या वो वीर को हरा पाटा? उसकी यदि सात पुष्टि भी वीर पर एक साथ हमला करती तोह भी न हरा पाती उससे. तोह खुद अकेला पुष्पेंद्र तोह जैसे मज़ाक था वीर के लिए.

वीर ने उसके तुच्छ हमलो से आराम से बचते हुए एक घुसा उसके पेट में मारा और फिर दो झापड़ उससे लगाते हुए उससे भी गिरा दिया.

उसके बाद भी वीर शांत नहीं बैठा. मुँह से तोह शांत hi था पर उसके एक्शन्स बोल रहे थे.

आईटी वास् लिखे... ी won't स्पीक. माय एक्शन्स विल.

आगे बढ़ते हुए वीर ने पुष्पेंद्र को पकड़ा और...

*डिंग*

लिम्बुवाओ!!!

*क्रआआआअक्खक्खककक*

"Eaaaarrrggghhhhhhhhhh"

वीर ने एक झटके में पुष्पेंद्र का एक हाथ मरोड़ दिया. और कमरे में उसकी दर्द भरी चींख गूँज उठी. हाथ क्यों मरोड़ा? क्युकी उसने अपनी सुमन और आभा के गालो पर उन् थप्पड़ के निशाँ देख लिए थे.

थे दरद तो स्लैप हिज वीमेन? थे DON'T डेसेर्वे अन्य हैंड्स!!!

और अगले hi पल,

*कराआआअआकककककक*

"Aaaaaaaaarrrrrghhhhhhhhhh"

पुष्पेंद्र का अगला हाथ भी गया. बोथ ऑफ़ हिज लिम्बस वेरे ट्विस्टेड बियॉन्ड रिकग्निशन.

यू थिंक थिस वास् थे एन्ड? NO!!!

*क्रआआआकककककककक*

*CRAAAAAAAACKKKKKKKKKKKK*

"अअअअअररररररह्ह्हह्ह"

दोनों परर भी मुद चुके थे पुष्पेंद्र के.

वीर के चेहरे पर कोई भाव नहीं थे. बस यही बात थी मैं में...

थे DON'T डेसेर्वे अन्य लेग्स तू!

पुष्पेंद्र को पूरा अपाहिज चोरर वीर अमित की तरफ बढ़ा, जो घबराते हुए रेंग के पीछे जा रहा था और फिर...

उस कमरे में उसकी भी दिल दहला देने वाली चींखे गूँज उठी. दोनों बाप बेटे किसी कचरे के माफ़िक़ पड़े हुए थे ज़मीन में. कुछ देरर पहले का उनका जोश, उनका बल, उनका गुरूर जैसे उनकी गांड में घुस चूका था अब.

वीर ने दोनों hi आभा और सुमन की रस्सिया खोली और उन्हें आज़ाद किया.

सुमन और आभा दोनों की आँखें आसुओ से भरी हुई थी. तोह वही थोड़ा भय भी था. क्या हालत करि थी वीर ने उनके पतियों की?

क्रुएल! तू क्रुएल!!

पर यही तोह खासियत थी वीर की. सुमन की आँखें आसुओ से भरी होक चमक रही थी.

थिस वास् हेर मास्टर!!!

न केवल वो उससे यहाँ बचाने आया, बल्कि इतनी जल्दी आया की सुमन ने खुद इस बात की उम्मीद नहीं की थी. ऊपर से उसका क्रूर व्यवहार. साफ़ बता रहा था की वो कितना गुस्से में था. किसके लिए? केवल उसके और आभा के लिए.

वीर ने धीरे से दोनों के गालो पर अपना हाथ फेर्रा तोह सुमन ने इधर अपने मालिक का हाथ जोरर से थाम लिया.

सुमन : यदि आप न आते तोह... तोह में अपनी...

कहते हुए वो ृक्क गयी. उससे ध्यान आया की वो क्या कहने जा रही थी. अपने मैं की बात कहने जा रही थी वह. वीर को जैसे पता चल गया. इसका आभास होते hi उसके रौंगटे खड़े हो गए.

आप न आते तोह में अपनी? अपनी क्या? वीर ने फौरन hi पूछ लिया,

वीर : अपनी क्या?

सुमन : ....

वीर : अपनी जान दे देती???

सुमन ये सुन्न अपनी नज़रे नीचे झुका ली. वो कैसे भला अपने मालिक से नज़रे मिला सकती थी? पर वीर के होश उड़द चुके थे. इतने के लिए सुमन अपनी जान देने वाली थी?

उसने फौरन hi सुमन की चीन पकड़ उसका चेहरा ऊपर किया और उससे देखा,

वीर : अहिंदा से कभी ऐसी बात न कहना और न hi सोचना समझी? ये मेरा आर्डर है!

*बेदुम्प*

सुमन का दिल जैसे एक धड़कन फांद गया.

और अगले hi पल,

सुमन : आआह्ह्ह्हह~

सुमन वीर की गॉड में थी. उसके गाल लाल पद चुके थे. इस बार थप्पड़ से नहीं, शर्म से.

और अबकी बार वीर के चेहरे पर एक नरम एक्सप्रेशन था.

वीर : तुम तोह मेरी hi हो. है न? फिर तुम दोनों hi ऐसा क्यों सोचती हो? कुछ भी हो जाए, में तुम दोनों को कही जाने नहीं दूंगा. और न hi कुछ होने दूंगा.

जब वीर ने सुमन को उतारा तोह सुमन ने आभा को पीछे से धकेल के वीर की ऑर्डर कर दिया.

वीर : हम्म?? ओह्ह्ह~

और अगले hi पल एक बार फिर...

आभा : आआह्ह्ह्हह~

इस बार आभा वीर की गॉड में थी. शर्म के मारे उसके गाल सुर्ख लाल हो रहे थे. अपने दोनों हाथो से उसने अपना चेहरा छुपा लिया और मैं hi मैं अपनी माँ जी को कोसने लगी.

आभा को उतार के वीर ने सुमन को देखा

वीर : तुम jaan'na चाहती थी न? की क्यों में तुम्हे वो सब चीज़े सीखने को कह रहा था? तोह सुनो???

सुमन : हहहह?

वीर : You'll बे थे लीडर. तुम लीडर bann'ne के लिए hi बानी हो सुमन!!!!

सुमन : H-Huhhh?

वीर (स्माइल्स) : महिला मंडल!!!!

*बेदुम्प*

एक बार फिर सुमन के दिल को धड़कन तेज़्ज़ हो गयी और वो बस फटी आँखों से अपने मालिक को निहारती hi रह गयी. तोह इसलिए...

इसलिए वो सब चीज़ें उसके मालिक उससे सीखने को कह रहे थे? न केवल वो उससे एक दासी के रूप में देखते थे बल्कि उससे इतना आगे बढ़ने का मौका भी दे रहे थे? कौन देता है अपनी दासियो को इतनी चूत?

सुमन को जैसे इस बात की हामी मिलते hi रोना आ गया. आज पहली बार अपने पूरे जीवन काल में वो इतना इमोशनल हुई थी. मतलब उसके मालिक शुरू से hi उससे आगे बढ़ाने के बारे में सोच रहे थे? इस से ज़्यादा उसके लिए ख़ुशी की बात क्या हो सकती थी?

सच बात तोह ये थी की, जिस दिन वीर ने सुमन को विवेक के माता पिता को लताड़ते हुए देखा था. की कैसे उसने हर्र तर्क के जवाब कितनी आसानी से दे दिए थे. उस दिन hi वीर को समझ आ गया था की...

सुमन वास् बोर्न तो लीड!!!

दूसरे शब्दों में, वो उसका एक ऐसा हथियार बन सकती थी जो समाज में अच्छे से अच्छे लोगो की वाट लगाने में सक्षम हो.

और तभी,

*डिंग*

[You have broken Suman's affection meter.]

[Suman's favourability has exceeded 100]

*डिंग*

[Suman's favourability : 126]

'हहहहहह? ये???'

वीर को झटका तोह लगा था. पर अभी एक और ज़रूरी काम बाकी था.

उसने सीधा बलहार को फ़ोन लगाया,

वीर : Hello!

बलहार : हाँ!

वीर : अपनी लोकेशन भेज रहा हु. यहाँ दो कचरे के धेरर है. उन्हें अलग करवाना है. उनसे में निपट चूका हु तोह और कुछ मत करना.

बलहार : ठीक है. काम हो जाएगा. और तुम्हारा काम भी हो गया है. एक अहम् रिकॉर्डिंग है मेरे पास. इससे मिलकर hi दूंगा में. फ़ोन में नहीं भेजूंगा.

वीर : ठीक है! क्या बात है?

और फिर बलहार ने बस इतना hi बताया की स्लोगन क्या करने वाला था.

हे वास् गोइंग फॉर ा..

फुल स्केल अटैक!!!

.

.

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.

.

.

आज के लिए इतना hi गाइस!

धन्यवाद! ✨


रेवोस रखने का और लिखे की बटन पे कंटाप मार के जाने का. 😁
 
अपडेट - 74 ~ लेट थे हंट बिगिन

[Contains gore related scenes.]

अब तक...

वीर : अपनी लोकेशन भेज रहा हु. यहाँ दो कचरे के धेरर है. उन्हें अलग करवाना है. उनसे में निपट चूका हु तोह और कुछ मत करना.

बलहार : ठीक है. काम हो जाएगा. और तुम्हारा काम भी हो गया है. एक अहम् रिकॉर्डिंग है मेरे पास. इससे मिलकर hi दूंगा में. फ़ोन में नहीं भेजूंगा.

वीर : ठीक है! क्या बात है?

और फिर बलहार ने बस इतना hi बताया की स्लोगन क्या करने वाला था.

हे वास् गोइंग फॉर ा..

फुल स्केल अटैक!!!


अब आगे...

*वरररररररओओओओओओओओओमममम*

कारन की ब्लू मुलसंने रोड पर सन्नाटे हुए भाग रही थी.


ब्लू मुलसंने~





लेन में डिविडेंड में लगी चमकती हुई लाइट्स से कार की रिम्स ऐसे चमक रही थी की हर्र निकलता हुआ व्यक्ति एक बार ज़रूर देखने पे मजबूर हो जाता. कार थी hi ऐसी.

कारन ड्राइव कर रहा था और उसके बगल से वीर बैठा हुआ था. वैसे उसकी ब्लू मुलसंने कोई रेसिंग कार नहीं थी, पर फिर भी अभी के लिए सही थी. क्युकी, ये सिक्योर्ड कार ख़ास उसकी सेफ्टी के लिए डिज़ाइन की गयी थी. समय रात का था तोह किस्मत थी उनकी जो ट्रैफिक दिन के मुक़ाबले काम था. वर्ण ट्रैफिक में hi लौड़े लग जाते उन् दोनों के. क्युकी, मुंबई के ट्रैफिक से तोह हर्र कोई वाक़िफ़ था.

वीर खामोश बैठा था. उस दिन सुमन और आभा को बचाने के बाद कई नयी चीज़ें उससे देखने को मिली थी.

सबसे पहली बात तोह वही थी. सुमन की 126 की फवौराबिलिटी. न केवल वीर को 300 पॉइंट्स मिले थे बल्कि उसने एक चलता फिरता बम तैयार कर दिया था. ऐसा क्यों?

क्युकी सुमन उसके लिए अब कुछ भी कर सकती थी. और जब कुछ भी कहा जाए. तोह वाक़ई, उसका मतलब कुछ भी hi था.

शी कुड इवन किल फॉर वीर.

एंड कुड इवन दिए फॉर हिम.

अब्सोलुटे सेरवीटुडे!!!

और इसलिए, वो एक चलता फिरता बम थी. वही दूसरी तरफ आभा की फवौराबिलिटी भी स्कीरोक्त होक 94 पर पहुँच चुकी थी.

वीर उन् 300 पॉइंट्स का उपयोग कर के जल्द से जल्द अपने स्टैट्स फुल करना चाहता था. पर उसने ऐसा नहीं किया. क्यों?

क्युकी पॉइंट्स को बचा के रखना बोहत अहम् था. वीर को कई बार ऐसा महसूस हुआ था की यदि उसके पास पॉइंट्स होते तोह वह कई मुसीबतो से बच के निकल सकता था. पर उसके 0 पॉइंट्स के चलते वो मात खा जाता था.

इसलिए उसने डीडे कर लिया था की वो कुछ पॉइंट्स हमेशा रिज़र्व में रख के चलेगा. क्या पता, कब कहा पॉइंट्स की ज़रुरत पद जाए?

इन केस, यदि वो किसी सिचुएशन में फस्स्त है तोह यदि उसके पास पॉइंट्स रहे तोह शॉप से स्किल खरीद के वो उस सिचुएशन से बाहर आ सकता है. पॉइंट्स का रिज़र्व में रहना इसलिए इम्पोर्टेन्ट था.

बगल से कारन उससे बार बार लुक दे रहा था. शायद कुछ कहना चाह रहा था. पर वीर को खामोश देख वो चुप होक रह गया.

इधर वीर टाइम पास नहीं कर रहा था. उसके मैं में आलरेडी एनिमी ट्रैकर स्किल एक्टिव थी.

और टारगेट कौन था??

स्टीव!!!!!

*बीप* *बीप* *बीप*

उसके मैं में वो लाल बिंदु, जो स्टीव की लोकेशन को दर्शा रही थी, काफी स्पीड में एक लोकेशन की तरफ बढ़ रही थी. यानी की स्टीव ने प्लान शुरू कर दिया था. वही प्लान, जो बलहार ने रिकॉर्ड कर के वीर को सौप दिया था.

वीर अब बस स्लोगन को ये दिखाना चाहता था, की वो उसके जाल में फास्सी हुई एक मछली है. पर ऐसा था नहीं. असल में तोह वो खुद हंटर था इस बार.

'थिस टाइम... ी विल ले डाउन थे नेट फॉर यू!!!!'

स्टीव बॉस एनिमी नहीं था, तोह ऑब्वियस्ली बेसिक एनिमी ट्रैकर स्किल काम कर गयी. बस, वीर यही उम्मीद कर रहा था की...

काश...

काश, स्लोगन स्टीव के साथ hi बैठा हो. यदि ऐसा हुआ, तोह वीर एक बार में hi उसका काम तमाम कर पाएगा.

क्युकी अब चाहे उससे मिशन मिले या न मिले, वीर स्लोगन को और समय नहीं देना चाहता था. वर्ण ये उसके और उसके क़रीबी के लिए और भी घातक हो सकता था.

पर जैसे सिस्टम ने उसके मैं की बात सुन्न ली थी और तभी,

*डिंग*

[Mission : Kill Slogan at all cost.


रिवार्ड्स : 1) ???? पॉइंट्स

2) ओने रैंडम स्किल

टाइम लिमिट : 4 हॉर्स.

मिशन फेलियर पेनल्टी : 2000 पॉइंट्स डिडक्शन.]

और मिशन पढ़ते hi, वीर के होंठो पर एक मुस्कान थी.

[You are surprisingly calm!]

तभी, पारी की आवाज़ अचानक hi उसके मैं में आयी.

'क्या मतलब?'

[Matlab ye ki jab Aatish ko tumne maara tha. Tum sadme me the. Because, tumne pehi baar kisi ki jaan lii thi. So abhi ye mission milne ke baad tum kaafi shaant ho. No! Balki tum excited ho.]

'हूँ~ क्या मेरी पारी को मेरी चिंता हो रही है? हाँ?'

[W-Wh-Who? Who cares for you? Hmph!]

'तोह फिर अचानक ये सवाल क्यों?'

[Wo toh... Wo... Wo bas... Tumhaare andar pehle jaisi koi feelings nahi aayi iss waqt. Tum pehle sadme me the. Aatish ko maarne ke baad. But abhi tum ye jaante bhi ho ki tumhe kisi ki jaan lena hai. Still, you are calm. Isliye, mene pucha. Warna... Who cares for you? Hmph~ Stupid!]

पारी की बात सुन्न वीर सर्र झुकाते हुए अपनी उन् हथेलियों को देखने लगा. इन्ही हाथो से उसने आतिश की जान ली थी. और इन्ही की वजह से वो गोलू को खो दिया था. यदि इनमे तब और ताक़त होती, तोह आज कारन के hi जैसे, उसका एक और दोस्त उसके बगल से बैठा होता.

'ये... मेरे हाथ... इनमे पहले hi खून लग चूका है पारी!!!'

[...]

'अब इनपे... मेरा बस नहीं चलता.'

[But...]

'जो कोई भी मेरे परिवार को नुक्सान पहुचाने के बारे में सोचेगा. उन्हें में अपने रास्ते से हटा दूंगा. चाहे जान hi क्यों न लेनी पड़े मुझे.'

पारी कुछ देरर शांत रही. उसके बाद बोली,

[Well, yes! That is the correct way. World unfair hai. Yadi koi ye sochta hai ki muskuraane se agla aadmi usse kuch nahi karega. Toh ye Bewakoofi hogi uski. Strong trample on weak. That is how world works. Yadi tum powerful ho, toh tumhari kahi gayi harr baat sahi hai.]

'ी थिंक सो तू! ी हैवे तो गेट मोरे पावरफुल.'

[Yeah!!]

पारी और वीर की आपस में हो रही बातो से अनिभिज्ञ, आखिर कार कारन ने कुछ बोलने का सोचा.

उनके बीच की काफी देरर से मौजूद ख़ामोशी को उसने तोडा,

कारन : यू क्नोव व्हाट!? मुझे नहीं लगता तुम्हारी इन्फो सही होगी. डैड ने सिक्योरिटी बोहत हाई कर दी है. सो, ी don't थिंक ऐसा कुछ होने वाला है.

वीर शांत था. उससे पता था की बलहार की इन्फो पक्की थी. आखिर उसने खुद वो वीडियो देखा था जो बलहार ने उससे बाद में दिया था. वही यहाँ कारन मूड को लाइट करने की कोशिश कर रहा था. उसके हिसाब से सिक्योरिटी टाइट थी और उसकी बहिन को कुछ नहीं होने वाला था.

ऐसा नहीं था की वो अपनी बहिन की चिंता नहीं करता था. वीर से भी ज़्यादा फिक्र उससे करा की थी. पर उससे अपनी सिक्योरिटी पर भी भरोसा था. इसलिए कारन को लगा की शायद वीर बेवजह hi ज़्यादा फिक्र कर रहा है.

कारन : हे! वैसे, तुमने अपने लिए कोई पार्टनर धुंडी या नहीं?

उसने मूड को लाइट करते हुए कहा.

वीर : तुम्हे अभी ये बात सूझ रही है? सीरियसली?

कारन : व्हाट? हेय्य! जस्ट आंसर में!

वीर (शिघ्स) : फिलहाल नहीं!

कारन : यू क्नोव व्हाट? ी कैन इंट्रोडस यू तो सम फाइन लेडीज. और सब बड़ी फॅमिली से hi है. मेरे कहने पर वो पक्के से तुम्हारे संग... हेहेहे~

वीर : यू शुड थिंक अबाउट योरसेल्फ. और तेज़्ज़ ड्राइव करो. हम लेट नहीं हो सकते.

कारन : ड्राइविंग में तुम्हे मुझसे बेहतर ड्राइवर नहीं मिलेगा वीर. फॉरेन में में हर्र वीकेंड्स की रात को फ्रेंड्स के साथ मिलकर हम ट्रैक रेसिंग करते थे. I'm ओने हेलल ऑफ़ ा ड्राइवर हाहाहा~

कहते हुए उसने फौरन hi गाडी, 3रद से 4तह गियर में दाल दी और अक्सेलरेशन दिया,

*Vrrrrooooooooooooooommmmm*

गाडी सरपट भागते हुए रोड पर दौड़ने लगी.

वीर का हाथ उसके सीने में टंगे लॉकेट पर था. उससे कस के थामे हुए था. उसकी असल माँ की दी हुई एक मात्र निशानी. आज वो कैसे भी कर के, अपने इस मिशन में फ़ैल नहीं हो सकता था.

क्युकी ये फाइनल फाइट थी. या तोह आज वो घर लौटने वाला था, या फिर स्लोगन.

तेरे वास् no इतर वे.

ओने है तो किल थे इतर!

***

दिल्ली एयरपोर्ट...

टाइम : 10 : 15 पं

मैंवहीले, दिल्ली के एयरपोर्ट में इस वक़्त एक फ्लाइट जस्ट अर्रिवे हुई और एयर स्ट्रिप पर प्लेन की गति धीरे धीरे काम होती जा रही थी.

और देखते hi देखते कुछ hi पालो में वो प्लेन पूरी तरह से रुक गया.

अंदर पैसेंजर्स वाली सीट पर से सारे यात्री धीरे धीरे उठ के बाहर की ऑर्डर निकलने लगे. एयर होस्टेसेस, उन्हें स्माइल देते हुए विदा कर रही थी.

इन्ही सीट्स में से दो सीट्स पर एक नौजवान लड़की और एक ख़ूबसूरत महिला बैठी हुई थी.

"माँ!! पहुँच गए. उठिये!"

उस लड़की ने कहते हुए अपनी माँ को हिलाया तोह वो महिला फौरन hi उठ गयी. वो तोह बस थकान के चलते आँखें बंद की हुई आराम कर रही थी. सोई नहीं थी.

अपनी बेटी की बात सुन्न, हां में सर्र हिलाते हुए वो दोनों माँ बेटी, एयरपोर्ट से निकले और कैब कर अपने घर की ऑर्डर निकल गए.

घर पॅहुचते hi अंदर मौजूद एक काम करने वाली माइड ने गेट खोला और उन् दोनों का स्वागत किया.

ये माइड पूरी लॉयल थी उनकी. इसलिए जब भी वो कही भी जाते थे, वो अक्सर हफ्तों हफ्तों तक अकेली घर में रहा करती थी. और घर की पूरी देख भाल करती थी.

अंदर आते hi, दोनों माँ बेटी एक साथ बीएड पर गिरते हुए पसर गयी. दोनों ने एक दूसरे को देखा. और फिर दोनों hi जोरर से हस्सन लगी.

"सच में, बोहत थकान हो गयी. हास्सःह! फाइनली, अपने घर के सुकून की कुछ बात hi अलग होती है. है न माँ?" वो लड़की बोली.

तोह उसकी माँ भी मुस्कुरायी, "बिलकुल! अपने घर की बात तोह कुछ..." बोलते बोलते वो अचानक hi ृक्क गयी.

"क्या हुआ माँ?"

"K-Kuch नहीं... में वाशरूम से आती हु." और वो उठ के सीधा वाशरूम में चली गयी.

उसकी बेटी केवल उससे जाता हुआ देखती रही. वो असहाय, एकाकी, और अकेली औरत.

'कब तक? कब तक और मुझसे छिपाओगी माँ? ी आलरेडी क्नोव व्हाट यू अरे हिडिंग.' उसने सोचा और मायूसी उसके चेहरे पर छ गयी.

ये कोई और नहीं, वही थी. भावना की एकमात्र लड़की.

और वो औरत वीर की असली माँ थी ~ भावना.

जो फिलहाल, यहाँ भावना नहीं, बल्कि गीता के नाम से जानी जाती थी.

***

मुंबई...

क्सक्सक्सक्सक्सक्सक्स रिसोर्ट.

10:35 पं

रिसोर्ट की एंट्रेंस पर अचानक hi एक कार आयी. तोह गार्ड उठ के उस कार के नज़दीक आया. और...

*थुड़* *थुड़*

उसने हाथ से शीशे पर दो बार ठोका तोह...

*सव्वियिस्सश्ह्ह्ह्ह*

शीशा नीचे हुआ.

गार्ड : पीछे की डिकी खोलो.

तोह उस कार के ड्राइवर ने हां में सर्र हिलाया और डिकी खोल दी. गार्ड ने पूरी डिकी चेक की और बंद कर अंदर जाने का इशारा दे दिया.

*वॉररूओम्म्म*

कार आगे बढ़ी और अंदर जाती जा रही थी. रिसोर्ट इतना बड़ा था की ऐसा लग रहा था किसी हाईवे में गाडी चल रही हो.

एक जगह आके गाडी रुकी और ड्राइवर ने गाडी की हेडलाइट्स बंद कर दी. पर गाडी अभी भी चालु थी.

*क्लिक*

ड्राइवर की बगल वाली सीट पर बैठे आदमी ने लाइटर जलाया और सिगरेत्ते को मुँह में दाल उससे जला के एक काश लगाया.

और बड़ी गंभीरता से बोलै, "आज सब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा."

ये बुलंद आवाज़ जो अच्छे अच्छा की हवा टाइट कर दे, किसी और की नहीं, स्लोगन की थी.

और ड्राइविंग सीट पर बैठा कोई और नहीं, स्लोगन का hi राइट हैंड आदमी, स्टीव था.

स्टीव : यदि आपका अनुमान सही है दादा. तोह वह यहाँ नहीं आएगा. पर...

स्लोगन : हम्म! इनफार्मेशन उसने सही भेजी. पर अभी उसका आना बाकी है.

यहाँ बात हो रही थी एकमात्र शख्स की. और वो था...

बलहार!!!

आज बलहार का टेस्ट था. स्लोगन जिस दिन अपना प्लान समझा रहा था स्टीव को. उससे एक अनुभूति हुई थी की कुछ गड़बड़ था. और उसका शक, बलहार पर था.

इसलिए, आज बलहार की परीसखा थी. स्लोगन ने स्टीव को कह के बलहार की साड़ी छान बीन करवाई थी. पर उन्हें कुछ हासिल न हुआ. स्टीव का कहना था की बलहार लॉयल है. पर स्लोगन अभी भी अपनी बात पर ऐडा हुआ था. कुछ गड़बड़ ज़रूर थी. इतना एक्सपीरियंस उसने ऐसे hi नहीं हासिल कर के रखा था.

ये रिसोर्ट किसी और का नहीं, बल्कि करा का था. जो उसने हाल hi में अपने नाम करवाया था. आज वो यहाँ बस बची हुई पेमेंट करने आयी थी. स्लोगन को ये बात पहले hi अपने आदमियों से पता लग चुकी थी. पर...

पर वो बलहार को टेस्ट करना चाहता था. यदि बलहार बेक़सूर था, यदि उसने गद्दारी नहीं की होगी, तोह वह बेशक सब कुछ सही डिटेल्स देने वाला था. इसलिए स्लोगन ने रिसोर्ट की साड़ी डिटेल्स लाने का काम बलहार को सौप दिया.

यदि, बलहार गलत इन्फो देता, तोह स्लोगन को पता लग जाता और वो बलहार को धड़ दबोचता. पर ऐसा न हुआ. बलहार ने उससे एकदम सही इन्फो दी.

की ये रिसोर्ट करा का है, और वो इस तारिख को इस समय पर इस गाडी से यहाँ पेमेंट देने आएगी. इनफार्मेशन इतनी सही थी की स्लोगन का बलहार के ऊपर से शक समाप्त हो जाना चाहिए था. लेकिन फिर भी... ऐसा न हुआ.

कुछ था, जो स्लोगन को अंदर से कचोट रहा था. जैसे आभास दिला रहा था की कुछ गड़बड़ है.

और तभी,

रिसोर्ट की मैं बिल्डिंग का बड़ा सा आटोमेटिक गिलास दूर खुला और एक बेहद ख़ूबसूरत लड़की एक सुन्दर सी ड्रेस में बाहर आयी.






करा!!!!

और उससे देखते hi, स्लोगन की आँख में एक चमक आ गयी. वैसी चमक जैसी एक सांप को अंडे देखते वक़्त आती है.

और तभी उससे साइड से आता हुआ बलहार नज़र आया.

उसने उनकी कार की तरफ देखा पर किया कुछ नहीं.

स्लोगन ने एक काम उससे और सौपा था. उसका काम ये था की... करा को जाके बस इतना कहना की उस कार में वीर उसका इंतज़ार कर रहा है.

करा नज़दीक आएगी, कार में पीछे बैठे और दो लोग करा के बोडीगार्ड्स को रेस्ट्रिक्ट करेंगे, स्टीव इसी बीच करा को कार में डालेगा और वो खुद तब तक ड्राइवर सीट पर आके कार आगे बढ़ा चूका होगा.

यही स्लोगन का प्लान था. इन फैक्ट पीछे बैठे दो लोगो को ये भी नहीं पता था की स्लोगन उन्हें यहाँ मारने लाया है. बलि का बकरा बना के.

वो बस, वेट कर रहा था. बलहार के कॉल की. यदि उसने कॉल किया, और जैसा बताया गया था वैसा किया इसका मतलब था की बलहार धोकेबाज़ नहीं था. हे वास् लॉयल. वो अपनी परीसखा में पास हो जाएगा.

तभी स्लोगन और स्टीव दोनों ने hi देखा की बलहार ने अपना फ़ोन निकाला और कॉल लगाया.

उन् दोनों ने अपने अपने फ़ोन बाहर निकाले पर...

कॉल नहीं आया.

स्लोगन : हँ??

स्टीव (फ्रोंस) : ये कॉल क्यों नहीं आया.

और तभी, स्लोगन ने देखा की...

बलहार वही शांत खड़ा हुआ था. उसके चेहरे पर अगले hi पल... धीरे धीरे... शैतानो वाली मुस्कान बिखरती जा रही थी.

उस अँधेरे में केवल हलकी रौशनी में, बलहार के चेहरे की वो डरावनी मुस्कान देख, आज पहली बार इतने सालो में...

स्लोगन के रौंगटे खड़े हो गए.

स्टीव को जैसे hi समझ आया वो चिल्लाया,

स्टीव : बल्हाअरररररर!!!!

स्लोगन सही था. वो सही था. बलहार वास् ा फूकिंग ट्राईटर.

और स्टीव ने अभी चिल्लाया hi था की...

*BAAAAAANGGGGGGGGGGGG*

*स्पलऊऊऊरररत्तत्तत्त*

अचानक hi स्लोगन के चेहरे पर खून के चीते बिखर गए.

स्टीव वास् डेड!!!!

कार के विंडो गिलास को चीरती हुई, बुलेट आयी और उसकी खोपड़ी को फाड़ते हुए घुस गयी. सर्र का मॉस आधा लटक गया और कार के अंदर खून के चीते बिखर गए. स्लोगन के चेहरे पर जो खून लगा था, वो स्टीव का hi था. मानो उसके तोह दिल की धड़कन hi बंद हो गयी थी अचानक से ये सब देख.

"आआअह्हह्ह्ह्ह!!!!" करा जिसने सब कुछ दूर से देखा वो चिल्लाई. और उसके बोडीगार्ड्स फौरन hi आकर उससे घेर के अंदर ले जाने लगे.

इधर स्लोगन ने तभी, दूर खोला और...

*थुड़*

स्टीव के शरीर को लात से मार के बाहर गिराया. पालक झपकते hi वो ड्राइविंग सीट पर आया, उसका परर एक्सेलरेटर पर और...

*Vrrrrrrrrrrroooooooommm*

जोरर से रेस देते हुए गाडी आगे बढ़ी...

*बाआआआंणगगगगगग*

एक और गोली चलने की आवाज़ आयी पर स्लोगन बच के निकल चूका था.

आखिर क्या हुआ पालक झपकते hi? बोहत कुछ हुआ था.

रिसोर्ट के ऊपरी भाग पर hi...

तेरे वास् ा स्नाइपर!!!

जो किसी और ने नहीं वीर ने hi कारन को कह के रखवाए थे. और स्नाइपर ने अपना काम बखूबी किया. एक सर्र दर्द जा चूका था. स्टीव!

*बेदुम्प* *बेदुम्प*

स्लोगन की धड़कने यहाँ ट्रैन के जैसे तेज़्ज़ हो चुकी थी. सेकण्ड्स में hi क्या से क्या हो गया था.

पर उसके चेहरे पर भयंकर गुस्सा भरा हुआ था.

"Veeeeeeeeeeeeeeeerrrrrrr!!!"

वो चिल्लाया. क्युकी, ऑफ़ कोर्स...

उसके सिवा और कौन कर सकता था ये? आज उससे एक बात का पता लग गया था की,

हे ुँडेरेस्टीमटेड वीर!!!

स्लोगन को ये नहीं पता था की जब वो बलहार का टेस्ट लेने के लिए उससे रिसोर्ट की इन्फो लाने को सौप रहा था, तोह वह अपनी hi क़बर खोद रहा था.

बलहार ने जान बुझ के करा की एकदम सही इन्फो दी थी. ताकि, स्लोगन यहाँ आये करा को पकड़ने के लिए.

बलहार ने शुरू से अंत तक आस्वाशन जताते हुए और भरोसा दिलाते हुए उन्हें यकीन दिलाया था की काम हो जाएगा. वो अंत तक स्लोगन और स्टीव को शक में रखा रहा. केवल इस मोमेंट के लिए.

स्टीव के जाने से, एक झटका तोह लग hi गया था स्लोगन को.

और ये सब किसके कहने पर किया था बलहार ने?

वीर!!!!

जहा स्लोगन ये समझ रहा था की वो बलहार का टेस्ट लेगा और करा को पकड़ भी लेगा तोह वही वीर ने जान बूझ के बलहार का टेस्ट लेने दिया. उसने जान बूझ के करा की एकदम सही लोकेशन दिलवाई बलहार से.

यही कारण था की वीर ने कारन को अपने संग रखा. कारन ने सिक्योरिटी बढ़वा दी थी और ऊपर स्निपर्स रखवा दिए थे, वीर के कहने पर.

और वीर ने जान बूझ के ये जगह चुनी. ये करा का hi रिसोर्ट था. इन इतर वर्ड्स, यदि स्टीव मर्रा भी, तोह पुलिस का कोई लफड़ा होने hi नहीं वाला था. वीर वास् टोटली सेफ.

आईटी वास् ा प्लान तो लूरे आउट ा स्नेक आउट ऑफ़ इतस केव. सांप को मारने के लिए उससे उसके बिल से निकालना ज़रूरी था. वही किया था वीर ने.

*करायअस्स्सस्स्स्शह्ह्ह्हह्ह*

स्लोगन की कार एंट्रेंस के बैरियर को तोड़ते हुए निकली, गार्ड बस दौड़ता hi रह गया उसके पीछे.

और बलहार जो फ़ोन पे कॉल लगा रहा था उसने फ़ोन में बोलै,

बलहार : वो निकल गया.

"गुड!!!" दूसरी तरफ से आवाज़ आयी, जो किसी और की नहीं, वीर की hi थी.

एंट्रेंस से बाहर निकलते hi जैसे hi स्लोगन की कार सड़क पर आयी. उसके ठीक पीछे से hi कुछ hi दुरी पर...

एक और कार आ रही थी.

कारन : वो रही कार... दमन आईटी!!!! तुम सही थे!!!

वीर (स्माइल्स) : ी टोल्ड यू!!!

कारन कुछ न बोलै. क्युकी, यदि कार दिखी तोह अब प्लान के नेक्स्ट मूव को अंजाम देने का था.

उसने सीधा कॉल जस्सी को लगाया.

कारन : जसससससीईई!!!

जस्सी : गोत आईटी!!!

*कॉल एंड्स*

जस्सी जो एक मोड़ पर कार के अंदर बैठा हुआ था उसने शीशा खोल अपने हाथ से बस एक बार आगे बढ़ने का इशारा किया और...

करीब 15 से 20 गाड़िया इखट्टे मोड़ से निकल के मैं रोड पर आ गयी.

*वरररररओओओओओओममममम*

स्लोगन जो गाडी चला के भाग रहा था उसने जैसे hi अपने दायी तरफ देखा तोह उसके होश hi उड़द गए.

दायी तरफ से न जाने कितनी साड़ी काली गाड़िया बस निकलते hi जा रही थी. उसके तोह मानो चेहरे से रंग hi उड़द चूका था.

"फूऊककककककक!!!!" वो खीजते हुए चिल्लाया.

"D-Dadaaaa!!! अब क्या करना है???" पीछे बैठा एक चिल्लाया.

स्लोगन के दांत आपस में गुस्से से किटकिटा रहे थे. उसका पूरा ध्यान फिलहाल गाड़ियों को चकमा देके भागने में था.

"वीइररररर!!! दमंत्र यौऊ!!"

जस्ट व्हाट रियली हप्पेनेड? उसका प्लान बैकफीरे कैसे कर गया? वो जानता था की यदि बलहार धोका भी देगा तोह ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा?

उससे पता चलेगा और वो वह से तुरंत hi करा को चोरर के भाग निकलेगा. आखिर इसलिए तोह उसने स्टीव से कह के कार को ों hi रखा था वह पर. की कुछ भी यदि हो, तोह फौरन भाग सके.

पर...

व्हाट हे didn't अंडरस्टैंड वास् तहत...

उसने वीर को ुँडेरेस्तिमाते कर दिया. वो सोचता था की वीर बस एक लड़का था जो लड़ना जानता था बस. उसकी हलकी फुलकी पहचान थी और वो करा की नज़रों में एक अच्छा लड़का था. बस, इस से ज़्यादा कोई इम्प्रैशन नहीं था स्लोगन के मैं में वीर के लिए.

और यही पर उससे मुँह की खानी पद गयी आज.

उसका प्लान सिंपल था. एक गाडी में जाना जिस से भागने में आसानी हो, यदि कुछ गड़बड़ होती है तोह. यदि नहीं होती है तोह प्लान सिंपल hi था आगे भी.

करा को किडनैप करना, और फिर उससे अपनी डेस्टिनेशन पर लाना.

स्लोगन ने सारा इंतज़ाम क्युकी वही करके रखा हुआ था. उससे लगा था की यदि वो करा को किडनैप कर के ले जाएगा. तोह किशोर शांत नहीं बैठेगा. वो डेफिनिटेली अपनी पूरी सिक्योरिटी भेज देगा करा की खोज में. और वो ये भी जानता था की किशोर की सिक्योरिटी उसका ठिकान धुंध भी लेगी.

पर...

पर यदि धुंध भी लिया तोह क्या?

यही तोह प्लान था उसका. उसने इतने आदमी और इतनी फाॅर्स वह लगा के राखी थी की यदि करा की सिक्योरिटी एंटर करती भी है तोह उन्हें पूरी तरह से अंदर आने में काफी समय लग जाएगा. यदि किशोर कोप्तेर भी भेजता है तोह उसका इंतज़ाम भी था स्लोगन के पास. राकेट लांचर!!!

और जब तक सिक्योरिटी उसकी गैंग से भिड़ेगी, तब तक स्लोगन करा को ठिकाने लगा चूका होगा.

उसका लक्ष्य पूरा हो चूका होगा. पर...

पर न केवल आज उसने अपने लक्ष्य को खोया, बल्कि स्टीव को भी खो दिया था.

और इतना hi नहीं, उसकी हालत भीगी बिल्ली की तरह हो चुकी थी.

एंड, आईटी वास् आल बिकॉज़ ऑफ़ तहत फूकिंग वीर!!!

ऑफ़ कोर्स, यदि वीर नहीं था तोह और कौन था? किशोर को भली भाति जानता था स्लोगन. उसपे इंटेलिजेंस भी रखता था. ये उसका काम हरगिज़ नहीं था.

'कही वो तोह नहीं? N-Nahi... वो नहीं हो सकता.'

सोचते हुए उसने मैं को शांत करने की कोशिश की.

पर गुस्सा उसके चेहरे से जा hi नहीं रहा था.

एक hi उपाय था. जल्द से जल्द वो अपनी डेस्टिनेशन पर पहुँच जाए.

पर पीछे...

*वररररूओम्म्म*

*वररररओओओओओओओम*

*वररररओओओओओओओम*

धेरर साड़ी गाड़िया उसके पीछे लगी हुई थी.

और तभी,

*BANNNNGGGGGGGGGG*

एक बुलेट आयी और सीधा आके उसकी कार के राइट मिरर से लगी और मिरर को पूरा उखाड़ के अलग कर दी.

"डायमंत्र ित्तत्त!!!!"

इस हमले का जवाब देने के लिए, स्लोगन के साथ पीछे बैठे वो दो आदमी भी अपनी अपनी गन निकाल क्रॉस फायरिंग शुरू कर दिए.

*बंग*

*BANNNNGGGGGGGGGG*

जस्सी और रघु, अपने पूरे आदमियों के साथ उसके पीछे थे. साथी hi वीर और कारन भी.

स्लोगन की कार एक सुनसान रास्ते में घुसती जा रही थी.

ये लम्बा रूट था.

और रास्ता ऐसा था की चाह के भी वीर और कारन उसकी गाडी को ओवरटेक कर उससे रोक नहीं सकते थे.

पर वीर के होंठो पर मुस्कान थी. वो कॉंफिडेंट था.

कितना भी क्यों न भाग ले स्लोगन, आज उसका अंत निश्चित था. वो इसलिए क्युकी...

ऊपर हलके घने बदलो में जो चमक कर अपनी रौशनी बिखेर रहा था. वो था...

फुल मून!!!

.

.

.

.

.

.

.

आज के लिए इतना hi गाइस!

धन्यवाद!

नेक्स्ट अपडेट बोहत धमाकेदार होएगा. ये आप अनुमान लगा hi सकते हो.


लिखे करने का और रेवोस रखने का यारा! ✨
 
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