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- Dec 5, 2013
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Part - 60
माणिक अपने कमरे में था, लेकिन उसका दिमाग दिव्या पर था. वह जानता था की दिव्या अभी भी ऊपर होगी और शायद अपने चरम सुख में लीं होगी. माणिक को आज दिव्या को रेंज हाथों पकड़कर उसे पूरी तरह से अपने वश में करने का अंतिम मौका चाहिए था.
माणिक आज सोचता है की वह उसे ऊपर जाकर रेंज हाथों पकड़ेगा.
रात के लगभग 11:45 बज रहे थे. माणिक ने अपने कपडे उतारे और सिर्फ अंडरवियर में रहा. उसने नंगे पेअर ऊपर जाना शुरू किया ताकि क़दमों की आवाज़ न हो. सीढ़ियों पर चुप्पी थी.
वह स्टोर रूम के पास नहीं गया, बल्कि सीधा छत के उस कोने की तरफ बढ़ा जहाँ दिव्या बैठती थी.
माणिक ने छिपकर देखा. दिव्या की पीठ उसकी तरफ थी, और वह अपनी लोअर थोड़ी नीचे करके बैठी थी. उसके पास फ़ोन नहीं था, लेकिन वह हाथ से अपनी छूट को सहला रही थी. वह पूरी तरह से अपनी धुन में खोई हुई थी और aas-paas के माहौल से बेखबर थी.
माणिक को अपनी जीत का एहसास हुआ. वह बिना कोई आवाज़ किये, दबे पाऊँ, दिव्या के ठीक पीछे जाकर खड़ा हो गया.
माणिक: (गुनगुनाते हुए, उसकी सांस दिव्या की गर्दन पर पद रही थी) क्या कर रही हो, दीदी?
दिव्या एकदम से चौंक गयी! दर के मारे उसकी सांस रुक गयी.
इससे पहले की दिव्या पलट पाती, माणिक ने तुरंत आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ा जो उसकी छूट पर था, और उसे परे (दूर) हटा दिया.
फिर, माणिक ने दिव्या की पकड़ी हुई कलाई को उसकी छूट पर फिर से रखा.
माणिक: (वासना और अधिकार से भरी, धीमी आवाज़ में) लाओ, मैं कर देता हूँ. तुम क्यों कष्ट कर रही हो?
माणिक ने यह कहकर न सिर्फ दिव्या की सबसे बड़ी वर्जित क्रिया को उजागर किया, बल्कि खुलेआम उसे अपनी सेवा देने का प्रस्ताव भी दिया. दिव्या का दिल ज़ोरों से धड़क रहा था, वह अब पूरी तरह से माणिक के जाल में फँस चुकी थी.
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माणिक की इस सीढ़ी और खुली चुनौती से दिव्या का शरीर सिहर उठा. उसे एहसास हुआ की वह पूरी तरह से पकड़ी जा चुकी है.
दिव्या ने तुरंत अपनी सलवार का नाडा कैसा और कसकर बाँधा. उसने पलटकर माणिक की तरफ देखा, उसकी आँखों में गुस्सा, दर और लाचारी थी.
दिव्या: (गुस्से और झल्लाहट से) तुम... तुम यह क्या कर रहे हो! जानते भी हो, तुम मेरे भाई हो! तुम्हे शर्म नहीं आती!
माणिक ने इस बात को सुनकर ज़ोर से हंसा.
माणिक: (क्रूरता से) भाई? कैसी बात करती हो! हम दोनों के बीच bhai-behan का नहीं, एक hi रिश्ता है — वह है नफरत का! तुम्हे मेरी हर बात से नफरत है, मुझे तुम्हारी नफरत से!
माणिक का चेहरा अब जूनून से भरा था.
माणिक: और इस नफरत को मैं तेरी छूट मार कर दूर करूँगा, दिव्या! मैं तुझे बताऊंगा की बदला क्या होता है!
माणिक की इस बात पर दिव्या अपना आप खो बैठी. उसकी साड़ी हताशा, गुस्सा और दर एक थप्पड़ में बदल गया.
दिव्या ने ज़ोर से माणिक के गाल पर चटका मारा!
माणिक के गाल पर लाल निशाँ पद गया. माणिक को यह थप्पड़ बिलकुल सहन नहीं हुआ. उसे ज़बरदस्त गुस्सा आ गया. उसके चेहरे पर शैतानी भाव आ गया.
उसने तुरंत अपने अंडरवियर को नीचे खिसकाया और अपना खड़ा लुंड निकाला.
माणिक ने दिव्या को दीवार से सताया और बिना कुछ कहे, अपने गर्म, तन चुके लुंड को दिव्या की सलवार पर, उसकी छूट पर ज़ोर से घिसने लगा.
दिव्या की आँखें दर के मारे फ़ैल गयी. यह स्पर्श, यह ज़बरदस्ती, उसे अंदर तक हिला गयी. वह जानती थी की अगर वह अब नहीं भागी, तो माणिक उसकी इज़्ज़त छीन लेगा.
दिव्या ने किसी तरह माणिक को हल्का सा धक्का दिया और फटाफट नीचे भाग गयी. वह बिना soche-samjhe, सिर्फ अपनी जान बचने के लिए, सीढ़ियों से उतरती चली गयी. माणिक, हँसता हुआ, उसके पीछे नहीं गया. वह जानता था की दिव्या का प्रतिरोध अब पूरी तरह से टूट चूका था.
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माणिक, छत पर दिव्या को दरकार और अपना लुंड उस पर रगड़कर, एक अजीब से जोश में था. वह अपने अंडरवियर में hi नीचे आया.
जैसे hi वह सीढ़ियों से उतारकर लिविंग एरिया में पहुंचा, तो उसने देखा की दरवाज़ा खुल रहा है और उसके पापा (आनंद) अंदर आये हैं!
आनंद को देखकर माणिक एकदम से सकपका गया. उसे लगा था की पापा रात भर बहार रहेंगे.
माणिक: (खुद को सँभालते हुए) पापा! आप आज बड़ी लेट हो गए! मुझे लगा आप आज रात बहार hi रहोगे.
आनंद, जो abhi-abhi छोटू के साथ अपनी वर्जित क्रिया करके आया था, सकपका गया. उसे लगा की माणिक को कहीं कुछ पता तो नहीं चल गया.
आनंद: (झुंझलाहट छिपाते हुए) हाँ... हाँ, बीटा. वह... एक मीटिंग थी, ज़रा लम्बी खिंच गयी. तुम इतनी रात को...
आनंद ने अपनी बात पूरी नहीं की, क्यूंकि उसकी नज़र माणिक के अंडरवियर में तन चुके लुंड पर पड़ी. माणिक अभी भी छत वाले जोश में था.
आनंद: (सख्त आवाज़ में) और यह तुम किस हाल में हो? माणिक! घर पर तुम्हारी teen-teen जवान बहनें हैं! शर्म नहीं आती? ढंग से रहा करो! तुम्हे पता है न, यह सब अच्छा नहीं लगता.
माणिक को अपनी गलती का एहसास हुआ. वह जानता था की आनंद को उसके खड़े लुंड को देखकर ग़लतफ़हमी हो गयी है.
माणिक: (शांत होकर) जी, पापा.
माणिक ने तुरंत ‘जी पापा’ बोलै और बिना और कोई बात किये, अपने कमरे में भाग गया. वह जानता था की अब उसे जल्दी hi कपडे पेहेन्ने चाहिए.
आनंद ने रहत की सांस ली. उसे लगा की माणिक सिर्फ अपनी आदत से अंडरवियर में घूम रहा था. वह अपने कमरे की तरफ बढ़ गया, जबकि उसके दिमाग में अभी भी छोटू और 8 इंच के लुंड का रोमांच चल रहा था.
*******************************************************
माणिक अभी अपने कमरे में घुसने hi वाला था की उसकी नज़र सामने गलियारे में कड़ी दिव्या पर पड़ी. दिव्या का चेहरा गुस्से, अपमान और दर से लाल था. वह दरवाज़े पर आकर कड़ी हो गयी थी, ताकि माणिक से बात कर सके.
दिव्या: (गुस्से में, फुसफुसाते हुए) तुम! अगर अभी मैं पापा को तुम्हारी साड़ी हरकतें बता देती तो क्या होता? छत पर जो तुम कर रहे थे! तुम्हे पता है! पापा तुम्हे घर से निकाल देते!
माणिक भी अब जोश में था. वह पीछे हटने वाला नहीं था.
माणिक: (तैश में आकर, चुनौती देते हुए) अच्छा! और अगर मैं उन्हें तुम्हारे बारे में बता दूँ तो? मैं बता दूँ की तुम रात को kya-kya करती हो?
दिव्या: (आत्मविश्वास दिखने की कोशिश करते हुए) पापा तुम्हारी बात नहीं मानेंगे! तुम छोटे हो, और तुम पहले भी मुझसे लड़ाई कर चुके हो! वह तुम्हारी बात मानेंगे hi नहीं!
माणिक: (एक रहस्यमय हंसी के साथ, आँखें सिकोड़ते हुए) हाँ? तुम्हे ऐसा लगता है? मैं कुछ ऐसा करूँगा की वह मान लेंगे! और फिर तुम्हे मेरी हर बात माननी पड़ेगी, दीदी!
दिव्या ने हार नहीं मानी. वह बस ‘हुँह’ करके गर्दन झटकती है, जैसे माणिक की बात पर विश्वास न हो.
माणिक को उसका यह प्रतिरोध और भी ज़्यादा उकसा गया. उसने तुरंत, बिना किसी दर के, फिर से अपना लुंड निकाला.
माणिक: (अधिकार भरे लहजे में, अपने लुंड की तरफ इशारा करते हुए) क्या लगता है? लगता है तू इसे अपनी छूट में डलवाये बिना नहीं मानेगी! यह तेरी साड़ी नफरत और ग़ुरूर निकाल देगा!
दिव्या अब और बर्दाश्त नहीं कर सकीय. इस बार वह प्रतिरोध करने के बजाय, भागकर अपने कमरे में गयी और दरवाज़ा लॉक कर लेती है.
माणिक ज़ोर से हँसता हुआ अपने कमरे में जाता है. उसने दिव्या को पूरी तरह से डरा दिया था. कमरे में पहुंचकर, वह संतुष्टि से अपनी मुठ मारने लगता है, इस बार पूरी तरह से अपनी बड़ी बहिन की कल्पना में लीं होकर.
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माणिक अपने कमरे में था, लेकिन उसका दिमाग दिव्या पर था. वह जानता था की दिव्या अभी भी ऊपर होगी और शायद अपने चरम सुख में लीं होगी. माणिक को आज दिव्या को रेंज हाथों पकड़कर उसे पूरी तरह से अपने वश में करने का अंतिम मौका चाहिए था.
माणिक आज सोचता है की वह उसे ऊपर जाकर रेंज हाथों पकड़ेगा.
रात के लगभग 11:45 बज रहे थे. माणिक ने अपने कपडे उतारे और सिर्फ अंडरवियर में रहा. उसने नंगे पेअर ऊपर जाना शुरू किया ताकि क़दमों की आवाज़ न हो. सीढ़ियों पर चुप्पी थी.
वह स्टोर रूम के पास नहीं गया, बल्कि सीधा छत के उस कोने की तरफ बढ़ा जहाँ दिव्या बैठती थी.
माणिक ने छिपकर देखा. दिव्या की पीठ उसकी तरफ थी, और वह अपनी लोअर थोड़ी नीचे करके बैठी थी. उसके पास फ़ोन नहीं था, लेकिन वह हाथ से अपनी छूट को सहला रही थी. वह पूरी तरह से अपनी धुन में खोई हुई थी और aas-paas के माहौल से बेखबर थी.
माणिक को अपनी जीत का एहसास हुआ. वह बिना कोई आवाज़ किये, दबे पाऊँ, दिव्या के ठीक पीछे जाकर खड़ा हो गया.
माणिक: (गुनगुनाते हुए, उसकी सांस दिव्या की गर्दन पर पद रही थी) क्या कर रही हो, दीदी?
दिव्या एकदम से चौंक गयी! दर के मारे उसकी सांस रुक गयी.
इससे पहले की दिव्या पलट पाती, माणिक ने तुरंत आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ा जो उसकी छूट पर था, और उसे परे (दूर) हटा दिया.
फिर, माणिक ने दिव्या की पकड़ी हुई कलाई को उसकी छूट पर फिर से रखा.
माणिक: (वासना और अधिकार से भरी, धीमी आवाज़ में) लाओ, मैं कर देता हूँ. तुम क्यों कष्ट कर रही हो?
माणिक ने यह कहकर न सिर्फ दिव्या की सबसे बड़ी वर्जित क्रिया को उजागर किया, बल्कि खुलेआम उसे अपनी सेवा देने का प्रस्ताव भी दिया. दिव्या का दिल ज़ोरों से धड़क रहा था, वह अब पूरी तरह से माणिक के जाल में फँस चुकी थी.
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माणिक की इस सीढ़ी और खुली चुनौती से दिव्या का शरीर सिहर उठा. उसे एहसास हुआ की वह पूरी तरह से पकड़ी जा चुकी है.
दिव्या ने तुरंत अपनी सलवार का नाडा कैसा और कसकर बाँधा. उसने पलटकर माणिक की तरफ देखा, उसकी आँखों में गुस्सा, दर और लाचारी थी.
दिव्या: (गुस्से और झल्लाहट से) तुम... तुम यह क्या कर रहे हो! जानते भी हो, तुम मेरे भाई हो! तुम्हे शर्म नहीं आती!
माणिक ने इस बात को सुनकर ज़ोर से हंसा.
माणिक: (क्रूरता से) भाई? कैसी बात करती हो! हम दोनों के बीच bhai-behan का नहीं, एक hi रिश्ता है — वह है नफरत का! तुम्हे मेरी हर बात से नफरत है, मुझे तुम्हारी नफरत से!
माणिक का चेहरा अब जूनून से भरा था.
माणिक: और इस नफरत को मैं तेरी छूट मार कर दूर करूँगा, दिव्या! मैं तुझे बताऊंगा की बदला क्या होता है!
माणिक की इस बात पर दिव्या अपना आप खो बैठी. उसकी साड़ी हताशा, गुस्सा और दर एक थप्पड़ में बदल गया.
दिव्या ने ज़ोर से माणिक के गाल पर चटका मारा!
माणिक के गाल पर लाल निशाँ पद गया. माणिक को यह थप्पड़ बिलकुल सहन नहीं हुआ. उसे ज़बरदस्त गुस्सा आ गया. उसके चेहरे पर शैतानी भाव आ गया.
उसने तुरंत अपने अंडरवियर को नीचे खिसकाया और अपना खड़ा लुंड निकाला.
माणिक ने दिव्या को दीवार से सताया और बिना कुछ कहे, अपने गर्म, तन चुके लुंड को दिव्या की सलवार पर, उसकी छूट पर ज़ोर से घिसने लगा.
दिव्या की आँखें दर के मारे फ़ैल गयी. यह स्पर्श, यह ज़बरदस्ती, उसे अंदर तक हिला गयी. वह जानती थी की अगर वह अब नहीं भागी, तो माणिक उसकी इज़्ज़त छीन लेगा.
दिव्या ने किसी तरह माणिक को हल्का सा धक्का दिया और फटाफट नीचे भाग गयी. वह बिना soche-samjhe, सिर्फ अपनी जान बचने के लिए, सीढ़ियों से उतरती चली गयी. माणिक, हँसता हुआ, उसके पीछे नहीं गया. वह जानता था की दिव्या का प्रतिरोध अब पूरी तरह से टूट चूका था.
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माणिक, छत पर दिव्या को दरकार और अपना लुंड उस पर रगड़कर, एक अजीब से जोश में था. वह अपने अंडरवियर में hi नीचे आया.
जैसे hi वह सीढ़ियों से उतारकर लिविंग एरिया में पहुंचा, तो उसने देखा की दरवाज़ा खुल रहा है और उसके पापा (आनंद) अंदर आये हैं!
आनंद को देखकर माणिक एकदम से सकपका गया. उसे लगा था की पापा रात भर बहार रहेंगे.
माणिक: (खुद को सँभालते हुए) पापा! आप आज बड़ी लेट हो गए! मुझे लगा आप आज रात बहार hi रहोगे.
आनंद, जो abhi-abhi छोटू के साथ अपनी वर्जित क्रिया करके आया था, सकपका गया. उसे लगा की माणिक को कहीं कुछ पता तो नहीं चल गया.
आनंद: (झुंझलाहट छिपाते हुए) हाँ... हाँ, बीटा. वह... एक मीटिंग थी, ज़रा लम्बी खिंच गयी. तुम इतनी रात को...
आनंद ने अपनी बात पूरी नहीं की, क्यूंकि उसकी नज़र माणिक के अंडरवियर में तन चुके लुंड पर पड़ी. माणिक अभी भी छत वाले जोश में था.
आनंद: (सख्त आवाज़ में) और यह तुम किस हाल में हो? माणिक! घर पर तुम्हारी teen-teen जवान बहनें हैं! शर्म नहीं आती? ढंग से रहा करो! तुम्हे पता है न, यह सब अच्छा नहीं लगता.
माणिक को अपनी गलती का एहसास हुआ. वह जानता था की आनंद को उसके खड़े लुंड को देखकर ग़लतफ़हमी हो गयी है.
माणिक: (शांत होकर) जी, पापा.
माणिक ने तुरंत ‘जी पापा’ बोलै और बिना और कोई बात किये, अपने कमरे में भाग गया. वह जानता था की अब उसे जल्दी hi कपडे पेहेन्ने चाहिए.
आनंद ने रहत की सांस ली. उसे लगा की माणिक सिर्फ अपनी आदत से अंडरवियर में घूम रहा था. वह अपने कमरे की तरफ बढ़ गया, जबकि उसके दिमाग में अभी भी छोटू और 8 इंच के लुंड का रोमांच चल रहा था.
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माणिक अभी अपने कमरे में घुसने hi वाला था की उसकी नज़र सामने गलियारे में कड़ी दिव्या पर पड़ी. दिव्या का चेहरा गुस्से, अपमान और दर से लाल था. वह दरवाज़े पर आकर कड़ी हो गयी थी, ताकि माणिक से बात कर सके.
दिव्या: (गुस्से में, फुसफुसाते हुए) तुम! अगर अभी मैं पापा को तुम्हारी साड़ी हरकतें बता देती तो क्या होता? छत पर जो तुम कर रहे थे! तुम्हे पता है! पापा तुम्हे घर से निकाल देते!
माणिक भी अब जोश में था. वह पीछे हटने वाला नहीं था.
माणिक: (तैश में आकर, चुनौती देते हुए) अच्छा! और अगर मैं उन्हें तुम्हारे बारे में बता दूँ तो? मैं बता दूँ की तुम रात को kya-kya करती हो?
दिव्या: (आत्मविश्वास दिखने की कोशिश करते हुए) पापा तुम्हारी बात नहीं मानेंगे! तुम छोटे हो, और तुम पहले भी मुझसे लड़ाई कर चुके हो! वह तुम्हारी बात मानेंगे hi नहीं!
माणिक: (एक रहस्यमय हंसी के साथ, आँखें सिकोड़ते हुए) हाँ? तुम्हे ऐसा लगता है? मैं कुछ ऐसा करूँगा की वह मान लेंगे! और फिर तुम्हे मेरी हर बात माननी पड़ेगी, दीदी!
दिव्या ने हार नहीं मानी. वह बस ‘हुँह’ करके गर्दन झटकती है, जैसे माणिक की बात पर विश्वास न हो.
माणिक को उसका यह प्रतिरोध और भी ज़्यादा उकसा गया. उसने तुरंत, बिना किसी दर के, फिर से अपना लुंड निकाला.
माणिक: (अधिकार भरे लहजे में, अपने लुंड की तरफ इशारा करते हुए) क्या लगता है? लगता है तू इसे अपनी छूट में डलवाये बिना नहीं मानेगी! यह तेरी साड़ी नफरत और ग़ुरूर निकाल देगा!
दिव्या अब और बर्दाश्त नहीं कर सकीय. इस बार वह प्रतिरोध करने के बजाय, भागकर अपने कमरे में गयी और दरवाज़ा लॉक कर लेती है.
माणिक ज़ोर से हँसता हुआ अपने कमरे में जाता है. उसने दिव्या को पूरी तरह से डरा दिया था. कमरे में पहुंचकर, वह संतुष्टि से अपनी मुठ मारने लगता है, इस बार पूरी तरह से अपनी बड़ी बहिन की कल्पना में लीं होकर.
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