Incest JANNAT TERI BAHON (TANGO) MEIN - Page 10 - SexBaba
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Incest JANNAT TERI BAHON (TANGO) MEIN

Part - 60

माणिक अपने कमरे में था, लेकिन उसका दिमाग दिव्या पर था. वह जानता था की दिव्या अभी भी ऊपर होगी और शायद अपने चरम सुख में लीं होगी. माणिक को आज दिव्या को रेंज हाथों पकड़कर उसे पूरी तरह से अपने वश में करने का अंतिम मौका चाहिए था.

माणिक आज सोचता है की वह उसे ऊपर जाकर रेंज हाथों पकड़ेगा.

रात के लगभग 11:45 बज रहे थे. माणिक ने अपने कपडे उतारे और सिर्फ अंडरवियर में रहा. उसने नंगे पेअर ऊपर जाना शुरू किया ताकि क़दमों की आवाज़ न हो. सीढ़ियों पर चुप्पी थी.

वह स्टोर रूम के पास नहीं गया, बल्कि सीधा छत के उस कोने की तरफ बढ़ा जहाँ दिव्या बैठती थी.

माणिक ने छिपकर देखा. दिव्या की पीठ उसकी तरफ थी, और वह अपनी लोअर थोड़ी नीचे करके बैठी थी. उसके पास फ़ोन नहीं था, लेकिन वह हाथ से अपनी छूट को सहला रही थी. वह पूरी तरह से अपनी धुन में खोई हुई थी और aas-paas के माहौल से बेखबर थी.

माणिक को अपनी जीत का एहसास हुआ. वह बिना कोई आवाज़ किये, दबे पाऊँ, दिव्या के ठीक पीछे जाकर खड़ा हो गया.

माणिक: (गुनगुनाते हुए, उसकी सांस दिव्या की गर्दन पर पद रही थी) क्या कर रही हो, दीदी?

दिव्या एकदम से चौंक गयी! दर के मारे उसकी सांस रुक गयी.

इससे पहले की दिव्या पलट पाती, माणिक ने तुरंत आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ा जो उसकी छूट पर था, और उसे परे (दूर) हटा दिया.

फिर, माणिक ने दिव्या की पकड़ी हुई कलाई को उसकी छूट पर फिर से रखा.

माणिक: (वासना और अधिकार से भरी, धीमी आवाज़ में) लाओ, मैं कर देता हूँ. तुम क्यों कष्ट कर रही हो?

माणिक ने यह कहकर न सिर्फ दिव्या की सबसे बड़ी वर्जित क्रिया को उजागर किया, बल्कि खुलेआम उसे अपनी सेवा देने का प्रस्ताव भी दिया. दिव्या का दिल ज़ोरों से धड़क रहा था, वह अब पूरी तरह से माणिक के जाल में फँस चुकी थी.

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माणिक की इस सीढ़ी और खुली चुनौती से दिव्या का शरीर सिहर उठा. उसे एहसास हुआ की वह पूरी तरह से पकड़ी जा चुकी है.

दिव्या ने तुरंत अपनी सलवार का नाडा कैसा और कसकर बाँधा. उसने पलटकर माणिक की तरफ देखा, उसकी आँखों में गुस्सा, दर और लाचारी थी.

दिव्या: (गुस्से और झल्लाहट से) तुम... तुम यह क्या कर रहे हो! जानते भी हो, तुम मेरे भाई हो! तुम्हे शर्म नहीं आती!

माणिक ने इस बात को सुनकर ज़ोर से हंसा.

माणिक: (क्रूरता से) भाई? कैसी बात करती हो! हम दोनों के बीच bhai-behan का नहीं, एक hi रिश्ता है — वह है नफरत का! तुम्हे मेरी हर बात से नफरत है, मुझे तुम्हारी नफरत से!

माणिक का चेहरा अब जूनून से भरा था.

माणिक: और इस नफरत को मैं तेरी छूट मार कर दूर करूँगा, दिव्या! मैं तुझे बताऊंगा की बदला क्या होता है!

माणिक की इस बात पर दिव्या अपना आप खो बैठी. उसकी साड़ी हताशा, गुस्सा और दर एक थप्पड़ में बदल गया.

दिव्या ने ज़ोर से माणिक के गाल पर चटका मारा!

माणिक के गाल पर लाल निशाँ पद गया. माणिक को यह थप्पड़ बिलकुल सहन नहीं हुआ. उसे ज़बरदस्त गुस्सा आ गया. उसके चेहरे पर शैतानी भाव आ गया.

उसने तुरंत अपने अंडरवियर को नीचे खिसकाया और अपना खड़ा लुंड निकाला.

माणिक ने दिव्या को दीवार से सताया और बिना कुछ कहे, अपने गर्म, तन चुके लुंड को दिव्या की सलवार पर, उसकी छूट पर ज़ोर से घिसने लगा.

दिव्या की आँखें दर के मारे फ़ैल गयी. यह स्पर्श, यह ज़बरदस्ती, उसे अंदर तक हिला गयी. वह जानती थी की अगर वह अब नहीं भागी, तो माणिक उसकी इज़्ज़त छीन लेगा.

दिव्या ने किसी तरह माणिक को हल्का सा धक्का दिया और फटाफट नीचे भाग गयी. वह बिना soche-samjhe, सिर्फ अपनी जान बचने के लिए, सीढ़ियों से उतरती चली गयी. माणिक, हँसता हुआ, उसके पीछे नहीं गया. वह जानता था की दिव्या का प्रतिरोध अब पूरी तरह से टूट चूका था.

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माणिक, छत पर दिव्या को दरकार और अपना लुंड उस पर रगड़कर, एक अजीब से जोश में था. वह अपने अंडरवियर में hi नीचे आया.

जैसे hi वह सीढ़ियों से उतारकर लिविंग एरिया में पहुंचा, तो उसने देखा की दरवाज़ा खुल रहा है और उसके पापा (आनंद) अंदर आये हैं!

आनंद को देखकर माणिक एकदम से सकपका गया. उसे लगा था की पापा रात भर बहार रहेंगे.

माणिक: (खुद को सँभालते हुए) पापा! आप आज बड़ी लेट हो गए! मुझे लगा आप आज रात बहार hi रहोगे.

आनंद, जो abhi-abhi छोटू के साथ अपनी वर्जित क्रिया करके आया था, सकपका गया. उसे लगा की माणिक को कहीं कुछ पता तो नहीं चल गया.

आनंद: (झुंझलाहट छिपाते हुए) हाँ... हाँ, बीटा. वह... एक मीटिंग थी, ज़रा लम्बी खिंच गयी. तुम इतनी रात को...

आनंद ने अपनी बात पूरी नहीं की, क्यूंकि उसकी नज़र माणिक के अंडरवियर में तन चुके लुंड पर पड़ी. माणिक अभी भी छत वाले जोश में था.

आनंद: (सख्त आवाज़ में) और यह तुम किस हाल में हो? माणिक! घर पर तुम्हारी teen-teen जवान बहनें हैं! शर्म नहीं आती? ढंग से रहा करो! तुम्हे पता है न, यह सब अच्छा नहीं लगता.

माणिक को अपनी गलती का एहसास हुआ. वह जानता था की आनंद को उसके खड़े लुंड को देखकर ग़लतफ़हमी हो गयी है.

माणिक: (शांत होकर) जी, पापा.

माणिक ने तुरंत ‘जी पापा’ बोलै और बिना और कोई बात किये, अपने कमरे में भाग गया. वह जानता था की अब उसे जल्दी hi कपडे पेहेन्ने चाहिए.

आनंद ने रहत की सांस ली. उसे लगा की माणिक सिर्फ अपनी आदत से अंडरवियर में घूम रहा था. वह अपने कमरे की तरफ बढ़ गया, जबकि उसके दिमाग में अभी भी छोटू और 8 इंच के लुंड का रोमांच चल रहा था.

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माणिक अभी अपने कमरे में घुसने hi वाला था की उसकी नज़र सामने गलियारे में कड़ी दिव्या पर पड़ी. दिव्या का चेहरा गुस्से, अपमान और दर से लाल था. वह दरवाज़े पर आकर कड़ी हो गयी थी, ताकि माणिक से बात कर सके.

दिव्या: (गुस्से में, फुसफुसाते हुए) तुम! अगर अभी मैं पापा को तुम्हारी साड़ी हरकतें बता देती तो क्या होता? छत पर जो तुम कर रहे थे! तुम्हे पता है! पापा तुम्हे घर से निकाल देते!

माणिक भी अब जोश में था. वह पीछे हटने वाला नहीं था.

माणिक: (तैश में आकर, चुनौती देते हुए) अच्छा! और अगर मैं उन्हें तुम्हारे बारे में बता दूँ तो? मैं बता दूँ की तुम रात को kya-kya करती हो?

दिव्या: (आत्मविश्वास दिखने की कोशिश करते हुए) पापा तुम्हारी बात नहीं मानेंगे! तुम छोटे हो, और तुम पहले भी मुझसे लड़ाई कर चुके हो! वह तुम्हारी बात मानेंगे hi नहीं!

माणिक: (एक रहस्यमय हंसी के साथ, आँखें सिकोड़ते हुए) हाँ? तुम्हे ऐसा लगता है? मैं कुछ ऐसा करूँगा की वह मान लेंगे! और फिर तुम्हे मेरी हर बात माननी पड़ेगी, दीदी!

दिव्या ने हार नहीं मानी. वह बस ‘हुँह’ करके गर्दन झटकती है, जैसे माणिक की बात पर विश्वास न हो.

माणिक को उसका यह प्रतिरोध और भी ज़्यादा उकसा गया. उसने तुरंत, बिना किसी दर के, फिर से अपना लुंड निकाला.

माणिक: (अधिकार भरे लहजे में, अपने लुंड की तरफ इशारा करते हुए) क्या लगता है? लगता है तू इसे अपनी छूट में डलवाये बिना नहीं मानेगी! यह तेरी साड़ी नफरत और ग़ुरूर निकाल देगा!

दिव्या अब और बर्दाश्त नहीं कर सकीय. इस बार वह प्रतिरोध करने के बजाय, भागकर अपने कमरे में गयी और दरवाज़ा लॉक कर लेती है.

माणिक ज़ोर से हँसता हुआ अपने कमरे में जाता है. उसने दिव्या को पूरी तरह से डरा दिया था. कमरे में पहुंचकर, वह संतुष्टि से अपनी मुठ मारने लगता है, इस बार पूरी तरह से अपनी बड़ी बहिन की कल्पना में लीं होकर.



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Part - 61

दिव्या अपने कमरे में दरवाज़ा बंद करके, हांफ रही थी. माणिक की आखिरी धमकी और उसके लुंड का घर्षण उसे अंदर तक हिला चूका था. विरोध और नफरत के बावजूद, माणिक के तन चुके लुंड का एहसास उसके मैं से हैट नहीं रहा था.

वह बिस्तर पर बैठी और अपने दर, गुस्से और एक छुपी हुई उत्तेजना को शांत करने के लिए, उसने अपनी छूट को सहलाना शुरू कर दिया.

जैसे hi उसने हस्तमैथुन शुरू किया, उसकी आँखों के सामने माणिक का लुंड आ जाता है. वह उस दृश्य को याद करने लगी जब माणिक उसे छूने की कोशिश कर रहा था.

दिव्या सोचने लगी: “कितना बड़ा है इसका लुंड! जब उसने मेरे ऊपर रगड़ा था तो मुझे पूरा दबाव महसूस हुआ था. यह काम से काम 9 इंच तो होगा!”

उसे तुलना याद आयी. “उद्धार रोहन (उसका बॉयफ्रेंड) का मैंने गलती से देख लिया था जब वह पेशाब कर रहा था. वह तो 5.5 इंच से ज़्यादा नहीं होगा.”

माणिक का बड़ा, मज़बूत और आक्रामक लुंड, उसके बॉयफ्रेंड के लुंड से कहीं ज़्यादा प्रभावी लग रहा था. यह तुलना, नफरत और दर के बावजूद, दिव्या को ज़बरदस्त जोश दे रही थी.

माणिक का लुंड — वह वर्जित फल — उसकी कल्पना में पूरी तरह से हावी हो गया. वह माणिक के स्पर्श और उसके लुंड की कठोरता को महसूस करती हुई, तेज़ी से अपनी छूट को रगड़ने लगी. उसकी सांसें तेज़ हो गयी और वह जल्दी hi चरम सुख पर पहुंचकर झाड़ जाती है.

सतुष्टि के बाद, दिव्या को तीव्र शर्मिंदगी महसूस हुई.

दिव्या: (अपने सर पर ज़ोर से हाथ मारकर, खुद से बोलती है) पागल! क्या किया तूने! अपने भाई के लुंड को सोचकर मस्टुर्बते किया तूने! क्या हो गया है तुझे?

दिव्या नफरत करती थी, लेकिन माणिक ने उसे ऐसी जगह पर चोट की थी जहाँ उसका कण्ट्रोल नहीं था. वह जानती थी की अब माणिक सिर्फ उसका भाई नहीं रहा, बल्कि उसकी सबसे खतरनाक और वर्जित वासना का स्रोत बन चूका था.

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अनु अपने शादी के इवेंट की व्यस्तताओं में लगी हुई थी. हर चीज़ को ठीक से व्यवस्थित करना उसकी ज़िम्मेदारी थी. उसे जल्द से जल्द दूल्हे की बुआ को ढूंढकर उनसे उनके डांस परफॉरमेंस के बारे में बात करनी थी.

उसने दरवाज़े पर हल्का सा दस्तक देने की सोची, पर आवाज़ अंदर से आ रही तेज़ धुन में डाब गयी होगी. अनु ने सोचा की वह दरवाज़ा खोलकर आवाज़ लगाएगी.

उसने जैसे hi कमरे का दरवाज़ा खोला, उसकी आँखें फटी रह गयी.

अंदर का दृश्य स्तब्ध कर देने वाला था. दूल्हे की बुआ, जो एक सादे और संस्कारी अंदाज़ में दिखती थी, किसी दुसरे मर्द के साथ कमरे के बीच में चौड़ाई कर रही थी. वह दोनों इस क्रिया में इतने लीं थे की उन्हें दरवाज़ा खुलने की आवाज़ भी नहीं आयी.

यह अनु के लिए दूसरा मौका था जब उसने अपनी आँखों से ऐसी अंतरंगता देखि थी (पहला मल्लिका और आर्यन के साथ). अनु के haath-paon ठन्डे पद गए. उसका दिल ज़ोरों से धड़कने लगा. वह तुरंत घबरा गयी और बिना कोई आवाज़ किये बहार जाने लगी.

तभी, बुआ की नज़र दरवाज़े की तरफ गयी.

बुआ: (एकदम से रूककर, नाराज़गी और फुसफुसाहट में) No... नॉक नहीं कर सकती थी!

बुआ ने तुरंत उस आदमी को इशारा किया. वह दोनों तेज़ी से कपडे ठीक करने लगे.

अनु पूरी तरह से अपराधी महसूस कर रही थी, जबकि गलती उसकी नहीं थी.

अनु का विचार (मैं hi मैं): अब अनु क्या बोले? मैं यहाँ शादी की रस्में देखने आयी हूँ, यह सब नहीं! उसे क्या पता था की वह शादी के इतने शुभ मौके पर कोई दुसरे मर्द के साथ इस हाल में होगी!

अनु ने किसी तरह खुद को संभाला.

अनु: (हकलाते हुए, नज़रें झुकाकर) माफ़... माफ़ करना! मैं... मैं तो आपके डांस के... आपके डांस के अर्रंगेमेन्ट्स के बारे में बताने आयी थी. मुझे... मुझे नहीं पता था की आप यहाँ किसी के साथ हैं.

बुआ का चेहरा अभी भी गुस्से से लाल था, लेकिन वह जानती थी की अब माहौल शांत करना होगा.

बुआ: (सख्त आवाज़ में) ठीक है! अब तुम्हे पता चल गया है. अब बहार जाओ और दरवाज़ा बंद करो. मैं थोड़ी देर में आती हूँ. और हाँ... किसी को कुछ बताने की ज़रूरत नहीं है!

अनु ने बिना एक और शब्द बोले दरवाज़ा बंद किया और वहां से लगभग भाग गयी. मल्लिका के बाद, यह दूसरा दृश्य था जिसने अनु की अपनी दुनिया के नैतिक मूल्यों को हिला कर रख दिया था.

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डांस परफॉरमेंस ख़तम होने के बाद, बुआ तुरंत अनु को एक और ले गयी, जहाँ भीड़ काम थी. बुआ का चेहरा अभी भी शर्मिंदगी और घबराहट से भरा हुआ था.

बुआ: (अनु का हाथ पकड़ते हुए, धीमी, काम्पटी आवाज़ में) बीटा... अनु! तुम्हे मेरी बात सुन्नी होगी. प्लीज! जो तुमने देखा... जो तुमने अंदर देखा था... किसी को बताना नहीं!

बुआ ने चारों तरफ देखा, डरते हुए की कोई उनकी बात सुन न ले.

बुआ: नहीं तो मेरी इज़्ज़त की धज्जियां उड़ जाएँगी! मेरा घर बर्बाद हो जायेगा! तुम समझो मेरी मजबूरी!

दर के मारे, बुआ ने अपने पर्स से 500 के नोटों की एक गद्दी निकाली और उसे अनु को पकड़ाने लगी. यह एक तरह से अनु का मुँह बंद रखने की रिश्वत थी.

बुआ: यह लो बीटा. इसे रख लो. और बस, तुम किसी को कुछ मत बताना.

अनु ने बुआ के हाथ को छुआ तक नहीं. वह पहले से hi मल्लिका के जीवन से हतप्रभ थी, और अब इस बुआ की हरकत ने उसे और ज़्यादा सख्त बना दिया था.

अनु: (शांत और प्रोफेशनल अंदाज़ में) देखिये, आंटी. आप यह पैसे वापस रख लीजिये. मैं वैसे भी किसी की फटी में टांग नहीं ादती.

अनु ने अपनी बात पूरी स्पष्टता से कही.

अनु: आपको जो करना है, आप अपनी ज़िन्दगी में करो. मुझे कोई मतलब नहीं है. मेरा काम यहाँ शादी के अर्रंगेमेन्ट्स देखना है, और मैं जिस काम से मतलब है, वह बखूबी कर रही हूँ. और उसके मुझे achhe-khaase पैसे मिल रहे हैं.

अनु ने एक गहरी सांस ली और आत्मविश्वास से बुआ की आँखों में देखा.

अनु: अब आप निश्चिंत होकर जाओ. मैं आपके राज़ को किसी को नहीं बताउंगी. मुझे इसमें कोई दिलचस्प नहीं है.

बुआ ने रहत की सांस ली. उन्होंने पैसे वापस पर्स में रखे और अनु को धन्यवाद देकर तेज़ी से वहां से चली गयी. अनु वही कड़ी रही, यह सोचते हुए की इस दुनिया में हर कोई, उसके परिवार से बहार भी, apni-apni मर्यादाओं को तोड़ रहा है.

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Baar-baar चौड़ाई के दृश्य देखने के बाद — पहले मल्लिका और आर्यन, फिर शादी की बुआ — आज तो अनु की छूट में भी खुजली हो गयी थी. यह दृश्य उसके अवचेतन मैं पर ज़ोर दाल रहे थे, और उसकी दबी हुई इच्छाएं जाग उठी थी.

अनु, जो मुश्किल से do-teen महीने में एक बार hi अपनी छूट को सहलाती थी, आज खुद को रोक नहीं पायी. उसे तुरंत बाथरूम में घुसकर छूट सहलाना पद जाता है. उसने तेज़ी से खुद को संतुष्ट किया, लेकिन उसकी सांसें तेज़ थी और चेहरा लाल हो चूका था.

वह जैसे hi बाथरूम से निकली, तो वहां पहले से कड़ी मल्लिका उसे देख लेती है.

मल्लिका, जो अनु की हर हरकत को भाँती थी, उसने तुरंत अनु की हालत देखकर टिपण्णी की. अनु के शरीर से निकली भाप और उसकी थकी हुई आँखें सब कुछ बता रही थी.

मल्लिका: (आँख मारते हुए, शरारती अंदाज़ में) अरे! क्या हुआ, दीदी? ऐसे ‘डिस्चार्ज’ सी हुई लगती हो! क्या बात है? कहीं मस्टुर्बते करके तो नहीं आयी? शादी में इतने खुले माहौल में, ऐसा होना तो लाज़मी है!

अनु को मल्लिका का मज़ाक बिलकुल पसंद नहीं आया. वह तुरंत मल्लिका को इग्नोर करते हुए बोली.

अनु: (गुस्से से) यह सारे गंदे काम तुझे hi मुबारक! और तुझे hi यह सब चीज़ें दिखती हैं हर जगह! मुझे ज़रूरत नहीं इस सब की! मैं यह सब नहीं करती.

मल्लिका: (हँसते हुए) मुझे भी क्या ज़रूरत है! मैं क्यों यह सब करूँ? मैं यह सब नहीं करती, मैं तो डायरेक्ट चौड़ाई करवाती हूँ और ज़िन्दगी के मज़े लेती हूँ! यह सब तो aadhe-adhoore लोग करते हैं!

अनु के पास मल्लिका की इस बेशर्मी का कोई जवाब नहीं था.

अनु सोचती है, “इससे maatha-pacchi करके कोई फायदा नहीं.” मल्लिका के पास हर जवाब के लिए एक नया तर्क होता था. अनु को अपनी खुजली और शर्म पर गुस्सा आया.

अनु ने मल्लिका की तरफ देखा तक नहीं और सीधे घर की तरफ निकल जाती है. उसके दिमाग में अब बस यह चल रहा था की उसकी ज़िन्दगी कितनी seedhi-saadi है, जबकि उसके aas-paas की दुनिया कितनी खुली और वर्जित है.



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Part - 62

अगले दिन सुबह, माणिक की योजना तैयार थी. वह जानता था की अगर उससे घर में बिना किसी रूकावट के कुछ करना है, तो उसे पारी का साथ चाहिए.

स्कूल जाने के लिए तैयार हो रही पारी को माणिक ने दरवाज़े पर hi स्कूल जाने से रोक लिया.

माणिक: (आवाज़ में अधिकार) छुटकी! आज तुम स्कूल नहीं जाओगी.

पारी, जो अपने प्यारे भाई की बात कभी नहीं टालती, उसने तुरंत हामी भर दी.

पारी: ठीक है, भाई! पर दीदी (अनु) को क्या बोलूंगी?

माणिक ने तुरंत अनु को बहाना बताने को कहा.

माणिक: तुम अनु दीदी को बोलना की तुम्हे पीरियड्स आ गए हैं और तुम्हारे पेट में बहुत दर्द है, इसलिए तुम नहीं जा पाओगी.

पारी ने वही किया. अनु ने उसकी बात मान ली, और पारी रुक जाती है.

जब सबके जाने के बाद — अनु के काम पर और आनंद के ऑफिस — माणिक ने तुरंत बहार का दरवाज़ा लॉक कर दिया. घर में अब सिर्फ माणिक और पारी थे.

माणिक, पारी को अपने कमरे में ले गया. उसने दरवाज़ा बंद किया और तुरंत पारी को अपनी बाहों में भर कर, उसे प्यार से किश किया.

माणिक: (फुसफुसाते हुए) आज बहुत मज़ा आएगा, छुटकी!

इसके बाद, माणिक ने पारी को बिस्तर पर बिठाया और उसे दिव्या वाली और आनंद वाली साड़ी बातें बता दी.

पारी की आँखें उत्सुकता और आश्चर्य से फैली हुई थी. वह एक बार फिर से इस वर्जित और रोमांचक दुनिया के अंदर आ चुकी थी. माणिक जानता था की यह राज़ अब उसे और पारी को और भी ज़्यादा क़रीब लाएंगे.

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माणिक की साड़ी बातें सुनकर, पारी का चेहरा आश्चर्य और शरारत से भरा हुआ था.

पारी: (हँसते हुए) भाई! तुम... तुम तो बहुत शैतान हो! मतलब दीदी के पास खीरा और मूली?

पारी ने फिर माणिक की तरफ देखा और एक चेतावनी दी.

पारी: देखना, कहीं सच में दिव्या दीदी की चौड़ाई न कर देना, भाई! फिर तो घर में तमाशा हो जायेगा!

माणिक ने पारी की बात सुनी, लेकिन उसका मैं कुछ और hi चाह रहा था.

माणिक: (गंभीरता से) वह तो करनी hi है, छुटकी! दिव्या को सबक सीखना है! पर...

माणिक थोड़ा रुका और पारी की आँखों में देखा.

माणिक: पर क्या तुम भी मेरे साथ चौड़ाई कर सकती हो? मेरा मैं तो तुम्हे पूरी तरह से अपना बनाने का करता है!

माणिक का यह सीधा सवाल सुनकर पारी एकदम से हैरान रह जाती है!

पारी: (शांत होकर, थोड़ी हिचकिचाहट के साथ) भाई! तुम क्या बोल रहे हो! जितना हम लोग कर रहे हैं, भाई, उतना भी गलत है! पर उतना hi होगा, उससे ज़्यादा नहीं! हम दोनों bhai-behan हैं, यह सीमा नहीं टूट सकती.

माणिक को निराशा हुई. उसने तुरंत एक उदास सा चेहरा बनाया. उसने अपने अंडरवियर को थोड़ा नीचे खिसकाया और खड़े लुंड को पारी को दिखाया.

माणिक: (लाचार आवाज़ में) देखो न! कैसे खड़ा हुआ है! यह मेरी बात नहीं सुन रहा है! तुम मुझे मन क्यों कर रही हो?

पारी को माणिक की हताशा पर दया नहीं आयी, बल्कि हंसी आ गयी.

पारी: (हँसते हुए, प्यार से माणिक के गाल पर हाथ रखते हुए) अरे, मेरे प्यारे भाई! इसका इलाज तुम्हारी गर्लफ्रेंड आस्था के पास है न! तुम क्यों चिंता करते हो? वह तो इस काम की एक्सपर्ट है! वह मुँह से और छूट से इसे शांत करेगी! जाओ, उसके पास जाओ!

माणिक को पारी से ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी. उसे अब आस्था की याद आ गयी. उसने समझा की पारी की सीमाएं अभी नहीं टूटेंगी, लेकिन वह उसे आगे की योजनाओं में ज़रूर शामिल कर सकती थी.

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माणिक को पारी से ‘न’ सुनने पर ज़बरदस्त निराशा हुई. उसने अब अंतिम प्रयास किया ताकि काम से काम पारी का स्पर्श तो मिल सके.

माणिक एकदम से अपने लुंड को अंडरवियर से बहार निकालता है. वह पूरी तरह से तन चूका था.

माणिक ने बिना कोई और बात किये, उस खड़े लुंड को पारी के हाथ में पकड़ाते हुए बोलै.

माणिक: (आवाज़ में ज़बरदस्त आग्रह और बेताबी) काम से काम इसे हाथ से तो शांत कर दो! मेरी बात मान लो! मुझे पता है तुम्हे भी अच्छा लगेगा!

पारी, माणिक के इस अचानक और बेताब आग्रह से एकदम से चौंक गयी. माणिक का गर्म, कठोर लुंड उसके हाथ में था. एक पल के लिए वह विरोध करने वाली थी, लेकिन माणिक की हताशा और bhai-behan के बीच की टूटी हुई सीमा ने उसे रोक दिया.

पारी ने एक गहरी सांस ली और माणिक के आग्रह को स्वीकार कर लिया. उसने धीरे से माणिक के लुंड को सहलाना शुरू कर दिया.

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पारी, माणिक के तन चुके लुंड को सहलते हुए, उसे बड़े ध्यान से देखने लगी. दिव्या और आनंद की कहानियों ने उसकी जिज्ञासा को चरम पर पहुंचा दिया था.

पारी: (सहलाते हुए, विस्मय से) भाई... यह तो बहुत बड़ा है! 9 इंच तो होगा hi न?

उसने फिर एक ज़रूरी सवाल पुछा, जो उसे हैरान कर रहा था.

पारी: छूट में कैसे जाता होगा? मुझे तो सोचकर hi दर लग रहा है. यह तो इतना मोटा है!

माणिक ने पारी के सवाल पर हंस पड़ा. उसका अहंकार और आत्मविश्वास चरम पर था, क्यूंकि पारी उसके लुंड की तारीफ कर रही थी और उसे सहला रही थी.

माणिक: (प्यार से पारी के गाल पर हाथ रखते हुए, शरारती अंदाज़ में) बीटा, तुमने कहावत नहीं सुनी? पानी और लुंड, तंग से तंग जगह में भी अपना रास्ता बना लेते हैं!

माणिक ने फिर अपनी बात पूरी की.

माणिक: थोड़ा दर्द होता है, पर जब मेरी तरह कोई अच्छा मर्द हो, तो वह थोड़ा प्यार करता है, थोड़ा ज़ोर लगता है, और फिर मज़ा hi मज़ा आता है!

पारी माणिक की बात सुनकर हंस पड़ी. वह जानती थी की माणिक मज़ाक कर रहा है, लेकिन उसका स्पर्श और उसकी बातें दोनों को इस वर्जित खेल में और ज़्यादा डुबो रही थी.

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पारी, माणिक के तन चुके लुंड को बड़े ध्यान से देखती हुई हिलती रही. उसकी गति में dheere-dheere तेज़ी आ रही थी, और माणिक अब चरम सुख के नज़दीक था.

माणिक की आँखें बंद थी, और उसके मुँह से गहरी आहें निकल रही थी. कुछ hi पलों में, माणिक का लुंड, पारी के हाथ में hi छूट जाता है.

सारे वीर्य से पारी का हाथ गन्दा हो जाता है.

पारी ने तुरंत अपना हाथ हटाया. उसे अजीब और थोड़ा घिनौना महसूस हुआ, लेकिन साथ hi रोमांच भी था.

पारी: (शिकायत भरे लहजे में, हँसते हुए) क्या भाई! आपने मेरा हाथ गन्दा कर दिया! उफ्फ्फ्फ़! अब इसे धोना पड़ेगा!

माणिक, जो abhi-abhi संतुष्टि के चरम पर पहुंचा था, वह ज़ोर से हंसने लगता है.

माणिक: (हाँफते हुए) है! है! अब जाकर शांत हुआ है! जाओ, मेरी प्यारी छुटकी, और धो लो! तुमने मेरा बहुत बड़ा काम कर दिया!

पारी, माथे पर शिकन और होंठों पर मुस्कान लिए, तुरंत बाथरूम में घुस जाती है हाथ धोने. माणिक बिस्तर पर लेता रहा, विजयी और संतुष्ट. उसे पता था की भले hi पारी ने चौड़ाई के लिए मन कर दिया हो, लेकिन इस हाथ के स्पर्श ने उनके वर्जित रिश्ते को एक नए स्टार पर पहुंचा दिया था.



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Part - 63

पारी, बाथरूम से हाथ धोकर और खुद को साफ़ करके, वापस माणिक के पास आकर बैठती है. उसके चेहरे पर thodi-si शर्म और ढेर साड़ी शरारत थी.

माणिक अब पलटवार करने को तैयार था. उसने तुरंत पारी की सलवार पर से hi उसकी छूट पर हाथ फेरते हुए कहा.

माणिक: (शरारत और वासना से) आओ! अब मैं भी तुम्हारा बदला पूरा कर लेता हूँ. लाओ, अब मैं अपना हाथ गन्दा कर लेता हूँ, ताकि हिसाब बराबर हो सके!

माणिक ने ऐसा कहकर, उसके हाथ से हुए वीर्य के स्पर्श का बदला लेने का मज़ाक उदय, जबकि उसका असली मकसद पारी को उत्तेजित करना था.

माणिक: (ज़ोर से हंसने लगता है) है! है! अब बताओ!

पारी ने तुरंत माणिक के हाथ की इस हरकत को महसूस किया. उसने तुरंत माणिक के हाथ को परे (दूर) झटकते हुए कहा.

पारी: (गुस्से और मज़ाक के मिश्रण से) नहीं बाबा! मैं तुम्हे अपना हाथ गन्दा नहीं करने दूंगी! और मुझे आपसे कुछ नहीं करवाना है!

पारी ने फिर से अपनी सीमा स्पष्ट की.

पारी: मैं अपने कमरे में जाकर मैं खुद कर लुंगी! मुझे पता है कैसे करते हैं!

माणिक समझ गया की पारी अब आगे नहीं बढ़ेगी, लेकिन उसने उसे छेड़ने का मौका नहीं छोड़ा.

माणिक: (मुस्कुराते हुए) ठीक है, ठीक है! जाओ, और मेरे बारे में सोचते हुए करना!

पारी ने माणिक को घुरा, लेकिन वह खुद hi मुस्कुरा दी. वह माणिक की बात का जवाब दिए बिना अपने कमरे की तरफ चल दी.

*******************************

घर के अंदर पिछले कुछ दिनों या हफ़्तों में माहौल पूरी तरह से बदल चूका था. हर सदस्य अब apni-apni वर्जित इच्छाओं और नए रिश्तों के जाल में फँस चूका था.

Baar-baar यौन क्रियाओं के दृश्य देखने और अपनी दबी हुई वासना के जागृत होने के कारण, अनु की अब मस्टुर्बते करने की आदत बन गयी थी. वह अब ज़्यादा नहीं तो हर दुसरे दिन खुद को संतुष्ट करने लगी थी. मल्लिका और बुआ के दृश्य, और मल्लिका का खुला ताना — सब कुछ उसे अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए प्रेरित कर रहा था.

छत पर माणिक के अंतिम हमले और उसके लुंड के स्पर्श के बाद, दिव्या आजकल माणिक से काम hi नज़रें मिलती थी. वह हमेशा माणिक से दूर रहने की कोशिश करती थी. माणिक की धमकी और खुद की शर्मिंदगी ने उसे इतना डरा दिया था की वह अब ऊपर (छत पर) भी नहीं जा पाती थी. उसने अपनी सबसे निजी और आरामदेह जगह खो दी थी.

दिव्या के प्रतिरोध और उसके लुंड के हाथ से छूने के बाद, पारी और माणिक अक्सर किश करते थे. उनके बीच की bhai-behan की सीमा अब और भी ज़्यादा धुंधली हो चुकी थी. वह अभी भी चौड़ाई की सीमा को पार नहीं कर रहे थे, लेकिन गहरी किसिंग (चुम्बन) और स्पर्श उनके रिश्ते का एक सामान्य हिस्सा बन चूका था, जिसमें माणिक का खड़ा लुंड भी शामिल होता था.

पहली विर्जिनिटी तोड़ने वाली रात के बाद, आनंद दो बार छोटू से मिल चूका था. छोटू का वर्जित आकर्षण और आनंद के अंदर की वासना उन्हें baar-baar खींच रही थी. उनका रिश्ता अब एक स्थायी गुप्त सम्बन्ध बन चूका था.

घर का हर सदस्य अब apni-apni गुप्त दुनिया में जी रहा था.

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इसी बीच, घर में एक नया मेहमान आया. वह थी माणिक की मासी की लड़की, सिमी, जिसकी उम्र 20 साल थी. सिमी का रेलवे का पेपर इस शहर में था, जिसके लिए वह कुछ दिन यहाँ रुकने आयी थी.

सिमी स्वभाव से एकदम मस्त क़िस्म की लड़की थी, ज़िंदादिल और हमेशा मज़ाक करने को तैयार. उसके आने से घर का माहौल थोड़ा हल्का हो गया.

सिमी ने माणिक को देखते hi छेड़ना शुरू कर दिया, क्यूंकि वह जानती थी की माणिक अपने कजिन bhai-behnon में सबसे शरारती है.

माणिक एक ढीली t-shirt पहने हुए किचन में पानी पीने आया. सिमी पहले से hi वहां कड़ी थी.

सिमी: (माणिक को ऊपर से नीचे तक घूरते हुए, ज़ोर से हँसते हुए) माणिक! यार, तू अभी भी यह ‘ी लव माय माँ’ वाली t-shirt पहनता है? तेरी उम्र क्या है? 10 साल?

माणिक: (झुंझलाकर) हाँ! मैं अपनी माँ से प्यार करता हूँ! इसमें क्या है? और यह मेरी फवौरीते है!

सिमी: (शरारती अंदाज़ में) प्यार अपनी जगह है, पर बीटा, अब तुम ‘जवानी’ की t-shirt पहनो! या फिर... (वह नज़दीक आती है) ...या फिर इसे उतार दो, काम से काम पता तो चले की ‘मम्मी के लाल’ अब कितने बड़े हो गए हैं!

माणिक: (शरमाते हुए, पर हंसकर) ज़्यादा फ़्लर्ट मत कर, सिमी दीदी! नहीं तो मैं मासी को बता दूंगा!

सिमी: (आँख मारते हुए) हाँ, बता देना! पर आज़ाद हूँ मैं!

एक शाम, माणिक सोफे पर लेता हुआ फ़ोन देख रहा था, और सिमी पास में hi बैठी थी. सिमी ने जानबूझकर अपना पेअर बढ़ाया और माणिक की जांघ से छूकर उसे गुदगुदी की.

माणिक: (अचानक उछलकर) अरे! क्या कर रही हो!

सिमी: (मासूमियत से) ओह! सॉरी! मैं तो बस पेअर फैला रही थी. यहाँ जगह hi कितनी है!

सिमी: (फिर धीमी आवाज़ में, झुककर माणिक के कान के पास) सुना है, तुम रात को अकेला सोते हो? मेरा पेपर है, मुझे रात को देर तक पढ़ना होगा. अगर दर लगे, तो बता देना. मैं तुम्हारे बिस्तर पर आ सकती हूँ, हम दोनों साथ में पढ़ लेंगे!

माणिक: (हँसते हुए) नहीं, दीदी! मैं डरता नहीं हूँ. और अगर कोई डरेगा, तो वह आप होंगी!

माणिक को सिमी के इस खुले मज़ाक में मज़ा आ रहा था. सिमी की मस्ती ने माणिक के दिमाग को दिव्या और छोटू के तनाव से थोड़ा दूर किया, लेकिन साथ hi उसके अंदर एक और नए आकर्षण की शुरुआत भी कर दी थी.

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पिछले कुछ दिनों से, पारी देख रही थी की सिमी माणिक के साथ कुछ ज़्यादा hi खुल रही है. सिमी का मज़ाकिया अंदाज़ और उसका baar-baar माणिक को छूना, पारी को बिलकुल पसंद नहीं आ रहा था. माणिक पर अपना ‘अधिकार’ महसूस करने वाली पारी को ज़बरदस्त जलन हो रही थी.

एक रात, लगभग 11 बजे, माणिक और पारी अपने कमरे में थे. पारी पहले से hi बैठी थी और माणिक से ‘मैथ्स सीख रही थी’ (जो उनके बीच अंतरंगता का एक बहाना था). माणिक आराम से बीएड पर लेता था और पारी ज़मीन पर बैठकर उसकी बातों का जवाब दे रही थी.

तभी, बिना दस्तक दिए, सिमी माणिक के कमरे में चली आती है. उसने एक छोटी निघ्त्य पहनी हुई थी और उसके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान थी.

सिमी ने अंदर आकर देखा की पारी और माणिक ek-dusre के बहुत नज़दीक हैं.

सिमी: (प्यार से, पर सीधे पारी को सम्बोधित करते हुए) अरे, छोटी रानी! तुम अभी तक यहाँ हो?

पारी: (माणिक को देखते हुए, अजीब अंदाज़ में) हाँ, दीदी! भाई से एक सवाल पूछ रही थी.

सिमी ने पारी को नज़रअंदाज़ किया और माणिक के बिस्तर पर बैठ गयी.

सिमी: (माणिक को आँख मारते हुए) माणिक! पारी को अपने कमरे में जाने को बोलो! मुझे तुमसे एक ज़रूरी बात करनी है.

माणिक को समझ आ गया की सिमी क्या चाहती है, और वह उत्साहित हो गया.

सिमी: (पारी की तरफ मुड़कर, नकली लाचारी से) पारी, प्लीज! कल मेरा पेपर है. मुझे भाई के साथ सोना है! मैं पूरे रास्ते पढ़ते हुए आयी हूँ और मुझे कुछ समझ नहीं आया. इससे थोड़ी देर कुछ समझूंगी, फिर हम सो जायेंगे.

सिमी ने ‘सो जायेंगे’ शब्द पर ज़ोर दिया.

पारी को सिमी की बात पर बिलकुल विश्वास नहीं हुआ. वह जानती थी की सिमी का असली मकसद पढ़ना नहीं, बल्कि माणिक के साथ समय बिताना था. पारी का चेहरा जलन से तप गया. वह कुछ बोल नहीं पायी, क्यूंकि सिमी ने ‘पेपर’ और ‘सोना’ कहकर उसे फंसा दिया था.

पारी, गुस्से से उठकर कड़ी हो गयी. उसने माणिक की तरफ देखा, जिसकी आँखों में एक अजीब सी ख़ुशी थी. पारी ने बिना कुछ बोले, अपना सामन पकड़ा और तेज़ी से कमरे से बहार चली गयी.

सिमी ने विजयी मुस्कान के साथ दरवाज़ा बंद किया और तुरंत माणिक की तरफ पलटी.



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नन्ही मुन्नी प्यारी प्यारी

मुझको भाती चूत तुम्हारी

आकर्षित ये करे जीभ कों

परमानंद दे मेरे लंड कों

रसभरी मदभरी सबसे न्यारी

मुझको भाती चूत तुम्हारी

दोस्तों कैसी है कविता 😊😊😊😊

और जन्नत तेरी टांगो में के लिए बेस्ट पिक्चर

https://i.ibb.co/LdCnsCqX/Screenshot-20260521-084458-xforum.jpg



 
Part - 64

पारी के जाने और दरवाज़ा बंद होते hi, कमरे में एक अलग hi तनाव भर गया.

माणिक अभी भी बिस्तर पर बैठा था. वह जानता था की सिमी मज़ाकिया और बोल्ड है, लेकिन आगे जो हुआ, उससे वह हैरानी में पद गया.

सिमी ने बिना कोई भूमिका बनाये, अपने शरीर से अपनी निघ्त्य उतार दी. निघ्त्य अब फर्श पर थी.

अब उसके शरीर पर सिर्फ एक स्लिप और एक पंतय थी. यह कपडे भी बहुत हलके थे, जो उसके पूरे शरीर की बनावट को उभार रहे थे.

माणिक आँखें फाड़कर उसकी तरफ देख रहा था. वह पूरी तरह से अचंभित था. यह पहली बार था जब उसने अपने परिवार में किसी कजिन को इतने खुले रूप में देखा था.

सिमी मुस्कुराकर माणिक की तरफ देख रही थी. उसकी मुस्कान में न सिर्फ शरारत थी, बल्कि एक खुला निमंत्रण भी था.

माणिक: (थोड़ा हकलाते हुए) तुम... तुम यह क्या कर रही हो?

सिमी: (बिस्तर पर माणिक के पास बैठकर, शरारत से) क्या? मुझे गर्मी लग रही थी! और वैसे भी, मुझे पता है की तुम भी तो गर्मी में नहीं सोते!

माणिक: (तुरंत खुद को सँभालते हुए, अपनी इच्छा को बहाने के रूप में इस्तेमाल करते हुए) हाँ! मुझे भी सिर्फ अंडरवियर में नींद आती है!

माणिक ने बिना देर किये अपने कपडे उतार दिए. अब वह भी सिर्फ अंडरवियर में था.

सिमी ने माणिक के अंडरवियर में उसके आधे खड़े लुंड को देखा. वह अभी पूरी तरह से खड़ा नहीं हुआ था, लेकिन साफ़ दिख रहा था की माणिक उत्तेजित हो चूका है.

सिमी फिर से मुस्कुरा रही थी. उसने समझ लिया की माणिक अब पूरी तरह से उसके कण्ट्रोल में आ चूका है.

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माणिक और सिमी अब दोनों hi काम कपड़ों में थे, और कमरे का माहौल वासना से भर चूका था. सिमी ने तुरंत स्थिति को अपने कण्ट्रोल में ले लिया.

सिमी थोड़ी और नज़दीक आयी और बहाना किया की वह नोट्स देख रही है.

सिमी: (माणिक के नोट्स को देखते हुए, अपना घुटना जानबूझकर माणिक के घुटने से रगड़ते हुए) माणिक! मुझे यह ‘इकोनॉमिक्स’ वाला chapter बिलकुल समझ नहीं आ रहा है! देखो न... यह डिमांड और सप्लाई क्या होता है?

माणिक का ध्यान अब नोट्स पर नहीं, बल्कि सिमी के घुटनो के स्पर्श पर था. उसने देखा की स्लिप के कारण सिमी के वक्षस्थल का ऊपरी भाग हिल रहा था.

माणिक: (गहरी सांस लेते हुए) यह... यह तो बहुत आसान है! जब डिमांड बढ़ती है...

सिमी ने माणिक की बात काट दी. उसने अपनी ऊँगली उठायी और माणिक के अधखुले होंठों पर रख दी.

सिमी: तुम इतने दूर क्यों बैठे हो? पास आओ न! ऐसे दूर से कौन पढता है? यह रहा तुम्हारा मास्टर... (वह मज़ाक में माणिक के अंडरवियर को छूती है) ...इसे शांत करो, और फिर मुझे समझाओ!

सिमी की इस खुली हरकत से माणिक का लुंड तेज़ी से पूरा खड़ा हो गया. माणिक अब विरोध करने लायक नहीं बचा था.

माणिक: (आवाज़ में हताशा) सिमी... तुम... तुम पढ़ने आयी हो या...

सिमी: (आँख मारते हुए, उठकर बिस्तर पर माणिक के सामने बैठ जाती है) मैं पढ़ने आयी हूँ! और मैं पहले अपने दिमाग की टेंशन दूर करती हूँ! जब शरीर शांत होता है, तभी दिमाग काम करता है!

सिमी ने माणिक के अंडरवियर को नीचे खिसकाया और उसके खड़े लुंड को बहार निकाल लिया.

सिमी: (उसे पकड़कर, ख़ुशी से) वह! यह तो मेरे ex-boyfriend से भी बड़ा और मज़बूत है! अब इसे देख लिया, तो मेरा मैं तो बस इसे ‘डिमांड’ करने का कर रहा है!

सिमी ने बिना और समय गंवाए, तुरंत माणिक के लुंड को चूमना शुरू कर दिया. उसका इरादा साफ़ था: यह रात सिर्फ पढाई के लिए नहीं थी.

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सिमी, बिना किसी संकोच के, माणिक के तन चुके लुंड को अपने मुँह के पास ले गयी. तभी, माणिक को एक अंतिम बार प्रतिरोध करना याद आ गया.

माणिक: (दर और उत्तेजना के मिश्रण में, अपना हाथ सिमी के कंधे पर रखते हुए, नाटक करते हुए) सिमी... तुम... तुम यह क्या कर रही हो? यह बहुत गलत है! तुम मेरी बहिन हो!

माणिक का यह नाटक सिमी को हंसा दिया. उसे पता था की माणिक की यह बात सिर्फ दिखावा की है.

सिमी: (हँसते हुए, माणिक के होंठों को हलके से चूमते हुए) के ों! माणिक! हम दोनों जानते हैं की हम क्या चाहते हैं! और रही बात ‘बहिन’ की... मैं तुम्हारी मासी की लड़की हूँ!

सिमी ने अपनी बात पूरी की, जो इस वर्जित माहौल को और ज़्यादा उग्र बना गयी.

सिमी: तुम भी देखो न बहार की दुनिया! आजकल तो लोग सगी बहनों को भी छोड़ देते हैं! हम तो फिर भी दूर के हैं. अब शांत हो जाओ और अपना लुंड मेरे मुँह में दो! मुझे तुम्हारी साड़ी गर्मी निकालनी है!

माणिक का प्रतिरोध पूरी तरह से दाह गया. सिमी के इस खुले और बोल्ड बयां ने उसे एहसास करा दिया की अब कोई सीमा नहीं है.

सिमी ने तुरंत माणिक के लुंड को अपने मुँह में लिया और चूसना शुरू कर दिया. सिमी की चूसने की कला बहुत तेज़ और कुशल थी. माणिक को लगा की वह किसी प्रोफेशनल के साथ है. माणिक की आँखों से पानी आ गया और उसके मुँह से गहरी आहें निकल रही थी. वह अपने कजिन के मुँह में इस सुख को महसूस करते हुए, बिस्तर पर लेट गया.

सिमी ने थोड़ी देर बाद माणिक के लुंड को मुँह से निकाला. माणिक ने तुरंत सिमी की स्लिप और पंतय फाड़कर अलग कर दी. सिमी का पूरा नग्न शरीर अब माणिक के सामने था. माणिक ने उसके मोठे बूब्स को पकड़ा और उन्हें zor-zor से चूसना शुरू कर दिया.

सिमी: (सिसकते हुए) माणिक! हाँ! तुम बहुत अच्छे हो!

वह दोनों ek-dusre के नग्न शरीर को सहलाने लगे. सिमी ने माणिक के लुंड को अपनी छूट (योनि) पर रगड़ा.

सिमी अब और इंतज़ार नहीं कर सकती थी. उसने माणिक को अपने ऊपर आने का इशारा किया.

सिमी: (जूनून से) अब अंदर आओ! मुझे अपना कठोर लुंड अंदर चाहिए!

माणिक ने एक गहरी सांस ली और सिमी की योनि में अपना लुंड ज़ोर से धंसा दिया. सिमी की योनि थोड़ी तंग थी, और उसे थोड़ा दर्द भी हुआ, लेकिन वह तुरंत आनंद में बदल गया.

माणिक ने ज़ोरदार धक्के लगाना शुरू कर दिया. सिमी ने अपने पैरों को माणिक की कमर के चारों तरफ कसकर लपेट लिया.

सिमी: (तेज़ आवाज़ में) हाँ! और तेज़! माणिक! तुम सच में 9 इंच के हो! बहुत मज़ा आ रहा है!

दोनों तेज़ी से, बिना रुके चौड़ाई करने लगे. माणिक की कजिन होने का विचार अब पूरी तरह से गायब हो चूका था. वह सिर्फ वासना से भरे हुए दो प्राणी थे.

चरम सीमा:

कुछ hi देर में, वह दोनों एक साथ चरम सुख पर पहुंचे. माणिक ने अपना सारा वीर्य सिमी की योनि में उतर दिया. वह दोनों पसीने से भीगे हुए, ek-dusre के ऊपर गिर पड़े.

सिमी की “पढाई” पूरी हो चुकी थी.



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Part - 65

तीव्र चौड़ाई के बाद, माणिक और सिमी ek-dusre के बगल में हांफते हुए लेते थे. सिमी की आँखें बंद थी, लेकिन उसके चेहरे पर गहरी संतुष्टि का भाव था.

तभी, सिमी ने अचानक माणिक की तरफ पलटी.

सबसे पहले, सिमी ने माणिक के गाल पर प्यार से एक चुम्बन लिया, और उसके तुरंत बाद, उसने माणिक के गाल पर ज़ोर से नहीं, बल्कि हल्का सा दांत गड़ाकर काटा. माणिक दर्द से कराह उठा.

माणिक: (आँखें खोलकर) आह! सिमी! क्या कर रही हो!

सिमी ने माणिक के गाल पर अपने हाथ से हलकी सी चपपट लगायी (थप्पड़ मारा), लेकिन उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं, बल्कि एक शैतानी मुस्कान थी.

सिमी ने अब अपनी जुबां खोली, और उसके शब्दों में गाली, प्यार और स्वीकरण का एक अजीब मिश्रण था.

सिमी: (आवाज़ में जीत का भाव, माणिक की आँखों में देखते हुए) साला बहनचोद!

माणिक इस गाली को सुनकर हंस पड़ा.

सिमी: (गुस्से और मज़ाक के मिश्रण से) ज़रा देर पहले बोल रहा था ‘तुम मेरी बहिन हो!’... और देखो, छोड़ भी दिया! तुम्हे शर्म नहीं आयी? तुमने मेरा इतना बड़ा लुंड अंदर ले लिया!

सिमी ने अपने हाथ से माणिक के तन चुके लुंड को प्यार से सहलाया.

माणिक: (कमाई हंसी हँसता है) है! है! तो क्या हुआ? तुम भी तो मेरी बहिन हो! मैंने तो वही किया जो एक भाई को करना चाहिए! मैंने तुम्हारी ‘डिमांड’ पूरी कर दी, अब तुम्हारी ‘सप्लाई’ हमेशा मेरे लिए रहेगी.

सिमी: (माणिक के सीने पर सर रखकर) तुम्हे पता है, तुम बहुत बुरे हो, लेकिन मुझे बहुत मज़ा आया. तुम सच में रोहन (उसका बॉयफ्रेंड) से हज़ार गुना बेहतर हो.

माणिक: (अहंकार से) हाँ! और अब, तुम मेरे पास आओगी, और मैं तुम्हे वह सब दूंगा जो तुम्हे चाहिए. अब तुम मेरी हो, समझे!

सिमी: (एक लम्बी सांस लेती है) हाँ, मैं तुम्हारी हूँ. पर अगली बार तुम मेरी तरह से चलोगे! अब हम दोनों ek-dusre के राज़दार हैं. यह राज़ तुम्हारी प्यारी अनु दीदी को भी पता नहीं चलना चाहिए, ठीक है?

माणिक: (सिमी के बाल सहलाते हुए) वादा रहा! अब सो जाओ!

वह दोनों ek-dusre की बाहों में लेट गए. Bhai-behan के इस रिश्ते ने अब पूरी तरह से यौन सम्बन्ध का रूप ले लिया था.

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अगली सुबह, सिमी का पेपर था जिसके लिए वह जल्दी उठकर चली गयी थी. पारी की सेकंड सैटरडे की छुट्टी थी, इसलिए वह भी घर पर थी. आनंद और अनु भी apne-apne काम पर जा चुके थे. घर पर अब फिर से माणिक और पारी दोनों अकेला थे.

लेकिन, कमरे का माहौल पिछली रात से बिलकुल अलग था. पारी माणिक से बात नहीं कर रही थी. वह मुँह फुलाकर सोफे पर बैठी थी और टीवी देख रही थी, लेकिन उसका ध्यान टीवी पर नहीं था.

माणिक को समझ आ गया की यह सब सिमी के प्रति उसकी जलन है. वह जानता था की पारी को यह बिलकुल पसंद नहीं आया की सिमी ने उसे बहार निकलवाकर उसकी जगह ले ली.

माणिक धीरे से सोफे पर गया.

माणिक: (प्यार से पारी के पास जाकर, उसे अपनी गॉड में बिठाकर) क्या हुआ मेरी गुड़िया को? सुबह से क्यों नाराज़ है?

पारी, माणिक की गॉड में बैठते hi, अपना गुस्सा व्यक्त करने लगी.

पारी: (खीज कर, गुस्से से) क्या हुआ? पूछो मत क्या हुआ! मैं तो कुछ भी नहीं हूँ न! माँ छुड़ाने गयी आपकी गुड़िया!

माणिक को पारी के मुँह से गाली सुनकर थोड़ा आश्चर्य हुआ, लेकिन वह हंस पड़ा.

माणिक: (पारी की पीठ सहलाते हुए) अरे, मेरी शेरनी! इतना गुस्सा क्यों? कौन सी बात बुरी लग गयी तुम्हे?

पारी: (माणिक के सीने पर मुक्का मारते हुए) बात बुरी क्या लगी! कल तो कैसे सिमी दीदी की बात मान ली! मुझे तो झट से कमरे से बहार निकाल दिया! और मुझे पता है, पूरी रात चौड़ाई की होगी उसकी! तभी तो आज सुबह से उसके पीछे पड़े हुए हो. अब वही तुम्हारी जान है न!

माणिक: (ज़ोर से हंसने लगता है) है है है! ओहो! मेरी छुटकी को कितनी जलन हो रही है!

माणिक: हाँ, की मैंने उसकी चौड़ाई! और वह बहुत मज़ेदार थी! पर, मेरी जान, तुम मेरी ‘गुड़िया’ हो, और वह मेरी ‘कजिन’ है. दोनों की जगह अलग है.

पारी: (नाराज़गी से) नहीं! मुझे यह सब नहीं सुन्ना! आप उसके बने हुए हो! मैं आपसे बात नहीं करुँगी!

माणिक ने तुरंत पारी का मुँह अपने दोनों हाथों से पकड़ा और उसे अपनी तरफ घुमाया.

माणिक: (प्यार से) सुनो! वह सिर्फ एक रात का मज़ा था. तुम्हे पता है, मैं तुम्हे कितना प्यार करता हूँ. और सुनो... मैंने कल रात तुम्हारे बारे में सोचते हुए उसकी चौड़ाई की थी! मुझे तुम्हारे स्पर्श की याद आ रही थी.

माणिक ने यह झूठ बोलै, लेकिन वह जानता था की इससे पारी का गुस्सा शांत हो जायेगा.

माणिक: तुम दोनों से ज़्यादा खास मेरे लिए कोई नहीं है. और सुनो! अगर तुम्हे इतना बुरा लगा है, तो अब तुम मुझे दंड दो! मैं तो तुम्हारा हूँ!

माणिक ने पारी को फिर से किश किया, और पारी का गुस्सा dheere-dheere शांत होने लगा. वह जानती थी की माणिक पर उसका अधिकार सिमी से ज़्यादा मज़बूत है.

**********************************

माणिक जानता था की पारी को शांत करने का सबसे अच्छा तरीका उसे अपने वर्जित खेलों में शामिल करना और उसे विशेष महसूस करना है.

माणिक: (पारी को अपनी गॉड में कसकर पकडे हुए, शरारती अंदाज़ में) अच्छा! अब रोना बंद करो, मेरी जान! आओ, एक मज़ाक करते हैं!

माणिक: (सवाल पूछते हुए) यह बताओ, अगर सिमी दीदी की शादी हो जाती है, तो तुम सिमी के घरवाले की क्या लगोगी?

पारी: (थोड़ा मुस्कुराते हुए, तुरंत जवाब दिया) साली!

माणिक: (ज़ोर से हँसते हुए) है! है! बिलकुल सही! और इस लिहाज़ से तो... तुम मेरी भी साली लगी!

माणिक ने यह कहकर पारी को छेड़ दिया, और उसके चेहरे पर एक कामिनी मुस्कान आ गयी.

माणिक: (पारी की सलवार पर हाथ फेरते हुए, उसकी आँखों में देखते हुए) तो अब बताओ! जब तुम मेरी साली लगी, तो आधी घरवाली भी लगी न! और जब आधी घरवाली लगी, तो क्या आधी चौड़ाई का हक़ तो बनता है न मेरा?

माणिक का यह तर्क इतना बेतुका और शरारती था की पारी का सारा गुस्सा हवा हो गया.

पारी: (ज़ोर से हँसते हुए, माणिक के मुँह पर हाथ रखते हुए) हाँ! हाँ! आधे हक़दार! माणिक! तुम सच में पागल हो! तुम्हे हर चीज़ में बस वही दीखता है!

माणिक: (हँसते हुए) क्या करूँ! जब सामने इतनी प्यारी ‘आधी घरवाली’ बैठी हो, तो हक़ तो माँगना hi पड़ेगा!

वह दोनों ज़ोर से हंसने लगते हैं. माणिक ने पारी को फिर से किश किया. पारी की जलन अब ख़तम हो चुकी थी, और वह इस नए रिश्ते में अपने ‘साली’ होने के हक़ का मज़ा लेने लगी थी.



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Part - 75

Scene: CA Amit Goyal ka Office (Subah ka Samay)

Bahar ki halki chahal-pahal se door, CA Amit Goyal ka cabin shaant aur behad vyavasthit (organized) tha. Deewaron par lagi kitaabon ki almariyan bhaari-bhkam tax law books, auditing guides aur files se bhari hui thheen. Table ke peeche baithe Amit Goyal—jo shehar ke jaane-maane aur behad sakht Chartered Accountant maane jaate the—apna chashma naak par tikaye ek file dekh rahe the.

Tabhi darwaze par dastak hui aur Jasleen ne cabin mein pravesh kiya. Jasleen, jo khud ek behad honhaar CA thheen aur pichle do saalon se Amit Goyal ki senior associate ke roop mein kaam kar rahi thheen, ke chehre par ek professional confidence tha. Unke peeche-peeche thoda jhijhakta hua, lekin aankhon mein gajab ki chamak liye Manik andar aaya. Manik, Jasleen ki sagi maasi ka beta tha. Woh B.Com aur CA Intermediate ke baad ab apni articleship (practical training) ki shuruat karne ja raha tha.

"Good morning, sir," Jasleen ne muskuraate hue wish kiya.

Amit Goyal ne file se nazrein hatayin aur chashma theek karte hue kaha, "Good morning Jasleen. To... aa gaya tumhara bhai?"

"Ji sir," Jasleen ne Manik ko aage badhaate hue kaha, "Amit sir, yeh Manik hai. Meri maasi ka beta. Aur jaisa ki humne baat ki thi, yeh aapka naya trainee."

Manik ne turant aage badhkar haath jode, "Namaste sir."

Amit Goyal ne use upar se neeche tak dekha. Unki paarkhi nazrein kisi bhi naye intern ki neeyat aur yogyata ko bhaampne mein mahir thheen. Unhone haath ke ishaare se saamne padi khaali kursiyon ki taraf ishaara kiya, "Baitho Manik, baitho Jasleen."

Amit Goyal aupchariktaayein (formalities) nibhaane wale insaan nahi the. Wel seedhe mudde par aane ke liye jaane jaate the. Manik ke baithte hi unhone mej par rakhe apne pen ko ungliyon mein ghumaate hue seedhe technical sawaal daagna shuru kar diya. We dekhna chaante the ki Jasleen ka yeh bhai sirf sifarish ke bharose aaya hai ya isme waqai koi dum hai.

"To Manik," Amit Goyal ki aawaaz gambheer ho gayi, "CA ki duniya mein theory aur practical mein zameen-aasman ka antar hota hai. Tumne padhai to acchi ki hogi, lekin mujhe tumhari buniyaadi samajh dekhni hai. Mujhe bas itna batao ki 'Deemed Income' aur 'Advance Tax' ke beech mukhy व्यावहारिक (practical) antar kya hai? Ek client ko tum ise kaise samjhaoge?"

Jasleen ne thoda chintit hokar Manik ki taraf dekha. Use pata tha ki Amit sir aksar pehle hi din naye bacchon ko aise sawaalon mein uljha dete hain. Lekin Manik ke chehre par shikan tak nahi aayi. Ushne ek pal ka samay liya, gahri saans lee aur behad shaant aawaaz mein jawaab dena shuru kiya.

"Sir, agar seedhe shabdon mein kahein, to Deemed Income woh kamai hai jo kaanooni roop se ya seedhe taur par aapki pocket mein nahi dikh rahi hoti, lekin tax authorities maan leti hain ki yeh aapki hi income hai. Jaise—agar koi apni property apne spouse ko bina kisi solid badle (bina consideration ke) transfer kar de, to usse hone wali kamai transfer karne wale ki hi deemed income maani jayegi. Yeh tax chori rokne ka sarkar ka ek tareeka hai."

Amit Goyal ne halke se sir hilaya, maano keh rahe hon—'Aage badho.'

Manik ne jaari rakkha, "Doosri taraf, Advance Tax sarkar ki 'Kamate jao, tax chukaate jao' (Pay-as-you-earn) ki yojna hai. Yeh kisi khaas tarah ki income nahi hai, balki tax chukaane ka ek tareeka hai. Agar kisi vyakti ka poore saal ka estimated tax liability ₹10,000 ya usse zyaada banta hai, to use saal ke khatam hone ka intezar nahi karna padta, balki use financial year ke dauran hi installments mein ise advance mein chukaana hota hai."

Manik yahin nahi ruka, usne ek practical example bhi jod diya ki kaise advance tax na chukaane par Section 234B aur 234C ke tehat interest ka bojh client par padta hai.

Jawaab sunkar Amit Goyal ke sakht chehre par ek dheemi si muskaan tair gayi. Manik ne na sirf kitaabi definition rati thi, balki use yeh bhi pata tha ki corporate jagat mein iska istemaal kaise hota hai. Amit Goyal samajh gaye ki yeh ladka asadharn roop se intelligent hai aur isme ek behtareen CA banne ki poori capability hai.

Jasleen, jo ab tak thodi fikarmand baithi thi, Manik ka bebaak aur sateek jawaab sunkar khushi se phooli nahi samayi. Use apne bhai par bahut proud feel ho raha tha. Ghar mein jo Manik hamesha shararati, chulbula aur laparwah sa dikhta tha, woh office ke mahaul mein itna mature aur honhaar nazar aayega, yeh usne bhi nahi socha tha.

Jasleen ne muskuraate hue Amit Goyal ki taraf dekha aur thode garv ke lehje mein kaha, "Maine kaha tha na, Amit sir! Yeh sirf ghar par shararatein karta hai, lekin jab baat kaam aur padhai ki aati hai, to iska dimag computer se bhi tez chalta hai. Yeh aapke office ke liye bahut accha kaam karega."

Amit Goyal ne apni kursi ke peeche take lagaate hue kaha, "Bilkul Jasleen, tumhari baat sahi thi. Iski foundation sach mein bahut mazboot hai. Tax law ki itni gahri samajh is umar mein kam hi bacchon mein dikhti hai."

Manik ki yogyata aur uske confidence se prabhavit hokar Amit Goyal ne mej par haath maarte hue apna faisla sunaya.

"Chalo Manik, main bahut khush hoon. Tumhari training ki shuruat acchi hone wali hai. Formalities hum baad mein poori kar lenge. Tum aisa karo, kal subah theek 9:30 baje se office join kar lo. Jasleen tumhe tumhari desk dikha degi."

Kal se join karne ki baat sunkar Manik ke bheetar ka utsaahi छात्र (student) jaag utha. Woh apne career ko lekar kitna serious tha, yeh uske agle hi kadam se sabit hone wala tha. Usne bina ek pal ganwaye Amit Goyal ki aankhon mein dekha aur behad vinamrata lekin dridhta (firmness) se kaha:

"Aaj se kyun nahi, sir? Mera hamesha se yeh maanna raha hai ki jo kaam hamein karna hi hai, aur jo hamare future ke liye sahi hai, use kabhi kal par nahi chhodna chahiye! Agar aapki permission ho, to main abhi se kaam seekhna shuru karna chahunga."

Manik ke is unexpected aur energy se bhare jawaab ne CA Amit Goyal ko chauka diya. Aamtaur par naye interns kaam se bachne ya ek-do din ka waqt maangne ke bahaane dhoondte hain, lekin yahan ek ladka tha jo turant kaam mein koodne ko betaab tha. Amit Goyal ke dil mein Manik ke liye respect aur badh gayi.

"Adbhut!" Amit Goyal ne khush hote hue kaha, "Yeh lagan dekhkar mujhe bahut khushi hui Manik. CA profession mein isi jazbe ki zaroorat hoti hai."

Paas khadi Jasleen bhi apne bhai ki is seriousness ko dekhkar behad khush aur hairan thi. Usne Manik ki peeth thapthapayi. Amit Goyal ne Jasleen ki taraf dekhkar kaha, "Jasleen, ise aaj hi se GST department wale section mein le jao aur pending files ke review se iski shuruat karwao."

Manik ne uthkar Amit Goyal ke pair chhue aur unka aashirwad liya. Apni mauseri behen Jasleen ke saath cabin se bahar nikalte hue, Manik ne CA banne ke apne sapne ki ore pehla aur behad mazboot kadam badha diya tha. Office ka pehla hi din uske ek sunhere bhavishya (bright future) ki shuruat ka gawah ban chuka tha.

Office ke kaam ka pehla din Manik ke liye sirf tax aur accounting seekhne ka zariya nahi tha, balki uske dimag mein kuch aur hi khichdi pak rahi thi.

Cabin se bahar nikal kar Jasleen use office ke bade se hall ke ek kone mein le gayi, jahan naye trainees ke liye desk bani hui thheen. Jasleen ne ek khaali kursi ki taraf ishaara karte hue kaha, "To Manik, yeh hai tumhari desk. Aaj se yahi tumhara working station hai."

Manik ne muskuraate hue apni seat sambhali. Jasleen turant kaam ke mode mein aa chuki thi. Usne paas rakhi kuch bhaari files uthayin aur Manik ki table par rakhte hue samjhane lagi, "Dekho Manik, Amit sir ne tumhe seedhe GST department ki pending files dekhne ko kaha hai. Theory mein tumne GST padha hai, lekin practical mein GSTR-1, GSTR-3B aur Input Tax Credit (ITC) ka milan (reconciliation) karna sabse pechida kaam hota hai. Agar yahan ek bhi invoice miss hua, to client ko bhaari penalty bharni pad sakti hai."

Jasleen table par jhukkar filon ke panne palat rahi thi aur badi bariki se data entry aur mismatch dhoondne ke tareeke samjha rahi thi. Woh poori tarah se ek serious senior associate ki bhumika mein thi aur uska poora dhyan sirf files par tha.

Lekin doosri taraf, Manik ka dhyan files se kahin zyaada Jasleen par tha. Jab Jasleen samjhane ke liye table ki taraf jhukti, to Manik ki nazrein uski shirt ke collar se hote hue uske boobs par tik jaatin. Jasleen is baat se bilkul anjaan thi, use lag raha tha ki uska bhai bahut dhyan se uski baatein sun raha hai aur screen ko dekh raha hai.

Asal mein, Manik ke is bekhauf andaaz aur dimag mein chal rahi khurafat ke peeche ek gehra raaz tha. Woh man hi man soch raha tha aur apni aur simi ki yaadon mein kho gaya tha. Kuch samay pehle hi usne Jasleen ki chhoti behen—yaani apni hi maasi ki doosri beti, Simi ki chut mari thi aur uske sath gupt tarike se saare physical relations bana liye the. Simi ke sath bitaye un haseen palon ko yaad karke Manik ke chehre par ek shatir muskaan aa gayi.

Us naate se Manik ab Jasleen ko sirf apni mauseri behen ya office ki senior nahi dekh raha tha. Uske dimag mein ek alag hi theory chal rahi thi—"Jab Simi ko poori tarah apna bana hi liya hai, to us hisaab se to Jasleen meri ek tarah se saali sahiba hui! Hahaha!" Is mazedaar aur khurafati khayal ne uske confidence ko aasmaan par pahuncha diya tha. Woh man hi man hans raha tha ki kaise yeh CA sahiba daftar ke niyamon mein uljhi hui hain, jabki use inke ghar ke sabse bade raaz ka pata hai.

"Manik! Tumhara dhyan kahan hai? Main tumhe Input Tax Credit ke reconciliation ke baare mein bata rahi hoon," Jasleen ne achanak uski taraf dekhte hue tok diya, jisse Manik ka dhyan toota.



"जी दीदी... मेरा मतलब है ma'am, मैं बिलकुल ध्यान से सुन रहा हूँ. आप बस बताती जाइये, मैं ek-ek बारीकी को दिमाग में बिठा रहा हूँ," माणिक ने अपनी नज़रें तुरंत स्क्रीन पर टिकते हुए बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, जबकि उसकी आँखों में वही पुराणी शरारत और राज़ छुपा हुआ था.
 
Part - 76Office ke kaam ki shuruat karte hi Manik ne apna rang dikhana shuru kar diya tha. Dimag ka tez to woh tha hi, isliye jo kaam naye trainees ko samajhne mein poora din lag jaata tha, use Manik ne kuch hi ghonton mein pakad liya. Excel sheets par uski ungliyan computer ke keyboard par tezi se chal rahi thheen. Mismatch invoices ko dhoondna aur data ko sort karna uske liye baayein haath ka khel lag raha tha. Agal-bagal baithe baaki ke staff aur trainees uski is speed aur confidence ko dekhkar aapas mein kaana-foosi karne lage the ki, "Bhai, yeh ladka to pehle hi din se pro lag raha hai." Jasleen bhi door se use dekhkar man hi man khush ho rahi thi.

Abhi office ke kaam mein do-teen ghante hi beete the ki Manik ki is training mein ek naya aur mazedaar mod aaya. Manik ek badi si file ka data computer mein feed kar raha tha, tabhi use mehsoos hua ki koi uski desk ke paas aakar khada ho gaya hai.

Manik ne jaise hi screen se nazar hata kar upar dekha, to saamne ek ladki khadi thi. Umar yahi koi 18-19 saal rahi hogi. Usne behad saade lekin bahut hi dhang ke, ekdam organized kapde pehne hue the. Chehre par ek ajeeb sa bholapan aur ankhon mein thodi jhijhak thi.

Ladki ne Manik ko dekha aur behad shalaheen aur namra (polite) aawaaz mein kaha, "Namaste."

Manik ne turant apna kaam roka, kursi par thoda seedha hua aur apni aawaaz ko thoda jachate hue bola, "Namaste. Ji kahiye, main aapki kya madad kar sakta hoon?"

Ladki ne halka sa muskuraate hue apna haath aage badhaya aur kaha, "Mera naam Vani Goyal hai."

'Goyal' surname sunte hi Manik ke shatir dimag ki banti turant jal gayi. Usne thoda dhyan se ladki ke features ko dekha, to use samajhte der nahi lagi ki yeh shehar ke itne bade CA aur uske boss, Amit Goyal ki beti hai.

Vani ne aage bataya, "Papa ne bataya tha ki aaj ek naye bhaiya ne join kiya hai jo bahut

intelligent hain. Actually, main abhi CA Foundation ki padhai kar rahi hoon aur mujhe accounts ke ek-do concepts mein thoda doubt tha. Papa busy the, to unhone kaha ki main aapse aakar thoda samajh loon."

Manik ke chehre par ek gahri aur shatir muskaan tair gayi. Usne socha, "Wah re kismat! Pehle maasi ki dono betiyan, aur ab sidha boss ki beti khud chal kar mere paas aayi hai." Usne turant apni seat ke paas padi ek khaali kursi ko aage badhaaya aur behad shareef bante hue bola, "Oh, to aap Amit sir ki beti hain! Baithiye, baithiye Vani ji. CA Foundation to bas shuruat hai, aap jo bhi poochna chahti hain bejhijhak poochiye. Aapke doubts clear karna to mera farz hai."

Vani ne jaise hi kursi thoda aage badhayi aur baithne ke liye jhooki, Manik ki shatir nazrein turant apna kaam karne lagin. Vani ne kehne ko to behad shalin aur saade kapde pehne hue the—ek white formal shirt aur dark blue color ki knee-length skirt—lekin uske baithte hi uski skirt thoda upar khisak gayi. Manik ka dhyan turant uski gori aur aadhi nangi taangon par chala gaya, jo us saade pehnawe ke bawajud behad aakarshak lag rahi thheen.

Khel sirf wahin tak nahi ruka. Office ke tez AC ki wajah se cabin ka mahaul thoda thanda tha. Vani ne jo white cotton shirt pehni hui thi, woh kafi patli thi. Thand ki wajah se uski shirt ke andar se uske nipples saaf pop karte hue ubhar aaye the, jo halki white fabric ke bheetar se saaf jhalak rahe the. Vani is baat se bilkul bekhabar thi aur apni accounts ki book kholne mein busy thi, lekin Manik ki tharki nazrein uske chehre se hatkar seedhe uski shirt ke un do ubhaaron par tik gayin.

Manik ne man hi man ek thandi aah bhari aur socha, "Baap re baap! Baahar se itna bholapan aur andar se itna kadak maal! CA sahab ne apni beti ko padhne ke liye mere hi paas bhej kar lagta hai pura intezam kar diya hai."

Vani ne apni book table par rakhte hue kaha, "Manik bhaiya, mujhe na Consortium Accounts aur Partnership ke basic valuation mein thoda confusion ho raha tha. Kya aap thoda easy karke samjha denge?"

"Haalanki mera dhyan kahin aur hi valuation karne mein laga hai," Manik ne man hi man hanste hue socha, lekin upar se usne ekdam professional aur sharif hone ka natak kiya. Usne thoda aage jhukte hue, jisse uski nazar Vani ke collar ke andar tak ja sake, bade pyaar se kaha, "Bilkul Vani ji, kyun nahi. Accounts ka to ek hi rule hai—jitna gehrai mein jaoge, utna hi maza aayega. Lao, dikhao kahan dikkat aa rahi hai."

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Shaam ke lagbhag 5:30 baj chuke the. Office ki baki desks par baithe log dheere-dheere apna samaan samet rahe the, lekin Manik aur Vani ki table par abhi bhi do-teen badi files khuli hui thheen. Pichle do-teen ghanton mein unhone sath milkar kafi kaam niptaya tha. Manik ne na sirf apna pending data entry ka kaam khatam kiya, balki sath hi sath Vani ko taxation ke kuch aisi barikiyan samjhaiyan jo kafi complex maani jaati hain.

Vani jab-jab kisi concept ko samajhne ke liye Manik ke thoda paas aati, Manik ki tharki nazrein apna rasta dhoond hi letiyan. AC ki thandak abhi bhi office mein barkarar thi, aur Vani ki patli white shirt mein se uske nipples ka woh halka sa ubhaar abhi bhi Manik ko andar hi andar bechain kar raha tha.

Jab bhi Vani pen uthane ya file ka panna palatne ke liye jhukti, to uski skirt thoda aur upar khisak jaati, jisse uski gori aur chikni taangon ka nanga hissa Manik ki aankhon ke saamne aa jata. Manik ne poore waqt bade shatir tareeke se ek taraf apna dhyan uske jism par rakha, aur doosri taraf apne dimaag ko ekdam alert rakhkar accounts ke formulae samjhata raha, taaki Vani ko zara bhi shak na ho.

Vani ne Manik ki is samjhane ki capability aur uski clear thinking ko bahut kareeb se mehsoos kiya tha. Use lag raha tha ki Manik sirf padhai mein hi tez nahi hai, balki uska behavior bhi kitna professional aur supportive hai. Woh Manik ke is double game se bilkul anjaan, uski deewani hoti ja rahi thi.

Jab office ka bilkul aakhiri samay aaya aur Manik apni desk saaf karke apna bag pack karne laga, to Vani apni chair se uthi aur uske paas aayi. Uske chehre par ek behad pyaari aur sachi muskaan thi.

Vani ne bade aakarshak andaaz mein muskuraate hue kaha, "Manik, aaj aapke sath kaam karke mujhe sach mein bahut accha laga."

Manik ne bag ki zipper band karte hue upar dekha aur bola, "Mujhe bhi Vani ji. Aapka grasping power sach mein kamaal ka hai."

Vani ne poori honesty aur respect ke sath aage kaha, "Nahi Manik, main sach keh rahi hoon. Papa bilkul sahi keh rahe the aapke baare mein. Jis tarah se aapne GST input credits ke reconciliation ko aasan karke samjhaya na, woh mujhe meri coaching classes mein bade-bade teachers bhi kabhi nahi samjha paaye the. Mujhe to lagta tha ki yeh boring aur bohot mushkil topic hai, par aapne ise jitna simple bana diya, mere saare doubts ek jhatke mein clear ho gaye. Mujhe sach mein lag रहा hai ki is articleship ke dauran mujhe aapse bohot kuch seekhne ko milega."

Manik ko apni mehnat aur dimaag ki tareef sunkar andar hi andar ek alag hi maza aa raha tha. Ek taraf uski ego satisfy ho rahi thi ki usne pehle hi din boss ki beti ko impress kar diya hai, aur doosri taraf uske shatir dimaag mein aage ke bohot se haseen khayal chal rahe the. Usne socha, "Chalo, is par to poora asar ho gaya hai. Ab aage ka raasta aur aasan hoga."

Upar se behad shareef aur polite bante hue Manik ne ek dheemi muskaan ke sath jawaab diya, "Shukriya, Vani. Mujhe bhi aapke sath discuss karke bohot accha laga. Padhai sabhi karte hain, par aap jis tezi se concepts ko pakadti hain, woh kabil-e-tareef hai. Vaise bhi, abhi to yeh pehla din tha. Kal se hum thoda aur deep jayenge aur thoda aur zyada mehnat karenge!"

Vani ne khushi se apna sir hilaya, "Bilkul Manik! Kal se main aur tayari ke sath aaoongi."

Shaam ki halki dhoop office ki khidkiyon se bahaar dhal rahi thi. Manik ne apna bag kandhe par tanga aur Vani ko ek aakhiri baar upar se neeche tak dekha, jo ab apni books samet rahi thi. Naye shehar mein, naye office ke andar, Manik ka pehla din har tarah se ekdam super-hit aur successful raha tha. Usne na sirf Amit Goyal ka dil jeeta, Jasleen ko proud feel karwaya, balki ab boss ki bholi aur jism se kadak beti Vani ke dil mein bhi ek khaas jagah banani shuru kar di thi.



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दोस्तों जमकर कमैंट्स किया कीजिये ताकि मज़ा ए मुझे लिखने MEIN.....EK और कहानी शुरू की है शार्ट स्टोरीज MEIN...MASI के साथ. उस थ्रेड पर भी चक्कर मरकर आइये मज़ा आएगा आप लोगों को
 
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