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- Dec 5, 2013
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Part - 51
मल्लिका के किचन में जाते hi, आर्यन ने अनु को सहज करने की कोशिश की. वह सोफे के पास राखी टेबल से अपना फ़ोन उठाकर बैठ गया.
आर्यन: (उत्साह से) अनु दीदी, मल्लिका ने जिन गांव की बात की थी, वह बहुत ज़बरदस्त हैं! हमने abhi-abhi एक नया एल्बम सुना है. मैं आपको सुनाता हूँ.
आर्यन ने अपना फ़ोन अनु की तरफ बढ़ाया.
अनु अभी भी गहरे विचारों में डूबी हुई थी. उसका ध्यान मल्लिका और आर्यन के खुलेपन और बीएड के दर्द से हैट नहीं प् रहा था. वह इस बात से नाराज़ थी की आर्यन इतना सहज क्यों है, जैसे कुछ हुआ hi न हो.
अनु: (बिना फ़ोन देखे, ठंडी आवाज़ में) नहीं, धन्यवाद, आर्यन. मेरा सुनने का मन नहीं है.
आर्यन: (थोड़ा निराश होते हुए) अरे, एक बार सुनिए तो! यह बहुत अच्छे बीट्स हैं. मल्लिका और मैं तो...
आर्यन ने रुक कर अपनी बात पूरी नहीं की, क्यूंकि उससे लगा की मल्लिका का नाम और उनके साझा अनुभव अनु को असहज कर सकते हैं.
अनु: (रूखेपन से, आर्यन की आँखों में देखते हुए) आर्यन, देखो. मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है, और न hi मुझे तुम्हारी 'बीट्स' में कोई दिलचस्पी है. मैं यहाँ अपनी ज़रूरी चीज़ें लेने आयी हूँ. तुम अकारण मुझे तवज्जो देने की कोशिश मत करो.
अनु ने jaan-bujhkar यह कहकर आर्यन को अपनी सीमाएं याद दिला दी. आर्यन को एहसास हुआ की अनु, मल्लिका जैसी खुली मिज़ाज की नहीं है, और वह उनके 'चिल' अंदाज़ को स्वीकार नहीं कर रही थी.
आर्यन: (माथे पर बल डालते हुए) ओह! ठीक है. सॉरी. मुझे लगा आप...
आर्यन ने अपना फ़ोन वापस रख लिया और सोफे पर थोड़ा दूर खिसक गया. अनु सोफे पर अकेली बैठी रही, अपनी नाराज़गी और मल्लिका की ज़िन्दगी से उपजी असहजता में डूबी हुई.
*********************************
मल्लिका दो कप कॉफ़ी लेकर वापस आयी. एक कप उसने अनु को दिया और दूसरा खुद आर्यन को पकड़ाया. मल्लिका ने स्थिति भांप ली थी — अनु ने आर्यन को पूरी तरह से उपेक्षित कर दिया था.
मल्लिका jaan-bujhkar अनु के पास, सोफे पर बिलकुल करीब आकर बैठ गयी. आर्यन अब फ़ोन पर व्यस्त होने का नाटक करने लगा.
मल्लिका: (कॉफ़ी का कप अनु की तरफ बढ़ते हुए) यह लो, तुम्हारी पसंदीदा कॉफ़ी. अब शांत हो जाओ. तुम यहाँ मुझे जज करने आयी हो, या ज़रूरी फाइल्स लेने?
अनु: (कॉफ़ी लेते हुए, रूखेपन से) मैं तुम्हे जज नहीं कर रही हूँ, मल्लिका. मैं बस... परेशां हूँ. तुम इतनी बेफिक्र कैसे हो सकती हो?
मल्लिका: (शांत लहजे में) परवाह के लिए धन्यवाद, दीदी. लेकिन मेरी फलसफा सुनो. तुम और मैं, हम दोनों काम करते हैं. तुम अपने घर की मर्यादाओं को लेकर चिंता करती रहती हो. तुम्हारा दिमाग हमेशा फॅमिली वैल्यूज और पारिवारिक इज़्ज़त में उलझा रहता है.
मल्लिका अनु के कंधे पर धीरे से हाथ फेरती है.
मल्लिका: तुम विक्रम जैसे घटिआ लोगों की गन्दी नज़रों से क्यों परेशां होती हो? क्यूंकि तुम खुद को दोषी महसूस करती हो की शायद तुमने कुछ गलत पहना होगा. लेकिन मैं नहीं करती. मैंने अभी आर्यन से सेक्स किया, तुम अचानक आ गयी, और मैंने तुम्हे कॉफ़ी ऑफर की. क्यों?
अनु चुपचाप मल्लिका को देखती रही.
मल्लिका: (आँखों में आत्मविश्वास) क्यूंकि यह मेरी आज़ादी है. मैं अपने शरीर की मालिक हूँ, और मैं किसी को अधिकार नहीं देती की वह मेरे जीवन को कण्ट्रोल करे. न विक्रम की नज़र, न सोसाइटी, और न hi तुम्हारे 'क्या कहेंगे' वाले दर.
मल्लिका की बातों में एक ज़बरदस्त आत्मविश्वास और सच्चाई थी.
मल्लिका: तुम्हे पता है, अनु? तुम बहार से बहुत सख्त दिखती हो, लेकिन अंदर से तुम भी बहुत कुछ चाहती हो — वह चाहत जो तुम अपने पार्टनर से नहीं कह पाती. इसीलिए जब तुम मुझे देखती हो, तो तुम्हे गुस्सा आता है — क्युकी तुम वह आज़ादी जी नहीं पाती.
अनु को मल्लिका की बात चुभ गयी. उसे याद आया की विक्रम की नज़रों से वह कितनी परेशां हुई थी. मल्लिका शायद सही कह रही थी.
अनु: (निराश होकर) तुम... तुम इतनी खुली बातें क्यों करती हो?
मल्लिका: क्यूंकि मुझे उम्मीद है की एक दिन तुम भी अपने लिए जीना सीखेगी. जाओ, अपनी फाइल्स लो. और हाँ, अगर तुम्हे कभी कोई रोमांच चाहिए हो, तो मुझे कॉल करना. मैं तुम्हे ज़रूर कोई अच्छा साथी ढूंढने में मदद कर सकती हूँ!
मल्लिका हसने लगी. अनु ने अपने ज़रूरी कागज़ात उठाये, लेकिन अब वह पहले से ज़्यादा परेशां थी. मल्लिका ने उसके दिमाग में खतरे की घंटी बजा दी थी, जिससे उसे अपनी मर्यादा और अपनी दबी हुई चाहतों के बीच का संघर्ष साफ़ दिखाई दे रहा था.
*********************************
पारी, माणिक के कमरे में आयी. वह जानती थी की माणिक अभी भी दिव्या के प्रतिशोध की योजना बना रहा होगा. वह तुरंत माणिक के पास बैठ गयी और फुसफुसाते हुए एक काम की बात बताई.
पारी: (उत्सुकता से) भाई, मुझे तुम्हे एक बात बतानी है. यह शायद तुम्हारे काम की हो.
माणिक: (आँखें चमकते हुए) क्या है? जल्दी बता!
पारी: मुझे लगता है की मैंने दीदी की कोई कमज़ोरी पकड़ ली है. भाई, पता है दिव्या दीदी रात को 11 बजे के बाद छत (टेरेस) पर जाती हैं. पता नहीं क्या करती हैं! वह रोज़ जाती हैं और काफी देर तक ऊपर रहती हैं.
माणिक का चेहरा तुरंत उत्साह से भर गया. उसे लगा की उसकी प्रतिशोध की योजना के लिए यह पहला सुराग है.
माणिक: (पारी को शाबाशी देते हुए, उसके गाल पर थपथपाकर) यह तो तुमने बड़े काम की बात बताई है, छुटकी! तुमने मेरा काम आसान कर दिया!
माणिक की पुराणी नफरत और नयी वासना का आवेग फिर जाग उठा.
माणिक: बस! अब देखना उसका (दिव्या का) तो बंटाधार करना है मुझे! अब तो मैं उसका जीना हराम कर दूंगा! देखना, एक दिन उसकी छूट मारूंगा! यह उसकी हर नफरत का बदला होगा.
पारी तुरंत गंभीर हो गयी. वह माणिक की वासना और गंदे शब्दों से परेशां थी.
पारी: (गंभीरता से) फिर वही बात, भाई! प्लीज! अपनी बहिन के लिए ऐसी बात नहीं बोलते! यह सब गलत है, भाई.
माणिक, जो अब अपनी योजना में पूरी तरह खो चूका था, उसने पारी की चेतावनी को अनदेखा कर दिया. वह बस हंस देता है.
माणिक: (आत्मविश्वास और गर्व से) तेरे भाई का लुंड अगर कुछ सोच ले, तो उसे पूरा करके रहता है! मेरी बात मान, यह दिव्या की छूट लेकर hi रहेगा! उसका सारा गुस्सा और नफरत इसी से निकलेगा!
पारी, हार मानकर, ना में गर्दन हिलती है. वह जानती थी की वह माणिक को रोक नहीं सकती, लेकिन उसे अपने भाई के इस खतरनाक इरादे से दर भी लग रहा था. माणिक अब पूरी तरह से तैयार था की आज रात 11 बजे वह छत पर जाकर दिव्या का 'रहस्य' पता लगाएगा.
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मल्लिका के किचन में जाते hi, आर्यन ने अनु को सहज करने की कोशिश की. वह सोफे के पास राखी टेबल से अपना फ़ोन उठाकर बैठ गया.
आर्यन: (उत्साह से) अनु दीदी, मल्लिका ने जिन गांव की बात की थी, वह बहुत ज़बरदस्त हैं! हमने abhi-abhi एक नया एल्बम सुना है. मैं आपको सुनाता हूँ.
आर्यन ने अपना फ़ोन अनु की तरफ बढ़ाया.
अनु अभी भी गहरे विचारों में डूबी हुई थी. उसका ध्यान मल्लिका और आर्यन के खुलेपन और बीएड के दर्द से हैट नहीं प् रहा था. वह इस बात से नाराज़ थी की आर्यन इतना सहज क्यों है, जैसे कुछ हुआ hi न हो.
अनु: (बिना फ़ोन देखे, ठंडी आवाज़ में) नहीं, धन्यवाद, आर्यन. मेरा सुनने का मन नहीं है.
आर्यन: (थोड़ा निराश होते हुए) अरे, एक बार सुनिए तो! यह बहुत अच्छे बीट्स हैं. मल्लिका और मैं तो...
आर्यन ने रुक कर अपनी बात पूरी नहीं की, क्यूंकि उससे लगा की मल्लिका का नाम और उनके साझा अनुभव अनु को असहज कर सकते हैं.
अनु: (रूखेपन से, आर्यन की आँखों में देखते हुए) आर्यन, देखो. मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है, और न hi मुझे तुम्हारी 'बीट्स' में कोई दिलचस्पी है. मैं यहाँ अपनी ज़रूरी चीज़ें लेने आयी हूँ. तुम अकारण मुझे तवज्जो देने की कोशिश मत करो.
अनु ने jaan-bujhkar यह कहकर आर्यन को अपनी सीमाएं याद दिला दी. आर्यन को एहसास हुआ की अनु, मल्लिका जैसी खुली मिज़ाज की नहीं है, और वह उनके 'चिल' अंदाज़ को स्वीकार नहीं कर रही थी.
आर्यन: (माथे पर बल डालते हुए) ओह! ठीक है. सॉरी. मुझे लगा आप...
आर्यन ने अपना फ़ोन वापस रख लिया और सोफे पर थोड़ा दूर खिसक गया. अनु सोफे पर अकेली बैठी रही, अपनी नाराज़गी और मल्लिका की ज़िन्दगी से उपजी असहजता में डूबी हुई.
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मल्लिका दो कप कॉफ़ी लेकर वापस आयी. एक कप उसने अनु को दिया और दूसरा खुद आर्यन को पकड़ाया. मल्लिका ने स्थिति भांप ली थी — अनु ने आर्यन को पूरी तरह से उपेक्षित कर दिया था.
मल्लिका jaan-bujhkar अनु के पास, सोफे पर बिलकुल करीब आकर बैठ गयी. आर्यन अब फ़ोन पर व्यस्त होने का नाटक करने लगा.
मल्लिका: (कॉफ़ी का कप अनु की तरफ बढ़ते हुए) यह लो, तुम्हारी पसंदीदा कॉफ़ी. अब शांत हो जाओ. तुम यहाँ मुझे जज करने आयी हो, या ज़रूरी फाइल्स लेने?
अनु: (कॉफ़ी लेते हुए, रूखेपन से) मैं तुम्हे जज नहीं कर रही हूँ, मल्लिका. मैं बस... परेशां हूँ. तुम इतनी बेफिक्र कैसे हो सकती हो?
मल्लिका: (शांत लहजे में) परवाह के लिए धन्यवाद, दीदी. लेकिन मेरी फलसफा सुनो. तुम और मैं, हम दोनों काम करते हैं. तुम अपने घर की मर्यादाओं को लेकर चिंता करती रहती हो. तुम्हारा दिमाग हमेशा फॅमिली वैल्यूज और पारिवारिक इज़्ज़त में उलझा रहता है.
मल्लिका अनु के कंधे पर धीरे से हाथ फेरती है.
मल्लिका: तुम विक्रम जैसे घटिआ लोगों की गन्दी नज़रों से क्यों परेशां होती हो? क्यूंकि तुम खुद को दोषी महसूस करती हो की शायद तुमने कुछ गलत पहना होगा. लेकिन मैं नहीं करती. मैंने अभी आर्यन से सेक्स किया, तुम अचानक आ गयी, और मैंने तुम्हे कॉफ़ी ऑफर की. क्यों?
अनु चुपचाप मल्लिका को देखती रही.
मल्लिका: (आँखों में आत्मविश्वास) क्यूंकि यह मेरी आज़ादी है. मैं अपने शरीर की मालिक हूँ, और मैं किसी को अधिकार नहीं देती की वह मेरे जीवन को कण्ट्रोल करे. न विक्रम की नज़र, न सोसाइटी, और न hi तुम्हारे 'क्या कहेंगे' वाले दर.
मल्लिका की बातों में एक ज़बरदस्त आत्मविश्वास और सच्चाई थी.
मल्लिका: तुम्हे पता है, अनु? तुम बहार से बहुत सख्त दिखती हो, लेकिन अंदर से तुम भी बहुत कुछ चाहती हो — वह चाहत जो तुम अपने पार्टनर से नहीं कह पाती. इसीलिए जब तुम मुझे देखती हो, तो तुम्हे गुस्सा आता है — क्युकी तुम वह आज़ादी जी नहीं पाती.
अनु को मल्लिका की बात चुभ गयी. उसे याद आया की विक्रम की नज़रों से वह कितनी परेशां हुई थी. मल्लिका शायद सही कह रही थी.
अनु: (निराश होकर) तुम... तुम इतनी खुली बातें क्यों करती हो?
मल्लिका: क्यूंकि मुझे उम्मीद है की एक दिन तुम भी अपने लिए जीना सीखेगी. जाओ, अपनी फाइल्स लो. और हाँ, अगर तुम्हे कभी कोई रोमांच चाहिए हो, तो मुझे कॉल करना. मैं तुम्हे ज़रूर कोई अच्छा साथी ढूंढने में मदद कर सकती हूँ!
मल्लिका हसने लगी. अनु ने अपने ज़रूरी कागज़ात उठाये, लेकिन अब वह पहले से ज़्यादा परेशां थी. मल्लिका ने उसके दिमाग में खतरे की घंटी बजा दी थी, जिससे उसे अपनी मर्यादा और अपनी दबी हुई चाहतों के बीच का संघर्ष साफ़ दिखाई दे रहा था.
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पारी, माणिक के कमरे में आयी. वह जानती थी की माणिक अभी भी दिव्या के प्रतिशोध की योजना बना रहा होगा. वह तुरंत माणिक के पास बैठ गयी और फुसफुसाते हुए एक काम की बात बताई.
पारी: (उत्सुकता से) भाई, मुझे तुम्हे एक बात बतानी है. यह शायद तुम्हारे काम की हो.
माणिक: (आँखें चमकते हुए) क्या है? जल्दी बता!
पारी: मुझे लगता है की मैंने दीदी की कोई कमज़ोरी पकड़ ली है. भाई, पता है दिव्या दीदी रात को 11 बजे के बाद छत (टेरेस) पर जाती हैं. पता नहीं क्या करती हैं! वह रोज़ जाती हैं और काफी देर तक ऊपर रहती हैं.
माणिक का चेहरा तुरंत उत्साह से भर गया. उसे लगा की उसकी प्रतिशोध की योजना के लिए यह पहला सुराग है.
माणिक: (पारी को शाबाशी देते हुए, उसके गाल पर थपथपाकर) यह तो तुमने बड़े काम की बात बताई है, छुटकी! तुमने मेरा काम आसान कर दिया!
माणिक की पुराणी नफरत और नयी वासना का आवेग फिर जाग उठा.
माणिक: बस! अब देखना उसका (दिव्या का) तो बंटाधार करना है मुझे! अब तो मैं उसका जीना हराम कर दूंगा! देखना, एक दिन उसकी छूट मारूंगा! यह उसकी हर नफरत का बदला होगा.
पारी तुरंत गंभीर हो गयी. वह माणिक की वासना और गंदे शब्दों से परेशां थी.
पारी: (गंभीरता से) फिर वही बात, भाई! प्लीज! अपनी बहिन के लिए ऐसी बात नहीं बोलते! यह सब गलत है, भाई.
माणिक, जो अब अपनी योजना में पूरी तरह खो चूका था, उसने पारी की चेतावनी को अनदेखा कर दिया. वह बस हंस देता है.
माणिक: (आत्मविश्वास और गर्व से) तेरे भाई का लुंड अगर कुछ सोच ले, तो उसे पूरा करके रहता है! मेरी बात मान, यह दिव्या की छूट लेकर hi रहेगा! उसका सारा गुस्सा और नफरत इसी से निकलेगा!
पारी, हार मानकर, ना में गर्दन हिलती है. वह जानती थी की वह माणिक को रोक नहीं सकती, लेकिन उसे अपने भाई के इस खतरनाक इरादे से दर भी लग रहा था. माणिक अब पूरी तरह से तैयार था की आज रात 11 बजे वह छत पर जाकर दिव्या का 'रहस्य' पता लगाएगा.
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