Incest JANNAT TERI BAHON (TANGO) MEIN - Page 6 - SexBaba
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Incest JANNAT TERI BAHON (TANGO) MEIN

Part - 27

माणिक ने पारी की सलाह को गंभीरता से लिया. उसने पारी की मदद से अपनी एक अच्छी प्रोफाइल बनायीं, जिसमे उसने अपनी पढाई के saath-saath अपने शौकों (जैसे, रात में तारे देखना और पुराणी हिंदी फिल्में देखना) का भी ज़िक्र किया.

अगले कुछ घंटों तक, माणिक, जो आमतौर पर घंटों जटिल समीकरणों (काम्प्लेक्स एक्वेशन्स) को हल करने में बीतता था, अब सावधानी से alag-alag प्रोफाइल्स को 'स्वाइप' कर रहा था. यह उसके लिए एक बिलकुल नयी दुनिया थी.

शाम hote-hote, जब माणिक अपने कमरे में बैठा अपनी केमिस्ट्री की किताब खोलने hi वाला था, तभी उसके फ़ोन पर एक नोटिफिकेशन आया.

"कोंग्रटुलतिओन्स! You've गोत ा नई मैच!"

माणिक का दिल ज़ोर से धड़का. उसने जल्दी से फ़ोन उठाया. उसका पहला मैच!

पारी कमरे में चाय लेकर आयी और उसने माणिक को लगभग जमे हुए देखा.

पारी: (हँसते हुए) क्या हुआ? क्या कोई नया ग्रेविटी फार्मूला मिल गया?

माणिक ने बिना कुछ कहे, पारी की तरफ फ़ोन घुमा दिया.

पारी: (ख़ुशी से चिल्लाते हुए) ओह माय गॉड! मैच! बधाई हो भाई! मेरी सलाह काम कर गयी!

प्रोफाइल पर एक लड़की की तस्वीर थी, जिसका नाम आस्था था. वह एक ग्राफ़िक डिज़ाइनर थी और उसने अपने बायो में लिखा था की उसे कला और विज्ञानं के बीच संतुलन पसंद है.

पारी: (Manik ko ut उत्साहित karte hue) Wah bahut acchi lag rahi hai! Ab der kis baat ki? Jaldi se message karo!

माणिक: (घबराते हुए) मैसेज? क्या लिखूं? मैं क्या बात करून? मुझे नहीं आता! यह कोई प्रयोगशाला (लैब) की रिपोर्ट नहीं है!

पारी: (आँखें घूमते हुए) बस वही लिखो जो तुम सोचते हो! चलो, मैं बताती हूँ.

पारी ने फ़ोन लिया और टाइप किया:

पारी (माणिक): "Hi आस्था! आपकी प्रोफाइल अच्छी लगी. खासकर कला और विज्ञानं वाला पॉइंट. एक वैज्ञानिक होने के नाते, मैं अक्सर संतुलन खोजने की कोशिश करता हूँ. आपकी डिज़ाइन की दुनिया कैसी है?"

पारी ने मैसेज भेज दिया.

माणिक: (चिंता से) तुमने भेज दिया! क्या यह ज़्यादा 'किताबी' नहीं है?

पारी: यह 'माणिक' जैसा है, जो सही है! वह जानती है की वह एक साइंटिस्ट से बात कर रही है. अब ज़्यादा मत सोचो.

माणिक को अभी भी असहजता महसूस हो रही थी, लेकिन एक हलकी सी उत्तेजना भी थी. उसे एहसास हुआ की यह रास्ता, जो पारी ने दिखाया, अकेले कमरे में मचलने से कहीं ज़्यादा स्वस्थ और सही था. अब उसकी साड़ी निराशा एक नयी उम्मीद में बदल रही थी.

माणिक: अच्छा, अब क्या? क्या तुम मुझे आगे भी सलाह देती रहोगी?

पारी: (मुस्कुराते हुए) ज़रूर, भाई. मैं तुम्हें 'डेटिंग गुरु' बनकर गाइड करती रहूंगी. पर याद रखना, असली खेल तुम्हें खुद hi खेलना है. अब यह फ़ोन रखो और चाय पियो. और हाँ, अगर उसका रिप्लाई आये तो सीधे मेरे पास आना!

माणिक ने चाय का कप पकड़ा, पर उसकी आँखें baar-baar फ़ोन पर जा रही थीं. उसका मैं अब केमिस्ट्री की किताब में नहीं, बल्कि आस्था के रिप्लाई का इंतज़ार कर रहा था. एक नया, अंजना सफर शुरू हो चूका था.


माणिक और पारी, दोनों hi बेताबी से फ़ोन की स्क्रीन घूर रहे थे. कुछ देर की चुप्पी के बाद, जैसे hi माणिक ने हिम्मत हारकर चाय का आखरी घूँट लिया, फ़ोन की घंटी बजी.

पारी: (ख़ुशी से uchhal-kar) आ गया! रिप्लाई आ गया!

माणिक ने लगभग झपटकर फ़ोन पकड़ा. उसका दिल ज़ोरों से धड़क रहा था.

आस्था का मैसेज:

"Hi माणिक! :) थैंक्स! मुझे भी तुम्हारी प्रोफाइल पढ़कर अच्छा लगा. संतुलन तो हर जगह ज़रूरी है, खासकर डिज़ाइन में! मेरे लिए डिज़ाइन की दुनिया साइंस से ज़्यादा आर्ट है... पर हाँ, बिना लॉजिक के कुछ नहीं चलता. अच्छा बताओ, स्टरगाजिंग के लिए तुम्हारी पसंदीदा जगह कौन सी है?"

माणिक ने मैसेज को काम से काम तीन बार पढ़ा. वह मुस्कुराया.

माणिक: उसने जवाब दिया! और उसने सवाल भी पूछा है!

पारी: (ख़ुशी से) हाँ! यह बहुत अच्छा संकेत है! वह तुममें दिलचस्पी ले रही है. अब ज़्यादा 'वैज्ञानिक' मत बन जाना, थोड़ा रोमांटिक और कासुअल जवाब दो.

माणिक: रोमांटिक? मैं क्या लिखूं? की मुझे उसके साथ स्टरगाजिंग करनी है?

पारी: (माणिक को एक halka-sa धक्का देते हुए) नहीं! अभी नहीं! थोड़ी मिस्ट्री रखो! चलो, मैं बताती हूँ.

पारी ने फ़ोन लिया और टाइप किया:

पारी (माणिक): "मेरे लिए सबसे अच्छी जगह वह है जहाँ आसमान साफ़ हो, लेकिन अगर आप साथ हों तो शायद कोई भी जगह परफेक्ट होगी! 😉 मेरी पसंदीदा जगह मेरे शहर से थोड़ी दूर एक पहाड़ी है. पर मुझे लगता है की मैं आपकी दुनिया (डिज़ाइन) के बारे में और जानना चाहूंगा. आप कहाँ से हैं?"

पारी ने मैसेज भेज दिया.

माणिक: (आँखें चौड़ी करते हुए) तुमने स्माइली और आँख मारने वाला इमोजी क्यों भेजा?

पारी: (हँसते हुए) क्यूंकि तुम एक बोरिंग साइंटिस्ट नहीं हो! तुम एक हैंडसम लड़का हो जो फ़्लर्ट कर सकता है! यह ज़रूरी है, भाई.

माणिक को अपनी बेहेन की यह 'डेटिंग एक्सपर्ट' वाली भूमिका बहुत मज़ेदार लग रही थी. उसे लग रहा था जैसे वह कोई नया, रोमांचक प्रोजेक्ट शुरू कर रहा हो. कुछ देर में आस्था का फिर से जवाब आया.

आस्था का मैसेज:

"ः! मुझे यह पसंद आया. और मैं इस शहर के पास hi रहती हूँ. डिज़ाइन की दुनिया तो कमल है, यहाँ हर रोज़ कुछ नया होता है. मैं आपको अपनी कुछ वेब्सीटेस दिखा सकती हूँ. 😉"

पारी: (विनिंग स्माइल के साथ) अब! अब मौका आ गया है! अब तुम उसे सीधे कॉल या मिलने का पूछो!

माणिक: (थोड़ा हिचकिचाते हुए) कॉल... या मिलना?

पारी: मिलना! कॉफ़ी पर. और अब यह तुम्हारा काम है! मेरे पास मेरे खुद के प्रोजेक्ट्स हैं. जाओ, भाई. अपनी किस्मत आज़माओ!

माणिक ने पारी की तरफ देखा, जिसने उसे हिम्मत और एक सही राह दिखाई थी. उसके दिल में एक अजीब सी शांति थी. वह अब निराशा के अँधेरे में नहीं था, बल्कि उम्मीद की रौशनी में एक नया कदम उठाने को तैयार था.


माणिक और पारी को खुद भी अंदाज़ा नहीं हुआ की कब डेटिंग अप्प पर आस्था से बात करने के बहाने, वे दोनों ek-doosre के और क़रीब आ गए. हर नया मैसेज, हर नया 'चैटिंग सेशन', दोनों bhai-behen के बीच एक अनकहा तालमेल बन गया था.

Baat-cheet का यह सिलसिला रोज़ शाम को शुरू होता था, जब माणिक अपने कमरे में होता एरा. पारी, माणिक के बीएड पर बैठ जाती थी, और दोनों फ़ोन की स्क्रीन पर झुके होते थे. जब पारी तेज़ी से आस्था के लिए कोई मज़ेदार या फ्लिर्टी मैसेज टाइप कर रही होती थी, तो माणिक उसके कंधे पर झुक जाता था. उसका एक हाथ अक्सर अनजाने में पारी के कंधे पर टिका होता था, और उनके शरीर सटे हुए होते थे.

माणिक की नज़रें पारी की उँगलियों की हरकत पर होती थीं, लेकिन उसका ध्यान पारी की मौजूदगी के ताप और नज़दीकी पर भी होता था. पारी को भी यह नज़दीकी अच्छी लगती थी. उसे माणिक के शरीर का सहारा, उसकी गर्म साँसों का एहसास, एक अजीब सी सुरक्षा और अंतरंगता (इंटिमेसी) देता था.

दोनों, इस सब में इतने सहज हो गए थे की उन्होंने कभी इस बात पर ध्यान hi नहीं दिया की उनके बीच की शारीरिक दूरी लगभग ख़त्म हो चुकी थी. वे इस नज़दीकी को केवल 'मैसेज टाइप करने में मदद' का हिस्सा मानते थे, जबकि यह उनके बीच का नया, अनकहा और सहज स्नेह बन चूका था.

करीब दो हफ़्तों की लगातार चैटिंग, वर्चुअल डेट्स और लम्बी baat-cheet के बाद, आस्था आख़िरकार पहली मुलाकात के लिए तैयार हो गयी.

आस्था का मैसेज:

"माणिक, मुझे लगता है की हमने ek-doosre को फ़ोन पर काफी जान लिया है. अगर तुम कल शाम फ्री हो तो मैं कॉफ़ी के लिए मिलना चाहूंगी. एक ख़ास कैफ़े है, वहां मिलते हैं."

माणिक यह मैसेज देखकर ख़ुशी से उछाल पड़ा.

माणिक: (पारी को झकझोरते हुए) पारी! उसने हाँ कर दिया! उसने हाँ कर दिया!

पारी: (खुश होते हुए) हाँ! मैंने कहा था न, मेरी सलाह कभी गलत नहीं होती! अब तुम खुद hi रिप्लाई करो!

माणिक ने तुरंत जवाब देने के लिए फ़ोन पकड़ा. तभी आस्था का एक और मैसेज aaya—yeh एक चेतावनी थी, जो माणिक को थोड़ी असहज कर गयी.

आस्था का मैसेज:

"पर माणिक, एक शर्त है. मैं जानती हूँ की तुम बहुत इंटेंस हो सकते हो, और तुम्हारी प्रोफाइल में लिखा है की तुम ज़िन्दगी में 'रोमांस' ढून्ढ रहे हो. लेकिन पहली मुलाकात में तुम्हें 'लिमिट' में रहना होगा. मेरा मतलब है... कोई हाथ पकड़ना नहीं, कोई ख़ास नज़दीकी नहीं. बस बात करेंगे, ek-doosre को व्यक्तिगत रूप से जानेंगे. अगर तुम यह वादा कर सकते हो, तभी हाँ कहना. ठीक है?"

माणिक ने यह मैसेज ज़ोर से पढ़ा. उसका उत्साहित चेहरा अचानक गंभीर हो गया.

माणिक: लिमिट? इसका क्या मतलब है? क्या वह डर रही है?

पारी: (आराम से समझते हुए, माणिक के कंधे पर हाथ फेरते हुए) नहीं, भाई. वह डर नहीं रही है. वह सिर्फ यह जानना चाहती है की तुम कितने रिस्पेक्टफुल हो. इसका मतलब है की तुम्हें जेंटलमैन बनकर रहना है. कोई जल्दी नहीं. वह तुम्हारी परीक्षा ले रही है.

पारी ने मैसेज टाइप किया:

माणिक: "शर्त मंज़ूर है, आस्था. मैं 'लिमिट' का पूरा सम्मान करूँगा. मैं तुम्हें परेशां करने के लिए नहीं, बल्कि तुम्हें जान्ने के लिए मिल रहा हूँ. कल शाम 5 बजे, मैं वहीँ मिलूंगा."

मैसेज भेजकर पारी ने माणिक की तरफ देखा.

पारी: देखो, माणिक. यह अच्छा है. यह तुम्हें सिखाएगा की अपनी इच्छाओं को कैसे काबू में रखा जाता है. अब जाओ और अपने लिए अच्छे कपडे निकालो. यह तुम्हारा पहला ऑफिसियल डेट है!

माणिक ने अब मुस्कुराते हुए, एक गहरी सांस ली. वह जानता था की यह पहली मुलाकात उसके लिए एक बड़ी परीक्षा थी, लेकिन वह इस नए सफर के लिए अब पूरी तरह तैयार था.
 
Part -28

नीरू बुआ के ससुर – श्री रामेश्वर मित्तल – की मौत एकदम अचानक आयी थी. दिल का दौरा पड़ा था, और हॉस्पिटल pahunchte-pahunchte सब ख़तम हो गया. घर में माहौल भरी था – लोग rote-bilakte आये, अंतिम यात्रा निकली, और dah-sanskaar के लिए सारा परिवार गाओं के किनारे शमशान घात पहुंचा.

आनंद अंकल – माणिक के पिता – अपने 'काम' के नाम पर बहार गए हुए थे. सबको पता था की वह अनीता के साथ कहीं फार्महाउस पर हैं, फ़ोन भी स्विच ऑफ. इसलिए dah-sanskaar की पूरी ज़िम्मेदारी माणिक पर आ गयी. वह अकेला hi मुखाग्नि देता रहा, लोगों को सम्हालता रहा, और अपने छोटे से दिल में एक अजीब सा khali-pan महसूस करता रहा.

शाम dhalte-dhalte घर लौटने के बाद, सब apne-apne कमरों में सिमट गए. नीरू बुआ अपने कमरे में अकेली बैठी थी. उनका चेहरा सूज गया था रोने से, आँखें लाल, बाल बिखरे हुए. उनके ससुर उनके लिए सिर्फ ससुर hi नहीं थे – छोटी उम्र में hi विधवा हो जाने के बाद उन्होंने hi नीरू को पिता का प्यार दिया था. हर त्यौहार पर नए कपडे, हर बिमारी में दवाई और सेवा – वह उनका सहारा थे. अब वह भी चले गए.

माणिक ने दरवाज़ा खोला और धीरे से अंदर आया. कमरे में सिर्फ एक छोटी सी लाल लाइट जल रही थी. बुआ बिस्तर पर बैठी थी, गॉड में सर पकडे हुए, कंधे हिल रहे थे.

माणिक: (धीरे से) बुआ... आप... आप ठीक तो हैं न?

नीरू बुआ ने सर उठाया. उनकी आँखों से आंसूं अभी भी बह रहे थे. वह कुछ नहीं बोली, बस हाथ फैला दिया. माणिक तुरंत आगे बढ़ा और उन्हें अपनी बाहों में भर लिया. बुआ का सर उसके कंधे पर टिक गया, और वह zor-zor से रओं लगने लगी.

माणिक उनकी पीठ पर हाथ फेर रहा था, dheere-dheere, जैसे माँ बच्चे को सुलाती है.

माणिक: (आवाज़ में दर्द) बुआ... मैं हूँ न. आप अकेली नहीं हैं. पापा जी आपको बहुत प्यार करते थे... हम सब करते हैं.

नीरू बुआ ने और कास कर उसे जकड लिया. उनका गरम सांस माणिक की गर्दन पर लग रहा था. उनका शरीर अभी भी काँप रहा था, लेकिन dheere-dheere शांत होने लगा. माणिक का हाथ उनकी पीठ पर घूम रहा था, कभी कमर पर, कभी सर पर.

पर jaise-jaise बुआ की साँसें शांत हुई, माणिक को एक अजीब सी बेचैनी महसूस होने लगी. बुआ का नरम शरीर उसके साथ चिपका हुआ था. उनकी साडी का पल्लू सरक गया था, और उनका ब्लाउज उसके सीने से सात रहा था. उनकी गरम साँसें, उनकी खुशबू – वह सब माणिक के अंदर एक पुराणी आग को फिर से सुलगा रही थी.

उसने कोशिश की की अपने मैं को समझाए – यह दुःख का वक़्त है, यह गलत है. पर शरीर ने सुना नहीं. उसका दिल zor-zor से धड़कने लगा. बुआ का सर अभी भी उसके कंधे पर था, और उनकी गर्दन बिलकुल पास.

माणिक का हाथ रुक गया. उसने अपने होंठों को धीरे से बुआ के कंधे पर टिका दिया – पहले एक हल्का सा किश, जैसे सांत्वना में. फिर दूसरा. उसके होंठ बुआ की नरम त्वचा पर महसूस हुए – थोड़ा नमकीन, थोड़ा गरम.

नीरू बुआ का शरीर एक पल को सख्त हो गया. उन्हें तुरंत एहसास हो गया की यह सिर्फ bhai-bahan वाला स्पर्श नहीं था. उनकी सांस रुक सी गयी. वह जानती थी की माणिक के दिल में क्या चल रहा है – पिछली रात की बात उन्हें याद थी, उसकी भूखी निगाहें, उसकी तड़प.

पर वह चुप रही. उन्होंने न सर हटाया, न दूर किया. बस आँखें बंद कर ली और धीरे से माणिक की पीठ पर हाथ फेरने लगी – जैसे कह रही हो की वह भी महसूस कर रही हैं, लेकिन अभी कुछ नहीं बोलेगी.

माणिक का दिल ज़ोर से धड़का. उसने तीसरा किश कंधे पर दिया, थोड़ा और गहरा. उसकी सांस तेज़ हो गयी. बुआ ने अभी भी कुछ नहीं कहा – सिर्फ उनका हाथ माणिक की पीठ पर और कास गया.

कमरे में सिर्फ उनकी साँसों की आवाज़ थी. बहार रात गहरी हो चुकी थी, और अंदर एक नयी, वर्जित आग dheere-dheere सुलग रही थी – दुःख और इच्छा का अजीब सा मिश्रण.

नीरू बुआ ने आँखें खोली, लेकिन अभी भी चुप थी. उनकी आँखों में आंसूं अभी भी थे, लेकिन साथ hi एक गहरी समझ और शायद... एक छुपी हुई प्यास भी. माणिक ने सर उठाया और उनकी आँखों में देखा. दोनों के बीच एक लम्बे, अनकहा पल था.

फिर माणिक ने धीरे से बुआ का सर अपने हाथों में लिया और उनके माथे पर एक लम्बा किश किया – जैसे बड़ा भाई छोटी बहिन को सुलाता हो. पर दोनों जानते थे की यह सिर्फ इतना hi नहीं था.

नीरू बुआ ने धीरे से उसके गाल पर हाथ फेरा और फुसफुसाया: "सो जा, बीटा... आज बहुत थक गया होगा तू."

पर उसकी आवाज़ में एक अजीब सी कम्पन थी – जैसे वह खुद को समझा रही हो की अभी रुकना है.

माणिक ने सिर्फ सर हिलाया और उठ कर दरवाज़े की तरफ बढ़ा. दरवाज़े पर रुक कर उसने पीछे मुड़कर देखा – बुआ अभी भी बिस्तर पर बैठी थी, पल्लू से आँखें पोंछ रही थी. उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी जो माणिक ने पहचान लिया.

दरवाज़ा बंद हुआ. बहार कॉरिडोर में माणिक खड़ा रहा, दिल ज़ोर से धड़क रहा था. उसने अपने होंठों को छुआ – बुआ की त्वचा का स्पर्श अभी भी वहां था.

और अंदर, नीरू बुआ बिस्तर पर लेट गयी, आँखें बंद कर के. उनका हाथ धीरे से अपने कंधे पर गया – जहां माणिक के होंठों का निशाँ अभी भी गरम था. उन्होंने आँखें बंद कर ली, लेकिन नींद नहीं आयी. उनके मैं में एक तांडव चल रहा था – दुःख का, प्यार का, और एक वर्जित इच्छा का.

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नीरू बुआ के ससुर – श्री रामेश्वर मित्तल – की मौत एकदम अचानक आयी थी. दिल का दौरा पड़ा था, और हॉस्पिटल pahunchte-pahunchte सब ख़तम हो गया. घर में माहौल भरी था – लोग rote-bilakte आये, अंतिम यात्रा निकली, और dah-sanskaar के लिए सारा परिवार गाओं के किनारे शमशान घात पहुंचा.

आनंद अंकल – माणिक के पिता – अपने 'काम' के नाम पर बहार गए हुए थे. सबको पता था की वह अनीता के साथ कहीं फार्महाउस पर हैं, फ़ोन भी स्विच ऑफ. इसलिए dah-sanskaar की पूरी ज़िम्मेदारी माणिक पर आ गयी. वह अकेला hi मुखाग्नि देता रहा, लोगों को सम्हालता रहा, और अपने छोटे से दिल में एक अजीब सा khali-pan महसूस करता रहा.

शाम dhalte-dhalte घर लौटने के बाद, सब apne-apne कमरों में सिमट गए. नीरू बुआ अपने कमरे में अकेली बैठी थी. उनका चेहरा सूज गया था रोने से, आँखें लाल, बाल बिखरे हुए. उनके ससुर उनके लिए सिर्फ ससुर hi नहीं थे – छोटी उम्र में hi विधवा हो जाने के बाद उन्होंने hi नीरू को पिता का प्यार दिया था. हर त्यौहार पर नए कपडे, हर बिमारी में दवाई और सेवा – वह उनका सहारा थे. अब वह भी चले गए.

माणिक ने दरवाज़ा खोला और धीरे से अंदर आया. कमरे में सिर्फ एक छोटी सी लाल लाइट जल रही थी. बुआ बिस्तर पर बैठी थी, गॉड में सर पकडे हुए, कंधे हिल रहे थे.

माणिक: (धीरे से) बुआ... आप... आप ठीक तो हैं न?

नीरू बुआ ने सर उठाया. उनकी आँखों से आंसूं अभी भी बह रहे थे. वह कुछ नहीं बोली, बस हाथ फैला दिया. माणिक तुरंत आगे बढ़ा और उन्हें अपनी बाहों में भर लिया. बुआ का सर उसके कंधे पर टिक गया, और वह zor-zor से रओं लगने लगी.

माणिक उनकी पीठ पर हाथ फेर रहा था, dheere-dheere, जैसे माँ बच्चे को सुलाती है.

माणिक: (आवाज़ में दर्द) बुआ... मैं हूँ न. आप अकेली नहीं हैं. पापा जी आपको बहुत प्यार करते थे... हम सब करते हैं.

नीरू बुआ ने और कास कर उसे जकड लिया. उनका गरम सांस माणिक की गर्दन पर लग रहा था. उनका शरीर अभी भी काँप रहा था, लेकिन dheere-dheere शांत होने लगा. माणिक का हाथ उनकी पीठ पर घूम रहा था, कभी कमर पर, कभी सर पर.

पर jaise-jaise बुआ की साँसें शांत हुई, माणिक को एक अजीब सी बेचैनी महसूस होने लगी. बुआ का नरम शरीर उसके साथ चिपका हुआ था. उनकी साडी का पल्लू सरक गया था, और उनका ब्लाउज उसके सीने से सात रहा था. उनकी गरम साँसें, उनकी खुशबू – वह सब माणिक के अंदर एक पुराणी आग को फिर से सुलगा रही थी.

उसने कोशिश की की अपने मैं को समझाए – यह दुःख का वक़्त है, यह गलत है. पर शरीर ने सुना नहीं. उसका दिल zor-zor से धड़कने लगा. बुआ का सर अभी भी उसके कंधे पर था, और उनकी गर्दन बिलकुल पास.

माणिक का हाथ रुक गया. उसने अपने होंठों को धीरे से बुआ के कंधे पर टिका दिया – पहले एक हल्का सा किश, जैसे सांत्वना में. फिर दूसरा. उसके होंठ बुआ की नरम त्वचा पर महसूस हुए – थोड़ा नमकीन, थोड़ा गरम.

नीरू बुआ का शरीर एक पल को सख्त हो गया. उन्हें तुरंत एहसास हो गया की यह सिर्फ bhai-bahan वाला स्पर्श नहीं था. उनकी सांस रुक सी गयी. वह जानती थी की माणिक के दिल में क्या चल रहा है – पिछली रात की बात उन्हें याद थी, उसकी भूखी निगाहें, उसकी तड़प.

पर वह चुप रही. उन्होंने न सर हटाया, न दूर किया. बस आँखें बंद कर ली और धीरे से माणिक की पीठ पर हाथ फेरने लगी – जैसे कह रही हो की वह भी महसूस कर रही हैं, लेकिन अभी कुछ नहीं बोलेगी.

माणिक का दिल ज़ोर से धड़का. उसने तीसरा किश कंधे पर दिया, थोड़ा और गहरा. उसकी सांस तेज़ हो गयी. बुआ ने अभी भी कुछ नहीं कहा – सिर्फ उनका हाथ माणिक की पीठ पर और कास गया.

कमरे में सिर्फ उनकी साँसों की आवाज़ थी. बहार रात गहरी हो चुकी थी, और अंदर एक नयी, वर्जित आग dheere-dheere सुलग रही थी – दुःख और इच्छा का अजीब सा मिश्रण.

नीरू बुआ ने आँखें खोली, लेकिन अभी भी चुप थी. उनकी आँखों में आंसूं अभी भी थे, लेकिन साथ hi एक गहरी समझ और शायद... एक छुपी हुई प्यास भी. माणिक ने सर उठाया और उनकी आँखों में देखा. दोनों के बीच एक लम्बे, अनकहा पल था.

फिर माणिक ने धीरे से बुआ का सर अपने हाथों में लिया और उनके माथे पर एक लम्बा किश किया – जैसे बड़ा भाई छोटी बहिन को सुलाता हो. पर दोनों जानते थे की यह सिर्फ इतना hi नहीं था.

नीरू बुआ ने धीरे से उसके गाल पर हाथ फेरा और फुसफुसाया: "सो जा, बीटा... आज बहुत थक गया होगा तू."

पर उसकी आवाज़ में एक अजीब सी कम्पन थी – जैसे वह खुद को समझा रही हो की अभी रुकना है.

माणिक ने सिर्फ सर हिलाया और उठ कर दरवाज़े की तरफ बढ़ा. दरवाज़े पर रुक कर उसने पीछे मुड़कर देखा – बुआ अभी भी बिस्तर पर बैठी थी, पल्लू से आँखें पोंछ रही थी. उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी जो माणिक ने पहचान लिया.

दरवाज़ा बंद हुआ. बहार कॉरिडोर में माणिक खड़ा रहा, दिल ज़ोर से धड़क रहा था. उसने अपने होंठों को छुआ – बुआ की त्वचा का स्पर्श अभी भी वहां था.



और अंदर, नीरू बुआ बिस्तर पर लेट गयी, आँखें बंद कर के. उनका हाथ धीरे से अपने कंधे पर गया – जहां माणिक के होंठों का निशाँ अभी भी गरम था. उन्होंने आँखें बंद कर ली, लेकिन नींद नहीं आयी. उनके मैं में एक तांडव चल रहा था – दुःख का, प्यार का, और एक वर्जित इच्छा का.
 
Part -29

घर में मौत के बाद के तीसरे दिन का रिवाज़ था – जिस घर में मृत्यु हुई हो, वहां औरतों को रात को सिर्फ एक साडी पहनकर सोना पड़ता था, नीचे कुछ भी नहीं. यह पुराण परंपरा था, शुद्धता और दुःख के प्रतीक के रूप में. नीरू बुआ ने भी यह रिवाज़ निभाया – उन्होंने एक सदा सफ़ेद साडी पहनी, ब्लाउज तक नहीं, और नीचे बिलकुल नग्न. उनकी उम्र 35 साल थी, शरीर अभी भी जवान और भरा हुआ – bade-bade बूब्स, पतली कमर, और मोठे हिप्स जो साडी के नीचे से भी नज़र आते थे. उनका चेहरा रोने से सूजा हुआ था, आँखें लाल, लेकिन वह अकेली कमरे में बैठी थी, दिल में एक गहरा दुःख.

दिन भर की थकान और गम ने सबको सुस्त कर दिया था. फूफा जी – नीरू के पति – अपने कमरे में बैठे थे, उनकी तबियत भी ख़राब हो गयी थी. उम्र के कारन और ससुर जी के गम ने उन्हें टूट सा दिया था. माणिक ने उन्हें देखा – फूफा जी की आँखें नुम थी, हाथ काँप रहे थे. माणिक ने धीरे से बोलै:

माणिक: फूफा जी, बुआ बहुत रो रही हैं अकेली. कमरे में जाकर सुन रहा था, उनकी सिसकियाँ रुक hi नहीं रही. मैं उनके कमरे में सोने चला जाता हूँ आज... शायद मेरी बात से उन्हें सांत्वना मिल जाए. आप भी थक गए हैं, आप सो जाइये.

फूफा जी ने थकी हुई आँखों से देखा. उन्होंने हाथ उठा कर सर हिलाया.

फूफा जी: हाँ बीटा... जा. वह बेचारी बहुत दुःख में हैं. ससुर जी उनके लिए पिता सामान थे... तू उनके पास रह, बात कर उनसे. मैं भी थक गया हूँ, सोने जाता हूँ.

माणिक ने सर हिलाया और बुआ के कमरे की तरफ बढ़ा. दरवाज़ा धीरे से खोला – अंदर अँधेरा था, सिर्फ एक छोटी सी नाईट लैंप जल रही थी जो हलकी लाल रौशनी दे रही थी. नीरू बुआ नीचे फर्श पर एक पतला बिस्तर लगा लिया था – रिवाज़ के अनुसार उन्हें ऊंचा बिस्तर नहीं छूना था. वह बिस्तर पर बैठी थी, साडी का पल्लू लपेटे हुए, लेकिन रोने से वह सरक गया था. उनका शरीर हलकी रौशनी में चमक रहा था – उनकी त्वचा फेयर थी, बूब्स के उभार साडी से बहार झाँक रहे थे.

माणिक अंदर आया, दरवाज़ा बंद किया. बुआ ने सर उठा कर देखा – उनकी आँखें आंसुओं से भरी थी.

नीरू बुआ: (धीरे से) तू... तू आ गया बीटा?

माणिक: हाँ बुआ... आप अकेली मत रहिये. मैं आपके साथ सोऊंगा आज.

नीरू बुआ ने सर हिलाया और बिस्तर पर लेट गयी. माणिक ने लाइट बंद कर दी. कमरे में पूरा अँधेरा छ गया, सिर्फ बहार से थोड़ी सी रौशनी दरवाज़े के नीचे से आ रही थी – इतनी की सिर्फ सिल्होउएटेस नज़र आते थे. माणिक ने अपने कपडे उतारे – शर्ट, पंत, सब – और सिर्फ एक टाइट अंडरवियर में बुआ के बगल में लेट गया. उसका शरीर जवान था – मस्कुलर चेस्ट, स्ट्रांग आर्म्स, और अंडरवियर में उसका लुंड हल्का उभरा हुआ.

वह धीरे से बुआ की तरफ मुद्दा और उन्हें अपनी बाहों में भर लिया – एक गहरी जफ्फी. बुआ का सर उसके सीने पर टिक गया, उनका गरम शरीर उसके सीने से सात गया. साडी का पल्लू फिसल गया, और बुआ के नंगे बूब्स माणिक के सीने पर डाब गए – वह नरम, भरे हुए, गरम.

माणिक: (फुसफुसाकर) बुआ... होनी को कौन ताल सकता है... पापा जी तो स्वर्ग में खुश होंगे. आप अकेली नहीं हैं... मैं हूँ न. हम सब हैं.

उसने उनकी पीठ पर हाथ फेरना शुरू किया – dheere-dheere, उनकी कमर तक, फिर हिप्स पर. बुआ की साँसें तेज़ थी, वह चुप थी लेकिन उनका शरीर काँप रहा था. माणिक के होंठ धीरे से उनके गाल पर लगे – एक हल्का सा किश. फिर कान के पास – वह गरम सांस छोड़ कर किश किया. फिर कंधे पर – उसने ज़ुबान से हल्का सा छाता.

बुआ की सांस रुक सी गयी. वह जानती थी यह क्या हो रहा है – पिछली रातों की यादें ताज़ा हो गयी. उस दिन 69 पोजीशन में उन्होंने ek-doosre को कितना मज़ा दिया था, लेकिन पूरा नहीं कर पाए थे. अब माणिक उसी को पूरा करने आया था.

नीरू बुआ: (आवाज़ में एक अजीब सी तेज़ी) मुझे पता है तू कौन सी सांत्वना देने आया है, कमीने माणिक...

माणिक अँधेरे में मुस्कुरा रहा था – बुआ को नज़र नहीं आ रहा था. उसने साडी का पल्लू धीरे से पूरा हटा दिया. बुआ के बड़े, भरे हुए बूब्स खुल गए – दोनों नंगे, अँधेरे में भी उनकी गर्मी महसूस हो रही थी. उनके निप्पल्स कड़क हो गए थे – गम और ठण्ड से, या शायद इच्छा से. माणिक ने एक निप्पल मुँह में लिया और चूसने लगा – पहले धीरे, जीभ से घुमा कर, फिर बेतहाशा ज़ोर से. उसने दांत से हल्का सा काटा, फिर चूसा.

माणिक: (चूसने के बीच में) जब पता है तो बोल क्यों रही हो, बुआ... आपको भी तो यह चाहिए... उस दिन जो अधूरा रह गया...

नीरू बुआ की सांस फूल गयी. उन्होंने अपना हाथ माणिक के सर पर रख दिया और उसे और अंदर दबाने लगी. उनकी छूट अब गीली होने लगी थी – साडी के नीचे से महसूस हो रहा था.

नीरू बुआ: (कराहकर) ठीक ऐसे hi चूसते थे... ससुर जी... हर रात... तभी तो उनकी इतनी याद आ रही है आज... आह... तू उनकी जगह ले रहा है बीटा...

यह सुनकर माणिक का जोश और बढ़ गया. उसने दूसरा निप्पल मुँह में लिया – अब दोनों बूब्स दबा रहा था, चूस रहा था. बुआ की सिसकियाँ निकलने लगी – "आह... हाँ... ज़ोर से...". माणिक ने अपनी अंडरवियर उतार फेंकी. उसका लुंड पूरा तना हुआ था – लम्बा, मोटा, गरम. उसने बुआ का हाथ पकड़ कर उस पर रख दिया.

बुआ ने उसे पकड़ लिया और हिलने लगी – dheere-dheere, पूरी कुशलता से. माणिक ने उनकी साडी पूरी खोल दी – अब बुआ बिलकुल नंगी थी नीचे बिस्तर पर. उनकी छूट गीली थी, बाल हलके से काटे हुए, गरम.

माणिक: (आवाज़ दबाकर) क्या यह भी चुसवाते थे आपके ससुर जी?

नीरू बुआ ने लुंड को मुँह के पास ले आया और बोलै, आँखें बंद:

नीरू बुआ: हाँ बीटा... बहुत प्यार करते थे वह मुझसे... हर रात... तू भी कर... आज उनकी याद में...

फिर उन्होंने माणिक का लुंड मुँह में ले लिया और चूसने लगी – गहरा, पूरा अंदर तक. उनकी जीभ लुंड के सुपडे पर घूम रही थी, दांत से हल्का सा काट रही थी. माणिक की सिसकियाँ निकलने लगी – "आह बुआ... कितना मज़ा...". वह बुआ की छूट पर हाथ रख कर ऊँगली दाल रहा था – एक ऊँगली, फिर दो, andar-baahar.

कुछ देर बाद दोनों 69 की पोजीशन में आ गए. माणिक बुआ के ऊपर था – उसका लुंड बुआ के मुँह में, और उसका मुँह बुआ की छूट पर. वह जीभ से चाट रहा था – क्लाइटोरिस को चूस रहा था, ऊँगली से अंदर घुसा रहा था. बुआ की छूट से पानी बह रहा था – गरम, नमकीन. बुआ उसका लुंड चूस रही थी – पूरा मुँह में ले कर, गर्दन हिलाकर.

नीरू बुआ: (लुंड निकाल कर) आह... माणिक... यह... यह ससुर जी की याद दिलाता है... वह भी ऐसे hi करते थे...

माणिक: (चाट ते हुए) तो आज पूरा करते हैं बुआ... उस दिन जो अधूरा रह गया...

दोनों की साँसें तेज़ थी, कमरा उनकी आवाज़ों से भर गया – "आह... हाँ... और...". माणिक सीधा हुआ, बुआ के ऊपर आया. उसने अपना लुंड बुआ की छूट के मुहाने पर रखा – धीरे से रगड़ा, फिर एक ज़ोर का धक्का दिया. लुंड पूरा अंदर घुस गया – बुआ की छूट टाइट थी, गरम, गीली.

नीरू बुआ: (चीख कर) आह्हः... माणिक... हाँ... धीरे...

माणिक ने धक्के शुरू किये – पहले धीरे, फिर तेज़. हर धक्के के साथ बुआ की आहें निकल रही थी: "आह... ज़ोर से... हाँ... बीटा... छोड़ मुझे...". माणिक उनके बूब्स दबा रहा था, निप्पल्स चूस रहा था, धक्के मारता जा रहा था. बुआ की टाँगे उसकी कमर पर लापति हुई थी, उनकी हिप्स उठ रही थी हर धक्के के साथ.

माणिक: (हाँफते हुए) बुआ... कितनी गरम हो तुम... ससुर जी को याद कर के और मज़ा आ रहा है...

नीरू बुआ: हाँ... वह भी ऐसे hi करते थे... आह... तू उनकी जगह ले... पूरा कर दे मुझे...

चुदाई तेज़ी से चल रही थी – बिस्तर की आवाज़, दोनों के शरीरों के टकराने की आवाज़, बुआ की आहें. "आह... उह... माणिक... और ज़ोर... हाँ... पहाड़ दे...". उनकी आवाज़ें कमरे से बहार जा रही थी – दबी हुई चीखें, सिसकियाँ.

बहार, कॉरिडोर में फूफा जी अपने कमरे के दरवाज़े पर खड़े सुन रहे थे. उन्होंने अनु और दिव्या को भी उठा दिया था – "सुनो... नीरू कितना रो रही है... बेचारी... ससुर जी के गम में...".

फूफा जी: (धीरे से) देखो... बेचारी कितना रो रही है... पापा जी के गम में... दिल पिघल जाता है सुन कर. लोग कहेंगे की बहु कितनी वफादार थी.

अनु: (आँखों में आंसूं) हाँ... बुआ को कितना दुःख हुआ है... उनकी सिसकियाँ सुन कर दिल टूट जाता है.

दिव्या चुप थी, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी समझ थी – वह जानती थी की यह सिर्फ रोना नहीं है.

अंदर, माणिक बुआ को तेज़ी से छोड़ रहा था. बुआ की छूट से पानी बह रहा था, लुंड chup-chup की आवाज़ कर रहा था. माणिक ने उन्हें पलटा – अब बुआ ऊपर थी, काउगर्ल पोजीशन में. बुआ अपनी हिप्स हिलने लगी – oopar-neeche, लुंड को पूरा अंदर ले कर. उनके बूब्स उछाल रहे थे, माणिक ने उन्हें पकड़ कर दबाये.

नीरू बुआ: आह... हाँ... ससुर जी... तू... आह... कितना बड़ा है तेरा...

माणिक: बुआ... तुम्हारी छूट कितनी टाइट है... हर धक्के में मज़ा...

दोनों पसीने से तर थे. बुआ की आहें और तेज़: "आह्हः... झाड़ रही हूँ... हाँ...". उनकी छूट सिकुड़ने लगी, माणिक का लुंड जकड लिया. माणिक ने आखरी ज़ोर के धक्के मारे और बुआ के अंदर hi झाड़ गया – गरम वीर्य की धारें उनकी छूट में भरी.

दोनों हाँफते हुए ek-doosre से लिपट गए. बुआ माणिक के सीने पर गिर गयी, उनके बूब्स उसके सीने पर डाब गए. उनके आंसूं अब भी बह रहे थे – गम के और सुख के.

नीरू बुआ: (फुसफुसाकर) तू... तू मेरे लिए पापा जी जैसा hi है अब... उनकी याद में यह... यह मज़ा...

माणिक ने उन्हें कास कर जकड लिया, उनके गाल पर किश किया. बहार लोग सोच रहे थे की बुआ रो रही है गम में – "बेचारी... कितना रो रही है... फूफा जी के गम में" – लेकिन अंदर एक वर्जित मिलान पूरा हो चूका था, दुःख और इच्छा का पूरा संगम.



रात गहरी थी... और यह राज़ दोनों के बीच hi रह गया. बुआ की साँसें शांत हुई, लेकिन उनका हाथ माणिक के लुंड पर अभी भी था – धीरे से हिलाते हुए. माणिक मुस्कुरा रहा था – यह सिर्फ शुरुआत थी.
 
Part -30



वह उनके साथ बिताये गए एक हफ्ते का आखिरी दिन था.

सुबह से hi दोनों के दिल में एक अजीब सी बेचैनी थी. कुछ hi घंटे बाद उन्हें अलग होना था, और यह एहसास उनके बीच की हर अंतरंगता को एक खतरनाक, बेकाबू तीव्रता दे रहा था. Jaise-jaise वक़्त क़रीब आ रहा था, उनकी इच्छा और जूनून दोनों बढ़ते जा रहे थे. उनका आखिरी सेशन शुरू होने वाला था, लेकिन दोनों जानते थे की यह सिर्फ एक सेशन नहीं, बल्कि एक यादगार विदाई थी.

कमरे में सिर्फ एक हलकी सी लाल रौशनी जल रही थी, जैसे कोई मदहोश शाम अंदर घुस आयी हो. हवा में पसीने, परफ्यूम और तीव्र वासना की घनी महक थी. पर्दा थोड़ा सा खुला था, बहार से ठंडी हवा आ रही थी जो उनके गरम शरीरों को छू कर और गरम कर रही थी.

आनंद आज बिलकुल अलग था. उसने अपनी साड़ी ऊर्जा, सारा गुस्सा, साड़ी मोहब्बत एक साथ निकलने का फैसला कर लिया था. वह जानता था की आज के बाद शायद hi इतनी लम्बी तन्हाई मिलेगी दोनों को. इसलिए वह daan-daan, zor-zor से, बिलकुल जानवर की तरह सहवास कर रहा था. हर धक्का एक वादा था – “मैं तुम्हे इतना कुछ देकर जाऊंगा की तुम मुझे हर रात याद करोगी.”

इस आखिरी सेशन के लिए आनंद ने अनीता को बिस्तर पर डोगग्य स्टाइल में आने को कहा.

अनीता बिना एक भी शब्द कहे, बिना एक पल की हिचक के, घुटनो के बल बैठ गयी. उसने अपनी कमर को ऊंचा किया, अपने बूब्स को बिस्तर पर टिका दिया और अपने हाथों से चादर को इतनी ज़ोर से पकड़ा जैसे जान निकल जायेगी अगर छोड़ा तो. उसके बाल पीछे की तरफ लटक रहे थे, उसकी गर्दन पर पसीने की बूँदें चमक रही थी.

आनंद ने पीछे से उसकी कमर को दोनों हाथों से पकड़ा. उसके हाथ इतने गरम थे की अनीता के शरीर में एक करंट दौड़ गया. उसने अपना लुंड धीरे से उसकी गीली छूट पर रगड़ा – सिर्फ एक बार, दो बार – और फिर एक hi ज़ोर के झटके में अंदर तक घुसेड़ दिया.

“आह्ह्ह्हह्ह्ह्हह…!”

अनीता के मुँह से एक लम्बी, गहरी, dard-bhari लेकिन सुख से भरी चीख निकली. यह दर्द का नहीं था, यह वह सुख था जो हद्द से गुज़र जाए तो दर्द बन जाता है.

आनंद ने एक पल भी रुक कर सांस नहीं लिया. उसने तुरंत अपनी कमर aage-peeche करना शुरू कर दिया – तेज़, बहुत तेज़. हर धक्का इतना ज़ोर का था की अनीता का पूरा शरीर आगे को सार्क जाता था, उसके बूब्स बिस्तर पर रगड़ खा रहे थे. पूरा बिस्तर khat-khat, khat-khat कर रहा था, जैसे टूटने वाला हो.

आनंद: (डेंटन में दबी हुई आवाज़, सांस फूली हुई)

आज… आखिरी बार… पूरी तरह से… याद रखना मुझे… हर रात… हर सपने में… मेरी जान… मेरी रानी…

अनीता की सांसें अब तेज़ी से upar-neeche हो रही थी. उसके मुँह से सिर्फ सिसकारियां निकल रही थी – “उफ्फ्फ… ाःह… आनंद… और तेज़… और ज़ोर से… हाँ… हाँ वही… वही अंदर तक… मर डालो मुझे आज…!”

आनंद ने उसकी कमर को और ज़ोर से जकड लिया. उसके नागिन (नेल्स) अनीता की कमर पर गड्ड रहे थे, लाल निशाँ बना रहे थे. वह अब बिलकुल पागल हो चूका था. उसके धक्के अब इतने वाइल्ड थे की अनीता का शरीर हर बार आगे को उड़द जाता, फिर वापस आ कर उसका लुंड पूरा अंदर ले लेता. हर धक्के के साथ एक chap-chap, chik-chik की आवाज़ आ रही थी – उन दोनों के शरीरों के मिले हुए हिस्सों की.

आनंद ने एक हाथ से अनीता के बाल पकडे और पीछे की तरफ खींचा. उसका सर ऊपर उठ गया, गर्दन बिलकुल सीढ़ी. उसने दुसरे हाथ से उसकी क्लीट को रगड़ने लगा – tez-tez, बिना रुके.

अनीता: (रोटी हुई आवाज़ में, लेकिन सुख से)

बस… अब… नहीं… सहा… जा… रहा… आनंद… मैं… जा… रही… हूँ…!

आनंद: (दीवानो की तरह)

हाँ जा… मेरी जान… साथ में जाएंगे… दोनों साथ… आअह्ह्ह… फ़क… कितनी टाइट हो गयी हो… अनीता… ले… ले पूरा…!

और फिर वह पल आ गया.

आनंद ने अपने धक्के और तेज़ कर दिए – जैसे कोई मशीन गन चल रहा हो. उसने एक लम्बी, जनवरी दहाड़ भरी – “ाअररघहहह… अनिताआए…!!!” और अपना सारा गरम, गहरा, तड़पता हुआ माल उसके अंदर उगल दिया. एक, दो, तीन, चार – हर झटके के साथ और निकल रहा था, जैसे कभी ख़तम न हो.

उसी पल अनीता का शरीर पूरा अकड़ गया. उसके पेअर कम्पनी लगे, उसकी छूट ने आनंद के लुंड को इतनी ज़ोर से जकड लिया की वह भी रुक गया. फिर एक ज़ोर की चीख – “आनंददददद… मैं… मर… गयीईइ… आआह्ह्ह्हह्ह…!!!” और उसका शरीर बिलकुल ढीला पद गया. उसके अंदर एक गर्मी की लहार दौड़ गयी, उसका अपना रास बहार निकल आया, आनंद के लुंड को और गीला करते हुए.

आनंद थकान से चूर, पूरा पसीने में तर, अनीता के ऊपर hi गिर पड़ा. दोनों के शरीर एक दुसरे से चिपके हुए थे, सांसें तेज़ी से चल रही थी. उनका दिल एक hi ले में धड़क रहा था – एक हफ्ते की साड़ी वासना, सारा प्रेम, साड़ी तड़प की आखिरी प्रचंड गूँज.

कुछ देर तक दोनों वैसे hi पड़े रहे. न कोई बोलै, न किसी ने हरकत की. सिर्फ सांसें और दिल की धड़कन.

फिर धीरे से आनंद ने खुद को अलग किया. दोनों ने करवट बदली और एक दुसरे की बाहों में सिमट गए. अनीता का सर आनंद के सीने पर था, उसके आंसू उसकी छाती पर गिर रहे थे.

अनीता: (रोटी हुई, डबडबायी आवाज़)

आनंद… अब क्या होगा? यह हफ्ता… इतनी जल्दी ख़तम हो गया. मैं सच कह रही हूँ… ऐसा ज़ोर दार, ऐसा वाइल्ड सेक्स… अब कभी नहीं मिलेगा. तुम्हारी यह एनर्जी… यह स्टैमिना… यह पागलपन… कहाँ मिलेगा मुझे दोबारा?

आनंद ने उसके बालों में हाथ फेरा, उसके माथे को किश किया.

आनंद: (गहरी, प्यार भरी आवाज़)

शठ… मेरी जान… रोना बंद करो. तुम भूल गयी क्या? यह सब तोह शुरुआत है, अंत नहीं. तुम्हारे पति विनोद खुद चाहते हैं की हम दोनों मिलकर तुम्हे माँ बनाएं. यह कोई छुपा छुपी बात नहीं, यह एक प्यारा सा समझौता है हम तीनो का.

उसने अनीता के पेट पर हाथ रखकर धीरे से सहलाया.

आनंद: (मुस्कुराते हुए)

और देखना… अभी तोह मैंने तुम्हारे अंदर इतना कुछ छोड़ा है… अगली बार प्रेगनेंसी टेस्ट पॉजिटिव आएगा, मैं दावा करता हूँ. और जब तक बेबी नहीं हो जाता, जब तक तुम खुद नहीं कहोगी “बस हो गया”, तब तक हम मिलते रहेंगे. हर महीने, हर हफ्ते… जितनी बार तुम चाहोगी. यह सफर अभी ख़तम नहीं हुआ, मेरी रानी.

यह सुनते hi अनीता के चेहरे पर एक बड़ी सी रहत भरी मुस्कान आ गयी. उसने आनंद को और ज़ोर से गले लगाया.

अनीता: (शर्माते हुए)

तोह फिर… अभी भी थोड़ी देर है न? फ्लाइट में अभी तीन घंटे हैं…

आनंद ने बुरी सी स्माइल दी, उसने अनीता को सीधा लिटाया और उसके ऊपर चढ़ गया.

आनंद: अभी तोह सिर्फ राउंड एक ख़तम हुआ है, बेबी. राउंड दो और तीन भी बाकि हैं. आज तुम्हे चलना भी मुश्किल होने वाला है… याद रखना.

और फिर कमरे में दोबारा वही सिसकारियां, वही चीखें, वही chap-chap की आवाज़ें गूंजने लगी. दोनों जानते थे की अब घर जाना है, लेकिन इससे पहले वह एक दुसरे के शरीर को इतना यादगार बना देंगे की हर रात सपने में भी वह एहसास रहेगा.

जब आखिर में दोनों ख़तम होकर उठी, तोह अनीता के पेअर सच में कम्प रहे थे. आनंद ने उसे गोदी में उठाया, बाथरूम तक ले गया, साथ में नहलाया, प्यार से कपडे पहनाये. दोनों है रहे थे, एक दुसरे को छेड़ रहे थे.

पैकिंग करते वक़्त भी दोनों के हाथ रुक रुक कर एक दुसरे को छू रहे थे. एक छोटी सी किश, एक निप्पल पिंच, एक थप्पड़ गांड पर – जैसे अभी भी पूरा नहीं हुआ हो.

विला के स्टाफ को टिप दिया, गाडी में बैठते वक़्त अनीता ने आनंद के होंठों को एक लम्बी, गहरी किश दी.

अनीता: जल्दी पॉजिटिव आएगा टेस्ट… फिर मिलेंगे… और वाइल्ड… और ज़ोर से…

आनंद: प्रॉमिस, मेरी जान.

दोनों अपनी अपनी गाड़ियों में घर की तरफ निकल गए.

दोनों के चेहरे पर एक अलग सी चमक थी, एक तृप्ति थी, एक उम्मीद थी.

आनंद को अपनी ज़िन्दगी का सबसे वाइल्ड, सबसे सटिस्फीइंग हफ्ता मिला था.

अनीता को माँ बनने की सबसे मज़बूत उम्मीद, जो अब उसके अंदर dhire-dhire पल रही थी.

यह हफ्ता सिर्फ एक हफ्ता नहीं था.

यह एक नयी शुरुआत थी.


एक ऐसी आग जो कभी ठंडी नहीं होने वाली थी.
 
धन्यवाद सभी दोस्तों कों 🙏🙏🙏🙏
 
Part -31



शाम 5 बजे का समय, और माणिक उस कैफ़े में पहुँच गया जहां आस्था ने बुलाया था. कैफ़े का माहौल शांत और कलात्मक था. माणिक आज पूरी तरह से जेंटलमैन बन कर आया था. उसने एक साफ़, इस्त्री किया हुआ शर्ट और ट्रॉउज़र पहना था, और उसके बाल करने से सँवारे हुए थे. वह अपनी बहिन पारी की मदद से आत्मविश्वास बटोर कर आया था और बहुत खूबसूरत लग रहा था.

जब माणिक ने आस्था को देखा, तोह वह पल भर के लिए सांस लेना भूल गया.

आस्था एक कोने की टेबल पर बैठी थी. उसने गहरे नीले रंग का एक one-piece पहना हुआ था, जो उसकी ख़ूबसूरती को और बढ़ा रहा था. उसके बाल खुले थे, और चेहरे पर एक हलकी, प्यारी मुस्कान थी. वह सचमुच परियों जैसी लग रही थी.

माणिक को अपनी बहिन पारी की सख्त हिदायत याद आयी: "उसके अंगों को नहीं घूरना! आँखों में देखना!" उसने तुरंत अपनी भावनाओं को नियंत्रित किया और एक सीढ़ी मुस्कान के साथ उसकी तरफ बढ़ा.

माणिक: (मुस्कुराते हुए) Hi आस्था. तुम आ गयी? मैं माणिक.

आस्था: (उठकर, गर्मजोशी से) Hi माणिक! हाँ, मैं आ गयी. तुम बिलकुल वैसे hi दिख रहे हो, जैसा मैंने कल्पना की थी. और तुम समय पर हो!

दोनों बैठ गए. माणिक ने जानबूझकर टेबल पर थोड़ा ज़्यादा दूरी बनाये राखी, ताकि 'लिमिट' का उल्लंघन न हो.

माणिक: (आँखों में देखते हुए) मुझे लगा, एक वैज्ञानिक को तोह समय का पाबन्द होना hi चाहिए, है न? पर सच कहूँ, मुझे यहां आने की बहुत जल्दी थी.

आस्था: (हँसते हुए) अच्छा! यह सुन कर अच्छा लगा. मुझे लगा था की तुम बैलेंस शीट्स के बारे में बात करोगे!

दोनों ने कॉफ़ी आर्डर की, और फिर उनकी बातचीत शुरू हुई. उनकी ऑनलाइन बातचीत की सहजता व्यक्तिगत रूप से भी कायम रही.

आस्था: तो माणिक, मुझे बताओ... सच में एक का की दुनिया कैसी होती है? क्या सब कुछ लॉजिकल होता है, या kabhi-kabhi तुम भी हवा में तीर मारते हो?

माणिक: (आराम से) सब लॉजिकल, पर kabhi-kabhi 'हवा में तीर' भी मारना पड़ता है. जब अफसर लोगों को डील करना पड़ता है. पर अभी तो मेरी पढाई चल रही है. तुम्हारा पसंदीदा डिज़ाइन क्या है?

आस्था: मुझे लगता है, सादगी. जो चीज़ें जटिल नहीं होती, वे ज़्यादा सुन्दर होती हैं. जैसे... (वह माणिक की तरफ देखती है) ...तुम्हारी ईमानदारी. तुम्हारी प्रोफाइल बिलकुल वैसी hi थी, जैसी तुम असल में हो. यह अच्छा लगा.

माणिक के चेहरे पर मुस्कान आ गयी. वह जानता था की वह अपनी बहिन की वजह से 'ईमानदार' दिख रहा था.

माणिक: धन्यवाद. तुम्हारी प्रोफाइल भी बहुत आकर्षक थी. और हाँ, तुमने जो 'लिमिट' वाली बात कही थी, मुझे उस पर कोई आपत्ति नहीं है. मैं चाहता हूँ की हम dheere-dheere ek-doosre को जानें.

आस्था ने मुस्कुराकर सर हिलाया. उसने देखा की माणिक पूरी बातचीत में उसकी आँखों में देख रहा था और उसके शरीर पर बिलकुल भी ध्यान नहीं दे रहा था. यह बात उसे बहुत अच्छी लगी.

उनकी बातचीत जल्द hi उनके व्यक्तिगत जीवन, परिवार और भविष्य की योजनाओं पर चली गयी. माणिक को यह एहसास hi नहीं हुआ की वह कितनी सहजता से बात कर रहा है. वह अपनी पढाई के दबाव, पारी के साथ अपने अजीब रिश्ते और अपनी पिछली निराशाओं को लगभग भूल चूका था. आस्था की उपस्थिति, और एक नए रिश्ते की उम्मीद, उसे एक नयी शान्ति दे रही थी.

करीब एक घंटे बाद, जब कॉफ़ी ख़तम हो गयी, तोह माणिक उठा.

माणिक: आस्था, मुझे तुमसे मिल कर बहुत अच्छा लगा. यह मेरे लिए एक... अविश्वसनीय अनुभव था.

आस्था: (खुश होकर) मेरे लिए भी, माणिक. मुझे बिलकुल मज़ाक नहीं लग रहा था जब तुमने कहा की तुम सिर्फ एक का नहीं हो. तुम बहुत अच्छे हो.

माणिक ने 'लिमिट' का पूरा सम्मान किया और उसने हाथ मिलाने या छूने की कोई कोशिश नहीं की. दोनों ने ek-doosre को विदा कहा, और माणिक कैफ़े से बहार निकला. उसके कदम ज़मीन पर नहीं पद रहे थे. वह जानता था की यह मुलाक़ात उम्मीद से कहीं ज़्यादा अच्छी रही थी.

*****************************************

अगले दिन शाम को, माणिक अपने कमरे में अपनी पढाई पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसका दिमाग baar-baar पिछली शाम की मुलाक़ात पर जा रहा था. तभी पारी, अपनी किताबें लेकर, उसके पास आयी और उसके बीएड पर बैठ गयी. आज वह पढ़ने के मूड में काम, और बातें करने के मूड में ज़्यादा लग रही थी.

पारी: (उत्सुकता पूर्वक, किताब बंद करते हुए) तो मिस्टर का! अब पढाई छोड़ कर मुझे अपनी डाटा रिपोर्ट दो. कल की मुलाक़ात कैसी रही?

माणिक ने मुस्कुराते हुए अपनी किताब एक तरफ रख दी. अब वह पारी से किसी भी बात पर खुल कर बात करने में सहज महसूस करने लगा था.

माणिक: अच्छी रही, पारी. बहुत अच्छी रही. तुम जानती हो, आस्था सच में बहुत अच्छी है. वह बहुत समझदार और शांत है.

पारी: (ज़ोर देकर) और 'लिमिट' का क्या हुआ? तुमने कुछ गड़बड़ तोह नहीं की?

माणिक: (गर्व से) बिलकुल नहीं! मैंने तुम्हारी दी हुई हर हिदायत का पूरा ध्यान रखा. मैंने उससे बिलकुल जेंटलमैन की तरह बात की.

माणिक, फिर थोड़ा शरारती होते हुए, और अपनी बात को ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए, पारी के बूब्स की और इशारा करके, झुक कर धीमी आवाज़ में बोलै:

माणिक: और तुम्हारी सबसे ज़रूरी हिदायत... की मैंने इन्हें (इन्हें मतलब पारी के बूब्स की और इशारा करते हुए) नहीं देखा. पूरी मीटिंग में मेरी नज़रें सिर्फ आस्था की आँखों में थी!

माणिक की इस बात पर पारी ज़ोर से हंस पड़ी. उसे अपने भाई की यह शरारत भरी टिपण्णी बिलकुल बुरी नहीं लगी, क्यूंकि अब वे दोनों एक दोस्ती भरे, खुले रिश्ते में आ चुके थे.

पारी: (हँसते हुए, प्यार से माणिक के कंधे पर मारते हुए) आप बड़े खराब हो, भाई! अपनी बहिन के hi बूब्स की बात कर रहे हो? तुम्हे शर्म आणि चाहिए!

माणिक: (हँसते हुए) क्या करून? मुझे यही पता है की 'नज़दीकी' से दूर कैसे रहना है!

पारी: (आँखों में शैतानी भरते हुए) अच्छा! अब बस... मेरी तरफ से माफ़ी. अब तुम्हारी ज़िम्मेदारी है की तुम अपनी आस्था के बूब्स देखो! और हाँ, अगली बार जब मिलो, तोह तुम्हे उन्हें छूने की हिम्मत भी दिखानी होगी! दोस्ती में इतनी नज़दीकी तोह बनती है!

माणिक और पारी, दोनों अब दोस्तों की तरह खिलखिला रहे थे. माणिक को यह सुन कर अजीब नहीं लगा, बल्कि उसे हंसी आ गयी. अब उनका रिश्ता उस डर और शर्म से बहुत आगे निकल चूका था, जो कल माणिक की एक गलती ने पैदा किया था.

माणिक: (मज़ाक करते हुए) ओहो! 'गुरु माँ'! अब मुझे अगली बार के लिए भी टिप्स देंगी आप?

पारी: (ख़ुशी से) बिलकुल! अगली बार तुम्हे कॉफ़ी नहीं, डिनर पर ले जाना है! और वहाँ... तुम थोड़ी 'फिजिक्स' उसे करना. जैसे, हाथ पकड़ते समय 'घर्षण' कैसे काम करता है, या फिर... (वह शरारती आँख मारते हुए) ...'टेंशन' को कैसे रिलीज़ किया जाता है.



दोनों बहुत आगे तक का मज़ाक कर रहे थे, और यह सब माणिक की मानसिक शान्ति के लिए बहुत अच्छा था. अब वह जानता था की उसकी अपनी बहिन hi उसकी सबसे बड़ी दोस्त और मार्गदर्शक बन गयी है, और इसी दोस्ती ने उसे एक स्वस्थ रास्ते पर ला खड़ा किया था. अब उसे न तोह निराशा थी, न आत्मग्लानि, बस नयी उम्मीद और हंसी थी.
 
Part -32



माणिक और पारी अभी भी बिस्तर पर बैठे थे, पिछली बातचीत के मज़ाक में डूबे हुए थे. पारी का हाथ अभी भी माणिक के कंधे पर था, और दोनों की हंसी की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी.

ठीक इसी समय, अनु दीदी कमरे में आयी. उनके हाथ में दो कप थे, वह दोनों के लिए चाय लायी थी. अनु दीदी ने दरवाज़े से hi दोनों को इस तरह हँसते हुए देखा.

अनु दीदी: (प्यार से हँसते हुए) अरे वाह! आज तो बड़ी रौनक है! क्या बातें हो रही हैं bhai-behen में जो इस तरह से हंस रहे हो? आज तो लग रहा है की कोई बहुत बड़ा सीक्रेट चल रहा है!

चाय के कप लिए अनु दीदी उनके पास आयी और दोनों को चाय दी.

माणिक और पारी, एक पल के लिए, स्तब्ध रह गए. उनकी बातें इतनी व्यक्तिगत थी, इतनी खुली थी की वे दुनिया में किसी के सामने, यहाँ तक की अपनी प्यारी अनु दीदी के सामने भी, उन्हें दोहरा नहीं सकते थे. 'आस्था के बूब्स' और 'सेक्सुअल टेंशन' जैसे शब्द उनके दिमाग में गूँज रहे थे.

दोनों को समझ नहीं आया की क्या जवाब दें. दोनों के चेहरे पर अचानक हंसी की जगह घबराहट आ गयी.

पारी: (चाय का कप पकड़ते हुए, बात को ताल ने की कोशिश में) K-kuch नहीं दीदी! बस... ऐसे hi!

माणिक: (झट से) हाँ, हाँ! वह... वह मुझसे मेरी पढाई के बारे में पूछ रही थी! की मैं कैसे इतना फोकस कर लेता हूँ!

अनु दीदी ने उनकी तरफ एक संदेह भरी नज़र से देखा.

अनु दीदी: (मुस्कुराते हुए) 'फोकस' पर इतनी ज़ोरदार हंसी? ऐसा कौन सा मंत्र बता दिया माणिक जो मेरी समझ से बाहर है? तुम दोनों कुछ छुपा रहे हो.

पारी: (तुरंत बचाव करते हुए) अरे नहीं, दीदी! सच में! वह मुझे बता रहा था की कॉलेज में एक प्रोफेसर ने एक बार मज़ाक किया था, तो मैं उसी को याद करके हंस रही थी! यह अंदर की बात है, दीदी!

अनु दीदी, जो अपनी व्यस्तता के कारण ज़्यादा देर रुकना नहीं चाहती थी, ने उनके चेहरे पर आयी अचानक घबराहट को भांप लिया, लेकिन उन्होंने ज़ोर नहीं दिया. वह जानती थी की bhai-behen के बीच कुछ निजी चीज़ें होती हैं.

अनु दीदी: (प्यार से उनके बाल सहलाते हुए) ठीक है बाबा, ठीक है! मुझे सीक्रेट नहीं जानना. बस हँसते रहो. यह देखकर अच्छा लगा की तुम दोनों इतने अच्छे दोस्त बन गए हो. अब तुम दोनों मेरी चाय पियो, और हाँ, माणिक, पढ़ने बैठ जाओ अब.

अनु दीदी कमरे से बाहर चली गयीं. उनके जाते hi, दोनों ने राहत की एक लम्बी सांस ली.

पारी: (माणिक को कुहनी मारते हुए) उफ़! Baal-baal बचे! अगर दीदी को पता चल जाता की हम किसके 'वक्षस्थल' की बात कर रहे थे, तो वह क्या सोचती!

माणिक: (हँसते हुए) हाँ! वह हमें सीधा काउंसलिंग के लिए भेज देती! चलो, जल्दी से चाय पीते हैं और अब हम अपने नए 'मिशन: आस्था' पर फोकस करते हैं.

अब उन्हें अपनी दोस्ती पर और भी ज़्यादा गर्व महसूस हो रहा था, क्यूंकि उन्होंने एक 'वर्जित' सीक्रेट को मिलकर हंसी में बदल दिया था.

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आनंद और अनीता का एक सप्ताह का प्रवास (स्टे) पूरा करके आनंद अगले दिन अपनी दोस्त सविता से मिला. वे दोनों एक निजी अपार्टमेंट में बैठे थे. सविता बहुत बेचैन थी, क्यूंकि उसे पता था की आनंद abhi-abhi एक शानदार yaun-satra से लौटा है.

सविता: (उत्सुकता से आनंद के पास झुकते हुए) तो आनंद! बताओ! कैसा रहा? मैंने तुम्हारा फ़ोन भी नहीं किया, ताकि तुम डिस्टर्ब न हो. जल्दी बताओ, इस एक हफ्ते में kya-kya हुआ?

आनंद मुस्कुराया. वह अपनी सफलता की कहानी सुनाने के लिए तैयार था.

आनंद: (आराम से) क्या बताऊँ, सविता? वह एक तूफ़ान था! अनीता कमाल की है. आखिरी दिन तो...

आनंद ने विस्तार से बताना शुरू किया की कैसे उन्होंने आखिरी दिन 'डोगग्य स्टाइल' में ज़ोरदार सेक्स किया, और कैसे अनीता भावनात्मक रूप से टूट गयी थी, लेकिन विनोद की सहमति के आश्वासन से शांत हो गयी. वह हर बात को उत्तेजक अंदाज़ में, आँखों में चमक लिए बता रहा था.

Jaise-jaise आनंद कहानी बता रहा था, उसके चेहरे के भाव, उसकी आवाज़ की गर्माहट और पूरी यात्रा की अंतरंगता को याद करने से, उसके शरीर में प्रतिक्रिया होने लगी. बातचीत के बीच hi, आनंद को महसूस हुआ की उसका लुंड तन गया है और उसकी पेंट में तनाव बढ़ रहा है.

सविता, जो पूरी तरह से कहानी में डूबी हुई थी, वह भी उत्तेजित महसूस कर रही थी, लेकिन उसकी आँखें आनंद की बातों से हटकर उसके उभरे हुए लुंड पर hi तिकी थी. उसे साफ़ दिखाई दे रहा था की आनंद की पेंट पर तनाव बन रहा है.

आनंद ने कहानी के बीच एक chhota-sa विराम लिया. उसने अपनी आँखें सविता की आँखों में डाली और फिर इशारे से अपने लुंड की और इशारा किया, सविता को उसे सहलाने को बोलै.

सविता ने बिना एक पल की देरी किये, अपनी कुर्सी आनंद के पास खींच ली. उसने आनंद की बातों को नज़रअंदाज़ करते हुए, धीरे से उसकी पेंट की ज़िप खोली. उसने आनंद के कपडे को हटाया और उसके उत्तेजित लुंड को बाहर निकला.

आनंद ने बात करना जारी रखा, जबकि सविता ने तुरंत अपने हाथ में आनंद के लुंड को थाम लिया और उसे upar-neeche करने लगी (हिलाने लगी).

आनंद: (आनंद की आवाज़ थोड़ी डगमगा गयी, पर उसने बोलना जारी रखा) और फिर हम बस वही पड़े रहे... उसने कहा की उसे इतना ज़ोरदार सेक्स अब नहीं मिलेगा...

आनंद बोलता रहा, लेकिन उसके चेहरे पर संतुष्टि और उत्तेजना का मिश्रण था क्यूंकि सविता के हाथों का स्पर्श उसे बेहद सुख दे रहा था.

इधर, सविता का ध्यान पूरी तरह से आनंद की बात और उसके हाथ के काम पर था. आनंद और अनीता के इतने ज़ोरदार और खुले सेक्स की बातें सुन कर, सविता अंदर से पूरी तरह गरम हो गयी थी. अनीता के उन्माद की कल्पना करके, सविता की छूट में तीव्र उत्तेजना होने लगी थी, और उसका शरीर भी यौन सम्बन्ध बनाने के लिए मचल रहा था.

लेकिन सविता ने यह बात आनंद को बताई नहीं. वह जानती थी की आनंद अभी भी अनीता की यादों में डूबा है और अपनी संतुष्टि के लिए hi आया है. वह बस शांत चेहरे से आनंद का काम कर रही थी, लेकिन अंदर hi अंदर वह खुद भी तीव्र कामेच्छा से जल रही थी, अगली बारी में खुद को अनीता की जगह पर रख कर कल्पना कर रही थी.



आनंद कहानी ख़तम करने के करीब था, और सविता की गति तेज़ होती जा रही थी. दोनों एक अजीब से 'टेंशन' और 'डिस्चार्ज' के बीच थे, जहाँ एक की ज़रुरत पूरी हो रही थी और दूसरी की चाहत दबी हुई थी.
 
ठक्स ा लोट फ्रेंड्स
 
Part -33



मल्लिका आज अनु दीदी के घर आयी हुई थी. दोपहर का समय था और teeno—Anu, मल्लिका और Manik—hall में बैठे बातें कर रहे थे. माणिक सोफे पर बैठा अपनी किताब पलटने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसकी आँखें baar-baar मल्लिका पर जा रही थी. मल्लिका ने आज एक कासुअल टॉप पहना था, और माणिक की नज़रें, जो अब पारी की सलाह के बाद भी पूरी तरह नियंत्रण में नहीं थी, अक्सर मल्लिका के वक्षस्थल (बूब्स) पर जाकर टिक जाती थी.

मल्लिका ने माणिक की एकटक निगाहों को तुरंत भांप लिया. उसे इस बात से कोई आपत्ति नहीं थी, बल्कि उसे यह सब मज़ेदार लगता था.

मल्लिका ने धीरे से झुक कर अनु दीदी के कान में फुसफुसाया.

मल्लिका: (धीमी, शरारती आवाज़ में) दीदी! तुम्हे पता है? माणिक भाई अब बड़ा हो गया है! वह मुझे कैसे घूर रहा है, देखा तुमने?

अनु दीदी, जो कुछ और सोच रही थी, उन्होंने माणिक की तरफ देखा, जो तुरंत अपनी आँखें किताब पर टिका लेता था. अनु दीदी को हंसी आ गयी.

मल्लिका: (आगे) मुझे लगता है, इसे अब सेक्स चाहिए! यह सब उसी की निशानी है! तुम इसकी मदद क्यों नहीं करती?

अनु दीदी ने मल्लिका को हलके से मारा.

अनु दीदी: (दबी हुई हंसी के साथ) तुम्हे तो सब अपने जैसे hi चाहिए! हर किसी को अपने जैसे मत समझो! वह पढ़ने वाला बच्चा है, तुम उसे गन्दा मत करो!

मल्लिका: (ज़ोर से हँसते हुए) क्या दीदी! गन्दा क्या? यह दुनिया में सब लोग मेरे जैसे hi हैं, क्यूंकि सभी सेक्स करते हैं! या तुम यह कह रही हो की तुमने कभी नहीं किया?

अनु दीदी: (शरमाते हुए, पर मुस्कुराकर) चुप! और तुम्हारी क्या गारंटी है? तुम नहीं करोगी कभी सेक्स?

मल्लिका: (थोड़ी ऊपर उठाते हुए) मैं क्यों नहीं करुँगी? मैं तो करती हूँ और खुल कर करती हूँ! अब तुम बताओ, क्या तुम... क्या तुम कभी नहीं करोगी सेक्स?

अनु दीदी: (मुस्कुराते हुए, अपनी मर्यादा बनाये रखते हुए) क्यों नहीं करुँगी? जब सही समय आएगा तो ज़रूर करुँगी, और हाँ, मैं सिर्फ अपने पति के साथ hi करुँगी!

मल्लिका ने एक आँख मारते हुए कहा:

मल्लिका: (शैतानी भरी हंसी के साथ) देखते हैं! ज़्यादा 'pati-pati' मत करना! पता चला तुम मुझसे पहले hi...

मल्लिका ज़ोर से हंसने लगी, और उसकी हंसी से माहौल और हल्का हो गया. अनु दीदी को भी अपनी सहेली की यह बेबाक बातें मज़ेदार लगी.

अनु दीदी: (हँसते हुए, थोड़ा चिंतित होकर) देखना! मेरे भाई को ख़राब मत कर देना! वह अभी seedha-saadha है.

मल्लिका: (हंसी रोक कर, रहस्यमयी अंदाज़ में) मेरा तजुर्बा कह रहा है, अनु... माणिक भाई ख़राब हो चूका है! अब वह वापस नहीं आएगा!

यह सुन कर अनु दीदी 'न' में गर्दन हिलाकर मुस्कुरायी.

अनु दीदी: (प्यार और मज़ाक से) तुम दोनों का कुछ नहीं हो सकता. तुम हमेशा ऐसी hi रहोगी और तुम मेरे भाई को भी बिगाड़ कर hi मानोगी!

उनकी यह बातचीत, जो अब khule-aam मज़ाक और हंसी में बदल गयी थी, उनके बीच के गहरे और मज़बूत रिश्ते को दर्शा रही थी. माणिक ने भले hi ऊपरी तौर पर किताब में ध्यान केंद्रित करने की कोशिश की, पर उसने सारा मज़ाक सुन लिया था, और वह अंदर hi अंदर शर्मा रहा था, पर मुस्कुरा भी रहा था.

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माणिक और पारी, हमेशा की तरह, माणिक के कमरे में उसके बीएड पर बैठे थे. दोनों का ध्यान पूरी तरह से माणिक के फ़ोन पर था, जहाँ वह आस्था से चाट कर रहा था. पारी, माणिक के बहुत करीब बैठी थी, और माणिक का हाथ उसके कंधे पर था, जैसा की अब उनकी आदत बन चुकी थी.

माणिक, अब आस्था को वीकेंड पर पास के हिल स्टेशन पर जाने के लिए ज़िद कर रहा था. वह जानता था की यह उनके रिश्ते को आगे बढ़ने का सबसे अच्छा तरीका होगा.

माणिक: (टाइप करते हुए) "आस्था, प्लीज मान जाओ. सिर्फ दो दिन के लिए. हम वही पास में hi रुकेंगे, बहुत मज़ा आएगा. और वहां की रातें तो स्टरगाजिंग के लिए कमाल की होंगी!"

आस्था का जवाब:

"माणिक, मैं जानती हूँ, पर मेरे पेरेंट्स बिलकुल नहीं मानेंगे. वे मुझे दोस्तों के साथ भी इतनी दूर अकेले नहीं जाने देते. मुझे कोई बहाना समझ नहीं आ रहा."

माणिक ने निराश होकर फ़ोन पारी को पकड़ाया.

माणिक: देखा! मैंने कहा था न! अब क्या करें?

पारी ने फ़ोन लिया. उसकी आँखें चमक उठी. उसने तुरंत एक चालाकी भरी सलाह दी, जो उसके दिमाग में आयी.

पारी (माणिक बन कर): (तेज़ से टाइप करते हुए) "तुम्हारे पेरेंट्स को हम ग्रुप स्टडी का बहाना देंगे! कहो की हमें एक बहुत ज़रूरी प्रोजेक्ट पर काम करना है और शहर से दूर शान्ति वाली जगह चाहिए. तुम्हारी और मेरी एक और दोस्त भी साथ होगी (पारी का इशारा खुद की और था). रात भर पढाई करेंगे, और थोड़ा ब्रेक लेंगे. क्या यह अच्छा बहाना नहीं है?"

पारी ने माणिक की और देखा, और माणिक ने तुरंत हाँ में सर हिलाया. मैसेज भेजा गया.

लगभग दो मिनट बाद, फ़ोन विबरते हुआ. आस्था का जवाब आया.

आस्था का जवाब:

"ओह माय गॉड! तुम सच में बहुत तेज़ हो! हाँ! यह 'ग्रुप स्टडी' वाला आईडिया परफेक्ट है! मैं पेरेंट्स को आज शाम मानती हूँ. माणिक, तुमने कमाल कर दिया!"

यह मैसेज पढ़ते hi, माणिक की ख़ुशी का ठिकाना न रहा. दो हफ्ते की ऑनलाइन डेटिंग के बाद, वह अपनी पहली ट्रिप पर जाने वाला था!

माणिक ख़ुशी और उत्तेजना में अपनी सीट से उछला और "ईई!" कहते हुए तुरंत पारी को अपनी बाहों में भर लिया.

यह आलिंगन ज़ोरदार, अचानक और अनियंत्रित था. ख़ुशी के मारे, दोनों का शरीर ek-doosre से कास कर सत्ता हुआ था. माणिक के हाथ पारी की कमर पर थे, और पारी ने भी ख़ुशी में माणिक को ज़ोर से पकड़ा हुआ था. उनकी सांसें तेज़ हो गयीं और दोनों के नग्न शरीर का ताप (हालांकि वे कपडे पहने थे, पर उनकी नज़दीकी बहुत ज़्यादा थी) ek-doosre को महसूस हुआ.

जैसे hi उनका उत्साह थोड़ा शांत हुआ, पारी ने अपने आप को माणिक से अलग करने की कोशिश की, तभी उसकी नज़र उनके बीच की हालत पर पड़ी. उनकी नज़दीकी, उनके शरीर का कोण, और माणिक के चेहरे पर आयी बेकाबू uttejna—yeh सब उस वर्जित आकर्षण की याद दिला रहा था, जिससे वे बाहर निकल आये थे.

पारी तुरंत शर्मा गयी. उसका चेहरा लाल हो गया. उसने अपने आप को तुरंत माणिक से अलग कर लिया, जैसे किसी गरम चीज़ को छू लिया हो.

पारी: (घबरा कर, धीमी, रूखी आवाज़ में) बस... बस, भाई. बधाई हो! अब... अब तुम अपनी प्लानिंग करो! मैं जाती हूँ.

माणिक को अपनी उत्तेजना का एहसास हुआ. वह समझ गया की उसने ख़ुशी के मारे हद पार कर दी थी. वह फिर से शर्मिंदा हुआ, लेकिन इस बार उसकी बेहेन के साथ कोई गलत इरादा नहीं था, बस बेकाबू ख़ुशी थी.

माणिक: (थोड़ा हकलाते हुए) हाँ... हाँ, सॉरी पारी. मैं बस... बहुत खुश था.



पारी बिना और कुछ कहे तेज़ी से कमरे से बाहर निकल गयी, उसके चेहरे पर अभी भी लाज और हंसी का मिश्रण था. वह जानती थी की उसके भाई का ध्यान अब आस्था पर है, लेकिन उसके और माणिक के बीच की अनकही नज़दीकी अभी भी पूरी तरह ख़तम नहीं हुई थी.
 
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