Incest Katha Chodampur Ki - Page 25 - SexBaba
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Incest Katha Chodampur Ki

खैर हम वहां से निकले तो गाओं के बहार तक एक सेवक साथ आया और उसने हमें तीनो तालाब के रास्तों से अवगत कराया तो ज़रूरी सामान और जानकारी लेकर और जल्दी hi मिलने का वादा कर हम लोग तीन जोड़ो में बांटकर निकल गए..

मैं और मौसी- उत्तर के तालाब की और, माँ और अनुज- पश्चिम, जग्गू और तै- पूर्व.

आगे देखना था ये सफर क्या क्या नए नए अनुभव करवाने वाला था...



अपडेट 145


जग्गू और मंजू

दोनों माँ बेटे बताये हुए रस्ते पर धीरे धीरे बढ़ने लगे, दोनों में hi कुछ झिझक थी एक दुसरे को लेकर, जग्गू मन में वही चल रहा था की कैसे कर्मा ने चची को सबके सामने अपनी hi माँ को सबके सामने छोड़ लिए क्या होता अगर उसकी जगह मैं और मम्मी होते तो, मम्मी का बदन भी काम गदराया हुआ थोड़े hi है... मम्मी की क्या प्रतिक्रिया होगी अगर मैं उन्हें छोड़ने की कोशिश करूँ तो... इन्ही सब सवालों में उलझा हुआ जग्गू सोच में पड़ा हुआ था...

वहीं मंजू का तो कालक गाओं आकर पूरा नजरिया hi बदल गया था, अपने बेटे को सेविकाओं की चुदाई करते देखना, फिर कर्मा और अनुज से एक साथ छोड़ना और अंत में कर्मा और सभ्य की, माँ बेटे की चुदाई देखना, अब मंजू के लिए कुछ सही गलत नहीं था वो बस साडी परिस्थितियों में खुद को रखकर देख रही थी...

और कहीं न कहीं सभ्य और कर्मा की चुदाई के बाद उसके मन में भी अपने और जग्गू को लेकर अजीब अजीब से ख्याल आने लगे थे...

मंजू ने देखा की जग्गू काफी देर से कुछ बोल नहीं रहा तो उसने खुद चुप्पी छोड़ने की सोची

मंजू- का हुआ बचुआ कछु बोल नहीं रहा, कोई नात है का?

जग्गू- नहीं मम्मी कुछ बात नहीं है बस ऐसे hi..

मंजू- हुंका तो यकीन नहीं हो रहा की हम लोग मुक़ाबला जीत गए...

जग्गू- पर हम जीत गए मम्मी यकीन करलो...

मंजू- पर जीतने के लिए भी न जाने क्या क्या करना पड़ा तब जाकर जीते हैं..

मंजू ने ये बात कही तो दोनों के hi मन में कर्मा और सभ्य की चुदाई की तसवीरें उभर आई..

Jaggu-haan जीते तो बड़ी मुश्किल से हैं...

मंजू- हिम्मत है कर्मा और बन्नो की...

जग्गू- कैसी हिम्मत मम्मी.?

मंजू- यही सब करने की जो भी मुक़ाबला जीतने के लिए करना पड़ा... उनकी जगह कोई नहीं कर पता..

जग्गू- क्यों मम्मी अगर उनकी जगह तुम होती तो हिम्मत नहीं दिखती का??

मंजू जग्गू के इस सवाल से थोड़ी असहज हो गयी और बोली- ुहम्म्म्म हम पता नहीं...

जग्गू- बात मुक़ाबला जीतने की होती तो करना पड़ता न..

मंजू- वही तो पता नहीं कर भी सकते थे या नहीं भी... तू बता तू कर पता...

जग्गू- हाँ बिलकुल इतनी दूर से आकर खली हाथ थोड़े hi जाते, मैं बिलकुल करलेता..

मंजू को जग्गू के इस जवाब से ये एहसास हो गया की जग्गू के इस बारे में क्या विचार हैं...

मंजू- मतलब तू कर लेता हुनर साथ भी जो कर्मा एयर सभ्य ने किआ...

इस बार जग्गू ऐसे सीधे प्रश्न से हिल गया और बात टालते हुए बोलै- ओह्हो मम्मी हम भी कहाँ की बातों में लग गए सच तो ये है की जो होना था हो चूका...

मंजू- हम्म्म हाँ ये भी है, थोड़ा पानी तो दे प्यास लगी है..

जग्गू ने कंधे पर लटका थैला उतरा और उसमे से पानी की बोतल निकल कर मंजू को दी... तो मंजू बोतल से पानी पीने लगी पानी पीते हुए जग्गू ध्यान से अपनी माँ को देख रहा था, भरा हुआ बदन, मांसल कूल्हे, हल्का चर्बीदार पेट, कमर पर पसीने की बूँदें जो मोतियों सी फिसल रही थी...

मंजू ने पानी पीकर बोतल बापिस दी और फिर से दोनों चलने लगे...

मंजू- ऐ लल्ला हम सही रस्ते पर तो हैं न..

जग्गू- हैं मम्मी बताया तो यही था...

मंजू- इतनी देर हो गयी चलते चलते हमारे तो पेअर थकने लगे हैं ऊपर से ये गर्मी...

जग्गू- रुक जाते हैं थोड़ी देर मम्मी..

मंजू- नहीं थोड़ी देर और चल लेंगे अभी हम फिर रुकेंगे तो खाना भी खा लेंगे...

जग्गू- ठीक है मम्मी..

अनुज और सभ्य

ये दोनों भी काफी देर से चले जा रहे थे, गर्मी के कारन दोनों पसीने से नहाये हुए थे, सभ्य की छूछीयो पर तो जैसे ब्लाउज चिपक सा गया था, वो तो भला हो साड़ी के पल्लू का जिससे उसकी भरी हुई छुछियां ढकी हुई थी वर्ण बिना ब्रा के गीले ब्लाउज में सभ्य की बड़ी छुछियां कहाँ छुपती...

वहीं अनुज भी धीरे धीरे से अपनी माँ के साथ साथ चले जा रहा था, उसको न जाने क्यों एक अलग ख़ुशी थी की वो माँ के साथ अकेला है...

जबसे कर्मा के साथ मिलकर उसने पहली बार ममता चची को छोड़ने से शुरुआत की थी और फिर अपनी सगी बुआ और उनके परिवार की औरतों को छोड़कर उसके विचार रिश्तों के बारे में काफी बदल गए थे, अपनी माँ के बारे में भी पिछले कुछ समय से ऐसे hi ख्याल आने लगे थे, ऊपर से वो जनता था की जितनी नहीं औरतें उसने भोगी हैं, बदन के मामले में उसकी माँ सबसे इक्कीस hi होगी, घर में भी माँ के बदन को देखकर उसने कई बात लुंड हिलाया था...

और फिर कालक आने पर तो जैसे सब कुछ hi बदल गया और अंत में अपने भाई और माँ की चुदाई देखकर अनुज का दिमाग पूरी तरह खुल गया था, उसके मन में माँ के साथ सब कुछ करने की उम्मीद जागने लगी थी... इसी सोच में साथ hi इस ख़ुशी में की वो माँ के साथ अकेला है चले जा रहा था...

सभ्य अभी तक अनुज से सामने से नज़र मिलाने और कुछ बोलने से बच hi रही थी क्यूंकि मुक़ाबले के दौरान जो कुछ हुआ उसके बाद समझ नहीं आ रहा था की वो अनुज का सामना कैसे करे, वो क्या सोच रहा होगा इसके बारे में, वैसे तो सबने फैसला किआ है की इसके बारे में किसी को नहीं बताएँगे पर कहीं अनुज ने घर जाकर अपने पापा के सामने कुछ बोल दिया तो..

नहीं नहीं मुझे पता करना होगा इसके मन में क्या है और कब तक मैं नज़रें चुराऊँगी या बात नहीं करुँगी तो इससे ाचा है खुद hi पहल करूँ...

सभ्य- लल्ला रस्ते का ध्यान रखियो कहीं भटक न जाएं हम...

अनुज- नहीं माँ हम एक दम सही रस्ते पर हैं.....

अनुज को साधारण तरीके से जवाब देता देख सभ्य को थोड़ी राहत महसूस हुई.

सभ्य- चलो वैसे काफी देर हो गयी हमें चलते चलते...

अनुज- हाँ माँ हो गए होंगे दो तीन घंटे...

सभ्य- पता नहीं कितनी दूर होगा ये तालाब, यहाँ तो कोई मिलता भी नहीं की पूछ लें किसी से...

अनुज- इस बीहड़ में कौन मिलेगा माँ. सिवाए जानवरों के और अभी तो गर्मी में वो भी सुस्ता रहे होंगे...

सभ्य- हाँ सही है चलते रहते हैं थोड़ी देर और खाने के लिए hi रुकेंगे कहीं सही सी जगह देखकर.

अनुज- हाँ माँ अब खाने के लिए hi रुकेंगे...

कर्मा और शालू मौसी

शालू- उस कल्मुये ने तो बोलै था थोड़ी hi दूर है तीन घंटे हो गए चलते चलते आ hi नहीं रहा,

कर्मा- क्या हुआ थक गयी मौसी...

शालू- और का इतनी देर से लगातार चले जा रहे हैं थकेंगे नहीं लल्ला...

कर्मा- तो आराम करलो थोड़ी देर..

शालू- नहीं अनहि नहीं लल्ला जब तू ये थैला उठाकर चल रहा है तो हमारे पास तो कोई बोझ नहीं है हम और चल लेंगे..

मौसी बोझ तो तुम्हारे पास मुझसे भी ज़्यादा है कर्मा ने मौसी की बड़ी बड़ी छुछियां को घूरते हुए मन में कहा..

Karma-therk मौसी पर जब थको तो बता देना...

शालू- बिलकुल लल्ला तू हमारी कितनी फ़िक़र करता है... मन हम थोड़े बूढ़े हो गए पर चल लेंगे..

कर्मा- क्या मौसी तुम और बूढी... अरे अभी तो तुम इतनी जवान हो. जितने जवान लड़के लड़कियां न जवान हो..

शालू- चल चल कछु भी मत बोल....

शालू जान बूझ कर कर्मा से इधर उधर की बातें कर रही थी वो चाहती थी की कर्मा खली न रहे नहीं तो उसके दिमाग में उसके और उसकी माँ के बीच जो कुछ हुआ वो याद आएगा और वो उसके बारे में सोचने लगेगा...

शालू के खुद के मन में बार बार वो तस्वीर आ रही थी जब उसकी बहन को अपने hi बेटे के साथ सम्भोग करना पद रहा था .. इसीलिए वो कर्मा को बातों में लगाने की कोशिश जार रही थी.. और कर्मा को साधारण तरीके से बात करते देख उसे लग रहा था की वो कामयाब भी हो रही है...

कर्मा- सही बोल रहा हूँ मौसी..

Shalu-waise कितनी हरी भरी है जगह है न....

कर्मा- और सुनसान भी.

इसी तरह से काफी देर तक आगे बढ़ने के बाद शालू की नज़र एक जगह पड़ी...

जग्गू और मंजू

मंजू- ऐ लल्ला ये जगह कैसी रहेगी थोड़ी देर आराम कर लेते हैं, कुछ खा भी ले बहुत देर से चल रहा है थक गया होगा...

जग्गू- ाचा मैं या तुम थक गयी हो...

मंजू- हाँ हाँ हम थक गए हैं खुश अब..

जग्गू- ाचा ठीक है चलो इस पेड़ के नीचे बैठते हैं...

मंजू- हाँ लल्ला हमारी तो हालत ख़राब हो गयी चालत चालत..

और मंजू धम्म से जाकर पेड़ के बगल में जाकर बैठ गयी और पीछे से पेड़ से तक lagali..aur अपने घर की तरह अगले hi पल अपने पल्लू को नीचे गिरा दिया...

जग्गू ने बैठते हुए जब सामने का नज़ारा देखा तो कुछ पल के लिए उसकी आँखें वहीं रुक गयी...

पल्लू के गिरनेसे उसकी मम्मी की आधी सी ज़्यादा चूचियां गदराया मांसल पेट गहरी नाभि सब सामने था...





लम्बी सांस भरने के बाद जब मंजू की नज़र ने जग्गू की नज़र का पीछा किआ तो पाया उसका बीटा उसकी छूछीयो और नंगे पेट को घूर रहा है, तो मंजू को न जाने क्यों एक अलग सा एहसास हुआ... जग्गू ने खुद को संभाला और खाना निकलने लगा...

दोनों माँ बेटे खाना खाने लगे बीच बीच में जग्गू अपनी माँ के बदन से आँखें सेक रहा था, उसने देखा पसीने की बूँद उसकी माँ के पेट पर फिसलती हुई उसकी नाभि में घुस गयी..

जग्गू का तो मनो गाला सूख गया उसका मन किआ अभी जीभ डालकर चतले वो अपनी माँ की नाभि को चूस ले, उसकी धोती में उसका लुंड कड़क हो गया.... और ये मंजू ने भी देखि , की उनके बेटे के धोती के सामने उभर है... और फिर मंजू ने अपनी तरफ देखा तो पाया की भीगे ब्लाउज में उसकी बड़ी बड़ी छुछियां लगभग नंगी hi दिख रही हैं वहीं पल्लू हटाने से सामने का हिस्सा पूरा बेटे के सामने है, पर मंजू ने खुद को ढकने या छुपाने की कोई कोशिश नहीं की बल्कि ऐसे hi बैठ कर कहती रही...

अनुज और सभ्य

अनुज- अब जाकर थोड़ा चैन मिला है न माँ, तुम्हारा पेट तो भर गया??

सभ्य- हाँ लल्ला बिलकुल भर गया और सही कह रहा है चलते चलते थक गए थे अब खाना खाकर कुछ ाचा लग रहा है..

अनुज- वही तो वैसे अब क्या करें चलें या थोड़ा रुकना है...

सभ्य- थोड़ा रुकते hi हैं, खाकर मुझसे तो चला नहीं जायेगा...

Anuj-ye तो है माँ, चलो फिर कुछ देर आराम कर लेते हैं.

सभ्य- हाँ तू भी आराम करले....

माँ बेटे दोनों घास में hi लेट गए, सभ्य ने अपने सर के पीछे हाथ लगा लिए और अनुज को बोली- आ लल्ला इधर लेट जा अपना सर मेरी गॉड में रख ले...

बस अनुज की तो जैसे मन मांगी मुराद पूरी हो गयी.. मन ने लड्डू फूटने लगे... अनुज तुरंत अपनी माँ की जांघ पर सर रखकर लेट गया...

अनुज का लुंड बस इतनी सी बात पर खड़ा हो गया, उसे अपनी माँ के करीब होने भर से hi एक अजीब सा एहसास हो रहा था, सभ्य जहाँ आँखें बंद जिए हुए लेती थी वहीं अनुज ने करवट लेकर अपना चेहरा सभ्य के ऊपर के हिस्से की और कर लिए...

अनुज को अपनी माँ की हर सांस के साथ ऊपर नीचे होती हुई चूचियां दिखी जिन्हे देखकर उसका मन किआ की अभी ब्लाउज उतारकर उन्हें अपने मुँह में भर के चूसले...

उसने अपने सर को खुजलाने के बहाने से हाथ से माँ के पेट पर पड़े साड़ी के पल्लू को थोड़ा साइड खिसका दिया जिससे उसकी माँ का भरा हुआ चिकमा मांसल पेट और नाभि ुनगर हो गयी...

जिसे देखकर hi अनुज की नज़रें चमक उठी, उसनर एक बार माँ को ध्यान से देखा और कोई प्रतिक्रिया न पाकर चैन में आ गया, माँ का चिकना पेट थोड़ा पसीने की वजह से और चमक रहा था उसे सामने पाकर उसके मुँह में पानी आ रहा था साथ नाभि को देखकर उसका मन बार बार उसे चूसने का हो रहा था...

पर मन में दर भी था, अनुज ने एक बार फिर से सर खुजाने के बहाने हाथ ऊपर रखा और फिर सर खुजाकर नीचे ले जाने की वजह माँ के पेट पर hi रख दिया...

माँ के पेट की नंगी त्वचा को अपने हाथ पर. महसूस कर अनुज के पूरे शरीर में एक अलग सी ऊर्जा दौड़ गयी उसका लुंड झटके खाने लगे,

गर्मी के मौसम में उसे और गर्मी लगने लगी... अनुज इस बात का भी ध्यान रख रहा था की उसके कुछ भी करने पर माँ की क्या प्रतिक्रिया है पर अभी तो वो आँखें बंद किये लेती थी और कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रही थी.....

इससे अनुज का हौसला थोड़ा थोड़ा बढ़ता जा रहा था... उसने अपने सर को खिसका कर जांघ से ऊपर अपने माँ के पेट पर रख लिए....

और चेहरा माँ के चेहरे की और कर लिए अनुज का चेहरा माँ के पेट पर था और अपने गाल पर माँ के पेट की नरम त्वचा को महसूस कर अनुज तो फूला नहीं समां रहा था... पर साथ hi उसका लालच भी बढ़ता जा रहा था, इतनी पास माँ का पेट देखकर उसका मन कर रहा था की वो उसे चूमे कहते और बहुत धीरे से वो अपना चेहरा हिलाते हुए अपने होंठों को माँ के पेट पर घिसने लगा...

ऐसे खुले जंगल के बीच अकेले में अपनी माँ के साथ ये सब करने में अनुज को एक अलग आनंद की प्राप्ति हो रही थी...

माँ की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न पाकर अनुज और अपने होंठों से माँ के नंगे चिकने पेट को चूमने लगा पर बहुत आराम से धीरे धीरे,





फिर उसका मन माँ की नाभि को चूसने को हुआ पर वो जनता था की नाभि कितनी संवेदनशील होती है कहीं माँ जाग गयी तो, फिर भी उसने हिम्मत करते हुए माँ की नाभि पर अपने होंठ रखे hi थे की माँ बोल पड़ी: आई लल्ला...

अनुज की तो दर से फटने लगी...

सभ्य- लल्ला पेट से हैट खाना खाया है पेट डाब रहा है .

माँ की बात सुनकर अनुज तुरंत हैट गया अपनी माँ के पेट से पर उसे एक बात की राहत भी मिली की माँ ने उसे उनके पेट को चूमने पर कुछ नहीं बोलै... इसी उधेड़बुन में अनुज भी अब बगल में लेट कर लगा हुआ था...

कर्मा और शालू

शालू- कुछ भी हो कालक वाले खाना बड़ा स्वादिष्ट बनाते हैं.

कर्मा- हाँ मौसी अब मस्त पेट भर गया...

शालू- तो थोड़ी देर सुस्ता लें फिर आगे चलेंगे... वैसर तुझे मिला न खाने को भरपेट किसी चीज़ की कमी तो नहीं रह गयी..

कर्मा- बस एक चीज़ की कमी रह गयी मौसी.

शालू- क्या किस चीज़ की?

कर्मा- दूध की...

शालू- अब दूध यहाँ कहाँ मिलेगा...-

कर्मा- है तो यही मौसी ध्यान से देखो..

कर्मा ने मज़ाक करते हुए कहा और इशारा शालू की और hi किआ..

जब शालू को कर्मा की बात समझ आई तो मुँह बनाते हुए बोली- बड़ा कमीना होता जा रहा है तू,

शालू ने लाड में कर्मा के मरते हुए कहा..

कर्मा- कमीना कहाँ मौसी जो सच है बताया अब दूध पीने का मन है तो है..

shalu-abhi यहाँ पागल है क्या तू...

कर्मा- क्यों चोदामपुर में भी तो मैं और अनुज रोज़ रात को तुम्हारा दूध पि कर सोते थे मौसी..

शालू- तब की बात अलग थी, अभी यहाँ खुले में कैसे..

कर्मा- मौसी ध्यान से देखो हम जंगल में यहाँ ढूंढने से कोई नहीं मिल रहा ऐसे तो आने से रहा..

शालू- मुझे अजीब सा लग रहा है...

कर्मा- इसमें अजीब क्या है मौसी...

शालू ने कुछ सोचा और फिर अपनी साड़ी के पल्लू को नीचे गिरा दिया कर्मा के सामने उसकी मौसी की ब्लाउज में क़ैद चूचियां और नंगा गोरा पेट आ गया, शालू ने फिर अपने ब्लाउज के हुक खोलने शुरू किये अब इतनी बड़ी छुछियां बिना ब्लाउज खोले तो बहार नहीं आ सकती थी,

कुछ hi पालो में ब्लाउज खुल गया जबसे कालक गाओं में प्रवेश हुआ था तबसे hi पेटीकोट और ब्रा तो कोई भी औरत पहनती hi नहीं थी तो बचा सिर्फ ब्लाउज और उसके दोनों पत् अलग होते hi कर्मा की आँखों में चमक आ गयी अपनी मौसी की नंगी छूछीयो को देखकर...

रात में घर में देखने पर यहाँ खुले आसमान में मौसी का यूँ ब्लाउज खोलकर अपनी छुछियां बहार निकलना कर्मा को बेहद उत्तेजित कर रहा था उसका लुंड धोती में तम्बू बना चूका था

ब्लाउज को पूरी तरह से खोलकर शालू पेड़ से तक लगाकर बैठ गयी

और बड़े प्यार से बोली- आजा लल्ला ले पीले दूध...

शालू की इस बात में जितना स्नेह झलक रहा था उससे भी कहीं ज़्यादा हवस, पहले जो भी हुआ उससे वो उत्तेजित थी hi और अब अपने भांजे को यूँ बीच जंगल में अपनी छुच्छी चुसवाने के ख्याल से hi अति उत्तेजित महसूस कर रही थी..

कर्मा भी तुरंत आगे बढ़ा और अपनी मौसी के सामने जाकर आगे झुक कद के एक छुच्छी को मुँह में भरते हुए चूसने लगा साथ. Hi हाथ से मसलने भी लगा..





शालू के मुँह से मादकता भरी सिसकियाँ निकलने लगी वहीं कर्मा मज़े से अपनी मौसी की बड़ी बड़ी छुच्छी का रास पि रहा था निचोड़ निचोड़कर...

कर्मा का लुंड बेहद सख्त हो गया था.. आसान को और सजग बनाने के लिए, कर्मा ने शालू को आगे खिसका कर वहीं लिटा लिया और फिर उसके बगल में लेटकर छूछीयो को चूसने लगा, उसका सख्त लुंड शालू की जांघ पर चुभ रहा था जिसे शालू भी बड़े अचे से महसूस कर रही थी और वही उसकी उत्तेजना को और बढ़ा रहा था, जहाँ कर्मा छूछीयो में खोया हुआ था तभी शालू के दिमाग में एक ख्याल आया और उसने कुछ ऐसा किआ जिससे कर्मा के मुँह से आह्हः निकल गयी...

इसके आगे क्या होता है देखते हैं अगले अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्.
 
कर्मा का लुंड बेहद सख्त हो गया था.. आसान को और सजग बनाने के लिए, कर्मा ने शालू को आगे खिसका कर वहीं लिटा लिया और फिर उसके बगल में लेटकर छूछीयो को चूसने लगा, उसका सख्त लुंड शालू की जांघ पर चुभ रहा था जिसे शालू भी बड़े अचे से महसूस कर रही थी और वही उसकी उत्तेजना को और बढ़ा रहा था, जहाँ कर्मा छूछीयो में खोया हुआ था तभी शालू के दिमाग में एक ख्याल आया और उसने कुछ ऐसा किआ जिससे कर्मा के मुँह से आह्हः निकल गयी...



अपडेट 146


जग्गू और मंजू

मंजू- अह्ह्ह्हह जग्गू बचुआ जल्दी कर... अहह..

जग्गू- कर रहा हूँ मम्मी ज़्यादा जल रहा है क्या?

मंजू- हाँ बहुत अह्ह्ह कुछ कर...

ऐसा क्या हो रहा था और क्या जल रहा था मंजू को आइयें देखते हैं...

जग्गू आराम कर रहा था तभी अचानक से उसकी मम्मी चिल्लाने लगी, आअह्ह्ह जग्गू बचा आह्हः

जग्गू हड़बड़ी मेंउठा और देखा उसकी मम्मी अपने बदन को झाड़ रही है साथ hi इधर उधर कूद भी रही है...

जग्गू- क्या हुआ मम्मी

. जग्गू ने घबराते हुए पुछा...

मंजू- अह्ह्ह्हह बछ्ह लगत है किसी कीड़ा ने काट लिया है कमर और पीठ पर पेट पर सब जगह जलन हॉट है...

जग्गू- रुको मम्मी मुझे देखने दो..

मंजू- देख बचुआ हमतो परेशां हैं..

जग्गू करीब से अपनी मम्मी की पीठ मांसल कमर और मुलायम पेट को देखता है तो उसे कुछ भी ऐसा नज़र नहीं आता...

जग्गू- निशान तो दिख नहीं रहे मम्मी कैसे भी.

मंजू- तू निशान मत ढूंढ मुये जलन मिटने का तरीका ढूंढ..

जग्गू- हाँ रुको कर रहा हूँ,

जग्गू दिमाग चलने लगता है और उसे कुछ सून्हता है तो वो तुरंत थैला उठता है और उसमे से पानी की बोतल निकलता है और खोल कर अपनी मम्मी की पीठ और कमर को धोने लगता है, पानी पड़ते hi मंजू का ब्लाउज बिलकुल पारदर्शी हो जाता है और जग्गू को अपनी मम्मी की लगभग नंगी लीथ दिखने लगती है..

पानी पड़ने पर मंजू को भी कुछ राहत मिलती है और बोलती है:- अह्ह्ह्ह थोड़ी रहत मिली बचुआ आह्हः पानी से.

जग्गू भी थोड़ी चैन की सांस लेता है पर अभी परेशानी ख़तम कहाँ होने वाली थी ..

मंजू- ले बच्चा आह्हः पेट और आगे कमर के हिस्से पर भी दाल यहाँ भी बहुत जलन हो रही है.

जग्गू ने बोतल पलट कर देखि तो मायूस हो गया..

Jaggu-mummy पानी इतना hi बचा था..

मंजू- हे भगवन अब क्या होगा... ये जलन से कैसे छुटकारा मिलेगा हमें..

जग्गू मन hi मन कुछ उपाय ढूंढने लगता है उससे अपनी मम्मी की तड़पन देखि नहीं जाती...

जग्गू- मम्मी जहाँ पानी से धोया था वहां तो नहीं हो रही न जलन..

मंजू- नहीं बचुआ पर ये पेट और कमर के आस पास बहुत हो रही है..

जग्गू- अभी आराम आएगा मम्मी..

जग्गू ये कहकर अपनी मम्मी के सामने घुटनो पर बैठ जाता है और उसका चेहरा मंजू के पेट के सामने आ जाता है मंजू समझ नहीं पाती क्या होने वाला है तब तक जग्गू अपने होंठों को अपनी मम्मी के मांसल पेट पर रख देता है और उसके पेट को जल्दी जल्दी चाटने लगता है ..

मंजू को एक झटका लगता है और बोलती है- अह्ह्ह बच्चा ी का कर रहा है...

जग्गू एक पल को अपना मुँह उसके पेट से हटा कर जवाब देता है

जग्गू- मम्मी पानी है नहीं तो थूक के अलावा और कोई उपाय नहीं था,

मंजू अपने बेटे की समझदारी देख खुश हो जाती है और अपने दोनों हाथों को उसके सर पर रखकर पेट परदबटि है..

बाकि का काम जग्गू करने लगता है, अपनी माँ के चिकने भरे पेट को चाटने में जग्गू को मज़ा आने लगता है, हालाँकि शुरू तो उसने अपनी मम्मी कोजलान से रहत दिलाने के लिए किया था पर अब जैसे उसके मुँह में मम्मी के बदन का स्वाद लगा तो उसकी उत्तेजना बढ़ने लगी थी धोती में दोबारा तम्बू बन चूका था वो पागलपन की तरह अपनी मम्मी के पूरे पेट को चाट और चूम रहा था साथ hi हाथ से मसल भी रहा था..





मंजू तो अपने पेट की जलन को भूल चुकी थी बेटे की जीभ और होंठ पेट पर उसे अलग hi सुख दे रहे थे, जहाँ पेट पर अब तक जलन थी वहीं से एक अलग उत्तेजित करने वाली तरंगे उठ रही थी जो की उसके पूरे बदन में कामुकता का संचार कर रही थी...

जग्गू के होंठों का जादू उसकी मम्मी के पेट पर खूब चल रहा था और उसी जादू का आखिरी खेल जग्गू ने दिखते हुए अपनी जीभ को मम्मी की नाभि में घुसा दिया, जिसके जाते hi मंजू के मुँह से एक गहरी सिसकी निकल गयी...

जंगल के बीच में एक बीटा अपनी माँ की नाभि को चूस रहा था और माँ गहरी गहरी सिसकियाँ भर रही थी, कोई भी देखता तो यही लगता की दोनों माँ बीटा अपनी मर्यादा को. भूल कर हवस में अंधे हो चुके हैं... और शायद सच भी कुछ यही था......

कर्मा और शालू

जहाँ कर्मा अपनी मौसी के बड़े बड़े पापीती चूस रहा था तो उसकी प्यारी मौसी जो उसका इतना ख्याल रखती हैं उन्होंने ध्यान दिया की उनका भांजा किसी तकलीफ में है, कर्मा जिस उत्तेजना के रास को अपनी मौसी के बड़े बड़ी छूछीयो से चूस रहा था वही रास नीचे जाकर उसकी गोलियों में भरता जा रहा था और उसका लुंड फूलता जा रहा tha,aur कर्मा परेशां हो रहा था पारर वो मौसी hi क्या जो अपने भांजे की परेशानी को दूर न करे...

तो बस क्या था थाम लिए हाथ बढाकर मौसी ने कर्मा के तपते हुए लुंड को, हालाँकि साधारण समय पर ऐसा कुछ करने के बारे में शायद वो सोच भी नहीं सकती थी पर अभी पिछले कुछ समय से जो भी हुआ उसके बाद उसे कुछ भी ज़्यादा या गलत नहीं लग रहा था...

शालू ने जब कर्मा के तपते हुए लुंड को अपने हाथ में लिए तो उसकी सख्ती और गर्मी को महसूस कर वो पिघलने लगी.. एक तरफ छूछीयो को कर्मा बेरहमी से चूस रहा था जिससे शालू के पूरे बदन में सनसनी हो रही थी वहीं हाथ में उसका कड़क लुंड जिसकी छुवन से शालू की छूट पसीजने लगी thi...upar से ऐसे खुले जंगल में ये सब करना सब कुछ मिलकर शालू और कर्मा की उत्तेजना को बढ़ा रहे थे...

शालू कर्मा को रहत दिलाने के लिए उसके लुंड को मुठिया रही थी, और कर्मा भी जो बेहद उत्तेजित हो चूका था उससे भी खुद पर काबू करना मुश्किल हो गया...

कुछ देर बाद hi कर्मा के मुँह से सिसकारियां फूटने लगी और वो अपने मुँह को शालू की छुच्छी से हटते हुए बोलै...

कर्मा - ahhhhhhhhhh मौसियी बड़आहहह मज़ा आ रहा है ऐसे hiiiiiiiiii... ुहम्म्म्म..

और ये बोलकर बापिस उसने एक चुकी को मुँह में भर लिए पर उसके साथ hi उसके लुंड ने रास की पिचकारियां मारनी शुरू कर दी, जो एक के बाद एक आकर शालू के हाथ को पूरा भीगा गयी, शालू वीर्य की इतनी साडी मात्रा देख सोचने लगी, कितनी कीमती चीज़ ऐसे hi व्यर्थ हो रही है, उसका एक मन किआ की इसे कहीं संभल कर रखले, पर फिर खुद की नादानी पर हंसती हुई... अपने आप को काबू किआ और हाथ को एक पत्ते पर पांच दिया, इधर कर्मा झड़ने के बाद आराम से लम्बी लम्बी साँसे लेते हुए सुस्ताने लगा...

वहीं शालू उसे देखते हुए सोचने लगी की कितना कुछ बदल गया है पिछले कुछ दिनों में...

खैर वो भी थोड़ी देर के लिए सुस्ताने लगी... ब्लाउज ऐसे hi खुला हुआ दोनों छुछियां बहार और ये दोनों सुस्ताने पर लगे हैं.

अनुज और सभ्य

सभ्य- ध्यान से देख रहा है न लल्ला..

अनुज- हाँ माँ मेरे हिसाब से तो सही hi है...

सभ्य- ठीक है अँधेरा होने में अभी लग रहा हैं की दो तीन घंटे तो हैं इसी बीच चलना है जितना चलना है...

अनुज- हाँ माँ

दोनों माँ बेटे आराम करने के बाद चल दिए थे अपनी मंजिल की और सभ्य बार बार अनुज को रस्ते को ध्यान से देखने को कह रही थी, जिससे की वो भटक न जाएँ...

सभ्य- बस थोड़ा समय है अन्धता होने में बस उतने में पहुंच जाये तो ाचा है नहीं तो अँधेरे में इस जंगल में कोई जगह नहीं मिलने वाली...

अनुज- हाँ माँ अँधेरा होने तक तो लगातार चलना होगा..

दोनों थोड़ा आगे hi बढे थे की सभ्य के मुँह से निकला- है दिया अब ये भी आज hi होना था...

अनुज- अरे यार अब ये बारिश कहाँ से आ गयी..

अनुज ने ऊपर देखते हुए कहा जहाँ आसमान से मोती मोती बूँदें पातर पातर धरती पर पढ़ने लगी..

सभ्य- होनी hi थी गर्मी इतनी थी... चल इस पेड़ के नीचे छुप जाते हैं नहीं तो भीग जाएंगी..

दोनों फुर्ती में पेड़ के नीचे जाकर खड़े हो गए कुछ देर तक तो पेड़ ने उन्हें बचाये रखा और फिर एक हवा का झौंका आया और पेड़ कोहिला गया जिससे पत्तों पर रुका हुआ पानी फर फर फर नीचे गिरने लगा और अनुज और सभ्य को भीगा गया...

अनुज- धत्त्त तेरी की...

सभ्य- अब क्या करें हवा भी है पानी के साथ लल्ला पेड़ के नीचे तो बचने से रहे...

अनुज - फिर क्या करें माँ?

अनुज ने अपनी भीगी हुई साड़ी में लिपटी माँ को देखा और साड़ी भी अब गीली होकर छुपाने से ज़्यादा दिखने का काम कर रही थी.. पूरी तरह से बड़ी छूछीयो और पेट पर चिपक गयी थी

और ये नज़ारा अनुज की आँखों को खूब भ रहा था





अनुज ने मन में सोचा बारिश इतनी भी बुरी नहीं है..

सभ्य- यहाँ खड़े रहे तो भीगते रहेंगे एक काम कर आगे चलते हैं शायद कोई जगह मिल जाये...

अनुज- हाँ माँ चलते हैं..

दोनों सर पर हाथ रखकर आगे पेड़ों के बीच संभल संभल कर भागने लगे..

पर कोई भी ऐसी जगह नज़र नहीं आ रही थी जहाँ चुप सकें ..दोनों पूरी तरह से भीग चुके थे... फिर भी दोनों आवे बढे जा रहे थे...

तभी अनुज को कुछ नज़र आया और bola-maa वो क्या है...

सभ्य ने आँखों से पानी हटते हुए देखा एक गाढा सा था पर अलग क्यूंकि इसकी दीवारें पठार की थी साथ hi एक दो बड़े पत्थर फिर एक छोटा पत्थर रखे थे.. ऐसा लग रहा था जैसे नीचे जाने का कोई रास्ता है...

सभ्य- चल के देखते हैं...

माँ की बात सुनकर दोनों भागते हुए गद्दे के पास गए और देखा सच में नीचे जाने के लिए एक सीढ़ीनुमा पत्थर का hi रास्ता बना हुआ था, दोनों ने एक दुसरे को असमंजस से देखा फिर सोचा चल कर देखते हैं..

अनुज आगे आगे और सभ्य उसके पीछे उतरने lagi...dono संभल के उतर रहे थे क्यूंकि नयी जगह ऊपर से उन्ही सीढ़ियों से बारिश का पानी अंदर आ रहा था...

एक बार घूमने के बाद सीढ़ियां नीचे ख़तम हो गयी , और पानी एक तरफ बने नाली नुमा रस्ते में जाने लगा वहीं दोनों ने नज़र घुमा कर देखा तो हैरान रह गए, क्यूंकि नीचे एक खँडहर पड़ा हुआ पुराने छोटे से किले जैसा था,

अनुज इधर उधर घूम कर देखने लगा..

सभ्य- अनुज लल्ला ध्यान से नयी जगह है..

अनुज- हाँ माँ.. पर अजीब जगह है न ज़मीन के ऊपर कुछ भी नहीं और अंदर ऐसा किला...

सभ्य- हाँ है तो अजीब और पुराण भी बहुत लगता है...

अनुज- ऐसा लग रहा है किसी राजा वगेरा ने अपना गुप्त किला बनवाया होगा..

सभ्य- हाँ सुना तो है मैंने की राजा महाराजा ऐसे गुप्त किले बनवाते थे..

अनुज- बढ़िया है न माँ उनका किला हमारे काम आ रहा है काम से काम बारिश से तो बचे..

सभ्य- हाँ पर क्या बचे पूरे तो भीग hi चुके हैं....

अनुज- वो तो है माँ, अरे रे इसकी तो हालत ख़राब है .

सभ्य- क्या हुआ...

सभ्य ने अपनी साड़ी के पल्लू को निचोड़ते हुए पुछा...

अनुज- बस इसी जगह पानी नहीं हैं माँ नहीं तो देखो सब जगह पानी भरा हुआ है... शायद पुराण होने की वजह से रिस रिस कर आ रहा है पानी.

सभ्य- हाँ थोड़ा ऊंचा है न ये खैर कोई नहीं यही पर ठीक है ..यहाँ तो सूखा है...

जहाँ दोनों थे बस वहीं जगह सूखी थी बाकि साडी जगह पानी भरने लगा था...

अनुज से सब जगह देखभाल कर्ली तो फिर वो भी अपनी माँ के पास आ गया और उसे साड़ी का पल्लू निचोड़ते हुए देखने लगा.....

उसे अपनी माँ की भीगी हुई कमर और उस पर फिसलती हुई पानी की बूँदें बेहद कामुक लग रही थी...

उसकी खुद की धोती में लुंड जो भीग कर सिकुड़ गया था उसमे हलचल होने लगी...

जग्गू और मंजू

ये दोनों माँ बेटर भी बारिश से परेशां थे और पूरी तरह भीग चुके थे...

मंजू- है ढैय्या ये बारिश ुपत से इतनी तेज़ हवा चल रही है...

जग्गू- कोई जगह ढूंढनी पड़ेगी माँ छुपने के लिए..

और दोनों hi देखते हुए चलते हैं तो आगे जाकर जग्गू को एक पत्थर का टीला दीखता है और उसके ऊपर एक खांचा बना हुआ था ऐसा लग रहा था ये कोई पुराण झरना है..

जग्गू- मम्मी वो जगह ठीक रहेगी...

मंजू- ऐ पागल हो गया है का वो कितनी ऊपर है हम चढ़ेंगे कैसे...

जग्गू- बस यही उपाय है मम्मी अभी और मैं चढ़ा दूंगा..

मंजू कक भी कोई और चारा नज़र नहीं आया तो राज़ी हो गयी...

अब परज़हनि ये थी की मंजू को उस 6 फ़ीट ऊंचे पत्थर पर चढ़ना था...

जग्गू- चलो मम्मी चढ़ो जल्दी से.

मंजू- तू पगला गया है सच्चीई...

कैसे चढ़ जाएं हम इतने ऊंचे पर...

जग्गू- मैं उठता हूँ रुको...

और ये कहकर जग्गू अपनी मम्मी के पीछे आया और झुककर पीछे से उनकी जांघों को पकड़ के उठाने लगा...

मंजू भी हाथ आगे बढाकर ऊपर खिसकने की पूरी कोशिश करने लगी..

इधर जग्गू पीछे से पूरा ज़ोर लगा रहा था उसके चेहरे के सामने उसकी मम्मी के बड़े बड़े चूतड़ थे, और भीगी साड़ी बिलकुल उनपर चिपक कर उनका ाचा खासा नाप दिखा रही थी .जिसे देखकर नीचे जग्गू का लुंड सर उठा रहा था...

मंजू- ुह्ह्ह्हह्ह्ह्ह बस थोड़ा सा और ढकलल जग्गू...

जग्गू ने भी जांघों से हाथ सरकाया ऊपर और फिर अपनी मम्मी के चूतड़ों को दोनों हाथों से थमा और इसी के साथ मंजू की एक सिसकी निकल गयी... जग्गू के हाथ में. उसकी मम्मी के बड़े बड़े चूतड़ थे और फिर जग्गू ने उन दोनों चूतड़ों को मसलते हुए ज़ोर लगा कर ऊपर की और धक्का दिया तोएक चीख के साथ मंजू पठार पर चढ़ गयी .. और फिर उसके तुरंत बाद जग्गू भी....

छोटी सी उस जगह पर बस इतनी रहत थी की बारिश नहीं आ रही thi...dono hi लम्बी लम्बी साँसे भर रहे थे..

मंजू- पहले इतनी गर्मी एक एक बूँद के ोिये तरसे और अब इतनी बारिश...

मंजू में अपनी साड़ी के पल्लू को फटकते हुए कहा....

Jaggu-haan बहुत ख़राब हो गया मौसम...

जग्गू की नज़र रह रह कर अपनी मम्मी के बदन पर hi जा रही thi...poori तरह से भीगा हुआ बदन चिपजि हुई और पारदर्शी हो चुकी साड़ी को देखकर उसके मन में कुछ कैच हो रहा था...

इसके आगे क्या हुआ अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्

 
कहानी के 2 साल के साथ साथ 50 लाख व्यूज पूरे होने पर आप सभी को बधाई साथ ही अनेक अनेक धन्यवाद।

आप सभी के साथ के कारण ही शुरुआत में असंभव सा लगने वाला सफर पूरा हुआ है इसी तरह साथ रहें आगे भी सफर चलता रहेगा।

बहुत बहुत धन्यवाद।
 
अपडेट 147


कर्मा और शालू

मौसी और भांजा दोनों hi मस्ती में सुस्ता रहे थे की तभी बारिश की मोती मोती बूंदों ने उन्हें अचानक से चौंका दिया...

दोनों हड़बड़ा कर उठे...

Karma-mausi बारिश आ रही है जल्दी चलो...

और ये कहकर कर्मा ने शालू का हाथ पकड़ा और भागने लगा..

शालू- कर्मा ाराआम से लल्ला, मुझे ब्लाउज तो बंद करने दे...

कर्मा - अरे मौसी हो जायेगा ब्लाउज भी बंद पहले चलो कहीं बचने की जगह ढूंढते हैं...

कर्मा मौसी को खींचते हुए आगे आगे भाग रहा था वहीं हर कदम के साथ मौसी की नंगी भीगती हुई छुछियां बड़े hi कामुक तरीके से उछाल कूद कर रही थी, ऐसा नज़ारा देख कर तो मुर्दे का भी लुंड खड़ा हो जाता पर अभी हमारे कर्मा का ध्यान भाग कर खुद को और मौसी को बारिश से बचने पर था...

दोनों आगे बढ़ते हुए कोई छुपने लायक जगह देखते जा रहे थे और साथ hi बारिश उन्हें भीगती जा रही थी..

मौसी- कर्माहहहह अह्ह्ह अब्ब्ब मुझसे नहीं भगा जायेगा... बसससससा..

कर्मा- बस मौसी उस बड़े पेड़ तक वो काफी घाना है उसके नीचे बच जायेंगे...

कर्मा किसी तरह से मौसी को खींचते हुए पेड़ के नीचे पंहुचा दोनों hi लगभग पूरे भीग चुके थे...

कर्मा - यहाँ कुछ बच सकते हैं मौसी इस की शाखाएं काफी मोती हैं..

शालू तो बेचारी बैठ कर पेड़ से टिक गयी और बुरी तरह से हांफ रही थी... उसकी नंगी छुछियां हर सांस के साथ ऊपर नीचे हो रही थी...

एक बार तो कर्मा का मन दोबारा से मौसी की छूछीयों के लिए बहका पर अभी उसने खुद पर काबू kia..thodi देर ऐसे hi बारिश से बचते हुए पेड़ के नीचे आराम करते रहे की तभी एक हलकी सी आवाज़ पर कर्मा का ध्यान उस आवाज़ की और गया तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गयी...

जग्गू और मंजू

दोनों अभी बारिश से तो बचे हुए थे पर कपडे गीले होने की वजह से और हवा चलने की वजह से ठण्ड लग रही थी...

फिर भी किसी तरह से खुद को काबू किया हुआ था, पर बारिश काम होने का नाम नहीं ला रही थी ऊपर हवा का हर झौंका दोनों को कंपकंपा के चला जाता था,

मंजू- ुह्ह्ह्ह दिया ये बारिश तो रुक hi नहीं रही लल्ला ठण्ड लगने लगी है हमको तो..

जग्गू- वो तो लगेगी hi मम्मी गीले कपडे पहन रखे हैं हमने ऊपर से हवा,.

मंजू - यही हाल रहा तो कहीं बीमार न हो जाये इस जंगल में...

जग्गू- हाँ मम्मी कुछ न कुछ इंतेज़ाम तो करना होगा और लग नहीं रहा बारिश जल्दी रुकेगी..

मंजू- न जाने बाकि सब कैसे होंगे कोईजगह मिली होगी या बेचारे भीग hi रहे होंगे..

जग्गू- सब समझदार हैं मम्मी उन्होंने कुछ न कुछ ज़रूर कर लिए होगा..

मंजू - पर हम अभी क्या करें?

जग्गू- एक तो ये गीले कपडे सूखने होंगे और दूसरा कैसे भी करके हवा को रोकना होगा..

मंजू- अब जब तक ये बारिश बंद न हो तो कपडे तो सूखने से रहे..

जग्गू- अगर बारिश रुकने के लिए बैठे रहे तो ज़रूर बीमार हो जायेंगे...

मंजू- फिर क्या करें अब्बी...

जग्गू- एक उपाय तो है मम्मी पर थोड़ा अजीब सा है..

मंजू- अजीब सा मतलब बता तो सही..

जग्गू- अजीब सा hi है, समझ नहीं आ रहा कैसे बताऊँ..

मंजू- अरे बता तो फिर देखते हैं कैसा है..

जग्गू ने कुछ पल सोचा और फिर एक गहरी साँस भर के बोलै- हम लोग कपडे उतर देते हैं और तुम्हारी साड़ी और मेरी धोती को मिलकर बहार परदे की तरह बांध देते हैं जिससे बौछार और हवा भी काम हो जाएगी साथ hi हमारा बदन जो कपडे की वजह से भीगा है वो भी सूख जायेगा...

मंजू को कुछ पल लगे जग्गू की बाटत समझने में, और जब समझ आई तो वो बोली- अरे पागल कालक में हमारे अंदर के सरे कपडे ले लिए अब बदन पर बस ये साड़ी और ब्लाउज है अगर ये भी उतर देंगे तो बिलकुल नंगे हो जायेंगे,

अपनी बात बोलकर और अपने बेटे के सामने नंगा होने के ख्याल से hi मंजू के बदन में एक अलग सी सिरहन हुईसाथ hi जग्गू को भी अपनी मम्मी के मुँह से ये सुनकर कुछ ऐसा hi महसूस हुआ..

जग्गू- इसके अलावा तो मुझे कुछ और नहीं सूझ रहा मम्मी,.

मंजू- तू कह तो सही रहा है पर ये मुझे सही नहीं लग रहा, मैं कैसे तेरे सामने बिन कपड़ों के..

जग्गू- मम्मी अगर यही कर्मा और चची ने भी सोचा होता सही या गलत के बारे में तो क्या हम मुक़ाबला जीत पते..

मंजू को जग्गू के बोलने पर एक बार फिर से वो कामुक दृश्य याद आ गया जब एक बेटे ने माँ की चुदाई की थी,.

मंजू- कुछ देर तक कुछ नहीं बोली और कुछ पल बाद hi एक और हवा का झौंका आया साथ hi कुछ पानी की बौछार भी आई... जिससे दोनों एक बार फिर से काँप गए..

मंजू ने इस बार कुछ नहीं कहा पर धीरे से कड़ी हुई और अपनी साड़ी के पल्लू को कंपते हुए हाथों से पकड़ कर नीचे कर लिए...

जग्गू ने जब ये देखा तो उसकी आँखें बड़ी हो गयी...

मंजू ने भी साड़ी को उतारते हुए अपने बेटे की और देखा और बोली- बीटा ज़रा मुँह उधर करले...

जग्गू कुछ बोल तो नहीं पाया पर हाँ में सर हिलाकर दूसरी तरफ मुद कर खड़ा हो गया उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गयी थी उसे लगा नहीं था की उसकी मम्मी उसके सामने नंगी होने के लिए मान जाएगी पर अभी ऐसा हो रहा था पर वो थोड़ा असमंजस में भी था की जब कपड़व उतरने के बाद भी मम्मी को मेरे सामने hi रहना है उतारते हुए, मुँह दूसरी तरफ करने को क्यों बोलै.. ाहयाद मम्मी को अपने बेटे के सामने कपडे उतरने में शर्म आ रही होगी...

जग्गू इसी ूढेबुन में लगा हुआ था वहीं मंजू भी खुद के फैसले से हैरान थी उसे खुद पर यकीन नहीं हो रहा था की वो अपने बेटे के सामने बिलकुल नंगी होने के लिए मान गयी है, पर अपने बेटे के सामने साड़ी उतरने में उसे शर्म महसूस हो रही थी इसलिए उसने उससे दूसरी और मुँह करने को बोलै.....

कुछ पल के इंतज़ार के बाद जग्गू के बगल में उसे कुछ छुआ और उसने देखा तो एक हाथ था उसमे साड़ी थी. जग्गू को समझ आ गया की उसकी माँ की साड़ी है उसके दिल की धड़कने बेहद तेज़ हो गयी उसे इस बात का एहसास था की पीछे उसकी मम्मी नंगी कड़ी है जग्गू का एक मन कर रहा था की अभी पलट कर देखले और दूसरा इस ासभूत नज़ारे से दर रहा था की कहीं अपनी hi सगी माँ को वो नंगा देखकर होश न खो बैठे...

मंजू- ले लल्ला बांध दे इसे बहार..

जग्गू ने आवाज़ सुनकर धीरे से खुद को मंजू की और घुमाया और जो दृश्य उसे दिखा उसे देखकर उसकी साँसे रुक सी गयी..

अनुज और सभ्य

अभी तो दोनों माँ बेटे को बारिश से तो काम से काम राहत मिली थी पर गीले कपडे अब भी उन्हें सत्ता रहे थे, कुछ देर यूँ hi बैठने के बाद सभ्य कुछ परेशां दिखने लगी और इस बात पर अनुज का भी ध्यान गया और गया क्या तबसे उसका ध्यान अपनी माँ पर hi तो था भीगे कपड़ो में माँ का कामुक बदन उसे बेहद लुभावना लग रहा था नज़र हटाए नहीं हैट रही थी.....

अनुज- क्या हुआ माँ कोई परेशानी है क्या..

सभ्य- हाँ? ंन्न नाही ...तो..

अनुज- कुछ परेशान लग रही हो इसलिए पुछा..

सभ्य- ऐसा कुछ नहीं है बस वो तो..

अनुज- क्या वो तो..

सभ्य- अरे कुछ नहीं परेशां मत हो...

अनुज- अरे माँ बताओ न,... बताओ न बताओ ना..

सभ्य- ाचा बाबा अरे मुझे पेशाब जाना है पर हर जगह पानी है कहाँ जॉन..

अनुज- अरे तो बोलना चाहिए था न माँ.. बगल में दीवार के पीछे कहीं भी चली जाओ. .

सभ्य- वहां घुटनो घुटनो से ऊपर पानी भरा है नहीं जा सकती... मैं तेरी तरह खड़े होकर नहीं करती न...

सभ्य ने थोड़ा मुस्कुरा कर कहा..

अनुज- हाँ ये तो मैंने सोचा hi नहीं... एक काम करो न माँ मैं ऊपर चला जाता हूँ थोड़ी देर के लिए तुम यहीं कोने में कर लेना...

सभ्य को भी बहुत तेज़ पेशाब आ रहा था और वो भी किसी तरह से उससे छुटकारा पाना चाहती थी बस बेटे के होने से हिचक रही थी...

सभ्य- नहीं ऊपर वैसे hi तूफ़ान आया हुआ है मत जा..

अनुज- फिर या तो एक काम कर सकते हैं

सभ्य - क्या??

अनुज- आप सीढ़ियों पर कर करलो मैं यहीं रुकता हूँ, सीढ़ियों पर इतना तेज़ बहाव भी नहीं आ रहा की बैठा नजाए...

सभ्य को भी ये उपाय जहाँ तक ठीक लगा,

सभ्य- ठीक है तू यहीं रुक मैं आती हूँ...

अनुज- ठीक है माँ..

सभ्य सीढ़ियों के पास गयी तो पानी का बहाव पहले से काफी तेज़ हो गया था सीढ़ियों पर इतनी बारिश जो हो रही थी

सभ्य ने एक पेअर आगे बढ़ा कर बहाव में रखा तो लड़खड़ा गयी क्यूंकि पानी इतनी तेज़ी से उसके पैरों पर लगा पर सँभालते हुए उसने दीवार को पकड़ लिए...

सभ्य - लल्ला यहाँ बहाव तो बड़ा तेज़ है फिसल जाउंगी मैं..

अनुज- इतनी तेज़ कहा होगा माँ.

सभ्य- खुद आकर देख ले...

अनुज ने जकड देखा तो वाकई बहाव पहले से तेज़ हो गया था पुरी सीढ़ियां पानी से सराबोर होकर बाह रही थी.

सभ्य- एक काम कर मेरा हाथ पकड़ और मुझे एक दो सीढ़ियां चढ़ा दे फिर चले जाना मैं कर लुंगी तो आवाज़ दे दूंगी..

अनुज- ठीक है माँ, आओ चलो...

अनुज का सहारा लेकर सभ्य आगे बढ़ी और दो तीन सीढ़ियां चढ़कर बोली यहाँ ठीक है पर उसे कुछ असहज महसूस हुआ क्यूंकि पानी का बहाव बढ़ता hi जा रहा था...

सभ्य- अनुज यहाँ बहाव बढ़ता जा रहा है एक काम करते हैं... बापिस चल यहाँ मुझे ठीक नहीं लग रहा..

अनुज - फिर पेशाब कहाँ करोगी माँ?

सभ्य- अरे वो बाद में देख लेंगे..

अनुज- ठीक है आओ चलो माँ, अनुज ने सभ्य को सहारा दिया और दोनों सावधानी से नीचे उतर आये, हालाँकि इस मौके का अनुज ने अपनी तरफ से पूरा फायदा उठाया और सभ्य की कमर आदि को उसे सहारा देने के बहाने पकड़ लिए...

नीचे बापिस पहुंचकर अनुज बोलै- अब क्या करना है माँ ..

Sabhya-Samajh नहीं आ रहा क्या बताऊँ कुछ सोचते हैं...

वहीं इतनी देर से रुका हुआ पेशाब उसे परेशां कर रहा था...

अनुज बस अपनी माँ को देखे जा रहा था और उसके फैसले के इंतज़ार कर रहा था फिर बोलै- माँ मैं अभी आया.

सभ्य- कहाँ जा रहा है,

अनुज- मुझे भी पेशाब आ रहा है...

सभ्य- कहाँ जायेगा?

अनुज- यही सीढ़ियों पर,

Sabhya-theek है पर संभल कर बहाव तो देखा है न तूने और ज़्यादा ऊपर काट जाना..

अनुज- नहीं जाऊंगा माँ अभी आया करके... या फिर एक काम करते हैं न माँ..

सभ्य- क्या?

अनुज- मैं सीढ़ियों पर कर लेता हूँ तब तक तुम यहीं कर लेना...

सभ्य- यहाँ??

अनुज- हाँ

सभ्य- चल ठीक है...

अनुज ठीक है जाता हूँ फिर.

अनुज सीढ़ियों पर आ जाता है उसका लुंड न जाने क्यों माँ के पेशाब की बात से तन कर खड़ा हुआ था उसने सीढ़ियों पर जाकर अपनी धोती उठाई पर खड़े लुंड के कारन पेशाब नहीं कर प् रहा था तभी उसे कुछ सूझा और वो घूम कर जानबूझ कर इस तरह से खड़ा हो गया की उसका लुंड का हिंसा दीवार की ओट से बहार रहे...

इधर सभ्य ने भी अनुज के जाने के बाद एक सही सा कोना चुना और वहां जाकर बैठने hi वाली थी की उसने एक बार नज़र घुमाकर सीढ़ियों की और देखा और फिर अचानक से उसकी आँखें एक जगह जैम गयी उसने देखा की उसे अनुज का सख्त लुंड दिख रहा है, जो गीला होने के बाद भी पूरी तरह से खड़ा है, कुछ पल के लिए सभ्य ज्यों की त्यों hi रह गयी .. हालाँकि वो इतना तो जानती थी की उसके पति और कर्मा लुंड के अकार के मामले में कुछ काम नहीं थे वहीं अनुज के लुंड को देखकर उसे ये भी एहसास हुआ की छोटा बीटा भी भाई और बाप से ज़्यादा पीछे नहीं है...

खैर अनुज के लुंड को देखकर सभ्य को एक अजीब सा एहसास हो रहा था, एक बार को जीभ होंठों पर आई फिर बदन में एक सिरहन सी हुई, वो भूल hi गयी थी की उसे पेशाब करनी है बस अपने छोटे बेटे के बड़े से लुंड को निहारे जा रही थी जो बिलकुल सख्त होकर खड़ा था,

अनुज का ये सोच सोचकर बुरा हाल था की क्या सच में उसकी माँ को उसका लुंड दिख रहा होगा, अगर दिखा होगा तो क्या ख्याल आ रहे होंगे उनके मन में, उसके अंदर इतनी हिम्मत तो बिलकुल नहीं थी की एक बार झाँक कर देखले एक दर भी था की कहीं उसकी माँ गुस्सा न हो जाएं...

इसलिए सोचा पेशाब करना भी ज़रूरी है... वैसे पेशाब उसे आ भी रहा था तो थोड़ा खुद को शांत करने के बाद उसने कोशिश की तो लुंड से पेशाब की धार निकलने लगी,

इधर सभ्य जो वशीभूत होकर अनुज के लुंड को देखे जा रही थी उसे अनुज के लुंड से पेशाब की धार निकलती दिखी तो उसे एक झटका सा और लगा, न जाने क्यों उसे अपने बेटे का पेशाब करना बड़ा कामुक लग रहा था उसके शरीर में एक अलग प्रकार की सिरहन हो रही थी वैसी तो बिलकुल नहीं जैसी एक माँ को अपने बेटे के लिए होनी चाहिए पर उससे अलग...

थोड़ी देर लुंड से पेशाब की धार का सील सिला चलता रहा, और फिर धीरे धीरे धार कमज़ोर होने लगी और बंद होने को आ गयी, तब जाकर सभ्य को होश आया की उसने तो पेशाब की hi नहीं, और अब अनुज पेशाब ख़त्म करके बापिस आ जायेगा..

अब क्या करूँ तब से उसके खड़े लुंड को hi देखती रह गयी और अब पेशाब करने का समय hi नहीं है... तभी उसके दिनाग में एक विचार कौंधा, की अनुज का लुंड खड़ा क्यों था ये तो मैंने सोचा hi नहीं... इतनी बारिश और गीला होने पर तो उसे सिकुड़ा होना चाहिए, किसी का भी लुंड खड़ा क्यों होता है जब वो उत्तेजित हो, और अनुज किस्से उत्तेजित होगा यहाँ मेरे अलावा कोई है hi नहीं... तभी उसके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान आ गयी...

सभ्य ने अपनी साड़ी को उठाया और कमर पर पकड़ लिए और नीचे बैठ गयी और मूतने लगी..

इधर अनुज ने अपना मूतना बंद किआ लुंड को धोती से ढाका और सीढ़ियों से बहार निकला hi था की वो फिसलने से बचा वो भी पानी की वजह से नहीं बल्कि सामने का नज़ारा देखकर...

कर्मा और शालू

पेड़ के नीचे से कर्मा ने नज़र उठा कर देखा तो उसका खून सूख गया उसने देखा की पेड़ की शाखाओं से दो बड़े बड़े सांप लटक रहे हैं और ऊपर उन दोनों के अलावा भी कई सांप हैं, कर्मा ने एक बार चिल्लाना चाहा पर उसकी आवाज़ नहीं निकली, किसी तरह से हिम्मत करके धीरे से वो उठा और मौसी का हाथ पकड़ कर खींचता हुआ भागने लगा..

मौसी- जो बेचारी सांस इकठा hi कर रही थी वो हैरान रह गयी की कर्मा उसे क्यों खींच रहा है..

शालू- आह्हः कर्माह छोड़फ्ड क्यों खींच दहाआअह हीी..

कर्मा ने थोड़ा आगे जाकर पेड़ के ऊपर इशारा किआ तो शालू ने पलट कर देखा और देखते hi उसकी आँखें फैट गयी, और वो खुद बा खुद भागने लगी कर्मा ने शालू को भागते देखा तो बापिस देखा और पाया की एक दो सांप उतर कर उसकी तरफ hi बाद रहे हैं बस फिर क्या था कर्मा बे भी दौड़ लगाडी..

दोनों बिना पीछे मुड़े बस भागे जा रहे थे... की अचानक से एक जगह पेअर पड़ते hi दोनों की चीख निकल गयी और दोनों फचक से पानी में जा गिरे,

एक बड़ा सा गड्ढा था और कुछ 6-7 फुट गहरा भी जिसके ऊपर पेड़ पौधे और बेल वगेरा उग आई थी जिससे वो न कर्मा और न शालू किसी को नहीं दिखा और दोनों उसमे जा गिरे, जो की आधे से ज़्यादा पानी से भरा हुआ था... पानी में होने से कर्मा की धोती ऊपर कमर पर इकठी हो गयी थी और यही हाल शालू की साड़ी का हुआ जो की पानी के ऊपर तैर रही थी... अब हालत कुछ ऐसे थे की पहले कर्मा था और उसके ठीक ऊपर शालू थी दोनों की hi धोती कमर से ऊपर थी कर्मा ने दर से और अपनी मौसी को बचने के लिए उन्हें खुद से चिपका रखा था जिसमे कर्मा का एक हाथ मौसी के मुलायम पेट पर था तो दूसरा खुले ब्लाउज में बहार उछलती हुई एक छुच्छी पर...

दोनों गिरने के बाद कुछ पल शांत रहे और देखने लगे की कहीं कोई खतरा तो नहीं, कुछ देर तक कुछ महसूस नहीं हुआ तो थोड़ी जान में जान आई,

कर्मा- बुरे फंसे आज तो मौसी..

शालू- हाँ लल्ला एक के बाद एक मुसीबत काम होने का नाम hi नहीं ले रही...

कर्मा - क्या भयंकर भयंकर सांप थे न..

शालू- हाँ रे ऐसा बड़ा और कला नाग तो मैंने आज तक नहीं देखा,

कर्मा को न जाने क्यों शालू की ये बात दो अर्थी लगी.. और नाग की जगह वो अपने लुंड को रखकर सोचने लगा...

और तभी उसे अपनी स्तिथि का एहसास हुआ की उसका हाथ मौसी के पेट पर दूसरा हाथ एक चुकी पर है उसने देखा की मौसी की साड़ी पानी के ऊपर तैर रही है अपनी धोती भी उसे कमर के आस पास लिपटी हुई दिखी.. कर्मा पीछे थोड़ा झुककर गद्दे की दीवार से तक लगाया हुआ था और मौसी उसके ऊपर थी जैसे गॉड में हो और कर्मा के झुके होने से दोनों की लम्बाई कुछ बराबर hi लग रही थी...

कर्मा के दिमाग को जैसे hi उसकी हालत का एहसास हुआ तुरंत दिमाग की तरंगों को लुंड ने पकड़ लिए और अगले hi पल लुंड कड़क हो गया, जहाँ शालू भी ाव तक इस बात से अनजान थी उसे भी धीरे धीरे अपने चूतड़ों में कुछ चुभता हुआ महसूस होने लगा और सबसे खास बात की इस बार बीच में कपडे की कोई दीवार नहीं थी..

शालू को अपने चूतड़ों पर जैसे hi कर्मा का नंगा लुंड रगड़ता हुआ महसूस हुआ उसका ध्यान अपनी पानी के ऊपर तैरती हुई साड़ी पर गया, कुछ hi पलों में कर्मा का लुंड पूरी तरह खड़ा था और शालू के चूतड़ों को भेदने की कोशिश कर रहा था,

शालू का इस एहसास मात्रा से बुरा हाल हो गया, की उसके भांजे का लुंड नंगा उसके नंगे चूतड़ों पर रगड़ रहा है....

कर्मा भी हर पल के साथ उत्तेजित होने लगा...

शालू के मुँह से शब्द नहीं निकल रहे थे फिर भी वो बोली- ुहम्म कर्माहहह हुम्म्म कब तक इस गद्दे में रहेंगे..

कर्मा ने उत्तेजित होकर अपने हाथों की पकड़ को अपनी मौसी के बदन पर और कास दिया साथ hi हलके हलके छुच्छी को मसलने भी लगा.. और साथ hi मौसी की बात का जवाब देते हुए बोलै- अभी सांप आस पास hi हैं मौसी थोड़ी देर हमें इंतज़ार करना होगा...

शालू- किसका इंतज़ार सांप के बिल में जाने का?

शालू ने भरी सांस लेते हुए कहा..

कर्मा- हाँ मौसी सांप बिल में चला जायेगा उसी के बाद हम निकल सकते हैं..

ये कहते हुए कर्मा ने अपनी कमर को थोड़ा आगे की और धक्का दिया साथ hi मौसी के बदन को अपनी और दबाया जिसका नतीजा हुआ की कर्मा का लुंड मौसी के भरी चूतड़ों की दरार में घुस गया...

ठन्डे ठन्डे पानी के बीच कर्मा के गरम लुंड को अपने चूतड़ों की दरार में महसूस कर शालू का बदन कंपकंपा गया,

शालू- आह्ह्ह्म्म लल्ला और अगर सांप बिल में नहीं गया तो?

कर्मा- ऐसे कैसे नहीं जायेगा मौसी सांप तो बिल में घुस के रहेगा..

कर्मा ने कमर पीछे करके एक और धक्का दिया तो एक पल को उसके लुंड का टोपा शालू के गांड के छेड़ से टकराया जिससे दोनों के मुँह से hi एक बार को एक सिसकी निकल गयी फिर टोपा फिसलता हुआ ऊपर हो गया...

शालू- नहीं लल्ला इतना पानी है कहीं सांप अपना बिल ढूंढ hi न पाए तो..

कर्मा- मौसी सांप की यही तो खूबी होती है वो अपना बिल ढून्ढ कर उसमे घुस hi जाता है...

कर्मा ने एक और धक्का मारा और इस बार उसके लुंड का टोपा नीचे की और दरार में सीधा घुस गया और शालू की छूट के होंठों पर जाकर रगड़ गया...

उस रगड़ के एहसास से मौसी भांजा दोनों गंगना गए..

दोनों के मुँह से hi आह्ह्ह्हह्ह निकल गयी... कर्मा अब खुल कर अपनी मौसी की भरी भरकम छूछीयो को मसलने लगा जिस पर मौसी की तरफ से कोई विरोध नहीं दिखा...

शालू- सांप जल्दी घुस जाये नहीं तो बिल में पानी भर सकता है..

कर्मा- नहीं मौसी कितना भी पानी भर जाये बिल सांप के लिए रास्ता बना hi देता है...

कर्मा ने एक और करारा धक्का मरते हुए कहा.. और शाले के पेट से एक हाथ हटाकर उसने अपनी कमर के इर्द गिर्द लापति धोती को पकड़कर इकठा कर अपने कंधे पर डाला और पूरा नंगा तो था hi अब सही में हो गया, कर्मा ने हाथ वापिस ले जाते हुए, मौसी के खुले ब्लाउज के पैट को पकड़ा और उसे उनकी बाजुओं से निकलने लगा..

शालू- ये उतर क्यों रहा है लल्ला,.

कर्मा - साँपों को धोखा देने के लिए मौसी और..

कर्मा की बात सुनकर शालू ने अपनी बाजु से ब्लाउज निकलने में उसकी मदद करते हुए पुछा - और क्या?

कर्मा- कपडे इतने गीले हो गए हैं की अगर अचानक से भागना हुआ तो दिक्कत देंगे इसलिए..

कर्मा ने शालू के ब्लाउज को पूरी तरह से उसके बदन से अलग करके अपने कंधे पर डालते हुए कहा..

शालू- हाँ लल्ला सही कह रहा है ये मेरी धोती तो देख कैसे टेंट बानी पड़ी है पानी में...

कर्मा- वही तो मौसी इसलिए हमें पहले इन्हे अलग करना होगा..

कर्मा शालू की साड़ी को भी इकठा करता हुआ बोलै..

शालू- जान बचने के लिए भी क्या क्या करना पद रहा है

ये कहकर शालू ने अपने पेट पर बंधी साड़ी को खोल दिया... जिसे कर्मा ने इकठ्ठा कर अपने कंधे पर रखे कपड़ों को साथ बांधकर गद्दे के बहार फेंक दिया,

अब दोनों मौसी और भांजे पूरे नंगे जंगल के बीच में एक पानी से भरे हुए गद्दे में थे, कर्मा का हाथ बापिस मौसी के पेट और चूचियों पर फिरने लगा..

शालू का तो उत्तेजना से बुरा हाल था वो शायद hi कभी इतनी उत्तेजित हुई थी जितनी अभी थी जंगल के बीच अपने भांजे से चिपक कर बिलकुल नंगी होकर कड़ी थी... उसका लुंड शालू के चूतड़ों को बार बार भेद रहा था,

शालू की छूट रह रह कर पानी बहा रही थी जो की गद्दे के पानी में मिल रहा था...

कर्मा हर धक्के के साथ, अपने लुंड को मौसी के चूतड़ों पर बार बार रगड़ रहा था, कभी टोपा गांड के छेड़ को भेदने की कोशिश करता तो शालू अंदर तक गंगंगा जाती वहीं जब जब छूट के होंठों को रगड़ता तो तड़पने लगती...

वहीं कर्मा का भी उत्तेजना से बुरा हाल था उससे और खुद पर काबू नहीं हो रहा था, उसने शालू की कमर को कास के थम लिए और खुद की कमर को पीछे खींचा की तभी एक आवाज़ आई....

जग्गू और मंजू

जग्गू के सामने उसकी मम्मी बिलकुल नंगी कड़ी थी और जग्गू उन्हें देखे hi जा रहा था, मंजू को भी ऐसे अपने बेटे के सामने खड़े होने में बेहद शर्म आ रही थी तो उसी वजह से मंजू ने अपने हाथों से चूचियों और छूट को छुपाने की नाकाम कोशिश करते हुए कहा,

मंजू- अब देख क्या रहा है जा बांध दे न इसे..

जग्गू को जैसे होश आया तो उसने अपनी मम्मी के बदन से नज़रें हटाई और अपनी धोती को भी उतर कर मम्मी की साड़ी के साथ बांधने लगा, अब बहकने की बरी मंजू की थी जो अपने बेटे का सख्त लुंड देखकर उत्तेजित होने लगी, औरत चाहे कितना भी सम्भोग करले पर अपने खुद के बेटे के बारे में ऐसे ख्याल से hi इतनी उत्तेजित हो जाती है जितनी कभी नहीं हो सकती, क्यूंकि माँ का बेटे से जुड़ाव hi ऐसा होता hai...apane अंदर से निकला हुए अपने अंश को बापिस अपनी योनि में लेने भर का ख्याल छूट को कई बार बहाने के लिए काफी होता है ..

जग्गू साड़ी को परदे की तरह बांटने में लगा हुआ था मंजू उसका साथ दे रही थी दोनों hi चुपके चुपके से एक दुसरे के बदन को भी निहार रहे थे जग्गू की आँखें तो अपनी मम्मी की छूछीयों और बड़े बड़े चूतड़ों से नहीं हैट रही थी, वहीं मंजू भी बेटे की टांगों जे बीच झूलता हुआ केला देख कर मदहोश हो रही थी..

कुछ पल बाद साड़ी को बांधने का काम पूरा हो गया अब साड़ी के उस पार बारिश थी जंगल था और इस पार माँ बीटा थे जो की बिलकुल नंगे एक दुसरे के सामने थे वो भी दो खतों में जितनी जगह होती है उतनी जगह में..

मंजू- चलो ये काम तो ख़त्म हुआ..

जग्गू- हाँ बारिश से भी थोड़ी रहत मिलेगी और गीले कपड़ों से भी,

मंजू- न जाने ये बारिश कब बंद होगी, ठण्ड लग रही है,

जग्गू- मुझे भी लग रही है मम्मी इतनी देर से गीले कपडे जो पहन रखे थे न इसलिए,

मंजू- अरे तुझे भी लग रही है इधर आ मेरे पास...

जग्गू थोड़ासमझस में अपनी मम्मी के पास खिसका, दोनों hi इस असाधारण हालत में साधारण रहने का अभिनय कर तहे थे...

जग्गू- क्या हुआ मम्मी

Manju-are हुआ कुछ नहीं हम दोनों को hi ठण्ड लग रही है न तो आ थोड़ा सात के बैठ जाते हैं बदन की गर्मी मिलेगी..

अपनी मम्मी के बदन से सटने के ख्याल से hi जग्गू खुश हो गया

जग्गू- मम्मी सही उपाय है, तुम्हे ज़्यादा ठण्ड लग रही है, आ जाओ तुम मेरे आगे बैठ जाओं,.

जग्गू एक तरफ दीवार से तक लगा कर और टंगे खोल कर बैठ गया,

मंजू- अरे लल्ला ठण्ड तो बहुत लग रही है..

ये कहकर मंजू उठी और जग्गू के आगे उसकी टैंगो के बीच बैठ गयी और पीछे होकर अपनी पीठ को अपने बेटे के सीन्स से चिपका दिया और अपना सर उस्क्स कंधे पर रख दिया..

Jaggu-ab ठीक है,

मंजू- हाँ लल्ला अब थोड़ी रहत सी लग रही है और गर्मी का एहसास हो रहा है,

मंजू ने अपनी पीठ पर बेटे के लुंड की रगड़ को महसूस करते हुए कहा..

जग्गू ने भी अपने दोनोहाथों को मम्मी की बाजुओं के नीचे से निकल कर उन्हें खुद से चिपका लिए और दोनों हाथों को पेट पर रख कर सहलाने लगा...

अपनी माँ के बदन से इस तरह से सटाकर जग्गू को एक अजीब और अलग प्रकार की उत्तेजना हो रही थी, वहीं इस भाव से मंजू भी अछूती नहीं थी जो नंगी अपने बेटे की बाहों में थी..

मंजू- हाय जीवन भी क्या चीज है न...

जग्गू- क्या हुआ मम्मी ऐसे क्यों बोल रही हो जग्गू ने अपनी मम्मी के पेट को सहलाते हुए कहा...

मंजू- ऐसा लगता है कुछ दिन पहले की बात है, जब तू मेरी गॉड में नंगा खेलता था, और आज देख..

जग्गू भी ये बात सुनकर सोचने लगा की आज उसकी गॉड में उसकी नंगी मम्मी है,

जग्गू- सच कहा मम्मी ये तो है,

मंजू - हम जानते हैं की जैसे जैस तू बढ़ा होता गया हमारा ध्यान तुझसे हटाता गया,

जग्गू- ऐसा तो नहीं है मम्मी..

मंजू- ऐसा hi हुआ लल्ला, भग्गू की हरकतों से दिमाग में बस उसी की चिंता रहती थी, तूने कभी चिंता नहीं दी तो तुझ पर इतना ध्यान hi नहीं गया ..

Jaggu-iska मतलब मुझे भी चिंता देनी चाहिए थी तुम्हे.. हहहहए.

मंजू- पागल, पर आज देख हम कितने आराम से एक दुसरे की बाहों में बैठे हैं घर से इतनी दूर जंगल के बीच जहाँ कभी किसी ने नहीं सोचा था...

जग्गू ने अपनी मम्मी के पेट को मसलते हुए कहा

जग्गू- अब जो चला गया सो चला गया मम्मी, अभी तो हम साथ हैं बस यही ाचा है....

मंजू- हाँ लल्ला बड़ी शांति सी मिल रही है तेरी गॉड में...

जग्गू- सच्ची मम्मी,

जग्गू ने मंजू को और कास के खुद से चिपकाया जिससे उसका हाथ जो पेट पर था वो मंजू की एक विशालकाय चुकी पर आ गया जिसे जग्गू ने फिर हटाया भी नहीं ..

मंजू- बिलकुल lalla...bilkul सच्ची...

जग्गू- मुझे भी बहुत ाचा लग रहा है नुममय..

जग्गू ने एक हाथ पेट पर और एक हाथ चुकी पर सहलाते हुए कहा...

मंजू- ाचा क्या ाचा लग रहा है तुझे?

जग्गू- तुम्हे बाँहों में भर के बैठना...

मंजू- हमें बाहों में भर के बैठना या हमारे दुद्दू सेखेलना..

मंजू ने मज़ाक करते हुए पूछा..

एक बार को तो जग्गू इस बात से झेंप गया पर जब उसे एहसास हुआ की उसकी मम्मी मज़ाक कर रही हैं तो उसका हौसला और बढ़ गया..

जग्गू- दूध से खेलने में तो और मज़ा आ रहा है,..

जग्गू ने अपना दूसरा हाथ भी अब अपनी मम्मी की छूछीयों पर रख लिए और अब दोनों से मम्मी की बड़ी बड़ी छूछीयों को दबाने लगा..

मंजू- आह्ह्ह्ह आराम से लल्ला..

जग्गू को और ख़ुशी हुई की उसकी मम्मी उसे रोक नहीं रही बस आराम से करने को कह रही है...

जग्गू- कितने बड़े दूध हैं तुम्हारे मम्मी मज़ा आता है पकड़ने में...

मंजू- ाचा एक बात पूछूं...

जग्गू- हाँ मम्मी पूछो न.

मंजू- तू इन्हे सच में दूध बोलता है या कुछ और बोलता है..

जग्गू- कुछ और मतलब.

Manju-apane दोस्तों के सामने किस नाम से पुकारता है...

Jaggu-kya मम्मी तुम भी..

जग्गू अब पूरी आज़ादी के साथ मज़े से अपनी मम्मी की छूछीयों को मसल रहा था...

मंजू- मुझे नहीं बताएगा

जग्गू- वो छुछियां..

मंजू- हम्म्म चूचियां,

दोनों माँ बीटा को आपस में ऐसी बात करने में बड़ा मज़ा आ रहा था साथ hi उत्तेजित भी हो रहे थे...

जग्गू- हाँ छुछियां...

Manju-to कैसी लगी?

जग्गू- क्या...

मंजू- मेरी चूचियां...

Jaggu-bahut अछि हैं मम्मी इतनी बड़ी बड़ी, पर अभी मन नहीं भरा...

Manju-acha मन कैसे भरेगा फिर...

जग्गू समझ गया अभी तो रास्ता क्लियर है वैसे भी वो और उत्तेजित हो गया था तो उसने दोनों छूछीयों को अचे से मसलना शुरू कर दिया...





मंजू- ahhhhhhhhhh लल्ला..

जग्गू- इनसे कभी मन नहीं भर सकता मम्मी

जग्गू ने मंजू के कान को चूमते हुए कहा... जग्गू बेहद उत्तेजित हो चूका था, उधर मंजू भी चूचियों पर बेटे के हाथ पीठ पर रगड़ता उसका लुंड और साथ hi ये मौसम... मंजू भी उत्तेजना के सागर में गोते लगा रही थी...

Manju-ohhh लल्लाह सिर्फ दबाने का hi मन कर रहा है क्या तेरा...

जग्गू को जैसे hi बात समझ आई वो ख़ुशी से भर गया..

जग्गू- नहीं मम्मी मन तो बहुत कुछ कर रहा है..

मंजू- ाचा और क्या कर रहा है मन..

जग्गू- बताऊँ या करके दिखाऊं...

मंजू- जैसा तेरा मन करे बीटा...

बस फिर क्या था जग्गू तुरंत मंजू के पीछे से हटा और उसके सामने आ गया...

मंजू तो बस अपने बेटे को देखे जा रही थी और उसके अगले कदम का इंतज़ार कर रही थी...

जग्गू आगे बढ़ा.....

इसके बाद क्या हुआ अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्
 
मंजू- ाचा और क्या कर रहा है मन..

जग्गू- बताऊँ या करके दिखाऊं..

मंजू- जैसा तेरा मन करे बीटा..

बस फिर क्या था जग्गू तुरंत मंजू के पीछे से हटा और उसके सामने आ गया..

मंजू तो बस अपने बेटे को देखे जा रही थी और उसके अगले कदम का इंतज़ार कर रही थी.

जग्गू आगे बढ़ा...



अपडेट 148


जग्गू ने हलके से मुँह को आगे बढ़ाया और होंठों को अपनी माँ के नंगे मांसल पेट पर रख दिया,

मंजू- ahhhhhhhhhh लाल्ल्लाहहह

मंजू ये कहती हुई पीछे की और लेट गयी इधर जग्गू को भी जैसे खुली छूट मिल गयी अपनी मम्मी के बदन को भोगने की... जग्गू रह रह कर अपनी माँ के बदन को चाटने लगा,

पेट की खाल को ज़ुबान से चाटता और फिर होंठों में भरता, मंजू तो अपने बेटे की हरकतों से पागल सी होती जा रही थी.. पेट को चूमते चाटते हुए जग्गू ने अपनी जीभ को मम्मी की नाभि में घुसा दिया तो मंजू का बदन तो कुछ पल के लिए बिलकुल अकड़ hi गया, वहीं जग्गू तो जैसे मम्मी की नाभि के रास को पीकर जन्नत में था...

मंजू- हाय दैयाआआह्ह्ह्ह लाल्ल्लाःह्ह्ह मानहहह..

जग्गू लगातार जीभ को नाभि में में ऐसे घुसा रहा था जैसे वो नाभि नहीं छूट हो और उसकी जीभ लुंड हो और वो नाभि की चुदाई कर रहा हो...

काफी देर तक नाभि की चुदाई के बाद जग्गू ने अपनी जीभ को बहार निकला तो मंजू की नाभि पूरी जग्गू के थूक से सनी हुई थी... अब जग्गू ने ऊपर बढ़ना शुरू किआ और जैसे की वो अपना और साथ hi अपनी मम्मी का संयम जांच रहा हो उसने अपनी मम्मी की तड़पती चूचियों को एक बार फिर से इंतज़ार करवाते हुए और ऊपर की और चेहरा कर लिए और सीधा अपनी मम्मी के चेहरे के सामने आ गया, दोनों माँ बेटे की आँखें मिली, दोनों को hi आँखों में एक दुसरे के बदन की भूख साफ़ थी, फिर न जाने मंजू को क्या हुआ वो अपने hi बेटे से शर्मा गयी और उसने आँखें बंद कर्ली...

जग्गू को मम्मी की ये अदा और भ गयी साथ hi उसने अपने चेहरे को झुका दिया और अपने होंठों को मम्मी के तदप्तु सुलगते होंठों पर रख दिया...

मंजू को ज्यों hi अपने होंठों पर बेटे के होंठ महसूस हुए उसके बदन में बिजली दौड़ गयी, उसके हाथ बेटे के बदन पर कास गए, जग्गू जो अब तक अपनी कोहनी के बल पर था अपनी माँ के बदन पर छ गया, मंजू की चूचियां बेटे के सीने में धंस गयी..

वहीं ऊपर हो होंठों की एक अलग कहानी चलने लगी..

माँ बेटे के होंठों की गुथम गठी चल रही थी, जग्गू को अपनी मम्मी के होंठों से तो जैसे न जाने कौनसा रास निकल रहा था जो उसे इतना भ रहा था की उसका जोश हर बढ़ते पल के साथ बढ़ता जा रहा था, वो पूरी शिद्दत और जोश से मम्मी के होंठों को चूस रहा था और मंजू भी उसका उतना hi साथ दे रही थी.. कुछ hi पालो में दोनों की जीभें आपस में अटखेलियां करने लगी, जैसे नाग नागिन आपस में लिपटे हुए हो, जग्गू का लुंड ुत्तर्जना से फटने को हो रहा था और अपनी मम्मी की नंगी जांघ में बार बार घिस रहा था.... वही उसकी मम्मी की नंगी गरम छूट भी खूब रास बहा रही थी,

जब दोनों के होंठ अलग हुए तो दोनों बुरी तरह से हांफ रहे थे, माजू की तो जैसे सांस hi चढ़ी हुई थी,

जग्गू ने होंठों को छोड़ा तो इतनी देर से तरस रहे चूचियों पर ध्यान दिया जो न जाने कितने वर्षों से बेटे से दोबारा मिलान की इच्छा लिए हुए तड़प रहे थे, जग्गू ने नीचे सरकते हुए दोनों छूछीयों को हाथों में भर लिए और अगले hi पल अपने मुँह को उनके बीचे घुसा दिया और पागलों की तरह चूमने चाटने लगा...





मंजू- आह्ह्ह्ह लाल्ल्लाःह्ह्ह पीले अपनी मम्मी के दूध को ाष्ठ न जाने कितने सालो बाद आज तू फिर से िहने चूस रहा है...

जग्गू- ुहम्म्म्म अह्ह्ह्हम्म्म

जग्गू तो जैसे मम्मी की छूछीयों को पाकर पागल hi हो गया था और खूब ज़ोर से और पूरे जोश के साथ उन्हें चूस रहा था...

मंजू- अह्ह्ह्हब बच्चाःह्ह्हह्ह धीरी सीएइआह्ह्ह्ह यहीइ हूँ मैंनं...

जग्गू जी भरके अपनी मम्मी की उन्नत छूछीयो को पीटा रहा, और जब हटा तो उसने दोनों छूछीयों को थूक से सना दिया था, बहार से आती हलकी रौशनी में मंजू की चूचियां चमकने लगी थी...

जग्गू हांफते हुए मंजू की आँखों में देखते हुए इतनी देर बाद कुछ बोलै- मम्मी दूध तो इतने सालो बाद बापिस मिल गए पर...

मंजू- ओह्ह्ह है लल्ला अब क्या रह गया पर के लिए....

जग्गू- एक ऐसी चीज़ और है जिससे मैं जनम से hi नहीं मिला हूँ, सोचता हूँ आज उससे भी मिल लूँ..

मंजू- क्या ऐसी क्या चीज़ है...

जब मंजू को जग्गू की बात समझ आई तो वो बोलते बोलते चुप हो गयी...

जग्गू ने अपनी मम्मी की ख़ामोशी को हाँ समझा और चूचियों से धीरे धीरे नीचे खिसकने लगा एक बार नाभि को चूमा तो मंजू एक बार और सिसकी, साथ hi हर बढ़ते पल के साथ मंजू की धड़कन तेज़ होती जा रही थी उसे पता था की वो बेटे के सामने नंगी लेती है पर अभी जो जग्गू ने कहा उससे ये साफ़ था की वो छूट जिससे वो बर्षों पहले निकला था आज उसी को बापिस करीब से देखने वाला है,

मंजू- ुह्ह्हह्ह बेटाः ननननहहीइ..

जग्गू आज कुछ सुनने के नहीं बल्कि करने के मूड में था वो भी अपनी मम्मी के बदन के साथ और फ़िलहाल उसका लक्ष्य उसकी मम्मी की रसीली छूट थी..

कुछ hi पालो में जग्गू का चेहरा मम्मी की छूट के ऊपर था, जग्गू ध्यान से अपनी मम्मी की छूट को देखने लगा,

रसीली गीली छूट देखकर जग्गू को एक अजीब सा एहसास हो रहा था, उसे यकीन नहीं हो रहा था ये वही छूट है जिसमे से वो जन्मा है उसने कभी सोचा नहीं था की कभी ऐसा होगा, पर आज का दिन न जाने क्या लेकर आया था की वो और उसकी मम्मी एक दुसरे के सामने बिलकुल नंगा हैं..

मंजू का तो उत्तेजना और अजीब प्रकार की बेसब्री से बुरा हाल था उसे यकसँ नहीं हो रहा था की वो अपने बेटे को अपनी छूट दिखा रही है वो भी इतने करीब से, मंजू को अपनी छूट पर जग्गू की साँसे भी महसूस हो रही थी... हुए फिर उसे अपनी छूट पर अपनी गरम छूट पर कुछ और महसूस हुआ,

जग्गू अपनी मम्मी की छूट का गीलापन और गर्मी को देख और महसूस कर रहा था सामने एक गरम गदराये बदन की औरत की नंगी छूट थी और सबसे बड़ी बात वो गदराई हुई औरत उसकी माँ थी जग्गू को ये ख्याल बार बार इतना उत्तेजित कर रहा था की उसे लग रहा था की उसका दिमाग और लुंड दोनों उत्तेजना से फैट जायेगा...

लुंड की नसें दर्द कर रही थी, जो जग्गू के लिए असहनीय होता जा रहा था, फिर एक पल ऐसा आया जब जग्गू के साबरा का बांध टूट गया और उसने मम्मी की टैंगो के बीच में hi बैठे बैठे अपने चेहरे को ऊपर किआ और खुद आगे खिसक गया साथ hi अपने तपते लुंड को उसने अपने कंपते हुए हाथों से थमा, उसकी आँखें उत्तेजना में जल रही थी..

वहीं उसकी मम्मी की आँखें अब भी बंद थी, जग्गू ने एक बार मम्मी के चेहरे की और देखा और फिर अपने लुंड को पकड़कर अपनी मम्मी की गरम और गीली छूट पर रख दिया...

मंजू को छूट पर एक गरम एहसास हुआ और जैसे hi उसे समझ आया ये क्या हो सकता है वो चौंक गयी, अपने मन में कल्पना करना अलग बात है पर सच में वैसा कर जाना बहुत बड़ी बात है, मंजू को इस बात का एहसास हुआ तो उसने तुरंत आँखें खोली और गर्दन उठा कर देखा तो पाया की उसके बेटे का लुंड उसकी छूट के होंठों के ऊपर है, एक पल को तो ये नज़ारा देख कर hi वो पिघलने सी लगी पर किसी तरह से खुद को सँभालते हुए बोली- जजजजजागग्गूऊ लल्ला नाहठी एई सही नहीं haiiiiiiiiiiiiiaaahhhhhh..

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इसके आगे मंजू कुछ नहीं कह पाई क्यूंकि जग्गू ने और न इंतज़ार करते हुए कमर को आगे की और धकेला...

माँ बीटा दोनों की नज़रें छूट और लुंड पर hi तिकी हुई थी और दोनों की नज़रों के सामने hi बेटे का लुंड माँ की छूट के होंठों को खोलता हुआ अंदर घुस गया,





लुंड के घुसते hi माँ बेटे दोनों की एक चीख निकली जो की जंगल में कहीं गम हो गयी,

मंजू- ायाह्ह्ह लाल्ल्लाःह्ह्ह एईई क्याआअह्ह्ह कर दिया... आअह्ह्ह्हह

जग्गू तो जैसे जन्नत में पहुंच गया था अपनी hi मम्मी की छूट में लुंड घुसकर , उसे ऐसा कभी महसूस नहीं हुआ था,

जग्गू- ओह्ह्ह्ह मम्मी आह्ह्ह्हह्ह कीत्नीईई गरममममन हैईईई अह्ह्ह्ह बहुतत्त मज़ाआठ आए रहा है...

मंजू- ओह्ह्ह्हह्हह लाल्ल्लाःह्ह्ह अपणीइइइइइइ hi माँ को छोड़ड़ड़ड़ दिया तुणीऐ और तुझे मज़ाआ आ रहा है...

जग्गू- हाँ मम्मी ahhhhhhhhhh और ऐसा मज़ा कभी nahiiiiiiiiiiiiiiii आया

जग्गू ने ये कहकर एक धक्का और लगाया तो उसका लुंड पूरा उसकी माँ की छूट में समां गया...

मंजू- ahhhhhhhhhh पूरा घुसा दिया तूने अपणीइइइइइइ मा के अंदर... अह्हह्ह्ह्ह तुझे शर्म नहीं आ रही..

जग्गू- इतने सैलून बाद एक बार फिर से अपने जन्मस्थान से मिला हूँ मम्मी इसमें कैसी शर्म..

जग्गू ने अब कमर हिलाते हुए कहा.. और अब अपनी मम्मी को छोड़ने लगा...

मंजू को उसकी और जग्गू की बातें उत्तेजित कर रही थी इसी लिए वो खुद से भी बोलकर इस अद्भुत आनंद का मज़ा ले रही थी...

इधर जग्गू तो अपनी मम्मी को छोड़ते हुए पूरे जोश में आ चूका था उसकी कमर खुद बा खुद गति बढ़ा रही थी आज उसे अपने अंदर एक अलग hi आत्मविश्वास का एहसास हो रहा था, क्यूंकि अभी तक उसे जितनी भी छूट नसीब हुई थी वो सब कहीं न कहीं कर्मा की वजह से मिली थी, ये पहली बार था की वो खुद से किसी को छोड़ रहा था और वो भी और कोई नहीं अपनी सगी माँ को...

मंजू भी शुरुवात की हिचकिचाहट के बाद अब चुदाई के बहाव में बाह रही थी छूट में लुंड होना ऊपर से लुंड जब बेटे का हो तो माँ की उत्तेजना कितनी बढ़ सकती है इसका अंदाज़ा लगाना बड़ा मुश्किल है..

यही हाल मंजू का था, जग्गू तो मम्मी की कमर थामे अपनी आँखें बंद किये हुए लगातार अपने लुंड से मम्मी की छूट की जबरदस्त कुटाई किये जा रहा था,





मंजू- ahhhhhhhhhh लाल्ल्लाहहह ahhhhhhhhhh आह्ह्ह्हम्म्म्म ओह्ह्ह्हह्ह ढैय्या छोड़ड़ड़ड़ अपणीइइइइइइ मम्मी कोऊ आईसीईईई hiiiiiiiiii..

जग्गू- ओह्ह्ह्ह मम्मी ओह्ह्ह आअह्ह्ह्हह क्याआअह्ह्ह मस्त चुत है तुम्हारी...

मंजू- ahhhhhhhhhh तो छोड़ड़ड़ड़ड़ इसे औररे तेज़ लाल्ल्लाःह्ह्ह बंजा मादरचोद...

दोनों hi अपने होश खो कर चुदाई के नशे में खो चुके थे, बहार अलग तूफान था और इस पठार के ऊपर माँ बेटे के बीच एक अनोखा तूफ़ान आया हुआ था जिसने माँ बेटे के रिश्ते को hi पूरी तरह से बदल दिया था....

जग्गू अपनी मम्मी के मुँह से मादरचोद बनने की बात सुनकर जैसे पागल सा हो गया और कुछ तगड़े धक्के उसने मंजू की छूट में लगाए और फिर सर ऊपर कर के एक बार गुर्राया और उसकव साथ hi उसके लुंड ने अपनी मम्मी की छूट में अपनी धार मारनी शुरू कर दी...

मंजू को जब ये एहसास हुआ की उसका बीटा उसकी छूट को अपने रास से भर रहा है तो इस ख्याल मात्रा से hi उसका बदन अकड़ने लगा और वो भी बेटे का साथ देते हुए झड़ने लगी.... मंजू के मुँह से सिसकियाँ पर सिसकियाँ निकल रही थी,

मंजू- ahhhhhhhhhh मेरा लल्लाह ओह्ह्ह एरा राजाहहह...

जब दोनों स्खलन के वेग से नीचे उतरे और आँखें खुली तो दोनों की नज़रें मिली, अब दोनों के बीच का रिश्ता पूरी तरह से बदल चूका था, जग्गू अपनी मम्मी को और मंजू अपने बेटे को बस देखे जा रही थी, धीरे धीरे बिना कुछ बोले जग्गू जो अब तक मंजू की टैंगो के बीच बैठा था आगे की और झुकने लगा उसका लुंड जो अब भी बिलकुल कड़क था मम्मी की छूट में hi समाया हुआ था और शायद उसी की गर्मी थी जो बेटे के लुंड को बैठने नहीं दे रही थी, धीरे धीरे जग्गू पूरा अपनी मम्मी के मांसल बदन पर छ गया, दोनों के चेहरे एक दुसरे के सामने आये, और फिर मंजू ने प्यार से हाथ जग्गू के चेहरे पर फेरा और बोली- आखिर कर ली तूने अपने मन की..

जग्गू- हाँ मम्मी वैसे तुम्हे कैसे पता मेरे मन में यही था,

मंजू- औरत हर नज़र पहचान जाती है बीटा और तू तो मेटा बीटा है तेरे मन में क्या है नहीं जानूँगी...

जग्गू प्यार से मंजू के होंठ चूमता है और बोलता है- और तुम्हारे मन की क्या मम्मी, तुम्हारे मन में क्या था ...

मंजू- तू भी न दिमाग से गधा hi है, तेरे नीचे नंगी लेटकर तुझसे छुड़वा रही हूँ और तू पूछ रहा है मेरे मन में क्या थी...

जग्गू अपनी मम्मी के खुले शब्दों से थोड़ा हैरान हुआ फिर सोचा ऐसी hi तो हैं उसकी मम्मी जो मन में आया बोल दिया, जग्गू बापिस धीरे धीरे से कमर चलते हुए मम्मी को छोड़ने लगा,

जग्गू- सच मम्मी क्या तुम भी मेरे साथ छह चुदाई करना चाहती थी...

मंजू- ुहह्म्म ऐसे hi मज़ा आ रहा है करता रह अह्ह्ह क्या पुछा तूने... अरे हाँ ऐसा सोचा तो कछु नहीं था पर बन्नो और कर्मा को देखकर मन में ख्याल आने लगे थे..

जग्गू- और वही ख्याल आज सचाई है..

जग्गू ने आगे बढ़ाते हुए अपनी मम्मी के रसीले होंठों को मुँह में. भर लिए और चूसते हुए नीचे से थापें लगाने लगा...

एक बार फिर से चुदाई का सिलसिला शुरू हो गया माँ बेटे छूट और लुंड की जुंग में भागीदार बन गए...

जग्गू ताबड़तोड़ धक्के लगा कर अपनी मम्मी को सम्भोग सुख प्रदान कर रहा था.. दोनों माँ बेटे पूरी तरह से खुल चुके थे,

जग्गू- हाआनंनं मुम्ममय आह्ह्ह्ह क्या चुत है तुम्हारी... अह्ह्ह्हह

मंजू- ahhhhhhhhhh लाल्ल्लाहहह तेरा लुंड भी बहुत मज़े दे रहा हीी... आह्हः ऐसे hiiiiiiiiii अंदर तक दाल के छोड़...

जग्गू - ओह्ह्ह्ह आह्ह्ह्हह मम्मी ..

मंजू- छोड़ड़ड़ड़ साली दिखायःहःहः कितना बड़ा मादरचोद हीी टूउउ आह्ह्ह्हह...

Jaggu-apani मम्मी के मुँह से गली सुनकर चौंक भी गया साथ hi उत्तेजित भी हो गया..

जग्गू- आह्ह्ह्हह हांण मैं दिखाआता हूँ कितना बड़ा मादरचोद हुन्न्न मैं आह्ह्ह्ह ले मम्मी अपने बेटी का लुँड्ड़डडडड कहा जाहूऊ..

मंजू- ahhhhhhhhhh लाल्ल्लाहहह खा गयी मेरिइइइइ प्यासी छूट तेराः लुंड निगलललल गयी अह्हह्ह्ह्ह..

जग्गू- अह्ह्ह्हह क्या मस्त माल हो मम्मी तुम सोचा नहीं था अझ ऐसा भी देखने को मिलेगा...

मंजू- ahhhhhhhhhh लाल्ल्लाहहह अभी तो तूने कुछ देखा hi कहनननन haiiiiiiiiiiiiiaaahhhhhh अभी देखेगा अपणीइइइइइइ मम्मी कहाः रंडी आवला चेहरा...

जग्गू- औरर क्या रंडी बनेगी साली बेटे से चुद रही है अब क्या एक साथ तीन तीन से छुड़ेगी अह्ह्ह्ह

मंजू- ahhhhhhhhhh लाल्ल्लाहहह हानंन्न छोडूंगी तीन तीन लुन्डों से छोड़ना है मुझे...

जग्गू तो इस ख्याल से hi बेकाबू होने लगा ...

जग्गू - अह्ह्ह्हह्ह्ह्ह ले साली आज तेति छूट का भोसड़ा बना दूंगा..

मंजू- आह्ह्ह्हह्ह बना दे बीटा. अह्हह्ह्ह्ह अब ये टेरिइइइ hi हैईईई और ज़ोर से पेल आह्हः

जग्गू- अह्ह्ह्हह मम्मी पता होता तुम इतनी चुड़क्कड़ हो तो कब का छोड़ दिया होताहहह

मंजू- ahhhhhhhhhh लाल्ल्लाहहह तो अब निकाल ले सरई कसररररर.

जग्गू अपनी मम्मी की बातों और साथ hi चुदाई से और जोश में आ गया और फिर ताबड़तोड़ चुदाई करने लगा, कुछ देर बाद एक बार फिर उसे अपना रास लुंड में भरता हुआ महसूस हुआ तो उसकी गति और बढ़ गयी, और कुछ hi पालो में उसके लुंड ने एक बार फिर से रास छोड़ना शुरू कर दिया जो की हर धक्के के साथ मंजू की छूट से रिस रिसकर बहार आने लगा..





मंजू को भी एक बार फिर से अपनी छूट बहती हुई महसूस हुई... साथ hi जग्गू की थापें भी कुछ गहरी लगी तो वो समझ गयी की उसका बीटा एक बार फिर से उसकी छूट में झाड़ गया है..

मंजू प्यार से अपने बरते के चेहरे को देखे जा रही थी झड़ते हुए उसके बदलते भाव, गहरी सांस लेना, झड़ने के बाद जग्गू अपनी मम्मी के ऊपर लेट गया और होंठों को चूसने लगा, कुछ देर बाद जब दोनों के होंठ अलग हुए तो मंजू बोली- हॉट अब ऊपर से डाब रही हूँ मैं..

जग्गू- मुस्कुराता हुआ घूम गया और मुम्ममय के बगल में लेट गया..

जग्गू- अब ठीक..

मंजू- हाँ अब सांस आई है ठीक से,

दोनों कुछ देर तक यूँ hi लेते रहे फिर मंजू बोली- सुन लाल्ल्लाहहह जो भी कुछ अभी हुआ उसके बाद हमारा रिश्ता बदल तो नहीं जायेगा..

जग्गू- बदल तो गया है मेरी प्यारी मम्मी..

जग्गू ने एक हाथ से मंजू के पेट को मसलते हुए कहा..

मंजू- अरे वैसे नहीं अब क्या तू मेरा उतना hi सम्मान करेगा जैसे पहले करता था...

जग्गू- अरे मम्मी तुम मेरी माँ हो और हमेशा रहोगी और जो भी अभी हुआ आगे भी होगा पर इसमें हमारे बीच के माँ बेटे रिश्ते में कोई दरार नहीं आएगी..

मंजू- ऐसा hi हम चाहते हैं लल्ला..

ये कहकर मंजू उठने लगी..

जग्गू- कहाँ जा रही हो मम्मी?

मंजू- अरे तूने अपने रास से छूट को भर दिया है, और पेशाब भी आ रहा है..

इसके बाद मंजू उठी और उठकर बहार की तरफ साड़ी नुमा परदे को हटाकर पत्थर के किनारे बैठ गयी..

जग्गू भी उठकर बैठ गया उसकी मम्मी की पेशाब की बात से उसे थोड़ी उत्तेजना होने लगी थी.. उसका लुंड फिर से तनाव दिखने लगा..

अपनी मम्मी को मूतने के लिए बैठते हुयव वो भी बिलकुल नंगी देखना किसी भी बेटे के लिए बहुत बड़ी बात होती है और जग्गू के लिए भी उतनी hi थी, बैठने पर मंजू के फैले हुए कूल्हे देखकर जग्गू का हाल और ख़राब होने लगा और तभी उसके कानो में एक सीटी की आवाज़ आई जिसे सुनकर उसका लुंड पूरा तन गया, उसे पता था की औरत के मूतने पर सीटी की आवाज़ आती है और ये ख्याल की उसके सामने बैठकर उसकी माँ मूट रही है... इस ख्याल ने जग्गू को हिला कर रख दिया, साथ hi मम्मी के फैले हुए चूतड़ देखकर उसके मुँह में पानी आने लगा..

जग्गू खुद बा खुद उठा और धीरे से चलते हुए अपनी माँ के पास पंहुचा, उसका लुंड पूरी तरह से अकड़ चूका था, अपनी मूत्ति हुई मम्मी के बगल में जाकर जग्गू खड़ा हो गया, मंजू को जब एहसास हुआ की उसके बगल में कुछ आहात हुई तो उसने सर उठाकर एक तरफ देखा और चेहरा घुमते hi उसका चेहरा जग्गू के खड़े लुंड से टकरा गया..

Manju-ohhh है दिया मुये डरा hi दिया हमको.. और ये का फिर से खड़ा कर लिए तूने ये..

जग्गू- बस मम्मी तुम्हे देखकर हो गया अपने आप..

जग्गू ने लुंड को हाथ से पकड़कर अपनी मम्मी के चेहरे पर रगड़ते हुए कहा...

मंजू को भी अपने चेहरस पर बेटे के लुंड का गरम स्पर्श ाचा लगने लगा...

जग्गू ने चेहरे पर घिसते हुए धीरे से टोपे को मम्मी जे होंठों पर रखकर धक्का दिया तो मंजू के होंठ खुल गए और लुंड का टोपा धीरे से अंदर घुस गया...

मंजू को अपने बेटे का लुंड अपनी जीभ पर महसूस हुआ, तो उसके बदन में भी झुरझुरी छाने लगी धीरे धीरे से उसने जग्गू के लुंड चूसना शुरू कर दिया, इधर जग्गू जैसे जन्नत में था दो बार माँ की छूट में झड़ने के बाद अब उसका लुंड उसकी माँ के गरम मुँह में था, और उसकी माँ भी पूरी लगन से उसे चूस रही थी...

धीरे धीरे से जग्गू आक्रामक होने लगा और लुंड को अंदर तक गले में घुसा घुसा कर अपनी माँ के मुँह को छोड़ने लगा, मंजू तै को भी ऐसी मुँह चुदाई से तकलीफ हो रही थी पर वो रुकने को नहीं बोल रही थी... बेटे का लुंड हलक तक चोट कर रहा था पर मंजू कहाँ पीछे रहने वाली थी...

जग्गू भी तब तक काफी आक्रामक हो चूका था उसकी उत्तेजना उस पर हावी हो चुकी थी

कुछ और झटके लगाने के बाद एक बार फिर से जग्गू गुर्राया और एक बार फिर से उसके लुंड ने रास की धार छोड़नी शुरू कर बस फ़र्क़ सिर्फ इतना था की इस बार रास की धार उसकी मम्मी की छूट में नहीं मुँह में गिर रही थी कुछ धार मुँह के अंदर छोड़ने के बाद जग्गू ने लुंड को बहार खींचा तो मंजू का मुँह ज्यों का त्यों खुला रह गया, और जग्गू अपने मम्मी के खुले मुँह में hi रास की धार मारने लगा





मंजू भी बंद आँखों के साथ सिर्फ बेटे के रास की धार को अपनी जीभ और होंठों पर गिरता हुआ महसूस कर रही थी...

जितना भी रास जग्गू के लुंड ने उगला मंजू उसे सारा का सारा जातक गयी वो भी बड़े स्वाद से...

जग्गू झड़ने के बाद बापिस दीवार से टिक कर बैठ गया और हांफने लगा कुछ पल बाद मंजू भी बेटे के बगल में आकर लेट गयी, दोनों hi काफी संतुष्ट लग रहे थे जग्गू तो अब तीन बार झड़ने के बाद कुछ ज़्यादा hi आराम में था, उसने बगल में लेती हुई अपनी नंगी मम्मी को बाहों में जकड़ा और आँखें बंद कर्ली, मंजू ने भी खुद को बेटे की बाहों में ढीला छोड़ दिया और कुछ hi देर में दोनों नंगे एक दुसरे की बाहों में सो गए..

सरलपुर

आपने अब तक देखा की कैसे रिमझिम ने हमारी भोली भली चंचल को मॉडर्न तरह से साड़ी पहनाई है उसके पति को बोल्ड करने के लिए पर पर पति से पहले तो ससुरजी दर्शन कर गए अब देखते हैं क्या होता है.. आगे..

चंचल बेचारी शर्म से गाड़ी जा रही थी, अभी जो हुआ उसके बारे में सोच सोचकर- है मैया ये हमसर क्या हो गया बाबूजी ने किस हालत में देख लिए हमें, हम तो अब बदनाम हो जायेंगे.. कहीं बाबूजी ने माँ जी को बता दिए तो हमारी खैर नहीं... है मैया कहाँ फंसा दिया रिम्मी ने, क्या करें रिम्मी से पूछते हैं, अरे नहीं चंचल ये बात अपने तक hi रख अगर किसी को भी पता चली तो बदनाम हो जाएगी तू...

हे भगवन बस बाबूजी मुझे माफ़ कर दें और इस बारे में किसी को न बताएं...

तभी कमरे का दरवाज़ा खुला

रिम- जीजी सब तैयार है चलो.. और क्या हुआ इतनी परेशां क्यों हो..

चंचल- परेशां हम?? नं नन्ही तो.. वो तो बस थोड़ी घबराहट हो रही है.

रिम- अरे जीजी शर्माओ मत और जाकर भाई साब को क्लीन बोल्ड करने की तयारी करो...

चंचल- मुझे तो बड़ी घबराहट हो रही है..

रिम- अरे जीजी अब जाओ भी जेठ जी कमरे में hi हैं.. मैं ये सारा सामान इकठा करके अपने कमरे में लेजाकर ख़ुशी को भेज दूंगी...

रिमझिम ने चंचल पर ज़ोर डालते हुए कहा.. चंचल ने भी सोचा अब जो होना है वो तो होगा hi देखते हैं, और वो ख़ुशी के कमरे से निकल कर अपने कमरे की और जाने लगी....

दुसरे कमरे में हमारे रमन बाबू जो की अपनी बहन को छुपके छुपके ताड़ रहे थे वो चिंता में थे साथ hi थोड़े उत्तेजित भी, उत्तेजित ख़ुशी की वजह से, और चिंतित की अभी तक रिमझिम क्यों नहीं आई कहीं मेरा ख़ुशी को हूँ देखना उसे पता तो नहीं चल gaya.nahi जाकर देखता हूँ वो क्या कर रही है.. ये सोचकर वो उठे और अपने कमरे के दरवाज़े को खोलकर सर बहार निकला hi था की हॉल में उन्हें एक साया दिखा जिसे देखकर उनकी आँखें चौड़ी हो गयी...

उनकी भाभी भोली भली भाभी अपने कमरे की और जा रही थी पर चौंकाने वाली बात ये थी की उन्होंने जो पहना था साड़ी इतनी नीचे और क्यूंकि चंचल की पीठ रमन की और थी तो रमन को लगभगग अपनी भाभी की पूरी पीठ नंगी दिख रही थी,

भाभी का येअवतार देखकर रमन की धड़कनें तेज़ हो गयी, और पाजामे में तुरंत तम्बू बन गया...





इतनी देर में चंचल अपने कमरे में घुस गयी, ये पल दो पल का नज़ारा hi रमन बाबू के मन पर जैम गया, हालाँकि ऐसा नहीं था की उसने कभी अपनी भाभी को सोच कर मुठ नहीं मरी था या उनके बारे में सोचा नहीं था,

बहन से पहले वो भाभी को hi रोज़ अपने सपनो में नंगी करता था, और अभी भी कभी कभी कर लेता था पर अब शादी हो गयी थी तबसे हिलने से ज़्यादा चुदाई का मौका मिल जाता था इसलिए सिलसिला थोड़ा काम हो गया था..

पर आज भाभी को इस हाल में देखकर फिर से पुराने ख्याल जागने लगे थे...

लुंड पहले hi ख़ुशी की वजह से अकड़ा हुआ था और अभी तो ऐसा लग रहा था की फैट न जाये, फिर मन में ख्याल आया की वो तो रिमझिम को ढूंढने निकले थे,

तो अपनी बीवी को ढूंढने लगे हॉल में नहीं थी फिर याद आया ख़ुशी के कमरे में उसे कुछ काम था तो ख़ुशी के कमरे में झांक कर देखा तो पाया रिमझिम कुछ मेक उप का सामान उठाकर इकठा कर रही है और ड्रेसिंग टेबल के पास झुकी हुई है बस साड़ी में रिमझिम की कासी हुई गांड देखकर रमन बाबू अपना काबू खो बैठे...

ख़ुशी की पढाई पूरी हो चुकी थी और अब उसे नींद आने लगी थी, वो तबसे भाभी जका इंतज़ार कर रही थी न जाने उनका काम कब होने वाला था, उसने कुछ देर और इंतज़ार किआ और फिर भी भाभी नहीं आई और अब तो भैया भी नहीं थे तो उसने सोचा मैं खुद देख लेती हूँ जाकर क्या कर रही हैं भाभी...

कमरे से निकल कर जब वो अपने कमरे की तरफ जाने लगी तो उसके बड़े भैया के कमरे से उसे कुछ आवाज़ें आती सुनाई दी, ख़ुशी को ये तो एहसास हो गया ये किस चीज़ की आवाज़ है उसके मन में अजीब हलचल होने लगी... उसका मन देखने को करने लगा की आखिर अंदर हो क्या रहा है .. उसका घर था बचपन से उसी में रही थी तो चप्पा चप्पा जानती थी इसलिए उसने एक फैसला किआ और दबे पाऊँ सीढ़ियों के नीचे से होती हुई चेतन और चंचल के कमरे की पीछे की और आ गयी जहाँ एडजस्ट फैन के लिए एक खिड़की थी पर एडजस्ट फैन नहीं लगा था, तेज़ धड़कते मन के साथ उसने खिड़की से अंदर झंकार देखा तो उसकी साँसे और तेज़ हो गयी उसने पाया की अंदर बीएड पर उसके बड़े भैया पूरे नंगे लेते हैं, और वहीं उसकी भाभी वो भी पूरी नंगी होकर भैया की कमर के ऊपर झुकी हुई हैं और फिर उसने देखा की भाभी का सर ऊपर नीचे हो रहा है जब उसका ध्यान गया तो और आँखें चौड़ी हो गयी..

उसकी भाभी भैया के लुंड को अपने मुँह में भरकर चूस रही थी, कितनी असामी से भाभी भैया के पूरे लुंड को अपने मुँह में समां रही थी और पहिए निकल कर दोबारा मुँह में ले लेती..





ख़ुशी का मुँह भैया का लुंड देखकर और भाभी का उसे चूसना देखकर सूखने लगा उसकी जीभ बार बार उसके होंठों पर घूमने लगी उसके बदन में उत्तेजना का एहसास होने लगा...

पर उसने खुद को संभाला सोचा अगर रिमझिम भाभी ढूंढने लगी और किसी ने देख लिए तो...

इसीलिए वो वहां से निकली और अपने कमरे की और बढ़ी, कमरे का दरवाज़ा खोलने hi वाली थी की उसे कुछ आवाज़ें फिर से सुनाई दी.. उसे समझ नहीं आया पर इतना था की ये आवाज़ें कमरे के अंदर से hi आ रही थी..

उसने फिरसे कांपते हाथों से दरवाज़ा को बहुत हलके से खोला और एक दो इंच की दरार में से hi अंदर झाँका. तो इस बार तो उसने किसी तरह से खुद को गिरने से बचाया उसके बीएड का दृश्य hi कुछ ऐसा था की उसके छोटे भैया बीएड पर लेते हुए थे, और रिमझिम भाभी उनके ऊपर बैठी उछाल रही थी उनकी साड़ी कमर पर इकठा थी पंतय एक तरफ खिसकी हुई थी और दोनों चूतड़ों के बीच में से उसके भैया का लुंड दिख रहा था जिसपर भाभी कूद रही थी...





भैया भाभी की चुदाई का ये नज़ारा देखकर ख़ुशी के तो मनो होश hi उड़ गए थे ये पहली बार था जब वो अपनी आँखों से किसी को वास्तविक चुदाई देख रही थी, फ़ोन में तो खूब देखि थी पर सच में सामने से पहली बार देख रही थी वो भी उसके भैया भाभी की...

इधर बीवी को अपने लुंड पर उछालते हुए रमन बाबू बेहद उत्तेजित हो रहे थे एक कारन था रिमझिम का भरा बदन कासी हुई छूट, दूसरा उनकी भाभी का वो अवतार और तीसरा वो अपनी बहन के कमरे में उसी के बीएड पर चुदाई कर रहे थे, उडी बीएड पर जिस पर वो सोती थी..

रमन तो भावनाओ में बहने लगे..

इधर ख़ुशी का बुरा हाल था चुदाई देखकर उसकी छूट पसीज रही थी निपे कड़क हो गए थे..

की तभी उसके कानो में. आवाज़ आई जिसने उसे अंदर तक हिला कर रख दिया... उसे अपने भैया की आवाज़ आई- आह्ह्ह्हह खुशीीीी ुह्ह्ह्हह्ह्ह्ह क्या मस्त छूट हीी टेरिइइइइइइ...

ख़ुशी हैरान हो गयी की उसके भैया अपनी बीवी को छोड़ते हुए उसका नाम क्यों ले रहे हैं .. पर उसके आगे उसने जो सुना उससे वो और हैरान हो गयी..

रिम- हाआनंनं भैयाहहहजह आह्ह्ह्ह छोड़ो अपनी बहन कूऊह्ह्ज आह भैया भेनचोद बनकर छोड़ो मुझे अपने लुंड सीईई..

ख़ुशी ये भाभी अपने पति को भैया क्यों कह रही है मुझे कुछ समज्ज नहीं आ रहा पहले मेरे भैया मेरे बारे में इतनी गन्दी बातें कर रहे थे अपनी बीवी को छोड़ते हुए और अब भाभी उन्हें भैया बोल रही है..

अब बेचारी ख़ुशी को क्या पता की ये इन दोनों पति पत्नी का रोज़ का कह था दोनों hi एक दुसरे को तृप्त करने लिए ऐसा स्वांग रचते थे जिसमे रिमझिम ख़ुशी बनती थी और भैया भैया कहकर खूब चुस्वाति थी...

Khushi-kkkkkyaaa भैया मेरे बारी में ये सब सोचते हैं... वो ममेरे साथ भी ये सब करना चाहते हैं जो भाभी के साथ कर रहे हैंन.

ये सोचकर hi ख़ुशी के बदन में सिरहन होने लगी उसके हाथ खुद बा खुद उसके बदन पर रंगने लगे... उसका हाथ निक्कर के ऊपर से hi उसकी छूट को मसलने लगा दूसरा हाथ छूछीयो को मरोड़ने लगा, वो उत्तेजना में बहने लगी, उसका मन करने लगा की उसकी छूट में भी लुंड जाये एक पल को मन की अभी अंदर जाये और भाभी को हटाकर खुद भैया के लुंड पर बैठ जाये पर अभी उसमे इतनी हिम्मत नहीं थी...

अंदर का नज़ारा वैसा hi थबसफारक इतना था की अब भाभी का मुँह दरवाज़े की और था पर उछाल वो वैसर hi रही थी





ख़ुशी उत्तेजना से पागल होती जा रही थी.. ौरिस उत्तेजना के पागलपन को वो ज़्यादा देर नहीं सह pai...aur उसकी छूट ने रास छोड़ दिया जिससे उसकी पंतय पूरी भीग गयी...

उसका बदन ढीला पद गया, और वो ज़ोर ज़ोर से साँसे लेने लगी.. खैर शांत होने पर उसको अपनी स्थिति का अंदाज़ा हुआ तो ेओ उठाकर बाथरूम में भागी...

इसके आगे क्या हुआ अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्
 
दोस्तों किसी ज़रूरी काम में व्यस्त हूं पिछले हफ्ते से और शायद एक हफ्ता या दो तीन और लग सकते हैं अपडेट उसके बाद ही दे पाऊंगा थोड़ा सब्र रखें और साथ बनाए रखें जल्दी ही मिलते हैं।

धन्यवाद।
 
अपडेट 149


जंगल के बीच में जहाँ जग्गू और मंजू के बीच में एक नया रिश्ता बन चूका था पर वहीं कर्मा और शालू साँपों के खतरे से घिरे हुए थे और अनुज और सभ्य की जोड़ी पानी से परेशां थी, अब आगे देखते हैं ये कालक का जंगल और क्या क्या दिखता है इन चोदामपुर वासियो को.

कालक

अनुज और सभ्य

अनुज पेशाब करके ज्यों hi पलटा उसे ऐसा नज़ारा दिखा जो आज तक उसने कभी नहीं देखा था, और वो उसकी ज़िन्दगी का सबसे खूबसूरत नज़ारा था..

सामने उसकी माँ पेशाब करने बैठी हुई थी माँ की पीठ अनुज की और थी और इसी लिए अनुज की आँखों के सामने माँ के दो गोल मटोल बड़े बड़े मांसल नितम्ब थे जिनकी सुंदरता देखते hi अनुज तो जैसे जैम hi गया, अपनी माँ के नंगे चूतड़ों को देखकर अनुज के बदन में उत्तेजना का तूफ़ान दौड़ने लगा और वो तूफ़ान बहार के तूफ़ान कहीं ज़्यादा तेज़ था, उसका लुंड जो पहले से hi अकड़ा हुआ था और फूल गया, उसकी समझ नहीं आरहा था कुछ भी..

वहीं सभ्य को पूरा अंदाज़ा था की उसका बीटा ज़रूर hi अभी उसकी चूतड़ों को देख रहा होगा और ये सोच कर hi उसे न जाने क्यों एक अलग hi उत्तेजना और नयेपन का एहसास हो रहा था, बड़े बेटे से छोड़ने के बाद वो इतना तो खुल hi चुकी थी की छोटे को थोड़ा फ्री का दूरदर्शन करवा सके पर सबसे बड़ी बात ये थी की उसे खुद भी मज़ा आ रहा था ये सब करने में..

पर कुछ देर तक यूँ hi रहने के बाद सभ्य को एहसास हुआ की उसका मूतना रुक चूका है, तो वो धीरे से ऊपर उठी और साथ hi अपनी कमर पर इकट्ठी साड़ी को नीचे करके अपने कातिलाना चूतड़ों को धक् दिया..

इतने अचे और कामुक दृश्य पर पर्दा पड़ने के बाद अनुज को होश आया की तब तक सभ्य पलट चुकी थी,

सभ्य- कर्ली पेशाब तूने?

सभ्य ने एक नज़र अनुज की धोती में बने तम्बू पर डालते हुए पुछा..

अनुज- ुह्ह्ह्ह ahhhhhhhhhh हाँ हाँ माँ कर्ली...

सभ्य- चल सही है अब ये बारिश तो न जाने कब थमेगी तब तक के लिए कुछ इंतेज़ाम करना पड़ेगा..

अनुज जो अब भी अपनी मम्मी के चूतड़ों के नशे में था खुद को सँभालते हुए बोलै- हाँ हाँ मम्मी. वैसे साड़ी गीली होने से वो सभ्य के बदन से चिपकी हुई थी तो चूतड़ों और बदन के हर कटाव का अचे से प्रदर्शन कर रही थी ..

अनुज- हाँ हाँ माँ..

अनुज जो अब भी अपनी माँ के चूतड़ों के सपने में खोया हुआ था उसने किसी तरह से खुद को संभाला.

सभ्य - एक काम करते हैं तू एक तरफ देख और मैं दूसरी तरफ जाती हूँ कोई और जगह ऊंची सी जहाँ पानी न भरा हो ऐसी जगह देख.

Anuj-theek है माँ

ये कहकर अनुज जगह ढूंढने चल दिया और सभ्य दूसरी तरफ.

जाते हुए अनुज के मन में बस यही चल रहा था की जब उसकी माँ पेशाब करके पीछे मुड़ी तो वो वहीं खड़ा था पर उसकी माँ ने उससे ये भी नहीं पुछा की कबसे खड़ा है यूँही शक नहीं हुआ की मैं उन्हें पेशाब करते हुए देख रहा था, क्या माँ को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा की मैं उनके चूतड़ों को देखूं..

पानी में छाप छाप चलते हुए अनुज यही सोच कर आगे बढ़ता हुआ जगह ढूंढ रहा था..

इधर सभ्य भी धीरे धीरे इधर उधर देख रही थी की तभी उसे अनुज की आवाज़ आई सभ्य अनुज की आवाज़ सुनकर बापिस उसकी और बढ़ी..

और कुछ पल बाद अनुज से मिल गयी

अनुज - माँ एक बहुस्त मस्त जगह मिली है.

सभ्य- धन्यवाद् ऊपर वाले का, कहाँ है जगह ..

अनुज- उस तरफ आगे जाकर पर बीच में खुला है तो बारिश में भीगते हुए जाना पड़ेगा..

सभ्य- तो अभी कौनसे सूखे हैं चल जल्दी..

अनुज- हाँ चलो माँ..

सभ्य और अनुज धीरे धीरे से अनुज मि बताई हुई दिशा में चलने लगे और जैसा अनुज ने कहा था आगे जाकर खुला था तो तेज़ बारिश के बीचे से दोनों को जाना था..

अनुज- माँ संभल के चलना यहाँ फिसलन हो सकती है..

सभ्य- हाँ लल्ला तू भी आराम से चल.

अनुज- माँ एक काम करो मेरा हाथ पकड़लो कहीं फिसलेगी तो पकड़ लूंगा..

सभ्य- हाँ ये सही रहेगा..

सभ्य अपने बेटे का हाथ पकड़कर धीरे धीरे उसके पीछे आगे बढ़ने लगी पानी तेज़ी से बरस रहा था..

थोड़ा आगे बड़ी hi थी की जैसा अनुज ने कहा वैसा hi हुआ और सभ्य का पेअर एक जगह पड़ा और फिसल गया.. सभ्य गिरने को हुई तो उसके साथ अनुज भी खिंचा, अनुज ने उसे सँभालने की कोशिश की पर सब इतनी जल्दी हुआ की वो खुद भी संभल न सका और दोनों गिर पड़े पर अनुज नेगिरते हुए भी अपनी माँ को कास के अपनी बाहों में जकड लिए और सभ्य नव भी दर से..

इतनी तेज़ नहीं गिरे की चोट लगे पर गिरने से माँ बेटे बिलकुल करीब आ गए, अनुज का चेहरा उसकी माँ के चेहरे के बिलकुल सामने और करीब था,

गिरने के दर से सभ्य ने अपनी आँखें बंद कर ली थी उन्हें धीरे धीरे से खोला तो अनुज का चेहरा बिलकुल सामने था वो उसकी hi आँखों में देख रहा था अनुज की सांसें सभ्य को अपने चेहरे पर महसूस हो रही थी... दोनों hi एक दुसरे की आँखों में देख रहे थे,

अपने बेटे को इतना करीब पाकर साथ hi उसको आँखों में देखत्ता देख न जाने क्यों सभ्य को शर्म का एहसास हुआ और उसने नज़रें झुका ली..

अनुज को उसकी माँ की ये अदा बहुत भाई उसका खुद से काबू हैट गया और न जाने कैसे जैसे सब कुछ अपने आप हो रहा हो उसका चेहरा नीचे झुका और उसके होंठ उसकी माँ के होंठों से जाकर छू गए जिनके छूटे hi दोनों के बदन में जैसे बिजली दौड़ गयी..

सभ्य को जैसे hi ये एहसास हुआ की उसके होंठों पर अनुज के होंठ हैं उसके पूरे बदन में भीगने के बाद भी गर्मी का एहसास हुआ वहीं अनुज का तो जैसे बदन उत्तेजना से कंपनी लगा.

सभ्य इतनी उत्तेजित हो गयी साथ hi अनुज के इस कदम से स्तब्ध हो गयी की उसकी आँखें फिर से बंद हो गयी, वो खुली आँखों से अपने बेटे का सामना नहीं कर सकती थी,

अनुज ने होंठों को कुछ पलों तक वैसे hi सिर्फ छुवा कर रखा, और माँ की और से कोई प्रतिक्रिया न पाकर साथ hi उनकी आँखों का बंद होना देखकर अनुज की हिम्मत बढ़ गयी... और उसने अपने होंठों को हलके से खोल कर अपनी माँ के होंठ को अपने होंठों के बीच दबा लिए और बारिश में भीगे हुए मगर फिर भी तपते हुए होंठों के रास को पीने लगा...

सभ्य जो वैसे hi स्तब्ध थी अब तो और हैरान परेशां हो गयी अनुज की हरकत से, शायद उसने ऐसा कुछ सोचा नहीं था, वहीं अनुज धीरे धीरे माँ के होंठों के रास को पीते हुए नशे में खोने लगा वो बाकि सब भूल गया और अभी पूरी शिद्दत से सभ्य के होंठों को चूसने लगा...

इधर सभ्य का उत्तेजना से बुरा हाल होने लगा अनुज तो जैसे सरे होश खो बैठा था और माँ के मुलायम होंठों का रास पीने में जूता हुआ था.

बारिश की बूंदे दोनों को लगातार भीगा रही थी पर शायद hi दोनों में से किसी को अभी बारिश की फ़िक़र थी...

कुछ पलों तक सभ्य ने कुछ नहीं किआ और सिर्फ अनुज को उसके होंठों को चूसने दिया पर कुछ देर बाद वो इतनी उत्तेजित हो गयी की उसे खुद पता नहीं चला की वो कब अपने बेटे का साथ देने लगी और उसके होंठों को चूसने लगी.. माँ का साथ पाकर अनुज का हौसला और बढ़ गया, दोनों माँ बेटे इस होंठों के दंगल में तब तक रहे जब तक की दोनों की hi सांस न फूल गयी और फिर अनुज ने अपने होंठों को हटाया तो सभ्य ज़ोरो से सांस लेने लगी पर अनुज को इतनी भी फुर्सत कहाँ थी, होंठों से हटते hi उसने माँ के गले पर हमला बोल दिया और उसे चूमने चाटने लगा... साथ hi अनुज का हाथ भी माँ के बदन पर घूमने लगा और एक हाथ बदन पर घुमते हुए ब्लाउज से नीचे सरकते हुए माँ की नंगी चिकनी गदराई कमर तक पंहुचा तो अनुज ने माँ की कमर को मसल दिया जिससे सभ्य की एक और सिसकी निकल गयी





सभ्य जो अभी एक हमले से संभाली नहीं थी दुसरे से और व्याकुल हो गयी, अनुज उसके चेहरे और गर्दन को चूम चाट रहा था उत्तेजना वस् सभ्य के हाथ अनुज के बदन पर चलने लगे...

गर्दन को अच्छे से चाटने के नाद अनुज थोड़ा नीचे हुआ और सीने के ऊपर चाटने लगा, जिससे सभ्य भी सिसकियाँ लेने लगी... जब सीने को अचे से चाट लिए तो अनुज का मन और की लालसा करने लगा और इसी लिए उसने माँ के पल्लू को जो कंधे से गीला हो कर चिपका हुआ था उसे पकड़ कर नीचे कर दिया..





पल्लू के हटने से माँ की बड़ी बड़ी ब्लाउज में कैद भीगी छुछियां मांसल कोमल पेट और सुन्दर गोल नाभि अनुज के सामने आ गयी..

इतनी साडी सुंदरता एक साथ देखकर अनुज से रुका नहीं गया और उसने अपने होंठों को माँ के पेट पर चिपका दिया..

जिनके छुटे hi सभ्य के मुँह से आअह्ह्ह्ह लाल्ल्लाःह्ह्ह निकल गया..

अनुज माँ के कोमल पेट को हर जगह चाटने चूमने लगा, सभ्य तो बेटे के होंठों पेट पर चूमने के एहसास से पागल सी होने लगी...

और फिर वो घडी आई जब अनुज ने पूरे पेट को अचे से चाटने के बाद अपनी जीभ को माँ की सुन्दर गोल नाभि में घुसा दिया...

जिसके घुसते hi सभ्य तड़प उठी उसके हाथ अनुज के सर पर कास गए..

अनुज तो बेसुध सा होकर माँ की नाभि को चूसने लगा और सभ्य बेटे की इस हरकत से तड़प रही थी...

अनुज का लुंड पूरी तरह से फूल चूका था पर वो माँ की नाभि को छोड़ना नहीं छह रहा था इधर सभ्य का भी बुरा हाल था...

उसे ऐसा एहसास हल रहा था जैसे अनुज की जीभ से उत्तेजना की तरंगे उसकी नाभि से होते हुए पूरे बदन में फ़ैल रही है..

सभ्य की छूट रह रह कर पनिया रही थी, अनुज था जो की माँ की नाभि को छोड़ने को तैयार नहीं था...

की तभी अचानक से बदल गरजे तो न जाने क्या हुआ की सभ्य ने अनुज को अपने पेट से अलग कर दिया...

अनुज बिलकुल हैरान परेशां रह गया, की सब कुछ ाचा चल रहा था तो फिर अभी अचानक क्यों.

वो सभ्य की और ध्यान से देखने लगा...

सभ्य हांफते हुए उठी और अनुज को खड़ा होने का इशारा किआ

अपनी माँ का इशारा पाकर अनुज खड़ा हुआ तो सभ्य ने सहारे के लिए हाथ बढ़ाया और अनुज का हाथ थम कर कड़ी हो गयी..

अनुज अब भी परेशां था क्यूंकि उसे अभी तक माँ गुस्से में तो बिलकुल नहीं लग रही थी,

अनुज ये सोच hi रहा था की तभी सभ्य बोली - चल लल्ला बिलकुल भीग चुके हैं कहाँ है वो सूखी जगह..

अनुज इस बात से और हैरान हो गया क्यूंकि उसकी माँ ने बिलकुल साधारण तरीके से ये कहा जैसे अभी कुछ हुआ hi नहीं.. खैर सुकर मानते हुए की काम से काम माँ गुस्सा तो नहीं ये सोचकर वो माँ को हाथ पकड़कर आगे ले गया...

एक जगह जाकर अनुज ने दिखाया माँ ये है वो जगह...

सभ्य ने देखा तो पाया की जहाँ वो खड़े थे वहां से करीब 5 फुट ऊँची जगह पर एक पुराण कक्ष नुमा था जिसकी दरवाजे की और की दीवार ढह चुकी थी बाकि तीनो तरफ से घिरा हुआ था एक तरफ का छोटा सा टुकड़ा छत का भी ढह चूका था पर बीच में मोठे मोठे स्तम्भ की वजह से छत तिकी हुई थी, वहीं एक तरफ केले के एक दो पेड़ उगे हुए थे साथ hi दीवार को बैलों ने धक् रखा था..

सभ्य ने नज़र डाली और देखा की ज़मीन सुखी थी क्यूंकि छत बहार की तरफ hi टूटी थी तो पानी गिर कर बहार hi बाह रहा था सभ्य ये सब देखकर अनुज से बोली- ये सही जगह है यहाँ काम बन सकता है..

अनुज- हाँ माँ मुझे भी सही लगी थी...

सभ्य- वो सब तो ठीक है पर ये इतनी ऊंची है मैं चढून कैसे...

अनुज - हाँ यहाँ तो कोई पत्थर वगेरा भी नहीं है..

सभ्य - वही तो क्या करें?

Anuj-maa मैं तुम्हे उठा कर चढ़ा दूंगा..

सभ्य - सही में चढ़ा पायेगा.

अनुज- अरे हाँ माँ बिलकुल...

सभ्य - तो ठीक है रुक फिर

ये कहकर सभ्य ने अपनी गीली सारी को नीचे से पकड़ा और ऊपर उठाकर घुटनो तक मोड़ लिए और लपेट लिया जिससे अनुज को उसकी नंगी गीली पिंडलियाँ घुटनो तक दिखने लगी...

सभ्य- चल अब उठा... मैं चढ़ने की कोशिश करती हूँ तू पीछे से धक्का लगा दियो..

इस बात पर न जाने क्यों सभ्य को खुद को हंसी आ गयी.. पर उसने वो किसी तरह छुपली...

सभ्य ने हाथ ऊपर रखे और चढ़ने की कोशिश करने लगी इधर अनुज भी नीचे हुआ और माँ की जांघों को कसके थमा और ऊपर उठा दिया जिससे सभ्य को थोड़ी मदद मिली और वो कमर तक चढ़ गयी...

क्यूंकि अनुज ने माँ को जांघो स्व पकड़ा था तो माँ की साड़ी भी उसके हाथों के साथ ऊपर उठ कर जांघों से भी ऊपर उठ गयी थी,

सभ्य- बस लल्ला हो hi गया थोड़ा सा और ऊपर उठा..

Anuj-maa तुम थामे रहने मैं हाथ हटा कर नीचे से उठाऊंगा

Sabhya-theek है बीटा मैं पकड़े रहूंगी तू जल्दी कर

अनुज- ठीक है माँ चढ़ो

सभ्य ने कह तो दिया की वो पकड़े रहेगी पर जैसे hi अनुज ने जांघों से हाथ हटाया और सभ्य का वजन खुद के हाथों पर आया तो उसके हाथ फिसलने लगे और हाथों के साथ साथ वो भी नीचे खिसकने लगी...

उससे भी बड़ी बात ये हुई की सभ्य की साड़ी जो उसने खुद से घुटनो तक मोड़ कर लपेटी थी वो भी एक जगह फास गयी और ऊपर hi रह गयी जिसका नतीजा ये हुआ की सभ्य कमर से नीचे पूरी नंगी होकर बापिस नीचे फिसलने लगी अनुज ने जब ये देखा तो तुरंत माँ की जांघों को थमा पर तब तक सभ्य इतना नीचे आ चुकी थी की सभ्य के दोनों मोठे गोल चूतड़ अनुज के चेहरे पर आकर छ गए..

अनुज का पूरा मुँह उसकी माँ की रसीली और कोमल गांड में समां गया...

और ये सब इतनी जल्दी हुआ की दोनों में से किसी को सँभालने का मौका नहीं मिला...

तो अब नज़ारा कुछ ऐसा था की माँ का सीने से ऊपर का हिस्सा और हाथ ऊपर ज़मीन पर थे बाकि का हिस्सा नीचे था जो की साड़ी के फसने के वजह से कमर से नीचे नंगा था, और माँ की बड़ी गोल मटोल गांड बेटे के चेहरे पर थी, बेटे का मुँह दोनों चूतड़ों के बीच में घुसा हुआ था.. वहीं बेटे के हाथों में माँ के पेअर थे जिससे उसने अपनी माँ का भर ुतः हुआ था...

दोनों को hi जैसे ये एहसास हुआ तो दोनों के बदन में बिजली दौड़ने लगी अनुज की तो जैसे मन चाही मुराद पूरी हो गयी उसकी नाक माँ के गांड के छेड़ से चिपकी हुई थी और उसके होंठ माँ की रसीली छूट से.. सभ्य को जैसे hi स्थिति का एहसास हुआ वो पागल सो हो गयी उसे लगा की ये क्या हो रहा है वो किसी भी तरह से इस जंजाल से निकले, उसने ऐसा तो बिलकुल भी नहीं सोचा था और इसी लिए वो खुद को ऊपर खींचने की कोशिश करने लगी पर इसका कोई फायदा नहीं हो रहा था बल्कि इससे ऐसा लग रहा था की सभ्य अपनी गांड को बेटे के मुँह पर घिस रही है..

ऐसा hi कुछ अनुज को भी लगा वो तो वैसे भी इस स्तिथि की वजह से अचम्भे में था, ऊपर से माँ का यूँ गांड हिलने से उसकी छूट अनुज के मुँह से और रगड़ने लगी बस अनुज एक बार फिर से सुध बुध खो बैठा और उसने अपने होंठों को खोलकर अपनी माँ की छूट के होंठों को अपने होंठों में भर लिया..

जिसके साथ hi सभ्य की एक चीख गूँज गयी ायाह्ह्ह लाल्ल्लाःह्ह्ह

पर लल्ला को अब कोई होश नहीं था उसने धीरे धीरे से माँ की छूट को चेतना शुरू कर diya...apani जीभ को भी उसने होंठों के साथ माँ की छूट की सेवा में लगा दिया,

कभी छूट के होंठों को चूसता तो कभी सिर्फ डेन को तो कभी जीभ को नुकीला करके उसकी छूट में घुसा देता तो कभी छूट के डेन को जीभ से छेड़ता...

अनुज की हर हरकत पर उसकी माँ की उतनी hi जबरदस्त प्रतिक्रिया आ रही थी, कभी आह्ह्ह्हम्म्म्म लाल्ल्लाहहह तो कभी ओह्ह्ह्हह nahiiiiiiiiiiiiiiii बससससस, तो कभी अपनी गांड को आगे पीछे करती...

ऐसा लग रहा था जैसे वो अनुज की कठपुतली बन चुकी थी और अनुज जैसे चाहे वैसे अपनी माँ से करवा रहा था...

साथ hi अब सभ्य भी इतनी उत्तेजित हो चुकी थी की वो सही गलत या सब कुछ भूल चुकी थी बस अपनी छूट में घुसी बेटे की जीभ का आनंद ले रही थी....

अनुज भी पूरी शिद्दत से माँ की छूट को ऐसे चाट रहा था जैसे ये उसकी ज़िन्दगी का आखिरी दिन हो और उसकी माँ की छूट उसका आखिरी भोग... और उसी का नतीजा ये हुआ की कुछ hi देर में सभ्य भरभरा के झड़ने लगी और अपना कॉमर्स बेटे के मुँह में छोड़ दिया... जिसे बीटा अमृत समझ कर सारा पि गया...

झड़ने के बाद सभ्य को थोड़ी रहत मिली और वो तेज़ी से साँसे लेने लगी थोड़ा आराम मिला hi था और वो अनुज से कुछ बोलने hi वाली थी की जो बोलना चाहती थी उसकी जगह उसके मुँह से आअह्ह्ह्ह लाल्ल्लाःह्ह्ह की सिसकारी एक बार फिर से निकल गयी ..

झड़ने के बाद सभ्य तो शांत हो गयी थी पर अनुज का मन अब भी नहीं भरा था माँ के झड़ने के बाद और छूट को अचे से चाटने के बाद अनुज ने अपना ध्यान माँ की गांड के भूरे छेड़ पर लगाया और मुँह को थोड़ा पीछे खिसका कर अपनी जीभ गांड के छेड़ पर फिरै जिसकी प्रतिक्रिया सभ्य ने दी...

सभ्य- आह्ह्ह्हम्म्म्म लाल्ल्लाहहह अब्बब्बब्बब्ब बससससस चहहहहह्हूऊऊडद ahhhhhhhhhh...

अनुज बिना माँ की बातों पर ध्यान दिए बस अपनी जीभ का सही उपयोग कर रहा था पहले तो उसनर छेड़ को जीभ से खूब छठा और सहलाया और फिर अपनी जीभ को नुकीला किआ और माँ की गांड में अंदर बहार करने लगा..

जिसके साथ hi सभ्य का जो कमज़ोर सा विरोध था वो भी हैट गया और वो भी अपनी गांड से आ रहे आनंद में खोने लगी... दोनों माँ बेटे हवस के तूफ़ान में बहे हुए थे और अपने अपने हिस्से का मज़ा लूट रहे थे... की तभी कुछ ऐसा हुआ की दोनों की एक साथ चीख निकल गयी

चोदामपुर

चोदामपुर में वैसे तो एक आम रात थी पर जैसा दीखता है वैसा अक्सर चोदामपुर में होता hi कहाँ है तो उसके लिए थोड़ा टांक झाँक करके देखते हैं की आगे क्या होता है..

चलिए पहले कर्मा के यहाँ hi देख लेते हैं कहाँ हैं उसके पिता श्री... अरे ये क्या यहाँ तो सुनसान पड़ा है पूरा घर खली है दरवाज़े पर टाला भी है.. न जाने कहाँ होंगे नीलेश बाबू...

ढूंढना तो पड़ेगा hi की कहाँ हैं हमारे नीलेश बाबू, अरे ये क्या ये रहे तो यहाँ हैं वैसे क्या मस्त नज़ारा है आइयें आपको भी दिखते हैं..

यहाँ नीलेश बाबू बिस्तर पर लेते हुए हैं पीठ के बल बिलकुल नंगे और उनके ऊपर एक मस्त गदराये बदन की महिला उछाल कूद रही है और वहीं उनके बगल में भी एक आदमी लेता हुआ है और उसके ऊपर भी कोई महिला उछाल कूद कर रही है.. चलिए जरा पास से देखते हैं..

तो नज़ारा कुछ ऐसा है की नीलेश के ऊपर बिलकुल नंगी महिला जो नीलेश के लुंड को अपनी छूट में लेकर उछाल रही है वो हमारी प्यारी ममता चची हैं..

और उनके बगल में उनके पति यानि राजन चाचा हैं जिनके ऊपर हमारी सबकी प्यारी और उनकी बेटी पल्ली है जो अपने पापा का लुंड लेकर मस्ती से उछाल रही है...





नीलेश- आह्ह्ह्ह फिर कैसी रही शादी?? भाई मज़ा आया की नहीं...

राजन- हाँ भैया मज़ा तो बहुत आया...

ममता- ुहम्म्म्म भाई साब आह्हः इन्हे मज़ाआ क्यों nahiiiiiiiiiiiiiiii आएगा, अपनी सलहज को जो बजा आये...

ममता ने आगे होकर अपने चूतड़ों को उछलते हुए कहा

नीलेश- हैं रे सही में बाबू?

राजन- हाँ भैया अब क्या करते सलहज माल hi कुछ ऐसा है...

राजन ने अपनी बेटी की छूछीयों को मसलते हुए कहा

नीलेश- हाँ यार एक आड़ बार देखि है हमने बड़ी गदराई हुई घोड़ी है...

ये कहकर नीलेश ने ममता की गांड को कसके मसल दिया...

राजन- तभी तो भैया हम भी सवारी कर लिए, और वो भी एक दो बार तो उसके पति के साथ hi मिलकर बजाय उसे...

नीलेश- अरे ऐसे कैसे हो सकता है,

राजन - अरे सही में बड़ा मस्त बाँदा है मेरा साला, अपनी बीवी को साथ में पिलवाया.. बड़ा मज़ा आया..

राजन ने पल्ली को अपने लुंड पर पटकते हुए कहा..

ममता- हाँ तुम्हे तो मज़ा आएगा hi न जाने कबसे नज़र थी तुम्हारी मेरी भाभी पर.

राजन - ाचा तुम ज़्यादा भोली न बनो खुद तो अपने भैया से छुड़वा ली...

पल्ली- हैं मम्मी ये कब हुआ तुमने हमें बताया भी नहीं की तुमने मां से छुड़वा लिए..

पल्ली ने पापा के लुंड पर कूदते हुए हैरानी से पुछा..

नीलेश- क्या सही में ममता..

ममता- हाँ भाई साब कुछ हालत भी ऐसे बन गए की बस सब हो गया..

ममता ने महसूस किआ की उसकी ये बात सुनकर नीलेश का लुंड उसकी छूट में थोड़ा और फूल सा गया है..

वहीं नीलेश ममता के भाई से छोड़ने की बात सुनकर अपनी और शशि के बारे में सोचने लगा...

पल्ली- मम्मी बताओ तो सही कैसा हुआ..

नीलेश- हाँ भाई और सिर्फ ममता hi नहीं, हमें तो सब की कहानी जननी है..

राजन- भैया एक बार ये राउंड हो जाये फिर आराम से सुनते हैं..

नीलेश- ये भी ठीक कही..

पल्ली- पर सिर्फ हम लोग hi नहीं ताऊजी तुन भी सुनाओगे

Nilesh-hum क्या सुनाएंगे बीटा..

पल्ली- वही कैसी चाय पिलाई प्रेमा भाभी ने..

Nilesh-are हाहाहा बिलकुल सुनाऊंगा

और इसी के साथ hi दोनों जोड़े तगड़ी चुदाई की और अग्रसर हो गए बाप बेटी को जमकर छोड़ने लगा जबकि बगल में hi उसकी बीवी को उसका दोस्त जो भाई से बढ़कर था छोड़ रहा था..

अब बात प्रेमा भाभी की आ hi गयी है तो एक बार उधर भी नज़र मार लेते हैं की क्या हो रहा है

प्रेमा के घर में नज़ारा कुछ अलग नहीं था

राजपाल ने अपनी गदराई बहु की साड़ी को ऊपर उठा कर कमर तक कर रखा था और फिर झुककर पीछे से बहु की रसीली छूट को छोड़ रहे थे...





प्रेमा- ओह्ह्ह्हह्ह पापजीई ahhhhhhhhhh

राजपाल- आह्ह्ह्ह बेटाः क्याआआआ गरम और मस्त चुत है तेरी मज़ाआ आ रहा है..

प्रेमा- आअह्ह्ह्ह पापाआजीई एक बात पुछुन्नँ?

राजपाल - ओह्ह्ह्ह बेट्टा पूछ अह्ह्ह्ह जो चाहे पूछ.

प्रेमा- जब सब लोग आए जायेंगे तब क्या होगा मतलब हम दोनों का..

राजपाल- आह्ह्ह्ह बहु सोचूंगा इस बरीस में भीई पर अभी तो तेरी. गरम छूट का मज़ा लेने दे...

Prema-theewek है पापा जी...

िस्क्स बाद राजपाल अपनी बहु प्रेमा की जमकर चुदाई करने लगा जिसका पूरा लुत्फ़ प्रेमा भी उठा रही थी...

इसके आगे क्या हुआ अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्
 
दोस्तों खेल है या बवाल में भी अपडेट पोस्ट कर दी है अपनी उपस्थित दर्ज ज़रूर कराएं
 
अपडेट 150


सरलपुर

रिमझिम ने चंचल को जिस प्रकार से तैयार किया था और जिस चीज़ के लिए किया था वो काम करता नज़र आ रहा था..

चेतन ने अपनी बीवी का नया अवतार देखा तो आँखें फटी की फटी रह गयी लुंड तन्न से खड़ा हो गया और फिर तुरंत चढ़ पड़े.. एक राउंड ज़बरदस्त चुदाई के बाद भी, आज चेतन का मन नहीं हो रहा था छोड़ने का अपनी बीवी को.. अभी भी चंचल की बड़ी बड़ी छूछीयों को चूसते हुए उसकी रसीली छूट को सहला रहे थे जिससे चंचल ाः ahhhhhhhhhh करके कराह रही थी...





एक बहार दोबारा से चंचल गरम हो गयी तो उठकर उसने पति के लुंड को मुँह में भर लिए और चूसने lagi,ab बरी कराहने की चेतन की थी... थोड़ी देर चूसने के बाद चंचल उठी और पति के सामने घोड़ी बन गयी.. अपनी पत्नी की गोल गांड देख कर चेतन खुद को रोक नहीं पाया और गांड के बीच में अपना मुँह घुसा दिया और चाटने लगा,

चंचल एक बार फिर से सिहर गयी अपने पति की हरकतों से और फिर चेतन खड़ा हुआ और अपने लोहे जैसे कठोर हो चुके लुंड को पकड़ा और अपनी बीवी की रसीली गरम छूट के द्वार पर लगा दिया और एक धक्का देकर लुंड को अंदर घुसा दिया..

चंचल- है अम्मा.. ओह्ह्ह्ह जीई..

चेतन- ओह्ह्ह्हह मेरी जान ahhhhhhhhhh ये ले पूरा..

और फिर एक थप के साथ पूरा लुंड घुसा दिया...

और एक बार फिर से शुरू हो गया वलघामसँ चुदाई का एक और दौर..





चेतन क्यूंकि एक बार पहले hi झाड़ चूका था तो इस बार वो और देर तक टिका रहा और करीब आधा घंटा अलग अलग आसनो में छोड़ने के बाद अपने रास को बीवी की छूट में जमा करने के बाद बीएड पर लेट गया और उसके सीने पर सर रख कर चंचल लेट गयी.

चेतन- ओह्ह्ह्हह आज तो मज़ाआ आ गया.

Chanchal-hai न. हमें भी... साडी खुजि hi मिटा दिए तुम हमारी...

चेतन- वैसे इस नए अवतार की तयारी कब से thi..kasam से तुम्हे ऐसे देखकर हम खुद को रोक hi नहीं पाए.

चंचल- अरे कभी से नहीं और ये सब हमारी योजना नहीं थी.

चेतन- तुम्हारी योजना नहीं मतलब फिर किसकी थी..

चंचल- रिम्मी की,

Chetan-kya रिम्मी की क्यों उसने क्यों बनाई ये योजना भाई..

Chanchal-wo हम औरतों की बात है..

चेतन- अरे बताओ भी न.

चंचल- अरे कुछ नहीं ऐसे hi बातो बातो में हमसर निकल गया की आज कल तुम्हारे भैया हम पर ध्यान hi नहीं देते..

Chetan-dhatt तेरे की ये क्या बॉडी तुम अब न जाने क्या सोचेगी वो हमारे बारे में...

Chanchal-are कुछ नहीं सोचेगी उसी ने फिर बोलै देखते हैं कैसे भाईसाब ध्यान नहीं देते और फिर ये सब हुआ..

चेतन- वैसे जो भी किआ मस्त किआ,

चंचल- अब डोज न हम पर ध्यान..

चेतन- बिलकुल मेरी रानी अभी तो आज हम तुम्हारी गांड पर ध्यान देने के बाद hi सोयेंगे..

चेतन ने चंचल के चूतड़ों को मसलते हुए कहा...

Chanchal-dhattt एक hi दिन में सब मत लुटा दीजिये हमें कल भी चाहिए...

चेतन- मिलेगा रानी कल भी मिलेगा.. और हम मानते हैं की कुछ दिनों से हम दुकान और दुनियादारी में इतने उलझ गए की तुम्हारा भूल hi जाते हैं.. पर आज जो तुमने किआ हमें बहुत भय.

चंचल - हम जानते हैं और रिमझिम भी हमसे यही बोली की एक समय बाद पति पत्नी के जीवन में नीरसता आने लगती है तो उसी नीरसता को काम करने के लिए कुछ नयी नयी चीज़ें करते रहना चाहिए.

चेतन- अरे वाह ये तो सही कहा रिम्मी ने बहुत समझदार है वो.

चंचल- वो तो है...

चेतन- और क्या कहा रिम्मी बहु ने..

चंचल - यही की अपनी फ्फ्फ्फंतास्ती अपने साथी को बताना चाहिए उससे पूछना चाहिए, और उन्हें पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए. तभी पति पत्नी सच में एक दुसरे के करीब आ पात्र हैं.

चेतन- हाहाहा धत्त पागल वो फंतासी होता है फंतस्ति नहीं.. और सही बोली बहु सच में काफी ज्ञान है उसे..

चंचल - और वो ये भी बोली की रोज़ एक hi सब्ज़ी किसी को पसंद नहीं आती तो या तो सब्ज़ी बदल बदल खाएं या सब्ज़ी को अलग अलग तरीके से बनाया जाये...

चेतन- अरे ये रिम्मी बहु भी न बड़ी शैतान है... ाचा तुम बताओ तुंहारी कोई फंतासी हो तो..

चंचल- धत्त्त हमारी कछु नहीं है..

चेतन- देखो हमसे शतमाओगी तो कैसे होगा..

चंचल- पहले तुम बताओ...

चेतन- ाचा हम batayein.agar हम बताएं तो पूरी करोगी तुम.

चंचल- हाँ करेंगे न...

चेतन- तो हमारी फंतासी है की तुम हमारा लुंड चूस चूस कर हमें झाड़ो और हमारे रास को पि जाओ... सारा का सारा... जो तुम कभी नहीं करती.

चंचल- छठी वो भी कोई पीने की चीज़ है..

Chetan-bilkul है.. अब बताओ करोगी पूरी.

Chanchal-nahi हमसे नहीं होगा..

चेतन- ये तो गलत है अभी तो तुम बोली थी की करोगी...

चंचल- पता नहीं हमें थोड़ा अजीब लगता है हम कर पाएंगे भी की नहीं..

Chetan-are कोशिश तो करना क्या पता तुम्हे पसंद आये.

चेतन ने उसका हाथ अपने लुंड पर रखते हुए कहा

चंचल- देखते हैं पर अभी नहीं सुबह या कल रात को .

Chetan-aur गांड

Chanchal-wo भी.

चेतन- फिर रात नहीं.. सुबह hi. ाचा अब तुम बताओ तुम्हारी.

चंचल- हमें कुछ समझ hi नहीं आ रहा.. हमारी नहीं है कोई.

चेतन- यार देखो ये गलत है अभी तुमने बोलै की तुम बताओ तो बताउंगी अब मुकर रही हो..

चंचल- अरे कुछ नहीं है जी हमें शर्म आएगी..

Chetan-are शर्माओ मत अब बता भी दो..

चेतन ने एक उंगली चंचल की गांड में घुसते हुए कहा.

चंचल- अह्ह्ह्ह हमसे नहीं होगा..

Chetan-acha आँखें बंद करके बतादो शर्म नहीं आएगी..

चंचल- ाचा बताते हैं पर फिर तुम हमको चिढार नहीं..

Chetan-dhatt हम चिढ़ाएँगे क्यों बल्कि हम तो उसे पूरा करने की कोशिश करेंगे... अब बताओ जल्दी से..

चंचल- हम बस यही सोचते हैं की जैसे बीएड पर तो हम रोज़ करते हैं पर अलग अलग जगह करने में कैसा लगता होगा खासकर खुली जगह और....

चेतन- और..

चंचल- और ये की कैसा लगेगा की हम चुदाई कर रहे हो किसी के सामने मतलब कोई हमें देख रहा हो और हम चुदाई कर रहे हो..

ये बोलकर चंचल शर्मा gayi..aur अपना सर छिपा लिए..

चेतन- हाय मेरी शर्मीली रानी...

ऐसे hi आगे भी बातें करते हुए दोनों नंगे hi एक दुसरे की बाहों में सो गए...

सुबह का काम निपटा कर रिमझिम अपने कमरे में आई hi थी की उसका फ़ोन बजा, जिसे उसने उठा कर देखा तो उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी. उसने तुरंत उठाया और ख़ुशी से बोली - कैसी है मेरी लड़ो...?

और वो सामने जो भी था उससे बातों में लग गयी करीब एक घंटे तक बात करने के बाद फ़ोन रखा तो बड़ी खुश नज़र आ रही थी... कमरे में ख़ुशी सिधार उधर टहलने लगी और फिर तुरंत पति को फ़ोन मिलाया पर काफी देर तक न उठने पर निराश होकर कट कर दिया और फिर कुछ सोचकर बहार भाग गयी...

घर में इधर उधर घूमने के बाद उसे बाथरूम में उसकी जेठानी चंचल मिली..

रिम- ओह्ह्हो जीजी पूरा घर ढूंढ लिए और तुम यहाँ कपडे धो रही हो..

Chanchal-are क्या हुआ... क्यों ढूंढ रही थी.. पूरे घर में..

रिम-. एक बात है जीजी बोलो मन तो नहीं करुँगी.

ये कहकर रिमझिम ने चंचल को पकड़कर खड़ा कर लिया

चंचल- अरे कपडे धोने है रिम्मी, हे भगवन ये लड़की भी न, ाचा पहले बात तो बता..

रिम- नहीं पहले बोलो की तुम मन नहीं करोगी..

चंचल- तू भी बच्चों से भी बच्ची है.. ाचा नहीं कररंगे अब बता क्या बात है..

रिम- अभी न मेरे पास पूर्वी का फ़ोन आया था...

चंचल- पूर्वी तेरी बहन?

Rim-haan जीजी और कौन है पूर्वी ?

चंचल- ाचा हाँ पूर्वी का फ़ोन आया फिर..

रिम- तो बात ऐसी है की वो और जीजाजी 5 दिनों के लिए घूमने जा रहे हैं मनाली... तो उसने हमें भी बोलै है की साथ चलते हैं तो और मज़ा आएगा..

चंचल- अरे वाह ये तो बड़ी अछि बात है जाओ घूम के आओ, इसमें हम मन क्यों करेंगे पागल.. तुम जाओ देवरजी के साथ मनाकर आओ क्या कहते हैं उसे हनीमून,

रिम- नहीं मैं और वो नहीं बल्कि तुम भी चलोगे हमारे साथ मतलब तुम और भैया भी..

Chanchal-are धत्त हम जाकर क्या करेंगे, तुम लोगो की नयी शादी हुई है तुम जाओ अभी..

रिम- नहीं जीजी तुमने बोलै था की तुम मन नहीं करोगी... और बोल ऐसे रही हो जैसे बूढी हो गयी हो..

चंचल - हमें तो समझ नहीं आ रहा क्या बोलेन?

रिम- अरे हाँ बोलो और क्या बोलोगी बस.. ाचा तुम बताओ कब घूमने गयी थी तुम आखिरी बार.

चंचल- हमें तो याद भी नहीं..

रिम- तभी तो चलो न जीजी और अगर तुम मन करोगे तो हम भी पूर्वी को मन कर देंगे...

चंचल- चल ठीक मैं मान भी गयी तो तेरे भैया उन्हें कौन मनाएगा..

रिम- तुम मनाओगी और कौन मनाएगा, एक और मस्त साड़ी और ब्लाउज है मेरे पास उन्हें मानाने के लिए बोलो फिर तैयार हो..

चंचल- धत्त्त पागल, ाचा ठीक है इनसे बात करती हूँ...

रिम- अरे वाह जीजी तुम बहुत अछि हो ी लव यू..

और ये कहकर रिम्मी चंचल के गाल पर चूम लेती है.

चंचल- अह्ह्ह्ह क्या करर रही है कुछ कुछ होता है..

चंचल शरारती अंदाज़ में बोलती है..

रिम- ाचा जी तो ये लो..

रिमझिम आगे बढ़कर उसके गले पर छोटी छोटी किस्सेस देने लगती है..





चंचल- अह्ह्ह्ह छोड़ न रिम्मी अब तो सच में कुछ होने लगा ..

रिम- तो चलें कमरे में

रिमझिम चंचल के एक छूछे को ब्लाउज के ऊपर से दबाते हुए कहती है..

चंचल- धत्त्त बहुत बदमाश है तू. अब जा कपडे धोने दे..

रिम- जा रही हूँ पर भाईसाब से बात करना मत भूलना नहीं तो अगली बार जाउंगी नहीं बल्कि कुछ और कर दूंगी..

चंचल- धत्त पागल भाग अब यहाँ से...

कालक के जंगल

अनुज बिना माँ की बातों पर ध्यान दिए बस अपनी जीभ का सही उपयोग कर रहा था पहले तो उसनर छेड़ को जीभ से खूब छठा और सहलाया और फिर अपनी जीभ को नुकीला किआ और माँ की गांड में अंदर बहार करने लगा..

जिसके साथ hi सभ्य का जो कमज़ोर सा विरोध था वो भी हैट गया और वो भी अपनी गांड से आ रहे आनंद में खोने लगी... दोनों माँ बेटे हवस के तूफ़ान में बहे हुए थे और अपने अपने हिस्से का मज़ा लूट रहे थे... की तभी कुछ ऐसा हुआ की दोनों की एक साथ चीख निकल गयी....

हुआ ऐसा की जहाँ अनुज खड़ा था और जहाँ उसका पेअर रखा था पानी के लगातार बहाव से वहां की मिटटी अचानक से काटने लगी तो अनुज ने स्वाभाविक hi पेअर को दूसरी जगह बिना ध्यान दिए रखा और पेअर रख कर जैसे hi उसपर वजन पड़ा उसका पेअर फिसल गया... और उसके साथ hi अनुज पीछे की और गिरने लगा... पर क्यूंकि उसने माँ को भी पकड़ा हुआ था तो साथ में माँ भी उसके साथ खींचती चली आई और फिर अगले hi पल दोनों नीचे थे...

अनुज पीठ के बल नीचे पड़ा हुआ था और माँ उसके ऊपर पीठ के बल पर नज़ारा दिलचस्प इसलिए था क्यूंकि माँ की साड़ी अब भी कमर के ऊपर थी और वो कमर से नीचे नंगी थी..

अनुज की धोती बगल में पड़ी हुई थी इसका मतलब वो पूरा नंगा था... माँ के अनुज के ऊपर होने से अनुज का लुंड माँ के पैरों के बीच से निकल कर माँ की छूट के होंठों से रगड़ रहा था...

जिसके एहसास भर से अनुज ये भूल गया की वो अभी गिरा है कहाँ हैं किस स्थिति में है...

क्यूंकि उसके लुंड पर माँ के छूट की गर्मी महसूस हो रही थी अनुज का लुंड माँ की छूट के लिए तड़प रहा था... खास कर अब उसकी गर्मी को अपने लुंड के इर्द गिर्द महसूस कर... अनुज के हाथ खुद बा लहुड माँ के पेट पर कास गए जैसे वो नहीं चाहता हो माँ उससे दूर हो ज़रा भी...

माँ को जैसे hi एहसास हुआ अनुज के सख्त लुंड का अपनी छूट पर वो भी तड़प उठी... उनका रोम रोम सिहर गया... पूरे बदन में उत्तेजना का असीम संचार होने लगा..

उसके साथ hi अनुज ने धीरे धीरे से अपनी कमर को हिलना शुरू कर दिया जिससे उसका लुंड छूट. पर आगे पीछे घिसने लगा, और माँ बीटा दोनों hi सिहरने लगे...

अब न अनुज के बस की थी खुद को रोक न और ना माँ में शायद इतनी शक्ति थी की खुद को और अनुज को काबू कर सकें...

बारिश का पानी पल पल बदन को भीगा रहा था पर माँ बेटे के बदन में अभी सिर्फ गर्मी का संचार हो रहा था..

अनुज का हाथ एक पेट पर तो एक गीले ब्लाउज के ऊपर से माँ की एक छुच्छी पर गया और कमर हिलने और लुंड को छूट पर घिसने के साथ hi वो छुच्छी को भी मसलने लगा...

माँ- ओह्ह्ह्हह लाल्ल्लाःह्ह्ह एईई क्याआअह्ह्ह कर रहा है...

अनुज- ओह्ह्ह्हह maaaahhhhhhhhhhhh अह्ह्ह्हह्हह...

अनुज अभी सिर्फ लुंड से सोच रहा था जो की अभी उसकी माँ की गरम छूट पर घिस रहा था... अनुज ने एक कदम और बढ़ने का सोचा और माँ के ब्लाउज को खोलने की कोशिश करने लगा...

पर उसके लिए दोनों हाथों की ज़रुरत थी... और जैसे hi उसने माँ के पेट से पकड़ ढीली की माँ एक तरफ को करवट लेने लगी तो अनुज ने भी उवैसे hi माँ के साथ साथ करवट ली पर माँ को खुद से चिपकाये hi रखा...

अनुज ने अब अपना ध्यान माँ के ब्लाउज को खोलने पर लगाया.... माँ को अब कोई फ़र्क़ नहीं था की उनका लड़का उन्हें नंगा कर रहा है वो बस अनुज के लुंड को छूट पर महसूस कर मस्त हो रही थी.....

कुछ hi पालो में अनुज ने माँ के गीले ब्लाउज के सरे हुक खोल दिए और फिर दोनों पाटों को अलग फैला कर अपने हाथ में माँ के नंगे छूछे को पकड़ा..

माँ का नंगा छूछा हाथ में आते hi अनुज के बदन में एक बार और करंट लगा और उसने एक बार फिर से कमर पीछे खींच के आगे की और धक्का मारा और उसी समय माँ को भी अपने नंगे छूछे का अनुज के हाथ में होने का एहसास हुआ तो उत्तेजना से उनका बदन भी थोड़ा अकड़ा...

एक तरफ करवट लेकर लेटने से पहले hi स्थिति थोड़ी बदल गयी थी ऊपर से अनुज का कमर पीछे करना और माँ का बदन अकड़ना और फिर अनुज का कमर से बापिस आगे की और झटका देना जिसका नतीजा ये हुआ की अनुज का लुंड अब तक जो माँ की छूट पर घिस रहा था उसका टोपा सीधा जाकर लगा माँ की छूट के होंठों से और थोड़ा ज़ोर पड़ते hi माँ की छूट के होंठ खुल गए और अनुज का लुंड करीब तीन इंच माँ की छूट में समां गया.....

जिसके साथ hi एक चीख गूँज उठी जो माँ की थी...

माँ- ओह्ह्ह्हह लाल्ल्लाःह्ह्ह आआह्ह्ह्हह्ह...

अनुज को तो जैसे काटो तो खून नहीं उसका बदन काँप रहा था उसके मन में तूफ़ान आ गया था की उसका लुंड उसकी माँ की गरम छूट में है... वो ज्यों का त्यों अटक गया था...

माँ- ओह्ह्ह्हह लाल्ल्लाःह्ह्ह अह्ह्ह टेरराह लललललूणनंदददद...

अनुज ने कास के माँ की चूचियों को भींच लिए और फिर एक गुर्राहट की आवाज़ उसकी निकली और अनुज का लुंड उतना hi घुसे हुए hi माँ की छूट में रास की धार मरने लगा...

अनुज ये सोचकर की उसका लुंड उसकी माँ की छूट में है खुद को रोक hi नहीं पाया और रास की पिचकारियां छूट में मरने लगा...

माँ को भी जब ये एहसास हुआ की उसका बीटा उसके अंदर झाड़ रहा है तो उनके चेहरु पर इस सब के बाद भी एक अजीब सी मुस्कान आ गयी...

इधर पीछे से अनुज ने गुर्राते हुए अपनी एक एक बून्द निचोड़ दी... और माँ से चिपके हुए हांफने लगा माँ ने कुछ पल और इंतज़ार किआ और फिर खुद आगे खिसक गयी तो अनुज का लुंड उनकी छूट से निकल गया जो की झड़ने के बाद भी बिलकुल सख्त होकर खड़ा था... माँ की छूट से अनुज का रास बहकर बहार आ रहा था जिसे माँ ने अपनी गीली सारी से पांच लिए..

माँ के हटने पर अनुज को भी जैसे होश आया वो खुद से नाराज़ था की वो इतना ाचा मौका मिलने के बाद भी माँ को ठीक से छोड़ नहीं पाया और झाड़ गया... उसे इस बात का बहुत दुःख हो रहा था....

कर्मा और शालू

कर्मा हर धक्के के साथ, अपने लुंड को मौसी के चूतड़ों पर बार बार रगड़ रहा था, कभी टोपा गांड के छेड़ को भेदने की कोशिश करता तो शालू अंदर तक गंगंगा जाती वहीं जब जब छूट के होंठों को रगड़ता तो तड़पने लगती...

वहीं कर्मा का भी उत्तेजना से बुरा हाल था उससे और खुद पर काबू नहीं हो रहा था, उसने शालू की कमर को कास के थम लिए और खुद की कमर को पीछे खींचा की तभी एक आवाज़ आई....

जिसे सुनकर दोनों hi बिलकुल शांत हो गए... और गद्दे में hi खड़े हो गए आवाज़ पास से hi आ रही थी, मौसी और कर्मा दोनों hi परेशां थे की क्या हो सकता है.. आवाज़ धीरे धीरे पास आने लगी मौसी बिलकुल पीछे होकर कर्मा से चिपक गयी..

कर्मा ने भी उन्हें खुद से कास लिया, आवाज़ बिलकुल पास आई और फिर अचानक से उनके गद्दे के बगल में कुछ नज़र आया.. जो की एक हिरन था... और वो गद्दे में मुँह दाल कर पानी पीने लगा...

हिरन को देखकर दोनों की जान में जान आई.. तो दोनों की परेशानी काम हुई तो कर्मा जो मुश्किल के लिए तैयार था बापिस गद्दे की दीवार से टिक कर बैठ गया.

वहीं मौसी ने चैन की सांस ली और बोली.

मौसी- हे भगवन इसने तो डरा hi दिया..

मौसी भी ये कहकर वैसे hi पहले की तरह पीछे कर्मा से टिक कर बैठी पर वैसे hi उनके मुँह से एक चीख निकल गयी....

क्यूंकि इस बार मौसी जैसे hi बापिस बैठी तो. कर्मा के लुंड को अपने चूतड़ों के बीच फंसने की जगह वो उस पर hi बैठती चली गयी... और कर्मा का लुंड उनकी छूट में घुसता चला गया...

इसके आगे क्या हुआ अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्
 
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