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अनुज ने बहार निकल क्र मोटरसाइकिल निकली और फिर दोनों लोग निकल गए.
हम लोग गेट बंद करके घर के अंदर आये और फिर मैं आकर खत पर बैठ गया माँ थोड़ी चिंता में लग रही थी फिर उनकी नज़र मुझ पर गयी
तो माँ ने बोलै तुझे भी भूख लगी होगी तेरे लिए भी नाश्ता ला देती हूँ....
अपडेट 91
मैं जाकर आंगन में बैठ गया सच में बहुत तेज़ भूख लगी थी सुबह से दो बार झाड़ चूका था माँ ने आलू के परांठे बनाये थे जो दही के साथ में जल्दी जल्दी लपेटने लगा.. उधर माँ रसोई का काम निपटा रही थी मैंने भरपेट खा लिए तो शांति मिली झूठे बर्तन उठाकर रसोई में ले गया और रख दिए... खैर पेट पूजा तो हो चुकी थी अब मेरी नज़र माँ पर गयी तो माँ अब भी थोड़ी चिंता में लग रही थी मौसी की वजह से...
मैंने माँ को पीछे से जाकर गले लगा लिया...
माँ- हाँ बीटा...
में- तुमने नाश्ता किआ माँ?
माँ- हाँ बीटा तेरे पापा और अनुज के साथ खा लिया था थोड़ा...
मैं माँ से पीछे से चिपका हुआ था और उनकी गांड की गर्मी पाकर मेरा लुंड जागने लगा और मेरे अरमान भी...
में- माँ तुम कितनी प्यारी हो..
और ये कहकर मैं उनकी गर्दन को चूमने लगा माँ उस वक़्त चूल्हा साफ़ कर रही थी...
माँ- कर्मा अभी नहीं बीटा मेरा बिलकुल भी मन नहीं है...
में- मैं जनता हूँ माँ मौसी की वजह से ना... पर माँ तुम्हारे या मेरे परेशां होने से थोड़े hi कुछ होगा... होगा वही जो होना है तो इतना मत सोचो..
माँ- ऐसे कैसे न सोचूं कर्मा... बहन है वो मेरी... वैसे hi बेचारी को दुखो की कमी नहीं ऊपर से मुये उसके ससुराल वाले...
में- माँ सब ठीक हो जायेगा तुम परेशां मत हो...
और मैंने माँ का पल्लू पकड़ कर उनके सीने से नीचे गिरा दिया और अपने हाथ उनके नंगे पेट पर फिरने लगा साथ hi पीछे से उनकी गर्दन को चूमते हुए उन्हें समझा रहा था...
माँ- उम्मीद तो यही है की सब ठीक हो जाये और बेचारी को और परेशां न होना. पड़ा ..
माँ ने चूल्हे से हाथ हटाकर एक मेरे हाथ के ऊपर पेट पर रख लिया और दूसरा ऊपर लेकर मेरे गाल पे और सहलाने लगी...
में- नहीं होगी माँ और उनका साथ देने के लिए हम लोग हैं न तुम क्यों चिंता करती हो हम लोग मौसी को किसी भी परेशानी में नहीं पड़ने देंगे...
मैं जैसे जैसे बोल रहा था मेरे हाथ माँ के नंगे पेट और कमर पर घूम रहे थे....
माँ- अब काम करने दे बीटा...
में- काम तो होता रहता है माँ... अभी थोड़ा तुम्हे प्यार तो करने दो...
और मैंने अपनी एक उंगली माँ की नाभि में घुसेड़ दी और छेड़ने लगा साथ hi ब्लाउज में पीछे नंगी पीठ को चाटने लगा.
माँ- तेरा बस चले तो हर समय प्यार hi करता रहे...
मैंने कुछ नहीं कहा और सीधा होकर माँ के चेहरे को एक तरफ करके अपने होंठो को उनके होंठो पर रख दिया.. माँ ने भी अपने होंठो को खोलकर मेरा साथ दिया और हमारे होंठ आपस में धीरे धीरे कुश्ती करने लगे...
मेरा एक हाथ माँ के पेट और कमर को मसल रहा था तो दूसरा माँ की नाभि में उंगली दाल कर उसे छेड़ रहा था.. लेकिन सब कुछ धीरे धीरे आराम से हो रहा था मुझे कोई जल्दी नहीं थी और मैं आराम से अपनी माँ के मदहोश और गदराये बदन का मज़ा ले रहा था... मेरा लुंड पूरी तरह तन चूका था और पीछे से माँ की गांड में घुसना छह रहा था...
मैं माँ के रसीले होंठों का रास पि रहा था और होंठो के साथ जीभ कब खेल में शामिल हो गयी हमें भी पता नहीं चला.. कभी मैं माँ की जीभ को अपने मुँह में लेकर चूसता तो कभी माँ मेरी... माँ जब अपने कोमल और रसीले होंठों से मेरी जीभ और होंठो को चूसती तो एक बेहद हस्सें आनंद मिलता.. माँ मेरी जीभ को ऐसे चूस रही थी जैसे वो मेरा लुंड चूसती है..

माँ और बेटे के प्यार का ऐसा कामुक और उत्तेजक रूप बहुत काम hi देखने को मिलता होगा...
हमारे होंठों और जीभ की कुश्ती का असर पूरे शरीर पर हो रहा tha...maa के हाथ मुझे चूमते हुए मेरे बालों में चल रहा था तो दूसरा अभी भी मेरे हाथ के ऊपर था जो की का की कमर के कोमल गदराये हुए मॉस को मसल रहा था... और मेरा दूसरा हाथ अब माँ की साड़ी के एक छोर को पकड़ कर धीरे धीरे से उसे माँ के बदन से अलग करने की कोशिश कर रहा था...
हालाँकि पीछे से मेरे चिपके होने की वजह से निकलना मुश्किल हो रहा था पर एक पल के लिए भी मैं माँ से अलग नहीं होना छह रहा था... फिर भी किसी तरह कोशिश कर कर के मैं माँ की साड़ी को ढीला करता जा रहा था... ये सब होने के बाद भी हमारे होंठ आपस में जुड़े हुए hi थे... और मैं चाहता भी था की ये होंठो का मिलान बस चलता hi रहे...
खैर माँ की जीभ को चूसते चूसते और कोशिश करते करते मैंने माँ की साड़ी को उनकी कमर से ज़्यादातर ढीला कर दिया था...
और अंत में एक झटके से मैंने साड़ी को खींचा और वो माँ की कोमल और गदराई हुई कमर से अलग हो गयी...

और अब माँ की चिकनी कमर, नंगा पेट और गहरी नाभि सामने आ गयी...
अब माँ सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में मेरे सामने कड़ी थी.... हालाँकि मैं माँ को पीछे से पकड़े हुए था और सामने से देख नहीं प् रहा था पर फिर भी मेरे और माँ के बीच से कपड़ो की एक दीवार काम हो चुकी थी...
जब साड़ी नीचे कदमो थी तब जाकर हमारे होंठ अलग हुए और माँ तो इतनी खो गयी थी मेरी जीभ चूसने में की उन्हें अपनज साड़ी खुलने का अंदाज़ा भी नहीं हुआ... माँ भी इतनी देर की होंठो की जुगलबंदी से गरम हो गयी थी...
माँ- बदमाश तूने मेरी साड़ी भी उतर दी और मुझे पता भी नहीं चलने दिया...
में- कमसे काम एक कपडा तो काम हुआ हमारे बीच में...
माँ- ाचा कपडे काम करके क्या करना है तुझे...
में- प्यार करना है माँ बहुत सारा...
और फिर मैं माँ के पीछे घुटनो पर बैठ गया और उनकी पीठ के नंगे हिस्से जो ब्लाउज और पेटीकोट के बीच था उसे चाटने लगा...
माँ मेरे होंठों को अपने बदन पर महसूस कर सिहर उठी...
माँ- हममममममममम ललललाआआअ...
मैंने जब पीठ के नंगे हिस्से को चाट चाट कर गीला कर दिया तो फिर माँ को अपनी तरफ घुमा लिए और मेरे सामने माँ की नंगा पेट और नाभि आ गयी... पता नहीं माँ के साथ ये सब करने की वजह से था या माँ के बदन का हर अंग इतना कामुक और खूबसूरत था की मेरा उनके जिस्म के किसी भी हिस्से को छोड़ने का मन नहीं करता था...
और इस समय तो मेरे सामने मख्हन जैसा कोमल और गदराया हुआ पेट और कमर थी... मैंने समय न गंवाते हुए अपने होंठों को माँ के मखमली पेट पर रख दिया और चाटने लगा... माँ के हाथ खुद बा खुद मेरे बालों पर आ गए और मेरे सर को पकड़ लिया माँ ने
मैंने भी अपने दोनों हाथ पेटीकोट के ऊपर से माँ के दोनों गद्देदार चूतड़ों पर रख दिए और उनके गुड़गुड़ेपन का मज़ा पेटीकोट के ऊपर से hi दबा कर लेने लगा... साथ hi मैं माँ की कमर और पेट के पूरे हिस्से को कहते जा रहा था... और फिर जब मैं संतुष्ट हो गया की मैंने पूरे हिस्से को अपने थूक से गीला कर दिया है मैंने अपनी जीभ माँ की नाभि में घुसा दी और चूसने लगा...
Maa-aahhhhh अह्ह्ह्हह्ह्ह्ह कर्माआआआ aaaahhhhhhhhhhhhh..
माँ मेरी जीभ के प्रहार से गरम होकर सिसकियाँ ले रही थी...
नाभि को चूसते हुए hi मैं अपने हाथों को माँ के चूतड़ों से उठाकर ब्लाउज के सामने लाया और फिर एक एक करके माँ की ब्लाउज के हुक खोलने लगा... ब्लाउज के खुलते hi मैंने दोनों पतों को अलग कर दिया जिससे माँ के पेट का थोड़ा और हिस्सा मेरे सामने आ गया जिसे मैंने चाटने लगा...
और फिर चाटते चाटते.... मैं ब्रा के ऊपर से माँ की बड़ी बड़ी छूछीयों को दबाने laga...aur फिर हाथ हटाकर माँ के ब्लाउज को पूरी तरह निकल दिया अब माँ सिर्फ पेटीकोट और ब्रा में कड़ी थी मेरे सामने रसोई में...
मैंने माँ को एक बार फिर से घुमा दिया और फिर से उनके पीछे से चिपक gaya...aur अपना लुंड एक बार फिर से माँ की गांड की दरार में पेटीकोट के ऊपर से hi फंसा दिया.. और पीछे से माँ की बड़ी बड़ी मुलायम दूध की थैलियों को दबाने लगा... साथ hi साथ उनकी गर्दन को भी चूम रहा था बीच बीच में..
माँ- अह्हह्ह्ह्ह ummmmmmmmmmmmmm लललललाहा ारायअम्म्मम्म्म्म सीईए...
में- माँ तुम हमेशा ब्रा क्यों पहनती हो.. परेशानी नहीं होती...
मैंने ब्रा के ऊपर से hi दबाते हुए पुछा...
Maa-ummmmmmmmmmmmmm होती है बेटा पर मेरे दूध बड़े हैं ना अह्ह्ह्ह तो बिना ब्रा के संभालेंगे नही...
मैंने फिर माँ की ब्रा को नीचे खिसका दिया और उनकी नंगी छूछीयों को अपने हाथों से मसलने लगा...

माँ की नरम नरम छूछीयो को मसलने में बहुत मज़ा आ रहा था ऐसा लग रहा था जैसे रुई के दो बड़े बड़े गोले मेरे हाथो में हो...
में- तो क्या हुआ माँ ब्लाउज तो होगा hi न फिर सँभालने की क्या बात है..
माँ- ुहम्म्म्म ऐसे hiiiiiiiiiiiiiiiiiiii लल्ला... बिना ब्रा के काफी नज़र आएंगे और ऊपर से निप्पल भी दीखता है ब्लाउज से तो...
में- तो क्या हुआ माँ घर में तो रह hi सकती हो बहार जाना तो ब्रा पहन लेना...
माँ- ाचाहहह तू चाहता है तेरी माँ की छूछीयो को और कोई भी देखे... घर में तेरे अलावा अनुज भी है और बहार से भी लोग आते जाते रहते हैं.
में- कैसे दिखेगी माँ ब्लाउज के ऊपर साड़ी का पल्लू भी तो रहता है.. और तुम्हारी छुछियां इतनी मस्त हैं की हर कोई देखना चाहेगा जो जी भर के देखले उसका तो मज़ा आ जाये..
मैंने माँ की छूछीयो को मसलते हुए कहा साथ hi माँ की गर्दन पर भी चूम लिया
माँ- ाचाहहह तो तू क्या चाहता है सबको अपने दूध दिखती फिरू..?
में - अरे माँ तुम भी न मैं इसलिए कह रहा हूँ की तुम्हे तकलीफ नहीं होगी और घर घर में क्या बुराई है...
माँ- ाचा ठीक है सोचूंगी अगर ठीक लगेगा तो नहीं बिना ब्रा के तो नहीं पहनूंगी...
में- ये हुई न बात और ये कहकर मैंने माँ की ब्रा को पीछे से खोल दिया और उसे भी ब्लाउज के ऊपर फ़ेंक दिया..
और माँ को फिर से अपनी तरफ घुमाया और अपने होंठ उनके होठों पर रख कर एक बार फिर से चूमने लगा साथ hi मेरे हाथ उनकी नंगी छूछीयों पर चल रहे थे...
करीब 2-3 मिनट्स तक माँ के होंठों को चूसने के बाद मैंने होंठ अलग किये और फिर उनकी छूछीयों की तरफ सर को झुका दिया और मुँह खोल कर एक छुच्छी को मुँह में भरा hi था की कोई हमारा गेट बजाना लगा...
माँ और मैं चौंक गए वहीं मैं किलास भी गया की साला इतने सही टाइम पर किसने अपनी गांड मरवाली... इतना मज़ा आ रहा था... माँ अपनी सारी और ब्लाउज उठा कर अपने कमरे में चली गयी...
माँ- जा कर्मा तू गेट पर देख...
मैंने गेट खोला तो सामने जग्गू खड़ा था सेल को देखकर गुस्सा तो बहुत आ रहा था की सेल को सुबह hi छूट और गांड का स्वाद चखाया और अब मेरे और माँ के बीच में आ गया... एहसान फरामोश कहीं का....
मन ऐसी अजीब सी बातें सोचते हुए मैंने पुछा- क्या हुआ बे?? कैसे परेशां हो रहा है..
जग्गू- अबे सेल वो गाड़ी वाला तेरे बाघ के पास खड़ा है गाड़ी लेकर तुझे फ़ोन कर रहा हूँ तो तू उठा नहीं रहा..
में- गाड़ी वाला आ गया? बड़ी जल्दी.. और मेरा फ़ोन शायद कमरे में था इसलिए पता नहजी चला.. रुक मैं माँ को बोलकर और फ़ोन लेकर आता हूँ..
जग्गू- जल्दी आ..
मैं अंदर गया अपने कमरे से फ़ोन लिए और फिर माँ के कमरे में गया तो वो साड़ी लपेट रही थी..
में- माँ वो गाड़ी वाला आ गया है.. मैं जा रहा हूँ...
माँ- ठीक है लल्ला और आराम से कार्यो ..
में- ठीक है माँ...
और ये कहकर मैं जग्गू के साथ निकल गया... पहले अपने बैग पहुंचा वहां से मैं और जग्गू गाड़ीवाले के साथ हमारे खेत वाले कमरे पर पहुंचे पापा ने एक खेत के किनारे एक कमरा बनवा रखा था फसल रखने के लिए... उसे गोदाम की तरह इस्तेमाल करते थे वहां पहुँच कर गाड़ी ठीक से लगवाई और फिर शुरू हुई बेलदारी... काम से काम 200-300 किलो आलू था ट्रक में चढ़ाते चढ़ाते जान निकल गयी मेरी और जग्गू की साथ hi गाड़ीवाले की भी... उसके बाद जब मेरे आलू रख गए तो फिर गाड़ी लेकर जग्गू के खेत पहुंचे वहां भी.. यही काम शुरू हो गया.. उतने hi आलू फिर से ट्रक में रखवाने थे... बहुत म्हणत करने के बाद वहां का भी काम ख़तम हुआ पर हम लोग बुरी तरह थक चुके थे...
और फिर वहीं बैठकर पानी वगेरा पि रहे थे...
जग्गू- और भैया अब तो किसी के आलू नहीं उठाने न यहाँ से..
गाड़ीवाला- अरे उठाने हैं भैया गेंदपुर में से..
गैंदपुर सुनके मेरे कान खड़े हो गए...
में- गैंदपुर में किसके यहाँ से?
गाड़ीवाला- नाम तो मुझे नहीं पता भैया... बस घर देखा है..
Me-acha घर किधर है...
गाड़ीवाला- बस गाओं में घुसते hi दूसरा माकन है उलटे हाथ पर...
जो कान खड़े हुए थे वो फिर बापिस बैठ गए...
में- ाचा... ठीक है.. चलें जग्गू थक गए बहुत..
जग्गू- हाँ यार चलते हैं
ऐसे hi थोड़ी देर बाद गाड़ीवाला गाड़ी लेकर निकल गया और हम दोनों भी खेत से चल दिए..
जग्गू- चल कर्मा घर चल चाय वगेरा पिटे हैं..
वैसे भी उसके खेत से उसका घर पास था तो मैं उसके साथ hi चल दिया..
में- ठीक है चल... यार वैसे भी गांड पहात गयी आलू चढ़ाते चढ़ाते...
जग्गू- देखले कहीं पह्मा लाल न हो गया हो...
में- सेल बाप के साथ मजाक करता है...
जग्गू- सेल काम बोल अभी फटी हो या न फटी हो अब जरूर पहाड़ दूंगा तेरी गांड...
ऐसे hi लड़ते झगड़ते हम लोग जग्गू के घर पहुंचे...
घर पर हमेशा की तरह भग्गू गायब था ताऊ जी भी नहीं थे भाभी और तै थी घर पर...
तै जी बहार खत पर बैठी बैठी सब्जियां छील रही थी भाभी कहीं दिख नहीं रही थी...
मंजू तै- अरे आ गए तुम दोनों बच्चा... चढ़ा दिए सरे आलू..
जग्गू- हाँ मम्मी सरे चढ़ा दिए...
मंजू तै- चलो बढ़िया.. हाय थक गए आज तो दोनों बछुआ..
Me-are तै साडी जान निकल गयी...
और मैं वहीं तै के बगल में खत पर धम्म से गिर कर लेट गया...
मंजू तै- हाँ बच्चा थक तो गए होंगे इतना आलू चढ़ा कोई हलकी बात थोड़े hi न है... चलो चाय बनवाती हूँ तुम्हारे लिए... ऐ प्रेमा आरी ो प्रेमा चाय रखले 4 कप..
अंदर से प्रेमा भाभी की आवाज़ aai...theek है मम्मी..
जग्गू- ऐ कर्मा आगे हो मुझे भी लेटना है...
मंजू तै- आजा कर्मा तू इधर खिसक आ..
मंजू तै ने सब्जियां का बर्तन खत से उठा कर नीचे रख दिया और मैं उनकी तरफ खिसक कर लेट गया...
और मेरे बगल में जग्गू भी मगरमच्छ की तरह पसर गया...
मंजू तै- ले बच्चा आराम से अपना सर रख ले इधर अब लेट...
और तै ने मेरा सर अपनी गॉड में रख लिए... अह्ह्ह बड़ा आराम मिला ऐसे लेटने में गॉड में सर रखकर सोने में तकिये से भी ज़्यादा आराम मिलता है...
मैंने उनकी गॉड में सर रख लिए और वो मेरे सर पर हाथ फिरने लगी... मुझे तो बेहद आराम मिलने लगा...
मंजू tai-thak गया बछुआ हमार...
थोड़ी देर hi हुई थी की जग्गू बोल पड़ा...
जग्गू- ऐ कर्मा थोड़ा उधर हो तेरे घुटने लग रहे हैं मुझे..
में- तुझे भी चैन नहीं है.. आराम नहीं करने दे रहा
मंजू तै- तू इधर घूमजा कर्मा फिर जगह बन जाएगी..
अब तक मेरा चेहरा बहार की तरफ था फिर घूमने से अब मेरा चेहरा तै के पेट की तरफ हो गया...
जिससे जग्गू ने एक और ाचा काम कर दिया और अब मेरी आँखों के सामने तै का नंगा गोरा पेट और गहरी नाभि आ गयी उनका पल्लू हमेशा की तरह कंधे पर साइड में लटका हुआ था...
हाय देखने में hi कितना ाचा लग रहा था तै का गदराया हुआ पेट उनकी कमर और गहरी नाभि मेरे नूह में तो देख कर hi पानी आने लगा था... मैंने सोचा वाह क्या किस्मत पाई है रे कर्मा सीधा गॉड में आ गया तै की... मेरा मन कर रहा था उनके पेट को चूम्लूं उनकी नाभि में जीभ घुसेड़ कर चूस लूँ... और मैंने सोचा भी क्यों न इस मौके का पूरी तरह फायदा उठाया जाये...
इतना ाचा मौका दोबारा कब मिले नहीं पता तो सोच कर्मा सोच क्या कर सकते हैं... मेरे मन में एक ख्याल आया और मैंने बिना सोचे समझे चेहरा पीछे किआ और जग्गू से बोलै- अब तो ठीक से लेता है तू ले और आराम से लेट्जा....
और ये बोलकर मैं जानकार आगे बढ़ गया जिससे अब मेरा चेहरा तै के पेट से चिपक गया और मैंने जानकर अपना हाथ उनकी नंगी कमर पर रख लिए जिससे ऐसा लगे की मैं उनको पकड़ कर लेता हूँ....
उनकी नरम नरम पेट की त्वचा मेरे चेहरे पर बहुत अछि लग रही थी बेहद कोमल और गद्देदार पेट था तै का... कुछ देर ऐसे hi लेते रहने के बाद मैंने आगे बढ़ने की सोची...
और तै के पेट को अपने होंठ खोलकर हलके से चूम लिए... और रुक गया देखने के लिए की तै की क्या प्रतिक्रिया होती है... तै ने कोई खास प्रतिक्रिया नहीं वैसे hi मेरे बालों में हाथ फिरत रही... मैंने फिर से उनके पेट को चूम लिए और फिर रुक के देखा फिर से कोई प्रतिक्रिया नहीं... तो मेरी हिम्मत बढ़ने लगी और मैं तै के पेट को चूमते हुए अपनी जीभ भी इस्तेमाल करने लगा साथ hi मैंने अपना हाथ उनकी कमर पर फिरना शुरू कर दिया...
तभी तै चहक से बोल पड़ी- क्या कर रहा है कर्मा...
मैं दर गया की अब क्या होगा कहीं तै गुस्सा तो नहीं हो गयी.. कहीं जग्गू के सामने बोलै तो वो गुस्सा तो नहीं हो जायेगा...
इतने में तै ने आगे लाइन बोली- गुदगुदी हो रही है बच्चा...
मैंने जब उनकी पूरी बात सुनी तो थोड़ा चैन आया तै गुस्सा नहीं थी उनका हाथ अब भी बालों में चल रहा था न hi उन्होंने मेरे उनके पेट चूमने को गलत लिए बस गुदगुदी हो रही थी तो बोली...
में- ाचा लग रहा है तै तुम्हारा पेट नरम और मुलायम है...
Jaggu-kya नरम और मुलायम है कर्मा...
मंजू तै- अरे कर्मा को हमारा पेट मुलायम लग रहा है... तभी कैसे छू छु कर देख रहा है...
Jaggu-mujhe भी देखना है...
और जग्गू उठकर तै के बगल में आकर बैठ गया और अपना हाथ उनकी कमर पर रख दिया... पर मैं भी ज़िद्दी था मैंने अपना हाथ और मुँह ज़रा भी नहीं हटाया साला मेरी नक़ल करता है...
मंजू tai-tum दोनों hi बच्चे रहोगे हमेशा जो एक को करेगा वो दूसरा भी करेगा... पागलो कहीं के...
तै जग्गू के बालों में दूसरा हाथ डालकर सहलाने लगी... पर ाचा hi हुआ अब मैं खुल कर उनके पेट को चूम सकता था और मैं चूमने भी लगा साथ hi उनकी कमर को मसल रहा था... वहीं जग्गू भी अपनी मम्मी की कमर को दबाते हुए मज़े ले रहा था...
मैं तै के पेट को चूमते हुए... उनकी नाभि की और बढ़ने लगा मेरा बड़ा मन था उनकी नाभि में जीभ डालकर चूसने का... और मैं तै की नाभि के बिलकुल करीब पहुंच गया और अपनी जीभ उनकी नाभि में डालने hi वाला था की एक आवाज़ आई और तै उठ गयी..
प्रेमा भाभी- लो सब लोग चाय पि लो...
ले मेरी फूटी किस्मत... पर क्या क्र सकते थे उठना पड़ा भाभी ने चाय के साथ नमकीन दी... चाय पीते पीते सबने मिल बैठकर बातें की मैंने उन्हें मौसी जे बारे में बताया तो दोनों hi बोली बेचारी के साथ गलत हो रहा है चैन से जीने नहीं देते लोग तै तो तै थी एक कदम आगे बढाकर मौसी के ससुराल वालो को गली देने lagi...phir बोली की माँ से मिलने जाएँगी... भाभी बोली मैं भी चलूंगी.. इसी तरह चाय ख़तम हुई...
.. एक उम्मीद थी की चाय ख़तम करने के बाद फिर से शायद मौका मिले पर चाय ख़तम होने के बाद तै और भाभी अपने अपने काम में लग गयी.. मेरा मूड ख़राब हो गया तो मैंने सोचा अब चलना चाहिए और जग्गू से बोलकर घर से निकल लिए...
रस्ते में जा hi रहा था की पीछे से एक आवाज़ आई...
इसके आगे क्या हुआ जानिए अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत शुक्रिया
हम लोग गेट बंद करके घर के अंदर आये और फिर मैं आकर खत पर बैठ गया माँ थोड़ी चिंता में लग रही थी फिर उनकी नज़र मुझ पर गयी
तो माँ ने बोलै तुझे भी भूख लगी होगी तेरे लिए भी नाश्ता ला देती हूँ....
अपडेट 91
मैं जाकर आंगन में बैठ गया सच में बहुत तेज़ भूख लगी थी सुबह से दो बार झाड़ चूका था माँ ने आलू के परांठे बनाये थे जो दही के साथ में जल्दी जल्दी लपेटने लगा.. उधर माँ रसोई का काम निपटा रही थी मैंने भरपेट खा लिए तो शांति मिली झूठे बर्तन उठाकर रसोई में ले गया और रख दिए... खैर पेट पूजा तो हो चुकी थी अब मेरी नज़र माँ पर गयी तो माँ अब भी थोड़ी चिंता में लग रही थी मौसी की वजह से...
मैंने माँ को पीछे से जाकर गले लगा लिया...
माँ- हाँ बीटा...
में- तुमने नाश्ता किआ माँ?
माँ- हाँ बीटा तेरे पापा और अनुज के साथ खा लिया था थोड़ा...
मैं माँ से पीछे से चिपका हुआ था और उनकी गांड की गर्मी पाकर मेरा लुंड जागने लगा और मेरे अरमान भी...
में- माँ तुम कितनी प्यारी हो..
और ये कहकर मैं उनकी गर्दन को चूमने लगा माँ उस वक़्त चूल्हा साफ़ कर रही थी...
माँ- कर्मा अभी नहीं बीटा मेरा बिलकुल भी मन नहीं है...
में- मैं जनता हूँ माँ मौसी की वजह से ना... पर माँ तुम्हारे या मेरे परेशां होने से थोड़े hi कुछ होगा... होगा वही जो होना है तो इतना मत सोचो..
माँ- ऐसे कैसे न सोचूं कर्मा... बहन है वो मेरी... वैसे hi बेचारी को दुखो की कमी नहीं ऊपर से मुये उसके ससुराल वाले...
में- माँ सब ठीक हो जायेगा तुम परेशां मत हो...
और मैंने माँ का पल्लू पकड़ कर उनके सीने से नीचे गिरा दिया और अपने हाथ उनके नंगे पेट पर फिरने लगा साथ hi पीछे से उनकी गर्दन को चूमते हुए उन्हें समझा रहा था...
माँ- उम्मीद तो यही है की सब ठीक हो जाये और बेचारी को और परेशां न होना. पड़ा ..
माँ ने चूल्हे से हाथ हटाकर एक मेरे हाथ के ऊपर पेट पर रख लिया और दूसरा ऊपर लेकर मेरे गाल पे और सहलाने लगी...
में- नहीं होगी माँ और उनका साथ देने के लिए हम लोग हैं न तुम क्यों चिंता करती हो हम लोग मौसी को किसी भी परेशानी में नहीं पड़ने देंगे...
मैं जैसे जैसे बोल रहा था मेरे हाथ माँ के नंगे पेट और कमर पर घूम रहे थे....
माँ- अब काम करने दे बीटा...
में- काम तो होता रहता है माँ... अभी थोड़ा तुम्हे प्यार तो करने दो...
और मैंने अपनी एक उंगली माँ की नाभि में घुसेड़ दी और छेड़ने लगा साथ hi ब्लाउज में पीछे नंगी पीठ को चाटने लगा.
माँ- तेरा बस चले तो हर समय प्यार hi करता रहे...
मैंने कुछ नहीं कहा और सीधा होकर माँ के चेहरे को एक तरफ करके अपने होंठो को उनके होंठो पर रख दिया.. माँ ने भी अपने होंठो को खोलकर मेरा साथ दिया और हमारे होंठ आपस में धीरे धीरे कुश्ती करने लगे...
मेरा एक हाथ माँ के पेट और कमर को मसल रहा था तो दूसरा माँ की नाभि में उंगली दाल कर उसे छेड़ रहा था.. लेकिन सब कुछ धीरे धीरे आराम से हो रहा था मुझे कोई जल्दी नहीं थी और मैं आराम से अपनी माँ के मदहोश और गदराये बदन का मज़ा ले रहा था... मेरा लुंड पूरी तरह तन चूका था और पीछे से माँ की गांड में घुसना छह रहा था...
मैं माँ के रसीले होंठों का रास पि रहा था और होंठो के साथ जीभ कब खेल में शामिल हो गयी हमें भी पता नहीं चला.. कभी मैं माँ की जीभ को अपने मुँह में लेकर चूसता तो कभी माँ मेरी... माँ जब अपने कोमल और रसीले होंठों से मेरी जीभ और होंठो को चूसती तो एक बेहद हस्सें आनंद मिलता.. माँ मेरी जीभ को ऐसे चूस रही थी जैसे वो मेरा लुंड चूसती है..

माँ और बेटे के प्यार का ऐसा कामुक और उत्तेजक रूप बहुत काम hi देखने को मिलता होगा...
हमारे होंठों और जीभ की कुश्ती का असर पूरे शरीर पर हो रहा tha...maa के हाथ मुझे चूमते हुए मेरे बालों में चल रहा था तो दूसरा अभी भी मेरे हाथ के ऊपर था जो की का की कमर के कोमल गदराये हुए मॉस को मसल रहा था... और मेरा दूसरा हाथ अब माँ की साड़ी के एक छोर को पकड़ कर धीरे धीरे से उसे माँ के बदन से अलग करने की कोशिश कर रहा था...
हालाँकि पीछे से मेरे चिपके होने की वजह से निकलना मुश्किल हो रहा था पर एक पल के लिए भी मैं माँ से अलग नहीं होना छह रहा था... फिर भी किसी तरह कोशिश कर कर के मैं माँ की साड़ी को ढीला करता जा रहा था... ये सब होने के बाद भी हमारे होंठ आपस में जुड़े हुए hi थे... और मैं चाहता भी था की ये होंठो का मिलान बस चलता hi रहे...
खैर माँ की जीभ को चूसते चूसते और कोशिश करते करते मैंने माँ की साड़ी को उनकी कमर से ज़्यादातर ढीला कर दिया था...
और अंत में एक झटके से मैंने साड़ी को खींचा और वो माँ की कोमल और गदराई हुई कमर से अलग हो गयी...

और अब माँ की चिकनी कमर, नंगा पेट और गहरी नाभि सामने आ गयी...
अब माँ सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में मेरे सामने कड़ी थी.... हालाँकि मैं माँ को पीछे से पकड़े हुए था और सामने से देख नहीं प् रहा था पर फिर भी मेरे और माँ के बीच से कपड़ो की एक दीवार काम हो चुकी थी...
जब साड़ी नीचे कदमो थी तब जाकर हमारे होंठ अलग हुए और माँ तो इतनी खो गयी थी मेरी जीभ चूसने में की उन्हें अपनज साड़ी खुलने का अंदाज़ा भी नहीं हुआ... माँ भी इतनी देर की होंठो की जुगलबंदी से गरम हो गयी थी...
माँ- बदमाश तूने मेरी साड़ी भी उतर दी और मुझे पता भी नहीं चलने दिया...
में- कमसे काम एक कपडा तो काम हुआ हमारे बीच में...
माँ- ाचा कपडे काम करके क्या करना है तुझे...
में- प्यार करना है माँ बहुत सारा...
और फिर मैं माँ के पीछे घुटनो पर बैठ गया और उनकी पीठ के नंगे हिस्से जो ब्लाउज और पेटीकोट के बीच था उसे चाटने लगा...
माँ मेरे होंठों को अपने बदन पर महसूस कर सिहर उठी...
माँ- हममममममममम ललललाआआअ...
मैंने जब पीठ के नंगे हिस्से को चाट चाट कर गीला कर दिया तो फिर माँ को अपनी तरफ घुमा लिए और मेरे सामने माँ की नंगा पेट और नाभि आ गयी... पता नहीं माँ के साथ ये सब करने की वजह से था या माँ के बदन का हर अंग इतना कामुक और खूबसूरत था की मेरा उनके जिस्म के किसी भी हिस्से को छोड़ने का मन नहीं करता था...
और इस समय तो मेरे सामने मख्हन जैसा कोमल और गदराया हुआ पेट और कमर थी... मैंने समय न गंवाते हुए अपने होंठों को माँ के मखमली पेट पर रख दिया और चाटने लगा... माँ के हाथ खुद बा खुद मेरे बालों पर आ गए और मेरे सर को पकड़ लिया माँ ने
मैंने भी अपने दोनों हाथ पेटीकोट के ऊपर से माँ के दोनों गद्देदार चूतड़ों पर रख दिए और उनके गुड़गुड़ेपन का मज़ा पेटीकोट के ऊपर से hi दबा कर लेने लगा... साथ hi मैं माँ की कमर और पेट के पूरे हिस्से को कहते जा रहा था... और फिर जब मैं संतुष्ट हो गया की मैंने पूरे हिस्से को अपने थूक से गीला कर दिया है मैंने अपनी जीभ माँ की नाभि में घुसा दी और चूसने लगा...
Maa-aahhhhh अह्ह्ह्हह्ह्ह्ह कर्माआआआ aaaahhhhhhhhhhhhh..
माँ मेरी जीभ के प्रहार से गरम होकर सिसकियाँ ले रही थी...
नाभि को चूसते हुए hi मैं अपने हाथों को माँ के चूतड़ों से उठाकर ब्लाउज के सामने लाया और फिर एक एक करके माँ की ब्लाउज के हुक खोलने लगा... ब्लाउज के खुलते hi मैंने दोनों पतों को अलग कर दिया जिससे माँ के पेट का थोड़ा और हिस्सा मेरे सामने आ गया जिसे मैंने चाटने लगा...
और फिर चाटते चाटते.... मैं ब्रा के ऊपर से माँ की बड़ी बड़ी छूछीयों को दबाने laga...aur फिर हाथ हटाकर माँ के ब्लाउज को पूरी तरह निकल दिया अब माँ सिर्फ पेटीकोट और ब्रा में कड़ी थी मेरे सामने रसोई में...
मैंने माँ को एक बार फिर से घुमा दिया और फिर से उनके पीछे से चिपक gaya...aur अपना लुंड एक बार फिर से माँ की गांड की दरार में पेटीकोट के ऊपर से hi फंसा दिया.. और पीछे से माँ की बड़ी बड़ी मुलायम दूध की थैलियों को दबाने लगा... साथ hi साथ उनकी गर्दन को भी चूम रहा था बीच बीच में..
माँ- अह्हह्ह्ह्ह ummmmmmmmmmmmmm लललललाहा ारायअम्म्मम्म्म्म सीईए...
में- माँ तुम हमेशा ब्रा क्यों पहनती हो.. परेशानी नहीं होती...
मैंने ब्रा के ऊपर से hi दबाते हुए पुछा...
Maa-ummmmmmmmmmmmmm होती है बेटा पर मेरे दूध बड़े हैं ना अह्ह्ह्ह तो बिना ब्रा के संभालेंगे नही...
मैंने फिर माँ की ब्रा को नीचे खिसका दिया और उनकी नंगी छूछीयों को अपने हाथों से मसलने लगा...

माँ की नरम नरम छूछीयो को मसलने में बहुत मज़ा आ रहा था ऐसा लग रहा था जैसे रुई के दो बड़े बड़े गोले मेरे हाथो में हो...
में- तो क्या हुआ माँ ब्लाउज तो होगा hi न फिर सँभालने की क्या बात है..
माँ- ुहम्म्म्म ऐसे hiiiiiiiiiiiiiiiiiiii लल्ला... बिना ब्रा के काफी नज़र आएंगे और ऊपर से निप्पल भी दीखता है ब्लाउज से तो...
में- तो क्या हुआ माँ घर में तो रह hi सकती हो बहार जाना तो ब्रा पहन लेना...
माँ- ाचाहहह तू चाहता है तेरी माँ की छूछीयो को और कोई भी देखे... घर में तेरे अलावा अनुज भी है और बहार से भी लोग आते जाते रहते हैं.
में- कैसे दिखेगी माँ ब्लाउज के ऊपर साड़ी का पल्लू भी तो रहता है.. और तुम्हारी छुछियां इतनी मस्त हैं की हर कोई देखना चाहेगा जो जी भर के देखले उसका तो मज़ा आ जाये..
मैंने माँ की छूछीयो को मसलते हुए कहा साथ hi माँ की गर्दन पर भी चूम लिया
माँ- ाचाहहह तो तू क्या चाहता है सबको अपने दूध दिखती फिरू..?
में - अरे माँ तुम भी न मैं इसलिए कह रहा हूँ की तुम्हे तकलीफ नहीं होगी और घर घर में क्या बुराई है...
माँ- ाचा ठीक है सोचूंगी अगर ठीक लगेगा तो नहीं बिना ब्रा के तो नहीं पहनूंगी...
में- ये हुई न बात और ये कहकर मैंने माँ की ब्रा को पीछे से खोल दिया और उसे भी ब्लाउज के ऊपर फ़ेंक दिया..
और माँ को फिर से अपनी तरफ घुमाया और अपने होंठ उनके होठों पर रख कर एक बार फिर से चूमने लगा साथ hi मेरे हाथ उनकी नंगी छूछीयों पर चल रहे थे...
करीब 2-3 मिनट्स तक माँ के होंठों को चूसने के बाद मैंने होंठ अलग किये और फिर उनकी छूछीयों की तरफ सर को झुका दिया और मुँह खोल कर एक छुच्छी को मुँह में भरा hi था की कोई हमारा गेट बजाना लगा...
माँ और मैं चौंक गए वहीं मैं किलास भी गया की साला इतने सही टाइम पर किसने अपनी गांड मरवाली... इतना मज़ा आ रहा था... माँ अपनी सारी और ब्लाउज उठा कर अपने कमरे में चली गयी...
माँ- जा कर्मा तू गेट पर देख...
मैंने गेट खोला तो सामने जग्गू खड़ा था सेल को देखकर गुस्सा तो बहुत आ रहा था की सेल को सुबह hi छूट और गांड का स्वाद चखाया और अब मेरे और माँ के बीच में आ गया... एहसान फरामोश कहीं का....
मन ऐसी अजीब सी बातें सोचते हुए मैंने पुछा- क्या हुआ बे?? कैसे परेशां हो रहा है..
जग्गू- अबे सेल वो गाड़ी वाला तेरे बाघ के पास खड़ा है गाड़ी लेकर तुझे फ़ोन कर रहा हूँ तो तू उठा नहीं रहा..
में- गाड़ी वाला आ गया? बड़ी जल्दी.. और मेरा फ़ोन शायद कमरे में था इसलिए पता नहजी चला.. रुक मैं माँ को बोलकर और फ़ोन लेकर आता हूँ..
जग्गू- जल्दी आ..
मैं अंदर गया अपने कमरे से फ़ोन लिए और फिर माँ के कमरे में गया तो वो साड़ी लपेट रही थी..
में- माँ वो गाड़ी वाला आ गया है.. मैं जा रहा हूँ...
माँ- ठीक है लल्ला और आराम से कार्यो ..
में- ठीक है माँ...
और ये कहकर मैं जग्गू के साथ निकल गया... पहले अपने बैग पहुंचा वहां से मैं और जग्गू गाड़ीवाले के साथ हमारे खेत वाले कमरे पर पहुंचे पापा ने एक खेत के किनारे एक कमरा बनवा रखा था फसल रखने के लिए... उसे गोदाम की तरह इस्तेमाल करते थे वहां पहुँच कर गाड़ी ठीक से लगवाई और फिर शुरू हुई बेलदारी... काम से काम 200-300 किलो आलू था ट्रक में चढ़ाते चढ़ाते जान निकल गयी मेरी और जग्गू की साथ hi गाड़ीवाले की भी... उसके बाद जब मेरे आलू रख गए तो फिर गाड़ी लेकर जग्गू के खेत पहुंचे वहां भी.. यही काम शुरू हो गया.. उतने hi आलू फिर से ट्रक में रखवाने थे... बहुत म्हणत करने के बाद वहां का भी काम ख़तम हुआ पर हम लोग बुरी तरह थक चुके थे...
और फिर वहीं बैठकर पानी वगेरा पि रहे थे...
जग्गू- और भैया अब तो किसी के आलू नहीं उठाने न यहाँ से..
गाड़ीवाला- अरे उठाने हैं भैया गेंदपुर में से..
गैंदपुर सुनके मेरे कान खड़े हो गए...
में- गैंदपुर में किसके यहाँ से?
गाड़ीवाला- नाम तो मुझे नहीं पता भैया... बस घर देखा है..
Me-acha घर किधर है...
गाड़ीवाला- बस गाओं में घुसते hi दूसरा माकन है उलटे हाथ पर...
जो कान खड़े हुए थे वो फिर बापिस बैठ गए...
में- ाचा... ठीक है.. चलें जग्गू थक गए बहुत..
जग्गू- हाँ यार चलते हैं
ऐसे hi थोड़ी देर बाद गाड़ीवाला गाड़ी लेकर निकल गया और हम दोनों भी खेत से चल दिए..
जग्गू- चल कर्मा घर चल चाय वगेरा पिटे हैं..
वैसे भी उसके खेत से उसका घर पास था तो मैं उसके साथ hi चल दिया..
में- ठीक है चल... यार वैसे भी गांड पहात गयी आलू चढ़ाते चढ़ाते...
जग्गू- देखले कहीं पह्मा लाल न हो गया हो...
में- सेल बाप के साथ मजाक करता है...
जग्गू- सेल काम बोल अभी फटी हो या न फटी हो अब जरूर पहाड़ दूंगा तेरी गांड...
ऐसे hi लड़ते झगड़ते हम लोग जग्गू के घर पहुंचे...
घर पर हमेशा की तरह भग्गू गायब था ताऊ जी भी नहीं थे भाभी और तै थी घर पर...
तै जी बहार खत पर बैठी बैठी सब्जियां छील रही थी भाभी कहीं दिख नहीं रही थी...
मंजू तै- अरे आ गए तुम दोनों बच्चा... चढ़ा दिए सरे आलू..
जग्गू- हाँ मम्मी सरे चढ़ा दिए...
मंजू तै- चलो बढ़िया.. हाय थक गए आज तो दोनों बछुआ..
Me-are तै साडी जान निकल गयी...
और मैं वहीं तै के बगल में खत पर धम्म से गिर कर लेट गया...
मंजू तै- हाँ बच्चा थक तो गए होंगे इतना आलू चढ़ा कोई हलकी बात थोड़े hi न है... चलो चाय बनवाती हूँ तुम्हारे लिए... ऐ प्रेमा आरी ो प्रेमा चाय रखले 4 कप..
अंदर से प्रेमा भाभी की आवाज़ aai...theek है मम्मी..
जग्गू- ऐ कर्मा आगे हो मुझे भी लेटना है...
मंजू तै- आजा कर्मा तू इधर खिसक आ..
मंजू तै ने सब्जियां का बर्तन खत से उठा कर नीचे रख दिया और मैं उनकी तरफ खिसक कर लेट गया...
और मेरे बगल में जग्गू भी मगरमच्छ की तरह पसर गया...
मंजू तै- ले बच्चा आराम से अपना सर रख ले इधर अब लेट...
और तै ने मेरा सर अपनी गॉड में रख लिए... अह्ह्ह बड़ा आराम मिला ऐसे लेटने में गॉड में सर रखकर सोने में तकिये से भी ज़्यादा आराम मिलता है...
मैंने उनकी गॉड में सर रख लिए और वो मेरे सर पर हाथ फिरने लगी... मुझे तो बेहद आराम मिलने लगा...
मंजू tai-thak गया बछुआ हमार...
थोड़ी देर hi हुई थी की जग्गू बोल पड़ा...
जग्गू- ऐ कर्मा थोड़ा उधर हो तेरे घुटने लग रहे हैं मुझे..
में- तुझे भी चैन नहीं है.. आराम नहीं करने दे रहा
मंजू तै- तू इधर घूमजा कर्मा फिर जगह बन जाएगी..
अब तक मेरा चेहरा बहार की तरफ था फिर घूमने से अब मेरा चेहरा तै के पेट की तरफ हो गया...
जिससे जग्गू ने एक और ाचा काम कर दिया और अब मेरी आँखों के सामने तै का नंगा गोरा पेट और गहरी नाभि आ गयी उनका पल्लू हमेशा की तरह कंधे पर साइड में लटका हुआ था...
हाय देखने में hi कितना ाचा लग रहा था तै का गदराया हुआ पेट उनकी कमर और गहरी नाभि मेरे नूह में तो देख कर hi पानी आने लगा था... मैंने सोचा वाह क्या किस्मत पाई है रे कर्मा सीधा गॉड में आ गया तै की... मेरा मन कर रहा था उनके पेट को चूम्लूं उनकी नाभि में जीभ घुसेड़ कर चूस लूँ... और मैंने सोचा भी क्यों न इस मौके का पूरी तरह फायदा उठाया जाये...
इतना ाचा मौका दोबारा कब मिले नहीं पता तो सोच कर्मा सोच क्या कर सकते हैं... मेरे मन में एक ख्याल आया और मैंने बिना सोचे समझे चेहरा पीछे किआ और जग्गू से बोलै- अब तो ठीक से लेता है तू ले और आराम से लेट्जा....
और ये बोलकर मैं जानकार आगे बढ़ गया जिससे अब मेरा चेहरा तै के पेट से चिपक गया और मैंने जानकर अपना हाथ उनकी नंगी कमर पर रख लिए जिससे ऐसा लगे की मैं उनको पकड़ कर लेता हूँ....
उनकी नरम नरम पेट की त्वचा मेरे चेहरे पर बहुत अछि लग रही थी बेहद कोमल और गद्देदार पेट था तै का... कुछ देर ऐसे hi लेते रहने के बाद मैंने आगे बढ़ने की सोची...
और तै के पेट को अपने होंठ खोलकर हलके से चूम लिए... और रुक गया देखने के लिए की तै की क्या प्रतिक्रिया होती है... तै ने कोई खास प्रतिक्रिया नहीं वैसे hi मेरे बालों में हाथ फिरत रही... मैंने फिर से उनके पेट को चूम लिए और फिर रुक के देखा फिर से कोई प्रतिक्रिया नहीं... तो मेरी हिम्मत बढ़ने लगी और मैं तै के पेट को चूमते हुए अपनी जीभ भी इस्तेमाल करने लगा साथ hi मैंने अपना हाथ उनकी कमर पर फिरना शुरू कर दिया...
तभी तै चहक से बोल पड़ी- क्या कर रहा है कर्मा...
मैं दर गया की अब क्या होगा कहीं तै गुस्सा तो नहीं हो गयी.. कहीं जग्गू के सामने बोलै तो वो गुस्सा तो नहीं हो जायेगा...
इतने में तै ने आगे लाइन बोली- गुदगुदी हो रही है बच्चा...
मैंने जब उनकी पूरी बात सुनी तो थोड़ा चैन आया तै गुस्सा नहीं थी उनका हाथ अब भी बालों में चल रहा था न hi उन्होंने मेरे उनके पेट चूमने को गलत लिए बस गुदगुदी हो रही थी तो बोली...
में- ाचा लग रहा है तै तुम्हारा पेट नरम और मुलायम है...
Jaggu-kya नरम और मुलायम है कर्मा...
मंजू तै- अरे कर्मा को हमारा पेट मुलायम लग रहा है... तभी कैसे छू छु कर देख रहा है...
Jaggu-mujhe भी देखना है...
और जग्गू उठकर तै के बगल में आकर बैठ गया और अपना हाथ उनकी कमर पर रख दिया... पर मैं भी ज़िद्दी था मैंने अपना हाथ और मुँह ज़रा भी नहीं हटाया साला मेरी नक़ल करता है...
मंजू tai-tum दोनों hi बच्चे रहोगे हमेशा जो एक को करेगा वो दूसरा भी करेगा... पागलो कहीं के...
तै जग्गू के बालों में दूसरा हाथ डालकर सहलाने लगी... पर ाचा hi हुआ अब मैं खुल कर उनके पेट को चूम सकता था और मैं चूमने भी लगा साथ hi उनकी कमर को मसल रहा था... वहीं जग्गू भी अपनी मम्मी की कमर को दबाते हुए मज़े ले रहा था...
मैं तै के पेट को चूमते हुए... उनकी नाभि की और बढ़ने लगा मेरा बड़ा मन था उनकी नाभि में जीभ डालकर चूसने का... और मैं तै की नाभि के बिलकुल करीब पहुंच गया और अपनी जीभ उनकी नाभि में डालने hi वाला था की एक आवाज़ आई और तै उठ गयी..
प्रेमा भाभी- लो सब लोग चाय पि लो...
ले मेरी फूटी किस्मत... पर क्या क्र सकते थे उठना पड़ा भाभी ने चाय के साथ नमकीन दी... चाय पीते पीते सबने मिल बैठकर बातें की मैंने उन्हें मौसी जे बारे में बताया तो दोनों hi बोली बेचारी के साथ गलत हो रहा है चैन से जीने नहीं देते लोग तै तो तै थी एक कदम आगे बढाकर मौसी के ससुराल वालो को गली देने lagi...phir बोली की माँ से मिलने जाएँगी... भाभी बोली मैं भी चलूंगी.. इसी तरह चाय ख़तम हुई...
.. एक उम्मीद थी की चाय ख़तम करने के बाद फिर से शायद मौका मिले पर चाय ख़तम होने के बाद तै और भाभी अपने अपने काम में लग गयी.. मेरा मूड ख़राब हो गया तो मैंने सोचा अब चलना चाहिए और जग्गू से बोलकर घर से निकल लिए...
रस्ते में जा hi रहा था की पीछे से एक आवाज़ आई...
इसके आगे क्या हुआ जानिए अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत शुक्रिया




















