Incest Pyaar - 100 Baar - Page 20 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 116

मुकाम - Haansil/Pryaas (2)


इस बड़े और थोड़े आधुनिक शहर के इस रईस इलाके में शंकर जी की कार 7 बजे आ रुकी थी. 1000 गज का ये घर बेशक अकार में रामेश्वर जी के घर के बराबर था लेकिन अपने आप में एक महल सा. शाही बड़ा गेट और घर के बहार हे बड़ा बगीचा. अंदर चमकदार संगमरमर का फर्श और बाहरी आँगन में मॉटे स्तम्भ भी कला का ख़ास नमूना थे. गेट पर हे एक प्रहरी खड़ा था, 6 फ़ीट का रोबदार मुछो वाला. रामेश्वर जी को देखते हे सलाम करते हुए गेट खोल कर एक तरफ हो गया.

"वाओ. ये घर है?", ऋतू ने तारा का हाथ थामे हे इस 2 मंजिला महल को निहारते हुए कहा. जहा रामेश्वर जी और शंकर जी हाथ में कार्ड और शगुन का डिब्बा लिए आगे चल रहे थे वही ये दोनों खूबसूरत लड़कियां पहले aas-pas के इलाके को देख रही थी और अब अंदर आते हुए इस घर को. आँगन में हे ये 50 वर्षीया आकर्षक अधेड़ व्यक्ति और समकक्ष खूबसूरत महिला महीन बांस के टेबल के आमने सामने कुर्सियों पर बैठे थे जो अपने मेहमानो को देख तुरंत harsh-ullas से खड़े हो गए.

"चरण स्पर्श पंडित जी, ram-ram शंकर भाई.", ये जनाब है श सुभाष चन्दर दत्त, प्रख्यात औषधि निर्माता और कारोबारी. रामेश्वर जी को देखते हे उनके पाँव छूने के बाद शंकर जी से भी गले लग कर मिले. इनकी खूबसूरत बीवी, देविका दत्त ने भी दोनों हाथ जोड़ कर अभिवादन करने के साथ हे Tara-Ritu को बाहों में लेते हुए स्नेह जताया.

"कहते है के सम्बन्धी को निमंत्रण सवेरे देने चाहिए लेकिन हमारी धर्मपत्नी जी के विचार थोड़े अलग है. उन्होंने कहा के यही समय ठीक है तोह हम आ गए बिटिया के घर. शायद उन्हें भान था के सवेरे आप लोगो में से कोई उपलब्ध नहीं होगा.", रामेशवर जी ने सुभाष के सामने बैठते हुआ कहा.

"पंडित जी कैसी बात करते है आप? हम लड़की वाले है और पहला निमंत्रण तोह हमको देना चाहिए था आपके यहाँ आ कर.", सुभाष जी ने अभी भी दोनों हाथ जोड़ कर आभार जताया. शंकर जी भी एक कुर्सी पर बैठ चुके थे और दोनों की बातचीत के साथ देख रहे थे की Tara-Ritu को देविका जी खुद अंदर ले गयी थी उस लकड़ी के बड़े दरवाजे से. इधर ये स्याह काली बिल्ली निडरता से चौथी खाली कुर्सी पर आ चढ़ी. शंकर जी देख रहे थे इस ख़ास नेसल को फिर ध्यान हटा कर सुभाष जी और अपने पिता को देखने लगे.

"देखो भाई ऐसा है के कन्यादान करने वाले आप हैं तोह हम याचक हे हुए.", उनके हाथो में निमंत्रण पत्र और मिठाई का डब्बा रखते हुए रामेश्वर जी ने शुभकार्य की शुरुवात की तोह खड़े हो कर सुभाष जी ने एक बार फिर उनका आशीर्वाद लिए. देविका जी बहार अकेली हे आयी और इस बिल्ली ने जगह खली करते हुए जाना हे ठीक समझा.

"श्रीमती जी, chaye-nashte का प्रबंध कीजिये कुछ. पंडित जी और शंकर भाई हमारे घर रोज रोज नहीं पधारते.", सुभाष जी का कथन कुछ अलग लेकिन खूशीवाला हे था.

"जी बस आ रहा, वैसे आपकी दोनों बेतिया बड़ी प्यारी है शंकर जी.", देविका इस उम्र में भी कही आकर्षक और छरहरी महिला थी. कंधे तक के आधुनकि लेकिन व्यवस्थित बाल, बेहतरीन तरीके से बंधी साड़ी, बिना ब्याह का बोलूसे और हाथो में सिर्फ सोने के 2 ख़ास कड़े और एक छोटे डायल वाली heere-jadit घडी. मतलब साफ़ था के वह भी दवाई कंपनी संभालती थी, कारोबारी महिला.

"जी ऋतू मेरी बेटी है और तारा मेरी बहिन की लेकिन दोनों में प्यार बहोत है. वैसे आज यहाँ chehal-pehal नहीं दिख रही.", शंकर जी ने इधर बातें शुरू की तोह ये नेपाली युवक ट्राली में chai-nashta लिए आ गया. बड़ी सफाई और सावधानी से एक एक चीज सलीके से रखने के बाद वह ख़ामोशी से वैसे हे वापिस चला गया.

"यहाँ ऐसा हे रहता है लेकिन जब आप आये थे तब एक दिन पहले हे मम्मी का जन्मदिन था इसलिए सभी आये हुए थे. खैर रहते तोह aas-pas हे सब तोह मिलना चलता रहता है जब वक़्त मिले. वैसे आप लोग आज रात रुकने वाले है न?", देविका जी के रुकने वाली बात पर जवाब रामेश्वर जी ने दिए.

"बिटिया, रुकने का तोह ऐसा है के हम 10 मिनट में हे निकलने वाले है. बेटी का ससुराल 20 किलोमीटर है यहाँ से, तोह वह न्योता देने के बाद हम वापिस घर हे जाने वाले है.", रामेश्वर जी की बात सुन्न कर सुभाष जी ने भी कोशिश की थी की वह रात इनके यहाँ हे रुके लेकिन उसूल के पक्के रामेश्वर जी होने वाली बहु के घर ब्याह से पहले कटाई नहीं रुक सकते थे. फिर बाकी बातें होने लगी और वह इस महल से घर के अंदर इस विशिस्ट कमरे में तारा और ऋतू इतनी जल्दी हे अपनी होने वाली भाभी के साथ उन्मुक्त बातें कर रही थी.

"आप फोटो में तोह अलग हे दिख रही थी. अब एक्ट्रेस जैसी लग रही हो.", तारा ने शायद पहले हे राधिका की तस्वीर देख ली थी और अपनी इन छोटी ननदो के साथ गुलाब सी राधिका भी खुल कर मुस्कुरा रही थी. हलके घूमे हुए बाल, तराशे हुए होंठ, साफ़ बादामी अकार का चेहरा और लम्बी पलकों वाली 2 जोड़ी गहरी आँखें. शरीर देखने में गोरा और छरहरा था लेकिन एक police-afsar थी तोह अंदरूनी तौर पर सख्त हे होगा.

"ट्रेनिंग के बाद की तस्वीर पंहुचा दी थी आप लोगो के घर. मुझे भी बिलकुल पसंद नहीं थी वह फिर भी डैड तोह डैड है. कह दिए के जब असली जा रही है तोह ये तस्वीर कहा मायने रखती है. वैसे तुम दोनों बहोत सुन्दर हो यार. संजीव ने तोह बताया हे नहीं कभी के उसकी बहने ऐसी है.", राधिका जैसे अभी से दोस्ती गाँठ रही थी इन दोनों से.

"ट्रेनिंग?", दोनों हे हैरानी से पूछ बैठी और जैसे राधिका पहली हे मुलाकात में फंसने वाली थी. यहाँ अलका होती तोह पक्का था के पोल खुल चुकी होती.

"हाँ, ललब के बाद वकालत की तरीनिंग भी होती है बस वही ट्रेनिंग के समय की फोटो थी. ज्यादा मेकअप या फैशन नहीं कर सकते न उस समय. वैसे घर के अंदर कैसा माहौल रहता है?", पूरी चतुर थी राधिका और ये वकील के रूप में पंडित परिवार की सदस्य bann-ne वाली थी.

"वाओ, लॉयर हैं आप. फिर तोह ाचा हे रहेगा. वैसे घर आपके यहाँ जैसा तोह नहीं है लेकिन आपको पसंद जरूर आएगा. सर खाने के लिए 6-7 बहने तोह हर वक़्त दिखती रहेंगी और ख़याल रखने वाला एक बड़ा परिवार. वैसे भाभी, संजीव भैया को आप पहले से जानती है या सब घरवालों की मर्जी से हो रहा है?", ऋतू की बात सुन्न कर जहा राधिका खुश हो रही थी वही संजीव के जीकर पर थोड़ा शांत हो गयी.

"क्या लगता है तुम दोनों को?"

"भैया के साथ अफेयर तोह पॉसिबल हे नहीं है. वह हर वक़्त सीरियस रहते है और सिर्फ अर्जुन के साथ हे बातचीत करते दिखेंगे या हँसते हुए. बाकी तोह आवाज हे सुनाई नहीं देती उनकी.", ऋतू की बात पर तारा ने भी सहमति जताई.

"अर्जुन कौन है? वैसे तुम दोनों को बता दू के तुम्हारे भैया बातें बहोत करते है और हम दोनों हे एक दूसरे को पसंद करते है इसलिए घरवालों ने शादी का फैंसला लिए. नवंबर में होने वाली थी शादी लेकिन अब देखो गर्मी में बेहाल होने वाले है. वैसे बताओ जरा के अर्जुन कौन है? संजीव ने तोह कभी जीकर तक नहीं किआ और दादा जी के मुँह से ये नाम सुना है मैंने जब वह मेरे पापा से बात कर रहे थे.", राधिका की गाडी हे अटक गयी थी इस नाम पर और दोनों हैरान थी की संजीव भैया तोह बड़े तेज निकले.

"अर्जुन अर्जुन है. मिल लीजियेगा जब आएँगी तब. पहले से हे कुछ बताया तोह हमारी खैर नहीं. वैसे भैया से पूछ लेना आप, अगर उन्होंने कभी जीकर हे नहीं किआ तोह कुछ तोह बात होगी.", तारा ने ऋतू से पहले हे बात कह दी, उसको चुप करवाते हुए. और इधर बहार से आवाज आने पर दोनों लड़किया अलविदा कहती निकल गयी, हंसती हुई. ऊपरी की मंज़िल से आती आवाजे बता रही थी की घर में और भी लोग है लेकिन शायद सभी अपने में व्यस्त थे. बहार आने पर शंकर जी और पंडित जी उनसे विदा ले रहे थे और जाने से पहले दोनों लड़कियों को देविका जी ने अगली बार रुकने का न्योता दिए था. अब Ritu-Tara के पास ढेरो सवाल थे जो कार के चलते हे वह पूछने वाली थी.

.

.

आज रेखा जी के साथ रोमिला जी की बातचीत कही लम्बी चली थी और कोई साढ़े 8 बजे वह प्रीती के बुलाने पर हे बिस्टेर से उठी. घडी पर नजर पड़ते हे वह रेखा जी से फिर मिलने का बोल कर अपनी बेटी के साथ चल दी. अब घर में ज्यादा लोग नहीं थे इस वजह से माधुरी और कोमल ने हे समय पर खाना बना लिए था जिसमे रुपाली ने भी अपनी बड़ी बहनो की मदद की थी. दोनों कामवाली बर्तन और सफाई करके अपने घर जा चुकी थी. मेनका को मंजू ले आयी थी जो अब कौशल्या जी के पास बैठी थी.

"दीदी, आपका खाना भी यही दादी जी के साथ लगा देती हु.", कोमल के पूछने पर मेनका ने हामी भरी तोह कुछ हे देर में उन दोनों का खाना परोस कर कोमल ने अपनी माँ और रुपाली का खाना भी उनके हे कमरे में लगा दिए था और अब बहार खाने की मेज पर सिर्फ 4 लोग हे थे. मंजू और अर्जुन के दूसरी तरफ कोमल दीदी और माधुरी दीदी.

"घर एकदम हे कितना khali-khali हो गया न दीदी.", अर्जुन ने भोजन शुरू करते हे कहा.

"हाँ, बहोत समय बाद ऐसा दिखाई दिए है. वैसे शुक्र है के मंजू और मेनका यहाँ आ गए, नहीं तोह हम लोग भी कमरों में हे होते.", कोमल दीदी ने माधुरी दीदी की तरफ देखते हुए कहा.

"पता है मंजू, जब अर्जुन यहाँ नहीं रहता था न तब टेबल पर कभी रौनक नहीं होती थी. Daadi-dada जी अपने कमरे में, मेरी माँ और चची एक तरफ, Ritu-Alka भी अपने कमरे में खाना खाती थी और सिर्फ मैं और कोमल हे यहाँ सबके बाद खाना खाते थे.", माधुरी दीदी ने ये बात कही तोह अर्जुन बस सोच हे सकता था के कैसा माहौल होगा उसके पीछे से. लेकिन मंजू का सवाल बड़ा अलग था.

"संजीव भैया? उनका जीकर नहीं होता कभी और वह ज्यादा दीखते भी नहीं. वह कहा रहते थे तब?", अब अर्जुन सवाल सुन्न कर बादकी दोनों बहनो को देखने लगा और जैसी उम्मीद थी जवाब कोमल दीदी देने लगी.

"मंजू संजीव भैया को अकेले हे रहने की आदत है शुरू से. अर्जुन के जाने के बाद उन्होंने सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान दिए और फिर ग्रेजुएशन करते हे वह आगे पढाई के लिए बहार कॉलेज चले गए. 2 साल में वह बस कभी कभी आते थे और फिर जब अर्जुन आया तोह उस से थोड़ा पहले हे वह आ गए थे. एक इन्शुरन्स कंपनी में जूनियर मैनेजर की नौकरी पकड़ ली और आज मेहनत से रीजनल मैनेजर हैं इसलिए कभी कभी हे घर आ पाते है.", कितनी सफाई से झूठ बोल दिए था कोमल दीदी ने लेकिन अर्जुन को अभी भी लग रहा था के भैया की सच्चाई सिर्फ वही जानता है. और ये 2 साल वाली बात कभी भी उसको तोह किसी ने नहीं बताई थी.

"ाचा. शायद वह अपने काम के लिए जरुरत से ज्यादा हे सीरियस है. इतना तोह नहीं होना चाहिए इंसान को. परिवार भी तरक्की की तरह जरुरी है.", मंजू ने समझदारी से बात जारी राखी.

"हाँ, अंतर्मुखी है न वह थोड़े. अब शादी के बाद बदल जाए शायद. वैसे अर्जुन ने भी काफी बदलाव किआ है उनमे. अब वह सबके साथ उठने बैठने लगे है, बोलते है और हँसते भी.", माधुरी दीदी सुन्न कर अर्जुन को ख़ुशी हुई और मंजू ने भी भैया सम्बंधित आगे कोई बात नहीं करि.

"वैसे आज सोने का क्या हिसाब है दीदी? मुनीर भैया बहार आँगन में हे बिस्टेर लगा लेंगे, खाना मैं दे आयी थी.", कोमल ने माधुरी दीदी से पुछा और वह कुछ पल सोचती रही.

"हाँ आज ये भी देखना पड़ेगा. घर ज्यादा हे खाली हो गया है. दादी के साथ तोह मेनका दीदी सो रही है, चची के साथ तुम हो और Manju-Rupali ऊपर वाले कमरे में होंगी. मैं माँ के कमरे में सो जाउंगी, वैसे भी आज अकेले हे सोने का दिल है.", माधुरी दीदी ने सोच समझ कर कहा था लेकिन मंजू को पता था के रुपाली माँ के साथ हे सोयेगी.

"रुपाली ने कहा था के वह मौसी के हे साथ सोने वाली है. कोमल दीदी आप मेरे साथ ऋतू के कमरे में सो जाना, मुझे वह नींद आ जाती है. आप वाले कमरे में सुबह दिक्कत होगी.", मंजू की ऐसी बात पर कोमल दीदी हंसने लगी.

"तुझे शायद रौशनी से जागने की आदत है मंजू. वैसे ऊपर भी अगर परदे कर दिए तोह आँख वह भी नहीं खुलेगी. ठीक है ऊपर हे सोयेंगे, बिस्टेर भी नरम है और गुप्षुप भी करेंगे.", कोमल दीदी की बात सुन्न कर मंजू हंसने लगी.

"मेरा मतलब था के ऊपर ज्यादा देर सोने को मिलेगा दीदी. यहाँ तोह सुबह होते हे आवाज से उठना पड़ेगा और आजकल मैं 7 बजे से पहले नहीं उठती.", अब कोमल और माधुरी दीदी भी हंस रहे थे.

"जिसने जहा सोना है सोये, हम तोह हमारे ठिकाने पर हे रहने वाले है. आप लोग बातें करो, मैं बहार टाला लगाने के बाद दादी के पाँव दबा के सोने चला जाऊंगा.", अर्जुन ने प्लेट उठा कर रसोई की तरफ जाते हुए कहा. बाकी तीनो भी कुछ देर बातें करती रही फिर मंजू रेखा जी के कमरे में चली गयी और जो थोड़े बहोत बरतन थे वह दोनों बहने मिल कर साफ़ करती हुई रसोई समेटने लगी. अर्जुन भी अब दादी के पाँव दबाते हुए उनके साथ साथ मेनका से भी थोड़ी बहोत बातें कर रहा था. 10 बजे तक सब शांत था और कोमल दीदी मंजू के साथ ऊपर Ritu-Alka वाले कमरे में जा चुकी थी. उन्हें भी थोड़ी थकावट थी, दिन में काम कुछ ज्यादा हे था आज.

"माँ के कमरे में आ जाओ.", अर्जुन बाथरूम से हाथ मुँह धो कर रात के कपडे पहने रसोई में पानी की बोतल लेने गया तोह माधुरी दीदी ने धीमी आवाज में उसको साथ चलने को कहा.

"इतनी जल्दी दीदी?"

"कोई जल्दी नहीं है. दादी भी सो चुकी है और चची के साथ रुपाली भी. और ऊपर वह दोनों बातें कर रही है तोह तुम्हारी तरफ मेरा जाना ठीक नहीं. वैसे अगर किसी ने देख लिए तोह मैं बोल दूंगी की तुम्हे मैंने बुलाया था, सरदर्द हो रहा था इसलिए.", माधुरी दीदी की बात सुन्न कर अर्जुन निश्चिंत हो गया था. उन्हें जाने का बोल कर वह कुछ देर जायजा लेता रहा और ऊपर कोमल दीदी को बता दिए के वह थोड़ी देर बहार मुनीर भैया के पास बैठा है, नींद आएगी तोह अपने कमरे में चला जायेगा. मंजू और दीदी कपडे बदलने के बाद बिस्टेर पर लेती बातें कर रही थी.

.

.

मधु के घर निमंत्रण देने के बाद समधी जी ने रामेश्वर जी को जबरदस्ती भोजन करवा कर हे विदा किया. अशोक जी ने भी अपने बेटे होने वाली बात कह कर उन्हें मन हे लिया था. वह से फारिग हो कर रामेश्वर जी ने अब अपने बेटे से गए लेनी चाहि.

"भाई, सफर 3 घंटे का है वापसी का इस शहर से अपने घर तक. होटल का काम भी अभी पूरा नहीं हुआ है. क्या कहते हो, घर चला जाए या फिर रात गुजारी जाये.?", शंकर जी ने घडी में समय देखा तोह रात के 10 बज चुके थे. गाडी चलने से उन्हें कभी परेशानी न हुई थी और ये तोह समय भी ऐसा था उनके अनुकूल.

"इन दोनों से पूछ लेते है पापा. वैसे होटल तोह एक बार जाना हे पड़ेगा लेकिन हाँ ऐसा हो सकता है के उमेद की गाडी और ड्राइवर के साथ आप लोग आराम से चले जायेंगे और अगला दिन भी ख़राब नहीं होगा.", शंकर जी की मंशा थी उमेद से मिलने की तोह रामेश्वर जी ने मन नहीं किया.

"मां, घर हे चल पड़ेंगे जब होटल पूरा हे नहीं हुआ है और फिर हम लोग तोह वैसे भी 2-3 बजे हे सोते है पढाई करके.", तारा ने अपने मां को अपना मैट स्पष्ट किया और साथ हे ऋतू ने भी बोल दिए.

"है पापा, अभी चलना ठीक रहेगा. सुबह मैं नहीं उठने वाली 4 बजे. आप मिल लीजिये चाचा से और फिर देख लेंगे कैसे जाना है.", अब वोट 3-1 हो चुके थे जिस पर शंकर जी अपने पिता को देख मुस्कुरा दिए.

"ये बात मेरी लाड़लियों ने ठीक कही और जान कर ाचा भी लगा के तुम लोग अपनी पढाई के लिए सही समय का चुनाव करती हो. शंकर, मिल लो भाई उमेद से और कह दो इस बंजारे को साथ हे चलने के लिए. तुम उसकी गाडी में बैठ जाना, यहाँ ड्राइवर या तारा चला लेंगे.", रामेश्वर जी ने तारा पर भी भरोसा जताया जो शंकर के लिए हैरानी की बात थी वही तारा के लिए ख़ुशी की. उनकी कार इस होटल मार्क के बहार रुकी तोह सामने वाली कार से निकल कर उमेद इधर हे चला आया.

"आप रुकने वाला है यहाँ?", उमेद ने अभिवादन के बाद यही सवाल किआ तोह रामेश्वर जी ने ना में गर्दन हिला दी.

"सवेरे तुम्हारे जिम्मे कितने काम है ये पता भी है या रात काली करने की आदत पड़ गयी है उमेद? ले जाओ अपने दोस्त को अपनी कार में और जैसा मुझे लग रहा है तुम अकेले हे हो. दोनों कार साथ हे चलेंगी, फिर तुम शंकर के साथ हे सो जाना. तडके चले जाना हवेली भाभी और बहु को लाने.", रामेश्वर जी ने सलाह न दी थी, बाप सामान आदेश दिए और शंकर जी भी तुरंत सीट से उठ कर बहार निकल गए.

"कार आप चलाएंगे चाचा जी?", उमेद अभी रुका रहा था.

"मैं चला रही हु मां जी.", पीछे से तारा भी उतर कर ड्राइवर सीट पर आ बैठी तोह उमेद बस एक निगाह दाल कर अपनी कार में चल दिया. तारा दक्ष ड्राइवर थी जो सफारी जैसी बड़ी गाडी भी निपुणता से चला लेती थी और ये तोह वैसे भी एक आटोमेटिक कार थी. अर्जुन से पहले शायद पूरा घर हे इसको चलने वाला था. इनकी कार आगे और पीछे दोनों दोस्तों की गाडी सुनसान रस्ते पर चल निकली. साढ़े 10 का समय था और 3 घंटे से पहले हे ये पहुंचने वाले थे, खली रस्ते की वजह से.

"अवधेश मिश्रा है वह जो तोमर और ताराचंद के साथ था.", उमेद अब एक तरफ बैठा था और छक्के पर नियंत्रण शंकर के हाथ संभाले थे. इस नाम को सुन्न कर पहली बार शंकर के चेहरे पर निराशा के भाव आये थे.

"तोमर का क्या हुआ? कर लिया तुमने फण्ड का जुगाड़?"

"न भोले, मैंने वह इलेक्शन हे फिर से करवाने का फैंसला लिया. अब जो भी आएगा तोमर की पार्टी से वह sarv-sammati से जीत जायेगा लेकिन अपने लिए कोई खतरा नहीं बनेगा. वैसे वह तोह ताराचंद के लिए भी तुम्हे दोषी नहीं मान रहा था. मतलब शबनम और ताराचंद कुछ और हे खेल रहे थे. फिर भी मारना पड़ा उस नीच को.", उमेद ने सीट पीछे करते हुए पाँव पसार लिए थे. शंकर भी अपने सामने मख्हन सी चलती कार को देखने के बाद बोलै.

"गज्जू हमको अवधेश मिश्रा के साथ नहीं उलझना है. वो भी ऐसा हे करेगा जितना मैं जानता हु.", शंकर को ऐसे फ़िक्र करते देख उमेद के चेहरे पर फीकी सी हंसी तैर गयी. एक बटन दबाने के बाद डैशबोर्ड से सिग्रत्ती निकल कर जलाते हुए उमेद ने लम्बा काश खींचा.

"तुझे डर है की वह Umed-Shankar पर भारी पड़ेगा?", उमेद की बात पर शंकर ने होंठो को दबाने के बाद ढीला किया और मैं को थोड़ा शांत.

"नहीं गज्जू मैं डर नहीं रहा लेकिन फ़िक्र जरूर है के उसके साथ उलझने से बात खुल कर सामने आ जाएगी. वैसे भी अवधेश उप और दिल्ली में हे खुश है और हमारी आपस में कोई रंजिश तोह है नहीं. अगर वह दखल देगा तोह फिर सोचेंगे.", सिग्रत्ती अब शंकर के हाथ में थी और दोनों कुछ पल खामोश रहे. फिर उमेद ने हे बात शुरू की.

"शबनम ने कही ज्यादा गुल्ल खिलाये हुए है भोले, अपनी माँ से भी ज्यादा. तोमर उसको रखैल बना कर हमेशा के लिए अपने साथ रखने के मनसूबे बनाये हुए था. मतलब ऐसा बिना शबनम की हाँ के तोह मुमकिन नहीं हो सकता. मतलब अभी भी कुछ नाम हमको मालूम नहीं है और तोमर ने कहा था के अवधेश को भी शबनम के प्रति चाहत थी, ताराचंद की मौत के बाद वह पीछे हट गया. लेकिन मुझे लगता है वह तोमर का भी अंजाम जानता था. शबनम खेल रही है भोले, और मेरा दिल कह रहा है के उसने जानबूझ कर तोमर का नाम लिया है.", उमेद की बात सुन्न कर शंकर को भी उलझन होने लगी थी.

"लेकिन वो दरी हुई थी और उसने तोह अपनी माँ का पता भी दे दिया हमको. और फिर जैसा हम दोनों हे जानते है के अवधेश मिश्रा खुद हरयाणा में कदम नहीं रखेगा तोह शबनम को कैसे ढूंढेगा?", शंकर की बात भी अपनी जगह सही थी. शबनम की हालत मरने जैसी हे तोह हो गयी थी.

"भोले, वो सही में तब दरी थी जब तुझे इन्दर का सुन्न कर ताव चढ़ा था. और बिंदु का पता बताने से तू क्या कर लेगा विदेशी धरती पर.? मिर्ज़ा परिवार वह पर एक सभ्य व्यापारी परिवार है भोले, जिसके पास पैसे के साथ साथ ाचा नाम भी है. इसलिए चाचा जी ने अभी हमको कुछ करने से रोक दिया. लेकिन ध्यान से सोच की वह ऐसा क्यों कर रहे हैं. तेरे पास उनके जैसा हे दिमाग है.", शंकर ने सिग्रत्ती उमेद को पकड़ते हुए पानी का घूँट लिए और एक हाथ से हे स्टीयरिंग संभाले बड़े सांगवान, अपने पिता और उमेद के साथ हुई इंग्लैंड वाली बात पर गौर करने लगे.

"यार गज्जू पापा ऐसा नहीं करने वाले जैसा मुझे लग रहा है. और तू भी अगर वो बात समझ चूका है तोह खुल कर बात कर भाई. सांगवान चाचा ने पहले कहा था के उनके कनेक्शन है इंग्लैंड में, ऋतू वही से अपनी डिग्री पूरी करेगी और मस भी. अलका ने भी बताया था के वह भी बिज़नेस स्टडी के लिए ऋतू के हे साथ इंग्लैंड रहेगी. तू और मैं या फिर कोई भी हम में से उन सब के लिए वाकिफ इंसान है और कही हम बिंदु के पीछे वह गए तोह सब चौपट हो जायेगा. बचता है तोह सिर्फ एक इंसान.", शंकर जी ने बात करते हुए गाडी धीमी की तोह इशारे से उमेद ने कार बराबर रखने को कहा.

"अर्जुन. और वह हे सबसे पहले जायेगा ऋतू के लिए एडमिशन और कॉलेज देखने. मतलब बात एक तरह ठन्डे बास्ते में दाल दी गयी है तोह शबनम का भी कुछ फैंसला लिया हे होगा चाचा जी ने. इतना वक़्त शबनम को क़ैद करके तोह नहीं रख सकते."

"पापा कही शबनम को उसके देश हे वापिस न भिजवाने वाले हो गज्जू. ऐसा हे होने वाला है भाई. उस पर क्रिमिनल चार्ज लगते हे वह इंग्लैंड वापिस, जहा का कानून अवधेश जैसो को भी दूर रखेगा और शबनम हत्या के इल्जाम में लम्बे वक़्त के लिए अंदर. ये बड़ा झोल है जो खुद पापा ने तैयार किया जिस से हम यहाँ के खतरों को पहले निबटा दे और फिर वह हमेशा की तरह इन्तजार करेंगे. लेकिन अर्जुन नहीं शामिल करना चाहिए.", अब ठंडी कार में भी शनकर के माथे पर पसीना आ गया था. रामेश्वर जी उसकी सोच से कही ज्यादा हे आगे का काम करते थे और शंकर अनजाने में हे उनके साथ शामिल हो जाता था.

"चाचा की ख़ास बात पता है क्या है, वह हमेशा तुझे तेरी करने देते है लेकिन पता लगे बिना. फिर वह अपराधी को भी उसकी करनी की सजा दे कर खुद को साफ़ रखते है. और रही बात इसमें अर्जुन के शामिल होने की तोह वह सीधा नहीं घुसने वाला इस सब में. उसके लिए ये दोनों खिलाडी (Sangwan-Pandit जी) पहले हे मंच तैयार करके देने वाले है. फ़िलहाल हमको अब शांत हो जाना चाहिए भाई. अवधेश मिश्रा के हाथ से शबनम निकल गयी तोह हम लोग वैसे भी कही भी कहानी में नहीं है.", उमेद सिंह की बात अपनी जगह सही थी. पंडित जी ने हे तोह खुद शबनम से सवाल करने के लिए शंकर की प्रतीक्षा की थी. वह लिस्ट भी एक तरह से शंकर की नजरो में लायी गयी थी जिनमे दुश्मनो का जीकर था. कुछ जेल में बंद कर दिए थे जिन लोगो से काम खतरा था बाकी सब शंकर के हाथे चढ़वा दिए.

"बाप न सचमुच बाप हे है गज्जू. बता माँ के सामने मुझे फटकार देंगे और खुद हे रस्ते पर दाने बिछा के गायब. मैं उन दानो पर चल के पहेली सुलझाता हु और फिर मैं हे फंस जाता हु. बहनचोद दिमाग घंटा चलता है मेरा."

"गाली काम दिया कर तू भोले. सांगत खराब हो गयी है तेरी. वैसे तुझे तेरी एक और कारस्तानी बता दू.", उमेद ने भी गाला गीला करते हुए शंकर को आँख मारते हुए कहा.

"अब बोल के तू क्या नए बखेड़े बताने वाला है?", शंकर ने बेफिकरी से कहा.

"गौशाला में तुझे सबकुछ रखने को किसने कहा था? तू घटना के सबूत साथ क्यों रखता है बे?", अब सचमुच शंकर का चेहरा सुन्न हो गया था. ये बात सिर्फ दलीप और शंकर को हे तोह पता थी.

"वह तक कोई नहीं पहुंच सकता गज्जू, तुझे कैसे पता ये सब? और वह जरुरी था इसलिए करता हु मैं. याद रहे की किसने क्या किया है. लेकिन ये बात छोटी नहीं है."

"वही तोह कह रहा हु भोले के ये बात छोटी नहीं है. अपने लिए फांसी का फंदा तैयार करना छोटी बात कैसे हुई."

"सही सही बता न भाई के वह तक तू कैसे पहुंच गया? मेरी उस जगह का भेद कोई सपने में नहीं लगा सकता और उस सामान तक पहुंचने के लिए रास्ता जटिल है. कैसे पता लगा तुझे और क्या वह सबकुछ अब ठिकाने लगा दिया या वही है?"

"तेरी एक हे औलाद तोह है जो तुम baap-beto से आगे है. अर्जुन पहुंच गया था वह तक लेकिन उसको भी यही लगा के वह सामान वह नहीं होना चाहिए. वैसे उसको ये नहीं पता के वह तेरा है, संजीव पर शक है उसको.", अर्जुन का नाम यहाँ तोह नहीं होना चाहिए था.

"उसने तुझे ये बताया?"

"हाँ. और घडी में कांटे की जगह से चाबी निकल कर मैंने उस छुपे हुए कमरे से वह सारा सामान आग के भेंट कर दिया. आइंदा ऐसा कुछ मैट करना बता रहा हु. ले देख ले जलने की रिकॉर्डिंग.", एक नजर शंकर ने उन बक्सों पर डाली जो आग के हवाले कर दिए थे उमेद ने फिर उमेद को देखने के बाद सामने नजर कर ली.

"दलीप ने भी थोड़े दिन पहले कहा था के हमको साफ़ कर देना चाहिए वो सब लेकिन कुछ ज़िंदा लोगो को दबोचे रखने के लिए उनमे जरुरी सामान था उमेद. शुक्र है अर्जुन ने तुझे हे बताया और शक संजीव पर किया."

"जिनको तू दबोचना चाहता था शायद अर्जुन भी वही न कर रहा हो. 5-7 जगह फाइल्स में सिर्फ स्टेप्प्लेर की पिन लगी थी, वह से कागज या फोटो गायब थे.", अब शंकर का माथा ठनका. अर्जुन ने खंगाला होगा तोह बाल की खाल निकल हे लेगा और शायद वह कुछ लोगो को जानता हो.

"तुझे पता है थोड़ा बहोत के आजकल अर्जुन कहा जाता है? नजर नहीं रख सकता यार मैं उस पर. वह सचमुच कुत्तो के जैसा चौकन्ना है लेकिन देख कर नजरअंदाज भी कर देता है.", शंकर की चिंता देख उमेद को हंसी आ गयी.

"ऐसा तोह नहीं करेगा वह जिस से परेशानी हो कुछ. वह दुःख देने वालो में से नहीं है. हाँ आचार्य हंस के साथ रहता है, स्कूल से कन्नी काट रहा है थोड़ी, बीच में मुझे भी ज्यादा नहीं बताता था लेकिन थोड़े समय से वह यूनिवर्सिटी भी जाने लगा है. और शहर वाली मार्किट में भी 3-4 दोस्त बन्न गए है उसके.", उमेद ने जैसे हे यूनिवर्सिटी और मार्किट का जीकर किया तोह शंकर जी ने गहरी सांस ली.

"तुझे वक गुप्ता का पता है न? उसकी भी फाइल थी मेरे पास. आदमी ठीक है लेकिन गलती से उसकी कारस्तानी हाथ लग गयी थी और शायद अब अर्जुन के पास न हो वो. लेकिन साला ये होशियारचंद वह लेने क्या गया था? गोशाला में और वह भी मेरे पाले हुए कुत्तो की सुरक्षा टॉड कर. तू यही सब सीखा रहा था क्या उसको गज्जू?"

"न भोले, कसम से तू जनता है मेरा दिमाग हिंदी फिल्मो जैसा हे है. अपने को एक्शन का पता है और शशि कपूर की तरह अपनी माँ का. ये तोह सबकी maa-behan करने में लग जाता है कही थोड़ी सी चूक हो जाये अगर. चाचा जी ने इसको तेज किया है और ये भी मैट भूल के वह आचार्य हंस का चाहता है. हंस जी साधारण नहीं है और अर्जुन dhyaan-yog और बाकी हर वैसी हे चीज करता फिरता है. मुझे भी बता रहा था के 'शोल्डर बॉल' कैसे अलग कर सकते है, कनपटी के पास नस दबाने से कैसे बेहोश किया जा सकता है. वैसे कुत्तो से याद आया, अर्जुन को व्यस्त कर दे 2-3 पिल्लै ला कर.", उमेद की बात सही लगी शंकर को लेकिन दिमाग अभी भी यूनिवर्सिटी पर था.

"कैसे भी ये पता कर के वह यूनिवर्सिटी में कोई गुल्ल तोह नहीं खिला रहा. कुत्ते मैं उसको अगले महीने ला के दे हे रहा हु. हाँ जो तेरे पास है वह घर तोह नहीं रख सकते इसलिए सांगवान चाचा वाले हे रखने पड़ेंगे.", अब दोनों ghar-pariwar के बातें करने लगे थे. दिमाग से बहोत सारे बोझ हट गए थे और कुछ सवाल भी जेहन में थे जिनका कोई जवाब इनके पास फ़िलहाल नहीं था. आगे वाली गाडी अभी भी अपनी लाये में चल रही थी.

.

.

इधर ललिता जी के कमरे में जीरो बल्ब की रौशनी बहोत थी माधुरी का वह बेहतरीन हुस्न जगमग करने के लिए. बिस्टेर के ठीक बीच में अर्जुन उन बेपर्दा बड़े वक्षो को दबा दबा के पी रहा था. माधुरी ने भी इस अवसर के लिए अपने इस गदराये जिस्म को भरपूर संवारा था. अर्जुन के हाथ उन बड़े खरबूजे से फिसल कर चिकने कूल्हों को दबाते हुए माधुरी दीदी की पहली हुई चिकनी छूट को उसके motte-tagde प्रेमी से मिला रहा था. माधुरी दीदी हे तोह उसकी वह शिक्षिका थी जिन्होंने kaam-kala में अर्जुन को पारंगत किया था. बेशक ज्योति ने अर्जुन को शारीरिक सुख से ru-ba-ru करवाया था लेकिन शारीरिक सुख को निस्वार्थ मिलान तक माधुरी दीदी हे लेकर गयी थी अपना कौमार्य भेंट करते हुए. यही कारण था के अर्जुन के लिए वो बेहद ख़ास थी और दोनों के बीच मामूली झिझक भी न थी.

"आपने आज हे निचे से साफ़ किया है न? वैसे आप पहले से भी ज्यादा सुन्दर और मांसल हो गयी हो.", अर्जुन महसूस कर रहा था के चुके ज्यादा हे चिकने और सख्त हो चुके थे. दीदी की कमर भी अब सपाट सी लेकिन मखमली थी. पहले हल्का सा उभार हुआ करता था नाडा बांधने वाले हिस्से से ऊपर. कूल्हों की थिरकन और लज्जत भी बढ़ चुकी थी. छूट वैसे हे गुलाबी गोरी लेकिन थोड़ी मोटी दिखने लगी थी.

"हाँ तोह नहीं करती क्या? और अब तेरे भी जड़ के पास खेती होने लगी है लेकिन नरम है, साफ़ मत करना. वैसे तू इसको इतने पर हे रोक ले, पहले हे कही बड़ा और मोटा हो चूका है.", माधुरी दीदी अर्जुन के ऊपर आती हुई झुक गयी थी. उनके गोर बड़े बड़े वक्ष अर्जुन के मुँह के सामने थे जहा भूरे चूचक पहले हे मॉटे और बड़े कर दिए थे अर्जुन ने. एक हाथ से उसका चिकना लुंड पकड़ कर वह अपनी गीली छूट पर भिड़ते हुए निचे होने लगी. आहिस्ता आहिस्ता सूपड़ा उस गरम दहकते छेड़ में प्रविष्ट कर हे गया.

"आह्हः.. बहोत टाइट हो गयी हो आप और कितनी गरम भी.", अर्जुन अभी इतना हे कह पाया था और माधुरी दीदी ने उसके कंधे को पकड़ कर पूरा भार निचे गिरा दिया.

"मर्डर गयी रे.. आह्ह्ह्हह.. फट्ट्ट्ट गयीईइ तेरे लौड़े से..", समूचा 9 इंच उनके भारी कूल्हों के बीच फैली हुई गुलाबी फांको में धंस चूका था. गुलाबी छूट की फांके बहार निकल आयी थी इतना चौड़ा होने से. दर्द सेहन करती वह पागलो की तरह अर्जुन के होंठो को खाने लगी. माधुरी का शरीर ाचे से परिचित था इस ख़ास अंग से लेकिन गदर्य शरीर भी तड़प जाता था पहली बार इसको निगलते हुए. कुछ देर वह दोनों ऐसे हे लिपटे रहे.

"पागल हो क्या दीदी? मैं कर रहा था न.. आह्हः.. मेरा भी बुरा हाल कर दिया आपने.", अर्जुन ने मजबूती से दोनों मॉटे दूध दबोचते हुए दीदी को उत्तेजित करना शुरू किया. पीछे से देखने पर साफ़ पता लगता था के माधुरी दीदी की क्या हालत हुई होगी. लाल छूट कास के लिपटी हुई थी कलाई से मॉटे लुंड की जड़ पर. भारी मॉटे चुत्तड़ एक हे जगह स्थिर थे.

"अगले 2 हफ्ते बस तू सारा दर्द और तड़प ख़तम कर दे मेरे भाई. आह्ह्ह्ह.. ये तोह कुछ भी नहीं, मैं तोह एक हे बार में तेरा ये घोडा पूरा अपने पीछे लेने का सोच रही हु. चल अपनी दीदी को अब पूरा प्यार दे. आह्ह्ह्ह. उम्म्म.", आज वह न अर्जुन को चुके सख्ती से दबाने से रोक रही थी और न खुद रुकने के मूड में थी. छाती पर हाथ रखे जल्द हे माधुरी ने uthak-baithak लगाने की तरह आधा लुंड अंदर बहार शुरू किया तोह मजे से अर्जुन भी कमर ऊपर उठाते हुए गर्भ तक ठोकर लगाने लगा. एक हाथ की 2 उंगलिया दीदी के मुँह में डाले वह दूसरे से उनकी कमर पकडे था.

"ाः दीदी, आप तोह कुछ ज्यादा हे जोश में हो. थोड़ा धीरे.. आह्हः.", माधुरी बिना बोले बस अर्जुन की उंगलिया चूसती हुई अपने 38-40 के कूल्हों को अर्जुन पर पटकती हुई बेतहाशा अपनी चुदाई खुद हे कर रही थी. उस हलकी रौशनी में उछलते दोनों खरबूजे और काम में डूबा माधुरी का चेहरा अध्भुत दृश्य दिखा रहा था. बिखरी जुल्फे शरीर के साथ साथ इधर उधर हो रही थी लेकिन आज आहें अर्जुन ले रहा था. छूट ने पहला सखलन लिया हे था और माधुरी निढाल होती अर्जुन से लिपट गयी. दोनों चुके अर्जुन के सीने से पिस्टे हुए आधे आधे बहार लुढ़क आये. लुंड के जोड़ से बेहटा वह गधा कॉमर्स अंडकोष तक जाने लगा था.

"यार सचमुच तेरी जरुरत थी अर्जुन. खुद देख मेरी हालत जरा. आह्हः... मजा आ गया इतने दिन बाद थोड़ी गर्मी ख़तम करके.. लेकिन सच कहती हु एक बार तोह फट हे गयी थी... आठ..", माधुरी वैसे हे लेती हुई अर्जुन के पूरे चेहरे पर होंठो से कलाकारी कर रही थी. अर्जुन उनकी बातें सुनते हुए दोनों मॉटे चिकने कूल्हों को दबा रहा था.

"आप तोह ऊँगली भी करती थी न? और प्रियंका दीदी के साथ शायद और भी कुछ. वैसे ये बूब्स भी कुछ ज्यादा प्यारे हो गए आपके.", अर्जुन ने दीदी के चेहरा ऊपर होते हे एक निप्पल को होंठो में दबाने के बाद छोड़ दिए. उसको दोनों कूल्हे दबाने में ज्यादा मजा आ रहा था.

"न रे. तेरे होते ऊँगली नहीं करने वाली मैं. प्रियंका बस थोड़ा बहोत जानकारी लेती रहती है, करती वह भी कुछ नहीं. बाकी तारा और वह आपस में ज्यादा क्लोज है. पता नहीं भाई वह मुझे तेरे जैसा प्यार मिलेगा भी या नहीं. चल तू ऊपर आजा, ये अंदर उछाल रहा है.", दीदी ने उठते हुए ये लम्बी सिसकारी ली और छूट को दो उंगलियों से फैला कर जायजा लेने लगी.

"देख पहले कैसे बंद रहती थी और अब तेरे लुंड ने इसकी क्या हालत कर दी है. आठ.. जल्दी ऊपर आजा और जितने खाली न हो इतने उठना नहीं.", दीदी ने लेटने से पहले हे छूट के अंदर अपनी 2 उंगलिया दाल कर अर्जुन को गीलापन दिखाया और बिस्टेर पर पीठ के बल फ़ैल गयी. अर्जुन भी कुछ पर देखता रहा उनके सुघड़ जिस्म को, थिरकते चुचो को और रस बहती हुई वह 4 इंच लम्बी उभरी हुई छूट को, जिसका वह फुदकता छेड़ ऊँगली की मोटाई जितना खुला था. इस दृश्य को देखते हे चुतरस से सना उसका विकराल लुंड फड़क उठा. आराम से अर्जुन का लम्बा चौड़ा जिस्म उस गदराये भरे भरे मांसल बदन पर छ गया. लम्बी सिसकारी बता रही थी की माधुरी की गीली सुरंग में वह समूचा अजगर उतर चूका था. हथेली में दोनों कठोर उभर पकड़ते हुए अर्जुन ने लम्बे लेकिन धीमे धक्को से दीदी की छूट को मथना शुरू किया तोह निरंतर ाहो के साथ वह मादक fach-fach और thap-thap की आवाज कमरे में गूंजने लगी.

"आठ.. कितना सुखदायी है रे तेरा प्यार करना अर्जुन.. उम्म्म.. ये पूरा एहसास बस तभी होता है जब ये अंदर तक लगता है.", चिकनी जाँघे ऊपर उठती हुई माधुरी ने अर्जुन को पाँव के बंधन में ले लिए. इस तरह वह बड़े कूल्हे भी हर धक्के के साथ अपनी लचक दिखते हुए अर्जुन का मजा बढ़ने लगे.

"दीदी, आप इसलिए ख़ास हो. मैं भी आपको बहोत मिस करूँगा.. उम्माह..", माधुरी के होंठो को खोल कर अर्जुन उनकी गुलाबी जीभ चूसता हुआ अब थोड़े तेज धक्के दे रहा था. उंगलियों के बीच उनके पहले हुए निप्पल मसलता वह दीदी को हर मुमकिन सुख देने लगा. माधुरी दीदी भी अपने इस तगड़े झोटे को मजे से झेल रही थी. मखमली छूट की गहराई में वह बड़ा सूपड़ा जो मीठी रगड़ देता तोह वह पूरी कोशिश करती ज्यादा से ज्यादा अर्जुन को अंदर लेने की.

"जान भी निकल जाये तोह कोई परवाह नहीं.. आठ.. इस सुख को तेरे अलावा कोई न दे सकेगा अर्जुन. आह्हः... बात छोटे या बड़े लुंड की भी नहीं है... मेरा जिस्म खुद तुझे चाहता है जैसे तू मुझे. आह्ह्ह्ह.. थोड़ा कस के धक्के लगा मैं होने हे वाली हु रे.", उनकी बात और प्यार को देख अर्जुन ने चुचो को छोड़ कर दीदी की पीठ को हे हाथो में जकड लिए था. यहाँ उसकी मजबूती और ताक़त ने भरपूर असर दिखाया. अब माधुरी दीदी अर्जुन की कमर में पाँव फंसाये गॉड में बैठी उछाल रही थी. दोनों के जिस्म के वह खास अंग जैसे गायब से हो जाते उन भरपूर धक्को से. अपना एक दूध अर्जुन के मुँह में भर्ती वह खुल कर इस चुदाई को जी रही थी.

"दीदी जान की बात मत करो.. आठ.. प्यार के बीच ये सब कहा आ गया?", बड़े दूध को बदलते हुए अर्जुन ने इतना जवाब दिए और दीदी के झड़ते हे उन्हें बिस्टेर पर गिरा दिया.

"आह्हः... यही तेरी खासियत है रे. एक हे बार में साड़ी कसार निकल देता है.", दीदी ऊँगली से अपनी छूट रगड़ रही थी जहा से रह रह कर पानी की हलकी बौछार निकल रही थी. अर्जुन हैरानी से देख रहा था के ये कैसा सखलन है. इस से पहले ek-do बार उसने ऐसा हे पानी बहते हुए अपनी संगिनी को देखा था लेकिन माधुरी दीदी की छूट ने वह सूक्ष्म फुजहरे 4-5 बार छोड़े थे. फिर खुद हे वह मुस्कुराती हुई घुटनो के बल हो गयी. जिस अदा से उन्होंने अर्जुन को अपने ऊपर चढ़ने को कहा वह भी सम्मोहित और कामाग्नि में मचलता उन बड़े कूल्हों के नीच रास टपकती छूट में एक झटके से हे पूरा समां गया. लटकते उभारो को दबोच कर वह अपनी पसंदीदा मुद्रा में दीदी को भरपूर जोर से छोड़ने लगा था. अब तोह माधुरी की भी सिसकियाँ हलकी चीख सी निकल रही थी. लुंड फटने की कगार तक मोटा और सख्त हो कर छूट के अंजार पंजर ढीले करने लगा. चुचो को भी दूध की तरह दुहता हुआ वह भरपूर मजा ले रहा था दीदी पर सवार होने का.

"मर्डर गयी रे.. aahhh..kamine तू पागल हो जाता है क्या मुझे ऐसे देख कर.. आह्हः.. धीरे कर अर्जुनंन.. छूट फट गयी तोह आह्ह्ह्ह.. फंस जाउंगी मैं... मेरी माँ बचा ले इस सांड से.. आह्हः.. गयी रे मैं आठ.. माआआ..", अर्जुन के फड़कते लुंड ने 25-30 तगड़े निरंतर धक्को के बाद अपना माल गहराई में उड़ेलना शुरू किया तोह माधुरी दीदी की सांसें सम्भली. एक बार तोह उन्हें लगा था के अर्जुन उनके चुचो को नोचने के साथ पेट तक लुंड दाल देगा. लेकिन गरम वीर्य ने अर्जुन की हालत बता दी थी की वह दीदी को ऐसे देख पागल हो जाता है लेकिन चरम भी हांसिल कर लेता है. लुंड 5-6 लम्बी धार उड़ेलने के बाद बहार निकल आया, दीदी के आगे हो कर अर्जुन की गिरफ्त से निकलते हे. ये लम्बी सफ़ेद वीर्य की तार बिस्टेर पर गिरता हे अर्जुन भी एक तरफ लुढ़क गया. माधुरी दीदी बस उसको निहार रही थी. छूट के चौड़े गुलाबी होंठो से उसका गधा सफ़ेद तरल जाएंगे तक आ रहा था.

"सॉरी.. लेकिन कण्ट्रोल नहीं होता जब आप ऐसे होती हो.. आह्हः.. और खुद हे तोह मुझे अंदर रोक रही थी आप.", अर्जुन की बात पर वह निर्वस्त्र हे अपने चुचो को सहलाती हुई मुस्कुरा रही थी.

"मुझे भी ाचा लगता है रे. तू ऐसे में जब करता है तोह मुझे एहसास दिलाता है के हम इंसान भी जैसे जानवर हे है. और तेरा पागलपन तोह और भी प्यारा लगता है. चल तू कपडे पहन, मुझे बाथरूम जाना होगा नहीं तोह तेरा ये प्यार पूरी रात सोने न देगा. उसके बाद तेरा दिल हो तोह एक बार फिर कर लेंगे.", दीदी ने बहते वीर्य की तरफ इशारा किया तोह अर्जुन ने हँसते हुए निक्कर और टीशर्ट पहन ली. वह hara-kala गाउन दीदी की तरफ बढ़ाते हुए वह खड़ा हो गया.

"साढ़े 11 हो गए है दीदी. मैं चलता हु, कल करेंगे. हाँ आज जैसे ऊपर आया था वैसे कल भी आऊंगा लेकिन दूसरी जगह.", अर्जुन ने उस वजनी यौवन को कपडे में जाने से पहले ाचे से निहारा और दरवाजे की तरफ चलने लगा.

"मुझे पता है तू मेरे पीछे क्यों चढ़ता है, कल वह भी कर लेना. और कल छत्त पर हे करेंगे. गूडनिघत. उमाहहहह.", दीदी ने उसको गले लगते हुए एक बार और अपने बड़े चुचो का एहसास करवाया और ये गहरा चुम्बन करते हुए विदा किया. आँगन में भरपूर सन्नाटा था और अर्जुन गलियारे से हे बहार की तरफ निकल चला. 5 मिनट मुनीर से बात करने के बाद अब वह अपने कमरे में बिस्टेर पर लेता था. अभी पौने 12 हे हुए थे और मंजू ने 2 बजे आना था. इसलिए हे वह माधुरी दीदी के पास और न रुका था और अब 2 घंटे आराम करना हे सही था.

.

.

तक़रीबन 1 से कुछ ऊपर का हे समय था जब मुनीर ने घर का प्रवेश द्वार खोला और वह दोनों कार बरी बरी से अंदर आ गयी. रामेश्वर जी को सलाम करते हुए मुनीर ने कुछ सामान वगैरा का पुछा तोह उन्होंने इंकार कर दिया. उमेद और शंकर ने बैठक में हे सोने का फैंसला करते हुए दीवान के बराबर हे बनवारी मां वाली बड़ी चारपाई बिछा ली.

"तू इस्पे अभी भी सोता है भोले?", उमेद ने कपडे खोलते हुए चारपाई को देखा और इधर कौशल्या जी भी उठ कर अपने कमरे से उमेद के लिए धोती और शंकर के लिए पायजामा ले आयी.

"नींद ाची आती है इस पर गज्जू. ले तू धोती बाँध ले और माँ, पापा कहा गए?", शंकर जी ने अपने पिता को उनके कमरे के साथ वाला दरवाजा खोलते देख पुछा.

"मेहमान कमरे में. और तुम दोनों भी सो जाओ अब, पानी यहाँ रख दिया है.", एक लौटा वही मेज पर रखने के बाद उन्होंने कमरे की बत्ती बुझा दी. शंकर और उमेद वैसे हे हलकी आवाज में git-pit करते लेट गए थे. रामेश्वर जी मेहमान वाले कमरे में आराम करने लगे थे जहा वह पहले भी कभी कभी सोया करते थे जब कौशल्या जी के साथ उनकी संधान या उमेद की माता जी आती थी. उधर तारा को ऊपर जाने का बोल कर ऋतू पिछले आँगन वाले बाथरूम में हे नहाने के के लिए घुस गयी थी. उसको भी अर्जुन जैसी आदत थी ये सोने से पहले स्नान लेने की. 15 मिनट बाद हे ऋतू सिर्फ एक चुस्त पजामा और ढीली टीशर्ट पहन कर पानी की बोतल लिए ऊपर वाले पिछले हिस्से में दाखिल हुई तोह सामने कोमल दीदी की बाहों में मंजू और उनके पीछे कपडे बदले बिना हे सोई तारा नजर आयी. तारा सचमुच थकी हुई थी ये ऋतू को पता था लेकिन मंजू किसी छोटी बची सी कोमल दीदी के सीने लगी हुई उनके आगोश में सो रही थी.

'कमाल है यार. एक तोह ये मंजू और दीदी का समझ नहीं आता और ऊपर से ये तारा की बची भी जा घुसी. अब तोह अकेले हे सोना पड़ेगा ऋतू तुझे.', खुद से इतना कहती वह अंदर जाने हे लगी थी की ठिठक गयी. दरवाजा आराम से बंद करती वह अगले हिस्से की तरफ चल दी. ड्राइंग hall-Tara के कमरे का दरवाजा वैसे हे बंद था और उसको खोल कर अंदर आयी तोह सामने अर्जुन का भी दरवाजा खुला हुआ था. सिर्फ निक्कर पहने अर्जुन औंधे मुँह बिस्टेर के बीच पसरा था. बहार वाले उसके कमरे के दोनों दरवज्जे बंद देख ऋतू समझ गयी थी की अर्जुन शायद इसलिए हे नहीं उठा और काम की थकान भी जरूर होगी. मुस्कुराती हुई वह drawing-hall का दरवाजा भी बंद करती हुई फिर से अर्जुन के पास चली आयी.

'अपना तोह ऐसा है अर्जुन डार्लिंग, तुम्हारे साथ ये सरप्राइज मोमेंट्स मिलना हे ज़िन्दगी जीने के लिए बहोत है. चल अब जरा ये तकिया हटा.', उसके हाथ के निचे से तकिया निकल कर सिरहाने रखती वह उसके साथ आ चिपकी. नींद में हे अर्जुन ने फिर से अपना यही हाथ ऋतू की कमर में रखते हुए अपने साथ पूरी तरह से लगा लिए.

"ऋतू.", अर्जुन नींद में बंद आँखों से भी पहचान गया था के उसके पास कौन है.

"हम्म्म", इतना जवाब देती वह अब अर्जुन के चौड़े सीने से सीढ़ी लिपट गयी थी. एक पाँव अर्जुन के ऊपर रखती हुई. दोनों ने बड़े प्यार से एक दूसरे के होंठो को चूमा और लिपट कर सो गए. ऋतू को तोह जैसे स्वर्ग सा सुकून मिल गया था, उम्मीद से परे. और अर्जुन के मैं मस्तिष्क से वह सभी नाम गायब हो चुके थे जिनके बारे में वह सोचता था या परवाह करता था. ऋतू का उसकी बाहों में यु बेफिक्र पूरे हक़ से सोना और शरीर का हरेक हिस्सा उसके साथ लगाना जैसे सबसे बड़ी दौलत थी अर्जुन की. नींद में भी ऋतू उसके बालो को सहलाती हुई अपने साथ उस जहां सफर पर ले गयी जहा सिर्फ इन दोनों की हे दुनिया थी. उधर मंजू भी कोमल दीदी के साथ वही प्यार और सुरक्षा पा रही थी जो उसको शायद अपनी माँ से भी नसीब न हुई थी. इन सभी की आँखें अपने अपने सुख से पुरजोर बंद हे रही.

30/04/1998 (गुरुवार)

सवेरे साढ़े 4 बजे कौशल्या जी नाहा धो कर चाय लिए शंकर और उमेद को जगानी आयी थी. पंडित जी भी अभी उठ कर बाथरूम गए थे, वह चाय भी नहाने और पूजा के बाद पीते थे. उस से पहले सिर्फ वही एक लौटा पानी का.

"मेडी, उठ जा बीटा. दिन में सो लियो फेर वापिस आने के बाद.", उमेद सिंह के पाँव पर अभी भी वह सुरक्षा कवच था, शायद रात उतरना भूल गया था वह. और अब अपनी चची के ऐसे प्यार से सर सहलाने पर वह करवट दूसरी तरफ लेके फिर सो गया.

"चची, इसको भेज दो माँ को लेने. मैं न उठ रहा.", मुँह पर तकिया रखता वह साफ़ हे मुकर गया जागने के लिए और कौशल्या जी ने भी उचित न समझा उठाना. उमेद की नींद का उन्हें भी पता था के वह कभी कभी हे सोता है लेकिन फिर अपनी मर्जी तक बिस्टेर तोड़ता है.

"चल शंकर, तू उठ मेरे लाल. तैयार हो के तेरी चची को ले आ. उमेद थका हुआ है.", शंकर जी अंगड़ाई लेते हुए तुरंत उठ गए. वैसे भी वह 5 से पहले हे उठने वाले और नियम के पक्के थे. माँ के गले लगते हुए के नजर उमेद पर डाली तोह उसको मुँह छुपाये सोये देख मुस्कुरा दिए.

"इसको उठाना मैट माँ. कल रात भी ये 2 घंटे हे सोया था और पापा को कह देना के बैठक बंद हे रखे.", बहुत धीमी आवाज में उन्होंने बात की और खड़े होते हे सबसे पहल उमेद के पाँव से वह सुरक्षा पट्टी का हक्क खोल कर एक तरफ रख दी. जख्म बड़ा नहीं था और सफ़ेद पट्टी से ढंका था. चाय की प्याली उठाये वह बहार निकल आये.

"तू बहार आँगन में नाहा ले या फिर ऊपर किसी बाथरूम में चला जा. इधर तेरे पापा है और उधर अभी रेखा गयी है.", कौशल्या जी ने टोलिया और अंदरूनी वस्त्र अपने बेटे को पकड़ते हुए कहा जो उन्हें रेखा ने दिए थे. चाय का खली कप माँ को देते हुए वह बहार वाली सीढ़ियों पर चढ़ने हे लगे थे की उनके पिता जी इस बाथरूम से बहार चले आये.

"इधर हे नाहा ले शंकर, ऊपर वह सो रहा होगा या फिर बाथरूम में होगा.", रामेश्वर जी की बात समझते हुए शंकर चुपचाप इधर हे चल दिए नहाने. वैसे भी उन्हें ऊपर जा कर दरवाजा खटखटाना हे पड़ता और कुछ उम्मीद से अलग देख लेते तोह काम हो जाता. वही अर्जुन को भी अपनी बाहों में ऋतू दीदी का नरम एहसास हुआ तोह कुछ पल वह उनकी भोली से मासूम सूरत निहारता रहा. रात ाची नींद आयी थी उसको और उसकी चाहत ने यु बाहों में आ कर इसमें इजाफा हे किया था. सचमुच हे ऋतू दीदी के होंठो को लाली की जरुरत न थी. सुर्ख गुलाबी होंठो को बड़े आराम चूम कर अर्जुन अलग हुआ और घडी देखने के बाद दीदी के साथ तकिया लगा कर बाथरूम में घुस गया.

आज सचमुच शरीर में कही अधिक ऊर्जा थी, नींद भी भरपूर मिली थी और ऋतू दीदी तोह जैसे पास आते हे उसकी थकान मिटा देती थी. नित्यक्रम से फारिग होने के बाद वह कमरे में आया और खिड़की के सामने परदे ठीक करते हुए रौशनी बंद करके निचे चल दिया. बैठक का दरवाजा तोह उसने भी नहीं खोला था.

"हाँ तोह जनाब उठ हे गए समय पर. आज कहा का इरादा है फिर?", रामेश्वर जी pooja-path करके अब आँगन में बैठे थे. बैठक का दरवाजा बहार से बंद और मेहमान कमरे के खुला देख अर्जुन भी उनके पास चला आया. दादा जी का आशीर्वाद लेने के साथ हे सवाल भी पूछ लिया.

"आप रात में कब आये थे? और ये कमरा बंद है जो कभी नहीं होता और दूसरा खुला है जिसको दादी बंद रखती है.", पंडित जी से पहले जवाब पीछे से आती आवाज ने दिया.

"तेरे चाचा सो रहे है वह. तू भी उन्हें परेशां मैट करना अभी. आज क्या काम है तेरे जिम्मे?", अर्जुन से बात करते हुए शंकर जी भी करीब आ गए थे. कमर से निचे टोलिया लिप्त था और ऊपर सफ़ेद उजली बनियान.

"अभी तोह मैं दौड़ लगाने जा रहा हु फिर घर आ के नाश्ता करूँगा. 9 बजे कोमल और प्रियंका दीदी की फीस भरने जाना है, ब में एडमिशन की और उसके बाद दूसरे घर काम देखना है, ताऊजी बोल कर गए थे. उन्हें सामान देने के बाद फिर बैठक और मेहमान कमरे के साथ संजीव भैया के कमरे के लिए एक का आर्डर देके आना है लकी भैया की दुकान पर और बाद में दादा जी के साथ कार लेने जाना है.", अर्जुन ने एक सांस में सब कह सुनाया तोह शंकर जी हँसते हुए अपने पिता की तरफ देखने लगे.

"ये लिस्ट बना के देते हो क्या आप इसको? और स्टेडियम जाना क्यों बंद है?", शंकर जी की बात का जवाब रामेश्वर जी ने हे दिया, अर्जुन को भागने का इशारा करते हुए.

"काम भूलता नहीं है ये इसलिए इसको कहता हु. और स्टेडियम कल से जाने लगेगा, तेरी माँ ने हे मन किया था अभी 3 दिन तक. नयी खुराक देने लगी है तोह देख रही है के अर्जुन बेचैनी या तपिश तोह नहीं महसूस कर रहा. मेरे हिसाब से तोह ठीक है बस इसको नींद 5-6 घंटे तोह लेनी हे पड़ेगी.", रामेश्वर जी ने खुराक और नींद का जीकर किया तोह शंकर जी हैरत से देखने लगे.

"कैसी खुराक शुरू की है माँ ने इसकी? पहले हे ये वह देसी दवा के लड्डू खा रहा था, शरीर अभी से इतना चौड़ा हो रहा है. और इसके सोने की क्या परेशानी है? मैंने भी देखा है के ये बहोत बार तोह समय से पहले हे घर से निकल जाता है बेशक 2-3 बजे सोये.", शंकर जी बात करते हुए हे माँ से कमीज लेकर बटन लगाने लगे थे.

"कुछ गलत नहीं दे रही मैं उसको लेकिन ये वाली खुराक ज्यादा मजबूत व्यक्ति हे झेल सकता है. Kasal-chhaal, दिगंबर बीज, रक्तसिंदूर, काली मूसली, swarn-bhasm, kesar-vati, amal/swarn भस्म के साथ shail-kesar और बहोत कुछ है. हृदय गति नियंत्रित रहती है मानसिक और शारीरिक पुष्टि के साथ. वह अलग बात है के इस खुराक को झेलने वाले विरले हे हुए है वह भी 50-60 साल पहले. नींद भी आने लगेगी अब इसको थोड़ी बहोत. पहले तोह कान खड़े हे रहते है इसके नींद में भी. कभी 2 घंटा तोह कभी 3, इतना हे सोता है वह.", पतलून थमते हुए कौशल्या जी ने थोड़े बहोत हे नाम बताये थे लेकिन शंकर हैरानी से बस देख रहा था के माँ क्या क्या परिक्षण करती रहती है अर्जुन पर.

"कुछ ऐसा वैसा हो गया तोह? वह kam-umar है माँ."

"मुझे न बता के वह कितनी उम्र का है. तेरी सोच से ज्यादा उलझा और तगड़ा होता है इंसान का सही स्वरुप. अर्जुन ने इस से पहले भी मेरी दी हुई खुराक आराम से हजम की है. शरीर देख लियो कभी उसका ध्यान से. नाश्ता अपनी चची के हे करेगा तू?", शंकर जी ने भी बात न बढ़ाते हुए पीछा छुड़ाया और अपने पिता की हे चमड़े की जूती जो एक तरफ राखी थी पहन कर उमेद वाली कार की चाबी उठाते हुए जाना हे बेहतर समझा. हॉस्पिटल के लिए तोह अभी 4 घंटे बाकी थे उनके पास.

'साला ये और कितना पुष्ट होगा? माँ का बस चले तोह अर्जुन को असली का भीमसेन बना दे. म्हणत भी कितनी करती है इसके पीछे तोह क्या गलत करेंगी. मेरे से ज्यादा तोह उनका हे है अर्जुन.', गाडी में बैठ कर यही सोचते हुए शंकर ने शिक्षा निचे किया और माँ को सॉरी बोलते हुए बहार निकल चले.

"देख लो जी, खुद हे शर्मिंदा हो गया अपनी बात पर. इसलिए ये मेरा लाडला है.", कौशल्या जी की ख़ुशी देख रामेश्वर जी भी हंस दिए.

"आधी सामग्री जो मनघडंत सी बताती हो वह भी अपने लाडले को साफ़ साफ़ क्यों नहीं बताई?"

"आप अपना काम हे करो तोह ठीक है. वैसे भी आज तोह चहकते हे रहोगे, भाभी जो आ रही है तुम्हारी.", कौशल्या जी नहले पर दहला मारने से कहा चूकती थी. लेकिन ये भी सच था के वो शंकर या किसी को भी jadi-booti का ज्ञान नहीं देती थी. रामेश्वर जी जानते थे लेकिन वह भी थानेदारनी जी से जुबान नहीं लड़ते थे इस मामले में.

.

.

साधू सिंह घर से दूध के ड्रम लाड कर निकले थे और उनकी धर्मपत्नी बिमला देवी बहार कच्चा आँगन बुहार कर अपनी mooh-boli देवरानी के साथ चाय के कप लिए बैठी थी. कुछ दिनों से वह थोड़ी उखड़ी उखड़ी सी रहने लगी थी और आज कही दर्शन समय से इनके पास आ बैठी. चूल्हे से दोनों के लिए चाय उतार कर डालने के बाद बिमला भी अपनी देवरानी की अनदेखी नहीं करना चाहती थी.

"जीजी, देखो कोई समस्या है तोह मेरे साथ साँझा करने में कोई गुरेज न करो. इतने दिन से देख रही हु के न घर आती हो और न यहाँ समय देती हो. भाई साहब से मतभेद हुआ या कोई और बात है?", दर्शन ने भी चौकी पर बैठते हुए अपना घाघरा ठीक करने के बाद ओढ़नी पीछे हटा ली. बिमला कुछ देर सोचती रही फिर बोली.

"देख तेरा चक्क शीलू के साथ है क्योंकि देवर में अब दम नहीं रहा और तू तड़पती रहती थी. मेरी हालत भी तेरे सामने है, भगवन ने जवानी ऐसी दे दी के लड़की ब्याने के उम्र में खुद की छूट में आग ख़तम नहीं हो रही.", दर्शन थोड़ा शर्मा गयी लेकिन जल्द हे संभालती हुई कहने लगी.

"फेर जीजी, आप भी शीलू जैसा कोई देख लो. जगह की तोह कमी भी नहीं कोई."

"अरे देख्या था दर्शन और कबड्डी भी खेल ली एक बार लेकिन नाराज हो के चला गया वह लड़का. पहले हे उसने मन किया था के जो भी करू लेकिन गाली न दू और मेरे मुँह से तोह कुछ और भी निकल गया. जब से गया है न उस दिन से मैं कच्चा सा रेहान लग गया."

"छोरे में ज्यादा हे अकड़ लगती है जीजी. ऐसा है तोह जान दो परे, आपके साथ करने को तोह मुर्दा भी तैयार हो जाये. ऐसी बात दिल पे क्या लेनी."

"न दर्शन, तू समझी नहीं अभी तक. अगर मैं उस लड़के को याद कर रही हु तोह मतलब छोरा ऐसा वैसा तोह नहीं है. सच बोलू तोह लड़का दिल का साफ़ और लुंड का घोडा है. एक बार में तोह मेरी फटी छूट भी फाड़ गया लेकिन चुदाई से परे भी बात है ऋ.", देवरानी तोह घोडा सुन्न कर हे घाघरे के सामने हाथ से मुनिया दबाने लगी.

"और के बात है जीजी? इस उम्र में जवान लड़के से प्यार वाला तोह चक्कर न चला लिया? वैसे संतुष्ट कर गया था के वह आपके बदन को?"

"प्यार वाली कोई बात न है दर्शन और संतुष्ट तोह तू पूछ हे मैट. एक गीत से बड़ा लौड़ा है और वह भी तेरे शीलू की तरह नहीं के 5 मिनट में 2 बूँद गिरे और पजामा ऊपर. आधे पौने घंटे तक पूरी कुटाई, पूरी तगड़ी वाली. बुखार आ गया था एक बारी तोह. लेकिन बात है थोड़ी गंभीर. अपनी काजल का सम्बन्ध है उस लड़के से और तू पहले कुछ बोले या सोचे बात पूरी सुन्न. दामाद तोह है शिग्रपतन की लुल्ली वाला लेकिन रिश्ता टॉड नहीं सकती. काजल इस लड़के से पहले से हे जिस्मानी और दिल से जुडी हुई है, तोह ब्याह के बाद बचे की समस्या भी वही हल कर देगा. लेकिन इसको वापिस कैसे बुलाऊ? मेरे साथ न करे तोह मंजूर है लेकिन अगर वह काजल की भी अनदेखी करेगा तोह मेरी बेटी गलत रस्ते न चल पड़े जिस्म की आग में.", अब दर्शन का हाथ छूट के आगे से हट चूका था. वही इन दोनों से परे जाली वाली खिड़की से काजल ने भी सुन्न लिया था जो थोड़ी देर पहले हे उठी थी.

"ये तोह सचमुच गंभीर बात हो जाएगी जीजी. अपनी उम्र तोह फेर भी जैसे तैसे निकल जाएगी और आपको भी पता है के पूरी जवानी अपने मरद के निचे हे बितायी है. लड़की अगर घर से बहार निकली तोह फेर वापिस न आ सकेगी और कुछ ulta-sulta हो गया तोह शायद ज़िंदा भी न रहे. आपको लड़के के बारे में कुछ पता है तोह बताओ, मैं संदेसा भिजवा के मिलने बुला लुंगी. शीलू भी तोह खाली घूमता फिरता है.", दर्शन की बात सुन्न कर फीकी सी हंसी देती बिमला कहने लगी.

"शीलू जैसे को गेट पे न खड़ा होने देंगे वह. पंडित जी है न अपने ## सेक्टर में जिनकी कोठी है, उनका पौता है अर्जुन. पहले सोचा के महेन्दर को बहाने से उनके घर भेज दू लेकिन बात जंचेगी नहीं. काजल के बापू उनके घर रोज जाते है लेकिन उन्हें क्या कहु के आपकी लाड़ली की चुदाई करने वाले को न्योता दे आओ.? बस यही उलझन है मेरी. एक बात मिलने आ जाये तोह माफ़ी मांग लुंगी लेकिन अपनी बेटी के लिए इतना तोह कर हे सकती हु."

"देखो जीजी, संदेसा तोह मैं भिजवा दूंगी उसकी चिंता मैट करो. लेकिन अगर होने वाले दामाद में इतनी हे दिक्कत है तोह भाड़ में जाये rishtey-mayka, ब्याह किसी ढंग के लड़के से कर दो. वैसे भी ज्यादा हे जल्दी न रिश्ता कर बैठी आप काजल बिटिया का?", दर्शन की बात पर बिमला खामोश हो गयी लेकिन अंदर से उनकी बातें सुनती काजल खुश थी की उसकी माँ कितना सोचती है उसके लिए. चची भी तोह इतनी खरी खरी बात कह रही है उसकी ाची ज़िन्दगी के लिए.

"तू संदेसा तोह भिजवा अगर तेरे पास कोई ऐसा है जो सिर्फ अर्जुन को यहाँ आने को कहे. मैं देखती हु इसके बापू से बात करके फिर. महेन्दर की बात पक्की हो गयी है सविता से तोह पहले बहु ले औ घर में फेर देखती हु काजल का क्या बनता है. ये बात भी सही है के अर्जुन भी कितने टाइम ठंडी करेगा लेकिन चलो जितने ब्याह नई होता ये किसी और के पास तोह िज्जात्त न लुटवायेगी."

"पुस्पा और चन्नो उनकी हे कोठी पर काम कर रही है 2-3 दिन से. ब्याह है उनके यहाँ थोड़े दिन बाद तोह दोनों को 8-8 से काम पर रखा है थानेदारनी ने. चन्नो से मैं यहाँ से जाते हे मिलती हु. पुस्पा फेर भी डर्टी है और आप न अपना ख़याल रखो. लड़का अगर सचमुच वैसा हे है न जैसा बताया तोह साफ़ कहती हु के मैं भी निचे आने को तैयार हु. शीलू अपना पानी निकल के भाग जाता है कमीना.", चाय का खली कप एक तरफ रखती हुई दर्शन उठ कड़ी हुई.

"ये काम कर दे बस दर्शन. वह लड़का अगर काजल से मिलने आने लगा तोह तू तेरे दिल की भी कह डीओ अर्जुन को. आगे जैसा वह चाहे."

"वैसे जीजी एक और बात है. आप का जिगरा बहोत बड़ा है जो शादी से पहले हे लड़की का साथ दे रही हो बिना उसको पता लगे, लेकिन अगर लड़की घर से बहार कही उसके साथ करती है तोह नाम खराब होने का पूरा खतरा है. सहेली बनो तोह फेर पूरी हे बनो, साफ़ कह दो के अगर मिलना है तोह घर में करे ऐसा कुछ. मैं करती हु ये काम आपका.", दर्शन तोह इतना कह कर चली गयी यहाँ बिमला देवी धीमी आवाज में बड़बड़ाने लगी

'अररि तू उसको घर में बाड़ने का तोह कह गयी, लेकिन काजल के साथ कही मेरी होने वाली बहु भी पेल गया तोह मेरे बेटे का क्या होगा? चल देखती हु जितने ब्याह नहीं होता उतने अपनी बेटी की हे राजदार बानी राहु.', कप को बर्तन धोने वाली जगह ले जाती वह अभी भी soch-vichar में थी और उसके सामने हे काजल लौटा लिए सर पे ओढ़नी करती खेतो की तरफ चल दी.

'सविता, देख मेरी माँ के जलवे. तेरे से पेहे तोह यही चुड़ गयी और अब उस सांड को कमरा दिखने वाली है मतलब तेरी चुदाई मैं खुद करवाउंगी.', बहार दूसरी तरफ सविता को देखते हे काजल मैं में यही बुदबुदाती हुई मुस्कुरा रही थी.

.

.

अर्जुन आज भी कुछ वक़्त आचार्य जी के साथ बिताने और दौड़ लगाने के पश्चात उनके साथ गाडी सीखने गया था. अब वह कल से कही ज्यादा विश्वास और समझदारी से संभल रहा था और वह अंजना डर उसके मैं में उतना नहीं था जिसकी वजह से वह कल परेशां हुआ था. संकरी जगह पर भी आचार्य जी ने उसको बड़े आराम से चलने में मदद की थी और एक घंटे बाद अर्जुन हे कार को उनके घर तक लेके आया था.

"बेवजह परेशां होते रहते हो तुम, देखा आज कैसे तुम्हे ज्ञान हो गया के ये गाडी कितनी जगह लेती है और टायर के साथ साथ इसके अकार को भी कैसे समझना है? याद रखना बीटा के जीवन में निर्भीक प्रयास हे सबकुछ है एक मुकाम के लिए, हांसिल होना या न होना कोई बड़ी बात नहीं.", अर्जुन के कंधे पर हाथ रखते हुए वह उसको गैराज में हे ले आये. बहार से बड़े दरवाजो से बंद ये जगह उसकी सोच से कही ज्यादा हे थी. करने से 2 कार और एक विदेशी मोटरसाइकिल यहाँ खड़े थे और दिवार पर लकड़ी की प्लेट में स्टील के हक्क से टंगे 5 कतार में इतने सारे हेलमेट देख अर्जुन हैरान हे रह गया. वह कार भी आधुनिक और विदेशी थी.

"जी समझ गया मैं जो आपने कहा लेकिन यहाँ ये सब क्या है? इतने सारे हेलमेट और सभी एक दूसरे से अलग अलग. आपने इनको जब इतना सहेज कर रखा है तोह इनमे से एक मुझे क्यों दिया.?", अर्जुन के कंधे पर हाथ रखे वह भी अपने हेलमेट का संग्रह निहार रहे थे.

"बीटा सहेज कर तुम्हे रखना जरुरी है, हेलमेट या गाडी तोह आते जाते रहेंगे. मेरे बेटे को तोह जीवन में बस एक हे चीज में दिलचस्पी रही है और मैं नहीं चाहता के तुम भी वैसा हे कुछ करो. ज़िन्दगी में safalata-vifalta paisa-gareebi कुछ मायने नहीं रखता. सिर्फ ज़िन्दगी मायने रखती है और वो बेहतर है तोह उसको सार्थक बनाओ. मुझे ये हेलमेट याद दिलाते है के मैंने अमेरिका के 50 राज्यों को मापा है, ये कुछ ख़ास है. मेक्सिको, साल्वाडोर, पेरू और ये 3 है जर्मनी, स्पेन और पुर्तगाल के. इधर ये कंगारू और कीवी पक्षी वाला है ऑस्ट्रेलिया नई ज़ीलैण्ड का. सबसे ख़ास है ये जो सबसे पुराण है लेकिन ये मेरे पिता जी ने मुझे पहनाया था जब मैंने पहली बार लम्बी चलाया था. मुझे ये याद दिलाता है के जीवन की शुरुवात जैसे भी हो लेकिन वह निरर्थक नहीं होना चाहिए.", सभी हेलमेट दिखने के बाद उन्होंने वह प्लास्टिक की टोपी जैसा ये पुराण मैला सा हेलमेट हाथ में लेते हुए कुछ पल बस उसको थामे रखा.

"समझ गया दादा जी, वैसे सचमुच आपकी यादें है बड़ी खूबसूरत. बहोत म्हणत की होगी ऐसी यादों के लिए आपने.", अर्जुन की बात सुन्न कर वह हँसते हुए उस हेलमेट को वापिस अपनी जगह रख कर उसके साथ बहार आ गए.

"यादें है भाई तोह खूबसूरत हे रखूँगा. यहाँ भी दुःख दर्द सहेजने लगे तोह फिर लोग मेरे पास आना बंद कर देंगे.", अब अर्जुन भी उनकी बात का मतलब समझते हुए मुस्कुराने लगा.

"अर्जुन तुम यही हो अभी? 9 बजे एडमिशन करवाने भी जाना है न. और नाना जी आप तोह आज भी लेट हो गए अपनी नन्ही बेटियों को खाना खिलने के लिए.", हिमानी नाहा धो कर एक उजले सलवार कमीज में थी. अर्जुन ने पहले हमेशा उसको dheeli-lambi आस्तीन की टीशर्ट और पाजामे में हे देखा था. बहुरंगी आँखें इस वक़्त अपने असली स्वरुप में उसके सामने थी. फिर ध्यान हटाता हुआ वह अभिवादन करके 9 बजे आने का बोल कर चुपचाप निकल चला.

"ये इसको क्या हो जाता है नाना जी? ाचा भला bad-bad करता रहेगा फिर एकदम खामोश हो जाता है. पता नहीं ये समझ से बहार हे है.", हिमानी के ऐसा कहने पर वह हंसने लगे और अर्जुन के बराबर जाते हुए जॉय के साथ उसकी मस्ती देखने लगे.

"डर गया होगा न तुम्हारी आवाज से. वह घर में भी इसके पास तुम जैसी 5-6 बहने है जो हर वक़्त अर्जुन की खबर लेती रहती है. न गुड मॉर्निंग न कोई hello बस सीधा 'तुम यही हो अभी? 9 बजे जाना है.', चलो अब खाना दाल कर दो. और तुम्हारे मां का फ़ोन वोने आया या वह अपने बाप के घर होने पर लापरवाह हो गया है.?"

"मां का फ़ोन थोड़ी देर पहले हे आया था. वह और मामी जी आ रहे है शाम को. वैसे वह लापरवाह नहीं है, बस आप यहाँ है तोह थोड़ा फ्री जरूर हो गए होंगे. और अर्जुन को मैं सॉरी बोल दूंगी.", अंदर आते हे हिमानी एक तरफ चली गयी और आचार्य जी इस छायादार आँगन में बने गोल छोटे से सरोवर में उंगलिया फिरते हुए इन kesariya-safed अलग सी मछलियों से मूक बातचीत करने लगे.

.

.

घर आने के आधे घंटे बाद अर्जुन यहाँ ऊपर तैयार हो रहा था. ऋतू दीदी अभी तक सपनो की दुनिया में खोयी थी लेकिन शर्मिंदा सी मंजू हाथ में इस्त्री किये अर्जुन के कपडे लिए करीब आ गयी. वह चिंतित भी थी और अर्जुन से थोड़ी कटी कटी भी.

"दीदी के साथ ाची नींद आयी न रात? बहोत समय बाद जब किसी परवाह करने वाले के साथ निश्चिन्त सोया जाये तोह अक्सर हम दुनिया भूल जाते है. ाचा लगा के तुम कोमल दीदी के साथ इतना जुड़ाव महसूस करने लगी हो.", अर्जुन ने सफ़ेद कमीज लेते हुए मंजू के गाल पर पप्पी करते हुए दूसरे हाथ से अपने साथ लगा लिया. अर्जुन की बात से मंजू प्रभावित भी थी और खुश भी. जाने वह क्या क्या सोचने लगी थी लेकिन अर्जुन ने तोह पल में हे सब भूलते हुए उसको अपने साथ लगा लिया था. शरमाते हुए मंजू ने भी अर्जुन के गाल को चूम लिए और पीछे ऋतू की तरफ इशारा किया.

"पता नहीं रात दीदी कब आ कर सो गयी यहाँ. शायद वह जगह नहीं होगी और ये अकेले सोती नहीं तोह मेरे पास चली आयी. वैसे तुम आजकल घर पे भी ऐसे हे रहती हो kya?",Arjun ने कमीज एक ब्याह में हे डाली हुई थी. करीब कड़ी मंजू का सख्त उभार हलके से पकड़ते हुए अर्जुन ने सहलाया तोह वह सिसक उठी.

"शर्म करो, ऋतू ने देख लिए तोह यहाँ भी आना बंद न हो जाये. और घर में तोह मैं वैसे हे रहती हु जैसे तुमने माँ के घर देखा था. आउच.. प्लीज.", बात कहते कहते वह थोड़ा पंजे के भर उठ गयी थी, अर्जुन ने कमीज दूसरी ब्याह में डालते हुए इधर वाला उभर थोड़ा ाचे से मसला दिए था.

"दीदी कैसे देखेगी की मैं क्या कर रहा हु? और वह तुम्हे कुछ नहीं कहेंगी बेशक मुझे दांत दे. ऐसे सचमुच ाची लगती हो.", अर्जुन ने एक बार निश्चिन्त किया की दीदी सो रही है और मंजू के होंठो पर एक चुम्बन जड़ दिया. इस बार मंजू की आँखें बंद हो चुकी थी.

"अब निचे मेरा नाश्ता लगवा दो, फिर मुझे यूनिवर्सिटी जाना है.", अर्जुन ने प्यार से उन सख्त गोलाकार कूल्हों को सहलाते हुए मंजू से धीमी आवाज में कहा.

"हम कब मिलेंगे अर्जुन?", मंजू ने नजरे झुकाये हुए हे पुछा.

"ऐसा है न के मिल तोह हम दिन में भी सकते है लेकिन मैं तुम्हारे साथ रात रहना चाहता हु. और रात मुझे मुश्किल हे लग रही है फ़िलहाल तोह कल मेनका के जाते हे फ़ोन कर देना."

"ट्रेनिंग भी जाना होता है और प्रीती सीधा घर चली आती है.", मंजू ने मज़बूरी बताई. वह भी रात हे रहना चाहती थी जिस से पूरा सुकून मिले.

"ठीक है फिर तोह तुम्ही बताओ मैं क्या करू? जो तुम कहोगी मैं वही करूँगा.", अर्जुन ने कमीज के बटन लगाने के बाद शीशे में देख कर बाल ठीक किये और जूते pehan-ne लगा.

"कल हम खेत चलते है न, 12 बजे.", मंजू ने गीला टोलिया उठाते हुए अर्जुन से उसकी मंशा jaan-ni चाही.

"दोने. 12 बजे तुम्हारे घर आऊंगा मैं, तैयार रहना.", मंजू उस से पहले हे बहार निकल गयी, मुस्कुराती हुई. खेत हे तोह वह ख़ास जगह थी जहा अर्जुन को पाया था मंजू ने, आत्मा और शरीर से. कुछ हे देर बाद ऋतू दीदी को जागते हुए अर्जुन निचे चला आया. 8 बज चुके थे और बहार कुछ आवाजे सुनाई दे रही थी. उनसे नजर हटा कर वह dahi-aalu के पराठो पर ध्यान देने लगा जो कोमल दीदी ने बनाये थे. उमेद चाचा तोह अभी तक नहीं उठे थे और सारा घर अपने काम में जूता था.

"फीस, ज़ेरॉक्स और फॉर्म ये रहे मेरे और प्रियंका के. बाकी प्रोसेस तोह कॉलेज शुरू होने पर होंगी.", कोमल दीदी ने अपना गोरा चेहरा रुमाल से पौंछते हुए अर्जुन से कहा. अर्जुन बेहिचक उनको निहार रहा था जिस वजह से सर पे चपत खानी पड़ी.

"सुधर जा तू ारु और जब टाइम मिले मेरे से बात जरूर करना. वैसे ख़ास मेहमान आये हुए है, जाने से पहले जरूर मिल लेना.", दीदी की मुस्कान सीधा दिल में उतर जाती थी. अर्जुन भी मुस्कुराते हुए नाश्ता ख़तम करने लगा. हाथ धोने के बाद वह दादी के कमरे में आया तोह कितनी हे जोड़ी आंखें सीधा उस पर हे जम्म गयी. उनमे से वह सिर्फ चंद्रो दादी को जानता था लेकिन बाकी सभी जैसे उसको जानते थे.

"मुन्ना, ये तेरी दादी है. उमेद चाचा की मम्मी पूर्णिमा, तू बहोत पहले हे मिला था इनसे. ये तेरी चची है राजेश्वरी और ये बड़ी दीदी विनीता. बड़ी दादी को तोह तू जानता हे है और ये भी तेरी बड़ी दीदी लगती है ऋचा. ये है तेरी यशोदा दादी, सांगवान दादा जी डॉक्टरनी.", अर्जुन अपनी दादी की बात सुन्न कर सबके पाँव छू कर आशीर्वाद लेने लगा तोह पूर्णिमा जी ने एकके भावुक हो कर उसको अपने सीने से लगा लिया. बाकी सब ख़ामोशी से ये देखते रहे और चंद्रो देवी ने इनके कंधे पर हाथ रखते हुए जैसे शांत किया. वह भी खुद को संभालती हुई अर्जुन को पहले से हे भरे हुए बिस्टेर पर अपने साथ बिठाती हुई उसके चेहरे को पकड़ कर देखने लगी.

"बहोत बड़ा हो गया मेरा बचा. अपने चाचा जितना मैट हो जाना नहीं तोह यहाँ सभी यही कहेंगे की उमेद की छाया जरुरत से ज्यादा हे पड़ गयी.", वह ऐसा कह रही थी की इधर उमेद सिंह भी उबासी लेते हुए अंदर चले आये.

"माँ, बाद में लाड कर लियो इसको. ताई जी प्रणाम, काकी आप तोह बड़ा कोने में सरक कर बैठी हो. और ये मेरी लाडो रानी गुमसुम कैसे है? ऋचा तू और विनीता कोमल के साथ बैठो. इसको भी दिखा के घर में और भी कमरे है.", उमेद ने तुरंत हे सबको चलता किया और थोड़ी जगह खली होते हे कौशल्या जी की गॉड में सिकुड़ कर सर रखे लेट गया. यशोदा जी मुस्कुरा रही थी ये देख कर.

"काकी, मेरी माँ न भोले को लाड करती है तोह मैं मेरी चची के गॉड आ गया. वैसे आपको याद नहीं आया तोह मैं बता दू हम आपके घर भी मिले है और शंकर की प्रमोशन वाली पार्टी में भी."

"तुझे भीड़ में भी पहचान लू मैं उमेद, ताड़ का एक हे तोह पेड़ है हरयाणा में.", यशोदा सांगवान जी की बात सुन्न कर चंद्रो देवी भी हंसने लगी. आज वह भी थोड़ी खुश थी और ाचा लगा था के बिस्टेर के ठीक बीच में वही घर की मुखिया जैसी थी.

"ऐ पूर्णिमा तेरा जी भर गया हो तोह इस बुढ़िया ने भी निहार लेने दे मेरे बचे ने.", अर्जुन के लिए चंद्रो देवी ने हाथ आगे बढ़ाया तोह अर्जुन को उनकी हालत देख थोड़ा दुःख भी हुआ.

"दादी, आप आराम करने की जगह सफर करके यहाँ चली आयी? बहोत ज्यादा दर्द होगा न आपको?", अर्जुन ने जैसे उन्हें सिर्फ एक तरफ से गले लगते हुए चिंता जाहिर की थी वह देख चंद्रो देवी का अर्जुन पर ज़माने भर का प्यार आ गया. माथा चूमती वह उसके सर को सहलाने लगी.

"मेरे बचे, तेरी दादी नाजुक न है. और तुझसे मिल के तोह दर्द हे ख़तम हो गया, या जाली हुई खाल हफ्ते में चली जाएगी.", अर्जुन उनकी बात से थोड़ा खुश हुआ और फिर कुछ सोच कर यशोदा जी से भी गले लग के मिला.

"सॉरी मुझे लगा जब सभी दादी है तोह सबके हे गले मिल लेना चाहिए.", अर्जुन की ऐसी बात सुन्न कर उमेद की भी हंसी निकल गयी.

"चची, इसको राजनीति का भी ज्ञान दे रही हो क्या.? बताओ ये मुन्ना इतना समझदार है. वैसे तेरी चची भी बैठी है उस कोने में, के पता दिल कर रहा हो लेकिन शर्म मान ऋ हो.", राजेश्वरी ये बात सुन्न कर अपनी सास का हाथ पकड़ने लगी थी और अर्जुन ने उन्हें भी एक तरफ से गले लगा लिए.

"देखि है मैंने चची की फोटो आपके बटुए में. और चची जी, उमेद चाचा न अगर बात नहीं करते तोह आपकी फोटो देखने लग जाते है.", अर्जुन इतना बोल कर कमरे से भाग लिया. जाते हुए जहा वह राजेश्वरी चची के चेहरे पर शर्म तोह बाकी सबके हंसी छोड़ गया था. यशोदा जी भी खुश हो गयी थी अर्जुन के ऐसा करने से.

"कौशल्या जीजी, सच कहु तोह मिनट में हे दिल में बैठ गया ये लड़का. कलेजे को ठंडक साफ़ महसूस हुई इसके गले लगने से. शंकर सचमुच धनि है.", यशोदा जी की बात पर जहा कौशल्या जी बस मुस्कुरा रही थी वही जवाब पूर्णिमा जी ने दिया.

"यशोदा जी, बस यही तोह डर है मेरी बहिन को इसलिए नहीं बुलाती हमे यहाँ. किसी दिन मैं अपने साथ ले गयी न मुन्ना को तोह घंटे में ये वह पहुंच जाएगी. लाडला क्या घर आया जरा इस से पूछो के फिर मेरे पास कब आयी ये. आप भी आजमा के देख लेना अगर मैं झूठ कहु तोह."

"ऐ ले जा तू इसको, न रोकती मैं तुझे. फेर तू हे कहेगी क्या आफत ले आयी.", चंद्रो जी की बात सुन्न कर उमेद अपनी चची को इशारा करने लगा के देखो अर्जुन को आफत बुला रही है.

"सही बात है जीजी की. आफत है तभी तोह मैं कही जाने जोगी नहीं रही. वैसे ये सितारा जीजी कहा रह गयी?", अभी यहाँ इनकी बातें चल रही थी और बैठक में सांगवान जी, पंडित जी, छोल साहब, शंकर जी और मल्होत्रा जी की महफ़िल लगी थी. जाने क्या बातें हो रही थी वह. इधर अर्जुन आँगन में आने के बाद अपनी माँ से मिल कर कमरे से बहार हे निकला था और सामने ऋचा दीदी को देख ठिठक गया. वह बेशक उनसे आज पहली बार मिला था लेकिन कही कही वह कोमल दीदी जैसी हे थी, बस जरा गहरी आँखें और सीधे काले बाल.

"वाशरूम?", ऋचा ने इतना हे कहा तोह वह इशारे से बाए तरफ के बंद दरवाजा दिखता हुआ आगे बढ़ गया. ऋचा ने एक पल के लिए उसको जाते देखा और फिर अंदर चली गयी.

"यहाँ कितने लोग रहते है?", विनीता ने कोमल दीदी के साथ बात करते हुए कमरे से हे अर्जुन को जाते देख पूछ लिया. विनीता का व्यक्तित्व भी बड़ा प्रभावशाली था. लम्बी, छरहरी लेकिन सुडोल. रंगत safed-gulabi से जो शायद विदेश में रहने का प्रभाव और वैसा हे उसकी आवाज और कपड़ो से झलकता था.

"आज सबसे नहीं मिल पाएंगी आप, कुछ लोग बहार है और बाकी इधर उधर. वैसे आप जब आखिरी बार आयी थी तब मैं 4तह में थी और आप 7तह में.", कोमल दीदी की बात सुन्न कर विनीता के चेहरे पर ये दिलकश मुस्कान आ गयी थी. चेहरा अंडकार और आकर्षक था विनीता का, मुस्कुराते वक़्त दोनों तरफ गालो में पड़ते गद्दे 4 चाँद लगा देते थे.

"तोह तुम्हे याद है मैं कौन हु? मुझे लगा सब अनजान होंगे सिवाए शंकर काका और dada-daadi के.", विनीता चलते हुए बिस्टेर की तरफ हे आयी थी की ऋतू ने 'भाव' की आवाज करते हुए सचमुच डरा दिया. वह एक पल इस चस्मा लगाए हाथो में किताब पकडे खिलखिलाती हुई खूबसूरत बाला को देखती रही और विनीता के बोलने से पहले हे ऋतू दीदी हे बोल उठी.

"विनि डार्लिंग आप बड़ी हो गयी लेकिन हम आज भी बचे है. कैसी रही? वैसे आप तोह यार कमाल हे दिख रही हो.", ऋतू ने गले लगते हुए गाल हे चूम लिया.

"ये पक्का रोटलु ऋतू हे है न कोमल? अलका तोह ऐसा नहीं करती थी.", विनीता ने भी पल में हे ऋतू को चिढ़ा दिया था.

"मतलब आप भी ड्रामा हे कर रही थी इतनी देर से.", कोमल दीदी के ऐसा कहते हे वह ऋतू को गले लगते हुए बिस्टेर पर बैठ गयी.

"लाइफ में इतना कुछ देख लिया है न कोमल के अब ऐसा लगता है जैसे अपने भी बदल न गए हो. लेकिन खुश हु ये देख कर की यहाँ सिर्फ घर हे बदला है बाकी सब वैसे हे है. और ये Alka-Madhuri कहा है?", विनीता के सवाल के ख़तम होते हाथ में कॉफ़ी की ट्रे और नमकीन लिए माधुरी दीदी भी इधर चली आयी.

"नाम ले और मैं भी हाजिर हो गयी. आठ..", माधुरी दीदी ने ट्रे रखने के बाद जैसे हे विनीता को गले लगाया एक सिसकी मुँह से निकल गयी. कोमल ने तोह कोई प्रतिक्रिया न दी लेकिन ऋतू हैरान हो गयी.

"बड़ी मजबूत है यार विन्नी तू. और लम्बी तगड़ी भी हो गयी है."

"ये ऋचा है माधुरी दीदी और ऋचा ये ऋतू है छोटी बहिन और विन्नी दीदी को तोह जानती हे होगी.", कोमल दीदी ने तोह तुरंत हे मामला पलट दिया था. माधुरी दीदी एक बार पहले मिल चुकी थी लेकिन ऋतू ने हाथ मिलते हुए बस ध्यान से देखा इस लड़की को जैसे अर्जुन ने भी देखा था.

"यार तुम दोनों भाई बहिन ऐसे हे देखते हो सबको? कमाल हे हो.", ऋचा सहज होती इनके साथ हे बैठ गयी तोह ऋतू झेंपते हुए वापिस विन्नी की बगल में आ गयी.

"सॉरी, बस ऐसा लगा जैसे आपको पहले भी देखा है. बूत it's ऑलराइट. और अर्जुन से आप कब मिली?", ऋतू कहा चूकने वाली थी अपने भाई का जीकर होते हे. अब विनीता भी ऋतू को देख रही थी.

"Munna-Arjun, Arjun-Munna. वो अर्जुन हे था न जो अंदर मिला था ऋचा?", विन्नी के इस सवाल पर ऋचा ने हां में सर हिलाया.

"हाँ अभी उस से हे वाशरूम पुछा था मैंने. पिछली बार जब कोमल से मिली थी तभी देखा था मैंने अर्जुन को पहली बार. तुम पहले से हे जानती हो उसको?", ऋचा ने सपष्ट किया तोह ऋतू तोह खामोश हो गयी लेकिन विन्नी सोचने लगी.

"ध्यान नहीं दिया यार मैंने लेकिन वो मेरे साथ कभी ठीक से बात नहीं करता था. इसके और अलका के हे साथ चिपका रहता था. लेकिन इतना बड़ा हो गया है वह, मुझे लगा कही कोई और है क्योंकि सबसे पहले तोह वही दिखा न उधर कमरे में.", विन्नी की बात सुन्न कर ऋतू बस मंद मंद मुस्कुरा रही थी और कोमल दीदी उसको देख कर ना में गर्दन हिलने लगी.

"तुम दोनों क्या इशारे कर रही हो?", माधुरी दीदी के ऐसे टोकते हे कोमल तोह कुछ नहीं बोली लेकिन ऋतू हँसते हुए विन्नी दीदी का हाथ पकड़ते हुए कहने लगी.

"अब तोह फिर से देखने का दिल कर रहा होगा आपका. क्यों गलत तोह नहीं कह रही?", विन्नी को क्या पता था के वह किस लहजे में बोल रही है. वह तोह खुद हे सोचो में उलझी हुई थी.

"हाँ. मिल हे नहीं सकीय तोह अब मिलने पर मैं बताती की मैं कोई अनजान नहीं हु. ये ऋचा ने भी नाम लिया और वह सभी ने मुन्ना कहा तोह मैंने क्यों ध्यान देना था.", विन्नी कहने को ऐसा कह गयी लेकिन बाकी सभी हंसने लगी थी और ऋचा भी तीनो बहनो का साथ देने लगी.

"ऐ ऋतू की बची. मेरी टांग खींच रही हो तुम. कोई बात नहीं अब मैं बात नहीं करती.", विन्नी नाराजगी से थोड़ा पीछे हो गयी तोह ऋतू ने हाथ थाम लिया.

"चिल यार विन्नी दीदी. आप तोह अभी भी नाराज हो जाती हो पहले जैसे. मेरा कोई गलत मतलब तोह था नहीं. बस इतना हे कहा था न के अर्जुन को पहचान ने के बाद आपको ऐसा लगा न के उस से सही से मिलना चाहिए था. लेकिन मैं बता देती हु के उसको पता है आप कौन हो. बस वह बात शुरू नहीं करता. और अब कॉफ़ी लो आप.", विन्नी ने भी झूठी नाराजगी दूर करते हुए इतने सालो में जो भी कमी महसूस की थी वह पूरी करते हुए अपनी छोटी बहनो और ऋचा के साथ hansi-majaak करते हुए समय बिताना शुरू किया. ऋचा और विनीता के मैं में जरूर था के वह एक बार अर्जुन से जरूर बात करे, मसले दोनों के हे अलग अलग थे. ऋचा जहा इस लड़के को jaan-na चाहती थी जिसके बारे में कितना हे कुछ सुना था उसने और उसकी माँ ने भी कहा था के वही कर सकता है ऋचा को इस घर में बेटी की तरह शामिल. वही विनीता ने जहा पहले अर्जुन को मज़बूरी में दरकिनार किया था, बड़ो की मौजदगी की वजह से लेकिन बाद में पता लगने पर अब वह उस से मिलना चाहती थी. लेकिन अर्जुन तोह इन सबसे अलग अपनी रानी पर सवार हिमानी को उसकी नयी मंज़िल पर ले जा रहा था.
 
अपडेट 117

मुकाम - Haansil/Pryaas (3)


आचार्य प्रमोद शास्त्री जी को विवाह का निमंत्रण देने के बाद अर्जुन हिमानी के साथ यूनिवर्सिटी के लिए निकल चला था. सुबह की उजली किरण सी सुर्ख हिमानी कुछ अलग हे महसूस कर रही थी जैसे हे वह घर से बहार अर्जुन की मोटरसाइकिल पर बैठी. दुपट्टा सर पे घूमते हुए गले में लेने के साथ हे हिमानी ने अपनी आँखों को इस काले चश्मे से ढँक लिए था. अर्जुन को यु chup-chaap देख उसने हे बात की शुरुआत की थी.

"सॉरी. सुबह वह मैंने जैसे कहा वैसे नहीं कहना चाहिए था?", दोनों हाथ अपनी गॉड में लिए वह सारे kagaj-file मजबूती से पकडे थी. दिल में अजीब सी बेचैनी हो रही थी. एक सच ये भी था के ऑस्ट्रेलिया में अकेले रहने वाली हिमानी को यहाँ ढलने में थोड़ी परेशानी भी आ रही थी. अर्जुन से वह भी बात करना चाहती थी लेकिन शायद वह शब्दों का चयन करने में असमर्थ हो जाती थी.

"आपने तोह कुछ भी गलत नहीं कहा था. मैं और दादा जी हे तोह दुनिया भूल कर अपने में लगे हुए थे. और मैं समझता हु के आपको कुछ परेशानी अभी भी है.", अर्जुन ने गली में से मोटरसाइकिल मुख्या सड़क पर अपनी दिशा में बढ़ाते हुए जवाब दिया और पीछे देखने वाले गोल शीशे को सड़क के हिसाब से ठीक करने लगा.

"हाँ. मैं इर्रिटेट होने लगती हु और जबसे यहाँ आयी हु बस नाना जी को हे तोह जानती हु. तुम्हे भी उनके हे साथ देखा है बस. वैसे कल भी तुम बिना जवाब दिए निकल गए थे और आज भी. बुरा तोह मुझे भी लगा था.", हिमानी ने अब थोड़ा सँभालने के हिसाब से एक हाथ अर्जुन के पीठ पर टिका दिया.

"सॉरी. कल तोह मेरा ध्यान बस उस कार पर हे था और आज सुबह मैं दादा जी के सामने ये तोह नहीं कह सकता था के आप बड़ी ाची लग रही है. 3-4 बार देखा भी है तोह बस वही जॉगिंग वाले ड्रेस में. सॉरी मेरा मतलब था के आप ऐसे हे रहा कीजिये.", अर्जुन ने कहने को तोह बात कह दी लेकिन अब हिमानी की जगह उसको घबराहट हो रही थी. पीछे बैठी हिमानी के चेहरे पर भाव पता नहीं कैसे थे क्योंकि आँखें तोह ढंकी थी और आधा चेहरा दुपट्टे के पीछे था. बस वह सुर्ख होंठ एक तरफ से थोड़ा लम्बे हो गए. कुछ पल शान्ति रही तोह अब अर्जुन खुद को दोष दे रहा था.

"तुम ये सब भी सोचते हो?", हिमानी ने हे चुप्पी तोड़ी जब वह laal-batti पर आ रुके. सवेरे के इस वक़्त हे थोड़ी भीड़ होती थी और अर्जुन ने गौर न किया लेकिन उसके दूसरी तरफ ये एस्टीम भी कड़ी थी.

"इसलिए तोह सॉरी कहा आपको. मैं जल्दी हे खुल जाता हु अगर किसी से थोड़ा बहोत मिल लेता हु.", अर्जुन ने बत्ती पर 5 सेकंड का समय देखते हुए किक लगा कर मोटरसाइकिल चालू की और हरी होते हे आगे बढ़ लिया. ये कार भी थोड़ी दुरी बनाये उसके करीब हे थी. अब हिमानी के चेहरे पर विशेष भाव न थे.

"मेरे एक बार सॉरी के बाद तुम इतनी बार सॉरी बोल चुके हो. लीव आईटी और अब मुझे बुरा नहीं लग रहा. वैसे तुम थोड़ा खुद को बदल हे लो अर्जुन.", अर्जुन को ये बार नहीं समझ आयी थी के वह कैसे बदल ले. लेकिन उसने एक तरफ निगाह की तोह गोल चक्कर से उसके पापा की एस्टीम शहर की तरफ निकल चली जहा हॉस्पिटल था और वह स्टेडियम के सामने से यूनिवर्सिटी वाली सड़क पर हो लिया.

"बदल लू? जैसे की?"

"सी. वर्ल्ड इस नॉट थिस मच ट्रांसपेरेंट एंड ा पर्सन लिखे यू अरे रियली वल्नरेबल अस यू अरे अपोजिट. इतना स्पष्स्ट या सरल भी नहीं होना चाहिए. मुझे लगता है के हम फ्रेंड्स जैसे तोह हैं हे. तुम क्या कहते हो?", अर्जुन ने मोटरसाइकिल धीमी कर ली थी ये सब सुन्न कर. और सामने जूस की दूकान पर बलबीर भाई सुमन के साथ बातें कर रहा था जिसका ध्यान अर्जुन की तरफ बिलकुल न था. अर्जुन भी अपने रस्ते पर ध्यान देने लगा.

"हाँ तोह हम दोस्त हैं."

"एक्चुअली तुम मेरे पहले मेल फ्रेंड हो. लेट में क्लियर थिस थिंग, जिस से तुम्हे बुरा न लगे. माँ का सच मुझे पता लगा तोह मुझे अपने aas-pas मलेस (पुरुषो) से घुटन होने लगी. मेरी स्कूलिंग भी इस वजह से नाना जी ने सिर्फ गर्ल्स school-college में करवा दी थी, वह ऑस्ट्रेलिया में.", हिमानी की बात सुन्न कर अर्जुन का अंतर्मन विचलित सा हो गया था.

"मुझे लगता है बदलाव की आपको ज्यादा जरुरत है. हर व्यक्ति अलग होता है और जरुरी नहीं सबकी वही मंशा हो जैसी एक की थी. अगर ऐसी हे बात है के आपको पुरुषो से डर या परहेज है तोह मेरे साथ भी नहीं आना चाहिए था.", अर्जुन यूनिवर्सिटी के बड़े गेट से अंदर आने लगा तोह हमेशा की तरह सुरक्षा कर्मी ने मुस्कुराते हुए हाथ हिलाया तोह अर्जुन ने मोटरसाइकिल एक तरफ रोक ली.

"कैसे हो भैया? ये हिमानी दीदी है और अगले 2 साल यही ब की पढाई करने वाली है.", अर्जुन ने रजिस्टर में आज एंट्री की तोह सुरक्षा कर्मी थोड़ा हैरत से देखने लगा.

"अर्जुन भैया, आपकी दीदी को यहाँ असुविधा नहीं होने वाली और एंट्री की क्या जरुरत थी.?", इन्होने पूरी इज्जत से हिमानी को नमस्कार किया और अर्जुन से बात की. ये व्यक्ति हे जैसे सुरक्षा प्रमुख था यहाँ.

"इनकी एंट्री की है भैया. वैसे गुल्लू और मीनू कैसे है?"

"बहुत हे ाचे है अर्जुन भैया, पूछ रहे थे के चाचा नहीं आये और कहानी की किताबे लेके. अब तोह अपनी माँ और मुझे चित्र दिखा दिखा कर खुद हे कहानी सुनते है दोनों.", सुरक्षा कर्मी के चेहरे पर ये निस्चल मुस्कान आ गयी थी अपने बचो का जीकर करते हुए.

"जल्दी हे मिलूंगा भैया. मेरी 2 और दीदी भी यही आने वाली है, उनका भी दाखिला आज करवा रहा हु.", अर्जुन ने फिर से मोटरसाइकिल चालू करते हुए हाथ हिलाया और आज हॉस्टल से दूसरी तरफ इस सीढ़ी सड़क पर चल दिया. हिमानी ने दोनों तरफ साफ़ सड़क और छायादार वृक्ष देखते हुए दुपट्टा सर से हटा लिया था

"तुम यहाँ aate-jaate रहते हो? और वो सिक्योरिटी गार्ड के बचो की बात हो रही थी न?"

"हाँ, वह भैया हे इंचार्ज है बाकी सिक्योरिटी के. इनके बचे अभी छोटे है तोह मैं उन्हें कहानी की किताबे देते रहता हु. ये ब कॉलेज है आपका.", इस गुलाबी पत्थर से बानी बड़ी ईमारत को दिखते हुए अर्जुन ने मोटरसाइकिल स्टैंड पर लगायी तोह हिमानी देखने लगी यहाँ बड़े गोलाकार घेरे में लगे फुहारों और हर तरफ सलीके से लगे आकर्षक लम्बे पत्तो वाले पैदा को. माहौल ाचा था यहाँ और कई युवतिया छतरी लिए बतियाती हुई आ जा रही थी. कदम बढ़ाते हे अब फाइल अर्जुन के हाथ में थी और हिमानी दुपट्टा ठीक करते हुए उसके बराबर चलने लगी.

"ये तुम्हे घूर रही है, ऐसे तोह नहीं करना चाहिए.", सामने से आती 2 लड़किया निरंतर इन्हे हे देख रही थी और पास आते हुए वह मुस्कुरा भी गयी.

"आपको देख रही है, मुझे भला देख कर क्या होगा. ये एडमिशन विंडो इस तरफ है.", अर्जुन ने इमारत के एक तरफ वाले हिस्से में जाते हुए कहा तोह लाइन देख कर हिमानी बस हैरान हो रही थी.

"अर्जुन, यहाँ इतनी भीड़ है. सभी ब में हे एडमिशन लेंगे क्या?", पहली बार हिमानी ने उसका हाथ पकड़ लिया था. अर्जुन बस मुस्कुराने लगा हिमानी का डर देख कर.

"यहाँ बबा, ब और 2-3 डिपार्टमेंट है. वैसे भी ब में भी अलग अलग स्ट्रीम्स है तोह इतना मत सोचिये के भीड़ है या क्या. हाँ थोड़ी प्रतीक्षा तोह करनी हे पड़ेगी.", 2 कतार थी जिनमे हरेक में करीब 30-35 लड़कियां और कुछ हे लड़के थे. शायद लड़के इंजीनियरिंग और दूसरे कोर्स में जायदा िट्छुक हो. अभी दोनों हे ये सोच रहे थे की कोनसी कतार में लगा जाये और अर्जुन के पास लाइब्रेरियन नवीन आ खड़े हुए.

"कैसे हो अर्जुन? Hello मिस. यार तुम सही हो जो कितने हे दिन दीखते भी नहीं. अब यहाँ एडमिशन लेने लगे हो क्या?", नवीन कोई 30-32 साल का पतला लम्बा सा युवक था जिसने आते हे अर्जुन का हाथ थाम लिया. औपचारिक तौर पर हिमानी को भी hello कहा और अर्जुन के हाथ से फाइल ले ली.

"नहीं नवीन भैया ऐसी कोई बात नहीं है. वह पंजाब जाना पड़ा और फिर अब थोड़े हे दिन में दीदी की शादी है तोह काम में उलझ गया. 3 प्रॉस्पेक्टस लेके तोह गया था आपके साथ, तीनो दीदी का एडमिशन करवाना है. बस थोड़ी देर में फारिग हो जाऊंगा इस सब से. वैसे आपसे मिलने तोह परसो हे आऊंगा लंच टाइम पर.", अर्जुन उनके साथ हे बात करता लाइन में लगने लगा लेकिन नवीन फाइल लिए एक तरफ चलता हुआ खिड़की के पिछली तरफ घुस गया. अर्जुन इस समय बीच में खड़ा था जहा से थोड़ी दूर नवीन और उतनी हे दुरी पर हिमानी अकेली कड़ी थी.

"इधर आ जाओ भाई. और दीदी को बोलो 5 मिनट बैठ जाये.", नवीन के ऐसा कहने पर अर्जुन झिझकता हुआ उस तरफ चल दिया, हिमानी को एक तरफ लगी कुर्सियों पर बैठने का इशारा करते हुए.

"ये ठीक तोह नहीं है भैया. वह लोग लाइन में लगे है.", अर्जुन ने देखा की यहाँ एक अतिरिक्त महिला भी बैठी थी 2 खिड़की पर बैठे लोगो से. और वह नाम अनुसार हिमानी, कोमल और प्रियंका का डाटा तेजी कंप्यूटर में डालने के बाद प्रिंट निकलने लगी. नवीन ने तोह अर्जुन को बस खड़े रखा कंधे पर हाथ रखे.

"लो भाई ये आ गयी एडमिशन स्लिप. और क्लास का कुछ चेंज करवाना हो तोह ये हमारी नागपाल मैडम है. मिस खुसबू नागपाल, एडमिशन प्रमुख और मैडम जी ये अपने वक साहब के चाहते अर्जुन शर्मा है, मेरे छोटे भाई जैसे भी.", अब अर्जुन थोड़ा झेंप रहा था और इधर इन मैडम ने मुस्कुराते हुए अर्जुन को देखा और 2 रजिस्टर वह से उठा कर बहार चल दी.

"भैया फीस?", अर्जुन ने जेब से पैसे निकल कर आगे बढ़ाये तोह नवीन ने भी वह पैसे एक तरफ बैठे व्यक्ति को पकड़ा दिए.

"मेहता जी, 3 स्टूडेंट्स की फीस है ब की, नागपाल मैडम तोह बस पर्ची काट कर चली गयी. जमा कर दो गईं कर.", मेहता जी ने चस्मा ठीक करते हुए पैसे लिए और पर्ची पर नजर डालते हुए मशीन में पैसो की गिनती करने लगे. 2-3 मिनट से ज्यादा न लगा और पर्ची पर ठप्पा लगा कर उन्होंने वही मंद सी मुस्कान दोनों को दी.

"थैंक यू सर.", अर्जुन ने आभार जताया तोह मेहता जी ने सर पर हाथ फेर दिया

"नवीन भी अपने बेटे जैसा है और तुम भी. मिलते रहना, वैसे हफ्ता फुर्सत तोह नहीं लेकिन उसके बाद मैं भी लाइब्रेरी में हे दिखूंगा.", मेहता जी बड़े हंसमुख थे. इनसे बात करते हुए वह बाकी स्टूडेंट्स की भी फाइल ले रहे थे. नवीन और अर्जुन बहार निकल आये तोह अर्जुन की नजर फिर से मिस खुशबु नागपाल पर पड़ी जो 2-3 अभिभावकों से बात कर रही थी.

"ये एडमिशन वाली हे मैडम है न भैया?"

"हाहाहा.. भाई वह वह रिकॉर्ड लेने गयी थी और मैंने मजाक में कहा था के एडमिशन हेड है वह. मिस नागपाल हर सब्जेक्ट पद्धति है और साथ हे अपने पापा की हेल्प करती है जो एडमिशन हेड है. उनकी क्लासेज नहीं है तोह वह यहाँ time-pas कर रही है. सभी यही यूनिवर्सिटी कैंपस में हे रहते है तोह आपस में फॅमिली जैसा है हमारा. कभी फुर्सत लगे तोह क्वार्टर भी दिखा दूंगा तुम्हे.", नवीन को किसी ने आवाज दी तोह वह हाथ हिलाते हुए निकल लिया. मिस खुशबु ने भी एक नजर अर्जुन को देखा था जिस पर अर्जुन ने भी aadar-sahit धन्यवाद् जताया और हिमानी के पास आ खड़ा हुआ.

"यार तुम्हे तोह बहोत लोग जानते है यहाँ. लाइन तोह अभी भी वैसी हे है और तुम एडमिशन करवा कर आ भी गए.", हिमानी गौर से पर्चियां देख रही थी. वह अब थोड़ा खुश भी थी और उसको ाचा लगा था ये देख कर की अर्जुन को यहाँ लोग जानते है जिस से उसको परेशानी नहीं होने वाली.

"वह सब छोड़िये आप, अब मेरे घर चलना है आपको. बुक्स तोह फिर कभी ले लेंगे जब मार्किट जाना होगा.", अर्जुन के ऐसा कहते हे हिमानी थोड़ा परेशां होने लगी.

"मैंने लेंस नहीं लगाए आज. फिर कभी चल पड़ूँगी?"

"चस्मा लगाए रखियेगा अगर इतनी हे इन्सेक्युरित्य है आपको. वैसे आपके यहाँ भी तोह अभी कोई नहीं है. दादा जी भी तोह कह रहे थे के हमारे बाद वह भी निकल रहे है 3 दिन के लिए.", अर्जुन ने अपनी बात राखी तोह हिमानी कुछ देर सोचने लगी.

"नाना जी नहीं है इसलिए तोह घर रहना जरुरी है अर्जुन. वह सिर्फ माइड के भरोसे नहीं रह सकते लेकिन कल मैं पक्का तुम्हारे घर चलूंगी. वैसे अभी साढ़े 10 हुए तोह तुम मेरी एक हेल्प और कर दो.", अब अर्जुन ने भी सोचा था के वह ज्यादा ज़िद्द नहीं करेगा. काम की बात सुन्न कर उसने सर हिला दिया.

"यहाँ फिश फीड कहा मिल सकती है कुछ आईडिया है?", हिमानी के ऐसा कहते हे अर्जुन हंस दिया.

"मुझे लगा पता नहीं कितनी हे बड़ी बात होगी जो आपकी शकल इतनी गंभीर हो रही थी. मॉडल टाउन में है पेट शॉप और वह ऐसा सब सामान मिल जाता है. चलिए मुझे भी उधर हे एक काम है. वो भी हो जायेगा.", इस बार हिमानी सहज हे बैठ गयी थी अर्जुन के पीछे और यहाँ से निकलते हुए भी वह देख रही थी की पहले वाली दोनों हे लड़कियां आगे एक पेड़ के निचे कड़ी थी और अर्जुन को देख कर फिर से मुस्कुराने लगी थी.

"छी.. ये लड़कियां बढ़ी दीठ है. कैसे देख रही थी अभी भी.", हिमानी अनजाने हे अर्जुन से सत् कर बैठ गयी थी. एक हाथ कमर में दाल कर.

"वो स्टेडियम की वजह से जानती है थोड़ा बहोत. मैं वह बॉक्सिंग के लिए जाता हु न और ये लड़कियां वही बास्केटबॉल प्रैक्टिस करती है. ऐसा कुछ नहीं है के वह दीठ है या कुछ और.", अर्जुन ने लड़कियों का पक्ष रखा और इधर हिमानी का हाथ कमर से वापिस गॉड में आ गया. वह अजीब हे थी. कभी उन्मुक्त, कभी संजीदा और कभी निराश. अगले 2 किलोमीटर दोनों में ख़ास बात न हुई लेकिन अर्जुन जरुरी रस्ते और चौक बताता जा रहा था, जवाब में हिमानी बस haa-hu करती एक तरह से हे बैठी रही.

"ये लीजिये हम पहुंच गए आपकी जरुरत की जगह. चलिए.", एक तरफ छाया में मोटरसाइकिल कड़ी करके अर्जुन ने इस पार्किंग के दूसरी तरफ मार्किट दिखते हुए हिमानी से कहा और साथ लिए इस बड़ी दूकान पर आ गया. कुत्ते, बिल्ली, पक्षियों और मछली के चित्र लगे बता रहे थे के यहाँ उनसे संबंधिंत सब सामान मिलता है. हिमानी सकुचाती हुई अंदर आयी तोह अर्जुन ने हे काउंटर पर खड़े 17-18 साल के लड़के से मछली की खुराक के बारे में पुछा.

"भैया कौनसी नेसल है? हर मछली की खुराक अलग होती है और साथ हे पानी साफ़ रखने की दवा भी.", अंदर की तरफ एक बुजुर्ग सरदार जी बैठे अख़बार पढ़ रहे थे, वही मालिक थे इस जगह के. यहाँ हिमानी ने जवाब दिया.

"कोई फिश है. और वो वाली फीड है जो ऊपर राखी है. आपके पास डॉग कालर और लीश भी होगी."

"जी हाँ, कुछ तोह यहाँ रखे है और बाकी नीचे है. चलिए मैं दिखा देता हु.", लड़का काउंटर के ऊपर रखा फटता खोल कर आगे आया तोह अर्जुन ने हिमानी से अपने काम की बात कही.

"आप यहाँ देखो मैं 5 मिनट तक आ जाता हु. यही पास में हे शॉप पर एक आर्डर देना है.", हिमानी ने बस अर्जुनको देखा लेकिन चश्मे की वजह से अर्जुन आँखें न देख पाया. वो सहमति समझते हुए हिमानी के आगे जाते हे बहार निकल गया. अरोरा इलेक्ट्रिकल 10 दूकान छोड़ कर हे थी जहा अर्जुन ने एक के लिए कहना था. वह तेज कदमो से चलता इधर आया तोह आज लकी की जगह उसके पिता जी और डिम्पी बैठे थे. डिम्पी शायद कुछ खेल रही थी पेन और कागज से.

"नमस्ते अंकल जी. वो दादा जी ने 3 एक और फिटिंग करने वाले को भी घर मंगवाया है. लकी भैया को फ़ोन किया था लेकिन शायद आपसे हे बात हुई होगी उनकी."

"कैसे हो अर्जुन बीटा. पहले बैठो भाई तुम तोह खड़े गाँव से आये हो. डिम्पी, कभी देख भी लिया कर के कोई पहचान का भी आता है.", डिम्पी अर्जुन को देखते हे मुस्कुराती हुई उसके पास आ गयी. अंकल जी ने लड़के को आवाज दे कर किसी को बुलाने भेज दिया.

"ओह तोह अर्जुन महाराज पधारे है आज यहाँ. कैसे हो और क्या बात स्टेडियम आना जाना बंद कर दिया क्या?", डिम्पी ने हाथ मिलाने के बाद सीधा सवाल किया और अरोरा जी किसी से फ़ोन पर बात करने लगे.

"कहा स्टेडियम. देख रही हो न अभी भी काम से हे आया हु इधर. संजीव भैया और माधुरी दीदी की शादी है तोह जितने भैया नहीं आ जाते इतने तोह मेरा मुश्किल है स्टेडियम आना जाना. वैसे तुम बताओ, आज दूकान पर कैसे?", डिम्पी से पानी ले कर पीते हुए अर्जुन ने पुछा तोह वह कुछ ज्यादा हे खुश नजर आ रही थी.

"जाती हु लेकिन मजा नहीं आता, प्रीती भी आजकल नहीं आ रही. वैसे घर पे कुछ करने को था नहीं तोह इधर पापा के साथ आ गयी. अब तुम मिल गए तोह आना सफल हुआ. कार्ड देने तोह आओगे न?"

"दादाजी आये तोह साथ आऊंगा लेकिन भैया या ताऊजी आये तोह पता नहीं. वैसे तुम भी आ हे सकती हो, घर तोह तुम्हे ाचे से पता है.", अर्जुन ने गिलास रखा तोह बहार रेहड़े पर 2 मजदूर एक के बड़े डब्बे लादने लगे थे.

"तुमने आज पहली बार बुलाया है वह भी इतने दिन बाद. यही देख रही थी मैं. चलो अब तुमने बुलाया है तोह पक्का आउंगी, सैटरडे को.", अभी वह बात कर रहे थे के अंकल जी इधर चले आये.

"अर्जुन बीटा रेहड़े वाला तोह 20 मिनट में तुम्हारे घर पहुंच जायेगा और फिटिंग वाले लड़के भी आ रहे है, तुम्हारे घर पहुंचते हे वह भी आ जायेंगे.", वह अपनी गद्दी पर बैठे तोह अर्जुन ने बटुए से ये चेक निकल कर पकड़ा दिया.

"अंकल जी ये दादा जी ने दिया है, बाकी बात वह आपसे कर हे लेंगे फ़ोन पर.", चेक 2 लाख का था जिसको देख कर अरोरा जी समझ गए थे के अभी और सामान भी जाने वाला है.

"Chai-nashta मंगवाता हु बीटा. तुम अकेले तोह आज हे आये हो.", वह उठने हे लगे तोह अर्जुन ने मन कर दिया.

"फिर कभी अंकल जी, अभी और भी काम है. आप भी मिलने आ जाना, अब तोह पापा का भी तबादला यही हो गया है.", अर्जुन ने हाथ जोड़ कर विदा लेते हुए कहा और उन्होंने भी आने का वादा किया.

"कितनी जल्दी में हो. कोई इन्तजार कर रही है क्या?", अर्जुन के साथ गेट तक आते हुए डिम्पी ने हँसते हुए कहा और अर्जुन को जैसे कुछ याद आ गया.

"सॉरी. सचमुच दीदी इन्तजार कर रही है पेट शॉप पर. जल्दी मिलता हु तुमसे.", अर्जुन को जैसे अब याद आया था के हिमानी के चेहरे पर वह कैसे भाव थे. तेज कदमो से लगभग दौड़ता हुआ वह इधर आया तोह दूकान के अंदर वही लड़का खड़ा था. मछली की खुराक वही काउंटर पर राखी थी.

"वो दीदी कहा गयी?", अर्जुन ने हड़बड़ाते हुए पुछा.

"वह तोह आपके निकलने के बाद नीचे से आधी सीढ़ियों उतारते हे बहार निकल गयी. सामान भी नहीं ले गयी और ये पर्स भी इधर हे भूल गयी.", अब अर्जुन को गलती का एहसास हो रहा था. हिमानी पहले शायद नाराज थी जिस वजह से थोड़ी खामोश थी लेकिन उसने अर्जुन को बताया भी था के अनजान पुरुषो के aas-pas उसको घुटन महसूस होती है. दूकान से बहार निकल कर वह इधर उधर देखने लगा लेकिन खाली पार्किंग और दुकानों के सामने वो कही न दिखी. अब सचमुच माथे पर पसीना आ गया था उसके.

'क्या जवाब दूंगा मैं दादा जी को..' विचलित मैं से वह हर तरफ देखने लगा तोह मोटरसाइकिल से हे थोड़ी दुरी पर वृक्ष के निचे सेहमी कड़ी हिमानी दिख हे गयी. अर्जुन दौड़ता हुआ उसके सामने आ खड़ा हुआ. कुछ पल वह बस अर्जुन को देखती रही और चश्मे के अंदर से लुढ़कते वह आंसू बता गए थे के हिमानी की हालत क्या होगी. अर्जुन को अपनी भूल का एहसास तोह हो हे गया था लेकिन हिमानी की ऐसी दशा देख वह भी खुद को कोसने लगा. बिना कुछ बात किये उसने बस हिमानी को गले से लगा लिया.

"सॉरी. बड़ी गलती हो गयी मुझसे. प्लीज माफ़ कर दीजिये, मैं भूल गया था के मैं आपको अकेला छोड़ के जा रहा हु. सॉरी आइंदा अगर आप बहार आएँगी तोह एक पल भी अलग नहीं जाऊंगा.", हिमानी छोटे बचो सी सुबकने लगी थी.

"अर्जुन मैं मन भी किया था जाने से तुम्हे. पता है कितना डर गयी थी मैं बेसमेंट में उतारते हुए, वह निचे और भी लोग थे लेकिन मदद कर देखा तोह तुम मेरे साथ नहीं थे.", सुबकियां सीने को भिगोने हे लगी तोह अर्जुन ने माहौल समझते हुए हिमानी को थोड़ा अलग किया और चस्मा हटा कर रुमाल से उसकी आँखों से बहते आंसू सांफ किये.

"बोलै था न के ये चस्मा मत पहनो. चलो सामान ले कर यहाँ से चलते है.", अर्जुन ने बड़े प्यार से जैसे चेहरा साफ़ करने के बाद एक हाथ में चस्मा और दूसरे में हिमानी का हाथ थाम लिया तोह हिमानी का भी रोना बंद हो गया था. वह सकुचाती हुई साथ चलने हे लगी थी की बोल पड़ी.

"सॉरी. बस मुझे डर लगता है ऐसे इसलिए नाना जी यहाँ ले आये थे और मैं घर से बहार भी नहीं आती. तुम हेल्प करोगे तोह ये डर ख़तम हो जायेगा. वो दूकान वाला भी क्या सोच रहा होगा न?", हिमानी किसी सेहमी हुई बची की तरह अर्जुन का हाथ थामे चल रही थी. अब जैसे उसका ध्यान अपनी बेपर्दा आँखों पर गया.

"वह भला क्या सोचेगा लेकिन पर्स भी वही भूल आयी आप."

"मेरा चस्मा."

"इसकी कोई जरुरत नहीं है. मेरे साथ हो तोह खुद को अलग समझना बंद करो अब."

"प्लीज. यहाँ पहन लेने दो, समय आने पर अपने आप इसकी आदत चली जाएगी.", दूकान से बहार हे अर्जुन ने खुद अपने हाथो से चस्मा लगा दिया.

"डरना बंद कीजिये अब. यहाँ कोई ऐसी वैसी हरकत करने वाला इंसान नहीं है. आप सेफ है और सब अपने काम से काम रखते है इधर.", अंदर आने पर भी हिमानी मजबूती से उसका हाथ पकडे थी. सामान लेने के बाद अर्जुन ने हे पर्स हिमानी को थमाया और फिर उसको छोड़ने घर की तरफ चल दिया.

"अकेले कैसे मैनेज करती हो घर में? डर नहीं लगता क्या?"

"अकेलेपन से तोह डर नहीं लगता और वह घर पर बहुत कुछ है जिस से मैं खुश रहती हु. सॉरी, बहोत वीयर्ड फील हो रहा है अब."

"कोई बात नहीं. हर मुकाम जल्दी नहीं मिलता और जहा जख्म हो वह तोह थोड़ा ज्यादा हे समय लग जाता है. आपको इसलिए कह रहा था के मेरे घर चलिए, आपको ाचा लगेगा. मेरी दीदी बड़ी समझदार और केयरिंग है. अगले 2 साल वह आपका पूरा ख़याल रखने वाली है तोह आपको उनसे मिलना चाहिए.", अर्जुन ने इन jaani-pehchani सड़को पर आराम से मोटरसाइकिल चलते हुए कहा और फिर गोल शीशे में के नजर हिमानी पर डाली तोह अब वह झिझकती हुई चस्मा उतरे उसको हे देख रही थी. एक नीली और दूसरी भूरी आँख इस दिन के उजाले में कितनी अध्भुत्त लग रही थी ये अर्जुन साफ़ देख प् रहा था. फिर झेंपते हुए नजर सामने की और हिमानी की तारीफ करने लगा.

"ाची भली हो आप फिर भी जाने क्यों खुद को हे छुपाये रहती हो. ऋतू दीदी ने आपकी आँखें देख ली तोह वह आपके पीछे हे पड़ जाने वाली है.", अर्जुन की बात पर छोटी सी मुस्कान हिमानी के चेहरे पर भी आ गयी.

"इतना आसान नहीं है ये सब अर्जुन. एक तरह का दोष हे तोह है ये आँखें जो मुझे जरा भी पसंद नहीं."

"इन्हे वरदान कहो तोह बेहतर है. लीजिये आपकी मंजिल आ गयी और आशा करता हु माफ़ कर चुकी होंगी उस गलती के लिए."

"तुम्हारी कोई गलती नहीं है. मैं बड़ी हो कर भी कमजोर हु लेकिन तुम ाचे लड़के हो. कल लेने आओगे न?"

"तैयार रहना आप, मैं 10 बजे के आसपास आऊंगा. अपना ध्यान रखियेगा.", अर्जुन जाने लगा तोह हिमानी ने हाथ मिलते हुए कहा.

"थैंक यू वैरी मच अर्जुन. ाचे दोस्त हो तुम, ऐसे हे थोड़ा बहोत झेलते रहना इस पागल को. कल मिलते है.", हिमानी के जाने के बाद भी अर्जुन कुछ पल बस देखता रहा और फिर सर झटकता हुआ अपने रास्ते हो लिया.

.

.

घर अभी भी व्यस्त दिख रहा था और अर्जुन ने काम करवाना हे बेहतर समझते हुए पहले मेहमान कमरे में एक लगवाया और फिर बैठक को अब खाली देख कर इधर काम पूरा करवा दिया. कौशल्या जी के कमरे में फ़िलहाल chai-nashte का दौर चल रहा था जहा अभी सिर्फ बुजुर्ग महिलाये हे थी. राजेश्वरी चची अब रेखा जी के कमरे में थी जहा उनके साथ रोमिला जी और रेणुका भी मौजूद थी. रामेश्वर जी भी सांगवान जी और छोल साहब के साथ छोल जी के हे घर चले गए थे और उमेद सिंह भी सितारा देवी को ले कर उनके गाँव निकल गए थे जहा तैयारियां जारी थी विकास की निगरानी में. अर्जुन दोनों व्यक्तियों और इस आखिरी एक के साथ ऊपर चला आया था, संजीव भैया के कमरे में.

"भैया, पावर प्लग इधर है और खिड़की यहाँ से निकालनी पड़ेगी. स्टैब्लिसर लगा कर आप तार को ाचे से इस पट्टी के साथ हे रखना.", अर्जुन उन्हें समझा भी रहा था के कोई भी तार aadi-tedhi नहीं लगाना और जितना काम से काम tod-fod हो उतनी हे करनी है. दोनों व्यक्ति पहले हे देख चुके थे के ये लड़का हर चीज पर ध्यान दे रहा है. वो भी कोई जल्दबाजी किये बिना अब सलीके से काम कर रहे थे. अर्जुन ने chai-paani का भी ख़याल रखा था और खुद भी उनके साथ बराबर हाथ लगवा रहा था.

"बही तुम क्यों मिटटी में मिटटी होते हो? अपना रोज का है ये सब करना, तुम्हे chot-vot आ गयी तोह हमारा भी दिल दुखेगा.", ये व्यक्ति कोई शिकायत नहीं कर रहा था क्यूंकि बहार वाली सीढ़ियों से अर्जुन हे एक उठवा कर यहाँ लेके आया था. लेकिन दिहाड़ी वाला व्यक्ति परवाह तोह करेगा हे.

"ऐसी बात नहीं है भैया. एक तोह आप इतना ज्यादा काम कर रहे है ऊपर से हालत भी देखो जरा. मैं तोह ये तार, खिड़की के बहाने आपको आराम हे दे रहा हु. शरीर इतना भी मैट इस्तेमाल कीजिये के मेरी जगह आपको दिक्कत आये. कोई जल्दी नहीं है.", ये व्यक्ति अब हंसने लगा था अर्जुन की सूझबूझ देख कर.

"हो हे गया छोटे उस्ताद. मान भी ली तुम्हारी बात और ये टांग दी मशीन. चालू कर के देखो फिर तार पर गिट्टी लगा देते है.", सचमुच कोई tod-fod न हुई थी यहाँ. खिड़की में एक ाचे से फिट हो गया था और अब चालू भी हो गया था. इस बीच ये तीनो हे लोग पसीने से नाहा गए थे, याद भी नहीं रहा था के कमरे में पंखा हे चला ले. काम ख़तम होते हे अर्जुन ने 500 रुपये अपनी तरफ से देके दोनों को विदा किया. मन करने के बावजूद अर्जुन ने पैसे दे दिए थे. अब कमीज की हालत देखि तोह बुरा हाल था. हाथ भी मैले और शरीर भी चिपचिप. वापिस ऊपर चला आया और कमीज उतार कर तारा वाले कमरे से बाथरूम में नहाने के लिए इधर आ गया.

"सॉरी. पता नहीं था के यहाँ कोई है.", अर्जुन ने बाथरूम से बहार आती विनीता को सामने देखा तोह ठिठक गया. पसीने से चमकता अर्जुन का तराशा हुआ जिस्म विनीता की नजरो के सामने था, जो अभी मुँह धो कर बहार निकली थी. उसको तोह यकीन हे नहीं हो रहा था के अर्जुन का जिस्म इतना तराशा हुआ और मांसल होगा. आवाज कैसे निकलती जब आँखे हे अर्जुन पर जम्म गयी थी.

"विन्नी दीदी, ये अर्जुन है और अर्जुन ये विन्नी दीदी है. विनीता सिंह, उमेद चाचा की बेटी. कल हे वापिस आयी है बहार से.", कोमल दीदी के ऐसा कहने से विन्नी की तन्द्रा भांग हुई और अर्जुन सीने पर टोलिया रखे बस सर हिला कर बाथरूम में जा घुसा. विन्नी के चेहरे पर कोई शर्मिंदगी या झिझक न थी.

"ये गूंगा हो गया है?", विन्नी ने कमरे से बहार जाते वक़्त भी बाथरूम पर नजर डाली थी लेकिन अब वह बंद था.

"कहा था न के बोलता काम है. वैसे आप ऐसे क्या देख रही थी उसको.?", दोनों इस तरफ आ गयी थी जहा ऋतू का कमरा था और बाकी सभी वही थे.

"देख रही थी के वह मुझे पहचानता भी है या नहीं. वैसे ये जल्दी हे बड़ा नहीं हो गया? ऋतू से सवा साल छोटा है.", कमरे के अंदर आते हे वह बिस्टेर पर लेट गयी थी. यहाँ ऋचा, जो खुद चेहरा साफ़ करके इस बाथरूम से आयी थी के साथ सरोज भाभी बैठी थी. ऋतू निचे चली गयी थी माधुरी दीदी के साथ काम करवाने के लिए.

"वह बहोत छोटा था दीदी उस वक़्त. वैसे उमेद चाचा की बेटी हो ये जरूर जानता होगा, उनके साथ अर्जुन की ाची जमती है. आप बैठो थोड़ी देर, भाभी दिल लगाए रखेगी आप दोनों का मैं जरा माँ को देख औ. ऋतू भी आ जाएगी थोड़ी देर में.", कोमल दीदी उन्हें कमरे में सरोज भाभी के पास छोड़ कर निचे चली गयी.

"तोह भाभी जी आप कब से है यहाँ पर? लगता तोह यही है के ज्यादा समय नहीं हुआ शादी को.", विनीता भी ऋचा की तरह बिस्टेर से तक लगते हुए बैठ गयी. सरोज भाभी सामने बैठी थी पाँव जमीन पर टिकाये.

"ज्यादा समय नहीं हुआ और यहाँ सामने हे रहती हु इस घर के. वैसे क्या चर्चा कर रही थी आप दोनों?", सरोज भाभी को भी जैसे जिज्ञासा हुई अर्जुन का नाम सुन्न कर.

"कुछ नहीं बस वैसे हे. मैं यहाँ बहोत पहले आती होती थी तब सभी छोटे थे. अब अर्जुन को देखा तोह पहचाना नहीं गया, बाकी सब तोह आसानी से पता चल गए थे. आप सामने हे रहती है तोह थोड़ा बहोत जानती हे होंगी के वह अब इतना चुपचाप क्यों रहता है.?"

"हाँ, मुझे भी इशारे से हे बता कर चला गया था.", ऋचा भी इस बातचीत में शामिल हो गयी.

"अर्जुन तोह ऐसा बिलकुल नहीं है. खूब हंसी मजाक करने वाला लड़का है वह. दिल का भी साफ़ है और सबसे ाचे से मिलता है. आप दोनों से ऐसा क्यों किया ये तोह मुझे समझ नहीं आया."

"वह मुझे ध्यान से जरूर देख रहा था. और तुझे विन्नी?"

"उसको मैं ध्यान से देख रही थी. मतलब मैं बात करने की कोशिश कर रही थी.", विन्नी ने तुरंत हे बात पलट दी.

"फिर तोह वह बस हैरान हे होगा के आप लोग यहाँ हो. मतलब तोह यही हुआ के वह जानता है ऋचा दीदी को और आपसे शायद झिझक रहा हो किसी बात पर.", ऋचा के तोह समझ न आया लेकिन विन्नी मुस्कुरा दी.

"ऐसा है के वह था बहोत ज़िद्दी तोह एक बार मैंने उसके गाल लाल कर दिए थे. कोई था नहीं aas-pas और वह बस गुस्से में मुझे anaap-shanaap बोल रहा था. मैंने पिटाई कर दी थी और फिर शायद उसके बाद मिलना अब हुआ. बचपन था और मैं चिढ़ती थी ऐसे बचो से.", विन्नी ने अब थोड़ा हँसते हुए कहा तोह भाभी को अंदर अंदर बुरा जरूर लगा लेकिन जाहिर न किया.

"छोटे बचे कुछ याद रखे या न रखे लेकिन अपने ख़ास पल कभी नहीं भूलते. जिसमे सबसे ज्यादा ख़ुशी हो या फिर जिसमे उन्हें दुःख हुआ हो. बाकी मेरा रिश्ता उसके साथ भाभी का है और इसलिए क्या पता वह ज्यादा hansta-bolta हो मेरे साथ.", सरोज भाभी की बात ख़तम होते होते विन्नी के हँसते चेहरे पर अब विपरीत भाव थे. लेकिन बात यही बदलनी पड़ी इन्हे ऋतू और प्रीती के आते हे. ऋचा ने बड़े ध्यान से देखा प्रीती को जो विन्नी को hello करने के बाद उस से भी हाथ मिलती हुई ऋतू के बगल बैठ गयी. सरोज भी भी हंस कर मिली थी प्रीती से जैसे अब इनकी भी ाची bol-chal हो.

"अब ये मत कहना के आप इसको जानती है.", ऋतू के इतना कहते हे विन्नी ने ना में गर्दन हिला दी.

"बूत she's ब्यूटीफुल. आँखे सचमुच ऐसी है या लेंस लगाए हुए है?" विन्नी ने हाथ पकड़ रखा था प्रीती का. Lambi-sudol प्रीती का नूर अलग हे था अपनी सबसे खूबसूरत होने वाली ननद से. विन्नी की बात पर प्रीती बस मुस्कुरा भर दी.

"हाँ ये गुड़िया जैसी हे है. इसका नाम है प्रीती पूरी, छोल दादा जी की पौती है. प्रीती ये विन्नी दीदी है और ये ऋचा दीदी.", अब ऋतू ने परिचय करवाया तोह प्रीती ने सर हिला कर हामी भरी.

"प्रीती तुम सचमुच अलग हे हो. वैसे ऋतू और तुम कद में एक बराबर हो लेकिन दोनों हे फेयर होने के साथ बिलकुल हे अपोजिट हो. नहीं विन्नी?", ऋचा भी देख रही थी इस 5'7" के neeli-hari आँखों वाली को. अगर कोई ऋतू और प्रीती को साथ देखता तोह तुलना करना स्वाभाविक हे होता था. दोनों हे विपरीत लेकिन लगभग सामान ऊंचाई और बेशक हसीं थी.

"टोटली एग्री विथ यू ऋचा. देखो तोह दोनों लड़किया मतलब अलग हे है. ऋतू है लॉन्ग कर्ली हेयर, ब्राउन आईज, फेयर कम्प्लेक्सीओं विथ रियली गुड वाइटल स्टैट्स एंड गुड हाइट. Where's थिस गर्ल है िडेंटिकल हाइट बूत she's सॉलिड एंड पिंकिश. प्रीती नाम यार तुम्हारी पर्सनालिटी से मैच नहीं करता. ऊप्स तुम वह फोरेनर आंटी की बेटी तोह नहीं हो? ऋचा जो थोड़ी देर पहले रेखा चची के पास आयी है.?", विन्नी ने तोह गहराई से हे नाप लिए था प्रीती को.

"जी मैं तोह इंडियन हु बूत माँ ग्रीस से है. सो ी इनहेरिटेड सम ऑफ़ हेर फीचर्स लेकिन ऋतू दीदी से कपरिसों नहीं हो सकता.", प्रीती की बात पर ऋतू ने उसके गले में हाथ दाल कर अपने साथ लगा लिया.

"तोह प्रीती क्या करती हो tum?",Richa ने पुछा और जवाब ऋतू ने दिया.

"अब चिटेक्टर के लिए कॉलेज जाने वाली है इस सेशन से. लेकिन स्पोर्ट्स में भी ाची है प्रीती. स्विमिंग और टेनिस."

"मतलब अपनी बहोत जमने वाली है प्रीती. कॉलेज तोह अभी 3 महीने के आसपास शुरू होगा. मैं भी आर्किटेक्ट हु और टेनिस मुझे भी खेलना ाचा लगता है. अब यहाँ वापिस आयी हु जर्मनी से तोह इस घर का पता है और ऋचा का पता है. शादी तक तोह अल्टेरनाते डेज मिलना रहेगा हे लेकिन ी होप उसके बाद भी मिलते रहेंगे.", विन्नी के ऐसा कहने पर प्रीती ने भी मुस्कुराते हुए सर हिला दिया.

"यार ये भी तेरे भाई जैसी है क्या ऋतू. खुश भी हो रही है, सर भी हिला रही है लेकिन बोलती बहोत काम है.", ये बात वैसे हे कही थी विन्नी ने लेकिन ऋतू ने हँसते हुए पोल खोल दी.

"दोनों बेस्ट फ्रेंड है न दीदी. बचपन से अभी तक. आदत एक जैसी हे है, बस अर्जुन थोड़ा रोटा रहता है और प्रीती हंसती रहती है.", प्रीती झूटी नाराजगी दिखने के बाद बोल हे पड़ी.

"वो आप बड़ी है न तोह आजकल मेरी आदत थोड़ी खराब हो गयी है, फ्लो फ्लो में दीदी की जगह यार निकल जाता है. बातें जितनी मर्जी करवा लीजिये फिर याद नहीं रहता के Ritu-Alka दीदी नहीं है, कोई बड़ा है. बुआ से भी दांत पड़ जाती है इस चक्कर में.", प्रीती के ऐसे भोलेपन पर विन्नी ने गाल हे सेहला दिया.

"ोये ये तोह बड़ी प्यारी है यार. तुम जैसे मर्जी बात करो प्रीती. होंठ हिलती हो तोह ऐसा लगता है जैसे बस देखती राहु. ऋचा भी ऐसा हे कर रही है और भाभी बस हंस रही है."

"दीदी बहार जा कर कही कुछ गलत कंपनी तोह नहीं मिल गयी थी? सुना है यूरोपियन कन्ट्रीज में ऐसा नार्मल है.", ऋतू ने जो ये बात कही ऋचा और भाभी की हंसी हे न बंद हुई. प्रीती शर्मा गयी थी क्योंकि ऋतू का तोह उसको पता था लेकिन विन्नी ने किया उसके हे साथ था.

"ठहर जा तू शैतान की नानी. हैं मुझे तू ऐसा वैसा समझती है. स्ट्रैट हु और अगर ऐसी मिले तोह बी होने से भी गुरेज नहीं.", अब ऋतू का हंसना तेज हो गया था क्योंकि प्रीती तोह उठ कर हे जाने लगी थी.

"हाहाहा.. मजे ले रहे है यार प्रीती. बैठ जा बैठ जा. विन्नी दीदी मजाक हे तोह कर रही है और अगर इनका ऐसा हे दिल है तब भी तू हे मजे करेगी. दीदी ने कहा न तू सॉलिड है.", ऋतू के आँख मारते हे प्रीती भी हंसती हुई बैठ गयी लेकिन एक तकिया विन्नी ने ऋतू के मार दिया.

"कसम से यार तुम हो क्या चीज? तौबा तौबा, कोमल ठीक कहती है के ऋतू आफत हे है.", विन्नी की हंसी अभी तक चेहरे पर थी.

"इसकी जुड़वाँ यहाँ नहीं है, वह तोह आपको अभी तक पकड़ हे लेती. अलका न जाने देती बातों में और जो बाल की खाल वो निकलती है उस से तोह बाकी सब भी कतराते है. दोनों, सॉरी अब तोह ये 5-6 हैं लेकिन साड़ी ऐसी है के घेर ले तोह पानी पानी करके हे सांस ले सामने वाले को.", सरोज भाभी की बात पर ऋचा भी बोल हे पड़ी.

"5-6? मतलब यहाँ हर रोज हे ऐसा माहौल होता है?"

"और क्या दीदी. आप थोड़ा समय साथ रहो तोह मेरी तरह आपकी भी जुबान चलने लगे. तारा, अलका, मंजू, आरती, प्रियंका दीदी और अब तोह रुपाली भी. हम दोनों तोह है हे. ये साथ वाला कमरा भी जोइनेड है और एक इधर भी है. तीनो में बस यही लोग रहते है.", प्रीती ने सारे नाम गिनवाए तोह ऋचा हैरान थी की ये इतने लोग वह भी एक जैसी उम्र के साथ रहते है.

"तारा, बुआ वाली बेटी है न? वो यहाँ रहती है?", विन्नी ने सोच कर पुछा.

"हाँ. अभी तोह ट्रेनिंग पर होगी लेकिन पौने 6 बजे घर आ जाती है. वीकेंड ऑफ है उसका और ट्रेनिंग के बाद भी यही से ब करेगी. मिलना आप उस से.", ऋतू ने बताया तोह विन्नी एक बार प्रीती की तरफ देख कर फिर पूछने लगी.

"गर्मी की छुट्टियों में उसकी और अर्जुन की तोह kutte-billi वाली हालत रहती थी. अब कैसे मैनेज होता है.?"

"अब तोह बिलकुल हे उल्टा है, दोनों साथ साथ हे रहते. देख के तोह कोई कह नहीं सकता के वह कभी झगड़ते भी होंगे.", ऋतू ने जैसे इतना कहा आगे प्रीती बोल पड़ी.

"अर्जुन बचपन जैसा तोह रहा नहीं. अब जिद्द नहीं करता उल्टा सबका ख़याल रखता है. आप देखना, अभी भी कही न कही किसी काम में लगा होगा. मिली नहीं क्या आप अर्जुन से?", प्रीती के ऐसा पूछते हे ऋचा ने ना में गर्दन हिला दी और विन्नी बस खामोश बैठी रही.

"तभी दादी उसको गले लगाए थी. वैसे तुम दोनों दोस्त हे या ..?", विन्नी की ऐसी बात पर सभी एक दूसरे को देखने लगे.

"परिवार है तोह सब करीब है.", ऋतू ने ये बात जैसे कही उसकी कोई तोह वजह जरूर थी. वार्ना वह तोह सामने से प्रीती को अर्जुन की मंगेतर या होने वाली बीवी कह देती थी. इस बीच ऋचा भी बड़े गौर से देख रही थी ऋतू को. ऐसे हे इधर महफ़िल लगी रही दोपहर तक और बाकी लड़कियां भी शामिल हो गयी थी. बुजुर्ग मण्डली तोह वही बतला रही थी जो अनिवार्य था, shaadi-rasme, कब कैसे और क्या क्या होगा, करना पड़ेगा...

.

.

शंकर जी दोपहर में सिर्फ अपने पिता जी और बेटे को कार के शोरूम तक छोड़ने के लिए हॉस्पिटल से आये थे लेकिन अर्जुन थोड़ा दुविधा में दिखा जब कार में ऋचा दीदी को भी बैठे पाया. अर्जुन पिछली सीट पर ऋचा के हे साथ बैठा था और कार चलते हुए शंकर जी बीच बीच में इन्हे देख भी लेते. ऋचा भी समझ रही थी की अर्जुन थोड़ा बहोत झिझक रहा है और इस से बचने के लिए वह ख़ामोशी से बस बहार देख रहा था.

"शंकर, कुछ और भी काम है? वह बड़ी भाभी ने भी वापिस जाना है तोह उन्हें कौन छोड़ के आएगा? उमेद तोह अपनी माँ और बीवी को लेके चला जायेगा कुछ हे समय में.", पंडित जी ने जैसे इस ख़ामोशी को भांग किया और एक बार अर्जुन की तरफ भी नजर घुमाई. वो जैसे बहार की दुनिया में हे खोया था.

"मैं जरा ऋचा को मार्किट ले जा रहा हु. इनके उधर भी शादी है तोह भाभी और बचो के कपडे लेने है. फिर मैं हे ताई को छोड़ने चला जाऊंगा.", शंकर जी ने बात कहने के साथ हे बहार वाले शीशे से अर्जुन को देखा जो अपलक उनकी तरफ हे देख रहा था इस शीशे से.

"हहह.. ऋचा बीटा, अपने चाचा के साथ होने वाली भाभी के लिए भी उपहार ले लेना. फिर अगले 3-4 दिन व्यस्त होने वाले है तोह सबकुछ अभी ले लेना. शंकर, थोड़ा समय अधिक भी लगे तोह आज मैनेज कर लेना भाई.", रामेश्वर जी भी समझते थे के shaadi-byaah वाले घर में बहुत सी जरुरत होंगी और वह इतने पुरुष सदस्य भी नहीं है.

"जी दादा जी, माँ और दादी ने भी बताया है जो सामान यहाँ शहर से लेके जाना है. वैसे चाचा जी को अगर हॉस्पिटल वापिस जाना हो तोह इतनी देर अर्जुन मेरे साथ kharid-dari करने में मदद कर सकता है.", ऋचा ने बात ख़तम करते हुए अर्जुन की तरफ देखा जो अपना नाम सुन्न कर एक बार ऋचा को देख कर अब आँखे दादा जी पर किये था.

"नहीं नहीं बेटी. शंकर ने समय निकला है तोह वह तुम्हारे हे साथ रहेगा. अर्जुन आज अपनी कार लेने आया है तोह इस बार वो साथ नहीं जा सकेगा. फिर कभी जरूर तुम अपने भाई को ले जाना.", रामेश्वर जी के 2 टूक मन करने से ऋचा को तोह ज्यादा फरक न पड़ा लेकिन शंकर जी थोड़ा सपाट सा चेहरा करते हुए इन 2 शोरूम तक ख़ामोशी से गाडी ले आये. 'जैन ऑटो' नामक ये 2 शोरूम जैसे एक हे व्यक्ति के थे लेकिन एक जगह 'मित्सुबिशी' किंग सून और दूसरे पर हिंदुस्तान मोटर्स लिखा था.

"लीजिये पापा, आ गया शोरूम. ऐसा तोह नहीं के यहाँ से गाडी अर्जुन हे लेके जाने वाला है?", शंकर जी ने अपने पिता को बैग उठाते देख पूछ हे लिया. अर्जुन अब सामने शोरूम को घूर रहा था जैसे वह गलत जगह आ गए हो.

"उसकी कार कोई ड्राइवर घर नहीं देने आएगा शंकर. और ये तोहफा तोह है नहीं, उसकी पहली कार है उसके हे नाम. अर्जुन हे लेके जायेगा और अर्जुन हे चलाएगा.", इधर अर्जुन और ऋचा भी कार से बहार निकल आये थे. शोरूम के बहार हे चमचमाती एकमात्र काले रंग की 'मित्सुबिशी लांसर' कड़ी थी बाकी सभी दूसरी कार जो सरकारी गाड़ियों जैसी थी.

"इसका हाथ साफ़ नहीं है अभी, इसलिए कह रहा हु. बाकी आप बेहतर जानते है.", शंकर जी ने अपनी समझ से हे कहा लेकिन अब उनके हैरान होने की बारी थी जो अर्जुन ने कहा उसको सुन्न कर.

"वैसा दादा जी आप तोह फोर्ड की कार बता रहे थे और हाँ ऋचा दीदी, आप हे तिलक कर दीजिये.", अर्जुन ने पहली बार ऋचा को सम्बोधित किया था, बेशक उसने ये बात सहज भाव से हे की थी लेकिन ऋचा ने एक बार शंकर जी को देखा और फिर अर्जुन को. बहार खड़े रामेश्वर जी भी सर झटक रहे थे अर्जुन की बात सुन्न कर.

"मैं कैसे तिलक कर सकती हु? वैसे भी गाडी तोह घर जाने के बाद तिलक करते है."

"घर जाने के बाद भी करेंगे लेकिन यहाँ से भी कार ने निकलना तोह है हे. बाकी आपको जैसा ठीक लगे.", अर्जुन ने एक बार उन्हें और अपने पिता को देखा और फिर दादा जी के साथ अंदर चल दिया.

"वो ऐसा है न भाई के बुक तोह फोर्ड वाली हे करवाई थी लेकिन तेरे सांगवान दादा जी ने कहा के एस्कॉर्ट ाची गाडी नहीं है. ये वाली भी इधर सबसे पहली कार हे है और उन्होंने हे सुझाया के नए ज़माने के हिसाब से तेरे लिए यही ाची रहेगी. हाँ जेब पर थोड़ी ज्यादा भरी पड़ गयी.", रामेश्वर जी अर्जुन के कंधे पर हाथ रखे अंदर ले आये सब समझते हुए. कार तोह एक नजर में हे अर्जुन को पसंद आ गयी थी.

"चलो, 2 हे मिनट लगने वाले है. जहा तक दिख रहा है यही कार ली है अर्जुन के लिए.", शंकर जी भी बहार निकल आये और ऋचा को साथ लिए अंदर आ गए जहा एक और झटका तैयार था उनके लिए.

"आप भी इधर है चाचा जी?", शंकर जी ने छोल साहब को कुर्सी पर बैठे देख कहा.

"हाँ भाई घंटा पहले हे आया था जब इनका फ़ोन आया के गाडी आ गयी है और तैयार है. अगर कुछ अतिरिक्त काम करवाना है तोह देख लीजिये. अब अपने पुत्तर को गाडी बिना कद प्लेयर और सीट कवर के तोह देने से रहा. और भी थोड़ा बदलाव करवाया है बाकी एक बात पता चल गयी के ऊँचा मॉडल भी ले लो तोह पल्ले से 30-35 हजार लग हे जाते है.", छोल साहब ने हँसते हुए कहा और शोरूम का मालिक उनका हाथ पकड़ते हुए साथ मुस्कुराने लगा. रामेश्वर जी बैठने की जगह अंदर कड़ी कॉन्टेसा कार देखने लगे.

"जैन भाई, हमारी एक एस्टीम भी निकलवा दो यार. घर में अब इतनी जगह नहीं दिखती.", रामेश्वर जी घूम फिर के वापिस आ बैठे और बैग जैन साहब के सामने कर दिया.

"पंडित जी वो गाडी नयी तोह है अभी और खर्चा भी ज्यादा नहीं करवाती. जगह काम पड़ती है तोह ek-aadh प्लाट ले लीजिये. हाहाहा. वैसे सच कहु के जबसे आपकी कार आ के कड़ी हुई है सवेरे से 20 लोग इसकी बुकिंग का पूछने आ गए है. मुझे नहीं लगा था के इधर इसकी डिमांड होगी लेकिन गाडी मजबूत भी है और आज के ज़माने की भी.", पैसे सिर्फ गद्दी के हिसाब से देखने के बाद बैग एक तरफ रखते हुए उन्होंने एक लड़के को ठंडा पानी लाने को कहा.

"देखते है भाई के प्लाट के पैसे कब तक जुड़ते है. इस साल की तोह साड़ी कमाई तुमने गल्ले में रख दी हमारी. चलो अब इजाजत दो और चाबी भी. कागज बनवाने का कष्ट भी कर देना यार. घर में फ़िलहाल विवाह का समय है तोह मुश्किल होगी थोड़ी."

"शर्मिंदा तोह मत कीजिये पंडित जी. बस अर्जुन को भेज देना जब मैं फ़ोन करू, वैसे प्लाट से मेरा मतलब था के नए सेक्टर में हुडा प्लाट निकल रहा है, भर दीजिये 2-3 फार्म बचो के नाम. चलिए बेटे को सीट पर बैठाइये.", पानी पीने के बाद सब खड़े होने लगे तोह अर्जुन ने भी लड़के को तिलक का सामान लाने भेज दिया जो वह तुरंत ले आया था. शंकर जी तोह छोल साहब से अलग बातों में लगे हुए थे.

"चलिए दीदी.", अर्जुन ने वह छोटी सी प्लेट ऋचा को देते हुए कहा और ये दोनों सबसे पहले इस कार तक आ गए. यही लम्बी चमचमाती 'मित्सुबिशी' कार थी अर्जुन की. जैन साहब भी जैसे धार्मिक और मान्यताओं में यकीन करने वाले इंसान थे जिन्होंने गाडी के सामने खुद हे ये नारियल फ़ूड कर शुभारम्भ किया और ऋचा ने बोनट की जगह बम्पर के मध्य में तिलक करते हुए लाल धागा बाँध दिया. अर्जुन ने अपना पर्स निकल कर खोला तोह एक पल शंकर जी उसको रोकने लगे थे लेकिन अपने पिता के इंकार करने पर बस वह देखते रहे. रेखा और कृष्णा की वह 25 साल पुराणी shyam-shwet स्टाम्प अकार की फोटो अर्जुन के बटुए में लगी थी. अर्जुन ने 1100 रुपये अपनी बड़ी बहिन ऋचा को शगुन के तौर पर दिए तोह वह भी मन करने लगी थी.

"रख लो ऋचा बीटा, भाई नेग दे रहा है.", रामेष्वर जी ने कहा तोह ऋचा ने अर्जुन को थैंक यू कहते हुए रख लिए. शंकर जी भी देख रहे थे इस कार को, उन्हें शौक जो था. अर्जुन के लिए खुद रामेश्वर जी ने दरवाजा खोला और अपने लादले को बैठा कर सर पे हाथ फेरते हुए खुद पिछली सीट पर जाने लगे. उनका हे अनुसरण करते हुए छोल साहब भी दिखे तोह शंकर जी ने पूछ हे लिया.

"आगे और कोई नहीं बैठ रहा?"

"ऋतू इसकी जान ले लेगी बीटा. कह के भेजा है उसने की अर्जुन की बगल में सबसे पहले वही बैठने वाली है. हाँ बाकी अब अर्जुन बस सही सलामत घर पंहुचा दे.", रामेश्वर जी की तरफ का शिक्षा खुद हे थोड़ा निचे हो गया था. अर्जुन ध्यान से अंदर हर चीज को समझ भी रहा था और हाथ फिर कर देख भी रहा था. सचमुच अंदर से बेहतरीन थी ये गाडी. स्वचालित निचे होने वाले शीशे, ढेर सारे बटन, स्टीयरिंग भी ऊपर निचे होने वाला जैसा थोड़ी हे देर पहले अंदर लड़के ने बताया था. ये किताब भी उसने रख ली थी जिसमे गाडी के बारे में सबकुछ बताया गया था.

"बेस्ट ऑफ़ लक.", शंकर जी ने अपने बेटे से कहा तोह अर्जुन ने भी अपने पिता को हँसते हुए जवाब दिया.

"फिर भी आपसे सीखना बंद नहीं करूँगा पापा.", और जिस सफाई से उसने शंकर जी की सामने कड़ी कार के बराबर से अपनी कार निकली थी वह भी खड़े देखते रहे. पेट्रोल का ये मॉडल कही ज्यादा जानदार और तेज था.

"सीख तोह गया है बीटा लेकिन अब सचमुच पंप हे खरीदना पड़ेगा."

"पापा, तिलक करने वाले को अंदर नहीं बैठते क्या?", ऋचा ने धीमी आवाज में कहा तोह उन्हें ध्यान आया के वह भी साथ हे कड़ी है. दोनों कार की तरफ चलने लगे.

"बीटा इतनी जल्दी मैट करो, अर्जुन ने तुम्हे सबसे पहले हाथ लगाने दिया है यही बहोत है फ़िलहाल. तुम ऋतू को भी थोड़ा समझना, अर्जुन को बेहतर जान सकोगी उसके बाद. सुना था ने के मेरे पापा ने क्या कहा, अर्जुन के बराबर वाली सीट ऋतू की है. वैसे अब तुमने जो भी खरीदना है आराम से लेना, डिक्की खली है गाडी की.", हँसते हुए वह गाडी में बैठे तोह ऋचा भी अंदर बैठ गयी.

"ऋतू के हे साथ थी मैं सुबह से. वह इंटेलीजेंट है, ऑब्सेर्वे करती है और सबसे बड़ी बात है के वह बिलकुल घमंडी नहीं है. मतलब आज मुझे रीलीज़ हुआ के वह मुझसे कही बेहतर है पापा. सच कहु तोह गिल्ट फील होने लगी थी एक बार."

"ऐसा नहीं है. बेशक ऋतू घर की लड़कियों में सबसे ज्यादा इंटेलीजेंट है लेकिन वह भी ज़िद्दी है. हाँ परिवार में रहने से वो फ्लेक्सिबल है और सबसे प्यार से बात करती है लेकिन उसका भी एक अपना दायरा है जिसमे वह शायद कुछ हे लोगो को रखती है. अलका और प्रीती के साथ शायद तारा हे है जिन लोगो के साथ ऋतू करीब है. मिलने लगोगी तोह और ाचे से समझोगी.", शंकर जी भी किसी हद्द तक ऋतू को लोगो से ज्यादा हे जानते थे. वह उनकी जान जो थी. कार का रुख मुख्या सड़क पर करते हुए वह ऋचा को भी देखने लगे.

"मुझे सचमुच ाचा लगा यहाँ आ कर. फॅमिली तोह ऐसी हे होनी चाहिए पापा. सब एक दूसरे के साथ इतना ghul-mil के रहते है की लाइफ में फ्रेंड्स की जरुरत हे नहीं लगे. कोमल के साथ साथ माधुरी ने भी ाचे से ख्याल रखा मेरा, मैं बड़ी हु लेकिन एक बार भी किसी काम को हाथ तक नहीं लगाने दिया. वैसे विन्नी इतने सालो बाद भी कही ज्यादा जानती है सबको. और ये प्रीती कौन है?", 2 बड़े सवाल इतनी तारीफ के बाद.

"और भी लोग है घर में जिनके दिल बिलकुल Komal-Madhuri जैसे हे है. अलका, प्रियंका, तारा और आरती भी बहोत प्यारी और मिलनसार है. वैसे रेखा से मिली थी तुम?", अपनी बीवी का जीकर करते हुए शंकर जी सामने देख रहे थे.

"वो तोह मैं बताना हे भूल गयी आपको पापा. रेखा माँ तोह सबसे ज्यादा प्यारी लगी मुझे. उन्होंने तोह गले भी लगाया और फिर खाने के वक़्त मैं उनके हे कमरे में थी, रुपाली के साथ. उन्होंने थोड़ा बहोत अपने हाथो से खिलाया मुझे और ये देखो, चैन भी दी एक और.", शंकर जी को अब थोड़ा पसीना आने लगा था ये सुन्न कर. हैरत होना लाजमी था के इतना महंगा तोहफा कैसे रेखा ने इस लड़की को दे दिया और अपने कमरे में भी प्यार दिया.

"फर्राटेदार इंग्लिश जैसे वह बोलती है ऐसे तोह प्रोफेसर भी नहीं बोलते थे मेरे कॉलेज में. पड़ोस वाली एक विदेशी आंटी के साथ वह बात कर रही थी, एक वर्ड हिंदी का नहीं उसे किया. वो इतनी पढ़ी लिखी है और फिर भी घर में हे रहती है? सुन्दर भी कितनी है वो, ऋतू से भी ज्यादा. उनसे मेरी बहोत जमने वाली है पापा.", ऋचा अब बिलकुल मायूस न थी जैसे वह कार में बैठते समय लग रही थी. Ritu-Komal का जीकर करने के बाद अब रेखा का वर्णन करते हुए वह बस चहकती हुई बोले जा रही थी.

"बस कर बस कर मेरी लाडो. एक हे बार तोह मिली है तू अभी. वैसे कुछ पुछा क्या रेखा ने तुझसे और तू माँ क्यों कह रही है?", शंकर जी के ऐसा कहने पर बुरा सा मुँह बनाते हुए वह अपने पापा को देखने लगी फिर दोनों हाथ झोली में रखती हुई कहने लगी.

"उनसे मिल कर मुझे तोह नहीं लगा के मैं एक हे बार मिली हु. और उन्होंने ऐसा वैसा तोह कुछ भी नहीं पुछा मुझसे बस जब मैंने मेरा बर्थडे का बताया तोह उन्होंने भी कहा के ऋतू का शामे डे होता है. फिर ये चैन दे दी ये कहते हुए के तब सहयद हम मिले न मिले. और बोली की गोल्ड देने से maa-beti का रिश्ता मजबूत होता है. तोह जब उन्होंने maa-beti कहा तोह मैंने भी आपके सामने उन्हें माँ कह दिया. सामने तोह मैंने उन्हें आंटी हे बोलै था."

"अपनी माँ से इतना जीकर मैट कर देना गुड़िया."

"हाहाहा.. आपकी जान क्यों निकलती है माँ के सामने.? इतना डरते हो आप उनसे. वैसे मैं बेवकूफ नहीं हु जो ये सब कहूँगी, वह मुझे भी नहीं आने देंगी ऐसे तोह. पापा, हर इंसान अलग क्यों होता है? पैदा तोह एक जैसे हे होते है.", ऋचा की बात पर जहा पहले शंकर जी मधुलता के जीकर पर मुस्कुरा रहे थे वही अब इस सवाल को सुन्न कर थोड़ा शांत हो गए.

"Aas-pas का माहौल, शिक्षा, हालात और बहोत सी बातें हर इंसान को दूसरे से अलग बना देती है. तुम्हे तोह ऐसा सवाल नहीं करना चाहिए था इतनी पढाई के बाद."

"वैल्यूज एंड एदुकतिओन अरे तवो डिफरेंट थिंग्स पापा. यहाँ वाली फॅमिली में सब एक जैसे है, ी आल्सो ऑब्सेर्वे एंड अंडरस्टैंड हुमंस. एक भी ऐसा नहीं मिला जो हक़ जताता हो, गलत शब्द बोलता हो या कुछ छुपता हो. बड़े भी छोटो को सम्मान देते है. एक विदेशी लड़की भी बिलकुल आपकी फॅमिली जैसी थी वह. बॉन्डिंग, लव, वैल्यूज, ट्रस्ट सबकुछ है वह और आप थोड़े अलग है उनसे. सॉरी, मेरा मतलब आप भी मुझे प्यार करते है, कभी गलत नहीं बोलते लेकिन कुछ अलग जरूर है.", ऋचा ने थोड़ा खुल कर कहा तोह शंकर जी ने हामी भरी. वो जानते थे अपने परिवार में संस्कार, इज्जात और सभी का एक दूसरे के लिए प्यार.

"वो लड़की प्रीती, जानती हो वह कौन है?", शंकर जी ने सिर्फ यही बात करना मुनासिब समझा.

"हाँ पड़ोस में रहती है. ऋतू के साथ बहोत क्लोज है वह और उसकी हे माँ बहार से है. ाची लड़की लगी लेकिन शायद उसकी जगह ऋतू हे ज्यादा जवाब देती है."

"अर्जुन की होने वाली बीवी है प्रीती. वह शुरू से हे फॅमिली का part है जैसे छोल चाचा जी मेरे पापा के भाई है.", ये बात ऋतू ने तोह ताल हे दी थी ऋचा के सामने. और उसको अब बड़ी हैरानी हो रही थी ये जान कर की प्रीती एक तरह से अपनी हे ससुराल में कितना खुल कर घूमती फिरती है.

"गौने के बिना हे वह ऐसे आती रहती है? और क्या ये अर्जुन की मर्जी के बिना हे हुआ है? क्योंकि उसको तोह मैंने देखा हे नहीं घर में इतना."

"तुमने क्या देखा क्या नहीं वह अलग बात है. प्रीती और अर्जुन शुरू से हे साथ है और इधर समाज khaap-panchayat जैसा नहीं है. प्रीती घर की बेटी है और वो हमेशा वैसे हे रहने वाली है. उस लड़की की दुनिया इन 2 घर में हे है जिस वजह से वह अपने maa-baap से अलग यहाँ दादा जी के साथ रहती है. अर्जुन को घर में नहीं देखा क्योंकि वह काम करवा रहा होगा. एक तोह मैंने भी लगे हुए देख लिए थे और फिर दूसरा घर भी तैयार हो रहा है तोह वह वही होगा बाकी समय.", इधर दोनों मार्किट आ गए और कार एक तरफ लगते हुए शंकर जी अपनी इस लाड़ली को लिए कपड़ो के शोरूम की तरफ पैदल चल दिए.

"यही तोह कह रही हु मैं. वह गाँव वाला घर ऐसा क्यों नहीं है? क्यों माँ किसी से सीधे मुँह बात तक नहीं करती और क्यों वह माहौल हमेशा जंजीर सा बंधन लगता है.? आप आते हो न तभी 3 लोग एक साथ बैठे दीखते है, दादी के साथ. ऐसा नहीं हो सकता के वह भी सब ऐसा हे लगे.?"

"अब बिजेन्दर आ रहा है न घर तोह तुम्हे दिक्कत नहीं होगी. वह ताई को आराम देने के बाद घर का माहौल सही करेगा. बाकी कुछ तोह फरक रहने वाला है हवेली और घर में. हवेली की शान बहार से दिखती है और घर की उसके अंदर के लोगो से. चलो यहाँ तुम्हारे और लता की पसंद का सबकुछ मिल जायेगा. जो भी लेना है या तैयार करवाना हो कर लो.", शंकर जी ने भी एक तरह से फरक बता हे दिया था. इस बड़े शोरूम में आते हे अपने दोस्त से हाथ मिलते हुए शंकर जी ने ऋचा का परिचय दिया और सुधीर के साथ एक लड़की भी ऋचा की सेवा में लग गयी.

.

.

"देख अर्जुन कार घर के अंदर नहीं आएगी.", प्रवेश द्वार पर हे ऋतू हाथ कमर पर रखे कड़ी थी. कोमल दीदी भी तिलक करने के लिए थाली ले आयी तोह रामेश्वर जी हँसते हुए एक तरफ से घर के अंदर चले आये अपने भाई सामान परम मित्र के साथ. कौशल्या जी तोह अंदर हे थी चंद्रो देवी के साथ जहा रेखा और राजेश्वरी भी थी लेकिन पूर्णिमा जी अपनी पौती विन्नी के साथ कड़ी ये ड्रामा देख रही थी.

"ये बड़े नहीं होने वाले कभी?", हँसते हुए उन्होंने रामेश्वर जी से पुछा तोह वह भी इनके पास रुक गए.

"भाभी ये बड़े हो गए तोह फिर घर घर नहीं लगेगा. इन सबकी वजह से तोह घर आबाद लगता है."

"देख ले सतीश, बहाना मिला नहीं की मेरी बहिन के पास आ खड़े हुए. चलो आपके लिए 2 बार फ़ोन आ चूका है और पूर्णिमा तू भी चाय पी ले नहीं तोह ये ऐसे हे डोरे डालते रहेंगे.", कौशल्या जी की बात सुन्न कर पंडित जी तोह तेजी से बैठक में हो लिए और छोल साहब हँसते हुए अपनी भाभी को देखने.

"भाभी जी कुछ भी कहो, आप हो खतरनाक.", हंस तोह पूर्णिमा जी भी रही थी उनकी बात पर.

"आदत है कौशल्या की, रिश्ता बराबर है न तोह हंसी मजाक चलता रहता है भाई साहब. उन्होंने भी बुरा नहीं मन और मैंने भी. चलो चाय पी के फिर निकलना भी है.", तीनो अंदर आये तोह विन्नी गेट की तरफ बढ़ गयी जहा कोमल ने तिलक कर दिया था और ऋतू अभी तक वैसे हे कड़ी थी.

"आने दे इसको अंदर. क्या ज़िद्द लगाए बैठी है?"

"दीदी, आप बीच में न आओ. पहले ये मुझे स्टीयरिंग वाली जगह बैठायेगा और मैं गाडी अंदर करुँगी.", ऋतू को वजह बताई तोह विन्नी हंसने लगी वही कोमल दीदी थोड़ा गुस्से से ऋतू को देखने लगी.

"तोह इसमें क्या बड़ी बात हुई. जा बैठ जा सीट पर और कर दे कार अंदर. वैसे ाची कार ली है अर्जुन ने."

"विन्नी दी, इसको कार चलनी नहीं आती. अर्जुन तोह इसको अपने साथ बैठा कर हर बात मान ने को तैयार है लेकिन मैडम ने ठान लिया है के खुद हे कार अंदर करेंगी."

"चलो तोह फिर ऐसा करो की अर्जुन के साथ उस सीट पर हे बैठ जाओ. स्टीयरिंग तुम पकड़ लेना और बाकी वह कर लेगा. इतना तोह आता हे होगा.", विन्नी दीदी के ऐसा कहते हे ऋतू आँखे चमकती हुई अर्जुन की तरफ वाले दरवाजे पर जा कड़ी हुई.

"देख बेस्ट सलूशन है अब. गॉड में बैठती हो और तू बस स्टीयरिंग सँभालने दियो.", अर्जुन अब और क्या कहता, लेकिन वही झिझक थी मैं में की ऋतू दीदी उसकी प्रेमिका हैं और सामने विन्नी कोमल और माँ भी कड़ी थी. फिर भी सीट पीछे करके ऋतू दीदी को अपने आगे बैठा लिया. उनके जिस्म की महक पहले हे उसका बुरा हाल कर देती थी.

"दीदी, खतरा ले रहे है हम. प्लीज, आप बस बैठी हे रहना आराम से. बहार सब लोग है और माँ भी.", अर्जुन ने कान में धीमी आवाज में बताया तोह ऋतू थोड़ा सा और पीछे सरक गयी.

"पति पत्नी ऐसे हे तोह घर में कदम रखते है. चल तू मेरे हाथो को पकड़ ले मैं ज्यादा तंग नहीं करती.", ऋतू ने भी वैसे हे कहा और अर्जुन ने सावधानी से कार अंदर बढ़ा दी. ऋतू तोह आखिर ऋतू हे थी. थोड़ा सा अपने कूल्हों को रगड़ते हे अर्जुन को उत्तेजित कर हे दिया. एक पल के लिए कार घूमने की जगह सीढ़ी हुई लेकिन ऋतू ने हे सही तरफ स्टीयरिंग कर दिया. गाडी को रोकते हे अर्जुन ने नाराजगी से दीदी को देखा जो हंसती हुई बहार निकल गयी.

"मरवा दिया न. अब बहार कैसे निकलू?", अर्जुन बता रहा था और ऋतू जा के माँ की बगल में कड़ी हो गयी.

"अब कार ले ली तोह इसका ये मतलब तोह नहीं सारा दिन वही बैठेगा. चल माँ को भी चाभी दे जरा.", ऋतू दीदी की करतूत से पहले हे अर्जुन का बुरा हाल था और बहार निकलते हे सब उसकी हालत देख लेते.

"आ रहा हु दीदी बस 2 मिनट. ये फाइल रख दू बस.", अर्जुन बहाने से डैशबोर्ड में कुछ भी देखने लगा और फिर अपनी कमीज बहार निकलने के बाद लम्बी सांस भरता हुआ बहार आ गया. उभर एक तरफ से अभी भी थोड़ा नुमाया था लेकिन कुछ ज्यादा नहीं.

"शैतान हो तुम पूरी.", विन्नी ने स्नेह से ऋतू का हाथ पकड़ते हुए कहा और इधर अर्जुन ने कोमल दीदी को शगुन देने के बाद माँ को गाडी का दरवाजा खोलते हुए अपनी सीट पर बैठा दिया. बाकी तीनो भी देख रही थी.

"अब कही कार पूरी हुई मेरी.", अर्जुन ने चाबी भी माँ के हाथ में रख दी.

"ऐसा कुछ नहीं है अर्जुन. ऋतू बैठ गयी तोह वैसे हे ये पूरी हो गयी थी लेकिन सचमुच ये कार बहोत ाची है. इसकी चाबी हमेशा अपने पास हे रखना, ये तेरी है बीटा सिर्फ तेरी.", उन्होंने भी अर्जुन के गाल को सहलाते हुए स्नेह जताते हुए चाबी बेटे के हाथ पर रख दी.

"आप मेरे साथ चलेंगिना मार्किट जब शॉपिंग करनी होगी? न मत करना प्लीज.", अर्जुन ने उन्हें मानते हुए कहा तोह रेखा जी की वही मुस्कान चेहरे पर आ गयी जिसके लिए अर्जुन ये सब कर रहा था.

"जब भी तू कहेगा मैं चल पड़ूँगी. अब जा के अपनी दादी और चची से मिल ले, उन्हें निकलना है.", कार से बहार आते हुए रेखा जी ने कहा तोह वह बिना किसी को देखे अंदर दौड़ गया. घर के भीतर सभी कार के दरवाजे टाला लगे हो या न इस से कोई फरक नहीं पड़ता था.

"ये तोह सुबह से हे मुझे इग्नोर कर रहा है. चची मैं इसलिए हे नहीं आना चाहता थी हवेली से इधर. कोई मुझे इग्नोर करे ये मुझे बहोत बुरा लगता है.", विन्नी ने साफ़ साफ़ रेखा जी से कहा और नाराज होने लगी.

"दीदी, वह अंदर गया है न तोह आप भी चली जाओ. कान खींच लेना उसका और उमेद चाचा के सामने वह चुसकेगा भी नहीं.", ऋतू के इस सुझाव पर रेखा जी ने भी हँसते हुए हाँ लगा दी थी.

"देख लो चची, वह उसने मेरी इंसल्ट की तोह मैं फिर आज रुकने वाली नहीं यहाँ और सीधा शादी की जगह हे आउंगी. कह देती हु.", विन्नी को इतना नाराज देख रेखा जी भी बोल पड़ी.

"कोई बात तोह होगी जिस वजह से अर्जुन ऐसा कर रहा है. ये तुम दोनों जानते हो और फिर तुम्हे हे बात करनी चाहिए. दीखता नहीं लेकिन थोड़ा ज़िद्दी वह भी है जब बात अपनों की हो. नाराज होने का हक़ उसको भी तोह होगा.", रेखा जी अपने साथ कोमल को ले जाते हुए विन्नी को प्यार से समझा गयी.

"आपने मारा था न भाई को? मुझे बताया था उसने, लेकिन अब मनाओ और वह दादी के सामने पक्का मान जायेगा नहीं तोह दादा जी भी तोह उधर हे हैं.", ऋतू ने आँख मारते हुए कहा और प्रीती की तरफ चली गयी. दोनों को कुछ काम था जिसके लिए प्रीती ने हे बुलाया था ऋतू को अपने घर.

"ठीक है. मुझे नहीं पता था के वह इतनी पुराणी बात को दिल पे लिए होगा. और तुझे कैसे पता ये सब.", विन्नी पूछती रह गयी लेकिन ऋतू जा चुकी थी. फिर धीमे कदमो से वह भी इधर हे चल दी जहा बाकी सब थे. कुर्सी पर छोल साहब और पंडित जी बैठे थे और बीएड पर पूर्णिमा जी, चंद्रो देवी, कौशल्या जी और अब अर्जुन भी. उमेद सिंह भी अब तैयार हो कर एक तरफ कुर्सी पर बैठे थे. विन्नी ने आते हे देखा की अर्जुन उसकी दादी के साथ चिपका बैठा था और पूर्णिमा जी भी उसके बाल सहलाती बात कर रही थी.

"सॉरी. लेकिन इतनी पुराणी बात पर तुम अभी तक मुँह बनाये बैठे हो?", विन्नी अभी भी थोड़ा अकड़ के कड़ी थी उनके सामने. अर्जुन ने चेहरा पूर्णिमा जी की तरफ हे कर लिया.

"क्या बात कर रही हो तुम और सॉरी किस लिए?", उमेद सिंह ने अपनी बेटी को देखते हुए सवाल किया तोह सभी बस विन्नी को हे देख रहे थे सिवाय अर्जुन के जो मुँह छुपाये बस मुस्कुरा रहा था.

"ये इतना बड़ा हो गया है और देखिये न पापा 13 साल पुराणी बात पे मुँह फुलाए बैठा है. आज इसने एक बार भी मुझसे बात नहीं की है. सब इतना gunn-gaan कर रहे है इसका और मुझे लगता है बस ड्रामा हे है."

"दादी, ये कैसी सॉरी बोल रही है.?", अर्जुन ने धीमी आवाज में पूर्णिमा जी से कहा जिसको इस कमरे में लगभग सबने सुना था.

"हाँ, बता तू ये कैसी सॉरी बोल रही है जिसमे इतना गुस्सा दिखा रही है मेरे बचे पर?", पूर्णिमा जी ने भी नाराजगी से विन्नी से पुछा.

"वो ये हमेशा उल्टा सीधा बोलता रहता था न इसलिए मैंने इसकी पिटाई कर दी थी एक बार. फिर तोह मिलना हे नहीं हुआ और ये उस बात को हे दिल पे लिए बैठा है अब तक. गुस्सा तोह मुझे भी आएगा न जो ये इतना इग्नोर करेगा. बड़ी हु मैं इस से और अगर अब भी ये नहीं मन तोह फिर से गाल लाल कर दूंगी मैं इसका.", विन्नी ने कमर पर हाथ रखते हुए कहा. गुस्से में सचमुच वह लाल हो रही थी.

"ाचा, समझने की जगह तू इसकी पिटाई करे और फिर सॉरी मांगने की जगह सॉरी छीन रही है. हाथ लगा के दिखा जरा मेरे बेटे. मैं भी यही बैठी हु और तेरे बाप में भी हिम्मत नहीं जो बीच में बोल सके.", पूर्णिमा जी ने अर्जुन के दोनों गाल हाथ में लिए कहा. रामेश्वर जी आदत अनुसार बीच में बोलने लगे.

"भाभी, बचो की बात है."

"आप तोह चुप हे करो जी.", कौशल्या जी ने उन्हें चुप करवा दिया. विन्नी इधर उधर देखने लगी और कोई अपने साथ न दिखा तोह धम्म से अर्जुन की हे बगल में बैठ गयी.

"चल सॉरी. गुस्सा मुझे भी तेरे जैसा हे तोह आता है. लेकिन तू बता इतनी पुराणी बात के लिए कोई ऐसे नाराज रहता है क्या? देख अब ख़तम कर ये बात, सारे हे तेरी तरफ है. मुझे न हर्ट होता जब कोई इग्नोर करे तोह, आदत है मेरी.", विन्नी की आँखों में सचमुच हे थोड़ा पानी आ गया था. लेकिन इस से पहले की वह रोने हे लगती अर्जुन ने पलट कर उन्हें गले लगा लिया.

"बड़ी हो तोह इसका मतलब ये नहीं के छोटे हे सामने से आ कर मिले. सुबह दादी से मैं मिल रहा था तब तोह देख के भी नजरे हटा ली थी. मैंने भी फिर वही किया, आया मजा विन्नी टिन्नी.", जैसे अर्जुन चिडता था बचपन में वैसे हे बोलने लगा.

"देखो लो दादी इसको. मैं 6 साल बड़ी हु इस से और अभी तक मेरा नाम बिगड़ता है. तू चल मेरे साथ मैं तेरे कान ाचे से मरोड़ती हु."

"अब न 6 साल तोह बीच में रहने हे वाले है लेकिन 6 इंच लम्बा हु आपसे. मरोडो मेरा कान और देख उठा कर अँधेरे वाले कमरे में बंद न किया तोह कहना. मम्मी भूत करके शोर मचने लगोगी.", विन्नी अँधेरे से अभी तक डर्टी थी लेकिन अर्जुन के ऐसे कहने पर वह खुद जोर से उसके गले लग गयी.

"ाचा सॉरी, अब परेशां नहीं करुँगी. सुबह जानबूझ कर इग्नोर नहीं किया था मैंने.", विन्नी कहने को ये कह रही थी लेकिन अर्जुन के सीने से लगी वह और भी बहोत कुछ महसूस कर रही थी.

"हो गया तुम्हारा समझौता, देख लिया मेरे बेटे का बड़ा दिल. तेरी तोह साड़ी बातें याद रखे हुए है और फिर इसकी बाद सही है. इसने तोह तेरी माँ से भी प्यार से मुलाकात की थी लेकिन तू हे इग्नोर करेगी तोह ये भी वैसा हे करेगा. चल अब छोड़ मेरे बेटे को और जा के अपनी बहनो का सर खा.", पूर्णिमा जी ने इतना कहा तोह विन्नी अलग होते हुए कड़ी हुई और जाते हुए फिर से अर्जुन के सर पर चपत लगाती भाग गयी.

"देख लो आप लोग."

"तेरे साथ हे करेगी अब. एक हे छोटा भाई है उसका और तेरी बात भी गलत थी जो बड़ी बहिन को ऐसे सत्ता रहा था. इतने साल बाद लड़की घर आयी और जनाब को माफ़ी मंगवानी थी. जा के दूसरे घर चक्कर लगा आ, मिस्त्री 5 बजे चले जाते है और 10 मिनट बाकी है. टाला लगा आईओ.", कौशल्या जी ने अब अर्जुन को फटकार लगाई तोह चंद्रो देवी बोल हे पड़ी.

"तेरी न उम्र होती कौशल्या जो बालको के बीच रैली रहे है? रामेश्वर, बोल दे तेरी लुगाई ने के छोरे साथ ult-sult न बोलेगी. जा बीटा अर्जुन, इसकी आदत है तोह जावे कोणी.", अर्जुन भी हँसता हुआ चंद्रो देवी के पाँव छूने के बाद कौशल्या जी का गाल चूम कर बहार भाग गया.

"लो और देख लो आप. मेरी फटकार का कोई असर न है इस बैलबुद्धि पर. और ये सब आपके देवर का किया धरा है.", चंद्रो देवी के साथ पूर्णिमा जी भी हंसने लगी और रामेश्वर जी उमेद छोल साहब की तरफ देख रहे हो.

"ताई जी, चची जी की न यही खासियत है के हर बात के लिए चाचा जी को हथकड़ी लगवा दो बस. हाँ भोले ने मेरी माँ के गाल चूमे होते तोह बड़ी खुश होती. मेरा लाल तोह सिर्फ तेरा है पूर्णिमा.. तब न फूल झड़ते है सिर्फ."

"चुप कर तू भी. आया चाचा का लगता बड़ा, तू आजतक मेरी गॉड में सोया रहता है. इनकी भाभी आ गयी तोह बस जनाब शरीफ."

"बस करो थानेदारनी जी. मेरी भाभी तोह आपके बगल में भी है. अब इजाजत हो तोह कल की बात भी कर ले? मार्किट जाना है आपने, सामान लेना है और फिर बड़ी भाभी के घर और राममेहर के वह भी जाना है. दोनों तरफ शादी है और आपको बस मैं नजर आ रहा हु. उमेद बीटा, शंकर न होगा कल और मैं तेरी चची को लेके नहीं जाने वाला बहार. तू तेरी माँ और चची को बाजार ले जाना, अर्जुन को इस सब की समझ नहीं है.", रामेश्वर जी ने कहने को कह दिया लेकिन उमेद के साथ साथ छोल साहब ने भी अपने मुँह पर हाथ रख लिया था. पूर्णिमा जी के साथ साथ अब चंद्रो देवी भी हंसने लगी थी.

"धन्य हो जी आप. जीजी, पूर्णिमा और बचे एक फ़ोन करते थे न के छुट्टियां पड़ गयी है तोह थाने से सीधा इन्हे लेने चले जाते थे आपके देवर, बिना घर बताये. एक बार तोह फिल्म भी ले गए थे और मेरे साथ मार्किट जाना भी भारी है. अकेले चली जईओ तू पूर्णिमा, देख फेर 2 घंटे का काम 5 में करके न आये."

"कौशल्या बस भी किया कर कभी तोह. तेरी आदत है न ये चुहल करने की वह जाएगी नहीं. फिल्म वाली बात भी मैं बता देती हु जीजी को. जीजी, कौशल्या ने मुझे बुलाया था फिल्म के लिए जब आपके दूसरे देवर भी थे. उन्होंने कहा के टिकट मुश्किल है रामेश्वर को कह कर करते है कुछ हल. आप तोह मैडम वही रुक गयी और इधर हम लोग वापिस आये तोह ये काम से चले गए और मैं भाई साहब के साथ अंदर आयी टिकट ले के तोह पिक्चर शुरू हो चुकी थी. इनके बराबर कोई बैठ चूका था तोह साथ वाली पर हम लोग बैठ गए. ये तोह आयी नहीं इस तरफ. और आज तक मजे लेती है. मेरे देवर के साथ फिल्म देखि मैंने तुझे जो सोचना वह सोच.", अब पूर्णिमा के तुनकने पर कौशल्या जी भी हंसने लगी थी. यहाँ इनका halka-fulka मजाक कुछ और देर हुआ फिर उमेद सिंह के साथ पूर्णिमा जी और राजेश्वर जी ने विदा li.Vinni ने बोल दिया था के वह आज यही रहने वाली है.

.

.

क्रमश
 
जारी

.

.

अर्जुन पुराने घर में jaanch-padtal करने के बाद ठेकेदार से जानकारी ले रहा था. आज भी बहोत काम हुआ था यहाँ और घर अब ाचा दिखने लगा था.

"बीटा, बहार वाली दिवार का पूरा प्लास्टर कर दिया है, ये बड़ा दरवाजा भी मरम्मत के बाद पेंट हो गया. 2 मजदूर लगा कर सारा खली हिस्सा साफ़ करवाया था और अब कल 4 ट्राली मिटटी बिछवा देंगे. इधर ये साड़ी टूंटी, चिटकनी, हैंडल बदलवा दिए है. पल्ले (दरवाजे) भी कल वार्निश के बाद लगा देंगे. प्लम्बर ने भी सारे नल और पाइप जांच कर जो बदलने वाले थे वह बदल दिए है.", ठेकेदार के हाथ में 3-4 कागज़ थे और वह अर्जुन को सब दिखते हुए बता भी रहा था.

"अंकल जी अभी रसोई का पत्थर रह गया है, और ये पेंट बचा है शायद. वैसे चारो सीट बदलवा दी न बाथरूम की? और बहार गाये वाले कमरे का क्या करना है?", अर्जुन ने कमरे के अंदर हे बने एक बाथरूम का दरवाजा खोल कर देखा तोह यहाँ rang-rogan हो चूका था, नयी कोड और toonti-fuhare चमक रहे थे.

"हाँ, पहले बाथरूम हे पेंट करवाए है, रसोई भी हो गयी बिजली का काम करवाने के बाद. आज बहार आँगन का पत्थर रोका है कल रसोई का होगा. पंखे, एक, तुबेलिघ्त और जैसे लैंप लगवाने हो वह कल हे मंगवा देना सुबह. इस काम को भी शाम तक फारिग करवा देंगे, इलेक्ट्रीशियन कल 2 से 9 बजे तक काम करेंगे. और बहार वाले कमरे को तोह ाचे से तैयार करने का बोलै है आपके ताऊजी ने. पिछले हिस्से में भी वेहड़े को पक्का करना है. छत्त पर ाजे निरु किया है जिस से बारिश में कही भी पानी का सीलन नहीं होगा.", ठेकेदार काम का पक्का आदमी था और अर्जुन को भी ाचा लगा था ये देख कर की सभी तरह के मिस्त्री एक साथ लगा दिए थे इन्होने.

"छत्त की टंकी रह गयी है जैसा मैं देख रहा हु कागज़ पर नहीं लिखी."

"हाँ. ये शायद भूल गए राजकुमार जी. लेकिन अब लिख लेता हु यहाँ. वैसे वह दुरुस्त है बस सफाई करवा के प्लास्टर करवा देते है. बाकी कांच वाला परसो आएगा, 2-3 खिड़कियों के चटके हुए है. चौखट तोह सभी पालिश करवा दी है तोह ज्यादा काम नहीं है. वैसे मेरी सलाह है के बहार आँगन में गाडी कड़ी करने की जगह एक तरफ शटर वाला गैराज बनवा लिया जाये तोह बेहतर रहेगा. यहाँ का पत्थर भी इस वजह से हे खराब हुआ tha.",Aangan में लगे नए संगमरमर को देखते हुए ठेकेदार ने सलाह दी.

"हाँ, यहाँ तीनो तरफ हे तोह इतनी जगह. लेकिन मुझे नहीं लगता के शादी से पहले दादा जी कोई ऐसा काम करवाएंगे. आप संपर्क में हे रहना अंकल, शादी होते हे ये राइट साइड में घर की लम्बाई बराबर हे गैराज के लिए मैं दादा जी मन लूंगा. रंग तोह हर कमरे के आपको पता हे है, कल बाकी सामान मैं समय पर मंगवा दूंगा. वैसे भी ताऊजी आज हे आने वाले है वापिस, दादा जी ने बताया था थोड़ी देर पहले. तोह कल वो जरूर आएंगे इधर. अपना समय और उचित सलाह देने के लिए धन्यवाद्.", अर्जुन उनके साथ हे इस छोटे दरवाजे से बहार चला आया जो शायद सुविधा के लिए बड़े गेट के बाए हिस्से में बनाया गया था. दोनों पर टाला लगते हुए वह पैदल हे चल दिया एक तरफ.

ऐसा लग रहा था जाने कितने हे दिन बाद वह इस गली में आया हो. शाम के साढ़े 5 बज चुके थे, मतलब आधा घंटा वह इस घर रहा था और अब आकांक्षा की गली में चलते हुए चेहरे पर अलग हे ख़ुशी थी. उनके घर के बहार कोई गाडी न देख घंटी बजा दी. अंदर आकांक्षा की माता जी की कार कपडे से ढंकी थी, पिछली बार की तरह. कोई एक मिनट बाद ये 35-36 साल के लगभग उम्र की महिला ने दरवाजा खोला. एकटक वह अर्जुन को ऊपर से निचे देखने लगी जो 6 फ़ीट के गेट से भी लम्बा था.

"हांजी?", इन मोहतरमा ने इतना हे बोलै और ख़ास तरह से आँखें हिलाते हुए परिचय माँगा.

"जी अर्जुन, अंशु का फ्रेंड हु और नोट्स लेने थे. आंटी और अंशु नहीं है क्या घर में?", अर्जुन अपनी हे जगह खड़ा था. इन महिला ने अर्जुन को अंदर न बुला कर आकांक्षा को आवाज लगाई जो नंगे पाँव हे hilti-dulti से आँगन तक आयी और अर्जुन को देखते हे चिल्ला उठी.

"ोये तुम हो. वह क्यों खड़े हो, अंदर आ जाओ. बुआ ये अर्जुन है, अर्जुन.", अब जैसे इन महिला को कुछ याद आया और वह एक तरफ हुई के आकांक्षा ने अंदर आते हे अर्जुन का हाथ पकड़ लिया.

"सॉरी बीटा, दिमाग से निकल गया था. थैंक यू अर्जुन.", अर्जुन कुछ जवाब देता उस से पहले हे हॉल में बैठी सुषमा तनेजा सोफे से कड़ी होती उसके पास आ गयी. पहले से भी ज्यादा खूबसूरत लग रही थी वह और एक आकांक्षा की हमउम्र लड़की बस बैठी हुई देख रही थी.

"तुम घर के बहार से हे चले गए थे न? और फिर उसके बाद अब आ रहे हो.", सभी जैसे चाय हे पी रहे थे अर्जुन के आने से पहले.

"सॉरी आंटी रुपाली दीदी ने बताया हे होगा आपको की मैं तोह स्कूल भी नहीं जा रहा घर में शादी की वजह से. कल आने लगा था लेकिन फिर जरुरी जाना पड़ गया. आप कैसे है और अंकल?", अर्जुन दीवान के किनारे बैठ गया था और सुषमा जी उसके साथ.

"हम सब तोह तुम्हरे सामने हे है. लाइफ ज्यादा ाची हो गयी है, तुम्हारी वजह से. हाँ ये अब ज्यादा परेशां करने लगी बस.", गॉड में आ बैठी आकांक्षा को गले लगाती सुषमा जी ने हँसते हुए कहा. अर्जुन भी खुश था ये सब देख कर.

"आप लोग तोह मेरी वजह से चाय भी भूल गए. और आप हैं अंशु की बुआ जी और शायद ये सेजल है.", अर्जुन ने उस खामोश सी बैठी लड़की की तरफ नजर करते हुए कहा तोह वह थोड़ा हैरान हुई लेकिन सुषमा जी ने अर्जुन का सर सहलाते हुए कहा.

"सही पहचाना तुमने, ये सेजल हे है और अबसे यही रह कर अपना कॉलेज शुरू करेगी. और ये मेरी ननद काम छोटी बहिन ज्यादा है, जाया. अंशु की बुआ और सेजल की माँ. अब तुम बताओ के तुम्हारे लिए क्या बनाऊ? इतने दिन बाद दिखाई दिए हो तोह ऐसे न जाने दूंगी, कह देती हु.", सुषमा जी ने परिचय करवाया तोह अर्जुन ने फिर से बुआ को नमस्ते की. देख कर नहीं लगता था के सेजल उनकी बेटी होगी लेकिन सच यही था.

"ये क्या पियेगा वह मुझे पता है माँ. आप न अपनी चाय पी लीजिये और तुम उठो वह से और मेरे साथ चलो.", वह अर्जुन को हाथ पकड़ कर उठती हुई हॉल से बहार रसोई में ले जाने लगी.

"मैंने दूध गरम करना सीख लिया, अब देख लेना.", आकांक्षा की बात पर अर्जुन के साथ सुषमा भी हंस रही थी. सेजल भी वह से उठ कर अंदर वाले कमरे में टीवी देखने का बोल कर निकल गई. दोनों के जाते हे जाया कुछ सोचते हुए बोल पड़ी.

"भाभी, लड़का ाचा है लेकिन अंशु का व्यवहार ज्यादा हे खुला हुआ है. मुझे यकीन है के वह ऐसा वैसा कुछ नहीं करेगी लेकिन.."

"जाया तुम्हारी यही बात ाची है के तुम सबकी परवाह करती हो. लेकिन ये लड़का हमारी अंशु की परवाह हमसे ज्यादा करता है. और वह शादी में तुमने देखा हे था न के पहली बार मेरी बेटी कितना चहक रही थी, सबसे मिली भी और शामिल भी हुई. फिर ये समाज तोह मेरी बेटी के बुरे समय में उसके साथ न था. जान लेना थोड़ा इस लड़के को तुम भी, जितना मैंने जाना है इसने लोगो के घर आबाद हे किये है.", अपनी ननद से चाय का कप लेते हुए सुषमा जी मुस्कुरा दी. जाया थोड़ा झेंप रही थी.

"सच कहती हो आप के ज़िन्दगी में सबसे जरुरी अगर कुछ है तोह सबके साथ खुश रहना हे है. अकेलापन और दर्द इंसान को टॉड देते है. सॉरी भाभी, सेजल की वजह से थोड़ा अजीब लगा था.", इधर ये बातें कर रहे थे और रसोई में आकांक्षा अर्जुन से हे दूध गरम करवा रही थी.

"ज्यादा मत गरम करना और ये मलाई तोह निकल हे देना प्लीज. हाँ मेरे वाले में बॉर्न्विटा एक्स्ट्रा थोड़ा."

"वह तोह बोल रही थी की दूध गरम करना सीख लिया है तुमने.", अर्जुन ने पलट कर उसकी कमर में दोनों हाथ दाल लिए थे. वो बिल्लोरी आँखें इतने में हे चमक उठी और खुद हे आकांक्षा उसकी तरफ होने लगी.

"तुमने मुझे मिस किया न? ी क्नोव थिस एंड ी आल्सो मिस्ड यू ा लोट. दूध गिलास में दाल लो इस से पहले की मैं बताना शुरू करू के क्या मिस किया मैंने.", जीभ होंठो पर फिरती हुई वह अर्जुन का गाल चूम कर बहार निकल आयी. अर्जुन 2 गिलास में दूध डालते हुए हंस रहा था.

"मुझे बिलकुल पता था के मेरी बेटी कितना काम जानती है. दूध भी तुमने हे बनाया होगा?", अर्जुन को 2 गिलास लिए अंदर आते देख सुषमा जी ने हँसते हुए कहा और आकांक्षा जीभ निकाल कर कमरे में भाग गयी.

"इधर है हम दोनों, वह फिर आप उसके साथ दुनिया जहाँ की बातें करने लगोगी."

"जाओ अर्जुन नहीं तोह ये ऐसे हे सबको परेशां करती रहेगी. कुछ साथ में बना देती हु."

"नहीं आंटी जी, वैसे भी मैं फिर आऊंगा. अभी नोट्स लेके जाने है मैथ के इसलिए आया था.", अर्जुन को जाते देख सुषमा जी ने टेबल से बर्तन समेटे और अपनी ननद के साथ ऊपर चल दी, जहा उनकी सास अकेली थी.

"अब ये दूध रखो एक तरफ और मुझे प्यार करो.", अर्जुन के हाथ से गिलास एक तरफ रखती वह बंद कमरे में अब उसकी गॉड में बैठी थी.

"सब घर में हे है मेरी माँ. मरवाओगी तुम.", अर्जुन कुछ कहता उस से पहले कंधे से दोनों तान्निया सरकती वह उस प्यारी सी ब्रा में क़ैद अपने उभर सामने करती अर्जुन के होंठो से लगी. आकांक्षा का चूमने का अंदाज शुरू में जहा धीमा था थोड़ी हे देर में कशिश भरा हो कर तेज होने लगा. अर्जुन का हाथ अपने सीने पर दबती वह बुरी तरह उसके होंठो को चूस रही थी. 2 मिनट बाद होंठ अलग हुए तोह अर्जुन बस इस खूबसूरत सी पारी को निहार रहा था.

"आज न एक बात और केहनी है, पूरी जरूर sunn-na.", ब्रा से एक उभर खुद हे बहार निकल कर अर्जुन के पंजे में रखवाती वह हलकी हलकी कमर हिला रही थी. अर्जुन हमेशा उसके शरीर को बिहार प्यार से हे सहलाता था, कभी कोई उतावलापन या जोर नहीं. आज भी इस गुलाबी छोटे से निप्पल को उकेरता वह बस उसकी आँखों को देख रहा था.

"सुन्न रहा हु."

"तुम बस ऐसे हे मुझसे प्यार करते रहना चाहे हमारी मंज़िल अलग अलग हो जाये. सेंटी हो कर नहीं दिल से कह रही हु. तुम हमेशा प्रेजेंट में रहना मेरे साथ अर्जुन, फ्यूचर की बात कभी नहीं करेंगे.", बड़ी अजीब बात कह दी थी आकांक्षा ने. अर्जुन जानता था के ऐसा मुमकिन नहीं लेकिन खुद सामने से उसने ऐसा क्यों कहा.

"तुम्हे ये गलत नहीं लगता. मैं प्यार करता हु तुमसे, बेशक सबसे पहले मैंने कहा था के हम फ्रेंड्स है जब तुमने प्रोपोज़ किया था."

"बुद्धू, तुम बड़े नहीं हो रहे दिमाग से. प्यार है तभी तोह मेरे कमरे में मैं नंगी हो जाती हु तुम्हारे सामने. बस चाहती हु के हम ऐसे हे रहे, कोई प्रॉमिस नहीं जैसे shaadi-vaadi या बचे तक. मेरे प्यार का फैंसला मैंने किया लेकिन शादी या फ्यूचर का फैंसला पेरेंट्स करेंगे और इसके बारे में नहीं सोचना मुझे. नाउ टेक थिस इन योर माउथ.", हँसते हुए खुद हे उसने आगे बढ़ते हुए अपना वह प्यारा सा सतांन अर्जुन के होंठो पर लगा दिया. एक हाथ से वह अर्जुन को पकड़े हुए कमर हिला रही थी. फ्रॉक के निचे शायद पंतय उसने पहले हे निकल दी थी.

"घर में शादी है 2-2, कार्ड देने आऊंगा मैं तुम्हारे घर जब अंकल होंगे. वैसे पता है तुम्हे तुम कितनी प्यारी हो अंशु?", मुँह से उभर निकल कर अर्जुन ने दोनों तरफ चुम्बन करते हुए वह गाल थाम लिए. इस बार आकांक्षा भी उतने हे प्यार से उसको देख रही थी. फिर उसके सीने पर सर रखती वह चिपक गयी.

"यही तोह मुझे ाचा लगता है तुम में. तुम दिल से प्यार करते हो, शरीर से नहीं. सॉरी नुदे होने के लिए. होल्ड में फॉर ा व्हिले. और तुम बुलाओगे तोह पापा मन कैसे करेंगे.", अर्जुन ने भी कपडे ठीक करने के बाद उसको बाहों में जकड कर बैठा रहा.

"मैं चाहता हु के तुम हर फंक्शन में आओ. और फ्राइडे को तैयार रहना, मैं कार लेके आऊंगा तुम्हे लेने दोपहर को 1 बजे.", अर्जुन के सीने से लगी वह उसके गले को चूमने लगी.

"तोह अब कार भी ले ली है जनाब ने. वैसे कार में मैं ऐसा वैसा कुछ नहीं करने वाली."

"वह तोह हम मिल कर डीडे करेंगे. बस तैयार रहना और अब कड़ी हो जाओ, सवा 6 हो गए है. अंकल भी आ सकते है.", अर्जुन ने अलग करते हुए उसके गुलाबी होंठो पर प्यारा सा चुम्बन करते कहा तोह खुद को ठीक करती वह बाथरूम में चली गयी. कुछ देर बाद कमरे की चिटकनी खोल कर वह बीएड पर उसके बराबर हे बैठ गयी. दोनों दूध पी रहे थे और साथ हे अर्जुन उसके नोट्स भी देख रहा था.

"नानी जी पूछ रहे है के तुम ऊपर आओगी क्या? मां जी भी आ गए है.", सेजल ने दरवाजे के बहार से हे पुछा तोह जवाब अर्जुन ने दिया.

"हाँ मैं बस निकल हे रहा हु, ये आ रही है.", सेजल इतना सुन्न कर अजीब सा चेहरा बनती निकल गयी और जाने से पहले अर्जुन ने भी आकांक्षा के माथे को चूमा और उसके साथ हे बहार निकल गया. अपने घर पहुंचते पहुंचते उसको 8 बज हे गए थे, अन्नू की माता जी के साथ 4-5 बाजी लूडो की खेलने और सरदार जी के साथ गप्पे लगा कर हे वह वापिस आया था. अंकल आंटी बहोत खुश हुए थे उस से मिल कर और अन्नू से फ़ोन पर तीनो ने बात की थी.

.

.

शंकर जी आज चंद्रो देवी के हे घर रुकने वाले थे, विवाह के काम बहोत बाकी थे और बिजेन्दर के होने से उस से भी बात कर सकते थे. राममेहर की हवेली में विकास सब देख हे रहा था और उसको हे वह गॉड लेने की बात आज सितारा देवी से कौशल्या जी ने की थी. विकास की माँ को भी इस से ऐतराज न हुआ था क्योंकि अपने शहर वह जैसे अकेले हे रह रही थी. वैसे भी सितारा देवी के सर पर बोझ था अपने बेटे द्वारा बहु के कतल का. उमेद सिंह भी अपने घर आज सुकून से माँ और बीवी के साथ था, उसको अपनी बेटी की थोड़ी कमी खाल रही थी क्योंकि विन्नी के आने के बाद वह अभी तक पूरा समय नहीं दे पाया था. लेकिन बिटिया को शंकर के घर खुश देख कर वह भी खुश था. इधर पंडित जी के संसार में चहल पहल ज्यादा हो गयी थी. राजकुमार जी 7 बजे हे ससुराल से वापिस लौट आये थे क्योंकि एक रात और वह बिताना उन्हें भी ठीक नहीं लगा था.

"कहा था तू इतनी देर तक? पता नहीं के घर पे काम हो सकता है.", ये आवाज सुन्न कर अर्जुन के पाँव वही ठिठक गए थे. कौशल्या जी थोड़ा रूखे स्वर में उसका स्वागत करती हुई बोली. वो बहार आँगन में हे कड़ी थी जब अर्जुन अंदर आया तब. अर्जुन कुछ सोचने के बाद उनके गले जा लगा.

"दादी, कोई ऋचा और मधुलता जी आपके इस अर्जुन को आपसे अलग नहीं कर सकती. मैं आपका हु बेशक वह लोग बुरे नहीं और जो भी है मैं jaan-na नहीं चाहता लेकिन आज आप बहोत परेशां रही है. गुस्सा दादा जी पर निकाल रही थी लेकिन काम से काम ये तोह याद रखती की ये आपका घर है, हमारा घर. मैं सबको जानता हु बड़ी माँ और जिसका जो हक़ है वह आप हे दे सकती है, मैं बस उन्हें इज्जत दे सकता हुआ क्योंकि वही तोह आपने सिखाया है.", अर्जुन के इस बयान से जहा कुछ पल तक कौशल्या जी सकते में थी वही रामेश्वर जी ने अपनी धर्मपत्नी के कंधे पर हाथ रखते हुए दूसरे से अर्जुन का सर सेहला दिया.

"थानेदारनी, तुम जिसको नासमझ मानती हो न वह सचमुच वही औलाद है जिसके लिए तुमने शिवजी की उपासना की और अपना रामायण का पाठ एक दिन भी नहीं त्यागा. जब ये सबको समझता है तोह तुम संदेह क्यों करती हो? आज तोह इसने नाम भी ले दिया और कह भी दिया के हक़ सिर्फ तुम हे दे सकती हो. दिल देख रही हो अपने बेटे का? ऋचा चाहे तोह यहाँ जितना दिल करे रह सकती है अर्जुन, बाकी तुम खुद समझदार हो. ये तुम्हारी दादी के लफ्ज़ मैं कह रहा हु.", रामेश्वर जी की बात सुन्न कर कौशल्या जी ने एक बार उन्हें देखा और फिर अर्जुन के चेहरे को पकड़ कर बोली.

"तू कितना कुछ दिल पर लिए फिरता है रे. तेरे बटुए में जो तेरी माँ है न बस वही रहेंगी, इस बगावत में तू अगर किसी का साथ देगा तोह फिर मैं यहाँ नहीं रहूंगी. और मैं जानती हु तू ऐसा नहीं करेगा. तू मेरे दिल को समझता है बीटा ये मैं जानती हु और सबूत खुद अभी दे दिया तुमने. मेरे बचे कभी वो मैट कर गुजरना जिसकी पीड़ा मैं सेह न सकू."

"दादी, जितने आपका अर्जुन आपकी छाँव में है, इतने इस घर में वही होगा जैसा आप कहेंगी. उसके बाद शायद मैं भी धुप बर्दाश्त न कर सकू.", एकाएक उसकी आँखों में 2 पानी की बुँदे उतर आयी.

"मेरे बचे तेरे साथ हमेशा मैं और तेरे दादा जी रहेंगे. मेरा बीटा कभी इन सायो से अलग नहीं होगा. बस माफ़ कर देना व्यवहार के लिए. तेरे सहारे लोग रास्ता ढून्ढ रहे है और तू भोला है, तेरे दादा ने थोड़ा भी मैल नहीं आने दिया न तुझमे."

"सही तोह किया बाउजी ने, मैल आ जाता तोह शायद मैं आपका ाचा बीटा नहीं होता. आपने जो सिखाया है वो हे मेरी सबसे बड़ी शिक्षा है बड़ी माँ. अपना परिवार एक घर है जिसकी नीव कभी नहीं बदल सकते, अस्तित्व नहीं रहता. फिर क्या मुकाम और क्या मंज़िल. गुस्सा हुआ करो लेकिन उतना जितना दादा जी को ाचा लगे, इन्होने तोह आज बप की दवा भी नहीं खायी होगी. देख लेना 4 गोली होंगी पत्ते में.", अर्जुन ने अब प्यार से दादी का गाल चूम कर फिर से अपने दादा को निशाने पर खड़ा कर दिया था.

"करने दे जरा इन्हे ऐसा. फिर कल जा के दकिहये ये घर से बहार. और तू चल के कपडे बदल ले, खाना खा के कमरे में आ जाना अगर फुर्सत हो तोह. और आप जरा अपनी दवा दिखा दो, फिर मैं बताती हु.", पल में हे तीनो अपने सामाजिक रूप में आ गए थे. एक बात तोह साफ़ थी की कौशल्या जी बेवजह हे शंकर से ज्यादा अर्जुन की सगी न थी. वो भी अपने इस बचे पर जान न्योछावर करती थी और अर्जुन उनके दिल को कही ज्यादा समझता था. बस बात सोचने वाली थी तोह अर्जुन का मधुलता और ऋचा का सच jaan-ne वाली, जो कोमल तक ने उसको न बताया था. अर्जुन यही से ऊपर चल दिया था और रामेश्वर जी बड़े स्नेह से अपनी धर्मपत्नी को देख रहे थे.

"तोह क्या जाना मेरी थानेदारनी ने आज?"

"यही की ये मेरा एकलौता है, असली एकलौता. काम बाकी तीनो भी न है लेकिन वह मेरे पेट से न हो के भी दिल को जानता है. चलो अब दवाई दिखाओ अपनी."

"सजा हे दे लो कौशल्या, सच कहु तोह तुम्हारे दर्द से मैंने आज दवा न खाई.", रामेश्वर जी ने इकबालिया जुर्म स्वीकार लिया था.

"तोह क्या हुआ जी, दिन में एक हे तोह खानी है. चलो आप भोजन करो फिर मैं दूध के साथ देती हु आपकी दवा. और मुझे तोह आपको सताने में सचमुच मजा आता है, बस कभी कभी पूर्णिमा को देख के आपके भाई की याद आ जाती है. हम ज्यादा खुश थे जब रघुबीर भाई साहब आपके साथ होते थे. आज अकेले हो आप.", दोनों अंदर चल दिए थे.

"रघुबीर आज भी तोह साथ है कौशल्या. देखा नहीं पूर्णिमा को, वह यहाँ आ कर कितना खुश होती है. भगवन मेरे भाई की आत्मा को सुखी रखे और परिवार को भी.", रामेश्वर जी ने कमरे में आते हे कपडे उठाते हुए स्टोर का रुख किया और कौशल्या जी पिछले आँगन में चली गयी खाने का बोलने.

ये रात भी हमेशा की तरह सुकून से गुजर रही थी. वही अर्जुन का सबके साथ हंसी मजाक, अलका का उसका साथ देना और बदले में Ritu-Tara का उन दोनों को चिड़ाना. आरती भी रुपाली की तरह इस सब में शामिल होने लगी थी. प्रियंका दीदी को तोह जैसे एक हे दिन में यहाँ की कमी महसूस हो गयी थी जो वह अर्जुन की बगल में बैठी बस उसकी हे प्लेट में साथ खाना खा रही थी. कोमल और माधुरी दीदी हमेशा की तरह सबको खाना परोस रही थी, ख़ुशी ख़ुशी. रसोई में ललिता जी का परिचित अंदाज समां बनाये था और रेखा जी सभी बचो को परोस रही थी. परिवार क्या होता है? कोई मंज़िल तोह नहीं, न कोई प्रयास. बस एक संसार जिसमे सब एक सामान और एक दूसरे के साथ हो. विन्नी ने आज यही जाना था, यही देख रही थी और अर्जुन ने जो निवाला उसको खुदसे खिलाया वह जैसे अनमोल हे था.

"ी रियली मिस्ड थिस लाइफ. चची सच कहु तोह आज मुझे लग रहा है के मैं न यहाँ पैदा होनी चाहिए थी."

"तू यही पैदा हुई थी विनीता, तुम्हारी हवेली में नहीं. राजेश्वरी ने इस मेहमान कमरे में तुझे पैदा किया था, डॉक्टर कांटा की मदद से.", ललिता जी मुँह पौंछती बहार चली आयी और विन्नी के सर पर हाथ फिरती हुई फिर रेखा जी को देखने लगी जो आरती को अपने हाथो से खाना खिला रही थी.

"सच ताई जी? ये तोह किसी ने बताया भी नहीं कभी."

"उमेद डर के मारे तेरी माँ को यही ले आया था रात को 9 बजे. क्योंकि राजेश्वरी के एकदम दर्द उठा था और तू समय से 2 हफ्ते पहले हे उस रात हो गयी. ये पिछले कमरे में भी बाद में बने है तेरे पैदा होने के.", ललिता जी ने जैसे सब बताया बाकी सब भी हैरान हो उठे विन्नी के साथ साथ.

"मतलब मैं इस घर की बेटी हुई? ये सब मेरे से वैसे हे छोटे है लेकिन अब तोह मेरा हक़ है इन पर हुकुम चलने का.", विन्नी ने जिस अदा से कहा उतनी अदा से सामने से जवाब आया.

"भूल भी मैट करना दीदी. नानी के घर मैं भी पैदा हुई हु. दहेज़ में आप सब आते हो मेरी माँ के.", तारा ने आँख मारते हुए कहा तोह सभी चेहरों पर हंसी आ गयी.

"यार कोमल, तुम सही थी. Ritu-Alka तोह मेरी समझ से बहार हे है लेकिन ये मिर्ची भी काम नहीं है. अपनी जोड़ी तोह अर्जुन के साथ हे ठीक है."

"इसके साथ तोह सपने में भी मैट बनाना.", अलका ने ये कह तोह दिया लेकिन हर तरफ से आती हंसी ने उसको झेंपने पर मजबूर कर दिया था. विन्नी को तोह कुछ समझ नहीं आया तोह वह बोल हे पड़ी. अर्जुन चुपचाप खाना ख़तम करके वह से गायब हे हो गया था.

"ये क्या मतलब हुआ? अर्जुन मेरे जैसा हे तोह है."

"बिलकुल अपोजिट है दीदी. बाकी आपकी मर्जी.", ऋतू ने वैसे हे कहा था, जिस से किसी को ज्यादा कुछ न कहना पड़े. खाना सबने खा लिया था यहाँ और फिर बात आयी सोने पर.

"मैं तोह बड़ी माँ के साथ सोने वाली हु.", आरती ने सबसे पहले हे घोसित कर दिया.

"मैं और प्रियंका.", माधुरी दीदी ने भी बता दिया.

"विन्नी दीदी, आपको हमारे साथ मैनेज करना है या अकेले सोना है? मैं अलका और तारा एक साथ हे सोने वाली है और कोमल दीदी के साथ रुपाली. आप चाहे तोह हम तीनो में से किसी के साथ सो सकती है और अगर दिल करे तोह कोमल दीदी और रुपाली के साथ.", ऋतू ने सभी बरतन समेटने के साथ हे बता दिया.

"यार मेरी प्रॉब्लम है के मैं अकेले सोती हु. िफ़ यू don't मंद. तोह चाहे एक वाला कमरा मैट मैं मैनेज कर लुंगी लेकिन अकेले सोना है. ी don't फील कम्फर्टेबले, सॉरी. शुरू से आदत है."

"तोह आप इसके ऊपर वाले कमरे में सो जाना. मेरा हे है और एक भी लगा है. सबसे बड़ा कमरा है विथ टेलीविज़न.", तारा ने परेशानी हल करते हुए कहा और विन्नी को भी पता था के कोनसा कमरा है.

"फाइन तो में. वैसे चाचा जी नहीं आ रहे क्या?"

"नहीं, वह कल हे आएंगे, काम है न शादी का.", कोमल दीदी ने जब बताया तोह विन्नी ने हाँ में सर हिलाया. इधर सभी उठ कर बातचीत में मशगूल हो गयी ऊपर वाले कमरों में और अर्जुन अपने दादा दादी के पाँव की मालिश कर रहा था. रसोई में बर्तन प्रियंका दीदी के साथ कोमल दीदी और ललिता जी धो रही थी, गेट पर टाला पहले हे लग चूका था और देखते हे देखते 11 बजे तक पूरा घर हमेशा की तरह शांत हो गया. विन्नी Alka-Ritu के कमरे से अलका के हे रात के कपडे ले कर इधर तारा वाले कमरे में चली आयी. दरवाजा अंदर से बंद करते हुए विन्नी ने एक चालू किया और बेधड़क सी बाथरूम में चली गयी.

लघुशंका के साथ हे तंग ब्रा की परेशानी से निजात पाने के किये इस एकांत में अपनी जीन्स, टीशर्ट और ब्रा उतार कर वह सिर्फ हलके बैंगनी रंग की पंतय में एक तरफ कोड की तरफ बढ़ी और कुछ सोच कर आईने में खुद को देखने लगी. वह हलकी बैंगनी पंतय भी उतार कर विन्नी आईने में खुद को निहार रही थी. फक्क गोरी और कपडे के अंदर वह बहार से बिलकुल अलग, मांसल बड़े चुचो के साथ पतली कमर और baal-vihin. सचमुच विन्नी का जिस्म बिना कपडे को ऐसा था जो यकीन नहीं दिलाता था के कपड़ो के पीछे वह इतनी गदराई, लम्बी और छरहरी होगी. कोड पर बैठती वह अपने में हे खोयी थी. बस यही वह अनहोनी हो गयी जो बहुत कुछ बदलने वाली थी. ये कैसा अंजाम था, कैसा मुकाम?



 
अपडेट 118

मुकाम - Haansil/Pryaas (4)


चंद्रो देवी की हवेली इतने सालो बाद जगमग हुई थी. घर में पौटे का विवाह होने वाला था और पौती भी अपने नए घर जाने वाली थी 3 दिन बाद. रात में जल्दी हे खाने से फारिग हो कर सभी आसपास हे बैठे थे. सुशीला भी एक बड़ी चारपाई पर 2 तकियो पर तक लगाए थी और चंद्रो देवी हमेशा वाली कुर्सी पर. मुन्नी और गुड्डी (मधुलता और मल्टी) एक तरफ बर्तन धोने में लगी थी वही बिजेन्दर भी अपनी माँ के हे करीब कुर्सी पर बैठा था. बिजेन्दर को सुशीला ने बता दिया था शंकर और ऋचा के रिश्ते के बारे में और वह थोड़ा हैरान हुआ लेकिन ज्यादा बात नहीं कही थी. अभी भी ऋचा अपने पिता की चारपाई पर बैठी शंकर जी का सर खा रही थी और वह अब हुक्का गुदगुदाते हुए अपनी लाड़ली के भी जवाब दे रहे थे.

"फेर आज के लेके आयी तू शहर से?", चंद्रो देवी ने हे बीच में बात कही.

"दादी, पूछो के क्या नहीं लेके आयी? आपके लिए salwar-kameej, जूती, शाल. बड़ी ताई जी के लिए तोह सूट भी और साड़ी भी, माँ और छोटी ताई जी के लिए भी वैसे हे कपडे. बबिता दीदी के लिए लेहंगा, साड़ी, 5 सूट और मेकअप का पूरा सामान, कड़े, चूड़ियां, झांझर और नाथ भी. बिजेन्दर भैया के लिए समर coat-pant, kurta-pyjama, जूती, स्पेशल धोती और सेहरा. अनुपमा भाभी का भी शादी का लेहंगा लिया लेकिन वह यहाँ नहीं लेके आये, कल शहर से उनके घर पापा हे ले जायेंगे.", ऋचा के एक हाथ में चॉक्लेट और दूसरे में मेहँदी की कीप थी. चॉक्लेट खाते हुए हे वह बोली जा रही थी. बिजेन्दर भी थोड़ा हैरान हुआ के ऋचा ने सबके साथ उसके लिए भी इतना कुछ लिया है.

"कितने लगवा आयी अपने बाप के? और अपने लिए न लिया कुछ जो इतना सब बाकियो के लिए ले लिया.?"

"पैसे मैंने तोह दिए नहीं जो मुझे पता हो. मैंने भी लिया है थोड़ा बहोत, बाकी माधुरी की शादी से पहले ले लुंगी.", ऋचा ने इतराते हुए शंकर जी को देखा जो धुआं निकलते हुए इस नौटंकी को देख खुश हो रहे थे.

"थोड़ा बहोत? माँ जी इस अकेली के 2 बैग कपड़ो के और एक सिंगार का है. और अभी और लेने है इस महारानी को.", मुन्नी उर्फ़ मधुलता हाथ पौंछती हुई चूल्हे से दूध का बड़ा बर्तन उठा कर एक तरफ रखती हलकी नाराजगी से बोली.

"मुन्नी तू ले आ, कोई माँहै है के? शंकर ने दिलवाया है और ख़ुशी में खुश आया कर, गुस्सा करने के लिए मैं बहोत हु. तू टेंशन न ले बेटी, Madhuri-Sanjiv की शादी में मैं मेरी लाड़ली ने एक लाख का लेहंगा दिलवाऊंगी. और वैसा हे अनुपमा के लिए लेना है. पता चले के हवेली की beti-bahu ब्याह में आयी है. तू बिजेन्दर, अपने कान भिंडवा ले जे दादा के कुण्डल पहन ने है तोह.", चंद्रो देवी की बात पर मधुलता जहा ख़ामोशी से दूध फेंटने लगी वही बिजेन्दर भी बात में शामिल हो गया था.

"दादी, के जरुरत है इतने सब की.? और दादा जी कुण्डल के मैं लायक कोणी. सुदर्शन ठीक रहेगा इस सबके लिए, वह है भी उनके जैसा लम्बा तगड़ा. बाकी शनकर काका हे जा रहे है नानी घर तोह बबिता ने ले आवेंगे, मेरे तोह आज नजर बाँध दी है काकी ने.", बिजेन्दर की बात पर शंकर जी ने हामी भर दी और सुशीला अपने बेटे के सर पे हाथ फेरने लगी.

"रेहान दे, जो लायक होगा फेर वही पहनेगा. शादी में बिल्लो तोह लेके जावेगा या नहीं?", उनका मतलब अपनी पुश्तैनी बन्दूक से था.

"कारतूस निकलवा डीओ दादी और फेर ब्याह के बाद घर में कोई हथियार बहार नहीं रहेगा, तलवार तक नहीं. हथियार नहीं होंगे तोह नहीं चलेंगे.", बिजेन्दर की इस 2 टूक बात को सुन्न कर सुशीला का हाथ हे रुक गया था. बिजेन्दर ने जैसे हुकुम हे सुना दिया था अपनी दादी को जो मुखिया थी परिवार की.

"तुझे पता भी है तू क्या बोल गया? वो बड़ी है और घर की मुखिया भी."

"तोह दादी मेरी आज भी तगड़ी पड़ी है और सबको पता है के वही मुखिया है माँ. बस इस घर में आइंदा कोई हथियार नई आएगा और न ये दिवार पे सजे talwar-bandook दिखाई देंगे.", बिजेन्दर ने नरमी से हे बात कही थी.

"ठीक है तेरी बात. तड़के सबसे पहले ये असला हे ताले में बंद करती हु बीटा. सामने दिखेगा तोह चलेगा, ये बात बहोत पहले किसी ने कही थी और तब तू 4-5 साल का था. लेकिन किसी ने बात मानी नई और फेर पहली गलती अपने तरफ से हे हुई.", कुछ विचार करती चंद्रो देवी अतीत को याद करने लगी.

"होश था मैंने दादी तब भी. मेरे बाप ने घमंड और ताक़त का भद्दा प्रदर्शन किया था और दादा जी की पूरी शह थी उसमे. आग लगाने वाली थी आप की सौतन और देख लो अर्जुन काका और दलशेर काका को षड़यंत्र से मार दिया इन सब ने मिल के. मेरे से ज्यादा तोह आपको पता है लेकिन तब आपने न कोशिश की सब रोकने की. मान लिया वक़्त और था और घर में मर्दो की चलती थी, लेकिन रहते वह सबके सामने थे, आप रघुबीर काका या रामेश्वर काका को इतिल्ला कर सकती थी की कोई समझौता करने नई आ रहे ये लोग. काम से काम ज़िंदा होते सारे आज. एक गलत समय चुप रहने से आज कितने अनाथ, कितनी विधवा है 3 परिवार में. चौथे में भी हो हे गयी होती कौशल्या दादी. के जवाब है इसका आपके पास, मेरी माँ के पास या नानी के पास.? 30 साल का हो गया मैं लेकिन नफरत न किसी और से नहीं अपने आप से है जो मैं गुस्सा अखाड़े और खेत में निकलता हु. अब शादी करके मैं जीना चाहता हु दादी, खेत में काम करना चाहता हु और इस घर में वही दिन वापिस लाना चाहता हु जो 25 साल में कभी न आ पाए. ये सामने जो बैठे है इनका दिल देख लो, आपको आज भी माँ की नजर से देखते है. मेरे बाप ने इनके बाप पर गोली चलाई थी, आपने जिस बेटे के साथ इनके प्यार का हाथ बांध दिया था वही बुआ को उठाने की हिमकर करने वाला मेरा चाचा था. मर्दानगी ये है जो रघुबीर दादा और रामेश्वर दादा ने दिखाई. मेरे dada-nana, baap-chacha तोह इंसान कहलाने लायक नहीं.", बिजेन्दर अपनी रौ में बेहटा आँखों में आंसू लिए बोलता हे चला गया था, एक बार सुशीला ने हाथ पकड़ा लेकिन वह भी झटक कर वह दूर खड़ा हो गया था.

"बिजेन्दर, कोई मतलब नहीं इस सबका. सोमबीर काका ने कभी बचो में भेदभाव नहीं किया था. शीला के बहकावे में एक गलती हो गयी और सबने फिर से रिश्ता बनाया न फिर. ाचे माहौल और वक़्त में ये सब कहना कहा ठीक है? गलती करने वाला तोह मैं भी हु, मैंने हे आधे बचो को अनाथ किया है, bahu-betiyo को विधवा किया. इस तरह तोह मुझे भी सजा मिलनी चाहिए, लेकिन तेरी दादी और नानी ने मुझे दुत्कारा नहीं."

"चाचा दुत्कार कैसे सकते है? मैंने और बेबे (बहिन) ने सबसे पहले आपके साथ हे जिद्द की, उमेद चाचा ने असली फ़र्ज़ निभाए. जब सामने से एक गोली चली हो तोह जवाब में 1 से हजार भी चल सकती है. जानते हो मेरे बाप ने एक औरत के पीछे पूरा कुनबा ख़तम कर दिया. क्या बूढ़े, क्या बचे, क्या औरत. सब चुप थे इस घर में और मेरे chacha-mama इस पर खुश थे. मेरी माँ दुखी थी, मेरी दादी दुखी थी लेकिन एक चुप रही और दूसरी ने सब समय के हवाले छोड़ दिया. बापू के मरे बाद अपना बोरिया बिस्टेर उठा के एक नरक से दूसरे नरक चली गयी. मेरी गुजारिश है हाथ जोड़ के सभी से, रसोई में चाकू छोड़ के घर में और कुछ न हो. सुदर्शन ने तोह तैयारी कर ली थी बाकी बचे खुचे परिवार को भी मिटने की. अब समय है परिवार सँभालने और वक़्त के साथ चलने का. दादी, दिल दुखाया हो तोह शमा चाहता हु और आपसे भी चाचा लेकिन अब आँगन में अगर किसी का खून निकला तोह फेर मैं नहीं जीने वाला.", बिजेन्दर की भीगी आँखें और जुड़े हाथ देख कर चंद्रो देवी कड़ी हो कर उसके पास आ गयी. इतने तगड़े पहलवान ने हर लफ्ज़ सिर्फ प्यार और परिवार का कहा था. चंद्रो देवी ने उसको आगोश में लेते हुए माथा चूम लिया. ऋचा की आँखों में आंसू आ गए थे क्योंकि बहोत कुछ उसको पता भी न था.

"माफ़ कर दे बीटा, मैं नहीं जानती थी के तू इतने सालो से ये दर्द दिल में लिए अकेला घुट्ट रहा है. बाकी सबसे तोह माफ़ी मांग ली थी मैंने सब खोने के बाद लेकिन फेर ज़िंदा रहने के लिए और तेरी चाचियों की रक्षा में हथियार उठाने हे पड़े. तू आ गया है तोह अब हथियार की जरुरत नहीं. शंकर और इसके पिता का क़र्ज़ तोह 7 जनम में न उतार सकती क्योंकि तब खामोश रह कर शायद मैं भी जिम्मेदार थी इस सबकी. तू सही कह रहा है और आइंदा इस घर में कोई झगड़ा न होगा, वादा करती हु.", इस बार चंद्रो देवी ने हाथ जोड़ने चाहे तोह बिजेन्दर ने अपनी दादी के हाथ पकड़ते हुए उन्हें अपने सीने से लगा लिया.

"औरत आप जैसी हो न तोह मुखिया वही होनी चाहिए दादी, मेरे दादा जैसा नहीं. अब बस आप सबको सुकून की ज़िन्दगी देने का फ़र्ज़ मेरा है. बाकी शंकर चाचा के साथ अब मेरे कई रिश्ते बन्न चुके है तोह इनका सम्मान हमेशा सबसे ऊपर रहेगा.", बिजेन्दर ने अपनी दादी को वापिस उनकी कुर्सी पर बैठने के बाद ऋचा की आँखें साफ़ करते हुए छोटी बहिन को स्नेह से थपकी दी.

"हाँ भाई. तेरा चाचा, मां और अब ससुर भी हु. देख ले ताई, अभी 3-3 बेटी बाकी है और मैं ससुर भी बन्न गया.", शंकर जी ने इस माहौल में भी खुद को बड़े धीरज से शांत रखा था. उन्हें ये देख कर भी ाचा लगा था के बिजेन्दर ऋचा से भी प्यार करता था बड़े भाई की तरह.

"सचु कहु तोह शंकर आज न बिजेन्दर ने वैसा हे कहा जैसा रामेश्वर ने कहा था. वो भी परिवार बखूभी संभाले है और मेरा बीटा भी अब यही करेगा. तू ससुर सिर्फ उस परिवार की नजर में रहेगा, यहाँ तू हमेशा मेरा बीटा है. चल भाई मैं सोने चली, गुड्डी तू थोड़ी देर में मेरे मलहम लगा दिए.", चंद्रो देवी ने जाते हुए इन तीनो के सर पे हाथ फेरा और उनके अंदर जाते हे ऋचा ने जो सवाल किया उसको सुन्न कर सब उसको हे देखने लगे लेकिन मधुलता के तोह हाथ से दूध का गिलास हे छिटक गया.

"ये अर्जुन सिंह कौन थे? इनका नाम आज हे सुना है और कही ये आपके अर्जुन के साथ तोह नहीं जुड़े.?", मधुलता की ऐसी प्रतिक्रिया होना ऋचा के सवाल पर जैसे शंकर जी को भी थोड़ा हैरान कर गयी. फिर लगा के कही न कही वह डर गयी है के बेटी ने पुराने इतिहास को हे टटोलने की कोशिश की है जिस से लता चौंक गयी.

"तू इतने सवाल क्यों करती है? जब कुछ न पता हो तोह ऐसा मत पुछा कर."

"भड़कती क्यों हो माँ? नहीं पता हो तभी तोह पूछते है? क्यों बड़ी ताई जी?", ऋचा को जैसे अपने बाप और परिवार के सामने माँ का डर न था.

"ऋचा, अर्जुन चाचा भी परिवार से हे जुड़े थे. उमेद चाचा के छोटे भाई और सही मायने में वह सबसे अलग थे. किसी से कोई ladai-jhagda नहीं करना बेवजह, हमेशा हँसते मुस्कुराते हुए सबके काम करते रहना. मेरे साथ मेरी उम्र के और माँ के साथ उनके जैसे. कई बार तोह वो और शंकर चाचा अखाड़े में भी बाकी सबके साथ शरारते कर देते थे जिस से बाकी सबका उल्लू बन्न जाता था. अर्जुन, चाचा से मैं थोड़ा हे तोह मिला जुला था क्योंकि तब मैं 5 साल का हे है और बबिता 7 की. लेकिन जितना पता है वो यही के उनको सभी प्यार करते थे. मैं नहीं जनता था के शंकर चाचा वाला अर्जुन उनसे जुड़ा है या नहीं लेकिन स्वाभाव दोनों का लगभग एक जैसा है. ये वाला अर्जुन बेस्ट है लेकिन, क्योंकि इसको मैं जानता हु.", बिजेन्दर भी अब ऋचा की बगल में बैठ कर उसको बताते हुए सर सेहला रहा था.

"फिर ऐसे इंसान के साथ कोई गलत कैसे कर सकता है भैया? क्या वह पापा या उमेद चाचा जैसे स्ट्रांग नहीं थी?"

"अज्जू स्ट्रांग नहीं था? बेटी वो तोह दर्द में भी मुस्कुराता रहता था. इन्दर और वो दोनों एक जैसे थे लेकिन अज्जू न गलत को भी मौका देता रहता था सब जानते हुए भी. इतने साल बीतने के बाद भी मैं ये नहीं जान पाया के उसकी मौत के लिए वह खुद जिम्मेदार था या मैं? उसकी ताक़त प्यार और दुनिया हे थी लेकिन वह मरते हुए भी हँसता हुआ जुबान बंद रखे था. और जो बोल के गया वह ये शब्द थे, 'इन्दर तेरी बहोत याद आयी यार, चची माँ को कहना के भोले को मेरी माँ से मिलवाती रहे. आम तोड़ने अब अकेले जाना पड़ेगा..', और वो खामोश हे हो गया था. कोई अर्जुन मेरे अज्जू की जगह नहीं ले सकता बेटी, कोई भी अर्जुन.", शंकर जी खड़े हो कर हवेली का दरवाजा बंद करने चल दिए. थोड़ा दिमाग शांत करना चाहते थे वह अब.

"ये तोह सचमुच बहोत बुरा हुआ भैया. आपने शायद नहीं देखा के पापा को जैसे कुछ हो गया था अभी.", ऋचा ने परेशां होते हुए बिजेन्दर से कहा.

"ऋचा, कभी कभी न प्यार सब हद्द पार चला जाता है. 2 भाइयो के बीच, दोस्तों के बीच और ऐसे किसी भी 2 लोगो में. शंकर चाचा और अर्जुन चाचा में भी कुछ ऐसा हे था. हाँ उमेद और नरिंदर चाचा भी वैसे हे थे. मतलब 4 लोग. यहाँ तोह ये लोग मेरी माँ और दादी जी की वजह से आते रहते थे. रामेश्वर जी की बहोत ाची दोस्ती थी हमारे दादाजी और नाना के साथ. कुछ गलतियों और किसी के लालच का शिकार सभी हो गए. तुम अब इस बात को यही ख़तम कर देना, घर में रोटी नहीं मिलेगी नहीं तोह. चलो अंदर जाओ अब, सवेरे बहोत काम है और माँ को मैं ले चलता हु.", बिजेन्दर ने ऋचा को समझाया और फिर सुशीला को सहारा दे कर व्हीलचेयर से उनके कमरे की तरफ ले गया. मधुलता भी यहाँ से जा चुकी थी और गुड्डी ने शंकर जी की चारपाई के पास दूध का गिलास और एक लौटा पानी रख दिया. उनके आने से पहले तकिया, दरी और चादर चारपाई पर सही से कर दिए गए थे.

.

.

बाथरूम के अंदर भरपूर रौशनी के बीच दोनों की नजरे बस एक शन्न के लिए टकराई थी और अर्जुन तुरंत वह से ओझल हो गया. हतप्रभ सी कोड पर निर्वस्त्र बैठी विन्नी बस यही सोचती रह गयी की एक सेकंड में हे ये क्या हो गया. बाथरूम का दरवाजा अब ढला हुआ था और फर्श पर उसकी बैंगनी पंतय वैसे हे पड़ी थी. बेफिकरी में ये कैसी भूल हो गयी थी जिसमे वह दरवाजा तक बंद करना भूल गयी थी. और अर्जुन, वह क्या सोच रहा होगा उसके बारे में? इतने सालो बाद पहली बार मिले और वह उसके सामने निर्वस्त्र बैठी थी. हिम्मत करती वह अपने कपडे पहन कर बहार आयी तोह खूबसूरत चेहरा अब हताश निराश सा था.

"अर्जुन.", कुछ पल तोह वह बिस्टेर पर करवट बदलती रही लेकिन दिल अशांत था और ये बात जितनी जल्दी ख़तम हो उतना हे बेहतर लगा विन्नी को. धीमी आवाज में उसने इस दरवाजे पर दस्तक देते हुए अर्जुन को पुकारा तोह जल्द हे दरवाजा खुल गया. Nikkar-tshirt में अर्जुन दूसरी तरफ खड़ा था, गीले बाल जैसे वह नाहा कर आया हो.

"जी दीदी."

"मैं अंदर आ सकती हु?", विन्नी ने नजरे झुकाते हुए इजाजत चाही.

"हाँ, आप आ जाइये. मैं वैसे भी थोड़ा देरी से सोता हु.", विन्नी अर्जुन के एक तरफ होते हे इस कमरे में चली आयी. चाल सेहमी सी थी जैसे दिल पर कोई भारी बोझ हो. कमरे के अंदर स्टडी टेबल पर नोट्स खुले थे और किताबे भी. कमरा व्यवस्थित था और एक टोलिया कुर्सी पर टेंगा था.

"सॉरी.", विन्नी सर झुकाये बिस्टेर के करीब हे कड़ी हुई बोली.

"अकेले आप की तोह गलती नहीं है. हो जाता है ऐसा है. यहाँ 3 कमरों पर एक हे बाथरूम है और मुझे लगा के आप बाकी सबके साथ होंगी इसलिए मैं नहाने उधर चला गया. ये भी नहीं सोचा के लाइट जल रही है, तोह मुझे भी माफ़ कर दीजिये.", अर्जुन ने अपनी अलमारी खोल कर पुराने कपडे एक तरफ रखते हुए एक साफ़ चादर निकल कर बिस्टेर पर रखते हुए कहा.

"तुम सोच रहे होंगे की कैसी लड़की हु मैं, लेकिन सचमुच अर्जुन मैं नहीं जानती थी की इस कमरे में तुम भी हो सकते हो. ये दरवाजा बंद था और साथ वाले में कोई नहीं. बस थोड़ा बेफिक्र हो गयी थी. कुछ ऐसा वैसा मत सोचना प्लीज.", विन्नी की हालत देख अर्जुन ने भी हालात समझते हुए बात को भूलना हे सही समझा.

"इतना कैसे सोच लिया आपने? आपको पता भी है के मैं कितनी देर वह था? दरवाजा खुला, आप पर नजर गयी और मैं बहार. और ऐसा हो जाता है दीदी, it's नॉट ा बिग डील. मैंने कुछ नहीं देखा और मैं तोह आपसे सॉरी बोल रहा हु. बात यही ख़तम करते है और दिमाग में ये बात दाल लीजिये के वैसा कुछ हुआ हे नहीं. खुद हे इतना कुछ सोचेंगी तोह नींद भी नहीं आएगी.", अर्जुन ने उन्हें बिस्टेर के किनारे बैठते हुए मुस्कुरा कर कहा तोह हलकी घबराहट से विन्नी ने अर्जुन की तरफ देखा जो इस तरफ से निकल कर अब कुर्सी विन्नी की तरफ घूमते हुए बैठ गया था. ये देख कर विन्नी कुछ शांत हुई.

"तुम सचमुच मेरे बारे में गलत नहीं सोच रहे न? तुम समझ नहीं रहे के मैं कितनी परेशां हो रही हु अर्जुन. मैं इंडिया से बहार रही हु लेकिन मैं पर्सनली वैसी हे हु जैसे यहाँ पर सब पारिवारिक लड़कियां होती है."

"शांत हो जाइये भगवन के लिए. और अगर आप इतना हे परेशां है तोह मैं बोल देता हु के मेरे लिए ये सब मायने नहीं रखता के कोई कैसा है? किसने क्या पहना है या कुछ भी नहीं पहना? आप बहोत ाची है और अपने एकांत में आप अकेली जैसे मर्जी रह सकती है. बस आइंदा अपनी तरफ से मेरे दरवाजे को भी बंद कर दिए करना. फिर बाथरूम खोल कर नाहा सकती है. क्या विन्नी दीदी आप सचमुच अपनी इमेज से अलग बेहवे कर रही है. मैं तोह सोच रहा था के आज मेरे गाल लाल होने वाले है इधर आप बिलकुल विपरीत व्यवहार करती सॉरी और जाने क्या क्या बोल रही है. अब इजाजत हो तोह मैं मेरे बिस्टेर पर बैठ जाऊ, मुझसे भी डर रही थी अभी आप.", अर्जुन ने विन्नी का मैं हे पढ़ लिया था.

"मैं darti-varti नहीं. और आइंदा ऐसा कुछ किया न तोह सचमुच गाल लाल कर दूंगी. मैं इधर हे सोने वाली हु, तू मेरी तरफ नहीं आएगा.", जाने क्या सोच कर विन्नी ने चादर उठाई और बिस्टेर के इस तरफ लेट गयी. अर्जुन देखता रहा.

"मैं फिर उधर सो जाता हु.", अर्जुन कुर्सी से उठ कर तारा के कमरे में जाने लगा तोह फिर से विन्नी की आवाज गूँज गयी.

"चुपचाप बॉर्डर के इस तरफ लेट जा. मुझे नींद नहीं आ रही तोह बात कर मेरे साथ. मैं अकेले नहीं सोने वाली.", कहा तोह थोड़ी देर पहले विन्नी ने उधर कहा था के वह अकेले हे सोना पसंद करती है और इधर वह अकेले सोना नहीं चाहती थी. अर्जुन भी जैसे तैसे बिस्टेर के दूसरी तरफ लेट गया, दोनों के बीच एक तकिया रखते हुए.

"बॉर्डर से इस तरफ मेरी जगह है दीदी, उस तरफ आपकी.", अर्जुन की इस बात पर विन्नी के चेहरे पर इतनी देर बाद हंसी आयी थी.

"ये तू ध्यान रखना, मेरे हाथ पांव चलते है इसलिए मैं अकेली सोती हु. चाहे तोह एक और पिलो बीच में लगा ले.", उनकी बात को पालन तुरंत करते हुए अर्जुन ने 2 तकियो से कतार सी बना दी लेकिन एक पल के लिए विन्नी के चेहरे पर थोड़ा अजीब सा भाव आया और अर्जुन तुबेलिघ्त बुझा कर जीरो का बल्ब चालू करते हुए हमेशा की तरह तकिया हाथ के निचे रखे औंधे मुँह लेट गया.

"तोह अब अकेले सोने पर तुम हाथ के नीचे तकिया रखने लगे हो?"

"हाँ, हॉस्टल में आदत पड़ गयी. पहले दीदी साथ होती थी और अब ये है.", अर्जुन ने जैसे तकिये को एक तरफ से अपने साथ लगाया था विन्नी के होंटो पर मुस्कान आ गयी ये देख कर.

"इधर ऊपर कौन कौन रहता है?"

"वो टीवी वाला कमरा पहले हॉल था फिर तारा ने ले लिया. अब जिसका दिल करे वह सो जाता है. इधर वाला संजीव भैया का है और जब वह यहाँ होते है मैं उनके साथ सोता हु, लेकिन ये वाला सिर्फ मेरा है. पहले इधर सिंगल दीवान था अब ये नया बीएड लगा है 2 लोगो वाला. सभी दीदी ने तोह पिछली तरफ अपना इलाका बनाया हुआ है. उधर 3 कमरे, एक्सरसाइज रूम और बाथरूम है. बाकी स्टोर और एक कमरा बंद है."

"तोह तुम हे हो जो इस कमरे के साथ कही भी सो जाते हो?", विन्नी की बात को समझते हुए अर्जुन भी हंसने लगा.

"हाँ, छत्त पर, माँ के कमरे में, दादा जी की तरफ या जहा बिस्टेर दिखे वही लेट जाता हु. छोटे होने का यही तोह फायदा है."

"इतने भी छोटे नहीं रहे तुम अब. सुबह देखा तोह मैं हैरान रह गयी थी के ये 'मुन्ना' इतना बड़ा है लेकिन सभी इसको बचे की तरह प्यार कर रहे है. कहा तोह मरियल से हर वक़्त रोने धोने वाले थे बचपन में और अब पहलवान से lambe-tagde.", विन्नी के शब्द उसके दिल से अलग थे लेकिन अर्जुन गद्दे में मुँह एक तरफ दबाये उन्हें देखता मुस्कुरा रहा था.

"थी तोह आप भी motti-hitler जैसी. किसी से सीधे मुँह बात भी नहीं करती थी सिवाय ऋतू दीदी और माधुरी दीदी के. और अब देखो.", अर्जुन ने आगे कुछ नहीं कहा.

"अब क्या देखे? और मैं मोटी नहीं थी, हेअल्थी थी और अभी भी हु. बस हाइट बढ़ गयी है और वर्कआउट करती हु. तुमने बताया नहीं के अब क्या बदला है?", विन्नी कुछ और हे सुन्न न चाहती थी जैसे.

"अब आप सभी के साथ din-bhar हंसती बोलती रही. ाचा बदलाव किया है आपने ये. हाँ अभी भी ये पसंद नहीं के कोई आपको najar-andaaj करे. हाहाहा."

"करके देखो फिर बताती हु मैं. वैसे बस यही बदला है क्या?", कहते हुए विन्नी ने भी सही से करवट लेते हुए एक तकिया खुद के साथ लगा लिया था. अब दोनों के सर के निचे कोई तकिया न था.

"बदलाव बुरे नहीं होते जब वह उम्र के साथ आये. आप ाची हो और सबको आपका गुस्सा भी पसंद है क्योंकि वह भी आपका प्यारा नाटक हे होता है. चलिए अब सोया जाये, फिर मुझे जल्दी उठना है. गूडनिघत.", अर्जुन ने तोह बातचीत पर purn-viraam हे लगा दिया. आँखें बंद करके वह जल्द हे नींद में चला गया और विन्नी टकटकी लगाए उसके चेहरे को देखने लगी जहा घुंगराले बाल आँखों से निचे तक आये हुए थे.

'तुमको najar-andaaj नहीं किया था पागल. बस खुद को बचा रही थी उस लड़के से जो एक नजर में हे दिल में उतर गया था. कहा तोह दुनिया घूमने पर भी कभी ऐसा कोई न मिला जो विनीता के खयालो सा हो और देखो जो मिला भी तोह वही जहा मेरा आशियाना है. दुविधा में दाल दिया तुमने अर्जुन इस लड़की को. तुम्हारी टिन्नी मिन्नी विन्नी को.', कोई आधे घंटे बाद बड़ी एहतियात से वह बीचे के दोनों तकिये एक तरफ करती हुई अर्जुन के करीब आ गयी. धड़कन बढ़ी हुई और जैसे इस पल में विन्नी अपने हे वश में न थी. अर्जुन के हाथ के निचे वाला तकिया भी एक तरफ करती अब वह बिलकुल उसके बराबर लेती थी. बस यही वह अदृश्य दिवार थी के इस से आगे वो न जा सकीय.

'सब गलत हो रहा है. मैं बड़ी हो कर ये क्या कर रही हु? माफ़ करना.'

"आराम से सो जाओ अब, बहोत duvidha-maafi हो गयी. चलो अब आँखें बंद करो अपनी.", अर्जुन ने नींद में हे उनकी कमर पर हाथ रखते हुए 60-65 किलो की विन्नी को कागज की तरह अपने साथ लगा लिया. हैरान होती वह सब दोहरा रही थी जो भी उसने मैं में कहा था लेकिन अर्जुन के साथ खुद को चिपका देख शर्माती हुई सीने में मुँह छिपाये आँखें बंद करके शांत हो गयी.

घडी में 4:30 के साथ हे आज 1 तारीख हो गयी थी मई महीने की और अर्जुन ने बेसुध सी उसके साथ लिपटी विन्नी दीदी को देखा तोह कोई हैरत न हुई. बाथरूम से फारिग होने के बाद कपडे बदल कर सबसे पहले उसने विन्नी दीदी को तारा के बिस्टेर पर सावधानी से लिटाया. बेशक इस पल में एक बार विन्नी ने उसको बाहों में कास लिया था जैसे कोई ख़ास सपना देख रही हो. फिर आराम से सोई रही और अर्जुन उनके जिस्म पर चादर ुधा कर निचे चला आया. बहुत दिनों बाद अपनी साइकिल को घर से निकलता वह उस पुराने रस्ते पर हो लिया जहा से कल उसके लिए कामवाली ने संदेसा दिया था.

मौसम बदलने लगा था जो अमूमन मई महीने में होता है. 5 बजने में 5-6 मिनट थे और ताज़ी हवा में पैदल मरता अर्जुन प्रकृति को महसूस करता नए सेक्टर से आगे निकल आया. हमेशा की तरह साधू सिंह उसको गाँव की सड़क से इधर मुड़ते हे मिल गए.

"अरे बीटा इतने समय बाद झलक दिखी तुम्हारी?"

"Ram-ram अंकल जी. थोड़ा व्यस्त था इसलिए nehar-jungle से दूर रहा. आज थोड़ा समय मिला तोह इस तरफ आ गया. थोड़ी हे देर में वापिस भी जाना पड़ेगा, काम हैं घर में."

"हाँ दूध भी 5 किलो करवा दिया है तुम्हारी दादी जी ने. बता रहे थे की मिलने वाले आने लगे है और फिर 2-2 लोगो का विवाह भी है घर में. ाचा लगा तुमसे मिल कर, समय लगे तोह आते जाते रहा करो बीटा. आज तोह मुझे भी थोड़ा जल्दी है, काम ज्यादा हो गया है 4-5 घर बढ़ने से. आजकल तोह शहर में हे 7 बजने लगे है, कभी दिन में खेत आना आराम से baithenge.",Saadhu सिंह की साइकिल पर 2 बड़े कनस्तर के साथ एक 10 किलो का छोटा कनस्तर बता रहा था उनकी बात.

"जी अंकल जी, जरूर आऊंगा. जल्द हे मिलते है. अपना ध्यान रखियेगा.", उनसे विदा लेता अर्जुन हाथ हिला कर गाँव वाली सड़क पर बढ़ चला और साधू सिंह अपने काम पर. गाँव में माहौल शांत और हलकी ठंडक वाला था, नहर की दिशा से आती हवा की वजह से शायद. सविता के घर के बहार भी ये फौजी बुलेट मोटरसाइकिल कड़ी थी, जंजीर से बंधी. थोड़ी आगे आते हे बहार कच्चे आँगन में पानी छिड़कती बिमला देवी से भेंट हो गयी. बाल्टी एक तरफ रखती वह बस अर्जुन को हे देख रही थी जो एक तरफ साइकिल कड़ी करते हुए उनके सामने आ गया.

"नमस्ते आंटी जी. वो आपने सन्देश भिजवाया था कल? थोड़ा व्यस्त चल रहा था इसलिए आना न हो पाया. कहिये कैसे याद किया आपने?", अर्जुन को ऐसे साधारण बात करते देख एक पल तोह बिमला देवी भी थोड़ा हैरान हुई फिर जगह और समय देख अर्जुन को अपने साथ आने को कहा.

"आओ अंदर बात करते हैं, यहाँ खड़े हो कर ठीक से बात नहीं होगी.", बिमला देवी आँगन के आखिर में बानी पानी की टंकी पर हाथ मुँह धोने के बाद तोलिये से सूखने लगी और बीच बीच में वह करीब खड़े अर्जुन को देख रही थी.

"उस दिन जो हुआ शायद तुम्हे ठीक नहीं लगी बीटा. अब मैं ठहरी gaanv-dehat की तोह bol-baani वैसी हे है थोड़ी. चाय लेके औ दूध?", घर के पिछले हिस्से में बने बगीचे में चारपाई बिछाते हुए उन्होंने बात शुरू की, साथ हे khaane-peene का भी पूछ लिया.

"नहीं आंटी अभी कुछ भी नहीं. और मैं नाराज नहीं हु आपसे, थोड़ा अजीब लगा था उस वक़्त लेकिन बाद में मैं खुद घर के काम, पढाई और स्टेडियम में लग गया. उसके बाद दोपहर में समय लगा भी तोह ये सोच कर नहीं मिलने आया के आप खुद हे कही परिवार में व्यस्त न हो.", अर्जुन अपना चेहरा रुमाल से साफ़ करते हुए बिमला देवी से बात कर रहा था.

"देख बीटा, मैंने न तुम्हारे पिता के लिए वह नहीं कहा था. डॉक्टर साहब का तोह dur-dur तक संपर्क नहीं है. लेकिन कहावत है के जोश बढ़ाना हो तोह baap-bete की गाली मर्द पर असर करती है. मेरे मुँह से भी निकल गया और फिर जब एहसास हुआ तोह तुम जा चुके थे.", बिमला देवी ने एक बार अंदर नजर मारी तोह बचो के कमरे बंद हे थे. फिर खाट के एक तरफ बैठती वह अर्जुन से वार्तालाप आगे बढ़ने लगी.

"हाँ वह समय था के मुझे थोड़ा अलग लगा था लेकिन सच कहु तोह मुझे वैसे भी gaali-galoch की आदत नहीं है. तभी थोड़ा ज्यादा हे बेकाबू हो कर आपके साथ कर बैठा. फिर हिम्मत नहीं हुई की आपसे कह सकू के दोनों की गलती है इसमें. लेकिन इसका ये मतलब नहीं के मैं नाराज हु."

"बीटा, मैं तोह जैसे तैसे काट लुंगी क्योंकि मेरे लिए अकेले रहना नयी बात नहीं है लेकिन काजल. वो लड़की है मेरी और जवान लड़की एक बार शारीरिक सम्बन्ध बना ले तोह फिर वह ज्यादा समय खुद को रोक नहीं सकती. तुम्हारे दूर जाने से मेरी बेटी किसी गलत इंसान से रिश्ता न जोड़ ले, यही मेरी चिंता है. तुम ख्याल रखने वाले लड़के हो और मेरी बेटी कोई कुंवारी तोह न थी तुमसे मिलने तक. वो गलत चले इस से पहले उसकी शादी तक बस उस से समय समय पर मिलते रहो, यही मैं चाहती हु. किसी की नजरो में अगर मैं गलत हु तोह मेरी बेटी के लिए ये भी सही.", बिमला देवी के इस कथन पर अर्जुन ने उनका हाथ अपने हाथ में ले लिया.

"आप गलत नहीं है कही से भी. ऐसी हिम्मत और निर्णय लेना सबके वश में नहीं होता. आप अपनी बेटी से प्यार करती है उसकी परवाह के साथ साथ. मैं काजल से मिलूंगा और कोशिश करूँगा के वह भी समझे थोड़ा क्योंकि मैं यहाँ हर रोज नहीं आ सकता. वह मान जाएगी लेकिन हमारे बीच भी तोह कोई वादा हुआ tha?",Arjun के हां कहने से जहा बिमला देवी को सुकून मिला था अब वाडे की बात सुन्न कर वह थोड़ा शर्मा गयी थी. हमेशा बिंदास रहने वाली बेबाक से बिमला युवती सी शर्माती हुई ाची लग रही थी.

"वादा निभाना तोह मुश्किल लगता है. आगे जो हाल हुआ उसके बाद जहा तुम चाहते हो वह जान निकल जाएगी. समय आने पर देखते है फ़िलहाल अगर तुम चाहो तोह काजल को जगा सकते हो. मिन्दर (महेन्दर) कल अपने मां के गाँव चला गया था और कल हे वापिस आएगा. मैं काजल की चची के घर जा रही हु.", बिमला देवी ने जाते हुए अर्जुन का गुल चूम कर बता दिया था के वह भी तैयार है लेकिन पहले बेटी. और अर्जुन ने भी उनके मांसल मॉटे चुके को मसलते हुए इरादा बता दिया. वह अब चिंतित होने की जगह मुस्कुराती हुई एक आँगन से निकलती बहार चली गयी थी, दरवाजा लगाती हुई. अर्जुन भी साढ़े कदमो से काजल के कमरे की तरफ हो लिया. दरवाजा वैसे हे बंद था जिसको खोलते हे कूलर की ठंडी हवा के सामने बिस्टेर पर सोई काजल दिखी.

गोर फूले हुए गाल, हवा से हिलती हुई जुल्फे, उभरे हुए होंठ और हरे रंग की चादर में छिपा गरदन से नीचे का हिस्सा. काजल को एहसास भी न हुआ के कोई उसकी चादर के अंदर आ गया है. कपड़ो के नाम पर जिस्म पर तान्नियो वाली पेट तक की टीशर्ट और निचे सिर्फ पंतय थी. होंठ सूखे थे लेकिन अर्जुन के मुँह में आते हे गीले और नरम हो गए. अपने बड़े पंजे में वह मुलायम बड़ा सतांन पकड़ कर हलके हलके मसलते हुए अर्जुन होंठो को पी रहा था और काजल की काली आँखें खुल गयी. जहा पहले कुछ डर था अब वह हैरत. लेकिन बराबर जोश दिखती हुई वह अपनी गोरी मांसल टांग उसके ऊपर रखती सीधा अर्जुन के पाजामे में हाथ दाल कर लुंड सहलाने लगी.

"तुम्हे मालूम था के ये मैं हु.?"

"और कोई करके तोह देखे ऐसी हिम्मत. हाथ अलग कर दूंगी जो कपडे के ऊपर से भी मेरे चुके को छू जाये. उम्मीद तोह थी तुम्हरे आने की लेकिन इतनी जल्दी?"

"तुम्हारी माँ ने कहा था के उनकी लाड़ली बिगड़ रही है, सुधर दू थोड़ा.", अर्जुन ने भी कच्ची के एक सिरे को खिंचा तोह खुद हे काजल ने वह अलग कर दी घुटने मोड़ते हुए.

"पता है मुझे के तुमने उनकी भी चुदाई कर दी है. कल चची के साथ बतला रही थी वो. लेकिन उनकी चिंता गलत है, इस लुंड को लेने के बाद मुझे और कोई न पसंद आने वाला. वापिस तोह तुम्हे आना हे था, आज नहीं तोह हफ्ते बाद.", काजल अपने ऊपर हिस्से को भी बेपर्दा करती हुई अर्जुन की तरफ अपने गोर उभार लिए चुत्तड़ करती फुर्ती से पजामा सरका कर लोहे से सख्त लुंड को होंठो में लेके चूसने लगी. एक हाथ बड़ी सख्ती से लुंड को हिला रहा था और इधर अर्जुन ने भी उन भूरी फांको के बीच ऊँगली घुसाई तोह एक पल के लिए चूसै रोकती वह हंस के अर्जुन की तरफ देखने लगी. छूट में जल्द हे 2 उंगलिया मजे से आगे पीछे हो रही थी और लुंड भी अपनी औकात पर आता काजल की लार में भीगा चमक रहा था.

"तुम जरा भी समय खराब नहीं करती न? सोचा था के कभी ऐसी गुड मॉर्निंग भी होगी?", अर्जुन की तरफ काजल पलट कर ऊपर आयी और टाँगे फैलाती लुंड को छूट पर रखती निचे होने लगी. दोनों मॉटे गोल मटोल से चुके अर्जुन हथेलियों में पकडे tha.Bhoore निप्पल आमंत्रित कर रहे थे मुँह में भरे के लिए..

"टाइम मिलता हे कितना? वो भी गवा दू तोह छूट रखने का क्या फायदा. आअह्ह्ह.. तेरा तोह और भी मोटा होता जा रहा है यार. मा.. सशह्ह्हह्ह..", आधा हे अंदर लिया था के दर्द से वही रुक गयी काजल.

"जल्दी तुम कर रही हो. चलो निचे आओ.", अर्जुन ने पलट कर काजल को ऐसे हे आधा लुंड फंसाये अपने निचे ले लिया. छूट का कसाव गवाह था के इस लड़की ने कही और मुँह नहीं मारा था. बस हलकी झांटे ऊपरी हिस्से पर आ गयी थी. थोड़ा लुंड पीछे खींच कर अर्जुन चुचो का मर्दन करने लगा.

"बाद दे रे अब अंदर. ज्यादा टाइम न है अपने paas.aahhh.", आधे हे लुंड से चुदाई करते हुए अर्जुन उन मोटी फैंको के बीच की गली ढीली करने लगा. छूट ने जल्दी हे गीला हो कर बता दिया था के काजल हमेशा की तरह पूरी गरम है.

"लो अब सम्भालो.", अर्जुन ने कास के चुचो को दबाते हुए ये धक्का लगाया और सचमुच हलकी चीख निकल गयी थी काजल की जिसको अपने हाथ से हे उसने रोक लिया था.

"आह्हः मेरी माँ की भी फाड़ दी और बेटी की सत्यानाश करके छोड़ेगा.. आह्हः ... माँ.. यार तेरा पेट के अंदर तक लगता है. रुक थोड़ा एक मिनट.. आह्हः..", अर्जुन भी रुक कर एक भूरे निप्पल को चूसने लगा. जैसे हे काजल के पाँव ऊपर हुए तोह वो समझ गया के अब जड़ तक धक्के लेने को वह तैयार है.

"सचमुच तुमने ऊँगली भी नहीं की.. कितनी कासी हुई हो तुम.. उम्म्म..", अर्जुन का मोटा लुंड छूट को ाचे से फैलते हुए अंतिम हिस्से तक जा रहा था. गदराये बदन की काजल तोह खुद हिम्मत वाली थी जो हमेशा अर्जुन का पूरा साथ देती थी. आज भी वह उसको दूध चुस्वाति हुई हर धक्के पर अपनी कमर उसके साथ हिला रही थी. लुंड का सूपड़ा बच्चेदानी पर लगता तोह सिसकारी तेज हो जाती जो कूलर की वजह से ज्यादा प्रभाव नहीं दाल रही थी.

"आह्हः.. तेरा हे तोह काबिल है रे.. आह्हः.. पता है छाती पे 2 नंबर बड़ा हो गया मेरी और कच्ची भी पहले से टाइट है. देखियो ब्याह तक औरत हे न दिखने लागु मैं. और तेज कर रे आठ... निप्पल न बटन से थे मेरे और अब dekh...teri चुसाई से कितने मॉटे और बहार निकल आये है..", छूट से निकलता पानी चादर पर लग रहा था और इधर ये दोनों पूरे जोश में dhakkam-pel करते एक दूसरे का पूरा शरीर मसल रहे थे.

"तुम पहले से हे मजबूत हो और हेअल्थी भी. तभी तोह गांड में भी करवा लिया था उस दिन. और बड़े होने के बाद भी ये सख्त है. आठ..", अर्जुन ने चूस चूस कर सचमुच दोनों निप्पल अकड़ा दिए थे किसी बड़े मटर के दाने से.

"आज न पीछे करियो, घोड़ बना ले चाहे. पीछे तोह पानी में हे करवाउंगी. वैसे गलत टाइम शुरू हो गए हम dono.aahhhh.", लुंड पुक्क से छूट से निकला तोह हांफती हुई काजल ने छूट को पास राखी अपनी ब्रा से साफ़ किया. ढेर सारा लिसलिसा गधा तरल छूट से निकल कर बता रहा था के कितना पानी रोके हुए थी वह. फिर कूलर की दिशा में पिछले हिस्सा करती वह घुटनो पर आयी तोह अर्जुन भी अपना पजामा पूरा निकल कर उन गोर बड़े कूल्हों के निचे मुँह खोले इन्तजार करती छूट में लुंड उतरता ऊपर चढ़ गया काजल के.

"आह्हः.. तू है रे मर्द तोह अर्जुन.. आठ.. सच कहु तोह सविता भी करना चाहती है तेरे साथ जल्द हे. इतने दिन नहीं आया तोह नाराज hogi...aahhh माँ.. सविता का नाम लेते हे फाड़ क्यों रहा है..", अर्जुन भी घुटनो के भर पीछे खड़ा सटासट चुदाई कर रहा था और कूलर के साथ वाले 6 इंच के झरोखे से बहार कड़ी सविता इन दोनों की ये तगड़ी चुदाई देखि हुई घाघरे के ऊपर से हे अपनी जवानी मसल रही थी. कुछ दिनों में काजल ने उसको भी जिस्म रगड़ना सीखा दिया था, 2-3 बार तोह दोनों ने अकेले में एक दूसरे के साथ निर्वस्त्र बदन रगड़े थे. वह बड़े ध्यान से देख रही थी उस गुलाबी छोटी से छूट के अंदर बहार होता बांस सा मोटा अर्जुन का गीला लुंड.

"आठ.. कस के इसलिए कर रहा हु के जल्दी फारिग होना है. और सविता झेल नहीं पाएगी ये. आठ.. वह पतली है और पहली बार में बहोत दर्द भी होगा उसको. उस प्यारी लड़की के साथ नहीं कर सकता मैं.. आठ.. तुम फिर से झाड़ गयी na..aahh..", काजल सिसकती हुई घोड़ी बानी रही और अर्जुन धक्के लगता रहा दोनों चुचो को ढीला करते हुए.

"उम्म्म.. पूछ हे न रे.. आठ.. लगता है आज खाली हो के रहूंगी. अब मूट निकलने वाला है अर्जुन एक मिनट रुक जा प्लीज.. अभी आती हु मैं.", वह तुरंत बहार दौड़ गयी ऊपर चादर लपटे और अर्जुन अपना गीला खड़ा लुंड लिए दिवार से तक लगाए सांस सँभालने लगा. लेकिन 2 मिनट बाद कमरे के अंदर काजल के साथ साथ सविता भी आ गयी थी, जिसका हाथ काजल ने पकड़ा हुआ था.

"मैडम बहार कड़ी फिल्म देख रही थी. इतना हे दिल कर रहा था तोह मेरे पीछे से आ जाती इसके पास. देख कैसे अकेला है.", अर्जुन शांत रहा और सविता खुद हे उसके लुंड को एकटक देखती सम्मोहित से पास चली आयी.

"मैं कोई पतली नहीं हु. काजल ले सकती है तोह मैं भी ले लुंगी. लेकिन यहाँ नहीं, जहा तुम दोनों ने किया था वही.", अर्जुन और सविता chooma-chaati पहले भी कर चुके थे और अब सविता सामने से हे उसके होंठो को चूमने लगी तोह अर्जुन ने भी एक हाथ दाल कर उसको करीब कर लिया. काजल अर्जुन की गॉड में आती पूरा लुंड छूट में निगल गयी.

"करो तुम ऊपर ऊपर se..aahh.. मैं मेरा काम करती हु. आह्हः.. वैसे चूचिया तोह इसकी भी काम न है, तुमने तोह पकड़ी हुई है अर्जुन.", काजल की बात सुनकर अर्जुन ने होंठो को चूमते हुए सविता की चोली पर हाथ रखा तोह सविता ने हटा दिया. आँखे मूंदे वह अर्जुन को चूमने के साथ हे चोली के हक्क खोल कर अपने माध्यम से उभारो को अनावृत करके खुद अर्जुन को पकड़ने लगी.

"आठ.. ऊपर से तोह मैंने इन्हे रोका हे कब है.. लेकिन सच कहु तोह डर तोह लगेगा हे. देख तेरी मुनिया कितनी बड़ी कर दी है इनके लौड़े ने. आह्हः.. आराम से मुँह में लो अर्जुन.. भाग नहीं रही मैं. खुद आयी हु चल कर अंदर. काकी तोह बहार चली गयी थी लेकिन साइकिल कड़ी थी मतलब तुम दोनों हे हुए न अंदर.. उम्म्म.. ये तोह तेरे साथ से भी ज्यादा मजेदार है काजल.", सिसकती हुई सविता चुचो की चूसै से मदहोश हो रही थी और लुंड पर हिलती काजल ने घुटनो के बल बिस्टेर पर कड़ी सविता की छूट मसल दी.

"नंगी हो जा न यार. आठ..", सविता ने कोई जवाब न दिया और आँखे बंद करके लम्बी साँसे लेती वह फिर थोड़ी दूर हो गयी. हाथ छूट के ऊपर था और चुके हिल रहे थे.

"इसका था चूसै से हे पानी निकल गया.. आठ.. मेरा भी.."

"ऊपर से उठो काजल.", अर्जुन ने जैसे हे काजल को हटाया गधा सफ़ेद वीर्य उछलता हुआ काजल के चेहरे, gale,chucho और आखिर में पेट पर 4 पिचकारिओ के रूप में बरस गया. कमरे में तीनो हे लोग अब गहरी सांसें ले रहे थे. काजल का गोरा रंग तोह ख़ास हिस्सों से पूरा लाल हो चूका था.

"कर दिया सत्यानाश.. आह्हः.. इसकी हालत देख सविता, तेरी भी ऐसी हो जाएगी 2-3 बार me.",Kajal ने अब वह टीशर्ट भी गन्दी कर दी थी वीर्य साफ़ करते हुए. अर्जुन के लुंड को भी सही करके वह बिस्टेर से कड़ी हो गयी. 5 मिनट में हे कमरा व्यवस्थित हो चूका था और काजल शरीर पर पानी डालने का बोल कर कमरे से चली गयी.

"तुम्हे बुरा लगा मेरी बात का?", अब अर्जुन ने पहली बार सविता से बात की तोह वह उसकी गॉड में आ बैठी.

"बुरा लगा जब तुमने आना बंद कर दिया. आखिरी बार मैं हे तोह तुम्हे चूम रही थी वह. जब खुद हे हाथ खजाने पर रख दिया तोह तुम्हारे न आने से ऐसा लगेगा न के मुझमे कोई कमी है."

"तुम में कोई कमी नहीं है सविता. काजल से पहले तोह तुम मिली थी मुझे और तुम सचमुच बहोत प्यारी हो, थोड़ी गुस्से वाली और तीखी.", अर्जुन ने इस बार होठो पर बड़े आराम से चुम्बन किया था.

"ाचा तोह फिर मेरे साथ कब करोगे? लेकिन इसके सामने नहीं और मेरे बापू के जाने के बाद. अभी तोह वह हफ्ते की छुट्टी पर आये है तोह परसो चले जायेंगे लेकिन सावन के पहले हे हफ्ते मेरा ब्याह है तब वह महीना यहाँ रहने वाले है.", लाड से अर्जुन की गॉड में पाँव फैलाये बैठी सविता उसके चेहरे को पकडे थी. अर्जुन को सविता पहली मुलाकात में किसी खोयी प्रेयसी सी लगी थी और आज वह उसकी गॉड में पूरे हक़ से बैठी जैसी मन रही थी.

"इसका फैंसला भी तुम करो सविता. मैं तुम्हारी ख़ुशी के लिए वो सब करूँगा जो कहोगी. बस इस घर में तुम्हारी िज्जात्त पर बात नहीं आणि चाहिए."

"नहीं आती कोई बात और बोल देती हु इसके सामने जो कड़ी हंस रही है. इसका भाई न लट्टू है मुझपे लेकिन मुझे तुम पसंद हो. आना तोह इनके हे घर है बेटी की तरह लेकिन ये जो मेरा हक़ इतने दिन से खा रही है वह बराबर लुंगी, कह देती हु. बापू जा रहे परसो और नर्सो आओगे तुम वही नहर पर. साढ़े 4 मतलब ठीक टाइम पर. और काजल की बची, घंटा भर दिखाई मत देना वह.", उठने से पहले सविता ने अर्जुन के होंठो को चूमा और बहार चली गयी.

"लो जी, जिस से मिलने तुम आते थे वह बकरी भी मान गयी. लेकिन याद रखना, नाजुक है मेरी भाभी.", बहार निकलने से पहले काजल ने नौटंकी के साथ अर्जुन को ऊँगली दिखाई तोह अर्जुन ने भी उसको अपने साथ लगते हुए एक मोटा उभर थोड़ा कस के दबाते हुए जवाब दिया.

"मालूम है मुझे, शरीर और दिल देख कर हे करता हु मैं. और सच कहु तोह देख लेना तुमसे ज्यादा जोश दिखाएगी सविता."

"आठ.. कमीने आराम से दबा. आह ऐसी चुदाई की है मूट भी रुक रुक के निकल रहा था मेरा. ऊपर से ये दबा दबा के लाल कर दिए.. आठ.. छोड़ अब, जाना है मुझे. ये तेरा डंडा पहले मेरी सविता के अंदर जायेगा उसके बाद हे मैं लुंगी. उमाठ.. bye.", अर्जुन को अकेले हे छोड़ कर वह बहार निकल गयी तोह अर्जुन ने भी घर जाने में हे भलाई समझी. घंटा हो गया था उसको यहाँ आये हुए और लोग बातें बना सकते थे. घर से बहार आया तोह बिमला देवी अपनी देवरानी के साथ भैंसो को चारा दे रही थी. अर्जुन को लगा था के वह किसी के घर होंगी.

"आते रहना बीटा."

"जी, अभी चलता हु.", अर्जुन साइकिल के पैदल मरता अपने घर की तरफ हो लिया और जाते हुए नजर दातुन करते फौजी पर पड़ी. सविता के पिता कोई 40 के व्यक्ति थे, lambe-majboot, साफ़ मूछे और इस वक़्त तोह अपने छोटे से बेटे के साथ मुस्कुराते हुए टहल रहे थे.

"सचमुच घोडा है जीजी ये लड़का तोह. Kad-kaathi तोह गाँव में भी किसी का न इसके जैसी. काजल गाडरी है और तगड़ी भी इसलिए झेल गयी, शायद दोनों काफी बख्त (टाइम) से कर रहे है khaat-kabaddi.", देवरानी ने जीकर किया तोह बिमला के चेहरे पर अलग हे मुस्कराहट आ गयी.

"तू गलती से निचे न आ जइयो बता देती हु. काजल ने तोह पूरा साथ दिया और जो तू बीच में हट गयी तोह वही किल्ला तेरे पिछवाड़े में थोकक देगा. छूट में तोह तेरी भी आग लगी है जो बेटी की चुदाई देखने चली गयी."

"जीजी, मैं तोह डर के गयी थी जब आपकी होने वाली बहु शामिल हुई उनके कमरे में. लेकिन सविता ने chooma-chati दिल से करि थी. चक्कर काजल से पहले शायद इन दोनों का हैं."

"सविता न ले पायेगी दर्शन, लिखवा ले मेरे से. इसलिए जवान लड़की choom-chaati करके दूर हो गयी."

"हाँ जीजी, सही बात है. सहेली है न दोनों तोह ब्याह से पहले देख रही होगी के काजल ये सब कैसे करती है. आपने तोह दिन हे खराब कर दिया मेरा."

"मैं यहाँ चारा बना रही थी और तू करमचंद बानी आप अंदर गयी. छूट तेरी कुलबुला रही और दोष मेरा. अब हो जाई खेत में शीलू के सामने नंगी, कुछ तोह करेगा हे.", बिमला ने हँसते हुए कहा

"एक बार आप करवा लो इस से मेरे सामने, मैं भी ले लुंगी फेर इसका. काजल और सविता कर सकती है तोह हम दोनों तोह बरसो से सहेली है जीजी.", दर्शन की हालत देख बिमला भी काम करती रुक गयी.

"इस बार आएगा न, तब रख लुंगी टाइम इसके साथ. लेकिन कह देती हु के ऐसा वैसा न करियो कुछ, वह तैयार हो तोह हे होगा नहीं तोह ताल."

"जीजी, अब ऐसे करोगी? मैं भी तोह काम आयी न आपके इस लड़के को बुलाने में. कसम से एक बार इसने दर्शन की गर्मी देख ली न तोह खुद हे आया करेगा. और फायदा हे है, दोनों मिलेंगी तोह बदल बदल के लेगा.", दर्शन की बात पर हंसती हुई बिमला ने सर पे चपत लगा दी.

"कमीनी, चल ये भैंस के सामने रख. बदल बदल के करेगी."

.

.

गाँव से तैयार हो कर निकलने के बाद शंकर जी 6 बजे हे अपने घर आ गए थे. नए कपडे पहन कर वह अपने पिता के पास बैठे नाश्ता कर रहे थे के अर्जुन साइकिल लिए घर में दाखिल हो गया. अपने पिता को इतनी सवेरे वह भी आँगन में नाश्ता करते देख अर्जुन भी करीब आ बैठा.

"कही जा रहे है क्या आप? और दादा जी आप भी जूते पहन कर बैठे है?", अर्जुन की भीगी टीशर्ट को एक बार देखते हुए रामेश्वर जी ने हे जवाब दिया.

"माधुरी के ससुराल जा रहा हु तेरी दादी के साथ. वह से धर्मवीर जी के घर और फिर िग कपूर और निर्मल सिंह के पास. अब तू बता के साथ चलना है मेरे या घर के काम करेगा?", शंकर जी तोह आराम से नाश्ता करते रहे और अर्जुन अपने दादा का जवाब सुन्न कर नाराजगी से उन्हें देखने लगा.

"सिर्फ पुछा हे तोह है आपसे और मैं नहीं जा रहा कही भी. मुझे यही बहोत काम है.", अर्जुन जूते खोल कर एक तरफ रखने के बाद बहार वाली तरफ हाथ मुँह धोने चल दिया. टीशर्ट भी उतार कर वही तार पर टांगते हुए वापिस आया तोह दादी भी तैयार थी जो उसका दूध और खुराक लिए इन्तजार कर रही थी.

"इसके जिम्मे काम दे तोह दो फेर ये मैट पूछना के वो आज होगा या कल.", कौशल्या जी बड़बड़ाती हुई अर्जुन को गिलास पकड़ने लगी तोह वह उन्हें भी हैरानी से देखने लगा.

"अब मैंने ऐसा कोनसा काम है दादी जो नहीं किया है? अगर कोई भूल गया हु तोह याद दिला दीजिये.", अर्जुन ने गिलास और खुराक का लड्डू निचे रखते हुए पुछा.

"किसी को घर से बहार नहीं निकलने की आदत है तोह कोई घर में आता हे नहीं. सब अपनी मर्जी की करो काम बुढ़ापे में भी हमको हे करना है तोह फिर नहीं देखना किसी की तरफ.", कौशल्या जी का तंज सुन्न कर शंकर जी के हाथ रुक गए.

"माँ, वह भी shaadi-byaah के काम है तोह देखना जिम्मेवारी बनती है या नहीं? यहाँ तोह फिर भी 20 दिन पड़े है लेकिन उस तरफ तीसरे दिन 2-2 शादी है. बेशक ख़ास समारोह नहीं हो रहा मृत्यु की वजह से लेकिन आये गए की रोटी, ब्याह के रिवाज, सबके कपडे लट्टे और बाकी कितना कुछ होता है वह भी देखना पड़ता है. नहीं गया माधुरी के ससुराल कल तोह आफत नहीं आ गयी कोई. आपको ये तोह दीखता नहीं की 3 दिन से हॉस्पिटल की फर्लो लगा रहा हु kaam-ghar के चक्कर में. बस इस बात से गुस्सा हो के सम्बन्धियों को कार्ड नहीं देके आया. अब जा रहा हु न."

"जब मर्डर जाउंगी न तब भी अर्थी अलग से उठाने अगले दिन आ जईओ. रात को ये काम करवा रहा था वह. झंडे गाड़ रखे है न जो हर तरफ वह तेरे काम की कहानी गाते रहते है. और आप भी चलो जी, गाडी निकालो खुद और इसको करने दो ब्याह की तैयारियां. वह हॉस्पिटल से इसको स्पेशल परमिशन है.", कौशल्या जी की इतनी खरी खरी सुन्न कर शंकर जी ने प्लेट एक तरफ रख दी थी.

"अब जा रहा हु न."

"एहसान कर रहा है बड़ा. नहीं लेके जा रही मैं तुझे, जा के तू तेरे काम देख मेरे मैं आप कर लुंगी. और आपने खड़े होना है या फेर मैं हे मिल औ सबसे? सरे mel-jol का सत्यानाश करना पड़ा सम्बन्धियों के एक फ़ोन आने से. पूर्णिमा अब अकेली करेगी बेचारी सबकुछ.", रामेश्वर जी तोह चुपचाप सफारी की चाबी ले कर उठ गए.

"तू हे चला जा माँ के साथ. इधर तोह कोई काम ऐसा नहीं जिसमे तेरी जरुरत हो.", शंकर जी ने हलके गुस्से से अर्जुन को आदेश दिया जिसने घी का काम किया जलती आग में.

"तू कौन होता है इसको बताने वाला के क्या करना है क्या नहीं? उसके जिम्मे 10 काम दो तोह 11 करता है वह. तेरे एक लगा दो तोह वह भी टाइम पे नहीं. अब काम से काम जिनके ब्याह करवा रहा है वही शकल ले जा. यहाँ ये घर संभल रहा है और हम देख लेंगे बाकी.", शंकर जी अब और क्या कहते. गलती उनकी हे थी जो बेवजह हवेली पर रुक गए थे और माधुरी के ससुराल न गए. गुस्सा आ रहा था लेकिन यहाँ निकलने से तोह और काम खराब होता. अपनी कार ले कर तुरंत निकल गए बहार.

"कौशल्या, कभी कभी तुम ठीक नहीं करती हो. दिन की शुरुवात हे ऐसी कर दी तोह अब वह सारा दिन बाकी सबसे उलझता रहेगा.", रामेश्वर जी ने सफारी के दरवाजे को खोलते हुए अब कही पहली बार कुछ कहा था.

"आप भी थोड़ा समझो के वह क्या कर रहा है. फिर कहते हो के मैं इसको बिगड़ती रहती हु. भगवन ने 3 दिए लेकिन एक भी वो काम नहीं करता जो जिम्मेवार बचा करता है हर घर में. उमेद के तोह दोनों भाई न रहे फिर भी अकेला सबके काम अपने जिम्मे लिए बस करता रहता है. गया वह टाइम जी जब ये लड़के शरारत करते थे, लड़ते झगड़ते थे. आज हलकी सी डोर इधर उधर हुई न तोह पतंग loot-te रहना या चरखड़ी पकडे खड़े.", कौशल्या जी भी दूसरी तरफ बैठने लगी थी की ऋतू तैयार हो कर सामने आ कड़ी हुई.

"नाना जी, मैं चल रही हु. नानी पीछे बैठो आप लोग.", कौशल्या जी के जवाब देने से पहले हे रामेश्वर जी बीच वाला अपनी तरफ का दरवाजा खोलते हुए अंदर बैठ गए. तारा सफ़ेद कमीज, जीन्स के साथ धुप का चस्मा लगाए थी और दूसरी तरफ से अलका ने अगली सीट पर कब्ज़ा जमा लिया. अर्जुन अब खड़ा हुआ ये देख रहा था और तारा उसको हाथ हिलती हुई इस बड़ी गाडी को निकल कर घर से निकल चली.

"पापा की तोह आज ाची क्लास लगी ारु, तू था नहीं थोड़ी देर पहले. दादी ने शुरू में तोह आराम से कहा था के उन्हें कुछ याद नहीं रहता. पापा का जवाब सुन्न कर तोह जो दादी ने झाड़ लगायी वह इधर आ कर बैठ गए.", ऋतू दीदी के चेहरे के भाव देख कर अर्जुन ने थोड़ा चैन की सांस ली.

"यहाँ तोह उनकी और ज्यादा बुरी हालत कर दी दादी ने. वह प्लेट रख कर गुस्से में कार लेके चले गए दीदी."

"प्लेट में 4 पराठे थे ारु, सारे खा गए और लौटा लस्सी का भी छत्त. पापा का गुस्सा ऐसा हे है, खा पी कर निकल लिए क्योंकि दादी खुद थोड़ी देर में चिंता करने लगेगी उनकी. चल तू ये दूध दे मैं गरम करके लाती हु.", ऋतू दीदी जैसे ये सब देखती आयी थी वही अर्जुन परेशां हो गया था पहली बार ऐसा देख कर लेकिन रहत की सांस ली जब दीदी ने बताया उसको. अभी भी वह सिर्फ पाजामे में खड़ा था, उघडे सीने.

"तुम हमेशा ऐसे हे आधे कपड़ो में घुमते फिरते हो क्या?", ये खनकती आवाज और हाथो में दूध का गिलास लिए विन्नी दीदी उसकी तरफ चलती आयी तोह अर्जुन ने सर खुजाते हुए मुस्कुरा कर कहा.

"आप इतनी जल्दी उठ गयी? थैंक यूं.", अर्जुन ने गिलास लेने के बाद ज्यादा ध्यान नहीं दिया विन्नी दीदी पर. कही वह कुछ और हे न शुरू कर दे.

"7 बजने वाले है और इतनी लेट मैं कभी कभी हे उठती हु. तोह बताओ के क्या तुम ऐसे हे घुमते फिरते हो या aas-pas किसी के साथ चक्कर है.? और ये कैसी चीज है तुम्हरे हाथ में. युक", विन्नी ने बातें करते हुए वह आयुर्वेदिक लड्डू सुंघा और अजीब सी शकल बनाने लगी.

"अभी रनिंग से आया था तोह मैं रोज हे दूध के टाइम टीशर्ट उतार देता हु, पसीने की वजह से. कोई चक्कर वक्कर नहीं और आप देख हे रही है के यहाँ से बहार क्या दीखता होगा. ये है मेरी दादी जी के बनाये प्यारे लड्डू, चख कर देखिये इनकी स्मेल से ज्यादा गन्दा टास्ते लगेगा.", अर्जुन ने इस बार जैसे हे दीदी को देखा तोह दोनों की नजरे मिल गयी. बेवजह की बातें भूल कर दोनों ने एक दूसरे को देखा और विन्नी शर्माती हुई बगीचे की तरफ चली गयी. अर्जुन भी पलभर के लिए देखता रहा उन्हें. कल रात सचमुच उस पर बिजली हे गिर गयी थी.

.

.

शंकर जी घर से तोह निकल आये लेकिन अब इतनी सवेरे जाए कहा यही सोच रहे थे मार्किट से आगे इस पार्किंग में कार लगाए. कुछ न सूझा तोह सिग्रत्ती सुलगा ली.

'माँ भी न बेमतलब हे गरम हो जाती है. उन्हें पता है के मुझे वह भी ध्यान रखना पड़ता है. मेरी बीवी है लता और ऋचा बेटी है, बड़ी बेटी. उन जिम्मेवारियों को न निभाउ? बस कोई काम देरी से हो तोह जाये फिर सोचती तक नहीं के मैं बड़ा हो चूका हु, मेरी भी लाइफ है लेकिन उन्हें तोह फरक हे नहीं पड़ता.', अभी तक गुस्सा शांत नहीं हुआ था शंकर का. फिर कुछ सोच कर पीसीओ से एक नंबर मिलाया और बात करने के बाद सड़क पर गाडी दौड़ा दी. 10 मिनट बाद हे कार फार्महाउस से अंदर दाखिल हुई और खाने की मेज पर मेहुल गुलाटी अकेला बैठा था.

"तोह आज शंकर जी इतनी तड़के तड़के हमारे गरीबखाने पर. भाई सब ठीक है न, ले कॉफ़ी पी.", गुलाटी ने कप अपने दोस्त की तरफ बढ़ाते हुए कहा और नाश्ते की प्लेट दूर करते हुए खुद भी कप हाथ में उठा कर शंकर को देखने लगा.

"यार गुलाटी बहनचोद ये ट्रांसफर के बाद एक दिन भी चैन नहीं मिल रहा. साला दिन शुरू हुआ नहीं के गांड उठा कर भाग लो.", एक और सिग्रत्ती इतनी जल्दी सुलग उठी.

"मतलब आज तोह आंटी जी ने क्लास ले ली तेरी. तभी फड़फड़ा रहा है इतना. क्या हुआ ये तोह बता?", गुलाटी भी करीब से जानता था अपने दोस्त को. आखिर कॉलेज से वह साथ थे और आज भी एक दूसरे के बिना दिन पूरा नहीं होता था.

"यार कल रात हवेली चला गया था, लता ने कहा के मैं रुक जाऊ तोह मैं भी रुक गया. ऋचा को भी ाचा लगा और फिर सुबह टाइम से घर आ गया लेकिन माँ शुरू हो गयी जब बताया के हवेली था. देखती भी नहीं के वह मेरे बचे भी सुन्न रहे होंगे."

"तेरे बचे? भाई पहली बात तोह तू उनका बचा है. दूसरी बात ये की तू अगर फड़फड़ा रहा है तोह तेरी गलती है. अब बोल के बात क्या है?"

"कुछ नहीं यार. कल माधुरी के ससुराल जाना था निमंत्रण देने और मैं भूल गया. उनका फ़ोन आया माँ के पास की आप लोग महूरत देख कर आ रहे है तोह माँ मेरे पर भड़क गयी. बता शादी को 20 दिन पड़े है और ये निमंत्रण न हुआ जैसे मेडिकल का पेपर हो गया के 10 से 1 है तोह है. लता का दिल था रात मेरे साथ रहने का, बातें करने का हमारे आने वाले कल के लिए. अब उसको एक रात भी नहीं दे सकता क्या? मेरी बीवी है यार गुलाटी वो और इतना तोह मैं कर हे सकता हु न उसके लिए."

"गांड मारा भोस्डिके. साला इतना नई समझता के लड़केवालों से अगर समय लिया है तोह जाना हे पड़ेगा. सही करती है आंटी तेरे साथ, तू हैं हे चुटिया. मेरी बेटी, मेरी बीवी.. कभी कहा है मेरा घर. मेरी रेखा मेरा अर्जुन.. न सिर्फ मधुलता तेरी बीवी है जिसके गले में किसी और का मंगलसूत्र, जो किसी और की विधवा.. लेकिन तुझे उसमे वही लड़की दिखती है जो शादी से पहले थी. अबे इतना हे दम होता न उस मधुलता में तोह घर से भाग जाती तेरे साथ जब शादी होनेवाली थी उसकी. तेरे जैसा चुटिया भोला सनम मिले तोह कहने हे क्या? और तू अब तक दोष देता है पंडित रामेश्वर जी को जिन्होंने तेरी शादी उस लड़की से नहीं होने दी. ब्याही होई औरत के साथ तेरी बेटी उनके घर आती है तोह सजा तोह तू ाची दे रहा है उन्हें शंकर. सांगवान को समझाया था न तूने कल, आज मेरी बात कान खोल के सुन्न ले. दोस्त हु और दोस्त की तरह हे कहूंगा के तू जिस do-tarfa रस्ते पर है न उसकी मंजिल ऐसा चौराहा होता है जहा कोई राह नहीं होती.", मेहुल गुलाटी का पारा इस तरह गरम होते तोह शंकर ने भी नहीं देखा था कभी. सबसे ठंडा व्यक्ति था वह इन दोस्तों में.

"इतनी हे कदर करता है तू मेरे प्यार की मेहुल? कॉलेज से तू जानता है के दुनिया में मेरी सिर्फ 2 कमजोरी है. एक मेरी माँ और दूसरी लता."

"तेरे प्यार की मैं दिल से कदर करता हु शंकर. बीवी का दर्जा देने वाली बात पर ऐतराज है मुझे. रेखा कौन है? वो तीन बचे कौन है शंकर जो तेरे घर में सब चुपचाप संभालती है? जिसको तूने कमजोरी में गिना है न उसमे से तेरी ताक़त है आंटी जी. हाँ मधुलता तेरी कमजोरी है दोस्त. जिसके सामने आज तुझे अपनी बेटी के सम्बन्धी जरुरी नहीं लगे. तू सवेरे सवेरे उस बूढी माँ से बहस करके आ गया जो तेरे हर जुर्म और गलती को ढकती आयी. जानता हु औकात से ज्यादा बोल गया लेकिन मेरे दोस्त रेखा को मैंने भाभी मन है और बीवी ने बहिन. 10 लोगो से गए ले लिओ और कही 2 लोग भी तेरे पक्ष में निकले तोह गुलाटी ज़िन्दगी भर गुलामी करेगा तेरी. बहार लड़किया छोड़, दारु पी, कतल कर या कुछ भी लेकिन घर जो है वह सुकून है मेरे भाई, उसको खराब किया न तोह सारे दोष भी खिलाफत पर उतर जायेंगे.", गुलाटी अलग सिग्रत्ती सुलगता हुआ बगीचे की तरफ आ गया था. इतना बोलने के बाद उसका भी दिल भरी होने लगा, वह अपने दोस्त पर इतना नहीं बरसा था कभी. शंकर बस कुर्सी पर बैठा गुलाटी को टहलते देख रहा था.

आज तोह सचमुच कही ज्यादा हे बातें कह दी थी मेहुल ने लेकिन मेहुल तोह उनमे से है जो हमेश सीढ़ी और साफ़ बात करते है. मतलब शंकर अपने बाप को दोष देने के बावजूद खुद को उस औरत का पति कैसे घोसित करता रहा. ये बात दिमाग में आते हे सर टेबल पर रख के शंकर सोचो में डूब गया.

"देख शंकर, कई बार हम मंज़िल खुद नहीं बनाते दोस्त. वो ऊपर वाला है न वही बना देता है. हम कितने भी प्रयास करे लेकिन वो हांसिल नहीं होगा जो ऊपरवाला देना नहीं चाहता. इसके चक्कर में डाव पर सबकुछ लगा देते है. तू चाहता है न के ऋचा को अपना नाम दे, तोह भाई उसके लिए म्हणत कर मैं तेरे साथ हु. किसी और की बहु को तोह वो दर्जा देने की सोच रहा है जिस पर पहले से कोई मासूम इतने सालो से अकेली है. मैं भाई ज्यादा समझदार नहीं हु दुनियादारी में लेकिन इतना पता है के इन्साफ का तराजू दोनों पलड़े बराबर रखने पर होता है लेकिन तेरा झुकाव सिर्फ उस तरफ है जहा सबकी कबर खुदी हुई है.", गुलाटी ने किसी बड़े की तरह शंकर के सर को बड़े प्यार से सहलाया.

"भाई क्या करू, मैं लता के बिना नहीं रह सकता."

"छोड़ दे पंडित जी को. बात ख़तम. लेकिन ऐसा करने से पहले चादरों देवी से मधुलता को मांग कर दिखा. Arjun-Ritu-Komal से उनके बाप का नाम हटा दे. कर सकता है ऐसा?", ये सचमुच असंभव सा था लेकिन मेहुल गुलाटी का हर शब्द सच हे तोह था.

"नहीं भाई. मेरे बाप का साया मेरी सबसे बड़ी दौलत है. मैं लता के साथ सिर्फ इसलिए महीने में 2 बार मिलता हु की उसको उतना हे समय दे सकू जितना रेखा को देता हु. बाप से अलग नहीं हो सकता और तीनो बचो से तोह सपनो में भी नहीं."

"वो लड़का है न अर्जुन, सबको संभल लेगा. तू तेरी मर्जी कर और मैं जानता हु के तू घर से जाना चाहेगा तोह तेरी माँ रोकेगी नहीं तुझे."

"हाँ. जानता हु के आज वो सबकुछ है उनके लिए. और माँ बोल चुकी है के वह मेरा साथ नहीं देगी अगर अर्जुन कभी मेरे सामने खड़ा हुआ."

"खुद को देख तू अर्जुन से बराबरी कर रहा है. वो नासमझ सा छोटा बचा है वो भी तेरा खून. शंकर तू घर पे बोल कर 2 दिन के लिए कही चला जा मेरे भाई. सबकुछ सोचना जो तू कर रहा है. हमाम में हम सब नंगे है लेकिन तू बहार भी नंगा निकलना चाहता है. घर की बातों को हलके मैट ले, एक नासमझ अगर तेरे काम करता रहेगा तोह तू हे उसका गुनेहगार होगा. चची तोह फिर तुझे सीने से लगा लेगी. मेरी बातों के लिए मैं माफ़ी चाहता हु लेकिन मैं अपनी नजरो में खुद शर्मिंदा हु.", गुलाटी ने थड़ी कॉफ़ी एक घूँट में हलक से निचे उतार ली.

कही से भी शंकर का दोस्त गलत न था. अब अपने इस दोस्त के चक्कर में गुलाटी ने हॉस्पिटल फ़ोन करके छुट्टी ले ली थी, जिस से शंकर अकेला न रहे.

.

.

अर्जुन ने भी पुराने घर का सारा सामान अरोरा जी को बता दिया था और हार्डवेयर वाली दूकान से भी rang-rogan का सामान भिजवा दिया था जहा देखरेख राजकुमार जी कर रहे थे. हिमानी को अपने घर लाते हुए 11 बज गए थे और वह थोड़ा झिझकती हुई उसके साथ चली आयी थी लेकिन अर्जुन ने ऋतू और कोमल दीदी को पहले हे बता दिया था इनके बारे में. कोमल दीदी और प्रियंका दीदी तोह उसके हे साथ पढ़ने वाली भी थी.

आँखों पर चस्मा लगाए हिमानी को कोमल दीदी ने अपने निचले कमरे में हे बैठा लिया जो पहले Ritu-Alka का होता था. यहाँ अर्जुन की मौजदगी में halka-fulka परिचय हुआ तोह ऋतू दीदी ने उसको बहार भेज दिया. अब कमरे में विन्नी, कोमल, प्रियंक, ऋतू के साथ प्रीती भी थी.

"दीदी, यहाँ तोह चस्मा हटा दीजिये. Eye-flu तोह नहीं है न?", प्रीती ने इतना कहा तोह हिमानी ने चस्मा निकल कर सामने वाली दोनों लड़कियों की आँखों को अब उजाले में देखा. Ek-ek आँख उसकी इन दोनों जैसी हे थी. तीनो हे कुछ पल के लिए खामोश हो गयी थी.

"वाओ. ब्यूटीफुल.", प्रीती ने तोह इतना हे कहा लेकिन ऋतू खिसक कर बिलकुल करीब हे आ गयी, बेशक कोमल दीदी कुछ इशारा कर रही थी लेकिन विन्नी ने रोक दिया.

"यार आप तोह कमाल हे हो. अर्जुन ने सही कहा था के आप स्पेशल हो. No डाउट ब्यूटीफुल तोह हो हे लेकिन ये तोह ऐसा है के मैं और प्रीती फ्यूज कर दिए गए हो. हैं न प्रीती.?"

"एक्साक्ट्ली. पता नहीं दीदी ने गॉगल्स क्यों पहने हुए थे.? आप और मैं. मतलब सबकुछ हुआ न ऋतू दीदी?", उनका सवाल बस वही दोनों जानती थी.

"It's वीयर्ड यू क्नोव. ी हेट माय आईज, it's ा डिफेक्ट. बूत थैंक यू सो मच फॉर थिस लव.", हिमानी थोड़ा सहज थी लेकिन अजीब भी लगा उसको ये देख कर की 2 लड़कियां उसको इतना खुश हो कर देख रही है.

"ये बीमारी नहीं है हिमानी. हेट्रोक्रोमिअ इस रेयर बूत it's नेचुरल. बिलीव में ी हैवे सीन मोरे वीयर्ड कलर्स. एंड थे बोथ अरे राइट, यू अरे ब्यूटीफुल अस वेल अस स्पेशल. यार मेरी आँखें ऐसी होती तोह ...", विन्नी इतना कह कर बस मुस्कुरा दी.

"छोडो ये सब और ये बताओ के तुम सेहमी हुई क्यों रहती हो? आँखों की वजह से तोह बिलकुल नहीं. टेंशन मत लेना हिमानी, मेरा छोटा भाई जब किसी का हाथ पकड़ ले तोह उसकी साड़ी परेशानिया वह खुद उठा लेता है, हमको शामिल करके.", कोमल दीदी ने जिस अपनेपन से हिमानी का हाथ पकड़ा था वह बस उन्हें देखती रह गयी.

"वो मेरे पेरेंट्स नहीं है. मैं अपने नाना जी के साथ रहती हु मतलब अभी आयी हु. ऑस्ट्रेलिया से. माय मदर वास् सिंगल पैरेंट.", हिचकिचाते हुए हिमानी ने सबकी तरफ देखने के बाद नजरे झुका ली.

"तोह अब तोह फिर साड़ी उम्र रोना हे पड़ेगा?", कोमल दीदी की ऐसी बात पर बाकी सब उनको देखने लगे.

"देखो हिमानी, ज़िन्दगी एक हे व्यक्ति की होती है, खुदकी. नाना जी है न तुम्हारे जो अर्जुन से भी प्यार करते है. एक बहार का लड़का है वह. तुम उनकी हो, तुम परेशां मतलब वो परेशां. एक सच मैं बताती हु तुम्हे जिसको सुन्न ने के बाद तुम फैंसला करना.", कोमल दीदी ने उसके हाथ में मजबूत से अपना हाथ रखते हुआ कहा.

"अर्जुन छोटा सा था जब इस घर से दूर कर दिया गया. कह लो की निकाल हे दिया गया. 8-9 साल तक. वो वापिस आया तोह सब लोग सामने थे उसके. सभी बराबर दोषी. क्या करना चाहिए था उसको ऐसे में?"

"गुस्सा, ऑब्वियस्ली. िफ़ हे वास् ा चाइल्ड तहत टाइम. इतने साल दूर रहा तोह फ़्रस्ट्रेशन होगी हे. लेकिन क्यों हुआ ऐसा.?"

"उसने बिखरे हुए घर को जोड़ दिया. आज तुम्हारे सामने इतने लोग है जो सिर्फ उस से प्यार करते है. उसने खुद को नुक्सान नहीं पहुंचाया, कोई गलत कदम नहीं उठाया या फिर कमरे में बंद हो गया. बहार निकला और सभी कमरे में रहने वाले लोग बहार मेज पर एक साथ बैठा दिए. अब तुम्हे यहाँ लेके आया है तोह इसकी वजह जरूर होगी."

"हाँ वह नाना जी उस से सबसे ज्यादा प्यार करते है.", हिमानी थोड़ा और खुलने लगी थी इतना कुछ जान कर.

"सोचो वह तुम्हारे नाना जी के लिए इतना कर रहा है तोह तुम्हे तोह ये खुद करना चाहिए था. कॉफ़ी पीती हो न? मैं ठीक थक बना लेती हु. इतने तुम जरा ऋतू के साथ बाकी सबको झेलो, मैं आयी.", कोमल दीदी ने हँसते हुए कहा तोह हिमानी पहली बार मुस्कुराई थी.

"ये बात. आपकी तोह क्लास ले लेंगे हम. ऐसे कमजोर शिकार हे तोह पसंद है हमको, जो खूबसूरत भी हो.", ऋतू की बात सुन्न कर प्रियंका दीदी ने हँसते हुए उसका कान पकड़ लिया.

"देखो, इतनी परवाह मिलेगी कही जहा आपके लिए मेरी दीदी मेरा हे कान खींच रही है.? अब तोह इसके लिए आपको अपने घर में कॉफ़ी पिलानी पड़ेगी नेक्स्ट टाइम, विथाउट गॉगल्स.", ऋतू ने तोह हिमानी को इधर हे खींच लिया था जहा कोमल दीदी थी पहले.

"यार ऋतू सच कहु तोह हिमानी कुछ समझे या न समझे लेकिन मैंने देख लिया के तुम लोगो की बॉन्डिंग अपने आप में एक पहेली है.", विन्नी के बोलने पर जवाब हिमानी ने दिया.

"हे इस रियली ान अमेजिंग पर्सन दीदी. आप उसको एक दिन या महीने में तोह नहीं समझ सकती. हे मेड में कम्फर्टेबले ों माय फर्स्ट यूनिवर्सिटी विजिट. गेटकीपर से लेकर हर एडमिन पर्सन उसको प्यार हे कर रहा था. ी सॉ तहत लव एंड रेस्पेक्ट. आप लोग उसका परिवार है तोह उसका ध्यान रखना बस."

"वह आपके नाना जी का भी पौता है दीदी. ये काम आप भी करना. वैसे मेरी माँ तोह जगत माँ बन्न ने वाली है, आपको देखेगी तोह गले लगा लेगी.", ऋतू की बात सुनकर प्रीती जरूर ऋतू के गले लग गयी.

"एक्साक्ट्ली. आप रेखा माँ से मिलना, लंच तक तोह यही हो.", प्रीती ने रेखा माँ कहा तोह विन्नी थोड़ी हैरान हुई लेकिन बोली नहीं.

"नहीं जाना होगा मुझे थोड़ी देर में.", हिमानी ने इतना हे कहा और प्रीती हंसने लगी.

"नहीं जा सकती आप. अर्जुन तोह अब 3 बजे आएगा और कार सिर्फ तारा को आती है जो चली गयी."

"हाँ और अर्जुन ने कहा था के आप शाम तक यही है. Komal-Priyanka दीदी के पास सभी बुक्स है तोह उनके साथ लंच के बाद बैठ जाना. वैसे भी आज आपके mama-maami है घर पे.", ऋतू ने आँख मारते हुए बताया के उसको अर्जुन सबकुछ बता देता है.

"वाओ. आप लोग तोह मेरे बारे में सबकुछ जानते हो. देखो मैं कभी इतना बहार नहीं रही हु."

"स्कूटी लेके चली जाना फिर. कॉलेज साथ जाने वाले है हम लोग.", प्रियंका दीदी ने भी घेर हे लिया था हिमानी को.

"हमने कहा था न के शिकार कमजोर और खूबसूरत हो तोह नहीं छोड़ते. अलका भी आ जाएगी लंच तक, फिर आपको आज हे सीखा देते है हर एंड मार्केटिंग. ब तोह ऊपर वाले कमरे में हर रात होती है.", ऋतू ने जैसे कहा था प्रियंका की हंसी छोट गयी.

"यार तुम लोग बड़ी खराब हो. ये बेचारी कंफ्यूज हो जाएगी.", विन्नी ने बचाव करते हुए कहा.

"आपको डर है तोह साथ आ जाना हिमानी दीदी के, आपका नक्शा भी करेक्ट कर हे देंगे दीदी. टीम है पूरी प्रोफेशनल इसलिए अर्जुन भी उधर नहीं दीखता.", ये आवाज अंदर आती आरती की थी. ये भी आजकल बोलने लगी थी.

"Hi, आरती. अर्जुन की एक और बहिन.", अपना परिचय देती आरती प्रीती की बगल में हे बैठ गयी थी.

"हम गर्ल्स हॉस्टल के रूम में है क्या?", हिमानी थोड़ा उत्तेजित हो गयी थी इतने लोगो को अपने लिए तैयार देख.

"हाँ कुछ ऐसा हे लेकिन हॉस्टल ऊपर है. निचे लोग स्ट्रिक्ट है. ऊपर कासुअल रह सकती हो.", प्रीती ने बहाव में इतनी बड़ी बात कही तोह विन्नी हैरत से देखने लगी वही हिमानी भी इधर उधर देखने लगी.

"ये नासमझ है थोड़ी. कल बताया था न विन्नी दीदी.", ऋतू ने बात को सँभालते हुए कहा.

"बहार कभी मर्दो को ले कर घुटन हुई है किसी को? मुझे हर रोज होती है.", हिमानी ने दिल की बात कह दी थी अब.

"मर्द तोह फिर अर्जुन है, बाकी को हम देख लेते है. हाथ तोह लगा कर देखे कोई, अर्जुन जमीन में ज़िंदा गाड़ देगा उस इंसान को जिसने कभी ऐसी हिम्मत की. बिलीव में हिमानी दीदी पूरे स्टेडियम में लोग नजरे झुका कर चलते है अब.", प्रीती ने जो खुलासा किया था वह इन दोनों के लिए हैरानी वाला था. विन्नी के लिए खासतौर पर.

"वह ऐसा भी करता है?", विन्नी ने सिर्फ सवाल किया था.

"जिसकी परवाह करता है उसके लिए तोह वह ऐसा हे करता है.", आरती की बात सुन्न कर प्रीती ने हां में गर्दन हिला दी.

"अरे यू गाइस रियल? मतलब यार इतना कम्फर्ट कौन सेट करता है.?", हिमानी अभी भी थोड़ा एडजस्ट कर रही थी खुद को. वैसे अब उसको ाचा लग रहा था इन सबके बीच बैठना. कोमल दीदी ने अपने हाथो से कॉफ़ी का कप सबको दिया इस बीच.

"मेरे भाई को प्यार है आपके नाना जी से. फॅमिली एन्जॉय करो बस, देखते है ये male-phobia कब तक रहता है.", ऋतू दीदी ने सबके सामने हे प्रीती का गाल चूम कर आँख मारते हुए कहा.

"कमीनी, ये हरकते तोह मैट किया कर?", प्रियंका दीदी ने कहा तोह अब सबके चेहरे पर हंसी थी.

"इसलिए किया था देखो सब खुश है सिवाए विन्नी दीदी के. इनका तोह आशिक़ जैसे कही भाग गया बिना बताये.", अब मारा था ऋतू ने हुकुम का एक्का और विन्नी के पास न 'है' कहते बना न 'न'. हिमानी खुल कर हंसने लगी और उसके मुँह में प्रीती ने अपने हाथो से बर्फी लगा दी थी.

"दीदी, शादी है न घर में. काजू कतली से हे मुँह मीठा कर लीजिये.", हिमानी ने महसूस किया था के अर्जुन की असली ताक़त यही तोह हैं. सब एक से बढ़ कर एक और इसलिए वह उसको घर आने के लिए बोल रहा था. इधर विन्नी के कान में भी ऋतू ने कुछ कह दिया था जिसको सुन्न कर वह नजरे झुकाये शर्मा रही थी. और हिमानी ने सही मायने में जाना था के जो परवाह करता है वो पास न हो कर भी आपको ऐसी दिशा में पंहुचा देता है जहा खुदको सुरक्षित महसूस किया जा सके.

.

.

क्रमश
 
जारी

.

.


अर्जुन आज गौशाला रुकने की जगह सीधा मंजू को लिए उनके खेत में चला आया था, बहार वाले रस्ते से. गौर करने वाली बात थी की अब इधर कटीली तारो से पूरे खेत को सुरक्षित किया जा चूका था. Laal-safed salwar-kameej और सर पे दुपट्टा लिए मंजू ने इस तरफ बने लोहे की पाइप वाले गेट को देखा और फिर अर्जुन को जो खुद थोड़ा हैरान था.

"वह गौशाला से इसलिए नहीं आया था के कोई देख ले तोह और सवाल. ये पता नहीं क्या करवा दिए मेरे ससुर जी ने.", अर्जुन द्वारा अपने पिता को ससुर कहना मंजू के प्यारे मुखड़े पर हंसी ले आया.

"बलमा जी, आपके ससुर न हैं तोह नीरे सीधे. जैसे घर की चाबी गमले में राखी होती है, इसकी चाबी भी इस पत्थर के निचे होगी.", मंजू ने इस चौकोर सीमेंट के पत्थर को हटाया तोह वही पर चाबी मिली. अर्जुन भी हंस रहा था अब.

"तुम न कमाल हे हो मंजू. मतलब ऐसे वक़्त पर तुम्हारा दिमाग भी चलता है? और यहाँ चाबी न होती तोह?"

"फिर टाला टॉड देते. हमारा खेत है और मेरे पति ने जहा से कहा वो वही से जायेगा.", कड़ी खोल कर अर्जुन को रास्ता देती मंजू मुस्कुराई और अर्जुन भी मोटरसाइकिल अंदर करने के बाद मंजू को बैठाये वही आ गया जहा दोनों ने पहली बार मिलान किया था. घने वृक्षों के झुरमुट के बीच बने इस 2 कमरे के आशियाने और टूबवेल पर. आज भी यहाँ सबकुछ वैसा हे था जैसा हमेशा होता था. बस अनार थोड़े बड़े हो गए थे, पत्ते बिखरे थे जैसे 2-3 दिन से सफाई न हुई हो. टंकी लबालब भरी थी, ऊपर पत्ते तैर रहे थे.

"तोह बीवी जी आ गए हमारे घर पर. अब बताये के क्या हुकुम है.?", अर्जुन ने यहाँ आते हे मंजू की कमर में हाथ डालते हुए अपने से लगा लिया. खिलखिलाती हुई मंजू ने भी कहने से पहले उसके होंठो को चूम कर अपनी बाहें भी अर्जुन के पीठ पर बांध ली.

"हाँ ये ठीक कहा तुमने. ये सचमुच हम दोनों का घर हे है, जहा मैंने तुम्हे पाया है. उम्माह. अब छोडो न, तुम आराम कर लो मैं कपडे बदल लू.", मंजू ने प्यार से अर्जुन को खुद हे चूमने के बाद अलग करते हुए जवाब दिया.

"कपडे मैं हे बदलूंगा, लेकिन प्यार करने के बाद.", मंजू कुछ समझ पाती उस से पहले हे अर्जुन उसको बाहों में उठाये कमरों के पिछली तरफ ले चला. वह खुश भी थी लेकिन जिधर अर्जुन जा रहा था उस तरफ जाते हुए हैरान भी थी.

"कर लो मैं तोह खुद चाहती हु के तुम मुझे इस पल में भरपूर प्यार दो. लेकिन किधर जा रहे हो?"

"यहाँ और मुझे पता था के तुम्हे ये जगह ज्यादा पसंद है.", लबालब पानी से भरी उस लम्बी खेल (ओपन टैंक) के पास मंजू को खड़ा करते हुए अर्जुन ने इशारे से दिखाया.

"ोये होये. बड़ा पता किये रखते हो के मुझे क्या पसंद है. वैसे सचमुच ये जगह ऐसी है अर्जुन जहा मैं खुद को सबसे ज्यादा महसूस करती हु और तुम्हारा यहाँ होना मतलब मेरी दुनिया पूरी. बहोत छोटी थी मैं जब पापा ने ये बनवाया था मेरे लिए और घंटो मैं इसमें उछाल कूद करती रहती थी.", मंजू पानी में हाथ फिरती जैसे खो सी गयी थी. अर्जुन ने भी उसको पीछे से बाहों में भरते हुए गाल पर लगते हुए जवाब दिया.

"इसलिए तोह मैं तुम्हे यहाँ लेके आया हु. क्योंकि ये जगह तुम्हारे आसपास न होने पर भी वही एहसास करवाती है मुझे. हमेशा दिल को ठंडक देने वाला एहसास जो मुझे तुम देती हो.", मंजू के पेट पर दोनों हाथ कुछ जांच रहे थे जैसे.

"अभी से बड़ा हो जायेगा क्या? 5 महीने बाद दिखने लगेगा कुछ और तुम कब आये यहाँ मेरे बिना?", मंजू समझ गयी थी की अर्जुन क्यों ऐसे पेट सेहला रहा है.

"आया था जब गौशाला का काम देखने आया था. तब भी मैं बहार वाले हौद (टैंक) में नाहा कर गया था जहा तुमने मुझे खुद से लगा के नहलाया था. ये सचमुच फूल गए है या मुझे लग रहा है?", सूट के ऊपर से उन गोलाकार उभरे दोनों किन्नू से बड़े स्टैनो को पकड़ कर जायजे लेते हुए अर्जुन ने हल्का सा दबाया और मंजू ने अपने ठोस नितम्भ पीछे चिपका दिए जहा अर्जुन का मोटा लिंग अकड़ने लगा था.

"आह्हः.. म्हणत दिल लगा कर की है न तुमने मेरी जमीन पर. ऐसे हे बड़े होते रहे तोह बाद में दिक्कत होने वाली है. उम्.. रुको, खोलने दो कपडे. आज पहली बार हे पहना है ये सूट.", मंजू पूरी गरम हो गयी थी अर्जुन द्वारा बस थोड़ा सहलाने और कान को चूमने से. दुनिया की नजरो से दूर इस प्राकृतिक आशियाने में मंजू को अपने सामने कमीज के बिना देख अर्जुन बस निहारता हे रह गया. एक लास वाली लाल ब्रा में क़ैद उसके उरोज और वह सुनहरी रंगत लाजवाब हे थी.

"ऐसे हे देखते रहोगे तोह फिर तुम बस वक़्त जाया करोगे.", मंजू के शब्द कानो में पड़ते हे जैसे अर्जुन उस सुन्दर ख्वाब से बहार आया जो वह खुली आँखों से देख रहा था. 3 फ़ीट ऊँची टैंक के अंदर वह कब उतर गयी थी अर्जुन को होश न था. एक तरफ लटके चारो वस्त्र बता रहे थे के वह अंदर किस हालत में होगी.

"इतनी जल्दी तुम पानी कब उतर गयी? और ये चीटिंग है.", अर्जुन ने तुरंत अपनी टीशर्ट निकल कर जीन्स खोलते हुए उसकी तरफ कदम बढ़ाये तोह मछली सी मंजू इस लम्बे टैंक के दूसरे किनारे जा लगी.

"5 मिनट तुम बस देखते हे रहे, अब गलती तुम्हारी है तोह सुधारना भी तुम्हे पड़ेगा.", टैंक कोई इतना चौड़ा न था के दोनों शरीर एक दूसरे के बराबर निकल सकते. पानी के बहार सिर्फ गर्दन से ऊपर का हिस्सा निकले मंजू दोनों तरफ की पतली दीवारे पकडे अर्जुन को उकसा रही थी.

"आज तुम नहीं बचने वाली. 5 मिनट मेरी गलती थी, अब 50 मिनट इसकी सजा तुम्हे मिलेगी मंजू डार्लिंग.", अर्जुन के कपडे जमीन पर थे और टैंक के अंदर उतारते देख मंजू ऊपर से निचे तक निहारने लगी थी इस लम्बे चौड़े निर्वस्त्र जिस्म को.

"सजा के लिए तोह तुम यहाँ लेके आये थे न. चीटिंग है ये.", मंजू को लगा था के अर्जुन तैर कर उसकी तरफ आएगा, वह चलता हुआ आने लगा तोह इतना कहती वह बस खो सी गयी थी पानी की सतह से बहार झूलते उस विकराल मॉटे लिंग को. इस बार उसको होश आया तोह इस आखिरी छोर पर वह अर्जुन की बाहों में लिपटी थी, निर्वस्त्र.

"तुम्हे इस हौद से भी प्यार है न मंजू, आज इसके साथ और यादें जोड़ देते है.", पानी से भीगे उन पतले नरम होंठो को चूमता अर्जुन उन्मुक्त प्यार कर रहा था. मंजू के हाथ दीवारों से हटने के बावजूद वह निचे न गिरी थी. पानी के अंदर घुटने टेके अर्जुन ने उसको अपने सीने से लगा रखा था और मंजू आगे होती अपनी लम्बी टांगो को उसकी कमर में डाले उसके सीने से चिपकी बस वही दोहरा रही थी जो अर्जुन कर रहा था.

"तुम्हारे घुटने छील जायेंगे अर्जुन.", बेहद परवाह से मंजू ने ऐसा कहा तोह अर्जुन मुस्कुराने लगा. पानी के अंदर अब वह मंजू के पहले से बेहतर और मांसल हो चुके नितम्बो को दबा रहा था. तीखे निप्पल सीने को जैसे भेदने में लगे हो.

"ऐसा मुमकिन नहीं है मंजू, हाथ लगाओ इधर.", अर्जुन ने अपने हाथ में उसका हाथ लेके अंदरूनी सतह पर लगाया तोह वह एक चिकना फर्श सा था बस.

"कम्फर्टेबले नहीं होगा न?"

"मैं तुम्हे कम्फर्ट दे रहा हु, जो जरुरी है. और इस से मुझे ज्यादा ाचा लगेगा.", आगे की बात बंद करते हुए अर्जुन ने वापिस होंठ चिपका दिए. दोनों के हाथ एक दूसरे के पीठ पर कैसे शरीर थामे थे. फिर गहरी सांस लेते एक दूजे को देखते हुए मुस्कुराने लगे.

"हम यहाँ बस किसिंग हे करने वाले है?"

"बिलकुल. और कुछ नहीं फ़िलहाल.", अर्जुन के जवाब से मंजू उसके गले लग गयी.

"मैं सोच रही थी की हम यहाँ प्यार करेंगे, पूरा वाला."

"करेंगे न मंजू. लेकिन यहाँ नहीं. इसको साफ़ रहने दो, वो प्यार वही पेड़ की छाव में करेंगे.", अर्जुन की ऐसी परवाह देख वह कुछ देर उसके गले लगी रही. कुछ देर एक दूसरे को भिगोते रहने के बाद जब हौद से बहार आये तोह अर्जुन मंजू के गीले लम्बे बदन को वैसे हे बाहों में लिए चारपाई पर आ गया. कोई कोना ऐसा न था जहा अर्जुन ने होंठो से मंजू के जिस्म पर लगा पानी चूमा न हो. शरीर की गरमी बहोत थी बाकी सूखने के लिए. मंजू खुद हे अपने अर्जुन के ऊपर लेट चुकी थी.

"तुमको देख कर न लालच आ जाता है मुझे. सचमुच दिल करता है के बस ऐसे हे तुम्हारे साथ साड़ी दुनिया से अलग प्यार करते हुए ज़िन्दगी बिता लू.", मंजू थोड़ा जज्बाती होने लगी थी. Kaam-jwar कही न था.

"तुम्हारा हे तोह हु और ऐसा लालच गलत तोह नहीं मंजू. वैसे हम जिस हालत में है अगर कोई इधर आ गया तोह?", अर्जुन कूल्हों को थपकता बीच बीच में उसके गाल, होंठ और गर्दन चूम लेता.

"आने दो जिसको आना है. वह सवाल नहीं कर सकते कोई.", मंजू का उखड़ा हुआ स्वर देख कर अर्जुन ने थोड़ा तेज थप्पड़ लगा दिया था एक नितम्ब पर.

"आउच. गंदे कही के."

"गलत बात तोह तुमने कही के वह सवाल नहीं कर सकते. समझाया था न के वह बड़े है मंजू और औलाद होने के नाते हमारा फ़र्ज़ है इज़्ज़त्त देना. सवाल समय आने पर आराम से कर सकते है.", सुडोल कूल्हों की उस गहरी दरार में उंगलिया दबाते हुए अर्जुन मंजू को अपने और करीब चिपका रहा था.

"ओह्ह्ह.. बीच में ये रहता है न तोह बात भी नहीं होती. उम्माह.. नहीं कहती है ऐसा कुछ. और माँ घर पे है, पापा राजेश मां के साथ. यहाँ कोई नहीं आने वाला, देखा न सफाई कितनी है.", खुद को थोड़ा आगे करती मंजू ने उस मॉटे लिंग को अपनी फूली हुई छूट के बराबर से निकलते हुए जांघो में फंसा लिया. अर्जुन अब निश्चिन्त था ये जान कर की इस एकांत में कोई उन्हें तंग नहीं करने वाला. बातें ख़तम करते दोनों हे बेतहाशा एक दूसरे को चूमते शरीर आपस में रगड़ने लगे थे. हर बार की तरह आज भी मंजू ने हे कमान अपने पास हे राखी थी.

"बस ये हे है जो मेरी परवाह करता है.. आह्हः... तुम्हारा नजरअंदाज करना इसको गुस्सा दिलाता है.. मा.. कितना आह्ह्ह्ह.. मुश्किल होता है शुरू में हर बार.. रुके रहना.", मंजू ने जो लचकता दिखते हुए 1 मिनट में हे वह पूरा लिंग अंदर समाहित कर लिया, वह बहोत था बताने को उसका प्यार. दर्द बहार न आने दिया बेशक छूट की फांके चुआड़ी हो कर रबर सी खिंच गयी थी. कुछ पल आँखे मूंदे वह सहज होने लगी तोह अब कही अर्जुन ने उन रसीले उभारो को जकड लिया. कठै रंग का वह निप्पल चूसते हुए अर्जुन बचा खुचा लिंग भी अंदर भरने लगा.

"प्यार से जान.. आठ.. अब तोह ये और भी ाचा लगता है. आह्ह्ह्ह.. पहले बहोत दर्द होता था लेकिन अब सिर्फ मजा मिलता है थोड़ी परेशानी के बाद.", मंजू भी इस खुले आँगन में मिलान आगे बढाती हुई धीरे धीरे हिलने लगी थी. अब देखने से पता चलता था के अर्जुन के प्यार ने कहा कहा मेहनत करके इस शरीर को निखार दिया था. कूल्हे हलके दबाव पर जैसे हिलते थे, वह purn-golakar चुचो की थिरकन, जांघो का थोड़ा अतिरिक्त घेरा. पहले वाली छरहरी मंजू अब एक पूर्ण युवती बन्न चुकी थी, मांसल और लचकदार.

"आह.. तुम भी तोह किसी नशे जैसी हो गयी हो मंजू. हावी हो जाती हो पल में हे और मुझे लगता है जैसे अंदर खींच रही हो.. आह्हः.. उम्म्म..", मंजू ने हे झटके तेज कर दिए थे और छूट से निकलता ये अतिरिक्त रस लिंग की जड़ पर एकत्रित होता उसको चमकाने लगा. पागलपन में मंजू बदस्तर उसके होंठो को बस खा रही थी. लेकिन अर्जुन के हाथो में बस उन नितम्बो पर पूरा प्यार हे दिखाया. वो इस युवती के साथ अब कोई josh-jor नहीं दिखाना चाहता था. मदहोशी में एक ऊँगली गांड के उस अछूते छेड़ से टकराई तोह अर्जुन उन दरदरी लकीरो को सहलाने लगा जो बताती थी की अर्जुन यहाँ से कोरी है. चुम्बन एकके रुक गया.

"वह करना है?"

"नहीं. बिलकुल भी नहीं, बस जो कर रहे है वही.", अर्जुन के जवाब पर मंजू उतरती हुई बगल में लेट गयी थी. लुंड के फूले हुए सुपडे पर जैसे शीशी उलट दी हो शहद की.

"हो गया और वह भी पता नहीं कितना. साफ़ करू क्या?", मंजू के साखहालां का जान कर अर्जुन ने बस करवट लेते हुए उसके बंद होंठो को चूमा और ऊपरी सतांन को हलके से दबा दिया.

"कुछ साफ़ नहीं करना जितने दोनों का नहीं होता.", यहाँ अर्जुन ने ऊपर आने की जगह ऐसे करवट लिए हे चारपाई हिलना ठीक समझा. रगड़ कुछ ज्यादा हे लग रही थी लेकिन दोनों खुश थे और एक दूसरे के साथ. वही कोई 100-सवा 100 गज दूर शीशम के घने वृक्ष के पास से उन्हें प्रेम में लिप्त देख कर ये व्यक्ति थोड़ा हैरान हो गया. ये कटाई उम्मीद न थी की दोनों यहाँ हो सकते है इस समय और वह भी इतने निर्भीक की खुले में संसर्ग करने लगे. हर तरफ नजर दौड़ाई तोह पाया के वह खुद हे इनके एकांत में चला आया, क्योंकि यही से तोह वह थोड़ा बहोत दिख रहे है. कदम वापिस गौशाला की और हो गए, बहोत सारे खयालो और सवालो के साथ.

"आअह्ह्ह.. अंदर हे आठ.. सारा अंदर हे डालना.. उम्म्म्म..", इस धीमी और लम्बी चुदाई में दोनों को जरा भी थकान न थी लेकिन परिणाम वही था. साधारण से कही ज्यादा वह मरदाना तरल रह रह कर मंजू की छूट की गहराई में अर्जुन ने खाली कर दिया. मंजू और कस के लिपट गयी थी, एक टांग ऊपर रखती.

"हहह.. अब प्रेग्नेंट तोह हो चुकी, अंदर दालु या बहार. फरक नहीं पड़ना चाहिए.", अर्जुन भी वैसे हे बाहों में लिए लिप्त था.

"फरक पड़ता है अर्जुन. ये ख़ास लगता है और मुझे ाचा भी. अब अंदर करने से 1 बचे की जगह 2 तोह नहीं होने वाले इतनी समझ है मुझमे. लेकिन वास्ते क्यों करू ऐसी फीलिंग को जिसमे हमारा मिलान पूरा होता है. कुछ देर ऐसे हे लेते रहो, फिर नाहा के खाना लगाती हु.", अर्जुन ने तोह लेटने के नाम पर आँखें हे बंद कर ली थी और यही हाल मंजू का था. लिंग भी तिथिल हो कर बहार निकल आया लेकिन दोनों वैसे हे सोये रहे, एक दूसरे से लिपटे.

.

.

दोपहर के 2 बजे रामेश्वर जी घर लौटे तोह साथ साथ उमेद सिंह भी चला आया था. अपनी माँ और बीवी के साथ वह सब सामान भी खरीद लाया था जो उसकी चची ने बताया था. विन्नी भी अपने पापा के आने पर इधर कमरे में चली आयी, ट्रे में सबके लिए पानी लेके. पूर्णिमा जी ने अपनी पौती को जितनी हैरत से देखा था उतना हे उमेद और राजेश्वरी ने अपनी बेटी को.

"ऐसे क्या देख रहे हो आप लोग? अब घर में सभी ऐसा हे करते है न. वैसे मेरे कपडे भिजवा देने किसी के हाथ अगर इधर चक्कर लगे तोह. वह तोह अकेले मैं बोर हो जाउंगी, इधर मेरा दिल लग गया है.", विन्नी की ऐसी बात सुन्न कर राजेश्वरी जी थोड़े नाराजगी से देखने लगी लेकिन पूर्णिमा जी ने अपने पौती को दुलारते हुए कहा.

"ाचा है न के तेरा यहाँ दिल तोह लगा. तेरी माँ को तोह चिंता थी के जाने कुछ खाया होगा या नहीं, सोई कैसे होगी और जाने क्या क्या. एक दिन में हे मेरी बची इतनी समझदार हो गयी तोह फिर महीने भर में तोह कौशल्या हे न हो जाये.", पूर्णिमा जी ने इधर अपनी सहेली को भी लपेट लिया था जिनके चेहरे पर अब तनाव न था सुबह वाला.

"मेरी हे तोह है ये, समझदार शुरू से है बस इसकी दूसरी दादी को दिखी नई. विनीता बेटी, ताई को बोल दे तेरी खाना बना दे सबका.", कौशल्या जी ने ज्यादा बात न करते हुए पानी का घूँट लिया और विन्नी तुरंत बहार चली गयी.

"आप परेशां क्यों हो चची जी? भोले की वजह से या फिर माधुरी के ससुराल में कुछ हुआ.", उमेद ने जूती उतार कर एक तरफ रखते हुए पाँव बिस्टेर पर कर लिए.

"हॉस्पिटल फ़ोन किया तोह शंकर वह नहीं था. सुबह नाराज हो कर गया है और जाने कहा टक्कर मार रहा होगा.", कौशल्या जी के इतना कहते हे रामेश्वर जी हंसने लगे. उन्हें भी पता था के जितना भी उनकी बीवी गुस्सा कर ले लेकिन शंकर से नाराज रह हे नहीं सकती.

"आपसे दांत खा के वह कही टक्कर मरता नहीं फिरता. सवेरे वो गुलाटी के साथ राममेहर के उधर काम करवा रहा था. थोड़ी देर पहले गौशाला फ़ोन कनेक्शन लगवाया है तोह अभी आने हे वाला होगा. बाकी सब ठीक रहा चाचा जी?"

"हाँ भाई. मेरी बच्चियां बहोत बड़ी हो गयी है उमेद. तारा ने तोह सफर का पता तक नहीं लगने दिया और शंकर जैसा हे हाथ है उसका गाडी पर. माधुरी के ससुराल में लक्ष्मी में ने जैसे बात की मुझे लगा हे नहीं के वो अभी कॉलेज जाने वाली छोटी सी लड़की है. कपूर जी के धर्मपत्नी तोह दोनों में से एक का हाथ हे मांगने लगी थी अपने छोटे बेटे के लिए. सब ाचा रहा और साथ हे थोड़ा सामान भी लेते आये. तुमने सबसे जरुरी काम कर दिया बीटा, नहीं तोह शाम तक खाना नसीब न होता.", रामेश्वर जी ने सारा हाल बताया तोह उमेद को भी ाचा लगा के Tara-Alka इतनी समझदार हो गयी है. वही बुरा भी लगा के शंकर को ऐसा नहीं करना चाहिए था, काम से काम ऐसे वक़्त तोह नहीं.

"मुन्ना नहीं दिख रहा आज.", ये बात राजेश्वरी जी ने कही तोह उमेद मुस्कुराने लगा अपनी बीवी के ऐसा कहने पर.

"घर पे होता तोह अब तक आ हे जाता, कही लगा होगा किसी काम में. तुझे मिलना है तोह भेजती हु किसी को ढुँढ़वाने.", कौशल्या जी की बात सुन्न कर उमेद हंसी हे न रोक पाया और अपने पति को ऐसे हँसते देख राजेश्वर जी ने अपनी सास का हाथ पकड़ लिया.

"चुप कर. हर वक़्त दांत निकलता रहता है. ये भी लाड करती है अपने भतीजे को, वो अलग बात है के मेरी बहु बोलती नहीं.", कौशल्या जी ने उमेद को झिड़का तोह वह उनकी गॉड में हे पसर गया. कौशल्या जी उसका सर सहलाते हुए कहने लगी.

"ज्यादा हे परेशां कर दिया न आज तुझे? अगली बार 2 दिन तक बस घर में हे रहियो मेरे पास. और इस शंकर की टाँगे मैं तोडूंगी, एक बार आने दे."

"चची जी, लो टॉड के दिखाओ. आ गया आपका सुपुत्र.", उमेद ने अंदर आये शंकर को देखते हे कहा जिसके साथ मेहुल गुलाटी भी आया था. दोनों के हाथ में ek-ek बैग था जो खरीदी का लग रहा था.

"कौशल्या कुछ कह के तोह दिखाए जरा, इधर आ मेरे बचे. नाराज न हुआ कर तू तेरी माँ की बात से. मैं देख लुंगी इसको.", पूर्णिमा जी ने शंकर को अपने पास बैठते हुए कहा और गुलाटी के लिए रामेश्वर जी ने भी कुर्सी खींच दी जिसने तीनो बुजुर्गो के charan-sparsh करने के बाद राजेश्वरी और उमेद को भी नमस्कार किया था. कौशल्या जी गुस्से में शंकर को घूरने लगी तोह वह शर्म से अपनी चची को देखने लगा.

"चची जी, ये कुछ डब्बे तैयार करवाए है निमंत्रण के साथ देने के लिए और बाकी बहार आँगन में रख दिए. वह राममेहर जी के घर भी दुल्हन का जोड़ा, सामान देने के साथ साथ जगह भी तैयार करवा दी है bhoj-baraat के लिए. गहने तैयार हे ले लिए थे और आते हुए गौशाला भी चक्कर लगा आये.", गुलाटी ने एक बैग कौशल्या जी और पंडित जी के मध्य रखते हुए सब बता दिया.

"और ये कहती है के शंकर कोई काम नई करता. बीटा तुम दोनों ने बहोत ाचा किया जो सब निबटा दिया और अगर हो सके तोह अनुपमा की बिदाई तक शंकर के साथ रहना. अकेले का इसका दिमाग उतना नहीं चलता.", पूर्णिमा जी ने गुलाटी का धन्यवाद् करते हुए शंकर को भी पूछकर दिया.

"हाँ ये अफलातून अधूरे दिमाग के साथ पैदा किया था मैंने, इलाज तोह बहोत बढ़िया करता है बस बाकी काम के वक़्त इसको कुछ याद नई रहता.", कौशल्या जी के ऐसे तंज पर शंकर नजरे नीची करते उमेद को देखने लगे. जैसे कह रहे हो के तू हे कुछ कर.

"चची जी, भोला शुरू से ऐसा हे तोह है. आपको भी पता है के वह अकेला कभी रहा नहीं तोह फिर कैसे इतने सालो बाद आप इसको दोष दे सकती है. मेहुल भाई तुमने ाचा काम किया इसके साथ रह कर. चची तोह परेशां थी के ये जाने कहा होगा, कुछ खाया भी होगा या अभी तक भूखा होगा.", उमेद के ऐसा कहते हे पंडित जी की हंसी छूट गयी. और न चाहते हुए भी कौशल्या जी मुस्कुरा दी.

"इसको पता है के मैं इस से नाराज नई रह सकती लेकिन अगर नहीं सुधरा न तोह सच कहती हु शंकर मैंने जो सवेरे कहा था फिर वही होगा. बीटा तू बड़ा हो जा थोड़ा, मेहुल को हे देख ले जो तुझे सही घर लेके आया और अपने किये काम तेरे नाम कर रहा है. देना सीख शंकर, चाहत तोह मरते समय तक ख़तम न होंगी.", कौशल्या जी ने अपने बेटे का हाथ पकड़ कर थोड़ा भावुकता से कहा.

"आइंदा ऐसा नहीं होगा माँ. सॉरी पापा."

"आइंदा ऐसा जल्दी हे होगा, सॉरी कौशल्या.", रामेश्वर जी ने भी शंकर को घेर हे लिया था इस बात पर.

"पापा जिसकी तारीफ कर रहे थे वह कहा है जरा बता दो.", गलती से ये लफ्ज़ निकल हे गया शंकर के मुँह से और गुलाटी ने हाथ पकड़ कर ना में गर्दन हिलाई. तीर तोह छूट हे चूका था jaane-anjaane. उमेद ने भी गहरी सांस ली जैसे शंकर को समझ रहा हो.

"कहा हो सकता है वह? सवेरे दूसरे घर का बिजली, rang-rogan और पत्थर का सामान भिजवाने के बाद शास्त्री जी के घर गया होगा, वह से फिर मंजू के पास और 3 बजे घर होगा. पूरे 5 मिनट बाद. देख लियो अपनी आँखों से, तू भी यही है और मैं भी. बात बेटे बेटे की ले आया तोह यही सही. पौता है वैसे वो.", कौशल्या जी ने अर्जुन का पूरा हाल बताने के साथ मंजू का जीकर भी किया तोह शंकर के चेहरे पर शर्म सी आ गयी थी. गुलाटी ने सवेरे कहा भी था के वह बीटा है, प्रतिद्वंदी नहीं. लेकिन बोल हे गए. इधर बैठक में सबके लिए खाना लग रहा था के बुलेट की gadd-gadd सुनाई पड़ गयी. 3 बजने में 1 मिनट बाकी था और अर्जुन लौट आया था.

"हाँ, तू कुछ पूछ रहा था शंकर? आइंदा गलती नहीं, फेर पूर्णिमा के गले लग के न बचने दूंगी मैं. संदेह नहीं.", कौशल्या जी की बात ख़तम होते होते शंकर जी का झेंपना और भी बढ़ गया था अर्जुन के साथ राजकुमार जी को देख कर. मतलब लड़का इन्हे भी घर लेके आया था. सबसे मिलने के बाद अर्जुन तोह अंदर चला गया लेकिन गुलाटी और कौशल्या जी की मुस्कराहट से शंकर जी को एहसास हो गया था के वो बेमतलब ऐसा खेल खेल रहे हैं जिसका नतीजा जो भी हो, गलती वही कर रहे है

हिमानी बहोत खुश थी अब और अर्जुन से मिलते हे वह सिर्फ धन्यवाद् करती नजर आयी. बेशक कोमल दीदी और प्रियंका दीदी के साथ अगले 2 साल पढ़ने वाली थी, अभी उसके साथ ऋतू और तारा थी. जहा ऋतू परिचय करवा चुकी थी तारा का और अलका कपडे बदलने गयी थी. माँ ने भी अर्जुन को प्यार किया और फिर खाना परसो, तब तक विन्नी बाकी सबको बैठक में खिला रही थी कोमल दीदी के साथ.

"चलती हु आंटी जी और ऋतू अगर घर पे आएगी लेने तोह मैं आती रहूंगी. विन्नी दीदी, आप भी थोड़े दिन रहना प्लीज.", जाने से पहले हिमानी ने सबसे मिलने के उपरान्त ख़ास तौर पर रेखा जी के सामने ऋतू और विन्नी को आमंत्रित किया था.

"मतलब मैं नहीं आ सकती?", प्रीती अभी रेखा जी की बगल में थी जो नौटंकी में उस्ताद हो चुकी थी.

"तुम तोह ऋतू जैसी हे हो न? अलग से कहना पड़ेगा?", जाने से पहले हिमानी ने प्रीती का गाल खींच कर बता दिया था के वह भी पसंद आयी थी उन्हें. अर्जुन उन्हें छोड़ने निकल चला.

01-05-1998
 
भैया 1 बजे से पहले अपडेट दूंगा. ों थे वे तो कसौली फ्रॉम चंडीगढ़. It's डाइनिंग. अपडेट हर हाल में दूंगा
 
बस भाई थोड़ा इंतजार. पहुंच गया हु बस
 
Back
Top