Incest Pyaar - 100 Baar - Page 19 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar





इनायत





ज़ुबैदा

कुछ समय पहले एक चारकोल से तैयार की थी 8 घंटे में (इनायत) और दूसरी बस एक कागज़ पर पानी फैला कर रंग भर दिए
 
अपडेट 111

वक़्त और बदलाव (1)


तक़रीबन साढ़े 6 का समाया हुआ था और अर्जुन कार से उतर कर बड़े गेट को खोलने लगा. सीट पर पंडित जी हे थे और अर्जुन के चेहरे पर ख़ुशी बता रही थी की उसका समय ाचा गुजरा है. लेकिन यहाँ आँगन में ये 4क्ष4 महिंद्रा क्लासिक कड़ी देख वह अपने दादा को देखने लगा जो गाडी को बहार हे एक तरफ लगा कर अंदर चले आये.

"अब इतनी सवेरे किसकी जीप आई है यहाँ दादा जी?", रामेश्वर जी अर्जुन के कंधे पर हाथ रखते हुए साथ हे अंदर लिए चल दिए. चाबी अर्जुन को पकड़ा दी थी उन्होंने और भीतर आँगन से आती आवाजे बता रही थी की कोई ख़ास हे है जो आया है. सामने वाले को देख कर अर्जुन उछाल हे पड़ा.

"चाचा.", वह बिना किसी पर ध्यान दिए इस दैत्याकार शरीर वाले व्यक्ति के गले जा लगा. ये उमेद सिंह थे, जिनके पाँव पर सुरक्षा के लिए गुलाबी कवच लगा था और सामने ये बड़ा गिलास दूध का जो वह पी हे रहे थे.

"भतीजे, तू मेरे चाचा को बुढ़ापे में क्यों दुखी करे रखता है? चरण स्पर्श चाचा जी.", रामेश्वर जी ने कंधे पर हाथ रखते हुए उमेद को बैठे हे रहने को कहा और शंकर की बगल में आ गए.

"तू ठीक था तब तेरे grah-dosh ख़तम नई हो रहे थे और अब टूटी टांग लिए आज इधर आ गया. पार्षद साहब की टीम नज़र नहीं आ रही? और शंकर तुमने कम से दरखास्त की थी क्या जो ये आज यहाँ आ गया?", उमेद सिंह उनके ऐसे मीठे तंज सुन्न कर मुस्कुरा रहा था और शंकर जी भी खुश थे अपने पिता का मूड देख कर. अर्जुन अभी तक उमेद की गॉड में हे बैठा था.

"पापा मैंने हे बुलाया है इसको, नाश्ते के बाद आपने भी चलना है हमारे साथ. वैसा कैसा रहा आज इतने साल बाद गाडी चलना? कुछ सीखा भी इसने या बस तफरी मार के आ गया आपके साथ?", उमेद गरम दूध पी रहा था और कौशल्या जी भी पंडित जी के लिए चाय और अर्जुन का दूध लिए उधर आ बैठी. अर्जुन भी उमेद के बगल वाली कुर्सी पर बैठा था लेकिन कुछ फुसफुसा रहा था.

"यार तू तोह जानता हे है ये आटोमेटिक गाड़ियां. इसमें क्या सिखों मैं इसको ये बता? स्टीयरिंग संभल लेता है लेकिन कल से तू हे लेके जाना सीखने अगर टाइम हो तेरे पास और कोई जरुरी नहीं सुबह हे जाना है. जब दोनों एक दूसरे से मिलो तोह निकल जाना. मैं तोह इसलिए चला गया था के शर्त हार गया और बदले में बहु से चाबी लेनी पड़ी और कार चलनी पड़ी.", रामेश्वर जी ने अपनी धर्मपत्नी से छोटा टोलिया लेते हुए चेहरे साफ़ किआ तोह शंकर जी हैरत से अर्जुन और अपने बाप को देखे जा रहे थे. कौशल्या जी भी हैरान थी.

"कैसी शरत जी? और बुढ़ापे में इस बचे के साथ शर्ते लगते फिरते हो आप?"

"ओह थानेदारनी जी, तेरा बीटा आया हुआ है थोड़ी उसकी सेवा करो ये dada-paute के बीच में क्या रखा है. वैसे शंकर एक पेट्रोल पंप लेना था, काम पैसे में और किश्तों पर. करवा दो भाई ये काम तोह मुझे आराम मिलेगा.", पंडित जी अजीब से बातें कर रहे थे जो अर्जुन समझ रहा था या अब शंकर जी समजह गए थे.

"मुँह लगा के तेल पीती है न ये गाडी? कोई न जो चलाएगा वह भरवाएगा. पंप ले हे लेना चाहिए वैसे, डिमांड में है ये काम.", शंकर जी ने उमेद की तरफ देख कर कहा.

"चाचा गलत बात है ये. मैं कोई घोटाला तोह नई करता जो मेरे बिज़नेस में शंकर हाथ फंसने की कह रहा और ऊपर से आप हे दे रहे हो सुझाव.", उमेद सिंह के कई व्यापार भी थे जिनमे से एक उसके पेट्रोल पंप का काम भी था. आसपास के तीन शहरों में करीब 10 पंप का वह अकेला मालिक था और इतने हे में सांझेदार भी जो अगले शहर थे.

"खोते ये मजाक कर रहा है. वैसे तू आया सही टाइम पर है. नाश्ते के बाद चल हे रहे है तोह 6-6 निशाने भी लगा लेंगे.", रामेश्वर जी की ये बात और जोश देख कर कौशल्या जी बड़बड़ाती हुई उठ गयी और अर्जुन आराम से दूध पीटा रहा.

"हाँ क्यों नई, मैं तोह आया भी था ये सोच कर. शंकर अपना काम करता रहेगा इतने हम रेंज पर चल पड़ेंगे फिर शंकर के साथ आगे जाना है लेकिन पहले आप को वापिस छोड़ जरूर देंगे."

"मैं भी सोच रहा हु आज रेंज पर चालू. लेकिन आप दोनों में से गोल्फ तोह कोई खेलता नहीं.", शंकर जी ने बात थोड़ी बदलनी चाही शायद अर्जुन की वजह से या उनका दिल था खेलने का.

"कपूर को बोल देना अभी के शाम की चाय उसके साथ लेंगे. सतीश भी कह रहा था तोह आज गोल्फ भी सही. वैसे पवन (हॉर्स) भी आ जायेगा आज, बहार वाले फार्म पर.", शंकर जी हैरत के साथ थोड़ा खुश भी थे. सुबह से पहली बार उनके चेहरे पर हे ख़ुशी आई थी जिसमे वह दिल से प्रसन्न थे.

"कल आपके साथ अर्जुन भी चल पड़ेगा. इसको भी थोड़ा बहोत सीखा सकते है.", शंकर जी ने ख़ुशी में अपने बेटे को शुमार करना चाहा.

"अभी नहीं शादी के बाद. और थोड़ा अब ड्यूटी पर भी ध्यान देना है इसलिए आज कर लो जो दिल करता है. फिर shaadi-byaah के काम भी देखने है. रात के 8 अगर घर से बहार बजे तोह फिर सवेरे हे आना बरखुरदार. तुम्हारी माँ अभी बोल कर गयी है के मैं बूढ़ा हो गया हु तोह उसको भी अपने बचो को बताना पड़ेगा वह 2 दशक से बाप बने हुए है और जल्द nana-dada भी होंगे.", शंकर जी पिता की आखिरी बात सुन्न कर झेंप से गए लेकिन उमेद खुश हो गया. वह नहाने के लिए चले गए तोह उमेद ने अर्जुन के कंधे पर बाजू डालते हुए अपने भाई सामान दोस्त से कहा.

"ये ड्रामा अभी तक चलता है बे? वैसे मैं महीने के रेस्ट पे हु, तू आ सकता है अगर दिल करे तोह.", शंकर जी ने हाथ मुँह के सामने रख लिए.

"जो बोलके गए है सुना न ध्यान से. बाकी देखते है, तू छुट्टी पे है तोह खराब तोह होने नहीं देंगे. नरिंदर भी आ जायेगा 2 हफ्ते तक. अर्जुन, अपनी माँ से कहो के चाचा और मेरा नाश्ता लगा दे. तुमने स्कूल नहीं जाना आज?", रुपाली को तैयार देख कर उन्होंने अर्जुन से भी पूछ लिए.

"नहीं, ये हफ्ते और स्कूल है फिर समर वेकेशन है लेकिन मेरे तोह पहले हे एप्लीकेशन गयी हुई है पापा. आज कार्ड छपने देके आने है जो बुआ ने कल तैयार करवाया था वही वाला. उसके बाद ताईजी ने एक लिस्ट दी और एक दादी जी ने तोह वह सामान भी लाना. फिर पुराने घर की मरम्मत के लिए ठेकेदार से जानकारी लेनी है और कल से वह काम शुरू करवाना है.", अर्जुन ने जितने काम बताये थे वह शंकर जी को भी मालूम नहीं थे के इतना कुछ अर्जुन देख रहा है.

"ठीक है. मेरी जरुरत हो तोह बता देना.", शंकर जी ने सर हिलाते हुए सहमति जताई.

"जी जरुरत तोह है, वह अगर आपको समय मिले तोह.", अर्जुन कुर्सी से उठ चूका था और अपनी बात कहते कहते रुक गया.

"जो कहना है कहो. मुझे ाचा लगेगा अगर कुछ मेरे मतलब का काम मैं कर सका तोह."

"जी वह का नक्शा और अंदर की सजावट आप बता पाए तोह. बुआ और दादी कह रहे थे की उस घर को आप अपने हिसाब से बनाना चाहते थे और बुआ का नया घर भी आपने हे तैयार करवाया था.", अर्जुन ने नजरे नीची कर ली थी. शंकर का ये भी एक शौक था जो सिर्फ करीबी लोगो को हे पता था. घर तोह हर कोई बना सकता है लेकिन उस आशियाने की ख़ास सजावट और हर छोटी बड़ी चीज को महत्व अनुसार लगाने का पता था शंकर को. अपनी बहिन के घर का नक्शा खुद उन्होंने बनाया था और बाद में आंतरिक saaj-sajja उनके कहे अनुसार हे करवाई थी उनके जीजा अशोक ने.

"हमारी हवेली भी पहले सिर्फ हवेली थी बीटा. शंकर ने एक महीने में अपने 5 रविवार वह जाया किये थे लेकिन आज जो भी अंदर से देखता है वह पहला सवाल यही करता है के काम किस से करवाया है. हाँ ये अलग बात है के हमारा भोलेनाथ काम अपनी मर्जी से हे करता है और फीस इतनी की हर कोई अफ़्फोर्ड नहीं कर सकता.", उमेद के ऐसे कहने के बाद हंसने से शंकर जी भी हंस दिए.

"तेरे चाचा की यही आदत है, लेकिन अभी तुम मरम्मत करवाओ हम संडे को देखते है और फिर संजीव आ जायेगा तोह सामान भी मंगवा लेंगे.", अर्जुन हामी भर के चला गया अपनी माँ को बताने के पापा का नाश्ता लगवा दे लेकिन उसके कहने से पहले हे आरती दीदी ने 2 प्लेट टेबल पर लगा दी थी. वह इतनी सुबह काम कर रही थी, अर्जुन को यकीन नहीं हुआ. फिर वह भी ऊपर चला गया नाहा कर तैयार होने. आज और भी बहोत काम थे.

इधर थोड़ी हे देर में नाश्ते से दोनों फारिग हुए तोह रामेश्वर जी आ बैठे और उन्हें कौशल्या जी हे नाश्ता करवाती थी. शंकर अपने कमरे में गए थे रुमाल और बाकी सामान लेने जो वह रखते थे. यहाँ सब सामान रेखा जी ने निकाल कर अभी टेबल पर रखा हे था के शंकर जी ने बात शुरू की.

"कल रात मैं आया था. लेकिन यहाँ ऋतू और रुपाली सोई हुई थी."

"जी कल पहला दिन था तोह तबियत ठीक नहीं थी. इसलिए आज रसोई में भी नहीं गयी.", रेखा जी ने अपनी मासिक की परेशानी बताई तोह शंकर जी अब क्या कहते.

"डॉ कांटा से मिल लो, अर्जुन या कोई भी साथ चला जायेगा. ये गंभीर भी हो सकता है क्योंकि पिछले 5-6 महीने से ऐसा होने लगा है."

"जी.", रेखा जी ने ज्यादा बड़ा जवाब न दिए और शंकर जी बहार चले गए. रेखा जी के साथ कुछ समय से हे ऐसा होने लगा था के maasik-chakra के पहले दिन कमजोरी के साथ अतिरिक्त बहाव की समस्या होती थी. अपने पति के जाने के बाद वह अपने घुटने दबती बिस्टेर के किनारे बैठ गयी.

"माँ, आप ठीक तोह हो न?", इधर अर्जुन तैयार हो कर सीधा अपनी माँ के हे पास चला आया था. रुपाली को स्कूल छोड़ने जाने से पहले वह बस देखने आया था के माँ आज रसोई में क्यों नहीं दिखी. और उन्हें ऐसे देख वह सामने आ खड़ा हुआ.

"मुझे क्या होना बीटा, बिलकुल ठीक हु मैं.", रेखा जी ने अपना दर्द चेहरे पर न जाहिर होने दिए था.

"आप सुबह समय से पहले उठी हुई थी और उसके बाद से आप फिर बहार नहीं दिखाई दी. सच सच बताओ माँ के क्या बात है? दीदी भी यही सो रही थी पापा के घर होने के बावजूद.", अर्जुन उनके घुटने पर हाथ रखता हुआ फर्श पर उकडू बैठ गया था. रेखा जी ममता से उसके सर पर हाथ फेरने लगी.

"मुझे कुछ नहीं हुआ है बीटा, जा दीदी इन्तजार कर रही है तेरा उसको स्कूल छोड़ दे.", अर्जुन जानता था के माँ उसको नहीं बता रही और वह उन्हें कुरेदना नहीं चाहता था. वह उनके माथे को चूम कर बहार निकल गया लेकिन कोमल दीदी के पास.

"माँ ठीक नहीं है दीदी, आप बात कीजिये और देखिये उन्हें क्या हुआ है.", कोमल दीदी जैसे जानती थी लेकिन अर्जुन ने जितनी गंभीरता से कहा था वह समझ गयी थी पूरा सच उन्हें भी नहीं पता.

"जा तू रुपाली को छोड़ के आ मैं माँ से बात करती हु. और फिर आने के बाद साथ हे नाश्ता करते है.", दीदी ने अर्जुन को निश्चिन्त किआ और वह रुपाली दीदी को ले कर निकल गया.

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अर्जुन मोटरसाइकिल पे रुपाली दीदी को लिए आकांक्षा के घर के पास हे पंहुचा था के यहाँ पूर्वी और आकांक्षा बहार हे कड़ी दिख गयी. मोटरसाइकिल बराबर में रोकते हे आकांक्षा की बिल्लोरी आँखों में वह ख़ास चमक आ गयी अपने प्यार को देखते हे. पूर्वी थोड़ा नाराजगी से अर्जुन को देख रही थी.

"तुम एक दिन पहले आ गयी? कैसी हो पूर्वी?", रुपाली दीदी ने आकांक्षा से गले लगने के बाद पूर्वी से हाथ मिलाया. अर्जुन खड़ा बस देख रहा था और वह कहता भी क्या दीदी के सामने.

"पापा को काम था तोह हम पहले आ गए. वैसे ये जनाब छुट्टी पर कैसे है?", आकांक्षा ने अर्जुन को ऐसे कपड़ो में देखते हुए पुछा.

"इसकी लाइफ तोह मत हे पूछ. संजीव भैया और माधुरी दीदी की शादी है 21 को, और सारा काम इसके जिम्मे. बाबा तोह कह रहे थी की शादी वाले दिन तक भी काम ख़तम हो जाये तोह भी गनीमत होगी. वैसे पूर्वी तुम आई थी न शनिवार को तोह तुम्हे तोह पता हे होगा?", अब पूर्वी की झूटी नाराजगी फुर्र हो चुकी थी.

"ये न मार खायेगा. अगर इतना हे काम है तोह बता भी सकता है, कही कही तोह हेल्प कर हे सकती हु. अब नाश्ता करने चलोगे घर?"

"अभी टेबल पर नाश्ता इन्तजार कर रहा है मेरा. आप लोग करो बातें मैं चलता हु फिर शहर भी जाना है. गीता आंटी को कहना के जल्द हे आऊंगा मैं और दूसरे घर के लिए सोलंकी अंकल ने हे ठेकेदार भिजवाया है, पूछ लेना. Bye आकांक्षा, नोट्स लेने कर आऊंगा.", अर्जुन ने मोटरसाइकिल स्टार्ट हे की थी की संदीप पिछली सीट पर आ बैठा.

"ईद के चाँद चल अब स्कूल तक छोड़ हे दे.", अर्जुन हँसता हुआ उसको लिए सीधा निकल लिए.

"ऐ तुम दोनों का कोई चक्कर चल रहा है क्या?", रुपाली दीदी के ऐसे सवाल पर पूर्वी भी ध्यान से आकांक्षा को देखने लगी जिसके चेहरे पर हलकी लाली थी लेकिन कोई शर्म या परेशानी नहीं.

"बेस्ट फ्रेंड है मेरा, तुमसे एक साल पहले से. अब इसको चक्कर तोह मत हे कहो और अर्जुन के साथ मैं कम्फर्टेबले हु. बस इतना हे है, चाहे माँ से पूछ लेना. अब चले और दीदी आप जरा बुआ की हेल्प करवा देना अगर टाइम मिले तोह.", पूर्वी को वही छोड़ कर दोनों लड़किया अपने स्कूल की तरफ चल दी बातें करती हुई. रुपाली दीदी को ाचा लगा था सुन्न ये सुन्न कर की ाकनसक्षा और अर्जुन बेस्ट फ्रेंड है.

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"भतीजी, तुमसे मिलने कोई आया है.", उमेद सिंह इस निजी हॉस्पिटल के ख़ास कमरे में अकेले दाखिल हुआ था जहा शबनम सिंह उपचार के साथ हे 24 घंटे नजर में भी थी. देख रेख का उचित प्रबंध बता रहा था जैसे दुश्मनी से ज्यादा सामने वाले को इस लड़की की परवाह थी. उमेद सिंह को ऐसे अल्मुनियम की छड़ी के साथ अंदर आते और अपने पास बैठते देख शबनम के चेहरे पर कई भाव उभर आये. इसके भी पाँव की हड्डी में फ्रैक्चर हुआ था लेकिन किस्मत ाची थी जो सुशीला जितनी चोटिल न हुई. मामूली जख्म भर रहे थे जिनपर आई पपड़ी दवा से लिपि थी.

"मुझे किसी से नहीं मिलना और मैं कोई भतीजी नहीं हु एक हत्यारे की.", अभी तक उसके तेवर कम् नहीं हुए थे या शबनम दिखावा कर रही थी की वह मजबूत है.

"यहाँ तुमसे इजाजत नहीं ली जा रही भतीजी. बताया जा रहा है के आराम बहुत हो चूका और अब काम की बात की जाएगी. समझदारी नहीं दिखने की सूरत में ये कमरा खली हो जायेगा और शमशान में 4 मैं (40 कग- 1 मैं) लकड़ी खराब हो जाएगी. कोशिश करना के गलती न हे हो, वह बात उतनी हे समझता है जितनी उसको समझ आये.", उमेद सिंह की बात ख़तम होते हे एक कोने में कड़ी नर्स सर हाँ में हिलती बहार चली गयी और सामने से कमीज की आस्तीन कोहनी तक ऊपर किये शंकर शर्मा इस कमरे में दाखिल होने के साथ हे दरवाजा बंद करके शबनम के दूसरी तरफ आ बैठे. औजार की ट्राली अपनी तरफ खींच कर वह बारीक सी चंद्राकार (स) टाँके लगाने वाली सुई उठाते हुए उन्होंने कोई haal-chaal न पूछते हुए शबनम का हाथ अपने हाथ में पकड़ लिए.

"वह 7 लोग तुम्हारा साथ देने वाले थे. कैसे पहचान हुई उन पेशेवर कातिलों के साथ?", शंकर जी का ये सवाल और अपनी पहली ऊँगली पर मजबूत पकड़ देख कर शबनम के सुन्दर चेहरे पर पसीना उभर आया.

"Main..main ऐसे किसी भी आदमी को नहीं जानती. मैं सच कह रही हु. आह्ह्ह्हह.. माआ.. प्लीज रुको रुको..", वह स्टील की बारीक सुई कितनी पैनी थी इसका अंदाजा उमेद को भी लग गया था जब ऊँगली के आरपार वह नाखून से बहार निकल आई. शबनम का एक पाँव बंधा था और दूसरे पर उमेद का हाथ था. ऊँगली के भिन्डने के 5 सेकंड बाद हे रक्त की बूँद निचे टपकी थी. दर्द से चेहरे सफ़ेद पड़ गया था.

"Aana-kani की तोह 20 उंगलियों का निशाँ मिटा दूना बिना बेहोश किये. कौन था तुम्हारे साथ और कैसे मिली तुम.?"

"मोहर सिंह ने मिलवाया था मुझे उस से. असली नाम नहीं पता बस उसको लोहान बोलते है. उप और हरयाणा बॉर्डर पर वह यही काम करता है. पैसे के बदले में गिरोह साफ़ करने का. तुम मेरे चाचा लगते हो, ऐसा मैट करो मेरे साथ.", शबनम जो भी दिखा रही थी वह उतनी कमजोर तोह नहीं थी.

"20 लाख मोहर सिंह के पास तोह पड़े नहीं होंगे, रिवॉल्वर वह भी स्वचालित जो आसानी से नहीं मिलती वह भी तुम्हारे पास थी. पीछे से कौन मदद दे रहा था तुम्हे?", इस बार वह सुई ऊँगली में हे छोड़ कर शंकर जी ने दांत उखाड़ने वाला जमूरा इस हाथ के अंघूठे की जड़ पर लगा दिए था.

"मेरी माँ के बहोत पैसे हैं. aahhhhhhhh...maaaa..", इस बार खून नहीं निकला था लेकिन 'कड़ाक' की आवाज से वह नाजुक अंगूठा अपनी जगह से लटक चूका था. शबनम बिस्टेर पर हाथ पाँव पटकती चीखे मार रही थी. लेकिन न उमेद सिंह के चेहरे पर कोई भाव आया और न शंकर ने को प्रतिक्रिया दी.

"मार डालो मुझे .. आह्हः.. जल्लाद हो तुम.. मैं रिश्ते में तुम दोनों की भतीजी लगती हु आह्हः माँ... प्लीज तरय तो अंडरस्टैंड. मैं कुछ भी कहूँगी तोह यहाँ से निकलते हे वह लोग मुझे मार देंगे. ाःह.. प्लीज स्पेयर में.", शबनम तड़पने के बाद कुछ सम्भली तोह वह गिड़गिड़ा रही थी.

"नाम और पता.", इस बार उमेद ने सवाल दोहराया. "और तुम्हे वादा करता हु के मैं खुद तुम्हे सुरक्षित तुम्हारी जगह पंहुचा दूंगा."

"ताराचंद और मला तोमर. आह्हः.. एक और भी था लेकिन वह दोनों उसका नाम नहीं लेते थे. पैसा, गाडी, पिस्तौल ताराचंद अर्रंगे करके देता था और तोमर मेरे रहने खाने के साथ सेफ ट्रेवलिंग अर्रंगे करता था, माँ ताराचंद की rakhi-behan है. लेकिन तुम लोग बड़ी गलती कर रहे हो. बेशक वह सब इसमें शामिल नहीं हुए लेकिन उनकी पहुँच और ताक़त कही ज्यादा है."

"तेरी माँ रंडी थी ताराचंद की और तूने भी तोह वही सब किआ है न उसके साथ. गांड में गोली मारी थी मैंने उसके और पता है वह कमरे में तेरी फोटो पकड़ कर हिला रहा था. चल अब अगला सवाल पूछ रहा हु लेकिन गलती की सजा होगी chakshu-bhidan. ी विल स्टिच योर आईज इन केस यू दो नॉट आंसर माय क्वेश्चन.", शंकर जी ने जहा पहले शबनम को जलील किआ था अब वह बता रहे थे के अगला दर्द कैसा देने वाले है.

"तुम जल्लाद हे हो.. मैं लड़की हु और वह भी तुम दोनों की भतीजी."

"रंडीरोना बिलकुल नहीं. वह घर में तेरा साथ देने वाला कौन है जो हर खबर तुझे देता रहता था चंद्रो ताई की और इस काम के बाद तेरा अगला कदम क्या होने वाला था.?", इस बार सूई में धागा डालते हुए शंकर का स्वर थोड़ा सख्त था वही उमेद ने दोनों हाथ ाचे से जकड लिए थे शबनम के. काल हे तोह था जो ऐसे तड़पा रहा था. हत्यारा होता तोह मार के दफ़न कर देता.

"प्लीज रुको मैं बता रही हो. पहले हे मेरी हालत क्या कर दी है देखो. मैं बता रही हु सब.", रट हुए शबनम गिड़गिड़ा रही थी की जो भी पूछना है आराम से. आँखों की सिलाई का सुन्न कर हे पेशाब निकलने वाला था. शरीर के रोये खड़े हो चुके थे और धड़कन ast-vyast. सांस ले कर उसने बोलना शुरू किआ.

"सरपंच ज़िले सिंह का घर हवेली के हे साथ है. वही एक व्यक्ति है जो रोज दादी से मिलता है और घर भी आना जाना है."

"वह तेरे झांसे में कैसे आया?", शंकर जी ने बात बीच में हे काट कर ये सवाल किआ. वह सरपंच को ाचे से जानते थे जो शुरू से हे ताई का पडोसी रहा है.

"Wo..wo मैं नहीं बता सकती लेकिन कीमत के बदले वह काम कर रहा था मेरा. तुम्हे जवाब से मतलब है मैं दे रही हु न. ज़िले सिंह मुझे वह की हर बात बताता था और दादी के बाकी परिवार को मारने के बाद माँ ने कहा था के ## मोडल टाउन, ##### शहर में कृष्णा और उसकी दोनों बेटियों को मारना है. अगला काम यही था."

"तेरी माँ की..... साली 2 कौड़ी की रंडी मेरे भाई के घर तक जाएगी... बिंदु का एड्रेस बोल अभी के अभी माँ की लोदी. यही गले से छूट तक एक लकीर बना दूंगा अगर अब कुछ भी अलग बताया तोह. एक बार में पूरा एड्रेस और गलती की सजा मैं ऐसी दूंगा के कोठे पर तेरे 10 रुपये नहीं मिलने वाले.", शंकर कभी ऐसे हालात में आप खोने वाला व्यक्ति नहीं था इसलिए उसको रामेश्वर जी ने चुना था शबनम से सब उगलवाने के लिए लेकिन नरिंदर के बारे में सुनते हे चेहरे लाल और आँखों में आग उतर आई थी. शबनम को महसूस हुआ के गले पर सचमुच हे वह तीखा ऑपरेशन ब्लेड शंकर लगा चूका है और अब बिस्टेर गीला हो चूका था. उमेद किसी और हे मिटटी का था जो अभी भी सुकून से बैठा था.

"विला ##, स्ट्रीट क्सक्स नियर ओल्ड ट्राफ्फोर्ड, मेनचेस्टर. और एक फार्म है जहा माँ ज्यादातर रहती है कंट्रीसाइड में रौच्दले. मिर्ज़ा फॅमिली. मैं सिर्फ वही कर रही हु जिस से मेरी माँ को सुकून मिले. आपने भी तोह अपनी माँ के लिए इतना कुछ कर दिए था. स्पेयर में प्लीज, ी don't वांनै दिए अंकल.", शंकर जी ने वह ब्लेड फर्श पर फेंक दिए और फिर से कुर्सी पर बैठ कर खुद को शांत करने लगे. शबनम सबकुछ अपनी माँ के लिए कर रही थी.

"मेरी माँ गलत नहीं थी शबनम और मैंने सिर्फ उनके लिए वह नहीं किआ था. इसका भी तोह परिवार उजाड़ गया था, क्या गलती थी रघुवीर ताऊजी की. तुम्हे कोई दुःख नहीं देगा लेकिन बस अभी यही रहना और हो सके तोह कोई गलती मैट करना जिस से मुझे सोमबीर काका से माफ़ी मांगनी पड़े एक और अपराध की.", शंकर जी भी अलग हे इंसान थे. थोड़ी हे देर पहले इस लड़की और माँ को रंडी तक बोल दिए था और अब उसका सर सेहला रहे थे. उमेद भी उनके कथन पर हामी भर रहा था.

"यहाँ तुम अपने चाचा की शरण में हो अगर वफादार हो तोह.", उमेद सिंह ने वह बेतार घंटी बजाते हुए नर्स को बुलाया और उसके आने से पहले शबनम ने रट हुए कहा.

"माँ मुस्कान को मरवा देगी. उसका इस सब से कुछ लेना देना नहीं है वह लड़की बेगुनाह और मासूम है. उसके पिता भी बहोत ाचे इंसान है जिनकी जीने की वजह सिर्फ मुस्कान है. प्लीज उसको बचा लो.", शबनम ने पहली बार अपनी सौतेली बहिन के प्रति फ़िक्र दिखाई थी. आँखों में अभी भी आंसू थे और शंकर जी ने वह सूई निकल कर स्पिरिट का फाहा वह लगा दिए था.

"मुस्कान सुरक्षित है राममेहर के घर और अर्जुन उसका ध्यान रख रहा है.", उमेद सिंह के इस खुलासे से शंकर जी हैरत से देखने लगे अपने इस भाई को. वही शबनम ने कुछ पल के लिए आँखें मूँद ली लेकिन फिर भी मुँह से आवाज निकल आई.

"अर्जुन उसको कुछ नहीं होने देगा. अर्जुन ने मेरी ज़िन्दगी बचाई है तोह मुस्कान को वह कैसे कुछ होने देगा. अर्जुन आप लोगो जैसा बिलकुल नहीं है. वह उनमे से है जो जुंग ख़तम करने के एवज में खुद को भी भेंट कर सकता है लेकिन दूसरा पहलु तोह आपने भी देखा था न उमेद अंकल. वह काल है जो अपनों के लिए यमराज से भी भीड़ सकता है. अर्जुन उस मेनका के लिए गाला कटवाने को तैयार था, कितनी मार खाई थी उसने भीम से लेकिन उफ़ तक नहीं की थी. क्या किआ फिर भीम के साथ देखा था न आपने?", बात होने से पहले हे नर्स अंदर आ गयी.

"सिस्टर किसी ऑर्थो को बुला कर थंब का ट्रीटमेंट करा देना. पहले बेडशीट और कपडे चेंज करने है. ये अगले 3 हफ्ते तक यही है.", शंकर जी ने खड़े होने के साथ हे कहा और उमेद के साथ बहार चल दिए.

"अर्जुन का तुम्हे कैसे पता गज्जू?", ये दोनों के बीच प्यार का नाम था उमेद का.

"वह मेरा शिष्य है शंकर, खून तेरा है लेकिन मैंने पला है उसको. हर बात वह मेरे साथ करता है. मुस्कान मैंने गॉड ले ली है उसके कहने पर, बिजेन्दर की शादी के बाद वह मेरे घर रहेगी. वह मेरे आदमी सुरक्षा करते है और हॉस्टल में कही ज्यादा सुरक्षा है मुस्कान के लिए. अब तू बस चाचा जी से बात करके उन्हें बता क्या करना है. तोमर मैं देख लूंगा लेकिन ज़िले सिंह को तू निबटा. बाकी इंग्लैंड अपनी हद्द में नहीं आता याद रखना. इस लड़की को तोह फ़िलहाल यही रखते है.", उमेद ने तस्वीर साफ़ की लेकिन शंकर जी तोह बस अर्जुन पर हे अटके हुए थे.

"तू उस लड़के की क्षमता से वाकिफ है न उमेद?"

"नहीं. कोई वाकिफ नहीं है उसकी क्षमता से और वह खुद नहीं जानता के वह क्या कर सकता है. इसका जवाब भाभी या चाचा जी दे सकते है अगर उन्हें तेरे पर अर्जुन जितना हे ऐतबार हो तोह. आठ (8) जमात में उसने मुझे पटक दिए था वह भी साधारण तरीके से और जहा तक मैं जानता हु असाधारण तोह बस झलक भर सामने आया है सुदर्शन या भीम की रूप में. वह कनेक्शन था कुछ और ऐसा हे के बार हॉस्टल में भी हुआ था यहाँ आने से पहले लेकिन शंकर वह उसकी पूरी क्षमता नहीं है. तीनो में बस के समानता है के अर्जुन के करीब रहे होंगे ये लोग जो वह आप से बहार हो गया, नियंत्रण में. बस ये सोच के सबसे ज्यादा प्यार वह किस से करता है. भूल कर भी उस पर संकट नहीं आना चाहिए.", उमेद सिंह की बात से शंकर जी भी एक हद्द तक वाकिफ थे. सुदर्शन ने प्रीती का हाथ पकड़ा था तोह वह साल भर के लिए अपाहिज कर दिए गया. वह भीम तोह अलग हे मनसूबे पाले था लेकिन अगर ऐसा बात है तोह अर्जुन ऋतू के साथ कुछ होने पर क्या कर गुजरेगा?

"वह घर में ठीक है गज्जू. पापा से ये इंग्लैंड वाली बात करते है और तू इसके बाद तेरा काम कर मैं मेरा करता हु. वैसे तोमर मेरे लिए आसान शिकार है."

"तोमर मेरे लिए सही शिकार है लादले. साला प्लाई की मार्किट पे कब्ज़ा किये बैठा है बाघपत से यमुनानगर तक. वह तीसरा ताराचंद बता सकता था लेकिन तू किसी से पूछता कहा है कुछ? और इस तोमर को वक़्त देने की गलती मैं नहीं करने वाला. रह गयी उलझन.", उमेद ने सोचते हुए कहा और अपनी अल्मुनियम की लाठी के सहारे आराम से चलता वह लिफ्ट तक आ गया.

"ये चुनाव में कोई पैसा तोह लगता होगा न गज्जू?", शंकर जी का सवाल सटीक था और उमेद के चेहरे पर मुस्कान आ गयी.

"भोले तू न कभी कभी इन्दर जैसा सोच लेता है. ले मेरे चुनाव फण्ड का इंतजाम हो गया समझ ले.", उमेद ने लिफ्ट का बटन दबाया और दोनों नीचे आने लगे.

"गज्जू तुझे बुरा नहीं लगता? पहले तू मैं और इन्दर हर वक़्त साथ होते थे और अब तोह मिलना महीने में होने लगा है.", शंकर जी ने ये बात बिना सोचे कही थी. कभी ये त्रिमूर्ति थे और आज हालात बदल गए थे.

"देख भोले, तू हमेशा हे ऐसा था. जब जिसके साथ उसके साथ. इन्दर और मेरा अलग हिसाब है जैसा उसके साथ तेरा है. पता है हम लोग भाई है और भाई अलग नहीं होते बस उनके दोस्त बदल जाते है. तुझसे अलग होने के बाद मुझे अर्जुन मिल गया तोह तेरी याद नहीं आई उतनी. हाँ कभी कभी अखाड़े में तेरी कमी लगती है. इन्दर तोह मुझे पटकता था लेकिन तू मेरे बराबर था. इतना मैट सोचा कर भाई, बस ये ध्यान रखना के चाचा अपना बड़ा नेक आदमी है. बहोत लांछन लग गए उनके ऊपर हमरै वजह से.", उमेद अतीत से बहार आया लिफ्ट का दरवाजा खुलते हे और बात ख़तम करता वह शंकर के साथ बहार निकल चला. फायरिंग रेंज में रिपोर्ट देनी थी अभी और आगे के बारे में बातचीत अभी तक पक्की नहीं हुई थी. दिन की शुरुवात उम्मीद से बेहतर हुई थी दोनों की.

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अर्जुन नाश्ते से फारिग हुआ तोह कौशल्या जी उसको कुछ समझा रही थी और इधर राजकुमार जी भी hath-mooh धो कर उनके समीप बैठे वार्तालाप सुन्न रहे थे. आँखे हलकी लाल थी, शायद अपर्याप्त नींद या किसी ख़ास वजह से.

"कार्ड आज छपने देगा तोह वह परसो से पहले तोह देने वाला नहीं है. और 3 हफ्ते में कितना काम है ये बस तू और मैं जानते है. बाकी सबको तोह अपने mel-milap से फुर्सत नहीं. ये राशन और तेरी ख़ास खुराक का सामान भी लेना है. स्टेडियम जाना मुश्किल लगता है इस बीच तोह अपने सेक्टर की व्यायामशाला (गयम) में महीना लगा ले. समय निकलना अब तेरे हाथ में हैं.", कौशल्या जी अर्जुन को सब समझा रही थी.

"दादी वह सब बाद में देखेंगे. स्टेडियम के टाइम कोनसा कुछ और काम हो सकता है, मैं कर लूंगा कुछ न कुछ. फूफा जी ने भी आना है आज, दादा जी तोह शाम को गोल्फ खेलने का जीकर कर रहे थे? बस माँ को दिखा के मैं मार्किट चला जाता हु, फूफा जी के लिए भी तोह कुछ लेना हे पड़ेगा.", अर्जुन ने अशोक जी का जीकर किआ तोह राजकुमार जी खुद हे झेंप गए क्योंकि उनकी माँ घूर कर देखने लगी थी अपने बड़े बेटे को.

"यहाँ दामाद से जरुरी सबके अपने काम है. Mauj-masti की मनाही नहीं करती लेकिन जिमेवारी बस तू उठा. मैं रिक्स नहीं लेती अब कोई.", कौशल्या जी ने अपने छोटे से बटुए से वह एक और पर्ची निकाल कर अर्जुन को पकड़े और इधर मधु बुआ भी अर्जुन की बगल में आ बैठी.

"क्या हुआ है रेखा को? और इनके आने के लिए कोनसे सामान की बात हो रही है.?", मधु बुआ ने बात कहते हुए अर्जुन के हाथ से पर्ची ले ली.

"बुआ, घर में शादी है तोह फूफा जी अकेले दामाद है यहाँ के. उनका परिवार सबसे पहले आमंत्रित करना पड़ेगा न दादा जी को? और आपके बिना तोह जैसे ये परिवार पूरा नहीं होता तोह वह भी नहीं होगा.", अर्जुन ने बुआ का एक हाथ अपने दोनों हाथ में थाम कर जैसे विनती कर दी थी.

"इस सबका क्या मतलब है अर्जुन? माँ ये क्या कह रहा है आपको समझ आ रहा है?"

"बुआ, दादा जी सबसे ज्यादा प्यार आपसे करते है. वह हमेशा आपको खुश देखना चाहते है लेकिन इसके बदले थोड़ा सा प्यार और कोशिश आपकी भी बनती है. बेटी अपने pati-pariwar के साथ मायके में सेवा करवाए बस यही इत्छा है दादी और दादा जी की.", अर्जुन क्या कह कर चला गया था वह मधु को भी समझ न आया लेकिन राजकुमार जी भी अपने भतीजे के साथ हे उठ गए थे. वह अर्जुन के साथ हे जा रहे थे रेखा को दिखने और फिर मार्किट से सामान लेने.

"देख मधु, तेरे पापा कभी तुझे कुछ नहीं कहेंगे क्योंकि उनका लगाव तेरे साथ सबसे ज्यादा है. अर्जुन जाने कैसे उनके दिल की हर बात समझ जाता है और वो जो कह रहा था शायद उसकी उम्र और रिश्ता इजाजत नहीं देता खुल कर कहने की.", कौशल्या जी ने कुर्सी से उठ कर अपने कमरे की तरफ चलते हुए कहा और मधु भी अपनी माँ के पीछे पीछे चल दी.

"आप तोह कह सकती है या आपको भी इजाजत नहीं है?", कमरे की लाइट जलाते हुए मधु भी बिस्टेर पर अपनी माँ के पास बैठ गयी.

"अशोक तेरे लिए लापरवाह हो रहा है. फैक्ट्री, विदेश और पैसा उसको ज्यादा व्यस्त रखता है. बचे भी घर नहीं रहते और तू अकेली इतनी दूर हिमाचल रहती है. तेरे पापा बहोत खुश है आज तुझे पहले की तरह खुश देख कर. कितने सालो बाद ये देखा है उन्होंने. वह तोह अशोक से बात करना चाहते थे की तुझे अब यही छोड़ दे. क्या वह सही करेंगे ऐसा कर के?", कौशल्या जी ने फैंसला न सुनते हुए बस मधु की मंशा जान न चाहा.

"इस घर में सब मेरा ध्यान रखते है न माँ और वह तोह कोई होता हे नहीं मेरे पास."

"यही उनकी चिंता है बेटी. अर्जुन को पता है के वह इस बात से परेशां है, सवेरे 4 बजे वह तेरे पापा से बस यही बात कर रहा था. अर्जुन को तुझ पर भरोसा है के तू अशोक के परिवार को यहाँ की बहुओ से ज्यादा बेहतर संभल सकती है, जाने कैसे उसने ये कहा लेकिन मुझे अर्जुन पर उतना हे विश्वास है जितना मैं इन पर करती हु. वह तेरे पापा से कह रहा था के उसकी बुआ चाहे तोह एक क्या 10 परिवारों को जोड़ सकती है.", कौशल्या जी ने तुलसी की माला को हाथ पर कपडा पहनते हुए उठा लिए. मधु का दिल अलग धड़क रहा था और दिमाग अलग.

"उसने एक बात कही थी अपने बात रखते हुए बेटी. जो इंसान दुःख को गहराई से जानता है वही सुखी परिवार की नीव रख सकता. गुस्सा एक आवरण भर है क्योंकि कुछ म्हणत तोह सामने वाले को भी करनी चाहिए उस आवरण को हटाने की. उसकी बुआ अपने पापा की लाड़ली सिर्फ लड़की होने भर से नहीं है, वह उनके जैसी हे है. अनुशाशन, बेहतर प्रयास, लक्ष्य और गंभीरता से लोग डरते है तोह लोग गलत है, उसकी बुआ नहीं. वो उस परिवार को संभल सकती है अगर उनके पति एक बार विश्वास दिखाए तोह.", कौशल्या जी ने सारा विवरण दे दिए था मधु को जो भी अर्जुन ने कहा था.

"उसने ये सब पापा से कहा?", मधु की आँखों में हलकी नमी और थोड़ी हैरत थी.

"उसने तोह ये भी कहा के चारो बचो में सिर्फ तुम हे हो जो दिल की सबसे नरम भी है और अकेली भी. अर्जुन तुझे इतना कैसे जान गया बेटी? मुझे लगता है जैसे तेरी परवरिश मैंने नहीं उसने करि हो."

"कभी कभी परवरिश बड़े होने के बाद भी हो जाती है माँ, जरुरी तोह नहीं बचपन में सब सीखा जाये. अर्जुन चाहता है के मैं ससुराल में राहु तोह ठीक है, भाभी को बोल देना के मेरे सामान भी पैक कर देंगी कल तक."

"वह बदमाश मुझे बोल कर गया है के उसकी बुआ को ब्याह के शगुन तोह बाद में देने है, पहले वो यहाँ maa-baap के घर अकेली आई है तोह इस बारी का सामान और तोहफे साथ हे लेके जाएँगी. कोई ये न कहे के शादी में शगुन के वक़्त हे kapde-latte देके काम चला दे. तेरे पापा ने भी सवेरे चेक सिग्न करके दे दिए था उसको, चली जाना शाम को बाजार."

"वह सब पहले हे करके बैठा है तोह मुझे सलाह क्यों दे रहा था थोड़ी देर पहले? वह उम्र से दुगना नहीं जी रहा माँ? एक बार हाथ लगने दो इस अर्जुन के बचे को, मेरे घर से मुझे निकाल रहा है. और मेरी सास और ससुर के कपडे साथ देके भेजना, पहले कह देती हु.", मधु ने पुराने अंदाज में गुस्से से कहा तोह कौशल्या जी ने अपने लाड़ली को गले से लगा लिए. वह खुश थी और मधु की आँखों ने उनसे नजरे बचा कर वह आंसू बहा दिए जो कुछ देर से रुके हुए थे.

"हे प्रभु राम, shat-shat नमन. भगवान् मेरे परिवार को, बचो को ऐसे हे खुश रखना. अपनी शरण में बुलाने तक ये घर ऐसे हे आबाद रखना प्रभु.", कौशल्या जी कुछ देर अपनी बेटी को ऐसे हे सीने से लगे उपरवाले का शुक्रिया करती रही. मधु भी जल्द हे अलग हो कर बहार निकल गयी चेहरा धोने और उस शैतान को ढूंढ़ने जो कब का घर से जा चूका था.

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9 बज रहे थे सुबह के और रामेश्वर जी के साथ बड़े सांगवान जी कान पर dhwani-rodhak लगाए निशानेबाजी का लुत्फ़ ले रहे थे. शंकर थोड़ी दुरी पर बैठा वह काली कॉफ़ी कप में उड़ेलता उमेद को अपनी पिस्तौल तैयार करते देख रहा था. वह दोनों भी इधर हे चले आये थे मुस्कुराते हुए और शंकर ने 2 कप में उनके लिए भी चाय दाल दी, दूसरी केतली से.

"Maan-na पड़ेगा भाई साहब 70 की उम्र में भी 10 मीटर से आपका निशाना अचूक है. मेरे तोह 4 निशाने घेरे में हे मुश्किल से आये और 2 तोह बोर्ड से बहार.", सांगवान जी ने तोलिये से चेहरा साफ़ करते हुए एक कुर्सी रामेश्वर जी के लिए खींची और दूसरी पर खुद बैठ गए.

"धर्मवीर भाई, 10 मीटर से थोड़ा आगे मेरे भी निशाने फ़ैल हे है. पुलिस रेंज की यही सीमा निर्धारित रहती है न लेकिन डॉक्टर होने के बावजूद पिस्तौल पर पकड़ बड़ी उम्दा है यार.", रामेश्वर जी ने भी हाथो को साफ़ करते हुए पहले पानी का घूँट लिए और फिर उमेद को देखने लगे.

"ये जनाब हमेशा बस दूर से मिले है, पहचान पुराणी है लेकिन लगता है घुलते मिलते नहीं. भाई हम भी तुम्हारे चाचा लगते है उमेद सिंह."

"चाचा जी, क्यों याद दिलाते रहते हो आप ये बात. जितनी बार मिला हु आपको घर आने का न्योता दिए लेकिन खुद बताये के कभी विचार तक किआ आपने? हाँ शंकर के लिए तोह आप 24 घंटे उपलब्ध रहते है.", उमेद ने भी हंसी हंसी में तंज़ कस दिए था.

"भाई तुम जवान लोग और मैं बूढा डॉक्टर, क्या करता बताओ हवेली पर आके?"

"जो यहाँ कर रहे है वही करते. वैसे आपके खानसामा से ाचा मुर्गा भी बना लेता हु मैं और कुत्तो का शौक आपके जितना हे रखता हु, शायद नस्ली लगाव अलग होगा बस. आ भाई भोले, देखे तेरे निशाने जरा.", एक पिस्तौल शंकर की तरफ सरकते हुए उमेद ने अपने बाए हाथ में सफ़ेद कपडे का दस्ताना पहना तोह रामेश्वर जी ने बिना बोले कुछ इशारा किआ बड़े सांगवान जी को और Shankar-Umed के जाते हे उन्होंने नजरे पीछे घुमा ली. शंकर के कान पर आधुनिक सा हैडफ़ोन जैसा यन्त्र लगा था और 2 गज सामानांतर खड़े उमेद के कान उजागर थे जैसे उसको ये शोर पसंद हो.

"आप कह रहे थे की ये लड़का ख़ास है. हथियार चलने भी दक्ष है ये?", चाय की चुस्की लेते हुए बड़े सांगवान जी ने पुछा तोह रामेश्वर जी ने हामी भरी. साढ़े 6 फ़ीट का उमेद उस वजनी पिस्तौल को कलम की तरह उठाये था और शंकर की मांसल कलाई बता रही थी की उसकी पकड़ भी कही कमजोर नहीं थी. 3 गोल घेरे को बीच केंद्र 1, बहरी घेरा 2-5, और सबसे बाहरी 6-9 से अंकित था. शंकर का पहला निशाना उस दूसरे घेरे में लगा और उमेद का सटीक उस गोल बिंदु के बीच. रेंज से बहार बैठे बड़े सांगवान जी देखते हे रहे उन दोनों को. उमेद की सटीकता का अंदाजा उन्हें हो गयाथा जब 6 में 5 उस एक इंच के गोले में जा धंसे, और जो चूका था वह भी 2 इंच पर. लेकिन शंकर के निशाने भी किसी हिसाब से ज्यादा चुके नहीं थे, हर निशाना उस 2-5 इंच के दायरे में रहा था.

"ये उमेद मेरी सोच से कही ज्यादा हे विलक्षण है पंडित जी. शंकर का तोह पता है के वह जो भी करता है उसमे पूरा उतर जाता है लेकिन इस लड़के की प्रतिभा नहीं पता थी. आप जानते है ये कॉलेज और हॉस्टल में भी Shankar-Narinder के साथ पड़ा रहता था. शायद नरिंदर के साथ इसका ज्यादा लगाव है.", वह वह दोनों अभी अपनी बंदूके बदल रहे थे जैसे मैं नहीं भरा हो दोनों का और यहाँ पंडित जी सांगवान जी की बात सुन्न रहे थे.

"ये 4 थे धर्मवीर और इनकी दुनिया बस आपस में हे थी. रघुबीर का दूसरा बीटा था अर्जुन सिंह, जिसमे नरिंदर की जान बस्ती थी. उमेद शुरू से हे शंकर के ज्यादा करीब था लेकिन तुमने कलगे में इसको नरिंदर के साथ इसलिए देखा होगा क्योंकि दोनों हे अखाड़े के शौक़ीन थे. अर्जुन सिंह की हत्या में फ़तेह और राममेहर के लड़को का हाथ था क्योंकि वह ऐसा कुछ जान गया था जिसका पता अगर इन तीनो को लगता तोह आज हालात कुछ और हे होते. उमेद उस घटना और बदला लेने के बाद परिवार में चला गया क्योंकि रघुबीर के बाकी दोनों बचे तोह दुनिया में रहे नहीं थे, बाप ने बिस्टेर पकड़ लिए तोह उमेद को हे परिवार संभालना था. शंकर खुद को दोष देता था उमेद के दोनों भाइयो की मौत का लेकिन उमेद ने सचाई खुद बताई और उसके कहने के बाद नरिंदर को शंकर ने दूर किआ. उमेद चाहता था के शंकर का परिवार वह सब न देखे जो उनके साथ हुआ.", रामेश्वर जी अतीत में डूब गए थे, चाय ठंडी हो चुकी थी और सांगवान जी को आज ये पता चल रहा था के शंकर की ज़िन्दगी में उमेद के क्या मायने है.

"मतलब अर्जुन का नाम? और शंकर उमेद को भी इसलिए दूर रखता है के उस पर कोई आंच न आये?"

"हाँ लेकिन उमेद दूर नहीं रहता और नरिंदर की इत्छा थी की अर्जुन सिंह की याद में शंकर के बेटे का नाम वही रखा जाये. नरिंदर का तोह ज़िंदा रह नहीं पाया था.", रामेश्वर जी के इतना बताते हे बड़े सांगवान जी ने अपना हाथ उनके हाथ पर रख दिए.

"भाई साहब, नियति को तोह कोई बदल नहीं सकता लेकिन इतना कहूंगा के आपने सब कुछ ख़ामोशी से मंजूर किआ और हमेशा परिवार को पहले रखा. आपके साथ ऊपर वाला बुरा नहीं कर सकता. और मुझे भी उमेद के बारे में इतना कुछ नहीं पता था. परिवार तोह सभी जानता हु लेकिन उस दौर में हमारी इतनी बातें नहीं हो पाई थी. अर्जुन तोह ये भी बड़ा नेक और समझदार है."

"हाँ दहारमवीर, वह भी ऐसा हे था कुछ लेकिन ये लड़का सब सही कर देगा. उमेद उसका दत्तक पिता है और अर्जुन का भी उसके साथ उतना हे प्यार है. मिलते काम है लेकिन उमेद ध्यान रखता है ाचे से उसका.", धर्मवीर जी को इतने काम समय में हे आज बहोत कुछ पता चला था और वह अब उमेद के बार में सबकुछ jaan-ne को उत्सुक थे.

"तोह अब उमेद राजनीति के साथ और क्या करता है?"

"राजनीती तोह बस नाम के लिए है जिस से उमेद दुनिया में शामिल रहे. वह परिवार और बिज़नेस के साथ साथ अनाथ बचो को ाची ज़िन्दगी देने की कोशिश में लगा रहता है इसलिए इतना व्यस्त दीखता है. लेकिन शंकर के साथ वह फिर से दुनिया से अलग हो जाता है. और तोह कुछ है नहीं उसके पास.", रामेश्वर जी ने चाय की तरफ ध्यान दिए तोह मुस्कुरा दिए. फिर पानी से गाला गीला करने के बाद लघुशंका का बता कर एक तरफ बने बाथरूम की और चल दिए. यहाँ धर्मवीर जी अब उन दोनों को देख रहे थे जो बचो की तरह लड़ रहे थे. एक पिस्तौल जमीन पर राखी थी दूसरी में दोनों गोली भरते हुए kheench-taan कर रहे थे. शंकर ऐसा भी है ये तोह उन्हें भी आज मालूम चला था. फिर दोनों ने हे पिस्तौल कवर में बंद कर दी.

"लगता है तुम दोनों का दिल भरा नहीं आज?", उमेद और शंकर इधर चले आये तोह धर्मवीर जी ने हँसते हुए पुछा.

"चाचा ये न हारने के बाद हमेशा ऐसा हे करता है. पिस्तौल भी बदल ली लेकिन फिर हार गया. सांझी पिस्तौल से भी हार गया तोह अब कह रहा है के घोड़े के दौड़ लगाएंगे. पता है के वह ये जीत जायेगा लेकिन मुकाबला तोह निशानेबाजी का था. इसकी आदत कभी नहीं जाएगी इसलिए इन्दर इस से ज्यादा ाचा है."

"हाँ वह तुझे patak-patak के मारता है तोह ाचा हे लगेगा. कल तू फार्म पे आएगा फिर देखता हु तुझे.", शंकर जी पानी की बोतल मुँह के लगाए उमेद को घूर रहे थे.

"तुम शंकर को भोले क्यों बुलाते हो? भोलेनाथ का पर्याय है इसलिए?", बड़े सांगवान जी के सवाल पर शंकर के मुँह से पानी बहार निकल गया और उमेद हंसने लगा.

"कुछ नहीं चाचा, ऐसे हे इसकी आदत है.", शंकर जी बिदक गए थे थोड़ा.

"ऐसा है न चाचा जी, ये दुनिया के सामने जैसा मर्जी हो लेकिन अपना शंकर उल्लू मिनट में बन्न जाता है. इन्दर और अज्जू इसकी ऐसे हे खिंचाई करते रहते थे और एक बार तोह अज्जू नहर में डूब गया तोह ये दहाड़े मार के रोने लगा था. खेल था इन्दर और अज्जू का लेकिन शंकर का बुरा हाल हो गया था क्योंकि अज्जू स्कूल से बिना बताये इन दोनों के साथ आया था. मेरी माँ को ये क्या जवाब देगा अगर अज्जू को कुछ हो गया तोह? ये बिलकुल वैसा नहीं है जैसा दीखता है या काम से काम हमारे साथ ये वह नहीं है.", उमेद ने बात तोह कहने को कह दी लेकिन शंकर के चेहरे पर एकाएक इतना दुःख उभर आया था के वह उठ कर बहार चला गया. उमेद को भी गलती का एहसास हो गया था के उसने गलत जीकर कर दिए था अपने भाई का.

"मैं आता हु चाचा जी, सॉरी.", उमेद अपनी अल्मुनियम की छड़ी लिए शंकर के पीछे पीछे बहार निकल गया. बड़े सांगवान जी ने गहरी सांस ली और उस बोतल को हाथ में पकड़ कर कुछ सोचने लगे. इधर रामेश्वर जी भी सब देख चुके थे और अपनी जगह आ बैठे.

"यही दिल है शंकर का धर्मवीर जो मैंने अपने बचे से इतना प्यार करता हु. शंकर लाख बुरा सही क्योंकि वह शुरू से हे कानून या समाज की परवाह नहीं करता. जिस से दिल लग जाये उसके लिए शंकर माँ है. चंद्रो देवी, आप, कौशल्या, उमेद, ऋतू और मधुलता वह लोग हो जिनके परवाह शंकर सबसे ज्यादा करता है. बनवारी (मां) रहा नहीं और नरिंदर को इस से अलग मैंने कभी समझा नहीं. इतना हे दायरा है उस naram-dil शंकर का.", रामेश्वर जी के मुँह से मधुलता का नाम सुन्न कर धर्मवीर जी हैरत से उन्हें देख रहे थे.

"क्या करता बताओ मैं? मेरा बचा सवाल नहीं करता मेरे फैंसले पर, अगर वह सबके सामने लिए गए हो तोह. बात एक लड़की की नहीं थी, उसके पिता की मर्जी, सोमबीर भाई की पसंद और बिरादरी की थी. मैं ब्राह्मण आदमी कैसे उनकी हे बिरादरी में उस लड़की के परिवार को खड़ा कर देता? सोमबीर के साथ रघुबीर, राममेहर और पूरा हँसता खेलता परिवार अगर मेरे फैंसले से आबाद रहता तोह वह जरुरी था. नियति को कुछ और हे मंजूर था के ये फैंसला लेने के बाद भी कुछ नहीं बचा."

"चलो भाई साहब, बातें भी हो गयी और दिल भी हल्का हो गया. शबनम वाला मामला देखते है थोड़ा और उसके बाद आपने घर के काम भी देखने है और मैं शंकर को थोड़ा व्यस्त करता हु.", दोनों हे बुजुर्ग इस जगह से बहार की और चल दिए जहा अब उमेद फिर से शंकर के साथ किसी बात पर maan-manuhar कर रहा था.

"हो गया तुम्हारा बचपना ख़तम तोह गाडी निकल लो भाई. निर्मल सिंह से मिलने के बाद मुझे घर छोड़ देना और उमेद भाभी जी को बहु के साथ घर भेज देना.", उनकी बात का तुरंत हे पालन हुआ. उमेद ने जाने से पहले दोनों बुजुर्गो का आशीर्वाद लिए तोह इस बार बड़े सांगवान ने अपने से भी lambe-chaude इस व्यक्ति को सीने से लगा लिए.

"इस बार हम आएंगे बीटा तुम्हारे पास."

"इन्तजार रहेगा चाचा जी. और शंकर रात मेरे घर आने वाला है चाचा जी.", अपनी जीप में बैठने से पहले उमेद ने शंकर को भी बाँहों में कस लिए था. उसके सामने शंकर जी का तगड़ा शरीर भी सूक्ष्म लगता था.

"हाँ, अब ये यही है तोह रातें तेरे साथ गुजरेगा. बस टांग ठीक होने तक घोड़े के aas-pas दिखाई मैट देना, ये अपने चक्कर में तुम्हारी टांग पहले भी आधा दर्ज़न बार तुड़वा हे चूका है.", शंकर जी तोह नजरे झुकाये कार की तरफ चल दिए उनके बचपन की बातें सुन्न कर. उमेद आराम से जीप का गियर लगता अपने यार को हाथ हिलाते हुए यहाँ से निकल चला. और काली मेरसेदेज़ में शंकर ड्राइवर की तरह आगे, पीछे पंडित जी के साथ बड़े सांगवान यहाँ से अपने अगले गंतव्य की तरफ बढ़ गए.

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रेखा जी और कोमल दीदी को घर वापिस छोड़ते हुए 9 बज चुके थे. वह महिला डॉक्टर करीब हे रहती थी और उन्होंने निरिक्षण के बाद कुछ दवा देने के साथ हे 2 दिन का आराम करने को कहा था. घर के बहार कार से दोनों के उतारते हे अर्जुन भी बहार निकल आया.

"दीदी, माँ को काम मत करने देना कोई भी और ऋतू दीदी को भी बोल देना के इनके पास रहे."

"बीटा, डॉक्टर ने कहा है न के कोई बड़ी बात नहीं है.", रेखा जी ने घर में प्रवेश करते हुए अपने बेटे को समझाना चाहा.

"मुझे कुछ नहीं पता माँ. आप बस कमरे में आराम करेंगी और अगर बहार नजर आई तोह फिर मैं आपकी तरफ नहीं आने वाला शादी तक.", अर्जुन ने ये बात अपनी दीदी की तरफ देखते हुए कही.

"माँ आराम हे करेंगी और ऋतू इनके पास रहेगी. दवाई और खाने की जिम्मेवारी मेरी है. तुम बस बाकी काम करो ताऊजी के साथ.", कोमल दीदी के आश्वस्त करने पर अर्जुन ने सहमति जताई तोह रेखा जी थोड़ी नाराज दिखी.

"हाँ तोह टिक के कमरे में न बैठा जाता तेरे से? आँगन में बेवजह दिखी तोह तेरे भाई को बुला के साथ विदा कर दूंगी हफ्ते के लिए. काम करने के लिए अंदर पूरी फ़ौज है. और ये मुस्टंडा बाकी सब देख लेगा.", कौशल्या जी ने भी समीप आते हुए अपनी बहु का हाथ थमा और अर्जुन हँसता हुआ अपने ताऊ जी के साथ निकल चला. कार में हे दोनों आज पहली बार थोड़ा खुल कर बातें कर रहे थे.

"ताऊ जी पिछली बार भी आप सवेरे जल्दी चले गए थे और इस बार तोह आने के बाद आप घर में दिखे हे नहीं."

"बीटा तू 2 दिन बहार था और मैं बाकी कामो को पूरा करने के बाद आज फारिग हो गया हु. अब पूरा महीना मैं यही दिखूंगा. वैसे मुझे तोह आज पता चला के मेरा ये छोटा बीटा इतना बड़ा हो गया है के माँ किसी और को काम के लिए कुछ कहती हे नहीं.", कार चलते हुए राजकुमार जी ने एक हाथ से अर्जुन के कंधे को थपथपा तोह वह बस मुस्कुरा दिए.

"इतना भी कोई काम नहीं करता मैं ताऊजी. घर में तोह इतने लोग है जो सब करते रहते है. ताई जी- माँ तोह सुबह 5 से लेकर रात 10 बजे तक कभी फुर्सत हे नहीं रखती. माधुरी दीदी, प्रियंका दीदी और कोमल दीदी भी पूरे घर के काम करती रहती है. बस संजीव भैया कुछ समय से नहीं है इधर तोह थोड़ा बहोत काम मुझे दे देते है dada-daadi. वैसे तोह मैं खली फिरता रहता हु.", राजकुमार जी के दिल में हलकी सी तीस मच गयी ये सुन्न कर के उनके biwi-bache परिवार में शामिल रहते है और एक वह है जो रात को नशे में अपनी बीवी को जाने क्या कुछ कह गए थे.

"हाँ परिवार ऐसा हे तोह होता है बेटे. सब जहा sukh-dukh में शामिल रहे और mil-baant कर काम करते रहे. चल ये बड़ी लिस्ट यहाँ किरयाने वाले को दे दे फिर मोडल टाउन में भी एक बड़ा पंसारी है. सामान उधर से हे ले लेंगे और ठेकेदार से भी मिल कर शाम का वक़्त रख लेंगे.", अर्जुन उनका कहा मान कर उस बड़ी दूकान में पर्ची दे आया और घंटे तक वापिस आने का बोल दिए. राजकुमार जी कार हमेशा एहतियात से और धीमी हे चलते थे शहर के बीच और आज भी वैसे हे शीशे निचे किये वह अपने भतीजे से बातें करते हुए आगे बढ़ रहे थे.

"आपके पास पहले वह हरे रंग का प्रिय स्कूटर होता था न ताऊजी? अलका दीदी के साथ आप मुझे भी उसपे बड़े पार्क घूमने ले जाते थे.", अर्जुन की बात सुन्न कर राजकुमार भी हंसने लगे.

"तू कोनसा उतने से हे मान जाता था. रोज सुबह मेरे घर से निकलने से पहले हे स्कूटर पर खड़ा मिलता था, dipsi-frooti के लिए. पहले दूकान से तुझे वह सब दिलाता, फिर tini-mini तब कही जा पता था काम पे मैं. दिन जल्द हे बदल जाते है बीटा, व्यस्त रहना शायद इतना भी ठीक नहीं है.", राजकुमार जी बातें करते हुए गुजरे ज़माने की भी यादें तजा कर रहे थे.

"आपको पता है मैं और संजीव भैया तोह अभी भी बनते वाली बोतल पीने जाते है. बस अब वह अठन्नी की जगह 2 रुपये की हो गयी है और निम्बू वाली 5 रुपये की.", अर्जुन ने जैसा मुँह बनाया था राजकुमार जी हंसने लगे.

"भाई तुम भी तोह अब हर महीने मेरे से 500 लेने लगे हो, पहले तोह हर रोज का एक रूपया फीस होती थी. सुना है पिता जी भी उतने हे देते है और बाकी सब भी.", अर्जुन उनकी बात सुन्न कर खुश हो गया.

"500 आप तोह 500-500 संजीव भैया और तेजी से भी मिलते है. Maa-papa से भी और दादा जी देते है पेंशन का दसवा हिस्सा. दादी देती है सबसे ज्यादा 2000 लेकिन खर्च हे नहीं होते क्योंकि हर रोज किसी न किसी बहाने पैसा मिलते रहते है. आपने 50000 क्यों दिए थे वैसे? उनमे से अभी भी बहोत सरे बाकी रह गए है मेरे पास.", अर्जुन को राजकुमार जी ने वह पैसे ननिहाल जाने से पहले दिए थे.

"वह तेरे हे थे बीटा. 3 महीने के मुनाफे का तेरा हिस्सा लेकिन आगे से वह बैंक में रखना क्योंकि मुझे पता है तू उन्हें अपनी बहनो पर खर्च करता रहेगा. ले तू जरा तोताराम से सामान ले मैं जरा ठेकेडेर से मुलाकात करके आता हु. शाम को मैं हे देख लूंगा दूसरी कोठी का काम और तेरे लायक कुछ होगा तोह बताता हु.", राजकुमार जी जिधर अर्जुन को छोड़ कर गए थे इस मार्किट में तोह वह आता हे रहता था. सामने हे पंसारी की दूकान देख वह उधर हो लिए. लिस्ट में अलग अलग सामान था जिस से पंसारी भी थोड़ा हैरत से देखता हुआ अपने लड़को को नाम ले ले कर बताई मात्रा में सामान निकलने को कहने लगा. अगले 20 मिनट में ये सब कुछ थैले में भर के अर्जुन को उसने पकड़ा दिए.

"कितने पैसे हुए अंकल?"

"बीटा 4830 रुपये. वैसे ये कोण वैद जी जो ऐसा दुर्लभ सामान मंगवा रहे है? बुरा मैट maan-na बीटा लेकिन दुकान मेरी 1960 से यहाँ है और तुम्हारी लिस्ट में से कुछ सामान ऐसा है जो इतने सालो में gini-chuni बार हे किसी ने लिए होगा.", ये बुजुर्ग सा व्यक्ति उम्र में अधिक था लेकिन जुबान साफ़ और शरीर patla-robila था. अर्जु भी रकम सुन्न कर हैरान था. लगभग 5000 रुपये का सामान वह भी इस थैले में.

"जी मेरी दादी जी ने मंगवाया है ये सब. वैसे ऐसा क्या ख़ास सामान है ये?"

"वह वैध है क्या?", बुजुर्ग ने अगला सवाल किआ अर्जुन को जवाब न दे कर.

"जी उनके पिता जी मतलब मेरे pad-dada जी वैद थे. स्वर्गीय कांशीराम जी."

"तुम्हारी दादी का नाम कौशल्या तोह नहीं? वैध कांशीराम जी के 2 बेटे और एक बेटी थी, बनवारी- हंसमुख और कौशल्या, जिनके यही नाम थे जितना याद है मुझे.", ये तोताराम तोह बहोत करीब से जानता था मतलब.

"जी मेरी दादी जी वही है."

"जग जग जियो बीटा, उनके पिता जी के साथ जवानी में 10 साल काम सीखा था मैंने लेकिन jadi-booti तोह याद रही लेकिन इलाज करने का जिगरा नहीं था मेरे में. दूकान खोल ली और यही ठीक रहा. वैसे कौशल्या बहिन उस समय 13-14 बरस की रही होंगी जब मैं उनके पिता जी के पास जाता था. उस उम्र में भी वह मजबूत दिल के साथ साथ होनहार थी अपने पिता जी के नक़्शे कदम में. लेकिन वक़्त और था बीटा जो लड़की को वैध ban-ne से रोक गया. उन्हें कहना के बड़े भाई ने शुभकामनये भेजी है.", पंसारी ने उस लोहे के गल्ले से 500 का नोट वापिस करते हुए अर्जुन के सर पर हाथ फेर दिए.

"जी बिलकुल कहूंगा.", अर्जुन ने कार का हॉर्न सुनते हे हाथ जोड़ कर विदा ली और अपने ताऊजी के साथ बैठ गया. पंसारी बस जाते हुए देखने के बाद अपनी गद्दी पर बैठ गया था.

"मिल गया सारा सामान?"

"जी, सारा मिल गया ताऊजी. अब चलते हुए राशन उठा लेते है फिर मुझे भी दोस्त के पास जाना है थोड़ी देर के लिए.", अर्जुन ने ऐसा बताना हे ठीक समझा. 10 तोह यही बज गए थे और आगे 11 बजे का उसने समय दिए हुआ था. थोड़ी हे देर में दोनों सब सामान लिए घर आ चुके थे. अर्जुन ने दादी से सामान के बारे में बाद में हे पूछना ठीक समझा. निचे से फारिग होते हे वह दौड़ कर अपने कमरे में आ कर कपडे बदलने हे लगा था के पीछे से मधु बुआ ने उसको अपने बाहुपाश में भर लिए.

"तू इतना समझदार कैसे हो गया रे? मैं तोह समझती थी तू दिमाग और दिल के मामले में हे आगे है लेकिन तुझे तोह बाकी सब भी कही ाचे से पता है.", उनके मॉटे सतांन अर्जुन की पीठ में धंस रहे थे.

"मेरी प्यारी बुआ, आप अलग नहीं हुई तोह फिर नजरिया बदल लोगी मेरे बारे में. कुछ ाचा लग रहा है मेरे पीछे."

"कर ले जो करना है, मैं तोह तुझे मन नहीं करती. करेगा तोह मुझे हे ख़ुशी देगा न.", अर्जुन उनकी बात पर पलट कर उनके माथे को चूम कर बोलै.

"आपकी खुशिया अभी अधूरी है बुआ. पता है मुझे वह दिन देखना है जब आप न दादी की तरह एक मजबूत परिवार की बागडोर अपने हाथ में लेंगी. उस से पहले मेरी maa-taai जी या किसी भी ऐसी बहु से ज्यादा बड़ी पहचान बनाएंगी जो सबको साथ रखने के साथ हे सही रस्ते पर चलती है. आपमें वह ख़ास बात है बुआ क्योंकि आपके पिता जी वैसे हे है. और आपका ये बीटा हमेशा आपको खुश रखेगा.", अर्जुन इस वक़्त सिर्फ जीन्स और बनियान में हे था. मधु बुआ उसके सीने से लगी ख़ुशी के आंसू बहा रही थी. और दोनों हे इस बात से अनभिग थे के शंकर जी शायद मधु से मिलने हे अभी इधर आये थे. वह बस ख़ामोशी से खड़े थे और उन्होंने इस दृश्य के अलावा सिर्फ अर्जुन की आखिरी बात हे सुनी थी.

"तू सचमुच मेरा प्यारा बीटा है रे. जनम न दे पाई तोह क्या हुआ लेकिन अब लगता है के सबसे बड़ी ख़ुशी बस तू हे है. इतनी परवाह करता है के आज अँधेरे में तू पापा से ये गंभीर बात कर रहा था? माँ ने बताया कैसे तू उन्हें विश्वास दिला रहा था के मेरी ज़िन्दगी ठीक हो जाएगी और तुझे मुझपर कितना भरोसा है. सच कहु तोह मैं खुद हे नहीं जानती थी की मेरी में कोई खूबी है भी या सब कोरी बातें कही है तूने. लेकिन ये सब मेरी, पापा और बाकी सबकी ख़ुशी से जुड़ा है तोह फिर मैं मेरे बेटे को विश्वास डूबने नहीं दूंगी."

"ाचा अब रोना बंद करो बुआ, कोई देखेगा तोह कुछ और हे समझ लेगा. और मुझे अभी जरुरी जाना है, शाम को आपकी शॉपिंग भी करवानी है. तब करेने बातें और अभी आप नीचे जाओ, दादा जी आ गए है.", अर्जुन के ऐसा कहते हे मधु बुआ ने अपना खूबसूरत चेहरा उसकी तरफ किआ तोह अर्जुन ने साफ़ टीशर्ट से वह आंसू पांच दिए.

"गन्दी कर दी न ये टीशर्ट. चल मुझे दे मैं धो कर रख दूंगी. समय से वापिस आ जाना.", मधु बुआ बहार वाले दरवाजे से हे निकल गयी थी और अर्जुन के मुड़ने से पहले हे शंकर जी भी कमरे से बहार जा चुके थे. वह पहले जहा हैरत में थे अब थोड़े dukhi-khush के मिश्रण में साढ़े कदमो के साथ निचे उतर रहे थे. उनका बीटा सवेरे उनके बाप से जो बातें कर रहा था वह ये थी. उनकी बहिन की बेहतर ज़िन्दगी के लिए. माँ जिस बात के लिए चेतावनी दे रही थी वह ये मामला था. घर को सुरक्षा देने के चक्कर में वह आतंरिक जिम्मेवारियों से भाग रहे थे और उनका बीटा ये गंभीर मसले अपने दादा से सांझे कर रहा था. यहाँ वह मधु की चौखट पर कामाग्नि में जा खड़े हुए थे और उनका बीटा उस स्त्री के जीवन को सुखी करने के लिए neem-andhere ये सब परेशानिया लिए बैठा था.

"शंकर, कहा खोया हुआ है?", वह चलते चलते रसोई में आ खड़े हुए तोह अपनी माँ की आवाज से होश में आते इधर उधर देखने लगे.

"वह.. वह मैं आपके पास हे आ रहा था.", रसोई में इस वक़्त कोई न था उन दोनों के सिवा. कौशल्या जी खुद अपने पति और देवर के लिए चाय बनाने आई थी.

"हाँ तोह परेशां क्यों है? उमेद से झगड़ बैठा क्या तू? हर बार का काम है तुम दोनों का.", कौशल्या जी maahm-daste में अदरक इलाइची कूट रही थी चाय के लिए.

"नहीं वह चलता रहता है, कोई झगड़ा नहीं मेरा उस हठी के साथ. मधु की बात अर्जुन ने पिता जी के साथ की?", साड़ी बात एक तरफ रखते हुए शंकर जी ने सीधा प्रश्न किआ.

"तेरी लाड़ली की ज़िन्दगी में अगर परेशानिया है तोह तेरा फ़र्ज़ है ये की सब ठीक करे, मधु से बात करके उसको समझाना. अपने जीजा से बात करनी और कही अड़चन हो तोह अपने बाप और मेरे साथ बैठ कर इसका हल निकलना. वह नासमझ सा लड़का स्कूल के दिनों में अपना बचपन ख़तम कर चूका है शंकर. इसका कसूरवार कौन है? मधु मान गयी, तेरे पिता भी चैन से सो सकेंगे और इसलिए हे आज वह इतना खुश है सुबह से. अर्जुन ने उनसे शर्त ये लगाई थी की वह उनकी परशानी सही सही बता देगा. और बता भी दी. कान खोल के सुन्न ले अब जरा मेरी बात नहीं तोह इस उम्र में मार खता तू ाचा न लगेगा. दारु पी के रात अँधेरे में घर नहीं आना, पी तोह जहा पीयेगा वही सो जाया कर. बचे बड़े हो रहे है घर में और देर रात तक पढ़ते भी है.", कौशल्या जी ने उबलते पानी में पट्टी, अदरक और इलाइची डालने के बाद पतीली हिलाई.

"भाई को क्यों दांत रही हो आप?", मधु ने अंदर आते हे सवाल किआ. शायद माँ की आवाज सुनाई दे गयी थी.

"इसकी बीवी बीमार है, ये डॉक्टर हो के भी कॉलेज की दुनिया से बहार न निकल रहा तोह आरती उतारू. तू जा के अपनी भाभी के पास बैठ. आई भाई की चमची.", कौशल्या जी का गुस्सा देख कर मधु वैसे हे बहार निकल गयी.

"रेखा ठीक है माँ."

"हाँ वह लेके गया था अपनी माँ को डॉक्टर के पास. रेखा के मुँह में तोह जुबान है नहीं जो तुझसे कोई बात कहे वह. तेरे से इतनी हे बिनती है के थोड़ा सुधर जा बीटा, कल को नरिंदर के आते हे तू उसको भी लिए आवारा सांड सा घूमता नजर आया तोह बाहरवीं में तोह सिर्फ तेरे पे मिटटी का तेल छिड़का था अब तिल्ली लगा दूंगी.", उनकी ऐसी बात सुन्न कर शंकर जी ने पीछे से अपनी माँ को बाहों में भर लिए.

"माँ तू न गुस्सा करती है तोह ज्यादा प्यारी लगती है. चल नहीं परेशां करता मैं तेरे को ज्यादा.", कौशल्या जी का गाल चूम कर वह अपनी माँ का गुस्सा काम करने लगे.

"बीटा मन नई कर रही मैं. तू मेरा ाचा बचा है लेकिन बड़ा हो जा थोड़ा. तेरा जो दिल करता है तू किआ कर लेकिन यहाँ तू भी 4 बचो का बाप है बस याद रखा कर. नरिंदर आएगा तोह मुझे भी ख़ुशी मिलेगी क्योंकि तू उसके साथ हे खुश रह सकता है. वह तुझे गलत रस्ते पर नहीं जाने देता. टंकी पे बियर की बोतल जितनी मर्जी छुपा ले क्योंकि यही तोह तुम दोनों का पर्दा है मेरे से. बस जब बहार तेरी महफ़िल लगी हो तोह बहार रहा कर. अर्जुन का बचपना ख़तम होने का दुःख मुझे भी है लेकिन वह हमारे साथ खुश है और यहाँ वह सबका ध्यान रखता है. तेरे और उसमे बहोत फरक है जिस से कभी कोई मतभेद न हो जाये. मैं तेरा साथ नहीं दूंगी बीटा, क्योंकि उस लड़के ने तुम तीनो भाइयो के फ़र्ज़ अभी से निभा दिए है. तेरा बाप भी अर्जुन में अपना सबकुछ देखता है. बस तू बचो की पढाई, अपना काम और जो जरुरी जिम्मेवारिया है वह निभा.", चाय उबाल गयी तोह कौशल्या जी ने 4 कप में छान दी थी जिसका मतलब था के शंकर जी की भी प्याली थी.

"उसके रस्ते में नहीं आता माँ. जान गया हु के वह बचा नहीं है और वह घर के अंदर हे खुश है सबके साथ. लेकिन मतभेद क्यों होने लगे अपने हे बेटे के साथ?", शंकर जी ने खुद हे ट्रे उठा ली तोह कौशल्या जी साथ चलने लगी.

"वह तू अपने बाप से पूछ लिओ. सब पता है तुझे के उसको भी पोलिसिअ नाक लगी है अपने दादा जैसी. और मेरा बीटा तोह दूध का धुला है. गलती से तू उसके साथ दोस्ती करने बैठ गया न तोह वह तेरे बाप को निरुअत्तर कर देता है सवाल पूछ पूछ के, तेरी फिरकी पहले सवाल पर अटक जाएगी बता देती हु.", दोनों हे बैठक में चले आये तोह छोल साहब ने आते हे पूछ लिए.

"कोनसी फिरकी अटकने लगी है मेरे शेर की भाभी जी? शंकर के सामने तोह ाचे ाचे फिरकी हो जाते है.", उन्होंने शंकर को गले लगते हुए अपने बराबर हे बैठा लिए. रामेश्वर जी मंद मंद मुस्कुरा रहे थे और उनकी बीवी बगल में बैठी सबकी तरफ चाय की प्याली रखने लगी.

"शंकर कह रहा था के थोड़ा समय अर्जुन के साथ घुमा फिर करेगा. उसको समय देगा. तोह मैं बता रही थी की समय की फिरकी वैसे हे घूमने दे नहीं तोह अटक जाएगी.", कौशल्या जी ने इतना हे कहा तोह रामेश्वर जी के हाथ से थोड़ा पानी दुल्ल गया पीते पीते. वह हंस रहे थे और कौशल्या जी के भी चेहरे पर हंसी आ गयी थी.

"देख लिए, ये भी हंस रहे है बात सुन्न कर."

"सतीश भाई, अगर शंकर ऐसा चाहता है तोह ाची बात है. मैं तोह कहता हु ये उसको अपने दोस्तों से मिलवाये, लोगो से jaan-pehchan करवाए अपने बेटे की.", रामेश्वर जी की बात पर छोल साहब गंभीर चेहरे से शंकर को देखने लगे.

"भाई साहब आपको मजाक लग रहा है? ऐसा मैट करना शंकर, तुम्हारे दोस्त फिर उसके दोस्त बन्न जायेंगे.", और वह भी ठहका लगा कर हंसने लगे. शंकर जी इन बड़ो के बीच बैठे बस मुस्कुरा रहे थे और उन्हें अपनी माँ की बात समझ आ चुकी थी. लेकिन दूसरी बात अभी तक उन्हें परेशां किये थी की मधु ने रात इतना कुछ कहने के बावजूद थोड़ी देर पहले माँ के सामने भाई की वकालत करने की कोशिश की थी. उस अनैतिक रिश्ते के परे मधु अभी भी उसको अपना वही प्यारा बड़ा भाई मानती थी. सभी का ध्यान भांग हुआ जब मोटरसाइकिल की dug-dug हवा में गूंजी.

"लो भाई नवाबसाहब की सवारी भी चली गयी. इसके पाँव में को til-vil तोह नहीं है कौशल्या?", रामेश्वर जी ने हँसते हुए कहा.

"न जी, काम से हे गया है वह. दामाद ने आना है तोह मिठाई, फल और बाकी सामान भी लाना है. धर्मपाल (संदीप के पिता) ने भी यूनिवर्सिटी बुलाया था इसको, कोई नयी किस्म के अमरुद के पौधे देने के लिए. और भी bail-boote लेते आएगा देखना. ाचा बगीचा हवाले किआ आपने उसके."

"ये पढता लिखता कब है माँ? और धर्मपाल मेरा दोस्त है लेकिन अर्जुन उसके साथ यूनिवर्सिटी तक जाने लगा है.?"

"पढ़ने का तोह तू रहने दे. ऋतू खाल उतार ले अगर इस से कोई गलती भी हो जाये तोह. अपनी किताबे तक रतवा दी इस लड़के को उसने. बाकी अभी सतीश भाई साहब ने बताया था न के तेरे दोस्त वह अपने बना लेगा. धर्मपाल खुद इसके साथ बेटे और दोस्त सा व्यवहार रखता है. Baag-bagiche के अलावा उसकी बेटी के रोके पर भी धर्मपाल ने अर्जुन को निमंत्रित किआ था. तेरा वह सोलंकी था न, उसके घर में भी इसकी दखल है. गीता ने अर्जुन को बीटा मान लिए है अपने बेटे के जाने के बाद. आई थी उसकी बेटी भी इस से मिलने जब ये पंजाब था. कोठी का ठेकेदार सोलंकी ने भेजा है और साथ हे गीता ने मेरे और इनके लिए suit-saree भिजवाई थी.", शंकर जी को तोह इन सब की भनक तक न थी.

"सोलंकी आदमी ठीक नहीं है, वैसा दिल का बुरा भी नहीं है."

"अर्जुन है वह. पहले ठीक हे करता है सबकुछ.", कौशल्या जी ने जैसे तरेर कर ये कहा तोह शंकर जी मुस्कुरा दिए. उन्हें ये भान हो चूका था की लड़का गलत लोगो से दूर हे रहता है.

"चलो ाची बात है के वह बहार भी माँ और बहिन के रिश्ते निभा रहा है. गीता डिप्रेशन में थी जब लड़के की मौत के बाद वह मेहुल से चेकउप करवाने गए थी. मनोविज्ञान वाला डॉक्टर भी हमारा दोस्त है जिस से सोलंकी इलाज करवा रहा था गीता का. ाचा है के इसकी वजह से उन लोगो में सुधर हो रहा है. ये सोता कब है?"

"सब आज हे पूछेगा? तूने कही जाना भी है."

"हाँ. भूल गया था माँ. चलता हु और आपसे कल मिलूंगा चाचा.", शंकर ने खड़े होते हुए छोल साहब से कहा.

"आज?"

"नहीं. आज उमेद के घर जाना है और पहले थोड़े काम है तोह 8 वैसे हे बज जायेंगे.", शंकर जी ने इजाजत लेते हुए कहा और बहार जाने लगे.

"अर्जुन वाली गाडी ले जा शंकर. रवा हो जाएगी थोड़ी और दिन में 1-2 बार चलती भी रेहनी चाहिए.", शंकर जी बात सुन्न कर चाबी के लिए देखने लगे.

"तेरे हे कमरे में चाबी रहती है उसकी.", कौशल्या जी के कहते हे वह अंदर चले गए लेकिन अगले कमरे में हे मधु सामने से उनकी हे तरफ आ रही थी.

"सॉरी. रात के व्यवहार के लिए. तुमने सही कहा के अब होश में रहना हे ठीक है, असली रिश्ते के साथ. रात के लिए मुझे माफ़ कर देना.", शंकर जी ने बड़े नरम स्वर में नजरे झुकाये अपने बात कही.

"जहा गलती दोनों की हो वह बस पीछे हट जाना चाहिए शंकर. मैं इसलिए हे तोह आखिरी बार आई थी."

"लेकिन तुमने कुछ और भी कहा था. सच्चा प्यार मजबूर नहीं करता, हवस से कोसो दूर वह ख्याल रखता है. दर्द ख़तम करता है.. शायद ऐसा हे कुछ था न? इस उम्र में सच्चा प्यार जाना तुमने?", शंकर जी के माफ़ी मांगने में भी सवाल जरूर थे.

"उम्र बस एक गुजरता समय है. किसी का जल्दी तोह किसी का देरी से गुजरता है. तुम ाचे भाई हो, दुनिया के शायद सबसे ाचे लेकिन तुमने आकर्षण को प्यार साबित करने में 20 साल से ज्यादा व्यर्थ कर दिए और रहा फिर भी एक आकर्षण जिसमे दोनों को हवस, अपने अपने कारण से शामिल थी. मेरी तोह ख़तम हो गयी जब समझ में आया के जिद्द, जज्बात और परवाह वही समझ सकता है जो डूबने से रोक ले. साथ डूबना तोह गलत है न शंकर, उसमे एक बच भी जाये लेकिन दूसरा? चलो ख़तम करो इस बात को. मुझे माँ के साथ मल्होत्रा जी के जाना है. बाद में बात करती हु."

"अर्जुन. अर्जुन ने तुम्हारी तकलीफ ख़तम की जैसा तुम्हारे शब्दों से लग रहा है?"

"अर्जुन बचा है शंकर, एक समझदार प्यारा बीटा. जलन मत रखना कोई उसके लिए, मैंने देखा था तुम्हे कमरे में खड़े लेकिन तुमने भी देखा होगा."

"हाँ. वह ाचा लड़का है और तुम्हारे लिए वह किआ जो शायद मुझे करना चाहिए था. उसके लिए भी माफ़ करना."

"कोई बात नहीं, मैं खुश हु तोह पिछली हरेक बात के लिए कोई माफ़ी नहीं. तुम्हारा बीटा पहले है वह, तोह मुझे शिकायत नहीं कोई.", मधु ने जैसे ये कहा था के अर्जुन शंकर का हे बीटा है तोह ये सुन्न कर ाचा लगा के अर्जुन जैसे भी कर रहा है और जो भी कर रहा है, वह शंकर के हे नाम को बेहतर करता जा रहा है. हलके मैं से शंकर अपनी बीवी के कमरे में चला आया जहा रेखा दवा खाने के बाद सो गयी थी. हल्का बुखार था लेकिन ऋतू और अलका वही बैठी ध्यान रख रही थी और आरती कोई किताब पढ़ने में व्यस्त थी.

"चाबी पता है तुम में से किसी को नयी कार की?", शंकर जी ने धीमी आवाज में पुछा तोह ऋतू ने हे मुस्कुराते हुए दर्ज से चाबी निकल कर अपने पापा को दी और गले में बाहें दाल कर कड़ी हो गयी.

"अर्जुन की गाडी में अभी तक हम में से कोई नहीं बैठा. पता है उसने कहा था के दादा जी के बाद पापा और फिर जब वह सीख जायेगा तब हमको बिठायेगा. जल्दी सीखा दो उसको.", शंकर जी के दिल को चैन आया था अपनी इस पारी की मुस्कान देख कर.

"ऐसी बात है तोह उस उल्लू को मैं 5 दिन में हे सीखा दूंगा. वैसे सबसे पहले वह किसको बिठाने वाला है?"

"कोमल दीदी को.", तीनो ने हे ये कहा तोह उन्हें हैरानी हुई.

"मुझे लगा था के वह तुम तीनो में से किसी को पहले बिठायेगा या फिर अपनी माँ को."

"माँ को तोह आपने हे उस कार में सबसे पहले बिठा के अर्जुन की विश पूरी कर दी. लेकिन जब वह चलाएगा तोह दीदी को हे सबसे पहले बिठायेगा क्योंकि सबसे ज्यादा तोह उन्हें हे मंटा है."

"और उसके बाद मुझे बड़े पापा.", आरती के इतना कहते हे ऋतू झूठे गुस्से से हंसती हुई आरती को देखने लगी.

"देख रहे हो, ये भी बोलने लगी है पापा. इन सबको बैठने दो फिर बोल देती हु अगली सीट पर मेरा नाम लिखवा दूंगी. हाँ अभी बता देती हु.", ऋतू ने ये बात लाड में हे कही थी जिस पर बाकी दोनों हंस रही थी और बहार से शंकर जी भी. अंदर हे अंदर वह बस वही सोच रहे थे जो उन्हें महसूस हो रहा था.

"ाचा, अपनी माँ का ध्यान रखना. मैं शाम को एक बार आऊंगा लेकिन रात बहार रहूँगा काम है थोड़ा.", इतना कह कर वह बहार चल गए.

'ये प्यार जाने क्या दिन दिखायेगा समझ से बहार है मेरी तोह. लड़का पागल हो तोह समझ में आता है कुछ लेकिन यहाँ तोह उल्टा हे हो रहा है. साला अपना हे बीटा दामाद बनाना पड़ेगा. नामुमकिन सा हे है लेकिन maa-papa को अगर भनक है तोह अपने आप हल करे इसका नहीं तोह रेखा रोक सके तोह रोक ले. भाड़ में जाये जो होना है वह तब की तब देखा जायेगा बस सब ऐसे हे रहे जैसे हैं.', सर को खुजाते हुए शंकर जी ने गाडी में बैठने से पहले चले को देखा था उस मोरपंख के पीछे ये नया स्टीकर लगा था. दिल के बीच में 'र'.

'हे भगवन ये लड़की भी न. बेडा गरक हो इस प्यार का, साला बाप हो कर बेबस हु इस पागल लड़की के सामने.' और ध्यान से चले का वह हिस्सा हल्का हिलाते हे लाल 'र' की जगह नीले रंग का 'प' उभर आया. शंकर का दिमाग अपनी जगह से खिसकने हे लगा तोह वह सीट पीछे करके अब इस 'दिल' को बड़े ध्यान से देखने लगे. 3डी स्टीकर था ये जिसमे अक्षर दिशा के साथ बदल रहा था. बस सीधा होने पर 'र' दीखता था और बाएं करने पर 'प'. कुछ सोच कर दाएं घुमाया तोह गाला सूख गया.

'ये बहनचोद अब 'ा' से किसकी मासी का नाम शुरू होता है. स्टीकर तोह ऋतू ने हे लगाया है मतलब उसको ये तीनो नाम पता है. क्या खेल हो रहा है इस उम्र में ये सब? एक फसाद काम था प्रीती के बाद, अपनी हे बेटी बेटे के साथ और यहाँ ये 'ा'.. ओह तेरी ज्यादा हे दिमाग चल गया. ा मतलब अर्जुन. शक भी न कैसे हे हो जाता है.', शंकर के चेहरे पर हलकी मुस्कान आई तोह पसीना साफ़ करते हुए याद आया के बंद गाडी में इतनी देर से matha-pachi कर रहे है वह. थोड़ा निश्चिंत होने के बाद चाबी लगाई और साथ हे एक ों कर लिए. चले को इतना देखने के बाद भी उन्हें वह सुनेहरा बड़ा ा न दिखा जिसके बीच में दिल बना था.

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क्रमश
 
जारी

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अर्जुन आचार्य जी का दिया हुआ हेलमेट पहने अपनी रानी पर सवार इस 30-35 मिनट के सफर को कुछ 10 मिनट पहले हे पूरा करता गाँव से मुड़ने वाले रस्ते पर आ पंहुचा. 11 बज कर 10 मिनट हो चुके थे और एक तरफ जाते इस अलग रस्ते को नजर करने के बाद वह इस पुराणी हवेली की तरफ हे हो लिए. ज्यादा लोग कही दिखाई न दिए थे और ये वक़्त भी ऐसा था के gaanv-dehat में धुप चढ़ने पर log-baag घरो में या khet-khalihaan की छायादार जगह में आराम करते है. बहार से देखने पर ये वाली हवेली अंदर वाली से बड़ी और शानदार थी. बस rakh-rakhaav और उम्र ज्यादा होने से समय की मार साफ़ झलक रही थी. सामने हे बरगद के विशाल वृक्ष के नीचे चबूतरा जर्जर हालत में था जो शायद कभी आबाद रहा होगा.

'अंदर हे करता हु अपनी रानी को. यहाँ नजर पड़ सकती है किसी की भी.', अर्जुन ने उस बड़े लोहे के दरवाजे को धकेला तोह वह आराम से खुल गया. मोटरसाइकिल के तरफ खड़ा करता वह वापिस दरवाजा बंद करके इस खामोश से विशाल ढाँचे को देखने लगा. अंदर से ये उतना भी जर्जर या टूटा फूटा न था. हवेली का प्रवेश का हिस्सा कोई आधा एकड़ का समतल मैदान था. 4 कुर्सियां, एक लकड़ी की पुराणी मेज एक तरफ नीम के नीचे लगी थी. तजा सफाई के बाद koode-karkat का ढेर कोने में किआ गया था जहा पानी की व्यवस्था भी थी.

'यहाँ काम चल रहा है तोह बबिता ने इधर क्यों बुलाया?', वह देख रहा था के इस निचली मंजिल पर तजा हे साफ़ सफाई हुई थी. गिलयारे के आगे 4 दरवाजे बता रहे थे के वह कमरों और हॉल में जाने के लिए है और बहार से हे पक्की सीढिया ऊपरी मंजिल तक जाती थी. एक तरफ से चौड़ी गली हवेली के पीछे वाले भाग में जाने का रास्ता दिखा रही थी.

"देख लिए हो तोह चाय में आ सकते हो.", गलियारे में हवेली की चाय था जिधर काले रंग की कासी हुई कुर्ती और सफ़ेद ढीली पजामी पहने दिवार पर हाथ रखे बबिता जाने कबसे अर्जुन को देख रही थी. गले में सफ़ेद दुपट्टा ऐसे लिया हुआ था के सीना ढकने की नाकाम कोशिश हो, अकार जरुरत से ज्यादा बड़ा जो था.

"सोच रहा था के कतल की जगह बड़ी ाची चुनी है आपने. कितनी ख़ामोशी और सुकून है यहाँ. आज हे खुलवाया है क्या इस हवेली को?", अर्जुन अभी भी इधर उधर देखता हुआ बबिता की तरफ जा रहा था. ऐसी जगह वीरान ाची नहीं लग रही थी.

"बस एक यही जगह है जहा कभी कतल नहीं हुए. शादी के बाद मैं यही रहने वाली हु.", बबिता आज बागड़ी हरियाणवी की जगह साफ़ हिंदी बोल रही थी, dhara-pravah.

"ाचा फैंसला किआ आपने. मैं यही देख रहा था के इतनी खूबसूरत जगह वीरान नहीं होनी चाहिए. कितने सालो से बंद है ये?", बबिता के बराबर आ रुका तोह वह उसके साथ धीमे कदमो से आगे चलने लगी. ये रास्ता भी शायद कभी बगीचे जैसा था, सूखी मोटी बैले अभी तक दिवार से लगी थी.

"बंद नहीं है, बस जरुरत पड़ने पर हे कोई इधर आता जाता है. वैसे ये हवेली मेरे pad-nana की थी और उस से पहले उनके पिता जी की. फिर नाना ने ये मेरे नाम कर दी थी और उनका परिवार अभी जहा है वह चला गया. माँ आती रहती थी कभी कभी और मैं तोह जब भी अकेली होती तोह समय बिताने यही आ जाती हु.", बबिता लड़की होकर भी चलते हुए अर्जुन सामान हे लम्बी दिखती थी, शायद वह 2 इंच ऊँची काली सैंडिल की वजह से. जिस्म कही से भी साधारण न था.

"यहाँ कच्चे कमरे है और ये झूला, शायद बरसो से कोई बचा नहीं आया इधर.", अर्जुन ने उन 2 कमरों को देखने के बाद इधर एक और नीम के पेड़ की दाल पर मोटी रस्सी और लकड़ी की फटती से बना झूला देखते पुछा. वृक्ष का घेरा कही ज्यादा हे मोटा था, जैसे इसने पूरी सदी देखि हो.

"कमरे यहाँ काम करने वालो के थे और ये झूला माँ का है, होगा कोई 40-45 साल पुराण, वैसे हे बंधा पड़ा है. इधर आओ कुछ दिखती हु.", बबिता अर्जुन को लेकर हवेली की मुख्या ईमारत में इस पिछले दरवाजे को खोलती हुई दाखिल हुई तोह अर्जुन भी पीछे पीछे आ गया. शायद 2 कमरों को जोड़ कर ये कमरा तैयार किआ होगा. छत्त पर 4 ताडियो वाला पंखा नया था, दीवारे भी साफ़ उजली हुई सफ़ेद और ऊंचाई 12-13 फ़ीट. एक तरफ ये कही ज्यादा हे बड़ा बीएड जिसके दोनों तरफ ख़ास लकड़ी के काले चौकोर टेबल जिन पर पुराने लेकिन साफ़ लैंप रखे थे. दीवारों पर 2 हिरणो के मुँह टंगे थे, लम्बे सींग वाले. जैसे किसी महाराजा का कमरा हो. बंद हवेली में इतना साफ़ कमरा और तजा बिस्टेर उम्मीद से परे था.

"ये कमरा था बड़े नाना जी का और बाद में इधर वाला कमरा भी इसमें मिला दिए क्योंकि पहले हे 16 कमरे है इधर. उस ज़माने में बाथरूम इतने बड़े थे जितने आजकल शहर वाले घरो में कमरे होते है.", बबिता ने वह चौड़ा दरवाजा खोला और अर्जुन भी देखते हुए अंदर आ गया. सचमुच ये विशाल हे था जिसमे शायद कुछ मरम्मत और रंग कुछ समय पहले हे किआ गया था. पीतल का बड़ा नहाने का टब, धातु का फुजहरा जिसके पीछे लम्बी पाइप लगी थी और बाथरूम को 2 हिस्सों में विभाजित करता पर्दा जो पाइप में लगा था. बबिता अर्जुन को देख रही थी जो बाकी सबकुछ देख रहा था उसको छोड़ कर.

"तुम्हे मैंने यहाँ क्यों बुलाया जानते हो?", बबिता को 2 फ़ीट की दुरी पर थी अर्जुन से और उसके चेहरे पर हलकी गंभीरता का पट था अपनी बात कहते हुए.

"सिर्फ हवेली दिखने तोह नहीं बुलाया है आपने लेकिन ये मुझे पसंद आई. वैसे बताये क्या जरुरी बात करनी थी आपको?", अर्जुन बाथरूम से बहार आया तोह बबिता भी चुन्नी का एक कोना अपनी ऊँगली में घूमती हुई थोड़ी बेचैन सी उसके साथ वापिस कमरे में आ गयी.

"मुझे औरत bann-na है वह भी तुम्हारे साथ अपना पहला संसर्ग करके. 32 की हो चुकी हु मैं फरवरी महीने में लेकिन आज तक वही कोरी लड़की हु जो 16 की उम्र में थी फिर 21 की और आज 32 भी ख़तम हो चुके है.", बबिता ने यहाँ बुलाया था तोह बात ख़ास हे होगी ये अर्जुन जानता था लेकिन ये होगी ऐसी कल्पना भी न की थी.

"आपको पता है आप क्या कह रही है?"

"शायद तुम्हारी नजर में मैं बेशरम कहलाउंगी अपनी इत्छा जाहिर करने के बाद. लेकिन जो तुमने सुना वही सच है. मेरी शादी भी है हफ्ते बाद और मैं तब भी औरत बन्न सकती हु लेकिन मुझसे बचपन से आकर्षित होने वाला मेरा भाई जो मुझे पाने के लिए तुम्हारी बलि तक देने के लिए तैयार हो गया था उसको दरकिनार करके तुम्हे chunn-ne की एक बहोत बड़ी वजह है मेरे ऐसा करने की.", बिजेन्दर का सच तोह अर्जुन को गोलू ने हे बता दिए था लेकिन बबिता की बात जैसे कुछ रहस्य छुपाये बैठी थी.

"यहाँ सिर्फ हम दोनों हे है तोह बेशर्मी कहा हुई? अभी तक जो तहजीब और ाचे मेजबान की तरह बातें कर रही है वह आपको एक संजीदा इंसान ज्यादा कहता है. आप बताये क्या वजह है ऐसा करने की?"

"वजह कई है तुम्हे मैं इतना हे कहूँगी की बात ऐसी है के मैं मेरे परिवार को वापिस वैसा हे देखना चाहती थी जैसा वह पहले था. जिस इंसान की वजह से वह अपने ससुराल जाए मैं उसको हे अपना पहला मर्द मानूंगी, बेशक फिर चाहे एक हे बार के लिए क्यों न बने. तुमने तोह वैसे भी मेरे भाई के साथ लगी शर्त जीत कर मुझे हांसिल कर लिए है लेकिन मैं अभी भी पहली बात पर रहूंगी. जो इंसान इतना बदलाव कर सकता है वही मेरे में ये कुदरत का जरुरी बदलाव लाएगा. लड़की से औरत बनाने वाला महत्वपूर्ण बदलाव. किस्मत भी देखो, तुम्हे लगता है कोई साधारण इंसान मुझे संभल सकता है?", बबिता ने दुपट्टा एक तरफ रखते हुए बिस्टेर पर बैठ कर कहा.

"नहीं. लेकिन आप फिर भी एक बेहतरीन युवती हो. वैसे अगर ये काम मेरे पापा करते तब भी आप उनके साथ ऐसा करती?", अर्जुन का सवाल सुन्न कर बबिता के चेहरे पे एक अलग हे हंसी आ गयी.

"हाहाहा.. शंकर काका और परिवर्तन? दया या बचाव? नामुमकिन है अर्जुन. वह बेशक मेरी माँ को हाथ न लगाए लेकिन गलती से बिजेन्दर उनसे भिड़ा तोह उसके शरीर कोई कोई हिस्सा सलामत नहीं मिलेगा. बिजेन्दर ऐसा करता भी नहीं, जो बात पीढ़ी मतलब जनरेशन के बीच होती है उसमे बचे आवाज बुलंद नहीं करते, अगर वह समझदार हो और बिजेन्दर, सुदर्शन, ऋचा, संजीव, कोमल, अक्षरा या मैं हे क्यों नहीं, हमने ऐसा कोई कदम नहीं लिए. तुमने लिए क्योंकि जान बचने गए थे, शबनम ने लिए वह गायब हो गयी. मेरी बात का जवाब दो अब? इतिहास काम का नहीं है. क्या कहते हो, मेरी इत्छा और मांग समझ लो या कुछ भी लेकिन पूरी करोगे?"

"इसके गंभीर परिणाम हो सकते है. और अगर ये एक बार से आगे बढ़ा तब?", अर्जुन भी अब एक तरफ बैठ गया था.

"माँ- बिजेन्दर कुछ नहीं कह सकते. उन्हें पता है के मैं कौन हु और तुम्हारे साथ मैं ये कर सकती हु. इसके सिवा तोह तुम्हे किसी से डरना नहीं चाहिए."

"इस जगह को चुन ने की ख़ास वजह?"

"अर्जुन, ये मेरा घर है जहा मैं रहने वाली हु. ये कमरा इस याद को संजोये रखेगा, अगर तुम सबकुछ दिल से और प्यार से करोगे तोह. और मैं जानती हु तुम निराश नहीं करोगे.", बबिता इतनी संजीदा युवती हो सकती है ये उसके साथ रहने वाले भी शायद न जान पाए हो लेकिन आज वह अपनी हमेशा की छवि को जैसे कही बंद करके यहाँ इस नए रूप में थी.

"पता है मुझे अंजाम की परवाह बहोत कम् होती है. आपके साथ बस मैं सुशीला बुआ को ठेस नहीं पहुंचना चाहता. लेकिन जब सामने से आप हे यही चाहती है के मैं हे आपका प्रथम पुरुष बनु तोह अर्जुन भी वादा करता है के आपको दुःख नहीं होने दूंगा.", अर्जुन ने इस बड़े कमरे में आती रौशनी को बंद करते हुए इन 3 बड़ी खिड़कियों को परदे से धक् दिए. कमरे में जहा थोड़ी देर पहले आधे हिस्से में भरपूर रौशनी थी अब गहरे रंग के पर्दो ने वह सोखते हुए एक हल्का अंधकार कर दिए था.

"यहाँ वैसे भी कोई नहीं है तोह इसकी जरुरत?", बबिता शांत चेहरे से बस अर्जुन को उस आखिरी खिड़की के पास खड़ा देख रही थी. थोड़े से उजले हिस्से के सामने खड़ा वह खुद रौशनी सा दिख रहा था. बबिता जांघ पर कोहनी रखे बस एकटक उसको देख रही थी, हथेली ठुड्डी के निचे टिकाये.

"ऐसा करने से आपको सहज लगेगा और मैं भी शायद पूरा प्यार दे पाव. सेक्स नहीं करने वाले हम.", अर्जुन के इतना कहते हे बबिता कड़ी हो गयी. वह क्या बोल रहा है ये सुन्न कर जैसे उसको बुरा लगा था. अर्जुन वह आखिरी रौशनी भी ढलने के बाद अपने समकक्ष कद की बबिता के बिलकुल सामने आ खड़ा हुआ.

"सेक्स नहीं करना तोह ये सब क्या था जो कह रहे थे और कमरे को ऐसा बना दिए?", ठंडी आवाज में गुस्सा नहीं बस तड़प सी थी जैसे अर्जुन ने ना बोल दिए हो.

"2 मिनट वाला हवस का मिलान आपको मेरी ाची याद तोह नहीं दिलाने वाला. आप कहती हो न के कोई साधारण इंसान आपको संभल नहीं सकता, मैं भी वैसा हे मिलान चाहता हु जो कभी आपको साधारण न लगे. ख़ास हो तोह आपके साथ मेरा संसर्ग भी ख़ास होना चाहिए.", अर्जुन ने वह गोरी गोल कलाई पकड़ कर हाथ को चूम लिए. पहली बार बबिता की नजरे शर्म से झुकी थी उसकी बात पूरी समझते हुए. वह पलट गयी थी जाने कैसे लेकिन अर्जुन की पहली चुहान ने अंदर नया एहसास अभी से दिला दिए था.

"मेरी दादी कहती है के मैं गलती नहीं करती, बेशक काम फैंसले किये है आजतक.", बबिता की कलाई अभी भी अर्जुन के हाथ में थी और अब वह दूसरी कलाई भी पकड़ कर दोनों हाथो को बबिता के पेट के सामने ले आया. इस तरह अर्जुन अब उसके पिछले हिस्से से पूरी तरह सत्ता हुआ था. काली कमीज से भी गोरी गर्दन और आधे कंधे नुमाया थे जहा ठोस गोश्त इस शरीर के भराव का वर्णन कर रहा था. बबिता की धड़कन तेज हो चली जैसे हे अर्जुन के तपते होंठो ने वह गोरा नरम कन्धा चूम लिए. खुद हे बबिता ने उसके हाथो को मजबूती से पकड़ कर अपने पेट पर दबा लिए. आँखें बंद करती वह गर्दन अर्जुन की तरफ करने लगी थी.

"ज़िन्दगी में पहली बार पुरुष का स्पर्श दिल तक महसूस हुआ है. सच कहती है मेरी सहेली की ये शब्दों में नहीं कह सकते. ाः..", बबिता को अब अर्जुन के हाथ पेट सहलाते लगे तोह झनझनाहट सी होने लगी हर तरफ. बड़े कूल्हों के बीच अर्जुन का धीरे धीरे तनाव लेता लिंग एक और मजा दे रहा था.

"आपको पता है आप जब वह होती हो जैसा पहली बार देखा था तब ज्यादा ख़ास लगती हो. यहाँ हम दोनों है तोह वैसी रहो न. और थोड़ी देर पहले इतना खुल कर बोल रही थी मिलान के लिए अब शरीर कांप रहा है."

"बेशरम करना चाहता है मुझे.?", बबिता ने गर्दन पीछे टिकाये हुए आँखें बंद रखे हे कहा. अर्जुन ने वह दूध सा गोरा नरम गाल चूमते हुए दोनों हाथ उन पर्वतो के निचले हिस्से पर टिका दिए.

"उसको बेशरम होना नहीं कहते, साथ देना ज्यादा ठीक लगता है. वैसे मैं भी महसूस कर रहा हु के आप खुल कर साथ देने लगी तोह भारी न पड़ जाओ.", अर्जुन को आभास हो गया था उन बड़े तरबूजों का जो बबिता कितने आराम से सीने पे लिए रहती थी. रेशमी कपडे के ऊपर फिसलता हाथ उनकी निचली गोलाई सेहला रहा था.

"आठ.. बात ऐसी है के आज तेरी बारी और अगर दिल में अरमान कभी भूले से पैदा हुए इस बबिता के लिए तोह दूसरी बारी मेरी. साथ दूंगी तेरा लेकिन करेगा सबकुछ तू आज. आह्हः.. शहर में हु मैं अभी तोह 5 बजे तक 5 घंटे में जितना खोलना खोल ले. आह्हः.. चेहरा छोड़ के जहा मर्जी स्टाम्प लगा मैंने कोई परहेज न.", वह तगड़ा शरीर नरम और गद्देदार सा अर्जुन की मजबूत पकड़ में धंस रहा था. लेकिन वक़्त था यहाँ बबिता को युवती वाला एहसास करने का और अर्जुन के लिए जैसे मुश्किल न था. पल में हे वह सीने से उसके सामने घूम चुकी थी.

"कोशिश करता हु लेकिन ऐसे में बात नहीं हो पायेगी.", विशाल नितम्बो का गोश्त दबा कर अर्जुन ने दोनों की कमर सताते हुए पहला मुखस्पर्श किआ. वह नरम लरजते होंठ माखन से फिसल कर अर्जुन के मुँह में भर गए. खड़े हुए हे दोनों इस चुम्बन का मजा लेने लगे. बबिता के लिए तोह सब नया था, जीवन का पहला चुम्बन और वह भी इतना कामुक जहा उसके भरी पिछवाड़े को अर्जुन प्यार से मसलता हुए अपने लिंग की सख्ती जांघो के बीच करवा रहा था. बबिता की सांस उखाड़ने लगी तोह अर्जुन ने होंठ गर्दन से निचे खुले सीने पर लगा दिए

"आह.. बावला करे है तेरा हाथ लगाना. पप्पी का पता था यु किश करना तोह जानलेवा है अर्जुन. आठ.. आराम से मसल, मेरा भाई पहलवान है मैं कोणी.. आअह्ह्ह.. अरे के करे है.. आह्हः..", अर्जुन ने कूल्हों के निचे से उन भारी जांघो को बाँहों में लेते हुए बबिता को ऊपर हे उठा लिए था. बड़े पहले हुए गुब्बारों को कमीज के ऊपर से हे चूमता वह बता रहा था के बबिता भी एक लड़की है और मर्द कैसा भी हो अपनी औरत को उठा हे लेता है.

"आपको एहसास करवा रहा हु और कुछ नहीं.", अर्जुन ने जैसे हे बबिता को फर्श पर खड़ा किआ वह धम्म से बिस्टेर पर जा लेती, पाँव निचे टिकाये. नशीली आँखें और लम्बी साँसे लेती वह अर्जुन को निहार रही थी जो अपनी टीशर्ट उतार कर एक तरफ रखते हुए अब वैसे हे उसके ऊपर आ गया. एक कोहनी बबिता के सीने के बराबर बिस्टेर पर रक्त वह फिर से उन गीले होंठ का रस निचोड़ने लगा. फैले पाँव के बीच अर्जुन का मोटा तगड़ा लिंग बबिता के खजाने को जांच रहा था.

"ससससष्ठ.. आठ.. अर्जुन तू घाना तगड़ा है रे.. आठ.. आग लग ऋ सारे बदन में.", सीने पर सचमुच पसीना उभर आया तोह अर्जुन ने उस लाल चेहरे को अपने निचे बिस्टेर पर देखने के बाद सीना होंठो से साफ़ कर दिए. वह नमकीन पसीना कोई घिन्न नहीं दे रहा था और बबिता को पेट से नीच तक बिजली सी जाती महसूस हुई.

"आग बस वह एहसास है जो बहोत पहले हर युवती को हो जाता है लेकिन आप आज महसूस कर रही थी. वैसे कैसे संभालती है इतने बड़े खजाने को?", अर्जुन ने उन दोनों पर्वतो पर हाथ रखे तोह कसाव भरपूर लगा. बड़े थे बेडोल नहीं. बबिता भी सख्त हाथो का वह लग्न देख मचलने लगी. हर सांस के साथ दोनों फुटबॉल से चुके ऊपर निचे थिरक रहे थे. कमीज के सिरे को ऊपर करने की कोशिश बिना बबिता के साथ दिए असफल होने लगी.

"संभालना जरुरी था रे. ले कर ले उघड़ा (निर्वस्त्र).", बबिता ने कमर के ऊपर का हिस्सा उठाते हुए साथ दिए और अर्जुन कमीज हटते हे बस देखता रह गया. बबिता के गाल सेब से लाल हो चले थे अर्जुन की हालत देख. मर्द की आँखें क्या असर करती है ये बखूबी पता चल गया था.

"असली है?", अर्जुन का कंठ सूख गया क्योंकि इतने बड़े होंगे ये आभास कपड़ो के ऊपर से न था. बड़े जरूर थे लेकिन अकाल्पनिक से वह सचमुच 5-5 किलो के तरबूज से फक्क गोर चुके सफ़ेद ब्रा में बस जैसे तैसे आधे छुपे थे.

"ब्रा न मिलती इनके माप की लेकिन सचमुच कष्ट बहोत दिए रे इन्होने. आह्हः.. आराम से जालिम, बोब्बे है रबर कोणी. आठ.. तू सरे बटन दबावेगा तोह फिल्म कद शुरू होवेगी?", अर्जुन तोह उनका नुमाया हिस्सा सहलाते हे होश खो बैठा था. चुचो में कम्पन्न होती बता रही थी की इनका बोझ कही ज्यादा हे है. ब्रा के किनारे आते आते हथेली ने जोर लगा हे दिए.

"ये कमाल के है.", छोटा सा चूचक फुदक के बहार निकलते हे अर्जुन ने होंठो से लपक लिए.

"सीईईई.. आठ माँ.. के करके मानेगा रे.. आह्ह्ह्ह.. आराम से खा.. पहली बार चुसवा ऋ हु प्रैक्टिस कोणी.. माँ..", इधर अर्जुन उन बड़े दूध सी रंगत के गोलों को एक तरफ से मसलता और दूसरी तरफ निप्पल को होंठो में दबाता पीने लगा. सलवार के सामने कमीज न थी और लुंड उस पहले हुए नरम मांस को बुरी तरह रगड़ रहा था. बबिता का सर मस्ती और अलग से मीठे दर्द में इधर उधर हिलता उसकी आग भड़काने लगा.

"आप न हर तरफ से खाने के लिए हे बानी हो. सचमुच कितनी नरम और मीठी हो, मैं शायद जल्दबाजी कर दू.", अर्जुन ने दूसरी तरफ से भी ब्रा का कप निचे खिसका दिए था.

"तेरे से ज्यादा जल्दी मैंने हो ऋ है. आठ.. बेरा न के कर दिए जो शरीर सुन्न पड़े है. जोर जहा दिखाना वह दिखा, इनका स्वाद लेता रहिओ.. आठ.. तू बहरा से के.. दर्द hove..aaahh.. मा.. कर ले जो करे है.. मेरी छूट गीली हो गई.", बबिता ने शर्म लिहाज दूर फेंकते हुए आँखे मूँद कर छूट पर हाथ रख लिए. अर्जुन अब दूसरे बोब्बे को जितना मुमकिन था उतना मुँह में लेने लगा. कमरे में अब कही बबिता की निरंतर सिसकिया गूँज रही थी. 2 भरी और तगड़े शरीर किसी आम बिस्टेर को टॉड कर रख देते. जीन्स में क़ैद लुंड बेशक सर उठाये छूट के पास लग रहा था लेकिन उत्तेजना के साथ वह भी दुखने लगा.

"आप सलवार उतरो बस.", अर्जुन जैसे नशे में पहुंच गया था और फर्श पे खड़े होते हे उसकी जीन्स और कच्चा दोनों हे जिस्म से जुड़ा हो गए. वह गेंहुआ 9 इंची अंग ठुमक रहा था, भयंकर रूप लिए. बबिता बेसुध सी अभी तक सलवार के ऊपर से छूट मसलती दूसरे हाथ से एक चुके को सेहला रही थी. अर्जुन ने खुद हे आगे बढ़ते हुए गोल नाभि पर होंठ लगा दिए. सलवार का नाडा ढीला करके बबिता के यौवन को उजागर किआ तोह यहाँ भी चुचो जैसी विलक्षणता थी. चीरा लमबी लिए दोनों बेदाग़ मोटी जाएंगे के बीच बस लकीर सा था और फुलावट लिए. पारदर्शी रस उस दरार के किनारे फैला अर्जुन को अपनी तरफ खींच रहा था.

"कहु थी के तू करियो जो करना है. अब देर न कर अर्जुन आह्ह्ह्ह.. यु गन्दी se..aaahhhhh.. जानवर.. माँ आह्ह्ह्ह.", बात अधूरी हे रह गयी जब अर्जुन ने अपना मुँह उस फूले हुए मांस और रसभरी छूट पर भिड़ा दिए. ाचा खासा मांस अर्जुन के मुँह में आने लगा था और उसके बड़े पंजो के बीच ब्रा से बहार झूलते खरबूजे मसले जाने लगे. बबिता ने छूट के अंदर जाट वह गीली जीभ महसूस करते हे पानी छोड़ दिए.

"मर्डर गयी रे जालिम.. बहनचोद.. कुत्ता भी न करता यु काम.. छूट है चासनी कोणी.. आह्हः.. मजा तोह आवे है.. माँ.. मार दिए इस खागड ने.. ", छूट के छेद तक जाने में हे आधी जीभ लकीर में उतर गयी थी. सब साफ़ करते हुए अर्जुन ने अपना चेहरा बबिता के ऊपर झुकाया तोह शर्म से उसने गर्दन एक तरफ कर दी.

"की.. के कार्य यो गंदे आदमी? छूट कोण चूसे करे है?"

"कहा था न आपका हर हिस्सा खाने लायक है. कसम से आपकी छूट के पास पहुंचने में हे इतना सफर करना पड़ा जो सोच नहीं सकता था. बड़ी मीठी हो आप.", अर्जुन के इतना प्यार दिखने पर बबिता ने बड़ी बड़ी आँखे उसके चेहरे की तरफ करते अपने होंठो को उसके सामने कर दिए.

"जड़ तन्ने मेरा सब पसंद तोह फिर मैं भी तेरी और ेब कोई नखरा न करती. देखु जरा अगला सफर तू किस तरिया करे है... उम्म्म्म..", अपनी हे छूट का वह अलग सा स्वाद पहले बकबका सा लगा लेकिन बबिता अर्जुन के होंठो को चूसती रही. निप्पल फूल कर अपनी अकड़ अर्जुन के सीने पर बता रहे थे और नंगी छूट के बाहरी मलमल से हिस्से पर कठोर सूपड़ा अर्जुन की बेचैनी भी जाहिर कर रहा था.

"दिल नहीं भर रहा आपके किसी हिस्से को छोड़ने का. कितनी नरम हो aap..aahh.", बबिता ने उसकी बात पूरी होने से पहले हे अपनी नरम उंगलियों से वह खूंटा अपनी जामे के ऊपर टिका दिए.

"घाना हे बड़ा औजार है तेरा. देख के ठोकिये खसम.. फेर काट लिए बोब्बे mere..aa रे किलकि (चीख) लिकद्वान में ज्यादा मजा आवे है के.. आअह्ह्ह.. भोत मोटा है यु.", लुंड को थोड़ा हे दबा पाई थी अपनी नरम गुदगुदी छूट के बहार और अर्जुन ने हल्का सा अंदर दबा दिए. आधा सूपड़ा धंसने के बाद कही छूट के छेड़ पर लगा था.

"आप कोनसा छोटी सी हो. मोमबत्ती से तोह आपको फरक नहीं पड़ने वाला था.. आअह्ह्ह.. आग उगल रही हो निचे से.", अर्जुन ने मदहोश होते हुए ाचे से बबिता की दोनों बाहो के निचे हाथ रखते हुए जकड लिए था. अभी तक पाँव निचे लटके थे लेकिन बबिता का जिस्म भरवा और हर चोट झेलने के मुताबिक था. चुचो का मर्दन करते हुए अर्जुन ने कमर का जोर भरपूर लगा दिए था इस धक्के के साथ.

"आअह्ह्ह्ह.. महानस.. फाड़ दी रे मेरी छुट्ट्ट्ट.... खसम... तेरा लुंड सत्यानाशी hai..maar दिए रिइइइइ... आइइइइइइइ.. दत्त जा (रुक ja)..aahhhh..", लिजलिजे हिस्से से आगे छूट का मुँह फाड़ता अर्जुन का मोटा सूपड़ा सब परत फाड़ता आधा अंदर जा धंसा. बबिता बस होंठ हे छुड़ा पाई थी, शरीर जैसे जंजीर से बाँध कर ताले में बंद था अर्जुन की मजबूत पकड़ में.

"हो गया बस जो होना था.. आह्हः.. बहार से तोह इतनी नरम हो.. आह्हः.. कितनी टाइट छूट है आपकी.. aahh..ummmm", अर्जुन फिर से उन होंठो को चूसने लगा, भरी चुके तोह अब खुद चीख रहे थे के दर्द खराम करने के लिए चाहे उन्हें मसल डालो.

"खसम (पति) मोटी हु छूट तोह सबकी एक सी होव है.. आह्हः.. ेब चूस मेरे बोब्बे.. फाड़ के रख दी बेरा न चाल भी सकुंगी के आड़े रात काटनी padegi..maa गलती हो गयी.. आह्हः. पी ले रे इन्हने.. किम्मे दर्द काम होव है.", अभी तक अर्जुन ने उसके भरी कूल्हों को निर्वस्त्र नहीं थमा था. एक बोब्बे को मुँह में लिए उसने बबिता की टांग ऊपर उठाई तोह लुंड थोड़ा और अंदर धंस गया.

"माँ छोड़ ले मेरी मैंने बक्श de..aahh.. के सर्कस करे है अर्जुन. मैं कहु हु रुक जा और तू यो सत्ता (मूसल) और धक्के है छूट के भीतर."

"सॉरी. आपके पाँव ऊपर कर रहा था. अब नहीं करता."

"नाराज न हो मेरी जान. छूट का दर्द ज्यादा से, मैंने पीछे खिसका दे आराम से फेर उठा लिए मेरी सांतल (जांघ).", अर्जुन ने भी प्यार से होंठ चूम कर बात मान ली. बबिता के वजनी शरीर को बड़े एहतियात से पीछे बिस्टेर पर करते हुए वह पूरी तरह ऊपर ले आया. आधा लुंड अभी भी उस नरम मांस के अंदर फंसा हुआ था जहा से इतनी देर बाद खून बहार निकलने लगा था.

"बबिता जी, आपके ये भी काम नहीं है.", एक हाथ नरम कूल्हे के निचे गया तोह अर्जुन ने हलके से थोड़ा लुंड बहार निकल कर अंदर कर दिए.

"सीई.. आह्हः.. आज आगे हे कर ले मेरी जान, पिछवाड़े की तारीफ बहोत है कुछ करियो न.. आठ.. तेरा लुंड कोई कबूतरी ले किस तरिअ सके है? आह्हः.. ेब पूरा घायल दे, रओं दिए जे मैं रौ तोह.", बबिता अब वक़्त न जाया करते हुए अर्जुन के साथ मिलान आगे ले जाना चाहती थी और निप्पल मसलते हुए अर्जुन ने भी बात ख़तम होते हे पूरा लुंड जड़ तक अंदर ठूस दिए.

"माआआआ...", बबिता चीख रोकने के लिए अर्जुन के कंधे पर दांत गदति तडफने लगी. लम्बे कद्द के बावजूद अर्जुन का लुंड गर्भ चूम कर थोड़ा पीछे आ गया था. अंदर जैसे वह सुरंग आज जा कर पूरी हुई थी. अर्जुन भी कसमसा गया था नरम मांस के बीच सख्ती से फंसे लुंड की हालत से.

"आअह्ह्ह.. बबिता जी, कही और दांत गदा लो, यहाँ नहीं.", कंधे के मांस में 4 दांत गाड़ने से बबिता को भी मुँह में खून का स्वाद पता लगा. तुरंत हे वह सर हटती अपना दर्द भूल कर अर्जुन को देखने लगी. चेहरे पर बस म्हणत का पसीना था लेकिन कंधे पर लगे 4 कट से हल्का खून रिस रहा था.

"अर्जुन माफ़ कर दे रे, गलती हो गयी दर्द में दर्द दे बैठी."

"आपने कुछ नहीं किआ, हो जाता है ये सब.. उम्म्म", अर्जुन ने अपनी छाती से उन रसीले खरबूजों को कुचलते हुए बबिता की छूट में 2 इंच लुंड अंदर बहार किआ तोह वह भी जोश में उसको लगाती हुई इन हलके धक्को को सहने लगी.

"आह्हः.. अब न चीखती मैं.. तू सच्ची मरद है रे और मैंने जी जी न कह. बबिता बोल या जान बोल ले या जो दिल करे.. आह्हः.. आराम से कर या खुली कोणी."

"खोलने में तोह हफ्ते लगेंगे बबिता और ज्यादा भी लग सकता है अगर ये चुके ऐसे हे ईमान खराब करते रहे. ाःह..", अर्जुन ने जोश में आधा लुंड निकल कर धक्का लगाया और दोनों की तेज चीख निकल पड़ी. गोर बूबे लाल पड़ने लगे थे और छूट से paani-rakt बहार आने लगा था.

"तन्ने यु घने पसंद है न, पलट जा मेरी जान.", अर्जुन ने बबिता की बात सुनते हे लुंड फसाये हुए हे दोनों को पलट लिए. अब बबिता का मखमली बड़ा बदन उसके ऊपर था और जड़ तक लुंड छूट के अंदर निचे से धंसा हुआ.

"हिम्मत वाली हो Babita..aahh.. उम्म्म्म..", जोश में दोनों की राल एक दूसरे के मुँह में जाने लगी. इधर चुचो को छोड़ अर्जुन ने वह मटके से बड़े बड़े कूल्हों को थाम लिए. गांड की दरार को कास के दबाते हे पहली बार लुंड आखिरी हद में जा अटका. इस मुद्रा में छूट फैलने से हे ऐसा हो पाया था.

"ओह्ह्ह्ह.. इतना बचा के राख्या था ke..aahhh.. तू आदमी ठीक कोणी लगे मैंने.. गांड छोड़ दे अगर थोड़ी इज़्ज़त करे है तोह.."

"नहीं कर रहा वह kuch..aahh.. छूट तोह मारी नहीं अभी तक आप तीसरी बार गांड बोल कर वह ले जा रही हो. आपका तोह दिल नहीं कर रहा वह करवाने का? आठ.. ये दोनों है कितने बड़े..?", अब अर्जुन ने वह झूलते गुब्बारे हे चूसना ठीक समझा. एक चुके को खुद हे बबिता ने मुँह में ठूंस दिए और अपने वजनी कूल्हों को आगे पीछे हिलने लगी..

"आठ.. कसम से अर्जुन तू सच बोलिये के कोई छोरी पूरा लुंड ले चुकी तेरा? आठ.. मेरे चुके 44-ह है और कच्ची मिलती न तोह सलवार पहन के रहना पड़े है बस. वैसे भी पसंद कोणी मैंने अंदर कुछ पहन न.. आठ.. राम रे.. चुका लुंड है तेरा."

"आपके बोब्बे अभी इतने बड़े है माँ बनोगी तब घर से नहीं निकल पाओगी.. आठ पूरा पीछे जाओ न."

"तू बस बोब्बे चूस, पीछे जाओ न. लुंड मेरी छूट में है और आठ.. मैं गयी रे.. ", बीच में हे टंगे कांप उठी बबिता की. धम्म से वह अर्जुन पे गिरी और एक और चीख निकल गयी निप्पल पर दांत गाड़ने से.

"मार दे manne..aahh.. निचे लुंड ऊपर मुँह.. आह्हः चुकी काट दी. बालक होये तोह के पिलाऊंगी मैं..", चरम का मजा अधूरा लगने लगा था लेकिन अर्जुन गलती सुधरता निचे निकल आया.

"अब देखो जब दोनों सही से खुलकर करते है तोह मंजिल कैसे नहीं मिलती.", अर्जुन ने बबिता को सही से घोड़ी की मुद्रा में किआ और पीछे आ गया. कूल्हे सचमुच इतने बड़े थे जिनते सरोज मौसी या ललिता जी के भी न हो. मांस से लबरेज गोल मटके से दोनों बहार को निकले गोर नितम्बो के बीच हे वह गुलाबी पारी उभरी हुई दिख रही थी. छूट को फैला कर छेड़ का जायजा लेने पर हे अर्जुन देख पाया था उन मॉटे होंठो की असाधारण गहराई.

"कमाल हो बबिता.", चिकनाई छूट को खोलने से हे नजर आ गयी थी उस लाल छेड़ के ऊपर. हाथ में कास के लुंड को पकडे वह इस मुर्राह भैंस सी युवती पर जिप्सी घोड़े सा जा चढ़ा.

"आह्ह्हह्ह्ह्ह.. कसूता आदमी है टूउउ.. माँ.. कितनी बार फाड़ेगा मेरी...?", ठप्प की आवाज से दोनों के जिस्म जा मिले और ऊंचाई के साथ झुकने पर भी वह बड़े बड़े गुब्बारे बिस्टेर को छू रहे थे. Hatti-katti बबिता के दोनों भारी चुके गिरफ्त में लेता अर्जुन jor-shor से चुदाई में लग गया. जल्द हे तेज चीखे अब मीठी आहों में बदल चुकी थी. बड़ा और मजबूत बिस्टेर कांपने लगा था इन bhari-bharkam जीवो के भरपूर मिलान से.

"बबिता आह्हः.. ये एक बार में नहीं ख़तम होने wala..aahh..", अर्जुन के अंडकोष छूट के नीच जा भिड़ते. Thap-thap की आवाज ने बिस्टेर की चूल्हो के साथ बबिता का भी जिस्म हिला दिए था. गांड के बड़े गोले दोनों तरफ हिलते हर धक्के को लील रहे थे.

"मैं तोह कहु हु तू हे हरी करदे रे मेरी dharti..aahh.. बेरा न कोई और कर सकेगा के कोणी.. माँ मैं फेर गयी रे..", वह मजबूती से हाथ टिकाये खुद को रोके हुए थी झड़ते हुए भी. लेकिन लुंड और तेजी से फिसलता छूट का सत्यानाश करता रहा. चुके उमेठे जाने से सिसकारियां तीव्र होने लगी.

"आने वाला हु.. आह्हः.."

"भीतर (अंदर) भर दे सामान.. आह्ह्ह्ह.. oooiii....ke छोड़ दिए रे अंदर? आह्ह्ह्हह..", वीर्य भी ऐसे गिर रहा था जैसे नलका खोल दिए हो. अब दोनों के जिस्म जा गिरे बिस्टेर पर और बबिता अपने ऊपर अर्जुन को आराम से लिए पसरी रही. चुके आधे दोनों तरफ से बहार निकल आये थे.

"अभी और करेंगे.", अर्जुन जैसे समय और इंसान भूल चूका था.

"कर लिए लेकिन थोड़ा दत्त जा. मेरी बुरी दुर्गति हो गई है. 4 घंटे है अपने पास."

"बस आधे घंटे बाद एक बार और.", अर्जुन ने लेते हुए हे दोनों उभारो को दबोच लिए.

"आह्हः.. कर ले मेरी जान. आज कोरी कोणी रही तोह आज हे रमा करदे. तेरी रेल तगड़ी है, पटरी फाड़ दी."





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वक़्त और बदलाव (2)


घर से कार लेकर शंकर जी निकल तोह आये लेकिन कुछ समझ में नहीं आ रहा था के कहा जाए. काम कुछ जरुरी थे और कुछ जहा उनका होना हे बहोत था. उनके पिता ने भी इंग्लैंड वाली बात को नकार दिए था फ़िलहाल के समय को देख कर. उजले दिन में गुलाटी और सांगवान के साथ भी रहना बेमतलब हे था. कार एक पीसीओ के बहार रोक कर अपने साले राजेश को हे फ़ोन मिला लिए. लेकिन वह तोह खुद नदारद था.

'दीपक से फाइल तोह ले ली लेकिन शादी से पहले ये पंजाब जाना नामुमकिन है.', कार में आँखें बंद किये वह आराम से सोच विचार कर रहे थे की उनकी तन्द्रा इस कांच पर होती khat-khat से भांग हो गयी. एक पल तोह हल्का गुस्सा आया लेकिन बहार maile-kuchle कपड़ो में लिपटी ये महिला और उसके साथ खड़ा 7-8 साल का उसका बचा देख कर शिक्षा निचे कर दिए.

"बाबू जी, मेरा बचा भूखा है. 1 रूपया दे दो बिस्कुट खा लेगा.", उस औरत और बचे को देख कर शंकर ने पहले अपना पर्स उठाया फिर कुछ सोच कर वापिस निचे रख दिए. गाडी का हॉर्न 2 बार मारने पर सामने पेड़ के निचे chole-poodi बनता रेहड़ी वाला गमछे से मुँह साफ़ करके उनके करीब आ गया.

"जी साहब.", एक बार उसने इस औरत को घृणा से देखा और फिर शंकर जी से पूछने लगा.

"दोनों को भरपेट खिला देना और वैसे बिलकुल मत देखना जैसे अभी देखा है.", 100 रुपये का नोट उस रेहड़ी वाले को थमते हुए शंकर जी ने चेतावनी भी दे दी थी और वह झेंपता हुआ हाथ जोड़ कर अपनी जगह चल दिए.

"जाओ और आराम से अपने बेटे के साथ भोजन करो बहिन. बाकी पैसे रख लेना या और खाना ले लेना, बाद के लिए.", शंकर जी ने चाबी घूमते हुए कार चालू की और उस औरत ने विनम्रता से हाथ जोड़ दिए.

"भगवन आपका भला करे बाबू जी. मेरे बेटे ने कल से हे कुछ नहीं खाया था, मैं तोह माँ हु रह सकती हु जैसे तैसे. भगवन आपको लम्बी उम्र दे.", बात पूरी होने से पहले हे शंकर जी ने गाडी पीछे करते हुए उस बड़ी पार्किंग से घुमा ली. अब जैसे उन्हें अपनी मंज़िल पता थी और कार का पंजा पूरी तरह दबाते हुए वह जैसे इस मशीन का औकात जान न चाहते थे. बिपास पल में हे पीछे छूट चूका था और इस खाली सड़क पर सिखर दोपहर ये नीली इलो कार 160 के पार जाती जैसे इसको चलने वाले की गुलाम हे थी. क़स्बा शुरू होने से पहले हे रफ़्तार काम हो चुकी थी, सड़क पर चहल पहल का अंदेशा था शंकर जी को और इसके बाद गाडी सोमबीर सिंह के गाँव में दाखिल हो चुकी थी.

"आपने नयी गाडी ली और मुझसे तिलक भी नहीं करवाया?", आँगन में गाडी आते हे ये ऋचा हे थी जो कार से शंकर जी के उतारते हे उनके गले लग गयी थी. आँगन में दोनों के सिवा बस मल्टी हे थी जो ये बड़ा किवाड़ (दूर) बंद कर रही थी जो शंकर के लिए खोला था उन्होंने.

"कर ले तिलक तू, कोण रोक रहा है तुझे? नमस्ते भाभी.", शंकर ने मल्टी को आवाज से हे अभिवादन करते हुए अपनी बड़ी बेटी को साथ लगाए रखा.

"Ram-ram देवर जी. माँ जी सो रही है अभी सुशीला के कमरे में. खाना धार (बना) दू?", मल्टी उर्फ़ गुड्डी ने मटके का ठंडा पानी गिलास में भर कर देते हुए कहा. ऋचा अभी भी एक तरफ से शंकर जी को जकड़े कड़ी थी, किसी छोटी बची की तरह.

"आप आराम करो भाभी, लता बना देगी जब मुझे भूख होगी. आप ठीक हो?", शंकर जी ने गिलास ऊपर करके हे पानी पी लिए था और वापिस गिलास पकड़ते हुए उनका हलचल भी पूछ लिए.

"हाँ सब कुशल मंगल है. वो सुदर्शन की खबर मिली थी 2 दिन पहले. कह रहे थे के सफदरजंग में डॉक्टर अरोरा है जो माहिर है ऐसे मरीजों के. एक हे है मेरा तोह देवर जी, माँ जी के सामने तोह मैं क्या हे कहु. गलती हो गयी, सजा भी मिल गयी लेकिन मेरा बीटा है और आपका भतीजा. न इलाज होता तोह घर हे लिया lao.",Baat कहते कहते मल्टी का हल्का गाला रुंध गया.

"भाभी परेशां मत होना मैं ये बात भी करने आया था यहाँ. डॉक्टर अरोरा के पास उसकी फाइल भिजवा दी थी कल अंकल ने और जल्द हे उनकी निगरानी में सुदर्शन का इलाज शुरू हो जायेगा. इस बार जब वह घर आये तोह बाँध देना खूंटे से, सुधर जायेगा. पहले तोह लग रहा था के हालत सही होने में 8-10 महीने तक लग सकते है, अब शायद 4 महीने के बाद वह दुरुस्त हो जाये.", शंकर जी यहाँ बात कर रहे थे उधर मधुलता कमरे के सामने गलियारे में कड़ी इन तीनो को देख रही थी.

"मुझे पता था देवर जी कोई और उसकी चिंता करे न करे आप जरूर देखोगे."

"मेरा भतीजा है भाभी वह. और कही न कही गलती मेरी भी है.", शंकर जी के नजरअंदाज करने पर अब वह मधुलता नहीं कड़ी थी, शायद कमरे में जा चुकी थी. लेकिन वह मालती से वैसे हे बात करने लगे.

"पापा, लड़ाई उन दोनों में हुई तोह आपकी क्या गलती. वह भाई है तोह झगड़ पड़े.", ऋचा अब शंकर जी से कार की चाबी लेने के बाद चले को गौर से देख रही थी. उसको ये बड़ा सुन्दर लगा था.

"तुम अफसर bann-ne वाली हो और ऐसी दलीले देना छोडो. भाई है ये उन दोनों को नहीं पता था और मामूली झगड़ा नहीं हुआ उन दोनों के बीच.", शंकर जी यही बात किसी और को कहते तोह आवाज गूँज रही होती लेकिन ऋचा के सामने बस नरमी से हे काम चलना पड़ा.

"हो गया सो हो गया देवर जी. रस्ते पर तोह गलत हे चल रहा था वह. अर्जुन से तोह कोई शिकवा नहीं बस इस बार ये घर आ जाये तोह मैं khet-khalihaan संभलवा दूंगी उसको. लड़की कोई मिली तोह ठीक नहीं तोह जय राम जी की. आप भी मेरी वजह से यही घाम (धुप) में खड़े हो, अंदर बैठो मैं लस्सी लेके आती हु."

"अंदर हे जा रहा हु भाभी, आप आराम करो और समय मिलने पर में ले जाऊंगा आपको सुदर्शन से मिलवाने. चल बदमाश अब तू बता यहाँ आँगन में क्या कर रही थी.?", वह ऋचा को लिए एक तरफ से इमारत के पहले कमरे की तरफ बढे तोह ऋचा बोली.

"ये आपकी गाडी नहीं है न पापा? और मैं छत्त पर गयी थी जब आपकी गाडी पिछली सड़क से दौड़ती आ रही थी, गाँव में अब ऐसे कोई कार नहीं चलता तोह मैं समझ गयी के आप हे होंगे. नीचे आई तोह ताई ने दरवाजा खोल दिए था मेरे से पहले. वैसे चटख रंग की गाडी ाची लगती है आप पे.", ऋचा ने अंदर आते हे बिस्टेर पर पड़ी कटी हुई सब्जी, अखबार और दुपट्टा उठा कर एक तरफ मेज पर रखा और चादर झड़ने के बाद एक तरफ हो गयी.

"अर्जुन की है और उसको चलनी नहीं आती अभी. कड़ी थी तोह ले आया, वैसे चंडीगढ़ कब जाना है वापिस?", गोल तकिये पर कमर टिकते हुए शंकर जी ने जूते पाँव से हे खोल कर एक तरफ रखे और बिस्टेर पर सही से तक लगा कर बैठ गए.

"कब आई हु मैं? जुलाई में जाना है और आप से ये पूछने लगे. वैसे अर्जुन जल्दी हे बड़ा हो गया.", अभी ऋचा बात कह हे रही थी की अंदर से ट्रे में एक कप लिए मधुलता आ कड़ी हुई.

"तेरे बाप को बस तू बड़ी होती नहीं दिख रही. दुनिया ख़तम हो जाएगी तब भी ये जवान रहेंगे और तू इनकी doodh-moohi बची. 2 हफ्ते पहले बात करने लगे थे लेकिन फेर अमेरिका जा बैठे. तारीख याद है कुछ डॉक्टर साहब?", सर के आगे अभी भी हाका पल्लू था और आवाज में तंज होने के बावजूद स्वर नरमी भरा और धीमा. शंकर जी के साथ ऋचा के चेहरे पर भी हंसी आ गयी.

"ये अब काली चाय लाइ होगी. जिस दिन इसका पारा गरम हो तोह सुबह दूध वाली चाय, दोपहर में काली और रात को तोह पूछ हे मैट."

"बात बनानी आसान है, बैठने से हे काम हो जाता है. हंस लो मिल के दोनों baap-beti इस चारदीवारी में. घर के बहार तुम्हारे पापा तुम्हारे चाचा और मेरे देवर. लड़की जरुरत से ज्यादा पढ़ गयी, उम्र हो गयी लेकिन कोई विचार नई."

"इधर बैठ लता, तेरा गुस्सा जायज़ है. लेकिन जितना मैं यहाँ आता हु शायद उतना हे उस घर में जाता रहा हु. शादी की चिंता बेवजह है तुम्हारी, बेटी जब होनहार और काबिल हो तोह लड़के वाले खुद आएंगे न देखने? मेरी नजर में भी है एक लड़का बस इसकी अगले साल जोइनिंग हो जाने दे और मैं ताई को बोल के तुझे भी चंडीगढ़ शिफ्ट करवा दूंगा.", मधुलता बीएड के दूसरे किनारे थोड़ी दूर बैठी थी और ऋचा ने ट्रे में देखा तोह काली चाय हे थी.

"तेरे पापा के लिए खाना दाल दे उठके, कोई एक काम कर लिए कर घर का. हर वक़्त फ़ोन, टीवी और तेरी दादी.", मधुलता ने इतना कहा और ऋचा उठ कड़ी हुई.

"अपने आप खिला देना आप, मैं चली सोने. आये आपसे मिलने है तोह ये बहाने मैट हे दो के मैं क्या करती हु और क्या नहीं. हर टाइम शांत रहती है लेकिन पापा दिखे नहीं के कुकर की सीटी बज जाती है, गर्मी से.", ऋचा शंकर जी की तरफ आँख मार कर बहार दौड़ गयी.

"दत्त जा मैं बताऊ तन्ने. हर टाइम बस masti-majaak. भेज लो चंडीगढ़, चढ़ेगी किसी दिन चाँद तुम्हे भी और मुझे भी.", ट्रे को एक तरफ रखने लगी हे थी की शंकर जी ने कप उठा लिए.

"चंदा (आपस में प्यार का नाम) तू न गुस्सा करना कम् कर दे अब. बप की शिकायत होने लगी तोह अलग समस्या हो जनि है. मुझे याद था के महीने का आखिरी दिन है और इस बार तेरा समय नहीं दे पाया था.", दूसरे हाथ को मधुलता के हाथ पर रखते हुए शंकर जी ने सहलाया और कप को मुँह की तरफ ले जाने लगे.

"छोड़ो ये चाय. सिग्रत्ती पी के पहले हे फेफड़े जला रखे है अब और कलेजा फूंक लो. बातें करवा लो बस baap-beti से लेकिन 2 दिन छोड़ के 28 दिन मैं यहाँ बस बेजुबान सी रहती हु. अब तुम्हारे साथ भी न बोलू तोह क्या करू? पिछली बार आये तोह लगा मेरे लिए आये हो, माँ से बात करके फेर गायब.", मधुलता ने कप लेना चाहा तोह शंकर जी ने उस दूसरे हाथ से पकड़ी कलाई अपनी तरफ खींच ली. मधुलता सीधा सीने से जा लगी.

"शर्म करो थोड़ी शंकर, घर में सब है और तुम्हारी हरकते वही कॉलेज वाली.", मधुलता अलग न होती बस सीने को सेहला रही थी. कप अब बिस्टेर के एक तरफ लकड़ी पर रखा था.

"हाँ मैं कॉलेज में हु और तुम जो मोटर पे ना आने पे मरने की धमकी देती थी वह? तब दिन में कर्फ्यू रहता था न?", शंकर ने वह माथे के सामने से पल्लू हटते हुए उन बड़ी काली आँखों को देखा और फिर थिरकते हुए होंठो को चूम लिए. मधुलता ने तुरंत हे आँखें बंद कर ली थी.

"दरवाजा बंद करने दो, सब सो रहे है लेकिन फिर भी.", शर्माती हुई लता दबे पाँव दोनों तरफ से दरवाजा बंद करके अब आराम से शंकर जी की बगल में आ लेती. सर पे ओढ़नी, सीने पर कैसा पारम्परिक ब्लाउज जैसा कमीज, सामने बटन लगा और गहरे हरे रंग का घाघरा पहने वह अब शंकर के आगोश में बस उस ख़ास चेहरे को देख रही थी जिसके लिए इतना इन्तजार रहता था.

"सच कहु तोह अब मेरा जी नहीं लगता यहाँ शंकर. या तोह अपने घर बता हे दो नहीं तोह यहाँ से अलग कही घर ले दो. घुटन होती है हर वक़्त और ये विधवा का वस्त्र अब सेहन नहीं होता.", लता शंकर के सीने को सहलाती हुई अपने दिल का हाल बयान कर रही थी. शंकर भी निचले हाथ से पीठ सहलाता दूसरे को उस गोर गाल पर रखे थे.

"ताई और maa-papa को पता है लता हमारे बारे में लेकिन जानती हो के वह और भी कितने लोग है? ऋचा जैसी मेरी 2 बेटी है, मेरा एक लड़का है और रेखा भी तोह है. उन सबसे जुड़े लोगो को मैं क्या जवाब दूंगा? लेकिन मेरे लिए तुम हे मेरा प्यार और पहली पत्नी हो, ऋचा पहली बेटी. फिर भी तुम अगर चाहती हो के यहाँ नहीं रहना तोह मैं ताई से कैसे भी करके बात करता हु. ऋचा और तुम्हारे लिए एक घर देख लेते है फिर.", शंकर ने अपना पहलु बताया तोह लता उस चौड़े सीने पर खिसकती हुई थोड़ा ऊपर आ गयी.

"होने को तोह हो सकता है अगर समझदारी दिखाओ. बचे सब कर सकते है शंकर और मुझे भी बड़ा परिवार मिल सकता है.", लता ने चेहरा शंकर के ऊपर करते हुए खुदसे हे उसके होंठो को मुँह में ले लिए. शंकर ने भी घाघरे के पास कमर को पकड़ कर अब लता को पूरी तरह अपने ऊपर लिटा लिए था. जल्द हे इस लम्बे चुम्बन के साथ शंकर के हाथ उन नरम कूल्हों को दबाने लगे थे. घाघरा भी हर गुजरते क्षण के साथ baal-vihini गोरी पिंडलियों से ऊपर उठता चिकनी भाई जांघो तक आ पंहुचा. दोनों के चेहरे अलग हुए तोह शंकर के चेहरे पर सुकून और लता की आँखों में चमक थी.

"तुम्हे इतना यकीन कैसे है के ऐसा भी हो सकता है? मैं तोह खुद सोच रहा था के शादी में कोशिश करके तुम्हारे बारे में घर बता दू लेकिन गुलाटी ने कहा के ऐसा करना बड़ी गलती होगी और उसकी बात एक तरह से उचित हे थी.", लता इतना सुन्न कर थोड़ी ऊपर उठ गयी. शंकर की कमीज के बटन अपने हाथो से खोलती वह मुस्कुरा रही थी. चौड़ी छाती पर वह काले बाल उजागर होते होते लता ने अपनी कमर भी शंकर के उभर के नजदीक खिसका लिए.

"कोमल और ऋचा में नजदीकियां है शंकर. और जितना मुझे पता है वह अर्जुन हे एक ऐसा बचा है जो समझदार और भोला है. उसको सबके हक़ की फ़िक्र रहती है न तोह क्या वह अपनी बड़ी माँ के लिए कुछ न करेगा?", बात सुन्न कर शंकर जी ने आँखें मूँद ली थी. किस धर्मसंकट में दाल रही थी लता उन्हें.

"चंदा कोई भी ऐसी बात उसके साथ नहीं करेगा. वह तुमसे जुडी हर बात खंगालने लग गया तोह लेने के देने पड़ जायेंगे. लेकिन मैं कोशिश करूँगा ऋचा को उसका हक़ मिले और मैं तुम्हारी ज़िन्दगी को बेहतर बना सकू.", शंकर के इतना कहने पर लता ने भी इस वक़्त बात को खींचना ठीक नहीं समझा. खुद हे शंकर के हाथ अपने सीने पर रखती वह निचे झुकने लगी.

"महीने में ये 2 दिन तोह पूरे दिए करो. आह्हः..", ये सिसकारी का निकलना तुरंत हो गया जैसे हे शंकर ने दोनों उभर पंजो से दबाये. लता के वापिस ऊपर होते हे उस कासी हुई कमीज के 4 बटन खोल कर के मांसल चुका बहार निकलते हुए शंकर ने वह भूरा निप्पल मसलने के बाद मुँह में भर लिए. लता कसमसाती सी अपनी कमर को शंकर की पतलून के पहले हुए हिस्से पर रगड़ने लगी. अब बातें काम करते हुए दोनों हे शरीर को ज्यादा हरकत देने लगे थे. ऊपर झुके हुए लता ने पतलून की ज़िप खोलनी चाही तोह शंकर ने खुदसे हे बटन ढीला करते हुए निचे के दोनों वस्त्र सरका दिए. वह सख्त पहला हुआ लिंग बहार निकलते हे घाघरे के भीतर गायब हो गया.

"आठ.. तू आज भी वैसा हे करती है चंदा. आराम से मेरी जान, टूट जायेगा तोह तेरा हे नुक्सान है.", शंकर जी की ये सिसकारी बता गयी थी की लता उस लुंड से ाचे से खेलना जानती है. अब कमीज से दोनों चुके बहार निकल आये थे और अपने मालिक के हाथो में पूरा प्यार लेते चूचक तान रहे थे.

"तुम चुप रहोगे thoda..aahh.. ये ऊँगली अगर और करीब आई तोह औजार सचमुच टॉड दूंगी..", शंकर जी ने घाघरे में हाथ घुसते हुए भारी कूल्हों की दरार में उंगलिया चलाई हे थी की तुरंत निकल ली. इधर लता ने वैसे हे खुद को थोड़ा उचकते हुए जैसे दोनों ख़ास अंगो का संपर्क करवाया और मस्त होती पूरा लिंग अंदर निगल गयी. एक पल रूकती फिर वह वापिस शंकर के सीने पर अपने चुके रगड़ती हिलने लगी. कभी शंकर के गाल तोह कभी गले को चूमती kaat-ti लता इस मिलान की बागडोर खुद थामे मादक चुदाई कर रही थी. मूक सिसकारियां बस उस मादक चेहरे से झलक रही थी.

"शर्म करो आठ.. एक तोह सब खुद हे करती हो.. आठ. ऊपर से 27 साल में आज तक वह कुछ करने न दिए तुमने. चंदा मेरा तोह ख़याल कर thoda..aahh.. आराम से मेरी जान.. ", जैसे हर बार पूरा लुंड अंदर लेते हुए लता एक पल के लिए छूट से लुंड को कस लेती थी. दोनों के बीच ये कमाल का तालमेल था. शेर सा शंकर हर शिकार पर भारी रहता था और इधर उसकी नब्ज़ लता के हाथ थी.

"शर्म, करुँगी मैं. 27 साल से तुमने वह हर काम किआ है मेरे साथ जो पति करता है. कुंवारापन तोह कॉलेज के पहले दिन हे ख़तम कर दिए था, जाने मेरा जन्मदिन का इन्तजार कर रहे थे तुम जो ऐसा तोहफा दिए. और उसके बाद से लेके आज तक तुम्हारी चंदा ने सामने से तुम्हे सुख दिए. आठ.. बुड़के मैट मार शंकर, नोच लुंगी मैं. आठ.. सुहागरात के बिना विवाह पूरा न होता शंकर, उस दिन तुम कर लेना अपने दिल की जिस दिन ससुराल में कपडे उतरोगे. निकाल मुँह से आह्ह्ह्ह..", इधर जोश जोश में शंकर ने एक चुका काट खाया तोह लता ने नाखून गदा दिए थे सीने में. लेकिन दूसरे के साथ भी वैसा हे हो गया. लता दर्द में भी मुस्कुरा रही थी.

"एक तू है जो इतने सालो में भी मैं पूरी न पा सका लेकिन कोई मलाल नई है सिवाए .. आठ.. चंदा उम्..", शंकर ने इस बार लता को कस के सीने से चिपका लिए. वह भी बेसुध होती धीरे धीरे झटके खाती हुई शांत हो गयी थी. दोनों एक साथ हे स्खलित हो कर अब सांसें दुरुस्त कर रहे थे.

"मलाल भी ख़तम कर लेना शंकर. सोचेगा तोह रास्ता मिल जायेगा नहीं तोह जी तोह मैं वैसे भी रही हु और तू भी जितना खुश है मुझे पता है. बगावत जवान करते है जो तुमसे न हुई, अब ससुर जी की जगह तुम आ चुके हो तोह वैसे हे सोच लो. यहाँ से जाने के बाद मेरी नस खुलवा देना, अपना तोह प्यार भर देते हो मेरा पता नहीं चलता. 3 बजे उठा दूंगी, आराम करो.", जैसे हे लता अलग हुई, वीर्य से लिसड़ा लिंग एक तरफ लटक गया. तुरंत कपडे से उसको पांच कर अंदर करते हुए लता ने हे पतलून चढ़ाई और खुद को सही करते हुए फिर से घूंघट लेती वह अगले कमरे में चली गयी. इस म्हणत के बाद शंकर की भी आँख जल्द हे लग गयी थी.

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बबिता अब एक गहरी नींद में जा चुकी थी लेकिन अर्जुन बिस्टेर से खड़ा हुआ तोह अंगड़ाई लेते हुए एक नजर उस विलक्षण युवती को जी भर के देखने के बाद मुस्कुराता हुआ बाथरूम में घुस गया. कमरे में ठंडक के बावजूद शरीर पर पसीना और चिपचिप थी. कुछ सोच कर अर्जुन उस बड़े धातु के टब का भी नल खोल देता है. इधर फुहारे से अपना बदन साफ़ करता बस वह यही सोच रहा था के बबिता जैसी युवती भी संभव हो सकती है क्या.

वह शरीर से विशाल थी लेकिन कही से भी बेडोल नहीं थी. पहला नाम ज़ेहन में माधुरी दीदी का हे आया बबिता के जिस्म की तुलना करने पर. ऊपर और निचे अगर 8-10 इंच का घेराव बढ़ा दिए जाये तोह वह माधुरी दीदी का हे बड़ा प्रतिरूप थी. आज ये वक़्त था के माधुरी दीदी अर्जुन का बराबर साथ देती थी बेशक जब से ये कुछ बदलाव अर्जुन में आये थे उसने दीदी के साथ ऐसा संसर्ग नहीं किआ था. ऊपर से बबिता के मजबूत शरीर की ये नर्माहट कही जानलेवा थी. पहली बार अर्जुन दिल के साथ साथ उस मर्द की तरह सोच रहा था जिसने औरत के जिस्म का आकर्षण महसूस किआ था. लुंड में हल्का हल्का तनाव आते हे अर्जुन ने सर के ऊपर पानी उडेलन शुरू कर दिए.

'शांत. होता है ये सब इस उम्र में. वह ख़ास तोह है हे उसमे कैसा संदेह. लेकिन बबिता दिल की भी बड़ी ाची और प्यारी है.', अर्जुन खुद हे बबिता के हर पहलु की तारीफ करता खुद को साफ़ और ठंडा करने के बाद पहले से हे अंदर रखे तोलिये से खुद को पांच कर बाथरूम में अपने मतलब का सामान देखने लगा. उस 8 फ़ीट लम्बे और ढाई फ़ीट ऊँचे टब को भरने में अभी कोई 20 मिनट तोह लगने हे वाले थे. यहाँ उसको ये साफ़ फिटकरी, खुसबूदार तेल और पानी का जग मिल गया था. टोलिया लिए वह कमरे में दाखिल हुआ तोह बबिता को ऐसे सोये देख उस पर उतना हे प्यार आया जितनी वह अर्जुन को पसंद आई थी.

'सचमुच आसान नहीं होगा इनके साथ करना. ये अपने वाली पे आ जाये तोह किसी औसत लड़के की तोह जान हे ले ले.', सुडोल जांघो के बीच छूट के होंठ इतनी चुदाई के बाद भी उस मांसल जगह बस लकीर से दिख रहे थे. वीर्य अभी तक ऊपर लगा था जो जाएंगे तक बेहटा आया था. टोलिया गीला करके अर्जुन ने सावधानी से वह जगह साफ़ की तोह बबिता के जिस्म में कोई ख़ास हरकत न हुई. अब वह निश्चिन्त हो कर उस 5 इंच की लकीर के दोनों तरफ प्यार से सफाई करने लगा. हिम्मत करके फांके खोलने पर अंदर उसका वीर्य भरा मिला.

'छूट तक जाने से पहले हे आधा इंच पहली हुई है. सचमुच अलग हे है ये.', यहाँ उसने ऊँगली से सफाई की तोह वह मामूली सा जख्म नजर आ गया जो उसके लुंड की मोटाई ने दिए था. एक चुदाई में हे बबिता की छूट खिल गयी थी. फिटकरी को गीले तोलिये पर मलने के बाद फिर से सब साफ़ करके अर्जुन ने उन गोर खरबूजों का रुख किआ.

'44 बताया था साइज इनका. हद्द है इनकी तोह, इतने बड़े बड़े लेकिन सचमुच दिल नहीं भरता. लाल पड़ गए मेरी वजह से, गोरी भी है तोह निशान जल्दी बन्न गए.', वह तेल दोनों हथेलियों पर चुपड़ कर अर्जुन ने एक लयबद्ध तरीके से एक सतांन की मालिश करनी शुरू की और बबिता ने आँख खोल दी. लेकिन बस मुस्कुरा कर वह अर्जुन को देखती रही. किनारो से लेकर चूचक तक वह इस वजनी चुके को आराम दे रहा था. साथ हे ऐसा करने से चूचक अकड़ कर खड़ा हो गया. अगले चुके को भी 5 मिनट तक सहलाते हुए सुख दे कर चिकना किआ और उन्हें साफ़ करने के लिए टोलिया उठाने लगा.

"रेहान दे रे. बहोत सुख दे दिए तन्ने, ेब मेरी बारी है.", बबिता ने बराबर बैठ कर अर्जुन को चूमते हुए एक हाथ से उसका वह विकराल लिंग थाम लिए. वह उसके अकार, फुलावट और सख्ती को जांचती हुई मुस्कुरा रही थी. अर्जुन बस देख रहा था और बबिता ने तेल अपने हाथ पर गिरते हुए हलके हाथ से जड़ की तरफ से सुपडे तक मालिश करनी शुरू की. उसके मॉटे बोब्बे कही कही से थिरकने लगते, इस हलकी गतिविधि से हे.

"तन्ने (तुम्हे) बेरा है मैं कान्वेंट से पढ़ी हु. लड़का लड़की के मिलान का भी पता है आरर गाँव में तोह प्रैक्टिकल देखन ने भी मिल जाया करे है. मैं 19 की थी उस बख्त (समय) जड़ एक सहेली ने मैंने लुची (सेक्सी) किताब दिखाई थी. तू तोह स्कूल जान हे लगया होगा उस टेम. व किताब बस ऐसी थी की कोई छोरी (लड़की) देख ले तोह चुदाई के लिए पागल हो जे. मैंने सबर किआ लेकिन तस्वीर तोह दिमाग में चा गयी. लुंड देख लिए था, ladka-ladki के करे है पता चाल गया था.", बात कहती कहती वह एक पल रुकी और अर्जुन के हाथ पर थोड़ा तेल गिरा कर हाथ छूट के ऊपर रख दिए. अर्जुन समझ गया.

"फिर क्या हुआ?"

"मैं दिल की भोत मजबूत सु, उस टेम भी थी. रोक लिए लेकिन नॉलेज हो गयी थी. फेर आड़े (यहाँ) गाम में एक भाभी आया करती hansan-bolan, मेरी ाची सहेली बन्न गयी वह 4 साल पहले की बात. दिन में उसके घर कोई था नई और उसने दिखा दी नीली फिल्म (पोर्न movie/Blue फिल्म). 1 घंटा बस बुरा हाल था अर्जुन लेकिन मैंने सवाल उठ गए फिल्म देखे बाद. भाभी तोह अपने पति से सेक्स करे हे थी तोह पूछ लिए के सबके इतने बड़े बड़े होये करे है (लुंड) ार उसका जवाब था यु फिल्म बनान वाले स्पेशल होव है. हिंदुस्तानी तोह 6 ांगल (ऊँगली) से 8-9 तक. कोई हद्द 10-11 की लम्बाई लेजे है लेकिन बीतते भर के लुंड दुर्लभ है. भाभी ने फेर या बात भी कही के मेरा शरीर बीतते से ऊपर का लुंड हे खुश कर सके है लेकिन मुमकिन कोन्या.", अर्जुन बात सुनते हुए छूट के बहार ाचे से मालिश कर रहा था. और अब दूसरे हाथ से एक उभर को सहलाने में बबिता भी राजी थी.

"उस दिन के बाद मैंने सोच लिए था के चुदाई के बारे में सोचना हे कोणी. जो लिख्या होवेगा मिलेगा. लेकिन किस्मत देख, तेरा तोह उस फिल्म में देखे लुंड से भी बड़ा है. नींद में भी छूट कुलबुलावे थी की आज के कर लिए यु.", इतनी मालिश से तोह लुंड अपनी औकात से भी ज्यादा हे बड़ा हो चूका था. बबिता भी उस बड़े कुकुरमुत्ते (मशरुम) से सुपडे को निहार रही थी.

"तोह इस से पहले असली नहीं देखा कभी?"

"अरे एक बार देख लिए तोह फेर नजर आ हे जाये करे है. लेकिन आज तक बस भाभी की बात सही थी. 2-3 जोड़े चुदाई करते देखे khet-khalihaan में लेकिन सबके नार्मल. आज चुदाई के वक़्त यो पकड़ के समझ गयी थी के तेरा ख़ास है. ेब देख्या तोह हैरान सु, अंदर लिए किस तरिया मैंने. लेकिन दुमदार है."

"अभी फिर से लोगी आप, क्योंकि आप भी ख़ास हो ये मैंने जान लिए है. और मेरा दिल है के बाथरूम में करते है.", अर्जुन ने अब दोनों बोब्बे सहलाते हुए बबिता से नजरे मिले.

"तेरा गिफ्ट दे दू, रेतुर्न. फेर जहा मर्जी कर लिओ बबिता न नहीं करती. और जी न कहे कर, बबिता बहोत है अकेले में.", अर्जुन को पीठ के बल बिस्टेर पर लिटटी वह कुशलता से उसके ऊपर आ गयी. पहाड़ से चुत्तड़ ऊपर उठाये बबिता ने अपने गुब्बारों के बीच अर्जुन का मूसल दबाते हुए एक अदा से हवाई चुम्बन दिए अपने होंठो का.

"आह.. ये कहा से सीखा.?", नरम कैसे हुए चुचो की रगड़ लुंड पर होते हे अर्जुन मदहोश हो गया.

"टाइम बदल गया है अर्जुन जी. फिल्म देखि थी मैंने और उसमे सबसे सेक्सी सन 2 हे थे. एक तोह मैं करके दिखा रही हु दूसरा तू करिये.", बबिता ने चुचो से बहार निकलते मॉटे सुपडे पर लार गिरते हुए उसको और गीला कर दिए. अपने हे खरबूजे दबती हुई वह उनके बीच लुंड को भरपूर चिकनाई से रगड़ रही थी. देखते हे देखते सूपड़ा गोल होंठो से जा लगा. बबिता ने एक पल रुक कर बस अर्जुन को देखा और अगले हे पल आँखे मूंदे वह निप्पल मसलती उसका लाल सूपड़ा जीभ से चाटने लगी. जल्द हे होंठ खोलते हुए अपने मुँह में सूपड़ा भर कर वह कुछ पल रुक गई.

"आह्हः.. दांत नहीं.", अर्जुन के इतना कहते हे बबिता ने दोहरा वॉर शुरू कर दिए. सूपड़ा मुँह के अंदर और बाकी लुंड चुचो के बीच. 5 मिनट बाद वह अलग हुई तोह लुंड भयंकर दिख रहा था. हरी नस्से उभरी हुई और सुपडे से जड़ तक लार का गीलापन.

"आय मजा मेरी जान? चल दिखा तेरा बाथरूम."

"रुको.", अर्जुन बिस्टेर से निचे उतरा और एक हाथ बबिता के गर्दन के निचे और दूसरा कूल्हों के करते हुए आराम से उठाये अंदर ले आया. बबिता बस उसको निहार रही थी, आँखों से प्रशंशा करती हुई उसकी ताक़त की. अंदर टब भरा हुआ था जिसका नल बंद करने से पहले अर्जुन ने बबिता को एक तरफ खड़ा कर दिए.

"इसमें करेगा? पानी बहार हम अंदर.", बबिता हंसने लगी तोह अर्जुन भी उसके साथ खुश हो गया.

"वह सब बाद में. पहले एक पाँव यहाँ रखो.", टब के बराबर हे पत्थर को तराश कर बनाया ये 2 फ़ीट ऊँचा गोल स्टूल दिखते हुए अर्जुन ने बबिता का एक पाँव उसके ऊपर रखवा दिए. ऐसे करते हे शरीर दिवार के साथ और छूट उभर कर बहार निकल आई.

"के करेगा? आह्हः.. सत्यानाश.. आह्हः..", अर्जुन नीचे बैठ कर छूट फैलते हे चूसने लगा और बबिता सिसकती हुई अपने बोब्बे मसलने के साथ उसका सर भी छूट पर दबाने लगी. 2-3 मिनट बाद हे वह सीधा खड़ा हुआ तोह बबिता कांप रही थी. अर्जुन ने अपने अकड़े हुए लुंड को करीब करते हुए बबिता का मुँह अपने होंठो से बंद कर दिए. लुंड दबाव बनता एक इंच अंदर हुआ और उसके पीछे से अर्जुन की कमर ने जोर लगा दिए. 'कच' से आधा लुंड उस संकरे रस्ते में जा फंसा. होंठो को छोड़ कर अर्जुन ने वह मोटा दूध पकड़ते हुए निप्पल मुँह में ले लिए. बबिता दर्द सेहती दिवार पर लगे पाइप को पकडे थी.

"आह्हः.. अर्जुन तू कोणी माने रे. आज घर जाऊँगा या शमशान.. aahh..bas बस..", मस्ती में अर्जुन ने बबिता की कमर अपनी तरफ खींचते हुए उसके हलके झांटो को अपने पेडू से चिपका दिए. समूचा लुंड बबिता के अंदर और उसके मॉटे ुबहार अर्जुन के सीने में. वह तड़प रही थी लेकिन अर्जुन को और जोर से चिपकये बस उसका अपनी नरम गुफा में महसूस करती सिसक रही थी.

"बबिता, तुम मेरा पूरा लुंड ऐसे हे ले सकती थी या फिर टाँगे फ़ैलाने पर जो ज्यादा दर्द देता. अंदर से तुम भी एक नार्मल लड़की सी टाइट हे हो.", अब वह दोनों कूल्हों को मसलते हुए बबिता को नारिसुख देने लगा था. हर धक्का बबिता को अपने गर्भ पे ठोकर मारता लग रहा था. चुके तोह पहले अभ्यास से हे सख्त हो कर अकड़ चुके थे जो अर्जुन के सीने से दबते हुए और गर्मी बढ़ा रहे थे. 7-8 मिनट में हे पूरा लुंड अंदर बहार करते हुए अर्जुन ने बबिता को घुटनो पर ला दिए था. झड़ती हुई वह फर्श पर हाथ टिकाये लम्बी सांसें ले रही थी. छूट अंदर से फड़कती हुई जैसे उसका बरसो से बंद पानी बहार गिरती जिस्म को हल्का कर रही थी.

"घोडा है तू पूरा. यो ेब तक खड़ा है, थके कोणी के?", बबिता ने चेहरा ऊपर करके उस चुतरस से भीगे लुंड को देखा तोह अपनी हालत पर तरस आने लगा.

"अब यही लेट जाओ.", फर्श पर हे उसका जिस्म फैलते हुए अर्जुन फिर जड़ तक अंदर समां गया. इस बार वह बस चुदाई के साथ उन दोनों निप्पल को चूस चूस का फूलने में लगा रहा. बबिता haye-haye करती उसके कूल्हों पर नाखून गदति रही.

"डांगर (जानवर), इनमे दूध koni.aahhh.. फाड़ दी तोह गोलू के करेगा? वैसे तू हे बीज भर दे.. आठ.. बेरा न गोलू कर भी सकेगा या आड़े में रह जाये.", बबिता भी 2 बार झड़ने के बाद पागल होती उसके साथ लगी रही. आज बड़े बाथरूम का उपयोग सही से हुआ था. Fach-fach की आवाज छूट के अतरिक्त पानी से बाथरूम को भी गूंजा रही थी, कॉमर्स पूरी हवा में भर चूका था इनके मिलान का. आखिरी धक्को पर बबिता की चीखे निकलने लगी लेकिन न उसने अर्जुन को रोका और न छोड़ा.

"आह्ह्ह्ह...", इस बार अर्जुन का चरम भीषण था, बबिता के लायक. दोनों टाँगे ऊपर उठाये वह बबिता की छूट पूरी फैलता समूचा लुंड अंदर तेल कर खाली होने लगे. चेहरा लाल हो चूका था, बाजू ऐसे जैसे 200 किलो वजन से अभ्यास किआ हो. दोनों एकदूसरे से चिपक कर ठन्डे होने लगे.

"मार दिए रे तूने तोह. ऐसा कोण करे है? लात टूट जाती थोड़ा और पीछे करता आह्हः.. गोलू ने तेरा गिफ्ट दे हे दिए ब्याह से पहले. आठ.. जानवर. उम्मम्मम्म", दोनों हाथो में उसका चेहरा लेती वह जोश से अर्जुन को चूमने लगी. कुछ देर बाद जैसे तैसे पानी में पहोच कर वह शांत हुए और हलकी छेड़छाड़ करते एक दूसरे के शरीर से खेलते रहे.

"जब इनमे दूध आएगा तोह मैं पक्का मिलने आऊंगा."

"पिलाऊंगी दूध. मेरा बचा पीयेगा.", बबिता ने अपने भरी भरकम चुके अर्जुन के सीने से लगते हुए मस्ती में कहा

"पीने नहीं आऊंगा, देखने है के ये कितने बड़े होंगे तब. अभी एक दोनों हाथो में आधा आता है."

"तू पी लिओ रे, और जब दिल करे मेरे पे चढ़ जइयो. मैंने भी तू पसंद है और तेरा साथ भी. बालक जड़ होवेगा तब होवेगा, तू दिल करे आ जाया करियो.", अब बबिता ने प्यार से कुछ देर अर्जुन को चूमा और दोनों अलग हो गए.

"और बचा मेरा हुआ तोह?"

"तेरे बाप के भी है हमारे घर में. फरक कोणी किआ कड़े और तेरा होवेगा तोह थोड़ा तेरे जैसा थोड़ा मेरे जैसा. देखिये एहसा झोटा 21 गाम में न मिलने वाला. बाकी दिन ठीक है मेरा, हो सके है जे तेरा बीज मजबूत होया."

"पता नहीं बीज का तोह लेकिन बता देता हु के थोड़ा बहोत काबिल जरूर हु. अब यही बैठे रहना है या निकलना भी है.?", अर्जुन ने एक उभर को दबाते हुए पुछा.

"आअह्ह्ह... पहले हे मेरी माँ गाल काढ़ती रहे है के मैं चुन्नी कोणी लू, बोब्बे दुख के कपडे भी कोने पहन सकू. बस कर. तू जा मैं आराम करू हु. फेर सांझ ने जाउंगी.", बबिता के इतना कहने पर अर्जुन ने एक बार छूट को पानी के अंदर से हे सहलाया और होंठो को चूम कर टोलिया लिए अंदर आ गया.

"बबिता, चादर जरूर बदल देना."

"हाँ, ेब संभल के रखनी पड़ेगी. तू ध्यान से जाइये, धीरे. मेरे ब्याह पे जरूर आना है."

"वह तोह मैं आने हे वाला हु."

"गिफ्ट दूंगी रे बावले, जो तन्ने आज दिए है उसके बदले में तेरी पसंद का गिफ्ट.", बबिता की हंसी सुन्न कर अर्जुन भी कपडे पहन कर सब ठीक करता हुआ बहार निकल चला.

" बावला है लेकिन मर्द बावला न होया तोह मर्द कोणी. आह्हः.. फाड़ दिए निगोड़ी देरी जिद्द ने.", मुँह बनती बबिता अपनी छूट को साफ़ करने लगी. 3 बज गए थे अर्जुन को यहाँ से निकलते निकलते.

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शंकर की आँख खुली तोह समय 3 से ऊपर हो चला था. एक बार कमरे को ाचे से देखने के बाद करवट ली तोह अब वह साथ वाले कमरे का दरवाजा खुला हुआ था. ऋचा उधर अपनी माँ की मदद कर रही थी कपडे तेह लगवाने में. लता की नजर अपनी तरफ देखते शंकर पर तुरंत हे चली गयी. पल्लू चेहरे पर करते हुए अपनी बेटी से कहा.

"पापा को पानी दे जरा, मैं खाना लेके आती हु.", समेटे हुए कपडे एक तरफ करती मधुलता उस कमरे से हे बहार निकल गयी और साथ हे ऋचा भी. शंकर जी ने इस कमरे में हे एक तरफ बने बाथरूम में चेहरा ठन्डे पानी से धोया और हालत दुरुस्त करके वापिस आये तोह ऋचा के पीछे हे चंद्रो देवी भी चली आई.

"कब आया था? किसी ने बताया भी नहीं के तू आया है.", बिस्टेर पर वह बैठते हुए उस सूती पतले कपडे से अपना जला हुआ हिस्सा सही से ढंकती हुई शंकर से पूछने लगी.

"थोड़ी देर पहले हे आया था ताई. आप सोई हुई थी और दोपहर की वजह से मैं भी सो गया था. अब जख्मो में जलन तोह नहीं है.?", शंकर जी ने आशीर्वाद लेने के बाद बगल में हे बैठते हुए कहा.

"न कोई जलन नहीं. क्रीम बढ़िया है जो डॉक्टर ने दी है. बस झंझट का काम है और इतने दिन से घर हस्पताल (हॉसिपिटल) के बीच हे ज़िन्दगी रह गयी है बस. गाँव का कुछ पता नहीं और मुआ ज़िले (सरपंच) भी कुछ बताने न आया इतने दिन से.", ताई के ऐसा कहने पर शंकर को कुछ याद आ गया. इशारे से ऋचा को बहार जाने को कहा तोह वह लड़की भी बिना सवाल किये कमरे से निकल गयी.

"कब आया था आखिरी बार ये सरपंच? और जहा तक मुझे पता है सरपंच तोह आपने हे बनाया है न इसको?", चंद्रो देवी धान से शंकर को देखने लगी.

"कुछ मामला गड़बड़ है के शंकर? साफ़ साफ़ बता."

"शबनम से मिला था आज मैं. इस घर की खबर आपका सरपंच हे उसके पास पहुंचा रहा था, जाने कैसे तार भिड़ाये लेकिन शबनम झूठ नहीं बोल रही थी. और आप हे सोचो के जो हर काम आपसे पूछ के करता हो वह इतने दिन से नहीं आया. एक दिवार है न इस घर की और सरपंच की?", चंद्रो देवी के जख्मी शरीर में भी सिहरन उठ गयी ऐसी बात सुन्न कर. इधर मधुलता गोल ऊँचे किनारे वाली थाली में गरम रोटी और कढ़ी लेकर अंदर आई तोह अपनी सास को देख कर जड़ हो गयी.

"रख दे रोटी और मेरी चा (चाय) भी लय दे. पता कोणी के शंकर ने कढ़ी में कितना घी घालना होव है?", मधुलता ने बड़ी कटोरी को देखा तोह उसमे हिसाब से घी डाला हुआ था.

"जी माँ जी मैं और लय देती हु. ध्यान न रहा.", मधुलता जाने लगी तोह सास की आवाज से ठिठक गयी.

"बुरा न माने कर, बूढी हो गयी हु मैं ेब. घर में पड़े पड़े दिमाग खराब हो हे जावे है. तू शांतु (हवेली का maali-rakhwala) ने बोल जरा ज़िले के घर संदेसा देके आवे. कह देगा दादी ने खड़े पाँव बुलाया है. ऋचा ने भीतर भेज दिए, सुशीला अकेली है.", चंद्रो देवी के इतना सब कहने का जवाब छोटा सा हे मिला.

"जी माँ जी.", और इधर शंकर जी ने खाने पर ध्यान दिए. मधुलता के पास आने पर हे जैसे वह इत्मीनान से खाना खाते थे, बिस्टेर पर बैठ कर. चंद्रो देवी बस देख रही थी.

"ताई क्या सोच रही हो? और ज़िले को एकदम से क्यों बुला लिए आपने?", सुशीला के पास जाने से पहले ऋचा लस्सी का लोटा रख गयी थी उनके पास और कढ़ी में और देसी घी भी दाल दिए था. चाय का गिलास हाथ में पकडे चंद्रो देवी सहजता से हे बोली.

"बात शबनम की कोणी शंकर, वह सच कहे है के झूठ. जिस दिन मेरे साथ दुर्घटना होई थी ज़िले ने मुन्नी (मह्दुलाता) के हाथ संदेसा दिए था के भत्ते पे काम कोणी हो रहा, मजदूर गायब थे जब वह चक्कर लगा के आया. मैं या बात भूल गयी थी. ऋचा ने कहा भी था के शांतु या गोपी ने ले जाऊ लेकिन आदत कोणी जावे. चली गयी ेक्लि.", वह बात कहती हुई चुप हुई मधुलता को पालते में गरम रोटी लिए देख कर. चंद्रो देवी ने खुद हे बिना हाथ लगाए प्लेट से रोटी शंकर की थाली में सरका दी.

"मुन्नी, बैठक में बिल्लो घने टेम से तंगी हुई है. कपडा लेती आइये उसके साथ."

"जी. ज़िले भाई साहब भी आ गए है माँ जी."

"बिठा आँगन में उसने, चाल छोड़. आड़े हे भेज दे, तू बिल्लो ने पकड़ा दे जरा.", अब मधुलता के घूंघट से भी गाल पर पसीना दिखने लगा था. शंकर जी ने ये सब ध्यान से देखा लेकिन खामोश हे रहे. सरपंच को संदेसा देने के बाद लता अपनी सास का बताया सामान लेने चली गयी.

"Ram-Ram दादी. आज तोह बड़ी हस्ती गाम में आई होई है, इस खातिर आपने याद किआ इस गरीब ने. नमस्कार शंकर भाई.", ये 6 फ़ीट ऊँचा कोई अधेड़ सा लम्बी मूंछो वाला व्यक्ति देखने में हे कोई सरपंच लग रहा था. चेहरे से तोह वह खुश हे दिख रहा था लेकिन अंदरूनी तौर पर पता नहीं.

"मुद्दा ले ले ज़िले, घने दिन दिखया कोणी तोह मैंने सोच्या आप हे बुला लू. बेरा न अपनी बुद्धि से किस बात पे नाराज बैठ्या हो. शंकर भी केहवे था के गाम की बहोत तरक्की होगी. सरपंच से मिलवाओ, शाबाशी देनी है.", चंद्रो देवी के बात सुन्न कर ये घाघ सा व्यक्ति दांत निपोरता मुस्कुराने लगा.

"जी आपने जिम्मेवारी लायक समझया या बड़ी बात है. ाँ का तोह ऐसा है के गाम के काम, खेत में जीरी (राइस), एक लड़के का बिज़नेस (बिज़नेस) और दूसरे की विदेश की पढाई के काम भोत है जी. किम्मे (कोई) टेम मिले है तोह शहर भी मला साहब तक चक्कर लग जाया करे है. थोड़े समय में हे इस गरीब की कदर अपना शो आरर तहसीलदार भी कारन लगे है.", ये बात सरपंच ने शंकर की तरफ नजर मारने के बाद चंद्रो देवी से कही थी शंकर जी को ठसक लगी, खाना खाते हुए. जैसे हंसी हे आ गई हो और रोकने की कोशिश में ऐसा हो गया.

"ले लस्सी पी तू आरर जल्दबाजी न करे कर रोटी खाते. ज़िले आज अपना नाम बना चुक्या है, काम तोह मेरे करवा हे देगा.", इधर मधुलता जो चीज ले कर अंदर आई थी वह देख कर शंकर जी हैरत में पड़ गए. लकड़ी के घुमबावदार चमकीले हाथे वाली ये 2 नाली वाली बन्दूक सोमबीर सिंह की थी. ज़िले ने भी एक नजर बन्दूक को देखा और फिर kapde-salaai से चंद्रो देवी को उस नलकी की सफाई करते हुए.

"हाँ तोह सब आपके लिए हे है जी. सब आपका दिया होया है तोह काम आपके हे करवाऊंगा. भाई का लड़का भी 30 हजारी में बड़े वकील के पास काम सीखे है जी तोह ेब आपने कही बहार देखन की जरुरत न पड़ेगी. दूसरे तोह मज़बूरी देख फायदा उठावेंगी काम के बदले, मैं तोह आपका अपना हु."

"देख शंकर यु है सच्चा हितेषी. कोई लालच नई कोई मांग नई ज़िले के दिल में. मेरा काम कारवां खातिर हमेशा तैयार. तू तोह मतलब से आवे है मेरे धोरे, आग लगे हफ्ता हो गया खबर आज लें आया.", चंद्रो देवी को किसी ने नज़र का चस्मा लगाए न देखा था कभी जो सबूत था उनके तंदरुस्त जीवन का. दोनों नाली शंकर की तरफ करती वह अंदर देख रही थी की ाचे से साफ़ हुई है या नहीं.

"फ़िक्र करनी जरुरी है जी. तू हे बता शंकर इस घर में छोटी तोह ना हों के बराबर है, रविंदर ज़िन्दगी भर दूसरा के रेहम पे रोटी खावेगा बेचारा. 3 विधवा महिला, एक जवान लड़की कोई काम बहार के आदमी ने कहती सुथरी न लगती. दादी भी तोह मुश्किल से बची लेकिन उम्र तोह हे गयी है.", शंकर जी का पारा चढ़ने लगा था अब लेकिन चंद्रो देवी को मुस्कुराते देख बस थाली बिस्टेर से निचे रख दी और ज़िले सिंह ज्यादा हे फ़ैल गया था चंद्रो देवी की प्रतिक्रिया देख कर. और चंद्रो देवी ने वह दोनों नलकी बंद करते हुए बस इतना हे जवाब दिए.

"यु मेरा बीटा है ज़िले. घर का अगला मुखिया जितने बिजेन्दर समझदार नई हो जाता. तेरे बर्ज (जैसे) की यु इस खातिर सुन्न गया क्योंकि मैं बैठी हु आरर फ़िलहाल फैंसले मैं हे करुँगी. तेरे दादा ने मेरी raam-raam कह दिए.", और जैसे कोई धमाका सा हुआ इस कमरे में. दिवाली का बड़ा बम फूटने जैसा धमाका. ज़िले सिंह का सर तरबूज की तरह फट कर एक चौथाई तोह कमरे में हे बिखर गया था. शरीर फर्श पर गिरते हे लहू सीमेंट की चिकनी सतह पर फैलने लगा. शंकर की कमीज तक खून उड़ता आया था और इधर चंद्रो देवी ने वह दोनाली बराबर आ कड़ी हुई लता को पकड़ा दी कपडे से हठी साफ़ करते हुए. शांतु और गोपी के साथ ऋचा भी इधर आने लगी तोह मधुलता ने उस मासूम लड़की को अंदर भेज दिए.

"दोनो खड़े के देखो हो? साफ़ करो या गंदगी आरर चारा कॉटन खेत में जाओ तोह भत्ते में फेंक आइओ. टेम भी हो गया है. गोपी तेरी लुगाई ने बोल कमरे में कपडा मारेगी, दिवार भी खराब कर गया डेढ़.", आज्ञा का तुरंत पालन हुआ और दोनों हे आदमी मुस्तैदी से उस लाश को पहले दरवाजे से निकल कर हवेली के पिछले हिस्से में ले गए. शंकर को होश आया तोह वह बस अपनी ताई को देखने लगा.

"के बात, पसंद न आया अपनी ताई का पुराण रूप? आज भी मेरे फैंसले सीधे और साफ़ होव है. तेरे बारे में ज्यादा बोल गया इस खातिर मुँह पे गोली मारनी पड़ी, निशाना मेरा दिल पे भी उतना हे चोखा है. ऐ मुन्नी, चा ले आ 2 कप, फेर शंकर ने भी काम hai.Byaah वाला घर है शहर में, देवर मेरा अकेला कितना काम करेगा?", चंद्रो देवी की आवाज से मधुलता काम में लग गयी और शंकर जी भी कमरे में सफाई होते देख चंद्रो देवी के साथ आँगन की और चल दिए.

"ताई, निशाना तोह मुझे पता है लेकिन अब इसके परिवार और गाँव में क्या माहौल होगा?", चारपाई पे ताई के बैठने के बाद शंकर ने भी बैठते हुए पुछा.

"दिल्ली गया आरर वापिस कोन्या आया, 30 हजारी बतावे था न वह. टेंशन न लिया कर तू, गाम मेरा है आरर मैं जड़ तक ज़िंदा हु मेरा रहेगा. भत्ते में भी खून न दिए था इस बारी, बढ़िया होया ऊँची भेंट लगेगी तोह ईंट भी चोखी होवेंगी.", अब ऋचा भी एक तरफ से सुशीला को व्हीलचेयर पे इधर ले आई थी. सुशीला का हाल पूछने के बाद शंकर ने आगे बात करि. ऋचा अपने बाप की बगल में थी इस वक़्त.

"मैं भी यही करने वाला था थोड़ी देर बाद लेकिन सावधानी से. कुछ भी बात हुई तोह मेरा नाम ले देना ताई, संभल लूंगा मैं."

"तू तेरी बलूंगड़ी ने संभल, इतनी देर होगी बेरा न के मांगे है जो कह न सकती.", चंद्रो देवी ने शंकर का ध्यान ऋचा की तरफ करवाया तोह सुशीला भी मुस्कुराने लगी ऋचा को झेंपते देख. शंकर ने हँसते हुए इस मासूम सी लड़की को अपने साथ कस लिए.

"बोल अब तोह तेरी दादी भी कह रही है. क्या चाहिए मेरी पारी को?"

"सुशीला कानि (की तरफ) के देखे है, उसने भी बेरा है यो तेरा बाप है ार तू इसकी लाड़ली. और शंकर का aade(yaha) के खजाना दबा है, तेरे खातिर आवे है.", चंद्रो देवी ने भी शंकर की बात में साथ देते हुए ऋचा को अपनी तरफ से आजादी दे दी.

"दादी, वह घर में शादी है तोह मैं कब जा सकती हु उधर? सॉरी अगर गलत बात कह दी हो तोह, बस दिल था इसलिए कह दिए.", झेंपते हुए बात ख़तम करके ऋचा ने शर्मिंदगी से नजरे नीची की तोह चंद्रो देवी ने देख लिए था मधुलता को घूरते हुए वह चाय रखने से पहले.

"आँख मैंने दिखा तू, बालक है और सबका दिल करे है khushi-utsav में शामिल हों का. ऋचा, जड़ तेरा बाप लें आवे चली जाइये, इस मुन्नी ने मैं देख लुंगी."

"माँ जी मेरा वह मतलब नहीं था. ये अकेली और फिर उधर उन सबके बीच.", मुन्नी उर्फ़ मधुलता ने बेटी की वजह से आज सवाल कर लिए था.

"वह परिवार पूरा परिवार है इसका ध्यान रखने के लिए लता. और मैं तोह खुद ये बात करने हे वाला था के परसो ताई के साथ ऋचा उधर आ जाएगी. शीला तै और पूर्णिमा काकी (उमेद सिंह की माता जी) भी परसो सुबह घर पे आने वाली है, Bijender-Babita का न्योता भरने. 5 दिन बाद तोह इस घर में भी शादी है फिर बिजेन्दर के इधर आते हे रिच्स 20 दिन वही रहेगी, मेरे साथ. कल उमेद के साथ मैं सवेरे चक्कर लगा जाऊंगा यहाँ और हलवाई बिठा देंगे.", शंकर जी ने पूरी बात बताई तोह मुन्नी थोड़ी दुरी पर स्टूल पे जा बैठी. इधर सब चाय पीने लगे तोह ऋचा को इतना लाड करते देख सुशीला ने जुबान खोली.

"चिपक ले जितना चिपकना है. फेर तू भी अगले घर जावेगी. तेरा नंबर नजदीक है."

"मैं कही नई जा रही ताई. ट्रेनिंग के बाद बस नौकरी और पापा.", शंकर जी ने लाड़ली की बात सुन्न कर सर पे हाथ फेर दिए.

"घर जमाई ले आऊंगा अपनी लाडो के लिए, किसी के घर भेजने से ाचा."

"यु न कह दिए शंकर के अर्जुन गइल फेरे लगवा देगा.", सुशीला की ऐसी बात पर सबकी हंसी छूट गयी थी सिवाए मधुलता और शंकर जी के. शंकर जी जहा झेंप गए वही मधुलता अंदर से थोड़ी नाराज हो गयी.

"भाई है वह मेरा."

"तेरी ताई मजे ले रही है. वह ऐसे हे बोलती है तुमने ज्यादा समय नहीं बिताया न अभी. और अर्जुन का रिश्ता हो चूका है सुशीला, अपने छोल चाचा की पौती है प्रीती. ाची लड़की है और बचपन के दोस्त है दोनों, बड़ो ने मजाक में कहा था लेकिन फिर दोनों परिवारों ने यही करना बेहतर समझा. अभी 18 पार किये तोह 6-7 साल उसकी तरफ कोई देखने वाला नहीं."

"कुछ भी कह शंकर, बबिता उसकी हाँ (बराबर) की होती तोह मैंने लड़का उठवा लेना था मेरी बेटी खातिर. भाग तगड़े है तेरे जो ऐसा लड़का दिए, माँ आप तोह मिली होगी?", सुशीला ने बात का रुख चंद्रो देवी की तरफ किआ तोह चाय का खली गिलास ट्रे में रखते हुए उन्होंने जवाब दिए.

"एक नजर में दिल में उतर गया था मेरी. ऊपर से सुदर्शन वाला किस्सा लेकिन छोरा न मासूम है सुशीला. शहरी कोणी, नखरे वाला किसे थानेदार के कपूत बर्गा. सलाह मेरी भी तेरे जैसी थी, फेर थाम में से किसे की कोई इतनी छोटी छोरी भी कोणी आरर ेब बेरा लगया के रिश्ता हो चुक्या है तोह कोई फायदा कोणी था रिक्स लें का.", आखिरी बात सुन्न कर कही मधुलता के चेहरे पर दबी हुई हंसी आई और बाकी सब खुल कर हंस हे रहे थे.

"वैसे इसका अकेले का तोह वह है भी कोणी, या भी सुन्न ले. नरिंदर ने दे आया था यो जड़ अर्जुन 8 महीने का था. उसने लुगाई के साथ हे अर्जुन इसके धोरे भेज दिए था. 4-5 महीने बाद कृष्णा सम्भली तोह रेखा ने आप हे कह दिए के अर्जुन पे उन दोनुआ का बराबर अधिकार है. बहोत मुश्किल तेह बच्या था अर्जुन भी कृष्णा के जाए बाद, दूध बदल गया फेर बेरा नई और के होया था लेकिन ज़िन्दगी जीनी थी तोह समझ ले पैदा होते के साथ वह लड़ता आया है. बिरले होये करे है ऐसे सपूत जो बाद में दूसरे लोग की ज़िन्दगी संवार दे. मुन्नी आरर गुड्डी भी जे उस से मिलेंगी तोह वह ओप्रा कोणी करेगा, यकीन से कहु मैं. फेर इनका जी भी न लगेगा आड़े.", अतीत में कहा चली गयी थी चंद्रो देवी की खुद शंकर को हे हाथ रख कर उन्हें रोकना पड़ा.

"चलता हु ताई, और अर्जुन वैसे भी पूरे परिवार का हे है. मैं तोह तड़ीपार कपूत हु थानेदार का. सवेरे मिलूंगा और तू तेरी taai-daadi का ख्याल रखे कर. फिर शॉपिंग लेके चलूँगा अपनी पारी को.", उठने से पहले ऋचा के गाल को चूम कर उन्होंने ताई का आशीर्वाद लिए और नजरो से लता को अलविदा कहते हुए कार की तरफ चल दिए.

"पापा, बिना चाबी के तोह कार चलने से रही.", पीछे हे ऋचा चाबी हिलती उनके पास आ कड़ी हुई और शंकर जी मुस्कुरा दिए उसकी हरकत पर.

"ला दे फिर?"

"नेग कहा हैं? छोटे भाई से तोह लेने से रही, आपको हे देना पड़ेगा.", इधर मधुलता ये सुन्न कर उनकी तरफ आने लगी तोह चंद्रो देवी ने रोक लिए. शंकर जी ने हँसते हुए अपना बटुआ हे ऋचा के हाथ पर रखते हुए कहा.

"तेरी मर्जी है, सब तेरा हे तोह है.", ऋचा ने पैसे से भरे पर्स को खोलते हुए उस पारदर्शी जेब पर नजर डाली तोह वह ऋतू के बचपन की तस्वीर थी. हाथ लगाती वह जैसे कुछ महसूस करना चाहती थी.

"तेरी इसके पीछे है.", शंकर जी के इतना कहते हे ऋचा ने ऊँगली अंदर करते हुए ऋतू की तस्वीर बहार निकली तोह सचमुच ये दूसरी तस्वीर ऋचा की हे थी और साथ हे कागज भी. ऋचा द्वारा लिखी पहली चिट्ठी जिसमे लिखावट बता रही थी की शायद वह तब 7-8 साल की रही होगी. ऋचा अपने बाप से कस कर लिपट गयी, नम्म आँखों से.

"ी लव यू पापा. यू अरे थे बेस्ट डैड एंड मोस्ट प्रेसियस. ये मेरे 8तह बर्थडे पर मैंने लिखी थी, आपने आजतक इसको अपने पास रखा हुआ है?"

"एक तेरा और एक ऋतू का हे बर्थडे तोह याद रहता है मुझे. किस्मत देख मेरी दोनों परियां 1 जुलाई को हे पैदा हुई बस 5 साल के फरक से. यू अरे माय प्रिंसेस डार्लिंग.", शंकर जी ने भी उसको सीने से लगाने के बाद माथा चूम कर खुद रुमाल से चेहरा साफ़ किआ.

"वह मुझे लेहंगा लेना है और ढेर सारे कपडे. फॉर 20 डेज, 20 ड्रेसेस.", सबकुछ पर्स में वापिस सही से रखते हुए ऋचा ने लाड से अपनी ज़िद्द बताई.

"तेरी शादी अगले साल करूँगा बीटा, अभी क्यों लेना है?"

"जाओ आप, मैं बात हे नहीं करती. यहाँ ये salwar-kameej, कॉलेज में यूनिफार्म और अब ट्रेनिंग पे भी सब वैसा हे. कुछ नहीं चाहिए मुझे.", ऋचा रूठ कर जाने लगी तोह शंकर जी ने जाने न दिए.

"तेरे लिए 20 नहीं 50 ड्रेस ले लिओ और लेहंगा तोह मैं वैसे भी दिल्ली लेने जाऊंगा हे. बिजेन्दर की शादी की शॉपिंग परसो कर लिओ, बाकी तू घर आएगी तोह अर्जुन या संजीव में से कोई ले जायेगा तुझे मार्किट. दूकान खरीद लेना लेकिन पापा से गुस्सा नहीं करना.", शंकर जी ने पल में हे उसको मन लिए था.

"एक ऐसा पेंडंट चाहिए मुझे, छोटा सा. चैन है मेरे पास सोने की लेकिन उसमे ऐसा मोरपंख डालना है.", ये नयी डिमांड सुन्न कर मधुलता रुक न सकीय अपनी जगह.

"पायजेब, पेंडंट, कड़े जो भी मेरी बेटी को चाहिए वह मिलेगा. तेरी माँ घूर रही है अब, मैं चलता हु.", शंकर जी ने गाल थपथपा कर चाबी ली और एक बार खुद भी वह चला देख कर गाडी में बैठ गए. ऐसा पेंडंट उन्होंने घर में भी कही देखा था. पीछे हे चंद्रो देवी भी उठ कड़ी हुई थी अपने नौकरो को गाडी में सरपंच की लाश लकड़ी, उपलों के बीच बोरी में लपेटे ले जाते देख.

"ऐ मुन्नी, चल तेरा गुस्सा हो गया हो तोह मेरे मलहम लगा दे. और अपने बाप से नई कहेगी तोह किस से कहेगी? शंकर जैसा भी हो, इसका एकतरफा करता है और ज़िन्दगी भर करेगा. ऋचा चेक बना डीओ फेर तड़के कोई लिकद्वा ल्यायेगा बैंक से पैसे. पौती के शगन भी करने है, पौता तोह सार लेगा लेकिन बबिता टेंटुआ पकड़ के मर्जी का लेके जाएगी.", चंद्रो देवी की बात सुन्न कर ऋचा अपनी माँ को ठेंगा दिखती उनकी तरफ दौड़ गयी. सुशीला हंस रही थी मुन्नी की हालत पर

"देख लो जीजी, घर में बस एक मैं हे हु जिसके बस में कुछ नहीं."

"देख्या तोह कोणी मुन्नी पर पलंग हाल्ने के आवाज सुनी जरूर थी. शंकर सबसे ज्यादा खुश तोह तन्ने करके गया है. बलूंगड़ी की माँ बिलाव खा के बुखी. वाह मेरी बेबस बेचारी. तू न बदली आज तक, बस कमरा बदल गया थाम दोनुआ का. चारे वाले खंडहर से ेब प्राइवेट रूम. ग्रेट.", सुशीला की बात सुन्न कर मुन्नी के कदम जैसे मिटटी में हे जम्म गए, थोड़ी हे दूर बैठी गुड्डी भी हंस रही थी सुशीला के बिंदास लहजे को देख कर.

"वो तोह.."

"सुशीला जीजी, मुन्नी नहीं लता नाम है इसका या फेर चंदा, इन प्राइवेट रूम.", गुड्डी की इस अतिरिक्त चुहल से मुन्नी जहा पानी पानी हो रही थी वही सुशीला को नयी छेड़ मिल गयी थी.

"ओहो चंदा. गुड्डी, एक बात तोह है. मुन्नी ने देख के लागे कोणी के या इतनी उम्र की हो गयी होगी. के राज है इसका.?", मुन्नी चुपचाप एक तरफ बर्तन धोने हे बैठ गयी थी शर्म से खड़ा न रहा जा सका.

"जीजी, खुराक.", गुड्डी ने बस इतना जवाब दिए.

"खुराक? मेरी खुराक तोह इस से दुगनी है. लेकिन मेरी चमक जा चुकी आरर या सोने बरगी निखरी पड़ी है."

"जीजी, वाह खुराक शंकर जी हे दे सकते है.", अब मुन्नी ने झूठे गुस्से में दोनों की तरफ देखा और शकल ऐसी के जैसे अभी रो देंगी.

"गुस्सा क्यों होव है चंदा. तेरी खुराक तन्ने मुबारक. महारी कोई सुखी रेहनी है तोह ेब के कर सका है. क्यों गुड्डी?"

"जीजी, आप न बेशक एक्सीडेंट करके कमजोर दिखो हो. एक बार ठीक हो जाओ फेर कहियो के मैं सुनहरी दिखू हु के आप. टूबवेल पे टेम तोह आपके ाँ का सेट करे करते लोग, बस देख के जी भरण वाले. स्कूल के आरर कॉलेज वाले के, बाकी शंकर कोनसा आड़े रेहवे है. महीने में 2 घंटे आरर फेर बाकी सब यु आपके स्यामि है. Pashu-chulhe के काम सेहत ठीक रखे है लेकिन उतनी कोणी जितनी आपकी है.", मुन्नी ने नरमी से सुशीला से बात कही तोह सुशीला ने मजाक बंद कर दिए.

"ज़िन्दगी 2 तरह इंसान जी सके है मुन्नी. आज इसके साथ चलो या फेर कल इसकी बुराई करो. जो है उसमे खुश रह, काल शिकायत न होगी पीछे मदद के देखन पर.", सुशीला ने बड़ी गंभीर बात कह दी थी जैसे उसको अपने गुजरे हुए वक़्त में खुद से हे शिकायत रही हो.

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क्रमश
 
जारी

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अर्जुन मार्किट से सामान लेने धर्मपाल जी के हे साथ चला गया था और सब कार्यो को निबटा कर 5 बजे से पहले हे घर पहुंचा तोह धर्मपाल जी भी उसके कहने पर आज पंडित जी के दर्शन को आ गए. अर्जुन के आने का पता तोह उसकी रानी की आवाज से हे चल जाता था और कौशल्या जी इस देरी की वजह से बैठक से बहार निकल चली आई.

"राम राम चची.", पाँव के हाथ लगा कर धर्मपाल जी ने उनका अभिवादन किआ तोह वह भी खुश हो गयी.

"पाल, तू बात करनी बंद हे कर दे. पड़ोस में होने के बाद भी तेरे पास टाइम न है जो हफ्तों बाद घर आया. और ये कपूत इतना सामान तेरे से उठवा के ले आया, शर्म न आई अर्जुन?"

"दादी, पैदल कहा आये है हम? सामान ज्यादा था और जल्दबाजी में मैं स्कूटर की जगह ये ले गया. अंकल के पास गया तोह इन्हे आज थोड़ा पहले हे काम से निकाल कर मार्किट चला गया. अंकल आप सामान दीजिये, मैं दादी के कमरे में रख देता हु.", अर्जुन ने बुलेट कड़ी करने के बाद वह 3-4 थैले और पौधे उनसे लेने चाहे तोह Preeti-Rupali मदद को आ गयी.

"ये हम ले जाते है तुम ये मिटटी वाला सामान अलग करो.", प्रीती के ऐसा कहने पर अर्जुन अपनी दादी को देखने लगा जैसे शिकायत कर रहा हो.

"झगड़ हे लो थोड़ा तुम लोग, आ बीटा पाल तू अंदर चल मेरे साथ. राजकुमार भी अभी आया है तोह चाय के साथ तेरे साथ 2 बातें भी कर लेंगे.", कौशल्या जी बैठक में गयी जहा पंडित जी और राजकुमार जी भी बैठे थे पहले से. संदीप के पिता जी सबसे मिलने के बाद उनके साथ हे बैठ गए. इधर दादी के जाते हे अर्जुन तैश में आ गया.

"ये मिटटी क्या होता जरा बताओ? हर वक़्त क़तर क़तर कैंची जैसे बोलती रहती हो.", अर्जुन ने अमरुद के पौधों के साथ हे कुछ अंगूर की कलमे भी ली थी अंकल से और 2 हरी मिर्च के ख़ास पौधे. प्रीती मार्किट वाला सामान लिए रुपाली के साथ कड़ी बड़ी अदा से जवाब देने लगी.

"ऐसा है माली जी, मिटटी भी आपको मुबारक और झाड़ काटनी वाली कैंची भी. रुपाली दीदी कह दो जरा अपने भाई से की इज्जत से बात करा करे घर की छोटी मालकिन से, आइंदा ऐसी गुस्ताखी माफ़ नहीं होगी.", रुपाली दीदी भी प्रीती का हे साथ देती गंभीर चेहरा बनाये अर्जुन को बोली जो 'छोटी मालकिन' सुन्न ने के बाद हैरत से प्रीती को देख रहा था.

"सुन्न लिए न, एक भी शब्द कहा तोह घर से बहार हो जाओगे. चलो छोटी मालकिन", रुपाली दीदी ने भी अर्जुन को चिडया और वह इधर उधर देखने लगा.

"ठहरो मैं बताती हु तुम दोनों को, मेरे भाई की टांग खींच रही हो. दोनों एक्टिंग कर रही थी कामवाली की और यहाँ एक छोटी मालकिन दूसरी उसकी चमची. गेम पूरा करो चल कर अंदर आई बड़ी. और तू अर्जुन इनके कान खींच दिए कर अगर choo-chaa करे ये ज्यादा. हाँ कह देती हु.", अलका दीदी के इतना कहते हे दोनों की sitti-pitti गम हो गयी.

"ये क्या? कोई खेल खेल रहे थे क्या आप लोग? तभी सोचु ये पडोसी एक प्लाट दुरी रहने वाले आज मालकिन कैसे?"

"हाँ ारु, ये न अपनी बारी आई तोह दोनों हे बहाने से इधर आ गयी, चुपके. इनको टास्क मिली थी नौकरानी बन्न ने की तोह एक फिरंगी दूसरी जमींदार, इनसे होना तोह था नहीं. इधर आ कर एक्टिंग ॉपपोस्टी हो गयी.", अब प्रीती और रुपाली झेंप रही थी.

"बदला तोह यहाँ भी कुछ नहीं दीदी. उठा तोह अभी भी बोझ हे रखा है इन्होने.", अर्जुन ने हँसते हुए उनकी तरफ अलका दीदी का ध्यान दिलाया तोह दोनों के हे हाथो में बैग थे. अलका दीदी हंसने लगी तोह प्रीती ने नाराजगी दिखते हुए अपने दोनों बैग जमीन पर रख दिए. लेकिन अर्जुन कहा पीछे हटने वाला था.

"हाँ ये ाचा किआ तुमने, घर के अंदर वाला सामान दीदी ले जाएँगी. तुम काम से भागने वाली लगती हो, ये पकड़ो और जहा छोटे मालिक बताएँगे वह रखना नहीं तोह पगार नहीं मिलेगी.", प्रीती के हाथो में वह सारे पौधे थमते हुए अर्जुन ने ब्याह पकड़ कर अपने साथ ले जाते हुए कहा.

"हाहाहा.. चोर को मोर पड़ना इसको कहते है प्रीती. तेरी तोह 99 पे गीति काट दी अर्जुन ने.", ऋतू दीदी, जो जाली वाले दरवाजे के पार सब देख रही थी उनके पास आती बोली तोह प्रीती का चेहरा उतर चूका था.

"चल अर्जुन छोड़ दे बेचारी को. ला ये बैग मुझे दे रुपाली, तू चाय बना आरती के साथ मैं ये सब रखती हु.", अलका दीदी ने हे सामान ले लिए था और फर्श पर रखा हुआ ऋतू दीदी ने. अर्जुन भी उनकी बात मान कर प्रीती को आजाद करता बगीचे की और चल दिए. लेकिन प्रीती अंदर जाने की जगह उसके पीछे चल दी तोह ऋतू दीदी को लगा वह नाराज हो गयी है. फिर कुछ सोच कर वह पहले सामान रखने चली गयी.

"बहोत बुरे हो तुम. इतनी छोटी सी बात पर मुझे इतना बोलै तुमने.", प्रीती का उतरा हुआ चेहरा और ऐसी आवाज सुन्न कर अर्जुन ने पौधों को एक तरफ रखने के बाद उसके पास खड़े होते हुए कहा.

"मेरा तुम पर हक़ नहीं है क्या? मजाक के बदले मैंने भी तोह वही किआ लेकिन तुम्हे बुरा लगा तोह आइंदा नहीं करूँगा. बस ऐसी सूरत मत बनाया करो, तुम छोटी नहीं मेरी मालकिन हो.", अर्जुन ने वह नरम हाथ पकड़ते हुए अपने सीने पर रखते हुए प्रीती की नजरो को देखा जहा इस हाथ की चुहान से हे लाली आ गयी थी.

"लेकिन बुरे तोह तुम हो हे. सॉरी. वो बस मुझे तुम्हारे साथ रहना है इसलिए नाराज थी. सारा दिन मेरा ऐसे हे निकल जाता है ऊपर से अब रिजल्ट आने के बाद फिर जाना पड़ेगा.", प्रीती और करीब आ कड़ी हुई, घर की शर्म जैसे अभी दोनों को हे नहीं थी.

"अभी समय है रिजल्ट में और फिर कॉलेज शुरू तोह अगस्त में हे होगा. इतनी दूर का सोचोगी तोह अभी का समय खराब कर लोगी प्रीती. वैसे मैं क्या कह रहा था के तुम चुपचाप निकल आना 7 बजे, पुराने घर चलेंगे.", अर्जुन ने धीमी आवाज में कहा और इधर ऋतू दीदी इन दोनों को देख रही थी अपनी कमर पर हाथ टिकाये.

"पब्लिक गार्डन में घूम रहे हो क्या?", दोनों ने हे हड़बड़ाते हुए दुरी बनाई थी की कार का हॉर्न भी सुनाई पड़ गया. अर्जुन गेट खोलने भगा और प्रीती शर्माती हुई ऋतू दीदी की तरफ लपकी जो हंस रही थी. लेकिन अपने पापा को देख कर वह भी गाडी में बैठे दूसरे शक्श को pehchan-ne लगी. ये उसके अशोक फूफा जी थे, मधु बुआ के पति. और वह बिना उनसे मिले ये बताने अपनी दादी की तरफ चली गयी, प्रीती को साथ लिए.

"नमस्कार फूफाजी.", अशोक जी की तरफ का दरवाजा खुद अर्जुन ने हे खोला था, ऐसा उसने बचपन में अपने पापा को करते देखा था जब भी उसके फूफा जी आते थे. और उनके पाँव छू कर आशीर्वाद लेने के बाद पिछली सीट से सामान उठाने लगा.

"शंकर, अर्जुन जल्दी हे बड़ा हो गया भाई. मुझे तोह लगा था के घर में घुसूंगा और Tara-Arjun की लड़ाई की आवाजे आती मिलेंगी. बीटा, थोड़ी लम्बाई रोको अपनी कल को लड़की नहीं मिलेगी अगर ताड़ से लम्बे हो गए तोह.", ये थे अलग मिजाज अशोक वशिष्ठ जी, बिजली के आधुनिक पुर्जे बनानी वाली कंपनी के मालिक और ज़िंदादिली मनमौजी व्यक्ति. उनकी बात सुन्न कर अर्जुन झेंपते हुए बस बताया हुआ सामान निकल कर पीछे पीछे चल दिए. घर के दामाद की इज्जत तोह ऐसी होती है के पूरा परिवार सामने पेश रहे खिदमत में. बस यहाँ थोड़ा अपनेपन वाला माहौल था जहा सबको बराबर रखा जाता था.

"फूफा जी हिमांशु (तारा का भाई) भी आएगा न? जाने कबसे नहीं देखा उसको."

"आएगा क्यों नहीं भाई लेकिन पहले वह अपने dada-daadi के पास जायेगा. शनिवार से उसके बोर्डिंग में छुट्टियां पड़ रही है.", अभी वह आँगन से बैठक के तरफ आये तोह कौशल्या जी आरती का थाल लिए दरवाजे पर आ गयी. नजर उतरने के बाद तिलक लगा कर अपने दामाद को आशीर्वाद दिए तोह अशोक जी भी उनसे गले लग कर मिले. ऐसा हे कुछ रामेश्वर जी ने किआ और धर्मपाल जी हाथ मिलाने के पश्चात फिर आने का कहते चले गए. मधु बुआ खुद हे पानी लेकर आई तोह अशोक जी देखते हे रह गए. आरामदायक वेशभूषा में उनकी धर्मपत्नी पहले से अधिक खूबसूरत और जवान नजर आ रही थी. दोनों की नजरे 4 होते हे वह नजरे झुकाती हुई वह से चली गयी.

"ये तोह एक मिनट में हे ज़िन्दगी का सबसे बड़ा झटका दे दिए पिता जी घर में आते साथ. मधु की जुड़वाँ बहिन यहाँ रख ली और फूलन देवी हमारे बाँध दी.", मधु बुआ ने भी ये सुन्न लिए था जाते हुए और वह हंसती हुई गयी थी.

"अशोक बीटा, बदलाव तोह नियम है ज़िन्दगी का. बचे खुश तोह हम भी खुश. Chai-nashta करने के बाद ऊपर वाले कमरे में चले जाना. लम्बे सफर से आये हो थोड़ा थकान दूर करो फिर आराम से बैठेंगे. अर्जुन, अपने फूफा जी का सामान बुआ के कमरे में हे रख दो बीटा.", अर्जुन ने तुरंत हे बात का पालन किआ और अंदर चला गया.

"तुम मुझे मार्किट लेके जाने वाले थे न? अब हो गया प्रोग्राम खराब.", बुआ भी अर्जुन के साथ हे ऊपर चल दी, कपडे बदलने.

"ओह मेरी प्यारी बुआ, जरा फूफा जी के साथ समय बिताओ. मार्किट तोह हम सवेरे चलेंगे, भीड़ भी नहीं होगी और समय का झंझट भी नहीं.", कमरे के अंदर आते हे अर्जुन ने बिस्टेर पर एक तरफ वह महंगा अटैची रखा, चमड़ा चढ़ा हुआ और साथ हे वह बैग. लेकिन मधु बुआ का दिल तोह जैसे कुछ और हे कह रहा था. अर्जुन को पीछे से बाहों में लेती वह लिपट हे गयी.

"मेरा दिल था तेरे साथ शाम को थोड़ा अकेले रहने का, घर से बहार. और जो तू कह रहा है वह जाने क्यों अजीब लग रहा है. फूफा जी ाचे है तेरे लेकिन उनके साथ अंतरंग होने का मैं नहीं करेगा मेरा."

"ये बात दिमाग से निकल दो बुआ. वह आपके पति है और उनका अधिकार है आप पर. जानती है मेरा भी दिल था आपके साथ 3 बजे अँधेरे में प्यार करने का. लेकिन ऐसा करना ठीक नहीं रहता, आज आप उनके साथ दिल से रहिये. कल मैं आपको नाराज नहीं करूँगा.", पलट कर अर्जुन ने बुआ के मादक होंठो को चूम लिए. मधु बुआ जो चलती फिरती कामदेवी थी, खजुराहो की मूरत सी उन्हें अर्जुन ने अपनी इत्छा और मधु का स्थान बताने में कोई हिचक न दिखाई.

"अब मुश्किल होगा अर्जुन."

"यही तोह जीवन है बुआ और आपको अगर मुझसे प्यार है तोह इस प्यार के सफर को फूफाजी से अपने परिवार तक ले जाना है. उन्हें उनकी अर्धांगिनी के साथ साथ साबित भी करना है के आप उनके साथ है, परिवार के साथ है. मैं तोह हमेशा हे यहाँ हु और आपके दिल में भी.", अर्जुन ने स्नेह से उन्हें अपने सीने से लगा लिए.

"सारे रिश्ते अकेला तू हे पूरे करेगा क्या? चल तेरी बुआ तुझे नाराज नहीं करेगी लेकिन तू कल पक्का मेरे साथ चलेगा?"

"हर हाल में. अब मैं निचे चलता हु आप फूफा जी के कपडे निकल कर बाथरूम में रखिये और उनकी देखरेख करिये.", अर्जुन जाने लगा तोह मधु बुआ ने एक बार फिर रोक लिए. इस बार उनके चेहरे पर मुस्कान थी, शरारत से भरी.

"वैसे तेरा मेरे साथ न करना शायद इस वजह से था के फिर तेरे फूफा को मजा नहीं आता?", अर्जुन भी हँसता हुआ बहार निकल गया.

"बदमाश कही का.", बुआ उसकी हंसी में 'हाँ' समझ गयी थी. अर्जुन अपनी माँ के पास चला गया और इधर मधु कपड़ो के बैग से pajama-kurta निकल कर पलंग पे रखने के बाद अपनी पति के अंदरूनी वस्त्र और टोलिया बाथरूम में रखने लगी. अंदर भी सब सही करते हुए बहार आई तोह सामने अशोक जी जूते और कमीज खोले उनका हे इन्तजार कर रहे थे.

"मैं क्या कह रहा था मेमसाब, ये मधु वशिष्ट किसी काम की नहीं रही. आपसे इश्क़ की गुस्ताखी कर ली जाए?", और मधु बस शरमति कड़ी रही जैसे आज वह पहली बार उनका सामना कर रही हो. अशोक जी ने गीले कमीज और सलवार में अपनी पत्नी को देखा तोह खड़े हो कर बाहों में ले लिए.

"क्या करते हो अशोक? घर में सब हैं."

"कमरे में हम दोनों लेकिन आज मैं जरा साथ नहाने के मूड में हु. बाद में देखेंगे कमरा और घर के लोगो को.", और साथ लगाए वह मधु को भी अपने साथ अंदर हे ले चले. बिन बदल बरसात तोह वही हो सकती थी..

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"अब आप कैसी हो माँ? आराम किआ था कुछ आपने? सॉरी बहार जाना पड़ा था मुझे काम से और फूफा जी भी आ गए है.", अर्जुन कमरे में आया तोह रेखा जी के पास इस वक़्त कोई नहीं था. वह नाहा कर कुछ समय पहले हे अंदर आई थी लेकिन हालत बहोत बेहतर थी अब. अर्जुन को गले लगते हुए वह मुस्कुराने लगी.

"इतनी परवाह न किआ कर अपनी माँ की बीटा. कल तेरी बीवी न इस बात पे हे नाराज हो जाएगी. मैं ाची भली हु और सारा दिन बस बिस्टेर पे हे थी. ाचा लगता है तुझे काम करते देख कर, ऐसे हे सबका ख़याल रखा कर."

"माँ हो आप मेरी तोह इस रिश्ते के बीच कोई नहीं आ सकता. अपना ध्यान रखा करो माँ और तकलीफ हो तोह प्लीज छुपाया मत कीजिये. जानती हो न के आप हो तोह मैं हु, मैं हर बात आपसे कह देता हु या बिना कहे आप समझ जाती हो. लेकिन ऐसा दोनों तरफ से होना चाहिए न माँ?"

"आइंदा सबसे पहले मेरे मुन्ना को हे बताउंगी. अब तू बता के आज दिन में क्या खाया?", यहाँ अर्जुन फंस गया था.

"आपने खाया?"

"बात मत बदल और जो पुछा है वह बता. मेरे पास तू 2 को छोड़ कर गया था लेकिन 6 लोग ख्याल रख रहे हैं. दवा, आराम, खाना और बोरियत न हो तोह तेरी taaiji-bua मेरे साथ बातें करती रही. लेकिन लगता है आज तू नियम भूल गया.", रेखा जी की दांत में भी कही से गुस्सा या तेज आवाज न होती थी.

"ये सुधरेगा नहीं माँ, खुद खिलाओ इसको और कल से इसकी अलग खुराक भी शुरू होने वाली है. दादी ने पहले हे कहा है के उसके लिए तीनो समय खाने के साथ साथ 2 गिलास दूध, जूस, फल और बाकी सब भी इसका टाइम पे होना चाइये.", कोमल दीदी खाने की प्लेट और दूध का गिलास लिए अंदर आई तोह अर्जुन मुँह बनाने लगा. पीछे हे माधुरी दीदी भी चली आई थी.

"और साथ हे ये भी कहा है के नींद 6 घंटे से काम की नहीं होगी. चची आपका लाल सारा सारा दिन घर से गायब रहता है.", माधुरी दीदी की बात का अब वह क्या जवाब देता लेकिन माँ ने खुद हे उसको खिलाना शुरू कर दिए.

"इस वक़्त खाने का समय कहा है माँ?", अर्जुन न करता रहा लेकिन वह खिलाती रही. माधुरी दीदी ने 3 कप चाय के टेबल पर रख दिए थे और दोनों बहने वही बैठ कर चाय पीने लगी.

"इसको खुदसे भी खाने दिया करो रेखा. बड़ा हो गया है ये अब.", शंकर जी आये थे कपडे बदलने के लिए लेकिन यहाँ अर्जुन को अपनी माँ के हाथो खाना खाते देख वह अपनी सलाह देने लगे. कोमल दीदी ने चाय छोड़ कर अलमारी से अपने पापा के कपडे निकले और इधर अर्जुन ने उन्हें अपना जवाब दिए.

"दादी की गॉड में बैठ कर तोह आप भी अभी तक खाते हो पापा. मैं तोह फिर भी सामने बैठा हु. दादी तोह ये भी बता रही थी की मेरी उम्र तक तोह आपने घर रहते खुदसे खाया हे नहीं, वह तोह दादा जी के डांटने से आपने उनके सामने ऐसा करना बंद किआ.", अब शंकर जी खुद हे झेंप गए थे अपना राज खुलते हुए.

"मैं इसलिए कह रहा था के तेरी माँ की तबियत ठीक नहीं है. बाकी तुझे खिलने वाले तोह हर तरफ है, मैं कुछ बोलूंगा तोह मेरी रोटी न बंद कर दे घरवाले.", शंकर जी ने हँसते हुए अपने कपडे ले लिए. "खाना खा कर आ जाओ बहार, गाडी सिखाता हु तुम्हे.", अपने पिता की बात सुनते हे अर्जुन उठने लगा था खुश हो कर लेकिन कोमल दीदी ने वापिस बैठा दिए.

"खाने के बाद. और पापा कपडे बदल ले फिर.", अर्जुन ने अब जल्दी जल्दी सब ख़तम किआ और दूध पीते हे उसके पिता जी भी आ गए थे.

"चलो, मैं तोह कबसे वेट कर रहा था.", अर्जुन लाड में उनका हाथ पकडे चहकता हुआ साथ हो लिए.

"मैं भी साथ चलूंगी नहीं तोह कोई नहीं जायेगा.", ये ऋतू थी जिसको जरा भी चैन न था. एक तरफ से वह भी अपने पापा का हाथ पकड़ती हुई बिना उनके जवाब के खुद हे शामिल हो गयी.

"एक साथ दोनों कैसे सीखोगे? तुम्हे ये सीखा देगा या फिर संजीव. उसको तोह अनुभव भी है."

"आपसे सीखना है तोह मतलब आपसे हे. और ये छोटा है मैं बड़ी. मतलब पहले मेरा हक़ है लेकिन मैं शेयर कर रही हु न. चुपचाप चलिए बस.", अर्जुन बीच में बोलै हे नहीं लेकिन ऋतू पिछली सीट पर बैठी तोह उसको चैन मिला. शंकर जी जहा अपने बेटे के साथ कुछ समय रहना चाहते थे वह उनकी ये लाड़ली आफत भी साथ हो चली. घर से एस्टीम कार निकलते हे उन्होंने अर्जुन को समझाना शुरू कर दिए.

"अभी के लिए तुम्हे गियर का पता होना उतना जरुरी नहीं क्योंकि एक तोह तुम्हे स्टीयरिंग संभालना है और दूसरा ये एब्स. एक्सेलरेटर, ब्रेक और क्लच. हम इस खाली सेक्टर में चलते है, मैदान दूर दूर तक साफ़ है इधर.", अर्जुन सर हिला रहा था पता होने के बावजूद. संजीव भैया की गॉड में बैठ कर स्टीयरिंग वह संभालना सीख चूका था लेकिन घर कभी बताया नै था. आज दादा जी ने भी सुबह सब बताने के बाद उसको आजमाया था. ऋतू पीछे बैठी हुई भी सब सुन्न रही थी और देख भी. ये वाला मैदान तोह जैसे स्टेडियम जितना बड़ा था और पक्की जमीन साफ़ थी.

"तुम ये समझो के मोटरसाइकिल पर हे बैठे हो. हैंडल की जगह स्टीयरिंग है जिसको जिधर घुमाओगे कार वही घूमेगी लेकिन यहाँ तुम्हारे बराबर में एक और मोटरसाइकिल है. जहा तुम अभी बैठे हो. मतलब पैरेलल 2 मोटरसाइकिल है जुडी हुई और पाँव की जगह गियर हाथ से लगते है. 1-3-5 गियर िधत और 2-4-र ऐसे. क्लच प्रेस करके ये पहला गियर डाला और अब धीरे धीरे क्लच रिलीज़. एड़ी टिकाये रखनी है और कोई जल्दबाजी नहीं. हलकी वाइब्रेशन हुई तोह अब धीरे से मोस्ट राइट में अक्सेलरेटर वैसे हे आराम से प्रेस. ये चलने लगी आगे. अब क्लच तोह दबाना नहीं, ब्रेक और रेस सम्भालनि है.", शंकर जी ने गियर नहीं बदला था और गाडी थोड़ी आगे चलने पर आभास करने लगी तोह उन्होंने अर्जुन को दिखते हुए दूसरा गियर दाल दिए.

"अब गॉड में बैठ कर स्टीयरिंग संभालोगे?", गाडी एक बार फिर रोक कर उन्होंने अर्जुन की तरफ देखा.

"हाँ बस आप सीट पीछे कर दीजिये और दीदी आप लेफ्ट साइड हो जाओ.", शंकर जी ने कुछ सोच कर अपनी कार चुनी थी, बजाये इलो के. अर्जुन दरवाजा खोल कर घूमता हुआ अपने पिता की तरफ आया तोह सीट अपनी सीमा तक पीछे थी.

"पापा आपने ारु वाली गाडी क्यों नहीं निकली? तारा कह रही थी की वह स्कूटी जैसी है.", पीछे बैठी ऋतू ने सवाल किआ और इधर अर्जुन जैसे तैसे अपने पिता के पाँव के बीच आ बैठा.

"वह ठीक कह रही है, ये सीख लो फिर उसमे दिक्कत नहीं आएगी. वैसे अर्जुन तुमने पहले गाडी चलाई है?", अर्जुन ने जैसे गियर लगाया था शंकर जी ने देख लिए था. और बिना परेशानी के वह गियर बदल कर कार आगे ले चला था. दूसरा गियर भी बदल दिए था 20-25 सेकंड बाद हे.

"वह पापा उमेद चाचा की भी एस्टीम हे थी न, उसमे गियर बदल लेता था मैं लेकिन स्टीयरिंग पर संजीव भैया ने थोड़ी प्रैक्टिस करवाई. वह कह रहे थे इस बार पूरी तरह सीखा देंगे.", अर्जुन बात करते हुए सामने बड़े गौर से देख कर चला रहा था. आगे घूमते वख्त थोड़ी gad-gad हुई तोह शंकर जी ने हे गियर छोटा करते हुए दूसरे में दाल दी. उन्हें भी पता नहीं चला था के अर्जुन ने तीसरा कब दाल दिए.

"ाची बात है. वैसे इतना ध्यान से मत देखो, मैदान समतल है और निचे पाँव का आईडिया जल्द हो जायेगा. तुम्हे सीखने की नहीं प्रैक्टिस की जरुरत है."

"रिवर्स तोह होती नहीं मेरे से. जेन की लाइट मेरे से हे टूटी थी.", अर्जुन ने जैसे हे ये कहा शंकर जी मुस्कुरा दिए.

"चलो गाडी रोक कर जरा पिछले गियर दाल कर दिखाओ. गाडी लेफ्ट साइड में बैक करनी है.", अर्जुन ने उनके कहे अनुसार हे किआ तोह स्टीयरिंग और गाडी के तालमेल में वह उलझ गया जिस से गाडी बाए की जगह दाए तरफ मुड़ने लगी.

"ओह बैलबुद्धि, स्टीयरिंग अपोजिट वर्क करेगा रिवर्स केस में. किताब भी काम करती है ऐसे में.", ऋतू ने जैसे हे ये बताया अर्जुन ने गाडी रोक दी.

"मेरे से कही लग जाएगी. बाकी कल करेंगे पापा, आप थोड़ा दीदी को सीखा दो. वैसे भी हम दोनों भरी है जगह काम है इधर.", अर्जुन हताश हुआ तोह शंकर जी ने खुद अपने बेटे के हाथ पकड़ कर स्टीयरिंग पर रख दिए. चाबी ों करते हे उन्होंने गियर लगाया और पूरा गोल चक्कर हे बना दिए उलटी दिशा में, हाथ अर्जुन के वही मजबूती से रखवाए हुए. ऋतू ने भी सीट पकड़ ली थी. और फिर ऐसा हे स्टीयरिंग को दूसरी दिशा में घुमा कर किआ. अर्जुन ने गौर किआ था के उसके पिता जी खिड़की, बड़े शिशु से नहीं देख रहे थे ऐसा करते हुए. वह पीछे देखने वाले खिड़की के बहार और कार के अंदर वाले पर बस निगाह डालने के बाद बड़ी कुशलता से ऐसा कर रहे थे.

"अब anti-clock वाइज, स्पीड स्लो कर के.", शंकर जी के ऐसा कहते हे अर्जुन ने पाया की वह तेजी से खुद हे पीच ले जा रहा था गाडी को लेकिन पिता के बताते हे उसने पंजा थोड़ा ढीला किआ और गाडी दूसरी दिशा में घूमने लगा.

"पीछे चलना कठिन नहीं है, हाँ अभ्यास जरुरी है. लेकिन सबसे पहले ये डर निकल दो की गाडी के कुछ होगा, गियर अटक जायेगा या गाडी टकरा जायेगा. तुम इसको चला रहे हो, ये तुम्हे नै बेटे. It's सिंपल लिखे थिस. कल यहाँ ईंट से मार्किंग करके प्रैक्टिस करेंगे अब तुम बराबर बैठो मैं ऋतू को स्टीयरिंग समझाता हु.", अर्जुन को जब मजा आने लगा तोह पापा ने उठा दिए था.

ऋतू दीदी हर चीज बारीक से समझती थी लेकिन स्टीयरिंग शंकर जी ने साथ हे पकडे रखा. कही कही वह ज्यादा घूम जाता तोह वह समझने लगते. दोनों भाई बहिन हे पूरी तन्मयता से सीख रहे थे. लेकिन थोड़ी मस्ती में ऋतू दीदी ने रेस पर पाँव दबाया तोह शंकर जी ने तुरंत कमान अपने हाथ ले ली.

"एक दिन में सिकंदर नहीं बनते प्रिंसेस, अभी आपने सिर्फ स्टीयरिंग सीखना है थोड़े दिन तक. ये रेस गियर बाद में."

"भाई को तोह आपने इतना सिखाया?"

"उसको आता है लेकिन डर है मैं में थोड़ा. शायद इसलिए की ये मेरी गाडी है लेकिन अबसे तुम्हे फ़िक्र करने की जरुरत नहीं है अर्जुन. कुछ दिन मेरे और अपने ताऊजी के साथ प्रैक्टिस करते रहो, डर ख़तम हो जाये फिर सड़क पर चलना. जानते हो मैंने क्या किआ था जब सीख रहा था उस समय.", शंकर जी ने दोनों बचो को 30-30 मिनट दिए थे इधर और उन्हें अपनी अपनी जगह बैठने के बाद वह अपना किस्सा सुनाने लगे.

"बताओ बताओ, कुछ मजेदार लग रहा है.", ऋतू के ऐसा कहते हे अर्जुन हंसने लगा.

"क्या किआ था पापा?"

"मैं था 11 साल का और पापा मुझे गॉड में बैठा कर स्टीयरिंग पकड़ते थे तोह इतना मुझे समझ आ चूका था. एक दिन वह घर आये हुए थे और उस वक़्त उमेद और नरिंदर भी थे घर पे. उमेद आया हुआ था छुट्टियों की वजह से और पापा घर आये थे 2 दिन के लिए. वह दोपहर में सो गए तोह हम चारो ने धक्का मार कर गाडी बहार निकल ली. सरकारी जीप थी पुलिस की.", शंकर जी आराम से गाडी चलते हुए सेक्टर की मार्किट से आगे चलने लगे.

"फिर.", अर्जुन ने उत्सुकता से पुछा.

"उमेद ट्रेक्टर चला लेता था तोह उसने जीप चालू कर ली. उस वक़्त भीड़ तोह होती नहीं थी और गर्मी में गलियां सुनसान. गाँव जैसा तोह था सबकुछ. हम घूमने लगे और वह घुटा रहा. फिर मैंने कहा के मैं भी चला सकता हु तोह उमेद ने सीट बदल ली. सीढ़ी खाली सड़क पर मैंने जीप दौड़ा तोह दी लेकिन घबराहट में भूल गया के ब्रेक दबनी है और रेस दबा दी. उमेद तोह बहार कूद गया लेकिन जीप जा घुसी जोहड़ (तालाब) में. हम तीनो बच गए थे और कूदने से उमेद की टांग टूट गयी थी.", शंकर जी हंसने लगे अपना किस्सा बताते हुए तोह ऋतू बोल पड़ी.

"फिर तोह दादा जी ने आपकी ाची धुलाई की होगी."

"उनका तोह बुरा हाल हो गया था ये देख कर की बचे जीप लेकर निकल गए है. माँ, पापा और तेरे ताऊजी पूछताछ करते हुए उधर पहुंचे तोह माँ रोने लग पड़ी. पापा ने गाडी में हम तीनो को जांच परख कर देखा तोह सब ठीक मिले लेकिन मुझे छोड़ कर बाकी दोनों रो रहे थे तोह किसी को कुछ नहीं कहा. उमेद बेचारा पूरी छुट्टियां बिस्टेर पर रहा और मुझे अगले हे दिन गाडी सीखनी शुरू." शंकर जी की बात सुन्न कर दोनों हे bhai-behan हंस रहे थे. उन्हें बड़ा मजा आया था ये किस्सा सुन्न कर.

"उमेद चाचा बेचारे, समझदार ban-ne के चक्कर में टांग तुड़वा बैठे.", ऋतू ने लाचारी के भाव से कहा तोह अर्जुन ने जवाब दिए.

"वह जानबूझ कर ऐसा करते है दीदी. और उस टाइम भी उन्होंने ऐसा इसलिए हे किआ होगा के पापा लोगो को कोई कुछ न कहे.", शंकर जी इतना सुनते हे अर्जुन की तरफ देखने लगे. कार बीकानेरी मिठाई की बड़ी दूकान के सामने कड़ी थी.

"ऋतू, घर के लिए स्पंज के रसगुल्ले और इमरती पैक करवा लो. फूफा जी और तुम्हारे दादा जी को पसंद है.", ऋतू दीदी 500 रुपये लेकर अंदर चली गयी और शंकर जी ने अब अर्जुन से बात की.

"तुम्हे कैसे पता के उमेद जानबूझ कर ऐसा करता है? उसने बताया था तुम्हे?", अर्जुन अपने पिता का सवाल सुन्न कर थोड़ा चुप रहा फिर बोलै.

"हॉस्टल में एक बार मुझसे गलती हो गयी थी अभ्यास के समय तोह उन्होंने खुद हे मुझसे ऐसा दांव लगवाया था जिस से एंकल (पाँव का जोड़) टूट गया. बात उन्होंने अपने ऊपर ले ली थी और अभी भी वह गोली पाँव पर जानबूझ कर खाई थी चाचा ने, गाडी के पीछे सुरक्षित होने के बावजूद उन्होंने पाँव बहार निकल कर सामने वाले को निशाना बनाने दिए था. वह ऐसा हे करते है."

"हाँ बीटा तब भी उमेद बचने के लिए जीप से नहीं कूड़ा था, उसने जान बूझ चोट खाई थी.", शंकर जी ने बड़े प्यार से अर्जुन के सर पर हाथ फेरा.

"वैसे जान सकता हु जीप में 4 लोग कौन थे? क्योंकि ताऊजी तोह आपने हे बताया के बाद में आये थे और वह वैसे भी आप लोगो के साथ मैच नहीं करते, जाने क्यों.", अर्जुन के इस सवाल से वह बचना चाहते थे लेकिन अब पूछ लिए था तोह बताना भी जरुरी था.

"हमारा एक और दोस्त था, तुम नहीं जानते."

"जब वह अंकल कभी मिलने आये तोह मुझे जरूर बताना पापा. मुझे न नरिंदर चाचा और उमेद चाचा बहोत पसंद है, पक्का वह अंकल भी आप लोगो जैसे हे होंगे.", अर्जुन की ख़ुशी देख कर इतने दिनों में पहली बार उन्होंने अपने बेटे को सीने से लगा लिए था.

"जरूर बताऊंगा मेरे बेटे को जब भी तेरे अंकल आएंगे तोह. वैसे थोड़ा बहोत दोस्त भी बनाओ अब, ज़िन्दगी में परिवार सबसे जरुरी है लेकिन दोस्त ज़िन्दगी जीना सिखाते हैं. Hum-umar दोस्त, क्योंकि वह अलग होंगे. सोच अलग होगी और हर तरह के पहलु बेहतर jaan-samajh सकोगे. ये समय ऐसा होता है बीटा जो फिर कभी नहीं आता.", शंकर जी ने ये नया पथ पढ़ते हुए अपने बेटे से कहा.

"हाँ दादा जी भी कहते है के दोस्त हे निष्पक्ष बता सकते है के आप कहा गलत हो और कहा सही. वह दोनों हे सूरत में साथ देंगे क्योंकि वह दोस्त होते है. लेकिन ये ट्वेल्थ तक मैं परिवार में हे रहना चाहता हु पापा. दोस्त 4 साल कॉलेज में बन्न जायेंगे लेकिन आप सब वह नहीं होंगे न.", अर्जुन बात मानता भी था तब भी कुछ अलग कह देता था. शंकर जी गाडी से बहार देखते हुए इस बात की गहराई को अपने अंदर खोजने लगे और अर्जुन उन्हें ऋतू दीदी का बोलकर दूकान में चला गया.

'सही कहा बेटे, परिवार वह नहीं होता और सही बिताया समय शायद तुम्हे वह सब गलतिया न करने दे जो मेरे से हो गयी. मेरा उस वक़्त का बहाना था के घर पे maa-papa के पास समय नहीं होता था लेकिन माँ तोह सब काम छोड़ कर हमारे घर आते हे बस जी भर के प्यार लुटाती रहती थी, भूल हुई थी समझने में की वह क्या कमी महसूस करती होगी हमारे घर न होने पर. उमेद ने हमारी गलतिया तुम्हे नहीं दोहराने दी और अर्जुन, वह भी ऐसा हे था.', यादों से आने वाली मुस्कान कभी नहीं बता पाती की इंसान खुश है या खुद पर हंस रहा है. कुछ ऐसा हे हाल था शंकर जी का. फिर कुछ याद आते हे नजर बचो की तरफ दौड़ाई तोह ऋतू ने दोनों पैकेट अर्जुन को पकड़ते हुए कान में कुछ कहा और दौड़ती हुई उस से पहले कार में आगे आ बैठी.

"तू बड़ी कब होने वाली है?", उन्होंने हंसती खेली अपनी लाड़ली से कहा तोह वह आँखें बड़ी करती उनके अंदाज में हे बोल पड़ी.

"जब आप पर बुढ़ापा आने लगेगा.", और उधर अर्जुन के सामने ये काले शीशे वाली बड़ी कार आ रुकी जिस से शंकर जी का ध्यान भांग हुआ. वह तुरंत कार से निकले तोह नजर इस सोच से अलग दृश्य पर जम्म गयी. आचार्य हंस उर्फ़ प्रमोद शास्त्री जी अर्जुन को सीने से लगाए खड़े थे. इस वक़्त उनके साथ 2 सुरक्षाकर्मी और एक लड़की भी थी, Ritu-Komal की उम्र की.

"क्या हुआ पापा? और ये अर्जुन का बचा कहा रह गया?", ऋतू ने थोड़ा विचलित होते हुए पुछा तोह शंकर जी दूर से आचार्य जी के हाथ हिलने का जवाब वैसे हे दे रहे थे. अर्जुन को इस लड़की से बात करते ऋतू ने देख लिए था, जो अब कार में आ बैठा था. शंकर जी भी मुस्कुराते हुए आ बैठे लेकिन उनके कुछ कहने से पहले हे ऋतू का सवाल सुन्न कर वह कार स्टार्ट करने में हे भलाई समझे.

"वह लड़की कौन थी और कबसे जानते हो उसको?", अर्जुन ने बात संभल ली थी बिना हिचकिचाए.

"वह हैं मेरे एक और दादा जी, आचार्य प्रमोद शास्त्री जी. उनसे मैं लाइफ के लेसंस और मैडिटेशन भी सीखता हु. जो आपने हेलमेट पुछा था न, वह इन्होने हे गिफ्ट किआ था मेरी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए. उनकी दोहती है ये दीदी जिनका नाम है हिमानी और वह ऑस्ट्रेलिया से अब अपने नाना के यहाँ हे आ गयी है. Maa-papa नहीं है उनके और दादा जी ने कहा के Komal-Priyanka दीदी के साथ हे मैं हिमानी दीदी का भी ब में नाम लिखवा औ यूनिवर्सिटी में. आपको क्या लगा?" यहाँ ram-kahani बताते हुए अर्जुन ने हे ऋतू दीदी से पलट कर सवाल कर दिए था. अब ऋतू को भी एहसास हुआ के गलत जगह, गलत सवाल कर दिए और बात सिंपल सी.

"ाचा कर रहा है तू. इन्हे घर बुलाना फिर जब अकेली हे है तोह.", ऋतू ने जैसे सवाल को टाला था शंकर जी मंद मंद मुस्कुरा रहे थे. वह ध्यान दे रहे थे की ऋतू अर्जुन पर भरी है और अर्जुन कुछ छिपा नहीं सकता उस से.

"वह कोमल दीदी देख लेंगी, मैं नहीं कहने वाला. दादा जी तोह नाराज है के मैं उनके घर अभी तक नहीं गया हु. पापा, क्या मैं इन्हे शादी का निमंत्रण दे सकता हु?", अर्जुन को जैसे ये बात याद आई उसने पूछना हे बेहतर समझा.

"हाँ अब तुम्हारे दादा जी है तोह ये करना उतना हे जरुरी है. वैसे वह मुश्किल हे आ पाएंगे बाकी तुम्हारा उनके साथ कितना प्यार है इस पर देपेंद करता है. हेलमेट ाचा दिए है उन्होंने, पता है उसकी कीमत क्या होगी, तक़रीबन 15-20 हजार रुपये.", शंकर जी के ऐसा कहते हे ऋतू पलट कर अर्जुन को देखने लगी.

"वह जरूर आएंगे, मैं मेरी तरफ से पहला निमंत्रण उन्हें हे देने का सोच रहा था.", शंकर जी को मालूम था के वह अर्जुन के बुलाने पर जरूर आएंगे. जो इंसान अपने काम को सिर्फ अर्जुन से मिलने के लिए दरकिनार कर सकता है वह अर्जुन के लिए क्या कुछ नहीं कर सकता. हलकी फुलकी बातें करते हुए वह घर तक आये तोह शंकर जी ने घडी में समय देखा. 7 बज चुके थे और उन्हें बचो के साथ आज समय का पता हे नहीं चला था.

"चलो तुम दोनों अंदर जाओ और मैं तुम्हारे उमेद चाचा के यहाँ जा रहा हु. सवेरे भी घर नहीं आ पाउँगा क्योंकि ड्यूटी जाना है. दोपहर का खाना साथ खाएंगे.", शंकर जी ने दोनों बचो को उतारते हुए कहा तोह ऋतू ने bye किआ और अर्जुन ने भी वैसे हे अपने पिता को विदा किआ.

'साला ये है परिवार. बहार शराब पी कर समय गुजरना पड़ता है और इधर अभी घर से निकला था 2 घंटे गायब हो गए. चलो अब रोज दिन में तोह यही होने वाला है, रात अपने हिसाब से.' शंकर जी ने अब कही कसेट्टी चालू की थी और गण भी शोले फिल्म का 'ये दोस्ती, हम नहीं तोड़ेंगे. तोड़ेंगे दम मगर, तेरा साथ न छोड़ेंगे.. ये दोस्ती...
 
अपडेट 113

वक़्त और बदलाव (3)


ये पुराण घर एक गली के बाद हे था जहा अर्जुन चक्कर लगाने का बोल कर चला आया था. प्रीती भी स्कूटी से अर्जुन के पीछे 5 मिनट बाद हे चली आई थी. घर नजदीक था तोह उचित संभल की वजह से बिलकुल साफ़ सुथरा था, बस कही कही दिवार का प्लास्टर झाड़ा हुआ था, फर्श पक्का लेकिन पुराण और अंदर की ईमारत के चारो तरफ जगह कच्ची थी, सिवाय उस एक कमरे के जहा कभी गए (काऊ) बंधी होती थी और चारा रखा जाता था. घाना वृक्ष आज भी इस तरफ मजबूती से खड़ा था जिसके निचे गए का खूंटा गदा हुआ था.

अर्जुन ने स्प्रिंग लगा जाली वाला दरवाजा खोल कर ईमारत में प्रवेश किआ तोह कुछ पल बस ध्यान से सब तरफ देखता रहा. इस बड़े हॉल में दोनों तरफ 2-2 कमरे और एक स्टोर, पूजा का कमरा था वही सामने रसोईघर और उसके साथ हे पिछली तरफ जाने के दरवाजा. अंदर जैसे aaj-kal में हे ाचे से सफाई की गयी थी.

"उस टाइम के हिसाब से ये घर ज्यादा मॉडर्न है न अर्जुन?", प्रीती के अंदर आने का जैसे अर्जुन को पता न चला था लेकिन आवाज सुन्न कर वह मुस्कुराते हुए पलट कर देखने लगा.

"हाँ, दादी कह रही थी की पहले यहाँ 2 कमरे होते थे पिछले हिस्से में और एक कच्चा कमरा गए के लिए. फिर बाद में ये ऐसे बनवाया गया था 30 साल पहले और ताऊजी शादी के बाद इधर रहने लगे बाकी सब वह नए घर में चले गए. फिर उधर दूसरी मंजिल बन्न गयी तोह सब वही रहने लगे लेकिन मुझे ये घर ज्यादा पसंद है लेकिन दादी आने हे नहीं देती थी इधर.", प्रीती अर्जुन का हाथ थामे सब सुन्न रही थी.

"तुम यहाँ आने के बाद संजीव भैया के कमरे में चुप्प जाते थे, बड़ी मुश्किल से लेके जाना पड़ता था तुम्हे वापिस. वैसे मुझे भी ये वाला घर ज्यादा पसंद आया."

"तुम्हे तोह आना हे है. छोटा जो है और सुनसान भी.", अर्जुन के हँसते हे प्रीती उसके गले लग गयी.

"बदमाश होते जा रहे हो. हाँ बात ठीक है वैसे. प्राइवेसी एंड पीस. और बहार दीवारे इतनी ऊँची है के गार्डन एरिया में भी किसी की नजर नहीं जा सकती."

"तुम्हे बहार चलना है न? आओ, वैसे भी यहाँ अभी थोड़ी गर्मी है.", अर्जुन प्रीती को लिए बहार चला आया और दोनों कच्चे हिस्से में टहलने लगे. यहाँ सचमुच purn-shanti थी. थोड़ा आगे चलते हे प्रीती ने अर्जुन को बाहों में भर लिए. उस चुम्बन में सिर्फ प्यार और तड़प थी जिसको अर्जुन ने दिल से महसूस किआ था.

"मैं चाहती हु की हम दोनों यहाँ प्यार करे लेकिन अभी घर जाना पड़ेगा मुझे विक्की आई हुई है.", प्रीती उसके गले लगी हुई थी.

"हाँ जाना तोह मुझे भी पड़ेगा. वैसे मैंने इसलिए हे तुम्हे यहाँ बुलाया था. घर हफ्ते बाद बेहतर हो जायेगा तब मैं तुम्हे यही लेके आऊंगा.", अर्जुन ने दोनों कूल्हे पंजो में पकड़ कर प्रीती के नरम होंठो को मुँह में ले लिए. अर्जुन की तरफ से भी प्रीती को उतना हे प्यार और तड़प जवाब में मिली. आँखें बंद किये दोनों का ये चुम्बन तबतक चलता रहा जब सांस उखाड़ने लगी.

"अह्ह्ह.. बूत no वैजिनल पेनेट्रेशन. और सम्भालो अपने इसको, किसी दिन पिटाई कर दूंगी मैं इसकी.", अर्जुन के उभर को दबाते हुए प्रीती ने मस्ती में कहा तोह वह झेंप गया. फिर हँसते हुए कहने लगा.

"तुम करीब आती हो तोह इसकी हालत ख़राब हो जाती है और गलती इसकी नहीं है. तुम हो हे इतनी सेक्सी."

"सेक्सी? ज्यादा हे डिफाइन नहीं करने लगे हो. हु मैं सेक्सी लेकिन सिर्फ तुम्हारे करीब होने पे. बाकी टाइम तोह मुझे खुद पता नहीं होता के मैं ज़िंदा हु या मशीन."

"प्रीती, कॉलेज 3 महीने बाद है. इस समय को ख़राब मत करो ये सोच कर की हम बिछड़ जायेंगे. हर हफ्ते मिलेंगे न saturday-sunday को.", अर्जुन अब प्रीती को समझते हुए बहार की तरफ चलने लगा. प्रीती साथ हे चिपक कर धीमी गति चलती सुन्न रही थी.

"फिर भी अर्जुन दुरी तोह होती हे है. यहाँ मैं दीदी के साथ रहती हु, 2-2 परिवारों का प्यार मिलता और कॉलेज में सबकुछ अलग हे होगा. नए लोग, हॉस्टल और अजीब माहौल. तुम नहीं थे तोह मैं बस जी रही थी अर्जुन लेकिन अब बात अलग है. तब उम्र भी काम थी और ध्यान पढाई, खेल, दादाजी पर रहता था. आज ऐसा नहीं है. मेरा एआईएम (लक्ष्य) तुम हो अर्जुन.", प्रीती संजीदा होती भावुक हो चली थी.

"और क्या तुम्हारे कॉलेज जाने से ये सब बदल जायेगा? नहीं न. अभी मैं खुद हे स्कूल में हु और 4 साल मुझे भी कॉलेज जाना होगा लेकिन हम हमेशा साथ होंगे प्रीती. और मैं नहीं चाहता के हम अपने सपनो का बलिदान दे. तुम मंजू से भी प्यार करती हो न, जरा उसके हे फेंसलो की बात कर लो.", अर्जुन न चाहते हुए भी इस वक़्त ऐसा उदहारण देने लगा.

"वह बात नहीं है बस मुझे ऐसा लगता है के तुमसे दूर जाना मेरे बस की बात नहीं है."

"ऋतू दीदी भी चली जाएँगी लेकिन वापिस आने के लिए. उनकी राह तोह और मुश्किल है प्रीती. मैं तोह कॉलेज ख़तम होते हे तुम्हे बीवी बना लूंगा लेकिन सोचो ऋतू दीदी तोह घर में पास हो कर भी साथ नहीं रह सकती. तुम मेरा साथ दो मेरी हिम्मत बन्न कर. और मैं वादा करता हु के हफ्ते के वह दोनों दिन बस तुम्हारे होंगे.", अर्जुन ने दोनों गाल पकड़ कर बड़े लाड से प्रीती को समझाया तोह वह मुस्कुराने लगी.

"पक्का मेरे साथ रहा करोगे न वीकेंड्स पे?"

"प्रॉमिस.", अर्जुन ने होंठो को चूम कर मोहर लगा दी.

"लेकिन पहले दिन तुम मेरे साथ चलोगे मुझे छोड़ने. पहले हे बता देती हु और कभी कभी लेने भी आया करोगे.", प्रीती ने आँगन में उसके गले लगते हुए बचो सी जिद्द जताई और अर्जुन ने भी उसको बाँहों में कस लिए.

"मतलब पहले हे दिन सबको बताना है के प्रीती पूरी कमिटेड है? कोई बात नहीं फिर ऐसा हे होगा और 21 का होते हे तुम्हारी ऊँगली में हीरा पहना के पक्का भी कर दूंगा हमारे रिश्ते को.", अर्जुन ने दोनों की सगाई का कहा तोह प्रीती चहक उठी. उसका गाल चूमती हुई वह प्यार से बस देखे जा रही थी अर्जुन के चेहरे को और दोनों अलग हुए तोह आँगन की बत्ती बुझाते हुए अर्जुन ने खुद स्कूटी बहार निकल ली. प्रीती भी बड़े दरवाजे को टाला लगाती उसके पीछे आ बैठी.

"तुम सबकुछ सोच कर रखते हो न? तब तोह पक्का ऋतू दीदी के लिए सोच लिए होगा.", प्रीती ने पीछे बैठ कर अर्जुन की कमर में हाथो को डालते हुए पूछ लिए.

"नहीं, वो मैं नहीं कर पाउँगा प्रीती. फ़िलहाल तोह सोच भी नहीं रहा हु इस बारे में. दीदी को पहले डॉक्टर ban-na है और उसके बाद जैसा वो चाहेंगी वही करूँगा.", अर्जुन ने घर की चाबी जेब में डालने के बाद स्कूटी आगे बधाई तोह प्रीती को अब एहसास हुआ था के इन दोनों का तोह मिलान सीधा और आसान है लेकिन ऋतू दीदी की तोह समस्या कही ज्यादा बड़ी है. जहा प्रीती के लिए दोनों परिवार खुश है, शामिल है वही ऋतू दीदी के साथ सिर्फ अर्जुन अकेला है, बेशक वह खुद भी चाहती है के ऋतू दीदी को उनका प्यार भी मिले लेकिन क्या वह साथ दे सकेगी उनका?

"सॉरी. थोड़ा सेल्फिश हो गयी थी अर्जुन लेकिन जब ऋतू दीदी की बात आएगी तोह मैं साथ कड़ी रहूंगी. परिवार का सामना मिल कर करेंगे."

"ओह मेरी प्यारी बिल्ली. परिवार का सामना नहीं करते होते, उनको शामिल करते है. दादा जी कहते है के सूखी रेत को लगातार सींचते रहो तोह वह बिखरती नहीं. परिवार वैसा हे होता है कुछ.", अर्जुन की बात समझ तोह नहीं आई लेकिन प्रीती को ाचा लगा था के अर्जुन परिवार को हे सबसे ऊपर रखता है.

"वैसे एक और भी है लाइन में.", प्रीती का इशारा था अलका दीदी की तरफ.

"उनके पास पूरे घर से ज्यादा दिमाग है, उनकी तरफ से तोह निश्चिन्त रहो. शादी नहीं करने वाली वह और रहना ऋतू दीदी के साथ है उन्हें. वैसे तुम्हे बुरा नहीं लगेगा मेरी 4-4 बीवी होंगी?"

"न. मैं तुम्हारी और तुम मेरे. बस यही सच है मेरे लिए और 4 में से एक तोह अब अपना करियर सँभालने में लगी हुई है. माँ ने मंजू को इटली सुग्गेस्ट किआ है. मां का नोन है वह कोई और मंजू स्विमिंग की ट्रेनिंग के साथ साथ वही जॉब करेगी.", अर्जुन कुछ और सवाल करता उस से पहले दोनों प्रीती के घर के बहार आ चुके थे. सामने हे रोमिला और विक्की आँगन में बातें कर रही थी, ग्रीक में और रेणुका अपने पिता छोल पूरी के साथ छत्त पर कड़ी थी. अँधेरा हो चला था लेकिन सब निश्चिन्त थे.

"अंदर मत आना, कह देती हु.", प्रीती ने धीमी आवाज में कहा तोह अर्जुन ने स्कूटी अपने घर की तरफ कर दी.

"ये ठीक है न? वैसे आजकल तुम और ऋतू दीदी कुछ ज्यादा हे फ़िक्र नहीं करने लगी हो?", अर्जुन ने यहाँ स्कूटी से उतारते हुए कहा तोह प्रीती ने मुँह बनाते हुए कहा.

"जरा हमारी जगह आ कर देखो फिर कहना ये बात. विक्की सीरियस है तुम्हारे लिए और जबतक यहाँ माँ है तुम ऐसा कुछ मत करना जिस से उन्हें बुरा लगे. वह विक्की को गलत नहीं समझेंगी क्योंकि वह माँ के करीब है जबसे पैदा हुई है. बाकी तुम जो करते हो उस से फरक नहीं पड़ता.", प्रीती ने बात कहते हुए अर्जुन के पीछे देखा तोह तारा कार की चाबी घूमती हुई उनके हे पास आ कड़ी हुई.

"हाँ तोह tota-maina यहाँ गली में खड़े क्या कर रहे है?", तारा ने आते हे प्रीती के गाल को सेहला दिए. वह मुस्कुराती हुई तारा और अर्जुन को देखने लगी लेकिन कहा कुछ नहीं.

"वैसे हे रुक गया था इसको देख कर. तुम फूफा जी से मिल ली?", अर्जुन ने बात पलट कर तारा से हे सवाल कर दिए.

"हाँ उनके हे पास थी और अब तुम्हे ढूंढ रही थी तोह नानी ने कहा के तुम पुराने घर गए हो तोह तुम्हे लेने हे आ रही थी. दरवाजा खोलते हे तुम यही दिख गए.", तारा ने अब प्रीती का हाथ थाम रखा था.

"कुछ जरुरी काम है?", अर्जुन दिनभर की bhaag-daud के बाद अब नाहने का विचार बनाये था लेकिन अगर तारा को काम है तोह बाद में नाहा लेगा.

"हाँ तुम्हे साथ चलना है मेरे. मद (मैनेजिंग डायरेक्टर) ने एक पार्टी राखी है और मैं जाना नहीं चाहती थी लेकिन अभी फ़ोन आया तोह पापा ने कहा के जाना चाहिए. फैक्ट्री के पास हे रिसोर्ट है जहा पार्टी राखी है.", तारा की बात सुन्न कर जवाब प्रीती ने दिए.

"बिलकुल जाना चाहिए और अर्जुन तुम्हारा साथ जाना जरुरी है तारा के.", जैसे अर्जुन तारा को नाम से बुलाता था वैसे हे प्रीती भी. और अब प्रीती ने जैसे कहा तोह अर्जुन को लगा जैसे बात कुछ और भी है पार्टी के साथ साथ.

"ठीक है, मैं माँ को बता देता हु और नहाने के बाद चलते है.", अर्जुन अंदर चला गया और तारा उसके जाते हे प्रीती से धीमी आवाज में बात करने लगी. स्कूटी अब एक तरफ थी और ये दोनों दूसरी तरफ.

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अशोक जी ने घडी में समय देखा तोह 8 बज रहे थे और अपने बड़े साले को आँखों के इशारे से उन्होंने कुछ कहा तोह राजकुमार जी ने भी आँखों से हे सहमति जाता दी. रामेश्वर जी यही बैठे थे अपनी बीवी संग और सबसे बातें कर रहे थे.

"अशोक बीटा खाना तोह देरी से खाओगे.", पंडित जी के ऐसा कहते हे दामाद ने भी इत्छा जताई.

"जी पापा साढ़े 9 बजे तक और अभी एक परिचित से मुलाकात करनी है तोह राजकुमार के साथ जरा वही जा कर आ रहा हु. फिर कल शाम को गाँव निकलना है तोह मिल नहीं पाउँगा.", अशोक जी की बात सुन्न कर कौशल्या जी ने राजकुमार जी की तरफ देखा और अपनी बात कही.

"बीटा तुम्हारे पापा ने जो कहा उसपे थोड़ा गौर करना. सम्बन्धी जी से भी बात कर लेंगे ये और मेरी जरुरत पड़ी तोह मैं भी."

"माँ जरुरत हे नहीं पड़ेगी और मैं खुद सहमत हु इस बात से. सभी यही चाहते थे लेकिन उस वक़्त कुछ और बात थी तोह घर से अलग रहना पड़ा. अब तोह पिता जी भी कह रहे थे के शहर में घर देख लो, khet-khalihan पत्ते पर दिए हुए है. अजीत (अशोक जी का छोटा भाई) रोज 20 किलोमीटर दूर शहर जाता है अपनी फैक्ट्री तोह घर शहर में होने से उचित रहेगा. Tulika-Nipun (भाई के बचे) के college-school वही है और अब मधु के साथ रहने से सारिका (अजीत की बीवी) को भी सहारा रहेगा. मैं तोह अपनी ख़ुशी बता हे नहीं प् रहा मधु के इस फैंसले से. जाने कैसे उसमे ये इतने बदलाव आ गए और वजह कोई बता नहीं रहा.", अपनी ख़ुशी जाहिर करते हुए अशोक सबको देख रहा था जैसे कोई तोह बता हे दे मधु के परिवर्तन की वजह.

"वजह क्या होगी अशोक बीटा? जरुरी है के मधु ने खुद ये कहा और समझा. बस काम के साथ साथ थोड़ा समय देते रहना जिस से सबकुछ ठीक रहे. बाकी देरी मत करो और राजकुमार के साथ मिल आओ अपने मित्र से. कल आराम से चर्चा करेंगे. घर भी मैं देख दूंगा, संजीव की होनेवाली बीवी वही से है तोह मुझे भी दिक्कत नहीं आएगी.", पंडित जी के जवाब से अशोक अब संतुष्ट हुए और आज्ञा ले कर बहार चले गए अपने बड़े साले के साथ.

"राजकुमार भाई, शंकर भी साथ होता तोह और मजा आ जाता.", राजकुमार जी सफारी की तरफ जाने लगे तोह अशोक जी ने छोटी वाली कार पर थपकी दी. "तारा को ले जाने दो यार वह, बचे सेफ रहेंगे, हम इसमें चलते है और वैसे भी ये कार मुझे शुरू से पसंद है.", उन्होंने जैसा कहा राजकुमार जी ने वही किआ. बड़ी गाडी की चाबी अंदर दे आये और जेन की लेते आये.

"शंकर के साथ मजा तोह आता है लेकिन फिर घर वापसी मुश्किल हो जाती है अशोक जी. वह तोह होश में रहता है मेरा अगला दिन भी खुमार नहीं ख़तम होता.", राजकुमार जी ने हँसते हुए जवाब दिए.

"हाँ यार वह साला अलग हे प्राणी है. एक पार्टी में गए थे हम दोनों और वह शंकर पूरी एक बोतल हलक में उतारने के बाद भी कार चला कर मुझे घर तक लेके आया था. जाती कहा है उसके अंदर दारु? और यहाँ तोह वह जवान सेवा भी करवाता, एक से बढ़ कर एक.", अशोक जी की बात का मतलब समझते हुए राजकुमार जी झेंप गए.

"हाँ वह सेह लेता है लेकिन एक बार में एक हे नशा करता है. मिक्स होने पर उसका दिमाग फिर थोड़ी देर तक काम नहीं करता."

"वह मिक्स सेहन तोह कर लेता है यार, यहाँ तोह हालत हे ख़राब हो जाती है. याद है न जोधपुर में क्या हुआ था? अँगरेज़ के चक्कर में अपनी जान जाते बची थी लेकिन शंकर दारू और चिल्लम बराबर खींच रहा था."

"उसके बाद याद नहीं क्या? शंकर 2 घंटे तरणताल (स्विमिंग पूल) से बहार न निकला. नशा उतरने के बाद हे कमरे में गया था अपने. लेकिन उसको आदत है अशोक जी और उसका शरीर सख्त है. नरिंदर उस से भी 2 कदम आगे है वैसे.", सबसे छोटे भाई का जीकर किआ तोह अशोक ने हैरत से देखा.

"वह कहा कुछ करता है यार? ड्रिंक भी 2 से ज्यादा नहीं लेते देखा मैंने."

"मैंने भी नहीं देखा ज्यादा उसको और पहले तोह मैं सिर्फ आपके साथ हे या कश्यप जी के साथ कभी कभी लगा लेता था लेकिन 2 साल पहले उमेद के यहाँ पार्टी थी तोह नरिंदर सीधा वही आया था घर भी नहीं बताया था उसने. उमेद और शंकर तोह चलो पता हे है खाने और पीने के शौक़ीन है लेकिन नरिंदर ने उमेद की कंपनी के 10 साल पूरे होने की ख़ुशी 10 गिलास शराब वह भी पानी की जगह बियर मिला कर ख़तम करके मनाई थी. उसके बाद भी वह पार्टी में आखिर तक था और मेरे टोकने पर उसका जवाब था के 'यहाँ सोने नहीं आया हु भाई, भाई की ख़ुशी में शामिल होने आया हु.' अलग हे है ये दोनों.", बात करते करते कार इस होटल के सामने आ रुकी जो शहर से थोड़ा बहार था.

"छोल साहब ज़िंदाबाद.", अशोक जी के ऐसा कहते हे राजकुमार जी हंसने लगे और दरबान ने खुद हे कार की चाबी लेते हुए गाडी सुरक्षित जगह लगा दी. इस आलिशान होटल के मालिक थे छोल सतीश पूरी. दोनों हे बड़े बेफिक्र से अंदर चले आये और ये काउंटर पर बैठा लड़का हाथ जोड़ कर उनके सामने खड़ा हो गया.

"सर ये लीजिये 101 की चाबी."

"और सामान?", राजकुमार जी के इतना पूछते हे लड़के ने हामी भर दी.

"जी सर. वह भी लगा दिए गया है और वेटर मैं भेज रहा हु.", चाबी ले कर दोनों हे उन चमकती सीढ़ियों से पहली मंज़िल की तरफ चल दिए. लिफ्ट लगी थी लेकिन उन्हें यही ठीक लगा. काउंटर पर खड़े लड़के ने भी चैन की सांस ली और वापिस बैठ गया अपनी कुर्सी पर.

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आधे घंटे बाद अर्जुन तैयार हो कर कमरे से निकलने से पहले खुद को आईने में देख रहा था. बड़ी पार्टी में जाना था वह भी तारा के साथ तोह ाचे से तैयार होना जरुरी था. ये ड्रेस उसने पंजाब से हे ली थी जो आरती ने दिलवाई थी. जवाब नहीं था आरती की पसंद का जिसको अर्जुन अब साफ़ देख रहा था. बाल सही करता हुआ वह सबसे पहले आरती दीदी को दिखने उनके कमरे में गया तोह ऋतू दीदी हे सबसे पहले उसकी और खींची चली आई.

"वाओ. ये तुम हे हो न? ऐ Rupali-Aarti, जरा देखो तोह अर्जुन को.", उनकी बात सुन्न कर दोनों के साथ अलका भी आ कड़ी हुई.

"बी गॉड, अर्जुन ये तोह kaya-kalp हे हो गया.", आरती एकटक देख रही थी लेकिन अलका ने सीधा गाल हे चूम लिए और उसकी ब्याह पकड़ कर बाकी सबको देखने लगी.

"फोटो खींचो यार कोई तोह मेरी.", अलका के इतना कहते हे बाकी हंसने लगी और अर्जुन शर्माने.

"सचमुच बड़े स्मार्ट लग रहे हो अर्जुन. वैसे ये ड्रेस कब ली तुमने?", रुपाली के ऐसा कहते हे अर्जुन ने आरती की तरफ इशारा कर दिए.

"दीदी ने दिलवाई है मुझे और इनकी पसंद है ये.", अर्जुन के मुँह से अपने लिए प्रशंशा सुन्न कर आरती भी निसंकोच उसके साथ जा कड़ी हुई.

"ाचे लग रहे हो और ये अर्जुन का बर्थडे गिफ्ट था मेरी तरफ से.", आरती के ऐसा कहने पर बाकी सबको भी ख़ुशी हुई.

"इस बार मेरी शॉपिंग भी तुम हे करोगी. कह देती हु.", ऋतू ने आरती को गले लगाया और रुपाली ने काजल के पेन से अर्जुन के कान की पीछे बिंदी बना दी. Ritu-Alka को ाचा लगा उसका ऐसा करना.

"हमारी हे नजर लग रही है यहाँ तोह बहार जाने किसकी किसकी लगेगी. ध्यान से जाना और तारा भी तैयार हो गयी है.", रुपाली के ऐसा करने पर अर्जुन ने इस बहिन को भी गले लगा लिए.

"थैंक यू."

"मेंशन नॉट.", रुपाली ने हँसते हुए जवाब दिए और अब सबकी आँखें अर्जुन के साथ साथ इधर आती तारा पर अटक गयी. कमर से परिधान को ठीक करती वह सामने आई तोह अर्जुन ऊपर से निचे तक तारा को निहारने के बाद खुद हे शमरा गया. एक कपडे का ये गाउन सीने से कमर तक कैसा था लेकिन फिर जमीन तक किसी फ्रॉक की तरह. काल और लाल रंग जैसे एक दूसरे में मिल रहे थे. झालर वाला पारदर्शी कपडा कंधे से बाँहों तक उन गोरी बाहों की झलक दे रहा था वही खुले बाल ख़ास तरीके से सेट थे. गोल छोटी सी काली बिंदी और कानो में बारीक चैन के झुमके बहोत थे तारा को सबकी आँखों का तारा बनाने के लिए. होंठो पे सिर्फ ये चमकदार परत बहोत थी प्राकृतिक लाली को बचाये रखने के लिए.

"वाह. ये तोह दोनों हे आग लगाने वाले है ऐसे. तारा तू यार पूरी ढंकी हो कर भी केहर मचा रही है.", अलका की बात सुन्न कर तारा ने आँख मार दी.

"ऋतू की ड्रेस है और देख मेरे कैसे फिट आई. तेरे वाली लम्बी थी, क्योंकि तू है भी तोह लम्बी. चले हीरो, लेकिन तेरे कमरे से निकलना पड़ेगा.", तारा के ऐसा कहने का मतलब अर्जुन को पता था. लेकिन साथ हे वह खुद तारा को कैमरा में क़ैद करने की खवाहिश लिए देख रहा था.

"चलो फिर वापिस भी आना है टाइम पर. और दीदी आप दादी के कमरे से चाबी पकड़ा देना बहार.", अर्जुन ने अलका से कहा तोह वह पहले हे इस तरफ से निचे चल दी.

"ध्यान से चलना गाडी तारा. और अर्जुन इसका ख़याल रखना, कोई चूक नहीं होनी चाहिए. तेरी जिम्मेवारी है ये.", ऋतू दीदी के साफ़ शब्दों में ऐसा कहने पर अर्जुन ने अर्जुन ने उन्हें विश्वास दिलाया के वह हरपाल साथ रहेगा. दोनों अर्जुन के कमरे से होते हुए सीधा बहार वाले आँगन में चले आये. अलका ने सफारी की चाबी दी और फिर से अर्जुन का गाल चूम कर अंदर भाग गयी. अँधेरे में किसी को क्या पता चलता. कुछ हे समय बाद तारा की महक से गाडी भर चुकी थी और दोनों सेक्टर से बहार निकल चले थे.

"कमाल लग रही हो सचमुच.", अर्जुन के इतना कहते हे तारा मुस्कुरा उठी. थोड़ा बहार आते हे गाडी एक तरफ रोक कर उसने अर्जुन के होंठो को अपने होंठो से मिला दिए. कुछ पल ये प्यार भरा शन्न बिताने के बाद वह अलग हुई और कहने लगी.

"तड़प तोह मैं रही हु तुम्हे देख कर. पार्टी के बाद मुझे प्यार नहीं किआ तोह तुम्हारे कमरे में आ जाउंगी, याद रखना."

"तोह इसलिए ये ड्रेस पहनी है? मेरा तोह खुद दिल कर रहा है के अभी तुम्हे गॉड में बिठा लू लेकिन पार्टी तक रुकना पड़ेगा. वैसे कुछ और भी चक्कर है जो तुम बता नहीं रही.", अर्जुन ने गाडी चलते हे अपने दिल की बात कह दी. अब वह बिपास वाले चौराहे से औद्योगिक नगर वाली चौड़ी सड़क पर थे.

"पार्टी में मैनेजिंग टीम, मार्केटिंग टीम, एडमिनिस्ट्रेशन और सीनियर लोग हे होंगे. सभी ख़ास लोग और बड़ी पोस्ट वाले. शराब ऐसी पार्टीज में रहती है तोह मैं आना नहीं चाहती थी और दूसरी बात ये रात की पार्टी ऐसे सुनसान जगह. मतलब ठीक है के यहाँ day-night काम होता है लेकिन है तोह खाली सड़क हे. अकेली लड़की ऐसी जगह बिलकुल ठीक नहीं.", तारा ने जो कहा अर्जुन ने सुना लेकिन वह अभी भी उसको देख रहा था और तारा ने समझ लिए के अर्जुन संतुषट नहीं है उसके सवाल से. एक गहरी सांस लेते हुए उसने अर्जुन को देखा और फिर बोलने लगी.

"ऐसा है के मैं फैक्ट्री में प्रोडक्ट से ज्यादा मार्किट और मैन्युफैक्चरिंग समझ रही हु. जो जरुरी भी है और अभी लास्ट वीक ये नया मार्केटिंग गम (जनरल मैनेजर) आया है कोई साहिल खन्ना, दिल्ली से है लेकिन वर्धमान लुधिअना से अब हमारी कंपनी ज्वाइन की है इसने. 2-3 दिन तोह सब ठीक था लेकिन थर्सडे मैंने नोटिस किआ के वह मुझे फॉलो करता है या बहाने से बुलाता रहता है. कल मुझे कह रहा था के इस शहर को घुमा दू नेक्स्ट वीकेंड, जो मैंने तमीज के साथ मन कर दिए. लेकिन आज उसने कहा के पार्टी में मैं उसके साथ चालू तोह मैंने सीधा ना करते हुए बोल दिए के आइंदा अपने काम से काम रखे. लिमिट क्रॉस की तोह ठीक नहीं होगा लेकिन उसको समझ नहीं आया शायद.", अर्जुन ख़ामोशी से सब सुनता रहा और तारा के चुप होते हे बोलै.

"तुमने घर पर किसी को या मुझे क्यों नहीं बताया अगर ये बात 4-5 दिन से हो रही है?"

"Ritu-Alka को पहले बताया था और उन्होंने कहा के अर्जुन मिल लेगा उस से तू परेशां मत हो. कंपनी का ओनर पापा की पहचान का है तोह अगर बात बढ़ी फिर दूसरे तरीके से निपट लेंगे. वैसे भी मेरे लिए ये ट्रेनिंग इम्पोर्टेन्ट तोह मैं इसको बीच में नहीं छोड़ सकती. ऐसे इंसान को अवॉयड कर सकती हु और पापा को कहा तोह मेरी हे गलती निकल जाएगी क्योंकि मैं लड़की हु.", तारा ने स्पष्ट किआ और गाडी इस जगमग रिसोर्ट के बहार आ रुकी. Shaadi-byaah जैसे कार्यक्रम सँभालने जितना बड़ा नहीं था लेकिन ाची जगह थी. तारा ने गाडी अंदर ले जाते हुए दरबान से लगाने की जगह पूछी तोह उसने अंदर सीधा ले जा कर उलटे हाथ की तरफ पार्किंग बता दी.

"मिल लेते है इन जनाब से जो हमारी प्रेमिका पर लट्टू है. वैसे यहाँ कोई पहचान वाला होगा हमारी?", इधर तार पर 5-6 बल्ब लगे थे जहा इनकी गाडी के साथ कतार में 20 के करीब गाड़िया कड़ी थी और इतनी हे बहार भी थी. मतलब 70-80 लोग अंदर होनेवाले थे. अर्जुन की बात सुनते हे तारा ने ड्रेस ठीक करने के बाद उसका हाथ पकड़ लिए.

"कंपनी का ओनर है पका वैष्णो. न वह पार्टी में आता है न कुछ खता पीटा है लेकिन दिल बड़ा है और सुना है के वह साल में 2-3 पार्टी इस रिसोर्ट में हे सबके लिए अर्रंगे करता है. जगह भी उसकी हे है तोह बस catering-sharaab का खर्च होता है.", अर्जुन भी तारा के हाथ को पकडे इस कोटा पत्थर की पगडण्डी पर चलता सामने की और बढ़ गया. दोनों तरफ साफ़ घांस थी और जमीन पर कही कही gulabi-neeli लाइट जल रही थी. मुख्या हिस्से से पहले ये बड़ा फुहारा घास के बगीचे में चल रहा था, जगमग रौशनी से घिरा. कांच से हे अंदर हॉल का नजारा दिख रहा था जहा 15-16 गोल मेज पर लोग बैठे थे. युवक, युवतियां, कुछ अधेड़ और कुछ 30 के करीब वाले.

"Hello रिया, Hello सर.", अर्जुन के साथ अंदर आते हे तारा ने सबसे पहले इन चश्मे वाले व्यक्ति और उनसे बात करती इस युवती से मुलाकात की. उन्होंने भी खुश हो कर हाथ जोड़ा और रिया ने तारा से हाथ मिलाया. वह अर्जुन को गौर से देख रही थी.

"सर हे इस अर्जुन, माय ओनली बेस्ट फ्रेंड एंड अर्जुन मीट सुबोध सर, आवर वप.", अर्जुन ने बड़ी िज्जात्त से हाथ मिलाया और सामने से भी मुस्कान के साथ सुबोध जी ने ख़ुशी जाहिर की. 2 व्यक्ति और इधर चले आये जो सुबोध जी की तरह हे 40+ हे थे लेकिन तारा उन्हें दूर से हे नमस्ते करती अर्जुन का हाथ पकडे रिया के साथ एक तरफ चल दी. करीब 8-9 और युवतिया और 7-8 महिला थी यहाँ बाकी करीब 45-50 पुरुष.

"अर्जुन, रिया हर है और मेरी ाची फ्रेंड भी. चंडीगढ़ से बिलोंग करती है.", अब अर्जुन ने रिया से हाथ मिलाया तोह उसने हाथ पकड़ हे लिए.

"बॉयफ्रेंड हो या फिऑन्स (मंगेतर)?", रिया के सवाल पर अर्जुन मुस्कुराते हुए तारा को देखने लगा और उनसे थोड़ी दूर 3 लोग खड़े थे जिनमे से एक लगातार बेपरवाह सा तारा या रिया को देख रहा था. इनको उसकी परवाह नहीं थी.

"लवर ज्यादा सही रहेगा.", तारा ने खुद हे अर्जुन की ब्याह पकड़ते हुए जवाब दिए.

"वाह. ये जनाब आये थे पहले दिन तुम्हे छोड़ने और अब दूसरी बार दिखे है. गलत बात है यार तारा तेरी. कभी Saturday-Sunday मिल हे लिए कर, इस बहाने लवर जी के भी दीदार हो जायेंगे.", रिया की बेबाकी से तारा हंस रही थी लेकिन अर्जुन थोड़ा शर्मा गया.

"2 हे दिन तोह मिलते है इसके साथ. चल अब बाकी सब से भी मिल लेते है.", तारा ने इतना कहा और उनके करीब हे 4 जवान लोग और आ गए. 2 लड़के और 2 लड़किया. सभी ने तारा और रिया को मैडम कह के सम्बोधित किआ और पता चला के वह सभी नए नए कमपनी में आये थे. अर्जुन को ाचा लगा उनसे मिल कर. शायद वो दोनों लड़के उन लड़किये के प्रेमी भी थे. वेटर यहाँ sharaab-beer और खाने का सामान लिए आये तोह सबके बहोत कहने पर हे दोनों ने मन कर दिए.

"शराब नहीं पीटा और non-veg बिलकुल भी नहीं. हाँ ये ऑरेंज जूस आप लोगो को कंपनी देने के लिए.", अर्जुन ने पहले तारा को दिए और फिर रिया से पुछा लेकिन उसने कोला में वोडका मिलवा कर लेना पसनद किआ. बाकी चारो के भी हाथ में जाम या बियर थी.

"दोस्त तभी लम्बे चौड़े हो. लेकिन non-veg के बिना ऐसी हेल्थ तोह मुमकिन नहीं.", एक ने ये सवाल किआ तोह बाकी सब भी अर्जुन को देखने लगे.

"मांस खाने से मांस बनता तोह ghoda-bail-hathi तोह बिल्ली जैसे होने चाहिए थे दोस्त जो शाकाहार पर जीवन भर रहते है. मैं मन नहीं करता के मांस खाना चाहिए या नहीं लेकिन मुझे phal-sabji पसंद है क्योंकि इनके लिए किसी की हत्या नहीं करनी पड़ती. जीवन में जो दिल को ठीक लगे वह करो बस किसी को हानि मत पहुचाओ.", अर्जुन के इतना कहते हे बाकी सबने सहमति जताई.

तारा के होंठो से एक बूँद संतरे के रास की बहती हुई ठुड्डी तक चली आई तोह अर्जुन ने बड़े प्यार से उसको साफ़ करने के बाद तारा का हाथ फिर से थाम लिए.

"ाची सोच है. दिलचस्प इंसान हो यार.", रिया ने तारीफ की हे थी और सामने से वही 3 लोग इधर चले आये. 2 करीब 38-40 की उम्र के थे और एक 34-35 का थोड़ा ज्यादा हे चमकदार सा.

"रिया हमको भी मिलवाओ इन जनाब से. हम भी जाने के कौन है ये जिन्होंने आते हे मैफिल लूट ली.", गर्मी ज्यादा नहीं थी क्योंकि हॉल वातानुकूलित था लेकिन इस भरी शरीर के व्यक्ति ने कला coat-pent पहना हुआ था जिसके सारे बटन खुले थे और हाथ में शराब का गिलास. अपनी बात कहते हुए वह तारा को भी घूर चूका था.

"आप है मर साहिल खन्ना, गम मार्केटिंग और सर ये हैं मर अर्जुन, मिस तारा वशिष्ट के बॉयफ्रेंड.", साहिल खन्ना ने गर्दन हिलाई लेकिन हाथ आगे नहीं बढ़ाया बस मुस्कुरा दिए ऊपरी तौर पर.

"बहुत खूब लेकिन jaam-vaam लो क्या ये बचो की तरह santra-cola लिए खड़े हो. लड़की के बॉयफ्रेंड हो तोह मर्दो जैसा इम्प्रैशन होना चाहिए.", उसके बराबर हे वह दोनों आदमी भी आ गए जो शायद साहिल के दोस्त थे क्योंकि रिया ने या तारा ने कोई परिचय न दिए था. अब तारा कुछ जवाब देती तोह बात गलत हो सकती थी और अर्जुन को मौका खुद साहिल ने दे दिए.

"अपने लिए संतरा कोला हे सही है सर. झूठा इम्प्रैशन शराब से बन्न सकता है जिसकी कोई जरुरत मैं समझता नहीं और मर्दानगी तारा को ाचे से पता है तभी वह मेरे साथ खुश है.", अर्जुन ने इस बार हाथ तारा की कमर में दाल लिए था. साहिल के चेहरे पर कुछ पल के लिए गुस्सा आया लेकिन वह गर्दन हिलता एक तरफ चल दिए अपमान का घूँट शराब के साथ पी कर. उसके दोस्त कुछ कह रहे थे धीमी आवाज में लेकिन अर्जुन ने परवाह नहीं की.

"वाह. तुम तोह बड़े खतरनाक हो दोस्त. वह गम है एंड यू जस्ट इन्सुलटेड हिम ों हिज फेस.", ये लड़का अर्जुन की हिम्मत की दाद दे रहा था वही रिया के चेहरे पर बल पड़ गए थे.

"वह टेढ़ा आदमी है, गुस्सा तोह मुझे भी आता है इसकी शकल देख कर लेकिन सीनियर पोस्ट पे आया है तोह कुछ कह नहीं सकती. तारा तुम्हे आगे कोई परेशानी न हो जाये.", रिया ने चिंता जताई तोह अर्जुन मुस्कुराते हुए तारा को देखने लगा जो खुश थी.

"अर्जुन हैं मेरे साथ जो खुद सर्किल जितना टेढ़ा है. तुम्हे तोह बताया हे था न मैंने इसके बारे में.? चलो टेबल पर चलते है.", तारा के कहने पर रिया साथ चल दी लेकिन बाकी 4 लोग नए थे और उन्हें सबसे मिलना था इसलिए अलग हो गए. गोल टेबल पर तारा ने हल्का फुल्का खाते हुए रिया से बातचीत की और अर्जुन की मुलाकात भी कुछ लोगो से करवाई जो ाची पोस्ट पर थे. तक़रीबन साढ़े 9 बजे हॉल आधा खली हो चूका था, क्योंकि सुबह लोगो ने काम पे आना था और जो परिवार वाले अधेड़ थे उनके घर परिवार की वजह से वह खाना खा कर निकल चले थे.

"रिया बीटा, तुम्हे घर ड्राप कर दू अगर डिनर हो गया हो तोह?", ये सुबोध जी थे जो उनके पास चले आये थे.

"ी विल ड्राप हेर सर.", तारा के ऐसा कहने पर रिया ने भी हामी भर दी.

"जी अंकल मैं तारा के साथ चली जाउंगी वैसे भी आपको समय लग जायेगा मुझे ड्राप करने में."

"ठीक है और पापा से कहना के वह डिनर पर जरूर आये शनिवार को जब तुम्हे लेने आये तोह. अर्जुन ध्यान से लेके जाना बीटा लड़कियों को.", वो शायद पारिवारिक मित्र थे रिया के और जैसे अर्जुन से उन्होंने कहा तोह उन्हें शायद लड़की की चिंता थी.

"जी सर मैं ध्यान रखूँगा.", सबके सर पर हाथ फेर कर वह अपने ड्राइवर और बीवी के साथ चले गए. हॉल के बहार सिग्रेटी के काश लगता साहिल अपने दोस्तों के साथ खड़ा इधर भी देख रहा था.

"तुम कोई पन्गा करने का सोच रहे हो क्या?", रिया ने ये बात अर्जुन से कही थी जो बहार देख रहा था.

"बिलकुल ऐसा हे इरादा है मेरा लेकिन वह खुद ऐसा करेगा देख लेना.", अर्जुन का जवाब सुन्न कर रिया ने हैरत से तारा को देखा जो बेफिक्र सी कटे हुए फल खा रही थी.

"यू अरे यंग एंड स्ट्रांग लेकिन जानते हो बड़ी बात भी हो सकती है. यहाँ साहिल के साथ और भी लोग है लेकिन तुम्हारे साथ सिर्फ लड़कियां है.", रिया ने चिंता जताती तोह अर्जुन बाथरूम जाने का बोल कर अंदर की तरफ चला गया. उसके जाते हे साहिल खन्ना अपने दोनों दोस्तों के साथ बड़े रोबीले अंदाज में इन दोनों के पास चला आया.

"ाचा नहीं कर रही तुम तारा. मैंने कहा था न के पार्टी में मेरे साथ रहना लेकिन तुम्हे अपने सीनियर की कोई कदर हे नहीं है. गम हु तुम्हारा मैं.", वह टेबल पर हाथ रखे झुका था. तारा आराम से बैठी बस टिश्यू से चेहरा साफ़ करती रही. उसका वह अधेड़ दोस्त कंधे पर हाथ रख के माहौल के बारे में बताने लगा

"कहने, अभी कुछ लोग है आसपास. ऐसे बात मत कर, बहार बुला ले या फिर बाद में कर लिओ.", हॉल में कोई 15-16 लोग और थे जो सिर्फ शराब पर ध्यान देने के साथ बस खा पी रहे थे.

"सब मेरे निचे है ये और इन्हे घंटा न फरक पड़ता निक्कू. ये लड़की मेरा दिमाग खराब कर रही है. प्यार से मन रहा हु इतने दिन से.", रिया ने थोड़ी शर्म महसूस की लेकिन बोलना हे ठीक समझा.

"सर आपने ड्रिंक की हुई है और बेहेवियर बहोत गलत है आपका. She's नॉट योर एम्प्लोयी सो प्लीज स्टे इन योर लिमिट्स.", खन्ना इस बात पर और भड़क गया था. तारा बेफिक्र थी और ऊपर से रिया का लेक्चर.

"तू चुप कर वप की चम्म्ची साली. दिल्ली होता तोह अबतक उठा लेता मैं इस जैसी को और साथ हे तुझे भी. अब कहा गया वह लोंदा जिसके साथ आई थी तू?", तारा ने मुस्कुरा कर कहा.

"तेरे पीछे खड़ा है वह और दिल्ली दर्शन करवा देगा तुझे अगर एक भी लफ्ज़ और कहा तोह.", तारा ने जिस तरह कहा था साहिल खन्ना भड़कते हुए पीछे मुदा और साथ हे अर्जुन ने उसकी कलाई पकड़ कर पीठ पे लगा दी.

"तमीज में रहोगे तोह कमीज में रहोगे. नहीं तोह रुमाल तक फाड़ दूंगा. और अगर सोच हे लिए है कुछ ऐसा वैसा करने का तोह चलो मैं कसार पूरी कर देता हु.", अर्जुन वैसे हे उसको इस दूसरे दरवाजे से बहार ले चला जहा से उसने वेटर लोगो को अंदर आते देखा था. गाडी पार्किंग भी इस मैदान की तरफ हे थी. साहिल का दोस्त ये देख कर सामने की तरफ भाग चला अपने साथी को बुलाने.

"हो गया पन्गा तारा. वो अकेला है."

"अकेला हे बहोत है.", तारा ने खड़े होने के बाद आसपास देखा तोह अब सर 2 हे टेबल पर नशे में धुत्त कुछ लोग बैठे थे. अर्जुन की दिशा में कदम बढाती वह चली और पीछे रिया भी थोड़ी परेशां सी. परेशानी बहार निकलते हे हैरत में बदल गयी.

"दिल्ली में होता तोह तू उसको उठा लेता? यही कह रहा था न?", साहिल जमीन पर घुटना पकडे बैठा था और अर्जुन को रुकने को कह रहा था जो पहले हे रुका खड़ा जैसे किसी की प्रतीक्षा कर रहा था. 2 लोग तुरंत हे इधर आ खड़े हुए और 5-6 वेटर तमाशा देखने लगे थे जहा कमीज की आस्तीन ऊपर उठाये ये पहलवान जमीन पर गिरे आदमी पर मौत की तरह खड़ा था.

"दोस्त को लेने आये हो या मार खाने?", निक्कू और वह 40 वर्षीया व्यक्ति इधर आये तोह अर्जुन के पास अपने दोस्त की हालत देख अपनी जगह ृक्क गए.

"देखो भाई तुम कर रहे हो गलत, मेरी यहाँ के थंडर से पहचान है और इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा तुम्हे.", अभी वह बात कह के रुका हे था और अर्जुन ने जमीन पर गिरे खन्ना को कमीज से पकड़ कर ऊपर उठा लिए.

"जिस जिस से पहचान है उनको बोल देना के अर्जुन शंकर शर्मा ने तुम्हारा ये हाल किआ है जो अब इसका करूँगा मैं.", और यहाँ तबियत से अर्जुन ने उस डेल्हीवाले के गाल सेकने शुरू कर दिए. निक्कू आगे बढ़ा था थोड़े जोश में और साहिल की पसली में भरपूर मुक्का मरते हुए अर्जुन ने एक तरफ फेंका और निक्कू को दबोच लिए.

"यहाँ क्या हो रहा है?", कड़कदार आवाज सुन्न कर अर्जुन वही रुक गया लेकिन गर्दन नहीं छोड़ी. साहिल खन्ना के कपड़ो पर मिटटी थी, चेहरे पर मार के निशाँ और नाक से बेहटा खून. जो व्यक्ति आया था उसके साथ 2 सुरक्षाकर्मी भी थे.

"सर, एक तोह ये लड़का आठ.. पार्टी में जबरदस्ती घुस आया.. ऊपर से गुंडागर्दी शराब पीने के बाद.", साहिल खन्ना के इतना कहते हे इन महाशय ने अर्जुन की कालर पकड़ ली.

"नाम जानते हो हमारा, सत्येंद्र अग्गरवाल है हम. हमारे रिसोर्ट में घुस कर हमारे हे मुलाजिम के साथ मारपीट करने पर जमीन में ज़िंदा गढ़वा सकते है तुम जैसे हीरोगिरी करने वाले गुंडे को."

"सर, इनका नाम है अर्जुन शंकर शर्मा. और गम ने तारा वशिष्ठ के साथ नशे में गन्दी हरकत की थी और उनके दोस्त भी शामिल थे. 5 दिन से सहली खन्ना एब्यूज कर रहा था तारा को वीरबल्ली एंड मेंटली.", रिया की आवाज सुन्न कर अग्गरवाल के हाथो से गिरबान रेत की माफिक फँसल गया.

"अर्जुन शंकर शर्मा, डॉक्टर शंकर शर्मा.", 2 सुरक्षाकर्मी तुरंत अर्जुन की तरफ लपके तोह इन्होने हाथ से उन्हें पीछे जाने को कहा और अर्जुन ने निक्कू को एक तरफ फेंकते हुए तारा की तरफ कदम बढ़ा दिए.

"ऐ बीटा सुनो, अनजाने में गलती हो जाती है इंसान से इसका ये मतलब नहीं की माफ़ न कर सको. तारा के पिता मेरे दोस्त है और ये मुझे बता देती तोह मैं खुद इस घटिया आदमी को बहार फेंक देता.

"इसलिए तोह गिरेबान नहीं पकड़ा आपका. शराब की महफ़िल सजाने वाले को ध्यान रखना चाहिए के कांच टूटेंगे तोह नाम उसका हे आएगा, बेशक वह शराब पीटा न हो. जिस अकड़ से नाम बताया था उतनी जरूर दिखाना इन लोगो पर नहीं तोह फिर मेरे पापा बात करेंगे या उनके पापा."

"उसकी जरुरत नहीं पड़ेगी बीटा. श्याम जी के भक्त है और बिटिया पर हाथ डालने वालो के साथ हम कोई दया नहीं दिखते. सूरज, पुलिस बुलवाओ और तुम दोनों जरा इनकी ाचे से खातिर करना गम साहब की.", उनके बोलते हे दोनों सुरक्षाकर्मी साहिल पर बरस पड़े और वह भी इधर से बहार चल दिए.

"देखो सर जी, पहचान मेरी भी थानेदार से है. इस लड़के का साथ दे कर आप भी गलत कर रहे हो.", ये दूसरा दोस्त था साहिल खन्ना को जो नशे में ऊँगली दिखा कर बात कर बैठा.

"जिस लड़के से हमने माफ़ी मांगी है वह यमराज की औलाद है. थानेदार तुम्हारी लाश का पोस्टमॉर्टम उसी से करवाएंगे. उसको छोडो और इस थंडर के लाडले को प्यार दो थोड़ा. जय श्याम बाबा की. और बीटा भूल के लिए माफ़ी चाहता हु, सही कहा के ये ऐसी पार्टी नहीं होनी चाहिए, आइंदा हम दिन में पारिवारिक khaan-pan आयोजित करेंगे. पंडित जी को नमस्कार कहना हमारा.", पीछे अब साहिल की जगह उस आदमी की चीखे गूँज रही थी. और अर्जुन के सर पे हाथ रखते हुए अग्गरवाल जी बहार चल दिए, मैनेजर से सब taam-jhaam साफ़ करने का बोलने.

"ये तोह कभी आते नहीं है इधर.", रिया ने साथ चलते हुए अर्जुन का दूसरा हाथ थाम लिए, बिना सोचे समझे.

"बाथरूम नहीं गया था मैं. मैनेजर को बोलने गया था के मालिक को बुलवा ले क्योंकि यहाँ झगड़ा होने वाला है. मैं इसकी पिटाई तोह कर सकता था लेकिन दिखाना भी जरुरी था के करतूत कैसी है इसकी.", अर्जुन के जवाब पर तारा मुस्कुराने लगी लेकिन अपनी सहेली का हाथ वह देख झूठे गुस्से से बोल पड़ी.

"तेरा बॉयफ्रेंड नहीं है जो मेरे वाले का हाथ पकडे है.?"

"सॉरी, एक्ससिटेमेंट में ध्यान नहीं रहा. वैसे बॉयफ्रेंड नहीं है कोई मेरा, शेयर हे कर ले यार.", झेंपते हुए हाथ तोह छोड़ दिए लेकिन बात जो कही उसको सुन्न कर अर्जुन शर्माने लगा.

"चल चल अपना रास्ता नाप. और यही रुको तुम दोनों, मैं गाडी निकल के लाइ.", तारा इतना कहती अर्जुन से चाबी लेकर उधर चल दी जहा गाडी कड़ी थी. अर्जुन कमीज ठीक कर रहा था और रिया उसको देख रही थी.

"जान बहोत है तुम में. कैसे उठा लिए था तुमने उसको और वह पलट कर एक बार भी हाथ न लगा पाया. बाकी दोनों बीच में हे नहीं आये ये देख कर."

"वह परिवार वाले आदमी थे और फ्री में अपने दोस्त के पास शराब पीने का मजा लेना था उन्हें. लड़ने वाले ऐसे नहीं होते. वैसे थैंक यू, आप भी बड़ी हिम्मत वाली है और ाचा है के तारा को आप जैसी फ्रेंड मिली यहाँ.", अर्जुन ने धन्यवाद किआ तोह रिया मुस्कुरा दी बस.

"तुमने बड़ी समझदारी दिखाई जो सबके सामने ladai-jhagda करने की जगह अग्गरवाल जी तक मैसेज पहुंचाया और उसको यहाँ अकेले में तबियत से मारा. तारा खुशकिस्मत है के तुम्हारे जैसा बॉयफ्रेंड मिला और वह भी इतनी जल्दी.", अब रिया को क्या पता था के दोनों तोह बचपन से हे साथ है और एक परिवार से है.

"वह ऐसा किसी के भी साथ करता तोह मैंने यही करना था. मारा तोह सिर्फ इस बात पर की मेरी माँ को गाली दी थी. वार्ना बस समझा कर अग्गरवाल जी के हवाले हे करना था.", अर्जुन की बात सुन्न कर वह एकटक उसको देख रही थी और इधर तारा गाडी लेकर बराबर में आ रुकी.

"आगे बैठिये आप, मैं पीछे हु.", अर्जुन ने रिया के लिए दरवाजा खोला और फिर बैठने के बाद बंद करके सफारी के बीच वाले हिस्से में खुद बैठ गया. तारा को इसमें परेशानी न हुई और रिया भी खुश थी अर्जुन के ऐसा करने पर.

"थैंक यू. और तारा, मेरी वजह से थोड़ा सुफ्फेर करना पड़ेगा तुम्हे, मासी का घर ## सेक्टर में है.", रिया ने जहा बताया ये वही सेक्टर था जहा इनका भी घर था.

"## सेक्टर में कहा रहती हो आप?", अर्जुन ने जैसे हे पुछा तारा भी मुस्कुराने लगी.

"मार्किट की बक्सीडे में 200 वाली लाइन में.", अर्जुन वही जाता था संजीव भैया के साथ nimbu-jeera पीने. 220 से 260 तक मकार ठीक मार्किट के पीछे हे थे.

"मतलब 220-260 वाली लाइन में?", अब बारी रिया की थी हैरान होने की. बेशक तारा और वह दोस्त थी लेकिन दोनों के समय अलग थे आने जाने के और रिया को यही पता था के वह यहाँ नाना जी के घर रहती है.

"बड़ी नॉलेज है घरो की तुम्हे. और मेरे सेक्टर में क्या करने आते हो?"

"ऐसा है न के आपके हे सेक्टर में मैं रेंट पर रहता हु.", अर्जुन ने लाचार सा चेहरा बनाते हुए जवाब दिए.

"हाहाहा, फनी. ऐसा तोह नहीं के तारा से अलग भी किसी के साथ चक्कर चला रहे हो?"

"तारा वही रहती है, आपको पता नहीं क्या? मार्किट के सामने वाली तरफ.", अर्जुन के जवाब पर वह तारा को देखने लगी.

"हाँ नाना जी का घर ## सेक्टर में है लेकिन तुम्हे पता है न के मैं उनके घर हु और ट्रेनिंग के सिवा मेरा कही आना जाना नहीं है. अर्जुन को वह जानते है इसलिए आज पार्टी में आने दिए.", तारा ने तोह अलग हे कहानी बना राखी थी जैसे उस पर पाबंदिया लगी हो लेकिन सच तोह अर्जुन समझ चूका था.

"तुम नहीं आ सकती तोह मुझे तोह rok-tok नहीं है न तुमसे मिलने पर?"

"नहीं तुम मत आना, मैं हे सैटरडे आ जाउंगी अपनी कजिन के साथ. वैसे भी माँ स्ट्रिक्ट है लेकिन सैटरडे वो नहीं होंगी तोह मैं मिलने आ जाउंगी.", तारा ने अपनी माँ को हिटलर बना रखा था जैसे. अर्जुन मंद मंद मुस्कुरा रहा था नौटंकी देखता.

"हाँ.. आंटी के बारे में बताया था तुमने. होता है यार कुछ पेरेंट्स स्ट्रिक्ट होते है और कुछ मेरे वालो जैसे फ्रैंक. ठीक है तुम्ही आ जाना 250 नंबर है मासी के घर का. उनकी कोई औलाद नहीं है तोह मुझे हे अपनी बेटी मानते है. सैटरडे पापा आएंगे तोह वह सब लोग सुबोध अंकल के घर चले जायेंगे और हम दोनों मस्ती करेंगे. वैसे अर्जुन आना चाहे तोह ले आना.", अर्जुन ने तोह बीच में बोलना हे ठीक नहीं समझा. जाने तारा ने और क्या क्या बीज बो रखे हो.

"इसका और भी मुश्किल है. डॉक्टर है इसके पापा दूसरे शहर में और Saturday-Sunday घर होते है इसलिए ये कदम भी नहीं निकाल सकता बहार. खाल उधेड़ देंगे वह इसकी अगर इसने ऐसा कुछ किआ भी तोह.", अर्जुन लाचारी से हाँ में हाँ मिलाने लगा. अंदर हे वह तारा को कोस रहा था के कल को रिया को सच पता चला तब क्या होगा.

"ओह, वैसे तुम्हारे पापा कोई खूंखार आदमी है क्या? डायरेक्टर सर तक डर गए थे न इसका पूरा नाम सुन्न कर. डॉक्टर शंकर शर्मा. सीरियसली यार वो इतने क्रुएल और डेंजरस है जिनसे बड़े बड़े लोग डरते है तोह अर्जुन की ज़िन्दगी कैसी होगी?", रिया के भोलेपन पर दोनों भाई बहिन अंदर से हंस रहे थे.

"अब क्या कर सकते है यार. पापा है इसके तोह सहना पड़ता है सबकुछ."

"देखो अर्जुन, वह 5 डेज यहाँ नहीं होते तोह तुम मुझसे मिलने आ सकते हो शाम को 7 बजे के बाद. ाचा लगेगा तुम्हे, ज़िन्दगी में टेंशन सबके होती है लेकिन किसी के साथ शेयर करने से मैं हल्का करना चाहिए.", अब तारा अर्जुन को घूर रही थी पिछले शीशे से.

"ठीक है रिया जी, अगर आपको दिक्कत नहीं हो तोह मैं शाम को खली पार्किंग की तरफ टहलने आ जाऊंगा. कभी कभी मैं उधर चला जाता हु जब अकेला होता हु. 7 बजे के आसपास हे.", तारा ने उनके सेक्टर में आते हे गाडी थोड़ी तेज कर दी थी. अर्जुन ज्यादा देर रिया के साथ बातें करता रहा तोह कही दोनों डेट पर हे न चले जाए.

"हाँ मैं भी पिछली सड़क पर वाक करने आती हु उधर. मार्किट में lemon-soda पीने भी कभी कभी.", शाबाश.. अर्जुन मैं हे मैं ऐसा कह रहा था.

"जीतू पनवाड़ी के पास.? मैं भी वह जाता हु लेकिन आप इतनी बड़ी हो कर jeera-lemon पीती हो?"

"हाँ उसके हे पास. और बड़ा होने का क्या मतलब तुम्हारा? 24 की हु मैं और इतने हे तुम भी होंगे. तुम पी सकते हो तोह मैं क्यों नहीं.?"

"सही कहा आपने.", अर्जुन ने हाँ में हाँ मिला दी थी ये देख कर की हर कितनी तेज होती है लेकिन यहाँ रिया उल्टा एक bholi-bhali लड़की है.

"Aap-vaap क्या लगा राहकः है.? रिया ढिल्लों नाम हैं मेरा लेकिन तुम सिर्फ रिया बोलो. और तारा तुम्हे तोह कोई ऐतराज नहीं न अगर अर्जुन का मैं हल्का हो मेरे साथ बात करने से? ी प्रॉमिस की मैं पर्सनल टाइम में इंटरफारे नहीं करुँगी तुम्हारे. तुम साढ़े 5 निकलती हो और फिर इस से मिल कर हे घर जाती होगी न?"

"हाँ मैं इस से मिल कर साढ़े 6 बजे तक निकलती हु और 10-15 मिनट बाद घर में क़ैद. अर्जुन को तुमसे मिल कर ाचा लगेगा तोह मुझे ख़ुशी हे होगी. क्यों हैं न अर्जुन?", तारा के तंज़ को पहचानते हुए अर्जुन थोड़ा संभल कर बोलै. रिया के घर की सड़क भी आ गयी थी.

"फ़िलहाल तोह समय नहीं मिलेगा क्योंकि घर में बहोत काम है बड़ी दीदी की शादी की वजह से लेकिन उसके बाद मैं मिलने आया करूँगा.", अर्जुन ने मज़बूरी बताई तोह रिया भी थोड़ा समझी.

"हाँ जब तुम्हे ठीक लगे और तारा तुम्हे सैटरडे आना होगा. थैंक यू एंड गूडनिघत.", रिया ने गाडी रुकवाई तोह अर्जुन भी निचे उतर आया. हाथ हिलती वह घर में घुस गयी और अर्जुन तारा की बगल में जा बैठा.

"मिलवौ तुम्हे इस रिया से? चल घर चल फिर मिलवाती हु तुझे, ऋतू को भी बताउंगी तू कैसे bholi-bhali लड़की को जाल में फंसा रहा था.", तारा ने मुँह बनाते हुए कहा तोह अर्जुन हंसने लगा.

"काम नहीं हो तुम जरा भी. क्या क्या पट्टी पढ़ा राखी है इस लड़की को तुमने? बुआ ऐसी है, मेरे पापा तोह और भी डेंजरस और घर तक नहीं बताया हुआ अपना. वाह.", तारा भी साथ हे हंसने लगी.

"चल यार अब और मत तड़पा अर्जुन. लेकिन प्रॉब्लम है के घर में कहा मिल सकते है हम? तेरे कमरे में पॉसिबल नहीं, छत्त रिस्की है और हमारी तरफ तोह साड़ी मण्डली होगी.", तारा ने गाडी इस सड़क पर आगे बढ़ाते हुए लाचारी से कहा. एक तरफ तोह वह सोच रही थी की होटल में कमरा ले ले, लेकिन वह तोह और गलत होता.

"होटल ठीक रहेगा क्या?", फिर भी उसने पूछ हे लिए.

"पागल हो क्या तारा? घंटे के लिए होटल वह भी अपने शहर में. यहाँ से राइट ले लो और अगला सेक्टर भी पर कर दो.", सेक्टर की madhya-sadak पर आते हे अर्जुन ने तारा को गाडी घर से विपरीत ले जाने को कहा और तारा ने उधर हे घुमा दी. इस साफ़ खली सड़क पर गाडी चलते हुए उसने पूछ हे लिए.

"कहा ले जा रहे हो? आगे तोह कुछ भी नहीं है जितना मुझे पता है."

"वही तोह जाना है, जहा कुछ न हो.", तारा समझ गयी थी की अर्जुन क्या कहना चाहता है.

"तुम खुले में करना चाहते हो? रिस्की हो सकता है और ये गाडी बहोत बड़ी है जिस पर किसी की भी नजर पड़ सकती है."

"ये गाडी बहोत बड़ी है तारा और वह ये नजर भी नहीं आने वाली.", अर्जुन के इतना कहते हे तारा सामने देखने लगी. यहाँ सड़क अब संकरी थी और दोनों तरफ घने पेड़. गति धीमी करती वह अँधेरे में ध्यान से गाडी बढ़ने लगी तोह सामने भी जंगल सा नजर आने लगा.

"Dead-end है ये तोह.", गाडी थोड़ा पहले हे रोकते हुए कहा.

"ये राइट साइड पेड़ देख रही हो, इधर गाडी नहीं दिखेगी और वैसे भी यहाँ कोई नहीं आता. पेट्रोलिंग करने पुलिस भी नहीं.", अर्जुन के इतना बताते हे बड़ी दक्षता से तारा ने वह बड़ी गाडी इस झुरमुट के बीच 10 फ़ीट चौड़ी कच्ची जगह में घुसा दी. कोई इधर आता और ध्यान से देखता तभी वह गाडी देख सकता था लेकिन रौशनी के बिना मुमकिन न था.

"यार ये तोह एडवेंचर जैसा है.", तारा ने लाइट भी बंद कर दी तोह बस अब स्याह घने अँधेरे में बंद शीशे और अंदर ये 2 जिस्म.

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राममेहर की हवेली में रात 9 बजे हमेशा की तरह माहौल शांत था बहार से. बिजेन्दर दिन भर व्यस्त था और अब सुलतान को सैर करवाने के बाद आँगन में चारपाई बिछाये विकास के साथ बातें कर रहा था. विकास भी ड्यूटी से अपनी माँ को लेकर इधर चला आया था. अब दोनों हे घर पिरवार, शादी की बातें कर रहे थे और अंदर बबिता के कमरे में अलग हे महफ़िल जमी हुई थी. खाने के बाद अक्षरा मुस्कान के साथ यही चली आई थी लेकिन अनुपमा अपनी ताई के साथ सोने चली गयी थी.

"जीजी, शाम से हे सो रही हो आप. बताया भी नहीं के आज क्या किआ और आप बिस्टेर पे हे क्यों हो जबसे आई हो.?", अक्षरा के साथ मुस्कान भी बिस्टेर पर बैठी बबिता को घूर रही थो जो कितनी हे देर से बस मुस्कुराये जा रही थी.

"अररि आज स्वर्ग देख लिए बस इतना पता है. हैरान भी हु के इस मुस्कान ने कैसे किआ होगा उसके साथ. लेकिन दर्द से ज्यादा तोह नशा दे गया जुल्मी. अपना हे शरीर आज प्यारा लग रहा है.", बबिता की बहकी बातें और मुस्कान का जीकर सुन्न कर अक्षरा थोड़ा हैरान थी लेकिन मुस्कान शर्माने लगी.

"आपने अर्जुन के साथ सबकुछ कर लिए? और वह तैयार भी हो गया था?", अक्षरा ने बिना सोचे दिल की बात कह दी.

"तैयार? वह हटने का नाम नई ले रहा था और दर्द न होता तोह मैं तीसरी बार भी करती. सारा शरीर हिला के रख दिए उस पहलवान ने तेरी बहिन का. खुद हे देख ले इनकी हालत.", बबिता ने जिस्म से चादर हटाते हुए अपना सीना उजागर कर दिए. अभी तक चूचक पहले हुए थे, जहा तहा गोर गुब्बारों पर अर्जुन के होंठो, दांत और उंगलिया के निशाँ बने साफ़ दिख रहे थे. एक पल के लिए तोह मुस्कान नजदीक हे आ गयी जैसे वह हाथ लगा कर महसूस करना चाहती हो इन असाधारण चुचो को.

"2 बार ले लिए आपने उसका? और उसने आपको संभल भी लिए?", मस्कान की नजर और बात सुन्न कर बबिता के होंठ फ़ैल गए.

"दिल तोह था के अपने अंदर हे राखु और लिपटी राहु उस खागड से. मर जाना तबाही है पूरी. और तू सँभालने की कह रही है, वह तोह गॉड में लिए फिर रहा था जैसे मैं 10 किलो की हु. सच कहु अक्षरा, पहली बार तोह औरत को ऐसे हे मर्द से करना चाहिए जो प्यार करे, ध्यान रखे और जरा भी जबरदस्ती न करे. किश करके हे आत्मा बहार निकल ली थी मेरी तोह. खुशकिस्मत है तू जो वह तेरे साथ है.", चादर के ऊपर से बबिता ने छूट पर हाथ रखा और आँखें बंद हो गयी..

"वाह जीजी, आपकी बात सुन्न कर यकीन तोह नहीं होता के वह लड़का इतना दुमदार होगा लेकिन हालत सामने है तोह इंकार नहीं कर सकती. बिन्नी भाभी तोह कहती थी की उनके पति 4-5 मिनट करके मुँह फेर के सो जाते है और उनका तोह अब पता भी नई चलता के अंदर गया है के नै. आपकी हालत देख के लगता है अर्जुन ने तबियत से किआ होगा.", अक्षरा ने पहली बार नाम लिए था अर्जुन का.

"वह आधा घंटा नहीं hat-ta अक्षरा दीदी बाकी बबिता दीदी ने 2 बार किआ है तोह इन्हे मेरे से ज्यादा एक्सपीरियंस हो गया.", मुस्कान अब तड़प रही थी अंदर से अर्जुन के लिए.

"दूसरी बार तोह घंटा हे लगा होगा. और बिन्नी ने बताया था न के मरद का 4 इंच का है लेकिन इसका तोह मुट्ठी में भी ना आये इतना मोटा और ये इतना बड़ा. अक्षरा तू तोह है भी दुबली और कद में औसत, गलती से तेरे अंदर चला गया तोह गाँव एकता कर लेगी. मुस्कान ने बताया था न के पूरा ये भी न ले पाई, मैंने ले लिए लेकिन जगह न बची थी अंदर. अब तोह हर तरफ बस उसका नाम लिखा है, जहा मर्जी हाथ लगा लू बस मस्ती चढ़ने लगती है बहिन.", बबिता ने चादर फिर से ऊपर ले ली तोह अक्षरा के चेहरे पर अजीब से भाव आ गए.

"ले लुंगी मैं, कमजोर नई हु हाँ. सबकी एक जैसी हे होती है.", अक्षरा ने फिर से ज़िद्द दिखाई तोह बबिता ने अपने ऊपर खींच लिए उसको.

"आअह्ह्ह.. मेरी जान मन न करती मैं लेकिन तू 2 दिन चल न सकेगी उसके बाद. जो करे ऐसे समय करियो जब 2-3 दिन का टाइम हो. इस मुस्कान के पिछवाड़े भी चर्बी है और चुचो पे भी. ऊपर से बास्केटबॉल खेलने वाली अंग्रेजन है ये. इसकी भी तोह हालत खराब हुई होगी.", अक्षरा ने एक हाथ उन मॉटे चुचो पर रख लिए कपडे के ऊपर से और बबिता पीठ सहलाने लगी इस हलकी फुलकी लड़की की.

"सच बात है दीदी. मेरी हालत खराब तोह हो गयी थी लेकिन नशा अभी तक है उसका. अगली बार आने दो फिर देखना कच्चा खा जाउंगी इस अर्जुन को मैं. वैसे अक्षरा दीदी, आप हॉस्टल आ जाओ मेरे कुछ दिन लेकिन उस से पहले थोड़ा अर्जुन से खुलना पड़ेगा नहीं तोह वह हाथ न लगाने वाला ऐसे."

"हॉस्टल. ये बात सही कही मुस्कान ने अक्षरा. अर्जुन शादी में आएगा तोह उस से बात करियो और फिर शहर घूमने का प्लान बना. आएगा तोह धीरे धीरे बात शुरू हो हे जाएगी. टाइम है तेरे पास जुलाई के बीच तक. कोई जल्दबाजी नई बस उसके साथ संपर्क में रह, थोड़ा घूम फिर और चंडीगढ़ जाने से पहले औरत बन्न के जाइयो.", बबिता ने जैसे समझाया अक्षरा भी मान गयी.

"थैंक यू मुस्कान. अब ऐसे हे हेल्प करियो मेरी फिर मैं भी देखु कितना प्यार करता है वह.", अक्षरा वैसे हे ऊपर लेती कहने लगी.

"थैंक यू रखो अपने पास. लेकिन थोड़ा शर्माना कम् करना और उसको अपने साथ काम में लगाना जब यहाँ आये. और दीदी, अर्जुन ने डिमांड की या नहीं फिर?", मुस्कान की इस बात को सुन्न कर दोनों हंस पड़ी.

"हाँ जीजी, उसने कहा क्या आपके साथ वह करने के लिए?"

"अरे वह पागल तोह आज हे छड्ड जाता मेरे पहाड़ पे लेकिन उसको भी पता था के आगे पीछे एक हे दिन में न होने वाला. शादी वाले दिन तोह वह उधर गाँव में आएगा हे दादी वाली हवेली पे, बिजेन्दर फेरे पे आएगा नहीं यहाँ गाँव में तोह और मेरे कितने भाई है? अब बस माँ या दादी के सामने ये कहना है के अर्जुन को भेज दे. गोलू तोह दवा खा के सोयेगा, तबियत ठीक होने में महीना लग्न है उसकी. बड़े नाना वाले कमरे में अर्जुन को रेतुर्न गिफ्ट दे दूंगी मैं.", बबिता की तरफ दोनों हे हैरत से देख रही थी.

"इतनी दूर का सोचके बैठी हो आप? और अर्जुन अगर न गया आपके साथ तब?", मुस्कान अचरज से पूछ रही थी.

"हाँ जीजी, वह न गया फेर?"

"फेर के, अगले दिन आ जायेगा. हवेली में कोनसा कोई होगा और जहा तक मुझे यकीन है शंकर काका खुद भेजेंगे उसको देख लिओ. लेकिन समस्या ये भी है के शादी अनुपमा की भी मेरे साथ है और कन्यादान करेंगे शंकर काका, कही अर्जुन इधर से वह न चला जाये रात को.", बबिता का ये सोचना जायज था.

"न, वह नहीं रुकने देते पापा अर्जुन को. किसी हाल में नहीं जीजी.", अक्षरा ने पापा कहा तोह मुस्कान घूरने लगी.

"बावली, ऐसे न देख. इसके तोह पापा हे है वह जब कन्यादान भी कर रहे है तोह पापा हुए. और तुझे ऐसा क्यों लगता है वह नहीं भेजेंगे अर्जुन को?"

"जीजी, आपकी मुन्नी kaaki-Richa जीजी की वजह से. अर्जुन को वह खुला छोड़ना मतलब अपने पाँव पर खुद कुल्हाड़ी मारनी. बुआ (सुशीला) ने खुद हे बताया था न के वह दिलेर और समझदार भी है. ऋचा जीजी घर के अंदर पापा को पापा कहती है बेशक शादी में वह न कहे लेकिन कही अर्जुन ने सुन्न लिए तोह लेने के देने पड़ जायेंगे.", अक्षरा बहोत गहराई से जानती थी सबकुछ और उसकी बात सुन्न कर बबिता के चेहरे पर ख़ुशी आ गयी थी.

"मेरे से ज्यादा तेज दिमाग तोह तेरा है कबूतरी. वह न भेजते उसको शंकर काका. शादी में यहाँ से वह अनुपमा के साथ बेशक आ जाये लेकिन वापिस इधर हे आना पड़ेगा. चल अब सोने दे बस बाकी बात कल करेंगे.", बबिता ने करवट लेते हुए अक्षरा को दोनों के हे बीच लिटा लिए.

"आपने पूरी बात तोह बताई नई कैसे शुरू किआ, कैसे आगे हुआ और फिर लास्ट में कैसा लगा.", अक्षरा के इस सवाल पर जहा मुस्कान हंसने लगी वही बबिता थोड़ा कहिज्ज गयी.

"मैंने न उसका अपने मुँह में भी लिए, बोब्बो के बीच दबाया भी, उसने मेरी choot-chusai की और फेर पेल दिए. बाकी डिटेल में कल बताउंगी ेब सो जा. मैंने नींद की गोली खाई है और तू लगी है bhog-vilas के गीत गाने. छूट फाड़ दी है मेरी उसने देख.", चादर हटा के सूजी हुई छूट दिखने के बाद फिर से चादर ओढ़ कर बबिता ने अक्षरा को सीने से लगा लिए और मस्ती भरी आह निकल गे मुँह से.

"गूडनिघत. कल बाटना पक्का से.", अक्षरा ने जैसे हे कहा मुस्कान हंसती हुई अलग चादर लिए अक्षरा के पीछे लिपट गयी.

"हाँ बताउंगी सब बताउंगी. बोब्बे से मुँह हटा ले नहीं तोह मार खायेगी.", इस बात पर अक्षरा मुस्कुराती हुई थोड़ा पीछे खिसक गयी, मुस्कान की तरफ.

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सुनसान जंगल में 11 बजे जहां अँधेरे में दुनिया की नजरो से दूर इस बड़ी गाडी के अगले हिस्से में भरपूर हलचल थी. अर्जुन अपनी तरफ की सीट पीछे खिसकने के बाद ऊपरी हिस्से को भी 150 डिग्री तक गिराए लेता था और उसके ऊपर किसी बदल सी तारा छायी हुई थी. दोनों जाँघे फैलाये वह कमर तक अपनी ड्रेस उठती उसकी गॉड में बैठी थी. गाउन की पीठ पर लगी चैन खोल कर अर्जुन ने वह दोनों मस्त उभार बहार निकल कर पंजो में दबोच रखे थे और पागलपन करते वह एक दूसरे के होंठ बुरी तरह पी रहे थे.

"आठ.. सामने रहते हो फिर भी नहीं मिल सकते आठ.. खुद हे सोचो कैसा लगता होगा मुझे? उम्म्म... आह्हः.. आराम से बाबा.. उम्म्म्म..", अर्जुन को भी तारा से उतना हे जुड़ाव था जितना तारा को. और जहा मधु बुआ का शरीर किसी खजुराओ की मूरत सा था वही तारा अप्सरा थी, एक सांचे में ढली खूबसूरत अप्सरा. शरीर हाथो में पानी सा फिसल जाता था और मांसल स्टैनो के साथ साथ उसके गोर नितम्ब कुशल नर्तकी से थिरकते थे. अर्जुन भी उतने हे प्यार से जिस्म को सेहला रहा था.

"हालत सिर्फ तुम्हारी ऐसी होती है क्या? मेरा तोह दिल करता है तुम ऐसे हे मुझ पर छायी रहो. और सचमुच तुम बहोत खूबसूरत हो तारा.", अर्जुन ने थोड़ा ऊपर उठाते हुए एक तन्ने हुए निप्पल को होंठो में लेकर पीना शुरू किआ तोह तारा भी सिसकारी लेती हुई मस्त होने लगी.

"आह्हः.. बस माँ को जाने दो फिर आठ.. हर सुबह तुम्हारी बाहों में आँखें खोलूंगी. आराम से करो न आठ.. ये तुम्हारे हे है और मुझे पता है तुम्हे मेरे ब्रेअस्ट्स और हिप्स पसंद है. उम्म्म..", दूसरा निप्पल पीते हुए अर्जुन ने थोड़ा ज्यादा हे तेज दबाया लेकिन तारा ने रोका नहीं. दोनों खूबसूरत उभर तन्न कर खड़े थे लेकिन समय काम था और वक़्त रात का.

"कैसे करना चाहोगी तारा?"

"ऐसे हे. पंतय नहीं है अंदर और तुमन ट्रॉउज़र निचे करो बस."

"ड्राई होगा तोह तुम्हे दर्द जरूर होगा.", अर्जुन की ये बात सुन्न कर वह अँधेरे में अंदाजे से एक तरफ हो गयी.

"मेरे पास इलाज है बस तुम पंत निचे करो.", अर्जुन ने बेल्ट खोल कर पंत को खिसकते हुए घुटनो से निचे सरका दिए. अब वह देखना चाहता था के तारा कैसे चिकना करेगी. वह नाजुक हाथ सरक कर अर्जुन की जांघो से लुंड तक आया और एक बार सख्ती जांच कर पकड़ से बड़े लुंड को हिलने लगा.

"आठ.. अब तुम्हे ये क्या सूझा?", नरम होंठो ने सुपडे को अपने अंदर उतार लिए. तारा तब तक मुँह चलती रही जब तक उसकी लार ने हाथ को गिला न कर दिए. सांस उखाड़ने लगी तोह उसका नरम जिस्म हरकत में आया. एक बार फिर वह पाँव फैलाये अर्जुन के ऊपर थी.

"आज मज़बूरी है लेकिन नेक्स्ट टाइम अनल (गांड) भी करेंगे. आह्हः.. होल्ड में. कितना बड़ा होता जा रहा है तुम्हारा.. उस दिन बाथरूम में भी पूरा नहीं ले पाई थी मैं.. आठ.. सलौली.", तारा की छूट पहले से पानी बहा रही थी. हिम्मत करती वह सूपड़ा अंदर लेने के बाद अर्जुन के कंधे पकड़ कर रुक गयी.

"बीएड पर ाचे से करते हम तारा, यहाँ तुम्हे प्रॉब्लम हो रही है. और तुम क्या करती हो वागिना के साथ जो ये गीली भी रहती है लेकिन टाइट भी?", अर्जुन को भी छूट की कसावट पता चल रही थी. लेकिन आँखें मूंदे तारा ने जवाब देने की जगह लम्बी साँसे लेने के बाद शरीर निचे दबा दिए.

"ाःह.. माआ.. उफ़.. अर्जुनंनं.. होल्ड में aahh..Bahot मेहनत लगती है यार तेरा ये अंदर लेने में... ", अर्जुन से चिपकी हुई वह अब शांत हो गयी थी. गाडी के अंदर साँसों के सिवा कोई आवाज न हुई कुछ पल. छूट की जड़ तक लुंड अंदर हो गया था. अर्जुन पसरा हुआ वह नरम मांसल कूल्हे दबाने लगा तोह तारा ने उसके होंठो पर कब्ज़ा जमा लिए. इशारा साफ़ था के अब चुदाई शुरू करो. कूल्हों को दबोचे वह तारा को सहारा देने लगा तोह जल्द हे शरीर एक लाये में ऊपर निचे हिलने लगा. इस मुद्रा में थोड़ा लुंड बहार हे था लेकिन उन्हें फरक नहीं पड़ा.

"आठ.. यही मिस कर रही थी मैं.. उम्म्म.. फ़क.. aahhh..deep तक लगता है तोह मजा आता है यार. ी लव यू अर्जुन.. आठ.. हमेशा ऐसे हे प्यार करना अपनी तारा को. आठ.", कमर उछलती हुई वह अर्जुन को हर तरफ चूम रही थी. गोल मॉटे स्टैनो का उछलना कही ज्यादा दिलकश था अगर यहाँ रौशनी होती. जल्द हे अर्जुन ने तारा का सर डैशबोर्ड पर टिका दिए. आज वह छोटा तकिया भी काम आ गया था जो हमेशा दरवाजे में रखा रहता था. कमर पकडे अर्जुन तारा के साथ साथ धक्के देने लगा.

"तुम जब कहोगी और जहा कहोगी प्यार करूँगा तारा. आठ.. तुम्हारा हक़ है मुझपर .. उम्..", हिलते चुके को मुँह में लिए अर्जुन ने धक्के तेज कर दिए थे और तारा काम्पटी हुई झड़ने लगी..

"आह्हः.. it's स्ट्रांग.. आठ.. बड़ा ाचा लग रहा है अर्जुन.. आठ..", पसीने में भी अलग हे महक थी तारा के जो अर्जुन बावरा सा हुआ उसके सीने को चाटने लगा. दोनों बड़े उभारो पर जीभ और होंठो से कलाकारी करता वह तारा को आराम दे रहा था. कुछ पल बाद वह सम्भली तोह अर्जुन को गहरा चुम्बन देने के बाद बोली.

"ऐसे तुम्हे पूरा मजा नहीं आने वाला अर्जुन. Let's दो आईटी आउटसाइड."

"पागल हो तारा? मैं नहीं भी करूँगा तोह चल जायेगा लेकिन बहार नहीं. जंगल है और कुछ भी हो सकता है. मुझे मेरी परवाह नै लेकिन तुम्हे कुछ हुआ तोह .. नहीं मतलब नहीं."

"Okay. फिर तुम ऊपर आ जाओ."

"पॉसिबल नहीं है.", अर्जुन ने जगह के हिसाब से कहा.

"बेवकूफ पिछली सीट पर, और दूर खोल सकते है न इस तरफ वाला. चलो.", तारा नंगे उभर लिए हे बहार आई तोह उसको बड़ा ाचा लगा अपने चुचो पर ये ताजगी का एहसास और अर्जुन के बहार निकलते हे वह कुशलता सा बीच वाली सीट पर जा लेती. जगह तंग थी लेकिन पाँव बहार लटकाये अर्जुन सवार हो गया तारा पर. अगली सीट को पकडे वह भी उसके धक्को से निहाल होती रही.

"अर्जुन आह.. मान लो न प्लीज.. मेरा दिल है बहार खड़े हो कर करने ka..aahhhh..", अब अर्जुन भी मान गया था. ऐसे न वह होता और न तारा उसको छोड़ने वाली थी बिना स्खलित हुए.

"ठीक है लेकिन गाडी के बहार मतलब ये नहीं की कही और.", तारा हामी भर्ती हुई अँधेरे में गाडी के पायदान पर एक पाँव टिकाये अर्जुन की तरफ पीठ करके कड़ी हो गयी. गाउन को दूसरे हाथ से एकत्रित करके ऊपर उठाये हुए. अर्जुन अब इस जंगल के बीच तारा से एकाकार होने लगा था. दोनों उभारो को पकडे वह जोश से तारा की छूट का मंथन करने लगा लेकिन दोनों इस बार ख़ामोशी से इस मिलान को अंजाम दे रहे थे.

"अंदर मत करना आठ.. और मोटा हो रहा है तुम्हारा.. मैं गयी aahhh..ummm", तारा की टाँगे कांपने लगी थी बहार खड़े हो कर 10 मिनट की भीषण चुदाई से. अर्जुन ने भी चुचो को थोड़ा जोर से भींचने के बाद तुरंत हे लुंड निकल कर शरीर घुमा लिए. अँधेरे में हे उसका कॉमर्स धरती पर गिरने लगा. तारा वैसे हे गाउन को एक हाथ से पकडे दूसरे से गाडी का सहारा लेती हांफ रही थी. शरीर में जान न थी अब खड़े होने की लेकिन घर तोह जाना हे था.

"तुम ठीक हो न तारा.?", अर्जुन ने खुद को सही करने के बाद तारा को बाँहों में भर लिए. होंठो को प्यार करते हुए सामने से ड्रेस ठीक कर चैन बंद करते हुए कुछ पल तारा को गले लगाए रखा.

"थैंक यू यार अर्जुन. तुम न मेरे हर पागलपन में साथ देते हो. ी रियली लव आईटी. कितना मजा आया न यहाँ ओपन में करके. चलो अब घर चल के दांत खायी जाये.", अर्जुन को छोटा सा किश करती वह इस तरफ से हे ड्राइवर सीट पर चली गयी. अर्जुन भी मुस्कुराता हुआ बगल में बैठ गया और गाडी स्टार्ट करके तारा ने पीछे की और फिर सड़क पर घर की दिशा में दौड़ा दी.

"तुम्हे ऐसी खुली जगह पसंद है तारा?"

"मेरा ड्रीम था के कभी ऐसे करे लेकिन शहर है तोह इतने से हे खुश हो, माउंटेन्स होते तोह मैं पूरी रात खुले आसमान के निचे तुमसे चिपकी रहती, be-libas.", तारा का ये सपना अर्जुन ने अपने जेहन में बैठा लिए था.

"कभी न कभी वह भी हो जायेगा. अब जरा हम घर पे ध्यान दे? 11:50 हो चुके है और हमारी हालत बिलकुल वैसी नहीं है जैसी घर से निकलते वक़्त थी.", अर्जुन के याद दिलाते हे तारा ने अंदर की लाइट जला दी. वह मुस्कुराती हुई एक हाथ से बाल बना रही थी और रुमाल से चेहरा साफ़ करने लगी.

"साढ़े 8 बजे के बाद निकले थे और 12 बजे तक का समय ले लिए था मैंने. और पार्टी में थोड़ा बहोत डांस भी तोह हो सकता है.", तारा ने आँख मारते हुए कहा और घर की गली में गाडी घुमा दी. जल्द हे दोनों घर के बहार थे.

"जैसे घर से निकले थे वैसे हम जा नहीं सकते और आँगन से अगर गयी तोह पक्का कोई देख लेगा.", अर्जुन की बात सुन्न कर तारा ने मुँह चिढ़ाया.

"तुम्हारे कमरे से हे चली जाउंगी. Mom-dad हे तोह है नेक्स्ट कमरे में.", अर्जुन अब क्या समझाता लेकिन गाडी कड़ी करने के बाद वह जैसे हे टाला लगाने लगा माधुरी दीदी गलियारे से चलती उसके पास आ रुकी. तारा तोह इतनी हे देर में udan-choo हो गयी थी.
 
अपडेट 114

वक़्त और बदलाव (4)


"देख रही हु तुम्हारे पास बात करने का भी टाइम नहीं है आजकल. ऐसा तोह नहीं के मेरे जाने से तुमने ये दुरी खुद हे बना ली है?", माधुरी दीदी के शब्दों में शिकायत से ज्यादा अर्जुन द्वारा अनदेखी और पीड़ा थी.

"नहीं दीदी, बस बात ऐसी है के आप कभी अकेली होती हे नहीं. और घर में अब कितने लोग रहते है ये आपको भी पता है. अगले 3 हफ्ते तोह ज्यादा मुश्किल होंगे.", अर्जुन ने चाबी दिवार पर टांगने के बाद दीदी के पास जा कर धीमी आवाज में हे जवाब दिए. उसको पता था के माधुरी दीदी से किआ वादा वह पूरा नहीं कर रहा है. लेकिन सच ये भी था के हालात मिलान के लिए सही भी नहीं थे.

"कल bua-fufa जी चले जायेंगे 4 बजे और फिर papa-maa के साथ अलका और प्रियंका भी नानी के घर जा रहे है 2 दिन के लिए. यही बताने के लिए मैं इन्तजार कर रही थी. अब तोह ये नहीं कहोगे न के 2 रात तुम्हे मौका नहीं मिलने वाला? और मैं शिकायत नहीं कर रही हु, मुझे भी पता है के तुम व्यस्त हो."

"अगली दोनों रात आपके पास आऊंगा मैं, जैसे भी हो.", अर्जुन के इतना कहते हे वह मुस्कुराती हुई अंदर चली गयी. अर्जुन भी सीढ़ियों से अपने कमरे में चला आया.

"क्या कह रही थी माधुरी दीदी? और वह जाग रही थी अभी तक?", तारा ने धीमी आवाज में पुछा. वह कमरे में आने के बाद अब कही बेहतर दिख रही थी. अर्जुन ने ध्यान दिए और निचे बैठ गया.

"तुम्हारे पाँव पर खरोंचे लगी है? इसलिए मैं वह मन कर रहा था.", अर्जुन ने पाया के तारा के गोर पाँव जंगल में बहुत कुछ सेह गए थे.

"इतना कुछ नहीं है यार. सुबह तक निशान नहीं रहने वाले. बस अब जरा गेट खडका दो माँ का.", तारा ने जैसे ये अर्जुन को करने के लिए कहा तोह वह पाँव सहलाते हुए हैरत से तारा को देखने लगा.

"मुझे फसवा रही हो? खुद क्यों नहीं बोल सकती?", अर्जुन को जैसे ठीक नहीं लगता था अशोक फूफा जी का बेमतलब सामना करना. और यहाँ कुछ बात और भी हो सकती थी.

"यार इतना नहीं कर सकते मेरे लिए? माँ तुम्हे कुछ नहीं कहेंगी लेकिन उन्हें मेरी आवाज से मौका जरूर मिल जायेगा कुछ न कुछ कहने का.", अर्जुन समझता था तारा का मतलब. बुआ बेशक बदल गयी थी लेकिन इतनी रात में आने के लिए वह पक्का तारा से बहस करती. अर्जुन ने हौले से बंद दरवाजा thap-thapaya तोह तुरंत आवाज आई दूसरी तरफ से.

"अर्जुन?"

"जी बुआ, एक मिनट दरवाजा खोल सकती है क्या आप?", अर्जुन की गुजारिश पर जवाब 30 सेकंड बाद आया.

"रुको. खोल रही हु.", सामने दरवाजा खुलते हे अर्जुन एक पल के लिए जड़ हो गया और मधु बुआ भी. तारा अर्जुन के एकतरफ कड़ी नजरे झुकाये थी. बुआ ने सिर्फ काली निघ्त्य पहनी थी जो शरीर का पूरा विवरण दे रही थी.

"मतलब तुम लोग अब आ रहे हो वापिस?", अपने पीछे दरवाजा ढालती वह इनके कमरे में हे चली आई.

"बुआ 9 बजे तोह गए थे और दादा जी को बताया था के 3 घंटे बाद आ जायेंगे. तारा तोह साढ़े 10 हे आने वाली थी वह मैं पहली बार ऐसी पार्टी में गया था toh..",Arjun के इतना कहते हे तारा ने हाथ कस के पकड़ लिए लेकिन नजरे अपनी माँ की तरफ कर दी.

"नहीं ऐसा भी नहीं है माँ. वह एक परेशानी थी इसलिए मैं अर्जुन को साथ ले कर गयी थी. पापा से कहती तोह वह मुझे हे गलत कहते."

"पूरी बात बताओ. तुम्हारे पापा तोह 11 बजे से हे सो रहे है.", मधु बुआ ने तारा को अपने सामने हे बिस्टेर पर बैठा लिए. अर्जुन एक तरफ खड़ा देख रहा थे के जब बात संभल हे ली तोह क्या जरुरत थी इस सब की लेकिन तारा ने साहिल खन्ना वाला पूरा मामला बताने के साथ जो अर्जुन ने किआ वह भी बता दिए. देरी की थोड़ी वजह में रिया भी जिम्मेवार बन्न हे गयी बेचारी. इस बीच कितने हे भाव आये मधु बुआ के चेहरे पर. कभी गुस्सा तोह कभी डर लेकिन जैसे अर्जुन ने अकेले हे सब संभल लिए ये जानकार उन्होंने तारा को सीने से लगा लिए.

"मेरी बची तू सचमुच बड़ी हो गयी ऋ. अपने पापा के साथ साथ नाना जी को भी परेशां न करके खुद हे संभल कर तूने बता दिए के तू काबिल भी है और जिम्मेवार हिम्मती भी.", बुआ की ऐसी ममता देख अर्जुन भी मैं हे मैं खुश हो रहा था. मधु बुआ सचमुच दिल की नरम और कही परिपक्व महिला थी, शायद वह भी अकेले फैंसले लेने वालो में से थी.

"बड़ा तोह ये हो गया है माँ. मुझे तोह ऋतू ने कहा था के ये उसके कान के निचे 2 लगा के सब ठीक कर देगा लेकिन अर्जुन ने तोह अग्गरवाल जी को हे बुलवा लिए, 4 लगाने के बाद.", तारा ने थोड़ा चहक कर कहा था जिस से बुआ भी मुस्कुरा उठी.

"इसलिए तोह मैंने कोई सवाल तक नहीं पुछा. मुझसे बेशक कुछ छुपा लेना तारा लेकिन तुम यहाँ हो और अर्जुन को तुम्हारी जिम्मेवारी ऐसे हे निभानी होगी. रात काफी हो गयी है, जाओ अपने कमरे में सो जाओ अब. कल ऑफिस भी जाना होगा. अर्जुन तुम भी कपडे बदल कर सो जाओ."

"मई कल छुट्टी पर हु माँ. आप कल चली जाएँगी तोह कुछ समय आपके साथ भी रहूंगी.", तारा ने जाने से पहले अपनी माँ के गाल को चूम कर बाहों में लिए और अर्जुन को आँख मार कर पिछली तरफ निकल चली, जहा उसकी बाकी बहने जाग रही थी.

"नहाना है तोह अंदर वाला बाथरूम उसे कर लो.", अर्जुन को टोलिया उठाये देख बुआ ने कहा लेकिन उसने मुस्कुरा कर मन कर दिए.

"बहार आँगन वाले में नाहा लूंगा बुआ. आप आराम कीजिये फूफा जी की नींद ख़राब हो जाएगी हमारी वजह से.", अर्जुन ने अलमारी से पजामा और साफ़ बनियान निकल ली थी. बुआ भी कड़ी हो कर उसके करीब आ गयी.

"शराब पीने के बाद उन्हें बस सोने का पता है अर्जुन. जनाब 8 बजे उठेंगे सीधा.", मधु बुआ ने उसको अपने आगोश में लेते हुए कास लिए. एक पल अर्जुन के चेहरे को देख कर प्यार से गहरा चुम्बन देने के बाद वह बिना कुछ कहे अपने कमरे में चली गयी. अर्जुन जानता था के बुआ के दिल में कुछ और भी था लेकिन फ़िलहाल बस वह अपनी बेटी के प्रति अर्जुन का आभार जाता कर चली गयी थी. 20 मिनट बाद अर्जुन भी नहाने के बाद चैन से सो चूका था. दिन अजीब और व्यस्त था लेकिन तारा ने अपने प्यार से अर्जुन को भरपूर आराम दिए था.

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"शंकर, बीटा शंकर उठ जा अब. भाई तैयार हो गया है तेरा.", ये चंडी से बालो वाली गौरवर्ण बुजुर्ग महिला बड़े स्नेह से औंधे मुँह बिस्टेर पर सोये शंकर जी को जगा रही थी. रात ाची नींद आयी थी शंकर को उमेद के साथ. दोनों हे 11 बजे तक बातें करते साथ सो गए थे. उमेद सिंह की बीवी को इनका रिश्ता पता था जिस से उन्हें कोई आपत्ति नहीं हुई थी की पति अपने भाई के साथ सोया है. सुबह 4 बजे हे उमेद सिंह की माता जी ने शंकर को उठाने की चेष्टा की.

"काकी, वह कायदे वाला है मुझे थोड़ा सोने दो अभी.", शंकर जी अपनी काकी की गॉड में हे सर रख कर फिर सो गए. पूर्णिमा जी ने भी मुस्कुराते हुए थपकी देनी शुरू की और इधर उमेद नाहा धो कर धोती और कुरता पहने कमरे में चला आया.

"माँ ये ठीक है. उठाने भेजा था और आप इसको सुलाने में लगी हो. राजेस्वरी पानी की बाल्टी देना जरा मैं बताऊ इस काकी के दुलारे को.", शंकर ने एक बार आँख खोल कर देखा और फिर सोने का नाटक करने लगे.

"महीनो बाद आता है ये लेकिन तेरे से सेहन नहीं होता इसका आराम करना. कौशल्या की गॉड से तोह मैंने तुझे कभी न उठाया फिर इस से क्यों जलता है.", पूर्णिमा जी ने तंज करते हुए उमेद को घूरा तोह वह सकपका गया.

"ओह भोले क्यों दिन का सत्यानाश कर रहा है? देख मंदिर में पूजा तुझे हे करनी है फिर ताई के पास भी जाना है भाई. आज हॉस्पिटल में तेरी ड्यूटी भी है. अगले 5 घंटे में सब नहीं होने वाला.", अब शंकर जी ने बिस्टेर त्यागना हे ठीक समझा.

"काकी ये न ज्यादा बुजुर्ग हो गया एकदम से. आप चाय बनाओ मैं नाहा के आया.", शंकर जी ने उठने के साथ हे उमेद को मुँह चिढ़ाया.

"शंकर, चाय पूजा के बाद बीटा. चल तू नाहा मैं कपडे भिजवाती हु.", वह भी कड़ी हो गयी और उमेद के साथ हवेली में इस बड़े हॉल में आ गयी.

"पूजा का सब सामान dekh-bhal लिए न उमेद?"

"जी माँ. सब रात हे रखवा लिए था. आने के बाद शंकर और मेरा नाश्ता लगवा देना और मैं शायद रात देरी से आऊंगा.", उमेद ने कलाई में अपने पिता की घडी पहनते हुए जवाब दिए. पूर्णिमा जी ने बहोत कहा था उमेद को की ऐसे अपने पिता की याद को हर वक़्त साथ न लगाए रखा करे. लेकिन उमेद का जवाब यही होता था के उसको एहसास होता है की उसके पिता कितने जिम्मेवार इंसान थे. अब तोह यह घडी और रुद्राक्ष उसकी सबसे अमूल्य संपत्ति थे. शंकर भी कुछ हे देर में सफ़ेद कुर्ते और धोती में समीप आ खड़े हुए.

"काकी, ये धोती न सचमुच समस्या हे है. भाभी को कह देना के मेरे कपडे धोने न दाल दे. धोती पहन के मैं नहीं जाने वाला.", काकी का आशीर्वाद ले कर शंकर जी बहार आँगन में चल दिए उमेद के साथ और 2 सेवक सब सामान लिए उनके पीछे. उमेद सिंह की धर्मपत्नी इतनी सवेरे भी सही से तैयार हो कर अपनी सास के साथ कड़ी इन्हे जाता देख रही थी.

"माँ जी, देवर जी आज तक वैसे हे है जैसे पहली बार मैंने देखा था. उम्र में हे बड़े हुए है बस."

"राजेश्वरी बीटा, उमेद भी बिलकुल हे शंकर जैसा था. बस उमेद आधा तोह अपने भाइयो के जाने के बाद हे बदल गया था और फिर इनकी लम्बी बीमारी के साथ साथ अधूरे सपनो को पूरा करने में ये अपने आप से हे दूर चला गया. लेकिन ये शंकर है न, मेरा लाडला बीटा. इसके साथ उमेद वैसा हे हो जाता है जैसे ये चारो बचपन में थे. शीलू (उमेद का सबसे छोटा भाई) तोह इन जैसा था हे नहीं लेकिन अज्जू शंकर का लाडला था और इन्दर का हमजोली. बड़े खुश थे मेरे बचे बस समय का फेर है जो ये हवेली इतनी खामोश रहने लगी.", बात कहते कहते पूर्णिमा जी के चेहरे पर दर्द उभर आया. राजेस्वरी को ये सब पता था क्योंकि उमेद खुद बताता था इनकी दोस्ती के किस्से लेकिन न मौत का पता था न इस हवेली में पसरे सन्नाटे का.

"विनीता भी आने वाली है माँ जी आज.", राजेस्वरी ने अपनी सास को ये जीकर किआ तोह उन्हें भी याद आया.

"हाँ, कल हे तोह बात हुई थी और मैं भूल हे गयी की मेरी बची आने वाली है. कौन जा रहा hawai-adde उसको लेने? उमेद?", उन्होंने थोड़ी चिंता से कहा.

"इन्होने मेरे भाई को बोलै है विनीता को लिवा लाने के लिए. पारस भी दिल्ली हे है तोह कोई दिक्कत नहीं होगी लेकिन कल शहर जाना है तोह विनीता हवेली रहेगी या साथ चलने वाली है?", राजेस्वरी की बात से उमेद की माता जी की चिंता तोह ख़तम हो गयी थी लेकिन स्वर थोड़ा भारी हो गया था.

"उसको शामिल होना हे होगा. बाप की राजकुमारी है तोह इसका ये मतलब कदापि नहीं के परिवार में शामिल न हो. समझा देना लाड़ली को की उनकी दादी का हुकुम है ये. आज कर लेगी जितना आराम करना है.", इतना कह कर पूर्णिमा जी रसोईघर की तरफ चली गयी तैयारी देखने. और दूसरी तरफ उमेद के साथ शंकर जी इस मंदिर में पहुंच चुके थे जिसकी नीव रघुबीर सिंह और सोमबीर सिंह के पिता जी ने रामेश्वर जी के पिता से रखवाई थी. उस से पहले सिर्फ बरगद के पेड़ के निचे देवी की पूजा होती थी. और ये मंदिर उस संहार का भी गवाह था जब उमेद, शंकर और नरिंदर ने डेढ़ दर्ज़न लाशें सुदा सोमबीर Singh-Rammehar के यहाँ बिछा दी थी.

"पंडित जी, घर में मंगल समय है तोह आशीर्वाद लेने आये है.", उमेद सिंह के नमस्कार करने के साथ हे शंकर जी ने भी नतमस्तक हो कर प्रवेश किआ.

"देवी सब मंगल करेंगी. आप लोग स्थान ग्रहण कीजिये मैं प्रारम्भ करता हु.", पुजारी ने सब सामान व्यवस्थित करवाने के साथ हे Devi-vandna शुरू की. अगले 30 मिनट तक purn-sevabhaav से उमेद और शंकर ने देवी माँ की पूजा की और vastra-phal-mishthaan लगाने के बाद बाकी प्रशाद लोगो में विस्तृत करने के लिए पुजारी को हे सौंप दिए. यहाँ कुछ समय बिताने के बाद दोनों हे खाली हाथ घर की तरफ चल दिए.

"याद है भोले, तू इधर क्या करता था गर्मी की छुट्टियों में?", मंदिर के बहार बने बगीचे में एक तरफ इशारा करते हुए उमेद ने कहा तोह शंकर के चेहरे पर मुस्कान आ गयी. मैं पहले हे बहोत शांत हो चूका था आज यहाँ आने से.

"आम तोड़ने पड़ते थे अचार के लिए. और क्या करता था मैं.", शंकर कुछ पल इस पुराने आम के घने वृक्ष को देखता रहा. अभी से इस्पे बोर आने लगे थे.

"रहने दे तेरे आम वाला बहाना. साले आठवीं में हे तू तेज हो गया था. लता की माँ आवाज लगाती रहती थी लेकिन तुम दोनों इसके पीछे छिपे रहते थे. पता भी था के प्यार क्या होता है उस वक़्त?", उमेद उस पेड़ की तरफ हे चल दिए और सचमुच ये कही बड़ा था. साथ हे कुछ अलग सा था जो मोटा तना कुछ फ़ीट के बाद सामान 2 तनो में बाँट रहा था.

"न यार बस वह ाची लगती थी और मेरे से ज्यादा समझदार थी. आठवीं में हे तोह सही से मिले थे हम. फिर अगले साल तू हमारे वह आ गया था तोह पूरे 2 साल बाद मैं उसको देख पाया था. बिलकुल बदल हे गयी थी वह.", शंकर जी जैसे उस पेड़ पर हाथ लगा कर कुछ महसूस कर रहे थे.

"हाँ यार. लड़कियां ऐसी हे होती है, अचानक बड़ी हो जाती है और हम बस देखते हे रह जाते है. वैसे बड़े पापड़ बेलने पड़ते थे उसकी माँ को उलझाए रखने के लिए. इन्दर ने तोह मार भी खाई थी नहीं तोह तुम दोनों रेंज हाथ पकडे जाते. हाहाहा."

"पागल हे था वह उस वक़्त. बता लता की माँ को हे बोल पड़ा के भाग कर शादी कर लेते है. हाहाहा.", शंकर हँसते हुए वही घास में बैठ गया. उमेद भी धोती ठीक करता पेड़ के सहारे अपने दोस्त की तरफ मुँह करके सब याद करने लगा.

"पंडित जी से बोलूंगी अपना तिनगर (बचा) संभल लो. नाडा पकड़ने की उम्र माँ जैसी औरत को भगा के ले जाने पर तुला है. कमीना.", उमेद ने जैसे ये पंक्ति आज भी ृत्त राखी थी.

"यार मार तोह तेरे भी पड़ी थी. याद आया?", शंकर जी ने जैसे ये कहा उमेद ने अपने गाल को सेहला दिए हँसते हुए.

"भाई, फ़तेह के साथ यही तोह बीमारी थी. साला हमेशा बीच में टांग घुसा देता था. तू फिर भी उस से दूर रहता था लेकिन मेरी मज़बूरी होती थी उस से मिलना. मेरा हे नाम लगा दिए था कमीने ने लता के साथ और लता भी तुझे बचने के चक्कर में बोल गयी की उमेद ने हे रोका था. साला उसकी माँ के सामने बापू ने तबियत से हाथ फेरा था मेरे. लेकिन सच कहु तोह ाचा लगा था के तेरा नाम न आया.", उमेद की ख़ुशी देख शंकर हँसते हुए घास के तिनके उखड कर मुँह में लेने लगे.

"वैसे विनीता भी आज आ रही है, तुझे खुद लेने जाना चाइये था उसको.", शंकर जी ने बात की दिशा बदल दी.

"नहीं यार, आज तोमर से भेंट करनी जरुरी है. और विनीता मेरे साले के साथ हे आ जाएगी, पारस दिल्ली हे है."

"तेरा दिल कैसे कर गया रे उस बची को इतनी दूर भेजने के लिए? वह 10 साल तक तेरी छाती पे सोई है, एक दिन अपनी माँ के पास नहीं सोई. और 13 साल दूर रखा उसको, वजह जान सकता हु?", शंकर जी के स्वर में थोड़ा गुस्सा था उमेद के प्रति.

"क्या दिखता मेरी जान को यहाँ रख कर.? ये जख्मी लात, आये महीने कपड़ो पे खून. तू जानता है भोले के पिछले 13 साल में मैंने हर वह नाम मिटा दिए जो रघुबीर सिंह और रामेश्वर शर्मा के प्रति बदले की भावना रखता था. उनके कदम मेरी हवेली तक आ पहुंचे थे जब विनीता यहाँ थी. ऊपर से एक और भी डर था भाई दिल में.", उमेद एकाएक चुप हो गया.

"विनीता के लिए डर? कुछ ऐसा है जो मुझे नहीं पता?"

"ताई, चंद्रो ताई कहती थी की अगर मैं विनीता और बिजेन्दर का रिश्ता करवा दू तोह परिवारों में जल्द शान्ति स्थापित हो जाएगी. और माँ भी मान जाती. इसलिए मैंने फैंसला किआ की मेरी बेटी इस सबसे दूर रहे वही ठीक है. जब भी वह आती तोह मैं घर से निकलने हे नहीं देता था लेकिन अब बिजेन्दर की भी शादी हो रही है और विनीता की डिग्री भी पूरी हो गयी. ाची बात है न के उसने अपनी ज़िन्दगी के फैंसले खुद हे लिए भाई. बस अब जब तक चाहेगी आराम करेगी फिर कुछ साल दिल्ली या चंडीगढ़ में खोल लेगी अपनी आर्किटेक्ट की दूकान. मेरे बिज़नेस में तोह वह पड़ने नहीं वाली और ाचा हे है न जो दूर रहे इन taam-jhaam से.", उमेद ने सहारा ले कर खड़े होते हुए बात ख़तम की तोह शंकर भी साथ खड़ा हो गया.

"आर्किटेक्ट बन्न हे गयी फिर डॉ शंकर की राजकुमारी. देख ले अनपढ़, मेरी बेटी मेरे पे गयी है.", शंकर ने उपहास उड़ाते हुए कहा और उमेद ने कूल्हों पर छड़ी से टकोर कर दी.

"अब तेरी बेटी, बहोत बढ़िया. थोड़ी देर पहले तोह तू भेजने के हे खिलाफ था. वैसे ट्रेनिंग में हे अवार्ड जीत के आ रही है बता देता हु, जर्मनी में कोई ख़ास बिल्डिंग बनाई थी उस कंपनी ने जहा विन्नी (छोटा नाम) ने पूरी टीम संभाली थी. साले यही तोह फरक है यार भोले अपने देश में और बहार. वह लायक को काम मिलता है और इधर नाम को काम.", उमेद ने आखिरी बात वैसे हे कही थी लेकिन शंकर ने बोहेन ऊपर उठा ली.

"क्या कहा जरा फिर से कहियो."

"मैं तेरी बात नहीं कर रहा बे. तू हीरा आदमी है शंकर और सबसे बड़ी बात तोह ये है के इतनी बड़ी शक्शियत के बोझ टेल भी तूने अपनी अलग हस्ती और मुकाम बनाया. तेरे जैसा दिमाग और लगन हरेक के बस का नहीं है. पर मेरी बात का मतलब था के और बहोत से काबिल लोग है अपने यहाँ लेकिन उनको कोई पूछता नहीं. एक लड़की से मिलवाऊंगा तुझे मैं. उसके maa-baap 7 साल पहले गुजर गए थे जब वह 13 बरस की थी और फिर ऐसे हे किसी संस्था के हाथ चढ़ गयी जो बाद में बंद हो गयी. छोटी उम्र के बचे तोह गॉड चले गए लेकिन इसको किसी ने नहीं लिए था. फिर मेरे से किसी ने संपर्क किआ और मैं तोह एक और बेटी मिलने पे खुश हे हुआ. लेकिन भाई उसका दिमाग न भोले, कैलकुलेटर से तेज है. अभी स्नातक के आखिरी वर्ष के इम्तिहान दिए है और #### शहर वाले आश्रम में है. बचो को भी पद्धति है और खाना भी पकती है, मर्जी से. लेकिन एक बार तू मिलना उस बची से, मुझे तोह समझ नहीं के उसको कैसे बेहतर भविष्य दू.", शंकर ने सहमति जताई और फिर गाडी में बैठने के बाद दोनों हवेली की तरफ चल दिए. आगे भी बहोत से काम बाकी थे 9 बजने से पहले और यही इन्हे साढ़े 5 हो चुके थे.

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अर्जुन अभी तक सो रहा था और घडी में 5 बज चुके थे. वह इतनी गहरी नींद yada-kada हे सोता था और निचे दरवाजे पर टाला लगा देख रामेश्वर जी ने अपनी भार्या कौशल्या जी को ये बताया तोह वह पिछले आँगन में चली गयी. यहाँ भी थोड़ा सन्नाटा हे था लेकिन बाथरूम से रेखा को नाहा कर बहार आते देख उन्होंने कहा.

"रेखा, तबियत कैसी है अब तेरी.?"

"माँ जी, रात से हे अब बहोत ठीक हु. दर्द भी नहीं है और आराम करने से थकान भी नहीं है. बस 3-4 दिन रसोई बड़ी दीदी और बचो को हे देखनी पड़ेगी.", मासिक चक्र में हे रेखा जी रसोई से दूर रहती थी. बेशक वह bartan-safaai आदि करने से नहीं चूकती थी.

"रसोई की तू चिंता मैट कर. ललिता और लड़किया देख लेंगी और मैं भी हु. तू ऊपर अर्जुन को उठा दे बस. आज वह ज्यादा हे देर तक सो रहा है.", कौशल्या जी अगर सीढिया चढ़ती भी थी तोह सिर्फ छत्त पर जाने के लिए और रामेश्वर जी तोह जाने कब आखिरी बार ऊपर गए होंगे, शायद जब ऊपरी मंजिल बानी होंगी उस समय.

"जी मैं जगा देती हु उसको."

"जगाने से पहले बस तबियत देख लेना. वह ऐसा बहोत काम करता है. शायद रात देरी से आने की वजह न हो.", कौशल्या जी को भी अर्जुन की चिंता थी. रेखा जी ने अपनी सास को आश्वस्त किआ और ऊपर चल दी. हॉल की तरफ दरवाजा ढलका हुआ था जिसका मतलब था के मधु भी जाग चुकी है. अंदर आने से पहले किवाड़ खटकाया तोह मधु ने हे दरवाजा खोला. अभी भी वह उस काली निघ्त्य में हे थी लेकिन चेहरा धुला हुआ था.

"हाँ, वह माँ जी ने अर्जुन को उठाने के लिए कहा था. परेशां तोह नहीं किआ?"

"हद्द है भाभी, जाओ अपने लल्ला को उठा लो मैं चाय बनती हु तबतक. ये तोह 8 बजे हे उठेंगे.", अशोक जी एक चादर लिए निश्चिंत सो रहे थे और रेखा के सामने हे मधु अपने कपडे ले कर बाथरूम में चली गयी. अर्जुन का दरवाजा खोलने के बाद वह अंदर आई तोह अपने बेटे को ऐसे सोये देख चेहरे पर वह दिलकश मुस्कान आ गयी जिसको देखने के लिए अर्जुन कुछ भी कर सकता था. घुंगराले बाल चेहरे के सामने आये हुए थे और नींद में भी अर्जुन मुस्कुरा रहा था. कुछ पल वह बस उसके करीब बैठी देखती रही लेकिन बालो से एक बूँद पानी की अर्जुन के चेहरे पर गिरते हे उसने आँखें खोल ली.

"माँ, आप.", सरक कर वह उनकी गॉड में हे आ लेता. गोर मुलायम पेट को चूमता वह अपनी माँ से लाड जाता रहा था और रेखा जी उसके सर को सेहला रही थी.

"रात देरी से घर आये थे तुम?"

"हाँ वह तारा की बची ने लेट करवा दिए पार्टी से आते हुए. लेकिन आप इतनी जल्दी कैसे नाहा ली?"

"मुन्ना 5 से ऊपर वक़्त हो चला है.", उनके इतना कहते हे अर्जुन बिस्टेर से उछाल कर फर्श पर खड़ा हो गया.

"मर्डर गया माँ. दादा जी अब खिंचाई करेंगे और उधर पार्क में शास्त्री जी इन्तजार कर रहे होंगे.", अर्जुन ने तुरंत अलमारी से कपडे निकलने शुरू किये तोह रेखा जी को ध्यान आया के कई दिनों से उन्होंने अलमारी ठीक नहीं की थी उसकी.

"आराम से बीटा. और मैं फिर तेरी अलमारी सही कर दूंगी. कमरा तोह तू खुद हे ाचे से रखने लगा है.", उन्होंने पाया था के यहाँ जरा भी गंदगी या चीजे इधर उधर न थी. अर्जुन के सिर्फ रात वाले जूते बहार थे जबकि कपडे तक कमरे में इधर उधर न दिखे.

"ऐसा है भाभी के मैं सबसे पहले इसका कमरा हे ठीक करती हु. रात वाले कपडे इधर है मेरे पास. धो के प्रेस करने के बाद मैं रख दूंगी. हाँ आज के बाद ये जिम्मेवारी किसी और को दे देना.", मधु बुआ ने कमरे में आते साथ कहा और अर्जुन उनका गाल चूम कर अंदर वाले बाथरूम में भाग गया.

"मधु इस सबकी क्या जरुरत है? यहाँ काम करने तोह नहीं आयी न तुम? ये और बिगड़ जायेगा ऐसे तोह. मुझे लगा था के ये खुद हे सीख गया होगा.", रेखा जी ने शिकायत की तोह मधु बराबर बैठती उनकी हाथ अपने हाथ में लेती हुई बोली.

"ये सिर्फ कमरा हे है न भाभी, वह लड़का घर संभल के रखता है तोह इतना उसके लिए मैं कर हे सकती हु. वैसे भी कोई ज्यादा काम नहीं है ये और मुझे भी ाचा लगता है.", मधु के परिवर्तन को रेखा जी भी कुछ समय से देख रही थी. वह अब बड़े प्यार से उनसे बात करती, समय बिताती और अब तोह नाम लेना भी बंद करके भाभी कहने लगी थी.

"रोक नहीं रही मधु, तेरा भी तोह हक़ है अर्जुन पर. बस थोड़ा उसको भी ये सब सीखना चाहिए."

"हॉस्टल में रहा है वह 8 साल से ज्यादा, भाभी. आगे भी पढ़ने बहार जायेगा तोह सब खुद हे करेगा. यहाँ वह छोटा है सबसे, मेरा बस चले तोह मैं ड्राइवर लगा दू उसके लिए. यहाँ आराम मिलना चाहिए उसको लेकिन ाची बात है अगर वह खुद हे सब करना चाहता है तोह क्या कर सकते है. चलो चाय पीते है फिर आपकी साड़ियों में सेंध भी लगनी है मैंने. हम भी देखे जरा ऐसा क्या ख़ास है साड़ी में जो हमारी भाभी हमेशा लिपटी रहती है.", मधु की ऐसी चुहल सुन्न कर रेखा जी भी हंसती हुई साथ चल दी. कुछ समय बाद अर्जुन भी तैयार हो कर आँगन में आ रुका था.

"नवाबसाहब, देरी से आप आये तोह मतलब गलती आपकी है. आगे से बेशक घंटा पहले सो जाना लेकिन गेट 5 बजे से पहले खुलना चाहिए.", रामेश्वर जी की साफ़ बात सुन्न कर अर्जुन हामी भरता घर से बहार दौड़ गया. पार्क पहुंचते हुए हे पौने 6 हो चुके थे लेकिन शास्त्री जी मिल हे गए थे उसको.

"प्रणाम दादा जी. सॉरी आज आँख देरी से खुली और लेट हो गया. आप जा रहे है क्या?", अर्जुन ने पार्क के अंदर जाते हे अपनी तरफ आते आचार्य जी के पाँव चूहे तोह उन्होंने भी आशीर्वाद देते हुए उसका सर सेहला दिए.

"अररि भाई को बंदिश तोह नहीं है के मुर्गा बांग देगा तभी आँख खोलनी है. ज़िन्दगी है प्यारे कभी कभी आराम कर लेना चाहिए. वैसे कल तोह कमाल हे हो गया, शंकर शर्मा के साथ सुपत्र और सुपुत्री दोनों दिख गए.", उनकी ख़ुशी देख अर्जुन भी खुश हो गया. वह कंधे पर हाथ रखे उसको बहार हे ले चले.

"हाँ पापा गाडी सीखा रहे थे दीदी और मुझे तोह फिर मार्किट ले आये. फूफा जी भी आये हुए है तोह उनके लिए मिठाई भी ले ली थी."

"तुम्हे कार चलना नहीं आता? मुझे तोह लगा था के तुम जानते होंगे. लाइसेंस है तुम्हारे पास?"

"जी कच्चा है अभी (लर्निंग). और दादा जी ने 18 से पहले सीखने नहीं दी अब कच्चा लाइसेंस आया है तोह इजाजत दे दी."

"यही बात पंडित जी की उत्तम है बीटा. दुपहिया को तोह लाइसेंस की श्रेणी में रखना हे नहीं चाहिए अगर आपकी उम्र 16 है तोह लेकिन गाडी से संभालना भी एक तरह की गृहस्थी हे है. 4 पहिये 4 स्तम्भ. एक स्टीयरिंग से सब एक तरफ और गलत जगह पाँव से सत्यानाश. एक मजे की बात बताता हु तुम्हे, मेरा पहला इश्क़ कार से हे हुआ था लेकिन उम्र छोटी थी और मैं गरीब. तोह अमीर की लाड़ली मिली नहीं.", हँसते हुए वह हर बात को एक ख़ास अंदाज में कह देते थे. यही तोह उनका आकर्षण था जिसके लिए अर्जुन भगा चला आता था.

"फिर अमीर होने के बाद वह मिली या नहीं?", अर्जुन ने भी मसखरी करते हुए उनके हे लहज़े में सवाल किआ

"बीटा फिर प्यार कहा रहा? इश्क़ ऐसा हे होता है जो जैसे हो वैसे मिला तोह सही लेकिन बाहरी संसाधनों के दम पे हांसिल किआ तोह क्या किआ. इसलिए मैंने बस उस गाडी की तस्वीर अपने कमरे में लगा ली थी. हाँ मोटरसाइकिल मुझे आज भी बहोत पसंद है और थोड़ी बहोत पूँजी भी है पल्ले तोह मैं कभी कभी sair-sapata कर लेता हु. लेकिन चलो आज हम 4 चक्को (टायर) का मजा लेते है.", सड़क पर उनके घर की तरफ दोनों चले आये तोह वह अर्जुन को आज अंदर हे ले आये. वह लैब्राडोर भी दौड़ता हुआ अर्जुन के पास आ गया.

"Hello जॉय. कैसे हो दोस्त?", अर्जुन ने भी प्यार के बदले इस समझदार दोस्त को प्यार दिए. दोनों कान अपने हाथो से सहलाते हुए वह जॉय के सामने घुटनो पर बैठ गया. कुत्ता गहरी दोस्ती की चाहत रखता था और अर्जुन का गाल चूम कर उसने ये जाता दिए.

"No जॉय. स्टॉप.", ये आवाज थी हिमानी की जो गैराज खोलने के बाद इधर चली आई थी.

"सॉरी, मैं हे खेल रहा था इसके साथ. इसकी गलती नहीं hai.",Arjun ने खड़े होने के बाद जॉय का सर थपथपाते हुए कहा और हिमानी थोड़ा शर्मिंदा हो गयी.

"ये इसकी आदत है न और सबको पसंद नहीं होता. लोग इसको कुछ कहे तोह नाना जी को भी ाचा नहीं लगता और मुझे भी. तुम्हे कोई प्रॉब्लम नहीं है तोह ी टेक माय वर्ड्स बक. हे जॉय, जो.", ये टेनिस बाल बगीचे में एक तरफ हिमानी ने फेंकते हुए कहा और कुत्ता दौड़ता हुआ वह उठाने चला गया.

"कल यूनिवर्सिटी जाना होगा. अगर आप फ्री हो तोह. वैसे तोह फॉर्म 10 दिन तक जमा करवा सकते है लेकिन फिर मैं शायद भूल न जाऊ घर में काम की वजह से.", अर्जुन ने जानकारी दी और इधर जॉय उसके सामने पूँछ हिलता बॉल दिखने लगा. इस बार अर्जुन ने बॉल उछाल दी, जो थोड़ी आगे तक चली गयी. जॉय फिर भाग गया.

"नहीं, कल ठीक है. लेकिन ज्यादा धुप में नहीं चलेंगे.", हिमानी ने धुप का जीकर किआ तोह अर्जुन ने पूछ हे लिए.

"आपको कार नहीं आती?"

"तुम्हे मोटरसाइकिल पे दिक्कत है?", सामने से हे सवाल के बदले सवाल मिला तोह अर्जुन झेंप गया.

"मुझे लगा मोटरसाइकिल पे नहीं जाना चाहेंगी."

"9 बजे तुम्हारी मोटरसाइकिल पर. अब जाओ नाना जी इन्तजार कर रहे है.", हिमानी ने अर्जुन का ध्यान गेट की तरफ कड़ी गाडी पर करवाया तोह वह चुपचाप आचार्य जी की और बढ़ गया. हिमानी ने bye भी कहा लेकिन जैसे उसको सुनाई हे न दिए. ये चमचमाती हुई सफ़ेद मेरसेदेज़ 70 के दशक की थी, चौकोर लाइट वाली. अर्जुन के लिए उन्होंने खुद हे अंदर से दरवाजा खोला तोह बैठने के बाद वह बस गाडी को निहारता हे रहा.

"ये पहले लेफ्ट साइड स्टीयरिंग में आती थी लेकिन मैंने सेकंड हैंड ख़रीदा था ये मॉडल क्योंकि ये यहाँ की सड़को के हिसाब से है. चलती आज भी माखन जैसी है.", आचार्य जी ने बहार निकलते हुए अर्जुन को बताया जो देख रहा था के कैसे सहेज कर उन्होंने ये खूबसूरत कार राखी हुई है.

"ये आपकी ख़ास गाडी है न? कल जो थी वह 'ल' निशान वाली तोह नए ज़माने की बड़ी गाडी थी."

"वह अपनी नहीं है बीटा. ये अपनी है और इसमें मैं तुम्हारी दादी को दिल्ली से मुंबई तक लेके गया था. बड़ी प्यारी बेटी है ये मेरी और इसमें सीट ऊपर निचे भी बेहतर होती है तोह तुम्हे परेशानी नहीं होगी.", अर्जुन को उम्मीद नहीं थी की आचार्य जी उसको इस गाडी पर सीखने वाले है.

"आप जानते है आप क्या कह रहे है दादा जी? मुझे गाडी अभी ाचे से नहीं आती और ये शायद आपकी सुनहरी यादों से जुडी है. मैं इसको नहीं चला सकता."

"बीटा, यादें तुम्हे भी बनानी चाहिए. इस बहाने तुम मुझे भी जेहन में रखोगे, कभी भूले याद कर लिए करोगे इस सनकी बुजुर्ग को. और विश्वास दिलाता हु के अगर तुम मेरी बात मानोगे तोह 2 दिन बाद गाडी तुम सड़क पर चलते दिखोगे.", बातें करते हुए वह लोग इस तरफ चले आये थे जहा एक पुराणी औद्योगिक पार्किंग वीरान पड़ी थी शहर के बहार. जहा कभी ट्रांसपोर्ट का काम होता था लेकिन अब जगह बदल कर दूसरी तरफ हो गयी थी.

"कितना चलना जानते हो?"

"स्टीयरिंग, गियर, क्लच, रेस, ब्रेक का पता है. ये इंडिकेटर है और शायद यहाँ से लाइट और डिपर है.", अर्जुन ने जितना देखा उतना बता दिए था.

"कहा दिक्कत होती है?"

"पीछे करने में और अभी गाडी मोड़ने में उतनी सफाई नहीं है. एस्टीम और जेन चलाई है मैंने लेकिन रिवर्स कल हे पापा ने सिखाया.", अर्जुन के जवाब से संतुष्ट होते हुए उन्होंने अपनी सीट पीछे खिसका दी. यहाँ उनकी कार से ज्यादा जगह थी और सीट पीछे भी बहोत हो गयी थी.

"चलाओ और फिर मैं तुम्हे समझाता हु इन पीछे देखने वाले शिशु का काम. ये भी बता देते है कैसे मोड़ना है. बाकी बस विश्वास रखना खुद पर. सबसे मुश्किल तोह साइकिल है यार.", अर्जुन हिम्मत करता ध्यान से चलने लगा. उसको ये गाडी कही बेहतर लग रही थी और जब भी गाडी को घूमना होता आचार्य जी खुद हे उसको समझते हुए मदद करते. कोई 25-30 मिनट बाद अर्जुन झिझक नहीं रहा था और पीछे मोड़ते वक़्त अब उसकी गर्दन नहीं मुड़ती थी. वह समझने लगा था के शीशे कैसे इस्तेमाल होते है. इसके बाद आचार्य जी ने साथ लगती खली सड़क पर कार उतार दी.

"यहाँ ये सफ़ेद पट्टी पर टायर रखना. आगे गोल चक्कर है छोटा सा वह से U-turn लेना है.", अब तोह उन्होंने स्टीयरिंग से भी हाथ हटा लिए थे और अर्जुन ने रफ़्तार काम रखते हुए पूरी कोशिश करि एक तरफ के टायर सड़क के बीच सीधे में रखने की. उमेद चाचा ने खुली सड़क पर उस से गाडी चलवाई थी और संजीव भैया तोह स्टीरी पकड़ा हे देते थे. यहाँ आज सबकुछ उसके हाथ में था और गाडी बहोत कीमती. Gol-chakkar से गाडी सफलता से घूमने के बाद माथे पर पसीना निकल आया था.

"तुम घबरा क्यों रहे हो यार? मैं आराम से बैठा हु लेकिन तुम चिंता में हो. चलो अब घर ले चलो.", आचार्य जी के इस ati-vishwas से अर्जुन की घबराहट तोह काम हुई लेकिन वह अभी भी संभल कर हे चला रहा था.

"आप ज्यादा हे विश्वास दिखा रहे है दादा जी."

"यहाँ गाडी भिड़ने से विश्वास तोह नहीं टूटेगा. तुम चलाओ भाई और ाचा कर रहे हो. बस daaye-baye सर घूमने की जगह नजर सामने और बीच बीच में राइट साइड से अगर कोई आये तोह साइड दे देना. मैं साथ हु.", और उन्होंने ऐसा किआ भी शहर में आने के बाद. समझाया कैसे किसी गाडी को पास देना है और जिधर मुड़ना हो उस तरफ कैसे लाइन में चलना है. अर्जुन उनके घर की तरफ जाने लगा तोह उन्होंने मन कर दिए.

"भाई अपने हे घर ले चलो. बहार से हे नजर कर आएंगे पंडित जी को.", अर्जुन पिछले डेढ़ घंटे में अब कही मुस्कुराया था. वही 40 की रफ़्तार से चौड़ी सड़क पर चलता वह मार्किट के पास आया तोह अब पहले से ज्यादा विश्वास था उसमे. गली में खुद हे आराम से गियर बदलता वह घर के सामने आ रुका. पार्क में छोल साहब और पंडित जी बैठे थे और कोमल दीदी चाय देने हे आई थी. गाडी देख कर रामेश्वर जी खुद हे इधर चले आये.

"धनभाग हमारे शास्त्री जी. आपने आज स्वयं दर्शन दिए और ये नालायक आपको परेशां कर रहा है गाडी के साथ.", रामेश्वर जी के हाथ जोड़ने पर उन्होंने खुद हे हाथ थाम लिए.

"पंडित जी अब हम अर्जुन की डोर से बाद में बंधे है पहले तोह आपके हे हरिणी (कर्जदार) है. आज और कर्ज चढ़वाने आ गए हम खुद से हे. सुना है भाभी जी अभी तक आपके लिए चाय बनती है.", रामेश्वर जी मुस्कुरा दिए इस बात को सुन्न कर और बड़े आदर से उन्हें अपने साथ बगीचे में ले आये. छोल साहब भी हाथ जोड़ कर मिले, जो खुद जैसे आचार्य जी के प्रशंसक थे. कोमल दीदी को आशीर्वाद दिए उन्होंने और पंडित जी ने अपनी पौती को बताया के दादी से एक कप चाय और लेके आने को. जो अर्जुन की नयी खुराक और दूध लेने गयी थी अंदर.

"पंडित जी, बगीचा तोह आपका बेहतरीन है. रिटायरमेंट के बाद लगता है दुनिया भर की नस्ले ढून्ढ लाये है आप. गर्मी में भी गुलाब और इतने फूल.", बेंत (चैने) की कुर्सी पर बैठते हे उन्होंने इस 500 गज हिस्से को देखा तोह नजर बस हर पौधे को समझने लगी थी. फल और सब्जिया भी बड़े ख़ास तरह से लगाए हुए दिखे.

"मैं तोह शास्त्री जी तेहरा पोलिसिअ आदमी, थोड़ा बहोत छायादार पौधे लगाए थे. फिर मेरे घर के सबसे ाचे पौधे ने अपनी म्हणत से ये बाग़ तैयार किआ. अर्जुन की म्हणत का पसीना हे है के हर 5 गज पर मिटटी अलग और नस्ले अलग है यहाँ.", ये तोह उन्हें अर्जुन ने बताया भी नहीं था के बागवानी का भी शौक रखता है.

"कमाल है जी.", अर्जुन मुँह हाथ धो कर इधर आया तोह उन्होंने उसको करीब हे बैठा लिए.

"तुम ये सब कबसे करते आ रहे हो.?", आचार्य जी के सवाल पर अर्जुन ने अपने दादा जी की तरफ देखा और फिर कहा.

"बचपन में तोह बस मैं खुरपी से मिटटी हे खोद देता था दादा जी, बेशक पौधे के साथ हे. फिर बोर्डिंग से वापिस आया था न तोह 10तह की स्टार्टिंग से 1 महीने पहले पूरा हिस्सा बाउजी (पंडित जी) के साथ लग कर तैयार किआ. बोर्डिंग में मंदतोर्य था गार्डनिंग करना. और एक मेरे अंकल भी है यूनिवर्सिटी में जिन्होंने हेल्प की मेरी. अब तोह मेरे पास यहाँ गैंडे के हे 10 किस्मे होंगी.", अर्जुन के ऐसा कहने के साथ हे कौशल्या जी भी इधर चली आई. आदर से दोनों ने एक दूसरे को नमस्कार किआ और चाय के साथ बेसन के लड्डू, नमकीन रखने के बाद उन्होंने अर्जुन को भी वह आधा किलो का बादाम दूध का गिलास और ये पुराने लड्डू से थोड़ा छोटा लेकिन गहरा लड्डू थमा दिए.

"वह गुलाब तुमने अलग उगाया हुआ है. और शायद तुमने जान बूझ को वह नमी का इंतजाम और ज्यादा चाय राखी है.", ये प्रीती के देश का गुलाब था जो अभी भी खिला हुआ था. साथ हे पहले से थोड़ा घाना हो चूका था.

"हाँ वह ग्रीस से है न दादा जी. ोमोर्फी नेसल है ये और ग्रीस में तोह हमेशा एक सामान मौसम रहता है इसलिए मैंने इन्हे नमी और छाया के साथ संभल कर रखा है.", अर्जुन के चेहरे पर जो चमक आई थी ये बताते हुए वह आचार्य जी से छिप न सकीय. और बातें आगे होती उस से पहले हे बगीचे में ये चलता फिरता गुलाब देख वह उसको हे देखने लगे. अर्जुन आराम से दूध के साथ ये कसैला लड्डू चबा रहा था. जाने इस बार क्या बनाया था जो थोड़ा मिटटी सा स्वाद दे रहा था.

"ये प्रीती है शास्त्री जी, मेरे भाई छोल सतीश की पौती और प्रीती ये है हमारे अर्जुन के ज्ञान का स्त्रोत और उसकी नब्ज़ श्रीमान..", अभी वह कुछ बोलते प्रीती हे बोल पड़ी.

"आचार्य प्रमोद शास्त्री जी, अर्जुन इन्ही की बातें तोह करता रहता है.", अब हैरत थोड़ी आचार्य जी के चेहरे पर थी और शर्म अर्जुन के.

"बीटा कहा से आप? यूरोप से या घर में हे कोई बहार से है?", इतना सपाट सवाल रामेश्वर जी को छोड़ कर बाकी तीनो के लिए हैरत भरा था.

"शास्त्री जी ने दुनिया हे देखि है, गहनता से.", रामेश्वर जी ने जैसे ये कहा प्रीती ने सहमत होते हुए बताया.

"जी माँ ग्रीस से है मेरी. वह भी आयी हुई है लेकिन घर पे काम कर रही हैं. मैं इंडिया में हे रहती हु अब, दादा जी के पास.", छोल साहब के गले में बाहें दाल कर कड़ी वह भी ध्यान से आचार्य जी को देख रही थी. अलग हे चमक थी इन वृद्ध लेकिन मजबूत से इंसान में.

"बड़े मेहनती हो बीटा, पता तोह मुझे पहले हे दिन से था लेकिन पक्का आज हो गया. वैसे मुँह ऐसा क्यों बना रहे हो भाई?", अर्जुन को वह दवा जैसा लड्डू चबाते देख उन्होंने जो बात कही उस से शर्म के साथ साथ नजरे भी झुकी हुई थी अर्जुन की. आचार्य जी कहा म्हणत का बता रहे है वह गुलाब और प्रीती का जीकर था.

"ये मेरी दादी जी के लड्डू है. जरा खा कर देखिये, शकल आपकी ज्यादा अजीब बन्न जाएगी.", बाकी सब इस बात पर हंसने लगे थे और कौशल्या जी भी इधर आ कड़ी हुई.

"तेरे हे फायदे के लिए इतने म्हणत करती हु मैं इस उम्र में. चल उठ के अंदर जा और प्रीती बीटा तुम्हारे दादा जी आज इनके साथ हे है. बता दो घर पे.", कौशल्या जी ने जैसे यहाँ से उन्हें भागना जरुरी समझा. जाने क्या बात थी.

"दादी थोड़ी देर में चला जाता हु न. आचार्य दादा जी के पास हे तोह हु."

"10 मिनट बाद आ जाना तुम. मैं जाने से पहले मिलूंगा.", अब ये बात खुस आचार्य जी ने कही तोह अर्जुन तुरंत अंदर चला गया, प्रीती भी अपने घर जाने की जगह उसके साथ चल दी.

"पंडित जी, इसको बाँध नहीं सकते लेकिन सही जीना सिखाया जा सकता है.", आचार्य जी ने जैसे ये बात कही कौशल्या जी भी थोड़ा हैरान हो गयी. उन्हें बेशक रामेश्वर जी ने हे इशारा दिए था Preeti-Arjun को यहाँ से भेजने का लेकिन ये एकांत की मांग आचार्य जी ने हे की थी.

"आप अर्जुन को कितना जानते है? और क्या अलग है इसमें?", कौशल्या जी ने कुर्सी पर बैठते हुए अपना सवाल किआ. उन्हें भी जिज्ञासा हो रही थी की ये तेजस्वी इंसान अर्जुन के साथ उनके घर पहली बार वह भी बड़े हक़ से आये.

"भाभी जी मेरे से ज्यादा तोह आप जानती है अर्जुन को. उसके ताप को काम रखने और शरीर को इतना बलवान करने के लिए सही औषधि आप हे दे रही. आयुर्वेद का गहरा ज्ञान है आपको. वो मैं का सरल भी है और जिज्ञासा से भरा हुआ भी. कभी कभी व्यस्को सा प्रतीत होता है कभी baal-buddhi लेकिन जीवन की हम सब से बेहतर परिभाषा है उसके पास.", आचार्य जी ने ये बात कही तोह पंडित जी के साथ छोल साहब ने भी सहमति जताई.

"शास्त्री जी, वैद कांशीराम जी की पुत्री है मेरी धर्मपत्नी और इन्हे पता है के अर्जुन थोड़ा अलग है. वो बचपन से हे अतिरिक्त ऊर्जावान है (hyper-active) लेकिन दोस्त भी हम सबका है के उस वक़्त हे संभल न सके. वैसे भी जीवन बड़ा मुश्किल से मिला है अर्जुन को. हमारी कोशिश रहती है के वह ऊर्जा को सही जगह लगाए और खाली न रहे. मानसिक और शारीरिक दोनों तरह से. आपके साथ रहने से वह अब कही ज्यादा विश्वासभरा रहने लगा है.", रामेश्वर जी ने अपने स्वर्गीय ससुर का नाम लिए तोह शास्त्री जी ने दोनों हाथ जोड़ दिए थे, जिसका ख़ास कारण था. और अर्जुन के बारे में जान कर वह भी उनकी बात से इत्तेफ़ाक़ रख रहे थे.

"आप ाचा कर रही है जो इसको ये अतिरिक्त आहार दे रही है जिस से वह शरीर के साथ मानसिक तौर पर भी मजबूत हो रहा है. भाभी जी अभी जिस्म थोड़ा और बढ़ेगा अर्जुन का लेकिन जल्द हे शायद ये बड़े माहौल में जाए, जो की अभी शायद पारिवारिक है जितना मैं समझ रहा हु."

"जी, उसको rok-tok नहीं है लेकिन परिवार में सबके साथ अटूट प्रेम है तोह वह खुद भी सिर्फ काम से हे बहार निकलता है या सुबह आपके पास और शाम को स्टेडियम, जहा डेढ़-2 घंटा पूरी म्हणत करता है. लेकिन माहौल बदलने से क्या कुछ जायदा बदलाव होगा? हमे लगता है के उचित शिक्षा हम दे रहे है उसको.", कौशल्या जी ने जवाब के साथ हे प्रश्न किआ तोह आचार्य जी ने उस ख़ास गुलाब की तरफ इशारा किआ.

"अर्जुन उसको अलग वातावरण दे रहा है. एक तरह से जैसे आप अर्जुन को दे रहे है. सबके सात वह गुलाब क्या परिवर्तन सेहन करके बड़ा हो पायेगा? बेशक ये गुलाब श्रेष्ठ नेसल का है लेकिन माहौल मुताबिक नहीं है बहार का.", बड़ी दिलचस्प और गंभीर बात कह दी थी उन्होंने. अब रामेश्वर जी के भी चेहरे पर चिंता थी थोड़ी.

"आपने आज क्या जाना शास्त्री जी? आप निसंदेह अर्जुन से प्रेम करते है और वह भी. इसलिए आपने शायद वह देख लिए जिस से हम भी अनजान है और यही वजह है के आप इधर चले आये.", रामेश्वर जी का सवाल जायज था.

"परेशां होने वाली कोई बात नहीं है पंडित जी, बस इसको थोड़ा सार्वजनिक होने दीजिये. धीरे धीरे हे सही लेकिन अगर आजाद नहीं किआ तोह ये ज़िन्दगी भर बस परवाह हे करता रहेगा. मैं तोह आप लोगो से मिलने आया था और जान कर बड़ा ाचा लगा के आप सभी लोग इस बचे को इतना ाचा माहौल दे रहे है. अब थोड़ी दुनियादारी देखेगा तोह और बेहतर बनेगा. आप सभी का प्यार तोह इसकी असली शक्ति है. बाकी आप भी कभी पावन कीजिये इस गरीब का घर.", उन्होंने हाथ जोड़ कर उठते हुए जाने की इजाजत ली तोह बाकी तीनो लोग भी खड़े हो गए.

"आते रहिये शास्त्री जी, हम रिटायरमेंट वाले तोह घर बैठे है लेकिन आप vishwa-bhraman पे कब होते हो ये खबर नहीं रहती.", रामेश्वर जी ने हाथ मिलते हुए मजाक किआ तोह वह भी हंसने लगे.

"अब यही विश्व है और यही तक भ्रमण मेरा. कभी अर्जुन ने इजाजत दी तोह सीखने निकल लेंगे उस दुनिया में कुछ न कुछ.", उनके कथन में साफ़ था के वह अर्जुन से कितना लगाव बना चुके है और रामेश्वर जी गदगद हो उठे इस बात से.

"जल्द हे आपके निवास आते है शास्त्री जी, घर के 2 बचो की शादी है 21 तारीख को और अगर आप शामिल होंगे तोह हमारे साथ साथ अर्जुन को भी ाचा लगेगा.", यहाँ पंडित जी ने इतना कहा था और अर्जुन बीच में आ गया..

"कर दिए न सरप्राइज खराब. मैं पहला कार्ड देने इनके पास हे जाने वाला था. अब आपको साथ हे चलना पड़ेगा.", अर्जुन की इस बात पर आचार्य जी ने उसको गले से लगा लिए.

"पहला निमंत्रण गणेश जी को, दूसरा समधी जी को और तीसरा अपने प्रमुख को. फिर पहला मुझे कैसे?", उन्होंने सबके सामने हे अर्जुन को गले से लगाए पुछा.

"ओफ्फो. मतलब मैं भी तोह किसी को इन्विते कर सकता हु न? इसलिए मैंने कल हे पापा से कह दिए था के मैं आपके घर जाऊंगा इन्विते करने लेकिन पता है उन्होंने कहा के आपके पास वक़्त हे नहीं होता. उन्हें तोह बहोत ख़ुशी होगी अगर आप थोड़ी देर के लिए भी आये तोह.", अर्जुन ने उतने हे लाड से उन्हें सब बता दिए.

"देखो भाई बेटे का विवाह है तोह सिर्फ शगुन देने आऊंगा और बिटिया का है तोह विवाह से 3 दिन पहले हे आना शुरू कर दूंगा. अब सब इस बात पर निर्भर है के शादी किसकी है.", उनकी बात पर पंडित जी मुस्कुराये तोह कौशल्या जी भी खुश हो गयी की अर्जुन को अब ाचा लगेगा.

"फस्स गए आप तोह. दीदी की शादी है और साथ हे भैया की भी. अब तोह एक दिन की जगह 4 दिन आप आने वाले है इधर. और ऋतू दीदी कह रही थी की हिमानी दीदी को भी बुलाना चाहिए.", अर्जुन ने ये भी जीकर कर दिए.

"भाई तुम्हारी दीदी से मिलने तुम तोह कभी आये नहीं, चलो बिटिया ने कहा है तोह लेके तोह आ हे सकते हो. फ़िलहाल तोह एक किताब में व्यस्त हु, ाचा हे होगा जो अगर उस शैतान को तुम घर से बहार लेके आओगे. अब आज्ञा दीजिये जी, बचो का खाने का भी वक़्त हो गया है तोह मुझे भी चलना होगा. भाभी जी आप सचमुच चाय ाची बनती है, adrak-elaichi कूटने की म्हणत बचे तोह करते नहीं.", जाते हुए भी उन्होंने सबको प्रणाम किआ और अर्जुन के साथ हे बहार चल दिए. कौशल्या जी भी खुश थी इन तेजस्वी व्यक्ति से मिल कर. अर्जुन ने कुछ समय उनके साथ गाडी में हे बात करि और हँसता हुआ वापिस घर में चला आया.

"यार बता तोह दिए करो के ऐसे महानुभाव घर बुला रहे हो. जानती भी हो कौशल्या के ये कौन है?", बगीचे से कोमल दीदी ट्रे में बर्तन ले जा रही थी लेकिन दादा जी की बात सुन्न कर वही रुक गयी.

"जो भी हैं जी, साधारण नहीं है और मुझे ख़ुशी है के वह अर्जुन से प्यार करते है. बीटा ाचा किआ जो पहला निमंत्रण तू उन्हें दे रहा है. बाकी वह जितनी भी बड़ी हस्ती हो मुझे भाभी कहा तोह देवर हे हुए. जैसे छोल सतीश पूरी मेरे लिए सतीश है बस.", कौशल्या जी तोह आखिर थी हे बेबाक और हंसमुख.

"सही कहा दादी आपने. वह अपने साथ क्या है बस यही सच है, बहार जो मर्जी हो. वैसे आज उन्होंने डेढ़ घंटा मुझे गाडी सिखाई और ट्रांसपोर्ट एरिया से घर तक मैं हे चला के लाया हु वह गाडी.", अर्जुन चहकता हुआ अपनी दादी को बता रहा था और छोल साहब अभी तक अपनी भाभी की बात पर हंस रहे थे.

"चल अब तेरे मुँह से आज शादी की बात निकल गयी है तोह काम भी शुरू करते है. कल तेरी बाकी सभी दादी आने वाली है, कह दे तेरे दादा जी से के इन्हे पता है क्या करना है. मैं चली अपने काम पर, चल कोमल.", कौशल्या जी ने चेतवानी दे हे दी थी जाते जाते पंडित जी को.

"नाश्ते के बाद हम दोनों बुधो को हे जाना पड़ेगा सतीश बाजार. अब इनकी devrani-jethani आ रही है तोह बचो की समझ में तोह आने से रहा के उन्हें क्या पसंद है क्या नहीं."

"हाँ जानती हु बड़ी होली खेली है न आपने तोह पता हे होगा क्या पसंद है. पूर्णिमा के कान खींचती हु आपके सामने कल.", रामेश्वर जी तोह कहते हुए भी पचता गए क्योंकि कौशल्या जी के कान कितने तेज है वह भूल गए थे.

"मर्डर गया भाई. चल नाश्ता करते है फिर शाम को हे वापिस आएंगे.", दोनों हे हँसते हुए बैठक में चल दिए और अर्जुन नहाने.

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पंडित जी के घर से निकलने के आधे घंटे बाद हे नाश्ते की टेबल पर अर्जुन, मधु बुआ के साथ हे तारा और मंजू भी बैठे थे. मंजू अभी आयी थी कौशल्या जी के बुलाने पर और आते हे हुकुम मिला पहले नाश्ता करने का. अर्जुन आराम से चुपचाप खाना खा रहा था लेकिन मंजू ने मधु बुआ को हे बातचीत का आकर्षण बना दिए.

"बुआ जी आज आप सचमुच ज्यादा हे खूबसूरत लग रही है. कुछ ख़ास दिन है क्या आज?", तारा ने भी अपनी माँ को ध्यान से देखा और मंजू की बात का समर्थ किआ.

"सही में माँ. आप आज ज्यादा हे जवान लग रही हो."

"बस बस. ऐसा कुछ नहीं है, मार्किट जा रही हु अर्जुन के साथ थोड़ी देर में तोह सोचा तैयार हो जाऊ. जितने साल की तुम दोनों हो उस से ज्यादा उम्र है मेरी तोह ये बात कही से भी ठीक नहीं.", मुस्कुराते हुए मधु बुआ ने उनकी बात को झुटलाया तोह अर्जुन ने भी एक नजर अपनी बुआ को देख हे लिए. खूबसूरत तोह वैसे भी थी हे वह और इस हलके चटख रंग के कैसे हुए सूट के साथ साधारण मेकअप में भी वह बेजोड़ हे लग रही थी.

"बचे झूठ नहीं कह रहे मधु. अब लग रही है तोह लग रही है.", ललिता जी के ऐसा कहने पर थोड़ा झेंप गयी वह. उनका इशारा अर्जुन पर जो था.

"खींच लो भाभी आप भी टांग खिंच लो बचो के साथ. ऐसा कुछ नहीं है और ये सूट अर्जुन ने दिलवाया था तोह आज पहन लिए. वैसे मंजू, ये बात तोह मुझे केहनी चाहिए के तुम ज्यादा आकर्षक लगने लगी हो. पहले दुबली सी दिखती थी वह भी बिना कोई taam-jhaam और अब शरीर भी सही हो गया है साथ में चमक भी रही हो. सूट बहोत सुन्दर है तुम्हारा.", मंजू पर पलटवार हुआ तोह अर्जुन की हंसी निकल गयी. वह घूर कर अर्जुन को देखती हुई बोली.

"बुआ, आपकी तरह ये सूट मुझे भी अर्जुन ने हे पसंद करके दिए था. हाँ मैं पहनती नहीं लेकिन आज सामने दिखा तोह पहन लिए. शादी का गिफ्ट था इसकी तरफ से.", अर्जुन से अनजाने में गलती हो गयी थी जो बीच में बोल पड़ा था.

"देख लो माँ, ये अर्जुन का बचा सबको गिफ्ट देता रहता है और मेरे लिए आज तक रुमाल भी नहीं लाया. मामी, बोल देना मां से के एक दिन पूरा मैं इसके साथ शॉपिंग करने वाली हु और पैसे तैयार रखे.", गिनती के दिन थे और अब एक ले लिए था तारा ने. अर्जुन लाचारी से उसको देख रहा था.

"ले बीटा बोलने का मजा तू भी ले. वैसे मंजू तू गायब कहा है आजकल? कुछ दिनों से दिखाई नहीं दे रही.", मधु बुआ के सवाल से मंजू थोड़ा सकपका गयी लेकिन चरण बोल पड़ी.

"ट्रायल्स है बुआ अगले महीने स्विमिंग के तोह प्रीती के साथ 9-11 या 10-12 प्रैक्टिस करती हो. फिर मेनका दीदी स्कूल जाती है तोह घर के काम थोड़े बहोत. ऋतू और अलका आ जाती है वह मेरे पास. आज दादी ने बुलाया तोह प्रैक्टिस नहीं गयी. आप आई नहीं मेरे यहाँ.", मंजू के ऐसा कहने पर मधु बुआ ने बड़े प्यार से जवाब दिए.

"लेके जाने वाला कौन है भला? लेकिन अब शादी से हफ्ता पहले आउंगी तोह यहाँ नहीं रुकूंगी, तेरे साथ हे रात बितानी है मैंने.", बुआ के ऐसा कहने पर अर्जुन के चेहरे पर अलग से भाव आ गए थे लेकिन तारा और मंजू खुश हो गयी.

"सही बात है माँ ात लीस्ट वह शांति होगी. वैसे मंजू तोह यही रुकने वाली है उस वक़्त, क्यों मंजू?"

"मैनेज कर लेंगे और तब की तब देखेंगे. बुआ घर आएँगी तोह ाचा हे है न.", अभी ये लोग बातें कर रहे थे के प्रीती hilti-dulti बिना बुआ को देखे मंजू पे जा चढ़ी.

"ओह मैडम जी, घर के टाला लगाना याद है लेकिन फ़ोन करके तोह बोल सकती हो के पड़ोस में हे हो. चलो नाश्ता हो गया तोह अब स्टेडियम चले.", बाकी सब हंसने लगे तोह ध्यान मधु बुआ पे गया.

"सॉरी. मुझे लगा कोमल दीदी है, आप तोह पहचान में हे नहीं आई.", प्रीती के ऐसा कहने पर बुआ जवाब हे न दे सकीय.

"आते हे तू भी शुरू हो जा. वैसे ये आज यही है, प्रैक्टिस ऑफ."

"चलो ाची बात है बुआ, वैसे भी मेरा खुद का हे दिल नहीं था. आप लोग नाश्ता करो मैं ऋतू दीदी के पास चली.", प्रीती कोई और बात किये बिना ऊपर भाग गयी.

"ये भी कभी कभी मुझे बची हे लगती है. तुम दोनों रह तोह लोगे न साथ?", मधु बुआ के इस सवाल पर अर्जुन का चेहरा गुलाबी हो गया. पानी पी के वह बिना जवाब दिए अपनी माँ के कमरे की तरफ दौड़ गया.

"देख ले मंजू, दोनों बचे हे है अभी तक. एक अपनी ननद के पास और दूसरा अपनी माँ के पल्लू में. फिर इनका रिश्ता कर दिए घरवालों ने. जाने क्या गुल खिलाएंगे."

"नहीं बुआ, दोनों समझदार है लेकिन परिवार में छोटे है न तोह बस हमको लगता है के दोनों नासमझ है. प्रीती इंटेलीजेंट भी है और मेंटली स्ट्रांग भी. अर्जुन का बराबर साथ देगी ज़िन्दगी भर.", मंजू ने जैसे विश्लेषण किआ था वह बताता था के इन दोनों के बीच कही ज्यादा हे गहरा रिश्ता बन्न चूका है.

"मैं एग्री करती हु मंजू से. और अर्जुन भी माँ काबिल है. ऐसा नहीं है के वह डील नहीं कर सकता लाइफ के प्रोब्लेम्स या सीटुएशन्स से, he's कपबले.", तारा के मुँह से भी तारीफ निकली तोह मधु बुआ मुस्कुराने लगी.

"जानती हु के तुम दोनों उसको ाचे से जानती हो. मेरा मतलब था के इन दोनों को हमेशा कोई सीनियर इंसान की जरुरत रहेगी. परिवार के बहार दोनों हे सर्वाइव नहीं कर सकते क्यों की ये कही ज्यादा हे साफ़ और सीधे है.", इस बार मंजू और तारा की हंसी छूठ गयी ये सुन्न कर.

"हंस क्यों रही हो तुम दोनों. गलत नहीं कहा मैंने."

"हाँ बुआ आप सही हो लेकिन इतना बता देती हु की प्रीती हमारे हे साथ रहती है. ऋतू जहा लाइफ के पॉजिटिव समझती है वही अलका कंप्यूटर है. मैं स्ट्रांग हु और तारा एक मैनेज्ड पर्सन है. आरती साइलेंट लेकिन ऑब्सेर्वे करने के साथ हे रिव्यु भी बेस्ट करती है. फिर है कोमल दीदी और माधुरी दीदी जिनको शायद कही ज्यादा समझ है इंसान, परिवार और इमोशंस की. प्रियंका वुल्नरबाले भी है और स्ट्रैट भी. इन सबके बारे में मैंने इसलिए बताया क्योंकि प्रीती इनका कॉम्बिनेशन है. आप अर्जुन से पूछ लीजिये के मेंटली और फिजिकली प्रीती क्यों उस से बेटर है.", मंजू ने जितना बताया था वह तारा को भी पता था और उसने भी अपनी माँ से यही कहा.

"सबसे ख़ास बात है माँ के दोनों को हे परिवार की कदर है तोह वह अकेले तोह कभी रहने वाले नहीं."

"बस बस भाई. तुम लोग तोह मेरी उम्मीद से भी आगे जा चुके हो. यही सब करते हो क्या ऊपर कमरों में बंद रह कर.?"

"पढाई और थोड़ी मस्ती, हक़ है हमारा.", तारा ने जैसे कहा मंजू भी हंसने लगी. इधर रेखा जी ने आते हे मंजू को गले से लगाया और फिर अपने साथ ले गयी.

"चलो भी बुआ अब. फिर आपने जाने की जल्दी मचा देनी है मार्किट से.", अर्जुन के पुकारते हे मधु बुआ उठ कड़ी हुई और तारा भी ऊपर चली गयी अपनी बाकी बहनो के पास. जाने क्या खिचड़ी पकती रहती थी वह सब. मधु बुआ ने भी पर्स उठाने के साथ हे अपनी माँ को बता दिए के वह 3-4 घंटे तक आ जाएँगी मार्किट से.

"चल अब जल्दी, इस से पहले कोई आवाज लगा दे.", अर्जुन ने भी तुरंत अपनी रानी निकली और आँखों पर धुप का चस्मा लगा कर निकल चला घर से. यहाँ रेखा जी बंद कमरे में मंजू को लिए बैठी थी. शायद गंभीर हे बात थी जो कमरा बंद कर दिए था.

"माँ से बात हुई मंजू?", बिस्टेर पर दोनों हे पाँव ऊपर रखे बिलकुल पास बैठी थी.

"नहीं मौसी, कल रात बस हलचल के लिए बात हुई थी. कल आने वाली है दादी ने बताया मुझे. तोह आपने कैसे याद किआ जो ट्रेनिंग भी नहीं करने दी.?", मंजू अपनी बात पूरी करके उन्हें देखने लगी और रेखा जी ने दराज से ये चंडी के मनके पिरोये काले धागे को उसके दाहिने पाँव पर बाँध दिए.

"ऐसा नहीं सोचा था मेरी बची. किसको कसूरवार कहु जब अनजाने में मैं हे शामिल हो गयी तेरी बर्बादी में. लेकिन अब बेटी और बहु दोनों हे तू है तोह जो बन्न पड़ेगा वह करुँगी. बेशक मुझे ये सबके सामने कहना पड़े अगर तेरा हक़ न मिला तोह.", इतनी बड़ी बात उन्होंने इतनी जल्दी हे कह दी. सचमुच दर्द उतर आया था रेखा जी के चेहरे पर.

"माँ.. मेरा हक़ तोह मिल चूका है मुझे अब और कुछ दे कर पराया मत करो. माँ बुला सकती हु न अकेले में?", मंजू उनके सीने से लगी तोह वह बस उसकी पीठ सहलाने लगी.

"माँ हे तोह मैं तेरी तोह अकेले में क्या और सबके सामने क्या. लेकिन दलीप जी को जवाब देना पड़ेगा इस बात का. सरोज बेचारी तोह लड़ भी नहीं सकती, समाज के डर से लेकिन तुम्हारे पापा से मैं जरूर पूछूँगी इसकी वजह."

"जरुरत हे नहीं है इस सबकी माँ. पापा ने जो भी किआ वह वजह बड़ी हे होगी, क्योंकि उनकी जान हु मैं. जितना मुझे पता है मेनका का परिवार ख़तम हो गया तोह बात वही से जुडी होगी. लेकिन अर्जुन से मैं प्यार तब से करती आ रही हु जब मुझे उसके बारे में पता भी न था. और ये आपका हे खून है, मेरा और अर्जुन का प्यार है जो शादी से पहले हे मेरे अंदर आ गया था. इस से बड़ा हक़ क्या दे सकता है कोई? बस कॉलेज ख़तम हो जाये तोह फिर अर्जुन के साथ अपने सपने पूरे करुँगी लेकिन आपको वादा करना होगा के सबके सामने मैं बस आपकी बेटी हु, बहु नहीं.", मंजू ने अपने पेट पर रेखा जी का हाथ रखे हुए उनसे वादा मांग लिए तोह उनकी भी आँखों में पानी आ गया.

"ये पाप है मंजू और काम से काम मेरे साथ तोह ऐसा न कर."

"मान जाइये न प्लीज. मैं और अर्जुन बात कर चुके इस बारे में और वह प्रीती के समकक्ष हे दर्जा देता है मुझे. ऋतू को भी इसका पता है लेकिन उस से भी आप बात नहीं करेंगी. बस वादा कीजिये और मैं यकीन दिलाती हु के अर्जुन और मेरे बचे का आपके साथ दादी का रिश्ता हे रहेगा. लेकिन कभी ये नहीं कहना के मैं उसकी पहली पत्नी हु, अर्जुन से भी नहीं जबतक वह खुद आपको लेके मेरे पास न आये. और वह ऐसा करेगा जरूर.", रेखा जी ने फिर से उसको गले लगते हुए वादा कर हे दिए.

"अर्जुन ध्यान देता है तुझ पर?"

"पूरा. उसकी वजह से हे मैं अकेली नहीं रहती कभी भी. इसलिए तोह मुझे आपके बेटे से प्यार हुआ था माँ. वह ध्यान रखना जानता है और अभी से वह पिता की जिम्मेवारी समझ रहा है. शहर से बहार था तब भी रात में और सुबह फ़ोन किआ था उसने. अभी व्यस्त है लेकिन टाइम देता है."

"और प्रीती? उसकी भी ज़िन्दगी पर फरक न पड़े भगवन. वह भी तेरे जैसी हे मेरी बेटी है मंजू."

"माँ, प्रीती से अर्जुन कुछ नहीं छिपता और उल्टा वह उस से भी ज्यादा ध्यान रखती है मेरा. आप बस पापा या माँ को कुछ मत कहना, एक तरह से दुनिया की नजरो में तोह मैं विवाहित हु हे नहीं. जिनको पता है उन्होंने पति कहा देखा है मेरा. सब सही है बस आप कुछ भी मत सोचना. आपके बेटे का प्यार बहोत है जीने के लिए और मैं ज़िन्दगी में कुछ करना चाहती हु जो पहले नहीं कर सकती थी लेकिन अर्जुन के सहारे कर पाऊँगी."

चल तेरी साड़ी बातें मान ली बस तू भी मेरी एक बात मान ले इंकार मैट करना.", रेखा जी ने खड़े होने के बाद अलमारी खोल कर 2 कड़े, एक अंगूठी और सिन्दूर की डिब्बी निकल ली. अपने हाथो से हे दोनों कंगन मंजू को पहना कर वह अंगूठी भी सही ऊँगली में दाल दी.

"16 श्रृंगार करने वाली थी मैं मेरी बहु के लेकिन देख अब ऐसे करना पड़ रहा है. लेकिन जिस दिन अर्जुन तेरे पास लेके आया तोह मैं वह भी करुँगी. फिलहाल तोह अपनी बहु को यही दे सकती हु.", मांग में थोड़ा सिन्दूर दाल कर चुन्नी से हे सर ढँक दिए. मंजू की आँखों में ख़ुशी के आंसू निकल आये थे ये सब देख कर.

"आप न बहोत ाची है. जैसा अर्जुन बताता है उस से भी ज्यादा.", उनके गले लगी वह लिपटी कड़ी रही कुछ देर.

"तेरी माँ कहती थी के उसकी बेटी की शादी बिरादरी में हे होगी. और मैं कहती थी मेरे बेटे से हो तोह ज्यादा ाचा है. दोनों की हे सुन्न ली ऊपर वाले ने. वैसे अर्जुन ने ाचा असर किआ है तुझपे.", अब रेखा जी ने उसकी सुंदरता की प्रशंशा अपने तरीके से की तोह वह भी शरमति हुई नजरे चुराने लगी.

"बहोत ाचा है वह और आप आराम कीजिये मैं आज यही हु. थोड़ी देर ऋतू के पास जा रही हु. उसने भी बात करनी है कुछ.", मंजू ने इस बार पाँव छू कर जैसे सास का आशीर्वाद लिए. एक और परिवर्तन हो चूका था जिसके लिए जहा रेखा के दिल में कुछ कसक थी वही अब ख़ुशी भी थी की बचे कुछ फैंसले बड़ो से बेहतर ले रहे थे. जिसमे उन्होंने अपने साथ हुए अन्याय के लिए किसी को दोषी ठहरने की जगह सबको एक साथ रखना बेहतर समझा था.

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"आप क्या विचार बना रही हो बुआ?", अर्जुन सुधीर की दूकान से बहार आया तोह इतनी देर से मैं में रुका सवाल पूछ हे लिए. यहाँ उन्होंने कपडे पसंद किये थे लेकिन थोड़ी देर बाद लेने का कहा था. मधु ने अपने बेटे, पति और saas-sasur के साथ देवरानी (सारिका) और बच्चों (Tulika-Nipun) के लिए भी कपडे पसंद किये थे.

"तुम्हे क्या लगता है मैं बस ये सब लेने आई हो वह भी तुम्हारे साथ?", ख़ुशी से अर्जुन का हाथ पकडे वह उसके साथ मोटरसाइकिल की तरफ चल दी.

"तोह अब इसके बाद हमने क्या करना है? जाते हुए इनविटेशन कार्ड भी ले चलेंगे. प्रिंटिंग प्रेस वाले अंकल कह रहे थे की और जरुरी आर्डर न होने की वजह से आज 11 बजे हे कार्ड मिल जायेंगे."

"ओह मेरे भोले सनम, हर वक़्त काम काम करते रहते हो. यहाँ मैं तुम्हारे साथ समय निकाल कर बहार आई हु और तुम ऐसी बातें कर रहे हो. आज मैंने ससुराल चले जाना है और फिर पता नहीं के मौका कब मिले तुम्हारे साथ कुछ पल बिताने का. मेरा दिल है अगले 3 घंटे बस मैं दुनिया से परे तुम्हारे साथ राहु. अब शहर तुम्हारा है तोह जगह भी तुम्ही लेके चलोगे.", अर्जुन अब समझ गया था के बुआ की ये ख़ास हसरत क्या है और वह भी उन्हें नाराज नहीं करना चाहता था. सच हे था के अब वह अगर आएँगी तोह पूरे कुटुंब के साथ और उस माहौल में दोनों को मिलना मुनासिब होता भी तोह मुश्किल जरूर होता.

"अब ऐसी कोनसी जगह होगी बुआ, पुराने घर भी आज मिस्त्री लगे होंगे और होटल तोह किसी भी सूरत में नहीं."

"क्यों होटल में क्या बुराई है? कौनसा कोई जानता है हमको.", बुआ ने मोटरसाइकिल के पीछे प्रेमिका की तरह सत् कर बैठते हुए कहा.

"नाम हे बहोत है हमारा पहचान के लिए और आपकी इज्जत मैं दांव पर नहीं लगा सकता. चलिए अब आपने मेरे साथ हे एकांत में समय बिताना है तोह हम मेरी जगह हे चलते है. ली तोह थी ये सोच कर की दिन में पढ़ाई करना ठीक रहेगा लेकिन अपने गार्डियन से भी मिलवा हे देता हु उन्हें.", अर्जुन ने शहर से मोटरसाइकिल घुमा कर वापिस घर की तरफ मदद दी.

"तुम उधर कहा जा रहे हो और कौनसी जगह ली है तुमने जो किसी को भी नहीं पता.?"

"देख लीजियेगा अब जा हे रहे हैं. और वह आपको तोह कोई पहचानता नहीं तोह बस जैसा मैं कहु वही करना. जहा तक उम्मीद है कोई परेशानी नहीं होने वाली.", अर्जुन अब घर की बजाये यूनिवर्सिटी वाली सड़क पर हो लिए. खाली सुनसान सड़क पर मोटरसाइकिल सही गति से जा रही थी और मधु बुआ भी वाकिफ थी इस जगह से क्योंकि शहर तोह उनका भी यही था शादी से पहले.

"तुम यूनिवर्सिटी लेके जा रहे हो मुझे? वह पक्का पहचान का कोई मिल हे जायेगा. होटल बेहतर रहता अर्जुन नहीं तोह वैसे हे घूम लेते कही.", थोड़ी बेचैन होने लगी थी वह लेकिन देख कर हैरान भी हुई की यूनिवर्सिटी के गेट पर खड़े गार्ड ने अर्जुन को मुस्कुरा कर सलाम किआ और इसने भी हाथ हिलाते हुए बिना रोके मोटरसाइकिल आगे बढ़ा दी. अब कही कही yuvak-yuvtiyan दिख रहे थे जो या एडमिशन के लिए आये होंगे या हॉस्टल वाले. ज्यादा भीड़ नहीं थी. और 500 मीटर इस तरफ आगे आते हे वह भीड़ भी पीछे रह गयी.

"हम जा कहा रहे है ये तोह बता दो.?"

"मेरे हॉस्टल लेकिन आप कुछ पूछेंगी नहीं बाकी मैं बता हे दूंगा.", एकांत में हे ये बड़ी बिल्डिंग बानी थी जहा आगे जंगल और सामने खाली हिस्से में कुछ दोपहिया वहां खड़े थे. अर्जुन ने 109 नंबर वाली जगह मोटरसाइकिल उस शेड के निचे लगाने के साथ हे बुआ को अभिभावक की तरह चलने को कहा. इस खुले हॉल में चमकदार फर्श और आगे एक तरफ लकड़ी के बड़े काउंटर के पीछे कुर्सी पर बैठा करीब 40 की उम्र का व्यक्ति.

"गुड मॉर्निंग सर. मेरी बुआ जी आये है हॉस्टल और ैकादशं देखने. इनका विसिटियर्स फॉर्म फइलल कर दीजिये. बुआ जी अपना पहचान पत्र दे दीजिये सर को.", अर्जुन ने जैसे हे ये कहा वह व्यक्ति मुस्कुराता हुआ खड़ा हो गया कुर्सी से. बुआ पर्स से वोटर कार्ड निकल रही थी, जो हिमाचल का था.

"नहीं नहीं अर्जुन बाबा. आपको जरुरत नहीं इतनी फॉर्मेलिटी की. वैसे भी मम इतनी दूर से आयी है तोह आप दिखाए हॉस्टल, कॉमन एरिया और बाकि फैसिलिटीज.", एक नजर भर पहचान पत्र पर डालते हे व्यक्ति ने देख लिए था के ये बहार से हे आयी है और बातों से बुआ भी समझ गयी थी की अर्जुन का इस निरीक्षक से ाचा taal-mel है. उन्हें धन्यवाद कहते हुए दोनों लम्बे गलियारे से आगे को चल दिए. एक तरफ कमरे थे और दूसरी तरफ उद्यान जहा शान्ति थी.

"लोकल हो कर इंटरनेशनल हॉस्टल में. क्या चक्कर है ये सब और घर पे पता है इस सबके बारे में?", बुआ ज्यादा देर न रोक सकीय पूछने से लेकिन अर्जुन गलियारे से अंदर मुड़ते हे इस अलग से कमरे को अपनी चाबी से खोलता इस बड़े कमरे के अंदर आ गया. बुआ ध्यान से देखने लगी. आम कमरों से करीब डेढ़ या दोगुना बड़ा कमरा था ये जहा एक डबल बीएड, स्टडी table-chair, computer-internet, छोटी रसोई जैसी जगह और इण्टरकॉम भी लगा था. एक तरफ किताबो की कतार और अर्जुन की बॉक्सिंग किट भी लती हुई थी.

"ऐसा है न बुआ के यहाँ सुकून है थोड़ा पढ़ने के लिए और कंप्यूटर सीखने के लिए. 2-3 सीनियर्स भी है इधर जिनसे वार्डन ने परिचय करवाया था के वह कंप्यूटर में हे मेजर कर रहे है. तोह मैंने ये रूम ले लिए और स्टेडियम भी पास हे है तोह दोपहर को यहाँ आने के बाद शाम को सीधा घर.", अर्जुन ने दरवाजा बंद करते हुए आधी बात बता दी.

"सवाल है के इंटरनेशनल हॉस्टल में रूम कैसे मिल गया?", बुआ ने आँखें उठा कर टेढ़ी मुस्कराहट से अर्जुन को देखा और वह उनकी बगल में बिस्टेर पर पसर गया.

"चैन नहीं मिल रहा क्या आपको? साथ समय बिताना जरुरी है या jaan-na?", अर्जुन के ऐसा कहते हे वह दुपट्टा और पर्स एक तरफ रखती उसके ऊपर झुकती चली गयी. होंठो पर होंठ रखती मधु बुआ ने खुद को थोड़ा व्यवस्थित करते हुए पूरी तरह अर्जुन पर टिका लिए था. आँखें मस्ती में बंद हुई और हाथ अर्जुन के कंधो पर कस गए.

"आठ. मिल गया जवाब? और हमको घर जाना है इसलिए कपडे खराब नहीं करने.", बुआ ने बिस्टेर पर बैठ कर अर्जुन की तरफ पीठ करके चैन खोलने का इशारा दिए. जल्द हे वह peela-hara कमीज उनके मादक गदराये जिस्म से जुड़ा हो कर एक तरफ पड़ा था. सफ़ेद रेशमी ब्रा उनके सुडोल बड़े सन्नो को मुश्किल से समेटे थी. वही गोरा पेट और गहरी नाभि इस उजाले में देख अर्जुन ने भी फुर्ती से अपनी टीशर्ट और जीन्स जुड़ा कर दी जिस्म से. बुआ सलवार में बैठी उसकी तरफ मुस्कुरा कर देख रही थी.

"क्या देख रही हो बुआ?"

"देख रही हु के तू भी मेरे हे जितना खुश है. और आज काम से काम मैं तेरे साथ सुकून से हु, तेरी जगह.", बुआ के इतना कहते हे अर्जुन उनकी तरफ घुटनो के बल सरक आया. ब्रा के ऊपर से नुमाया उन चिकने उभारो और खाई को चूमते हुए उसने मखमली पीठ से ब्रा की पत्तियां खोल दी. दूसरे हाथ से सलवार का नाडा ढीला करता वह बुआ को बिस्टेर पर लिटा चूका था. दोनों गोल मटोल बड़े उभर हिलते हुए बुआ के साथ हे निचे हो गए.

"अब तोह कोई डर नहीं है न बुआ?", अर्जुन ने सलवार को भी जुड़ा कर के बाकी कपड़ो के पर रखने के बाद बुआ से चिपक कर कहा. दोनों मखमली उभर उसके सीने से दबते हुए उत्तेजना में इजाफा कर रहे थे. अंगूर के छोटे दाने जितने चूचक कड़े हो कर सीने पर चुबने लगे लेकिन अर्जुन ने बुआ के नरम मांसल जिस्म को आगोश में लेते हुए उन रसभरे हिलते होंठो को अपने होंठो में ले लिए. दोनों के जिस्म पर बस एक एक छोटा वस्त्र था और उनमे क़ैद ख़ास अंग अभी से गर्मी पकड़ रहे थे.

"डर तोह तेरे साथ होने पर कबि लगता हे नहीं अर्जुन. बस परवाह होती है जैसे तू मेरी करता है वैसे हे मैं तेरी. आह्हः.. तूने मेरे लिए इतना किआ तोह आज मेरी इत्छा थी की मैं खुलकर तेरा शुक्रिया करू. जैसे तुझे पसंद है वैसे और मुझे तोह तेरा सबकुछ पसंद है. उमंमाहहह.", बुआ भी अभी गीली जीभ उसके मुँह में घूमती निचे से अपनी टाँगे फैलाये उस सख्त उभार की रगड़ का मजा छूट पर ले रही थी.

"आपके लिए तोह मैं हमेशा हे हु बुआ, बस वह आप अपना नाम सार्थक करना.", अर्जुन ने निचे की तरफ सरकते हुए दोनों मॉटे उभारो को थाम कर उस सफ़ेद झीनी पंतय के पहले हुए हिस्से पर होंठ लगा दिए. मधु के पेट में उठती हुई तरंगो ने जैसे स्वागत किआ था उसके इस स्पर्श का. वह ख़ास कस्तूरी की महक लेता अर्जुन जान गया था के बुआ ने आने से पहले अपने यौवन को भी निखारा है.

"रात उम्मीद के मुताबिक नहीं गयी क्या बुआ.?", अर्जुन ने एक पल के लिए दोनों चुचो को छोड़ कर उन मटके से गोल और बड़े कूल्हों के बीच फांसी पंतय निकल कर इस दमकती छूट को नजर किआ और बुआ के उपहार पर खुश हो गया. गोरी छूट खासी उभरी हुई थी लेकिन पूरी सफाचट. छूट के बाहरी होंठ थोड़े खिले गुलाब से उसको आमंत्रित कर रहे थे. अर्जुन ने एक छोटा सा चुम्बन करने के बाद बुआ को देखा और इस ras-kund पर होंठ लगा दिए. दोनों हाथो से वह अब उनके कैसे हुए चुचो को भी मसल रहा था.

"आठ.. यही जादू हर किसी के बस का नहीं है रे.. आठ तेरे फूफा मेरे इस नए जिस्म की गर्मी के आगे 2 मिनट मुश्किल से टिक सके बाथरूम में और फिर शराब के बाद बस तरफ करते सो गए. ाचा लगा उनकी आँखों में अपने लिए प्रशंशा देख कर. बार बार कह रहे थे.. आह्हः... की मधु तू हॉट हो गयी है.. आह्हः... अर्जुन इतनी जल्दी नहीं आह्हः..", बुआ खुद भी 3-4 मिनट में अर्जुन के होंठो से हे स्खलित हो गयी. जो उनकी तड़प का सूचक था. सरक कर अर्जुन उनके मॉटे गुब्बारों पर मुँह लगता छूट को ऊँगली से छोड़ने लगा.

"आपको नहीं लगता के आप सचमुच पहले से ज्यादा हॉट हो गयी है? अब चाल में भी बदलाव आ गया है आपकी, कितने कॉन्फिडेंस से चलती है आप. और थोड़े हे दिन रूटीन बदलने से शरीर टाइट हो गया है हर तरफ से."

"उम्म्म.. धीरे ऊँगली चला राजे, आठ.. मैं तोह ट्रेडमिल पर भी दौड़ रही हु 10 दिन से.. उम्म्म.. जल्दी समां जा एक बार.", बुआ ने मस्ती में अर्जुन को ऊपर खींचा तोह उसने एक तरफ हो कर पहले अपना अंडरवियर निकला और फिर से उनके होंठो को पीते हुए एक उभार मसलने लगा.

"बुआ, यहाँ चीख भी सख्ती हो आप. Sound-proof है कमरा.", अर्जुन ने अपना मोटा सूपड़ा रास बहती छूट पर फिरते हुए उन्हें खुलकर साथ देने को कहा तोह वह भी उसकी बात हंसती हुई टाँगे फ़ैलाने लगी.

"मतलब तू चाहता है मैं बेशर्मी के साथ करू? ऐसा हे ले फिर.. चल आजा andar..ahh..", अर्जुन ने भी सूपड़ा निशाने पर रखते हुए उनकी दोनों टाँगे ऊपर उठा ली. छूट कुंवारी की तरह बिलकुल चिपक चुकी थी, फूलने के साथ हे. और अगले हे पल लुंड बुरी तरह रगड़ पहुँचता आध छूट में उतर गया.

"माआ.... मार दिया रे अर्जुन तूने तोह.. आठ.. ओह्ह्ह्ह माँ. ृक्क जा कमीने.. फाड़ दी एक हे बार में.. आठ.. फट गयी सचमुच ", छूट फटी न थी लेकिन लुंड 2 हे बार में अर्जुन ने जड़ तक अंदर थोक कर उसको फैला जरूर दिए था. 1 मिनट उन्हें सँभालने का देते हुए अर्जुन ने बुआ को तबियत से छोड़ना शुरू कर दिए. हर धक्के पर वह कसमस्ती हुई aah-aah करने लगी थी.

"बुआ हो तो आप कमाल हे .. आठ.. लगता हे नहीं के पहले भी किआ है मैंने आठ.. टाइट कैसे हो आप इतनी.. उम्म्म.", उनके चुचो को मुँह में भर कर चूसता वह बड़ी बेरहमी से धक्के लगा रहा था क्योंकि बुआ बराबर जोश बढ़ा रही थी.

"ोूफ़.. पता है मेरा दिल था तेरे साथ खुलकर सेक्स करने को.. आठ कोई तरस न खाये तू और मेरे जिस्म को इतना हिला दे के बस करवट लेने पर भी तेरी याद आये.. आठ.. कस के और जोर से.. आठ.. 2-3 दिन में वैसे भी ये रेस्ट पे जाने वाली है.. आठ.. चल पोज़ बदल. मुझे पता है तुझे कैसे ाचा लगता है.", बुआ ने वह समूचा लुंड बहार निकल कर एक बार ध्यान से देखा और मुस्कुराती हुई अपने 40 के कूल्हे अर्जुन की तरफ देख अपने ऊपर बुलाने लगी. तजा सखतलित छूट इस मुद्रा में रास बहती खुलकर न्योता दे रही थी. लटकते मॉटे दूध भी उकसा रहे थे के अब इस घोड़ी को तबियत से रगड़ डालो. चिकनी कमर को पकड़ कर अर्जुन ने एक हे बार में पूरा खूंटा अंदर उतार दिए.

"आह्ह्ह्ह.. माँ. सीधा आखिर में जा के लगता है रे तेरा. आठ. चल दिखा जोर अब.. आह्हः..", बुआ के इतना कहते हे अर्जुन उनके गाल चूमता छूट का भूगोल बिगड़ने लगा. मुलायम गीली छूट खुलकर रास उड़ेल रही थी. हर धक्के पर कमरे में मस्ती भरी आहों के साथ fachak-fachak का संगीत गूँज रहा था. उनके पूरे जिस्म पर चाय अर्जुन स्टैनो को मसलते हुए लाल होने लगा था. छूट भी लुंड की फुलावट जान गयी थी.

"अंदर हे भर दे अर्जुन.. आह्हः.. उम्म्म.. मैं भी गयी रे.. ", बुआ का सखलन होने के बाद अर्जुन भी 8-10 धक्के उनके भारी चुत्तड़ो को दबाते हुए मार कर गहराई में खाली होने लगा. साड़ी चुदाई का नशा एक तरफ और अर्जुन के वीर्य को अंदर भरता महसूस करके बुआ के मीठी सिसकारियां एक तरफ थी. उसने भी निराश न किआ और पूरी सुरंग को गरम धार से सेंकने के बाद हे लुंड बहार निकल कर बिस्टेर पर लुढ़क गया.

"अह्ह्ह्ह.. जान निकल कर फिर से ज़िंदा कर देता है रे. कसम से जितना तू एक बार में अंदर छोड़ता है मुझे नहीं लगता कोई 5-6 बार में भी इतना रिलीज़ करता होगा. चादर ख़राब होने से पहले बाथरूम जाना हे ठीक रहेगा.", बुआ कड़ी होने लगी तोह अर्जुन उनसे पहले उठ कर उन्हें गॉड में लिए बाथरूम में आ गया.

"आराम से बुआ, आप साफ़ कर लो फिर थोड़ा आराम करते है.", उन्हें कोड पर बैठा कर खुद अपना लुंड वाशबेसिन पर धोने के बाद बहार भी वह बुआ को गॉड में उठा ले आया.

"आधा घंटा बस. उसके बाद आगे और पीछे.", बुआ ने उसका चौड़ा सीना सहलाते हुए कहा तोह अर्जुन ने लटकते दूध को पकड़ लिए.

"सो कौन रहा है बुआ. आधा घंटा मैं इन्हे प्यार करूँगा, बातें करूँगा फिर जो आप चाहे वही.", अर्जुन ने उन लरजते होंठो को कस के चूम कर बुआ को अपने साथ लगा लिए. एक टांग उनके ऊपर रखता अब बड़े आराम से सिर्फ चुचो को पी रहा था. अभी इनका बड़ा दौर बाकी था और समय का कोई अभाव भी न था.
 
लगता है के 2 अपडेट ज्यादा हो गए एक साथ. आगे से एक हे देना ठीक रहेगा.
 
अपडेट 115

मुकाम - Haansil/Pryaas (1)


चंद्रो तै के घर जरुरी काम शुरू करवा कर और भरोसे के आदमी लगवाने के बाद शंकर जी अपनी ड्यूटी पर निकल लिए. उमेद सिंह भी अपने दोस्त के जाने के बाद कुछ देर 2-3 काम करवाने के बाद अपनी मंज़िल पर बढ़ चला. शंकर जी का दिन ाचा हे शुरू हुआ था और आज लता ने बिना नखरे हे उनकी चाय समय पर पीला दी थी. बिजेन्दर भी इधर आ गया था क्योंकि दूसरी हवेली पर विकास ने काम अपने जिम्मे ले लिए था, अक्षरा उसकी मौसी की बेटी जो थी. आज शंकर जी लगभग 2 हफ्ते के बाद काम पर लौटे थे.

"कहा गायब है बे तू? वैसे आज तोह सुबह सुबह चमक रहा मेरे चाँद.", छोटा सांगवान भी अपने दोस्त को देखते हे चहक उठा. शंकर के बिना तोह शायद हे कोई दिन गुजरता था उसका. अभी राउंड शुरू हे करने लगा था के सामने से अपने मित्र को देख हाथ पकड़ के राउंड पर हे हो लिए.

"घर पे काम भी है चल रहे है यार. रात उमेद के साथ था और सवेरे देवी के मंदिर में पूजा करने के बाद ताई की हवेली भी काम शुरू करवाया. बिजेन्दर और बबिता की शादी है 5 दिन बाद. वैसे तू तोह कल नहीं आया होगा?", शंकर जी ने अपने दोस्त के हाथ से पेशेंट फाइल ली और देखने लगे. दोनों को अब तक कोई 7-8 nurse/doctor गुड मॉर्निंग बुला चुके थे.

"यार हालत हे बुरी हो गयी थी. साली रुस्सियन ने 3-4 सिग्रेटी पीला दी थी सुबह तक और उसके बाद आँख शाम को 4 बजे खुली. बाप ने गांड तोड़ी वह अलग, सुना सुना के. आइंदा ये बकचोदी नहीं करने वाले भाई.", सांगवान के लहजे में सचमुच चिंता थी.

"मेरे बारे में क्या कहा उन्होंने?", शंकर जी को भी असर तोह हुआ हे था उस सिग्रत्ते का साथ हे उन्हें चिंता भी थी की कही बड़े सांगवान जी उन्हें हाजिर हे न कर ले.

"तू तोह आया हे नहीं था यार मेरे. रामेश्वर ताऊजी से 7-8 बजे बात हुई थी उनकी कल और तू उमेद के साथ था नाश्ते पर. बोले के उस से सीख, वह दारु भी पीटा है लेकिन अपना दिन खराब नहीं करता. बहनचोद सच में शंकर तू पक्का कमीना है. चल इधर ये तेरे मतलब का पेशेंट है.", दोनों हे इस कमरे में चले गए और मरीज को चेक करने के बाद फिर से बातों में लग गए.

"तू एनी भाभी और मरीना बिटिया को कब लाने की सोच रहा है? चाचा (बी सांगवान) कह रहे थे के कानूनी प्रक्रिया पूरी हो गयी है. काम से काम बहनचोद तेरा हे ठरक्पना तोह ख़तम होगा.", शंकर जी ने इस बात का जीकर किआ तोह सांगवान दूसरी तरफ की सीढ़ियों से निचे उतरता SMO-P सांगवान की नाम प्लेट लगे केबिन में घुस गया.

"इतना आसान न है बावले भाई. ांनी की शर्त है के मैं आधी प्रॉपर्टी का वारिस मरीना को बनाऊ."

"चाचा नहीं मान रहे क्या?", शंकर जी ने पानी की घूँट लेने के बाद टेबल पर राखी फोटो को निहारा. छोटा सांगवान जहा भी जाता था बदली होने के बाद, अपने ऑफिस में ये फोटो सबसे पहले रखता था. उसकी बेटी मरीना क सांगवान.

"बापू तोह अपने आप में पहेली है. बोले था के अभी तक प्रॉपर्टी का बंटवारा हे कब किआ है. लेकिन फेर बोल्या के एक फार्महाउस, गाँव वाला घर, इधर वाली कोटि और 10 किल्ले जो मेरे नाम है वह ांनी को दिखा के उसकी मर्जी से चाहे आधा या फिर पूरा हे नाम कर दे मरीना के. लेकिन इस से सब बदलेगा क्या यार शंकर?", सांगवान ने भी उस फोटो को उठा लिए. फोटो शायद थोड़ी पुराणी थी जिसमे ये 15-16 साल की छरहरी पतली सी लड़की मुस्कुरा रही थी. कंधे से थोड़ा निचे तक के सुनहरे बाल, हरी आँखें और safed-gulabi रंग.

"आज भाई की तरह कहता है परम. तेरी हे गलती थी जो एनी को दूर जाना पड़ा और उसके बाद तूने उसके बाप को कितना कुछ कहा था. चाचा ने उस दिन फार्म पर तेरे जीकर करते हे वह बात कर ली थी, माफ़ी के साथ. पता है मानसिकता रखनी है खाप अनपढ़ वाली और टशन दिखने है इंग्लिशमैन वाले. किस बात का हकार है भाई जरा ये बता तू, इंगलिश में ईगो कहने से समझ आ जाये शायद तुझे. दुनिया biwi-beti के लिए जान पर खेल जाती है और तू अकड़ में कितना कुछ कर गया और फिर माफ़ी मांगने की जगह जुगाड़ लगा के लाने की बातें कर रहा था. बंद करके रखेगा क्या यहाँ हवेली में?", शंकर का एकाएक अलग लहजा देख कर सांगवान की नजरे झुक गयी.

"हो जाया करे यार गलती जाट से. Khaa-pee के तोह ज्यादा समस्या हो जाया करे है. लेकिन घर में वैसे कपडे ठीक बात तोह न थी, मेहमान के सामने."

"रूस से है वह, उप से नहीं के इधर की गर्मी का असर न हो. क्या बुराई थी कपड़ो में? लोगो को तोह ट्रॉफी की तरह तू हे दिखता था न के मेरी बीवी रूस से है, मेरे जितने लम्बी फलाना ढिमका. समझ तोह तुझे अभी भी पूरी नहीं आयी मेरे दोस्त. बेशक अब गलती का एहसास होता है लेकिन एनी ने तेरे साथ शादी के बाद तेरा नाम अपने साथ जोड़ लिए और सबूत है मरीना का पूरा नाम जो आज भी सांगवान लिखती है. भाड़े की रंडियों पे गुस्सा या प्यार जताने से ाचा है सामरा (रूस का एक शहर) जा और biwi-beti को ले आ. जाट की तरह नहीं एक बाप और पति की तरह जा. ससुर भी तेरा ाचा और शरीफ आदमी है, माफ़ी मांग लियो.", शंकर जी ने अपने दोस्त का हाथ पकड़ कर समझते हुए हिम्मत दी.

"तू सही कह रहा है यार. मैं न उसको जायदाद जैसा समझ रहा था. एनी पहली बार जब देखि थी तोह बिकिनी में हे थी, अपने देश से बहार. यहाँ तोह वह सर्दियों में सलवार कमीज पहन के रक्तही थी. गर्मी में भी गाँव वाले घर में अगर जाती तोह पूरे कपडे, बेशक पसीने में बेहाल हो जाती थी. भाई मरीना तोह हिंदी भी बोलने लगी थी शंकर. पापा से बात कर न यार.", सांगवान सचमुच हे कमजोर सा हो गया था इतनी हे देर में. शंकर ने भी एक हाथ थामे दूसरे से बड़े सांगवान जी का नंबर मिला दिया. कोई 4-5 घंटी के बाद हे आवाज सुनाई दी.

"चाचा, शंकर बोल रहा हु."

"हाँ बीटा, हुकुम."

"परम की टिकट करवा दो मास्को की, बीवी बेटी लेके आ रहा है ये."

"जायदाद मांग रही है एनी और ikraar-nama भी के अगर फिर से फिजिकल एब्यूज या झगड़ा किआ तोह वह फिर केस भी कर देगी और तलाक भी ले लेगी. बता दो जरा अपने जिग्गी को."

"बापू, सब मंजूर है. मेरा तोह सबकुछ हे मरीना है फेर आधी के और पूरी के. बस आप फ़ोन कर दो उनके घर के मैं आज हे निकल रहा हु लेने. अब न नींद आती गुलाटी के फार्म पर.", सांगवान तोह बाप से कहते कहते रोने हे लग पड़ा. अपने बेटे के आंसू जैसे बड़े सांगवान को भी एहसास करवा गए के इस बार सचमुच परमवीर सांगवान एक baap-pati बोल रहा है.

"कल सवेरे लिकड़ जाइये, मैं प्रबंध करू हु. दोपहरी तक शंकर धोरे रहिये, मैं आऊंगा तेरी माँ के साथ. एनी तैयार है बस फ़ोन तू कर ले, पौती भी केहवे थी 'where's माय डैड? व्हाई हे नेवर स्पीक तो उस?', फ़ोन शंकर ने दे नकली जाट. सुसरा टेसू बहन लाग रहा तड़के तड़के.", मीठी झाड़ मारने के बाद कुछ देर उन्होंने शंकर को समझाया और अलग बात की.

"सुन्न लिए, चाचा ने भी कह दिए के तू नकली है. चल छोड़ ये सब और मूड ठीक कर. इतने साल बाद ससुराल जा रहा है खली हाथ जायेगा? वैसे भी वह तमीज और िज्जात्त के साथ उपहार भी मायने रखता है.", शंकर ने अपने दोस्त को थोड़ा ठीक थक किआ और 2 चाय मंगवा ली. कुछ देर अपने दोस्त से बातें करने के बाद वह अपने केबिन में चले गए. यहाँ भी उनके पास कुछ मरीज इन्तजार कर रहे थे और लाइन कुछ लम्बी हे थी.

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हॉस्टल के कमरा नंबर 109 में एक बार फिर माहौल गरम और मादक हो चला था. बुआ को सामने से 2 बार संतुष्ट करने के बाद अर्जुन अब उन बड़े कूल्हों के गहरी दरार को फैलाये लचीले guda-dwaar में पूरा लुंड फंसा कर चिपका हुआ था. इस छेड़ के लिए मधु पर्स में हे लोशन लेके आई थी. उन्हें भी मालूम था के बेशक पीछे भी उन्होंने करवाया है लेकिन अर्जुन का हथियार उस छूट से ज्यादा तंग चले में आराम से नहीं जाने वाला था. जड़ तक लुंड अंदर लेने में हे उनके पसीने निकल आये थे और अब अर्जुन उनका चेहरा घुमाये होंठो को चूसता हुआ बस मॉटे चुचो को मसल रहा था.

"तुझे इतना पसंद है मेरे पीछे करना?"

"बात करने की नहीं है बुआ. ये बड़े आकर्षक है और बहोत हे ख़ास. ऐसे हे आपको बूब्स भी है. आपके हिप्स को बिना कपड़ो के देखते हे बस दिल करता है के इन्हे प्यार करू. नरम और कितने लचीले है ये, एकदम चिकने.", अर्जुन ऊपरी कूल्हे को मसलते हुए वह गर्मी भी महसूस कर रहा था जहा लुंड अंदर फंसा था. बुआ भी उस मॉटे डंडे को अंदर फडकता देख अर्जुन की बाहों में मचलने लगी थी. उनकी हालत देख अर्जुन ने आराम से कमर पीछे करते हुए थोड़ा बहार निकल और फिर से अंदर कर दिए.

"आह्हः.. ये पहले ऐसे न थे.. आह्हः. हेअल्थी तोह मैं शुरू से हे थी लेकिन तारा और हिमांशु के होने के बाद ये बड़े होने लगे. उम्म्म.. धीरे धीरे कर अर्जुन, इतना भी आसान नहीं आह्हः.. फिर मुझे भी एहसास हुआ के ऊपर और निचे से मैं अलग दिखने लगी हु. बचो के होने के बाद पति प्यार करना काम न कर दे इसलिए उम्म्म.. मैंने इनका ख़याल किआ.. आह्हः.. ऐसे हे कर बड़ा ाचा लगता है रे उम्म्म.. तेरी नजरो में जब मेरे लिए इतनी चाहत देखती हु न तोह लगता है बस तेरे लिए हे शायद इन्हे इतना संभाला मैंने.", बुआ मस्ती में सिसकती हुई अपने पीछे अर्जुन के गहरे धक्को का मजा लेने लगी. धक्को के साथ हे अर्जुन का उनके नरम कूल्हों का मांस दबाना बता रहा था के अर्जुन कितना आकर्षित था उनके इस हिस्से से.

"कोई कह नहीं सकता बुआ.. आठ.. आप 2 बचो की माँ हो.. अभी तक ये कितने सख्त है.", निचले हाथ से उनका एक लुढ़का उभर पकडे वह पहले हुए निप्पल को सेहला रहा था. गोरी गर्दन पर होंठ फिरता अर्जुन भी गांड की कसावट से निहाल हो रहा था. पिछले डेढ़ घंटे में उसने बुआ का पूरा शरीर निखारते हुए अपनी चाप जगह जगह बना दी थी. इधर गुलाबी गांड के चले में फंस कर अंदर बहार होते उस मॉटे लुंड ने तोह छेड़ अधिकतम चूडा दिए था. लुंड बहार आते हुए गुलाबी हिस्सा भी साथ ले आता.

"आह्ह्ह्हह.. तेरा इंसान वाला नहीं है न.. मा.. धीरे कर पूरा निकल कर क्यों दाल देता है? उम्म्म्म.. शरीर ऐसा न हो तोह तुझे कोई जवान लड़की तोह क्या औरत भी झेल नहीं सकती.. जाने कैसे रेणुका ने आह्ह्ह्ह.. हिम्मत जूता दी.", अर्जुन ने पीछे से हे ऊपर वाली चिकनी जांघ उठाते हुए बुआ की कास के चुदाई शुरू कर दी. अब धक्को से बिस्टेर भी हिलने लगा था. चुत्तड़ और उभर कर पानी के गुब्बारे से हिलने लगे.

"रेणुका भी प्यार करती है न बुआ. आह्हः.. और उनके साथ मैं पूरी कोशिश करता हु के दर्द न दू. आप स्ट्रांग हो और बॉडी भी भरी हुई है. उम्..", बुआ के लार से भीगे होंठो को चूसता हुआ वह निरंतर guda-dwar को ढीला कर रहा था. मधु बुआ तोह इस छेड़ में चुदाई से भी चरम पर आने लगी थी.

"उम्म्म्म.. पता है मुझे.. आठ.. लेकिन अब थोड़ा जोश से किआ कर उसके साथ, सावधानी तोह रखता हे है.. माँ बन्न ने के बाद फिर तुझे बताएगी देखना.. आह्हः.. मैं गयी अर्जुन..", बुआ झड़ने लगी तोह अर्जुन ने सीने के बल लिटाते हुए अब पूरी रफ़्तार से दोनों बड़े गोलों के बीच धक्के लगाने शुरू कर दिए. मस्ती की चीखें तेज हो गयी थी. एक बार वह स्खलित हो चूका था इसलिए अभी तक टिका था.

"मार दिए रे kamine..aahh.. घर जाने लायक छोड़ डीओ.. माआहहहह.. आह्हः.. और तेज कर ..आह्हः.. अंदर हे भर दे आह्हः..", अर्जुन के लुंड की भयंकर मोटाई होते हे बुआ भी चादर कस के पकड़ती निढाल हो गयी. गार्डन की गहराई में वह मोटी वीर्य धरा ाचे से सिकाई करती हुई अलग हे सुख दे रही थी. लुंड अंदर हे फंसाये अर्जुन उनके ऊपर पसर गया. गर्दन को प्यार से चूमता हुआ वह बुआ के शरीर को सेहला रहा था.

"बुआ आपके साथ करने में इतना अलग और ज्यादा मजा क्यों आता है?", अर्जुन बुआ के बिखरे बालो को एक तरफ करते हुए उनके गाल चूमने लगे. निचे दबी मधु के चेहरे पर ये अलग हे मुस्कान आ गयी थी अर्जुन की बात सुन्न कर.

"कितनो के साथ कर चूका है और किसके साथ मजा नहीं आया?", अर्जुन इस सवाल से झेंप गया लेकिन वैसे हे उनके गाल को मुँह में भर कर चूमने के बाद लुंड बहार निकल कर दरार में दबाते हुए बोलने लगा.

"आपके और रेणुका बुआ के साथ.", अर्जुन नाम नहीं लेना चाहता था और मधु बुआ भी उसको शर्मिंदा नहीं करना चाहती थी ललिता जी का नाम ले कर.

"रेणुका तुझे पति की तरह देखती है और मैं प्रेमी की तरह. यही तोह फरक होता है दोनों में. वह चाह कर भी खुल नहीं सकती और मैं तोह तेरे सामने कपडे खोलने में परवाह भी नहीं करती. बस यही वजह है और जब तुम दोनों खुल कर बातें करोगे या घूमोगे फिरोगे तोह वह भी जल्द साथ देने लगेगी. लेकिन तू न ज्यादा हे एक्सपीरियंस है. जैसे पीछे करता है तोह कोई भी कह देगा ये, रेणुका तोह वह से कोरी है.", बुआ भी आराम से उसके वजन को झेल रही थी. उन्हें ाचा लग रहा था उसके निचे ऐसे दबना.

"नॉलेज हो जाती है बुआ और मैं ध्यान दूंगा रेणुका पर भी. वह सचमुच कुछ नहीं मांगती या कभी सामने से ख्वाहिश भी नहीं बताती."

"चल अब मैं नाहा कर त्यार हो जाऊ फिर इसका भी हल करते है. रेणुका के लिए मैं हे गिफ्ट लेती हु, निघ्त्य तोह वह सिर्फ तेरे साथ अँधेरे में पहनती है. इस बार जरा उसको थोड़ा फैशन भी सीखा दू, जाने से पहले. बाकी तुम मेरी बहिन का ऐसे हे ध्यान रखना. दिल से जुडी हुई है वह तुमसे.", बुआ के नहाने वाली बात से अर्जुन एक तरफ करवट ले कर लेट गया. गाढ़ा सफ़ेद रास उन गदराये कूल्हों की गहरी दरार से निकलता चिकने पत् तक आ रहा था. नंगी हे वह अपने कूल्हे हिलती हुई बाथरूम चली गयी. अभी चाल में जो बदलाव आया था वह देख अर्जुन मुस्कुराने लगा. बुआ जितनी भी हिम्मती थी लेकिन हथियार ऐसा हो तोह चाल बदलना स्वाभाविक हे है. अगले 20-25 मिनट में हे दोनों शहर की तरफ चल दिए थे, कमरा बंद करके.

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UP-Haryana की सरहद पर लगता ये शहर लकड़ी का एक बड़ा बाजार था और यहाँ कई व्यापारियों के पीछे प्रमुख था मला तोमर. कहने को एक कद्दावर नेता था ये 52 वर्षीया व्यक्ति लेकिन पिछले 30 सालो में इसने बहोत म्हणत से aas-pas के इलाके में मजबूत छवि बना ली थी. 4 बड़े प्लाईवुड के कारखाने थे इसके और साथ हे जमीन के सौदे karne-karwane में ये अव्वल व्यक्ति था. बेशक व्यापार में और भी लोगो का हिस्सा था लेकिन तोमर के मला बन्न ने के बाद वही प्रमुख था. बड़े बड़े बिल्डर जमीन खरीदी के लिए तोमर से हे संपर्क करते थे क्योंकि chote-mote व्यापारियों से वह सिर्फ चुनाव के वक़्त या अपनी मर्जी से मिलता था. व्यापारी होने के साथ साथ राजनैतिक व्यक्ति था तोह इसके भी 2 शौक थे, शराब और शबाब.

आज इसके प् ने बताया था के एक बड़ा व्यापारी उनके साथ मुलाकात करना चाहता है, काम करवाने के बदले आधा हिस्सा देने को तैयार. तोमर का भी तोह यही काम था. व्यापारी से मिलने के लिए 12 बजे का समय निर्धारित किआ गया. अगर सब सही रहा तोह दोपहर का भोजन साथ में नहीं तोह अपने आदमियों से उस जरुरी काम की जानकारी लेनी थी जो 5 दिन पहले सौंपा था. इन जनाब की एक माशूका थी जो फ़िलहाल गायब हो गयी थी लेकिन जहा ये घटना हुई वह वह खुद हाथ नहीं डालना चाहते थे. अपने निजी आलिशान में ऑफिस में ठीक 12 बजे पहुंचे तोह इनकी विदेशी टोयोटा के बराबर हे ये उस चंडी रंग की E-class आ रुकी. साढ़े 6 फ़ीट के ड्राइवर ने पिछले दरवाजा खोल कर अपने मालिक को बहार निकलने की सुविधा दी तोह तोमर कभी इस पहलवान से ड्राइवर तोह कभी इस चमकदार सफारी सूट और सोने की घडी पहने रईस आदमी को देखने लगा.

वह भी एक रईस था इसलिए फ़िलहाल नजरअंदाज करता ईमारत के अंदर बढ़ गया. उसके साथ हे वह चुस्त सरकारी ड्राइवर जिसने अब कंधे पर राइफल ले ली थी. इधर ये दोनों अनुयाई साढ़े कदमो से चलते हुए अंदर आये तोह बड़े बगीचे के बीच बानी इस एक मंजिला ईमारत में प्रवेश से थोड़ा आगे हे ये व्यक्ति रिसेप्शन पर बैठा था.

"आप है श रौनकलाल जी, V.R.S. ग्रुप के मद और इनकी मुलाकात का समय निर्धारित है श्रीमान M.L. तोमर जी के साथ.", ड्राइवर के लहजे से ये नहीं लग रहा था के ये दतियाकर व्यक्ति सिर्फ ड्राइवर है.

"हांजी. आप एक मिनट प्रतीक्षा कीजिये.", इस व्यक्ति ने तुरंत फ़ोन लगाया और जवाब मिलते हे उन्हें पहला कमरा छोड़ कर अगले में जाने का कहा. ड्राइवर भी उनके पीछे चलता इस कमरे के बहार पंहुचा तोह सुरक्षकर्मी ने वही रोक लिए.

"रिवॉल्वर जमा करवानी पड़ेगी, नहीं तोह यही इन्तजार कीजिये.", सरकारी सुरक्षाकर्मी ने ड्राइवर की कमर में होल्स्टर वाली रिवॉल्वर देख कर कहा. ड्राइवर ने भी बेल्ट के साथ रिवॉल्वर थमा दी जिसको खुले दरवाजे से अंदर बैठा तोमर भी देख रहा था. रौनकलाल जी अंदर हाथ मिलते हुए बहार भी देख रहे थे. ड्राइवर अंदर आने के बाद एक तरफ खड़ा हो गया था.

"बुरा मैट मानियेगा मला साहब, सिंह मेरा सिर्फ ड्राइवर नहीं साया भी है. अब व्यापर के साथ साथ पैसा भी लेकर चलना पड़ता है तोह जान का खतरा रहता हे है. सिंह ने 3 बार मेरी जान बचाई है पिछले 20 सालो में. इसलिए मैं अपनी मीटिंग में भी साथ रखता हु."

"अरे भाई रौनकलाल जी ज़िन्दगी है तोह पैसा है और जब ज़िन्दगी हे नहीं तोह पैसा किस काम का. आज पूरे 10 साल बाद मैं इस मुकाम पर पंहुचा हु के खुल कर इधर उधर घूम लेता हु. नहीं तोह पहले मुझ पर तोह अनगिनत बार गोली चली है. धीरे धीरे jan-sadharan की ताक़त से आसपास के 200 गाँव, 10 कसबे और 4 शहरों में जनता और व्यापारी सिर्फ इज्जत और प्यार करते है हमसे. फिर भी ये बहार खड़ा सरकारी ड्राइवर पोलिसिअ रखना पड़ता है, मज़बूरी में. बताया जनाब आपकी क्या खिदमत कर सकता है ये नाचीज, इतने बड़े ग्रुप के मालिक आज इस तरफ कैसे.?", रौनकलाल ने हाथ जोड़ दिए इतना सुन्न कर और फिर अपने ड्राइवर की तरफ देखा जो मूर्ति की तरह खड़ा था

"ऐसा है मंत्री जी की मध्य हरियाणा से दक्षिण तक तोह काम जमाया हुआ है, देवी माँ की कृपा से. लेकिन वह अब तकलीफ होने लगी है थोड़ी और उधर से व्यापार हटा कर अब आपकी तरफ भवन निर्माण और प्लाई के कारखने में आना चाहते है. रूपरेखा भी तैयार है और आप साथ देंगे तोह जमीन के साथ साथ निर्माण का मटेरियल भी आपकी शरण में मिल जायेगा. पैसे की चिंता नहीं है और आपके शाशन में शहर की तरक्की से दोनों को हे फायदा होगा.", रौनकलाल ने खीसे निपोरते हुए पूरी चाशनी उड़ेल दी थी.

"यार ये भवन निर्माण में कहा मुनाफा है? पैसा लगाओ, जमीन लगाओ और फिर बेचते फिरो. और न बिकी तोह सब पैसा जाम."

"न न मंत्री जी, आप तोह हाईवे पे हो दोनों तरफ से, और यहाँ से दिल्ली साथ हे तोह है. कितनो को संभालेगी छोटी सी दिल्ली? यु मान लो के 1 लाख की जमीन पे 1 लाख का माल लगे तोह 4 लाख में बिकेगी. खर्चे निकल कर डेढ़ लाख तोह खरा बचेगा भाई साहब. और परमिशन 6 से ज्यादा मंज़िल की मिल गयी तोह फिर वारे न्यारे है जी. डेढ़ की जगह 3 मुनाफा पक्का है. आपका तोह और भी ज्यादा, material-jameen भी तोह आप जी से हे लेंगे.", इस बार तोमर सोचने लगा था. सोचते हुए फ़ोन मिलाया और 3 कप चाय का बोलने के बाद थोड़ा आगे झुक गया उस आलिशान टेबल पर.

"इन्वेस्टमेंट कितना सोच के बैठे हो रौनकलाल जी? देखो इस जगह मैं अपने हे लोगो को बुलवाता हु बस निराश मैट करना."

"देखो जी हम भी साफ़ बात करने वाले व्यक्ति है भाई साहब. फ़िलहाल तोह ऐसा है जी की 40 तोह लगते साल में खर्च सकते है. थोड़ा समय लगेगा बाक लेकिन अगले साल इसका 5 गुना और फिर तोह यही से कामना और यही लगाना है जी.", रौनकलाल की बात सुन्न कर थोड़ा हैरत से देखने लगा था तोमर.

"ये 40 लाख और अगले साल 2 करोड़ लगाने का कह रहे हो आप? इतना तोह मैं जमीन के 2 सौदे करवाने में कमीशन ले लेता हु रौनकलाल जी. आप हमारा और अपना समय बरबड़ करने आ गए."

"क्या बात कर रहे हो भाई साहब? 250 करोड़ का सोचके आये थे हम तोह. कही आप मेरे उदहारण देने वाली बात को तोह नहीं मान गए? भाई साहब 50 लाख की गाडी में आपसे chindi-chori वाली बात करने आएंगे. इधर आप मंत्री हो जी लेकिन अपनी तरफ 5 ज़िलों में हम पत्ता ढून्ढ दे इतना वर्चस्व. बाकी अभी तोह अकेले इधर आये है लेकिन काम बढ़ेगा तोह जी मेरे जैसे दर्जन भर व्यापारी मित्र है जो शामे धंदे में उतरना चाहते है. इतना पार्टी फण्ड देंगे मिल कर के आपको कभी हमसे बहार नहीं जाना पड़ेगा.", यहाँ जैसे रौनकलाल ने किसी दुखती रागग पर हाथ रख दिए था तोमर की और हाथ में हाथ पकड़ने से तोह तोमर ठंडी सांस लेने लगा. रौनकलाल ने अपनी कलाई घडी उसके हाथ में पहना दी.

"भाई साहब को मुलाकात का शगुन है जी छोटे भाई की तरफ से. स्विट्ज़रलैंड से ख़ास मंगवाई थी 15 लाख की लेकिन मेरे हाथ थोड़े पौले है और आपके मजबूत.", अब घडी को निहारने के बाद तोमर खुसी से खड़ा हो कर रौनकलाल के गले जा लगा.

"आप मीटिंग रखवा लो भाई. हाईवे की साड़ी जमीन मेरे पास है जो मैं गलत इंसान को देने लगा था क्योंकि पिछले चुनाव में उसका एहसान था मेरे ऊपर. मैं भी काले को सफ़ेद करना चाहता हु. जमीन मेरी, पैसा आपका और मुनाफा आधा आधा."

"ये बात करि बड़े भाई आपने एक नंबर की. दिल्ली तक शहर बनाते जायेंगे अगर आपका आशीर्वाद रहा तोह."

"सर, बुरा न मानो तोह पूछ सकता हु के वह इंसान कौन है जिसको आप जमीन देने वाले थे? कल को कही आपके और हमारे रस्ते में आया तोह बात बिगड़ सकती है.", ड्राइवर सिंह के इस पहले सवाल पर जहा रौनकलाल ने गुस्से में आँखे दिखाई वही तोमर ने कंधे पर हाथ रखते हुए उसको शांत किआ.

"गलत सवाल नहीं है आपके आदमी का रौनक भाई. आदमी आपका अगर त्रिनेड है तोह शायद ये उस मुश्किल को हल कर दे. मेरे पास है राजनैतिक ताक़त और समझ लो के मैं इधर से उधर काम कर सकता हु. नाम बताने के एवज में मैं पहले तुम मेरा काम कर दो फिर हमारे इस नए धंदे पर मैं आँखें मूँद कर मोहर लगा दूंगा.", तोमर इतना भी बेवकूफ नहीं था.

"आप काम कहिये सर, हमारे इलाके में जैसा सेठ जी ने कहा हम पत्ते का पता बता सकते है.", ड्राइवर का आत्मविश्वास देख कर तोमर के चेहरे पर कुटिल मुस्कान आ गयी.

"ये लड़की गायब है कुछ दिनों से. ज़िंदा है इतना पता है और आखिरी बार **** शहर में थी हफ्ता पहले. चाहो तोह फैक्स मशीन इस्तेमाल कर लो, ईमेल की सुविधा भी मिल जाएगी तुम्हे. शबनम नाम है इसका और ये हमारी जान है.", तोमर ने तस्वीर ड्राइवर की तरफ सरकै और एक तरफ पड़ी machine-computer दिखते हुए कहा.

"जी कुछ एकांत मिल सकता है अगर बुरा न लगे तोह.?", ड्राइवर के इतना कहते हे तोमर अपने साथ रौनकलाल को बहार बगीचे में लिए चल दिए. चाय के कप रिसेप्शन वाला व्यक्ति उनके पीछे. वो लोग बगीचे में अगला आधा घंटा तफरी मारते रहे और इधर ये व्यक्ति मशीन और फ़ोन के साथ लगा रहा. फिर खुद हे तस्वीर लिए बहार चल दिए. ये सुरक्षाकर्मी भी उसके पीछे हो लिया जो शायद नजर रख रहा था दरवाजे के बहार से हे.

"सर, #### शहर में हे है ये लड़की. शबनम मिर्ज़ा नाम है इसका और इंग्लैंड से सम्बन्ध रखती है.", ड्राइवर के ऐसा बताने पर घास पर टहलते तोमर के पाँव वही जम्म गए. इतनी जल्दी इस व्यक्ति ने लड़की का पता लगा दिए था, उसके आदमी 5 दिन से मारे मारे फिर रहे थे लेकिन असफल.

"उस शहर में कहा है शबनम? मुझे वह लड़की चाहिए हर हाल में सिंह. तुम उसको मेरे पास ले आओ, मैं अपने हिस्से का 5 प्रतिशत तुम्हे देने को तैयार हु.", तोमर जैसे शबनम मिर्ज़ा का दीवाना था और दीवानगी की सीमा कहा होती है.

"वो कहा है इसकी कीमत चुकाने के बाद हे मुझे पता चल पायेगा. लेकिन कल ये लड़की आपके पास होगी, मैं जुबान देता हु.", सिंह ने वचन दिए तोह तोमर के चेहरे पर ख़ुशी आ गयी.

"कल का इन्तजार कही ज्यादा न हो जाये रौनकलाल जी. लेकिन हमको आपका ये वफादार व्यक्ति पसंद आ गया.", तोमर के ऐसा कहने पर रौनकलाल ने भी प्रशंशा की दृष्टि से अपने ड्राइवर को देखा.

"अब तोह ये आपके लिए भी काम करेगा भाई साहब. वैसे मैं कह रहा था के अगर आपके पास कुछ समय हो तोह भोजन किआ जाये और गाडी में ये सूटकेस भी इन्तजार कर रहा है आपका.", रौनकलाल ने सीधा पैसे न कहते हुए गाडी की तरफ इशारा किआ. तोमर भी बात समझते हुए उनके साथ कार की तरफ बढ़ चला, अपने surkashakarmi-driver को दूसरी गाडी पीछे लाने का कहा. सिंह की रिवॉल्वर भी अब वापिस मिल चुकी थी.

"रौनकलाल जी, आज आपको ऐसा भोजन करवाते है जो बड़े बड़े रेस्ट्रा में भी नहीं मिलता होगा. अपना एक निवास स्थान ये बहार हाईवे पर हे है, सिंह यहाँ से बहार निकल कर गाडी अपने हाथ की दिशा में सीधा ले चलना. और काम के बदले नाम की बात कही थी मैंने, तोह वो व्यक्ति है अवधेश मिश्रा, चीनी मिल और ईंट भत्तों की आड़ में इसके बहोत से अनैतिक धंधे है. मेरे पास लोगो का साथ है लेकिन संसद में जाने के लिए सिर्फ वही काफी नहीं होता.", तोमर अपने दिल की बात करने लगा था जैसे वह खुद किसी मुसीबत में हो और सिंह उसकी ये समस्या भी हल कर देगा.

"अवधेश मिश्रा, हरदोई वाले?", सिंह ने गाडी को इस हाईवे पर डालते हुए बस इतना हे पुछा और फिर से सामने ध्यान देने लगा.

"हरदोई तोह बस baa-dada की वजह से बताता है वह. साला यही दिल्ली के aas-pas अवैध खनन, रंगदारी और लोगो को सुरक्षा देने का धंधा चलता है ये. मजबूर था तब इसने अपने हे फायदे के लिए मेरी टिकट करवा दी थी और उस 5 करोड़ के क़र्ज़ को पिछले 10 साल में 50 देने के बाद भी न उतार पाया हु. बेशक ghar-pariwar से मैं भी शसक्त हु लेकिन उसके लिए तोह बस गुलाम से ज्यादा कोई एहमियत नहीं है मेरी. दोस्त, जानता हु के बहोत बड़ी मांग रख रहा हु जिसमे तुम्हारी जान भी जा सकती है लेकिन अगर अवधेश को हटा दो तोह मैं मेरी 2 प्लाईवुड की फैक्ट्री में से के तुम्हारे नाम कर दूंगा. कहने को 4 है लेकिन मेरे हिस्से में 2 हे कारखाने आते है. नहीं तोह जितना पैसा अवधेश ने मुझे दिए था उतना हे मैं तुम्हे दे सकता हु.", लाचारी दिखाना तोमर के लिए कोई बड़ी बात नहीं थी, पेशा भी तोह ऐसा था जिसमे पूरी जनता को वह ऐसे हे उल्लू बनता आ रहा था.

"देखिये सर, वह छोटा व्यक्ति नहीं है. मैंने भी थोड़ा बहोत जाना है अवधेश मिश्रा के बारे में और उस तक सीधा पहुंचना आसान काम नहीं. बाकी देखते है क्या हो सकता है, किस्मत कब साथ दे जाये ये तोह भगवन हे जानता है.", शहर ख़तम होने से पहले हे तोमर ने कन्धा थपथपा कर सिंह को इस तरफ मुड़ने को कहा और थोड़ा आगे चलते हे खुली जगह में ये बड़ा सा घर दिखते हुए हॉर्न बजा कर गाडी अंदर करने को कहा. पिछली सीट पर बैठ कर वह देख चूका था के ये अटैची खचाखच नोटों से भरा था.

"रौनकलाल जी, ये घर हाल हे में लिए था मैंने मेरे मरहूम दोस्त ताराचंद से. आपको देख कर उसकी याद आ गयी, ताराचंद और मेरे बीच सबकुछ साँझा था. यहाँ तक की शबनम भी लेकिन अब शबनम को यही रखूँगा मैं.", गाडी से उतर कर वह रौनकलाल को साथ लिए आँगन से अंदर चलने लगा तोह कार के पास खड़े सिंह को भी अंदर आने का न्योता दिए. सुरक्षाकर्मी अब दरवाजे के पास मुस्तैद था. घर सुनसान था जैसे यहाँ कोई आता जाता नहीं था लेकिन saaf-safaai से इतना पता चलता था के देखभाल के लिए तोह कोई रहता हे है.

"आरी ओह मुनिया, 3 लोगो के लिए खाना परोस दे. तैयार कर लिए है न?", हॉल में से हे आवाज देने पर ये खनकती आवाज जवाब के रूप में आई.

"जी साहब, बस 5 मिनट में लगा रही हु."

"वैसे हुआ क्या आपके मित्र ताराचंद को? प्राकृतिक या ..", रौनकलाल ने झिझकते हुए पुछा. अब यहाँ ये दोनों एक बड़े सोफे पर बैठे थे और टेबल के दूसरी तरफ साढ़े 6 फ़ीट का सिंह सिंगल सोफे पर बैठा अपनी हे दुनिया में खोया था.

"न भाई न. ताराचंद की हत्या हुई लेकिन कोई सबूत न मिला सिर्फ शबनम की तस्वीर थी जो मैंने पुलिस रिकॉर्ड में जाने न दी. शबनम की माँ भी कभी प्रेमिका थी ताराचंद की और फिर बेटी ने वह जगह ले ली. दिल तोह अवधेश मिश्रा का भी उसपे आया लेकिन ताराचंद के बाद वह पीछे हट गया और अब सिर्फ वह मेरी है."

"कही ताराचंद की हत्या के पीछे भी ये मिश्रा जी तोह नहीं?", रौनक ने थोड़ी सोच विचार के बाद बात कही तोह तोमर ने ना में गर्दन हिला दी.

"ताराचंद सरहद के इस पार हरयाणा में दबिश रखता था और अवधेश उसके जरिये हे अपने काम लेता था. कुछ नाम दिमाग में आये थे लेकिन वह लोग नहीं हो सकते. सालो पहले हम लोग एक दूसरे के रस्ते से हट गए तोह अब फिर से कोई khoon-kharaba नहीं करेगा. उम्र भी हो गयी रौनक भाई, दुश्मनी के लिए समय हे कहा रहा.", हँसते हुए तोमर ने गिलास में पानी डाली और ये घूंघट लिए आई सांवली सी जवान युवती मेज पर खाना सजाने लगी.

"पढाई लिखे नहीं करती?", बाकी दोनों भी सिंह के इस सवाल से चौंक गए जो इस लड़की से बात करने लगा था.

"साब यही करना आता है, अफसर नहीं लग्न मुझे कोई.", लड़की के घूंघट से भी आँखे और मासूम चेहरा दिख रहा था.

"सिंह, मुनिया की माँ मेरे घर काम करती है. ये भी वही सीख रही थी और फिर मैं इसको यहाँ ले आया. अगले बरस ब्याह है इसका तोह सोचा ghar-grahsthi मैं हे सीखा दू. समझदार है और खाना भी बढ़िया बनती है, अपने माँ से भी लजीज. आज यही रुकने वाला हु तोह सबसे बड़ा ज्ञान रात में देके आज हे औरत बना दूंगा.", जिस तरह तोमर ने ये बात कही थी वह लड़की pal-bhar भी कमरे में न रुकी. चेहरे पर शर्म से ज्यादा डर और हैरत थी बेचारी के. लेकिन तोमर ऐसे हंस रहा था जैसे चुटकुला सुनाया हो. मतलब साफ़ था के वह इस कुंवारी लड़की को भोगने वाला था.

"भाई साहब, बड़े हे पहुंचे हुए हो आप. आजकल ऐसी देसी जवानी हमारी तरफ तोह देखने को नहीं मिलती. मिल जाए तोह पहले से हे जवान हरामी लोंदे खराब कर देते है.", रौनकलाल भी जैसे व्यापारी होने के साथ साथ ऐसे शौक रखता था.

"तभी कहा था के भाई तुम ताराचंद की याद दिलाते हो. हाहाहा, वो भी हर shaniwar-eitwaar मेरे साथ मिलकर यही सामाजिक कार्य करता था. अब तोह 50 से ज्यादा 18 वाली भोगी होंगी हमने.", अट्टहास के साथ तोमर अपना राज बता रहा था और हॉल के दूसरी तरफ कड़ी मुनिया की आँखों से आंसू बह रहे थे. लेकिन एक पल में हे पाठकः चलने की आवाज के साथ वह हंसी भी बंद हो गयी और आवाज सुन्न कर कमरे में आई मुनिया की आँखों से आंसू भी थम्म गए. रौनकलाल भी आँखे फाड़े बस सिंह को हे देख रहा था जिसने तोमर के माथे के ठीक बीच वह चवन्नी सा छेड़ करके ताराचंद के पास भेज दिए था. सुरक्षाकर्मी दौड़ता हुआ अंदर आया तोह वह भी ठिठक गया ये नजारा देख कर.

"मुनिया बेटी, घर जा कर तुम्हे यही ज़िन्दगी मिलेगी. कोई और तोमर आएगा वही करने जो साला ये राक्षश करना चाहता था. मुझे नहीं लगता के तुम्हारी माँ की भी हालत कुछ अलग होगी.", सिंह ने खड़े हो कर बड़े प्यार से लड़की के सर पर हाथ फेरते हुए कहा. सुरक्षाकर्मी दीवान पर राखी चादर से खुद हे तोमर की लाश लपेटने लगा तोह रौनकलाल के पसीने आने लगे.

"बाबू जी, माँ को तोह आदत है और उसने हे यहाँ भेजा था के मालिक जो कहे वही करना है. घर की देहलीज से बहार नहीं निकलना और मुँह बंद रखना है. कल रात भी इन्होने मेरे साथ गन्दा काम किआ था."

"कितने साल की हो तुम?"

"जी 16 की.", आँखों में आंसू लिए वह इतना हे बोल पायी. सिंह ने बची को अपने कलेजे से लगा लिए.

"साले हैवान कही के. और ये लोग जनता पर राज करते है. हरी, इसकी लाश को सीट पर बैठा कर आग लगा देना. साथ हे सरकारी गाडी को पंप ले जाना पेट्रोल डलवाने जिस से तुम घटना के समय यहाँ उपलब्ध नहीं होंगे. मुनिया बेटी भी पुलिस को बयान दे देगी और फिर इसको #### शहर में हमारे आश्रम छोड़ देना. मामला गंभीर है तोह कड़ी पूछताछ हो सकती है."

"जी सर. इसलिए हे लाश को यहाँ से उठाया है. गोली निकाल दूंगा जलने से पहले और मुनिया बहिन तुम बस यहाँ से सफाई में मदद कर देना.", हरी के इतना कहने पर मुनिया ने हामी भरी लेकिन सिंह को कुछ और हे मंजूर था.

"रौनक, होश में औ और मुनिया को कार में बैठाओ. इसको गायब करना हे ठीक है यहाँ से. लड़की छोटी है और टूट सकती है. तोमर की लाश को रसोई में रख कर गैस खोल दो और चलो सब यहाँ से. हरी, अम्बस्सडोर लेके तुम पंप चले जाओ इसके बाद.", प्लान में खुद हे बदलाव करते हुए सिंह ने लड़की को रौनक के साथ बहार भेजा और हरी की मदद करते हुए तोमर को उस बड़ी सी रसोई में लिटा दिए. गोली निकले बिना हे गैस का हरा पाइप सिलिंडर से निकलने के बाद पहले हरी को बहार भेजा और फिर खाने के बर्तन आराम से आँगन में एक तरफ रखने के बाद बहार हॉल में हे सिग्रत्ती सुलगा कर फेंक दी. अब घर के अंदर सिर्फ तोमर की टोयोटा कड़ी थी.

"निकलो यहाँ से.", ड्राइवर अब रौनकलाल था और पीछे सिंह के साथ सेहमी हुई मुनिया बैठी थी. डर भी था और हैरत भी की ये लोग क्या कर रहे है? मैदान से बहार आते हे हल्का भूकंप और एक भीषण आवाज सुनाई दी. हवा में मलबा दूर दूर तक उड़ता गया था. गाडी आसपास होती तोह पक्का शीशे टूट जाते.

"सर आप न ऐसे काम करते हो के हर वक़्त यही लगता है के अब मौत आई तब मौत आई. मैं आइंदा फैक्ट्री से बहार नहीं निकलूंगा. मैनेजर हु वही ठीक है, मालिक आप हे बनो.", रौनकलाल थोड़ी तेज़ी से गाडी भगा रहा था.

"तुम पहली बार तोह ऐसा नहीं कर रहे रौनक. दिलेर हो और इसलिए उमेद सिंह तुम पर भरोसा करता है. हरी के घर 5 लाख भिजवा देना, बेचारे की बहिन की शादी ने ईमान बेचने को मजबूर कर दिए. इसको भी मामला शांत होने के बाद अपने यहाँ काम पर रख लेना.", उमेद सिंह ने हुलिया दुरुस्त करने के बाद फिर से मुनिया के सर पर हाथ फेरा.

"बेटी जानता हु तुम सदमे में हो और दरी हुई भी हो. लेकिन मैं पूरी कोशिश करूँगा तुम्हे ाचा और उचित जीवन देने की. पढाई नहीं करनी तोह silai-kadhai हे सीख लेना.", उमेद ने लड़की को हौंसला देते हुए सामने देखा तोह गाडी राज्य की हद्द में आ चुकी थी.

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दोपहर के 2 बजने वाले थे और यहाँ अर्जुन अपनी बुआ के साथ घर वापिस आ गया था. पीछे बैठी मधु बुआ ने ये बड़े बैग पकडे हुए थे जिनमे कपडे, निमंत्रण पत्र और बाकी सब सामान था. सबसे भारी तोह निमंत्रण पत्र वाला बैग था जिसकी वजह से टांग भी सुन्न हो गयी थी. अंदर आते हे बुआ ने प्रियंका को आवाज दी तोह उसके साथ साथ शंकर जी खुद भी आ गए.

"अरे बाप रे. तुम दोनों पागल हो क्या? ये कार में भी लेके आ सकते थे. 10 किलो से ज्यादा का तोह ये बण्डल है और इसको गॉड में उठा के ले आई.", शंकर जी ने वह बण्डल उठाते हे नाराजगी जाहिर की. प्रियंका भी बुआ से कपड़ो के लिफाफे लेती उन्हें देखने लगी. जमीन पर खड़े होते हे मधु बुआ पाँव पटकने लगी.

"आठ. ये पाँव सो हे गया. अर्जुन की गलती नहीं है शंकर, इसने मन किआ था लेकिन ललिता भाभी ने अपने घर भी जाना है शाम को और पिता जी भी तोह देविका के घर जायेंगे अभी कार्ड देने. तुम्हे भी जाना है मधु की ससुराल कार्ड पहुंचने. बाद फिर बाद हे रह जाता है.", शंकर जी अपनी बहिन की ख़ूबसूरती देख रहे थे लेकिन फिर झेंपते हुए अंदर चल दिए. अब यहाँ बुआ के हिलते चुके बस अर्जुन देख रहा था.

"बुआ, अंदर चलो न. क्या कर रही हो आप?", अर्जुन ने झिझकते हुए एक बार और सीने को देखा और फिर दोनों की नजरे मिली.

"बदमाश कही के. मैं चली माँ के पास और तू तेरा काम कर.", बुआ हंसती हुई उधर हे चली गयी जिधर प्रियंका गयी थी और अर्जुन गहरी सांस लेता हुआ गलियारे में हो लिए. आज सुबह से हे वह ये अलग सा बदलाव महसूस कर रहा था. जैसे शरीर में गति बढ़ गयी हो और बुआ के साथ 2 बार करने के बावजूद उसका अंग ठिठिलता नहीं महसूस कर रहा था. ऐसे हे हिलता डुलता हुआ वह माँ के कमरे में जा पसरा जहा अभी कोई न था.

कौशल्या जी के कमरे में जमघट लगा था और कुछ वैसा माहौल रामेश्वर जी के पास बैठक में था. ललिता जी, प्रियंका, कोमल, माधुरी और रेणुका मधु के खरीदे कपडे देख रही थी वही रेखा जी ने ये 10 नयी साड़ी प्लास्टिक के साथ मधु के सामने रख दी. कौशल्या जी और तारा भी एक एक साड़ी को निहार रही थी. कुछ वजनी जरीदार साड़ी थी विशेष समय के लिए और 6-7 आरामदायक रंगो की खूबसूरत जैसी खुद रेखा जी पहनती थी.

"मामी, माँ की तोह लाटरी हे लग गयी. कितनी सुन्दर है ये और आपने खुद कभी क्यों नहीं पहनी?", दरवाजे पर शंकर जी आ खड़े हुए जो अपनी माँ को बुलाने आये थे लेकिन महफ़िल देख बस चुपचाप खड़े रहे.

"तारा बिटिया, मेरे पास एक बीएड पूरा भरा हुआ है और वैसे भी मुझे वही साड़ी पसंद है जो मैं हमेशा पहनती हु. और ये सभी तेरी मम्मी पर खिलने वाले रंग है, मधु सुन्दर हे इतनी है.", मधु बुआ भी रेखा जी की बात सुन्न कर ये गहरी लाल साड़ी अपने सीने के सामने रखती खुश हो कर अपनी माँ को दिखने लगी.

"माँ, कुछ भी कहो रेखा भाभी की पसंद सचमुच लाजवाब है. और ये वाली तोह मैं घर से हे पहन कर जाने वाली हु.", ये फिरोजी रंग की साड़ी देखते हे कौशल्या जी ने अपने हाथ में पकड़ ली.

"ऐ रेखा, ये वाली तोह अर्जुन ने दिलवाई थी न? इसके साथ की एक रेशमी नीली भी थी. इसको क्यों दे रही है फेर जब अर्जुन ने उपहार दी है.", कौशल्या जी की पारखी नजरो से ये बच न सकीय.

"माँ जी, अर्जुन से पूछ लिए था सवेरे हे मैंने. वह वाली मैं पहनती हु और ये मधु के लिए है. उपहार वह तोह नहीं होना चाहिए जो सिर्फ अतिरिक्त हो? मधु ख़ास है तोह इसके लिए ये ख़ास साड़ी और आप खुद हे देख लीजिये इसने भी यही पसंद की है. ब्लाउज मेरे माप का है लेकिन फिट आएगा तुम्हे.", रेखा जी का इतना बड़ा दिल देख मधु ने गले लगा लिए अपनी भाभी को.

"फेर बदले में जो सूट मुझे अर्जुन ने पसंद करवाए थे उनमे से एक तुम भी लोगी भाभी. अब ये न कहना के सूट नहीं पहनती? ननद कह रही है तोह एक बार पहन लेना.", मधु बुआ ने पहली बार मार्किट से जो सूट लिए थे उनकी बात कही.

"हाँ पहन लेगी रेखा. तू तेरा बाकी सामान पैक करवा इन लड़कियों के साथ और प्रियंका तू अपनी ताई के साथ खाना बनवा बेटी. ये तोह लगे रहेंगी बाजार लगा के, काम न है कोई इन्हे. मैं जरा देखु ये सारे मरद क्या गप्पे हाँक रहे जो हंसने की आवाज यहाँ तक आ रही. शाम तक आने वाले नहीं थे और 3 घंटे में महफ़िल लगा के बैठ गए.", बड़बड़ाती हुई वह कड़ी हुई तोह अब शंकर जी इधर नहीं थे.

"भाभी जी, तोह ये पक्का हुआ है के भाई साहब निमंत्रण ले कर राधिका और फिर मधु बिटिया के घर जायेंगे ड्राइवर के साथ. शंकर बीटा जा रहा है माधुरी के ससुराल लेकिन इसकी वापसी कल हे होगी क्योंकि सुबह ये मेरी श्रीमती जी को लेके आएगा आपके पास. राजकुमार भी अपनी ससुराल जा रहा है बीवी के साथ. फिर कल आप सभी मंत्रणा कर लेना जैसा पता लगा है के चंद्रो देवी, सितारा जी और पूर्णिमा जी सवेरे आ रही है. उसके अगले दिन एक तरफ मैं और शंकर निमंत्रण देने शुरू कर देंगे, एक तरफ सतीश भाई के साथ आप भी मायके जा आना और फिर सतीश भाई के साथ पंडित जी निजी लोगो को आमंत्रित कर लेंगे. बचे अपने हिसाब से देख लेंगे सबा और संजीव भी 3 तारीख को आ रहा है तोह वह भी संभल लेगा.", ये धर्मवीर सांगवान जी थे जिनके हाथ में बुंदल से बहार अभी 4-5 कार्ड थे. सभी पर रामेश्वर जी ने हे नाम लिखे थे और सबसे पहले पर श्री गणेशाये नमः.

"भाई साहब, शंकर को हे रोटी करवाते रहोगे हमेशा? आप निमंत्रण बाद में बाँटना पहले कल शाम मैं और आपके भाई साहब घर आ रहे है आपके. अब हटाओ ये सब यहाँ से, खाना लगवा रही हु मैं. शंकर खाने के बाद कार ला दियो अपने जीजा की, अर्जुन साफ़ कर देगा जाने से पहले.", कौशल्या जी ने अपने रोबीले अंदाज में जहा सबके प्लान के बाद अपनी बात कही वही शंकर को भी काम बता दिए.

"ले आता हु माँ, वैसे भी भाई को छोड़ने जाना था उधर. अब भाई मुझे छोड़ देगा वह तक.", शंकर जी अपन जीजा के साथ बैठे हुए राजकुमार जी की तरफ हंस कर देख रहे थे. कोई गुप्त बातचीत हो जैसे.

"पता नई क्या गिटपिट करते रहते हो. अपने जीजा का भी ख्याल किआ करो, बड़ा रिश्ता है दोस्ती नहीं.", कौशल्या जी जाने से पहले ऐसा बोल गई लेकिन शंकर जी अशोक जी के कंधे पर हाथ रखे कान में कुछ कहते जैसे माँ की बात की परवाह हे न करते दिखे. गहरी दोस्ती तोह थी हे बेशक jija-sala थे लेकिन हमाम में नंगे.

छोल साहब ने बहोत कहने के बावजूद घर जाने की इत्छा व्यक्त की और भोजन शुरू होने से पहले हे निकल गए, 4 बजे आने का कह कर. यहाँ मंजू खाना लगवाने कोमल दीदी के साथ बैठक गयी तोह के पल के लिए शंकर जी बस देखते हे रह गए. शंकर की नजरो का पीछा साथ बैठे अशोक जी ने भी किआ और कान में कुछ फुसफुसाया तोह जवाब में शंकर जी ने हलकी नाराजगी से देखा और फिर जैसे अशोक जी ने भी आँखों से हे गुस्ताखी की शमा मांगी.

"मंजू तुम कब आई बेटी?", शंकर जी के ऐसा कहने पर मंजू ने सर पे लिए दुपट्टा ठीक करते हुए जवाब दिए.

"मौसा जी, मैं 8 बजे हे आ गयी थी. दादी ने बुलाया था काम से और फिर ऊपर ऋतू के साथ थी. आप जल्दी चले गए थे क्या सुबह?", अब जैसे अशोक को भी थोड़ा पता चला के मंजू ख़ास है परिवार की.

"तेरा मौसा घर में होता हे कब है बेटी.? कल से हमारे शंकर जी नदारद थे, शुक्र है आज हॉस्पिटल तोह दर्शन दे आये. वैसे अशोक, ये अपने दलीप सिंह की बेटी है. तुमने शायद इसको 10-12 साल पहले हे देखा होगा.", रामेश्वर जी के ऐसा कहने पर अशोक जी को अब समझ आया के ये लड़की कौन है.

"जी पापा. दलीप भाई से तोह मैं 2 महीने पहले हे मिला था लेकिन आखिरी बार शंकर के ससुराल गए थे तभी मंजू को देखा था, कोई 9-10 साल की छोटी सी बची थी. अब शायद इसका विवाह हो गया है.", ये एक और गलत बात निकल गयी लेकिन मंजू ने बस मुस्कुरा कर उनकी बात पर सहमति जाता दी. अब बारी थी शंकर के ठसका लगने की जिस पर कौशल्या जी मुस्कुराने लगी. कुछ भी हो, था तोह शंकर मंजू का ससुर हे बेशक बाहरी रिश्ता मौसा का हो.

"मौसा जी पानी लीजिये.", मंजू ने सबके लिए खाना लगाने के साथ हे ये पानी का गिलास उनकी तरफ सरका दिए.

"थैंक यू बीटा. वैसे अभी भी बास्केटबॉल खेल रही हो? अशोक जी, अपनी मंजू नेशनल लेवल प्लेयर है इस खेल में.", शंकर जी ने पानी पीने के बाद जीजा को बताया.

"देख के हे लगता है भाई. लम्बाई में तोह इस कमरे में कोई इसके बराबर नजर नहीं आ रहा. शायद अर्जुन हे ek-do इंच ऊपर हो.", अशोक जी तोह वही कह रहे थे जो उन्हें लग रहा था लेकिन हर बार बात वही जाने लगती थी जिधर शंकर जी नहीं चाहते थे.

"फूफा जी, अब मैं स्विमिंग में हूँ और ट्रायल्स के लिए तैयारी कर रही हु. अर्जुन ने हे कहा था के टीम गेम में कोई फ्यूचर नहीं है और जो मुझे पसंद है वही करना चाहिए.", मंजू ने समझदारी से एक तीर और 2 निशाने लगा दिए थे. अर्जुन का भी नाम ले दिए अपनी पसंद का जीकर करते हुए निर्णय भी बता दिए. इसके बाद अगला आधा घंटा सभी लोग बातें करते हुए भोजन का लुत्फ़ लेने लगे लेकिन कही न कही शंकर जी के दिमाग में मंजू की हे छवि घूम रही थी.

"चल शंकर मैं भी साथ हे चलता हु यार.", खाने के बाद अशोक जी ने राजकुमार और शंकर को दूसरे घर के लिए जाते देख अपनी इत्छा जताई और वह भी साथ निकल लिए इस जेन कार में. घर पे आज toot-foot को ठीक करने मिस्त्री और मजदूर लगे हुए थे. राजकुमार जी इधर आते हे ठेकेदार से मिलने लगे जो 2 युवको को पेंट खुरचते वक़्त हिदायते दे रहा था. आँगन में भी पत्थर तराशने की मशीन पर कुछ लोग काम कर रहे थे और एक तरफ cement-reta का मसाला एक मजदुर बना रहा था. मतलब साफ़ था के सभी तरह के काम एक साथ हो रहे थे. रंग, मरम्मत्त, पत्थर, बिजली इत्यादि के. लबादा ओढ़े कड़ी अशोक जी की कार को अनावृत करते हुए शंकर जी ने कपडा डिक्की में रखा और कार को चालू करने के बाद कुछ देर वैसे हे छोड़ दिए.

"यार शंकर अब बता के क्या चक्कर है? पहले तोह मुझे माफ़ करना भाई के मैंने गलती से वह कह दिए क्योंकि मुझे लगा तू भी वही देख रहा है. और दलीप की बेटी अपने यहाँ अकेले कैसे?", अशोक जी ने सिग्रेटी सुलगने के बाद एक काश लगा कर शंकर की तरफ बढ़ा दी.

"पहले हे 50 पंगे है यार. अब ये उलझन मैं कैसे स्पष्ट करू? और मैं गलत नहीं देख रहा था, थोड़ा हैरान था मंजू को सामने देख कर बस.", शंकर ने 2 गहरा काश ले कर धुआं उगला और एक तरफ देखने लगे जैसे कुछ याद कर रहे हो.

"दलीप से तेरा याराना आज का नहीं है और पापा का भी उसके पिता से घनिष्ठ सम्बन्ध था. लेकिन वह अकेली यहाँ देखि तोह थोड़ा अजीब लगा. अगर ये झंझट बताने लायक है तोह बोल दे."

"कुछ समय में बचे करीब आ गए है बड़े होने के बाद. मंजू भी स्कूल के बाद इधर हे कॉलेज और स्टेडियम में आ गयी. अब मिलने लगे तोह नजदीकियां भी बढ़ना लाजमी है यार. अब परिवार में पहचान आज की तोह हैं नहीं, बचे भी आपस में खुश है.", शंकर की बात अशोक को समझ नहीं आ रही थी की वह किस दिशा में कह रहा है लेकिन जो समझा उसके हिसाब से वह कहने लगा.

"हम्म्म. बताया था न मंजू ने के वह ऋतू के साथ थी. लड़कियां है और उम्र भी aas-pas हे है. ाची बात है के घुलना मिलना है. मुझे बस पता नहीं था इसलिए गलती हो गयी. वैसे जल्दी शादी नहीं करवा दी दलीप ने इसकी? लड़का क्या करता है?", अशोक के इस सवाल से हे तोह शंकर बचना चाहता था. अपने जीजा को अब वह क्या जवाब दे? मंगलसूत्र पहना है, मांग में सिन्दूर भी है तोह ये तोह कह नहीं सकता के विधवा है. अपने बेटे का नाम लिए तोह माँ से vada-khilafi और जीजा के अधिक सवाल.

"ाचा लड़का है जिस से ब्याह किआ है मंजू ने. मैं ज्यादा नहीं मिला लेकिन लड़का ाचा है मंजू भी खुश हे होगी, देख के तोह यही लगता है.", वापिस सिग्रत्ती का काश लेते हुए राख निचे झड़का दी.

"हाँ. ये तोह ठीक कहा तुमने. लड़की ऊपर से खुश हो तोह पता चल जाता है लेकिन मंजू के भाव और चमक से लगता है के लड़का सचमुच प्यार करने वाला मिला है उसको. ाची बात है के बचे खुश रहे, क्या करता है या कुछ भी नहीं करता इस से फरक नहीं पड़ता. वैसे भी जमीन जायदाद वाले परिवार है.", शंकर से सिग्रेटी लेने के बाद अशोक काश लगाने लगा और शंकर कार में बैठ कर घर से बहार निकलने लगा. जीजा ने तोह दिमाग हे खा लिए था. और बात सही भी थी की लड़का कुछ भी नहीं करता और क्या क्या करता है ये पता भी नहीं. हाँ जमीन जायदाद भी तोह अर्जुन के हे नाम थी. अपनी सोच पर खुद हे हंसने लगे और जीजा को बैठा कर घर चल दिए. राजकुमार जी ने भी कहा था के वह घंटे तक आ जायेंगे.

अर्जुन खाने से फारिग हो कर अपनी माँ और बुआ से बातें कर रहा था के पापा की आवाज सुन्न कर उठ गया.

"हानि पापा?", आँगन में आते के साथ उसने पुछा.

"यार तेरे फूफा जी वाली गाडी पर बहार पानी मार देगा? धोने के बाद बस चारो दरवाजे खोल देना. इतनी गन्दी नहीं है बस पानी से हो जायेगा और अंदर से साफ़ हे है.", शंकर जी ने अपने बेटे से बड़े प्यार से बात कही थी.

"हाँ अभी कर देता हु. आप बैठो माँ और बुआ अंदर है और ऋतू दीदी चाय बना रही है. घंटे तक तोह चले जाना है बुआ ने.", अर्जुन ने बात करते हुए सीढ़ियों के बराबर लड़की पुराणी सूती चादर उठा ली और बहार आँगन में चल दिए. शंकर जी भी अपने कमरे में चले आये.

"जनाब, मैं नजर नहीं आई क्या?", अर्जुन ने रबर की पाइप आँगन वाली टूंटी में लगाने के बाद पानी चालू करके लम्बे बोनट पर आराम से गिरना शुरू किआ हे था के मंजू इस तरफ चली आई. कार बगीचे और आँगन के बीच बाथरूम के पास कड़ी थी. आँगन में उसकी गाडी थी और पापा की घर से बहार. अर्जुन मंजू की आवाज सुन्न कर बस उसको देखता हे रह गया. पानी कार के ऊपर एक हे जगह गिर रहा था.

"जवाब देने की जगह बस देखते हे रहोगे?", मंजू खुश थी की अर्जुन उसको ऐसे निहार रहा था.

"सचमुच नहीं पता था के तुम घर में हो. कब आयी और अगर यही थी तोह मुझसे नहीं मिली.", अर्जुन ने पानी का दाब काम करने के बाद मंजू की तरफ बढ़ते हुए पाइप छत्त पर रख दिए. अब दोनों हे नजदीक थे और ऊपर जाती सीढिया भी उनको अंदर वाले लोगो से दूर रखे थी. अर्जुन देख रहा था मंजू कितनी हसीं लग रही थी और आज उसकी मांग भी भरी थी, हाथो में कंगन और फिर दिखाई दी वह अंगूठी जिसकी ाचे से पहचान थी.

"देखते हे रहोगे क्या? सुबह से तोह यही हु. याद नहीं नाश्ते के वक़्त साथ हे थे."

"हाँ लेकिन तब मुझे लगा के तुम चली गयी हो. और फिर मैं बुआ के साथ मार्किट चला गया और वापिस खाने के वक़्त हे आया था. तुम दिखाई नहीं दी.", अर्जुन ने कुछ न पूछ कर बड़े प्यार से एक हाथ थाम लिए. वह इधर उधर भी देख रहा था जैसे कोई इनको देख न रहा हो. मंजू उसकी हालत पर मुस्कुरा रही थी.

"बिजी रहते हो न, मुझे पता है. तुम काम नहीं करोगे तोह कौन करेगा? वैसे भी मैं ऋतू और प्रीती के साथ ऊपर थी. फिर खाने के वक़्त निचे आयी तोह तुम मौसी के कमरे में आराम कर रहे थे.", मंजू भी उसकी उंगलियों में अपनी लम्बी उंगलिया फंसा कर और करीब आ गयी थी.

"मेरा दिल करता है मंजू के तुम्हारे पास आऊं और कभी कभी रात तुम्हारे हे साथ रह कर ढेरो बात करू. घर में कोई होता नहीं तोह मुझे रुकना पड़ता है. लेकिन अब पापा इधर है तोह कैसे न कैसे मैं आ जाया करूँगा रात में.", अर्जुन को इतनी चिंता करते देख मंजू को थोड़ा बुरा लगा था.

"मैं औ या तुम आओ, एक हे तोह बात है न अर्जुन. वैसे भी मेनका ख्याल रखती है मेरा और फिर आधा दिन Preeti-Ritu साथ होती है. बस हफ्ते में एक आध दिन होता है जब मुझे लगता है के तुम्हारा सीना होता उस तकिये की जगह. टेंशन मत लो, आज रात मैं तुम्हारे कमरे में आने वाली हु लेकिन 2 बजे के बाद. ये लोग उस से पहले सोती नहीं है लेकिन फिर सुबह तक हमको परेशां भी नहीं करने वाली.", मंजू ने भी एक बार इधर उधर देखा, निश्चिन्त होने के बाद जल्दी से अर्जुन के गाल को चूम कर खिलखिलाती हुई भाग गयी.

"पागल कही की. आओ रात में फिर बताता हु तुम्हे.", अर्जुन ने अब बहते पानी पर ध्यान दिए और जुट गया गाडी को धोने. आधा घंटा लग हे गया था इस बड़ी कार को धोने और सूखने में. दरवाजा खोलते हे नजर कार में लगी चाबी पर गयी तोह दिल किया के सेल्फ मार कर कार बहार निकल ले लेकिन बस हाथ लगा कर उठने हे लगा था के पंडित जी आ खड़े हुए.

"अगर दिल कर रहा है तोह बहार निकल लाओ."

"नहीं दादा जी, हमारी नहीं है.", अर्जुन मुस्कुराता हुआ गाडी से बहार हे निकल आया. रामेश्वर जी ने भी उसका सर सेहला दिए.

"तेरे लिए एक और गाडी आ रही है कल. वह तू हे लेके आना शोरूम से, मेरे साथ.", उनकी बात पर अर्जुन दादा जी के गले लग गया.

"गाडी से ज्यादा जरुरी है के आप साथ चलने का कह रहे है. चलिए अंदर चलते है नहीं तोह दादी शुरू हो जाएगी अगर फूफा जी का शगुन नहीं किया तोह.", अर्जुन के हँसते हे वह अपने लादले के साथ अंदर चल दिए. अर्जुन ने यहाँ से पानी भी साफ़ कर दिए था. घर के बेटी वापिस जा रही थी तोह मिलने के लिए उम्मीद से ज्यादा हे लोग आ गए थे. छोल साहब तोह परिवार का हिस्सा हे थे और रेणुका, प्रीती के साथ रोमिला भी उपस्थित थी. मधु की रोमिला से ाची बोलचाल हो गयी थी और पहले भी उनका परिचय आपस में था लेकिन इतना अर्जुन को संज्ञान था. वही सामने से कश्यप जी की बहु सरोज और मल्होत्रा जी की बीवी भी मिलने आयी थी.

"बुआ, आपके तोह बड़े चाहने वाले है.", अर्जुन ने कमरे से 4 बैग निकलते हुए मधु बुआ के कान में कहा जो सभी से मिलने के बाद अब अर्जुन को बताने लगी थी कोनसा बैग डिक्की में और कोनसा सीट पर रखना है. दोनों के मुँह आसपास हे थे जिस से बुआ ने वह गरम सांसें महसूस की.

"एक हे पसंद है मुझे तोह और मैं जानती हु वह भी उतना हे पसंद करता है अपनी बुआ को.", अर्जुन झेंपता हुआ मुस्कुराने लगा और बहार निकल चला. पीछे हे रुपाली और मंजू भी सामान लिए चली आयी तोह अर्जुन ने हलकी नाराजगी दोनों पर जताई.

"आपको ये सब नहीं करना चाहिए. मैं कर रहा हु न.", अर्जुन की नाराजगी मंजू को तोह पता थी लेकिन रुपाली थोड़ा हैरत में आ गयी.

"मदद हे तोह कर रही हु तेरी. गुस्सा क्यों हो रहा है?"

"दीदी, मैं कर रहा हु न. और बैग भरी है तोह मुस्कले खिंच सकती है आप लोगो की. सॉरी लेकिन अब मैं कर लूंगा.", रुपाली को बड़ा ाचा लगा था के अर्जुन इतनी परवाह करता है बस आधी सचाई नहीं पता थी की उसने मंजू को झुकते देखा तोह पारा चढ़ गया था जिसको जैसे तैसे शांत कर लिए था.

"ाचा ठीक है बाबा. चल मंजू इसको करने दे, नहीं तोह फिर गुस्सा हो जायेगा.", रुपाली दीदी हाथ पकड़ कर मंजू को ले गयी, हंसती हुई. सभी बहार चले आये तोह गाडी में बैठने से पहले अशोक जी ने अपने saas-sasur का आशीर्वाद लिए. मधु बुआ सबसे खुश हो कर मिली थी और फिर जैसे गाडी के पीछे से घूम कर आगे वाली सीट की तरफ बढ़ी तोह अपने लिए दरवाजा खोल कर खड़े अर्जुन को देख उसके सीने से चिपक गयी. अजीब हे तोह होता है इंसान का अंतर्मन, वह कितना भी खुश दिखे या सकरात्मक बात करे लेकिन एक चाहने वाले से पल भर भी जुड़ा होना पड़े तोह हर दलील फ़ैल हो हे जाती है.

"तुम आओगे न मेरे पास? तुम्हारी हर बात मानी है और मैं पूरी कोशिश करुँगी तुम्हारी बात को खरा रखने के लिए, बस कभी कभी अपनी बुआ को हौंसला देने आता रहना.", इस रोने में कोई फफकना या शोर न था, बस आँखों में नमी और दिल में कुछ दर्द था. अर्जुन भी उन्हें सीने से लगाए हँसते हुए बोलै.

"सब देख रहे है बुआ और वैसे भी आप जल्द वापिस आने वाली हो. हाँ उसके बाद मैं जरूर अपनी बुआ से मिलने आता रहूँगा. ऐसे हे रट हुए जरा अपने पापा के भी गले लग जाओ, देख रहे है आपको वह.", अर्जुन के ऐसा कहते बुआ ने गीली आँखों से अपने पिता को देखा और वह खुद हे बराबर चले आये.

"मेरी गुड़िया को बाप के सीने से लगने के लिए आज भी किसी की परमिशन नहीं चाहिए.", रामेश्वर जी ने इतना कहा और बुआ ने उस सफ़ेद कमीज पर इस बार आँखों की कालिख पॉट दी. यहाँ वह अपना दर्द रोक न सकीय बेशक सीना अर्जुन की जगह बाप का था.

"ाचा मैं भी आ हे रहा हु न तेरे पीछे हे. बेटी का घर का पानी नहीं पीते लेकिन चाय तोह पीला हे देना अपने बाप को.", रामेश्वर जी ने माहौल को खुशनुमा करते हुए अपनी लाड़ली को गाडी में बैठाया और अर्जुन ने दरवाजा बंद करते हुए हाथ हिला कर उन्हें विदा किआ. इस दौरान रेणुका और कोमल की नजरे बराबर अर्जुन पर हे थी. लेकिन तारा बिंदास अर्जुन के करीब आती हुई बोल पड़ी.

"मेरी माँ तोह मेरे से ज्यादा इसकी सगी हो गयी दुनियावालो. देखा मेरी किस्मत. ऐसा करते है मां हम अर्जुन को माँ को दे देते है और आप मुझे ले लो.", तारा की बात सुन्न कर सबके चेहरे पर हंसी आ गयी थी. शंकर जी भी अपनी भांजी को साथ लिए हँसते हुए अंदर चल दिए.

"तुझे लेने की क्या जरुरत है, तू तोह हैं हे अब इस घर की. तेरी माँ ने एक बार न कहा के तू साथ चल. मतलब अब तू बस मेरी बेटी है और अर्जुन बस तेरी खिदमत के लिए यहाँ रखा हुआ है.", अपने मां की बात सुनती हुई वह अर्जुन को ठेंगा दिखती आगे चलने लगी. सभी जा चुके थे आँगन से सिवाए कोमल दीदी और रेणुका बुआ के. छोल साहब के बाकी सदस्य अभी यही घर में हे थे लेकिन रोमिला कुछ जरुरी बात करने रेखा जी के साथ उनके कमरे में थी और लड़कियां फिर से अपने ऊपर वाले कमरों में.

"कुछ बताने लायक बात है?", कोमल दीदी ने स्पष्ट चेहरे से ये सवाल किआ था और रेणुका बुआ बस देख रही थी.

"मुझे तोह नहीं लगता के ऐसा कुछ है जो बताना जरुरी हो दीदी. कोई बात है क्या जो आपने देखि और मुझे नहीं पता.?", अर्जुन का ये जवाब सुन्न कर कोमल दीदी भी ना में गर्दन हिलती अंदर चली गयी एक इशारा रेणुका को करते हुए.

"मेरे साथ जरा घर तक चलोगे अर्जुन? भाभी ने कुछ मंगवाया है तोह लेते आना.", रेणुका बुआ के कहने पर अर्जुन उनके साथ चल दिए. रेणुका बुआ के हाथ में ये पैकेट था बड़े लिफाफे में. अर्जुन हामी भरता हुआ उनके साथ चल दिए. आज वह आकांक्षा से मिल न पाया था और कही न कही ये उसके जेहन में था. रेणुका ने घर के अंदर आने के साथ हे गेट बंद करते हुए अर्जुन को साथ ले लिए. पारवती भी नजर नहीं आयी थी हॉल में और रोमिला के कमरे की जगह दोनों रेणुका के कमरे में आ चुके थे.

"कुछ ख़ास बात है?", अर्जुन के इतना पूछते हे रेणुका उसके जिसमे से लगती हुई अर्जुन का चेहरा झुका कर होंठो को चूमने लगी. यहाँ तड़प तोह नहीं थी लेकिन बहोत कुछ ऐसा था जिसको अर्जुन समंझने की जगह बस कपडे के ऊपर से रेणुका के माध्यम अकार के सख्त कूल्हों को दबाते हुए चुम्बन में साथ देने लगा. दोनों हे करीब 1 मिनट बाद अलग हुए.

"ये दीदी दे कर गयी है मुझे. तुम्हे पसंद था तोह खुद मुझे देना चाहिए था न."

"पसंद तोह आपको भी बहोत कुछ है लेकिन कहती नहीं हो मुझसे.", अर्जुन ने उन कशिश भरी आँखों में देखते हुए अपनी बात कही तोह रेणुका की नजरे झुक गयी.

"कभी कभी ज्यादा खुलापन बुरा लग सकता है न अर्जुन. दिल के सभी अरमान या हसरते कह देना गलत हो जाता है."

"आपके और मेरे रिश्ते में कुछ ख़ास भी है, जानती है न आप. लेकिन फिर भी आप बड़ी है तोह हक़ से कह सकती है. रही बात इन कपड़ो की तोह हाँ मुझे लगा के जब आपने मधु बुआ से सब साँझा कर लिए है तोह उनके हे हाथो ये दिए जाये. हमारे बीच में मध्यस्थ जैसी तोह हैं वह.", अर्जुन ने निरुत्तर हे कर दिए था.

"सॉरी, आइंदा नहीं होगा ऐसा. बस औरत हु तोह मर्यादा भी है मेरी. सबके सामने एक तलाकशुदा जो हु."

"मेरे साथ आप क्या है वह ज्यादा जरुरी है रेणुका. दिल साथ होने पर तोह कुछ बुरा नहीं लगता.", अर्जुन की बात पूरी होते हे रेणुका ने फिर से होंठो को मुँह में भर लिए था उसके. इस बार खुद हे अर्जुन का हाथ अपने कूल्हों पर रखती वह भी उसको अपने साथ चिपका रही थी. आँखें उन्माद से भरने लगी तोह दोनों अलग हुए.

"मैं चाहती हु के तुम मुझे खुलकर प्यार करो. अगले 4 महीने ऐसे प्यार करो के मुझे इल्म न हो के मैं औरत हु, अपनी प्रेमिका की तरह. चाहे तोह मैं घर से चोरी तुमसे बहार मिलने भी आ जाउंगी."

"अब ऐसा हे करते है. बचा शैतान न हुआ तोह म्हणत व्यर्थ समझो. वैसे पता है ये कपडे कैसे है?", अर्जुन ने एक उभर को कस कर दबाते हुए कान में सरगोशी की. रेणुका की मादक सिसकारी बता रही थी की वह अभी अगर कुछ करेगा तोह रेणुका रुक न सकेगी.

"आह्हः.. वैसे है जैसे हर लड़का सिर्फ फिल्म में देख कर खयालो में सोचता है. गंदे."

"बस अब मैं खयालो की जगह परसो रात आपको इनमे हे देखने वाला हु. और सोच रहा हु के एक जगह जो बची है उसको भी प्यार कर लू, इन्हे पहनाये हुए हे.", अर्जुन ने कूल्हों के बीच उंगलिया दबाते हुए मंशा जताई तोह रेणुका सिसक उठी.

"आह्हः. कर लेना. भाभी कहती है के मेरे ये बहोत छोटे है. पता भी नहीं लगता के पहले भी माँ बन्न चुकी हु. ऊपर से तोह असर दिखने लगा है. आह्हः. चलो अब यहाँ से. भाभी (रोमिला) ने कैमरा मंगवाया था, मैं ले कर जाती हु.", रेणुका बुआ अलग होती कमरे से बहार चल दी और अर्जुन भी उन्हें निहारता हुआ उनके साथ घर आ गया. दादा जी भी तैयार हो कर बस निकल रहे थे लेकिन उनके प्लान में बदलाव था अब. यहाँ उनके साथ शंकर जी और Tara-Ritu जा रहे थे और राजकुमार जी अपनी बीवी के साथ अब अलका, आरती और प्रियंका को ले कर निकल रहे थे. माधुरी दीदी के इधर जाने का कार्यक्रम परसो का बना था क्योंकि उनके घर अभी मुख्या लोग नहीं थे.

"ये तोह आप सभी लोग एक साथ जा रहे है. बाकी सबको भी ले जाइये.", अर्जुन ने थोड़ा नाराजगी से अपने दादा जी से कहा तोह वह शंकर को देखने के बाद हँसते हुए अर्जुन से कहने लगे.

"घर का असली मालिक और दादी जब यही है तोह फिर सब कहा बहार हुए? भाई ऐसा है के तुम्हारी दोनों बहने जिद्द कर बैठी अपनी भाभी को देखने की और इनको तोह तुम्हारा बाप भी ताल नहीं सकता. रही बात राजकुमार की तोह Sanjiv-Madhuri के मां हे तोह भात न्यौतेंगे. मैं तड़के (सुबह) 7 बजे तक तेरे सामने मिलूंगा और निश्चिन्त सोना तुम, मुनीर ड्यूटी पर आ जायेगा 9-10 बजे तक.", रामेश्वर जी ने उसको सब समझते हुए कहा. यहाँ गाडी भी अर्जुन वाली इलो हे थी जिसमे बैठ कर ऋतू और तारा अर्जुन को जीभ चिढ़ा रही थी.

"ाचा जाओ आप लोग. और दीदी आप लोग अपना ध्यान रखना.", अर्जुन ने उनकी मस्ती नजरअंदाज करते हुए ऐसा कहा तोह जल्द हे दोनों के चेहरे अजीब हो गए. ऋतू ने तोह गाल हे सेहला दिए था.

"रात की हे तोह बात है ारु. अभी पता लगा था के वह ताऊजी और पापा ने होटल लिए है इसलिए हम देखने चल दिए. होटल आरक, उमेद चाचा वही मिलेंगे.", ऋतू ने सरप्राइज हे ख़तम कर दिए तोह शंकर जी ने गाडी आगे बढ़ा दी.

"आरक तोह स्पेलिंग मिस्टेक है अर्च होता है. आरक.. अर्जुन ऋतू कोमल.. शाबाश. मतलब ये हो नाम ऐसे है.", अर्जुन ने गाडी जाने के बाद पहेली सुलझाई तोह हैरान हो गया. ज्यादा इसलिए के उमेद चाचा ने भी जीकर तक न किआ था इसके बारे में. दूध और खुराक से फारिग हो कर आज अर्जुन पुराने घर भी चक्कर लगा आया था. और अपने समय पर बगीचे में था. साथ देने के लिए यहाँ मंजू और प्रीती भी थी जो बेशक दिखने के लिए आपस में बातें कर रही थी लेकिन शामिल अर्जुन भी था हर बात में.

"तुमने बगीचे में हर चीज पर बराबर ध्यान दिया है, बेशक हर नेसल अलग है.", मंजू ने ये बात कहते हुए उन लाल हिबिस्कुस के फूलो को हाथ लगाया तोह अर्जुन का ध्यान गया. इन्हे सबसे काम देखभाल की जरुरत थी.

"सही नेसल एक जैसी हे होती है जिन्दा, अलग नहीं. ये ोमोर्फी अगर ख़ास है तोह इनके बराबर साथ देने के लिए वैसे हे लिंकन गुलाब है, अलग झाड़ नहीं.", अर्जुन ने साफ़ कह दिए था के वह आज प्रीती के सामने कबूल कर रहा था के वह कही भी अलग नहीं है. प्रीती चहकती हुई उस बड़े झाड़ तक चलती आयी और मंजू को दिखते हुए बोली.

"ये देखो मंजू, यहाँ सब रंग एक साथ है. दादू ने बताया था के अर्जुन ने साल भर सिर्फ इन पर म्हणत करके इतने सारे रंग एक साथ एक जगह जोड़ दिए. लाल, गुलाबी, संतरिया और सफ़ेद तक शामिल है एक जड़ में, बस पीले वाले आज नहीं दिख रहे. अर्जुन सबको साथ रखने के लिए इतनी म्हणत कर सकता है तोह काम से काम हम तारीफ कर हे सकते हैं. क्यों क्या कहती हो.?", मंजू को गलती का एहसास हुआ और वह झुक कर अर्जुन की मदद करने हे वाली थी की प्रीती ने रोक लिए.

"ऐसा मत करो मंजू. बेशक हम साथ स्विमिंग करते है लेकिन यहाँ उसको अकेले म्हणत करने दो. वो बाँट नहीं सकता, हाँ कभी खुद ले आये तोह मिटटी में हाथ लगा लेना लेकिन शायद तब अर्जुन किसी को इस जगह का एहसास वारिस की तरह करवाएगा.", बात दबी छुपी थी लेकिन मंजू की आँखों में हल्का पानी आ गया था. वजह अर्जुन या प्रीती नहीं थे. बात हे ऐसी कर दी थी प्रीती ने. उसने वह अधिकार मंजू के बचे को हे दे दिए था जो शायद प्रीती का था. अर्जुन भी अपनी जान को समझता था और खुश भी हुआ ऐसा कहने पर.

"तुम दोनों अंदर चलो. अब यहाँ गारा (कीचड) होने वाला है. चलो जाओ अंदर और माँ से पूछ लेना के उन्हें कुछ चाहिए तोह नहीं. मेनका जी अकेली होगी इसलिए बुला लेना उन्हें भी. दादी के पास सो जाएँगी खाने के बाद.", अर्जुन ने सारा कचरा और सूखे पत्ते एक तरफ करते हुए कहा तोह प्रीती भी मंजू को ले कर अंदर चल दी. अन्धकार होने लगा था. अर्जुन को ये ख़ुशी थी की प्रीती सचमुच उसकी अर्धांगिनी हे थी और मंजू हमेशा तैयार रहती थी बलिदान के लिए. वह दोनों को हे अब एक सामान देखने लगा था, सिवाए ऋतू से तुलना के लिए. जो बेशक अधिकार जताती थी लेकिन वह अर्जुन की आत्मा थी. बस यही तोह फरक था जहा अर्जुन Preeti-Manju के श्रेष्ट होने के बावजूद ऋतू के समकक्ष न ला पाया था और ऐसा होना मुमकिन भी कहा था, धड़कन तक एक थी दोनों की. सब शामिल थी, सब प्यार करते थे लेकिन Ritu-Arjun सबको खुश करने के बावजूद अपने प्यार को सार्थक नहीं कर सकते थे. एक जान कही दोहरी हो सकती है? ऋतू गुलाब न थी, वो थी तोह बस जमीन जिस पर अर्जुन ने प्यार उगाया था
 
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