Incest Pyaar - 100 Baar - Page 18 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 105

खेल -1


अर्जुन थोड़ा देरी से आया था लेकिन किसी ने ज्यादा सवाल नहीं किये. आज बहार छोल पूरी ने अपने आदमी मुनीर को देखभाल के लिए लगा दिए था. रात 10 से सुबह 6 तक वह एक दिन के लिए पंडित जी के घर था. अर्जुन 5 मिनट मुनीर से बात करने के बाद अंदर चल दिए. कोमल दीदी नाहा कर अपने कमरे में गयी थी और अर्जुन ख़ामोशी से अपनी माँ के पास आ गया.

"मिल आया वालिए जी से?", रेखा जी भी स्टोर से गाउन पहन कर बीएड के पास हे आई थी.

"जी माँ. अंकल आंटी ने डिनर रखा था, कल उनकी बेटी इंग्लैंड जा रही है इसलिए. संधू सर भी आये थे तोह थोड़ा समय लग गया. आज मैं यही सोने वाला हु.", अर्जुन ने पहली बार खुदसे हे टेबल पर रखे अपने कपडे लिए और स्टोर में जा कर बदलने लगा. माँ अभी भी बात कर रही थी.

"पहले तोह नहीं बताया के तुम वालिए जी के घर भी aate-jaate हो. वैसे उनके एक बीटा और बेटी है न? बीटा भी इंग्लैंड हे रहता है.", बिस्टेर को ठीक करते हुए रेखा जी ने पुछा.

"हाँ, वह इंग्लैंड में हे मैरिड है और अन्नू नाम है उनकी बेटी का जो फिजिक्स में रिसर्च प्रोग्राम के लिए वह जा रही है. अंकल से ज्यादा आंटी के साथ मेरी जमती है. अन्नू मेरी टीचर थी थोड़े समय के लिए और संधू जी की बेटी की सगाई के वक़्त ाचे से पहचान हुई थी सबसे.", अर्जुन बहार आने के बाद अपना पर्स, रुमाल और वह उपहार टेबल पर रखने के बाद माँ के बराबर लेट गया. अब बड़ी लाइट की जगह वह जीरो का बल्ब रोशन था. रेखा जी हमेशा सोने से पहले नहाती थी और अब अर्जुन को वही महक आ रही थी जिस से उसको सुकून मिलता था. लेकिन आज वह बस उनकी तरफ आराम से करवट लिए लेता रहा.

"ाचे लोग है और तेरे पापा के दोस्त भी है वालिए जी. बस आना जाना काम हो गया पिछले 6-7 साल से. तेरी पापा की ट्रांसफर हो गयी और उनका बीटा भी बहार चला गया. लेकिन तेरे पापा को समय मिलता है तोह मिलने जाते रहते है.", रेखा जी ने हलके हाथो से अपनी नाजुक उंगलिया अर्जुन के सर पर फिरने लगी, सुकून देने के लिए.

"आंटी भी बहोत ाची है. मेरा बहोत ध्यान रखती हैं और मैं भी उनके साथ लूडो खेलता हु तोह कभी किचन में हेल्प करवा देता हु.", अर्जुन ने घुटने मोड़ते हुए अपना सर तकिये से निचे लाते हुए चेहरा गाउन के सामने कर दिए. रेखा जी ने भी एक पल के लिए हाथ सर से हटा कर चैन खोली और ऊपर वाला उभर अर्जुन के सामने कर दिए. निप्पल अभी हल्का सूजा हुआ था और एक पल देखने के बाद अर्जुन ने होंठो में भर लिए. रेखा जी फिर से उसका सर सहलाने लगी साथ हे दोनों की आँखे कुछ पल के लिए बंद हो गयी.

"वह हमेशा से हे ऐसी हैं. लोगो से मिलकर उन्हें ख़ुशी मिलती है और जल्दी हे सब पर भरोसा कर लेती है. बस उनका बीटा बहार चला गया तोह उन्होंने भी खुद को बदल लिए. अब पहले जैसी नहीं रही.", रेखा जी अर्जुन का सर सहलाती हुई खुद भी बड़ा हल्का महसूस करने लगी थी. स्टैनो का बोझ अर्जुन हल्का करता हुआ उन्हें आराम पंहुचा रहा था. वह आगे कुछ बातें करती उस से पहले हे वह नींद में जा चूका था.

'बिलकुल नहीं बदला, ले थोड़ी देर ये वाला पी.', अर्जुन को सोये में भी दूध पीटा देख वह मुस्कुराने लगी और निचला उभर उसके होंठो में दाल कर खुद भी आँखें बंद करके अर्जुन से लिपट गयी.

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Crime-branch की ये ईमारत शहर से 5-6 किलोमीटर बहार थी जहा चारदीवारी के बीच 2 एकड़ जामें को ाचे से वृक्षों से सुसज्जित रखा गया था. ठीक बीच में ये 2 मंजिला ईमारत में कई कमरे और दफ्तर थे और इनमे से हे एक कमरे में ये 55-56 साल का रोबीला सा आदमी एक कुर्सी पर बैठा जाम पी रहा था. चेहरे पर ज़माने भर का गुस्सा था और इस जगह पर होने की बेबसी. जाम पीते हुए वह ख़ास तरीके से होंठ भींचता अपने सामने बैठे व्यक्ति को नफरत से देख रहा था.

"सर, मुझसे क्या नाराजगी है? मुर्गा, शराब और उधर ख़ास गद्दा भी लगवा दिया मैंने आपके लिए फिर भी 2 शब्द तारीफ की जगह गुस्सा दिखा रहे हो.", सेव 6 फ़ीट का ये 26-28 वर्षीया आदमी मुस्कुरा रहा था. शरीर भी मजबूत और haav-bhav भी एक काबिल अफसर के थे.

"तुम ओहदे में बराबर हो दीपक लेकिन मैं सीनियर हु तुम्हारा. बहनचोद तुम सब लोगो की क्या हालत करूँगा वह देख कर तुम्हारा रोना न निकल गया तोह मैं भी एक बाप का नहीं.", दुष्यंत शाम से यही बंद था और दिग के जाने के बाद अब देखभाल और पूछताछ का जिम्मा इस नौजवान के पास था. सस्ती शराब और कामचलाऊ सी प्लास्टिक की प्लेट में रखे तंदूरी मुर्गे से वह ाची सेवा कर रहा था दुष्यंत मालिक की.

"सर, मैंने तोह रैंक की बात हे नहीं की. आप मेरे सीनियर है इसलिए तोह आपके लिए पेग बना रहा हु. आजतक हाथ नहीं लगाया इन दोनों चीजों को लेकिन देखिये आपके लिए ये भी कर रहा हु. आप तोह मेरा ख्याल रखने की जगह गाली दे रहे है.", दीपक वैसे हे मुस्कुराते हुए फिर से जाम बनाने लगा. यहाँ न बर्फ थी और न ठंडा पानी. लेकिन घड़े के पानी से भी काम चल हे रहा था.

"2 करोड़. 2 करोड़ 24 घंटे में तुम्हारे पास होंगे बस मेरे 2 काम कर दो.", दुष्यंत ने वह अधपका सा मांस का टुकड़ा उठा कर चबाते हुए कहा. थोड़ा बहोत बहार भी गिर रहा था जैसे भूख जोरो की लगी हो.

"इतना तोह हमारे पूरे गाँव में किसी ने देखा नहीं होगा. 2 करोड़ के लिए तोह मैं सबको मारने के लिए तैयार हु.", अभी दोनों बातें कर हे रहे थे की एक कांस्टेबल ने हलके से दरवाजा खटखटाया और अंदर आ गया. सलाम करते हुए वह जैसे आदेश का इन्तजार करने लगा था.

"रौनक जरा बहार गश्त लगा लो और बाकी सबसे भी कहना के यहाँ जरुरी काम चल रहा है.", दीपक की बात सुन्न कर हाँ में सर हिलने के बाद फिर से सलाम बजाय और बहार चला गया.

"मैं कह रहा था के 2 करोड़ तुम्हारे पास और बस 2 काम करने है.", दुष्यंत ने एक छोटा सा घूँट पीने के बाद बात जारी की लेकिन जवाब में दीपक ने बस सहमति जताई जैसे पूछ रहा हो के पूरी बात कहो.

"राजपाल और अमरीक के बयान के साथ हे मेरे खिलाफ जो बलात्कार और हत्या के सबूत जमा किये गए है वह बिना chhed-chaad के मुझे चाहिए. और यहाँ से दिल्ली तक जाने का इंतजाम. ये 2 काम के बदले 2 करोड़. क्या कहते हो?"

"डील बुरी नहीं है और मैं कोशिश करता हु लेकिन आधे पैसे अभी चाहिए.", दीपक ने अपना पक्ष रखते हुए थोड़ी गंभीरता से दुष्यंत को देखा.

"फ़ोन का इंतजाम करवाओ, एक करोड़ मैं अभी तुम्हारी कही जगह भिजवा देता हु.", दुष्यंत के इतना कहते हे दीपक कुर्सी से उठ खड़ा हुआ और दरवाजा बंद करके साथ वाले कमरे से एक लम्बी तार वाला टेलीफोन लेकर फिर से अंदर आ गया.

"क्सक्सक्सक्स दूकान के बहार मेरा आदमी मिलेगा मोडल टाउन में, पैसा उसके पास पहुंचना है. एक करोड़ मिलते हे मैं आपको यहाँ से बहार भिजवा दूंगा और बाकी पैसा सबूत देते समय मैं खुद लूंगा. दिल्ली आप कल निकलना आज रात होटल तुलिप में मेरे खास कमरे में रहिये.", दीपक की बात सुन्न कर दुष्यंत के चेहरे पर ख़ुशी चा गयी. नंबर मिलाने से पहले उसने कहा.

"एक काम करो फिर. अपने आदमी को तुलिप हे आने को कहो, वही 2 करोड़ दे देता हु और रात की थकान दूर करके वही से दिल्ली निकल जाऊंगा. सबूत मेरा आदमी तुमसे ले लेगा.", दुष्यंत जरुरत से ज्यादा हे कड़ियल और हरामी इंसान था. जिसका विश्वास दीपक को भी नहीं था लेकिन उसने रजामंदी जाता दी और दुष्यंत नंबर मिलाने लगा.

"सट्टे, अनाज मंडी वाले गोदाम से 2 करोड़ ाचे से बैग में भर कर तुलिप होटल पहुंच आधे घंटे में. साथ हे रात के लिए एक नजराना भी, थोड़ा कमसिन सा.", इतना बोल कर सामने वाले की थोड़ी बात सुन्न कर दुष्यंत ने फ़ोन रखा और दीपक से अपने आदमी को घंटे बाद बुलाने को kaha.Deepak ने भी अपने आदमी को फ़ोन करके होटल से पैसा लेने को कहा एक घंटे बाद. हाथो में हथकड़ी पहनते हुए वह दुष्यंत को ले कर बहार आ गया. किसी ने सवाल नहीं किआ अपने अफसर से और मारुती 800 में बैठा कर दीपक दुष्यंत को बड़े आराम से बहार निकाल ले आया. रस्ते में बस 2-4 बात हुई और कार 10 मिनट बाद हे इस साधारण से होटल के बहार आ रुकी. हथकड़ी खोल कर दीपक खुद हे दुष्यंत की तरफ का दरवाजा खोल कर उसको लिए होटल में आ गया.

"मेरा कमरा खली है?", दीपक ने काउंटर पर बैठे जवान से लड़के को पुछा और उसने मुस्कुराते हुए खड़े हो कर एक चाबी हवाले कर दी.

"मेरा कोई दोस्त या साहब को पूछने कोई आये तोह 204 में भेज देना. ख़ास है अपने.", दीपक ने 50 का नोट देते हुए लड़के को खुद किआ और कमरे की तरफ चल दिए. दूसरी मंजिल पर 4 कमरे थे और सबसे आखिरी वाले को खोल कर दीपक ने दुष्यंत को कमरा दिखाया और आराम करने का बोल कर वापिस चला गया.

"चुटिया साला. किसने पुलिस में भर्ती कर दिए गांडू को? इसकी गांड भी ाचे से मारूंगा.", दुष्यंत बिस्टेर पर बैठने की जगह खिड़की के पास खड़ा बहार देखने लगा. जल्द हे दीपक अपनी मारुती कार को चलता वह से गायब हो गया जैसे दुष्यंत पर उसको पूरा विश्वास हो. लेकिन दुष्यंत मुचो पर हाथ फिरता वही खड़ा रहा जबतक बहार एक और गाडी न आ कर रुक गयी. ये उसके हे आदमी थे और 2 लोग गाडी में बैठे रहे बस एक आदमी और एक जवान लड़की होटल की तरफ बढ़ गए.

"खेल खेलने से पहले जरा पानी निकल हे लू.", लुंड को पतलून के ऊपर से खुजाते हुए वह बिस्टेर पर बैठ गया. पहले शराब का हल्का सुरूर था और अब आने वाली लड़की के लिए उत्तेजना में नशा दोगुना हो रहा था. जल्द हे दरवाजे पर दस्तक हुई.

"सट्टे दिल खुश कर दिए, साली क्या हूर लेकर आया है.", दरवाजा खोलता हुआ दुष्यंत कही ज्यादा हे खुश था. लेकिन अंजाम तोह सपने में भी नहीं सोचा था जो हो गया. मुँह पर जोरदार मुक्का लगते हे भारी शरीर बिस्टेर पर जा गिरा.

"आज ये mehmaan-navaaji का मौका गलती से मुझे मिल गया है मालिक.", नाक और होंठो से बहते खून से ज्यादा दर्द तोह सामने खड़े आदमी को देख कर दिल में होने लगा था दुष्यंत मालिक को. न सट्टे आया था और न लड़की लेकिन जल्लाद जरूर खड़ा था जिसके चेहरे पर ज़माने भर की ठंडक और भूरी आँखों में ख़ास चमक थी.

होटल के बहार भी अब न वह गाडी थी और न उन लोगो में से किसी का निशान. सबकुछ दुष्यंत की मर्जी से नहीं हुआ था.

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साढ़े 4 बजे अर्जुन की आँख खुली तोह दोनों उभर उसके चेहरे पर थे. उनसे आती वह सोंधी महक ाचे से साँसों में भरने के बाद वह सावधानी से अपनी माँ का हाथ तकिये पर रखते हुए कमरे से बहार निकल कर बाथरूम में आ गया. अगले 15 मिनट में हे वह नाहा धो कर बहार आ चूका था. कपडे माँ के हे कमरे में थे और टोलिया लपेटे वह अंदर आ गया. रेखा जी भी उठ चुकी थी और अर्जुन को तैयार होते देख उसके पास आ कड़ी हुई.

"नींद ाची आई?"

"बेस्ट.", अर्जुन ने ट्रैक पाजामे के ऊपर टीशर्ट पहन ली थी. और माँ के खूबसूरत चेहरे को इतने करीब देख कर अब ज्यादा सबर न कर सका. वह मॉटे होंठ चेहरा धुले बिना भी रस से भरे थे जिनपर अपने होंठ रखता वह ये गहरा चुम्बन करने लगा. जिस्म पर कही हाथ न लगते हुए दोनों कुछ पल इस लम्हे में क़ैद रहे और अलग होते हे रेखा जी नजरे झुकाये जाने लगी.

"गलती हो गयी क्या माँ?", अर्जुन ने उनकी कलाई पकड़ते हुए पुछा.

"पागल है तू. बाथरूम जाने दे.", वह मुस्कुराई तोह अर्जुन के दिल को स्वर्ग सा एहसास हुआ. उनके हसीं चेहरे और बिखरी जुल्फों को देखता वह हाथ थामे खड़ा रहा.

"जाने दे न अर्जुन.", इस बार होश में आते हे वह उनसे पहले कमरे से बहार निकल गया.

'पगला कही का. मुँह भी धोने की परवाह नहीं की.', उसके बहार निकलते हे रेखा जी ने वही गीला टोलिया कुछ सोच कर उठाया और वो भी नहाने के लिए चली गयी. अर्जुन जूते पहन कर बहार जा चूका था और जाने से पहले मुनीर को भी ठन्डे पानी की बोतल पकड़ते हुए haal-chaal पूछ गया था. मौसम में हलकी उमस थी लेकिन फिर भी सुकून भरा और शांत माहौल था. हलके कदमो से दौड़ता अर्जुन आज कुछ दुविधा में था लेकिन कुछ सोचता हुआ वह पार्क की और बढ़ गया.

"आज बेचैन हो कुछ.", जाने कैसे आचार्य जी उसका दिल नजर भर में हे पढ़ लेते थे.

"ऐसा कुछ नहीं है गुरु जी. बस कल का दिन थोड़ा ज्यादा हे व्यस्त था और नींद भी टुकड़ो में हे लेनी पड़ी.", उनके पाँव छूने के बाद अर्जुन 10 मिनट दौड़ने का बोल कर पटरी पर तेज कदमो से भागने लगा. आचार्य जी shaant-bhav से उसको दौड़ते देख अपने नरम जूते एक तरफ रखते हरी घांस पर चहल कदमी करने लगे. ऐसे में भी वह आँखें बंद करते गहरी साँसे ले रहे थे. फिर इस हिस्से के ठीक बीच में घांस पर बैठते हुए उन्होंने पद्मासन की मुद्रा धारण कर ली. अर्जुन पूरे 5 चक्कर लगाने के बाद उनके पास आया तोह वह भी शरीर को ढीला छोड़ कर आराम से बैठ गए.

"तोह अब बताओ के परेशां क्यों हो?", सवाल वही था और अर्जुन के चेहरे का पसीना भी जैसे उसके भाव न छुपा पाया.

"एक दोस्त है, ख़ास. वह आज जा रही है 3 साल के लिए देश से बहार. रात मैं डिनर पर भी गया था उसकी ख़ुशी के लिए और वह भी सरप्राइज करते हुए. वह से आते हुए मेरे कदम साथ नहीं दे रहे थे दादा जी. लेकिन मैं माँ के पास सोया तोह सब भूल कर गहरी नींद ली. लेकिन घर से बहार आते हे आज कदम यहाँ आना नहीं चाहते थे और मैं वह जाना नहीं चाहता.", अर्जुन कुछ पल झुक कर खड़े होने के बाद फिर आचार्य जी के बगल में हे घास पर पाँव फैलते हुए बैठ गया. आचार्य जी भी सब ध्यान से सुन्न रहे थे और अर्जुन को पढ़ रहे थे.

"तुम वही जाना चाहते हो लेकिन खुद को कमजोर साबित नहीं करना चाहते बीटा. उस दोस्त की ख़ुशी के लिए तुमने रात जो किआ वह सही था लेकिन अब तुम्हारा अपनी ख़ुशी को दबाना गलत है. जिसकी परवाह हो उसके दर्द में शामिल होना जितना जरुरी है उतना हे जरुरी है उस से तब मिलना जब तुम्हे भी ख़ुशी की जरुरत हो. कभी कभी ऐसे प्यारे स्वार्थ करना जरुरी है.", आचार्य जी ने पीठ पर हलकी थकी देते हुए जैसे अर्जुन को खड़ा होने को कहा.

"गलत नहीं लगेगा?"

"लगेगा न, अगर तुम वक़्त रहते भी ना मिलने जाओ तोह गलत लगेगा. और शायद तुम जो आज कहना चाहते हो उसकी एहमियत तब्ब न रहे जब समय का चक्र घूम जाये.", आचार्य जी भी खड़े हो गए थे. अर्जुन ध्यान से उन्हें देखता रहा जैसे अब वह उन्हें पढ़ना चाहता हो.

"समय का एक सही पल.", उन्होंने फिर से अर्जुन को चेताया, मुस्कान के साथ. अर्जुन भी तुरंत उनके पाँव छु कर वह से निकल भागा. अब कदम असमंजस में न थे और न शरीर में किसी तरह का कोई दबाव. अन्नू से वह पहले उसकी ख़ुशी के लिए मिला था लेकिन अब वह अपने लिए उस से बात करना चाहता था, बताना चाहता था के अन्नू की एहमियत ख़ास है उसके जीवन में और वह भी उसको जरुरत से ज्यादा याद करेगा जाने के बाद. कदम khud-ba-khud आ रुके सरदार जी के घर के सामने. सफ़ीद टीशर्ट से पसीना पानी की तरह टपक रहा था और भीगे हुए बाल आँखों के सामने आ रहे थे. घडी 5:25 बजा रही थी और अर्जुन ने बिना सोचे बस धड़कते दिल से वह घंटी का बटन दबा दिए.

"वालिए जी तोह गुरुद्वारा साहिब चले गए अभी 5 मिनट पहले.", ये आवाज सुनते हे अर्जुन ने नजर घुमाई तोह ये आंटी वही थी जो अन्नू की माता जी के पास आती रहती थी. कहा तोह वह हिम्मत करके 2 किलोमीटर की दुरी उड़ता हुआ तये करके आया था और इनके शब्दों ने शरीर हे ठंडा कर दिए. वह भी इतना कह कर हाथ में दूध का दल्लु लिए अपने रस्ते चली गयी. गहरी सांसें लेता वह आँगन में कार को नदारद देख कर भारी कदमो से अपने घर की और जाती गली की तरफ बढ़ने लगा.

"अर्जुन.", यही आवाज तोह थी जिसके लिए अर्जुन जाने कितना बेचैन था. सपना न हो बस ये सोच कर एक बार फिर से नजर घुमाई तोह अंदर के दरवाजे को खोले अन्नू उनींदी सी कड़ी अर्जुन जैसी हे हालत में थी. लेकिन अर्जुन सजग था और इस बार वह जैसे अन्नू को नजरो से दूर नहीं होने देना चाहता था. गेट की कड़ी खोल कर वापिस बंद करता वह पलभर में हे अन्नू के सामने जा खड़ा हुआ.

"तुम नहीं जानती मेरे साथ क्या हो रहा है.", अन्नू ने अर्जुन की हालत देखि तोह साड़ी नींद काफूर हो गयी. उसका हाथ पकड़ती वह उसको अंदर करते हे दरवाजा बंद करके पीठ लगाए कड़ी हो गयी. धड़कन अपनी चाहत को यु सामने देख कर बेकाबू हो चुकी थी. भगवन क्या कर रहा है उसके साथ और अर्जुन ऐसे कैसे. लेकिन दिल के सामने सब समीकरण और उम्मीदे एक तरफ करती वह उसके पसीने से भरे जिस्म से जा लगी. ऐसी प्रभात होगी ये दोनों ने कहा सोचा था. आँखों से आंसू सब बाँध टॉड कर बहते हुए अर्जुन के सीने पर आये पसीने में घुलने लगे. दोनों के प्यार की तरह.

"ी लव यू अन्नू, मैं इस बार खुद ये कहने के लिए आया हु. जितना भी कहु के मैं ठीक हु और हम दोनों फिर मिलेंगे लेकिन एक सच ये भी है के मेरे दिल का एक हिस्सा तुम्हारी याद में सूना रहेगा. मैंने कभी महसूस नहीं किआ था के प्यार करने वाला अगर दूर हो जाये तोह कैसा लगता है लेकिन कल रात मैं तुम्हारे साथ रहना चाहता था. कल रात मैं तुम्हारे लिए आया था लेकिन आज अपने लिए, हमारे लिए मुझे तुमसे मिलना था.", अर्जुन भी कसके अन्नू को बाहों के घेरे में लिए उसको सीने से लगाए खड़ा था.

"ये मेरे लिए भी मुश्किल है और मुझे भी तुमसे अकेले मिलना था जाने से पहले. बस डर था के सबके सामने तुम्हे देख कर मैं कोई गलती न कर दू. ी लव यू जान.", आज अन्नू के नमकीन होंठो का स्वाद अब तक का सबसे मीठा लग रहा था.

"मैं तुम्हे रुलाने नहीं आया अन्नू. बताने आया हु की तुम हमेशा मेरे पास रहोगी. जाने से पहले नहीं मिलना अगले 6 महीने तक जरूर खेलने वाला था.", अर्जुन उन बड़ी आँखों को चूमते हुए चेहरे को साफ़ करने लगा.

"तुम्हे इतना प्यार कब हो गया मुझसे? और देखो क्या हाल किआ है मेरा.", अन्नू ने हाली नाराजगी से अर्जुन के सीने पर मुक्का मारते हुए कहा और खुदकी भीगी टीशर्ट दिखने लगी, जहा अर्जुन का पसीना कपडे को त्वचा से चिपकाये था.

"काम या ज्यादा प्यार क्या होता है मुझे नहीं पता. और तुम मेरी हो तोह प्यार के साथ हे पसीना भी बराबर मिलेगा.", अर्जुन ने उस ताजे गुलाब से चेहरे को दोनों हाथो में लेते हुए ये गीला चुमबन्द किआ तोह अन्नू भी उसको मजबूती से पकडे बराबर साथ देने लगी. लम्बे कद के बावजूद अन्नू एड़ी उचकती ऊपर होने लगी तोह अर्जुन ने कमर थामते हुए चेहरे को देखा.

"मम्मी पापा 7 बजे तक आएंगे. हर संडे वह इस वक़्त घर नहीं होते.", अर्जुन को भी पता था के वह कहा गए है लेकिन कब आएंगे ये जानते हे कमर से हाथ निचे उन बेजोड़ मांसल कूल्हों पर आ गए. अन्नू को उठाये वह उसकी गर्दन चूमता उसके कमरे में आ गया. यहाँ भी दोनों एक कशिश से भरे चुम्बन में डूब गए. घडी के कांटो और दुनिया से परे ये 2 जिस्म और दिल एक दूसरे से लगे एक दूसरे में खोने लगे.

"जाने से पहले एक और बार प्यार नहीं करोगे?", अन्नू का हिलता सीना और लाल चेहरा अपनी हालत बयां कर रहा था. अर्जुन बस इस चेहरे को देख रहा था जो जाने कब दिल की गहराई में अपनी छाप बना गया था.

"जिस्मानी नहीं लेकिन रूमानी जरूर. आज तुम्हारे साथ मैं वह कुछ ख़ास शेयर करना चाहता हु. अगले 10 मिनट तुम बस मेरे साथ मेरा कहना मान लो.", अर्जुन ने अन्नू को फर्श पर खड़ा करते हुए गाल चूमते हुए कहा और बाथरूम से खुद का चेहरा दुरुस्त करने के बाद साथ लिए रसोई में आ गया.

"जो अब हम करेंगे वह तुम्हारे साथ हमेशा रहने वाला है.", अर्जुन ने चाय के बर्तन में थोड़ा पानी डालने के बाद चूल्हे पर उबलने रखा और अन्नू के महकते जिस्म को पीछे से बाँहों में लिए वही खड़ा हो गया.

"तुम मुझे ऐसे वक़्त चाय बनाना सीखा रहे हो?", अन्नू ने मुस्कुराते हुए अर्जुन के हाथ अपने बड़े उरोजों पर रखते हुए पुछा. अर्जुन मस्ती करता उन दोनों मांसल गोलों को दबाते हुए गोरी गर्दन पर होंठ फिरने लगा.

"हमेशा अकेले रहने से बचने का तरीका बता रहा हु. हॉस्टल में सीखा था मैंने की ख़ास पल कैसे याद रखे जाते है.", चायपत्ती के डब्बे से 2 चम्मच चाय की उबलते पानी में डालने के बाद अर्जुन 2 मिनट उसको पकता रहा. अन्नू को तोह इस सबसे कोई लेना देना न था, अर्जुन का पास होना काफी था उसके लिए. गिलास में वह काली बिना चीनी की चाय छान कर अर्जुन को साथ लिए वह वापिस कमरे में आ गया. गीली टीशर्ट दरवाजे पर तंगी थी और अन्नू उसकी गॉड में बैठी उसके सीने पर हाथ रखे हलके हलके चुम्बन लगातार करती रही.

"एक सिप लो.", अर्जुन ने वह गिलास सामने बढ़ाया तोह सिर्फ चाय की तीखी महक एक पल के लिए अन्नू को बेचैन करने लगी लेकिन अर्जुन के इतना प्यार से कहने पर गरम उबले पानी की छोटी सी घूँट मुँह में भरते हे दुनिया के सबसे बुरे जायेके का एहसास हो गया.

"हाहाहा.. बहोत बुरा स्वाद है न?", अर्जुन ने चेहरे के भाव देखते हुए हँसते हुए कहा.

"युक.. क्या है ये?", अन्नू ने मुँह के सामने हाथ रखते हुए कहा.

"मेरा प्यार, हमारा प्यार है ये अन्नू.", अर्जुन ने एक घूँट अपने होंठो से अंदर करते हुए बड़े आराम से स्वाद को महसूस करते हुए पी लिए. गिलास एक तरफ रखते हुए अन्नू के होंठो से अपने होंठ मिलते हुए इस बार जो चुम्बन किआ उसमे दोनों के होंठो के साथ हे जीभ भी अठखेलिया करने लगी और अलग होते हे अन्नू के चेहरे पर हैरत के भाव थे.

"आईटी टर्न्ड स्वीट."

"कहा न के ये हमारा प्यार है. जैसा स्वाद सिर्फ अकेले मिला, दोनों के बांटने पर वह बेहतर में बदल गया.", कसैली चाय का स्वाद भी अजीब था जो बाद में मीठा हो चूका था. इस बार अन्नू ने खुद हे घूँट भरी तोह वह अजीब महक उतनी बुरी न लगी, वह कड़वा पानी भी होंठो के साथ जीभ को तर करता आराम से निचे उतर गया. असर भी ऐसा था के दिमाग के नसों को आराम देने वाला. 5 मिनट में 10 घूँट और 5 गहरे मीठे चुम्बन. शरीर को कपड़ो के ऊपर से हे सेहलते हुए दोनों ने प्यार किआ और घडी में 6:10 का समय देखते हुए अर्जुन खड़ा हो गया.

"जल्द मिलेंगे अन्नू. जब भी याद आये तोह अब तुम्हारे पास हमारे प्यार को महसूस करने का एक pra-roop है. पंजाब न जाना होता तोह मैं ये दिन तुम्हारे साथ हे व्यतीत करता. इनका ख्याल रखना.", आखिरी लफ्ज़ कहते हुए अर्जुन ने शरारत से दोनों उभारो को पकड़ते हुए अन्नू के होंठो को कस के चूम लिए.

"ये सिर्फ तुम हे कर सकते हो. मैं तोह अब इन्हे हाथ भी नहीं लगाती. वैसे थैंक यू फॉर छीरिंग में उप. लव यू एंड टेक केयर.", दोनों हाथो को थाम कर अन्नू ने अर्जुन के दिल के ऊपर किश किआ और ाचे से गले लग गई.

"आंटी से मिलता रहूँगा और उन्हें बता देना के अर्जुन अपनी माँ के साथ उन्हें शादी का कार्ड देने आएगा. भैया और दीदी की शादी एक साथ हे है इस 21 मई को. तुम्हे भी फोटो ईमेल करूँगा.", दरवाजे तक आते हुए इस बार अन्नू भी खुश थी और अर्जुन की बेचैनी भी ख़तम हो चुकी थी. आँगन में भी अन्नू ने बिना किसी की परवाह के उसको गले लगा कर विदा किआ. अब अर्जुन के पाँव उस से अलग नहीं चल रहे थे.

अगले आधे घंटे बाद वह तैयार हो कर अपनी बहनो से मिलने के बाद प्रीती और रेणुका के साथ 10 मिनट बिता कर इस एस्टीम कार में बैठा था पिछली सीट पर आरती और प्रियंका दीदी के साथ. अगली सीट पर लकी अरोरा और दीपक स्टीयरिंग पर थे और लकी ने हे अर्जुन का परिचय दीपक से करवाया था दोस्त के छोटे भाई और शंकर जी के सुपुत्र के रूप में.

"छोटे भाई पता है के तुम आराम से जाने वाले थे लेकिन जरा सरकारी काम हमको भी था और राज्य से बहार पुलिस की गाडी से जा नहीं सकते थे इसलिए तुम्हारे साथ हो लिए. भरोसा दिलाता हु के मेरी वजह से कोई व्यवधान नहीं आएगा तुम्हारे सफर में और गुड़िया आप दोनों भी निश्चिंत रहिएगा. एक हे शहर जा रहे है तोह बस सफर हे साथ होगा. कल मेरा काम ख़तम हो गया तोह शायद वापसी में भी आप लोगो के साथ औ नहीं तोह ये पोलिसिअ आप लोगो को झेलना नहीं पड़ेगा.", दीपक हंसमुख और मिलनसार व्यक्ति था.

"भैया जैसे लकी भैया वैसे हे आप हो हमारे लिए. ऐसा मत सोचना के आप जबरदस्ती हमारे साथ जा रहे हो, हो सकता है के हम लोग हे आपके पल्ले पड़ गए हो.", अर्जुन ने हाथ मिलते हुए जवाब दिए तोह सभी के चेहरे पर हंसी आ गयी. दीपक ने गाडी चालू करते हे सही दिशा में दौड़ा दी. प्रियंका दीदी बहार देख रही थी और आरती ने चेहरे पर दुपट्टा रखते हुए सोना हे बेहतर समझा.

"वैसे अर्जुन के किस्से तोह सुने हे होंगे तुमने दीपक.", हलकी फुलकी बातों में हे घंटा गुजर गया था और प्रियंका दीदी के सोते हे लकी ने बात शुरू की.

"अगर ये वही अर्जुन है तोह maan-na मुश्किल है. वैसे अर्जुन भाई तुम अपने पिता से थोड़ा जुड़ा हो.", दीपक ने पिछले शीशे में अर्जुन को देखते हुए कहा.

"हाँ पापा हमेशा व्यस्त रहते है और मैं दिन भर घर के लोगो को परेशां करता रहता हु.", अर्जुन हँसते हुए बोलै.

"अरे भाई मेरा मतलब वह नहीं था. शंकर जी तोह इतने मजाकिया और जिंदादिल इंसान है लेकिन तुम लगता है ज्यादा बातें नहीं करते.", लकी भी दीपक की बात सुन्न रहा था, ख़ामोशी से.

"भैया ऐसा है न के आप हो पोलिसवाले और पापा भी सरकारी डॉक्टर. आप लोगो का मजाक चल जाता है लेकिन मेरा तोह सिर्फ मेरे रिटायर्ड दादा जी या रिटायर्ड छोल अंकल हे झेल सकते है. ों ड्यूटी वालो से अपना थोड़ा दूर से नमस्कार है.", अर्जुन के मजाक पर दोनों हे हंसने लगे.

"वाकई दिलचस्प इंसान हो यार. सुना है बॉक्सिंग का भी शौक रखते हो."

"हाँ संजीव भी बता रहा था के तुम ाचा कर रहे हो बॉक्सिंग में.", लकी ने भी सुर में सुर मिलाया.

"शौक तोह है सीखने का, जो भी नया सीखने को मिले मैं तैयार हो जाता हु. उसके अलावा तोह बस peid-paudhe और परिवार.", अर्जुन की बात सुन्न कर धीमी आवाज में चलता रेडियो भी दीपक ने बंद कर दिए. साफ़ 15 फ़ीट चौड़ी सड़क के दोनों तरफ हरियाले वृक्षों की कतार से बस उनकी हे कार गुजर रही थी. कही कही कोई स्कूटर या गाडी सामने से उनकी तरफ निकल आती.

"सुदर्शन को तुमने हे मारा था?", दीपक ने इस बार शीशे से पीछे नहीं देखा था. अर्जुन की दोनों बहना आराम से सोई हुई थी और लकी को भी जैसे इस सवाल की उम्मीद न थी लेकिन वह भी चुप हे रहा.

"जैसी हरकत उसने की थी तोह मैंने वही किआ जो ठीक लगा. आपको सहानुभूति है क्या सुदर्शन से?", अर्जुन अब दीपक को टटोल रहा था.

"मेरा वह मतलब नहीं था. सुदर्शन पर पहले भी कुछ केस थे और 2-3 बार उसने पुलिस टीम जो उसको पकड़ने गयी थी उस पर भी हुम्ला किआ था. शरीर तगड़ा होने के बावजूद तुम उम्र में बहोत छोटे लगते हो और अनुभव में भी. कैसे कर दिखाया तुमने वह सब?", दीपक बात को समझते हुए पूछने लगा. शरीर से वह भी तगड़ा और लम्बा था, शायद अर्जुन से भी एक इंच ऊँचा.

"इंसान 2 हे हालात में सोच से ज्यादा कर गुजरता है. जब बात परिवार की हो या फिर खुद की जान की. मेरे साथ तोह दोनों स्थिति थी वह.", अर्जुन भी उतना हे जवाब दे रहा था जितने में अगला सवाल पैदा हो सके. दीपक कुछ देर सामने सड़क पर देखने लगा और फिर अगली बात कही.

"वह कबड्डी सिर्फ शौक के लिए खेलता था लेकिन कुश्ती और भारोत्तोलन (वेटलिफ्टिंग) में वह प्रोफेशनल था कोई 5 साल पहले. शायद जितनी तुम्हारी उम्र है उस से ज्यादा उसको अनुभव है इन खेलो का और शरीर भी लोहे सा. इसलिए मुझे बस हजम नहीं हुआ था उस वक़्त की कोई अकेले हे सुदर्शन और उसके जैसे 4 और लोगो को धुल छठा सकता है. और तुम्हे देख कर तोह अब बात ज्यादा हे मंनघडंत लग रही है.", दीपक की हंसी में जैसे एक तंज़ था. वह जाने क्या सोच कर ये सब बात कर रहा था लेकिन अर्जुन भी मुस्कुरा रहा था.

"यही तोह जरुरी है. मैं भी नहीं चाहता के आप विश्वास करे.", अर्जुन ने जवाब देते हुए आरती दीदी के लुढ़कते सर के पीछे अपनी ब्याह रख दी, जिस से वह बिना हिले और आराम से सोई रहे.

"सॉरी यार. अनजाने में हे ऐसी बातें होने लगी. वैसे एक पते की बात बताता हु. जहा जा रहे हैं वह माहौल बड़ा मजेदार होता है.", दीपक को भी लगा के अर्जुन दिल से बात नहीं कर रहा और शायद उसकी वजह भी दोनों बहनो की उपस्थिति है.

"मैं तोह कभी पंजाब आया नहीं हु पहले तोह मुझे ख़ास पता नहीं है.", अर्जुन को भी ठीक लगा था के बात अब सही तरफ मदद गयी है.

"सबसे बड़ा शहर है पंजाब का ये और छोटे भाई यहाँ न लोग भी मिलनसार है और खाना तोह पूछो हे मैट. कॉलेज रोड के samose-chole, मोडल टाउन के कुलचे, गोलगप्पे और राबड़ी. बड़ी मार्किट के छोले भठूरे, kulfi-falooda और जाने क्या क्या. हर मोहल्ले में कुछ न कुछ ख़ास रहता है. वैसे लकी इसलिए आया है के यहाँ उसकी पसंद का murga-machli हर जगह मिलता है वह भी इसके हिसाब से दुनिया का बेस्ट.", दीपक ने हँसते हुए लकी का जीकर किआ तोह वह भी हंसने लगा.

"बातो से तोह लगता है के शहर ज्यादा बड़ा है ये. फिर तोह मैं दीदी के साथ जितना समय मिलेगा बस घूमना पसंद करूँगा.", अर्जुन इस नए शहर के बारे में सुन्न कर रोमांचित होने लगा था.

"अर्जुन शहर भी बड़ा है और मार्किट तोह अनगिनत. पार्क, सिनेमा, विदेशी कपडे, फैक्ट्री और हर वह चीज जो होनी चाहिए तुम्हे देखने को मिलेगी. कॉलेज, यूनिवर्सिटी तोह तुम जाने हे वाले हो.", लकी ने चर्चा में शामिल होते हुए और भी बातें बताई.

"आप लोग भी घूमेंगे?", अर्जुन ने जिज्ञासा से पूछ लिए.

"कहा यार, हमारी कहा ऐसी किस्मत 12 बजे कमिश्नर साहब से मीटिंग है फिर शाम तक पुलिस लाइन में रहना पड़ेगा और कल सारा दिन काम. रात को समय मिला तोह लकी का तोह मनोरंजन तैयार रहेगा और मैं देखूंगा टेलीविज़न पर फिल्मे.", दीपक ने मायूस सा चेहरा बनाते हुए लकी को देखा.

"कोई बात नहीं. आप न हमारे शहर में समय निकलना फिर मैं आपको वह हमारे लायक जगह घुमाऊंगा. संजीव भैया भी बोरिंग लगते है लेकिन सच कहु हम दोनों भी मस्ती कर हे लेते है.", अर्जुन ने जैसे अस्पष्ट शब्दों में दोस्ती का हाथ बढ़ा दिए था दीपक के सामने.

"दोने भाई, वैसे भी मेरी शाम तोह बेकार हे रहती है. लकी का तोह घर है वह जब चाहे निकल जाता है लेकिन मैं तोह समय व्यतीत करने भी ड्यूटी चला जाता हु.", दीपक को ख़ुशी हुई थी की अर्जुन समझदार होने के साथ हे जिंदादिल लड़का था. सड़क किनारे एक ढाबा देख कर उन्होंने कार रोकी तोह दोनों दीदी की भी आँख खुल गयी. उन्हें बाथरूम दिखने के बाद कार में हे चाय और पराठे देने का बोल कर वह तीनो लोग 2 चारपाई पर आमने सामने बैठ गए.

"अब गाडी लकी चलाएगा और मैं नाश्ता करने के बाद घंटा नींद लूंगा. रात भी काली हो गयी और अब दिन भी वैसा हे जाने वाले है.", दीपक ने अपनी बात कहते हुए 5 आलू प्याज के परांठे माखन के साथ और 4 चाय एक लस्सी आर्डर कर दी. प्रियंका और आरती दीदी भी बाथरूम से मुँह धोने के बाद कार की तरफ जाते हुए अर्जुन को देखने लगी तोह अर्जुन ने इजाजत लेते हुए अपनी दीदी को भी एक तरफ चारपाई पर बुला लिए. लकी और दीपक अपनी बातों में लग गए और अर्जुन नाश्ता अपनी बहनो के साथ हे करने लगा.

"क्या परांठे है दीदी, मजा आ गया. लस्सी भी बड़ी ाची है.", अर्जुन ने खाने की तारीफ की तोह प्रियंका दीदी के बोलने से पहले हे ढाबे के संचालक, एक सफ़ेद दाढ़ी वाले आकर्षक से सरदार जी बोल पड़े.

"पुत्तर जी, यह पंजाब विच खुराक हे हैंगी जेहड़ी गबरू बनाये रखड़ी है. शहर विच मेरे छोटे प्रः (बरोथेर) डा ढाबा है गुरमेल दे नाम तोह मोडल टाउन दे गोल चक्कर कॉल, समां मिले तह होक ाइयो.", इतना कह कर वह अर्जुन के सर पर हाथ फेर कर आगे बैठे एक गरीब को chai-roti देने चले गए. अर्जुन को ाचा लगा उनका स्वाभाव और ऐसे अपनापन दिखाना.

"मैं भी यही कहने वाली थी की pyaaj-paneer के परांठे तोह गुरमेल के या फिर बंसी के खिलाऊंगी. देखना सब स्वाद भूल जाओगे.", आरती दीदी चेहरा धोने के बाद अब स्वाभाविक हो गयी थी, हमेशा की तरह खूबसूरत और प्यारी. प्रियंका दीदी भी बातों के साथ नाश्ता करने लगी और यहाँ से फारिग होने के बाद गाडी चल पड़ी अपनी मंजिल की और. अगले एक घंटे में हे सड़क के दोनों तरफ बड़ी फैक्ट्री और शोरूम दिखाई देने लगे. सड़क इतनी चौड़ी की 4 गाडी बराबर चल सके. अर्जुन बहार देख रहा था के 3 में से एक शख्स सरदार नजर आ रहा था.

"वाह दीदी, आपका शहर तोह बहुत बड़ा और ाचा है."

"अभी शहर आगे है भाई और मोडल टाउन तक जाते हुए हे 20-25 मिनट लग जायेंगे, खाली सड़क है इसलिए.", प्रियंका दीदी जिसको खली सड़क बता रही थी वह तोह पहले हे ाची भीड़ थी.

"आप शहर के आखिर में रहती हो क्या?", अर्जुन की बात का जवाब लकी ने दिए.

"अर्जुन, मोडल टाउन शहर के ठीक बीच में है और सबसे ख़ास इलाका. उस से आगे भी इतना हे शहर है और ऐसा हर तरफ से है न की सिर्फ सीढ़ी सड़क पर. हमारे शहर में तोह 4 लाख की आबादी है लेकिन यहाँ 22 लाख लोग रहते है. शायद अब तुम्हे ाचे से समझ आये.", प्रियंका दीदी के साथ आरती दीदी भी हंसती हुई अर्जुन की हैरत को देखने लगी.

"तभी सोचु की दीदी इसको खली सड़क क्यों कह रही है. मतलब प्रमुख समय पर तोह यहाँ जाम हे लग जाता होगा."

"सुबह 9-10 और शाम को 5-7 बजे के वक़्त गाडी 10 मिनट वाला सफर 25-30 मिनट में करती है.", दीपक ने भी थोड़ा ज्ञानद दिए और ऐसे हे शहर के दृश्य देखता रहा और प्रियंका दीदी लकी भैया को रास्ता समझती अपने घर तक ले आई. उन्होंने बहोत कहा था दोनों को अंदर आने के लिए लेकिन फिर कभी आने का बोल कर लकी और दीपक उन्हें घर के बहार हे छोड़ कर निकल चले.

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रामेश्वर जी के घर के बहार 11 बजे 3 गाडी कड़ी थी. 2 सरकारी और एक काली बेंज. शंकर जी घर आ चुके थे और इस वक़्त बैठक से इतर पूरा घर जैसे काट सा गया था.

"कल रात दुष्यंत मालिक होटल तुलिप में मारा गया. वह से एक 19 वर्षीया लड़की, 2 जख्मी अपराधी और 1 करोड़ बरामद हुआ है. होटल के कारिंदे का हे फ़ोन आया था और उसने पुष्टि की है के 3 लोग ऊपर गए थे उनमे से वारदात को अंजाम देने वाला भी साथ हे गया था लेकिन रूपरेखा बनवाई जा रही है.", निर्मल सिंह जी पूरी बात रामेश्वर जी को बता रहे थे. साथ हे धर्मवीर जी, परम और शंकर के साथ वह छोल साहब और 3 पुलिस वाले भी बैठे थे.

"दुष्यंत वह से निकला कैसे?" रामेश्वर जी पहला सवाल वही था जो हर पुलिस वाले का होता है.

"शराब पीने के बाद उसने कांस्टेबल से खुली हवा में घूमने की रिक्वेस्ट की थी पंडित जी. बप की शिकायत थी उसको तोह ऐसा करना ठीक लगा. लेकिन दुष्यंत भी भली भांति वाकिफ था हमारी जगह से जो वह ऐसा कर गया.", निर्मल सिंह ने लाचारी दिखते हुए नजरे झुका ली.

"हो क्या रहा है यहाँ पर.? पहले ताई के घर हादसा हुआ, फिर सुशीला और शीला वाला काण्ड. उसके बाद बहन सिंह भी चौड़ा हो गया मेरी gair-maujdgi में और अब ये दुष्यंत कैसे और क्यों शामिल हुआ?", शंकर जी ने आवाज नीची रखते हुए हे नाराजगी में दिल की बात कही. लेकिन रामेश्वर जी ने वह जैसे सुनी हे नहीं.

"रात को ड्यूटी पर सिर्फ कांस्टेबल हे था.?", ये सवाल धर्मवीर जी ने किआ.

"जी. 2 कांस्टेबल खाना खा रहे थे और एक दुष्यंत के साथ बहार गया था. अफसर तोह आपको भी पता है के 8 बजे के बाद वह नहीं रहते. लेकिन सोचने वाली बात है के इतना पैसा, लड़की और आदमी के साथ दुष्यंत क्या प्लान कर रहा था? मामला आपसी विवाद का हे होगा जो साथ आया आदमी हे ये अंजाम दे गया.", निर्मल सिंह की बात पर रामेश्वर जी खामोश रहे. वैसा हे हाल धर्मवीर जी, शंकर और परम का था.

"भाग गया चलो मान लिए. लेकिन 6 किलोमीटर दूर पहुंच गया तोह मतलब इसमें कोई न कोई तोह शामिल हे था. निर्मल जी ऐसा तोह नहीं की बकरा जान बूझ कर हलाल हुआ हो.?", छोल पूरी का ये सवाल हर पक्ष को खोल रहा था.

"छोल पूरी, ये पुलिस विभाग है आर्मी नहीं जहा एक छोल के कहने पर पूरी रेजिमेंट बात मान लेती है. यहाँ हमारा सिपाही तक आजाद विचार लिए रहता है चाहे उसकी गलती से िग की नौकरी चली जाए.", िग कपूर के इतना कहते हे छोल साहब ने उनका हाथ पकड़ लिए.

"मेरा ये मतलब नहीं था कपूर. चूक हुई है और अभी 2 लोग बाकी थे जिनके साथ दुष्यंत का भी रिश्ता हो सकता था. उनसे खतरा है और इसलिए दुष्यंत की ज़िन्दगी की परवाह थी. नहीं तोह मैं खुद गोली चलने में देरी नहीं करता."

"4 लोगो की लाश भी मिली है. एक तोह पार्षद रमन कुमार और 3 उसके साथ के हे व्यापारी थे. आप जानते है किसी को? दुष्यंत के साथ उनका गठबंधन भी था और चारो हे लोक दाल के ख़ास थे.", एक 3 सितारा पोलिसवाले गट्टे की फाइल उनके सामने रखने के बाद अपनी जगह वापिस खड़ा हो गया.

"ये कब हुआ?", रामेश्वर जी की लिस्ट में रमन कुमार का भी नाम था. और उसकी मौत भी ठीक उसी दिन होना एक अलग कहानी बता रहा था.

"रात किसी ने **** होने फ़ोन किआ था के सड़क के बीच 4 लोग पड़े है. करीब 3 बजे की बात है. पोस्टमॉर्टम में हत्या तोह साबित हुई लेकिन कोई सबूत या जिस्म पर निशान नहीं मिला.", उस इंस्पेक्टर ने डिटेल दी और धर्मवीर जी के साथ हे रामेश्वर जी भी फोटो और रिपोर्ट देखने लगे.

"ाचा निर्मल जी, आप टीम को ले जाइये. मैं शाम को बात करता हु. कपूर साहब, आप छूती पर है तोह सतीश के साथ जाम शुरू कीजिये मैं इनके घर आता हु अभी.", रामेश्वर जी ने धर्मवीर जी को छोड़ कर बाकी सभी सरकारी व्यक्तियों को जैसे जाने का इशारा दिए और छोल साहब भी अब िग से गले मिलने के बाद उन्हें अपने साथ यह ले गए. शंकर जी भी जाम की बात सुन्न कर खड़े हुए लेकिन इस बार आवाज बड़े सांगवान जी की आई, पंडित जी की जगह.

"तुम दोनों यही बैठो अभी.", परम और शंकर दोनों हे ठिठक कर रुक गए लेकिन छोल साहब ने मदद कर भी नहीं देखा उन्हें. बैठक का दरवाजा बंद करने के लिए उन्होंने परम को कहा और शंकर को सामने बिठा लिए.

"बरखुरदार, बस इतना कह दो के तुम कल शाम 7 बजे अमेरिका से वापिस आ गए थे.", धर्मवीर जी का ये सवाल शंकर जी से था. रामेश्वर जी भी ध्यान से देख रहे थे.

"ये अभी आया है और मैं हे तोह लेके आया हु.", छोटे सांगवान ने बीच में जवाब दिए.

"तुम्हे पता है के तुमने क्या किआ है शंकर? दुष्यंत हमारा निशाना नहीं था, रमन के साथ ताराचंद गर्ग भी था इस मामले में. इन सबमे अमीर और ताक़तवर ताराचंद हे है जो आने वाला मला है. तुम्हारी वजह से वह हमारी पकड़ से निकल गया.", धर्मवीर जी के लफ्जो में अलग हे परेशानी थी. बात पूरी करने लगे.

"वह वर्तमान सर्कार में भी बड़ी हैसियत रखता है लेकिन तुमने सब gud-gobar कर दिए.", हताश से वह रामेशवर जी का हाथ पकड़ कर बैठ गए. कुछ पल ख़ामोशी छायी रही और इस बार रामेश्वर जी बोले.

"तोह ताराचंद को भी मार दिए?"

"पुलिस को 5 मिले है लेकिन 7 और मिलने बाकी है. मैं आप जितना दरियादिल नहीं हु और मेरी माँ की नींद एक रात भी खराब हुई तोह मैं शहर मिटा दूंगा उनके सुकून के लिए. दुष्यंत भी आपने छोड़ा था और ताराचंद के लिए चाचा ने मन किआ था. मेरी मज़बूरी थी की वह मैं बेबस था, दूर था लेकिन अब अगर किसी ने भी ऐसी गलती की तोह उन्हें मालूम रहेगा शंकर यही हैं.", बिना कोई जवाब सुने शंकर बहार निकल गया, धर्मवीर जी ने भी परम को इशारे से उसके साथ जाने को कहा.

"तोह आपको ये मालूम था?", धर्मवीर सांगवान जी का सवाल साधारण हे था.

"हाँ. और कौन हो सकता है जो लाशो का सैलाब ले आये? जब इसने कहा के ये आज दोपहर तक वापिस आ जायेगा मैं समझ गया था के ये रुकेगा नहीं लेकिन निर्मल की कोनसी नब्ज़ इसने दबाई हुई है जो वह इसका साथ दे रहा है? शंकर ने एक पोलिसवाले को मारा है धर्मवीर."

"नहीं भाई साहब. शंकर ने सबूत हे कहा छोड़ा है. दुष्यंत मालिक तोह आपको मरवाने की सुपारी दे रहा था. ये रही रिपोर्ट.", बड़े सांगवान जी ने फाइल का आखिरी पन्ना दिखते हुए कहा. जहा पुलिस की लेखनी में भी रामेश्वर जी को 25 साल पुराणी लिखवत नजर आ गयी.

"क्या करू मैं इसका धर्मवीर? कपूर और सतीश तोह इसके हे साथ है, मेडिकल भी ये करवा लेता है और चंदू भी मेरा दोस्त होने पर इसके साथ है.", रामेश्वर जी ने अपनी लाचारी दर्शाई.

"भाभी. भाई साहब ये सब इसलिए हुआ क्योंकि भाभी को ये बात पता लगी होगी. ऊपर से कौन बाप चाहेगा के उसका बीटा वह गन्दा काम करे जिसमे वह पहले हे शामिल है.", धर्मवीर जी भी थोड़ा परेशां थे.

"ताराचंद छोटी मोती हस्ती नहीं था भाई."

"7 लोग मारे है मतलब शंकर ने वंश हे ख़तम कर दिए. मैंने पहले हे कहा था के संजीव और दीपक को अलग रखना शंकर से क्योंकि वह दोनों आपके साथ रह कर भी शंकर से सीखने के लिए बेताब है. बुरा मैट मानियेगा लेकिन आप उस से ज्यादा हे क्रूर थे. वह अलग बात है के आपने हमेशा छोटे मोठे मुजरिम माफ़ किये लेकिन लड़की, माँ और धरम के खिलाफ वाले तोह आपने भी ज़िंदा नहीं छोड़े.", धर्मवीर सिंह ने टेबल से पानी का गिलास उठा कर रामेश्वर जी के मुँह पर लगाया तोह उन्होंने वह थाम कर पी लिए.

"तुम सब जानते हो दोस्त. मैं आज घर पर हु 8 साल से. लेकिन इन maa-bete को तोड़ना नामुमकिन है."

"तोडना क्यों है भाई साहब? जोड़ दीजिये फिर देखिये शंकर को घर से फुर्सत नहीं मिलेगी. मैं भी परेशां हु इस से क्योंकि ये उस जगह पहुंच चूका है के 1% ज़िन्दगी पर भी ये 100 का डाव खेलने लगा है. इसमें शंकर के संहार के साथ हे नारायण की जीवन देने का रूप भी अख्तियार हो चूका है. चैलेंज न मिले तोह शंकर खुद पैदा कर लेता है. इसको अपनी माँ के हे पास छोड़ दो.", धर्मवीर जी की बात में जो सत्य था वह रामेश्वर जी को समझ आ गया था.

"सीधा बोलो न के अर्जुन के सामने ला खड़ा करू. धर्मवीर, भजन को फ़ोन लगाओ और बोलो के रामेश्वर ने याद किआ है. देखे जरा शंकर कितनी देर टिकता है मेरे शेर के सामने. मैं बेशक नहीं चाहता था के कौशल्या का हम टूटे लेकिन शान्ति जरुरी है और शंकर को ये नहीं पता के उसकी माँ भी अब प्यार बाँट चुकी है. इस बार अर्जुन होगा मैदान में अभिमन्यु नहीं.", इतनी बात सुनते हे धर्मवीर जी के चेरे पर लम्बी मुस्कान आ गयी और फ़ोन को पास खींचते हुए उन्होने अपनी बात कही.

"मतलब अब दोनों को नहीं पता के मुकाबला किस से है और जीत कहा? मेरा डाव अर्जुन पर है.", धर्मवीर जी ने नंबर लगाने से पहले कहा.

"अर्जुन का डाव अपने बाप पर हैं.", रामेश्वर जी ने बेहिचक कहा और नंबर मिलने के बाद फ़ोन ले लिए.

"नमस्कार पंडित जी. कहो कैसे याद आ गयी इस नाचीज की?", सामने भी जैसे नंबर पता लगने की मशीन थी.

"ऐसा है भाई के शंकर की माँ की तबियत ठीक नहीं रहती जबसे मेरे साले का देहांत हुआ है. तुम तोह कम बने बाद फ़ोन करते नहीं मुझे, अपनी बहिन से गप्पे लगा लेते हो. जरा शंकर का कुछ करो के वह यहाँ पास रह सके. राजकुमार बहार रहता है नरिंदर की भी समस्या है.", रामेश्वर जी ने जो शब्दों का जाल बना सामने वाला उसमे पल में हे फंस गया.

"क्या बात कर दी आपने जीजा जी. शंकर कल सुबह हे आपके शहर का सिविल हॉस्पिटल समो के हिसाब से ज्वाइन करेगा. बाकी बचो की शादी और समारोह में मैं आ रहा हु. जीजी ने कल हे मुझे बता दिए था. कोई और सेवा हो तोह कहिये."

"बस तुम इतना कर दो मैं समझूंगा के मैंने अपनी बीवी के लिए कुछ तोह किआ. तुम जानते हे हो के शंकर उसकी सांस है.", रामेश्वर जी ने तुरुप का इक्का हे मार दिए.

"हाँ तोह वह है हे. दीदी ने तोह खुद हे कहा है के होने वाली बहु के लिए मैं अपनी गाड़ियां और लोग लागू जिस से उन्हें भी पता लगे के परिवार कैसा है.", रामेश्वर जी उसकी मंदबुद्धि पर बस मुस्कुरा दिए.

"जो करना है करो. मैं बीच में नहीं पड़ता. बस मेरी बीवी मुझे प्यारी है और उसका बीटा उसके पास. शंकर जो भी दलील दे ख़ारिज कर देना."

"बात करते हे हो गया जी. अभी नोटिस गया और उसका फार्मोसे का सामान भी मैं इधर मंगवा लूंगा.", भजन ने इतना कहा और हलकी फुलकी बात के बाद फ़ोन कट हो गया.

"भाई साहब शंकर को यहाँ रख रहे हो? मेरा काम भी तोह वह चलता है."

"धर्मवीर, वह तुम्हे बाप हे मानता है. तुमसे तोह अलग नहीं किआ. लेकिन सच कहु 8 साल मैंने कभी किसी पर नहीं लगाए और मैं अब देखना चाहता हु के क्या अर्जुन इस काबिल है जो कौशल्या के 9 महीने के बाद 45 साल पर भरी पड़ सके. दिमाग कहता है के शंकर जल्लाद और अधूरा इंसान है. दिल कहता है के अर्जुन के साथ रह कर वह इंसान भी बनेगा और पंडित भी. मुझे उसकी हरकत से परेशानी नहीं है, जिम्मेदारी से है.", रामेश्वर जी ने बात खोल कर रख दी.

"अर्जुन को मैं नहीं जानता. थोड़ा उल्लेख करेंगे."

"धर्मवीर, वह अजय है. हार के भी वही जीतेगा ये गुर उसको पता है. उमेद यही कहता है के शंकर की जवानी अर्जुन का बचपन और बाबा मलंग का बुढ़ापा अर्जुन का ये समय है. उसके पास शायद हमारे तक पहुंच हो लेकिन सबूत नहीं होने पर उसने सवाल नहीं किये. लेकिन यहाँ वह रेखा के साथ होगा, कौशल्या के सामने दोनों होंगे, जिम्मेदारी भी होगी. ऊंच नीच भी होना लाजमी है. शंकर को पता लग्न चाहिए के वह अब बाप है, बीटा नहीं.", रामेश्वर जी ने बात विस्तार से कही.

"अर्जुन कुछ और भी है. याद है न आपको."

"शंकर को देखने दो जरा के ताक़त के बावजूद होश रखना जरुरी होता है. मौका मैं खुद दूंगा. तुम भी जानते हो लिस्ट 12 की थी शंकर वही तक सिमित रहा. 3 जान कर छोड़े है शंकर के लिए लेकिन अब अर्जुन अपने बाप के साथ रहने वाला है.
 
Billi420 भाई खेल बड़ा है. क्या लगता है के नरिंदर जी और शंकर भेद पाएंगे अर्जुन का तिलिस्म?

अब हवा वो नहीं है जिसमे शंकर ने सांस ली थी. बेशक अर्जुन अनजान रहेगा लेकिन ताश के पत्ते कोई और बाँट रहा है. किसके साथ कौन है ये देखना होगा. शंकर बहरी मदद जरूर लेगा लेकिन यही तोह काट काम आएगी.

कहानी कैसे घूमती है ये अब पता चलेगा
 
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खेल -2


इस नीले तरणताल में मंजू किसी मछली से तैरती हुई 10 चक्कर पूरे कर चुकी थी. लम्बा आकर्षक जिस्म पानी से बहार आया तोह प्रीती टोलिया लेकर उसके पास आ गयी. दोनों हे यहाँ पिछले एक घंटे से अभ्यास कर रही थी.

"ये वाला थोड़ा स्लो था लेकिन 10 के 10 लैप पिछले रिकॉर्ड से तेज हे रहे. वैसे तुमने पक्का मैं बना लिए है के स्विमिंग हे करोगी?", प्रीती के हाथ से टोलिया लेकर मंजू मुस्कुराती हुई हाथ और सुडोल पाँव साफ़ करने लगी.

"देख ये खेल अकेले का है, इसमें जो भी करना है वह खुद हे करना है. और मेरा दिल है के यहाँ स्टेट खेलने के बाद मैं हमेशा के लिए बहार चली जाऊ.", मंजू प्रीती को साथ लिए यहाँ नहाने के लिए बने अलग बाथरूम में आ गयी. तैराकी की वह चुस्त पौषक शरीर से जुड़ा करती वह सिर्फ एक पंतय पहने फुहारे के नीचे कड़ी हुई तोह प्रीती ने भी अपनी वैसी हे गीली ड्रेस उतार कर साथ वाला फुहारा चला लिए.

"तुम ऐसा क्यों कर रही हो? यहाँ भी तोह रह सकती हो न.", प्रीती के जिस्म पर भी वैसी हे मांसपेशिया था जैसी मंजू के लेकिन जहा प्रीती शुरू से ख़ास जगह से सुडोल थी वही मंजू के सतांन और कूल्हे अब बेहतर होने लगे थे.

"देख यार प्रीती, इंसान को ज़िन्दगी में प्यार के साथ हे अपने बाकी सपने भी पूरे करने चाहिए. अर्जुन मुझे खुश रखता है, माँ भी बन्न हे जाउंगी 8 महीने बाद. लेकिन स्विमिंग मेरी ज़िन्दगी है और यहाँ इंडिया में इस खेल का भविष्य क्या है ये बता? बहार मैं कोचिंग भी लुंगी, काम भी करुँगी और बाकी जो सपने है उन्हें भी पूरा कर सकती हु.", साफ़ पानी से दोनों अपना बेदाग़ जिस्म साफ़ करती हुई क्लोरीन उतरने के साथ निजी बातें कर रही थी.

"अर्जुन का क्या होगा? तुम उसको इस सबमे शामिल नहीं करना चाहती क्या? वह बेशक नहीं कहता लेकिन तुम्हारे साथ भी वह उतना हे खुश रहता है जितना मेरे साथ.", प्रीती ने शैम्पू की बोतल मंजू की तरफ बधाई और अपने बालो में झाग बनाने लगी.

"उसको तोह मैंने कल हे बता दिए था जब मेरे घर से हम वापिस आ रहे थे. ऐसा नहीं है के मैं अर्जुन से दूर जाने के लिए ऐसा कर रही हु. उसको अपने से अलग हे करना होता तोह मैं माँ हे क्यों बन्न न चाहती उसके बचे की? वैसे भी मेरी लाइफ जितनी कॉम्प्लिकेटेड है उसमे कुछ भी आसान नहीं. यहाँ रहूंगी तोह maa-baap से मैं भी सवाल करुँगी और मेरे लिए दुनिया वाले भी. और अभी बहोत समय है यार इस सब में. बचा पैदा होने के बाद भी 4-6 महीने से पहले तोह ये शहर मैं छोड़ नहीं सकती लेकिन कोशिश करुँगी की अब अपने घर न जाना पड़े.", बालो में उंगलियों से झाग बनती वह एक बार प्रीती के जिस्म को ाचे से देख कर मुस्कुराने लगी.

"हंस मैट. मैं सीरियस हु. तुम्हारा अर्जुन के साथ रहना भी जरुरी है. वह पागल बहोत इमोशनल है और जल्दी परेशां हो जाता है.", प्रीती भी थोड़ी शर्म महसूस करने लगी थी जैसे मंजू ने उसके खड़े निप्पल देखे थे.

"पता है इसलिए तोह साल भर मैं उसके साथ हु. कॉलेज भी कर लुंगी इस बीच और बहार जाने का ये मतलब नहीं के अर्जुन से दूर जा रही हु. मिलने भी आउंगी और रिश्ता जनम भर का है हमारा.", मंजू ने खुद पर नजर घुमाई तोह हलकी भूरी चूचक उसकी भी कड़ी हो चुकी थी. जल्दी से बाल धोते हुए आँखे बंद किये पानी के निचे कड़ी हो गयी.

"माँ से बात कर न अगर तेरे पास टाइम हो. उनके कुछ क्लाइंट्स मॉडलिंग हाउसेस में भी है. बहार time-pas के लिए भी अगर रैंप या swim-wear मॉडल बानी तोह इंडिया में आते हे इंटरनेशनल स्टेटस मिल जायेगा. घर से दूर तोह इंडिया में भी रह सकती है, एक ाची लाइफ के साथ. फिर लोग बचे के लिए बातें भी नहीं बनाएंगे और सही बताऊ ज्यादा स्ट्रांग बन्न जाओगी.", प्रीती ने बाल धोने के बाद चेहरे को तेज फुहारे के सामने किआ. गुलाबी जिस्म पर पानी टकराता हुआ भी जानलेवा दृश्य बना रहा था. सफ़ेद रंग की रेशमी पतली सी पंतय पूरी पारदर्शी हो कर वह बनावट भी दिखा रही थी जो अभी तक कोरी थी.

"हम्म्म.. मेरा भी कुछ ऐसा हे ख्याल था बहार जाने के बाद. चल आज आंटी को मेरे यहाँ लेके आ, सेवा के साथ हे थोड़ी काम की बातें भी करते है.", दोनों हे फुहारे के बाहर आई और हक्क पर टंगे अपने अपने तोलिये लेती जिस्म सूखने लगी.

"वैसे अर्जुन ने तुम पर ाची म्हणत की है. याद है जब पहली बार तुम मिली थी तोह सिर्फ एथलेटिक गुस्सैल लड़की थी. आज कर्तव्य हो चुकी हो और सेक्सी भी.", प्रीती ने मंजू के झुकने पर दोनों गोल उभारो को निहारते हुए कहा. मंजू ने कमर पर टोलिया लपेड़ कर पंतय अलग की और मुस्कुराती हुई ब्रा पहन ने लगी.

"तेरे पर तोह शायद अर्जुन के साथ हे ऋतू ने भी म्हणत की है जो तेरा शरीर इतना हॉट है. सीरियसली यार मैं गर्ल्स हॉस्टल में रही हु और एक से एक बेशरम और शरीफ को कपडे बदलते वक़्त नंगा देखा है लेकिन तेरी बात सबसे अलग है. अर्जुन को बराबर संभालती होगी तुम.", प्रीती थी हे इतनी अध्भुत और आकर्षक की हिंदुस्तान के गरम सख्त मौसम के बावजूद प्राकृतक ख़ूबसूरती ज्यादा निखार चुकी थी.

"आज तक उसने किआ हे नहीं है कुछ. ऋतू दीदी के साथ वैसे हे ऊपर ऊपर वाली मस्ती होती रहती है और थोड़ी सी ज्यादा अर्जुन के साथ. पता नहीं उसने म्हणत की तोह क्या हाल होगा. तुम्हे देख कर लग रहा है के इतना चेंज मेरे में आया तोह घर से बहार निकलना मुश्किल हो जाने वाला है.", प्रीती ने भी जल्द हे अपने अंगवस्त्र पहन लिए लेकिन इस दौरान उसके बंद गुलाब के दर्शन मंजू को हो गए थे.

"मतलब तुम दोनों ने अभी तक वो किआ हे नहीं है?", मंजू ने दोनों का प्यार देखा भी था और महसूस भी किआ था.

"बताया तोह था के वह शादी तक नहीं करने वाला लेकिन मैंने दूसरा रास्ता निकल लेना है तब तक. तुमने बहोत मजे ले लिए अब जरा मैं भी देखु के ऐसा क्या करता है जो सब पागल हो जाती है उसके लिए.", प्रीती ने ये बात कह तोह दी लेकिन एक पल के लिए ख़ामोशी चा गयी लेकिन दोनों एक दूसरे को कुछ देर देखने के बाद हंस दी.

"तुम्हे भी मालूम है के उसके चक्कर औरो के साथ भी है?", मंजू ने सलवार पहनते हुए कहा.

"वह शादी तक इस बात का हे फायदा उठा रहा है. वैसे तुम्हे उसके चक्कर के बारे में कैसे पता? और कितनो के साथ उसका चक्कर है.?", प्रीती ने जीन्स का बटन लगाने के बाद थोड़ा फिटिंग ठीक करते हुए पुछा.

"अन्नू, रेणुका और मेनका के साथ. मुझे रेणुका बुआ और अन्नू का तोह कल हे अर्जुन ने बताया है लेकिन मेनका के बारे में मुझे खुद पता लग गया था लेकिन अर्जुन ने सब बताते हुए मेनका के बारे में भी बता हे दिए.", मंजू और प्रीती ने जब सब बाँट हे लिए था तोह मंजू ने छुपाना भी ठीक नहीं समझा.

"सही मजे ले रहा है ये अर्जुन लेकिन ये अन्नू का तोह मुझे भी नहीं पता था. हैं कौन वैसे ये मैडम?", प्रीती ने पीले रंग की ये ढीली सी टीशर्ट पहन कर बाल ठीक किये और तोलिये से उन्हें सूखने लगी.

"स्कूल की टीचर थी कुछ हफ्तों के लिए उसकी लेकिन आज हे वह इंग्लैंड जा रही है. और टीचर का ये मतलब नहीं के कोई बूढी या शादीशुदा, डिग्री करने जा रही है और सरदारनी है.", मंजू ने हँसते हुए बताया.

"सही खेल रहा है ये. मिलने तोह दो एक बार फिर बताती हु मैं इस अर्जुन के बचे को."

"वैसे तुमने नहीं बताया के कितनो के साथ और उसके ऐसे रिलेशन है?", मंजू के सवाल का अब प्रीती क्या जवाब देती लेकिन नाम तोह लेना जरुरी था.

"एक स्कूल के फ्रेंड की बड़ी सिस्टर है लेकिन अर्जुन अब उस से हमेशा के लिए दूर हो चूका है. रेणुका बुआ, अर्जुन की छोटी मामी जिनको भी बचे की जरुरत की वजह से अर्जुन से अलग रिश्ता जोड़ना पड़ा. बाकी तुमने हे बता दिए.", दोनों हे अब तरणताल की तरफ चलने लगी अपने अपने बैग में सामान रखने के बाद. Joote-chappal यही थे उनके.

"वैसे तुम्हे बुरा नहीं लगता, अर्जुन के इतने सम्बन्धो के बारे में जानकार.?", मंजू ने अंघूठे वाली चमड़े की चप्पल सही से पहनी और प्रीती को वह नरम जूते पहनते देखने लगी.

"किस बात का बुरा? इतनी लड़किया अर्जुन पर मरती है इसका या अर्जुन के साथ उनके सेक्स रेलशन है इस बात का? पहली बार स्ट्रेंज लगा था लेकिन सच कहु तोह अर्जुन ने जो भी किआ या कर रहा है उस से लोगो को ख़ुशी हे मिलती है. हाँ कोई उसका मिसयूज करेगा तोह फिर मामला गलत हो सकता है लेकिन अर्जुन हैंडल करना जानता है. और जब प्यार हमसे करता है तोह सेटल होने के बाद रुकेगा हमारे हे साथ न. इसलिए शादी तक उसके पास आजादी है बाद में देखेंगे की क्या सही क्या गलत. फ़िलहाल तोह मैं भी खुश हु और तुम भी.", प्रीती ने आँख मारते हुए कहा और मंजू का हाथ पकडे दरवाजा खोल कर बहार चल दी. दोनों हे खुश थी.

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"दीदी घर तोह बहोत सुन्दर है आपका. और इतने पौधे किसने लगाए यहाँ पर और ये तोह अभी भी ाची हालत में है.", अर्जुन इस 350 गज के एक मंज़िला घर में दाखिल हुआ तोह इतनी हरियाली और हर चीज एक सही क्रम में देख कर खुश हो गया. घर तोह बस आधे हिस्से में ठीक बीच में बना था लेकिन एक छोटे बगीचे के बावजूद कोई 50 से ज्यादा chhote-bade गमले, लम्बी बेले जो छत्त तक पहुंची हुई थी, जामुन और आम के 2 घने वृक्ष और उनके आगे ये हरे रंग के कोटा पत्थर का फर्श.

"माँ हमेशा घर हे रहती है तोह उन्होंने हे ये सब पौधे लगाए और ये जामुन का पेड़ आरती के पैदा होने पर लगाया था जो थोड़े हे दिन बाद देखना जामुन की बेरी से लड़ा दिखेगा. पिछली तरफ भी इतना हे बड़ा बगीचा है जहा अमरुद, आम के साथ साथ सब्जियों की भी कितनी किस्मे माँ ने लगाईं हुई है. शाम की चाय वह पीछे और सुबह की इधर सामने बैठ कर हे वह पीती है. अंदर तोह चलो पहले फिर आराम से सब देखना.", प्रियंका दीदी ने अर्जुन का हाथ पकड़ कर अंदर ले जाते हुए कहा. आरती दीदी दरवाजे में हे स्थित ताले को चाबी से खोलकर अंदर जा चुकी थी.

इतनी बड़ी जगह के बावजूद नरिंदर जी ने यहाँ 3 कमरे, ड्राइंग हाल, रसोई और 3 बाथरूम हे बनाये थे. हर चीज अपने क्रम में सही से लगी थी. सब्ज रंग के लम्बे परदे, उजली सफ़ेद दीवारे जिन पर ाची सजावट की गयी थी. बचपन की फोटो, एक बड़ी हाथ से बानी श्री कृष्ण जी की पेंटिंग और आकर्षक लाइट. 3 बराबर लम्बाई के सोफे जिन पर 2-2 लोग बैठ सकते थे, काले कांच की टेबल और एक दीवान जिसके सामने 21 इंच का रंगीन टेलीविज़न जो कपडे से ढाका था. बसा सुकून सा था इस घर में. अर्जुन चलते हुए उन तस्वीरों की तरफ आया तोह हरेक को ध्यान से देखने लगा. 2-1-2 की क्रम में लगी ये 5 तस्वीर ख़ास थी.

"ये तोह मैं हु न?", अर्जुन ने काले फ्रेम को हाथ से छू कर देखा तोह हाथ में पानी का गिलास लिए आई आरती दीदी भी उस तस्वीर को देखने लगी जिसमे कृष्णा जी की गॉड में 2 साल का अर्जुन उनका गाल चूम रहा था. शायद इस तस्वीर को बिना बताये खींचा गया था और दोनों हे बेहद खुश थे जैसे उन्हें किसी से कोई लेना देना न था.

"माँ घंटो इस तस्वीर को देखती थी फिर पापा ने बीएड से उठा कर ये यहाँ लगा दी. ये मैं और ऋतू है, ये वाली प्रियंका दीदी, कोमल दीदी और माधुरी दीदी की है जब प्रियंका दीदी का 7तह बर्थडे था. ये पापा, ताऊजी और बड़े पापा (शंकर जी) की है जो शादी के वक़्त हे है. ऐसी हे ये है शादी के वक़्त माँ की.", उस तस्वीर में कृष्णा जी के साथ रेखा जी और ललिता जी थी. कृष्णा जी और रेखा जी की शादी एक हे दिन हुई थी और दुल्हन के परिधान में दोनों को देख कर अर्जुन बस उनमे हे खो गया.

"पानी पी लो पहले और फिर तुम थोड़ा आराम करो इतने मैं नाहा लेती हु, अभी दीदी नहाने गयी है.", आरती दीदी ने जैसे हे अर्जुन को ये बताया वह उनकी तरफ घूम गया. एक हाथ में गिलास पकड़ कर दूसरे से उसने आरती दीदी को अपने साथ लगा लिए.

"तोह ये मौका भी ाचा है हमारे लिए.", उनके गाल को चूमता वह दीदी को सीने से लगाए था के आरती दीदी हल्का धक्का देती थोड़ी दूर भाग गयी.

"बाथरूम भी 3 है यहाँ. तुमने अगर नहाना हो तोह maa-papa का कमरा इधर है और बाथरूम भी.", उनकी ऐसी हंसी और चंचलता अर्जुन ने आज हे देखि थी. लगता था जैसे ये घर उनके लिए ख़ास था और इसलिए वह यहाँ अर्जुन से अपना पहला मिलान करने के लिए बेचैन थी. अर्जुन भी हँसता हुआ इस कमरे में चला आया जो हॉल के बाए तरफ था. एक बड़ा लेकिन साफ़ सुथरा कमरा. टीक से बना आकर्षक लेकिन वर्तमान समय से पुराण बीएड जिस पर सफ़ेद चादर और वैसे हे 2 टैक्ये सलीके से रखे थे. लैंप के बराबर हे राखी किताब की बीच दबा होल्डर बता रहा था के कृष्णा चची ने शायद इसको आधा हे पढ़ा था.

'निकोलस Sparks-The नोटबुक. हम्म्म.. पता नहीं कैसा होगा लेकिन तस्वीर तोह किसी झील के किनारे बने घर की है. बहोत खूबसूरत और जैसे दुनिया से परे कोई जगह. ले जाऊंगा जाते वक़्त.', अर्जुन ने वापिस रखते हुए बिस्टेर की इस तरफ देखा तोह हैरान हे रह गया. कपड़ो की अलमारी के साथ हे ये 3 फ़ीट चौड़ी और 8 फ़ीट ऊंचाई तक की खुली रैक बानी थी 5 भाग वाली. इतनी किताबे राखी थी और सभी जैसे बेदाग़ और सलीके से.

'वाह. चची माँ के पास तोह लाइब्रेरी है किताबो की. इतना शोक है पढ़ने का और शायद इसलिए आरती दीदी भी किताबे इतना पसंद करती है.', अर्जुन ने भी ढेरो किताबे पढ़ी थी लेकिन यहाँ जितने नाम थे उनमे से ज्यादातर उसने नहीं सुने थे सिवाय स्वामी विवेकानंद, महादेवी वर्मा, खुशवंत सिंह, इक़बाल, चौरसिया, दिनकर, शेक्सपियर, एरिच सीगल के.

'ये लगभग हर तरह की किताबे हैं. रोमांटिक, रिसर्च, जीवनी, अध्यात्म, शरीर विज्ञान, parlokik-gyaan, आत्मज्ञान. चची माँ इसलिए ज्यादा नहीं बोलती क्योंकि वह बेहतर जानती है व्यक्ति और व्यक्तित्व को. लेकिन ये 2 खाने शायद सिर्फ प्रेम और रोमांस पर आधारित नावेल के है. कवर से तोह ऐसा हे लगता है.', अर्जुन उन मोटी मोटी किताबो को ध्यान से उठा कर थोड़ा बहोत देख कर वापिस रखने लगा.

"अर्जुन, नाहा लो फिर पास की मार्किट चलना मेरे साथ. थोड़ा सामान लेके आना है. वैसे तुम अकेले नहीं हो जो किताबे देख कर हैरान हो रहे हो. माँ दिन भर में 10-15 घंटे तक किताबे पढ़ सकती है और यहाँ सिर्फ साल भर की कलेक्शन है. बाथरूम से पहले ये स्टोर पूरा किताबो से भरा हुआ है. माँ को तोह हमारी क्लास की बुक्स भी रत्ती हुई है इसलिए कभी टूशन की जरुरत तक नहीं पड़ी.", प्रियंका दीदी अब एक काले पंजाबी salwar-kameej में क़यामत लग रही थी. गोरी पुन्जब्न तोह वह लगती हे थी भरे भरे जिस्म के साथ ऊपर से कला रंग और कपडे की भरपूर कसावट.

"बस करो देखना, बहोत टाइम मिलेगा उसके लिए. पहले नाहा कर फ्रेश हो जाओ फिर मेरे साथ चलना. फ्रिज भी खाली पड़ा है और चाय के लिए दूध तक नहीं है.", प्रियंका दीदी ने हलकी शर्म के साथ एक मुस्कान लिए टोलिया अर्जुन की तरफ बढ़ाया और बहार चली गयी. वह भी हँसता हुआ chhan-bin छोड़ कर नहाने चला गया. प्रियंका दीदी इस बीच थोड़ी साफ़ सफाई करते हुए खिड़किया खोलने लगी. घर अंदर से पूरा साफ़ हे था बस बंद रहने की वजह से थोड़ी हवा और रौशनी की जरुरत थी. अगले 15 मिनट में हे अर्जुन ाचे से तैयार हो कर हॉल में आ गया था जहा आरती दीदी ने टेलीविज़न चालू करते हुए गाने लगा रखे थे.

"ऐसे बहार निकलोगे तोह यहाँ की लड़किया पीछे लग जाएँगी.", आरती दीदी ने अर्जुन की टांग खींची अपनी बात से लेकिन वह भी निहार रही थी उसके रूप को. चौड़े सीने पर कासी हुई सफ़ेद टीशर्ट जिसके बीच काले रंग का सांड (बैल) का चेहरा छापा था और काली चुस्त जीन्स भी जिस्म की मजबूती दिखा रही थी. घुंगराले लम्बे बाल हर तरफ से थोड़े झूलते हुए ख़ास छटा बना रहे थे अर्जुन के मासूम गोर चेहरे की.

"लगने दीजिये, वापिस जहा आना है उस से सुन्दर तोह बहार कोई नहीं होने वाली.", अर्जुन ने भी उनकी तारीफ करते हुए बहार से प्रियंका दीदी की बात करने की आवाज सुनी और उस दिशा में चल दिए. प्रियंका दीदी पड़ोस की 4 फ़ीट ऊँची दिवार के परे कड़ी एक आंटी और सरदार अंकल से बात कर रही थी. 50 के aas-pas दीखते ये दंपत्ति भी हंसमुख और चाचा के परिवार के शुभचिंतक लगते थे.

"अर्जुन ये हैं रेशम सिंह अंकल जी और ये आंटी जी. Uncle-Aunty ये है मेरा भाई अर्जुन.", अर्जुन ने उन्हें हाथ जोड़ कर नमस्ते की तोह Uncle-Aunty भी उसके व्यक्तित्व को निहारने लगे.

"पहलवान हो क्या बीटा जी? इतना तोह हमारा रिस्की भी नहीं है और मेरा दोस्त नरिंदर भी. ाचा लगा के बिटिया के साथ उनका मजबूत भाई आया है.", सरदार रेशम सिंह जी के लफ्ज और चेहरा वही कह रहे थे जो वह महसूस कर रहे थे अर्जुन को देख कर.

"जी शरीर तोह ऐसा हे है लेकिन थोड़ी बहोत कसरत और बॉक्सिंग करता हु. आपसे मिलकर ख़ुशी हुई.", अर्जुन उनसे बात कर रहा था के नीली पगड़ी पहने कोई 22-23 साल का सरदार लड़का और दीदी की उम्र की एक लड़की भी इस दिवार के पास आ कड़ी हुई. जो चहक कर दीदी से मिली और लड़का अर्जुन को घूर रहा था.

"अर्जुन बीटा ये है रिस्की, इंजीनियरिंग के आखिरी इम्तिहान है इसके मई महीने के आखिर में तोह अभी घर रह कर तैयारी कर रहा है. और ये गुरदीप है मेरी बेटी, प्रियंका के साथ हे पढ़ती है. बचो ये अर्जुन है Priyanka-Aarti के ताऊजी का बीटा.", उन्होंने सभी का परिचय करवाया तोह रिस्की बेदिली से सर हिला कर बहार चल दिए. यामाहा 100 की आवाज ने शान्ति ख़तम हे कर दी थी कुछ पल के लिए.

"ाचा परिवार है अंकल जी आपका और ये जगह भी उतनी हे ाची है.", अर्जुन ने रिस्की के व्यवहार का बुरा नहीं मन. गुरदीप ने भी अर्जुन को हाथ जोड़ कर नमस्ते की और फिर एक बार ाचे से देख कर प्रियंका दीदी से बात करने लगी. थोड़ी हे देर में दीदी अर्जुन के साथ करीब की मार्किट से सामान लेने का बोल कर इधर से चल पड़ी.

"पैदल चलेंगे?", अर्जुन ने गेट से बहार आने के बाद कड़ी लगते हुए पुछा.

"हाँ अभी पैदल हे चलते है. मार्किट ये हमारे ब्लॉक से बहार निकलते हे है.", मोहल्ले की ख़ास बात थी की यहाँ भी अर्जुन के सेक्टर की तरह सभी घर कतार से हे बने थे लेकिन सामने ये पार्क था जिसके गिर्द 4 क़तर माँ समान प्लाट के घर बने थे और साफ़ 15 फ़ीट की सड़क पार्क और घरो के बीच थी.

"यहाँ वाला मोडल टाउन भी हमारे शहर जैसा हे है लेकिन थोड़ा ज्यादा ाचा बना हुआ है.", अर्जुन कभी aas-pas देखता तोह कभी प्रियंका दीदी को, जो सर पर दुपट्टा लिए चल रही थी लेकिन काले लिबास में क़ैद उनका हुस्न बिजलिया गिरा रहा था.

"हर शहर में मोडल टाउन होता हे है हरयाणा और पंजाब के. वैसे न तुम कुछ ज्यादा हे देख रहे हो.", दीदी के ऐसे कहने पर अर्जुन ने सामने देखते हुए मुस्कुरा कर कहा.

"ऐसा है न के आज पहली बार आपको ऐसे देख रहा हु. चाह कर भी नजर आप पर हे आ रूकती है.", अर्जुन ने ये ब्लॉक की गली पार करते हे सामने देखा तोह चौड़े madhya-marg से दूसरी तरफ ाची खासी पार्किंग और badi-badi दुकानों से सजी मार्किट नजर आई.

"वाह. ये तोह सचमुच बड़ी ाची मार्किट है.", सड़क और पार्किंग पर लम्बी महंगी गाड़िया, छतरी लिए घूम रही खूबसूरत पुंजभी लड़किया जो ज्यादातर उजले या चटख पुंजभी salwar-kameej पहने थी. कही कही जवान सिख युवक भी scooter-motorcycle पर सवार आते जाते दिख रहे थे. प्रियंका दीदी ने सड़क पार करने से पहले अर्जुन का हाथ थाम लिए. एक पल उनकी तरफ देखते हे उनकी मुस्कान पर फिर से दिल आ गया. वह जैसे भीड़ की आदि नहीं थी और अर्जुन पर तोह उन्हें पूरा भरोसा था, प्यार के साथ हे.

"ये मार्किट का अभी एक हे हिस्सा है, अर्जुन. वह दूसरी तरफ गोल चौक वाली मार्किट है और इस तरफ गुरुद्वारे साहिब वाली मार्किट है. शाम को तोह यहाँ आने में हे मुझे घबराहट होती है.", अर्जुन समझ सकता था क्योंकि उसकी कोई भी बहिन शायद इतनी बड़ी मार्किट में अकेली नहीं आयी होगी. जल्द हे दोनों इस बड़ी confectionary-kiryana की दूकान पर आ गए. दूध, दही, ब्रेड के साथ हे जूस, कोला आदि लेने के बाद अर्जुन ने हे सामान के पैसे दिए. प्रियंका दीदी थोड़ा नाराज हुई लेकिन अर्जुन ने उनका हाथ काउंटर से निचे कर दिए जिसमे पैसे थे.

"तुमने पैसे क्यों नहीं देने दिए?", दीदी दुकान से बहार आते हे अर्जुन से नाराजगी में पूछने लगी. एक हाथ में सामान लिए दूसरे से अर्जुन ने उनका नाजुक हाथ थाम लिए.

"ये अलग तोह नहीं है न? वैसे भी बॉयफ्रेंड को हे पेमेंट करने का हक़ होता है, गर्लफ्रेंड सिर्फ शॉपिंग करे.", दीदी का गोरा रंग हल्का गुलाबी हो चला था लेकिन उन्होंने खुद हे अर्जुन का हाथ मजबूती से पकड़ लिए.

"पागल हो तुम पूरे. और हम घर का सामान लेने आये हैं शॉपिंग करने नहीं."

"हमारे हे घर का सामान न? और मैं तोह चाहता हु के शॉपिंग भी करने चले, जहा आप थोड़े ाचे से मेरे साथ घूम सके.", अर्जुन का हाथ थामे हे वह थोड़ी आगे चली आयी. यहाँ ताजे फल और सब्जियों की कई दुकाने थी. दोनों हे बातें करते हुए jaanch-parakh कर थोड़े मौसमी फल और जरुरी सब्जिया लेने लगे. यहाँ अर्जुन के पैसे देने पर उन्होंने ऐतराज नहीं किआ लेकिन सामान अपने एक हाथ में पकड़ते हुए फिर से अर्जुन का हाथ थामे वह चलनी लगी.

"और कुछ नहीं लेना? वैसे सब्जी की क्या जरुरत थी हम खाना बहार भी खा सकते हैं या पैक करवा के घर ले जा सकते है.", अर्जुन ने देखा के दीदी के चेहरे पर हल्का पसीना आ गया था. हाथ छुड़ाते हुए उसने जीन्स की जेब से साफ़ रुमाल निकल कर उनके माथे और गाल को साफ़ किआ और फिर से हाथ पकड़ कर चलने लगा. हरे रंग के वेस्पा पर 2 लड़के तीसरी बार उनके पास से निकले थे लेकिन दीदी ने आँख उठा कर भी उन्हें नहीं देखा था. वह अर्जुन के साथ इस पल का पूरा लुत्फ़ ले रही थी.

"पिंकी ने फेर यार बना लिया. चक्कर रांझे लौंडे रह गए हीर किसी होर दी हो गयी. (प्रियंका ने किसी और से दोस्ती कर ली. हीर के पीछे वह लोग थे लेकिन वह किसी और की हो गयी.)", सड़क पार करने के बाद वही दोनों लड़के गली के मदद पर खड़े थे और अर्जुन के करीब से गुजरने पर उनमे से के ने ये तंजज कैसा तोह प्रियंका दीदी अर्जुन का हाथ पकड़ कर उसको आगे ले जाने लगी. दोनों हे 23-24 के करीब थोड़े आवारा मनचले थे. अर्जुन ने ृक्क कर दोनों को घूर कर देखा तोह दीदी के कहने पर वापिस आगे चलने लगा.

"जीते बाई, ेहड़ा न कह काका रौन हे न लग पावे. शरीर वड्डा तेह दिल चूजे डा. (जीते भाई ऐसा मत कहो, कही बचा रोने हे न लग पड़े. शरीर बड़ा और दिल बचे का.) हाहाहा.", स्कूटर का हैंडल पकडे बैठा ये वाला जरुरत से थोड़ा ज्यादा हे बोल गया था. और इस बार अर्जुन प्रियंका दीदी से हाथ छुड़ा कर बड़े आराम से उनके सामने आ खड़ा हुआ.

"काका जी, तुहाडा जीजा बहरो आया है ते तुस्सी इज्जत की देनी मखौल बनाई जांदे हो. लगदा कानन लाल करना पैना.", अर्जुन के इतने बेबाकी से सामने खड़े हो कर ऐसा कहते हे दोनों लड़के एक दूसरे को देखने लगे.

"तू साहनु जांदा नै, जूनिवर्सिटी (यूनिवर्सिटी) डा प्रधान साहड़ा वेहली है." पिछले लड़के ने ऐसा कहा तोह अर्जुन ने उसका गाल थपथपाते हुए जवाब दिए.

"कल मिलदे है फेर अपने वड्डे साले तोह, जूनिवर्सिटी विच हे. सेवा डा मौका तह देना जरुरी है. तित्तर हो जाओ हुन्न इस तोह पहला मैं तुहाडे डोवा दे चित्तर लाल कर दू.", अर्जुन ने आखिरी बात कहते हुए थोड़ा गुस्सा दिखाया और दोनों हे लड़के दांत भींचते हुए बाद में देख लेने का बोल कर 9-2-11 हो गए. अर्जुन भी मुस्कुराता हुआ दीदी के पास आ गया.

"क्या जरुरत थी इस सब की? आये हुए अभी घंटा हुआ नहीं की तुम ऐसे आवारा लड़को से उलझने लगे. इनका यही काम है और वह सिर्फ बोलते है, रोकने की हिम्मत भी नहीं है उनकी.", दीदी इतना बोल कर चलने लगी और अर्जुन ने फिर से उनका हाथ पकड़ लिए. मोहल्ले की परवाह नहीं थी क्योंकि बहिन का हाथ पकड़ने से कोई कैसे ऐतराज कर सकता था.

"अगर ये हर रोज ऐसा करेंगे तोह एक दिन जरूर रोक भी लेंगे और हद्द भी पार करेंगे. शुरू में हे तेज आवाज में झाड़ दिया जाए तोह हिम्मत नहीं होती ऐसे मनचलो की. लड़ने वाले होते तोह मैं आपको पहले यहाँ से जाने को कहता और फिर मरम्मत्त करता इनकी तबियत से.", अर्जुन अभी भी हमेशा की तरह बेपरवाह सा मस्त था.

"वैसे पंजाबी ाची बोल लेते हो और क्या कह रहे थे तुम उन्हें? तुम उनके जीजा और वह साले. बड़े आये..", दीदी अपनी हे बात कहती शर्माती हुई हंस भी रही थी.

"उन्होंने ने हे तोह कहा था के आपने मुझे पसंद कर लिए है. तोह उनका दिल कैसे दुख देता और वैसे आप न इतनी बुरी भी नहीं दिखती तोह सोचा हर्ज़ हे क्या है.", अर्जुन की इस चुहल से तोह दीदी के होंठ कुछ पल के लिए बंद हे हो गए.

"इतने भोले नहीं हो जितने लगते हो. वैसे थोड़ा कण्ट्रोल में रहा करो, यहाँ लोग जानते भी है हमे.", दीदी इतना बोल कर अपने घर वाली गली में आ चुकी थी.

"मुझे तोह नहीं जानते और वैसे भी कल के बाद आपका यहाँ आना काम हे होने वाला है. और कण्ट्रोल तोह कितनी देर से कर रहा हु आपको भी पता है.", अर्जुन ने उनके साथ हे वृक्षों की चाय में चलते हुए बात जारी राखी. दोनों हे घर पहुंचे तोह हॉल में गुरदीप आरती के साथ बैठी थी और उन्हें देख कर कड़ी हो गयी.

"बैठ यार मैं अभी आयी मुँह धो कर. आरती इतने 4 गिलास में कोला दाल ले.", प्रियंका दीदी ने अर्जुन से सामान लेते हुए रसोई की स्लैब पर रखा और उसको भी टेलीविज़न देखने का बोल कर अपने कमरे के बाथरूम में चली गयी. अर्जुन भी एक सोफे पर बैठ गया, आरती दीदी के साथ वाले पर.

"देख ली मॉडल टाउन की मार्किट?", आरती दीदी ने खड़े होते हुए अर्जुन से कहा और टेलीविज़न का रिमोट हाथ में लिए गुरदीप भी कनखियों से अर्जुन को देख रही थी. कमर तक लम्बे बाल, gori-chitti और मांसल शरीर वाली गुरदीप भी प्रियंका दीदी जैसी हे थी लेकिन सरदारनी वाला अलग हे व्यक्तित्व था. शायद वैसी हे हंसमुख और ज्यादा बोलने वाली लड़की थी वह.

"हाँ सब्जी और किरयाने की दुकान हे दिखा कर लायी दीदी. मार्किट जाने के बाद भी यही दुकाने देखने को मिले तोह क्या खाख घूमना हुआ.", अर्जुन जैसे बात कह रहा था वह दिखा रहा था के मार्किट जाने में कोई ख़ास मजा नहीं आया.

"शुक्र करो वह घर से मार्किट तोह गयी, नहीं तोह अंकल या आरती हे बहार के काम करते है. वैसे तुम्हे बुरा न लगे तोह शाम को हमारे साथ चलना, मैं दिखती हु तुम्हे पंजाब का नजारा. खाने पीने के शौक़ीन हो तोह ज्यादा मजा आएगा.", गुरदीप बात करते हुए नजरे चुरा रही थी लेकिन बोल बिंदास रही थी.

"मेरे तोह शाम को कोई पेपर या मीटिंग नहीं है जो व्यस्त राहु. जहा चलना हो हम चल सकते है लेकिन पहले प्रियंका दीदी की मर्जी होनी चाहिए.", अर्जुन ने एक बार गुरदीप को देखने के बाद टेलीविज़न पर चलते पंजाबी गाने पर नजरे जमा ली. सुरजीत बिंदरखिया के ठेठ पंजाबी माहौल का वीडियो चल रहा था लेकिन आवाज ज्यादा ऊँची नहीं थी.

"दोनों हे चलेंगी अगर तुम चलोगे तोह. आरती मार्किट जाएगी तोह किताबे लेगी, प्रियंका बस देख कर खुश हो जाती है. वैसे मैं खूब मस्ती करती हु. गोलगप्पे, फालूदा, चिकन टिक्का तोह हर बार खाती हु. और न यहाँ के कपडे वर्ल्ड फेमस है. तुम लोग ज्यादा देर के लिए नहीं आये नहीं तोह फिल्म और वाटरपार्क का भी प्लान बना लेते.", ये तोह चलती फिरती रेडियो निकली. अभी अर्जुन ने सिर्फ एक बात की थी और गुरदीप तोह हो गयी patar-patar करना.

"ओह झाँसी की रानी, थोड़ा तोह कभी सांस लिए कर. कैंची जैसे चलती है तेरी जुबान और अर्जुन भी हमारी तरह शुद्ध शाकाहारी है.", प्रियंका दीदी अर्जुन के बराबर आ बैठी. अब भी वही कला सूट था लेकिन चेहरा धोने के बाद दुपट्टा लेने की जेहमत उन्होंने नहीं की.

"एक तोह मेहमान का ध्यान रख रही हु और ऊपर से तू मुझे बोल रही है. हँ.", गुरदीप की एक्टिंग देख अर्जुन मुस्कुराया और दीदी हंसने लगी.

"मेरी माँ, मुझे तोह ाचा लगा के तू इस से बात कर रही है. लेकिन अगर घूमने हे जाना है तोह पहले प्लान तोह बना सकते है न? कैसे जायेंगे, कौनसी मार्किट में और फिर कितनी देर के लिए?"

"रिस्की को नहीं लेके जाउंगी साथ बेशक उसको कार चलनी आती है. हाँ तुम लोग अंकल की मोटरसाइकिल पे चलना और मैं आरती के साथ मेरी काइनेटिक पर. पहले गोल मार्किट, वह से सिनेमा रोड वाली मार्किट और फिर बड़ी मार्किट से शॉपिंग करके वापिस आ जायेंगे. 6 बजे चलेंगे तोह खाना बहार खा कर 9-10 बजे तक वापिस आ जायेंगे. बन्न गया प्लान भी. और तुम लोग चिकन नहीं खाते तोह कोई बात नहीं गुरमेल रेस्टॉरेंट पे आज पनीर के पराठे, माखन और लस्सी का मजा लेंगे नहीं तोह सिटी होटल की दाल मखनी, पनीर भुर्जी और बटर नान भी तोह फेमस है.", अर्जुन मैं हे मान कह रहा था के ऐसी लड़कियां भी भगवान् ने हे बनाई है या कही और बनती है. ये तोह शोले फिल्म की बसंती से भी 10 कदम आगे थी.

"आप शर्म कर रही है इसलिए इतना कम् बोल रही है न?", अर्जुन से चुप्प न रहा गया लेकिन गुरदीप शायद ज्यादा हे भोली या नासमझ थी जो उसकी बात का मतलब न समझ सकीय.

"अब पहली बार में तोह काम हे बोलना ठीक रहता है न. Jaan-pehchan होने पर हे तोह लोग ज्यादा बातें करते है. वैसे न मुझे बातें करना पसंद है लेकिन मेरे घर में पापा तोह सिर्फ संडे हे वेहले होते है, बेबे मेरी बस wahe-guruji और खाना बनाना, घर के काम में बिजी रहती है और मेरा भाई साडू है जिस से मेरी ज्यादा बनती नहीं. लेकिन प्रियंका आरती के साथ मैं कॉलेज की फ्रेंड्स के साथ दिल खोल कर बातें करती हु. अब तुम फ्रेंडशिप करोगे तोह तुम्हरे साथ भी बातें करने में मजा आएगा.", प्रियंका दीदी पेट पकड़ कर हंसने लगी और अर्जुन के चेहरे पर सिर्फ हैरत हे थी की ये बाला है कौन. उसने तोह टांग खींची थी लेकिन यहाँ तोह सामने वाला तबियत से अपनी कहे जा रहा था.

"ोये पागल अर्जुन का मतलब था के तुम इतना कैसे बोल लेती हो. हाहाहा.", दीदी को यु हँसते देख आरती की भी हंसी निकल गयी जो ठन्डे के चार गिलास टेबल पर रखती गुरदीप के गले लग कर उसको समझने लगी.

"सच में हे भोली बेगम हो यार. अंकल ने सही नाम रखा है तुम्हारा. तुमने अर्जुन से उसके बारे में कुछ पुछा? नहीं न लेकिन अपनी बोले जा रही हो और मुझे रसोई तक सुन्न रहा था.", आरती समझा रही थी और गुरदीप मुँह टेढ़ा करके अर्जुन को देख रही थी.

"वैसे क्या पुछु अर्जुन से? तुमसे तोह पूछ हे लिए था मैंने सबकुछ.", अब बारी थी आरती दीदी के अपना माथा पीटने की. अर्जुन उन दोनों को हे देख रहा था.

"ाचा मेरे बारे में तोह आपको पता लग गया लेकिन अपने बारे में तोह आपने कुछ बताया भी नहीं.", अर्जुन ने फिर से हवा दी तोह वह बोलने हे वाली थी की प्रियंका दीदी ने सबको चुप करवा दिए.

"बस कर अर्जुन और डीप तू थोड़ी देर कोला पी और गाने देख. ये तेरे मजे ले रहा है और तू भी बोले जा रही है.", दीदी ने गुरदीप को गिलास दिए और आरती दीदी ने अर्जुन को. अपना भी गिलास दोनों ने उठाया और आरती दीदी ने टेलीविज़न पर चैनल बदल कर सिटी केबल पर आ रही हिंदी डुब्ब इंग्लिश फिल्म चला दी.

"ये मजे कैसे ले सकता है?", गुरदीप जैसे अलग हे मिटटी की बानी थी.

"सॉरी. इनका मतलब है के मैं आपको और बोलने के लिए अनजाने में हे बेहला रहा था और आप भी एक्सप्लेन करने लगी थी. अब ऐसा नहीं करूँगा.", अर्जुन को यही कहना बेहतर लगा तोह गुरदीप ने एक ाची स्माइल देते हुए 'मेंशन नॉट' कहा और फिर वह भी फिल्म देखने लगी. थोड़ी देर बाद प्रियंका दीदी ने रसोई में पुलाव की तैयारी की और अर्जुन भी उनके साथ मदद करने लगा. गुरदीप की मम्मी ने कहा भी था के वह लोग उनके यहाँ खाना खा ले या वह वही भिजवा देती है लेकिन दीदी के साथ गुरदीप ने भी मन कर दिए.

"प्रियंका यार नोटरी वाले पुलाव बनइयो. साथ में वह aalu-pyaaj या बूंदी का रायता. सलाद मैं काट देती हु.", गुरदीप ने रसोई में आते हुए कहा तोह अर्जुन दीदी को कटी हुई सब्जिया देने के बाद सलाद हे काट रहा था. आरती दीदी भी फ्रिज को साफ़ करने के बाद पानी की बोतल भर के लगा चुकी थी. इस बीच वह तीनो कमरे की चादर बदलने में व्यस्त थी और रसोई में बाकी 3 लोग थे.

"ये तोह काम भी करता है.", गुरदीप ने प्लेट से गोल कटा खीरे का टुकड़ा उठा कर खाते हुए कहा और नमकदानी अर्जुन के सामने रख दी.

"सभी करते है तोह इसमें अलग क्या है?", अर्जुन के कुछ जयादा हे करीब कड़ी थी गुरदीप और छिलके प्लास्टिक के बंद कूड़ेदान में डालते हुए एक पल के लिए गुरदीप का वह सख्त मांसल बया उभर अर्जुन की दायी ब्याह से रगड़ खा गया. गुरदीप तोह वैसे हे मुस्कुरा रही थी लेकिन अर्जुन सॉरी बोल कर वापिस काम करने लगा.

"मैं तोह किचन में कभी नहीं जाती और मेरा भाई तोह कमरे से डाइनिंग टेबल तक आना भी बड़ा काम समझता है इसलिए दोपहर को तोह वह अपने कमरे में हे खाना खता है. हाँ कभी कभी मैं टास्ते करने में मम्मी की हेल्प कर देती हु.", गुरदीप यहाँ भी शुरू हो गयी थी लेकिन प्रियंका दीदी और अर्जुन खुश थे के कोई तोह बोल रहा है.

"टास्ते करना कोई छोटा काम थोड़ी है यार. स्वाद खराब होने का भी खतरा रहता है.", प्रियंका दीदी ने अपनी सहेली की ऐसी तरफदारी की तोह सामने से वैसा हे जवाब आया.

"और नहीं तोह क्या. कभी ज्यादा फीका तोह कभी कड़वा स्वाद भी मिल जाता है. इसलिए मैं मम्मी को कह देती हु के मेरी फवौरीते डिश हे टास्ते करवाया करो. वैसे मैं सलाद काट लेती हु, अगर तुम चाहो तोह.", अर्जुन के ज्यादा हे करीब आती वह चाकू लेने लगी और एक बार फिर वही हुआ जिस से अर्जुन को बेचैनी होने लगती थी. गुरदीप के शरीर की महक के साथ हे उसका स्पर्श होना.

"मैं कर लूंगा जी. आप दीदी से बात कीजिये या बहार टेलीविज़न देखिये, गर्मी लगेगी आपको.", अर्जुन ने तोह कुछ और सोच कर हे कहा था.

"ाची बात है के तुम्हे मेरी परवाह है लेकिन कोई बात नहीं मैं थोड़ी देर तोह ये गर्मी झेल हे सकती हु. वैसे भी अकेले तोह मैं टीवी देखती नहीं.", गुरदीप का क्या किया जाये ये अर्जुन सोच रहा था.

"ाचा अर्जुन सलाद अभी फ्रिज में लगा दो और तुम घर के कपडे पहन लो haath-mooh धो के. इतने पुलाव भी तैयार हो जायेंगे और मैं भी गुरदीप से बातें कर लेती हु.", दीदी ने सही हल निकला था और अर्जुन raita-salad फ्रिज में लगाने के बाद सीधा हे अपने chacha-chachi के कमरे में जा घुसा. दरवाजे के पीछे अपने ये कपडे टांग कर बैग से पजामा टीशर्ट निकल वह बाथरूम में जा घुसा. थोड़ी देर पहले हे वह नहाया था लेकिन कुछ सोच कर फिर से पानी के निचे जा खड़ा हुआ. नाहा कर कपडे बदलने के बाद वह कमरे में हे बीएड पर लेट गया, खाने में थोड़ा समय था.

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शंकर जी ने छोल साहब के घर कोई जाम नहीं लिए था. वह सबसे थोड़ी बातें करने के बाद जब मैं ठीक हुआ तोह घर आ कर अपनी बीवी के साथ हल्का भोजन करके वह अपनी माता जी के पास आ बैठे. लाड प्यार के बाद अपनी माँ की गॉड में सर रख कर लेते वह अब सब बातें जान रहे थे.

"आज ठीक लगे तोह आज नहीं तोह कल एक बार चंद्रो बहिन से मिल आना. कल तोह घर चली जाएँगी वह हॉस्पिटल से. और हो सके तोह सुशीला से भी सब भूल कर नए सिरे से बात करना, वह बेचारी तोह अब बिल्कुल टूट चुकी है. मोहर सिंह बुरा था लेकिन था राममेहर का बीटा हे, शोक न भी मनाये तोह भी उनके घर जाना जरुरी है तेरा.", कौशल्या जी शंकर जी को सब घटना बताने के बाद अब आगे क्या करना है वह समझा रही थी.

"चला जाऊंगा लेकिन कल. आज इतने दिनों बाद आया हु तोह थोड़ी देर आपके पास सोने के बाद फिर शाम को रेखा को लेकर मेहुल के घर जाना है. भूपिंदर से भी मुलाकात करनी है. जाने कैसी बेवकूफी कर गए जो सब चोटिल हो गए मेरे पीछे से.", शंकर जी को बड़ा ाचा लग रहा था अपनी माँ की गॉड में लेट कर सर की मालिश करवाना. रामेश्वर जी एक बाद उन दोनों को देख कर मुस्कुराते हुए बैठक से बहार चले गए. उन्हें िग कपूर और छोल साहब से बातें करनी थी और दोपहर का खाना उनका वही था.

"हाँथ बंधे हो और चीजे एकदम घट्ट जाये तोह ऐसा हो जाता है. भूपिंदर के बेटे की बात थी, मेहुल अकेला गया था वह भिड़ने और परम की हालत भी वैसी हे थी. तेरे और इनके (रामेश्वर जी) जैसे उन्हें कहा ऐसे हालात का सामना करने की आदत है लेकिन दिलेर तोह हैं वह लोग.", कौशल्या जी की बात सही थी की हालात और समय हे सब निश्चिंत करते है.

"हाँ सही कहा आपने. वैसे राजेश ने ाचा काम किआ और कल रात उसने हे मेरा साथ दिए था एयरपोर्ट से लेकर सुबह 6 बजे तक.", अपने साले की तारीफ करते वक़्त उन्होंने अपनी माँ के चेहरे पर आई एक अलग सी ख़ुशी को देखा और इशारे में सवाल किआ.

"राजेश हे था जिसने एक तरह से चंद्रो बहिन की जान बचाई और बाकी लोगो को जेल में पहुंचाया तेरे पापा के कहने पर निर्मल सिंह के साथ. उसका दिमाग वैसे हे चलता है जैसे तेरे हाथ. लेकिन संजीव और उमेद का सुन्न कर बहोत दुःख हुआ. उमेद पर कितनी जिम्मेवारिअ है और संजीव की शादी भी है.", कौशल्या जी का दुखी होना लाजमी भी था.

"उमेद ठीक है और जल्द हे आएगा मिलने आपसे. संजीव की खैरियत राजेश के साथ जा कर देख ली थी, वह भी हफ्ते बाद घर आ जायेगा माँ. लेकिन आप सबने अभी तक ये नहीं बताया के अर्जुन इन सभी घटनाओ में कैसे आ गया. और इतने लोग घायल हुए तोह वह बिलकुल सही सलामत है?", शंकर जी ने अपनी माँ को सोच से बहार निकला और वह मुस्कुरा उठी.

"उसने तेरे भतीजे की जो दुर्गति बनाई वह तोह तूने भी हमसे छुपाये राखी. और उन लोगो की हालत देखने के बाद भी तुझे लगता है के अर्जुन तेरे से किसी तरह कम् है? वैसे तेरे पापा ने बताया था के अर्जुन का दिमाग थोड़े वक़्त के लिए अनजाने सुराग ढूंढ़ने लगा था और उसको सँभालने के लिए हे उन्होंने उमेद के साथ उसको बस खबरि की तरह ये काम दिए, पहली और आखिरी बार. लेकिन हैरत तोह मुझे भी हुई की उसने उमेद और संजीव की जान बचने के साथ हे भीम जैसे जानवर की कैसी हालत बनाई. डॉक्टर यही मान रहे है के वह गोली से मारा लेकिन तेरे पापा कह रहे थे की उमेद गोली न भी मारता तब भी भीम अपने जख्मो के साथ जिन्दा नहीं बचने वाला था.", कौशल्या जी को अर्जुन के लिए चिंतित और इतना प्यार देख कर शंकर जी भी मुस्कुरा उठे.

"वह नादान है और उसको वही बनाये रखना माँ. मैं भी कोशिश करूँगा उसके साथ समय बिताने की. सतीश चाचा ने बताया मुझे के कैसे अर्जुन ने सुशीला, शबनम की भी जान बचाई और बिजेन्दर से भी बैर न रखते हुए उनके घर मिल कर आया. उसने वह कर दिखाया जो हम सभी चाहते थे लेकिन नामुमकिन सा था. सितारा काकी भी उस से मिल कर दुःख के समय भी कितना खुश हुई और पहली बार उन्होंने अब घर की जिम्मेवारी खुद लेने की बात कही. ये सब आपकी और पापा की म्हणत है उस पर जो उसका दिल लोगो से बदला लेने की जगह उन्हें बदलने में रहता है.", शंकर जी को गहरी ख़ुशी थी की उनका बीटा अभी से इतना जिम्मेदार और सबसे मिल कर रहने में यकीन रखने वाला है.

"हम दोनों से ज्यादा म्हणत की है ऋतू ने. रेखा, कोमल और प्रीती ने भी काम साथ नहीं दिए है अर्जुन को ऐसा व्यक्ति बनाने में. जितना वह ख़ास है उसको 2-3 लोग नहीं संभल सकते. मुझे तोह बाद में पता लगा के उमेद ने हे अर्जुन को अपना दत्तक पुत्र मन हुआ है और वह शुरू से उसको तुम्हारे पापा के साथ शिक्षा दे रहा था.", इतने नाम सुन्न ने के बावजूद शंकर जी को सिर्फ ऋतू हे सुनाई दिए. चेहरे पर कई रंग आने जाने लगे थे ये सोच कर की ये अनहोनी भी लिखी थी क्या किस्मत में. लेकिन वह भूल गए थे की जिसकी गॉड में वह लेते है उनसे कुछ छुपा नहीं सकते.

"तू अभी से परेशां मत हो बीटा. देख इंसान कितना भी ताक़तवर क्यों न हो जाये, समाज भी जितने मर्जी नियम बना ले लेकिन नियति के सामने न समाज के ठेकेदारों की चलती है और न होनी के सामने teri-meri चलेगी. अगर तू Ritu-Arjun को लेकर परेशां रहेगा तोह न तू दोनों के प्रति बाप बन्न के जी पायेगा और अगर अलग किआ तोह वैसे हे उन्हें मार देगा. तेरे पापा ने उनके अटूट प्यार को हम सबसे पहले पहचान लिए था और उन्होंने एक ख़ास तरह से मुझे इसका जवाब भी दिए था.", कौशल्या जी के शंकर के सर पर चलता हाथ कुछ पल के लिए ृक्क गया था.

"इसका जवाब वह कैसे दे सकते है माँ? उन्हें तोह प्यार समझ में हे कहा आता है. देखा था ना आपने मधुलता को कैसे मुझसे अलग कर दिए था एक पल में. अब तोह बात इतनी गंभीर है के उनके पूरे परिवार की साख दांव पर लगी हुई है. साथ हे एक और निर्दोष प्रेमिका है अर्जुन के साथ, उसकी ज़िन्दगी के बारे में भी कोई सोच सकता है क्या?", शंकर जी के स्वर में ज़माने भर की पीड़ा और लाचारी थी इस वक़्त.

"तुमने और दलीप ने तोह जैसे बहोत बड़ा तीर मार दिए था मंजू को हे दांव पर लगा कर? बदले में अपनी बेटी हे झोंक दी थी बेशक दलीप के बाप की मौत में उनका हाथ था लेकिन कोई भला ऐसा करता है?", कौशल्या जी जैसे अपने पति को उनसे भी ज्यादा जानती थी और चाहती भी थी.

"मंजू की शादी के सबूत तक नहीं है माँ और समय आने पर मैं खुद उसको बेहतर ज़िन्दगी दूंगा. और तुम्हे शायद ये न पता हो लेकिन उसका भी अर्जुन से रिश्ता है. लेकिन फिर भी आप मेरी बात को नहीं झुटला सकती. पापा ने तब भी गलत किआ था और अब भी कई ज़िंदगिया दांव पर लगा देंगे. जिम्मेवार मैं मन जाऊंगा क्योंकि ऋतू को मैं जान से ज्यादा चाहता हु और अर्जुन के लिए रेखा मर्डर जाएगी.", शंकर जी अपने प्यार की दलील दे कर जैसे उस बात से भाग रहे थे जो कौशल्या जी पकडे बैठी थी.

"पेट से है वह लड़की. आज भी गले में मंगलसूत्र और मांग में टीका है उसके. लेकिन उसने अपनी जुबान से एक लफ्ज़ तक नहीं कहा. और जानता है जिसके साथ तू उसका रिश्ता जोड़ रहा है वह उस से हे प्यार करती है, उसके हे नाम का मंगलसूत्र और सिन्दूर लगाए वह अकेली जी रही है. लेकिन तू बता के तू कैसी ज़िन्दगी देने की बात कर रहा था.? अर्जुन ने विधवा को संभाला और तूने प्यार के नाम पर मधुलता को उसकी शादी के बाद भी माँ बना दिए. हैं तेरे पास इस उलझन का इलाज.?", कौशल्या जी ने उतनी हे ताक़त वाला परमाणु बम शंकर जी पर गिरयाया था जितना Nagasaki-Hiroshima पर गिरा होगा. पल में हे हम चकनाचूर हो गया.

"ये कब और कैसे हुआ माँ? और आपको ये सब कैसे पता चला? किसी और को भी खबर है क्या इसकी? अनर्थ हो जायेगा माँ ऐसे तोह.", शंकर जी उठ कर बैठ गए थे. चेहरे पर इतनी परेशानी देख कौशल्या जी मुस्कुरा उठी.

"अर्जुन ने बताया मुझे. शब्द ऐसे नहीं थे जैसे मैंने कहे लेकिन उसने कहा के वह मंजू को वैसी हे ज़िन्दगी देगा जैसी हर इंसान अपने चाहने वाले के लिए सोचता है. तेरे पापा ने तोह अर्जुन का कॉलेज का हिस्सा भी प्रीती और मंजू में बंटवा दिए, तेरा नाम लेकर. मंजू ने खुद हे कहा है के वह अर्जुन की बीवी बन्न कर तोह रहेगी लेकिन इस घर में वह सिर्फ दलीप की बेटी और रेखा से रिश्ते के तौर पर रहेगी. कुछ फैंसले हमसे छोटे भी ऐसे लेते हैं की ज़िन्दगी भर शर्म महसूस होती रहे. लेकिन अर्जुन ने न उसको सिर्फ संभाला है बल्कि वह उसके ाचे भविष्य के लिए भी तैयारी में लगा है. ये बात तेरे और मेरे बीच रेहनी चाहिए शंकर और भूल कर भी उसमे अपनी बहु देखने की चेष्ता मत करना अर्जुन की इजाजत के बिना. अर्जुन मेरा विश्वास है और मैं भी उतनी हे हु उसके लिए.", कौशल्या जी की बात सुन्न कर बहोत से सवाल थे शंकर के दिमाग में लेकिन मुँह बंद रखना हे बेहतर था क्योंकि गलती के सूत्रधार तोह वही थे. अब बीटा बचा रहा है तोह ऐसी मूर्खता नहीं करनी चाहिए.

"और अब मधुलता की बात भी ले ले जरा. तेरे पापा तुम चारो में सबसे अधिक प्यार करते है सिर्फ तेरे से, बेशक तू उनके सर पर पाँव रख के बात मनवा ले. उन्हें भी तेरा यही ज़िद्दी रूप पसंद है जिसमे तेरा अपना हे प्यार है उनके लिए. मधुलता उस घर गयी क्योंकि एक तोह उसके बाप ने रिश्ता वह करवाया, दूसरा वह परिवार भी हमारा हे है. तेरा दिल टॉड कर उन्होंने सजा खुद को हे दी थी मधुलता की शादी वह करवा कर. उन्होंने तोह उसके बाद तेरी सभी गलतियां अपने फैंसले का नतीजा मान कर खुद पर मंध ली लेकिन तुझे एहसास हुआ की रेखा के साथ अब तेरी ज़िन्दगी में ाचे बदलाव लाने वाला उनका पौता अर्जुन हे है. एक पल को मेरा भी दिल टूट गया था अर्जुन का मंजू का साथ देने वाली बात पर लेकिन तुझे पता है अर्जुन की आँखें उसके दिल का हाल भी बता देती है. वह सच्चा है और किसी और के खेल का मोहरा बानी उस लड़की के दर्द को समझने वाला वह लड़का साधारण नहीं है शंकर. यही फरक है मेरे बेटे और मेरे पौटे में.", कौशल्या जी का वात्सल्य शंकर के साथ कितना था इसकी कोई सीमा न थी लेकिन अर्जुन जैसे उनकी आत्मा को उन पीड़ा से मुक्त करता था जिनमे अनजाने हे सही लेकिन वह भी भागीदार थी.

"सही कहा माँ आपने. अर्जुन ने बहोत कुछ बदल दिए है और मुझको इसका एहसास करने का वक़्त भी नहीं मिला. और अगर वह मंजू को बेहतर ज़िन्दगी दे सकता है वह भी सिर्फ उन्दोनो के आपसी तालमेल से तोह मैं कोशिश करूँगा की उन्हें परेशानी न आये. और न ये जाहिर हो के मुझे उनके बारे में पता है. वैसे अब मेरा दिल करता है के मैं इस घर में राहु. लेकिन आपने ऋतू वाली बात नहीं पूरी की.", शंकर जी ने तकिये को बाहों के निचे रखते हुए अपनी माँ से जैसे ये आखिरी सवाल किआ.

"वह कहते है के ऋतू अगर अर्जुन की सुभद्रा है तोह हम होते हे कौन है उनके बीच आने वाले. लेकिन प्रीती के साथ शादी भी अटल है. बाकी जो फैंसला ये लोग करेंगे वह पहले परिवार को ध्यान में रख कर हे करेंगे. फ़िलहाल सभी के अपने अपने लखस्या है तोह अगले 5-6 साल ये समझदार बचे कोई unch-neech नहीं करने वाले. वैसे तुझे कैसा लगा था ऋतू और अर्जुन के प्यार का जान कर? और पता कैसे लगा?", कौशल्या जी भी अपनी तरफ के बिस्टेर पर लेट गयी थी.

"वह अर्जुन को उस दिन हॉस्पिटल में देख कर मैंने मेरी बेटी की धड़कन महसूस की थी माँ. अर्जुन को कुछ हो जाता तोह वह भी ज़िंदा न रह पाती. Bhai-behan में प्यार का गहरा रिश्ता होना बड़ी बात नहीं लेकिन जो आंसू और दुनिया से अलग हो जाने वाली ताक़त उसमे मैंने देखि थी वह बहोत थी बताने के लिए की उन दोनों का बचपन का जुड़ाव आज किस मदद पर पहुंच चूका है. ाची बात तोह ये है के वह दोनों अपने bhai-behan के रिश्ते को मजबूत बनाये हुए है. दिल से तोह मैं भी चाहता हु के ऋतू जैसा चाहती है वैसा हे हो लेकिन फिर प्रीती भी तोह हमारी हे है."

"ऋतू और प्रीती भी आपस में सगी से काम नहीं है. चल तू अब आराम कर और जैसा मैंने कहा वैसा हे कर. समय और नियति ाचे लोगो के साथ बुरा नहीं करते.", कौशल्या जी के द्वारा कनपटी सहलाये जाने से शंकर जी जल्द हे गहरी नींद में पहुंच गए. कल शाम से हे आराम न किआ था और उस से पहले 20 घंटे का सफर भी. कौशल्या जी भी भगवान् से दुआ मांगती अपने लाडले को सुलाने के बाद आँखें बंद कर के आराम करने लगी. अर्जुन ने उनके साथ इतना बड़ा फैंसला साँझा किआ था और सब समझने के बाद उनके दिल में अपने पौटे के लिए सम्मान की भावना मजबूत हो गयी थी. वह कभी गलत नहीं करेगा लेकिन दिल का नासमझ और सबको बराबर प्यार देने वाला है इसलिए थोड़ी चिंता रहती थी कौशल्या जी को. दुनिया ऐसे लोगो के साथ भी खेल खेलने से नहीं टलती.

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इधर पंजाब के इस बड़े शहर के इस प्यार से बने घर में दोपहर का भोजन होने के बाद सभी ने थोड़ी बहोत बातें की और आरती दीदी ने थकान की वजह और शाम को घूमने जाने से पहले आराम करना बेहतर समझा. रात में भी ज्यादा नहीं सो पायी थी और गाडी में वो आराम न मिला था. सबको बोल कर वह कमरे का दरवाजा बंद करके ढीले कपडे पहन अपने बिस्टेर पर लेट गयी. इतने दिनों के बाद अपने ख़ास बिस्टेर पर पल में हे नींद ने उन्हें आ घेरा.

"यार ज्यादा हे खा लिए मैंने तोह. अब लगता है मुझे भी सोना हे पड़ेगा लेकिन शाम को अगर मैं इधर नहीं आई तोह तुम साढ़े 5 मुझे जगा देना. गुरदीप ने टेबल साफ़ करती अपनी सहेली प्रियंका से कहा और ाचे से अर्जुन को निहारने लगी. अर्जुन भी टेलीविज़न बंद करके खड़ा होने लगा था की गुरदीप की आँखें बहोत कुछ कहना छह रही थी और अर्जुन एक पल के लिए ठिठक गया.

"ाचा चलती हु प्रियंका, शाम को मिलते है अर्जुन.", एक प्यारी सी मुस्कान देती वह बहार चली गयी और प्रियंका दीदी भी उसको छोड़ने का बोल कर साथ निकल गयी. अर्जुन अपने मैं को शांत करता पानी पीने के बाद चची के कमरे में चला गया. दोपहर के 3 बज रहे थे और अब थोड़ा आराम करना हे बेहतर था. कमरे में गहरे रंग के परदे बहार से आती रौशनी को पूरी तरह जज्ब करके उचित अँधेरा और ठंडक बनाये थे. नरम गद्दे पर लेट कर वह अपनी सोचो में खो गया. बहोत कुछ हुआ था इन कुछ दिनों में और आने वाले दिन भी व्यस्त रहने वाले थे.

मंजू का पूरा साथ देना था उसको तभी वह अपने सपनो को दिल से पूरा कर पायेगी. अन्नू भी चली गयी थी लेकिन उसके साथ वार्तालाप काम नहीं होने देना था. ऋतू दीदी और प्रीती के साथ भी उसको ाचा समय मिलने वाला था काम के साथ हे. माधुरी दीदी को आने वाले दिनों में समय देना हे पड़ेगा, दीदी का सपना था के अर्जुन उन्हें वैसे हे विदा करे जैसा उनका सपना था. सबको याद करते हुए ध्यान आया के परसो बबिता से भी मिलने का वादा किआ था और अब स्कूल जाना नहीं था तोह कुछ जुगत लगा कर वह उनसे भी मिल हे लेगा. सोचते सोचते तकिये को ब्याह के निचे दबाये अर्जुन की नजर दरवाजे पर कड़ी प्रियंका दीदी पर पड़ी. वह चौखट पर हाथ टिकाये बस अर्जुन को हे देख रही थी.

"आप कड़ी क्यों है? आ जाइये न इधर मुझे भी नींद नहीं आ रही, वैसा हे लेता हु.", अर्जुन ने उन्हें अपने पास बुलाया तोह वह नंगे पाँव बहार चली गयी लेकिन तुरंत हे वापिस आ कर दरवाजा ढालती हुई सीधा उसके ऊपर लेट गयी.

"मैं तोह कबसे हे आना चाहती थी तुम्हारे पास. इतने दिन वह रहने के बाद भी देखो मौका कहा मिल रहा है.", दीदी ने सलवार कमीज नहीं बदला था, जैसे वह ख़ास अर्जुन के लिए हे उन्होंने पहना हो. वह बड़े मखमली लेकिन ठोस गोले पीठ पर महसूस करके अर्जुन को भी सुखद एहसास हो रहा था. बाकी का जिस्म भी रूई सा नरम उसकी पीठ से पाँव तक बिछा हुआ था.

"चाहता तोह मैं भी यही हु की आपको जी भर के प्यार दू लेकिन वह आपके सामने हे था और अब यहाँ आरती दीदी भी है."

"आरती अंदर से दरवाजा बंद करके सोई है और उसकी नींद मैं जानती हु. वह शाम को उठाने से हे उठेगी और फिर भी मैंने हॉल और उसका कमरा बंद कर दिए है.", अपने दोनों हाथ अर्जुन की बाहों के निचे ले जाती प्रियंका दीदी ने तपते होंठो से उसके गले और कान को चूम लिए. उनकी तड़प जायज थी क्योंकि हवा देने के बाद अर्जुन ने उन्हें पूरा सुख नहीं दिए था. खुद को पलट कर सीधा करते हुए अर्जुन ने उन्हें अपने सीने पर ले लिए.

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क्रमश
 
अपडेट 106

खेल - 2 (बी)


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जारी

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"सॉरी. मेरी अनदेखी की भी वजह थी लेकिन पहली बार होने वाला दर्द अभी पूरी तरह से आपने देखा नहीं है. लेकिन आज मैं आपको पूरा प्यार दूंगा. वैसे आपने हालत मेरी सुबह से हे बुरी कर राखी है.", उनके 38 के मॉटे नरम कूल्हे हलके हलके मसलता अर्जुन उन नाजुक तपते होंठो को प्यार से पीने लगा. दीदी भी सब भूल कर उस पर लेती हुई अर्जुन का साथ देने लगी. अर्जुन के मजबूत हाथ उस लचीली दरार में उतारते हुए प्रियंका को अलग तरह की उत्तेजना का एहसास दिला रहे थे. नाड़े वाली सलवार की वजह से हाथ अंदर न जा पाए तोह वह एक पल के लिए अलग हो कर बराबर में फर्श पर कड़ी हो गयी. गांठ ढीली करते हे वह पटिआला सलवार निचे गिर गयी लेकिन अर्जुन ने उन्हें कमीज उतरने से रोक लिए. पजामा टीशर्ट हटा कर वह भी सिर्फ अपनी ढीली निक्कर में बीएड की किनारे पांव लटकाये बैठ गया.

"ये मुझे करना है, देखु तोह जरा ये इतने टाइट कैसे हो गए है.", उनके नंगे कूल्हों को कमीज का निचला भाग छुपाये था लेकिन हाथ वह अपना खेल दिखने लगे. सामने कड़ी दीदी के बड़े स्टैनो के बीच मुँह दबाये वह उनके चिकने बेदाग कूल्हों को ाचे से मसलता हुआ छूट के aas-pas भी उंगलियों से हरकत दे रहा था. ये अध्भुत स्पर्श और अर्जुन का उनके शरीर के साथ एक बार में कई जगह प्यार जाताना उन्हें माँ सा पिघला रहा था. खड़े हो कर अर्जुन ने वह काला कमीज ऊपर उठाया तोह इसमें दोनों को हे म्हणत करनी पड़ी. शायद सीने पर वह कुछ ज्यादा हे टाइट था. लेकिन कपडा जुड़ा होते हे अर्जुन बस उन्हें देखता हे रह गया.

"बस करो न. प्यार करना अलग बात है लेकिन ऐसे घूरने से अजीब लगता है.", दीदी उसके गले लग्न चाहती थी लेकिन अर्जुन ने उनकी कमर को थाम कर ये शरीर ाचे से नजरो में क़ैद किआ. काली जाली वाली ब्रा और उसके साथ की हे काली पंतय में प्रियंका दीदी का भरा हुआ शरीर पहले से अधिक गठीला और कही ज्यादा हे आकर्षक हो गया था. कमर पहले से कही पतली और सीना ज्यादा उभर आया था. वैसे हे अनुपात में कूल्हे बहार और गोर पत् सुडोल और मांसल दिख रहे थे.

"आप एक्सरसाइज कर रही थी इतने दिनों से? फिगर पहले भी ाचा था लेकिन अब दिल करता है बस देखता राहु.", उनकी चिकनी कमर से हाथ फिरते हुए वह गोल नाभि को ऊँगली से सहलाने लगा.

"सीई.. आह्हः. अलका ने म्हणत करवाई है ये.. और तुम्हे ाचा लगा तोह मैं इसको ऐसे हे बनाये रखूंगी. बस ये ज्यादा बड़े लगते है.", दीदी अपने चुचो की बात करती उसके सीने से चिपक गयी. अर्जुन का प्रचंड अंग उनकी नाभि से 2 इंच ऊपर तक ठोकर मारता बता रहा था के अर्जुन पे उनका जादू चल गया है.

"सच कहु तोह मैं तोह सुबह से हे पागल हो रहा था. घर पे आप ढीले कपडे पहनती हो तोह ये बदलाव देख नहीं पाया था. लेकिन सचमुच आप जान हे ले रही हो.", अर्जुन के ऐसा कहते हे दीदी ने उसको होंठो को मुँह में लेते हुए खुद हे एक हाथ अपने कूल्हों पर रखवा दिए. पूर्ण कशिश से दोनों एक लम्बा चुम्बन करते हुए एक दूसरे का जिस्म सेहला रहे थे. अर्जुन के निर्वस्त्र सीने से लगने पर चुके और भी कड़े होने लगे. कूल्हों पर भी रोये खड़े होते बता रहे थे की ये एहसास स्वर्ग सा है.

"सब तुम्हारे लिए हे है अर्जुन. बस थोड़ा अजीब लगता था खुद को देख कर की मैं वैसी नहीं हु जैसी ज्यादातर शहर की लड़किया होती है.", उनका तात्पर्य अपने पहरावे के साथ हे शरीर से भी था.

"आप उन लड़कियों से कही बेहतर हो दीदी. ऐसा शरीर तोह किसी संत की तपस्या भी भांग कर दे. आपने माधुरी दीदी को देखा है, वह कितनी खुश रहती है क्योंकि उनको पता है उनके पास क्या है. लेकिन सच कहु तोह आपने तोह म्हणत से इसको कही ज्यादा हे निखार दिए है. साइज जान सकता हु?", अर्जुन ने एक हाथ से योनि को उस पतले कपडे से सहलाते हुए दूसरे से वह 2 हुक खोल कर ब्रा ढीली कर दी. दीदी वैसे हे गले लगे मस्ती में आ रही थी. लुंड की गर्मी, चुचो का ऐसे अर्जुन से दबना और अर्जुन द्वारा उनकी फूली हुई योनि को रगड़ना.

"36-दद, 30 और 36. पहले कमर 32 और हिप्स 38 हो गए थे.. आह्हः.. आराम से मैं कही भागी नहीं जा रही हु.. उम्म्म...", अर्जुन ने छूट के कपडे के ऊपर से हे ऊँगली अंदर दबाई तोह दीदी ने सर पीछे झटक दिए. फिगर इतना कातिल था और अब बस वह जल्द हे इसको निर्वस्त्र करके भरपूर प्यार देना चाहता था. ब्रा की दोनों पत्तिया कंधे से निचे सरकते हुए अर्जुन ने वह दोनों यौवन कलश बेपर्दा किये तोह एक सेंटीमीटर लम्बे दोनों चूचक तन्न कर सामने खड़े थे. बेशक अतुलनीय थे और अर्जुन ने एक लम्बी सांस लेते हुए दोनों को बरी से चूम लिए. बीएड के किनारे बैठते हुए अर्जुन ने उन्हें दोनों तरफ पाँव करते हुए ऊपर बिठा लिए. अगले 5 मिनट उन दोनों मॉटे चुचो को चूसने के साथ हे दबाते हुए वह प्रियंका दीदी को पागल करने लगा.

"आअह्ह्ह्ह.. आराम से.. उम्मम्मम.. Arrrjjunnn.aahh.. खा जा इन्हे आह्हः.. अब तोह मैं आह्हः.. इन्हे हाथ लगाने से भी डर्टी हु.. आठ..", जमीन से पाँव ऊपर करती वह अर्जुन की जांघो के बीच सरकती खुद को बीएड पे हे ले आई. मस्ती में छूट का उभर मॉटे लुंड की जड़ से रगड़ती वह आँखे बंद किये बस उसको उत्साहित कर रही थी चुचो से वो अदृश्य रस पीने के लिए जो उन्हें जोश दिला रहा था. दोनों खरबूजे से बड़े चुके अब गुलाबी हो चुके थे. थूक और लार से गीले निप्पल भी फूल चुके थे.

"अब बाकी काम यहाँ पर करते है. देखे वह भी इतना हे मजा है क्या.", अर्जुन ने शरारत से उन्हें तकिये पर सर रख कर लिटाते हुए पंतय को भी खींच कर अलग कर दिए. दीदी आँखें बंद किये छूट को छुपाना चाहती थी लेकिन अर्जुन ने उनके हाथो को हे चूम कर बिना कहे हे बता दिए यहाँ उसका अधिकार है. धीरे धीरे हाथ हटाने पर अर्जुन उस जगह को देखने जो वह पहले देख भी चूका था और आधा अंदर समां भी. लेकिन आज ये ख़ास चमक रही थी और हलके बाल भी जड़ से हे गायब थे इस गुलाबी छूट के ऊपरी हिस्से से. कॉमर्स की एक बूँद छूट के निचले हिस्से पर जमा हो कर हालत बता रही थी.

"इसको भी बदल दिए आपने.", अर्जुन ने पहले चिकने हिस्से को चूमा और फिर उन मॉटे लंबवत होंठो को. सुडोल चिकनी जांघो को ऊपर उठाते हुए वह ाचे से छूट को उभरने के बाद जीभ से हर हिस्सा चाटने लगा.

"आअह्ह्ह्ह... माँ... अर्जुन क्या कर रहा है ....िसष्ठ.. ाचा लग रहा है भाई.. धीरे कर कुछ हो रहा है.", जीभी का नुकीला हिस्सा अंदर के रस को भी निकल कर मुँह में लाने लगा तोह प्रियंका दीदी मस्ती में आँखें बंद किये खुदके चुके मसलने लगी. जाँघे अकड़ चुकी थी और इसके साथ हे चुतरस रह रह कर बहार आने लगा. साँसों की बढ़ी हुई गति बता रही थी की ये आनंद सर्वोपरि था. दीदी को निढाल और छूट को भरपूर गीला देख अर्जुन ने निक्कर अलग कर दी. लुंड के मॉटे सुपडे के ऊपर भी चिकनाई का होना बता रहा था के ये भी प्यार के लिए बड़ी देर से तरस रहा था.

"अब आगे का सफर करते है दीदी.", अर्जुन ने सुपडे को चुतरस से गीला करते हुए होंठो को भी फैलते हुए उनके प्रेमी से परिचय करवाया और दबाव से सूपड़ा अंदर तेल दिए.

"ोुछः... माँ... अर्जुनंनं..", दीदी को सुपडे से दर्द होगा ये अर्जुन ने सोचा न था. लेकिन छूट की सख्ती बता रही थी की कसाव ज्यादा आ चूका है. गुलाबी होंठो को मुँह में लेते हुए अर्जुन ने ये एक और करारा धक्का मारा तोह शरीर अकड़ गया दीदी का. गरम चाक़ू सा लुंड छूट की गहराई में 5 इंच बैठ गया. कोई पतली छूट और हलके कूल्हों वाली होती तोह पक्का उसकी चीख अर्जुन संभल न पता या वह बेहोश भी हो सकती थी. अकड़े निप्पल मसलते हुए वह उनकी जीभ को भी चूस रहा था. नीली उभरी रागे लुंड को कही भयंकर दिखा रही थी. असामान्य रूप से ज्यादा मोटाई वाला लुंड उन मॉटे होंठो को फैलाये फंसा हुआ था.

"बस दीदी, शांत. अब दर्द थोड़ी हे देर में दूर हो जायेगा.", कनपटी पर अर्जुन के भी पसीना छू रहा था, गरम लचीली छूट उम्मीद से जयदा कसाव लिए थी लेकिन स्टैनो का मर्दन और होंठ चूसने से दीदी बेहतर महसूस करने लगी. सुपडे तक लुंड निकल कर अंदर ठेलते हुए अर्जुन ने उतने हिस्से को प्यार देने शुरू किआ तोह 5 मिनट बाद हे दीदी भी अपने बड़े कूल्हे हिलने लगी.

"आठ.. ाचा लग रहा है थोड़ा .. उम्म्म.. तेरा बहोत ज्यादा हे मोटा है भाई.. आह्हः.. पता नहीं माधुरी ने कैसे ले लिए था.. आह्हः.. तारा ने भी लिए है न.. उम्.. वह तोह मेरे से छोटी भी hai..aahh..", प्रियंका दीदी जैसे नशे में पहुंच गयी थी. लुंड की ये रगड़ छूट में भूचाल लाने लगी और अर्जुन उनके होंठो की जगह अब मॉटे चुचो से दूध निकलने की असफल कोशिश करता उन्हें होंठो में दबा कर पी रहा था. इतनी रगड़ से छूट में फिर से बहाव आने लगा और यही सही मौका था उनकी गहराई में उतरने का. चुचो से मुँह हटा कर फिर से जुबान बंद करते हुए अर्जुन ने अपना मूसल दम लगा कर उस नरम गुफा में जोर से पेल दिए. साड़ी रुकावट ख़तम करता वह उनके गर्भ से जा टकराया. दीदी की सांसें रुक सी गयी थी.

"माहहहहह... मार दिए अर्जुन तुमने तोह.. आह्हः....", कुछ देर उनके होंठो को चूसने के बाद अर्जुन ने उन्हें ढीला छोड़ा तोह दर्द से सर इधर उधर पटकने लगी. छूट की जड़ में दोनों अंडकोष चिपके बता रहे थे के ये गुफा भी माप ली गयी है. हल्का लाल पानी उस चौड़े चले से बहार आ गया था. अर्जुन दर्द को दर्द से काम करते हुए उन रसभरे स्टैनो को मसलता हुए उन्हें चुपचाप प्यार करने लगा. जल्द हे दर्द इस प्यार के सामने कमजोर पड़ने लगा और लुंड धीरे धीरे सरकता अंदर बहार होने लगा.

"आह्हः.. दीदी आप ज्यादा हे टाइट हो लेकिन देखो पूरा अंदर ले लिए आपने. उम्.. अगर बॉडी ऐसी नहीं होती तोह हाल बुरा हो जाता.", उनके ऊपर लेता वह बड़े प्यार से गहराई मापते हुए धीमी रफ़्तार से चुदाई करने. प्रियंका दीदी के गोर चेहरे पर आये पसीने और आंसू वह पी चूका था. सिसकिया बंद कमरे में मादकता बढाती दोनों को एक दूसरे से और अधिक जोड़ रही थी. छूट की फांके भी अब हर रगड़ से फूल जाती.

"Ummm...aahhh.. बड़ा है लेकिन.. आठ.. आखिर तक टच हो कर मजा भी दे रहा है. उम्... ये पागलपन सा है.. मैं होने लगी हु.. आह्हः..", दीदी लुंड के जोर और छूट की आग से निकल कर लगातार झड़ने लगी. होंठो के साथ हे शरीर भी कांप रहा था. चुके पत्थर से सख्त हो कर उन्माद का स्तर बयां करने लगे. अर्जुन बस उनके जिस्म को सहलाता पूरा सुख देने लगा. 20 मिनट की लगातार चुदाई ने आज उन्हें पूर्ण स्त्री बना हे दिए था. 5 मिनट के आराम के बाद अर्जुन ने लुंड बहार निकला तोह मोटा सूपड़ा फिर से हल्का दर्द देता बहार आया. चुतरस से भीगा वह लाल टमाटर सा हिस्सा देख कर दीदी की आँखे फटी रह गयी.

"ये इतना मोटा है? अंदर कैसे गया ये?", छूट के ऊपर हाथ लगते हे जवाब मिल गया. पहले जहा दोनों होंठ चिपके थे अब वह 2 ऊँगली की मोटाई जितना खुल बंद होते हलके रक्त और कॉमर्स से भीगे थे. अर्जुन ने उन्हें चूम कर बिस्टेर पर उल्टा लिटा दिए.

"घुटने के भार हो जाओ दीदी. अब आपको थोड़ा भी दर्द नहीं होगा.", प्रियंका दीदी चुदाई से निहाल होने के बावजूद अर्जुन के नशे में डूबी थी. घोड़ी की मुद्रा में उनके वह 38 के कूल्हे उभर के बहार निकल आये तोह अर्जुन बस उनमे हे खो गया. ये माधुरी दीदी के कूल्हों से अकार में बराबर थे लेकिन जैसे तराशे हुए थे वैसे तोह बस 2 हे थे इनकी टक्कर में. कोमल दीदी, जिनके नितम्ब देखने के बावजूद अर्जुन उनसे दूर रहता था और दूसरी अन्नू. दोनों के हे पिछले भाग अछूते थे लेकिन यहाँ उसकी धड़कन और मैं अलग चल रहे थे.

"तू वह तोह नहीं सोच रहा न अर्जुन.", दीदी के ीनता कहते हे वह झेंपता हुआ घुटने के बल पीछे आ गया. लुंड को ाचे से उन लाल फांको के बीच रगड़ कर चिकना करते हे उसने 2 धक्को में हे छूट की गहराई माप दी.

"आठ... क्या करता है भाई? ममम... बहोत हे अंदर तक लगता है ये... आठ..", दीदी ने तोह सर बिस्टेर पर टिका दिए. कूल्हों के निचले हिस्से में रगड़ मारता वह बांस सा मोटा अंग छूट को ढीला करने लगा और उनके निचे की तरफ झुके दोनों खरबूजे पकड़ कर दबाता अर्जुन हर धक्के में कूल्हों से टकरा जाता. वह का लचीला मांस पानी में उठती तरंग सा हिलता तोह दोनों हे सिसकार उठते.

"दीदी.. सच कहु तोह मैं बड़ी गलती कर दी.. आठ.. आपके साथ बहोत पहले हे कर लेना चाहिए था... उम्म्म. आपके बूब्स कितने टाइट है और ये वागिना इतनी नरम और टाइट है के रुकने का दिल नहीं करता. लम्बी चुदाई और अर्जुन के ऐसे शरीर दबाने से भी प्रियंका दीदी थकी नहीं थी. वह फिर से पूरी गरम होने लगी थी. चिकने रस्ते में फंस के जाता वह बड़ा सा लुंड अब उन्हें प्यार देने वाला जादुई kaam-dand नजर आ रहा था.

"आह्हः.. उम्म्म.. अर्जुनंन.. जो सुख आज मिला है शायद पहले न मिलता.. आठ.. लेकिन मैं तोह तेरी हे हु, जब दिल करे जितना करे उतना प्यार करना.. आठ.. वैसे इन्हे बूब्स की जगह मुम्मे बोलै कर और वह तारा निचले part को छूट बोलती है तोह ाचा लगता है. ..आठ..", प्रियंका दीदी एकांत में बस खुलकर प्यार करना और वैसी हे बात चाहती थी. अर्जुन भी उनके निप्पल मसलता हुए पीठ को चूम रहा था. दोनों हे मंजिल के करीब आते जा रहे थे.

"ममम.. आह.. दीदी एक दिन आपके साथ बैक साइड से भी करूँगा. ये सपने भी याद रहेंगे अब मुझे. हहहहह..", इधर दीदी चौथी बार झड़ने से बिस्टेर पर गिरी और हुंकारता हुआ अर्जुन उनकी चिकनी पीठ, पहाड़ से उठान लिए कूल्हों और उसकी गहरी दरार को सफ़ेद गाढ़े वीर्य से टर्र करने लगा. 5-6 लम्बी धार मारने के बाद भी मोटी बुँदे कूल्हों पर टपकती रही. छूट के होंठ खुल चुके थे लेकिन अभी बिस्टेर पर आराम कर रहे थे. अर्जुन भी निर्वस्त्र हे दीदी के बराबर में पीठ के बल लेता सांस संभल रहा था. प्रियंका दीदी भी कोमल दीदी जैसी हिम्मतवाली निकली जो भयंकर दर्द भी जल्दी हे जज्ब कर गयी थी. कुछ क्षण बाद उन्होंने नीचे गाल टिकाये हे अर्जुन से कहा.

"अनल (गांड) के बारे में भी मुझे तारा ने बताया था, माधुरी का तोह मैं देख कर पहले वही करना चाहती थी. लेकिन जैसे आज मैंने ये स्पेशल बनाया है वैसे हे तुम स्पेशल बनाओगे तोह जब दिल करे मैं तैयार हु.", इतना सुनते हे अर्जुन ने उनके होंठो को चूमा और उठ कर बाथरूम से टोलिया और मग में पानी ले आया. घडी में 4 बज चुके थे और अगले 10 मिनट दीदी को ाचे से साफ़ करने के बाद एहतियात के लिए चची के दवाई के डब्बे से एक dard-niwarak गोली खिलने के बाद उनको बाहो में लिए लेट गया. दीदी के मॉटे दूध अब आराम से उसके सीने पर आधे ठीके थे.

"वैसे एक बात करू अगर तुम्हे बुरा न लगे तोह?", दीदी ने अर्जुन के ऊपर एक ब्याह डालते हुए खुद को चिपकते हुए पुछा. अर्जुन ने भी आगोश में लेते हुए हामी भरी.

"मुझे कभी भी किसी लड़के में इंटरेस्ट नहीं था क्योंकि यहाँ लोग प्यार से ज्यादा बस लड़की को एक शिकार की तरह देखते है, शेर समझते है न खुद को. लेकिन तुमने न वैसे कभी देखा था मुझे और न कभी फायदा उठाने की कोशिश की. लेकिन बात इस से भी कही अलग है जो मैं तुम्हे आज बताना चाहती हु.", दीदी छाती पर हाथ फिरते हुई बेफिक्र थी जिस्म के निर्वस्त्र होने से. अब अर्जुन से वह कैसे शर्म करती जो उनके दिल में समां चूका था.

"फिर?", अर्जुन ने पीठ सहलाते हुए कहा

"माँ न हमेशा तुम्हे सबसे ज्यादा प्यार करती रही है. बचपन में हम सब साथ हे होते थे गर्मी की छुट्टियों और त्यौहार में लेकिन मैं जहा कोमल के साथ होती थी वही आरती हमेशा तुम्हारे और Ritu-Alka के साथ. फिर कितने हे साल तुमसे मिलना न हुआ लेकिन इस घर में कोई दिन ऐसा न गया जब तुम्हारे नाम से दिन न शुरू हुआ हो और न ख़तम. माँ कितना हे बताती रहती थी क्योंकि वह नियम से तुम्हारा हाल लेने के बाद हे हमारी तरफ ध्यान देती थी. शुरू में अजीब लगता था लेकिन फिर मैं में तुम पक्के हे बैठ गए. इस बार वह आते हे तुम मेरी गॉड में बैठे तोह मुझे वह दिखा जो पहले कभी न दिखाई दिए था. यही लड़का था जो मुझे प्यार भी कर सकता था और मेरी इज्जत भी रख सकता था. तुम बेशक बाद में करीब आये लेकिन मैं तभी सोच बैठी थी की कभी हिम्मत करके मैं बोल हे दूंगी, बेशक ये पाप है लेकिन हम कोई वादा किये बिना प्यार कर सकते है.", दीदी ने पूरा इतिहास हे बयान कर के रख दिए था. अर्जुन को पता था के कृष्णा माँ की जान उसमे हे बस्ती है लेकिन यहाँ ऐसा माहौल था ये नहीं पता था.

"तोह आपको मिला आपका प्यार? शिकायत तोह नहीं है मुझसे?", अर्जुन ने उनकी बड़ी बड़ी आँखों में देख कर पुछा.

"शिकायत तुम्हे हो सकती है पूरी बात सुन्न कर."

"क्या?"

"आरती. वह तुमसे इतना प्यार करती है ये मुझे बस 3 दिन पहले हे पता चला. गलती से मैंने उसका नावेल खोल लिए जो शायद तुमने हे गिफ्ट दिए था. वह नावेल का कवर लगाए मोटी डायरी में क्या क्या लिख रही है पढ़ कर मुझे तोह अपना प्यार भी कम् लगने लगा है. तुम्हे पता है मैंने दिन में हे ये फैंसला क्यों किआ?"

"नहीं."

"रात में तुम उसकी सबसे बड़ी ख्वाहिश पूरी कर सको, उसको इस घर में उसके कमरे में वह प्यार दे कर जो वह हर पल खयालो में देखती रहती है. इंट्रोवर्ट है लेकिन मुझे इस बात की भी ख़ुशी है के आरती ने प्यार उस से हे किआ जो उसका ध्यान रखने के साथ कभी दुःख नहीं देगा. शादी का फैंसला तोह लेने का हक़ पापा और दादा जी को हे है लेकिन प्यार करने के लिए तोह परमिशन नहीं लेंगे. वह जो भी मांगे तुम बस दिल से देना और कोशिश करना के वह तुम्हारे साथ सोने का भी सपना पूरा कर सके. ध्यान रखना के ये वैसे हे चोरी छिपे हो जैसे वह चाहती है. दोनों को एक दूसरे से बचाये हुए.", अर्जुन इन दोनों का प्यार देख गदगद हो गया था. वादा करने के बाद वह हलकी फुलकी बातें करता उन्हें बाँहों में लिए हे सो गया. एक घंटा आराम करने के लिए बहोत था ऐसे हालात में.

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हरिद्वार से आने के बाद बिजेन्दर खुद हे आज मुस्कान को हॉस्टल से लेकर अपने गाँव वाली हवेली आया था. बबिता ने कहा था के मुस्कान भी छोटी बहिन है और उसको भी परिवार में शामिल रखना जरुरी है. यहाँ आने से पहले मुस्कान सुशीला से ताई कह कर हे हॉस्पिटल में मिल कर आई थी और अब 5 बजे वह घंटा भर सबसे मिलने के बाद अपनी बबिता दीदी के कमरे में थी जहा अक्षरा भी साथ बैठी थी तीनो के लिए गरम चाय लेकर.

"तोह कबूतरै मिलान आ हे गई. छोरी तू तोह घनी तेज लकड़ी ऋ.", बबिता हमेशा की तरह बिंदास लहजे में बात करती मुस्कान को अपने साथ लगाए बैठी थी और अक्षरा सामने बैठी मुस्कुरा रही थी.

"दीदी हिंदी में बात कर लिए करो कभी तोह. और आती क्यों नहीं, आपने जो बुलाया था.", मुस्कान भी झेंप रही थी जैसे बबिता बार बार उसको अपने से लगाती तोह वह जरुरत से बड़ा उभर उसके माध्यम से नाजुक चुके से रगड़ जाता. बबिता को ये असाधारण जिस्म अपनी माँ और बाप से विरासत में मिला था लेकिन माँ से 4 इंच लम्बी होने के साथ साथ वह वह शरीर के हर भाग में सुशीला से कही बड़ी और ठोस थी.

"डार्लिंग मैं तोह इंग्लिश में भी बात कर लू लेकिन तू तेरी कहानी सुना दे पहले फिर मैं बात करुँगी. और झूठ तोह बोलिये मैट, अक्षरा डार्लिंग भी गवाह है फ़ोन की आवाज में.", बबिता ने मुस्कान को आजाद करके चाय का कप उठाया और अक्षरा ने हिम्मत करके मुस्कान का हाथ थाम लिए.

"दीदी, आपने तोह सब सुना हे है फिर मैं क्या कहु?"

"मुस्कान, उस मुलाक़ात का चाहे तू कुछ मत बता लेकिन जो बाद में हुआ वह दीदी ने सुन्न न है. बता देगी तोह फायदे में रहेगी क्योंकि यहाँ भी वह तेरे और अर्जुन के लिए जगह जुगाड़ हे लेंगी.", अक्षरा के ऐसा कहने पर बबिता को थोड़ी हैरत हुई लेकिन वह खुश भी हुई की अक्षरा ने सही तीर चलाया है.

"रात 2 बजे वह आया और हमने प्यार किआ. फिर वह मेरे साथ थोड़ी देर सोया और 5 बजे से पहले चला गया.", मुस्कान ने नजरे झुकाये शरमाते हुए बस इतना हे कहा तोह बबिता ने चाय का घूँट भर के कप ट्रे में रख दिए.

"देख ले अक्षरा, या छोरी कितनी तेज है. मुस्कान डार्लिंग पता है तुम्हारे प्यार के बारे में और उतना हमने भी सुना. लेकिन विस्तार से वह अंतरंग पालो का बखान करो जैसे हमने सुने थे जब वह तुम्हारे दूध पी रहा था और तुम मस्ती में सिसक रही थी.", बबिता की ऐसी भाषा कोई और सुनता तोह हंस हंस के दोहरा हो जाता. जाटनी पर विशुद्ध हिंदी मजाक सी लग रही थी लेकिन बात ने असर कर हे दिए. मुस्कान सर झुकाने के बाद एक बार अक्षरा को देख फिर पानी का घूँट भर के बोली.

"वह बयान नहीं कर सकती दीदी. सोमेथिंग्स अरे बेटर िफ़ वे फील थम एंड थे नेवर गेट जस्टीफ़ाइड विथ एक्सप्लनेशन. वर्ड्स कहा से लौ मैं आप हे बताओ. अर्जुन इस गिफ्टेड लवर. पता है वह प्यार करता है तोह आप दुनिया से अलग हो जाते हो. हिज सलीगत टच कैन मेक यू स्पेशल. थे मोरे ी हैवे ऑफ़ हिम, थे मोरे ी चरावे अबाउट हिम. लेकिन अगर वह इतना ाचा प्यार करता है न तोह इसकी सजा भी मिलती है. पूरी बॉडी के साथ हे वह दिल पर नाम लिखने के बाद जब पेनेत्रते करता है न तोह हे टीयर्स यू ईंटो तवो. इतना लम्बा है उसका और इतना मोटा.", आधी अंग्रेजी और आधी हिंदी में अपनी कहानी बताती मुस्कान जैसे हर लम्हे को दोहराने से परहेज कर रही थी. कलाई से 2 इंच नीचे लकीर बनाने के साथ हे हाथ के उंगलियों से एक बड़ा 'स' बनती वह अर्जुन के अंग की जानकारी दे रही थी.

"ाचा जी. तू तोह इंग्लैंड रही है और सुना है के हब्शी लोगो के ऐसे बड़े होते है. अर्जुन ने तोह तेरा सत्यानाश कर दिए होगा अगर उसका थोड़ा भी इसके पास हुआ जितना बढ़ा चढ़ा के तू बता रही है.", बबिता के ऐसा कहने पर मुस्कान का तापमान थोड़ा बढ़ गया.

"मैंने इंग्लैंड में जैसे पंत उतार कर Kaale-Gore लुंड देखे है न दीदी? कैसी बात करती हो आप? एवरेज पेनिस का पता है मुझे और वह भी ऐसा साइज कॉमन नहीं है जितनी नॉलेज है मुझे. मैंने अभी जितना बताया वह मेरे अंदर गया था लेकिन फिर भी उसका थोड़ा बहार था क्योंकि वह प्यार से कर रहा था और जितना काम दर्द दे सकता था दिए लेकिन फिर भी 2 दिन लगे मुझे ठीक होने में. अक्षरा दीदी जैसी तोह कन्फर्म बेहोश हे हो जाये लेकिन आप मजबूत भी हो और ख़ास शरीर वाली. उस घोड़े के बराबर हो आप लेकिन जान तोह आपकी भी निकल हे देगा एक बार.", मुस्कान ने बिना सोचे हे ये कहा था, शरीर के अनुपात की अपनी समझ से.

"ओह hello, वागिना इस एनफ फ्लेक्सिबल तो टेक अन्य साइज ऑफ़ ह्यूमन पेनिस बिकॉज़ पेनिस इस नथिंग इन कपरिसों विथ थे बेबी व्हिच चामे आउट ऑफ़ तहत होल. हाँ दर्द होगा हे पहली बार कुछ करने में, ऊँगली से भी होता है और नार्मल पेनिस से भी.", अक्षरा ने जैसे उदहारण दिए न चाहते हुए भी मुस्कान और बबिता के चेहरे पर हंसी आ गयी.

"मेरी प्यारी दीदी. प्रेगनेंसी में जो दर्द होता है न वह तोह आप अभी सोचो भी मत. लेकिन मैं शर्त लगाती हु की अर्जुन का आधा आपने ले लिए तोह जो बोलोगी मैं करुँगी, बस रोना नहीं और चीखना भी मैट. बेशक पहले किसी और से ढीली करवा लेना.", मुस्कान ने सीधा सीधा चुनौती हे दे डाली इस गोरी पतली नाजुक सी अक्षरा का.

"मंजूर है और हारने की सूरत में तू अर्जुन के साथ सेक्स करेगी पूरी रात और हर बार वह अंदर फारिग होगा.", अक्षरा ने अजीब हे शर्त रख दी थी. बबिता जो इतनी देर से खामोश थी वह हे बोल पड़ी.

"कोई शरत नहीं है ऐसी. बात ऐसी है मुस्कान, अक्षरा न छुड़ेगी अर्जुन से और मैं जान न छह रही थी क्योंकि अर्जुन के साथ मुझे अपनी ज़िन्दगी का पहला मिलान करना है. थैंक यू समझ ले चाहे मेरी तरफ से उसको. लेकिन तेरे से ये जान न था के वह किसी काबिल भी है या बचा हे है. हाँ तेरी मदद मैं पूरी करुँगी अर्जुन के साथ यहाँ सम्बन्ध बनाने में. चाहे मेरी शादी की रात भी तू उसके साथ मजे करने चाहे तोह वह भी कर दूंगी.", बबिता ने बात संभाली तोह अक्षरा ने नजरे नीची कर ली पता नहीं किस वजह से.

"अगर ऐसा है तोह वह आपको निराश नहीं करेगा लेकिन अक्षरा दीदी ने जो भी कहा वह मैं खुद हे चाहती हु. यहाँ से अगले साल मैंने जाना हे है, थोड़ा जल्दी भी चली गयी तोह कोई बात नहीं लेकिन अर्जुन का प्यार ज़िन्दगी भर के लिए साथ लेकर जरूर जाउंगी. दीदी उसके साथ करे या न करे.", मुस्कान ने अक्षरा का हाथ पकड़ कर खेद जताया अपनी बात के लिए.

"तेरी ये बहिन भी इतनी कमजोर है मुस्कान, अब मेरे ऊपर नाम लिखेगा तोह अर्जुन हे लिखेगा. चाहे वह एक बार हे क्यों न हो लेकिन पहला वही होगा. जुबान रही तेरे साथ और देखती हु के कितना जोर है उसमे जो मेरो आँखों से पानी निकाल सके. बबिता दीदी ने मंगलवार को मिलना है उस से, उस दिन तेरे लिए भी मैं इंतजाम कर दूंगी लेकिन फिर अर्जुन इधर आएगा या मैं उसके पास जाउंगी ये नहीं पता लेकिन वही करुँगी जो कहा है.", मुस्कान ने ठंडी छाए एक घूँट में हे ख़तम करते हुए कप रखा और बबिता गहरी सांस लेते हुए बस डेक्टि रही.

"थाम दोनुआ ने सोच लिए हो तोह ेब मेरी भी खुजली बंद करवा डीओ. देखु यो अर्जुन कितना बड़ा खिलाडी है जो मुस्कान गीत गावे है आरर तू सबकुछ डाव पे लगाए है.", बबिता की बात पर अक्षरा के साथ हे मुस्कान भी झेंप गयी. लेकिन माहौल को हल्का करते हुए मुस्कान ने हे बात कही.

"दीदी पता नहीं अर्जुन आपके साथ कैसे करेगा लेकिन इतना बोल सकती हु की अगर उसने किआ तोह वह तारीफ जरूर करेगा आपकी. आपका साइज इनक्रेडिबल है और इतना तोह मैंने किसी इंग्लिश लेडी का भी नहीं देखा जो आपके aas-pas हो उम्र में और फिटनेस में. आपकी बॉडी नार्मल नहीं है और अर्जुन ये जरूर ऑब्सेर्वे करेगा. पता नहीं कैसे ब्रा मिलती होगी आपके साइज की और इतनी फिट भी हो आप."

"रेहड़ी पे न मिलती रे मेरे नाप की अंगिया. या देख जरा पूरा तिरपाल हे है वह भी शहर में छोरी काम करे है मार्किट में तोह उस से ख़ास तैयार करवा के लौ हु.", बबिता ने मुस्कुराते हुए ये बड़ा सा कमीज उठा कर जैसे तैसे वह सफ़ेद ब्रा बहार निकली तोह एक पल के लिए अक्षरा के भी आँखों के सामने वह दुर्लभ और असाधारण बोब्बे आ गए जिन्हे मुस्कान हैरत से देख रही थी. छोटे से गुलाबी निप्पल तोह दिखाई दे रहे थे लेकिन इतना व्यास था उनका की मुस्कान स्तब्ध रह गयी थी. ब्रा हाथ में पकड़ने के बावजूद वह नजर न हटा पायी उन अकड़े हुए मॉटे तरबूज से चुचो से. एक चुका 4 हाथ में समाये और ऊपर से उनकी सख्ती भी भरपूर होने के साथ छोटे निप्पल बता रहे थे के बबिता उन्हें मसलती नहीं थी.

"देखे के है, सबके होव है. मेरे बड़े है बस लेकिन साइज पढ़ ले ब्रा का आरर यु देख के आड़े इलास्टिक लगाना पड़े है.", बबिता को अपने नग्न होने की कोई चिंता नहीं थी लेकिन मुस्कान ने जिज्ञासा से ऊँगली लगते हुए जैसे देखना चाहा के वह असली हे है.

"मुँह में ले लिओ उसके करने के बाद. जो कहु हु वह देख ले.", बबिता ने होश में लाते हुए कहा तोह दोनों हे उस अत्यधिक बड़ी ब्रा को देखने लगी. हक्क के बराबर दोनों तरफ हे 2-2 इंच कपडा अतिरिक्त लगा था. साइज था 44-ह जो एक विदेशी साधारण रंग की ब्रा पर लिखा देख दोनों हे चौंक गयी. अक्षरा ने चुके 2 बार पहले भी देखे थे लेकिन अकार आज पता लगा था.

"मेरे तोह 34-स है दीदी.", मुस्कान ने हैरत से जवाब दिए.

"मेरे तोह तेरे से भी काम है, 32-ा. बबिता दीदी का साइज तोह आर्डर पर मिलता है, जाने कैसे झेलेगा गोलू.", अक्षरा ने ऐसा कहा तोह बबिता भड़क उठी.

"चुके न चूसती मैं उस गोलू को. अर्जुन के बाद मुस्कान का दिल करे तोह चूँग लेगी लेकिन यहाँ हक़ उसका रहेगा जो पहली बार मुँह लगाएगा और वह दिल से अर्जुन हे है. हलवाई की कढ़ाई कोन्या के हर कुत्ता मुँह मार ले बबिता के खजाने पे. गोलू प्यार करे है तोह नीचे कुटाई कर लेगा लेकिन ऊपर बिलकुल नहीं."

"दीदी, अर्जुन ने अगर आपका पिछले हिस्सा देख लिए तोह वह पक्का वह भी करेगा.", मुस्कान ने ये बात सिर्फ मजे लेने के लिए कही थी और उसको जरा भी नहीं पता था के अर्जुन ऐसे हे बड़े तोहफे के लिए तैयार रहता है.

"बावली है. गांड न मरवाती मैं. वैसे बोलेगा तोह कोई न, इस बहाने aata-jata रहेगा तोह यु भी उसके नाम. तू तेरी टेंशन ले, खिलाडी है न तोह तेरी भी फड़कती होगी. मारे बिना तोह फेर वह तेरी भी रहे कोणी. अक्षरा की बच सके है मांस कोणी.", बबिता ने ब्रा पहन ली और तीनो मस्ती भरी बातें करती अपने अपने दुःख भूल चुकी थी. उन्हें आस थी की अर्जुन हे उनकी उजड़ी दुनिया संवार देगा. लेकिन वह तोह nang-dhadang सा बस अपनी प्यारी प्रियंका से चिपका सो रहा था उनसे दूर.
 
अपडेट 107

खेल-3


शाम को आँख पौने 6 बजे खुली तोह अर्जुन ने खुद को चादर से ढाका पाया. प्रियंका दीदी का इधर कोई निशाँ न था और कमरा भी ाचे से बंद था. वह उठ कर सीधा बाथरूम चला गया और कोई 10 मिनट बाद हे दरवाजे बजने की आवाज पर वह तैयार हो कर बाथरूम से निकला तोह सामने चटख सलवार कमीज में आरती दीदी के साथ हे गुरदीप कौर भी कड़ी अर्जुन का हे इन्तजार कर रही थी.

"शुक्र है तैयार हो गए हो. दीदी भी रेडी है और बस तुम्हारा हे इन्तजार हो रहा है.", आरती दीदी ने तोह अर्जुन को बस नजर भर देखा लेकिन गुरदीप की आँखे बस अर्जुन पर जम्म सी गयी थी. वह भी सफ़ेद बिंदी वाले लाल कमीज और सफ़ेद कड़ी सलवार में यौवन से लड़ी पूरी सरदारनी के रूप में तैयार थी. लम्बे बाल अब एक मोटी छोटी के साथ सलीके से रबर में बंधे थे. अर्जुन ने कुछ सोच कर अपना दिमाग उस पर से हटाया और जेब में purse-rumaal रखने के बाद कलाई पर घडी (वाच) बाँध कर उनके साथ हे बहार चला आया.

"तोह इन्तजार ख़तम और चलिए देखे आपका शहर भी.", अर्जुन के इतना कहते हे गुरदीप ने एक अदा से उसको देखा.

"हाँ, हमको भी मजा आएगा दिखने में. ाचे से देखना और फिर बताना के क्या पसंद आया. वैसे मेहमान की हम पूरी खातिर करते है.", अब गुरदीप जाने किस तरह बात कह रही थी. उसकी ऐसी बात के 2 मतलब तोह साफ़ निकलते थे लेकिन क्या पता ये भोली रेडियो तीसरी तरह कह रही हो. अर्जुन बस मुस्कुराते हुए बहार आँगन में आया तोह आरती दीदी ने हॉल के साथ बहार की लाइट भी जगा दी, संध्या का वक़्त देख कर. बेशक रौशनी थी लेकिन आने में समय लगने हे वाला था. टाला लगा कर वह गलियारे की तरफ अर्जुन को लेकर आ गयी.

"वाह.", अर्जुन ने प्रियंका दीदी को ये मोटरसाइकिल चमकते देखा तोह मुँह से बस इतना हे निकला. नीले रंग की ये यामाहा रद350 मोटरसाइकिल अपने आप में एक मिसाल थी. अर्जुन ने ऐसी हे एक अपने बोर्डिंग स्कूल में देखि थी लेकिन साक्षात् अपने घर में देख कर वह उसकी और खिंचा चल दिए. प्रियंका दीदी उसको साफ़ करने के बाद हाथ धो कर तोलिये से पांच रही थी. उनसे भी अर्जुन की ऐसी उत्सुकता छुपी न रह सकीय.

"ये है तोह बड़े papa(Shankar जी) की लेकिन उन्होंने पापा को गिफ्ट कर दी थी. वह भी इसको बहोत काम निकलते है लेकिन ये उनके दिल के बहोत करीब है.", प्रियंका दीदी के ऐसा कहने पर अर्जुन ने ख़ुशी से उन्हें देखा और फिर वापिस किसी छोटे बचे की तरह हाथ लगते हुए इस रफ़्तार की रानी को निहारने लगा.

"ये अब मिलती नहीं दीदी लेकिन ये मुझे बहोत पसंद है. चाचा ने तोह इसको बिलकुल नया हे रखा हुआ है.", पल में हे वह उस 2 सीलेंसर और बड़े इंजन वाली मोटरसाइकिल की सीट पर बैठ गया. पेट्रोल टैंक हिलने से मालूम चल गया के वह आधे से ज्यादा भरा है और अगले हे पल एक किक में वह 'vroom-vroom' की आवाज गूँज उठी. गेट के बहार मेहरून काइनेटिक चालू किये गुरदीप के साथ आरती दीदी भी इन्तजार कर रही थी और उन्हें और देरी न करवाते अर्जुन ने पंजा दबाते हुए गियर दाल दिए.

"जाँच रहे हो इस्पे.", आरती दीदी के इतना कहने पर अर्जुन मुस्कुराया और प्रियंका दीदी संभल कर पीछे बैठ गयी. अर्जुन का ध्यान अब कही दीदी पर आया था जब चारो लोग गली से बहार चौड़ी सड़क पर आ गए.

"आप ठीक है न दीदी? वैसे मुझे नहीं लगता के आपकी हालत बेहतर है.", मोटरसाइकिल उनके आगे चलती काइनेटिक से 10 गज़ दुरी रखे थी.

"मैं बिलकुल ठीक हु अर्जुन, वह बस हलकी सूजन है तोह तइस आपस में टच होने पर प्रॉब्लम होती है. परेशां मत हो ज्यादा.", उनके कहने पर अर्जुन ने सामने देखा तोह आरती दीदी जहा पीछे मुद मुद कर अर्जुन को देख रही थी वही गुरदीप भी शीशे से उस पर नजर घुमा रही थी. शाम को इस मार्किट और सड़क पर ाची gehma-gehmi और भीड़ दिखाई दे रही थी. हर तरफ khaane-peene की रेहड़ी, स्टाल और रेस्ट्रा नजर आ रहे थे जहा जवान क्या और महिलाये क्या सब khaane-kharidne का मजा ले रहे थे. गुरदीप ने इस बड़ी पार्किंग के अंदर काइनेटिक घुमाई और पीछे हे अर्जुन भी पहुंच गया.

"ये यहाँ के सबसे मशहूर gol-gappe वाला है. Choor-moor गोलगप्पे, khatte-meethe पानी वाले या फिर दही चाट वाले. सब एक से बढ़ कर एक है यहाँ.", प्रियंका दीदी एक तरफ और गुरदीप अर्जुन के दूसरी तरफ थी लेकिन hansti-khelti उस सरदारनी ने अर्जुन की कलाई थाम ली. ये स्टाल भी रौनक से भरी थी लेकिन गुरदीप ने तुरंत हे आर्डर दिए.

"2 प्लेट chur-mur, एकक चाट बाकी पानी ाले अस्सी बाद विच खाने है.", स्टाल पर 4 लोग पहले हे 20 को संभल रहे थे और गुरदीप का आर्डर सुनते हे एक लड़के ने बड़ी रफ़्तार से तैयार करने शुरू कर दिए. आरती दीदी भी बराबर आ गयी थी और अर्जुन ध्यान से देख रहा था उस लड़के को. खली gol-gappe में उबले aalu-pyaaj और चने का मसाला भरने के बाद सेव और 2-3 तरह की चुटनी से सजता वह दूसरी प्लेट में भी वैसे हे 6 gol-gappe लगाने लगा. देखते हे देखते 3 प्लेट एक गोल ऊँची टेबल पर सज चुकी थी.

"देख क्या रहे हो, शुरू हो जाओ. पंजाब में न शर्म नहीं करते और खाने से पीछे नहीं hat-te.", गुरदीप की ऐस प्यारी हंसी देख अर्जुन भी आरती दीदी के बराबर आ गया और उन्होंने बिना किसी की परवाह के खुद हे चाट भरा गोलगप्पा अर्जुन को खिलाया. प्रियंका दीदी को भी ये पसंद थे और अब अर्जुन भी जान गया था के ये स्वाद कैसे इतना अलग और बेहतर है. यहाँ गुरदीप और प्रियंका दीदी ने अपनी अपनी प्लेट पल में हे साफ़ कर दी थी बिना अर्जुन को choor-moor का स्वाद चाकहए. लेकिन अर्जुन ने जो देखा तोह सर चक्र गया. यहाँ आरती और उसने अभी तक 2-2 हे खाये थे, गुरदीप अपने साथ हे दीदी के लिए एक प्लेट चाट ले आई थी. इस बार वह दोनों एक साथ खा रही थी.

"तुम लोग न kachue(Tortoise) हो. देख प्रियंका जरा इनको, ऐसे तोह कल तक हे सब टास्ते ले पाएंगे.", अर्जुन के साथ आरती दीदी के चेहरे पर भी हंसी आ गयी और उसके बाद भी गुरदीप, प्रियंका दीदी ने पानी वाले भी 5-5 खा हे लिए और अर्जुन ने आरती दीदी के कहने पर स्वाद के लिए के.

"ये इंसान हे है न?", अर्जुन ने आरती दीदी के कान में कहा तोह वह हंसती हुई अर्जुन को वैसे हे जवाब देने लगी.

"सुन्न लेगी तोह भड़क जाएगी. ये और दीदी अभी शर्म कर रहे है इतना समझ लो तुम. बाकी आगे आगे देखो क्या होता है.", आरती दीदी की बात सुन्न कर अर्जुन ने पैसे दिए और इस बार वह उनका हाथ थामे बाकी दोनों के पीछे चल रहा था.

"मैडम जी अब अगला स्टॉप कोनसा है हमारा?", अर्जुन ने जब देखा की गुरदीप पैदल हे उन्हें आगे लिए जा रही है तोह कुछ देर वह उसके हिलते कूल्हों को निहारता रहा लेकिन आरती दीदी का ध्यान आते हे पूछ लिए के वह कहा जा रहे है.

"तुम्हारी वजह से लेट हुए है तोह सॉरी गिफ्ट दिलाओगे या नहीं? वैसे भी मुझे पर्स खाली करवाना आता है.", गुरदीप ने आँख मार कर हँसते हुए जवाब दिए और वह इन्हे ले कर इस 4 मंजिला ईमारत के सामने आ रुकी. एक भूमिगत जहा सीढिया नीचे जा रही थी और बाकी तीनो उसके ऊपर बानी थी. शीशे की बानी हर मंजिल जगमग थी शाम के इस हसीं समां में. अर्जुन ख़ुशी से उनके साथ अंदर आया तोह यहाँ ladke-ladkiyo के आधुनिक कपड़ो के साथ हे जूते, बेल्ट, पर्स आदि सजे थे. सभी एक से बढ़ कर एक.

"हम यहाँ क्यों आये hai?",Arjun देख भी रहा था के ऐसा सब सामान तोह उसके शहर में मिलता हे नहीं और थोड़ा बहोत मिलता भी होगा लेकिन इतने डिज़ाइन एक हे जगह कभी नहीं देखे थे.

"तुम्हे सफ़ेद शर्ट पसंद है इसलिए आये है.", आरती दीदी ने इतना बता कर काउंटर के दूसरी तरफ खड़े लड़के से कहा.

"भैया, इनके साइज की लिनन में शर्ट दिखा दीजिये पुरे वाइट.", लड़के ने अर्जुन का माप लिए और आकर्षक डब्बो को जांचने के बाद एक डब्बा काउंटर पर रख दिए. आरती दीदी शायद पहले हे मैं बना चुकी थी ऐसा करने का. डब्बा बस हल्का सा खोल कर एक तरफ रख दिए.

"अब एक विथाउट प्लेट्स कैमल ब्राउन पंत, ऐसे फिटिंग में.", दिखने के लिए तंगी ये पतलून भी कुछ कम् नहीं थी. लड़के ने तुरंत हे 3-4 डब्बे सामने रख दिए, ऊपर लगे पारदर्शी प्लास्टिक से अपनी मर्जी का रंग पसंद किआ और वह भी एक तरफ रखते हुए आगे बात की.

"इसकी अल्टरेशन अभी करवा दीजियेगा अगर लेंथ इशू हो. और आपने ड्रेस देख लिए है तोह विथाउट लास नैरो पॉइंट शूज भी, सोले बिलकुल काम. वैसी हे बेल्ट लेकिन पिन वाली.", आरती दीदी ने जैसे एक पूरी रूपरेखा हे बना राखी थी की अर्जुन को वह क्या उपहार देने वाली है या कैसे देखना चाहती है.

"होर कुछ मैडम जी? वैसे सर दी हाइट चंगी है इस करके अल्टरेशन दी कोई लोड नई. शूज डा स्टॉक कल हे आया है और तुहाडी चॉइस मुताबिक हे हैगा.", लड़के को भी जैसे बहोत समझ थी फैशन की. खुद भी वह ाचे से तैयार था और साथ हे कान में सोने की बलि लड़के पर जाँच रही थी. जल्द हे आरती दीदी ने जूते भी पसंद कर लिए, बेल्ट के साथ.

"अब ये orange-white शर्ट, चेक वाली और इसके साथ जो बहार डिस्प्ले पर ग्रीन जीन्स है वह और आल स्टार वाइट कलर के.", प्रियंका दीदी ने सब एक हे लाइन में बता दिए. अर्जुन हैरत में था के कहा तोह ये तीनो उसको घूमने, खाने पीने के लिए लेके आई थी और सबको शॉपिंग करवाने वाले अर्जुन को आज वह शॉपिंग करवा रही थी. हमेशा हिंदुस्तानी परिधान या ज्यादा से ज्यादा jeans-top पहन लेनी वाली उसकी बड़ी बहने विदेशी ब्रांड और कपड़ो से ाचे से वाकिफ थी. जल्द हे सबकुछ अर्जुन के साइज का काउंटर पर आ चूका था.

"अब हम बस करे मेरे लिए खरीदना? आप लोग मुझे शहर दिखने लाइ थी और देखो ये मैडम अपनी शॉपिंग का बोल कर मुझे यहाँ ले आई.", गुरदीप को घूर कर देखने से वह शर्माती हुई दूसरी तरफ देखने लगी.

"हाँ हाँ हो गया. तुम यही रुको आरती के साथ जरा मैं ऊपर हो कर आती हु.", प्रियंका दीदी गुरदीप को लिए ऊपर मंजिल पर चली गयी और अब अर्जुन आरती दीदी की तरफ नाराजगी से देखने लगा.

"गुस्सा क्यों होते हो? देखो ये हम वही देने वाले थे तुम्हारे बर्थडे प्रेजेंट के रूप में, बिलेटेड सही लेकिन फिर पापा से बात हुई तोह उन्होंने कहा के अर्जुन को जरा यहाँ की मार्किट ले जाना. मैंने और दीदी ने ये ड्रेस एक मैगज़ीन से तुम्हारे लिए पसंद किये. मतलब शामे वैसे नहीं है लेकिन हमको ाचा लगगे अगर तुम इन्हे पहनोगे. वैसे अब शादी के टाइम ठीक रहेंगी.", आरती दीदी अपनी सफाई देते वक़्त बस एक बार अर्जुन की आँखों में देखा था और बाकी बात नजरे झुकाये हे पूरी की. अर्जुन समझता था उनकी आँखों में छाए प्यार को.

"ाची बात है और मैं गुस्सा नहीं हु बस मैं कभी अकेले के लिए कपडे नहीं लेता.", अर्जुन ने प्यार से जवाब दिए

"मुझे दिला दो मैं मन नहीं करुँगी.", एकाएक दीदी के प्यारे चेहरे पर जैसे ये शरारत आ गयी थी.

"सोच लीजिये."

"सामने से तोह बोल रही हु और मेरा भी दिल है अगर तुम्हारी कुछ ख़ास पसंद है तोह.", दोनों हे इस वक़्त काउंटर से दूर इस गद्दी वाली टेबल पर बैठे थे. आवाज धीमी और शोखी से भरपूर थी. जैसे 2 प्रेमी अपनी ख़ास गुफ्तगू में लगे हो, प्यार भरी चुहल और मस्ती करते.

"ऐसा है तोह मैंने कुछ देखा था अंदर आने से पहले.", अर्जुन की आँखों में जो भी था वह जैसे आरती को भी पता था.

"जहा तुम्हारी नजर थी वही मेरी भी थी. इसलिए मैंने पूछ हे लिए क्योंकि तुम जैसे भी हो लेकिन खुद ऐसा नहीं करने वाले थे. और वैसा कुछ मैंने एक रोमांटिक नावेल में पढ़ा था, फोटो नहीं होती लेकिन जैसा बताया था वह वैसी हे थी."

"लेना आपको पड़ेगा.", अर्जुन ने एक बार बहार की तरफ नजर दौड़ाई जैसे प्रियंका दीदी को देख रहा हो.

"वैसे प्रेजेंट देने वाले को लेना चाहिए. और दीदी को 10 मिनट लगेंगे अभी. इतना कर सकती हु की साथ चल पड़ूँगी.", आरती दीदी की बात और साथ आना हे बहोत था अर्जुन के लिए. वह तुरंत खड़ा हो गया और दीदी भी.

"नीचे जा कर अभी आ रहे है भैया.", दीदी ने इतना कहा और लड़के ने हाँ में सर हिला दिए.

"जी मैडम बेफिक्र जाओ तुस्सी. मैं ेन्नी देर विच यह सब पैक कर डंडा है."

"भैया, बॉक्स के बिना कर देना कपड़ो को. जगह काम लेंगे.", बहार निकलने से पहले आरती दीदी ने हिदायत दी और फिर दोनों हे निचले भाग की तरफ आ गए. अर्जुन की धड़कन तेज चल रही थी. शीशे पर अंदर की तरफ से हे महिलाओ के महंगे अधोवस्त्र लटक रहे थे. अंदर आते हे काउंटर के पीछे कड़ी आधुनिक सी युवती को देख अर्जुन ठिठक गया.

"डिस्प्ले वाली ड्रेस अवेलेबल है आपके पास?", आरती दीदी, जो हमेशा शर्माती रहने वाली अंतर्मुखी लड़की थी उन्होंने हे बात की. ये युवती शिष्टाचार से मुस्कुराई और एक बार अर्जुन की तरफ देखने के बाद जैसे समझ गयी की ये दोनों प्रेमी युगल है.

"वैसा जरूर मिल जायेगा लेकिन 100% शामे मुश्किल है. कंपनी का अड़ पोस्टर है जो यूरोप मार्किट में हे अभी अवेलेबल है लेकिन कुछ सिमिलर सैम्पल्स हैं हमारे पास. वैसे यहाँ हमारी स्टोरेज और सैम्पल्स रहती है, सेकंड फ्लोर पर आप और भी ओप्तिओंस देख सकेंगी और तरय भी कर सकती है.", युवती ने अपनी बात समझे तोह अर्जुन का मुँह लटक गया. दूसरी मंज़िल पर तोह प्रियंका दीदी गयी हुई थी.

"तरय नहीं करना है और वह कम्फर्टेबले नहीं रहेगा. पॉसिबल हो तोह आप यही से दे दीजिये, कलर दिखा कर बस पैक और बिल. साइज 34-स, 28 एंड 36.", उन्होंने अपना शारीरिक माप अर्जुन की तरफ देखे बिना बोल दिए. आरती दीदी की बात वह लड़की भी समझ गयी.

"मिस यहाँ म, ल, सल और स्क्सल साइज में फोर पीेछे सेट रहेगा. ये कलर्स अवेलेबल है और आपको ल साइज फिट आएगा. पंजाब के हिसाब से 'स' साइज तोह हमारे लिए वास्ते हे है.", मुस्कुराते हुए जैसे वह युवती इनके मजे भी ले रही थी. एक रंगीन कागज आरती दीदी की तरफ करते हुए उसने उपलब्ध रंग चित्र के साथ दिखाए तोह उन्होंने तुरंत अपनी पसंद पर ऊँगली रख दी.

"एक मिनट दीजिये बस.", वह लड़की अंदर एक तरफ चली गयी और अर्जुन मुस्कुराता हुआ दीदी को देखने लगा.

"ऐसे मत देखो. पता है मेरी हालत क्या हो रही है इस वक़्त?", आरती दीदी के चेहरे पर आया लाल रंग बता रहा था उनकी बात का मतलब. हिम्मत दिखाना हे बहोत बड़ी बात थी और अर्जुन इस बात से खुश भी था. जल्द हे वह युवती अपने साथ ये गट्टे का मिठाई जैसा डिब्बा ले कर चली आई. एक ाचे प्लास्टिके में पैक करने के बाद ऊपर स्टेपलर से बंद करते हुए उसने वह पैकेट दीदी के सामने रख दिए.

"हाउ मच?", अर्जुन इस दौरान बस अभी बोलै था.

"2500 ओनली.", दाम सुनते हे अर्जुन ने इस बार पर्स की जगह 500 की आधी गद्दी जेब से निकल कर 5 नोट उनकी तरफ कर दिए. शुक्रिया कहते हुए लड़की ने एक मचिनी रसीद भी उन्हें पकड़ा दी.

"आपके पास कभी दिन में समय हो तोह आप आराम से कलेक्शन देख सकती है. वीक डेज पर 12 से 4 आपको दिक्कत नहीं आएगी.", आरती दीदी ने पैकेट लिए तोह एक मुस्कान के साथ इस युवती ने उन्हें सही समय बताया यहाँ आने का तोह 'थैंक यू' कहते दोनों हे बहार निकल आये.

"ओह बाप रे. कहा फांस्वा दिए था तुमने?", आरती दीदी तोह बहार निकलते हे लम्बी सांसें लेने लगी. बहोत बड़ा काम करके आये थे न दोनों.

"आप तोह मेरी उम्मीद से ज्यादा हिम्मतवाली निकली. चलो अब बाकी सबको देख ले फिर आपकी पड़ोसन ने अगली मार्किट भी लेके चलना है हमे.", अर्जुन के इतना कहते हे दोनों पहले वाली जगह आये तोह पीछे हे 2-3 पैकेट लिए गुरदीप के साथ प्रियंका दीदी भी अंदर आ गयी. दोनों के चेहरे पर अलग हे ख़ुशी थी.

"कितना हुआ इन सबका?", अर्जुन के इतना पूछते हे प्रियंका दीदी ने उसको एक तरफ कर दिए.

"यहाँ कोई ऐसी बात मत करना जो बुरी लगे. दादा जी और पापा से हम दोनों को हे पैसे मिले है. तुम्हे अगर कुछ दिलाना भी हो तोह वह दिन आज के बाद.", दीदी ने इतना कहते हे अपना mahila-purse काउंटर पर रख दिए. वह लड़का जानता था के हर मंजिल के सामान का बिल वही होता है तोह यहाँ सिर्फ अर्जुन के 2 जोड़ी कपडे और जूते का हे बिल देना है. ध्यान से एक कागज़ पर सभी दाम लिखने के बाद उसने एक जगह 50% घटाए और 2 जगह 30%.

"डिस्काउंट छड्ड के जी टोटल होये 8750. तुस्सी 8700 दे डॉ.", अर्जुन ने भी वह पर्ची देखि तोह चमड़े के जूते और बेल्ट को छोड़ कर सभी पर रियायत थी. बिना रियायत के तोह सब सामान की कीमत 12000 के पर जा रही थी. प्रियंका दीदी ने जिन्न कर पूरे पैसे दिए और आरती के साथ अर्जुन का सामान उठा लिए, जिसमे गुरदीप ने भी मदद की.

"अब कहा चलना है?", अर्जुन ने बहार निकलते हुए सबकी तरफ देखते हुए कहा और फिर से जवाब गुरदीप ने हे दिए.

"बड़ी मार्किट चलते है अब. वह थोड़ा तफरी मारेंगे और फिर सिटी होटल में खाना. 8 तोह बजने हे वाले है और फिर आराम से घर चल कर गप्पे लड़ाएंगे.", गुरदीप की बात सुन्न कर प्रियंका दीदी तोह बस मुस्कुरा उठी लेकिन आरती ने पूछ हे लिए.

"आज तेरा भाई घर नहीं है क्या? और aunty-uncle को क्या बोलै है?"

"वह कमीना आजकल रात भर जाने कहा आवारागर्दी करता फिरता है, बेबे ने जब उसको कुछ नई कहा तोह फिर मैं तोह बोल कर आई हु. एक दिवार है हमारी और वैसे भी मैंने पहले हे बोल दिए था के आज पिंकी के साथ सोने वाली हु.", दीदी का ये नाम सुन्न कर अर्जुन के चेहरे पर हंसी आ गयी. सुबह वह लड़के यही नाम ले रहे थे.

"अब न मैं 10 साल की नहीं जो तू यही नाम लेती रहती है. सो जइयो मेरे साथ लेकिन पिंकी मत बोलै कर.", दीदी के ऐसा कहते हुए अर्जुन उनके hav-bhav भी देख रहा था. चेहरे पर हलकी शर्म जैसे अर्जुन की उपस्थिति की वजह से थे.

"हाँ चल ठीक है नहीं बोलूंगी पिंकी लेकिन तू मुझे डीपी हे बुलाया कर, मुझे ाचा लगता है.", गुरदीप ने इस बार काइनेटिक के पीछे प्रियंका दीदी को हे बिठा लिए था. कुछ सामान आगे टांग लिए था और बाकी प्रियंका दीदी और आरती ने पीछे बैठ कर पकड़ रखा था. वो दोनों हे बातें करती आगे चलने लगी और Arjun-Aarti उनके पीछे कुछ दुरी पर. मॉडल टाउन से आगे निकलते हे आरती दीदी थोड़ा बेफिक्र होती ाचे से अर्जुन से सत् गयी.

"ाचा जी.", अर्जुन ने हँसते हुए इतना हे कहा.

"अब यहाँ हम घर से दूर है न. वैसे तुम सामने हे देख कर चलाओ, सिंगल रोड है.", आरती दीदी चतुराई से बात बदल कर वैसे हे बैठी मुस्कुराती रही. शहर सचमुच khula-dula था, मार्किट बड़ी, सड़के चुआड़ी और भरपूर रौशनी सड़क के दोनों हे तरफ थी. अर्जुन देख रहा था के यहाँ हर तरह की car-jeep और कुछ इम्पोर्टेड मोटरसाइकिल भी थे. आगे एक तरफ मुड़ने पर काम भीड़ वाली इस उतनी हे चौड़ी सड़क पर आये तोह जैसे हर चीज यहाँ ख़ास थी. खूबसूरत लड़कियां, lambe-chaude लड़के जो मोटरसाइकिल, खुली जीप और कार में तफरी कर रहे थे. कही कही पुलिस वाले आराम से नजर रखते ek-aadh को रुकवा भी लेते.

"क्यों देखा है इस से पहले ऐसा माहौल?", आरती दीदी के इतना कहते हे अर्जुन ने भी पल भर के लिए उस खुली जीप से नजर हटा ली जो अभी 2 बार सामने चलती काइनेटिक के पास से चक्कर लगाने के बाद फिर से इधर हे आ रही थी.

"नहीं, पहले कभी नहीं देखा. यहाँ लोग मॉडर्न भी ज्यादा है और साथ हे पारम्परिक भी है. लेकिन ज्यादातर ये जीप या कार में तफरी मार रहे है इनकी हरकते क्या ऐसी हे होती है?", जीप 10 की रफ़्तार से पास से निकली लेकिन इस बार काइनेटिक और जीप के बीच अर्जुन चल रहा था. 25-26 साल का daadhi-mooch वाला लड़का जो स्टीयरिंग पे था वह कुछ बड़बड़ाता हुआ आगे निकल गया. जीप में कुल 4 लोग थे और उनमे से एक जो पीछे बैठा था उसने मुँह पर हाथ रखा हुआ था, जैसे पहचान छुपा रहा हो.

"नशेड़ी, बिगड़े अमीर जो कॉलेज में आने के बाद 5-7 साल डिग्री पूरी नहीं करते. पैसे की वजह से कॉलेज के और लड़के भी इनके aage-piche घूमते रहते है और पुलिस तोह तभी इन्हे कुछ पूछताछ करेगी जब कोई शिकायत करेगा.", आरती दीदी के चेहरे के भाव एकदम बदल गए थे इस जीप पर ध्यान जाते हे.

"लड़किया घर पे शिकायत नहीं करती अगर ऐसे लोग उन्हें परेशां करते है तोह?"

"ये लोग उन लड़कियों को हे परेशां करते है जो seedhi-sharif और अपने काम से काम रखती है. हाँ कभी कभी कोई sundar-ameer लड़की टकरा जाये तोह फिर इनकी भी रेल बन्न जाती है. लेकिन ऐसा बहोत काम हे हुआ होगा.", आरती दीदी के स्वर में कोई ख़ास ख़ुशी न थी.

"आप भी खूबसूरत हो और दीदी भी. College-University तोह आप भी जाती होंगी, क्या आपका सामना नहीं हुआ ऐसे लड़को से.?", एक और मदद लेते हे ये बड़ी मार्किट पर करके वह इस तरफ आ गए जहा 3-4 रेस्ट्रा और 2 महंगे मयखाने (बार) थे. सामने खुली पार्किंग जहा दर्जन भर गाड़ियां दूर दूर आराम से कड़ी थी. कुल मिला कर जगह ाची थी और शांत भी.

"देखो ाचे और बुरे लोग हर जगह होते है. वैसे भी यूनिवर्सिटी में हमारा कॉलेज गर्ल्स ओनली है.", दीदी ने बात बदलते हुए कहा.

"हैं तोह यूनिवर्सिटी के अंदर हे न? और घर से कॉलेज तक कुछ दुरी तोह जरूर होगी, गली के बहार तोह है नहीं.", अर्जुन ने काइनेटिक की बगल में मोटरसाइकिल खड़ा किआ. प्रियंका दीदी और गुरदीप जैसे कुछ ख़ास बात कर रही थी और चेहरे पर उनके भी थोड़ी गंभीरता थी.

"हाँ. लड़के पीछे चलते है जब हम कॉलेज जाती है. किसी ने मुँह से बोलने के सिवा कोई हरकत नहीं की कभी. एक बार पापा ने देख लिए था 2 लड़को को और उन्होंने कुछ नहीं कहा.", आरती दीदी अब थोड़ी जैसे मायूस सी थी.

"लेकिन वह लड़के फिर कभी दिखाई दिए क्या?"

"इतना ध्यान कौन देता है के वह कौन थे लेकिन पापा को एटलीस्ट उन्हें डांटना तोह चाहिए था."

"आपको फिर क्या हे पता चाचा के बारे में. चलो ाचा हे किआ न के उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किआ. शायद वह मामला खराब करके आप लोगो की पढाई पर असर नहीं पड़ने देना चाहते हो. वैसे बहोत बार ऐसा होता है के हम खुद हे सामने देखि बात को समझ नहीं पाते.", अर्जुन ने बात ख़तम करते हुए कहा और बाकी दोनों के पास हे आ गया. वह भी अर्जुन के सामने सहज होने का दिखावा करने लगी लेकिन अर्जुन भाप गया था के कुछ तोह दिक्कत की बात जरूर है. वही laal-kaali खुली जीप उनके पिछली कतार में कड़ी थी और अब वह 3 हे लोग थे.

"ऐ पटोला किसे दिन मोटर ते रज्ज के मसलना मैं भोलेय. वेख साली दे मम्मी कीड़ा हिल्दे ने तेह बून्द वि 71-72 करदी है साली दी. लूंण फसा के साले दे मुम्मे ते बुड़के मारन च जो मजा आउगा न ओह ऐ वि याद रखेगी.", ये daadhi-mooch वाला ठेठ देहाती गबरू था जिसकी आंखें बता रही थी की ताक़त के घमंड के साथ इनमे ज़माने भर की बेशर्मी है.

"बराड़ा, मेनू जे ऋतिंदर दी भें मिल गयी तह साली दे मुँह विच लुल्ला पा के आंखें बहार कद्द दवंगा ेहड़ी. बड़ा गुस्सा दिखंडी है साली. लेकिन मुम्मा तेह बून्द इस गश्ती दे वि क़यामत ने.", ये भी यार तोह ऐसे हे आदमी का था तोह विचार भी वैसे हे थे. तीसरा भी कहा चुप रहता, जो सेहत में इनसे थोड़ा काम लेकिन कद में अर्जुन जितना हे था.

"तुस्सी धोवे जड़ो फारिग हो जाओ तह मोटर खली कर देयो. मैं तह बराड़ दी साली (आरती) ने रात भर agge-piche घुत्तू. माँ दी लोदी ने मेरा ना दास्य सी प्रिंसिपल न के मैं ेहड़ी चुन्नी पकड़ी है. दिल तह करदा होने इन टीना न चक्क लिए और हफ्ता मोटर तोह बहार न ाँ दिए. माँ दी लोदी साली गश्ती, कॉलेज को ना कटान लग्गी सी मेरा.", इसको सबसे ज्यादा हे परेशानी थी और उतना हे बड़ा बदला लेने की सोचे हुए था.

"मेरे हुन्दे तनु जूनिवर्सिटी विच कोई हाथ नई लगा सकदा गोग्गिये. जे तू चौंदा है के ेहना न चक्क लिए तह फेर अप्पा कर दे आ हिला बस थोड़े शराबी कथे हौं दे नाल ऐ सपाटे (पुलिस) जान दे. 8:20 होये ने ते 10 मिनट बाद एक कुट्टी दी गर्दन तेह छुरी रख के बाकी डोवा न भी ले हे चलदे है. अफीम खा के ेहना दी बून्द लेने है अज्ज.", ये 3 लोग 15 फ़ीट दूर अपने मनसूबे बना रहे थे और अर्जुन हेल शोर के बावजूद हर लफ्ज़ सुनता खुद को संभाले आराम से खड़ा था. तीनो लड़कियां आपस में बात कर रही थी, यहाँ से चलना चाहिए या रुकना. गुरदीप अभी भी कह रही थी की वह लोग ऐसा कुछ नहीं कर सकते पब्लिक प्लेस पर.

"ोहना दे नाल मुंडा वि है बराड़ा.", ये भोले ने चेताया तोह बरार ने निचे थूकने के बाद कहा.

"माँ दी फुद्दी साले दी. बिच आया तह इस वार मैं कुछ नहीं वेखना. जूनिवर्सिटी विच कुछ नई कर सकदे अस्सी लेकिन हूँ यह घर तोह वि दूर ने और यह जगह वि सही है पिंड न जान लायी.", बरार जैसे दिल पक्का कर चूका था और उसके हिसाब से अब माहौल उनके लिए बिलकुल सही था.

"विच कोई नई ांडा बाई. सबनु डर लगदा जूनिवर्सिटी दे बदमाश तोह नाल बराड़ डा बापू सरपंची साहड़े वास्ते हे तोह करदा.", ये गुग्गी भी हवा दे रहा था बाकी दोनों को जैसे आरती ने ाची चोट पहुंचे हो उसको पहले कभी. दूसरी तरफ अर्जुन ने गुरदीप की बात पर सहमति जाता दी.

"दीदी आप लोग सामान ले कर चलो अंदर और सीट रुकवा कर आर्डर दो, मैं ये goli-soda पी कर आया.", अर्जुन के साथ देने से गुरदीप खुश हो गयी लेकिन आरती दीदी ने एक बार हलके अँधेरे में जीप की तरफ नजर की और उन तीनो को ऐसे घूरते देख गुस्से में बाकी दोनों के साथ अंदर चली गयी.

"गुरदीप तेरे भाई की मैं जान ले लुंगी. वह कमीना इनके साथ यारी लगाए बैठा है और तू भी जानती है के ये लोग कैसे है. आज हिम्मत देख इनकी कैसे गन्दी बातें कही इन्होने दीदी और तुझे, अब भी इधर हे खड़े है.", आरती की बात सुन्न कर प्रियंका दीदी को भी गुस्सा आ रहा था उन जीप वाले लड़को पर.

"तू परेशां मत हो यार. बोलते है और कुछ तोह नहीं.", गुरदीप नासमझ वाली बात कर रही थी.

"सिर्फ बोलते है? तेरे भाई के सामने उस गगनदीप (गुग्गी) ने मेरा दुपट्टा खींच लिए था एग्जाम के टाइम. हिम्मत न दिखती तोह वह गाडी में दाल लेता और तू इनको आराम से ले रही है. अर्जुन पूछ रहा था मेरे से लेकिन क्या कहती उसको? वह यहाँ एक दिन के लिए आया है और कोई ऊंच नीच हो गयी तोह क्या जवाब देगी तू? तेरे भाई की टांग टॉड दूंगी मैं बता देती हु.", इधर वह तीनो इस रेस्ट्रा के अंदर आई जिसके 2 मुख्या द्वार थे. एक इस तरफ से तोह दूसरा ईमारत के दूसरी तरफ वैसी हे पार्किंग से. अंदर तक़रीबन 15-16 बढ़िया टेबल लगी थी और 2 को छोड़ कर बाकी सब पर लोग pariwar-dosto के साथ बैठे थे. मतलब दूसरी तरफ से ज्यादा लोग आते थे.

"जीप बड़ी ाची है ये, सरपंच कौन है तुम में से.?", अर्जुन अंगड़ाई लेता इन तीनो के हे पास आ खड़ा हुआ. जीप के सामने लिखा था 'सरपंच', पंजाबी में. और अर्जुन को ऐसे बेफिक्र अपने सामने खड़ा देख तीनो हे उसको देखने लगे.

"जीप वि तेरे ना करा दूंगा काके, ओह 3 पटोले एक वारि रज्ज के मसल लिए. जे तेरा दिल करे तेरी वि बून्द मार लेनी मैं.", बरार ने कुर्ते का बटन खोलने के साथ हे हाथ में पहना पीतल का कड़ा ऊपर चढ़ा लिए. मूछ ऊपर उठता वह कामिनी हंसी के साथ अर्जुन को हे देख रहा था. चौक से अब वह सरदार पोलिसवाले जा चूका था और कुछ गिनती के हे लोग इस तरफ नजर आ रहे थे. रेस्ट्रा की तरफ जाने वाले मदद से पहले बने फुटपाथ से निकल रहे थे, वह रास्ता छोटा था.

"मैंने पुछा सरपंच कौन है?", अर्जुन ने इस बार गुग्गी की तरफ देख कर कहा और तीनो के चेहरे पर हे गुस्सा आ चूका था सामने खड़े लड़के की हरकत देख कर.

"इसका बाप है सरपंच. तू माँ छुड़ानी अपनी?", गुग्गी के इतना कहने पर उसके साथ जो हुआ बाकी दोनों हैरत से देखने लगे. आँख और गाल के बीच झन्नाटे दर थप्पड़ मारने के बाद अर्जुन ने गर्दन से पकड़ कर गुग्गी को जीप के सामने वाले हिस्से से भिड़ा दिए. टक्कर ऐसी थी की दर्द से वह चीख भी न सका. 'धड़ाम' की तेज आवाज और सर से टपकते खून के साथ हे गुग्गी सड़क पर लोट लगा रहा था.

"अपने बाप को बुला ले क्योंकि माँ तोह मैं तुम्हारी छोड़ने वाला हु और जीप में दाल के तुम्हे वही लेके जायेगा. एम्बुलेंस में नहीं जाने दूंगा तुम्हे मैं.", अर्जुन ने बरार को गर्दन से पकड़ कर जीप में फेंकते हुए चाबी निकल ली. अब उसके हाथ में भोले की मोटी कलाई थी. घुटने के जोड़ पर एक तरफ से लात मरते हुए वह हिस्सा भी ढीला करता अर्जुन तड़ातड़ थप्पड़ बरसा रहा था भोले के गाल पर. चीखे सुन्न कर लोग पहले तोह दूर से हे देखते रहे के यहाँ हो क्या रहा है. भोला अपनी टूटी टांग के दर्द से चीख भी नहीं प् रहा था थप्पड़ो की वजह से.

"तेरी भें दी फुद्दी सलैया.", ये लोहे की कतार अर्जुन की ब्याह के करीब से रगड़ करती निकल गयी लेकिन पीछे से वार करने वाला बरार मजबूत सड़क पर मुँह के बल जा लगा. अर्जुन पूरे होश से तैयार भी था और तेज भी. गुग्गी की हालत बहोत खराब थी लेकिन बाकी दोनों को अर्जुन कोई मौका दिए बिना रूई की तरह धुन्न रहा था, तसल्ली से. एक घुटना टूटा था और दूसरे की नाक की हड्डी और सामने वाले 2 दांत. और अब बाकी शरीर पर mukke-thappad-laat. कुछ लोग जो शायद शराब पीने आये थे अर्जुन की तरफ बढ़ गए.

"कोशिश भी मत करना, बेवजह घर की बजाये सरकारी हस्पताल पहुंच जाओगे.", अर्जुन ने 5-6 युवको को चेतावनी देने के साथ हे उन्हें दिखते हुए बरार की कोहनी का जोड़ भी हिला दिए. 'कड़ाक' की आवाज बहोत थी बताने के लिए की सामने वाला पागल है. वह लड़के वही रुक गए लेकिन अर्जुन की बात सुन्न कर उनके विचार इन लोगो के लिए बदल गए.

"तीनो लड़कियों को उठा हफ्ते भर उनका रपे करोगे तुम? और क्या कहा था रंडी है वह? मतलब एक शरीफ लड़की जो तुम्हारे मुँह पर थूक दे उसके साथ ऐसा करोगे. गाडी चलने के लिए हाथ और बीवी को सुख देने वाला हथियार हे काम नहीं करेगा आज के बाद.", पंजे में दोनों गोटियां पकड़ कर दबाई तोह गधे सा रामभता बरार जमीन पर लौटने लगा. अब वह भीख मांग रहा था की अर्जुन उसको छोड़ दे लेकिन अर्जुन का मैं नहीं भरा था. जहा पहले 5-6 युवक हे इधर आये थे अब वह 30-35 लोग खड़े तमाशा देख रहे थे और अपने अपने तुक्के लगाने में व्यस्त थे. अर्जुन के इतनी देर होने पर भी ना आने से तीनो लड़कियां भी इधर आ गयी थी लेकिन उनके पाँव जाम हो गए ये नजारा देख कर.

"तेरा दोस्त है वह लड़का और तू उसकी बहिन को हे रुस्वा करने चला था. ऐसे ख़याल आते कैसे है दिल में? और वह नामर्द साला यहाँ आने की जगह चुप्प कर निकल गया.", अर्जुन की गर्जना और बात सुन्न कर लोगो को पता चल रहा था के ये हो क्या रहा है. भोले को गर्दन से पकड़ कर 3-4 बार जोर से बोनट पर मारते हुए अर्जुन जैसे और भड़कने लगा था. उसको बेहटा खून देख कर जाने क्या सुख मिलने लगा. वही भोला भी खून से साणे चेहरे के साथ बस माफ़ी मांग रहा था. एक पाँव उसका साथ नहीं दे रहा था और हालत ऐसी की अभी बेहोश हो जाये. गुग्गी चोट से उबरने के बाद अब दहशत में था अपने दोस्तों की हालत देख कर. लेकिन उसका भी नंबर लगा दिए अर्जुन ने.

"जिसका दुपट्टा छूने की गुस्ताखी तुमने की वह लड़की कितनी मासूम है ये पता भी है तुम्हे? जानवर के साथ जानवर हे होना पड़ता है.", अब वह शरीर हवा में लहराता सभी ने देखा था. जीप में शीशा न था लेकिन किसी टेनिस बॉल की तरह बोनट पर टप्पा खता गुग्गी जीप के अंदर जा गिरा. ऐसा जलवा वह खड़े लोगो ने शायद हे कही देखा हो. किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी इस पागल शेर को रोकने की. सफ़ेद मोटरसाइकिल पर 2 पोलिसवाले हूटर बजाते अभी मदद पर हे पहुंचे थे उनसे 200 गज दूर और आरती ने जल्दी से अर्जुन को पीछे से पकड़ लिए.

"बस कर अर्जुन, बहोत हुआ. चल यहाँ से नहीं तोह बात बढ़ जाएगी.", अर्जुन पल में हे ठंडा हो गया. उसने नजर दौड़ाई तोह बरार जमीन पर औंधा लेता हुआ कराह रहा था, भोला जीप का टायर पकडे बैठा दर्द झेलने की कोशिश में लगा था और गुग्गी बेहोश जीप के अंदर. बिना कुछ कहे अर्जुन आरती दीदी के साथ इधर मोटरसाइकिल तक आया और पुलिस भी भीड़ को हटती वह शोर मचने लगी.

"होया की है इत्थे कोई डसेगा? ओह बदमाश किन्ने कित्ती तुहाडी दुर्गति? तुस्सी सारे तमाशबीन वांग मुजरा वेख रहे सी.?", ये bhari-bharkam एक सितारा सरदार पोलिसवाले भी समझ गया था के यहाँ कॉलेज के लड़को में mara-mari हुई होगी लेकिन उसका फ़र्ज़ था पूछताछ करना और कोई रिपोर्ट करना चाहे तोह अपना काम करना. भीड़ अभी भी इधर हे थी और वह तीनो कुछ कहने काबिल नहीं.

"लड़कियों को उठाने की कोशिश कर रहे थे ये तीनो. उनके घरवालों ने इनकी ये हालत की है.", ये लड़का उनमे से हे था जो पहले 5-6 लोग आये थे.

"हथियार भी है ेहना कोले लेकिन ओह लोग भी तगड़े सी, ज़िंदा छड्ड गए यह बहोत वड्डी गाल है. मेरी dhi-behan नाल कोई ेंज़ करदा मैं साले डा गट्टा हे ला देना सी.", ये 35-40 की उम्र के सरदारजी ने जोश में आ कर झगडे की वजह बताई तोह दूसरा पोलिसवाले भी इधर आ गया. डायरी में पेन से कुछ लिखने के बाद निचे लेते बरार को पाँव से हिला कर देखने लगा.

"जनाब ज़िंदा ने. कोई मर्या नहीं है ेहना को. की रिपोर्ट बनाइये?", वह अब अपने सीनियर को देखने लगा.

"कम् तह ेहना ने कोई सरपंची वाला नहीं कित्ता शिंदे पर दवखने पहुंचना हे पैना. पब्लिक प्लेस तेह lutt-paat डा परचा बना दे, नाल लिख देवी के चिट्टा वि बरामद होया ेहना कॉल. साली नशे ने जून हे ख़राब करके रखती जवका दी.", भीड़ भी शान्ति से हटने लगी थी लेकिन इन जनाब की नजर अर्जुन और तीनो लड़कियों पर अटक गयी. सब सामान रखते हुए आरती ने अर्जुन की ब्याह पर वह रिस्ता हुआ खून देख लिए था. घाव खास गहरा नहीं था लेकिन लम्बाई होने की वजह से खून कोहनी तक बह आया था. रुमाल बांधती आरती के पास ये एक सितारा सरदार जी आ खड़े हुए.

"पुत्तर जी, कानून मदद वास्ते हे हुँदा है. कई वरि गल्ल हाथो बहार निकल सकदी है आप फैंसले कारन तोह. मैं लिया के गुस्सा जायज़ है जड़ो bhen-votti दी इज्जत ते गल्ल आ जावे पर होश रखना जरुरी हुँदा. 302 लग सकदी है जे कोई मर्डर जावे नहीं 307 पक्की जे किसे ने बयान दिया तुहाडे खिलाफ. साहड़ा की है, मुलाजिम बन्दे है और रिपोर्ट होएगी तह करवाई करनी पैंदी है.", आवाज भरी थी लेकिन गुस्सा नहीं था. बड़े प्यार से आरती के सर पे हाथ फिरने के बाद वह वह से चले गए अपने आदमी के पास जो हाथ में पकडे बेतार (वायरलेस) से अब जिप्सी बुलवा रहा था. घटना के होने के इतनी देर बाद, जैसे वह खुद चाहता हो के थोड़ा और दर्द सहने दो इन सबको.

"जनाब बड़ी तेज नजर है तुहाडी, तुस्सी तह भीड़ विच वि मुजरिम ढून्ढ लिया."

"ओह शिन्देय, उस मूंदे ने दिलेरी दिखाई है. खुद सोच कोई होर परशान दिखया तेन्नु उन मासूम जी कुड़ियां दे अलावा? ब्याह मूंदे दी जख्मी है मतलब ओह बचा रहा सी ोहना न. जनता ने वि जो दस्सेया उस गल्ल न मद्दे नजर रखदे होये ऐ 3 मूंदे कसूरवार है. मैं नहीं चौंदा के ओह कुड़िया थाने ावन, केस बेशक मजबूत हो जावेगा जे ओह स्टेटमेंट दें. गल्ल इज़्ज़त्त दी है शिन्देय तेह अप्पा पोलिसवाले है. जुर्म ख़तम करना है लेकिन बेक़सूर maa-dhiyan-behna न हिफाजत डंडे होये. बदमाश दी जल्दी पट्टी करवा फेर बनाने है ेहना डा मोर.", ये साहब तोह बड़े हे जिंदादिल और सुलझे हुए आदमी निकले. जो भी बात कही वह एक सच्चा इंसान हे कह सकता है.

"तुस्सी न इस करके हे मेरे फवौरीते हो जनाब. कड़े गलत फैंसले नहीं लैंड भावे कानून डा कोई रूल हल्का जा मोड़ना पे जावे."

"शिन्देय, गुरुघर जांदे होये एक्को विचार रेह्न्दा है मैं विच, कड़े किसी नाल मेरे हाथो गलत न होव. वे मानस बन्न गया बंदेया तेरी जून सुधर जावेगी.", ये गहरी बात कहते हुए जनाब कान पर हाथ लगते इस जिप्सी की तरफ बढ़ गए. इधर अर्जुन भी तीनो को लेके रेस्टा में आ गया था. देरी हो गयी थी और लड़कियां घबरा भी गयी थी जब उन्होंने बहार नजारा देखा था. अर्जुन के समझने और फिर मानाने के बाद अब प्रियंका दीदी और आरती दीदी कुछ हद्द तक शांत हो गयी थी. टेबल के दूसरी तरफ गुरदीप और प्रियंका दीदी बैठी थी और इधर अर्जुन और आरती दीदी. आरती ने अपने बाए हाथ में अर्जुन का दाया हाथ दबा रखा था जो सामने वालो को नजर नहीं आ सकता था.

"यार तुम तोह सनी देओल निकले मैं तुम्हे रोमांटिक हीरो समझ रही थी. क्या हालत बनाई उन तीनो की तुमने अकेले, मजा आ गया.", गुरदीप फिर से पहले सी हो गयी थी माहौल ठंडा होते हे.

"ऐसा नहीं करता तोह तुम तीनो खतरे में होती. वैसे सच कहु मैंने तुम्हारे भाई को देखा था इनके साथ और जैसे ये लोग है मतलब वह इनका चमचा हे होगा. कैसे सुन्न सकता है वह अपनी प्यारी बहिन के लिए इतना कुछ? सॉरी मेरा मतलब तुम्हे दुःख पहुंचना नहीं था गुरदीप लेकिन राखी तोह तुम भी बांधती होगी न ऋतिंदर उर्फ़ रिस्की के.", अर्जुन ने पूरा नाम लिए तोह गुरदीप के साथ बाकी दोनों भी उसको देखने लगी. गुरदीप के खिलते चेहरे पर अब दर्द और बेबसी आ चुकी थी. प्रियंका दीदी ने उसका हाथ अपने हाथ में लिए तोह वह अपने दिल की बात बताने लगी.

"वह कॉलेज के फर्स्ट ईयर से हे ऐसे लोगो के साथ रहने लगा था. पता नहीं किसने उसका दिमाग बदल कर रख दिए. हद्द तोह साल पहले हुई थी जब वह शराब पी कर घर आया और माँ से झगड़ने लगा. पैसो की भी कमी नहीं होने दी कभी उसको और पापा ने तोह कार भी दिलवा दी लेकिन रिस्की नहीं सुधरा. अब तोह वह घर में भी सिर्फ अपने कमरे में बंद रहता है अगर घर पे हो तोह. बेबे और दादी भाई की वजह से बहोत हर्ट होते है लेकिन एकलौता होने का फायदा वह उठा कर वह और बिगड़ रहा है. आज ये भी पता लग गया के उसको अपनी बहिन की इज्जत की भी परवाह नहीं.", गुरदीप की आँखें भीग गयी थी. अर्जुन को भी लगा के गलत जगह पर गलत बात कर दी उसने.

"तुम रट हुए बसंती जैसी नहीं लगती. मैं वादा करता हु की रिस्की को मैं जाने से पहले समझा कर जाऊंगा. समय के साथ वह भी बदलने की कोशिश जरूर करेगा. ऐसे रो कर अपना शहर घूमने वाली हो?", अर्जुन ने निस्वार्थ भाव से गुरदीप का हाथ पकड़ कर समझते हुए कहा तोह वह तुरंत हे शांत हो गयी. एक बार अर्जुन को देख कर वह प्रियंका दीदी की तरफ देखने लगी.

"यार रोने के बाद तोह ज्यादा हे भूख लगती है. बैरे को बोल जल्दी खाना ले आये नहीं तोह मैंने प्याज चटनी हे खा जाने.", सचमुच गुरदीप जैसी दिखती थी वह वैसी नहीं थी. वह इतनी समझदार थी की अपनी बकबक से दिल का दर्द छुपाये रखती थी. अर्जुन जान गया था के ये लड़की दिल की बहोत समझदार और परिवार की चिंता करने वाली ाची लड़की है. गुरदीप की बात सुन्न कर सबके चेहरे पर मुस्कान आ गयी.

"हाथ छोड़ दो तोह मैं खाना शुरू करू.", अर्जुन के मजे लेते हुए गुरदीप ने कहा और झेंपते हुए अर्जुन ने हाथ के ऊपर से अपना हाथ हटा लिए. आरती दीदी ने उसके लिए खुद खाना परोसा था और हलकी फुलकी मस्ती करते चारो इस जायकेदार पंजाबी खाने का लुत्फ़ लेने लगे. गुरदीप को पता था के अर्जुन को क्या खिलाना बेहतर रहेगा और खाने के बाद Gurdeep-Aarti दीदी की जिद्द पर अर्जुन ने टिल्ले वाली कुल्फी खाने में भी उनका साथ दिए.

"10 बजने वाले है और आप लोग तोह जाने का नाम नहीं ले रही हो. कल यूनिवर्सिटी भी जाना है तोह आराम करना भी जरुरी होगा.", अर्जुन के ऐसा कहने पर गुरदीप और आरती दीदी थोड़ा झेंप गयी लेकिन प्रियंका दीदी परेशां हो गयी.

"यूनिवर्सिटी हम खुद चले जाये तोह बेहतर नै होगा?"

"बिलकुल नहीं. मैं तोह आया हे इसलिए हुए के आपका कॉलेज और यूनिवर्सिटी देख सकू. गुरदीप भी साथ चलेगी हमारे और आप न परेशां होना बंद करो.", अर्जुन ने बिल खुद हे दिए और इस बार दीदी ने उसको टोका तक नहीं. इस बार सभी आराम से ये शांत सफर तये करते हुए घर आ गए. शाम से बिलकुल विपरीत था ये वक़्त जहा अँधेरे में भी रोशन सड़के ज्यादातर खाली और माहौल ाचा था हवा बहने से. गुरदीप ने भी काइनेटिक इनके हे यहाँ कड़ी करते हुए आरती के साथ हॉल में प्रवेश किआ. अर्जुन मोटरसाइकिल को उसकी जगह कड़ी करने के बाद कुछ देर गली में टहलने के बोल कर बहार आ गया. पार्क में केसरिया रौशनी जगमग थी और सड़क पर ikka-dukka लोग खाने के बाद टहल रहे थे. 2 चक्कर पार्क के गिर्द टहलने के बाद अर्जुन के पास ये आवाज करती यामाहा आ रुकी. अर्जुन घर से विपरीत पार्क के दूसरी और था जब रिस्की उसके सामने आ रुका.

"तू की समझदा है तू बड़ा बहादुरी डा कम् कर लिया? गलत पन्गा लिया है तू ते नतीजा भी भुगतना पैना तेन्नु.", रिस्की की आवाज धीमी थी लेकिन गुस्से वाली. Aas-pados की वजह से हे वह ऐसा बोल रहा था.

"तुझमे इतनी हिम्मत आयी कहा से? अपनी बहिन को उनके सामने छोड़ कर भागने वाला नामर्द मुझे धमका रहा है? हैं कौन तू और क्या वास्ता है मेरे से तेरा?", बात करते करते अर्जुन ने रिस्की का गाल थपथपाते हुए सवाल किआ.

"उन तीनो की जो हालत की है वही मैं तेरी भी करता अगर तू उनके साथ होता. साला कुत्ता भी रोटी खिलनवाले की रक्षा जान देने तक करता है और तुम जैसी औलाद इतनी गिरी हुई है जो अपने maa-baap की सेवा तोह दूर अपनी छोटी बहिन को उन कमीनो को हे परोस के आ गया था. खाख बड़ा भाई है तू उस मासूम लड़की का जो ज़िंदगीभर तेरी कलाई पर राखी बांधती आई ये सोच कर की तू उसकी रक्षा करेगा और यहाँ देखो जिसने उसको बचाया उसके साथ हे बदतमीजी. चल निकल यहाँ से इस से पहले की तुम्हारे maa-baap को और दुःख हो अपने बेटे की दुर्गति देख कर. शायद ज्यादा दुखो होगा अगर हरकत पता चली तोह.", अर्जुन ने बात ख़तम करते हुए रिस्की को इशारे से वापिस जाने को कहा और आगे बढ़ गया.

कुछ देर तक रिस्की वही खड़ा अर्जुन की बात समझता रहा फिर जेब से कुछ सामान निकाल कर एक तरफ फेंकते हुए आँखों में आंसू लिए मोहल्ले से हे बहार निकल गया. अर्जुन पार्क के अंदर आ कर गहरी सांसें लेता मैं को शांत करने लगा. रिस्की से वह बिलकुल भी ऐसी बात नहीं करना चाहता था लेकिन समझाना जरुरी था और ऐसी बात जल्द असर कर सकती थी.

"अंदर आ जाओ अब, 11 बजने वाले है अर्जुन.", प्रियंका दीदी की बात सुन्न कर अर्जुन आराम से उनकी तरफ चल दिए.

"आ गया दीदी, मैं दरवाजा बंद कर लेता हु.", अर्जुन ने पार्क से बहार आते हुए दीदी से कहा लेकिन वह उसके साथ हे गेट बंद करके अंदर हाल में आई और यहाँ भी दरवाजे की चिटकनी लगा दी. गुरदीप और आरती दीदी ने भी कपडे बदल लिए थे इस वक़्त प्रियंका दीदी के साथ हे. शायद सभी नाहा चुकी थी और गुरदीप के भरे भरे शरीर पर ये आरती के कपडे थे. गुलाबी सूती टीशर्ट और घुटने से थोड़ा निचे तक का चुस्त इलास्टिक वाला पजामा. पूरा भूगोल नुमाया हो रहा था क्योंकि गुरदीप भी सेहतमंद लड़की थी और आरती के कपडे अपनी क्षमता तक खिंचाव लिए जिस्म पर चिपके हुए थे.

"मैं नाहा कर चाचा के कमरे में हे आराम करता हु दीदी.", अर्जुन ने ज्यादा देर वह बैठना उचित न समझा लेकिन गुरदीप के चेहरे पर कुछ अलग हे भाव आ गए थे. प्रियंका दीदी भी गुरदीप को टेलीविज़न से जल्दी फारिग होने का बोल कर उनके कमरे में सोने का कहती चली गयी.

"मुझे बहोत नींद आ रही है डीपी, जल्दी आना और आरती कूलर चला दिए था क्या तूने अपने कमरे का?", जाते हुए उन्होंने पुछा तोह आरती ने जवाब दिए.

"हाँ दीदी, कमरा खोल कर रखा है थोड़ा अभी और मैं दिन में सोई थी इसलिए थोड़ी देर तक सोने जाउंगी.", आरती आराम से एक सोफे पर अधलेटी सी ये डरावनी फिल्म देख रही थी गुरदीप के साथ जो बराबर वाले सोफे पर वैसे हे बैठी थी. अब माहौल शांत था अर्जुन और प्रियंका दीदी के जाने से. दोनों के कमरे के दरवाजे बंद होते हे गुरदीप ने आरती को देखा.

"ऐसे क्या देख रही हो?", आरती ने एक बार गुरदीप पर नजर डालने के बाद चेहरा टेलीविज़न पर कर लिए.

"तुम्हे सब पता है फिर भी पूछ रही हो. पढ़ती मैं प्रियंका के साथ हु लेकिन सहेली पक्की तुम हो मेरी. तुझे बताया था फिर भी तूने बात नहीं करवाई मेरी.", गुरदीप झूठी नाराजगी से अपने गोर गाल फूलती हुई कहने लगी. आरती के चेहरे पर भी हलकी सी मुस्कान आ गयी थी ये रूठना देख कर.

"दीदी गयी सोने और तुझे भी बुलाया है. मैं यहाँ फिल्म देख रही हु तोह अर्जुन इस वक़्त अकेला हे होगा इधर वाले कमरे में. मैं सामने से कैसे कह दू अर्जुन को, मौका तुम्हारे सामने है तोह जाओ बात करो. मैं इधर ध्यान रखूंगी.", आरती की बात सुनते हे गुरदीप पल में हे चहक उठी. इतराते हुए कड़ी हो कर वह जाने से पहले आरती को हवाई चुम्बन देती आँख मार गयी.

"नौटंकी कही की. गलत जगह सर घुसा रही है.", आरती ने धीमे स्वर में बुदबुदाते हुए कहा और हंसती हुई फिल्म देखने लगी. इधर अर्जुन नहाने के बाद आरती से मिलने से पहले समय व्यतीत करता हुआ लैंप की रौशनी में एक उपन्यास पढ़ रहा था. गुरदीप नंगे पाँव कमरे में आई तोह अर्जुन को किताब में खोया देख दरवाजा ढाल कर करीब आ कड़ी हुई.

"जरुरी किताब पढ़ रहे हो?", बिंदास रहने वाली गुरदीप का सीना जोरो से हिल रहा था इस पल में. वह खुद नहीं जानती थी की वह क्या कर रही है. बस अर्जुन उसको एक नजर में पसंद आ गया था और अब वह पूरा दिन बिताने के बाद रात में उसके सामने आ कड़ी हुई थी. दिल की बात कहने के लिए. हलकी घबराहट और अर्जुन की प्रतिक्रिया से आशंकित वह पास बैठने की हिम्मत नै कर पाई.

"आओ बैठो. मैं तोह कुछ भी पढ़ने लगता. कुछ काम था क्या?", अर्जुन के इतना कहने पर गुरदीप 2 फ़ीट दुरी पर बिस्टेर के किनारे बैठ कर अर्जुन को देखने लगी. कैसे कहे और क्या कहे इस उधेद्बुण में मुँह से आवाज हे नहीं निकल रही थी. अर्जुन उसको इतना परेशां और सोच में देख कर हाथ पकड़ते हुए पूछने लगा.

"कुछ सीरियस बात है? कही शाम वाली घटना से तोह परेशां नहीं हो? देखो आप ाची लड़की हो और मेरी जगह कोई भी होता वह वैसा हे करता.", अर्जुन को जैसा लगा उसने वही कहा लेकिन बात ख़तम होते हे गुरदीप उसके गले लग गयी. अर्जुन भी वैसे हे किनारे बैठा था सामने रखे टेबल पर लैंप के नीचे उपन्यास रखे. गुरदीप के ऐसा करते हे वह बिस्टेर के सिरहाने जा लगा. भारी कबूतर सीने पर डब्ब गए लेकिन गुरदीप आँखें बंद किये उसके सीने लगी रही.

"तुम मुझे ाचे लगे और मैं यही बताना चाहती थी.", जल्दी हे वह अलग हो कर पहले वाली जगह बैठ गयी. पाँव के नाखून फर्श पर रगड़ती गुरदीप का चेहरा लाल हो चूका था अपने दिल की बात कहने से. अभी भी वह इतना हे बता पाई थी.

"तोह इसमें इतना परेशां क्यों हो रही थी. वैसे ये तोह मुझे कहना चाहिए था जो आपने इतना समय दिए और अपना शहर घुमाया. ये दिन मुझे याद रहेगा और आपकी बातें भी.", अर्जुन ने गले मिलने को ज्यादा तवज्जो न देते हुए बड़े आराम से जवाब दिए. वह आज पहली बार यहाँ आया था और अपने चाचा के सालो से रहे पडोसी रेशम सिंह जी के परिवार के साथ ऐसा कुछ नहीं करना चाहता था जिस से उनको कोई बात सुन्न नई पड़े.

"दिन मुझे भी याद रहेगा और तुम बस आते रहना मुझसे मिलने. तुम बहोत ाचे हो अर्जुन.", इस बार गुरदीप कही से भी परेशां नहीं थी. अपनी बात के लिए वह बस सही शब्द नहीं ढून्ढ प् रही थी लेकिन उसने हिम्मत करते हुए अपनी बात कहकर अर्जुन के करीब आते हुए अपनी आँखें बंद कर ली. साँसें मिलने लगी थी और गुरदीप की धड़कन साफ़ बता रही थी की इस लड़की ने अभी तक चुम्बन नहीं किआ है. अर्जुन उन बंद आँखों वाले खूबसूरत चेहरे को बस एकटक देखता रहा. काली लम्बी पलके, महकती सांसें, तराशी हुई प्यारी नाक और मदभरे होंठ जो लरजते हुए फड़क रहे थे. एक बार अपनी बड़ी आँखें खोल कर अर्जुन को ऐसे निहारते देख जल्दी से गुरदीप ने आँखें वापिस बंद की और अंदाजे से हे अपने होंठ उसके होंठो से मिला कर वापिस सीढ़ी बैठ गयी. दिल की धड़कन इतनी तेज हो चुकी थी की सीना और चेहरा दोनों कांप रहे थे.

"आपको मैं ऐसे पसंद आया हु?", अर्जुन गुरदीप की हालत समझ चूका था और मैं में द्वन्द के साथ हे उसकी हालत और ख़ुशी के बीच उलझा वह तये नहीं कर प् रहा था के गुरदीप से क्या कहे.

"मुझे न शौक तोह बहोत है. खाने, घूमने, डांस करने और कपडे खरीदने का भी. ब्यूटी पार्लर जाना भी पसंद है और गप्पे मारने का भी. लेकिन कभी किसी लड़के के लिए मेरी हालत ऐसी खराब नहीं हुई जैसी तुम्हे देखने से हो गयी थी. वह क्या हैं न के मुझे ऐसा एक्सपीरियंस नहीं है लेकिन तुम्हे पता है तोह मैं सीख लुंगी.", गुरदीप अब जो भी कह रही थी अर्जुन को सुन्न कर उस पे बड़ा प्यार आ रहा था. ये आधुनिक सी दिखने वाली मुटियार सच में हे दिल के मामले में कितनी भोली थी.

"तुम्हे पता है तुम क्या कह रही हो?", अर्जुन अब दोस्तों की तरह बात करने लगा था. गुरदीप ने अपनी खूबसूरत पलके झपकते हुए एक नजर अर्जुन को देखा.

"तुम्हे मुझसे प्यार हो गया है, यही बात है न? लेकिन पता भी है के इस प्यार का अंजाम वैसा नहीं हो सकता जैसे सपने तुम देख चुकी हो या देखना चाहती हो वह पूरे न होने पर बड़ा दुःख होगा डीपी. हर मंजिल तक रही पहुंच जाये ये जरुरी नहीं और तुम इतनी प्यारी हो के मैं तुम्हारा दिल नहीं तोड़ना चाहता. अभी गलती होने से रुका जा सकता है लेकिन बाद में पछतावा बड़ा दर्द से भरा होगा. तुम इतनी ाची लगती हो जब ऐसे तितली सी उड़ती फिरती हो, pyaari-nasamajh सी लेकिन हमेशा दिल से बात करती हो. मुझे पापी मत बनाओ ऐसा प्यार करके जिसमे मैं तुम्हे वह खुशियां न दे सकू जो इतनी प्यारी लड़की को हर हाल में मिलनी चाहिए. मेरी ज़िन्दगी ऐसी नहीं होती जैसी आज है और मैं तुमसे अलग हालात में मिला होता तोह जो बात तुमने कही है वह मैं खुद तुमसे कह देता. बेशक मुझे गलत समझ लेना क्योंकि दिल टूटेगा नहीं बस बुरा लगेगा थोड़ा. ऐसा नहीं किआ तोह खुद हे सोचो के क्या जी पाओगी तुम इस अधूरे प्यार के साथ?", अपनी बात का हर लफ्ज़ सलीके से कहते हुए अर्जुन ने वह कोमल हाथ पकड़ते हुए गुरदीप के चेहरे से पल भर भी नजर न हटाई. वह अपनी बात का असर होते देखना चाहता था इस मासूम दिल पर.

"अपनी बात कह दी तुमने? मैं भी कुछ कहु अगर तुम्हारा समझाना हो गया हो.?", गुरदीप के चेहरे पर अभी भी कुछ सवाल थे, कुछ अनकहे जवाब भी. अर्जुन पहली बार एक लड़की के दिल को समझ नहीं पा रहा था. क्या कहना चाहती है वह यही बेहतर था अगर अर्जुन उसको हे बोलने दे.

"हाँ. तुम कहो."

"प्यार होने से रोक सकते हो क्या? मैंने तुमसे वादा लिए कोई? मैं तुम्हे इतनी प्यारी लगती हु, मेरी बातें भी तुम सुनते हो बिना शिकायत के और तुमने हर बात मेरी मानी इस पूरी शाम. कौनसा दर्द दिए तुमने मुझे? मेरी िज्जात्त बचाई और कितनी परवाह है तुम्हे हर इंसान की क्योंकि मैंने तुम्हारे दिल में मेरे साथ हे मेरे परिवार के लिए भी चिंता देखि. तुम उस इडियट रिस्की को भी सुधारना चाहते हो, एक हे दिन में कितने एहसान करोगे? प्यार में वादे नहीं होते, दर्द नहीं होता और जरुरी नहीं के हमको वह कितने समय के लिए मिला इस बारे में सोचना. बस एक पल बहोत है अर्जुन दुनिया में ख़ुशी से जीने के लिए. तुम पानी से साफ़ हो, निर्मल. तोह कैसे सोच सकते हो तुम मुझे मैला कर डोज? तुमने इसको छू लिए और शरीर को खबर तक नहीं.", अर्जुन का हाथ अपने सीने से निचे दिल के ऊपर रखती वह अर्जुन को वैसे हे देख रही थी जैसे थोड़ी देर पहले. अर्जुन की धड़कन वैसे हे चलने लगी थी जैसी वह गुरदीप के सीने में धड़कते दिल की महसूस कर रहा था.

"तुम्हे सचमुच दुःख नहीं होगा? माफ़ कर सकोगी मुझे?"

"प्यार में दुःख और माफ़ी जैसे छोटे शब्दों के लिए कोई जगह नहीं है. बस एक नज़र भी ज़िन्दगी दिखा देती है किसी को, यु ज़िन्दगी भर खुली आँखों से कुछ नजर नहीं आता.", गुरदीप ने अर्जुन की uthal-puthal इस पंक्ति से हे शांत करते हुए उसको गले से लगा लिए. कोई छल नहीं, कोई मेल नहीं. बस आत्मसात करते हुए गुरदीप अर्जुन को दिल में क़ैद कर चुकी थी. अर्जुन इस वक़्त में ऐसा महसूस कर रहा था जैसे वह आचार्य जी के पास बेचैन गया हो और उन्होंने उसका दिल स्पर्श से हे शांत करते हुए जहां ध्यान में भेज दिए हो. गुरदीप कैसे संभाल गयी थी अर्जुन को? 10 मिनट बाद वह अलग हुई तोह अर्जुन की आँखें बंद थी और चेहरे पर वह मनमोहक मुस्कान जैसे स्वर्ग पा लिए हो.

"हाँ तोह डॉक्टर लव, sawal-jawab हो गए हो तोह अपॉइंटमेंट मिल सकता है कुछ वक़्त आपके साथ गुजरने का.?", गुरदीप ने चुटकी बजाते हुए अर्जुन को जैसे नींद से जगाया. वह शर्मा रहा था और लाजवाब हुआ बस गुरदीप को देखने लगा.

"तुम कौन हो?"

"गुरदीप कौर और अगर तुम्हे मंजूर हो तोह बस एक बार के लिए मुझे अपना लो. वैसे तुम्हारा बोझ थोड़ा हल्का कर देती हु, शादी है मेरी नवंबर में और जिस से हो रही है वह न खुद तोह काम करता है वानकोउवर (कनाडा) में और शादी के बाद मुझे रहना पड़ेगा चंडीगढ़, क्योंकि 3 साल का एग्रीमेंट है उसका वह और 2 साल बचे है अभी. तोह पीछे मैं तुम्हारे पड़ने वाली नहीं लेकिन दिल से चाहती हु के अगर तुम्हे एक पल भी मैं ाची लगी हु या मेरे प्यार को तुम समझ रहे हो तोह बस मुझे इतना प्यार दो के मैं शिकायत न करू के कभी मुझे प्यार नहीं हुआ या जिस से प्यार हुआ उसने ठुकरा दिए.", अब गुरदीप के दोनों हाथो में अर्जुन के हाथ थे और वह मानसिक रूप से तैयार था गुरदीप के दिल की चाहत को पूरा करने के लिए.

"अभी तुम प्रियंका दीदी के पास जाओ, मैं सुबह 4 बजे तुम्हे जगाने आऊंगा.", अर्जुन ने गुरदीप को अपनी तरफ आराम से खींचा और उन होंठो को सिखाया के अधरपान कैसे करते है. ये कशिश और चाहत भी बड़ी जोरो की थी गुरदीप की जो एक पल में हे अर्जुन के होंठो को वैसा हे जवाब देने लगी. कुल 30 सेकंड में हे दोनों ने एक दूसरे का पूरा अनुभव कर लिए था. अलग होते हे गुरदीप चुपचाप वह से चली गयी. अर्जुन बस सोचता रह गया के प्यार ऐसा भी हो सकता है, वह भी सामने वाले की तरफ से? इंसान तोह प्यार होने पर जन्मो के साथ की दुहाई देने लगता है, हजारो वाडे, अनगिनत सपने और उतनी हे िचाये साथ आती है. गुरदीप ने तोह हर चीज ख़ारिज करते हुए बस एक बार का हे समय माँगा और वह भी ऐसे जवाब के साथ की अर्जुन सवाल न कर सका. उसका भी दिल था अब गुरदीप के साथ समय बिताने के लेकिन यहाँ एक और प्यार करने वाला भी कतार में प्रतिक्षारत्त था. आरती दीदी और 15 मिनट के बाद शांत घर में उसके दरवाजे पर दस्तक देती वह आ हे गयी.

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"आप आज ये कार लेके चलिए.", शंकर जी शाम को उठने के बाद सभी सदस्यों के साथ थोड़ा समय व्यतीत करके अब तैयार हो कर अपनी भार्या रेखा जी के साथ अपने दोस्त के घर रात्रिभोज के लिए जा रहे थे. अब तोह उन्हें फिर से Kurte-pyjama की आदत हो गयी थी और रेखा जी भी एक फिरोज़ी रेशमी साड़ी में पति के अनुकूल तैयार होती उनके साथ जा रही थी. आँगन में आते हे उन्होंने शंकर जी की तरफ ये नयी कार की चाबी बढ़ा दी, चले में धातु का मोरपंख लटक रहा था.

"मैडम जी ये आपके सुपुत्र की कार है और पहली बार वही इसको चलाएगा ऐसा मुझे पता चला. हम बड़ी गाडी ले चलते है.", उन्हें लगा के जैसे रेखा पुराणी कार में नहीं जाना चाहती.

"बात बढ़ी छोटी की नहीं है जी. वो चलना इस गाड़े में हे सीखेगा और आप से बेहतर कोई सीखा नहीं सकता इसलिए मैं चाहती हु की पहले आप इस गाडी को उसके लिए जांच लीजिये और हो सके तोह अपने बेटे को कार चलना आप हे सिखाये. बस निवेदन है.", अपनी पत्नी द्वारा ऐसी प्रशंसा और प्रेम कौन नहीं चाहेगा. शंकर जी ने मुस्कुराते हुए वह लबादा कार से हटाया और एक बार बहार से देखने के बाद पहले अपनी बीवी को सीट पर बैठाया और फिर खुद सवार हो गए स्टीयरिंग के पीछे.

"जैसा आप कहे मैडम और सच कहु तोह मुझे भी ाचा लगेगा उसको कुछ सीखा कर. वैसे तोह अर्जुन हे सबको कुछ न कुछ सीखा रहा है लेकिन अब मैं खुद भी चाहता हु के सबको समय दू. देखना वह मेरे से भी बेहतर गाडी चलने लगेगा.", कद प्लेयर चालू करते हुए उन्होंने इस 3 गियर वाली आटोमेटिक कार को ज्यादा देखने की कोशिश नहीं की. उन्हें जैसे इस गाडी की बेहतर जानकारी और अनुभव था. माखन की तरह स्टीयरिंग घूमते वह अपनी बीवी को हे निहार रहे थे, घर का भी जैसे उन्हें पूरा अंदाजा था. कार बहार निकलते हे उन्होंने पंजा दबा दिए.

"पापा तोह गए आज लोंगदरीवे पर. ये मम्मी को जैसे देख रहे थे लगता नहीं सीधा हे मेहुल अंकल के घर जाएंगे.", ऋतू गेट के बहार उन्हें जाते देख रही थी और साथ कड़ी अलका को बता रही थी. प्रीती भी साथ कड़ी हंसने लगी.

"चाचा जिस उम्र में जवान हो रहे है उस वक़्त लोग रिटायरमेंट के प्लान्स बनाने लगते है. वैसे उनकी भी गलती नहीं है, चची खुद भी तोह हम सबसे बेहतर है, इतनी उम्र होने पर भी.", अलका खुद भी जैसे अपनी चची से बहोत प्रभावित थी.

"मेरी माँ भी बोल रही थी की आंटी अगलस्स और सेक्सी है, लगता नहीं के वह Komal-Ritu और अर्जुन की माँ होंगी.", प्रीती के ऐसा कहते हे अलका और ऋतू, दोनों हे उसको हैरानी से देखने लगी.

"माँ तुम्हारी भी कहा काम है. सच कहु तोह ाचा हे हुआ के अर्जुन उनके साथ हे तुम्हारी मामी और विक्की से दूर है. पता नहीं क्या क्या हो जाता अगर वह सब लोग अर्जुन के साथ मनचाहा समय बिता लेते.", ऋतू दीदी ने चुहल करते हुए प्रीती का हाथ पकड़ा और साथ अंदर ले आई, अलका दीदी ने गेट बंद किआ और तीनो अंदर चल दी.

"सच कहु तोह मुझे भी यही डर लग रहा है. माँ इस रियली डेस्पेरेट अबाउट अर्जुन, आपसे क्या छुपाना लेकिन अर्जुन से बात करने के लिए वह मरी जा रही है. वीसा भी शादी के बाद तक एक्सटेंड करवा लिए है उन्होंने." प्रीती के इतना कहते हे ऋतू दीदी हंसने लगी.

"नहीं मिलने वाला उन्हें वह और अगर ऐसा हुआ तोह मम्मी तुम्हारी वापिस कही नहीं जाने वाली.", ऋतू की हंसी में दोनों ने हे साथ दिए लेकिन कुछ लोग इतना खुश नहीं थे जितना यहाँ ये सब थी. पंजाब के इस बड़े शहर में माहौल अलग था.

"थानेदार, केहड़े बन्दे सी ओह जिन्हाना मेरे बचे दी यह हालत कर दी? मैं ोहना न सावेर डा सूरज नहीं वेखन देना.", ये सफ़ेद दाढ़ी वाले सरदार जी कोई 20-22 लोगो के साथ सरकारी हस्पताल में खड़े अपना रॉब झाड़ रहे थे. 2 सितारा पुलिस वाले के पास ज्यादा कुछ नहीं था कहने को क्योंकि डॉक्टर ने बताया था के तीनो मुजरिम काम से काम एक महीना यहाँ रहने वाले थे. हालत बुरी थी और हालात ज्यादा बुरे. परचा भी नशे और पब्लिक प्लेस पर maar-peet का दर्ज हुआ था.

"सोचा सिंह जी, यह केस अपने सतवंत सिंह जी ऐसी दे कॉल है. तुस्सी ोहना तोह हे जानकारी ले लिओ. मूंदे तह तुहाडे हॉस्पिटल दे बाद सीधे कचेहरी पेश होने, ओहदे बाद सजा सबूत दे आधार ते फैंसला होना.", इन्होने मामले से पल्ला झाड़ा था सरपंच सोचा सिंह सामने से आते इन ऐसी से ru-ba-ru हुए.

"तू बहोत वड्डी गलती करती मेरे मूंदे न केस विच फसा के सतवंत सिंह. ेहना डा कुछ विगड़ने नहीं ते तेरा कुछ रहना नहीं. तेन्नु पता न के मेरे कॉल लागे दे 15 पिंड डा समर्थन है. तेरे अफसर नाल वि मैं चा पिण्डा है.", यहाँ वह पुत्रप्रेम में बह कर ज्यादा हे बोल गए थे और हाथ पकड़ लिए था ऐसी सतवंत सिंह जी का.

"दार जी, तुस्सी बहोत वड्डी टॉप हो. मैं जान डा है. मूंदे तुहाडे कुड़ियां छक्कन लग्गे सी, नशा तेह हथियार वि गद्दे तोह बरामद होया. मैं तुहाडी लिहाज करके किडनेपिंग ते एटेम्पट तो रपे दे चार्ज तोह ेहना न बचाया लेकिन तुस्सी मेरी िज्जात्त उड़ेली जाने हो.", इनका स्वर ठन्डे पानी सा शांत था. कोई गुस्सा नहीं कोई शिकायत नहीं.

"तू फेर वि गलती करती. मैं कड़े मेरे बचे न धुप नई लगन दित्ती, अज्ज ॉडी एक baah-latt ते सामने दे 2 दंड टूटे पाए ने. कुल 18 टाँके शरीर ते ने. बाँदा बन्न के ोहना डा ना दस् दे नहीं ते फेर मैं अपनी आई तेह आया फेर यह न कही के मैं की कित्ता.", गुस्सा में कोई कमी ना आई थी इनके. वैसे हे गर्जना करते हुए सरपंच साहब अपने आदमी दिखने लगे थे ऐसी साहब को.

"मूंदे नहीं सी ओह कल्ला मुंडा सी. केहड़ी चौधर दी गल्ल करदे हो तुस्सी, ना वि दसदा ते पता वि. साडी मदद वि चाहिदी होव तह दस् देयो.", ऐसी सतवंत ने नाम बताने से पहले कान पर हाथ लगाया तोह सरपंच सुच्चा सिंह जलती आँखों से घूरने लगा.

"केहड़ा पैदा हो गया जो सरदार सोचा सिंह बरार नाल जाती ला सके.?"

"नरिंदर शर्मा, सप रामेश्वर जी डा मुंडा. ॉडी कुड़ियां छक्कन न फिरदा सी तुहाडा मुंडा ते ोस्डे आदि. जिसने ेहना दी मरम्मत कित्ती न ओह कुड़ी डा यार नई सी, कोई अपना हे सी. शंकर वर्ग लेकिन साहू. अस्सी एक्को पिंड दे ने बरार साहब पर जाकीं मैंने ओह बाँदा बदला नई सी ले रेया. जित्थे तुस्सी सरपंची करदे हो 11 पिंड दे बाद अगला शहर पंडित जी डा है तेह पूरे 30 पिंड वि. करो फ़ोन ोहना न और दस्सो की होया, नहीं मैं कहना है के तुहानू दिक्कतत है. मुंडा तुहाडा ोहना दी दही (बेटी) छक्कन लगेया सी.", हर लफ्ज़ किसी पत्थर सा असर कर रहा था सोचा सिंह बरार पर. पंजाब में पैदाइश हुई थी लेकिन जिस जगह उनका दबदबा था उसके साथ लगता अगला हे शहर पंडित रामेश्वर जी को अपना बीटा मानता था. उनसे और उनकी ताक़त से ये व्यक्ति ाचे से वाकिफ था.

"नरिंदर छड्ड भरवा (भाई) ओह कॅशे न जान लावे. मेरे मूंदे न मैं आप साम लू, तू बस इलाज चंगी तरिया करवाई. साले कर्मा विच यह दिन खास लायी आये मेनू वि नई पता. शंकर ने जेहड़े 2 मूंदे गायब कित्ते अज्ज तक गवाही नहीं पायी, मेरा तह एक्को हे है. माफ़ करि कोई गल्ल निवि कित्ती होव तह.", सरपंची गायब हो गयी थी एक हे पल में और आज ये भी मालूम चला के नरिंदर को बहार रखते हुवे भी रामेश्वर जी ने अपने पैतृक शहर के साथ हे रखा था. शंकर जी भी उतनी हे परवाह और ध्यान रखते थे यहाँ, छोटी मोती बातों को छोड़ कर.

"सरपंच जी, वैसे गल्ल कहा एक बुरा न मान्यो.?" सतवंत सिंह ने बात जारी की तोह थानेदार जी की भी उत्सुकता बढ़ गयी की अब वह क्या कहने वाला है.

"महेश (शिव जी) संहारे पापी, नारायण सुधरे जून. मेनू संवरी दातिया, साफ़ राखी खून. ओह मुंडा शंकर हुँदा तह मूंदे मिलने नई सी. ओह दिल डा साफ़ तेह अपने ताक़त न पेहचानदा सी. तुस्सी गलती नाल वि ओस सच्चे बन्दे नाल पन्गा न लेयो. किथे जगह ोस्डे मुताबिक होई तह मेनू नई लगदा ओह किसे दे हद्द सलामत राखु.", सरदार सतवंत सिंह ने अर्जुन के बारे में ऐसे बताया जैसा उन्होंने महसूस किआ था.

"कोई न सतवंत मैं ध्यान रखेंगे. तू हो सके तह केस हल्का कर दे मित्र.", यहाँ जैसे भीख मांगने लगा था वह सरपंच.

"मैं कड़े feem-bhukki न हाथ नई लाया सरदार साहब, झूठा केस कीड़ा बना सकदा सी? यह असल परचा है जिस विच साफ़ लिख्या है के आपसी लड़ाई तेह पब्लिक न परेशां कारन डा जुर्म है. बैल मिल जोगी लेकिन अपनी गल्ल ते रहियो.", उन्होंने फिर की प्रति थमते हुए अपने सी को सलाम किआ और अंदर चले गए.

"मैं कह्या सी तुहानू के यह बाँदा रब्ब न सामने रख के चलदा सरपंच साहब. मुंडिया दी ज़िन्दगी खराब नई करदा सतवंत. बाकी एनकाउंटर करदे होये वि ओह गुरु गोबिंद सिंह जी डा ना लेंदा है, याद रखियो.", सी साहब भी यहाँ से निकल चले.

"बाबा मेहर करि. बचाव हो गया बहोत है.", सरपंच इतना कहता फिर से िक में चला गया. बहोत भरी पड़ गया था ज़िन्दगी से खेलना उसको भी और उसकी औलाद को भी.

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अर्जुन आरती के बताये समय पर सावधानी से उस कमरे की तरफ बढ़ चला जहा वह अकेली बड़ी बेसब्री से उसके इन्तजार में थी. रसोई को पार करते हे इस तरफ बस आरती दीदी का हे कमरा था. दरवाजा पूरी तरह से ढाल कर वह जैसे अर्जुन की नजरो की प्रतीक्षा में अंदर क़ैद थी. सावधानी से हैंडल घूमते हुए अर्जुन ने दरवाजा खोला तोह कमरे में पूर्ण अँधेरा व्याप्त था. कूलर की ठंडी हवा के साथ हे आरती दीदी की इस मधुर आवाज ने स्वागत किआ.

"बंद कर दो और लेफ्ट साइड पर जो बोर्ड है वह पर दूसरे बटन को दबा दो.", अर्जुन ने दरवाजा बंद करने के साथ हे चिटकनी चढ़ा दी. अँधेरे में हे हाथ घूमते हुए वह बोर्ड ढून्ढ कर दूसरा बटन दबाते हे अर्जुन मंत्रमुग्ध सा उस काली चादर पर फैले नूर को देखने लगा. रौशनी बस बिस्टेर पर केंद्रित थी लेकिन उस पर करवट लिए लेती आरती का ये रूप सोच से भी परे था अर्जुन के लिए.

"सच में आप हे हो?", अर्जुन ने अपनी हे बात को परखने के लिए बटन बंद करके फिर से चालू किआ तोह आरती के सुन्दर मुखड़े पर ये शर्मीली मुस्कान सीधा दिल पर असर कर गयी. उस अंतःवस्त्र की अभिनेत्री की तरह आरती दीदी ने अपने जिस्म पर ये काली जैकेट जो ब्रा जितनी हे थी, काली 6 इंच की स्कर्ट और घुटने तक की काली पारदर्शी जुराबे पहनी थी. चौथा वस्त्र उस bra-jacket के पीछे छिपा था. लम्बे बाल भी बड़ी सफाई से एक तरफ बिस्टेर पर बिछे थे. वह पहले हे खूबसूरत थी और उतनी हे खूबसूरत बड़ी आँखें उनकी सुंदरता उभरती थी लेकिन उनके ऊपर लगाया वह काजल बहोत था अर्जुन की ख़ास हसरत पूरी करने के लिए.

"तुमने यही देखा था और मैं भी चाहती हु की जब तुम मुझे प्यार करो तोह वैसे हे जैसे तुम चाहो. तुम्हारी मर्जी, ख्वाहिश और सपने की तरह.", अर्जुन उनकी बात सुन्न कर करीब आ गया. गोरी गोल चिकनी जाँघे माँ सी चिकनी लग रही थी. नग्न समतल पेट और वह गोल नाभि देख अर्जुन बस करीब बैठ गया. जैकेट से उस जालीदार काली ब्रा की झलक मिल रही थी और जिस्म से उठती ये भीनी भीनी सुगंध बहोत थी अर्जुन का संयंम तोड़ने के लिए.

"ये किसी भी ख्वाब से परे है और आपको पता भी है के ऐसा करके अपनी क्या गलती कर दी है.?", अर्जुन ने अपना हाथ उन गोल जांघो पर फिरते हुए धनुषाकार लाल होंठो को देखते हुए कहा.

"मेरा पहली बार है और तुम डर रहे हो की काबू नहीं रहा तोह मुश्किल हो जाएगी.", आरती दीदी निसंकोच अपनी बात कह रही थी. वह शर्म कही भी चेहरे पर न थी जो हर घडी पूरे 365 दिन उनको बांधे रखती थी. बेशर्मी भी न दिखी क्योंकि वह एक हे मुद्रा में लेती बस अर्जुन को देख रही थी

"कभी ऐसे सपने को ख्वाहिश नहीं बनाया न. ऊपर से वह साक्षात् सामने है तोह दुविधा होना लाजमी है.", अर्जुन के हाथ सरक कर जांघो की लकीर पर करके स्कर्ट को उठाये उन गोल नितम्बो पर पहुंच गए. पानी से चिकने कूल्हे उतने हे नरम और purn-golakaar थे. एक पल के लिए आरती की भी आँखें मुंड गयी लेकिन फिर से अर्जुन को देख कर उन्होंने अपनी बात कही.

"मैं भी चाहती हु की तुम्हारे लिए और बस तुम्हारे सामने मैं वैसे राहु जैसी मैं नहीं हु. हर वक़्त कुछ जंज़ीरे मुझे जकड़े रहती है अर्जुन, तुम्हारे साथ मैं इनसे दूर हे रहना चाहती हु. कर सकते हो मुझे ऐसा प्यार जिसमे सपने, दर्द, हम और प्यार हो?", आरती के ऐसे जवाब और सवाल से अर्जुन उनके ऊपर झुक गया.

"कई बार मैं भी कुछ बंधन तोडना चाहता हु दीदी. बस वह आपके जैसे हे मैं चाहता हु.", अर्जुन ने भी पुष्टि कर दी की वह उनके साथ वैसा हे होने को तैयार है जैसा दीदी उसको कह रही है.

"दीदी नहीं आरती. या जो तुम्हे ठीक लगे लेकिन...", उन्होंने जैसे अर्जुन को देख कर ये कहा वह चेहरे पर झुकता हुआ रुक गया.

"लेकिन?"

"ये राज बस हम दोनों का.", दीदी ने खुद हे बात पूरी करते हुए बड़ी अधीरता से अर्जुन के होंठो को जैसे नोच हे लिए. ये अलग हे संसर्ग की शुरुआत थी. अपने ऊपर अर्जुन को खींचती आरती ने आज खुद कहा था के कोई बंदिश नहीं कोई लगाम नहीं. अर्जुन भी उत्तेजना से उनके नरम होंठो को चूसता उस मांसल नरम शरीर को निचे दबाने लगा.

"ये सब इस रात के साथ हे चले जाने चाहिए.", जैकेट को खोलने के प्रयास में वह एकमात्र बटन का टूटना और आरती का ऐसा कहना बता रहा था के ये रात वह हमेशा दिल में हे रखना चाहती है, बिना किसी और सबूत के. झटके से जैकेट खुलते हे दोनों कठोर वक्ष पारदर्शी जालीदार ब्रा में क़ैद उसके सामने आ गए. गुलाबी निप्पल लालायित कर रहे थे की मुँह में भरो या दबाओ लेकिन बस देखो मैट.

"आपने तोह पागलपन भी पीछे छोड़ दिए."

"तभी तोह पता लगेगा मैं ज़िंदा भी हु या बस जी रही हु.", उन्होंने अर्जुन के हाथ उन मांसल उभारो पर रखते हुए खुद से लगा लिए. निक्कर के अंदर से हे फुंफकारता वह अजगर स्कर्ट पर ठोकर मार रहा था. इधर अर्जुन के मजबूत पंजे चुचो को भँभोङते हुए उनकी नरमी और कठोरता का मिश्रण माप रहे थे. होंठ लार से भीगे फूलने लगे और इधर वह नाजुक जालीदार कपडा भी 'चर्र' से अलग हो गया.

"ाःह.. खा जाओ सबकुछ.. उम्म्म.. ", गुलाबी निप्पल ुक्रे हुए न्योता देने लगे तोह अर्जुन ने भी देरी न करते हुए तपते गीले होंठो में उन्हें क़ैद कर लिए. वह जैसे उन्हें पीना चाहता था आरती भी पूरी इजाजत देती उसको चूसने देने लगी. पीठ सहलाती हुई वह दूसरे हाथ से स्कर्ट भी कमर से ऊपर कर चुकी थी. अब वह मोटा डंडा कही कही छूट के करीब रगड़ देने लगा. इतना रस भरा होगा उन चुचो में ये अर्जुन को भी मालूम न था या शायद इस से पहले वह एहतितयात रखता था के किसी को दर्द न हो.

"आपने ये क्या कर दिए है मुझ पे? मेरा काबू जा रहा है.", अर्जुन ने दोनों निप्पल दबा के चूसने के बाद निर्वस्त्र छूट को मुट्ठी में भरते हुए कहा. बालो का रोया तक न था उस झालर ढकी छूट के aas-pas. अर्जुन के ऐसा करने पर तेज सिसकारी लेती वह कमर उठाने लगी.

"जिसने दिया है वही पूछ रहा है के दर्द क्यों है. ये तड़प ऐसे शांत न होती अर्जुन, बहोत अरमान लिए तुम्हारा इन्तजार करती रही मैं. अब देरी न करो अपना नाम पक्का करने में.", निक्कर के ऊपर से वह सख्त लिंग मसलती हुई जैसे उसको और कड़ा करने लगी थी. होंठो को पीटा हुआ वह भी उनके नंगे कूल्हे मसल कर कमर ऊपर उठाने लगा. निक्कर आरती ने हे खिसका दी और स्कर्ट झटके से फाड़ कर अर्जुन ने. वह इस शबनम बहती अक्षत योनि को पीने हे लगा था के आरती दीदी उसके निचे से निकलती निर्वस्त्र अपनी अप्सरा सी काया दिखती अर्जुन के चेहरे के दोनों तरफ पाँव रखती सही मुद्रा में उस तन्नाए लुंड पर झुक गयी. लम्बे बालो से ढाका कमर से निचे का अर्जुन का भाग वह खुद भी न देख सका.

"यहाँ दोनों को बराबर रहना है.", आरती ने इतना कहते हे लुंड की जड़ को थाम लिए. न घृणा न शर्म, बस उस लाल सुपडे को निहारने के बाद वह नरम होंठो में अग्रभाग दबती चूमने लगी. अर्जुन को भी अपने होंठो के पास ये महकती फूली हुई योनि नजर आई तोह उन गुदाज फांको को मुँह में भरते हुए वह भी रस लेने लगा अपनी ज़िन्दगी में आये इस अनूठे मिलान का. हर कटरा शहद सा मीठा और उतना तरल था. सम्भोग में संगिनी का ऐसा साथ कही भी वर्णित न था लेकिन आज वर्णन करके कौन उपेक्षा करता इस बहुमूल्य मिलान की. जल्द हे होंठ अपनी चौड़ाई से अधिक फ़ैल कर आधा लिंग अंदर समाये ऊपर नीचे होने लगे. इधर अर्जुन भी फांको के बीच निकली इस गुलाबी चूंच को होंठो में पकड़ कर दबाते हुए आरती को ये चरमसुख देने लगा जो बस एक शुरुवात था.

"आह्ह्ह्हह.. उम्मम्मम..", जैसे हे स्खलन हुआ एक पल के लिए लुंड छोड़ कर आरती सिसकने लगी पर तुरंत हे अपने मॉटे कूल्हे निचे करती वह अर्जुन को बताने लगी की मधुकुन्द अभी भरा है. चुसाई से लुंड भी फूल कर फटने लगा तोह दोनों अलग हो गए.

"कैसे करना है?", दीदी का ये सवाल भी अजीब हे था.

"आप कैसे चाहती है?"

"जैसा तुमने सिर्फ सोचा हो.", और अर्जुन ने इतना सुन्न कर वह नीली निवा क्रीम की डब्बी से चिकनाई लुंड पर लगते हुए पूरा चिकना किआ और कुछ उन गुलाबी मॉटे छूट के होंठो पर लगाने के बाद आरती को बिस्टेर पे करवट के बल लिटाते हुए उसके पीछे से मुद्रा बना ली. एक टांग हाथ में ऊपर उठाये अर्जुन उस नाजुक सी फूली हुई कौमार्य रचना पर अपना कामदण्ड टिका कर, उनके सर को अपनी तरफ घुमाये ये मादक चुम्बन करने लगा. चुके नजाकत से हिलते बता रहे थे की जो भी करो लेकिन दिल से. कमर का इतना तीव्र धक्का पहले नहीं लगा था. शरीर मरणासन्न सा पलभर जड़ हुआ और 5 इंच लुंड ने हर परत को फाड़ते हुए छूट की आधी से ज्यादा दुरी लांग दी.

"आठ..", ये सीत्कार अर्जुन की थी, आरती जैसे सदमे में हो लेकिन इतना जोर अर्जुन ने भी कभी न लगाया था. अगले धक्के में पूरा लुंड समां चूका था और आरती की छूट से अविरल रक्त, आँखों से अश्रु बहने लगे. नरम मांस के गोलों को मसलता अर्जुन प्रववत्त उन गुलाबी होंठो को पीटा रहा. जल्द हे आरती की मीठी जीभ हरकत करती अर्जुन के मुँह में घूमने लगी और दुमदार कूल्हों के बीच वह खून से सना लुंड भी छूट के हर हिस्से को फैलता आगे पीछे होने लगा. कमरे में कोई आवाज न थी, बस गहरी सांसें और ऐसा मिलान जो कल्पनी हे हो सकता था. रक्त के छींटे बिस्टेर पर गिरने बंद हुए लेकिन एक लकीर उस काली चादर में समाती रही.

"आह्हः... अर्जुननननन.. थिस इस ड्रीम. थिस मोमेंट, अरौसल, पैन एंड नाउ थिस फीलिंग. ी वांट तो stay...aahhh.. ी वांट तो स्टे हेरे फॉरएवर.. थिस पैन विल केएम रेमिन्डिंग में ऑफ़ माय फर्स्ट एंड थिस प्लेअसुरे. ी लव यू अर्जुन, don't स्टॉप, दो आईटी एंड टेक में तो आवर प्लेस.", आँखें बंद किये आरती अपनी फटी छूट की परवाह न करती उस 9 इंच के लिंग को छूट में कस्ती और कभी ढील देती पूरा अंदर ले रही थी. जल्दी हे फिर से चिकनाई निकलने लगी लेकिन कूल्हों पर धक्के निरंतर लगते रहे.

"मेरा नाम आप क्या लेती हो?", अर्जुन ने ऊपर वाले चुके को मसलते हुए कान में कहा.

"ारु.. आठ..", गर्भ में ठोकर लगते हे रस बहने लगा.

"ारु आप हो अब हमारे समय में. आअह्ह्ह..", गीले चेहरे पर दर्द में भी ये मुस्कान तैर गयी आरती के. अर्जुन ने अपना हे नाम दे दिए था.

"आपने एक पल ये नहीं कहा के आप क्या चाहती हो. इतना प्यार देने के बाद अब मेरी बारी है वही दोहराने की, लेकिन मेरे कमरे में.", अर्जुन लगातार चुदाई जारी रखे उन्हें बता रहा था के वह अब उनके शहर में क्या करने वाला है वापिस जाने के बाद.

"मन नहीं करुँगी.. उम्म्म.. बस एक और ख्वाहिश है.. आह्ह्ह्ह..", पीछे हाथ करते हुए आरती ने अर्जुन के कूल्हों पर नाखून चुभाये तोह लुंड पूरा गहराई में उतर गया. मजे से अर्जुन वही ृक्क गया एक पल को.

"आठ.. अभी भी बहोत टाइट हो.. बोलो ारु क्या ख्वाहिश है?", गले को चूमता हुआ वह चुदाई के साथ हे छूट को ऊपर से सहलाने लगा.

"घर वापिस जाने के बाद बता दूंगी.. उम्म्म.. आठ. अब इन्हे थोड़ा काम दबाओ. सुबह कपडे भी पहन ने है.", बात बदल कर आरती ने कूल्हों को पीछे हिलाते हुए अर्जुन के लुंड को जकड लिए. अचानक हे वह फुहारा छूट को भरने लगा और अर्जुन कस के पीछे से लिपट कर हांफने लगा. बेशक चुदाई लम्बी चली थी लेकिन इतना सबर वह हमेशा रखता था. गधा वीर्य छूट में भरते हुए वह वैसे हे काँप रहा था जैसे आखिरी बार ऋतू दीदी के साथ हुआ था. आँखें एक पल के लिए बंद हुई तोह 10 मिनट बाद हे होश आया. आरती छूट से खून और वीर्य साफ़ करने के बाद उसके लुंड को भी दुरुस्त कर रही थी.

"मुझे क्या हुआ था?"

"बॉल्स हिप्स में डालने पर दबंगई तोह दर्द होगा हे. घर को उठाने वाले थे तुम और बता देती हु की अभी मुझे माँ नहीं बन्न न, बेशक तुम चाहो तोह कुछ साल बाद हम ऐसा कुछ करने का सोच भी ले लेकिन आइंदा ध्यान रखना के पीक पर पहुंचने वाले हो तोह अनल part से पेनिस दूर रखना. दोनों को शामे टाइम हुआ तोह हिप्स में ये डब्ब गयी थी.", अंडकोष पर गीला टोलिया रखे वह अर्जुन को समझा रही थी की उत्तेजना में कोनसी गलती नहीं करनी. उस रात भी ऋतू दीदी के साथ बार बार उसका लिंग जड़ के पास से और अंडकोष कूल्हों में डब्ब रहे थे.

"सॉरी, जहा मुझे आपका ध्यान रखना चाहिए था आपने मेरा रखा. आपको पेनकिलर दू?"

"दर्द नहीं है और जब अपना नाम दे दिए है तोह ध्यान मुझे हे रखना पड़ेगा. वैसे एक बज चूका है, अपने कमरे में या यही सोने वाले हो?", दीदी के चुके नीले होने लगे थे, छूट पर भी वह गीला कपडा रखे थी लेकिन कमाल की हिम्मत थी जो वह अर्जुन की हालत पूछ रही थी. जिस्म पर वह पारदर्शी जुराबे भी गायब करने के बाद वह निर्वस्त्र हे उसके चेहरे क सहलाती प्यार से उस से पूछ रही थी.

"आपके पास सो जाऊ तोह दिक्कत तोह नहीं होगी?"

"नहीं होगी लेकिन मैं नींद में लिपट गयी तोह तुम्हे यहाँ दर्द हो सकता है. वैसे चांस काम है लेकिन थोड़ी देर तुम्हे पाँव फैला कर ऐसे हे सोना चाहिए.", दीदी ने बात कहते हुए एक प्यारा सा चुम्बन दिए तोह अर्जुन ने भी हलके से उनके दोनों उभर चूमने के बाद होंठो पर प्यार किआ और गूडनिघत कहता सावधानी से वह से निकल गया.

'गुलाम बना लिए तुमने मुझे अपना. अब बुखार हुआ तोह तुमसे हे सेवा करवाउंगी, पागल कही का.', मुस्कुराती हुई आरती ने एक बार भी अर्जुन के सामने दर्द न जाहिर किआ था. कैसा प्यार कर बैठी थी वह लेकिन अर्जुन ने भी इस मिलान के बाद बहोत कुछ सोच लिए था. आरती को उसके सपने के मुताबिक हर बार प्यार करने के लिए. ये वाला बस एक बार बहोत था.
 
सब सही रहा तोह पंजाब का संस्करण आज पूरा कर हे दूंगा दोस्तों. अगले 2 दिन काम धंदा भी देखना है. लोखड़ौन ने पहले हे सब चौपट किआ हुआ. कहानी वैसे हे चलती रहेगी बस थोड़ा काम भी करना पड़ेगा. 11 बजे सन्देश दे दूंगा क्योंकि मंगलवार दूर है और Billi420 परेशां
 
अपडेट 108

खेल - 4


इधर रात 11 बजे शहर के किसी और हिस्से में लकी और दीपक एक सरकारी आवास के ठन्डे कमरे में बैठे बातें कर रहे थे. लकी का समय हमेशा की तरह मदिरापान का था और दीपक उसके लिए जाम बनाते हुए कुछ फाइल पर लिखे नाम भी पढ़ रहा था.

"तोह मेरे भाई, कैसी रही शाम? लड़ाई तोह नहीं देखि लेकिन उन लोगो की हालत तोह देख हे ली तुमने.", लकी सिग्रत्ते का धुआं बहार उगलते हुए इत्मीनान से धूम्रपान का मजा ले रहा था.

"देख बुरा मत मान न लेकिन साला दिमाग में कोई सर्किट जरूर खराब है इस अर्जुन के. सी से फाइल न लेनी होती तोह ये भी पता नहीं चलता. हालत देखि उन तीनो की?", बर्फ के 4 टुकड़े जाम में डालने के बाद दीपक ने अपने लिए भी खाली कांच के गिलास में शरबत वाला दूध उड़ेला और उसमे भी बर्फ मिला कर शांत हो गया. आज थोड़ी हे देर पहले वह दोनों रामेश्वर जी द्वारा बताई फाइल और कुछ लोगो की जानकारी के लिए #### थाने गए थे और वह से सरकारी हॉस्पिटल. यहाँ उन्हें ऐसी सतवंत सिंह से भी मिलना हुआ और उन्होंने 3 घायल युवक और एक घबराया हुआ सरपंच भी देखा था.

"हालत फिर भी ठीक हे थी तीनो की, शायद तरस आ गया होगा जो उन्हें बहार से हे ज्यादा मारा. लेकिन मेरी बात का जवाब नहीं दिए तुमने.", लकी ने अपना जाम दूध के गिलास से भिड़ने के बाद एक छोटा सा घूँट लिए.

"हाँ यार, सी ने तोह ज्यादा नहीं बताया था लेकिन ऐसी कह रहा था के ये सारा मामला 15 मिनट भी नहीं चला होगा. और लोग भी लड़को की खिलाफत कर रहे थे जैसे वह भी अर्जुन के हिमायती हो. कुछ भी कह पंडित जी के पास पहले से हे शंकर जी जैसा छुट्टा सांड है और ऊपर से ये लड़का अभी 18 पार हे हुआ लेकिन बाप का बाप होने जा रहा. और ऐसी इतने करीब से कैसे जानता है पंडित जी को? उसको अर्जुन के बारे में तोह कुछ पता नहीं था लेकिन नरिंदर जी की दोनों बेटियों को पहचानता है."

"एक बार संजीव ने मुझे बताया था के रामेश्वर जी के परिवार का ाचा रसूख है ये अगले शहर में. पिताजी वह के महाराजा के मुंशी थे लेकिन चरित्र के बड़े असाधारण व्यक्ति. शहर के साथ लगता एक पूरा गाँव पंडित जी के पिता को दिए था महाराजा ने और आगे चल कर उनके पिता जी ने गाँव को इतना समिर्ध कर दिए के उस समय हे वह स्कूल, पानी, बिजली और शहर तक सड़क बनवा दी गयी थी. पंडित जी और उनके छोटे भाई ने गाँव के लोगो को वह जमीन दे दी जहा उन्होंने घर बनाये थे. आसपास के गाँव भी वही आने लगे और दोनों भाइयो ने अपनी क्षमता अनुसार सबकी मदद की.", फिर एक और घूँट लेने के बात अपनी बात जारी की.

"उनके छोटे भाई का नाम कृष्णेश्वर है जो बड़े हे भले व्यक्ति है, उनसे तोह मैं मिला भी हुआ हु. पास लगते गाँव में गुरुद्वारा साहिब के लिए उन्होंने अपनी जमीन और कारसेवक दिए थे. उस गुरुघर के संरक्षक है सतवंत सिंह जी के पिता, जो पाती भी है और शिक्षक भी. एक तरह से यहाँ रहकर नरिंदर जी गाँव जो अब क़स्बा है, वह की dekh-rekh भी करते है और यहाँ सुकून से अपनी ज़िन्दगी भी व्यतीत करते है. दोस्त बहोत है उनके लेकिन शंकर जी से ऊपर उनका भी कोई नहीं. अब बता के तुझे क्या समझ में आया इस ram-kahani में.?", बात ख़तम करते हुए लकी ने जाम में 2 बर्फ की टुकड़ी और डाली.

"रामेश्वर जी और उनके भाई ने लोगो के लिए बहोत किआ लेकिन जहा तक लगता है उन्होंने इस श्रेया नहीं लिए. बात पुराने समय की है तोह #### वह शहर नदी किनारे है तोह इस शहर से ज्यादा पुराण और ऐसा होने पर यहाँ तक भी पंडित जी के पिता का नाम जरूर होगा. गाँव देहात में तोह लोग वैसे भी पीढ़ियों को याद रखते है ये तोह अभी भी ज़िंदा है और शायद नरिंदर जी वैसे हे काम करते होंगे जैसे उनके baap-dada ने किये. मतलब साफ़ है के इनकी जेड बहोत मजबूत और गहरी है जो दूर दूर तक फैली हुई है.", दीपक ने सबकुछ सही समझा था.

"तोह दूसरी बात ये है के संजीव तोह आ गया अपने साथ बाकी कोई लड़का घर में है नै सिवाए अर्जुन के तोह आगे ये काम अर्जुन करेगा या फिर कृष्णेश्वर जी का पौता जो अभी 2 महीना का होगा शायद. लेकिन अर्जुन को मानसिक रूप से तैयार किआ जा रहा है जिस से वह फैंसले लेने में सक्षम हो सके. हाँ वह अलग बात है के ये उसकी मर्जी रहेगी के वह पुश्तैनी काम संभालता है या नहीं लेकिन सबसे जरुरी बात जो संजीव ने भी बताई और मैंने खुद भी समझी है, अर्जुन को कुछ भी कहो लेकिन गलती से उसके परिवार पर बात आई तोह वह रोके नहीं रुकने वाला. मोहर सिंह एनकाउंटर में मारा था लेकिन 2 लोग और थे न उसके साथ जिनमे से एक नाकारा हो चूका है और दूसरा अभी भी कुछ महीनो तक कितने ऑपरेशन सेहन करेगा. वह दोनों इस हाल में इसलिए पहुंचे क्योंकि उन्होंने संजीव पर हुम्ला किआ था, अर्जुन के सामने. सतवंत जी को मैंने आते हुए अर्जुन की असलियत बताई है और वह अब खुद कह रहे थे के एक बार और अर्जुन से मिलना चाहते है.", लकी ने जाम ख़तम करना हे उचित समझा और दीपक अपनी सोचो में डूबा रहा. फिर थोड़ी देर बाद हे बोलै.

"यार लड़का हैं तोह कमाल का हे. मैं न संदेह करता हु क्योंकि ये हमारी आदत है. Ladai-jhagde के परे भी न उसमे बहोत कुछ ख़ास है. अब कैसे कहु के मुझे उसके साथ थोड़ा समय बिताना है और खुद हे अपने सवाल एक तरह से बिना पूछे jaan-ne है. ऊपर से तुझे ये न पता हो की 2-2 कमाल की गर्लफ्रेंड है उसकी और वह आपस में भी दोस्त है."

"मेरे बाप उन लड़कियों का जीकर भी मत करियो. डिम्पी बता रही थी की वह सुदर्शन की हालत उन दोनों की वजह से अर्जुन ने ऐसी की थी. हम पडोसी थी जब पैदा हुए उस से पहले से और मेरी बहिन के साथ हे उन दोनों में से एक लड़की अर्जुन के साथ बचपन से जुडी है, प्रीती नाम है उसका. बहार देश की है वह लेकिन छोल साहब की पौती है, उनसे तोह तू मिला हे है शंकर चाचा के साथ और पंडित जी के साथ. अर्जुन की जान उस लड़की में बस्ती है और दूसरी की ज्यादा खबर नहीं. तू अर्जुन के साथ ghul-mil, समय बिता और जो दिल करे वह बात कर बस ऐसी कोई बात मत करना के वह तुझसे नाराज हो जाये. वैसे तुझे एक और बात बता देता हु.", लकी ने बात रोकते हुए दीपक की तरफ देखा.

"बता बे."

"तू Haridwar-Hrishikesh क्यों गया tha.?",Lucky के सवाल पर दीपक झुंझला गया.

"पूछ रहा है या बता रहा है? पता है न के नींद नहीं आती ज्यादा मुझे, टेंशन में आ जाता हु और दवा कहानी पड़ती है. आचार्य प्रमोद जी से इसके निवारण के लिए मिलने गया था. करता हु अब थोड़ा बहोत ध्यान और फरक भी पड़ रहा है. तू अपनी बात पूरी कर."

"वह आचार्य अपने शहर के है तोह तू उनसे मिलने वह क्यों गया?"

"बेवकूफ जैसी बातें क्यों कर रहा है यार लकी? यहाँ नहीं मिलते वह किसी से और हृषिकेश में भी मिलने के लिए मुझे 2 महीने पहले जुगाड़ लगवाना पड़ा था. हाँ बहोत दिलचस्प इंसान है वह सब समझते है इंसान के बारे में और उसकी समस्या भी. ढोंगी वाले काम नहीं है कोई, प्रैक्टिकल और डीप साइंस के साथ योग की जाने किस ऊंचाई पर है आज."

"अर्जुन उनका चाहता है और उस से मिलते रहने के लिए आचार्य जी ने अपने कुछ टूर तक कैंसिल कर दिए है. नजर रखनी पड़ी थी अर्जुन के ऊपर कुछ दिन सुबह अँधेरे में, तब मैं जाना के वह 5-6 बजे या 5 से थोड़ा पहले भी उनसे मिलता है और दोनों घंटा भर साथ हे रहते है. अर्जुन का कोई नेटवर्क नहीं है लेकिन उसके साथ jaane-anjane वह लोग है जिनकी पहुंच रामेश्वर जी से भी ऊपर तक जाती है."

"बाप रे. तू सच कह रहा है, आचार्य जी के साथ उसका घनिष्ट सम्बन्ध है?"

"यूनिवर्सिटी का वक भी अर्जुन से मिलता देखा गया है, हो सकता है वजह कोई और लेकिन एक 2 जगह वह शायद खुद नहीं जान पाया के वह लोग कितने बड़े है. यही वजह है के वह लोग अर्जुन से जुड़ाव बनाये बैठे है क्योंकि वह प्यार करता है सबसे.", जाम ख़तम होने के बाद अब दोनों हे ऐसी बातें करते खाना गरम करने लगे. दीपक मेहनती अफसर था और शंकर जी के साथ निर्मल सिंह भी उसके कायल थे लेकिन अब वह खुद अर्जुन की तरफ खिंच रहा था.

.

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कोई 3 घंटे गुजरे होंगे अर्जुन को सोये हुए और अपने हाथ के नीचे ये नरम जाना पहचाना एहसास होते हे वह हाथ फिरते हुए जायजा लेने लगा. मांसल नरम पेट से रेंगता हाथ कही ज्यादा हे उभरे और लचीले मांस के गोलों पर आया तोह आँखें khud-ba-khud खुल गयी. गुरदीप बगल में आँखें मूंदे अर्जुन के स्पर्श का आनंद ले रही थी. शरीर पे पहने 2 चुस्त कपड़ो में से एक उसके उभारो की शुरुवात तक उठ चूका था अर्जुन के सहलाने से. लम्बी मांसल टाँगे भी अर्जुन एक पाँव से दबाये नींद में हे चिपक गया था जब वह खुद हे थोड़े समय पहले उसके बराबर आ लेती थी.

"क्या समय हुआ है अभी?", अर्जुन ने वह पहले हुए गोर गाल अपनी नजरो के 5-6 इंच नजदीक देखते हे गुरदीप को कमर से ऊपर पकड़ कर ाचे से सत्ता लिए.

"सही समय हो गया है, तुम सोये हुए थे तोह मैं बस तुम्हारे साथ लेट गयी. मेरा हे सपना देख रहे थे जो हर जगह naap-tol कर देख रहे थे? वैसे ाची बात नहीं है ये.", गुरदीप भी करवट लिए उसके सीने से लगी थी. अब उसका वह चिकना गुदाज पाँव अर्जुन के ऊपर था और मॉटे मुलायम दूध उसके सीने में धंसे थे.

"क्यों? जब पसंद मुझे किआ है तोह प्यार भी करने का हक़ मेरे पास हे हुआ. तुम जैसी लड़की ने मुझमे क्या देखा? वैसे मैंने तोह देख लिए है के तुम कैसी क़यामत हो.", अर्जुन को वह छोटे बटन से चूचक कपडे पर से भी अपने सीने में महसूस हो रहे थे. एक हाथ गुरदीप के निचे से उसको अर्जुन से लगाए थे और दूसरा उन नरम मॉटे कूल्हों को सेहला रहा था.

"देखा है तुमने अभी कुछ. और मेरा मतलब था के तुम अकेले हे लगे हुए थे, न बात की और न शामिल किआ. रही बात तुम्हे पसंद करने की तोह तुम्हे नापसंद करने की वजह हे नहीं मिली. और अब तोह ये गबरू अंदर से भी देख लिए है.", शरीर गदर्य और मांसल था गुरदीप का लेकिन nain-naksh भी जैसे ख़ास हे मिले थे उसको. ऊपर से साढ़े 5 फ़ीट की लम्बाई के साथ कूल्हों तक लम्बे बाल उसके हुस्न पर एक जरुरी पर्दा करते लगते थे.

"देखा तोह तुमने भी नहीं है अभी अंदर से. लेकिन दिल से कह रहा हु के तुम वाकई बहोत हसीं हो.", अर्जुन ने ये छोटा सा चुम्बन करके अपने कही बात पर जैसे मोहर लगा दी थी इस सरदारनी के जन्नत से हुस्न पर.

"हमारे यहाँ कहावत है के शेरनी को शेर हे संभल सकता है कोई बछड़ा नहीं. ऊपर से जरा खुद हे सोचो के 65 किलो की मैं किसी दुबले पतले पर आ गिरी तोह हड्डियां जोड़नी नहीं पड़ेंगी उसकी? न मुझे तिल्ली जैसी वह लड़कियां पसंद जो खाना काम और मेकअप ज्यादा खाती है. और न वह लड़के जो चेहरे पे बोझ और शरीर पर सिर्फ ढांचा लिए फक्की तोर बनाये उड़ते रहते है. बेबे हर रोज कहती है के घोड़ी हो रही हु तोह उनकी बात मान कर मैंने अपने लिए ये घोडा ढून्ढ लिए. खच्चर के लिए खुद को क्यों कम् करू?", यही थी गुरदीप, प्रेम के पालो में भी ऐसी कहावत देती थी की प्रेमी मुस्कुरा रहा था.

"शैतान हो तुम पूरी. वैसे सच कहु तोह जैसी हो न वैसी परफेक्ट हो. लोग क्या चाहते है इसकी जगह ज्यादा जरुरी है के हम कैसे खुश है. और तुम तोह अपने आप में खुशियों का पिटारा हो डीपी. उम्मम्माह्ह्ह..", इस बार गुरदीप ने भी चेहरा उठा कर सामने से अर्जुन के होंठो को पीने में साथ दिए. उसका उभरे हुए अपने मॉटे नरम कूल्हों पर फिरता हाथ खुद हे इलास्टिक निचे सरकते हुए सीधा निर्वस्त्र चिकने तन्न पर रखवा दिए. मलाई से कूल्हों का स्पर्श मिलते हे अर्जुन के लिंग में भी पूरी कसावट आने लगी. निरंतर एक दूसरे का मुखरास पीते वह महसूस कर रहे थे इस डोर का मजबूत होना जो विश्वास और प्रेम से बानी थी.

"किश करो तुम, हिप्स दबाओ तुम और यहाँ भी ये जाने क्या चुभा रहे हो लेकिन शैतान मैं हु? देखो मेरी शैतानी अब.", गुरदीप ने अर्जुन के गले का मांस होंठो में दबा लिए, लम्बे तराशे हुए नाखून अर्जुन के कूल्हे पर दबती वह जैसे उसका खून पीने का अभिनय कर रही थी लेकिन इसके साथ हे वह अपना सीना जोरो से अर्जुन के चौड़े सीने पर रगड़ती अपनी हे आग भड़का रही थी. अलग हुई तोह वह गुलाबी निशाँ बना चुकी थी.

"आया मजा या अभी और करू? िष्ठ्हह.. आह्ह्ह्ह.. पागल..", बात कहते हे ये मादक सिसकी निकल गयी गुरदीप के होंठो से. पल में हे आँखें बंद करती वह अर्जुन के सीने से लगे अपनी गर्दन पीछे करने लगी. दोनों तरबूज से कूल्हे निर्वस्त्र करने के बाद अर्जुन ने उस अनछुई पहली हुई छूट के निचले हिस्से में ऊँगली का एक पूरा दबा दिए था. जाने वह कबसे रस बहा रही थी जो छूट ने सामने से खुद हे जगह बना दी.

"मेरी शैतानी अभी शुरू हे कहा हुई है. वैसे तुम वह से भी ख़ास हे हो.", छूट के होंठो का आभास अर्जुन ने कर लिए था. जरुरत से कही मॉटे और चिकने वह निचले होंठ मक्खन से चिकने और रूई से नरम थे. ऊँगली निकल कर अब वह हलके हलके उनकी मालिश कर रहा था.

"बड़े गंदे हो कसम से. यहाँ हाथ लगा दिए सीधे. बेशरम कही के.", गुरदीप की सांसें तेज चल रही थी और उसको भी मजा आ रहा था जैसे अर्जुन उसकी कुंवारी मोटी छूट को मालिश करता महका रहा था.

"तुमने तोह खुद मेरे लिए जगह बनाई थी और इसमें गन्दा क्या है? तुम हाथ नै लगाती यहाँ? और ये तुमने रात में हे साफ़ किये है न?", अर्जुन का अभिप्राय छूट के बालो से था क्योंकि उसने वह कही महसूस हे नहीं किये थे.

"छी.. ये बातें करके बेशरम बना रहे हो अपनी तरह. और मुझे ाचा लग रहा था जब तुम हिप्स सेहला रहे थे.", जो पाँव ऊपर रखा था अर्जुन की टांग पर उसको ाचे से मदद कर खुद हे गुरदीप ने छूट तक का रास्ता आसान कर दिए था.

"बताया नहीं तुमने के तुम हाथ नहीं लगाती वह?", अर्जुन लम्बी ऊँगली छूट की फांको में ऊपर से निचे फिरते हुए गुरदीप को और गीला करने में लगा रहा. टीशर्ट के अंदर क़ैद गुब्बारे और फूलने लगे, चूचक जो चने के दाने जितने थे वह भी सख्ती दिखते बहार से हे पता चल रहे थे.

"आह्हः.. कभी कभी बस सेहला लेती हु सोने से पहले या बाथरूम में और इस उम्र में इतना तोह कर हे सकती हु.. आह्हः.. धीरे करो न साथ हे तोह हु.. उम्म्म.. फाइनल ईयर ख़तम हुआ है फिर भी यही तक रुकी हु लेकिन मेरे साथ की लड़कीअ तोह 12तह में हे अपने आशिक़ो के कमरे में जाने लगी थी. उम्म्म.. यूनिवर्सिटी में toh..aahhh.. और बुरा हाल था. आर्ट्स ब्रांच की कुछ लड़कियां तोह 3-4 को घूमती फिरती थी.. आह्हः.. ऐसे हे अर्जुन.. उम्मम्मम्मम्माह्ह्ह..", गुरदीप ने ये सुख पहली बार हे लिए था. चाहने वाले के हाथ अपने खजाने पर हरकत करते ये नया सुख दे रहे थे. बीच बीच में अर्जुन थोड़ी सी ऊँगली अंदर करता तोह कराह निकल जाती.

"फिर तोह मैं आर्ट्स ले लेता हु तुम्हारी यूनिवर्सिटी में.", गुरदीप द्वारा चुम्बन करने के बाद अर्जुन ने मस्ती में कहा.

"मार खाओगे जो यहाँ कही एडमिशन लेने की भी सोची तोह.. कह देती हु हाँ. जितने काबिल हो तुम्हे जी के एक्साम्स देने चाहिए और वह भी एडमिशन न हो तोह ंसित दिल्ली, नित, थापर, पेछ जैसे कॉलेज है. करियर को कभी मजाक में मैट लेना, ऐसी गश्तिया (प्रोस्टीटूटे) किसी की नहीं होती और अगर तुम्हारा ज्यादा दिल करे तोह मुझे बुला लिए करना, आ जाउंगी बिना सवाल किये.", गुरदीप एक हे पल में अलग हो कर बैठ गयी थी. चेहरे पर अब ख़ुशी की जगह जाने कैसा दर्द उभर आया था उसके.

"हे डीपी, एक्सट्रेमेली सॉरी. मैंने ये मजाक में कहा था जैसे बातें कर रहे थे. मैं तुम्हे ऐसा लगता हु, कही से भी.?"

"तुम बहोत प्यारे और सच्चे लड़के हो अर्जुन. मैं जानती हु के तुम कभी कुछ ऐसा नहीं करोगे क्योंकि तुम्हारी बहने, chacha-chachi को भी मैंने इतने साल से हर रोज देखा है. तुम्हारा नाम मुझे बहोत पहले से पता था लेकिन देखा अभी. मेरी ऐसी रिएक्शन के लिए सॉरी लेकिन ये जो सस्ते रस्ते होते है न इन पर शुरू में बड़ा मजा आता है लेकिन फिर सब अँधेरा.", अर्जुन के चेहरे को हांथो में थामती वह माथे को चूमने लगी.

"रिस्की ने भी ऐसे हे शुरुवात की थी, मैं उतनी समझदार नै थी तब लेकिन साल बाद कॉलेज जाने लगी तोह थोड़ा पता लगा के कुछ लड़किया कैसी होती है. भाई भी वैसी हे किसी लड़की के चक्कर में था. Pocket-money, उस लड़की की शॉपिंग, घूमना सब खर्चे वह उठता लेकिन वह उस से प्यार तोह करती नहीं थी. मेरी सहेली ने बताया था मुझे उस लड़की के बारे में. हमसे 2 क्लास आगे थी फाइनल ईयर में और उसका चक्कर जूनियर से लेकर टीचर तक से था. इंजीनियरिंग के तोह शायद 10 लड़के होंगे जिन्हे वह इस्तेमाल करती थी. रिस्की को भी उसने कैसे न कैसे काबू किये रखा और नतीजा, 7 एक्साम्स में फ़ैल. वह सिर्फ शराब नहीं पीटा अर्जुन, उसके चुप रहने के पीछे वह मेडिकल नशा है जो वह किये रहता है. शाम को वह जीप में मुँह नहीं छिपा रहा था, रुमाल में लगा केमिकल सूंघ कर वह नशा कर रहा था. तुम प्लीज कभी ऐसे माहौल में मैट शामिल होना अर्जुन.", अर्जुन को गले से लगाए वह एक दिन में हे कितनी परवाह करने लगी थी इस लड़के की. उसकी झील सी आँखों को प्यार से साफ़ करता अर्जुन बस देख रहा था.

"ऐसा नहीं होगा डीपी, लेकिन पूछ सकता हु के तुम्हारी फॅमिली ने रिस्की को समझाया क्यों नहीं?"

"क्या लगता है तुम्हे? बेबे ने अपनी कस्मे दी, पापा ने हर बात मानी और मैंने तोह ladna-jhagadna भी बंद कर दिए उसके साथ. हम सबकी ख़ुशी के लिए उसने बस इतना किआ की वह ऐसा कुछ अब घर नहीं करता लेकिन सांगत वैसी हे है उसकी. लड़कियां अब उसके लिए कोई मायने नहीं रखती बस उसको घर में अकेले और बहार उन लोगो के साथ रहना पसंद है जो दुनिया से अलग हो और काम बुरे करते हो. तुम कभी ऐसे मैट होना.", गुरदीप ने वह राज भी जाहिर कर दिए था जो शायद पूरी तरह प्रियंका या आरती से भी साँझा न किआ होगा. कुछ पल उसको प्यार से सँभालते हुए अर्जुन ने मूड ठीक करने की कोशिश की.

"वह तुम कुछ कह रही थी?"

"क्या? मेरी कोई बात बुरी लगी तुम्हे?", थोड़ी परेशानी से गुरदीप ने अर्जुन से पुछा.

"तुम कह रही थी न के अगर मुझे जरुरत पड़ी तोह तुम आ जाओगी मेरे पास. सच में हे ऐसा कर सकती हो या मुझे बहलाने के लिए कहा था.?", गुरदीप एक प्यारी सी मुस्कान देती अपनी टीशर्ट उतार कर उसके ऊपर आ बैठी.

"जब तुम कहो अर्जुन, मैं चली आउंगी. बस प्यार के बदले प्यार और कोई वादा नहीं.", अर्जुन शन्न भर के लिए उन gulabi-kathai से निप्पल को देखने लगा जो सफ़ेद बड़े मांस के गोलों के ठीक बीच उभरे हुए सुंदरता में इजाफा कर रहे थे. अपने माखन से चिकने उरोजों पर अर्जुन के हाथ रखती वह खुद हे उसके ऊपर झुकती चली गयी. इस बार होंठो में वही कशिश थी जैसी बेक़रार प्रेमिका के होंठो में होती है जब वह वर्षो बाद अपने दिलबर को सामीप्य में पाती है. 2-2 किलो के वह मॉटे दूध हथेली पर संभाले अर्जुन भी गुरदीप के मुँह के अंदर तक जीभ घूमता इस पागलपन में साथ देने लगा. हौले हौले कमर हिलती वह अर्जुन के कामदण्ड पर भी असर कर रही थी.

"कितने रूप है तुम्हारे.? आह आराम से बाबा. रुको मैं पजामा हटा हे दू.", अर्जुन ने रगड़ लगते हे अपना पजामा खिसका दिए. वह 3/4 इलास्टिक वाला कपडा भी गुरदीप के सौन्दर्य से हटते हुए अर्जुन खुद उसके ऊपर छाने लगा और दोनों हिलते चुचो को थामे गुरदीप की गुलाबी सहेली को चूमने लगा. पहले जहा ऊँगली ने कमाल दिखाया था अब ठीक उसी तरह जीभ उन मोटी फांको की मालिश करने लगी.

"उम्म्म्म.. कैसे कैसे गंदे काम करते हो.. इसशहहहह.... माहहहह... अंदर गन्दा haiiii....aahhhhh..", गुलाबी छेड़ में जीभ की नोक दबाते हे गुरदीप ने पानी बहा दिए. पेशानी पर पसीने की बुँदे आई देख अर्जुन मुस्कुराता हुआ उसकी बगल में लेट गया. दोनों जैसे रुक रुक कर कोई खेल खेलने में लगे थे. गुरदीप ने फिर से करवट अर्जुन की तरफ ली और वह मोटा सूपड़ा गीली छूट को चूमने लगा.

"बाप रे. ये क्या बाला है अर्जुन? असली मूसली का है क्या ये? इतना बड़ा...", हैरत से जाँघे पीछे करते हे नजर उस लाल दहकते जीरो बल्ब से सुपडे पर गयी तोह लुंड का अकार देख वह भौचक्की रह गयी. धीरे से हाथ बढ़ा कर अपनी नरम हथेली से सुपडे से निचला हिस्सा थमा तोह हाथ वही जम्म गए. उंगलिया गोलाई न माप सकीय हथेली लपेटने पर.

"क्यों? ये ऐसा नहीं होता क्या? अब मेरे पास तोह यही है जो भी है.", अर्जुन उसके दूध मुठी में भरने लगा तोह हाथ झटक दिए गुरदीप ने.

"पागल हो तुम. सच कहती हु के मैंने कुछ पोर्न देखि है. इंडियन भी और फॉरेन की भी लेकिन इंडियन में तोह इसका आधा भी नहीं दिखा, छममिया नाम की कोई फिल्म थी जो मेरी चंडीगढ़ वाली कजिन ने जबरदस्ती दिखा दी थी पिछली छुट्टियों में. उस लड़के का तोह इसका आधा हे था लेकिन एक बहार की फिल्म में कुछ कुछ इतना हे बड़ा एक अफ्रीकन का था और वह लड़की उसको बस किश कर रही थी. उस से आगे नहीं देखा. लेकिन ये कला भी नहीं है और कितना गरम है ये, सख्त भी.", गुरदीप ने अपनी कलाई से मोटा और 9 इंच लम्बा ये औजार देखा तोह मुट्ठी कस के उसकी ताक़त का अंदाजा लगाने लगी.

"तुमने लड़किया देखि थी उन मूवीज में? कोई तुम्हारे जैसी दिखी?"

"नहीं वह हिंदी वाली में तोह जो लड़की थी उसके न ब्रैस्ट ऐसे थे और न हिप्स. सुन्दर भी नहीं थी, बिलकुल वैसी हे थी जैसी कॉलेज के फर्स्ट ईयर वालो को फंसा के रखती है. तुमने ऐसा क्यों पुछा.?"

"अब जितनी तुम सुन्दर और इतने ाचे शरीर वाली हो तोह ऐसी फिल्म में कैसे कोई तुम्हारी जैसी हो सकती है? वह लड़कियां भीड़ का हिस्सा होती है और घर चलने के लिए ऐसी फिल्मे करती है. लोग वह ब्यूटी नहीं देखते क्योंकि वह तोह बाकी नार्मल मूवीज में दिख जाती है. सेक्स देखते है. तोह लड़के भी ऐसा हे करते है. गरीब घर से और dur-daraaj से आते है. फिर मेरे पास तोह कोई अभाव है हे नहीं. ऊपर से तुम्हारे जैसे गर्लफ्रेंड हो तोह हम आपस में हे खुश है फिर फिल्म क्यों बनाने लगे.", अर्जुन ने भी जैसे तैसे गुरदीप के भोले दिमाग को शांत कर दिए.

"हाँ वही तोह सोच रही थी मैं. तुम सेहत में भी तोह डबल हो तोह ये भी वैसा हे होगा. और मैं भी सल साइज हु. उमाठ.. तुम समझते बहोत ाचा हो. ी लव यू.", गुरदीप ने खुश होते हुए अर्जुन की जगह सुपडे को चूम लिए. हलके हलके हाथ चलती वह उसकी मालिश करने लगी और अर्जुन इत्मीनान से उन उभारो को दबाते हुए मुँह में लेने.

"उम्माह.. आराम से पीयो, छोटे बचे नहीं हो और न इनमे से कुछ आ रहा है. दबाओ तोह प्यार से ात लीस्ट. आह्हः.. ऐसे .. पता नहीं तुम इन्हे पी रहे हो और गुदगुदी निचे हो रही है.. उम्मम्माह्ह.", लुंड को छोड़ कर वह अर्जुन से लिपट गयी. नंगे चुके दबने से फ़ैल कर बहार आने लगे और गुरदीप नामुमकिन सी कोशिश करने लगी उस लुंड को छूट में लेने की.

"मैडम, ये इतने आराम से अंदर नहीं जाने वाला.", अर्जुन ने हाथ लगा कर छूट की चिकनाई देखि तोह वह गीली थी, फांके भी चुसाई से थोड़ी खुल चुकी थी लेकिन जहा ऊँगली का एक पूरा हे गया हो वह इतना मोटा बांस आराम से कैसे चला जाता.

"फिल्म में तोह कमर हिलाते हे अंदर चला जाता है?"

"चीखने लगोगी जब अंदर जायेगा."

"हाँ भूल गयी थी ये मैं. मेरी कजिन ने बताया था के बॉयफ्रेंड ने पहली बार किआ तोह उसको ब्लीडिंग भी हुई थी और दर्द भी लेकिन फिर वह रेगुलर करने लगे तोह सिर्फ मजा हे आता था.", गुरदीप को चचेरी बहिन ने ये नहीं बताया था के दर्द कितना होता है और लुंड अर्जुन जैसा हो तोह बयान भी नहीं कर सकते. कुछ सोच कर अर्जुन खड़ा हुआ तोह करवट के बल लेती गुरदीप उसके तगड़े लुंड को देखने लगी जो बेख़ौफ़ सा सर उठाये खड़ा फड़क रहा था. गुरदीप के लम्बे बाल बिस्टेर पर फैले थे और उसकी तरफ मुस्कुरा कर देखने के बाद अर्जुन ने चची की अलमारी से ये क्रीम की गोल डिब्बी निकल ली. गुरदीप के पास बैठ कर वह प्यार से उन मोटी फैंको को चिकना करते हुए अंदर भी क्रीम लगाने लगा और गुरदीप ने लेते हुए हे उसका अनुसरण करते हुए लुंड को भी क्रीम से चिकना किआ.

"हो गया न अब तोह?", गुरदीप ने अर्जुन को उठते हुए देखा लेकिन वह अपनी मैली टीशर्ट उसके भारी कूल्हों के निचे बिछाने के बाद हे ऊपर आने लगा.

"मैं करुँगी.", गुरदीप की अलग हे ज़िद्द थी.

"पहली बार है तोह मुझे करने दो."

"नहीं मैं ऊपर आउंगी तोह मैं हे आउंगी.", और अर्जुन बिना कुछ कहे सीधा लेट गया. दोनों कूल्हे और उभर गए गुरदीप के पाँव फैलने से. उसका लुंड मजबूत से पकडे वह छूट पर लगाती बैठने लगी तोह लुंड फिसल गया.

"कहा था न?"

"इसको तुम पकड़ कर लगाओ. करुँगी मैं हे.", अर्जुन ने मजबूरी में खुद हे वह पहला हुआ मोटा सूपड़ा उन मुलायम फैंको के बीच छोटे से छेड़ पर टिकाया और गुरदीप ने जोश में गलती कर हे दी.

"माहा.", चीख बहार सुनाई देती उस से पहले हे अर्जुन ने होंठो पर पंजा मजबूती से जमा दिए. दर्द से काम्पटी वह आगे गिरने लगी थी लेकिन अर्जुन ने संभल लिए. आधा लुंड उस कोरी छूट के अंदर फंसा रक्त का स्वाद चख रहा था. दर्द में रोटी गुरदीप के होंटो से हाथ हटा कर अर्जुन उसको अपने सीने से चिपकाये निचे लेता रहा. अब वह चीख नहीं रही थी लेकिन आँखों में आंसू और छूट में पीड़ा लिए वह निढाल थी.

"कहा था न के मुझे करने दो. पागल लड़की ऐसे हे इतना बड़ा अंदर नहीं चला जाता."

"उन्न्नन्नं.. जाता है.. आह्हः.. तुम्हारा ज्यादा मोटा है और मैं कोई हर रोज करती हु क्या? ुन्नन.. आअह्ह्ह्ह.. हिलना बंद करो थोड़ी देर.. जान निकल दी मेरी ऊपर से बातें बना रहे हो.", रोटी हुई भी वह प्यारी लग रही थी ऊपर से शिकायत करना.

"मेरी भोली बेगम, आराम से करने पर दर्द काम होता. तुम्हारी जल्दबाजी में जो काम 20 मिनट में होना था वह 20 सेकंड में हो गया तोह इसमें मेरी क्या गलती? वैसे आदत होने पर तुम आराम से ले लोगी ये. अब खुद हिलना बंद करो और आराम करो."

"नहीं, जब 20 मिनट का काम हो हे गया तोह अब करो. फिर मुझे जाना भी है.", गुरदीप को बनाने वाली मिटटी शायद उसके बाद बची हे नहीं होगी. अर्जुन भी बात मान कर उसको लिए हे पलट गया. आधा लुंड अंदर फंसाये पहले निचे कपडा रखा और फिर इत्मीनान से होंटो को चूसते हुए गुरदीप के नरम चुचो को मसलने लगा. जल्द हे चूचक फूल गए और अब थोड़ा थोड़ा लुंड अंदर बहार चलने लगा.

"आह्हः.. सचमुच बहोत मोटा है यार. ऐसा लगता है चाकू से काट दिए तुमने.. उम्म्म.. करते रहो इस्स्स्सस्छ्हः.. अब दबाओ भी इन्हे, ाचा लगता है तब करते नै.", चुचो को मसलने के लिए वह खुद हे कहने लगी, दर्द काम होता था छूट में अर्जुन के वैसा करने से. और हर बार की तरह अर्जुन ने ये बात भी मान ली. दोनों गुब्बारे मुट्ठी में भर के मसलता हुआ वह उसकी मुएलएम छूट में ठोकर मारने लगा. छूट अंदर हे अंदर लुंड खींच रही थी.

"आह्हः... तेज करो आअह्ह्ह.. ऐसे हे आठ.. फाड़ डालो sabkuch..maahhh.. पूरा दाल दो आयी.... इसशहहह.. मैं मर्डर गयी आह्हः.", अर्जुन को डर था के उसकी चींखे कोई घर में न सुन्न ले. दरवाजा बंद था और अंदर गुरदीप शेरनी बानी 8 इंच तक लुंड ले रही थी. छूट बुरी तरह फैली लुंड पर हे रगड़ मार रही थी. चुके भी लाल पड़ चुके थे लेकिन वह रुकना नहीं चाहती थी. होंठो को फिर से मुँह में भरते हुए अर्जुन ने उसकी आवाज बंद की और अब एक रफ़्तार से उसका youn-manthan करने लगा.

लुंड जैसे इस लचीली संकरी गुफा में अंदर फिसल रहा था, बस मुहाने पर कसावट थी. गर्भ तक ठोकर लगने से जल्द हे गुरदीप की टाँगे ऊपर उठ गयी. अर्जुन को जकड़ती वह गहरी साँसे लेने लगी.

"मार डाला तुमने आज.. आठ.. क्या कर दिए तुमने इस लड़की का अर्जुन.. आह्हः.. दर्द के बाद ये मजा और आठ.. जो अंदर से कुछ निकलने की फीलिंग मैं बता नहीं सकती.. उमाह.", अर्जुन को दिल का हाल बताती वह चूम कर बिस्टेर पर ढेर हो गयी.

"अभी तुम ऊपर आओ.", अर्जुन ने लुंड निकल कर साफ़ किआ और छूट की बहरी हालत ठीक करने के बाद बगल में लेट गया.

"गंदे हो तुम और बेशरम भी.. आठ.. एक लड़की से म्हणत करवा रहे हो. उम्म्म माँ.. ये हर बार दर्द देगा क्या.. आठ.....", सूपड़ा अंदर करते हे गुरदीप थोड़ा ृक्क कर सांस लेने लगी. उसके बाद धीरे धीरे पूरा अंदर लेती वह अर्जुन की जांघो पर बैठ कर बस अर्जुन को देखती रही.

"ये अंदर एन्ड में कही लग रहा है. कैसे लिए था इसको मैंने?", अर्जुन ने उसकी परेशानी समझते हुए अपनी तरफ झुका लिए. होंठो को चूसते हुए खुद हे निचे से कमर हिलता वह गुरदीप को वही मजा फिरसे देने लगा जो निचे लिटा कर दिए था. फूली हुई फांको के बीच निचे से अंदर जाता लुंड बड़ा आकर्षक दृश्य बना रहा था. गांड का वह बेदाग़ गुलाबी बंद छेड़ सिलवट दिखा रहा था. जल्द हे गुरदीप उसके ऊपर लेती चुचो के साथ हे अपने कूल्हे भी हिलने लगी. 7-8 इंच हे लुंड से चुदाई करते हुए अर्जुन भी सुख ले रहा था इतने नाजुक और मांसल बदन का.

"कमाल हो तुम डीपी. पहले पागलपन किआ और अब इतनी जल्दी खुद हे सवारी कर रही हो. तुम्हारी तारीफ करनी हे पड़ती है."

"तारीफ जितनी मर्जी करो.. आह्हः.. उस जगह से हाथ दूर रखो बस.. उम्म्म..", गांड के छेड़ पर ऊँगली महसूस करते हे गुरदीप ने कमर पूरी पीछे करते हुए 9 इंच भी अंदर समाहित कर लिए.

"वह से भी बहोत सेक्सी हो तुम. आह्हः.. ये कैसे कर रही हो. उम्म्म्म", गुरदीप ने अनजाने में हे छूट को लुंड पर कैसा तोह उसको ाचा लगा. बार बार करने से लुंड भी मोटा होने लगता था और ठोकर ज्यादा असर करती.

"मुँह बंद रखो या इन्हे मुँह में भर लो. उस तरफ देखना भी matt..aahhhh.. कमीने कही ke..aahhh.. उन्नातुराल सेक्स नहीं करना.. आह्ह्ह्ह.. मानोगे nahiii..aahhh..", जहा वह अर्जुन को अपना एक चुका चूसती चुदाई में लगी थी अर्जुन ने कॉमर्स से भीगी ऊँगली गांड के छेड़ पर रगड़ते हुए अंदर उतर दी. 5-6 बार थोड़े से हिस्से को अंदर चलते हे गुरदीप की सिसकारी निकल गयी. छूट फिर एक बार झाड़ गयी थी लेकिन अर्जुन ने अगले 6-7 जोरदार धक्के मारते हुए जल्द हे लुंड बहार निकल लिए. लुंड का कोण आगे की तरफ था और सारा वीर्य गुरदीप के मॉटे कूल्हे और दरार को भरने के साथ थोड़ा बहोत अर्जुन पर भी आ गिरा.

"छी.. यही बाकी था? अंदर छोड़ देते तोह साफ़ कर लेती, अब नहाना पड़ेगा. Aahhh..Woh भी मुश्किल है.", उसकी हालत देख अर्जुन ने हे टीशर्ट से वीर्य साफ़ किआ और बिस्टेर को व्यवस्थित करने के बाद गुरदीप की छूट की मामूली मरम्मत करते हुए dard-niwarak गोली भी खिला दी, प्रियंका दीदी को जो खिलाई थी वही.

"अंदर करता तोह माँ बन्न जाती."

"गोली तोह जैसे सिर्फ दर्द की हे मिलती होगी केमिस्ट पर?", गुरदीप भी जवाब देती उसके साथ नंगी हे लिपट गयी.

"आउच.. कमीने क्या हाल किआ है मेरी वागिना का. और मुम्मे तोह सुजा हे दिए. घर क्या कहूँगी मैं?"

"घर बता कर सेक्स किआ है?"

"पागल. दर्द तोह होगा न और बेबे पूछेगी जरूर."

"ठीक हो जाओगी जब सो कर उठोगी. चलो अब आराम करो थोड़ा.", गुरदीप घर जाना चाहती थी लेकिन अर्जुन ने अपने सीने से चिपकते हुए साथ सुला हे लिए. डेढ़ घंटे से दोनों अंदर थे और साढ़े 5 बजे साथ सोने पर उन्हें शायद मालूम नहीं था के नतीजा क्या होने वाला है.

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रात घर देरी से आने के बाद शंकर जी अपने maa-papa के कमरे में हे चारपाई पर सोये थे. रुपाली अनजाने में हे उनके कमरे में सोई थी तोह शंकर जी ने मुस्कुराते हुए अपनी अर्धांगिनी को वही सोने दिए और खुद माँ के बिस्टेर के करीब खाट पर सोये. कितने सालो बाद वह इस सन्न की बनी खाट पर सोये थे उन्हें खुद याद नहीं था लेकिन नींद भरपूर आयी थी और हमेशा 5 से पहले उठने वाले शंकर जी को कौशल्या जी ने सर सेहला कर 6 बजे जगाया. माँ के हाथो बिस्टेर पर चाय भी दशक पुराणी बात हो चली थी.

"तू कब सोया यहाँ? मुझे बोल देता तोह तेरे पापा को बैठक में सोने का कह देती. वैसे पहली बार तुझे इतना आराम से सोया देखा मैंने शादी के बाद.", शंकर जी ने उठने की जगह अपना सर माँ की गॉड में रख लिए.

"ये बनवारी मां ने बनी थी न मेरे लिए जब हॉस्टल में मुझे पलंग पर नींद नहीं आती थी.?", वह भी ज़माने पुराणी यादें दोहराने लगे थे. उनकी माँ प्यार से बालो में उंगलिया फिरती बस देख रही थी अपने लादले को.

"बनवारी के साथ तेरी जरुरत से ज्यादा हे जमती थी. और बस अड्डे से पैदल तेरे कॉलेज तक वह ये खाट लेके पहुंच गया था के उसके भांजे को नरम खाट नहीं मिली सोने के लिए. आखिरी वक़्त तक वह कहता था के शंकर उसका भांजा नहीं जिगरी है और इसकी काबिलियत जीजा कभी समझ नहीं सकते. वैसे थोड़ा गलत तोह वह भी था लेकिन मुझे ख़ुशी है के तू रुपाली से उतना हे प्यार करता है."

"कहा की बात कहा ले गयी माँ? रुपाली मेरी बेटी है और मैं उसको उतना हे प्यार दूंगा जितना बाकी बचो से करता हु. हाँ हॉस्टल में इस खाट पर मैं और मां भी कई बार सोये है. वही याद आ गया था.", शंकर जी हंस रहे थे और इधर रामेश्वर जी भी अपने बेटे की कमर के पास आ बैठे.

"अब कही दूध हे न पिलाने लग्न इसको. चाय गरम कर लाओ भगवान और शंकर ये खबर तुम्हारे मतलब की है.", उन्होंने अख़बार का ये पृष्ट सामने किआ तोह शंकर जी ने माँ को वही बैठाये हे खबर पढ़ी.

'17 जिलों के सीनियर मेडिकल ऑफिसर्स का तबादला और 8 का कार्य विस्तार.' शंकर से पहले हे कौशल्या जी नाम को सूची पढ़ने लगी. शंकर का नाम भी था तबादले में और अब वह अपने हे शहर में नियुक्त हो रहा था. मेहुल अर्जुन के ननिहाल में ट्रांसफर हुआ था शंकर के सामान ओहदे पर और सांगवान का तबादला भी पुराणी जगह से उनके हे शहर में हो गया था.

"अब ये क्या हो गया जी? सारे हे डॉक्टर पलट कर रख दिए सर्कार ने.", कौशल्या जी के सवाल पर वह क्या कहते लेकिन शंकर ने जवाब दिए.

"माँ, रोटेशन तोह होती हे रहती है 2-3 साल में और वैसे भी ाचा हे हुआ न के यही ट्रांसफर हो गया मेरा. वो दोनों भी पास हे आ गए तोह एक शहर में मिलना रहेगा अब. वैसे आप दोनों खुश नहीं हो तोह मैं बात करता हु के मेरा ट्रांसफर रुक जाये.", शंकर जी उठ कर बैठ गए और रुपाली गरम चाय की 3 प्याली लिए आ गयी.

"पापा, माँ कह रही है के आज आपने गांव जाना है और एडमिशन भी करवाना है किसी का.", कौशल्या जी ने सर पे हाथ फेरते हुए रुपाली से ट्रे ली और साथ हे बता भी दिए.

"रेखा से बोल दे के तेरे पापा और मेरा नाश्ता थोड़ी जल्दी तैयार कर दे. मैं भी साथ हे जाउंगी, तू स्कूल के लिए तैयार हो जा.", रुपाली को देख कर शंकर जी भी मुस्कुरा उठे.

"वैसे बाप को यहाँ छोड़ कर जाने का विचार भी ठीक नहीं है. भाई तुम दोनों जा हे रहे हो तोह मैं भी ज्यादा जगह नहीं लूंगा अगर ले जाना चाहो तोह.", रामेश्वर जी के ऐसी मजाक से रुपाली हंसती हुई बहार चली गयी ये बताने की तीनो का नाश्ता तैयार करना है.

"बड़ी गाडी से चलते है पापा, मैं कह रहा था भाई भी चले तोह ज्यादा ठीक रहेगा.", शंकर जी ने चाय का घूँट लिए और रामेश्वर जी ने भी.

"हाँ वह नन्दलाल भी न अलग हे खोया रहता है. मैं बोलती हु उसको और जी आप सतीश भाई साहब को बोल देना वह Renuka-Madhu को ले जायेंगे कार्ड की दूकान पर. वैसे भी मधु ने परसो वापिस जाना है.", कौशल्या जी की बात सुन्न कर रामेश्वर जी कुछ पल सोचते रहे और शंकर जी मुस्कुराने लगे.

"अशोक को बोल दूंगा के मधु को यही रहने दे, वह फैक्ट्री से अपने घर हो आएगा तोह शादी में हफ्ता पहले पहुंच जायेगा. कल आ रहा है तोह मैं बात कर लूंगा. मधु यहाँ खुश है और वह अभी कुछ और समय यही रहे तोह ठीक होगा. अकेली रहती है उधर वह, अशोक ने फिर कही चले जाना है.", रामेश्वर जी के ऐसा कहते हे कौशल्या जी बुरा सा मुँह बनाने लगी.

"ब्याह के बाद बेटी इतने दिन घर नहीं रहती. Putri-prem में इतने भी नहीं खोना चाहिए के बात बड़ी हो जाये."

"कौशल्या मुझे अशोक से बात करनी हे होगी. वह मधु अकेली रहती है, महीनो तक. अशोक अपने परिवार में बात करे और तुम मधु को भी समझाओ तोह जो तुम कह रही हो वह होगा. अकेले में मेरी बेटी अवसादग्रस्त हो ये मैं नहीं देख सकता. बात ख़तम और मेरे कपडे निकल दो और आप जनाब maa-baap की लड़ाई का लुत्फ़ हे लेते रहोगे या उठ कर तैयार भी होना है.", शंकर जी इतना सुनते हे हँसते हुए अंदर वाले आँगन में चले गए. कौशल्या जी भी अंदर से खुश थी की पंडित जी का ध्यान इस समस्या की तरफ भी गया तोह सही.

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दरवाजे पर लगातार हो रही दस्तक से अर्जुन की आँखें खुली तोह अंगड़ाई लेता वह उठ खड़ा हुआ. 7 बजने वाले थे और वह निर्वस्त्र सो रहा था. दरवाजे के पास जाते हे नजर वापिस बिस्टेर पर गयी. गुरदीप के निर्वस्त्र जिस्म उसके सामने हे था.

"मर्डर गया आज. ये कुंभकरण भी नहीं उठने वाली और दूसरा दरवाजा भी नै घर में.", अर्जुन ने जल्दी से चादर गुरदीप को ुधई और कपडे पहन कर बहार से आती आवाज का जवाब दिए.

"उठ गया दीदी, बाथरूम से तैयार हो कर आता हु आप दूध गरम करो इतने."

"जल्दी कर, मैं आधे घंटे से आवाज दे रही हु.", अर्जुन ने प्रियंका दीदी की आवाज सुन्न कर गहरी सांस ली और गुरदीप के होंठो को चूमने के बाद बाथरूम में चला गया. आज जाने कैसा दिन रहने वाला था उसका और नहाते वक़्त वह देख रहा था गुरदीप की हुई कलाकारी उसके जिस्म पर. आरती दीदी ने भरपूर प्यार के निशाँ बना दिए थे शरीर पर. 20 मिनट बाद वह कमरे में आ कर कपडे पहन ने लगा तोह हालत खराब हो गयी. गुरदीप गायब थी और दरवाजा खुला. भगवन याद आ गए थे इस पल में अर्जुन को. जैसे तैसे कमरे से बहार आया तोह यहाँ आरती दीदी हॉल में तैयार बैठी उसका इन्तजार कर रही थी.

"उठ गए जनाब? कितना घूम लिए थे कल जो आँख 7 बजे खुली?"

"सोया हे कहा हु.", अर्जुन ने धीरे से कहा तोह वह हंसने लगी.

"चलो ये दूध और फरिट्स लो और फिर मेरे साथ कपडे पैक करवाना. 9 बजे यूनिवर्सिटी चलेंगे और उसके बाद दिल करे तोह घूम लेना नहीं तोह ...", दीदी के ऐसे बात ख़तम करने पर अर्जुन शर्माता हुआ एक तरफ बैठ गया. उसको समझ नहीं आ रहा था के कैसे पूछे गुरदीप के बारे में.

"प्रियंका दीदी कहा है?"

"गुरदीप मेरे बाथरूम में नाहा रही है.", आरती दीदी ने अर्जुन को घूरते हुए जवाब दिए और दीदी का पूछने पर गुरदीप का नाम सुन्न कर अर्जुन ने नजरे झुका ली. आरती ये देख कर मुस्कुरा रही थी.

"सॉरी."

"क्या हालत बनाई है तुमने उसकी और मेरे साथ करने के बाद तुमने सोने की जगह ये सब भी कर दिए?", आरती दीदी की बात सुन्न कर अब अर्जुन क्या जवाब देता.

"बाद में बात करेंगे इस बारे में हम. प्रियंका दीदी आने हे वाली होंगी, वह आंटी के घर से पराठे लेने गयी है.", आरती दीदी ने बाथरूम का दरवाजा बंद होने की आवाज सुन्न कर चुप होते हुए चाय का कप उठा लिए. थोड़ी हे देर में गुरदीप तैयार हो कर इधर आ गयी थी, कल वाला सलवार कमीज में. चेहरे पर अलग हे चमक थी लेकिन चाल धीमी.

"गुड मॉर्निंग. नींद ाची आई आरती?", सोफे पर आरती की बगल में बैठते हुए गुरदीप की हलकी सी सिसकारी निकल गयी और अर्जुन उठ कर बहार चला गया, दूध ख़तम कर चूका था.

"कामिनी, जरा सबर नहीं हुआ तुझसे? कूलर में भी तेरी आवाजे सुनाई दे रही थी. और दीदी ने तुझे देख लिए होता तोह हो गयी थी तेरी कहानी ख़तम. अर्जुन भी मरता और मैं भी सफाई क्या देती?", आरती दीदी थोड़ा गुस्सा थी.

"ओह फूलन देवी, ज्यादा नाटक मैट कर. तुझे बताया था के मौका मिला तोह मैं अर्जुन से मिलने जाउंगी. और जरा ये बता के तू मेरी आवाजे कहा से सुन्न रही थी? कूलर तोह हमारे कमरे में भी था और तेरे में भी.", गुरदीप के ऐसा कहने पर आरती हंसने लगी.

"तू न कमीनी है, पक्की."

"कमीना तेरा भाई है. आह्हः.. गलती हो गयी जो ऐसा कर बैठी. मेरी माँ मार डालेगी मुझे."

"अब जो हो गया सो हो गया. तू पेनकिलर खा ले."

"दर्द की परवाह नहीं है, ये देख. बेबे की नजर यहाँ पड़ हे जनि है और ऐसे निशाँ हर जगह है. क्या बोलूंगी उन्हें?", दुपट्टा हटा कर थोड़ा कमीज खींच कर सीने पर होंठ, दांत, उंगलिया के निशाँ आरती को दिखाए तोह वह भी कुछ पल देखती रही.

"फाउंडेशन पड़ा है make-up बॉक्स में. चल सेट कर देती हु, वैसे न तूने ऐसी हिम्मत दिखा कैसे दी यार?", आरती दीदी उसको अपने साथ अंदर ले गयी और बहार पौधों को पानी देते अर्जुन के चेहरे पर ये मुस्कान आ गयी. दोनों लड़कियों ने देखा भी नहीं था के दरवाजा खुल्ला था और अर्जुन वही आँगन में. कुछ समय बाद हे तीनो ने नाश्ता किआ था और गुरदीप यहाँ इनके साथ नहीं थी. कपडे और कुछ जरुरी सामान 2 बैग में रखने के बाद सब फारिग हुए तोह प्रियंका दीदी अपने कमरे में तैयार होने चली गयी. वह थोड़ी परेशां थी अर्जुन के यूनिवर्सिटी जाने से लेकिन जाहिर नहीं किआ.

"सॉरी अर्जुन, जो मैंने कहा उसके लिए. वैसे गुरदीप ने मुझे बताया था के वह तुम्हे पसंद करती है लेकिन थोड़ा अजीब लगा उसको ऐसे देख कर.", आरती दीदी ने गलती मान ली थी और अर्जुन ने भी उनकी कमर थाम कर होंठो पर एक गहरा चुम्बन अंकित कर दिए.

"मुझसे भी गलती हुई तोह हिसाब बराबर. आप निश्चिन्त रहिये, गुरदीप ाची लड़की है और कमरे की बात वही ख़तम. आप भी तैयार हो जाइये फिर चलते है.", अर्जुन ने हलके से उनके कूल्हों पर चपत लगाई तोह वह सीने से लिपट गयी.

"गंदे हो तुम. हालत मेरी भी खराब है लेकिन वह पद लगा कर काम चला रही हु और पेनकिलर फिर से खाई नाश्ते के बाद."

"तभी कहा मैंने की आगे से जो करेंगे वह प्यार से और मेरे तरीके से."

"वैसे गुरदीप हिम्मत वाली निकली, झेल गयी वह."

"आपने तोह ज्यादा हिम्मत दिखाई. और उसकी बॉडी झेल सकती है. चलिए मैं भी तैयार होता हु.", ज्यादा बात न करते हुए अर्जुन भी तैयार होने लगा. थोड़ी हे देर बाद गुरदीप laal-peele सलवार कमीज और लाल दुपट्टा लिए तैयार हो कर इधर हे आ गयी. कल शाम की तरह चारो घर से निकल चले. यूनिवर्सिटी मोडल टाउन से विपरीत दिशा में बस 2 किलोमीटर हे दूर थी घर से. इस बड़े से प्रवेश द्वार पर सिर्फ अर्जुन को हे अपनी जानकारी भरनी पड़ी सुरक्षाकर्मी द्वारा दिए रजिस्टर में.

"वाह.. ये तोह बहोत बड़ी है.", 50 फ़ीट चौड़ी अंदर की सड़क के दोनों हे और खुले साफ़ बड़े मैदान थे जहा फुहारे चल रहे थे और हरी घांस को माली मशीन से दुरस्त करे में लगे थे. ज्यादातर कॉलेज बंद थे लेकिन एडमिशन और कुछ परीक्षा के चलते हुए लोगो का aana-jana ाचा खासा दिख रहा था. कोई आधा किलोमीटर के बाद दाए मुड़ते हे थोड़ी आगे ये महिला कॉलेज की ईमारत थी. उस से पहले बड़ी पार्किंग के आगे 3-4 स्टाल जैसी दुकाने और कैंटीन. पार्किंग में भी yuvak-yuvatiyo के झुण्ड बैठे थे.

"ऑफिस किधर है आपके कॉलेज का?", अर्जुन धीमी रफ़्तार से मोटरसाइकिल चला रहा था काइनेटिक के बराबर हे.

"ये राइट साइड में बहार हे है एडमिन ब्लॉक. तुम मोटरसाइकिल इधर लगाओ हम दोनों आ जाती है काम करवा के.", प्रियंका दीदी गुरदीप के पीछे बैठी थी.

"नहीं गुरदीप भी साथ चली जाएगी, मैं रुकता हु इधर.", अर्जुन के कहने पर गुरदीप ने सहमति जताई और आरती दीदी को बिल्डिंग के बहार उतार कर वह वापिस इस पार्किंग की तरफ आ गया. बिल्डिंग के बहार हे लिखा था 'बॉयज नॉट अल्लोवेद' और अर्जुन ने इसलिए कैंटीन में इन्तजार करना हे ठीक समझा.

"फ्रेशर हो?", ये 4 लोग तीन की चादर की चाय में कुर्सी पर बैठे अर्जुन के सामने आ खड़े हुए. टेबल पर अर्जुन के सामने निम्बू पानी का गिलास रख कर कैंटीन का लड़का जा चूका था.

"मैं यहाँ नहीं पढता.", अर्जुन ने गिलास उठा कर घूँट लिए और वापिस रखते हुए सामने देखा. 2 लड़के और 2 लड़किया बड़े अजीब भाव से उसको देख रहे थे. कपड़ो से पता चल रहा था के वह अमीर भी है और शायद दबंग्ग भी.

"आउटसाइडर यहाँ कॉलेज कैंटीन में अल्लोवेद नहीं है मिस्टर.", ये लम्बा चौड़ा लड़का कासी हुई टीशर्ट और हलकी दाढ़ी में किसी हीरो सा लग रहा था.

"देखिये यहाँ लिखा है विसिटोर्स कैंटीन. अगर आपको मेरे यहाँ बैठने से प्रॉब्लम है तोह मैं चला जाता हु.", अर्जुन आराम से उठ गया टेबल पर 20 रुपये रखते हुए. दोनों लड़किया अपने साथ वालो को देखने लगी.

"रैगिंग लेने आये थे और तुम आउटसाइडर हो, वह भी वीमेन कॉलेज के पास तोह रैगिंग दिए बिना जाना मुमकिन नहीं.", दूसरे लड़के ने सामने आते हुए कहा. कान में बाली, गले में सोने की चैन, कलाई में भी सोने का कड़ा और ाची jeans-shirt पहने वह भी कुछ काम नहीं दिख रहा था अपने दोस्त से.

"आप बड़े है और मैं छोटा. चलिए जो करना है करवाना है मैं तैयार हु.", अर्जुन का दिल हे नहीं कर रहा था के वह ऐसे लोगो पर गर्मी दिखाए. उन चारो के पास अब कुछ नहीं बचा था कहने को और एक दूसरे को बस देखते रहे. अभी वह कुछ कहते उस से पहले एक मारुती 800 पीले रंग की और एक जीप उसके सामने आ रुकी.

"क्या हो रहा है यहाँ जसलीन?", जीप की ड्राइवर सीट से उतरा ये लम्बा चौड़ा सरदार युवक उन चारो के पास आ खड़ा हुआ बाकी लोग दोनों गाड़ियों में हे बैठे रहे.

"आउटसाइडर है. पहले हेकड़ी दिखा रहा था और अब रैगिंग के लिए तैयार है. ाचा हुआ तुम भी आ गए, हमको तोह कुछ समझ आ नहीं रहा था के इसके साथ क्या करे.", इस लम्बी पतली लड़की ने कासी हुई टीशर्ट और सलेटी चुस्त जीन्स पहनी हुई थी. भूरे बाल सलीके से मॉटे रबर में बांधे वह भी हेरोइन जैसी थी. दूध सी सफ़ेद और आँखों पर महंगा धुप का चस्मा.

"बनाओ फिर मुर्गा साहब को.", इधर सभी लोग गाडी से उतर आये थे और कुछ और भी dopahiya-char पहिये वह आ रुके. माहौल ऊर्जा से भरपूर हो गया था.

"जग्गी यार ऐसा है के murga-shurga तोह खाने में ाचा लगता है. लड़का तगड़ा है जरा इसकी शर्ट उतरवाओ तोह देखे कही वैसे हे तोह नहीं पहला हुआ.", ये दूसरी लड़की अपने सफ़ेद दांत दिखती हंसने लगी तोह बाकी सब भी साथ देने लगे. अब यहाँ कोई 15-20 लड़के और 10 के करीब युवतिया एकत्रित थी. ज्यादातर तगड़े लड़के और खूबसूरत लड़कियां.

"चल वि छोटे, उतरो भाई अपनी कमीज और दिखाओ अंदर क्या है.", सरदार का नाम जग्गी था और उसके कहते हे अर्जुन ने कलाई घडी टेबल पर रखने के बाद तुरंत हे 6 बटन खोल कर सफ़ेद कमीज कुर्सी पर रख दी. नीली कासी जीन्स के ऊपर उसका वह तगड़ा चौड़ा जिस्म सबकी आँखों के सामने था. 46 की छाती उभरी हुई दोनों तरफ से सामान chaudi-sakht, पेट पर 6 चौकोर बराबर paav-roti से माँसपेषियो के उभार और कटाव लिए मजबूत बाहें बहोत थी बताने के लिए की अर्जुन क्या छुपाये थे. जसलीन की नजर जिस्म पर बने निशाँ, बाजू के जख्म और खूबसूरत चेहरे पर बराबर चल रही थी.

"जग्गी भाई मुंडा हैंडसम है लेकिन लगता है जो ये है वह दीखता नहीं.", जसलीन अर्जुन के सामने टेबल पर आ बैठी, साथ हे जग्गी भी.

"फौजी तोह तू हैं नहीं बाल तेरे लम्बे है. बॉडीबिल्डर भी नहीं है नहीं तोह चाल हे बता देती और शरीर पर निशाँ अलग अलग है छोटे. Maar-kutai के साथ ishq-vishq वाला बाँदा लगता है.", जग्गी कही ज्यादा हे ज्ञानी था अपनी बहिन से.

"सोनू तेरे से भी तगड़ी बॉडी है लड़के की.", ये वह दूसरी लड़की बोली थी उस शानदार से लड़के को जिसने पहले अर्जुन को रुकवाया था.

"कीर्ति, खली बॉडी है इसकी. दम नहीं होता इन फ़ोक्के लंडरो में.", सोनू को अपनी ताक़त पर भरोसा था, जिस्म भी ाचा था लेकिन कही न कही अर्जुन से काम.

"देख तू आउटसाइडर है तोह थोड़ा दया करते है तेरे पे. सोनू से पंजा लड़ना पड़ेगा, फिर गुरी से और आखिर में जग्गी से. तू हरा तोह दोनों गाल पे थप्पड़ खुद मारने के बाद वह गोल चक्कर तक ऐसे हे दौड़ लगाएगा. जीता तोह आजाद.", कीर्ति जसलीन की बगल में बैठती हुई बोली तोह गुरी और जग्गी हंसने लगे. वह भी सवा 6 फ़ीट ऊँचे तगड़े लड़के थे.

"बड़ी अजीब सी शर्त लगा दी है आपने तोह. हरा तोह इतना कुछ और जीता तोह खली हाथ.", अर्जुन ने मुस्कुरा कर अपनी बात उनके सामने राखी.

"बड़ा भरोसा है खुद पे.", जग्गी ने धुप का चस्मा एक तरफ रखते हुए फिर से अर्जुन को ऊपर से नीचे तक देखा.

"और कोई है यहाँ मेरे साथ? शरीर मेरा, सांस मेरी और भरसो किसी और का उधार लेके चालू?"

"हाहाहा. फनी मन. Okay स्टार्ट करते है.", कीर्ति ने जैसे टालना चाहा अर्जुन की बात को.

"न न कीर्ति, लड़के ने कुछ कहा है और सबसे बड़ी बात ये कल्ला है और फिर भी बात सही की है. बोल छोटे तू क्या चाहता है?"

"जग्गी सर, मैं हरा तोह इनमे से कोई भी मेरे थप्पड़ मार सकता है. जीता तोह हरने वाला मेरे गले लगेगा.", अर्जुन ने थप्पड़ का जिम्मा जसलीन, कीर्ति और उनके साथ बैठी तीसरी लड़की को दे दिए.

"शेर वाली बात करदी. चल मंजूर है. सोनू आजा और आजमा ले इस जवान को. तुबेलिघ्त, सबके लिए ठन्डे दे जा.", सोनू को अर्जुन के सामने आने का बोल कर जग्गी ने देखने वालो के लिए ठंडा मंगवा लिए. इधर अर्जुन और सोनू आमने सामने हुए तोह उनको रूल समझने के बाद गुरी एक तरफ बैठ कर देखने लगा. दोनों मजबूत पंजे आपस में उलझे तोह सोनू ने तुरंत हे पूरी जान झोंक दी. अर्जुन का हाथ थोड़ा सा हे हिला और वापिस बीच में आ गया. सोनू टेबल पर आगे झुकने लगा, गुरी कुछ बोलना चाहता था लेकिन कीर्ति ने मन किया. चेहरा लाल हो चूका था लेकिन अर्जुन शांत सा बस सोनू को एकटक देखता रहा. अचानक सोनू का हाथ निचे जाने लगा और वह बस देख रहा था.

"वाह. क्या बात है. चलो बचो गले मिलो.", जसलीन के ऐसा कहते हे अर्जुन ने सामने से आ कर सोनू को गले लगा लिए.

"आपमें बड़ा दम है भैया लेकिन शायद मैं शोल्डर की ज्यादा एक्सरसाइज करता हु.", अर्जुन ने पूरी इजत्त देते हुए सोनू को बुरा नहीं लगने दिए.

"नहीं यार, मैं न कीर्ति की बात से थोड़ा गलत सोचने लगा था, तुम सचमुच तगड़े हो. हाँ ये गुरी 100 किलो के शोल्डर लगता है.", सोनू के कहने के बाद गुरी के साथ मुक़ाबला भी वैसे हे गया. अभी वो दोनों हे गले मिले थे और ये यामाहा वह आ रुका. रिस्की सफ़ेद कुर्ते पयजामे में सीधा चलते हुए अर्जुन के सीने आ लगा. जग्गी गुस्से में उठ कर उसकी तरफ लपका हे था के गुरी और जसलीन ने रोक लिए.

"मैं गलत हु दोस्त बहोत गलत इंसान हु मैं. तुमने मेरी बहिन को बचाया और उसके लिए तुम उन लोगो से टकरा गए जो तुम्हे मार भी सकते थे. मुझे माफ़ कर दे मेरे दोस्त, मैं हाथ जोड़ता हु. कल हे मैंने तुम्हारे जाते हे अपने नशे को फेंक दिए था. वाहेगुरु की कसम आइंदा नशा भी नहीं करूँगा और ऐसी सांगत में भी नहीं रहूँगा. सिंह हो कर मैं नामर्दी कर गया इसका एहसास तुमने मुझे बड़े प्यार से करवाया. मैं तुम्हारी बहनो और डीपी से भी माफ़ी मान लूंगा बस एक बार मुझे इतना कह दो के मेरे लिए तुम्हारे दिल में कुछ गलत नहीं है.", रिस्की की आँखों में पश्चाताप के आंसू थे और वह हाथ जोड़े अर्जुन के सामने खड़ा था.

"बड़े भाई हो आप ऋतिंदर भैया, मैं वैसा नहीं कहना चाहता था आपको. गुरदीप ने बताया मुझे के क्या वजह थी अपने रस्ते से आपके भटकने की, अकेलेपन में हो जाता है ऐसा लेकिन आपके पास परिवार है. मुझसे माफ़ी मैट मांगिये बस अपने परिवार को उनका वही बीटा बन कर दिखाए जो वह हमेशा उम्मीद करते आये है. ये लड़कियां, नशे या फिर college-paisa कुछ भी नहीं है. परिवार और प्यार है तोह ज़िन्दगी है. ाचा लगा के जल्द हे पश्चाताप हो गया.", अर्जुन इस बार खुद हे रिस्की को गले से लगा लिए. बाकी सब अभी शांत हे थे की एक और जीप वह आ कर ृक्क गयी. जग्गी और उसका ग्रुप उन्हें देखता हे थोड़ा संभल कर सतर्क हो गए. लड़किया एक तरफ करके सोनू भी जीप वालो को देखने लगा.

"तू गद्दार है सरदार. इसने हे मारा है न हमारे दोस्तों को और तू इसके पाँव पड़ रहा है. देख तेरे सामने मैं इसकी क्या हालत करता हु और उसके बाद तेरी. बहिन हे पसंद आई थी न बरार को तेरी, साले जायदाद नहीं मांगी थी.", काली जीप के आगे लिखा था 'प्रधान' और बोलने वाला दुमदार सा 25 के करीब का युवक बिजेन्दर पहलवान जैसे शरीर का था. उसके साथ वैसे हे 5 लोग और एक आखिर में पतला सा लड़का था. जीप में बैठा ये लड़का थोड़ी देर पहले यही था जिसको जग्गी और अर्जुन दोनों ने हे पहचान लिए था.

"भाई न मैं तुम्हारे सामने आऊंगा और ना आप इसको कुछ कहोगे. हमारे रस्ते अलग है अबसे. विनती करता हु के जो हुआ उसके लिए माफ़ कर दो और इसको जाने दो.", रिस्की आगे बढ़ा तोह एक लड़का हॉकी लिए उसके सामने आ खड़ा हुआ.

"चीमे, टॉड दे दोनों की लाते सालो की.", अभी चीमा कुछ करता उस से पहले हे अर्जुन ने रिस्की को एक तरफ कर दिए. हॉकी उसके पत् से टकराई लेकिन वह हिला तक नहीं.

"दूसरी बार नहीं बोलूंगा. ये यूनिवर्सिटी है और यहाँ लड़ना ठीक नहीं. बहार चलते है और 5-6 लोग बुलाने हो तोह ले आना.", चीमे को najar-andaaj करते हुए अर्जुन उस 'प्रधान' से बात करने लगा. गुस्से में चीमे ने हॉकी घुमाय और अर्जुन ने वही हाथ पकड़ कर 180 घुमा दिए. चीख के साथ हे हॉकी जमीन पर और चीमा दूसरे हाथ से जीप पकडे घुटनो के भार.

"गलती कर हे दी न.", अर्जुन ने इस बार कोई मौका नहीं दिए इस 'प्रधान' को. उमेद सिंह ने सिखाया था के लीडर पास्ट ईमारत ध्वस्त. और अर्जुन ने उसके भी दोनों हाथ पकड़ कर बहार उछाल लिए. एक क्वांटल वजनी 'प्रधान' इस खली सड़क के बीच मुँह के बल गिरा और उसके फैले हुए दोनों हाथ कोहनी के पास से पल भर में हे अर्जुन ने लटका दिए. वह चीख रहा था और बाकी सब बस हैरत से सुन्न पड़े देख रहे थे.

"6 लोग हो तुम, कोई भी यहाँ दिखा या कुछ सुना तुम्हारे बारे में तोह इस से बुरी हालत करुँगी तुम्हारी. ले जाओ उठा कर अपने 'प्रधान' को.", अर्जुन जैसे झगड़ना हे नहीं चाहता था.

"तू नहीं बचेगा.", ये 3 युवक एक साथ उसकी और लपके तोह अर्जुन ने गहरी सांस भरी. 'माफ़ करना दादाजी', इतना कहता वह सबसे आगे वाले को लिए बाकी दोनों से भी जा भिड़ा. पिछले दोनों युवक जीप से जा भिड़े और इस ललकारने वाले को अर्जुन ने कंधे से ऊपर उठा लिए, चेहरा फिर से बदलने लगा था लेकिन जैसे एक लड़ाई उसके अंदर भी चल रही थी. कुश्ती के डाव की तरह इस युवक को घास पर फेंकते हुए वह बाकी दोनों की पसलियों पर मुक्के बरसाने लगा. 1 मिनट में दोनों युवक जीप के नीचे घुसते बचने लगे और इधर जग्गी ने उस जीप में बैठे लड़के को गर्दन पकड़ का बहार खींच लिए.

"जाने तोह जग्गी भाई उसको, वह झेल नहीं पायेगा. वैसे झेल तोह ये सब भी नहीं सकेंगे लेकिन फिर भी थोड़ी तस्सली इनकी जरुरी थी.", एक युवक अभी भी जीप में हे बैठा था.

"ओह भाई इन्हे ले जा, मैंने ज्यादा नहीं मारा लेकिन 2 को हॉस्पिटल ले जाना जरुरी है. और प्रधान जी बात ऐसी है के मर्द लड़ते है kalle-kalle और फैंसले भी वैसे हे होते है. यु भीड़ लगा के एक को मारने चले आये तोह कैसी प्रधानी और कैसे मर्द हो भाई? जोड़ ढीले किये है, हफ्ते में ठीक हो जायेंगे. चलो बैठो गाडी में.", अर्जुन ने उस भैंसे जैसे प्रधान को बड़े आराम से उठा कर जीप के पिछले हिस्से में ला बिठाया. चीमा भी हाथ पकडे खड़ा होने लगा तोह उसको भी अर्जुन ने मदद की. 2 और भी थे जिनकी पसलिया सुजा दी थी उसने.

"तुमसे भी माफ़ी मांगता हु भाई और छोटी सी बात फिर से कहूंगा के लड़की की िज्जात्त करना जरुरी है. वह बहिन हो या माँ या फिर कोई भी हो. प्रधान जी जायदाद से भी जरुरी होती है behan-maa.", ये बात अर्जुन ने थोड़ी तेज कही तोह उसका सर शर्म से झुक्क गया. जिस लड़के को अर्जुन ने उठा कर पटका था वह बस घबरा गया था लेकिन हालत ठीक थी उसकी.

"गुरु, तू मार सकता था मुझे.", उसने खुद हे अर्जुन को सबकी मदद करते देखा तोह उसके पास हे चला आया.

"खिलाडी आदमी हो यार आप. गलती से कुछ toot-foot हो जाती तोह काम ख़राब हो जाता.", अर्जुन ने इस व्यक्ति को गले से लगा लिए. बाकी सभी देख रहे थे.

"भाई कबड्डी खेलता हु, वह एक हे गाँव के है तोह आ गया साथ. तुमने कैसे पहचाना.?"

"ये बनियान स्टेडियम की है जो नीचे पहनी हुई है. मैं भी स्टेडियम जाता हु तोह अंदाजा लगा लिए.", अर्जुन की बातें सुन्न कर 'प्रधान' ने जीप में पीछे बैठे हुए नजरे झुकाये हे आवाज दी.

"बाई, bhul-chook माफ़ करि दोस्त. मैं गलत था और बहिन मेरे भी घर में है. रिस्की भाई अपने रस्ते अलग है, कोई शिकवा नहीं. दिल करे तोह पिंड आ जैव, शहर ने शरीर खराब कर दिए.", अर्जुन के ब्याह से कल वाले जख्म पर खून फिर से उभर आया था और ये किसी को नजर नहीं आया. जीप के जाते हे वह भीड़ चीरता हुआ अपनी कमीज लेने आया और जसलीन ने तुरंत हे पानी की बोतल से घाव पर ठंडा पानी उड़ेल दिए. अर्जुन हैरत से बस देख रहा था और जग्गी ने अपना रुमाल वह लपेटना चाहा तोह वह छोटा पड़ गया.

"रहने दीजिये भाई, ये एक दिन में हे भर जायेगा. शुक्रिया साफ़ करने के लिए.", दूसरी पंक्ति उसने जसलीन को कही तोह जसलीन ने वही रुमाल घाव पर दबा दिए.

"जग्गी तू बड़ा नहीं होगा. बांध नहीं रहा तोह खून तोह बंद कर सकता है यार.", जसलीन ने इतना हे कहा था और जग्गी अर्जुन के घाव पर रुमाल दबाये खड़ा हो गया. अर्जुन ने दूसरी ब्याह कमीज में दाल कर कुछ हिस्सा धक् लिए.

"क्या किआ था मेरे दोस्त तुमने? और ये रिस्की आज नशे में भी नहीं है और लड़कियों को घूरने की जगह तेरे से माफ़ी मांग रहा है.", जग्गी से रुमाल ले कर अर्जुन ने घाव देखा और फिर साफ़ करके कमीज पहन ली.

"रास्ता भटक जाये तोह बस मदद कर देनी चाहिए.", अर्जुन क्या कहता.

"जगतार भाई, बरार, गुग्गी और भोला मेरी हे बहिन को उठाने वाले थे, अर्जुन ने समय रहते उसको बचा लिए. वह तीनो महीना तक बिस्टेर से नहीं उठेंगे लेकिन सरपंच अभी घर माफ़ी मांग के गया है और मैं भी गुरुघर कसम खा के आया हु आइंदा ऐसा कोई काम नई करूँगा जिस से अपने साथ अपने परिवार का नाम ख़राब हो. आप सभी से भी मैं माफ़ी चाहता हु.", रिस्की ने जब अर्जुन की पूरी बात बताई तोह एक बार जग्गी के साथ बाकी लड़को ने भी उसको गले लगाया.

"बड़े दिलेर हो दोस्त, हम तुम्हे परेशां कर रहे थे और तुम हमारा हे साथ आराम से दे रहे थे. इतने गलत लोगो से पन्गा लेने के बाद भी सुकून से कैसे बैठे रह सकते हो?", गुरी ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया तोह अर्जुन ने भी स्नेह से हाथ मिला लिए.

"इंसान तोह कोई बुरा नै होता. आप सभी मस्ती मजाक करने वाले लोग लगे तोह मैं भी शामिल हो गया. वह गलत रस्ते पर थे तोह थोड़ा सख्त होना जरुरी लगा. बाकी मेरे दादा जी कहते है के हालात हम बनाते है और उनसे भागना कायरता होती है.", अर्जुन का जवाब आधो को समझ हे न आया.

"सॉरी. वैसे उम्र से कही ज्यादा परिपक्व हो और ाचा लगा जान कर की खुद पर भरोसा रखते हो और दुसरो की परवाह भी करते हो.", जसलीन ने खुद हे हाथ मिलाया और पीछे पीछे दोनों बहनो के साथ हे गुरदीप चुपचाप आ कड़ी हुई.

"निक्का जा संसार वे बुलेया, की तेरा की मेरा. रेल के रहिये नाल हमेशा, तू मेरा मैं तेरा.", अर्जुन ने जसलीन से हाथ मिलाने के बाद उनकी हे भाषा में बात कही तोह पीछे से आरती दीदी ने उसका हाथ पकड़ लिए. रिस्की भी अपनी बहिन से गले लगा तोह बाकी सब भी खुश और थोड़ी हैरत में थे.

"मेरा भाई है, #### शहर से कल आया था और आज हमारा तक लेकर वापिस जा रहा है.", आरती दीदी ने जसलीन से हाथ मिलाया और वह बड़े प्यार से उन से मिली. प्रियंका दीदी को वह सभी लड़किया जानती थी.

"बड़ा हे छोटा टूर बनाया भाई. Jaan-pehchaan हुई नहीं और तुम तोह अभी से चल दिए.", जग्गी के ऐसा कहते हे अर्जुन ने भविष्य में फिर मिलने का वादा किआ.

"घर यही रहने वाला है भाई. रास्ता पता लग गया है तोह आता जाता रहूँगा. कभी #### वह आना हुआ तोह जरूर मिलना.", अपना एड्रेस बिना जान पहचान हे अर्जुन ने बता दिए था.

"अर्जुन जगतार और जसलीन का गाँव हमारे गाँव के साथ हे लगता है. और यहाँ शहर में भी घर हमारे हे घर के पास वाली मार्किट के पीछे है.", प्रियंका दीदी ने बताया तोह अर्जुन ने हाँ में गर्दन हिलाई जैसे उसको जान कर ाचा लगा.

"वापिस अगर देरी से जाना हुआ तोह 5 बजे मिलते है, गुरुघर जाता हु उस वक़्त तोह फुर्सत भी होगी.", जग्गी ने अर्जुन को न्योता दिए और उसने दीदी की तरफ देखा.

"मिल लेना, जाना तोह 7 बजे है. लकी भैया से सुबह बात हुई थी 6 बजे और यहाँ जाने से पहले मेरी भी सहेलिया मिलने घर आएँगी तोह तुम्हारा दिल करे तोह चले जाना.", प्रियंका दीदी ने इजाजत दे दी थी.

"आप थोड़ा पहले चले जाना मत्था टेकने. मैं वही सामने मार्किट में मिलूंगा आपसे 5 बजे.", अर्जुन ने जाने से पहले ये कहा तोह सवाल जसलीन ने किआ.

"क्यों तुम mandir-gurdware नहीं जाते? चल कर देखना ाचा हे लगेगा."

"मुझे बहार भी ाचा हे लगता है. शाम को मिलते है जगतार भैया.", अर्जुन सबको हाथ जोड़ कर अभिवादन करता यहाँ से निकल कर अपनी मोटरसाइकिल पर आया तोह अब रिस्की भी उनके साथ हे था. गुरदीप खुश थी और इन दोनों को देख बाकी भी. अर्जुन आरती दीदी को लिए बाकी तीनो के साथ वापिस चल दिए, घर की और. पीछे भी भीड़ कम् हो चुकी थी. जग्गी, कीर्ति, गुरी, सोनू और जसलीन एक टेबल के गिर्द बैठे थे.

"पागलपन कमाल का था. क्यों गुरी?", सोनू लड़ाई की बात कर रहा था.

"मुझे नहीं पता था भाई के ये उस परिवार से है. लेकिन बात सही है सोनू, फक्की दिलेरी नहीं जान भी है लड़के में. पागलपन शायद कल किआ हो आज वह किसी को भी मारना नहीं चाहता था, 'प्रधान' की हालत देख कर मुझे लगा था के वह सबको मार हे न दे. उसने वैसा कुछ नहीं किआ.", गुरी की जगह जग्गी बोल रहा था.

"शरीर पे पहले हे छोटो के निशान थे.", सोनू ने जैसे बताना चाहा के वह शायद लड़का हे हो.

"जो जख्म उसके शरीर पर थे वह लड़की के नाखून और प्यार के थे. कुछ ताजे और कुछ थोड़े पुराने. लड़ाई का सिर्फ ब्याह पर था जो कल लगा होगा और आज फिर चिल गया.", गुरी के इतना ज्यादा हे बता देने से सोनू और जग्गी उसको घूरने लगे. जसलीन शर्मा रही थी लेकिन जसलीन हैरान थी.

"मेरी बहिन बैठी है और तू ऐसी बातें कर रहा है? मान लिए सोहना है तगड़ा है तोह गर्लफ्रेंड भी होगी और क्या पता रिस्की की बहिन हे दिल दे बैठी हो. उसको बचाया है लड़के ने लेकिन इतना तोह खुल्ला न बोलै कर यार.", जग्गी नाराजगी से कहने लगा.

"तू मेरे पे गुस्सा हो रहा है, देख तोह जसलीन उसको ऐसे रही थी जैसे तू अब बोले और ये शादी के फेरे लेने को तैयार. चोट पानी से काम दिल से ज्यादा साफ़ कर रही थी ये. मैं तोह इसलिए बता रहा हु के इसको पता रहे के उसकी लाइफ में लवर है पहले से.", गुरी अपनी बात कहता नखरा करने लगा. जसलीन के चेहरे पर घबराहट चा गयी.

"कुछ भी बोलता है यार तू. छोटी उम्र का लड़का है वह और खिलाडी लोग दूर हे रहते है ishq-mushq से. वैसे हे बन्न गए होंगे निशान और तुम यहाँ जेम्स बांड बन्न रहे हो. चलता हु मैं, गयम का टाइम हो गया मेरा.", सोनू खड़ा हो कर अपनी जेन कार की तरफ बढ़ चला सबको हाथ हिलने के बाद. और बाकी सब भी थोड़ी बातें करने के बाद अपने अपने रस्ते हो लिए. आज सबने हे के नया खिलाडी देखा था, जो हर खेल कायदे से खेलता था.
 
अपडेट 109

बेरंग इंद्रधनुष

साल 2010


परिवर्तन हे नियति है और जो परिवर्तन सेहन नहीं कर पाते उनका वजूद नहीं रहता. क्या हर परिवर्तन जरुरी होता है? परिवर्तन बेवजह होना भी प्रकृति का वजूद मिटा सकता है. ऐसा इंसान तोह अक्सर करते है और वजह भी यही है झूठा वजूद दिखने की या वजूद मिटने की. दुनिया किस तेजी से बदल रही है इस परिवर्तन का नजारा कर रहा ये शख्स कुछ देर तक बस हर तरफ यही देख रहा था. अनजान न था वह इस जगह से लेकिन अब दोनों की पहचान बदल चुकी थी. शहर की भी और इंसान की भी.

हाथ में पकडे सोनी क्सपेरिअ आधुनिक फ़ोन पर लिखा कुछ पढ़ते हुए वह सड़क के उस पार चल दिए. कभी हरियाली से भरपूर रहा ये शहर अब करो के काफिले से आबाद था. सड़के वैसी हे साफ़ और चौड़ी जैसी याद थी, घने पेड़ आज भी सड़क के दोनों तरफ थे बस इमारतों का जंगल कही ज्यादा विस्तार ले चूका था जिसके सामने ये वृक्षों की कतार बस महीन लकीर भर थी. कोई रईस सेक्टर था ये इस शहर का जहा इस बड़े स्कूल के सामने सड़क के इस पार ये व्यक्ति कलाई पर बंधी घडी में समय देखने के साथ हे फ़ोन पर लगी तस्वीर भी निहार रहा था. नजर कभी घडी, कभी फ़ोन और फिर सड़क एक उस पार स्कूल के बड़े गेट पर घूम रही थी.

अभिभावकों की गाड़िया गेट से कही पहले बानी बड़ी पार्किंग में रुकने लगी. महंगी desi-videsi कार और ाचे सुसज्जित अभिभावक इन्तजार कर रहे थे अपने मासूम बचो का और ये युवक सब भुआलये अब बस द्वार पर नजर जमाये था. दुनिया की नजरो से खुद को छिपाये जाने वह किसका इन्तजार कर रहा था. चेहरे पर दाढ़ी भी उत्तेजना छिपाने में असमर्थ थी लेकिन एकाएक जैसे उसकी आँखों में ज़माने भर का नूर आ गया.

ये लाल रंग की ऑडी ा4 अलग हे रॉब से ठीक गेट के सामने आ रुकी और ड्राइवर साइड का शीशा निचे होने पर भूरे 'एविएटर' लगाए ये दिलकश युवती का चेहरा देख युवक के सख्त चेहरे पर जो दिलकश मुस्कान आई थी वह बताने को बहुत थी की उसके सामने ज़माने भर की दौलत ये लुटा सकता था. दरवाजे से बचे आने लगे थे और उनकी सुरक्षा के लिए साथ हे महिला शिक्षक भी. युवती की नजर भी वही थी और एक खूबसूरत महिला हाथ थामे 3 साल के बचे को कार की तरफ ले कर आई तोह युवक की धड़कन जैसे रुक सी गयी थी.

'मेरी जान...', अपने आप हे मुँह से निकल गया उस गुलाबी चेहरे, भूरे घुंगराले बालो और वैसी हे आँखों वाले बचे को देख कर. वह भागना चाहता था उसकी तरफ, अपने हाथो में उठा कर सीने से लगाना चाहता था इस बचे को फिर नजर उस युवती पर गयी जो चस्मा उतार कर मुस्कुराती हुई बहार निकली. भूरे बाल, बलखाती कमर और कुदरत का हर खजाना समेटे हुए भी कुछ तोह था जो वह भी झूटी मुस्कान लिए अपने बचे की शिक्षिका से मिलने लगी. वह बचा भी सीने से जा लगा अपनी माँ के और कार का दरवाजा वह शिक्षिका खोलती हुई बातें करने लगी. बचा अंदर बैठा और इस तरफ से युवती कार की तरफ बढ़ने लगी लेकिन नजर सामने सड़क पार खड़े युवक पर जाते हे सब भूलकर वह इस और हे तेजी से आने लगी. कार सामने आने से एक पल रुकी लेकिन इतना समय बहोत था दूसरी कार में इस युवक के निकलने के लिए.

कोई नहीं था इस तरफ लेकिन वह चलती हुई इस वृक्ष के पास आ रुकी. जाने क्या अदृश्य चीज उसकी खूबसूरत आँखें ढून्ढ रही थी. वृक्ष की दाल एक जगह से जैसे बहुत पहले टूट चुकी थी, सूखी तीखी लकड़ी पर लगा तजा खून बता रहा था के वह वही इंसान था जिसको उसने देखा था. ये भ्रम न था और खून पर ऊँगली फिरते हुए उसकी आँखों में शबनम से बूंदे चालक आई.

'हो गया न जो होना था जान. किसी और की गलती की सजा तुमने इतनी बड़ी कर दी जो अपने दिल को भी निकाल फेंका. बस करो सतना प्लीज, तुम ज़िंदा हो.', निरंतर रोने पर वह गुलाबी चेहरा काजल की कालिख से मैला होने लगा और इधर वही अध्यापिका पीछे आ कड़ी हुई.

"अरे यू फाइन मरस गौर? अभी इस वेटिंग फॉर यू.", तुरंत हे चेहरा साफ़ करती वह पलटी तोह इन अध्यापिका के चेहरे पर भी थोड़ी परेशानी चा गयी.

"I'm ऑलराइट शालिनी. जस्ट सॉ समथिंग स्टंज हेरे एंड थिस ब्लड. थैंक यू I'm टेकिंग अभी होम.", आवाज ऐसी थी जो दिल पर असर करती लेकिन आँखों के निचे हलके काले घेरे भी बहोत कुछ कह रहे थे.

"ये ब्लड नहीं है, इसकी वजह से परेशां हो गयी आप. ग्रिल पेंट हुई है तोह किसी ने यहाँ भी ये गिरा दिए होगा.", शालिनी के चेहरे के भाव सामान्य हो गए थे और इस युवती ने देखा तोह वृक्ष के पीछे बने पार्क की इस चारदीवारी पर मेहरून पेंट किआ गया था. उसके सामने स्वाभाविक होती वह वापिस कार की तरफ चल दी. बीटा अंदर बैठा हाथ में कुछ पकडे हुए था.

"अभी ये किसने दिए आपको?", सीट पर बैठते हे युवती ने तुरंत वह पैकेट बचे से ले लिए.

"ये तोह खुलता हे नई माँ.", अपनी मीठी आवाज में मासूम शकल बनता वो दोनों नन्हे हाथ विपरीत दिशा में करता जवाब देने लगा. युवती ने झिझकते हुए पैकेट पर लगी पारदर्शी टेप हटाई और अंदर देखा तोह ये जैसे उसकी हे रूपरेखा बानी थी काले रंग से, कही ज्यादा जवान और खूबसूरत. आँखों में फिर से पानी भर आया लेकिन बेटे के सामने दर्द रोकना भी जरुरी था.

"वह बाबा अंकल थे माँ. किसी दी, गिफ्ट भी और चले गए.", युवती ने अपनी ऊँगली पर वृक्ष से लगा रंग देखा जो गायब होने के बाद पीछे राखत का गुलाबी निशान छोड़ गया था.

"वह बाबा अंकल नहीं थे अभी. पापा थे तुम्हारे.", अपने बेटे के दोनों गालो को चूम कर जैसे वह पक्का कर रही थी की हाँ वही व्यक्ति था जिसको उसकी नजरे ढून्ढ रही थी. बचे को सीटबेल्ट से सुरक्षित करती वह फिर से चस्मा लगाती गियर दाल कर कार आगे बढ़ा चली. रफ़्तार बताते मीटर के पास रखा महंगा फ़ोन दूसरी बार बजा था लेकिन वह इस वक़्त शायद किसी से भी बात नहीं करना चाहती थी. फिर भी वह मासूम की आवाज सुन्न कर कार धीमी करती उसको देखने लगी.

"माँ, पापा टर्बन पहनते है. मैं भी पहनूंगा स्कूल में.", आवाज उतनी भी साफ़ नहीं थी लेकिन प्यारी बहोत थी. अंग्रेजी के शब्दों पर लड़खड़ाना भी बचे को कही ज्यादा मासूम बनता था.

"पापा टर्बन नहीं पहनते बीटा, वह आपको सरप्राइज देने के लिए ऐसे आये थे. नेक्स्ट टाइम आये तोह उन्हें बता देना के आप ने उन्हें पहचान लिए है.", युवती ने प्यार से बचे का सर सहलाया और इस ठंडी सड़क पर गाडी उतार दी. बड़े बड़े घर लेकिन सड़क सुनसान. 'तेरे बाप को हाथ चढ़ने दे बीटा, टाँगे टॉड दूंगी मैं उनकी. इतना तंग करते हैं न' एक मंजिला कोठी के बहार गाडी कड़ी करके हॉर्न बजाय तोह घर की आया ने अंदर से आते हुए दरवाजा खोला और उसके साथ हे पीछे नन्हा सा रॉटवेलर पिल्ला भी हिलता डुलता आ खड़ा हुआ. आया ने हँसते हुए पिल्लै को गॉड में लिए और कार अंदर आ रुकी.

"आंटी, बोनो मेरे पास आना चाहता है.", कार से बहार आते हे बचा आया की तरफ दौड़ गया. तीनो अंदर चले गए और बंद कार में अब ये युवती फुट फुट कर रोने लगी थी. यहाँ उसको रोकने वाला अब कोई नहीं था, तस्वीर को चूमती हुई वह बस 'ी लव यू' और 'वापिस आ जाओ' कहे जा रही थी. कोई होता तोह आता....

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वही इस बहुमंजिला रिहायशी ईमारत किसी मंजिल पर ये एक आकर्षक 4 कमरे का घरोंदा था जहा हॉल में बैठे उस लम्बे सरदार युवक के हाथ पर उसका दोस्त पट्टी बांध रहा था. टेबल पर रखा महंगी शराब से भरा गिलास निहारता ये सरदार इस बाहरी दर्द से दूर मुस्कुरा रहा था.

"तू मादरचोद मर्डर जायेगा किसी दिन. हालत क्या बना राखी है और तू सरदार कब बन्न गया सेल.? अपने बारे में कुछ बताएगा या हमेशा की तरह रहस्य बना फिरेगा? बहनचोद कहा रहता है, कब आता है कब जाता है कुछ नहीं पता. हफ्ते में दूसरी बार तू यहाँ आने के बाद बता रहा है के पहुंच गया. भाई हाथ जोड़ता हु खुद को संभल ले यारा, सबकी ज़िन्दगी सँवारने वाले की ऐसी हालत अब देखि नहीं जाती.", दोस्त की बात सीधा दिल से निकल रही थी और ये युवक उस शराब में बर्फ के टुकड़े भरता जैसे शुन्य में था.

"माँ छुड़ा साले. तेरे से तोह कुछ कहना हे बेकार है. हालत सुधार ले तेरी भाभी आने वाली होगी, दारू से नहीं रोक रहा लेकिन हुलिया ठीक कर.", बड़बड़ाता हुआ वह आकर्षक युवक कमीज की आस्तीन ऊपर चढ़ाता एक कमरे को खोल कर अंदर बने बाथरूम में टोलिया और अलमारी से कपडे निकल कर रखने लगा. बहार आया तोह उसका दोस्त सर पे पहनी पगड़ी िज्जात्त से उतार कर ऊँची अलमारी पर रख रहा था. शराब का गिलास लिए वह तैयार बाथरूम में आ घुसा.

'मेरे भाई तू बता के तोह देख मैं जान लुटा दूंगा तेरे लिए. तेरा खोखलापन दिल में डर दे रहा है. एक बार तू फिर से वैसा बन्न जा न मेरे भाई, भगवन तू हे कुछ कर.', उसके जाने के बाद दोस्त की आँखों में पानी आ गया था. उसका दोस्त नहाते हुए भी शराब पी रहा था और ये बिना कुछ किये उसके लिए आंसू बहा रहा था. 5 मिनट बाद घंटी बजने पर तोलिये से मुँह साफ़ करता ये दरवाजा खोलने चल दिए.

"अबीर, तुम इस वक़्त घर पे कैसे? चलो ाचा हुआ के तुम्हारे पास आज मेरे लिए टाइम तोह है.", तीखे nain-naksh और गदराये शरीर वाली ये महिला भी बड़ी दिलकश थी. गले का मंगलसूत्र और मांग में सिन्दूर बता रहा था के वह अबीर की अर्धांग्नी हे है.

"वह.... मैं कह रहा था..", अबीर बात करते करते अटकने लगा तोह नंदिता ने टेबल पर राखी उनकी सहेजी हुई विदेशी शराब की बोतल देख ली. चेहरे पर कोई गलत भाव नहीं आये.

"वह वह क्या कर रहे हो? ाचा है न के तुम्हारा जोड़ीदार हमारे घर आया है. शादी के बाद 2 बार हे मिलना हुआ लेकिन तुम्हारी बातें इतना बता चुकी है के इस घर में हमारे अलावा किसी के लिए जगह है तोह वह उसके लिए हे है. मैं फ्रेश हो कर लंच देखती हु तुम जरा मजनू को कंपनी दो.", आँख मारती हुई वह अपने पति का गाल चूमती अंदर चली गयी और अबीर धम्म से सोफे पर पसर गया.

"ये बंगालन इतना कुछ समझ जाती है लेकिन कही gudd-gobar हे न हो जाये इस मजनू की वजह से. बचा लेना ऊपर वाले.", परेशानी में वह बस बार बार भगवन को हे याद कर रहा था और इधर उसका दोस्त गीले बाल और दाढ़ी के साथ खली गिलास लिए नंगे पाँव चलता हुआ उसकी बगल में आ बैठा.

"ोये मूर्खनंद. मेरी बीवी भी आ गयी है घर और तू अगला जाम बना रहा है. रोटी खा ले फिर बोतल ख़तम कर डीओ.", आते हे जाम बनाते देख अबीर ऊपर तौर पर हे टोकने लगा.

"नहीं पिलानी तोह कोई बात नहीं. मैं चलता हु कोनसा दुनिया में शराब की कमी है. प्यार होता तोह बात अलग होती.", अबीर उसकी बात सुन्न कर खीजता हुआ अपने लिए भी जाम बनाने लगा.

"तू मादरचोद है, था और रहेगा. बहनचोद 6 साल हो गए मैंने दिन में दारु नहीं पी और तू इस एक हे हफ्ते में मुझे दूसरी बार दिन में टल्ली करने वाला है."

"कौन टल्ली कर रहा है मेरी जान को? और जनाब आपसे हमको बहोत शिकायत है. सिर्फ अपने दोस्त से मिल कर निकल गए पिछली बार, भाभी को भुला दिए.", नंदिता एक ढीली लम्बी स्कर्ट और कमर तक का चुस्त टॉप पहने उनके पास चली आई. युवक खड़ा हुआ तोह वह उसके गले लग कर मिली अपनी शिकायत कहती. टेबल पर अब तीसरे गिलास में जाम बन्न रहा था.

"सॉरी भाभी, काम की वजह से जाना पड़ा. इसलिए आज उस दिन की भरपाई करने ृक्क गया. शिकायत ज़माने भर को है मुझसे लेकिन आपकी तोह हल कर हे सकता हु.", हलकी ख़ुशी चेहरे पर ढेर सारा दर्द सीने में दफ़न किये इस युवक ने पाँव छूने की कोशिश की तोह नंदिता पीछे हो गयी.

"इतनी बूढी मैट करो मुझे, मान लिए बड़ी हु लेकिन रिश्ते में छोटी हु. वैसे सच कहु तोह बहोत बुरा लगा था जान कर उस हादसे के बारे में. लेकिन तुम्हे कोशिश करनी होगी अपनी ज़िन्दगी को एक दिशा देने की. मेरे लिए या अपने दोस्त के लिए न सही लेकिन इनायत के लिए तोह इतना कर सकते हो. एक बार तुमने हे कहा था के सब ख़तम होना बस दिखावा है नंदिता, अकेला अबीर तुम्हे पूरा परिवार देगा. मैंने तुम्हारी बात मान ली थी और तुमने पूरा साथ दिए हम दोनों का. आज मेरी बात पर बस गौर करके देखो.", नंदिता ने उसका हाथ थाम कर जिस अपनेपन से ये कहा वह युवक बिना कुछ बोले बस गर्दन हाँ में हिलाते हुए नंदिता के बराबर हे सोफे पर बैठ गया. अपने हाथ से गिलास युवक को पकड़ने के बाद बिना जाम टकराये तीनो ने हल्का घूँट लिए.

"डार्लिंग, अपने देवर को आज करारी भिंडी तोह बना कर खिलाओ. हमेशा यही कॉलेज में तुम्हारा दिए खाना खा जाता था."

"क्यों नहीं. भिंडी भी और जीरे वाले आलू भी बनाउंगी. काम से काम मेरे देवर को मेरे हाथ का खाना तोह पसंद है. तुम्हारी तरह ये ऑफिस से खाना वापिस लेके तोह नहीं आता.", अगले कुछ समय तक कोई भी दुखभरी बात नहीं कही थी किसी ने लेकिन 2 जाम के बाद युवक ने अपनी भाभी का हाथ थाम लिए.

"आज मैं अभी से मिला था भाभी.", और चेहरे पर फिर से दर्द आ गया.

"तुमने ाचा किआ जो कदम भदया आख़िरकार. वह छोटा है और अभी माँ के साथ उसको अपने बाप की भी जरुरत है. जरा सोचो कैसे ध्यान रखती होगी वह अकेली उस मासूम का? मैं भी कभी अकेली माँ थी और इस दुनिया को मैं जानती हु. तुम तोह फिर भी ज़िंदा हो और आपस में इतना प्यार है तुम दोनों के. इनायत भी अभी की माँ को हे माँ समझती है. दोनों बचे एक हे माँ के साथ है तोह अब उन्हें बाप का प्यार भी दो.", नंदिता ने हाथ दबाते हुए युवक को जैसे हौंसला दिए.

"आपको क्या लगता है मैं जाना नहीं चाहता अपने घर? अब वही तोह हैं मेरे पास जो बाकी है. लेकिन एक इंसान से हजारो सवाल पूछने है और दूसरी तरफ मैं इस बात से भी डरता हु के जैसे मेरी परछाई बाकी सबको खा गयी कही ये दोनों बचे भी अनाथ न हो जाये."

"समय सब ठीक कर देगा देवर जी. तुम्हारा कोई कसूर नहीं है. जहा तक मैं जानती हु तुम्हारे पास अभी भी पूरा परिवार है, बिखरा जरूर है लेकिन कही न कही सभी हैं तोह दुनिया में. और जो जा चुके है उनके लिए तुम कही जिम्मेवार नहीं हो. खुद को दोष देना बंद करो और वापिस समेटो अपने संसार को. इनायत की एक माँ के जाने के बाद उसके पास दूसरी अभी भी है. बस तुम हे नहीं हो. क्या ऐसे रुस्वा करोगे अपने पहले प्यार की आखिरी निशानी को? सोचने से बस समय निकलेगा और वही तोह काम पड़ जाता है ज़िन्दगी में.", नंदिता ने उन आँखों को टेबल पर रखे टिश्यू से साफ़ किआ और बोतल उठा कर अलमारी में रख कर रसोई में चली गयी.

"दोनों फ्रेश हो जाओ, सब्जी तैयार है. मैं सबके फुल्के (रोटी) साथ हे बना रही हु.", नंदिता के इतना कहने पर अबीर ने सिगग्रेटे सुलगा ली.

"बंद कर दे ये मौत पीनी.", युवक ने खड़े होते हुए अपने दोस्त को हलके गुस्से में कहा.

"इस से ज्यादा आग तेरे सीने में जलती रहती है, हर वक़्त. बंद कर दे खुद को जलना. कर सकता है?"

"हाँ कर सकता हु. पहले समझ नहीं आ रहा था के सतरंगी ज़िन्दगी बेरंग क्यों हो गयी. अब इस जलते काले दिल को न सफ़ेद बादल सा बनाया तोह मेरा नाम बदल देना. इंद्रधनुष वैसा हे होता है न अबीर? प्रिज्म बिटवीन था डार्केस्ट तो थे लइतेस्ट. सफर फिर से शुरू कर दिए है मैंने और इस बार शंकर शर्मा को भी वही दर्द मिलेगा जो इतने सालो से मैं लिए घूम रहा था. लेकिन मैं बहार निकल आया हु और वह अंदर जाने वाले हैं.", इतना कहता हुआ वह युवक एक भरपूर ऊर्जा लिए उस कमरे की तरफ चल दिए जहा से नाहा कर आया था डेढ़ घंटा पहले.

'बल्ले शेरा, साला सब बदला लेकिन इसकी ये चाल और शरीर कही ज्यादा निखार गया है. वेलकम बैक तो थिस ब्यूटीफुल वर्ल्ड माय बरोथेर. वेलकम बैक.', अपने दोस्त को फिर से ज़िंदा महसूस करते हे अबीर ने सिग्रेटे कटोरी में बुझा दी.

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साल 1998

यूनिवर्सिटी से घर आने पर जहा प्रियंका दीदी अपने और आरती के कागज संभल कर फाइल के साथ बैग में रखने कमरे में चली गयी वही अर्जुन आते हे फ्रिज से पानी निकल कर पीने लगा. दोपहर के 12 बज रहे थे और अभी उनके पास बस कुछ हे घंटे बाकी थे इस शहर में. आरती दीदी भी कमरे में घर के कपडे पहन ने जा चुकी थी. इधर पानी पी कर बोतल वापिस राखी हे थी की गुरदीप हॉल का दरवाजा खोलती अंदर आ गयी.

"थैंक यू सो मच अर्जुन. तुम्हे बेबे बुला रही है और मेरे साथ हे चलना होगा.", अर्जुन ने अभी mooh-hath भी न धोया था और ये महारानी फरमान लिए कड़ी हुई. आरती दीदी ढीला सा पजामा और टीशर्ट पहने कमरे से आई तोह उन दोनों को हे देखने लगी. अर्जुन अभी भी फ्रिज के हे पास खड़ा था और गुरदीप बहार वाले दरवाजे के.

"सांस तोह ले लिए करो कभी. चलो मैं भी चलती हु आंटी के पास.", आरती दीदी ने हँसते हुए अर्जुन का हाथ थमा और उसको लिए गुरदीप के घर आ गयी. रेशम सिंह जी ने भी घर saaf-suthra और बगीचे के साथ हे बनाया था. आज दिन में हे उनकी कार घर में कड़ी थी. तीनो गलियारे से होते हुए दरवाजे से हॉल में आये तोह सरदार जी ने आते हे अर्जुन को सीने से लगा लिए. बराबर हे गुरदीप की माता जी भी आ कड़ी हुई और अर्जुन के सर पर हाथ फेरती भावुक हो गयी. कुछ पल ऐसे रहने के बाद सरदारजी अलग हुए तोह उनके चेहरे पर सुकून था.

"तुम्हारी माँ भी बहोत भागो वाली है पुत्तर जी. ऐसा बीटा पैदा किआ और परवरिश दी है के उनको नमन करता हु. मेरा घर आबाद कर दिए बीटा जी तुमने यहाँ आने के एक हे दिन में.", सरदार जी ने दोनों हाथ जोड़े तोह अर्जुन ने उनके हाथ पकड़ लिए.

"क्यों पाप लगा रहे है अंकल? आप पिता सामान है और इतनी छोटी सी बात पर ऐसा करना ाची बात नहीं. आप लोगो का प्यार हे वजह है ऋतिंदर भैया के सँभालने के पीछे. थोड़े समय के लिए वह भूल गए थे बस और बचा गली में घूम कर वापिस घर हे आता है.", अर्जुन ने मुस्कुराते हुए कहा और आरती दीदी खुद हे उसको पकड़ कर सोफे पर ले आई. बाकी सभी भी वही आमने सामने बैठ गए.

"पुत्तर जी, दिल रखने के लिए अब जो भी कह दो लेकिन जो हम नहीं कर पाए वह तुमने कर दिए. शिक्षक का दर्जा तोह maa-baap से भी ऊपर हे होता है. रिस्की ने खुद हे कहा के उस से गलती हो गयी और तुमने हमे बड़ी मुसीबत से बचा लिए."

"अंकल जी अब आप ये सब ले कर बैठ गए. मैंने तोह सुना था के पंजाब में स्वागत lassi-doodh से होता है.", अर्जुन ने वार्तालाप को अलग दिशा में ले जाते हुए mehman-nawaji की तरफ मदद दिए.

"बैठो बीटा, मैं लेके आती हु. ख़ुशी में भूल हे गयी थी के बचा पहली बार घर में आया है.", आंटी रसोई में गयी तोह गुरदीप भी उनके साथ हे चल दी. कनखियों से अर्जुन को देखना अभी भी जारी था.

"वैसे कृष्णा ने बताया था के तुम्हारी माता जी बड़ी होनहार और सुलझी हुई महिला है. बहोत पहले हे मैं उनसे मिला था लेकिन शंकर जी से मिलना होता रहा है साल-6 महीने में. शायद उनकी हे परवरिश है बीटा जो तुम ऐसे बन्न गए हो. आज भाई भाई को नहीं पूछता लेकिन तुम्हारे परिवार में जैसे ये भावना खून में हे हैं."

"हाँ माँ बहोत ख्याल रखती है अंकल मेरा लेकिन वह गलतियां नहीं निकलती. उसके लिए मेरे dada-daadi और ढेर साडी बहने पहले से हे त्यार रहती है. वैसे गलतियां मैं भी बहोत करता हु लेकिन वह शायद उतनी बड़ी नहीं होती के दिखाई दे. छोटा भी हु तोह घरवाले ध्यान नहीं देते. वैसे एक बात केहनी थी अगर आपकी इजाजत हो.", अर्जुन ने अपनी बात पूरी कहने से पहले पूछना ठीक समझा.

"बीटा जी निश्चिंत हो कर कहो. हमारे यहाँ दिल बड़े होते है घर से भी.", अंकल जी ने हँसते हुए जवाब दिए.

"आप सभी कोशिश किआ करो एक साथ रहने की, समय बिताने की. मेरे दादाजी के साथ मेरे पापा और बाकी सब यही करते है. कई बार एक दूसरे की बात से सहमति नहीं भी होती लेकिन वह फिर भी साथ रहते है, हल निकलते है और सुख से ज्यादा जरुरत के वक़्त एक दूसरे का ध्यान रखते है. दादा जी पापा के दोस्त की तरह है, चाचा और पापा तोह जैसे एक हे हैं और चची माँ के साथ मेरी माँ भी रिश्ते से अधिक जुडी हुई है. आरती दीदी को कोई ये नहीं कहता के वह किनकी बेटी है, ये भी Ritu-Alka दीदी की तरह बस मेरे दादा जी के संसार का अटूट हिस्सा है. ऋतिंदर भैया में बेटे के साथ आपको और भी कुछ जरूर मिल जायेगा. आंटी भी ऐसे में सबके साथ रहने पर अकेलापन नहीं महसूस करेंगी.", इधर आंटी लस्सी के 4 गिलास लेकर आई और उनके साथ हे गुरदीप प्लेट में namkeen-meetha ला कर टेबल पे रखती हुई आरती की बगल में बैठ गयी.

"बचे बड़े होने पर हम संपर्क कमजोर कर लेते है. मेरी उम्र ऐसी बात करने की इजाजत नहीं देती लेकिन आप लोग एक दूसरे को समय देंगे तोह कभी किसी अर्जुन को शब्शी नहीं देनी पड़ेगी. मैं तोह मेरे दादाजी के प्यार को ज्यादा पाने के लिए बगीचे में माली बन्न ने के साथ साथ ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ता जिसमे वह अकेले हो.", अर्जुन ने बात ख़तम करने के साथ हे bhool-chook के लिए हाथ जोड़ते हुए मांफी मांगी तोह आंटी जी ने उसको सीने से लगा लिए.

"बीटा कुछ गलत नहीं कहा तुमने. ये गुरुघर के बाद समय से पहले तैयार हो कर काम पे चले जाते है, शाम को आने के बाद मैं चाय दे कर ड्यूटी ख़तम समझ लेती हु और इनके होते हुए भी टीवी चला कर बैठ जाती हु. रिस्की को पहले हर वक़्त सामने रखते थे, डीपी भी इनके और मेरे पीछे लगी रहती थी. बस अनजाने में हे बंद घर में सबके कमरे अलग होते होते ये दूरिया आ गयी. जिम्मेवारी के नाम पर बचो को भी भूल गए और एक दूसरे को भी."

"सच कहती हो आप दार्नी जी. बीटा बात तुमने बड़ी कही लेकिन बिना चोट पहुचाये आइना दिखा दिए. मेरे बचो को अब सिर्फ चीजे नहीं मिलेंगी, वह मेरे साथ जाया करेंगे और मैं भी पहले ाचा मुर्गा बना लेता था, तुम्हारी आंटी को पसंद था तोह अब फिर से खुश करने की कोशिश करूँगा."

"तोह इस बात पर लस्सी से मुँह मीठा करो.", अर्जुन ने एक गिलास अंकल की तरफ बढ़ाया तोह गुरदीप ने अपनी माता जी को आँखें दिखाई.

"तुझे क्या हु डीपी?", अंकल ने जैसे पुछा वह फटाक से बोल पड़ी

"मैंने कहा था बेबे से लस्सी मीठी बनाओ, इन्होने नमकीन बना दी तोह मुँह मीठा नहीं नमकीन होगा. देख लो बेबे अर्जुन मीठी लस्सी पीटा है.", वह रेडियो फिर से चालू हो गया था.

"बंदरिया, बर्फी पड़ी है टेबल पर. दिमाग में पापा से तेल डलवाया कर, चलने लगेगा.", रिस्की अंदर से तैयार हो कर आया और गुरदीप से चुहल करने के बाद अपनी माँ से जा लिप्त, जो छोटे सोफे पर बैठी थी.

"तू मार खायेगा मेरे हाथ से अगर बंदरिया बोलै तोह. अपनी शकल देख जरा tikki-chhole जैसी.", गुरदीप की कहावत देख अर्जुन भी हंसने लगा और बाकी सब खुश थे इन भाई बहनो को ऐसे देख कर.

"वैसे गुरदीप को खाने का इतना शौक है के मिसाल भी अपनी हे पसंद से तैयार करती है?", अर्जुन के इतना कहते हे गुरदीप का मुँह फूल गया.

"भाई ये तोह पापा भी बता देंगे, मॉडल टाउन में Chur-mur वाला देखते हे खुश हो जाता है डीपी को, 100 के टिक्की गोलगप्पे अकेले खा जाती है हमारी भोली बेगम. पापा ने तोह इसकी शादी की बात भी उस रेहड़ी वाले से की थी. वही बेचारा डर गया. एक तोह ये इतनी मोटी वह मरियल सा ऊपर से जितने का सामान बिकेगा उस से ज्यादा ये खा जाएगी.", रिस्की की पीठ पर ढोल पड़ते हे वह अपने पापा को देखने लगा जो हंस भी रहे थे और झूठा गुस्सा दिखा रहे थे.

"बस करो भाई, वह भड़क गयी तोह फिर तुम हफ्ता कमरे में चेहरे पर टेप लगते फिरोगे. मेरी बेटी अपने बाप का खाती है और उसको कोई कुछ नहीं कहेगा.", रेशम सिंह जी की बात सुन्न कर भोली बेगम रिस्की को अंगूठा दिखने लगी. उसको भी मालूम न था के पापा भी मजाक उसका हे उड़ा रहे थे. कुछ देर बातें हुई और सबको हे ाचा लग रहा था इस बदले हुए माहौल में शामिल होने पर. 1 बजते हे अर्जुन ने इजाजत ली घर पर बाकी बचे काम करने के लिए. उन्होंने दोपहर के खाने के लिए रोकना चाहा लेकिन जैसे तैसे उन्हें मन कर आरती अर्जुन उनसे जाने से पहले मिलने का बोल कर बहार आ गए.

"मैं भी वही जा रही हु, खाना प्रियंका के साथ हे खा लुंगी.", गुरदीप उनसे पहले हे बहार भाग चली. अपनी बेटी को भी हँसता खेलता देख mia-biwi के साथ रिस्की भी खुश था. अंदर जाते हुए वह अपने पापा से कहने लगा.

"वह मैं कह रहा था पापा के यामाहा बेच देते है. काम की नहीं है कुछ और एवरेज तोह 15 की देती है. कॉलेज तोह दोनों के हे ख़तम हो गए है हमारे, मेरे re-exam देने आपके साथ चला जाया करूँगा. यही जॉब भी देख लूंगा उसके बाद."

"गाडी तेरे लिए हे ली है बीटा, तू हे ऑफिस छोड़ दिए कर मुझे, लेने आएगा तोह ठीक नहीं दोस्त मेरे भी है. अपनी माँ के साथ रह और बस पढाई कर. जॉब नहीं करनी अभी डीपी की शादी तक."

"पापा, वह डीपी की शादी बुआ के कहने पर पक्की तोह कर दी लेकिन लड़का उसको पसंद है या नहीं ये तोह पूछ लेना चाहिए था.", रिस्की ने नजरे झुकाये अपनी बहिन के प्रति इतने समय बाद चिंता जाहिर की तोह रेशम सिंह जी ने उसकी पीठ थपथपा दी.

"अंगूठी थोड़ी बदली है शेरा. जहा वह चाहेगी कर देंगे लेकिन तू न अपनी सेहत पे ध्यान दे और अपनी माँ का ख़याल रख. बड़े टाइम बाद उसका बीटा यहाँ सबके साथ दिखा है तोह आज हे वह साल भर का खाना बना रही है तेरे लिए.", मुस्कुराता हुआ रिस्की अपनी माँ के पीछे लिपट गया.

"बेबे, कुछ नहीं बनाना. आप शक्कर दाल के चोरी बना दो बस.", माँ की आँखों में अब वह आंसू चालक आये जो कबसे वह रोके हुए थी.

"माफ़ कर देना बीटा अगर मुझसे कोई अनदेखी हुई हो."

"बेबे दिल मैंने दुखाया है और रो आप रही हो. आज न आपको मैं बड़े गुरुघर लेके जाऊंगा, आपकी बड़ी इत्छा थी न जाने की तोह हम दोनों हे चलेंगे शाम को. क्या पता वाहेगुरु जी मेरी माँ को कौनसी नयी खुशिया दे दे इतने माडे दिन देखने के बाद."

"तू न सचमुच मेरी जान है बीटा.", वह मदद कर अपने बेटे के सीने से लग गई थी. इधर पड़ोस के घर में अलग हे माहौल था.

हॉल में प्रियंका दीदी के साथ 4 युवतिया बैठी थी सोफे पर और घर के बहार हे जेन कार 2 स्कूटी कड़ी थी. गुरदीप तोह जाते हे उनमे शामिल हो गयी, उसकी भी सहेलिया थी वह और आरती भी सबसे मिल कर उनके लिए ठंडा बनाने चली गयी रसोईघर में. रह गया अर्जुन जो अंदर से आती आवाजे सुन्न कर आँगन में हे ठिठक गया. इतनी साडी अनजान लड़कियों से नजरे मिलाना उसके बस का नहीं था. अभी वह वापिस बहार जाने का विचार हे कर रहा था के पिछले बगीचे से चलती जसलीन उसके पास आ रुकी.

"क्या बात हीरो, यहाँ खड़े पहरा दे रहे हो?", हाथो में 2 अमरुद लिए वह मुस्कुरा रही थी. शरीर पर वही रंगीन कपडे थे जो कैंटीन में देखे थे.

"नहीं, वह मैं पीछे गार्डन में हे जा रहा था. आपके कदमो की आहात से रुक गया देखने के लिए की कोई पहले से उधर है शायद.", जवाब देते न बना तोह जसलीन पर हे बात घुमा दी थी उसने.

"चलो यार अंदर, वह बड़ी उमस है. वैसे रुको, बगीचे में हे चलते है. ये अमरुद थोड़े सख्त है लेकिन पास थे इसलिए टॉड लिए. तुम मेरे लिए ऊपर वाले पके हुए अमरुद टॉड हे सकते हो.", जसलीन को अब वह न मन कर सकता था और न वह उसके साथ जाना चाहता था. पहले हे आरती दीदी के सामने गुरदीप वाली बात पर वह खुद को दोष दे रहा था और ये लड़की अब नयी मुसीबत पैदा कर रही थी.

"आप उमस में परेशां होंगी, मैं टॉड लता हु आपके लिए.", अर्जुन ने कदम उधर गलियारे में बढ़ा दिए लेकिन जसलीन मुँह टेढ़ा करती हुई उसके पीछे हे चल दी. वह मैं बनाये हुए थी जैसे की अर्जुन का पीछा नहीं छोड़ना. इस तरफ आते हे अर्जुन बस ये हरियाली देखने लगा जो उसकी चची माँ ने प्यार और म्हणत से तैयार की थी. अमरुद का पेड़ सचमुच 8-9 फ़ीट ऊँचा और उसके साथ दुगना बड़ा जामुन का वृक्ष. एक तरफ अंगूर की घनी बैल पाइप से लिपटी आगे अनार के झाड़ तक फैली थी. उसकी चाय में हे हरी मिर्च, भिंडी, टमाटर, प्याज की क्यारी बड़े सही क्रम और दुरी से बानी थी. अनार भी टेनिस बॉल से बड़े और laal-bhure. आप के पेड़ पर बौर आने लगे थे.

"तुम यही तोह हो कल से, देखा नहीं क्या पहले?", जसलीन की आवाज सुन्न कर उसका ध्यान टूटा और जवाब में बस ना में गर्दन हिला दी.

"समय हे नहीं मिला इधर आने का लेकिन यहाँ तोह सामने वाले बगीचे से भी ज्यादा हरियाली है. बड़ी मेहनत लगी होगी इतना सब सँभालने में.", अर्जुन जसलीन के होने पर भी बगीचे में खोया था.

"आंटी ने तोह यहाँ झूला भी लगवाया था पिछली बैसाखी पे, वह जामुन वाली दाल जाने किसकी वजह से टूट गयी थी. तुम भी गार्डनिंग करते हो क्या?", जसलीन चलती हुई उसके करीब से निकल कर अनार के झाड़ के पास आ रुकी. सुखी टहनिया बहोत थी उस नाजुक कलाई को खरोंच देने के लिए.

"रुको.", अर्जुन कहता रह गया और दर्द से हाथ झटकती जसलीन अपनी गोरी पतली कलाई देखने लगी.

"मैंने बोलै भी था आपको और देखो लग गयी न.", अर्जुन ने बगीचे में बानी टंकी से हाथ पर पानी डालते हुए साफ़ किआ और जसलीन की बड़ी बड़ी काजल लगी आँखें उसके चेहरे को हे निहारती रही. दर्द तोह जैसे अर्जुन के हाथ पकड़ने से हे चला गया था लेकिन अंदर जो दर्द उठने लगा था उसकी दवा भी अर्जुन हे कर सकता था.

"हो गया.", अर्जुन ने हाथ ाचे से धोने के बाद देखा तोह खरोंचे बस हलकी हलकी नजर आ रही थी.

"इतनी जल्दी हो गया?", जसलीन का सवाल उसको खुद नहीं मालूम था.

"हाँ बस दीदी से बोल कर बेतनावटे तुबे लगवा लेना. जलन नहीं होगी और आइंदा सूखी झड़ी में सीधा हाथ डालने से पहले सोचना जरूर. चलो मैं आपके लिए वह अनार टॉड देता हु.", अर्जुन ने कलाई क्या छोड़ी जसलीन का रंग हल्का पड़ गया. फिर भी अर्जुन उसके लिए तोह ये कर रहा था. वह देख रही थी कितनी कुशलता से अर्जुन एक टहनी को झुकाते हुए उस अनार तक पंहुचा और आराम से टॉड कर उसके पास ले आया.

"थैंक यू."

"अमरुद भी टॉड हे लेते है.", अर्जुन ने मुस्कुरा कर जवाब दिए और उस बड़े और हलके पीले अमरुद तक पहुंचने की कोशिश करने लगा जो तक़रीबन 8 फ़ीट ऊपर था. ऊँगली छू रही थी और वह हिल जाता.

"मुझे ऊपर उठा लो, मैं टॉड लेती हु.", जसलीन की बात सुन्न कर अर्जुन को झटका लगा लेकिन शरीर को ऊपर उछाल कर उसने वह अमरुद भी टॉड लिए.

"10 फ़ीट के बास्केट रिंग को पकड़ सकता हु ये तोह फिर भी पास हे था. वैसे आपको उठा भी लेता तब भी वह तक तोह नहीं पहुंचते.", अर्जुन ने अमरुद हाथ में थमाया तोह जसलीन फुर्ती से उसका गाल चूम कर खिलखिलाती हुई भाग गयी. अर्जुन भोचक्का सा अपने पर गिरी बिजली की तपिश महसूस करता खड़ा रहा.

'अब इसको क्या हुआ जो गाल चूम कर भाग गयी.?', अपने सोच में हे खोया था के आरती दीदी इधर आ गयी.

"चलो, बहार अकेले क्या कर रहे हो. अंदर सब इन्तजार कर रहे है."

"इन्तजार?"

"सभी फ्रेंड्स आई है न हमारी तोह फेयरवेल ट्रीट होगी हे. सब अपनी अपनी पसंद का खाना लेके आई है और साथ मिल कर खाएंगे.", आरती दीदी के ऐसा बताने पर अर्जुन चुपचाप उनके साथ चल दिए. अंदर तक़रीबन 8 लोग तोह सोफे और कुर्सियों पर बैठे हे थे और अर्जुन का सभी से परिचय करवाने के बाद आरती दीदी और अर्जुन भी खाने में शामिल हो गए. लड़कियों की kachar-pachar भोजन के वक़्त भी निरंतर चालु थी और अर्जुन पर ज्यादा किसी ने ध्यान नहीं दिए था और न उसने खुद. फिर भी गुरदीप और जसलीन बीच बीच में अर्जुन को देख हे लेती थी. सबसे पहले अर्जुन हे खाने से निवृत हो अपनी प्लेट रसोई में रखने के बाद चची माँ के कमरे में आ गया. उसको मालूम था के अभी बहार भूचाल भी आ जाये तोह उन लोगो की बातें नहीं ख़तम होने वाली. एक तकिये में मुँह दबाये वह दूसरे को ब्याह के निचे रखे सोने लगा.

"यार प्रियंका, बुलाने के लिए शुक्रिया लेकिन तुझे पता है न शादी में इतनी दूर मेरा आना तोह पॉसिबल नहीं है. हाँ वैसे कभी आना हुआ तोह मैं बिना मिले नहीं आउंगी वापिस.", ये कीर्ति थी जो दीदी के न्योता देने पर अपनी असमर्थता बता रही थी.

"ठीक कह रही है कीर्ति यार प्रियंका, बेशक गाडी भी है घर में लेकिन तू खुद हे सोच जॉइंट फॅमिली में रहती हु मैं तोह कोई भी इजाजत नै देगा. और तूने कोशिश की भी तोह मुझे बुरा लगेगा अगर परिवार वाले तेरे सामने मन करेंगे. वैसे घर तोह यही रहने वाला है तोह जब जब तू आएगी तोह हम भी मिलने चले आएंगे. मेरी भी शादी है दिसंबर में.", खूबसूरत सी ये पतली सी लड़की शमा मांगती हुई अपनी मजबूरी बताने लगी.

"मतलब तुम में से कोई भी नहीं आएगा? ये तोह बड़ी गलत बात है यार. मेरी सहेलिया हे नहीं होंगी तोह मैं क्या जवाब दूंगी अपनी बहनो को.?", प्रियंका दीदी सबको देखती हुई नाराजगी जाता रही थी.

"कोई आये या न आये मैं तोह आ रही हु और वह भी हफ्ता पहले, डीपी के साथ. गाडी है मेरे पास और रास्ता मुझे ाचे से पता है.", जसलीन के ऐसा कहते हे साथ बैठी गुरदीप उसके गले लग गयी.

"ये है मेरी सहेली बेशक लड़ती रहती है मेरे साथ क्योंकि मैं मॉडर्न नहीं रहती इसके जैसी लेकिन साथ भी मेरे हे रहती है.", गुरदीप के ऐसा कहने पर आरती दीदी दोनों को देख रही थी.

"डीपी को तोह uncle-aunty के साथ आना पड़ेगा. ये तुम्हारे साथ कैसे आ पायेगी? और जग्गी तुझे कैसे अकेले आने देगा वह भी हफ्ते पहले?", आरती दीदी की बात पर जसलीन ने कपडे से अमरुद साफ़ करते हुए जवाब दिए.

"बेबे को ले कर जग्गी जा रहा है नांदेड़ और वह से बॉम्बे वाली मस्सी के पास. उनका प्रोग्राम है 2 हफ्तों को और उन्होंने जाना है 13 तारीख को शादी है 21 की. मैं मैनेज कर लुंगी आराम से. और डीपी के घरवाले शादी वाले दिन हे आएंगे लेकिन इसने परमिशन ले ली है अभी अभी.", जसलीन ने आँख मारते हुए कहा तोह कीर्ति गौर से उसको देखने लगी.

"तू इतनी उतावली कैसे हो रही है वह जाने के लिए? एक में रहने वाली को वह Gucci-Tommy की जगह Apsara-Bata मिलेंगे और ज्यादा से ज्यादा कूलर की उमस वाली हवा के साथ. कितना पिछड़ा हुआ है हरयाणा. इसलिए तोह मेरे घरवाले मन कर रहे है के वह गर्मी और बागड़ी भाषा की वजह से.", कीर्ति की बात का जवाब Priyanka-Aarti देती उस से पहले हे जसलीन ने कमान अपने हाथ में ले ली.

"ओह मिस पंजाबी बाघ, इतना भी मत बोल. हरयाणा वैसा हे है जैसा ये पंजाब है. #### शहर में रहते है ये लोग और सर्विस क्लास सिटी है. इंजीनियर, डॉक्टर, साइंटिस्ट्स गली मोहल्ले में मिलते है उधर. लैंग्वेज का क्या है, यहाँ उनके लिए पंजाबी अलग है हमारे लिए हरयाणवी लेकिन समझ दोनों हे लेते है. रही बात कूलर की और ब्रांड्स की तोह जहा जाओ वैसे हो जाओ. यूनिवर्सिटी में मैं इस जीन्स टॉप में रहती हु लेकिन घर पे तोह मैं भी सबके जैसे हे salwar-kameej या pajama/nikkar ज्यादा से ज्यादा. दिल लगाओ दिमाग नहीं.", जसलीन की बात सुन्न कर कीर्ति थोड़ा शर्मिंदा हो गयी.

"वह यार मैं तोह वही बोल रही थी जो मेरी चची ने कहा. सॉरी प्रियंका मेरा वैसा मतलब नहीं था."

"तेरी चची न टेढ़ी बहोत है. पता नहीं तेरा चाचा कहा से ब्याह लाया उसको. आप तोह राजस्थान के रेगिस्तान से आई है और उसको हर तरफ अमेरिका लंदन चाहिए.", जसलीन ने खिंचाई की तोह आरती ने हँसते हुए हाथ पर हाथ रखते हुए चुप करवाया.

"ऐसा है कीर्ति अगर तुम्हारा दिल करे तोह आ जाना और मैं विश्वास दिलाती हु की सेवा में कोई कमी नहीं होंगी. वह हमारे 2 घर है और दोनों हे जसलीन के घर से भी बड़े. जिसमे अभी रहते है न वह मेरे दादा जी और अर्जुन ने सिर्फ प्यार से बनाया हुआ है. रही बात सुख सुविधा की तोह हम सभी बहनो के कमरे में तोह एक लगवा दिए गया है और बाकी दूसरे घर में 5 कमरे और तैयार हो रहे है जैसे हमारे है वैसे हे. शहर यहाँ से थोड़ा छोटा होगा लेकिन भीड़ भी नहीं है जिस से दम घुटे या परेशानी हो. और सच कहु तोह तुम्हे आना हे चाहिए, परिवार में कोई एडजस्ट नहीं होता. प्यार होता है और सभी अपनी जगह बना हे लेते है.", आरती दीदी ने बड़े प्यार से समझाया तोह जसलीन के साथ साथ बाकी लड़किया भी देखने लगी. जैसे उनको विश्वास न हो के आरती लोगो का घर परिवार ऐसा होगा.

"दूसरी बात ये है के अगर वह कुछ तेरी पसंद का न मिला तोह हमारा भाई कही से भी ढून्ढ कर ला हे देगा जो तुझे चाहिए होगा. वैसे परिवार में आएगी तोह एक बात कन्फर्म कर देती हु तुम दोनों को, ये jeans-top की जगह साड़ी न पहनी तोह मेरा नाम बदल देना. तुम दोनों से ऊपर तोह तारा हे होगी इस सबमे लेकिन मिलना जरा मेरी बुआ की बेटी से. Western-conventional का बेस्ट एक्साम्प्ले है. बाकी ठीक नहीं लगे तोह hotel-farmhouse भी है. आगे तुम्हारी मर्जी.", प्रियंका दीदी ने तोह सबको सोचने पर मजबूर कर दिए था.

"बात कही से गलत भी नहीं हो सकती. तुम्हारे दादा जी का जब गाँव हे खुदका हो तोह ये सब छोटी बातें हे हैं. कीर्ति आये न आये, मैं तोह अपनी डार्लिंग के साथ तैयारियों में लगने वाली हु. शायद इसको गुरी के साथ आना हो और वह ऐसा अल्लोवेद नहीं होगा तोह मूड बदल रही होगी ये. और डिंपल तू भी चल न यार, कार में 2 लोग और भी आ जायेंगे.", जसलीन ने कीर्ति की फिरकी लेने के साथ हे इस एक और कटीले nain-naksh वाली लड़की से पुछा.

"अभी कन्फर्म नहीं है कुछ. एक एग्जाम है यार मेरा, घरवाले तोह पीछे हे पड़े हुए है के देहरादून चली जा या दिल्ली घूम आ. घरवाले तोह कभी मन नहीं करेंगे लेकिन पहले ये एग्जाम फिर मैं तुझे बता दूंगी. वैसे हाँ हे समझ अब.", डिंपल के इतना कहते हे प्रियंका दीदी ने उसको एक तरफ से अपने साथ लगा लिए.

"चलो भाई अब एक हे सीट बाकी है और और कोई नहीं जाना छठा तोह मैं आराम से पिछली सीट पर सोती हुई जाने वाली हु.", गुरदीप की ऐसी घोसना पर ये chui-mui सी सबसे चुपचाप सी बैठी लड़की बोल पड़ी तोह सभी उसको देखने लगे.

"हम जाना चाहता है. अगर आप लोगो को पसंद हो तोह.", किसी कश्मीरी सेब जैसी रंगत, भूरे सुनहरी बाल, बड़ी बिल्लोरी आँखें जिनमे कारीगरी से जैसे सुरमा लगाया गया हो. और जरीदार ख़ास तरह का सलवार कमीज पहने ये पतली सी लड़की सहेलियों के साथ भी सर पर दुपट्टा किये थी. चेहरे और आवाज से वह इनमे सभी से कही ज्यादा खूबसूरत थी.

"अफसाना, तुम ठीक तोह हो न? तुम्हारे अब्बा तोह मुझे पता है कभी मन नहीं करते लेकिन अम्मी और बड़ी बहिन राजी नहीं होंगी. वैसे तुम्हे याद भी है के कब तुम आखिरी बार अकेले मार्किट भी गयी थी, शायद पांचवी क्लास में.", गुरदीप के ऐसा मजा लेते हुए भी गंभीरता से कहने पर अफसाना ने मुस्कुराते हुए पलके झुका ली.

"हमने तोह कभी ऐसा जाहिर नहीं किआ के अम्मीजान या बाजी ने कोई पाबन्दी लगाई हो हम पर. वह हमे पसंद हे नहीं अकेले बहार जाना. आपने कभी हमे हिजाब या परदे में देख है? आरती के साथ कभी हमारे परिवार ने हम पर सख्ती नहीं की है और अब्बू तोह खुद इनके पापा की सोहबत में शरीक रहते है, जुम्मे से अगले दिन.", अफसाना की आवाज कान की जगह बस दिल पर जा लगती थी. वह पतले सुर्ख होंठ हिलते थे तोह ऐसा लगता के ये कोई विदेशी गुड़िया हो जैसे. आरती दीदी ने तोह उसका गाल हे चूम लिए कपडे के ऊपर से हे.

"ये देखो जरा आप लोग. मेरी एक हे सहेली है और जैसा सबलोग सोचते थे उस से बिलकुल अलग और मेरी ख़ुशी में खुश होने वाली. हुसैन अंकल तोह वैसे भी आने हे वाले लेकिन ये ाचा है न के हमारी माँ की गुड़िया उनसे पहले हमारे घर आएगी. और डीपी सच कहती हु एक बार तुम्हे मिलना चाहिए इनकी मम्मी और दीदी से, वह बिलकुल भी वैसी नहीं है जैसे तुम्हे लगता होगा. हाँ ये लड़की जरूर घर में सबसे ज्यादा शर्माती रहती है और कभी कभी आवाज सुन्न ने को मिलती है इसकी ऐसे माहौल में. मेरे साथ खूब पातर पातर बोलती है लेकिन.", अफसाना तोह शर्म से गड़े जा रही थी लेकिन आरती उसको अपने साथ लगाए खुश थी की उसकी एकमात्र सखी भी उनके शहर आने को तैयार हो गयी.

"इन मैडम को देखने कितने हे लड़के पागल हुए रहते है, लेकिन ये तोह सड़क को देख कर मशीन से हे चलती रहती है. वैसे तुम्हारी सिस्टर को मैं ाचे से जानती हो. जुबैदा नाम है न? तुमसे भी कही सुन्दर है वह लेकिन पता नहीं डिग्री ख़तम होने के बाद एक साल में ज्यादा मिलना नहीं हुआ उनसे. हमारी सीनियर थी लेकिन ाची सहेली भी.", जसलीन ने अफसाना की बड़ी बहिन का जीकर किआ तोह जवाब आरती ने दिए.

"ज़ुबैदा नाम है उनका. और दीदी हैं आजकल पेंटिंग में बिजी तोह वह घर पे भी मुश्किल से समय देती है लेकिन तुम सही कहती हो, उनके साथ गप्पे लगाने में जो मजा है न वह इस शर्मीली अफसाना के साथ भी नहीं.", आरती ने जसलीन को पहले तोह नाम में सुधार बताया और फिर अपनी हे सहेली के मजे लेने लगी. अफसाना ने थोड़ी नाराजगी सी आरती को देखा तोह उसने फिर से गाल चूम लिए, दुपट्टे के ऊपर से हे.

"हाँ सही कहा तुमने. चलो यार अब चलते है साढ़े 3 बज गए है और तुम लोगो को भी काम होगा, थोड़ी देर बाद जाना भी है. वैसे शादी के कार्ड देने तोह अंकल आएंगे न शहर में?", जसलीन ले अब कही अमरुद खाना शुरू किआ था.

"हाँ पापा तोह आएंगे हे और वह अगर देरी से इंडिया आये तोह बड़े पापा या फिर अर्जुन के साथ किसी को भेजेंगे. नहीं तोह बी पोस्ट हे होगा अगर समय हे न मिला तोह.", प्रियंका दीदी ने जसलीन को हाथ पकड़ कर वापिस बिठाया तोह वह बाथरूम जाने का बोल कर अमरुद टेबल पर रखती वह से अंदर की तरफ आ गयी. बाकी सब भी बातें करती हुई थोड़ा और समय व्यतीत करने लगी.

दोनों कमरे खली देख जसलीन इधर आई तोह अर्जुन बड़ी मासूमियत से सोया हुआ दिखा. चेहरा दरवाजे की हे तरफ था लेकिन माथे के सामने बिखरे बाल, ऊपरी चौड़ा जिस्म सिर्फ बनियान में और चेहरे पर सुकून. जसलीन दबे पाँव उसके पास आ कड़ी हुई. ये लड़का उसके साथ क्या खेल रहा था जो कुछ हे घंटे में वह इसके लिए पागल हुए जा रही थी. कॉलेज में तोह भाई के सामने हे शर्मिंदा होना पड़ा था लेकिन उसको परवाह नहीं थी. पतले छरहरे शरीर पर टेनिस बॉल से चुके धड़कन के साथ हिल रहे थे और हिम्मत करती वह उसके पास बैठ गयी.

'क्या कर रहे हो तुम? मेरा बस चले तोह तुम्हारा हाथ अपने दिल पर रख कर बता दू अपनी हालत लेकिन इसमें समय लगेगा अर्जुन. अपना ध्यान रखना.', मैं में इतना कहती वह अपने रेशमी बाल उसके चेहरे पर झुकाती हुई बड़े प्यार से गाल चूम कर तुरंत हे कमरे से बहार चली गयी. अर्जुन के चेहरे पर नींद में हे मुस्कान आ गयी थी. बहार भी थोड़ी बहोत बातें करने के बाद सभी चली गयी थी और प्रियंका दीदी के साथ गुरदीप उनकी मदद कर रही थी जरुरी सामान पैक करवाने में वही आरती बंद कमरे में अफसाना के साथ महीने भर की बातें साँझा करते हुए अपने कपडे, किताबे और कुछ सामान ठीक से रख रही थी. 2 बैग तोह सुबह हे दोनों बहनो ने तैयार कर लिए थे लेकिन अब रहना हे बड़े परिवार में था तोह ये सामान भी जरुरी था. बाकी तोह अगर जरुरत हुई तोह घरवाले हे गाडी से लेके जाने वाले थे.

"चल मेरी जान, चाय बनाते है. दीदी का भी हो गया होगा तोह वह नाहा लेंगी इतने हम चाय बना लेते है फिर तुझे छोड़ने मैं चल पड़ूँगी.", आरती ने अपनी सहेली को काम से फारिग होने के बाद मुँह हाथ धोते हुए कहा. अफसाना ने कमरे को बंद देखा तोह दुपट्टा सलीके से एक तरफ रखते हुए अपना चेहरा बेपर्दा किआ और बाथरूम में मुँह धोने लगी. ये लड़की शायद खुदा की एक नायाब कारीगरी का उदहारण थी. कोई इतना भी खूबसूरत कैसे हो सकता ये बात हर वह इंसान कहता जो इस चेहरे को बेपर्दा देख लेता. शायद परिवार और कुछ लोगो को हे इसकी इजाजत दी थी अफसाना ने. आरती ने साफ़ टोलिया निकाल कर बिस्टेर पर रखा हे था अफसाना के लिए और एक तरफ से अफसाना बाथरूम से गीले चेहरे के साथ बहार निकली और इधर दरवाजे से अर्जुन सफ़ेद कुरता पायजामा पहने तैयार हु अंदर आ खड़ा हुआ.

दुआ की मूरत में वह माँ से नाजुक और गोर हाथ भीगे चेहरे से निचे आये थे और इधर अर्जुन की नजरे जा मिली उन सुनहरी आँखों से. दोनों के लिए ऐसा मंजर कुछ अनहोनी सा हे था. अर्जुन तोह दिन में खाना भी वही बैठ कर खा के गया था लेकिन न तब उसने किसी को देखने की कोशिश की था न अफसाना ने हे नजरे उठा कर परिचय के वक़्त अर्जुन का दीदार किआ था. माहौल इतना शांत देख कर आरती ने बैग बिस्टेर पर रखने के बाद पलट कर देखा तोह वह भी उन दोनों को ऐसे अपलक एक दूसरे को देखते हुए पा कर सोच में पड़ गयी. जल्द हे गाला खंखारते हुए आरती ने दोनों का ध्यान भांग किआ तोह अर्जुन बिना कुछ कहे बहार और अफसाना बाथरूम के अंदर. आरती ने हँसते हुए कमरा फिर से बंद कर दिए.

"ओह मेरी माँ की गुड़िया, सॉरी यार अर्जुन को पता नहीं था के तुम भी अंदर हो सकती हो. ये लो चेहरा साफ़ कर लो और मैंने दरवाजा बंद कर दिए है.", एक बार फिर से चेहरा धोने के बाद अफसाना धीमे कदमो से बहार आई और तोलिये से चेहरे का पानी सूखने लगी. वह कपडे को रगड़ नहीं रही थी, बस हलके हलके दबाते हुए नमी भर पानी चेहरे पर रखने के बाद चुपचाप सर, मस्तक और गले को ढकने के बाद आरती को देखने लगी.

"कोई बात नहीं. देखने से हम मैले नहीं हो जायेंगे.", अफसाना ने इतना कह तोह दिए था लेकिन चेहरे पर थोड़ी गंभीरता थी. बहार अर्जुन रेशम सिंह जी के साथ बातें करते हुए बगीचे में पानी देने लगा था. उन्होंने हे बताया था अर्जुन को की वही सुबह शाम उसके चाचा की gair-hajri में दोनों बगीचे और घर का ख़याल रखते है. कुछ देर बातें करने के बाद समय देखा तोह पौने 5 हो चुके थे और आरती दीदी ने उसको अंदर से आवाज दी तोह नल बंद करने के बाद वह भीतर चला आया. टेबल पर उसका बादाम वाला दूध तैयार पड़ा था. सोफे पर एक तरफ सिमटी हुई अफसाना चाय का कप घूर रही थी और आरती दीदी रसोई से बिसुईट लाने का बोल कर उठ गयी.

"क्षमा चाहता हु, वह गलती से कमरे में दाखिल हो गया था. मुझे नहीं पता था के आप भी अंदर हो सकती है. माफ़ कर दीजियेगा क्योंकि बुरा तोह आपको लगा हे है.", अर्जुन ने नजरे उठाये बिना हे साढ़े हुए शब्दों में अफसाना से अपनी गलती की माफ़ी मांगी और गिलास ले कर प्रियंका दीदी के कमरे में चला गया जहा गुरदीप भी बैठी थी.

"अब ये कहा चला गया? अफसाना उस बात का बुरा मैट maan-na. अर्जुन दिल का बुरा नहीं है बस वह hansta-khelta रहता है और उसको जरा भी पता नहीं था के तुम वह हो सकती हो. ऐसे में वह वह नहीं आता. शायद इसलिए हे वह उठ कर चला गया. देख तुझे बुरा लगा तोह मैं बोल देती हु वह सॉरी भी कह देगा.", आरती ने अपनी सहेली की कलाई पर हाथ रखते हे कहा.

"ऐसा क्या ज़लज़ला आ गया है आरती? हमसे वह नजरे मिलाये बिना हे माफ़ी मांग गए और यहाँ आप भी ऐसा कर रही हो. चेहरा नजर किआ था बस कोई दीदार नहीं और हमे बुरा इस बात का लगा के आपके भाई ने हमे किस हालत में देखा, इस बात का बुरा नहीं लगा के उन्होंने देखा. हम खुदसे नाराज थे लेकिन उनकी माफ़ी को हमने क़ुबूल किआ है, बेशक जरुरत नहीं थी.", इस बार अफसाना के चेहरे पर विश्वास था और वह नजरे उठा कर संजीदगी से बात कर रही थी.

"शुक्र है के तुम रोने नहीं लग पड़ी. मेरी हालत पता है कैसी हो रही थी ये सोच कर के कही तुम फिर से नाराज न हो जाओ.", आरती ने हँसते हुए अफसाना की नरम उंगलिया अपने हाथो में ले ली.

"आपसे रुस्वा होने का सवाल हे नहीं होता. हमारा मतलब था के आपके भाई ने जब हमे देखा तब चेहरे पर पानी था हमारे. ऐसे में नज़र करना ाचा नहीं मन जाता. चलिए अब हमे भी ज़रा हमारे घर पहुँचने की ज़ेहमत कीजिये.", अफसाना ने कप भी सलीके से ट्रे में रखा था, बिना कोई आवाज किये.

"चल यार, तू न बंद कमरे में हे ठीक रहती है. 15 साल से ये तेरा 'hum-aap' और उर्दू झेल रही हु. कभी तोह दोस्तों की तरह बात किआ कर मेरी जान.", आरती दीदी ने भी सोफे पर रखा दुपट्टा उठाते हुए सीने के सामने से घुमा कर सर पे ले लिए.

"क्लास में हमे सुना है न? यहाँ हम आपके साथ दुनिया से बेफिक्र रहते है और जुबान तोह अब जैसी है वैसी हे रहेगी. चलिए अब.", अफसाना के चेहरे पर ये मुस्कान देख आरती ने अर्जुन को आवाज दी.

"चलो भाई, जरा हमको अफसाना के घर छोड़ दो. तुम्हे भी तोह जगतार से मिलना है, अफसाना का घर मार्किट से पहले हे है और वापसी में मुझे वही से ले लेना.", आरती के ऐसा कहने पर अर्जुन ने एक पल के लिए सोचा और फिर जवाब दिए.

"गुरदीप साथ चले तोह बेहतर नहीं होगा? 3 लोग मोटरसाइकिल पर जायेंगे?"

"डीपी को दीदी के साथ काम करवाने दो और मैं तुम्हारी तरह बैठ जाउंगी अगर ज्यादा दिक्कत है 2 को अपने पीछे बैठने में.", बात दोनों कर रहे थे लेकिन अफसाना की गए किसी ने न ली.

"पैदल हे चलते है न फिर. घर मार्किट से पहले हे है तोह ज्यादा दूर नहीं है. जगतार भाई से भी मैं मिलने पैदल चला जाऊंगा, मार्किट भी तोह यही पर हे है.", अर्जुन जैसे अभी भी अडिग था अपनी बात पर.

"आपको परेशानी नहीं आएगी.", अर्जुन ने एक झलक बस इस आवाज की स्त्रोत को देखा और चुपचाप मोटरसाइकिल की चाबी फ्रिज के ऊपर से उठा कर हॉल से बहार चल दिए मोटरसाइकिल निकलने.

"वाह. तुम तोह बोलने भी लगी.", आरती ने अफसाना के साथ चुहल करते हुए कहा तोह वह खुद हे आरती का हाथ पकड़ कर बहार आ गयी. अर्जुन सीट पर कपडा मारने के बाद आधा टंकी और आधा सीट पर बैठ गया था. आरती दीदी उसके पीछे दोनों पांव एक तरफ करके बैठ गयी थी इतनी जगह देख कर और उनका अनुसरण करते हुए अफसाना भी, जो आरती से काम जगह घेरे थी, थोड़ा हल्का शरीर होने की वजह से.

"आप लोग बैठ गए तोह मैं चालू?"

"हाँ ये पार्क पर करके मार्किट वाली गली में ले लेना. वह सड़क से पहले हे राइट साइड अंदर गली में सीधा.", आरती दीदी ने कंधे पर हाथ रखा हुआ था और अफसाना पीछे सिमटी सी बैठी आरती का दूसरा हाथ पकडे थी. अर्जुन आदेशानुसार रस्ते पर मोटरसाइकिल 20 की गति से ले जाने लगा. ये कही अजीब था जो आज उसके दिल में हो रहा था इस लड़की को देखने के बाद और कुछ समय पहले सुनी आवाज से. जैसे दिल में तूफ़ान सा उठ रहा हो लेकिन लहरें उस साहिल को बढ़ने से रोक रही थी. न चाहते हुए भी शीशे पर नजर चली हे गयी. Safed-neele दुपट्टे के बीच वह सुनहरी आँखें आईने में उसकी नजरो से टकराई तोह तपिश सेहन न कर पाया वह.

"यहाँ मुड़ना है.", आरती दीदी की बात सुन्न कर झेंपता हुआ वह थोड़ी तेज मोटरसाइकिल चलता गली में आ गया. 200 गज पर हे रुकने का कहा तोह अर्जुन उनके उतारते हे बिना कुछ सुने या बताये मोटरॉयचले 'स' के अकार में घूमता वापिस मदद गया.

"यही वापिस आ जाना मुझे लेने.", दीदी की आवाज कानो में गयी लेकिन वह बस वह से निकल गया.

"पता नहीं क्या हो जाता है कभी कभी इसको. सहायत देरी हो रही होगी, चल आंटी से तेरी शिकायत लगाती हु.", आरती दीदी अफसाना का हाथ पकडे हे इस एक मंजिला saaf-suthre घर में चली आई. सामने हे अफसाना की अम्मी जी तार से कड़े समेत रही थी और उनके आगे पीछे ये नीली आँखों वाली झबरीली बिली उछाल कूद मचा रही थी.

"नमस्ते आंटी जी और बिल्बो बड़ी मस्ती सूझ रही है तुझे.", उनकी अम्मी ने गले लगा कर आरती से स्नेह जताया और ये बिल्ली भी उनके पाँव पर पंजे मारने लगी, जिसको अफसाना ने गॉड में ले लिए.

"मेरी बची अब समय लगा तुझे अपनी आंटी से मिलने का? ऊपर से तुम हमेशा के लिए यहाँ से जा रही हो.", अफसाना की अम्मी के दिल में बड़ा अपनापन था आरती के लिए. दुआएं देने के बाद वह उसकी नजर उतरती अपने साथ अंदर ले चली तोह अफसाना की गॉड से उछाल कर वह खूबसूरत विडाल भी मस्ती करती साथ हो चली. घर का हरेक हिस्सा जैसे दिल से सजाया हुआ था. अफसाना यहाँ आने के बाद भी हाथ मुँह धोने चली गयी और आरती अपनी आंटी जी के साथ दीवान पर पसर कर ram-kahani बतियाने लगी. उधर अर्जुन 5 मिनट देरी से पंहुचा तोह जगतार सिंह भी कुर्ते पयजामे के साथ नीली दसर पहने बड़ा सुकून में नजर आ रहा था.

"देरी के लिए सॉरी जगतार भाई.", अर्जुन से वह गले लग कर मिला.

"अभी तुम्हारे सामने तोह वह से इधर आया हु. क्या सॉरी? मुझे तोह ाचा लगा के जाने से पहले तुमने थोड़ा वक़्त निकला हमारे लिए.", जग्गी अर्जुन के साथ टहलता हुआ मार्किट के पिछली तरफ चला आया. सभी दुकाने और भीड़ सामने थी लेकिन इस तरफ बस खाली पार्किंग और उसके साथ ये बड़ा सा पार्क. जग्गी ने कुर्ते की निचली जेब से मुट्ठी भर बाजरा निकला और थोड़ा अर्जुन को देते हुए खुद भी पार्किंग आगे वाली समतल मैदान में बरसाने लगा. यहाँ ाचे खासे पक्षी थे इस वक़्त.

"बड़ा नेक काम करते हो भाई.", अर्जुन देख रहा था के यहाँ एक तरह के हे कबूतर नहीं थे. कुछ rang-birange भी थे और 2-3 हरे टूटते भी.

"अर्जुन भाई, बुराई तोह साड़ी ज़िन्दगी करते हे रहते है. कभी कभी इन बेजुबानो की हे भलाई कर देनी चाहिए. वैसे मेरी बेबे ने कोई दर्जन भर जगह ड्यूटी लगवा राखी है खुद की. वह subah-shaam नियम से dana-paani देने जाती है इनको.", वह मिटटी का बना बड़ा सा बर्तन उठा कर जग्गी ने एक तरफ लगी ठन्डे पानी की टंकी के नल के निचे लगाया और दोनों हाथो से उसको मांजने के बाद ऊपर तक पानी भरके वापिस ध्यान से अपनी जगह रख दिए. टंकी पर पंजाबी में कुछ लिखा था जो अर्जुन ने ज्यादा ध्यान नहीं दिए.

"तभी कहा के नेक काम. इंसान तोह अपनी मदद और ितचापूर्ति खुद कर सकता है लेकिन हम तोह इनकी जगह पर हे किरायेदार हो कर किराया नहीं देते.", अर्जुन ने अगला बर्तन खुद उठा लिए और जग्गी का अनुसरण करते हुए साफ़ करने के बाद पानी भरके रख दिए.

"सच कहा. किरायेदार. प्लाट तोह काट लेते है फिर ये नहीं सोचते के आखिर ये जमीन हमारी हुई कैसे. तुमने तोह मेरा भी दिमाग हिला दिए भाई.", जग्गी हँसता हुआ उसके साथ वही बानी पत्थर की सीढ़ियों पर बैठ गया. अगले 10 मिनट जग्गी अपने और अर्जुन के परिवार और इतिहास के बारे में कुछ बताता रहा लेकिन बात अधूरी रह गयी जब उन्हें ढूंढ़ती हुई जसलीन इधर आ गयी.

"जग्गी बेबे बुला रही है, तूने कही जाना था उनके साथ.", जग्गी को बेबे को ले जाने वाली बात याद आई तोह वह तुरंत हे उठ खड़ा हुआ. इधर जसलीन को सादे सफ़ेद salwar-kurti और सफ़ेद दुपट्टे में देख कर अर्जुन हैरत में था. ये लड़की वही है जो कॉलेज में आधुनिक हेरोइन सी दिख रही थी. लेकिन जग्गी की आवाज सुन्न कर वह उसकी तरफ देखने लगा.

"वीरे भूल गया था, बेबे को सोमवार Shiv-mandir लेके जाना होता है. उनकी आस्था के बीच मैं भी नहीं आ सकता लेकिन वादा रहा के जल्द मिलेंगे और हो सके तोह इस गरीब (जसलीन) को ये पार्क के पिछली तरफ हमारे घर के बहार तक छोड़ देना नहीं तोह आप हे पैदल चली जाएगी.", अर्जुन से गले मिल कर जग्गी तेजी से भाग गया और जसलीन अपने भाई पर गुस्सा दिखते दिखते रुक गयी. हाथ में पकड़ा लिफाफा खोलती वह सारे दाने पक्षियों की तरफ उछाल कर खली लिफाफा एक तरफ कूड़ेदान में रख कर बस अर्जुन को देखने लगी.

"चलिए, मैं छोड़ देता हु आपको.", अर्जुन ने जाने का कहा तोह जसलीन थोड़ा भुझे मैं से उसके साथ इधर से चलने लगी.

"वैसे उम्मीद नहीं थी की आप ऐसे परिधान भी पहनती होंगी."

"क्यों? और मैं इनमे बुरी दिखती हु क्या?"

"नहीं नहीं. बस वह कॉलेज में अलग रूप था और यहाँ अलग. दोनों में हे आप ाची लग रही है.", अर्जुन ने एक बार ाचे से जसलीन को ऊपर से नीच तक निहारा और मोटरसाइकिल पर बैठ गया. अब जसलीन के चेहरे पर नाराजगी की जगह मुस्कराहट थी. दोनों इस भीड़ भरी सड़क से निकल कर बराबर की गली में चले आये तोह अर्जुन ने हे चुप्पी तोड़ी.

"दिन में 2 बार आपने मेरे साथ शरारत की है. पूछ सकता हु वजह अगर बुरा न लगे तोह?", अर्जुन जाग गया था जब जसलीन ने उसके कमरे में आ कर गाल चूमा था.

"वजह होना जरुरी तोह नहीं. थैंक्स भी तोह कहने का तरीका हो सकता है.", जसलीन के चेहरे पर पकडे जाने की लाली बता रही थी की शर्म उसको भी आती है.

"थैंक्स वाला मान लिए बगीचे में लेकिन फिर उसके बाद? और ऐसे तोह आपने भी मेरी मदद की थी वह कैंटीन में."

"समझ लो दूसरी बार मैंने थैंक्स खुद ले लिए था.", जसलीन इतना बोल कर उसको पार्क के साथ वाली गली बताने लगी और उस से आगे का रास्ता. मुस्कुरा वह अभी भी रही थी.

"मतलब खुद हे हिसाब बराबर कर दिए आपने? चलो ाचा है न नहीं तोह लेने के बदले देना पड़ता.", अर्जुन ने एक नजर पार्क को देखा और आसपास बने शानदार घरो को. फिर नजर होंठ चबाती जसलीन पर चली गयी जो आईने में उसको हे देख रही थी.

"हिम्मत नहीं है तुम में ये मुझे पता है इसलिए खुद हे वसूल करना पड़ा.", अब जैसे वह अर्जुन को हे उकसाने लगी थी.

"आप सही कह रही है, हिम्मत नहीं है मुझमे. कुछ सफर ऐसे हे होने चाहिए जिसमे पल भर की खुशियां याद रहे. ज्यादा की चाहत कई बार कही का नहीं छोड़ती.", अर्जुन ने गंभीर बात करते जाताना चाहा के वह इस दोस्ती को इतना हे रखे तोह दोनों के लिए ठीक रहेगा.

"मुझमे हिम्मत है. सफर अकेला इंसान भी तये कर सकता है जरुरी नहीं की दूसरा सिर्फ इस लिए पीछे हट जाये क्योंकि मंज़िल अलग है.", बात को कहने के साथ हे जसलीन ये कविता गुनगुनाने लगी. जिसको सुन्न कर अर्जुन भी हर शब्द की गहराई को महसूस करने लगा.

'मंज़िले तोह आती रहेंगी सदा, मुझे सफर का मजा लेने दे यारा.

खुशियां जताने वाले है हर तरफ, एक दर्द से जरा मुलाकात करवा दे यारा.

दफ़न है खंडरो में भी अरमान कई, चल उन्हें भी जीना सीखा दे यारा.

मंज़िले तोह आती रहेंगी सदा, मुझे सफर का मजा लेने दे यारा.
'

"मालूम नहीं था के बात ऐसी हो सकती है."

"चलो, परेशां मत करो खुद को. तुम भी क्या याद करोगे किसी जट्टी से पला पड़ा है. तुम्हारे शहर आउंगी तब फैंसला लेना कितनी दूर तक साथ चल सकते हो. गले नहीं पड़ूँगी, बस पसंद आ गए हो और मैं इतने में हे खुश हु.", जसलीन ने ऊपर तौर पर हँसते हुए कहा. उनका घर भी आ गया था जो सचमुच आलिशान था. सफ़ेद लम्बी मेरसेदेज़, एक जीप और बस वह जेन कार हे नदारद थी वह से.

"सुन्दर घर है आपका."

"देखो पहली बार आये तोह चाहे 1 मिनट हे सही, अंदर आना होगा. वैसे बानो आंटी ठंडाई बड़ी ाची बनती है.", जसलीन के इतना कहने पर अर्जुन ने हामी भरी और एक तरफ मोटरसाइकिल खड़ा करके उसके साथ हे इस संगमरमर के बने गलियारे से होता अंदर चल दिए. बड़े पिंजरे में ये सुल्तान से भी बड़ा और अलग नेसल का कुत्ता बंद था. लेकिन वह भोंकने की जगह आँखें खोल कर देखने के बाद वापिस पसर गया.

"ये पिंजरे में क्यों बंद है?", अर्जुन उस कुत्ते के बड़े मुँह और लटकी खाल को देख रहा था. बड़ा शांत और मजबूत जीव था वह.

"उसको सजा मिली है, वैसे जेउस जग्गी के साथ हे सोता है और मेरी माँ का लाडला बीटा है. आज इसने मस्ती में माँ के धुले हुए कपडे खराब कर दिए. शाम तक ये यही रहने वाला है और वही खोलेंगी इसको.", अर्जुन को ाचा लगा ये देख कर की वह जीव को परिवार की तरह मानते है और ऐसी सजा देते है जिसको सहने वाला भी दुखी नहीं दीखता.

अंदर हर चीज करने से सजी थी. सफ़ेद साफ़ दीवारे, उचित मात्रा में सही सजावट और 'ल' अकार का ये ड्राइंग हॉल इतना साफ़ था जैसे कोई रहता हे न हो. एक तरफ दिवार पर रोबीले शख्स की तस्वीर पर हार टेंगा था. वर्दी पर लगे मैडल बता रहे थे के फ़ौज में थे. अर्जुन की नजर का पीछा करते हुए जसलीन ने बताया.

"दादा जी आर्मी में थे मेरे और 71 में शहीद हो गए थे. हम में से किसी ने उन्हें नहीं देखा और दादी रहती है पिंड में. बानो आंटी, 2 गिलास ठंडाई बना के मेरे कमरे में दे देना.", ये महिला रसोई में थी और उधर से हे आवाज का जवाब देती कहने लगी.

"बस 5 मिनट में लेके आई बिटिया.", और जसलीन अर्जुन को हॉल से आगे दरवाजा खोल कर इस बड़े कमरे में ले आई. उम्मीद के मुताबिक हे कमरा आलिशान था. दौड़ने की मशीन, बड़ी दिवार में लगी अलमारियां, कंप्यूटर, पढ़ने के लिए अलग kursi-table और शाही बड़ा बीएड. दिवार के बीच लगा ऐरकण्डीशनर और छत्त पर 5 ताड़ी वाली महंगा पंखा.

"बहोत ाचा कमरा है तुम्हारा.", अर्जुन पीछे हे अंदर आया तोह जसलीन आँखे नाचती उसको बताने लगी जैसे कमरा किसका है. लेकिन वह अनजान थी अर्जुन के अगले कदम से. चमकदार दरवाजे को पाँव से बंद करते हुए अर्जुन ने जसलीन की कमर पकड़ते हुए खुद से सत्ता लिए. वह हैरत से उसकी आँखों में देख हे रही थी और आँखें बंद होती चली गयी. उन होंठो पर अर्जुन ने लगातार एक मिनट तक अपनी चाप बना दी थी. अलग होते हे जसलीन बढ़ी हुई धड़कन और तेज साँसों के साथ बड़े प्यार से उसको टुकुर टुकुर देख रही थी.

"मेरा थैंक्स कहने का तरीका सीधा है और सफर छोटा हो या बड़ा, इतना समय जरूर देता है के रही एक दूसरे से पहचान बना हे ले. आशा करता हु शादी का न्योता दीदी ने दे हे दिए होगा.", जसलीन कुछ जवाब देती और अर्जुन ने इस बार उसकी आँखों पर दोनों तरफ चूम लिए.

"कबसे देख रहा हु ये ज्यादा बोलती रहती है."

"तुम देखो मैं क्या करती हु तुम्हारे साथ.", जसलीन ताव में आई हे थी की दरवाजे पर दस्तक देने से पहले बानो आंटी की आवाज आ गई और अर्जुन ने दरवाजा खोल दिए.

"जी नमस्ते.", अर्जुन ने हाथ जोड़ने के साथ हे ट्रे पकड़ ली. जवाब में इन महिला ने भी सर हिलाया और वापिस चली गयी. दरवाजा पूरा हे खोल कर अर्जुन बीएड के किनारे बैठ गया.

"आओ, बाकी बातें फिर कभी कर लेना. ले लेना बदला भी लेकिन 2 मिनट बाद मैं जा रहा हु.", जसलीन सामने बैठ गयी और अर्जुन कांच के गिलास को उठा कर ठंडाई पीने लगा.

"किसी की हिम्मत नहीं हुई आजतक ऐसा करने की.", जसलीन ने ये बात बड़ी धीमी आवाज में कही थी.

"किसी को तुमने कहा हे नहीं होगा जैसे मुझे कहा."

"कमीने हो पक्के वाले. वैसे जाना जरुरी है तुम्हारा?", पल में माशा पल में टोला वाला हाल हो रहा था जसलीन का.

"कार्ड देने आऊंगा.", अर्जुन ने आधा गिलास ट्रे में रखा और जसलीन ने वही गिलास उठा लिए.

"फ़ोन करके आना, वह का नंबर मैंने प्रियंका से ले लिए है. बात हो हे जाएगी.", अर्जुन ने हामी भरी और उठ खड़ा हुआ. 6 बजने में 5 मिनट थे.

"चलता हु और थैंक्स.", अर्जुन के इतना कहते हे जसलीन ने जल्दी से एक छोटा सा चुम्बन कर दिए.

"थैंक्स ऐसे बोलते है और चलो बहार तक छोड़ देती हु." दोनों बहार चल दिए और मोटरसाइकिल स्टार्ट करने से पहले अर्जुन ने हँसते हुए कहा.

"तुम्हारी वाली ठंडाई ज्यादा मीठी लगी."

"मार खाओगे. गुडबाय एंड हैवे ा सेफ जर्नी.", जसलीन ने हाथ हिला कर कहा और अर्जुन ने भी प्रतिउत्तर में हाथ हिलने के बाद अपना रास्ता पकड़ लिए. अगले 2-3 मिनट में हे वह वापिस उस घर के बहार खड़ा था जहा आरती दीदी को उतार कर गया था. घंटी बजाते हे अंदर दरवाजे को खोल कर ये आकर्षक महिला अर्जुन को हैरत से देखने लगी.

"जी, आरती दीदी होंगी.", अर्जुन ने हाथ जोड़ कर इतना हे कहा

"अंदर आ जाओ बीटा, अपना हे घर समझो.", उनकी बात सुन्न कर एक पल के लिए अर्जुन उन्हें देखने लगा और फिर गेट खोल कर अंदर आ गया. पाँव सावधानी से रखता उनके पास पंहुचा और उनका आशीर्वाद लेने लगा.

"नरिंदर भाई जैसे हे दीखते हो लेकिन बाल और आँखें बिलकुल बड़े देवर जी जैसी है.", उन्होंने अर्जुन को आशीर्वाद देते हुए ध्यान से देखा और इस हॉल में ले आई. अभी यहाँ कोई भी न था इन दोनों के सिवा.

"पापा को जानती है आप? सॉरी मैं पहले आपसे नहीं मिला हु न इसलिए."

"हाँ याद भी कैसे होगा. तुम तब गॉड में हे थे शायद 8-10 महीने के लेकिन Shankar-Narinder देवर हे हैं मेरे. आओ बैठो पहले फिर ले जाना अपनी दीदी को.", उन्होंने सर पर हाथ फेरते हुए अर्जुन को बैठाया और खुद अंदर चली गयी. इधर आरती दीदी दौड़ती हुई हॉल में दाखिल हुई और अर्जुन के बगल में पसर गयी.

"बड़ी देर लगा दी, कहा रह गया था?", वह कुछ जवाब देता उस से पहले हे दिल में वही बेचैनी सी अपने चरम पर पहुंच गयी. अफसाना जैसे आरती के पीछे दौड़ी आई थी लेकिन दोनों ने एक दूसरे को देखा तोह अर्जुन बस जड़ हो कर रह गया. अफसाना धीमी चाल से दीवान तक चली आई. इस वक़्त न दुपट्टा था न कोई salwar-kameej. पूरी आस्तीन की टीशर्ट के नीचे सब्ज़ रंग का पजामा और सुनहरी आँखें बेधड़क उसको हे देख रही थी.

"इस से तुम मिल हे लिए होंगे, अफसाना है ये और ये है ज़ुबैदा. मेरी बड़ी बेटी.", आंटी जी ने दूसरी लड़की का परिचय दिए तोह अर्जुन होश में आया. मांसल भरे भरे शरीर की ये युवती भी बेजोड़ थी लेकिन जैसे बंधनो से परे. सफ़ेद कमीज और चुस्त नीली जीन्स पहने ज़ुबैदा के हाथो पर कई तरह के रंग लगे थे और हाथ में पेंटिंग करने वाला ब्रश.

"नमस्ते.", अर्जुन ने इतना हे कहा.

"Hi. ज़ुबैदा. सॉरी वह पेंटिंग कर रही थी और इन दोनों का शोर सुन्न कर चली आई. अम्मी चाय बना दो मेरे लिए प्लीज.", अर्जुन के करीब बैठ कर वह अपना परिचय खुद देने लगी.

"आर्टिस्ट है आप?"

"आपको आर्ट के बारे में मालूम है.?"

"ज्यादा नहीं लेकिन वह स्कूल से थोड़ा बहार तक.", अर्जुन ने झेंपते हुए जवाब दिए.

"It's okay. जब कुछ वैसा न हो जैसा चाहते हो तोह बस बना डालो, कोनसा कोई रोक रहा है. ज्यादा डिफाइन नहीं करना, समझने वाला समझे और नहीं तोह नहीं. देखना चाहोगे?", ज़ुबैदा के ऐसे कहने पर अफसाना और आरती हैरानी से देखने लगी. और अर्जुन के उठते हे वह दोनों अंदर की तरफ चलते सीढ़ियों से नीचे उतर कर बेसमेंट में आ गए.

"आज तक तोह दीदी ने हमको भी उधर नहीं आने दिए.", आरती ने इतना कहा और अफसाना तोह जैसे उस रस्ते को देखे जा रही थी जिधर दोनों गए थे.

"बाजी का तोह वही जाने. हम शायद कही ज्यादा बदकिस्मत है.", अफसाना के ऐसा कहने पर आरती ने उसको अपने साथ लिए और उधर हे चल पड़ी जहा दोनों गए थे. 2 कमरों से ज्यादा बड़े इस भूमिगत हॉल में करीब 15-16 पेंटिंग दिवार पर लगी थी, कुछ कोयले के कागज टेबल पर थे और एक पर जैसे वह काम कर रही थी. 3 बड़ी तुबे इस वक़्त भी रोशन थी और जगह जगह खली गिलास, rang-brush और सूती कपडे की कतरन थी.

"ज़िन्दगी ऐसी हे तोह है. हम रंगीन इंद्रधनुष की चाहत करते है लेकिन बरसात का इन्तजार गंवारा नहीं. जो पास है उसकी कीमत नहीं, kala-safed इंद्रधनुष सच है जीवन का. इसके हे तोह बीच वह थोड़े समय वाला रंग भरता है, किसी ख़ास बारिश के बाद.", अर्जुन उस बड़ी पेंटिंग को छु कर देखने के बाद जैसे उसमे हे खो गया था. बादलो के बीच सूखी धरती और safed-saleti-kala इंद्रधनुष. ज़ुबैदा बस उसके कंधे पर हाथ रखे कड़ी थी.

"इसके बारे में क्या ख़याल है?", कुछ अलग अलग से रंग नजर आते थे उस कैनवास पर अगर कोई पहली बार देखता. अर्जुन ज्यादातर लोगो में से नहीं था जो कुछ नजरअंदाज कर देता.

"ये इंसान है. कितना कुछ चाहता है ज़िन्दगी से, कितनी म्हणत करता है लेकिन वह बंधन से आजाद नहीं हो सकता. ये सब रंग इस कालिख में डूब कर कालिख बन्न जायेंगे. वाओ, आपको पैन पर पीएचडी करनी चाहिए, ba-shart वह fine-arts हो. लिख तोह नहीं पाएंगी आप.", ज़ुबैदा मुस्कुराने लगी और फिर उसने अर्जुन को ये बारिश में धुंधली सी दिखती कार की पेंटिंग दिखाई. शायद यहाँ नजर किसी अपने की थी जो जाते देख रहा था कुछ. अर्जुन उसके करीब जा खड़ा हुआ और सूख चुकी इस बड़ी पेंटिंग को हाथ लगा कर महसूस करने लगा. उसको जैसे अपना हे घर से बिछड़ना याद आ चूका था. बिना कुछ बोले वह बस ऊँगली से कार के पिछले शीशे पर अदृश्य चेहरा बनाने लगा था.

"Let's जो. वैसे तुम कभी फुर्सत में आना. बहोत जमने वाली है अपनी. वैसे ये सभी पेंटिंग जल्द हे यहाँ से चली जाएँगी शरजहाँहं. आर्ट गैलरी ने खरीद लिए इन्हे और मुझे भी जगह खली करनी थी. घरवाले बोलते रहते है क्या करती रहती हु यहाँ मैं. लेकिन जानते हो अपनी फीलिंग्स के पैसे भी मिलते है.", ज़ुबैदा हंसती हुई जैसे कोशिश कर रही थी अर्जुन का दिल बहलाने की.

"कैसा लगता है जब आपने कुछ किआ हे न हो और सजा इतनी बड़ी मिल जाये की लाख चाहने पर भी भुला न पाओ, बेशक माफ़ कर दो उन्हें.?", अर्जुन का ऐसा सवाल सुन्न कर ज़ुबैदा ठिठक गयी. न जाने कैसे उसने अर्जुन को गले लगा लिए.

"मेरे भाई, तुम बहोत छोटे हो लेकिन तुम अलग हो ये मैं जानती हु. उस धरती के टुकड़े का क्या कसूर जिसको बेरंग इंद्रधनुष मिला? धरती तोह हर तरफ है न, फिर भेदभाव क्यों?", बहार कड़ी अफसाना और आरती से तोह कुछ कहते हे न बना. ज़ुबैदा किसी तूफ़ान सी आई थी अर्जुन के पास और अगले 10 मिनट में सदियों का रिश्ता जुड़ गया था उनमे.

"आप ठीक कहती है दीदी. कभी कभी बंजर रहना भी जरुरी है. लोगो को फिर उतनी हे ज्यादा म्हणत और सेवा करनी पड़ती है उस जमीन की. लेकिन वह तभी समझते है के ज़िन्दगी के बस 2 हे रंग है.", अर्जुन ने उनके सीने से अलग होते हुए चेहरा साफ़ किआ और कुछ पल वही बैठा रहा. ज़ुबैदा ने इतनी हे देरी में अर्जुन की तस्वीर कैमरा में क़ैद कर ली.

"अगली बार जब भी आओगे एक ऐसी पेंटिंग मिलेगी जिसको किसी भी कीमत पर मैं नहीं बेचने वाली. और आना जरूर, तुम्हारी ये बहिन अभी तुमसे मिली नहीं है ठीक से.", ज़ुबैदा अर्जुन को साथ लिए बहार आई और कमरे के टाला लगाती उसको घर से बहार ले आई. आंटी बस देख रही थी और ज़ुबैदा ने आरती को आवाज दी तोह वह तुरंत आ कड़ी हुई.

"शादी में मिलेंगे आरती, चलना चाहिए तुम्हे अब. अर्जुन, कलम के साथ कभी कोई रंग जरूर पकड़ना.", हाथ हिला कर उन्होंने इतना हे कहा और जाने से पहले अर्जुन ने उनके सामने हाथ जोड़ दिए. ज़ुबैदा उन्हें जाता देखती रही.

"ज़ुबैदा वह चाय भी नहीं पी कर गया.", उनकी अम्मी ने इतना कहा तोह वह बेफिकरी से बोली.

"अमृता प्रीतम कहती है के जो सुन्दर होता है वह बदनसीब होता है. जो ताक़तवर होता है वह अंदर से अकेला. लेकिन सबसे विचित्र बात पता है आपको अम्मीजान, सबकी परवाह करने वाले की परवाह सबको नहीं होती. आज चाय से हे पेंटिंग कर लेंगे.", ज़ुबैदा अपने रस्ते चली गयी और उनकी अम्मी अफसाना के सामने ना में सर हिलती अंदर. इधर घर आने के बाद अर्जुन भी कुछ समय बाद अपने रस्ते निकल चला था. Lucky-Deepak के साथ हे अपनी बहनो को लिए. डेढ़ दिन में वह बहुत कुछ जी चूका था. गुरदीप के साथ साथ अपनी दोनों बहनो का प्यार, mara-maari, रिस्की को समझाना, नए दोस्त जिनमे जग्गी जैसा सच्चा इंसान और जसलीन जैसी एकतरफा मोहब्बत थी. अफसाना ने तोह उसको बेचैन कर दिए था लेकिन जो kala-safed इंद्रधनुष उसने ज़ुबैदा के साथ देखा था वह उसकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा सच था. ज़ुबैदा के पास वापिस आना हे होगा. कार अपनी गति से शहर से बहार जा चुकी थी और अर्जुन ने आँखें बंद कर ली थी इस मुलाकात को दिल में जिवंत रखने के लिए.
 
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