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Upar-Niche (2)
"पूछ सकती हु की अर्जुन यहाँ क्या कर रहा था?", रोमिला ने सबसे पहले बाथरूम में जा कर खुद को व्यवस्थित किया था. कितने हे दिनों बाद आज उनकी योनि ने भी महक बिखेरी थी वो kaam-leela देख कर. शरीर पर पंतय भी बोझ लगने लगी तोह एक लघु स्नान के बाद सिर्फ झीना सा गाउन पहन कर वो रेणुका के कमरे में चली आयी. वो भी नाहा कर सलवार कमीज में थी अब. अपनी भाभी के सवाल पर रेणुका ने सीधा हे जवाब दिया.
"वो मुझसे हे मिलने आया था भाभी. आपको ाचा नहीं लगा क्या अर्जुन का मेरे पास मिलने आना?", अब ऐसा मिलना जो की मिलान था उस पर रोमिला ने गहरी सांस लेते हुए बिस्टेर पर बैठ कर बात करना हे उचित समझा.
"मिलना कुछ ज्यादा हे गहरा था रेणुका और तुम्हे इस बीच एक बार भी प्रीती का ख्याल नहीं आया? मुझसे ज्यादा तोह वो तुमसे प्यार करती है और तुम भी तोह उतना हे ध्यान रखती हो प्रीती का. वो लड़का इस घर का होने वाला दामाद है और प्रीती का सबकुछ.", रोमिला का लहजा जरा भी सख्त न था और वो बात कह भी बड़े अपनेपन से रही थी.
"आपको तोह मैंने बताया हे था न सबकुछ कौशल के साथ मेरी ज़िन्दगी के बारे में? और अर्जुन कभी मेरे जेहन में था भी नहीं भाभी. हालात अलग थे और कुछ घटनाये हुई जिसमे मुझे एक समझने वाला इंसान मिला. आप यकीन कीजिये मेरी ख़ुशी को देने वाली भी प्रीती हे है और ये बचा सिर्फ कहने को कौशल का है लेकिन असली पिता अर्जुन हे है. हाँ मेरा तीसरा महीना शुरू हुआ है और कहने को मैं बताती हु की पूरा हो गया. आप कहेंगी तोह मैं हमेशा के लिए यहाँ से चली भी जाउंगी सब छोड़ कर, बस जाने से पहले पूरी बात सुन्न लीजिये.", रेणुका के इतने बड़े खुलासे से रोमिला भी समझ गयी थी की बात वासना या आकर्षण वाली नहीं है. वो भी jaan-na चाहती थी की ऐसा क्या हुआ के अर्जुन जैसा लड़का और रेणुका जैसी तलाकशुदा एवं सख्त अनुशाषित महिला ने ये कदम लिए.
"मैं jaan-na चाहती हु रेणुका और तुम्हे कही जाने की जरुरत नहीं है लेकिन अर्जुन भी जरूर अपनी बात साबित करेगा. फिर मैं अपनी बात कहूँगी.", रोमिला के ऐसा कहने पर अगले 20-25 मिनट तक रेणुका न वो सब राज, घटनाये और अपने एकाकीपन की कहानी बयान कर दी. क्यों वो सिर्फ एक औलाद के सात बाकी ज़िन्दगी बिताना चाहती है. प्रीती और रेणुका का भावनात्मक जुड़ाव, अर्जुन का रेणुका के प्रति आदर और सम्मान के साथ एक अलग हे प्रेम जहा सिर्फ स्वार्थ रेणुका का था. कही भी रेणुका ने बात अर्जुन पर न जाने दी और औरत का दर्द औरत से बेहतर कौन समझ सकता है? रोमिला के भी अपने दुःख दर्द थे जिस वजह से वो रेणुका की बातों से भावुक हो गयी.
"हम इंसान को बहार से देख कर हे धरना बना लेते है लेकिन जब अंदर से देख कर अलग हे सच पता लगता है तोह अपनी हे सोच पर शर्म आती है. मुझे सिर्फ एक पल के लिए दुःख हुआ था जब अर्जुन और तुम्हे मैंने उस हालत में देखा. फिर थोड़ी जलन भी हुई. जानती हो रेणुका, तुम्हारे भाई के सम्बन्ध मेरी भाभी से है और ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि वो एक मर्द है जिसकी प्यास एक हे पानी से नहीं बुझ सकती. वह ऐसी कोई मज़बूरी या प्यार नहीं है जैसा तुम्हारे और अर्जुन के सन्दर्भ में hai.",Romela ने भी आज अपने हमेशा वाले मुस्कुराते चेहरे से आवरण हटते हुए दर्द दिखा हे दिया.
"और आपने कोई कोशिश नहीं की भाभी? भैया से तोह आपका prem-vivah हुआ था न.", रेणुका के लिए भी ये सोच से परे था और कही न कही ये भी एक वजह थी रोमिला के यहाँ रुकने की.
"वह तोह इस भी ज्यादा संगीन काम होते है आधुनिकता के नाम पर. खैर मैं बस इतना कहूँगी की हो सके तोह तुम्हे एहतियात रखनी चाहिए. मैंने तोह एक दृश्य बहार देखा लेकिन कलाकार हु तोह हमेशा तस्वीर के कई पहलु देख कर हे अपना नजरिया बनती हु. अर्जुन बिलकुल भी तुम्हारे भाई जैसा नहीं है और उसका प्रीती के लिए प्यार सबकुछ बताता है. यहाँ वो लालच की जगह तुम्हे सहारा दे रहा है जीने के लिए और वह कोई शायद ज़िन्दगी हे लालच में जी रहा है.", रोमिला कितनी हिम्मतवाली होगी जो ऐसे पल में भी संयंम में थी.
"जो भी मेरे और अर्जुन के बीच है भाभी, ये सब जल्द हे रुक जायेगा. हाँ ऐसा जरूर हो सकता है के किसी लम्हे मैं बस उसके पास इसलिए जाऊ जब मुझे कमी महसूस हो. लेकिन औलाद के बाद शायद हे ऐसी नौबत आये.", रेणुका ने भी स्पष्ट कर दिया था के वो जिस्मानी रिश्ता जल्द हे रोक देगी.
"पागल हो तुम रेणुका. वो एक सही मर्द है अभी से जो तुम्हारा ख्याल रखता है और इसका नकरात्मक असर कभी भी मेरी बेटी पर नहीं होने दिया उसने. जो पैदा होगा काम से काम उसको तोह अर्जुन से दूर मैट करना. बाप कहलवाना जरुरी नहीं है लेकिन एहसास हमेशा रहना चाहिए के उस बचे पर एक जरुरी साया है. अलेक्सान्दर ने तोह माँ के साथ साथ हजारो रानियां राखी थी, ये अर्जुन कुछ काम तोह नहीं.", रोमिला ने ये बात मुस्कुरा कर कही थी और द्विअर्थी मतलब समझते हुए रेणुका ने शर्म से नजर नीची कर ली.
"आप उसकी सास हो और सच कहु तोह मुझे एक पल लगा था के सबकुछ खराब हो गया. मैं अर्जुन से बिना मिले यहाँ से चली जाती भाभी क्योंकि प्रीती और अर्जुन का रिश्ता मेरे लिए सबसे ऊपर है. आप कही ज्यादा हे सुलझी हुई और परवाह करने वाली है."
"ये बात तोह है हमारे बीच में लेकिन भूल कर भी अर्जुन से इसका जीकर मैट करना. सास के हाथ लग हे गया है तोह अब जरा मैं भी हालत पतली करू उसकी. देखे क्या प्रतिक्रिया होती है जब मैं टॉर्चर दूंगी उसको. वैसे तुम भी हिम्मतवाली हो जो वो चीज झेल गयी जिसको शायद कोई ग्रीक माँ भी न झेल पाए.", रोमिला ने जैसे ठान लिया था के वो अर्जुन को तोह दबोचेंगी हे लेकिन मजे रेणुका के भी लेती रहेंगी.
"क्या भाभी आप कुछ भी बोलती हो. पहली बार तोह नहीं था न ये हमारा.", रेणुका बिस्टेर पर अपनी उंगलिया उलझा रही थी और चेहरा शर्म से झुका था.
"पहली बार की हे बात कर रही हु मैं. घर खाली था क्या उस वक़्त? वैसे माँ तोह पहले भी बानी हो इसलिए थोड़ा हे दर्द हुआ होगा.", रोमिला अलग हे अंदाज में कचोट रही थी और रेणुका बेध्यानी में बोल हे गयी.
"जान हे निकाल दी थी भाभी शुरू के 3-4 वक़्त तोह. फर्स्ट नाईट से ज्यादा दर्द और खून अर्जुन के साथ करने पर आया. दर्द तोह अभी भी एक बार होता है लेकिन वो जल्दबाजी नहीं करता और हमेशा मेरा ख्याल रखता है अपने मजे की जगह.", रोमिला की हंसी और गहरी हो गयी थी और अपना हे जवाब समझते हुए रेणुका की धड़कन तेज.
"हाहाहा, तुम भी बहोत हे भोली हो रेणुका. चलो ाचा है की तुम्हे हर बार ये एहसास मिलता है और अगर वो इतना हे काबिल है तोह मेरी बेटी हमेशा खुश रहेगी. प्रीती से भी इस बारे में बात मैट करना. मैं खाना बनती हु हम दोनों का और बाकी बातें बाद में करेंगे.", रोमिला मुस्कुराती हुई हे बहार चली गयी थी. रेणुका जहा पहले अपना राज खुलने पर अंदर से दरी थी वही इतनी बातें होने के बाद वो खुश थी की उसकी भाभी ने हंगामा करने की जगह बात करना बेहतर समझा. लेकिन अब चिंता थी तोह फिर से अर्जुन की. क्योंकि रोमिला का चेहरा पढ़ना तोह अभी अर्जुन को भी नहीं आता था और वो फंस गया था, चाहे मजाक में हे सही.
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अर्जुन पैदल हे प्रीती के घर से निकल कर गलियों में भटकता हुआ अपने हे विचारो में चला जा रहा था. आज इतने दिनों बाद वो रेणुका के साथ समय बिता कर कुछ शांत होना चाहता था लेकिन उस अख़बार वाले लड़के और मुकेश की वजह से माहौल ख़राब हो गया. रोमिला पर भी नजर पड़ हे गयी थी जो एक और वजह थी वापिस न जाने की. यहाँ वो चलता हुआ मंजू के घर तक आ गया और बिना विचारे हे गेट खोल कर अंदर आ खड़ा हुआ. ढीली टीशर्ट और पाजामे में हॉल के सफाई करती मंजू को देख कर वो वही खड़ा रहा जब तक मंजू ने उसकी मौजदगी न भांप ली.
"तुम इस वक़्त और वो भी यहाँ?", अभी वो आगे कुछ कहती की अर्जुन उसके गले जा लगा. मंजू के लिए तोह हमेशा हे अर्जुन रेगिस्तान में बारिश सा था. उसके सीने लगती वो भी सबकुछ भुला कर अर्जुन का चेहरा चूमने लगी. घर पर मेनका की गैरमौजदगी उसकी कार न कड़ी होने से पता लग चल हे गयी थी. सख्त उभारो को बेसब्रो की तरह मसलता अर्जुन वैसे हे मंजू को सीने से लगाए कमरे में चल दिया.
"कुछ मैट बोलना प्लीज.", अर्जुन ने एक पल के लिए होंठ अलग किये और वो ढीला पजामा हटतने के बाद मंजू की टीशर्ट भी ऊपर सरका दी. सबसे सुडोल और सख्त चुके थे मंजू को इस समय. तन्न कर खड़े चुचकों का आमंत्रण स्वीकारने में तनिक भी देरी न करते हुए अर्जुन उन्हें जोश से पीने लगा. यहाँ भी तोह हालत रेणुका से कुछ अलग न थी मंजू की. ये भी गर्भवती थी और अर्जुन के लिए हमेशा हे तड़प से भरी. सिसकते हुए खुद हे अपनी पंतय निचे सरकती वो दूसरे हाथ से अर्जुन का सर अपने चुचो पर दबाने लगी.
"आअह्ह्ह.. अर्जुन... सचमुच बहुत ाचा लग रहा है.. उफ़.. ये सरप्राइज पसंद आया तुम्हारी मंजू को.. आह्हः..", रगड़ती हुई वो बिस्टेर पर आगे होने लगी थी अर्जुन को ऊपर लाते हुए. कपडे दोनों के हे अभी तक जिस्म से जुड़ा न थे और अर्जुन ने भी सिर्फ लिंग बहार निकलते हुए पनियाई छूट की दरार भर भिड़ा दिया. उत्तेजना में इस वक़्त वो लाल सूपड़ा फूल कर कही गहरा और मोटा हो चूका था. दोनों कंधो को पकड़ते हुए अर्जुन ने अपना जिस्म आगे झटका दिया.
"आठ.. सॉरी मंजू.. उम्म्म..", ये छूट कही ज्यादा हे अभ्यस्त थी उस मॉटे डंडे से लेकिन दर्द मंजू को भी हुआ. आधा लुंड एक झटके में अंदर उतरने से छूट की फांके फटने जैसी हो गयी थी और अब तोह मोटाई भी अधिक थी.
"माह.. सॉरी मैट बोलो.. आठ.. मुझे भी ये.. आठ.. अंदाज हे पसंद है.. पूरा समां जाओ अपनी मंजू में.. उफ्फ्फ.. ", अर्जुन ने चुचो को मसलते हुए इस बार जोश में मंजू के होंठो को मुँह में पकड़ते हुए समूचा 9 इंच हे अंदर उतार दिया. एक पल के लिए तोह दोनों के शरीर शुन्य हो गए.
"फाड़ दी.. आउच.. कहा से भरे आये हो तुमममम.. ? इतना मोटा .. आठ.. थोड़ा प्यार से करो जान.. ",अब मंजू ने हे गुहार लगाई तोह अर्जुन उस से लिपट कर बस लेट हे गया. सीने से सीना लगते हे वो अब शांत हो चूका था. मंजू भी समझ गयी की आज उसका प्यार कुछ परेशां है. सर को उंगलियों से सहलाती हुई वो अपना हे दर्द भूल गयी. अर्जुन अब जैसे वो महसूस कर रहा था जिसकी तलाश थी. आत्मा से आत्मा का मिलान और सुकून. मंजू ने उसका चेहरा ऊपर करते हुए अपने चेहरा पर टिकाया और एक लम्बा प्यार भरा चुम्बन दोनों में शुरू हो गया. यहाँ भी मंजू हे भरी थी लेकिन अर्जुन को यही आराम की जरुरत थी.
"तुम कभी परेशां मत हुआ करो जान. मानती हु आजकल मैं तुम पर ध्यान नहीं देती लेकिन ये घर हमारा है और मैं तुम्हारी.", मंजू के ऐसा कहने पर अर्जुन ने अपने हाथ बिस्टेर में धंसते हुए उसकी पीठ को जकड लिया. अब उस कासी हुई छूट में हल्का घर्षण शुरू हो गया था. ये इतना धीमा और एहसास से भरा था की वो दोनों हे एक दूसरे को देख रहे थे. मंजू की ये मुस्कान दिलकश थी और अर्जुन का सुकून जैसे मंजू की चाहत. इस घर में हमेशा उन्होंने बंद कमरे में संसर्ग किया था लेकिन आज हर दरवाजा खुल्ला था.
"तुम मुझे थाम लेती हो और पता है मैं जितना भी तेज राहु, तुम रोक सकती हो मुझे मंजू. सच कहु तोह आज मुझे तुम्हारी जरुरत थी और मेरे कदम अपने आप हे यहाँ आ गए.. आह्हः.. सॉरी.. वो गलता तरह से शुरू करने के लिए.. ummm.",Beech बीच में दोनों हे एक दूसरे को चूम लेते. मंजू की लम्बी सुडोल टाँगे अब ाचे से कासी अर्जुन पर, पजामा और कच्ची उसने खुद हे पाँव से झटक कर अलग कर दी थी. यही उसकी संगिनी थी जो कद के साथ साथ जिस्म से भी अर्जुन को टक्कर देती थी. Nami-yukt योनि और वो भयंकर लिंग अपना तालमेल बना चुके थे लेकिन यहाँ चुदाई से भड़कर इन दोनों का प्रेम था, परवाह थी और दोनों हे जी भर कर बातें कर रहे थे. आँखों, शरीर, दिल और मुँह से. प्यार ऐसा हे तोह होता है जहा सबकुछ आपस में जुड़ा हो.
"थामती नहीं मैं तुम्हे, प्यार करती हु जैसे तुम करते हो. तुम चाह कर भी मेरे ऊपर जोर नहीं दिखा सकते क्योंकि आज भी तुम मुझे गीला करने के बाद 2 बार में अंदर आये हो. ाचा लगा जान कर की मैं तुम्हारे sukh-dukh की साथी हु. That's व्हाई थिस लेडी इस इन लव विथ यू माय मन. तुम हमेशा से हे मेरा प्यार हो और फिर कभी सॉरी मैट बोलना. और मैं उधर के लिए भी तैयार हु.", मंजू का इशारा गुदाद्वार की तरफ था. दोनों यहाँ prem-safar में इतने खोये थे की बहार कड़ी मेनका की आहात तक न सुनाई दी.
"इसलिए तोह तुम्हारे पास हु.. आठ.. लेलिन पहले मेरी बेटी फिर वह आऊंगा.. उम्म्म्म..", दोनों के मुख पर बनती लार बता रही थी की इनका प्रेम पागलपन है. धक्के किसी रेल से चल रहे थे और चिकनी सुरंग में अंदर बहार होता वो विकराल लिंग सचमुच कोई पहली बार तोह नहीं झेल सकता था. मंजू का शरीर थिरका, बिस्टेर भीगा लेकिन वो निरंतर अपने सुडोल चुत्तड़ हिलती रही. इनकी मस्ती की सिसकियाँ सुन्न कर मेनका की भी छूट कुलबुला गयी थी. घर्षण की fatch-fatch बहार हाल में भी सुनाई दे रही थी और वही अर्जुन का जोश बढ़ता हे जा रहा था.
"आअह्ह्ह.. मार हे डाला रे तुमने तोह.. ऐसा सरप्राइज.. आह्हः.. कही घर पर देते तोह... मेरी माँ ..उफ़.. खुद हे पागल हो जाती .. आह्हः...", मंजू अपनी माँ का जीकर कर गयी और अर्जुन तोह दिल से जुड़ा था.
"मौसी को सब पता है.. आठ. उन्होंने हे तोह उस दिन ऊपर भेजा था तुम्हारे पास... आठ.. जल्दी से माँ बन्न jao..ummm. ये भर दो मंजू.. उम्म्म", अर्जुन का इशारा चुचो में दूध की तरफ था. थिरकते अनार भी इतनी लम्बी चुदाई में कही ज्यादा हे फूल चुके थे जिन्हे बार बार वो मुँह में भर रहा था.
"आअह्ह्ह.. दूध आएगा तोह दिक्कत होने वाली है.. उम्. बाप और बीटा .. लगे रहेंगे... जानती हु की माँ को पता है.. आह्हः.. तभी तोह वो तुम्हे घर बुला रही थी.. िसष्ठ.. कस के मारो न अंदर... आह्हः..", अर्जुन इतना कहते हे द्रुतगामी रफ़्तार से मंजू की लज्जत भरी छूट में पूरा हे लिंग जड़ तक पेलने लगा. मेनका तोह देख कर हे झाड़ गयी थी और ये दोनों ऐसी गहरी बातें करते हुए अगले 20 मिनट तक लगे रहे. झटके खता अर्जुन इतना झाड़ा था जितना वो चुनिंदा समय हे हुआ होगा. गर्भ पर गरम धार महसूस करते हे मंजू भी नागिन की तरह इस तगड़े चन्दन वृक्ष पर लिपट गयी. दोनों हे जाने कितनी देर तक ऐसे लिपटे रहे और सफ़ेद वीर्य चादर तक आ पंहुचा.
"उठो अपने बेटे के पापा. मम्मी को नहाना पड़ेगा.", मंजू के ऐसे कहने पर अर्जुन एक तरफ लुढ़क गया लेकिन बाथरूम तक जाती वो थिरकती गांड दिल को हिला गयी.
"मैं साथ नहाऊंगा और कोई सवाल नहीं.", अर्जुन के ऐसा कहने पर मंजू ने इतने कामुक तरीके से हवाई चुम्बन किया था की वो उसके बराबर जा खड़ा हुआ.
"अंदर भी एक राउंड पूरा हे लगाना. पानी में तोह आग मुझे शुरू से हे पसंद है तुम्हारे साथ.", मेनका की तोह sitti-pitti हे गम हो गयी थी मंजू का ये अंदाज सुन्न कर. वो कार ले कर बहार हे निकल गयी और इधर अर्जुन पौने घंटे बाद निर्वस्त्र मंजू को लेकर बिस्टेर पर आ गया. दोनों के जिस्म अब taro-taja थे. कपडे पहन कर मंजू अपने पति के लिए खाना बनाने लगी वही अर्जुन भी हॉल में बैठ कर उस से बातें करने लगा.
"तुम कब आये? शुक्र है आज दर्शन तोह दिए जनाब ने.", मेनका जब आयी तोह अर्जुन आराम से सोफे पर बैठा समाचार देख रहा था. मंजू भी आधा काम निबटा चुकी थी.
"बहोत देर हो गयी मुझे तोह आये लेकिन आप तोह स्कूल बंद होने के बावजूद बहार हो.", अर्जुन ने अपने आने के समय में कोई her-fer न की थी. मेनका असमंजस में थी की वो कुछ कहे या न कहे. लेकिन आज उसने जाना था की निर्विरोध संसर्ग क्या होता है जो वो कभी अर्जुन से कर न सकीय थी.
"हाँ कुछ काम था डाक्यूमेंट्स का तोह थोड़ा समय लग गया. मंजू ने ख़याल तोह रखा न तुम्हारा?", ये बात बहोत आराम से कही थी मेनका ने और वो अर्जुन के चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रही थी जहा पूर्ण सुकून था.
"मंजू मेरा ध्यान प्रीती की तरह हे रखती है मेनका जी. न कोई औपचारिकता और न दिखावा. वैसे आप ये मैट कहना के मैं आपको याद नहीं करता. फ़ोन तोह मैं हे करता हु लेकिन आप तोह मेरे घर आने के बाद भी मुझसे नहीं मिली.", यहाँ तोह अर्जुन ने हे मेनका को घुमा दिया था. वो जवाब क्या देती जब सामने वाला सच कह रहा था. लेकिन मंजू और अर्जुन का सम्बन्ध पता लगने के बाद वो थोड़ा बेकाबू भी थी.
"शायद तुम्हारी बहिन मुझसे ाचा ख्याल रखना जानती है."
"बीवी. और मैंने भी कहा था के वो प्रीती की तरह मेरा ध्यान रखती है न की बहिन की तरह. ऐतराज?", अब मेनका का दिल बैठ हे गया था इतना स्पष्ट जवाब सुन्न कर. अर्जुन क्या कह गया था ये जैसे सपने सा था उसके लिए.
"फिर से कहना."
"फिर से सुनिए अगर समझ नहीं आया तोह. उसको पता है मेरे साथ आपका सम्बन्ध है. मंजू और मैं आपके सौतेले भाई से पहले से हे आपस में विवाहित है. मैं उस बचे का बाप हु जो मंजू के पेट में है. आपके परिवार ने तोह खेल हे खेला था इसके साथ लेकिन ये मेरी है और मैं इसका. इसलिए मंजू ने आपको बहिन बनाया न की बड़ी ननद. बड़ी साली हे हो आप अब मेरी और ज्यादा कुछ jaan-na हो तोह लंच के बाद मंजू खुद बता देगी.", अर्जुन ने बात ख़तम करते हुए मेनका का गाल सेहला दिया था. कुछ देर शांति रही और फिर खाना भी लग गया. म्हणत करने वालो ने भरपेट खाया था और अर्जुन बिना किसी की अनुमति के मंजू के कमरे में जा लेता. थकान भी थी और अब कही मैं शांत हुआ था.
"ये अर्जुन कुछ कह रहा था.", मेनका ने बात की शुरुआत की.
"हाँ. वो कह रहा था की आपके साथ सचमुच बहोत बुरा हुआ. लेकिन वो कोशिश करेगा की आपको उतना प्यार मिले जो नहीं मिला.", मंजू ने बर्तन सिंक में रखते हुए जवाब दिया तोह मेनका सफ़ेद हे पड़ गयी.
"तुम कब से इसके साथ हो?"
"उस दिन मैं खेत में इसके हे साथ थी जब आपको पहली बार प्यार हुआ और आप मुझे हे देखने आ रही थी. ये मेरे साथ बचपन से हे है, बताया था न.? खेल तोह आपके घरवालों ने रचा था शिकार मैं बन्न गयी, आपके साथ साथ. याद है ये यही इस घर में जख्मी आया था आपको बचने के बाद? किस से बचाया था इसने आपको और फिर आपके साथ कौन था?", मंजू के ये शब्द बहोत थे मेनका को वास्तविकता में लाने के लिए. उसको भी ध्यान आ गया था के अगले दिन ऋषभ की तस्वीर इस घर में न थी.
"सॉरी."
"उसको बोल देना दीदी अगर वो जान गया हो तोह. मैं तोह पहले हे दिन से जानती हु लेकिन सम्बन्ध इस घर से बहार कभी मैट बनाना. यही हद्द है और यही दुनिया. वो इसके बहार सिर्फ प्रीती का है.", मंजू ने हिदायत देते हुए कहा तोह दयारा मेनका को समझ न आया.
"और अगर ये किसी और के भी साथ हो तोह.?"
"वो प्रीती को पता होगा लेकिन हद्द भी. आपकी सहेली अन्नू की बात कर रही हो तोह वो हद्द से बहार है. इतना बोझ मैट डालो दिमाग पर क्योंकि आप भी चोट खायी हो, मैं भी. अंदर सोया शक्श इलाज है और वो मेरा प्यार भी. दिक्कत मुझे होनी चाहिए लेकिन आपके साथ अब रिश्ता बहिन का है. आराम कीजिये, मैं अपने पति के पास सोने जा रही हु जिस से वो उठे नहीं.", मंजू अपने चरित्र को आज कितने दिन बाद दिखा रही थी. वो सचमुच भारी थी और मेनका को मान न पड़ा के यहाँ वो सही है. बस आज के बाद यहाँ माहौल बदलने वाला था जिस वजह से कुछ आशा थी मेनका को. मंजू के बगल में आते हे अर्जुन चैन से सो चूका था.
'काश तुम ये पहले हे बता देती मेरी बहिन. लेकिन ाचा हे है के तुमने मेरे भी प्यार को समझा और दुत्कारा नहीं.', मेनका का दिल अब परेशां न था. ये सभी राज जिस तरह से खुले थे वह किसी का भी किसी से मतभेद नजर आने की जगह बस प्यार और परवाह दिखी. मंजू भी जिगरा रखने वाली छोटी बहिन थी अब और अर्जुन भी हक़ ज़माने वाला प्रेमी. अपने कमरे में जाते हे मेनका बिलकुल ढील कपड़ो में चैन से बिस्टेर पर लेट गयी.
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3 की जगह करीब 4 हे बज गए थे शंकर जी को घर पहुंचते पहुंचते. उमेद जी भी उनके साथ हे इधर आये थे और फ़ोन पर पहले हे बता दिया जिस वजह से Komal-Rupali वाला कमरा अपनी चची के लिए खुद कोमल ने हे व्यवस्थित कर दिया था. संजीव अपने साथ बिजली वाले को लेता आया था और इस कमरे में air-conditioner फिट हो चूका था सभी के आने से पहले.
"मेरी बची कैसी है? संजीव तुम हे काम करवा रहे हो और वो शैतान नहीं दिख रहा?", कृष्णा जी आते के साथ कोमल और संजीव से गले लग कर मिली थी पिछले आँगन में. बाकी सभी तोह फ़िलहाल बैठक में रुक गए थे.
"मैं ठीक हु चची जी और भैया खुद हे आ गए थे. अर्जुन स्टेडियम से 6 बजे तक आएगा. आप इधर आराम से बैठिये मैं जूस ले कर आती हु. भैया आप भी चची के साथ हे बैठिये.", कोमल ने उन्हें अंदर बैठने को कहा और संजीव भैया ने भी एक चालू कर दिया अपनी चची के लिए. 2 तकिये सर की तरफ रखते हुए उन्होंने अपनी चची के आराम का सही ध्यान रखा था.
"आने में परेशानी तोह नहीं हुई आपको चची जी? कार में तंग हुई होंगी.", संजीव पाँव की तरफ बैठा कृष्णा जी को हे देख रहा था जिनके चेहरे पर एक मुस्कान थी और कही कोई थकान का निशान नहीं.
"कान न खींच देती मैं इनके अगर तकलीफ होती तोह. बहोत ध्यान से ले कर आये है बस लड़कियों ने कुछ ज्यादा हे शॉपिंग कर ली. भाभी (ललिता जी) कल आएँगी?"
"हाँ, दादा जी बता रहे थे की वो लोग 9 बजे तक पहुंच जायेंगे वापिस घर. ाचा लगा आपको थोड़ा बेहतर देख कर लेकिन अब यहाँ कोई काम नहीं करना आपने.", संजीव ने कुछ सोच कर हे काम न करने वाली बात कही थी.
"काम तोह मैं वह भी कोनसा करती थी लेकिन तुम परेशां हो बीटा. इधर बैठो जरा.", संजीव इतना सुन्न कर हे हिल चूका था लेकिन पास तोह बैठना हे था. कुर्सी खिसका कर अब वो अपनी चची के चेहरे के करीब आ बैठा. कृष्णा चची ने अपने ठन्डे हाथो में भतीजे का हाथ पकड़ते हुए फिर से चेहरे को देखा तोह संजीव की नजरे झुक गयी.
"तुम सिर्फ 2 लोगो की हे सबसे ज्यादा चिंता करते हो ये मुझे पता है. वैसे तोह पूरे घर की dekh-rekh तुम ाचे से करते हो लेकिन इस परेशानी की वजह पापा है या अर्जुन?"
"अर्जुन चची जी. आप तोह जानती हे है वो कुछ ज्यादा हे भावुक है. नाश्ते के बाद से हे वो घर से चला गया था दोस्त का बता कर. थोड़ी देर पहले कोमल को फ़ोन पर बताया के स्टेडियम जा रहा है. वो ऐसा कभी नहीं करता जब घर में दादा जी न हो.", संजीव की चिंता बड़े भाई के रूप में जायज थी लेकिन बात अभी भी अधूरी हे बता रहा था वो.
"और तुम्हे पता है न वो क्यों भावुक हुआ?", अभी आये 10 मिनट हे हुए थे कृष्णा जी को और ऐसी बातें शुरू हो गयी. कोमल रसोई में थी जहा प्रियंका चाय बना रही थी और वो मुसम्बी का जूस निकल रही थी.
"इस बारे में तोह अभी बात करने का कोई फायदा नहीं है चची जी लेकिन वो घर आये तोह थोड़ा अपने aas-pas हे रखना. हो सकता है यहाँ दादा जी और रेखा चची नहीं है तोह वो ऐसा कर रहा हो. मुझे भी काम से जाना पड़ा था बहार नहीं तोह अर्जुन मेरे साथ हे होता.", संजीव की बात पर कृष्णा जी ने ज्यादा कुछ न कहा. इधर 2 गिलास जूस के ट्रे में लिए कोमल अंदर चली आयी.
"मेरी बची, मैं हर काम खुद कर सकती हु. इतनी टेंशन न ले और देख तेरे चाचा या पापा को कुछ चाहिए तोह नहीं. उमेद भाई साहब भी है उधर और Vinni-Aaisha भी.", कोमल दीदी फिर भी उन्हें अपने हाथो से हे जूस पिलाती रही. संजीव ने भी गिलास एक सांस में ख़तम किया और बैठक की तरफ बढ़ गया.
"मुन्ना फ़ोन पर परेशां था क्या?", उन्होंने अब सवाल कोमल से किया.
"बिलकुल भी नहीं चची जी. हाँ जब घर से गया था तब जरूर लग रहा था और उस वक़्त सामने वाली भाभी यहाँ आयी हुई थी तोह वो दोस्त के घर चला गया. फिर भैया आ गए थे तोह काम में लगे रहे. वैसे अब डॉक्टर क्या कह रहे है?"
"कह रहे थे की जल्दी से अपने घर जाओ और बिस्टेर खाली हमारा. कुछ हुआ है नहीं और इधर कब्ज़ा करे बैठे हो. तोह अब मैं इधर आ गयी, तेरे कमरे पर कब्ज़ा करने.", कृष्णा चची की बातें कोमल के चेहरे पर भी ख़ुशी ले आयी.
"पूरा घर हे तोह आपका है चची और मुझे तोह आपने प्रियंका से भी ज्यादा प्यार दिया है. ख़ुशी है के आप इस कमरे में हो और अब मैं रात में आपके पास रहा करुँगी.", कोमल दीदी ने ये गिलास खली होने के बाद ट्रे में रखा और रुमाल से चची के होंठ साफ़ करने लगी जहा हल्का सा हे गीलापन था.
"अब तू मेरी माँ बनेगी लगता है. तुझे यहाँ अर्जुन सोने देगा तोह सो जाना, मैं तोह मन नहीं कर रही.", फिर से अर्जुन का नाम लेने पर खुद कृष्णा जी को थोड़ा अजीब लग रहा था. एक तोह वह इतने समय बाद वापिस आयी थी वो भी हॉस्पिटल से और ऊपर से हमेशा घर में रहने वाला उनका लाडला गायब था.
"मैट सोचिये के ारु यहाँ क्यों नहीं है. वो अपनी चची माँ से ऐसे तोह नहीं मिलने वाला ख़ुशी के मौके पर. अब आराम कीजिये आप और मैं papa-chacha जी का खाना होने के बाद आती हु.", कोमल की भी यही ख़ास बात थी की वो हर सदस्य का दिल और भाव पढ़ लेती थी बेशक ज्यादा लोगो के साथ बात काम हे करती थी.
"पता है मुझे मेरे बेटे का. वो तोह बस आदत है और ये बदल नहीं सकती. आरती से कह देना के मेरा सामान यहाँ अलमारी में लगा देगी. वो भी यहाँ आ कर ऋतू जैसी शरारती हो गयी है इस बार.", चची की ये बात सुन्न कर अब कोमल क्या बताती की आरती ऋतू की वजह से बदली है या अर्जुन की.
"आप आराम कीजिये और सारा सामान घंटे बाद अलमारी में हे मिलेगा. मैं आती हु चची जी थोड़ी देर में.", चादर अपनी चची के कमर तक करने के बाद वो बहार निकल गयी. सफर में कृष्णा जी सो न पायी थी आरती की chak-chak की वजह से. उधर संजीव ने भी दोनों गाड़ियों से यहाँ का सामान उतार कर मेहमान कमरे में रख दिया था फ़िलहाल. विन्नी रुकना चाहती थी लेकिन आइशा की वजह से वापिस जाना पड़ा और उमेद जी भी परसो आने का बोल कर अपनी हवेली की और निकल चले.
यहाँ बैठक में संजीव के दोनों चाचा बैठे हल्का भोजन कर रहे थे और आरती अपनी माँ का सामान लगाने उनके कमरे में चली गई. कुछ समय बाद शंकर जी ने हे बात शुरू की.
"तोह पंजाब कौन जा रहा है अब? तुम्हे तोह शायद हे जाने दिया जाये और फिलहाल तोह इन्दर को भी यहाँ काम देखने होंगे.", नरिंदर जी बस ध्यान दे रहे थे जो भी बड़ा भाई बोल रहा था.
"पापा कह रहे थे की वो जा सकते है लेकिन अभी समझ लीजिये के 3 दिन उनके भी बहार हो जायेंगे और फिर उनको भी इधर देखना हे होगा. वैसे अगर जरुरी है तोह मैं चला जाता हु चाचा जी.", शंकर जी ने पहले हे गर्दन न में हिला दी.
"तुम्हे फ़िलहाल तोह रूटीन में ड्यूटी देखनी है अपनी और वह काम एक दिन में तोह नहीं होने वाला. इन्दर और कृष्णा का सामान है वह और jaan-pehchaan वाले घरो में कार्ड भी देने है. आरती ने जिद्द पकड़ राखी है के वो जरूर जायेगी तोह कार्ड वाला काम वो कर सकती है."
"यार वह से सिर्फ कृष्णा के कमरे का सामान आना है वो भी किताबे, कपडे, एल्बम, documents-files वगैरह. कोई भी चला जाये आरती के साथ और उसको कृष्णा सब समझा देगी. रेशम सिंह भाई जैसे है और हुसैन भी घर चक्कर लगा कर देखभाल करता रहेगा. घर वैसा हे रहेगा.", नरिंदर जी ने स्पष्ट कर दिया की जरुरी सामान इतना नहीं है के पूरा घर हे इधर लाना हो. अपनी तरफ से किसी ने भी अर्जुन का नाम नहीं लिया था अभी तक.
"चाचा जी, तारा भी जानती है गाडी चलना लेकिन सिर्फ दोनों लड़कियों को भेजना ठीक नहीं रहेगा."
"यार संजीव तेरा लाडला भी तोह जा सकता है न कार ले कर?", अब शंकर जी ने हे ये बीड़ा उठाया और अपने बेटे का नाम आगे कर दिया. संजीव ने अनिश्चित भाव दिखाए तोह नरिंदर जी हे बोल पड़े.
"हाँ अगर वो कार चला लेता है तोह यही ठीक रहेगा. शहर तोह गया हे है अभी कुछ दिन पहले अर्जुन, दिक्कत भी नहीं होगी फिर."
"ये तोह अब बाउजी (रामेश्वर जी) हे बता सकते है की अर्जुन को भेजना है या नहीं. बाकी शंकर चाचा बोलेंगे तोह अर्जुन चला जायेगा.", संजीव का जवाब अजीब था और वो जैसे चाहता था की अर्जुन रुके.
"ठीक है फिर यही करते है. आज गुरुवार है तोह कल पापा के आने के बाद अर्जुन निकल जायेगा. परसो सवेरे समय से चलेगा तोह दोपहर तक वापिस या हद्द शाम तक. ठीक है न इन्दर? मैं पापा को तोह अभी बता देता हु फ़ोन करके."
"करो भाई तुम लोग प्लान और मैं चला पापा के बिस्टेर पर सोने. शंकर, रात को धर्मवीर अंकल के यहाँ जाना है?", नरिंदर जी ने अपनी जगह से उठते हुए पुछा.
"हाँ. घर पे संजीव और अर्जुन होंगे हे तोह हम चलते है 7 बजे.", तोह यहाँ आज रात फिर घर पर संजीव और अर्जुन की ड्यूटी लग गयी थी और संजीव को तोह कभ ऐतराज होता हे नहीं था. यहाँ शंकर जी फ़ोन पर अपने पिता से बतलाने लगे वही संजीव दूसरे घर चक्कर लगा कर आने का बोल कर बहार निकल गया. थकान तोह थोड़ी शंकर जी को भी थी इसलिए आराम करने से पहले नहाने का सोच कर वो बहार वाले बाथरूम में चले गए. कोमल ने पापा के कहने पर कपडे निकल दिए थे.
"अर्जुन कहा है?", रोमिला तक़रीबन साढ़े 5 बजे इधर आयी थी और अंदर आँगन में प्रियंका कोमल को चाय पीते देख जान न चाहा. इस वक़्त भी उन्होंने एक चुस्त परिधान पहना हुआ था बिना बाहों का. चेहरे से कोई ख़ास भाव तोह नहीं दिख रहे थे पर कशिश हमेशा की तरह बखूब थी.
"आंटी वो तोह स्टेडियम से 6 बजे के बाद हे आता है. कुछ काम था तोह बताइए, मैं बोल दूंगी उसको.", ये बात प्रियंका ने कही थी लेकिन कोमल ने उन्हें बैठने का कहा और एक कप चाय उनके लिए भी ले आयी. रोमिला जी भी खाली थी क्योंकि 2 लोगो का काम हे कितना था घर पर.
"हाँ काम तोह था लेकिन मैं हे बात करुँगी उस से. वैसे बहार गाडी कड़ी है मतलब कृष्णा आ गयी है क्या?", चाय का स्वाद लेने पर जो भाव आये थे उन्होंने रोमिला के गुलाबी चेहरे की ख़ूबसूरती में कही ज्यादा इजाफा कर दिया था. आँखों से हे उन्होंने इसकी तारीफ कर दी थी.
"हाँ चची जी 4 बजे आ गए थे और अभी आराम कर रहे है. माँ ने कहा था आपको एक ड्रेस देने के लिए, मैं ले कर आती हु तब तक आप प्रियंका से बातें करे.", कोमल उठ कड़ी हुई तोह एक नजर प्रशंशा से रोमिला ने इन दोनों बहनो को देखा.
"तोह प्रियंका अब पंजाब जाना होगा या मुश्किल है?", रोमिला के ऐसा पूछने पर प्रियंका ने हामी भरी.
"आंटी, मैं तोह शायद न जॉन लेकिन आरती एक दो दिन में जाने वाली है अर्जुन के साथ या जो भी जायेगा. बताये क्या लाना है वह से, आरती लेती आएगी?"
"तुम मेरे घर हे आ जाना शाम को. वो शहर बड़ा है और जो मुझे चाहिए, वह मिल हे जायेगा. दिल्ली ज्यादा हे भीड़ थी तोह मैंने रिस्क नहीं लिया."
"हाँ ये बात तोह है की वह इम्पोर्टेड सामान आराम से मिल जाता है. चाहे वो पैक्ड फ़ूड हो, फ्रूट्स या कपडे. मैं आ जाउंगी थोड़ी देर तक."
"यही सब मंगवाना है प्रियंका और तुम वैसे भी मेरे पास आ सकती हो जरुरी नहीं के प्रीती हो तभी आना है.", मुस्कुराती हुई रोमिला कड़ी हुई थी जाने के लिए और कोमल वो पैकेट लिए आ गयी. प्रियंका चाय के कप समेटने लगी.
"ये लीजिये आंटी जी. मुझे नहीं पता था के ये आपके है क्योंकि टेलर आंटी ने माँ का नाम लिया था. वो दिन में माँ से बात हुई तोह पता चला ये वाला आपका है.", कोमल के ऐसा कहने पर रोमिला ने वो काले रंग का रेशमी वस्त्र पैकेट से बहार निकल लिया. तेह लगा हुआ कपडा भी बता रहा था के परिधान ख़ास है.
"थैंक यू कोमल. वैसे तुम्हारे पास सेफ्टी पिन होंगी, छोटी साइज की? रेणुका के पास सभी डिज़ाइनर है और वो बड़ी भी है.", कोमल ने हाँ में सर हिलाते हुए कमरे का रुख किया और प्रियंका भी रसोई में चली गयी बर्तन रखने. परिधान वाला पैकेट टेबल से जमीन पर गिर गया हवा की वजह से तोह रोमिला खुद हे झुक कर उठाने लगी.
'ये मरवायेगी किसी दिन..', रामेश्वर जी के कमरे से बहार निकलते शंकर जी की नजर उन सफ़ेद बड़े गुब्बारों पर पड़ी तोह ईमान ऊपर निचे हो गया. लगभग आधे उभर उस ढीले गले से नजर आ रहे थे. इतने उन्नत और दूधिया उभार जिनका चिकनापन और कठोरता लाजवाब थी बस एक नजर में ईमान हिला गए थे. रोमिला की नजर इधर पड़ी और झेंपते हुए शंकर जी ने ध्यान सामने दरवाजा बंद करके इस तरफ आती कोमल पर कर दिया.
"कोमल बीटा, 2 कप चाय बना देना.", और वो इतना कह कर वापिस कमरे में चले गए. रोमिला देख रही थी की शंकर ने कतराते हुए haal-chal भी नहीं पुछा था. वो भी कोमल से सेफ्टी पिन ले कर जाने हे लगी थी की गलियारे में ये टक्कर हो गयी.
Upar-Niche (2)
"पूछ सकती हु की अर्जुन यहाँ क्या कर रहा था?", रोमिला ने सबसे पहले बाथरूम में जा कर खुद को व्यवस्थित किया था. कितने हे दिनों बाद आज उनकी योनि ने भी महक बिखेरी थी वो kaam-leela देख कर. शरीर पर पंतय भी बोझ लगने लगी तोह एक लघु स्नान के बाद सिर्फ झीना सा गाउन पहन कर वो रेणुका के कमरे में चली आयी. वो भी नाहा कर सलवार कमीज में थी अब. अपनी भाभी के सवाल पर रेणुका ने सीधा हे जवाब दिया.
"वो मुझसे हे मिलने आया था भाभी. आपको ाचा नहीं लगा क्या अर्जुन का मेरे पास मिलने आना?", अब ऐसा मिलना जो की मिलान था उस पर रोमिला ने गहरी सांस लेते हुए बिस्टेर पर बैठ कर बात करना हे उचित समझा.
"मिलना कुछ ज्यादा हे गहरा था रेणुका और तुम्हे इस बीच एक बार भी प्रीती का ख्याल नहीं आया? मुझसे ज्यादा तोह वो तुमसे प्यार करती है और तुम भी तोह उतना हे ध्यान रखती हो प्रीती का. वो लड़का इस घर का होने वाला दामाद है और प्रीती का सबकुछ.", रोमिला का लहजा जरा भी सख्त न था और वो बात कह भी बड़े अपनेपन से रही थी.
"आपको तोह मैंने बताया हे था न सबकुछ कौशल के साथ मेरी ज़िन्दगी के बारे में? और अर्जुन कभी मेरे जेहन में था भी नहीं भाभी. हालात अलग थे और कुछ घटनाये हुई जिसमे मुझे एक समझने वाला इंसान मिला. आप यकीन कीजिये मेरी ख़ुशी को देने वाली भी प्रीती हे है और ये बचा सिर्फ कहने को कौशल का है लेकिन असली पिता अर्जुन हे है. हाँ मेरा तीसरा महीना शुरू हुआ है और कहने को मैं बताती हु की पूरा हो गया. आप कहेंगी तोह मैं हमेशा के लिए यहाँ से चली भी जाउंगी सब छोड़ कर, बस जाने से पहले पूरी बात सुन्न लीजिये.", रेणुका के इतने बड़े खुलासे से रोमिला भी समझ गयी थी की बात वासना या आकर्षण वाली नहीं है. वो भी jaan-na चाहती थी की ऐसा क्या हुआ के अर्जुन जैसा लड़का और रेणुका जैसी तलाकशुदा एवं सख्त अनुशाषित महिला ने ये कदम लिए.
"मैं jaan-na चाहती हु रेणुका और तुम्हे कही जाने की जरुरत नहीं है लेकिन अर्जुन भी जरूर अपनी बात साबित करेगा. फिर मैं अपनी बात कहूँगी.", रोमिला के ऐसा कहने पर अगले 20-25 मिनट तक रेणुका न वो सब राज, घटनाये और अपने एकाकीपन की कहानी बयान कर दी. क्यों वो सिर्फ एक औलाद के सात बाकी ज़िन्दगी बिताना चाहती है. प्रीती और रेणुका का भावनात्मक जुड़ाव, अर्जुन का रेणुका के प्रति आदर और सम्मान के साथ एक अलग हे प्रेम जहा सिर्फ स्वार्थ रेणुका का था. कही भी रेणुका ने बात अर्जुन पर न जाने दी और औरत का दर्द औरत से बेहतर कौन समझ सकता है? रोमिला के भी अपने दुःख दर्द थे जिस वजह से वो रेणुका की बातों से भावुक हो गयी.
"हम इंसान को बहार से देख कर हे धरना बना लेते है लेकिन जब अंदर से देख कर अलग हे सच पता लगता है तोह अपनी हे सोच पर शर्म आती है. मुझे सिर्फ एक पल के लिए दुःख हुआ था जब अर्जुन और तुम्हे मैंने उस हालत में देखा. फिर थोड़ी जलन भी हुई. जानती हो रेणुका, तुम्हारे भाई के सम्बन्ध मेरी भाभी से है और ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि वो एक मर्द है जिसकी प्यास एक हे पानी से नहीं बुझ सकती. वह ऐसी कोई मज़बूरी या प्यार नहीं है जैसा तुम्हारे और अर्जुन के सन्दर्भ में hai.",Romela ने भी आज अपने हमेशा वाले मुस्कुराते चेहरे से आवरण हटते हुए दर्द दिखा हे दिया.
"और आपने कोई कोशिश नहीं की भाभी? भैया से तोह आपका prem-vivah हुआ था न.", रेणुका के लिए भी ये सोच से परे था और कही न कही ये भी एक वजह थी रोमिला के यहाँ रुकने की.
"वह तोह इस भी ज्यादा संगीन काम होते है आधुनिकता के नाम पर. खैर मैं बस इतना कहूँगी की हो सके तोह तुम्हे एहतियात रखनी चाहिए. मैंने तोह एक दृश्य बहार देखा लेकिन कलाकार हु तोह हमेशा तस्वीर के कई पहलु देख कर हे अपना नजरिया बनती हु. अर्जुन बिलकुल भी तुम्हारे भाई जैसा नहीं है और उसका प्रीती के लिए प्यार सबकुछ बताता है. यहाँ वो लालच की जगह तुम्हे सहारा दे रहा है जीने के लिए और वह कोई शायद ज़िन्दगी हे लालच में जी रहा है.", रोमिला कितनी हिम्मतवाली होगी जो ऐसे पल में भी संयंम में थी.
"जो भी मेरे और अर्जुन के बीच है भाभी, ये सब जल्द हे रुक जायेगा. हाँ ऐसा जरूर हो सकता है के किसी लम्हे मैं बस उसके पास इसलिए जाऊ जब मुझे कमी महसूस हो. लेकिन औलाद के बाद शायद हे ऐसी नौबत आये.", रेणुका ने भी स्पष्ट कर दिया था के वो जिस्मानी रिश्ता जल्द हे रोक देगी.
"पागल हो तुम रेणुका. वो एक सही मर्द है अभी से जो तुम्हारा ख्याल रखता है और इसका नकरात्मक असर कभी भी मेरी बेटी पर नहीं होने दिया उसने. जो पैदा होगा काम से काम उसको तोह अर्जुन से दूर मैट करना. बाप कहलवाना जरुरी नहीं है लेकिन एहसास हमेशा रहना चाहिए के उस बचे पर एक जरुरी साया है. अलेक्सान्दर ने तोह माँ के साथ साथ हजारो रानियां राखी थी, ये अर्जुन कुछ काम तोह नहीं.", रोमिला ने ये बात मुस्कुरा कर कही थी और द्विअर्थी मतलब समझते हुए रेणुका ने शर्म से नजर नीची कर ली.
"आप उसकी सास हो और सच कहु तोह मुझे एक पल लगा था के सबकुछ खराब हो गया. मैं अर्जुन से बिना मिले यहाँ से चली जाती भाभी क्योंकि प्रीती और अर्जुन का रिश्ता मेरे लिए सबसे ऊपर है. आप कही ज्यादा हे सुलझी हुई और परवाह करने वाली है."
"ये बात तोह है हमारे बीच में लेकिन भूल कर भी अर्जुन से इसका जीकर मैट करना. सास के हाथ लग हे गया है तोह अब जरा मैं भी हालत पतली करू उसकी. देखे क्या प्रतिक्रिया होती है जब मैं टॉर्चर दूंगी उसको. वैसे तुम भी हिम्मतवाली हो जो वो चीज झेल गयी जिसको शायद कोई ग्रीक माँ भी न झेल पाए.", रोमिला ने जैसे ठान लिया था के वो अर्जुन को तोह दबोचेंगी हे लेकिन मजे रेणुका के भी लेती रहेंगी.
"क्या भाभी आप कुछ भी बोलती हो. पहली बार तोह नहीं था न ये हमारा.", रेणुका बिस्टेर पर अपनी उंगलिया उलझा रही थी और चेहरा शर्म से झुका था.
"पहली बार की हे बात कर रही हु मैं. घर खाली था क्या उस वक़्त? वैसे माँ तोह पहले भी बानी हो इसलिए थोड़ा हे दर्द हुआ होगा.", रोमिला अलग हे अंदाज में कचोट रही थी और रेणुका बेध्यानी में बोल हे गयी.
"जान हे निकाल दी थी भाभी शुरू के 3-4 वक़्त तोह. फर्स्ट नाईट से ज्यादा दर्द और खून अर्जुन के साथ करने पर आया. दर्द तोह अभी भी एक बार होता है लेकिन वो जल्दबाजी नहीं करता और हमेशा मेरा ख्याल रखता है अपने मजे की जगह.", रोमिला की हंसी और गहरी हो गयी थी और अपना हे जवाब समझते हुए रेणुका की धड़कन तेज.
"हाहाहा, तुम भी बहोत हे भोली हो रेणुका. चलो ाचा है की तुम्हे हर बार ये एहसास मिलता है और अगर वो इतना हे काबिल है तोह मेरी बेटी हमेशा खुश रहेगी. प्रीती से भी इस बारे में बात मैट करना. मैं खाना बनती हु हम दोनों का और बाकी बातें बाद में करेंगे.", रोमिला मुस्कुराती हुई हे बहार चली गयी थी. रेणुका जहा पहले अपना राज खुलने पर अंदर से दरी थी वही इतनी बातें होने के बाद वो खुश थी की उसकी भाभी ने हंगामा करने की जगह बात करना बेहतर समझा. लेकिन अब चिंता थी तोह फिर से अर्जुन की. क्योंकि रोमिला का चेहरा पढ़ना तोह अभी अर्जुन को भी नहीं आता था और वो फंस गया था, चाहे मजाक में हे सही.
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अर्जुन पैदल हे प्रीती के घर से निकल कर गलियों में भटकता हुआ अपने हे विचारो में चला जा रहा था. आज इतने दिनों बाद वो रेणुका के साथ समय बिता कर कुछ शांत होना चाहता था लेकिन उस अख़बार वाले लड़के और मुकेश की वजह से माहौल ख़राब हो गया. रोमिला पर भी नजर पड़ हे गयी थी जो एक और वजह थी वापिस न जाने की. यहाँ वो चलता हुआ मंजू के घर तक आ गया और बिना विचारे हे गेट खोल कर अंदर आ खड़ा हुआ. ढीली टीशर्ट और पाजामे में हॉल के सफाई करती मंजू को देख कर वो वही खड़ा रहा जब तक मंजू ने उसकी मौजदगी न भांप ली.
"तुम इस वक़्त और वो भी यहाँ?", अभी वो आगे कुछ कहती की अर्जुन उसके गले जा लगा. मंजू के लिए तोह हमेशा हे अर्जुन रेगिस्तान में बारिश सा था. उसके सीने लगती वो भी सबकुछ भुला कर अर्जुन का चेहरा चूमने लगी. घर पर मेनका की गैरमौजदगी उसकी कार न कड़ी होने से पता लग चल हे गयी थी. सख्त उभारो को बेसब्रो की तरह मसलता अर्जुन वैसे हे मंजू को सीने से लगाए कमरे में चल दिया.
"कुछ मैट बोलना प्लीज.", अर्जुन ने एक पल के लिए होंठ अलग किये और वो ढीला पजामा हटतने के बाद मंजू की टीशर्ट भी ऊपर सरका दी. सबसे सुडोल और सख्त चुके थे मंजू को इस समय. तन्न कर खड़े चुचकों का आमंत्रण स्वीकारने में तनिक भी देरी न करते हुए अर्जुन उन्हें जोश से पीने लगा. यहाँ भी तोह हालत रेणुका से कुछ अलग न थी मंजू की. ये भी गर्भवती थी और अर्जुन के लिए हमेशा हे तड़प से भरी. सिसकते हुए खुद हे अपनी पंतय निचे सरकती वो दूसरे हाथ से अर्जुन का सर अपने चुचो पर दबाने लगी.
"आअह्ह्ह.. अर्जुन... सचमुच बहुत ाचा लग रहा है.. उफ़.. ये सरप्राइज पसंद आया तुम्हारी मंजू को.. आह्हः..", रगड़ती हुई वो बिस्टेर पर आगे होने लगी थी अर्जुन को ऊपर लाते हुए. कपडे दोनों के हे अभी तक जिस्म से जुड़ा न थे और अर्जुन ने भी सिर्फ लिंग बहार निकलते हुए पनियाई छूट की दरार भर भिड़ा दिया. उत्तेजना में इस वक़्त वो लाल सूपड़ा फूल कर कही गहरा और मोटा हो चूका था. दोनों कंधो को पकड़ते हुए अर्जुन ने अपना जिस्म आगे झटका दिया.
"आठ.. सॉरी मंजू.. उम्म्म..", ये छूट कही ज्यादा हे अभ्यस्त थी उस मॉटे डंडे से लेकिन दर्द मंजू को भी हुआ. आधा लुंड एक झटके में अंदर उतरने से छूट की फांके फटने जैसी हो गयी थी और अब तोह मोटाई भी अधिक थी.
"माह.. सॉरी मैट बोलो.. आठ.. मुझे भी ये.. आठ.. अंदाज हे पसंद है.. पूरा समां जाओ अपनी मंजू में.. उफ्फ्फ.. ", अर्जुन ने चुचो को मसलते हुए इस बार जोश में मंजू के होंठो को मुँह में पकड़ते हुए समूचा 9 इंच हे अंदर उतार दिया. एक पल के लिए तोह दोनों के शरीर शुन्य हो गए.
"फाड़ दी.. आउच.. कहा से भरे आये हो तुमममम.. ? इतना मोटा .. आठ.. थोड़ा प्यार से करो जान.. ",अब मंजू ने हे गुहार लगाई तोह अर्जुन उस से लिपट कर बस लेट हे गया. सीने से सीना लगते हे वो अब शांत हो चूका था. मंजू भी समझ गयी की आज उसका प्यार कुछ परेशां है. सर को उंगलियों से सहलाती हुई वो अपना हे दर्द भूल गयी. अर्जुन अब जैसे वो महसूस कर रहा था जिसकी तलाश थी. आत्मा से आत्मा का मिलान और सुकून. मंजू ने उसका चेहरा ऊपर करते हुए अपने चेहरा पर टिकाया और एक लम्बा प्यार भरा चुम्बन दोनों में शुरू हो गया. यहाँ भी मंजू हे भरी थी लेकिन अर्जुन को यही आराम की जरुरत थी.
"तुम कभी परेशां मत हुआ करो जान. मानती हु आजकल मैं तुम पर ध्यान नहीं देती लेकिन ये घर हमारा है और मैं तुम्हारी.", मंजू के ऐसा कहने पर अर्जुन ने अपने हाथ बिस्टेर में धंसते हुए उसकी पीठ को जकड लिया. अब उस कासी हुई छूट में हल्का घर्षण शुरू हो गया था. ये इतना धीमा और एहसास से भरा था की वो दोनों हे एक दूसरे को देख रहे थे. मंजू की ये मुस्कान दिलकश थी और अर्जुन का सुकून जैसे मंजू की चाहत. इस घर में हमेशा उन्होंने बंद कमरे में संसर्ग किया था लेकिन आज हर दरवाजा खुल्ला था.
"तुम मुझे थाम लेती हो और पता है मैं जितना भी तेज राहु, तुम रोक सकती हो मुझे मंजू. सच कहु तोह आज मुझे तुम्हारी जरुरत थी और मेरे कदम अपने आप हे यहाँ आ गए.. आह्हः.. सॉरी.. वो गलता तरह से शुरू करने के लिए.. ummm.",Beech बीच में दोनों हे एक दूसरे को चूम लेते. मंजू की लम्बी सुडोल टाँगे अब ाचे से कासी अर्जुन पर, पजामा और कच्ची उसने खुद हे पाँव से झटक कर अलग कर दी थी. यही उसकी संगिनी थी जो कद के साथ साथ जिस्म से भी अर्जुन को टक्कर देती थी. Nami-yukt योनि और वो भयंकर लिंग अपना तालमेल बना चुके थे लेकिन यहाँ चुदाई से भड़कर इन दोनों का प्रेम था, परवाह थी और दोनों हे जी भर कर बातें कर रहे थे. आँखों, शरीर, दिल और मुँह से. प्यार ऐसा हे तोह होता है जहा सबकुछ आपस में जुड़ा हो.
"थामती नहीं मैं तुम्हे, प्यार करती हु जैसे तुम करते हो. तुम चाह कर भी मेरे ऊपर जोर नहीं दिखा सकते क्योंकि आज भी तुम मुझे गीला करने के बाद 2 बार में अंदर आये हो. ाचा लगा जान कर की मैं तुम्हारे sukh-dukh की साथी हु. That's व्हाई थिस लेडी इस इन लव विथ यू माय मन. तुम हमेशा से हे मेरा प्यार हो और फिर कभी सॉरी मैट बोलना. और मैं उधर के लिए भी तैयार हु.", मंजू का इशारा गुदाद्वार की तरफ था. दोनों यहाँ prem-safar में इतने खोये थे की बहार कड़ी मेनका की आहात तक न सुनाई दी.
"इसलिए तोह तुम्हारे पास हु.. आठ.. लेलिन पहले मेरी बेटी फिर वह आऊंगा.. उम्म्म्म..", दोनों के मुख पर बनती लार बता रही थी की इनका प्रेम पागलपन है. धक्के किसी रेल से चल रहे थे और चिकनी सुरंग में अंदर बहार होता वो विकराल लिंग सचमुच कोई पहली बार तोह नहीं झेल सकता था. मंजू का शरीर थिरका, बिस्टेर भीगा लेकिन वो निरंतर अपने सुडोल चुत्तड़ हिलती रही. इनकी मस्ती की सिसकियाँ सुन्न कर मेनका की भी छूट कुलबुला गयी थी. घर्षण की fatch-fatch बहार हाल में भी सुनाई दे रही थी और वही अर्जुन का जोश बढ़ता हे जा रहा था.
"आअह्ह्ह.. मार हे डाला रे तुमने तोह.. ऐसा सरप्राइज.. आह्हः.. कही घर पर देते तोह... मेरी माँ ..उफ़.. खुद हे पागल हो जाती .. आह्हः...", मंजू अपनी माँ का जीकर कर गयी और अर्जुन तोह दिल से जुड़ा था.
"मौसी को सब पता है.. आठ. उन्होंने हे तोह उस दिन ऊपर भेजा था तुम्हारे पास... आठ.. जल्दी से माँ बन्न jao..ummm. ये भर दो मंजू.. उम्म्म", अर्जुन का इशारा चुचो में दूध की तरफ था. थिरकते अनार भी इतनी लम्बी चुदाई में कही ज्यादा हे फूल चुके थे जिन्हे बार बार वो मुँह में भर रहा था.
"आअह्ह्ह.. दूध आएगा तोह दिक्कत होने वाली है.. उम्. बाप और बीटा .. लगे रहेंगे... जानती हु की माँ को पता है.. आह्हः.. तभी तोह वो तुम्हे घर बुला रही थी.. िसष्ठ.. कस के मारो न अंदर... आह्हः..", अर्जुन इतना कहते हे द्रुतगामी रफ़्तार से मंजू की लज्जत भरी छूट में पूरा हे लिंग जड़ तक पेलने लगा. मेनका तोह देख कर हे झाड़ गयी थी और ये दोनों ऐसी गहरी बातें करते हुए अगले 20 मिनट तक लगे रहे. झटके खता अर्जुन इतना झाड़ा था जितना वो चुनिंदा समय हे हुआ होगा. गर्भ पर गरम धार महसूस करते हे मंजू भी नागिन की तरह इस तगड़े चन्दन वृक्ष पर लिपट गयी. दोनों हे जाने कितनी देर तक ऐसे लिपटे रहे और सफ़ेद वीर्य चादर तक आ पंहुचा.
"उठो अपने बेटे के पापा. मम्मी को नहाना पड़ेगा.", मंजू के ऐसे कहने पर अर्जुन एक तरफ लुढ़क गया लेकिन बाथरूम तक जाती वो थिरकती गांड दिल को हिला गयी.
"मैं साथ नहाऊंगा और कोई सवाल नहीं.", अर्जुन के ऐसा कहने पर मंजू ने इतने कामुक तरीके से हवाई चुम्बन किया था की वो उसके बराबर जा खड़ा हुआ.
"अंदर भी एक राउंड पूरा हे लगाना. पानी में तोह आग मुझे शुरू से हे पसंद है तुम्हारे साथ.", मेनका की तोह sitti-pitti हे गम हो गयी थी मंजू का ये अंदाज सुन्न कर. वो कार ले कर बहार हे निकल गयी और इधर अर्जुन पौने घंटे बाद निर्वस्त्र मंजू को लेकर बिस्टेर पर आ गया. दोनों के जिस्म अब taro-taja थे. कपडे पहन कर मंजू अपने पति के लिए खाना बनाने लगी वही अर्जुन भी हॉल में बैठ कर उस से बातें करने लगा.
"तुम कब आये? शुक्र है आज दर्शन तोह दिए जनाब ने.", मेनका जब आयी तोह अर्जुन आराम से सोफे पर बैठा समाचार देख रहा था. मंजू भी आधा काम निबटा चुकी थी.
"बहोत देर हो गयी मुझे तोह आये लेकिन आप तोह स्कूल बंद होने के बावजूद बहार हो.", अर्जुन ने अपने आने के समय में कोई her-fer न की थी. मेनका असमंजस में थी की वो कुछ कहे या न कहे. लेकिन आज उसने जाना था की निर्विरोध संसर्ग क्या होता है जो वो कभी अर्जुन से कर न सकीय थी.
"हाँ कुछ काम था डाक्यूमेंट्स का तोह थोड़ा समय लग गया. मंजू ने ख़याल तोह रखा न तुम्हारा?", ये बात बहोत आराम से कही थी मेनका ने और वो अर्जुन के चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रही थी जहा पूर्ण सुकून था.
"मंजू मेरा ध्यान प्रीती की तरह हे रखती है मेनका जी. न कोई औपचारिकता और न दिखावा. वैसे आप ये मैट कहना के मैं आपको याद नहीं करता. फ़ोन तोह मैं हे करता हु लेकिन आप तोह मेरे घर आने के बाद भी मुझसे नहीं मिली.", यहाँ तोह अर्जुन ने हे मेनका को घुमा दिया था. वो जवाब क्या देती जब सामने वाला सच कह रहा था. लेकिन मंजू और अर्जुन का सम्बन्ध पता लगने के बाद वो थोड़ा बेकाबू भी थी.
"शायद तुम्हारी बहिन मुझसे ाचा ख्याल रखना जानती है."
"बीवी. और मैंने भी कहा था के वो प्रीती की तरह मेरा ध्यान रखती है न की बहिन की तरह. ऐतराज?", अब मेनका का दिल बैठ हे गया था इतना स्पष्ट जवाब सुन्न कर. अर्जुन क्या कह गया था ये जैसे सपने सा था उसके लिए.
"फिर से कहना."
"फिर से सुनिए अगर समझ नहीं आया तोह. उसको पता है मेरे साथ आपका सम्बन्ध है. मंजू और मैं आपके सौतेले भाई से पहले से हे आपस में विवाहित है. मैं उस बचे का बाप हु जो मंजू के पेट में है. आपके परिवार ने तोह खेल हे खेला था इसके साथ लेकिन ये मेरी है और मैं इसका. इसलिए मंजू ने आपको बहिन बनाया न की बड़ी ननद. बड़ी साली हे हो आप अब मेरी और ज्यादा कुछ jaan-na हो तोह लंच के बाद मंजू खुद बता देगी.", अर्जुन ने बात ख़तम करते हुए मेनका का गाल सेहला दिया था. कुछ देर शांति रही और फिर खाना भी लग गया. म्हणत करने वालो ने भरपेट खाया था और अर्जुन बिना किसी की अनुमति के मंजू के कमरे में जा लेता. थकान भी थी और अब कही मैं शांत हुआ था.
"ये अर्जुन कुछ कह रहा था.", मेनका ने बात की शुरुआत की.
"हाँ. वो कह रहा था की आपके साथ सचमुच बहोत बुरा हुआ. लेकिन वो कोशिश करेगा की आपको उतना प्यार मिले जो नहीं मिला.", मंजू ने बर्तन सिंक में रखते हुए जवाब दिया तोह मेनका सफ़ेद हे पड़ गयी.
"तुम कब से इसके साथ हो?"
"उस दिन मैं खेत में इसके हे साथ थी जब आपको पहली बार प्यार हुआ और आप मुझे हे देखने आ रही थी. ये मेरे साथ बचपन से हे है, बताया था न.? खेल तोह आपके घरवालों ने रचा था शिकार मैं बन्न गयी, आपके साथ साथ. याद है ये यही इस घर में जख्मी आया था आपको बचने के बाद? किस से बचाया था इसने आपको और फिर आपके साथ कौन था?", मंजू के ये शब्द बहोत थे मेनका को वास्तविकता में लाने के लिए. उसको भी ध्यान आ गया था के अगले दिन ऋषभ की तस्वीर इस घर में न थी.
"सॉरी."
"उसको बोल देना दीदी अगर वो जान गया हो तोह. मैं तोह पहले हे दिन से जानती हु लेकिन सम्बन्ध इस घर से बहार कभी मैट बनाना. यही हद्द है और यही दुनिया. वो इसके बहार सिर्फ प्रीती का है.", मंजू ने हिदायत देते हुए कहा तोह दयारा मेनका को समझ न आया.
"और अगर ये किसी और के भी साथ हो तोह.?"
"वो प्रीती को पता होगा लेकिन हद्द भी. आपकी सहेली अन्नू की बात कर रही हो तोह वो हद्द से बहार है. इतना बोझ मैट डालो दिमाग पर क्योंकि आप भी चोट खायी हो, मैं भी. अंदर सोया शक्श इलाज है और वो मेरा प्यार भी. दिक्कत मुझे होनी चाहिए लेकिन आपके साथ अब रिश्ता बहिन का है. आराम कीजिये, मैं अपने पति के पास सोने जा रही हु जिस से वो उठे नहीं.", मंजू अपने चरित्र को आज कितने दिन बाद दिखा रही थी. वो सचमुच भारी थी और मेनका को मान न पड़ा के यहाँ वो सही है. बस आज के बाद यहाँ माहौल बदलने वाला था जिस वजह से कुछ आशा थी मेनका को. मंजू के बगल में आते हे अर्जुन चैन से सो चूका था.
'काश तुम ये पहले हे बता देती मेरी बहिन. लेकिन ाचा हे है के तुमने मेरे भी प्यार को समझा और दुत्कारा नहीं.', मेनका का दिल अब परेशां न था. ये सभी राज जिस तरह से खुले थे वह किसी का भी किसी से मतभेद नजर आने की जगह बस प्यार और परवाह दिखी. मंजू भी जिगरा रखने वाली छोटी बहिन थी अब और अर्जुन भी हक़ ज़माने वाला प्रेमी. अपने कमरे में जाते हे मेनका बिलकुल ढील कपड़ो में चैन से बिस्टेर पर लेट गयी.
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3 की जगह करीब 4 हे बज गए थे शंकर जी को घर पहुंचते पहुंचते. उमेद जी भी उनके साथ हे इधर आये थे और फ़ोन पर पहले हे बता दिया जिस वजह से Komal-Rupali वाला कमरा अपनी चची के लिए खुद कोमल ने हे व्यवस्थित कर दिया था. संजीव अपने साथ बिजली वाले को लेता आया था और इस कमरे में air-conditioner फिट हो चूका था सभी के आने से पहले.
"मेरी बची कैसी है? संजीव तुम हे काम करवा रहे हो और वो शैतान नहीं दिख रहा?", कृष्णा जी आते के साथ कोमल और संजीव से गले लग कर मिली थी पिछले आँगन में. बाकी सभी तोह फ़िलहाल बैठक में रुक गए थे.
"मैं ठीक हु चची जी और भैया खुद हे आ गए थे. अर्जुन स्टेडियम से 6 बजे तक आएगा. आप इधर आराम से बैठिये मैं जूस ले कर आती हु. भैया आप भी चची के साथ हे बैठिये.", कोमल ने उन्हें अंदर बैठने को कहा और संजीव भैया ने भी एक चालू कर दिया अपनी चची के लिए. 2 तकिये सर की तरफ रखते हुए उन्होंने अपनी चची के आराम का सही ध्यान रखा था.
"आने में परेशानी तोह नहीं हुई आपको चची जी? कार में तंग हुई होंगी.", संजीव पाँव की तरफ बैठा कृष्णा जी को हे देख रहा था जिनके चेहरे पर एक मुस्कान थी और कही कोई थकान का निशान नहीं.
"कान न खींच देती मैं इनके अगर तकलीफ होती तोह. बहोत ध्यान से ले कर आये है बस लड़कियों ने कुछ ज्यादा हे शॉपिंग कर ली. भाभी (ललिता जी) कल आएँगी?"
"हाँ, दादा जी बता रहे थे की वो लोग 9 बजे तक पहुंच जायेंगे वापिस घर. ाचा लगा आपको थोड़ा बेहतर देख कर लेकिन अब यहाँ कोई काम नहीं करना आपने.", संजीव ने कुछ सोच कर हे काम न करने वाली बात कही थी.
"काम तोह मैं वह भी कोनसा करती थी लेकिन तुम परेशां हो बीटा. इधर बैठो जरा.", संजीव इतना सुन्न कर हे हिल चूका था लेकिन पास तोह बैठना हे था. कुर्सी खिसका कर अब वो अपनी चची के चेहरे के करीब आ बैठा. कृष्णा चची ने अपने ठन्डे हाथो में भतीजे का हाथ पकड़ते हुए फिर से चेहरे को देखा तोह संजीव की नजरे झुक गयी.
"तुम सिर्फ 2 लोगो की हे सबसे ज्यादा चिंता करते हो ये मुझे पता है. वैसे तोह पूरे घर की dekh-rekh तुम ाचे से करते हो लेकिन इस परेशानी की वजह पापा है या अर्जुन?"
"अर्जुन चची जी. आप तोह जानती हे है वो कुछ ज्यादा हे भावुक है. नाश्ते के बाद से हे वो घर से चला गया था दोस्त का बता कर. थोड़ी देर पहले कोमल को फ़ोन पर बताया के स्टेडियम जा रहा है. वो ऐसा कभी नहीं करता जब घर में दादा जी न हो.", संजीव की चिंता बड़े भाई के रूप में जायज थी लेकिन बात अभी भी अधूरी हे बता रहा था वो.
"और तुम्हे पता है न वो क्यों भावुक हुआ?", अभी आये 10 मिनट हे हुए थे कृष्णा जी को और ऐसी बातें शुरू हो गयी. कोमल रसोई में थी जहा प्रियंका चाय बना रही थी और वो मुसम्बी का जूस निकल रही थी.
"इस बारे में तोह अभी बात करने का कोई फायदा नहीं है चची जी लेकिन वो घर आये तोह थोड़ा अपने aas-pas हे रखना. हो सकता है यहाँ दादा जी और रेखा चची नहीं है तोह वो ऐसा कर रहा हो. मुझे भी काम से जाना पड़ा था बहार नहीं तोह अर्जुन मेरे साथ हे होता.", संजीव की बात पर कृष्णा जी ने ज्यादा कुछ न कहा. इधर 2 गिलास जूस के ट्रे में लिए कोमल अंदर चली आयी.
"मेरी बची, मैं हर काम खुद कर सकती हु. इतनी टेंशन न ले और देख तेरे चाचा या पापा को कुछ चाहिए तोह नहीं. उमेद भाई साहब भी है उधर और Vinni-Aaisha भी.", कोमल दीदी फिर भी उन्हें अपने हाथो से हे जूस पिलाती रही. संजीव ने भी गिलास एक सांस में ख़तम किया और बैठक की तरफ बढ़ गया.
"मुन्ना फ़ोन पर परेशां था क्या?", उन्होंने अब सवाल कोमल से किया.
"बिलकुल भी नहीं चची जी. हाँ जब घर से गया था तब जरूर लग रहा था और उस वक़्त सामने वाली भाभी यहाँ आयी हुई थी तोह वो दोस्त के घर चला गया. फिर भैया आ गए थे तोह काम में लगे रहे. वैसे अब डॉक्टर क्या कह रहे है?"
"कह रहे थे की जल्दी से अपने घर जाओ और बिस्टेर खाली हमारा. कुछ हुआ है नहीं और इधर कब्ज़ा करे बैठे हो. तोह अब मैं इधर आ गयी, तेरे कमरे पर कब्ज़ा करने.", कृष्णा चची की बातें कोमल के चेहरे पर भी ख़ुशी ले आयी.
"पूरा घर हे तोह आपका है चची और मुझे तोह आपने प्रियंका से भी ज्यादा प्यार दिया है. ख़ुशी है के आप इस कमरे में हो और अब मैं रात में आपके पास रहा करुँगी.", कोमल दीदी ने ये गिलास खली होने के बाद ट्रे में रखा और रुमाल से चची के होंठ साफ़ करने लगी जहा हल्का सा हे गीलापन था.
"अब तू मेरी माँ बनेगी लगता है. तुझे यहाँ अर्जुन सोने देगा तोह सो जाना, मैं तोह मन नहीं कर रही.", फिर से अर्जुन का नाम लेने पर खुद कृष्णा जी को थोड़ा अजीब लग रहा था. एक तोह वह इतने समय बाद वापिस आयी थी वो भी हॉस्पिटल से और ऊपर से हमेशा घर में रहने वाला उनका लाडला गायब था.
"मैट सोचिये के ारु यहाँ क्यों नहीं है. वो अपनी चची माँ से ऐसे तोह नहीं मिलने वाला ख़ुशी के मौके पर. अब आराम कीजिये आप और मैं papa-chacha जी का खाना होने के बाद आती हु.", कोमल की भी यही ख़ास बात थी की वो हर सदस्य का दिल और भाव पढ़ लेती थी बेशक ज्यादा लोगो के साथ बात काम हे करती थी.
"पता है मुझे मेरे बेटे का. वो तोह बस आदत है और ये बदल नहीं सकती. आरती से कह देना के मेरा सामान यहाँ अलमारी में लगा देगी. वो भी यहाँ आ कर ऋतू जैसी शरारती हो गयी है इस बार.", चची की ये बात सुन्न कर अब कोमल क्या बताती की आरती ऋतू की वजह से बदली है या अर्जुन की.
"आप आराम कीजिये और सारा सामान घंटे बाद अलमारी में हे मिलेगा. मैं आती हु चची जी थोड़ी देर में.", चादर अपनी चची के कमर तक करने के बाद वो बहार निकल गयी. सफर में कृष्णा जी सो न पायी थी आरती की chak-chak की वजह से. उधर संजीव ने भी दोनों गाड़ियों से यहाँ का सामान उतार कर मेहमान कमरे में रख दिया था फ़िलहाल. विन्नी रुकना चाहती थी लेकिन आइशा की वजह से वापिस जाना पड़ा और उमेद जी भी परसो आने का बोल कर अपनी हवेली की और निकल चले.
यहाँ बैठक में संजीव के दोनों चाचा बैठे हल्का भोजन कर रहे थे और आरती अपनी माँ का सामान लगाने उनके कमरे में चली गई. कुछ समय बाद शंकर जी ने हे बात शुरू की.
"तोह पंजाब कौन जा रहा है अब? तुम्हे तोह शायद हे जाने दिया जाये और फिलहाल तोह इन्दर को भी यहाँ काम देखने होंगे.", नरिंदर जी बस ध्यान दे रहे थे जो भी बड़ा भाई बोल रहा था.
"पापा कह रहे थे की वो जा सकते है लेकिन अभी समझ लीजिये के 3 दिन उनके भी बहार हो जायेंगे और फिर उनको भी इधर देखना हे होगा. वैसे अगर जरुरी है तोह मैं चला जाता हु चाचा जी.", शंकर जी ने पहले हे गर्दन न में हिला दी.
"तुम्हे फ़िलहाल तोह रूटीन में ड्यूटी देखनी है अपनी और वह काम एक दिन में तोह नहीं होने वाला. इन्दर और कृष्णा का सामान है वह और jaan-pehchaan वाले घरो में कार्ड भी देने है. आरती ने जिद्द पकड़ राखी है के वो जरूर जायेगी तोह कार्ड वाला काम वो कर सकती है."
"यार वह से सिर्फ कृष्णा के कमरे का सामान आना है वो भी किताबे, कपडे, एल्बम, documents-files वगैरह. कोई भी चला जाये आरती के साथ और उसको कृष्णा सब समझा देगी. रेशम सिंह भाई जैसे है और हुसैन भी घर चक्कर लगा कर देखभाल करता रहेगा. घर वैसा हे रहेगा.", नरिंदर जी ने स्पष्ट कर दिया की जरुरी सामान इतना नहीं है के पूरा घर हे इधर लाना हो. अपनी तरफ से किसी ने भी अर्जुन का नाम नहीं लिया था अभी तक.
"चाचा जी, तारा भी जानती है गाडी चलना लेकिन सिर्फ दोनों लड़कियों को भेजना ठीक नहीं रहेगा."
"यार संजीव तेरा लाडला भी तोह जा सकता है न कार ले कर?", अब शंकर जी ने हे ये बीड़ा उठाया और अपने बेटे का नाम आगे कर दिया. संजीव ने अनिश्चित भाव दिखाए तोह नरिंदर जी हे बोल पड़े.
"हाँ अगर वो कार चला लेता है तोह यही ठीक रहेगा. शहर तोह गया हे है अभी कुछ दिन पहले अर्जुन, दिक्कत भी नहीं होगी फिर."
"ये तोह अब बाउजी (रामेश्वर जी) हे बता सकते है की अर्जुन को भेजना है या नहीं. बाकी शंकर चाचा बोलेंगे तोह अर्जुन चला जायेगा.", संजीव का जवाब अजीब था और वो जैसे चाहता था की अर्जुन रुके.
"ठीक है फिर यही करते है. आज गुरुवार है तोह कल पापा के आने के बाद अर्जुन निकल जायेगा. परसो सवेरे समय से चलेगा तोह दोपहर तक वापिस या हद्द शाम तक. ठीक है न इन्दर? मैं पापा को तोह अभी बता देता हु फ़ोन करके."
"करो भाई तुम लोग प्लान और मैं चला पापा के बिस्टेर पर सोने. शंकर, रात को धर्मवीर अंकल के यहाँ जाना है?", नरिंदर जी ने अपनी जगह से उठते हुए पुछा.
"हाँ. घर पे संजीव और अर्जुन होंगे हे तोह हम चलते है 7 बजे.", तोह यहाँ आज रात फिर घर पर संजीव और अर्जुन की ड्यूटी लग गयी थी और संजीव को तोह कभ ऐतराज होता हे नहीं था. यहाँ शंकर जी फ़ोन पर अपने पिता से बतलाने लगे वही संजीव दूसरे घर चक्कर लगा कर आने का बोल कर बहार निकल गया. थकान तोह थोड़ी शंकर जी को भी थी इसलिए आराम करने से पहले नहाने का सोच कर वो बहार वाले बाथरूम में चले गए. कोमल ने पापा के कहने पर कपडे निकल दिए थे.
"अर्जुन कहा है?", रोमिला तक़रीबन साढ़े 5 बजे इधर आयी थी और अंदर आँगन में प्रियंका कोमल को चाय पीते देख जान न चाहा. इस वक़्त भी उन्होंने एक चुस्त परिधान पहना हुआ था बिना बाहों का. चेहरे से कोई ख़ास भाव तोह नहीं दिख रहे थे पर कशिश हमेशा की तरह बखूब थी.
"आंटी वो तोह स्टेडियम से 6 बजे के बाद हे आता है. कुछ काम था तोह बताइए, मैं बोल दूंगी उसको.", ये बात प्रियंका ने कही थी लेकिन कोमल ने उन्हें बैठने का कहा और एक कप चाय उनके लिए भी ले आयी. रोमिला जी भी खाली थी क्योंकि 2 लोगो का काम हे कितना था घर पर.
"हाँ काम तोह था लेकिन मैं हे बात करुँगी उस से. वैसे बहार गाडी कड़ी है मतलब कृष्णा आ गयी है क्या?", चाय का स्वाद लेने पर जो भाव आये थे उन्होंने रोमिला के गुलाबी चेहरे की ख़ूबसूरती में कही ज्यादा इजाफा कर दिया था. आँखों से हे उन्होंने इसकी तारीफ कर दी थी.
"हाँ चची जी 4 बजे आ गए थे और अभी आराम कर रहे है. माँ ने कहा था आपको एक ड्रेस देने के लिए, मैं ले कर आती हु तब तक आप प्रियंका से बातें करे.", कोमल उठ कड़ी हुई तोह एक नजर प्रशंशा से रोमिला ने इन दोनों बहनो को देखा.
"तोह प्रियंका अब पंजाब जाना होगा या मुश्किल है?", रोमिला के ऐसा पूछने पर प्रियंका ने हामी भरी.
"आंटी, मैं तोह शायद न जॉन लेकिन आरती एक दो दिन में जाने वाली है अर्जुन के साथ या जो भी जायेगा. बताये क्या लाना है वह से, आरती लेती आएगी?"
"तुम मेरे घर हे आ जाना शाम को. वो शहर बड़ा है और जो मुझे चाहिए, वह मिल हे जायेगा. दिल्ली ज्यादा हे भीड़ थी तोह मैंने रिस्क नहीं लिया."
"हाँ ये बात तोह है की वह इम्पोर्टेड सामान आराम से मिल जाता है. चाहे वो पैक्ड फ़ूड हो, फ्रूट्स या कपडे. मैं आ जाउंगी थोड़ी देर तक."
"यही सब मंगवाना है प्रियंका और तुम वैसे भी मेरे पास आ सकती हो जरुरी नहीं के प्रीती हो तभी आना है.", मुस्कुराती हुई रोमिला कड़ी हुई थी जाने के लिए और कोमल वो पैकेट लिए आ गयी. प्रियंका चाय के कप समेटने लगी.
"ये लीजिये आंटी जी. मुझे नहीं पता था के ये आपके है क्योंकि टेलर आंटी ने माँ का नाम लिया था. वो दिन में माँ से बात हुई तोह पता चला ये वाला आपका है.", कोमल के ऐसा कहने पर रोमिला ने वो काले रंग का रेशमी वस्त्र पैकेट से बहार निकल लिया. तेह लगा हुआ कपडा भी बता रहा था के परिधान ख़ास है.
"थैंक यू कोमल. वैसे तुम्हारे पास सेफ्टी पिन होंगी, छोटी साइज की? रेणुका के पास सभी डिज़ाइनर है और वो बड़ी भी है.", कोमल ने हाँ में सर हिलाते हुए कमरे का रुख किया और प्रियंका भी रसोई में चली गयी बर्तन रखने. परिधान वाला पैकेट टेबल से जमीन पर गिर गया हवा की वजह से तोह रोमिला खुद हे झुक कर उठाने लगी.
'ये मरवायेगी किसी दिन..', रामेश्वर जी के कमरे से बहार निकलते शंकर जी की नजर उन सफ़ेद बड़े गुब्बारों पर पड़ी तोह ईमान ऊपर निचे हो गया. लगभग आधे उभर उस ढीले गले से नजर आ रहे थे. इतने उन्नत और दूधिया उभार जिनका चिकनापन और कठोरता लाजवाब थी बस एक नजर में ईमान हिला गए थे. रोमिला की नजर इधर पड़ी और झेंपते हुए शंकर जी ने ध्यान सामने दरवाजा बंद करके इस तरफ आती कोमल पर कर दिया.
"कोमल बीटा, 2 कप चाय बना देना.", और वो इतना कह कर वापिस कमरे में चले गए. रोमिला देख रही थी की शंकर ने कतराते हुए haal-chal भी नहीं पुछा था. वो भी कोमल से सेफ्टी पिन ले कर जाने हे लगी थी की गलियारे में ये टक्कर हो गयी.

