Incest Pyaar - 100 Baar - Page 26 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 137

Upar-Niche (2)


"पूछ सकती हु की अर्जुन यहाँ क्या कर रहा था?", रोमिला ने सबसे पहले बाथरूम में जा कर खुद को व्यवस्थित किया था. कितने हे दिनों बाद आज उनकी योनि ने भी महक बिखेरी थी वो kaam-leela देख कर. शरीर पर पंतय भी बोझ लगने लगी तोह एक लघु स्नान के बाद सिर्फ झीना सा गाउन पहन कर वो रेणुका के कमरे में चली आयी. वो भी नाहा कर सलवार कमीज में थी अब. अपनी भाभी के सवाल पर रेणुका ने सीधा हे जवाब दिया.

"वो मुझसे हे मिलने आया था भाभी. आपको ाचा नहीं लगा क्या अर्जुन का मेरे पास मिलने आना?", अब ऐसा मिलना जो की मिलान था उस पर रोमिला ने गहरी सांस लेते हुए बिस्टेर पर बैठ कर बात करना हे उचित समझा.

"मिलना कुछ ज्यादा हे गहरा था रेणुका और तुम्हे इस बीच एक बार भी प्रीती का ख्याल नहीं आया? मुझसे ज्यादा तोह वो तुमसे प्यार करती है और तुम भी तोह उतना हे ध्यान रखती हो प्रीती का. वो लड़का इस घर का होने वाला दामाद है और प्रीती का सबकुछ.", रोमिला का लहजा जरा भी सख्त न था और वो बात कह भी बड़े अपनेपन से रही थी.

"आपको तोह मैंने बताया हे था न सबकुछ कौशल के साथ मेरी ज़िन्दगी के बारे में? और अर्जुन कभी मेरे जेहन में था भी नहीं भाभी. हालात अलग थे और कुछ घटनाये हुई जिसमे मुझे एक समझने वाला इंसान मिला. आप यकीन कीजिये मेरी ख़ुशी को देने वाली भी प्रीती हे है और ये बचा सिर्फ कहने को कौशल का है लेकिन असली पिता अर्जुन हे है. हाँ मेरा तीसरा महीना शुरू हुआ है और कहने को मैं बताती हु की पूरा हो गया. आप कहेंगी तोह मैं हमेशा के लिए यहाँ से चली भी जाउंगी सब छोड़ कर, बस जाने से पहले पूरी बात सुन्न लीजिये.", रेणुका के इतने बड़े खुलासे से रोमिला भी समझ गयी थी की बात वासना या आकर्षण वाली नहीं है. वो भी jaan-na चाहती थी की ऐसा क्या हुआ के अर्जुन जैसा लड़का और रेणुका जैसी तलाकशुदा एवं सख्त अनुशाषित महिला ने ये कदम लिए.

"मैं jaan-na चाहती हु रेणुका और तुम्हे कही जाने की जरुरत नहीं है लेकिन अर्जुन भी जरूर अपनी बात साबित करेगा. फिर मैं अपनी बात कहूँगी.", रोमिला के ऐसा कहने पर अगले 20-25 मिनट तक रेणुका न वो सब राज, घटनाये और अपने एकाकीपन की कहानी बयान कर दी. क्यों वो सिर्फ एक औलाद के सात बाकी ज़िन्दगी बिताना चाहती है. प्रीती और रेणुका का भावनात्मक जुड़ाव, अर्जुन का रेणुका के प्रति आदर और सम्मान के साथ एक अलग हे प्रेम जहा सिर्फ स्वार्थ रेणुका का था. कही भी रेणुका ने बात अर्जुन पर न जाने दी और औरत का दर्द औरत से बेहतर कौन समझ सकता है? रोमिला के भी अपने दुःख दर्द थे जिस वजह से वो रेणुका की बातों से भावुक हो गयी.

"हम इंसान को बहार से देख कर हे धरना बना लेते है लेकिन जब अंदर से देख कर अलग हे सच पता लगता है तोह अपनी हे सोच पर शर्म आती है. मुझे सिर्फ एक पल के लिए दुःख हुआ था जब अर्जुन और तुम्हे मैंने उस हालत में देखा. फिर थोड़ी जलन भी हुई. जानती हो रेणुका, तुम्हारे भाई के सम्बन्ध मेरी भाभी से है और ऐसा सिर्फ इसलिए क्योंकि वो एक मर्द है जिसकी प्यास एक हे पानी से नहीं बुझ सकती. वह ऐसी कोई मज़बूरी या प्यार नहीं है जैसा तुम्हारे और अर्जुन के सन्दर्भ में hai.",Romela ने भी आज अपने हमेशा वाले मुस्कुराते चेहरे से आवरण हटते हुए दर्द दिखा हे दिया.

"और आपने कोई कोशिश नहीं की भाभी? भैया से तोह आपका prem-vivah हुआ था न.", रेणुका के लिए भी ये सोच से परे था और कही न कही ये भी एक वजह थी रोमिला के यहाँ रुकने की.

"वह तोह इस भी ज्यादा संगीन काम होते है आधुनिकता के नाम पर. खैर मैं बस इतना कहूँगी की हो सके तोह तुम्हे एहतियात रखनी चाहिए. मैंने तोह एक दृश्य बहार देखा लेकिन कलाकार हु तोह हमेशा तस्वीर के कई पहलु देख कर हे अपना नजरिया बनती हु. अर्जुन बिलकुल भी तुम्हारे भाई जैसा नहीं है और उसका प्रीती के लिए प्यार सबकुछ बताता है. यहाँ वो लालच की जगह तुम्हे सहारा दे रहा है जीने के लिए और वह कोई शायद ज़िन्दगी हे लालच में जी रहा है.", रोमिला कितनी हिम्मतवाली होगी जो ऐसे पल में भी संयंम में थी.

"जो भी मेरे और अर्जुन के बीच है भाभी, ये सब जल्द हे रुक जायेगा. हाँ ऐसा जरूर हो सकता है के किसी लम्हे मैं बस उसके पास इसलिए जाऊ जब मुझे कमी महसूस हो. लेकिन औलाद के बाद शायद हे ऐसी नौबत आये.", रेणुका ने भी स्पष्ट कर दिया था के वो जिस्मानी रिश्ता जल्द हे रोक देगी.

"पागल हो तुम रेणुका. वो एक सही मर्द है अभी से जो तुम्हारा ख्याल रखता है और इसका नकरात्मक असर कभी भी मेरी बेटी पर नहीं होने दिया उसने. जो पैदा होगा काम से काम उसको तोह अर्जुन से दूर मैट करना. बाप कहलवाना जरुरी नहीं है लेकिन एहसास हमेशा रहना चाहिए के उस बचे पर एक जरुरी साया है. अलेक्सान्दर ने तोह माँ के साथ साथ हजारो रानियां राखी थी, ये अर्जुन कुछ काम तोह नहीं.", रोमिला ने ये बात मुस्कुरा कर कही थी और द्विअर्थी मतलब समझते हुए रेणुका ने शर्म से नजर नीची कर ली.

"आप उसकी सास हो और सच कहु तोह मुझे एक पल लगा था के सबकुछ खराब हो गया. मैं अर्जुन से बिना मिले यहाँ से चली जाती भाभी क्योंकि प्रीती और अर्जुन का रिश्ता मेरे लिए सबसे ऊपर है. आप कही ज्यादा हे सुलझी हुई और परवाह करने वाली है."

"ये बात तोह है हमारे बीच में लेकिन भूल कर भी अर्जुन से इसका जीकर मैट करना. सास के हाथ लग हे गया है तोह अब जरा मैं भी हालत पतली करू उसकी. देखे क्या प्रतिक्रिया होती है जब मैं टॉर्चर दूंगी उसको. वैसे तुम भी हिम्मतवाली हो जो वो चीज झेल गयी जिसको शायद कोई ग्रीक माँ भी न झेल पाए.", रोमिला ने जैसे ठान लिया था के वो अर्जुन को तोह दबोचेंगी हे लेकिन मजे रेणुका के भी लेती रहेंगी.

"क्या भाभी आप कुछ भी बोलती हो. पहली बार तोह नहीं था न ये हमारा.", रेणुका बिस्टेर पर अपनी उंगलिया उलझा रही थी और चेहरा शर्म से झुका था.

"पहली बार की हे बात कर रही हु मैं. घर खाली था क्या उस वक़्त? वैसे माँ तोह पहले भी बानी हो इसलिए थोड़ा हे दर्द हुआ होगा.", रोमिला अलग हे अंदाज में कचोट रही थी और रेणुका बेध्यानी में बोल हे गयी.

"जान हे निकाल दी थी भाभी शुरू के 3-4 वक़्त तोह. फर्स्ट नाईट से ज्यादा दर्द और खून अर्जुन के साथ करने पर आया. दर्द तोह अभी भी एक बार होता है लेकिन वो जल्दबाजी नहीं करता और हमेशा मेरा ख्याल रखता है अपने मजे की जगह.", रोमिला की हंसी और गहरी हो गयी थी और अपना हे जवाब समझते हुए रेणुका की धड़कन तेज.

"हाहाहा, तुम भी बहोत हे भोली हो रेणुका. चलो ाचा है की तुम्हे हर बार ये एहसास मिलता है और अगर वो इतना हे काबिल है तोह मेरी बेटी हमेशा खुश रहेगी. प्रीती से भी इस बारे में बात मैट करना. मैं खाना बनती हु हम दोनों का और बाकी बातें बाद में करेंगे.", रोमिला मुस्कुराती हुई हे बहार चली गयी थी. रेणुका जहा पहले अपना राज खुलने पर अंदर से दरी थी वही इतनी बातें होने के बाद वो खुश थी की उसकी भाभी ने हंगामा करने की जगह बात करना बेहतर समझा. लेकिन अब चिंता थी तोह फिर से अर्जुन की. क्योंकि रोमिला का चेहरा पढ़ना तोह अभी अर्जुन को भी नहीं आता था और वो फंस गया था, चाहे मजाक में हे सही.

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अर्जुन पैदल हे प्रीती के घर से निकल कर गलियों में भटकता हुआ अपने हे विचारो में चला जा रहा था. आज इतने दिनों बाद वो रेणुका के साथ समय बिता कर कुछ शांत होना चाहता था लेकिन उस अख़बार वाले लड़के और मुकेश की वजह से माहौल ख़राब हो गया. रोमिला पर भी नजर पड़ हे गयी थी जो एक और वजह थी वापिस न जाने की. यहाँ वो चलता हुआ मंजू के घर तक आ गया और बिना विचारे हे गेट खोल कर अंदर आ खड़ा हुआ. ढीली टीशर्ट और पाजामे में हॉल के सफाई करती मंजू को देख कर वो वही खड़ा रहा जब तक मंजू ने उसकी मौजदगी न भांप ली.

"तुम इस वक़्त और वो भी यहाँ?", अभी वो आगे कुछ कहती की अर्जुन उसके गले जा लगा. मंजू के लिए तोह हमेशा हे अर्जुन रेगिस्तान में बारिश सा था. उसके सीने लगती वो भी सबकुछ भुला कर अर्जुन का चेहरा चूमने लगी. घर पर मेनका की गैरमौजदगी उसकी कार न कड़ी होने से पता लग चल हे गयी थी. सख्त उभारो को बेसब्रो की तरह मसलता अर्जुन वैसे हे मंजू को सीने से लगाए कमरे में चल दिया.

"कुछ मैट बोलना प्लीज.", अर्जुन ने एक पल के लिए होंठ अलग किये और वो ढीला पजामा हटतने के बाद मंजू की टीशर्ट भी ऊपर सरका दी. सबसे सुडोल और सख्त चुके थे मंजू को इस समय. तन्न कर खड़े चुचकों का आमंत्रण स्वीकारने में तनिक भी देरी न करते हुए अर्जुन उन्हें जोश से पीने लगा. यहाँ भी तोह हालत रेणुका से कुछ अलग न थी मंजू की. ये भी गर्भवती थी और अर्जुन के लिए हमेशा हे तड़प से भरी. सिसकते हुए खुद हे अपनी पंतय निचे सरकती वो दूसरे हाथ से अर्जुन का सर अपने चुचो पर दबाने लगी.

"आअह्ह्ह.. अर्जुन... सचमुच बहुत ाचा लग रहा है.. उफ़.. ये सरप्राइज पसंद आया तुम्हारी मंजू को.. आह्हः..", रगड़ती हुई वो बिस्टेर पर आगे होने लगी थी अर्जुन को ऊपर लाते हुए. कपडे दोनों के हे अभी तक जिस्म से जुड़ा न थे और अर्जुन ने भी सिर्फ लिंग बहार निकलते हुए पनियाई छूट की दरार भर भिड़ा दिया. उत्तेजना में इस वक़्त वो लाल सूपड़ा फूल कर कही गहरा और मोटा हो चूका था. दोनों कंधो को पकड़ते हुए अर्जुन ने अपना जिस्म आगे झटका दिया.

"आठ.. सॉरी मंजू.. उम्म्म..", ये छूट कही ज्यादा हे अभ्यस्त थी उस मॉटे डंडे से लेकिन दर्द मंजू को भी हुआ. आधा लुंड एक झटके में अंदर उतरने से छूट की फांके फटने जैसी हो गयी थी और अब तोह मोटाई भी अधिक थी.

"माह.. सॉरी मैट बोलो.. आठ.. मुझे भी ये.. आठ.. अंदाज हे पसंद है.. पूरा समां जाओ अपनी मंजू में.. उफ्फ्फ.. ", अर्जुन ने चुचो को मसलते हुए इस बार जोश में मंजू के होंठो को मुँह में पकड़ते हुए समूचा 9 इंच हे अंदर उतार दिया. एक पल के लिए तोह दोनों के शरीर शुन्य हो गए.

"फाड़ दी.. आउच.. कहा से भरे आये हो तुमममम.. ? इतना मोटा .. आठ.. थोड़ा प्यार से करो जान.. ",अब मंजू ने हे गुहार लगाई तोह अर्जुन उस से लिपट कर बस लेट हे गया. सीने से सीना लगते हे वो अब शांत हो चूका था. मंजू भी समझ गयी की आज उसका प्यार कुछ परेशां है. सर को उंगलियों से सहलाती हुई वो अपना हे दर्द भूल गयी. अर्जुन अब जैसे वो महसूस कर रहा था जिसकी तलाश थी. आत्मा से आत्मा का मिलान और सुकून. मंजू ने उसका चेहरा ऊपर करते हुए अपने चेहरा पर टिकाया और एक लम्बा प्यार भरा चुम्बन दोनों में शुरू हो गया. यहाँ भी मंजू हे भरी थी लेकिन अर्जुन को यही आराम की जरुरत थी.

"तुम कभी परेशां मत हुआ करो जान. मानती हु आजकल मैं तुम पर ध्यान नहीं देती लेकिन ये घर हमारा है और मैं तुम्हारी.", मंजू के ऐसा कहने पर अर्जुन ने अपने हाथ बिस्टेर में धंसते हुए उसकी पीठ को जकड लिया. अब उस कासी हुई छूट में हल्का घर्षण शुरू हो गया था. ये इतना धीमा और एहसास से भरा था की वो दोनों हे एक दूसरे को देख रहे थे. मंजू की ये मुस्कान दिलकश थी और अर्जुन का सुकून जैसे मंजू की चाहत. इस घर में हमेशा उन्होंने बंद कमरे में संसर्ग किया था लेकिन आज हर दरवाजा खुल्ला था.

"तुम मुझे थाम लेती हो और पता है मैं जितना भी तेज राहु, तुम रोक सकती हो मुझे मंजू. सच कहु तोह आज मुझे तुम्हारी जरुरत थी और मेरे कदम अपने आप हे यहाँ आ गए.. आह्हः.. सॉरी.. वो गलता तरह से शुरू करने के लिए.. ummm.",Beech बीच में दोनों हे एक दूसरे को चूम लेते. मंजू की लम्बी सुडोल टाँगे अब ाचे से कासी अर्जुन पर, पजामा और कच्ची उसने खुद हे पाँव से झटक कर अलग कर दी थी. यही उसकी संगिनी थी जो कद के साथ साथ जिस्म से भी अर्जुन को टक्कर देती थी. Nami-yukt योनि और वो भयंकर लिंग अपना तालमेल बना चुके थे लेकिन यहाँ चुदाई से भड़कर इन दोनों का प्रेम था, परवाह थी और दोनों हे जी भर कर बातें कर रहे थे. आँखों, शरीर, दिल और मुँह से. प्यार ऐसा हे तोह होता है जहा सबकुछ आपस में जुड़ा हो.

"थामती नहीं मैं तुम्हे, प्यार करती हु जैसे तुम करते हो. तुम चाह कर भी मेरे ऊपर जोर नहीं दिखा सकते क्योंकि आज भी तुम मुझे गीला करने के बाद 2 बार में अंदर आये हो. ाचा लगा जान कर की मैं तुम्हारे sukh-dukh की साथी हु. That's व्हाई थिस लेडी इस इन लव विथ यू माय मन. तुम हमेशा से हे मेरा प्यार हो और फिर कभी सॉरी मैट बोलना. और मैं उधर के लिए भी तैयार हु.", मंजू का इशारा गुदाद्वार की तरफ था. दोनों यहाँ prem-safar में इतने खोये थे की बहार कड़ी मेनका की आहात तक न सुनाई दी.

"इसलिए तोह तुम्हारे पास हु.. आठ.. लेलिन पहले मेरी बेटी फिर वह आऊंगा.. उम्म्म्म..", दोनों के मुख पर बनती लार बता रही थी की इनका प्रेम पागलपन है. धक्के किसी रेल से चल रहे थे और चिकनी सुरंग में अंदर बहार होता वो विकराल लिंग सचमुच कोई पहली बार तोह नहीं झेल सकता था. मंजू का शरीर थिरका, बिस्टेर भीगा लेकिन वो निरंतर अपने सुडोल चुत्तड़ हिलती रही. इनकी मस्ती की सिसकियाँ सुन्न कर मेनका की भी छूट कुलबुला गयी थी. घर्षण की fatch-fatch बहार हाल में भी सुनाई दे रही थी और वही अर्जुन का जोश बढ़ता हे जा रहा था.

"आअह्ह्ह.. मार हे डाला रे तुमने तोह.. ऐसा सरप्राइज.. आह्हः.. कही घर पर देते तोह... मेरी माँ ..उफ़.. खुद हे पागल हो जाती .. आह्हः...", मंजू अपनी माँ का जीकर कर गयी और अर्जुन तोह दिल से जुड़ा था.

"मौसी को सब पता है.. आठ. उन्होंने हे तोह उस दिन ऊपर भेजा था तुम्हारे पास... आठ.. जल्दी से माँ बन्न jao..ummm. ये भर दो मंजू.. उम्म्म", अर्जुन का इशारा चुचो में दूध की तरफ था. थिरकते अनार भी इतनी लम्बी चुदाई में कही ज्यादा हे फूल चुके थे जिन्हे बार बार वो मुँह में भर रहा था.

"आअह्ह्ह.. दूध आएगा तोह दिक्कत होने वाली है.. उम्. बाप और बीटा .. लगे रहेंगे... जानती हु की माँ को पता है.. आह्हः.. तभी तोह वो तुम्हे घर बुला रही थी.. िसष्ठ.. कस के मारो न अंदर... आह्हः..", अर्जुन इतना कहते हे द्रुतगामी रफ़्तार से मंजू की लज्जत भरी छूट में पूरा हे लिंग जड़ तक पेलने लगा. मेनका तोह देख कर हे झाड़ गयी थी और ये दोनों ऐसी गहरी बातें करते हुए अगले 20 मिनट तक लगे रहे. झटके खता अर्जुन इतना झाड़ा था जितना वो चुनिंदा समय हे हुआ होगा. गर्भ पर गरम धार महसूस करते हे मंजू भी नागिन की तरह इस तगड़े चन्दन वृक्ष पर लिपट गयी. दोनों हे जाने कितनी देर तक ऐसे लिपटे रहे और सफ़ेद वीर्य चादर तक आ पंहुचा.

"उठो अपने बेटे के पापा. मम्मी को नहाना पड़ेगा.", मंजू के ऐसे कहने पर अर्जुन एक तरफ लुढ़क गया लेकिन बाथरूम तक जाती वो थिरकती गांड दिल को हिला गयी.

"मैं साथ नहाऊंगा और कोई सवाल नहीं.", अर्जुन के ऐसा कहने पर मंजू ने इतने कामुक तरीके से हवाई चुम्बन किया था की वो उसके बराबर जा खड़ा हुआ.

"अंदर भी एक राउंड पूरा हे लगाना. पानी में तोह आग मुझे शुरू से हे पसंद है तुम्हारे साथ.", मेनका की तोह sitti-pitti हे गम हो गयी थी मंजू का ये अंदाज सुन्न कर. वो कार ले कर बहार हे निकल गयी और इधर अर्जुन पौने घंटे बाद निर्वस्त्र मंजू को लेकर बिस्टेर पर आ गया. दोनों के जिस्म अब taro-taja थे. कपडे पहन कर मंजू अपने पति के लिए खाना बनाने लगी वही अर्जुन भी हॉल में बैठ कर उस से बातें करने लगा.

"तुम कब आये? शुक्र है आज दर्शन तोह दिए जनाब ने.", मेनका जब आयी तोह अर्जुन आराम से सोफे पर बैठा समाचार देख रहा था. मंजू भी आधा काम निबटा चुकी थी.

"बहोत देर हो गयी मुझे तोह आये लेकिन आप तोह स्कूल बंद होने के बावजूद बहार हो.", अर्जुन ने अपने आने के समय में कोई her-fer न की थी. मेनका असमंजस में थी की वो कुछ कहे या न कहे. लेकिन आज उसने जाना था की निर्विरोध संसर्ग क्या होता है जो वो कभी अर्जुन से कर न सकीय थी.

"हाँ कुछ काम था डाक्यूमेंट्स का तोह थोड़ा समय लग गया. मंजू ने ख़याल तोह रखा न तुम्हारा?", ये बात बहोत आराम से कही थी मेनका ने और वो अर्जुन के चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रही थी जहा पूर्ण सुकून था.

"मंजू मेरा ध्यान प्रीती की तरह हे रखती है मेनका जी. न कोई औपचारिकता और न दिखावा. वैसे आप ये मैट कहना के मैं आपको याद नहीं करता. फ़ोन तोह मैं हे करता हु लेकिन आप तोह मेरे घर आने के बाद भी मुझसे नहीं मिली.", यहाँ तोह अर्जुन ने हे मेनका को घुमा दिया था. वो जवाब क्या देती जब सामने वाला सच कह रहा था. लेकिन मंजू और अर्जुन का सम्बन्ध पता लगने के बाद वो थोड़ा बेकाबू भी थी.

"शायद तुम्हारी बहिन मुझसे ाचा ख्याल रखना जानती है."

"बीवी. और मैंने भी कहा था के वो प्रीती की तरह मेरा ध्यान रखती है न की बहिन की तरह. ऐतराज?", अब मेनका का दिल बैठ हे गया था इतना स्पष्ट जवाब सुन्न कर. अर्जुन क्या कह गया था ये जैसे सपने सा था उसके लिए.

"फिर से कहना."

"फिर से सुनिए अगर समझ नहीं आया तोह. उसको पता है मेरे साथ आपका सम्बन्ध है. मंजू और मैं आपके सौतेले भाई से पहले से हे आपस में विवाहित है. मैं उस बचे का बाप हु जो मंजू के पेट में है. आपके परिवार ने तोह खेल हे खेला था इसके साथ लेकिन ये मेरी है और मैं इसका. इसलिए मंजू ने आपको बहिन बनाया न की बड़ी ननद. बड़ी साली हे हो आप अब मेरी और ज्यादा कुछ jaan-na हो तोह लंच के बाद मंजू खुद बता देगी.", अर्जुन ने बात ख़तम करते हुए मेनका का गाल सेहला दिया था. कुछ देर शांति रही और फिर खाना भी लग गया. म्हणत करने वालो ने भरपेट खाया था और अर्जुन बिना किसी की अनुमति के मंजू के कमरे में जा लेता. थकान भी थी और अब कही मैं शांत हुआ था.

"ये अर्जुन कुछ कह रहा था.", मेनका ने बात की शुरुआत की.

"हाँ. वो कह रहा था की आपके साथ सचमुच बहोत बुरा हुआ. लेकिन वो कोशिश करेगा की आपको उतना प्यार मिले जो नहीं मिला.", मंजू ने बर्तन सिंक में रखते हुए जवाब दिया तोह मेनका सफ़ेद हे पड़ गयी.

"तुम कब से इसके साथ हो?"

"उस दिन मैं खेत में इसके हे साथ थी जब आपको पहली बार प्यार हुआ और आप मुझे हे देखने आ रही थी. ये मेरे साथ बचपन से हे है, बताया था न.? खेल तोह आपके घरवालों ने रचा था शिकार मैं बन्न गयी, आपके साथ साथ. याद है ये यही इस घर में जख्मी आया था आपको बचने के बाद? किस से बचाया था इसने आपको और फिर आपके साथ कौन था?", मंजू के ये शब्द बहोत थे मेनका को वास्तविकता में लाने के लिए. उसको भी ध्यान आ गया था के अगले दिन ऋषभ की तस्वीर इस घर में न थी.

"सॉरी."

"उसको बोल देना दीदी अगर वो जान गया हो तोह. मैं तोह पहले हे दिन से जानती हु लेकिन सम्बन्ध इस घर से बहार कभी मैट बनाना. यही हद्द है और यही दुनिया. वो इसके बहार सिर्फ प्रीती का है.", मंजू ने हिदायत देते हुए कहा तोह दयारा मेनका को समझ न आया.

"और अगर ये किसी और के भी साथ हो तोह.?"

"वो प्रीती को पता होगा लेकिन हद्द भी. आपकी सहेली अन्नू की बात कर रही हो तोह वो हद्द से बहार है. इतना बोझ मैट डालो दिमाग पर क्योंकि आप भी चोट खायी हो, मैं भी. अंदर सोया शक्श इलाज है और वो मेरा प्यार भी. दिक्कत मुझे होनी चाहिए लेकिन आपके साथ अब रिश्ता बहिन का है. आराम कीजिये, मैं अपने पति के पास सोने जा रही हु जिस से वो उठे नहीं.", मंजू अपने चरित्र को आज कितने दिन बाद दिखा रही थी. वो सचमुच भारी थी और मेनका को मान न पड़ा के यहाँ वो सही है. बस आज के बाद यहाँ माहौल बदलने वाला था जिस वजह से कुछ आशा थी मेनका को. मंजू के बगल में आते हे अर्जुन चैन से सो चूका था.

'काश तुम ये पहले हे बता देती मेरी बहिन. लेकिन ाचा हे है के तुमने मेरे भी प्यार को समझा और दुत्कारा नहीं.', मेनका का दिल अब परेशां न था. ये सभी राज जिस तरह से खुले थे वह किसी का भी किसी से मतभेद नजर आने की जगह बस प्यार और परवाह दिखी. मंजू भी जिगरा रखने वाली छोटी बहिन थी अब और अर्जुन भी हक़ ज़माने वाला प्रेमी. अपने कमरे में जाते हे मेनका बिलकुल ढील कपड़ो में चैन से बिस्टेर पर लेट गयी.

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3 की जगह करीब 4 हे बज गए थे शंकर जी को घर पहुंचते पहुंचते. उमेद जी भी उनके साथ हे इधर आये थे और फ़ोन पर पहले हे बता दिया जिस वजह से Komal-Rupali वाला कमरा अपनी चची के लिए खुद कोमल ने हे व्यवस्थित कर दिया था. संजीव अपने साथ बिजली वाले को लेता आया था और इस कमरे में air-conditioner फिट हो चूका था सभी के आने से पहले.

"मेरी बची कैसी है? संजीव तुम हे काम करवा रहे हो और वो शैतान नहीं दिख रहा?", कृष्णा जी आते के साथ कोमल और संजीव से गले लग कर मिली थी पिछले आँगन में. बाकी सभी तोह फ़िलहाल बैठक में रुक गए थे.

"मैं ठीक हु चची जी और भैया खुद हे आ गए थे. अर्जुन स्टेडियम से 6 बजे तक आएगा. आप इधर आराम से बैठिये मैं जूस ले कर आती हु. भैया आप भी चची के साथ हे बैठिये.", कोमल ने उन्हें अंदर बैठने को कहा और संजीव भैया ने भी एक चालू कर दिया अपनी चची के लिए. 2 तकिये सर की तरफ रखते हुए उन्होंने अपनी चची के आराम का सही ध्यान रखा था.

"आने में परेशानी तोह नहीं हुई आपको चची जी? कार में तंग हुई होंगी.", संजीव पाँव की तरफ बैठा कृष्णा जी को हे देख रहा था जिनके चेहरे पर एक मुस्कान थी और कही कोई थकान का निशान नहीं.

"कान न खींच देती मैं इनके अगर तकलीफ होती तोह. बहोत ध्यान से ले कर आये है बस लड़कियों ने कुछ ज्यादा हे शॉपिंग कर ली. भाभी (ललिता जी) कल आएँगी?"

"हाँ, दादा जी बता रहे थे की वो लोग 9 बजे तक पहुंच जायेंगे वापिस घर. ाचा लगा आपको थोड़ा बेहतर देख कर लेकिन अब यहाँ कोई काम नहीं करना आपने.", संजीव ने कुछ सोच कर हे काम न करने वाली बात कही थी.

"काम तोह मैं वह भी कोनसा करती थी लेकिन तुम परेशां हो बीटा. इधर बैठो जरा.", संजीव इतना सुन्न कर हे हिल चूका था लेकिन पास तोह बैठना हे था. कुर्सी खिसका कर अब वो अपनी चची के चेहरे के करीब आ बैठा. कृष्णा चची ने अपने ठन्डे हाथो में भतीजे का हाथ पकड़ते हुए फिर से चेहरे को देखा तोह संजीव की नजरे झुक गयी.

"तुम सिर्फ 2 लोगो की हे सबसे ज्यादा चिंता करते हो ये मुझे पता है. वैसे तोह पूरे घर की dekh-rekh तुम ाचे से करते हो लेकिन इस परेशानी की वजह पापा है या अर्जुन?"

"अर्जुन चची जी. आप तोह जानती हे है वो कुछ ज्यादा हे भावुक है. नाश्ते के बाद से हे वो घर से चला गया था दोस्त का बता कर. थोड़ी देर पहले कोमल को फ़ोन पर बताया के स्टेडियम जा रहा है. वो ऐसा कभी नहीं करता जब घर में दादा जी न हो.", संजीव की चिंता बड़े भाई के रूप में जायज थी लेकिन बात अभी भी अधूरी हे बता रहा था वो.

"और तुम्हे पता है न वो क्यों भावुक हुआ?", अभी आये 10 मिनट हे हुए थे कृष्णा जी को और ऐसी बातें शुरू हो गयी. कोमल रसोई में थी जहा प्रियंका चाय बना रही थी और वो मुसम्बी का जूस निकल रही थी.

"इस बारे में तोह अभी बात करने का कोई फायदा नहीं है चची जी लेकिन वो घर आये तोह थोड़ा अपने aas-pas हे रखना. हो सकता है यहाँ दादा जी और रेखा चची नहीं है तोह वो ऐसा कर रहा हो. मुझे भी काम से जाना पड़ा था बहार नहीं तोह अर्जुन मेरे साथ हे होता.", संजीव की बात पर कृष्णा जी ने ज्यादा कुछ न कहा. इधर 2 गिलास जूस के ट्रे में लिए कोमल अंदर चली आयी.

"मेरी बची, मैं हर काम खुद कर सकती हु. इतनी टेंशन न ले और देख तेरे चाचा या पापा को कुछ चाहिए तोह नहीं. उमेद भाई साहब भी है उधर और Vinni-Aaisha भी.", कोमल दीदी फिर भी उन्हें अपने हाथो से हे जूस पिलाती रही. संजीव ने भी गिलास एक सांस में ख़तम किया और बैठक की तरफ बढ़ गया.

"मुन्ना फ़ोन पर परेशां था क्या?", उन्होंने अब सवाल कोमल से किया.

"बिलकुल भी नहीं चची जी. हाँ जब घर से गया था तब जरूर लग रहा था और उस वक़्त सामने वाली भाभी यहाँ आयी हुई थी तोह वो दोस्त के घर चला गया. फिर भैया आ गए थे तोह काम में लगे रहे. वैसे अब डॉक्टर क्या कह रहे है?"

"कह रहे थे की जल्दी से अपने घर जाओ और बिस्टेर खाली हमारा. कुछ हुआ है नहीं और इधर कब्ज़ा करे बैठे हो. तोह अब मैं इधर आ गयी, तेरे कमरे पर कब्ज़ा करने.", कृष्णा चची की बातें कोमल के चेहरे पर भी ख़ुशी ले आयी.

"पूरा घर हे तोह आपका है चची और मुझे तोह आपने प्रियंका से भी ज्यादा प्यार दिया है. ख़ुशी है के आप इस कमरे में हो और अब मैं रात में आपके पास रहा करुँगी.", कोमल दीदी ने ये गिलास खली होने के बाद ट्रे में रखा और रुमाल से चची के होंठ साफ़ करने लगी जहा हल्का सा हे गीलापन था.

"अब तू मेरी माँ बनेगी लगता है. तुझे यहाँ अर्जुन सोने देगा तोह सो जाना, मैं तोह मन नहीं कर रही.", फिर से अर्जुन का नाम लेने पर खुद कृष्णा जी को थोड़ा अजीब लग रहा था. एक तोह वह इतने समय बाद वापिस आयी थी वो भी हॉस्पिटल से और ऊपर से हमेशा घर में रहने वाला उनका लाडला गायब था.

"मैट सोचिये के ारु यहाँ क्यों नहीं है. वो अपनी चची माँ से ऐसे तोह नहीं मिलने वाला ख़ुशी के मौके पर. अब आराम कीजिये आप और मैं papa-chacha जी का खाना होने के बाद आती हु.", कोमल की भी यही ख़ास बात थी की वो हर सदस्य का दिल और भाव पढ़ लेती थी बेशक ज्यादा लोगो के साथ बात काम हे करती थी.

"पता है मुझे मेरे बेटे का. वो तोह बस आदत है और ये बदल नहीं सकती. आरती से कह देना के मेरा सामान यहाँ अलमारी में लगा देगी. वो भी यहाँ आ कर ऋतू जैसी शरारती हो गयी है इस बार.", चची की ये बात सुन्न कर अब कोमल क्या बताती की आरती ऋतू की वजह से बदली है या अर्जुन की.

"आप आराम कीजिये और सारा सामान घंटे बाद अलमारी में हे मिलेगा. मैं आती हु चची जी थोड़ी देर में.", चादर अपनी चची के कमर तक करने के बाद वो बहार निकल गयी. सफर में कृष्णा जी सो न पायी थी आरती की chak-chak की वजह से. उधर संजीव ने भी दोनों गाड़ियों से यहाँ का सामान उतार कर मेहमान कमरे में रख दिया था फ़िलहाल. विन्नी रुकना चाहती थी लेकिन आइशा की वजह से वापिस जाना पड़ा और उमेद जी भी परसो आने का बोल कर अपनी हवेली की और निकल चले.

यहाँ बैठक में संजीव के दोनों चाचा बैठे हल्का भोजन कर रहे थे और आरती अपनी माँ का सामान लगाने उनके कमरे में चली गई. कुछ समय बाद शंकर जी ने हे बात शुरू की.

"तोह पंजाब कौन जा रहा है अब? तुम्हे तोह शायद हे जाने दिया जाये और फिलहाल तोह इन्दर को भी यहाँ काम देखने होंगे.", नरिंदर जी बस ध्यान दे रहे थे जो भी बड़ा भाई बोल रहा था.

"पापा कह रहे थे की वो जा सकते है लेकिन अभी समझ लीजिये के 3 दिन उनके भी बहार हो जायेंगे और फिर उनको भी इधर देखना हे होगा. वैसे अगर जरुरी है तोह मैं चला जाता हु चाचा जी.", शंकर जी ने पहले हे गर्दन न में हिला दी.

"तुम्हे फ़िलहाल तोह रूटीन में ड्यूटी देखनी है अपनी और वह काम एक दिन में तोह नहीं होने वाला. इन्दर और कृष्णा का सामान है वह और jaan-pehchaan वाले घरो में कार्ड भी देने है. आरती ने जिद्द पकड़ राखी है के वो जरूर जायेगी तोह कार्ड वाला काम वो कर सकती है."

"यार वह से सिर्फ कृष्णा के कमरे का सामान आना है वो भी किताबे, कपडे, एल्बम, documents-files वगैरह. कोई भी चला जाये आरती के साथ और उसको कृष्णा सब समझा देगी. रेशम सिंह भाई जैसे है और हुसैन भी घर चक्कर लगा कर देखभाल करता रहेगा. घर वैसा हे रहेगा.", नरिंदर जी ने स्पष्ट कर दिया की जरुरी सामान इतना नहीं है के पूरा घर हे इधर लाना हो. अपनी तरफ से किसी ने भी अर्जुन का नाम नहीं लिया था अभी तक.

"चाचा जी, तारा भी जानती है गाडी चलना लेकिन सिर्फ दोनों लड़कियों को भेजना ठीक नहीं रहेगा."

"यार संजीव तेरा लाडला भी तोह जा सकता है न कार ले कर?", अब शंकर जी ने हे ये बीड़ा उठाया और अपने बेटे का नाम आगे कर दिया. संजीव ने अनिश्चित भाव दिखाए तोह नरिंदर जी हे बोल पड़े.

"हाँ अगर वो कार चला लेता है तोह यही ठीक रहेगा. शहर तोह गया हे है अभी कुछ दिन पहले अर्जुन, दिक्कत भी नहीं होगी फिर."

"ये तोह अब बाउजी (रामेश्वर जी) हे बता सकते है की अर्जुन को भेजना है या नहीं. बाकी शंकर चाचा बोलेंगे तोह अर्जुन चला जायेगा.", संजीव का जवाब अजीब था और वो जैसे चाहता था की अर्जुन रुके.

"ठीक है फिर यही करते है. आज गुरुवार है तोह कल पापा के आने के बाद अर्जुन निकल जायेगा. परसो सवेरे समय से चलेगा तोह दोपहर तक वापिस या हद्द शाम तक. ठीक है न इन्दर? मैं पापा को तोह अभी बता देता हु फ़ोन करके."

"करो भाई तुम लोग प्लान और मैं चला पापा के बिस्टेर पर सोने. शंकर, रात को धर्मवीर अंकल के यहाँ जाना है?", नरिंदर जी ने अपनी जगह से उठते हुए पुछा.

"हाँ. घर पे संजीव और अर्जुन होंगे हे तोह हम चलते है 7 बजे.", तोह यहाँ आज रात फिर घर पर संजीव और अर्जुन की ड्यूटी लग गयी थी और संजीव को तोह कभ ऐतराज होता हे नहीं था. यहाँ शंकर जी फ़ोन पर अपने पिता से बतलाने लगे वही संजीव दूसरे घर चक्कर लगा कर आने का बोल कर बहार निकल गया. थकान तोह थोड़ी शंकर जी को भी थी इसलिए आराम करने से पहले नहाने का सोच कर वो बहार वाले बाथरूम में चले गए. कोमल ने पापा के कहने पर कपडे निकल दिए थे.

"अर्जुन कहा है?", रोमिला तक़रीबन साढ़े 5 बजे इधर आयी थी और अंदर आँगन में प्रियंका कोमल को चाय पीते देख जान न चाहा. इस वक़्त भी उन्होंने एक चुस्त परिधान पहना हुआ था बिना बाहों का. चेहरे से कोई ख़ास भाव तोह नहीं दिख रहे थे पर कशिश हमेशा की तरह बखूब थी.

"आंटी वो तोह स्टेडियम से 6 बजे के बाद हे आता है. कुछ काम था तोह बताइए, मैं बोल दूंगी उसको.", ये बात प्रियंका ने कही थी लेकिन कोमल ने उन्हें बैठने का कहा और एक कप चाय उनके लिए भी ले आयी. रोमिला जी भी खाली थी क्योंकि 2 लोगो का काम हे कितना था घर पर.

"हाँ काम तोह था लेकिन मैं हे बात करुँगी उस से. वैसे बहार गाडी कड़ी है मतलब कृष्णा आ गयी है क्या?", चाय का स्वाद लेने पर जो भाव आये थे उन्होंने रोमिला के गुलाबी चेहरे की ख़ूबसूरती में कही ज्यादा इजाफा कर दिया था. आँखों से हे उन्होंने इसकी तारीफ कर दी थी.

"हाँ चची जी 4 बजे आ गए थे और अभी आराम कर रहे है. माँ ने कहा था आपको एक ड्रेस देने के लिए, मैं ले कर आती हु तब तक आप प्रियंका से बातें करे.", कोमल उठ कड़ी हुई तोह एक नजर प्रशंशा से रोमिला ने इन दोनों बहनो को देखा.

"तोह प्रियंका अब पंजाब जाना होगा या मुश्किल है?", रोमिला के ऐसा पूछने पर प्रियंका ने हामी भरी.

"आंटी, मैं तोह शायद न जॉन लेकिन आरती एक दो दिन में जाने वाली है अर्जुन के साथ या जो भी जायेगा. बताये क्या लाना है वह से, आरती लेती आएगी?"

"तुम मेरे घर हे आ जाना शाम को. वो शहर बड़ा है और जो मुझे चाहिए, वह मिल हे जायेगा. दिल्ली ज्यादा हे भीड़ थी तोह मैंने रिस्क नहीं लिया."

"हाँ ये बात तोह है की वह इम्पोर्टेड सामान आराम से मिल जाता है. चाहे वो पैक्ड फ़ूड हो, फ्रूट्स या कपडे. मैं आ जाउंगी थोड़ी देर तक."

"यही सब मंगवाना है प्रियंका और तुम वैसे भी मेरे पास आ सकती हो जरुरी नहीं के प्रीती हो तभी आना है.", मुस्कुराती हुई रोमिला कड़ी हुई थी जाने के लिए और कोमल वो पैकेट लिए आ गयी. प्रियंका चाय के कप समेटने लगी.

"ये लीजिये आंटी जी. मुझे नहीं पता था के ये आपके है क्योंकि टेलर आंटी ने माँ का नाम लिया था. वो दिन में माँ से बात हुई तोह पता चला ये वाला आपका है.", कोमल के ऐसा कहने पर रोमिला ने वो काले रंग का रेशमी वस्त्र पैकेट से बहार निकल लिया. तेह लगा हुआ कपडा भी बता रहा था के परिधान ख़ास है.

"थैंक यू कोमल. वैसे तुम्हारे पास सेफ्टी पिन होंगी, छोटी साइज की? रेणुका के पास सभी डिज़ाइनर है और वो बड़ी भी है.", कोमल ने हाँ में सर हिलाते हुए कमरे का रुख किया और प्रियंका भी रसोई में चली गयी बर्तन रखने. परिधान वाला पैकेट टेबल से जमीन पर गिर गया हवा की वजह से तोह रोमिला खुद हे झुक कर उठाने लगी.

'ये मरवायेगी किसी दिन..', रामेश्वर जी के कमरे से बहार निकलते शंकर जी की नजर उन सफ़ेद बड़े गुब्बारों पर पड़ी तोह ईमान ऊपर निचे हो गया. लगभग आधे उभर उस ढीले गले से नजर आ रहे थे. इतने उन्नत और दूधिया उभार जिनका चिकनापन और कठोरता लाजवाब थी बस एक नजर में ईमान हिला गए थे. रोमिला की नजर इधर पड़ी और झेंपते हुए शंकर जी ने ध्यान सामने दरवाजा बंद करके इस तरफ आती कोमल पर कर दिया.

"कोमल बीटा, 2 कप चाय बना देना.", और वो इतना कह कर वापिस कमरे में चले गए. रोमिला देख रही थी की शंकर ने कतराते हुए haal-chal भी नहीं पुछा था. वो भी कोमल से सेफ्टी पिन ले कर जाने हे लगी थी की गलियारे में ये टक्कर हो गयी.
 
अपडेट 138

कृष्णा (1)


आज स्टेडियम में सिर्फ कसरत करने के बाद अर्जुन बड़ी मार्किट निकल गया था. उसका दोस्त संदीप ख़ास वजह से साथ आया था और दोनों ने हे भरपूर खिरदारी की थी अर्जुन की बनाई लिस्ट के अनुसार. शुक्र था वह चारुल आराम करने के वजह से नहीं आयी थी और समय का सदुपयोग करते हुए अर्जुन ने सुधीर की बताई सभी दुकानों से वो सामान लिया था जिसकी जरुरत थी. 40-45 मिनट बाद दोनों जब वापिस घर की तरफ निकले तोह संदीप बस जैसे तैसे इतना बोझा उठाये थे.

"भाई, तू इस लिए मुझे लेके आया था अपने साथ?", संदीप झूठी नाराजगी दिखा रहा था. उसको भी स्टेडियम देखना था और अर्जुन के साथ आज ाचा समय निकला था उसका.

"हाँ भाई इसलिए हे लाया था तुझे साथ क्योंकि कार नहीं है न मेरे पास. बड़ा नखरे दिखा रहा है अब लेकिन वह मेरे से ज्यादा तुझे मजा आ रहा था. हर औरत को घूर रहा था और अब ये 5 थैले बोझ लग रहे है.", अर्जुन भी अपने दोस्त के मजे लेते हुए अपनी रानी दौड़ा रहा था.

"हाहाहा.. सचमुच यार हर तरफ बस माल हे माल था. अपनी तरफ तोह सड़के भी खाली और मार्किट में लोग भी jaan-pehchaan वाले होते है. उधर कोई चिंता नहीं थी और वैसे भी तुझे पता है के मैं ऐसी वैसी हरकत नहीं करता भाई. देख कर हे खुश हो जाता हु. वैसे स्टेडियम में तेरी बड़ी पहचान है यार और जितनी लड़किया मैं ताड़ रहा था वो तुझे निहार रही थी.", संदीप को अजीब भी लगा था के कहा उसका ये दोस्त शर्मीला सा होता था और आज चलने में भी व्यक्तित्व निखार के आता था.

"तभी तोह तुझे साथ लेके आया था भाई. स्टेडियम भी दिखा दिया और तेरी इत्छा भी पूरी हो गयी. मुझे पता है के तू ऐसी वैसी हरकत नहीं करता और सच कहु तोह कभी कभी लगता है के रोज तेरे साथ थोड़ा समय रहा करू.", दोनों हे laal-batti तक आ गए थे.

"तोह आ जाया कर भाई मेरे यहाँ. वैसे भी अब तोह वीडियो गेम की कलेक्शन भी बहोत हो गयी है और माँ भी पूछती रहती है के अब तेरा आना काम क्यों हो गया? पापा बता रहे थे के तू यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में भी पढता है, स्टेडियम जाना और फिर घर में शादी के काम है तोह लाइफ मुश्किल चल रही है. लेकिन कभी कभी तोह आ हे सकता है.", अर्जुन अब क्या कहता के वो घर उसकी बड़ी बहिन ज्योति के साथ हुए काण्ड की वजह से नहीं आता. ऐसा मन भी नहीं कर सकता था और दोस्त से तोह मिल हे सकता था.

"आया करूँगा भाई और घर न भी आ सका तोह हम बहार चल पड़ा करेंगे. वैसे तेरी गेम वाली के क्या हाल है?", अभी वो लाइट से आगे हे बढे थे की बराबर चलती स्कूटी पर सवार लड़की उन्हें हे देख रही थी. अर्जुन का ध्यान सामने था लेकिन संदीप तिरछी नजरो से देख रहा था उस लड़की की हरकत.

"गेम वाली नहीं भाई उसका नाम चारु है और हमारा सही चल रहा है. दूसरे तीसरे दिन लगा हे लेते ट्रिप चुपके से. अब तोह प्रैक्टिस भी हो गयी है और उसको भी मजा आता है. लेकिन ये साथ में जो चल रही है वो कही किसी से भीड़ न जाये.", संदीप ने धीमी हे आवाज में बताया था और अर्जुन ने एक नजर अपने बाए तरफ की तोह थोड़ा झेंप गया. ये पारुल थी और बार बार वो अर्जुन को देख रही थी.

"सॉरी भाभी, देख हे रही हो न बिजी चल रहा हु. कल पक्का आता हु आपके घर और वो शादी का कार्ड भी देना था.", पारुल ने सर हाँ में हिलाया लेकिन चेहरे पर नाराजगी थी.

"कल मतलब कल.", इतना कह कर वो एक तरफ गली में मदद गयी और अर्जुन ने चैन की सांस ली.

"भाई ये तेरी कौनसी भाभी है? अपनी टीचर थी ये स्पोर्ट्स की लेकिन आइटम बन्न गयी ये तोह.", संदीप के ऐसा कहने पर अर्जुन के एक बार तोह मैं में आया के 2-3 मीठी बातें सुना दे फिर आराम से जवाब दिया.

"कमीने ये चारुल सिंह की जुड़वाँ है पारुल और भाभी इस वजह से क्योंकि विकास भैया है मेरे उनके साथ इनकी शादी पक्की हो चुकी है. कोच साहब की बेटी भी है ये और वो पापा के दोस्त भी है. अब शान्ति से बैठ और सोचने दे थोड़ा."

"इसमें सोचना क्या है? कल कार्ड देने हे तोह जाना है. दे आ लेकिन मैडम नाराज थी शकल से तोह और जैसे देख रही थी मुझे एक बार तोह लगा कही तूने इनका दिल तोह नहीं तोडा हुआ.", संदीप की बात पर हंसी आ गई थी अब अर्जुन को.

"हाँ भाई मुझे इन्होने काम बोलै था और वो मैं भूल गया. अब नाराज है और कल क्लास लगेगी पक्का.", बातों बातों में दोनों हे अर्जुन के घर तक पहुंचे तोह मोटरसाइकिल बहार हे एक तरफ कड़ी करते हुए अर्जुन ने सारा सामान अपने हाथो में ले लिया. अभी भी 3 डब्बे बाकी थे जो मोटरसीले पर दोनों के बीच दूकान वाले हे रखवाए थे.

"मैं ले चलता हु अंदर अगर तू कहे तोह.", संदीप ने मदद करनी चाही लेकिन अर्जुन ने मन कर दिया.

"ये मेरी कलाई पर रख दे भाई बस.", अब अर्जुन के ठुड्डी तक वो डब्बे एक के ऊपर के रखे गए और वो धीमी चाल से अंदर गलियारे में चल दिया. सनदीप पैदल हे घर की और. अभी अर्जुन पिछले आँगन में प्रवेश कर हे रहा था के कोई सीधा हे आ टकराया.

"आउच. ऐसे कौन चलता है?", ये रोमिला थी जो उस तरफ से मुड़ते हे अर्जुन के जा लगी थी. तीनो डब्बे अब जमीन पर थे और अर्जुन के बहार को निकली हथेलियों से अपने उभार टकराने पर रोमिला को अलग हे दर्द हुआ.

"सॉरी आंटी. वो सामान इतना ज्यादा था न और ये मदद की वजह से दिखाई भी नहीं दिया."

"इतने बड़े बिना देखे हे दबा दिए.?", रोमिला इतना बोल कर सामान उठाने में अर्जुन की मदद करने लगी वही अर्जुन के पसीने निकल गए थे ये 'इतने बड़े' वाली बात सुन्न कर. वो एक बार और सॉरी बोलने के बाद सारा सामान ऐसे हे लिए आगे चलने लगा.

"अर्जुन, जब फ्री हो तब मिलने के लिए आना. मैं यहाँ तुम्हे हे बुलाने आयी थी लेकिन पता नहीं था के तुम स्टेडियम की जगह शॉपिंग गए हो."

"आंटी, स्टेडियम के बाद हे गया था ये सब लेने. थोड़ी देर तक आता हु मैं मिलने.", अर्जुन के पास अब कोमल दीदी और आरती भी आ चुकी थी. उन्हें भी हैरत थी इतना सामान अर्जुन के पास देख कर लेकिन रोमिला रहस्यमयी मुस्कान देती bye बोल कर बहार चली गयी.

"ये सब क्या ले आया तू ारु?", दीदी ने पुछा तोह अर्जुन इधर उधर देखने लगा.

"Chachi-maa कहा है?"

"ये मेरे वाले कमरे में. आजा मेरे साथ हे.", इधर वो आगे आगे और अर्जुन उनके पीछे कमरे में. सारा सामान बिस्टेर के दूसरी तरफ रखता वो अपनी कृष्णा चची के ऊपर हे झुकते हुए गले लग गया. वो भी उठ चुकती थी और अर्जुन के ऐसे मिलने पर उस से भी ज्यादा खुश थी.

"मेरा बचा अब आ रहा है मेरे पास? 2 घंटे से इन्तजार था तेरा और तुझे जरा भी परवाह नहीं.", यहाँ बातें शुरू हे हुई थी की आरती ने तुबेलिघ्त जलने के बाद सभी सामान खंगालना शुरू कर दिया. नरिंदर जी भी मुँह हाथ धोने के बाद यहाँ चले आये थे. अर्जुन अपने चाचा से भी गले लग कर मिला.

"तू यार मेरी जननी मत लेके भाग जइयो कही. मान लिया के मैं बूढा हो गया पर बुढ़ापे का यही सहारा है ले दे के.", मजाक तोह सबसे ज्यादा नरिंदर जी हे करते थे और अभी भी वो जारी था.

"भागना क्यों है चाचा जी जब chachi-maa हैं हे मेरी. वैसे प्यार आपसे ज्यादा करती है ये और आप भी तोह इस चक्कर में इन्हे यहाँ नहीं आने देते थे.", अर्जुन और नरिंदर जी hans-bol रहे थे वही आरती और तारा ने चहकते हुए शोर मचा दिया.

"इतनी सॉफ्ट चप्पल और ये सब कपडे. वाओ. और ये सब क्या है?", आरती के कहने पर अर्जुन और बाकी सबका भी ध्यान गया.

"ये सब मेरी प्यारी chachi-maa के लिए है. ये air-pillow, एआरएम रेस्ट, ओलिवेस की बोतल. ये वाले 2 बैग कपड़ो का है और इस वाले में वाक करने के लिए लाइटवेट शूज. ये इनकी ख़ास बेडशीट्स जैसी वह पंजाब वाले बैडरूम में थी, एकदम सफ़ेद लिनन. और ये दोनों बैग में चाचा जी के कपडे. हाँ कुछ छोटा मोटा सामान भी है जैसे photo-frame, डायरी, पेन.", अर्जुन ने फ़िलहाल के लिए सभी कुछ एकतरफ रखने की कोशिश की लेकिन उसको ऐसा करने न दिया गया.

"माँ ये फोटो इसने बड़ी करवा दी है देखो. आप, पापा और ये. इसमें भी मैं और प्रियंका दीदी नहीं है. और इतने सामान में मेरे लिए कुछ भी नहीं.", आरती ने नौटंकी के साथ वो 18क्ष12 इंच की फ्रेम वाली तस्वीर दिखाई तोह नरिंदर जी ने बड़े ध्यान से उसको पकड़ कर देखा. अर्जुन लगभर वो हर चीज ले आया था जिसकी या तू उन्हें जरुरत थी या वैसा हे कुछ उनके वह कमरे में रहता था. अपने लिए ख़रीदे jeans-shirt और कुरता पजामा देख कर वो अर्जुन को एक तरफ से लगा कर खड़े हो गए.

"मेरी जननी सही कहती है और मुझे भी पता है के न सबसे समझदार बचा है मेरा. वैसे तेरे कहने पर मान लेता हु के बूढ़ा नहीं हुआ. पसंद ाची है तेरी और सच कहु तोह तेरी चची के लिए ये सब मुझे लेना चाहिए था."

"आपने हे तोह लिया है चाचा जी. और इन्हे कह दीजिये की बिस्टेर पर सिर्फ रात 10 से सुबह 6 तक रहना है. बगीचा यहाँ पर भी है और अब बंद कमरे में नहीं रहना. दीदी, आप सब सामान chachi-maa की अलमारी में लगा दीजिये मैं नाहा कर आता हु.", जाने से पहले अर्जुन ने अपनी चची का गाल चूमा और ऊपर चला गया.

"लो मैडम जी सुन्न लो अपने बेटे का फरमान. वैसे सचमुच तुम्हारी परवाह कही ज्यादा हे करता तुम्हारा लाडला. देखो तोह जरा जितना बता के गया है यहाँ उस से कही ज्यादा हे सामान रखा है.", नरिंदर जी के चेहरे पर एक गर्वित पिता वाले भाव थे अर्जुन के लिए और उतनी हे खुश कृष्णा जी के साथ साथ आरती, कोमल और तारा भी थी.

"ये इसलिए इतनी देरी से आया है और उसकी बात मुझे भी पसंद आयी. आपके कपडे भी बिलकुल वैसे हे लाया है जैसे इन तस्वीरों में हैं.", ये अलग फ्रेम थे जिसमे 5 फोटो लगी थी. उन्हें देखते हुए नरिंदर जी भी अपनी बीवी के करीब हे बैठ गए. ये सभी दृश्य बचो के बचपन के थे उनके साथ.

"माँ, ये देखो वो तोह आपके लिए मैक्सी, सलवार कमीज और नए टॉवेल्स भी लेके आया है. इसमें भी कपडे हे है और ये वाले में सिर्फ dry-fruits. आपकी खैर नहीं अगर अर्जुन इतना सोच कर हे सबकुछ लेके आया है.", आरती ने सब सामान निकल निकाल कर कोमल को पकड़ते हुए कहा. 4 पैकेट तोह सिर्फ आरामदायक कपड़ो के हे थे और कुछ किताबे भी.

"ाचा ाचा सब बाद में देख लेना पहले अपने भाई के लिए दूध बना दो. जी आप ये फ्रेम उस कील पर टांग दो और ये किताबे इधर हे रहने दीजिये.", कृष्णा जी के लिए तोह अर्जुन की लायी हर वास्तु ख़ास थी जो अपनेपन और प्यार से लाया था. नरिंदर जी ने भी 5 फोटो वाला फ्रेम सामने तंग दिया और बड़ी तस्वीर को फ़िलहाल टेबल पर रखते हुए बहार चले गए.

"सही कहती हो चची के वो आपके पास नहीं सोने देने वाला किसी को. लीजिये ये तकिया लगा लीजिये पीठ के पीछे, आपका बीटा तकिया भी अलग से लेके आया है बताओ.", कोमल दीदी ने प्लास्टिक से जैसे हे वो लिहाफ जैसा कपडा बहार निकला, अपने आप हे वो फूल कर नरम तकिया बन गया था. कुछ हे देर में वो कमरा अब कृष्णा जी को अपने shayan-kaksh जैसा लगने लगा था.

"हाँ वो अभी तक कहानियां जो सुनता है. वैसे अब ये कमरा भी वैसा हे लगने लगा है."

"कल तक बिलकुल आपके कमरे जैसा हे होगा चची जी. अर्जुन ने मुझसे कहा था की जिस कमरे में आप रहने वाली हो वह किताबो की रैक लगवा दू और गहरे परदे भी. दिन में खाती नाप ले गया था और कल वो लगा जायेगा. लैंप ये लीजिये और कुर्सी टेबल पहले हे रख दिया था मैंने.", संजीव भैया अंदर आते के साथ हे उस चोको टेबल पर ये ऊँचा स्टडी लैंप रखते हुए बोले.

"मतलब की वो हर चीज पहले हे सोच कर बैठा है? तुम्हे इतना सब नहीं करना चाहिए था बीटा."

"चची जी, मैं तोह अर्जुन का कहा हे कर रहा हु. और सच कहु तोह आपको इन सबकी जरुरत हो या न हो लेकिन फ़िलहाल आपकी जरुरत उसको है. चलिए आरती ने आपके लिए भी दूध बना दिया है और अर्जुन के साथ साथ मेरा भी.", संजीव भैया चची को भी अपने साथ बहार ले आये. अर्जुन ने उनसे भी वचन लिया था के अब वो भी दोनों वक़्त उसके साथ दूध पीया करेंगे और संजीव भैया ने स्वीकार कर लिया था.

"देखते है क्या जरुरत है. फ़िलहाल तोह बस उसको अपना ये समय जीना चाहिए जितना हो सके.", कृष्णा जी को चलना फिरना भी ाचा लगने लगा था बातें करने के साथ. यहाँ अर्जुन नाहा धो कर वापिस आया तोह अगले आधे घंटे तक वो सब हलकी फुलकी बातें करते रहे. कृष्णा जी अमेरिका की बातें बता रही थी और प्रियंका दीदी उन्हें पंजाब वाले किस्से. कैसे रिस्की को सुधारा, रेशम सिंह अंकल ने कितना मान दिया अर्जुन को और आरती ने भी अपने किस्से सुनाये. सबसे ख़ास बात थी की संजीव भैया भी बोल रहे थे और अर्जुन बस सुन्न कर मुस्कुराता या जरुरत पर कुछ पूछ लेता. शंकर जी के साथ नरिंदर जी बहार चले गए तोह ये महफ़िल भी अलग हुई.

"आपके लिए सूप, खिचड़ी और साल्ड ठीक 8 बजे चची जी. उसके बाद बाकी सबका खाना लगा देंगे.", कोमल ने उठने के साथ हे रसोई का रुख किया और अर्जुन भी रोमिला जी से मिल कर आने का बोल निकल गया. तारा और आरती ने अब कृष्णा जी के साथ टेलीविज़न देखने का इरादा बनाया और उन्हें लिए वो बैठक में आ गयी.

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"अंदर मेरे कमरे में चलो अर्जुन. यहाँ ाचे से बात नहीं हो पाएगी.", रोमिला जी ने अब रात को पहने जाने वाला गाउन धारण कर लिया था. रेणुका को विटामिन और जूस देने के बाद वो खुद एक कांच के गिलास में red-wine का लुत्फ़ ले रही थी. उस लगभग पारदर्शी कपडे के भीतर से हाहाकारी यौवन की संरचना नुमाया तोह ाचे से हो रही थी लेकिन अर्जुन ने तनिक भी ध्यान न दिया. दोनों हे इस एकांत में चले आये तोह रोमिला ने कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए अर्जुन को बैठने को कहा. कमरे में परदे बंद थे और एक तरफ लटकी लाइट से thik-thaak सा उजाल था.

"आपको कुछ जरुरी काम था मुझसे?"

"हाँ बहोत हे जरुरी काम था. वाइन तोह नहीं पीते तुम ये मुझे पता है. कुछ लोगे?"

"जी अभी दूध पी कर हे आया हु. वैसे बड़ा हे खूबसूरत चित्र बनाया है आपने ये वाला.", ये एक राजकुमारी की पेंटिंग थी जिसमे किरदार hu-ba-hu विन्नी जैसी थी. ये दृश्यावली बताती थी की रोमिला किस कदर माहिर थी अपने काम में.

"थैंक यू सो मच और सब्जेक्ट विनीता हे है. मैंने तुम्हे यहाँ ऐसे हे काम से बुलाया है अर्जुन और आशा है के तुम समझोगे."

"जी बिलकुल करूँगा अगर मेरे वश में hoga.",Arjun अभी भी aas-pas दिवार के सहारे राखी पेंटिंग देख रहा था. कुछ दृश्य तोह जैसे गाँव के हे थे जहा वो दोनों गए थे.

"ये फोटोग्राफ देखो जरा. ये बस एक अन्सिएंट आर्ट की तस्वीर है. मैं ऐसा हे कुछ करना चाहती हु.", अर्जुन ने ठीक ऊपर जगती रौशनी में ये फोटो देखा तोह बस देखता हे रह गया. सफ़ेद साड़ी जैसा कपड़ा उस अप्सरा के शरीर पर ऐसे लिप्त था के ख़ास अंग नुमाया था निर्वस्त्र. हाथ बढ़ता वो मजबूत योद्धा भी बेलिबास था. रचना बेशक बहोत हे ख़ास और उम्दा थी लेकिन रोमिला ऐसी तस्वीर उसको क्यों दिखा रही है.

"ये खूबसूरत है लेकिन मैं समझा नहीं के इसमें मेरी जरुरत क्या पड़ी आपको?", अर्जुन की ऐसी नादानी और भोलेपन पर पास कड़ी रोमिला मुस्कुरा दी. थोड़ा निचे झुकते हुए जब रोमिला ने भी उस तस्वीर पर हाथ रखा तोह उनका एक मोटा उभर अर्जुन के कंधे पर आ टिका.

"कुछ कहानिया तस्वीरों से हे आगे बढ़ती है अर्जुन. मुझे इस मेल सब्जेक्ट की जगह तुम्हारी जरुरत है. मुझे मालूम है तुम इस अवस्था में 5-6 घंटे नहीं रह सकते और इसलिए बस 8-10 तस्वीरें चाहिए जो पूरी कहानी बयां कर सके.", इतना सुन्न कर अर्जुन के कान गरम हो गए थे. एक तरफ वो मांसल मोटा सतांन जहा टिका था उसकी उत्तेजना, रोमिला के शरीर की ये अनोखी महक और फिर ऐसी तस्वीरों की मांग जहा अर्जुन बाल्यावस्था में हो. गाला सूखने लगा था ये देख कर की रोमिला उस तस्वीर वाले युवक पर अंगूठा फिर रही थी.

"Mainn..main कैसे कर सकता हु ऐसा?"

"घबरा क्यों रहे हो अर्जुन? नुदितय इस कॉमन इन आर्ट. मैं तोह तुम्हारी मदद मांग रही हु और क्या तुम्हे ाचा लगेगा की तुम्हारी mother-in-law इस रूप में किसी अनजाने व्यक्ति के साथ तस्वीर खिंचवाए? मैं औरत हो कर तुम पर भरोसा कर सकती हु क्योंकि तुम मेरा फायदा नहीं उठाओगे लेकिन तुम शायद कुछ और सोच रहे हो. चाहो तोह मैं प्रीती या रेणुका से परमिशन दिलवा देती हु.", अब अर्जुन की हालत कही ज्यादा बुरी हो गयी थी ये दोनों हे नाम सुन्न कर. गलत जवाब दे कर वो किसी को भी ठेस नहीं पहुंचना चाहता था.

"ये सिर्फ आर्ट पर्पस के लिए है? और अगर प्रीती या किसी ने ये सब देखा तोह?", अर्जुन जहा खुद को काबू करने की नाकाम कोशिश कर रहा था वही अब रोमिला ने दूसरा हाथ पीछे से उसके दूसरे कंधे पर लाते हुए जैसे उसको आगोश में हे ले लिए. गुलाब सी सुगंध और इतना नरम एहसास जैसे आज उसकी परीक्षा हे ले रहा था.

"यहाँ सिर्फ तस्वीरें लेंगे और मैं कुछ रफ़ स्केच तैयार करुँगी. इतनी पेंटिंग्स मैं वापिस कैसे ले कर जाउंगी ये नहीं सोचा? मेरे पास वह मेरा अलग art-studio भी है अर्जुन. और थोड़ा ग्रीक कल्चर को भी समझलो, ये शर्म काम हो जाएगी."

"क्या.. क्या होता है वह ऐसा?", ये खुद अर्जुन के शब्द नहीं थे जैसे लेकिन रोमिला की आँखों में अलग हे चमक आ गयी थी. हलके से अपना गाल अर्जुन के चेहरे से लगते हुए उन्होंने वो तस्वीर अपने हाथ में जरूर पकड़ ली लेकिन पीछे न हटी.

"बेटी की पहली रात पर माँ उसके साथ होती है अर्जुन ये सुनिश्चित करने के लिए की वो कोई गलती न करे. और son-in-law का भी पूरा हक़ होता है अपनी mother-in-law को प्यार करने का. लेकिन तुम्हे देख कर लगता है के तुम्हे सिर्फ मेरी हे परवाह नहीं है बाकी जहाँ भर की मदद करते रहते हो.", अर्जुन खड़ा होने लगा तोह रोमिला ने कुछ गलत कदम न लिया. बड़े सलीके से वो बिलकुल अलग कड़ी हो गयी और एक साधारण मुस्कान से अपनी उत्तेजना सफलता पूर्वक छुपा ली. अर्जुन ये समझ न पाया लेकिन आज वो दुविधा में था.

"ये तस्वीरें जब भी लेनी हो आप बता दीजियेगा. मुझे लगता है इनके लिए बैकग्राउंड भी जरुरी होगा और कुछ अलग कपडे भी.", दिल में पहली बार वो रोमिला के प्रति कुछ महसूस कर रहा था लेकिन ये ाचा या बुरा जैसा नहीं था. उसको बस वजह जान नई थी की रोमिला वो दूसरी बात क्यों कर रही थी.

"डीडे कर चुकी है मैं बस तुम्हारी हे हाँ की प्रतीक्षा थी. तुम्हारा वो दूसरा घर इसके लिए बिलकुल सही रहेगा. मैंने 2 दिन पहले हे वो देखा है जब ऋतू मुझे ले गयी थी. परसो शाम को 6 से 8 के बीच. अभी तुम्हे जाना चाहिए क्यूंकि तुम्हारा दिल यहाँ रुकने का नहीं है.", रोमिला सचमुच हे अर्जुन की समझ से परे थे. वो जान गयी थी की उसके मैं में क्या चल रहा है.

"बिलकुल भी ऐसा नहीं है आंटी. मैं बस ये सोच रहा था के आज आपने ज्यादा ड्रिंक की है या वो ग्रीक ट्रेडिशन वाली बात सचमुच है."

"मैं अपने हे दामाद से झूठ बोलूंगी क्या? और डार्लिंग ये मेरा फर्स्ट गिलास हे है वो भी वाइन का. एक बोतल वाइन कोई भी यूरोपियन लड़की या औरत सिर्फ डिनर के साथ ख़तम कर सकती है. तोह कभी जज मैट करना ऐसी चीज के लिए. उमाहहह. सी यू लेटर.", गले से लगाने के बाद एक औपचारिक चुम्बन गालो पर देते हुए रोमिला ने अर्जुन को जैसे शांत हे कर दिया था. अर्जुन ने भी जवाब में उनके गुलाबी गाल पर हलके से चुम्बन करते हुए विदा ली. उसको ये प्रीती ने बताया था की ऐसे गाल पर चुम्बन आपसी प्रेम और इज्जत देने का तरीका होता है. रोमिला ने भी बहार दरवाजे तक साथ दिया और फिर वापिस अपने कमरे में आ गयी.

'ाचे लड़के हो तुम अर्जुन और मैं कभी भी तुम पर शक नहीं कर सकती. प्यार देने वाला गलत नहीं होता और जो गलत होता है उसकी नजरे बता देती है.', रोमिला उसी कुर्सी पर बैठते हुए आराम करने लगी थी, विचारो की दुनिया में जाने के साथ.

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उधर शंकर और नरिंदर का अलग हे काम चालू था जहा होटल के बंद कमरे में उनके साथ भुप्पी, परमवीर, उमेद और राजेश बैठे थे. थोड़े समय बाद हे वह दलीप का भी आगमन हो गया तोह शराब के साथ ख़ास चर्चा भी शुरू हो गयी. जाने यहाँ क्या हो रहा था लेकिन समय आने पर पता लगने हे वाला था.

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"गेट बंद कर दिया है भैया और मैं chachi-maa के कमरे में सोने जा रहा हु.", अर्जुन ने खाने के बाद कुछ समय संजीव भैया के साथ बीत्या और बाकी सभी लड़कियां ऊपर अपने कमरे में जा चुकी थी. आज कोमल दीदी भी वही सोने वाली थी तोह निचली मंजिल पर बस संजीव भैया बैठक में और अर्जुन उनसे विदा ले कर कृष्णा जी के कमरे में आ गया था.

अंदर कमरे में वही लैंप जल रहा था और अर्जुन द्वारा ख़रीदा ये नरम गाउन पहने कृष्णा जी भी बाल बाँध कर आराम से लेती जैसे उसका हे इन्तजार कर रही थी. कमरे में आने के बाद सिर्फ दरवाजा वैसे हे लगाया और बिस्टेर के दूसरी तरफ से चलता वो अपनी chachi-maa के करीब आ लेता.

"आपको समय से आराम करना चाहिए माँ. वक़्त साढ़े 10 हो चला है और शायद आपने अभी वो किताब बंद की है.", अर्जुन ने टेबल पर राखी किताब देख ली थी. कृष्णा जी के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान ने सहमति जाता दी.

"कितना आराम किया है तुझे पता भी है? वो सब छोड़ और अपना हाथ इधर रख.", अर्जुन की ब्याह पर सर रखते हुए वो बिलकुल आराम से साथ लगती हुई सीढ़ी लेट गयी. अर्जुन भी उनके करीब हे रहता था हमेशा.

"ाचा तोह कितना आराम किया आपने? मुझे सब पता है के वह आपका दिल नहीं लगता था और कितने साल उस घर में भी आप सिर्फ बगीचे और किताबो में हे लगी रही. नींद के लिए जब दवा की जरुरत पड़ने लगे तोह मतलब कुछ भी सही नहीं है.", अर्जुन करवट के बल हो चूका था लेकिन हाथ खुद की कमर पर रखे हुए.

"हाँ उसके लिए सॉरी बीटा. तब मुझे लगा की शायद यही ठीक है और ज़िन्दगी कभी कभी अनचाही सचाई सामने ला देती है."

"उस पल में भी क्या आपको मेरी, दीदी की या चाचा की फ़िक्र नहीं हुई? जानती हो की रेखा माँ बोलती नहीं लेकिन सबसे ज्यादा परेशानी उन्हें हे हो रही थी इस से."

"और अब जरा हम तुम्हारी और रेखा की परेशानी की बात करे? रेखा पर हुम्ला हुआ था न अभी हाल हे में? और तुम क्या कर रहे हो अपने साथ? वह तुमने मेरी डायरी पढ़ी लेकिन ये महसूस नहीं किया की उसको लिखने वाली औरत पर क्या बीता होगा? अर्जुन हम सभी एक निशाँ मिलने पर उन कदमो के पीछे चल पड़ते है जहा जवाब हमेशा चैन नहीं देते. लेकिन मुझे वो चैन वापिस मिला जब तुमने प्यार का जीकर किया. बेटे, जीवन में बड़ी से बड़ी घटना भी धूमिल हो सकती है अगर तुम दिमाग को विस्तृत करो.", अब अर्जुन थोड़ा बेचैन होने लगा तोह कृष्णा जी ने उसका दूसरा हाथ अपने पेट के ऊपर रख लिया.

"माँ आप दोनों ने हे इतना सहा लेकिन कोई कोशिश नहीं की बदलने की या सवाल करने की? मैं बेचैन क्यों न हो अगर बात मेरे अपनों पर मुसीबत की हो?"

"तेरे चाचा ने कहने को तोह सबकुछ बताया था मुझे लेकिन उतना हे जितना शायद उन्हें ठीक लगा. रेखा भी बहोत समय तक सब छुपाये रही लेकिन मैंने खुद वो परेशानी देखि तोह दिल टूट गया. साल भर पहले वो फिर से खुश रहने लगी और उसने बहोत कोशिश की मुझे यहाँ बुलाने की. आखिर मैं भी कसम के आगे हार कर आ हे गयी. वो ख़ुशी देने वाले तुम हो और ये नया परिवार जिसकी आत्मा भी तुम हो. अब जितना भी जीवन हो मैं मेरे बचो और इस परिवार में रहना चाहती हु. और मेरा बीटा अब उन कदमो का पीछा नहीं करेगा.", अर्जुन के ललाट को चूम कर कृष्णा जी ने जैसे अपना भरोसा दिखाया और वो चाहती थी की अर्जुन बस वैसा हे रहे जैसा उसकी माँ चाहती है.

"और रेखा माँ पर जो बीती उसका क्या? आपने जो दुःख देखे है क्या वो भुलाये जा सकते है माँ? मैं रुक कर क्या यही देखता राहु की उनका हक़ उन्हें नहीं मिल रहा. दादा जी का सम्मान?"

"रेखा का हक़ तुम हो और तुम्हारे दादा जी का भी. अब तोह मैं भी मेरे बेटे के पास हु. चल मेरी बात में थोड़ा सा बदलाव कर देते है."

"कहिये."

"घर पर सामने से कोई दिक्कत आये तोह मैं तुम्हे नहीं रोकूंगी. तुम उस व्यक्ति को नहीं बदलोगे जबतक वो खुद हे बदलना न चाहे. जैसे सबके साथ प्यार से रहते आये हो अब तुम वैसे हे रहोगे. परेशानी सिर्फ संजीव और अपनी माँ को बताना और हम हल न कर सके तोह फिर अपने दादा जी को. कर सकते हो न ऐसा?"

"आपके लिए मैं ये भी करने को तैयार हु माँ. और मैं जानता हु के अब आप भी ये मरीज जैसी नहीं रहेंगी. मैं फिर से मेरे नियम पर चलूँगा और किसी से बेमतलब नहीं उलझूंगा."

"ये बात फिर घुमा रहे हो. मैंने कहा के उन रास्तो पर नहीं चलोगे जहा निशाँ ढून्ढ रहे हो तुम.", अब थोड़ा ज्यादा हे प्यार से कहा तोह अर्जुन ने भी वचन दे दिया की वो उन रास्तो पर नहीं जाएगा. वैसे भी वो खुद सोच चूका था की सिर्फ जानकारी लेनी है कुछ भी करना नहीं. और शादी तक तोह वो इन सबमे पड़ेगा भी नहीं सिवाए संजीव भैया से बात करने के.

"जो राजकुमार होता है न उसको शिक्षा तभी दी जाती है जब वो अपना सही बचपन जी चूका हो. राजगद्दी के काबिल होने के बावजूद एक सही राजकुमार कभी उसकी चाहत नहीं रखता अर्जुन, वो जनता में रहना चाहता है स्वछन्द. तुम ठीक वही हो और ऐसे हे तुम्हारे चाचा और दादा जी है. बाकी सब तुम तभी समझोगे जब समय आएगा. वैसे ाचा ख्याल रख रहे हो तुम रेखा का.", इतने ाचे विवरण के बाद जो आखिरी बात चची ने कही तोह वो अर्जुन को द्विअर्थी लगी लेकिन उसको पता था के वही गलत सोच रहा है.

"माँ ने भी तोह मुझे सबसे ज्यादा प्यार दिया है न. और आज अगर मैं उन्हें खुश रख सकता हु तोह शायद जीवन का उद्देश्य सही बन्न रहा है. उतना हे प्यार मैं आपसे भी करता हु लेकिन आपने तोह कभी समय बिताया हे नहीं मेरे पास.", अर्जुन की बात पर मुस्कुराती हुई वो उसकी हे तरफ पलट गयी.

"अब मैं तेरे हे पास हु और रेखा को बता दूंगी की 3 दिन उसके और 4 दिन मेरे है अब हफ्ते में तुम्हारे साथ. ये चादर ऊपर लो, हलकी ठण्ड लग रही है.", अर्जुन ने दोनों के सीने तक लिहाफ लिया और सीधा हो कर लेट गया. अब चची हे उसकी ब्याह पर सर रखे लेती थी, जिस्म से सत् कर. दूसरे हाथ से वो उनका सर सहलाते हुए एक अभिभावक की तरह सुला रहा था और जाने कब दोनों की हे आँख लग गयी. ये सुकून इन दोनों को हे जैसे जरुरी था और कृष्णा के लिए तोह कुछ अधिक हे. आज अर्जुन की कृष्णा उसके पास थी जो सही से थाम सकती थी उसको.
 
अपडेट 139

कृष्णा (2)


"राजेश, तू इस तरफ से जा और अगर ठुल्ले (पुलिस) नजर आये तोह भी परवाह न करना. मैं और गज्जू सामने से एंटर करेंगे और दलीप तुझे बैकअप देगा.", गहरी स्याह रात में ये 4 लोग हे थे इस अलग शहर के रईस इलाके में. सामने 40 फ़ीट चौड़ा गेट बता रहा था के ये सोसाइटी ख़ास भी है और आज यहाँ बड़ा कारनामा होने वाला है.

"गोली चलनी पड़ी तोह?", राजेश की कमर के एक तरफ एक महंगी रिवॉल्वर थी और दूसरी तरफ 15 इंच फल वाला घातक खंजर. ऐसी हे तैयारी बाकी तीनो की थी लेकिन उमेद सिंह आज दोनों हे तरफ लम्बे चाक़ू लिए था.

"गोली तभी चलनी है जब मामला हम दोनों के हाथ से बहार हो. तुम्हे पता है न के एक जैसे 3 डुप्लेक्स है, शिकार किसी में भी हो सकता है और गलती होने पर हम चारो का काम हो जाना है. वैसे भी तुम आज तक चीते हो डार्लिंग, खंजर से हे शिकार करोगे.", नरिंदर के ऐसा कहने पर वो दोनों हे अँधेरे में एक तरफ निकल लिए और अब उमेद कार को उस गेट की तरफ ले चला. 2 गार्ड पहरे पर थे जो मुस्तैद दिख रहे थे लेकिन उमेद ने भी प्रवेश की प्रक्रिया पूरी करते हुए दिखाया की वो अपने दोस्त को मिलने हे आये है. गेट पर लगे इण्टरकॉम से फ़ोन मिलाना कर्त्तव्य था उन गार्ड्स का और पहचान बताते हे उन्हें अंदर जाने की इजाजत मिल गयी.

"सही कहा तूने, ये साला शंकर वाला आईडिया अपनाते तोह हो गया था काम. ये ख़ास एजेंसी के लोग पैसे लेने की जगह हूटर हे बजा देते.", नरिंदर ने प्रशंसा करते हुए आगे भी नजर राखी. उमेद सिग्गट सुलगता हुए पूरी तरह चौकस था.

"इसलिए उसको नहीं लाये इन्दर. भोले यहाँ इन्हे हे गोली थोक देता और फिर लग जाते सबके लोडे. अपने मुंशी के नाम से हे मैंने ये प्रॉपर्टी ली थी 2 दिन पहले और वो तभी से यहाँ है. लेकिन उसको साथ ले आते तोह बेहतर रहता."

"नहीं गज्जू ऐसा कभी नहीं होगा के हम तीनो हे एक साथ किसी काम पर जाए. राजकुमार भैया साधारण इंसान है और हमारे दोनों परिवारों को पीछे देखने के लिए हम में से एक का होना जरुरी है. वैसे भी वो बांगड़ू कहा टिका होगा. लिस्ट में जो भी नाम थे वो भुप्पी और सांगवान के साथ उनके पीछे जायेगा. मन कर लो लेकिन उसको समझ कहा आता है.", कार धीमी करते हुए उमेद ने एक घर के बहार 2-3 बार डिपर मारा तोह उसके मुंशी ने भी आँगन की लाइट on-off करके इशारा दे दिया.

"कार यही रहेगी इन्दर और हमको इसके ठीक पिछली सड़क पर पैदल हे जाना है. 2-3 कुत्ते भी होंगे और उन्हें स्वर्ग तू पहुंचना बाकी भाड़े के टट्टू मैं देख लूंगा.", सिग्गट अब नरिंदर ने लेते हुए 2 गहरे काश लगाए और बोतल से पानी का घूँट लेते हुए कुल्ला किया. हर तरफ कतार में घने वृक्ष और रह रह कर आती कुत्तो के भोंकने की आवाज. माहौल सटीक था और ये समय ऐसा था जिसमे अधिकतर लोग गहरी नींद में सोये रहते है.

"अनुमान?", बहोत हलकी आवाज में नरिंदर ने इतना हे कहा और ये दोनों हे एक साथ जुड़े 3 घरो को देख रहे थे जो ठीक सड़क के पार थे.

"20 काम से काम.", उमेद ने ख़ास अंदाज में एक हाथ में उलटी तरफ करके वो खंजर पकड़ा और दूसरे वाले पर रुमाल लपेट लिए. नरिंदर की कमर पर बस एक रिवॉल्वर थी और हाथ खाली. साढ़े कदमो से हे पहले नरिंदर इस 4 फ़ीट ऊँची दिवार के पार उतरा और एक कुत्ते की हलकी गुर्राहट सुनाई देने के साथ हे शांत हो गयी. गेट के एक तरफ कुर्सी पर बैठा आदमी जैसे सिर्फ नींद पूरी करने की ड्यूटी दे रहा था. उमेद के अंदर आते हे कुर्सी पर बैठे आदमी की भी गर्दन लुढ़क चुकी थी और इस बार हड्डी टूटने की आवाज इस सन्नाटे पे ाचे से सुनाई दी.

"बायीं तरफ.", नरिंदर ने बहोत हे धीमी आवाज में जैसे उमेद को बताया के उसको कहा जाना चाहिए.

"तुम?", उमेद पूरी चौकसी से इधर उधर देख रहा था. उसको रखवाली वाले कुत्तो का अंदेशा था लेकिन इधर सिर्फ एक हे मिला वो भी अब दिवार के साथ पड़ा था.

"ये सभी घर अलग नहीं है भाई. जहा हम खड़े है इस रैंप की ऊंचाई बराबर है जिसका मतलब बेसमेंट एक."

"तोह फिर इधर की कुण्डी लगा दे बहार से.", उतनी हे हलकी आवाज में उमेद ने जवाब दिया तोह नरिंदर ने वैसे हे किया.

"अब उस दायी तरफ वाले का क्या करे?", नरिंदर का मतलब साफ़ था के दोनों को हे घर में अलग अलग दरवाजो से जाना होगा.

"ठीक है.", अभी दोनों अलग हुए हे थे की 'धप्प' की आवाज सुनाई दी जो बहोत हे हलकी थी लेकिन थी किसी आदमी के गिरने की.

"राजेश है. चल उसको अपने साथ ले जा.", ये परछाई उनके पास पहुंची तोह उमेद ने भी देख लिया. दोनों हे बायीं तरफ चल दिए और नरिंदर उनको जाता देख वही खड़ा रहा जैसे कोई विचार बना रहा हो. वो दरवाजा बंद था और दोनों वापिस चले आये.

"अंदर से बंद है."

"यही से अंदर चलना पड़ेगा."

"न न. पिछली दिवार से चलते है.", राजेश ने सुझाव दिया लेकिन उमेद ने मन कर दिया.

"इन्दर ठीक कह रहा है और अब कोई बात नहीं करनी. तीनो अलग अलग दिशा में. राजेश राइट, मैं लेफ्ट और इन्दर ऊपर वाली मंज़िल पर.", और इसके साथ हे तीनो दबे पाँव घर में दाखिल हो गए. लम्बे हाल में हे बस हलकी पीली रौशनी थी जहा दिवार पर भोलेनाथ की लाइट वाली बड़ी तस्वीर लगी थी. तीनो हे मुस्कुरा दिए और उमेद ने ऊँगली से अलग अलग होने का इशारा दिया.

राजेश की नजर एक तरफ जमीन पर गद्दा बिछाये सोये व्यक्ति पर पड़ी तोह अगले हे पल राजेश का हाथ उस व्यक्ति के मुँह पर और गर्दन किनारे से किनारे उस खंजर से रेत दी. सचमुच कही चीते से हे रफ़्तार थी राजेश के हाथो में जो खून बहना भी कुछ समय बाद शुरू हुआ. खून से सना खंजर लिए वो वैसे हे आगे बढ़ते हुए हर कमरे को देख रहा था. इस हिस्से में कोई नजर न आया लेकिन अंतिम छोर पर ये रास्ता निचे जाता दिखा. राजेश कुछ सोच कर सीढ़ियों से इस निचले भाग की और चल दिया.

इधर अभी तक उमेद ने 4 सर धड़ से अलग कर दिए थे इस ऊपर वाले हिस्से में और अब वो एक बिस्टेर पर आराम से बैठा इस सोये हुए आदमी को निहार रहा था. एकाएक किसी की जोर की चीख से ये आदमी उठ खड़ा हुआ लेकिन उमेद को बगल में बैठे खंजर साफ़ करते देख चेहरा सफ़ेद हो गया. गेट पर खड़े नरिंदर के हाथ में अवधेश मिश्रा के सुपुत्र भानु की गर्दन थी. वो सचमुच चामुंडा का हे अवतार नजर आ रहा था और इसके बाद तहखाने की तरफ से 'pitt-pitt' की आवाज करीब 5-6 बार सुनाई दी जो सीलेंसर युक्त पिस्तौल की थी. इतनी ख़ामोशी में और dhawani-bandh मकान में ये आवाज सुनाई देना उचित भी था.

"तुम.. तुमसे तोह मैंने समझौता कर लिया था न उमेद? ये धोखा है और इसकी बहोत बड़ी सजा भुगतोगे तुम दोनों और तुम्हारे परिवार.", बेटे की मौत ने जैसे गहरा असर किया था अवधेश मिश्रा पर और अब नरिंदर करीब आ बैठा.

"समझौता? बहनचोद दल्ले, समझौता करवाया था मेरे बाप ने जिस से तू बचा रह सके. लेकिन नहीं तुम तोह बाहुबली हो और गांड में प्लास्टिक के कीड़े है जो मरते नहीं. आज तू जो बकना चाहता है वो बक और तेरे पास है.. उम्म्म. इसने कितने मिनट बोले थे शंकर को जब समझौता हुआ था गज्जू?"

"एक मिनट.", उमेद ने खंजर का नुकीला हिस्सा अवधेश की पीठ पर जहा लगाया था वो ठीक दिल की तरफ जाता था. अवधेश की गांड और ज्यादा फट गयी जब खून से tar-batar राजेश अंदर चला आया.

"क्या टाइम टाइम खेल रहे हो आप दोनों जीजा जी? इस साले की तोह गांड के अंदर पूरी मागज़ीने खाली करने के बाद लुल्ली काट कर इसके हे मुँह में दाल दो. मेरी बहिन पर हुम्ला करवाया था न मादरचोद तूने, देख बेसमेंट में मैंने तेरी नेसल हे साफ़ कर दी. वैसे लुगाई तेरी वह भी नहीं है. कहा है मिश्राइन?", इन्दर भी हालत देख रहा था राजेश की जो अलग हे धूमकेतु बना हुआ था खून में सना और गुस्से से भरा.

"वो... वो.. मुझे छोड़ गयी कल हे.. शंकर के बेटे ने उसको उठवा दिया था 2 घंटे के लिए अपनी ताक़त दिखते हुए.", अब उमेद और नरिंदर के साथ राजेश भी बिस्टेर पर आ बैठा.

"और तू भोस्डिके क्या बना फिरता है? घंटा न है तू मेरे ाँद के बाल. चलो जीजा जी इसका टाइम ख़तम हुआ.", राजेश ने जैसे हे खंजर आगे बढ़ाया नरिंदर ने कलाई पकड़ ली.

"मेरे दोस्त इसके पास अभी 10 मिनट है. फिर तू आराम से इसकी लुल्ली काट या पेट से आंतड़िया निकाल कर उनकी माला इसके गले में पहना. कुछ सवाल है मेरे और इसने सभी के जवाब सही दिए तोह ये ज़िंदा बच जायेगा.", राजेश खामोश हो गया और एक नजर इधर से बहार डाली तोह दलीप सड़क किनारे बैठा बीड़ी पीटा दिखा खम्बे की रौशनी में.

"ज़िंदा छोड़ डोज?"

"मैंने कहा न सच बोलोगे तोह मैं तुम्हे ज़िंदा छोड़ दूंगा. पहला सवाल. तुम्हे रेखा भाभी पर हुम्ला करने के लिए किसने कहा था? बिंदिया का नाम मैट लेना क्योंकि उस से तोह तुम भी कुछ चाहते हो न?", नरिंदर के चेहरे पर हे शांति थी इस कमरे में जो सवाल करते हुए भी बिलकुल संयमित था.

"करम सिंह ने फ़ोन किया था की इस औरत को मारना है बदले में वो तोमर वाले इलाके में मेरा काम संभालेगा जैसे तोमर करता था. मुझे नहीं पता था के वो शंकर की बीवी है."

"करम सिंह मारा गया मतलब तुमसे यही सवाल किसी और ने भी किया होगा?"

"नहीं मेरा यकीन करो नरिंदर ये बात सिर्फ तुम्हे हे बताई है.", अवधेश मिश्रा की हालत ऐसी हे थी की वो झूठ बोल भी नहीं सकता था. खौफ इन्दर की हरकत और बढ़ा रही थी जो भानु के कटे हुए सर को हाथो में घुमा रहा था.

"ब्याह में किसने बुलाया था तुझे वह?", इतना सीधा सवाल शायद कोई और कर भी न पता. नरिंदर जैसे यहाँ आने से पहले हर बात समझ के आया था.

"मुन्नी ने बताया था के बबिता की शादी है उस दिन. वो ये बता देती की बिजेन्दर की बरात वह जा रही है जहा शंकर हे कन्यादान कर रहा है तोह मैं वो गलती नहीं करता. शबनम मुझे अपने कब्जे में चाहिए थी इस वजह से मैं सोच न पाया नरिंदर और ये गलती हो गयी.", अब उमेद और नरिंदर की बत्ती जल उठी थी ये नाम सुन्न कर.

"आखिरी सवाल और ये वाला सबसे जरुरी है. अर्जुन सिंह नाम याद है न तुझे?", नरिंदर की आँखों में खून उतर आया था इस नाम को बताते हुए और अब उमेद हैरान था के ये कैसा सवाल है लेकिन मिश्रा के हाँ में सर हिलाते हे सवाल पुछा.

"वो मेरा अजीज भाई था मिश्रा और 25 साल से मुझे ये सवाल परेशां कर रहा है. गलत जवाब का नतीजा होगा तेरे पूरे कुनबे का सफाया. यहाँ कोई रामेश्वर शर्मा और सारंग कुमार नहीं है ध्यान रखना. उस दिन जो आदमी वह मारे गए थे वो किसके थे? क्या जानते हो उस दुर्घटना के बारे में?", नरिंदर ने राजेश के हाथ से वो खंजर लेते हुए मिश्रा की छाती के ठीक बीच में रख दिया था. बहार सड़क पर दलीप पूरा मुस्तैद था और यहाँ अंदर फ़िलहाल ये 4 लोग हे थे.

"घटना से एक दिन पहले शाम को भवानी और फ़तेह मिले थे. उन्होंने बताया था के शंकर और मुन्नी को ख़तम करना है. तब मैं वही था #### शहर में. अगले दिन 11 बजे मेरे पास सुंडी और चंदरभान आये थे और उन्होंने बताया था के क्या करना है. दिक्कत थी की अब वह अर्जुन सिंह को ख़तम करना था. मेरे 10 आदमी गए थे इस काम पर लेकिन कोई वापिस नहीं आया. चन्दर ने मुझे बताया था की उन्हें इस बीच अर्जुन के छोटे भाई शीलू को भी मारना पड़ा जिसने उन्हें देख लिया था.", इस बयान से उमेद का दिल दर्द से भर उठा. उसके छोटे भाई को ज़िंदा जलने वाला शक्श चंदरभान था जो इतने दिनों तक ज़िंदा रहा.

"तेरी माँ की साले हिजड़े.. शीलू बचा था कमीने.. ", उमेद ने खंजर के साथ साथ रिवॉल्वर निकल कर मिश्रा की कनपटी पर लगायी तोह नरिंदर ने ना में सर हिला दिया.

"मेरा जवाब अभी भी नहीं मिला है मिश्रा. अर्जुन सिंह की हत्या धोखे से की गयी थी और वह आम के बगीचे में तेरी रुद्राक्ष की टूटी माला मिली थी मुझे. अज्जू ने बताया था के अब आम तोड़ने मुझे अकेले जाना होगा. सर्दी में ना आम होते है और न बगीचों में कोई जाता है. मतलब तुझे सबकुछ पता है न मिश्रा? वो बंद स्कूल, रेल की पटरी और आम के बगीचे बराबर हे होते थे उस समय. नाम चाहिए मुझे और सभी.", नरिंदर के हाथ का दबाव जैसे जैसे खंजर पर बढ़ रहा था मिश्रा की सफ़ेद बनियान पर खून के लकीर भी गहराने लगी थी.

"आह्हः.. तुम छोड़ डोज तोह भी मुझे मौत हे मिलने वाली है. आह्हः.. उसके बाद तुम सब भी मारे जाओगे.. ", मिश्रा की आवाज लड़खड़ा रही थी और दर्द हर गुजरते पल के साथ बढ़ रहा था.

"मैंने कहा न के तेरे कुनबे का हे वजूद मिटा दूंगा अगर जवाब न मिला तोह. मेरी परवाह मैट कर बस अपने वंश की परवाह कर, सब इतिहास में दफ़न हो जायेगा तेरी एक गलती से.", उमेद जाने कैसे खुद को रोके था लेकिन अब उसको भी वो नाम हर हाल में जान ने थे.

"आह्हः.. बगीचे में वो माला बिंदिया ने तोड़ी थी.. आह्हः.. वो मुझे रोक रही मुन्नी से मिलने से.. फ़तेह, सुंडी, आह्ह्ह्ह.... वह नहीं दिखे थे और चन्दर अपने दोस्त के साथ बेहोश मुन्नी को ले कर स्कूल से निकल गया था. ट्रैन के उस पार कौन था मुझे नहीं दिखा लेकिन सारंग उसको अपने साथ ले कर दूसरी तरफ से गाडी में निकल गया था. अर्जुन सिंह ने बहोत से लोगो को मारा था लेकिन लाशें गायब कर दी गयी थी. आह्हः.. सारंग सब जानता है नरिंदर लेकिन तुम उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकते और न तुम्हारा baap..ahhh.", ावदेष मिश्रा के इतना कहते हे नरिंदर चाक़ू हटा लिया. बात फिर वही रुक गयी थी जहा फ़िलहाल कोई रास्ता जाता न दिखा.

"राजेश, कर ले अपनी मर्जी. मिश्रा देख ले मैं तुझे नहीं मार रहा.", और इतनी देर से पीठ पर खंजर दबाये उमेद ने एक पल में वो दिल के आर पर कर दिया मिश्रा के. राजेश ने भी उसके चीखने से पहले हे गाला हलाल कर दिया था. खुली आँखों से नरक का सफर तय करना था मिश्रा को. और भारी मैं से नरिंदर घर से बहार निकल चला. राजेश और उमेद सिंह ने बहार निकलने से पहले बिजली के तार आपस में जोड़ दिए थे और रसोई में लगा चूल्हा भी खोल दिया था. अब ये चारो हे अँधेरे में उस तरफ निकल चले थे जहा एक दूसरी कार पहले हे कड़ी थी. ये उमेद की हे मेरसेदेज़ थी जो मुंशी के घर कड़ी थी. मुख्यद्वार से बहार निकलने के बाद भी करीब 5 मिनट लगे होंगे पूरी सोसाइटी में वो भीषण धमाका होने में. चप्पा चप्पा हिल गया था उस गर्जना से लेकिन वो बहार निकलते वक़्त न कोई एंट्री थी और न उस रस्ते पर बैरियर. 5 मिनट में वो कार 8-10 किलोमीटर दूर जा चुकी थी और पीछे छोड़ गयी थी करीब 20 लाशो के चीथड़े.

"तुम अब तक उस मामले की जांच में लगे थे इन्दर?", कार में अब एक साथ 2 सिग्गट जल रही थी और भारी ख़ामोशी जिसको उमेद ने हे भांग किया.

"मरते दम तक करता रहूँगा गज्जू और ये भी एक वजह थी की मैं शंकर को यहाँ नहीं लाया. मुन्नी और बिंदु इस सबमे अप्रत्यक्ष शामिल जरूर है लेकिन कुछ और लोग भी थे उस अपराध में. मिश्रा पर मेरी नजर थी लेकिन इन्तजार था के वो हरकत करे कुछ. चंदरभान तुमने थोक दिया जो मेरी लिस्ट में सबसे ऊपर था और अब ये साला करम सिंह भी चला गया.", नरिंदर की हताशा बहोत कुछ बता रही थी. दिन निकलने हे वाला था कुछ समय में और खाली सड़क पर कार 170-180 पर दौड़ रही थी.

"जीजा जी, इस सारंग की भी लुल्ली काट देते है. वो कौनसा तोपची है कही का.", राजेश उत्तेजना में बोल तोह गया लेकिन दलीप ने पीठ थापक दी.

"वो फ़िलहाल नामुमकिन है राजेश. सारंग कुमार से टकराव मतलब दोनों हे तरफ लाशो के ढेर और शायद हम एक जान के जाने का जोखिम भी नहीं ले सकते फ़िलहाल. वो ऐसा व्यक्ति जैसे पापा लेकिन उतना हे विपरीत. न हम दिमाग में उसके सामने टिक सकते है न घेराबंदी करके कुछ उखाड़ सकते है उसका. अब समस्या ये है की मधुलता से जानकारी मिलेगी नहीं क्योंकि वो तोह बेहोश थी और बिंदु की बेटी हमारे आदरणीय पिता जी ने वापिस भिजवा दी. ओह बहनचोद. दलीप तुम्हे पता है इस मामले का कुछ?", एकदम हे नरिंदर चौंक उठा ये याद करते हे.

"हाँ इतना पता है के ये फैंसला चाचा जी का नहीं था और ज्यादा बेहतर हमे बिट्टू या संजीव से पता चल सकता है के सब क्यों हुआ.", दलीप के जवाब पर उमेद बीच में हे बोल उठा.

"ये काम जरूर अर्जुन का होगा इन्दर. वो कल दिन में मिलने गया था शबनम से संजीव के साथ."

"कौनसे कल? आज नया दिन है."

"हाँ मतलब परसो वो गया था और कल जब संजीव शबनम से स्टेटमेंट लेने गया था उसके जाने से पहले तब भी अर्जुन साथ गया था अपने बड़े भाई के. और तुम्हारा ध्यान इस तरफ नहीं गया के अर्जुन ने मिश्रा की बीवी हे उठवा ली थी किसी से?", उमेद के इस जीकर से राजेश भी गर्दन हिलने लगा.

"छोटे मियां तोह अपने बाप से भी आगे जा रहे है. इस लड़के का तोह मेरी समझ से हे बहार है जीजा जी. स्कूल का लड़का और ऐसे gaand-pange जो हम भी करने से पहले टीम बना कर सोच विचार करने के बाद हे करते है."

"अर्जुन किसके साथ रहता है ये बड़ी बात है राजेश. और जैसा सुन्न रहा हु के वो सभी परिवारों में एक बड़ी पहचान बना रहा है तोह इसका मतलब साफ़ है की वो इस कार में बैठे लोगो से ज्यादा जानता है और उसका नेटवर्क पापा जैसा हे होगा. Chor-uchakke भी तोह पंडित जी के लिए काम करते थे पुलिस के साथ साथ. चलो उसके सामने कुछ जीकर मैट करना, वो फ़िलहाल अपनी 2-2 माओं के साथ ममता की छाँव में रहेगा. लेकिन संजीव से जानकारी जरूर मिलेगी."

"संजीव से बात तुम्हे हे करनी होगी इन्दर और फ़िलहाल सभी को दुरुस्त हो जाना चाहिए. ये रेस्टहाउस मेरा हे है और सभी कपड़ो को जलना उचित रहेगा.", उमेद ने हाईवे से थोड़ा अंदर की तरफ बंद पड़े एक घर के सामने कार रोक दी थी. लाल char-diwari के अंदर सिर्फ घने वृक्ष हे नजर आ रहे थे 2 हॉर्न बजने पर एक बुजुर्ग ने वो कला गेट खोल दिया.

"काका, काकी को बोल के चाय रखवा दो थोड़ी देर तक.", उमेद ने आधा शिक्षा निचे करके हिदायत दी और ईंट के गलियारे में कार आगे बढ़ा दी. बूढा व्यक्ति इस घर की बगल में हे बानी अपनी कोठरी की तरफ चल दिया.

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अर्जुन की नींद मैं की घडी से ठीक साढ़े 4 बजे हे खुल गयी थी. आगोश में चैन से सोई अपनी chachi-maa का चेहरा देख कर बड़े ध्यान से उनका माथा चूमने के बाद वो सावधानी से उठ खड़ा हुआ. कमरे में ठंडक देखते हुए सबसे पहले एक का तापमान बढ़ाया और कृष्णा जी के हाथ के निचे तकिया रखता वो बहार निकल गया. घर में इस वक़्त पूर्ण सन्नाटा था और बहार वाले बाथरूम का प्रयोग करने के बाद अर्जुन अपने कमरे में तैयार होने लगा. इस वक़्त दिमाग में chachi-maa की कही बातें चलने लगी थी और अर्जुन को भी उनका कथन सही लगा, फ़िलहाल वक़्त और माहौल के madde-najar.

अलमारी में राखी अपनी माँ की वो 15-16 साल पुराणी तस्वीर देखने के बाद अर्जुन का मैं अब पूर्ण शांत हो चूका था. जूते पहन कर वो घर से बहार निकल चला और वही प्रियंका दीदी भी आज समय से पहले हे उठ गयी और कमरे से निकल कर निचे अपनी माँ के बराबर जा लेती. उनका भी गहरा जुड़ाव था अपनी माँ के साथ.

"अर्जुन कुछ जल्दी हे नहीं उठ गया पिंकी?", कृष्णा जी ने करवट लेते हुए अपने बेटी के सुन्दर मुखड़े पर हाथ फिराया तोह प्रियंका भी माँ के स्नेह से मुस्कुरा दी.

"वो रोज हे इस वक़्त या इस से पहले उठ जाता है मम्मी. आपको नींद सही से आयी?"

"कही ज्यादा ाचे से और वो भी बिना दवा लिए. तुम भी इतनी सुबह उठने लगी हो क्या?", कृष्णा जी का व्यवहार घर के बड़े बचो के साथ बहोत हद्द तक दोस्ती वाला था और यही खूबी उनके पति नरिंदर जी की भी थी. और प्रियंका तोह अपनी माँ की संभल 5 सालो से कर रही थी तोह रिश्ता और दोस्ती कही ज्यादा मजबूत हो गयी थी.

"आज मेरी बारी थी जल्दी उठने की लेकिन घर में काम हे नहीं है तोह आपके पास आ गयी. कल भी कहा रह पायी मैं आपके पास सारा दिन तोह सोचा सबकी चाय बनाने से पहले 2 घडी आपके पास लेट जाऊ."

"मेरी बची मैं जानती हु तुम सबसे ज्यादा प्यार मुझे हे करती हो और परवाह भी मेरी हे रहती है. अब फ़िक्र मैट करना यहाँ तुम अकेली नहीं हो अपनी माँ को सँभालने वाली और न अब मैं खुद को बंद रखूंगी. वैसे क्या ड्यूटी बनाई हुई है तुम लोगो ने?", ये सवाल उन्होंने थोड़ा हँसते हुए कहा क्योंकि उन्हें तोह ये पता था की घर की ज्यादातर लड़कियां laad-pyaar या पढाई की वजह से देरी से उठती है.

"ये रूल तोह कोमल ने बनाये है माँ. वो हर रोज बड़ी माँ (रेखा) के उठने के साथ हे उठ जाती है और माधुरी दीदी को ज्यादातर काम से हटा दिया है. उनके साथ एक एक दिन बाकी सभी उठ कर रसोई और बाकी काम देखती है. आज मेरी बरी है जो हफ्ते में 2 बार है. लेकिन अलका, तारा, आरती, ऋतू और रुपाली भी अपने दिए हुए दिन पर काम करती है. और सच कहु तोह यहाँ आप सोच भी नहीं सकती की कितना कुछ है.", प्रियंका जैसे खुश थी और वो चाहती थी की माँ उसकी खुसी की वजह पूछे.

"कोमल बिलकुल रेखा जैसी है पिंकी. वो अपनी दिनचर्या नहीं बदलती लेकिन बाकी सबको अपने साथ बराबर रखती है ज्यादा परेशानी दिए बिना. वैसे ये ऊपर वाले पिछले हिस्से में सब लड़किया रहती है क्या?"

"वह आरती, अलका, ऋतू और तारा का हे राज है माँ और रुपाली उनके साथ पढाई भी करने वही जाती है. अब कोमल भी ऊपर हे चली गयी है आखिरी कमरे में और मैं बगल वाले कमरे में माधुरी दीदी के साथ, फ़िलहाल. आपने आरती में बदलाव देखा न माँ?", ये सही बात कही थी प्रियंका ने और कृष्णा जी के चेहरे पर एक ख़ुशी थी सी सवाल को सुन्न कर.

"हाँ. वो अब बिलकुल वैसी हे लगती है जैसी मैं हमेशा चाहती थी. और ये कमाल किसने किया है? अर्जुन या कोमल ने?"

"प्रीती, तारा, ऋतू और अलका ने माँ. वैसे वो सभी न एक दूसरे से हर चीज सीखती है जो किसी में बेहतर हो. तभी तोह कह रही थी की यहाँ एक नया हे माहौल है और आप भी गलत नहीं हो क्योंकि अर्जुन ने हे ऋतू अलका को कहा था के वो लोग अपना एक अलग व्यक्तिगत भाग बनाये. अब तोह अलका और तारा ने सबको एक्सरसाइज की आदत भी लगा दी है जहा दादा जी ने रनिंग करने वाली मशीन भी लगवा दी है उनके लिए."

"हाहाहा. गर्ल्स हॉस्टल जैसा कुछ. सचमुच ाचा लगा के maa-papa भी बचो को सपोर्ट कर रहे है बिना लड़का लड़की के फरक किये. वैसे माँ जी को भी ऐसे हे बचे पसंद है जो हिम्मत वाले हो लेकिन पापा (पंडित जी) यकीन करते है ाची शिक्षा, उचित फैंसले और संगठन में. मुझे ख़ुशी है सभी बचे मिल कर एक दूसरे को पूरा कर रहे हो. ाचा अब मैं भी उठती हु और अब से मेरे काम मुझे हे करने देना.", कृष्णा जी बिस्टेर से उठी तोह साढ़े 5 का समय होने वाला था और कोमल भी नाहा धो कर रसोई में एक तरफ दूध उबाल रही थी और दूसरी तरफ चाय की पतीली रखे थी. चची को बहार आता देख वो भी उनकी तरफ चली आयी.

"आपको आराम करना चाहिए था न चची."

"क्यों मैं मरीज हु क्या गुड़िया? हर काम बचो को नहीं करने देने अबसे. मैं नाहा लू फिर तुलसी में जल देने के बाद अर्जुन का दूध मैं बनाउंगी, बस आज बता देना के वो किस अनुपात में बनाते है.", कृष्णा जी कोमल के सर पर प्यार से हाथ फिरने के बाद बाथरूम में चली गयी, साफ़ कपडे साथ लिए.

"चची ने रसोई में कदम रखा तोह कही दादी हमको हे न सजा सुना दे.", कोमल की बात पर प्रियंका हँसते हे ना में गर्दन हिलने लगी.

"कर लेने दे माँ को अभी जो करना है. बड़ी माँ और ताई जी के आने के बाद उन्हें कोई हिलने भी न देगा. वैसे सचमुच कितना अजीब लगता है न घर में जब इतने लोग बहार चले गए हो तोह?", दोनों हे रसोई में चली आयी और अब चाय में दूध प्रियंका दाल रही थी.

"हाँ क्योंकि तुमने ये बहोत काम देखा है न जबसे आयी हो. लेकिन माहौल तोह ऐसा कई सालो से था. खरी अब ये ऐसे हे ाचा रहने वाला है और chacha-chachi के आने से तोह कही ज्यादा बेहतर.", कोमल स्लैब पर गीला कपडा मारते हुए सफाई करने के साथ साथ बात कर रही थी और अब आरती तारा भी नाहा धो कर आ गयी थी.

"तुम दोनों एक साथ नहाती हो क्या?", प्रियंका के अचानक ऐसे सवाल पर कोमल भी हैरत से देखने लगी लेकिन वो दोनों मुस्कुरा रही थी.

"दीदी ऊपर न 2 बाथरूम है और अगर साथ नाहा भी ले तोह दिक्कत कैसी? बस ये आरती हे शर्माती है, अलका को इशारा करो तोह वो मुझसे पहले बाथरूम के अंदर.", तारा की बात से आरती के गाल लाल हो चुके थे और बाकी दोनों सर झटकती हुई मुस्कुरा रही थी.

"ये तारा फिर भी थोड़ी समझदार है लेकिन आपने अभी Ritu-Alka को नहीं देखा दीदी. मैं तोह एक बार उनके बीच सोई थी जिस दिन रुपाली मेरी जगह सो गयी थी तारा के साथ पढ़ते हुए. आप सो कर देखना बस, बता नहीं सकती.", आरती इतना कह कर कटोरे में भीगे बादाम छिलने लगी और तारा भी हंसती हुई उसके साथ लग गयी. इनका masti-majaak ऐसा हे था जब ये लोग साथ होती थी.

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आज पार्क में आधा घंटा व्यतीत करने के बाद आचार्य जी अर्जुन को साथ लिए अपने घर चले आये. यहाँ उन्होंने अपने घास वाले क्षेत्र में हे कुछ पौधे एक तरफ रखे हुए थे और इस तरफ आते हे वो नटखट लैब्राडोर जॉय भी अर्जुन को देख कर उछलता कूदता हुआ आ गया.

"हे दोस्त. तुम सचमुच बड़े प्यारे हो और आज हम साथ में खेलेंगे.", अर्जुन वही घास पर घुटने टिकता हुआ जॉय के साथ अठखेलिया करने लगा और आचार्य जी उन दोनों की मस्ती देख खुश होते रहे. जॉय अर्जुन के चेहरे पर हर तरफ प्यार जताता हुए अपने दोनों पंजे उसके कंधो पर टिकाये थे.

"अरे भाई, आज हम तुम्हारे स्टूडेंट है और तुम हो की इस गंदे बचे के साथ खेल रहे हो. जॉय, तुम भी यहाँ बैठो.", सचमुच जॉय बहोत समझदार जीव था जो इतना कहते हे घास पर आराम से बैठ गया. हिमानी भी 2 जोड़ी रबर के दस्ताने, खुरपी और पानी देने वाला फुहारा लिए इनकी तरफ आ गयी. वो हमेशा की तरह ढीली टीशर्ट जो पूरी आस्तीन की थी और एक खिलाड़ियों वाला चुस्त पजामा पहने थी. बाल सलीके से सर के पीछे जुड़े में बंधे थे और इस साधारण अवस्था में भी वो बेहद हसीं नजर आ रही थी, ताजगी से भरी. अर्जुन ने बस एक पल देखने के बाद 'hello' कहा और खुरपी ले कर आचार्य जी की तरह आ बैठा. ये चोकर हिस्सा एक फ़ीट की संगेमरमर की पट्टी से घिरा और बड़े हे संभाल कर रखा गया था. घास जैसे समय समय पर एहतियात से हे छाती जाती थी.

"ये वाले 2 पौधे तोह आम के है और ये बैल है रात की रानी की. ये वाला हिबिस्कुस है, ये अमरुद और तुम्हारे पास वाला निम्बू जो beej-rahit प्रजाति है. लेकिन ये कसिए लगेंगे मुझे कोई आईडिया नहीं है.", आचार्य जी बता रहे थे और अर्जुन उन्हें पहले हे पहचानता था और निम्बू वाले पौधे की सुगंध ले रहा था.

"ाचे भले घास के मैदान को आप सचमुच हे झाड़ियों से भरना चाहते हो?", इतना कहता वो उस पत्थर की पट्टी से घास की दिशा में जैसे एक लम्बाई मापने लगा.

"यार कैसे व्यक्ति हो भाई तुम? ये घास तुम्हे jivan-dayni लगती है क्या? मुझे तोह यहाँ अभी बहोत कुछ लगाना है लेकिन पहली शुरुआत तुम करो और मुझे बताओ हर चीज बेसिक से. हिमानी तुम भी गौर करना बेटी जो भी आज हमारे बागवानी के गुरु जी समझाए.", अर्जुन उनकी बात पर हंसने लगा और खुरपी से एक तरफ की घास छिलने के साथ पूछने लगा.

"यहाँ मिटटी कुछ गहरी तोह है न दादा जी? ऐसा तोह नहीं की इस हिस्से में सिर्फ घास के लिए हे मिटटी लगायी गयी है."

"न बीटा यहाँ सब मिटटी हे है और जहा ईमारत है बस वही नीव (बेस) बिछाई गयी है या chaar-diwari वाली जगह. 8 फ़ीट मिटटी का भराव तोह मैंने हे करवाया था इस जगह बगीचे की उम्मीद में. वैसे तुमने ये लम्बाई क्यों मापी?"

"पटरी को बचने के लिए दादा जी. जड़े तोह फैलेंगी हे न और इस तरफ हम सदाबहार पौधे हे लगाएंगे जो की ज्यादातर आप लाये हो. रात की रानी उधर दिवार के पास ठीक रहेगी क्योंकि वह बड़े वृक्ष है तोह छाया भी मिलेगी और बढ़ने के लिए सहारा भी रहेगा."

"तुम्हे ग्लव्स pehan-ne चाहिए अर्जुन. क्या पत्ता यहाँ मिटटी कैसी हो और इन्फेक्शन भी हो सकता है.", हिमानी ने वो दस्ताने बढ़ाये तोह अर्जुन ने ना में सर हिला दिया.

"इन्फेक्शन मिटटी से होता तोह यहाँ ये घास भी नहीं होती और वो पेड़ भी नहीं. आपने खेत नहीं देखे न अभी यहाँ के, वह तोह लोग कीटनाशक छिडकने के बाद भी मिटटी पर भरोसा रखते है. ाचा इतनी गहराई ठीक है और ये कट्टा जैविक खाद का है न.?", अर्जुन ने खुरपी से हे बोरी को उधेड़ कर एक तरफ खाद का ढेर लगते हुए निकली हुई मिटटी में उचित भाग मिला दिया, आचार्य जी को समझते हुए. पौधे के बहार लिप्त प्लास्टिक हटा कर पहले कुछ मिश्रण गद्दे में भरा और फिर पौधा सही से रखने के बाद आसपास ाचे से बाकी मिश्रण भी भर दिया. फुहारे से हल्का छिड़काव करने तक उन्हें इस क्रिया में हे 15 मिनट लग चुके थे.

"नहीं नहीं.. आप खाद को बिना दस्ताने हाथ मैट लगाइये दादा जी. देखिये इसमें कुछ भी हो सकता है और मैं खुद भी सावधानी से कर रहा था क्योंकि मुझे आदत है. ये ग्लव्स पहन लीजिये पहले फिर जैसे मैंने नरम किया था वैसे हे करने के बाद मिटटी के बराबर हे मिलाये.", अर्जुन द्वारा ऐसी परवाह देख वो गदगद हो गए. अर्जुन ने खुरपी से हे खाद के कुछ ढेले टॉड कर बारीक किये तोह कही ढक्कन, प्लास्टिक के टुकड़े और वैसा हे कचरा थोड़ा बहुत दिखाई दिया.

"तोह तुम्हे इसकी भी समझ है के इसमें क्या निकल सकता है?", आचार्य जी हर चीज गौर से देख रहे थे.

"निकलने को तोह इसमें सांप भी निकल सकता है दादा जी लेकिन उस से ज्यादा खतरनाक हो सकता है कांच का टुकड़ा. अब खाद तोह बनती है गोबर, छिलके, पत्ते, गले सादे sabji-phalo से लेकिन लोग और भी कचरा गिरा देते है उधर. बस ये ध्यान में रखना पड़ता है और मैं इसलिए हमेशा पहले इसको नरम करता हु. वैसे अगर आप चाहे तोह यहाँ कुछ तैयार किये हुए थोड़े बड़े पौधे लगाना बेहतर रहेगा जिस से फूल और सब्जी के बैल जल्दी पनप सके. ये छोटे पौधे तोह June-July की धुप में खराब हो सकते है.", अर्जुन उन्हें सब जानकारी दे रहा था और हिमानी अपने नरम हाथो से गद्दा खोदने की कोशिश करने लगी.

"हाँ तोह फिर उसके लिए कब चले और कहा से मिलेंगे ऐसे पौधे भाई? और ये जॉय क्या कर रहा है?"

"ये ठंडी मिटटी के ऊपर पेट रख कर मजे ले रहा है दादा जी. घास हटने दो ये यही गद्दे कर देगा अगर ध्यान नहीं दिया तोह. हाहाहा.. वैसे अभी थोड़े दिन पहले हे छोल दादा जी ने भी मंगवाए थे कुछ पौधे नर्सरी से लेकिन हम ऐसा करते है की संडे सवेरे हे यूनिवर्सिटी वाली नर्सरी चलते है. सभी पौधे खुद हे पसंद करेंगे और वो लोग ट्राली या रेहड़ी से उन्हें यहाँ पंहुचा भी देंगे, साथ हे लगवाने में मदद भी कर देंगे. उसके बाद तोह मैं और आप मिल कर यहाँ गुलाब हे गुलाब भर देंगे एक तरफ.", अर्जुन की ख़ुशी देख हिमानी भी मुस्कुराई और अर्जुन ने उसके हाथो से खुरपी लेते हुए तेजी से वो गद्दा बिलकुल हे गोलाई में बना दिया.

"चलो ऐसा हे सही फिर और तुम्हे गुलाब से कितना लगाव है वो मैं देख हे चूका है. कुछ मेरी पसंद की नस्ले भी है और अगर तुमने वो यहाँ उगा दी तोह समझ लो मुझे एक और वजह मिल जाएगी घर रहने की. लाओ अब ये अगला गद्दा मैं करता हु.", इन बातों के बीच हे अगले घंटे में सभी पौधे लगा दिए थे इन्होने और उधर हे लगे नल पर अर्जुन हाथ मुँह धोने लगा तोह हिमानी ने अंदर चल कर साफ़ करने का सुझाव दिया.

"यहाँ की मिटटी यही रहने देते है और ऊपर से घर गन्दा करना ठीक नहीं हिमानी जी. हाँ हाथ साफ़ करने के लिए कोई कपडा हो तोह दे दीजिये.", अर्जुन के टोलिया मांगने पर सामने के दरवाजे से चलती हुई ये 36-37 साल की महिला इधर आ गयी जिनके हाथ में 2 तोलिये थे और पीने के पानी की बोतल भी.

"गुड मॉर्निंग आंटी.", अर्जुन ने टोलिया लिया तोह वो महिला मुस्कुरा दी.

"गुड मॉर्निंग बीटा. वैसे तुम जानते हो मुझे?"

"हाँ, दादा जी ने तस्वीर दिखाई थी जब मैं कार्ड देने आया था यहाँ. आप प्रेरणा जी है न हिमानी की मामी जी?", अर्जुन ने हाथ और चेहरा पौंछने के बाद टोलिया उन्हें वापिस देते हुए पटरी पर बैठ कर जूते पहन ने का उपक्रम किया तोह प्रेरणा जी बड़े ध्यान से अर्जुन को निहारने लगी. हिमानी टोलिया ले कर एक तरफ चली गयी थी अभी आने का बोल कर.

"बिलकुल ठीक पहचाना तुमने और मुझे भी ाचा लगा तुम्हे यहाँ देख कर. पिछली बार तुम्हे जब देखा था तब तुम गेट से अंदर भी नहीं आये थे. मुझे ख़ुशी है के पापा अब घर भी रहते है और खुश भी. हिमानी ने भी तुम्हारे बहोत से किस्से सुनाये है पिछले दिनों में तोह मेरी भी इत्छा हुई मिलने की."

"आप मिली हे नहीं आंटी जी इधर. मैं 3-4 बार आया हु लेकिन आप लोग बहार थे उस समय. ाचा अब मैं चलता हु और आपको समय मिले तोह हिमानी के साथ हमारे घर जरूर आइयेगा, शादी में तोह आप सभी लोग आने वाले है.", अर्जुन खड़ा हुआ तोह उधर से आचार्य जी भी उनकी और चले आये.

"इतनी जल्दी नहीं भागने दूंगा बरखुरदार. बिना नाश्ते के तोह जाना मुमकिन नहीं आज."

"दादा जी, आज के लिए शमा चाहता हु क्योंकि घर पर बाकी लोग नहीं है और चची जी अभी इलाज करवा के वापिस आयी है तोह उन्हें भी देखना होगा. लेकिन dada-daadi जी के आने के बाद ये नाश्ता मैं आपके साथ जरूर करूँगा.", अर्जुन का उत्तर भी किसी की परवाह दिखा रहा था जिसके लिए आचार्य जी चाह कर भी रोक न पाए.

"भगवन उन्हें पूरा स्वस्थ्य प्रदान करे और अब तुम उनकी देखरेख कर रहे हो तोह निसंदेह वो जल्द हे बेहतर हो जाएँगी. वैसे कल तोह मैं भी तुम्हारे पिता और चाचा से मिलने वाला हु. संडे को हमने यूनिवर्सिटी जाना है तोह पहले यहाँ नाश्ता फिर काम.", उनकी बात मानते हुए अर्जुन ने आशीर्वाद लिया और प्रेरणा को भी नमस्ते करने के बाद अपने घर की तरफ निकल चला.

"वो चला गया क्या? मैं तोह पूछने आयी थी की वो अभी यहाँ कितनी देर है?", हिमानी ने आते हे अर्जुन को नदारद देखा तोह चेहरा उतर गया.

"चली जाना तुम उनके घर और अगर मेरा चक्कर लगा तोह मैं छोड़ दूंगा तुम्हे वह. चलो बहु आज तुम्ही अदरक शहद का काढ़ा बना दो, इतने मैं मेरे बचो को नाश्ता खिला दू.", घर के अंदर प्रवेश करते हुए जॉय भी उन के साथ हो लिया.

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"अर्जुन, अब थोड़ा समझदारी से का लेना कही फिर से फालतू दिमाग चलने लगे अपना. काम से जा रहा है और बहिन भी साथ है.", घर आने के बाद अर्जुन काफी देर तक अपनी चची माँ के साथ हे रहा था और नाश्ते पर भी दोनों हे साथ थे. किसी और को तोह पता भी न था के ये दोनों क्या क्या बातें कर रहे है लेकिन कमरे से टेबल तक आने पर भी कृष्णा जी बस अर्जुन से बातें कर रही थी. वो तैयार हो चूका था और कोमल दीदी ने हे उसके कपडे एक बैग में रख दिए थे आरती के बैग के साथ हे.

"आपको क्या मैं शिकायत का मौका दे सकता हु चची माँ? मैं आराम से जाऊंगा, सारा काम ठीक से करूँगा और फिर कल सवेरे हे जल्दी वापसी के लिए चल पडूंगा.", अर्जुन संजीदा था इस वक़्त जैसे उम्र से कही ज्यादा हे बड़ा हो और नाश्ता शुरू हे किया था की बहार से गाडी के अगले आँगन में आने की आवाज हुई.

"लगता है तेरे चाचा और पापा है.", कृष्णा जी उठने लगी तोह अर्जुन ने वापिस अपने पास हे बैठा लिया.

"दादा जी आ गए है और ये सफारी की आवाज है मतलब बाकी सब भी उनके साथ हे आये है. आना तोह सभी ने अंदर हे है चची माँ तोह आप बहार क्यों जाने लगी?", अब कृष्णा जी भी मुस्कुराते हुए अपने लादले को खुद हे खाना खिलने लगी.

"तुझे बड़ा पता है के कौन आया है और कौनसी गाडी है. चल अब आराम से खाने पर ध्यान दे और अपने पर्स के साथ साथ और भी पैसे ले लेना."

"मेरे पास बहोत पैसे है चची माँ और पर्स पहले हे जेब में है. लो बहार अब दूसरी गाडी भी आ गयी है जिसका मतलब पापा और चाचा जी भी आ गए.", अभी वो इतना हे बोल पाया था की रेखा जी ने अपनी बहिन सामान देवरानी को एक तरफ से गले लगा लिया. ऋतू, अलका, रुपाली भी उनसे ाचे से मिली थी और फिर ललिता जी के साथ माधुरी दीदी दादी वाले कमरे की तरफ से इधर आ चली.

"यही उम्मीद थी मुझे कृष्णा. तू मेरे लल्ला को माखन खिलाती हे मिलेगी और ये कपूत भी बिन पेंदे का लौटा है. कभी तेरी तरफ, कभी मेरी और कोई न मिले तोह रेखा की गॉड में.", ललिता जी का हमेशा वाला अवतार देख बाकी सब तोह खुश हुए हे लेकिन कृष्णा जी उनसे खड़े हो कर गले मिली. माधुरी को भी उन्होंने सहेली की तरह मिलकर स्नेह जताया. लेकिन इतनी देर में अर्जुन ने दूसरी तरफ अपनी माँ को बैठा लिया था.

"आप हे खिलाओ अब, चची माँ के चाहने वाले उनसे मिल ले और मेरी तरफ किसी का ध्यान भी नहीं है.", अर्जुन के रूठने पर रेखा जी ने वैसे हे अपने लाडले को एक निवाला खिलाया और ऋतू ने पीछे से अपनी बहन अर्जुन के गले में दाल ली.

"ऐसा है न के तुझसे मिलने के लिए तोह आज अँधेरे में हे चलना पड़ा था वह से और तेरी ये नाराजगी माँ के साथ साथ मैं भी दूर कर देती हु.", ऋतू ने निवाला बना कर अर्जुन के मुँह के करीब किया और गप्प से खुद खा गयी.

"देखो न माँ दीदी को और ये दादा जी भी थोड़ा जल्दी या लेट नहीं आ सकते थे.", अर्जुन बचो की तरह हे कर रहा था और इधर बाकी सब कपडे बदलने, हाथ मुँह धोने चले गए तोह रेखा जी भी उठने लगी.

"ाचा अब आराम से नाश्ता कर बीटा, फिर मेरे कमरे में आना. दीदी, आप भी इसके साथ हे आ जाइये इतने मैं कपडे बदल लेती हु.", रेखा जी इतना बोल कर अपने कमरे में चली गयी और फिर से कृष्णा चची के हाथो अर्जुन नाश्ता करने लग गया. अलका उस से मिले बिना हे चली गयी थी और वो देख रहा था ये. दादी, राजकुमार जी के साथ साथ शंकर जी और नरिंदर जी भी इधर नहीं आये थे जिसका मतलब वो आते हे बैठक या दादा जी के कमरे में रुक गए थे.

"नमस्ते माँ जी.", कौशल्या जी मुँह हाथ बहार वाली तरफ से धो कर आयी थी शायद और उनके साथ हे शंकर जी भी इधर आ गए थे संजीव को लिए. कृष्णा जी अब फिर से अपनी जगह से उठ कर अपनी सास के पाँव छूने लगी तोह अर्जुन ने प्लेट हे सरका दी जो कौशल्या जी ने देख लिया था.

"जीती रहो और बेटी मेरे से मिलने से जरुरी काम शायद तुमने बीच में छोड़ दिया है.", कौशल्या जी का तंज सुन्न कर अर्जुन भी उठ गया.

"और नहीं तोह क्या दादी जी.", अर्जुन अभी इतना हे बोलै था की रंग में भांग दाल दिया शंकर जी की इस गरजदार आवाज ने.

"तुम्हे थोड़ी भी छोटे बड़े की तमीज नहीं है के कब कैसे बोलना है या करना है? बचा नहीं है तू जो मुँह में निवाला डालने के लिए कोई न कोई साथ बंधा रहे. तेरा खाने से ज्यादा जरुरी तोह किसी का aana-jana भी नहीं होगा जैसे? माँ, आप हे इसको ज्यादा सर पर चढ़ाये रखती हो तभी ये ऐसे बात करने लगा है.", अभी वो और भी कुछ कहते की कौशल्या जी का पारा तुरंत ऊपर जा चढ़ा क्योंकि अर्जुन वह से ऊपर की तरफ चल दिया सीढ़ियां चढ़ता हुआ.

"तेरी जुबान देख पहले और उम्र भी. यहाँ सब खुश बैठे ाचे नहीं दिख रहे थे जो बोलने से पहले कुछ सोचा नहीं? नाश्ता कर रहा था वो अपनी चची के हाथ से और दिन के पहले हे अन्न का अनादर करवा दिया तेरी जुबान ने. बहार से लड़ कर घर आये तोह गुस्सा मेरे घर की देहलीज के बहार हे रखना. तेरे पिता हे बात करेंगे तुझसे अब.", यहाँ एक हे पल में माहौल गरमा गया था और जब तक नरिंदर जी इधर आये तोह कृष्णा जी की आँख से पानी बहार निकलना हे बाकी रह गया था और वो भी बिना कुछ कहे रेखा जी की तरफ चल दी. हंसी ख़ुशी वाला वातावरण पल में हे धुल की तरह उड़द गया था.

"तुम्हे इधर आने के लिए कहा किसने था भाई? वह पापा बात कर रहे थे और तुम इधर संजीव के पीछे पीछे चले आये.", नरिंदर जी की बात का भी जैसे कोई जवाब न था इस वक़्त शंकर जी के पास क्योंकि ये सच था के गुस्सा किसी और पर था और निकाल घर में दिया था उन्होंने. संजीव भी बुझे मैं से ऊपर चला गया जहा अर्जुन ने होना था.

"दिन हे खराब है यार इन्दर और साला आ गया गुस्सा जैसे अर्जुन नाराजगी दिखा रहा था माँ को. लेकिन उसकी तोह गलती दिखती नहीं क्योंकि वो बचा है."

"देख शंकर ये बात हुई थी न के उसको बचा बना के हे रखना जरुरी है. एक जगह मुझे इसका नाम सुन्न ने को मिला और दूसरी जगह तुझे. दोनों हे कैसे लोग थे तू कही बेहतर समझता है भाई.", नरिंदर जी हाथ पकड़ कर अपने भाई को वापिस अंदर ले चले जहा फ़िलहाल उन्हें और दांत खाने को मिलने वाली थी. सभी चुपचाप अपने काम में लगे थे और संजीव भैया उधर अर्जुन से बात करते हुए उसको समझने में लगे थे.

"उन्हें गुस्सा किसी और बात पर था छोटे और गलती से तेरे पर निकाल दिया. दिल छोटा मत कर भाई वो प्यार भी तुजसे हे करते है. खराब मूड से तोह खुद का हे नुक्सान होता है न.? चल नाश्ता करते है और मैं हम दोनों का हे डलवा कर इधर हे लेके आता हु.", संजीव भैया ने बड़े दुलार के साथ अर्जुन की पीठ सेहलायी तोह अर्जुन का धैर्य जवाब दे गया.

"नहीं भैया आप खा लीजिये मुझे अब भूख नहीं है. आपने हे कहा था न के मैं वो सब न करू और यही चची माँ ने भी बोलै था. फिर पापा को क्या हो गया अचानक जो इतना बोलने लगे? आप नहीं जानते या आपने नहीं देखा लेकिन ऋतू दीदी की आँखों में आंसू आ गए थे वो सब सुन्न कर. और चची माँ यहाँ आराम से शांत जीवन जीने के लिए आयी है लेकिन उन्हें भी कितना बुरा लगा होगा. मुझे वो कुछ भी कह सकते है क्यूंकि मैं औलाद हु उनकी लेकिन ऐसा नहीं करना चाहिए जिस से दादी को भी बुरा लगे.", अर्जुन कुछ और बिफरता उस से पहले हे ड्राइंग रूम से कोमल दीदी की आवाज सुनाई पड़ी.

"ारु, तुझे माँ बुला रही है नीचे और भैया आपका भी नाश्ता लग गया है.", संजीव भैया ने उन्हें जाने को कहा और अर्जुन का हाथ थाम लिया.

"मानता हु के जो भी अभी हुआ उसमे चाचा जी की गलती है और सभी को वो बुरा लगा. दादा जी ने भी सुना है सब लेकिन तुम्हे ये भावुक होना बंद करना पड़ेगा मेरा भाई. कल भी यही समझाया था के कभी कभी नजरअंदाज कर देना सही रहता है. चल अब खड़ा हो और रेखा चची के पास चल.", उन्होंने बिना कोई मौका दिए अर्जुन को साथ लिया और पिछले आँगन में आ गए. आरती पहले से हे बैग लिए कुर्सी पर बैठी अर्जुन का इन्तजार कर रही थी. भैया भी टेबल की तरफ चले गए बेशक अब उनकी भी भूख ख़तम हो चुकी थी लेकिन चाय पी कर दिमाग शांत करना उन्हें भी ठीक लगा. अर्जुन अपनी माँ के कमरे में आया तोह कृष्णा चची बिस्टेर पर लेती थी जिनके बगल में बैठी रेखा जी उनका सर सहलाते हुए कुछ बात करने में व्यस्त दिखी.

"माँ, कहिये."

"इतना दुःख हुआ अपने पापा की बात सुन्न कर?", ये लफ्ज़ कृष्णा जी के थे और रेखा जी उठ कर अलमारी की तरफ चल दी.

"मेरे लिए तोह मुझे जरा भी दुःख नहीं हुआ चची माँ. ऋतू दीदी और आपकी आँखों का पानी ज्यादा दुःख दे गया. दादी जी के भी चेहरे पर दुःख था और ऐसा नहीं होना चाहिए था. पापा को अगर मेरी कोई भी बात बुरी लगी थी तोह वो आप लोगो से अलग दांत लेते पर ऐसे करके उन्होंने बेवजह हे सबको दुखी कर दिया.", बहार खड़े नरिंदर जी ने ये सुना तोह उन्हें भी थोड़ा खेद हुआ की बड़े भाई का ऐसा बेमतलब जज्बाती होना और घर में सबका मूड खराब कर देना ठीक नहीं था. लेकिन वो वापिस मदद कर बैठक की तरफ चले गए अपनी बात कहे बिना.

"तोह इतनी परवाह है तुझे अपनी बहिन, चची और दादी की? पीठ दिखा कर क्यों चला गया था फिर वह से? जब भी कोई बातचीत चल रही हो और वह सभी मौजूद हो तोह आइंदा ऐसा मैट करना. उन्होंने जो भी कहा हो लेकिन तुम्हारे साथ सभी वह थे और उन्हें इसका एहसास भी होता जब सबकी नजरे उनसे सवाल करती लेकिन तुम्हे तोह पीठ दिखा कर साबित करना था की बाकी सब मेरे लिए लड़ो और मैं चला यहाँ से.", कृष्णा चची की ऐसी बात सुन्न कर अब अर्जुन की गर्दन झुक चुकी थी. वो सचमुच यही तोह कर गया था. दादी कैसे चुप रह सकती थी अगर वो उसके परेशां चेहरे को जरा सही से देख लेती? ऋतू का रोना सिर्फ उसको दिखा क्योंकि वो उसकी तरफ चेहरा किये थे लेकिन अगर वो शंकर जी देख लेते तोह उन्हें पता चल जाता की बेटी का दिल भी दुख है.

"दीदी, बाकी बातें आप बाद में समझा देना इसको. ये सबसे मुश्किल काम थोड़ा समय लगा कर हे सीखेगा. अर्जुन ये सामान की लिस्ट है और ये पैसे. आरती और अलका के साथ हे रहना वह पर और फ़ोन पर तुम्हारी चची बता देंगी जो भी लाना होगा. कार्ड आरती के बैग में है और गाडी ध्यान से चलना. जाने से पहले अपने दादा जी और दादी से मिलना मैट भूलना.", अर्जुन अपनी माँ की बात सुन्न कर उनके गले से लग गया था. उन्होंने हे बता दिया था के अर्जुन की सबसे बड़ी कमी वो जल्दी नहीं सुधार सकता और वो आज भी सही थी कृष्णा चची के साथ साथ.

"आइंदा ऐसा नहीं होगा माँ."

"ये बात इस चेहरे के साथ नहीं कहते अर्जुन. जब सीख जाओगे तोह कहना हे नहीं पड़ेगा. दुनिया के सबसे मुश्किल पाठ हम बहार से नहीं सीख सकते, वो aatm-avlokan से हे सीखे जा सकते है. गलतिया पता है और उन्हें लिख कर बैठे हो तोह तुमसे कमजोर व्यक्ति कोई नहीं है. हर बार दिल दुखेगा, हर रोज दिल दुखेगा और फिर इस कमरे में बचे बाकी दोनों जैसी हालत तुम्हारी होगी जो की हम दोनों हे नहीं चाहती के ऐसा वक़्त हमारे बेटे को देखना पड़े. खुद को साबित करो लेकिन बोलना नहीं. अब तुम्हे जाना चाहिए.", ये था कृष्णा जी का वो अवतार जिस से रेखा जी भी आशावान रहती थी. वक़्त को देख कर नरम और सख्त लेकिन एक सबक से भरा. और अर्जुन दोनों के हे पाँव छू कर बैठक की तरफ चल दिया कार की चाबी अलका को पकड़ते हुए.

"हाँ तोह तुम्हे अब समय मिला है?", पंडित जी ने अर्जुन को सीने से लगते हुए लाड में झिड़क लगाई तोह वो उनके प्यार से कुछ बेहतर हो गया. कुछ पल ऐसे हे उसको अपने साथ लगाए वो हे आगे बोले.

"तू यार इन सबकी टेंशन मैट लिया कर, रोटी पानी बंद कर देंगे अगर किसी ने अर्जुन शर्मा को टोकने की जुर्रत की तोह. बीटा तुम हमारे इस छोटे से संसार की ऑक्सीजन हो और पर्यावरण में जीवन के लिए वही 21% ऑक्सीजन सभी पर भारी पड़ती है फिर चाहे नाइट्रोजन 78 हे क्यों न हो. और वो बाकी का 1% है उस पर तोह कटाई ध्यान नहीं देना. उसका असर तुम्हारे पर हुआ तोह तुम 1 और वो 21. क्या समझे?", पंडित जी ने भी हँसते हुए अर्जुन से सवाल किया तोह वो भी उनके साथ हे हंस दिया.

"यही की अपनी पहचान हमेशा याद राखु क्योंकि वो आपसे हे तोह है जो 100% है.", अर्जुन के इस जवाब पर कौशल्या जी भी उसको दुलारने लगी.

"तभी कहती हु के तू हे मेरा बीटा है और ये संजीव. चल मुँह खोल और फिर अपने भाई के साथ नाश्ता ख़तम करके हे बहार निकलना. ये भी भाग रहा था घर से बिना कुछ खाये.", अर्जुन ने वो निवाला खाते हुए हे भैया को देखा तोह उनके चेहरे पर मुस्कान थी. दादी जी ने यही पर दादा जी का भी खाना लगा दिया था जिन्होंने खुद भी नहीं खाया था अब तक.

"ये क्या बात हुई? आपने भी नाश्ता नहीं किया था दादा जी? सवा 9 बज गए और आपका समय 8 बजे का है."

"किसी ने भी नहीं किया था फ़िलहाल तोह. अब जल्दी से खाना ख़तम करो और आज तुम्हारी जगह संजीव घर पर रहेगा सारा दिन.", कौशल्या जी इतना बोल कर गरम चपाती लेने वापिस चली गयी और तीनो नाश्ता करने लगे. पंजाब के लिए निकलने से पहले एक बार फिर अर्जुन अपनी माँ और चची से मिलने गया था. ऋतू को भी ऊपर वाले कमरे में ाचे से गले लग कर समझाया और कल समय पर आने का बोल कर वो अलका और आरती को लिए घर से निकल गया अपने पहले antar-rajya सफर पर.

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"लोहान बचना नहीं चाहिए था यार शंकर और ज्यादा बड़ी गलती ये हुई की तुम लोगो ने सीधा हे हुम्ला कर दिया. अब दीपक की हालत कैसी है?", घर से निकल कर दोनों हे भाई सांगवान जी के निजी हॉस्पिटल आ पहुंचे थे. यहाँ एक मीटिंग बुलाई थी धर्मवीर सांगवान जी ने और ख़ास तौर पर नरिंदर और उमेद को भी हाजिर होने को कहा था.

"यार मुझे लगा के इतनी मुश्किल नहीं होगी लेकिन वह जरुरत से ज्यादा हे लोग मिले वो भी सामान के साथ. लोहान जख्मी था और अपने के आदमी के साथ अँधेरे की वजह से निकल गया. बाकी सब तोह निबटा दिए थे हमने.", दोनों हे बात करते हुए लिफ्ट से ऊपर चल दिए और इस मुलाकात कक्ष में आते हे उनका स्वागत खुद धर्मवीर सिंह जी ने किया. यहाँ भूपिंदर, मेहुल, परमवीर, उमेद और दलीप पहले से हे उपस्थित थे और एक अनजान व्यक्ति भी.

"तोह आ गए हीरा और पन्ना भी. चलो भाई अब जरा शंकर प्रेजेंटेशन देगा की लोहान ऑपरेशन कैसे अंजाम दिया गया.", एक कुर्सी शंकर की तरफ खिसकते हुए वो भी इस बड़ी टेबल के एक तरफ जा बैठे अपनी कुर्सी पर. नरिंदर भी सब जान न चाहता था इसलिए उमेद की बगल में जा बैठा.

"चाचा जी, प्लान में कमी नहीं थी और मौके पर 19-20 हो हे जाता है. परम और भुप्पी भी साथ हे थे और ये भी बता देंगे की सिचुएशन कण्ट्रोल में हे थी.", शंकर को शायद हे कभी सफाई देनी पड़ी होगी 1 या 2 बार छोड़ कर.

"शंकर ठीक कह रहा है पापा. वह की जो सूचना मिली थी उस हिसाब से लोहान के साथ 4 लोग और थे. लेकिन बगल वाले घर से करीब 8 लोगो ने बहार से हुम्ला कर दिया जो लोहान के साथी नहीं थे.", परमवीर ने भी सफाई हे दी थी जिस से बड़े सांगवान जी को कोई सरोकार न था और उमेद के साथ साथ नरिंदर और दलीप के चेहरे पर भी चिंता उमड़ आयी थी.

"तुम 4 लोग थे और चारो हे अटैक करने वाले. भुप्पी मान लेता हु के तहकिआत कर लेता है लेकिन अकाल तोह इसमें भी नहीं है के घेराबंदी कैसे करते है. और जब इन्दर स्पष्ट मन करके गया था तुम लोगो को की एक वक़्त पर एक काम करना है तोह 2 टीम अलग अलग मिशन पर कैसे चली गयी? देखो जो भी हुआ उसमे किस्मत से हे तुम 3 लोग सलामत आये हो वापिस लेकिन वो दीपक बेचारा एक नया दसप िक में ज़िन्दगी और मौत से लड़ रहा है. बच भी गया तोह क्या जवाब देगा डिपार्टमेंट को?", उन्होंने ये एक बड़ी चिंता सबके सामने राखी थी और फिर आगे भी उन्होंने हे कहना शुरू किया.

"दलीप घर को बहार की दुनिया से अलग करता है, राजेश नक्शा जुगाड़ कर लता है, उमेद पहले हे आने और जाने का हल निकाल कर रखता है और इन्दर सामने से चल कर रास्ता बनता है. फिर अंदर भी हरेक का काम एक साढ़े हुए तरीके से होता है जिसमे 3 लोग 18 कतल करने के बाद बिना सबूत छोड़े वापिस आ जाते है. लेकिन दूसरी तरफ 4 शराबी 4 तमंचे ले कर सीधा हे एक पेशेवर गुंडे के अड्डे पर घुसते है और ताबड़तोड़ गोलियां बरसा कर मोहल्ले के साथ साथ प्रशाशन की भी गांड मार कर रख देते है. जिसको मारने गए थे वही बच गया. उन 8-10 लाश में कोई भी काम का नहीं था न? ऊपर से अपना हे एक साथी इस हालत में वापिस लाये की बचना न बचना ऊपर वाले के हाथ में.", धर्मवीर जी ने पानी का एक घूँट भरा और फिर उमेद की तरफ देखने लगे.

"गलती शंकर की नहीं है चाचा जी, लोहान का जीकर मैंने और राजेश ने किया था. आदमी तोह उसके हे हुम्ला करने में प्रयोग हो रहे है इतने समय से तोह उसको हटाना भी जरुरी था."

"उमेद, तुम खुद समझदार हो. मैंने हटाने से कब मन किया लेकिन काम से काम मुझसे तोह ये काठ के उल्लू संपर्क बनाते. अब वो घायल भी है और पहुंच से बहार भी. दीपक को तोह मैं संभल लूंगा क्योंकि शंकर खुद इलाज आगे बढ़ाएगा उसका. डिपार्टमेंट में भी उसकी गैरहाजरी की जरुरी वजह दे दी जाएगी लेकिन यहाँ समस्या अब लोहान बन गया है जो कल तक हमसे वाकिफ भी न था."

"चाचा जी, मैं देख लूंगा उस लोहान को और मुझे बस भूपिंदर भाई की जरुरत पड़ेगी. Rajasthan-Punjab और हरयाणा का ये बॉर्डर मैं ाचे से जानता हु और पापा की भी मदद मिल जाएगी. आप निश्चिन्त रहिये और शंकर फ़िलहाल ड्यूटी हे करेगा या शादी के काम", नरिंदर के ऐसा कहने पर शंकर ने ना में गर्दन हिलाई थी और उमेद ने भी.

"मैं भी साथ चलूँगा इन्दर क्योंकि मेरे भी कुछ वाकिफ है उधर.", ये दलीप सिंह ने कहा तोह धर्मवीर जी के चेहरे पर गंभीर भाव आ गए.

"हद्द से बहार चला गया होगा तोह बात बढ़ सकती है इन्दर बेटे. इसको कानून के हाथ में हे जाने दिया जाये तोह बेहतर है. लोहान की वारदात दीपक के गाँव वाले रस्ते पर दिखा कर ये मामला पुलिस को हे हल करने देते है. मैं इसका प्रबंध करता हु और जितने भी डॉक्टर यहाँ बैठे है वो अपनी ड्यूटी के बाद भी gair-hajir नहीं दिखने चाहिए. सीड वाले बाबू जी आप जरा मेरे साथ बात करना इनके साथ धूम्रपान आदि करने के बाद.", ये बात उन्होंने दलीप सिंह को कही थी और फिर वो बहार निकल गए.

"भोले, ये पुलिस वाला कहा से तू बीच में ले गया अपने साथ? और इन्दर कह रहा था न के तेरा रहना जरुरी है. उसकी वजह ये है के हम तीनो हे एक वक़्त में बहार ऐसे काम पर नहीं जा सकते.", उमेद की आँखें बोझिल थी और उसको चेहरा बार बार गीला करना पड़ रहा था.

"यार दीपक तोह फाइल देने आया था और उसने तोह पी भी नहीं राखी थी. मैंने हे बोल दिया के चल आज शिकार करने चलते है. मेरी हिस्से की गोली वो अपने सीने पर ले गया और लोहान के भी उसकी हे गोली लगी थी. सचमुच भारी गलती हो गयी जो घात लगाने की जगह खुल कर हुम्ला कर दिए. एक महीना वो बेचारा बिस्टेर पर रहने वाला है सिर्फ मेरी वजह से. लोहान जिस दिन हत्थे चढ़ा न उसकी लाश पोस्टमॉर्टम के लायक भी नहीं छोडूंगा. मादरचोद भादवा साला.", शंकर फिर से उत्तेजित होने लगा था.

"ठण्ड रख भाई और जा कर चाचा जी के साथ उस दीपक का हालचाल ले. गज्जू को भी नींद चढ़ी है और मुझे भी. दलीप के हे खेत जा रहे है हम दोनों सोने के लिए, वही आ जइयो शाम को.", नरिंदर खड़ा हुआ तोह दलीप ने ना में मुंडी हिला दी.

"भाई उधर जाने की जगह छोल वाले होटल में आराम कर लेते है न."

"क्यों अब वह का बाग़ और हौदी साफ़ करवा दी क्या भाई?", नरिंदर ने थोड़ी हैरानी से इस ना का मतलब जान न चाहा.

"वो मेरी बीवी ने जगह हथिया ली है इन्दर और कलेश कर देगी अगर मैं उधर दिखा भी तोह.", अब नरिंदर के साथ बाकी सब भी हंसने लगे सिवाय शंकर और दलीप के.

"देख ले शंकर, एक इसकी बीवी है जो फाड़ के रखती है भाई की. हाहाहा. बीवी ने हे बेदखल कर दिया.. वाह रे शेर."

"छूट मारनी बहोत महंगी पड़ गयी इन्दर. जिस दिन तुम में से किसी के साथ ऐसा हुआ न तोह तुम्हारे वाली तोह घर हे ना घुसने देगी. मेरे वाली अभी तक रोटी तोह पका कर खिला रही है.", दलीप की ऐसी हालत पर और टिपण्णी न करते हुए परमवीर ने हे कहा.

"ये मेरे फार्महाउस की चाबी है. गेट पर तोह गार्ड तुम्हे जानता हे है लेकिन अगर अंदर भी आराम करना हो तोह कर लेना. खुले में भी चूल्हा और बिस्टेर का इंतजाम है घने पेड़ो की छाया के साथ. मुर्गा और दारु सब वही मिल जायेंगे."

"मैं भी चलता हु यार.", भुप्पी और शंकर ने एक साथ कहा था लेकिन सांगवान ने उन्हें याद दिला दिया के वो कहा है इस वक़्त.

"तुम लोग ये स्पिरिट की बदबू का मजो लो. आज गज्जू चिकन साफ़ करेगा और मैं बनाऊंगा. दलीप भाई की सिर्फ सेवा करेंगे क्यूंकि बेचारे बहोत परेशां और ज़िन्दगी के सताए हुए है.", नरिंदर ने जाते हुए भी दलीप की खिंचाई कर दी थी लेकिन अब वो भी मुस्कुरा रहा था.

"तेरे वाली जगह पर पानी की टंकी तोह है न जाट?", दलीप ने भी पूछ हे लिया.

"अबे तुम सभी हठी हो क्या जो दारु के बाद पानी में डुबकी लगनी जरुरी हे है? स्विमिंग पूल है लेकिन मोटर चला लेना. हम भी 2 बजे तक आ हे जायेंगे मेहुल को साथ ले कर.", अब छोटे सांगवान ने भी इरादे थोड़े बदल लिए थे ऐसे माहौल का सुन्न कर.

"रात की दारु के बाद से सिर्फ एक कप चाय हे पी है. जाते हुए 15-20 पराठे तोह लेके हे जाने पड़ेंगे ग्यांनी अंकल से. तू भी आ जइयो शंकर, भूक तुझे भी लगी होगी.", नरिंदर और उमेद उस तरफ से दरवाजे तक आ चुके थे.

"ये और बिना खाये रह जाए? उधर जाने से पहले भी बटर चिकन उधेड़ कर गया था और दीपक को एडमिट करवाने के बाद भी 6 पराठे कैंटीन में खा कर यहाँ से निकला था. शंकर से 2 हे चीज तोह बर्दास्त नहीं होती. छूट और भूख.", परमवीर ने शंकर को लपेटे में लिया लेकिन सभी शांत हो गए दरवाजे से अंदर आये धर्मवीर सिंह जी को देख कर.

"अबे नालायको सुधर जाओ थोड़ा सा. कॉलेज का कमरा नहीं है ये तुम्हारा और न हे तुम 20-22 बरस के. शंकर, ये दीपक की फाइल है और उसके पास चले जाओ. परम तुम ड्यूटी पे निकलो और भुप्पी मेरे साथ रहेगा थोड़ी देर. दलीप 10 मिनट चाहूंगा तुम्हारे और तुम दोनों जो चाहे वो करो.", वो अनजान सा व्यक्ति अभी तक वैसे हे बैठा था, न हिला न दुला."

"चाचा जी ये जनाब कौन है?"

"लाश है ये. हार्ट अटक आया था इसको तोह मैंने यहाँ बैठा दिया बातें करने के लिए जब तक तुम लोग आये नहीं थे. अभी ले जायेंगे इसके घरवाले कुछ देर में, थोड़ी दूर से आना है उन्हें.", एक बार तोह उमेद की भी सूख गयी थी ये सुन्न कर. वो उसकी हे बगल में इतनी देर से बैठा था.

"टेंशन न ले गज्जू, सांगवान चाचा तोह कई बार मोरगुए में भी मुर्दो को लेक्चर देते रहते है.", नरिंदर ने जाने से पहले धर्मवीर जी की भी टांग खींच दी थी.

"सुधर जा रे इन्दर सुधर जा. तू वह खुद लेट कर जो ध्यान लगता था मुझे अभी तक पता है. तेरे भाई जैसे विद्यार्थी हो तोह कक्षा शमशान और मुर्दाघर में हे लगेंगी. चलो निकलो सब और पता है बिना पार्टी के तुम्हारे मैं को शांति नहीं मिलेगी. 12 बजे तक फारिग कर दूंगा सबको.", धर्मवीर जी ने सबको विधा किया और दलीप को कुछ समझने लगे. ठीक 15 मिनट बाद हे दलीप भी उमेद की मेरसेदेज़ की पिछली सीट पर बैठा था और वो लोग निकल लिए आराम करने.

अगर अर्जुन के लिए उसके मार्गदर्शक आचार्य जी, पंडित जी और माँ के साथ कृष्णा चची थी तोह इन सब उद्दंड और होनहारो के कृष्ण डॉ धर्मवीर सांगवान जी थे जिन्होंने कठोर शिक्षा के साथ साथ उन्हें भरपूर लाड प्यार भी दिया था बिना फरक किये.
 
404 भाई 8तह सेमेस्टर नहीं पढ़ी लेकिन आत्मकामी मैं पढ़ रहा हु. नदी का रहस्य और आत्मकामी दोनों हे कहानियां जारी है.
 




सपने संजोने वाली चाहत तोह कुछ बड़ी न थी मेरी..

तस्वीर दिखाई क्यों नहीं देती अब उस बरसात में मेरी..
 




ये एक स्वर्ग हे है. कभी कभी बहार घूमने निकलता हु जब कहानी और दुनिया के बारे विचार करने होते है. जीवन चार दीवारों से बहार भी है.
 
इस से ाचा तोह अपडेट हे दे देता. बन्दे हे नई बात करने को. ☹️
 
अपडेट 140

जवान Din-Haseen रात (1)


काले रंग की ये लांसर कार अब जिस तरह से सड़क पर दौड़ रही थी उस से साफ़ पता चलता था के अर्जुन कितनी जल्दी हर चीज सीखता है. आवाजाही बेशक naam-matra थी सड़क पर इस वक़्त लेकिन कार सटीक 100 पर दौड़ती हुई मिनट से पहले हर किलोमीटर को पीछे छोड़ रही थी. वजनी कार और सड़क पर दुरुस्त पकड़ होने के साथ बंद शिशु के अंदर बस इन्ही तीनो की बातचीत जारी थी. आरती हमेशा सफर सो कर बिताने वाली लड़की थी लेकिन आज अलका और उसकी बातें अर्जुन को भी मुस्कुराने पर मजबूर कर रही थी.

"तोह अब जरा ये भी बता दो की ये अर्जुन तुम्हारा बॉयफ्रेंड कैसे बना था? सोचने वाली बात है के ऐसा क्या हुआ के भाई बहिन हे लवर बन गए.", आरती पिछली सीट पर एक नरम खिलोने को गॉड में लिए मुस्कुरा रही थी. और अर्जुन लाजवाब सा गाने चलने लगा तोह अलका ने वो कद प्लेयर बंद हे कर दिया.

"ऐसा है न आरती की एक यही तोह लड़का था जिसके साथ बचपन बिताया और फिर स्कूल और कॉलेज भी लड़कियों वाले मिले आगे. ये वापिस आया तोह ऋतू इस से दूर रहती थी और जनाब ज्यादातर मेरे आगे पीछे जिस से ऋतू को भी देख सके. मुझे जाने कब खुद हे वो सब ाचा लगने लगा था. दिल से तोह मैं खुद हे चाहने लगी थी की अगर मेरा बॉयफ्रेंड कभी बना तोह वो बस अर्जुन हे होगा नहीं तोह भाड़ में गया प्यार और शादी का झंझट."

"तोह इसने हे पहल की मतलब? लेकिन ये तोह ऐसा कही से भी नहीं लगता मुझे.", आरती ने एक नजर फिर से अर्जुन को देखा जो इस सीढ़ी do-tarfa सड़क पर कार चलते हुए भी बातें सुन्न रहा था.

"अरे इसके चक्कर में रहती तोह हो गया था बेडा पार. ऋतू के साथ इसकी नोकझोक में मैं खुद इसकी तरफ होने लगी और फिर जब बिर्थ्दया से पहले मेरे कॉलेज गए थे तोह मेरी सभी फ्रेंड्स ने इसको बॉयफ्रेंड समझा और उनकी आँखों में इसके लिए जो दिखा वो बताने के लिए बहोत था की मेरी जोड़ी अगर अब बनेगी तोह वो अर्जुन के साथ हे."

"ाचा? मुझे तोह लगा था के मैंने हे प्रोपोज़ किया और वो बर्थडे वाला शॉपिंग डे याद है आपको?", अर्जुन ने बीच में हे अपनी बात घुसानी चाहि तोह अलका हंसने लगी.

"इतने समझदार भी नहीं हो बच्चू. मैं जानबूझ कर तुम्हे ले कर गयी थी और याद हो तोह उस दिन प्रीती भी मेरे साथ चल सकती थी लेकिन हमारा वो किश तुमने नहीं मैंने किया था कमरे में. लड़कियां बोलती नहीं है अर्जुन डार्लिंग, वो कर देती है जैसे आरती ने भी किया.", अब अर्जुन की हालत थोड़ी खराब होने लगी थी जैसे अलका ने उसको नंगा हे कर दिया हो.

"हाहाहा.. सचमुच यार ये बहोत प्यारा है और जितना ख्याल ये रखता है न हर छोटी बड़ी बात का तोह ऐसा साथी हर लड़की चाहती है जो मुमकिन नहीं होता. मुझे सचमुच नहीं पता था के ये अर्जुन समय के साथ इतना बेहतर हो चूका होगा और ये पहला लड़का था जिसके पीछे बैठते हे मैंने महसूस किया था के ये बिलकुल वैसा नहीं है जैसा कॉलेज में सुना था या स्कूल के बिगड़े लड़को के बारे में पता लगता था.", आरती की संजीदा बातें सुन्न कर अलका भी हाँ में सर हिलती हुई अर्जुन को निहारने लगी.

"प्यार तोह ये सभी से करता आया है शुरू से और ाची बात है के इसने कभी दिल नहीं दुखाया. वैसे साहब अगर बुरा न लगे तोह रस्ते में सही जगह देख कर कार रोक देना. फ्रूटी और चिप्स लेने है पानी की बोतल के साथ.", अलका के कहने पर अर्जुन ने हाँ में सर हिलाते हुए कहा.

"अभी 68 किलोमीटर हुआ है और 10 के बाद रोक दूंगा. और आप भी आरती के साथ पिछली सीट पर आराम से बैठ जाना. दोपहर का 1 बजे वाला ट्रैफिक होने से पहले हे वह पहुंचना सही रहेगा.", अर्जुन की बात सुन्न कर आरती ने भी सिफारिश की.

"ये बात तोह एकदम सही कही है इसने. 1 बजे से ढाई बजे के बीच में ट्रफ़फ़िके हर चौक पर मिलेगा वह और आउटर से मोडल टाउन तक 15 मिनट की जगह एक घंटा भी लग सकता है. वैसे जिस तरह चला रहे हो उस से तोह हम 12 बजे तक हे घर पहुंच जायेंगे. पता हे नहीं चला के हम इतनी आगे आ चुके है."

"यार सड़क सचमुच ाची है नहीं तोह धुप से कही ज्यादा दिक्कत होती. ऊपर तोह दोनों तरफ के वृक्षों ने छतरी हे बना राखी है.", अलका की बात एकदम सही थी. सड़क भी काम यातायात की वजह से एकदम साफ़ थी और कीकर, सफेदे के वृक्ष एक कतार में दोनों हे तरफ लगे थे. साढ़े 10 बजे जहा गर्मी में कड़ी धुप रहती है, इस सड़क पर बस ाची रौशनी हे थी बाकी धुप वो वृक्ष ाचे से संभल रहे थे.

"ये वाला रास्ता मुझे चची जी ने हे बताया था सुबह. बस सड़क सिंगल है और क्सक्सक्सक्स शहर बीच में आएगा तोह रफ़्तार धीमी होगी 5-10 मिनट लेकिन दूसरे हाईवे पर भीड़ भी बहोत रहती है और मैं ओवरटेक करने के मूड में भी नहीं हु."

"सीधा क्यों नहीं कहते की साथ में 2 खूबसूरत लड़कियां बैठी है जिन्हे कोई और देखे तोह तुम्हे बुरा लगेगा.", अलका ने टांग खींचनी चाहि लेकिन अर्जुन ने तोह बात को सही तेहरा दिया.

"हाँ. बड़ी वजह तोह यही है के वह खामखाह ैंचाइ नजरे आप दोनों पर पड़ती और न चाहते हुए भी 10 में एक उल्लू का पता मिल हे जाता कोई और जैसा मूड पहले था तोह पक्का सड़क पर काण्ड हो जाना था और फिर बात घर तक जाती तोह मेरी क्लास लग्न तये थी. और ये शांत रास्ता है ज्यादा से ज्यादा कोई गाँव का बस अड्डा या फिर सवारी वाली जीप हे नजर आयी है इधर. लीजिये ये जगह आ गयी आपके मतलब की और मैं भी मुँह धो लेता तब तक. घर से चलते वक़्त ध्यान नहीं रहा.", अर्जुन ने अगली दोनों सीट के बीच में रखा वो छोटा सा टोलिया उठाने के साथ हे अलका दीदी को अपना पर्स दे दिया.

"इसका क्या करू?"

"जो भी लेना है वो पैसे यहाँ से हे देने आपने. जब गर्लफ्रेंड हो तोह इस पर हक़ जमा कर खुद हे जताया कीजिये.", अलका ने खुश होते हुए पर्स पकड़ लिया और आरती भी हंसती हुई कार से उतर कर इस dhaaba-dukaan की तरफ चल दी. सफेदे की बल्लीअ जमीन में गाड़ कर छायादार छप्पर डाला गया था जहा रुकने वाले लोग chai-nashta करते बैठ सके. एक तरफ ठेठ देसी ढाबा बना था घने पीपल की छाया टेल. 4 बड़े एलुमिनियम के पतीले सब्जी से भरे और gara-mitti का बना अड्डा और तंदूर वाला. उसके साथ हे ये एक बेहतर दूकान थी जहा बहार हे बड़े फ्रिज में ठन्डे की बोतल लगी थी और एक तरफ जाली में बंधे ढेर सारे चिप्स लटके थे. अर्जुन ढाबे की एक तरफ रखे झार (बड़े मटके) से डब्बे में पानी भरने के बाद चेहरे को धोने के सेहत हे कुल्ला करने के बाद वही ठंडा पानी पीने लगा.

"गुड्डी ठन्डे की बोतल तोह कांच वाली हे है जो ले जा नहीं सकते. हाँ ये 6 रुपये वाला आम का जूस (jumpion/frooti) ले सकती हो.", आरती ने Gold-spot ठन्डे की बोतल उठाई थी और दूकान वाले ने जब बताया के वो वही बैठ कर पीनी है तोह अलका ने वो बिसलेरी की बोतल वही रखे जग में खाली कर दी.

"इसमें दाल दो अंकल जी 2 बोतल और ये 2 फ्रूटी के साथ एक अंकल चिप्स का पैकेट है. कुछ और भी लेना है क्या आरती?", अलका के अंदाज को देख कर वही लोहे की निवार वाली कुर्सी पर बैठा बीड़ी पीटा युवक ढीट की तरह हंसने लगा.

"शहर की अमीर लोंड़िया इस बिराने में कड़े हांडे है सुबु?", ये 2 युवक थे और दूसरा वाला अलका की चुस्त जीन्स से बहार निकले कूल्हों के अकार को हे निहार रहा था. शायद ये करीब के हे किसी गाँव के मनचले थे जो एक खतरा हालत वाले कद 100 मोटरसाइकिल पर इधर beedi-ciggratte पीने आये थे, जैसे यही इनका अड्डा हो.

"बिराने और गाम में हे तोह देसी मिले है भाई कैरे लेकिन सच कहु तोह ऐसे खरबूजे तोह बिल्लू की लुगाई के भी न है. गाडी तोह देख जमा इनके बरगी है.", वो अभी आगे कुछ बोलता की दूकान वाले अधेड़ ने तल्खी से कहा.

"अपना रास्ता नापो. बहु बेटी की इज्जत तोह क्या करनी छोटे बड़े का भी लिहाज न है तुम्हे. ले बिटिया और इनकी तरफ ध्यान न हे दो, गाँव के मनचले है बस.", आदमी ने 100 रुपये के नोट से बचे बाकी पैसे और सामान अलका को पकड़ते हुए कहा तोह अलका मुस्कुराने लगी.

"इन जैसो की तरफ तोह मेरी जूती न देखे अंकल और रही बात मनचले होने की तोह ऐसे कितने हे वह ##### शहर में नाक रगड़ते हुए माफियां मांग चुके है.", अलका के तेवर और आदमी द्वारा की गयी बेइज्जत्ती से ये दोनों हे मनचले थोड़ा भड़क उठे.

"कबूतरी बिराने से गायब हो जाये तोह पता न लगता मैडम. आह्हः. कौन है रे.. behanchod..aahhh"

"तुम्हारा जीजा. आशिक़ी करो लेकिन जबतक सामने वाली लाइन न दे, तब तक हद्द पर नहीं करनी चाहिए. बैठे बिठाये गुड़ से गुलगुले बनवा लोगे और नुक्सान इस जगह का हो जायेगा. अंकल जी, ठंडा पानी पिलाओ इनको थोड़ा. गर्मी का वक़्त है चक्कर वक्कर आ गए तोह लेने के देने पड़ जायेंगे.", अर्जुन ने जिस तरह से कंधे के पास का हिस्सा पकड़ कर इस दरमियाने से युवक को दर्द देने के साथ समझाया था उसकी जान हे निकल गयी थी. दूसरा वाला तोह उसकी deel-dol देख कर हे मोटरसाइकिल पर बैठ चूका था.

"बेरा कौनि था के जीजा भी गइल आया है.. आठ.. वो तोह स्वाद स्वाद में बोल गया मैं.", ये लड़का भी अर्जुन को ठीक से देखने के बाद तुरंत गलती मान बैठा.

"टेंशन न ले दोस्त आश्कि सभी नौजवान करते है लेकिन थोड़ा कायदे से और कोशिश उसके साथ करो जिसको तुम जानते हो या देखते हो आस पास में. ये तोह मैं था इनके साथ और कही मेरे पापा होते तोह तुम गोली मारने के बाद इन अंकल से तुम्हारा घर पूछते. चलता हु और बात ध्यान में रखना.", अर्जुन का ऐसा बिंदास अंदाज और बिना झगडे हे सब समझाना अलका आरती को भी बड़ा पसंद आया था और वो अंकल भी हंस दिया. कार जल्द हे वह से निकल चुकी तोह मोटरसाइकिल पर बैठा लड़का बोलै.

"घात (शरीर) देख्या था मानस का? जमा राक्षस था और जोड़ी भी जांचे थे भाई कैरे. वैसे तू चीख्या क्यों था.?"

"बेरा न भाई किस तरिया मुद्दा (कन्धा) दबाया ससुरे ने, जान हे कांड के रख दी. झोटा (भैंसा) था और ठीक होया थूक के पकोड़े बनाये. जे गलती से कड़े हाथ राख्या जाता किसी छोरी पे तोह मेरे घर तोह संदेसा हे जावे था फेर. ाः. बात सही कही इसने. वो जुगने की बेबे लाइन तोह देवे है थोड़ी बहोत पर गाम की बात सोच के डर लगे है."

"लाइन देवे है तोह फ्यूज उदा दे रे. मैं भी गाम में हे कोई जुगाड़ देखूंगा. चाल खेत का चक्कर मार के निकला, के पता तेरे जुगनू की बेबे आज हे बतला ले तेरे सत्ती.", दोनों हे वह से खिसक लिए थे और जैसी इनकी बातें थी वो यही बता रही थी की हसरते बहोत थी लेकिन मेहनत शुन्य. वही कार में अब अलका मजे ले रही थी अर्जुन के.

"तोह तुम उनके जीजा कब बने ये भी बता हे दो?"

"हाँ ये तोह सही कहा और वैसे भी गाँव में ऐसा हे होता है न के लड़का तोह परिवार वाले देख लेते है पर लड़की शादी के बाद हे दिखाई जाती है. हाहाहा.", आरती ने इतना बोल कर ताली बजे अलका के साथ तोह अर्जुन भी उनके साथ हंसने लगा.

"अरे इसका मतलब ये हुआ की आप दोनों हे बहने लगी उनकी और वो बेचारे तोह बस सपना हे देख रहे थे. ाचा वो प्रियंका दीदी ने भी एक लिस्ट दी थी न आरती?", अर्जुन ने बात पलट कर दूसरी तरफ घुमा दी. अलका और आरती एक हे बोतल से ठंडा पीती हुई सफर का मजा ले रही थी.

"हाँ वो रोमिला आंटी का कुछ सामान लेना है वह से. अर्जुन, हम वापिस कब निकलने वाले है उधर से?", आरती जैसे कुछ सोच कर बैठी थी और जानकारी होने के बाद हे जैसे वो अपना hisab-kitab बनाने वाली थी.

"जब आप दोनों कहो तब निकल लेंगे लेकिन कल शाम से पहले वापिस पहुंचना है. जो भी काम हो या कही जाना हो तोह अकेले नहीं जाना ये ध्यान रखना.", अर्जुन ने बताने के साथ हे हिदायत भी दे दी. अलका भी आरती को गौर से देखने लगी के जाने वो अब क्या कहने वाली है.

"हाँ फिर ठीक है और तुम्हे साथ लिए बिना तोह मैं कही जाने भी नहीं वाली. अफसाना की मम्मी ने कल सवेरे नाश्ते के लिए कहा है. अगर तुम जल्दी निकलने का कहते तोह फिर ये मुश्किल होता और उन्हें मन करके मैं अफसाना और ज़ुबैदा दीदी को नाराज नहीं करना चाहती थी. बाकी तोह आज लंच हम लेते हुए चलेंगे और दोपहर को आराम करने के बाद फिर शाम को इनविटेशन कार्ड के काम के साथ साथ मार्किट से सामान भी ले लेंगे. रात को माँ का थोड़ा बहोत सामान पैक करने का जिम्मा भी मेरा.", आरती ने सारा हे कार्यक्रम बता कर सामने रख दिया.

"जसलीन और जग्गी के घर का तोह पता है मुझे लेकिन कीर्ति के घर भी कार्ड देना हे होगा. वो bol-bachan गुरदीप अलग हे जान खाने वाली है तुम्हारी.", अर्जुन ने जो भी नाम लिए थे वो अलका को तोह नहीं पता थे लेकिन आरती उसके मजे लेने लगी.

"आहे. जसलीन का घर पता है तुम्हे? फिर तोह एक काम करना के उनके घर तुम अकेले हे चले जाना, वैसे वो भी वो भाई बहिन तुम्हे जल्दी वापिस तोह आने नहीं देंगे. कीर्ति का घर भी उनके पड़ोस में हे है तोह आराम से उस से भी मिल लेना. और गुरदीप को मैं ये बात ऐसे हे कहने वाली हु जैसे तुमने अभी कही है. फिर देखना बच्चू वो रेडियो तुम्हारा क्या हाल करती है."

"ये तुम दोनों हे किन लोगो की बातें कर रहे हो? जग्गी, जसलीन, कीर्ति, गुरदीप.. 2 दिन में हे अर्जुन ने इतने दोस्त बना लिए थे क्या?"

"अलका, दोस्त तोह शायद इसकी अफसाना भी बन्न चुकी है. जितनी बार उसका फ़ोन आया था न घर पे उतनी हे बार उसने इसका जीकर जरूर किया. और ये जितना भोला दीखता है उतना है नहीं. प्रियंका दीदी के लिए तोह जसलीन वैसे हे फ़ोन करती थी, असल में तोह जनाब से बातें करने का दिल रहता है उन मैडम का. गलत तोह नहीं कह रही हु न मैं अर्जुन? फ़ोन तोह तुमने डीपी को भी किये है क्योंकि वो मुझसे कुछ नहीं छिपाती.", अर्जुन की हवा टाइट हो गयी थी अलका के सामने आरती के इतना खुलासा करने से.

"वो... वो ऐसा है न के जगतार भैया बहोत ाचे है और उनकी मम्मी से भी मैं मिला हु. जसलीन वैसी हे दोस्त है क्योंकि दोनों भाई बहिन के सभी दोस्त कॉमन है िसिये. और अफसाना का तोह मुझे कुछ भी नहीं पता क्यूंकि उस से मेरी बात हे कहा हुई?"

"हाहाहा.. मजे ले रही हु तुम्हारे और तुम टेंशन ले रहे हो. वैसे सच कहु तोह डीपी भी तुम्हे अपना ख़ास दोस्त मानती है अब क्योंकि तुमने रिस्की को जो सही रस्ते पर ला दिया. लेकिन अफसाना का तोह मुझे भी नहीं पता के वो तुम्हारे बारे में क्यों जानकारी ले रही थी? शायद ज़ुबैदा दीदी ने पुछा हो और वो फ़ोन पर बात करने की जगह सामने हे बात करती है. उन्हें भी ख़ुशी होगी तुमसे मिल कर.", आरती के ऐसा कहने पर अर्जुन की धड़कन थोड़ी सही हुई.

"वैसे मैं पहले हे बोल देती हु आरती की रात को कोई डिस्टर्ब न करे लवर्स को. तुम भी नहीं.", अलका पिछली सीट पर आरती के साथ बैठी उसको हे झूठी चेतावनी दे रही थी.

"वो उस लड़के की हम दोनों हे बहने हुई न अर्जुन के हिसाब से तोह लवर वाली बात कहा से आ गयी अलका? उनके जीजा जी तोह फिर हम दोनों के हे हुए. हाँ इतना कर सकते है के तुम 2 बजे तक साथ रहना और उसके बाद ये मेरे कमरे में.", आरती के ऐसा खुलमखुला कहने पर अर्जुन को बेचैनी होने लगी थी. आज तक तोह अर्जुन ने ऋतू और अलका के भी सामने एक दूसरे से खुल कर कुछ न किया था और यहाँ मामला सगीन होने लगा था. उस पर अलका ने और बड़ा झटका दे दिया.

"तू साथ हे सो जाना यार. कौन रात को ये कमरा बदलने का झंझट करे? वैसे भी बड़े डबल बीएड पर 3 लोग तोह आराम से सेट हो हे जाते है. तू आराम से सोना और मेरे सोने के बाद उठ जाना.", अलका कुछ भी बोल रही थी और आरती उसके साथ हैं में हाँ मिला रही थी.

"तुम्हारे मुँह पर क्यों टाला लग गया? याद है न मैंने कहा था के पंजाब जाते वक़्त मैं रस्ते में भी तुम्हे नहीं छोड़ने वाली. लेकिन देखो मेरा बड़ा दिल की मैंने तुम्हे परेशां नहीं किया. डीडे हो चूका है और अब तुम वह घर में नहीं हो जो ऐसे नजरे फिर रहे हो.", अलका के ऐसा कहने पर अर्जुन ने बस इतना हे कहा.

"मुझे तोह रात को सोना हे है फिर जैसे मर्जी चाहो सो हे जाऊंगा.", उसके जवाब पर दोनों हे लड़कियां हंसने लगी थी. सफर भी ख़तम होने हे वाला था जब वो बड़ी बड़ी इमारते नजर आने लगी.

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छोटे सांगवान के इस जंगल जैसे फार्महाउस पर भरपेट नाश्ता करने के बाद तीनो हे खाट बिछा कर सो गए थे. थकान कही ज्यादा हे थी और म्हणत भी कही काम न की थी दलीप, उमेद और नरिंदर ने. दही और 5-5 पराठे खाने के बाद जो वो तीनो सोये थे तोह सीधा डेढ़ बजे गोली की आवाज सुन्न कर उछलते हुए उठ खड़े हुए. पास हे खड़ा शंकर जोर जोर से हंस रहा था दलीप की हालत और बाकी दोनों को आँख मसलते हुए देख.

"सालो, तुम यहाँ ऐश कर रहे हो उधर मेरी गांड मार राखी है बाप और चाचा ने. ओह गज्जू, तेरी भी लुगाई का फ़ोन आया था घर पे माँ के पास. भाभी बोल रही थी की तू घर छोड़ कर भाग गया कल."

"तू भोले पक्का कमीना है बे. इधर दलीप की हालत देख जरा, जैसे एनकाउंटर से बचा हो. वैसे अब ठीक है न?", उमेद ने अंगड़ाई लेते हुए चारपाई का त्याग किया तोह पीछे आते हुए भुप्पी, मेहुल और परम नजर आ गए.

"क्या ठीक है? तू तोह भाभी की परवाह हे नहीं करता."

"अबे तेरी गांड मारी थी जो चाचा जी ने वो ठीक है या अभी भी दर्द है? मेरी लुगाई न फ़ोन नहीं करती क्योंकि उसको पता है मैं इन्दर के साथ हु और अब कल हे आऊंगा वापिस. काम होगा तोह चची को अपने आप माँ संदेसा दे देगी. आह्हः.. वैसे ज्ञानी अंकल के परोठे तोह बड़े हे मस्त थे यार इन्दर. मुर्गा बाद में देखेंगे.", उमेद मूढ़ धोने लगा था और शंकर ने पानी सर पे हे उड़ेल दिया.

"साले मुर्गा तोह तुम दोनों हे बनाओगे और इस चक्कर में हम चारो काम छोड़ कर इधर आये है. दलीप तुझे क्या हुआ जो ऐसे देख रहा है.", शंकर हंसने लगा तोह दलीप भी ब्याह हिलने के बाद कान खुजाने लगा.

"बामन तू न बहोत बड़ा पापी है. 2 घंटे नींद न ली और ये कान के पास धमाका कर दिया. अभी तक साये साये हो रही है मेरे तोह कान में. तुम लोग भी बैठो भाई मैं जरा धार (पेशाब) मार के आया. सचमुच पराठे जबरदस्त थे यार और इन्दर थैंक यू भाई एक एक्स्ट्रा खिलने के लिए.", दलीप जैसे चिडता हुआ चला गया था शंकर को.

"हाहाहा.. देख ले शंकर. वैसे सच कहु तोह यार दिल तोह मेरा भी नहीं है अभी चूल्हे पे हांड़ी रखने का. थोड़ा और सो लेते है गज्जू."

"ओह रेहम करो यार तुम लोग. शंकर हॉस्पिटल से बखान करता लेके आया है के नरिंदर उमेद के जैसा तोह कोई भी मुर्गा नहीं पका सकता. मेरे पापा का बनाया भी इसने फ़ैल कर दिया था तुम्हारे जायके के सामने. दारु न पिलाओ भाई लेकिन मुर्गा तोह बना हे दो.", अब तोह परम ने हे हाथ जोड़ दिए थे और वो बाकी दोनों के पास हे चारपाई पर बैठ कर जूते खोलने लगा. हर तरफ घास और छाया थी तोह नंगे पाँव भी फरक नहीं पड़ना था.

"टेंशन न ले यार परम. वो तोह वैसे हे इस भोले के मजे ले रहे थे हम. दलीप मुर्गा हे तोह पकड़ने गया है, देख उधर. बस तुझे दिक्कत न हो तोह हम भाई ऊपर सिर्फ बनियान पहन कर काम करते है.", उमेद के साथ हे नरिंदर ने भी कमीज हटा दी thi.Udhar दलीप भी कंधे पर कुरता टाँगे सिर्फ बनियान पाजामे में उनकी तरफ आ रहा था. 2 मुर्गे गर्दन कटे पंजो से पकडे हुए.

"अबे भाई तुम चाहो तोह ये निचे वाले वस्त्र भी त्याग दो. हमारे लिए कुछ नया नहीं है और अपनी जगह हे बैठे है. खुशीलाल, रसोई का सामान लगा दे इधर चूल्हे के पास.", परमवीर ने भी कमीज हटा कर खाट पर रख दी और अपने सेवक को मसाले, घी, बर्तन इत्यादि लाने का आदेश दे दिया. भुप्पी सिग्गट लिए नरिंदर के पास जा बैठा था और शंकर भी दलीप के हाथो बीड़ी के काश लगाने लगा. उमेद ने देरी न करते हुए हाथो से हे मुर्गा साफ़ करना शुरू कर दिए.

"भाई, जिसने भी डुबकी लगनी है आ जाओ. नहाने के बाद हे शरीर हरकत करेगा सही से.", गुलाटी ने ये बात दलीप और शंकर को देखते कही थी जो तुरंत उसके साथ हो लिए. नरिंदर ने परम को अपने पास बुला कर भुप्पी के सामने हे कुछ समझाया तोह वो दोनों भी तुरंत स्विमिंग पूल की तरफ हो लिए.

"तोह तू अभी भोले से बात करने वाला है? सोच ले इन्दर कही वो बांगड़ू बोरा हे न जाये."

"टेंशन न ले गज्जू. शंकर से मैं कभी सवाल नहीं करता और आज भी सवाल नहीं है बस कुछ बताना है और फिर आगे भूतनाथ की मर्जी, माने तोह सही न माने तब भी वो हे अपनी आत्मा है.", नरिंदर उठ कर वही उमेद की बगल में आ गया जो तसले में साफ़ किये हुए मुर्गो को धो रहा था. ख़ास बात ये थी की उमेद ने दोनों मुर्गे छिलने और साफ़ करने में किसी औजार का उपयोग न किया था. नरिंदर ने मुर्गा साफ़ होने के बाद खुद हे सटीक तरीके से टुकड़े करने शुरू किये तोह गीले शरीर हे शंकर उन दोनों के पास चला आया.

"ऐसी क्या जरुरी बात हो गयी इन्दर?"

"बैठ भाई यहाँ पे. वक़्त हे कहा मिला हमे आपस में बात करने का अभी तक?", नरिंदर के ऐसा कहते हे उमेद भी उठ कर वह से चला गया तोह नरिंदर ने सिग्गट की डब्बी शंकर की तरफ बढ़ा दी. मसालेदानी से वो चाकू पर मसाला लेते हुए मुर्गे पर लगाने लगा और खुशीलाल सारा बताया सामान वह ला कर रखता जा रहा था.

"तू यार घुमा फिर के बात न किया कर इन्दर. एक तू हे है जो मुझे समझता भी है और कभी कुछ पूछता भी नहीं. मैदान खली करवाया है तोह फुटबॉल भी दिखा दे." शंकर ने सिग्रत्ते सुलगा कर खुद हे एक काश अपने छोटे भाई को लगवाया और अपने मुँह से लगा ली वो जलती आग.

"देख तेरा जो भी मसला है हमारे बेटे से उसको साइड में रख दे. कृष्णा ने अगर बोरिया बिस्टेर बाँध कर चलने के लिए कह दिया तोह फिर तू अर्थी पर हे आएगा उसकी. आँखों में आंसू थे आज उसके लेकिन मुझे उस से ज्यादा दुःख था सिर्फ तेरे लिए. माँ को तुझे झाड़ना बुरा लगा था भाई. और ऐसा न करना सिर्फ तेरे हाथ में है."

"कृष्णा के लिए तोह मैं माफ़ी कार में हे मांग चूका हु यार और वो उस वक़्त बस गुस्सा आ गया. अर्जुन ाचा लड़का है और बेवजह मुझे गुस्सा आ गया."

"मुझसे तोह मैट छुपा शंकर. ऋतू रो रही थी और माँ के चेहरे पर गुस्सा अर्जुन के लिए तोह कही न था उस समय. वो सब भी छोड़ अगर बात कही अलग है तोह, लेकिन तू न अब वही रूप इख्तियार कर जो तेरे थर्ड ईयर में था. या तोह शांत या फिर सीधा चौथा गियर और दोनों हे केस घर से बहार. अर्जुन को तू उकसा रहा है और तू भी जानता है भाई के अगर वो थानेदार के साथ बहार निकला तोह फिर क्या होगा. वो तेरी ताक़त है, हमारी ताक़त लेकिन तू उसको प्रतिद्वंदी क्यों समझता है?", नरिंदर के इस कथन, समझने के तरीके और सच्चे सवाल पर शंकर ने सिग्गट उसको पकड़ते हुए खुद हे प्याज काटने शुरू कर दिए. मतलब साफ़ था के वो सोच रहा था.

"हाँ यार. वो न कम्पटीशन जैसा लगता है मुझे कभी कभी."

"तू जीत नहीं सकता उस से भाई. तुझे याद है न के मजाक में अज्जू भी तेरे से हार मान लेता था लेकिन हम सबकी हालत खराब थी जब पहली बार वास्तविक लड़ाई हुई थी और मेरी उम्र का 16 साल वाला अज्जू अकेले हे उन सबके haath-pair अकेले हे टॉड गया था. सिर्फ इसलिए की उसने तेरी आँखों में डर देखा था. ये उस से भी ज्यादा पागल है शंकर जो परिवार के लिए हे सबकुछ कर रहा है. मिश्रा की behan-biwi उसके हे शहर में उठवा दी, लोहान ने तोह खुद कहा था तुझे की तेरा बीटा तुझे बचा गया. किसी भी सूरत में अर्जुन अगर अज्जू बना तोह आज उसके पास ताक़त भी है, सपोर्ट भी और वैसा दिमाग जैसा सिर्फ पापा में है. अज्जू भी उतना नहीं सोचता था. बाप बन्न कर हमको उसकी देखभाल करनी चाहिए या वो हमारा हे बाप बन्न जाये.?", अज्जू के साथ तुलना करके नरिंदर ने ये तोह बता दिया था के अर्जुन किस क्षेत्र में बेहतर है और शंकर की कहा गलती हो रही है. आज कितने हे वक़्त बाद किसी ने शंकर को वो सचाई बताई थी जो कोई और कहने की हिम्मत भी न करता. कुछ पल दोनों हे खामोश रहे.

"अब क्या करू भाई?"

"तुझे कभी कुछ करना हे तोह नहीं होता. तू ठीक करने जाता है क्योंकि तू परवाह करता है लेकिन हो गलत जाता है. तेरे पास अब मैं हु न मेरे भाई? क्या इन्दर शंकर नहीं है?", नरिंदर ने छुरी अंदर तक डालते हुए मांस में वो मसाला जैसे भरा था वो बता रहा था के वो इस सबको कही बेहतर समझता है.

"तू मेरी परछाई लोगो की नजर में है लेकिन सच तोह ये है की दिल मैं हो सकता हु इन्दर लेकिन दिमाग और आत्मा तू हे है. अर्जुन सचमुच हे कुछ चीजों में मेरे, तेरे, उमेद और अज्जू से तेज है. तुझे नहीं बताया था मैंने लेकिन वो शीला वाला काण्ड अर्जुन ने हे झेला था. ताई (चंद्रो) के पौटे को देखा था न, वो जानवर भी अर्जुन के सामने कुछ न कर सका 4 तगड़े साथी होने के बावजूद. लड़कियां तोह खुद सामने से आती है उसकी तरफ और आज वो माँ के लिए मेरे से पहले हो गया है. ऋतू तक उसकी हिमायत करती है."

"तू न भाई वनवास हे चला जा अगर ऐसे हे सोचना है तोह. अबे वो हे तोह है जो घर देख रहा है और संजीव पापा की तरह बहार सुरक्षा दे रहा है. मेरी बीवी जी रही है यार उसकी वजह से. वो हद्द से ज्यादा करता है कृष्णा का लेकिन तुझे समझना चाहिए के वो अर्जुन नहीं तू कर रहा है. ये अर्जुन तेरा बीटा है, पंडित जी का मान है वो और माँ उसमे तुझे नहीं देखती. वो पापा और हम सबको देखती है क्योंकि सब उसके साथ जुड़े है. मुझे किसी भी चीज से दिक्कत नहीं है क्योंकि वो तोह कुछ गलत नहीं कर रहा. मेरे भाई, तू ड्यूटी कर और फिर घर पे आ कर माँ पापा के सामने हाजरी लगा. मिल कर काम करते है न बाकी जैसे कॉलेज में करते थे.", नरिंदर ने तोह साफ़ मुँह पर हे बता दिया था के वो कितना ाचे से जानता है अर्जुन और अपने माँ बाप को, दूर रहते हुए भी.

"वचन देता हु भाई के अब जो भी घर में होगा वो तू कहेगा और जहा दिक्कत होगी मैं तुझे कहूंगा. लेकिन तू मेरे साथ हे रहना और अर्जुन से थोड़ी सी दिक्कत है मुझे."

"तेरी दिक्कत माँ पापा को देखने दे यार और वो दिक्कत नहीं होती मेल ईगो होती है जब आप खुले सांड हो लेकिन आपसे हे बेहतर कोय आ जाये और आप छह क्र भी उसका कुछ न कर सको. वो सब छोड़ और अभी से तू वही करेगा जिसमे तू बेस्ट है और रिवॉल्वर की जगह हमेशा ब्लेड के साथ. वैसे उमेद ने सिखाया तोह बहोत सही है अर्जुन को.", नरिंदर की इस हंसी के बाद शंकर भी हंस दिया.

"वो उसका भी गुरु बना हुआ है. मेरा हे काण्ड हो जाता एक केस में लेकिन साला ये अर्जुन ऐसी गेम खेल गया की सांगवान चाचा ने लीड करते हुए सारे धुरंदर खुद निबटा दिए."

"वही 33 करोड़ वाले जिसकी बात गज्जू कर रहा था? और तू इस लड़के से भिड़ने लगा है.? भाई बोलै न के वो तेरा अंश है शंकर, तू न एक बार उसको गले से लगा ले और फिर देख नजारा. रघुबीर चाचा भी तोह इसके हे साथ रहे अंतिम समय और अपने पापा की चमक की वजह भी यही है. गज्जू ने जब वो मंदिर वाला किस्सा सुनाया था न तोह सच में दिल खुश हो गया था के अर्जुन वैसा हे है जैसा अज्जू था. सोमबीर तोह सोमबीर, अखाड़े में सारंग भी अपने आदमियों की गति देख घबरा गया था. तू याद रखना मेरी ये बात की अगर कभी सारंग के साथ लफड़ा हुआ तोह ये होगा ब्रह्मास्त्र पंडित जी का.", देगची में कड़छी भर घी डालते हुए नरिंदर ने कहा तोह शंकर को भी याद आ गया वो गाँव देहात का अखाड़ा.

"सचमुच अज्जू इतना तगड़ा या चौड़ा नहीं था जितना तू और उमेद थे फिर भी कैसे दोगुने तगड़े पहलवान को मिनट से पहले निचे टिका देता था. ये साला सारंग न होनी की जड़ है. अगर तेरा कहा ठीक है तोह अर्जुन बस उस तक पहुंच जाए, गर्दन मैं हे उखडुंगा उसकी.", शंकर की उत्तेजना बहोत थी उसका अज्जू से लगाव बताने को

"पापा. देख लेना शंकर की ये काम पापा करेंगे अगर अर्जुन उस रास्ते गया तोह. उन्होंने अर्जुन को एक बात सिखाई है की किसी को जान से नहीं मारना और वो जिस रफ़्तार से सीख रहा है वो उनसे बेहतर भी है और जान बक्शने वाला नरम दिल भी बस अभी इमोशंस के मामले में कच्चा है. वो लायक भी है बस कुछ समय सही से घर में बिता ले. तू विचलित मैट कर उसको. अब खामोश रह ये आ गए तेरे नगीने.", खड़े मसाले बर्तन में डालने के बाद नरिंदर ने बात का रुख हे पलट दिया. आज कही जा कर शंकर को समझ आया था के उसका बीटा वास्तविकता में क्या है. और उमेद को भी इस बात का अंदेशा था इसलिए वो पहले हे दूर हो गया था. दोनों की बातचीत के दौरान ख़ास बात थी की नरिंदर ने कही भी मधुलता या बिंदिया का नाम या फिर किस्सा नहीं छेड़ा था.

"मेरे से टेंशन मैट ले तू भोले, वो सब तोह अभी थोड़ी देर में हे आएंगे. मैं तोह यहाँ इसलिए आया था की कुछ और भी बता सकू इन्दर के साथ.", उमेद ने करीब आते हे वो सिग्गट का आखिरी काश लिया और बुझा दी.

"अब तू क्या कहानी कहने वाला है बता दे?"

"अर्जुन. उसने हे करम सिंह का काण्ड करवाया है और मतलब उसके पास जानकारी है आगे की. हम सोचते हे रह गए...... और काम हो gaya.",Umed ने बात गाने की पंक्ति से ख़तम की तोह अब नरिंदर की भी आँखों में हैरत दिखी.

"समझ न सबकुछ भाई. तुझे मिश्रा ने बीवी का बताया लेकिन गायब तोह उसकी बहिन भी हुई थी. और कर्मा मारा गया शंकर के तरीके से मतलब कोई तेज डॉक्टर जो भोले को जानता है लेकिन काम अर्जुन के लिए कर रहा है. और भूल मैट की अर्जुन पहले भी बड़े काम कर चूका है. किसी ने चंडीगढ़ में ऋचा की जानकारी ली जहा वो भोले की बेटी है. बबिता की शादी में वो उसके साथ गया था जहा विकास ने संजय को देखा था अर्जुन के साथ, घंटे भर अकेले में. लोहान के कुछ आदमी संजीव टपका गया हॉस्पिटल रहते हुए मतलब की वो और अर्जुन काम कर रहे है. भुप्पी जहा रिकॉर्ड लेने गया वह कुछ न मिला क्योंकि हिस्ट्री साफ़ करवा दी गई थी और उसके बाद शबनम इंडिया से बहार. तुम भी जरा सोचो की वो कहा तक पहुंच चूका होगा? मेरे हिसाब से तोह मेरे घर तक भी क्योंकि पापा तोह उसके साथ आखिरी समय में भी थे.", उमेद ने तोह धमाका हे कर दिया था.

"संजय. सुशीला वाला संजय?"

"हाँ भाई भोले वही संजय जिसका ख़ुफ़िया तंत्र किसी antar-rajiya संस्थान सा है और दिल्ली से राजस्थान की आखिरी हद्द तक हर तरफ उसके पाँव मजबूत है. और कर्म की हत्या में दिखी वो काली इलो राजेश से मांगी गयी थी क्योंकि वो काम से सांगवान अंकल के पास था जिस दिन संजीव और अर्जुन डिनर पर बहार थे. गोटे मुँह में हे आ गए होंगे तेरे तोह क्योंकि मेरे भी आ चुके है. वह नहाते हुए पता लगा है मुझे कुछ बातों का. अर्जुन जान चूका है और अब वो पंजाब गया है उसके बाद वो घर में रहने वाला है लेकिन नेटवर्क काम करेगा उसका." उमेद के खुलासे ने तोह दोनों भाइयों को हैरत में दाल दिया था.

"बहनचोद. ये तोह पापा ने खेला है लगता है.", शंकर उतना भी काम अकाल न था ऐसे मामलो में.

"बिलकुल ऐसा कह सकता है भाई तू. लेकिन यहाँ शायद उन्हें भी सबकुछ नहीं पता क्योंकि ये लड़का टुकड़ो टुकड़ो में काम कर रहा है तोह कुछ समझ नहीं आने वाला. और ये kaat-peet में तेरे जैसा हाथ तोह सिर्फ सांगवान चाचा का है लेकिन कर्म को उन्होंने नहीं मारा.", उमेद का सवाल जायज था. यहाँ पतीले में अदरक और लहसुन डालता नरिंदर सोच हे रहा था बस.

"वो हमेशा किसी न किसी को मेरी तरह तैयार करते है लेकिन फिर गायब कर देते है अगर गलती हो तोह.", शंकर के ऐसा कहते हे नरिंदर ठंडा हे पड़ गया.

"कोई बताएगा की ये लड़का कहा तक पहुंच चूका है.?", नरिंदर के इस सवाल का जवाब खुद शंकर ने दिया.

"मेरे केस में तोह भजन मां तक. बाकी अब लगता है के सांगवान चाचा भी उसके साथ हे है."

"मुर्गा तू हे चढ़ा उमेद और शंकर, तू न भाई मरीज हे देख या शादी के काम कर. कुछ भी किया इस से अलग तोह समझ ले उसको पता चल जायेगा और वो तेरी परवाह करता पीछे आ जायेगा. बापू खिलाडी निकला अपना जो हथियार भी सबकी मदद से तैयार किया और पता भी नहीं लगने दिया. उमेद, रघुबीर चाचा, पापा खुद और माँ के साथ साथ वियोग के बदले में पूरा परिवार. संजीव उसके साथ वैसे हे है जैसे तू और मैं या फिर गज्जू. अर्जुन को सबकुछ बताया गया है चाहे पहेली की तरह समझ ले और वो लड़का इसको हल कर हे देगा अगर उसको प्यार से रोका न गया तोह."

"वो तोह भोले की ख़ास जगह अकेला हे राइड मार गया था जिसके दम पर सांगवान चाचा जी भी उसके मुरीद हो चुके है.", उमेद ने वो गौशाला वाला जीकर किया तोह अब नरिदर ने एक कड़छी घी और दाल दिया बर्तन में.

"कोई न, गेम एक साथ हे खेलनी है तोह फिर अर्जुन साथ हे लेना पड़ेगा. लेकिन अब उस से तुम लोग नहीं टकराओगे. ये प्यार से हे मानेगा और अगर पापा इतना सोच कर चल रहे है तोह देख गज्जू, मैं सारंग की गांड में गुल्ला कैसे डालता हु. अर्जुन को बस ये नाम किसी तरह पहुंचना है.", नरिंदर जैसे सोच चूका था के अब खेल बड़ा करने का वक़्त आ चूका है.

"नाम पहुंच चूका है उस तक.", उमेद ने सर हिलाते हुए पुष्टि की

"कैसे?"

"वो बहोत पहले हे इस काम पर लग गया था इन्दर. सारंग का नाम उसको मेरे से हे पता लगा था. माफ़ करना क्योंकि जिस दिन सुशीला और शबनम वाला किस्सा हुआ था तोह मैंने हे उसको ये पहेली हल करने के लिए दी थी. उसका जवाब था के वो डरपोक आदमी किल्ले के अंदर बैठ कर दूर से हे निशाना लगता है.", उमेद ने ये परत भी खोल दी थी.

"और तुम्हे लगता है के अर्जुन सही बोल रहा है.?", ये सवाल शंकर का था.

"वो मुझसे मजाक नहीं करता भोले. लेकिन डर ये है की वो अकेला हे खोजबीन में लगा है. उसको समझना जरुरी है इन्दर और साथ चले तोह हम लोग इस सारंग से भी छुटकारा प् सकते है. बस चाचा जी को साथ ले कर चलना होगा."

"इन्तजार हे कर भाई गज्जू फिर तोह. पापा करने नहीं देंगे और सारंग के पास तोह हजारो पहुंच चुके फिर अर्जुन क्या नयी बात कर गया.? खेल आसानी से नहीं होने वाला."

"ये अर्जुन को भी पता है. और वो खुद अब आगे नहीं बढ़ेगा क्योंकि सारंग के साथ इन्तजार वाला हे खेल खेलने वाला है, चाचा जी के साथ रह कर. बाकी सवाल तोह उसके भी शायद बहोत से अनसुलझे है क्योंकि वो थोड़ा अलग अलग सा रहता है कुछ समय से.", उमेद ने अर्जुन की वर्तमान स्थिति समझते हुए कहा.

"ये समझ से भी परे है भाई. कौनसी शतरंज चल रही है जो ये लड़का इतनी सी उम्र में खेल रहा है? वो 11 में है और 2 साल बाद हे कॉलेज में जायेगा. इतना समय ये रुक रहा है और ये जानकारी भी रखता है. मतलब ये हमसे बेहतर जानता है के परिणाम क्या हो सकते है?", नरिंदर की बात से उमेद पूरा इत्तेफ़ाक़ रखता था.

"तुमने भी तोह कहा था इन्दर की अगर वो लड़ाई हुई तोह हम एक भी मौत को सेहन नहीं कर सकते. वो ये जानता होगा. लेकिन निश्चय भी देखो जरा उसका जो इतने साल भी इन्तजार करने को तैयार है. असल में हम उसको नहीं रोक रहे है, वो हे अब शांत रहना चाहता है."

"शंकर भाई तुझे तोह न व्रत रखने चाहिए की जो काम तुम और मैं नहीं कर पाए वो हमारा बीटा करने में लगा है.", नरिंदर ने शंकर से ये कहा था.

"क्यों? मैं अलग हु? मेरे भी बाप के सामने सारंग ने पत्ता हिलाया था न इन्दर."

"सॉरी भाई. तेरी जान की कसम, रघुबीर चाचा मेरे लिए पापा से आगे थे क्योंकि उनके बेटे तू और मैं थे. सारंग के गले में मैं हे पत्ता डालूंगा और सवाल वही होगा.", नरिंदर के इतना कहते हे उनका ध्यान शोर की तरफ गया. सांगवान, मेहुल, भुप्पी और दलीप दौड़ लगते आ रहे थे उनकी तरफ.

"बिना नशे हे गांड मरवा ली इन्होने लगता है.", शंकर के ऐसा कहते हे सभी हंसने लगे. आज मुर्गा तगड़ा हे बन्न ने वाला था.

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पंजाब वाले घर पहुंचते हे अर्जुन का सामना गुरदीप की माता जी से हुआ. गली में हे रेहड़ीवाले से सब्जी लेती हुई सरदारनी जी के चेहरे पर ख़ुशी साफ़ नजर आने लगी थी. अर्जुन भी कार को एक तरफ लगाने और दोनों बहनो के उतरने के साथ हे आंटी जी की तरफ बढ़ गया.

"नमस्ते आंटी जी. आशा करता हु सब ठीक होगा.", पाँव छूने में देरी किये बिना हे अर्जुन झुक गया.

"न पुत्तर जी न. तुम तोह मेरे ाचे बेटे हो और बेटे तोह गले लग के मिलते है. बड़ी ख़ुशी हुई तुम्हे सामने देख कर.", आंटी जी ने अर्जुन को गले लगाया और आरती भी उनसे वैसे हे मिली थी.

"ये मेरी बहिन अलका है आंटी जी. ताऊजी की छोटी बेटी और हमारी प्यारी आंटी जी है गुरदीप की मम्मी जी अलका.", अलका ने भी शिष्टाचार से हाथ जोड़े तोह उन्होंने अलका के सर पे हाथ फिरते हुए शुभकामनाये दी.

"चलो बीटा जी पहले मेरे यहाँ चल कर कुछ chai-thanda लो फिर कोई बात करेंगे."

"नहीं आंटी जी थोड़ी देर बाद. प्लीज. ड्राइविंग लम्बी थी और थोड़ा फ्रेश होने के बाद आपके पास आते है. वैसे भी अभी यही मार्किट से naan-chhole खा कर हे इधर आ रहे है.", अर्जुन की गुजारिश पर उन्होंने भी स्वीकार कर लिया लेकिन याद से आने का जरूर कह दिए. आरती ने पर्स से घर की चाबियाँ निकल कर गेट खोला और उसके पीछे हे अलका अंदर चल दी. अर्जुन सामान लिए सबसे आखिर में.

"यार आरती सच कहु तोह ये शहर मॉडर्न भी है और काफी बड़ा भी. हर तरह का फैशन था वह रेस्टोरेंट पे जब हम खाना खा रहे थे.", अलका तोह आते हे सोफे पर पसर गयी और आरती पानी की बोतल फ्रिज में रखने के बाद उसको चालू करके वापिस आ कर बगल में हे बैठ गयी.

"शहर आराम से देख लेना शाम को और मैं नाहा के आराम करने लगा हु. आप दोनों को शायद जरुरत न हो लेकिन फ़िलहाल मुझे थोड़ा रेस्ट चाहिए.", अर्जुन वही एक तरफ दोनों बैग रखता हुआ अपने चाचा चची के कमरे की और चल दिया. घर वैसा हे चकाचक था जैसा वो लोग छोड़ कर गए थे.

"ये तोह आते हे गुल हो गया. वैसे यहाँ सबके कमरे अलग अलग हे है?", अलका एक पल मायूस हुई थी लेकिन फिर ध्यान इतने व्यवस्थित और साफ़ सुथरे घर पर गया तोह वो बातें करने लगी.

"हाँ कमरे सबके अलग हे हैं. जहा अर्जुन गया है वो maa-papa वाला कमरा है और उसके साथ स्टोर रूम. ये रसोई के साथ हे 2 कमरे है अंदर वाला प्रियंका दीदी का और इधर वाला मेरा. एक और भी कमरे है गेस्ट्स के लिए जो इस तरफ है. तुम्हे भी फ्रेश होना है तोह मेरे कमरे में हो सकती हो.", आरती ने उठ कर टेलीविज़न के सामने से कपडा हटाया और स्विच दबाते हुए चालू कर दिया. रिमोट लिए वो वापिस अलका की बगल में आ गयी.

"तू हो जा यार अगर तेरा दिल कर रहा है तोह. मैं तोह फ़िलहाल यही ठीक हु लेकिन एक कॉफ़ी मिल जाये तोह मजा आ जायेगा.", अलका जिस तरह से पसरी हुई थी उसकी पतली गोरी कमर साफ़ दिख रही थी टॉप के ऊपर खिसकने से. चुस्त जीन्स वैसे हे पूरा भूगोल उजागर कर रही थी जहा आरती की भी नजर ठहर गयी.

"मजे की बची जरा हालत तोह देख अपनी. फिगर ाचा है तोह मतलब हर वक़्त दिखाना है?"

"डार्लिंग, फिगर तोह तेरा भी कुछ काम नहीं है. ये बड़े संतरे हर वक़्त हे टाइट रहते है. और मेरा जो है वो न तुझसे छुपा है और न अर्जुन से. लेकिन सोच रही हु की अगर दोपहर घर पर हे बितानी है तोह निक्कर हे पहन लू.", अलका की यही मजेदार बातें आरती के गाल लाल कर देती थी. वो बेशक पहले से कही बेहतर होने लगी थी लेकिन अक्सर शर्म आ हे जाती थी. बैग उठा कर उसमे से एक ढीली निक्कर निकाल कर अलका को देते हुए आरती भी अपने आरामदायक कपडे लिए अंदर चली गयी. बैठक के कमरे की चिटकनी अंदर से लगते हुए.

"टीवी देख मैं इतने नाहा कर कपडे बदल कर आती हु."

"अब तोह मैं भी कपडे बदल कर आउंगी डार्लिंग.", अलका ने अपने आप से हे ये कहा और एक नजर आरती के बंद कमरे में डालती हुई अर्जुन की तरफ चल दी.

"खोलो तोह सही.", बाथरूम के दरवाजे को हल्का सा थपकते हुए अलका ने आवाज दी तोह थोड़ी हे देर में उसके सामने अर्जुन का निर्वस्त्र शरीर था जहा साबुन का झाग कुछ हिस्सों को ढके दिखा.

"पागल हो रही हो क्या? आरती के होते हुए हे ये सब."

"हटो यार तुम भी कितने बड़े वाले फत्तू हो. वो नाहा रही है अपने बाथरूम में तोह टेंशन मत लो.", अलका ने जीन्स तोह बहार बिस्टेर पर हे उतर दी थी और अब वो टॉप के बाद bra-panty भी एक तरफ टांग कर अर्जुन से जा लिपटी. चलते फुहारे के निचे दोनों के निर्वस्त्र शरीर भीगने के बावजूद गरम हो रहे थे.

"आह्हः.. ये चोरी चोरी वाले मोमेंट्स की वैल्यू तुम क्या समझोगे डार्लिंग.. रात तोह हमारी है हे लेकिन इधर मैं हर मिलने वाला मौका ले कर रहूंगी.", कश्मीरी सेब से कही बड़े और मांसल चुचो को अर्जुन की सख्त छाती पर ऊपर निचे रगड़ती हुई अलका ने बिना समय गवाए होंठो से होंठ मिला दिए. तड़प तोह अर्जुन में भी थी जो 24 घटने से अतृप्त था. पहले हुए आकर्षक कूल्हे जो की अलका के कड़ी म्हणत का प्रमाण थे, उन्हें मसलता हुए वो अलका को अपने साथ जोर से चिपका रहा था. लुंड भी मूसल रूप इख़्तियार करता अलका के पेट पर दबाव बनाने लगा.

"इतना समय नहीं हैं हमारे पास..", अर्जुन ने होंठ अलग करते हुए कहा लेकिन अलका जैसे अलग हे खुमार की गिरफ्त में थी. गिरते पानी से अपनी गुलाबी छूट को ाचे से रगड़ कर साफ़ करती वो पंजो के भार ऊपर उचक गयी. एक हाथ से लुंड को पकड़ कर अधखिले गुलाब सी अपनी महकती छूट पर टिकते हुए वो खुद हे उस दैत्याकार सुपडे को अंदर करने लगी. अर्जुन ने भी सब विचार त्यागते हुए दोनों कूल्हों का थाम कर ये झटका दे दिया.

"आउच.. आह्ह्ह्ह.. कमीने ..आह्हः.. कर रही थी न मैं खुद हे...? रुको.. िसष्ठ.. माँ.. आह्हः.. इतने से हे करो थोड़ी देर.", आधा लुंड अंदर जाते हे छूट का जर्रा जर्रा कांप उठा. नरम खाल उस तगड़े मूसल पर केंचुली की तरह चिपक चुकी थी लेकिन अर्जुन समय और स्थिति को देखते हुए धक्के देने लगा.

"आठ.. बड़ी जड़ली थी न तुम्हे.. उम्म्म्म.. अब बस मुझे करने दो..", अर्जुन ने 3 धक्को में हे छूट की हद्द को छू लिए था और अब वो मादक बदन पूरी तरह आगोश में लिए कस कर अलका के खजाने को लूटने लगा. इस अवस्था में चुचो का मर्दन बस सीने से हे मुमकिन था क्योंकि गीले फर्श पर एक दूसरे के जिस्म को ढीला छोड़ना गलत होता. अलका भी जल्द हे जोश में आ गयी थी. छूट ने पहला हथियार जल्द गिरा दिया था और अब गीली सुरंग मजे से वो तगड़ा खूंटा झेलने लगी.

"आह्हः. करते रहो.. आह्हः.. आह्हः.. ऐसे हे ... उफ्फ्फ...", गर्दन में बाहें डाले वो हर धक्के पर सिसक रही थी और ठप्प ठप्प की आवाज गीले शरीर पर कही जायदा जोरदार होने लगी. 5 मिनट में हे अलका का शरीर कांपने लगा तोह अर्जुन ने धक्के रोक दिए. कुछ देर वो ऐसे हे अपनी इस खूबसूरत प्रेमिका को लिए खड़ा रहा और अलका के सँभालते हे अलग हो गया. वो बस देखती रही और अर्जुन ने एक प्यारा सा चुम्बन करते हुए टोलिया लपेट कर विदा ली.

"बाकी रात में.", अर्जुन अपनी परवाह किये बिना बस अलका को तृप्त कर गया था. वो भी जल्द हे खुद को ठीक करके कमरे में चली आयी जहा अब सिर्फ टोलिया और कपडे हे बिस्टेर पर थे. अर्जुन दरवाजा बहार से लगा कर हॉल में जा चूका था.

'इसलिए प्यार करती हु तुमसे. लेकिन हो पक्के गधे, वो भी बड़े wale..ouch.. क्या हालत करि है मेरी छूट की तुमने.. लाल हे कर दी 5 मिनट में.. आठ.. ी लव यू डंकी.', अलका ने छूट को सहलाते हुए बाकी कपडे पहने और टोलिया उठा कर बहार आ गयी जहा आरती भी अभी अभी आयी थी.

"अर्जुन कहा है?", अलका के इस सवाल पर आरती ने भी ना में सर हिला दिया.

"मुझे क्या पता. वो तोह नाहा कर सोने वाला था न और तुम उस कमरे से हे नाहा कर आ रही हो तोह तुम्हे पता होना चाहिए."

"वो बहार आया था तोह मैं नहाने चली गयी. लेकिन ये तोह गायब है.", अलका ने जाली वाले दरवाजे से बहार देखा तोह कार भी कड़ी थी पर ये दरवाजा खुला था.

"बहार हे गया है क्योंकि दरवाजा तुमने मेरे सामने बंद किया था."

"समझ गयी, वो दूध वगैरह लेने गया होगा क्योंकि घर में रोजाना वाला सामान तोह है नहीं. वैसे वो पैदल हे क्यों गया?", अब आरती हे जवाब देती हुई सवाल करने लगी.

"मुझे क्या पता के पैदल क्यों गया? वैसे भी अर्जुन उधर भी तोह गलियों में कई बार पैदल हे भटकने निकल जाता है. चल छोड़ ये सब और बता के रात के लिए तुझे वो सेटिंग मंजूर है जो मैं कार में बता रही थी.?", अलका कुटिलता से हंसती हुई आरती से लिपट कर कहने लगी. अलका की चिकनी मखमली टाँगे बेहद आकर्षक थी और आरती खुद भी एक उन्नत्त सौन्दर्य से भरपूर nav-youvana. दोनों के हे जीवन को महकने वाला एक हे शक्श था और उस को ले कर इनमे कही कोई द्वेष उपजने की जगह रिश्ता मजबूत हे हुआ था.

"आज यार तू हे सो अर्जुन के साथ, मुझे उस सब के बाद आराम चाहिए होता है जो नसीब नहीं होने वाला. और वो कौनसा दूर रहता है, कभी भी रह सकती हु उसके साथ. लेकिन तुम्हे यहाँ घर से दूर इस दिन को ाचे से एन्जॉय करना चाहिए अर्जुन के साथ.", आरती ने मस्ती भरे सवाल का जवाब बड़े हे प्यार और परवाह से दिए तोह अलका ने मुँह बना लिया.

"ऐसा करते है के पहले एक बार तू 2 घंटे बातचीत कर लेना उसके साथ. नींद ाची आएगी और फिर सही टाइम पर वो मेरे पास आ जायेगा अगर तुझे अलग हे सोना है तोह. या फिर तू सो जाना और मैं वही आ जाउंगी अगर तुझे दिक्कत न हो तोह.", अब आरती मुस्कुरा उठी.

"तुमने ऋतू को बिगाड़ा है या ऋतू ने तुम्हे? मतलब तुम मुझे भी देखना चाहती हो और फिर दिखाना भी चाहती हो. बेशरम कही की."

"मजा आता है न यार देखने में. मैंने ऋतू को देखा था एक बार और उसने मुझे भी. सच कहु तोह इसमें भी अजीब सा मजा आता है यार. लेकिन अर्जुन इस मामले में थोड़ा संजीदा है और वो एक साथ तोह दोनों को एक हे बिस्टेर पर प्यार करने से रहा लेकिन तुझे सोया देख कर मेरे साथ कर सकता है. जो मजा मैंने और ऋतू ने लिया है वही मैं तुझे देना चाहती हु बस.", अलका ने जैसे हे ये स्पष्ट किया आरती के चेहरे पर लाली चा गयी, खूबसूरत तोह वो भी ऋतू के जैसी हे थी.

"धत्त.. मैं सो जाउंगी और फिर जो चाहे करना तुम दोनों. काम से काम तुम्हे ये तोह रहेगा की किसी के पास तुमने वो सब किया. जानती हु तुम्हे भी ये मजा हे लेना है.", आरती ने भी सच हे कहा था.

"हाँ यार. ये भी बात सही है के मैं ऐसा करना चाहती हु और ऋतू के साथ तोह ऐसा कभी भी हो सकता है लेकिन अर्जुन को भी छेड़ने के मजे लेने है यहाँ. चल वो जब आएगा तब देखेंगे. फ़िलहाल तोह ये बाल सूखने है जिन्हे संभालना हे अपने आप में पूरी म्हणत है.", टोलिया उठा कर अलका बालो को सूखने बहार की तरफ चल दी.

"ओह पागल तेरी निक्कर बता रही है के अंदर पंतय भी नहीं है. किसी ने देख लिया तोह एक्सीडेंट हे न हो जाये."

"अपना तोह फिर भी कुछ नहीं जाता. हाहाहा. वैसे कमाल के है न मेरे हिप्स? तेरे जीजा को बहोत पसंद है ये और मौका लगा तोह देख लेना वो इन्हे भी प्यार करने से नै हटेगा.", दरवाजा खोलती अलका ने हँसते हुए जवाब दिया था लेकिन फिर गांड की दरार में घुसी वो सलेटी ढीली निक्कर बहार की तरफ खींच ली.

"छियई.. वो उधर भी प्यार करता है? और सचमुच तुम्हारे ये बिलकुल अलग से है. ऐसे तोह कोमल दीदी के भी नहीं है और माधुरी दीदी के बड़े या चौड़े होंगे लेकिन तुम्हारे तोह जैसे मसल्स की तरह अलग हे उभरे हुए है."

"नरम भी है डार्लिंग. बहोत म्हणत की है इनके ऊपर तभी तोह 28 कमर होने पर भी जीन्स 32 वाली लेनी पड़ती है skin-tight में. हाहाहा.. तेरे भी कुछ काम नहीं है और एक न एक दिन वो तेरे साथ भी यहाँ करेगा जरूर.", अलका बहार धुप में चली गयी आरती को शर्म और उलझन में छोड़ कर.

'पता है के वो यहाँ करेगा लेकिन इतना बड़ा ... छी.. क्या सोचने लगी मैं. सीधा हे ठीक है सबकुछ.. वैसे करेगा तोह रोकूंगी नै.. अलका कह रही है तोह ाचा हे लगा होगा. फट. जो हो देखा जायेगा.'

उधर घर से बहार निकलते हे अर्जुन को गुरदीप तकर गयी थी जिसकी आँखों में जाने एकाएक कितनी हे ख़ुशी उमड़ आयी थी इस जिवंत उपहार हो सामने खड़ा देख. आँखों से हे कुछ बातें करने के बाद वो स्कूटी पर आप हे पीच हो गयी थी जिस से अर्जुन जहा जा रहा हो वह उसके साथ हे चल सके. पार्क निकलने की हे देरी थी की गुरदीप के मॉटे सुडोल उभार अर्जुन की पीठ पर आ ठीके.

"फ़ोन तोह कर सकते थे ने के आज आ रहे हो. अभी घर वापिस आ रही थी तोह दिख गए नहीं तोह क्या पता जनाब बिना मिले हे रफूचक्कर हो जाते.", गुरदीप की ये प्यारी शिकायत अर्जुन को भी ाची लगी जो मुस्कुरा रहा था बस.

"तुम न सचमुच बसंती हे हो जो रेडियो की तरह चालू हो जाती है. जब आया था तोह सबसे पहले आंटी जी से हे मिला था और अभी बस नाहा कर घर से निकला हु सामान ले कर और देखो हम मिल गए. वैसे धुप में लाल होने का क्या कारण था?"

"रहने दो तुम हाँ नहीं तोह. दिल लूटने के बाद पूछते हो के मैं चैन से तोह हु. पता है अब तोह दिल भी नहीं लगता मेरा और इसलिए 12 से 2 की एक क्लास लगवाई है यही पास में. अब आये हो तोह मेरे साथ बिना समय बिताये जाने नहीं देने वाली मैं. कह देती हु. वैसे अभी 2-3 दिन तोह रहोगे हे न यहाँ?", दोनों जैसे हे उस खुली मार्किट में आये तोह एक तरफ स्कूटी कड़ी करते हुए अर्जुन को थोड़ा कस कर गुरदीप ने एक बार खुद से दबाया और तुरंत उतर गयी. अर्जुन जानता था की एक तड़प तोह गुरदीप में भी कही ज्यादा भर चुकी है.

"कल दोपहर में निकलना है वापिस हमको और मेरे साथ इस बार अलका दीदी भी आयी है. अगर तुम्हे टाइम बिताना है तोह आरती और अलका दीदी को घंटे 2 घंटे के लिए व्यस्त करना होगा. वैसे सचमुच प्यारी लग रही हो पहले से भी ज्यादा.", अर्जुन भी गुरदीप को निराश नहीं करना चाहता था लेकिन वो उसके साथ Alka-Aarti के होते एकांत समय भी नहीं बिता सकता था. और शाम को तोह उन्हें 4-5 जगह जाना भी जरुरी था मार्किट से सामान लेने के साथ साथ. दोनों हे उस डिपार्टमेंटल स्टोर तक धीमी चाल से बढ़ने लगे.

"वो तोह मैं कर हे दूंगी और कहो तोह यहाँ से जाते हे. तुम बताओ के सचमुच तुम मेरे साथ वक़्त बिताना चाहते हो?"

"अब ये सवाल गलत किया है तुमने. मैंने कहा न के मेरी बस यही मज़बूरी है और हमारे पास मिलने की एक हे जगह है, चाचा जी वाला घर. रात में मुमकिन नहीं है और शाम को बिजी रहने वाले है कार्ड्स देने में और कुछ सामान लेने में. कल सवेरे का तोह अफसाना की तरफ नाश्ता बता रही थी आरती. तुम हे बताओ मैं क्या कर सकता हु ऐसे में?", इस दौरान हे दोनों दूकान तक चले आये और अर्जुन दूध, ब्रेड, दही, बिस्कुट आदि लेने लगा. तब तक गुरदीप भी जैसे फैंसला कर चुकी थी की कैसे समय निकलना है.

"चलो फिर और देखना मैं कैसे हम दोनों के लिए सब अर्रंगे करती हु वो भी 5 मिनट में. लेकिन अभी आरती को मैट बताना के हम मिले है.", इस बार स्कूटी गुरदीप के हाथ थी और अर्जुन भी सोच रहा था के ये बसंती जाने अब कौनसा ड्रामा बनाने वाली है. पार्क के मदद पर हे वो अर्जुन को उतार कर वापिस कही जाने के लिए मदद गयी थी और अर्जुन यहाँ से 20 कदम दूर अपने घर चल दिया. अलका उसको बाल सूखती हे मिली थी आँगन में.

"तोह आरती ठीक कह रही थी की तुम यही सब लेने गए होंगे. वाह क्या बात है. बड़े समझदार हो तुम तोह.", अलका के लम्बे चमकदार खुले बालो को निहारते हुए अर्जुन मुस्कुराता हुआ उसके साथ हे अंदर हॉल में आ गया. आरती ने भी अलका को सामान की तरफ इशारा करते हुए अपनी बात सही साबित करवाई.

"हाँ, आप लोगो ने कॉफ़ी भी पीनी होती है तोह दूध चाहिए हे था. दही वैसे हे ले लिए क्यूंकि अलका को पसंद है चीनी मिला कर खाना. अब मैं सोने लगा हु थोड़ी देर और जब कही जाना हो तोह बता देना बस.", अर्जुन ने पर्स फ्रिज के ऊपर रखने के बाद टीशर्ट उतार कर हाथो में हे पकडे हुए कमरे का रुख किया. वो बनियान और जीन्स में हे बिस्टेर पर लेट गया था. मुश्किल से अभी 5-7 मिनट हे गुजरे थे की हॉल में रखा फ़ोन घनघनाने लगा.

"Hello.", आरती ने हैंडल उठाया तोह सोचा घर से फ़ोन होगा क्योंकि याद भी नहीं रहा था बताना पहुंचने के बारे में. लेकिन यहाँ दूसरी तरफ ख़ास सहेली अफसाना थी.

"हम नाराज हैं आपसे आरती. ऐसी भी क्या बेरुखी जो आपके आने का इल्म हमे कही और से हो?"

"ओह मेरी प्यारी बन्नो, एक तोह ये ilm-vilm जैसे भरी वर्ड्स मैट हे बोलै कर और यार तुझे बताया था के हम एक या दो दिन तक आने वाले है. बस आज का थोड़ा एकदम बन्न गया तोह याद नहीं रहा. वैसे शाम को तोह आने हे वाले है तेरे पास."

"गुस्ताखी तोह ये आपसे हुई है चाहे बेवक़्त हे आना मुकम्मल हुआ लेकिन बताया तोह यहाँ आने पर जा सकता था. आप अभी हमारी रिहायश तशरीफ़ ला रही है और दोपहर का खाना साथ में रहेगा. अम्मी को हमने इत्तिला कर दिया है और आगे आप हुकुमरान है."

"यार अफ़सा थोड़ा रेहम खाया कर प्लीज. तेरी ये उर्दू ाची लगती है लेकिन थोड़ा काम कर और आंटी जी को बता हे दिया है तोह मैं आती हु लेकिन उन्हें बोल दे खाना हम खा चुके है तोह जेहमत न उठाये. मिलती हु थोड़ी देर में."

"इन्तजार में है हम यहां. आप कहे तोह लेने भी आ सकते है."

"धुप में बहार नै निकलना और मैं आ जाती हु.", आरती की सबसे ख़ास सहेली अफसाना हे थी या ऐसा कहना बेहतर रहेगा की अफसाना की rehbo-khaas सिर्फ आरती हे थी. उसके बुलाने पर आरती न जा कर दिल नहीं दुखाना चाहती थी. तुरंत हे आरती ने अलका को भी तैयार होने को कह दिया.

"यार जाना जरुरी है?"

"चलते है न यार अलका, तुम्हे सचमुच ाचा लगेगा और अफसाना ने भी ख़ास बुलाया है तोह चाहे थोड़ी हे देर के लिए सही लेकिन चल पड़ यार."

"मुझे तोह कोई दिक्कत नहीं है उल्टा तेरी सहेली से मिल कर ाचा हे लगेगा. वैसे अर्जुन को लेके जाएगी? घर दूर है तोह लेके जाना हे पड़ेगा और वो अभी सोया है इसलिए मन कर रही थी मैं जाने से."

"परेशान मत हो बहिन, अफसाना का घर ये पार्क से आगे हे गली के अंदर है. और अपने यहाँ तोह डरने वाली बात भी नहीं है क्योंकि ये एक हे मोहल्ला है और सभी jaan-pehchan वाले है."

"जीन्स वीनस से तोह उन्हें कोई परेशानी नहीं होने वाली न?"

"कोई परेशानी नहीं होने वाली. ज़ुबैदा दीदी को देख लेना, मुस्लिम लड़कियों के बारे में ख्याल बदल जायेंगे."

"फिर तोह चलते है तेरी अफसाना और ज़ुबैदा दीदी से मिलने. कार्ड भी साथ हे ले ले जिस से काम भी निबट जाये और अर्जुन को बता भी दे. मैं तैयार होती हु.", अलका ने बालो में रबर बंधा और वही जीन्स और टॉप पहन ने आरती के कमरे में जाने लगी.

"बहार से हे बंद करके चलते है न. सोने दे उसको और इतना कुछ झंझट नहीं है."

"नहीं. बता कर जाना जरुरी है यार. उसको थोड़ी न पता होगा की हम दोनों कहा गए है अगर उठ गया तोह. खामखा परेशां होगा बेचारा."

"बोल देती हु बाबा.", आरती ने अर्जुन को बता दिया था के वो कहा जा रही है और 4-5 बजे तक वापसी हो जाएगी. अर्जुन ने उन्हें छोड़ने की बात कही लेकिन आरती ने साफ़ मन कर दिया.

"फ़ोन नंबर टेलीफोन के पास हे अफसाना हुसैन के नाम से लिखा है. अगर कुछ बात करनी हो तोह मिला लेना. आराम करो फिर शाम को बहोत काम रहने वाला है.", अर्जुन के दिमाग ने आज गुरदीप को मान लिया था. सचमुच सरदारनी भोली बेगम नहीं थी सिर्फ. दोनों को अर्जुन पार्क से आगे अफसाना की गली तक फिर भी छोड़ कर हे आया था और आते के साथ हे सोफे पर पजामा टीशर्ट पहने खिली हुई गुरदीप मिली.

"अब तोह कुण्डी लगा दो."
 
ऐसा है दोस्तों के बीवी को उपहार स्वरुप हम ये परिवर्तन दे गए है जैसा कल उनका जन्मदिवस था. पहाड़ो से वापिस जमीन पर पलायन अभी अभी हुआ है.

अबसे जीवन थोड़ा झंझट से दूर और वास्तविकता वाला रहेगा लेकिन आज के लिए मैनेज कर लीजिये. मंगल, गुरु और शनि को अपडेट मिला करेगा क्योंकि अब घर आ गया हु. आधा अपडेट टुकड़ो में लिखा है बाकी कल बीवी के ड्यूटी जाने बाद लिखूंगा.

गर्मियां जल्दी ख़तम हो गयी है. सॉरी आज के लिए लेकिन शिफ्ट करना हे ठीक था. कल 8 बजे शाम अपडेट दे दूंगा और अब खाना हमेशा घर का मिलेगा
 
8 बजे तक अपडेट देता हु भाई.
 
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