Incest Pyaar - 100 Baar - Page 27 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 141

जवान Din-Haseen रात (2)


"इतनी बेक़रार हो?", अर्जुन ने भी जाली के साथ लकड़ी वाला भी दरवाजा बंद करने के बाद उस गदराई जवानी को बाहों में भर लिया. एक पल में समझ गया की बदन में नहाने के बाद वाली नमी है और अंदर सबकुछ आजाद. वो मॉटे सख्त सतांन भी और भारी नितम्भ भी. गुरदीप के हाथ भी अर्जुन की पीठ पर कस चुके थे.

"बता भी नहीं सकती की मेरी हालत क्या है. एक तोह पहली मुलाकात में हे दर्द दे दिया और उसके बाद इतनी लम्बी जुदाई."

"दर्द दिया था तोह? फिर तोह तुम्हे मेरे पास नहीं होना चाहिए.", अर्जुन वो 38 के मॉटे गद्देदार छुटतात मसलते हुए गुरदीप को जैसे सताने लगा.

"आह्हः.. दर्द वह नहीं, यहाँ दिया था. अब बातें मैट करो, बस वो प्यार दो जिस से मैं कुछ दिन वो कमी महसूस न करू. आह्हः...", पजामा इस गदराये मॉटे हिस्से पर ाचे से फंसा था और गुरदीप की हालत को समझते हुए अर्जुन उसको गॉड में उठाये चाचा वाले कमरे में चल दिया. गुरदीप ने दिल के दर्द की बात कही थी और अर्जुन अपने प्यार से वही दूर करने वाले था इस भोली सरदारनी का.

उस बड़े बिस्टेर पर आते हे उनका जोश परवान चढ़ गया. वो मखमली गदराई सरदारनी किसी तजा गुलाब सी महक बिखेरती खुद हे अर्जुन को अपने जिस्म पर गिरती हुई उसका चेहरा चूमने लगी थी. गुरदीप के वो मलाई से नरम और गुलाबी होंठ आखिर मिल हे गए अपने हरजाई के होंठो से. वो चुम्बन पुरकशिश से भरा जाने कब तक चला और अर्जुन के हांथो दोनों हे मॉटे गुब्बारे से चुके मसलवटी हुई गुरदीप खुद हे कमर को उचकने लगी.

"उफ्फ्फ.. सेहन नहीं होता yar..ummmm..", गुरदीप की तड़प और हालत देख अर्जुन एक पल अलग हुआ कपडे उतरने के लिए. दिन के उजाले में जल्द हे दोनों एक दूसरे के निर्वस्त्र आकर्षक बदन को निहारने लगे. गुरदीप के चेहरे पर आयी लाली और लुंड से नजरे हटाना बता रहा था के वो kaam-jwar में तपने के साथ अब शर्मा रही थी. सफ़ेद मॉटे चुके इतने भारी थे की शायद प्रियंका वाले पर्वत भी 19 थे इनके सामने. अर्जुन ने अपने सख्त लुंड पर गुरदीप की नरम हथेली रखते हुए झुक कर कहा.

"इस से हे शरमाओगी तोह ये बुरा भी मान सकता है. प्यार से पकड़ कर सहलाने से शायद ये तुम्हारा साथ दे.", अर्जुन की बातें असर करती उस से पहले हे गुरदीप ने वो हथेली के घेरे से मोटा मूसल कास के थाम लिया. आकर्षित तोह वो भी थी उस जानदार अंग से और वो सख्ती जैसे गहरा असर करने लगी. अर्जुन भी मस्ती में डूबा उन कठै निप्पल को मुँह में लिए एक मॉटे चुके को चुसकने लगा तोह गुरदीप ने भी जाएंगे खोल दी. तजा बाल साफ़ की हुई वो gori-gulabi छूट शहद टपका रही थी.

"ाःह.. आराम से यार.. बड़े सेंसिटिव हो गए है ये जबसे इन्हे तुमने पहली बार हाथ लगाया है. उफ़... और मैं भी कुछ देना चाहती हु आज तुम्हे.", एक हाथ से लुंड मुठियाती हुई गुरदीप दूसरे से अर्जुन के बाल सेहला रही थी. अर्जुन को अपने चुचो पर इतना आसक्त देख मजे के साथ हे गुरदीप मुस्कुरा रही थी. ऐसे दृश्य में जो कामुकता एक गरम लड़की के चेहरे पर आती है वो जैसे बिखर रही थी गुरदीप के चेहरे पर. अर्जुन बात सुन्न कर अलग होते हुए बगल में लेट गया. अब गुरदीप उसके सीने पर दोनों दूध टिकती आगे कहने लगी.

"वीडियो देखि थी मैंने वर्ल्डसेक्स पर कुछ दिन पहले. ये थोड़ा ज्यादा मोटा और बड़ा है लेकिन मैं वैसा हे करके देखना चाहती हु.", गुरदीप की आधी अधूरी बात भी अर्जुन समझ चूका था. वो निरंतर उस तगड़े मूसल को हिलती रही.

"साथ में करते है जिस से तुम्हे भी ाचा लगा.", अर्जुन सरक कर अब गुरदीप की मोटी चिकनी जांघो की तरफ आ गया. गोल नाभि से 6 इंच निचे हे वो पूरा मैदान चमक रहा था जहा फूली हुई छूट कॉमर्स से लबरेज महक रही थी. छूट को इन्तजार न करना पड़ा और अर्जुन की जीभ ने करामात दिखानी चालू कर दी.

"िष्ठ... ये क्या करने लगे आह्हः.. बाप रे.. उम्म्म्म.. माहहह.. ", गुरदीप ने फिर से लुंड को कब्जे में लेते हुए जोर से भींच लिया. अर्जुन ने छूट को ाचे से चूमते हुए चेहरा वही दबा दिया. ठुमकता हुआ लाल सूपड़ा हे गुरदीप को अपनी आहें बंद करने की उम्मीद दिखा. ये कामशाष्त्र की वही उनहत्तर वाली मुद्रा थी जो ख़ास प्रचलित न थी. गुरदीप को एक पल वो lisa-lisa सा स्वाद अजीब लगा लेकिन सब भुला कर वो भी लुंड को सुपडे से थोड़ा आगा तक अपने गीले गरम मुँह में उतार गयी. अगले 5 मिनट में हे उसका गार्द्रय जिस्म झटके लेने लगा और होंठ उस जरुरत से अधिक मॉटे लिंग पर कही जोर से लिपट गए. अर्जुन के अलग होते हे गुरदीप भी बिस्टेर पर पीठ के बल पसारती हुई गहरी सांसें लेने लगी. चुके कम्पन्न से थिरक रहे थे और अर्जुन ने सही वक़्त देखते हुए क्रिया आगे बढ़ने का निश्चय किया.

"हिम्मत रखना डीपी, दूसरी हे बार है और मुझे लगता है के दर्द जरूर होगा.", भारी जाँघे फैलते हुए अर्जुन ने पनियाई तजा स्खलित छूट के मुहाने सूपड़ा भिड़ते हुए गुरदीप को चेताया तोह लाल डोरो से भरी आँखें बताने के लिए बहोत थी की वो तैयार है.

"जिस्म तोड़ने से पहले मैट अलग होना.. आठ..", ऐसी हिम्मत देख अर्जुन भी पूरी तरह उस मांसल नरम जिस्म पर छ गया. होंठो को चूसते हुए एक करारे धक्के के साथ हे वो लगभग ांचुडी छूट चीरती चली गयी. 5 इंच की दुरी छूट के कॉमर्स और उत्तेजना की वजह से वो भीषण लुंड उस धक्के में तये कर गया.

"उननननंग्ग....", न चाहते हुए भी बंद होंठो के बीच से वो दर्द की आवाज बहार आ हे गयी, आँखों में आंसुओं के साथ. गुरदीप के लचीले बदन की हरकत अर्जुन की कमर पर टाँगे बांधने से नजर आयी. एक और धक्के ने गर्भ को हे चूम लिया. मॉटे dugdh-kalash पइसस चुके थे चौड़ी छाती टेल और छूट किसी परत की तरह लिपटी हुई उस मजबूत लुंड को महसूस करने लगी. ये हिम्मत गुरदीप की अर्जुन के प्रति गहरी चाहत साफ़ बताती थी. होंठो की हरकत होते हे अर्जुन भी हौले हौले उन रसभरे लबो का रास पीने लगा. कमर को हिलना ऐसा लग रहा था जैसे दरवाजे में धंसी कोई कील प्लास से निकली जा रही हो. आधे लुंड को बहार निकलते हे अर्जुन ने होंठ अलग कर लिया.

"फाड़ के तोह रख हे दी है.. आठ.. अब रुकना नहीं.. आठ.. सचमुच बहोत मोटा है यार तुम्हारा और अंदर तक लगता है.", गुरदीप की बोली बातें और आँखों में आये आंसू देख अर्जुन ने हलके से दोनों आँखें चूमते हुए बड़ी नजाकत से लुंड वापिस अंदर उतार दिया. छूट बुरी तरह फ़ैल चुकी थी लेकिन चिकनाहट ने साथ दिया.

"उस दिन तोह बस जोश में हो गया था डीपी.. हहह.. आज तुम्हे मैं आराम से प्यार करना चाहता था... बहोत टाइट है तुम्हारी लेकिन हिम्मत दिखाई.. बहोत सुन्दर भी हो..", अर्जुन ने दोनों पंजे उन गुब्बारे पर लगते हुए छूट को आराम से छोड़ना शुरू किया तोह गुरदीप दर्द के बावजूद मजा ले रही थी. उसकी छूट आज दूसरी हे बार लुंड ले रही थी जिस से हर धीमा घर्षण भी कही जोरदार लगता था. ऐसे हे इस सरल मुद्रा में चुदाई गति पकड़ने लगी थी और जल्द हे दर्द तेज सिसकियों में बदल गया.

"आठ... ऐसे हे करते रहो.. उम्म्म.. मुझे नहीं लगता के ाःह... कभी तुम्हारी जगह कोई और ले पायेगा.. Arjunn.nn ी लव यू..", गुरदीप kaam-sagar में तैरती हुई भी अपने दिल की चाहत उजागर कर रही थी. सच हे तोह था के उसके जिस्म के साथ आत्मा ने भी खुद को अर्जुन के हवाले कर छोड़ा था. अर्जुन के चेहरे को हर तरफ चूमने के बाद उसने खुद हे उसका चेहरा अपने एक मॉटे गुब्बारे पर टिका दिया. चुचो को चुसवाना भी ऐसा सुखदायी हो सकता है ये बस कुछ वक़्त पहले तक उसको न पता था और न कोई अनुभव था. ठंडक भरे कमरे में भी दोनों जिस्मो की गर्मी बढ़ हे रही थी. धीमी चुदाई अब बदल कर लम्बे और गहरे धक्को के साथ रफ़्तार लेने लगी थी. छूट ने दुरसी बार बाँध तोड़ते हुए रस बहाया तोह अर्जुन अलग हो गया. गुरदीप की उखड़ी हुई सांसें और बंद आँखें बता रही थी की वो कितना दुर्लभ चरम महसूस कर रही है. छूट में खालीपन का एहसास होते हे उसने अर्जुन को देखा.

"तुम बहोत हे प्यारी हो डीपी. मैं तुम्हारे साथ कही गलत तोह नहीं कर रहा?"

"बड़े आये गलत और सही बताने वाले. जिसमे सिर्फ प्यार और सुख हो, वो सही और गलत से परे है मिस्टर. अब मेरी बारी है.", तरबूज से मॉटे चुत्तड़ फैलाती वो अर्जुन के ऊपर आ चढ़ी. अर्जुन जवाब देता उस से पहले समूचे लुंड को अपनी गीली छूट में उतारती हुई गुरदीप ने वो लम्बी सिसकी लेते हुए मंशा स्पष्ट कर दी. इस खेल में अनुभवी न सही लेकिन जोश भरपूर था इस लड़की में. अब सचमुच मजे की बारी अर्जुन की थी और गुरदीप के मॉटे मॉटे उभर सीने पर रगड़ते हुए अपना काम करने लगे. सवेरे अलका के साथ अधुरु मिलान से उत्तेजित अर्जुन भी 10 मिनट में अकड़ने लगा था गुरदीप के निचे.

"आह्हः.. होने वाला है मेरा डीपी.. हटो..", गुरदीप इतना सुनते हे लुंड को बहार निकलती हुई अपनी गीली छूट से हे रगड़ने लगी.

"उफ़... मैं भी..", अर्जुन का वीर्य दोनों के जिस्मो के बीच हे बरस कर रह गया. अलग होते हे गुरदीप हंसने लगी.

"देखो क्या हालत है हम दोनों की. फिर से नहाना पड़ेगा.", दोनों के हे पेट कॉमर्स और वीर्य से सन्न चुके थे और गुरदीप के उठते हे अर्जुन की निगाह थिरकते विशाल कूल्हों और तरबूज सी लाल हो चुकी छूट पर पड़ी. मुर्झात हुए लुंड ने भी हरकत करके सहमति जताई की गुरदीप की वो ख़ास जगह पसंद आयी.

"जहा देख रहे हो मुझे पता है बच्चू. इसके लिए तुम्हे म्हणत करनी पड़ेगी क्योंकि वो तुम्हे चाहिए, मुझे जो चाहिए था उसके लिए मैंने म्हणत की. आज साथ हे नहाते है.", गुरदीप ने जिस कामुकता से अर्जुन को इशारा किया था वो झट्ट उठ कर उसके साथ बाथरूम में घुस गया. जो चाहिए था उसके लिए म्हणत तोह करनी हे थी.

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"अर्जुन से मिली थी जाने से पहले?", ऋतू के साथ इस वक़्त सिर्फ प्रीती हे थी यहाँ ऊपर Ritu-Alka के कमरे में और दोपहर के इस समय घर में जो भी हलचल थी उस से ये वाला हिस्सा अछूता था. हमेशा हे खिले गुलाब सी रहने वाली प्रीती इस वक़्त थोड़ी उदास थी और ऋतू से बेहतर संगिनी और कौन हो सकती थी जो ये उदासी न समझ सकती.

"पता हे नहीं था के वो पंजाब जा रहा है और आपके सामने हे तोह वापिस आये थे सब. माँ ने जब बताया तबतक तोह वो निकल भी चूका था. आप हे बुलाने आ जाती अगर आपको पता चल गया था तोह.", प्रीती ने एक रबर से अपने कंधे से निचे तक के बालो को बंधा हुआ था और आज वो सफ़ेद सलवार कमीज में थी, अपनी वेशभूषा के विपरीत. ऋतू ने भी एक छोटी सी काली बिंदी उस प्यारे चेहरे के माथे पर लगाने के बाद प्रीती की ठुड्डी के निचे हाथ रखते हुए जवाब दिया.

"मुझे पता होता तोह क्या मैं तुझे बताती नहीं? ऊपर से सुबह थोड़ा माहौल खराब हो गया था जिस से मेरा मूड भी डाउन हो गया. जाने से पहले अर्जुन आया था मुझसे मिलने और बोल कर गया था के मैं तुम्हारा ाचे से ध्यान राखु. कल वापिस आने के बाद वो तुम्हारे साथ ाचा टाइम बिताने वाला है. वैसे तुम्हे कही इस बात का बुरा तोह नहीं लग रहा की वह गाँव जाने की वजह से तुम दोनों मिल नहीं पाए?", अर्जुन द्वारा कही बातें ऋतू से सुन्न कर अब प्रीती के चेहरे पर भी ख़ुशी आ गयी थी. ऋतू ने वो ख़ास पायल की जोड़ी प्रीती के गोर पाँव में पहनाई तोह प्रीती की आँखों में हलकी सी नमी भी आ गयी.

"पता नहीं दीदी ऐसा लगता है के शायद मैं उतना प्यार अर्जुन को नहीं दे प् रही जितना वो करता है. और आपका प्यार मेरे साथ न होता तोह शायद मैं ज्यादा गलतियां कर जाती. ी लव यू सो मच एंड प्लीज ऑलवेज स्टे विथ में लिखे थिस, फॉरएवर.", ऋतू ने दोनों पायल पहनाने के बाद एक बार बैठे हुए हे प्रीती को गले से लगाया और उठ कर अलमारी से nail-polish निकलते हुए कहने लगी.

"तेरे साथ हे तोह रहना है साड़ी ज़िन्दगी और वैसे भी मेरे लिए तुम भी उतनी हे जरुरी हो जितना अर्जुन. यकीन करो तुम उसको उस से ज्यादा प्यार करती हो और इसका एक्साम्प्ले है तुम्हारा उसको हर रूप में स्वीकार करना. कैसा लगता है जब वो किसी और के साथ हो जबकि प्यार वो हमारा है? हम दोनों हे इस बात को ाचे से समझती है की अर्जुन ऐसा तबतक हे कर रहा है जबतक शरीर में बदलाव आ रहे है और हम फ़िलहाल रिश्ता बना नहीं सकते. जब तुम उसकी ज़िन्दगी में बीवी बन्न कर आ जाओगी न प्रीती, वो किसी की तरफ देखने वाला भी नहीं.", गोर हाथो की लम्बी उँगलियों के नाखून भी सही लम्बाई के साथ बेदाग़ थे प्रीती के. ऋतू ने एक हाथ को पकड़ते हुए पोलिश लगाने का उपक्रम किया तोह प्रीती हलके से मुस्कुराई. ऋतू उसका सचमुच बहिन से ज्यादा ख्याल रखती थी.

"मैं चाहती हु के पहले आप उसकी बीवी बने या फिर हम दोनों हे साथ में. और मुझे बुरा नहीं लगता अर्जुन को किसी और के साथ सम्बन्ध बनाने से क्योंकि वो पहल नहीं करता. और शादी के बाद आप ाचे से संभल लेंगी उसको."

"धत्त... उसके लिए तोह sunday-monday बनाने पड़ रहे है और तुम कहती हो मैं अकेली संभल लुंगी. वैसे शादी तुम्हे हे पहले करनी पड़ेगी प्रीती और ये मई किसी वजह से हे कह रही हु.", प्रीती एकटक ऋतू के उस गंभीर चेहरे को देखने लगी जहा एक पल पहले मुस्कराहट और शर्म थी.

"ऐसी क्या वजह है? बड़ी आप है तोह पहला हक़ भी आपका हे हुआ."

"तुम असलियत भूल रही हो मेरे और अर्जुन के रिश्ते की. शादी तोह जैसे तैसे हो हे जाएगी लेकिन इस घर में नहीं. तुम यहाँ की बहु बनोगी और मैं इधर से बहार जा कर. सफर अभी दूर है लेकिन ये बताना जरुरी था जिस से तुम्हे भी वैसे ढलने में परेशानी न हो. ये एक कड़वा सच है प्रीती की इस घर में मैं कभी भी अर्जुन की बीवी का दर्जा नहीं पाने वाली और मैं भी चाहती हु के यहाँ तुम एकमात्र बीवी और बहु रहो. वैसे इतना परेशां भी मैट होना ज्यादा सोच कर, बहोत साल पड़े है इस सबके लिए.", ऋतू फिर से पहले की तरह मुस्कुराने लगी थी और प्रीती की सोच को विराम लगा.

"वैसे मंजू भी 2 साल से पहले हे हमेशा के लिए इधर से जाने वाली है दीदी. अर्जुन ने पूरी कोशिश की है उसको खुश रखने की और वो है भी लेकिन अब जैसे वो खुद अपनी लाइफ को बदलने का सोच चुकी है. कितना अजीब हैं न ये सब और अर्जुन अगर उसको न संभालता तोह बहोत बुरा हो सकता था उसके साथ.", प्रीती ने यहाँ मंजू का जीकर किया तोह ऋतू ने दूसरे हाथ को पकड़ लिया.

"कैसे बुरा होने देता वो मंजू के साथ? वो अर्जुन से प्यार करती है तोह अर्जुन परवाह करेगा हे लेकिन मंजू जैसे अपने नए लक्ष्य बना चुकी है और अर्जुन भी उसका साथ दे रहा है जैसे तू. एक मजबूत व्यक्ति हे ऐसे फैंसले ले सकता है और हारने की जगह जीवन को और बेहतर बनाने की कोशिश करने वाली मंजू ने मुझे भी प्रेरित किया है. वैसे तेरी मामी भी आ रही है, जितना मैंने सुना है. विक्की से मिलने या फिर कुछ और वजह है?"

"हाहाहा.. विक्की से मिलने क्यों आएँगी वो? आज माँ की बात सुनी थी मैंने थोड़ी बहोत जब वो फ़ोन पर लगी हुई थी. उनको तोह मालूम है घर में किसी को ग्रीक नहीं आती लेकिन मुझे भूल गयी. वो मामी को सरप्राइज देने की बात कर रही है और इस बार मामी हफ्ते भर इधर रहने वाली है शादी में शामिल होने के साथ साथ.", प्रीती की बात में अभी भी रहस्य छुपा था.

"पूरी बात बता न, क्यों मजे ले रही है.", ऋतू को तोह पता हे था के प्रीती ऐसे हे बात आगे बढ़ाएगी.

"वो कह रही थी की उनके पास कोई है जो एक आइडियल लवर है, दिल और शरीर को ाचे से सटिस्फी करने वाला. ऐसा लवर जैसा मामी ने कभी खयालो में भी न सोचा हो और अगर मामी उनकी बात मानेगी तोह वो उनके साथ भी उसको शेयर कर सकती है. माँ की बातों से लगा था जैसा वो मामी से इस टॉपिक पर पहले भी थोड़ी बहोत बात कर चुकी है और मेरी सोच कहती है के माँ की लाइफ में ऐसा कोई भी नहीं है. चाहे पापा के साथ उनकी केमिस्ट्री अब ाची नहीं है लेकिन वो अपने काम पर हे फोकस रहती है और घर से बहार तोह कही जाती नहीं.", प्रीती बातों के साथ सवाल करने लगी थी लेकिन ऋतू की कुटिल मुस्कान देख आँखें बड़ी हो गयी.

"सहित. ऐसा इम्पॉसिबल है दीदी. Don't तेल्ल की माँ अर्जुन की बात कर रही थी?", प्रीती ने हे sawal-jawaab किया था हैरान होते हुए.

"और कौन हो सकता है जरा खुद हे सोच? वैसे अर्जुन ने ऐसा कुछ किया तोह नहीं है जितना मैं उसको जानती हु तोह आंटी का ऐसा कहना समझ नहीं आया. और तुम्हारी मामी क्या निम्फो है जो सिर्फ ऐसी बात पर इधर आने वाली है? जरूर मसला कुछ और हे है प्रीती क्योंकि आंटी ने आजतक तोह अर्जुन के सामने ऐसी वैसी हरकत नहीं की. तुम जरा अब थोड़ा ध्यान रखना के वो उधर आता है तोह उनकी रिएक्शन और एक्सप्रेशंस कैसे रहते है. लेकिन खबर धमाकेदार है. तुम्हारी मामी तोह खुद हे चलती फिरती आग है और आंटी भी कुछ काम नहीं."

"छियई... माँ ऐसा वैसा नहीं करने वाली अर्जुन के साथ."

"ड्राइंग याद नहीं है क्या? आंटी कहती नहीं क्योंकि वो काम्प्लेक्स है थोड़ी जिसको समझना अलका और मेरे लिए भी फ़िलहाल मुश्किल हे है पर उनके जज्बात दिख हे जाते है अगर ध्यान दिया जाए. उन्हें दिलचस्पी तोह हैं अपने दामाद में लेकिन वो एक्सप्रेस नहीं करती.", ऋतू की बात से प्रीती को भी वो चित्र याद आ गए जिन्हे रोमिला ने बड़ा सहेज कर रखा हुआ था और कितने बेहतरीन बनाये गए थे वो.

"हम्म्म.. सही कहा आपने और मैंने हे गौर नहीं किया इस बात पर. मामी के बारे में जान ने के लिए अब विक्की की हे मदद लेनी पड़ेगी. वो अपने आप हे एक अलग समस्या है.", प्रीती ने विक्की का जीकर किया तोह ऋतू हंसने लगी.

"क्यों उसको तड़पा रही है यार? उसकी हालत भी समझ और वैसे भी हसरत पूरी करना भारी पड़ने वाला है विक्की को. हाहाहा."

"हंस लो आप लेकिन बात उसको रोकने की नहीं है. माँ के होते हुए अगर ऐसा कुछ हुआ न तोह बात बिगड़ जाएगी और विक्की बेशक यूनिवर्सिटी स्टूडेंट है और उम्र में भी बड़ी लेकिन आज तक वर्जिन है. अर्जुन के साथ कुछ भी उल्टा हुआ जो की होना निश्चित है, मैं भी फसूंगी और अर्जुन भी. माँ को विक्की से बहोत लगाव है और यहाँ वो उनकी जिम्मेवारी है. उनके जाते हे मैं विक्की को नहीं रोकने वाली. मेरी तरफ से तोह चाहे वो करे क्योंकि तब जिम्मेवार वही होगी."

"वो अभी तक वर्जिन है?"

"हैरानी वाली क्या बात है इसमें? आधे से ज्यादा ग्रीक लड़कियां जिसके साथ कमिटेड होती है वो लाइफ टाइम उसके साथ हे रहती है. विर्जिनिटी एक सिंबल है प्यार पर ट्रस्ट का और बॉटनिस्ट जैसी बोरिंग विक्की की लाइफ में कभी उतना ख़ास लड़का आया हे नहीं. इसलिए तोह मुझे माँ का डर है, कही अर्जुन को हे न कह दे की वो विक्की से शादी कर ले अगर दोनों ने वो सब किया toh.",Preeti ने एक और ाची बात बताई थी ग्रीस की लड़कियों के बारे में और उनके प्यार पर विश्वास की.

"फिर विक्की को कर राजी और जान ने की कोशिश कर उसकी माँ के बारे में.", ऋतू अभी आगे और भी कुछ बताती उस से पहले हे अपने नाम की आवाज सुन्न कर उठ कड़ी हुई. कोमल दीदी ने पुकारा था उसको निचे से.

"चल यार निचे हे चलते है. और दुपट्टा ऐसे ले, बहनजी की तरह नहीं. हाँ.. अब लगी तोह प्रीती शर्मा.", हँसते हुए ऋतू ने प्रीती को छेड़ा लेकिन जवाब में वो भी मुस्कुरा रही थी.

"अब जो हु तोह वही लगूंगी न.. थैंक यू सो मच अपनी पायल देने के लिए और इस सबके लिए भी."

"मुझे थैंक यू नहीं चाहिए, किश करने दे बस एक.", ऋतू अब कामयाब रही थी प्रीती को तंग करने में.

"की... कुछ भी बोलती रहती हो आप. चलो निचे और फ़िलहाल थैंक यू से हे काम चलाओ. कल अर्जुन को किश कर दूंगी तोह उस से हे ले लेना मेरी किश.", प्रीती भी अब कहा पहले जैसी रही थी. ाचा जवाब दे कर वो ऋतू के साथ हे निचे चली आयी जहा पहले से हे रोमिला रेखा और कृष्णा के पास बैठी थी. तीनो के साथ साथ कौशल्या जी भी कमरे से बहार आती हुई प्रीती को देख कर रुक हे गयी. वो इस रूप में कमाल की लग रही थी, ऋतू से बराबर टक्कर लेती एक खूबसूरत हिंदुस्तानी यौवना.

"देख ले रोमिला, ये अभी से मेरी चाहत पूरी कर रही है. नजर न लगे मेरी बची को.", यहाँ भी कौशल्या जी ने प्रीती को नजर का टिका ऋतू की आँखों के काजल से करते हुए जैसे कुछ साबित हे किया. एक दूसरे की पूरक जो थी ये दोनों.

"सचमुच आंटी जी, प्रीती कही से भी वैसी नहीं लग रही जैसी हमेशा दिखती है. रेखा, ये दोनों हे एक साथ कितनी ाची लग रही है न? और ये पायल कब ली तुमने प्रीती?"

"माँ, ये ऋतू दीदी ने दी है. उन्होंने हे सूट भी दिलवाया था और अब मैं ऐसे हे ढेर सारे सूट लेने वाली हु.", प्रीती चलती हुई अपनी माँ और रेखा जी के बीच हे बैठ गयी. ऋतू ने यही खड़े हुए हे अपनी दादी के गले में पीछे से बाहें दाल दी. कौशल्या जी ने भी हर बचे को बराबर प्यार दिया था लेकिन लड़कियों में जहा ऋतू उनके दिल के करीब थी वही पौटे दोनों हे सामान रूप से ख़ास. अर्जुन छोटा था इसलिए हे उसकी ज्यादा परवाह करती थी लेकिन फिर भी उन्हें मान था तोह बस ऋतू पर. ऋतू भी अपनी दादी के हे सामान थी गुणों और काम में.

"देख रही हो दादी ये लड़की हर तरह से आपकी बहु बन्न ने के लायक है.", धीमी आवाज में ऋतू ने अपनी दादी के काम में कहा था. कृष्णा जी भी बड़े स्नेह से उधर प्रीती की भोली बातें सुन्न रही थी. इधर कौशल्या जी के चेहरे के भाव तोह ऋतू न देख पायी लेकिन जवाब ने सोचने पर मजबूर कर दिया.

"वो तोह बहु बनेगी हे इस घर की लेकिन तेरा साया उस पर हमेशा रहना चाहिए. मैं से ये भोली भली है, sahi-galat की ज्यादा पहचान भी नहीं इसको. तू मेरी समझदार बेटी है जो दुनिया को सबसे बेहतर समझती है उम्र के हिसाब से. भगवन तुम दोनों का प्रेम ऐसे हे बरक़रार रखे.", कौशल्या जी इतना बोल कर थोड़ा पलटी तोह जैसे वो गले हे लग गयी थी एक पल के लिए. फिर अलग हुई तोह कोमल दीदी की आवाज सुनाई दी.

"दादी, आपने तोह कहा था ऋतू को बुलाने के लिए. बात हे भूल गयी क्या आप?"

"हाँ ाचा याद करवाया तुमने. ऋतू, तू जरा मेरे साथ चल स्कूटरी पर ये अगली मार्किट तक."

"दादी, आप क्यों तकलीफ करती हो. जो लेके आना है वो मैं हे ले आती हु प्रीती या रुपाली के साथ जा कर."

"दादी मैं हु या तू है? जब जाना मेरा जरुरी है तभी तोह कह रही हु. कपडे बदलने है तोह बदल ले, वैसे ये भी ठीक है. मैं पर्स लेके आयी.", उनकी बात सुन्न कर ऋतू तुरंत अपनी माँ के कमरे में चली गयी और बहार आयी तोह सलवार कमीज के साथ अब पाँव में जूती और आँखों पर अर्जुन द्वारा आज सुबह दिया 'एविएटर' चस्मा था पूर्ण श्याम रंगत का, डंडी समेत. उसको ऐसे देख कर कृष्णा जी भी पालक झपकना भूल गयी और ऋतू हाथ हिलती हुई मुस्कुराते हुए गलियारे से बहार वाले आँगन में.

'Dug-dug' की ये आवाज घर में सिर्फ अर्जुन के होने पर सुनाई पड़ती थी और इस वक़्त संजीव भी घर न था जो उस मोटरसाइकिल को चालू करता. कोमल दीदी के साथ हे प्रीती भी बहार चली आयी जैसे उसको पता था के ये कौन होगा. सामने ऋतू हे अर्जुन की रानी पर सवार दिखी तोह कोमल दीदी का चेहरा अजीब सा हो गया. प्रीती हंस रही थी.

"ये क्या शरारत सूझी तुम्हे?"

"उन्हें आती है ये चलनी दीदी. अर्जुन खुद हे सिखाता रहा है और अब वो चला लेती hai.",Preeti के ऐसा कहने पर ऋतू ने भी चस्मा थोड़ा निचे करते हुए बड़ी बहिन को आँख मारी और दुपट्टा गले में एक तरफ घूमते हुए कमर की और से बांध लिया. इधर कौशल्या जी के साथ साथ रामेश्वर जी भी चले आये थे क्योंकि ये शोर उन्हें भी पता था. लेकिन प्रीती की बात सुन्न कर वो भी मुस्कुरा दिए.

"संभल कर लेके जाना बीटा थानेदारनी को. वैसे भी स्कूटरी पर तोह ये जांचने नहीं वाली थी.", पंडित जी के स्वीकारने पर अब कोमल दीदी खुद भी मुस्कुरा उठी. कौशल्या जी भी पायदान पर पांव टिकती ाचे से बैठी और ऋतू ने गियर दाल कर 'रानी' को आगे बढ़ा दिया. ये घटना सबके लिए हे चौकाने वाली थी सिवाए प्रीती के.

"तुम्हे नहीं सिखाया अर्जुन ने मोटरसाइकिल चलना?", रामेश्वर जी के स्वर में हास्य का पट था और प्रीती भी मुस्कुराते हुए बोली.

"दादा जी, मेरे लिए तोह ड्राइवर रखने का फरमान है न अंकल (शंकर) की तरफ से. वैसे भी मुझे चलने का शौक नहीं है."

"वह पुत्तर जी, अहो भाग शंकर के. सीखने तोह क्या देना ऊपर से नाकारा बनाने की सिफारिश और कर दी. तुम्हे अब कार सीखनी चाहिए बिटिया क्योंकि जरुरत कभी भी पड़ सकती है. जैसे अभी न अर्जुन है, संजीव और तारा भी नहीं है. ये ऋतू भी चली गयी और ऐसे में जरुरी जाना पड़े तब? ड्राइवर पर विश्वास क्या करना जब वो भी आपकी हे गाडी चला रहा हो, तनख्वाह के बदले. हम ज्यादा सेफ अपने हे हाथो महसूस करते है न?", पंडित जी ने बड़े हे पते की बात की थी और प्रीती को भी लगा के सचमुच कार चलनी आणि हे चाहिए, ड्राइवर हो या न हो लेकिन खुद के लिए हे सही.

"तोह सीखने के लिए आपको कहु या दादू को?"

"कल से मुनीर ले जाया करेगा तुम्हे और फिर तारा तुम्हारा हाथ साफ़ करवा देगी. सीखना जरुरी है, ड्राइवर तोह तुम्हे मिलेगा हे जैसा शंकर ने कहा. ाचा अब एक बार अपने दादू को भी बुला लाओ, जरुरी बात करनी है.", रामेश्वर जी इतना कह कर अंदर चले गए और कोमल अभी भी वही प्रीती के पास कड़ी थी.

"अब लग रहा है न के मोटरसाइकिल भी सीख लेनी चाहिए थी?"

"क्या दीदी. मुझे कभी भी मोटरसाइकिल नहीं सीखनी, पीछे बैठना ज्यादा सही है. हाँ कार जरूर सीखूंगी और आपके पास टाइम हो तोह साथ हे चलना, रेखा माँ से मैं खुद बात आकर लुंगी.", प्रीती के इस प्रस्ताव को दीदी ने हँसते हुए मन कर दिया.

"साथ चलने में कोई हर्ज़ नहीं है लेकिन ड्राइविंग नहीं सीखनी. वैसे तुम भूल रही हो के दादा जी ने कुछ कहा है तुम्हे."

"आ कर बात करती हु आपसे तोह main.",Preeti भी हंसती हुई अपने दादा जी को बुलाने निकल चली और कोमल दीदी वापिस अंदर. उन्हें अभी हैरत हो रही थी की ऋतू वो bhari-bharkam मोटरसाइकिल चलने लगी थी और अर्जुन हे सीखा रहा था उसको.

'इनका प्रेम ना जाने और क्या क्या करतब करेगा. दोनों पागल हे है और जानती हु के ये अर्जुन की फरमाइश हे होगी की ऋतू सीखे ये सब.' खुद से हे वो ये कही जा रही थी और मुस्कुरा भी रही थी.

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यहाँ सांगवान के फार्महाउस पर तोह आज 3 बजे हे महफ़िल चालू हो गयी थी, वो भी घने वृक्षों के छाया टेल. नरिंदर और उमेद ने 2 मुर्गे अलग अलग तरीके से पकाये थे जिनको जरुरत अनुसार पतीली और देगची से निकल कर ये सब खाने के साथ गिलास भी खडका रहे थे. सारा तामझाम जमीन पर हे दरी बिछा कर हो रहा था. जाम गुलाटी बना रहा था और soda-baraf का जिम्मा दलीप के हाथ. परमवीर ने 2 बड़ी प्लेट सलाद काट लिया था इस बीच और अब जाम के साथ साथ मजेदार बातें भी चालू हो गयी.

"ऐसा हे भाई लोगो, हम सभी आपस में सालो से एक दूसरे के साथ है. एक दूसरे को thik-thaak जानते है तोह मेरी मंशा है के पहचान थोड़ी और बधाई जाए.", सांगवान की इस बात पर भुप्पी ने तोह बिना सोचे सहमति दे दी और जो खेल वो खेलने वाला था उसका अंदेशा बाकी सभी को भी हो गया.

"जान पहचान बढ़ाना तोह बढ़िया खेल है लेकिन जाट भाई, सवाल दर्द भरे न हो.", नरिंदर ने जैसे कुछ सोच कर ये कहा और सभी ने सहमति में एक एक लम्बी घुट शराब की निचे उतार ली.

"इन्दर जानी, मैं न बावली गांड जरूर हु लेकिन इतना भी नहीं के hansi-khushi के माहौल की माँ छोड़ दू. ये रोस्टेड चिकन की कसम दोस्त, ऐसी चुटिया बात नहीं करेंगे जिस से दिल दुखे. इसकी कसम इसलिए क्योंकि आज तक का सबसे बेहतरीन मुर्गा खाया है तेरे भाई ने और उमेद भाई बहोत धन्यवाद् इसके लिए. लुगाई होते तोह हाथ चूम लेता, दैत्य हो तोह दूर से हाथ जोड़ कर शुक्रिया.", इस बात पर सभी के ठहाके गूँज उठे. यही तोह यारी दोस्ती है जिसमे कोई स्वार्थ नहीं और उम्र बढ़ने पर कही ज्यादा हे गहरी.

"चल तू शुरू तोह कर क्या खेल खेलना है.", ये शंकर ने कहा और सांगवान ने बीच में एक थाली रख दी.

"बात ऐसी के खेल तोह विदेशी है पर इसमें देसी तड़का लगा दिया गया है ma-badolat श्री श्री 2016 परमवीर जी सांगवान जी ने. बोतल का धक् जिसकी कानि (तरफ) रुकेगा वो सवाल करेगा और बाकी सब लोग जवाब देंगे. मतलब एक सवाल और सबके जवाब उसके हे अनुसार."

"भोस्डिके जाट, तू न सुधारियो. अपने नाम के साथ गाँव, पिनकोड, तहसील भी बता देता. चल घुमा इस बोतल को और देखे किसके हाथ में लगाम आती hai.",Shankar उत्साहित था और जाम खली करके गिलास निचे टिका दिया. उधर सभी की नजर थाली में पड़ी गोल बोतल पर थी और संगवानी ने उसको फिरकी की तरह घुमा दिए. आखिर में वो आ रुकी मेहुल गुलाटी के सामने.

"लग गए लोडे जो इस पंजाबी की बारी आ गयी.", भुप्पी को जैसे इसकी जरा उम्मीद न थी.

"तेरी हे गांड मरता हु देखता रह.", बात कहने के साथ हे एक टुकड़ा मीट का चबाते हुए जाम भी हलक में खली करके गुलाटी ने मुँह साफ़ किया.

"आज तक कितनी लड़कियों से सम्बन्ध बनाये है? बाकि सभी भी जबतक गिनती कर हे लो भाई लोगो, भुप्पी के बाद सबका नंबर चक्की चलने के हिसाब से आने वाला है.", गुलाटी ने पहले हे सवाल में बम फोड़ दिया था.

"4. आज तक 4 के साथ भाई लेकिन शादी से पहले थी जो बाकि 3 थी.", भुप्पी के जवाब के साथ हे अब खेल शुरू हो चूका था. दलीप ने सबके जाम फिर से बनाने शुरू कर दिए जैसे वो ध्यान हटाना चाहता हो.

"भाई मेरा तोह कोई आईडिया हे नहीं है लेकिन तू 50 मान हे ले जिनमे से 20 तोह रुस्सियन हे होंगी.", ये स्वर था परमवीर सांगवान का और अब इन्दर देख रहा था उसको हैरानी से. ये सफेदपोश डॉक्टर 50 महिलाओ और युवतियों के साथ सम्बन्ध बना चूका था. अगली बरी थी दलीप की और उसको चेताया उमेद ने.

"दलीप भाई, जवाब दो जरा.", उमेद की हंसी से दलीप थोड़ा शर्मिंदा हो गया.

"वो मेरी बीवी से पहले 15 के करीब और शादी के बाद बस 4. टोटल 20."

"शादी के बाद 4 तोह ऐसे कह रहे हो जैसे बड़ी लाचार ज़िन्दगी है. 4 भी काम होती है क्या?", नरिंदर ने भी चुटकी ली तोह दलीप बगले झाँकने लगा. उसके बराबर बैठे हुए शंकर की तोह अभी तक गिनती चालू थी.

"ओह जल्लाद, तू भी फूट पड़ कितनी सील खोली है आज तक.", सांगवान अभी तक तोह सबसे आगे था गिनती में.

"सील तोह ज्यादा न खोली मैंने कोई 25-26 हे होंगी जो पहली बार हे कर रही थी. हाँ नर्स और डॉक्टर को मिला कर कोई 150 मान हे लो. रंडी इनमे से कोई नहीं थी.", अब उमेद के भी कान गरम हो गए ये आंकड़ा सुन्न कर. शनकर तोह ऐसे मुस्कुरा रहा था जैसे वर्ल्ड कप जीत लिया हो.

"यार गुलाटी जवाब तू तुझे भी देना पड़ेगा सबके बाद.", ये बात भुप्पी ने कही तोह गुलाटी ने हामी भर दी.

"अब भाई इन्दर तू भी बोल दे जरा. हैं तोह तू भी शंकर का सागा भाई और हमदम.", गुलाटी के कथन पर उमेद और नरिंदर दोनों हे हंसने लगे वही शंकर खिसिया कर इधर उधर देखने लगा.

"भाई 2. एक शादी से पहले और एक जिसके साथ शादी की है बस वही. पहले वाला सम्बन्ध भी मेरी तरफ से नहीं था और मैं अपनी कृष्णा के साथ सुखी हु.", नरिंदर का जवाब हतप्रभ करने वाला था और ये उत्तर उमेद के साथ शंकर भी जानते थे. शंकर को उम्मीद नहीं थी की इन्दर उस एक सम्बन्ध को भी यहाँ उजागर करेगा जो विवाह से पहले बनाया गया था.

"क्या बात भाई? शंकर के तोह कॉलेज में हे दर्जन पार हो चुके थे तोह तुम कैसे कोरे रह गए?", भुप्पी के सवाल पर दलीप भी जान न चाहता था.

"ऐसा है भूपिंदर भाई के पहले कभी उस तरफ ध्यान हे नहीं गया था और जब गया तोह jiwan-sangini हे बना लिया उसको. और सचमुच मुझे कभी कोई कमी महसूस नहीं हुई, उल्टा मेरी बीवी ने हे मुझे उस प्यार से बहार न आने दिया जिस से हम दोनों आजतक बंधे है. शरीर हे तोह है, एक क्या और 100 क्या लेकिन प्यार और समर्पण है तोह वो एक हे बहोत है. जानते हो मेरे दोस्त भी उँगलियों से काम रहे है क्योंकि शादी तक तोह ये दोनों हे हमेशा साथ रहे मेरे तोह और किसी की जरुरत हे महसूस नहीं हुई.", नरिंदर ने बताया था की सही जीवन का असली मंत्र ज्यादा आंकड़ों में नहीं बल्कि बेहतर साथी से है.

"वाह भाई. गज़ब इंसान हो यार तुम तोह. इसलिए हे तोह हमने ये खेल खेलना ाचा समझा. दोस्ती में हमको एक दूसरे का बेहतर पता होना चाहिए जिस से कभी तुम्हारे सामने गलत स्थिति न पैदा हो. खैर अब बारी आती है अपने दैत्य भाई साहब की.", सांगवान के इतना कहते हे उमेद ने बस एक ऊँगली उठा दी.

"एक और वही श्रेष्ठ है भाई अपने लिए तोह. सच कहु तोह मैं न हे कामुक इंसान हु और न मेरी संगिनी ने कभी अधूरा हे छोड़ा मुझे. यहाँ बैठे सभी दोस्तों में से विवाह भी मेरा हे पहले हुआ होगा, दलीप भाई के बाद. और विवाह से पहले तोह हम लोग बस भोले के प्रहरी भर रहे है ऐसे कामो में.", उमेद ने जैसे हे निगरानी वाली बात कही तोह शंकर भी हंसने लगा. खेत खलिहान वाले उस पुराने दौर में यही लोग तोह उसको ऐसा स्थान देते थे जहा शंकर गर्मी निकल सके या प्रेमिकाओ से मिल सके.

"वाह वाह.. बहनचोद ये है भाईचारा तोह. वैसे पंजाबी अब तू भी तेरे नंबर बता दे.", सांगवान ने मुर्गे की बोटी उधेड़ते हुए आँखे ऊपर निचे करके मेहुल को उसकी बारी याद दिलाई.

"100 से 10 ऊपर निचे. अब ये शंकर महाराज की किरपा है जो पहला ज्ञान भी इन्होने हे दिलवाया था और आज भी मौका दिलवाते रहते है. बाकी घरवाली आज भी साथ दे देती है जब कभी बहार मूड न हो तोह.", गुलाटी के आंकड़े भी उम्मीद से कही ज्यादा हे थे. उसको पूरा गिलास एक बार में खली करते देख बाकी सभी ने वैसा हे किया. दोस्त थे और जाम तक एकसाथ खली करना जैसे एक रिवाज था अब.

"बाप आ गया बहनचोद. और इन्हे बताया किसने यहाँ के बारे में?", सांगवान की गांड हे उधड़ गयी उस काली मेरसेदेज़ जीप को गेट से अंदर आते देख. शंकर ने हाथ के इशारे से वैसे हे बैठने को कहा और दलीप पेग बनाने जुट गया फिर से.

"बाप हे है भाई, कितनी बार दारू पी है गिनती भी याद नहीं. चाचा कुछ नहीं कहने वाले.", और धर्मवीर सांगवान जी इनकी हे और चले आये, तीसों को साथ लिए.

"ये नकली जाट साला गांडू अपनी बेबे (बहिन) को लारा लगा कर यहाँ murga-daaru उधेड़ रहा है. सांझ हो गयी और ऋचा तेरे गोली मारेगी जाते हे. दलीप बीटा मेरा भी पेग घायल (दाल). मुर्गे की शोरूम (खुसबू) तगड़ी आ रही है.", जूती उतार कर वो भी नरिंदर की बगल में आ बैठे.

"बेबे ने क्या काम कहा था इसको? ये तोह बोलै की आपने पार्टी करने की इजाजत दी है तोह हमने बोतल खोल ली. नहीं तोह दिन में कभी दारु पीते देखा आपने मुझे.", शंकर जैसे ऐसे हे मौके की तलाश में था.

"पापा यु भड़कान लग रहा है."

"पता है बीटा तुम सारे कितने हे लायक हो. कुछ लोग इधर आराम करने आये थे और बाकी चिकित्सक shagal-mela करने पहुंच गए. निक्कम्मो मान लिया के कभी कभी aish-masti करनी चाहिए लेकिन पता तोह हो. ये भुप्पी बता के आया था मुझे की कहा जा रहे हो तुम लोग तोह समझ गया पार्टी होगी."

"वैसे आप तोह इस वक़्त घर हे होते हो.", गुलाटी के ऐसा कहने पर उन्होंने एक घूँट भरते हु बुरा सा मुँह बनाया.

"बेटी ने घर से लिकाड दिया तोह सोचा गम मिटने के लिए मैं भी तुम लोगो से कुछ जाम उधार मांग लू. वैसे मुर्गा गज़ब बनाया है जिसने भी बनाया है.", नरिंदर उनकी बात सुन्न कर हंस रहा था. ऐसे हे मस्तमौला इंसान थे धर्मवीर सांगवान जी. बचो के साथ कब बचा और कब बाप बन कर रहना है उन्हें ाचे से पता था.

"पापा ये वाला उमेद ने और जो आप खा रहे हो वो इन्दर ने बनाया है. जमा मलाई बर्गा नरम और क्या मसाले है. आठ.. मजा आ गया."

"भाई इन्दर, तुम और उमेद न ऐतवार (संडे) शाम मेरे साथ बैठो. सीखा भी देना और हम तीनो गुफ्तगू भी कर लेंगे.", यहाँ मेल मिलाप का दौर अब लम्बा चलने वाला था और घर की चिंता इनमे से किसी को न थी.

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5 बजे कार से अर्जुन अपनी दोनों बहनो को लिए मोडल टाउन की इस बड़ी मार्किट में आ चूका था जहा उन्हें अपने कपडे और घरवालों द्वारा बताया सामान खरीदना था. गुरदीप के साथ ाची खासी म्हणत करने के बाद वो डेढ़ घंटा सोया था और गुरदीप अपने घर पर अभी तक बिस्टेर पे थी.

"आप लोग यही मिलना मैं आधे घंटे से पहले हे आ जाऊंगा. ये पैसे माँ ने दिए थे, सामान के लिए.", अर्जुन ने कार में बैठे हुए हे अलका के पर्स में वो नोटों की गद्दी डालते हुए हिदायत दी और दोनों को दूकान तक जाते देखता रहा. ये वही जगह थी जहा आरती और प्रियंका दीदी ने उसको वो आधुनिक कपडे ले कर दिए थे. गुरुद्वारे साहिब के सामने से कार को जगतार उर्फ़ जग्गी भाई के घर की ले जाता वो अब जसलीन का ध्यान कर रहा था. पिछली बार जाने से पहले जो प्यार वो जसलीन में जगह गया था क्या वो आज भी कायम होगा या हालात अलग होंगे? फ़ोन पर हमेशा हे बात अस्पष्ट होती थी चाहे वो 3-4 बार बात कर चुके थे.
 
जिस दोस्तों को आज की अपडेट छोटी लग रही है तोह मैं इतना हे कहूंगा की ये सब सिर्फ आज हे लिखा है. 50000 चरक्टेर्स टाइप करना थोड़ा आसान है लेकिन ये सब सोच कर लिखना थोड़ा समय लेने वाला काम है.

फिर भी कोशिश रहेगी की आगे से स्क्रिप्ट 2 साइज बढ़ा कर बोल्ड कर दू. लम्बाई ज्यादा हो जाएगी ??

जोकिंग. नेक्स्ट अपडेट के लिए मुझे पूरा समय मिलेगा और आप लोगो को निराशा नहीं होगी.
 
मेरे भाई, रो मैट. हिम्मत रख. ये चक्रव्यूह भी टूटेगा.. आठ.. दर्द बस एहसास है यार लेकिन तेरे बिना .. आह्हः.. सब ठीक कर देना.. " और इसके साथ हे वो छलनी शरीर भी गर्दन के साथ लुढ़क गया. करीब बैठा वो शख्स भी जख्मी था लेकिन आँखों में इतना रुदन जैसे कभी देखने को न मिला हो. जंगलात भी उसकी चीखों से गूँज उठे और वो कितनी हे देर ऐसे दहाड़े मार कर रोटा रहा. दुश्मन ने ये ज़िन्दगी जैसे उसको दान दी थी. अब बस इस शख्स की राह धूमिल थी. मनमर्जी ने वो करवा दिया था जिसकी मनाही थी और अभी भी हम कह रहा था की उसको किसी से मदद की जरुरत नहीं.

"घर जाओ. इसको मौत भी नसीब नहीं होगी." ये डिअर सुन्न कर हे इस शख्स की आँखें फ़ैल गयी थी. उसका बाप आज पिस्तौल थामे खड़ा था.
 
अपडेट 142

जवान Din-Haseen रात (3)

"माँ, अर्जुन अपने पंडित जी का पौता है और कॉलेज में जो वाकया हुआ था न वह इसने हे मदद की थी.", अर्जुन उस आलिशान ड्राइंग हॉल में जगतार के पास हे बैठा था जहा पिछली बार गहरा सन्नाटा था. आज घर पे जगतार और उसकी माता जी मौजूद थे लेकिन जसलीन पड़ोस में हे कीर्ति के घर गयी हुई थी. जगतार ने अर्जुन का परिचय दिया तोह उसकी माता जी ने बड़े हे स्नेह से अर्जुन के सर पर हाथ फिरते हुए आशीर्वाद दिया.

"संस्कार और सेवा के लिए अलग हे स्थान है बीटा तुम्हारे परिवार का. बहोत ख़ुशी हुई तुम्हे सामने देख कर और अपने बचो का एक सही दोस्त देख कर. वैसे तोह जग्गी भी बहोत ाचा और जिम्मेवार है बीटा है लेकिन तुम्हारे बारे में पता चला तोह मिलने की बहुत इत्छा थी.", अर्जुन और जगतार ek-ek सोफे पर बैठे थे और जगतार की माता जी ने कांच की टेबल पर दोनों के लिए दूध के साथ मेवे रखे और उनके सामने वाले बड़े सोफे पर बैठ गयी.

"आंटी जी शिक्षा में तोह आपने भी कोई कमी नहीं आने दी है. भैया dharam-karam के साथ साथ कितने जिम्मेवार है ये मैं पिछली मुलाकात में हे देख चूका हु. और जैसी सकरात्मक ऊर्जा आपके घर में व्याप्त है उस से साफ़ पता चलता है के आप स्वयं हे सिद्धांत और संस्कारो को मेहतवा सर्वोपरि रखती है. पहली गुरु माँ हे होती है हर बचे के जीवन में और माँ श्रेष्ठ होती है.", अर्जुन ने एक बार फिर उनकी तरफ दोनों हाथ जोड़ कर अभिवादन किया तोह आंटी जी के चेहरे पर अलग हे मुस्कान आ गयी. इधर ये तगड़ी deel-daul वाला कुत्ता मटकता हुआ आया और जगतार की गॉड में आ बैठा. वजन कही ज्यादा हे था उसका लेकिन जैसे वो खुद को अभी तक पिल्ला हे समझता था.

"लो देख लो संस्कार. ये हालत है यहाँ घर की और तुम्हारा ये भाई अभी तक बड़ा नहीं हुआ है."

"जेउस नाम है न इसका? आपने तोह इसके साथ भी कोई फरक नहीं किया. ये दिल माँ का हे हो सकता है जो हर बचे को बचा हे मानती है.", अर्जुन द्वारा अपना नाम लिए जाने से उस कुत्ते ने भी एक बार देखते हुए जीभ निकल कर जाता दिया के हां मैं हे जेउस हु.

"बड़ा ाचा लगा बीटा जी तुम्हारे विचार जान कर. ये जेउस और जग्गी दोनों हे एक जैसे है मेरे लिए. हाँ एक घर में मेरा ख्याल रखता है और दूसरा बहार. वैसे बीटा जी मैं और जग्गी महाराष्ट्र जा रहे है और शादी वाले दिन हमारा वह आना मुमकिन नहीं होगा. मैं खुद वह तुम्हारे परिवार से मिलने जरूर आउंगी वापिस लौटने पर."

"बेबे (माँ), जस्सी जा रही है व्याह विच. अप्पा बम्बई तोह आये बाद मिल ावणगे. अर्जुन भाई माँ ने मन्नत भी की हुई है और ये सब पहले से निर्धारित था इसलिए पहले हे साफ़ बताना उचित है. हाँ जस्सी अपनी सहेलियों के साथ शादी में शामिल हो जाएगी. बस बहिन का ख्याल रखना, जानता हु के तुम ऐसा हे करोगे पर अब एक हे चाँद है हमारे घर में तोह थोड़ी परवाह रहती है.", अर्जुन को बड़ा ाचा लगा था आंटी जी और जगतार का बिलकुल हे साफ़ बात करना और दोनों हे प्यार से भरे व्यक्ति थे.

"कोई शिकायत का मौका नहीं मिलेगा आपको. अब मैं चलता हु आंटी जी, मार्किट में दीदी भी इन्तजार कर रही होंगी. अगली बार जब भी आना हुआ तोह आपसे जरूर मिलने आऊंगा.", अर्जुन खड़ा हुआ तोह आंटी जी भी उठ गए. निमंत्रण पत्र और मिठाई का डिब्बा अब जगतार के हाथ में था जो इशारे से अर्जुन को बैठने का कह रहा था.

"बिटिया को भी लेते आना था बीटा. लेकिन मैं जानती हु ऐसा इसलिए नहीं किया होगा क्योंकि फिर बहाना क्या बनाते. जग्गी, इसके साथ कीर्ति के घर चले जाओ बीटा. कार्ड अर्जुन का हे देना बेहतर है.", जहा अर्जुन कीर्ति वाला कार्ड भी इधर से दे कर निकलना चाहता था अब आंटी जी की वजह से उसको उनके भी घर जाना पड़ना था.

"चल जेउस, थोड़ा सैर करके आते है.", जग्गी वैसे हे चप्पल पहने अर्जुन के साथ चल दिया. अर्जुन ने जाने से पहले आंटी जी का आशीर्वाद लिया और उन्होंने भी पहली बार घर आने पर हलकी सख्ताई के साथ अर्जुन की जेब में शगुन दाल दिया. बहार सड़क पर जेउस बड़ी शालीनता से इन दोनों के बीच चल रहा था.

"ये वाला कीर्ति का घर है भाई जो दिन में हमेशा हे खली रहता है. पूरा परिवार हे बिज़नेस देखता है, आंटी जी भी.", जगतार ने इस आलिशान घर की घंटी बजाते हुए बताया और उधर जेउस बगल वाले खम्बे पर हे टांग उठा कर अपनी पहचान लगाने में व्यस्त हो गया. घर आलिशान था लेकिन एकदम खामोश. लकड़ी का वो बड़ा दरवाजा खुला तोह सामने कीर्ति और जसलीन दोनों हे कड़ी थी. दोनों हे आधुनिक युवतिया इस वक़्त ढीली टीशर्ट और झालर वाले पजामा पहने भी बेहद आकर्षक लग रही थी और जसलीन के चेहरे पर सपाट भाव देख अर्जुन ने हे नजरे कीर्ति की तरफ कर दी.

"Hello कीर्ति.", अर्जुन ने इतना कहा और जगतार ये लोहे का गेट खोलता अंदर हे चल दिया अर्जुन का हाथ पकडे हुए.

"गेट से हे hello शैलो करोगे अब? कीर्ति, ये शादी का कार्ड देने आया है तुम्हे. प्रियंका का आना पॉसिबल नहीं हुआ तोह अर्जुन को जेहमत उठानी पड़ी. आंटी जी अभी तक नहीं आये?", जगतार इतना बोल कर इस जगमग हॉल में चला आया और उधर कीर्ति ने बड़े जोश से अर्जुन का हाथ थाम लिया.

"थैंक यू सो मच अर्जुन और मुझे प्रियंका ने फ़ोन पर बता दिया था के तुम आने वाले हो पर टाइम नहीं पता था. जग्गी तुम्हे पता है न माँ 6 बजे तक हे आती है. मैं माइड को बोल कर ठंडा बनवाती हु तुम लोग बैठो.", कीर्ति ने चेहरे से बालो की लत कान के पीछे करते हुए कहा तोह अर्जुन ने नजरे हटते हुए एक बार जसलीन को देखा और अपना जवाब दिया.

"नहीं कीर्ति जी, उसकी कोई जरुरत नहीं है. मैं अभी जग्गी भैया के घर से आ रहा हु और आंटी जी ने खिला पीला कर हे भेजा है. वैसे भी थोड़ा जल्दी में हु तोह रुकना मुनासिब नहीं है.", जसलीन उसकी बात सुन्न कर अंदर की तरफ चल दी. जाने क्या वजह थी और अभी तक उसने अर्जुन को hello भी नहीं कहा था.

"जरुरत कैसे नहीं है? मान लिया आंटी जी ने ाची सेवा की है पर यहाँ भी पहली बार हे आये हो तोह 5 मिनट बैठ हे सकते हो.", कीर्ति ने हाथ पकड़ कर बैठाया तोह अर्जुन भी 5 मिनट के लिए मान गया. जग्गी ने जेउस को अपने पास न देख इधर उधर नजर दौड़ाई.

"ओह भाई तुम बैठो मैं जरा जेउस को देख कर आया. वो अगर पार्क में भाग गया तोह माँ ने हम दोनों को हे घर से निकल देना है इस बार.", जगतार तेजी से बहार आया तोह जेउस उनके हे घर की तरफ जा रहा था जहा आंटी जी खड़े थे.

"माँ बुला रही है अर्जुन, मैं तुमसे कल सवेरे मिलता हु भाई क्योंकि अभी गुरुघर का समय हो गया है उनका.", जगतार ने हाथ हिलाते हुए कहा तोह अर्जुन ने भी थोड़ी हिचक के साथ सर हिला कर हाँ कह दिया. अर्जुन और जगतार ने सवेरे साढ़े 5 बजे मिलने का समय निश्चित किया था कुछ बातें करने के लिए.

"मेरा नंबर नहीं है तुम्हारे पास? घर आ रहे हो तोह बता भी सकते थे की किस वक़्त पहुंचने वाले हो.", अब जसलीन के चेहरे पर सिर्फ गुस्सा हे था और कीर्ति रसोई में जा चुकी थी. लकड़ी का मुख्या दरवाजा भी बंद था.

"वो.. वो मैंने सोचा की आप घर हे मिलोगी, कॉलेज बंद है तोह.", अर्जुन शायद कीर्ति का घर होने की वजह से ज्यादा फिकरमंद था. लेकिन कीर्ति की परवाह न करते हुए जसलीन वैसे हे गुस्से में बोलती हुई उसके करीब बैठ गयी.

"आप? बहोत सही और हर बात खुद हे सोच लिया करो के मैं कहा मिलूंगी और तुम अपनी मर्जी से हे आओगे. जितनी बार फ़ोन पर बात की हमेशा तुम्हारा haan-hun जैसा जवाब लेकिन यहाँ आने के बाद तोह आराम से फ़ोन कर सकते थे न?", अर्जुन अपने घर कैसे जसलीन से खुल कर बात कर सकता था जहा कोई न कोई मौजूद रहता था. यूनिवर्सिटी से 2 बार फ़ोन किया था लेकिन दोनों बार जगतार से हे बात हुई थी.

"वो मैंने भी फ़ोन किया था 2 बार लेकिन जग्गी भैया ने उठाया तोह बात नहीं हो पायी. इतना गुस्सा और काम से काम ये तोह देखो हम कहा बैठे है.", अर्जुन ने थोड़ी हिम्मत करते हुए जसलीन का हाथ अपने दोनों हाथ के बीच लेते हुए कहा. ये स्पर्श हे तोह था जिसकी कमी ने जसलीन को सताया था. पल में हे वो खामोश हो गयी. नजरे दोनों की हे एक दूसरे को निहार रही थी और उस खूबसूरत चेहरे पर हल्का दर्द उभर आया.

"सॉरी फॉर माय बाद बेहेवियर. तुम्हे कैसे बताऊ की कितना इन्तजार कर रही थी मैं तुम्हारा और फिर आये भी तोह मुझे याद नहीं किया. बुरा नहीं लगेगा क्या?"

"आया भी तोह दोपहर में हे हु और 3 घंटे बाद तुम्हारे घर. मैंने कहा था न के ऐसे सफर पर चलने की कोशिश मैट करना? तुम बहोत हे प्यारी लड़की जो जसलीन और तुम्हे दर्द देने वाला दुनिया का सबसे बदनसीब इंसान हे हो सकता है.", अर्जुन के ऐसा कहने पर जसलीन ने उसके होंठो पर हाथ रख दिया.

"शहहह.. इतना भी जलील मत करो अब. बस हो जाती हु थोड़ी इमोशनल और गुस्सा अपने ऊपर हे आता है. वैसे तुम 5 मिनट में जाने का क्यों बोल रहे थे?", जसलीन का पतला छरहरा जिस्म अब पूरी तरह से अर्जुन के साथ जुड़ा हुआ था बायीं तरफ से. वो गोरी नाजुक उंगलिया होंठो पर हे थी जिन्हे अर्जुन के चूमते हे शर्म से जसलीन ने हटा लिया. "गंदे कही के."

"5 मिनट से ज्यादा तुम्हारे पास रहा तोह फिर से थैंक यू ले लूंगा और ये जगह अलग है. वैसे मार्किट में दीदी इन्तजार कर रही होंगी इसलिए भी जल्दी जाना है.", अर्जुन आखिरी बार वाले चुम्बन का जीकर किया तोह जसलीन ने खुद हे उसका हाथ मजबूती से पकड़ लिया.

"चलो उठो और घर चलो मेरे साथ. 5 मिनट मेरे हिस्से के अभी बाकी है.", जसलीन को भी पता था की अब उनके घर भी कोई नहीं होगा. कीर्ति ख़ास दोस्त थी लेकिन उसके सामने वो भी खुल कर अर्जुन से बात नहीं कर सकती थी. जसलीन के खड़े होते हे अर्जुन की नजर उस ढीले पाजामे के ख़ास हिस्से पर अटक गयी. जसलीन के तराशे हुए माध्यम से उभार और लम्बी टाँगे जानलेवा थी. कीर्ति इधर हे चली आयी ट्रे में शरबत लिए.

"अब तुम दोनों उठ कर कहा चलने की तैयारी में हो?"

"ये वापिस जा रहा है और घर पे कार्ड्स रह गए है जो उठाने है. मैं आती हु 5 मिनट में वापिस.", ये 5 मिनट जैसे आज हर इंसान मांग रहा था और अर्जुन ने धन्यवाद् करते हुए एक सांस में शरबत का गिलास खाली करके ट्रे में रख दिया.

"जल्दी हे मिलते है और अभी कुछ जरुरी काम है तोह जाना जरुरी है कीर्ति जी."

"समझ सकती हु और अगली बार समय निकाल कर हे आना अर्जुन.", कीर्ति दरवाजे तक छोड़ने बहार आयी और दोनों हे जसलीन के घर की तरफ बढ़ चले.

"वह शिक्षा भी लगा था और तुम नजरे ज्यादा हे घूमते रहते है.", घर के अंदर आते हे जसलीन ने अर्जुन के मजे लेने शुरू कर दिए.

"मॉडल जैसी हो तुम बिलकुल या ये कहु के एक खूबसूरत मॉडल.", अर्जुन अंदर हॉल में आया तोह जेउस एक तरफ ऊंघ रहा था. आज घर में काम करने वाली वो आंटी नजर नहीं आयी थी जो शायद अवकाश पे थी. अर्जुन के कदम रुकने हे लगे थे और जसलीन हाथ पकड़ती उसको अपने कमरे में आ गयी.

"X-ray करने के बाद कितनी ढिटाई से जवाब देते हो. वैसे सचमुच बहोत गंदे हो तुम.. उम्माह्ह्ह.", जिस जोश से जसलीन ने अर्जुन की कमीज पकड़ते हुए अपने होंठ उसके होंठो से मिलाये थे अर्जुन ढीला हे पड़ गया. जसलीन की तड़प तोह बिना किसी मिलान के हे चरम पर थी और उसके पतले madd-bhare होंठो का स्वाद भरपूर मिठास से भरा था. ऐसा हे चुम्बन अर्जुन ने किया था और जसलीन जैसे उस दिन को हे याद करती हुई अपना प्यार दिखने लगी. 25-26 इंच की उस मखमली कमर पर अर्जुन का स्पर्श होते हे जसलीन की वो बड़ी बड़ी आँखें झटके में खुल गयी. वो pur-kashish से बस अर्जुन को देख रही थी. मरदाना स्पर्श इस अंदरूनी नरम हिस्से पर नयी तरंगे पैदा करने लगा. रेंगते हुए दोनों हाथ ने जैसे हे जसलीन के कूल्हों को दबाते हुए अर्जुन के साथ ाचे से चिपकाया उसकी आँखें फिर से बंद हो गयी.

कंपकंपाते गीले गुलाबी होंठो पर अब अर्जुन जानलेवा कलाकारी करता हुआ जसलीन को अपना पूरा एहसास करवाने लगा. जहा जसलीन के शरीर से निकलती ख़ास महक अर्जुन को उत्तेजित कर रही थी वही अर्जुन का मरदाना स्पर्श और उसके हाथो के मजबूती में जसलीन भी पिघलने लगी. उसके माध्यम अकार के ठोस चुके पहली बार मर्द की छाती से दबते हुए और कठोर होने लगे. समय से परे इनका ये चुम्बन अब एक दूसरे की रसना चूसने तक आगे बढ़ चला. जसलीन की जीभ को जितना अर्जुन अपने मुँह में पकड़ कर चूसता, उतना हे वो मीठा तरल रिस्ता हुआ उसके हलक से निचे उतर जाता. ये चुम्बन अब हद्द से आगे जा रहा था और अर्जुन की हथेली ने जसलीन का वो कठोर उभर पूरा मुठी में जकड लिया. जसलीन के शरीर का हर रोया सेकंड के 100वे भाग में खड़ा हो चूका था इस हरकत से. उसके उभर पर बस अर्जुन का हाथ लगने मात्रा से एक लहर नाभि से उसकी अक्षत योनि तक दौड़ गयी. शरीर में असंख्य विस्फोट आज पहली बार हे हुए थे और जसलीन निढाल होती हुई अर्जुन की बाहों में पिघल गयी.

आज से पहले तक जसलीन को सिर्फ हस्थमैथुन का थोड़ा अनुभव था वो भी अकेले में योनि को ऊपर से सहलाने तक. लेकिन अर्जुन के उस स्पर्श ने जैसे उसकी योनि को ras-vihin हे कर दिया था और वो भी बिना वह कुछ किये. 2 मिनट बाद कही जसलीन को होश आया तोह वो बिस्टेर पर लेती थी. करीब बैठा अर्जुन बड़े प्यार से उसका माथा और गाल सहलाते हुए बस उसको हे निहारे जा रहा था. जसलीन के चेहरे पर जहाँ भर की शर्म और लाली व्याप्त थी जिसका भान अर्जुन को ाचे से था.

"क्या ये पहली बार था?", अर्जुन के ऐसे सवाल ने जैसे जसलीन को निर्वस्त्र हे कर दिया. तकिये में मुँह छुपाने की कोशिश भी जब नाकाम रही तोह शर्माती हुई जसलीन ने भी कहना उचित समझा.

"हर रोज तोह तुम मुझे किश नहीं करते न? और आज किश से कुछ ज्यादा हे हो गया था. बहोत ज्यादा गंदे हो तुम और सब तुमने किया है."

"वैसे सच कहु तोह मेरा हाथ तुमने खुद हे अपने यहाँ रखा था और ये निशान तुम्हारे हे नाखून के है मेरी कलाई पर. डाइट लेना शुरू करो थोड़ी, अभी हाथ लगाने से बेहोश हो रही हो और कल को थोड़ा आगे बढ़ गए तोह पता नहीं पुलिस मेरा क्या हाल करेगी.", अर्जुन से उस स्पर्श की असलियत पता लगते हे वो और जायदा हे शर्माने लगी थी. नजरे चुराती वो करवट लिए दूसरी तरफ मुँह करके धीमे सवार में बोलने लगी.

"मुझे तुम्हारा स्पर्श हर तरफ चाहिए और उतने हे प्यार से जितना तुमने किश किया. वैसे सचमुच तुम बुरे हो. ये भी तोह कह सकते थे की तुमने खुद हे हाथ वह रखा.", इस तरह करवट होने से अर्जुन अब ाचे से जसलीन के उभरे हुए नितम्ब निहार रहा था. वही जसलीन बस ख्याल बना रही थी अब अर्जुन क्या सोचेगा और क्या बोलेगा. लेकिन जैसे हे अपने लचीले कूल्हों पर अर्जुन का हाथ रेंगता महसूस हुआ, जसलीन की धड़कन फिर से अनियंत्रित हो गयी. वो झल्लर वाला ढीला मखमली पजामा जैसे वह था हे नहीं और गोलाकार कटाव लिए वो हिस्सा इतना रोमांचित भी कर सकता है ये जसलीन ने बस अभी महसूस किया.

"अभी चलता हु जस, देर हो रही है. जल्द मिलते हैं.", अर्जुन ने ऊपर झुकते हुए चेहरा सामने किया तोह जसलीन जैसे निवेदन कर रही थी की आज वो उसके पास हे रहे. ये मुमकिन कहा था. एक पल दोनों के होंठ मिले और अर्जुन तुरंत यहाँ से निकल चला. आज हे जसलीन ने महसूस किया था की अर्जुन अब उसके लिए क्या मायने रखने लगा है. वो उसके बिना सचमुच जी न सकेगी और अर्जुन ने खुद पहले हे उसको मन किया था इन कदमो को रोकने के लिए. इस दुविधा में भी जसलीन की चाहत एक सामान बढ़ हे रही थी.

'ी लव यू..', इतना कहती वो फिर से उन चार ताडियो वाले पंखे को निहारने लगी जैसे शुन्य में भी वह अर्जुन का हे चेहरा हो.

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इस तहखाने में कही ज्यादा हे अंधकार था और लम्बाई अज्ञात. सीढ़ियों से 4 जोड़ी कदम निचे इस ठंडक भरे तहखाने में उतरने लगे तोह एक पल के लिए जैसे सूर्य हे प्रकाशित हो गया उस शक्श के सामने जो कुर्सी पर अधनंगी हालत में बंधा था. किस बंद पड़े गोदाम का ये तहखाना 100 गज के करीब लम्बाई और उसके आधी चौड़ाई लिए एक बड़ा हॉल था. रौशनी से आँखें कुछ अभ्यस्त हुई तोह अपनी तरफ बढ़ते कदमो की दिशा में ध्यान गया.

"इतने भी शातिर नहीं हो की हमारी नजर में न आओ. तोह कैसे हो बलबीर लोहान? सुना है chhena-jhaptti छोड़ कर अब लोगो के कतल करवाने के ठेकेदार बन्न गए हो.", पंडित रामेश्वर शर्मा के साथ उनका पौता संजीव शर्मा भी हमेशा की तरह उचित पतलून कमीज और चमड़े के जूते पहने इस शक्श के करीब आ खड़ा हुआ. पंडित जी की आवाज हे बहुत रहती थी किसी भी पुराने मुजरिम को याद दिलाने के लिए की ये व्यक्ति अभी तक उन फाइल पर काम जारी रखे है जो इनके रिटायरमेंट तक अधूरी थी. पुलिस डिपार्टमेंट खुद इनसे गुजारिश करता था अपनी सेवाएं देने की, sa-shart और नतीजा भी सामने था. जल्द हे पंडित जी लोहान के सामने राखी कुर्सी पर बैठ गए. छोल साहब भी दिग निर्मल सिंह के साथ यहाँ मौजूद थे.

"पंडित जी.. मैं आपके परिवार से कोसो दूर रहा हु. वो.. वह तोह शंकर ने हुम्ला किया तोह बचाव करना हे पड़ा. देखिये मुझे डॉक्टर और वकील की जरुरत है, रिमांड कोर्ट में पेश करके भी ले सकते है.", लोहान था जिगर वाला चाहे वो इस शक्श से डरता था और पता भी था के यहाँ कोई maar-pitai वाला काम उसके साथ नहीं किया जायेगा.

"देखो बलबीर, मैंने तुम्हे 27 साल पहले एक छोटी सी चोरी के अपराध में बक्श दिया था क्योंकि एक मौका सबको मिलना चाहिए. बदले में तुमने क्या किया? कैसे अदा किया उस एहसान का बदला जिस से हम तुम्हे एक बेहतर व्यक्ति बनाना चाहते थे? आज तुम कह रहे हो के मेरे परिवार से कोसो दूर हो, लेकिन सच तुम्हे ाचे से पता है बेटे. गलती एक बार होती है या 2 बार, उसके बाद वो नियत और आदत. यहाँ सिर्फ मेरे हे परिवार की बदौलत तुम्हे नहीं लाया गया है क्योंकि वो लोग तोह तुम्हे कुछ समझते हे नहीं. जानते हो न मेरा इशारा?", अब कही लोहान का कंठ सूख गया था. आज भी रामेश्वर जी ने उसको बेटे कह कर पुकारा था जैसे 27 साल पहले उसको थाने से रिहा करते हुए कहा था. मजबूत अपराधी का भी सर निचे झुकान बता रहा था की पंडित जी ने कभी उसके साथ बुरा नहीं किया था और वो उन्हें हे चोट पहुंचने में लगा रहा.

"सर, मैं बात करने की इजाजत चाहता हु इस से.", संजीव ने अपने हे दादा को 'सर' कह कर सम्बोधित किया था और लोहान ने इस आवाज को सुन्न कर संजीव की तरफ देखा जो मंजूरी मिलने के बाद अब ठीक लोहान के सामने खड़ा था.

"तुम बचे हो. मुझसे अगर कोई बात करेगा तोह वो पंडित जी.", लोहान के ऐसा कहने पर संजीव के चेहरे पर अलग हे भाव आ गए. एक कुटिल मुस्कान लिए वो लोहान के सामने झुक गया चेहरा करीब करते हुए.

"हम 2 भाई है लोहान और दोनों हे हर काम ऐसे करते है की देखने वाले को बस एक हे नजर आता है. जानते हो ये बचकाना सा लगने वाला अंदाज हमने कहा से सीखा है? वीडियो गेम से. मैं सामने रहकर गोलियां चलता हु तोह सबको लगता है के मैं हे हु जो हु लेकिन उनको वो नहीं दीखता जो हर तरफ नजर रखे मुझको कवर देता. तुम जानते हो मेरे भाई को और वो मुझसे भी छोटा है लेकिन अभी से तुम्हारा बाप है.", संजीव का अंदाज kabile-gor था और लोहान हर लफ्ज़ को ध्यान से सुन्न ने के बाद हैरत से देखने लगा.

"तुम.. तुम्हारा छोटा भाई अर्जुन शर्मा है मतलब तुम भी शंकर के बेटे हो? यानि पंडित जी के पौटे?"

"यादाश्त बहोत ाची है तुम्हारी और हाँ वो मेरा भाई जिसने तुम्हारी पतलून दूर से हे गीली कर दी थी. और तुम अपने का कितना बड़ा तुर्रम खान समझते हो जो 4 घंटे में हे पकड़ में आ गए? मार तोह मैं तुम्हे वही देता लेकिन ऐसा है के कुछ सवाल है मेरे पास तुम्हारे लिए.", संजीव ने पुष्टि कर दी थी की उसकी असलियत क्या है और ऐसा वो तभी करता था जब इंसान करीबी हो या फिर ऐसे व्यक्ति को जीने का अधिकार हे न हो.

"अर्जुन और तुम, दोनों हे मारे जाओगे अगर मुझे कुछ भी हुआ तोह. उसका नाम मैं पहले हे बता चूका जिसको बताना जरुरी था."

"और वो बदनसीब भी पूरे परिवार के साथ कल रात मारा गया. किस्मत ऐसी हे है या म्हणत से इतनी बुरी बनाई है? आदमी भेजते हो तोह उनका एक्सीडेंट हो जाता है, हमला करते हो तोह खुद घायल हो जाते हो, जिस पर भरोसा करते हो वही दुनिया से चला जाता है... आखिर तुम खुद पनौती हो या आसपास सभी मनहूस लोग हे है तुम्हारे? अब गौर से सुनो 4 सवाल और उनके बदले में 4 सही जवाब. गलती पर जान से नहीं मारूंगा लेकिन तुम भीक मांगोगे की मौत मिल जाये.", अब रामेश्वर जी भी इधर से उठ कर थोड़ा अलग चले आये. लोहान समझ नहीं प् रहा था के उसके साथ हो क्या रहा है. संजीव ने उसको बेबस कर हे दिया था.

"तुमने शबनम का साथ मोहर सिंह के कहने पर तोह नहीं दिया था क्योंकि तुम्हारी नजर में मोहर की कोई इज्जत नहीं थी. किसके कहने पर तुमने अपने लोग भेजे थे शबनम द्वारा बताई वारदात अंजाम देने के लिए? गलत नाम और मैं बताऊंगा की तुम्हारा परिवार भी है.", संजीव ने सवाल के साथ जो जीकर किया उस से लोहान तोह हैरत में था हे रामेश्वर जी भी अचम्भे में पड़ गए. लोहान अय्याश अपराधी था जो गिरोह सरगना था. उसके biwi-bache थे हे नहीं पंडित जी की नजर में या किसी भी व्यक्ति की.

"झूठ झूठ है ये.."

"गलत जवाब तोह अब तुम्हारे 3 बचो में से बीच वाला गया. बीटा है न तुम्हारा बीच वाला बचा? बड़ी बेटी फिर छोटी बेटी और बीच में तुम्हारा प्यारा बीटा."

"नहीं नहीं.. उन्हें बीच में लाने की जरुरत नहीं है मैं सब जवाब दूंगा लेकिन मेरे परिवार तक नहीं जाओगे."

"तुम हमारे परिवार को ख़तम करने के लिए गुंडे भेजो जबकि दादा जी के कितने एहसान रहे है लेकिन मैं ऐसा न करू. एक वजा दो लोहान, बस एक वजह दो ऐसा न करने की? सवाल वही है और अब 5 सवाल होंगे.", संजीव के चेहरे पर आया गुस्सा बहोत कुछ बता रहा था. बात फ़र्ज़ के साथ साथ परिवार की थी और इन दोनों में हे संजीव ने जीवन समर्पित किया था.

"शबनम सिर्फ चेहरा दिखने के लिए बुलाई गयी थी. आदमी मैंने करम सिंह के कहने पर भेजे थे क्योंकि वो चाहता था की शबनम को भी मार दिया जाये लेकिन उसकी हत्या अलग दिखनी चाहिए.", लोहान को जरा भी भनक न थी की इस समय आवाज के साथ साथ वीडियो भी बनाई जा रही थी इस तहकीकात की. चेरे पर पसीना छलक आया था बेशक यहाँ हलकी ठंडक थी.

"17 साल पहले मंदिर के सामने हुम्ला तुमने करवाया था न शंकर चाचा के बेटे पर? आदमी समझदार हो तोह नाम अपने आप बता डोज.", इतनी पुराणी घटना पर सवाल वो भी संजीव के मुँह से सुन्न कर रामेश्वर जी भी परेशां होने लगे थे. लेकिन इसका सच उन्होंने भी jaan-na था.

"हाँ. मेरा आदमी वही मारा गया था उस घटना को अंजाम देते हुए. सारंग साहब ने उस वक़्त की सबसे बड़ी सुपारी दी थी मुझे, 10 लाख की. लेकिन 3 प्रयास में भी मैं असफल रहा और किसी और जुर्म में जेल पहुंच गया. उसके बाद कभी सारंग साहब से बात नहीं हुई.", लोहान अब इस तफ्तीश में पूरा साथ दे रहा था. उसके परिवार की सलामत हे जैसे सबकुछ थी और अपना अंजाम वो जैसे समझ चूका था. सारंग कुमार का नाम सुन्न कर रामेश्वर जी के कंधे पर छोल साहब ने हाथ रखते हुए उन्हें शांत रहने का इशारा दिया.

"तोह वो नर्स कौन थी जिसने नरिंदर शर्मा के नवजात बेटे को जहर दिया था?", संजीव जैसे जज्बाती हे होने लगा था क्योंकि कुछ सवाल उसको भी परेशां कर रहे थे.

"मैं बिलकुल नहीं जानता और जैसा लगता है तोह इसमें भी सारंग साहब का हाथ होगा और वो पीछे सबूत नहीं छोड़ते. मैं नहीं जानता उस नर्स के बारे में, अपने परिवार की सौगंध.", लोहान के ऐसे बेबसी वाले चेहरे को देख कर संजीव ने गहरी सांस ली और खुद को शांत करने की चेष्टा करने लगा.

"अर्जुन सिंह के बारे में क्या जानते हो?", अब रामेश्वर जी को भी लगा के सवाल दिशा भटक चुके है और संजीव को ये परत नहीं खोलनी चाहिए. लेकिन देर हो चुकी थी क्योंकि लोहान नाम ले चूका था.

"सारंग साहब जवाब दे सकते है इसका. मैंने तोह बस वह से 15 लाश हे उठाई थी अफसर लेकिन वो इंसान चाहता तोह किसी को भी ज़िंदा न छोड़ता. अर्जुन सिंह उर्फ़ अज्जू. बेमिसाल आदमी था वो जिसको एक औरत ने आंसुओ की आड़ में धोखे से मारा. एक निहथे ने ढाई दर्जन लाशें 10 मिनट में बिछा दी थी और उनमे और भी कई नाम जुड़ जाते सारंग साहब समेत हे अगर वो औरत नीलिमा और शालिनी नाम ले कर उसके सामने न गिड़गिड़ाती. बस उसके बाद उन भेड़ियों ने कोई दया न दिखाई उस घुटनो पर गिरे योद्धा पर. मैं तोह एक ड्राइवर था बस लेकिन उस औरत को भूल नहीं सकता. हत्यारा तोह मैं भी हु लेकिन मर्द का हमेशा सम्मान किया है मैंने. अगर सारंग साहब तक न पहुंच सको तोह मैं थोड़ी और मदद कर देता हु.", लोहान जैसे मुरीद था अज्जू का बेशक एक अपराधी था पर उसको जैसे वो घटनाक्रम shat-pratishat याद था. अब रामेश्वर जी उसके करीब आ चुके थे.

"ये नीलिमा वही है न जो क्सक्सक्सक्स शहर के तहसीलदार की बेटी थी?"

"जी पंडित जी और सारंग साहब की एकलौती भांजी भी. मुझे 4 घंटे में ढून्ढ लिया तोह इसको 3-4 दिन में तोह खोज हे लेंगे. वैसे कर आप भी कुछ नहीं सकते सारंग साहब के सामने.", लोहान के कटाक्ष का साफ़ मतलब था की सारंग कुमार अपने आप में हे एक बड़ा नाम था. लेकिन यहाँ आज रामेशर जी का दिमाग सरक चूका था अपने लादले बेटे का हत्याकांड सुन्न कर.

"बलबीर, तुम बाकी नाम नहीं ले रहे हो. और इसका मतलब है तुम संजीव की बात भूल गए.", इतना सार्ड कथन और आँखों से निकलती ऊष्मा से लोहान भी सेहम सा गया था.

"ज़ोरावर, भवानी, चंदरभान, करम सिंह के साथ अवधेश मिश्रा भी शामिल था उस सबमे. पंडित जी, वो सभी तोह अब ज़िंदा नहीं रहे और इनका कहना है की अवधेश जी भी मारे गए कल रात. इसलिए ये नाम नहीं लिए मैंने और उस औरत को सारंग साहब अपने साथ हे कार में ले गए थे लेकिन फिर मैंने उसको भी कही नहीं देखा."

"इसको मार दो संजीव और इसका परिवार भी शायद इसकी असलियत से परिचित नहीं है. वो बताना मैट भूलना.", रामेश्वर जी उठने लगे तोह लोहान बिफरता हुआ गिड़गिड़ाने हे लग पड़ा.

"सच कहता हु पंडित जी की मैं इतना हे जनता हु. मुझे बेशक मार दीजिये लेकिन मेरा परिवार सुकून से अपनी हे अलग दुनिया में है, उसको मैट बीच में लाये. हाँ.. अज्जू सिंह ने उस औरत को काकी कह कर पुकारा था. 2 और भी जवान चेहरे थे जो दूर थे लेकिन दोनों हे जैसे नयी सुहागने थी. एक पटरी के साथ वाली दिवार के परे और दूसरी आम के जंगलात से सब देख रही थी. मैं नहीं जानता के वो कौन थी. मेरे परिवार को बक्श दीजिये मैं हाथ जोड़ता हु.", रामेश्वर जी इतना सुन्न कर शांत हो गए थे. वो दो nav-byahta उन्हें भी मालूम था के कौन थी लेकिन 'काकी' ने उलझा हे दिया.

"निर्मल सिंह जी, बलबीर को उचित देखरेख में ध्यान से रखवाइये. इसकी चिकित्सा का प्रबंध भी बेहतर हो ये जरूर सुनिश्चित कीजियेगा. बेटे, हम आज भी अपराध को ख़तम करने में यकीन करते है, अपराधी को नहीं. लेकिन अब तुम्हे सही कारावास भोगना होगा और हम तुम्हारे परिवार की भी उचित देखभाल करेंगे.", रामेश्वर जी ने एक बार फिर अपनी दरियादिली दिखा दी थी लेकिन संजीव अभी अशांत था और अपने दादा जी के ऐसे कहने पर अगला सवाल वो पूछ नहीं सकता था लोहान से.

"पंडित जी, इस रहमदिली के बदले एक बात और बताना चाहता हु आपको.", 2 पोलिसवाले अभी लोहान को लेने हे आये थे और हाथ खुलते हे उसको दोनों तरफ से पकड़ कर वही रुक गए.

"बताओ ऐसी क्या बात है जो तुम हमे इतने विश्वास के साथ बताना चाहते हो?"

"सुशीला सिंह की सुपारी उठी है 2 दिन पहले और काम करवाने वाला कोई उनके हे गाँव का है. हो सके तोह देख लेना शायद वो जो कोई भी है उसके पास सभी सवालो का जवाब हो.", अब संजीव ने एक लम्बी सांस भरी और अपने दादा की तरफ देखा.

"तुमने नहीं ली उसकी सुपारी? वैसे वो बेटी है हमारी तोह उसको हम कुछ होने नहीं देंगे बलबीर."

"बहिन मन है मैंने भी सुशीला को पंडित जी. भवानी जैसा भी था लेकिन मेरा ख़ास था और सुशीला उसके साथ मेरी भी बड़ी बहिन रही है. मैं पता हे करवा रहा था लेकिन शंकर ने ये सब कर दिया."

"शंकर से बच गया ये ाचा हुआ बलबीर. वो सवाल नहीं करता और हम जान नहीं लेते. धन्यवाद् इस सहयोग के लिए. चलो संजीव, इसको ठीक होने के बाद हे पेश करना है.", पंडित जी पहले हे अपने मित्रो और पौटे के साथ निकल चले और लोहान कड़ी सुरक्षा में सुरक्षित जगह पंहुचा दिया गया था.

"तुम कहते हो की अर्जुन भी यहाँ तक पहुंच गया है जहा तक बलबीर ने जानकारी दी?", पंडित जी शाम के धुन्दल्के में अब एक तरफ संजीव से गुफ्तगू कर रहे थे और छोल साहब दिग के साथ.

"ये सुशीला जी वाली जानकारी नहीं थी और मुन्ना जानकारी रखता है अर्जुन सिंह वाले घटना की लेकिन असली अपराधी तक वो भी नहीं पंहुचा है. हम दोनों हे मिल कर काम कर रहे थे और उसका कहना है आप भी इस मामले में सहायता कर सकते है. अब शायद वो आगे खोजबीन न करे घरवालों की वजह से लेकिन वो पता लगाना चाहता है की अर्जुन सिंह जी के साथ असलियत में क्या हुआ था."

"बेटे, मुझे बस इस बात का हे डर था कही अर्जुन अज्जू को समझने न निकल पड़े. ये नाम हमने भी कभी जुबान पर न आने दिए क्योंकि इस नाम से हमने एक नया बीटा पा लिया था. बलबीर की हे कथनी देखो, वो एक दुश्मन की सिर्फ तारीफ हे कर रहा था. मुझे तोह इतना सब भी मालूम न चल पाया था की कैसे दरिंदो ने एक saaf-dil इंसान को घेर कर मारा. शादी तक इस मामले में कोई खोजबीन न करना बेटे और अर्जुन के साथ मैं तुम्हारी मौजदगी में हे आराम से विचार करूँगा.", रामेश्वर जी बड़ी सफाई से अपनी आँखों में आयी नमी को छुपा गए. आज उनके जख्म फिर से हरे हो गए थे और वो कुछ वक़्त अपनी धर्मपत्नी का साथ चाहते थे.

"चलो भाई सतीश अब घर चलना चाहिए. कल निर्मल के साथ वैसे भी गोल्फ का कार्यक्रम तोह है हे.", उनकी बात पर दोनों हे इधर चले आये और निर्मल सिंह जी ने भी हाथ मिलते हुए आभार जताया और ये अपने घर के लिए निकल चले. संजीव का भी अंतर्मन व्यथित था जैसे आज वो इस मामले में बस कुछ हे दुरी पर अटक गया था लेकिन सच ये भी था की लोहान ने खुद साडी जानकारी दी थी उन्हें. अब इन्तजार था तोह अर्जुन का जिसके सामने उनके दादा जी शायद इस रहस्यमयी पुरुष का पूर्ण उल्लेख करे.

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हल्का अंधकार होने पर सांगवान के फार्महाउस से भुप्पी, मेहुल, परम और बड़े सांगवान जी जा चुके थे. शंकर को भी नरिंदर ने भुप्पी के हे घर भेज दिया था जिस से वो अब आराम कर सके. तरणताल में नरिंदर के साथ उमेद की अलग हे दौड़ जारी थी. आधा घंटा उचित गति से तैरने के बाद दोनों हे किनारे आ रुके तोह बहार बैठे दलीप ने हे सुलगती सिग्गट उमेद की तरफ बधाई.

"मरने का इरादा है क्या दलीप भाई? सांस चढ़ी हुई है और आप ये पीला दो. रात हसीं होने वाली है कल की तरह, राजेश को बुला लीजिये आप तब तक हम दोनों भी तैयारी कर लेते है.", दलीप के चेहरे पर चमक आ गयी थी नया मिशन सुन्न कर.

"आज कहा धावा बोलना है?"

"आज धावा नहीं बोलना दलीप भाई, सेंध लगनी है.", ये बात नरिंदर ने कही थी उमेद की जगह. दोनों के हे बलिष्ट शरीर भीगने पर कही ज्यादा हे आकर्षक लग रहे थे. नरिंदर और उमेद ने हमेशा हे शरीर को मेहतवा दिया था हर जरुरी चीज के साथ.

"तोह उसमे राजेश को क्यों बुलाना? सेंध लगाने के लिए तोह मैं अकेला हे बहोत हु बस जगह और आदमी बताओ.", दलीप के आत्मविश्वास को देख कर उमेद और इन्दर मुस्कुराने लगे.

"राजेश का साथ चलना बहोत जरुरी है भाई. ये समझ लो के वह सेंध लगाने वाली चाबी राजेश हे है और बाकी काम हम तीनो ने करना है.", नरिंदर की नियंत्रित बात सुन्न कर दलीप ने आश्वासन में सर हिला दिया.

"बदलो भाई तुम लोग कपडे पहनो और इतनी हे देर में वो भी आ जायेगा.", दलीप काश लगता हुआ बिल्डिंग के अंदर चला गया और पीछे ये दोनों एक दूसरे को देखने लगे.

"तोह तुम्हे उम्मीद है की करम सिंह के घर से हमको जानकारी मिलेगी?", उमेद ने ये सवाल करने के साथ हे बहार राखी बनियान से खुद को साफ़ करना शुरू कर दिए. सचमुच एक दतियाकर इंसान हे था उमेद सिंह और साढ़े 6 फ़ीट कद सिर्फ लम्बाई मात्रा नहीं, जिस्म भी उतना हे बेजोड़ था. काम तोह नरिंदर भी नहीं था बस दिखने में वो एक तगड़ा खूबसूरत अभिनेता लगता था.

"उम्मीद नहीं मैं यकीन से कहता हु के करम सिंह के घर हमको बहोत से सवालो के जवाब मिलने वाले है गज्जू. वो अकेला रह रहा था और उसकी माँ दमयंती भी अब उधर नहीं रहती. मुझे लगता है के वो बिलकुल सही जगह है छानबीन की."

"और राजेश का इस सबसे क्या लेना देना?"

"उसकी कार का लेना देना है भाई. वो वही कड़ी करेंगे जहा कर्म का कतल हुआ था. दलीप नजर रखेगा और हम तीनो उसके घर की छानबीन करेंगे.", नरिंदर ने वही अपना गीला कच्चा उतारते हुए अपनी बनियान से उस ख़ास हिस्से को सूखने का उपक्रम किया और ऐसे हे निर्वस्त्र घास पर चलता कपड़ो के पास आ गया. उमेद भी सामान अवस्था में था और जल्द हे दोनों पतलून पहन कर हाथो से हे बाल सूखने लगे. आज शायद ये एक सही ठिकाने पर सेंध लगाने चले थे और ये भी हो सकता था की उन्हें ऐसा कुछ मिले जिस से कदमो के निचे की जमीन हिल जाए. अब बस रात हसीं होने का इन्तजार था राजेश के आने के साथ साथ.

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मार्किट में खरीदी करने और घूमने फिरने में हे रात के 8 बज गए थे इन तीनो को. अर्जुन ने डिनर के लिए अगली मार्किट जाने का कहा तोह दोनों हे बहनो ने साफ़ इंकार कर दिया. आज पहली बार इन दोनों लड़कियों ने पूरे 50 हजार का सामान खरीद लिया था और अर्जुन का पर्स अभी तक जो का त्यों था. ये पैसे उसको माँ से मिले थे और साथ हे दादी के दिए 200000 शेष थे.

"ये हल्का फुल्का खाने के चक्कर में आरती ने मेरी तोह जान हे निकाल दी. मैं तोह डिनर नै करने वाली."

"मेरा भी हाल ऐसा हे है है अलका. पेट में जरा सी भी जगह नहीं है और आराम की तालाब कुछ ज्यादा हे हो रही है. माँ का सामान सवेरे हे समेटेंगे.", दोनों की ऐसी हालत देख अर्जुन हँसता हुआ उन्हें लिए घर वापिस आ गया. सचमुच आज अलका और आरती ने दिल खोल कर सामान ख़रीदा था, सिर्फ अपने लिए हे नहीं बल्कि ऋतू, प्रीती, कोमल के साथ सभी बहनो के लिए. रोमिला जी का भी सामान एक अलग गट्टे के बक्से में बंद करके वही पिछली सीट पर रखा था. कार जैसे हे घर के सामने रुकी तोह अफसाना और ज़ुबैदा भी स्कूटरी से आ पहुंची.

"ये ाफसु के इतनी रात में आने की वजह दीदी?", कार से निकलते हे आरती ने ज़ुबैदा दीदी से सवाल किया जो सब भुला कर अर्जुन से गले लग कर मिली.

"क्यों? पहले भी तोह तुम्हारे साथ रही है न रात में. और ये जनाब तोह ईद हो गए है. शहर में भी है लेकिन सेहन में नहीं.", ज़ुबैदा की बात पर अर्जुन क्या जवाब देता जबकि उसको खुद ाचा लग रहा था उनसे गले मिलना. कोई 30 सेकंड तक वो वैसे हे गले लगे रहे.

"अब्बा इन्तजार में होंगे बजी.", अफसाना तोह इस वक़्त भी सलवार कमीज के साथ मुँह पर दुपट्टा लिए थे.

"ओह मेरी बेनजीर भुट्टो, जिसको देखने आयी है काम से काम अपना तोह इस्तकबाल करवा दे. ध्यान रखना इसका तुम सभी, आजकल जरा कायदे में नहीं है मैडम.", ज़ुबैदा ने बिना किसी की परवाह के अर्जुन का गाल चूमने के बाद ऐसा हे आरती और अलका के साथ किया और वापिस चली गयी. अफसाना लरजती हुई आरती के साथ अंदर चली गयी.

"तुम रुका जरा यहाँ.", अलका ने अर्जुन का हाथ थाम लिया. वो जैसे इस पल में ऋतू हे बन्न गयी थी.

"क्या हुआ दीदी.?", बेसाख्ता अर्जुन के मुँह से भी दीदी हे निकला और अलका थोड़ा गंभीर हो गयी.

"इश्क़ बहोत कुछ बदल देता है मेरे भाई और आज मैं 2 घंटे अफसाना के घर रही हु. ये तुमसे कोई अलग हे इश्क़ कर बैठी है ध्यान रखना."

"मतलब"?

"इसमें और ऋतू में सीए किसी एक को को चुन न पड़े तोह?"

"क्या वाहियात सवाल है. साड़ी दुनिया एक तरफ और ऋतू एक तरफ. ज़िन्दगी का आखिरी सांस भी लू तोह वो बस ऋतू के आगोश में. ऐसा फिर कभी मैट कहना."

"मान लिया. प्रीती और इसमें से?"

"वो जान है मेरी. आप हमेशा मेरे साथ हो ऋतू की तरह लेकिन संवारा तोह मुझे और प्रीती को आपने भी है. ये सवाल जायज नहीं है. वैसे भी मैंने अभी तक अफसाना से बात नहीं करि है."

"बात करना अर्जुन. ये इश्क़ कुछ ख़ास दिख रहा है और अगर बंदिशे टॉड गया तोह क़यामत न हो जाये. ज़ुबैदा की बात अलग है, वो तुम्हे प्यार करती है और उसकी कोई चाहत नहीं है तुमसे. अफसाना तोह जैसे एक पहेली हे है, सुलझाने में हे नहीं आ रही.", अलका ने बात ख़तम करते हुए ठन्डे की बोतल, मिल्क बादाम और थोड़ा खाने पीने का सामान कार से निकला और घर के अंदर चली आयी. अर्जुन साथ हे था इस पल में. आज वो पहली बार अलका को खुल कर नहीं बता पाया था उस असाधारण शन्न के बारे में जो उसको अफसाना को देख कर हुआ था. ये रोमांच कही कुछ और हे न करवा दे.

"यार अलका मैं तोह थोड़ी देर आराम करते हुए टीवी देखने लगी हु.", आरती अब ढीले वस्त्रो में थी और अफसाना ने पहली बार नक़ाब हटाया था इस तरह गैरो की मौजदगी में. अलका भी उन सुनहरी आँखों से सम्मोहित सी हो गई.

"वाओ. तुम हसीं हो यार. घर पर भी तुमने नक़ाब लिया हुआ था दिन में."

"वह हम महफूज नहीं थे उस वक़्त. चाचा के साथ उनके भी दोस्त आये हुए थे दोपहरी के खाने पर. हमे ाचा नहीं लगता कोई हमे चीज समझे और पैमाइश करे.", अफसाना की मुस्कराहट तोह सचमुच कमाल थी. कंधारी अनार से सुर्ख होंठ, वो नक्काशीदार चेहरा और जिस्म ढाका हुआ.

"यार तुम न मेरा टेस्ट ले रही हो. मुझे तुमसे प्यार हो गया तोह प्लीज गाली मैट देना.", अलका के ऐसा कहने पर आरती भी हंस दी. अर्जुन उनके पीछे से कमरे में जा चूका था अपने.

"मयस्सर करना गर चेहरा देख कर हो तोह इल्तिजा है, ख्वाहिशे ाहदुरि ऐसे हे रहा करती है. आपने सिर्फ हमारा चेहरा देखा और इश्क़ फरमाने की हिदायत कर दी. हम kabile-gor नहीं है चेहरे से निचे.", Chhui-mui सी अफसाना आज बेहतर बोल रही थी और ये असर कुछ अलका का भी था. अलका थी हे ऐसी जो कही न कही सबसे तेज युवती थी इस परिवार में.

"देखो डार्लिंग, अभी तोह आराम करने का दिल है मेरा. रात 11-12 तक तुम्हे जरूर उठा दूंगी अपनी नींद पूरी करने के बाद.", अलका ने इतना कहा और वो आरती के कमरे की तरफ बढ़ चली. अर्जुन ट्रैक पजामा और टीशर्ट पहने एक बड़ा कार्टून सामान का भरे दरवाजे से बहार निकल गया. आरती देखती रही और वैसी हे नजर अफसाना की थी. अर्जुन अपनी चची का बताया सामान कार की लम्बी डिक्की में सही तरह से रखने लगा. उसने यही ठीक समझा था समय बचने के हिसाब से.

"यार अगर तुझे बुरा न लगे तोह अर्जुन के लिए दूध गरम कर देना. मैं बस नाहा लू क्योंकि हलकी थकावट हो रही है फिर आराम से कमरे में हे बातें करेंगे.", अब आरती के भी हाथ खड़े हो गए थे. सवेरे 5 बजे जागने के बाद उसने भी आराम कहा किया था.

"इन्हे दूध की जरुरत होगी तोह हम देख लेंगे. वैसे अलका दीदी अगर आपके बिस्टेर पर सोने गयी है तोह हम कहा नींद फरमाए?"

"अगर दिक्कत न हो तोह वही आ जाना मेरे कमरे में. प्रियंका दीदी का भी कमरा खाली है इन केस तुम्हे दिक्कत हो तोह हम दोनों दीदी वाले कमरे में सो जायेंगे.", आरती बता हे रही थी और अर्जुन वापिस कमरे की और चल दिया. वो जैसे ठान चूका था की अभी सब सामान डिक्की में भर देगा.

"लेट थे किते जो it's ओन वे हनी. मुशायरे के बहार तोह हमने सभी शायर शराबी देखे है. आप आराम फरमाए, हम प्रियंका बाजी के कमरे में हे आराम फार्मा लेंगे.", अब तोह आरती का भी माथा ठनक गया था. ये अर्जुन का असर था तोह भुगतना उसको हे था. लेकिन वो क्या हे कहती इस प्यारी गुड़िया को.

"जहा दिल करे वह महफ़िल लगा लेंगे सनम तुम्हारे साथ.", आरती ने बस इतना हे कहा और खिलखिलाती हुई प्रियंका दीदी के कमरे वाले बाथरूम में चली गयी. अलका भी आराम करने से पहले नहाने हे लगी थी और अर्जुन अपनी चची का सामान गट्टे के बक्से में सही से जमा रहा था. वो सवेरे के भरोसे कुछ छोड़ने वाला नहीं था और वैसे भी कल उसको जगतार भाई से ढेरो बातें करनी थी.

"आप जब कहियेगा हम दूध गरम कर देंगे.", अर्जुन इन्ही नजरो से बचने के लिए तोह काम में मसरूफ था लेकिन वाह ऋ किस्मत. पहले अफसाना के घर से दूर रहा, फिर उसको बहार भी निहारने से बचता रहा और घर में आते हे वो सामान के साथ लग गया. अफसाना खुद हे चल उसकी तरफ तोह आने से रही, यही सोचा था और ये सोच अफसाना ने हे बदल दी. वो सुनहरी आँखें और ताम्बे बाल उसकी नजरो के सामने थे. जुबान जैसे लकवा मार गयी और आँखें स्थिरर. अफसाना की भी धड़कन बढ़ने लगी तोह वो बिना जवाब सुने आरती के कमरे में चली आयी. दरवाजा बंद करके वो बिस्टेर पर बैठी बस अर्जुन के चेहरे को याद कर रही थी. हर बार क्यों दोनों हे खामोश हो जाते है एक दूसरे को देखने पर?

"ओह मैडम जी, कहा खोयी हो? वैसे सच कहु तोह तुम्हे आज पहली बार हे दिन में देखा था और कोई इतना खूबसूरत भी हो सकता है इसका अंदाजा बिलकुल नहीं था.", अलका बाथरूम से बहार आयी तोह बस एक घुटनो तक की ढीली निक्कर और जांघो तक लम्बाई वाली टीशर्ट पहने थी. अंदरूनी वस्त्रो का अभाव नुकीले निप्पल साफ़ बता रहे थे. अफसाना ने भी अलका को ध्यान से देखा तोह उसकी लम्बाई, कमर से निचे तक आते बाल, बादामी चेहरा और शरीर के इतने जबरदस्त कटाव से वो भी प्रभावित हुए बिना न रह सकीय. उसकी बड़ी बहिन भी एक बेहतरीन युवती थी जिसके सौन्दर्य की परिभाषा हजारो आँखें करती रही लेकिन अलका भी ख़ास थी.

"आप हमारी तारीफ कर हे है? जो खुद आफरीन हो उनके सामने तोह हम कुछ भी नहीं.", जिस तरह अफसाना के होंठ नजाकत से हिलते थे, अलका को बड़ा ाचा लगता था देखना. चेहरे पर ख़ुशी आ गयी थी अपने आप हे.

"ऐसी बात नहीं है अफसाना. जैसा सुना थी की तुम नक़ाब या बुरका पहने रहती हो हमेशा तोह मेरे दिमाग में कुछ और हे तस्वीर बन्न गयी थी. आरती ने थोड़ा बहोत हे बताया था तुम्हारे बारे में और कुछ मुझे प्रियंका दीदी ने बताया. आज तुम्हे सामने देखा तोह वो सभी ख़याल गायब हे हो गए. तुम किसी अरब देश की राजकुमारी सी हो, बिलकुल गुड़िया सी.", अलका गॉड में तकिया लिए बिस्टेर पर बैठ गयी. अब अफसाना के चेहरे पर हलकी लाली आ चुकी थी. ये थोड़े बहोत बदलाव उसमे कुछ समय से आये थे और ज़ुबैदा बाजी ने हे उसको निखारा था.

"वो हम आज भी पहनते है बाजी, आपने दोपहरी में देखा हे था. बस जहा जरुरी हो वह. वैसे अम्मीजान हमारी पैदाइश पर Marrakesh-Safi थी, ये मोरक्को का एक शहर है और हमारे चश्म (आईज) वही की सौगात है.", अलका ने इस जानकारी पर जैसे हे अफसाना का वो सफ़ेद माँ सा हाथ थमा तोह एक पल में हे उसके चेहरे पर थोड़ी बेचैनी सी आ गयी.

"यार एक तोह मैं baaji-didi नहीं हु, दोस्त हु जैसे आरती है. और तुम ख़ास हो जो पहली नजर में हे पता लग जाता है. इतना डर्टी क्यों हो वैसे? मैं लड़की हु और मेरे हाथ पकड़ने पर तुम्हे घबराहट नहीं होनी चाहिए.", अलका ने अब अपने दूसरा हाथ भी अफसाना की हथेली के ऊपर रख दिया.

"वो ज़ुबैदा बाजी कहती है के इस दौर में किसी का ऐतबार नहीं."

"हाहाहा.. अरे यार सचमुच तुम मासूम हो. तुम्हारी दीदी से आज मैंने एक घंटे से ज्यादा बातें की है वह तुम्हारे घर. उन्हें सबसे ज्यादा मजा आता है तुम्हे सताने में और तुम उनकी कही हर बात को सच मान लेती हो. वो बता रही थी की तुम कितनी मजहब की पक्की हो और कॉलेज में होने के बावजूद अभी तक ज्यादा दुनिया की खबर नहीं रखती.", अलका के ऐसा कहने पर अफसाना झेंप गयी लेकिन हलकी नाराजगी भी थी मैं में अपनी बड़ी बहिन के लिए.

"और उन्होंने आपसे क्या कहा हमारे बारे में?"

"बता रही थी की तुम कितनी प्यारी लड़की हो. लेकिन आज के ज़माने में तुम्हारा यही life-style परेशानी पैदा कर सकता है. उन्हें इसकी टेंशन रहती है और वो तुम्हे धीरे धीरे बदलने की कोशिश भी कर रही है. वैसे तुम गलत नहीं हो अफसाना बस ये लाइफ घर की चार दीवारी से थोड़ी बहार भी है. सुना है पहले तोह तुम घर से अकेली बहार भी नहीं निकली यहाँ तक आने के लिए?", अब अफसाना को जैसे खुद पर हे थोड़ी शर्मिंदगी होने लगी. अलका का हाथ सहलाना उसको प्रोत्साहित करने लगा बोलने के लिए.

"हम खौफजदा थे और अभी भी हम अकेले बहार नहीं निकलते. घर से बहार एक आरती हे है जिनके साथ हमारा कुछ वजूद है."

"डर? अगर चाहो तोह मुझसे बात कर सकती हो और बातें अपने आप तक हे रखना ज्यादा दुःख देती है. डर इंसान को कमजोर हे बनता है दोस्त. हादसे सबके साथ होते है, किसी के साथ छोटे किसी के साथ बड़े लेकिन क्या हम उन्हें याद रख कर घुटन में जिन्दा रहे? ये तोह और भी दुखदायी होगा. अगर फिर भी तुम्हे लगता है मैं गलत कह रही हु तोह माफ़ कर देना. मुझे शायद सही अंदाजा नहीं है के तुमने क्या झेला है."

"हमने कुछ भी नहीं झेला है. बस कुछ बुरे लोग लड़कियों की asmat-aabru पर हे निगाह रखते है. क्या यही इंसानियत है बहार दुनिया में?", अफसाना के शब्दों से हे पता चलता था की वो कितनी सरल लड़की है और उसका डर हर आदमी के लिए था जो गलत नजर रखता हो.

"तुम गलत नहीं कह रही हो अफसाना लेकिन हर इंसान बुरा नहीं होता. कुछ चाहत से देखते है और कई गलत इरादों से लेकिन किसी की कोई मजाल नहीं जबतक लड़की मजबूत रहे. तुम्हे बस अपनी लाइफ और खुशियां देखनी चाहिए न की ऐसे लोग जो मायने नहीं रखते. मैं भी कॉलेज जाती हु और हम 7 बहने है वह घर पर. देखने वाले देखेंगे और हमको उनसे कोई मतलब नहीं. वैसे तुमने सिर्फ ऐसा हे देखा है या कुछ बुरा भी?", ये अलका थी जो बाल की खाल निकल लेती थी और सामने वाले को पता भी नहीं चलता था.

"ज़ुबैदा बाजी को एक बार किसी ने सताया था. हम स्कूल में थे उस वक़्त और बाजी कॉलेज के पहले साल में. वो लड़के गलत इरादे रखते थे और बाजी ने कभी उन्हें नजर भी नहीं किया जैसा आप कहती है. फिर भी उन्होंने उनकी अस्मत खराब करनी चाही, नरिंदर चाचा जी न होते तोह बाजी के साथ कुछ भी हो सकता था. अब बताये की अगर बात इस हद्द तक चली जाए तोह क्या होगा? हर बार तोह कोई नेक बाँदा हिफाजत के लिए मौजूद नहीं हो सकता."

"तोह हमको हे हिफाजत करनी चाहिए अपनी. वैसे तुम्हारे लिए तोह मैं भी एक पल बहक सकती हु.", अलका ने जो जानकारी लेनी थी वो लेने के बाद अब माहौल बदलने की ये मस्ती भरी बात कह दी. एक पल के लिए अफसाना का चेहरा हे सफ़ेद हो गया.

"तौबा. बाजी सही कहती है के ज़माने के साथ बहोत कुछ बदल रहा है. आप ऐसे विचार रखती है हमारे बारे में?"

"हाहाहा.. किसी दिन तुम्हे प्यार हो गया न सही लड़के से तोह पक्का तुम उसकी बाहों में हे सांस टॉड डौगी. यार लड़की हो कर एक लड़की से घबरा रही हो तुम. हाहाहा.. मजाक कर रही हु और दोस्त मस्ती भी नहीं करते क्या आपस में?", अब अफसाना के चेहरे पर थोड़ी शर्म और वही गुलाबी रंगत आ चुकी थी.

"हम इश्क़ में यकीन नहीं करते और ऐसी बातें ाची नहीं लगती.", अभी वो आगे कुछ कहती उस से पहले हे दरवाजे पर दस्तक हुई. अलका कड़ी होने लगी तोह अफसाना ने ना में सर हिला दिया.

"आपके भाई भी हो सकते है और जहा तक हमे लग रहा है आपने अंदरूनी कपडे नहीं पहने है सीने पर. ये चादर ले लीजिये, हम खोलते है दरवाजा.", अलका की हंसी छूट गयी इतना सुन्न कर. फिर खुद को शांत करती हुई वो अफसाना की बात समझ गयी. सही कह रही थी क्योंकि अर्जुन के साथ अलका के ख़ास रिश्ते का उसको पता भी नहीं होना चाहिए.

"शहजादी साहिबा, दूध उबाल कर बहार निकल गया. ाची बात है की समय रहते मैंने देख लिया नहीं तोह हो गया था आज काम.", ये आरती थी और ठीक अलका जैसे कपड़ो में बस अभी सीने पर ब्रा पहनी हुई थी टीशर्ट के अंदर.

"ओह माफ़ करना, हम बातों में मसरूफ हो गए थे अलका बाजी के साथ. आपने दूध दे दिया अपने भाई को?"

"उबलता हुआ हे दे दू क्या? वैसे दरवाजा बंद क्यों था यहाँ?", आरती को अब वो कैसे बताती की अर्जुन ने बेचैन कर दिया था और खुद को शांत करने वो इस कमरे में चली आयी थी.

"आप बैठिये इधर, हम भी कपडे बदल कर आ जाते है प्रियंका बाजी के कमरे से.", आरती अंदर जाने की जगह हंसती हुई अर्जुन की तरफ चल दी और अफसाना ने प्रियंका दीदी के कमरे के अंदर जाते हे दरवाजा बंद कर लिया.

"हाँ तोह अभी तक काम ख़तम नहीं हुआ तुम्हारा?", अर्जुन अब ये पांचवा बक्सा भर रहा था. आरती के अंदर आते हे दरवाजा लगाने पर उसका ध्यान तजा नहीं हुई अपनी बहिन पर गया तोह एक कशिश से वो देखता हे रहा.

"इरादे नेक नहीं है लेकिन आज किस्मत में शायद प्यार करना भी नहीं लिखा.", अर्जुन वापिस कपड़ो को अटैची में और किताबो को बक्से में भरने लगा. आरती दबे पाँव उसकी तरफ आती पीछे से लिपट गयी. नरम उभारो का वो स्पर्श और ऐसे उनका लिपटना बता रहा था की चाहत आरती की भी वही है.

"रात को अलका के पास चले जाना."

"मैं यही सोने वाला आरती और जब भी आने का दिल हो तोह यही आ जाना, सावधानी से.", अर्जुन ने पलट कर आरती को अपनी बाहों में समेत लिया. गीले होंठो पर एक मिनट तक अर्जुन के होंठो ने भरपूर प्यार जताया. फिर आराम से दोनों हे दूर हो गए.

"मेरे और दीदी के कपडे भी मैंने बैग में रख लिए है. जगह होगी इतनी कार में?"

"कार की डिक्की अभी भी आधी खली है और कुछ सामान मैं अंदर भी रख लूंगा. 10 बजने वाले है तोह अब आपको आराम करना चाहिए.", अर्जुन भी जानता था की आरती आज रात उसके साथ रहना चाहती थी. लेकिन अफसाना के आने का भी अर्जुन को बुरा नहीं लगा था. अगले 10 मिनट में वो दोनों बैग और बक्से लिए बहार चल दिया. हॉल पार करते हे सामना भोली बेगम से हुआ.

"आज रात मैं यही सोने वाली हु. आरती कहा है?", अर्जुन चाह कर भी सर पे हाथ न रख सका. बस इसकी हे कमी थी.

"अंदर अपने कमरे में, तुम्हारा हे इन्तजार कर रही है वो.", गुरदीप के मजे लेते हुए अर्जुन ने उसको अंदर जाने को कहा और हँसता हु कार की तरफ चल दिया. ये सब सामान आ चूका था और अब बस Aarti-Priyanka के बैग ला कर रखने थे. डिक्की बंद करके वो वापिस अंदर चला आया तोह आरती के कमरे से आती आवाजों ने बता दिया था की रेडियो चालू हो चूका है. प्रियंका दीदी के कमरे का बंद दरवाजा धकेलते हुए वो अंदर आया तोह जीरो की मद्दिम रौशनी थी अभी.

'ये करि है पैकिंग इन्होने. चैन तक बंद नहीं की.', अर्जुन बेध्यानी में बस इन ऊपर तक भरे बैग को बंद करने में लगा था और बाथरूम का दरवाजा खुलने की आवाज जैसे सुनाई हे न पड़ी. अफसाना भी वो बड़ा टोलिया लपेटे अपनी हे धुन्न में बीएड तक चली आयी जहा उसकी पूरी आस्तीन की टीशर्ट और पजामा रखा था, रात को पहन ने के लिए. अब टोलिया उतार कर बिस्टेर पर रखा तोह सांसें अटक गयी. बीएड के दूसरी तरफ बैग में कपडे दबाता अर्जुन भी सुन्न पद चूका था नीली रौशनी में इस जानलेवा मंजर को देखते हे. उजले रंग की पूरे कप वाली नरम ब्रा और वैसी हे रंगत की पंतय में उसके सामने अफसाना का हाहाकारी यौवन था. अफसाना होश में आती उस से पहले हे अर्जुन बड़ी तेजी से कमरे बहार निकल गया. स्प्रिंग वाला दरवाजा वापिस बंद हो गया था.

अफसाना की आँखों में पानी आ चूका था होश में आते हे. जैसे तैसे कपडे पहन कर वो कुछ देर वही बिस्टेर पर बैठी रही. अंतर्मन मान हे नहीं रहा था के ऐसा भी कुछ हुआ है. अर्जुन की आँखें उस पल में भी अफसाना का चेहरा हे देख रही थी. ये याद आते हे अफसाना को हल्का आराम हुआ लेकिन दिल यही कह रहा था के अर्जुन क्या सोच रहा होगा उसकी इस बेशर्मी पर और अब वो कैसे उसका सामना करेगी. इस हालत में तोह आजतक आरती ने भी कभी उसको नहीं देखा था. बुझे मैं से वो एक बार और अपना चेहरा साफ़ करके Alka-Aarti के कमरे में चली आयी.

गुरदीप तोह आदत अनुसार पातर पातर करि जा रही थी और अलका को भी उसकी बातें सुन्न ने में मजा आ रहा था. उसकी भोली बातें, पंजाबी किस्से और चेहरे के मनमोहक भाव किसको पसंद न आते. गुरदीप बेबाकी से अलका की बगल में आ लेती तोह आरती भी कड़ी हो गयी.

"11 बज चुके है मैडम, अब सोना चाहिए. सवेरे 6 बजे तक उठ गए तोह भी ाचा है.", यहाँ भी अफसाना खामोश हे थी और इतने शोर में किसी का भी ध्यान नहीं गया था उस पर.

"हाँ यार लेकिन मैं तोह अलका के पास सोऊंगी. तू अपनी गुलाबो के साथ सो, वैसे भी वो हर वक़्त शर्माती रहती है.", गुरदीप की बात पर आरती भी हंसती हुई दोनों को बे बोल कर दूसरे कमरे में चली आयी अफसाना के साथ.

"तुम लेट जाओ, मैं जरा बहार दरवाजा देख आती हु.", आरती के कहने पर अफसाना बिस्टेर के दूसरी तरफ ख़ामोशी से करवट के बल लेती गयी. आँखें खुली थी और मैं विचलित. ये तबतक शांत नहीं होने वाला था जबतक वो अर्जुन से बात नहीं कर leti.Afsana के लिए उसकी इज्जत हे जैसे ज़िन्दगी थी और उसको कटाई ये कबूल न था के अर्जुन के मैं में उसकी कोई गलत छवि बने. उधर आरती ने बहार वाले दरवाजे पर अंदर से टाला लगा पाया तोह वो हॉल के दरवाजे को भी चिटकनी लगाती हुई अपने कमरे में आ गयी. घर की ज्यादातर रौशनी अब बंद हो चुकी थी, बस जीरो के बल्ब जगमग थे.

"सो गयी अफ़सा? सॉरी यार, थकान की वजह से मुझे भी नींद आ रही है और तेरे साथ टाइम नहीं बिता सकीय.", कूलर की ज्यादा आवाज न थी जिस से अफसाना को सुनाई न दिया हो लेकिन वो खामोश हे रही और आरती ने भी पतली चादर अपने ऊपर ओढ़ ली. 10 मिनट से पहले हे वो गहरी नींद में जा चुकी थी. यही हाल बराबर वाले कमरे का था जहा अलका गुरदीप के साथ बड़े आराम से सो रही थी. गाँव से शहर का लम्बा सफर, फिर यहाँ तक का सफर और शाम को ाची bhaag-daud के बाद अब जरा भी हिम्मत न बची थी इन दोनों में. साढ़े 11 का वक़्त हो चला तोह अफसाना बड़े एहतियात से उठ कड़ी हुई. रसोई में अभी तक दूध का पतीला चूल्हे पर था और जायज गरम भी. एक गिलास निवाये दूध का लिए वो धड़कते दिल और कांपते कदमो से अर्जुन के कमरे तक चली आयी. नींद अर्जुन की आँखों से भी कोसो दूर थी और इस सन्नाटे में लैंप की रौशनी टेल वो जाने क्या पढ़ने में व्यस्त था.

"आपको दूध देना भूल गए थे.", इतना भी जाने वो कितनी हिम्मत से कह पायी और अर्जुन ने एक पल के लिए अफसाना को देखा और हाथो से गिलास ले कर वही टेबल पर रखते हुए कहा.

"सॉरी अफसाना, मुझे बिलकुल भी नहीं पता था की उधर आप होंगी. मैं आपके लिए कोई गलत ख्याल नहीं रखता और वो सब अनजाने में हो गया.", अफसाना इतना सुन्न कर जैसे बर्फ सी ठंडी पड़ गई. पिछले डेढ़ घंटे से वो बस यही सोच रही थी की उसने एक बहोत बड़ी गलती कर दी है जिसका अंजाम जाने क्या होगा लेकिन यहाँ सामने से अर्जुन माफ़ी मांग रहा था. अफसाना को यु खामोश देख अर्जुन ने पहली बार उसको हाथ लगाया. निवाये दूध को पकड़ने से वो माँ से मुलायम हाथ भी हलके गरम थे.

"देखिये मैं जानता हु के आपको कितना बुरा लग रहा होगा लेकिन सचमुच जो हुआ वो अनजाने में हुआ. आपको दुखी करने का पाप मैं भूल कर भी नहीं कर सकता लेकिन अगर फिर भी आपको लगता है वो सब मैंने जानबूझ कर किया है तोह सजा दे सकती है. आइंदा मैं अपना चेहरा भी सामने नहीं लाऊंगा.", अर्जुन ने इतना कहते हुए हाथ छोड़ा तोह अफसाना को लगा जैसे उसकी रूह हे जिस्म से जुड़ा हो गयी. किस सम्मोहन में थी वो ये खबर न थी लेकिन आज वो अर्जुन से भागना नहीं चाहती थी.

"आपकी नजरो में हमने कभी गलत इरादे नहीं देखे अर्जुन. हम यहाँ आपसे माफ़ी मांगने आये थे जो हुआ उसके लिए. हम बेहया नहीं है जो अंदरूनी कपड़ो में jism-numaish करे. इल्म होता की आप वह है तोह हम बहार हे न निकलते.", धीमी आवाज में अपना दर्द बयान करती अफसाना की सुनहरी आँखों से भी दर्द छलकने लगा. उसकी मासूमियत और साफ़दिली देख अर्जुन को अब ज्यादा हे बुरा लग रहा था. आँखों में वो आंसू जब दिल को दर्द देने लगे तोह अर्जुन ने खड़े हो कर अफसाना को सीने से लगा लिया. ये हरकत वो कभी नहीं कर सकता था और अफसाना भी कभी ऐसा कदम नहीं लेती. लेकिन ये पल जैसे अपवाद था दोनों के लिए. अफसाना के चेहरे को अपने सीने से लगाए वो बड़े प्यार से उसका सर थामे खड़ा रहा.

"आप गलत नहीं हो सकती अफसाना और सच कहु तोह मैं कभी आपको ठेस नहीं पहुंचना चाहता. ये किस्मत क्या खेल खेल रही है मुझे बिलकुल नहीं पता. मैं दूर रहना चाहता हु आपसे क्योंकि जानता हु आप एक बेहद शालीन और saaf-dil मासूम युवती है. जो हुआ है उसको मैं ठीक तोह नहीं कर सकता लेकिन आपके आंसू मुझे गुनेहगार बता रहे है.", अर्जुन के वो पकड़ भी जैसे जानती थी की आगोश में एक ख़ास युवती है. बाहुपाश के जगह ये पकड़ सिर्फ प्यार भरी थी. अफसाना के हाथ भी अर्जुन की पीठ पर थे और वो अब कुछ सुकून में थी.

"आप गुनेहगार हो भी नहीं सकते अर्जुन और हमे आपके दीदार से परेशानी नहीं है. बस डर है के आप हमारे बारे में गलत ख़याल न बना बैठे.", अफसाना के दोनों हाथ अब अर्जुन की बगल में थे और चेहरा सीने पर एक तरफ रखे वो निचे देख रही थी. अर्जुन भी एक सुकून से भर चूका था अफसाना को अपने सीने से लगाए. जब आगे कोई और बात न हुई तोह अफसाना को दोनों की हालत का भान हुआ. वो आज पहली बार किसी गैर के गले लगी थी, वो भी एक पुरुष के. शरीर हल्का कसमसाया तोह अर्जुन ने हे कदम पीछे हटा लिए.

"सॉरी. आपकी आँखों में आंसू देख कर पता नहीं चला."

"शुक्रिया. और हमे बुरा नहीं लगा.", अफसाना ने नजरे झुकाये ये छोटा सा जवाब दिया और जाने के लिए अभी मुड़ी हे थी की अर्जुन की बात सुन्न कर हलचल मच गयी.

"वैसे आप साफदिल होने के साथ हे हद्द से ज्यादा खूबसूरत है. नक़ाब में रहा कीजिये, देखने वाले की नज़र भी ऐसी ख़ूबसूरती को मैला कर सकती है.", अर्जुन अभी भी खड़ा हे था और अफसाना के पलटने पर फिर से वो उन्ही आँखों को देखने लगा जो इतनी देर से झुकी हुई थी.

"आपके देखने से हम मैले नहीं होंगे और अब हमे आपके सामने नक़ाब रखने की जरुरत भी नहीं लगती. नींद फरमाए, हम भी जाते है.", इस बार जाने से पहले अफसाना ने जिस तरफ हाथ से सलाम करते हुए अर्जुन को देखा था वो गहरा असर कर गया. अफसाना खुद हे उसका दरवाजा बंद करती हुई चली गई.

'अब नहीं आता कभी पंजाब. जिस से बचना था वही रात को सामने आ गई. भगवान् इसको मत प्यार होने देना मुझ जैसे इंसान से.', अर्जुन खुद से इतना बोलता हुआ तकिया दबाये बिस्टेर पर लेट गया. अब बेचैनी नहीं थी और आँखें जल्द हे बंद हो गयी. रात के किसी पहर वो मांसल बदन अर्जुन से लिप्त तोह धीमी रफ़्तार से एक लम्बा संसर्ग शुरू हो गया इस बंद कमरे में.

.

.

"ये संदूक खोल यार गज्जू.", गाँव के इस बंद पड़े घर में बहार जितनी ख़ामोशी थी उस से ज्यादा चहल पहल इस बंद कमरे में थी. टोर्च की रौशनी में उमेद, दलीप के साथ नरिंदर हर चीज को बड़े ध्यान से जांच रहा था. यहाँ उन्हें कुछ जानकारी तोह मिली थी लेकिन वो उतनी भी ख़ास नहीं थी. कोने में रखा वो लोहे का बड़ा संदूक देखना बाकी था. उमेद ने पेचकस से बिना टाला खोले हे संदूक का कब्ज़ा निकल दिया.

"साला ये करम सिंह अकेला हे रहता था क्या? न बीवी न बचे और बाकी दोनों कमरे तोह ऐसे खाली थे जैसे उनकी जरुरत हे न पड़ी हो कबि. चल तू देख अंदर क्या है, मैं रौशनी देता हु.", संदूक के ढक्कन को पकडे उमेद टोर्च से रौशनी दिखने लगा और नरिंदर ने वो रजाई निकल कर एक तरफ रख दी. यहाँ अब बहोत कुछ था उस रजाई को हटाने के बाद. 2 पुराणी एल्बम, कुछ खट्ट, shwet-shyaam तस्वीरें और कुछ असला जो पुराण था.

"बन्दूक और खंजर पर हाथ मत लगाना. देख हाथी पर प्लास्टिक बंधा हुआ है.", उमेद ने जैसे हे चेताया तोह नरिंदर ने रुमाल से दोनों हे चीज पकड़ कर चारपाई पर रख दी. एक लकड़ी का बक्सा भी था जिसपर छोटा सा टाला लगा था. ऐसे बक्से ज्यादार सुहागने या युवतिया पुराने समय में saaj-sajja का सामान रखने के लिए प्रयोग करती थी.

"ये बहोत हे पुराण बक्सा है बे गज्जू. ऐसा एक तेरे भी घर था और मेरी माँ के पास भी. टाला लगा है तोह मतलब ये काम की चीज है."

"हाँ तोह निकल ले न. चल कर आराम से देखेंगे कौनसी सोने की बिंदी और चांदी की लीबस्तीक है इसमें. वो ताबीज भी उठा जो इस कागज के निचे है."

"ये कागज नहीं फोटो है और ये तोह ढिबरी (मोरी) वाला सिक्का है धागे में बंधा.", इन्दर ने वो दोनों चीज उठाने के बाद ताबीज जेब में और तस्वीर चारपाई पर रख दी. इतने में हे दलीप की आवाज पर ध्यान गया.

"इधर देखो भाई क्या मिला. ये इस फोटो के पीछे था और भी कागज़ है इस फोल्डर में.", दिवार पर तंगी उस हार चढ़ी पुराणी तस्वीर के पीछे से दलीप को एक बड़ा पैकेट और ये तस्वीर मिली थी जिसमे 8 जवान आदमी थे. एक के चेहरे पर गोल घेरा बनाया गया था. नरिंदर सब काम छोड़ कर उस तस्वीर को देखने लगा.

"बहनचोद ये क्या बवाल है बे गज्जू? देखियो जरा ये पापा और रघुबीर चाचा हे है न?", सफ़ेद पतलून और काली कमीज हे दिख रही थी उन दोनों के शरीर पर, तस्वीर के shwet-shyaam होने की वजह से. लेकिन उन चेहरों को पहचान पाना मुश्किल था क्योंकि सभी 15 से 23-24 साल के बीच के थे.

"हाँ बे ये तोह पापा हे है और ये सोमबीर ताऊजी है. बाकी किसी को तोह मैं नहीं पहचानता. लेकिन इस लड़के के ऊपर गोला क्यों मारा है जिसके कंधे पर चाचा का हाथ है?"

"फोटो दाल भाई दलीप वापिस पैकेट में. ये बहोत काम की चीज है और इसका यहाँ होना अपने आप में हैरानी वाली बात है. 50 साल पुराणी फोटो वो भी इस घर में."

"ये सब मैं झोले में डालता हु, दलीप भाई संदूक का कब्ज़ा वापिस दबा दो और निकट है यहाँ से.", उमेद के कहने के साथ हे अगले 5 मिनट में पूरा कमरा पहले की तरह व्यवस्थित हो चूका था. 2 थैले सामान लिए वो तीनो हे बड़ी कुशलता से इस पुराने घर से बहार निकल गए. दूर कही कुत्तो के रोने की आवाज के सिवा बस इनके कदमो की हलकी आहात हे थे इस गहरी रात में. आगे सुनसान खेतो के बीच पगडण्डी से रस्ते पर चलते हुए वो 10 मिनट बाद सड़क पर पहुंच गए.

"राजेश, क्या रहा?"

"क्या रहा? ये देखो साला मेरी कार पे ड्राइवर साइड की तरफ से एक आदमी गोली मार कर गायब हो गया और तुम्हे आवाज तक सुनाई न दी. चक्कर क्या है ये सब.? पहले तोह मुझे भी समझ नहीं आया था के तुम वो डमी साथ क्यों लाये लेकिन देखो उसका भेजा उड़ा दिया कमबख़्तो ने और मुझे मौका भी नहीं मिला उन्हें पकड़ने का.", राजेश की हालत देख नरिंदर हंस रहा था.

"साले तुम हो सही नौटंकी. कहा है वो आदमी?", अब इस सवाल पर राजेश मुस्कुरा दिया.

"डिक्की में है हरामी. बताओ गोली चलने आया था तोह चला के भाग जाये. लेकिन नहीं पहले दरवाजा खटखटाएंगे, फिर बात भी करनी है. कनपटी पे एक हाथ पड़ा तोह मूट निकल गया लुल्ली से उसकी. बाँध के दाल लिया डिक्की में साले को और उसकी फटफटी उधर फेंक दी झाड़ियों में. चलो अब निकलते है."

"गोली सचमुच चली थी क्या?", दलीप ने चिंता से कहा.

"पगला गए हो क्या दलीप भाई. ये कार मेरी दिलरुबा है और अगर वो गोली चलता तोह मैंने गांड काट देता उसकी. अब इस दुम्मी को भी फेंकना पड़ेगा.", कार की अगली सीट पर प्लास्टिक का आदमकद मूरत बिठाया हुआ था इन्होने, कमीज पहना कर.

"अबे फेंकना मैट, अपने दलीप भाई के काम आएगा. देख कैसे मॉटे चुके है इसके और लाने वाले भी राजेश तुम कमाल है. आदमी का स्टेचू मंगवाया लेकिन नहीं लोंड़िया हे पसंद है. दलीप भाई इसमें छेड़ कर लेना, भाभी तोह अब नाराज है लेकिन ये हमेशा साथ रहेगी बिना कुछ कहे.", नरिंदर ने वो मूरत पिछली सीट पर बीच में राखी तोह दलीप सचमुच उसके सीने पर हाथ फिरने लगा.

"यहाँ पे थोड़ा रबर लगवा दो भाई तोह मैं काम चला लूंगा..", दलीप की इस बात पर बाकी तीनो भी ठहाका लगा गए.

"हाहाहा.. मस्त आदमी हो यार आप. वैसे आईडिया बुरा भी नहीं है लेकिन इसको ऐसे हे रखो मैं जब अमेरिका जाऊंगा तोह आपके लिए चुदाई वाली गुड़िया लेता आऊंगा. उसके गुब्बारे दबा दबा कर पेलना साली को.", राजेश ने कार चालू करते हुए कहा और ये हँसते हुए बातों के साथ जानकारी भी साँझा करने लगे. अँधेरे में गाडी वापिस चल पड़ी.

"गौशाला हे चलते है यार.", नरिंदर की बात सुन्न कर दलीप ने ना में सर हिला दिया.

"वह इस वक़्त आराम नहीं कर सकते इन्दर और नींद लिए बिना मुझे चैन नहीं आता. होटल हे सही रहेगा."

"हाँ, होटल हे चलते है दलीप भाई. रौशनी भी होगी और सकूं से सारा काम भी कर लेंगे.", राजेश ने भी अपना दिमाग दिखा दिया जिसकी जरुरत नहीं थी.

"ओह काठ के उल्लू, जो मुर्गा डिक्की मैं है उसको भी होटल में रखेगा kya?",Ye उमेद न कहा तोह अब किसी ने कोई सवाल न किया. कार पूरी रफ़्तार से गौशाला की और बढ़ने लगी. आज एक बहोत बड़ी सेंध लगाई थी इन लोगो ने और उसके परनिअम क्या होने वाले है ये तोह दिन निकलने पर हे पता चलना था.

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गुरदीप की मोटी तरबूज सी गांड अर्जुन से बुरी तरह चिपकी थी और पीछे से उसका एक सुडोल सतांन दबाते हुए अर्जुन भी कही गहरे लेकिन धीमे धक्को से उसकी टाइट छूट को अपने लुंड का अभ्यस्त कर रहा था. पौने 4 बजे गुरदीप चुपके से इधर चली आयी थी और पिछले आधे घंटे में खामोसी से चलती ये चुदाई अब अपने चरम पर आने वाली थी. 3 बार अपना कॉमर्स निकलने के बावजूद गुरदीप उसका भरपूर साथ दे रही थी. लुंड से pach-pach की ये हलकी आवाज दोनों का हे मजा बखान करती रही.

"उम्म्म.. बस करो आह्हः.. दिन में किया था तब बाथरूम जाने में भी तकलीफ हो रही थी.. उफ्फ्फ.. अब तोह लगता है वो भी मुश्किल होने वाला है.", अर्जुन उसके मादक आवाजों से और तेज धक्के लगाने लगा.

"ध्यान रखना था न.. ह्ह्ह्हूऊऊह्ह.. अब होने हे वाला है.. bas..aahh.. सचमुच तुम्हारा जोश उम्मीद से ज्यादा है.."

"िष्ठ... हो गयी main..aahh.. मर्डर जाउंगी अगर इतनी बार ये रोयेगी तोह.. आह्हः... "

"हहहहहह... लो..", अर्जुन ने लुंड छूट से निकल कर गांड के छेड़ पर दबा दिए. वो कोरा छेड़ naam-maatra हे खुला था लेकिन पूरा लावा उसमे भरने के बाद हे अर्जुन अलग हुआ.

"चहहीइ.. कर दी न मनमानी.. आठ.. वह नहीं लुंगी तुम्हारा.. आह्हः माँ..", धीमी आवाज करती वो बाथरूम चली गयी और अर्जुन उसके पीछे.

"अब और नहीं करना.", निर्वस्त्र गुरदीप के चेहरे पर असीम ख़ुशी थी और उसकी ना भी जैसी साफ़ झूठ. खरबूजे से गोल और मोटी चूचिया लाल पड़ चुकी थी वही गुदाद्वार से निकल कर मोती सुडोल जांघो पर बेहटा अर्जुन का वीर्य उसको और कामुक दिखा रहा था.

"मैं नहाने आया हु डार्लिंग क्योंकि सवा 4 बज चुके है. साफ़ करो खुद को और जल्दी से वही चली जाओ जहा से आयी थी.", गुरदीप ने समय को गंभीरता से लिया और अपने शरीर पर पानी उड़ेलती साफ़ करने लगी. बाल भीगने नहीं दिए और पूरे 5 मिनट में हे वो टोलिया लपेटे कमरे में चली गयी. अर्जुन नित्यक्रिया से फारिग होने के बाद नाहा कर बहार आया तोह बिस्टेर अब साफ़ था. टोलिया उठा कर शरीर सूखते हुए वो कुछ सोच हे रहा था की अलार्म की बहोत हलकी आवाज सुनाई पड़ी. दिवार घडी भी 5 बजा रही थी लेकिन इतनी जल्दी कौन उठने लगा था? अर्जुन की सोच अलार्म की आवाज बंद होने के साथ हे ख़तम हो गयी.

कपडे पहन कर वो ाचे से तैयार हुआ और सीधा रसोई में चला आया. किसी को जगाने का कोई इरादा न था इसलिए खुद हे दूध गरम करते हुए हॉल की लाइट भी जला दी. Alka-Gurdeep जिस कमरे में थी उसका दरवाजा खुला था और दोनों हे गहरी नींद में थी.

'मतलब आरती ने अलार्म लगाया था? उन्हें क्या जरुरत है इतनी जल्दी उठने की?', अर्जुन अपने हे खयालो में था और दूध उबाल गया.

'हो गया ज्यादा गरम.', इधर उधर देखने पर जब कुछ समझ नहीं आया तोह कपडे से हे पतीला पकड़ कर हिलाते हुए दूध ठंडा करने लगा.

"आप रहने दीजिये, मैं कर देती हु.", इस खनकती आवाज को सुन्न कर अर्जुन पलटा तोह salwar-kameej पहने और दुपट्टे से सीने के साथ सर को ढके अफसाना कड़ी थी. नहाने के बाद तजा गुलाब सी खिली अफसाना का ये रूप भी जानलेवा था. अर्जुन एकटक बस उसको हे देखता रहा.

"खुली आँखों से ख्वाब देखना गलत नहीं लेकिन हाथ में गरम पतीली के साथ देखना गलत है. लाइए, हम करते है और आप बैठक में जाए.", इस बार अफसाना ने एक तरफ से कपडे पर हाथ रखा तोह दोनों की उंगलिया एक दूसरे को छू गयी. अर्जुन ने आहिस्ता से पतीला अफसाना के हवाले किया लेकिन करीब हे खड़ा रहा. सामने की तरफ बानी छोटी सी अलमारी से अफसाना ने जग निकल कर दूध को फेंटना शुरू किया तोह अर्जुन को समझ आया की बर्तन कहा रखे होते.

"आपको कष्ट नहीं देना चाहता था और मुझे इन दरवेर्स का भी पता नहीं था की बर्तन यहाँ होंगे."

"आप इतनी सवेरे उठ जाते है इसका इल्म नहीं था. हम पहले हे कर देते अगर खबर होती. साथ में क्या लेंगे?", उन गोरी कलाइयों में खोया अर्जुन अब क्या जवाब देता. थोड़ी बहोत भी कलाई दिख रही थी तोह वो बस इसलिए की अफसाना को हाथो को हिलना पड़ रहा था. उसके सभी परिधान पूरी आस्तीन वाले हे देखे थे अर्जुन ने. इतने करीब से वो गीले बालो से आती सुगंध भी महुआ का असर करने लगी तोह अर्जुन ने खुद को संभाला. अफसाना ने शरमाते हुए दूध का गिलास अर्जुन को थमाया और बहार जाने लगी. अर्जुन को तोह ये पता हे न चला था कब दूध गिलास में दाल दिया अफसाना ने.

"रुकिए. मैं भी बहार हे जाने वाला हु तोह आपको ड्राप कर दूंगा."

"हम खाली हाथ जाएंगे क्या? मोटर चलने जा रहे है जिस से पानी की कमी न हो.", अर्जुन इस जवाब से खुद हे झेंप गया. अफसाना कल रात जब आयी थी तोह एक बैग लिए थी और अभी भी उसने साफ़ कपडे पहने थे और आरती के कपडे अफसाना के आने वाले नहीं थे. मुस्कुराता हुआ वो दूध की घूँट भरने लगा. 10 मिनट बाद हे अफसाना एक बार फिर उसके सामने थी, हाथ में बैग लिए.

"अर्जुन, तुम इतनी सुबह कहा जा रहे हो?", आरती भी उनींदी सी कमरे से बहार चली आयी तोह अर्जुन को तैयार देख पूछ लिया.

"वो मुझे जगतार भैया से काम है तोह उन्होंने साढ़े 5 बजे बोलै था आने के लिए. घंटे भर तक वापिस आ जाऊंगा. नाश्ते के लिए कुछ लाना है?", अर्जुन की नाश्ते वाली बात पर अफसाना ने घूर कर आरती को देखा जो अब मुस्कुरा रही थी.

"हाँ, छोले पूड़ी ले आना 3 प्लेट. गुरुघर के पास हे दूकान है जो 6 बजे हे सब बनाने लगते है."

"आपको मालूम हैं न आरती अम्मी ने ख़ास कहा था के आज नास्ता हमारे यहाँ है आपका? 8 बजे मतलब 8 बजे. और आप हमे हमारे घर तक छोड़ सकते है?", अफसाना के गुस्से को देख आरती और अर्जुन बस मुस्कुरा रहे थे.

"छोड़ेगा क्यों नहीं. तुम कहो तोह अर्जुन गॉड में ले जायेगा. हाहाहाहा..", अब अफसाना का गुस्सा काफूर हो चूका था और चेहरे पर शर्म छ गयी.

"चलिए मैं आपको घर के सामने उतार दूंगा. आरती दीदी वैसे हे मजाक कर रही थी.", अर्जुन ने बैग लेना चाहा तोह अफसाना ने ना में गर्दन हिलाते हुए उसको अपने साथ लगा लिया.

"आप चलिए हम आते है.", अर्जुन कार की चाबी लिए बहार चल दिया.

"आप जानती है न आरती ऐसा मजाक नहीं करना चाहिए? आपके भाई के सामने हे ये बेहूदा बात करनी थी?"

"रहने दे मेरी भोली गुड़िया, सब जानती हु मैं. तेरे गाल ऐसे हे गुलाबी नहीं हुए थे और अभी तू निकल, नास्ते पर तेरी ऐसी खिंचाई करुँगी याद रखेगी.", आरती के कथन में अलग हे जोश था और सकुचाती सी अफसाना उसका हाथ पकडे बहार चल दी.

"आप ये मसखरी अम्मी के सामने मैट करियेगा. वैसे पहली बार हम ऐसे जा रहे है, कुछ गलत तोह नहीं हैं न?"

"ओह मेरी माँ, ये मेरा भाई है और आंटी जी इसको जानती है बचपन से. इस मोहल्ले में तुझे शायद हे कोई जानता हो जो तू इतनी परवाह करती है."

"हमको सभी जानते है के हम अफसाना हुसैन hai.",Afsana के भोलेपन पर आरती को हंसी आ गयी.

"तेरे नाम को और तेरे बुर्के को जानते होंगे लेकिन ये जो पारी जैसी सुन्दर लड़की है न इसको यहाँ किसी ने नहीं देखा. जा वो तेरा इन्तजार कर रहा है. मेरे भाई से थोड़ा दूर रहना, कह देती हु.", आरती जल्दी से दरवाजा बंद करती हुई अंदर भाग आयी.

"आपको मार की जरुरत है थोड़ी.", हंसती हुई अफसाना के मोतियों से दांत और सुर्ख गुलाबी अधरों को देखता अर्जुन फिर से ध्यान भटकने लगा. दरवाजा बंद होने की आवाज पर उसको होश आया लेकिन अफसाना पिछली सीट पर जा बैठी थी.

"ड्राइवर वाली फीलिंग ले रही है आप तोह.", अर्जुन ने ये बात शीशे में देखते हुए कही और अफसाना ने दुपट्टे का एक सीरा चेहरे पर कर लिया.

"हम आपकी तौहीन नहीं कर रहे है लेकिन साथ बैठना सवाल बन्न सकता है. आपको बुरा लगा तोह हम उतर सकते है.."

"हाहाहा.. मतलब आप हैं क्या? ऐसी छोटी छोटी बातों से भला बुरा किसको लगता है. मैं अपनी दीदी और माँ को भी पिछली सीट पर बैठा कर हे गाडी चलता हु. और ाचा है की आप पिछली सीट पर है, नहीं तोह गाडी चलते हुए ध्यान भटकना खतरनाक हो सकता है."

"बस कीजिये अब. देख अभी भी आप इधर हे रहे है और ऐसा करना गलत है.", अर्जुन ने ये बात तुरंत मान ली और ख़ामोशी से सड़क पर ध्यान देने लगा. शांत माहौल और पार्क में सैर करते हुए गिने चुने लोग. लेकिन अब अफसाना को ये ख़ामोशी खटक रही थी. वो आईने में लगातार देख रही थी जैसे अर्जुन से अब नजर मिलेगी. घर के सामने कार रुकते हे वो होश में आयी. बिना कुछ कहे वो सीधा गेट खोलती हुई अंदर चली गयी. अर्जुन ने भी कार को जगतार भाई के घर के पास वाले पार्क की तरफ घुमा लिया. आज बहोत कुछ जानकारी लेनी थी उनसे गाँव और वह के लोगो के बारे में.
 
अपडेट 143

चुग्गा (1)


उस बड़े पार्क के बहार हे कार सही से लगते हुए अर्जुन अंदर चला आया. जगतार समय का पाबंद इंसान था और वो पहले हे इन्तजार करता मिला. ट्रैक पजामा और टीशर्ट के साथ महंगे स्पोर्ट्स वाले जूते पहने वो अभी हल्का पसीने में भीगा अर्जुन की तरफ बढ़ चला.

"तोह टाइम निकल हे लिया तुमने? ाचा किया भाई, मैं भी बस अभी रनिंग से फ्री हुआ हु.", दोनों ने हाथ मिलाये और जगतार वृक्ष की छाया में रखे लोहे के बेंच पर अर्जुन के साथ बैठ गया.

"आपको इतना परेशां करने के लिए सॉरी भैया. बस ये जानकारी मेरे लिए बहोत जरुरी है. आप 3 बजे भी बुलाते तोह मैं उस वक़्त भी आ जाता.", अर्जुन के गंभीर चेहरे को देख जगतार हलके से मुस्कुरा दिया. सामने टहलते हुए लोगो पर एक नजर डालते हुए अपनी बात शुरू की.

"जैसा तुमने फ़ोन पर बताया था मैंने वो सब तोह पता करवा लिया है भाई लेकिन उसके साथ हे एक्स्ट्रा भी पता लगा है. समझ ये नहीं आ रहा की ये सब तुम मुझसे बेहतर जूता सकते थे अगर अपने घर या वह गाँव में खुद बात करते."

"मुमकिन नहीं है भैया और मैं कभी पुश्तैनी गाँव नहीं गया हु. जाने की इजाजत भी नहीं मिलती और ये नाम मैं उनके सामने ले भी नहीं सकता. खुद हे सोचिये की इतिहास कैसे पुछु जब उन्होंने खुद हे कुछ न बताया हो?", अब अर्जुन की बात जगतार के समझ आ चुकी थी.

"सही कहते हो यार तुम. वैसे मैंने भी ये सब खुद नहीं किया जैसा तुमने सुझाया था. हर जानकारी अलग अलग सोर्स से जुताई और कुछ कागज़ जुटाने में थोड़ी ज्यादा हे दिक्कत आयी थी लेकिन टेबल के निचे से वो भी निकलवा हे लिए तहसील से. मेरी कार में राखी है वो फाइल और जो कागज में नहीं है वो मैं अब तुम्हे खुद बता देता हु.", अर्जुन ने एक नजर उस जेन कार को देखा जो पार्क के उस तरफ जगतार के घर के सामने हे कड़ी थी और फिर सर हिला कर सहमति जाता दी.

"स्वर्गीय मोतीलाल शर्मा जी यानी तुम्हारे padd-dada जी diwan-e-khaas भी थे राजा साहब के और मुंशी भी. उनके चरित्र पर कभी कोई दाग नहीं आया पूरे जीवनकाल में लेकिन एक घटना पता लगी है के उनके बड़े बेटे यानी की तुम्हारे दादा जी पहले फ़ौज में थे और वह जरूर कुछ हुआ था जिस वजह से राजा साहब ने हे उन्हें फ़ौज से वापिस बुलवा लिया था मुंशी जी के आग्रह पर. एक साल बाद वो पुलिस में शामिल हो गए.", अर्जुन ये फ़ौज वाली बात नहीं जानता था.

"आपका सोर्स सटीक है न भाई?"

"100 प्रतिशत अर्जुन. काम की बात तोह ये है की तुम्हारे दूसरे दादा जी बिलकुल अलग चरित्र के थे और जवानी के कुछ साल उन्होंने शाही ताक़त का पूरा रौब दिखाया था अपने दोस्तों के साथ मिल कर. ये बात उनके आराम में उतनी फैली नहीं थी क्योंकि इधर अपने पिता के अनुशासन का भये था. जिस व्यक्ति सारंग का तुमने जीकर किया था वो भी कुछ समय तक कृष्णेश्वर शर्मा का अजीज रहा है और सारंग की असलियत जानते हो?", जगतार के इस सवाल पर हैरत में बैठा अर्जुन ना में गर्दन हिला गया.

"राजा साहब की तीसरी बीवी का सबसे बड़ा बीटा था कुमार सारंग जो बाद में सारंग कुमार हो गया. राजस्थान के एक शाही घराने से थी उनकी माँ और बाद में राजपाट को ले कर कुछ khincha-taani होने पर सारंग अपने ननिहाल चला गया जहा की साड़ी वसीयत उसको मिल गयी थी. 18-19 साल पहले हे वो आखिरी बार इस raj-gharane में आया था, कुछ काम से और फिर कभी उसका जीकर यहाँ नहीं हुआ. बाकी डिटेल्स फाइल में हे हैं, आराम से पढ़ लेना."

"ये कृष्णेश्वर दादा जी के बारे में तोह मैंने ऐसा कुछ कभी नहीं सुना. बाउजी तोह बताते है वो बड़े हे साधारण से और मेहनती व्यक्ति है."

"भाई, शादी के बाद ाचे ाचे मेहनत करने लगते है. वैसे उसकी भी एक वजह पता लगी है की उनके बारे में उनकी माता जी को कुछ खटका हुआ था और उसके बाद वो कभी अपनी जमीन से बहार नहीं गए. अब अंदर की बात नहीं पता की क्या हुआ होगा क्या नहीं. वैसे तुम तोह यार जरा भी रजवाड़े वाले नहीं लगते, शरीर असाधारण है लेकिन Diwan-e-khaas के परिवार का लड़का और कोई tadak-bhadak नहीं?", जगतार बस टांग खींच रहा था अर्जुन की लेकिन अर्जुन ने सरलता से जवाब दिया.

"मेरे दादा जी ने साड़ी ज़िन्दगी पुलिस की नौकरी की है भैया और वो भी एक बेहतर पहचान बनाते हुए. मेरा पापा सरकारी डॉक्टर है और उनकी अपनी पहचान है. जब उन्होंने हे कभी जीकर नहीं किया या वो पहचान नहीं दिखाई तोह मैं तोह फिर भी उनकी तीसरी पीढ़ी हु. वैसे भी मुझे तोह हमेशा जरुरत से ज्यादा हे मिलता रहा है इसलिए संतुष्ट हु."

"यार तुम तोह सचमुच हे गंभीर इंसान हो. वैसे तुम्हारे छोटे दादा का बीटा बड़ा हरामी और अय्याश आदमी है, अगर तुम नहीं जानते तोह बता देता हु. विनोद शर्मा बताया था न तुमने?"

"हाँ वो 3 भाई बहनो में सबसे छोटे है लेकिन उन्हें भी मैंने एक हे बार देखा है तक़रीबन 10 साल पहले. उनकी क्या जानकारी मिली है?"

"होटल ब्लू और कंट्री फार्म का मालिक है ये विनोद शर्मा, तक़रीबन 36-37 साल का है. शादी के 5 साल बाद अभी कुछ महीने पहले हे बाप बना है. जुआरी भी है और रंडीबाजी भी करता है. बुरा मैट मान न भाई लेकिन वही बोल रहा हु जो सच है.", एक पल के लिए जगतार रुका तोह अर्जुन ने आगे बोलने का इशारा दिया.

"चिंता मैट कीजिये, मुझे बस सब जानकारी लेनी है. और बताये उनके साथ साथ दोनों बड़ी बहनो के बारे में."

"हाँ वो जमीन का व्यापार अपने बड़े जीजा के साथ करता है, ये अगले हे शहर में जहा से गाँव भी कुछ 20 किलोमीटर हे होगा. जीजा का नाम सही से नहीं पता कुछ पप शर्मा करके है और रौशनी शर्मा जो, विनोद शर्मा की बड़ी बहिन है वो पहले तोह सरकारी टीचर थी लेकिन अब कुछ नहीं करती. विनोद शर्मा की दूसरी बहिन का पति कंट्री फार्म में सांझेदार है. रमन शर्मा नाम है उसका और बीवी दामिनी एक हाउसवाइफ है. ये सब जानकारी तुम्हे आराम से अपने घर से हे मिल जाती किसी न किसी से. लेकिन इनका चरित्र शायद वह भी बताने वाला कोई न होगा. पप शर्मा घाघ व्यक्ति है और ये रमन थोड़ा दब्बू किस्म का. ", अर्जुन बड़े गौर से अपने हे परिवार के उन सदस्यों की जानकारी ले रहा था जो उनके यहाँ कभी आते जाते नहीं थे.

"सही कहते हो की इनके बारे में ख़ास बातें मुझे वह भी पता नहीं चलती.", अब दोनों हे उठ कर पार्क के किनारे किनारे बानी पटरी पर चलते हुए बातें करने लगे. पौने 7 बजते हे अर्जुन ने जाने की इजाजत ली और फाइल को कार के दासबोर्ड में संभल कर रखते हुए वो वह से वापिस निकल चला. आज उसको बहोत कुछ पता चला था और जगतार ने सचमुच बहोत बड़ा काम कर दिखाया था अर्जुन के लिए. ऐसी गुप्त जानकारियां निकलना सरल तोह कटाई नहीं था लेकिन जगतार ने एक ख़ास दोस्त और छोटा भाई मानते हुए अर्जुन के लिए वो सब किया. बदले में अर्जुन ने भी ऐसा हे कुछ ख़ास काम जगतार के लिए किया था जो जगतार की ज़िन्दगी संवारने वाला था. ऐसे हे दोनों के बीच एक मजबूत दोस्ती की नीव शुरू हो चुकी थी.

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"ये तमंचा ख़ास है और काफी पुराण भी. जितना मैं समझ रहा हु ये ऐसे हे किसी के पास नहीं हो सकता और ऊपर से ये इस पर की गयी ये नक्काशी बताती है की इसका सही मालिक तोह कोई रुतबे वाला व्यक्ति हे होगा. फिंगरप्रिंट तोह उतरवा लिए है और नाली की जांच रिपोर्ट थोड़ी देर तक यही आ जाएगी.", सांगवान जी के साथ सिर्फ इन्दर और उमेद हे थे इस बड़े कक्ष में सुबह के 7 बजे. यहाँ आये उन्हें 2 घंटे हो चुके थे और इस बीच कुछ ख़ास लोगो से बहोत सी बातें हो चुकी थी.

"ये खंजर भी वैसा सा हे है चाचा जी. इसके बारे में क्या विचार है आपके?", नरिंदर ने वो 8-9 इंच लम्बे फल वाला खंजर प्लास्टिक सुधा सांगवान जी की तरफ बढ़ाया तोह उन्होंने गर्दन हाँ में हिला दी.

"इस्पे जहर लगा हुआ था, जैसा lab-assistant ने बताया. फिंगर प्रिंट इसके भी आ जायेंगे लेकिन देखने वाली बात ये है की इतने ख़ास और बेशकीमती हथियार ऐसे क्यों सहेज कर रखे गए थे. रिवॉल्वर जर्मन है 1949 में बानी और ये खंजर बेजोड़ है, किसी हुनरमंद व्यक्ति की कलाकारी का ख़ास नमूना. वैसे ये धीभरी वाला सिक्का जो है ऐसा हे कुछ इस लड़के के गले में भी है.", सांगवान जी ने तस्वीर को लेंस के निचे करते हुए दोनों को दिखाया तोह उमेद अब गहरी सोच में पड़ गया.

"बस रिपोर्ट आ जाये चाचा जी, फिर हम पता लगाने की कोशिश करते है की ये मुद्दा क्या है.", उमेद और नरिंदर ने बहोत कुछ छिपा लिया था सांगवान जी से. वो यहाँ बस इन हथियारों और तस्वीर के साथ आये थे. धागे में बंधा सिक्का खुद नरिंदर ने जेब से निकल कर उन्हें दिखाया था.

"अगर कुछ जरुरी काम है तोह तुम लोग वो कर सकते हो. ये दोनों चीज साथ ले जाओ मैं रिपोर्ट जांच कर खुद तुम्हे जानकारी दे दूंगा."

"ठीक बात है चाचा जी. वैसे भी अब मुझे घर जाना होगा और उमेद को भी हाजरी लगाए आज तीसरा दिन होने वाला है. आराम से बात करते है इस मामले में और हो सके तोह शंकर या पापा तक बात न जाए.", नरिंदर के आग्रह को उन्होंने भी स्वीकार कर लिया. दोनों लोग सामान उस छोटे से थैले में दाल कर बहार निकल चले. अभी जैसे उनके मैं में बहोत कुछ चल रहा था. लिफ्ट से निचे आते हे उमेद बिना कार चालू किये आँखें बंद करके गहरी सांस लेने लगा.

"इन्दर ये मामला कही गलत दिशा में न चला जाए भाई.", चेहरे पर दाढ़ी कुछ ज्यादा हे बढ़ गयी थी उमेद के और नरिंदर के भी साफ़ चेहरे पर महीन बाल बता रहे थे की 3-4 दिन से उसका भी ध्यान कही और नहीं गया है.

"अब जो होगा देखा जायेगा यार लेकिन काम पूरा करके हे रुकना है इस बार तोह. वैसे जान कर अजीब नहीं लगा की चंदरभान और करम सिंह जुड़वाँ थे? शकल तोह मिलती नहीं थी सालो की और ये गॉड भी गया तोह अपने मां के. दमयंती अगर ज़िंदा है तोह उसको ढूंढ़ना जरुरी है गज्जू और अब पकड़ना होगा लाजो काकी को. छिनाल सगी बहिन है वो दमयंती की और ईश्वर काका के साथ दूसरा ब्याह था उसका.", नरिंदर के सवाल सुन्न कर उमेद ने आँखें खोली और एक घूँट पानी से गरारे करते हुए बहार फेंक दिया.

"चंदरभान उस तस्वीर में मुन्नी को हे पेल रहा था न? और लाजो काकी को भी. बहनचोद हो क्या रहा है ये. अब भोले के सामने ये तस्वीर गयी तोह वो बांगड़ू मुन्नी को तोह मारेगा हे खुद को भी कुछ कर बैठेगा. चन्दर साला सगी मौसी और बहिन को हे छोड़ रहा था और ये तस्वीर किसने निकले होंगे?"

"लगता है ये कुछ बड़ा हे झोल है गज्जू. मधुलता से पूछताछ करने पर जवाब होगा की चन्दर उसको ब्लैकमेल कर रहा था क्योंकि लाजो को देख कर तोह यही लगता है के वो ये सब मजे में कर रही है तोह पता मधुलता को भी होगा. फिर वो कमीनी यही बात शंकर को बताएगी और महादेव कहा फिर किसी की सुनेंगे. मधुलता को अगवा कर सकते है क्या?", नरिंदर ने जिस तरह से ये सवाल किया था उमेद सकपका गया.

"Bawli-tared हो गया क्या भाई तू? चंद्रो ताई की हवेली में अब कुछ नहीं करना और अगवा हे करना है तोह शादी के बाद देखते है. लेकिन उसके बाद तोह उसको जान से मारना पड़ेगा बे. न न ऐसा कुछ नहीं करना. यहाँ अर्जुन को शामिल कर क्योंकि वही हवेली में मुन्नी की खबर ले सकता है. अब जरा उस फोल्डर में मिले जमीन के कागज़ पर आजा. कुमार सारंग ने जमीन के बदले जमीन दी थी. मतलब की दमयंती का उसके साथ अलग सम्बन्ध था."

"रखैल भी कह सकते है और ये जमीन वाला मामला ध्यान भटकने वाला भी. उस कागज़ के हिसाब से दमयंती यहाँ जब आयी तोह ये बचे हो चुके थे और वो विधवा थी. लाजो काकी का पहला पति जो ईश्वर काका का बड़ा भाई था वो उधर पंजाब से इसको ब्याह कर लाया था. दूसरे साल में मौत हुई और छोटे भाई ईश्वर सिंह के साथ लाजो का दूसरा ब्याह कर दिया गया. कुछ मिसिंग है यार और अगर वो कड़ी मिल जाए तोह ये सुलझ सकती है.", नरिंदर का भी सर चकराने लगा था ये मायाजाल समझते समझते और बात ghoom-fir कर वही अटक रही थी.

"दूसरी तरह से सोच जरा. बिंदु और मुन्नी का ब्याह एक हे खानदान में हुआ वो भी एकसाथ. वह आखिरी बार दमयंती नजर आयी थी और सारंग भी मौजूद था, तू और शंकर नदारद थे. ये मुझे भी अज्जू ने हे बताया था जो फेरे भी देख कर आया था इसलिए याद है मुझे. अब अज्जू जहा मारा गया वह शीलू ने औरत देखि थी और शीलू को मारा चन्दर ने. अज्जू के शरीर पर वार करना इतना आसान काम नहीं था और 10-12 लाशें जब गिरा दी हो तोह बिलकुल भी किसी में हिम्मत नहीं होगी ऐसे इंसान के करीब जाने की.", यहाँ ये दोनों हे लोहान के वर्णन से अनजान थे. पर नरिंदर भी उमेद की तरह हे सोचने लगा.

"तू कहना क्या चाहता है गज्जू? तुझे लगता है के उसकी मौत में दमयंती का हाथ है?"

"वो खंजर से जब निशाँ उतारे गए थे तोह मेरा दिल के रहा था ऐसी नक्काशी वाली चीज किसी रुतबे वाली औरत के हे पास हो सकती है, आत्मरक्षा के लिए. अज्जू कभी औरत पर हाथ नहीं उठा सकता था और इस बात को हरेक इंसान जानता था की उसके लिए हर औरत ijjat-balidan का रूप है. ऐसा मेरा दिल कह रहा है भाई की हो सकता है उस खंजर से हे अज्जू को जख्मी किया गया हो.", उमेद का मैं बेचैन हो चला था इतनी बार अपने भाई को याद करते हुए. कुछ ऐसा हे हाल नरिंदर का भी था.

"चल यहाँ से चलते है गज्जू. हम दोनों को हे आराम की सख्त जरुरत है फ़िलहाल. दलीप उस लड़के से जानकारी लेने के बाद बता हे देगा और उस मेकअप बॉक्स को आराम से देखेंगे.", उमेद को भी ये बात ठीक लगी. कार अब पंडित जी के घर की तरफ चल पड़ी, नरिंदर को उतरने के लिए.

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अर्जुन पिछले आधे घंटे से फ़ोन पर हे लगा था और दोनों बहने रेशम सिंह जी के घर गयी हुई थी. घर आते हे ये फैंसला हुआ था की नाश्ते के बाद वो सभी घर वापिस निकलेंगे. Aarti-Alka के जाते हे अर्जुन ने फ़ोन घुमा दिया था. एक नंबर पर तक़रीबन 10 मिनट तक बात करने के बाद अब वो संजीव भैया से गुफ्तगू करने लगा. इस तरफ से जैसे अर्जुन हे बोल रहा था और दूसरी तरफ संजीव आराम से जानकारी लेता रहा. घडी में पौने 8 का वक़्त देखते हे अर्जुन ने कुछ बोल कर फ़ोन रखा और घर को दुरुस्त करने जुट गया.

बहार से मुख्या सप्लाई बंद करने के बाद सभी ताले लगाए और मुख्या द्वार पर बड़ा टाला भी लटका दिया. पड़ोस वाले घर की घंटी बजा कर वो इन्तजार हे कर रहा था और गुरदीप को साथ लिए दोनों बहने बहार चली आयी.

"हमको निकलना होगा 10 बजे से पहले.", अर्जुन के संक्षिप्त से स्वर पर आरती ने एक निघा घर पर डाली और गुरदीप से गले मिल कर कार की तरफ चली आयी. अलका भी हंस कर गुरदीप से मिली और सब को कार में बैठने के बाद जाते देखती रही. रिस्की पहली मंजिल की छत्त पर खड़ा बड़े ध्यान से सब देख रहा था जब तक अलका कार में न बैठ गयी.

"पूरा घंटा लगा दिया आप लोगो ने तोह गुरदीप के यहाँ.", अर्जुन ने ये बात ऐसे हे कही थी लेकिन आरती हंसने लगी.

"आंटी जी आने हे नहीं दे रही थी. वैसे बाकी कार्ड्स मैंने अंकल को दे दिए है जो वो आज हे पंहुचा देंगे.", आरती की बात सुन्न कर अर्जुन ने आगे कोई सवाल न किया. कुछ हे देर में उनकी कार अब हुसैन साहब के घर के बहार कड़ी थी. अर्जुन ने कार्ड और मिठाई का डिब्बा निकलने के बाद ाचे से गाडी को लॉक किया और दोनों बहनो के साथ उनके गेट के सामने आ खड़ा हुआ. घंटी की आवाज सुनते हे ये रौबदार शक्श सेहन का दरवाजा खोल कर इस तरफ चले आये. तक़रीबन 6 फ़ीट लम्बाई और फक्क सफ़ेद कुरता पजामा पहने हुए ये अधेड़ उम्र के व्यक्ति की रंगत भी गुलाबी थी.

"नमस्ते अंकल जी. शुक्र है आज तोह आप घर पे हे है.", उनके चेहरे पर भी बचो को देख ख़ुशी छायी थी. आरती के सर पर हाथ रख कर आशीर्वाद देने के बाद उन्होंने अलका को भी स्नेह से अंदर आमंत्रित किया. अर्जुन ने चरण स्पर्श करने चाहे तोह इन्होने उसकी ब्याह थाम ली.

"बीटा, इतना भी बुजुर्ग मैट करो और आपसे पाँव पड़वा कर दोजख में जाना है क्या. Masha-allaah, Shankar-Narinder भाई से भी 21 हो बीटा. अल्लाह तुम्हे लम्बी उम्र और शोहरत दे. आओ, इसको अपना हे घर समझो.", अर्जुन के साथ उनका अंदाज भरपूर सम्मान और प्यार वाला था. अर्जुन साढ़े कदमो से उनके साथ भीतर चला आया जहा बैठक में 2 और लोग बैठे थे, इनकी हे उम्र के तक़रीबन.

"बिलाल भाई, आप है अर्जुन शर्मा अपने शंकर भाई के बेटे और अर्जुन बीटा ये हमारे छोटे भाई है. जनाब मुश्ताक़ साहब हमारे साले है और साथ हे व्यापर देखते है.", उन्होंने अर्जुन का परिचय करवाहा तोह निमंत्रण पत्र और मिठाई हुसैन साहब को देते हुए अर्जुन ने दोनों को हे हाथ जोड़ कर नमस्कार किया. मुश्ताक़ अफसाना ज़ुबैदा के मां और बिलाल चाचा थे. बिलाल ने ख़ुशी जाहिर की वही मुश्ताक़ के चेहरे पर सिर्फ औपचारिकता दिखी. अर्जुन वही एक सोफे पर बैठ गया लेकिन थोड़ा बेचैन था इन सभी अनजान व्यक्तियों में.

"शंकर भाई से हम 3 साल पहले मिले थे और आज तुम्हे पहली बार देख रहे है बीटा. Kad-kaathi तोह पठान जैसी है बिलकुल. Kaam-dhanda करते हो या सिर्फ पहलवानी.", ये बिलाल ने पुछा था और अंदर से चेहरा ढके ये महिला ट्रे में शरबत लिए ख़ामोशी से आयी और टेबल पर ट्रे रख कर वैसे हे चली गयी.

"जी फ़िलहाल तोह पढाई करता हु और थोड़ा बहोत बॉक्सिंग के साथ कसरत भी. 18 की उम्र है तोह बिज़नेस जैसा मुमकिन नहीं कुछ.", अर्जुन के सरल जवाब से हुसैन साहब ने सर हिलाते हुए हाँ कहा जैसे उन्हें अर्जुन की जानकारी हो.

"भाई जान, ऐसा लड़का वह लखनऊ में होता तोह अपनी बिटिया का निकाह एक पल में करवा देता. जनाब तोह अभी पढ़ने लिखने वाले है और शंकर भाई डॉक्टर है तोह वैसा हे कुछ ये भी बनेंगे. ाचा लगा तुम्हे देख कर.", बिलाल ने अपनी बात ख़तम करते हुए शरबत का एक गिलास अर्जुन को थमाया और एक अपने बड़े भाई साहब को. मुश्ताक़ पहले हे गिलास उठा कर पी रहा था.

"Ham-Zulf (जीजा) साहब, तारिक के लिए आप बात चलाये जरा उन लड़की के परिवार से जो अभी भीतर गयी थी इनके आने से पहले? अपनी हे कौम की लगी हमको तोह और आफताब है.", ये मुश्ताक़ ने जो भी कहा था वो अलका के लिए कहा था और अर्जुन के कुछ कहने से पहले हे हुसैन साहब नाराज हो गए.

"मुश्ताक़, हमने ये बहोत बार कहा है के इंसान की कदर करना सीखो और पहले पहचान करना भी. बिटिया इनकी बड़ी बहिन है, गर यही बात नरिंदर भाई के सामने जुबान से निकली होती तोह जुबान जमीन पर हलाल मिलती. बिलाल इन्हे बाहिर ले चलो, हम अपना पर्स और सामान लिए आते है. बेगम के वलद साहब ने निकम्मा यहाँ भेज दिया और हसनत जैसे हीरे को अपने पास रख लिया.", हुसैन साहब के गुस्से में भी एक अलग हे अंदाज था. आवाज बुलंद किये बिना हे वो मुश्ताक़ को तगड़ी झाड़ लगा गए थे. अर्जुन उनके जाने के बाद मुश्ताक़ को गौर से देखने लगा तोह झेंपते हुए वो बोल हे उठा.

"माफ़ करना हमे मालूम नहीं था के वो आपकी बहिन है."

"माफ़ी नजरो में होती है अंकल, यहाँ सिर्फ मजबूरी दिख रही है.", अर्जुन भी सोफे से खड़ा हो कर जाने हे लगा था और पीछे से आते हुसैन साहब ने कंधे पर हाथ रख दिया.

"बीटा, नाराजगी जाने दो और आप अंदर सबके साथ बैठ कर नाश्ता फर्मो. हमारे साले की कही बात का हमको दुःख है लेकिन आप इस बात को तवज्जो मत दे.", अर्जुन पल में हे ठंडा हो गया था.

"नहीं अंकल मैं गुस्सा नहीं हु और आपने तोह मेरे सामने हे उन्हें दांत दिया जिस पर उन्हें भी बुरा लगा होगा. गलती हो जाती है अनजाने में."

"काम से जाना नहीं होता तोह जरूर साथ हे नाश्ता फरमाते. आपके घर हे मिलेंगे शादी की दावत पर. शंकर भाई और पंडित जी को हमारा सलाम देना.", जाते हुए हुसैन साहब ने एक बार अर्जुन को गले से लगाया और दुआ देते हुए बहार अपनी गाडी में बैठ कर निकल गए. उनके जाते हे बैठक में ज़ुबैदा आ कड़ी हुई.

"तुम तोह यार बड़े खतरनाक इंसान हो. हमारे हे घर में हमारे मामू को हे डपट दिया? मजा आया वैसे.", हंसती हुई ये गदराई आधुनिक भी कमाल हे थी. पूरे घर में जैसे एक यही थी जो बेफिक्र रहती थी. यहाँ भी वो अर्जुन का हाथ पकड़ते हुए खिलखिला रही थी. गोर भरे भरे गाल और बिना लाली के भी सुर्ख होंठो वाली मुस्कान से अर्जुन भी मुस्कुराने लगा.

"कैसी है आप?"

"तुम्हारे सामने हे हु और अब अंदर चलो, अम्मी राह देख रही है के कब चाँद निकले और कब नाश्ता नसीब हो.", ज़ुबैदा की ऐसी बिंदास बातें सुन्न कर अर्जुन भी शर्मा रहा था. और वो ऐसे हे हाथ पकडे इस अंदर वाले हॉल में चली आयी. ये महिला थोड़ी हैरानी से ज़ुबैदा को देख रही थी लेकिन आंटी जी ने बड़े प्यार से अर्जुन को स्वागत करते हुए अपने करीब हे दीवान पर बैठा लिया.

"शुक्र है तुम मिलने आये यहाँ. हमने तोह सोचा था कही पिछली बार इस ज़ुबैदा की वजह से नाराज न हो गए हो.", उनकी ऐसी बातों पर अर्जुन जहा खुश हुआ वही ज़ुबैदा मुँह बिचका कर नखरा दिखने लगी. आज ज़ुबैदा भी सलवार कमीज में हे थी लेकिन दुपट्टा नदारद होने से शरीर का हर उभार क़यामत नजर करा रहा था.

"मैं अब किस बात से नाराज होता है आंटी जी? दीदी बहोत ाची है और पिछली बार इनसे मिल कर बड़ा ाचा लगा था. इस बार आप हमारे घर आने वाली है वो भी हर फंक्शन अटेंड करना पड़ेगा.", अर्जुन को इन आंटी का दुलार भी ाचा लगा था. एक मर्यादित परिवार जहा पाबंदियों का ढकोसला तक न था. सोच भी सबसे मिल जल कर रहने वाली.

"हम तोह जरूर आएंगे बस ये ज़ुबैदा हे ऐसे shaadi-byaah के माहौल से दूर रहती है. अफ़सा के अब्बू तोह बहोत खुश थे जब खुद अफ़सा ने उन्हें बताया की वो 7 दिन पहले हे अपनी सहेलियों के साथ तुम्हारे यहाँ जाने वाली है. कृष्णा बहिन के साथ तुम्हारी अम्मी भी वह होंगी तोह हमे भी परेशानी नहीं. बचे आज दुनिया देखेंगे तभी तोह कल अपने फैंसले लेने लायक होंगे."

"अम्मी, मैं तोह जरूर जा रही हु, फिर आप चाहे घुटने का बहाना करके रुक जाना. और मेहमान को नाश्ता परोसना पड़ता है, बातों से इनकी भूख कहा मिटेगी?", ज़ुबैदा के तंज पर आंटी भी मुस्कुराने लगी. ज़ुबैदा अपनी अम्मी के खड़े होते हे अर्जुन के बगल आ बैठी.

"मिस्टर, तुम न बड़े हे चापलूस किस्म के इंसान हो जो हमारी अम्मी के ख़ास बने जा रहे हो. वैसे ये जो हमे ताड़ रही है न ये हमारी मामी है, रुखसार बेगम.", ज़ुबैदा ने तोह मुँह पर हे उस महिला की फिरकी ले ली थी. झेंपती हुई रुखसार बेगम भी अपनी ननद के पीछे रसोई में चल दी. जाते हे उनके मुँह से बेसाख्ता निकल गया.

"आपने देखा नहीं क्या कैसे अपनी ज़ूबी gair-mard का हाथ थामे be-hayaai कर रही है? आप अम्मी है उनकी, टोकना तोह बनता है के kam-as-kam सीने पर दुपट्टा हे लेले. लड़का गर पसंद है तोह रिश्ता चलाये या बिरादरी में बात तोह कहे, ऐसे हे khule-aam तोह गलत है न बाजी.", रुखसार की आवाज धीमी थी और ज़ुबैदा की अम्मी बस हांसे जा रही थी.

"तुम जानती भी हो वो हमारे बेटे जैसा है रुखसार और बचे ाचा बुरा समझते है. Behan-bhai के बीच बिरादरी कहा आते है? Chana-paneer गरम करो, हम सेवनिया देखते है. अफसाना के कमरे में पहले तीनो बच्चियों का नाश्ता लगवाओ, अर्जुन उनके बाद हे खायेगा जैसा अलका ने कहा.", रुखसार तोह बेचारी अब आगे बोल भी न सकीय. वही बहार ज़ुबैदा आज अलग अंदाज में हे थी, चित्रकार वाले रूप से बिलकुल अलग.

"तोह आज ब्रेक लिया है आपने पेंटिंग से?", अर्जुन बड़ी तहजीब से बैठा था बेशक ज़ुबैदा उसके साथ आराम से बातें कर रही थी.

"मूड न हो तोह हम बिस्टेर से नहीं उठते फिर पेंटिंग के लिए तोह माहौल, आराम और दिमाग शांत होना चाहिए. वैसे हे अब्बू के आने के बाद माहौल नहीं मिलता."

"अंकल तोह बड़े सही लगे मुझे, वो तोह सपोर्ट हे करते होंगे आपको.", अर्जुन की नजर कान में पहनी उन चमकती बालियों से होती हुई तराशी हुई बॉहों और आँखों पर जा रुकी तोह उसको उनमे अलग हे अक्स दिखने लगा. यहाँ भी जैसे ज़ुबैदा की अलग हे कहानी दिख रही थी. ज़ुबैदा के भी चेहरे पर मुस्कान आ गयी अर्जुन द्वारा ऐसे देखने पर. चेहरे के सामने हाथ करके वो बोलने लगी तोह अर्जुन ने चेहरा घुमाया.

"अब्बू से तोह हमेशा प्यार हे मिला है. ये जो हमारे मामू है, इन्हे khoj-been की ज्यादा बुरी आदत है. हर बार कुछ ऐसा हो जाता है जिस से मूड खराब. 2 साल से रिश्ते ला रहे है, जाने उन्हें हे हमारी मेहर मिलनी हो निकाह में. वैसे भी इतना चलता है, हफ्ते में 2 दिन ब्रेक मिल जाता है तोह अफसाना की खिंचाई करके मजा ले लेती हु.", इस जीकर पर अर्जुन तोह थोड़ा असहज हे हो गया.

"वैसे तुम चापलूस होने के साथ साथ बन्दे थोड़े टेढ़े भी हो. नजरे कुछ ज्यादा हे बेकाबू है जनाब की.", कहा तोह अर्जुन सोच कर आया था की आज वो ज़ुबैदा से जब बात करेगा तोह कोमल दीदी के समझने वाले हिसाब से खुद उन पर हावी होगा, यहाँ ये अलग हे अवतार था जो उसका बुरा हाल किये जा रहा था.

"वो.. ऐसा कुछ नहीं है. बस कपड़े कर रहा था के लास्ट टाइम आप कैसी दिख रही थी और आज बिलकुल अलग."

"मतलब अब हमे घूरने के साथ बेशर्मी से मिलान भी करोगे kal-parso वाला? हद्द है यार तुम्हारी तोह और इतना साफ़ बोल कर तोह थोड़े दीठ भी जान पड़ते हो.", अर्जुन अब जो भी बोल रहा था ज़ुबैदा उसकी ज्यादा मर्रम्मत करने लगी.

"सॉरी. ऐसा तोह बिलकुल नहीं सोचा था मैंने.", अर्जुन के चेहरे की गंभीरता और झिझक देख ज़ुबैदा पेट पर हाथ रखते हंसने लगी.

"यार तुम न अफ़सा से भी गए गुजरे हो. मतलब मैं मजे ले रही हु और सामने से तुम दिए जा रहे हो. बुद्धू कही के, तुम्हे दोस्तों की सख्त जरुरत है. हाहाहा.. उफ़.. हंस हंस के दुखने लगा.", अब जैसे हे ज़ुबैदा हंसती हुई थोड़ा आगे झुकी वो बुरी तरह कैसा सीना अर्जुन के नजरो के सामने आ गया. दोनों मॉटे उभर आपस में जुड़ने पर कही ज्यादा हे दिखने लगे कमीज गले से. हलक सूखने लगा था इस दृश्य पर और अर्जुन ने नजर हटाई तोह ज़ुबैदा को भी समझ आ गया था के यहाँ क्या हुआ है. चेहरे पर लाली और शर्म चा गयी थी. इस बार अर्जुन ने देखा तोह ज़ुबैदा दूसरी तरफ देखते हुए दीवान की चादर कुरेदने लगी.

"एकदम से इतना खामोश कैसे हो गए तुम दोनों? लो बीटा तुम शुरू करो, मैं ज़ूबी का भी लगाती हु.", आंटी जी बहार चली आयी और नाश्ते के रूप में ढेर सारा खाना अर्जुन के सामने परोस दिया. अर्जुन उनकी बात सुन्न कर ज़ुबैदा की तरफ देखते हुए बोल पड़ा.

"वो दीदी दिखा रही थी.. मेरा मतलब बता रही थी की दोस्त कितने जरुरी है और आपस में कुछ भी छिपाना नहीं चाहिए. फिर बात बीच में भूल गयी.", अब ज़ुबैदा होंठो को मुँह के अंदर करती अर्जुन को ऐसे देख रही थी जैसे कह रही हो, 'बच्चू तू देख तेरी क्या हालत करती हु.'

"इस से जरा ये पूछो बीटा के कितनी सहेलिया होंगी इसकी. एक भी नहीं और हमारी शहजादी नसीहत दोस्ती की सीखा रही है. अल्लाह कुछ अकाल बक्शे इस भटके इंसान को.", आंटी जी ने अलग हे टांग खींच दी थी जाते जाते. उनके निकलते हे ज़ुबैदा कुछ कहती अर्जुन हे बोलै पड़ा.

"चलिए साथ में हे खाते है अगर इसके पीछे कोई अलग कानून न हो तोह."

"तुम ना मौकापरस्त हो और हमारी हे अम्मी के सामने क्या बकवास फार्मा रहे थे? वैसे साथ खाने में कोई बुराई नहीं है लेकिन ये दोनों प्लेट तुम यहाँ हमारे बीच में रखो.", अब ज़ेबेंडा प्लेट उठाने के लिए झुकने से भी बच रही थी और अर्जुन इस बात हँसते हुए दोनों प्लेट बीच में रखता उन्हें देखने लगा.

"खामोश रहो."

"मैं बोलै हे कहा हु. आप ठीक तोह है न?", अर्जुन अभी भी हंस रहा था और फिर ज़ुबैदा भी थोड़ा सहज हो कर मुस्कुराने लगी.

"तुम सचमुच खतरनाक इंसान हो और ये फाइनल स्टेटमेंट है मेरी तुम्हारे लिए. वैसे अगर तुमने ये साथ खाना खाने वाली बात अफसाना को कही होती तोह मजा आता.", एक निवाला चना पनीर के साथ लगा कर खाते हुए ज़ुबैदा ने आराम से ये कहा तोह अर्जुन का ध्यान गया के वो तीनो हे यहाँ नहीं थी. इधर आंटी जी ने दोनों को हे एक साथ खाते देखा तोह बिना कुछ कहे वह बीच में रायते और सेंवइयों की कटोरी ज़ुबैदा के लिए राखी और गरम पूड़ी लिए अंदर वाले कमरे की तरफ चल दी.

"क्यों ऐसा क्या हो जाता?"

"रुको अभी दिखती हु. Afsana-Afsana जरा सुनो तोह एक बार.", ज़ुबैदा ने थोड़ी ऊँची आवाज में कहा तोह अफसाना उस कमरे से झाँक कर बहार देखने लगी. फिर सीने और सर पे दुपट्टा करती वो इधर चली आयी तोह नजरो से हे अर्जुन को सलाम किया और अपनी बड़ी बहिन की तरफ देखने लगी.

"जी बाजी, कहिये."

"अर्जुन बुला रहा था तुम्हे. हम तोह सिर्फ सेंवइयाँ खा रहे है इसलिए तुम इनके साथ नाश्ते में साथ दो."

"हम हमारी प्लेट लिए आते है इधर अगर आप कहती है तोह.", बड़ी मासूमियत से अफसाना ने ऐसा कहा था और वो अर्जुन को देखने से कटरा रही थी इस वक़्त.

"कोई जरुरत नहीं है. अर्जुन कोई गैर है जो अलग प्लेट लगाए, साथ हे खा लो यहाँ बैठ कर.", इतना सुनते हे अफसाना के आँखें बड़ी हो गयी. मुँह पर हाथ रखती वो थोड़ा हैरानी से ज़ुबैदा को देखने लगी.

"तौबा. केस बातें करती है बाजी आप? ये पहचान के है लेकिन रिश्ता नहीं है. माफ़ कीजिये.", अफसाना के ऐसा कहते हे अर्जुन खाना बीच में रोक कर हे हंसने लगा और ज़ुबैदा भी खिलखिलाने लगी. अफसाना स्तब्ध से अब अर्जुन को भी देख रही थी की यहाँ हो क्या रहा है.

"सॉरी.. सॉरी.. आपको बुरा लगा तोह सॉरी बस ज़ुबैदा दीदी मुझे आपकी रिएक्शन दिखने वाली थी.", अर्जुन चुप होने की कोशिश करता फिर हंसने लगा था और अब अफसाना के चेहरे पर भी शर्म आ चुकी थी. अलका ठीक कहती थी की ज़ुबैदा बाजी उसके मजे लेती है.

"सॉरी अफ़सा डार्लिंग. ऐसा है न हम दोनों हे साथ खा रहे है तोह इसने पूछ लिया की ऐसे खाने में प्रॉब्लम तोह नहीं. बस हमने उन्हें बुला लिया जिन्हे प्रॉब्लम होती है. उमाह.. जाओ कर लो अपना नाश्ता अपने बंद कमरे में.", अफसाना इतना सुन्न कर थोड़ा हिम्मत से बोलने लगी.

"हम आरती अलका को भी इधर बुला लेते है.", और अब ज़ुबैदा अर्जुन को देख कर हाँ में सर हिला रही थी.

"मैडम थोड़ा थोड़ा खुद चलने लगी है. ाची बात है नहीं तोह पहले इतनी बात कही होती तोह अभी आंसू नजर आ जाते. वैसे सवेरे तुम हे ड्राप करके गए थे न?", अर्जुन बात सुनते हुए देख रहा था की ज़ुबैदा उसकी हे चम्मच का प्रयोग करती हुई उसकी हे कटोरी से सेंवइया खा रही थी. जिस पर ज़ुबैदा का ध्यान गया तोह वो आँखें हिलती हुई देखने लगी.

"है.. हाँ वो मैं जल्दी निकल रहा था और इन्हे भी घर वापिस आना था तोह लेते हुए आया. वैसे आप मेरी हे चम्मच उसे कर रही है."

"स्टील की चम्मच है वो भी हमारे घर की. ऐसा कहो के हम दोनों एक हे चम्मच से खा रहे है. दोस्तों में इतना तोह चलता हे है. वैसे देखो जरा अब अफसाना के और मजे कैसे लेती हु.", इधर अफसाना के साथ आरती अलका भी प्लेट उठाये चली आयी और तीनो हे टेबल पर प्लेट रखती सोफे पर बैठ गयी.

"ाफसु, आज घर पे तुम्हे छोड़ने आरती आयी थी?", ये सवाल सुन्न कर आरती ने सीधा हे ना बोल दिया और अफसाना बगले झाँकने लगी.

"वो हम पिछली सीट पर बैठ कर आये थे बाजी. बराबर नहीं बैठे."

"ओह मेरी गुड़िया तुम सचमुच हे बहोत कच्ची हो.", ज़ुबैदा के साथ इस बार अलका भी हंसने लगी थी.

"कहा था न मैंने तुम्हे की ज़ुबैदा दीदी टांग खींचती है और तुम सीरियस लेती हो ये सब. मजाक कर रही है तोह तुम्हे भी साथ देना चाहिए.", अलका के ऐसा कहने पर अफसाना ने बड़े हे धीमे से कहा.

"हम मजाक नहीं कर सकते. बाजी बड़ी है वो कर सकती है."

"हे भगवन. यार अफसाना तुम तोह सचमुच हे माँ हो. हर वक़्त बेमतलब पिघलती रहती हो. ज़ुबैदा दीदी, इसको बनाओ थोड़ा अपने जैसा.", आरती ने भी अब अफसाना को टोकते हुए अपने बात कही. लेकिन अफसाना ने जब ज़ुबैदा और अर्जुन को एक हे चम्मच बरी बरी से प्रयोग करते देखा तोह वो बस उन्हें हे देखने लगी.

"21वि सदी है ये मोहतरमा और अर्जुन हमारा दोस्त. जानती हु क्या देख रही हो लेकिन तुम्हे तोह एक प्लेट में तभी खाना है जब रिश्ता हो. भाई समझ कर भी तोह खा सकती थी.", ज़ुबैदा अलग हे तीर चलती थी और यहाँ अर्जुन की जगह अब अफसाना निशाने पर आ गयी.

"हम इन्हे भाई कैसे बना ले बाजी? आरती के छोटे भाई है ये और हमारी दोस्ती है आरती के साथ.", अपनी बात पर हे अफसाना फंस चुकी थी और अलका खाना छोड़ कर हंसने लगी. अर्जुन को ठसका लगा तोह ज़ुबैदा ने हँसते हुए पानी का गिलास उसकी तरफ किया.

"अरे बचो, नाश्ता तोह आराम से करो. फिर हंस बोल लेना.", आंटी गरम पूड़ियाँ सबकी प्लेट में रखने लगी तोह अफसाना को खामोश देख ज़ुबैदा की तरफ देखने लगी.

"अम्मी.. आपकी ये लाड़ली अर्जुन को भाई भी नहीं कह रही और दोस्त भी नहीं मान रही. बताओ अब इसका क्या करे? कार में अर्जुन के साथ तोह आयी लेकिन पिछली सीट पर बैठ कर. हाहाहा.. ोूई.. माँ.. बस.. और नहीं खाना अब.", ज़ुबैदा ने ना कर दी और उसकी बात सुन्न कर आंटी जी ने भी हँसते हुए सर पे चपत लगा दी.

"मेरी गुड़िया नादान है तुम्हारे जैसी हंसोड़ नहीं जो कुछ भी बोलती रहती है. अफसाना बिटिया, तुम दिल पर मैट लिया करो किसी बात को. सब hansi-majaak हे कर रहे है तोह शामिल हुआ करो."

"अम्मी, हम नाराज नहीं है. वो बाजी की बात समझ नहीं आयी थी. वैसे हम अर्जुन से बड़े है न?", अफसाना के ऐसा कहने पर आंटी जी के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान आ गयी थी. बेटी के सर को सहलाते हुए उन्होंने कहा.

"Hum-umar हो सभी हमारे लिए तोह. ये ज़ुबैदा भी तुमसे छोटी हे है, देखती नहीं हर वक़्त कैसे मस्ती करती रहती. अर्जुन बीटा, सब्जी या सेंवइयाँ चाहिए हो तोह बोल देना. और जितनी यहाँ राखी है वो लाजमी ख़तम होनी चाहिए."

"आंटी जी, मेरे तोह ख़तम हो गयी और पेट भी भर गया. ये ज़ुबैदा दीदी की जो कह रही थी की उन्हें खाना पसंद नहीं आया. ज्यादा तेल और घी डाला है आपने.", अफसाना ये बात भी हैरत से सुन्न रही थी.

"आप बाजी पर इल्जाम लगा रहे है? इन्होने तोह ऐसा कुछ भी नहीं कहा हमारे सामने और अम्मी बाजी बर्बर इनके साथ हे खा रही थी.", अब ज़ुबैदा अर्जुन के हाथ पर ताली देती हुई हंसने लगी थी और आंटी जी ने सर पे हाथ रख लिया.

"तुम सचमुच बहोत भोली हो बेटी. अर्जुन ज़ुबैदा से मजाक कर रहा था और तुमने बात अपने ऊपर ले कर खुद को फिर से साबित कर दिए. देखो ज़ुबैदा को जरा.", आंटी हंसती हुई रसोईघर में चली गयी तोह इस बार अर्जुन हे बोल उठा.

"आपके यहाँ ऐसे गलत इल्जाम लगाने की सजा क्या होती है? पता होता तोह ऐसी गुस्ताखी नहीं करते.", अर्जुन के ऐसा कहते हे अलका ने हँसते हुए अफसाना को अपने साथ लगा लिया.

"पता चला के सबके साथ रहने पर कितना मजा आता है. देखो खाना भी हो गया और हजम भी. ज़ुबैदा दीदी, थोड़ा तैयार करके भेजना जरा अफसाना को, वह आप जैसे हे है सब जो मौका नहीं छोड़ते."

"2 दिन संभल लेना मेरी बहिन को तुम लोग. फिर मेरे आने के बाद मिल कर मैडम की क्लास लगाएंगे.", ये बात चल हे रही थी की अर्जुन हाथ धोने के लिए उठ खड़ा हुआ. अफसाना अभी भी अलका के साथ लगी हुई शर्मा रही थी.

"बेटे वाशबेसिन इस तरफ है.", आंटी ने साफ़ टोलिया देते हुए अर्जुन को जगह दिखाई और ज़ुबैदा भी थोड़ा आगे हे बर्तन धोने की जगह पर प्लेट रखने लगी. इस बार फिर वही मनोरम गुब्बारे दबते हुए बहार निकले और अर्जुन की नजर न्यास हे वह पड़ गई. तुरंत अर्जुन ने ध्यान चलते पानी पर लगा लिया. ज़ुबैदा भी हाथ धोने करीब आयी तोह चेहरे पर फिर से लाली थी.

"अब मेरी कोई गलती नहीं थी.", अर्जुन इतना कह कर एक तरह हैट कर तोलिये से हाथ पौंछने लगा.

"मेरी गलती थी मतलब? नजरे रोकना सीखो जनाब."

"रोकता तोह ज्यादा बुरा लगता आपको और ऐसा करना भी गलत है तोह हटा ली.", अर्जुन इतना बोल कर वापिस चल दिया.

"बड़े हे ऊँचे दर्जे के ढीठ हो, कसम से.", हंसती हुई ज़ुबैदा भी वापिस आ गयी थी और अब अर्जुन ने जाने की इजाजत मांगी तोह अफसाना और ज़ुबैदा उसके हे देखने लगी. आंटी जी ने थोड़ी देर रुकने का कहा लेकिन सफर की बात समझते हुए उन्होंने कोई ज़िद्द नहीं की. लेकिन अभी भी अफसाना चोरी चोरी अर्जुन को देख रही थी, चेहरे पर थोड़ी परेशानी थी जो अलका हे भांप सकीय पर वो भी कुछ बोली नहीं.

"ाचा आंटी जी समय से आप सभी लोग पहुंच जरूर जाना.", आरती ने गले मिलते हुए कहा और अलका को भी आंटी ने ऐसे हे स्नेह दिया. अर्जुन आशीर्वाद ले कर चलने लगा तोह ज़ुबैदा ने हाथ थाम लिया.

"जनाब हम फ़ोन करेंगे आने से पहले, खातिर दरी में कमी हुई तोह सजा मिलेगी."

"आपका जरा भी कष्ट नहीं होगा, इसका पूरा ख़याल रखेंगे.", अर्जुन ने ये कहते हुए एक बार अफसाना को भी देख लिए. ज़ुबैदा और आंटी जी अर्जुन के साथ हे बहार चल दिए और अफसाना Aarti-Alka के साथ उनके पीछे. अब कही वो सफ़ेद बिल्ली अर्जुन को नजर आयी थी बहार आँगन में आते हे. उछलती हुई वो ज़ुबैदा की गॉड में आ चढ़ी. दरवाजे से बहार आते हे अर्जुन ने Alka-Aarti के लिए कार के दरवाजे खोले और देखने लगा.

"जल्द मिलते है अफसाना. चलने से पहले फ़ोन कर देना या जब शहर में एंट्री करो तोह पीसीओ से बता देना. कोई न कोई लेने आ हे जायेगा.", हाथ मिलाने के बाद आरती और अलका कार में बैठी और उनके बाद अर्जुन भी स्टीयरिंग वाली सीट पर आ गया. इस बार उसने अफसाना को हाथ हिला कर bye किया था, आंटी और ज़ुबैदा के पलटने पर. अफसाना के चेहरे पर भी एक हंसी आ गयी थी.

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इमरजेंसी केस आने की वजह से शंकर जी की ड्यूटी भी समय से पहल शुरू हो गयी थी. भुप्पी के यहाँ से 5 बजे वापिस अपने घर आने के बाद नाश्ता करते हे वो 7 बजे सरकारी हॉस्पिटल के ऑपरेशन थिएटर में एक गंभीर हालत में लाये गए व्यक्ति की सिलाई में जुट गए थे. ये एक नौजवान युवक था जो बड़ी मशीन की चपेट में आने से मरणासन हालत में इधर लाया गया था. 3 बोतल खून चढाने के साथ साथ पूरे शरीर पर तक़रीबन सवा सो टाँके लगाए गए थे. 3 घंटे बाद शंकर जी बहार निकले तोह वो युवक अब खतरे से बहार था और फ़िलहाल कृत्रिम रूप से ऑक्सीजन लगायी गयी थी. (9 मई 1998, शनिवार)

"डॉक्टर साहब, आपने हमारे ज़िन्दगी का सहर बचा लिया. आप हमारे लिए साक्षात् भगवन हो डॉक्टर साहब. हम गरीब लोगो के पास तोह अपने बेटे को बचने के लिए फूटी कौड़ी न थी लेकिन आपने जान बचने के साथ ये पैसे का बोझ भी हम पर आने न दिया. मैं ज़िन्दगी भर गुलामी करने को तैयार हु आपकी.", ये करीब 50 साल का बेहाल सा व्यक्ति अपने बेटे की जान बचने पर शंकर जी के पाँव में हे लिपट गया. आँखों से आंसुओं की नदियाँ बह रही थी और व्यक्तित्व से हे मालूम चलता था इस गरीब की दयनीय हालत का.

"देखो भाई तुम्हारा बीटा इसलिए बच गया क्योंकि तुम समय से उसको यहाँ ले आये. मैंने सिर्फ अपना काम किया है और रही बात पैसे की तोह वो मैं कफ़न के साथ तोह ऊपर लेके जा नहीं सकता. तुम निश्चिन्त रहो और यहाँ उसकी देखभाल के लिए उचित लोग है. इस वक़्त तुम्हे अपनी धर्मपत्नी के साथ होना चाहिए. आगे इलाज के खर्चे की भी मैट सोचना.", शंकर जी ने उस व्यक्ति को दोनों बाजू से पकड़ कर ऊपर उठाते हुए समझाया. फिर वही पास में लगी 4 कुर्सियों में से एक पर बैठते हुए एक नर्स को अपने पास बुला लिया.

"सिस्टर, इनकी डिटेल्स भर लो और पेशेंट के care-taker में मेरा नाम मेंशन कर देना. और हाँ, इनके लिए कैंटीन से चाय नाश्ता जरूर मंगवा देना. अब आप हिम्मत रखिये और नाश्ते के बाद अपने घर चले जाना, बेटे की माँ को भी फ़िक्र होगी. चलता हु.", शंकर जी के इतना करने पर अब उस व्यक्ति के पास बदले में कहने को कुछ भी शेष न बचा था. अपने खून से साणे अंगोछे को दोनों हाथो में थामे वो हाथ जोड़ कर बस भीगी आँखों से उनका आभार जताता रहा. शंकर जी कन्धा थपथपाते हुए अपने केबिन में चले गए.

"अंकल जी, ये हमारे सीनियर डॉक्टर है शंकर जी और इनसे काबिल सर्जन तोह यहाँ कोई नहीं है. सबसे बड़ी बात है की सर खुद हे अब आप के लड़के की जिम्मेवारी लेंगे तोह घबराने की जरुरत नहीं. चाय पीजिये आप, मैं अभी किसी के हाथ नाश्ता भिजवाती हु. साथ वाले कमरे में बैठ कर पहले कुछ खा लीजिये.", नर्स ने चाय पकड़ने के साथ हे शंकर जी की पूरी जानकारी दे दी.

"डॉक्टरनी जी वो साहब तोह हमारे लिए भगवन का हे अवतार है. आपका भी बहोत धन्यवाद् लेकिन नाश्ते की जरुरत नहीं. इसकी माँ को लेने जा हे रहा हु तोह घर पे हे कर लूंगा. वैसे भी कोई इत्छा नहीं है.", आदमी ने हाथ जोड़ कर मन किया तोह नर्स ने आगे दबाव नहीं दिया. वही शंकर जी के केबिन में सांगवान पहले हे इन्तजार करता मिला.

"यार शंकर तेरी तोह छुट्टी थी आज की. और ये सुन्न ने में आया के जिसका अभी तू इलाज कर रहा था उसका सारा खर्चा तू खुद उठा रहा है?", यहाँ भी चाय की चुस्किया चल रही थी.

"चाचा के 10 हॉस्पिटल से महीने का 30 लाख मिलता है मुझे. एक लाख किसी गरीब की जान बचने में काम आ जाये तोह क्या नुक्सान है भाई? वैसे वो भी तोह दसवा हिस्सा लोगो के मुफ्त इलाज में हे लगते है. ये तोह दसवा हिस्सा भी नहीं. वैसे तू यहाँ क्यों गांड मरवाने आ गया छूती के दिन? मेरी तोह चल हाजरी क्मो ने लगवा राखी है अगले शनिवार और ऐतवार की भी.", शंकर के ऐसा कहने पर परम ने अजीब सा चेहरा बनाते हुए कहा.

"घर में सांस न ली जाती जबसे रूचि आयी है. मैं तोह रात भी बहार सीढ़ी लगा के सीधा ऊपर गया था लुगाई के कमरे में. सवेरे बापू 4 बजे किसी के फ़ोन से बहार निकलन लगे तोह जाते हुए मेरी सुपारी भी देते गए. सारे धक्के खाने के बाद तेरे घर गया तोह पता लगा साहब यहाँ है. वैसे थोड़े बहोत काम तोह तू ाचे करता है शंकर, शकल देख की नई लगता लेकिन आदमी एक नंबर है.", परम मजे ले रहा था और शंकर हंस रहा था उसके साथ.

"वो सब छोड़ और ये बता के इन्दर और उमेद अभी भी तेरे फार्महाउस पर हे है क्या? मेरी तोह बात हे नहीं उनसे. कल कुछ ज्यादा हे ओवर हो गया था मैं और 8-9 घंटे सोया हे रहा भुप्पी के घर. माँ गुस्सा कर रही थी सवेरे जब इन्दर को मेरे साथ नहीं देखा तोह.", शंकर की अपने छोटे भाई के लिए परवाह हमेशा से हे थी और आज तोह झाड़ भी ाची खासी मिली थी अपनी माँ से क्योंकि नरिंदर 2 दिन में घर रहा हे कितना था.

"वो तोह घर पे हे था अभी जब मैं तुझसे मिलने गया था उधर. बहार आँगन में हे ताई जी (कौशल्या जी) उसके सर की मालिश कर रही थी और ताऊ जी के साथ वो शास्त्री जी भी इन्दर से बातें कर रहे थे हंस हंस के. मुझे तोह कही से न ताई जी गुस्से में दिखी. वैसे तू थोड़ा घर रहा कर अभी जितने शादी का काम है. अभी मार्किट चलेगा?", परम ने सारा वृत्तांत कह सुनाया और मार्किट जाने का पुछा तोह जैसे शंकर को कुछ और भी याद आ गया.

"यार आज मुझे ऋचा को लेने जाना है और ये 11 बजे जरुरी ऑपरेशन भी है. और रात को घर नहीं रहा तोह माँ इस बार माफ़ नहीं करने वाली.", शंकर ने अपनी स्थिति बताई तोह सांगवान भी कुछ सोचने लगा. कुछ पल बाद उसने हे राये दी.

"ऑपरेशन दोनों मिल कर करते है और उसके बाद मैं ऋचा को ले आता हु अगर तुझे ठीक लगे तोह. नहीं तोह तू आना जाना कर सकता है, ज्यादा टाइम मैट रुकना."

"लता ऐसे तोह वापिस आने नहीं देगी और 2 बजे निकलूंगा तोह 7-8 बजे से पहले वापिस आने से रहा. तू लेने गया तोह ऋचा तोह आ हे जाएगी पर उसकी माँ ने मेरा जीना हराम कर देना है. और आज तोह मैंने अभी तक उसको फ़ोन भी नहीं किया."

"तू हर रोज फ़ोन करता है लता को अभी तक?", अब थोड़ा सांगवान के चेहरे पर आश्चर्य के भाव थे.

"सवेरे 9 बजे से पहले और शाम को जब ड्यूटी से वापिस जाने लगता हु तोह करता हे हु. अब इतना भी नहीं करूँगा तोह उसको बुरा लगेगा. पहली हे बेचारी की ज़िन्दगी में कुछ बचा नहीं है और अब मैं भी दूर रहने लागु तोह दिल टूट नहीं जायेगा? बहोत परवाह और प्यार करती है भाई वो बस हालात की मारी है और मैं चाह कर भी उसको वो खुशियां नहीं दे प् रहा जो उसका हक़ है.", शंकर की इतनी प्यार भरी दार्शनिक बातें सुनते हे सांगवान के चेहरे पर घोर नाराजगी छ गयी.

"चुटिया है बे तू तोह वो भी चमन चुटिया. कौनसा हक़ बे और इंसान अपनी हालत का जिम्मेवार खुद होता है न की ये समाज. भोस्डिके नजर न आता के तेरी अब 3 बेटियां और के बीटा है रेखा भाभी से? उनको तूने लुंड हक़ दिया जो तेरे नाम का सिंदूर लगाने के बावजूद तेरी अनदेखी का शिकार है 23 सालो से. देख शंकर, तू और मैं कॉलेज के पहले दिन से साथ है और एक दूसरे के हरेक raaj-samasyaye सांझी है. तू मुझे ांनी की एहमियत समझा सकता है लेकिन अपनी बीवी के अस्तित्व को खुद नहीं मानता.", अंत में सांगवान ने हे अपनी आवाज नीचे करते हुए शंकर को वही समझाया जो उसने सांगवान को कहा था.

"रेखा के पास पूरा परिवार है भाई और मैंने हर जरुरत पूरी की है उसकी लेकिन लता मेरा प्यार है जिसकी बदतर हालत का जिम्मेवार आधा मैं भी हु. शादी मुझसे नहीं हुई लेकिन जिसके साथ हुई उसको मैंने हे ख़तम कर दिया. अंतर्मन पे हमेशा से यही बोझ है के सबकी नजर में तोह मैंने हे अपनी चाहत के लिए उसको विधवा बना दिया. अब तू मुझे चुटिया समझता है या गांडू लेकिन सच यही है के मैं हे कसूरवार हु लता की ज़िन्दगी को नरक बनाने के लिए. बस इसलिए जो थोड़ी बहोत खुशियां मैं उसको दे सकता हु वो उन पर उसका पूरा हक़ है. रेखा बड़े घर से है और यहाँ परिवार में भी एक तरह से माँ ने उसको हे सबकुछ सौंप रखा है. देखा जाए तोह रेखा सबसे ज्यादा सुखी है जो हर तरफ उसका ख्याल रखने वाले लोग है."

"सही कहता है भाई तू की वो सुखी महिला है. इतनी सुखी है की वो सवाल हे नहीं करती कभी. मैं कोई दूध का धुला इंसान नहीं हु शंकर लेकिन एक बार जरा ये सोच की अगर औरत को pati-sukh न मिले तोह उसकी हालत क्या होगी? अगर औरत संस्कारो में बंधी रहे तोह वो समय से पहले हे मर्डर जाती है अवसाद, मानसिक कष्ट और जाने कितनी हे जटिल बिमारियों से. अवसाद ग्रस्त दुखी मैं एक धीमा ज़हर है दोस्त और जितने लोग भाभी के aas-pas है वो उन्हें तेरे वाली ख़ुशी नहीं दे सकते. वैसे मुझे तोह लगता है अब देर हो चुकी है क्योंकि इतनी लम्बी अनदेखी के बाद भाभी तुझसे प्यार नहीं कर पाएंगी. वैसे भी आप जैसे हरिश्चंद्र ने तोह पहली रात हे उन्हें बता दिया था के वो घर की बहु है और तेरा प्यार कोई और. चल ऑपरेशन की तैयारी करते है और तुझे जैसा ठीक लगे कर. रेखा भाभी का कुछ हो नहीं सकता क्योंकि तू तोह उजड़े संसार में हरियाली लगाने में व्यस्त है इतने सालो से.", आज सांगवान का मैं बुरी तरह व्यथित हो गया था. उसकी बुआ जी की मौत अवसाद से हुई थी और कारण था फूफा की अयाशी और पत्नी की अनदेखी. शंकर मालूम नहीं था की आज हे सांगवान की बुआ की बरसी है और वो घर पे इसलिए हे नहीं रुक सका था. कुछ देर बाद दोनों हे दोस्त बिना ज्यादा khinch-taan के अपने काम पर लग चुके थे.

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अर्जुन दोपहर को 1 बजे से कुछ पहले हे वापिस घर पहुंच चूका था. सारा सामान संजीव भैया और अपनी बहनो की मदद से कार से निकल कर अंदर पहुंचने के बाद अपनी चची की बगल में हे लेट कर आराम करने लगा तोह नरिंदर चाचा भी इधर चले आये. कमरे में अब प्रियंका कोमल सामान सही कर रही थी और संजीव भैया भी कुर्सी पर बैठे थे.

"तोह अपनी चची माँ का खजाना ले हे आये और वो भी जैसे हरेक चीज. सफर कैसा रहा?", नरिंदर जी देख रहे थे की उनकी बीवी बड़े प्यार से अर्जुन का सर सेहला रही थी और वो भी पूर्ण आराम की स्थिति में था.

"नहीं चाचा जी, कोई दिक्कत नहीं आयी और गाँव वाले रस्ते से जयना तोह सफर का पता भी नहीं चला. वैसे मेरा दिल था आपकी मोटरसाइकिल भी लेके आने का, शादी के बाद जरूर ले आऊंगा.", अर्जुन की बात सुन्न कर नरिंदर जी भी मुस्कुरा दिए. उन्हें भी अपनी यामाहा बड़ी पसंद थी.

"जब दिल करे ले आना यार. वो तुम्हारी हे है अब क्योंकि मुझे तोह ये बुलेट पसंद आ गयी है.", वो जैसे अर्जुन के मजे ले रहे थे ऐसा कहते हुए.

"मुझे तोह अब न मोटरसाइकिल चाइये न कार. साइकिल ठीक है अपने लिए और बाकी कही जाना हो तोह आप और भैया हैं हे.", अब संजीव भी अपने भाई की बात पर हंस रहा था जैसे उसको पता था की अर्जुन चाचा से फंसने वाला नहीं.

"यार मुझे भी कभी अपने साथ शहर घूमने ले चल तुम दोनों. न संजीव कही लेके जाता है और न तुम. और तुम दोनों आपस में हे लगे रहते हो. इतना बूढा भी नहीं हु, दोस्त तोह बना हे सकते हो.", नरिंदर चाचा की बात अर्जुन समझ रहा था और जैसे उसने भैया को आँखों से हे इशारा किया.

"लंच के बाद चलते है चाचा जी. आपको आज लाइब्रेरी लेके चलते है और उसके बाद मैं घर हे रहूँगा या ज्यादा से ज्यादा स्टेडियम.", अर्जुन जैसे आज अपने चाचा से बहोत कुछ साँझा करना चाहता था. और अपनी माँ की आवाज से तुरंत उठ खड़ा हुआ जो उसको ढूंढ़ती हुई अंदर हे चली आयी.

"बीटा कपडे बदल लो और खाना बन चूका है आप सब भी डाइनिंग टेबल पर आ जाओ. आज देवर जी की पसंद का हे बना सबकुछ.", अर्जुन ने अपनी माँ के हाथ से कपडे लेते हुए उनका गाल चूमा और बाथरूम चला गया. वही संजीव भी अपनी जगह से उठ कर बहार चला आया हाथ मुँह धोने.

"भाभी, खुशबु आ गयी थी भरवा भिंडी की. एक आप हे हो जो ये सब्जी बना देती हो मेरे लिए, वर्ण माँ ने तोह हाथ हे खड़े कर रखे है और हमारी बेगम साहिबा तोह भिंडी तभी बनेंगी जब मैं खुद काट के दू. साथ में और क्या बनाया है भाभी.?", नरिंदर के चेहरे पर एक बचे जैसे ख़ुशी की भाव थे और रेखा जी भी थोड़ा खुश थी इस वक़्त.

"रेखा ने आपके लिए प्याज वाले करेले, काली दाल, आलू वाला रायता और खीर भी बनाई है. 2 घंटे से लगी हुई है ये रसोई में अकेली और आपकी ये लाड़ली बेटियां तोह kapde-samaan देखते हे उनमे खो गयी. रेखा, सवेरे का जिम्मा अबसे कोमल के साथ मेरा रहेगा. कोई तीन पांच नहीं बस.", कृष्णा जी बिस्टेर से उठ कर अपने कपडे व्यवस्थित करती हुई थोड़ी नाराजगी से बोली जिस पर रेखा जी अपने देवर को देखने लगी.

"कुछ दिन जैसे भाभी कहती है वैसे रहो कृष्णा. काम करने से कोई मन नहीं कर रहा लेकिन अभी bheed-bhaad वाला समय रहेगा तोह तुम बगीचे में अर्जुन के साथ म्हणत करो या शाम को पार्क में टहलने चली जाया करो. गर्मी का समय है जिसमे तुम्हे थोड़ा बचाव रखना है और भाभी तुम्हारी छोटी बहिन होने के साथ साथ जेठानी भी है. हर वक़्त जिद्द नहीं करनी. चलो आज साथ में हे खाना खाते है.", अब कृष्णा जी नाराजगी से रेखा को देख रही थी जो मुस्कुरा रही थी लेकिन कृष्णा जी के भी चेहरे पर एकके मुस्कान आ हे गयी.

"ये devar-bhabhi की साजिश मैं समझती हु. रेखा तू मिल जरा अकेले में फिर देखती हु तुझे ाचे से. बड़ी आयी जेठानी और आप भी ये भाभी के पल्लू से बंधे रहते हो न, मेरा बीटा बताएगा आपको. हाँ कह देती हु.", जमीन पर कदम रखने से पहले हे नरिंदर जी ने वो नरम चप्पलो की जोड़ी अपनी बीवी के चरणों के निचे रख दी.

"भगवान तुम्हारे बेटे का तोह मुकाबला हमारे पिता जी भी नहीं कर सकते फिर हम किस खेत की कद्दू है. चलो अब खाना खाते है फिर गए लेना अपनी raam-katha भाभी के साथ.", हँसते मुस्कुराते हुए नरिंदर जी अपनी बीवी संग बहार चले आये जहा संजीव पहले हे बैठा था. चेहरे पर कुछ सोच थी जो अर्जुन के बराबर आते हे धूमिल हो गयी.

"क्या इरादा है छोटे?"

"भैया चाचा को जानकारी सौंप देते है."

"किसी हाल में नहीं भाई. तू बस वैसे हे इशारे देता रह और हम दोनों हे चलते है तेरे ठिकाने पर. तेरी फाइल के बदले मेरे पास भी पूरी फाइल है करम सिंह के घर मिले सामान की. वो कृष्णेश्वर दादा जी पर हे गोला बना था.", संजीव और अर्जुन की ये बातचीत अपने हे अंदाज में हो रही थी और नरिंदर जी रसोई में अपना खाना खुद दाल रहे थे जब सब उनकी पसंद का बना था.

"ठीक है तोह पहल चाचा जी को हे करने देते है. अगर इन्होने कुछ बताया तोह बस आप अपने हिसाब से देखना. वैसे छोटे दादा जी की जानकारी अपने थानेदार साहब को भी पूरी नहीं है.", अर्जुन अब खामोश हो गया था जब नरिंदर जी इधर चले आये और कृष्णा जी माधुरी के साथ बाकी सबके लिए खाना परोसने लगी. आज का दिन अर्जुन के लिए ज्यादा हे व्यस्त रहने वाला था. संजीव और अर्जुन की बातों से इतना तोह पता चल चूका था की ये दोनों हे बाकी सबको चुग्गा चुगवा रहे है और चावल के दाने दिखने से पहले खुद हे चख कर आगे दिए जा रहे है.
 
भाई लोगो थोड़ा स्कूप भी पढ़ो सितम्बर एडिशन में नाम आया है भाई का. firefox420 कोंग्रटुलतिओन्स मन ??
 
अपडेट 144

चुग्गा (2)


अभी दोपहर का भोजन चल हे रहा था और घर के आँगन में ये कार आ रुकी. संजीव भैया की नजर खीर खाते अर्जुन पर पड़ी जो मुस्कुरा रहा था और वही नरिंदर जी के भी हाथ रुक गए अपनी बीवी को निवाला खिलते हुए जो Sanjiv-Arjun को देखने लगे थे.

"उमेद चाचा जी की गाडी है.", अर्जुन ने जैसे हे जवाब दिया वैसे हे गलियारे से चलता हुआ वो साढ़े 6 फ़ीट का लम्बा रौबदार मुस्कुराता व्यक्ति इधर चला आया. साथ हे विनीता भी चुस्त जीन्स और सफ़ेद कमीज पहने उनके बराबर चलती आयी. उमेद जी के हाथ में अपनी लाड़ली का ये बैग भी था, हफ्ते भर के कपड़ो वाला.

"वाह भाई तुम चाचा भतीजा तोह बड़ा जोरदार कनेक्शन बनाये हो. अर्जुन ने तोह कार की आवाज से हे बता दिया के तुम हो.", नरिंदर जी ने अपने दूसरी तरफ की कुर्सी खींच कर उमेद को बैठने का इशारा दिया वही विनीता ने कृष्णा जी और चाचा के गले में दोनों तरफ हाथ डालते हुए चची का गाल चूमते हुए ाबविदं किया. वो भी उसके सर को अपने साथ लगाती हुई भतीजी को दुलारने लगी.

"चाचा जी ये ारु कोई इतना भी तेज नहीं जो ऐसी हलकी आवाज से गाडी का बता दे. वो तोह उमेद चाचा की आदत है की गेट से पहले हमेशा 2 हॉर्न बजाते है. वैसे हॉर्न की आवाज जरूर ारु ाचे से पहचानता है.", ये अलका थी बहार से हे आयी थी इनके पीछे. और अब अर्जुन भी हंस रहा था क्योंकि अलका की बात बिलकुल उचित थी.

"हाहाहा.. तोह मेरी गुड़िया इस मुना से भी ज्यादा तेज है? जीती रहो और सदा ऐसे हे खुश रहो. वैसे मुझे तोह शाम को आना था लेकिन सुना के रेखा भाभी ने आज भरवा भिंडी बनाई है तोह लालच में थोड़ा जल्दी आ गया.", उमेद जी ने एक तरफ अलका का हाथ थाम रखा था दूसरी तरफ वो नरिंदर जी को देख हंस रहे थे जो बिना रोटी हे भिंडी को खाने में लगे थे. माधुरी ने भी तुरंत अपने चाचा के सामने दाल, भिंडी और करेले की प्लेट लगा दी गरमा फूली हुई रोटी के साथ.

"आप खाओ चची के हाथ की भिंडी और मैं जरा Ritu-Alka के साथ ऊपर चली.", विनीता ने एक बार बस अर्जुन को देखा था और अलका को साथ लिए वो ऊपर बढ़ चली, बैग के साथ. अलका भी धीमी आवाज में कुछ बताती जा रही थी अपनी इस बड़ी बहिन को और विन्नी हंसती हुई ऊपर वाली मंजिल के इस पिछले भाग में चली आयी. निचे थोड़ी हे देर में खाने पर सभी लड़कियां हे बैठी थी अब. खाने के तुरंत बाद हे नरिंदर जी और उमेद जी जरुरी काम बता कर बहार चले गए थे और अब अर्जुन संजीव के पास वक़्त था अकेले में बातचीत का. कार में संधू जी के नाम का कार्ड रखते हुए अर्जुन ने वो फाइल भी साथ ले ली. स्टीयरिंग पर अब संजीव भैया थे और कार यूनिवर्सिटी के रस्ते बढ़ चली.

"तोह आपको लगता है की हम इस राज को सुलझा सकते है? यहाँ तोह इतनी उलझन है की धागे का एक सिरा पकड़ो तोह आगे चल कर 4 सिरे और निकल आते है. पता नहीं ये सब अलग अलग घटनाये क्यों एक साथ जुडी हुई लग रही है भैया.", अर्जुन ने हे इलो में छायी चुप्पी तोड़ी तोह संजीव के चेहरे पर छायी सोच भी उतर गयी.

"जानता है छोटे ये सब सिरे क्यों पकड़ नहीं आ रहे? एक तोह हम इस पीढ़ी में है जहा आते आते बहोत कुछ गायब हो चूका है या फिर पिछली पीढ़ी के लोगो ने खुद को बदल लिया है. और जितने लोग उतनी बातें सुन्न ने को मिल रही है लेकिन पूरा तोह किसी को भी नहीं पता. लोहान ने जो बताया वो अब तक सबसे ज्यादा खुलासे वाला था तोह मिश्रा की कथनी जो मुझे नरिंदर चाचा ने बताई वो थोड़ी अलग थी. झूठ दोनों हे नहीं बोल सकते थे क्योंकि सच बताना मज़बूरी था. तुझे जो पता चला उसमे भी कॉमन लोग वही थे पर उनकी कहानी भी अलग.", संजीव भैया की बात अपनी जगह सही थी और अर्जुन की खोजबीन भी.

"करम सिंह वाला सच क्या कहता है भैया?", अर्जुन ने बात को एक और दिशा देने के मसकद से कहा था लेकिन सम्बन्ध इसका भी कही न कही पूरे प्रकरण से था.

"करम सिंह ने भी जैसे समय के पार का खेल सोच रखा था छोटे. एक तरह से इतनी साड़ी जानकारी उसने अपने घर में सहेज कर राखी जिसका मतलब ये तोह नहीं हो सकता न की वो यादें हो बस? वो जानता था की अगर उसको कुछ भी होता है तोह उसके जिम्मेवार लोग वही होंगे जिनके साथ टकराव है. खोजबीन भी होगी और वो साब चीज उसके घर से हे मिलेंगी जो कई ज़िन्दगियों में भूचाल ला सकती है.", अब कही अर्जुन का भी ध्यान इस प्रकरण पर गया. संजीव भैया ने बिलकुल सही बात कही थी की यहाँ चुग्गा तोह करम से दाल गया है पहले से. अर्जुन को खामोश देख भैया मुस्कुरा दिए.

"छोटे, परेशां मैट हो. आज बस जितनी जानकारी दोनों के पास है वो बदल ले, उसके बाद इस मामले पर काम तब तक नहीं करेंगे जब तक खुद थानेदार जी अपने मुँह से न कहे. वो खंजर शाही परिवार से था और रिवॉल्वर जर्मन, जिक्स हैंडल आइवरी (हाथी दांत) कोटेड था. मतलब वो भी शाही सदस्य या उनके सामन किसी बड़े परिवार की. कागज़ तोह और भी धमाकेदार थे, चल कर देख लेना खुद हे. वैसे ये तेरा अड्डा और किसको पता है?", भैया बातों के बीच हे यूनिवर्सिटी वाले कमरे के बारे में पूछने लगे.

"स्टडी के लिए है ये रूम भैया और अगर कुछ संभल कर रखना हो तोह बिलकुल ठीक जगह. वैसे शाही परिवार के साथ तोह हमारे परिवार का भी नाता रहा है. कुछ नया नाम मिला क्या आपको उन कागजो में.?", इस saaf-suthri सड़क पर जब कार अंदर आयी तोह हमेशा की तरह सुरक्षाकर्मी ने मुस्कुरा कर अर्जुन की तरफ हाथ हिलाया और प्रतिउत्तर में अर्जुन ने भी वैसा हे किया. आगे अर्जुन हे भैया को बताते हुए इंटरनेशनल हॉस्टल की पार्किंग में एक तरफ कार लगवाते हुए इस बेहद शांत और ठन्डे गलियारे में चल दिया.

"नाम तोह सामने 3-4 आये है छोटे. और जैसा मेरा दिल कह रहा है ये सभी नाम हे पूरी कहानी बता सकते है. नीलिमा नाम का उल्लेख था एक चिट्ठी में और वो सारंग द्वारा दमयंती को लिखी गयी थी. 19 अगस्त 1973 को, भांजी लगती थी वो सारंग की. लोहान ने भी इसका जीकर किया था और साथ में शालिनी बुआ का भी. नीलिमा को ढूंढ़ना है तोह शालिनी बुआ से मदद लेनी होगी और उनसे बात करना काम बिगाड़ देगा. वैसे बड़ी आलिशान जगह है ये छोटे और तू यहाँ पहचान बना चूका है ाची खासी.", काउंटर पर बैठे आदमी ने भी जब अर्जुन को दूर से हे हाथ हिलाया तोह अर्जुन ने भी वैसा हे किया. चलते हे वो इस आखिरी कमरे के बहार आ पहुंचे. अर्जुन ने चाबी से टाला खोलते हे अंदर की लाइट जला दी. दरवाजा वापिस बंद करते हुए उसने भैया को फ्रिज से पानी की बोतल निकल कर देते हुए अपनी बात कही.

"ये जगह अब सिर्फ आप हे जानते है भैया और मेरी ाची दोस्त है यूनिवर्सिटी के प्रमुख लोगो से जो इधर काम करते है. वैसे शालिनी बुआ से मैं हे बात करूँगा, लग तोह मुझे भी रहा था की अज्जू चाचा के बारे में जानकारी वही दे सकती है.", एक चालू करते हुए अर्जुन ने वही दिवार पर लगे पोस्टर को सरकते हुए ये अदृश्य सी खिड़की खोल कर कुछ कागज निकले और सबकुछ पहले जैसा करता हुआ वो जूते खोल कर बिस्टेर पर आ बैठा.

"बड़ी ख़ुफ़िया जगह बनाये बैठा हु तू यहाँ.", भैया मुस्कुरा रहे थे वो सब देख कर.

"बहोत कुछ है यहाँ जो दीखता नहीं है भैया. आप जरा ये कागज देखो मैं कंप्यूटर स्टार्ट कर दू.", अब संजीव भैया के पास पंजाब वाली जानकारी और ये कागज थे जिन्हे वो बड़े गौर से देखने लगे. अर्जुन ने यहाँ हर परिवार का जीकर किया हुआ था और सबसे आखरी पैन पर खुदके परिवार का. वह रामेश्वर शर्मा के बाद एक खाली बॉक्स में prashan-chinh था और उसके बाद एक हे व्यक्ति के 2 नाम. कृष्ण चाँद शर्मा और कृष्णेश्वर शर्मा. इसके आगे अर्जुन को बस अपने चाचा विनोद का पता था बाकी दोनों बुआ के आगे नाम की जगह खाली थी. संजीव को वो नाम पता था और अब जैसे अर्जुन को भी पूरी जानकारी जगतार से मिलने के बाद वो पता चल गए थे. मॉनिटर पर विंडो 98 का निशाँ जाने के बाद अर्जुन इंटरनेट चालू करके वापिस बिस्टेर पर आ बैठा.

"ये छोटे दादा के ऐसे नाम लिखने का मतलब? तुझे क्या लगता है के ये अलग अलग नाम लिखने में भी कोई फसाद है? और दादा जी लोग 2 भाई हे थे फिर ये सवाल इस घेरे में क्यों? तुझे लगता है की और भी bhai-behan होंगे?", संजीव भैया के कौतहूल को देख अर्जुन ने सर हाँ में हिलाते हुए अब वो फाइल उठा ली जो भैया ने तैयार की थी कर्मा सिंह के घर से मिली जानकारी के साथ. कुछ chitthi-patra और तस्वीरें उन्होंने वह से गायब करके यही रख ली थी. अर्जुन पैन पलट कर सब ध्यान से देख रहा था. कोई 5 मिनट बाद वो बोलै.

"भैया वजह तोह नहीं पता लेकिन बाद ऐसी है के हमको अभी तक padd-dada जी के समय की साड़ी जानकारी नहीं है. दिल तोह कहता है के शायद उनके और भी बचे थे लेकिन अपने दादा जी को देख कर विचार बदल जाता है. उनके और bhai-behan हो तोह स्वाभाविक है की परिवार में पता होता. और एक मजे की बात सुनो, ये दमयंती सारंग की क्या लगती है आपको?", अर्जुन बात सुनाने के साथ हे सवाल कर गया जिस पर संजीव ने तुरंत उत्तर दिया.

"रखैल. क्यों की दमयंती के पति के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली लेकिन सारंग के साथ उसका नाता गहरा था और बहोत से कागज़ इशारा करते भी है."

"ाचा तोह फिर यहाँ चन्दर और करम के जुड़वाँ भाई होने की बात है लेकिन उनके बाद बिंदिया भी पैदा हुई. कही भी सारंग का जीकर नहीं, शाही राजकुमार भी कई विवाह कर हे सकता था. दमयंती नाम भी रसूख वाला है और वो हथियार तक शाही थे. मधुलता की माँ के दो विवाह हुए. परिवार भी कोई कमी वाला तोह नहीं था जितना मुझे लगता है लेकिन शायद वो भी राजसी सुख चाहती होंगी.", अर्जुन के ऐसे सवालों से संजीव बस उलझ हे रहा था. दिमाग भन्नाया तोह सीधा सवाल.

"छोटे जो कहना है वो स्पष्ट कर. मेरा दिमाग चक्र रहा है इस सब में."

"दमयंती सारंग की बहिन थी भैया जिसको 19 की उम्र में मृत बताया गया है. कोई पति नहीं तोह वो माँ कैसे बानी? और क्यों कही भी उसका इतना उल्लेख नहीं है पर सरनग ने उसकी पूरी हिफाजत की है ये साफ़ है. अब एक और बात कहु, दिल थाम लीजियेगा.", अर्जुन के इस खुलासे से तोह संजीव के चेहरे पर 12 हे बज गए. वो बस मुंडी हाँ में हिला गया.

"छोटे दादा जी ने कुछ ऐसा किया था जिस से उन्हें घर में हे बाँध दिया गया. शायद इसकी वजह और घटना अपन थानेदार जी को भी नहीं मालूम, वो पुलिस से पहले फ़ौज में थे. अब कहानी तोह यही इशारा करती है के सारंग के ख़ास दोस्त कृष्णेश्वर जी हे सब काण्ड की वजह है.", संजीव अभी भी हैरत में था और अर्जुन उठ कर कंप्यूटर की तरफ चल दिया. ईमेल देखने के लिए. संजीव की चेतना वापिस आयी तोह अगला सवाल.

"लाजवंती कहा फिट होती है फिर इस मामले में? वो दोनों बहने है तोह raaj-pariwar की 2 लड़कियां गायब हो जाए और कोई कुछ न करे? लाजवंती ने तोह ऐसा कुछ किया भी नहीं था जिस से इज्जत पर बात आये, फिर वो शाही परिवार से दूर ऐसी जमींदारी वाली ज़िन्दगी क्यों जीने लगी भला?", अर्जुन एक ईमेल को पढ़ते हुए मुस्कुरा रहा था. उसका चेहरा संजीव देख तोह नहीं पाया लेकिन वो बस बैठा हे था.

"क्योंकि लाजवंती उसकी बहिन है हे नहीं भैया. उन्हें उनका पहला पति वही से ब्याह कर लाया था, सच है या कोई और खेल लेकिन कही भी लाजवंती के परिवार का उल्लेख नहीं. हाँ दमयंती और लाजवंती का रिश्ता बहोत गहरा है और शबनम लगी हुई है जांच पड़ताल करने में. आपको लगता नहीं शबनम को देख कर की वो कितनी हसीं है और ऐटिटूड खून के ख़ास होने का इशारा करता है जैसा बिंदिया का होगा. मधुलता घाघ औरत है, शातिर भी जैसे उसका खून मिलवट भरा हो. ऋचा पापा की वजह से अलग है अपनी माँ और नानी से. इधर आओ और ये दोनों तस्वीर देखो जरा.", अर्जुन आज जितनी जानकारी दे रहा था वो पहले हे संजीव को झकझोर चुकी थी और वो अभी भी नहीं रुक रहा था. कंप्यूटर के मॉनिटर पर ये रंगीन तस्वीर थी लंदन के प्रमुख स्थान की और इसमें जो युवती थी या महिला कहो, वो कही ज्यादा हे हसीं और रुबाब से भरी.

"वाह. ये कौन है?"

"आप केस सुलझाने में लगे हो और बिंदिया काकी को भी नहीं पहचाने? ये एक और तस्वीर देखो और जरा ठाठ भी देखो इनके.", अर्जुन ने दूसरी तस्वीर दिखाई तोह ये चेहरे और सीने तक की बड़ी तस्वीर थी. बिंदिया की आंखें, चेहरे का कटाव और चमक बिलकुल शबनम और मुस्कान जैसी थी.

"बहनचोद 40 पार की भी हो कर ये कितनी गजब है छोटे. साली ये औरत ताराचंद जैसे की रखैल कैसे बानी?"

"शबनम ने भी किया था इस नाम के आदमी के साथ, सिर्फ 2 बार. और ये मधुलता काकी के शिकार है भैया. बिंदिया का पहला प्यार तोह अपने इन्दर चाचा जी थे जैसा मुझे शबनम ने बताया और शबनम बेटी भी इन्दर चाचा और बिंदिया की है. सारंग का दखल जब ख़तम हुआ तोह उसके कुछ समय बाद हे बिंदिया देश से बहार चली गयी और उस बीच वाले समय में हे ये सूत्रधार मुन्नी काकी ने बिंदिया को कब्जे में ले लिया. आप खुद हे सोचो की बिंदिया ने कभी वह से मुन्नी को फ़ोन नहीं किया उल्टा वही करम सिंह या चंदरभान से बिंदिया को संदेसा भिजवाती थी."

"यार छोटे ये तोह सचमुच खतरनाक औरत है. मतलब शंकर चाचा की कमजोरी ये मधुलता काकी चंद्रो दादी का भी कोई राज दबाये बैठी होगी."

"उनसे बात नहीं कर सकते भैया और फ़िलहाल तोह मैं आज के बाद इस विषय पर चर्चा भी नहीं करने वाला. ज्यादा खोजबीन साड़ी ख़ुशी हे न ख़तम कर दे. और ये मुन्नी काकी के पर सही समय आने पर हे काटेंगे, कही जल्दबाजी में आप और मैं मेरे पाप एक हाथे चढ़ गए तोह जाने क्या गति होगी अपनी.", अर्जुन इसके बाद कुछ देर याहू मैसेंजर पर हे शबनम और अन्नू के साथ बात करता रहा.

संजीव भैया ने एक खाली गिलास उठा कर सिग्गट सुलगा ली. खिड़की खोल कर वो पीछे ये जंगला का नजारा करते हुए फाइल भी पढ़ रहे थे. अर्जुन की बात से अब उन्हें भी इत्तफ़ाक़ था की बिंदिया जो भी है वो पर एक गिरी हुई औरत नहीं है. अब तोह एक तरह से शबनम भी उसकी बहिन हे थी. दोनों हे भाई कुछ देर ऐसे हे व्यस्त रहे और 4 बजने से पहले हे वापिस घर की तरफ बढ़ चले. जाते हुए अर्जुन ने उसको संधू जी के घर उतारने का कहा तोह भैया भी उसको वही उतार कर अपने रस्ते चल दिए.

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"माँ जी कह रही थी की तुम इस महीने के बाद बहार जा रहे हो? मुझे ये बात तुमसे पता चलनी चाहिए थी. लगता है प्यार बदलने लगा है तुम्हारा.", लता संसर्ग के बाद बाथरूम से खुद को साफ़ करके वापिस बिस्टेर पर बैठते हुए शंकर जी पर तंज करने लगी तोह वो बस ना में गर्दन हिलने लगे. दोपहर के इस खामोश समय में बस यही दोनों हवेली में जाग रहे थे. बाकी सभी अपने कमरों में हे आराम फार्मा रहे थे.

"तुम्हे मैं हर बात बताता हु लता और ताई को ये पापा ने बताया होगा. अभी तोह घर में भी किसी को नहीं पता की मैं जा रहा हु. सर्कार भेज रही है बेहतर टेक्नोलॉजी समझने के लिए और ऐसा मौका आसानी से नहीं मिलता. मैं भी आधुनिक इलाज में उपयोग होने वाली मशीन, तकनीक और तरीके jaan-na चाहता हु. 4 हफ्ते का प्रोग्राम है बस.", शंकर जी के पूरे खुलासे पर लता के चेहरे पर पहले थोड़े नाराजगी के भाव आये फिर अचानक हे वो खुश हो उठी.

"ऐसे में तोह परिवार का भी एक व्यक्ति साथ जा सकता है न? बीवी भी?", अब संसर्ग के बाद तिथिल से पड़े शंकर जी को कहा समझ आता की उनकी ये प्रेयसी क्या कहना चाहती है.

"रेखा को नहीं ले रहा. उसको परिवार में हे रहना पसंद है और वह वो करेगी भी क्या."

"छूट मारने के वक़्त लता और बीवी का नाम लो तोह रेखा. वाह गजब का दोगलापन है तुम्हारा. अरे कबि तोह तरस खाओ मुझ बेचारी पर जो यहाँ बरसो से क़ैद है.", इस गुस्से और तीखी बातों ने तोह शंकर जी की नींद हे उड़ा दी.

"ओह मेरा वो मतलब नहीं था मेरी चंदा बस थोड़ी थकान थी. तुम्हे लेके तोह मैं भी जाना चाहता हु पर वह बहोत से जानकार डॉक्टर होंगे, उनके बीवियां भी साथ होगी जो रेखा को जानती है. तुम्हे साथ लेके जाना मतलब पहले ताई से बात करनी पड़ेगी और ये बात जाएगी पापा तक. गलत हो जायेगा, बहोत ज्यादा गलत.", शंकर जी ने अपनी लाचारी दिखाई तोह लता मैं हे मैं कुलबुलाने लगी थी. चेहरे पर भी साफ़ नाराजगी थी.

"मुझे अलग से भेज दो फिर, इतने पैसे तोह तुम्हारे पास होंगे हे या उसके लिए भी पंडित जी को शामिल करना पड़ेगा? 4 हफ्ते मैं भी सुकून ले लुंगी और तुम यहाँ का मैट सोचना, इधर से मैं निकल सकती हु.", अब तोह शंकर जी के पास भी कोई चेहरा न बचा था.

"तुम्हारा पासपोर्ट दे दो, वीसा लगवा दूंगा. लेकिन एहतियात रखना थोड़ी, घर में ये भनक भी लगी की तुम विदेश जा रही हो वो भी मेरे साथ तोह कोहराम मच जायेगा. वैसे भी मेरे दिन saadhe-sati से बदतर चल रहे है. और यहाँ कुछ फसाद हुआ तोह समझो पापा ने अखबार में हे निकाल देना की इस शंकर शर्मा से परिवार का कोई सम्बन्ध नहीं.", अपनी हे बात कहते हुए शंकर के चेहरे पर हंसी आ गयी.

"आज भी तुम उनके लिए कॉलेज वाले लड़के हो न जो हर काम maa-baap से पूछ कर करता है. इस से ज्यादा बेदखल क्या करेंगे जब सबकुछ पहले हे एक पौटे के नाम कर दिया हो. 3 भाई हो तुम और उसके बाद घर में 2 लड़के लेकिन यहाँ तोह सबकुछ बस अर्जुन एकलौते के नाम करके उन्होंने एक तरह से तुम्हे भी बाँध हे रखा है.", लता की आदत कहा बदल सकती थी और प्रमाण दे दिया जायदाद और अर्जुन का जीकर करके.

"वो मेरा अकेले का बीटा नहीं है लता. और संजीव ने खुद अपना हिस्सा उसको दिया है इन्दर के साथ साथ. हाँ रेखा वाली जायदाद उसके नाम अकेले के हुई, ऋतू कोमल को भी शामिल करना चाहिए था. बाकी बनवारी मां तोह पहले हे अर्जुन को वारिस बना गए थे और पापा ने बाकी जमीन खरीद कर वो भी अर्जुन को हे दे दी. वैसे मुझे कुछ नहीं चाहिए, 30 लाख महीना आता है मुझे. रिटायरमेंट के बाद 2 हॉस्पिटल बहोत है ज़िन्दगी ऐश से गुजरने के लिए और बाकी कई काम हैं जिनसे आमदनी बढ़ने हे वाली है. तुम्हे हर सुख दे सकता हु, इतनी हैसियत है मेरी.", शंकर जी आदतन अपना भोलापन दिखा हे गए जहा न बेटे के लिए कोई गुस्सा था और ना जायदाद का लालच. जरुरत से ज्यादा तोह उनके पास खुद की कमाई से भी था. लेकिन लता एक तरफ जहा शंकर की आमदन पर हैरान थी वही रेखा वाली जायदाद भी अर्जुन के नाम सुन्न कर उसको अब अर्जुन पर कही ज्यादा गुस्सा था.

"इतना कमा लेते हो तोह फिर ले चलो मुझे और अपनी बेटी को यहाँ से. कही आज अर्जुन का मोह तोह नहीं कमजोर कर रहा तुम्हे?"

"पागलपन क्यों करती हो यार तुम? जितने ताई है इतने तुम यहाँ हो और उसके बाद मैं तुम्हे शहर में अलग घर ले दूंगा जहा हर सुविधा मिले मेरी चंदा को. लेकिन दूसरा सच ये भी है की मेरे लिए मेरा परिवार हमेशा पहले स्थान पर रहेगा. अर्जुन मेरा बीटा है और मेरे पापा दुनिया के सबसे सही इंसान. उन्होंने कुछ सोच कर हे मेरे बेटे को वारिस बनाया होगा. मेरा मोह मेरी माँ से है, इन्दर से है और फिर तुमसे."

"मतलब मैं तीसरे स्थान पर हु तुम्हारी ज़िन्दगी में?"

"पहले पे तोह हमेशा हे maa-papa और इन्दर हे है चंदा और इस बारे में प्लीज कुछ टिपण्णी मैट करना. अब थोड़ी देर मैं आराम कर लू अगर इजाजत हो तोह? अपना पासपोर्ट निकाल कर दे देना मुझे जाने से पहले. 4 बजे है तोह 6 बजे तक उठा देना और ऋचा को बोल देना अपने कपडे पैक कर ले.", शंकर जी ने करवट लेते हुए आँखें बंद कर ली. भोजन के बाद संसर्ग और ऊपर से दोपहर वाला आलस बहोत था नींद के लिए.

'यही तीन लोगो ने ज़िन्दगी नरक बना दी मेरी और तुम्हे मुझसे ज्यादा वही पसंद है. ऊपर से कम्बख्त ये अर्जुन जाने क्या चीज है. जबसे ये ज़िन्दगी में आया है डंका हे सुनी जा रही हु कमीने का और मेरी ज़िन्दगी शमशान बनती जा रही है. पता नहीं इस से निजात मिलेगी या कमीना ऐसे हे मुझे घुटन से मार देगा. एक बार निकलू तोह सही इस कैदखाने से फिर देखती हु सबको.', मैं में हजारो विचार चल रहे थे और अब मधुलता को आस थी की वो शंकर का इस्तेमाल करके हे रहत पा सकती है. पता नहीं ये कबूतर इस शिकारी का चुग्गा चुगता है कोई और व्यवधान पैदा हो जाये.

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जोगिन्दर सिंह संधू जी का घर भी खुशनुमा माहौल से भरा था. आज इस माहौल में अर्जुन भी शामिल था और खुद संधू साहब भी अवकाश पर थे. Card-mithai देने के बाद कुछ देर तक बातें चलती रही और अर्जुन की नजर इस jaane-pehchane छोटे से कुत्ते पर पड़ी जो एक कमरे से निकल कर इधर हे चला आया.

"ये सैम है?", अर्जुन द्वारा नाम लेते हे उस कमरे से बहार निकलती पारुल भी थोड़ा हैरान हो गयी लेकिन जल्द हे चेहरे पर लम्बी मुस्कराहट लिए वो उसकी बगल में आ बैठी.

"तोह तुम सैम से अन्नू के घर मिल चुके हो. हाँ ये पहले उसके पास भी रहता था कभी कभी और जरा तुम ये बताओ के कल आने वाले थे. क्यों नहीं आये?"

"भाभी, घर के काम से पंजाब जाना पड़ा तोह नहीं आ पाया. लेकिन आज सीधा इधर हे आया हु.", एक तरफ अर्जुन द्वारा भाभी कहने पर पारुल खुश थी वही उसका सीधा यहाँ आना सुन्न कर भी ाचा लगा. अभी तक हॉल में संधू जी, आंटी और पारुल हे थे अर्जुन के साथ. पहले बातों का मोर्चा अंकल आंटी के पास था और अब उन्होंने जरुरी काम का बताते हुए अर्जुन से इजाजत ली तोह बचे पारुल और अर्जुन. संधू जी अपनी धर्मपत्नी के साथ कार में बहार चले गए तोह अब पारुल थोड़ा सहज हो कर सोफे पर पसर गयी.

"मान लिया जनाब तुम हद्द से ज्यादा हे बिजी हो लेकिन हर वक़्त तोह नहीं होते होंगे. उस दिन भी तोह अपने दोस्त के साथ तफरी मार हे रहे थे. वैसे अगर पंजाब वाले शहर जाने का बता देते तोह मैं और चारुल भी साथ चल पड़ते. क्सक्सक्सक्स नगर में सिम्मी का भी घर है जिसको लारे लगाए हुए हो तुम.", ढीला लाल शरारा और लम्बी चुस्त कमीज में पारुल बिना मेकअप हे गज़ब धा रही थी. वो अलग बात थी की दोनों अपने रिश्ते को पूरी इज़्ज़त देते थे लेकिन हर लड़की ये भी चाहती है की उसका दोस्त प्रशंशा जरूर करे. सीढ़ियों से उतर कर हॉल में कदम रखती चारुल के पाँव अपनी जगह हे जम्म गए इस चेहरे को देखते हे.

"अलका और आरती दीदी साथ थी भाभी और अब तोह मुझे कोई ख़ास भी नहीं है, जितना जरुरी था वो कर चूका हु. आप जब चाहे फ़ोन कर दिया कीजिये, बाँदा सेवा में हाजिर रहेगा. वैसा विकास भैया ने बताया था के आपको जरुरी काम है कुछ.", अर्जुन की पीठ थी चारुल की तरफ और चारुल जैसे मैं बनाने में उलझी थी की वो मिलते हे गुस्सा दिखाए या समझदारी. पारुल ने देख लिया था अपनी बहिन को और उसकी नजरो का पीछा करते हुए अब अर्जुन ने भी काले टॉप और चुस्त पाजामे में क़ैद इस सुंदरी को देखा तोह बस देखता हे रह गया.

"वो तुम्हे एक बार साथ चलना पड़ेगा मेरे लेकिन वीकडेस में हे. विकास के पास भी टाइम नहीं है क्योंकि नयी नौकरी है और घर की अब साड़ी जिम्मेवारी भी. अगर पॉसिबल हो तोह मंडे चलते है. चाहो तोह चारुल को भी ले चलेंगे.", अब ये आखिर में अपना नाम सुन्न कर झेंपती हुई चारुल भी इधर हे चली आयी. अर्जुन ने आँखों से hello तोह कर हे दिया था.

"हाँ तोह मेरी भी छुट्टियां है और सुना है अर्जुन ने कार भी ली है जिसकी ट्रीट देने से ये बचता आ रहा है. वैसे सच कहु तोह पारुल ये लड़का न टाइम का बड़ा पाबंद है.", अब चारुल कुर्सी खींच कर उनके सामने हे आ बैठी. समय की पाबन्दी वाला डायलाग बता रहा था की अर्जुन मिलने का वादा करके भी नहीं आया.

"पानी हे पीला दो भाभी.", अर्जुन जैसे इस वक़्त चारुल से बात करना चाहता था लेकिन पारुल की शरारत उसने कहा देखि थी.

"पानी? अभी तोह पिया है और ये ले इस बोतल में भी ठंडा पानी है. नहीं तोह चारुल इसको थोड़ी एक्स्ट्रा आइस दाल कर पानी दे जरा.", ये चारुल भी समझ रही थी की वो बात करना चाहता है और दीदी परेशां कर रही है. लेकिन उसको लगा चलो यही ठीक है, अर्जुन से थोड़ा मजा लिया जाए. चारुल उठ कर जाने हे लगी थी की अर्जुन ने कलाई पकड़ ली. जहा चारुल की धड़कन ने रफ़्तार पकड़ी वही पारुल झूठी हैरानी से उसको देखने लगी.

"नहीं पीना एक्स्ट्रा आइस वाला, आप बैठो अपनी जगह. और भाभी मैं आपका देवर लगता हु तोह सेवा आपसे करवानी है, इनसे नहीं."

"हे भगवन कितना निर्लज्ज है तू अर्जुन. विकास तोह तुझसे शरीफ और संस्कारी बताता रहता है और यहाँ मेरी हे छोटी बहिन का हाथ मेरे सामने हे पकड़ लिया.", पारुल ड्रामा करती चारुल को भी देख रही थी जो शर्म से निचे देखने लगी.

"ओह मेरी हिटलर भाभी, पहली मुलाकात में हे मेरी शराफत के झंडे सामने कर दिए था भैया ने और आपने भी अन्नू को लपेट लिया था. और मैंने इनसे भी कुछ बात करनी है इसलिए आपको किचन तक भेज रहा था. एक मिनट में बताओ जरा मैं कितनी बात कर लूंगा?", अर्जुन ने कलाई छोड़ दी थी और चारुल वापिस कुर्सी पर बैठी दोनों को देखने लगी.

"इस से दूर हे रहियो चारुल, जानती है न कितनी गर्लफ्रेंड है इसकी? अब तोह शायद नंबर बढ़ भी गया होगा. अन्नू, प्रीती, वो बास्केटबॉल वाली और जाने कौन कौन.", ये सब पारुल इसलिए कह रही थी क्योंकि चारुल ने ऐसा हे कुछ अर्जुन के लिया कहा था. और उसको पता था के इतने दिन से जो चारुल घर में रह रही है तोह उसकी वजह अर्जुन हे होगा लेकिन अर्जुन सॉरी न कहे बस.

"आप मेरे लिए चाय हे बना दो और अगर इसने कुछ bournvita-milkshake पीना है तोह वो सही. बाकी सबकी अपनी अपनी ज़िन्दगी है तोह मैं टेंशन नहीं लेती ज्यादा.", चारुल के इस कथन पर पारुल अंदर हे हंस रही थी क्योंकि खुद पारुल ने देखा था अपनी बहिन को बंद कमरे में मेकअप करते, गाने सुनते और लड़कियों वाले कपडे आईने के सामने खुद पर लगा कर देखते हुए. अर्जुन अभी खामोश हे था और पारुल थोड़े गंभीर चेहरे के साथ उठ कड़ी हुई.

"तुम्हारे कमरे में बात कर सकती हो अर्जुन से लेकिन ये जरूर ध्यान रखना की ये मेरा एकलौता देवर है.", पारुल ने नरम शब्दों में हे सचेत कर दिया था पिछले सारा मजाक हटते हुए. अर्जुन भी जानता था की पारुल भाभी उसकी परवाह करती है.

"खा नहीं जाउंगी मैं आपके देवर को. और मेरे लिए भी मिल्कशेक हे बना देना.", चारुल उठ कर कड़ी हुई और अर्जुन को अपने साथ हे ऊपर चलने का इशारा किया. लकड़ी की रेलिंग वाली ये बड़ी सीढ़ियां घर के अंदर से हे दूसरी मंजिल तक आती थी जहा 3 कमरे थे. संधू जी का घर बेशक 350 गज का था लेकिन आलिशान था. अर्जुन बस अपने से 2 कदम ऊपर चलती चारुल को देख रहा था और रसोई के पास कड़ी पारुल के चेहरे पर एक अलग हे मुस्कान थी. पहले कमरे के अंदर आते हे चारुल ने दरवाजे की चिटकनी चढ़ा दी.

"पाँव में गिर जॉन तोह शान्ति मिलेगी तुम्हे? या हाथ जोड़ने से काम चल जायेगा?", एक पल में हे चारुल के चेहरे पर वो दर्द उमड़ आया जिसको रोकने की वो भरसक कोशिश कर रही थी इतने दिनों से. अर्जुन द्वारा उसकी अनदेखी ने इस कदर दर्द दिया था की आँखों में मॉटे मॉटे आंसू एक पल में बहार टपक पड़े. अर्जुन बस हैरान था की ये क्या हुआ. दरवाजे से पीठ लगाए कड़ी चारुल सुबकती हुई फर्श की तरफ जाने लगी तोह बिना सोचे अर्जुन ने वो ढीला पड़ता जिस्म अपनी गिरफ्त में ले लिया. हर ख़याल दिमाग से निकल वो बस चारुल को अपने चौड़े सीने से लगाए खड़ा था जो फफक कर बस रोये जा रही थी.

"शह्ह्ह्ह.. मैंने कोई अनदेखी नहीं की चारुल. हालात भी साथ नहीं थे और जब वक़्त निकाल कर स्टेडियम गया तोह तुम भी नहीं मिली. मैं किसी प्यार करने वाले की अनदेखी करने का पाप नहीं कर सकता.", अर्जुन बस पीठ सहलाते हुए उसको चुप करवाना चाहता था जो थोड़ा मुश्किल काम लगने लगा. चारुल के आंसुओं की तेज रफ़्तार ने उसका कन्धा भिगो दिए और वो बस खामोश रही.

"अगर तुम्हारी अनदेखी करनी होती तोह मैं यहाँ क्यों आता? मुझे पता चला था की तुम अब स्टेडियम भी नहीं आ रही इसलिए मैं ऐसे वक़्त यहाँ आया जब बात कर सकू.", अर्जुन ने दोनों हाथो में वो गोरा चेहरा थाम कर देखा तोह अब वह रोने की वजह से रंगत लाल और सिर्फ आंसू हे थे. चारुल की बंद आँखें अभी भी आंसू बहा रही थी जो शायद किसी और वजह से भी थी. उभरे हुए सुर्ख आधार भी आंसुओ से भीगे देख अर्जुन ने बिना सोचे उनपर अपने होंठ टिका दिए. गीले नमकीन होंठो की लज्जत भी औंस में भीगे गुलाब सी थी. एक पल को चारुल का पूरा वजूद हे कांप गया अपने जीवन के इस पहले मरदाना संपर्क से. इन होंठो तक कभी कोई पहुंच न सका था और आज जिसने इन्हे इनके होने का एहसास करवाया बस वही चारुल की चाहत थी.

एक पल के लिए अपनी गहरी आँखें खोल कर हैरत से अर्जुन को देखा जो उसके दोनों गाल थामे पूरी शिद्दत से इनका पहला रस पीने में लगा था और चारुल ने भी अपनी उंगलिया उसकी पीठ पर कस्ते हुए इस लम्हे को आगे बढ़ा दिया. सांस लेने के लिए खुले होंठो के बीच अर्जुन की जीभ का जाना हे जैसे उसके लिए कौमार्य भेदन सा एहसास देने लगा. कब चारुल उसका अनुसरण कर बैठी ये खुद उसको न पता लगा. होंठो के साथ साथ अब अर्जुन बड़े इत्मीनान से उसकी jivha-ras को अपने में समता चारुल को दरवाजे से लगा चूका था. गालो पर रखे हाथ पीठ, कमर से फिसलते हुए उस चिकने पाजामे के उस भाग पर आ रुके जहा चारुल की जवानी के वो गोलाकार उन्नत नितम्भ थे.

"ोोूहः.. आह्ह्ह्हह..", अर्जुन ने होंठ अलग करे तोह उखड़ी हुई साँसों के साथ चारुल का सीना भी ऊपर निचे होता दिखा. आँखें सुकून, शर्म और इस जादुई अनुभव से बंद किये चारुल मदहोश सी कड़ी थी.

"अब भी लगता है की मैं तुम्हारी अनदेखी कर रहा था?", इस आवाज से चारुल तुरंत मदहोशी के नए आलम से बहार निकली. कुछ भी सपना नहीं था और अर्जुन कुछ इंच दूर उसकी नजरो के सामने हे खड़ा था. बिना कुछ कहे वो बुरी तरह अपने इश्क़ से जा लिपटी जिसके ख्वाब वो जाने कितने दिनों से देखती आयी थी. आज मैं में कोई गुबार न था और न वो दर्द जो अर्जुन की अनदेखी से ज्यादा उसने खुद के गलत फणिन्स्लो से पाया था. इतना कुछ होने के बावजूद अर्जुन उसके पास था, बगैर नाराजगी के. चारुल ने कोई कसार न रखते हुए अर्जुन की गर्दन, गाल, आँखें और होंठो अपने अपनी मोहर छाप दी. उसका बस चलता तोह वो इस पल में उसके भीतर हे समां जाती.

"I'm रियली बाद अर्जुन बूत यू अरे थे मोस्ट केयरिंग पर्सन. सॉरी फॉर माय स्ट्रेंज बेहेवियर, ी रियली मिस्ड यू एंड आईटी वास् जस्ट थे गिल्ट ी हद. सॉरी.", एक खिलाडी होने के बावजूद चारुल ठोस होने के साथ मखमल सी तरावट लिए थे. वो जिस्म आज उसकी चाहत के मजबूत बदन में था और अब दिल की हर बेचैनी हवा हो चुकी थी.

"वैसे मुझे तोह इस गिल्ट से भरे किश में बहोत मजा आया." अर्जुन की इस एक पंक्ति ने हे माहौल बना दिया. चारुल सब दुखड़े भूल कर शर्म से उसके सीने पर गाड़ी जा रही थी और अर्जुन भी अपनी टीशर्ट का खींचना महसूस करते हुए आगे बोल उठा.

"अगला स्टेप इतनी जल्दी नहीं चारुल डार्लिंग, भाभी भी रहती है मेरी यहाँ और वो चीखना चिल्लाना सुनेगी तोह मेरा यहाँ पहली और आखिरी बारी आना होगा. कपडे फाड़ना आज के लिए तोह बक्श हे दो.", अब तोह चारुल का खड़े रहना हे दूभर हो गया था. शर्माती हुई वो दरवाजा खोल बहार निकलने लगी तोह सामने पारुल को ट्रे हाथो में लिए खड़े पाया.

"वो.. वो हम निचे हे आ रहे थे.", चारुल की अनियंत्रित सांसें, हिलता सीना, बेहाल और गुलाबी चेहरा देख पारुल कुटिलता से मुस्कुराने लगी.

"सॉरी फॉर माय स्ट्रेंज बेहेवियर.. हाहाहा.. और ऐसा कौनसा किश होता है देवर जी जिसमे गिल्ट भरी हो?", अब ये दोनों हे पंछी झेंप रहे थे क्योंकि पारुल जैसे वह कई देर से कड़ी सब सुन्न रही थी. फिर भी अर्जुन हे बोलै और चारुल वापिस कमरे में प्रवेश करती बाथरूम में दौड़ गयी.

"आप न भाभी हद्द से ज्यादा हे शरारती हो, पता नहीं विकास भैया का क्या होने वाला है. मतलब आप हम दोनों की निगरानी कर रही थी?"

"देवरजी, वो मेरी बहिन है और आपके किस्से मशहूर भी बहोत है. निगरानी न करू तोह क्या बहार कड़ी हुई वो सब सुनु जो अभी नहीं होना चाहिए. हटो एक तरफ और जल्दी से मिल्कशेक ख़तम करो.", अर्जुन एक तरफ हुआ तोह पारुल अंदर आती हुई ट्रे के साथ बिस्टेर पर आ बैठी. अर्जुन भी अब कही इस आलिशान कमरे को देख रहा था जो लगभग वैसा हे था जैसा अन्नू का. बस अन्नू के कमरे में अर्जुन अपने आप को हर जगह हे महसूस करता था और शायद यहाँ भी थोड़ा बहोत उसका वजूद रहने वाला था आने वाले समय में.

"ये सब saaj-sajawat महीने भर का परिणाम है अर्जुन. पहले तोह इधर बस टीशर्ट पजामा का ढेर और ast-vyast चीजे दिखाई देती थी. मैडम तोह आजकल टेडी बेयर के साथ सोने लगी है.", बाथरूम के अंदर चेहरा धोती चारुल तोह ये सब सुन्न कर शर्म से मरी हे जा रही थी. अर्जुन बिस्टेर की जगह कुर्सी करीब रखते बैठ गया.

"कुछ बदलाव अगर खुद को ाचे लगे तोह ऐसा करना बेहतर है न भाभी? समय के साथ इंसान गलत और सही की पहचान कर हे लेता है. चारुल का अंतर्मन हमेशा उलझा रहा जो शायद इस वजह से भी की जीवन के उद्देश्य कभी क्लियर नहीं रहे. एक लड़की वाले रूपांतर को ग्रहण कर पाना हर महिला खिलाडी के लिए कठिन होता है, चारुल के लिए तोह ज्यादा हे मुश्किल था. दिल की बात पहले खुद कह नहीं सकीय, फिर अन्नू जैसी दोस्त के साथ मैं में प्रतिद्वंदिता आना स्वाभाविक भी था क्योंकि दोस्त हे तोह प्रतिद्वंदी होते है. इसके साथ हे अनगिनत बार खुद से हे सही गलत के लिए उलझना आसान तोह नहीं होता? इतने बदलाव आने के बाद कमजोर पड़ जाना स्वाभाविक है भाभी क्योंकि फिर सिर्फ चाहत हे बचती है.", अर्जुन के इतने गहरे कथन पर पारुल लाजवाब थी और चारुल खुश. चारुल की हालत का बयान शायद वो खुद भी इतना बेहतर न कर पाती जितना अर्जुन ने किया था. बाथरूम से निकलते हे उसने पारुल के सामने अर्जुन के गाल पर चुम्बन अंकित करते हुए सिर्फ 'थैंक यू' कहा और गिलास उठा कर उसकी तरफ बढ़ा दिया.

"अब घुसी न तेरे दिमाग में मेरी और अन्नू की कही बातें? ये तुझे हमेशा से समझता रहा है लेकिन मैडम तोह बस इसमें भी अकेले भाग लेंगी और अकेले जीतेंगी. चल अब अपना मिल्कशेक ख़तम कर और तैयार हो जा.", पारुल की बात सुन्न कर चारुल थोड़ी दुरी पर अपने हे बिस्टेर पर बैठ कर दूध पीने लगी. कुछ हलकी फुलकी बातों के बाद अब अर्जुन भी यहाँ से चल दिया, जल्द मिलने का वादा करता. घडी में 5 बजने वाले थे और 6 बजे उसको प्रीती के घर रोमिला से भी मिलना था, जो अलग हे दाने बिखेरने में लगी थी जिसका अर्जुन को कोई अंदाजा हे न था.

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पंडित जी यहाँ अभी कुछ ज्यादा चहल पहल नजर नहीं आ रही थी. सभी लड़कियां अपने ऊपर वाले कमरों में बंद थी और रामेश्वर जी आज छोल साहब के साथ गोल्फ खेलने निकल गए थे. कौशल्या जी भी ललिता जी और कृष्णा जी को साथ लिए आज मल्होत्रा जी के घर चली गयी थी. उनके साथ ाची बनती थी और कल हे उनकी बिटिया कृष्णा जी को अपने यहाँ आने का जोर दे कर गयी थी. रेखा जी यहाँ निचे वाले हिस्से में कुछ वक़्त तोह कोमल के साथ हे काम करती रही फिर खुद हे अपनी लाड़ली को विन्नी माधुरी के पास ऊपर भेज दिया.

सब बस यही देखते थे की रेखा जैसी बहु ने घर को कितने ाचे से संभल रखा है. बड़ो के उठने के समय से लेकर रात सबके सोने तक वो निरन्त हे काम करती रहती थी जिसके लिए जाने कितनी हे बार कौशल्या जी और ललिता जी ने भी उनसे नाराजगी जताई थी. ससुर बहु से ज्यादा रामेश्वर जी भी रेखा को अपनी बेटी और घर का एक प्रमुख स्तम्भ मानते थे. लेकिन किसी ने भी कभी एक नारी के अंतर्मन को उतने बेहतर तरीके से न समझा जितना जरुरी था.

मजबूत स्तम्भ! ये सबको बहार से दिखाई देता था लेकिन अंदर के खोखलेपन और तनाव को सिर्फ उनके बचे हे जान पाए थे और उनमे भी कोमल से आगे अर्जुन निकल चूका था. बाथरूम व्यवस्थित करने के बाद जैसे हे रेखा जी की नजर अपने कमरे पर गयी तोह विचारो के इतिहास में जाने में एक पल न लगा. इस दरवाजे से हे तोह उनकी जेठानी उन्हें अंदर ले गयी थी विवाह होने के बाद. सब बहोत खुश थे और हमेशा भरपूर laad-pyaar से पाली रेखा भी laaj-sharam, थोड़े डर और ढेरो सपने के साथ उधर दाखिल हुई थी.

अँधेरा गहराता गया था और उनके पति की झलक रात के आखिरी पहर शुरू होने तक न मिली. वो रात 2 बजे कमरे में दाखिल हुए थे और बस अगले आधे घंटे में रेखा के साथ वही सब हुआ जैसा अक्सर सुहागरात में होता था बस बिना प्रेम और मर्जी के. मुँह फेर कर सोने से पहले उनके पति के लफ्ज़ थे की तुम इस परिवार की बहु हो और तुम्हे यहाँ उचित maan-sammaan मिलेगा. बीवी का दर्जा वो हमेशा पाएंगी लेकिन प्यार का हक़ वो पहले हे किसी को दे चुके है. जिस्मानी दर्द अभी जज्ब भी न हुआ था और ये आत्मा को छलनी करते शब्दों ने जैसे हर सपने को असंख्य कांच के टुकड़ो में तब्दील करके रख दिया.

"माँ! ओह मेरी प्यारी माँ, यहाँ अकेली कड़ी किन खयालो में खोयी है आप? सॉरी जब आया था तोह आप इतनी व्यस्त थी की मैं मिल हे नहीं पाया सही से. उमाहहह..", अर्जुन ने जैसे हे अपनी माँ को पीछे से बाहुपाश में लेते हुए अपनी बात कहने के साथ गाल को चूमा तोह हाथ के घेरे पर 2 गरम पानी की बूंदे महसूस हुई. ये आंसू उसकी माँ रेखा की आँखों से निकले थे जो अतीत में मिले दर्द में खोयी थी और अचनाक बहार का लबादा उसके जिस्म पर बिच गया, अर्जुन के रूप में. लेकिन उन हाथो को तोह वो आंसू तेज़ाब से कही ज्यादा गरम और असहनीय लगे.

"आपकी आँखों में ये आंसू? मेरी..", अर्जुन अपनी कसम देता उस से पहले हे रेखा जी ने अपने बेटे के होंठो पर हाथ रख दिया. डबडबायी आँखों के बावजूद वो मुस्कुरा रही थी.

"तेरे प्यार की वजह से ये आँखें भीग गयी अर्जुन. तेरा पैदा होना हे जैसे मुझको पूरा कर गया था और तू कभी मुझे अपनी कसम नहीं देगा याद रखना.", अब अर्जुन pal-bhar खामोश रहा लेकिन उसको बिना कहे भी जवाब मिल सकता था. इस आस से अपनी माँ को सामने से सीने लगते हुए उसने आँखें बंद कर ली. कहा मालूम था इस नादान को की उसकी माँ से वो पैदा हुआ है, जितने वो नहीं चाहेंगी उनका दर्द अर्जुन भी महसूस नहीं कर सकता.

रेखा सबसे ज्यादा समझती थी अपने इस नादान से दिल को जो उसके लिए हे धड़कता था और इसके प्यार में रत्ती भर मिलावट न थी. बस इस पल में वो उसकी प्रेयसी बन्न कर जाता रही थी की अर्जुन के लिए उसके कुछ और भी मायने है. अर्जुन इतने समय गले लगने के बाद भी बस खुद को हे महसूस करता रहा अपनी माँ के दिल में. ये सबसे जटिल दिल था और अर्जुन उनका माथा चूम कर पीछे हट गया.

"आप नहीं बताएंगी, कसम भी नहीं दूंगा लेकिन सच तोह कुछ और भी सिवाय हमारे प्यार के. रात मैं आपके पास सोने वाला हु माँ.", अर्जुन इतना बोल कर बस अपनी माँ के शांत चेहरे को देखता रहा. उन गहरी आँखों में भी सिर्फ अर्जुन का हे अक्स था लेकिन अर्जुन इतना जान चूका था की माँ के वो आंसू प्रेम का मिश्रण लिए दिल को ठंडक देने की जगह पीड़ा से भरे खौलते हुए तेज़ाब से थे.

"तेरे पापा आएंगे तोह उन्हें क्या कहूँगी? तू मुँह हाथ धो ले मैं दूध बना देती हु.", रेखा जी मुस्कुरा कर ताल रही थी लेकिन अर्जुन ने ना में सर हिला दिया.

"वो आएंगे भी तोह चाचा के साथ बैठक में सोयेंगे. इन दोनों कमरों में मेरी माँ और चची माँ के साथ बस मैं हे हु. वैसे दूध मैं पी कर आया हु, आप रहने दीजिये.", अर्जुन ने एक तरफ रखे धुले हुए कपड़ो से टोलिया उठाते हुए कहा और 2 कदम पलट गया. लेकिन फिर एक बार मदद कर बोल उठा.

"अब मैं ऐसी कोई कोशिश नहीं करूँगा जिस से आपको दुःख हो. मैं आपका हे हु माँ, हर स्वरुप में आपका. आप जितनी भी परत ओढ़ लीजिये सबसे अंदरूनी कोख से एक माँ और प्रेमिका कुछ भी छिपा नहीं सकती. आइंदा गुजरे वक़्त से वो यादें बहार मैट लाइयेगा जिनमे मेरा अस्तित्व न हो.", अर्जुन एक बार फिर से उनके गाल चूम कर ऊपर वाले अपने बाथरूम की और बढ़ चला. रेखा जी के चेहरे पर ख़ुशी के बावजूद हैरत भी नजर थी.

वो अपने भगवान् पर हे भारी पड़ गया था गले लगने से ठीक उस देव (सेलेस्टियल) नर की तरह जिसका सबकुछ नारायण थे. दाना खिलने वाला कहा चुग्गा लेता है. रेखा अपनी गलती याद करते हुए आप पर हे मुस्कुरा उठी क्योंकि प्रेमिका के रूप में भी अर्जुन कमजोरी तोह भांप हे सकता था.
 
अपडेट 145

अल्फा - (1)


क्षितिज (होराइजन) रेखा के दोनों तरफ बस हल्का नीला आवरण था जो दुरी काम होने के साथ हे कही हरा तोह कही गहरा नीला होता जा रहा था. समंदर किनारे आती सफ़ेद लहरें भी उस गुलाबी रेत पर रंग बदल कर वैसी हे हो जाती. इस खुली हुई बड़ी खिड़की से ये प्रेमी युगल बस इस प्रकृति के स्वर्गिक सौन्दर्य को निहारते हुए खुश थे एक दूसरे के सामीप्य में. खिड़की से आती ताज़ी हवा जब इन भूरी जुल्फों को हिला रही थी, वो मजबूत सा पौराणिक काल के योद्धा सामान युवक उतने हे प्यार से अपने आधार अपनी प्रेमिका के निर्वस्त्र मखमली कंधे पर रखता जैसे महक लेने लगा.

खामोश खूबसूरत मंजर में वो दोनों हाथ अपनी प्रेमिका के बहार को निकले चमकदार निर्वस्त्र पेट पे रखता हुआ अलग हे एहसास से भरा जा रहा था. वो पेट सूचक था इस अप्सरा सी युवती के गर्भवती होने का, जो इस पल में अपनी अलौकिक सुंदरता से इन्दर को भी कदमो में झुका दे. युवती इस प्रेम स्पर्श और दृश्य में लुप्त मुस्कुरा रही थी. और ख़ामोशी को भी खुद उसने हे तोडा.

"ेलफ़ोनिसि पहले कभी इतना खूबसूरत नहीं था. आज लगता है जैसे ये जगह पहली बार देख रही हु.", होंठो का हिलना भी अपने आप में एक सुख भर देता देखने वाले को और वो चेहरे की गुलाबी रंगत जैसे उस समंदर किनारे की रेत को हे फीका दिखती लगी.

"ये जगह कैसी थी मुझे नहीं पता जान लेकिन जानती हो जितना कुछ बाहर के नज़ारे में है उस से कही ज्यादा इस वक़्त मेरी बाहों में है. वो कुदरत भी तुम्हारे सामने कुछ नहीं. या फिर यु कहो जैसे सब रंग आज कुदरत ने तुमसे उधार लिए है. वो दूर बिखरा neela-hara रंग जैसे तुम्हारी हे आँखों का एक मामूली सा प्रतिबिम्ब भर है. सफ़ेद रेत ने तुमसे हे गुलाबीपन मांग लिया हो और ये हवा कोशिश कर रही है तुम्हारी महक बहार फ़ैलाने की. लेकिन इन्हे ये नहीं पता की दर्पण को महकने का अधिकार नहीं होता. तुम्हारी ख़ूबसूरती की कल्पना करना तोह अब और भी मुस्ख्किल है.", युवक ने अपनी मुस्कुराती हुई प्रेयसी के गाल से गाल लगते हुए कहा तोह उस चेहरे की असलियत सचमुच बहरी दृश्य से भी बेहतर थी.

"और इसकी वजह है हमारा प्यार. मैं खुद हे बात पूरी कर देती हु, नहीं तोह फिर शुरू हो जाओगे बेहला फुसला कर.", रक्तिम अधरों को खोलकर मुस्कुराती वो सचमुच वरन से परे हे थी लेकिन युवक भी अपनी प्रेयसी के सामान था.

"बेटी चाहिए मुझे बिलकुल तुम्हारे जैसी और फिर उसको ले कर भी हम यहाँ आएंगे. मेरी नन्ही पारी को दिखने की यहाँ की कुदरत भी तुम्हारी माँ से ख़ूबसूरती उधार लेती रही है. वो बिलकुल तुम्हारे हे जैसी होगी जान, बिलकुल तुम्हारे जैसी मेरी धड़कन.", युवक के स्पर्श में इस वक़्त जितना प्रेम था उस से युवती की आँखों में भी पानी उभर आया लेकिन ख़ुशी से.

"बेटी अगर मुझसे भी ज्यादा सुन्दर हुई तोह थोड़ी जलन जरूर होगी मुझे."

"शहहह.. जैसे अबतक तुम मेरे सीने पर सर रख के सोती आयी हो, वैसे हे पूरी उम्र बितानी है हमने. बस मेरी नन्ही सी बेटी को मैं अपने दिल से लगा कर वो महसूस करना चाहता हु जो माँ ने मेरे साथ किया होगा. देख लेना वो भी तुम्हारी जैसी आँखों वाली होगी और तुमसे थोड़ी ज्यादा हे प्यारी."

"आँखें बाप पर हे जाती है और मुझे तुम्हारी ये ब्राउन आईज पसंद है, बड़ी बड़ी. उमंमाहः.. थैंक यू फॉर थिस ब्यूटीफुल लाइफ, I'm कम्पलीट नाउ.", सीने पर बस वो ढीला सा सफ़ेद वस्त्र वक्षो को ढके था लेकिन शायद वस्त्रो के मायने हे न थे. चुम्बन कही से भी कामुक न था और गले लग्न अपने आप में जैसे एकाकार होना.

"बाप पर तोह कुछ भी न जाये ये दुआ करूँगा. मैं दूंगा तोह सिर्फ उपनाम और वो भी सिर्फ दादा जी से विरासत मैं मिला है इसलिए. मुझे पूरा करने वाली भी तुम हो और अधूरा भी होता हु जब दूर होता हु.", युवक ने जैसे हे होंठो से होंठ लगाए युवती की बंद आँखें हैरानी से खुल गयी. ये एक बंद कमरा था जहा हल्का अँधेरा और ठंडक थी. नींद में मीठे ख्वाब देखती प्रीती जैसे उस सपने में जीवंत हे थी और यहाँ उसके होंठो पर होंठ रखे जो चेहरा छाया हुआ था वही तोह उसका हमसफ़र था.

अर्जुन बड़े इत्मीनान से उसके मदद्भरे होंठो को पीये जा रहा था लेकिन ज्यादा देर न ऊपर रह सका. प्रीती फुर्ती से उसको तेल कर उसके सीने पर आ लिपटी. वो चुम्बन अब कही ज्यादा हे उत्तेजक होने लगा था जिसमे लगाम बस प्रीती के हाथ थी और असहाये सा अर्जुन अपनी िज्जात्त उसके हवाले कर चूका था. प्रीती का जिस्म जिस कदर तराशा हुआ था वो बस अर्जुन जैसा हे संभल सकता था. ठोस उरोज इतने सख्त थे जैसे उनका मर्दन करना भी वश से बहार हो लेकिन अर्जुन का स्पर्श हे उनके ऐसे होने की वजह था.

"छोडो.. आह्हः.. बिल्ली कही की, काट हे लिया.. uff..",Arjun की सांसें उखड़ी हुई थी और उसके ऊपर झुकी प्रीती आँखों से हे जैसे उसको प्रताड़ित करने लगी.

"जब बस का हे नहीं है तोह शुरू क्यों करते हो? फत्तू कही के.", प्रीती की ऐसी बात पर अब अर्जुन भी हलके से हंसने लगा.

"मेरी जान तुम्हे सोये देखा तोह लगा जैसे तुम्हारी नींद में भी मैं था. रोकने की कोशिश करता रहा लेकिन फिर अपने आप हे सब हो गया. सासु माँ ने बोलै था के तुम्हे उठा दू, वो मेरे साथ आर्टवर्क के काम से बहार जा रही है.", अर्जुन की पूरी बात सुन्न कर प्रीती की भी चेतना लौटी जो इसके सान्निध्य में सबकुछ भूल कर इतनी देर से लगी हुई थी.

"मरवा दिया तुमने तोह जान के बचे. माँ घर में है और तुम कमरा बंद करके ये सब कर रहे थे? उठो और बहार जाओ, बाथरूम हो के आती हु मैं.", अभी प्रीती उठने लगी थी और अर्जुन ने दोनों हे बड़ी रबर बॉल से चुचो को पकड़ लिया. वो इस वक़्त अपनी औकात से कही ज्यादा हे ठोस और उभरे हुए थे.

"उन्होंने कहा था के जाओ अपनी प्रीती को प्यार करो और तुम अब भाग रही हो. इन्हे तोह प्यार करने दो काम से काम.", अर्जुन बड़ी ढिठाई से दोनों स्टैनो को पकडे हुए हलके हलके दबा रहा था. लेकिन यहाँ भी प्रीती उस पर भारी पड़ी. वो टीशर्ट एक पल में सीने से उतार कर फेंकती हुई वो ब्रा खोलने लगी तोह अर्जुन का गाला सूख गया.

"लो अब जो होगा देखा जायेगा. माँ आये या फिर बुआ, पर अब तोह प्यार हे करते है.", अर्जुन का हाथ पकड़ कर अपने सीने पर रखती वो ब्रा का हक्क खोलने लगी लेकिन अर्जुन फुर्ती से उसको एक तरफ पलट कर बिस्टेर से खड़ा हो गया. प्रीती गुस्से से देख रही थी अर्जुन की ये हरकत.

"पागल हो गयी हो यार. मैं तोह मजाक कर रहा था और तुमने एक सेकंड में हे टीशर्ट उतार दी. पहनो इसको."

"बड़े आये प्यार करने वाले, फत्तू. अगली बार हाथ लगाया तोह काट के रख दूंगी जो बीच में उठ कर भागे तोह. शुरू करो तोह साथ भी रहो. अब जाओ अपनी सास के पास और तुम्हारी खबर मैं ाचे से लुंगी रात को.", प्रीती अपनी चुस्त निक्कर को ठीक करती हुई वो ब्रा सचमुच निकाल कर अर्जुन को देखने लगी. अर्जुन की जीन्स में उसका उभार दायी टांग पर 7-8 इंच निचे तक नुमाया हो रहा था उन gulabi-gore चुचो को देख कर. शरीर का सारा रक्त जैसे जांघो के बीच उस ख़ास अंग पर आ चूका हो.

"शो ख़तम और जो खड़ा हुआ है न उसको खुद हे झेलो. एक कदम मेरी तरफ बढ़ा तोह फिर आज कमरे से बहार अपनी टांगो पे नहीं जाने वाले.", अर्जुन की रही सही हिम्मत भी जवाब दे चुकी थी अपनी इस शेरनी के सामने. वो नजरे झुका कर जाने लगा था और प्रीती ने पीछे से उसको बाहों में भर लिया.

"मेरी जान, तुम न सचमुच ज्यादा हे दिमाग से सोचते हो. मेरा भी दिल वही चाहता है जो तुम्हारा दिल लेकिन मैं इसको रोकना नहीं चाहती तुम्हारी तरह. बना दो न मेरा वो ख़ास दिन अर्जुन.", अर्जुन जैसे इस दिल को सुकून देती ठंडक से भर गया प्रीती के लिपटने और दिल की चाहत सुन्न कर.

"वो पल ख़ास होगा और बहोत जल्द प्रीती बस पहले मैं वो हमारी शादी की रात करना चाहता था लेकिन ऐसा करना बहोत गलत है. खुद संतुष्ट हो जाता हु और तुम्हे खुद से दूर रख कर तड़प दिए जा रहा हु. बहोत जल्द मैं तुम्हारी बाहों में होने वाला हु और सबकुछ तुम करोगी. उमाठ.. चलो बाथरूम में जाओ मैं बहार निकलता हु फिर.", अर्जुन की इस जवाब और चुम्बन से प्रीती का मैं हल्का हो गया. अब वो बाथरूम जा चुकी थी और अर्जुन दरवाजा खोल कर बहार आया और वापिस बंद कर दिया.

6 बजने में 10 मिनट थे और तभी बराबर वाले कमरे से ये जोरदार सुगंध बिखेरती हुई रोमिला प्रकट हुई. प्रीती को जनम देने वाली ये यूनानी महिला भी अपने आप में एक विलक्षण गुलाब हे थी जो इस वक़्त एक बिना ब्याह का सूती कमीज और चुस्त लेग्गिंग पहने उसके सामने थी. अर्जुन हमेशा उनकी उपस्थिति में घबराता या असहज होता था लेकिन आज उसके खवाबो ने अलग हे उड़ान ली थी. वो अपलक बस इस सौन्दर्य की मूरत को निहार रहा था. रोमिला के चेहरे पर एक अलग हे ख़ुशी थी अर्जुन की हालत देख.

"ये बैग उठा लो अर्जुन, कैमरा और प्रॉप्स है इसमें. तुम बहार चलो, मैं आती हु.", अर्जुन नींद से जगा और चुपचाप वो बैग उठा कर बहार निकल चला. दिल अलग हे आवाज करता लगा था और स्थिति याद आते हे जैसे घडो पानी उसके सर आ गिरा.

'बस यही बाकी था होना. वो माँ सामान है और सबसे बड़ी बात प्रीती की माँ है. अपनी हद्द नहीं भूलनी चाहिए मुझे.', आपने आप को ठीक करता वो बैग को कार में पिछली सीट पर रखे इन्तजार करने लगा रोमिला का.

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"देख यार गज्जू, वो रिवॉल्वर की रिपोर्ट तोह बताती है की उस से सिर्फ 2 हे गोली चली है और उँगलियों के निशाँ हाथी पर तोह एक हे व्यक्ति के थे पर कही कही जानना उँगलियाँ या शायद किसी पतली ऊँगली वाले लड़के के भी हो सकते है. खंजर के लिए मैं आश्वस्त हु की उस से हे अज्जू पर वार हुआ होगा. लेकिन ये दोनों सबूत करम के घर मिलना कुछ और इशारा करता है भाई.", नरिंदर और उमेद इस वक़्त एक साधारण से होटल की खुली छत्त पर एकांत में बैठे बियर की चुस्किया ले रहे थे.

"वो वह प्लांट किये गए है इन्दर और प्लांट इसलिए किये गए होंगे क्योंकि उनका असली मालिक दमयंती या उसका पति हो. वो महिला जैसी भी थी कभी विवाद या खुले में नहीं दिखी. दमयंती काकी को सबसे ज्यादा तोह अज्जू और तू हे जानते थे. खामोश जीवन जीने वाली वो एक विधवा थी जिसने कर्म और बिंदु के सहारे हे जीवन बिताया. अज्जू की मौत के बाद वो नजर हे नहीं आयी. फिर कभी सुनाई भी दिया के उसका आना हुआ है तोह देख नहीं पाया. कर्मा भी अकेला रहता था.", उमेद की बात अपनी जगह ठीक थी और बिंदु का नाम सुन्न कर जैसे इन्दर भी गहरी सोच में खोने लगा.

"इन्दर, मैं जानता हु की तूने कभी बिंदु को प्यार नहीं किया और उसका भी प्यार सिर्फ तू हे था. फिर भी बातचीत तोह बहोत होती थी न तुम्हारी, क्या कभी लगा के वो ऐसी लड़की होगी? मैं खुद उसको बहोत बुरा भला कह चूका हु और जिम्मेवार भी है वो बहोत से काण्ड के लिए लेकिन अगर तुझे अतीत की बिंदिया याद है तोह जरा गौर करना मेरी बात पर. और जैसे Chandar-Karme को जुड़वाँ दिखने के कागज़ मिले, चन्दर को लाजवंती के भाई के यहाँ गॉड देना... मुझे तोह वो सब भी चाल हे लगती है. तुझे याद है न बिंदिया का जन्मदिन कब आता था?", आज इस एकांत में जैसे इन दोनों का दिमाग भी शान्ति से हर बात को समझ रहा था.

"हाँ, बैसाखी वाले दिन और वो 4 साल तक मेरे लिए खीर लेके आती रही. पहले तोह बचपना कह सकते है लेकिन उस वक़्त लड़कियों को जल्दी समझ दे दी जाती थी घरवालों से. जानता हु के मैं उसका दोषी हु गज्जू, लेकिन अंतर्मन ने कभी उसको एक ाची लड़की से ऊपर नहीं स्वीकारा. या फिर मेरा ध्यान हे नहीं गया उस सब पर भोले की वजह से. वैसे उसके जन्मदिन का उन दोनों आदमियों के जुड़वाँ होने से क्या सम्बन्ध हैं?", नरिंदर ने ये बात नजरे चुराते हुए पूछी थी जैसे बिंदिया को कही ज्यादा हे याद कर लिया था.

"चन्दर को तूने कभी दमयंती काकी के घर जाते देखा था? उसको बिंदिया भी पसंद नहीं करती थी. कर्मा हमेशा गंभीर हे रहता था, बचपन से वो बस अपनी माँ के साथ. सही कहु तोह वो मुन्नी और चन्दर की तस्वीर सबकुछ बताती है. चन्दर को लाजो काकी ने हे तैयार किया होगा और जवान लड़के खेली खाई औरत आराम से काबू कर सकती है. बस मामला ये है की चन्दर गॉड नहीं दिया गया था बल्कि कर्मा को सुपुर्द किया गया दमयंती काकी के. और मुन्नी या तोह मर्जी से चन्दर के निचे आयी होगी या फिर लाजो लेके आयी जिस से चन्दर बहार न निकल सके. ये तस्वीरें जिसने भी ली थी उसके साथ लाजो काकी शामिल थी चाहे मुन्नी को पता हो या न हो. बस कर्मा अपने जुड़वाँ की तरह गिरा हुआ नहीं निकला.", उमेद वो बातें खोल रहा था अंदाजन जो नरिंदर को केहनी चाहिए थी. कुछ देर तक बस ख़ामोशी हे छायी रही फिर खुद नरिंदर हे बोलै.

"सहमत हु मैं भाई तेरी बात से. अज्जू को बहोत मानती थी दमयंती काकी और मेरे भी सर पर हमेशा हे प्यार से हाथ फेरा था उन्होंने. जैसा तूने बताया था की बिंदिया की शादी एकदम हे तये हुई थी और लता के साथ ब्याह कर वो ताऊ जी की हवेली गयी तब सिर्फ अज्जू हे मिला था दमयंती काकी से और वो भी बेटी को आशीर्वाद देने हे आयी थी. मतलब साफ़ है ळाजन्ती काकी, लता, चन्दर और ताऊजी के नालायक Fateh-Sundi इस सब में मिले हुए थे. और.."

"और क्या इन्दर?"

"और बिंदिया का वचन मैंने उसकी शादी से 2 रात पहले पूरा किया था. तुझे ये पता था की मैंने उसके साथ एक बार समबन्ध बनाया लेकिन वजह थी की वो फिर कभी अपने प्यार का इजहार नहीं करेगी अगर मैं उसको सिर्फ एक लम्हे के लिए कबूल कर लू. या वो उस रात मर जाती जिस से मेरा हे वचन टूट जाता या मैं उसको उस रात के लिए अपना लेता. उसके बाद बस एक बार उसने मुझे खत लिखा था जिसमे सिर्फ कुछ शब्द और एक तस्वीर थी.", बात करते हुए नरिंदर जैसे खुद को मजबूत कर रहा था और उसकी हालत देख कर उमेद को चिंता होने लगी.

"रहने दे भाई मत बता अगर कुछ भी ऐसा है जिस से तुझे दर्द हो रहा हो. रहने दे इन्दर.", उमेद ने कंधे पर हाथ रखते हुए जैसे रोकना चाहा था.

"इंदरजीत, ये तुम्हारी शबनम जो एक वचन से जन्मी है, मेरे प्यार के वचन से. जाने से पहले सोचा की तुम्हे पता हो की ये हमारी बेटी है. दुःख इस बात का रहेगा की हाथ थाम न सके तोह किसी और की भी सुहागन न रहने दिया. तुम्हारी शबनम का सामना तुम्हे जरूर करना होगा.' और वो तस्वीर और खत कृष्णा के हाथ लग गए भाई जिसको मैं कभी दुखी नहीं देख सकता. बहोत समय से मेरे मैं में ये दर्द था की कैसे भी करके मैं स्वीकार करू जो सच है. बिंदिया फिर कितनी बदल गयी और मैं भी अपराधी हु उसका लेकिन वो बदला लेने वाली नहीं थी और हद्द तोह तब हुई जब उसने हमारे हे उस मिलान के सबूत को मौत के मुँह में यहाँ भेज दिया. वो इतनी निर्मम कैसे हो सकती है गज्जू?", ये राज अब तक का सबसे बड़ा खुलासा था उमेद के लिए. वो ये सच्चाई नहीं जानता था शबनम और नरिंदर की लेकिन एक नरिंदर हे था जिसके दिल को उमेद सबसे अधिक समझता था जैसे शंकर के दिल को अज्जू.

"भाई माफ़ करना यार मुझसे भी गलती हो गयी. शबनम को मैं आते हे पकड़ सकता था लेकिन तब ध्यान शीला और सुशीला पर ज्यादा रहा. लेकिन ाचा हे हुआ जो अर्जुन ने शबनम को वापिस उसकी माँ के पास सकुशल भिजवा दिया."

"इसका दूसरा मतलब भी है गज्जू. अर्जुन ये सच्चाई जान चूका था और उसने वही किया जो भाई को करना चाहिए था. लेकिन बिंदिया से माफ़ी मांगे बिना मुझे भी मुक्ति नहीं मिलने वाली भाई. मेरी वजह से उसको वो सब दिन देखने पड़े और इसके साथ हे मैंने कृष्णा को भी टॉड दिया. उस बेचारी ने तोह कभी अपना दर्द साँझा हे नहीं किया उस दिन के बाद."

"मतलब कृष्णा भाभी बेटे की मौत से अवसाद में नहीं गयी थी?"

"अर्जुन के रूप में उसको बीटा मिल चूका था भाई लेकिन बिंदिया वाले खत ने उसको झकझोर कर रख दिया. वो आज भी मुझसे उतना हे प्यार करती है और मैं तोह सिर्फ कृष्णा का हे हु. दिल से माफ़ करने के बावजूद उसके दिल में ये निशाँ बन्न हे गया भाई, बन्न हे गया."

"मैं सब सही कर दूंगा इन्दर, चाहे फिर मुझे सारंग से ले कर इस मुन्नीबाई तक को साफ़ करना पड़े. भोले को संभल लेना बस और बिंदिया की बेबसी का अंदाजा तोह मुझे ाचे से है. चल अभी कुछ दिन तक ये सब बातें भूल कर घर का जिम्मेवार बीटा बन. जब मामले की जड़ के पास आ चुके है तोह कुछ दिन शांत रह कर हवा का रुख भी समझ ले.", उमेद ने बियर को एक सांस में ख़तम करते हुए सिग्गट सुलगा ली. नरिंदर भी कुछ हद्द तक संभल चूका था. आज अपने दर्द को साँझा करना जैसे उसके लिए भी अनिवार्य हो गया था और उमेद से बेहतर व्यक्ति इस सबके लिए उसके पास कोई था भी नहीं. दोनों हे कुछ देर बाद यहाँ से घर के लिए निकल चले थे.

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ऋतू का हाथ पकड़ कर प्रीती उसको अपने साथ हे एक तरफ ले चली. बाकी सब गप्पे लगाने में मशगूल थी और उन्हें इन दोनों का बेहतर पता था. बस विन्नी ने हे एक कुटिल मुस्कान दी थी प्रीती को लेकिन इस बार जवाब में वैसे हे प्रीती मुस्कुराई तोह विन्नी ने भी सर पे हाथ मार लिया.

"अब बता क्यों इतनी उतावली हो रही है जो अपने सैयां की जगह सबके सामने मेरा हाथ शान से पकड़ कर खींच लायी.", ऋतू जैसा वह किसी रोमांचक किस्से में बैठी थी और प्रीती के ऐसा करने पर नासमझी से बोल दिए. लेकिन जल्द हे गलती का एहसास भी हो गया क्योंकि हाथ पकड़ने वाली भी उसकी जान थी.

"सॉरी, वो अंदर कुछ अलग हे बात हो रही थी डार्लिंग. अब बता ऐसी क्या खबर हाथ लगी जो तू इतनी उतावली हो रही है जैसे तेरा खसम किसी और के साथ भाग गया हो.", ऋतू ने चुहल से बात संभल ली थी और प्रीती थोड़ा शर्म से बताने लगी.

"भाग हे गया है वो भी अपनी सासु माँ के साथ. आप जल्दी करो यार ये बहोत बड़ा मामला लग रहा है मुझे.", अब ऋतू का भी गाला खुश्क हो गया अर्जुन की कारस्तानी सुन्न कर. वो आँखें बड़ी करती बस प्रीती को शरमाते हुए देख रही थी जैसे उसको डर हे न हो के क्या कुछ हो सकता है.

"ओह मेरी बन्नो, वो तोह बैलबुद्धि है लेकिन तू तोह नहीं. और ये रोमिला आंटी भी डाका हमारे हे मर्द पर डालने में लगी है. गए कहा है वह दोनों?", ऋतू ने इधर उधर देखा तोह वह कोई न था सीढ़ियों के पास.

"वो.. वो मैंने आज भी माँ की बात सुनी थी. माँ अर्जुन की बढ़ा चढ़ा कर तारीफ कर रही थी मामी के साथ फ़ोन पर. पता नहीं क्या चल रहा है उनके दिमाग में लेकिन अभी वो लोग पुराने वाले घर गए है. अब मैं सीधा चली जाती तोह मामला बिगड़ सकता था या माँ कही भड़क जाती तोह बात हे पता न लगती. मेरी स्कूटी बहार हे कड़ी है, जल्दी चलो. उनको अब तक 20 मिनट हो चुके है, कही वो घोडा माँ पे चढ़ गया तोह फिर माँ उसको अपने साथ हे न बाँध ले. सुन्दर तोह वो हैं हे और ये मूर्खनंद मेरे चक्कर में कुछ कहेगा नहीं.", प्रीती की बात सुनते हे ऋतू दौड़ कर अपने कमरे में चली गयी. पूरे 2 मिनट बाद हे वो लम्बी टीशर्ट और चप्पल पहने प्रीती के साथ निकल चली.

"वैसे ये तेरी मामी का न जरूर कोई तगड़ा सन है जो साफ़ नहीं हो रहा. रोमिला आंटी ओपन माइंडेड जरूर है लेकिन वो अपने हे दामाद के साथ ऐसा कुछ इतनी आसानी से नहीं करने वाली.", ऋतू स्कूटी के पीछे बैठी थी अब.

"उन्होंने जादूगर अर्जुन का वो जादूए डंडा देख रखा है जैसा मैंने आपको बताया था स्केच के बारे में. और जितना ये बुद्धू दिल से हरेक के लिए करता है न तोह माँ भी अगर उस से चिपक जाए तोह कोई बड़ी बात नहीं. वैसे ये मामी का तोह ऐसा लग रहा है जैसे माँ उनको अर्जुन के निचे जान बूझ कर ला रही है. ऐसा तोह तभी हो सकता है जब कोई आपस की बड़ी बात हो. आपको नहीं लगता ऐसा?", प्रीती ने इस ऊँची दिवार वाले बड़े घर से पहले हे स्कूटी रोक दी.

"वो सब तोह पता लगा हे लेंगे लेकिन यहाँ स्कूटी रोकने से क्या होगा? दरवाजे से तोह जा नहीं सकते, बंद किया होगा उन्होंने और ये दिवार चढ़ना वो भी इस वक़्त, न बाबा. अब अंदर जाने का कुछ सोच नहीं तोह मेरा भाई अगर तेरी माँ के साथ कान कर गया तोह आंटी उसको निचोड़ हे लेगी. वैसे भी उनकी बातें इतनी गरम होती है पता नहीं बेचारा ारु सेहन कर भी सकेगा या नहीं.", ऋतू इस वक़्त गंभीरता में भी मजाक कर रही थी. बात ये भी सही थी की साढ़े 6 के समय अपने हे घर की दिवार फाँदना अजीब जरूर लगता और लोग देखते सो अलग.

"अर्जुन के साथ रहती हो आप और फिर भी नहीं समझती? वो हमेशा माहौल ऐसा रखता है के सबकुछ नार्मल लगे. और वो दोनों यहाँ होंगे भी तोह सबसे आखिर वाले बड़े कमरे में, ये छोटा गेट खुला हे होगा.", प्रीती की बात सुन्न कर ऋतू ने भी परखना हे ठीक समझा.

"बंद हुआ न तोह तू हे कूद के अंदर जाएगी, फिर गेट खोलना.", ऋतू की बात सुन्न कर प्रीती ने होंठो पर ऊँगली रखते हु चुप रहने का इशारा किया और मुस्कुराती हुई उस बड़े दरवाजे के दायी तरफ बने छोटे दरवाजे की सांकल बड़े हे आराम से सरकाई. लेकिन इस्पे अंदर से टाला लगा था. प्रीती को ऐसे मायूस देख ऋतू ने बड़ी सावधानी से बड़े दरवाजे पर लगा हैंडल 180 डिग्री घुमा कर कुंडे पर टिकते हुए मामूली सा खोला तोह वो खुल गया.

हाथ के इशारे से उसको अंदर आने का बोल कर वापिस उतनी हे सावधानी से वो हैंडल फंसते हुए दरवाजा बंद करती वो दोनों हे घर के बायीं तरफ बने चारे वाले कमरे की तरफ हो ली. दोनों हे दबे पाँव चल रही थी लेकिन मैं में हजारो विचार थे की जाने क्या हे देखने को मिले. हर कमरे की बत्ती गुल देखती वो सबसे आखिर तक चली आयी.

"ओह तेरी.. शठ.. यहाँ तोह पूरा माहौल बना है यार.", ऋतू कांच से अंदर देखते हे निचे बैठ गयी प्रीती के साथ. वो आश्वस्त थी की उनकी आवाज इधर से अंदर नहीं जा सकती कांच की वजह से. प्रीती ने भी किनारे से अंदर देखा तोह दांग रह गयी. एक स्टैंड पर कैमरा रखा था और बड़ी दिवार पर लाल चादर लटकाई गयी थी. कमरा भरपूर रोशन था जहा अर्जुन के शरीर पर सिर्फ एक धोती वाला वस्त्र जनता से लेकर सीने तक ख़ास अंदाज में बंधा में था. दाए घुटने के भर बैठा अर्जुन अपने बाए हाथ से यूनानी कामदेवी रोमेलिए की दूध सी गोरी गोलाकार कलाई थामे था. उधर भी जांघो से ले कर दोनों मॉटे खरबूजों पर हे वैसा सफ़ेद वस्त्र था. रोमिला जहा छत्त की तरफ देख रही थी वही अर्जुन रोमिला के मुड़े हुए चेहरे को.

"अंदर तोह 18+ वाली कोई हिस्ट्री डाक्यूमेंट्री चल रही है. माँ की तइस तोह देखो दीदी, ये अर्जुन बीच बीच में उनकी बैक (कूल्हे) भी ताड़ रहा है. कर क्या रहे है ये?", प्रीती एक किनारे से देख रही थी और उसकी बात सुन्न कर ऋतू भी इस कांच की खिड़की के ठीक निचले हिस्से से झाँकने लगी. यहाँ अँधेरे में और इतनी एहतियात बरतने से अंदर वाले तोह उन्हें देखने से रहे.

"ओह यार तेरी माँ तोह सचमुच जानलेवा है प्रीती. अर्जुन नहीं बचता.. देख तोह इनका खजाना.", अंदर रोमिला मुस्कुराती हुई अब अर्जुन को कुछ समझा रही थी. कमर पे बंधे कपडे से वो सुनहरी बकसुआ निकल कर एक तरफ किया तोह अर्जुन के शर्म से लाल चेहरे को देख जो हरकत रोमिला नई की Preeti-Ritu के तोह सांस हे गले में अटक गए. उसका नागराज प्रचंड अवस्था में झूल रहा था. रोमिला ने यहाँ अपने सीने से एक उभर को बेपर्दा किया तोह अर्जुन की हालत खराब. वो गोलाकार मोटा चुका इस उम्र में भी तन्न कर खड़ा था. इस उम्र के जितने चुके अर्जुन ने देखे तोह उनके निप्पल कठै या गहरे रंग के मॉटे थे लेकिन जो सामने था वो बिलकुल गुलाबी और किसी जवान लड़की की तरह थोड़ा माध्यम पर तीखा.

"हे भगवान्. ये माँ कोई ब्लू फिल्म बना रही है क्या?", प्रीती ने हाथ मुँह पर रखते हुए निचे बैठी ऋतू को देखा. अंदर रोमिला चलती हुई कैमरा स्टैंड तक आयी और कुछ बटन दबाने के बाद फिर से अर्जुन के समीप आ कड़ी हुई. अब पीछे से वो 2 अध्भुत्त फक्क सफ़ेद से बड़े बड़े तराशे हुए कूल्हे अर्जुन से ज्यादा इन दोनों के सामने थे. वही अर्जुन अब कलाई की जगह रोमिला की कमर थामे बैठा था और एक अदा से चेहरा घुमा कर देखती रोमिला की निगाहे अर्जुन पर. 3-4 बार कमरे में बिजली सी चमकी. मतलब ये दृश्य भी पूरा हो गया था.

"बड़ा सेक्सी फोटोशूट हो रहा है अंदर प्रीती. मुझे इसकी कॉपी चाहिए जैसे भी करके तुझे ये हांसिल करनी हे होगी.", ऋतू बोल रही थी और उधर प्रीती मंत्रमुग्ध से अंदर हे नजरे गड़ाए थी. आँखें जल्द हे बड़ी होती देख ऋतू ने भी अंदर नजर की. लाल तराशी हुई तिकोनी झांटे यहाँ से कुछ गहरी हे प्रतीत होती थी लेकिन रोमिला की निर्वस्त्र छूट देख इन दोनों सखियों की हालत बुरी हो गयी. अब तोह वस्त्र भी कमरे से कंधे के बीच बंधा सबकुछ दिखा रहा था. रोमिला जैसी कामदेवी के निर्वस्त्र होने पर भी अर्जुन अपनी जगह बैठा रहा.

"कहा ले आयी यार तू प्रीती."

"यार आप समझ नहीं रही हो. अगर ये बात सिर्फ आर्ट फोटोशूट तक है तोह ठीक लेकिन आगे बढ़ी तोह मैं दरवाजा टॉड दूंगी. माँ तोह बहोत पहुंची हुई चीज निकली और वो गधा कैसे उनके बूब्स घूर रहा है. ऊपर से माँ की हंसी देख मेरी जान जा रही है.", अब ऋतू ने थोड़ा मुस्कुराने की कोशिश की. अंदर से तोह वो भी चिंतित थी लेकिन प्रीती का उसको भी पता था.

"नहीं जाते कही आगे यार. बस देख तोह सही, ये मजे फिर नहीं मिलने वाले. अब रोमिला आंटी आयी मेरी पकड़ में और तेरी भी.", ऐसी बात सुन्न कर प्रीती भी कुछ सहज होती हुई अंदर देखने लगी. अर्जुन भी अब लगभग निर्वस्त्र था और फिर से कैमरा में कुछ बटन दबाने के बाद रोमिला ने जो मुद्रा इस बार बनाई तोह तीनो लोगो के कंठ सूख गए, अर्जुन समेत. हालत तोह रोमिला का लाल हुआ चेहरा भी बयां कर रहा था लेकिन वो खुद पर नियंत्रण किये रही. अर्जुन का एक हाथ अपने बड़े खरबूजे पर रखवाती वो दूसरे हाथ से छूट ढँक कर कैमरा की तरफ देखने लगी वही अर्जुन अपनी सासु माँ के गाल के पास होंठ किये था. फिर से फ़्लैश चमकी और फोटो खींचते हे रोमिला ने एक गहरा चुम्बन अर्जुन के होंठो पर जड़ दिया.

"हे भगवन. माँ, बस करो यार.", प्रीती इतना कहती हुई एकाएक हैरान हो गयी जब ऋतू ने निचे बैठ हुए हे उसका एक उभार दबोच लिया.

"चुप करके देखती रह न. मजा खराब कर रही है. मुझे तोह अर्जुन की हालत देख मजा आ रहा है."

"बातें मैट बनाओ, ये आपके चेहरे की रेडनेस मैं अँधेरे में भी देख रही हु और पसीना भी. हालत मेरी भी वैसी हे है लेकिन माँ जिसको उकसा रही है न वो उनका सत्यानाश कर देगा.", अंदर अब रोमिला काफी देर तक कैमरा से लगी रही और उसके बाद अर्जुन को सब समझते हुए वो जैसे उसके मजे भी ले रही थी. अर्जुन इस अगले दृश्य में उन्हें बाहों में लिए खड़ा था और यहाँ रुक रुक कर वो मुद्रा थोड़ी बदलने लगा.

"ये गया मुँह एक दुधु पर.. उफ़.. और हाथ देख उसका.. आंटी आप तोह खा हे जाओगी बिना कुछ करे..", अर्जुन अंदर वैसा हे कुछ कर रहा था और रोमिला का पूरा जिस्म अर्जुन की दोनों बाहों के बीच लेता था हवा में. एक गुलाबी निप्पल वो चुस्कने की जगह बस मुँह रखे निचे देख रहा था. यहाँ जैसे रोमिला की छूट ने कॉमर्स हे बहा दिया हो. दोनों जल्द हे अलग हुए तोह अर्जुन ने कुछ कहा जिस पर रोमिला के चेहरे पर अजीब से भाव आ गए.

"मन कर रहा है ये आगे कुछ भी करने से लेकिन तेरी माँ शायद अब नहीं रुकने वाली.", ऋतू के इतना कहते हे अंदर रोमिला ने अर्जुन के होंठो को दबोच लिया. अब शायद कैमरा का स्वचालित चक्र ख़तम हो चूका था और कुछ पल तक रोमिला का चुम्बन जारी रहा. वो हलके हलके अपना शरीर भी अर्जुन से रगड़ रही थी.

"पागलपन है ये तोह सरासर. मैं देखती हु माँ को."

"रुक मेरी फूलन देवी. वो अर्जुन है, तीर सोच के हे चलाएगा.", ऋतू ने विश्वास से कहा और कलाई थाम ली प्रीती की. अंदर अर्जुन ने कुछ कहा और फिर रोमिला के चेहरे पर थोड़ा दुःख देख कर वो निचे बैठ गया. रोमिला और ये दोनों कुछ समझती उस से पहले हे अर्जुन ने वो सुनहरी बालो से ढाका गुलाबी खजाना चूसना शुरू कर दिया. रोमिला कांप रही थी और 2 मिनट बाद हे वो झाड़ कर निचे फर्श पर बैठ गयी. अर्जुन ने कपडे से पहले उनका चेहरा साफ़ किया और फिर गाल सहलाने के बाद उनके साधारण कपडे अलमारी से निकल कर पास में रख दिए. रोमिला ने शर्म से कुछ कहा जिस पर अर्जुन ने हँसते हुआ ना में सर हिला दिया.

"ये देख जरा अपने हीरो को. कोई और होता तोह कबका काण्ड कर चूका होता लेकिन ये अर्जुन है प्रीती. तेरी माँ की स्थिति भी समझी और उन्हें संभल भी लिया.", अंदर अर्जुन ने कपडे पहन कर अब रोमिला की मदद करनी शुरू की तोह ऋतू प्रीती का हाथ थाम कर बहार निकल चली, दबे पाँव.

"सचमुच इसका कण्ट्रोल कुछ ज्यादा हे नहीं है दीदी? मैं तोह 10 बार फ़ैल हो चुकी लेकिन ये आगे हे नहीं बढ़ता."

"संभल के रख तेरी मुनिया को डार्लिंग, जिस दिन उसका चला गया फिर ये खाली खाली लगेगी. मैंने तोह ऊँगली हे करना बंद कर दिया अब. तड़प बढ़ने हे दो, जब मिलेगा तब कसार खुद हे निकलेगा.", दोनों वापिस घर की तरफ चल पड़ी.

"वैसे आपका भी हो गया था न वेट?"

"तू तेरी हालत देख जरा. निचे बैठी थी मैं और वो ख़ास स्मेल सीधा मेरे मुँह पर हे आ रही थी. लिखवा ले, अब तेरी माँ को मौका मिला न तोह वो अर्जुन का चाहे रपे कर दे लेकिन लेके रहेगी अगली बार.", ऋतू ने हँसते हुए कहा तोह प्रीती शरमति हुई हंसने लगी.

"माँ का हक़ है दीदी. उधर होता है ऐसा कुछ पार्ट्स में और माँ उस ख़ास जगह से हे है जहा ऐसा ट्रेडिशन भी है की बेटी और दामाद के बीच माँ को भी जगह मिलती है दामाद के साथ. वैसे आज उसका हल्का कर देना नहीं तोह हमारा हे नुक्सान है.", प्रीती का अर्थ अर्जुन के इतनी देर से अकड़े लुंड से था और ऋतू बस हंस दी.

"वो मैं देख लुंगी या अर्जुन अपने आप. स्कूटी कड़ी करके 'ह' को इधर हे घर लेती आ, रात यही रुकने वाली है तू मेरे पास.", ऋतू अपने घर के आगे उतारते हे प्रीती से बोली और अंदर चली गयी. आपस में इन्होने उस रॉटवेलर पिल्लै का लघु नाम 'ह' रखा हुआ था, जाने किस वजह से. प्रीती भी कपडे बदलने की जरुरत समझ कर सीधा अपने घर हे चल दी. जीवन में पहली बार ऐसा नजारा देखा था और अभी तक दिल में हलचल जारी थी. वही पुराने घर में अर्जुन ने कमरा पहले जैसी अवस्था में करके सारा सामान बैग में भर दिया था.

"सॉरी अर्जुन.", रोमिला की इस क्षमा के पीछे ग्लानि भाव न था लेकिन वजह थी की जिसको वो नादान जवान समझ रही थी वो उस से भी कही ज्यादा संयंम वाला निकला. अर्जुन उत्तेजित था जो उसने छुपाया नहीं था एक भी मुद्रा के दौरान लेकिन उसने रोमिला के साथ कोई गलत हरकत भी न की थी. वही रोमिला ने बिलकुल उलट किया था, उत्तेजना दबाये राखी और जब लगा की ये समय ख़तम होने वाला है तोह उसने जिस्म की गर्मी को प्रकट कर दिए. वो खुश भी थी की उसका भावी दामाद इंसान को समझता है.

"आपको सॉरी कहने की कोई जरुरत नहीं है. सिचुएशन ऐसी थी वो भी इतनी देर तक एक दूसरे के साथ वैसी हालत में. और वैसे भी आप यहाँ बिना अंकल (प्रीती के पिता) के है इतने समय से तोह अभी जैसी हालत में शरीर कैसे साथ दे सकता है. ख़ुशी है की आपने खुद पर फिर भी सेंट्र्ल रखा और हमने हद्द पर नहीं की.", अर्जुन ने वापिस बैग कार की पिछली सीट पर रखते हुए कहा और बहार आँगन की लाइट जला दी जैसा रात को जरुरी भी था. रोमिला अर्जुन का गाल चूम कर दूसरी तरफ से कार की सीट पर बैठ गयी. अर्जुन ने भी कार बहार करने के बाद फिर से मुख्या द्वार बंद किया और कार को आगे बढ़ा दिया. पौने 8 बज रहे थे.

"मैं महीनो कण्ट्रोल कर सकती हु अर्जुन, बस आज जैसे खुद से हे हार गयी थी. हम बहार थोड़ा समय बिता सकते है?", रोमिला अभी भी जैसे किसी सोच में थी. ये सच था की कही न कही दिमाग और जज्बातो को काबू करने के मामले में वो अर्जुन से बेहतर थी और अपनी छवि को आजतक वो साफ़ रखने में कामयाब भी रही थी.

"हाँ क्यों नहीं आंटी, पेट्रोल पंप जाना हे था सुबह फिर अभी चलते है. वैसे आपसे कुछ पूछ सकता हु अगर बुरा ना माने तोह?", अर्जुन ने कार घर की तरफ लेने की जगह इस तरफ से हे सेक्टर की मार्किट जाने वाली रोड पर भाड़ा दी. सामने से आती रौशनी में रोमिला का चेहरा प्रकाशित होता तोह अर्जुन बीच बीच में निगाह मार लेता. रोमिला कनखियों से ये सब देख रही थी लेकिन उसको इस से कोई आपत्ति न थी.

"अगर सवाल मेरे कण्ट्रोल करने वाली बात से है तोह नहीं पूछ सकते. बाकी जो भी चाहो, मैं जवाब जरूर दूंगी और तुमसे मैं नाराज नहीं हो सकती.", रोमिला की बात ने एक पल के लिए तोह अर्जुन को ठंडा हे कर दिया था. जिस बात को पूछने से उसने इंकार किया था अर्जुन वही बात घुमा फिरा कर पूछने वाला था. जगमग सड़क पर अब कार 40 की रफ़्तार से अपनी लाइन में चल रही थी. और अर्जुन को ख़ामोशी से सोचता देख रोमिला ने हे बात आगे बधाई.

"विवान हमेशा से होनहार और जीवन को जीने वाले व्यक्ति दिखे. ब के उन 2 साल में करियर के साथ सिर्फ मुझपे हे ध्यान दिया था विवान ने. शादी के बाद भी वो काम और परिवार के बीच बहोत बेहतर तालमेल बनाये रहे जिसको प्रीती और जोएल के जनम ने कही ज्यादा मजबूत किया. तुम्हे लग रहा होगा की मैं कैसी बातें कर रही हु?", रोमिला इस समय जितनी सहज और स्पष्ट थी अर्जुन ने देखने के बाद नजर फिर से सामने की.

"नहीं मैं ऐसा कुछ भी नहीं सोच रहा आंटी. बस मुझे sunn-na ाचा लगता है और मैं कभी राये नहीं बनता.", अर्जुन के नजरिये से रोमिला के स्पष्ट चेहरे पर छोटी सी मुस्कान तैर गयी.

"जानते हो विवान की ऐसी लाइफ तभी तक रही जब तक माँ ज़िंदा थी. वो साल में एक महीना यहाँ इंडिया आते रहे और 15 दिन ग्रीस भी जाते थे. प्रीती के यहाँ आने के बाद हे मुझे नजर आया की वो डिसिप्लिन, बैलेंस एंड एवरीथिंग वेरे नॉट इन आर्डर लिखे बिफोर. हे वास् चेंज्ड.", रोमिला अपने शब्दों को सही से कहने में असमर्थ सी लगने लगी.

"हो सकता है अपनी माँ के देहांत और प्रीती के यहाँ आने से ऐसा हुआ हो.", अर्जुन की इस समझदारी पर रोमिला ने फीकी सी हंसी दी जैसे वो बिना जवाब दिए हे उसको गलत साबित कर चुकी हो.

"डैड. डैड टूट गए थे जो विवान की लाइफ को ऐसे बनाये हुए थे. तुम्हे क्या लगता है की लव मैरिज और हर कदम विवान के साथ चलने वाली औरत ने अपना प्यार काम कर दिया होगा?", यहाँ उनका मंतव्य खुद से था.

"नहीं आंटी मेरा ऐसा मतलब बिलकुल भी नहीं था. बस समझने की कोशिश कर रहा हु के संतुलन खराब क्यों हुआ और कैसे? आप दोनों के prem-vivaah और आदर्श ज़िन्दगी की बातें मैंने माँ (रेखा) और प्रीती से जाने कितनी बार सुनी होंगी."

"रेखा ने वही बताया जो माँ अपने समझदार बेटे को बताती है जब उसका रिश्ता ऐसी लड़की से हो जाये जिसके उन्हें अपनी बेटी सी चिंता हो. और एक फैक्ट जाने तुम समझते हो या नहीं, शायद समझते हो लेकिन वैसे नहीं हो. औरत का मैं जटिल हो सकता है क्यों की वो अपनी दुनिया सिमित रखती है लेकिन एक मर्द दिल के मामले में हमेशा खुद को राजा मानता है. वो ज्यादा की चाहत रखता है और अवसरवाद जैसे पैदा होने के साथ हे उसमे रहता है. विवान मुझे हांसिल कर चुके और मेरे से बचे भी हो गए. दोनों ने मिल कर खुद को स्थापित भी कर दिया था तोह उनके हिसाब से वो जिम्मेवारियां ख़तम कर चुके.", रोमिला ने कुछ भी गलत नहीं कहा था एक पुरुष की सोच के बारे में.

"मेरी लाइफ भी इनके बराबर हे बिजी थी और दोनों ऑफिस शामे टाइम तक रहते थे. मैं हर दिन इनमे आ रहे बदलाव देखती रही लेकिन कभी रीज़न नहीं मिला और मैंने भी वही सोचा जो तुमने कहा था. कुछ समय तक ऐसे हे चलता रहा और फिर एक दिन जोएल के स्कूल से फ़ोन आया था कुछ एक्टिविटीज के रिगार्डिंग जिसमे पेरेंट्स की अप्रूवल लेनी जरुरी रहती है. वह से फुर्सत मिलते हे मैं ऑफिस की बजाये घर की तरफ चल पड़ी.", रोमिला की बातें सुनते हुए अर्जुन ने कार और धीमी कर दी. उसको ये जरुरी भी लगा की रोमिला पहले अपनी बात पूरी करे बिना व्यवधान के.

"बेधड़क दरवाजा खोलना जैसे जीवन का सबसे दुखदायी कदम रहा उस दिन. हमारे हे बैडरूम में, मेरे बिस्टेर पर विवान अलीशा के साथ उस हालत में जिसमे सिर्फ वह मैं और विवान हे हो सकते थे. मुझे उस समय कुछ समझ नहीं आया और मैं वापिस बहार चली गयी. ढेरो ख़याल लिए मैं कितनी देर भटकती रही इसका एहसास सिर्फ शाम होने पर आया. जोएल की याद आते हे मेरे कदम वापिस घर की तरफ मदद गए. क्या मेरे प्यार में कमी थी? क्या विवान संतुष्ट नहीं था मुझसे? क्या अलीशा ने हे मेरे पति को मजबूर किया होगा ऐसे सम्बन्ध के लिए?", रोमिला को एहसास भी नहीं हुआ कब कार उस शांत अँधेरी सी सड़क पर कड़ी हो चुकी थी. यही वो जगह थी जहा अर्जुन ने प्रीती को बाहों में लिया था.

"आप अपने पहले और एकमात्र प्यार के प्रति गलत हो हे नहीं सकती आंटी. आपने इतने सालो तक जब प्रीती को हे इस सबसे दूर रखा तोह मैं विश्वास से कह सकता हु की आप सिर्फ अपने पति और बचो से प्यार करती है. रही बात पुरुष मैं की तोह मैं सहमत हु इस बात से. गलत तोह मैं भी हु और जो मैं कहने वाला हु उसके बाद आप मेरे प्रति अपना निर्णय बदल सकती है. मैं सफाई नहीं दूंगा.", अर्जुन भी जैसे एक अलग से दर्द से भरने लगा था. उसको एहसास था के वो अब जो भी कहेगा उस से उसकी ज़िन्दगी बिखर सकती है.

"तुम अल्फा हो अर्जुन जिसको सभी का प्यार मिलता है क्योंकि वो सबके साथ प्यार से रहता है. है तोह ये भी पहला अक्षर ग्रीक का लेकिन इसका मतलब श्रेष्ठ है. प्रीती भी तुम्हारी प्रमुख है और बाकी सबके साथ तुम्हारा जो प्यार है वो उनकी ज़िन्दगी को संवारने और दर्द से उबरने के लिए एक जरुरी कदम है जो सिर्फ सही इंसान ले सकता है. तुम अपनी सफाई दे कर बाकी सभी को सही साबित नहीं कर सकते, उनके निर्णय लालच और वासना तक सिमित हैं और किसी की परवाह बिना. खुद को इतना मत झुकाओ की बाकी सभी को दर्द मिले. जब मेरी बेटी इसमें तुम्हारे साथ है तोह तुम गलत नहीं हो सकते.", इस बार बात कहते हुए रोमिला ने बिना किसी लाग लपेट के अर्जुन के बालो को सहलाया और हलके से होंठो को चूम कर कार पंप की तरफ लेने को कहा.

"तोह आपने इसलिए खुद को अध्यात्म और कला के साथ जोड़ लिया? मैं जानता हु की आप स्पिरिचुअल हीलिंग, फ़ूड फॉर मंद एंड आर्ट को ख़ास तरह से फॉलो करती है. आपका कमरा भी अपने आप में एक कही ज्यादा हे ऊर्जा से भरपूर और अलग सा एहसास करवाता है. वह सिर्फ आप हे रहती है, अलग दुनिया में.", अर्जुन इस पतली सड़क से मुख्या मार्ग पर आते हे दूसरी तरफ के पेट्रोल पंप पर आ रुका. सिर्फ इनकी हे कार थी और पेट्रोल टैंक का ढक्कन बटन से खोलते हुए अर्जुन ने थोड़ा शिक्षा उतार कर टैंक फुल करने का कहा और फिर से रोमिला को देखने लगा जो अभी तक अर्जुन को हैरानी से देख रही थी.

"हाँ आर्ट अपने आप में एक लाइफ है और मैं कमजोर ज़िन्दगी के खिलाफ हु. जीवन में आपको हमेशा वही करना चाहिए जो सही हो और जिस से मैं शांत रहे. ग्रीक महिला हु और आतंरिक सुंदरता के साथ मुझे बहरी शरीर को भी मजबूत रखना पसंद है. बस अब फरक नहीं पड़ता मुझे अनदेखी से क्योंकि प्यार हर तरफ है और सुकून पाना इतना भी मुस्ख्किल नहीं.", रोमिला की मुस्कराहट देख अर्जुन भी इस दौरान पहली बार ाचे से मुस्कुराया था. पैसे देने के बाद दोनों वापिस अपने सेक्टर की तरफ चल दिए.

"तोह आपने फिर कभी नहीं सोचा अंकल या अलीशा मामी से बात करने के बारे में इस मटर पर.? भरोसा रखिये, मैं हर बात यही तक सिमित रखूँगा.", अर्जुन भी अब सहजता से बात कर रहा था और उसके भरोसे वाली बात पर रोमिला हंसने लगी.

"भरोसे की बात तुम कह रहे हो? अभी थोड़ी देर पहले तुम चाहते तोह कुछ भी कर सकते थे, इतना भरोसा बहोत है मुझे sahi-galat समझने के लिए. वैसे भी तुम मेरे लिए ख़ास हो. हाँ बात की थी मैंने विवान से और उनका जवाब था की अलीशा भी उनसे प्यार करती है. वो रहेगी हमेशा अपने पति (रोमिला के भाई) के साथ क्योंकि उन्होंने कभी कोई दुःख नहीं दिया और विवान अलीशा के बीच जिस्मानी सम्बन्ध बस मेरे भाई की कमी से है. विवान इसको प्यार का नाम देता है और अलीशा इसको जरुरत वाला प्यार. अब विवान को असलियत दिखानी है अलीशा की और अलीशा को विवान की क्योंकि विक्की ने बताया था मुझे इस बारे में कुछ. विक्की मेरे लिए कही से भी Preeti-Joel से काम नहीं है. एक बार jija-saali नंगे हो जाये, फिर 3 देशो के कानून के हिसाब से बात करुँगी मैं. तुम निश्चिंत रहना अर्जुन, मैं हमेशा पापा की बहु रहूंगी.", रोमिला का उद्देशय और प्रीती के पापा की ये अलग हे चाहत सुन्न कर अर्जुन भोचक्का रह गया. लेकिन ये महिला तोह बिलकुल सहज थी.

"जो भी कीजियेगा, प्रीती हमेशा आपके साथ हे होगी. जरुरी नहीं सम्बन्ध तोड़ने से हे सब ठीक होता है, सुधारा भी जा सकता है और ज्यादा इत्छा हो तोह बेबस भी कर सकते है सुधरने के साथ.", अर्जुन अब घर की तरफ जाती सड़क पर आ चूका था. रोमिला अचरज से अर्जुन को देख रही थी की वो हालात को tehas-nehas करने की जगह सुधरने में हे विश्वास रखता है.

"कर देना बेबस. और प्रीती का मतलब यही न के तुम मेरे साथ हो? ाची बात है. वैसे डिनर हमारे यहाँ कर सकते हो, रेणुका ने तैयार कर लिया होगा. पापा भी खुश होंगे तुम्हे देख कर."

"जैसा आप कहे. लेकिन घर पे बताना जरुरी है तोह कार कड़ी करने के बाद आता हु.", अर्जुन ने समय देखा रोमिला को उतरने पर तोह साढ़े 8 हो चुके थे.

"रेखा को पता है के तुम मेरे साथ मार्किट गए थे 2-ढाई घंटे के लिए. फिर भी मिल आओ, मैं डिनर अर्रंगे करवाती हु.", रोमिला के खुलासे से अब थोड़ा अर्जुन को चैन मिला. उसको पता था के 8 बजे के बाद थानेदार साहब सवाल जरूर करेंगे की खाने पर देरी की वजह.

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विन्नी जबसे आयी थी वो इतने ाचे माहौल में कही ज्यादा हे खुश थी और अगर कमी थी तोह बस अर्जुन के साथ कुछ ख़ास लम्हो की. फिर भी यहाँ माधुरी, कोमल और प्रियंका के साथ उसका वक़्त ाचा गुजर रहा था और तारा, आरती, रुपाली भी घुलमिल गयी थी. शाम ख़तम होते हे सब निचे चले आये और शंकर जी के साथ ऋचा को प्रवेश करते देख विन्नी के साथ कोमल के चेहरे पर भी ख़ुशी थी.

"वेलकम. तुमने आ कर तोह सरप्राइज हे दे दिया यार. ये आपने ाचा किया चाचू जो ऋचा को लेते आये.", विन्नी के ऐसा कहने पर ऋचा उसके साथ गले लग कर मिली और वैसे हे कोमल, माधुरी और प्रियंका से भी. रसोईघर में बाकी महिलाये जो काम कर रही थी उन्होंने भी ऋचा का स्वागत किया जिस पर शंकर जी थोड़ा हैरान भी हुए और उन्हें ख़ुशी भी थी की उनकी इस बेटी के साथ बहार माँ से लेकर यहाँ अंदर तक सभी अपनेपन से पेश आये.

"मेरे साथ रहना आप और ये बैग मैं ऊपर मेरे कमरे में रख देती हु. फ्रेश होना है तोह साथ आ जाओ, फिर डिनर करते है.", कोमल ने बैग लेते हुए कहा तोह ऋचा भी हाथ पकड़ते हुए साथ चलने लगी सीढ़ियों की तरफ.

"आये हाय, क्या हाल है मैडम जी आप तोह पीठ दिखा कर चल रही हो.", ये ऋतू थी जो अभी अंदर आयी थी पुराने घर से और आते हे पीछे से ऋचा को जफ्फी दाल ली. ऋतू का ऐसे ऋचा से मिलना देख एक तरफ खड़े शंकर जी बड़े गौर से देख रहे थे और उनका भाई भी मुस्कुराता हुआ बराबर आ खड़ा हुआ.

"बचे है शंकर और बचे प्यार करना हे जानते है. चल कपडे बदल ले भाई, फिर खाने के बाद आज आराम से बातें करेंगे. कल संडे है तोह बहोत से घर के काम निबटने है, राजू भैया अकेले हे परेशां हो रहे है.", नरिंदर जी की बात सुन्न कर शंकर जी ने हामी भरी और इधर रेखा जी अपने पति के लिए कपडे और टोलिया लिए चली आयी. वो बिना कुछ बोले वापिस राजसी जा चुकी थी.

"हाँ यार.. आज आराम करने का दिल है और तुझसे बातें करने का भी. बस कही थानेदार साहब न कोई नया फरमान सुना दे."

"हाहाहा.. तू जा के नाहा ले पहले. पापा खुश रहते है और वो भी अभी थोड़ी देर पहले आये है गोल्फ खेल कर. बियर ऊपर टंकी में हे हैं हम दोनों की लेकिन जल्दी ख़तम करनी है तोह 5 मिनट में आजा ऊपर. संजीव वही है.", इतना बोल कर नरिंदर जी सीधा ऊपर छत्त की और बढ़ गए और शंकर जी बाथरूम में. सब समय से हो रहा था और यहाँ बचे खाने के लिए बैठे तोह ऊपर छत्त पर संजीव अपना क्वार्टर लिए दोनों चाचा के साथ महफ़िल में.

"तू तोह कह रहा था के शराब बंद कर रहा है?", दिवार पर बैठे शंकर ने अपने भतीजे को ये आखिरी जाम बनाते देखा. क्वार्टर में 3 हे बनते थे और 2 वो लगा चूका था.

"चाचा जी ये कहा था के काम कर रहा हु. पहले दिनभर में 10 सिग्गट लग जाती थी और अब मुश्किल से 2. क्वार्टर भी आज 3 दिन बाद पीने लगा हु वो भी इसलिए की इन्दर चाचा ने बियर मंगवाई तोह लेता आया. वैसे आप आज कुछ थके हुए लग रहे हो.", संजीव की बात पर नरिंदर ने भी हाँ में सर हिलाया. वो pyaaj-tamatar मिली गिरी के दाने चम्मच से उठाते कुछ पल सोचते रहे.

"यार कभी कभी लगता है के मैंने जीवन बिलकुल भी वैसे नहीं जीया जैसे जीना चाहिए था. और आज सुबह दिन ाचा जा रहा था जब हॉस्पिटल था लेकिन उसके बाद बस इन्ही खयालो ने मुझे चैन न लेने दिया. मानता हु की मैं सिर्फ वही करता हु जो ाचा लगता है लेकिन गलतियां तोह बहोत हुई है.", शंकर को ऐसे गंभीर देखते हुए नरिंदर ने कन्धा थपथपाया.

"गलतियां सभी करते है शंकर लेकिन तू अफ़सोस करके खुद को गलत साबित मैट कर भाई. ज़िन्दगी का इतना समय गुजरने के बाद ऐसा सोचना बाकी जीवन को पश्चाताप का गलत नक़ाब ुधा देता है. जो बातें सुधर सकती है उन्हें दुरुस्त कर और जिनका कुछ नहीं हो सकता उन्हें दूर रख. इंसान हैं हम और हिम्मतवाले भी, कभी कोई कीमत चुकाने का समय आया तब भी घुटने नहीं टेकने मेरे भाई. हाँ अगर तेरे औजार पर फफूंद लगने लगी है तोह पंजाब में एक हकीम जानता हु मैं, इलाज कर देगा.", नरिंदर की गंभीर बात के बाद ऐसी टिपण्णी करने से जहा संजीव शर्मा कर निचे देखने लगा वही शंकर ने पीठ पर थप्पड़ जड़ दिया.

"तू नहीं सुधरेगा बे. भतीजा शर्मा रहा है इसका तोह ख़याल कर थोड़ा. वैसे तू सही कहता है."

"क्या सचमुच ऐसी प्रॉब्लम है तुझे?", नरिंदर ने गंभीरता से कहा और थोड़ा पीछे हट गया. अब संजीव जोरो से हंस रहा था और शंकर ने फिर से अपने भाई की पीठ सेंक दी.

"सुधर जा भी सुधर जा. मेरा औजार दुरुस्त है और मुझे तेरी बात ाची लगी. 'रिग्रेट इस स्लो पाइजन'. नहीं सोचता इस बारे में और जो होगा देखा जायेगा लेकिन जो ठीक करने लायक नुक्सान हुआ है उसको सुधारने की पूरी कोशिश करूँगा. वैसे संजीव को जरूर उस मिया शाह जी से मिलवा दियो, मुझे शक है कही ये नाक न कटवा दे. इसके किस्से नहीं सुने न कभी मैंने बहार.", शंकर जी संजीव को लपेट रहे थे जो कुछ बोलने वाला था पर पहले नरिंदर जी हे बोल पड़े.

"अर्जुन के किस्से सुने है मतलब? जरा मुझे भी बता मेरे बेटे के बारे में. संजीव तोह थानेदार की कॉपी (कॉपी) है, ये एक से हे 4 निकालेगा.", नरिंदर का यही स्वरुप हर इंसान की निराशा मिटा देता था. लेकिन अब संजीव मंद मंद मुस्कुरा रहा था वही शंकर जी वापिस सोच में डूब गए.

"यार वो अपना बीटा है और ये दोस्त. उसको करने दे जो वो करे, कही साला नया पन्गा पड़ गया तोह लेने के देने पड़ जायेंगे."

"हाहाहा.. शंकर तू ऐसा न था भाई. मैं मजे ले रहा हु और तू सीरियस हो गया. जानता हु उसके पास राजा के साथ घर का पूरा mantri-mandal है लेकिन चमत्कार तोह वो भी करता हे होगा. नहीं भी करता होगा क्योंकि इतनी जल्दी रिश्ता हो गया उसका और वो बिटिया है भी लाखो में एक.", अपनी हे बात पर नरिदर को थोड़ा संदेह हुआ तोह अब शंकर के चेहरे पर हंसी आ गयी.

"उसके चमत्कार न हे जानियो भाई. एक के बारे में मुझे पता लगा था और उसके बाद से मैं थोड़ा दूर हे रहता हु. बस ये संजीव बाबू न आश्रम चले जाए कही इसकी बीवी अपने देवर की दीवानी हो गयी तोह. हाहाहा.."

"चाचा जी फ़िक्र न करो आप, राधिका अर्जुन के बीच न आने वाला मैं. वैसे आप देख लेना वो अपनी भाभी का ख्याल हर इंसान से बेहतर रखेगा. मेरा दिल कहता है की जितना प्यार अर्जुन मुझसे करता है वो उस से ज्यादा अपनी भाभी का ध्यान रखेगा. उसको यही तोह आता है बस.", संजीव का जाम ख़तम हुआ और बाकी दोनों की बियर भी.

"सिग्गट रात को पीनी बंद शंकर अबसे. घर में ये नहीं पीनी अब. संजीव दिन की 2 कर सकता है तोह हम इतना तोह कर हे सकते है? चल निचे खाना खाते है.", नरिंदर के इस फैंसले पर शंकर जी ने डिब्बी वापिस जेब में रख ली. संजीव सारा सामान समेत कर थैली में भरने के बाद घर के पीछे फेंक कर आ गया. सीढ़ियों से निचे उतारते हुए दोनों भाइयों के मैं में एक हे बात चल रही थी. संजीव और अर्जुन का ऐसा विश्वास ऊपर से उसका ये कहना की अर्जुन को सिर्फ ख़याल रखना हे तोह आता है. नरिंदर का मैं भली भांति जानता था अर्जुन को, वो लड़का इतनी काम उम्र होने के बावजूद chhip-chipata हुआ कितने हे खतरे लिए बैठा था सिर्फ अपनों के लिए.

"पापा आप लोग बैठिये मैं खाना लगाती हु.", ये ऋतू थी जिसके साथ इस वक़्त प्रीती भी काम करवा रही थी. टेबल साफ़ करने के बाद ये दोनों हे लड़कियां झूठे बर्तन धोने की जगह रख कर तीनो का खाना परोसने लगी. रामेश्वर जी अपने बीवी और राजकुमार जी के साथ खाना खा चुके थे और बाकी बचे भी. इनके बाद शायद घर की महिलाये हे बची थी और कृष्णा जी के कमरे में उनके साथ Aarti-Priyanka थी.

"सभी ने खाना खा लिया क्या ऋतू?", ये नरिंदर जी ने पुछा था और जवाब कोमल ने दिया जो टेबल पर अचार, पापड़ रखने आयी थी.

"चाचा जी माँ और ताई जी तोह बाद में हे खाती है लेकिन ऋतू का डिनर आज प्रीती के घर है, रेणुका बुआ बता कर गयी थी.", शंकर जी इन दोनों लड़कियों के तालमेल को कुछ हद्द तक समझते थे और इस मामले में अब वो कुछ कहने वाले भी नहीं थे. विन्नी और ऋचा सीढ़ियों से चलती निचे आयी जिनके हाथ में छोटा पिल्ला था.

"चाचा जी, हम इसको बहार घुमा रहे है.", विन्नी ने ऐसा कहा तोह शंकर जी ने मुस्कुराते हुए हामी भर दी. वो दोनों गलियारे से बहार निकली तोह नरिंदर जी ने पूछ हे लिया.

"यार ये पिल्ला कितने लोग पाल रहे है? ऐसे तोह हो गया ये त्रिनेड."

"उसको दादा जी ट्रेनिंग दे रहे है चाचा जी और अभी छोटा है तोह उन्होंने इतना हे कहा है की ज्यादा से ज्यादा लोगो से मिलवाते रहे. घूमने, खाने का टाइम भी अभी से बना दे तोह बाद की ट्रेनिंग वो आराम से देंगे.", अब अपने बाप के कथन पर ये दोनों कुछ कह भी नहीं सकते थे. ऋतू यहाँ खाना परोस कर रसोई में हे जाने लगी थी की अर्जुन कपडे बदल कर ऊपर से आता दिखा.

"मैं छोटे दादा जी के घर जा रहा हु, मेरा डिनर वही पर है आज.", प्रीती दरवाजे पर हे रुकी मुस्कुरा रही थी जैसे उसको ये पता था.

"हाँ तोह 5 मिनट बैठ, मैं भी चलती हु. वैसे तुम 3 घंटे से गायब कहा थे?", ऋतू बिलकुल पत्नी की तरह सवाल कर रही थी और अर्जुन अपनी माँ की तरफ देखने लगा लेकिन वह तोह पहले से प्रीती कड़ी उसको देख रही थी.

"वो.. वो मैं रोमिला आंटी के साथ था. उन्हें आर्ट रिलेटेड काम था थोड़ा और उसके बाद पेट्रोल डलवाने गया था कार में.", ऋतू मैं हे मैं हंस रही थी उसकी हालत पर और फिर बिना कुछ कहे रसोई में चली गई तोह प्रीती पानी का जग और गिलास टेबल पर रखने लगी जहा अर्जुन अपने भैया की हे बगल में जा बैठा. ये शंकर जी और अर्जुन की पहली मुलाकात थी पिछले दिन वाली बात के बाद. लेकिन वो बड़ा सहज नजर आ रहा था और आते हे उसने पापा के साथ चाचा को भी hello कहा.

"कल का क्या प्लान है छोटे?", संजीव भैया ने हे ये खामोसी भांग की.

"सवेरे वही आचार्य दादा जी के साथ, उसके बाद लाइब्रेरी जाना है भैया. फिर दादा जी और ताऊजी से पूछ लूंगा मेरे लायक कोई काम होगा तोह वो करूँगा. शाम को स्टेडियम नहीं है तोह घर पर हे वेगतः ट्रेनिंग. बाकी बचा टाइम आपके साथ और घर पर. फ़िलहाल तोह रूटीन यही रहने वाला है.", अर्जुन के जवाब से साफ़ जाहिर था की वो अब saaf-suthre टाइम टेबल पर चलने वाला है, घर के काम करने के साथ.

"अगर थोड़ा समय हो दिन में तोह निक रेस्टोरेंट तक चले जाना.", संजीव भैया और अर्जुन के बीच जैसे ये शब्द एक code-word था. अर्जुन मुस्कुरा दिया बस.

"हाँ चला जाऊंगा और जाने से पहले फ़ोन भी कर दूंगा.", अर्जुन ने सामने ऋतू को खाली हाथ खड़े देखा तोह तुरंत उठ गया. ये इशारा था प्रीती के घर चलने का और वो चुपचाप उन दोनों के साथ बहार निकल गया.

"ये नया रेस्टोरेंट है क्या कोई? खासियत तोह बताओ जरा यार, क्या पता कभी हम भी दर्शन कर ले. वैसे भी इन्दर के साथ बहार भी लंच किये बहोत समय हो गया.", शंकर जी के ऐसा कहने पर संजीव मुस्कुरा दिया.

"वह सिर्फ अर्जुन की एंट्री है चाचा जी, मेरी भी नहीं. यूनिवर्सिटी के अंदर हे छोटा सा बूथ में खोला है इसकी पहचान के व्यक्ति ने. मुझे भी इसके बड़े भाई के तौर पर पहचानते है तोह कहा था के मैसेज दे देना.", बड़ी सफाई से संजीव ने बातें gol-mol कर दी थी और उसको पता था शहर में शिक्षा वाली जगह से शंकर जी दूर हे रहते है.

"ये सही है के अभी से पहचान बना रहा है लड़का. वैसे शंकर मैं भी सोच रहा था ये रेस्टोरेंट का काम करने का. उमेद के साथ वो बिल्डिंग वाला काम शुरू हो गया था वही एक बढ़िया सा रेस्टोरेंट खोलेंगे भाई जैसा उधर अमेरिका में देखा था."

"तू सबकुछ हे खोल ले भाई और फिर वह भी तू मुझे बैठा देगा मेरी रिटायरमेंट के बाद. शादी के बाद बस दिल्ली वाले काम पर ध्यान दे, अर्जुन को मिलने दे ऐसे टटपुँजियो से जो कॉलेज में रेस्टोरेंट के नाम पर रेहड़ी लगते हो.", उनकी इस बात पर तोह संजीव का हंसी से बैठना हे दूभर हो गया. असलियत कहा पता थी इन लोगो को. और शंकर जी को कभी पता लगी तोह उनका हाल देखने वाला होगा.

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जहा अर्जुन और ऋतू आज रात्रिभोज के लिए छोल साहब के घर थे वही घर में आज सभी के सोने का स्थान थोड़ा बहोत इधर उधर हो चूका था. शंकर नरिंदर ने अपनी पसंद की जगह बैठक को हे araam-gaah बना लिया था और ऊपर वाले hall-kamre में Tara-Priyanka की जोड़ी की वजह से संजीव भैया भी अपने दादा जी वाले कमरे की बगल में बने मेहमान कमरे में सोने आ गए. फ़िलहाल तोह Tara-Priyanka के साथ रुपाली, अलका, माधुरी भी थी. कोमल निचे अपनी माँ, चची और ताई जी के साथ चची के कमरे में हे थी. आरती भी आज पहले हे बता चुकी थी की वो माँ के साथ सोने वाली है.

विन्नी Ritu-Alka वाले कमरे में बाथरूम से कपडे बदल कर आयी तोह ऋचा किसी सोच में डूबी दिखी. फ़िलहाल यहाँ purn-ekant था तोह विन्नी ने हे बात शुरू की.

"क्यों यहाँ आना ाचा नहीं लगा क्या?"

"अरे इस से ज्यादा ाची जगह कोई हो सकती है क्या यार? बस सोच रही थी की यहाँ सभी कितना hil-mil के रहते है और बड़े छोटे में कोई नाराजगी हे नहीं होती. कोई किसी पर आर्डर नै मारता, न यहाँ वो पंचायती सिस्टम जैसा अक्सर हवेली में दीखता है. दादी ने बहोत कुछ ठीक किया है लेकिन मुझे फिर भी ये घर पसंद है."

"ऋचा डार्लिंग, यहाँ तू शादी होने से पहले जितना मर्जी रह ले. उसके बाद तू मिलने आ सकती है लेकिन हमेशा यहाँ नहीं रह सकती. खैर जहा जाएगी वह ऐसा माहौल बना लेना, नहीं आता हो तोह अर्जुन से सीख ले.", इस नाम का जीकर करने का भी विन्नी का अपना हे मकसद था और ऋचा के चेहरे पर हलकी शर्म आ गयी.

"वो मिला हे कहा है जबसे आयी हु. बहार गले तोह लगा लेकिन बात नहीं हो पायी. उसने सचमुच मेरे आसपास के सभी लोगो को बदल दिया है विन्नी और वो इस घर का सबसे छोटा सदस्य है. मेरा उसके साथ ये उलझा हुआ रिश्ता न होता तोह मैं शादी इस से हे करती. बबिता दीदी को देखती हु तोह खुद के लिए बुरा लगता है."

"टेंशन मैट ले, ये रिश्ते धरे रह जाते है लेकिन जीवन भर याद रहेगा तोह वो एक हसीं पल जिसमे तुम्हारी चाहत तुम्हारे साथ रही हो. बबिता दीदी ने पहले जो किया वो उनकी इत्छा थी एहसान उतरने के हिसाब से लेकिन उन्हें भी प्यार हुआ और निसंकोच कबूल करती है के अब उन्हें जीवन में कुछ नहीं चाहिए. अर्जुन समय देगा तोह ाचा और नहीं मिला तोह अब जीने के लिए उनके पास वजह है. वैसे भी उन्हें सही मौका मिला और उन्होंने जाने नहीं दिया. यहाँ फ़िलहाल कुछ नहीं हो सकता सिवाय हलकी फुलकी पहल के.", विन्नी का इशारा घर के इतने सदस्यों की तरफ था और बात सही भी थी.

"चल जाने से पहले अगर ढंग से अपने दिल की कह भी पायी तोह बोझ उतर जायेगा. वैसे उसके साथ साथ यहाँ हर सदस्य बड़ा ाचा है. तुम तोह यहाँ आती रही हो न?"

"आती थी जब हम बचे थे लेकिन अब आयी हु सालो बाद और अर्जुन से पिछली बार मिलने के बाद तोह मेरा हवेली वाला कमरा भी जेल लगने लगा है. एक दो दिन में मैं तोह लपक लुंगी उसको, और नहीं सहा जाता. चल अब थोड़ी देर टीवी देखते है फिर Komal-Madhuri के साथ 'काट' खेलेंगे. उन्हें भी ाचे से आती है."

"इधर कर्रम भी रखा है.", ऋचा ने खड़े होते हे दिवार पर टेंगा वो बड़ा कर्रम बोर्ड दिखते हुए कहा.

"रहने दे, वो अपने बस का नहीं है. हमको तोह तारा और अलका हे निबटा देंगी और कोमल यहाँ सब पर भरी है कर्रम और चैस में. ये दोनों खेल वो पहली कक्षा से खेलती आ रही है. पिछली बार देखा था मैंने कैसे वो बारी हे नहीं आने देती. ताश में भी ध्यान रखियो, थोड़े हाथ सही चले तोह गेम ख़तम.", कोमल के बारे में ये नयी जानकारी मिली थी ऋचा को. हमेशा सबके सामने खामोश या थोड़ा बहोत बोलने वाली कोमल इन खेल में माहिर होगी उसने सोचा भी नहीं था.

"चैस. समय मिला तोह मैं जरूर खेलना चाहूंगी कोमल के साथ. कर्रम में अगर वो बारी नहीं आने देती तोह मतलब साफ़ है की मेरी उतनी गेम नहीं है. चैस तोह मैंने भी दादी और माँ के साथ बहोत खेली है बचपन से. माँ और दादी को एकसाथ खेलते ज्यादा नहीं देख लेकिन परसो वो लोग खेल रही थी. 3 घंटे बाद दादी हे हारी थी और मैं माँ को घंटे में हरा देती हु अब. दादी के साथ भी उतनी हे लमि चलती है बाजी.", ऋचा उठ कर विन्नी के साथ कमरे से बहार निकलती हुई अगले भाग के hall-kamre में चली आयी. इत्तेफ़ाक़ से यहाँ पहले हे शतरंज की बाजी चल रही थी. रुपाली और अलका के बीच.

"वाह. यहाँ तोह पहले हे आनंद और क्रेमनिक खेल रहे है.", विन्नी के ऐसा कहते हे अलका ने बाजी निबटा दी.

"इनके साथ नहीं खेलना विन्नी दीदी. अलका थोड़ी हे देर में हरा देती है. पहले प्रियंका दीदी हारी, फिर तारा ने थोड़ा मुकाबला किया लेकिन मेरी तोह बाजी हे 10 मिनट में ख़तम.", रुपाली के ऐसा कहते हे अलका न प्यार से सर सेहला दिया.

"ऐसे हे बोल रही है ये गुड़िया. बैठो आप दोनों यहाँ ऊपर हे आ जाओ.", अलका ने बोर्ड पीछे खिसकते हुए दोनों को जगह दी और सोफे पर बैठी Tara-Priyanka इत्मीनान से फिल्म में मशगूल थी. माधुरी भी बाथरूम से कपडे बदल कर सिंगल सोफे पर आ बैठी.

"ऐसे तोह कोई भी नहीं बोलता अलका मैडम. मुझे भी पता है के दिमाग में तुम कही ज्यादा हे तेज हो. अगर कुछ जरुरी नहीं करना तोह अपनी ऋचा को भी ये पसंद है. एक बाजी खेल लो क्या पता थोड़ा मुकाबला देखने मिले.", ऋचा पहले ना में सर हिलने लगी थी लेकिन अलका ने उन्हें खेलने के लिए राजी कर हे लिया.

"विन्नी दीदी की हर बात का ख़ास मतलब होता है और इस से इतना तोह पता चल हे गया के ऋचा दीदी आप बेहतर खिलाडी है."

"ठीक थक खेल लेती हु अलका और सच कहु तोह एक यही खेल है जो दिमाग की कसरत करवाने के साथ साथ टेंशन भी काम करता है. मैं काले मोहरो से खेलती हु ये बाजी.", ऋचा ने शतरंज की दिशा बदलते हुए काले मोहरे अपनी तरफ कर लिए. अलका को ऐतराज न था पहले चलने पर.

"मैंने ये खेलना थोड़े हे समय पहले शुरू किया है ऋचा दीदी और वो भी कोमल दीदी मुझे और ऋतू को सिखाती थी. आप पहले से खेलती आयी है तोह स्वाभिक है मैं ज्यादा देर नहीं टिकने वाली.", अपनी चाल चलते हुए अलका ने अपने थोड़े ज्ञान की बात सामने राखी.

"तोह ऋतू भी तुम्हारी तरह खेल लेती है? इसलिए पूछ रही हु क्योंकि रुपाली को तुमने ज्यादा मौके नहीं दिए और चाल अलग अंदाज में शुरू की है.", ऋचा ने भी अपना प्यादा बढ़ाया.

"ऋतू अटैकिंग खेलती है और मैं डिफेंसिव. जिस से एक गलती हो जाये तोह दूसरा उसकी पल्टन ख़तम कर देता है. मैं राजा के आसपास रहती हु और वो प्यादे से ले कर वजीर तक सबको ख़तम करके राजा को तनहा करके बाँध देती है. डॉक्टर बन्न रही है न तोह रेहम नहीं करती, हम बिज़नेस की पढाई करने वाले मार्केट काम हे करते है.", अलका की मजेदार बातें और सधी हुई चाल देखते हुए ऋचा भी उसके हे अनुसार खेलने लगी. ये बाजी पूरे एक घंटे तक चली लेकिन बेनतीजा रही. साथ वाले बंद कमरे में कपडे बदल कर अर्जुन भी इधर हे चला आया और निचे से कोमल दीदी भी सब काम निबटा कर ऋतू के साथ आ गयी. माधुरी दीदी भी जा चुकी थी पिछले हिस्से में जहा आज वो Tara-Aarti वाले कमरे में विन्नी के साथ सोने वाली थी.

"उफ़.. यार तुम कहती हो के तुम डिफेंसिव खेलती हो, यहाँ बोर्ड पर बचा हे क्या है देखो जरा. बहोत बेहतर खेलती हो यार अलका तुम, वैसे एक गेम तोह मेरा दिल कोमल के साथ खेलने का भी है अब.", ऋचा ने ऐसा कहा तोह कोमल ने सहर्ष हे प्रस्ताव स्वीकार कर लिया.

"ऋचा दीदी, आप अलका दीदी की बातों में आ गयी और ये शतरंज से ज्यादा दूसरे के मंद से खेलती है. खैर अपनी कोमल दीदी चुपचाप आराम से खेलेंगी.", अर्जुन भी एक तरफ बोर्ड के सामने पसर गया जिसकी पीठ पर ऋतू जा बैठी. यहाँ इन दोनों की बाजी शुरू हुई तोह 10-12 चाल तक कोमल जैसे बेमन से हे कभी प्यादे और कभी कोई घोडा हिला कर इधर से उधर करती रही. ऋचा से सिर्फ एक चूक हुई थी और वो बेमन से आगे लाये गए घोड़ो के दम पर हे कोमल ने वजीर से check-mate कर दिया. विन्नी को भी समझ नहीं आया के ऋचा चल क्यों नहीं रही.

"इतना क्या सोच रही है, बारी चल."

"क्या चालू? बाजी ख़तम हो चुकी है विन्नी. मैं तोह ये समझ रही हु की कोमल ने किया कैसे ये सब? पूरे 15 मिनट भी नहीं हुए और काम ख़तम. ये प्यादा आगे करती हु तोह वो सामने वाला ऊँट मारेगा, ये राजा तोह हिलेगा भी वजीर की तरफ जो मारेगा हे और इधर प्यादे से ब्लॉक नहीं होगा. दूसरा घोडा भी ढाई कदम पर है है एक कदम हिलते हे. मुझे तोह लगा था ये मेरे मजे ले रही है गेम जल्दी ख़तम करने के चक्कर में लेकिन इसको जैसे मेरी हर चाल पहले हे पता थी. शीट.. आउटस्टैंडिंग गेम कोमल.", ऋचा के चेहरे पर दिल से ख़ुशी के भाव थे हारने पर भी. कोमल ने बस हलके से मुस्कुराते हुए हाथ मिला लिया.

"मैं यही से खेलना चाहता हु कोमल दीदी के साथ अगर वो बस ये वजीर पीछे कर ले और ये काले वाला प्यादा वापिस अपनी जगह कर दो तोह.", अर्जुन को शतरंज खेलते इन्होने किसी ने नहीं देखा था लेकिन वो अपने दादा के साथ लम्बी बाजी खेलता था जब भी समय मिलता था. बचपन से हे उसको लगाव था इन haathi-ghode वाली गिट्टियों से. अर्जुन के ऐसा कहने पर खुद कोमल ने वो दोनों अपनी अपनी जगह करके बोर्ड उसकी तरफ घुमा दिया.

"ारु अगर तू जीता तोह मेरी तरफ से पार्टी.", ये तारा ने कहा था और वो भी अपने हीरो को खेलते देख इधर चली आयी.

"ारु 15 मिनट से ज्यादा टिका तोह मेरी नयी वाली ड्रेस तेरी हो जाएगी तारा.", अलका के ऐसा कहने पर अर्जुन ने चौंक कर देखा जैसे उसको लगता था अलका उसका समर्थन करेगी.

"अर्जुन जीतेगा मैं कह देती हु.", विन्नी के ऐसा कहने पर ऋतू हंसने लगी थी. और भाई बहिन चल चलने लगे. ऋचा बड़े गौर से देख रही थी ये बजी जिसको अर्जुन ऋचा की 2 गलतियों के बाद भी ाचे से संभल रहा था.

"गईं लो सभी और 5 चाल के अंदर बाजी ख़तम होने वाली है.", ऋतू के इस कथन पर अलका भी मुस्कुरा दी. और उस से भी बुरा हुआ, 4 चाल के बाद हे अर्जुन बाजी हार गया.

"हद्द है दीदी. मैंने तोह ाचे से संभाला था सबकुछ फिर ये चूक कहा से हुई? यकीन नहीं होता.", अर्जुन अभी भी ध्यान से देख रहा था. लेकिन जवाब ऋचा ने दिया.

"तुमने मेरी खेली हुई बाजी अपने हाथ में ली, थोड़ा सुधार करके. दूसरी तरफ वही खिलाडी था जिसने पूरी बाजी खेली. पहले तुम्हे मुझसे समझना था या फिर ऐसे अधूरे खेल में उतरना हे गलत है. जिस तरह से तुम खेल रहे थे मुझे लगता था के नयी बाजी होती तोह तुम जीत जाते.", ऋचा ने ये बात जैसे भी कही हो लेकिन इसका असर कही दूर तक हुआ था अर्जुन के जेहन में. किसी और की अधूरी बाजी, सामने वाला पुराण खिलाडी..

"थैंक यू समझने के लिए और दीदी हम फिर कभी खेलेंगे अब ये. मैं चला निचे माँ के पास सोने.", अर्जुन उठा खड़ा हुआ तोह प्रियंका दीदी बोल उठी.

"माँ के पास आज आरती है अर्जुन. तू तेरे कमरे में हे सो जा.", अब अर्जुन समझा या उसके ऊपर से गया लेकिन जवाब फिर भी दे गया.

"मेरी 2 माँ है. चची माँ के पास आरती दीदी है तोह मैं मेरी प्यारी माँ के पास सो जाऊंगा."

"मैं भी चलती हु.", ऋतू ने कहा तोह अर्जुन ने घूर कर देखा.

"आप नहीं सो सकती, मैं किनारे हो जाता हु और पहले गिर भी जाता था जब छोटा था. आप ये अलका जी के साथ आराम करिये देवी जी, हम चले अपनी माता के पास.", अर्जुन हाथ हिलता बहार जाने से पहले सबके सामने हे विन्नी के गाल को चूम कर भाग गया.

"तू रुक बदमाश कही के.", जवाब में बहार से अर्जुन की यही आवाज aayi..'Vinni-Tinni-Minni गूडनिघत'

"हाहाहा.. दीदी आपको तोह यही परेशां कर सकता है. देख लो इतना कोई और बोल जाये तोह गाल सेंक देती अबतक.", अलका के ऐसा कहने पर विन्नी हंसने लगी थी. अंदर से तोह दिल मचल चूका था इस हरकत पर लेकिन जाहिर बस bhai-behan वाला प्यार हे किया.

"वो ऐसा सभी के साथ करता है तोह मैं भी सब में हे आती हु. वैसे ये अभी तक चची के साथ सोता है?", इस सवाल पर ऋचा भी कोमल की तरफ देखने लगी.

"अर्जुन तोह जहा दिल करे सो जाता है. ये ऋतू और रुपाली भी माँ के साथ अभी तक सोती है. अलका इस मामले में थोड़ी बड़ी हो गयी इस से.", कोमल दीदी के इस जवाब पर ऋतू तुरंत पलट कर बोल उठी.

"कही बड़ी न हुई ये अभी तक. मैं इसके साथ नहीं सोती तोह ये माधुरी दीदी और आपके बीच पसर जाती है. अकेले सोने को बोलो तोह जरा इसको. थोड़े टाइम पहले तक तोह ताई जी के साथ भी सोती रही है दोपहर में. हाँ.. और विन्नी दीदी माँ के साथ हे तोह सोते है न बचे."

"तू बची नहीं है अब. कल ब्याह कर दे तोह साल से पहले चाचा को नाना बना देगी.", विन्नी के ऐसे तंज पर भी ऋतू ढिटाई से हंसने लगी.

"आप जरा प्रैक्टिकल दिखा दो इसका. पापा तोह आपकी बारी में भी नाना हे बनेंगे या कुछ और बनाने का इरादा है?", अब फुर्ती से वो इधर से भागी तोह अलका पेट पकड़ कर हंसने लगी थी.

"ले लो मजे आप भी विन्नी दीदी. ऋतू ने पिछली बार भी ऐसा हे कुछ कहा था और आपके हाथ ये तब भी नहीं आयी थी."

"हद्द है यार कोमल, ये लड़की तोह आग बानी फिरती है. कुछ भी बोलती है और सोचती भी नहीं.", विन्नी के गाल लाल हो चुके थे बात समझते हे और अब वो झेंपते हुए कोमल से शिकायत लगा रही थी.

"दीदी, वैसे आपको तोह लगता है ऋतू की बात पसंद हे आयी है. और इतना बुरा भी नहीं है हमारा भाई जो बुरा लगे.", ये तारा थी जिसने मौके पर चौका जमा दिया था.

"तारा की बची तू भी सबके जैसी हे है. चल कोमल, यहाँ से चलते हे है. पता नहीं इसके बाद जाने ये प्रियंका भी कुछ बोल उठे.", विन्नी की बात पर कोमल भी मुस्कुरा दी और प्रियंका पहले से हंस रही थी. विन्नी आज माधुरी के साथ ऊपर हे सोने वाली थी और कोमल ऋचा के साथ. ये चारो हे कमरे से निकल चली तोह तारा ने प्रियंका से दरवाजा बंद करते हुए कहा.

"प्लान फ़ैल हे समझो अपना तोह. अर्जुन नहीं आने वाला अब ऊपर इन सबकी वजह से और आज तोह प्रीती भी Ritu-Alka के पास सोने वाली है. बत्ती बुझाओ और चादर तान के मीठे सपने हे लो जानेमन."

"ाचा है न वो नहीं आया. तेरे साथ उसकी ख़ास डिमांड थी और कही तेरे चक्कर में वो मेरी चाल खराब करता तोह मैं फंस जाती. तेरी तोह कल सवेरे की छुट्टी है."

"कहा यार दीदी, कल का हे दिन है उसके बाद तोह मुझे नहीं लगता अगले 12-13 दिन अर्जुन हाथ लगेगा. देखते है अब किस्मत रही तोह अर्जुन के साथ कल वक़्त कटेगा नहीं तोह ऊँगली तोह मैं करने वाली नहीं अब. गूडनिघत.", तारा ने लैंप बंद करते हुए अलग हे चादर ओढ़ ली और प्रियंका ने भी मैं मारते हुए वैसा हे किया. दूसरी तरफ प्रीती पहुंच चुकी थी Alka-Ritu के कमरे में.

"काम हो गया दीदी और सब सफाई से मेरे कंप्यूटर में कॉपी कर लिया. टाइम मिलेगा तोह देखते है क्या कुछ था वह.", ऋतू और अलका के बीच पसरते हुए प्रीती ने भी खुशखबरी दी. ऋतू और अलका ने दोनों तरफ से उसके गाल चूम लिए.

"इसलिए बीच में लिटाया है? पहले कह देती हु कुछ ऐसा वैसा नहीं हाँ..", प्रीती ने हँसते हुए कहा था लेकिन तारा का हाथ सरक कर उसके उभर पर आ रुका.

"खा नहीं जाएंगे तुझे. चुप कर के लेती रह न, बस देखने दे की तेरे वाले ऐसे क्या ख़ास है जो हमारा मुन्ना कण्ट्रोल नहीं कर पता."

"हाहाहा.. ये रो न पड़े अलका. ऊपर से हे हाथ रख ले और अगर भड़क गयी तोह ये अर्जुन के काबू नहीं आती, अपनी हालत न खराब कर दे.", लेकिन यहाँ प्रीती ने काम कर हे दिया था अलका का.

"अब ऐसा है तोह मैं भी जांच हे लेती हु की मेरी हालत कैसी होने वाली है इनके बॉयफ्रेंड से.", और अलका तुरंत पीछे हट गयी प्रीती का हाथ छूट पर लगते हे. कुछ ज्यादा हे ाचे से सेहला दिया था प्रीती ने.

"ोूई.. कमीनी.. ऋतू सही कहती है. तू तोह दूर हे रह यहाँ से. एक तोह वो पागल है दूसरा तू भी उसके हे जैसी. ऋतू तू हे संभल इसको मैं तोह सोने लगी बाबा.", और प्रीती हंसती हुई ऋतू के सीने से लिपट गयी. थोड़ी हे देर बाद अलका भी वैसे हे पीछे लिपटी थी और साढ़े 11 बजे तक यहाँ सभी नींद के आगोश में जा चुके थे. बस निचे आज अर्जुन का सोने का कोई इरादा न था. आज कुछ कदम आगे बढ़ने वाला था वो 'तिलोत्तमा' के साथ स्वर्ग के सफर पर.
 
ी गेस नाउ ी शुड टेक ा ब्रेक. सम well-wishers फील सो एंड थिस इस टोटली सेल्फ स्ट्य्लेड. ी विल पोस्ट ान अपडेट टुमारो एंड नेक्स्ट विल बे व्हॅनवर ी विल फील कम्फर्टेबले.

सॉरी गाइस बूत ी नीड ा ब्रेक फ्रॉम एवरीथिंग.

कल रात अपडेट दूंगा उसके बाद जब ठीक महसूस करूँगा तब कहानी कंटिन्यू करूँगा लेकिन लिखता रहूँगा. 6 महीने वाले कृपया दूर रहे इस सबसे. ?
 
अपडेट आज रात 10 बजे तक दूंगा दोस्तों. कहानी मेरी है और मैं इतने लोगो को निराश नहीं करूँगा. जहा जरुरी होगा जवाब दूंगा लेकिन मेरी उपस्थिति यही तक सिमित रहेगी. ढेर सारा प्यार और भावनाओ को आहात करने के लिए माफ़ी.

बस मर्यादा बनाये रखिये और इस थ्रेड पर कोई टिका टिपण्णी नहीं करनी किसी भी व्यक्ति विशेष की.

एनिग्मा
 
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