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अल्फा - (2)
जिसका सुक्ष्म कानन भी सर्वोपरि हो उसका वर्णन खुद ब्रह्मा न कर सके और बनाने वाले विश्वकर्मा भी. Til(sesame सीड) सामान अनु भी उत्तम है तभी वो तिलोत्तमा है. जाने कितने हे असुर उस ख़ूबसूरती पर मोहित हो जान गँवा बैठे और साक्षात देवराज इंद्रा समेत कितने हे देवगण हांसिल करने को बेक़रार. तिलोत्तमा को पाना किसी चह्वाण के वश का न था, वो सिर्फ तिलोत्तमा स्वयं निर्णय ले या फिर कोई ऐसा जिसके लिए वो एक kaam-bhog से बढ़कर हृदय से लगा कर रखने वाली प्रेयसी हो.
वैसाख का ये समय उतना भी उष्मित न था और इस एकांत कमरे में प्रज्वलित हलकी सुनहरी रौशनी जैसे यहाँ उपस्थित इस तिलोत्तमा से फूट रही हो. जहां शान्ति से लबरेज ये माहौल अर्जुन की दिल की धड़कन भी बता देता. यहाँ उसकी मौजदगी आज ख़ास थी जिसमे वो एक निरनय लिए आया था. रेखा का दिल भी समझ चूका था अर्जुन का उद्देश्य और पहली बार उसको अपने बेटे के समीप होने पर घबराहट थी. अर्जुन द्वारा वो 2 कदम का फैसला पूरा करते हे रेखा के महकते बदन पर असंख्य ौंस की बूंदे उभर आयी. घबराहट का असर था या अर्जुन की चाहत, परन्तु स्पष्ट था की रेखा आज अर्जुन को रोकने नहीं वाली था.
वो घने कमर तक आते बालो का अर्जुन के हाथो खुलना हे रेखा की आँखें बंद करवाने के लिए बहोत था. फर्श पर अर्जुन की तरफ पीठ किये कड़ी रेखा की धड़कन आज अनियंत्रित थी. जल्द हे उस मुलायम कंधे पर अर्जुन के तपते होंठो की छुहान ने इस ख़ामोशी को भांग करके का काम किया.
"आठ.. तुम जानते हो न इसका परनिअम क्या हो सकता है.? एकाधिकार चाहते हो मुझ पर?", रेखा की सांसें आज पहली बार अर्जुन के सिर्फ स्पर्श से हे उखड रही थी. संसर्ग पहले भी हुआ था लेकिन आज अर्जुन उन्हें पाने की ठान चूका था. उसके दोनों मजबूत हाथ कमर को सहलाते हुए नाभि पर आ रुके. पूरा जिस्म अपने आगोश में लिए अर्जुन उन महकते गीले केशो की सुगंध सीने में भरने लगा.
"एकाधिकार नहीं स्वयं को सौंप रहा हु आपके पास. आपकी शोषित आत्मा अगर मेरे ऐसा करने से पूर्ण होती है तोह परिणाम की चिंता नहीं. मैं अब आपका हु माँ.", अर्जुन के ऐसा कहने पर रेखा ने हर विचार को परे कर दिए. बीटा अगर माँ को पोषित करना चाहता है तोह साथ देना स्वीकार है. केश एक तरफ करता अर्जुन भी माँ की सहमति पा चूका था. मखमली त्वचा पर रेंगते होंठ गर्दन से गुजरते उन रक्तिम मुलायम गालो पर आ ठीके. अर्जुन हर divya-ras की ौंस सी बूँद ग्रहण करता उस पुष्पित गाल को होंठो में भरने लगा.
यहाँ जैसे संसार रुक चूक था. मजबूत हाथ गहरी नाभि सहलाता उस तरल सामान सम्मोहक जिस्म के उठान तक आ पंहुचा. ये सम्मान से खड़ा ठोस गुम्बद सा उरोज सब्सके ख़ास अंग था रेखा को उत्तेजित करने का. पंजे के घेरे से कही बड़ा और पुष्ट सतांन मजबूत से दबाते हुए अर्जुन ने मोहर लगा दी थी रेखा के स्वामित्व पर.
"आह्ह्ह्ह.. ", इस मादक सिसकी की वजह चूचक से छलकता दूध था जहा अंगूठे और तर्जनी का मर्दन इस gulabi-kathai चूचक को आकर देने लगे. जाहिर था की आज अर्जुन अपनी माँ को बंधनमुक्त प्रेम सफर पर ले जाने वाला था. निरंतर एक मॉटे उभर को मसलता वो दूसरे हाथ से चेहरा अपनी तरफ करता उन मधभरे होंठो को रास भी निचोड़ने लगा. अर्जुन का इस तरह अधिकार युक्त प्रेम प्रदर्शन जैसे रेखा के जिस्म पर ये पहला पुरुष स्पर्श सा था. फर्श पर टपकता दूध और जिव्हा रास में लिपटे होंठो ने दोनों को इस कदर उत्तेजित कर दिए की बचा हुआ वस्त्र एक झटके में चर्र की आवाज करता रेखा के बदन से जमीन पर जा गिरा.
"आज कोई बंधन नहीं माँ और कोई हद्द नहीं. ये आपके जीवन का वही प्रथम क्षण है जिस से आज तक आप वंचित रही.", रेखा का अलौकिक दिव्या स्वरुप वस्त्रहीन हो कर अर्जुन के सम्मुख था. बेजोड़ दुग्ध कलश अपनी क्षमता से अधिक भरी हुए इस श्रेष्ट युवक के चौड़े सीने में दबे थे. बलखाती मेरु (रीढ़) के जोड़ से नीचे व्याप्त वो काल्पनिक से Kaam-gaagar नितम्ब मसलता अर्जुन आज रेखा के हर कानन को अपने वजूद से भरना चाहता था. इतनी जोर से उन मटके से कूल्हों का मर्दन पहले न हुआ था. मुलायम रबर से दोनों कूल्हे मसलता हुआ वो रेखा के ang-ang को पुलकित करने लगा. स्वतः रेखा ने हे अपने होंठो को अर्जुन से मिला दिया. मुखरास बेहटा हुआ होंठो तक आ चला तोह कुछ पल दोनों अलग होते एक दूसरे को देखने लगे.
"तुम मुझे इस स्वरुप में स्वीकार हो अर्जुन बस ये रिश्ता..", अर्जुन ने उन मृगनयनो से पहले हे जान लिया था की वो क्या कहने वाली है.
"ये रिश्ता आपके अनुसार और आपके दायरे में रहेगा. अब मैं वक़्त जाया नहीं करना चाहता, प्यार करना चाहता हु.", अगले हे पल घुटनो पर बैठते हुए अर्जुन ने जड़ से हे शुरुवात कर दी. वो चमकदार बूंदो से घिरी कमलिनी सी योनि का सम्पूर्ण अकार अर्जुन के होंठो में भर गया. इतनी मादक गंध किसी की न थी जितनी रेखा के यौवन से आज बरस रही थी. चुम्बन जल्द हे उन केसरी फांको से कस्तूरी पीने में बदल गया. एक हाथ निरंतर पुष्ट उरोज को मसलता और दूसरा भारी गोलाकार कूल्हों को. कॉमर्स बहती योनि का विस्फोट जैसे दोनों को निहाल कर गया.
"आह्ह्ह्हह्ह.... उम्.... अर्जुनंनं..", रेखा ने स्खलन के बावजूद अर्जुन को न रोका. उसका सर अपनी योनि पर दबती जैसे वो खुद आज इस सफर के हर पल को जीना चाहती थी, पागलपन की हद्द से परे. उत्तेजना काम होने की जगह बढ़ने लगी तोह अपना दूसरा सतांन वो खुद हे दबाने लगी. टपकता दूध अर्जुन के चेहरे पर गिरने लगा. यहाँ समय से परे हो रहा था सबकुछ. उन्नत जांघो को चूम कर अर्जुन खड़ा हुआ तोह रेखा ने मुक्त प्रेम पर अपनी पहल करि. तराशा हुआ जिस्म अलग हे मादकता से निचे हुआ और अर्जुन की कमर से वस्त्र सरकता जमीन तक ले गया.
"आप..", अर्जुन कुछ कहता उस से पहले हे रेखा ने वो लहराता हुआ ashwa-ling मजबूती से पकड़ते हुए ना में सर हिला दिया.
"प्यार एकतरफा नहीं होता जब दोनों सहमत हो. खुद को सौंप चुके हो न? तोह सवाल नहीं.", आज अपनी माँ के हाथो में खुद का लिंग देख अर्जुन भी चकित था. इतनी उत्तेजना और सुख जैसे पहली बार था. अपनी क्षमता से कही ज्यादा विशाल अकार लिए वो अंग रेखा के हाथो में कही ज्यादा मचल रहा था. लाल दहकता सूपड़ा उजागर होते हे रेखा ने अपने होंठ चिपका दिए. इस हलके चुम्बन ने अर्जुन को एहसास करवा दिया था माँ के समर्पण का. जल्द हे वो जीरो के बल्ब सा मोटा सपड़ा उन लाल होंठो से गुजरता गरम मुख में आ रुका.
"आअह्ह्ह.. माँ... उम्म्म.. आराम से.", मजे की इन्तहा से अर्जुन की आँखें बंद हो चुकी थी लेकिन रेखा के लिए तोह जैसे आज पहली prem-pariksha थी. होंठ बुरी तरह फैले उस कलाई से मॉटे लिंग पर जल्द हे हिलने लगे. नरम जीभ की रगड़ सुपडे को और आनंदित करने लगी, अकार मुँह के अंदर फूलने लगा. जल्द हे आधी लम्बाई मुँह में समाये रेखा ने mukh-maithun की रफ़्तार बढ़ा दी. हलक में लगने के बावजूद वो अर्जुन को उत्तेजना के शिकार पर ले जाती रही.
"बस्स्स...", अर्जुन ने माँ का सर पकड़ते हुए खुद को पीछे खींच लिया. मुखरास में बुरी तरह भीगा सूपड़ा माध्यम रौशनी में कोहिनूर सा चमक रहा था. अर्जुन ने माँ की दोनों गोलाकार नरम बाहें पकड़ते हुए सम्मुख खड़ा कर लिया. चूचक भी दूध बहते दोनों उभारो को भिगो चुके थे और अब अर्जुन अंतिम कदम लेने चला था. माँ के भीगे होंठो को बुरी तरह चूमता वो उन्हें बाहों में भरे इस बिस्टेर पर चला आया. रेखा ने भी खुद को अर्जुन के निचे कालीन सा बिछाते हुए दोनों गुदाज जाएंगे फैला ली.
"आप तैयार है न?", चुम्बन रोक कर अर्जुन ने इतना हे कहा था और रेखा ने उसके दोनों पंजे अपने दुग्ध कलशो पर जमा दिए.
"आज से ज्यादा तैयार तोह कभी न थी. आज वो सुख दो अर्जुन की सवेरा मुझे मेरी ये पहली रात बताये.", रेखा के इतना कहते हे दोनों के होंठ पुनः चिपक गए. दोनों मॉटे उभारो को मसलते हुए अर्जुन ने जांघो के बीच अपने kaam-dand का दबाव बनाया तोह रेखा ने हे लिंग थाम कर अपनी कमलिनी के मुहाने भिड़ा दिया. आज लिंग की मोटाई भी रेखा के जिस्म की तरह चरम पर थी. वो 2 गुलाब की भीगी पत्तिया भी जैसे सिहर उठी थी इस दहकते हुए सुपडे के चुम्बन से. क्षण के सौवे हिस्से में हे अर्जुन ने एक करारा वार कर दिया. तरल से भीगी yoni-surang भी दर्द से भर उठी इस मोटाई और धक्के पर.
"Aahhhh..ummm..", रेखा ये लिंग पहले भी ले चुकी थी पर आज जैसे prem-dard का भरपूर एहसास हुआ था. आधा लिंग बुरी तरह से उस सहेज कर राखी कासी हुई योनि को चीरता अंदर जा चूका था. अर्जुन ने तुरंत हे दूसरे वार में समूचा लिंग प्रवेश करवाते हुए गर्भ तक का रास्ता माप लिया.
"मममम.. आअह्ह्ह.", ये घुटी घुटी सी आवाज रेखा के पूरा होने का सन्देश था. योनि का अंदरूनी मांसल नरम हिस्सा बुरी तरह फैलाये वो भीमकाय लिंग गहराई तक फंस चूका था. होंठ अलग करता अर्जुन भी अब दोनों चुचो को मसलता एक निप्पल चुसकने लगा. साँसे नियंत्रित होते हे रेखा ने कमर को हिलाते हुए एक सिकसरी भरी.
"आप सरोवोत्तम हो... हहहहह..", अर्जुन इतना कहते हे आधे लिंग को बहार खींच कर फिर से अंदर करता हुए रेखा की गर्दन का मांस होंठो में भरने लगा. रेखा के लालिमा चढ़े लम्बे नाखून भी इन जोरदार धक्को से अर्जुन की मजबूत पीठ पर धंसने लगे. हर दुमदार धक्का योनि पटल को जैसे उधेड़ने लगा था. भारी वृषण (अंडकोष) नितम्भो की दरार पर टकराते और योनि रास चूमते. कुछ हे पल में कमरे में बस रेखा की लम्बी आहें और कॉमर्स की महक भर चुकी थी. रबर सी फैली हुई योनि की अंदरूनी गुलाबी रंगत लाल होती हुई लिंग के बहार आते हुए साथ खींची आती.
"आअह्ह्ह.. ऐसे हे .. उम्म्म.. माहहह.. कोई उठ जायेगा.. अर्जुन..", रेखा आवाज रोकना भी नहीं चाहती थी और मजबूरी भी थी. इस सबसे बेखबर अर्जुन तोह जैसे अपनी चाहत के सान्निध्य में जोरदार संसर्ग करता रहा. अब धक्को से बिस्टेर चरमराने के साथ रेखा के स्टैनो की भी भरपूर रगड़े होने लगी. 'Thapp-Thapp' की आवाज कॉमर्स ने बदल कर 'Fachh-Fachh' बना दी. हर बार सूपड़ा गर्भ पर लगता और इतने कॉमर्स से guda-dwaar के साथ बिस्टेर भी भीगने लगा.
"पलट जाओ आप. आह्हः..", अर्जुन की आवाज के बावजूद रेखा को हलकी परेशानी महसूस हुई. योरस से सरोबार लिंग बहार निकलते हे जैसे योनि ने गहरी सांस लेते हुए भरपूर रास बहार उड़ेल दिया. रेखा ने हिम्मत करते हुए करवट ली हे थी और अर्जुन ने मजबूती से वो पतली कमर थाम कर पिछले हिस्से को ऊँचा उठा दिया. वो गोलाकार गोर बेदाग़ नितम्भ चूमते हुए अर्जुन ने दांत गड़ाए तोह रेखा कराह उठी. अर्जुन आज सचमुच उस पर अधिकार जाता रहा था.
"एक मिनट.. अभी मैट डालना.. आठ..", रेखा ने चौपाया मुद्रा में हे ओढ़ने वाली चादर को खिंच कर मुँह में दबा लिया. अर्जुन ने भी इशारा मिलते हे दोनों बड़े कूल्हों के बीच उस गुलाबी रास बहती योनि पर लिंग टिकते हुए एक भरपूर धक्के से पूरी गहराई पार कर दी. उभर कर बहार निकल आयी योनि जैसे हल्का चिर्र हे गई थी. यहाँ 2 बेजोड़ nar-maada का जोरदार मिलान अब तूफानी रफ़्तार चल पड़ा. अर्जुन समागम करने के साथ साथ दोनों चुचो को दबाता माँ की पीठ चूमने लगा. रेखा जैसी अनुपमा को आज अपने स्त्रीत्व का पूर्ण एहसास हुआ था. अर्जुन शरीर के साथ अब आत्मा पर भी नाम लिख चूका.
"ाःह.. धीरे.. काट मैट अर्जुन. .. आठ.. ऐसा प्यार.. आह्हः.", अपनी हे बात गलत साबित हुई रेखा को अर्जुन द्वारा पीठ पर काटकने से. वो उस हिस्से को हल्का काटने के बाद चूमने लगा तोह रेखा जाने कौनसी बार चरमसुख प्राप्त करने लगी थी. बिस्टेर पर दूध की धारे इधर उधर बरसती और उमस भेदने लगी. कनक रुपी वो गुलाबी योनि पौने घंटे के संसर्ग और उस विशाल लिंग से बड़े 'ो' में बदल चुकी थी. Ashwa-shakti सा अर्जुन जैसे जिस्म की हर ऊर्जा इस पल में लगता अविलम्ब धक्के लगता रहा. बिस्टेर के सिरहाने रखा सजावट का सामान बिखर चूका था और लकड़ी के पायो की छू छू का भी अर्जुन पर कोई असर न हुआ.
"आह्हः.. माआ..", अब कही रेखा के इस जोरदार सखलन पर अर्जुन भी घोड़े की तरह हिनहिनाता बुरी तरह रेखा से लिपट गया. जड़ तक लिंग फंसाये वो रह रह कर हिलता हुआ अपने वीर्य की आखिरी बूँद तक गरबड़वार पर उड़ेलने लगा. रेखा उस गरम बौछार से पास्ट हो चली थी. अर्जुन के अलग होते हे रक्तिम सूजी हुई योनि ने सारा वीर्य चादर पर उड़ेल दिया. योनिमुख लिंग बहार निकलने के बाद भी सिक्के से ज्यादा चौड़ा खुलकर सफ़ेद धार बहार निकल रहा था.
अर्जुन ने बराबर लेट कर रेखा को अपने सीने से लगा लिया. न बिस्टेर के भीगे होने की परवाह थी और न बिखरे हुए दोनों के कॉमर्स की. अपने निर्वस्त्र मजबूत जिस्म पर अपनी माँ का फूलो सा नाजुक जिस्म लिटाते हुए अर्जुन उन्हें बड़े प्यार से चूम रहा था. हाथ पीठ और कूल्हों को सहलाते हुए साड़ी थकान मिटने लगे.
"आप सिर्फ प्यार करने के लिए बानी हो और मुझे दुःख है की इतने सालो तक आप सिर्फ और सिर्फ उपेक्षित रही. अबसे आपका पूरा ध्यान मैं रखूँगा और अपनी हर परेशानी आप मुझसे कहेंगी. वादा करता हु की गुजरा वक़्त पूछ कर आपको कभी दुखी नहीं करूँगा.", अर्जुन ने सर को सहलाते हुए कहा. रेखा को आज अर्जुन के ऊपर लेटना इतना भ रहा था की वो कुछ कहना हे नहीं चाहती थी. अर्जुन की धड़कन जैसे उसकी खुदकी हे थी. ये मजबूत जिस्म इस वक़्त उस इंसान का था जिसके सपने विवाह से पहले देखे थे. सिर्फ प्यार और परवाह करने वाला एक खूबसूरत दिल. आँखें मूंदने लगी तोह अर्जुन ने फिर से योनि को सेहला दिया.
"आउच.. अभी और नहीं अर्जुन.. आज ये दर्द कर रही है और मुझे आराम करना hai.",Rekha हमेशा पहल बिस्टेर और बाद में खुद को साफ़ करती थी. लेकिन इतनी तगड़ी चुदाई और उसके बाद अर्जुन के ऊपर आराम करना आज बाकी सब भुला रहा था.
"पता है आप अभी और नहीं कर पाओगी और मैं भी आपके साथ आराम से सोना हे चाहता हु. लेकिन आप नाहा लो माँ और मैं बिस्टेर ठीक कर देता हु. सुबह जवाब नहीं दे पाएंगी अगर दीदी या चची में से कोई अंदर चला आया तोह.", अर्जुन ने दोनों के सामाजिक रिश्ते की याद दिलाई तोह रेखा ने उसके चौड़े सीने पर कोहनी रखते हुए एक गीला चुम्बन दिया और उठने लगी. अर्जुन ने भी एक सतांन को हलके से दबाया तोह वो सिसक पड़ी.
"आह्हः.. इनकी हालत खराब कर दी है तुमने. दूध पिया काम और गिराया ज्यादा है आज.. ये भी दुःख रहे है और वो भी. साफ़ चादर अलमारी से निकल लो तुम, मैं नाहा कर आती हु.", रेखा बिस्टेर से उतरी तोह चाल में लड़खड़ाहट देख अर्जुन मुस्कुरा दिया. दोनों मांसल जाँघे थोड़ी फैलानी पड़ रही थी.
"अभी से ये हाल है तोह सुबह तक हालत ख़राब होने वाली है आपकी.", अर्जुन ने खराब चादर समेत कर स्टोर में रख दी और नयी चादर बिछाने लगा. रेखा ने वो फर्श पे गिरा हुआ गाउन उठाया तोह उसकी हालत अर्जुन को दिखने लगी.
"इसलिए दिलवाया था न तुमने ये गाउन? और मेरी हालत छोडो, खुद भी पजामा पहन लो पहले."
"मंडे को दिलवा दूंगा ढेर सारे जब आप मेरे साथ मार्किट चलोगी. फ़िलहाल दूसरा पहन लो कोई भी.", रेखा ने अलमारी से एक ढीला गाउन निकल कर पहना और टोलिया उठा कर बाथरूम की तरफ चली गयी. अर्जुन सिर्फ पजामा पहन कर बिस्टेर के बीच लेट गया. रात का 1 बज चूका था और शरीर अभी भी जैसे थका नहीं था. थोड़े हे समय बाद उसकी माँ हलके गीले बदन पर गाउन पहने कमरे में दाखिल हुई और दरवाजा लगते हे अर्जुन की बाहों में समां गयी.
"थैंक यू. उमाहहह.", हमेशा अर्जुन को अपनी ब्याह पर सुलाने वाली रेखा आज उसकी बाहों में थी. सोने से पहले दोनों हे हलके चुम्बन करते एक दूसरे को सहलाते रहे और जल्द हे रेखा सुकून से अर्जुन के आगोश में सो चुकी थी. तिलोत्तमा को उसका दिव्या नर प्राप्त हो चूका था इतनी तपस्या के बाद.
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4 बजे घर का मुख्या द्वार खुलने की आवाज पर रामेश्वर जी के साथ साथ नरिंदर जी भी जाग गए. बगल में अपने बड़े भाई को चैन से सोया देख वो मुस्कुरा कर उठते हुए बहार आँगन में चले आये जहा मौसम खुशनुमा था और हल्का अन्धकार भी. जिस्म जैसे प्रफुलित सा हो उठा इतनी प्यार सुबह देख. रामेश्वर जी भी पानी लौटा लिया आँगन में आये तोह नरिंदर को हाथ पांव खोलते देख अपने बेटे पर प्यार आ गया.
"लगता है नींद ाची पूरी हुई है तुम्हारी. वैसे शंकर भी इस समय तक उठ हे जाता है, शायद ज्यादा हे थक्क गया हो कल.", कुर्सी पर बैठ कर वो पानी पीने लगे तोह नरिंदर जी फर्श पर बैठते हुए उनके पंजे को हलके हलके दबाने लगे, जैसा अक्सर वो करते थे साथ होने पर.
"हाँ ाची नींद आयी थी पापा और बनवारी मां वाली चारपाई है भी बढ़िया. वैसे शंकर भी 11 बजे सो गया था मेरे साथ हे. ये अर्जुन हर रोज इतनी जल्दी उठता है क्या?"
"कभी कभी तोह कम्बख्त इस से पहले भी निकल जाता है और दिल न हो तोह 5 बजे घर से निकलता हु जबरदस्ती. आज जल्दी गया है तोह नहर की और गया होगा. उसके बाद अपने गुरुदेव के पास.", इधर कौशल्या जी भी नहाने जाने से पहले नरिंदर के सर पर हाथ फेरते हुए गिलास और पानी की बोतल पकड़ा गयी. गिलास भरते हुए नरिंदर जी ने जैसे और जानकारी लेनी चाही.
"वो नहर पे जाता है तोह आप उसको मन नहीं करते? वैसे हैरानी तोह मुझे भी हुई थी यहाँ आचार्य हंस को देख कर लेकिन उनकी बातों से लगता है के अर्जुन भी बहोत कुछ सीख चूका है अध्यात्म के बारे में. बिना सिक्योरिटी के पहली बार देखा और वो भी माँ के हाथ की चाय पीते हुए."
"हाहाहा.. मेरी तोह पहचान भी बहोत छोटी सी रही थी शास्त्री जी से, पासपोर्ट वाला एक काम था बस बहोत पहले. फिर अर्जुन को वो अपने आप हे मिल गए और अब वैरागी को जैसे नया राग मिल गया अर्जुन के रूप में. बहोत कुछ सिखाते रहते है उसको जो शायद मैं खुद भी नहीं सीखा पता. बेटे ये निस्वार्थ मोह है न, इस से बढ़कर कुछ नहीं. खैर तुम लोग जब नहर में जाते थे तोह स्कूल की दिवार फांद कर और वो भी kam-umar में सिर्फ मस्ती मारने. अर्जुन घडी लेके जाता है और वह भी कोई लक्ष्य बनाये हुए है. 30 मिनट तक वो सिर्फ और सिर्फ अभ्यास करेगा और ऐसा करके वो खुद को हे निखार रहा है."
"और कितना निखरेगा पापा? पहले हे आपने उसको सांड बना दिया है. इन्दर से 3 इंच ऊपर हो गया और शरीर देख कर ग्यारहवीं का कही से नहीं लगता. वैसे आज मैं भी क्लब जा रहा हु स्विमिंग के लिए इन्दर के साथ. देखते है स्टैमिना कितना बाकी है इसमें.", शंकर जी भी इधर आते हे फर्श पर तक लगा कर पसर गए. चाय मिले बिना तोह उन्होंने बाथरूम भी नहीं जाना था.
"ये ले देख ले इस डॉक्टर को. 50 का होने वाला है और स्टैमिना की बात ऐसे कर रहा है जैसे मुकाबला अर्जुन से हो.", रामेश्वर जी ने हँसते हुए हे ऐसा कहा था और उनके साथ इन्दर भी हंसने लगा.
"वो कल का बचा है पापा जो शरीर से बड़ा हो गया बस. अकेले भागो और अकेले जीतो वाली ज़िन्दगी है आपके लाडले की."
"रहने दे भाई बस कर. पापा सही कह रहे है की मुकाबला बनता हे नहीं है. वो हम दोनों से आगे है और ये गर्व करने वाली बात है. तू कॉलेज में नेशनल तक बॉक्सिंग खेला था न, 8 कक्षा से प्रैक्टिस करते हुए? उसने बिना मैच अभ्यास स्टेट चैंपियन हरा दिया डेढ़ महीने की कोचिंग से. अर्जुन का ज्ञान और क्षमता तू बेहतर जानते हुए भी जाने क्यों मानता नहीं है. अब छोड़ ये सब और चाय बना के ले आ.", नरिंदर के ऐसा कहने पर शंकर नखरे से अपने भाई को देखने लगा.
"अब थोड़ी न साहब चाय बनाएंगे. वो तोह स्कूल कॉलेज में जब लालच होता था तब मक्खन लगता था ये चाय बना कर. अब बाप की पेंशन से 100 गुना ज्यादा कमाने वाला डॉक्टर रसोई में क्यों जाने लगा.", अब झेंपते हुए शंकर उठने हे लगा तोह कोमल बिटिया को ट्रे लिए आता देख बैठ गया. सिर्फ 2 कप थे क्योंकि पंडित जी नहाने के बाद पूजा करके हे चाय पीते थे.
"सही कहते हो आप पापा. ये शंकर की बारी में पता नहीं भोलेनाथ ने माँ को क्या दे दिया जो इसको काम हे नहीं करना पड़ता. बैठे बिठाये हे साहब को माँ खिलाती रही और अब काम के लिए भी दर्जनों हाथ घर में हॉस्पिटल में तैयार रहते है. वैसे कोमल भी बड़ी जल्दी उठ जाती है.", चाय का कप शंकर को देते हुए नरिंदर ने अपने भाई से ये कहा था.
"वैसे तोह साढ़े 4 बजे तक बहु उठ जाती है और कोमल भी. आज मेहमान आने वाले है कुछ तोह जल्दी उठ गयी होगी. अब तोह बाकी बचे भी 5 बजे तक उठ जाते है जो 7-8 बजे तक उठते थे पहले. चलो अर्जुन ने सबकी आदत तोह बदली.", इतना बोल कर रामेश्वर जी टोलिया और कपडे लिए बाथरूम की तरफ चल दिए.
"सही है भाई. आरती तोह वह पर कॉलेज जाने से घंटा पहले उठती थी और पिंकी साढ़े 6 बजे तक. यहाँ दोनों हे 5 बजे बिस्टेर छोड़ देती है.", दोनों भाई कुछ देर तक ऐसे हे बातें करते रहे जबतक उनके पिता नाहा धो कर न आ गए.
"जल्दी उठ कर यही बैठना था तुम दोनों ने तोह सो हे जाते. क्लब जाना है तोह दोनों फ्रेश हो कर निकलो फिर दिन में काम भी है.", बाप की झिड़की सुनते हे शंकर जी बहार वाले बाथरूम में और नरिंदर जी अंदर वाले की और निकल लिए.
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"भेड़िये (वुल्फ) को ज्यादातर लोग ाचे से नहीं समझते बीटा लेकिन वो एक कही बेहतर सामाजिक जीव है जो सख्त नियमो से jiwan-yapan करते है. वह झुण्ड 7-8 से लेकर 100 तक का भी हो सकता है लेकिन अनदेखी किसी की भी नहीं होती चाहे वो बूढा हो या बचा. सबसे दिलेर और ताक़तवर को इस बड़े परिवार का मुखिया बनाया जाता है जिसको सहज भाषा में श्रेष्ठ या अल्फा कहते है.", अर्जुन आज नहर जाने की जगह सीध आचार्य जी के पास हे चला आया था. ऐतवार का दिन था और आज उन्हें यूनिवर्सिटी से पौधे भी लाने थे. समय बहोत बाकी था और दोनों हे गुरु शिष्य सुनसान पार्क में गीली डूब पर नंगे पाँव चलते चर्चा में लगे थे.
"आप बहोत जानते है भेडियो के बारे में दादा जी. मुलाकात भी की है कभी उनसे?"
"येल्लोस्टोने में भी मुलाकात की है जहा सबसे बड़ी प्रजाति पायी जाती है और साइबेरिया में भी, जहा सबसे ताक़तवर भेड़िये अपने से कही बड़े शिकारी बाघ (टाइगर) के साथ संतुलन बनाये रहते है. लेकिन हम बात यहाँ कुछ और कर रहे है."
"हाँ और मुझे भी लग रहा है के ये जरुरी है ाचे से समझना. आप बताये जरा इस अल्फा के बारे में.", अर्जुन भी उत्सुक था क्योंकि ये जीव उसने सिर्फ टेलीविज़न पर देखा था कुछ किताबो में. लेकिन जीव विज्ञान अभी भी ज्यादा नहीं टटोला था.
"बाद कर रहे थे उनके सामाजिक जीवन की बेटे. अल्फा सिर्फ ताक़तवर हे नहीं होता, वो हमेशा हे सबके लिए रास्ता बनता है, शिकार पर भी पहला आक्रमण वही करता है और जितने भी बूढ़े सदस्य होते है उनको पूरा maan-samman दिया जाता है. वो हमेशा ऐसी rann-niti का उपयोग करते है शिकार के वक़्त जिस से कोई सदस्य घायल न हो. तुम कुछ वैसी हे स्थिति में हो क्योंकि एक भरा पूरा परिवार है तुम्हारा लेकिन अल्फा तभी बन्न सकते हो जब तुम्हे घरेलु, सामाजिक और rann-niti का पूरा ज्ञान हो जाये."
"मैं अल्फा क्यों बनूँगा दादा जी. पापा और चाचा मेरे से पहले है तोह सही."
"हाहाहा.. कभी कभी न तुम बड़ी हे बचकानी बातें भी कर देते हो. पंडित जी के हिसाब से तुम्ही एकमात्र व्यक्ति हो जिसको हर तरह की जानकारी है और आने वाले वक़्त में परिवार को बनाये रख सकते हो. शंकर एक मजबूत व्यक्ति है इन्दर की तरह लेकिन घरेलु और सामाजिक जीवन में तालमेल नहीं है जैसा पंडित जी का है. राजकुमार एक बेहद हे सरल इंसान है जो सीढ़ी लकीर पर चलने में विश्वास रखता है. वापिस भेडियो पर आते है हम."
"ठीक है जरा मिलाये हमारे तार तोह मैं भी समझू.", अर्जुन ने हँसते हुए कहा तोह आचार्य जी ने कंधे पर हाथ रख दिया.
"भेड़िये के शावक परिवार में हे बड़े होते है और दूसरी बड़ी मादाये भी उनका वैसा हे ख्याल रखती है जैसा taai-chaachi या बुआ. ये माहौल बनाने वाला भी अल्फा हे होता है जिस वजह से झुण्ड का छोटा और बड़ा होना पता चलता है. फिर बात आती है शिकार की तोह सबसे पहले शावक वाली मादाये, बूढ़े और फिर ताक़तवर जवान भोजन करते है. बहार से होने वाले हमले जैसा की भालू या बाघ करते हे रहते है भोजन की कमी होने पर, उसमे भी सामने खड़ा होने वाला अल्फा हे होता है और उसके पीछे उसके सामान हे ताक़तवर सदस्य. सही rann-niti और बुजुर्गो से जवान तक के साथ से भेड़िये 10 में से 5 बार Bhaalu-Baagh का शिकार भी कर लेते है, जो 5 बार विफल भी हुए तोह गलत अल्फा की वजह से. वो थका कर मारते है और मुझे नहीं लगता की तुम अभी भी नहीं समझे होंगे.", आचार्य जी के इतने सही तरीके से बताने पर नासमझ भी समझ जाता था ये तोह फिर भी अर्जुन था.
"हम्म्म.. मतलब हर चीज में सही सदस्य से ज्ञान लेना, गृहस्थी समझना, सबको ek-saar परिवार में बनाये रखना और हमेशा खुद सामने रहना वो भी एक नियोजित नीति के साथ. वैसे कभी भेड़िये आपस में भी लड़ते है क्या?"
"बिलकुल सही समझे. All-rounder वो भी बेस्ट इन एव्री ट्रेड. नॉट लिखे जैक ऑफ़ आल ट्रेड्स एंड मास्टर इन नोने. आपस में तोह कभी कभार झुण्ड की मादा लड़ सकती है लेकिन दूसरे झुण्ड के साथ झगड़ा हो सकता है या फिर कोई अकेला बहार से आये और दावेदारी थोक दे अल्फा के लिए. वह फिर निर्णय 2-2 हाथ करके होता है और अगर अल्फा हार जाये तोह वो अकेला चला जाता है सबकुछ छोड़ कर. बहोत काम हे ऐसा होता है."
"इंसानो के कबीले भी तोह ऐसे हे होते थे न दादा जी पुराने समय में.? बस वह मुखिया ज्यादा हे शान दिखता था.", अर्जुन का मंतव्य समझ कर आचार्य जी थोड़ा खुल कर हंसने लगे जिस पर अर्जुन झेंप गया. वो गलती से हे ऐसा बोल गया था.
"कोई बात नहीं तुम जानकारी वाली बात हे कर रहे हो. ऐसा भेड़ियों से सीखा गया था और राजा की तरह अल्फा भी रौब से हे रहता है बेटे. उसके भी कई संगिनी होती है और बड़े परिवार में उसका एक अलग प्रमुख परिवार भी. अल्फा के समकक्ष हे एक मादा भी होती है जो अधिकतर जनम से साथ हो या पिछले अल्फा की बेवा. अल्फा अपने परिवार की मादाये साथ हे रखता है और नर बड़े होने पर या तोह जोड़ा बना ले या झुण्ड से जा सकते है परेशानी होने पर. हम बहोत बाद में विकसित हुए है अर्जुन लेकिन जानवरो से सीखने के बाद हम गलत इंसान की तुलना जानवर से करके ज्यादा बड़ी गलती करते है. वो तोह शिक्षक और हमारे होने की वजह है भला उनका अपमान क्यों?", अर्जुन के पल्ले सबकुछ पड़ गया था और वो आचार्य जी से भी कही ज्यादा समझ प् रहा था खुद के चरित्र को. अनजाने हे सही वो कुछ इस डगर पर हे तोह चल रहा था. लेकिन साबित करने के लिए बहोत वक़्त था और इसके लिए बेहतर होना जरुरी था.
"तुम ये वक़्त अपनों के साथ व्यतीत करो बेटे और जीवन का विस्तार करने के लिए कुछ समय तुम्हे बहार भी जाना पड़ेगा. बस हमेशा ये याद रखना की प्यार जीवन की आत्मा है और सही फैंसले ज्यादा मजबूत प्यार भरे परिवार का सच. आज इस प्यार ने हे तोह मुझे भी तुम्हारा बुजुर्ग सदस्य बना दिया है.", आचार्य जी ने जब खुद को भी अर्जुन के परिवार का सदस्य बताया तोह उसने अपनेपन से उनका हाथ थाम लिया.
"इंसान विकसित हो चुके है दादा जी और अब तोह छोटे परिवार में हे 2 दावेदार बन्न जाते है श्रेष्ट की होड़ में. बहार से खतरा बरक़रार हो और ऊपर से खुद हे घर के 2 हिस्से करके अपने आप को लाचार कर लो. मैं हमेशा मेरे दादा जी को श्रेष्ठ मानता हु जिन्होंने ऐसा कुछ कभी महसूस हे नहीं होने दिया एक भी व्यक्ति को. पिछले कुछ महीनो में ढेरो परिवार देखे जहा उन्हें हे सबकुछ चाहिए और या तोह अपनों को मार गए, या खुद मारे गए. परिवार की एहमियत समझते तोह अपनों से हार जाते लेकिन सबकुछ बरकरार रहता. वो प्यार, ताक़त, सम्मान और वजूद. मैंने यही सीखा है और मुझे आज समझ आया की संजीव भैया ने भी क्यों सबकुछ मेरे हवाले कर दिया.", अर्जुन अब अपनी बात बताने लगा था और आचार्य जी बड़े ध्यान से सब सुन्न रहे थे.
"पहले दादा जी ने ऐसा किया था फिर दादी जी ने भी. बच गए चाचा और ताऊजी तोह उन्होंने भी सबकुछ मेरे हवाले कर दिया. कहने को तोह लगता है की मैं सबका मालिक बन्न गया लेकिन उन्होंने मुझमे वो देखा होगा जो इस संपत्ति और पूर्वजो की धरोहर को संभाल सकता है. कभी ध्यान हे नहीं गया की अनजाने हे मैं कब जिम्मेवार बन्न गया."
"ये है विश्वास, प्रेम और हीरे को तराशना. तुम्हारे साथ ठीक वैसा हे तोह परिवार है और सभी लोग तुमको निस्वार्थ मजबूत इंसान के रूप में देखना चाहते है लेकिन वो सभी साथ है तुम्हारे. इसलिए तोह आज ये भेड़िया वर्णन किया. तुम अपने हुनर को और निखारो मेरे बचे, कड़े फैंसले भी लिए जाएंगे तुम्हारी बेहतरी के लिए जिस से आने वाले समय में तुम्हारे पिता और दादा जी को मान हो की उनके विश्वास और प्यार को सम्मान देने वाला सचमुच एक अल्फा है. हाँ वो राजा वाली बात व्यक्तिगत है जिसका निर्णय व्यक्तिगत है बस क्षमता पर फरक नहीं पड़ना चाहिए.", अर्जुन आज दूसरी बार शरमाया था उनकी बात पर और ऐसे हे हलकी फुलकी बातें करते दोनों वापिस घर की तरफ चल दिए. यूनिवर्सिटी जाने के लिए कार जो चाहिए थी.
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"क्या बात है रेखा आज बहोत अलग लग रही है तू? तबियत ठीक है न तेरी?", नाश्ता बनाते हुए ललिता जी ने अपनी देवरानी को असहज रूप से चलते देख कर पूछ हे लिया. अब रेखा जी क्या जवाब देती उन्हें की रात को अर्जुन ने बिस्टेर के साथ उनका भी पुर्जा पुर्जा हिला दिया. जांघो के बीच आयी हलकी सूजन की वजह से तोह कच्ची पहन न भी दूभर था और खुला रखने पर भी चलने पर होती रगड़ अलग सी मस्ती भर रही थी.
"हाँ माँ और आज तोह आप उठी भी 5 बजे. तबियत ठीक नहीं है तोह आप आराम कर लीजिये, मैं और ताई जी कर लेंगे सब काम.", कोमल अंदर चली आयी थी जो बहार सबको नाश्ता परोस रही थी. अर्जुन अभी तक नहीं आया था और उसने अपने दादा जी को फ़ोन पर बता दिया था की आचार्य जी के यहाँ वो पौधे लगवा रहा है.
"ऐसा कुछ भी नहीं है. तबियत बिलकुल ठीक है बस जांघ की नस चढ़ गयी थी थोड़ी तोह ीोडेक्स लगा ली."
"ीोडेक्स का असर है ये? हाहाहा.. वह तेल मालिश करनी थी पगली, ये ीोडेक्स अलग हे कमाल कर देती है जरा सी इधर उधर हुई तोह.", ललिता जी के कहने का तात्पर्य समझते हुए रेखा जी का चेहरा जो पहले से हे दमक रहा था वो गुलाबी हो गया. कोमल बिना कुछ बोले शर्माती हुई पराठे लिए बहार निकल चली.
"कुछ भी कह देती हो आप दीदी. देखो कोमल भी समझ गयी.", रेखा जी खुद चूल्हे के सामने बैठते हुए भी शर्मा रही थी लेकिन हंसती हुई ललिता जी ने अपनी देवरानी की गर्दन पर बना वो हल्का सा निशाँ देख हे लिया. वो रेखा को ाचे से जानती थी इसलिए आगे कुछ नहीं बोली. उन्हें यही लगा की रात शंकर ने चढ़ाई की होगी और utt-pataang मुद्रा बनवाते हुए टांग मदद गयी होगी.
"वैसे कही शंकर ने गुलाबो की बहिन पर तोह वार नहीं कर दिया कल रात.?", रुकी वो फिर भी नहीं चुहल करने से और इस बीच कृष्णा जी भी अंदर चली आयी. बेशक काम की मनाही थी लेकिन बैठ सकती हे थी. रेखा जी तोह पहले हे झेंप रही थी ऊपर से कृष्णा जैसी बड़ी बहिन के आने पर सर झुका लिया.
"अब ये तोह पता नहीं की गुलाबो पर हुम्ला हुआ या भूरी पर लेकिन कुछ गिरने की आवाज तोह जरूर आयी थी.", अब कृष्णा जी ने अलग हे जीकर छेड़ दिया था.
"ऐसा कुछ भी नहीं हुआ दीदी. रात मेरे पास अर्जुन सोया था और नहाने के बाद नींद नहीं आ रही थी इसलिए किताब पढ़ने लगी. 12 के बाद बस थोड़ा पाँव फँसल गया तोह बीएड के सिरहाने राखी अलार्म घडी गिर गयी थी. नस भी तभी खींची तोह ाचे से सो न सकीय. ये तोह अब बैठक में सोते है इसलिए बचे मेरे पास सोने आ जाते है.", रेखा जी ने आधा सच और आधा झूठ कहा था. वो किसी नयी प्रेमिका की तरह अपने मिलान को छिपा रही थी और दोनों ने सच मान लिया.
"बुला लेना चाहिए था न रेखा अगर इतनी दिक्कत हुई थी तोह. इस अर्जुन की खबर तोह मैं लेती हु, जो माँ का ख़याल तक नहीं रख सकता.", कृष्णा जी के ऐसा कहने पर रेखा जी ने अपनी जेठानी की तरफ देखा और जवाब दिया.
"इतनी रात को आपको बुलाने आती तोह वो जाग सकता था और उसको बताती तोह ठीक नहीं लगता. वो जिद्दी है और नस गलत जगह खींची थी. अब आराम है दीदी. आप परेशां मैट हो. ये दीदी भी मजे लेने से पीछे नहीं hat-ti.", रेखा को अपनी तरफ बात घूमते देख ललिता जी ढिठाई से हंसने लगी.
"रेखा तेरी जगह मैं होती तोह उठा देती पेटीकोट अर्जुन के सामने. नस उतरने में माहिर है मेरा लल्ला और वो दर्द दूर कर चूका है मेरा पहले भी. तू याद रखियो कृष्णा, कभी कही khinch-taan हो जाये तोह पसर जाइयो उसके सामने. बड़े प्यार से ठीक करेगा और फिर कभी ीोडेक्स या डॉक्टर वैध की जरुरत न पड़ने वाली.", ललिता जी की दिवार्थी बात वो भी अपने बेटे के लिए सुन्न कर रेखा तोह बस पानी हो गयी लेकिन कृष्णा को तोह इसमें भी मजा आ रहा था. वो पढ़ी लिखी होने के साथ हे स्वच्छंत मजाक समझती थी देवरानी जेठानी का.
"और किस से कहूँगी दीदी. अर्जुन ने तोह पहले हे मुझे आज ज़िन्दगी जीना सीखा दिया है. फिर पेटीकोट उठाना हो या ब्लाउज, नस चढ़ी तोह मैं उसको हे बुलाऊंगी. इन्हे तोह मैंने पहले हे कह दिया के वो मेरी देखभाल कर सकता है और करता रहेगा. हाँ ये रेखा ऐसी हे है जो हर बात पर गर्दन झुका लेती है. अर्जुन को आने दो मैं खुद हे कहूँगी की अपनी माँ की नस उतार जरा.", कृष्णा के साथ ललिता जी भी जोरो से हंसने लगी थी लेकिन कौशल्या जी के आगमन पर दोनों हे खामोश हो गयी. रेखा आज पहली बार nav-vadhu सी शर्मा रही थी जैसे सुहागरात के बाद आज वो फांसी हो.
"धर्मवीर भाई साहब आने वाले है थोड़ी देर में और उनकी बहु के साथ रूचि बिटिया भी होंगी. भाई साहब के लिए रेखा तू जरा मूंग की दाल रख दे और कृष्णा तू चल के नाश्ता ले उसके बाद दवा भी लेनी है. अर्जुन भी आ गया है और बहार नाहा रहा है. रेखा कपडे देके काम कर लेना.", आज तोह अर्जुन को कपडे देने वाली बात भी अलग हे उमंग जगा रही थी रेखा में. कही हाथ पकड़ कर अंदर हे न खींच ले. फिर अपनी सोच पर हे हंसती वो ख़ामोशी से कड़ी हो गयी.
"अभी दे आती हु माँ जी. दीदी आप उसका नाश्ता लगाओ फिर मैं दाल रख दूंगी.", रेखा की चाल देखते हुए कौशल्या जी ने ललिता की तरफ इशारा किया. रेखा जैसे तैसे सावधानी बारात कर बहार निकल चली.
"नस खिंच गयी थी रेखा की माँ जी कल रात. देर तक किताब पढ़ रही थी और फिर पाँव फँसल गया. आवाज तोह कृष्णा ने भी सुनी थी."
"अब ये भी गिरने लगी है. ध्यान से रहने को बोल जरा इसको और अर्जुन को कह देना दवा करवा लाएगा. शंकर इन्दर तोह दौड़ गए घर से ऋचा का आना सुनते हे.", कौशल्या जी जिसको ध्यान रखने का बोल रही थी वो हे जिम्मेवार था. इन सबको कहा पता था की अगर इस बार वो रेखा के करीब आया तोह वो बिस्टेर से उतने भी नहीं वाली.