Incest Pyaar - 100 Baar - Page 41 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 187 (ा)

संगीत

"नवीन का मतलब होता है नया यानी की मॉडर्न. जानती हो कौशल्या जो भी नवीन हो उसके लिए R&D होती है जिसको रिसर्च एंड डेवलपमेंट कहा जाता है आम भाषा में लेकिन अगर तुम कहो तोह मैं इसका हिंदी अनुवाद भी कर सकता हु.", रामेश्वर जी ने आज गहरी नीली पतलून और धारीदार सफ़ेद नीली कमीज पहनी हुई थी. एकदम ठीक किसी अफसर की तरह और उनके साथ गाडी में कौशल्या जी बगल में और पीछे छोल साहब, कृष्णेश्वर, हंसमुख और देवकी थे. जाने कहा से उन्होंने ये बात शुरू की थी लेकिन उनकी अर्धांगिनी समझ रही थी.

"मुझे न बताओ आपका रिसर्च और जो भी हो जी. मालूम है ये सब मुझे और वो आदमी अपने गाँव का तोह नहीं है चाहे परमिंदर का बीटा कह कर मिलवाया हो विनोद ने. परमिंदर के बीटा होता तोह जरूर वैसे हे मिलता जैसे अमूमन सभी आपसे मिलते है. आप खुल कर कहो और ये देवर जी खुद हे बता देंगे बाकी तोह. क्यों कृष्ण, जानता है तू उस नवीन को?", अब कृष्णेश्वर की क्या मजाल जो वो अपनी बड़ी भाभी के सामने झूठ बोल दे. रामेश्वर जी बस मुस्कुरा रहे थे और आज उनके हाथ में वो गाडी थी जो खुद शंकर ने अपने पिता को वापिस लौटाई थी ख़ास तैयार करके, जिसको चला कर उनकी उम्र बीती थी, महिंद्रा 4क्ष4.

"भाभी जी ये नवीन कोई व्यापारी दोस्त होगा विनोद का लेकिन अपने गाँव वाले परमिंदर के बेटे का नाम तोह गुरजीत है. दिखाई तोह दिया था मुझे एक बार लेकिन फिर वो लोग जाने कहा चले गए."

"जहाँ गए है घर से हे गए है नन्हे. और अब जहा जायेंगे मेरी नज़र में हे रहेंगे. बूढा होने का सबसे बड़ा फायदा यही तोह है भाई की सब लोग आपको वो समझ लेते है जिसका अभिप्राय एक गाली से दिया जाए तोह सार्थक लगेगा. लेकिन मैं उतना भी बेसहारा नहीं. बिनोदिये को अपने पास हे रखना देवकी नहीं तोह फिर तुम मुझे तना डौगी.", रामेश्वर जी इस जीप को लिए कम्युनिटी सेण्टर के बहार आ पहुंचे थे जहा के हाल मल्होत्रा जी वाली शादी से प्रतिकूल थे. हर तरफ सुरक्षा का ऐसा इंतजाम था जिस से परिंदा भी पर न मार पाए. उमेद सिंह ने हे ये सब इंतजाम किया था और उसके अलावा यहाँ भजन मां ने भी अपने अंगरक्षकों के साथ साथ सरकारी कर्मचारी लगा रखे थे. कपूर साहब को हिदायत थी की पुलिस न लगाईं जाए जिस से उन पर कोई बात आये. मुख्या प्रवेशद्वार पर स्वयं शंकर जी के साथ साथ हुसैन साहब, वालिए जी और दलीप सिंह मौजूद थे. और भी कई थे लेकिन परिवार से वही थे जो देख रहे थे की हर व्यक्ति उनसे मिलने के बाद हे भीतर जाए.

"यही उम्मीद थी मुझे मेरे बेटे से. शंकर, तू आजा इन्हे साथ लेके. ये बाकी लोग काम देख लेंगे.", कौशल्या जी ने जीप से उतारते हे शंकर को अपने साथ ले लिया. उनकी जीप एक सुरक्षाकर्मी खुद हे अंदर ले चला क्योंकि वो रामेश्वर जी की जीप जो थी.

"हाँ तेरी माँ का दूध आधे घंटे में हे सूख गया जो तू नजर नहीं आया. मल्होत्रा जी, सुना है यहाँ गाने बजेंगे? हमको तोह थोड़ी शान्ति हे दिलवा दो भाई.", रामेश्वर जी अपने साथ भाई और साले को लिए मल्होत्रा जी से मिलते हुए इस स्थान की दूसरी मंज़िल की तरफ हे बढ़ चले. वो चाहते थे की बचे आज अपनी मर्जी से दिलचाहे शौक पूरे करे.

"ऊपर तोह महफ़िल रंग वाली होगी भाई साहब. वैसे ये अपने सांगवान जी और शास्त्री जी भी आ गए. चलिए फिर तोह महफ़िल में रंग हो या न हो, अब तोह रंगीन हे होगी.", मल्होत्रा जी ने जैसे हे इनका ध्यान इस तरफ करवाया रामेश्वर जी हैरान हे रह गए सांगवान परिवार के साथ साथ शास्त्री जी के भी पूरे परिवार को देख कर. विशेष अपनी बीवी के साथ आया था उस पुराणी मेरसेदेज़ में जिसको खुद शास्त्री जी चला के लाये थे और हिमानी उस सुपारी रंग के गाउन में सचमुच divya-aabha सी लग रही थी. विशेष ने आते हे अपने पिता के कहे अनुसार पंडित जी के चरण स्पर्श किये.

"तोह हमारे भाई के सुपुत्र श्रीमान विशेष जी भी पधार गए आखिर. बीटा डॉलर कमाने से फुर्सत मिल हे गयी तुम्हे?", रामेश्वर जी के साथ साथ आगे जाते हुए कौशल्या जी और शंकर भी लौट आये. धर्मवीर जी से मिलने के बाद बाकी लोग अंदर चले गए लेकिन शंकर बड़े गौर से विशेष को देख रहा था.

"अंकल जी पहले पता होता तोह इतना लेट नहीं होता. ये अपने समो शंकर शर्मा जी तोह हमारे शुभचिंतक हे है. U.S. वाला काम मेरे पास हे था लेकिन तब भी पता नहीं चला के आप और ये एक हे परिवार है. कैसे हो डॉक्टर साहब?", शंकर खुद भी विशेष से गले लग कर मिला था और यहाँ बाकी सभी थोड़ा ताज्जुब में थे.

"विशेष ने हे वह का सारा काम करवाया था और ये अपने नाम के साथ शास्त्री नहीं लगता तोह मुझे क्या पता था के ये गुरूजी का बीटा है. वैसे भी दोनों एकसाथ कभी दिखे हे नहीं आज से पहले और हमारी तोह मुलाकात भी अबतक काम की जगह पर हुई है. पापा मीट विशेष थे हिडन दूर, और भाई ये मेरे पापा.", अब परिचय शंकर ने करवाया था और रामेश्वर जी के बाद खुद उमेद, छोल साहब और उमेद भी विशेष से गले लग कर मिले.

"ऐसी कोई बात नहीं है ताऊ जी. ताऊ जी बोल सकता हु न?"

"अब तोह तुम मुझे कुछ भी बोल लो बीटा. पता नहीं था अपने शास्त्री जी की औलाद डॉलर के साथ साथ नाम भी िज्जात्त स्वरुप बड़ा कर रही है. ख़ुशी हुई तुमसे मिल कर विशेष और तुम हो भी ख़ास क्योंकि शंकर बहोत काम हे तारीफ करता है और शास्त्री जी नजरअंदाज उसको हे करते है जो ख़ास हो. ताकि वो बेहतर हो सके. मिलते है, चलो भाई शास्त्री जी बाकी सभी प्रतीक्षा देख रहे है.", रामेश्वर जी ने अब अपनी पल्टन के साथ ऊपर का रुख किया तोह उनके बचो के बीच अभी भी अस्वमानिया स्थिति थी.

"अबे ये गुरु जी का लोंदा निकला? यार तुमने तोह एक भी दिक्कत न आने दी वह मेरी बीवी के समय.", नरिंदर ने तोह विशेष की गर्दन को हे बाहों में ले लिया था.

"आह.. भाई थोड़ा आराम से मैं नाजुक हु. ये डॉक्टर का डर हे इतना है की क्या कहूं. वैसे ये सब काम हे तोह मेरे जिम्मे है और मुझे ऑर्डर्स भी थे की सब अर्रंगे करके दू डॉ शंकर के केस में, डायरेक्ट कम ऑफिस से. और वो भी आये है इधर मैंने सुना है.", नरिंदर के साथ चलते हुए विशेष ने जैसे हे ये कहा उमेद उसको साथ लिए अपनी चची कौशल्या जी की तरफ आ गया.

"ये मेरी माँ है और ये चची जी, शंकर की माँ जी. और maa-chachi जी ये शास्त्री जी के सुपुत्र है विशेष. हाँ भाई विशेष ये भजन मां भी तोह बैठे है इधर.", कौशल्या जी ने बड़े स्नेह से विशेष के सर पे हाथ फिराया था जो थोड़ा असहज सा दिखा कम को वह बैठे देख.

"बचो की ram-ram का तोह जवाब दे दिया कर भजन. बीटा अभी अभी तुम्हारी बीवी से मिली हु और मेरी बच्चियां उन्हें लेके जाने कहा निकल गयी. तुम लोग अपना समय जैसे चाहो वैसे बिताओ. भगवन तुम्हे तरक्की और खुशिया दे.", कौशल्या जी की नजरे अपनी बहुओं को ढून्ढ रही थी जो शायद अभी तक पहुंची न थी. विशेष भी यहाँ से विदा ले कर ऊपर की और चल दिया था जहा उसको एक हलकी फुलकी महफ़िल मिलने वाली थी, सुकून पहुंचने वाली.

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धीरे धीरे पंडित जी के यहाँ से सभी सदस्य संगीत कार्यक्रम के लिए निकल चुके थे. उमेद ने कुछ ड्राइवर ख़ास तौर से इस कार्य पर हे लगाए थे और ऐसा करना ठीक भी था जब घर के सभी पुरुषो का वह पहले हे रहना जरुरी हो. राजकुमार जी स्वयं अभी घर आये थे अपनी धर्मपत्नी और जो रह गया हो उनको लेने. घर की सुरक्षा के लिए बहार हे मुनीर को तैनात किया गया था और वैसे तोह असगर को भी हिदायत थी की वो जितनी देर हो सके प्लाट में हे रहे.

"ललिता, देखो तुम्हारे beta-beti के विवाह सम्बन्धी प्रोग्राम है और सबसे आखिर में पहुंचने वाले भी हम लोग होंगे. भाई थोड़ा तोह ध्यान रखा करो इन छोटी छोटी चीजों का. वह सभी राह देख रहे होंगे.", राजकुमार जी आज चेहरा सफाचट करने के साथ हे बाल भी करीने से कटवा रखे थे. चमकदार चमड़े के जूते, कड़ी िस्ती की हुई हलकी नीली कमीज और भूरी पतलून में उनका वैसा हे व्यक्तित्व झलक रहा था जैसा अक्सर उनके पिता का रहता था. अपनी बीवी को अलमारी से पैसे निकलते देख उनका सबसे पहले जहा ध्यान गया वो बहार को उभरा हुआ मटके सा पिछवाड़ा था. उजले पीले रंग की कसीदाकारी वाली साड़ी में ललिता जी का पृष्टभाग इतना कैसा हुआ था की उठान देखने मात्रा से साधारण व्यक्ति का दिल बैठ जाए. ललिता जी भी अपने पति की निगाहें वह महसूस करती हुई सीढ़ी कड़ी हुई.

"अभी वह सिर्फ मेहमान और घर के मर्द हे पहुंचे है जी. ड्राइवर आपके सामने हे तोह ले कर निकला है शालिनी और बाकी लोगो को. Tara-Alka भी अभी अभी अपने बहनो को लेके गयी है और 4 लोग बाकी है.", होंठो की लाली ठीक करने के बाद ललिता जी ने वो सुनहरी हैंडबैग अपने कंधे पर लटकाया और अपने पति के साथ कमरे से बहार आ गयी.

"कृष्णा, चल जल्दी कर और रेखा को भी बुला ले. तेरे जेठ जी हे लेके चल रहे है हमे.", उनके कहने के साथ हे कृष्णा जी भी अपने कमरे से बहार चली आयी. गहरी हरी साड़ी में खुले बाल और बिना किसी अतिरिक्त saaj-sajja के वो उतनी हे हसीं थी जितनी नरिंदर जी से ब्याह होने के समय. बगल वाले कमरे से माधुरी को साथ लिए रेखा जी और रेणुका आयी तोह राजकुमार जी दुविधा में पड़ गए.

"कार में तोह ज्यादा से ज्यादा 4 लोग हे आ पाएंगे ललिता."

"हाँ तोह आपसे किसने कहा के हजार लेके जाने है. अर्जुन रोमिला और विवान को छोड़ कर वापिस आ रहा है अभी तोह वही माधुरी को लेके आएगा उधर. पिछली सीट पर ये अकेली जो बैठ के आएगी जैसा माँ जी ने कहा है. वो लड़का भी नीरा बैल है जो सुबह से बिना कपडे बदले हे लोगो को धोये जा रहा है. चलो भी अब यहाँ से, फिर कहोगे देर हो रही है. और माधुरी बीटा, अपना पर्स साथ ले लियो. तुझे नचाये बिना तोह तेरी सहेलियां मानेंगी नहीं लेकिन ये कंगन, हार और चूड़ियां थोड़ा ध्यान से रखने है. अर्जुन को बोल दियो के उसके कपडे ऋतू ने कोमल के कमरे में हे रख दिए थे. बदल कर जल्दी आने की कोशिश करना.", ललिता जी ने अपने साथ कृष्णा, रेखा और रेणुका को लिया तोह राजकुमार जी खिसियाते से आगे आगे चल दिए. अपनी माँ की हिदायत सुन्न कर माधुरी भी तुरंत कमरे में चली गयी, आभूषण पहन ने और बैग ढूंढ़ने.

"वैसे कोई एक रुक जाता तोह ठीक होता दीदी. माधुरी तैयार तोह हो गयी है लेकिन kade-choodiyan पहन ने में कही दिक्कत न आये.", रेखा ने अपनी जेठानी से धीमी आवाज में विचार जताये जिस पर वो परिचित अदा से मुस्कुरा दी.

"ब्याह होने वाला है कल उसका रेखा. जो अभी तक वो ये सब न सीखी तोह कल रात अपने आप उसका घरवाले सीखा देगा. वैसे भी माँ जी ने कहा था के माधुरी को तभी वह लेके आना है जब सब मेहमान और रिश्तेदार लोग उधर पहुंच जाए. पता तोह लगे की उनकी पौती ऐसी वैसी नहीं है. हाहाहा..", उनके इस मजेदार अंदाज और कहने के ढंग से खुद राजकुमार जी भी हंस दिए थे बाकी सभी के साथ.

"रेणुका तू आगे तेरे भैया के पास बैठ. मेरे से न साड़ी पहन के आगे बैठा जाता.", ललिता जी ने पिछली सीट पर कृष्णा और रेखा को अंदर करने के बाद रेणुका से कहा. वो खुद पिछली सीट पर खिड़की किनारे हे बैठ गयी. ये वाली गाडी कही ज्यादा हे खुली थी सीट के हिसाब से. राजकुमार जी ने एक बार सरसरी नजर घर के दरवाजे पद डाली जहा कुर्सी लगाए मुनीर मुस्तैदी से बैठा था और दरवाजा बंद. घर पूरी तरह लम्बी लटकन रोशनियों से नहाया हुआ साफ़ बता रहा था के यहाँ विवाह उत्सव जारी है. कार बेआवाज आगे बढ़ चली अपने गंतव्य की तरफ.

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माधुरी उस आदमकद आईने के सामने बैठी हुई अपने रूप लावण्या को देखती हुई मंद मंद मुस्कुराये जा रही थी. ब्यूटी पार्लर वाली लड़कियों ने उसके जिस्म को कही ज्यादा हे निखार दिया था. पूरे जिस्म पे कही किसी बाल का रोया तक न था और कोहनी तक रची गहरी मेहंदी इस आभा को बढ़ा हे रही थी. कंधे से कोहनी तक जालीदार हरा कपडा, सीने की बड़े बड़े उठान को समेटने की कोशिश करता वो सब्ज रंग का कमीज जिस पर चांदी की कारीगरी थी और कमर से तखने तक का वैसा हे लेहंगा पहने माधुरी पलभर में हे हर नजर को गुलाम बना सकती थी. आईने में देखते हुए अभी वो अपनी नाक के छिद्र में बारीक बाली पहन हे रही थी की कमर पे बाहों का घेरा महसूस होते हे चेहरे की चमक सो गुना हो गयी. माधुरी के कंधे पर ठुड्डी टिकाये अर्जुन भी दोनों के अक्स आईने में देख रहा था.

"बहोत हे ज्यादा खूबसूरत लग रही हो दीदी आप. सचमुच अब लग रहा है की आपके जाने के बाद दिल को समझाना बहोत मुश्किल होने वाल है. लाओ ये मैं अपने हाथो से आपको पहना दू.", अर्जुन ने बीएड के किनारे बैठे हुए हे अपने आगे बैठी माधुरी दीदी के गाल को चूम कर वो बाली उनके हाथ से ले ली. माधुरी ने भी चेहरा घुमा कर खुद को अर्जुन के सामने हे कर लिया. जाने ये कैसे वक़्त था या अलग हे असर की माधुरी के चेहरे पर ऊर्जा का अलग हे प्रभाव नजर आने लगा था अर्जुन के सम्मुख खुद को करते हुए. लरजते हाथो से अर्जुन ने बाली का वो बारीक सा कुण्डल जैसे हे दीदी के nakh-chhidra से छुहाया वैसे हे एक हलकी सी सिसकारी माधुरी के होंठो से निकलती हुई अर्जुन के दिल में उतर गयी. ये वो अनंत प्रेम था जिसको चाह कर भी मंज़िल नसीब न थी.

माधुरी के जीवन में आने वाला वो पहला मर्द जिसने उसको stree-sukh का संज्ञान करवाने के साथ साथ ऐसे प्यार से अभिभूत किया था जो माधुरी अर्जुन के आने से पहले तक बस कल्पना हे कर सकती थी. एकांत पालो में ये एक विलक्षण जोड़ी थी जो भरपूर संवाद के kaam-krida से आगे उस pur-sukoon तक बहते चले जाते थे जिसके आगे कोई और दुनिया हे न थी.

अर्जुन के लिए भी उसके prem-jiwan की नीव रखने वाली माधुरी पहली युवती थी. बेशक संदीप की बहिन ज्योति ने अर्जुन को kaam-krida से अवगत करवाया था लेकिन वह सिर्फ kaam-vaasna हे उस रिश्ते की मध्यस्थ थी, वो भी ज्योति की एकतरफा वासना. अर्जुन को हृदय से लगा कर अंतरंग पालो का सुख, prem-milan में दोनों हे दिलो का महत्व और पूर्ण समर्पण सीखने वाली माधुरी हे थी. और आज शायद इस घर में ये इन दोनों की आखिरी अंतरंग मुलाकात थी. अर्जुन पूरी एकाग्रता से वो दमकते नाग वाली छोटी सी बलि माधुरी को पहना रहा था. काम पूरा होते हे माधुरी का मुलायम चेहरा अपने दोनों हाथो में लिए अर्जुन बस ek-tak ऐसे देख रहा था जैसे वो इस मंजर को दिल में क़ैद रखना चाहता हो.

"शहहह.. ज्यादा टाइम नहीं है अर्जुन और फिर इसके बाद शायद हे ऐसा टाइम मिले.", माधुरी ने अभी अभी लगाईं लाली से सजे अपने उभरे हुए आधार अर्जुन के होंठो से जोड़ दिए. खुमार इतना हावी था माधुरी पर की इस चुम्बन को पल भर न लगा उतेजना के चरम पे जाने में. दोनों की जिव्हा अठखेलिया करती रही और बड़े ध्यान से अर्जुन ने माधुरी की पीठ पर बंधे धागे खोल कर वो कमीज ढीली कर दी. बैठी अवस्था में हे इस गहरे चुम्बन के साथ अब अर्जुन के दोनों हाथ कमीज के अंदर रेंगते हुए माधुरी के समतल निर्वस्त्र पेट और फिर उसके आगे उन मुलायम बड़े बड़े कसावयुक्त वक्षो पर आ रुके. कुछ पल उनकी गर्मी और चिकनाई को महसूस करता अर्जुन थोड़ा आवेग से माधुरी के होंठो को लगभग खाने हे लगा था. मॉटे उभारो पर अर्जुन के सख्त हाथो का स्पर्श माधुरी को भी जोश दिलाने लगा.

"उठ.. रुक भाई. कपडे खराब नहीं करने और इस सबके लिए जायदा टाइम नहीं है."

"आज उतनी जल्दी भी नहीं करने वाला दीदी. पहले आप ये अपना कमीज निकालो."

"नहीं बाबू. देख इसको निकलने के बाद मेरे बाल फिर से बनाने पड़ेंगे और सिलवट पड़ी तोह जवाब देते नहीं बनेगा. हाँ ये लेहंगा मैं हटा देती हु.", इतने में हे माधुरी ने अपने लहंगे की डोर खोल कर जिस्म का निचला भाग निर्वस्त्र कर दिया. दमकती लाजवाब जाँघे और उनसे ऊपर वो उभरा हुआ योनिप्रदेश देख अर्जुन ने फर्श पर घुटने टिका कर वो महकता कटाव अपने होंठो से छो लिया. माधुरी के गद्देदार कूल्हों को दोनों हाथ से दबोचे वो इस उभरी हुई योनि की मोटी फांको में तब तक मुँह धंसाए भोग करता रहा जबतक माधुरी की टाँगे जवाब न दे गयी.

"िष्ठ.. बस कर भाई.. आह्ह्ह्ह.. अब जल्दी कर.. उम्म्म..", अर्जुन भी जान चूका था की यहाँ उसकी दौड़ समय के साथ है जो हर गुजरते पल के साथ काम होता जायेगा. जमीन से उठ कर उसने एक और बार माधुरी दीदी के होंठो को अपने मुँह में भरा और अपनी जीन्स घुटनो से निचे सरकने के साथ हे वो बुरी तरह अकड़ा हुआ लिंग माधुरी दीदी के yoni-dwar पर टिका दिया. स्वतः हे माधुरी ने एक पाँव बिस्टेर पर टिका कर अपनी योनि का मुख उस दहकते लिंगमुण्ड के लिए उजागर कर दिया जिसको अपने अंदर महसूस करने की चाहत उस से अधिक शायद हे किसी को हो. इतने दिनों से prem-krida से दूर रहा अर्जुन इस मूक इशारे के साथ हे कमर धकेलता हुआ बिना रुके 3 ढको में हे माधुरी की कॉमर्स से महकती हुई योनि के अत्यधिक कसाव को दरकिनार करता हुआ गर्भ तक की दुरी लांग गया. माधुरी का जिस्म पहले वार पर तड़पा, दूसरे से जैसे वो दर्द में डूबी लेकिन अंतिम आघात से वो बस अर्जुन के जिस्म से जा लिपटी. आँखों में पानी की छोटी छोटी बूंदे निकल चुकी थी और अर्जुन भी जानता था की ऐसा होगा.

"आप वही महसूस करना चाहती थी न दीदी जो पहली बार हम दोनों ने एकसाथ किया था? देखो मुझे भी बिलकुल वैसा हे लग रहा है.. आह्हः", अर्जुन ने पुरकशिश से एक और गहरा चुम्बन जड़ने के बाद कमर को हरकत दी तोह माधुरी भी सिसकते हुए वो गहरे लेकिन धीमे धक्के बराबर झेलने लगी.

"आह्ह्ह्ह.. भाई.. उफ़.. सचमुच ऐसा हे लग रहा है जैसे पहली बार तेरा ये ले रही हु.. उम्म्म मा.. ऐसे ये कमीज ख़राब हो जायेगा..", माधुरी तुरंत अलग होती हुई दिवार का सहारा ले कर ठीक उस मुद्रा में हो गयी जिसको देख कर अर्जुन खुद को रोक न पता था. वही जुनूनी जानवर सा मिलान और अपनी संगिनी की लगाम हाथो में लेने वाली मुद्रा. इस अवस्था में माधुरी इसलिए भी आयी थी की वो अर्जुन को वो चीज थमा सकती थी जो वो सबसे अधिक चाहता था, उसके बड़े सुडोल और उन्नत वक्ष.

"आराम से डालना भाई, मैं इस मिलान का हर पल महसूस करना चाहती हु... आठ.", अर्जुन उन विशाल नितम्बो के बीच अपने मूसल अंग को सही दिशा दिखने के साथ हे इस बार बड़े प्यार से उस पनियाई गली को फैलता हुआ माधुरी दीदी को उस सुख का अनुभव करवाने लगा था जिसकी चाह ने इस ख़ास पल को सार्थक करने को उन्हें मजबूर किया था. जड़ तक उस गहराई को माप कर अर्जुन ने अपने दोनों हाथो आगे बढ़ा कर अकड़े हुए निप्पल के साथ भरे भरे मांस के गोले से वक्ष थाम लिए.

"उम्म्म.. आह्हः.. दीदी.. आपका सचमुच जवाब नहीं.", पीछे से जुड़ कर माधुरी की योनि में गहरे प्रहार करता हुआ अर्जुन ढीली कमीज के भीतर दोनों खरबूजों को दबाता हुआ हर बार अपने वृषण (अंडकोष) उन भारी कूल्हों की जड़ में टकराता. ताबड़तोड़ लेकिन साढ़े हुए धक्को ने जल्द हे माधुरी को दूसरे सखलन का एहसास करवा दिया लेकिन वो वैसे हे तिकी रही, हिम्मत बरकरार रखते हुए. गीली सुरंग में वो दैत्याकार सा लिंग बुरी तरह फिसलता हुआ माधुरी और अर्जुन को स्वर्गिक उड़ान पे लिए जा रहा था. Thapp-thapp की आवाज किवाड़ से बहार न जा कर बस इन्हे हे कामाग्नि के नशे में बाँध रही थी.

"उफ़... अर्जुनंन.. जल्दी कर.. आह्हः.. और अंदर हे करना अर्जुनंनं..", शायद ये अर्जुन का भी आजतक का सबसे तीव्र मिलान था और इतने दिन से सहेज कर रखा वीर्य अनंतकाल सामान जाने कितनी हे देर तक माधुरी के गर्भद्वार पर दस्तक देता योनि को भरने लगा.

"दीदी.. हहहहहह.", किसी अश्व की तरह हुंकार भरता हुआ वो माधुरी दीदी के जिस्म से जोंक की मानिंद जुड़ कर उनमे समाने की नाकाम सी कोशिश कर रहा था. Paani-bhare बड़े गुब्बारों से माधुरी के कूल्हों को फैलता हुआ अर्जुन लगभग होश भुला चूका था. आखिरी लम्हो में उसकी पकड़ माधुरी पर इतनी अधिक हो चुकी थी की चुचो पर बढ़ते दबाव से माधुरी लगभग चीख हे पड़ी. कासी हुई योनि के भीतर सूपड़ा फूलने पर एक और चरम प्राप्त करती हुई वो दिवार से हाथ टिकाये हे घुटनो के भर बैठ गयी. पक्क की आवाज करता वो भीषण लिंग दोनों के तरल में लिप्त बहार निकला बता रहा था के ये सम्भोग कुछ ज्यादा हे जोरदार रहा. अर्जुन की सांसें भी अनियंत्रित हो चुकी थी जिन्हे सँभालने के लिए वो बिस्टेर पर पसर गया.

"उफ़.. जान हे निकाल दी तुमने तोह भाई.. आह लेकिन अब उठ और जल्दी से कपडे पहन.. मैं भी तैयार होती हु.", माधुरी ने जैसे तैसे एक नजर अपनी योनि पर डाली जो जमीन पर सफ़ेद तरल टपकाती पहले से दुगनी फूल चुकी थी. होंठ फड़क रहे थे ऐसी भीषण चुदाई के बाद और उन्हें रुमाल से साफ़ करके माधुरी ने फुर्ती से लेहंगा पहना और आईने के सामने खड़े हो कर कमीज के पीठ की तरफ वाली डोर भी कसने लगी. अर्जुन जैसे तैसे उठने के बाद एक बार और अपनी बड़ी बहिन को सीने से लगते हुए चूम कर बगल वाले कमरे में चल दिया. माधुरी की तोह चाहत थी की अर्जुन उसको एक पूरी रात जी भर कर निचोड़ ले इस घर से विदा लेने से पहले लेकिन ये 15-20 मिनट का मिलान भी इस माहौल में कही से काम न था. फिर भी दोनों को त्यार होने में 15 मिनट और लग हे गए. अब माधुरी के हाथो में कलाई तक चूड़ियां और कड़े थे वही गले में एक हर और lehnge-kameej के अनुकूल हे एक जालीदार दुपट्टा सर पे लिए वो कार की पिछली सीट पर बैठी थी.

"मुनीर भैया, चलता हु. आपको कुछ चाहिए हो तोह असगर अंकल से बोल देना. वो भी बगल वाले प्लाट में हे चारपाई लगाए है.", अर्जुन ने कार की तरफ बढ़ने से पहले दरवाजा लगते हुए मुनीर को सूचित किया जो बदले में अदब से मुस्कुरा दिया. इसके बाद गाडी में हल्का संगीत चालू करके अर्जुन भी आगे बढ़ गया. इतने व्यस्त समय और भीड़भाड़ के बीच भी इन दोनों ने ऐसा समय निकाल हे लिया था जिसकी चाह इन दोनों को हे थी, माधुरी को कुछ अधिक.

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पार्टी में आया हर मेहमान खुदको माहौल में ढाल चूका था और शायद हे कोई ऐसा हो जो इस चकचौंध एक साथ साथ बेहतरीन मेजबानी से अभिभूत न हुआ हो. उम्मीद से कुछ हे मेहमान ज्यादा होंगे लेकिन प्रबंध शायद उनसे ज्यादा का था. गोलाकार पारिवारिक सजी मेज की गिनती दर्जनों में थी और संजीव की शराब पार्टी से कही अधिक बड़ा nirty-patal (डांस स्टेज) जगमग था जहा फ़िलहाल बचे उछाल कूद मचाते खुश हो रहे थे. पंडित जी के परिवार के सभी गृहस्थ लोग अपने अपने जोड़ीदारों के साथ आये हुए मेहमानो की आवभगत और बातचीत में व्यस्त थे.

"दादी, माधुरी दीदी भी आ गयी है.", प्रियंका ने जैसे हे कौशल्या जी को ये सन्देश दिया वो अपनी मंडली से उठ कर प्रियंका के साथ बहार की तरफ चली आयी. अर्जुन कार का द्वार खोले खड़ा था और माधुरी के लहंगे दुपट्टे को संभालती अलका रेणुका उसको इस तरफ हे लिए आ रही थी. अपनी माँ के बगल में खड़े हुए राजकुमार जी को भी ख़ुशी थी की आज उनकी बेटी इतनी बड़ी हो गयी है की विवाह करके वो कल अपने नए घर चली जायेगी. ललिता जी भी ये सब देखती हुई मुस्कुरा रही थी.

"देख ले माधुरी बिटिया, ये सब तामझाम मैंने संजीव के लिए न किया. सिर्फ और सिर्फ तेरे लिए और तेरी ख़ुशी जिसमे सभी शामिल हो इसलिए ऐसा हुआ है. मेरी बची सचमुच किसी पारी से काम न है.", कौशल्या जी ने अपनी बहु ललिता से काजल ले कर खुद हे माधुरी के कान के पीच लगाया और यहाँ से वो खुद हाथ पकड़ कर माधुरी को अंदर लिए आयी. सभी को लग रहा था के माधुरी की चाल में आयी हलकी लड़खड़ाहट लहंगे को थाम कर चलने की वजह से है. अर्जुन ये दृश्य देखता वही खड़ा खड़ा मुस्कुरा रहा था जिसको वजह ाचे से पता था.

"क्यों मिया अर्जुन ऐसे अकेले अकेले किसको याद करके मुस्कुरा रहे हो? कही कोई मेहमान हमारे छोटे उस्ताद को तोह नहीं भा गयी?", ये थे जनाब लकी अरोरा जी और उनके साथ हे उनकी बहिन डिम्पी भी आयी थी. Mata-pita शायद पहले हे अंदर जा चुके थे. डिम्पी को उनकी बगल में खड़े हँसते देख अर्जुन सकपका गया.

"ओह ऐसी बात नहीं है भैया. बस ये देख कर मुस्कुरा रहा था के घरवाले अपनी बेटी के जाने पर कितना खुश होते होंगे न जो इतने फंक्शन रखते है. वैसे डिम्पी की बारी में तोह मुझे लगता है आप ऐसी दिवाली हफ्ता भर मनाओगे. हाहाहा..", अर्जुन के व्यंग पर लकी भी खिलखिला पड़ा लेकिन डिम्पी दोनों को हे गुस्से से घूरने लगी.

"ओह सॉरी सॉरी डिम्पी. लकी भैया हफ्ता नहीं पूरे 10 दिन ख़ुशी मनाएंगे..", अर्जुन ने गंभीर होने के बाद फिर से मजाक किया तोह पाँव पटकती हुई डिम्पी वह से अंदर की तरफ चल दी. लेकिन थोड़ा आगे जा कर वो मुड़ी और बोली.

"मेरा नंबर जब आएगा तब आएगा लेकिन तुम्हारे कान मैं आज हे खिंचवा के जाउंगी और तुम भी जानते हो किस से. फिर कभी मजाक नहीं करोगे मुझसे और भैया आप तोह घर हे वापिस चलेंगे. आपको भी देखते है वह पर. बहोत हंसी आ रही है न आपको.", और अब वो अंदर जाते हे Afsana-Akanksha के साथ इधर उधर घूमती फिर रही प्रीती से मिली.

"गलती कर दी तेरी बात पर हंसने की अर्जुन. अब तोह भगवन हे बचाये मुझे मेरी शैतान बहिन से."

"आपको तोह भगवन बचा भी लेंगे भैया लेकिन मेरी तोह खबर खुद भगवन हे लेंगे अब. चलो छोडो ये सब और ये बताओ के ये संजीव भैया कहा है? आप लोगो का आज भी अलग प्रोग्राम है क्या?", अर्जुन ने कार के आईने में एक बार चेहरा देखने के बाद रुमाल से माथा साफ़ किया और कपडे दुरुस्त करता वो लकी के साथ हे दूसरे हॉल की और चल दिया.

"अरे ऐसा नहीं है भाई लेकिन तामझाम थोड़ा सा अलग अलग किया है. जिधर बाकी सभी जा रहे है वह फॅमिली वाले है और उनके हिसाब का हे माहौल. हम लोग भी उधर जा सकते है लेकिन संजीव ने साफ़ कहा है के जिसने ड्रिंक करनी है वो पिछले हॉल में एन्जॉय करे और फिर वही से निकल ले. ऊपर सिर्फ बड़े लोगो की व्यवस्था है. मैं तोह आज भी हमेशा वाले अपने 2 जाम लूंगा और संजीव शायद एक हे ले. चल आजा तुझे बाकी सभी से मिलवाता हु.", अर्जुन को अभी भी कुछ और जरुरी काम थे लेकिन फिलहाल बहोत समय था और अभी संजीव भैया के दोस्तों से बेहतर जगह उसको कोई लगी हे नहीं.

"हाँ मुझे भी ाचा लगेगा आपके दोस्तों से मिल कर.", अर्जुन इस तरफ से दाखिल हुआ तोह लम्बे हॉल में अभी खाने के काउंटर तैयार हे हो रहे थे और इस से आगे जाने पर वो इस तुलनात्मक छोटे हॉल में दाखिल हुए जिसका दरवाजा लकी के खटखटाने से खुला था. इधर तोह जैसे वो किसी अलग हे सभ्य पार्टी में आ पहुंचे थे जहा जाम के बहार भी सफ़ेद कागज लिपटे थे और तक़रीबन 2 दर्जन दोस्त में घिरा संजीव सबसे शुभकामनाये लेने के साथ हे उनके गिलास खुद बना रहा था.

"रूपक, एंड्रू, संजय तुम लोग तोह मिल हे चुके हो मेरे छोटे भाई से. दोस्तों ये है मेरी जान और मेरा सबकुछ, मेरा भाई अर्जुन.", संजीव भैया के ऐसे संक्षिप्त लेकिन सिर्फ और सिर्फ प्यार भरे शब्दों से अपना परिचय सुन्न कर अर्जुन सबसे पहले उनके हे गले लगा और फिर बारी बारी से उन्होंने अर्जुन का परिचय सभी से करवाया.

"तोह भाई अर्जुन तुम तोह इधर खड़े सभी लोगो से लम्बे तगड़े हो. आखिर तुम्हारे हे बड़े भाई और हमारे दोस्त की शादी होने की ख़ुशी में जो ये पार्टी है इसका पहला जाम तुम्हे नहीं लेना चाहिए?", आशीष ने गिलास उठा कर हवा में ऊँचा करके सभी से जैसे शामिल होने की दरख्वास्त की और ऐसा हुआ भी. लेकिन अर्जुन ने बिना कुछ जवाब दिए वही रखे एक खली गिलास को पानी से भर कर वैसा हे किया.

"ये तोह सरासर नाइंसाफी है दोस्त. संजीव बोलो अपने भाई को यार की वो भी जाम तोह बनाये, काम से काम बियर का हे सही.", एंड्रू की बात पर संजीव ने अपने भाई की पीठ पर हलकी सी ढोल जमा दी.

"हाहाहा.. ये नहीं पीयेगा एंड्रू और जिस दिन ये पीयेगा तोह यहाँ खड़े हर व्यक्ति को फिर से उस पार्टी में शामिल करूँगा. अर्जुन अभी सिर्फ 18 का है और इस से मेरा वादा है की जिस दिन इसका कॉलेज शुरू होगा, उस से पहले दिन मैं खुद अपने भाई के लिए जाम बनाऊंगा. फ़िलहाल तोह मेरे भाई की प्यूरिटी के लिए चियर्स.", और अब आगे कोई सवाल किये बिना khann-khann की ढेरो आवाजे हुई और उसके बाद सभी ने छोटा छोटा घूँट लेते हुए संजीव के आने वाले दिनों की शुभकामनाये प्रकट की.

"वैसे एक बात तोह मैं भी कहना चाहता हु अगर इजाजत हो तोह.?", ये जनाब थे कपिल मल्होत्रा, मल्होत्रा जी के बेटे और संजीव के ाचे दोस्त बेशक उम्र में लगभग 8-9 साल बड़े.

"कपिल भैया आपको तोह पूछना नहीं चाहिए. बोल भी दीजिये यार जो दिल में है.", संजीव ने उन्हें प्रोत्साहित किया था और कपिल भैया ने अर्जुन को अपने साथ लगते हुए कहा.

"ज़िन्दगी के लिए सभी का अपना अपना नजरिया है और वैसी हे सबकी प्राथमिकताएं. आप लोगो में से कई सिर्फ अपनी ड्यूटी को हे सबकुछ मानते है तोह कुछ मेरे जैसे जो धागा बनाते हे रह गए. पैसा, शोहरत और शायद कुछ ऐसे काम जिन्हे हम बताने में हिचक महसूस करते हो लेकिन मैंने व्यस्त जीवन में भी लगभग हर रोज 2 नाम अपने घर में जरूर सुने है. संजीव और अर्जुन. इन दोनों का नजरिया भी एक दूसरे से बिलकुल अलग है लेकिन ये दोनों फिर भी अलग नहीं. संजीव ने अभी कहा प्यूरिटी जिसका मतलब हुआ पवित्रता और यही तोह इनका सम्बन्ध है. ज़िन्दगी का एकमात्र नजरिया जो इन दोनों ने समझा है और बरक़रार भी ऐसे रखते है की सामने वाला मुरीद हो जाए. मैं उस दिन का इन्तजार करूँगा जब ये पवित्रता एक कदम आगे बढ़ेगी और उस वक़्त हमारे अर्जुन के हाथ में सामान जाम होगा. ये जाम इन दोनों के लिए.", कपिल भैया ने जोशीले अंदाज में कहा तोह एक साथ फिर कई स्वर गूंजे. पवित्रता के नाम.

इसके बाद तोह सरकारी क्या और व्यवसायी क्या और क्या हे बेरोजगार. सभी अपने अपने किस्सों के साथ सिमित जाम लेने लगे. संजीव ने अभी तक अपना पहला गिलास हे थाम रखा था और कोई आधे घंटे बाद अर्जुन ने जाने की आज्ञा मांगी तोह स्वीकार हुई.

"मिल कर ाचा लगा दोस्त. कल इत्मीनान से बातचीत होगी.", ये रूपक था जिसको अर्जुन ने बहोत प्रभावित किया था और उसकी बात पर अर्जुन ने भी हाथ मिला कर बस इतना हे कहा, "जी जरूर भैया. शुभरात्रि."

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जिधर जिधर ऋतू और आइशा जा रही थी वही वही उस शक्श की नजरे बस उन्ही दोनों का पीछा करती रही. सांगवान जी की धर्मपत्नी यशोदा जी के साथ ये युवक इस गोलाकार टेबल के गिर्द कुर्सी पर बैठा बस ऋतू को हे देख रहा था. यहाँ उसके करीब रुचिता, एनी और मधु के साथ अशोक जी भी बैठे हुए थे.

"क्या हुआ मंजीत, इतने गौर से क्या देख रहा है?", रुचिता ने एक बार इस युवक को और फिर उसकी नजरो का पीछा करने के बाद ये सवाल देगा तोह युवक थोड़ा सकपका गया.

"कुछ नहीं भाभी बस यहाँ की रौनक हे देख रहा था. आपको तोह पता है मुझे महफ़िल से ज्यादा परिवार के बीच रहना पसंद है. इसलिए देख रहा हु की यहाँ कितना पारिवारिक माहौल है. थोड़ा सा मॉडर्न है लेकिन सलीके से.", ये रुचिता का सबसे छोटा देवर था जो सांगवान जी के घर मिलने आया था और अब उनके अनुरोध पर इधर भी आ गया. अशोक जी तोह औपचारिक मुलाकात के लिए आये थे जो अब मधु को कुछ समय के लिए यहाँ से ले कर कुछ बात करने एक तरफ चल दिए.

"देख पारिवारिक माहौल में अगर कुछ ज्यादा हे पसंद आ जाए तोह ऐसी वैसी हरकत न कर दियो. बाकी तू समझदार है.", रुचिता ने बातों बातों में अपनी तरफ से आगाह करने की कोशिश भर की थी लेकिन ये युवक अब फिर से वही देख रहा था लेकिन अब उसकी नजर जिस युवती पर रुकी थी वो Ritu-Aaisha के दरमियान कड़ी उनसे भी कुछ लम्बी और क़यामत हे थी. अलका, जो ठीक ऋतू जैसे हे लेहंगा चोली में बरबस हे हर युवक का ध्यान अपनी और आकर्षित कर रही थी. ऋतू बेशक चेहरे के मामले में हमेशा मासूमियत की वजह से भरी पड़ती थी अलका पर लेकिन जो कटाव अलका के सुडोल तराशे हुए जिस्म पर थे उनका मुक़ाबला भी बस ऋतू हे कर सकती थी, 19 रह कर. ऋतू से कुछ बात करने के बाद अलका उस तरफ से हे बहार की और चल दी.

"मैं बाथरूम हो के आया भाभी. जूस कुछ ज्यादा हे पी लिया है लगता.", मंजीत ने रुचिता को बताने के बाद इस तरफ से हे बहार का रुख किया जैसे वो जानता हो की उसकी मंजिल किधर मिलेगी. ांनी के करीब हे रोमिला अपने साथ अलीशा को लिए चली आयी थी लेकिन ये युवक उन्हें न देख बस निकल चला.

'साला ऐसा स्वर्ग तोह दिल्ली में भी न देखने को मिला. जितनी देखि सभी रंडी थी लेकिन ये जो भी है बस हर कीमत पे यही चाहिए.', खुद से बड़बड़ाता हुआ ये व्यक्ति आगे की तरफ बढ़ा तोह अलका को उस लम्बे तगड़े युवक जो अर्जुन हे था, उसके सीने पर हाथ रख कर मुस्कुराते हुए बात करके देख अपनी हे जगह ठहर गया. कुछ हे पल में वह कोमल भी प्रकट हुई और प्रीती भी. कोमल के सामने अलका सहज रही और बाकी तीनो बस कोमल की बात सुनते रहे जो कुछ गंभीर दिख रही थी. लेकिन अर्जुन के संवाद के बाद जैसे वो खुश हो कर वापिस अंदर चली गयी. प्रीती भी बातों के साथ साथ हाथ के इशारो से अर्जुन को गंभीरता से समझती दिखी और फिर उसकी पीठ सेहला कर जैसे अर्जुन ने सांत्वना दी तोह प्रीती भी अपनी किसी सहेली की आवाज पर अंदर चली गयी. अब संगीत बजने लगा था और उस बड़े मंच पर लड़कियों का एक दूसरे के साथ ताल मिला कर नाचना भी. मधु, सरोज, पालक मल्होत्रा के साथ साथ प्रीती आकांक्षा और ज़ुबैदा इन नाचने वाली बालाओ में शामिल थी लेकिन इनसे अलग एकांत में अभी भी अर्जुन अलका का हाथ थामे उस से बातों में लगा रहा.

"चल यार अलका, तू इसके साथ हे लगी रहेगी तोह ये कब काम करेगा. विवान अंकल भी आ गए है और वो रोमिला अलीशा आंटी के साथ स्टेज के पास हे बैठे देख रहे है. अर्जुन तुझे सब याद है न?", ऋतू लगभग अलका को खिंच कर ले जाती हुई हंस भी रही थी. अर्जुन ने भी सर हिला दिया और 5 मिनट का इशारा करके वो इस तरफ हे आने लगा. वो दोनों अंदर जा चुकी थी लेकिन अब मंजीत से जैसे सबर न हुआ और वो भी अर्जुन की हे और चल दिया.

"क्यों पहलवान क्या चल रहा था वह?", मंजीत के सवाल पर अर्जुन ने पहले तोह इस आइटम को ऊपर से निचे तक ध्यान से देखा. गर्मी में भी उसने कमीज का ऊपर वाला बटन टांक रखा था और कमीज की आस्तीन भी पूरी लम्बाई वाली. पाँव में महंगे जूते जैसे उसके साथ न करते हो.

"देख लिया हो तोह मुँह भी खोल ले. ये जो तू कुछ भी कर रहा था वो कटाई गलत बात है और मैंने न यु सब पसनद नहीं.", मंजीत दांतो को भींच कर जैसे अपनी बात कह रहा था वो गंभीर की जगह वो अजूबा हे लग रहा था. अर्जुन को हंसी आ गयी ये देख कर.

"देखो भाई एक तोह तुम जो कोई भी हो मुझे उस से मतलब नहीं और दूसरी बात घर के मामलो में तुम्हे बोलना नहीं चाहिए. वैसे मैं अगर तुम्हारे हे अंदाज में तुम्हे समझने लागु तोह शायद तुम उन पैरो पर वापिस न जा सको जिनमे ये चमकदार जूते पहने हुए हो.", अर्जुन ने आखिरी लफ्ज़ बिलकुल भी नरमी में नहीं कहे थे. औसत कदकाठी का मंजीत अभी भी हैरानी से अर्जुन को हे देख रहा था जो चलता हुआ वही दाखिल हो गया था जहा से मंजीत आया था. उसके भी कदम ठीक पीछे हो लिए और जाते हे वो रुचिता से मुखातिब हुआ. अर्जुन इस बीच अपनी ताई जी से मस्ती करता हुआ उनका हाथ पकडे स्टेज की और जा रहा था.

"भाभी, ये पठानी कुर्ते पयजामे वाला लड़का कौन है?", रुचिता ने जब अर्जुन को देखा तोह वो मुस्कुरा दी और ये मंजीत ने भी देखा की उसकी भाभी इतनी खुश क्यों हुई.

"शंकर भैया का बीटा अर्जुन है वो और जहा तुम आये हो उस परिवार का लाडला. कहो तोह मुलाकात करवौ? मेरी बहोत जमती है इसके साथ और मेरी क्या सभी की ाची खासी निभती है फिर चाहे वो एनी भाभी हो या पापा जी.", रुचिता के खुलासे से एक पल के लिए तोह ये युवक खामोश हे हो गया.

"ाचा. पता नहीं था मुझे लेकिन कुछ ज्यादा हे अभिमानी न है ये लड़का?"

"तुमसे तोह 100 गुना काम होगा मंजीत बीटा. वो सबके साथ हमेशा अपनेपन और पूरी इज्जत देते हुए मिलता है. और यही वजह है के उसके लिए सिर्फ ाची बातें हे सुन्न ने को मिलेंगी. खाना खा लो तुम फिर हम लोग चलेंगे. रूचि के पापा और भाई का तोह आज रात घर आने का कोई इरादा नहीं दीखता मुझे.", ये यशोदा जी थी और उनकी बात का मंजीत से जवाब देते न बना. अर्जुन का परिचय हो जाने के बाद वो कुछ हद्द तक उस से उलझने का विचार त्याग कर अब बस स्टेज की तरफ देख रहा था जिधर नरिंदर जी ने संगीत रुकवाते हुए गले में ढोल पहन लिया था. सभी लोग खड़े हो कर उस तरफ हे चल दिए थे, क्या बड़े क्या छोटे.

"जिसको जिसको ढोल पे नाचना नहीं आता वो भी इधर आ जाओ.. आज कदम अपने आप हे न झूमे तोह फिर .. तोह फिर मेरा नाम एक बार और बदल देना..", और इतना कहने के साथ हे नरिंदर जी ने उन 2 डंडियों से जो ढोल की थाप दी उनका संगीत हर तरफ हे गूँज उठा. पंजाबी धुन में ढोल की थाप देते हुए वो खुद भी जोर शोर से कदम हिला रहे थे. उनके गिर्द हे घेरा बना कर गुरदीप, जसलीन, ज़ुबैदा के साथ साथ प्रीती, मरीना और दर्जन भर लड़कियां भी हल्ला मचती हुई कमर में दुपट्टा बांध ठुमकने लगी.

"अरे रास्ता तोह दो जरा...", यहाँ दलीप जी चले आये थे अपने साथ सरोज और अन्नू को लिए. वही आइशा को इतना खुश हो कर गुलाबी शरारे में थिरकता देख उमेद जी ने पूरे मंच पर नोटों की बारिश सी कर दी. विन्नी बहार से कड़ी रूचि के साथ ये दृश्य देख रही थी और उन्हें अपने साथ लिए कौशल्या जी भी ऊपर मंच पर चली आयी.

"माँ, आज तोह कंजूसी मैट दिखा.", शंकर जी की आवाज सुन्न कर कौशल्या जी ने 10-10 की गद्दी वापिस रख कर 100-100 के नोट अपने बचो पर वार के संगीत वाले को सौंप दिए. नरिंदर जी तोह अब और भी jor-shor से लगभग पागल सामान सर हिलाते हुए ढोल पीटने लगे थे. क्या लड़कियां और क्या भाभियाँ.. उनके साथ साथ अशोक जी और मधु, Saroj-Daleep, वालिए जी हुसैन साहब तक मंच पर अपनी बेगम को लिए हाथ उठा कर थिरकने लगे थे.

"ओह पापा.. और जोर से..", ज़ुबैदा ने सीटी बजाते हुए जैसे अपने पिता का जोश बढ़ाया और वो अब अफसाना को भी साथ लिए अपने माता पिता के साथ थिरकने लगी थी. ज़ुबैदा सचमुच इस शैली भी बेजोड़ और निर्भीक थी. उसके जोश और नृत्य को देख लगभग सभी लोग परे होते गए और बाकी बचे जो वो भी ज़ुबैदा की ताल से ताल मिलती ेद्दियों और नरिंदर जी के बेमिसाल ढोली अवतार में खोये रहे. यही पल था जब खुद हिमांशु कैमरा छोड़ सीटियां बजने लगा और मधु जी अपने बेटे के इस तरह सबमे शामिल होने पर मुस्कुराती हुई ज़ुबैदा का हौंसला बढ़ने लगी. इस बार नोटों की बारिश हर तरफ से हुई थी और ऐसी हुई की वह बस कागज हे कागज़ उड़ते दिखे. न वो ऑर्केस्ट्रा वाला पैसे उठाने स्टेज पर आया और न कोई और. आखिर में डंडे की चोट से ढोल हे दम टॉड गया.

"धत्त तेरे की. वाह ज़ूबी बीटा मान गए तुझे. पिछली लोहड़ी पर भी ढोल जवाब दे गया था और आज भी.", नरिंदर जी के बालो तक से पसीना पानी की तरह मंच पर टपक रहा था और पूरी कमीज जैसे पानी से निकली हो. ज़ुबैदा खुश हो कर अपना चेहरा और गाला दुपट्टे से पौंछती आदाब करके हंसती हुई अपनी माँ की तरफ चल दी. हर तरफ से जोरदार तालियां का शोर हुआ और मंच साफ़ होते हे एक बार फिर वही जुगलबंदी से सभी का नाचना शुरू हो चूका था. ये माहौल अब जैसे अलका, प्रीती, रोमिला और अर्जुन के लिए अनुकूल था उस काम को अंजाम देने के लिए जिसका इन्हे इंतजार था.

'शुरू करो. पापा वही दरवाजे के पास है लेकिन अलीशा आंटी उनसे रह रह कर नजरे मिला रही है.', अलका ने अर्जुन के कान में सरगोशी की तोह अर्जुन ने पाया की रोमिला ने भी कुर्सी पर बैठे हुए हे सहमति में गर्दन हिलाई. अर्जुन इस व्यस्त माहौल में साढ़े कदमो से चलता हुआ अलीशा के करीब आ रुका. उसका रुकना ऐसा था की हाथ जैसे अनजाने में अलीशा के मांसल कूल्हों पर छुआ हो, पूरी तरह जायजा लेते हुए. इस कोने में naam-matra हे लोग थे क्योंकि इधर से बहार जाने का दूसरा दरवाजा करीब था.

"सॉरी आंटी जी.", अर्जुन में अलीशा का ध्यान अपनी तरफ दिलाते हुए थोड़ा सा झुक कर क्षम्य चाहि और अलीशा के जिस्म की वह खूबसूरत महक भुला कर वो लक्ष्य पर हे केंद्रित रहा. सफ़ेद उभारो को समेटे वो कला लिबास उनकी आधी गहराई बखूबी दर्शा रहा था. और रोमिला ने इस हट्टे काटते लड़के को अपने जिस्म के करीब सत्ता देख ऐसी मुस्कान दी जैसे वो तोह इन्तजार में हो की अर्जुन ऐसी गलती ाचे से करे.

"मुझे तोह लगा था के तुम्हे मैं कभी दिखाई हे नहीं दी. शुक्र है सॉरी के साथ हे सही बात तोह की तुमने.", अलीशा की आँखें उसके जिस्म के सामान बहोत कुछ कहती थी, मादकता के साथ.

"दूर रहना भी चाहिए मुझे. पता नहीं फिर आप मेरे बारे में क्या सोचने लगे अगर ऐसी गलतियां जानबूझ कर होने लगी तोह.", अर्जुन अपनी आवाज और जिस्म को स्थिर किये वैसे हे कर रहा था जैसा वास्तविक हो. अलीशा के सुर्ख होंठो पर गहरी मुस्कान आ गयी.

"मौका तोह मैं खुद हे देना चाहती हु की तुम गलती करो और उस से मुझे पता भी चले की तुम गलती ाची कर सकते हो या फिर?"

"इतना जानता हु की आपसे खूबसूरत गलती कोई हो नहीं सकती. सॉरी आप बड़ी है तोह मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए. लेकिन जब पहली बार उस सुबह आपको पलभर के लिए देखा था तबसे बस हर गुलाब में जैसे आपको खोजता हु. जानता हु ये ठीक नहीं है इसलिए सॉरी.", अर्जुन सामने देख कर बात कर रहा था जिस से किसी को शक न हो की वो क्या बोल रहा है और किसके साथ. अलीशा के खूबसूरत चेहरे पर एकाएक हैरानी उभर आयी. रोमिला ने उसको बताया भी था अर्जुन के पुरुषार्थ के बारे में और वो अब हर हाल में उसके करीब जाना भी चाहती थी. अर्जुन को ऐसे अपने करीब से बहार जाते देख वो एक पल रुकने के बाद ठीक उसके पीछे हे हो ली.

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क्रमश
 
अपडेट 187 (बी)

संगीत

अलीशा को अपना पसंदीदा शिकार हाथ से जाता दिखा तोह वो सबकुछ भूल कर अर्जुन के पीछे तेज कदमो से चल दी. रोमिला की बगल में बैठे विवान को अपने करीब से अलीशा का ऐसा नज़रअंदाज करके गुजरना कुछ अजीब सा लगा लेकिन इस समय वो एक पति और जिम्मेवार पिता की भूमिका में था और वो एकाएक अपनी बीवी के पहलु से निकल कर अलीशा के पीछे जाने का खतरा उठाने से कटरा चूका था. मैं में संशय जरूर था क्योंकि अलीशा की चाल हे ऐसी थी और उसके haav-bhaav जैसे वो कुछ मंचन पाने की लिए निकली हो.

"विवान मैं जरा अभी आती हु. मरस गुलाटी अभी निकल रही है तोह एक बार मिलना ाचा रहेगा. तुम इतने एक ड्रिंक ले लो या फिर बैठ कर एन्जॉय करो.", रोमिला जैसे अपने पति को बेहतर जानती थी और उसने खुद हे ऐसा मौका दिया जिस पर विवान के चेहरे पर वो झूठी मुस्कराहट उभर आयी. अंदर से भी वो खुश था लेकिन अंजना भये भी उस ख़ुशी में शामिल था जो किसी अनहोनी का अंदेशा जाता रहा हो.

"हाँ रोमा, मैं भी सोच रहा था के 1-2 पेग ले लेने चाहिए. जेटलैग और फिर आधी अधूरी नींद लेने से अभी तक शरीर में कुछ अकड़न सी है. शंकर भाई भी वही गए है तोह थोड़ा उनके साथ और समय बिता लूंगा.", स्टेज पर इस वक़्त ज़ुबैदा, विन्नी और माधुरी की कुछ सहेलिया माधुरी को अपने साथ हे थोड़ा सहज डांस करवा रही थी. फोटोग्राफर पूरी तन्मयता से कार्यक्रम और naach-geet को क़ैद करने में लगा था. रोमिला ने अपनी जगह से उठ कर पीछे का रुखा किया लेकिन पहले एक इशारा अलका को भी नजरो नजरो में कर गयी जैसे अब तक सब कुछ प्लान के हिसाब से हे चल रहा हो. विवान ने एक बार मदद कर अपनी खूबसूरत बीवी को देखा जो वही जा रही थी जहा का बताया था. रोमिला जैसी अनुपम सौन्दर्य की मालकिन के साथ भी दांपत्य छल करने वाले विवान की जैसे नजरो पर हे लानत थी. या वजह जो भी हो लेकिन अलीशा हर मामले में अपनी भाभी से 19 हे होगी और विवान जैसे साबित करना चाहता था के पुरुषार्थ के मायने ऐसे भी होते है.

'अब ये लड़का कहा चला गया?', अलीशा ने संगीत हॉल से बहार आने के बाद अपने बायीं तरफ देखा तोह वह से बस लोगो को बहार की तरफ जाते पाया. वो दरवाजे की तरफ जाते हुए जैसे अर्जुन से एक बार के लिए नजर हटा चुकी थी और अब दूसरी तरफ उम्मीद से देखा तोह अर्जुन गलियारे से दायी और एक दरवाजा खोल अंदर hall/kamre में जाता दिखा. अलीशा कुछ तेज चाल से उस तरफ हे लपकी. उस से 20-25 कदम पीछे विवान भी अपनी जगह से उठ कर इधर हे चलने लगा था लेकिन उसकी चाल में चपलता न थी.

"रुको.", ये कम्युनिटी सेण्टर का स्टोर नुमा कमरा था जिसके आगे आपातकाल में प्रयोग करने के लिए बनाये गए प्रसाधन कक्ष थे. जगह के हे मुताबिक ये भी बेहद साफ़ सुथरा था. अलीशा ने भाप लिया था के आगे लगे दोनों दरवाजे बंद है और उन पर purush-mahila के हिसाब से निशान अंकित थे.

"जी कहिये आंटी.", अर्जुन चेहरे पर थोड़े हैरानी के भाव लता हुआ वापिस मुदा तोह उन दोनों कपाट को बंद करके अलीशा अपनी पीठ ठिकाये थी. हलकी उखड़ी हुई सांसें जाहिर करती थी की ये इस एकांत की वजह से है न की मीलो दौड़ने की.

"तुम ऐसा क्यों कर रहे हो?", अलीशा अपने चेहरे के सामने आये उन रेशमी बालो को वापिस पीछे करती हुई अर्जुन से बस 2 कदम दूर आ रुकी. कंधे से कुछ निचे बड़ी सफाई से कटे हुए भूरे बाल, गोलाकार दमकता ुननि (ग्रीक) आभा वाला आकर्षक चेहरा, उभरे हुए कटीले होंठ और सीने का वो उन्नत्त उफान जो एक काले कैसे हुए परिधान में क़ैद था. अलीशा किसी भी हृदय को अपने पाँव के निचे रखने में सक्षम थी क्योंकि वो अपनी ख़ूबसूरती के हथियार की ताक़त भली भांति पहचानती थी. अर्जुन द्वारा दिया गया मीठा तिरस्कार जैसे असहनीय हो गया था और जीवन में मिले ऐसे पहले विपरीत रुझान पर वो लगभग बोखला कर हे इधर आयी थी.

"मैंने तोह कुछ भी नहीं किया आंटी लेकिन आपने दरवाजा क्यों बंद किया? वैसे ये जगह इमरजेंसी के लिए है अगर गेस्ट्स ज्यादा हो पर फिर भी कोई आया तोह गलत समझ सकता है.", अर्जुन जैसे अब अलीशा के साथ ये अलग हे आँख मिचोली खेल रहा था. वो जैसे इस घटना के दोनों पक्ष रखता हुआ गलत और सही के बीच अलीशा को क़ैद करने लगा.

"तुम नहीं मेरी हालत नहीं समझ रहे हो. थोड़ी देर पहले तुमने तोह अपना सच बता दिया लेकिन शायद मैंने हे सही रिस्पांस नहीं दिया. मुझे लगता नहीं था के तुम्हे भी मुझमे इंटरेस्ट होगा.", अलीशा आहिस्ता आहिस्ता अर्जुन के नजदीक होने लगी थी. इस 12क्ष12 के खली कमरे में इतने करीब होने पर वो गुलाब सी महक अर्जुन भलीभांति महसूस कर रहा था. चाँद इंच के फैसले से हे अलीशा के वो हाहाकारी उभर हिलते हुए जैसे कभी भी अर्जुन के सीने से टकरा सकते थे.

"मैंने ऐसा क्या कर दिया आंटी? और आपकी हालत? मैं कुछ समझा नहीं.", अर्जुन के चेहरे पर आया हल्का पसीना गर्मी की वजह से था लेकिन अलीशा समझ रही थी की नादान सा ये भरपूर तगड़ा युवक एकांत में घबरा रहा है. अपने हाथ में पकडे रुमाल से अर्जुन का चेहरा साफ़ करती वो अब बिलकुल उसके साथ सत् चुकी थी. उन नरम मांसल चुचो को अपने सीने से चिपकते देख अर्जुन ने एक गहरी सांस भरी. जो भी कर रहा था शायद उसके लिए वो एक परीक्षा हे थी, इस से ज्यादा कुछ नहीं.

"रोमिला ने बताया था मुझे की वो एक ऐसे युवक से मिली है जिसकी क्षमता ाचे ाचे मर्द से भी कही ऊपर है. मेरी बेटी के मुँह से भी मैंने कुछ ऐसा हे सुना था जब वो अपनी किसी सहेली से बात कर रही थी, फ़ोन पर. लेकिन मुझे यकीन तब हुआ जब मैंने तुम्हे रोमिला के साथ मौखिक प्यार करते देखा.", अलीशा द्वारा रोमिला वाले प्रकरण को जानकार अर्जुन सचमुच कुछ परेशां हो गया था. लेकिन अभी ये समय अपनी उलझन सुलझाने का तोह कटाई न था.

"मैंने रोमिला आंटी के साथ कुछ भी नहीं किया आंटी. जो किया उन्होंने किया था लेकिन आपको वो सब कैसे पता चला?"

"वीडियो से. तुम्हारी तारीफ सुन्न कर मैंने हे रोमा से प्रूफ मांगे थे क्योंकि मुझे तोह सिर्फ तुम बहरी जिस्म से हे ठीक लगे थे लेकिन जब उसने मुझे तुम्हारी कामकला और पौरुष दिखाई तोह उस दिन के बाद से जैसे मेरा ध्यान किसी और की तरफ गया हे नहीं. कुछ देर पहले जो भी तुमने कहा था असलियत में वही मेरे अलफ़ाज़ है अर्जुन. तुम मुझे एक बार मौका दो और अगर तुम्हे लगा की मैं तुम्हारे काबिल नहीं हु तोह वादा करती हु फिर ऐसी कोई कोशिश नहीं करुँगी.", अर्जुन की ठुड्डी को हलके से चूमते वक़्त जिस तरह अलीशा ने आँखे मूंदने के साथ साथ कपड़ो के ऊपर से हे उसका वो ardh-utsahit मूसल सा हथियार पकड़ कर सहलाया था, अर्जुन के जिस्म में झुरझुरी दौड़ गयी. अलीशा ati-kaamuk महिला होने के साथ हे जैसे काम के हर क्षेत्र में माहिर खिलाडी थी. बस छूने भर से हे अर्जुन का वो भीषण अंग अपना विकराल रूप दर्शाने लगा था. अलीशा पूरी हथेली लपेट कर भी उसकी गोलाई न समेत सकीय.

"ये गलत जगह और गलत टाइम है आंटी. हम.. आह्ह्ह्ह.. बाद में बात करते है.. उम्म्म", अलीशा ने अब तक ठान लिया था के वो इस हथियार को देख कर हे रहेगी. अर्जुन के होंठो को ाचे से मुँह में भरने के साथ हे वो अपनी जीभ उसके मुँह में घूमती हुई एक हाथ अर्जुन के निचले वस्त्र के भीतर घुसा चुकी थी. पठार सा कठोर और लगभग उसकी चिकनी कलाई के सामान मोटा भुजंग पकड़ कर अलीशा साफ़ महसूस कर रही थी की अर्जुन का सबकुछ उसके शरीर के अनुपात में बड़ा हे है. लिंग भी किसी धड़कन सा फडकता हुआ और उग्र होने लगा. इसके बाद अर्जुन ने जैसे हथियार हे गिरा दिए और एक अदा से घुटने मदद कर झुकती अलीशा ने उसके वज्रा सामान लिंग को कपडे से आजाद करके पहले जी भर के देखा और फिर लपलपाते होंठो से चूम कर वो चमकदार फुला हुआ लाल हिस्सा अपने होंठो में लपेट लिया.

"उफ़.. गलती कर रहे है हम आंटी..", अलीशा को परेशानी हो रही थी लेकिन एक अलग हे ज़िद्द में क़ैद सी वो लगभग एक तिहाई लिंग को होंठो के अंदर बहार करती हुई बाकी हिस्से को हथेली से रगड़ने लगी. 2-3 सोने की चूड़ियां जो कलाई में थी वो अब खनन खनन करती अलीशा की भूख का परिचय दे रही थी. भारी चुके जैसे किसी भी वक़्त कपड़ो से निकल कर बहार उछाल आते. कमरे की धीमी रौशनी में ठीक बेचो बीच खड़े अर्जुन के मॉटे तगड़े लिंग को झुक कर कुशलता से चूसती हुई अलीशा के पृष्ठ भाग को अगर कोई इस पल देख लेता तोह यकीनन वो वही स्खलित हो जाता. मॉटे गोलाकार कूल्हे इस मुद्रा में जैसे न्योता देते प्रतीत हुए. 5 मिनट में हे अलीशा की सांसें उखड चुकी थी लेकिन वो हथियार कुछ ढलने की जगह कही ज्यादा भयंकर दिखने लगा.

"आठ.. मुझे ये अभी चाहिए.. कोई परवाह नहीं किसी की.", अलीशा अपने काले गाउन को ऊपर उठाने के लिए अलग हुई तोह बहार से किसी के कदमो की आहात सुन्न कर अर्जुन ने उसका हाथ थाम लिया.

"शहहह.. अभी खतरा है आंटी. हम जल्द हे आगे का काम करेंगे. ये बाथरूम रिपेयरिंग की वजह से बहार की तरफ से भी ओपन है. मैं इधर से निकलता हु और अगर कोई पूछे तोह आप बता देना के आप वीमेन वाशरूम में आयी थी.", अर्जुन बहोत हे धीमी आवाज में फुसफुसाता सा बोलै. किसी के सामने पकडे जाने के डर से अलीशा का भी नशा जैसे हवा हो चूका था और देखते हे देखते वो विपरीत दिशा में बने बाथरूम का दरवाजा खोल कर उसमे दाखिल हो गया. ये जगह इसलिए हे उसने चुनी थी जब वो संजीव भैया के दोस्तों से मिलने के बाद यहाँ का जायजा ले रहा था. अलीशा ने हिम्मत करके आईने का रुखा किया और अपने चेहरे को दुरुस्त करके वो सही दरवाजे की तरफ चल दी.

"ओह तोह अंदर तुम थी? दरवाजा क्यों बंद था?", और जैसा सोचा था ठीक वही हुआ. विवान जाने कबसे वह खड़ा था लेकिन उसके चेहरे के भाव बता रहे थे की वो कुछ उलझन में जरूर है. शायद यहाँ पर्याप्त सुराख या झिर्री न मिली थी उसको जिस से वो देख पता की अलीशा अंदर किसके साथ थी. हाँ वो ये जानता था के अंदर कोई और मर्द जरूर था.

"सेफ्टी के लिए बंद किया था. एक गार्ड ने बताया था के गेट्स वाशरूम भी इधर है और पार्टी में ड्रिंक्स चल रहे है इसलिए सावधानी के लिए दूर बंद कर लेना.", अलीशा के चेहरे पर naam-matra भी शिकन या डर न था. लेकिन तुरंत हे विवान की आँखें बड़ी हो गयी और उसके बदलते चेहरे को देख अलीशा ने नजर घुमाई तोह उसके पीछे से वो हत्ता कट्टा आदमी ऐसे निकला जैसे उसको पकडे जाने का डर हो. एकदम से उस व्यक्ति ने गले में लिए अंगोछा अपने चेहरे पर बंधा और उन दोनों को लगभग हटाता हुआ गलियारे से दौड़ कर पीछे अँधेरे में दौड़ गया. दिवार कोई 5 फ़ीट ऊँची थी और उसके बाद सेक्टर की अनगिनत गालियां.

"तुम यहाँ ये सब कर रही थी अलीशा?", विवान आगे भी कुछ बोलता लेकिन बराबर में आ कड़ी हुई अपनी बीवी रोमिला, बहिन रेणुका को देख बस गुस्से से घूरता रहा.

"विव, तुम तोह ड्रिंक लेने गए थे न फिर यहाँ क्या कर रहे हो? और रेणुका तुम्हे हे ढून्ढ रही थी अलीशा. तुम इधर अकेली चली आयी, किसी को साथ बुला लेती.", और इतना कहने के साथ हे रोमिला के हाथ से उसका रुमाल निचे गिर गया. झुक्क कर उसको उठाते हे बड़ा घृणात्मक भाव दिखाया.

"छियई. कैसे कैसे लोग इन वाशरूम्स और पार्टी पैलेसेज को उसे करते है. यही जगह मिली थी कंडोम डिस्पोसे करने की?", कपडे का साथ हे वो गुलाबी निरोध भी जैसे रोमिला ने उठा लिया था और रेणुका तोह बिना कुछ कहे वापिस हे चल दी. विवान का चेहरा खुश्क हो चूका था और उस से बुरा हाल था अलीशा का जिसकी नजर बगल वाली तरफ से संगीत हाल के लिए जाते सभी बुजुर्गो पर पड़ी. आखिर उन्हें भी इनके करीब से हे निकलना था. रोमिला ने समझदारी का परिचय देते हुए रुमाल सहित वो निरोध आगे अँधेरे की तरफ फेंक दिया.

"अरे बीटा तुम तीनो यहाँ वीराने में कौनसी पंचायत करने में लगे हो? विवान बीटा, अगर भाभी ननद के बीच का मसला है तोह इन्हे हे सुलझाने दो.", रामेश्वर जी आदतन हल्का फुल्का मजाक करते हुए अपने भतीजे के करीब चले आये और हँसते हुए छोल साहब भी.

"वो कुछ नहीं ताऊ जी. अलीशा को घर की याद आ रही थी जिस वषा से उसका मेकअप ख़राब हो गया और रोमा उसको यहाँ वाशरूम ले आयी. मैं साथ में आ गया क्योंकि इधर अँधेरा था थोड़ा."

"हाँ तोह ये भी इसका हे परिवार है बीटा. अलीशा बेटे उदास नहीं होते और अगर इतना हे दिल कर रहा है तोह उस जाने से पहले तुम शादी के बाद पहले ग्रीस हे चली जाना.", अलीशा छोल साहब को जवाब देती उस से पहले हे फिर से विवान हे बोल उठा.

"वो उस वाला तोह कॉन्ट्रैक्ट ख़तम हो गया न पापा तोह अब ग्रीस में हे रहने का विचार बना लिया है अलीशा ने. पूरा परिवार है वह पर और वही सब याद आ रहा था. मैंने तोह कहा भी की कुछ दिन रहो इधर, विक्की भी है और रोमिला भी लेकिन ये शादी के अगले हे दिन वापिस जा रही है.", इस बार विवान ने पलटने से पहले दहकती आँखों से रोमिला को देखा और फिर वो उधर चला गया जहा बड़ो के लिए मदिरा का इंतजाम था.

"कोई नहीं बीटा, तुम टेंशन मत लो. परिवार से बढ़कर कुछ नहीं होता और जब परिवार की याद आये तोह फिर सुकून भी उनके पास जा कर हे मिलता है. सतीश, मैं कल हे बोल दूंगा तत्काल में वापसी की टिकट हो जायेगी बिटिया की.", रामेश्वर जी आगे बढ़ने से पहले दोनों के सर पे हाथ फिराया और अपनी आगे निकल चुकी मण्डली की तरफ बढ़ गए. अब प्रीती भी अपनी सहेलियों को अपनी माँ से मिलवाने उन्हें आवाज देती हुई संगीत हॉल से बहार आ चुकी थी.

"आई प्रीती. चलो अलीशा, अंकल ने कह दिया है न की वो तुम्हे दिक्कत नहीं होने देंगे तोह समझ लो काम हो गया. टेंशन मत लिया करो इन छोटी छोटी बातों पर.", रोमिला ने हाथ पकड़ कर अलीशा को अपने साथ लिया तोह चेहरे पर विजयी मुस्कान साफ़ दमक रही थी और वही अलीशा की तोह जुबान को लकवा हे मार गया था. वो तोह समझ हे नहीं प् रही थी की आखिर हुआ क्या है. वो आदमी अंदर आ भी गया हो बहार से तोह वो भगा क्यों? और फिर वो निरोध जो तजा माल से भरा था उसका क्या सम्बन्ध था? विवान को शक तोह हो हे चूका था लेकिन अगर वो अर्जुन का नाम लेती तोह उल्टा ज्यादा तमाशा हो जाता. रोमिला फिलहाल चुप हे रही यही सोच कर की विवान को कैसे न कैसे मन हे लेगी.

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समय 10 से ऊपर हो चला था और खाना खुले हुए भी लगभग 1 घंटा होने को आया था. कौशल्या जी ने सभी लड़कियों को कल के बड़े दिन की हिदायत देते हुए समय से भोजन करने का सन्देश दिया तोह लगभग सभी महिलाये और लड़कियां अपने अपने रिश्तेदार या परिवार के साथ बड़े हॉल की और चली गयी. कौशल्या जी ने समय से हे अपना हल्का फुल्का भोजन कर लिया था जिनमे उनकी पूरी मण्डली उनके साथ हे थी. पूर्णिमा जी, यशोदा जी, रेखा के पीहर की सभी बुजुर्ग और बाकी आयी हुई परिवार श्रेष्ठ. अब संगीत हॉल में संजीव के दोस्त हलकी फुलकी मस्ती करते हुए नाच गए रहे थे और उनका साथ दिल से जवान उनसे पहले की पीढ़ी वाले नरिंदर, दलीप, वालिए जी, संधू साहब, धर्मपाल जी, Gulati-Sangwan-Bhuppi, संजीव के मां, अर्जुन के मां इत्यादि थे. कार्यक्रम रखने की एक और वजह थी विवाह से पहले हे सभी के साथ कुछ समय ाचे से बिताना. अक्सर bheed-bhaad वाले विवाह में सबका साथ नहीं दिया जा पता तोह ये भी एक वजह से बचो के साथ साथ सभी को खुश करने की.

"तू बता तोह सकता था अर्जुन की प्लान में कुछ चेंज करने वाला है? और अगर कही विवान अंकल की नजर तुझ पर पड़ जाती तोह? वैसे हुआ क्या था वह और अलीशा आंटी तोह उसके बाद रुकी हे नहीं.", अर्जुन अभी भी जैसे कुछ दुविधा में था और खाने की प्लेट लिए वो अपने माँ पिता से थोड़ी दुरी पर बड़ी मेज पे बैठा था और उसके करीब अलका, ऋतू, तारा हे थी. हिमांशु को अशोक जी ले गए थे अपने साथ नाचने के लिए और मधु, शालिनी, उमेद राजेश्वरी जी शंकर वाली टेबल पर खाने के साथ हंसी मजाक में लगे रहे.

"वो सब मेरे ध्यान में हे था और रोमिला आंटी ने विवान अंकल को रोक कर रखा था मेरे कहे मुताबिक. प्लान का क्या है अलका दीदी, समय और जगह के हिसाब से कभी कभी थोड़ा बहोत बदल लेना हे ठीक रहता है.", अर्जुन से जैसे एक निवाला तक गले के निचे उतरा न जा रहा था. ऋतू ने उसके सर पे हाथ फिरते हुए खुद हे पहले पानी का एक घूँट पिलाया और फिर अपने हाथो से छोटा निवाला बना कर खिलने लगी. तारा भी गौर से देख रही थी और उसको जैसे ज्यादा कुछ पता न था. वो इस दौरान अपनी सहेली और बाकी बहनो के संग नाचने में हे मसरूफ थी. प्रीती भी प्लेट लिए अफसाना और स्वाति के साथ उनके हे अगल बगल आ बैठी. उसके चेहरे पर संतोष था और धन्यवाद भी.

"तुझे बहोत बुरा लग रहा है न ारु? कभी कभी हमको सीढ़ी लकीर से हट कर भी चलना पड़ता है भाई. नहीं तोह वो सीढ़ी लकीरे कभी न कभी तोह एक दूसरे को काट कर टेढ़ा रास्ता अख्तियार करेंगी हे. समय रहते कुछ ठीक कर दिया जाए तोह बेशक उसकी ख़ुशी न मनाओ लेकिन खुद को वो दर्द भी न होने दो जिस से आत्मग्लानि हो. मैं जानती हु इस वक़्त तुम्हे अलीशा आंटी के लिए बुरा लग रहा है. लेकिन तुमने एक अपने का घर बर्बाद होने से बचने की कोशिश की है और ऐसी कोशिश जिसमे शायद तुम भी बर्बाद हो सकते थे. हर किसी में इतनी हिम्मत नहीं होती.", अर्जुन का सर अभी भी ऋतू बड़े प्यार से सहलाती हुई उसको खिलने में लगी थी. दूर बैठे शंकर जी तोह ये देख बस मुस्कुरा रहे थे की उनका सुपुत्र शायद कुछ मामलो में अपनी बड़ी बहिन पर हे निर्भर है.

"बात बर्बाद होने की नहीं दीदी. मैंने इतना तोह सीखा है की अगर एक परिवार को बचने के लिए खुद बर्बाद हो जाओ तोह वो कीमत भी कुछ नहीं. लेकिन किसी को अपनी हे नजरो में अपमानित या गिरा हुआ महसूस करवाना हरगिज़ सही नहीं. वो आदमी मैंने नहीं भेजा था लेकिन मैं इतना भी जानता हु की वो सिर्फ शराब की एक बोतल छुपा कर उस तरफ से गलती से भाग गया जहा से उसके निकलने भर से एक औरत के आत्मसम्मान के अनगिनत टुकड़े हो गए. वो प्लान में नहीं था और जब रोमिला आंटी ने मेरी तारीफ करते हुए ये बात बताई तब से ऐसा लग रहा है जैसे मैंने किसी का जीवन व्यर्थ हे संकट में ला दिया. इस से ाचा तोह विवान अंकल हे देख लेते मुझे तोह उन्हें इतना सबर तोह होता की वो कोई अंजना गैर व्यक्ति नहीं था. आंटी भी ऐसी दलील दे देती जिस से उनकी िज्जात्त पर आंच न आती. लेकिन ये कैसा हादसा था जो अपने आप हुआ? जो भी हो मैं अलीशा आंटी से माफ़ी जरूर मांगूंगा.", इस धीमी चर्चा पर ज्यादा किसी का ध्यान तोह नहीं था लेकिन अर्जुन से 4 फ़ीट दूर बैठी अफसाना के चेहरे पर भी उदासी सी आने लगी.

"मांग लेना भाई, माफ़ी भी मांग लेना. लेकिन क्या कहोगे की वो आदमी कौन था तुम नहीं जानते? फिर तुम खुद हे अपराधी बन्न जाओगे जो अभी तक कोई भी नहीं है इस मामले में. अलीशा आंटी परसो वापिस जा रही है और कल का दिन वो विक्की के साथ हे रहने वाली है. शादी अटेंड करके वो चली जाएँगी. हो सके तोह बस उन्हें ाचे से ट्रीट करना जिस से उन्हें काम से काम कुछ बेहतर लगे. अब तुम्हारे सामने भी ढेरो काम बाकी है माधुरी दीदी की विदाई, नयी भाभी का गृह प्रवेश और उस से पहले 2-2 शादी एक हे जगह मैनेज करना. और आइंदा कभी खुदको बर्बाद करने वाली बात तोह बिलकुल मत करना, फिर चाहे इस प्रीती के लिए हे क्यों नहीं.", ऋतू ने आखिरी शब्द जिस तरह से मुँह बना कर कहे थे अर्जुन के चेहरे से वो दर्द गायब हो गया.

'ी लव यू', अर्जुन ने अपना चेहरा ऋतू के गाल के करीब करके बहोत धीमी आवाज में ये 3 लफ्ज़ कहे थे और ऋतू से आगे बैठी प्रीती भी मुस्कुरा दी. ऋतू के चेहरे पर पहले हे गहरी लाली थी लेकिन ये सुन्न कर एक पल के लिए उसकी भूरी आँखों की लम्बी पलके झुकी और टेबल के निचे से अर्जुन का हाथ पकड़ कर उसने भी उतने हे दबे स्वर में कहा.

'साथ में आबाद रहेंगे.'

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"पत्तागोभी कोई सलाद में डालता है क्या भाई साहब?", अपनी प्लेट लगता हुआ मंजीत कोमल, ज़ुबैदा और प्रियंका के हे पीछे चल रहा था. वो तीनो पहले हे निर्धारित टेबल पर बैठी 5 लड़कियों की प्लेट लगा कर देने के बाद अब अपना खाना ले रही थी. सलाद की तरफ आते हे प्रियंका ने mila-jula सलाद प्लेट में डाला तोह मंजीत ने उस काउंटर को संभल रहे लड़के को पत्तागोभी के टुकड़े दिखते हुए ऐसा कहा. उसकी बात सुन्न कर लड़कियां तोह हंसने लगी लेकिन काउंटर वाला हंसी दबा गया.

"सर ये तोह सेहत के लिए फायदेमंद होती है और लोग कच्चा खाना भी पसंद करते है सलाद के रूप में. वैसे ये क्रीम सलाद है."

"ओह मैंने सोचा कही रायता और पत्तागोभी आपस में मिल गए होंगे. तरय कर लेता हु फिर तुम्हे इसका रिजल्ट बताऊंगा. मैडम जी वो चम्मच देंगी?", मंजीत ने इस बार हंसती हुई प्रियंका से कहा जो मुँह बनती हुई आगे बढ़ गयी.

"चम्मच हे तोह मांगी थी कौनसा हाथ मांग लिया था जो मुँह बना के लिकड़ गयी.", मंजीत अभी अपने आप में ये सब बड़बड़ा हे रहा था की आरती उसके बगल में आ रुकी.

"भैया, साइड प्लीज. वो स्पून लेनी है.", आरती के साथ हे गुरदीप और कीर्ति थी. खुद को भैया कहलाये जाने पर मंजीत ने भी थोड़ा सा उखड़े स्वर में जवाब दिया.

"सामने से आ कर लेले बेबे.", अब उसने तोह बेबे हरियाणवी के हिसाब से कहा था लेकिन गुरदीप का इतने पर पारा हे चढ़ गया.

"ोये तू बेबे किसनू आखड़ा आ? हाँ जरा दससी तनु किठो बेबे लगदी? आप पियो दी उम्र लिए फिरदा तेह कुड़िया न बेबे आखड़ा. दूर फिट्टे मुँह..", अब गुरदीप ने ये इतने गुस्से में कहा था की उसकी आवाज सुन्न कर आरती और कीर्ति तोह हंसने लगी थी वही मंजीत के चेहरे पर हवाएं उड़ने लगी. जैसे मधुमक्खी के छत्ते में हे हाथ दाल दिया हो वो भी बिना किसी गलती के. और गुरदीप की आवाज सुन्न कर एक तरफ से नरिंदर जी लपके तोह काउंटर के पास खड़े मंजीत को देख रुचिता और ांनी.

"ओह सरदारनी तुझे क्या हो गया? वह स्पीकर बंद हुए तोह तेरा शुरू हो गया. और भाई इसके बिगड़ने की वजह तुम हो क्या?", नरिंदर जी ऐसे माहौल में हमेशा हे चेहरे पर मुस्कान लिए हे रहते थे बेशक दुनिया में वो मशहूर किसी और वजह से हो. रुचिता भी अब मंजीत का हाथ पकडे उसको गुस्से से घूर रही थी.

"बोल कुछ उल्टा सीधा कहा है तोह चुपचाप सॉरी बोल. भतीजी है वो मेरी."

"भाभी, मैंने तोह कुछ भी न कहा. ये लड़की बोली के ीस्पून लेनी है तोह मैंने इतना हे कहा के सिस्टर इधर से आ कर ले लो. मैं तोह अपनी प्लेट लगा रहा था."

"इसने सिस्टर नहीं कहा था आंटी. ये बोलै बेबे यानि की माँ. इसको माँ दिखती है हम? चलो माफ़ किया अगर ये आपका रिलेटिव है तोह.", गुरदीप भी अजीब हे थी जो अब एकदम हे शांत हो गयी लेकिन उसके जवाब पर रुचिता और नरिंदर जी की भी हंसी निकल गयी.

"ओह मेरी भोली गुड़िया. रेडियो नाम तेरा बिलकुल सही है. और रुचिता के देवर जी, भाषा का प्रयोग थोड़ा इंसान देख कर किया करो. ये पंजाब से है और इसको नहीं पता की इधर बेबे का मतलब बहिन होता है माँ नहीं. जमा जाट बूढी हे है भाई तू तोह.", नरिंदर जी ने उसकी प्लेट से खीरा उठा कर चबाते हुए अपनी राह पकड़ी जहा उनकी श्रीमती जी और भाई भाभी बैठे थे वही मंजीत के तोह अरमानो पर घरो पानी गिरा कर गुरदीप हंसती हुई आरती कीर्ति के साथ कोमल वाली तरफ बढ़ गयी.

"भाभी, इसमें भी मेरी गलती है?"

"तेरी गलती नहीं है लेकिन तेरे बोलने की गलती है. पहले हे कहु थी की टाइम से रोटी खा ले लेकिन तू तोह आदत से बाज आने वाला नहीं. वो नरिंदर भैया था और जिस लड़की पे तू फिक्र कैसे था वो उनकी लाड़ली. थोड़ा सा मर्यादा में रहना सीख और जब भी कोई लड़की या औरत कुछ कहे तोह बोलने से पहले सम्मान दे और उनकी बात मान. चल अब जल्दी खाना ख़तम कर, माँ इन्तजार कर रही.", मंजीत बेचारा अपना सा मुँह लिए प्लेट लिए पहले तोह इधर उधर देखता रहा फिर आखिर में उस टेबल पर जा बैठा जहा संजीव, लकी, कपिल आदि आ कर बैठे थे. बैरे उनका खाना उस टेबल पर खुद हे परोस रहे थे.

"वाह भाई तुम्हारी मौज है. पार्टी में दिखे भी नहीं और अब खाना खाने बैठे तोह 4-4 लोग सेवा में लगे है. यहाँ तोह अपनी थाली लगाने गया था जिसमे 20 मिनट भी लगे और 2 बार िज्जात्त भी उत्तरी.", बड़बड़ाता हुआ मंजीत एक रोटी के 2 निवाले बना कर ऐसे ठूंस रहा था जैसे सारा गुस्सा खाने पर निकाल रहा हो.

"ले भाई थोड़ा सा रायता भी ले ले और ये पनीर की सब्जी चख के देख, ाची बानी है.", संजीव ने अपने सामने से हे वो दोनों कटोरी मंजीत की प्लेट के करीब सलीके से रखने के साथ पानी का गिलास भी वह रखा. मंजीत को ये सब देख कुछ ाचा लगा के उसको यहाँ तोह थोड़ी िज्जात्त मिली.

"वैसे थैंक यू भाई और सब्जी बहोत चोखी बानी है. तुम लोग भी बहार से आये हो इस पार्टी में? देख के तोह लगता है बिज़नेस करने वाले या कोई अमीर घर से हो. वैसे हमारे भी 50 किल्ले की खेती है, 2 भाई में लेकिन किल्ले सरे मैं हे देखता हु. आना कभी हमारी तरफ भी और मेरे भाई साहब तोह साल में 10 महीने विदेश हे रहते है.", मंजीत बिना रुके हे अपना पूरा परिचय देने लगा था जिस पर लकी मंद मंद मुस्कुराता संजीव को देखने लगा.

"दोस्त, ये संगीत पार्टी इस भाई की हे है और कल इसकी शादी है. हाँ शायद तुम पहले हॉल में हे थे इसलिए मिलना नहीं हुआ होगा.", कपिल भैया ने संजीव का परिचय देते हुए समझाया तोह मंजीत हैरानी से देखने लगा.

"और वो लड़की जिसकी कल शादी है? उसकी पार्टी नहीं है ये?"

"वो मेरी हे बहिन है दोस्त और कल उसकी भी शादी है. 2 तरफ इंतजाम थे आज. हम लोग अलग हॉल में थे जहा दोस्तों के पीने पिलाने का प्रोग्राम था और फिर थोड़ा बहोत अभी नाच गए कर आये है. मेरी बहिन घर से विदा हो जायेगी तोह इसलिए ज्यादा रौनक उसके लिए हे लगाईं थी. वैसे तुम्हे मैंने डॉ सांगवान जी के साथ देखा था जब तुम आये थे.", संजीव ने चेहरा पोंछने के लिए मंजीत को रुमाल दिया तोह उसने खुदका रुमाल जेब से निकल लिया. लाल रंग का कढ़ाई वाला रुमाल.

"थैंक यू, मेरा मैं लेके आया हु. हाँ वो मेरी भाभी के पिता जी है. तुमसे मिल कर ख़ुशी हुई और कल शादी में जरूर आऊंगा. पहले से हे बहोत बहोत बधाई. खाना भी ाचा था और पता होता की लड़को वाली पार्टी भी है तोह मैं उधर टाइम हे खराब न करता.", सभी से सब्जी लगे हाथ मिला कर मंजीत ऐसे उठा जैसे मीटिंग बर्खास्त करने की घोषणा करि हो. और वो सधी हुई चाल से चलता अपनी भाही की तरफ चल दिया.

"अजीब आइटम है भाई ये तोह. संजीव कल इसको जरूर पिलानी है मैंने. देख के हे लग रहा है की ये बड़े वाला है.", लकी तोह जैसे कबसे अपनी हंसी रोके बैठा था और मंजीत के जाते हे वो गाला पकड़ कर हंसने लगा.

"अरे सरल सा आदमी है यार ये. ऐसे लोगो के अरमान बहोत से होते है जो वो अपने हे मैं में बनाये रखते है और दुनियादारी का उतना हे पता होता है जीता सुना हो या कभी कभार अपने दायरे से निकल कर देख लिया हो. लड़का बुरा नहीं है लेकिन आइटम जरूर है. थोड़ा ध्यान रखियो कही परम चाचा अपने को हे न गाली देते मिले बाद में.", संजीव ने भी हाथ साफ़ करके हँसते हुए खाना शुरू किया. रात के 11 बजने लगे थे और घर के बड़े अब सभी लोगो के जाने का इंतजाम देखने के साथ उन्हें भिजवाने भी लगे थे. अर्जुन को संजीव ने हे हिदायत थी की वो पहले डिम्पी को घर तक छोड़ आये जब माधुरी और अपनी बुआ लोगो को लेके जाएगा और फिर यहाँ आ कर उसको भी ले जाए. अर्जुन भी सब काम से फारिग हो चूका था. आज का संगीत बहोत से वजह से यादगार रहा था लेकिन कुछ कटु अनुभव भी हुए थे कुछ एक लोगो को. लेकिन मेलजोल याद रखने लायक था बाकी सभी के लिए.
 




श्याम रंग के सीमा से हम पूरे वाकिफ नहीं...

फिर भी हमारे ख्वाब इंद्रधनुषी रहेंगे..!!
 




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1. प्रोलॉग एंड फर्स्ट 20 उपदटेस रिवाइज्ड

2. मल्टीप्ल उपदटेस विल बे फुसेड इन सिंगल chapter

3. सम कंवर्सशन्स एंड सन नराशंस हैवे बीन चेंज्ड एंड प्रेसेंटेड इन ा मोरे सिम्प्लिफिएड येत बेटर वे.

4. आल इन आल आईटी विल कॉन्टैन 50 चैप्टर्स एंड एव्री chapter विल बिगिन विथ ा drawing/portrait दोने बी में, रिलेटेड तो स्टोरी ओनली. ी विल अपलोड थी ार्टवर्क्स ों ा डिफरेंट प्लेटफार्म फॉर इंटरेस्टेड कलेक्टर्स . ओरिगिनाल्स अस वेल अस प्रिंट्स.

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ये उस टाइम ऑनलाइन कांटेस्ट में फर्स्ट रही थी. चारकल्स, कार्बन एंड वाइट पस्टेल ों ग्रे टोंड शीट
 
कल सोने से पहले इस कहानी का एक अपडेट पढ़ने लगा. जो जाने कैसे मैं खुद हे पढ़ना भूल गया होऊंगा पोस्ट करते वक़्त क्योंकि कहानी के बैकअप से बस यही अपडेट गायब था. 😅😅. यकीन हे नई आया के वो मेरे हे शब्द थे जो उधर लिखे गए. 🤣🤣🤣. आज के समय तोह मैं शायद हे कभी वैसा विस्तार से लिख पाउँगा क्योंकि पढ़ने के बाद मेरा हे कण्ट्रोल मुश्किल से हुआ. मेरे हिसाब से प्यार 100 बार का सबसे खतरनाक अपडेट वही है सेक्स के मामले में. कोई गेस करेगा उस दृश्य को ? 🤣🤣
 
अपडेट 188

दोस्ती

"तोह आज तोह तुम्हे बहोत मजा आया होगा अर्जुन? हैं न?", घर पे शालिनी बुआ, रेणुका बुआ के साथ साथ कोमल दीदी को छोड़ने के बाद अब अर्जुन डिम्पी को आगे उसके घर छोड़ने के लिए निकला था. पहले तोह कार में महिलाओं की हे बातचीत जारी थी जिस वजह से इन दोनों के बीच कुछ भी बात न हुई लेकिन इस वक़्त बस यही दोनों थे और संजीव भैया ने उसको थोड़ा समय लगाने को कहा था जिस वजह से अर्जुन कार को 20 की गति से चलता हुआ अभी तक विचारो की दुनिया में हे था की डिम्पी की आवाज सुन्न कर उसने एक नजर उसके गोलाकार मासूम से चेहरे पर की. उम्र के साथ वो अब एक खूबसूरत युवती जो बन रही थी. लेकिन उसके सवाल पर अर्जुन ने पहले बस गर्दन हिलाई.

"आखिर घर में ये पहला ऐसा अवसर है जिसमे इतने लोग और मेहमान आये है तोह उन सभी से मिलना ाचा हे लगेगा."

"मेरा सवाल ये तोह नहीं था. तुम्हे संगीत में मजा तोह आया था न?", डिम्पी ने अपनी कलाई में पहनी घडी को देखते हुए फिर से सवाल दोहराया. कान के करीब झूलती वो रेशमी लत्त संवार कर डिम्पी ने उसको फिर से कान के पीछे किया जो अर्जुन बड़े ध्यान से देख रहा था. उसका ऐसा करना भी जैसे gair-iradatan हे एक मोहक घटना हो.

"हाँ मुझे बहोत ाचा लगा था डिम्पी और तुमने तोह देखा हे होगा के सभी कितने खुश थे. आज तोह माधुरी दीदी के चेहरे पे भी स्माइल हर वक़्त दिखी. वैसे तुम भी ाचा डांस कर लेती हो.", अर्जुन ने छोटी सी मुस्कराहट देने की कोशिश की थी लेकिन डिम्पी के चेहरे पर विपरीत हे भाव उभर आये.

"झूठ तोह तुम कभी भी नहीं बोलते थे. फिर आज कैसे?

"क्या matlab?",Arjun थोड़ा हड़बड़ा सा गया था ऐसे तर्क पर.

"मैंने वह डांस किया हे कब था? और जितना मुझे याद है मैं वह सारा वक़्त या तोह मुस्कान के साथ थी या फिर प्रीती और उन पंजाब से आयी लड़कियों के साथ. तुम्हारी प्रॉब्लम क्या है अर्जुन? जानती हु के हम सिर्फ बचपन में हे कुछ साल साथ खेले होंगे लेकिन तुम्हारी पहली दोस्त मैं हे हु लेकिन तुम्हे ये सही से याद भी नहीं होगा. तुम देख नहीं प् रहे या फिर तुमने ऐसे हे जीने का सोच लिया है?", डिम्पी की धीमी आवाज अब उतनी भी धीमी न रही थी. अर्जुन एक पल के लिए तोह अंतर्मनन से हे सिहर उठा था जैसे उसको एक अंजना डर हो या फिर डिम्पी ने वो देख लिया हो जो उसको खुद ज्ञात नहीं.

"मैं बिजी था डिम्पी और मेरा ऐसा होना जरुरी भी है जब घर में ऐसा कार्यक्रम हो. लेकिन मेरे भी बहोत से दोस्त है.", अर्जुन कुछ विचलित सा था और उसकी हालत देख डिम्पी ने कार मोडल टाउन से पहले हे उस घने वृक्ष के निचे रोकने को कहा.

"मैंने तोह नहीं कहा था के तुम्हारे दोस्त है या नहीं. अब जब तुमने बात इस तरफ हे घुमा ली है तोह चलो फिर यही से हे सही. सच कहु तोह तुम्हारे पास आज के समय में एक भी दोस्त नहीं है अर्जुन. तुम सामाजिक मतलब सोशल इंसान बन हे नहीं प् रहे. मेरे से बेहतर तुम ये बात जानते हो की तुम्हे अपनों के साथ साथ काम से काम कुछ दोस्तों की तोह जरुरत है. वह तुम कोई काम नहीं कर रहे थे बल्कि खली स्थान भरने की कोशिश कर रहे थे. मेरे भैया अभी भी वही है क्योंकि संजीव भैया उनके दोस्त है. और संजीव भैया को हे लो तोह उनके 25-30 दोस्त आये थे वह जिनके साथ उन्होंने अपना समय बिताया, परिवार के होने के बावजूद. प्रीती भी तोह थी वह और उसके भी दोस्त थे जैसे की मैं या आकांक्षा या फिर पंजाब से आयी हुई वो अफसाना. लेकिन तुम जरा अपने किसी एक दोस्त का नाम बताओ. संदीप भी सिर्फ पडोसी है और जितना मैं समझती हु वो भी तुम्हारे सुख दुःख, अंतर्मन या चाहत के बारे में कुछ नहीं जानता.", डिम्पी जैसी लड़की जो हमेशा हे अपने काम से काम रखती थी और उसकी घनिष्ट दोस्ती वर्तमान में अर्जुन से ज्यादा प्रीती या मुस्कान से थी, वो भी अर्जुन को उसकी एक ऐसी सच्चाई से अवगत करवा रही थी जिस से अर्जुन मुँह नहीं मदद सकता था.

"संजीव भैया मेरे दोस्त है एक भाई होने के साथ साथ. ऋतू दीदी के साथ मैं लगभग हर बात कर लेता हु और प्रीती के साथ भी. विकास भैया को भी तुम जानती होगी स्टेडियम से और बलबीर भाई है. लड़कियों में तुम हो, आकांक्षा है और और भी है तोह फिर कैसे मेरे दोस्त नहीं हैं?", अर्जुन आज पहली बार जैसे खुद को बचने की जुगत लगा रहा था लेकिन डिम्पी उसकी दलीलों पर साफ़ हे ना में सर हिलती रही.

"बेहला लो अपने दिल को तुम जितना चाहे बेहला लो. जितने भी नाम लिए है या तोह वो भाई है या दीदी. और रही बात आकांक्षा की तोह मेरे मुँह मत हे खुलवाना तुम. लड़की जरूर हु लेकिन बेवकूफ नहीं हु अगर तुम ऐसा समझ रहे हो. मेरी बात ध्यान से सुनो अर्जुन और इसका गलत मत लेना. समझोगे तोह कभी उस अकेलेपन से नहीं लड़ना पड़ेगा जिसकी वजह से तुम इन्ही अपने के सामने जाने से डरते हो जब कुछ गलत हो जाता है या तुम्हे लगता है की वो तुम्हारी हालत पहचान जाएंगे तोह दुखी होंगे. दोस्त एक अलग दुनिया है और दोस्ती की कोई सीमा नहीं होती. रिश्तो की होती है क्योंकि उसमे आप दुःख दर्द बताने से झिझकते है और हंसी ख़ुशी के समय भी उन्हें ज्यादा महत्व देते है खुद की जगह. दोस्तों के बीच तोह इसका उल्टा होता है न?", अब डिम्पी ने बात कहने के साथ हे अर्जुन की हथेली के ऊपर अपनी हथेली जमाते हुए जैसे उसको तसल्ली देने के कोशिश की.

"तुम बहोत हे अलग थलग से इंसान बन रहे हो अर्जुन और तुम्हारे जीवन की पहली दोस्त होने के नाते मैं इतना हे कहंना चाहती हु की ऐसा मत करो. टाइम सबको दो और परिवार से इम्पोर्टेन्ट कुछ नहीं होता लेकिन... लेकिन एक daayra/circle इंसान का खुदका भी होता है. वो तुम्हारी ख़ुशी, ताक़त, पहचान और जीवन का नजरिया सबसे ज्यादा प्रभावित करते है दोस्त. उनके नहीं होने से वो अकेलापन जो तुम अभी देख नहीं प् रहे हो या जानबूझ कर देखना नहीं चाहते वो अकेलापन कभी नहीं भरेगा.", अर्जुन डिम्पी की बातें सुन्न कर गंभीर होने के साथ हे अपने हाथो में उसकी उँगलियाँ मिलाने लगा था लेकिन डिम्पी अचानक हे मुस्कुरा उठी.

"अब तुम हंसने लगी हो? तुम्हारा भी कुछ पता नहीं चलता डिम्पी की तुम कब सीरियस हो कब मजाक के मूड में."

"उल्लू कही के मैं प्रीती नहीं हो जो फीलिंग ले रहे हो. हाँ दोस्त की तरह हाथ पकड़ना तोह छोडो गाल भी चूम लो तोह मुझे अजीब नहीं लगेगा. क्योंकि वो दोस्त का अपना ख़ास एहसास होता है. तुम न खुद हे इतने मिक्स्ड उप हो अपनी थॉट्स या फीलिंग्स में की अभी भी तुम्हे बहोत टाइम लगने वाला है बड़ा होने में.", डिम्पी ने हाथ छुड़ा कर अर्जुन के कंधे पर भरपूर मुक्का ज्यादा जो अर्जुन के भी चेहरे पर हंसी ले आया.

"ये बात. यही तोह समझा रही थी मैं तुम्हे. एक आदमी की पहचान उसके काम और परिवार से तोह होती हे है लेकिन समाज में मटर उसकी दोस्ती भी करती है. संजीव भैया तोह हमेशा हे तुम्हारे ख़याल रखने वाले भाई और कुछ हद्द तक दोस्त जैसे रहेंगे लेकिन उनकी वाइफ में तुम एक ाचा दोस्त ढून्ढ सकते हो. और जब भी कोई तुम्हारी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाये तोह समय गुजरने के बाद जब सही लगे तोह दोस्ती को गहरा करते जाओ. बिना दोस्त का इंसान सिर्फ एक बॉडीगार्ड जैसा हो सकता है या फिर चुटिया.", डिम्पी इस अभद्र शब्द को बोल कर थोड़ा शरमाते हुए हंसने लगी और अर्जुन हैरान सा देखता रहा.

"तुमने अभी गाली दी."

"तुम मेरे दोस्त हो और मैं ये गाली कभी तुम्हे भी दे सकती हु अगर कुछ ऐसा वैसा किया तोह. अब सुनो मेरे भोंदू दोस्त, तुम्हे आज के प्रोग्राम में जरा भी मजा नहीं आया क्योंकि वह पर न तुम दिल से थे और न दोस्तों के साथ. अपनी छम्मकछल्लो से हे सीख लो जो काम से काम सबके साथ एन्जॉय तोह कर रही थी. स्कूल हे ख़तम नहीं होने को आ रहा तुम्हारा तोह अब मैं कहु भी तोह क्या कहु? कॉलेज जाने से पहले जरा खुद को सुधर लेना और जब भी घर में आगे कोई प्रोग्राम हुआ तोह मुझे तुम ऐसे अकेले इधर उधर घूमते दिखे न फिर तुम सोच भी नहीं सकते मैं तुम्हारे साथ क्या करुँगी. स्मार्ट हो तोह मतलब हमेशा यही मत सोचना की हर लड़की तुम्हारे पास उस फीलिंग से हे अत्त्रक्ट हो कर आएगी जैसा तुम्हे थोड़ी देर पहले मेरे लिए भी लगा था. चलो अब मुझे घर छोडो, ऐसे रात में अकेली लड़की को कार में बैठा कर जाने क्या फीलिंग ले रहे hoge.",Dimpi ने तोह जैसे आज ठान हे लिया था के वो अर्जुन का मोर बना कर हे रहेगी.

"तुम्हारे साथ बिताया ये पल हमेशा याद रखूँगा."

"मैं भूलने दूंगी तब न. बच्चू अब तुम घर ले चलो मुझे और फिर देखते जाओ ये डिम्पी तुम्हारी लाइफ कैसे सेट करती है.", कार आगे बढ़ते हे डिम्पी ने आँख मारते हुए कहा तोह अर्जुन हंसने लगा.

"तुम गाली कैसे दे सकती हो?"

"क्यों इस्पे भी एकाधिकार है क्या? मोनोपोली वाले टाइम गए मेरी मुनिया प्यारी. और तुम्हे तोह अभी बहोत कुछ नहीं पता लेकिन सब सीख जाओगे. दोस्ती की दुनिया में जो आ रहे हो."

"घर का नाम भी मेरा मुन्ना है डिम्पी, मुनिया नहीं. और मुझे भी सबकुछ आता है बस बोलता नहीं क्योंकि वो गलत है.", अर्जुन अब डिम्पी के घर वाली सड़क पे आ चूका था. और डिम्पी पेट पकड़ कर हंसने लगी

"तोह तुम्हे क्या लगता है मैं ये अपनी सभी फ्रेंड्स, mummy-papa या भैया के सामने बोलती हु? बेवकूफ तुम मेरे हमेशा से हे पहले दोस्त रहोगे और तुम्हारे सामने मैं बेहिचक कुछ भी कह सकती हु क्योंकि ऐसा किसी और के सामने कहना तोह ठीक नहीं होगा न. दोस्ती में ये भी तोह एक सीक्रेट फायदा है. और तुम नीरे हे झंडू हो तोह अकेले में तुम मेरे लिए मुन्ना नहीं मुनिया. हाँ तुम भी रख लो मेरा कोई नाम लेकिन मचा होना चाहिए उस क्वालिटी से. गूडनिघत मुनिया.", घर के सामने कार रुकते हे डिम्पी ने अर्जुन को फिर से आँख मार कर इस नाम से पुकारा तोह वो थोड़ा झेंप गया लेकिन अगले हे पर हैरान रह गया जब डिम्पी उसका गाल चूम कर उतर गयी.

"ज्यादा सोचो मत. शकल देखो अपनी जैसे करंट लग गया हो. ब्बये फॉर नाउ एंड okay फर्स्ट एंड लास्ट थैंक यू. आगे से ये तुम्हारी ड्यूटी हे होगी घर छोड़ के जाने की.", डिम्पी की बात सुन्न कर अर्जुन ने भी हाथ हिला दिया. गेट पे जाने के बाद डिम्पी ने मदद कर अर्जुन को देखते हुए अंगूठा उठा कर जैसे बताया हो की ज़िन्दगी वैसे हे जीना जैसे उसने अभी बताया है. अर्जुन भी सर हिलने के बाद आज पहली बार थोड़ा ऊंच संगीत बजता हुआ संगीत हॉल की तरफ चल दिया. हमेशा प्यार या पुराने गीत सुन्न ने वाले अर्जुन को ये थोड़ा तेज संगीत ाचा लग रहा था जैसे कुछ फ़िक्र काम हो गयी हो. कार चलते हुए वो गर्दन हिलता हुआ अकेले हे लुत्फ़ उठा रहा था और ये असर था डिम्पी से हुई एक बेबाक चर्चा का जिसमे वो पूरी तरह अर्जुन पे हावी रही थी लेकिन ऐसा गुरुज्ञान तोह पहले किसी ने भी उसको न दिया था.

'चुटिया.. मुनिया.. ये डिम्पी भी न.. तोह यही होती है सीक्रेट लाइफ? जो भी है एक बार तोह देखनी जरूर बनती है.', अर्जुन अपने आप से हे बात करके हर पल को दोहरा रहा था जिसमे डिम्पी और उसकी बातें थी.

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"वो अपना परम है न धर्मपाल भाई, जब उसकी शादी हुई तोह साला ऐसे डर रहा था जैसे अंकल जी उसका कतल हे कर देंगे. हाहाहा.. लेकिन हुआ उसके उल्टा. अंकल तोह सीना चौड़ा करके सबको खुद हे मिठाई खिलते रहे और यशोदा आंटी, आंटी तोह बस यही कह रही थी की उनके बन्दर के हाथ में इतना सुन्दर अंगूर कैसे आ गया. आज इस माहौल को देख कर वही सब याद आ गया. सबकी शादी और उनके किस्से.", शंकर जी खुली छत पर बैठे थे धर्मपाल जी, दलीप और अशोक के साथ. उमेद घर जाने से पहले एक बार शादी की जगह गया था नरिंदर को ले कर और वह ठहरे मेहमानो का हालचाल लेने. अभी यहाँ का हिसाब किताब हो चूका था और ठंडी बियर पीते हुए ये चारो लोग हलकी फुलकी चर्चा में लगे थे.

"याद है धर्मपाल की बारी में क्या हुआ था? तू तोह कॉलेज में था शंकर उस वक़्त लेकिन ब्याह के मजे सबसे ज्यादा तूने हे लिए थे. अपना पल तोह इतना शरीफ था के उधर लड़की विदा हो रही थी और अपने ससुराल वालो के साथ भावुक ये हो गया था. हाहाहा.. और अगले 3 दिन तोह जनाब बुखार का बहाना करके बस चारपाई तोड़ते रहे दिन में. क्यों भाई पल, याद है तेरे बहाने जो तुम अपने पिता को दिया करते थे?", अर्जुन और संजीव इन्हे बुलाने हे आये थे लेकिन कुछ दूर खड़े रह कर संजीव ने हे अर्जुन को शांति से सब सुन्न ने का इशारा किया. ये सुन्न कर जहा धर्मपाल जी सर झुकाते हुए हंसने लगे वही हाल बाकि सब का था.

"वालिए साहब वो दिन कुछ और थे और घर में जब पिता जी हो तोह रात में अपनी बीवी के साथ हमबिस्तर होना अपने आप में हे एक जुंग लगती थी. वो खेत चले जाते थे और फिर माँ और छोटी बहिन भी क्योंकि माँ तोह समझती थी की बेटे और बहु को ये समय देना चाहिए. इसलिए नौकरी पे साप्ताहिक (वायरल) बुखार की अर्जी दी और घर में क़ैद हो कर अपनी धर्मपत्नी जी से व्यवहार बनाया. ये शंकर उन दिनों भी मेरी बड़ी सहायता करता था. सच बात है की वो किस्से बस हम दोस्तों को हे पता है और जीवन में कितना भी उन्हें याद कर लो वैसा हे मजा आता है जैसे पहली बार सब घटित हुआ था. शंकर आया था होली खेलने और तबतक हमारी श्रीमतीजी के ख़ास देवर बन चुके थे इन्दर. भाई जो कोरडे मारे थे मास्टरनी ने शंकर के और उसके बाद जो रगड़ कर शंकर ने उसको हौदी में रंगारंग किया. मेरी माँ ने हे बचाया था इसको लेकिन बहोत यादगार दिन थे वो.", धर्मपाल जी ने बियर की एक तगड़ी घूँट भरने के बाद चस्मा ठीक करके फलो का टुकड़ा चखा और अपने लिए शंकर की नजरो में वही प्यार और दोस्ताना देख मुस्कुरा दिए.

"मेरे तोह इतने किस्से नहीं है भाई साहब लेकिन बात उन दिनों की है जब मेरी शंकर से जीजा साले वाली ज़िन्दगी शुरू हुई हे थी. पैसे की वजह से तोह दोस्त बहोत बने थे लेकिन जब मुसीबत आयी तोह फिर न पैसा काम आया और न वो दोस्त. लेकिन किसी को तोह बताना हे था के मेरे हालात के बारे में और बस उस शाम शंकर आया था मधु को लिवाने के लिए की मैंने इसको रात हमारे घर रुकने के लिए मन लिया. 2-2 जाम पापा से चुप कर लगाने के बाद मैंने अपना दिल इसके सामने खोल कर रख दिया. ये नहीं बताऊंगा की मुसीबत क्या थी और उसके लिया क्या कुछ घटा होगा लेकिन शंकर पहली बार जाम साँझा करने के बाद जो दोस्त बना न उसकी मिसाल मेरे तोह पास है नहीं. वो मुसीबत कब हल हुई, कैसे हुई और शंकर ने क्या किया वो सब न बता कर मैं इतना हे कहूंगा की मुझे फकर होता है आप लोगो को देख कर. मैं सोचता था की सिर्फ एक शंकर हे ऐसा है लेकिन यहाँ तोह शंकर जैसे हे दलीप और वैसे हे आप सभी. आप लोग अपने जीवन में आने वाली किसी भी समस्या से परिवार को प्रभावित इसलिए नहीं होने देते क्योंकि दोस्ती का सुरक्षाकवच हे अभेद है और ऊपर से जड़े इतनी गहरी की इसमें सिर्फ और सिर्फ प्यार और बेपनाह विश्वास है एक दूसरे पर. कोई किसी की बात नहीं काट ता और जो सही लगता है उस पर सभी की राये एक हे होती है. मैं शायद इतना लायक तोह नहीं लेकिन आप लोगो के बीच बैठ कर बड़ी ख़ुशी होती है.", अशोक जो भी कह रहा था वो उसके दिल की हे आवाज थी और अपने फूफा को इतना लचीला और सहज बतियाते देख अर्जुन भी प्रभावित हुआ.

"तोह हम jija-saale थे हे कब अशोक? जिस दिन जाम एक उस दिन काम भी एक. अभी तोह उमेद नहीं है यहाँ नहीं तोह वालिए जी जानते है उसकी क्लास कैसे लगाईं जाती है."

"वो तोह ज्यादातर गंभीर हे दीखता है.", अशोक ने सिर्फ इतना हे जवाब दिया जैसे अभी तक वो उमेद के साथ खुलकर नहीं रह पाया था.

"उस से ज्यादा मसखरा भी कोई नहीं है अशोक. हाँ जीवन में हम सभी ने खोया और सहा भी बहोत है लेकिन सबसे जरुरी बात जो बरकरार रही वो थी एक दूसरे का साथ उस वक़्त में भी और आज भी. उमेद के असूल सिर्फ बहरी दुनिया में लागू होते है, यहाँ नहीं. वालिए जी ने एक बार उसको किसी बात पर डपट दिया था और उमेद इनके प्रिय स्कूटर का टायर खोल के ले गया घर से रात में. पर्ची भी छोड़ गया था के मैं लेके जा रहा हु और आपको तभी मिलेगा जब आप मुझे मानाने मेरे घर आएंगे.", संजीव की हंसी निकल गयी क्योंकि वो बहोत देर से ये सब सुन्न रहा था और इन्हे देख कर बाकी सभी खड़े हो गए.

"तोह जवान यहाँ भी मुखबिरी हो रही है.", वालिए जी ने संजीव को अपने नजदीक बुलाते हुए कान खींचे और साथ हे अर्जुन के सर पे हाथ फिराया.

"नहीं नहीं अंकल वो अर्जुन की बात पर हंसी आ गयी थी. हम तोह आप लोगो को हे बुलाने आये थे की 12 बज चुके है, घर चलना चाहिए. मेरा क्या है मैं तोह सुबह 8 बजे भी उठूंगा तोह कोई बात नहीं लेकिन आप सभी के टाईमटेबल न बिगड़ जाए."

"तेरे टाइम टेबल तेरे तक हे रख बीटा. साफ़ बोल न के कल तू मौज करेगा और हम मजदूरी. 12 बज गए तोह चलना हे चाहिए वालिए जी. धर्मपाल भाई साहब आपको भी वालिए जी के साथ अशोक छोड़ देगा, ड्राइवर है इसके साथ. मैं आज पीने के बाद कार चलना नहीं चाहता और जाना घर हे है नहीं तोह उमेद और इन्दर को बुला लेते यही सोना होता तोह.", शंकर जी ने बोतल हिला कर देखि और बची हुई बियर एक सांस में हे खाली करके एहतियात से टेबल पर रख दी. लगभग ऐसा हे बाकी तीनो ने किया.

"हाँ, छोड़ना तोह अशोक को हे पड़ेगा. अन्नू आयी तोह मेनका के साथ थी लेकिन चली गयी अपनी माँ और पल की बीवी को ले कर मेरी कार में. कल सुबह एक बार जांच लेना सभी काम, ताजे फूल वह बहुतायत में पहुंच जाएंगे सजावट के लिए 12 बजे तक. मैं पल को हे ले जाऊंगा अपने साथ जो भी काम बचा होगा उसके लिए. दलीप, तुम हमारे साथ चल रहे हो?"

"न न वालिए साहब. मैं तोह फ़िलहाल मंजू के घर हे जाऊंगा."

"दलीप भाई, मैं भी वही रुका हुआ हु. तुम्हारी बिटिया के घर, चलो अब साथ में हे चलो. कार इधर हे लॉक कर देना सुबह ले लेंगे.", अशोक जी ने जब इस बात से अवगत करवाया तोह सभी हंस पड़े और दलीप जी खिसियाते से उनके साथ निचे चल पड़े. निचे चलते हुए शंकर जी ने अपना हाथ संजीव के कंधे पर रखा हुआ था और वालिए जी अर्जुन से गुफ्तगू करते उनके पीछे.

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"तारा, तुझे पता है वह संगीत में आज कुछ ख़ास बात हुई थी.", यहाँ छत पर आज तारा भी इन सभी के साथ बैठी थी. छत्त पर लगे लट्टू की रौशनी टेल ज़ुबैदा जहा जसलीन के नाखून तराश रही थी वही गुरदीप प्रियंका से अपने नाखो पर सुर्ख पोलिश लगवाती हुई किस्सों का मजा ले रही थी. आरती की बात सुन्न कर तारा ने अपनी निक्कर सही करने के बाद उसकी बगल में हे जगह बनाई.

"ऐसा क्या हुआ जो तू सिर्फ मुझे हे बता रही है लेकिन सुना सबको.", तारा जैसे कपडे बदलने के बाद नाहा कर आयी थी और उसके शरीर की चमक इस हलके उजाले में भी भरपूर थी. इनके सामने हे ऋतू की गॉड में सर रख कर लेती अलका मंद मंद मुस्कुराती हुई तारा की बेचैनी देख ऋतू को इशारा कर रही थी.

"आज तेरे लिए एक बिलकुल सही लड़का दिखाई दिया और वो तोह कल तेरे साथ अपने रिश्ते की बात भी करने वाला है बुआ से. पर्सनालिटी के हिसाब से तोह कमाल का था वो और उसके जैसा पूरी पार्टी में कोई न दिखा.", आरती की बात सुन्न कर गुरदीप लोटपोट हे होने लगी जिसको ज़ुबैदा ने जैसे तैसे रोका.

"ऐ कही तू उस नमूने की तोह बात नहीं कर रही जो खुद को शिमला में फील कर रहा था?"

"आये हाय देख तोह आरती इस तारा को. इसकी भी नजरे उस राहुल रॉय पर हे तिकी थी इसका मतलब.", अलका ने आरती से ताली मरते हुए कहा तोह तारा ने आरती की कमर पर चूंटी काट ली.

"कमीनी, इतना हे तुझे वो राहुल रॉय लग रहा है तोह मैं कल हे उसको बता दूंगी की तू लट्टू है उस पर. पिंकी दीदी की शादी बाद में पहले तेरी करवाते है उस अमोल पालेकर से. कमीना मेरी फ्रेंड रिया को ऐसे देख रहा था जैसे लड़की हे न देखि हो. और तोह और जब उसने भाव नहीं दिया तोह हाथ में गुलाब ले कर मुझे ऐसे देखने लगा जैसे बस मैं कूद कर उसकी गॉड में बैठ जाउंगी और वो गुलाब मेरे बालो में लगा देगा. उसको बुलाया किसने था यार पार्टी में?", तारा की बात सुन्न कर इस बार गुरदीप के साथ साथ प्रियंका, अलका और जसलीन भी लोटपोट हो गयी. यहाँ चर्चा का विषय वही मंजीत था जिसकी आदते, हरकते और बात करना किसी से न बचा था.

"वैसे तुम्हे नहीं लगता की किसी को जाने बिना उसके बारे में ऐसी राये बना लेना ठीक नहीं? बाकी मुझे नहीं पता के किसकी बात हो रही है. मैं तोह सचमुच फुल एन्जॉय कर रही थी.", ज़ुबैदा की बात पर एक पल को तोह गुरदीप रुकी लेकिन फिर से पागलो जैसे हंसने लगी और अब ज़ुबैदा से भी रुका न गया.

"देखो आपको तोह सिर्फ सुन्न कर हे हंसी आ रही अगर देख लेती तोह आप हे सबसे पहले उसकी शिकायत करती. वैसे ज़ूबी दीदी, आप इतनी हसीं होने के साथ साथ ाची आर्टिस्ट, डांसर और हाइली एडुकेटेड है, आप के तोह जाने कितने हे मुरीद होंगे.", यहाँ अनजाने में हे सही लेकिन अलका के मुँह से ये बात निकली तोह ज़ुबैदा ने बहोत गहरी निगाह से कुछ पल तक बस अलका को हे देखा.

"सॉरी. मेरा मतलब आपको हर्ट करना नहीं था दीदी. आप सचमुच बहोत हैट कर है और लगभग हर फील्ड में बहोत काबिल होने के साथ साथ इतनी सुन्दर भी. बस इसलिए अनजाने हे मैंने कह दिया.", अलका झेंप रही थी लेकिन ऋतू ने उसका हाथ थाम कर जैसे इशारा किया की ज़ुबैदा को बुरा नहीं लगा और अलका ने जैसे हे फिर से उनकी और देखा तोह वो मुस्कुरा रही थी.

"पता है मैं न ऐसा हे माहौल चाहती थी जब छोटी थी लेकिन नसीब कब हुआ और वो भी कुछ वक़्त के लिए हे. लेकिन मैं भी तुम्हारे हे जैसी हु, सभी के जैसी हे. बस ऐसा माहौल नहीं मिला तोह टाइम बहोत था मेरे पास और उसको वास्ते करने के लिए बुक्स, कुकिंग, डांस और जाने क्या क्या करती रहती थी. फिर कुछ बदलाव ऐसे आये जिस से मुझे लगा की मुझे सिर्फ दिमाग से हे काबिल नहीं होना, दिल और दुनिया से भी होना है. उन हजारो रंगो ने मुझे अपनी दुनिया दी जो सिर्फ मेरी है और उसमे जो भी दर्द या ख़ुशी हो उसका मुझ पर प्रभाव नहीं पड़ता.", ज़ुबैदा कहने के साथ हे नेलकटर एक तरफ रख कर रूई से जसलीन की उँगलियाँ साफ़ करने लगी. बाकी सभी गौर से सुन्न रहे थे और फिर बात जारी की.

"लड़के कैसे देखते है लड़कियों को ये वो खुद नहीं जानते लेकिन एक लड़की जिसकी परवरिश कुछ दायरे में हुई हो वो गलत लड़को का शिकार हो सकती है. मैंने बस इसलिए अपनी हड्डी हे बढ़ा दी और अब भी देखते है लेकिन देखने में क्या बुराई. तुम भी सुन्दर हो और यहाँ बैठी हर लड़की खूबसूरत है. इस हिसाब से तुम सभी के बॉयफ्रेंड होने चाहिए. हाँ मेरा नहीं है क्योंकि टाइम हे नहीं है इस सबके लिए. जब बनेगा तोह काम से काम वो थोड़ा मेरे जैसा हो नहीं तोह अपनी धरती अपनी ऊँगली से घूमते रहना भी बुरा नहीं.", इस उदहारण को पहले तोह कोई समझ न पाया लेकिन जैसे हे ऋतू ने मुँह पे हाथ रखा बाकी लड़कियां को भी ऊँगली और धरती की समझ आ गयी.

"छी.. क्या दीदी.", आरती नजरे चुराने लगी थी इतना बोल कर.

"अब तुम लोगो ने हे तोह ये सब शुरू किया था. बॉयफ्रेंड बाल में कंघी तोह नहीं करेगा न?", ज़ुबैदा जैसे जवाब दे रही थी ऋतू और अलका को मजा आ रहा था लेकिन प्रियंका बगले झांकती लगी.

"वैसे तारा का बॉयफ्रेंड है तोह इसको ज्यादा पता होगा.", अभी तक तारा को लपेटना आरती भूली नहीं थी और ये कह कर उसने फिर से सबकी नजर तारा पर हे घुमा दी थी.

"हाँ तोह मैंने कोई सवाल जवाब किया क्या? I'm हैप्पी विथ माय लवर और तुझे प्रॉब्लम है तोह तू मेरे वाला हे शेयर कर ले.", तारा के द्विअर्थी जवाब पर ज़ुबैदा बड़ी हैरान हुई लेकिन फिर वो भी मजाक समझ कर हंसने लगी.

"दीदी, ये सच हे बोल रही है. तारा और आरती का एक हे बॉयफ्रेंड है.", अलका ने जैसे ज़ुबैदा को तरीके से घेरा था सबके साथ मिल कर. तारा सिर्फ प्रयोग की गयी थी.

"मतलब क्या सचमुच तुम दोनों का एक हे लवर है?"

"पहले वो अलका ऋतू का था लेकिन इनका दिल भर गया तोह फिर इनके बाद वो मुझे मिल गया और आरती के साथ शेयर करने में मुझे परेशानी नहीं हुई. आपको भी जरुरत हो तोह बता देना.", ज़ुबैदा पहले तोह कुछ समझी नहीं फिर वो भी खिलखिला उठी.

"बी गॉड यार तुम लोग भी खतरनाक हो. समझ गयी की तुम वो बाल बनाने वाली बात से कुछ जोड़ रही हो."

"हाहाहा.. स्मार्ट हो. और हम बात कर रहे है इस पिलो की जो मेरे और तारा के पास है. पहले ये अलका और ऋतू का था लेकिन अब ये हमने हथिया लिया है.", ये एक भलूनुमा बड़ा हे मुलायम सा सफ़ेद भूरा तकिये जितना खिलौना था.

"वाओ. बहोत सुन्दर है ये तोह. बहोत ख़ास होगा? नहीं ऋतू?", ज़ुबैदा ने भी उसको हाथो में ले कर देखा तोह वो उसके मखमली एहसास से प्रभावित हो गयी.

"हाँ ख़ास तोह है दीदी. ये अर्जुन लाया था जब वो बोर्डिंग से वापिस आया था. उसने मुझे देने की जगह ये अलका को दिया था लेकिन इस्पे र का मतलब मेरा नाम है. बाद में जिसके जिसके पास गया उसके नाम का पहला अक्षर इस्पे आता गया. फ़िलहाल तोह तारा और आरती के बीच रहता है ये बाद में जाने किसके पास जाये.", अर्जुन का जीकर होते हे ज़ुबैदा को जैसे उसकी हे याद आ गयी. जसलीन गूडनिघत बोल कर गुरदीप और प्रियंका को लिए निचे चली गयी. जहा बाकी लड़कियां सो चुकी थी थकान की वजह से.

"कभी ऐसा नहीं लगा की काश अर्जुन भाई न होता?", ज़ुबैदा द्वारा कही बात पर ऋतू ने उसी वक़्त न में सर हिला दिया.

"जिस वजह से आप कह रही है शायद वो मायने नहीं रखती दीदी. मेरी दुआ तोह हमेशा यही होती है की जब भी जनम मिले तोह वो हमेशा साथ हो. हाँ ये तारा जरूर कहती रहती है की साउथ इंडिया में बुआ के बचे की शादी मां के बचो से हो सकती है. और ये इस बात से दुखी भी है की अपनी तरफ ऐसा क्यों नहीं होता.", ऋतू ने मस्ती मस्ती में आपस की कही गयी एक बात सामने रख दी थी जिस पर तारा उसकी और लपकी तोह अलका ने तारा को अपने ऊपर हे खिंच लिया.

"मेरे से मिल लिया कर डार्लिंग, ऋतू प्राइवेट प्रॉपर्टी है मेरी. और दीदी ये स्वाति भी शामे तो शामे यही बात कर रही थी.", स्वाति बेचारी तोह खमख्वाह हे फंस गयी और नजरे झुका कर दूना मांगने लगी की कोई उस से सवाल न करे क्योंकि वो कभी झूठ नहीं बोलती थी.

"वाह. क्या नेक इरादे है तुम्हारे तारा और स्वाति. लेकिन पता है न के ऐसा मुमकिन नहीं इधर और अर्जुन का तोह पहले हे प्रीती के साथ रिश्ता तये है. जानती हो अगर वैसा नहीं होता न तोह मैं किसी भी कीमत पर मेरी अफ़सा के लिए अर्जुन को मांग लेती. स्वाति, तुम इतना खामोश क्यों हो?'

"नहीं दीदी मैंने ऐसा कभी नहीं कहा और अर्जुन से दोस्ती वाला हे प्यार है मेरा.", स्वाति घबराहट में जो मुँह में आया वही बोल गई जिसको सुन्न कर एक बार तोह ख़ामोशी छायी रही फिर सभी हंसने लगी.

"बेवकूफ. दीदी तुझे बना रही है और तू फंस गयी. हाँ तेरे साथ वो बचपन से हे कुछ ज्यादा हे ओपन रहा है और ाची बात है के तुम दोनों दोस्त हो. वैसे दीदी आपको एक बात नहीं पता शायद.", अलका बात संभल कर कहने लगी.

"क्या बात? अफसाना से जुडी है या अर्जुन से ?"

"सबसे हे जुडी है यही मान लीजिये. अर्जुन फ़िलहाल बदलाव से गुजर रहा है और उसको हर छोटी बात प्रभावित करती है. आप बहोत सुलझी हुई है दीदी और मेरा मान न है की क्यों न आप उसको गाइड करे. आप प्रभवित कर सकती है उसको अपने एक बंद से दायरे से बहार निकलने में. सच कहु तोह मुझे खुद नहीं पता के मैं क्यों ऐसा कह रही हु लेकिन मुझे एक डर है की अर्जुन के इमोशंस हे कही उसकी ताक़त की जगह कमजोरी न बन्न जाये. आप शादी के बाद 2 दिन रुक सकती है?", ऋतू को जैसे पता था की ज़ुबैदा ने ज़िन्दगी में क्या क्या झेला है लेकिन आज उसकी मजबूत शक्शियत से वो अत्यधिक प्रभावित थी और इसलिए उसने मदद मांगी. बेशक उसके विचार से एक बार तारा असहमत दिखी और वैसा हे नजर आ रहा था स्वाति के चेहरे से जिसको लग रहा था के यहाँ अर्जुन को ऋतू कमजोर साबित कर रही है.

"इमोशंस चीज हे ऐसी है ऋतू. ाचे ाचे को अटैक दिलवा देते है लेकिन तुम अगर इस बात को डिसकस करना चाहती हो तोह ठीक है. मैं यही रहूंगी 2 दिन और फिर वही मुझे छोड़ देगा मेरे घर. पंजाब जो जाना है उसने बाद में. वैसे तुम ठीक कह रही हो, दोस्त चाहिए उसको और थोड़ा तजुर्बा भी. चलो मैं अब चलती हु सोने के लिए, shabba-khair.", ज़ुबैदा ने उठने के साथ हे चुस्त सलवार ठीक की और हाथ हिला कर निचे चल दी. आरती भी उठ गयी थी लेकिन कुछ सोच कर रुक गयी.

"तुम्हे बात करनी चाहिए थी ऋतू. ऐसे अकेले हे ये बात कह दी.", तारा नाखुश थी और उसकी बात ने साबित भी कर दिया था.

"क्या चाहती हो की इस बार जब अर्जुन गिरे तोह वो कभी उठने के काबिल हे न रहे? शादी हो जाने दो तारा, हम इस पर बात करते है. जैसे हमेशा डिसकस करते है वही होगा और अभी कुछ किया थोड़ी न है. दीदी को 2 दिन रुकने का हे तोह बोलै है और बाकी मैं तुम्हे समझा दूंगी.", अलका सब जानती थी जैसा मुमकिन था और उसके जवाब पर तारा ने शर्मिंदा होते हुए हामी भरी.

"चलो निचे चलते है सभी. आज संजीव भैया यही सोने वाले है और वो आ भी चुके है जैसे गेट खुलने की आवाज बता रही है.", अलका ने उठनेक का उपक्रम किया तोह ऋतू ने उसको वही रोक लिया.

"सोना हे तोह है. आरती तू स्वाति के साथ सो और तारा दिल करे तोह तू भी इधर हे सो जा. 3 गद्दे और भी है, भैया के साथ अर्जुन यही सो जायेगा. इस बहाने भैया से भी मजाक कर लेंगे.", ऋतू के कहते हे तारा उनकी बगल में हे आ लेती. कूलर चालू था और ठीक 2 मिनट बाद भैया के साथ अर्जुन भी ऊपर आ गया. कपडे बदल आये थे दोनों घर से और अर्जुन सोने का बोल कर एक तरफ जा लेता वही संजीव भैया लग गए अपनी बहनो से कल के बारे में चर्चा करने. कल शादी जो थी.
 
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