Incest Pyaar - 100 Baar - Page 42 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar





थिस इस तवो मोनथस ओल्ड Raghav1997 . अक इस no मोरे ात होम सोज़ ी शिफ्टेड हिम तो फारेस्ट लास्ट ईयर.
 




अपने Professsor साहब की बिगनिंग
 
दोस्तों अपडेट न देने पाने के लिए शमा चाहता हु. कल मेरा इंटरव्यू और लाइव आर्ट डेमोंस्ट्रेशन है. एक्सहिबिशन में तोह नहीं जा सका लेकिन कल मेरा इंट्रोडक्शन और मुलाकात है एक्सहिबिशन पर ऑनलाइन. इस वजह से थोड़ा व्यस्त हु तोह बस आज का और टाइम दीजियेगा. कल रात से यहाँ मौजूद रहूँगा
 
भाई आज सक्सेस है एक जगह. समय जरूर 12 से 8 बजे तक लगा क्योंकि वो फरक है जर्मनी और इंडिया में. कल अपडेट दूंगा
 
सॉरी ऐसे व्यवहार के लिए लेकिन सच कहु तोह आप लोगो से मैं हर बात कर लेता हु लेकिन ऐसे ऐसे लोग जाने क्यों सिर्फ इस कहानी पे आते है जो इसको पढ़ते भी नहीं. He's ा बोत सो ी ुसेड थिस लैंग्वेज. सॉरी फॉर थिस बेहेवियर
 
क्लास लगेगी और जरूर लगेगी
 
अपडेट 189

शुभ दिन (1)

ये दिन कुछ जल्दी हे शुरू हुआ था क्योंकि ये पंडित जी के परिवार में एक बड़ा दिन जो था. रात की पार्टी से चाहे देरी से लौटने वाला हो या जल्द, सभी लगभग 4 बजे तक बिस्टेर त्याग चुके थे, सिवाए घर के बचो और कुछ मेहमानो को छोड़ कर. दिन जो भी हो लेकिन पंडित जी का नियम हमेशा की तरह आज भी अप्रभावित था. नहाने के बाद वो अपनी बीवी कौशल्या जी के साथ पूजा आदि से निबट कर दाढ़ी बना रहे थे और कौशल्या जी अपने बचो को जगाने के साथ साथ उन्हें चाय परोस रही थी.

"माँ, आज नींद बहोत जबर आयी. दिल तोह कर रहा था के थोड़ा और सो जाऊ जैसे जाने कितने बरसो बाद आज हे सोया हु.", नरिंदर जी अपनी माँ की गॉड में सर रख कर वापिस आँखे मूंदने लगे थे और कौशल्या जी मातृत्व वश उनका सर सहलाती हुई मुस्कुराते हुए कहने लगी.

"जानती हु की तू ाची नींद सोया होगा. तेरा चेहरा हे बता रहा है के आज जैसे तुझे अपनी कसरत और नियमो का भी ध्यान नहीं. ाची बात है बीटा लेकिन बस आज भर की बात है. ये शंकर देख जरा, आज तोह ये भी करवट बदल कर ऐसे सो गया जैसे इसका ऐतवार हो. तेरे चाचा और पापा काम देखते ाचे नहीं लगते. उठ मेरे बचे और जरा मेहमानो के haal-chal ले ले.", नरिंदर इतनी बात सुन्न कर सरकता हुआ अपने बड़े भाई की बगल में चला आया.

"ोये शंकर. देख माँ कह रही है की तुझे उनकी फ़िक्र हे नहीं. कभी कभी तोह वो तुझसे कुछ चाहती है और उस दिन तू ऐसा करेगा.?", नरिंदर की बात सुन्न कर शंकर आँखें बंद किये हे मुस्कुराने लगा.

"हाँ जैसे मैं तोह गहरी नींद में हु? देख अगर अभी नींद पूरी नहीं हुई न तोह ये दिन मुश्किल गुजरने वाला है. शादी सुबह 4 बजे तक चलनी है और उसके बाद भी 6-7 बजते बजते सोने को मिलेगा. तब भला सोने का टाइम होगा?", शंकर ने तोह मुँह के ऊपर तकिया हे ओढ़ लिया. आसमान में अभी भी भोर से पहले का हल्का अन्धकार था और नीला रंग कुछ समय बाद केसरिया होने वाला था.

"जैसा तुम्हे ठीक लगे. दोनों मुस्टंडे जवान बचो के बाप हो लेकिन अभी तक एक दूसरे से चिपक के ऐसे सोते हो जैसे पांचवी में थे तब सोया करते थे. भगवन भला करे तुम दोनों का.", कौशल्या जी गद्दे से उठ कर कड़ी हुई तोह उमेद अंगड़ाई लेने के बाद उनके चरण स्पर्श करके कमीज पहन ने लगा.

"चची, सही तोह कह रहा भोलूराम. मैं और राजू भाई देख लेते है ये सब, इन्हे थोड़ी देर सोने हे दो. वैसे भी इन्दर बाथरूम में नहाने गया तोह आधा घंटा न आने वाला बहार. राजेश्वरी को बोल देना के मेरे कपडे निकाल दे, चाय पी कर मैं आया निचे.", उमेद की बात सुन्न कर कौशल्या जी उसको आशीर्वाद देती हुई निचे चल दी. वैसे भी छत पर आना अब उनके लिए थोड़ा मुश्किल होने लगा था और उमेद ये ध्यान से देख रहा था.

"हाँ, आप ऊपर मैट आया करो चची. किसी को भी भेज दिया करो और विनोद को भी उठा देना.", अपने भतीजे की बात सुन्न कर कौशल्या जी के चेहरे पर अलग हे ख़ुशी आयी थी. उमेद भी तोह आखिर उनके सेज बेटो से काम न था उनके लिए.

"ाचा अब तू चाय पी और मैं खुद हे बहार वाले बाथरूम में रखवा देती हु तेरे कपडे. विनोद हे नाहा रहा है अभी.", कौशल्या जी के जाते हे राजकुमार जी भी मुँह धो कर चाय पीने बैठ गए.

"ये लिस्ट है उमेद, देख लियो जरा एक बार अगर कुछ रह गया हो तोह. काम तोह लगभग सभी पूरे हो चुके है और वह की सजावट भी. जो बाकी है वो दोपहर तक हो जायेगी. माधुरी के ससुराल भेजने वाला सामान रात हे लोड कराव दिया था और शादी की सामग्री पैलेस पे मैं हे छोड़ आऊंगा थोड़ी देर तक.", राजकुमार जी ने जो 3-4 पैन दिखाए थे उनमे लिखे अधिकतर कार्यो के सामने टीका लगा था जो पूरे होने का प्रमाण था.

"हाँ मैं देख लूंगा अगर कुछ रह गया होगा तोह. वैसे आपने ये सोचा है की इधर हमे एक बड़ी मुश्किल आने वाली है और इसकी तरफ किसी ने ध्यान भी नहीं दिया?", उमेद की बात सुन्न कर शंकर से लिपट कर लेता नरिंदर तुरंत उठ खड़ा हुआ.

"वही तोह गज्जू, किसी का ध्यान हे नया गया उस बात पर. अब सुभाष जी अपनी बेटी ब्याह रहे है तोह बरात का स्वागत करेंगे. मतलब वो पैलेस पर 6 बजे आने का बता चुके है. और वह पे जो 40 कमरे है उनमे से 30 एक तरफ वाले उनके लिए आरक्षित हो गए. संजीव की बरात लेके जाने से पहले हमको खुद भी माधुरी के ससुराल वालो का स्वागत करने के लिए मौजूद होना होगा. फिर संजीव की बरात भी लेके जानी है तोह समस्या जरूर होगी. लड़के के पिता को दोनों जगह मौजूद रहना होगा लेकिन कैसे?", नरिंदर की बात सुन्न कर शंकर से भी रुका न गया.

"ओह घोंचुलाल तू ज्यादा हे होशियार है लेकिन पहले पापा से बात की इस मसले पर?", शंकर की बात का जवाब राजकुमार जी ने सर हाँ में हिला कर दिया.

"हाँ. ये बात मुझे भी खटकी थी और उमेद को भी नहीं पता तोह इसका मतलब जैसे ये जरुरी बात हमारी हे गलती की वजह से रह गयी. क्या लगता है के पापा ने इसका हल सोच रखा होगा?", राजकुमार जी इतनी सुबह हे थोड़े परेशां हो गए थे क्योंकि मसला भी आखिर बरात सँभालने और फिर बाराती बन्न ने के था और वो भी एक हे पंडाल में.

"वो यही तोह बेहतर करना जानते है हमसे भाई. चाचा जी बेशक हमे शामिल नहीं दीखते लेकिन हर काम की बारीकी और उस से जुडी choti-badi बात वो पहले हे करके रखते है.", उमेद वो कागज़ अपनी जेब में रखने के साथ हे चाय का कप ट्रे में टिका कर निचे चल दिया. नरिंदर एक बार फिर से गद्दे पर पसर चूका था क्योंकि फ़िलहाल तोह उसके पास भी करने को कुछ नहीं था.

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"क्या टाइम हुआ है? तुम इतनी जल्दी उठ जाती हो और तैयार भी हो?", मंजू ने जैसे कौशल्या जी की शिक्षा को अपनाते हुए सुबह भोर तक हे उठने के साथ नहाने के बाद pooja-path की आदत दाल ली थी. 5 से थोड़ा ऊपर हे समय था जब मंजू ने मधु जी के कमरे के बहार से हे दस्तक दी. कुछ समय बाद अलसाई सी मधु ढीले गाउन में दरवाजा खोल कर प्रकट हुई तोह मंजू ने एक सादगी भरी मुस्कान के साथ उन्हें shubh-prabhat कहा.

"वो दादी जी का फ़ोन आया था बुआ जी. उन्होंने कहा था के आपको बता दू की उधर कुछ रस्मे आपने हे करनी है. वैसे अभी सवा 5 हुए है और मैं चाय भी बना चुकी हु, अगर आप कहे तोह.."

"हाँ यार, चाय तोह दे हे दे. ये भतीजो की बुआ होना भी जाने क्या क्या दिन दिखायेगा? वाशरूम से आती हु बस, तू जरा टेबल पे हे चाय ले आ. सरोज भाभी उठ गयी हो तोह उन्हें भी बुला लेना."

"जी बुआ. माँ भी त्यार है और वो पापा अभी नहाने गए है तोह उनके कपडे इस्त्री कर रही है. आप फ्रेश हो जाए, मैं इतने चाय लगा देती हु.", मंजू इतना कह कर रसोई की तरफ चल दी लेकिन मधु उसको जाते देख बड़े गौर से शरीर का मुआयना करने लगी. आँख खुल चुकी थी और अब जहा घूम रही थी वो शरीर काफी बदल चूका था पहले की तुलना में. चाय पर इस बारे में चर्चा करने का सोच वो कमरे के भीतर हे बने बाथरूम में चली गयी. बीएड पर एक तरफ अशोक जी लिहाफ लिए सो रहे थे और अलग चारपाई पर उनका बीटा हिमांशु तकिये को पेट से लगाए मीठे सपनो में.

"तेरा निखार हर दिन कुछ ज्यादा हे बढ़ने लगा है मंजू. रात भी पूछना चाहती थी लेकिन उस वक़्त न तुझे फुर्सत थी और न मैं समय निकाल पायी. अब तोह बता दे इसकी वजह?", चटख संत्री फूलो वाली कमीज और उस से थोड़े हलके रंग की ढीली सलवार में मेनका तैयार हो कर रसोई में आते हे मंजू को गले लगा कर कहने लगी.

"अब आपको पता है फिर भी पूछती रहती है आप दीदी. कुछ तोह उसका असर है और बाकी जो बदलाव हर औरत में होते है माँ बन्न ने की प्रक्रिया में वही. वैसे यही विचार मेरे भी है आपके लिए. लेकिन आप नहीं बताने वाली मुझे पता है.", मंजू की शरारत सुन्न कर मेनका ने अपने माथे पर हे हाथ रख लिया.

"शर्म किया कर तू थोड़ी तोह. जानती है जबसे मुझे ये सब पता लगा था तभी से मैंने अपने कदम उस तरफ जाने नहीं दिए. हाँ परिवार में रहने का असर तोह ाचा हे होगा. बहोत ख़याल रखती है कौशल्या आंटी और अंकल जी मेरा. पहले ज़िन्दगी जहाँ थी वह मैं बेजान सी थी बहोत से रिश्तो के बीच भी और यहाँ जिनके साथ कोई रिश्ता तक नहीं वो बेटी से ज्यादा प्यार करते है. ाचा तू तैयार हो जा, मैं चाय छान लेती हु.", मेनका ने लगभग मंजू को हटते हुए आखिरी बात कही क्योंकि उसके हाथो में अभी चूड़ियां न थी.

"आप जो कर रही हो वो गलत है दीदी. अर्जुन आपको बाकी ख़ुशी भी दे सकता है और इस बारे में आपको मैं पहले भी समझा चुकी हु. दूर जाने से कुछ नहीं होगा क्योंकि सच्चाई आप भी जानती है की दुरी तब होती जब वैसा हुआ न होता. आप असली ख़ुशी ठुकरा रही है.", मंजू ने रसोई की शेल्फ पर हे राखी हुई वो लाल चूड़ियां कलाई में पहनते हुए कहा. मांग में छोटा सा कुमकुम का होना उसके ब्याहता की निशानी थी और चूड़ियां उसकी कलाई में नारीत्व का सम्पूर्ण होना.

"देखते है मंजू की ये दूरियां कितनी मजबूत है. निभा तोह नहीं पाउंगी लेकिन फ़िलहाल यही ठीक है माहौल और हालात के हिसाब से. वैसे तू भी तोह अकेलापन महसूस कर रही होगी ऐसे माहौल में?"

"न न दीदी. मुझे वो पूरा टाइम दे हे देता है जब भी मौका मिले. आज भी आएगा जब आप लोग उधर जाएंगे.", मंजू ने बेबाकी से बताया था की अर्जुन इधर आएगा और उसकी बात सुन्न कर मेनका हलकी सी चपत उसके कूल्हों पर लगाने के बाद चाय छान ने लगी. 3 कप चाय एक ट्रे में लिए वो सरोज जी वाले कमरे में चली गयी और 2 कप अलग ट्रे में मंजू और मधु जी के लिए वह रख दिए.

"तोह सब कैसा चल रहा है तुम्हारी लाइफ में मंजू?", अब गाउन की जगह मधु के जिस्म पर ढीला सा सलवार कमीज था जिसमे वो उतनी हे आकर्षक लग रही थी जितनी हमेशा. मंजू के बिलकुल करीब बैठ उन्होंने चर्चा शुरू की.

"मेरी लाइफ तोह अक्सर के टाईमटेबल में हे रहती है बुआ जी. फिलहाल तोह स्विमिंग से थोड़ा ब्रेक लिया है क्योंकि घर आना जाना और फिर इधर शादी भी है. बाकी मैं तोह पहले से ज्यादा बेहतर हु. आप बताओ अपने बारे में. अर्जुन और माधुरी दीदी से पता चला था के आप भी क्सक्सक्सक्स शहर में शिफ्ट हो गयी है.", अर्जुन का नाम सुन्न कर मधु के चेहरे परे हलकी सी मुस्कराहट आ गयी थी.

"अर्जुन ने बताया? हाँ बताया हे होगा क्योंकि एक तोह वो मेरी बहोत परवाह करता है ऊपर से तुम्हारी भी उसके साथ ाची निभती है. शायद दोस्तों से ज्यादा हो तुम लोग जैसा मुझे वह कॉलेज वाले भूमि पूजन से पता लगा."

"बिलकुल और ऐसा होना लाजमी भी है बुआ जी. आप भी उसको हिमांशु जितना हे प्यार करती है तोह वो परवाह करेगा हे. हाँ मेरे साथ थोड़ा कॉम्प्लिकेटेड है. दोस्त कह सकते हो या दोस्त से ज्यादा कह लो लेकिन रिश्ते किसी नाम में हे बंधे हो ऐसा जरुरी तोह नहीं? हाँ कॉलेज में उसने जो किया उसकी वजह न मैंने पूछी और न उसने बताई. प्रीती और मुझे उसने वह बराबर हिस्सा दे दिया."

"एक सवाल पूछ सकती हु अगर तुम्हे बुरा न लगे तोह?", मधु थोड़ा असहज सा महसूस कर रही थी ये बात कहते हुए और मंजू ने उनका चेहरा पढ़ भी लिया था लेकिन वो बिलकुल सहजता से बोली.

"जी बिलकुल पूछ सकती है. आप बड़ी है और आपका हक़ है. इसमें बुरा या ाचा जैसा कुछ भी नहीं.", मंजू द्वारा सहमति देने के बावजूद मधु को शंका थी जैसे वो कही कुछ गलत बात तोह नहीं करने वाली.

"वो .. वो ऐसा था के तुम्हारे पति की.. मतलब जिस से तुम्हारी शादी हुई थी वो तोह तभी गुजर गए थे न?"

"मेरी शादी ऋषभ से करवाई गयी थी बुआ जी और उस फैंसले में मैं शामिल नहीं थी. आपने मेरी मांग का सिन्दूर थोड़ा देरी से देखा है जिसने ये सवाल पैदा किया लेकिन ये सिन्दूर मेरी शादी ऋषभ से होने से पहले हे मेरी मांग में अपनी जगह बना चूका था. आप पूछ रही है और मैं इसलिए बता रही हु क्योंकि ये शायद जरुरी होगा.", मंजू भी उतने हे धीमे बोल रही थी जितना मधु और इनकी बातों से अलग सरोज, मेनका और दलीप अलग कमरे में थे.

"हाँ. मुझे भी लगता है की जैसे कुछ ज्यादा हे गहरी बात है जो न कोई कहना चाहता है और न करना. सिन्दूर एक सुहाग की निशानी है और इसका मतलब तोह यही है की तुम सुहागन हो. तुमने कहा की तुम्हारी वो शादी जिसमे तुम दिल से शामिल नहीं थी, ये सिन्दूर उस से पहले से तुम्हारे साथ है. लेकिन रिश्ते की बात से भी तुम इंकार करती हो."

"हाँ बुआ जी और मेरा फैंसला सिर्फ मेरे तक हे सिमित है. इसका प्रभाव किसी और पर नहीं पड़ने देना चाहती, बेशक वो जानते हो या खुद को अपराधी मानते हो मेरी अवस्था का लेकिन जो नाम आप जान न चाहती है वो वही है जो आप सोच रही है. लेकिन कोई बंधन नहीं है इसमें और मेरी सास ने ये अंगूठी पहनाई थी जो आप पहचानती होंगी.", रेखा द्वारा दी गयी अंगूठी ऊँगली पर सीढ़ी करके मंजू ने दिखाई तोह मधु ने एक ठंडी आह भरी फिर मुस्कुराने लगी.

"मतलब तुम्हारे शरीर में जो भी बदल रहा है उसका जिम्मेवार भी यही है?"

"मंजू ने भी उसको दिल से उतना हे प्यार किया है जितना वो मेरे साथ करता है. हाँ विधवा तोह मैं कभी थी हे नहीं लेकिन आजाद जरूर हु. उम्मीद है की आप भी समझेंगी और ये सब आप तक हे रहेगा. मैंने इसलिए हे आपको बताया है क्योंकि आप अपनी है.", मंजू ने चाय का कप उठाते हुए एक घूँट ली और फिर से मधु जी की तरफ देखने लगी.

"प्यार किसी भी रिश्ते या विवाह से कही ऊपर है मंजू. तुम एक बेहतरीन इंसान होने के साथ साथ बहोत सुलझी हुई सोच रखती हो, बिना किसी संकीर्ण सोच के. वो तुम्हारा ख़याल तोह रखता है न?", मंजू की अंगूठी पर स्पर्श करके मधु जी ने वो नरम हाथ अपने दोनों हाथो में लेते हुए पुछा.

"उम्मीद से ज्यादा ख़याल रखता है बुआ. वो कितना भी व्यस्त रहे या आसपास न भी हो लेकिन वो बात करता है, मेरी हर जरुरत बिना कहे पूरी करने के साथ साथ भविष्य के लिए भी मुझसे कही ज्यादा चिंतित और म्हणत करता है. बदले में कभी कुछ माँगा भी नहीं तोह आप हे बताओ की इस बेनाम रिश्ते वाली मैं ज्यादा खुश हु वो लोग जो रिश्ते भी बस नाम के बनाये हुए घुटन में जीते है.? मैं खुशकिस्मत हु और मेरे पास सबकुछ है. चलिए, ये चर्चा तोह होती रहेगी. 6 बजने को है और वो आपको लेने आता हे होगा.", यहाँ पर 'वो' से मतलब अर्जुन हे था जिसका नाम लिए बगैर हे इतनी लम्बी चर्चा होती गई.

"हाँ असली शादी तोह वही है जिसमे आप दिल से जुड़े हो और एक दूसरे का पूर्ण सहयोग रहे. प्रीती जानती है?"

"वो जानती न होती तोह मैं यहाँ नहीं होती. आखिर असली अर्धांगिनी तोह वही है बुआ और उसका दिल मुझसे हजार गुना बड़ा है."

"मतलब तुम तोह राधा हे हुई?", खड़े होने के साथ मधु जी ने मुस्कुरा कर कहा था और ये मुस्कान अजीब कटाई न थी क्योंकि वो भी अर्जुन के बारे में बहोत कुछ जानती थी जो उसको साधारण तोह नहीं बनता था.

"राधा द्वापर युग में थी बुआ और मैं मंजूबाला हु जिसको समानता के हिसाब से आप मुझे चित्रांगदा कह सकती है क्योंकि बात अर्जुन की है. आप तैयार हो जाए, मैं पापा के लिए नाश्ता बना देती हु.", मंजू भी चाय के दोनों कप उठा कर फिर से रसोई की और चल दी. मधु अब कुछ बेहतर महसूस कर रही थी लेकिन चित्रांगदा बता कर मंजू ने जरूर उसको पाशपेश में दाल दिया था. वो अर्जुन की तीसरी बीवी थी. प्रीती अगर पहली है तोह वो द्रौपदी कहलाई और दूसरी होती सुभद्रा जो मंजू खुदके लिए बोल सकती थी. लेकिन तीसरी क्यों?

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दिन जितना जल्दी शुरू हुआ था उतनी हे तीव्र गति से आगे बढ़ने लगा. घर में सुबह के नाश्ते के साथ हे पुरुष लोग अपने अपने निर्धारित कार्यो में जुट गए थे और प्रशंसनीय बात थी की विनोद और पप शर्मा भी नाश्ता करने के बाद vivaah-sthal की और चले गए थे उमेद और शंकर के साथ. नरिंदर भी अपने साथ हुसैन साहब को लिए घर में होनी वाली रस्मो का सामान और phal-phool लेने के लिए मार्किट प्रस्थान कर गए.

"अर्जुन पुत्तर, तू यार जरा अपने विवान चाचा को अड्डे ले जा. इसका एक दोस्त अकेला हे दिल्ली एयरपोर्ट से यहाँ की बस में आ रहा है. पहुंचने वाला होगा और कार सिर्फ ये तेरे वाली हे कड़ी है यहाँ.", छोल साहब बगीचे से होते हुए घर में दाखिल हुए तोह उनके साथ प्रीती और विवान जी भी थे. अर्जुन ने उन्हें नमस्कार करने के बाद बेहद प्यार से प्रीती के खिले हुए चेहरे को देखा जिस पर वो भी मुस्कुरा कर नजरो से इजहार करने लगी.

"जी क्यों नहीं छोटे दादू. मैं तोह वैसे भी फ़िलहाल कोई काम नहीं कर रहा.", अर्जुन ने ऐसा अपने दादा जी की तरफ देख कर कहा जो पहले हे अर्जुन को काम की लिस्ट पकड़ने के बाद कुछ निर्देश दे चुके थे. अब वो हंस रहे थे क्योंकि bus-adda भी बड़ी मार्किट की तरफ हे था जहा अर्जुन ने जाना था.

"नहीं इसकी जरुरत नहीं है अर्जुन अगर तुम काम कर रहे हो तोह. मैं ये मोटरसाइकिल ले जाता हु ताऊ जी अगर किसी को इसकी जरुरत नहीं है तोह?", विवान जी ने कहने के बाद नंबर प्लेट पर लिखा 'रानी' देखा और फिर प्रीती को थोड़ी हैरानी से देखने लगे जैसे उन्हें ये नाम अजीब लगा हो.

"रहने दे मेरे फिरंगी पुत्तर. 200 किलो का बुलेट तेरे पाँव पे गिरा तोह शादी की जगह हॉस्पिटल में बिजी रहेगा. अर्जुन को भाई साहब वही भेज रहे है तोह तू इतनी चिंता न कर. वैसे भी दामाद ससुर अभी से ाची सेटिंग बना ले तोह आगे दिक्कत नहीं होने वाली. भाई साहब, शास्त्री जी बहार इन्तजार कर रहे है आपका. आप भी चलिए.", रामेश्वर जी छोल साहब की बात सुन्न कर तुरंत हे उठ चले. अर्जुन को फिर से हिदायत दे कर.

"तोह ये मोटरसाइकिल भी तुम्हारी है और वो कार भी? वाह भाई तुम्हारी मौज है अर्जुन जो अभी से इतनी अराजदायक ज़िन्दगी नसीब है. यहाँ तोह कॉलेज तक मुझे मोपेड पे जाना पड़ता था.", कार की तरफ बढ़ते अर्जुन के साथ हे विवान जी भी चल दिए. प्रीती इधर से हे बैठक में जा चुकी थी.

"ये सब शर्तो पर हे मिला है अंकल है जी. स्कूल पैदल जाता हु, स्टेडियम मोटरसाइकिल पर वो भी अगर कड़ी हो तोह. और कार तभी जब घर के काम से एक से ज्यादा लोगो को बहार ले जाना हो या किसी को लेने. तोह अब आप बताओ के मेरी ज़िन्दगी मजे में है या फिर कुछ और?", कार में बैठ कर अर्जुन ने दूसरी तरफ का दरवाजा विवान के लिए खोला तोह सीट पर र लिखा देख वो फिर से सोचने लगे.

"यार, मोटरसाइकिल पर रानी, यहाँ पर र. चक्कर क्या है अर्जुन बीटा? प्रीती नाम ाचा नहीं है क्या जो उसका नाम तुम रानी रख रहे हो.?", अर्जुन तोह इस सवाल से किसी लड़की की तरह शर्माने लगा. घर के भीतर आते लकी भैया को देख उसने कार वही रोके रखे और उनको संजीव भैया से मिलते देख बहार का रुख किया.

"रानी तोह मोटरसाइकिल का हे नाम है अंकल जी जो मेरे एक दोस्त ने दिया है. और आप वाली सीट पे र का मतलब ऋतू दीदी है. कार दादा जी ने दिलवाई थी और ये मेरे साथ साथ ऋतू दीदी की भी है तोह उन्होंने अपना नाम हे लिख दिया.", अर्जुन की बात सुन्न कर विवान चस्मा ठीक करते हुए हंसने लगे.

"सही है भाई. ऐसा हे तोह होता है bhai-behno में आखिर. मेरा और रेणुका का तोह झगड़ा इसके उलट हे होता था. उसकी हर चीज पर मैं हक़ जमा लेता और फिर वो रोटी हुई कभी पापा से तोह कभी ताऊजी से शिकायत करती. लाड़ली भी है और मुझसे 9 साल छोटी भी. फिर बड़े होने के बाद तोह वो बस यादें हे रह गयी और मैं जितना परेशां करता था बाद में उतना हे ध्यान रखने लगा. जीवन में ये स्वाभाविक बदलाव हे है जो एक उम्र आने पर अपने आप हे शामिल हो जाते है हमारे जीवन में.", अर्जुन को एक कतार में नियंत्रित गति से कार चलते देख वो खासे प्रभावित हुए थे.

"बदलाव हे तोह नियम है अंकल जी. बस या सकरात्मक हे होना चाहिए जैसे आपने अनुभव किया. प्रीती बहोत तारीफ करती रहती है आपकी. जिस दौर में लोग मुश्किल से सरकारी नौकरी और छोटे मोठे बिज़नेस की हे सोच रखते थे आपने वो पढ़ाई की जो यहाँ उपलब्ध भी नहीं थी. अमेरिका में खुद को स्थापित करना और साथ साथ नयी नयी टेक्नोलॉजी में महारत रखना आसान काम नहीं है. लेकिन आप उदहारण है.", अर्जुन द्वारा की गयी प्रशंशा से विवान को कुछ ाचा तोह लगा लेकिन फिर प्रीती का जीकर होने पर जैसे कही सूई सी चुभी दिल में. अपनी हे कुछ गलतियों की

"तुम ाचे लड़के हो अर्जुन और इसका पता तुम्हारी परवरिश से चलता है. ताऊ जी और ताई जी जैसा चाहते थे तुम वैसे हे हो. पता नहीं तुम और प्रीती इतनी जल्दी हे कैसे इस सबके लिए तैयार हो गए लेकिन रिश्ता रजामंदी के साथ साथ ढेरो लक्ष्यों से निर्धारित है तोह मुझे भी ख़ुशी है की तुम परिपक्व युवक हो. वैसे तुम 2 क्लास पीछे हो अब प्रीती से.", विवान जी की बात का मतलब समझ कर अर्जुन बस मुस्कुरा दिया.

"पत्नी ज्यादा आगे हो तोह भविष्य में इसके विपरीत परिणाम भी हो सकते है.", यहाँ जैसे विवान अपनी और रोमिला की तुलना सन्दर्भ ये कह गया था.

"इस से ाची बात हे क्या होगी अंकल जी? एक ज्यादा पढ़ी लिखी और समझदार पत्नी कुबेर के खजाने से अधिक मूल्यवान होती है. वो आपको उचित सलाह दे सकती है जब आप विषम परिस्थितियों से गुजर रहे हो तोह. बस आपसी सहयोग और समर्पण बेजोड़ रहना जरुरी है. वैसे प्रीती ने 5 साल आर्किटेक्चर पढ़ना है और मैंने 4 साल इंजीनियरिंग. उसके बाद वो एक साल ट्रेनिंग करेगी और तब तक मेरी डिग्री भी ख़तम. ये 2 साल वाला गैप तोह वही ख़तम लेकिन मैं चाहता हु की प्रीती उसके बाद भी मास्टर्स करना चाहे तोह वो करे, इंडिया में या इंडिया से बहार. क्योंकि वो जो भी करना चाहती है वो उसको श्रेष्ठ करने में हे यकीन रखती है. क्योंकि उसका कम्पटीशन हमेशा खुदसे हे रहता है.", अर्जुन ने खली सड़क देख पल पर जाते वक़्त गति 50 से बढ़ा कर 70 कर दी थी लेकिन माहौल जैसे इस से अनभिज्ञ था.

"हहहहह.. वो कॉम्पिटिटिव है ये मैं भी जानता हु लेकिन क्या तुम भी वैसे हे हो?"

"नहीं अंकल. प्रतिस्पर्धा चाहे बाहरी हो या खुद से, इसका प्रभाव एक सिमित क्षेत्र में हमारे ऊपर भी पड़ता है. मैं बस वही करने में यकीन रखता हु जो ठीक हो, मेरे नजरिये से या फिर परिवार के.", अर्जुन ने मार्किट में अंदर जाने की जगह मुख्या सड़क पर हे कार एक बड़े शोरूम के पास रोकने के बाद उतर कर दादा जी की दी हुई पर्ची वह पहुंचे और वापिस कार का स्टीयरिंग संभल लिया.

"तुम कुछ हद्द तक शंकर भाई जैसे दीखते जरूर हो लेकिन हो बहोत अलग. तोह आज शाम के क्या प्लान है तुम्हारे?"

"पापा ने जो भी हांसिल किया है वो सबके लिए मुमकिन नहीं अंकल. मैं उनके जितना सक्षम कभी हो भी न पाउँगा लेकिन कोशिश करूँगा एक नाम अपना भी बनाने का. और शाम के प्लान तोह फ़िलहाल अनिश्चित हे है क्योंकि शाम दूर भी है और 2-2 विवाह एक बार में हे हैं तोह जाने क्या चेंज करना पड़ा. लीजिये आ गए बस स्टैंड.", कार को एक तरफ पार्किंग में खड़ा करने के बाद अर्जुन ने बसों की कतार पे निगाह दौड़ाई तोह दिल्ली वाले स्टैंड का पता चला.

"हाँ कुछ जल्दी हे आ गए. तुम बैठो मैं प्रदीप को लेके आता हु. प्रदीप कुमार मेरे बचपन और कॉलेज का दोस्त है. तुम्हे मिल कर ाचा लगेगा क्योंकि बाँदा बहोत दिलचस्प है.", विवान कार से उतर कर उस तरफ हे चल दिए जहा दिल्ली वाली बस रूकती थी.

'अंकल अब आप लोगो की सोहबत में रहूँगा तोह क्या ख़ाक दोस्त बनेंगे मेरे? इधर अन्नू इंतजात कर रही होगी और उधर मंजू के पास भी जाना है. बबिता दीदी अलग हे ृत्त लगाए बैठी है शादी के टाइम की. लेकिन सबसे जरुरी तोह संजीव भैया के काम है. अर्जुन बीटा लगता नहीं की तू शादी में एंजोये कर भी पायेगा.', यहाँ अर्जुन अपनी हे कश्मकश में डूबा था और कुछ वक़्त बाद विवान को एक जोशीले से अधेड़ व्यक्ति के साथ अपनी तरफ आता देख अर्जुन कार से उतर गया. पाँव छूने के साथ उनका अटैची डिक्की में दाल कर उसने दोनों को पीछे बैठने का न्योता दिया.

"यार तुम खाते क्या हो? दूर से हे देख रहा था के पूरे स्टैंड पर तुमसे ऊँचा और तगड़ा लड़का नहीं दिखा. विवान भाई, ये तेरा बीटा तोह बिलकुल भी तुझपे नहीं गया. हाँ शरीर विदेशी है लेकिन थोड़ा हिंदुस्तातनि हे लगता है.", प्रदीप कुमार के अनुमान पर दोनों हे हंस दिए.

"अर्जुन मेरा होने वाला दामाद है प्रदीप. ये अपने डॉक्टर भैया है न शंकर शर्मा, उनका सुपुत्र है. Kad-kaathi अपने पिता और चाचा से भी ज्यादा हे है लेकिन उतना हे समझदार लड़का है.", परिचय मिलते हे प्रदीप थोड़ा हैरान हुआ.

"वाह बीटा, अभी से अपने ससुर की सेवा में लगे हो. वैसे बेटी तोह इसके टक्कर की है न विवान? ये तोह अर्जुन की जगह भीमसेन ज्यादा लग रहा है. हाहाहा..", अब बारी अर्जुन की थी झेंपने की. दोनों दोस्त पिछली सीट पर बतियाते रहे और अर्जुन उन्हें लिए दादा जी के बताये काम और सामान लेता हुआ घर के और रवाना हो चला.

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"माधुरी, देख 5 दिन लगातार उबटन से तू कितनी कमाल की लगने लगी है. गौरव तोह तबियत से फिसलेगा तेरे ऊपर.", यहाँ ऊपर वाले hall-kamre में इस वक़्त माधुरी की कुछ सहेलियों के साथ साथ सरोज भाभी, पालक (मल्होत्रा जी की बेटी), प्रिय मल्होत्रा (कपिल की बीवी), अनामिका के साथ साथ विन्नी और ऋचा भी मौजूद थी. माधुरी की ढीली सलवार घुटनो से भी कुछ ऊपर करके सरोज भाभी ख़ास क्रीम से मालिश करती हुई उसको और naram-chamakdar बना रही थी. ताजे हे साफ़ किये हुए जिस्म के रोयों की वजह से माधुरी का सौंदर्य सभी की नजरो का प्रमुख केंद्र था लेकिन भाभी की बात सुन्न कर माधुरी के गाल टमाटर से दिखने लगे थे.

"आये हाय माधुरी. अभी से गुलाब सी खिल रही है तू तोह. टेंशन न ले तुझे काली से फूल बन्न ने अब एक दिन हे लगेगा.", ये प्रिय भाभी थी जिनकी बात सुन्न कर विन्नी खुल कर हंसने लगी और माधुरी सहराम से दोहरी होती हुई घुटने मोड़ने लगी.

"भाभी, वैसे आपका अनुभव कैसा था? सुन्दर तोह आप भी काम नहीं तोह भैया ने तबियत से फूल बनाया होगा आपको.", विन्नी ने हंसने के साथ हे ये कहा और प्रिय एक पल के लिए सकपका गयी फिर एक अदा से मुस्कुराई. अनामिका चची तोह बोलने से हे कटरा रही थी लेकिन उनको भी सुन्न कर कुछ मजा आ रहा था.

"अरे मैं इतनी गदराई हुई नहीं हु जितनी माधुरी है. और जब शादी हुई थी तब तोह मेरे संतरे भी टमाटर से कुछ बड़े हे थे. कांटा लगने पर दर्द तोह हुआ था लेकिन फिर फूल बन्न कर मजा भी आता है. असर देख लो की टमाटर संतरे बन्न चुके है और देंगे अब कढ़ाई (कूल्हे). वैसे विन्नी तू भी माधुरी के नक़्शे कदम पर हे है बस कमर तेरी कमजोर लगती है. तगड़ा घोडा मिला तोह कमर में मोच भी जोर की आएगी. माधुरी तोह झेल लेगी इसके पुट्ठे (कूल्हे) भारी और मजबूत है.", विन्नी बेचारी खुद हे फंस गयी थी लेकिन ऋचा ने हौंसला दिया अपनी ब्याह उसकी कमर में डालते हुए.

"भाभी आप मेरी चिंता न करो, जो लिखा होगा वो मिलेगा हे. लेकिन आपकी बात से लगता है आपको तगड़ा घोडा नहीं मिला नहीं तोह संतरे खरबूजे बन चुके होते.", विन्नी के दहला मारने पर सरोज भाभी भी खिलखिला उठी और बाकी सबके साथ पालक भी. लेकिन प्रिय जैसे बातों में कही ज्यादा हे खेली खायी थी.

"अरे मेरी विनीता रानी, ये न इंडिया है और इधर के कांटे उतने बड़े या तगड़े नहीं होते की बगीचा खिला दे. किस्मत ाची हो तोह 100 में से कोई एक को ऐसा मिलता है जो बगीचा hara-bhara कर दे नहीं तोह स्कूल वाले 6 इंची फूटते जितना भी नसीब से मिल जाए तोह बहोत है. तू ज्यादा हे उत्सुक है इसलिए बता देती हु की शादी से पहले हे जांच लियो अपनी बारी में. बस माधुरी को वो एक मिल जाए क्योंकि उस से काम में इसका गुजरा नहीं होने वाला.", कहने का अंदाज भी इतना मस्तीभरा था प्रिय भाभी का की कोई भी मुस्कुरए बिना न रह सका. माधुरी तोह मंद मंद शर्माती हुई मैं में यही विचार कर रही थी की प्रिय भाभी ने अगर वो मूसल देख लिया जो पहले हे माधुरी को फूल बनाने के साथ साथ इतना खिला चूका है तोह भाभी की बोलती बंद होना निश्चित है.

"ये फूटता और 6 इंच क्या मतलब है प्रिय जी?", अनामिका ने कौतहूल में पूछ हे लिया जिस पर सरोज भाभी खिलखिला उठी.

"अरे अनामिका दीदी, ये अपने हिंदुस्तानी औजार ज्यादातर उतने हे होते है न जितना स्कूल की गेमोटरय में मिलने वाला स्केल. वो भी सबके नहीं होते, कुछ तोह उस से भी एक डेढ़ इंच छोटे. प्रिय का कहना है के माधुरी का उतने से गुजरा नहीं होने वाला और वैसे भी जितना बड़ा उतना मजा.", आँख मारते हुए सरोज ने बात पूरी कही तोह अब अनामिका चची बगले झांकती हुई लाल होने लगी.

"पालक दीदी, आप कहा गम हो? आपकी तोह ओपनिंग भी थोड़े हे दिन पहले हुई है. आप हे बता दो कुछ किस्से और जरा साबित कर दो प्रिय भाभी का ज्ञान.", ये माधुरी की हे एक सहेली थी जो कुछ हे समय में इन सबके साथ घुलमिल गयी थी.

"तेरी भी तोह शादी होने वाली है मेरी लाडो. वैसे ये अन्नू इतनी कहा खोयी है? इंग्लैंड में कोई याद तोह नहीं आ गया?", सरोज भाभी ने दोहरा वार किया तोह अन्नू ना में गर्दन हिलती हुई तपाक से बोल उठी.

"ऐसा है सरोज भाभी की आप लोगो का ज्ञान शायद सिमित हे है. साइंस टीचर हु और प्रैक्टिकल के बिना डिग्री नहीं मिलती. मुझे जिसका ध्यान आया है न वो इंग्लैंड नहीं यही अपने हे देश का है और आप 5-6 इंच वाले कांटे की बात कर रही है लेकिन जो मैंने देखा है वो शायद 1000 में से एक हे होगा. बाकी इस मामले में दोहरे प्रैक्टिकल नहीं किये क्योंकि वैसा एक हो तोह फिर एक्सपेरिमेंट की जरुरत नहीं.", अन्नू के जवाब पर माधुरी ने चेहरे से तोह न जाहिर होने दिया लेकिन जैसे वो कुछ कुछ समझने लगी थी बस पुष्टि नहीं करना चाहती थी.

"ओह बाप रे! ये बिल्ली तोह पहले हे चूहा खाये बैठी है. कही बातें तोह नहीं बना रही न हमको उल्लू बनाने के लिए?", सरोज भाभी की बात पर पालक, प्रिय, विन्नी, अनामिका और बाकी सभी अन्नू को हे देख रहे थे जबकि वो मुस्कुराती हुई खम्सः रह कर भी हाँ बोल चुकी थी.

"मतलब तू सच कह रही है अन्नू? और शादी से पहले तूने वो भी कर लिया?", ये पालक दीदी थी और वैसा हे कहा था अनामिका चची ने.

"मैंने ये तोह नहीं कहा के वो सब कर लिया. मैंने कहा है की जो एपीरिएंस किया है वो इतना बड़ा तोह होगा और ये विन्नी की वृस्त से हल्का सा मोटा. वो सब नहीं किया जिस से बगीचा बन जाए.", अन्नू ने जितना इशारे से बताया था सभी भाभियाँ और चची, दीदी आदि हैरानी से उसको देख रही थी.

"इंसान हे था वो या कुछ और? और तूने सही किया जो नहीं लिया क्योंकि फिर तोह तू घर पे हे फंस जाती अन्नू.", प्रिय कौतहूलवश जैसे और भी जान न चाहती थी.

"मैं फिलहाल अपने करियर पे हे फोकस्ड हु भाभी लेकिन किसिंग तोह कॉमन हैं न? बस उतने तक हे लिमिट है अपनी. और लड़का क्या है समझ लो मेरी लाइफ का बेस्ट एक्सपीरियंस हे उस से मिलना है. और आपकी कौलेज के लिए बता देती हु की जहा से बेबी हो सकता है वह तोह ये भी जा सकता है. बाकी टाइम आने पर सिक्ख जाउंगी.", अब अन्नू हे आगे हो कर माधुरी की बाँहों पर क्रीम लगाने लगी थी. उसके बेहतरीन जिस्म और लम्बी कदकाठी से सभी प्रभावित थी और सबसे ख़ास था अन्नू का वो दिल से मुस्कुराना. विन्नी तोह कायल हे हो गयी थी इस युवती की.

"वैसे पालक दीदी ने जवाब नहीं दिया.", विन्नी ने फिर से बात बदली तोह अब पालक अपनी भाभी की तरफ मदद भरी नजरो से देख रही थी.

"इसके पतिदेव तोह फिलहाल दुबई है नौकरी की वजह से. आएंगे तोह ये तुम्हे अपने किस्से भी सुना देगी. हाँ माधुरी परसो वापिस आएगी तोह पहले इसके सुन्न लेना विनीता. जितनी जोरदार ये है, किस्सा भी काम नहीं होने वाला.", प्रिय भाभी ने इतना कहने के साथ माधुरी की नरम जांघ ऐसे दबाई की वो हलके से 'आह' भर उठी

"भाभी कुछ तोह शर्म करो आप. और जो होगा वो होने दो फिलहाल तोह कोई दरवाजा खोलो, माँ की आवाज है.", ललिता जी हे बहार से किवाड़ बजा रही थी. माधुरी की बची हुई रस्मे जो होनी थी और इसके साथ हे विवाह पूर्व होने वाले ढेरो काम. लेकिन विन्नी और प्रिय भाभी दोनों को हे अब अकेले में अन्नू से बात करनी थी जो दरवाजा खोलने चली थी.

"अन्नू, तुम जरा मेरे साथ अपने सेक्टर वाली मार्किट चलोगी?", इन दोनों से पहले हे पालक ने उसको पूछ लिया था. पालक खामोश रही थी लेकिन उसके मैं में जैसे उथल पुथल मच चुकी थी जिसका समाधान वो बातचीत करके हे करने वाली थी.

"हाँ, कार लेके आयी हु मैं तोह चलते है. आओ.", ललिता जी अंदर आयी और पालक तुरंत अपना दुपट्टा उठा कर अन्नू के साथ निकल चली.
 
अपडेट 189 (बी)

शुभ दिन

"अभिषेक का फ़ोन आया था माँ अभी. वो लोग क्सक्सक्सक्स पहुंच चुके है और 20-25 मिनट हे उन्हें लगेंगे. मैं जॉन फिर उन सभी का प्रबंध करने के लिए?", राजकुमार जी भीतर आँगन में आये थे जहा नाई संजीव की हजामत और दाढ़ी बना रहा था. ये भी एक रसम थी जिसमे होने वाले दूल्हे को तैयार करने का पहला चरण यही होता था. लकड़ी के पात पर बैठा कर संजीव के बाल तराशे जा रहे थे और ये सब कौशल्या जी की देख रेख में हो रहा था.

"तू नहीं जा सकता अभी कही भी. देख जरा ये अर्जुन कहा रह गया और उसको समझा दे सबकुछ. होटल का नाम और कितने कमरे वह आरक्षित है वो सब उसको बता के भेज दे.", कौशल्या जी कड़ी हो कर ललिता को वही रहने का बोल अपने कमरे की तरफ चल पड़ी. राजकुमार जी भी अपनी माँ के पीछे हे थे.

"उसका जाना ठीक रहेगा क्या माँ? सम्बन्धी है और उनकी खातिरदारी में घर के बचे को लगाना?", कौशल्या जी ने बात को दरकिनार करते हुए गोदरेज की अलमारी खोल उसमे से नोटों का एक बंडल निकालने के बाद वापिस टाला जड़ दिया.

"तू करेगा सेवा? अभिषेक भी तेरे बेटे जैसा है और दामाद खुद संजीव जितना. वो घर के बचे हे है राजू लेकिन इस वक़्त यहाँ के सारे कामो में तेरा होना ज्यादा जरुरी है. शंकर या उमेद चले जाते लेकिन वो लोग तोह पहले से जुटे हुए है सभी काम देखने. अर्जुन समझदार है और आज सीखेगा तभी तोह भविष्य में बाकी बहनो के विवाह समय अकेले देखरेख कर पायेगा. हाँ, वो सुभाष (राधिका के पिता) भी परिवार और रिश्तेदारों के साथ 1 बजे तक पहुंचेगा. उनके कमरे तोह जरूर पैलेस में हे हैं लेकिन जितने लोग साथ आ रहे है उनका इंतजाम भी तोह देखना पड़ेगा?"

"वो लोग तोह होटल खुद नहीं करने वाले थे माँ?"

"तू कभी कभी chappan-kaddu जैसा क्यों हो जाता है बीटा? उनके लिए होटल भी आरक्षित किया हुआ है शादी की जगह के पास हे लेकिन हमारे घर से कोई जाएगा तोह उन्हें भी ाचा लगेगा न. अर्जुन पहले अभिषेक और बरात को होटल ले जाएगा, फिर वही से सुभाष जी से बात करके उनके लोगो को सतीश के होटल के बगल वाले होटल में पंहुचा देगा. तू रहने दे, मैं हे समझती हु उस बैल को.", कौशल्या जी खुद हे बहार की तरफ चल दी और अपनी माँ से झाड़ खाने के बाद स्वयं राजकुमार जी भी. अर्जुन गाँव से आये हुए मेहमानो को चाय परोस रहा था और हुक्के का दौर गर्मी में भी जारी था. विवान जी से फारिग होने के बाद अभी तक उसको कपडे बदलने तक का मौका न मिला था.

"ये सब असगर के लड़के देख लेंगे अर्जुन. तू जरा यहाँ बैठ.", कौशल्या जी ने जिस तरह अर्जुन को बुलाया था वो वही एक तरफ स्टील की ट्रे रख कर उनके पास चला आया. चेहरे पर पसीना और गर्मी के कारण भीगे हुए घुंगराले लम्बे बाल अर्जुन की हालत बता रहे थे. अपने रुमाल से खुद हे कौशल्या जी ने उसका चेहरा साफ़ किया.

"बोलो दादी कहा जाना है?", अर्जुन ने भी अपनी दादी की मनोदशा समझते हुए सवाल किया.

"देख मैं जानती हु की तू सवेरे से हे bhag-daud में लगा है और गर्मी में ये सब थोड़ा मुश्किल भी होता है. लेकिन तेरे भाई के साथ साथ बहिन की भी शादी है न? तोह तुझे दुगनी म्हणत करनी हे पड़ेगी?", कौशल्या जी जिस तरह से अपनी बात को माहौल के हिसाब से रखती थी ये शायद उन्होंने अपने पति से हे सीखा था.

"मुझे कोई परेशानी नहीं है दादी और अब काम नहीं होंगे तोह फिर कब होंगे? आप बताओ के मुझे क्या करना है?"

"ऐसा है की माधुरी के ससुराल वाले पहुंचने हे वाले है. 35-40 लोग होंगे अभी क्योंकि बाकी तोह सीधा शादी में हे शामिल होने आएंगे. उन्हें भी होटल का naam-pata मालूम है पर वो लोग इस तरफ ज्यादा आये भी नहीं और हमारा फ़र्ज़ भी बनता है की खुद जा कर उनके ठहरने का इंतजाम देखे. तू उन्हें बहार वाले बिपास से सतीश वाले होटल ले कर चले जाना. सभी को कमरे दिलवाने के बाद तेरे जीजा गौरव के बड़े भाई साहब अभिषेक से पूछ भी लेना की उन्हें जो भी चाहिए हो वो बेहिचक होटल के मैनेजर से बोल दे. हाँ, ये पैसे वह होटल के काउंटर पर अकेले में पकड़ा देना मैनेजर को.", अर्जुन ने पूरी बात सुन्न कर बस गर्दन हिला दी.

"माँ वो सुभाष जी वाला..", राजकुमार जी कुछ कहने लगे थे की उनकी माता जी ने आँखे दिखा कर चुप करवा दिया.

"तू अंदर जा कर रस्मे करवा बीटा. हाँ अर्जुन, ये सब होने के बाद तू वही होटल में थोड़ा आराम कर लेना. ठीक 2 बजे शादी की जगह तेरी भाभी का परिवार पहुंचेगा. वैसे तोह उधर तेरे पापा, चाचा लोग होंगे लेकिन उनका वह रहना जरुरी है क्योंकि सबसे मिल कर उन्हें भी 3 बजे तक वापिस आना पड़ेगा. तू सुभाष या तेरे पापा से बात करके बाकी लोगो को होटल तुलिप ले जाना. वैसे तोह वो खुद सुभाष के नाम से हे बुक है लेकिन हमने करवाया है तोह उनके rishteydaro-mehmano को वह पहुंचना भी हमारा फ़र्ज़ है. कर लेगा ये सब?", अर्जुन के चेहरे पर सकरात्मक हे भाव थे और दादी द्वारा पूछने पर वो उनके रुमाल को अपनी जेब में रखता उठ खड़ा हुआ.

"मुझे तोह लगा था की जाने आप कितना बड़ा काम बताने वाली हो दादी? इतनी सीरियस थी और काम ये बताया. आप निश्चिन्त रहिये, मैं सब देख लूंगा और फ़ोन के करीब हे रहना आप. जरुरत पड़ी तोह आपसे हे बात करूँगा.", अर्जुन वही कपडे पहने जाने लगा तोह गलियारे से आयी प्रीती ने एक साफ़ नीली टीशर्ट उसकी और बढ़ा दी.

"बहार जा रहे हो तोह टीशर्ट बदल लो. देखो कितनी गन्दी हो चुकी है.", अर्जुन की सफ़ेद कमीज सचमुच जगह जगह से पसीने और मिटटी की वजह से दागदार हो चुकी थी. कौशल्या जी ये देख कर मुस्कुराई और वापिस अंदर जाते हुए प्रीती के सर को सेहला गयी.

"हाँ एक तुम तोह हो जिसको मेरा ख्याल है की कपडे साफ़ है या मैले.", अर्जुन ने मजाक में ऐसा कहा लेकिन प्रीती ने जिस अदा से मुँह बनाते हुए जवाब दिया वो हांसे बिना रह न सका.

"तुम्ही बचे हो न ख्याल रखने के लिए? वो तोह माँ (रेखा जी) ने कहा के तुम ऐसे हे घूम रहे हो. कपडे तक का ध्यान नहीं है इसलिए मैं ये टीशर्ट ले आयी. अब निकलो यहाँ से और वैसे भी मुझे बहोत काम है.", प्रीती इतना बोल कर भी गयी नहीं थी और अर्जुन ने वही खड़े खड़े अपनी कमीज उतार कर उसको थमा दी. अर्जुन के लिए तोह ऐसा करना कोई नयी बात न थी और न प्रीती को अब अर्जुन को ऐसे देख कर अजीब लगता था. लेकिन उस चौड़े तगड़े baal-viheen से जिस्म की आभा इतनी निराली और आकर्षक थी की बहार वाली सीढ़ियों से निचे आती प्रिय भाभी के साथ साथ माधुरी के 2 सहेलियां भी नजरे हटाने में नाकामयाब रही. चौड़ी छाती के वो कटाव और मांसपेशियों से भरा निचे कमर तक का हिस्सा था भी इतना विलक्षण. टीशर्ट पहनते वक़्त अर्जुन की मजबूत भुजाएं भी उस खुली टीशर्ट में मुश्किल से समां रही थी.

"ये शो बंद भी करो तुम. प्रीती, तेरी बुआ को बोल की घर पे मेहमान आये है. तू भी आजा, तेरे पापा के फ्रेंड और कुछ रिश्तेदार मिलना चाहते है.", रोमिला ने हँसते हुए अर्जुन को हे जैसे तंज किया. वो भी मुस्कुराता हुआ 'थैंक यू' बोल कर घर से बहार निकल लिया. माधुरी दीदी की ससुराल से लोग पहुंचने हे वाले थे. कार में बैठ कर वो तोह चला गया लेकिन घर के बहार आती प्रिय भाभी के साथ साथ वो दोनों युवतियां अभी भी जैसे कुछ पल पहले वाले दृश्य में खोयी थी.

"मैं तोह माधुरी को कॉलेज से जानती हु भाभी और कितनी बार उस वक़्त घर aana-jana भी हुआ है. ये लड़का कौन था?", प्रिय भाभी उस लड़की को जवाब देने से पहले अर्जुन की कार को गली से मुड़ते हुए देखती रही. दूसरी लड़की भी वही देख रही थी, जिसको खुद पता नहीं था के वो लड़का था कौन

"जानती तोह हु मैं सुरभि लेकिन इस तरह तोह पहली हे बार देखा है. छोटा देवर हे लगता है मेरा, अर्जुन. लेकिन आज हे पता लगा के उतना छोटा भी नहीं है. कोमल का सागा भाई है और वैसे तोह इधर सभी सेज हे है इसलिए माधुरी का भी छोटा भाई है.", ये लड़की जो अर्जुन में दिलचस्पी ले रही थी उसका नाम सुरभि था.

"लेकिन भाभी मैं तोह 3 साल कॉलेज गयी हु माधुरी के साथ और यहाँ घर भी आना जाना लगा रहता था. दिखाई तोह नहीं दिया ये लड़का.", सुरभि अब प्रिय भाभी के हे साथ उनके घर की और चल रही थी. तीसरी लड़की भी ख़ामोशी से सुन्न रही थी साथ चलते हुए.

"एक तोह अर्जुन शुरू से हे बोर्डिंग में रहा है और ऊपर से पिछले साल वापिस आया भी तोह जैसे वो ज्यादा दिखाई हे नहीं दिया. ललिता आंटी जी ने बताया भी था की अर्जुन स्कूल और घर के सिवा बहार सिर्फ संजीव के साथ हे जाता था. कुछ टाइम पहले थोड़ा बहोत दिखने लगा जब सुबह घूमने जाता था और 2-3 बार घर में मिला है. पालक की शादी के समय मैं व्यस्त थी इसलिए ध्यान नहीं दे सकीय. वैसे लग तोह यही रहा है के तू उसको ाचे से जान न चाहती है?", मल्होत्रा जी का घर भी आ चूका था और ये तीनो घर के बहार हे रुकी थी. सुरभि थोड़ा झेंप रही थी भाभी के सवाल पर.

"ऐसा नहीं है भाभी और अगर वो स्कूल जाने वाला लड़का है तोह मुझसे 4-5 साल छोटा हे है. लेकिन पता नहीं था के संजीव भैया के अलावा भी कोई लड़का है इनके यहाँ. दिखने में तोह ाचा है इस बात से जरा भी इंकार नहीं करुँगी.", सुरभि जैसे भाभी के साथ थोड़ा खुले व्यवहार वाली थी और दूसरी लड़की कुछ खामोश तबियत.

"हाँ दिखने में तोह ाचा है हे लेकिन स्वभाव भी बड़ा ाचा है सुरभि उसका. मिलनसार और सबसे िज्जात्त से बात करने वाला लड़का है अर्जुन. हाँ उस हालत में तोह मैंने भी आज हे देखा और उसको देखने के बाद तोह मुझे भी लग रहा है की जैसे सांड के सामने मैं बकरी से ज्यादा नहीं हु. हेहेहे..", प्रिय भाभी ने बात को मजाक का रुख दिया तोह दूसरी लड़की भी इस बार हंसने से न रुकी.

"सच्ची भाभी. मैं तोह यही देख रही थी की वो कितना ऊँचा और तगड़ा है. ये सुरभि पूरी 5 फ़ीट की है और उसके सामने तोह 3 इंच की हील पहन कर भी एक हाथ छोटी हे लगेगी.", पूरी बातचीत में पहली बार हे ये लड़की बोली थी और भूरी कमर तक की छोटी, चेहरे पर बारीक लाल डंडी का ाचा नजर का चस्मा, कानो में छोटी छोटी सोने के बाली और उभरे हुए केसरिया होंठो के साथ साथ सांचे में ढला आकर्षक शरीर. सलवार कमीज के ऊपर हरे रंग का दुपट्टा बड़ी शालीनता से लिए थी. इसके विपरीत सुरभि कुछ औसत से काम कद की लेकिन ख़ास जगह पर अधिक मांसल और चंचल चेहरे वाली युवती.

"कन्नू, तू तोह बोल हे मत कुछ. देखा भाभी आपने ये तोह मेरी तुलना उस लड़के से करने लगी जिसको हम दोनों ने हे बस 20 सेकंड के लिए देखा है. वैसे तोह आजतक इसने सड़क पर आगे पीछे मंडराते किसी एक भी मजनू को आँख उठा कर नहीं देखा लेकिन वह इसकी भी नजर रुकी जहा नहीं रुकनी चाहिए थी.", दूसरी लड़की का नाम था कनुप्रिया, प्यार से कन्नू.

"चलो तुम दोनों लगी रहो अपनी बातों में और मैं चली बाबा. शादी शाम को है लेकिन घर में 2 दिन के कपडे जमा है धोने के लिए. पालक आये तबतक मशीन हे भर लेती हु. हाँ, चाहोगी तोह मैं हे मुलाकात करवा दूंगी तुम्हारी अर्जुन से सुरभि. लेकिन कन्नू ने ठीक कहा है के तुम सचमुच उसके सामने कमाल हे लगोगी.", खिलखिलाती हुई प्रिय भाभी घर में चली गयी और ये दोनों भी फुटपाथ किनारे लगे पेड़ो की छाँव में चर्चा करती आगे बढ़ने लगी.

"चेहरे से हे पता चलता है सुरभि की वो लड़का तुझसे बहोत छोटा है. बाकी ये सब न इन भाभी लोगो की garma-garam बातों का असर है जो तुझे वो एक नजर में पसंद आ गया. सिर्फ अट्रैक्शन है क्योंकि मेल पिसीके से पहली बार सामना हुआ है तेरा.", कन्नू काम बोलने के साथ हे कही ज्यादा परिपक्व और सुलझी सोच वाली थी.

"ऐसा नहीं है यार की मैं उसपे लट्टू हो गयी हु. बस नार्मल लोग देखे है मैंने अपने आसपास. फाइनल ईयर में मेरा बॉयफ्रेंड अनिल भी तोह हैंडसम था. गयम वो भी जाता था और एक बार उसने जब मेरे साथ कोशिश करनी चाही थी तब मैंने देखा था उसके शरीर को. लेकिन वो इस लड़के के आसपास भी नहीं था.", सुरभि ने ये बात बहोत धीमी आवाज में कही थी और इस राज को सुन्न कर उसकी सहेली हैरान हो गयी

"अनिल? वो जो पहले माधुरी के चक्कर लगता था? तेरा बॉयफ्रेंड कब बना वो?"

"अरे बाद में पता चला था ये सब मुझे. उसने तोह मुझे यही बताया था की संजीव भैया ने उसकी ठुकाई इसलिए की थी की उनका पहले से किसी बात पर झगड़ा था. फिर 3-4 बार उसके प्रोपोज़ करने के बाद मैंने हाँ भी कह दी थी लेकिन इस शर्त के साथ की मैं कभी भी सबके सामने उस से बात नहीं करुँगी. 2 महीने तक तोह थोड़ी बहोत luk-chip कर बातचीत मुलाकात होती रही. फिर 2 बार फिल्म देखने भी गए थे और जब उसने कहा की वो अकेले में मुझसे मिलना चाहता है तोह मैंने मन कर दिया.", सुरभि बात करते हुए धीमी चाल से चल रही थी.

"तोह फिर तूने जो थोड़ी देर पहले कहा था की तूने अनिल के साथ वो किया है?"

"ओह मेरी माँ. मैंने कब कहा की किया था? हाँ उसने बाद में मुझे बातों में फंसा लिया था और मौका मिलने पर कोशिश की थी वो सब करने की लेकिन किस्मत ाची थी की मैं बच गयी. और पेपर ख़तम होने के बाद मुझे माधुरी वाले किस्से का सच पता चला तोह मैंने उस से किनारा कर लिया. अपनी क्लासमेट नीरजा मिली थी एक बार और उसने बताया की अनिल रपे केस में 8 साल के लिए जेल चला गया है. चल छोड़ ये सब बातें. कहा की बात पर कहा पहुंच गए.", सुरभि शहतूत के पेड़ की लटकती डाली पकड़ने की कोशिश करने लगी तोह कनुप्रिया ने खुद हे वो दाल उसकी तरफ झुका दी.

"अब तोह मेरे घरवालों ने भी बोल दिया है की शादी होने तक मैं भी जॉब छोड़ दू. फिर अगर ससुराल वाले कहे तोह कर लू नहीं तोह घर सँभालु. कितनी अजीब दुनिया है न सुरभि? पहले तोह maa-baap हे कहते है की बेटी उनका सम्मान और िज्जात्त है और फिर जब वो पढ़ लिख कर कुछ बन्न न चाहे तोह 21 की उम्र में हे घरवाले रिश्ते देखने लग जाते है. B.Ed. करके भी क्या फायदा जब ससुराल में बर्तन हे मांजने है?"

"टेंशन न ले मेरी जान. तेरी जैसी लड़की के लिए खुद ससुरालवाले गर्व करेंगे. तेरी मम्मी बता रही थी की अंकल खुद ऐसा परिवार देख रहे है जो शिक्षा से जुड़ा हो. जिस से तू आगे बढ़ सके. हाँ बात तेरी भी सही है. मेरी माँ तोह अब मुझे top/tshirt तक पहन ने नहीं देती. बोलती है कुछ तोह लिहाज करू.", सुरभि का आशय अपने मोठे उभारो से था और दोनों हे सहेलियां हंस पड़ी.

"चल शाम को मिलते है और आंटी ठीक हे कहती है. इन्हे ज्यादा न दिखाया कर नहीं तोह ..", कनुप्रिया और सुरभि आमने सामने हे रहती थी जो हंसती मुस्कुराती हुई अपने अपने घर प्रवेश कर गयी. लड़कियों का जीवन ऐसा हे होता है. सबसे ज्यादा पाबंदिया झेलने और हमेशा दूसरे घर जाने का तमगा ले कर बड़ी होने वाली इन पृथक जीवियों का असली घर कौनसा है ये अंतकाल तक चलने वाला विवादित मुद्दा है.

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"ऐ तारा. सुन्न जरा.", कौशल्या जी आज पूरे घर में हे सचेत चलित थी. आये गए से मिलना, सबके खाने पीने पर नजर, बच्चों की चलती रस्मो में शामिल होना और बाकि सभी को जरुरी हिदायते देते हुए वो कही भी एक पल रुक न रही थी. भीतर प्रांगण में आये कुछ हे लम्हा गुजरा होगा की शालिनी ने जो सवाल मधु से किया था उस पर कौशल्या जी भी कुछ वक़्त के लिए चिंतित हो गयी.

"मधु, ये शाम को कुछ मसला न हो जाए. यहाँ से कपडे बदल कर शादी में जाएंगे तोह संजीव की घोड़ी वाली रसम और फिर माधुरी के ससुराल वालो का स्वागत मिक्स नहीं हो जायेगा? घोड़ी और band-baaje में वक़्त लगेगा हे लेकिन माधुरी की तरफ स्वागत में भी सबका होना जरुरी है.", शालिनी की बात सुन्न कर हे कौशल्या जी ने तारा को आवाज दी थी.

"जी नानी.", तारा दोनों हाथों में मेहंदी रचाये ढीले से लम्बे टीशर्ट और पाजामे में हे दौड़ती हुई निचे आयी. मधु भी अपनी बेटी को बड़े ध्यान से देख रही थी. आज जाने उसको क्या हुआ था जो हर तरफ नजर अवलोकन या समीक्षा करती दिखी. वैसे तारा थी भी मधु की जवानी वाले समय से 21. हर अंग मांसल, kataav-yukt और अध्भुत्त. ऊपर से उसके चेहरे की चमक और चलने की अदा.

"तेरे नाना देख जरा कहा रह गए.? सतीश के घर होंगे तोह प्रीती को भेज और नहीं तोह ऋतू से कह अगर उसने मेहंदी नहीं लगाईं है तोह. वो देख आएगी शास्त्री भाई साहब के घर.", कौशल्या जी ने तारा के मेहंदी साणे हाथ देखे तोह उन्हें उसको बुलाना हे ठीक न लगा. रामेश्वर जी तोह जबसे शास्त्री जी के साथ निकले थे अभी तक वापिस हे न लौटे थे. इधर संजीव को भी सभी रस्मो से फारिग करके ऊपर अर्जुन वाले कमरे में भेज दिया था, जहा उसके दोस्त महफ़िल लगाए बैठे थे. तारा जैसे आयी थी वैसे हे ऊपर दौड़ गयी. मधु के साथ साथ इस बार शालिनी भी तारा को देख रही थी. ढीले पाजामे से भी उसकी बेहतरीन सुडोल जाँघे और लचीले गोलाकार नितम्बो का निचला कटाव साफ़ दिखाई पड़ा था, बाकी टीशर्ट ने भली भांति छुपा लिया था.

"सोचा है तारा के बारे में मधु? तेरी ससुराल की तरफ लड़की की निर्धारित उम्र तोह नहीं है न शादी के लिए?", शालिनी ने बेहद सरल लहजे में चर्चा की थी. कृष्णा जी इन दोनों के सामने ठन्डे शरबत के गिलास रख कर बाकी मेहमानो की तरफ बढ़ गयी. घर की सभी बहुएं सेवा में हे लगी थी.

"पहले तेरे जीजा ने जरूर देख रखा था लेकिन फिर जब अर्जुन ने कोमल और प्रियंका के ब में दाखिले की बात कही तोह मुझे भी लगा की इतनी जल्दी क्या है तारा की शादी करवाने की. ट्रेनिंग के बाद वो भी आगे पढ़ कर अपना खुद का हे कारोबार करना चाहती है. और वो लड़का भी कही से इसकी टक्कर का न था. तेरी नजर में है क्या कोई?", अब मधु ने सवाल किया तोह राजेश्वरी जी की तरफ देखने के साथ शालिनी ने कहा.

"नहीं नहीं. मैं जानती हु की जैसी तू है, तारा तुझसे एक कदम आगे हे होगी. और खुद अशोक जीजा तेरे सामने झुके रहते है तोह तारा को झेलने वाला लड़का मेरी तरफ तोह मुमकिन हे नहीं. वह औरत देहलीज से बहार बिना इजाजत नहीं निकल सकती. लेकिन मेरा कहने का मतलब कुछ और था. तेरी ससुराल में रूढ़िवादी तोह नहीं है न जो तारा को देख ये न कहने लगे की अब वो ब्याहने की उम्र में आ चुकी है?", शालिनी का सवाल भी गलत न था लेकिन मधु के चेहरे पर हंसी आ गयी थी.

"इसके पापा भी ये सवाल इसके साथ नहीं कर सकते. मैं जरूर सख्त थी पहले इस मामले में लेकिन फिर लगा की ये ज्यादती हे होगी जो तारा की मर्जी बिना मैं उसको किसी अनजाने घर में भेज दू. जवान हो गयी है और दिमाग में बाप की तरह अपना अलग नाम कारोबार बनाने की जिद्द भरी हुई है तोह उसको बेहतर पता होगा ाचे भले का. लेकिन इस बात से तोह मैं भी सहमत हु की ये लड़की जल्दी हे जवान हो गयी है. मैं भी न हुई थी इतनी बेशक इसको पैदा करने से पहले तक.", अब दोनों हे हंसने लगी थी और इनके बीच रोमिला, संजीव की मामी, कुछ और लोग चले आये तोह चर्चा का विषय बदला गया. ऋतू भी नहाने के बाद कपडे बदल कर आ चुकी थी जो अब अपनी दादी से गुफ्तगू में लगी थी.

"फ़ोन किया है मैंने अभी हिमानी को और वो तोह बता रही थी की उसके नाना जी भी घर नहीं है. तोह दादी उनके यहाँ जाने से फायदा? हाँ ऐसा हो सकता है की घोड़ी और मंदिर वाला काम करने गए हो. कल शाम को हे तोह वो बात कर रहे थे की दोनों दूल्हे क्सक्सक्सक्स मंदिर से घोड़ी पर पैलेस आधे घंटे के अंतराल पर निकलेंगे.. राधिका भाभी और माधुरी दीदी की तरफ से बरात का स्वागत भी 30 मिनट आगे पीछे रहेगा बस. पहले दीदी वाला कार्यक्रम है फिर उनके बाद हे संजीव भैया का.", ऋतू के जवाब ने तोह कौशल्या जी के साथ बाकि सभी का ध्यान अपनी तरफ खिंच लिया था.

"तेरे दादा सब मसले अपने आप हे तिकड़म लगा के हल करने लगते है?"

"नहीं मेरी प्यारी दादी. उन्होंने तोह आपको बुलाने के लिए भी कहा था पर आप हे बिजी थी और उसके बाद संगीत में जाते हुए शायद आप लोग बात नहीं कर सके. उन्होंने पापा को जरूर ये बताया था की घर के सभी मेमेबर्स को वो 5 बजे तक परम अंकल वाले फार्महाउस पर छोड़ दे. सब लोग उधर हे तैयार होंगे और जो बरात में शामिल होगा वो संजीव भैया के साथ रहे और जो स्वागत करने में रहना चाहे उनके लिए मैरिज पैलेस पर हे 10-12 कमरे है. आप टेंशन मैट हे लो. दादा जी सभी काम पहले हे कर चुके है और दोनों तरफ के लोगो को भी इसके बारे में बताया जा चूका है. तभी तोह गौरव जीजा जी की फॅमिली टाइम से आ गयी.", ऋतू ने तोह कौशल्या जी का सारा बोझ हे ख़तम कर दिया था ये सब बता कर.

"और तुझे इसके बारे में कैसे पता?"

"वो.. आप बिजी थी जब मैंने दादा जी को बताया तोह उन्होंने कहा की मैं हे वह बैठ जॉन उनके पास. बाद में आपको बता दू.. लेकिन मैं भी भूल गयी..", अब ऋतू खुद हे अपनी बात में फंस चुकी थी और कौशल्या जी की दांत से बचने के लिए वो बहार की तरफ दौड़ चली.

"शैतान कही की. ठहर तू.. एक तोह ये और इसके दादा जी. .. बताओ सबसे जरुरी बात हे कहना भूल गए. ऐ मधु, बोल तेरी भाभियों को और बाकी बचो को. अपने कपडे, गहने सब तैयार रख ले. खाने के बाद जो भी काम बचे है वो निबटा कर इधर से चलने की तैयारी रखना.", कौशल्या जी अब खुद भी अपने कमरे की और चल दी. वह सभी के मिलने और शगुन की तयारी भी उन्हें देखनी थी.

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"अर्जुन तुम भी कहोगे ये कैसी पहली मुलाकात रही? अपनी तरफ का सब काम छोड़ कर तुमने पहले हमारे बारे में सोचा और सबकुछ इतने ाचे ढंग से मैनेज कर दिया की धन्यवाद लफ्ज़ काम नहीं करेगा. काम से काम हमारे साथ थोड़ा नाश्ता हे कर लो भाई. तुम और तुम्हारा दोस्त तोह इस भागदौड़ में लगे रहे और हमारी बातचीत भी नहीं हुई.", 32-33 वर्षीया ये हलकी दाढ़ी वाला शक्श एक उचित शरीर के साथ प्रभावी शक्शियत का धनि था. माधुरी का होनेवाला जेहत और अपनी तरफ के हलके में वर्तमान राजनीति का एक सक्रिय चेहरा अभिषेक शर्मा. अर्जुन ने जिस तरह से उन्हें होटल लिवा कर सबकी जरुरत और सहूलियत अनुसार कमरे उपलब्ध करवाए थे, उस से अभिषेक और उनकी पत्नी शिल्पा जी खुदको एहसानमंद मान रहे थे. हर व्यक्ति का सामान होटल प्रबंधन के साथ साथ खुद अर्जुन और संदीप ने अंदर रखवाया था. लगभग 40-45 मिनट में सभी अतिथि और नए रिश्तेदारों को araam-kshetra पहुंचने के बाद अब अर्जुन इनसे मिल कर जाने हे लगा था.

"हाँ अर्जुन तुमने सचमुच हमे महसूस तक नहीं होने दिया के इतने लोगो के लिए हमे कुछ करना भी पड़ा. काम से काम साथ में जूस तोह ले हे सकते हो? संदीप, तुम्ही कहो जरा अपने दोस्त से. क्या पता मान जाये तुम्हारी बात.", शिल्पा जी ने बात कहने के साथ हे होटल की पेंट्री में फ़ोन मिला कर 4 जूस का आर्डर दे दिया. इन दंपत्ति का एक 3 साल का सुपुत्र भी था जो इस भागदौड़ के बाद अब बड़े आराम से उस नरम बिस्टेर पर सो चूका था.

"पहचान तोह अब जीवनभर हे बढ़ने वाली है बड़े जीजा जी. और रही बात जूस की तोह हम इसके लिए मन नहीं करेंगे. वैसे मैंने मैनेजर अंकल को बोल दिया है जीजा जी वाली कार सजाने के लिए और 6 बजे डेकोरेशन वाले आ जायेंगे. अभी धुप है तोह फूल झुलस कर जल्दी खराब हो सकते है.", कमरे में राखी 2 सफ़ेद कुर्सियों पर अर्जुन संदीप बैठ चुके थे. संदीप इस दौरान खामोश हे रहा क्योंकि अर्जुन ने उसको ऐसा कहा था जब उसने संदीप को एक महिला मेहमान के ख़ास हिस्से को घूरते पाया था. जवान लड़को में अक्सर ये सब होता रहता है तोह अर्जुन और संदीप इस मामले में राजदार रह कर बस जाना हे चाहते थे. अब रुकना पड़ा और शिल्पा जी ने भी फ़ोन करने के बाद बैग से कपडे निकल कर बाथरूम में प्रवेश किया.

"बड़े जीजा!!.. ये तोह ाचा नाम दिया है भाई तुमने. शिल्पा का भी कोई भाई नहीं और हमे भी एक मजबूत साले की कड़ी आवश्यकता थी. हाहाहा.. तोह बस एक तुम्ही हो जिस से हम कभी नहीं मिले थे लेकिन पंडित जी ने हमको गॉड में खिलाया है तोह तुम्हारा परिवार एक तरह से हमारा संरक्षक है पिछले 20 सालो से. Maa-pita जी के जाने के बाद से हे सबकुछ तुम्हारे दादा जी ने हे देखा. आज ख़ुशी है की उन्होंने सामाजिक रूप से हमे परिवार में शामिल कर लिया. वैसे तुम तोह कभी भी आ सकते थे उधर लेकिन शायद तुम्हे ये शहर हे रास आता है.", अभिषेक जी की बात सुन्न कर अर्जुन कुछ झेंप सा गया. लेकिन उसके बोलने से पहले संदीप हे बोल उठा.

"ऐसा नहीं जीजा जी. ये बचपन में शरारती बहोत था इसलिए बोर्डिंग भेज दिया था इसको. एक साल पहले वापिस आया है तोह अपने हे शहर को समझने में रहा. अभी तक ये यहाँ से हे पूरा परिचित नहीं है तोह आपकी तरफ कैसे aata?",Sandeep के जवाब ने अर्जुन को हंसा दिया लेकिन अभिषेक सोच में पड़ गया.

"शंकर जी अनुशाशन और शिक्षा को सबसे ऊपर हे मानते है. और ऐसा हो भी क्यों नहीं जब खुद पंडित जी हे इसके सबसे बड़े पक्षधर है. जानते हो संदीप, गौरव को भी बोर्डिंग में भिजवा दिया था उन्होंने और पूरे 6 साल. फिर 12 पार करते हे कॉलेज हॉस्टल में. मुझे आजादी मिली लेकिन वो भी उनकी निगरानी में. मेरे पिता जी सरपंच थे और कारोबारी भी. मैं भी वही बना लेकिन पंडित जी की वजह से शायद मैं अपने पूरे ज़िले का अध्यक्ष बनु और वो करू जो सब चाहते है. आज गौरव एक गहरी सोच वाला जीवनशास्त्री है. सरकारी नौकरी है और सबसे बड़ी बात है की वो उस समय की कदर करता है जब घर से दूर रख कर उसको पढ़ाया और काबिल इंसान बनाया गया. मेरी नज़र में बोर्डिंग कोई जेल नहीं है अगर आपका परिवार उसकी हिमायत करता है. बाकी आज तुम्हारा दोस्त बेहतर बता सकता है अपने उस वनवास के बारे में.", अभिषेक जी ने बात को हँसते हुए ख़तम किया तोह अर्जुन भी सहमति में मुस्कुरा दिया.

"कही ये तुम्हारे साथ भी अपनी प्रदेश राजनीति तोह नहीं ले कर बैठ गए? आखिर वही इनका पहला प्यार और परिवार जो है. लो शायद जूस भी आ गया.", शिल्पा जी ने दरवाजे पर हुई दस्तक से अवगत करवाया तोह अर्जुन उनकी और देखे बिना दरवाजे की तरफ लपका. एक बैरा बड़ी एहतियात से ट्रे में 4 गिलास ठन्डे जूस के लिए अंदर आया और सभी गिलास टेबल पर रख के वापिस चला गया. जैसे उसको पहले से हे निर्देश थे की ये सामान्य मेहमान नहीं है. अब अर्जुन ने घूम कर संदीप को देखा तोह वो नजरे चुराता हुआ शिल्पा जी को देखने के बाद जूस की और नजरे किये था. चेहरा धोने के बाद ढीला बादामी सलवार कमीज पहने शिल्पा जी एक कामुक लेकिन पारम्परिक स्त्री के अवतार में थी. अर्जुन ने भी ज्यादा बात किये बिना एक गिलास उनकी तरफ और दूसरा अभिषेक जी को पकड़ाया.

"बड़े जीजा जी तोह बस बोर्डिंग की हे चर्चा कर रहे थे दीदी. अब हमारी उम्र और विचार राजनीति लायक नहीं है इसलिए वो बातें ये हमारे साथ तोह नहीं करेंगे.", अर्जुन ने बैठने से पहले संदीप को भी जूस पकड़ाया लेकिन उसकी बात सुन्न कर शिल्पा जी जरूर मुस्कुरा उठी. अभिषेक जी झेंप रहे थे.

"ऐसा है के तुम सचमुच थोड़े विशेष माहौल में रहे हो. राजनीति की उम्र नहीं होती और इसका कोई दायरा नहीं होता. ये जब पहली बार मोर्चे में शामिल हुए थे तोह 16 बरस के थे. 25 की उम्र में पांच और 28 में सरपंच लेकिन इस दौरान इन्होने ग्राम समिति के साथ साथ शहर में भी दखल जारी राखी. क्सक्सक्सक्स पार्टी ने इन्हे वार्ड जीतने पर हे बता दिया था के ये आने वाले इलेक्शन में उनकी और से खड़े होंगे. खैर तुम जब घर आओगे तोह हम आराम से बातें करेंगे. आओगे न?", शिल्पा जी ने जैसे सवाल किया था अर्जुन ने तुरंत गर्दन हाँ में हिला दी. जैसे उन्होंने कोई आदेश दिया हो और उसकी अवहेलना करने की गुस्ताखी करके अर्जुन बचना चाहता हो.

"हाहाहा.. अरे अर्जुन भाई. तुम्हारी ये दीदी हिटलर नहीं है जो तुम ऐसा चेहरा बना कर हाँ भर रहे हो. Pag-fere पर तोह आना रसम है लेकिन जब कभी समय मिले तोह अपने इस परिवार से मिलने भी आना. हाँ थोड़ा पहले बता देना जिस से मैं घर पे हे मिलु और गौरव सिर्फ सप्ताहांत हे होता है.", अभिषेक जी ने खली गिलास वापिस रखने की चेष्टा की तोह खुद अर्जुन ने हे आगे बढ़ कर वो लेते हुए टेबल पर रख दिया.

"जी मैं जरूर आऊंगा. वैसे मैं 24 या 25 तारीख को हे गाँव जाने वाला हु, लगभग एक महीने के लिए. छुट्टियां चल रही है और यही समय है जब मैं घूम सकता हु. आपका शहर वह से दूर भी होगा तोह भी एक दिन के लिए तोह आ हे सकता हु.", अर्जुन ने मुँह रुमाल से साफ़ करने के बाद अपनी बात कही. शिल्पा जी ने आगे बढ़ कर बिस्टेर पर बैठे हुए हे गिलास टेबल की तरफ बढ़ाया तोह इस झुकी अवस्था में उनके पुष्ट उभार और उनकी आधी से ज्यादा लम्बी गहरी खाई इन दोनों युवको को भरपूर नजर आयी. बादामी कपडे के भीतर चिली हुए सफ़ेद बादाम सा उनका जिस्म हाहाकारी था और ढीले कमीज का इतना कसाव बखूबी बता रहा था की शिल्पा इस मामले में अपनी होने वाली देवरानी से ज्यादा काम नहीं है. अभिषेक जी इनके समीप थे जिस से उन्हें पता न चला की उनकी पीठ पीछे नजारा कितना कामुक हुआ था और न हे शिल्पा जी को ज्ञात था की उनकी इस हरकत ने इन दोनों पर क्या बिजली गिराई है. संदीप के कान गरम होने लगे थे लेकिन मजबूरी थी की अकेला बहार भी नहीं निकल सकता था.

"भाई एक तोह वो गाँव नहीं है, क़स्बा है वो भी 12 हजार की आबादी का. हाँ उसके बिलकुल हे साथ 6 गाँव लगते है जहाँ तुम्हारी और थोड़ी बहोत हमारी भी जमीन है. क्सक्सक्सक्स कसबे से हमारा घर है 18 किलोमीटर. मोटरसाइकिल विनोद की वह खली हे कड़ी रहती है नहीं तोह तुम गौरव की ले लेना जबतक उधर हो. हफ्ते के 5 दिन तुम्हारे और 2 दिन हमारे. ये अभी से बोल देता हु समझ लो दहेज़ मांग लिया है.", अभिषेक जी की बात कर उनकी पत्नी भी समर्थन किया.

"जी अभी से तोह मैं कोई वादा नहीं कर सकता लेकिन आपने कहा है तोह मैं लाजमी आऊंगा और मोटरसाइकिल वाली कोई बात नहीं है. मैं उधर मोटरसाइकिल से हे आने वाला हु. फ़िलहाल आप इजाजत दीजिये. आपसे बात करके बिलकुल नहीं लगा की हम पहली बार मिले है.", अर्जुन ने झुक कर पाँव छुए तोह न चाहते हुए भी अभिषेक जी ने आशीर्वाद दिया. शिल्पा जी ने तोह हंसी ख़ुशी उसको आशीर्वाद दिया जैसे उन्हें ाचा लगा हो पहली बार अपने पाँव छुआ कर.

"देखो भाई, ये पाँव मैट छूना आइंदा. बड़े जीजा हमको कबूल है लेकिन हाथ मिलाने से गुरेज करते हो तोह गले मिल लिया करो. चलो अब घडी देखना बंद करो और शाम को मिलते है. तुमसे सेवा भी करवानी है.", अर्जुन गर्वित महसूस कर रहा था इस शख्स से मिल कर जिसमे रत्ती भर भी न हम था और न हे कोई दिखावा. पैसा, प्रतिष्ठा और पड़ होने के बावजूद अभिषेक जी एक जमीन से जुड़े नेक और हंसमुख इंसान थे. उतनी हे सुशिल और बहुमुखी शिल्पा जी भी थी जिस वजह से अर्जुन ने उन्हें पहले हे दीदी सम्बोधन से नवाज दिया था. अपनी बहिन को जिस घर भेजना हो वह पहले हे बड़ी बहिन मिल जाए तोह आधी मुश्किलें वही हल हो जाती है.

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"सुभाष जी, ये पूरा एरिया सिर्फ आपके और परिवार के लिए हे है. दोनों तरफ 8-8 बड़े कमरे है और ऊपर इस तरफ से सीढ़ियों के बाद 7-7 कमरे. तुलिप होटल के सभी 50 कमरे आपके मेहमानो के लिए पहले हे बुक करवा दिए थे. और कोई आज्ञा हो तोह बेहिचक कहियेगा.", सभी लोगो का स्वागत करने के साथ हे शंकर जी ने 15-16 लोगो को यहाँ सुभाष दत्त जी की सेवा में लगवा दिया था. सफ़ेद संगमरमर का चमकता फर्श और बेहतरीन बड़े बड़े कमरे वाला फार्महाउस का ये हिस्सा कही से भी किसी 5 सितारा से काम न था. फार्महाउस भी अपने आप में विशिष्ट था जो तक़रीबन 20 एकड़ में घने वृक्षों से सुसज्जित होने के साथ हे आज ऐसे सजाया गया था की देखने वाला खुदको किसी और देश में महसूस करता. अभी भी तैयारियां जारी थी और खुले हिस्सों में कैटरिंग वाले अनगिनत लोग काम पर लगे थे. दर्जनों वृक्षों पर हजारो की संख्या में बल्ब ऐसे लगाए गए थे जैसे आम या सेब के फल लाडे हो.

"शंकर भाई अब बातों से भिगो कर जलील करोगे? हाहाहा.. मजाक कर रहा हु लेकिन मान न पड़ेगा की ये जगह किसी भी तरह से मेहरोली या महिपालपुर वाले बड़े बड़े फार्महाउस से काम नहीं है. शायद कई मशहूर नामो से बड़ी प्रॉपर्टी हे है. मुझे तोह एक पल लगा था की पार्किंग की सुविधा अलग से होगी लेकिन अंदर आने के बाद पता चला के यहाँ तोह पूरे शहर की गाड़ियां कड़ी हो जाए. कमरे भी बेहद शानदार है. देविका, आप है मर उमेद सिंह और मर नरिंदर शर्मा. शंकर भाई के भाई है दोनों और ये मेरी श्रीमती जी है देविका दत्त. इन्हे आप पर सबसे ज्यादा यकीन रहता है शंकर भाई.", दत्त साहब खुश थे इतनी आवभगत और उत्कृष्ट जगह के चुनाव के साथ साथ तैयारियों से. देविका जी भी एकसार रंग की समंदर के रंग की साड़ी और हमेशा की तरह पतली सुनहरी घडी पहने ाभ बिखेरती नजर आयी. सभी को नमस्कार करते हुए उन्होंने शंकर जी से दोनों हाथ पकड़ कर पूरा मान देते हुए मुलाकात की.

"अब इन पर तोह संदेह नहीं कर सकते न सुभाष? सचमुच आपने हमारा सारा बोझ अपने सर ले कर बहोत बड़ा एहसान किया है शंकर भाई. लड़की हम ब्याह रहे है लेकिन बोझ आपसे उठवाया. इस बारे में हमको डिसकस जरूर करना है. सुभाष आप याद रखियेगा.", देविका जी ने साफ़ न कहते हुए ये तोह बता हे दिया था की उन्हें हिसाब जरूर करना है शंकर जी से.

"भाभी जी आप न ये सब बातें इस साल तोह करना हे मैट. और रही बात इंतजाम की तोह वो मैंने किया है इस शंकर को बिनावजह हे हवा में चढ़ा रहे हो आप.", आदतन नरिंदर जी ने थोड़ा अलग दिशा में जा रहे माहौल में हास्यरस दाल कर देविका को भी हंसने पे मजबूर कर दिया था.

"ठीक है ठीक है नरिंदर भाई. वैसे नरिंदर को शार्ट कर सकते है लिखे नरेन्?", देविका नया नाम देने लगी थी और बाकी सभी मुस्कुरा रहे थे.

"आपको तोह बताना हे पड़ेगा देविका जी. इन्दर, धीरे, जीत, इंदरजीत और जाने क्या क्या नाम है मेरे. आप अब नरेन् कहना चाहो तोह ये भी सही. वैसे सोमनाथ जी नहीं नजर आये.", अभी नरिंदर जी ने सवाल किया थी की उन्हें एक ठेकेदार बुलाने आ गया. दलीप और भुप्पी बड़े हॉल में काम देख रहे थे और बहार की जिम्मेवारी नरिंदर जी की थी.

"भाई साहब आये तोह साथ हे थे लेकिन वो जरा पार्टी ऑफिस चले गए मिलने के लिए. अब वो और उनकी राजनीति के बीच हम तोह दखल हे नहीं देते. भाभी जी और beta-bahu इधर हे है Nikki-Radhika के साथ. आपको आपत्ति तोह नहीं होगी अगर 20-30 लोग अनुमान से ज्यादा हो जाए?", सुभाष जी बात करते हुए ये भी देख रहे थे की इस जगह की देख रेख कितनी उत्तम है. उनकी बीवी तोह चलती हुई आगे हे जा चुकी थी.

"आप 500 लोग भी ज्यादा बुलवा ले तोह हमे कोई आपत्ति नहीं है सुभाष जी. चाचा जी (पंडित जी) ने पहले हे इंतजाम इस अनुरूप हे रखने की हिदायत थी की सोच से 20% अधिक हे हो. आप निश्चिन्त रहे और मैं आपके मेहमानो को होटल पहुंचने का इंतजाम करता हु. ज्यादा दूर नहीं है लेकिन साथ जाने से उन्हें किसी तरह की मुश्किल नहीं होगी.", उमेद जी ने इस कार्य की तरफ ध्यान रखा हुआ था जिसका अनुमान शंकर जी को पहले हे था.

"हाँ ये लोग भी chai-nashta कर चुके है. आप किसी को भी भेज दीजिये मेरे भतीजे के साथ. बाकी सभी मेहमान और रिश्तेदार फिर वही संभल लेगा. इतने लोगो को एकसाथ भेजना और कहना अपने आप में बड़ी मुश्किल है.", इस बातचीत के दौरान ये लोग चलते हुए बगीचे जैसी जगह चले आये और सामने से अर्जुन इनकी हे तरफ आ रहा था. दूसरी मंजिल पर गोल्डस्पॉट पीती राधिका और निक्की की नजर इन 2 युवको पर पड़ी तोह राधिका इधर से पीछे सरक गयी. इनके साथ उर्वशी की बिटिया पीहू और 3-4 सहेलियां भी थी. राधिका को इस तरह पीछे होते देख कर निक्की थोड़ा हैरान हुई लेकिन उसने अर्जुन को जरूर हाथ हिला दिया था. जिसकी नजर से राधिका बच चुकी थी.

"ये संजीव का भाई और उसका दोस्त होगा?", राधिका के ऐसा कहते हे 3-4 लड़कियां नीचे झाँकने लगी थी और उधर Arjun-Sandeep को साथ लिए उमेद जी और सुभाष जी विपरीत दिशा में चल दिए जहा से उन्हें मेहमानो को होटल लेके जाना था. लड़कियों को बस उनकी पीठ हे दिख रही थी और संदीप भी kad-kathi में 6 फ़ीट का था जिसने यहाँ आने के लिए अपने बेहतरीन वस्त्र पहने हुए थे.

"हाँ लेकिन तू पीछे क्यों हो गयी रिट्स? अपने देवर से हे aankh-micholi में लगी है?", राधिका ने आँखें झपका कर हामी भरी.

"संजीव ने मुलाकात नहीं करवाई थी न अपने भाई से और न हे उसके बारे में बताया तोह फिर अब उसके हे तरीके से चलते है. वैसे मैं उस लड़के को जानती हु जो संजीव के भाई के साथ आया है.", राधिका यहाँ गलत समझ रही थी और निकिता ने भी कोशिश नहीं की ज्यादा जानकारी लेने की.

"तू कैसे जानती है?"

"वो बाद में बताउंगी लेकिन ाची बात है न के ये लड़का भी होने वाले परिवार का जानकार हे निकला. ोये, तुम सब अब हटोगी भी उधर से. पीहू चलो तुम भी अंदर कमरे में चलो. इनके साथ रह कर लड़के ताड़ना तुम्हारे लिए ठीक नहीं.", राधिका की आवाज पर सभी लड़कियां हंसती हुई एक हे कमरे में चली गयी और राधिका भी उनके पीछे जाने लगी.

"निक्की, तू क्या सोच रही है?"

"सोच रही हु तुझे तोह परदे में रहना है फिलहाल लेकिन मैं तोह मिलने जा हे सकती हु."

"हे राम. सुधर जा थोड़ा सा तोह. चल अभी अंदर चल और शाम को ाचे से मिल लियो अपने सो कॉल्ड क्लोज फ्रेंड से.", राधिका हाथ खिंच कर उसको ऐसे ले जा रही थी जैसे निक्की भाग हे जाती अर्जुन से मिलने के लिए. उधर अर्जुन भी अबतक उमेद चाचा के समझाए हिसाब से बस 2 हे लोगो को ले कर होटल की तरफ चला गया था. होटल पूरा हे दत्त परिवार के लिए आरक्षित था तोह उन्हें कोई मुश्किल नहीं होने वाली थी.

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"क्या सोच रही है जसलीन? मैं एक बात पर गौर कर रही हु की हम जबसे इधर आये है तू खुश तोह रहती है लेकिन कही न कही थोड़ा खोयी हुई लगती है. तुझे यहाँ कोई परेशानी तोह नहीं है न?", पिछले घर में भी लड़कियां अपने अपने कपडे पैक कर रही थी क्योंकि उन्हें अब शादी वाली जगह हे तैयार होना था. इस कमरे में फिलहाल कीर्ति, गुरदीप और जसलीन हे थी, जहा बात कीर्ति ने हे शुरू की. अपनी सहेली के सवाल का क्या जवाब दे ये जसलीन को सूझ हे नहीं रहा था.

"मैं बताती हु अगर किसी को बुरा न लगे तोह?", गुरदीप की आवाज सुन्न कर दोनों लड़कियां उसको हे देखने लगी. सफ़ेद चुस्त पाजामे और गहरी टीशर्ट में वो हमेशा की तरह खुश और चंचल हे नजर आ रही थी.

"ाचा जी. सरदारनी इतनी शातिर कबसे हो गयी की वो लोगो के चेहरे पढ़ने लगी हैं? बता जरा ये जसलीन क्यों कभी कभी खोयी खोयी दिखती है?", गुरदीप ने जवाब देने से पहले एक बार जसलीन की तरफ देखा और फिर हँसते हुए बोली.

"इसको बेबे (माँ) की याद आती होगी न कीर्ति. पहले तोह कभी भी ये उनसे अलग नहीं रही है, काम से काम रात में या एक दिन से ज्यादा तोह नहीं."

"Dur-fitte मुँह. सचमुच तू झल्ली हे है मोटो. मेरी पैकिंग तोह हो गयी, मैं जरा पिंकी को देख के आयी.", कीर्ति सर पे हाथ रखती हुई गुरदीप की बात पर हंसने लगी थी. फिर जल्दी आने का बोल कर बहार चली गयी. अब वह बस गुरदीप और जसलीन हे थी, एक दूसरे को देखती हुई.

"माहौल को तुम ाचे से समझ रही हो और मैं इसकी तारीफ हे करुँगी जसलीन. अब प्यार पे कण्ट्रोल थोड़ी न है किसी का. हो जाता है लेकिन इसमें ये ठहराव आता है न ऐसे माहौल की वजह से जहा तुम अपने प्यार से मिल न सको या उसकी चाहत करो, इस से ये बढ़ता हे है. काम नहीं होता. जितने यहाँ हो तोह परिवार में मशगूल रहो और जब वो टाइम आएगा तब तुम्हे कही ज्यादा ख़ुशी होगी.", गुरदीप ने बिना किसी का नाम लिए हे जसलीन को बता दिया था के वो भी सब समझती है चाहे सभी उसको kam-akal मानते हो. जसलीन के चेहरे पर मुस्कान और आँखों के कोरो में पानी था.

"हाँ तुम सही कह रही हो गुरदीप. मैं न थोड़ा लालच कर रही थी लेकिन मुझे समझ आ चूका है की ये वक़्त ठीक नहीं. वैसे सुबह तुम हे थी न वो बहार वाले कमरे के पीछे?"

"मैं जानबूझ कर वह नहीं थी यार. नींद जल्दी खुल गयी थी इसलिए 2 कुर्सियां लगा कर उधर हे पसर गयी. ठंडी हवा और सुबह का वो खामोश माहौल. फिर जब umaah-umaah की वो मजेदार आवाजे सुनी तोह गर्दन उचका के देखा की तुम अर्जुन की गॉड में चढ़ी हुई लगी हुई थी. पता नहीं तुझमे इतनी हिम्मत कहा से आ गयी क्योंकि ऊपर छत से अगर उसके भैया देख लेते तोह क़यामत हे हो जाती.", गुरदीप ने आवाज की नक़ल करते हुए जैसे बताया तोह जसलीन शर्म से दोहरी हो गयी लेकिन फिर भी काबू करके वो सफाई देने लगी.

"मैं भी वैसा नहीं करना चाहती थी यार. कीर्ति ने पानी का गिलास हाथी पर रखा था रात में और वो सुबह मेरे ऊपर लुढ़क गया. टोलिया उस तरफ सुखाया था तोह वही ले कर बाल सूखा रही की सीढ़ियों से उतर कर अर्जुन सामने आ रुका. न उसने कुछ बोलै और न मुझे कुछ समझ आया. बस फिर हो गया लेकिन उसने किश करके तोह मूड ज्यादा हे खराब कर दिया. वैसे छत या कमरे से उस तरफ कोई नहीं देख सकता. और अगर कोई आता भी तोह अँधेरे में एक जान तोह उस कमरे में चला जाता. फंसने का डर नहीं था लेकिन फिर भी फंस तोह गए हे जो तूने देख लिया.", जसलीन बहोत हे सावधानी से बात कह रही थी. आवाज बिलकुल धीरे रखते हुए.

"आये हाय.. तुझे मालूम भी है तेरी क्या हालत करेगा वो जो अगर तू किश से आगे बढ़ी तोह?", अब बारी जसलीन की थी हैरान होने की लेकिन गुरदीप जैसे अपनी गलती सँभालने का सोच चुकी थी.

"ोये तुझे कैसे पता की वो मेरी हालत खराब कर देगा? कही तू.."

"ओह मेरी माँ तू न या तोह जीरो पे रहती है सीधा 100 पे. अब हम लोग इतने दिन से है तोह कभी कभी गलती से नजर इधर उधर जा भी सकती है? मैंने उसको दूसरे घर में गलती से देख लिया था. निक्कर उतार कर कपडे बदल रहा था तोह नजर वह चली गयी. शरीर के साथ साथ वो अजगर भी इतना बड़ा है की तू क्या मेरी भी चाल बिगाड़ दे. बाकी तेरी मर्जी है फिर ये मत कहना मैंने बताया नहीं था.", गुरदीप बुरा सा मुँह बनती हुई जैसे कह रही थी जसलीन उसकी मासूमियत देख धोखा खा गयी.

"सच में तू भोली बेगम हे है डिप्पी. वैसे तोह वो भी part हे है बॉडी का लेकिन उसका कुछ अलग है तब भी फरक नहीं पड़ता. और न उसने कभी किश से आगे कदम बढ़ाया है और न मैंने. बाकी देखो क्या होता आगे किस्मत में. चल अब हम भी निकलते है अगले घर. तुझसे बात करके सचमुच अब ाचा लग रहा है."

"मैं तोह हु हे ाची बस तुझे वो सूखी तिल्लियां ज्यादा पसंद है अपने कॉलेज की. चल चलते है फिर घोड़ी के सामने नाचते हुए वीडियो भी बनवानी है. बहोत प्लानिंग कर राखी है उधर सभी ने. तू नहीं थी इसलिए मैं तुझे अभी बताते हुए चलूंगी. संजीव भैया ने तोह ये भी कहा है के जो सबसे ज्यादा देर तक डांस करेगा घोड़ी के सामने वो उसको 2100 देंगे अपनी तरफ से.", गुरदीप हमेशा से ऐसे हे तोह बोलती थी लेकिन वो कितनी समझदार है इसका भान ज्यादा लोगो का नहीं था. एक बड़े कार्यक्रम की तरफ सभी कदम बढ़ने लगे थे, तैयारी के साथ साथ.
 
ाचा एक वैसे हे सवाल है. जिसको पता हो या दिल करे बता देना..

ऐसा कौनसा धनुष था जो किसी देवता के पास न रहा लेकिन वो इतना श्रेष्ठ था की दुबारा प्रयोग भी न हुआ. ?

एक और धनुष था जो बनाया किसी देवता के लिए था, फिर थोड़ा उपयोग भी हुआ एक विद्वान दवाई लेकिन उसको भी उसी व्यक्ति ने धारण किया जिसने पहले वॉश को अपनाया.

जवाब कल के अपडेट से पहले देने वाले व्यक्ति को ऋतू की ओरिजिनल पेंटिंग का प्रिंट गिफ्ट करूँगा.
 
मैंने ये भी कहा है के वो धनुष किसी देवता या सम्मुख ने नहीं धारण किया था.

ाचा एक हिंट है अगर कोई ग्यानी ध्यानी हो तोह. जिसने भी उस वॉश पर प्रतंच्या चढ़ाई थी वो व्यक्ति वही था जिसने सुदर्शन के 108 नास्त्रो को 108 मनको में बदल दिया.

इसका जवाब कोई सिद्ध दे सके तोह भले हे दे दे बाकी गूगल बाबा के बस की बात नहीं.
 
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