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Vivah-purva
"सोच ले गुड्डी एक बार फिर से सोच ले. मैं जानती हु तू कभी भी कुछ गलत नहीं कर सकती. भूरे भाई साहब और तू हमेशा हे बाकी परिवार से अलग एक साफ़ ज़िन्दगी में यकीन रखते रहे. लेकिन तुझसे बेहतर कौन समझ सकता है की उस संत इंसान के जीवन का अंतत कैसा हुआ था? अर्जुन बेशक अलग है और उसकी सोच भी jag-bhalaai वाली है लेकिन यहाँ जो हमारे साथ और आसपास हमेशा रहते है वो तुझे जीने नहीं देंगे.", फ़िलहाल हवेली से सुशीला हे अलग निकली थी और उसने अपने साथ देवरानी गुड्डी उर्फ़ मल्टी को लिया था जिसकी बड़ी इत्छा थी ब्याह में शामिल होने से पहले अपने बेटे सुदर्शन से मिलने की. पिछले दिन वो लोग ठीक से मुलाकात न कर सके थे सुदर्शन की जांच होने की वजह से. गुड्डी ने एकांत देख अपना दिल हल्का करने के उद्देश्य से सुशीला से हे वो बात करनी उचित समझी जो प्रमुख वजह थी उसके शादी में शामिल होने की.
"फिर आप क्यों अपनी ज़िन्दगी की परवाह किये बिना उसको अभिमन्यु से अर्जुन बना रही हो? जीजी आप भी ये बात बखूबी समझती हो के वर्तमान में आपके लिए उस लड़के से बढ़कर कोई भी नहीं है. बस एक वजह बता दो की मैं मेरा maun-vrat क्यों न खोलू? 73 से 98 तक 25 साल बनते है और उतने बरस में मुझे एक बार भी वो इंसान न दिखा जो अपना न सोच के सबकी खुशियों को पहले रखता हो. बताओ न जीजी के आप अर्जुन को इतना कैसे मान ने लगी हो की अब न बबिता आपके लिए सर्वोपरि रही और न बिजेन्दर?", हॉस्पिटल के इस कमरे में फ़िलहाल यही दोनों थी और सुदर्शन रूटीन चेकउप के लिए ऊपरी ताल पर था. सुशीला खुद हे जहां सोच में पद गयी मल्टी का सवाल सुन्न कर. उसका एक एक शब्द वाजिब सच था जिस से सुशीला इंकार न कर सकती थी.
"मैं पहले हे बता चुकी हु गुड्डी. अर्जुन ने ये ज़िन्दगी दी है मुझे जबकि नसीब में नरक से बुरी मौत होती. मेरे बचे तक मैंने प्रतिशोध में जलने चाहे लेकिन उन्हें न सिर्फ अर्जुन वापिस लाया बल्कि वो दोनों अब मुझे उतना प्यार करते है जितना जनम के बाद भी न किया होगा. सबसे जरुरी बात की उसने वापिस बिखरे टूटे रिश्ते जोड़ कर मुझे उस परिवार से जोड़ दिया जो मुझे अपनी बड़ी बेटी का दर्जा दिल से देता है. उसने एक मैली आत्मा को साफ़ कर दिया गुड्डी, इंसान तोह मैले जिस्म को भी ठीक करने में असमर्थ है. कितना बड़ा दिल होगा न इस लड़के का जो मुन्नी का अतीत, उसकी गन्दी नेसल और भयानक इरादों को जानते हुए भी उसको मिटने की जगह आबाद करना चाहता है? भूरेलाल हमेशा कहता था के भाभी अज्जू परिवर्तन लाने वाला एक महान इंसान है और देखना एक दिन वो सभी के हिरदय निष्पक्ष (न्यूट्रल) कर देगा. न कोई ईर्ष्या रखेगा न कोई विवाद. अज्जू बिलकुल वैसा हे था लेकिन वो अभिमन्यु निकला गुड्डी, वो अभिमन्यु निकला. 7 घेरे तोह बाहरी थे जिन्हे वो टॉड गया लेकिन वो बहार क्यों न निकल सका?", सुशीला अपनी रौ में बहती हुई दोहरे समयकाल में खो चुकी थी. मल्टी भी ये सब जानती थी और आँखें उसकी भी नम्म हो गयी.
"क्योंकि.. क्योंकि वो अपनों के हाथ मारा गया न जीजी? वही तोह हथियार गिरा दिए उस dev-aatma ने क्योंकि उसको ये पता हे न था के सबसे कठिन युद्ध अक्सर अपनों के हे साथ होता है और आप बेशक सम्मान या प्रेमवश हथियार दाल दो लेकिन जिसने वो घेरे बनाये थे सबसे आखिर में वही सामने मिलेगा. और बस वो परिवर्तन लाने वाला दुनिया से परे हो गया. आप इस अर्जुन को वही घेरा तोडना सीखा रही है?", गुड्डी की बात सुन्न कर सुशीला के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान तैर गयी.
"ये रघुवीर चाचा की औलाद नहीं है गुड्डी और न इसके पूरे विचार रामेश्वर काका जैसे है. इसने तोह शुरुवात हे आखरी घेरे से की है और जीत भी चूका है. समस्या ये है की आज का अर्जुन कुछ ज्यादा हे तेजी से अतीत खोज रहा है. बहोत से तार अदृश्य है जो उसको नजर नहीं आने वाले और मैं jaane-anjaane उसको वो हे दिखाना चाहती हु. कही वो बीच में ek-aadh कड़ी छोड़ गया तोह परिणाम गलत भी हो सकता है. और मुझे पता है की इस तरह उसका साथ देने से मेरी जान भी जा सकती है, कोशिश हो चुकी है बीच में और आगे भी होगी. इसलिए मैं तुझे इस से दूर रखना चाहती हु.", सुशीला ने उठ कर शीशे की खिड़की से बहार का नजारा करते पाया की धुप अभी भी तेज है. सड़क पर ज्यादा chehal-pehal नहीं थी. वो मदद कर वापिस देखने लगी तोह गुड्डी की नजरे खुद पर हे पायी.
"आप पश्चाताप कर रही हो जीजी लेकिन मैं इसको अज्जू नहीं बनते देख सकती. आप तोह अपने पीहर चली गयी थी इसलिए बहोत कुछ आपको भी नहीं मालूम. बस आप किसी तरह मुझे उसके साथ आध घंटा उपलब्ध करवा देना मुन्नी और माँ जी से इतर. फिर मुझे किसी और मुलाकात की जरुरत नहीं.", गुड्डी ने अपनी बात एक सांस में हे पूरी कर दी. सुशीला हैरान थी की गुड्डी उस से भी ज्यादा कुछ जानती है.
"शादी में हे क्यों और ऐसा क्या है की जो मुझे भी नहीं पता.?"
"जीजी, भीड़ का चेहरा तोह नहीं होता लेकिन उस से अलग हो कर देखा जाए तोह भीड़ में बहोत से चेहरे मिल जरूर सकते है. मुझे उम्मीद है की आप इतना समय दिलवा देंगी.", अभी वो आगे कुछ बोलती उस से पहले एक नर्स व्हीलचेयर पर सुदर्शन को लिए अंदर चली आयी और उन दोनों के पीछे हे सफ़ेद कोट पहने वो भला सा डॉक्टर.
"सॉरी आप लोगो को इन्तजार करवाने के लिए. लेकिन ये सब हमारा रोज का हे रूटीन हे जिसको आप मिशन कहे तोह बेहतर होगा. सुदर्शन बहोत ाचे से प्रोग्रेस कर रहा है और इसके लिम्बस भी जुड़ने लगे है. 4 ऑपरेशन और होने बाकी है अगले 40 दिन में और उसके बाद फिजियो की देख रेख सही रही तोह ये 3 महीने बाद ये खुद हे चलने लगेगा. अब आप आराम से इसके साथ बातचीत कर सकती है. सुदर्शन, कल 9 बजे तुम्हे सिस्टर लेने आएँगी. गुडबाय.", डॉक्टर ने हे नर्स के साथ मिल कर छोटी को उस मशीन बिस्टेर पर सही से लिटाया और Guddi-Sushila को उसकी हालत से अवगत करने के बाद वापिस चला गया. मूंदे हुए सर पर अब बाल आ चुके थे. जगह जगह सिर्फ गहरे निशाँ थे लेकिन जख्म अधिकतर भरे हुए या फिर ऑपेरशन वाली जगह पट्टी से बंधी.
"ऐसे क्या देख रही है माँ? किसी को उम्मीद न थी की मैं 3-4 दिन भी निकाल सकूंगा. फिर उमेद चाचा आये और उसके बाद शंकर चाचा. तेरे सामने हे है अब सबकुछ. डॉक्टर बोल रहा के मैं अगर यही चला तोह 2 महीने बाद खड़ा हो सकूंगा. सुशीला ताई, बिजेन्दर नियम से मिलने आता है और मैं एक हे हाथ से सीप में उसके बाजी भी लगा देता हु.", सुदर्शन खुद हे परिवर्तित हो चूका था इस माहौल में. अब वो जानवर की जगह एक ऐसा इंसान बन्न रहा था जिसमे भावनाये थी और सामाजिक जीवन के लिए आस्था. गुड्डी बस अपने बेटे को देख कर भगवन को दुआ हे देती रही वही सुशीला मुस्कुराते हुए बोली.
"तू थोड़े से बाल बढ़ा ले तोह तेरे बाप जिसे लगेगा. वैसे और कौन कौन आया करे है तुझसे मिलने?"
"ताई पूछ हे न. पहली बार होया है के दिन में 10 लोग मिलान आया करे है. कुछ पहचान के और बाकी नए दोस्त. हाँ जो हर रोज बिन नागे आये है आजतक उनमे शंकर चाचा और पंडित दादा जी शामिल है. अर्जुन 2 दिन से न आया लेकिन वो विकास और उनका एक गिट्टू दोस्त बलबीर भी आते रेहवे है. शंकर चाचा तोह दरजी भी लेके आये थे 3 दिन पहला और शाम ने मैं ब्याह मैं भी जाऊंगा.", सुदर्शन की ये सभी आपबीती सुन्न कर गुड्डी अपने आंसू न रोक सकीय. ये ख़ुशी के थे और अपने बेटे का सुधार प्रमुख वजह.
"लेकिन तेरी दादी तोह कहे करती की तू एक दिन शंकर से भी आगे जाएगा. तेरे विचार बहोत बदल गए सुदर्शन. दादी शायद खुश न हो ये देख के.", सुशीला ने मजे लेते हुए कहा था जिसपर बदले में सुदर्शन भी हंस दिया.
"ताई तेरे लाडले ने चाँद देख्या था आरर मैंने दिन में सितारे देख लिए. दिखाएं वाला दोनुआ ने एक हे था और दादी ने बता दिए के शंकर चाचा ेब हिस्ट्री हो गया इन मामला में. पद्धति रही शंकर शंकर और भरी पड़ गया अर्जुन. हाहाहा.. सच कहु तोह घाना हे सरीफ छोरा है, सरपंची वाला हिसाब न है उसका के जान लेके हे माने. माँ, तू तोह मिली होगी अपने भतीजे से?", छोटी का आशय था अर्जुन द्वारा बिजेन्दर और खुद उसको धुल चाटने से. साथ हे उसने बता दिया था के जिस चेहरे को चंद्रो देवी उदहारण मानती थी उसका बीटा एक कदम आगे हे निकला.
"जिस दिन तेरी गलती पता लगी थी उसी दिन मुझे एहसास हुआ था के वो लड़का तुझे मारना चाहता हे नहीं था. खुद हे सोच बीटा की इतिहास में जो भी हुआ था क्या उनका वंश तुझे ज़िंदा छोड़ देता अपने घर की िज्जात्त पर हाथ डालने के दुस्साहस पर? नहीं न? तेरे चाचा उसी दिन माफ़ी मांगने आये थे तेरी दादी और मुझसे. आधी रात को सीधा हवेली पर. अर्जुन को सब बाद में पता लगा और उसने मुझे गले लगा कर कहा था के तू उसका बड़ा भाई है और जो हुआ वो सिर्फ इसलिए क्योंकि वो कभी उस लड़की को दर्द में नहीं देख सकता जिसके साथ तू गलत करने लगा था. इतना बड़ा दिल तोह तेरे पिता का भी न था सुदर्शन?", अपनी माँ की बातों को सुन्न कर एकाएक सुदर्शन का दिल आत्मग्लानि से भर उठा. उसको वो वक़्त फिर से याद आ गया जब वो कैसे उन मासूम सी खूबसूरत लड़कियों को अपनी ताक़त और दबदबे के दम पर अनगिनत लोगो के बीच एकतरफा शिकार की तरह दबोचने लगा था. वह हर इंसान उसके खौफ से वाकिफ था. प्रशाशन तक कभी उसको रोक न सका था और न हे जवाब माँगा था उस से. लेकिन एक लड़के ने उसकी वो बरसो की कमाई हुकूमत ऐसे धवस्त करके रख दी थी जिसका परिणाम साक्षात् उसका अभी तक अपने पाँव पर खड़ा न हो पाना था.
"गलती तोह भारी हुई है मुझसे माँ और इसका पश्चाताप मैं रोज करता रहा जबतक वो लड़की खुद हे मुझसे मिलने ना आयी. बड़ी हे प्यारी बची है वो माँ और जब उसने मुझे भाई कह कर बुलाया तोह मैं फुट फुट कर रोया. सिर्फ अर्जुन हे वैसा नहीं है, वो लड़की भी बिलकुल उसके जैसी है. प्रीती नाम है उसका और मासूम होने के साथ उतनी हे निडर भी. उस दिन दोनों हे मेरे पास पूरा घंटा बैठ के गए. बेचारी मेरी हालत देख बार बार सॉरी बोल रही थी और उस से ज्यादा दुखी मैं हो गया. फेर तोह शंकर चाचा ने मेरे लिए अँगरेज़ डॉक्टर भी लगा दिए और बाकी तेरे सामने हे है माँ. एक बार तोह उम्मीद हे हार गया था लेकिन अब हौंसला है के खड़ा भी होऊंगा और जैसा तू पापा के बारे में कहे करती वैसा हे करने की मेरी कोशिश रहेगी.", सुदर्शन ने खुद हे अपनी कलाई पर ग्लूकोस की बोतल वाली नलकी लगाईं और इन दोनों की तरफ जैसे तैसे करवट करके लेट गया. गुड्डी को आज पहली बार अपनी इस संतान पर प्यार और गर्व हुआ था.
"तोह फेर तेरा भूत उतर गया सरपंची झोटा बन्न ने का?", सुशीला ने अपना स्टूल करीब करके सुदर्शन के माथे को साफ़ किया और सर थपकने लगी.
"हाहाहा.. के बाते करे है ताई? इंसान बन्न के जीना हे बहोत मुश्किल है फेर झोटा तोह बहोत दूर की बात. दादी बहोत खुश हुई थी जड़ मैंने पहली बार मेशी (झोटा) अपने खेत में धा दिया था. उस दिन दादी कहे थी की मैं शंकर बन्न सकू हु. बहोत धुरंदर रगड़े मैंने अगले 8-10 साल लेकिन इस चाचा के लाडले ने जिस तरिया मैंने ाले (गीले) लट्टे (कपडे) की तरिया धोया तोह साड़ी अकड़ बिखर के बिस्टेर पे आ गिरी. ताई अर्जुन की ताक़त तोह मैं बयान कर सकू हु थोड़ी बहोत लेकिन दादी ने मेरे से न्यू कहा था के मैं शंकर बन्न सकू हु. मतलब उस वक़्त भी व मेरे से प्रभावित कोणी होई थी. चाचा तगड़ा तोह है लेकिन जेंटलमैन आदमी लगे है. 50 थे वो और दादा होर 14-15 जड़ उनकी भिड़ंत होई थी. फेर दादी न्यू किस तरिया बोली?", सुदर्शन भी जाने कहा से बात कहा ले गया था. गुड्डी इस विषय पर बोलना नहीं चाहती थी लेकिन सुशीला ने आश्वस्त करके खुद हे बताना शुरू किया.
"15 की उम्र में शंकर और उमेद शर्त शर्त में पूरा खेत जोट दिया करते, घडी देख के. तेरी दादी की नजर में हमेशा ताक़तवर की ख़ास इजत्त रही है बीटा और तू अपने दादा की बात करे है न की वो लोग इतने थे आरर शंकर होर 50.. सरासर झूठ है. इतने होते तोह पुलिस 3-4 तोह गिरफ्तार करती लेकिन असलियत में वो थे हे 3-4 और मेरे पिता जी के साथ साथ तेरे दादा लोग 20 वो भी हथियार सुदा. ललकार के मारे थे वो सारे इन्हने और यु पता है तेरी दादी ने भी. मेरे पति और तेरे दोनों चाचा तोह सड़क पे अकेले हे शंकर ने कुचल दिए थे लेकिन तेरे पिता का शरीर साफ़ था. झोटा गिरा के तू खुद की ताक़त समझे था तोह खुद हे सोच शंकर तोह तेरे जिसे पहलवान ने टांग टेल धार के चीयर दे पालक झपकते हे.", सुशीला के दुःख गहरे थे लेकिन अब वो उस रास्ते पर चल रही थी जहा पश्चाताप और सकरात्मक दृष्टिकोण हे वाजिब था.
"हाँ ताई या बात मैंने कड़े भी न सोची की आपकी पीहर में भी कोई न बचा, अपनी तरफ तोह समझ लो पहले की दोनों पीढ़ी हे ख़तम हो गयी. नुक्सान उमेद चाचा के परिवार ने भी तय लेकिन शंकर चाचा की तरफ तोह कुछ न होया. सच में वो मिसाल है तभी दादी उनका आज तक सेज से ज्यादा करे है.", सुदर्शन जैसे ये baal-sulabh बात करके खुद हे सोचने लगा लेकिन सुशीला फीकी मुस्कान के साथ गुड्डी को देखने लगी जो जानती थी की पंडित जी के परिवार ने तोह जो खोया है वो सब उम्मीद से भी परे है सुदर्शन की.
"बीटा, युद्ध में जीतने वाला भी बहोत कुछ हारता है. पंडित जी ने रिश्ते खोये, शंकर ने प्यार, कौशल्या जी ने तोह पूछ हे मत और तू पीढ़ी की बात करे था? इन्दर भाईसाहब की तोह नेसल हे ख़तम हो गयी आने वाली. हो तोह शंकर जी की भी जाती लेकिन बचाव हो गया. इन्होने तोह कुछ भी शुरू न किया था फेर दुःख भी इन्हे मिले. भूल जा ये सब बीटा और इनका जीकर कभी न करियो किसी के साथ. तू अपने पापा की तरह बन्न न चाहे है न तोह उनकी एक छोटी सी नसीहत याद रखियो. लकड़ी की कारोबार दीमक की दूकान में न होता. शुद्धचार कभी भी बदले से ग्रसित दिमाग में नहीं उपजते. अब तू आराम कर बीटा और जो दिल से महसूस किया न तूने अर्जुन के लिए, शंकर चाचा और अपने भाई Bijender-Vikas के लिए... बस वो बरकरार रख बीटा. जीजी, 4 बज गए. अब तक माँ जी भी मुन्नी के साथ वह पहुंच चुकी होंगी.", सुदर्शन को भी अपनी ताई द्वारा सर सहलाना भला लग रहा था. अपनी माँ की बात सुन कर वो हे बोल उठा.
"ताई ने 5 मिनट थपकी दे लेने दे माँ. मैंने नींद आवे है फेर आप चले जइयो."
"हाँ ठीक है बीटा तेरे शरीर ने आराम की बहोत जरुरत है. डॉक्टर कहे था के इंजेक्शन देने पड़ते थे पहले सुलाने के लिए. सो जा बीटा मैं तेरे हे पास हु. ब्याह में आवेगा तोह अपने हाथ से खिलाऊंगी मेरे बेटे ने.", सुशीला ने गुड्डी को बैठे रहने को कहा और कुछ गुनगुनाती हुई उस विशाल पर्वत से इंसान को सुलाने लगी. सुदर्शन अपने अबतक के जीवनकाल में बस प्यार और अपनेपन से पूरी तरह दूर रहा था. माँ तोह हमेशा चाहती थी की औलाद उसके पास रहे बस राह भटकने वाले भी अपने हे थे.
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"क्या सोच रही है तारा? कुछ परेशानी है तोह बता ऐसे सोचने से तोह कुछ होने वाला नहीं?", इधर घर में भी दोपहर का खाना हो चूका था और सभी आये हुए मेहमान या तोह अपने ठिकाने जा कर तैयारी में लगे थे या फिर आराम करने में. पंडित जी के niwas-sthaan पर तक़रीबन घर के हे लोग थे सिवाए कुछ ख़ास मेहमानो के. तारा फ़िलहाल पिछले हिस्से की ऊपरी मंज़िल पे अपने पुराने कमरे में हे थी और उसको ऐसे अकेले बिस्टेर पर लेते छत को घूरते देख कमरे में आयी अलका ने तन्द्रा भांग की. निचली मंज़िल पर सभी लोग अपनी अपनी पैकिंग में लगे थे और इस तरफ कोई न था.
"ऐसा तोह कुछ भी नहीं है यार अलका. बस सोच रही थी की अब इसके बाद क्या होगा? मैं इधर आने से पहले कैसी थी और अब बिलकुल अलग हु. आज शादी है और हमेशा हमारे साथ रेहनी वाली माधुरी दीदी अब हमे छोड़ कर नए घर चली जायेगी. हर सुबह उन्हें बहोत मिस करुँगी यार और एक नया मेंबर भी शामिल हो जाएगा तोह क्या बहोत कुछ बदल जाएगा?", तारा की बात में नए सदस्य वाला जीकर देख अलका उसकी बगल में बैठती हुई मुस्कुराने लगी.
"तुझे लगता है राधिका भाभी के आने के बाद बहोत कुछ बदल जाएगा? तुझे शायद इस बात की भी चिंता है की अर्जुन के साथ milna-bolna भी प्रभावित होगा. हैं न?", तारा अनमने ढंग से बस मुस्कुरा दी.
"देख यार अभी तोह ये घर भरा हुआ है इसलिए सोच भी उतनी हे उलझी हुई दिख रही है. भैया अब ज्यादातर रातें घर में रहा करेंगे लेकिन उनका अकेलापन उनके साथ न होगा. तू भी तोह चली जायेगी अगस्त महीने में, फिर तू इतना क्यों प्रभावित हो रही है? अर्जुन यही होगा और वो सबके साथ एक सामान हे रहने वाला है. ये कोई इंसानी या वैचारिक बदलाव थोड़ी न हो रहा है घर में. बस भाभी आ रही है और दीदी जा रही है.", अलका समझदार थी लेकिन तारा उसकी बात से कुछ असहमत.
"वो भी तोह जा रहा है शादी के 2 दिन बाद. पूरे एक महीने के लिए और अकेला हे. तू मेरी हालत नहीं समझ रही अलका. देख प्रीती तोह हमेशा हे यही होने वाली है, तेरा तोह लक्ष्य हे बिलकुल अलग है और ऋतू का स्पष्ट है की वो ज़िंदगीभर अर्जुन की रहेगी. क्या मैं फिर से ये दिन देख सकुंगी जिसमे मुझे वो प्यार मिलेगा जो पहले नहीं था लेकिन यहाँ नसीब हुआ?", तारा ने अपना दर्द तोह जाहिर कर दिया लेकिन वो सिर्फ उसका पक्ष हे था.
"तू क्या सोच रही है तारा? अर्जुन ने तुझे कभी मुझसे या ऋतू से अलग समझा? और तू कह रही है की ऋतू उसकी रहेगी लेकिन जानती है की अगर वैसा हुआ तोह ऋतू और अर्जुन के पास कुछ भी नहीं बचने वाला. ये परिवार और इसका हर इंसान न चाहते हुए भी अलग हो जाएगा ऋतू से. इतनी भारी कीमत तू चूका सकती है तोह बोल? बस एक बार गहराई से सोच कर देख की जब तेरे पास ये परिवार न हो, बुआ का परिवार तुझे बहिष्कृत कर दे और तेरे साथ साथ अर्जुन को भी शहर और ये सब लोग छोड़ने पड़ जाये तोह ऐसे रिश्ते का क्या मोल? ऋतू बस चाहत रखती है अर्जुन के साथ का. मिलना न मिलना किसी के भी हाथ में नहीं लेकिन इतना जरूर है की कीमत बहोत भरी चुकानी पड़ेगी अगर वैसा हुआ तोह. मैं नहीं दे सकती वो कीमत और न मैं मेरे पिता, दादा या किसी भी रिश्ते से अलग हो सकती हु. तूने हे कहा था के शादी होने तक तू अर्जुन के साथ बिना शर्त बस प्यार का रिश्ता रखेगी तोह आज क्यों तू अपनी हे बात से बेचैन है?", अलका के कठोर शब्दों ने तारा को तार तार करके रख दिया था. आँखों के किनारो से आंसू बिस्टेर पर गिरने लगे थे और होंठ ऐसे फड़फड़ा रहे थे जैसे अंदर से कुछ कहना चाहती हो लेकिन आवाज साथ न हो. फिर कुछ पल बाद हिम्मत समेत कर वो बोलने लगी.
"मैं स्वार्थी महसूस कर रही हु अलका. मेरा बड़ा दिल कर रहा है की अर्जुन मुझे अपने सीने से लगा ले और कह दे की वो हमेशा मेरा ख़याल रखेगा. आज दीदी शादी करके जा रही है इस घर से और मैं यही महसूस कर रही हु की ऐसा मेरे साथ भी होगा. मुझमे हिम्मत नहीं है अलका की कोई और इंसान मेरी आत्मा को महसूस करे. मेरे जिस्म पर मैं वो स्पर्श अर्जुन के सिवा किसी और का नहीं झेल सकती. मैं क्या करू अलका? मैं मानती हु ऐसा मुमकिन नहीं होगा और ऋतू का दर्द तोह कही ज्यादा है. वो उसके लिए हे ज़िंदा है फिर भी कभी न मुझे उसने टोका न किसी और को. मैं शादी नहीं करुँगी कभी.."
"शह्ह्ह्ह.. तेरे पास अभी 3-4 साल तोह वैसे भी पढ़ाई के लिए है और फिर बिज़नेस के लिए भी तोह दादा जी ने बुआ को मन लिया. वर्तमान में जीना सीख तारा और अपने भविष्य पर वह काम कर जिस से तू खुदको साबित कर सके. अर्जुन से तेरी शादी नहीं हो सकती लेकिन तेरी शादी किस से होगी या तुझे करनी है भी या नहीं ये तेरे हाथ में होगा जब तू खुदको स्थापित कर चुकी होगी. फिलहाल तू ज्यादा सोच मत और उठ कर त्यार हो जा. बुआ ने कहा है की तेरे दादा जी भी आ चुके है और तुझे उनके साथ हे पैलेस जाना है. Kal-parso तक जब वापिस सब पहले जैसा हो जाएगा तोह हम आपस में वैसे हे बात करेंगे जैसे पहले करते आये है. ऋतू खुद तुझे सलाह देगी और वो कभी गलत नहीं होती.", अलका ने अभी उसका चेहरा साफ़ किया हे था की तारा उसके सीने से लग गयी. कुछ पल दोनों हे ख़ामोशी से ऐसे रही लेकिन फिर रुपाली की आवाज ने उन्हें अलग कर दिया.
"ओह तारा तू अभी तक निक्कर में हे है? ये अलका तुझे बुलाने आयी थी लेकिन इसका भी कुछ नहीं हो सकता. वो तेरे चाचा जी बुला रहे है तुझे. चल जल्दी आ निचे और ऐसे मत आना, बुआ ने कहा है.", अब अलका भी हंस दी थी क्योंकि उस छोटी सी निक्कर में तारा की जाँघे हे ढकी थी बस और उसके कूल्हे तोह पूरे उभरे हुए स्पष्ट थे. तारा ने वैसे हे लापरवाही से तकिये के निचे से ब्रा निकाल कर रुपाली के सामने हे अपने सुडोल मॉटे उभारो पर पहनी तोह रुपाली झट्ट से भाग गयी. अब अलका भी खिलखिला कर हंस रही थी.
"सुधर जा ओह मिस बूबीए.. सुधर जा थोड़ा. बुआ भी जानती है के तू ऊपर और निचे पिंजरे नहीं पहनती जब कमरे में होती है तोह. थोड़ा ख्याल रखियो और चोली में भी ब्रा याद से पेहनियो लहंगे के साथ."
"पंतय नहीं पहन ने वाली और अगर मौका मिला न तोह किसी कोने में उठा लुंगी अर्जुन के लिए. चल अब तू जा के अपनी तैयारी कर. एक तोह पहले से इतनी गर्मी है ऊपर से चोली में भी ब्रा पह्नु." तारा बिलकुल सहज थी अलका के साथ बातचीत और उसके बाद इस मस्ती भरे माहौल से. अलका ने भी जाने से पहले पलटी हुई तारा के गद्दार मॉटे चुत्तड़ो पर एक करारा थप्पड़ जमाया और फुर्ती से भाग गयी.
'आउच.. साली तू लग हाथ मेरे एक बार.. Uff..kamini लाल हे कर दिए aahhh.",Tara ने तुरंत निक्कर सरका कर वो मटकी सा गोल कुल्हा आईने में निहारा तोह वह उँगलियों के निशाँ प्रकट होने लगे थे. हलके से मुलायम मांस को सहलाती हुई वो मुस्कुरा रही थी जैसे उसको ये भी पसंद हो. अब तारा के chacha-dada इत्यादि आ चुके थे तोह उसको अपने परिवार के साथ होना जरुरी हे था. तारा कुछ हे समय बाद आसमानी कमीज, सफ़ेद सलवार और गले में दुपट्टा पहने निचे आ चुकी थी. बैठक में अपने दादा जी से मिलने के बाद वो अपनी चची और चाचा के बीच हंसी ख़ुशी बतियाती रही और अर्जुन भी घर में दाखिल होने के साथ सभी से मुलाकात करके अपनी दादी के पास चला आया.
"आ बीटा आजा यहाँ. मेरा बीटा आज सुबह से बिना खाये पीये हे लगा हुआ है. रेखा, अर्जुन के लिए यही खाना भिजवा दे.", अर्जुन दादी के कमरे में आते हे चंद्रो देवी से मिला और फिर पूर्णिमा जी की बगल में हे बैठ गया. कौशल्या जी उसके सर पे हाथ फेरती हुई शाबाशी दे रही थी और चंद्रो देवी भी प्रशंशा भाव से उसको देखते हुए कहने लगी.
"कुछ भी कह कौशल्या, तेरी परवरिश की टक्कर नहीं. आजकल के लड़के तोह महफ़िल लगाने में व्यस्त रहते है और ऐसे मौको पर काम से पल्ला झाड़ कर बचते दिखेंगे. अर्जुन तोह वह भी बबिता के ब्याह में लगा रहा था और इधर भी देख रही हु की ये किस हाल में है. बीटा काम के साथ साथ खुराक भी जरुरी है. गर्मी का मौसम है तोह भूख चाहे काम हे क्यों न हो लेकिन खाना जरुरी है.", अर्जुन उनकी बात सुन्न कर बॉस हाँ में सर हिला कर ख़ामोशी से बैठा रहा.
"वैसे बहिन जी ख़याल तोह मैं पूरा रखती हु लेकिन इतना कुछ एकसाथ हो रहा है न तोह जिम्मवारी बढ़ हे जाती है. बस आज की हे बात है फेर तोह मेरा बीटा पहले से भी ज्यादा ध्यान रखेगा अपनी सेहत और खुराक का. वैसे बहुएं और बचे नहीं दिखाई दिए बहिन जी?", कौशलया जी बातचीत बढ़ा रही थी और इधर मुस्कान हे अर्जुन के लिए थाली लगा कर ले आयी. एक सादे सलवार कमीज और गले में दुपट्टे लिया मुस्कान साक्षात् मासूमियत की मूरत प्रतीत हो रही थी. अर्जुन के लिए वही छोटा सा स्टूल लगा कर उसपे थाली रखने के बाद मुस्कान ने एक टोलिया भी पकड़ाया. अर्जुन ने भी शिष्टाचार से धन्यवाद कहने के साथ भोजन शुरू किया तोह चंद्रो देवी भी इन्हे देख रही थी. बबिता भी यही कमरे आ बैठी थी हाथ में कॉफ़ी का कप लिए.
"मुन्नी तोह अभी इस बबिता के हे साथ थी और गुड्डी सुशीला आती हे होंगी सुदर्शन से मिल कर. वैसे तुमने ये ाचा किया कौशल्या की मुस्कान को यही रोक लिया. ाची लड़की है लेकिन मैं इसके साथ समय न बिता सकीय अभी तक. वैसे तू तोह बहोत रहती है न इसके साथ बबिता?", चंद्रो देवी ने बबिता को लगातार अर्जुन की तरफ देखते हुए पुछा था जिस पर बबिता थोड़ा हड़बड़ा गयी लेकिन फिर आदतन खिलखिलाती हुई बोली.
"दादी आपको किसी ने मन किया क्या मुस्कान के साथ रहने से? मैं तोह ये देख रही थी की इस अर्जुन का कोई समय न है खाने सोने का. वैसे मुन्नी काकी अभी माँ और गोलू के परिवार के साथ हे बैठी है. गुड्डी काकी भी उधर हे है. नानी आप कितने दिन तक रोकने वाली हो मुस्कान को यहाँ?", मुस्कान फिर से गरम रोटी लिए अंदर आयी तोह अपना नाम सुन्न कर ठिठक गयी. बबिता मुस्कुरा रही थी और अपने करीब कड़ी मुस्कान को कौशल्या जी ने हाथ पकड़ कर वही बैठा लिया.
"तुझे तकलीफ है क्या बबिता? तू भी रह ले अगर तेरा वह जी नहीं लगता तोह तू भी रह ले मेरे पास. हाँ ये मेरी बिटिया अभी कुछ दिन यही रुकने वाली है और बाद में मैं खुद हे इसको तेरे पास छोड़ने आउंगी. क्यों मुस्कान बीटा तुझे यहाँ मेरे साथ कोई तकलीफ है?", कौशल्या जी के इतने स्नेह को देख खुद चंद्रो देवी प्रशंसा करने लगी थी. मुस्कान भी कौशल्या जी के साथ hil-mil चुकी थी और बाकी घरवाले भी उसको उतना हे अपनापन दे रहे थे जिस से वो कही से भी कोई बाहरी व्यक्ति नहीं थी.
"मुझे तोह आपके पास रहना ाचा लगता है. हाँ बबिता दीदी भी मेरा ख्याल रखती है और उधर मैं ज्यादातर इनके साथ या अक्षरा दीदी के पास हे होती हु. अभी तोह जबतक कॉलेज से लेटर नहीं आता इतने मैं आपके हे पास हु. बीच में चली जाया करुँगी दीदी के घर bhi.",Muskaan की बात पर बबिता भी खुश थी. वो जानती थी की इस समय तोह खुद वो और अर्जुन हे इस लड़की की दुनिया थे जिसमे कौशल्या जी के आने से एक घनी छाया भी उसके सर आ गयी थी. अर्जुन की प्लेट में आखिरी निवाला देख वो तुरंत उठ कर चली गयी.
"बचे होते है तोह घर घर जैसा लगता है कौशल्या और सचमुच तुझमे गुण है जो ये मेरी बबिता तक तेरे पास दौड़ी चली आती है.", चंद्रो देवी की बात सही थी और इस बात पर पूर्णिमा जी ने भी जैसे अपनी सहेली की खिंचाई की.
"हां बहिन जी ये तोह बात पते की कही. आप उमेद और शालिनी को हे ले लो. यहाँ आने के बाद उन दोनों ने हे मेरी तरफ न देखा बस लगे हुए है अपने अपने में. आइशा जरा न घुलती मिलती किसी से लेकिन वो प्रीती और कोमल के हे पल्लू में बंधी घूम रही. ये सब इस कौशल्या का हे जादू है जो बाँध लेती है आनेवाले को.", कौशल्या जी ने अपनी सहेली की ब्याह पर हलके से ढोल लगते हुए हँसते हुए जवाब दिया.
"कौन बोल रहा है देख लो बहिन जी.? मैं तोह रस्मो तक में न बैठ सकीय और यही देख रही है सबकुछ. आप होती तोह मैं इसको भी कही न कही लगाती लेकिन चलो फिर सही. बबिता, दामाद घर आया हुआ है और तू है की उसको वह छोड़ यहाँ अपने में हे मस्त है."
"नानी, वो दूध पीटा बचा न है और बाकी बहोत लोग है उसके पास. रेखा मामी और कृष्णा मामी लगी हुई मेरी ससुराल की सेवा में और मैं तोह उन्हें पहले हे बोल चुकी के इसके साथ जाउंगी मैं ब्याह में. हाँ अर्जुन तेरी बुकिंग तोह न कर राखी पहले किसी ने?", बबिता के बेबाक जवाब पर अर्जुन तोह बगले झाँकने लगा लेकिन अंदर आती सुशीला ने जरूर बबिता के सर पे चपत जमा दी.
"ओह ब्याह हो गया लेकिन तेरी अकाल न बढ़ी. थोड़ा तोह सोच के बोलै कर और अपने पति के साथ आयी है तोह उसके साथ हे जायेगी. अर्जुन को 100 काम होंगे तोह फेर वो तुझे धोता फिरेगा या काम करेगा?"
"मैंने इसका हाथ पकड़ रखा माँ? तू भी साथ चल पढ़िए जे दिल करे तोह लेकिन मैं न जाती उनके साथ. Chacha-sasur कार में हे बीड़ी फूंके है और मैं पेट से हु. पसंद न मैंने यु सब. बाकी हाँ अर्जुन बिजी है तोह मैं विन्नी, कोमल या किसी के भी साथ चली जाउंगी.", बबिता ने मुँहफट अंदाज में जो बात कही थी वो सुन्न कर कौशल्या जी को भी आपत्ति हुई लेकिन बबिता से नहीं.
"सुशीला ये ठीक बोल रही है. टाइम मिले तोह इसका जीकर अपनी संधान से करियो. चूल्हे की आंच अलग चीज है लेकिन ये beedi-cigrattee वाला हिसाब गलत है जब इसके पाँव भरी चल रहे हो. बीटा, तू अर्जुन के हे साथ जाइयो लेकिन पहले ये बाकी सबको छोड़ दे उधर. संजीव अभी इसके साथ जाएगा और तू थोड़ा आराम कर ले. रात में ज्यादा घूमना फिरना भी नहीं udhar.",Kaushalya जी को तोह अभी से चिंता हो रही थी जिस पर सभी के साथ अर्जुन भी मुस्कुरा रहा था. उसके मुँह से अचानक हे निकल गया.
"अभी तोह दीदी का सेकंड मंथ हे है दादी."
"तुझे ये सब बड़ा पता है रे.", कौशल्या जी हैरत से देख रही थी अपने पौटे को जो अब झेंपता हुआ इधर उधर देख रहा था.
"वो कल सुन लिया था दादी मैंने जब बबिता दीदी उधर ये बात बता रही थी. और रेणुका बुआ को जब डॉक्टर के दिखने गया था तोह उन्होंने भी बुआ को बोलै था के इस बात को दिमाग में मत दाल लेना की हर वक़्त आराम हे करना है. घुमते फिरते रहना है और ाची डाइट लेनी है. इसलिए मैंने ये कह दिया.", अब कौशल्या जी को भी पूरी बात समझ आयी थी. आखिर रेणुका भी पेट से थी और अर्जुन भी डॉक्टर के लेके जाता था अपनी बुआ को उनकी नजर में.
"चल कोई बात नहीं लेकिन ये महिलाओ वाले मसले में न हे बोलै कर. मुस्कान बीटा, तेरी ललिता आंटी को बोल के वो तैयार हो जाये. अर्जुन उसके साथ संजीव और जो जाना चाहे उन्हें वह छोड़ आएगा. अभी से निकलना शुरू करेंगे तोह टाइम रहते तैयारी होगी. 7 बजे घुड़चढ़ी है फेर.", समय 5 होने वाला था और अर्जुन भी उठ गया अपनी जगह से.
"मैं हे जा रहा हु भैया के पास दादी. फिर एक और चक्कर लगाने के बाद मैंने गाडी पे फूल भी लगवाने है. भैया और भाभी को मैं हे लेके आऊंगा यहाँ घर अपनी कार में.", अर्जुन जाने लगा तोह कौशल्या जी ने फिर से रोक लिया.
"पैसे लेता जा."
"वो होटल वाले ने मुझसे लिए हे नहीं क्योंकि छोटे दादू ने उन्हें मन कर दिया था. 50 हजार पड़े है वैसे के वैसे. बाद में हिसाब दे दूंगा. आप लोग उठेंगे तोह बाकी तैयार होंगे नहीं तोह मुझे नहीं लगता अगले एक घंटे तक कोई निकलने वाला है.", अर्जुन ये बात कह कर दौड़ गया जिस पर कौशल्या जी खुद भी कड़ी हो गयी.
"हाँ ये भी सही है. बहिन जी आप मेरे और पूर्णिमा के साथ हे चलिए. राजू ने गाडी बहार हे लगवा राखी है. देवकी.. देवकी तैयार हो गयी क्या?", उनके कहने के साथ हे बगल वाले कमरे से दामिनी, देवकी और अनामिका अपने बेटे के साथ इधर आ गयी. वो लोग तैयार थी और बैग उनके हाथ में थे.
"जी सब तैयारी हो गयी है जीजी. आपके कहने का हे इन्तजार था."
"अनामिका बिटिया बचे के अतिरिक्त कपडे रख ले. तुम लोग शायद सुबह देरी से हे वापिस इधर आओगे. चलो बहिन जी हम चलते है, ये मधु का परिवार भी जा चूका. आपके देवर जाने अकेले बैठे क्या हिसाब किताब करने में लगे है.", बैठक में सचमुच रामेश्वर जी अकेले हे बैठे थे और डायरी में कुछ लिखने में व्यस्त थे.
"रामेश्वर, आज तोह रहने दे ये सब. एक बार घर का चक्कर लगा ले कौशल्या.", चंद्रो देवी ने समझदारी वाली बात कही थी और शादी वाले घर में ढेरो सामान और गहने के साथ साथ रूपया पैसा होना लाजमी था. उनकी बात का अर्थ भी यही था की कुछ खुला न रहा हो.
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"छोटे चल आजा इधर और 2 घडी अपने भाई से भी बतला ले.", अर्जुन यहाँ अपने भैया को बुलाने आया तोह उनके पास बिजेन्दर, विकास, लकी और दीपक भैया को पहले हे मौजूद देख थोड़ा हिचकिचाता सा अंदर दाखिल हुआ. नए बीएड पर दूल्हे की पगड़ी, पारदर्शी सांचे में विवाह का सूट और चांदी जड़ी मोजरी राखी थी. बाकी सभी भी अपने अपने वस्त्र लिए हे आये हुए थे. दोस्तों के वह होने पर भी संजीव के चेहरे पर अलग सी बेचैनी साफ़ देख सकता था अर्जुन. सभी से हाथ मिला कर वो अपने बड़े भाई की बगल में हे आ बैठा.
"मैं तोह आपको हे बुलाने आया था भैया लेकिन लगता है जैसे आप हे कुछ घबराये हुए है. बिजेन्दर भैया आपको तोह एक्सपीरियंस है, थोड़ा भैया को भी हौंसला दो.", अर्जुन ने मजाक में ऐसा कहा था और बिजेन्दर हँसते हुए संजीव को वो इशारा करने लगा जिसका मतलब था 'देख ले ये समझदार है'
"ऐसी बात नहीं है यार. लेकिन पता नहीं यु लग रहा है जैसे किसी मिशन पे जा रहा हु और वह हर तरफ हर नजर मुझे हे घूरती होगी. पब्लिक लाइफ जीरो हे रही है तोह बस थोड़ा अजीब लग रहा है.", संजीव ने अपने दिल की हालत छोटे भाई से बताई तोह लकी ने पीठ थपथपाते हुए जवाब दिया.
"भाई मैं तोह कहता हु अभी से 2 घूँट लगा ले फिर कोई परेशानी नहीं होने वाली. जानता हु की ये बहोत बड़ा सफर होने वाला है तेरे लिए आज लेकिन ये तोह सभी को तये करना पड़ता है. बिजेन्दर भाई ने बताया था न के ये कितना ख़ुशी ख़ुशी तैयार हुआ था लेकिन हवा इसकी भी खराब हुई थी जब घोड़ी पर बैठा. इसके दोस्तों ने बियर पीला कर हौंसला दिया था और उसके बाद सब आराम से हो गया.", लकी की बात से बिजेन्दर सरोकार रख रहा था लेकिन अर्जुन नहीं.
"ऐसा है भैया की छोटा मुँह और बड़ी बात. भैया वह तैयार होने के बाद मंदिर जाएंगे जहा शराब का सेवन करके जाना गलत होगा. ऊपर से इन्हे घोड़ी पर एक छोटे बचे के साथ भी होना है तोह ऐसा करना कटाई ठीक नहीं. गर्मी का समय है बेशक मंदिर से पैलेस 500 मीटर हे होगा पर उतनी दुरी आधे घंटे से काम में तोह पूरी नहीं होने वाली नाचने गाने वालो की वजह से. डिहाइड्रेशन हो जायगी तोह 6-7 घंटे बैठोगे कैसे उधर?", अर्जुन की इतनी दूर की सोच सुन्न कर संजीव जहा तारीफ से देख रहा था वही लकी हैरत से.
"तू अपने भाई को हौंसला दे रहा है या डरा रहा है बे? अबे शादी है इसकी आज लेकिन तू इसको डरा के यही चिपका दे.", लकी के जवाब पर विकास हंसी न रोक सका लेकिन अब अर्जुन ने हे आगे बात बधाई.
"ऐसा है भैया की राधिका भाभी प्यार करती है भैया से और भैया भी. ट्रेनिंग का समय इन्होने इस दिन के सपने देख कर हे तोह बिताया होगा. जब आप इतने बड़े सपने को पूरा करने चले हो तोह फिर किसी और सहारे की जरुरत हे क्यों पड़ेगी? नजरे तोह बेशक सभी की रहेंगी क्योंकि ये मुख्या किरदार जो है आज और उतनी हे नजरे भाभी पर होंगी लेकिन उन्हें तोह बहोत ख़ुशी है और वो तोह वह सब चीज अपने हिसाब से करवा रही है क्योंकि ये इन दोनों का सबसे बड़ा और ख़ास दिन है. ाचा लगेगा जब भैया वह भाभी की बगल में बैठे होंगे उस महकते माहौल में, लेकिन सिर्फ िंखे मुँह से शराब की दुर्गंद आये? भैया आप मिशन पर नहीं जा रहे. इस घर को वो ख़ुशी दिलाने जा रहे हो जिसके लिए सभी ने कितनी म्हणत और सेवा की है. चलो खड़े हो जाओ और ड्यूटी ज्वाइन करो क्योंकि लीडर आप हो.", अर्जुन ने अपने भैया को एक तरफ से अपने साथ लगते हुए बात पूरी कही तोह संजीव भी फकर से उसको जोर से भींचने के बाद उठ खड़ा हुआ.
"तोह फिर हम लोग यहाँ क्या कर रहे है? चलो बिजेन्दर भाई तुम भी गाडी निकालो और लो सबको साथ. दीपक यार तू भी उधर हे आजा अंकल आंटी जी को लेके. लकी और विकास मेरे साथ हे चल रहे है.", संजीव के चेहरे पर आयी ये नहीं ऊष्मा देख लकी भी प्रशंशा से इन दोनों को देखने लगा.
"तू न कुछ बने या न बने लेकिन मोटिवेशनल स्पीकर जरूर बन्न सकता है अर्जुन. और सही बात है की अगर ये मिशन हे है तोह फिर इसको होश में हे पूरा करते है. चलो भाई लोगो उठाओ अपने दूल्हे मियां का taam-jham और चलते है मिशन राधिका भाभी पर.", लकी ने ये इतनी तेज कहा था की बगल वाले कमरों तक उसकी आवाज गूंजी थी. नैरा लगाने में बाकी सभी ने साथ दिया और इस बार निचे तक सबको पता चल चूका था की ये लड़के क्यों शोर मचा रहे है. सारा सामान उठा कर पूरी मंडली बहार वाली तरफ से निचे आयी तोह बहुत से लोग तोह निकल भी चुके थे. अर्जुन की कार में संजीव, लकी, ललिता जी और अलका बैठे तोह उनके पीछे हे शंकर जी अपने साथ रेखा, कोमल, ऋतू, रुपाली को लिए. उमेद जी भी बड़ी गाडी में अपनी माँ, चची, चंद्रो देवी, रेणुका और राजेश्वरी को लिए थे तोह उनके बाद स्वयं राजकुमार जी माधुरी, शालिनी, कृष्णा जी, आरती को. बिजेन्दर ने अपनी माँ, काकी और बीवी के साथ साथ ऋचा को भी लिया था. सफारी को भी पूरी तरह से भर के नरिंदर जी निकले तोह उनके आगे आगे उनके पिता मुस्कान, छोल साहब, विनीता और कृष्णेश्वर जी को. फिलहाल घर में बस बबिता हे बची थी जिसके साथ प्रियंका थी. प्रियंका हर कमरे का निरिक्षण करने के बाद वही बैठक में बबिता के बगल आ बैठी.
"पिंकी तुम यही हो? बाकी सब तोह चले गए फिर तुम अकेली यहाँ?", बबिता आराम से पाँव पसरे चैनल बदल बदल कर देखते हुए पूछने लगी.
"अकेली कहा हु दीदी, आप भी तोह हो मेरे साथ यहाँ. हाहाहा.. वैसे दादी ने कुछ सामान ले कर आने का कहा है कच्चे दूध के साथ. बस वो अंकल आने वाले होंगे थोड़ी देर तक और इतने मैं आपको भी कंपनी दे दूंगी. वैसे तोह बहार सिक्योरिटी के लिए एक आदमी है और अर्जुन भी जल्दी हे आ जायेगा. लेकिन वो थोड़ा रुकेगा इधर कुछ काम से तोह अगर आप चाहो तोह मेरे हे साथ चल पड़ना. प्रीती की फॅमिली अभी इधर हे है और उनके साथ हे चलेंगे.", प्रियंका के पास एक खाड़ी का झोला था जो बता रहा था के इसमें ख़ास सामान है जिस वजह से वो सबसे अलग जाने वाली थी. बबिता ने टेलीविज़न बंद करके सोफे पर हे चौकड़ी जमा ली.
"मेरे सा गर्मी न सेहन होती पिंकी इसलिए मैं न गयी अभी. अर्जुन ने बताया था के मार्किट से 2 लड़के आएंगे ऊपर कमरा सजाने के लिए तोह अगर वो पहले आ जाये तोह उन्हें संजीव का कमरा दिखा दू. वैसे यहाँ घर पे कोई रुकेगा नहीं दुल्हन की कदम रसम के लिए? महारी तरफ तोह दिया भी जला के रखते है और घर खली भी न छोड़ते.", बबिता के ऐसे सवाल पर प्रियंका ने सहमति जताई.
"हाँ दीदी क्यों नहीं लेकिन उसके लिए ताई जी और दादी जी के साथ कुछ और लेडीज भी पहले आ जाएँगी घर पे. माधुरी दीदी भी आएँगी यहाँ विदा लेने के लिए. हाँ तब तक जरूर घर खली रहेगा पर चिंता वाली बात नहीं है. दोनों घरो में पहरेदार है और प्रीती के घर के बहार भी. हाँ आपके जैसे रिवाज तोह मुझे नहीं पता की हमारे होते है.", प्रियंका के स्पष्टीकरण पर बबिता बस मुस्कुरा दी लेकिन अपने जिस्म पर लगातार तिकी उसकी निगाहो को देख बबिता ने आखिर पूछ हे लिया.
"ब्याह में तोह यही होना चाहिए पिंकी. जब सरे हे जा रहे है तोह फेर एक क्यों पीछे रुके? वैसे तू बड़े ध्यान से कुछ देख रही है. अगर कोई सवाल है तोह पूछ ले झिझक न.", अब प्रियंका बगले झाँकने लगी थी जैसे उसकी चोरी पकड़ी गयी हो. चुन्नी को ऊँगली में घूमती वो जवाब देने से बचना चाह रही थी.
"क्या सोच रही है बेबे? तगड़ी हु या कुछ ख़ास है मेरे में जो तू आज हे देख सकीय?", बबिता को इस तरह मुस्कुराते देख और घर के इस एकांत में प्रियंका ने थोड़ी हिम्मत करके पूछ हे लिया.
"वो मैं बस देख रही थी दीदी की आप तोह माधुरी दीदी से भी थोड़ा ज्यादा भरी हुई हो. मतलब आप सुन्दर भी बहोत हो लेकिन इतनी .."
"मैं लम्बी तगड़ी हु और ऊपर से मेरा जिस्म भी भरी है. यही कहना छह रही है न?"
"नहीं नहीं दीदी.. मेरा मतलब आपकी तारीफ हे है पर आपके हस्बैंड भी आपके बराबर खड़े होते है तोह वो थोड़ा सा कमतर हे लगते है. वो भी हेअल्थी है लेकिन 19-20 का फरक तोह है हे. आपको परेशानी नहीं होती?"
"होती है परेशानी तोह. कपडे न मिलते सही से हर जगह और मैं गोलू के पीछे मोटरसाइकिल पे न जा सकती क्योंकि एक क्वांटल वजन है मेरा, ज्यादा फैलाव की वजह से. डबल बीएड पे कल को मेरे पति के पास जगह न बचेगी बचा होये बाद. लेकिन सच कहु तोह मुझे जरा भी दिक्कत नहीं होती मेरी बॉडी सँभालने में."
"हाँ वही तोह मैं कहना छह रही थी की आप फिट भी बहोत हो. मतलब वो लड़कियों वाली बात कहु तोह मुझे खुद परेशानी होती है अपने उप्पेर बॉडी से. लेकिन आप तोह मेरे से भी ज्यादा है उस हिस्से में."
"हाहाहा.. जब भोली है तू पिंकी. सीना तोह भरी हे होता है लेकिन इसके हिसाब से मेहनती भी होना पड़ता है. तेरा 36 होगा मेरा 44 है लेकिन फेर भी वजन महसूस न होता. हाँ तू भी जब घरवाले पसंद करे तोह थोड़ा तगड़ा हे देखियो बहिन. कोई तिल्ली जैसा तोह तुझे भी संभल न सकेगा जिस तरह गोलू जैसा तगड़ा पहलवान भी तू मेरे लिए 19 बता रही जो की सच भी है.", बबिता की बेबाक बातें सुन्न कर प्रियंका सहजता से मुस्कुराई जैसे वो इस चर्चा से अब भाग नहीं रही थी.
"वो तोह घरवाले हे डीडे करेंगे दीदी लेकिन इतना जरूर है के मेरी मर्जी शामिल होगी. वैसे आपकी बात भी सही है के फिट रहना जरुरी है इसलिए मैं घर के काम करने के साथ थोड़ी एक्सरसाइज भी करती रहती hu.Utni तोह नहीं जितनी अलका और ऋतू करती है पर कोमल के साथ थोड़ा बहोत फिट रहने की कोशिश रूटीन से करती हु."
"करती भी रहियो नहीं तोह ये खरबूजे अगर पपीते बने तोह साल बाद हे पति बहार मुँह मारने लगेगा. औरत इतने हे सुखी है जितने वो सही है. बेडोल हुई नहीं के मरद अनदेखी करना शुरू. शायद कोई बहार आया है.", बबिता के कान भी सचेत थे जिसने यही से बहार गेट पर किसी के आने का अनुमान लगा लिया. प्रियंकर तुरतं उठी अपनी दुपट्टा सही करती हुई. बबिता भी उसके साथ बहार आँगन में चली आयी तोह मुनीर वह साधुराम के बेटे से पूछताछ कर रहा था जिसके हाथ में मिटटी का कलश और एक दूध का डोल्लू था.
"अंकल जी इन्हे दादी माँ ने हे ये सामान लाने को कहा था. भैया आप ये मुझे हे दे दो.", प्रियंक आगे बढ़ी तोह देखा की एक गोरी और भरे हुए शरीर की लड़की भी वह थी. ये काजल थी जिसके हाथ में कुछ थैले थे शायद नए कपड़ो के. मिन्दर आगे बढ़ कर वो सामान देने लगा लेकिन काजल की नजरे भी घर में taak-jhaank करती रही. जैसे उसको जो देखना था वो वह कही छिपा न हो.
"काजल, वो डूब भी दे जरा थैले से निकाल कर.", मिन्दर ने काजल से ये कहा तोह वो जैसे होश में आयी लेकिन बबिता की पारखी नजरे उसके चेहरे को पढ़ चुकी थी. काजल ने सकुचाते हुए अख़बार में लिपटी दूर्वा खुद पकड़ाई तोह बबिता ने हे उसके हाथो से ली.
"उनले को धन्यवाद जरूर कहना हमारी तरफ से और तुम्हारा भी शुक्रिया भैया जो ये सब देने खुद आये.", प्रियंका की बात पर मिन्दर ने बस हाथ जोड़ कर सर हिला दिया. और फिर दोनों भाई बहिन मोटरसीले पे सवार हो निकल चले अपने रस्ते.
"बबिता दीदी ये शायद अर्जुन और आपके भैया वाली कार हे इधर आ रही है.", प्रियंका के ऐसा कहने पर बबिता के चेहरा हे उतर गया. दोनों कार ठीक वह आ रुकी तोह बिजेन्दर ने बबिता के सभी इरादों पर पानी फिरते हुए कहा.
"तुम दोनों मेरे साथ हे चलो. बबिता दीदी तुम संजीव से बड़ी हो तोह घोड़ी से पहले तुम्ही उसका तिलक करोगी. तब तक तैयार भी होना पड़ेगा और छोटी दादी ने बोलै है के प्रियंका को भी लेता औ क्योंकि ये पिछली सीट पर नाजुक सामान के साथ अकेली हे बैठेगी. अर्जुन तू करवा ले भाई जो काम करवाना है फेर जल्दी करियो आने की.", बिजेन्दर की बात सुन्न कर प्रियंका फुर्ती से बैठक की तरफ लपकी और बबिता उतरा हुआ मुँह ले कर अगली सीट पर जा बैठी. अर्जुन ने आँखों के इशारे से हे उसको आश्वस्त किया था के वो उसकी नाराजगी दूर करेगा. प्रियंका सामान ले कर आयी तोह उसको खुद अर्जुन ने हे पिछली सीट पर बैठाया. 2 लड़के विभिन्न फूलो से भरा बड़ा सा बोरा लिए मोटरसीले पे यहाँ आ रुके थे.
"पहले तोह आप लोग मेरे साथ ऊपर वाले कमरे में चलो. बस थोड़ा तेजी से काम करना भैया और उसके बाद ये कार सजनी है आगे की लाइट से लेकर डिक्की तक.", अर्जुन के कहने की हे देरी थी की दोनों लड़के उसके साथ हे लपके.
"कार के लिए तोह अभी 2 लोग और आ रहे है. अंकल जी ने पहले हे बता दिया था के सारा काम 20-25 मिनट में पूरा करना है. आप बस कमरा दिखाओ और हम ज्यादा समय नहीं लेंगे.", अर्जुन भी उनकी बात से खुश था और अब उसके पास पर्याप्त समय था नहाने के लिए क्योंकि भैया की घोड़ी का समय 8 बजे का था और गौरव जीजा की 7:30. उसकी ये bhaag-daud अभी तक पूर्ण सफल रही थी बस कुछ समय बाद मुख्या कार्य प्रारम्भ होने वाला था और वह बहोत कुछ ऐसा भी घटने वाला था जिस से अर्जुन पूरी तरह अनभिज्ञ था.
Vivah-purva
"सोच ले गुड्डी एक बार फिर से सोच ले. मैं जानती हु तू कभी भी कुछ गलत नहीं कर सकती. भूरे भाई साहब और तू हमेशा हे बाकी परिवार से अलग एक साफ़ ज़िन्दगी में यकीन रखते रहे. लेकिन तुझसे बेहतर कौन समझ सकता है की उस संत इंसान के जीवन का अंतत कैसा हुआ था? अर्जुन बेशक अलग है और उसकी सोच भी jag-bhalaai वाली है लेकिन यहाँ जो हमारे साथ और आसपास हमेशा रहते है वो तुझे जीने नहीं देंगे.", फ़िलहाल हवेली से सुशीला हे अलग निकली थी और उसने अपने साथ देवरानी गुड्डी उर्फ़ मल्टी को लिया था जिसकी बड़ी इत्छा थी ब्याह में शामिल होने से पहले अपने बेटे सुदर्शन से मिलने की. पिछले दिन वो लोग ठीक से मुलाकात न कर सके थे सुदर्शन की जांच होने की वजह से. गुड्डी ने एकांत देख अपना दिल हल्का करने के उद्देश्य से सुशीला से हे वो बात करनी उचित समझी जो प्रमुख वजह थी उसके शादी में शामिल होने की.
"फिर आप क्यों अपनी ज़िन्दगी की परवाह किये बिना उसको अभिमन्यु से अर्जुन बना रही हो? जीजी आप भी ये बात बखूबी समझती हो के वर्तमान में आपके लिए उस लड़के से बढ़कर कोई भी नहीं है. बस एक वजह बता दो की मैं मेरा maun-vrat क्यों न खोलू? 73 से 98 तक 25 साल बनते है और उतने बरस में मुझे एक बार भी वो इंसान न दिखा जो अपना न सोच के सबकी खुशियों को पहले रखता हो. बताओ न जीजी के आप अर्जुन को इतना कैसे मान ने लगी हो की अब न बबिता आपके लिए सर्वोपरि रही और न बिजेन्दर?", हॉस्पिटल के इस कमरे में फ़िलहाल यही दोनों थी और सुदर्शन रूटीन चेकउप के लिए ऊपरी ताल पर था. सुशीला खुद हे जहां सोच में पद गयी मल्टी का सवाल सुन्न कर. उसका एक एक शब्द वाजिब सच था जिस से सुशीला इंकार न कर सकती थी.
"मैं पहले हे बता चुकी हु गुड्डी. अर्जुन ने ये ज़िन्दगी दी है मुझे जबकि नसीब में नरक से बुरी मौत होती. मेरे बचे तक मैंने प्रतिशोध में जलने चाहे लेकिन उन्हें न सिर्फ अर्जुन वापिस लाया बल्कि वो दोनों अब मुझे उतना प्यार करते है जितना जनम के बाद भी न किया होगा. सबसे जरुरी बात की उसने वापिस बिखरे टूटे रिश्ते जोड़ कर मुझे उस परिवार से जोड़ दिया जो मुझे अपनी बड़ी बेटी का दर्जा दिल से देता है. उसने एक मैली आत्मा को साफ़ कर दिया गुड्डी, इंसान तोह मैले जिस्म को भी ठीक करने में असमर्थ है. कितना बड़ा दिल होगा न इस लड़के का जो मुन्नी का अतीत, उसकी गन्दी नेसल और भयानक इरादों को जानते हुए भी उसको मिटने की जगह आबाद करना चाहता है? भूरेलाल हमेशा कहता था के भाभी अज्जू परिवर्तन लाने वाला एक महान इंसान है और देखना एक दिन वो सभी के हिरदय निष्पक्ष (न्यूट्रल) कर देगा. न कोई ईर्ष्या रखेगा न कोई विवाद. अज्जू बिलकुल वैसा हे था लेकिन वो अभिमन्यु निकला गुड्डी, वो अभिमन्यु निकला. 7 घेरे तोह बाहरी थे जिन्हे वो टॉड गया लेकिन वो बहार क्यों न निकल सका?", सुशीला अपनी रौ में बहती हुई दोहरे समयकाल में खो चुकी थी. मल्टी भी ये सब जानती थी और आँखें उसकी भी नम्म हो गयी.
"क्योंकि.. क्योंकि वो अपनों के हाथ मारा गया न जीजी? वही तोह हथियार गिरा दिए उस dev-aatma ने क्योंकि उसको ये पता हे न था के सबसे कठिन युद्ध अक्सर अपनों के हे साथ होता है और आप बेशक सम्मान या प्रेमवश हथियार दाल दो लेकिन जिसने वो घेरे बनाये थे सबसे आखिर में वही सामने मिलेगा. और बस वो परिवर्तन लाने वाला दुनिया से परे हो गया. आप इस अर्जुन को वही घेरा तोडना सीखा रही है?", गुड्डी की बात सुन्न कर सुशीला के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान तैर गयी.
"ये रघुवीर चाचा की औलाद नहीं है गुड्डी और न इसके पूरे विचार रामेश्वर काका जैसे है. इसने तोह शुरुवात हे आखरी घेरे से की है और जीत भी चूका है. समस्या ये है की आज का अर्जुन कुछ ज्यादा हे तेजी से अतीत खोज रहा है. बहोत से तार अदृश्य है जो उसको नजर नहीं आने वाले और मैं jaane-anjaane उसको वो हे दिखाना चाहती हु. कही वो बीच में ek-aadh कड़ी छोड़ गया तोह परिणाम गलत भी हो सकता है. और मुझे पता है की इस तरह उसका साथ देने से मेरी जान भी जा सकती है, कोशिश हो चुकी है बीच में और आगे भी होगी. इसलिए मैं तुझे इस से दूर रखना चाहती हु.", सुशीला ने उठ कर शीशे की खिड़की से बहार का नजारा करते पाया की धुप अभी भी तेज है. सड़क पर ज्यादा chehal-pehal नहीं थी. वो मदद कर वापिस देखने लगी तोह गुड्डी की नजरे खुद पर हे पायी.
"आप पश्चाताप कर रही हो जीजी लेकिन मैं इसको अज्जू नहीं बनते देख सकती. आप तोह अपने पीहर चली गयी थी इसलिए बहोत कुछ आपको भी नहीं मालूम. बस आप किसी तरह मुझे उसके साथ आध घंटा उपलब्ध करवा देना मुन्नी और माँ जी से इतर. फिर मुझे किसी और मुलाकात की जरुरत नहीं.", गुड्डी ने अपनी बात एक सांस में हे पूरी कर दी. सुशीला हैरान थी की गुड्डी उस से भी ज्यादा कुछ जानती है.
"शादी में हे क्यों और ऐसा क्या है की जो मुझे भी नहीं पता.?"
"जीजी, भीड़ का चेहरा तोह नहीं होता लेकिन उस से अलग हो कर देखा जाए तोह भीड़ में बहोत से चेहरे मिल जरूर सकते है. मुझे उम्मीद है की आप इतना समय दिलवा देंगी.", अभी वो आगे कुछ बोलती उस से पहले एक नर्स व्हीलचेयर पर सुदर्शन को लिए अंदर चली आयी और उन दोनों के पीछे हे सफ़ेद कोट पहने वो भला सा डॉक्टर.
"सॉरी आप लोगो को इन्तजार करवाने के लिए. लेकिन ये सब हमारा रोज का हे रूटीन हे जिसको आप मिशन कहे तोह बेहतर होगा. सुदर्शन बहोत ाचे से प्रोग्रेस कर रहा है और इसके लिम्बस भी जुड़ने लगे है. 4 ऑपरेशन और होने बाकी है अगले 40 दिन में और उसके बाद फिजियो की देख रेख सही रही तोह ये 3 महीने बाद ये खुद हे चलने लगेगा. अब आप आराम से इसके साथ बातचीत कर सकती है. सुदर्शन, कल 9 बजे तुम्हे सिस्टर लेने आएँगी. गुडबाय.", डॉक्टर ने हे नर्स के साथ मिल कर छोटी को उस मशीन बिस्टेर पर सही से लिटाया और Guddi-Sushila को उसकी हालत से अवगत करने के बाद वापिस चला गया. मूंदे हुए सर पर अब बाल आ चुके थे. जगह जगह सिर्फ गहरे निशाँ थे लेकिन जख्म अधिकतर भरे हुए या फिर ऑपेरशन वाली जगह पट्टी से बंधी.
"ऐसे क्या देख रही है माँ? किसी को उम्मीद न थी की मैं 3-4 दिन भी निकाल सकूंगा. फिर उमेद चाचा आये और उसके बाद शंकर चाचा. तेरे सामने हे है अब सबकुछ. डॉक्टर बोल रहा के मैं अगर यही चला तोह 2 महीने बाद खड़ा हो सकूंगा. सुशीला ताई, बिजेन्दर नियम से मिलने आता है और मैं एक हे हाथ से सीप में उसके बाजी भी लगा देता हु.", सुदर्शन खुद हे परिवर्तित हो चूका था इस माहौल में. अब वो जानवर की जगह एक ऐसा इंसान बन्न रहा था जिसमे भावनाये थी और सामाजिक जीवन के लिए आस्था. गुड्डी बस अपने बेटे को देख कर भगवन को दुआ हे देती रही वही सुशीला मुस्कुराते हुए बोली.
"तू थोड़े से बाल बढ़ा ले तोह तेरे बाप जिसे लगेगा. वैसे और कौन कौन आया करे है तुझसे मिलने?"
"ताई पूछ हे न. पहली बार होया है के दिन में 10 लोग मिलान आया करे है. कुछ पहचान के और बाकी नए दोस्त. हाँ जो हर रोज बिन नागे आये है आजतक उनमे शंकर चाचा और पंडित दादा जी शामिल है. अर्जुन 2 दिन से न आया लेकिन वो विकास और उनका एक गिट्टू दोस्त बलबीर भी आते रेहवे है. शंकर चाचा तोह दरजी भी लेके आये थे 3 दिन पहला और शाम ने मैं ब्याह मैं भी जाऊंगा.", सुदर्शन की ये सभी आपबीती सुन्न कर गुड्डी अपने आंसू न रोक सकीय. ये ख़ुशी के थे और अपने बेटे का सुधार प्रमुख वजह.
"लेकिन तेरी दादी तोह कहे करती की तू एक दिन शंकर से भी आगे जाएगा. तेरे विचार बहोत बदल गए सुदर्शन. दादी शायद खुश न हो ये देख के.", सुशीला ने मजे लेते हुए कहा था जिसपर बदले में सुदर्शन भी हंस दिया.
"ताई तेरे लाडले ने चाँद देख्या था आरर मैंने दिन में सितारे देख लिए. दिखाएं वाला दोनुआ ने एक हे था और दादी ने बता दिए के शंकर चाचा ेब हिस्ट्री हो गया इन मामला में. पद्धति रही शंकर शंकर और भरी पड़ गया अर्जुन. हाहाहा.. सच कहु तोह घाना हे सरीफ छोरा है, सरपंची वाला हिसाब न है उसका के जान लेके हे माने. माँ, तू तोह मिली होगी अपने भतीजे से?", छोटी का आशय था अर्जुन द्वारा बिजेन्दर और खुद उसको धुल चाटने से. साथ हे उसने बता दिया था के जिस चेहरे को चंद्रो देवी उदहारण मानती थी उसका बीटा एक कदम आगे हे निकला.
"जिस दिन तेरी गलती पता लगी थी उसी दिन मुझे एहसास हुआ था के वो लड़का तुझे मारना चाहता हे नहीं था. खुद हे सोच बीटा की इतिहास में जो भी हुआ था क्या उनका वंश तुझे ज़िंदा छोड़ देता अपने घर की िज्जात्त पर हाथ डालने के दुस्साहस पर? नहीं न? तेरे चाचा उसी दिन माफ़ी मांगने आये थे तेरी दादी और मुझसे. आधी रात को सीधा हवेली पर. अर्जुन को सब बाद में पता लगा और उसने मुझे गले लगा कर कहा था के तू उसका बड़ा भाई है और जो हुआ वो सिर्फ इसलिए क्योंकि वो कभी उस लड़की को दर्द में नहीं देख सकता जिसके साथ तू गलत करने लगा था. इतना बड़ा दिल तोह तेरे पिता का भी न था सुदर्शन?", अपनी माँ की बातों को सुन्न कर एकाएक सुदर्शन का दिल आत्मग्लानि से भर उठा. उसको वो वक़्त फिर से याद आ गया जब वो कैसे उन मासूम सी खूबसूरत लड़कियों को अपनी ताक़त और दबदबे के दम पर अनगिनत लोगो के बीच एकतरफा शिकार की तरह दबोचने लगा था. वह हर इंसान उसके खौफ से वाकिफ था. प्रशाशन तक कभी उसको रोक न सका था और न हे जवाब माँगा था उस से. लेकिन एक लड़के ने उसकी वो बरसो की कमाई हुकूमत ऐसे धवस्त करके रख दी थी जिसका परिणाम साक्षात् उसका अभी तक अपने पाँव पर खड़ा न हो पाना था.
"गलती तोह भारी हुई है मुझसे माँ और इसका पश्चाताप मैं रोज करता रहा जबतक वो लड़की खुद हे मुझसे मिलने ना आयी. बड़ी हे प्यारी बची है वो माँ और जब उसने मुझे भाई कह कर बुलाया तोह मैं फुट फुट कर रोया. सिर्फ अर्जुन हे वैसा नहीं है, वो लड़की भी बिलकुल उसके जैसी है. प्रीती नाम है उसका और मासूम होने के साथ उतनी हे निडर भी. उस दिन दोनों हे मेरे पास पूरा घंटा बैठ के गए. बेचारी मेरी हालत देख बार बार सॉरी बोल रही थी और उस से ज्यादा दुखी मैं हो गया. फेर तोह शंकर चाचा ने मेरे लिए अँगरेज़ डॉक्टर भी लगा दिए और बाकी तेरे सामने हे है माँ. एक बार तोह उम्मीद हे हार गया था लेकिन अब हौंसला है के खड़ा भी होऊंगा और जैसा तू पापा के बारे में कहे करती वैसा हे करने की मेरी कोशिश रहेगी.", सुदर्शन ने खुद हे अपनी कलाई पर ग्लूकोस की बोतल वाली नलकी लगाईं और इन दोनों की तरफ जैसे तैसे करवट करके लेट गया. गुड्डी को आज पहली बार अपनी इस संतान पर प्यार और गर्व हुआ था.
"तोह फेर तेरा भूत उतर गया सरपंची झोटा बन्न ने का?", सुशीला ने अपना स्टूल करीब करके सुदर्शन के माथे को साफ़ किया और सर थपकने लगी.
"हाहाहा.. के बाते करे है ताई? इंसान बन्न के जीना हे बहोत मुश्किल है फेर झोटा तोह बहोत दूर की बात. दादी बहोत खुश हुई थी जड़ मैंने पहली बार मेशी (झोटा) अपने खेत में धा दिया था. उस दिन दादी कहे थी की मैं शंकर बन्न सकू हु. बहोत धुरंदर रगड़े मैंने अगले 8-10 साल लेकिन इस चाचा के लाडले ने जिस तरिया मैंने ाले (गीले) लट्टे (कपडे) की तरिया धोया तोह साड़ी अकड़ बिखर के बिस्टेर पे आ गिरी. ताई अर्जुन की ताक़त तोह मैं बयान कर सकू हु थोड़ी बहोत लेकिन दादी ने मेरे से न्यू कहा था के मैं शंकर बन्न सकू हु. मतलब उस वक़्त भी व मेरे से प्रभावित कोणी होई थी. चाचा तगड़ा तोह है लेकिन जेंटलमैन आदमी लगे है. 50 थे वो और दादा होर 14-15 जड़ उनकी भिड़ंत होई थी. फेर दादी न्यू किस तरिया बोली?", सुदर्शन भी जाने कहा से बात कहा ले गया था. गुड्डी इस विषय पर बोलना नहीं चाहती थी लेकिन सुशीला ने आश्वस्त करके खुद हे बताना शुरू किया.
"15 की उम्र में शंकर और उमेद शर्त शर्त में पूरा खेत जोट दिया करते, घडी देख के. तेरी दादी की नजर में हमेशा ताक़तवर की ख़ास इजत्त रही है बीटा और तू अपने दादा की बात करे है न की वो लोग इतने थे आरर शंकर होर 50.. सरासर झूठ है. इतने होते तोह पुलिस 3-4 तोह गिरफ्तार करती लेकिन असलियत में वो थे हे 3-4 और मेरे पिता जी के साथ साथ तेरे दादा लोग 20 वो भी हथियार सुदा. ललकार के मारे थे वो सारे इन्हने और यु पता है तेरी दादी ने भी. मेरे पति और तेरे दोनों चाचा तोह सड़क पे अकेले हे शंकर ने कुचल दिए थे लेकिन तेरे पिता का शरीर साफ़ था. झोटा गिरा के तू खुद की ताक़त समझे था तोह खुद हे सोच शंकर तोह तेरे जिसे पहलवान ने टांग टेल धार के चीयर दे पालक झपकते हे.", सुशीला के दुःख गहरे थे लेकिन अब वो उस रास्ते पर चल रही थी जहा पश्चाताप और सकरात्मक दृष्टिकोण हे वाजिब था.
"हाँ ताई या बात मैंने कड़े भी न सोची की आपकी पीहर में भी कोई न बचा, अपनी तरफ तोह समझ लो पहले की दोनों पीढ़ी हे ख़तम हो गयी. नुक्सान उमेद चाचा के परिवार ने भी तय लेकिन शंकर चाचा की तरफ तोह कुछ न होया. सच में वो मिसाल है तभी दादी उनका आज तक सेज से ज्यादा करे है.", सुदर्शन जैसे ये baal-sulabh बात करके खुद हे सोचने लगा लेकिन सुशीला फीकी मुस्कान के साथ गुड्डी को देखने लगी जो जानती थी की पंडित जी के परिवार ने तोह जो खोया है वो सब उम्मीद से भी परे है सुदर्शन की.
"बीटा, युद्ध में जीतने वाला भी बहोत कुछ हारता है. पंडित जी ने रिश्ते खोये, शंकर ने प्यार, कौशल्या जी ने तोह पूछ हे मत और तू पीढ़ी की बात करे था? इन्दर भाईसाहब की तोह नेसल हे ख़तम हो गयी आने वाली. हो तोह शंकर जी की भी जाती लेकिन बचाव हो गया. इन्होने तोह कुछ भी शुरू न किया था फेर दुःख भी इन्हे मिले. भूल जा ये सब बीटा और इनका जीकर कभी न करियो किसी के साथ. तू अपने पापा की तरह बन्न न चाहे है न तोह उनकी एक छोटी सी नसीहत याद रखियो. लकड़ी की कारोबार दीमक की दूकान में न होता. शुद्धचार कभी भी बदले से ग्रसित दिमाग में नहीं उपजते. अब तू आराम कर बीटा और जो दिल से महसूस किया न तूने अर्जुन के लिए, शंकर चाचा और अपने भाई Bijender-Vikas के लिए... बस वो बरकरार रख बीटा. जीजी, 4 बज गए. अब तक माँ जी भी मुन्नी के साथ वह पहुंच चुकी होंगी.", सुदर्शन को भी अपनी ताई द्वारा सर सहलाना भला लग रहा था. अपनी माँ की बात सुन कर वो हे बोल उठा.
"ताई ने 5 मिनट थपकी दे लेने दे माँ. मैंने नींद आवे है फेर आप चले जइयो."
"हाँ ठीक है बीटा तेरे शरीर ने आराम की बहोत जरुरत है. डॉक्टर कहे था के इंजेक्शन देने पड़ते थे पहले सुलाने के लिए. सो जा बीटा मैं तेरे हे पास हु. ब्याह में आवेगा तोह अपने हाथ से खिलाऊंगी मेरे बेटे ने.", सुशीला ने गुड्डी को बैठे रहने को कहा और कुछ गुनगुनाती हुई उस विशाल पर्वत से इंसान को सुलाने लगी. सुदर्शन अपने अबतक के जीवनकाल में बस प्यार और अपनेपन से पूरी तरह दूर रहा था. माँ तोह हमेशा चाहती थी की औलाद उसके पास रहे बस राह भटकने वाले भी अपने हे थे.
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"क्या सोच रही है तारा? कुछ परेशानी है तोह बता ऐसे सोचने से तोह कुछ होने वाला नहीं?", इधर घर में भी दोपहर का खाना हो चूका था और सभी आये हुए मेहमान या तोह अपने ठिकाने जा कर तैयारी में लगे थे या फिर आराम करने में. पंडित जी के niwas-sthaan पर तक़रीबन घर के हे लोग थे सिवाए कुछ ख़ास मेहमानो के. तारा फ़िलहाल पिछले हिस्से की ऊपरी मंज़िल पे अपने पुराने कमरे में हे थी और उसको ऐसे अकेले बिस्टेर पर लेते छत को घूरते देख कमरे में आयी अलका ने तन्द्रा भांग की. निचली मंज़िल पर सभी लोग अपनी अपनी पैकिंग में लगे थे और इस तरफ कोई न था.
"ऐसा तोह कुछ भी नहीं है यार अलका. बस सोच रही थी की अब इसके बाद क्या होगा? मैं इधर आने से पहले कैसी थी और अब बिलकुल अलग हु. आज शादी है और हमेशा हमारे साथ रेहनी वाली माधुरी दीदी अब हमे छोड़ कर नए घर चली जायेगी. हर सुबह उन्हें बहोत मिस करुँगी यार और एक नया मेंबर भी शामिल हो जाएगा तोह क्या बहोत कुछ बदल जाएगा?", तारा की बात में नए सदस्य वाला जीकर देख अलका उसकी बगल में बैठती हुई मुस्कुराने लगी.
"तुझे लगता है राधिका भाभी के आने के बाद बहोत कुछ बदल जाएगा? तुझे शायद इस बात की भी चिंता है की अर्जुन के साथ milna-bolna भी प्रभावित होगा. हैं न?", तारा अनमने ढंग से बस मुस्कुरा दी.
"देख यार अभी तोह ये घर भरा हुआ है इसलिए सोच भी उतनी हे उलझी हुई दिख रही है. भैया अब ज्यादातर रातें घर में रहा करेंगे लेकिन उनका अकेलापन उनके साथ न होगा. तू भी तोह चली जायेगी अगस्त महीने में, फिर तू इतना क्यों प्रभावित हो रही है? अर्जुन यही होगा और वो सबके साथ एक सामान हे रहने वाला है. ये कोई इंसानी या वैचारिक बदलाव थोड़ी न हो रहा है घर में. बस भाभी आ रही है और दीदी जा रही है.", अलका समझदार थी लेकिन तारा उसकी बात से कुछ असहमत.
"वो भी तोह जा रहा है शादी के 2 दिन बाद. पूरे एक महीने के लिए और अकेला हे. तू मेरी हालत नहीं समझ रही अलका. देख प्रीती तोह हमेशा हे यही होने वाली है, तेरा तोह लक्ष्य हे बिलकुल अलग है और ऋतू का स्पष्ट है की वो ज़िंदगीभर अर्जुन की रहेगी. क्या मैं फिर से ये दिन देख सकुंगी जिसमे मुझे वो प्यार मिलेगा जो पहले नहीं था लेकिन यहाँ नसीब हुआ?", तारा ने अपना दर्द तोह जाहिर कर दिया लेकिन वो सिर्फ उसका पक्ष हे था.
"तू क्या सोच रही है तारा? अर्जुन ने तुझे कभी मुझसे या ऋतू से अलग समझा? और तू कह रही है की ऋतू उसकी रहेगी लेकिन जानती है की अगर वैसा हुआ तोह ऋतू और अर्जुन के पास कुछ भी नहीं बचने वाला. ये परिवार और इसका हर इंसान न चाहते हुए भी अलग हो जाएगा ऋतू से. इतनी भारी कीमत तू चूका सकती है तोह बोल? बस एक बार गहराई से सोच कर देख की जब तेरे पास ये परिवार न हो, बुआ का परिवार तुझे बहिष्कृत कर दे और तेरे साथ साथ अर्जुन को भी शहर और ये सब लोग छोड़ने पड़ जाये तोह ऐसे रिश्ते का क्या मोल? ऋतू बस चाहत रखती है अर्जुन के साथ का. मिलना न मिलना किसी के भी हाथ में नहीं लेकिन इतना जरूर है की कीमत बहोत भरी चुकानी पड़ेगी अगर वैसा हुआ तोह. मैं नहीं दे सकती वो कीमत और न मैं मेरे पिता, दादा या किसी भी रिश्ते से अलग हो सकती हु. तूने हे कहा था के शादी होने तक तू अर्जुन के साथ बिना शर्त बस प्यार का रिश्ता रखेगी तोह आज क्यों तू अपनी हे बात से बेचैन है?", अलका के कठोर शब्दों ने तारा को तार तार करके रख दिया था. आँखों के किनारो से आंसू बिस्टेर पर गिरने लगे थे और होंठ ऐसे फड़फड़ा रहे थे जैसे अंदर से कुछ कहना चाहती हो लेकिन आवाज साथ न हो. फिर कुछ पल बाद हिम्मत समेत कर वो बोलने लगी.
"मैं स्वार्थी महसूस कर रही हु अलका. मेरा बड़ा दिल कर रहा है की अर्जुन मुझे अपने सीने से लगा ले और कह दे की वो हमेशा मेरा ख़याल रखेगा. आज दीदी शादी करके जा रही है इस घर से और मैं यही महसूस कर रही हु की ऐसा मेरे साथ भी होगा. मुझमे हिम्मत नहीं है अलका की कोई और इंसान मेरी आत्मा को महसूस करे. मेरे जिस्म पर मैं वो स्पर्श अर्जुन के सिवा किसी और का नहीं झेल सकती. मैं क्या करू अलका? मैं मानती हु ऐसा मुमकिन नहीं होगा और ऋतू का दर्द तोह कही ज्यादा है. वो उसके लिए हे ज़िंदा है फिर भी कभी न मुझे उसने टोका न किसी और को. मैं शादी नहीं करुँगी कभी.."
"शह्ह्ह्ह.. तेरे पास अभी 3-4 साल तोह वैसे भी पढ़ाई के लिए है और फिर बिज़नेस के लिए भी तोह दादा जी ने बुआ को मन लिया. वर्तमान में जीना सीख तारा और अपने भविष्य पर वह काम कर जिस से तू खुदको साबित कर सके. अर्जुन से तेरी शादी नहीं हो सकती लेकिन तेरी शादी किस से होगी या तुझे करनी है भी या नहीं ये तेरे हाथ में होगा जब तू खुदको स्थापित कर चुकी होगी. फिलहाल तू ज्यादा सोच मत और उठ कर त्यार हो जा. बुआ ने कहा है की तेरे दादा जी भी आ चुके है और तुझे उनके साथ हे पैलेस जाना है. Kal-parso तक जब वापिस सब पहले जैसा हो जाएगा तोह हम आपस में वैसे हे बात करेंगे जैसे पहले करते आये है. ऋतू खुद तुझे सलाह देगी और वो कभी गलत नहीं होती.", अलका ने अभी उसका चेहरा साफ़ किया हे था की तारा उसके सीने से लग गयी. कुछ पल दोनों हे ख़ामोशी से ऐसे रही लेकिन फिर रुपाली की आवाज ने उन्हें अलग कर दिया.
"ओह तारा तू अभी तक निक्कर में हे है? ये अलका तुझे बुलाने आयी थी लेकिन इसका भी कुछ नहीं हो सकता. वो तेरे चाचा जी बुला रहे है तुझे. चल जल्दी आ निचे और ऐसे मत आना, बुआ ने कहा है.", अब अलका भी हंस दी थी क्योंकि उस छोटी सी निक्कर में तारा की जाँघे हे ढकी थी बस और उसके कूल्हे तोह पूरे उभरे हुए स्पष्ट थे. तारा ने वैसे हे लापरवाही से तकिये के निचे से ब्रा निकाल कर रुपाली के सामने हे अपने सुडोल मॉटे उभारो पर पहनी तोह रुपाली झट्ट से भाग गयी. अब अलका भी खिलखिला कर हंस रही थी.
"सुधर जा ओह मिस बूबीए.. सुधर जा थोड़ा. बुआ भी जानती है के तू ऊपर और निचे पिंजरे नहीं पहनती जब कमरे में होती है तोह. थोड़ा ख्याल रखियो और चोली में भी ब्रा याद से पेहनियो लहंगे के साथ."
"पंतय नहीं पहन ने वाली और अगर मौका मिला न तोह किसी कोने में उठा लुंगी अर्जुन के लिए. चल अब तू जा के अपनी तैयारी कर. एक तोह पहले से इतनी गर्मी है ऊपर से चोली में भी ब्रा पह्नु." तारा बिलकुल सहज थी अलका के साथ बातचीत और उसके बाद इस मस्ती भरे माहौल से. अलका ने भी जाने से पहले पलटी हुई तारा के गद्दार मॉटे चुत्तड़ो पर एक करारा थप्पड़ जमाया और फुर्ती से भाग गयी.
'आउच.. साली तू लग हाथ मेरे एक बार.. Uff..kamini लाल हे कर दिए aahhh.",Tara ने तुरंत निक्कर सरका कर वो मटकी सा गोल कुल्हा आईने में निहारा तोह वह उँगलियों के निशाँ प्रकट होने लगे थे. हलके से मुलायम मांस को सहलाती हुई वो मुस्कुरा रही थी जैसे उसको ये भी पसंद हो. अब तारा के chacha-dada इत्यादि आ चुके थे तोह उसको अपने परिवार के साथ होना जरुरी हे था. तारा कुछ हे समय बाद आसमानी कमीज, सफ़ेद सलवार और गले में दुपट्टा पहने निचे आ चुकी थी. बैठक में अपने दादा जी से मिलने के बाद वो अपनी चची और चाचा के बीच हंसी ख़ुशी बतियाती रही और अर्जुन भी घर में दाखिल होने के साथ सभी से मुलाकात करके अपनी दादी के पास चला आया.
"आ बीटा आजा यहाँ. मेरा बीटा आज सुबह से बिना खाये पीये हे लगा हुआ है. रेखा, अर्जुन के लिए यही खाना भिजवा दे.", अर्जुन दादी के कमरे में आते हे चंद्रो देवी से मिला और फिर पूर्णिमा जी की बगल में हे बैठ गया. कौशल्या जी उसके सर पे हाथ फेरती हुई शाबाशी दे रही थी और चंद्रो देवी भी प्रशंशा भाव से उसको देखते हुए कहने लगी.
"कुछ भी कह कौशल्या, तेरी परवरिश की टक्कर नहीं. आजकल के लड़के तोह महफ़िल लगाने में व्यस्त रहते है और ऐसे मौको पर काम से पल्ला झाड़ कर बचते दिखेंगे. अर्जुन तोह वह भी बबिता के ब्याह में लगा रहा था और इधर भी देख रही हु की ये किस हाल में है. बीटा काम के साथ साथ खुराक भी जरुरी है. गर्मी का मौसम है तोह भूख चाहे काम हे क्यों न हो लेकिन खाना जरुरी है.", अर्जुन उनकी बात सुन्न कर बॉस हाँ में सर हिला कर ख़ामोशी से बैठा रहा.
"वैसे बहिन जी ख़याल तोह मैं पूरा रखती हु लेकिन इतना कुछ एकसाथ हो रहा है न तोह जिम्मवारी बढ़ हे जाती है. बस आज की हे बात है फेर तोह मेरा बीटा पहले से भी ज्यादा ध्यान रखेगा अपनी सेहत और खुराक का. वैसे बहुएं और बचे नहीं दिखाई दिए बहिन जी?", कौशलया जी बातचीत बढ़ा रही थी और इधर मुस्कान हे अर्जुन के लिए थाली लगा कर ले आयी. एक सादे सलवार कमीज और गले में दुपट्टे लिया मुस्कान साक्षात् मासूमियत की मूरत प्रतीत हो रही थी. अर्जुन के लिए वही छोटा सा स्टूल लगा कर उसपे थाली रखने के बाद मुस्कान ने एक टोलिया भी पकड़ाया. अर्जुन ने भी शिष्टाचार से धन्यवाद कहने के साथ भोजन शुरू किया तोह चंद्रो देवी भी इन्हे देख रही थी. बबिता भी यही कमरे आ बैठी थी हाथ में कॉफ़ी का कप लिए.
"मुन्नी तोह अभी इस बबिता के हे साथ थी और गुड्डी सुशीला आती हे होंगी सुदर्शन से मिल कर. वैसे तुमने ये ाचा किया कौशल्या की मुस्कान को यही रोक लिया. ाची लड़की है लेकिन मैं इसके साथ समय न बिता सकीय अभी तक. वैसे तू तोह बहोत रहती है न इसके साथ बबिता?", चंद्रो देवी ने बबिता को लगातार अर्जुन की तरफ देखते हुए पुछा था जिस पर बबिता थोड़ा हड़बड़ा गयी लेकिन फिर आदतन खिलखिलाती हुई बोली.
"दादी आपको किसी ने मन किया क्या मुस्कान के साथ रहने से? मैं तोह ये देख रही थी की इस अर्जुन का कोई समय न है खाने सोने का. वैसे मुन्नी काकी अभी माँ और गोलू के परिवार के साथ हे बैठी है. गुड्डी काकी भी उधर हे है. नानी आप कितने दिन तक रोकने वाली हो मुस्कान को यहाँ?", मुस्कान फिर से गरम रोटी लिए अंदर आयी तोह अपना नाम सुन्न कर ठिठक गयी. बबिता मुस्कुरा रही थी और अपने करीब कड़ी मुस्कान को कौशल्या जी ने हाथ पकड़ कर वही बैठा लिया.
"तुझे तकलीफ है क्या बबिता? तू भी रह ले अगर तेरा वह जी नहीं लगता तोह तू भी रह ले मेरे पास. हाँ ये मेरी बिटिया अभी कुछ दिन यही रुकने वाली है और बाद में मैं खुद हे इसको तेरे पास छोड़ने आउंगी. क्यों मुस्कान बीटा तुझे यहाँ मेरे साथ कोई तकलीफ है?", कौशल्या जी के इतने स्नेह को देख खुद चंद्रो देवी प्रशंसा करने लगी थी. मुस्कान भी कौशल्या जी के साथ hil-mil चुकी थी और बाकी घरवाले भी उसको उतना हे अपनापन दे रहे थे जिस से वो कही से भी कोई बाहरी व्यक्ति नहीं थी.
"मुझे तोह आपके पास रहना ाचा लगता है. हाँ बबिता दीदी भी मेरा ख्याल रखती है और उधर मैं ज्यादातर इनके साथ या अक्षरा दीदी के पास हे होती हु. अभी तोह जबतक कॉलेज से लेटर नहीं आता इतने मैं आपके हे पास हु. बीच में चली जाया करुँगी दीदी के घर bhi.",Muskaan की बात पर बबिता भी खुश थी. वो जानती थी की इस समय तोह खुद वो और अर्जुन हे इस लड़की की दुनिया थे जिसमे कौशल्या जी के आने से एक घनी छाया भी उसके सर आ गयी थी. अर्जुन की प्लेट में आखिरी निवाला देख वो तुरंत उठ कर चली गयी.
"बचे होते है तोह घर घर जैसा लगता है कौशल्या और सचमुच तुझमे गुण है जो ये मेरी बबिता तक तेरे पास दौड़ी चली आती है.", चंद्रो देवी की बात सही थी और इस बात पर पूर्णिमा जी ने भी जैसे अपनी सहेली की खिंचाई की.
"हां बहिन जी ये तोह बात पते की कही. आप उमेद और शालिनी को हे ले लो. यहाँ आने के बाद उन दोनों ने हे मेरी तरफ न देखा बस लगे हुए है अपने अपने में. आइशा जरा न घुलती मिलती किसी से लेकिन वो प्रीती और कोमल के हे पल्लू में बंधी घूम रही. ये सब इस कौशल्या का हे जादू है जो बाँध लेती है आनेवाले को.", कौशल्या जी ने अपनी सहेली की ब्याह पर हलके से ढोल लगते हुए हँसते हुए जवाब दिया.
"कौन बोल रहा है देख लो बहिन जी.? मैं तोह रस्मो तक में न बैठ सकीय और यही देख रही है सबकुछ. आप होती तोह मैं इसको भी कही न कही लगाती लेकिन चलो फिर सही. बबिता, दामाद घर आया हुआ है और तू है की उसको वह छोड़ यहाँ अपने में हे मस्त है."
"नानी, वो दूध पीटा बचा न है और बाकी बहोत लोग है उसके पास. रेखा मामी और कृष्णा मामी लगी हुई मेरी ससुराल की सेवा में और मैं तोह उन्हें पहले हे बोल चुकी के इसके साथ जाउंगी मैं ब्याह में. हाँ अर्जुन तेरी बुकिंग तोह न कर राखी पहले किसी ने?", बबिता के बेबाक जवाब पर अर्जुन तोह बगले झाँकने लगा लेकिन अंदर आती सुशीला ने जरूर बबिता के सर पे चपत जमा दी.
"ओह ब्याह हो गया लेकिन तेरी अकाल न बढ़ी. थोड़ा तोह सोच के बोलै कर और अपने पति के साथ आयी है तोह उसके साथ हे जायेगी. अर्जुन को 100 काम होंगे तोह फेर वो तुझे धोता फिरेगा या काम करेगा?"
"मैंने इसका हाथ पकड़ रखा माँ? तू भी साथ चल पढ़िए जे दिल करे तोह लेकिन मैं न जाती उनके साथ. Chacha-sasur कार में हे बीड़ी फूंके है और मैं पेट से हु. पसंद न मैंने यु सब. बाकी हाँ अर्जुन बिजी है तोह मैं विन्नी, कोमल या किसी के भी साथ चली जाउंगी.", बबिता ने मुँहफट अंदाज में जो बात कही थी वो सुन्न कर कौशल्या जी को भी आपत्ति हुई लेकिन बबिता से नहीं.
"सुशीला ये ठीक बोल रही है. टाइम मिले तोह इसका जीकर अपनी संधान से करियो. चूल्हे की आंच अलग चीज है लेकिन ये beedi-cigrattee वाला हिसाब गलत है जब इसके पाँव भरी चल रहे हो. बीटा, तू अर्जुन के हे साथ जाइयो लेकिन पहले ये बाकी सबको छोड़ दे उधर. संजीव अभी इसके साथ जाएगा और तू थोड़ा आराम कर ले. रात में ज्यादा घूमना फिरना भी नहीं udhar.",Kaushalya जी को तोह अभी से चिंता हो रही थी जिस पर सभी के साथ अर्जुन भी मुस्कुरा रहा था. उसके मुँह से अचानक हे निकल गया.
"अभी तोह दीदी का सेकंड मंथ हे है दादी."
"तुझे ये सब बड़ा पता है रे.", कौशल्या जी हैरत से देख रही थी अपने पौटे को जो अब झेंपता हुआ इधर उधर देख रहा था.
"वो कल सुन लिया था दादी मैंने जब बबिता दीदी उधर ये बात बता रही थी. और रेणुका बुआ को जब डॉक्टर के दिखने गया था तोह उन्होंने भी बुआ को बोलै था के इस बात को दिमाग में मत दाल लेना की हर वक़्त आराम हे करना है. घुमते फिरते रहना है और ाची डाइट लेनी है. इसलिए मैंने ये कह दिया.", अब कौशल्या जी को भी पूरी बात समझ आयी थी. आखिर रेणुका भी पेट से थी और अर्जुन भी डॉक्टर के लेके जाता था अपनी बुआ को उनकी नजर में.
"चल कोई बात नहीं लेकिन ये महिलाओ वाले मसले में न हे बोलै कर. मुस्कान बीटा, तेरी ललिता आंटी को बोल के वो तैयार हो जाये. अर्जुन उसके साथ संजीव और जो जाना चाहे उन्हें वह छोड़ आएगा. अभी से निकलना शुरू करेंगे तोह टाइम रहते तैयारी होगी. 7 बजे घुड़चढ़ी है फेर.", समय 5 होने वाला था और अर्जुन भी उठ गया अपनी जगह से.
"मैं हे जा रहा हु भैया के पास दादी. फिर एक और चक्कर लगाने के बाद मैंने गाडी पे फूल भी लगवाने है. भैया और भाभी को मैं हे लेके आऊंगा यहाँ घर अपनी कार में.", अर्जुन जाने लगा तोह कौशल्या जी ने फिर से रोक लिया.
"पैसे लेता जा."
"वो होटल वाले ने मुझसे लिए हे नहीं क्योंकि छोटे दादू ने उन्हें मन कर दिया था. 50 हजार पड़े है वैसे के वैसे. बाद में हिसाब दे दूंगा. आप लोग उठेंगे तोह बाकी तैयार होंगे नहीं तोह मुझे नहीं लगता अगले एक घंटे तक कोई निकलने वाला है.", अर्जुन ये बात कह कर दौड़ गया जिस पर कौशल्या जी खुद भी कड़ी हो गयी.
"हाँ ये भी सही है. बहिन जी आप मेरे और पूर्णिमा के साथ हे चलिए. राजू ने गाडी बहार हे लगवा राखी है. देवकी.. देवकी तैयार हो गयी क्या?", उनके कहने के साथ हे बगल वाले कमरे से दामिनी, देवकी और अनामिका अपने बेटे के साथ इधर आ गयी. वो लोग तैयार थी और बैग उनके हाथ में थे.
"जी सब तैयारी हो गयी है जीजी. आपके कहने का हे इन्तजार था."
"अनामिका बिटिया बचे के अतिरिक्त कपडे रख ले. तुम लोग शायद सुबह देरी से हे वापिस इधर आओगे. चलो बहिन जी हम चलते है, ये मधु का परिवार भी जा चूका. आपके देवर जाने अकेले बैठे क्या हिसाब किताब करने में लगे है.", बैठक में सचमुच रामेश्वर जी अकेले हे बैठे थे और डायरी में कुछ लिखने में व्यस्त थे.
"रामेश्वर, आज तोह रहने दे ये सब. एक बार घर का चक्कर लगा ले कौशल्या.", चंद्रो देवी ने समझदारी वाली बात कही थी और शादी वाले घर में ढेरो सामान और गहने के साथ साथ रूपया पैसा होना लाजमी था. उनकी बात का अर्थ भी यही था की कुछ खुला न रहा हो.
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"छोटे चल आजा इधर और 2 घडी अपने भाई से भी बतला ले.", अर्जुन यहाँ अपने भैया को बुलाने आया तोह उनके पास बिजेन्दर, विकास, लकी और दीपक भैया को पहले हे मौजूद देख थोड़ा हिचकिचाता सा अंदर दाखिल हुआ. नए बीएड पर दूल्हे की पगड़ी, पारदर्शी सांचे में विवाह का सूट और चांदी जड़ी मोजरी राखी थी. बाकी सभी भी अपने अपने वस्त्र लिए हे आये हुए थे. दोस्तों के वह होने पर भी संजीव के चेहरे पर अलग सी बेचैनी साफ़ देख सकता था अर्जुन. सभी से हाथ मिला कर वो अपने बड़े भाई की बगल में हे आ बैठा.
"मैं तोह आपको हे बुलाने आया था भैया लेकिन लगता है जैसे आप हे कुछ घबराये हुए है. बिजेन्दर भैया आपको तोह एक्सपीरियंस है, थोड़ा भैया को भी हौंसला दो.", अर्जुन ने मजाक में ऐसा कहा था और बिजेन्दर हँसते हुए संजीव को वो इशारा करने लगा जिसका मतलब था 'देख ले ये समझदार है'
"ऐसी बात नहीं है यार. लेकिन पता नहीं यु लग रहा है जैसे किसी मिशन पे जा रहा हु और वह हर तरफ हर नजर मुझे हे घूरती होगी. पब्लिक लाइफ जीरो हे रही है तोह बस थोड़ा अजीब लग रहा है.", संजीव ने अपने दिल की हालत छोटे भाई से बताई तोह लकी ने पीठ थपथपाते हुए जवाब दिया.
"भाई मैं तोह कहता हु अभी से 2 घूँट लगा ले फिर कोई परेशानी नहीं होने वाली. जानता हु की ये बहोत बड़ा सफर होने वाला है तेरे लिए आज लेकिन ये तोह सभी को तये करना पड़ता है. बिजेन्दर भाई ने बताया था न के ये कितना ख़ुशी ख़ुशी तैयार हुआ था लेकिन हवा इसकी भी खराब हुई थी जब घोड़ी पर बैठा. इसके दोस्तों ने बियर पीला कर हौंसला दिया था और उसके बाद सब आराम से हो गया.", लकी की बात से बिजेन्दर सरोकार रख रहा था लेकिन अर्जुन नहीं.
"ऐसा है भैया की छोटा मुँह और बड़ी बात. भैया वह तैयार होने के बाद मंदिर जाएंगे जहा शराब का सेवन करके जाना गलत होगा. ऊपर से इन्हे घोड़ी पर एक छोटे बचे के साथ भी होना है तोह ऐसा करना कटाई ठीक नहीं. गर्मी का समय है बेशक मंदिर से पैलेस 500 मीटर हे होगा पर उतनी दुरी आधे घंटे से काम में तोह पूरी नहीं होने वाली नाचने गाने वालो की वजह से. डिहाइड्रेशन हो जायगी तोह 6-7 घंटे बैठोगे कैसे उधर?", अर्जुन की इतनी दूर की सोच सुन्न कर संजीव जहा तारीफ से देख रहा था वही लकी हैरत से.
"तू अपने भाई को हौंसला दे रहा है या डरा रहा है बे? अबे शादी है इसकी आज लेकिन तू इसको डरा के यही चिपका दे.", लकी के जवाब पर विकास हंसी न रोक सका लेकिन अब अर्जुन ने हे आगे बात बधाई.
"ऐसा है भैया की राधिका भाभी प्यार करती है भैया से और भैया भी. ट्रेनिंग का समय इन्होने इस दिन के सपने देख कर हे तोह बिताया होगा. जब आप इतने बड़े सपने को पूरा करने चले हो तोह फिर किसी और सहारे की जरुरत हे क्यों पड़ेगी? नजरे तोह बेशक सभी की रहेंगी क्योंकि ये मुख्या किरदार जो है आज और उतनी हे नजरे भाभी पर होंगी लेकिन उन्हें तोह बहोत ख़ुशी है और वो तोह वह सब चीज अपने हिसाब से करवा रही है क्योंकि ये इन दोनों का सबसे बड़ा और ख़ास दिन है. ाचा लगेगा जब भैया वह भाभी की बगल में बैठे होंगे उस महकते माहौल में, लेकिन सिर्फ िंखे मुँह से शराब की दुर्गंद आये? भैया आप मिशन पर नहीं जा रहे. इस घर को वो ख़ुशी दिलाने जा रहे हो जिसके लिए सभी ने कितनी म्हणत और सेवा की है. चलो खड़े हो जाओ और ड्यूटी ज्वाइन करो क्योंकि लीडर आप हो.", अर्जुन ने अपने भैया को एक तरफ से अपने साथ लगते हुए बात पूरी कही तोह संजीव भी फकर से उसको जोर से भींचने के बाद उठ खड़ा हुआ.
"तोह फिर हम लोग यहाँ क्या कर रहे है? चलो बिजेन्दर भाई तुम भी गाडी निकालो और लो सबको साथ. दीपक यार तू भी उधर हे आजा अंकल आंटी जी को लेके. लकी और विकास मेरे साथ हे चल रहे है.", संजीव के चेहरे पर आयी ये नहीं ऊष्मा देख लकी भी प्रशंशा से इन दोनों को देखने लगा.
"तू न कुछ बने या न बने लेकिन मोटिवेशनल स्पीकर जरूर बन्न सकता है अर्जुन. और सही बात है की अगर ये मिशन हे है तोह फिर इसको होश में हे पूरा करते है. चलो भाई लोगो उठाओ अपने दूल्हे मियां का taam-jham और चलते है मिशन राधिका भाभी पर.", लकी ने ये इतनी तेज कहा था की बगल वाले कमरों तक उसकी आवाज गूंजी थी. नैरा लगाने में बाकी सभी ने साथ दिया और इस बार निचे तक सबको पता चल चूका था की ये लड़के क्यों शोर मचा रहे है. सारा सामान उठा कर पूरी मंडली बहार वाली तरफ से निचे आयी तोह बहुत से लोग तोह निकल भी चुके थे. अर्जुन की कार में संजीव, लकी, ललिता जी और अलका बैठे तोह उनके पीछे हे शंकर जी अपने साथ रेखा, कोमल, ऋतू, रुपाली को लिए. उमेद जी भी बड़ी गाडी में अपनी माँ, चची, चंद्रो देवी, रेणुका और राजेश्वरी को लिए थे तोह उनके बाद स्वयं राजकुमार जी माधुरी, शालिनी, कृष्णा जी, आरती को. बिजेन्दर ने अपनी माँ, काकी और बीवी के साथ साथ ऋचा को भी लिया था. सफारी को भी पूरी तरह से भर के नरिंदर जी निकले तोह उनके आगे आगे उनके पिता मुस्कान, छोल साहब, विनीता और कृष्णेश्वर जी को. फिलहाल घर में बस बबिता हे बची थी जिसके साथ प्रियंका थी. प्रियंका हर कमरे का निरिक्षण करने के बाद वही बैठक में बबिता के बगल आ बैठी.
"पिंकी तुम यही हो? बाकी सब तोह चले गए फिर तुम अकेली यहाँ?", बबिता आराम से पाँव पसरे चैनल बदल बदल कर देखते हुए पूछने लगी.
"अकेली कहा हु दीदी, आप भी तोह हो मेरे साथ यहाँ. हाहाहा.. वैसे दादी ने कुछ सामान ले कर आने का कहा है कच्चे दूध के साथ. बस वो अंकल आने वाले होंगे थोड़ी देर तक और इतने मैं आपको भी कंपनी दे दूंगी. वैसे तोह बहार सिक्योरिटी के लिए एक आदमी है और अर्जुन भी जल्दी हे आ जायेगा. लेकिन वो थोड़ा रुकेगा इधर कुछ काम से तोह अगर आप चाहो तोह मेरे हे साथ चल पड़ना. प्रीती की फॅमिली अभी इधर हे है और उनके साथ हे चलेंगे.", प्रियंका के पास एक खाड़ी का झोला था जो बता रहा था के इसमें ख़ास सामान है जिस वजह से वो सबसे अलग जाने वाली थी. बबिता ने टेलीविज़न बंद करके सोफे पर हे चौकड़ी जमा ली.
"मेरे सा गर्मी न सेहन होती पिंकी इसलिए मैं न गयी अभी. अर्जुन ने बताया था के मार्किट से 2 लड़के आएंगे ऊपर कमरा सजाने के लिए तोह अगर वो पहले आ जाये तोह उन्हें संजीव का कमरा दिखा दू. वैसे यहाँ घर पे कोई रुकेगा नहीं दुल्हन की कदम रसम के लिए? महारी तरफ तोह दिया भी जला के रखते है और घर खली भी न छोड़ते.", बबिता के ऐसे सवाल पर प्रियंका ने सहमति जताई.
"हाँ दीदी क्यों नहीं लेकिन उसके लिए ताई जी और दादी जी के साथ कुछ और लेडीज भी पहले आ जाएँगी घर पे. माधुरी दीदी भी आएँगी यहाँ विदा लेने के लिए. हाँ तब तक जरूर घर खली रहेगा पर चिंता वाली बात नहीं है. दोनों घरो में पहरेदार है और प्रीती के घर के बहार भी. हाँ आपके जैसे रिवाज तोह मुझे नहीं पता की हमारे होते है.", प्रियंका के स्पष्टीकरण पर बबिता बस मुस्कुरा दी लेकिन अपने जिस्म पर लगातार तिकी उसकी निगाहो को देख बबिता ने आखिर पूछ हे लिया.
"ब्याह में तोह यही होना चाहिए पिंकी. जब सरे हे जा रहे है तोह फेर एक क्यों पीछे रुके? वैसे तू बड़े ध्यान से कुछ देख रही है. अगर कोई सवाल है तोह पूछ ले झिझक न.", अब प्रियंका बगले झाँकने लगी थी जैसे उसकी चोरी पकड़ी गयी हो. चुन्नी को ऊँगली में घूमती वो जवाब देने से बचना चाह रही थी.
"क्या सोच रही है बेबे? तगड़ी हु या कुछ ख़ास है मेरे में जो तू आज हे देख सकीय?", बबिता को इस तरह मुस्कुराते देख और घर के इस एकांत में प्रियंका ने थोड़ी हिम्मत करके पूछ हे लिया.
"वो मैं बस देख रही थी दीदी की आप तोह माधुरी दीदी से भी थोड़ा ज्यादा भरी हुई हो. मतलब आप सुन्दर भी बहोत हो लेकिन इतनी .."
"मैं लम्बी तगड़ी हु और ऊपर से मेरा जिस्म भी भरी है. यही कहना छह रही है न?"
"नहीं नहीं दीदी.. मेरा मतलब आपकी तारीफ हे है पर आपके हस्बैंड भी आपके बराबर खड़े होते है तोह वो थोड़ा सा कमतर हे लगते है. वो भी हेअल्थी है लेकिन 19-20 का फरक तोह है हे. आपको परेशानी नहीं होती?"
"होती है परेशानी तोह. कपडे न मिलते सही से हर जगह और मैं गोलू के पीछे मोटरसाइकिल पे न जा सकती क्योंकि एक क्वांटल वजन है मेरा, ज्यादा फैलाव की वजह से. डबल बीएड पे कल को मेरे पति के पास जगह न बचेगी बचा होये बाद. लेकिन सच कहु तोह मुझे जरा भी दिक्कत नहीं होती मेरी बॉडी सँभालने में."
"हाँ वही तोह मैं कहना छह रही थी की आप फिट भी बहोत हो. मतलब वो लड़कियों वाली बात कहु तोह मुझे खुद परेशानी होती है अपने उप्पेर बॉडी से. लेकिन आप तोह मेरे से भी ज्यादा है उस हिस्से में."
"हाहाहा.. जब भोली है तू पिंकी. सीना तोह भरी हे होता है लेकिन इसके हिसाब से मेहनती भी होना पड़ता है. तेरा 36 होगा मेरा 44 है लेकिन फेर भी वजन महसूस न होता. हाँ तू भी जब घरवाले पसंद करे तोह थोड़ा तगड़ा हे देखियो बहिन. कोई तिल्ली जैसा तोह तुझे भी संभल न सकेगा जिस तरह गोलू जैसा तगड़ा पहलवान भी तू मेरे लिए 19 बता रही जो की सच भी है.", बबिता की बेबाक बातें सुन्न कर प्रियंका सहजता से मुस्कुराई जैसे वो इस चर्चा से अब भाग नहीं रही थी.
"वो तोह घरवाले हे डीडे करेंगे दीदी लेकिन इतना जरूर है के मेरी मर्जी शामिल होगी. वैसे आपकी बात भी सही है के फिट रहना जरुरी है इसलिए मैं घर के काम करने के साथ थोड़ी एक्सरसाइज भी करती रहती hu.Utni तोह नहीं जितनी अलका और ऋतू करती है पर कोमल के साथ थोड़ा बहोत फिट रहने की कोशिश रूटीन से करती हु."
"करती भी रहियो नहीं तोह ये खरबूजे अगर पपीते बने तोह साल बाद हे पति बहार मुँह मारने लगेगा. औरत इतने हे सुखी है जितने वो सही है. बेडोल हुई नहीं के मरद अनदेखी करना शुरू. शायद कोई बहार आया है.", बबिता के कान भी सचेत थे जिसने यही से बहार गेट पर किसी के आने का अनुमान लगा लिया. प्रियंकर तुरतं उठी अपनी दुपट्टा सही करती हुई. बबिता भी उसके साथ बहार आँगन में चली आयी तोह मुनीर वह साधुराम के बेटे से पूछताछ कर रहा था जिसके हाथ में मिटटी का कलश और एक दूध का डोल्लू था.
"अंकल जी इन्हे दादी माँ ने हे ये सामान लाने को कहा था. भैया आप ये मुझे हे दे दो.", प्रियंक आगे बढ़ी तोह देखा की एक गोरी और भरे हुए शरीर की लड़की भी वह थी. ये काजल थी जिसके हाथ में कुछ थैले थे शायद नए कपड़ो के. मिन्दर आगे बढ़ कर वो सामान देने लगा लेकिन काजल की नजरे भी घर में taak-jhaank करती रही. जैसे उसको जो देखना था वो वह कही छिपा न हो.
"काजल, वो डूब भी दे जरा थैले से निकाल कर.", मिन्दर ने काजल से ये कहा तोह वो जैसे होश में आयी लेकिन बबिता की पारखी नजरे उसके चेहरे को पढ़ चुकी थी. काजल ने सकुचाते हुए अख़बार में लिपटी दूर्वा खुद पकड़ाई तोह बबिता ने हे उसके हाथो से ली.
"उनले को धन्यवाद जरूर कहना हमारी तरफ से और तुम्हारा भी शुक्रिया भैया जो ये सब देने खुद आये.", प्रियंका की बात पर मिन्दर ने बस हाथ जोड़ कर सर हिला दिया. और फिर दोनों भाई बहिन मोटरसीले पे सवार हो निकल चले अपने रस्ते.
"बबिता दीदी ये शायद अर्जुन और आपके भैया वाली कार हे इधर आ रही है.", प्रियंका के ऐसा कहने पर बबिता के चेहरा हे उतर गया. दोनों कार ठीक वह आ रुकी तोह बिजेन्दर ने बबिता के सभी इरादों पर पानी फिरते हुए कहा.
"तुम दोनों मेरे साथ हे चलो. बबिता दीदी तुम संजीव से बड़ी हो तोह घोड़ी से पहले तुम्ही उसका तिलक करोगी. तब तक तैयार भी होना पड़ेगा और छोटी दादी ने बोलै है के प्रियंका को भी लेता औ क्योंकि ये पिछली सीट पर नाजुक सामान के साथ अकेली हे बैठेगी. अर्जुन तू करवा ले भाई जो काम करवाना है फेर जल्दी करियो आने की.", बिजेन्दर की बात सुन्न कर प्रियंका फुर्ती से बैठक की तरफ लपकी और बबिता उतरा हुआ मुँह ले कर अगली सीट पर जा बैठी. अर्जुन ने आँखों के इशारे से हे उसको आश्वस्त किया था के वो उसकी नाराजगी दूर करेगा. प्रियंका सामान ले कर आयी तोह उसको खुद अर्जुन ने हे पिछली सीट पर बैठाया. 2 लड़के विभिन्न फूलो से भरा बड़ा सा बोरा लिए मोटरसीले पे यहाँ आ रुके थे.
"पहले तोह आप लोग मेरे साथ ऊपर वाले कमरे में चलो. बस थोड़ा तेजी से काम करना भैया और उसके बाद ये कार सजनी है आगे की लाइट से लेकर डिक्की तक.", अर्जुन के कहने की हे देरी थी की दोनों लड़के उसके साथ हे लपके.
"कार के लिए तोह अभी 2 लोग और आ रहे है. अंकल जी ने पहले हे बता दिया था के सारा काम 20-25 मिनट में पूरा करना है. आप बस कमरा दिखाओ और हम ज्यादा समय नहीं लेंगे.", अर्जुन भी उनकी बात से खुश था और अब उसके पास पर्याप्त समय था नहाने के लिए क्योंकि भैया की घोड़ी का समय 8 बजे का था और गौरव जीजा की 7:30. उसकी ये bhaag-daud अभी तक पूर्ण सफल रही थी बस कुछ समय बाद मुख्या कार्य प्रारम्भ होने वाला था और वह बहोत कुछ ऐसा भी घटने वाला था जिस से अर्जुन पूरी तरह अनभिज्ञ था.
