Incest Pyaar - 100 Baar - Page 43 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 190

Vivah-purva

"सोच ले गुड्डी एक बार फिर से सोच ले. मैं जानती हु तू कभी भी कुछ गलत नहीं कर सकती. भूरे भाई साहब और तू हमेशा हे बाकी परिवार से अलग एक साफ़ ज़िन्दगी में यकीन रखते रहे. लेकिन तुझसे बेहतर कौन समझ सकता है की उस संत इंसान के जीवन का अंतत कैसा हुआ था? अर्जुन बेशक अलग है और उसकी सोच भी jag-bhalaai वाली है लेकिन यहाँ जो हमारे साथ और आसपास हमेशा रहते है वो तुझे जीने नहीं देंगे.", फ़िलहाल हवेली से सुशीला हे अलग निकली थी और उसने अपने साथ देवरानी गुड्डी उर्फ़ मल्टी को लिया था जिसकी बड़ी इत्छा थी ब्याह में शामिल होने से पहले अपने बेटे सुदर्शन से मिलने की. पिछले दिन वो लोग ठीक से मुलाकात न कर सके थे सुदर्शन की जांच होने की वजह से. गुड्डी ने एकांत देख अपना दिल हल्का करने के उद्देश्य से सुशीला से हे वो बात करनी उचित समझी जो प्रमुख वजह थी उसके शादी में शामिल होने की.

"फिर आप क्यों अपनी ज़िन्दगी की परवाह किये बिना उसको अभिमन्यु से अर्जुन बना रही हो? जीजी आप भी ये बात बखूबी समझती हो के वर्तमान में आपके लिए उस लड़के से बढ़कर कोई भी नहीं है. बस एक वजह बता दो की मैं मेरा maun-vrat क्यों न खोलू? 73 से 98 तक 25 साल बनते है और उतने बरस में मुझे एक बार भी वो इंसान न दिखा जो अपना न सोच के सबकी खुशियों को पहले रखता हो. बताओ न जीजी के आप अर्जुन को इतना कैसे मान ने लगी हो की अब न बबिता आपके लिए सर्वोपरि रही और न बिजेन्दर?", हॉस्पिटल के इस कमरे में फ़िलहाल यही दोनों थी और सुदर्शन रूटीन चेकउप के लिए ऊपरी ताल पर था. सुशीला खुद हे जहां सोच में पद गयी मल्टी का सवाल सुन्न कर. उसका एक एक शब्द वाजिब सच था जिस से सुशीला इंकार न कर सकती थी.

"मैं पहले हे बता चुकी हु गुड्डी. अर्जुन ने ये ज़िन्दगी दी है मुझे जबकि नसीब में नरक से बुरी मौत होती. मेरे बचे तक मैंने प्रतिशोध में जलने चाहे लेकिन उन्हें न सिर्फ अर्जुन वापिस लाया बल्कि वो दोनों अब मुझे उतना प्यार करते है जितना जनम के बाद भी न किया होगा. सबसे जरुरी बात की उसने वापिस बिखरे टूटे रिश्ते जोड़ कर मुझे उस परिवार से जोड़ दिया जो मुझे अपनी बड़ी बेटी का दर्जा दिल से देता है. उसने एक मैली आत्मा को साफ़ कर दिया गुड्डी, इंसान तोह मैले जिस्म को भी ठीक करने में असमर्थ है. कितना बड़ा दिल होगा न इस लड़के का जो मुन्नी का अतीत, उसकी गन्दी नेसल और भयानक इरादों को जानते हुए भी उसको मिटने की जगह आबाद करना चाहता है? भूरेलाल हमेशा कहता था के भाभी अज्जू परिवर्तन लाने वाला एक महान इंसान है और देखना एक दिन वो सभी के हिरदय निष्पक्ष (न्यूट्रल) कर देगा. न कोई ईर्ष्या रखेगा न कोई विवाद. अज्जू बिलकुल वैसा हे था लेकिन वो अभिमन्यु निकला गुड्डी, वो अभिमन्यु निकला. 7 घेरे तोह बाहरी थे जिन्हे वो टॉड गया लेकिन वो बहार क्यों न निकल सका?", सुशीला अपनी रौ में बहती हुई दोहरे समयकाल में खो चुकी थी. मल्टी भी ये सब जानती थी और आँखें उसकी भी नम्म हो गयी.

"क्योंकि.. क्योंकि वो अपनों के हाथ मारा गया न जीजी? वही तोह हथियार गिरा दिए उस dev-aatma ने क्योंकि उसको ये पता हे न था के सबसे कठिन युद्ध अक्सर अपनों के हे साथ होता है और आप बेशक सम्मान या प्रेमवश हथियार दाल दो लेकिन जिसने वो घेरे बनाये थे सबसे आखिर में वही सामने मिलेगा. और बस वो परिवर्तन लाने वाला दुनिया से परे हो गया. आप इस अर्जुन को वही घेरा तोडना सीखा रही है?", गुड्डी की बात सुन्न कर सुशीला के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान तैर गयी.

"ये रघुवीर चाचा की औलाद नहीं है गुड्डी और न इसके पूरे विचार रामेश्वर काका जैसे है. इसने तोह शुरुवात हे आखरी घेरे से की है और जीत भी चूका है. समस्या ये है की आज का अर्जुन कुछ ज्यादा हे तेजी से अतीत खोज रहा है. बहोत से तार अदृश्य है जो उसको नजर नहीं आने वाले और मैं jaane-anjaane उसको वो हे दिखाना चाहती हु. कही वो बीच में ek-aadh कड़ी छोड़ गया तोह परिणाम गलत भी हो सकता है. और मुझे पता है की इस तरह उसका साथ देने से मेरी जान भी जा सकती है, कोशिश हो चुकी है बीच में और आगे भी होगी. इसलिए मैं तुझे इस से दूर रखना चाहती हु.", सुशीला ने उठ कर शीशे की खिड़की से बहार का नजारा करते पाया की धुप अभी भी तेज है. सड़क पर ज्यादा chehal-pehal नहीं थी. वो मदद कर वापिस देखने लगी तोह गुड्डी की नजरे खुद पर हे पायी.

"आप पश्चाताप कर रही हो जीजी लेकिन मैं इसको अज्जू नहीं बनते देख सकती. आप तोह अपने पीहर चली गयी थी इसलिए बहोत कुछ आपको भी नहीं मालूम. बस आप किसी तरह मुझे उसके साथ आध घंटा उपलब्ध करवा देना मुन्नी और माँ जी से इतर. फिर मुझे किसी और मुलाकात की जरुरत नहीं.", गुड्डी ने अपनी बात एक सांस में हे पूरी कर दी. सुशीला हैरान थी की गुड्डी उस से भी ज्यादा कुछ जानती है.

"शादी में हे क्यों और ऐसा क्या है की जो मुझे भी नहीं पता.?"

"जीजी, भीड़ का चेहरा तोह नहीं होता लेकिन उस से अलग हो कर देखा जाए तोह भीड़ में बहोत से चेहरे मिल जरूर सकते है. मुझे उम्मीद है की आप इतना समय दिलवा देंगी.", अभी वो आगे कुछ बोलती उस से पहले एक नर्स व्हीलचेयर पर सुदर्शन को लिए अंदर चली आयी और उन दोनों के पीछे हे सफ़ेद कोट पहने वो भला सा डॉक्टर.

"सॉरी आप लोगो को इन्तजार करवाने के लिए. लेकिन ये सब हमारा रोज का हे रूटीन हे जिसको आप मिशन कहे तोह बेहतर होगा. सुदर्शन बहोत ाचे से प्रोग्रेस कर रहा है और इसके लिम्बस भी जुड़ने लगे है. 4 ऑपरेशन और होने बाकी है अगले 40 दिन में और उसके बाद फिजियो की देख रेख सही रही तोह ये 3 महीने बाद ये खुद हे चलने लगेगा. अब आप आराम से इसके साथ बातचीत कर सकती है. सुदर्शन, कल 9 बजे तुम्हे सिस्टर लेने आएँगी. गुडबाय.", डॉक्टर ने हे नर्स के साथ मिल कर छोटी को उस मशीन बिस्टेर पर सही से लिटाया और Guddi-Sushila को उसकी हालत से अवगत करने के बाद वापिस चला गया. मूंदे हुए सर पर अब बाल आ चुके थे. जगह जगह सिर्फ गहरे निशाँ थे लेकिन जख्म अधिकतर भरे हुए या फिर ऑपेरशन वाली जगह पट्टी से बंधी.

"ऐसे क्या देख रही है माँ? किसी को उम्मीद न थी की मैं 3-4 दिन भी निकाल सकूंगा. फिर उमेद चाचा आये और उसके बाद शंकर चाचा. तेरे सामने हे है अब सबकुछ. डॉक्टर बोल रहा के मैं अगर यही चला तोह 2 महीने बाद खड़ा हो सकूंगा. सुशीला ताई, बिजेन्दर नियम से मिलने आता है और मैं एक हे हाथ से सीप में उसके बाजी भी लगा देता हु.", सुदर्शन खुद हे परिवर्तित हो चूका था इस माहौल में. अब वो जानवर की जगह एक ऐसा इंसान बन्न रहा था जिसमे भावनाये थी और सामाजिक जीवन के लिए आस्था. गुड्डी बस अपने बेटे को देख कर भगवन को दुआ हे देती रही वही सुशीला मुस्कुराते हुए बोली.

"तू थोड़े से बाल बढ़ा ले तोह तेरे बाप जिसे लगेगा. वैसे और कौन कौन आया करे है तुझसे मिलने?"

"ताई पूछ हे न. पहली बार होया है के दिन में 10 लोग मिलान आया करे है. कुछ पहचान के और बाकी नए दोस्त. हाँ जो हर रोज बिन नागे आये है आजतक उनमे शंकर चाचा और पंडित दादा जी शामिल है. अर्जुन 2 दिन से न आया लेकिन वो विकास और उनका एक गिट्टू दोस्त बलबीर भी आते रेहवे है. शंकर चाचा तोह दरजी भी लेके आये थे 3 दिन पहला और शाम ने मैं ब्याह मैं भी जाऊंगा.", सुदर्शन की ये सभी आपबीती सुन्न कर गुड्डी अपने आंसू न रोक सकीय. ये ख़ुशी के थे और अपने बेटे का सुधार प्रमुख वजह.

"लेकिन तेरी दादी तोह कहे करती की तू एक दिन शंकर से भी आगे जाएगा. तेरे विचार बहोत बदल गए सुदर्शन. दादी शायद खुश न हो ये देख के.", सुशीला ने मजे लेते हुए कहा था जिसपर बदले में सुदर्शन भी हंस दिया.

"ताई तेरे लाडले ने चाँद देख्या था आरर मैंने दिन में सितारे देख लिए. दिखाएं वाला दोनुआ ने एक हे था और दादी ने बता दिए के शंकर चाचा ेब हिस्ट्री हो गया इन मामला में. पद्धति रही शंकर शंकर और भरी पड़ गया अर्जुन. हाहाहा.. सच कहु तोह घाना हे सरीफ छोरा है, सरपंची वाला हिसाब न है उसका के जान लेके हे माने. माँ, तू तोह मिली होगी अपने भतीजे से?", छोटी का आशय था अर्जुन द्वारा बिजेन्दर और खुद उसको धुल चाटने से. साथ हे उसने बता दिया था के जिस चेहरे को चंद्रो देवी उदहारण मानती थी उसका बीटा एक कदम आगे हे निकला.

"जिस दिन तेरी गलती पता लगी थी उसी दिन मुझे एहसास हुआ था के वो लड़का तुझे मारना चाहता हे नहीं था. खुद हे सोच बीटा की इतिहास में जो भी हुआ था क्या उनका वंश तुझे ज़िंदा छोड़ देता अपने घर की िज्जात्त पर हाथ डालने के दुस्साहस पर? नहीं न? तेरे चाचा उसी दिन माफ़ी मांगने आये थे तेरी दादी और मुझसे. आधी रात को सीधा हवेली पर. अर्जुन को सब बाद में पता लगा और उसने मुझे गले लगा कर कहा था के तू उसका बड़ा भाई है और जो हुआ वो सिर्फ इसलिए क्योंकि वो कभी उस लड़की को दर्द में नहीं देख सकता जिसके साथ तू गलत करने लगा था. इतना बड़ा दिल तोह तेरे पिता का भी न था सुदर्शन?", अपनी माँ की बातों को सुन्न कर एकाएक सुदर्शन का दिल आत्मग्लानि से भर उठा. उसको वो वक़्त फिर से याद आ गया जब वो कैसे उन मासूम सी खूबसूरत लड़कियों को अपनी ताक़त और दबदबे के दम पर अनगिनत लोगो के बीच एकतरफा शिकार की तरह दबोचने लगा था. वह हर इंसान उसके खौफ से वाकिफ था. प्रशाशन तक कभी उसको रोक न सका था और न हे जवाब माँगा था उस से. लेकिन एक लड़के ने उसकी वो बरसो की कमाई हुकूमत ऐसे धवस्त करके रख दी थी जिसका परिणाम साक्षात् उसका अभी तक अपने पाँव पर खड़ा न हो पाना था.

"गलती तोह भारी हुई है मुझसे माँ और इसका पश्चाताप मैं रोज करता रहा जबतक वो लड़की खुद हे मुझसे मिलने ना आयी. बड़ी हे प्यारी बची है वो माँ और जब उसने मुझे भाई कह कर बुलाया तोह मैं फुट फुट कर रोया. सिर्फ अर्जुन हे वैसा नहीं है, वो लड़की भी बिलकुल उसके जैसी है. प्रीती नाम है उसका और मासूम होने के साथ उतनी हे निडर भी. उस दिन दोनों हे मेरे पास पूरा घंटा बैठ के गए. बेचारी मेरी हालत देख बार बार सॉरी बोल रही थी और उस से ज्यादा दुखी मैं हो गया. फेर तोह शंकर चाचा ने मेरे लिए अँगरेज़ डॉक्टर भी लगा दिए और बाकी तेरे सामने हे है माँ. एक बार तोह उम्मीद हे हार गया था लेकिन अब हौंसला है के खड़ा भी होऊंगा और जैसा तू पापा के बारे में कहे करती वैसा हे करने की मेरी कोशिश रहेगी.", सुदर्शन ने खुद हे अपनी कलाई पर ग्लूकोस की बोतल वाली नलकी लगाईं और इन दोनों की तरफ जैसे तैसे करवट करके लेट गया. गुड्डी को आज पहली बार अपनी इस संतान पर प्यार और गर्व हुआ था.

"तोह फेर तेरा भूत उतर गया सरपंची झोटा बन्न ने का?", सुशीला ने अपना स्टूल करीब करके सुदर्शन के माथे को साफ़ किया और सर थपकने लगी.

"हाहाहा.. के बाते करे है ताई? इंसान बन्न के जीना हे बहोत मुश्किल है फेर झोटा तोह बहोत दूर की बात. दादी बहोत खुश हुई थी जड़ मैंने पहली बार मेशी (झोटा) अपने खेत में धा दिया था. उस दिन दादी कहे थी की मैं शंकर बन्न सकू हु. बहोत धुरंदर रगड़े मैंने अगले 8-10 साल लेकिन इस चाचा के लाडले ने जिस तरिया मैंने ाले (गीले) लट्टे (कपडे) की तरिया धोया तोह साड़ी अकड़ बिखर के बिस्टेर पे आ गिरी. ताई अर्जुन की ताक़त तोह मैं बयान कर सकू हु थोड़ी बहोत लेकिन दादी ने मेरे से न्यू कहा था के मैं शंकर बन्न सकू हु. मतलब उस वक़्त भी व मेरे से प्रभावित कोणी होई थी. चाचा तगड़ा तोह है लेकिन जेंटलमैन आदमी लगे है. 50 थे वो और दादा होर 14-15 जड़ उनकी भिड़ंत होई थी. फेर दादी न्यू किस तरिया बोली?", सुदर्शन भी जाने कहा से बात कहा ले गया था. गुड्डी इस विषय पर बोलना नहीं चाहती थी लेकिन सुशीला ने आश्वस्त करके खुद हे बताना शुरू किया.

"15 की उम्र में शंकर और उमेद शर्त शर्त में पूरा खेत जोट दिया करते, घडी देख के. तेरी दादी की नजर में हमेशा ताक़तवर की ख़ास इजत्त रही है बीटा और तू अपने दादा की बात करे है न की वो लोग इतने थे आरर शंकर होर 50.. सरासर झूठ है. इतने होते तोह पुलिस 3-4 तोह गिरफ्तार करती लेकिन असलियत में वो थे हे 3-4 और मेरे पिता जी के साथ साथ तेरे दादा लोग 20 वो भी हथियार सुदा. ललकार के मारे थे वो सारे इन्हने और यु पता है तेरी दादी ने भी. मेरे पति और तेरे दोनों चाचा तोह सड़क पे अकेले हे शंकर ने कुचल दिए थे लेकिन तेरे पिता का शरीर साफ़ था. झोटा गिरा के तू खुद की ताक़त समझे था तोह खुद हे सोच शंकर तोह तेरे जिसे पहलवान ने टांग टेल धार के चीयर दे पालक झपकते हे.", सुशीला के दुःख गहरे थे लेकिन अब वो उस रास्ते पर चल रही थी जहा पश्चाताप और सकरात्मक दृष्टिकोण हे वाजिब था.

"हाँ ताई या बात मैंने कड़े भी न सोची की आपकी पीहर में भी कोई न बचा, अपनी तरफ तोह समझ लो पहले की दोनों पीढ़ी हे ख़तम हो गयी. नुक्सान उमेद चाचा के परिवार ने भी तय लेकिन शंकर चाचा की तरफ तोह कुछ न होया. सच में वो मिसाल है तभी दादी उनका आज तक सेज से ज्यादा करे है.", सुदर्शन जैसे ये baal-sulabh बात करके खुद हे सोचने लगा लेकिन सुशीला फीकी मुस्कान के साथ गुड्डी को देखने लगी जो जानती थी की पंडित जी के परिवार ने तोह जो खोया है वो सब उम्मीद से भी परे है सुदर्शन की.

"बीटा, युद्ध में जीतने वाला भी बहोत कुछ हारता है. पंडित जी ने रिश्ते खोये, शंकर ने प्यार, कौशल्या जी ने तोह पूछ हे मत और तू पीढ़ी की बात करे था? इन्दर भाईसाहब की तोह नेसल हे ख़तम हो गयी आने वाली. हो तोह शंकर जी की भी जाती लेकिन बचाव हो गया. इन्होने तोह कुछ भी शुरू न किया था फेर दुःख भी इन्हे मिले. भूल जा ये सब बीटा और इनका जीकर कभी न करियो किसी के साथ. तू अपने पापा की तरह बन्न न चाहे है न तोह उनकी एक छोटी सी नसीहत याद रखियो. लकड़ी की कारोबार दीमक की दूकान में न होता. शुद्धचार कभी भी बदले से ग्रसित दिमाग में नहीं उपजते. अब तू आराम कर बीटा और जो दिल से महसूस किया न तूने अर्जुन के लिए, शंकर चाचा और अपने भाई Bijender-Vikas के लिए... बस वो बरकरार रख बीटा. जीजी, 4 बज गए. अब तक माँ जी भी मुन्नी के साथ वह पहुंच चुकी होंगी.", सुदर्शन को भी अपनी ताई द्वारा सर सहलाना भला लग रहा था. अपनी माँ की बात सुन कर वो हे बोल उठा.

"ताई ने 5 मिनट थपकी दे लेने दे माँ. मैंने नींद आवे है फेर आप चले जइयो."

"हाँ ठीक है बीटा तेरे शरीर ने आराम की बहोत जरुरत है. डॉक्टर कहे था के इंजेक्शन देने पड़ते थे पहले सुलाने के लिए. सो जा बीटा मैं तेरे हे पास हु. ब्याह में आवेगा तोह अपने हाथ से खिलाऊंगी मेरे बेटे ने.", सुशीला ने गुड्डी को बैठे रहने को कहा और कुछ गुनगुनाती हुई उस विशाल पर्वत से इंसान को सुलाने लगी. सुदर्शन अपने अबतक के जीवनकाल में बस प्यार और अपनेपन से पूरी तरह दूर रहा था. माँ तोह हमेशा चाहती थी की औलाद उसके पास रहे बस राह भटकने वाले भी अपने हे थे.

.

.

"क्या सोच रही है तारा? कुछ परेशानी है तोह बता ऐसे सोचने से तोह कुछ होने वाला नहीं?", इधर घर में भी दोपहर का खाना हो चूका था और सभी आये हुए मेहमान या तोह अपने ठिकाने जा कर तैयारी में लगे थे या फिर आराम करने में. पंडित जी के niwas-sthaan पर तक़रीबन घर के हे लोग थे सिवाए कुछ ख़ास मेहमानो के. तारा फ़िलहाल पिछले हिस्से की ऊपरी मंज़िल पे अपने पुराने कमरे में हे थी और उसको ऐसे अकेले बिस्टेर पर लेते छत को घूरते देख कमरे में आयी अलका ने तन्द्रा भांग की. निचली मंज़िल पर सभी लोग अपनी अपनी पैकिंग में लगे थे और इस तरफ कोई न था.

"ऐसा तोह कुछ भी नहीं है यार अलका. बस सोच रही थी की अब इसके बाद क्या होगा? मैं इधर आने से पहले कैसी थी और अब बिलकुल अलग हु. आज शादी है और हमेशा हमारे साथ रेहनी वाली माधुरी दीदी अब हमे छोड़ कर नए घर चली जायेगी. हर सुबह उन्हें बहोत मिस करुँगी यार और एक नया मेंबर भी शामिल हो जाएगा तोह क्या बहोत कुछ बदल जाएगा?", तारा की बात में नए सदस्य वाला जीकर देख अलका उसकी बगल में बैठती हुई मुस्कुराने लगी.

"तुझे लगता है राधिका भाभी के आने के बाद बहोत कुछ बदल जाएगा? तुझे शायद इस बात की भी चिंता है की अर्जुन के साथ milna-bolna भी प्रभावित होगा. हैं न?", तारा अनमने ढंग से बस मुस्कुरा दी.

"देख यार अभी तोह ये घर भरा हुआ है इसलिए सोच भी उतनी हे उलझी हुई दिख रही है. भैया अब ज्यादातर रातें घर में रहा करेंगे लेकिन उनका अकेलापन उनके साथ न होगा. तू भी तोह चली जायेगी अगस्त महीने में, फिर तू इतना क्यों प्रभावित हो रही है? अर्जुन यही होगा और वो सबके साथ एक सामान हे रहने वाला है. ये कोई इंसानी या वैचारिक बदलाव थोड़ी न हो रहा है घर में. बस भाभी आ रही है और दीदी जा रही है.", अलका समझदार थी लेकिन तारा उसकी बात से कुछ असहमत.

"वो भी तोह जा रहा है शादी के 2 दिन बाद. पूरे एक महीने के लिए और अकेला हे. तू मेरी हालत नहीं समझ रही अलका. देख प्रीती तोह हमेशा हे यही होने वाली है, तेरा तोह लक्ष्य हे बिलकुल अलग है और ऋतू का स्पष्ट है की वो ज़िंदगीभर अर्जुन की रहेगी. क्या मैं फिर से ये दिन देख सकुंगी जिसमे मुझे वो प्यार मिलेगा जो पहले नहीं था लेकिन यहाँ नसीब हुआ?", तारा ने अपना दर्द तोह जाहिर कर दिया लेकिन वो सिर्फ उसका पक्ष हे था.

"तू क्या सोच रही है तारा? अर्जुन ने तुझे कभी मुझसे या ऋतू से अलग समझा? और तू कह रही है की ऋतू उसकी रहेगी लेकिन जानती है की अगर वैसा हुआ तोह ऋतू और अर्जुन के पास कुछ भी नहीं बचने वाला. ये परिवार और इसका हर इंसान न चाहते हुए भी अलग हो जाएगा ऋतू से. इतनी भारी कीमत तू चूका सकती है तोह बोल? बस एक बार गहराई से सोच कर देख की जब तेरे पास ये परिवार न हो, बुआ का परिवार तुझे बहिष्कृत कर दे और तेरे साथ साथ अर्जुन को भी शहर और ये सब लोग छोड़ने पड़ जाये तोह ऐसे रिश्ते का क्या मोल? ऋतू बस चाहत रखती है अर्जुन के साथ का. मिलना न मिलना किसी के भी हाथ में नहीं लेकिन इतना जरूर है की कीमत बहोत भरी चुकानी पड़ेगी अगर वैसा हुआ तोह. मैं नहीं दे सकती वो कीमत और न मैं मेरे पिता, दादा या किसी भी रिश्ते से अलग हो सकती हु. तूने हे कहा था के शादी होने तक तू अर्जुन के साथ बिना शर्त बस प्यार का रिश्ता रखेगी तोह आज क्यों तू अपनी हे बात से बेचैन है?", अलका के कठोर शब्दों ने तारा को तार तार करके रख दिया था. आँखों के किनारो से आंसू बिस्टेर पर गिरने लगे थे और होंठ ऐसे फड़फड़ा रहे थे जैसे अंदर से कुछ कहना चाहती हो लेकिन आवाज साथ न हो. फिर कुछ पल बाद हिम्मत समेत कर वो बोलने लगी.

"मैं स्वार्थी महसूस कर रही हु अलका. मेरा बड़ा दिल कर रहा है की अर्जुन मुझे अपने सीने से लगा ले और कह दे की वो हमेशा मेरा ख़याल रखेगा. आज दीदी शादी करके जा रही है इस घर से और मैं यही महसूस कर रही हु की ऐसा मेरे साथ भी होगा. मुझमे हिम्मत नहीं है अलका की कोई और इंसान मेरी आत्मा को महसूस करे. मेरे जिस्म पर मैं वो स्पर्श अर्जुन के सिवा किसी और का नहीं झेल सकती. मैं क्या करू अलका? मैं मानती हु ऐसा मुमकिन नहीं होगा और ऋतू का दर्द तोह कही ज्यादा है. वो उसके लिए हे ज़िंदा है फिर भी कभी न मुझे उसने टोका न किसी और को. मैं शादी नहीं करुँगी कभी.."

"शह्ह्ह्ह.. तेरे पास अभी 3-4 साल तोह वैसे भी पढ़ाई के लिए है और फिर बिज़नेस के लिए भी तोह दादा जी ने बुआ को मन लिया. वर्तमान में जीना सीख तारा और अपने भविष्य पर वह काम कर जिस से तू खुदको साबित कर सके. अर्जुन से तेरी शादी नहीं हो सकती लेकिन तेरी शादी किस से होगी या तुझे करनी है भी या नहीं ये तेरे हाथ में होगा जब तू खुदको स्थापित कर चुकी होगी. फिलहाल तू ज्यादा सोच मत और उठ कर त्यार हो जा. बुआ ने कहा है की तेरे दादा जी भी आ चुके है और तुझे उनके साथ हे पैलेस जाना है. Kal-parso तक जब वापिस सब पहले जैसा हो जाएगा तोह हम आपस में वैसे हे बात करेंगे जैसे पहले करते आये है. ऋतू खुद तुझे सलाह देगी और वो कभी गलत नहीं होती.", अलका ने अभी उसका चेहरा साफ़ किया हे था की तारा उसके सीने से लग गयी. कुछ पल दोनों हे ख़ामोशी से ऐसे रही लेकिन फिर रुपाली की आवाज ने उन्हें अलग कर दिया.

"ओह तारा तू अभी तक निक्कर में हे है? ये अलका तुझे बुलाने आयी थी लेकिन इसका भी कुछ नहीं हो सकता. वो तेरे चाचा जी बुला रहे है तुझे. चल जल्दी आ निचे और ऐसे मत आना, बुआ ने कहा है.", अब अलका भी हंस दी थी क्योंकि उस छोटी सी निक्कर में तारा की जाँघे हे ढकी थी बस और उसके कूल्हे तोह पूरे उभरे हुए स्पष्ट थे. तारा ने वैसे हे लापरवाही से तकिये के निचे से ब्रा निकाल कर रुपाली के सामने हे अपने सुडोल मॉटे उभारो पर पहनी तोह रुपाली झट्ट से भाग गयी. अब अलका भी खिलखिला कर हंस रही थी.

"सुधर जा ओह मिस बूबीए.. सुधर जा थोड़ा. बुआ भी जानती है के तू ऊपर और निचे पिंजरे नहीं पहनती जब कमरे में होती है तोह. थोड़ा ख्याल रखियो और चोली में भी ब्रा याद से पेहनियो लहंगे के साथ."

"पंतय नहीं पहन ने वाली और अगर मौका मिला न तोह किसी कोने में उठा लुंगी अर्जुन के लिए. चल अब तू जा के अपनी तैयारी कर. एक तोह पहले से इतनी गर्मी है ऊपर से चोली में भी ब्रा पह्नु." तारा बिलकुल सहज थी अलका के साथ बातचीत और उसके बाद इस मस्ती भरे माहौल से. अलका ने भी जाने से पहले पलटी हुई तारा के गद्दार मॉटे चुत्तड़ो पर एक करारा थप्पड़ जमाया और फुर्ती से भाग गयी.

'आउच.. साली तू लग हाथ मेरे एक बार.. Uff..kamini लाल हे कर दिए aahhh.",Tara ने तुरंत निक्कर सरका कर वो मटकी सा गोल कुल्हा आईने में निहारा तोह वह उँगलियों के निशाँ प्रकट होने लगे थे. हलके से मुलायम मांस को सहलाती हुई वो मुस्कुरा रही थी जैसे उसको ये भी पसंद हो. अब तारा के chacha-dada इत्यादि आ चुके थे तोह उसको अपने परिवार के साथ होना जरुरी हे था. तारा कुछ हे समय बाद आसमानी कमीज, सफ़ेद सलवार और गले में दुपट्टा पहने निचे आ चुकी थी. बैठक में अपने दादा जी से मिलने के बाद वो अपनी चची और चाचा के बीच हंसी ख़ुशी बतियाती रही और अर्जुन भी घर में दाखिल होने के साथ सभी से मुलाकात करके अपनी दादी के पास चला आया.

"आ बीटा आजा यहाँ. मेरा बीटा आज सुबह से बिना खाये पीये हे लगा हुआ है. रेखा, अर्जुन के लिए यही खाना भिजवा दे.", अर्जुन दादी के कमरे में आते हे चंद्रो देवी से मिला और फिर पूर्णिमा जी की बगल में हे बैठ गया. कौशल्या जी उसके सर पे हाथ फेरती हुई शाबाशी दे रही थी और चंद्रो देवी भी प्रशंशा भाव से उसको देखते हुए कहने लगी.

"कुछ भी कह कौशल्या, तेरी परवरिश की टक्कर नहीं. आजकल के लड़के तोह महफ़िल लगाने में व्यस्त रहते है और ऐसे मौको पर काम से पल्ला झाड़ कर बचते दिखेंगे. अर्जुन तोह वह भी बबिता के ब्याह में लगा रहा था और इधर भी देख रही हु की ये किस हाल में है. बीटा काम के साथ साथ खुराक भी जरुरी है. गर्मी का मौसम है तोह भूख चाहे काम हे क्यों न हो लेकिन खाना जरुरी है.", अर्जुन उनकी बात सुन्न कर बॉस हाँ में सर हिला कर ख़ामोशी से बैठा रहा.

"वैसे बहिन जी ख़याल तोह मैं पूरा रखती हु लेकिन इतना कुछ एकसाथ हो रहा है न तोह जिम्मवारी बढ़ हे जाती है. बस आज की हे बात है फेर तोह मेरा बीटा पहले से भी ज्यादा ध्यान रखेगा अपनी सेहत और खुराक का. वैसे बहुएं और बचे नहीं दिखाई दिए बहिन जी?", कौशलया जी बातचीत बढ़ा रही थी और इधर मुस्कान हे अर्जुन के लिए थाली लगा कर ले आयी. एक सादे सलवार कमीज और गले में दुपट्टे लिया मुस्कान साक्षात् मासूमियत की मूरत प्रतीत हो रही थी. अर्जुन के लिए वही छोटा सा स्टूल लगा कर उसपे थाली रखने के बाद मुस्कान ने एक टोलिया भी पकड़ाया. अर्जुन ने भी शिष्टाचार से धन्यवाद कहने के साथ भोजन शुरू किया तोह चंद्रो देवी भी इन्हे देख रही थी. बबिता भी यही कमरे आ बैठी थी हाथ में कॉफ़ी का कप लिए.

"मुन्नी तोह अभी इस बबिता के हे साथ थी और गुड्डी सुशीला आती हे होंगी सुदर्शन से मिल कर. वैसे तुमने ये ाचा किया कौशल्या की मुस्कान को यही रोक लिया. ाची लड़की है लेकिन मैं इसके साथ समय न बिता सकीय अभी तक. वैसे तू तोह बहोत रहती है न इसके साथ बबिता?", चंद्रो देवी ने बबिता को लगातार अर्जुन की तरफ देखते हुए पुछा था जिस पर बबिता थोड़ा हड़बड़ा गयी लेकिन फिर आदतन खिलखिलाती हुई बोली.

"दादी आपको किसी ने मन किया क्या मुस्कान के साथ रहने से? मैं तोह ये देख रही थी की इस अर्जुन का कोई समय न है खाने सोने का. वैसे मुन्नी काकी अभी माँ और गोलू के परिवार के साथ हे बैठी है. गुड्डी काकी भी उधर हे है. नानी आप कितने दिन तक रोकने वाली हो मुस्कान को यहाँ?", मुस्कान फिर से गरम रोटी लिए अंदर आयी तोह अपना नाम सुन्न कर ठिठक गयी. बबिता मुस्कुरा रही थी और अपने करीब कड़ी मुस्कान को कौशल्या जी ने हाथ पकड़ कर वही बैठा लिया.

"तुझे तकलीफ है क्या बबिता? तू भी रह ले अगर तेरा वह जी नहीं लगता तोह तू भी रह ले मेरे पास. हाँ ये मेरी बिटिया अभी कुछ दिन यही रुकने वाली है और बाद में मैं खुद हे इसको तेरे पास छोड़ने आउंगी. क्यों मुस्कान बीटा तुझे यहाँ मेरे साथ कोई तकलीफ है?", कौशल्या जी के इतने स्नेह को देख खुद चंद्रो देवी प्रशंसा करने लगी थी. मुस्कान भी कौशल्या जी के साथ hil-mil चुकी थी और बाकी घरवाले भी उसको उतना हे अपनापन दे रहे थे जिस से वो कही से भी कोई बाहरी व्यक्ति नहीं थी.

"मुझे तोह आपके पास रहना ाचा लगता है. हाँ बबिता दीदी भी मेरा ख्याल रखती है और उधर मैं ज्यादातर इनके साथ या अक्षरा दीदी के पास हे होती हु. अभी तोह जबतक कॉलेज से लेटर नहीं आता इतने मैं आपके हे पास हु. बीच में चली जाया करुँगी दीदी के घर bhi.",Muskaan की बात पर बबिता भी खुश थी. वो जानती थी की इस समय तोह खुद वो और अर्जुन हे इस लड़की की दुनिया थे जिसमे कौशल्या जी के आने से एक घनी छाया भी उसके सर आ गयी थी. अर्जुन की प्लेट में आखिरी निवाला देख वो तुरंत उठ कर चली गयी.

"बचे होते है तोह घर घर जैसा लगता है कौशल्या और सचमुच तुझमे गुण है जो ये मेरी बबिता तक तेरे पास दौड़ी चली आती है.", चंद्रो देवी की बात सही थी और इस बात पर पूर्णिमा जी ने भी जैसे अपनी सहेली की खिंचाई की.

"हां बहिन जी ये तोह बात पते की कही. आप उमेद और शालिनी को हे ले लो. यहाँ आने के बाद उन दोनों ने हे मेरी तरफ न देखा बस लगे हुए है अपने अपने में. आइशा जरा न घुलती मिलती किसी से लेकिन वो प्रीती और कोमल के हे पल्लू में बंधी घूम रही. ये सब इस कौशल्या का हे जादू है जो बाँध लेती है आनेवाले को.", कौशल्या जी ने अपनी सहेली की ब्याह पर हलके से ढोल लगते हुए हँसते हुए जवाब दिया.

"कौन बोल रहा है देख लो बहिन जी.? मैं तोह रस्मो तक में न बैठ सकीय और यही देख रही है सबकुछ. आप होती तोह मैं इसको भी कही न कही लगाती लेकिन चलो फिर सही. बबिता, दामाद घर आया हुआ है और तू है की उसको वह छोड़ यहाँ अपने में हे मस्त है."

"नानी, वो दूध पीटा बचा न है और बाकी बहोत लोग है उसके पास. रेखा मामी और कृष्णा मामी लगी हुई मेरी ससुराल की सेवा में और मैं तोह उन्हें पहले हे बोल चुकी के इसके साथ जाउंगी मैं ब्याह में. हाँ अर्जुन तेरी बुकिंग तोह न कर राखी पहले किसी ने?", बबिता के बेबाक जवाब पर अर्जुन तोह बगले झाँकने लगा लेकिन अंदर आती सुशीला ने जरूर बबिता के सर पे चपत जमा दी.

"ओह ब्याह हो गया लेकिन तेरी अकाल न बढ़ी. थोड़ा तोह सोच के बोलै कर और अपने पति के साथ आयी है तोह उसके साथ हे जायेगी. अर्जुन को 100 काम होंगे तोह फेर वो तुझे धोता फिरेगा या काम करेगा?"

"मैंने इसका हाथ पकड़ रखा माँ? तू भी साथ चल पढ़िए जे दिल करे तोह लेकिन मैं न जाती उनके साथ. Chacha-sasur कार में हे बीड़ी फूंके है और मैं पेट से हु. पसंद न मैंने यु सब. बाकी हाँ अर्जुन बिजी है तोह मैं विन्नी, कोमल या किसी के भी साथ चली जाउंगी.", बबिता ने मुँहफट अंदाज में जो बात कही थी वो सुन्न कर कौशल्या जी को भी आपत्ति हुई लेकिन बबिता से नहीं.

"सुशीला ये ठीक बोल रही है. टाइम मिले तोह इसका जीकर अपनी संधान से करियो. चूल्हे की आंच अलग चीज है लेकिन ये beedi-cigrattee वाला हिसाब गलत है जब इसके पाँव भरी चल रहे हो. बीटा, तू अर्जुन के हे साथ जाइयो लेकिन पहले ये बाकी सबको छोड़ दे उधर. संजीव अभी इसके साथ जाएगा और तू थोड़ा आराम कर ले. रात में ज्यादा घूमना फिरना भी नहीं udhar.",Kaushalya जी को तोह अभी से चिंता हो रही थी जिस पर सभी के साथ अर्जुन भी मुस्कुरा रहा था. उसके मुँह से अचानक हे निकल गया.

"अभी तोह दीदी का सेकंड मंथ हे है दादी."

"तुझे ये सब बड़ा पता है रे.", कौशल्या जी हैरत से देख रही थी अपने पौटे को जो अब झेंपता हुआ इधर उधर देख रहा था.

"वो कल सुन लिया था दादी मैंने जब बबिता दीदी उधर ये बात बता रही थी. और रेणुका बुआ को जब डॉक्टर के दिखने गया था तोह उन्होंने भी बुआ को बोलै था के इस बात को दिमाग में मत दाल लेना की हर वक़्त आराम हे करना है. घुमते फिरते रहना है और ाची डाइट लेनी है. इसलिए मैंने ये कह दिया.", अब कौशल्या जी को भी पूरी बात समझ आयी थी. आखिर रेणुका भी पेट से थी और अर्जुन भी डॉक्टर के लेके जाता था अपनी बुआ को उनकी नजर में.

"चल कोई बात नहीं लेकिन ये महिलाओ वाले मसले में न हे बोलै कर. मुस्कान बीटा, तेरी ललिता आंटी को बोल के वो तैयार हो जाये. अर्जुन उसके साथ संजीव और जो जाना चाहे उन्हें वह छोड़ आएगा. अभी से निकलना शुरू करेंगे तोह टाइम रहते तैयारी होगी. 7 बजे घुड़चढ़ी है फेर.", समय 5 होने वाला था और अर्जुन भी उठ गया अपनी जगह से.

"मैं हे जा रहा हु भैया के पास दादी. फिर एक और चक्कर लगाने के बाद मैंने गाडी पे फूल भी लगवाने है. भैया और भाभी को मैं हे लेके आऊंगा यहाँ घर अपनी कार में.", अर्जुन जाने लगा तोह कौशल्या जी ने फिर से रोक लिया.

"पैसे लेता जा."

"वो होटल वाले ने मुझसे लिए हे नहीं क्योंकि छोटे दादू ने उन्हें मन कर दिया था. 50 हजार पड़े है वैसे के वैसे. बाद में हिसाब दे दूंगा. आप लोग उठेंगे तोह बाकी तैयार होंगे नहीं तोह मुझे नहीं लगता अगले एक घंटे तक कोई निकलने वाला है.", अर्जुन ये बात कह कर दौड़ गया जिस पर कौशल्या जी खुद भी कड़ी हो गयी.

"हाँ ये भी सही है. बहिन जी आप मेरे और पूर्णिमा के साथ हे चलिए. राजू ने गाडी बहार हे लगवा राखी है. देवकी.. देवकी तैयार हो गयी क्या?", उनके कहने के साथ हे बगल वाले कमरे से दामिनी, देवकी और अनामिका अपने बेटे के साथ इधर आ गयी. वो लोग तैयार थी और बैग उनके हाथ में थे.

"जी सब तैयारी हो गयी है जीजी. आपके कहने का हे इन्तजार था."

"अनामिका बिटिया बचे के अतिरिक्त कपडे रख ले. तुम लोग शायद सुबह देरी से हे वापिस इधर आओगे. चलो बहिन जी हम चलते है, ये मधु का परिवार भी जा चूका. आपके देवर जाने अकेले बैठे क्या हिसाब किताब करने में लगे है.", बैठक में सचमुच रामेश्वर जी अकेले हे बैठे थे और डायरी में कुछ लिखने में व्यस्त थे.

"रामेश्वर, आज तोह रहने दे ये सब. एक बार घर का चक्कर लगा ले कौशल्या.", चंद्रो देवी ने समझदारी वाली बात कही थी और शादी वाले घर में ढेरो सामान और गहने के साथ साथ रूपया पैसा होना लाजमी था. उनकी बात का अर्थ भी यही था की कुछ खुला न रहा हो.

.

.

"छोटे चल आजा इधर और 2 घडी अपने भाई से भी बतला ले.", अर्जुन यहाँ अपने भैया को बुलाने आया तोह उनके पास बिजेन्दर, विकास, लकी और दीपक भैया को पहले हे मौजूद देख थोड़ा हिचकिचाता सा अंदर दाखिल हुआ. नए बीएड पर दूल्हे की पगड़ी, पारदर्शी सांचे में विवाह का सूट और चांदी जड़ी मोजरी राखी थी. बाकी सभी भी अपने अपने वस्त्र लिए हे आये हुए थे. दोस्तों के वह होने पर भी संजीव के चेहरे पर अलग सी बेचैनी साफ़ देख सकता था अर्जुन. सभी से हाथ मिला कर वो अपने बड़े भाई की बगल में हे आ बैठा.

"मैं तोह आपको हे बुलाने आया था भैया लेकिन लगता है जैसे आप हे कुछ घबराये हुए है. बिजेन्दर भैया आपको तोह एक्सपीरियंस है, थोड़ा भैया को भी हौंसला दो.", अर्जुन ने मजाक में ऐसा कहा था और बिजेन्दर हँसते हुए संजीव को वो इशारा करने लगा जिसका मतलब था 'देख ले ये समझदार है'

"ऐसी बात नहीं है यार. लेकिन पता नहीं यु लग रहा है जैसे किसी मिशन पे जा रहा हु और वह हर तरफ हर नजर मुझे हे घूरती होगी. पब्लिक लाइफ जीरो हे रही है तोह बस थोड़ा अजीब लग रहा है.", संजीव ने अपने दिल की हालत छोटे भाई से बताई तोह लकी ने पीठ थपथपाते हुए जवाब दिया.

"भाई मैं तोह कहता हु अभी से 2 घूँट लगा ले फिर कोई परेशानी नहीं होने वाली. जानता हु की ये बहोत बड़ा सफर होने वाला है तेरे लिए आज लेकिन ये तोह सभी को तये करना पड़ता है. बिजेन्दर भाई ने बताया था न के ये कितना ख़ुशी ख़ुशी तैयार हुआ था लेकिन हवा इसकी भी खराब हुई थी जब घोड़ी पर बैठा. इसके दोस्तों ने बियर पीला कर हौंसला दिया था और उसके बाद सब आराम से हो गया.", लकी की बात से बिजेन्दर सरोकार रख रहा था लेकिन अर्जुन नहीं.

"ऐसा है भैया की छोटा मुँह और बड़ी बात. भैया वह तैयार होने के बाद मंदिर जाएंगे जहा शराब का सेवन करके जाना गलत होगा. ऊपर से इन्हे घोड़ी पर एक छोटे बचे के साथ भी होना है तोह ऐसा करना कटाई ठीक नहीं. गर्मी का समय है बेशक मंदिर से पैलेस 500 मीटर हे होगा पर उतनी दुरी आधे घंटे से काम में तोह पूरी नहीं होने वाली नाचने गाने वालो की वजह से. डिहाइड्रेशन हो जायगी तोह 6-7 घंटे बैठोगे कैसे उधर?", अर्जुन की इतनी दूर की सोच सुन्न कर संजीव जहा तारीफ से देख रहा था वही लकी हैरत से.

"तू अपने भाई को हौंसला दे रहा है या डरा रहा है बे? अबे शादी है इसकी आज लेकिन तू इसको डरा के यही चिपका दे.", लकी के जवाब पर विकास हंसी न रोक सका लेकिन अब अर्जुन ने हे आगे बात बधाई.

"ऐसा है भैया की राधिका भाभी प्यार करती है भैया से और भैया भी. ट्रेनिंग का समय इन्होने इस दिन के सपने देख कर हे तोह बिताया होगा. जब आप इतने बड़े सपने को पूरा करने चले हो तोह फिर किसी और सहारे की जरुरत हे क्यों पड़ेगी? नजरे तोह बेशक सभी की रहेंगी क्योंकि ये मुख्या किरदार जो है आज और उतनी हे नजरे भाभी पर होंगी लेकिन उन्हें तोह बहोत ख़ुशी है और वो तोह वह सब चीज अपने हिसाब से करवा रही है क्योंकि ये इन दोनों का सबसे बड़ा और ख़ास दिन है. ाचा लगेगा जब भैया वह भाभी की बगल में बैठे होंगे उस महकते माहौल में, लेकिन सिर्फ िंखे मुँह से शराब की दुर्गंद आये? भैया आप मिशन पर नहीं जा रहे. इस घर को वो ख़ुशी दिलाने जा रहे हो जिसके लिए सभी ने कितनी म्हणत और सेवा की है. चलो खड़े हो जाओ और ड्यूटी ज्वाइन करो क्योंकि लीडर आप हो.", अर्जुन ने अपने भैया को एक तरफ से अपने साथ लगते हुए बात पूरी कही तोह संजीव भी फकर से उसको जोर से भींचने के बाद उठ खड़ा हुआ.

"तोह फिर हम लोग यहाँ क्या कर रहे है? चलो बिजेन्दर भाई तुम भी गाडी निकालो और लो सबको साथ. दीपक यार तू भी उधर हे आजा अंकल आंटी जी को लेके. लकी और विकास मेरे साथ हे चल रहे है.", संजीव के चेहरे पर आयी ये नहीं ऊष्मा देख लकी भी प्रशंशा से इन दोनों को देखने लगा.

"तू न कुछ बने या न बने लेकिन मोटिवेशनल स्पीकर जरूर बन्न सकता है अर्जुन. और सही बात है की अगर ये मिशन हे है तोह फिर इसको होश में हे पूरा करते है. चलो भाई लोगो उठाओ अपने दूल्हे मियां का taam-jham और चलते है मिशन राधिका भाभी पर.", लकी ने ये इतनी तेज कहा था की बगल वाले कमरों तक उसकी आवाज गूंजी थी. नैरा लगाने में बाकी सभी ने साथ दिया और इस बार निचे तक सबको पता चल चूका था की ये लड़के क्यों शोर मचा रहे है. सारा सामान उठा कर पूरी मंडली बहार वाली तरफ से निचे आयी तोह बहुत से लोग तोह निकल भी चुके थे. अर्जुन की कार में संजीव, लकी, ललिता जी और अलका बैठे तोह उनके पीछे हे शंकर जी अपने साथ रेखा, कोमल, ऋतू, रुपाली को लिए. उमेद जी भी बड़ी गाडी में अपनी माँ, चची, चंद्रो देवी, रेणुका और राजेश्वरी को लिए थे तोह उनके बाद स्वयं राजकुमार जी माधुरी, शालिनी, कृष्णा जी, आरती को. बिजेन्दर ने अपनी माँ, काकी और बीवी के साथ साथ ऋचा को भी लिया था. सफारी को भी पूरी तरह से भर के नरिंदर जी निकले तोह उनके आगे आगे उनके पिता मुस्कान, छोल साहब, विनीता और कृष्णेश्वर जी को. फिलहाल घर में बस बबिता हे बची थी जिसके साथ प्रियंका थी. प्रियंका हर कमरे का निरिक्षण करने के बाद वही बैठक में बबिता के बगल आ बैठी.

"पिंकी तुम यही हो? बाकी सब तोह चले गए फिर तुम अकेली यहाँ?", बबिता आराम से पाँव पसरे चैनल बदल बदल कर देखते हुए पूछने लगी.

"अकेली कहा हु दीदी, आप भी तोह हो मेरे साथ यहाँ. हाहाहा.. वैसे दादी ने कुछ सामान ले कर आने का कहा है कच्चे दूध के साथ. बस वो अंकल आने वाले होंगे थोड़ी देर तक और इतने मैं आपको भी कंपनी दे दूंगी. वैसे तोह बहार सिक्योरिटी के लिए एक आदमी है और अर्जुन भी जल्दी हे आ जायेगा. लेकिन वो थोड़ा रुकेगा इधर कुछ काम से तोह अगर आप चाहो तोह मेरे हे साथ चल पड़ना. प्रीती की फॅमिली अभी इधर हे है और उनके साथ हे चलेंगे.", प्रियंका के पास एक खाड़ी का झोला था जो बता रहा था के इसमें ख़ास सामान है जिस वजह से वो सबसे अलग जाने वाली थी. बबिता ने टेलीविज़न बंद करके सोफे पर हे चौकड़ी जमा ली.

"मेरे सा गर्मी न सेहन होती पिंकी इसलिए मैं न गयी अभी. अर्जुन ने बताया था के मार्किट से 2 लड़के आएंगे ऊपर कमरा सजाने के लिए तोह अगर वो पहले आ जाये तोह उन्हें संजीव का कमरा दिखा दू. वैसे यहाँ घर पे कोई रुकेगा नहीं दुल्हन की कदम रसम के लिए? महारी तरफ तोह दिया भी जला के रखते है और घर खली भी न छोड़ते.", बबिता के ऐसे सवाल पर प्रियंका ने सहमति जताई.

"हाँ दीदी क्यों नहीं लेकिन उसके लिए ताई जी और दादी जी के साथ कुछ और लेडीज भी पहले आ जाएँगी घर पे. माधुरी दीदी भी आएँगी यहाँ विदा लेने के लिए. हाँ तब तक जरूर घर खली रहेगा पर चिंता वाली बात नहीं है. दोनों घरो में पहरेदार है और प्रीती के घर के बहार भी. हाँ आपके जैसे रिवाज तोह मुझे नहीं पता की हमारे होते है.", प्रियंका के स्पष्टीकरण पर बबिता बस मुस्कुरा दी लेकिन अपने जिस्म पर लगातार तिकी उसकी निगाहो को देख बबिता ने आखिर पूछ हे लिया.

"ब्याह में तोह यही होना चाहिए पिंकी. जब सरे हे जा रहे है तोह फेर एक क्यों पीछे रुके? वैसे तू बड़े ध्यान से कुछ देख रही है. अगर कोई सवाल है तोह पूछ ले झिझक न.", अब प्रियंका बगले झाँकने लगी थी जैसे उसकी चोरी पकड़ी गयी हो. चुन्नी को ऊँगली में घूमती वो जवाब देने से बचना चाह रही थी.

"क्या सोच रही है बेबे? तगड़ी हु या कुछ ख़ास है मेरे में जो तू आज हे देख सकीय?", बबिता को इस तरह मुस्कुराते देख और घर के इस एकांत में प्रियंका ने थोड़ी हिम्मत करके पूछ हे लिया.

"वो मैं बस देख रही थी दीदी की आप तोह माधुरी दीदी से भी थोड़ा ज्यादा भरी हुई हो. मतलब आप सुन्दर भी बहोत हो लेकिन इतनी .."

"मैं लम्बी तगड़ी हु और ऊपर से मेरा जिस्म भी भरी है. यही कहना छह रही है न?"

"नहीं नहीं दीदी.. मेरा मतलब आपकी तारीफ हे है पर आपके हस्बैंड भी आपके बराबर खड़े होते है तोह वो थोड़ा सा कमतर हे लगते है. वो भी हेअल्थी है लेकिन 19-20 का फरक तोह है हे. आपको परेशानी नहीं होती?"

"होती है परेशानी तोह. कपडे न मिलते सही से हर जगह और मैं गोलू के पीछे मोटरसाइकिल पे न जा सकती क्योंकि एक क्वांटल वजन है मेरा, ज्यादा फैलाव की वजह से. डबल बीएड पे कल को मेरे पति के पास जगह न बचेगी बचा होये बाद. लेकिन सच कहु तोह मुझे जरा भी दिक्कत नहीं होती मेरी बॉडी सँभालने में."

"हाँ वही तोह मैं कहना छह रही थी की आप फिट भी बहोत हो. मतलब वो लड़कियों वाली बात कहु तोह मुझे खुद परेशानी होती है अपने उप्पेर बॉडी से. लेकिन आप तोह मेरे से भी ज्यादा है उस हिस्से में."

"हाहाहा.. जब भोली है तू पिंकी. सीना तोह भरी हे होता है लेकिन इसके हिसाब से मेहनती भी होना पड़ता है. तेरा 36 होगा मेरा 44 है लेकिन फेर भी वजन महसूस न होता. हाँ तू भी जब घरवाले पसंद करे तोह थोड़ा तगड़ा हे देखियो बहिन. कोई तिल्ली जैसा तोह तुझे भी संभल न सकेगा जिस तरह गोलू जैसा तगड़ा पहलवान भी तू मेरे लिए 19 बता रही जो की सच भी है.", बबिता की बेबाक बातें सुन्न कर प्रियंका सहजता से मुस्कुराई जैसे वो इस चर्चा से अब भाग नहीं रही थी.

"वो तोह घरवाले हे डीडे करेंगे दीदी लेकिन इतना जरूर है के मेरी मर्जी शामिल होगी. वैसे आपकी बात भी सही है के फिट रहना जरुरी है इसलिए मैं घर के काम करने के साथ थोड़ी एक्सरसाइज भी करती रहती hu.Utni तोह नहीं जितनी अलका और ऋतू करती है पर कोमल के साथ थोड़ा बहोत फिट रहने की कोशिश रूटीन से करती हु."

"करती भी रहियो नहीं तोह ये खरबूजे अगर पपीते बने तोह साल बाद हे पति बहार मुँह मारने लगेगा. औरत इतने हे सुखी है जितने वो सही है. बेडोल हुई नहीं के मरद अनदेखी करना शुरू. शायद कोई बहार आया है.", बबिता के कान भी सचेत थे जिसने यही से बहार गेट पर किसी के आने का अनुमान लगा लिया. प्रियंकर तुरतं उठी अपनी दुपट्टा सही करती हुई. बबिता भी उसके साथ बहार आँगन में चली आयी तोह मुनीर वह साधुराम के बेटे से पूछताछ कर रहा था जिसके हाथ में मिटटी का कलश और एक दूध का डोल्लू था.

"अंकल जी इन्हे दादी माँ ने हे ये सामान लाने को कहा था. भैया आप ये मुझे हे दे दो.", प्रियंक आगे बढ़ी तोह देखा की एक गोरी और भरे हुए शरीर की लड़की भी वह थी. ये काजल थी जिसके हाथ में कुछ थैले थे शायद नए कपड़ो के. मिन्दर आगे बढ़ कर वो सामान देने लगा लेकिन काजल की नजरे भी घर में taak-jhaank करती रही. जैसे उसको जो देखना था वो वह कही छिपा न हो.

"काजल, वो डूब भी दे जरा थैले से निकाल कर.", मिन्दर ने काजल से ये कहा तोह वो जैसे होश में आयी लेकिन बबिता की पारखी नजरे उसके चेहरे को पढ़ चुकी थी. काजल ने सकुचाते हुए अख़बार में लिपटी दूर्वा खुद पकड़ाई तोह बबिता ने हे उसके हाथो से ली.

"उनले को धन्यवाद जरूर कहना हमारी तरफ से और तुम्हारा भी शुक्रिया भैया जो ये सब देने खुद आये.", प्रियंका की बात पर मिन्दर ने बस हाथ जोड़ कर सर हिला दिया. और फिर दोनों भाई बहिन मोटरसीले पे सवार हो निकल चले अपने रस्ते.

"बबिता दीदी ये शायद अर्जुन और आपके भैया वाली कार हे इधर आ रही है.", प्रियंका के ऐसा कहने पर बबिता के चेहरा हे उतर गया. दोनों कार ठीक वह आ रुकी तोह बिजेन्दर ने बबिता के सभी इरादों पर पानी फिरते हुए कहा.

"तुम दोनों मेरे साथ हे चलो. बबिता दीदी तुम संजीव से बड़ी हो तोह घोड़ी से पहले तुम्ही उसका तिलक करोगी. तब तक तैयार भी होना पड़ेगा और छोटी दादी ने बोलै है के प्रियंका को भी लेता औ क्योंकि ये पिछली सीट पर नाजुक सामान के साथ अकेली हे बैठेगी. अर्जुन तू करवा ले भाई जो काम करवाना है फेर जल्दी करियो आने की.", बिजेन्दर की बात सुन्न कर प्रियंका फुर्ती से बैठक की तरफ लपकी और बबिता उतरा हुआ मुँह ले कर अगली सीट पर जा बैठी. अर्जुन ने आँखों के इशारे से हे उसको आश्वस्त किया था के वो उसकी नाराजगी दूर करेगा. प्रियंका सामान ले कर आयी तोह उसको खुद अर्जुन ने हे पिछली सीट पर बैठाया. 2 लड़के विभिन्न फूलो से भरा बड़ा सा बोरा लिए मोटरसीले पे यहाँ आ रुके थे.

"पहले तोह आप लोग मेरे साथ ऊपर वाले कमरे में चलो. बस थोड़ा तेजी से काम करना भैया और उसके बाद ये कार सजनी है आगे की लाइट से लेकर डिक्की तक.", अर्जुन के कहने की हे देरी थी की दोनों लड़के उसके साथ हे लपके.

"कार के लिए तोह अभी 2 लोग और आ रहे है. अंकल जी ने पहले हे बता दिया था के सारा काम 20-25 मिनट में पूरा करना है. आप बस कमरा दिखाओ और हम ज्यादा समय नहीं लेंगे.", अर्जुन भी उनकी बात से खुश था और अब उसके पास पर्याप्त समय था नहाने के लिए क्योंकि भैया की घोड़ी का समय 8 बजे का था और गौरव जीजा की 7:30. उसकी ये bhaag-daud अभी तक पूर्ण सफल रही थी बस कुछ समय बाद मुख्या कार्य प्रारम्भ होने वाला था और वह बहोत कुछ ऐसा भी घटने वाला था जिस से अर्जुन पूरी तरह अनभिज्ञ था.
 
अपडेट 191

Baraati-Gharaati

पंडित जी के परिवार की अधिकतर महिलाये और लड़कियां शादी के स्थान से कुछ हे आगे धर्मवीर सांगवान जी के निजी फार्महाउस पर पहुंची थी. सिवाए माधुरी और उनको तैयार करने वाली छोटी बहनो और पार्लर वाली के. ये लोग वही शादी के पैलेस में एक तरफ आरक्षित 10 कमरों वाले हिस्से में ठहरी थी और उनमे से कुछ कमरे खुद घर के बड़ो के लिए थे जिनमे कौशल्या जी प्रमुख थी.

यहाँ शादी स्थल पर काम अभी तक जोरो शोरो से चालू था और खुले हिस्सों को लाल लटकन वाले शामियानों के साथ अनेको झूमर से सजा कर ये ख़ास भव्य रूप दिया गया था जिसमे भरपूर शाही एहसास था. गुजरते समय के साथ साथ कैटरिंग कंपनी के ठेकेदार अपने सर्विस स्टाफ और मैनेजर इत्यादि के साथ एक बड़े हिस्से में मीटिंग करते दिखे. हर व्यक्ति अपनी एक ख़ास वर्दी में था, चमकते जूते और साफ़ चेहरों के साथ. यही से पता लगता था के इस बड़े नाम को हे क्यों Shankar-Umed ने खासतौर पर चुना था. 7 समंदर नाम की ये कैटरिंग जितनी विख्यात थी उतना हे अपने काम और मेजबानी के लिए अचूक. एक तरह से यहाँ हर वेटर और खानसामे की परीक्षा हे हो रही थी.

इस बीच सबसे पहले पधारे दिग निर्मल सिंह, अपने ख़ास लश्कर के साथ और उनकी मुलाकात भी पहले से हे छोल सतीश पूरी से तये थी. उजली सफ़ेद कमीज और गहरे समंदर के रंग सी नीली पतलून में हमेशा की तरह तेज तरार सिंह साहब ने सामने वाले मित्र से भी उतनी हे गर्मजोशी से हाथ मिलते हुए अपने साथ आये एक लम्बे फौजी से व्यक्ति से परिचय करवाया.

"ये है जयबीर सिंह, छोल साहब. जयबीर जैसे मैंने समझाया था तुम्हे इस पूरे पैलेस को अंदर और बहार से सुरक्षा प्रदान करनी है. लेकिन खासतौर से ये ध्यान जरूर रखना के विश्ष्ट मेहमानो और आयोजकों के हिस्से के भीतर की तरफ तुम्हारा कोई व्यक्ति कदम न रखने पाए. परिणाम तुम्हारी सोच से भी परे हो सकते है ऐसी चूक पर. और तुम्हे छोल साहब को हे रिपोर्ट करना है.", जयबीर जहा पहले बड़े हे जोश से छोल साहब से हाथ मिलकर मिला था वही निर्मल सिंह जी की वो चूक वाली बात सुन्न कर चेहरे पर anishchit-ta के भाव आ गए.

"सर, जैसा आपने बताया है की यहाँ ati-vishisht लोग आने वाले है तोह कही कही उनके साथ भी मेरे सिक्योरिटी पर्सन्स करीब होंगे हे. मतलब आप जरा विस्तार से बताये तोह मैं पूरी कोशिश करुँगी की बाल बराबर भी गलती न होने पाए.", जयबीर सिंह की बात का जवाब खुद छोल साहब ने दिया.

"बीटा बात ऐसी है की जब ati-vishisht लोग आएंगे तोह क्या वो बिना सुरक्षा के आएंगे? अपने सिंह साहब को हे ले लेते है इस बात पर. परिवार के साथ आएंगे तोह सरकारी गार्ड और ड्राइवर साथ हे होंगे. लेकिन वो जगह देख रहे हो जहा एक कतार से गाड़ियां कड़ी है?", छोल साहब की बात कुछ हद्द तक जयबीर को समझ आ गयी थी और यहाँ से 250-300 गज दूर उस खुले हिस्से को देखने के बाद जयबीर ने भी गर्दन हाँ में हिलाई.

"वह तक हे हरेक बाहरी सिक्योरिटी वाले की सीमा है. ये एक तरफ 1000 से ज्यादा लोगो के लिए 3 खुले पंडाल है और वो दायी तरफ जहा कमरे है वह अतिथि रुके है. इनके भीतर कोई गार्ड नहीं चाहिए लेकिन घेरा बराबर वो भी बीच राह में नहीं. हाँ ये जो बड़ी बिल्डिंग है इसमें हे भोजन और बैठने आदि का प्रबंध है और अंदर बस तुम्हारी हे मौजदगी हो अपने किसी खास व्यक्ति के साथ. छत पर जरूर 4-6 लोग लगा देना लेकिन वो किसी को तोके नहीं अगर चहल पहल तक की बात हो तोह. यहाँ प्रसाधन कक्ष की तरफ भी कोई सुरक्षाकर्मी ना जाए. पार्किंग की और सभी के लिए 4 टॉयलेट बने है उनका प्रयोग तुम्हारे लोग कर सकते है. गेट के बहार भी गाड़ियां लगेंगी और पिछले हिस्से में भी चारदीवारी 5 फ़ीट की है तोह वह निगरानी रेहनी चाहिए. निर्मल जी अपने जयबीर के पास आज के लिए कितने व्यक्ति है?", सभी नक्शा ाचे से समझने के बाद उन्होंने जरुरी सवाल जयबीर की जगह निर्मल जी से हे किया.

"मैंने तोह 200 आदमी कहे है छोल साहब. पंडित जी ने तोह उन्हें भी ज्यादा बताया लेकिन मेहमानो की लिस्ट देख कर मुझे ये भी काम लग रहे है. लो जी पंडित जी और उनके भाई साहब भी आ गए.", भाई साहब से उनका आशय था धर्मवीर सांगवान जी से जो आज ठीक रामेश्वर जी की हे तरह होल्स्टर में रिवॉल्वर पतलून के एक तरफ टाँगे इधर हे आ रहे थे. ये लोग तोह अभी से पूरी तरह तैयार थे और जयबीर बस लगातार रामेश्वर जी को हे देखता रहा. जैसे हे वो करीब आ खड़े हुए तोह दोनों हाथ उनके पाँव पर लगता वो उनसे आशीर्वाद ले कर हे सीधा हुआ

"कैसे हो जिबिर बीटा? निर्मल भाई, ये तोह अपना हे बचा है. स्टार सिक्योरिटी वाले दिल्ली से बहार कबसे सुरक्षा देने लगे जयबीर?", पंडित जी की बात सुन्न कर वो शर्मा रहा था लेकिन फिर मुस्कुराते हुए उसने जो कहा उस पर बाकी सभी हंस दिए.

"सुरक्षा करने वालो को हम कैसे सुरक्षा दे सकते है सप सर? ये तोह बिलकुल नहीं मालूम था के आपके यहाँ सेवा देनी है. अब तोह कुछ समझने की भी दरकार नहीं है सर. मैं जानता हु की प्रबंध कैसे रखना है. परिवार से फांसले पर और बाकी संदिघ्ध जो भी लगे उसको एक तरफ. समय काम हे है इस हिसाब से तोह मैं आपसे इंतजाम करवाने के बाद हे मिलता हु सर. क्या कुछ सुरक्षा विशेष लोगो के लिए भी रखनी है सर?", जाने से पहले यही आखिरी सवाल था जयबीर को और पंडित जी बस मुस्कुरा रहे थे.

"उनसे हे लोगो को सुरक्षित रखना है बीटा तुम्हे. उनके हाथ कोई संदिग्ध लगा तोह फिर तुम्हारी हे खामी मानी जायेगी. इन्दर से तोह तुम मिल चुके हो न पहले?", ये नाम सुन्न कर जयबीर ने सर झटका और जहा से आया था वापिस उधर हे मदद चला. उसकी तेज चाल अपने हे लोगो की तरफ थी जिन्हे वो जल्द से जल्द समझा कर मुस्तैदी से काम पे लगाने वाला था.

'बेडा गरक हो जयबीर तेरा. शेरो के झुण्ड अगर खुदके हे पहरेदार गलती कर बैठ तोह जाने अंजाम क्या होगा? दिग साहब नाम पहले हे बता देते तोह कुछ सोचता भी लेकिन अब ओखली में सर दे दिया है तोह मूसल से क्या डरना.', बेचारा बड़बड़ाता हुआ जा रहा था और इधर पंडित जी अपने इन मित्रो के साथ बातचीत सुनते हुए भी जयबीर को जाते देख रहे थे.

"6 बजने वाले है सतीश और जैसा तये हुआ है साढ़े 7 बजे संजीव मंदिर पहुंचेगा और उसी समय वह से गौरव की घोड़ी को ले कर बरात इस और चलेगी. आधा पौने घंटा वो लोग naach-gaa भी लेंगे तोह फिर भी सवा 8 या साढ़े 8 तक बाराती गेट पे होंगे. ललिता राजकुमार के साथ उधर सभी बेटियों का होना भी जरुरी है. बताओ अब मंदिर से तुम्हारी भाभी को इस तरफ मैं ले कर औ या तुम करोगे ये काम?", पंडित जी ने थोड़ी देर पहले हे अभिषेक से हुई बातचीत का जीकर करते हुए ये सब बताया तोह जवाब में छोल साहब ने ना में गर्दन हिला दी.

"आप यहाँ देखिये भाई साहब और उधर मंदिर से संजीव की बरात लेकर मैं खुद भाभी जी के साथ हे आऊंगा. पैसे वारने में आप कर लो कंजूसी लेकिन बचे नाचने गाने का ये अवसर नहीं जाने देंगे और भाभी जी का वह होना आवश्यक भी है. आप चर्चा कर लो एक बार बच्चियों से या किसी एक से भी राये ले लोगे तोह वो बता देंगी की उनमे से कौन यहाँ रिबन कटवाएगा और कौन वह अपने भाई की घोड़ी के सामने नाचते गाते आएगा. कुछ कुछ आईडिया तोह मुझे प्रीती ने दे हे दिया था दोपहर में.", छोल साहब की बात पर सांगवान जी भी सहमत थे और हँसते हुए उन्होंने भी कहा.

"भाई साहब मेरे घर में भी ये सब हे चल रहा था. परम को मरीना ने पहले हे बोल दिया है के वो संगीत पर इसलिए हे नहीं ज्यादा शामिल हुई क्योंकि वो तोह दूल्हे की तरफ से आएगी यहाँ. हाँ रुचिता भी उसके हे साथ है लेकिन यशोदा और एनी ने यही पर होना है मेरे साथ."

"तोह फिर अब बात करके टाइम ज्यादा खराब हे क्यों करना डॉक्टर साहब. ये लक्ष्मी अभी बता देगी की कौन कौन यहाँ रहने वाला है और कौन वह संजीव के साथ. ाची बात है और मैं तोह खुद चाहता हु के दरबान का रोले निभाऊं आज. सभी से गेट पर हे मिलना बेहतर रहेगा.", हँसते हुए पंडित जी ने निर्मल सिंह जी के कंधे पर हाथ रख लिया था जिसका मतलब ये भी था के वो उनके हे साथ है.

"कपूर साहब के इरादे ऐसे न थे पंडित जी. वो भी कह रहे थे की आज नाचने की कसरत वो जरूर करेंगे. खैर वो तोह उन्हें हमेशा से हे पसंद है लेकिन मैं बीवी और बेटी को लिए आता हु 8 बजे तक और आपके हे समीप रहूँगा. बचे और बीवी परिवार को जानते है तोह अपने आप हे घुलमिल लेंगे.", तोह यहाँ से फैंसला हो चूका था के परिवार और खास दोस्त भी अब 2 भागो में बाँट चुके थे. कुछ यहाँ रहने वाले थे गौरव के स्वागत के लिए तोह कुछ रहने वाले थे संजीव के साथ.

"फिर तोह बोलता हु अपनी थानेदारनी साहिबा को की जो भी करे जल्दी करे. जिस दिन के लिए इतनी भागदौड़ की है वो आने पर हे देरी हो जाए तोह मजा नहीं आता.", रामेश्वर जी की बात भी अपनी जगह सही थी क्योंकि अब 6 बज चुके थे और आने वाला हर मिनट मायने रखता था.

"हाँ भाई साहब आप जरा भाभी जी से सलाह मश्वरा कर लीजिये. इतने मैं सांगवान भाई साहब के साथ यहाँ का थोड़ा जायज़ा ले लेता हु. शंकर थोड़ी देरी से हे आने वाला है क्योंकि वो बोल कर गया है घंटा भर सोने का.", रामेश्वर जी खुद भी परिचित थे अपनी औलाद से. यहाँ नाम शंकर का था लेकिन आराम उसके साथ साथ उमेद, नरिंदर और विनोद इत्यादि भी कर रहे थे. धर्मवीर जी भी इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते थे क्योंकि समय रहते हे हर कार्य पूरा होना जरुरी था जिसमे कही भी कोई कमी की गुंजाइश बाकी न थी.

.

.

"यार मैं तोह माधुरी दीदी के हे साथ रहने वाली हु. अपने तोह हाथ खड़े है इस गर्मी और कल के डांस की वजह से. हिम्मत नहीं है की आधा पौने किलोमीटर पैदल या डांस करते हुए भीड़ में औ.", फार्महाउस के बड़े से कमरे में एक तरफ बिस्टेर पर अलका बैठी हुई आरती और मरीना से कुछ बातचीत कर रही थी वही ऋतू ने सीने से घुटनो तक टोलिया लपेटे हुए आइना का रुख किया. वो अभी अभी नाहा कर निकली थी और गीले बालो को ड्रायर की गरम हवा से सूखती हुई गुलाबी लहंगे चोली में त्यार तारा की बात सुन्न कर मुस्कुराने लगी. आइशा और अफसाना भी यही थी जो इनकी बातें सुन्न कर हे कोई फैंसला लेती. अफसाना जरूर ऋतू को इस तरह खड़ा देख कुछ हैरान थी लेकिन कमरे में सिर्फ लड़कियां होने की वजह से कुछ रहत भी थी.

"तू तोह वैसे फ़िलहाल अपने दादाजी की फॅमिली में घुसी रहने वाली है तारा. और ये गर्मी का बहाना तोह तू कर हे मत जब इतनी भारी ड्रेस अभी से पहन के बैठी है. अलका तू भी बता दे की रिबन कटवाने के लिए इधर रुकेगी या मेरे साथ भैया की घोड़ी के सामने एन्जॉय करना है?", ऋतू ने बाल सही करने के बाद हाथ ऊपर करके अपनी बालविहीन बगलो में सुगन्धित इत्र छिड़कते हुए आईने से देखते हुए हे अलका से पूछने लगी.

"अगर तू घोड़ी में शामिल होगी तोह मुझे इधर रहना होगा. हाँ ये आरती तेरे साथ जा रही है और तू उठ के बाथरूम में जा मोटी.", आरती को जिस तरह अलका ने खदेड़ा था वो हंसती हुई अपने कूल्हे हिलती कमरे के अंदर हे बने बाथरूम में जा घुसी. मतलब वो सहमत थी अलका की बात से.

"I'm आल्सो गोइंग विथ यू ऋतू. गिव में 20 मिनट्स एंड ी विल बे बैक आफ्टर गेटिंग ड्रेस्ड.", मरीना का भी अब स्पष्ट हो गया था की वो कहा जा रही है. उसने तैयार होने की बात कही और दरवाजा खोल कर जैसे हे निकली वह रुपाली के साथ गुरदीप, कीर्ति और जसलीन कड़ी थी. उनको hello बोल कर मरीना तोह चली गयी और अंदर का माहौल देख इन्होने भी आते हे दरवाजा वापिस लगा दिया.

"मतलब अभी तक बस तारा हे तैयार हुई है?", रुपाली ने अभी से सब्ज रंग का सुहावना सा लेहंगा पहन लिया था. वैसे हे रंग के दुपट्टे को सीने से लेकर दोनों कंधो पे किये वो बेहद प्यारी दिख रही थी. जसलीन, जो की हमेशा हे पाश्चात्य पहनावे में दिखती थी आज उसने भी जमुनी रंग का चुस्त लेहंगा चोली, जिसका पृष्ठभाग सिर्फ 2 डोरियों से हे बंधा था वो पहन कर यहाँ बैठी सभी लड़कियों की नजर में थी.

"कपडे हे तोह पहन ने है जसलीन जी. और जो लोग यहाँ रुकने वाले है वो तोह चाहे अगले एक घंटे तैयार न हो तोह भी चलेगा.", तारा ने अपनी बात पे हे उदासी भरा चेहरा बनाया तोह ऋतू पलट कर उसके पास हे चली आयी.

"ओह मेरी गुस्सैल गुड़िया. तू इसलिए झिझक रही है न के वह तेरी दादी और चाचा होंगे.? मैं बोलती हु पापा को वो अपने आप ठीक कर देंगे सब. तू चलेगी मेरे साथ और यहाँ पहले हे अफसाना, कोमल दीदी, प्रियंका दीदी के साथ ऋचा, बबिता दीदी है."

"जी मैं भी दूल्हे भाई के सफर पर आपके साथ आना चाहती हु. बाजी कह रही थी की मुझे जाना चाहिए.", अफसाना ने अपना नाम यहाँ रुकने वालो में सुना तोह कहने से रुक न सकीय की वो ghodi-baraat में खुद हे जाना चाहती है. सभी हंस दिए थे उसकी मासूमियत देख.

"ये ऋतू तेरे मजे ले रही है अफसाना. प्रीती ने तोह पहले हे बता दिया था के तुम, आइशा, कीर्ति, गुरदीप इसके साथ जाओगी. मैं, ज़ुबैदा दीदी और कोमल, विन्नी और ऋचा यही माधुरी दीदी के साथ रिबन कटाई में साथ होंगे. बाकी जिसने जहा जाना है वो जा सकता है लेकिन उसके लिए थोड़ा जल्दी तैयार होना पड़ेगा. साथ वाले रूम में अब कोई नहीं है क्योंकि वह हम लोग तैयार हुए है. जाओ अफसाना तुम और आइशा वही तैयार हो जाओ. प्रीती अपनी बहिन के साथ वही आ रही है.", जसलीन ने एक सांस में हे सारा वृत्तांत कह सुनाया और इसके बाद वो दोनों लड़कियां निकल गयी इस कमरे से. ऋतू भी जिस्म पर लेहंगा लपेटने के बाद वो टोलिया हटा चुकी थी. उस बेदाग़ हुस्न पर आसमानी रंगी की ब्रा बहोत थी कुछ लड़कियों को हैरान करने के लिए. ब्रा से मेल खता हे तोह उसका लेहंगा और चोली था. बस कही कही मोरपंखी से रंग या सुनहरी डिब्बी वाले छाप उसको कही ज्यादा आकर्षक बना देते. ऋतू ने चोली को भी लगभग कमर तक हे रखवाया था जिस से नाम मात्रा उसका सपाट गोरा पेट झलक दिखता.

"मुझे तोह लगता था तुम इस मामले में थोड़ा काम हे होगी. लेकिन लगता है आरती के बराबर हे सीना होगा तुम्हारा. लेकिन डाइटिंग करती हो जो पेट बिलकुल नहीं है?", गुरदीप चलते हुए ऋतू के नजदीक हे कड़ी हो गयी. ऋतू ने नजरो से हे सुक्रिया कहा था और चोली के धागे बाँधने का न्योता दिया तोह गुरदीप ने बड़ी एहतियात से ऋतू के जिस्म को स्पर्श करते हुए वो चारों डोरियन आपस में बांध दी. अलका बैठी बैठी मुस्कुरा रही थी और यही हाल तारा का था. अलका से नजर मिलते हे अब ऋतू शर्माने लगी थी.

"ोये मैं कोई लड़का थोड़ी न हु जो तुम शर्मा रही हो. वैसे तुम नरम नहीं हो ऋतू, हाँ स्किन जरूर स्मूथ है लेकिन बॉडी टाइट है तुम्हारी.", गुरदीप ने इतनी हे देर में ऋतू के कंधो, पीठ और बाहों का जायजा ले लिया था.

"तू साथ सो के देख जरा डीपी, ये तुझे लड़को वाला मजा भी करा देगी. टास्ते तोह नहीं बदल लिया तुमने इसको देख कर.?", बाथरूम से आरती बहार आयी तोह उसकी बात सुन्न कर गुरदीप झिझकते हुए थोड़ी दूर हो गयी. बाकी सभी मुस्कुरा रहे थे और अब अलका हे आगे बढ़कर ऋतू को तैयार करने लगी.

"यार तुम तोह बोलती और मजाक करती हुई हे ाची लगती हो. देखा नहीं ये आरती भी हमारे साथ रह कर कैसे बोलने लगी है? वैसे ऋतू और आरती बहोत हद्द तक शामे हे थी लेकिन कुछ आरसे से ऋतू मेरे साथ रेगुलर एक्सरसाइज और वेट ट्रेनिंग करने लगी है. हाँ आरती भी करती है लेकिन वेट की जगह कार्डिओ या स्ट्रेचिंग इसको ज्यादा पसंद है. लेकिन तुम ऐसे हे बहोत ाची दिखती हो क्योंकि तुम्हे शायद वाक करने का शौक है और हेल्थ पहले हे बहोत ाची है तुम्हारी.", अलका ने सब समझते हुए ये बही जाता दिया की वो भी गुरदीप के मांसल और आकर्षक शरीर से प्रभावित है. गुरदीप तोह थी भी साढ़े 5 फ़ीट की पूरी गदराई घोड़ी.

"हाँ वो घर के सामने हे पार्क है तोह थोड़ा बहोत वह घूम लेती हु बाकी खाने पीने का शौक बहोत है मुझे तोह मार्किट में चलना फिरना भी हो जाता है. तुम लोगो का भी सही है जो खुद को फिट रखती हो. वैसे मैं कह रही थी की सड़क पे नाचने के बाद क्या इधर भी दज का प्रोग्राम रखा है क्या?", गुरदीप हमेशा ऐसे हे साफ़ बोलती थी जो उसका दिल करता था. और उसकी ये दज वाली बात सुन्न कर ऋतू ने हे जवाब दिया. अलका उसकी आँखों में काजल लगा रही थी अब.

"प्रोग्राम तोह सभी है जितना मुझे लगता है क्योंकि जगह इतनी बड़ी अर्रंगे की है तोह ये सब भी होगा. लेकिन कुछ कह नहीं सकते दादा जी का. जाने कही शहनाई का हे प्रोग्राम न रख दिया हो उन्होंने.", अब जसलीन और कीर्ति हंसने लगी थी जो शायद विवाह स्थल देख के आ चुकी थी.

"डीपी, इंतजाम तोह है लेकिन मुझे लगता है वह लड़के हे ज्यादा जोश दिखने वाले है. अगर कही भी कोई लड़कियों का ग्रुप दिखा तोह जरूर तुम कमर हिला लेना.", ये बातें करने में लगी थी अपने अपने अनुमान के साथ की एक बार फिर से दरवाजे पर दस्तक हुई. दस्तक का साफ़ मतलब था के बहार इनके साथ का कोई न था. रुपाली ने समय ले कर हे दरवाजा खोला जिस से आरती बाथरूम में वापिस जा सके. बहार हिमांशु खड़ा था पूरी तैयारी के साथ गले में कैमरा लटकाये.

"दीदी, नाना जी आये है निचे और वो अलका दीदी को बुला रहे है.", इसका साफ़ मतलब था की रामेश्वर जी इधर इसलिए हे आये थे की वो संजीव का कार्यक्रम जान सके और जो भी लोग उसके साथ जाने वाले है उनके अलग वालो को पैलेस में भेजने का इंतजाम बना सके. अलका ने तुरंत दुपट्टा गले में लिया और वो काजल की कलम जसलीन को देते हुए हिमांशु के साथ हे बहार निकल चली. यहाँ अब तैयारी थोड़ा तेज हो चली थी सजने सँवारने की. लेकिन इस विवाह में सबकुछ इतना हे सकरात्मक नहीं था.

.

.

"देखो नवीन, अभी तक तुमने जैसा कहा हमने अपनी औकात से बढ़कर भी वो सब किया तुम्हारे लिए. लेकिन तुम खुद हे देख सकते हो की हमारा ये परिवार कोई आम घर नहीं है और न हे इधर जो लोग है वो हमारी तरह मजबूर. अब तक तोह हम तीनो हे तुम्हारी वजह से ताऊ जी की नजरो में आ चुके होंगे वही मेरी बड़ी भतीजी ने भी वो तमाशा देखा जो उस कमरे में हो रहा था. माफ़ करना अब मैं और हाँ में हाँ नहीं मिला सकता. कठपुतली की मौत से बेहतर होगा की मुझे मेरे पिता या भाई हे मार दे.", शादी वाली जगह से आगे कुछ हे दुरी पर ये एक चाय का खोखा था जो फ़िलहाल बंद था शाम होने की वजह से. लेकिन फत्ते वाले बेंच वैसे हे रखे थे जो जंजीरो से बांध कर सुरक्षित किये गए थे. एक तरफ विनोद के साथ पप शर्मा और रमन बैठे थे और उनके सामने वाले बेंच पर नवीन अपने साथ 2 लोगो को लिए. इनके अलावा भी नवीन के पीछे 2 व्यक्ति और खड़े थे जिनके चेहरे से साफ़ हे लगता था की या तोह वो बहुत पहुंचे हुए अधिकारी है या फिर कोई पहेली.

"हाहाहा.. विनोद तुम्हे किसने कहा की मैं तुम्हे मार दूंगा अगर तुम मेरा साथ नहीं डोज? मैंने जितना चाहा था तुमने उस से कही ज्यादा हे किया है मेरे लिए दोस्त. हाँ मेरी वजह से तुम लोग नजरो में आये इसके लिए पछतावा है मुझे पर ये जरुरी था. तुम्हे भी तोह वैसे बदला लेना हे था इस नामुराद शंकर और इसके हैवान दोस्तों से? खैर अब तुम्हारे लिए वो काम मैं कर रहा हु तोह मामला बराबर हो गया हमारे बीच. क्यों रमन, मैंने गलत कहा क्या?", जिस तरह नवीन ने रमन को बुलाया था वो शरीफ अवतार इंसान ऐसी कुटिलता से मुस्कुराया की एक पल को खुद पप शर्मा भी काँप गया. विनोद ने हैरत न दिखाई या शायद वो जज्ब कर गया लेकिन इसके बारे में अर्जुन ने उसको 2 दिन पहले हे तोह चेताया था.

"देखो विनोद बुरा मैट maan-na लेकिन मैं बस इतने साल तक इसलिए हे खामोश था की वक़्त आने पर इस परिवार को वो आघात पंहुचा सकू जिसके ये हक़दार है. तबाह करके इन्हे खून के आंसू रुलवाना हे एकमात्र वजह थी तुम्हारी उस बदसूरत सी बहिन से शादी करने की. मैं राज्यवर्धन सिंह का वो हुकुम का इक्का हु जो 52 पत्तो में शामिल हे न था. हाँ मेरी जगह तुम जरूर उस गद्दी में थे एक जोकर की तरह. हाहाहा.. गुस्सा आ रहा है न तुम्हे अब? क्या करोगे? अपनी माँ से लिपट कर रोयेगा या फिर बहिन को मेरा सच बताएगा? ओह तू ऐसा कुछ भी नहीं कर सकता क्योंकि रौशनी फ़िलहाल मेरे कब्जे में है तेरी प्यारी भांजी अंजलि के साथ. एक गलती और उधर तेरी बहिन और भांजी दोनों परलोक पहुंच जाएँगी.", रमन की बातें सुन्न कर अब विनोद भौचक्का सा बैठा था जैसे उसके ऊपर बर्फ की सिल्लिअन उलट दी गयी है. नवीन और उसके आदमी ढिठाई से मुस्कुराते हुए ये दृश्य देख रहे थे.

"इसने तुम्हे हमेशा हे अपना भागीदार समझा है रमन और मैंने भी तुम्हारा हे पक्ष लिया हर समय. क्या कमी थी हमारे भाईचारे में जो आज तुम हमारे हे साथ इतना घिनोना विश्वासघात कर रहे हो? और अगर कोई जुंग या रंजिश भी हो तोह उसमे कभी घर की िज्जात्त या बेटी नहीं शामिल करते.", पप शर्मा इस समय कही से भी वो कमजोर सा व्यापारी नहीं लग रहा था जो अक्सर दीखता था. उसका सवाल करना हे जैसे भरी पड़ गया. 'चटाक' की एक तेज गूँज के साथ हे नवीन के भरी हाथ के निशान उसके गाल पे चिन्हित थे.

"मालिक से तू तड़ाक करने की हिम्मत नहीं है तुम्हारी. हाथ बंधे थे इनके क्योंकि वो समय वैसा था लेकिन तुम्हारे हे उस prem-pyaar की वजह से रमन भाई साहब ने ये पहले हे कह दिया था के तुम दोनों को ज़िंदा छोड़ दिया जाए. फिर दोबारा गलती न हो जुबान लड़ने की. भाई साहब, अब बताओ की सीधे हुम्ला करना है या लोमड़ी की तरह?", नवीन की बात पर रमन शर्मा थोड़ा गंभीर हो गया था. अपने हे रुमाल से उसने पप शर्मा के होंठ के किनारे निकला खून साफ़ किया और ठन्डे स्वर में बोलने लगा.

"हहहह.. सीधा हुम्ला तोह आत्महत्या है नवीन. लोमड़ी हे बनो और मैं अंदर हे रहूँगा परिवार के बीच. वैसे तोह मेरा साला और सहधू भाई कोई गलती नहीं करेंगे लेकिन इनके साथ रह कर अपनी छवि तोह साफ़ रख हे सकता हु. वकील सिंह, शंकर को एकांत में बुला कर बस वो 2 तस्वीरें दिखा देना जहा उसकी करतूत साफ़ नजर आती है. बाकी सौदेबाजी के लिए उसको यही बुलाना है और फिर अगर मुझे शंकर नजर आया तोह तुम सब लोग नजर नहीं आओगे.", नवीन की बगल में बैठा वो राजपूताना कलमे और घुमावदार मूछ से सजा इंसान हे वकील सिंह था.

"मैं तोह कहता हु भाई साहब की झटका राजेश से देते है. सबूत छोड़ कर जायेंगे उसकी लाश के पास तोह शंकर अपने आप हे हमारी और दौड़ा आएगा. और जब उधर आएगा तोह अपनी टोली के साथ जो हमारे लिया बड़ा शिकार हे होंगे. क्या कहते हो नवीन भाई जी?", वकील ने अपना मैट रखा तोह नवीन ने रमन शर्मा की तरफ देखते हुए अपनी गर्दन आहिस्ता आहिस्ता ऐसे हिलाई जैसे वो रमन से हाँ कहलवाना चाहता हो.

"सही कहते हो तुम वकील इसलिए तुम्हारा नाम तुम पर जंचता है. वैसे भी इस राजेश ने बहोत बार नुक्सान किया है और भरपाई तोह सभी करेंगे. शुरुआत इसके साथ हे करते है फिर. ध्यान रखना अंदर कोई भी नजर न आये तुम में से. उनके बीच मैं भी खड़ा हो कर असलियत बता न सकूंगा. साले बात बाद में करते है पहले जिस्म को लाश बना देते है.", रमन शर्मा ने खड़े हो कर अपनी आस्तीन के दोनों बटन बंद करके फिर से अपना वही शरीफ हुलिया बनाया और चमकती आँखों से विनोद और पप शर्म को देखते हुए कहा.

"भाई साहब, अब तोह हमे वापिस चलना चाहिए. वह भी रस्मे और काम देखने है. कोशिश कीजियेगा की जुबान पर टाला ज्यादा रहे नहीं तोह .. आप दोनों कुछ ज्यादा हे समझदार जो है.", रमन चलता हुआ एक तरफ आड़ में कड़ी कार की पिछली सीट पर जा बैठा तोह ये दोनों jija-saale भी पालतू कुत्ते की तरह उसके साथ हो लिए. कार विनोद हे चला रहा था और बगल में बैठा पप शर्मा तोह ख़ामोशी की मूरत में हे तब्दील था.

'नवीन भाई जी, तोह यहाँ जाल वैसे हे बिछाना है या थोड़ा फिल्मी स्टाइल.?", वकील की बात पर नवीन बस उस कार को जाते देख मुस्कुराया.

"हम 5 लोग है तोह सब कायदे से हे करना पड़ेगा. राजेश को यही बोलना है की उसकी फाइल है तुम्हारे पास और अगर वो चाहता है की बात rafa-dafa हो जाये तोह इस जगह मिले 50 लाख के साथ, नगद या सोना कुछ भी चलेगा. लेकिन पहले मुलाकात और पैसे कहा पहचाने है वो मीटिंग के बाद बता दिया जायेगा. चिंता मैट करना, हमारी सुरक्षा तुम पर भरपूर रहेगी. चलो अब बहार हे मौजूद रहना तुम जिस से काम को अंजाम दिया जा सके. अंदर तोह कड़ा पहरा है और रमन भाई ने पहले हे बता दिया है की वो वह हमसे इत्तेफ़ाक़ नहीं रखने वाले, फंसने की सूरत में.", अब तक तोह विनोद की कार भी नजरो से ओझल हो चुकी थी और ये लोग अपनी जीप में बैठने से पहले कमर में बंधी रिवॉल्वर जांचने के बाद हे सीट पर लपके. इतना तोह तये था की रमन ने जाल ाचा बना था अपनी हे बीवी और बेटी को क़ैद में रख कर. और राजेश इधर अकेला आने पर अगले दिन का सूरज नहीं देखने वाला था.

.

.

किसी बड़े महल के बगीचे से भाग को भरपूर रौशनी से सजा कर विशिस्ट रूप दिया जा चूका था. बहार गेट पर दोनों हे तरफ बड़े बड़े बोर्ड जगमग थे जहा एक पर लिखा था 'राधिका दत्त वेड्स संजीव शर्मा' और दूसरे पर 'माधुरी शर्मा वेड्स गौरव शर्मा'. बहुत से करीबी मेहमान पधार चुके थे और अनगिनत वेटर हाथो में ट्रे लिए उन्हें ठंडा गरम पेश करते हुए पूरी मुस्तैदी से अपने काम में लगे थे. Laal-safed रेशमी लटकानो और रौशनी से जगमग बेहतरीन झूमरो के साये टेल विभिन्न तरह के खाने पीने के स्टाल सज कर बता रहे थे की किसी भी तरह की कोई कमी नहीं राखी गयी. इस हरी घास के सजे हुए भाग से आगे चलकर ऊँचे स्टेज पर 2-2 के जोड़ो में स्वर्णिम आभा बिखेरते वो सिंहसर नुमा सोफे दूल्हा दुल्हन के लिए उतनी हे बखूबी सजाये थे. जगह जगह टेंट के पाइप फूलो की बेलो से सजे तजा महक बिखेर कर वातावरण को और मनमोहक बना देते. करने से लगे गुलाबजल मिश्रित पानी के कूलर भी गर्मी का naam-matra एहसास न होने दे रहे थे.

"ताई जी, बरात आ रही है. चलो आप सभी लोग गेट पर जल्दी से पहुँचो.", आरती ने जब जोशीली आवाज में माधुरी दीदी की तरफ वाले कमरों के गलियारे से चिल कर ये कहा तोह ललिता जी के साथ साथ रेखा, रेणुका, कृष्णा, मधु, राजेश्वरी आदि के साथ बाकी लड़कियां भी अपने अपने परिधान ठीक करती हुई उठ कड़ी हुई. तिलक की थाली, पानी, मिठाई आदि पहले से हे तैयार थी बिन जले दिए के साथ. ये सभी अपनी व्यावहारिक चाल और मर्यादित पहनावे के साथ अपनी बेटियों और बचो के साथ पंडाल की और बढ़ चली.

अब तक पंडाल की शुरुआत में हे gulabi-laal रिबुँ बांध दिया गया था जहा इस तरफ प्रियंका, रोमिला, आयशा और अलका के साथ साथ ढेरो लड़कियां और महिलाएं कड़ी थी. एनी यही थी लेकिन उनकी बिटिया अपने पिता के साथ संजीव की तरफ मंदिर जा चुकी थी. दूर से हे गाड़ीवान की माइक पे गाने की आवाज और झूमते गाते लोग इस तरफ आते नजर आये. सफ़ेद घोड़ी पर सेहरे और रेशमी सूट में दूल्हा गौरव इन सबके बीच था. पंजाबी स्वरों पर उसके दोस्त, सम्बन्धी, भाभियाँ और लड़के लड़कियां भरपूर जोश से नाचते हुए कुछ समय तक बस देहलीज से उस तरफ हे खड़े रहे.

पूर्णिमा जी खुद ललिता जी को साथ लिए रिबन से आगे बढ़ कर बरात के सामने आ कड़ी हुई. उमेद जी को लिए रामेश्वर जी की बुजुर्ग मंडली भी इनके करीब हे थी लेकिन कुछ फैसला रख कर. अर्जुन भी हॉल का जायजा लेने के बाद इस और आने लगा तोह एक पल के लिए दोनों हे तरफ के लोगो की नजरो का केंद्र हो गया. चुस्त कमीज और वो कड़ी इस्त्री वाली ख़ास पतलून पहने जब वो चल रहा था तोह बरबस हे कामदेव का सम्पूर्ण अवतार जान पड़ा. ये वही पोषक थी जो प्रीती ने हे उसके लिए पसंद की थी. बिना ब्याह का कोट अर्जुन ने फ़िलहाल अपनी एक ब्याह पर लटका रखा था और मुस्कुराता हुआ वो अपनी ताई और chachi-daadi के साथ अभिषेक जी और बाकी बरात के सामने आ खड़ा हुआ. दोनों तरफ से हाथ जोड़ कर अभिवादन हुआ तोह शिल्पा जी अपलक अर्जुन को हे निहारती रही. ऐसा हे हाल उनकी कुछ और सहेलियों के साथ जवान युवतियों का भी था.

"जीजा जी, तिलक तोह करवा लोगे लेकिन इस नाके पर भगतां किये बिना आप आगे नहीं बढ़ सकते.", अलका ने उस शोरगुल में भी इतनी बुलंद आवाज से ऐसा कहा था की सभी का ध्यान खींच लिया. पंडित जी के साथ आचार्य जी और बाकी बुजुर्ग भी बची की इस बात पर मुस्कुरा रहे थे. बरात में आये गौरव के दोस्तों ने जवाब भी शालीनता से हे दिया, मस्ती भरा थोड़ा.

"ऐसे नाके 10-12 लगा लीजिये सेज तक. हर जगह भुगतान करके हे आगे बढ़ेंगे अगर स्वागत ऐसे होगा तोह.", और जबरदस्त शोर ने उस लड़के की बात का समर्थन किया जिसमे क्या लड़के क्या औरतें, सभी शामिल थे. यहाँ अर्जुन ने आगे बढ़ कर अपने घुटने कुछ मदद कर दोनों हाथ गौरव के पाँव तलके करते हुए निचे उतरने की रस्म अदा की तोह गौरव ने भी अपने से 4 इंच ऊँचे इस साले को गले लगा कर धन्यवाद किया. उनको साथ लिए अर्जुन अपनी ताई की तरफ आया तोह अगल बगल अभिषेक जी और शिल्पा जी के साथ साथ कुछ बुजुर्ग और संगी- बाराती भी खड़े हुए.

"भगवान् नारायण हमेशा आप पर अपनी चाय बनाये रखे. परिवार में आपका स्वागत है गौरव बीटा.", ये लफ्ज़ खुद पूर्णिमा जी के थे और ललिता जी ने तिलक करने के साथ चावल बरसाने के बाद मुँह मीठा करवाया तोह आसमान जैसे कृत्रिम रूई की फुहारों से भर उठा. Gorav-Abhishek के दोस्तों ने वो ख़ास स्प्रे उड़ा कर अपनी ख़ुशी ऐसे दर्शाई थी की उस से किसी के वस्त्र या मेकअप न प्रभावित हो. बहुत से लोगो ने तोह आसमान भी आतिशबाजी से रंगीन कर दिया था. अंदर मेहमान बढ़ते जा रहे थे और इधर रसम की भीड़ में भी इजाफा होता गया.

"दादी माँ, आप मुझे 'आप' नहीं गौरव हे कह कर बुलाये. और माँ जी, बेटे का स्थान माँ के चरणों में होता है सर पे नहीं.", ललिता जी हाथ जोड़ हे रही थी की अपने सेहरे की परवाह किये बिना गौरव ने उनके और पूर्णिमा जी के चरण छू लिए. इस बात पर भी बाकी सभी ने खूब तालियां पीती. रिबन के दूसरी तरफ कड़ी उन अप्सरों की तरफ भी ढेरो जवान युवक नजरे किये थे लेकिन उन्हें पहले से हे भान था की यहाँ कोई ॉटची हरकत मंजूर नहीं. रामेश्वर जी के सम्मुख आने पर भी अभिषेक और गौरव ने ऐसा हे किया था और Arjun-Lalita जी के साथ वो लोग आगे चल कर अलका के सामने आये तोह उसकी बगल में कड़ी कोमल, ज़ुबैदा, ऋचा, आरती, रुपाली के साथ साथ ghar-pariwar की औरतों को देख थोड़ी लाचारी दिखने लगे.

"यहाँ पर फ़िलहाल जितनी नजर आ रही है उतनी हे गायब है जीजा जी. तोह 21 हजार से काम नेग तोह हम लेने नहीं वाली. बाकी आपकी मर्जी है की इतने दे सकते हो या बगल से निकल कर जाना है?", आरती जितनी हसीं थी उसकी आवाज भी उतनी दिल को छु लेने वाली. गौरव ने तोह अपने स्वभाव के कारण नजरे तक न मिलाई थी लेकिन अभिषेक जी अब अपनी बीवी और पंडित जी की तरफ देखने लगे जो हाथ उठा कर दूसीर और खिसक लिए.

"देखो आरती बीटा, नेग तोह कुछ भी हो सकता है. और वो सामने वाले की मर्जी अनुसार होना चाहिए न की तुम जितना बोलो उतना.", ये थी कृष्णा जी लेकिन अपनी माँ की बात पर आरती ने मुँह बना कर मन कर दिया.

"21 मतलब 20 भी नहीं. और हमने ऐसा तोह नहीं कहा के जीजा जी जा नहीं सकते. हाँ फिर वो रास्ता बदल कर हे जाएंगे."

"गौरव यार तू कहे तोह मैं 5000 दे देता हु. इतनी तोह वैल्यू कर हे सकते है जब मांगने वाला ऐसा नकचढ़ा हो.", एक जोशीला सा युवक ये बोलै तोह उसके दोस्तों ने भी ऐसे हे स्वर दिए.

"मतलब यहाँ भी कंट्रीब्यूशन करके आप लोग एंट्री करोगे? जीजा जी इस पार्टी के होस्ट है तोह आज इन्हे हे देने चाहिए.", अर्जुन ने अपनी बहनो का पक्ष लिया तोह गौरव ने नजरे नीचे किये हे मुस्कुराते हुए एक हाथ अपनी भाभी की तरफ बढ़ा दिया. शिल्पा जी ने भी हँसते हुए वो लाल कपडे की पोटली अपने देवर को थमा दी.

"पैसे का क्या है एक दिन खर्च हो हे जाते है. आप लोग परिवार है अब और परिवार बेमोल होता है. फिर भी ये तुच्छ से भेंट घर की देहलीज में पहला कदम रखने के एवज में. ज्यादा नहीं है सिर्फ 21 गिन्नियां है आप सभी के लिए भैया और भाभी की तरफ से.", गौरव के इस तरह नजरे झुका कर मृदुल लहजे में दिल से कहने पर अलका ने हे वो थैली पकड़ कर कैंची थमा दी.

"बस आप जीजा जी हे रहना हमारे.. हाहाहाहा..", इधर जैसे हे गौरव ने कांपती उंगलियों से वो बारीक सी कपडे की कतरन काटी, Madhu-Shalini-Ruchita के साथ साथ अनगिनत लोगो ने फूलो की बारिश हे कर दी. आरती के हंसोड़ जवाब पर ठहाको के साथ हे गौरव और बरात ने भीतर कदम रखा. तुरंत हे दोनों तरफ kataar-badh खड़े वेटर हरकत में आते सभी मेहमानो की सेवा में जुट गए. यहाँ से आगे का सफर सभी ने बगैर अर्जुन के हे तये किया, जो मुस्कुराता हुआ अपने पिता की कार लिए उधर चल पड़ा था जहा उसके भाई की बरात शुरू होने वाली थी. गौरव की बरात वाले तोह मंत्रमुग्ध से बस इस jalwa-sareen प्रबंध और विवाह स्थल को हे निहार रहे थे. जगह जगह अब छोटे झुण्ड बनाये वो लोग आराम करने के साथ खाते पीते हुए मेल जॉल बढ़ने लगे थे और सुशीला जी मुन्नी और अपनी सास के साथ साथ बबिता के परिवार को शामिल किये पंडाल में एक तरफ जा रही थी.

"गुड्डी जीजी कहा रह गयी?", मुन्नी जहा इस रौनक को देख हैरान थी वही उसको ईर्ष्या भी हो रही थी इतने व्यापक स्तर पर विवाह के होने पर. देख कर हे लगता था के पैसा पानी की तरह बहाया गया होगा. लेकिन इस सबके बीच भी उसने ये सवाल किया जिसके लिए सुशीला पहले से हे तैयार थी.

"वो सुदर्शन को लिवाने गयी है हॉस्पिटल शंकर के एक डॉक्टर दोस्त के साथ. वो लौट आ जाएगी कुछ हे समय में मुन्नी. तुम भी जरा थोड़ा बबिता के सम्बन्धियों से मेलजोल रखो. कल को ऋचा की शादी होनी है तोह तुम्हे सामाजिक भी होना है.", सुशीला ने हे तोह अर्जुन और गुड्डी को वो एकांत दिया था जिस वजह से सबसे दूर अर्जुन अब मल्टी को पिछली सीट पर बैठाये संजीव भैया की घोड़ी की आड़ में बातचीत करने निकल चूका था.

.

.

"बीटा, तुम पहले ये बताओ के हवेली के बारे में कितना जानते हो?", संयोग से अर्जुन मंदिर वाले रस्ते की और न जा कर कार को वही ले आया था जहा घंटा डेढ़ पहले Naveen-Raman आदि की मंत्रणा हुई थी. इस निर्जन से स्थान पर वो दोनों वैसे हे बैठे थे जिस से सामने से किसी के आने पर सिर्फ अर्जुन हे दिखाई पड़ता. मल्टी काकी के सवाल पर अर्जुन ने ज्यादा लम्बा न खींचते हुए मधुलता, सुशीला के पहले वाले इतिहास और सोमबीर सिंह के साथ साथ उनके चारो बेटो वाली जानकारी प्रगट कर दी.

"बीटा तुम जानते तोह जरुरत से ज्यादा हो लेकिन अभी भी तुम्हे वो सब नहीं मालूम जिसकी जानकारी होने पर मेरे साथ साथ तुम्हारा भी जीवन संकट में जाएगा. खैर मुझे मेरी उतनी परवाह भी नहीं और मेरे जैसी औरत को रस्ते से हटा कर उन्हें कुछ हांसिल भी नहीं होने वाला. अब तुम बताओ अर्जुन की क्या तुम अपनी खोजबीन आगे बढ़ाओगे या फिर तुम्हे रुकना है?"

"जानता हु की वह बहोत कुछ ऐसा है जो मुझे निशब्द कर देगा चची जी. लेकिन आधे रस्ते रहने वाला इंसान फिर कभी जीवन का कोई सफर नहीं कर सकता. कुछ तोह ऐसा है जो मुझसे छूटा रहा है या बच गया. जैसा मैंने आपको बताया है की बबिता दीदी और ऋचा दीदी भी वही बता सकीय जो उनको पता था या देखा. चंद्रो दादी जी मुझे हमेशा हे do-tarfa व्यक्तित्व वाली लगती है और क्यों सब जान कर भी वो मधुलता काकी को बचती आ रही है.? क्यों मेरी दादी के सामने उनके स्वर निचे रहते है लेकिन अकेले में वो दादा जी से अलग तरीके से पेश आती है? और सबसे जरुरी बात है की जब आपके पति को पहले से हे उनका अंजाम पता था तोह वो उस रात बाकी भाइयों के साथ गए हे क्यों? आपको भी पता होगा की राजकुमार ताऊजी ने उन्हें सचेत किया था पापा और चाचा के बारे में?", अर्जुन के इस कथन पर मल्टी को बड़ा गर्व हुआ था की वो ऐसी बातें भी जानता था जो सिवाए उनके किसी को पता न थी.

"वो ऐसे हे थे बीटा, आखिर तक परिवार के साथ रहने वाले. और उनके शरीर को तहस नहस न करने के पीछे नरिंदर की भी वही मंशा थी. शंकर जूनून में उनका भी वही हाल करता लेकिन खुद नरिंदर ने पंजाब जाने से पहले मुझसे अपराधबोध में माफ़ी मांगी थी और अपने पक्ष को रखा था. बात विपरीत होती तोह फ़तेह जेठ जी तोह इतनी िज्जात्त भी न देते उन्हें. हाँ अब माँ जी की बात आयी है तोह तुम्हे शायद समझौता बिलकुल भी नहीं पता. चंदरभान सिंह, जिसको उमेद भाई साहब ने परलोक भेजा वो कहने को तोह गुड्डी के मां का लड़का था लेकिन वो असलियत में ससुर जी का नाजायज बीटा था. हाँ करम सिंह एक ाचा इंसान था लेकिन उसका हे जुड़वाँ, शकल से अलग. वो बिंदिया का जुड़वाँ दर्शाया गया था जिसका खुद बिंदिया को कभी पता न चला. करम को पता चला तब भी वो कभी किसी की तरफ न हुआ. जानते हो उनकी माँ कौन थी?", ये तोह अर्जुन के भी सर के ऊपर से हे गया. उसने ये तोह जरूर पता लगा लिया था के चंदरभान और करम जुड़वाँ थे लेकिन उनकी माँ, मतलब लाजवंती की भाभी को वो ढून्ढ नहीं पाया था. और सोमबीर सिंह उनका बाप होगा ये तोह गले से निचे हे नहीं उतर रहा था.

"कौन थी उनकी माँ चची? और सोमबीर सिंह मतलब चंद्रो दादी जी के पति उन दोनों के पिता थे?"

"हाँ बीटा और ये बात मेरे पति, मेरे जेठ के साथ साथ चन्दर और मुन्नी को भी पता थी माँ जी के साथ. उन दोनों की माँ.. उन दोनों की माँ थी नहीं अभी भी ज़िंदा है. रेशमा.. सरपंच ज़िले सिंह की तत्कथित विधवा और लाजवंती की बहिन. इसलिए हे तोह हवेली के साथ वाली कोठी मिली थी उन्हें और सरपंच के साथ ब्याह भी खुद ससुर जी ने करवाया जो ब्याह से पहले हे बचे जनन चुकी थी. एक बिंदिया का भाई बना तोह दूसरा ससुर जी की एक और संगिनी की छत्रछाया में. हवेली के मालिक कभी एक रूप नहीं रखते बीटा. और माँ जी का सच भी अजीब है जिसकी वजह एक औरत हो कर तोह मैं तुम्हे नहीं बता सकती लेकिन ये जान लो की सिर्फ अपने सेज भाई से बढ़ कर रहे रघुवीर जी की वजह से पंडित जी उनके सामने कुछ दबे हुए है.", अर्जुन ने घडी में समय देखा तोह अभी भी उसके पास बहोत वक़्त था.

"और ये रेशमा जी कहा गायब है लाजवंती जी के साथ? राजस्थान?"

"वही तोह समुदाय है उनका या कहो कबीला. पांच ईश्वर जी नेक इंसान थे और उन्हें मारने वाला चंदरभान और खुद लाजवंती. खैर सबसे जरुरी बात बताना तोह रह गयी."

"हाँ मैं सुन्न रहा हु चची जी.", अर्जुन ने एक की गति धीमी करते हुए बंद शिशु पर आयी ढूंढ हलकी करने का प्रयास किया.

"नीलिमा को तोह खोज लोगे लेकिन क्या वो तुम्हे अज्जू देवर जी के कतल करने वाले का नाम आसानी से बता देगी?", ये मामला ऐसा था जिसमे अर्जुन के साथ ढेरो लोगो ने छानबीन की थी लेकिन अर्जुन हे था जिसको एक आस नजर आयी थी नीलिमा का जानकार वो भी शालिनी बुआ से. गुड्डी काकी इस मामले में क्या जानती होगी ये उसको अंदाजा भी न था.

"आप उनके असली कातिल को जानती है चची जी?"

"मैंने ऐसा तोह नहीं कहा बीटा. लेकिन एक इंसान है जो ाचे से जानता है की किसने अज्जू के हाथ बांध दिए थे और किसने उसके दिल में वो खंजर पेवस्त किया.. अज्जू किसको काकी कह कर बुला सकता था?", गुड्डी ने पहेलियाँ बुझाते हुए अर्जुन के हे दिमाग की परख लेनी चाही.

"चंद्रो दादी जी को तोह वो ताई जी हे कहते. मेरी दादी जी, नीलिमा जी की माँ, लाजवंती जी और ये रेशमा जी.. हाँ दमयंती जी भी हो सकती है..", गुड्डी काकी ने ना में गर्दन हिलाते हुए इंकार किया तोह अर्जुन को और लोग ध्यान हे नहीं आये.

"अज्जू कौशल्या जी को हमेशा से हे माँ बुलाता था जैसे पूर्णिमा जी को. और हो सकता है की वह नीलिमा की माँ भी मौजूद हो क्योंकि दमयंती काकी को वही से अगुआ करने के पीछे उनका हे हाथ था, जितना मुझे सुन्न ने में आया. लेकिन एक शक्श है जिसकी शकल मैं इतने बरस बाद भी नहीं भूली सिर्फ एक बार देखने भर से. वो उस दौरान हे एक रात हवेली आया था लेकिन घूंगट और हालिया बेवा होने की वजह से मैंने उसका सामना नहीं किया. बैठक के कमरे के पीछे हे उस समय मेरा कमरा होता था और वो इंसान उस रात कुछ नशे में अकेला हे बड़बड़ा रहा था के उसने ठीक नहीं किया. अज्जू के साथ ये गलत हुआ. भगवन भी अब माफ़ नहीं कर सकता.. वो यही सब बड़बड़ा रहा था और फिर वो रात में हे नशे की हालत में हवेली से निकल गया. मैंने साफ़ देखा था वो चेहरा क्योंकि आँगन में लालटेन के ठीक सामने खड़े हो कर उसने अपना चेहरा पानी से धोया और साफ़ किया. जब उसके काफी आरसे बाद मैंने माँ जी से उस व्यक्ति का जीकर किया था तोह उन्होंने सिर्फ इतना हे कहा था के वो मेरे ससुर जी का एक दोस्त था जो पंजाब में दूर जगह रहने की वजह से उनके शौक पर आया था. साथ हे उन्होंने ये भी पुछा था के मैंने कही उसको देखा तोह नहीं था. जिस पर मैंने साफ़ मन करके इतना हे कहा था के वो रात में बड़बड़ा रहे थे और फिर अँधेरे में हे चले गए.", अब अर्जुन के दिमाग की तारे झनझना उठी थी. ऐसा कौन हो सकता है और वो काकी तोह अब उलझन हे बन चुकी थी जब वो उन नामो में से थी हे नहीं जिनके बारे में अर्जुन जानता था.

"आपने इसलिए हे कहा था के शादी में वो इंसान नजर आएगा तोह आप मुझे इशारा करेंगी? लेकिन 25 साल बाद क्या पहचान भी सकती है आप उसको?"

"उम्मीद हे है क्योंकि कल जब हम तुम्हारे घर आये थे तोह मैंने वह भी वो ख़ास चीज दांग देखि थी जिसके मुट्ठ पर सुनहरी तार से आँख जैसा कुछ बना था. वो कोई मेहमान भी हो सकता है और मैं गलत भी हो सकती हु लेकिन अब तुम जहाँ इतने राज खोल चुके हो तोह कैसे भी करके उस व्यक्ति का पता करो जो हवेली से वास्ता रखता हो लेकिन हो पंजाब से. मैंने हवेली में रह कर भी वो इंसान दुबारा नहीं देखा और अगर वो ससुर जी से मिलने भी आता होगा तोह उनके ठिकाने अलग होंगे.", अब इसके बाद भी उनकी चर्चा कुछ 10 मिनट तक और चलती रही फिर खुद मल्टी काकी ने हे अर्जुन को समय का ध्यान करवाया तोह अर्जुन पसीना साफ़ करता तुरंत कार ले कर उस तरफ बढ़ा जहा उसने काकी को छोड़ना था. मंदिर से संजीव भैया की बरात निकल चुकी थी और उनसे कुछ दूर पहले हे अर्जुन ने एम्बुलेंस देख अपनी कार उसके सामने रोक कर चाबी भुप्पी अंकल को पकड़ते हुए धन्यवाद् कहा और चिंता साफ़ करता हुआ घोड़ी की और बढ़ गया. एम्बुलेंस के आगे अब वही कार डॉ भूपिंदर सिंह चलते हुए मल्टी काकी को फिर से शादी में ले चले थे. एम्बुलेंस के पिछले हिस्से में सुदर्शन था अपनी व्हीलचेयर के साथ.
 
कवर फ़िनलिज़्ड एंड सुबेटेड फॉर कॉपीराइट
 




क्लीन वर्शन इस उप फॉर फाइनल एडिटिंग एंड विल इन्फॉर्म यू गाइस व्हेन आईटी विल बे रेडी.
 
अब हुंका चाहि फुल प्रे बुकिंग्स. और प्रमोशन अकेले के बस की बात नहीं. 🙏
 
वैसे आज अगर 4 बजे हे अपडेट दे दू तोह? 🤔
 
अपडेट 192 (1)

विवाह

"अगर आज तूने ठुमके नहीं लगाए तोह देख लियो अर्जुन तुझसे बात नहीं करुँगी. तेरे भाई की शादी है और सिर्फ तुझे छोड़ कर सभी जश्न मन रहे.", कौशल्या जी खुद हे घोड़ी के साथ चलती हुई हर तरफ शातिर निगाह रखे थी. संजीव भैया भी अब गंभीर न हो कर सेहरे के पीछे से मुस्कुराते हुए सब देखते रहे. बार बार घोड़ी रूकती और 5-6 मिनट तक उनसे चाँद कदम आगे वो उत्साहित झुण्ड जोर शोर से dhol-gaane की थाप पर कभी भंगड़ा तोह कभी फिल्मी डांस करने लगता. झुण्ड में मुख्या लोग थे शालिनी बुआ, मरीना, तारा, हिमांशु, अर्जुन की सभी ममेरी बहने, मेनका, सरोज मौसी के साथ साथ संजीव भैया के सभी दोस्त. इनसे कुछ आगे हे घर के बड़े लोग थे जो कभी टांग उठा कर तोह कभी हाथ उठा कर अपनी मर्जी से ठुमके लगते रहे. उन्हें कुछ सुरूर भी था लेकिन सिर्फ उतना जितना मुँह से पता न चले.

"मुझे आपने कभी देखा है क्या दादी डांस करते हुए? मैं तोह आपकी बगल में भैया के हे साथ चलूँगा. ऊपर से ये गर्मी अलग है.", कहने को तोह अर्जुन ये बोल रहा था लेकिन उसकी नजरो ने उड़ते नोट देखे, नाचते लोग और खूबसूरत अपनी सखियाँ भी. बस वो चाँद यहाँ से नदारद था जिसकी तलाश हे उसको यहाँ लेके आयी थी. कुछ पल कनखियों से उसने प्रीती, आकांक्षा और मेनका का डिडाड किया फिर शालिनी बुआ और सरोज मौसी के जलवे भी देखे और अपने आप हे वो मुस्कुरा दिया. दिल में जो तालाब थी वो बेशक अनियंत्रित थी लेकिन अपने भैया के दोस्तों को यु जोश में नाचते गाते देख अर्जुन धीमे धीमे हाथ हिलता रहा. जैसे वो थिरकना तोह चाहता था लेकिन बस हिम्मत जवाब दे जाती. शायद जो उसको हौसला दे सकता वो साथी यहाँ नहीं था.

"अरे बड़ा बुझदिल है तू तोह. वो देख तेरे छोल दादा और चाचा कैसे uchal-kood कर रहे. तेरे मां भी पीछे नहीं लेकिन एक तू है जो आज हे दुबक कर मेरी पीठ पीछे चलेगा. डिम्पी बीटा लेके जा जरा इस बैल को.", यहाँ अनामिका चची के साथ साथ डिम्पी, ऋतू, मुस्कान और पंजाब वाली मण्डली भी उसके पीछे से करीब आयी तोह कौशल्या जी ने डिम्पी को हे अर्जुन का हाथ पकड़ा कर दफा किया. अर्जुन तोह बस उस neel-pari को हे देखने लगा था जिसके हाथ में एक चमड़े का बैग था. हलके पसीने से चमकता वो गुलाबी खिला हुआ चेहरा और काजल लगी दुनिया की सबसे खूबसूरत आँखें, अर्जुन के नजरिये से तोह काम से काम ऐसा हे था. ऋतू ने इस पल में शर्म से नजरे चुराई तोह अर्जुन भी स्थिति और हालात देख शर्म के साथ मुस्कुराये बिना न रह सका. अब तक डिम्पी उसका हाथ पकड़ कर नाचने वालो लोगो में ले जाने लगी थी और ऋतू ने भी उसको आँखों से हे ऐसा करने का कहा.

"ये बैग मुझे दे ऋतू और ले जा इस मुस्कान को भी अपने साथ. जाने घर के हे बचे क्यों कोनो में दुबक दुबक के फिर रहे है.?", मुस्कान से पहले भीड़ से आती हुई आइशा और प्रीती हे Ritu-Muskaan को खींचती हुई ले गयी. पहियों पर चलता वो ऑर्केस्ट्रा भी अब जोरदार धुन्न बजा रहा था जिस पर डिम्पी ने खुद हे अर्जुन के दोनों हाथ उठा कर नाच्वना शुरू कर दिया. हर तरफ से बस उसको हे घेरा जा रहा था फिर चाहे वो सौम्य हो, स्वाति या फिर शालिनी बुआ. जैसे तैसे करके अर्जुन हाथ उठता रहा लेकिन अभी भी वो सहज नहीं था. एक हाथ ने उसकी कलाई पकड़ कर एक तरफ खिंचा तोह जैसे हर आँख से वो कुछ पल अलग हुआ. प्रीती ने हे ऐसा किया था और वो उसकी दोनों आस्तीन खोल कर कोहनी तक ऊपर उठाते हुए कपडे ढीले कर रही थी. कमीज का भी एक बटन खोलने के बाद प्रीती ने अर्जुन के दोनों हाथो में अपने हाथ भर के कैंची का रूप दिया तोह उसके समझने से पहले हे प्रीती अर्जुन को गोल गोल घूमने लगी थी. वो neeli-hari आँखें और उनमे अर्जुन के ऊपर वो प्यार का सम्पूर्ण भाव. सुर्ख लहंगे में सजी हुई वो कही से भी ऋतू से कमतर तोह न थी. आज सबके सामने वो जिस तरह से अर्जुन को थाम कर नाचने लगी थी, बाकी सभी ने अपने आप उन्हें हे घेर लिया.

"ओह चक्क दे फटते .. उल्लू दे पाते..", नरिंदर जी ने बिंदास हो कर नैरा लगाया था बिना अपनी माँ की परवाह के और प्रीती शर्माती हुई अलग हुई लेकिन अब अर्जुन जैसे एक नशे में था और इस बार उसने कदम हिलाते हुए हे शालिनी बुआ को ऊपर उठा लिया. वो भी हंसती हुई कुछ देर कंधे उचकती रही और फिर एक बार पूरा समूह खुल कर नाचने लगा था. पता हे न चला के अर्जुन कितना नचा और किस किस के साथ. सरोज मौसी, अन्नू वालिए, मेनका, डिम्पी और सबसे आखिर में तोह अनामिका चची को नाचते हुए एक तरफ अपनी दादी के भी हाथ उठवा दिए. सफर अपनी मंजिल पर आ चूका था लेकिन एक ख्वाहिश बाकी थी और आज वो दिल से जश्न के नशे में सब भुला कर ऋतू की तरफ बढ़ा जो जैसे बचना चाहती हो और अर्जुन द्वारा कलाई पकडे जाने पर उसकी धड़कन अनियंत्रित हो गयी. वह कुछ कदम दूर अभी रिबन काटने वाला था और असंख्य युवतियों के साथ दत्त परिवार प्रतीक्षा में थे लेकिन इस सबसे बेपरवाह अर्जुन तोह बस ऋतू को ठीक अपने भैया की घोड़ी के सामने थामे ऑर्केस्ट्रा वाले के बोल का इन्तजार हे कर रहा था और उस गायक ने भी देरी न का.

'एक पंजाबन.. कुड़ी पुन्जब्न... दिल चुरा के ले gayi..Sohna सोहना..', और यही वो पल था की ऋतू अपनी शर्म त्याग कर जब नाचने लगी तोह माहौल हे बदल गया. बरात द्वार पर जैसे रुक हे चुकी थी और उतने हे तेज गाने वाले के साथ dhol-taashe की आवाज बढ़ने लगी. राधिका की तरफ के लोग भी दूर खड़े ये दृश्य देख रहे थे और इस जोड़ी को भी. जल्द हे उन्हें और इन्तजार करवाते हुए नरिंदर जी अपने भाइयो, दोस्तों और biwi-bhabhiyon को लिए इनमे शामिल हो गए. इस बीच वो हुआ जो आज से पहले कभी हुआ न हो. शंकर जी ने तोह अपने पिता और माँ को भी वह शामिल कर लिया जो बचो के ऊपर से नोट वार कर गाने बजने वालो को देने लगे. हुसैन साहब शुदा अपनी बेगम और दोनों बेटियों के कहा पीछे रहते और हिमानी ने अपने mama-maami और नाना जी तक को यहाँ खिंच लिया था. पंडित जी का भरा पूरा परिवार इतने उत्साह में था की वह अलग हे माहौल बन गया. गण फिर से बदला लेकिन भीड़ बढ़ती गयी और अंतत में जब खुद कौशल्या जी ने हे गायक को रुकवाया तोह सब उखड़ी साँसों से एक दूसरे को देखने लगे. अर्जुन ने पाया था के अब उसकी अगल बगल में कोमल दीदी और कृष्णा चची थी, पसीने में भीगी अपना चेहरा साफ़ करके उसको मुस्कुराती हुई देखती.

"अब दादी आप मत कुछ कहना. आपने हे कहा था के मैं डांस नहीं कर रहा.", अर्जुन ने सफाई देनी चाही लेकिन बदले में उतने हे प्यार से उसकी दादी और दादा जी ने आगे बढ़ कर उसको अपने साथ लगा लिया. एक बड़ा काफिला करो का इनके करीब हे आ रुका तोह दादा दादी कुछ सम्भले और संजीव के होने वाले साले उसको रसम अनुसार घोड़ी से उतार कर आगे बढे. भजन जी अपने laav-lashkar के साथ पधारे थे और उनकी मौजदगी देख बहुतो के चेहरे हैरत में थे, ज्यादातर राधिका के परिवार और मेहमानो के. यहाँ संजीव के साथ पूरा परिवार और दोस्त लोग आगे बढे तोह कौशल्या जी की बगल में हे भजन जी बड़ा गुलदस्ता लिए चलते दिखे. वो देरी से आने की वजह बता रहे थे और उनके भी सुरक्षा कर्मियों को रामेश्वर जी ने आराम से खाने पीने का समझा कर अलग कर दिया.

भीड़ में हर सदस्य था लेकिन एक शक्श न दिखा जो कुछ समय पहले उत्साह से नाचने के बाद शायद पेग बनाने गया था लेकिन लौटा नहीं. राजेश शर्मा, अर्जुन के मां.

.

.

"देखो मर राजेश, हमारी तुमसे कोई जयति दुश्मनी नहीं है इसलिए एक पेशकश है जिस से तुम भी साफ़ बहार निकल सको और हमे भी कुछ फायदा मिले. सबूत पुख्ता है और तुम ये मत समझना की मैं अकेला हु तोह तुम मुझे यही निबटा डोज. लोग हर तरफ है मेरे और कुछ तोह काफी करीबी भी है तुम्हारे जो हमारे साथ है. मेरे सीनियर से मीटिंग कर लो और जो हल निकले सहमति से उसपे सब राजी.", अँधेरे में वकील सिंह वो तस्वीरें राजेश को दिखने के बाद साथ लिए पैदल हे जा रहा था. राजेश के हाथ में वो तजा बना पेग था और दूसरे हाथ में शराब की पूरी बोतल. इस तरफ से भी पैलेस की भरपूर रौशनी नजर आ रही थी लेकिन ये लोग अँधेरे में इस सड़क किनारे चलते हर कदम के साथ दूर होते गए.

"आज से बढ़िया दिन न मिला तुम्हे इस mol-bhaav का? चल देखते है क्या कहता है तेरा सीनियर और कितने भारी ाँद है उसके? पहले बता देता हु के अगर घेरा बना कर शिकार करना चाहते हो तोह यही से अकेले निकल जाओ. जीजा को तोह तुम जानते हो लेकिन इधर उनसे बड़े बड़े शिकारी आये हुए है.", वकील के हाथो से हे भूने हुए चने ले कर चबाते हुए राजेश इतना सहज था उसको देख कर वकील के शरीर के रोयें खड़े हो रहे थे.

"जाल बिछा कर शिकार करना होता तोह यहाँ मिलते हे क्यों? सबूत न पेश कर देते जिस से तुम और शंकर तोह बिना विवाद जेल में होते लम्बे समय तक. बातचीत और सौदा हे करना है और आज से ाचा दिन निकलने में समय जाया नहीं करना चाहते थे. लो आ गए हम और बाकी भी आते हे होंगे.", चाय के खोखे पर तोह दुनिया भर का सन्नाटा पसरा था जिसकी वकील को आशा न थी.

"लगता है तुम्हारे अफसर लोग समय के पक्के नहीं है. चलो बैठ जाओ तुम ऐसे खड़े रह कर क्या फायदा? दारु पीनी है?", प्लास्टिक का दूसरा गिलास अपने हे जाम के निचे से खिंच कर निकलते हुए राजेश ने उस फत्ते वाले बेंच पर रखने के बाद उसको शराब से एक चौथाई भर दिया. कमर में खांसी हुई पानी की बोतल से लबालब भरके वो जाम बनाया और वकील की तरफ बढ़ा दिया.

"ड्यूटी के टाइम शराब पीना ाची बात नहीं.", वकील अभी भी खड़ा हे था और उसकी बात ख़तम होने के साथ हे चाय के खोखे से निकल कर ये परछाई इधर बढ़ी. राजेश तोह बड़े आराम से चुस्कियां लेता रहा लेकिन वकील उस व्यक्ति को देख सदमे से कुछ भी बोल न सका.

"हाँ तोह श्रीमान सौदागर क्या पेशकश है तुम्हारे पास? कुछ ऐसा होना चाहिए जिसको देख कर हमारी रूह तक खुश हो जाए नहीं तोह हमको बुरा बहोत लगेगा.", आप थे श कुन्दनलाल शर्मा जी, जो विवाह में आये तोह पूरे परिवार के साथ थे लेकिन आखिरी कुछ समय तक शंकर के साथ हे गायब रहे थे. अपने भतीजे राजेश के बनाये पेग के सामने हे नवीन का कटा हुआ सर रखने के बाद उन्होंने हे वो जाम उठा लिया. नवीन की दहशतगर्द आँखें गर्दन काटने के बाद भी खुली हुई थी.

"आप.. आपने ये किया? ये ठीक नहीं किया क्योंकि अब नुक्सान बहोत बड़ा होगा और भुगतना सभी को पड़ेगा.", लड़खड़ाहट साफ़ थी वकील की जुबान में और ये ज्यादा बढ़ गयी जब दलीप ने भी वह प्रकट होने के बाद राजेश से बोतल ले कर अपने खून साणे हाथ धोये और नेट गले में उतार ली.

"अबे नए नए भर्ती हुए हो क्या? तुम्हारे बाप ने ये उपहार आधे घंटे पहले हे पैक करके रख दिए थे और बताया था के तुम आओ तोह तुम्हे सौंप दे. तुम साले रेगिस्तान के कुत्ते इस तरफ आओगे और अपनी धुल न झाड़ो ऐसा हो सकता है? मिटटी में हे पीला बढे है और अलग गंध मिले तोह लपक पड़ते है उस तरफ. वैसे ये नवीन बोल रहा था के तुम दिमाग से बहोत शातिर हो. शंकर को जांची नहीं तोह उसने इसका ये हाल कर दिया. अब तुम साबित करो और मैं तुम्हारी गर्दन सलामत छोड़ दूंगा.", दलीप ने बात कहते हे इशारे से कुन्दनलाल जी को जाने का कहा. वो एक बार फिर से उस अँधेरे में बढे और कुछ समय बाद वो जगह कार की लीगत से रोशन हो उठी.

"मैं तोह ऐसे हे वापिस चला जाऊंगा. लेकिन तुम लोग नहीं जानते की तुम्हारे हे लोग अब खतरे में है.", वकील की तोह हालत अभी तक खराब थी क्योंकि उसके सामने कटा हुआ सर बस उसको हे घूर रहा था.

"जिसकी तुम बात कर रहे हो न मर आनंद सिंह उर्फ़ वकील, वो कथित जीजा रमनदीप सिंह उर्फ़ रमन शर्मा उस कार की डिक्की में सदा के लिए सोया हुआ है. कुछ समय बाद नहर में लाश होगी और सुबह खबर में यही होगा की मानसिक रूप से परेशां आदमी ने आर्थिक हालात के चलते खुदखुशी की. बीवी और बेटी पर ध्यान नहीं गया तुम्हारा रमन की? वो शादी में थे और अगर तुम इतने हे शातिर होते तोह राजेश के साथ इस तरफ आने की जरुरत नहीं करते.", वकील तोह अपने हे भेद सुन्न कर सकते में था. उसकी पतलून गीली होने हे लगी थी की एक हाथ ने पीछे से उसके मुँह को दबाया और दूसरे ने गाला सफाई से चीयर दिया.

"मादरचोद को इतना बता हे क्यों रहा था दलीप? गांडू ये सब किसको बताता मरने से पहले? ओह बेवड़े, तू एक तरफ लड़की का मां भी है तोह जरा बस कर ये शराब.", शंकर के तोह आने तक का न पता चला था वकील को और अब वो जमीन पर गिरा कुछ वक़्त तड़फा फिर शांत हो गया. बोतल से हे शराब अपनी कमीज पर गिरा कर शंकर ने वही जला दी.

"मजा आ रहा था यार शंकर. पहले वाले तोह 5 के 5 एकदम हे मारने पड़े और ये कुंदन चाचा तेरी वजह से आये न इस सबमे?", दलीप ने भी कुरता उतार कर उस आग के हवाले कर दिया. इनके पास जैसे पहले से हे और कपड़ो का इंतजाम था लेकिन फिलहाल ये सिग्रत्ती पीने में हे लगे रहे.

"पापा ने भेजा था उन्हें विनोद के पीछे और फिर जब उन्होंने मुझे देख लिया तोह फिर साथ लेना पड़ा. लेकिन मान न पड़ेगा ससुर जी को. हाथ से पकड़ कर हे 2 की गर्दन टॉड दी और आवाज तक न हुई. ाचा काम किया तुमने राजेश और दलीप तुम्हे भाभी खोज रही है तोह बहाना तैयार रखना.", शंकर ने देखा तोह कुंदन जी की कार अब वापिस इधर हे आ रही थी.

"हाँ भाई चाचा के जलवे भी आज हे देखे लेकिन जिस तरह पंडित चाचा जी ने उन्हें जिम्मेवारी दी तोह इसका मतलब साफ़ है की उनके लिए ये सब नया नहीं था. बस ये राज जैसे आज हे हमारे सामने जाहिर हुआ है."

"तुम बचे लोग टोली पहले बना लेते हो और काम बाद में करते हो. शंकर बीटा कपडे देख लो पिछली सीट पर.", कुंदन जी ने आते हे दलीप को मजाकिया लहजे में कहा और अपने दामाद को बताया के अब चलना चाहिए.

"इसकी लाश?"

"चिंता क्यों करते हो. यहाँ सिर्फ तुम लोग हे नहीं हो, और भी है जिन्हे तैनात रखा गया है. चलो अब जल्दी यहाँ से फिर मुझे भी जवाब देने पड़ेंगे.", कुन्दनलाल जी ने राजेश को हिला कर उठने का कहा तोह बाकी दोनों भी कार में जा बैठे. कार वापिस vivah-sthal की तरफ जाने लगी थी और सचमुच अँधेरे से कुछ लोग आये और वह मजूद हर सुराग मिटने में जुट गए.

"आपने पहले तोह कभी ऐसा कारनामा नहीं किया पापा.", शंकर इन्हे भी पापा हे कह कर बुलाता था.

"अब ये सब बता कर किया जाता है क्या शंकर बीटा? जमीन बचने से ले कर अपना वजूद बरकरार रखने के लिए जाने क्या कुछ करना पड़ा है. हाँ एक बार पंडित जी के हाथ चढ़ हे गया था लेकिन यु समझ लो की वो जो भी था उन पर हुम्ला करने वाला था इस वजह से बात रफा दफा हो गयी. आज भी उन्होंने मुझे सिर्फ इन्हे पकड़ने के लिए कहा था लेकिन अब जवाब तुम्ही देना या मैट देना. मैं जबतक गया तब तक सब साफ़ था. वैसे ये रमन का क्या किस्सा था?"

"दलीप बता जरा पापा को रमन का किस्सा.", शंकर ने जैसे पूरी तैयारी हे कर राखी थी इस मामले की

"अर्जुन ने सूचना दी थी मुझे, चाहे डायरेक्ट खुद न कहा कुछ लेकिन एक रिपोर्ट थी उसके पास. और वो मेरे हाथ लगवाई गयी थी. मैं उसपे हे काम कर रहा था और फिर मुझे पता लगा नवीन के बारे में और आज सुबह हे मैंने Roshni-Anjali को सुरक्षित किया फिर इन लोगो पर नजर रखवाई. पंडित चाचा जी इसमें खुद शामिल थे शंकर, मैंने पहले नहीं बताया तुम्हे लेकिन उन्हें भी पता था. इनमे से किसी के पास भी असली फाइल नहीं थी और जिसके पास थी उस से पंडित जी वो हांसिल कर चुके है. इन्हे पकड़ने का हे आदेश था और अगर माहौल बिगड़े तोह कोशिश करनी थी की रमन को तोह ज़िंदा रखा हे जाए. पर तेरा गुस्सा कभी कोई काम सही से करने दे तोह न. चल कोई बात नहीं यहाँ भी चाचा जी ने नहर में जान देने वाला हल निकाल लिया. वैसे अभी ऐसे और कितने लोग होंगे?", दलीप ने जैसे खुद हे सवाल करने के बाद जवाब सोचना शुरू कर दिया था.

"ये अर्जुन का क्या मामला है दलीप?", कुन्दनलाल जी को तोह और किसी से कुछ वास्ता हे नहीं था.

"वो बस खोजबीन करता रहता है पापा. आप खुद हे देखिये अगर वो शामिल होना चाहता तोह इनके बीच हमसे पहले पहुंच जाता. ये उसको लाइफ लेसंस दे रहे है पापा खुद. बस..", कहने को तोह शंकर ने ये बात कह दी लेकिन अब दिमाग फिर से अपने बेटे पर हे केंद्रित हो गया था.

"यहाँ 5 लोग मारे गए है शंकर, रमन को मिला कर. और रमन की लाश 3-4 दिन बाद हे सामने आएगी क्योंकि अभी घर में ख़ुशी का माहौल है. लेकिन तुम्हारे पिता जी के हिसाब से 6 लोग होने चाहिए थे. एक या तोह फरार है या ... या पता नहीं लेकिन एक और इंसान होना चाहिए था.", कुन्दनलाल जी के इस आशय ने हे दलीप और शंकर को वो जवाब दे दिया था जिसका उन्हें अनुमान था शायद.

"पापा अपना काम हमसे बेहतर करना जानते है.", शंकर के संक्षिप्त जवाब पर कुन्दनलाल जी मुस्कुरा दिए.

"इसलिए वो पिता है और उन्हें तुम्हारा भी ाचे से पता है. काम से काम एक तोह उन्होंने बचा हे लिया तुम्हारे हाथो."

"आपके और मेरे हाथ से."

"मैं तोह यहाँ था हे नहीं शंकर. तुम लोग मुझे बहार पीते हुए दिखे हो और मैं अभी काम से हे तोह गया था बहार. हम कही नहीं मिले और न हमारी बातचीत हुई.", कार को सही से लगाने के बाद वो अपनी बात ख़तम करके हँसते हुए अंदर चले गए लेकिन यहाँ ये तीनो अब ek-dusre को देख रहे थे.

"ये उसने कब किया होगा दलीप?"

"वो भुप्पी को कार देता हुआ दिखाई दिया था मुझे जीजा. घोड़ी में शामिल होने से पहले. और उसके पहले जब मैं मंदिर जा रहा था तब वो कपडे बदल कर भी आया था. हो सकता है उन्ही 2 समय के बीच उसने ये काण्ड कर दिया हो. वैसे आपके पापा भी उसके साथ हे थे जब वो कपडे बदल कर आया था. और वैसे तोह वो सबसे आखिर में आया है इधर."

"धत्त तेरे की. पापा ने जानबूझ कर हमसे ये करवाया है राजेश. उन्हें पता था की मैं इन्हे ज़िंदा जाने नहीं दूंगा और अब उनके पास वो इंसान है जो उन्हें चाहिए था. हमारे कनेक्शन कट हो गए इन्हे मारने के साथ हे लेकिन वो अब उस आदमी के जरिये पूरी तहकीकात करेंगे. दलीप, तू इस अर्जुन के पीछे नहीं लगा सकता था किसी को?", शंकर जी ने खीझते हुए ऐसा कहा तोह दलीप बेबसी से उनकी हे और देखने लगा.

"वो हमारे हे अड्डे पर सेंध मार चूका है शंकर और जब जब लोग लगाए गए उसके बचाव और जानकारी लेने के लिए, उसने उन्हें हे धुल छठा दी. भाई मेरी ज़िन्दगी पहले हे नरक सी बन्न चुकी है और तू ये ाचे से जानता है."

"मेरे कौनसा तुझसे ाचे हाल है यार. सिचुएशन शामे है मेरी भी. चल कोई बात नहीं, बीटा है तोह गलत नहीं करेगा.", मैं मार कर अब यही तोह कह सकते थे वो. पैलेस से बहार तक संगीत की आवाज और जगमगाती रोशनियाँ आ रही थी. ऐसे माहौल में भी ये शंकर हे था जो हमेशा परिवार को बहार के संकट से सुरक्षित रखता था, एक अभेद दिवार की तरह.

"वैसे एक बात और भी है जीजा जो आपने नहीं देखि. ऐसा है की आपकी होने वाली बहु अब sare-raah अर्जुन बिचारे को नचा रही है. ऐसी किकली घुमाई थी न उस लड़की ने के भांजा पूरा चार्ज हो के सभी औरतो को उठा उठा नाचने लगा. देखना कल को वो आपको हे उठा के न घूमने लगे."

"तूने जो देखा वो सबने देखा राजेश और मैंने जो देखा वो किसी ने न देखा. मुझे उठा के घूम ले तोह मैं ख़ुशी ख़ुशी कंधे बैठ जाऊ उसके.. पर जाने वो कैसे नाचने वाला है और अगर वैसे नचाया तोह भाई फिर रहने हे दे. चल अब खली यही बैठ के कुछ न होने वाला. भेतजा मेरा घबराया होगा ब्याह से. उसको भी tonic-vonic देते है.", शंकर जी की ये पहेलियाँ इन दोनों के हे ऊपर से गयी थी क्योंकि उन्हें कहा ऋतू के बारे में पता था. और कार से निकलते हे इनके साथ जुड़ गए मेहुल, परम और भुप्पी.

.

.

"ऐ निक्की ये लड़का तोह वही है न जो शाम को देखा था? और अगर मैं गलत नहीं हु तोह इसके साथ जो है वो इसकी गर्लफ्रेंड हे होगी?", रिबन कटाई के समय संजीव भैया इस तरफ खड़े थे और उनका तिलक देविका जी कर रही थी. उनकी जेठानी कुछ गीत जाती चावल वार रही थी और सोमनाथ जी के साथ खुद सुभाष जी भी यहाँ थे. गुलाबी पगड़ियां हर तरफ थी उनके सर के साथ साथ. इस बीच निकिता के बर्बर कड़ी एक खूबसूरत सी लड़की ने ये बात बहोत धीमी आवाज में पूछी तोह पीहू भी उनके करीब हो गयी.

"बहिन है वो अर्जुन की, बड़ी बहिन. हाँ इन दोनों में जुड़ाव तोह kabile-tareef है. वैसे तुझे कैसा लगा ये पम्मी? हैं न बिलकुल choco-lava केक.?", निक्की ने किसी विख्यात डिज़ाइनर का बहोत हे आधुनिक और मूल्यवान लेहंगा चोली पहना हुआ था. कई जगह से पारदर्शी और उतना हे कमाल का उसका जिस्म था जो हर कटाव जाहिर करता बरबस हे सबका ध्यान खिंच लेता. पीहू ने भी कुछ वैसा हे परिधान पहना था लेकिन परिपक्व हो रहे शरीर के साथ वो मासूम ज्यादा लगती थी.

"कसम से यार ये दिल्ली में होता तोह निचोड़ लेती अभी तक.", पम्मी की बात सुन्न कर सब खिलखिला उठी और इधर संजीव को आगे आते देख निक्की ने हे फरमाइश के लिए मुँह खोल दिया. अखिल, जो हमेशा हे खाने पीने और सुस्ती से भरा रहता था वो बस अर्जुन को वह देख मुस्कुराया.

"जीजा जीईई.. ऐसे कैसे आगे आओगे? डायमंड रिंग राधिका को दी थी तोह उस से काम मैं न लुंगी.", निकिता की बात सुन्न कर कौशल्या जी तोह हंसती हुई एक तरफ हे हो गयी. जीजा साली के बीच उनका क्या काम था भला लेकिन यहाँ पर रूपक ने जवाब दिया और उस से सभी की हंसी गूँज गयी.

"रिंग के साथ संजीव को राधिका मिल रही है. तुम हाँ करो तोह मैं अभी ले आता हु.", निकिता जैसे उसको भी जानती थी और हँसते हुए उसने बस इतना हे कहा.

"भैया बन्न कर तोह जो चाहे दे दीजिये रूपक जी.. लेकिन आज जीजा जी की बारी है. साली को आधा तोह मिलना चाहिए उस हिसाब से आधे कैरट की अंगूठी भी चलेगी.", अब बारी रूपक की थी झेंपने की लेकिन अलका भी तोह यहाँ थी.

"वैसे आप तोह बड़ी है राधिका भाभी से. आपको तोह दुगना मिलना चाहिए दीदी. एक काम करो आप न अर्जुन को हे रख लो.", अलका ने ढीले वाले खड़े अर्जुन को धकेला लेकिन पकडे हुए हे तोह सभी लड़कियां पीछे हट गयी. अर्जुन सब समझ कर अपनी हंसी हे न रोक सका.

"ऐसे भला कोई देता है? अर्जुन तुम इस तरफ आ जाओ तोह नेग नहीं लेंगे."

"वो तोह ये अपने आप हे उस तरफ हो जायेगा दीदी. भाभी जो मिल रही है इसको.", ऋतू ने तोह यहाँ भी अर्जुन को हे घेर लिया. जो पलट कर शिकायती लहजे में देख रहा था लेकिन ऋतू ने आँख दबा कर उसको इशारा किया की खेल है देखते जाओ.

"Oho..matlab ये अभी नहीं आने वाला लेकिन भाभी मिलने के बाद हमारी तरफ होगा? रास्ता तोह यही से जाता है तुम्हारी भाभी तक का मर अर्जुन. आप बोलो जीजा जीईई.. अंगूठी या.."

"अंगूठी.. लेकिन बीटा ये तोह बताओ के तुम लोग एक अंगूठी बाँटोगी कैसे?", नरिंदर जी यहाँ प्रियंका के कंधे पर दोनों हाथ रख कर सबके बीच शामिल हुए तोह अब लड़कियां बगले झाँकने लगी.

"देविका जी, अब अंगूठी वाली बात चल रही है और ये जवाब नहीं दे रही.", उन्होंने अब दुल्हन की माता जी को भी घेरे में ले लिया जिस पर सुभाष जी तोह खिसक लिए सोमनाथ जी के साथ लेकिन राकेश गौर बड़े ध्यान से ये सब देख रहा था. उसकी बीवी की नजर बेटी की तरह लगातार अर्जुन पे बानी हुई थी और अर्जुन के पीछे हे उसकी बहिन पूजा गौर जो अब शर्मा थी, वो बड़े प्यार से कन्धा टिकाये थे भांजे के साथ.

"नरेन् भाई साहब, हमने तोह नेग न लिया था लेकिन लड़कियों के साथ अन्याय नहीं होने देंगे."

"ये चंडी के चले है मेरे पास. 20-25.. इनसे काम चला लो.", लकी ने मुट्ठी भर चंडी के चले सामने किये तोह सभी पीछे हट गयी. संजीव तोह मारे गर्मी के परेशां हे हो चूका था जिसने बिना कुछ कहे थाली से कैंची झटकी और रिबन काट दिया. सभी हैरानी से उसको देख रहे थे लेकिन बगल में खड़े अपने पिता से 500 के नोटों की गद्दी पकड़ कर उसने सीधा निक्की के हवाले की और रौब से आगे बढ़ गया. बाकी तोह अपनी जगह खड़े बस देखते हे रह गए. कुछ आगे चल कर संजीव पलटा और अपने हे घरवालों से बोलै.

"अब मैं अकेला हे आगे जाऊंगा? अंगूठी नहीं है तोह पैसे दे दिए. खरीद लेंगे या बाँट लेंगे लेकिन खड़े खड़े हालत ख़राब हो रही है.", उसकी बात सुन्न कर फिर से सभी खिलखिला उठे.

"दूल्हे राजा, इतनी भी क्या जल्दी अपनी दुल्हन देखनी की? गर्मी के बहाने जनाब दोस्तों को हे पीछे छोड़ गए.", लकी की बात पर हँसते हुए बाकि सब भी फिर से संजीव के साथ हो लिए. पुष्पवर्षा इधर से भी जोरदार हुई थी. इस बीच Sangita-Anita मामी ने भी अर्जुन से मुलाकात की और पूजा जी ने उसकी भेंट अपनी भाभी उर्वशी और भतीजी पीहू से करवाई. कुछ लड़कियां और भाभियाँ ये सब देख कर या तोह वही कड़ी हो गयी या फिर एक तरफ चली गयी.

"अर्जुन, तुम उर्वशी मामी से तोह मिले हे हो? ये उनकी बेटी और मेरी गुड़िया पीहू है.", लेकिन अब ऋतू की जगह यहाँ स्वाति और कंचन अर्जुन को घेरे कड़ी थी. उन्हें जरा भी ाचा न लगा जब पीहू से अर्जुन की मुलाकात करवाई जा रही थी. अर्जुन ने उर्वशी को हाथ जोड़ नमस्ते की तोह पीहू ने खुद हे हाथ आगे बढ़ा कर मिलाया.

"प्लेअसुरे मीटिंग यू मिस पीहू.", अर्जुन ने नरमी से हाथ मिलाने के बाद यही कहा था की कंचन ने Preeti-Afsana और आकांक्षा को इधर हे बुलवा लिया. निक्की और उसकी सहेली पम्मी भी यही थी.

"उर्वशी मामी, ये बताओ कौन है?", कंचन की बात सुन्न कर उर्वशी ने बड़े गौर से प्रीती को देखा और सचमुच बहोत सी लड़कियां जैसे रश्क भी कर रही थी उस चलती फिरती कुदरत को देख कर. अफसाना भी समकक्ष थी और आज उस अनारकली पहरावे में किसी चाँद की तरह चमकती. आकांक्षा इनसे अलग चंचल और जिंदादिल चेहरे वाली भूरी बिल्लोरी आँखों की मालकिन.

"ये जरूर प्रीती हे होगी? रेखा दीदी ने बताया था और आंटी जी ने भी. आँखों से हे कह रही हु क्योंकि ऐसी किसी की नहीं है. वैसे तोह इन तीनो की हे बिलकुल अलग है लेकिन थोड़ी देर पहले ये रेखा दीदी के गले लगी हुई थी और ऋतू ने पुकारा भी था.", उर्वशी जी का जवाब सुन्न कर प्रीती ने पाँव छूने का प्रयास किया तोह उन्होंने खुद हे रोक दिया.

"बहोत हे खूबसूरत और प्यारी हो तुम तीनो. वैसे अर्जुन खुशकिस्मत हो बीटा तुम जो इतनी प्यारी गुड़िया सी दुल्हन नसीब हुई.", दुल्हन लफ्ज़ सुनते हे आधी लड़कियों के तोह होश हे उड़द गए बस निक्की हंस रही थी जिसको सब पता था. यहाँ इनकी चर्चा चल रही थी वही पम्मी अब निक्की को सुना रही थी.

"ये पहले से हे बुक है? बताया भी नहीं तूने तोह यार और सचमुच वो लड़की सुन्दर तोह है हे पर मेरा दिल टॉड दिया."

"अरे रुक तोह सही डार्लिंग. अभी तोह इस अर्जुन के भी कान खींचने का टाइम है. देखती जा बस. और ऐसा नहीं है के तू चांस नहीं मार सकती. कौनसा तू अपने से 5 साल छोटे लड़के से शादी करने वाली है.", निक्की को अपनी माँ की आवाज सुन्न कर अब जाना पड़ा था वही संदीप को देख अर्जुन भी खिसक लिया यहाँ से. हर तरफ 3-3 परिवारों के लोग मेलजोल बढ़ने में लगे थे और खाने पीने के साथ ऐसा माहौल था की जैसे 2-2 दूल्हा दुल्हन का विवाह न हो कर कोई बड़ा पारिवारिक समारोह हो. किसी के पास भेदभाव या ईर्ष्या का भाव न था फिर चाहे वह अभिषेक के साथ सोमनाथ जी घुलते मिलते दिखे या फिर भजन अपने चाहने वालो के साथ बिना सुरक्षा के आम इंसान की तरह gulab-jamun और ice-cream का स्वाद लेते.

भीतर मंच की तरफ फोटोग्राफर इन सभी परिवारों के सदस्यों की एक साथ तस्वीरें उतार रहे थे तोह 3-3 वीडियो रिकॉर्डिंग वाले हर मेहमान और उनकी सामाजिक गतिविधियों को क़ैद करते दिखे. ललिता जी के साथ शिल्पा जी, देविका जी और उनकी जेठानी मिनाक्षी दत्त की तस्वीरें हुई. फिर उसमे रेखा, कृष्णा और उनकी भाभियाँ मधु, सुशीला, रेणुका आदि भी शामिल हुई. लड़कियां अपने में हे लगी थी और उनकी सेवा सबसे छोटा भाई हिमांशु कर रहा था. निकिता के साथ प्रियंका, कोमल, अक्षरा, अनुपमा, रुपाली और शिल्पा जी ने भी ढेरो फोटो खिंचवाई थी.

.

.

"ऐ माँ.. देख किसी बालक ने धक्का देके मेरी ड्रेस का के हाल किया? तू जरा आड़े देख इन रिश्तेदार ने, मैं इसने साफ़ करके आयी.", बबिता की जरीदार कमीज पे कुछ कुल्फी गिर गयी थी और वो अपना हैंडबैग सुशीला जी को थमा कर कपडे साफ़ करने जाने लगी तोह सुशीला जी ने हे उसकी तरफ एक चाभी बधाई.

"पीछे जहा मैं तैयार हुई थी, उस कमरे की हे चाबी है. 103 नंबर. और आराम से साफ़ करियो कही पूरा भिगो ले कपडे को.", सुशीला जी से चाभी लेते हे बबिता के मैं में अलग हे लड्डू फूट रहे थे पर उसने बहार से जाहिर न होने दिया. जैसे कुल्फी गिरना भी एक निर्धारित कार्य था और अब सफाई भी. अर्जुन कुछ दूर खड़ा ये सब देख रहा था जहा बलबीर और संदीप उसके हे साथ थे. बलबीर को तोह संदीप से भी बात करना पसंद आया था और वही पूर्वी भी अपनी माँ गीता और पिता सोलंकी के साथ इधर शामिल थी. पूर्वी आकांक्षा के साथ Aarti-Afsana और प्रीती से मिलने निकली तोह सोलंकी अपने दोस्त तनेजा के साथ विवान की मण्डली में जा घुसा. अब अर्जुन ने काम का बहाना किया था और वो टहलता हुआ इस खाने के पंडाल से इतर थोड़ा अँधेरे में जा खड़ा हुआ.

'शठ.. 5 मिनट बाद ाइयो उस तरफ. 103 में और कोई शोर न करिये. अँधेरा रखूंगी तोह बस मैंने ठंडी कर के निकल लियो.', बबिता ने अपने इरादे जाहिर कर दिए थे के वो इस माहौल में बहोत गर्मी मान चुकी है और अब कैसे भी करके अर्जुन उसको ठंडा करे. अर्जुन भी जाने कैसा आकर्षित था बबिता की तरफ या वो कभी उसका मन कर हे नहीं सकता था. फिलहाल तोह दोनों दूल्हे अपनी सालियों से घिरे थे और mehman-rishteydar व्यपार, दुनिया की बातें करते हुए कही खाने में तोह कही तारीफ में लगे व्यस्त थे. इस माहौल में किसी का भी ध्यान अभी अर्जुन पर न था जो 5 मिनट काटने के लिए उस तरफ चल दिया जहा देविका जी के लोग रुके थे. राधिका भी पूरी तैयार थी और फिलहाल कमरे में हे उसके अकेले के तस्वीर निकले जा रहे थे, सहेलियों और उर्वशी की मौजदगी में. अर्जुन देख रहा था की ये जगह कितनी खास है. छोटे से बगीचे के बीच चलता रंगीन पानी और वृक्षों के झुरमुट में सरसराती हुई ठंडी हवा.

"जीजी, बबिता कहा गई?", चंद्रो देवी ने भी मधुलता की बात सुन्न कर सुशीला की तरफ देखा.

"वो उसकी ड्रेस पे कुल्फी गिर गयी थी तोह साफ़ करने के लिए मैंने हे उसको अपने कमरे में भेजा है.", सुशीला के जवाब पर मल्टी ने जरुरी जवाब दिया.

"जीजी, वह से तोह कपडे तोलिये उठा कर बैग बिजेन्दर की कार में न रख दिया था आपने?", अब सुशीला को भी समझ आया था के अगर बबिता ने सीधे पानी से हे वो साफ़ किया तोह उसको सूखने में कितना समय लगने वाला है. कपडे से साफ़ करके इस देरी से बचा जा सकता था. उन्हें सोचता देख करीब आये शंकर जी ने एक साफा (अंगोछा) सुशीला की तरफ बढ़ा दिया.

"जा ये दे आ बेबे उसको नहीं तोह फिर कमरे में हे बैठी रहेगी कई देर. ताई, आपको पापा बुला रहे है.", चंद्रो देवी भी शंकर का हाथ पकड़ कर अपनी जगह से उठ कर उनके साथ हे चल दी और सुशीला धन्यवाद करती हुई उस कमरे की तरफ जहा जाने क्या भूचाल आने वाला था.

"मुन्नी, समझ सकती हु तुझे ाचा न लग रहा होगा लेकिन देख ये उनका परिवार है तोह वो परिवार में हे रहेंगे. वैसे शंकर आज भी ढला नहीं. कौशल्या जी तोह यहाँ से जाते हे नजर उतरने वाली है शंकर की, मैंने खुद सुना था जब 3-4 औरते बात कर रही थी कौशल्या जी के पीछे कड़ी.", सुदर्शन को बिजेन्दर खुद हे संजीव की तरफ ले जा चूका था जिस से मल्टी निश्चिंत थी. लेकिन अब उसकी बात सुन्न कर मधुलता जरूर मुँह बिचका कर ऐसे दिखने लगी जैसे उसको परवाह हे न हो. सच तोह कुछ और हे था.

"मैंने कद कहा जीजी के ये मेरा परिवार है? हाँ बढ़िया तोह हमेशा दिखे है शंकर जिस करके उसकी जोड़ी भी जांचे है."

"मतलब तुम मानती हो न की रेखा के साथ शंकर जंचता है? माँ जी सुना था की रेखा के लिए अनगिनत रिश्ते आये थे और वो देख सुनंदा जी, रेखा की माता जी. उनसे हे विरासत में रेखा को वो ख़ूबसूरती मिली है जिसकी चर्चा यहाँ आये बहुत से लोग करते दिखे. श्याम बाबा इन पर कृपा बनाये रखे.", इस बीच ऋचा नजर आयी जो शंकर जी का हाथ पकडे कुछ कह रही थी हंस हंस कर और वो भी मुस्कुराते हुए सुन्न रहे थे. फिर अपनी गुलाबी पगड़ी शंकर जी ने ऋचा को पहना दी और ठीक वैसी हे पगड़ी पहने विन्नी उनके दूसरी तरफ आ कड़ी हुई. उमेद के सर से भी उसकी पगड़ी गायब जो थी. ये दोनों लड़कियां अपने बीच शंकर जी को खड़ा करवाए फोटो उतरवा रही थी और यही उमेद के साथ दोहराया था इन्होने. मल्टी तोह इस दृश्य को देखती हे रही वही उसने मधुलता को भी अनजाने में मुस्कुराते हुए पाया.

"शंकर अपनी जिम्मेवारियों से कभी नहीं भागता मुन्नी. खुद हे देख ले के यहाँ ऋचा उसके साथ है और वो भी पूरे प्रेम बरसा रहा है हमारी बिटिया पर."

"चाचा लगता है तोह भतीजी से लाड न करेगा? वैसे भी ऋचा ने ाचा किया पगड़ी उतरवा कर. जाँच न रही थी.", अब मल्टी हंसने लगी थी क्योंकि मुन्नी के कटाक्ष ऐसे थे जिनमे वो खुद हे नहीं जानती थी की क्या बोल रही है. सुदर्शन भी व्हीलचेयर पे ीदार आ गया था बिजेन्दर के साथ और अपनी माँ को मुस्कुराते देख उसको भी ख़ुशी हुई.

"काकी आप न हंस रही? माँ अकेले हे खुश हो रही.", सुदर्शन ने जाने किस विचार से मुस्कुराते हुए अपनी माँ से पहले मधुलता को लकड़ी की चम्मच से कुल्फी खिलानी चाहि तोह मधुलता भी न नहीं कर पायी. होंठो से वो चम्मच भिड़ते हे उसका हाथ अपने आप हे सुदर्शन के सर की और बढ़ गया.

"तू समझदार हो गया रे छोटी. वैसे मैं मीठा न खाती लेकिन तेरे हाथ से पहली बार कुछ खाया तोह ना भी न कर सकती. जल्दी ठीक हो के वापिस हवेली आजा.", यहाँ मधुलता ने उसको उस नाम से पुकारा था जो अक्सर सुदर्शन के दोस्त या सिर्फ उसकी दादी हे बुलाती थी. हाँ ये नाम मशहूर भी था लेकिन इन सबसे अलग दृश्य उस तरफ था जहा बबिता गयी थी.

.

.

"बबिता दीदी, आप जल्दी से मेरे साथ चलो.", यहाँ बबिता ने बस टाला खोला हे था की अनुपमा उसका हाथ पकड़ कर इस कमरे से 4 कमरे आगे माधुरी की तरफ ले चली. बबिता जबतक कुछ कहती गलियारे में आयी मुस्कान और प्रियंका भी उसको घेरे हुए आगे बढ़ गयी. माधुरी वह दुल्हन के अवतार में थी और उसको सजती हुई जसलीन के साथ सुरभि कन्नुप्रिया. कमरा एक बार फिर बंद हो चूका था क्योंकि सभी ने चित्र जो उतरवाने थे. बबिता इस सबमे अपना मकसद हे भूल गयी लेकिन कपडे साफ़ करने के लिए वो वही से एक तोलीअ उठा बाथरूम में जा घुसी.

'ये लड़की भी बेसुध हे है पूरी. चाबी तक दरवाजे से न निकली.', सुशीला बड़बड़ाती हुई इस शांत गलियारे से जैसे हे कमरे में दाखिल हुई वह अँधेरा देख और खीज गयी. बहार गलियारे में वैसे हे छत पर लगे वो हलकी रौशनी वाले बल्ब सिर्फ इतना हे उजाला करते थे की गुजरता व्यक्ति हे दिखाई दे. कमरों के भीतर उनका भी कोई जोर न था. अभी वो उस मद्दिम सी naam-matra रौशनी में अंदाजा हे लगा रही थी स्विच की दिशा का और पीछे से उन मजबूत हाथो ने उसको अपने आगोश में भर लिया. दरवाजा जितनी आहिस्ता से बंद हुआ था वो तोह सुशीला को पता तक न चला. लेकिन ये जोर्दर्न मरदाना पकड़ सीधा उसके बरसो से अनछुए मॉटे उभारो पर अनुभव करते हे वो किसी मूरत में हे तब्दील हो गयी. सुशीला के जिस्म पर आखिरी बार स्पर्श सिर्फ उसके पति फ़तेह ने हे किया था तक़रीबन 25 साल पहले लेकिन इस व्यक्ति ने जैसे मजबूती से उस पर हक़ जमाया था सुशीला हैरत से बर्फ हे बन्न चुकी थी.

'आप भी न बब्बू दीदी मानती नहीं हो. पता नहीं ये ज़िद्द बुआ से आपमें आयी है या अपने आप. और 5 मिनट में कपडे हे बदल लिए?', कान में ये आवाज पड़ते हे सुशीला का तोह खून हे जम्म गया. वो कुछ कहती उस से पहले हे अर्जुन ने उसके कान की लौ पर जीभ हे फिर दी. बबिता से कुछ ek-do इंच काम होने के बावजूद सुशीला का शरीर किसी हाल में भी अपनी बेटी से काम न था बेशक उतना गोरा न हो लेकिन म्हणत की वजह से आज भी सख्त और सांचे में ढला तगड़ा मांसल बदन. अर्जुन तोह उसके जवाब से पहले हे अपना एक हाथ सूट के निचले भाग में ले जा कर मखमली पेट सहलाता हुआ उन पहाड़ो की चोटियों पर ले जाने लगा. सुशीला का जर्रा जर्रा कैंप उठा था जब उसने अपने भरी नितम्बो की दरार में वो मोटा तगड़ा नाग फुंफकार कर सर उठता महसूस किया.

'ओह दीदी.. आप घर पे हे चाहती थी मेरे साथ करना .. लेकिन आपने हे देखा था न.. यहाँ भी रिस्की है लेकिन अब आपका क्या करू? मानती भी नहीं हो और ये कुल्फी खुद पे गिराने का आईडिया हे देखो.. उम्म्म.. सच कहु तोह मुझे भी आपका यु मुझ पर हक़ जमाना पसंद है लेकिन मेरे पास ज्यादा टाइम नहीं है didi..Aaj कुछ ज्यादा हे टाइट हो आप..', अर्जुन कान में धीमी सरगोशी करने के साथ अब सुशीला के मांसल पहाड़ को ब्रा के भीतर से हे दबोच चूका था. उसको भी एहसास हुआ के 'बबिता' का निप्पल कुछ ज्यादा हे अकड़ा और मोटा है पहले से. लेकिन ध्यान बाहरी माहौल पे भी था और इस काम पर भी. सुशीला के गाल से फिसलते उसके होंठो ने कब उन कांपते होंठो को मुँह में भर लिया खुद सुशीला भी भूल गयी. वो तोह पहली हरकत से हे सदमे थी और यहाँ अर्जुन उसके एक बड़े चुके को मसलने के साथ होंठो को चूसते हुए सुशीला की कमर से सलवार का नाडा भी खोल चूका था. पसीने से ठण्ड हो चुके विशाल कूल्हों की गहरी कासी हुई दरार के बीच जब सुशीला ने उस आजाद मूसल का स्पर्श सहा तोह बरसो से सूखी उसकी जंगल घिरी फांको ने न्यास हे पानी टपका दिया. अर्जुन अंदाजे से हे उसको आगे की तरफ झुकता गया और सुशीला कठपुतली की तरह झुकती चली गयी. उसके होंठ अब आजाद थे लेकिन फिर भी एक आह तक न भर पायी थी सुशीला. अँधेरे में जहा सुशीला झुकी था वह सामने हे दिवार थी और हाथ अब उस दिवार पर टिकाये सुशीला पूरी तरह अर्जुन के बाहुपाश में.

'गैलरी करीब हे है दीदी. शोर मत करना jyada.',Aur सिर्फ एक क्षण के लिए अर्जुन ने अपना वो भयंकर लिंग थोड़ा पीछे करके थूक से हे चिकना किया क्योंकि इतनी जल्दी बबिता की योनि तैयार नहीं होगी ये वो जानता था. चिकनाई का बस यही एक हल था उसके पास और उन फैली हुई विशाल जांघो के बीच अंदाजे से हे उसने अपना दहकता सूपड़ा फंसा दिया. बालो का सिर्फ हल्का सा हे एहसास हुआ था जिसको नजरअंदाज करके अर्जुन ने सही से मुद्रा लेते हुए कमर उचका दी. न चाहते हुए भी सुशीला भयंकर पीड़ा से भर उठी लेकिन ये पीड़ा फिलहाल तोह बढ़ने हे वाली थी. अर्जुन भी कुछ हैरान था इतनी कसावट से लेकिन मांसल फूली हुई योनि में क़ैद अपने लिंग को महसूस करके वो मजे में खोया आगे बढ़ता हे गया. सुशीला की आँखों में आंसू आ चुके थे लेकिन वो सबकुछ ख़ामोशी से सेहती अपने दोनों बड़े बड़े चुके अर्जुन से मसलवटी हुई बस उसको करने देती रही. 2/3 लुंड हे अर्जुन अंदर करने के बाद ताज्जुब से रुक गया.

'दीदी.. क्या किया है आज.. आह.. ये तोह पूरा जा हे नहीं रहा.. ', बस उसने इतना हे कहा था की बहार से किसी ने दरवाजा खड़काया और अर्जुन घबराहट में कुछ पीछे हुआ तोह सुशीला उस दिवार पे हाथ फेरती हुई बाथरूम का दरवाजा खोल अंदर चली गयी. बाथरूम बंद हो चूका था और अर्जुन अपनी चढ़ी साँसों को दुरुस्त करता हुआ जैसे तैसे दरवाजा खोलने बढ़ा. इधर से वो दरवाजा देख प् रहा था क्योंकि दूसरी तरफ हलकी रौशनी थी. उभर तोह उसका भी नजर आ जाता लेकिन फ़िलहाल वो परेशां भी था और यहाँ से निकलना जरुरी था उसके लिए. दरवाजा खोला तोह सामने गुड्डी काकी कड़ी थी.

"बीटा, सुशीला जीजी को देखा तुमने? और बबिता का भी पता नहीं कहा है? इधर आने का हे बोल के गयी थी वो.", अर्जुन ये कह देता की अंदर बबिता है तोह पक्का फंस जाता .

"चची जी, दीदी तोह मैंने थोड़ी देर पहले हॉल में देखि थी और सुशीला बुआ का मुझे भी नहीं पता."

"ाचा तू चल मेरे साथ, वो माँ जी पूछ रही थी और मुझे ज्यादा पता नहीं इधर का.", अर्जुन को भी खिसकना हे ठीक लगा अब यहाँ से. घबराहट में उसका वो अजगर भी सो चूका था जो थोड़ी देर पहले पूरे उफान में उस कासी हुई मांसल गुफा में घुसा था जिसकी गहराई वो कई बार पहले नापने के बाद जाने क्यों आज कुछ पहले हे रुक गया था. अर्जुन ये सोचता हुआ अपने हे विचारो में खोया था की वो लोग पंडाल में आ पहुंचे.

"अरे ये क्या हाल बना रखा है तूने.? कमीज बहार है तेरी, बाल बिखरे हुए और कोट कहा है तेरा?", कौशल्या जी से सामना हुआ जो चंद्रो देवी के पास हे थी यशोदा जी और पूर्णिमा जी के साथ. अर्जुन ने सचमुच अपनी हालत नहीं देखि थी जो ऐसी थी जैसे वो अभी फिर से नाच के आया हो.

"चल मेरे साथ मैं करती हु तुझे ठीक और ये रहा तेरा vaist-coat. प्रीती लिए तुझे ढून्ढ रही थी.", तारा ने वो बिना ब्याह का कोट उसकी तरफ बढ़ाया और हाथ पकड़ कर एक तरफ बने प्रसाधन कक्ष की और ले चली. अर्जुन ने भीतर जा कर चेहरा सही किया और कमीज भी अंदर करने के बाद बेल्ट चढ़ाई. बहार आने पर तारा ने हे उसका चेहरा अपने रुमाल से साफ़ करने के बाद बाल ठीक करके वो कोट सही से पहनाया.

"Shoe-lace भी बाँध ले. पता नहीं तू क्या करता फिर रहा है. हाँ अब माधुरी दीदी और राधिका भाभी स्टेज पर आने वाली है तोह सबके साथ हे रहना.", तारा बड़ी बहिन की तरह उसको समझती हुई वापिस से पंडाल में ले आयी थी और अर्जुन को पहले की तरह सजा हुआ देख कौशल्या जी ने तारा को हे सूर्य दिया.

"बबिता और सुशीला न दिखाई दे रही गुड्डी. तू गयी तोह थी उन्हें देखने?", चंद्रो देवी की बात ख़तम होने के साथ हे बबिता अपनी माँ से बात करती हुई वही आ रही थी. सुशीला दिलेर थी जो अपनी चाल को जैसे तैसे संभाले ख़ामोशी से हे इधर आ कड़ी हुई. बबिता की नजरो में अर्जुन के लिए प्यार के साथ हे न मिल सकने की माफ़ी भी थी पर सुशीला तोह नवब्याहता की तरह शर्मा कर एक तरफ जा बैठी कुर्सी पे. जाँघे कुछ फैलानी पड़ रही थी उसको और अर्जुन भी बबिता को मूक हामी भर के स्टेज की और चल दिया. उसको अब ये समझ नहीं आ रहा था के बबिता ने सूट उतार कर फिर से लेहंगा क्यों पहन लिया. और आज वो ऐसे क्यों लग रही थी जैसी पहली बार में सम्भोग के दौरान थी.

.

.

विवाह का माहौल अपने चरम पर पहुंच चूका था और द्वार के दोनों हे तरफ भरपूर आतिशबाजी चल रही थी. एक तरफ से माधुरी के सर पे लाल चुनरी की छ्या करके अर्जुन, हिमांशु, संदीप और संजीव भैया के मां का लड़का विवेक उन्हें पंडाल के तरफ ले जा रहे थे. माधुरी दीदी लाल लहंगे में इतनी खूबसूरत लग रही थी नजरे झुकाये चलती हुई की उनकी बगल साथ ले जाती विन्नी और प्रियंका का तेज भी उनके सामने फीका हे था. धीमे कदमो के साथ वो आगे बढ़ते हुए पंडाल में दाखिल हुए तोह 'बहरो फूल बरसाओ' गीत के स्वर से वातावरण चार चाँद लगाने लगा. यहाँ अनगिनत हाथ माधुरी के कदमो टेल फूल बरसा रहे थे और जगह जगह फोटोग्राफर वो दृश्य कैमरा में क़ैद करता उनके आगे चलता रहा. ठीक दूसरी तरफ से ऐसा हे दृश्य राधिका के आने का था. लाल जोड़े और कोहनी तक पहने चूड़े में सजी राधिका भी दुल्हन के अवतार में अध्भुत्त हे थी. अपने भाइयों के साथ मंच पर वो माधुरी के बराबर हे आयी थी और दोनों दुल्हन एक साथ मंच पर अपनी अपनी तरफ से चढ़ी तोह गौरव और संजीव अपनी अपनी जगह से उठ खड़े हुए. यहाँ तोह लोग भी तक़रीबन 3-400 मौजूद थे और लगातार फूल बरसते वो इन्हे दुआएं देने लगे.

संजीव ने आगे बढ़ कर राधिका का हाथ थमा तोह गौरव ने भी अपनी भाभी के कहने पर माधुरी का. ये पल कुछ समय ऐसे हे रुका और फिर से तस्वीरें ली गयी. स्टेज पर आते हे एक तरफ फूलो की माला राधिका संजीव ने एक दूसरे को पहनाई तोह दूसरी तरफ नजरे झुकाये माधुरी ने गौरव को. गौरव ने माला पहनाने से पहले माधुरी के इस रूप को जैसे दिल में क़ैद हे कर लिया था कुछ रुक कर. फिर अभिषेक जी के याद दिलाने पर उसने भी माधुरी के गले को हार से सुशोभित किया. अब दोनों जोड़े अपने अपने साथी के साथ फिर से मंच पर आसीन थे जहा अर्जुन और राधिका की नजर एक दूसरे से पहली बार टकराई और वो वह मौजूद सभी को भुला कर बस एक दूसरे को हे देखते रहे. संजीव ने हलके से सेहरा हटा कर राधिका के कान में कहा.

'जिसको ज़माने में कहा कहा नहीं ढूंढा आपने, वो हमेशा से हमारी बगल में था.', राधिका तोह हल्का सा चिढ़ कर वही संजीव के हाथ पर चूंटी काट गयी लेकिन सबके हंसने पर वो झेंपती हुई नजरे झुका कर नाराजगी भी दिखने लगी.

'अभी से संजीव का दुर्गति वाला समय प्रारम्भ होता है.', लकी ने जो बात कही थी उस पर खुद संजीव भी हंस रहा था और सबकी हंसी को देख गौरव ने भी इन दोनों को देखा तोह वो भी हंस दिया. इस बीच गौरव ने पहली बार खुदसे माधुरी का हाथ अपने हाथ में थाम लिया था जैसे वो बता रहा हो के अब माधुरी उसकी है और वो दिल से खुश है उसके साथ.

"मैं नहीं जानता की ये क्या हुआ है भाभी और क्यों हम पहले नहीं मिल पाए.. शायद भैया सब जानते थे और इसलिए हे वो आपको ये सरप्राइज देना चाहते होंगे. पर ये सरप्राइज उन्होंने आपसे ज्यादा मुझे दिया है. मैं इस चेहरे को कभी भी नहीं भुला था उस दिन सिर्फ एक बार देखने भर से. जो इंसान अपने हृदय में बेजुबान जीवो के लिए इतना प्रेम रखता है, वो मुझे तोह जीवनभर उस छाया में सहेजेगा जिसमे मैं महफूज राहु. भैया ने हम दोनों को हे देखा था उस दिन और शायद यही वजह थी की उन्होंने हम दोनों को हे ये नहीं बताया की हमारा एक अटूट रिश्ता पहले से हे तये हो चूका है.", घुटनो पे बैठे अर्जुन ने अपने दिल की बात ऐसे कही थी राधिका से उसके दोनों हाथ अपने हाथो में लेते हुए की राधिका भी उसके मासूम से लेकिन दमकते चेहरे को हे देखती रही. काजल से सुसज्जित वो खूबसूरत आँखें bhav-vivhal हे हो उठी और राधिका ने बिना किसी की परवाह के अर्जुन के सर को दोनों हाथो में लेते हुए उसका माथा चूम लिया. ये दृश्य निस्चल प्रेम का ऐसा पल था की कैमरा वाले को खुद संजीव ने पीछे हो कर जगह दी. देवर से भाभी की पहली और अनूठी मुलाकात का दृश्य.

"इनको तोह हम मिल कर सरप्राइज देंगे देवर जी. और मुझे भी तुम में एक देवर से ज्यादा अपना वही दोस्त और इनका सबकुछ मिल गया है. ये तुम्हे मुझसे बांटना हे नहीं चाहते थे इसलिए नहीं बताया न इन्होने?", देविका जी तोह इनकी मुलाकात और बातचीत से इतनी खुश हुई थी की उन्होंने अपने पर्स से बिना गिने हे ढेर सारे नोट दोनों से वार कर फोटोग्राफर को थमा दिए.

"ोये बैलबुद्धि अब छोड़ अपनी भाभी को. यहाँ सभी लोग है और इनसे सबने मिलना भी है. तू मिल लिया तोह अब फेरो तक इनके करीब भी नहीं दिखना.", कौशल्या जी ने तोह संजीव भैया वाले खेल को हे और आगे बढ़ा कर दोनों को अलग कर दिया था. राधिका चाहती थी की अर्जुन संजीव और उसके दरमियान हे बैठा रहे और वो उस से बातें करती रहे लेकिन कौशल्या जी के एक बार कहने मात्रा से अर्जुन उठ कर निचे चल दिया. राधिका उसकी पीठ देखती रही और संजीव के साथ कौशल्या जी रहस्यमयी मुस्कान लिए इनपे हँसते रहे. सभी परिवार के सदस्य अब बारी बारी से स्टेज पर आने लगे थे. और उन्हें 2-2 तस्वीर करवानी पड़ती क्योंकि वह जोड़े जो दो थे. संजीव और राधिका के बीच अलका जम्म चुकी थी तोह माधुरी और गौरव जी के मजे उनके बीच बैठी ऋतू ले रही थी. इन दोनों का साथ बाकी सभी छोटी बहने दे रही थी.

2 जिप्सी जो कमांडो से भरी थी, वो पूरे हक़ से पंडाल के पास बने फुहारे के गिर्द आ रुकी और उनसे निचे उतरे तक़रीबन 10 सुरक्षाकर्मियों ने वह खड़े कुछ जवान मेहमानो को रास्ता साफ़ करने का निर्देश दिया. अभी एक वेटर हॉल से पंडाल की तरफ आ हे रहा था की उनमे से एक सुरक्षाकर्मी ने ब्याह पकड़ को उसको पीछे धकेल दिया. लड़खड़ा कर वो युवक हाथ में पकडे उस कोयले वाले बर्तन को सँभालने की कोशिश करता खुद हे फर्श पर गिर गया और उसके बाद जो हुआ उसकी गूँज दर्जनों कानो में गयी और ठीक उस युवक की बगल में वो 6 फ़ीट ऊँचा सुरक्षाकर्मी पड़ा नजर आया. इतनी हे देर में आधा दर्जन बन्दूक अर्जुन पर तन्न चुकी थी लेकिन वो उन सबकी परवाह न करता हुआ निचे गिरे उस सुरक्षाकर्मी से पहले वेटर को उठाने लगा.

"काम तुम भी करते हो और काम ये भी कर रहा है. ये जगह तुम्हारे बाप की नहीं है जो मनमानी करोगे और कोई कुछ कहेगा नहीं. अगर तुम्हे लगता है तुमने सही किया है तोह साबित कर देना नहीं तोह बहार तोह मैं जाने नहीं दूंगा इस भाई से माफ़ी मांगे बिना.", अर्जुन ने वो स्टील की थाली और उस से बिखरा हुआ सामान भी एक तरफ रख कर युवक के कपडे सही करके कहा. बाकि लोग आगे बढ़ते उस से पहले हे एक निर्देश सुनाई पड़ा, महिला स्वर में.

"कुछ गलत तोह नहीं कही कहा इन्होने वाहिब. आपका काम है हमारे साथ रहना और सुरक्षा देना लेकिन किसी के साथ अभद्र व्यवहार करने की सख्त मनाही है जब वो कोई मासूम इंसान हो अपराधी नहीं.", सफ़ेद परिधान जो इस स्त्री के सर को भी मांग तक ढके था और वैसा हे शालीन ब्लाउज, हाथ में सोने की घडी के साथै गले में हरे माणिक का एक विशिष्ट हार. देखते हे लगता था की ये महिला बहोत विशिष्ट है और उसके पीछे हे वो जरुरत से ज्यादा लम्बी विदेशी कार जो शायद 25-30 साल पुराणी होने के बावजूद ऐसे चमक रही थी जैसे hal-filhal हे शोरूम से निकली हो. कार का पिछले दरवाजा एक शाही दीखते व्यक्ति ने खोला तोह बहार आयी 60-65 के करीब की बुजुर्ग महिला जिन्होंने भरपूर निगाह अर्जुन पर की. अब तक वाहिब भी हाथ जोड़ कर खड़ा हो चूका था, नजरे झुकाये. वो सभी बंदूके और उनके धारी पीछे हट चुके थे.

"आपका परिचय कुंवर?", ये महिला भी सफ़ेद साड़ी और वैसे हे सिमित गहने पहने थी जैसे पहले वाली ने धारण किये थे. इतनी उम्र होने के बावजूद चेहरे का तेज कौशल्या जी से भी कही ज्यादा था और उनका हाथ थामे खड़े व्यक्ति की नजर भी अर्जुन पर हे थी. घनी मूंछ, गहरे हरे रंग की कमीज और सफ़ेद पतलून के साथ विशुद चमड़े की ख़ास जूती पहने ये आदमी इनका हे खून था. तभी रामेश्वर जी खुद वह आ पहुंचे और उनके साथ हे हाथ जोड़ कर भजन, कृष्णेश्वर और कौशल्या जी. विनोद भी ये सब देख रहा था लेकिन करीब न आया.

"आपने हमारी बात का जवाब नहीं दिया?", खनकती हुई वो मीठी आवाज सुन्न कर अर्जुन तोह बस निहारे जा रहा था वही उन महिला ने हाथ आगे बढ़ा कर अर्जुन की पहले ब्याह सेहलायी फिर गाल.

"रानी सा, आप हमारे पौत्र अर्जुन है और बीटा ये हमारे अन्नदाता रानी साहिबा है क्सक्सक्सक्स से. कुंवर महेंद्र जी और कुमारी अमृता इनकी बहुमुखी संतान.", यहाँ परिचय देने पर उन दोनों ने हे आगे बढ़ कर रामेश्वर जी से गले लग कर प्रेम दर्शाया था जो कही से भी शाही तरीका न था पर रानी सौंदर्य मुस्कुराई और अर्जुन का हाथ पकड़ कर कौशल्या जी के सम्मुख आ कड़ी हुई. अभी तक बाकी कोई व्यक्ति इस तरफ न आने पाया था.

"गुस्ताखी पर भी ऐसे अवसर से अपनों को दूर नहीं रखा जाता दीदी.", रानी के ऐसे सम्बोधन पर कौशल्या जी से तोह कुछ कहते हे न बना लेकिन बगल में खड़े भजन जी बोले बिना न रह सके.

"जी दीदी को लगा था के आप देश में नहीं होंगी और फिर इतनी दूर आना.."

"हमे मत हे चराओ भजन. राजनीति और dal-neeti से हम तुमसे कही पहले से वाकिफ है. विदेश में थे लेकिन फिर भी हम आये तोह सही. और निमंत्रण न भी मिलता तोह हम आते. वैसे दीदी आपने भी ये नूर हमसे छुपा के हे रखा.", अर्जुन अभी तक सब देख कर समझने की कोशिश कर रहा था और इस बीच हे रामेश्वर जी ने उसको कुमारी अमृता और कुमार महेंद्र से मिलवाने के लिए इजाजत लेते हुए अपने साथ लिया.

"छुपाया तोह धन या वास्तु को जाता है सौंदर्य. बचा है और बड़ा होने पर तोह मिलने हे वाला था. ठीक समय लगा था हमे और उसी आशा से आपको निमंत्रण भेजा था की परिवार के बचे भी आपसे मिल सके. ये भजन खुद हे गया था लेकिन आप इंग्लैंड थी उस समय.", कौशल्या जी ने अभी तक हाथ जोड़े हुए थे जिन्हे थाम कर सौंदर्य ने उन्हें अपने साथ हे ले लिया, दूल्हा दुल्हन की तरफ बढ़ते हुए. सुरक्षाकर्मी आगे भी साथ आना चाहते थे लेकिन इस बार उन्हें इशारे से वही रुकने का निर्देश खुद रामेश्वर जी ने दिया, जिनके चेहरे पर गंभीरता थी.

"बताया गया था हमे इस बारे में इसलिए समय से पहले वापिस लौट आये. दिल्ली से जितना हो सका हमने समय उतना हे रफ़्तार से काम करना चाहा लेकिन देरी हो हे गयी. मुबारक हो पूर्णिमा दीदी. उमेद तुम बढ़ने से रुकोगे भी या नहीं?", जिस भाव से वो पूर्णिमा जी से मिली थी इस से साफ़ जाहिर था की उनके लिए तोह उमेद भी अपना हे था जो पाँव छूटे वक़्त भी रानी के सीने तक लम्बा था. उनकी बात पर बस वो मुस्कुरा दिया.

"आप आइये और पहले कुछ नाश्ता ग्रहण कीजिये. फिर बचो को आशीर्वाद दीजियेगा.", देखने वाली बात तोह ये थी की खुद सोमनाथ जी इस दृश्य को दूर से हे नजर कर रहे थे. उनके साथ वाले लोग तोह भजन जी के साथ हंस बोल कर हे खुश हो रहे थे लेकिन इस परिवार को सबके बीच बिना सुरक्षा के देख जानकार लोग आपस में बातें हे कर सकते थे. अदृश्य सुरक्षा जो थी इन तक आने से पहले स्वयं रामेश्वर जी की. जिन्होंने स्वयं किसी से इनका परिचय नहीं करवाया था.

"पहले हम संजीव और उनकी दुल्हन से मिल लेते है पूर्णिमा दीदी. माधुरी भी हमने बरसो पहले हे देखि थी और आज उनका विवाह हो रहा है.", रानी ने नजरो से हे अमृता और महेंद्र को अपने करीब बुआलया और फिर उन्हें शगुन मंगवाने का कहा.

"आप यही आराम कीजिये अगर चाहे तोह. मैं ले आता हु जो भी सामान ले कर आना है.", अर्जुन ने कुंवर महेंद्र से जिस तरह पेशकश की थी वो अर्जुन को साथ हे ले गए.

"ताऊ जी, अर्जुन को हमने कही देखा है पहले?", कुमारी अमृता ने बेशक एकांत समझ कर ये कह दिया था लेकिन रामेश्वर जी ने ये सुन्न कर पहले हर तरफ देखा. नजरे तोह बहोत जमी थी उन पर लेकिन करीब कोई नहीं आया था.

"हम यहाँ आपके लिए रामेश्वर हे है अमृता या फिर हो सके तोह अंकल बोल सकती हो. अर्जुन आजतक उधर नहीं आया है वैसे. हाँ अगर मिलना चाहो तोह वो 2 दिन बाद हे उधर आने वाला है. अब हम मेहमानो से मिल ले और आप राजू शंकर के साथ उनकी धर्मपत्नियों और बचो से."

"इतना डरते क्यों हो ताऊ जी? भैया आपको पंडित जी बुलाते है लेकिन मेरे लिए जो है वही है. हाँ पीछा छुड़ाना चाहो तोह ठीक है. वैसे शंकर भैया भी इधर हे आ रहे है.", एक बार फिर अमृता ने शाही मुखौटा ओढ़ लिया था लेकिन दिखावे के लिए. शंकर के साथ हाथ मिला कर तहजीब से जरूर मिली पर जो कहा उसको सुन्न कर शंकर भी हंस दिया.

"कैसे हो डॉक्टर लड्डूलाल? सुना है बड़े नामचीन डॉक्टर बन्न चुके हो और वो अमिताभ बच्चन आपकी औलाद है? न अमिताभ तोह नहीं है लेकिन लम्बा उतना हे है."

"रानी साहिबा ने सुन्न लिया न तोह यही पे सजा मिल जायेगी. हाँ वो मेरा हे बीटा है और चलो अपने बाकी बचो से मिलवाता हु.", अमृता फिर से तहजीब से चलती हुई शंकर के साथ हो ली जहा वो बारी बारी से उन्हें सभी से मिलवाने लगे. यहाँ उन्होंने रेखा के साथ साथ देविका जी और शिल्पा से भी भेंट करवाई थी और इस बीच रानी साहिबा के साथ कुंवर महेंद्र भी शगुन लिए मंच तक आ पहुंचे. दोनों जोड़ो को आशीर्वाद और शगुन देते वक़्त इस बात का जरूर ध्यान दिया गया था के ये तस्वीरें न उतारी जाए. नरिंदर जी ने तोह इनके आगमन पर हे वीडियो वालो को तब तक के लिए विश्राम दे दिया था जब तक कहा न जाए. इस सबके बीच हल्का नाश्ता और फिर जरुरी लोगो से इनकी मुलकात भी पंडित जी ने करवाई. शास्त्री जी को जान कर आश्चयॅ हुआ जब खुद रानी साहिबा ने उनका नाम पहले हे बता दिया. Subhash-Somnath जी तोह ज्यादा कुछ कह भी न सके सिवाय शिष्टाचार वश हाथ जोड़ कर खड़े रहने के. बस मर्यादा लांघ कर इनसे हंसी मजाक कर गया वो शीर्मअं नरिंदर जी हे थे और उनकी हर बात पर रानी जी के साथ साथ महेंद्र और अमृता के चेहरों पर भी हंसी नजर आयी.

"अब हम इस अवसर पर मुख्या पत्र नहीं होना चाहते. संजीव और माधुरी को हमने आमंत्रित कर दिया है एक बार हमारे निवास पर भी दर्शन देने के लिए. आज्ञा चाहते है आपसे.", रानी साहिबा के हाथ जोड़ कर खड़े होने पर पंडित जी तोह खामोश हे रहे. वो रोक भी नहीं सकते थे और कुछ कह भी नहीं.

"आपने तोह आ कर हमारा मान हे बढ़ाया है. आप रुकेंगी तोह ज्यादा ाचा लगेगा हमे.", कौशल्या जी का कथन वाजिब था लेकिन उनके हाथ फिर से थाम कर सौंदर्य जी ने हालात के हिसाब से उन्हें मन हे लिया.

"अर्जुन, आपको हम न्योता नहीं देंगे. वो भी आपका हे घर है और आशा करते है की पूर्ण हक़ से आप वह पधारेंगे.", रोमिला भी प्रीती के साथ इनके करीब हे थी जिसके साथ अमृता तन्मयता से बातचीत में लगी जैसे कुछ जान रही हो. अर्जुन तोह उन्हें देखे हे जा रहा था बिना सुने की वो क्या कह रहे है.

"ये जरूर आएगा आपसे मिलने और इसको आप नाम से बुलाये तोह बेहतर रहेगा.", कौशल्या जी के कहने के बावजूद रानी साहिबा ने ना में सर हिला दिया

"आप नहीं समझेंगी दीदी. इन्हे नाम से पुकारे इतना रुतबा नहीं है हमारा. जाने कैसे खुद हुकुम इन्हे नाम से बुलाते होंगे जब तस्वीर जेहन में आती होगी? आज्ञा चाहते है.", इसके बाद उन्होंने कुछ न कहा और अर्जुन का हाथ बड़े हे सहज भाव से थाम कर आगे बढ़ चली. कौशल्या जी जो नहीं देखना चाहती थी वही हो रहा था. अर्जुन उस हाथ से बंधा अपने आप हे जैसे दूर जाता दिखा उन्हें. छोल साहब भी इनसे मिलने के बाद अपने कार्य में लग चुके थे धर्मवीर जी को लिए. रामेश्वर जी को तोह दोनों भाई बहनो ने हे घेर रखा था जैसे उनके लिए वह और लोग थे हे नहीं.

"ताऊ जी.. वैसे एक एडवाइस दू आपको.? ाचा सॉरी सॉरी पंडित जी..", अमृता ने इधर उधर देखने के बाद अपने बड़े भाई की तरफ हंस कर देखा तोह महेंद्र भी मुस्कुरा दिया.

"बोले बिना तोह रहने वाली नहीं हो आप. बता हे दीजिये कुमारी साहिबा की क्या सलाह है इस बुड्ढे के लिए आपके पास?", रामेश्वर जी चलते हुए कार से थोड़ा पहले हे रुक गए.

"वो न अर्जुन की शादी आप कुमारी लतिका से करवा दो. सब मामले पल में हे ख़तम और ऊपर से 2-2 जगह सिर्फ आपका नाम होगा.", कहने को तोह अमृता ने ये बात हंसी में कह दी लेकिन पंडित जी ने गंभीर चेहरे से जब देखा तोह हंसी वही बंद हो गयी. फिर वो भी खिलखिला कर हंस दिए.

"बड़ी हो जाओ कुछ और सीखो कुंवर से थोड़ा शिष्टाचार भी. वह बातचीत होती है अभी भी?", उन्होंने दबे छिपे लफ्जो में हे पुछा था क्योंकि वो मजाक भली भांति जानते थे.

"सिर्फ लतिका से हे लेकिन जब वो दिल्ली होती है. पिंटू भाई साहब से भी एक बार दिल्ली हे मुलाकात हुई थी साल भर पहले. फ़ोन नहीं कर सकते उधर और आप जानते हे है वजह. वैसे गलत तोह नहीं कहा था मैंने और ये पहाड़ जैसा अर्जुन कही से भी सारंग ताऊ जी से काम नहीं लगता. पिंटू भैया भी कुछ काम हे होंगे इस से. चलते है अब ताऊ जी. माँ तोह जाने कबतक अर्जुन को लिए कड़ी रहेंगी. उन्होंने आज बढ़िया सन देख लिया तोह सोने नहीं वाली.", अमृता आँख मरती हुई दबे पाँव अपनी माँ की और लपकी तोह महेंद्र ने भी गले मिल कर विदा ली.

"कुंवर अर्जुन, राजमाता अब आज्ञा चाहती है. आप इनसे मिलने जरूर आना.", हंसती हुई अमृता ने ये तंज भी तहजीब से किया था और अपनी माँ को चलने का इशारा दिया तोह जाने से पहले खुद रानी सौंदर्य ने अर्जुन को गले लगा कर जल्द उनसे मिलने की गुजारिश की. अर्जुन ने भी हामी भरी और वो कुछ वक़्त वही खड़ा रहा, 4 गैप्सी और वो कार तोह अब जा भी चुकी थी.

"कुछ kaam-kaaj देखना चाहेंगे आप कुंवर sahab?",Rameshwar जी के इस तंज से अर्जुन को होश आया तोह वो झेंपता हुआ हंसने लगा.

"बीटा तुम हो डॉ शंकर की औलाद और मेरा मान. अपने नाम को हमेशा याद रखना और सार्थक भी वैसे हे करना. राजमाता से मुलाकात होना तोह ाची बात है लेकिन उनसे पेश आने की तहजीब हमेशा वैसी हे रखना जैसी हमारे पिता उनके पिता की करते थे और अब हम उनकी करते है. चलो अब हॉल में इंतजाम देखो फिर परिवार के लोगो का भोज भी लगेगा. जहा कमी हो उधर ध्यान देना लेकिन फिर कुछ वैसा मैट करना जो थोड़ी देर पहले किया था. सरकारी व्यक्ति पर तुमने हाथ उठाया था. भजन का सुरक्षाकर्मी होता तोह तुम एक दिन के लिए जेल होते. खैर अब इंतजाम देखो, मैं जरा गेस्ट हाउस में हु अपने मित्रो और कुछ मेहमानो के साथ.", रामेश्वर जी तोह साफ़ बता गए थे की वो अनुशाशन में रहे लेकिन अर्जुन के पहले से dwand-maye दिमाग में अब और भी बातें घर कर चुकी थी. बबिता वाले किस्से के बाद राधिका भाभी और अब ये राजमाता वाली मुलाकात. फिर कुछ न करता वो उधर हे चल दिया जहा दादा जी ने बताया था.

.

.

चंद्रो देवी ने अपनी बहुओं और paute-vadhu को भोजन करके फारिग होने का निर्देश दिया तोह सुशीला ने बताया की वो फेरो तक शामिल रहेगी और उसके बाद वो पंडित जी के हे घर ठहरने वाली थी. बबिता ने भी ऐसा हे जवाब दिया था अपने पति और परिवार को जिस पर उन लोगो ने आपत्ति न जताई. ये दोनों परिवार भोजन के लिए हॉल में बढे तोह पंडाल के इस आखिरी कतार में सिर्फ बबिता और उसकी माँ सुशीला हे बैठी थी. बबिता अलग बेचैन थी और सुशीला अलग लेकिन इनके साथ अनजाने हे जुड़ा शक्श एक हे था. सुशीला ने धीमी आवाज में बातचीत शुरू की.

"तेरा अर्जुन के साथ गहरा सम्बन्ध है?", सुशीला की बात सुन्न कर बबिता कुछ हैरान हुई लेकिन वो अब छुपा भी नहीं सकती थी.

"हाँ लेकिन उसकी अपनी ज़िन्दगी है और मेरी अपनी. क्यों माँ कोई परेशानी हो गयी के तन्ने? जो भी होया वो बस पहले मेरी ज़िद्द थी और बाद में दोनों की मर्जी से."

"और तू जो पेट में लिए है उसका बाप कौन है? देख एक माँ की तरह न पूछ रही लेकिन सच पता होना भी चाहिए."

"उस से कुछ न बदलने वाला माँ और गोलू तोह अभी तक म्हणत के काबिल न है. एक बार हे उसके साथ सोई हु बीवी की तरह तोह सच साफ़ है की ब्याह से पहले हे अर्जुन के साथ हु और उसका हे है जो है."

"बबिता, आग से खेलना भारी पड़ सके है बेटी. गोलू ने सच का बेरा चल्या तोह?"

"तू बताएगी माँ? वैसे भी वो तोह घाना खुश है के एक हे बार में मेरे टी माँ बना दिया उसने. अर्जुन तेरी बेटी की कदर भी करे है और उसकी मर्यादा भी जाने है. जो किया वो मैंने किया उसके साथ और अपनी मर्जी से. गोलू की बीवी हु अर्जुन की न. हाँ वो चाहे उम्र में कम् है लेकिन गोलू या किसी भी आदमी से ज्यादा समझदार और प्यार करने वाला इंसान. समझे है वो तेरी बेटी ने और जिस तरिया संभाले है उतना तोह मैंने न लगता के बापू भी तन्ने संभल सक्या होगा.", अब सुशीला क्या कहती की 2-2 बचे पैदा करने वाली इस औरत ने भी वो औजार अपने अंदर लिया है थोड़ी देर पहले जिसने बंद सुरंग को फाड़ हे दिया था और अगर मौका मिलता तोह वो सुशीला को चलने के काबिल न छोड़ता.

"फिर भी थोड़ा सा सबर तोह होना चाहिए न बेटी? तू तोह ब्याह का भी लिहाज न करने लाग ऋ. मौका हे देख लिया कर जे तू सिर्फ उस से हे संभल सके है तोह.", सुशीला बात कहते हुए बेशक असहज थी लेकिन मैं के किसी कोने में वो भी जान न चाहती थी की अर्जुन के और कौन कौन से गुण है जिन्हे पागल हुई बबिता को कुछ नजर हे नहीं आता उसके सिवा.

"न डाटा जाता माँ उसने देख के. फिर भी कोशिश बहोत करती हु लेकिन दिल न मानता जब मौका दिखे और वो भी हो. मैंने यु औरत आदमी का रिश्ता बहोत से लोगो से सुना लेकिन जब मैंने खुद महसूस किया तोह अर्जुन उनसे बिलकुल अलग है. वो औरत ने जायदाद न समझता माँ. वो मैंने बराबरी से ज्यादा देवे है और काबिल होने के बावजूद कभी न कहता के उसकी जरुरत है. गोलू का के है चाहे वो प्यार करता हो लेकिन खुद ने फारिग करवा के मुँह फेरे है और नींद में. यही वजह है माँ के मैंने लिमिट पार करि लेकिन आज तक इजत्त किसी के सामने खराब न होने दी.", अब सुशीला क्या कहती की आज वो हो गया बबिता की वजह से जो 25 बरस में न हुआ था.

"वैसे तू भी तोह उसने लाड करे है और आजकल तोह मेरे और बिजेन्दर से भी ज्यादा.?"

"वो लायक है बेटी उस िज्जात्त का. बस इतना ध्यान रखियो के खुदके सुख में उसका न सबकुछ उजाड़ जे. और मेरी कोई शिकायत न है तेरे से या अर्जुन से. उस से तोह होव भी क्यों गई.", सुशीला ने एक बार फिर से अपनी टांगो के बीच तूफ़ान सा महसूस किया लेकिन वो अनुभवी और सक्षम महिला थी जो जज्ब कर गयी अपनी भावनाये.

"शिकायत का मौका न देती माँ. जबसे पेट से हुई हु तोह थोड़ा परेशां जरूर होती हु क्योंकि मैंने उसका साथ भावे है. पर ेब कोशिश करुँगी की ऐसा जितना हो सके काम हो."

"बाप खातिर तोह बालक भी तड़पे है बेटी फेर तू तोह दिल से उसके साथ जुड़ चुकी. आइंदा अगर ज्यादा जी मचले और कोई हल न हो तोह बता दियो. मेरी बेटी की देखरेख तोह कर हे सकू हु.", सुशीला की बात सुन्न कर बबिता ने उसको बाहों में भर लिया.

"तू न सच में मेरी दोस्त ज्यादा है माँ और मैंने भी तू सबसे ज्यादा पसंद है."

"रेहान दे. दूसरे नंबर पे हे होउंगी ज्यादा से ज्यादा. चाल ेब तेरे ससुराल की भी थोड़ी सेवा कर लेवा.", अब इसके बाद dulha-dulhan का खाना हे लगने वाला था जिसमे ज्यादातर करीबी और घर वाले उनका साथ देने वाले थे. रात के 11 बज चुके थे और लोगो ने वापिस भी जाना था.
 
मैं इस सम्बन्ध को थोड़ा सा खोल कर समझाता हु भाई लोगो.

कहने को सारंग है पंजाब राजघराने में महाराजा की तीसरी बीवी की संतान और सौंदर्य है पहली की, जो राजमाता थी. अब बेदखल की सूरत में सारंग वारिस बना राजस्थान के एक राजघराने का और पंजाब वाली तरफ संरक्षक पंडित रामेश्वर जी. रिश्ता नज़ारा आता है अब इन दोनों के आपसी सम्बन्ध से. उसमे सौंदर्य ने कही भी सारंग को जेठ जी या देवर जी नहीं बुलाया और न पंडित जी को. उनके लिए वो हुकुम अथवा राजा साहब हे है. लेकिन 2 राजघरानो के प्रतिनिधि एक दूसरे को भाई हे बुलाते है जो समाज में उनका रिश्ता बनाते है. सिर्फ इस वजह से अमृता पंडित जी को ताऊ जी बुलाती है जैसे पुष्पक. देखा जाए तोह ये भी महिला शक्तिकरण से विपरीत हे है की शाही घरानो में अभी तक पुरुष प्रधान कार्यप्रणाली और रिश्ते नाते तये होते है.
 
ये विंटेज टाइपराइटर कहा मिलेगा? 🤔
 
अपडेट 192 (2)

विवाह

"तोह आपको पहले से हे पता था की वह एक ख़ास इंसान मिलने वाला है, रानी माँ?", अँधेरी खामोश सड़क पर आगे पीछे गैसपियों की सुरक्षा में चलती ये कार भी 120 की गति पर थी लेकिन भीतर जैसे माहौल किसी बैठक सा था. ड्राइवर सीट पर मौजूद कुंवर महेंद्र की नजर सामने और कान पिछली सीट पर बैठी अपनी माँ और बहिन की बातचीत पर हे थे. अम्रतिए की बात पर रानी सौंदर्य ने बहोत सलीके से ना में चेहरा हिलाते हुए जवाब दिया.

"ये हमारे लिए भी उतना हे आश्चर्य था जितना कुंवर के लिए. ये जानते थे की शंकर के 2 बेटियों के बाद एक बीटा हुआ था जो पैदाइश पर कुछ कमजोर और बाद में खतरे के माहौल से दूर पढ़ने के लिए भेज दिया गया था. उम्मीद नहीं थी की कुंवर अर्जुन को सबसे दूर रखने की और भी वजह होगी और ये आज हे जाना हमने. लेकिन लगता है आपको जरूर इनके बारे में कुछ जानकारी पहले से थी.", रानी साहिबा का संदेह सही साबित करते हुए अमृता मुस्कुरायी तोह ये हरकत आईने से महेंद्र ने भी देखि और वो कुछ हैरान भी हुआ.

"माँ आप तोह सब जानती हे है न के न अब समय पहले जैसा रहा और न विचारधारा. समाज के सामने बेशक सब बरक़रार हे रखना पड़ता है लेकिन उतने हे अवसर अब स्वतंत्रता से जीने के भी मिलते है. बस ऐसे हे एक अवसर पर हम दुनिया देख रहे थी की नजर इन जनाब पर ठहर गयी. और आप यकीन कीजिये ये युवक बिलकुल वैसा नहीं है जिनके साथ चेहरा मिलता है.", अमृता तोह इतना कहने के बाद जिस रहस्यमयी तरीके से मुस्कुराई थी वो रानी साहिबा के साथ साथ कार चलते हुए महेंद्र को भी हैरान कर रहा था.

"चरित्र कभी भी चेहरों पर निर्भर नहीं करता अमृता लेकिन इतना तोह मानती होगी की वो ख़ास है?"

"ख़ास तोह फिर शंकर भैया भी है माँ और इन्दर भैया उनसे भी ज्यादा क्योंकि वो राजनीति के साथ rann-niti में भी कही बेहतर है. सबसे बड़ी बात है की वो चरित्र के मामले में बिलकुल ताऊजी जैसे साफ़ और मजबूत भी है. अर्जुन के बारे में हमने भी पता किया था और आपकी बात भी उचित है लेकिन वो ताऊजी और शंकर भैया का मिश्रण है चरित्र के हिसाब से. बाकी आप खुद बेहतर जान सकेंगी जब तफ्सील से मिलेंगी और वक़्त बिताएंगी उसकी साथ. ताऊ जी ने बताया है की पिंटू भैया आये थे और उन्होंने अर्जुन से मुलाकात के बाद अपना वारिस घोषित कर दिया. ये खबर दूसरी तरफ से भी सच है क्योंकि भैया अपने पिता को भी बता चुके है. ख़ास तोह हो हे गया न माँ?", इस बात का जीकर रामेश्वर जी ने कब किया ये रानी सौंदर्य को भी नहीं पता चला था लेकिन ये जान कर आश्चर्य के साथ साथ वो कुछ गहरी सोच में भी डूब गयी. कार के भीतर ये ख़ामोशी कुछ पल बरक़रार रही जिसको स्वयं कुंवर महेंद्र ने हे तोडा.

"माँ, आप यही सोच रही है न की इस तरह तोह फिर से पिछले द्वार खुल जायेगा? लेकिन पुष्पक बिलकुल भी इंद्रनील या कुमार जैसा नहीं है. वह की सत्ता कभी भी इस तरफ का रुख नहीं कर सकती जबतक पंडित जी जीवित है और उनके जाने के बाद वो ऐसा करने की सोच भी नहीं सकते क्योंकि तब बागडोर किनके हाथ होगी आप जानती हे है. परेशां मत होइए आप माँ.", महेंद्र की बात से रानी साहिबा की चिंता तोह जरूर कुछ काम हुई थी लेकिन चेहरे पर भाव अब ख़ुशी के न थे.

"हम जानते है बीटा की जितने 'ये' है इतने हमे किसी भी तरह का खतरा नहीं है और ये उनकी म्हणता हे है की अगली पीढ़ी में भी उन्होंने इसकी जिम्मेवारी सही हाथो में सौंपी लेकिन कभी कभी खुद पर हे हमे तरस आता है. स्वार्थ भी लगता है और लोभ भी लेकिन अब किया भी क्या जा सकता है जब आप खुद पीढ़ी को आगे नहीं बढ़ाना चाहते.? आप क्या कहती हो अमृता, क्या 'ये' हमे कुंवर अर्जुन भी सौंपेंगे या सिर्फ वो दायित्व तक हे सिमित रखेंगे उन्हें?"

"माँ, आप ऐसा नहीं करेंगी? हम निवेदन हे कर सकते है लेकिन सच आपको भी पता चल हे गया होगा क्यों उन्होंने अर्जुन को अभी तक हमसे पृथक रखा है. ये सचमुच स्वार्थ हे होगा और इस सिर्फ नाम की राजशाही से कही ज्यादा जरुरत उन्हें है अर्जुन की. ताऊ जी बेशक वफ़ादारी साबित कर दे लेकिन उन्हें दर्द नहीं दिया जा सकता जब वो खुद हे अर्जुन से जुड़े हो. बेहतर होगा फ़िलहाल आप कुछ आराम करे और ये सब न सोच कर बस इतना ध्यान रखे की वो आपसे मिलने आएगा. सबसे जरुरी बात ये भी बतानी थी आपको की वो swayam-chalit है और आपके या ताऊ जी के नियम वो नहीं मानेगा.", अर्जुन के इस स्वाभाव को बता कर अमृता ने थोड़ा सरक कर कमर सही करते हुए आँखें मूँद ली. शायद सफर बहोत हुआ था और रात गहराने की वजह से उसको आराम की तालाब भी थी.

'हाँ ये स्वार्थ हे कहलायेगा बेटी. पहले हे सिर्फ हमारी वजह से वो लगभग अपना सबकुछ खो चुके है और अब उनकी आखिरी उम्मीद ले कर हम पाप के भोगी नहीं बन्न न चाहते. महेंद्र, आप हे विवाह कर लेते तोह कुछ आस बढ़ जाती हमारी जीवन के प्रति.', बेटी को आराम करते देख उन्होंने ये सब बहोत धीमी आवाज में कहा था और महेंद्र ने इस बात को तरजीह न देते हुए गंभीर चेहरे के साथ बस सामने हे नजर बरकरार राखी.

.

.

"भाभी, मैं के कहु था?", यहाँ सांगवान परिवार विवाह में पूर्ण भागीदारी प्रदर्शित करते हुए मेहमानो की उचित देखभाल कर रहा था लेकिन रात ज्यादा होने पर मंजीत खाने के लिए एक टेबल पर जा बैठा. रुचिता अपने देवर के साथ थी इस अवसर पर और उसकी अधूरी बात सुन्न कर मुस्कुरा उठी.

"बोल इतना क्या सोच रहा?"

"वो न भैया ने कहा भी था के मेरी अब शादी की उम्र हो चली है. आप बात चलाओ इस तरफ, jaan-pehchan तोह आपकी भी बहोत है.", अब रुचिता इस बात पर उसको हैरानी से देखने लगी लेकिन फिर हँसते हुए बोली.

"देख मंजीत, बात तोह तेरी सही है लेकिन एक तोह यहाँ पंडतो के परिवार ज्यादा है और दूसरा अपनी तरफ थोड़ा बिरादरी की पकड़ सख्त भी. हाँ कोई सही रिश्ता दिखा तोह बात चलती हु तेरी.", रुचिता ने बाकी सभी के तरह लेहंगा न पहन कर साड़ी पहनी हुई थी और उसकी पतली कमर पर बंधी होने की वजह से गहरी नाभि और विलक्षण बड़े स्टैनो से निचे तक का सपाट चिकना पेट साफ़ जाहिर था. रंग स्वांला होने के बावजूद अगर कोई इस shyam-sundari को गौर से देखने लगता तोह यकीनन वो रुचिता के जादू से बहार न निकल पता. ऐसा हे हाल कुछ लोगो का था जो थोड़ी दुरी पर खड़े खाना खाने के साथ चंचलता से भरपूर रुचिता और उसके हुस्न का भरपूर दीदार करते रहे. अर्जुन भी हर काउंटर और स्टाल की जांच करने के साथ साथ मेहमानो और Bijender/Vikas आदि के साथ कुछ समय बिताने के बाद टहलता हुआ इस तरफ आया तोह रुचिता ने उसको अपने हे करीब बैठा लिया. मंजीत को जैसे ाचा न लगा था और उसकी बात भी अधूरी रह गयी अर्जुन के बैठने से.

"ये मेरा भतीजा है मंजीत और अर्जुन ये मेरे देवर है मंजीत सिंह.", अर्जुन ने परिचय होने पर इस बार हाथ आगे बढ़ाया तोह मंजीत ने ऊपरी तौर पर मिलते हुए आदतन कटाक्ष सा किया जिस पर रुचिता मुस्कुरा उठी.

"हम बराबर के न है तोह ram-ram या नमस्ते ठीक थी. वैसे ाचे लड़के हो तुम.", मंजीत अब टेबल पर राखी ice-cream को देखता तोह कभी agal-bagal.

"वैसे मेरे देवर की शादी की उम्र हो चुकी है अर्जुन और अगर तुम्हारी नजर में कोई ाची जाट फॅमिली हो तोह जरूर सलाह देना.", अब रुचिता की बात सुन्न कर अर्जुन के चेहरे पर ख़ुशी दिखी और मंजीत को भी ाचा लगा के उसकी भाभी ने बात फैलानी भी शुरू कर दी है.

"वैसे है तोह सही बुआ अगर आप पापा से इस बारे में चर्चा करे तोह सही होगा. वो अनुपमा भाभी है न बिजेन्दर भैया की वाइफ? उनकी जुड़वाँ बहिन अक्षरा master's करने लगी है और उनकी शादी भी नहीं हुई है. बलबीर भैया भी जाट है और उनकी भी बड़ी बहिन शादी के योग्य है जिस वजह से भैया की शादी में देरी हो रही है. हाँ फ़िलहाल वो नयी नयी जॉब पर है तोह मुझे नहीं लगता दहेज़ वैगेरह ज्यादा होगा पर उनके बड़े भाई आर्मी में है तोह ghar-pariwar ाचा है उनका. अक्षरा दीदी तोह उधर कड़ी भी है मुस्कान और अनुपमा भाभी के साथ.", अर्जुन ने नजरो से हे रुचिता का ध्यान उनसे कुछ दुरी पर हे कड़ी लड़कियों की तिकड़ी पर करवाया तोह मंजीत भी वह गौर से देखने लगा.

"एक तोह घनी छोटी लग रही उम्र में और दूसरी ने मांग भर राखी. तीसरी नजर न आ रही सही से.", मंजीत तोह चाव चाव में ये भी भूल गया के वो ये सब मुँह से बोल रहा है मैं में नहीं. रुचिता ने टोकना चाहा तोह अर्जुन ने हे मन करते हुए मुस्कान को इशारे से करीब बाल्य. ऐसा करने पर अक्षरा उसकी ओट से बहार आ चुकी थी जो एक खूबसूरत से गुलबी जरीदार सलवार कमीज और बिना किसी अधिक प्रसाधन के सिर्फ अपने तीखे nain-naksh और गुलाबी रंगत की वजह से बिलकुल चाँद से नजर आयी. मुस्कान करीब चली आयी थी और अर्जुन ने बस इतना हे कहा.

"अक्षरा दीदी को भी सबसे मिलवा देती तोह ाचा लगता."

"हाँ बस अभी खाना हो गया है उनका तोह मैं वही करने वाली थी. वैसे यहाँ कुछ चाहिए तोह नहीं?", बात करते हुए मुस्कान तोह एक बार रुचिता बुआ को देख रही थी लेकिन अर्जुन उसके ढलक आये बालो और लुभावने चेहरे में हे खो गया. इतने करीब कड़ी थी वो और मैं मार कर अर्जुन अपनी कुर्सी से चिपका रहा. रुचिता ने उसकी तरफ देखा तोह मुस्कान ने भी और अब वो शर्माती हुई यहाँ से चली गयी.

"घाना चालु है तू लड़के. मैं तोह शरीफ समझती थी तुझे.", ये बात कही तोह रुचिता ने अर्जुन से थी जो झेंप गया लेकिन मंजीत भी हड़बड़ा कर अपनी भाबी की तरफ पलट गया.

"न भाभी ऐसी बात न है बस वो लड़की अगर पहचान की है तोह फेर बात चलाओ. थैंक यू है मिस्टर अर्जुन.", मंजीत तोह हसरते हे बना चूका था बस इतनी हे देर अक्षरा को देखने से. वो थी भी कमल की चाहे शरीर कुछ डुप्ले था लेकिन अनुपमा से भी कई गुना ज्यादा चमकदार चेहरा और समझदार भी.

"जल्दी न करते ऐसे मामलो में मंजीत और अर्जुन ने तोह एक और भी लड़की बताई है जिनके परिवार में फौजी भाई और दूसरा सरकारी मुलाजिम. हिसाब से तोह घर भी gaanv-jamindari वाला होगा. वह भी देख लेंगे और इसकी भी बात मैं ताई (कौशल्या जी) और शंकर से कर लुंगी इतने. तू कोई हरकत न करियो ऐसी वैसी की कल ने बात चले तोह बिगड़ जे. और अर्जुन तू 12 फ़ीट जमीन के भीतर भी है. बताना पड़ेगा ध्यान रखियो.", अर्जुन तोह काम देखने का बोल कर यहाँ से खिसकने हे लगा था की उठने के बाद सीधा किसी से टकरा गया. टक्कर न तोह तेज थी और न हे टकराने वाले की तरह है अर्जुन का ध्यान था उस तरफ. एक तरफ कुर्सी गिरी पड़ी थी और एक तरफ वो पारी जैसे परिधान में सजी हुई नाजुक सी खूबसूरत युवती. अर्जुन कुर्सी की वजह से गिरा था और वो भी घुटनो के भार. वैसे हे घुटनो के बल चलता हुआ वो इस लड़की के करीब आया और उसका निचे गिरा हुआ पर्स उठा कर बोलै.

"आपको ज्यादा तोह नहीं लगी? सॉरी मुझे नहीं पता था की कुछ लोग यहाँ उड़द कर आये है.", रेशमी भूरे बाल जो उस लड़की के चेहरे को ढकते हुए जमीन की सतह तक आ रहे थे उनके बीच से हे वो अर्जुन को बस एकटक देखती रही. घुटनो के भार उसका ऐसे बैठना और वो पर्स उसकी और बढ़ता हाथ. बालो के पीछे एक अलग हे मुस्कान थी इस लड़की के चेहरे पर और ये सब कोई घंटो का प्रसंग न था, बस पलभर में हे इतना कुछ हुआ था और अर्जुन सीधा खड़ा हो चूका और वो लड़की फुर्ती से उसके हाथ से पर्स लिए उस तरफ दौड़ गयी जहा से बहार जाने का रास्ता था. अर्जुन को तोह उसका चेहरा तक सही से न दिखा.

"Hello.. तुम्हारे दिमाग पर तोह चोट नहीं लगी?", रुचिता ने पहले कुर्सी उठा कर सही की फिर वो अर्जुन के बराबर आ गयी. अर्जुन जो अभी तक उस जाती हुई लड़की को हे देख रहा था वो चेतना में लौटा ये सुन्न कर.

"बुआ आपने हे देखा था के मेरी कोई गलती हे नहीं थी. सॉरी कहने की जगह वो तोह देखे बिना हे पर्स ले कर ऐसे भागी जैसे मैं कोई भूत हु.", अर्जुन अभी भी इस घटना से पूरी तरह नहीं उबरा था और रुचिता बुआ पर नजर पड़ते हे फिर से होंठो पर टाला जड़ गया. आँचल कुछ हल्का सा हे ढलका था लेकिन वो पर्वत तोह इतने विशाल थे की आँचल भी व्यर्थ हे था उन्हें छिपाने में. हलके पसीने से वो गहरी कासी हुई खाई नुमाया थी और रुचिता बुआ का पतला शरीर जैसे इस बोझ को बड़ी मुश्किल हे उठता था. सांवले चमकदार उठाव वाला मांसल हिस्सा अद्भुत्त हे था और अर्जुन की नजर का पीछा करते हे इस बार रुचिता की हे हालत खराब हुई. वो भी जानती थी की अपने कलशो की सच्चाई लेकिन अर्जुन की आँखों में अपने जिस्म के प्रति मरदाना नजर देख वो सामना हे न कर पायी. अब अर्जुन को जवाब दिए बिना वो भी इस तरफ से ऐसे निकली जैसे वो पहले वाली लड़की.

"आदमी तोह तुम भी एक नंबर हो मर अर्जुन. कितनी सुथरी लड़की थी वो और जैसे वो तुमसे जानबूझ कर भिड़ी थी मतलब साफ़ है की उसको तुम पसंद हो. डटी क्यों नहीं फिर जब इतनी मॉडर्न थी?", मंजीत ने इस दौरान हिंदी, बागड़ी और अंग्रेजी के बहोत से शब्द एकसाथ हे कह दिए थे और उसकी बात सुन्न कर अर्जुन ताज्जुब में पड़ गया था.

"क्या कहा आपने मंजीत जी? वो मुझसे जानबूझ कर टकराई थी? लेकिन मैं तोह उसको जानता तक नहीं था और न हे मैंने पहले कभी देखा होगा जितना मुझे यकीन है.", अब अर्जुन बहार जाना चाहता था ये जान ने के लिए की आखिर वो लड़की कौन थी और अगर उसने ऐसा जानबूझ कर किया तोह क्यों. लेकिन मंजीत को अकेला छोड़ कर ऐसा कैसे कर सकता था वो अब जबकि रुचिता बुआ भी जाने क्यों एकदम से चली गयी थी.

"मित्र, वह आपके बक्सीडे पर एक एलीफैंट जैसा लड़का था और ये लेडी जो अभी भी कड़ी है वो लड़की इनके हे साथ थी. फिर उसने कुछ सुना और आपकी तरफ देखने लगी. जैसे हे वो लेडी उस मोठे लड़के को कुछ बताने के लिए एकतरफ हुई तोह इन मैडम ने आपको stand-up होते देख कर कुर्सी को हिलाया लेकिन वो भी साथ हे गिर गयी. शायद वो इसलिए भाग गयी क्योंकि मैंने देख लिया था. बूत व्हाई? ये बड़ा सवाल है की ऐसा क्यों किया उसने.", अर्जुन अंदर हे अंदर मंजीत की ऐसी भाषा से सदमे में हे जाने वाला था लेकिन जानकारी लेना भी उतना हे जरुरी था. अब मंजीत ने जब ये बताया की पीछे औरत अभी भी है तोह अर्जुन ने गौर किया. ये महिला आकर्षक देहयष्टि की होने के साथ साथ कपड़ो से भी ाचे खंडन की प्रतीत होती थी. शरीर कुछ भरा हुआ, माध्यम सा कद और भरे भरे गाल. गले में पहना हीरो का एक कही ज्यादा हे महंगा हार बता हे रहा था के ये जो भी है जरूर ख़ास है. अर्जुन कुछ सोच कर उनके हे पास चल दिया. थाली रखने के लिए वो इधर उधर देख रही थी जिसको खुद अर्जुन ने लेने के बाद एक तरफ रखे स्टील के कूड़ेदान में आराम से रख दिया.

"थैंक यू सो मच बीटा. मैं तोह टेबल देख रही थी जो खली हो. झुकने में प्रॉब्लम होती है न फीमेल होने की वजह से.", आवाज भी मिठास से भरी और उतनी हे आकर्षक मुस्कान चेहरे पर.

"जी थैंक यू की जरुरत नहीं है आंटी. आप तोह हमारी मेहमान है और सेवा करने का अधिकार भी हमारा हे है. वैसे आप शायद राधिका भाभी की फॅमिली की तरफ से है. हैं न?", अर्जुन की बात सुन्न कर वो आकर्षक मुस्कान वैसे हे बरक़रार थी इनके चेहरे पर. निम्बू के रंग की वो साड़ी जिस पर मोती लगे थे, उसका पल्लू सही से सीने और कंधे पर करते हुए उन्होंने ना में सर हिलाया.

"शंकर भाई साहब और उमेद भाई साहब की तरफ से है बीटा. हम दिल्ली रहते है और मेरे हस्बैंड उमेद जी के पोलिटिकल फ्रेंड होने के साथ बिज़नेस पार्टनर भी है. सबसे मिलने में हे इतना टाइम लग गया था की डिनर के लिए लेट हो गए और अब बचे अपने पापा को बुलाने गए है तोह हम वापिस हे जाने वाले है.", अर्जुन को हैरानी हुई की ये कौनसा व्यक्ति आ गया जो उसेक पिता और चाचा का इतना घनिष्ट भी है और पहली बार परिवार समेत यहाँ आया है. एकदम हे उसके दिमाग में गजेंद्र भल्ला की तस्वीर उभर आयी.

"गजेंद्र अंकल की वाइफ है आप आंटी? साहिल की मम्मी?", अर्जुन ने जैसे हे ये 2 नाम लिए तोह इन्होने बड़े हे गौर से उसको देखा, फिर करीब होते हुए उसका एक हाथ अपने दोनों हाथो में ले कर सिर्फ इतना हे कहा.

"अर्जुन. तुम अर्जुन हे हो न बीटा? मुझे साहिल ने बताया था तुम्हारे बारे में और मैं मिल कर तुम्हे थैंक यू कहना चाहती थी और जानती भी हु की थैंक यू से कुछ नहीं होगा लेकिन तुमने मुझे और मेरे परिवार को टूटने से बचा लिया.", अर्जुन ने ना में सर हिलाते हुए उन्हें माहौल का संज्ञान दिया.

"मैंने कुछ भी नहीं किया आंटी जी और अगर आपको लगता है की मैंने कुछ किया है तोह समझ लीजिये वो मैंने अपने लिए किया था. इस बहाने आप दिल्ली से बहार तोह आयी. वैसे आपसे मिल कर ाचा लगा और साहिल बहोत हे प्यारा लड़का है."

"बोलता बहोत है वो लेकिन जबसे घर वापिस आया है तबसे तुम उसके हीरो हो. तुमसे मिलवाती हु और मेरे हस्बैंड भी पूछ रहे थे तुम्हे लेकिन शायद तुम कही बिजी थे जब उमेद जी ने पता किया था.", अर्जुन अब एक आस से उनके हे साथ हो लिया. इधर उधर की बातें करते हुए ये दोनों हे बहार वाले पंडाल के करीब पहुंचे तोह गजेंद्र भल्ला उमेद, शंकर, राजकुमार जी से हाथ मिलाने के बाद इस तरफ हे देख रहा था. अर्जुन को देख कर बड़े जोश से पहले हाथ मिलाया और फिर अपने साथ लगा के खड़ा हो गया.

"शंकर भाई, पहले हमने इन जनाब का जोहर देखा लेकिन अब आप सभी के बारे में जान कर इतना हे कहूंगा की पूत के पाँव पालने में. बहोत बहोत शुक्रिया आप सभी का इतना मान देने के लिए और इतनी बढ़ी खातिरदारी के लिए. अब इजाजत दीजिये, अगली मुलाकात मेरे हे बंगले पे होगी और आशा है बहोत जल्दी आप हमारी बेगम के हाथो के chai-nashta करते हुए आगे की चर्चा करेंगे. अर्जुन, तुम भी जरूर आना बीटा. जब भी तुम्हारा दिल करे.", गजेंद्र भल्ला ने हाथ जोड़ कर विदा ली तोह अर्जुन उसकी लम्बी गाडी की तरफ ध्यान से देख रहा था. काले शीशे थे और पिछली सीट का कुछ भी नजर न आया. दोनों मिया बीवी आगे वाली सीट पर जा बैठे थे लेकिन पिछली सीट पर बैठी हुई वो लड़की मुस्कुराती हुई एकटक अर्जुन को देख रही थी जो उसको देखने में असफल था.

'अब देखती हु मुझे ढूँढ़ते हो या नहीं.', इस लड़की ने तोह जैसे कुछ और हे ठान लिया था लेकिन जिस chhupan-chhipaai के खेल को बनाने लगी थी उसमे अर्जुन कितना माहिर है ये अभी उसको पता न था.

.

.

साधु सिंह के घर में आज रात कुछ अलग थी क्योंकि इतना समय बीतने के बावजूद घर के कुछ सदस्य जागे हुए थे. साधु सिंह तोह अपने कमरे में जा चुके थे पंडित जी के कार्यक्रम से आने के बाद लेकिन वह से लौटी काजल अपने कमरे में बंद सविता के साथ थी और पिछले आँगन में बिमला अपनी देवरानी दर्शन के साथ. मिन्दर विवाह में न गया था पीछे घर की देखभाल और इस एकांत का उपयोग सविता के साथ करने की वजह से. लेकिन जैसे उसको भी ज्यादा सफलता न मिली थी जो वो अकेला हे छत पर कूलर की हवा में सो चूका था.

"क्या हे बताऊ तुझे सविता के आज मैंने कैसा ब्याह देखा? मैं तोह और भी रुकना चाहती थी लेकिन बापू ने तोह घडी में 10 बजते हे माँ और मुझे साथ ले लिया. फिल्म जैसा हिसाब था ऋ वह पे. ये बड़ी जगह जो जाने कितनी दूर दूर तक फैली थी. सब तरफ हजारो लट्टू जो पेड़ो और टेंट पे लगे थे. 50 से ज्यादा तोह खाने के हे अड्डे बने हुए थे वह और एक से बढ़ कर एक लोग. सही किया जो मैं शहर से ये सूट ले आयी थी नहीं तोह जरा न जंचती वह उनके बीच.", काजल अब एक ढीले से कमीज और सलवार में थी बिना किसी अंगवस्त्र के और उसकी बात सुनती हुई सविता बगल में लेती हुई बस अपनी सहेली के चेहरे पर छायी ख़ुशी देखती रही.

"सच में इतना बड़ा प्रोग्राम था क्या?"

"तुझे भी तोह कहा था के साथ चल लेकिन तू मानी कहा? कार्ड तोह तुझे भी आया था लेकिन तू बस अपने हिसाब से हे चलती है. और मैं झूठ क्यों बोलने लगी ऋ? लड़कियां तोह लड़कियां औरते भी इतनी चमक उदा रही थी की देखने वाला हेरोइन भूल जाए. बापू बता रहे थे की उन्होंने खुद ऐसा ब्याह पहली बार देखा है और जिस जगह प्रोग्राम रखा था सिर्फ उसका खरच 15-20 लाख होगा. वैसे जितना बढ़िया तामझाम था उतने हे लोग भी बढ़िया था सविता. मैंने तोह सुना था के ये शहरी लोग घमंडी होते है पर ऐसा न हुआ. बापू से तोह मुख्यमंत्री भी मिलवाया था डॉक्टर अंकल ने."

"तूने उसको देखा वह? एक दिन बाद आने का बोल के गया था और देख ले आज हो रहा उसका एक दिन.", सविता के लफ्ज़ो में अर्जुन से मिलने की तड़प साफ़ झलक रही थी और उसको जैसे कोई लेना देना हे न था के शादी के इंतजाम कैसे थे और वह कौन कौन आया था. काजल भी उसकी बात सुन्न कर थोड़ा गंभीर हो गयी और करवट ले कर उसके गाल पे हाथ रखते हुए कहने लगी.

"कैसे आ सकता था भला वो सविता? जब मैं तुझे इंतजाम बता रही हु की कितना बड़ा था और हजार लोग होंगे काम से काम तोह वो भी तोह घर के ब्याह में जूता होगा? उसकी बहिन का ब्याह था और वो अकेला लड़का उस घर का क्योंकि बड़े भाई की भी शादी आज हे थी. मैंने साफ़ देखा है उसकी नजरो में तेरे लिए सिर्फ प्यार हे होता है. मेरी तरह नहीं की कबड्डी खेली और वो अपने रस्ते, मैं अपने रस्ते. ज्यादा न सोच अभी और जब टाइम आएगा तोह वो भी मिलने जरूर आएगा तुझसे."

"दिल तोह कहता है के वो आएगा लेकिन जाने क्यों ऐसा भी लगता है की शायद अब वो इस तरफ कभी ना आये. मैंने जल्दबाजी तोह न कर दी उसको सीधा सीधा कह कर? चाहती तोह नहीं थी मैं वो कहना लेकिन ऐसा लगा के कह दूंगी तोह वो आ जायेगा. पर तेरी बात भी सही है की वो मेरे शरीर से प्यार नहीं करता. मैंने ये बात उस रात महसूस की थी जब सवेरे उसने मेरी पप्पी ली थी. वो जबरदस्ती वाला नहीं था काजल जैसे आज मिन्दर ने करने की कोशिश की.", सविता के मुँह से अपने भाई का नाम सुन्न कर काजल कुछ चौंक सा गयी.

"मिन्दर ने तेरे साथ कुछ उलट सुलट किया क्या हमारे पीछे से.?"

"नहीं नहीं.. मैं खाना ले कर आयी थी उसका और उसने मेरा हाथ पकड़ कर दरवाजा बंद कर लिया. पप्पी लेने लगा तोह मैं धक्का दे कर भाग गयी थी. बाद में अभी सॉरी बोल कर ऊपर चला गया था. इसके बाद तोह मुझे अर्जुन और याद आने लगा. वो तोह हाथ भी पकड़ता है तोह झरझरी सी होती है और दिल करता है के हाथ न छुड़ौ पर शर्म भी आती है क्योंकि लगता है हद्द पार न हो जाये जैसे तू करती है उसके साथ.", सविता के गाल अँधेरे में लाल हो चुके थे और उसकी आँखों में साफ़ शर्म चमक रही थी.

"आज वो लग भी ऐसा रहा था सविता के देखते हे खा जाऊ पर मिलना भी न हो पाया उस निगोड़े से. सोच के देख जब वो ढाणी का खागड (सांड) तेरे ऊपर चढ़ेगा तोह तेरी क्या हालत होगी? झेल न सकेगी और अगर झेल गयी तोह फिर मिन्दर से कभी खुश न हो पाएगी. हाहाहा.. वैसे क्या कहा तेरे बापू ने शादी के बारे में?", काजल ने बात पलट दी थी अपनी सहेली की आँखें शर्म से बंद होते देख. सविता उस से विपरीत मुँह करने लगी थी जिसको रोक दिया था काजल ने.

"बापू कह रहे थे की कल बात करेंगे अंकल से इस बारे में. उनका इरादा है के जिस दिन तेरा ब्याह होना है उस दिन हे वो मेरा करे या उस से पहले लेकिन अभी गर्मी में न करने वाले. वैसे एक बात सुनी है मैंने भाभी से.", सविता का कहने का अंदाज ऐसा था के काजल थोड़ा चौकन्ना हो गयी.

"गंभीर बात है?"

"भाभी को तोह तू जानती हे है यार. उसके तोह कितनो से हे सम्बन्ध है लेकिन कल से पहले तोह उनके मुँह से मैंने किसी और के लिए ऐसी बात नहीं सुनी थी. लेकिन तुझसे तोह मैं वैसे कुछ न चिपटी इसलिए बता रही हु जो उन्होंने बताया या पता लगा. ये दर्शन काकी तेरी माँ के लिए उनसे बात कर रही थी. अर्जुन हमारी नजर से बच के तेरी माँ से मिलने आया था एक बार घर. और तेरी माँ ने दर्शाना काकी को बताया था के वो पूरा मर्द है. अब भाभी ने भी यही बात बोली और पूरा मरद होने का मतलब था के तेरी माँ ने उसका वो देख लिया है. अब पता नहीं दर्शन काकी के मैं में क्या था और वो शायद भाभी से हे कुछ उगलवाना चाहती होंगी पर भाभी ने भी उसको घर के पिछले हिस्से में तेरी माँ के साथ खाट पे बैठे जरूर देखा था.", सविता के मुँह से अर्जुन का सम्बन्ध अपनी माँ के साथ सुन्न कर काजल को भी हैरत हुई लेकिन वो अभी कुछ न कह सकीय.

"दर्शन काकी कौनसा दूध की धूलि है और वो भाभी तोह तू भी जानती है. अर्जुन आया होगा किसी काम से घर पे तोह माँ ने पीछे जमीन दिखाई होगी उसको. बाकी माँ ने सामान जरूर देख रखा है अर्जुन का ये मुझे भी पता है. वो जानती है मेरे और उसके चक्कर में. उन्होंने तोह छूट भी दे राखी बिना मुँह से कहे.", यहाँ काजल ये बात गोल कर गयी थी की उसको अपनी माँ का वो सच पता है जो सविता को पूरी तरह नहीं पता. वही दूसरी तरफ ऐसे हे शादी के किस्से बिमला देवी भी अपनी देवरानी दर्शन को सुना रही थी. इस सबके बीच एक बात सामान थी की जहा काजल और उसकी माँ को अर्जुन के साथ फिर से संसर्ग की आस थी वही सविता का दिल बेचैन था बस उसको देखने के लिए. सबकी नजरो के बीच नहीं, सिर्फ वैसे हे पल में जैसे उसने नदी किनारे बिताये थे. आज उसको अपनी आखिरी बार वाली मुलाकात का दुःख जरूर था जिसमे वो कुछ बेशरम सी हुई थी लेकिन अब वो फिर से पहले की तरह उसके बस सामीप्य की िट्छुक थी. अर्जुन इन सबसे दूर वह विवाह में व्यस्त था खाने की बड़ी मेज त्यार करवाने में.

.

.

"ताई, ज्यादा देर हो गयी है. आप लोग यहाँ भी रुक सकते है बस रात की तोह बात है.", चंद्रो देवी खाने के बाद सबसे मिल कर अब शंकर के साथ कड़ी थी. उनके करीब हे ऋचा, मल्टी, मधुलता भी थी क्योंकि सुशीला ने पहले हे यहाँ रहने के बारे में बता दिया था. घर के बाकी लोग तोह वैसे हे व्यस्त थे और अब तोह Sanjiv-Gorav के दोस्तों ने दोनों जोड़ो को नाचने में लगा लिया था अपने साथ स्टेज पर. घर के लोग और मेहमान इन लम्हो का पूरा मजा ले रहे थे. पूर्ववत रामेश्वर जी अभी तक गेस्ट हाउस में हे थे पिछले एक घंटे से. शंकर की बात सुन्न कर भी चंद्रो देवी ने अपनी मजबूर बता दी.

"न बीटा हवेली आज तक बियाबान न रही और ऐसे अवसर पे तोह बिलकुल भी नहीं जब घर परिवार में ब्याह हो. सुशीला यही है और जरा मैं बबिता के ससुरालियों से मिल लो, ये लोग भी निकल रहे.", चंद्रो देवी के साथ साथ मल्टी और ऋचा भी आगे बढे और ये जगह वही थी जहा गाड़ियां कड़ी की गयी थी. इन्हे पहुंचने के लिए भी शंकर ने हे इंतजाम करवाया था car-driver का. बिजेन्दर तोह अपनी बीवी के साथ फ़िलहाल इधर हे था और अब अनुपमा को भी पहली बार दज पर अपने पति के साथ नाचने में मजा मिल रहा था. ये सब रंगो से वो परिचित न थी और बिजेन्दर सोच चूका था की वो अपने दांपत्य जीवन को कभी नीरस न होने देगा. उनसे इतर अब शंकर के करीब मधुलता थी और उसके धीमे कदम साफ़ चुगली करते थे की वो बात करना चाहती है.

"तुम्हे ाचा तोह लगा न लता यहाँ आ कर? जानता हु मैं उतना समय नहीं दे पाया और ये बात तोह पहले हे तये थी हमारे बीच. परिवार में परिवार के साथ."

"हाँ तोह मैं शिकायत न कर रही तुमसे. बढ़िया इंतजाम करवाया है तुमने तोह फिर चाहे bhatiji-bhatija का हे ब्याह हो. कल को जब बेटी का होगा तोह लगता है देश को न्योता डोज. एक बेटी और भी है याद रखना.", कितनी हे देर से भरी बैठी थी मधुलता जो अब विवाह कार्यक्रम से कुछ दूर आते हे कहने से रुक न सकीय. शंकर के चेहरे पर भतीजे वाली बात पर गुस्से की जगह मुस्कान थी.

"जल्दी हे गुस्सा शांत कर दूंगा तुम्हारा. और जो तुम कह रही हो उसको खुद भी समझना थोड़ा. ये इंतजाम पापा और भैया ने किये है लता. रही बात भव्य और महंगे होने की तोह जगह के पैसे न लगे, कैटरिंग वाले भल्ला जी ने भिजवाए थे और ये tent-light सब मिल जल कर किया गया है. जिस बेटी के लिए तुम उलाहना दे रही हो वो सबसे बड़ी बेटी है और मैं उसका जितना करना चाहता हु उतना तुम होने नहीं डौगी. चाचा जो हु मैं उसका लेकिन फिर भी शिकायत का मौका नहीं मिलेगा जब ऋचा की बारी होगी.", शंकर का ध्यान उधर भी था जहा चंद्रो देवी गोलू और उसके परिवार से बातचीत में लगी थी. फ़िलहाल तोह वो लोग बातें कर रहे थे और अंदर सभी व्यस्त थे.

"वो सब मैं नहीं जानती लेकिन उसके ब्याह में भी mantri-santri आने चाहिए. तुम्हारी बीवी को भी जरूर बुलाना उस मौके पर. अनुभव हो जाएगा उसको भी आगे 2-2 उसने भी ब्याहनी है. वैसे मान न पड़ेगा डॉ शंकर की तुम रेखा को मुझसे अधिक हे चाहते हो. एक बार भी ऐसा न हुआ जब तुम्हारा कोई मेहमान आया हो और उसको तुमने रेखा से न मिलवाया.", बात को अब गलत दिशा में जाते देख शंकर के माथे पर पसीना आने लगा था. ाचे भले दिन का अंतत वो अवसाद या दुःख से नहीं करना चाहता था इसलिए बात सँभालने की एक कोशिश जरूर की.

"परिवार में रेखा हे वो चेहरा है लता जो मेरी बगल में रहेगा. ये तुम मेरे से बेहतर जानती हो और समझती भी हो. यहाँ उसके maa-baap और bhai-bhabhi सभी लोग आये हुए है जो मुझे भी उतना हे सम्मान और प्यार देते है जितना रेखा को. शायद उस से भी ज्यादा. घर में तोह मेरा फ़र्ज़ है न की मैं उसको बराबर खड़ा करू? बेटियां रेखा की 3 है, 2 नहीं. रही बात ऋचा की शादी में मेहमानो की तोह वह वो भी आएंगे जो इधर न आ सके. रेखा घर की बहु है और तुम मेरा प्यार. बाकी इस जगह मैं ये सब बातें नहीं करना चाहता.", शंकर ने बहोत हे धीमी आवाज में ये सब कहा था जो सुन्न कर मधुलता की चेहरे पर हलकी सी कुटिल मुस्कान जरूर आ गयी.

"तुम्हारी बीवी को ये भी समझा देना की बेटियां बढ़ने की कोशिश छोड़ दे. ऋचा का जरुरत से ज्यादा हे ध्यान रखती है वो और ऐसी साजिशे मुझे बहोत ाचे से पता है.", अभी ये बात मधुलता ने पूरी हे की थी की ऋचा भी इधर आती हुई ये बोल कर अंदर चली गयी.

"माँ, मैं एक बार रेखा आंटी को bye बोल आऊं. फिर निकलते है.", आग में घी हे दाल दिया था ऋचा ने तोह. अब शंकर के चेहरे पर दयनीय से भाव थे.

"वो तोह सबको हे ऐसा प्यार करती है लता. ऋतू को हे देख लेती अगर तुम्हे ये सब साजिश लगता है तोह. वो भी तोह ऋचा को असली बड़ी बहिन की तरह हे मानती है और दोनों कितना साथ भी रहती है. ये सब परिवार और एक दूसरे की िज्जात्त भर है लता. रेखा ऐसी नहीं है. उसको भला साजिश की क्या जरुरत जब उसके पास हम सबसे कही ज्यादा है. माँ ने भी ललिता भाभी की जगह घर रेखा को सौंप रखा है और वो घर से बहार तक नहीं निकलती. बचे उसने हे बड़े किये, उन्हें अब तक पद्धति रही है और उसने आजतक मुझसे कुछ माँगा तक नहीं. तुम सबकुछ जानती हो फिर भी ऐसा कह रही हो?", ये पहली बार हो रहा था जब शंकर अपनी बीवी का पक्ष ले रहा था और वो भी इतना खुल कर.

"हाँ बहोत संपत्ति है उसके पीहर वालो के पास और तुम्हारे पास भी. साडी उसकी हे तोह है और तुम्हारी माँ ने वैसा क्यों किया ये मैं समझती भी हु. अब रहने दो ये सब बातें और अगर समय लगे तोह आ जाना. बात वही पर होगी.", मधुलता ने इसके बाद एक बार भी शंकर की तरफ न देखा था और वो अपनी सास के पास पहुंच गयी. लोग मेहमान जा रहे थे और शंकर इस जगह खड़े हो कर उनसे मिलते हुए धन्यवाद् करता रहा. मधुलता की बातें झकझोर रही थी लेकिन वो ये किस से कहता.

"पापा, आपकी जरुरत है. फर्स्ट अिध बॉक्स रखा है न आपकी कार में?", कोमल शंकर जी को ढूंढ़ती हुई आखिर में इधर आ पहुंची थी और अपनी बेटी के मुँह से फर्स्ट अिध बॉक्स का सुन्न कर शंकर जी की साड़ी सोच हे धुंआ हो गयी. उत्तेजित होते हुए उन्होंने सबसे पहले यही पुछा.

"क्या बात हुई बीटा? फर्स्ट अिध बॉक्स की क्या जरुरत पड़ गयी यहाँ शादी में?", और इस बीच वो अपनी कार की तरफ भी चल दिए थे जिसमे हमेशा हे पर्याप्त सामान मौजूद रहता था.

"माँ की हथेली पे कट लग गया है पापा. मेहुल अंकल ने वह कपडा बांध रखा है लेकिन वो कह रहे है की काम से काम बैंडेज करनी हे पड़ेगी उन्हें क्लिनिक ले जाने से पहले.", अब शंकर जी की फुर्ती देखने वाली थी ये सुन्न कर. आगे सवाल न करते हुए उन्होंने कार के ग्लोवबॉक्स से रूई का वो लम्बा बंडल और पत्तियों का पैकेट उठाते हुए अपनी रफ़्तार तेज कर ली. कोमल भी उतनी हे तेज अपनी पिता के साथ चल रही थी.

"इस तरफ नहीं पापा. माँ लेफ्ट साइड वाले कॉटेज के बहार बैठी है.", कोमल द्वारा दिशा समझते हे शंकर जी पंडाल से एक तरफ मदद कर इस जगह आ गए जहा ये छोटा सा झोपडी नुमा मकान सा बना था. मेहुल की बीवी रेखा का हाथ कपडे से दबाये चिंता में दिख रही थी और कुछ वैसा हे हाल ऋतू का भी था जिसने अपनी माँ के कंधे पर हाथ रखे हुए थे. लेकिन रेखा का चेहरा कही से भी पीड़ा में न था और लेशमात्र भी चिंता तक नहीं. शंकर जी ने करीब पहुंचते हे फर्श देखा जहा ाचा खासा लहू टपक कर गिर चूका था.

"ये सब कैसे हुआ? और गुलाटी यार तू गाडी हे निकाल लेता अगर जख्म गहरा है तोह.", कहने के बाद शंकर जी खुद हे अपनी बीवी की बगल में कुर्सी पर बैठ कर वो कपडा हटते हुए घाव देखने लगे. पहली बार उनके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे उन्हें दुःख हो रहा हो ये देख. हथेली पर aayu-rekha के सामान एक गहरा चीरा था और उसमे से अभी तक राखत रिस्ता हुआ निचे टपकक रहा था. आनन् फानन में पूरी रूई का बंडल उस हथेली पर लपेट कर कसने के बाद फुर्ती से पट्टी बांधते हुए शंकर जी ने अपने दोस्त से कहा.

"स्टीट्चेस लगाने पड़ेंगे भाई. यहाँ पास हे कम्बोज का क्लिनिक है न?", गुलाटी तोह उठ खड़ा हुआ था कार निकलने के लिए.

"वो बंद हो चूका होगा शंकर. सांगवान के फार्महाउस पर सबकुछ है और वो कम्बोज के क्लिनिक से कही ज्यादा पास है. मैं और तेरी भाभी साथ हे चलते है बस हमको थोड़ा सावधानी से निकलना होगा. फंक्शन पर इसका असर नहीं होना चाहिए.", मेहुल गुलाटी ने जो कहा था वो असलियत में रेखा के हे शब्द थे जो उन्होंने मेहुल से बोलने को कहे थे शंकर जी के सामने.

"ऋतू तुम इस बारे में अभी कुछ मैट कहना और कोमल बीटा संभल लेना अगर कोई पूछे तोह. वैसे किसी ने ये नहीं बताया के ये सब हुआ कैसे? यहाँ शादी में ऐसी क्या चीज लग गयी जो हथेली इतनी गहरी कटी है?", कोमल इस का जवाब जानती थी लेकिन उसकी माँ की नजरो ने जवाब देने से साफ़ मन कर दिया.

"जी इतना परेशां होने वाली बात नहीं है. एल्युमीनियम की पट्टी निकली हुई थी वह पिलर के पास से तोह पीछे होते वक़्त बेध्यानी में हाथ उस पर रखा गया. वैसे तोह स्टीट्चेस की भी जरुरत नहीं है. हमारा यहाँ होना जरुरी है फ़िलहाल."

"तुम्हे मैं 20-25 मिनट में वापिस ले आऊंगा और इधर की फ़िक्र मत करो. घाव कही ज्यादा गहरा है किनारे से. बीटा तुम दोनों मैनेज कर लेना, हम लोग अभी आते है कुछ समय में.", शंकर जी ने मेहुल की बीवी को रेखा का हाथ पकड़ने का कहा और ये चारो हे लोग पिछली तरफ से कार की और चल दिए. शंकर जी अभी तक अपनी बीवी के जवाब से सहमत न थे क्योंकि किसी भी खम्बे या पाइप पर एल्युमीनियम की चादर न चढ़ी हुई थी. ये समय सवाल जवाब का नहीं था और वैसे भी समय था भी काम.

"दीदी, सच बताओ ये सब कैसे हु? और माँ के चोट शायद काफी देर से लगी हुई थी."

"अर्जुन या किसी को भी मैट कहना ऋतू. माँ की हथेली को किसी ने कटा था जब वो बाथरूम से बहार आने लगी तोह. और उसके बाद जिसने भी ये किया उसने माँ को बाथरूम में हे बहार से बंद भी कर दिया. पापा को पता लगता तोह वो भूल हे जाते की यहाँ शादी है. और मुझे लगता है की माँ जान गयी है उस इंसान को. बैठूं में सचमुच बहोत खून फैला हुआ था जब मैंने खोला तोह.", ऋतू का पारा अपने पिता की तरह हे चढ़ चूका था ये बात सुन्न कर लेकिन वो ये भी जानती थी की इस समय कुछ भी खोजबीन करना व्यर्थ हे रहेगा. और अगर माँ उस इंसान को पहचान गयी है तोह कैसे भी पता तोह कर हे लेगी वो. विवाह जहा इतने समय तक भरपूर सकरात्मक गुजरा था, इस पल में कुछ भांग पड़ चुकी थी जिसको रेखा के साथ साथ कोमल ने समझदारी से सँभालने की भरपूर कोशिश की. अब कितना संभल सकता था ये तोह फ़िलहाल अपने आप में एक सवाल था.

"अर्जुन शायद हमको हे ढून्ढ रहा है दीदी. बिना maa-papa के हम लोग वह सबके साथ टेबल पर कैसे बैठेंगे?"

"इसलिए तोह वह बैठना और भी जरुरी है अब. पूछे तोह बता देना की वो लोग किसी मेहमान के साथ है और आते हे होंगे."

"हाँ माँ के हाथ में बंधी पट्टी तोह इनविजिबल होगी न. चलो इस से पहले वो यहाँ चला आये हम हे उसके पास चलते है दीदी.", खून अभी तक मौजूद था जिसका डर ऋतू को था और अब वो दोनों हे अर्जुन की और चल दी थी जो अपनी बहनो को देख कुछ ज्यादा हे खुश था.
 
Back
Top