Incest Pyaar - 100 Baar - Page 45 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 193 (1)

पहली मुलाकात

दिन के 11 बजने तक यहाँ ज्यादातर लोग बिस्टेर त्याग चुके थे. रेखा हे एकमात्र स्त्री थी जो अभी तक सोई थी और उसकी वजह भी सबको पता थी इसलिए कोश्शिह राखी गयी की उनके आसपास कोई आवाज न हो. पूरे घर में कौशल्या जी और रामेश्वर जी के अलावा कोई और ऐसा था जो एक पल भी न सोया था वो कोमल थी. अपनी दादी को खबर लगने से पहले हे वो रसोई के सारा काम निबटा चुकी थी और दोनों कामवाली बाई से पूरे घर की ाची तरह सफाई भी करवा दी थी. कौशल्या जी रस्मो की तैयारी करने के बाद आँगन में आयी तोह पसीने से लथपथ और सबसे बेपवाह सी कोमल को रसोई की गर्मी में उलझते देख कुछ गंभीर हो गयी.

"मैट बन्न दूसरी रेखा और ये शरीर है न इसकी भी सीमा होती है बिटिया. इतना मैट घिसाव के भविष्य में ये जल्दी साथ छोड़ दे. वैसे यहाँ से इतनी महक कैसे आ रही है?", कौशल्या जी ने अपने पल्लू से हे कोमल का चेहरा साफ़ करने के बाद चूल्हे पर सकती वो भरवा भिंडी देख ली थी पर पूछने की मंशा कुछ और भी थी.

"ओह दादी आप भी न. न तोह मैं कभी आप जितना काम कर सकती हु और न हे माँ की तरह. परसो आप हे तोह कह रही थी की नयी बहु घर आये तोह चूल्हे पर सबसे पहले मीठा हे बन्न न चाहिए.? खीर तैयार कर रही थी तोह लगा की सभी लोग हलवाई वाला खाना खाते हुए परेशां न हो गए हो. ये अमचूर वाली भिंडी दादा जी के साथ साथ चाचा जी को भी पसंद है और सफ़ेद छोले के साथ चावल संजीव भैया को. आपने भी कल ठीक से खाना नहीं खाया था और सुबह से एक कप चाय के अलावा कुछ लिया भी नहीं. गली में ज्ञान अंकल आये थे सब्जी ले कर तोह आपके लिए अजवाइन वाली तोरई बनाई है, बिना ज्यादा मसाले के. बस अभी maal-pooye बाकी है जो गरम हे ठीक रहेंगे परोसने."

"बस बस.. पागल कही की. वो बहार मशीन भी तूने हे लगाईं होगी?", कौशल्या जी की बात सुन्न कर कोमल को जैसे याद आया की वो आखिरी चक्कर के कपडे निकलने भूल गयी है इस सबमे.

"ओह दादी. मैं आती हु अभी कपडे निकल कर. गलती से भूल गयी."

"बस बीटा तू बैठ यहाँ. मैंने कर दी बंद और वो कपडे सूखने वो दोनों कामवाली छत पर भेज भी दी. तुझे क्या पड़ी थी ये सब करने की? आज हे कपडे भी धो दिए?", कोमल को अपने साथ लिए वो वापिस कमरे में आ गयी थी. चूल्हा बंद था अब सब्जी पकने से. उनके बिस्टेर पर एक तरफ शालिनी सोई हुई थी और उसकी बगल में मुस्कान. जिसको भी जहा जगह दिखी थी वो थकान से वही सो गया था.

"दादी, अभी लगे हाथ काम हो गया न. बाद में ज्यादा काम इकठ्ठा हो जाता और मेहमान भी chal-fir रहे होते. मुझे यही टाइम ठीक लगा और बाकी सबको आराम की जरुरत भी थी. आप भी तोह आने के बाद नहीं सोई.", कोमल ने एक बार कमरे में दाखिल होते अपने दादा जी को देखा जो अब तैयार हो चुके थे.

"की गाल हो रही है दोनों दादी पौती दे विच?", कुर्सी लगा कर वो भी यही बैठ गए. उनके हाथ में एक फाइल थी जो फ़िलहाल बंद हे रखे हुए थे.

"ये पागल आराम करने की जगह सारा काम अकेले हे निबटा चुकी. मैं इसको यही समझा रही थी की सबकी आदतें इतनी न बिगड़े की कल को उनके साथ साथ हमे भी परेशानी हो. Saaf-safaai करवाने के साथ कपडे और खाना तक कर दिया इस लड़की ने अकेले. कल सुबह 4 बजे की उठी हुई है.", कौशल्या जी की बात सुन्न कर रामेश्वर जी ने बड़े हे स्नेह से कोमल के सर पे हाथ फिरते हुए कहा.

"थानेदारनी जी आप हम तीनो के लिए चाय हे बना लो. इतने मैं मेरी इस अन्नपूर्णा की खबर हे ले लू.", कौशल्या जी अपने पिता और पौती के स्नेह को देख मुस्कुराती हुई कड़ी हो गयी. कोमल खुद ये करना चाहती थी लेकिन अपने दादा जी की बात पर गौर करते हुए वो उन्हें प्रश्नवाचक निगाह से हे देखने लगी. कौशल्या जी के जाते हे उन्होंने वो फाइल कोमल के सामने कर दी. हरे गट्टे की फाइल खोल कर कोमल ने पहले तोह उन स्टाम्प पेपर को सरसरी निगाह से देखा और उसके बाद बिना कुछ कहे वो अगले 2 पेज पढ़ने लगी.

"मुझे क्या करना है इसमें दादा जी? वैसे इस पर मेरे सिग्नेचर नहीं है और इसके बारे में तोह मुझे आपने या दादी ने भी नहीं बताया.", कोमल ने फाइल को बिस्टेर पर एक तरफ रख दिया था जैसे वो फ़िलहाल हर बात को ाचे से जान सके.

"पहले केयरटेकर तुम्हारी माँ और चची थी इस सबकी. तुम्हारी चची ने ये आगे प्रियंका को वारिस बनाया जब अर्जुन ने मन किया और बाद में अर्जुन मान गया तोह उसको. ऐसा हे रेखा बहु ने किया तुम्हारे और ऋतू के कहने पर. लेकिन इस बैलबुद्धि ने ये नयी विल तैयार करवा दी अपने भाई और मुझे झांसे में ले कर. रुपाली की तरफ भी उसने ऐसा हे किया है जिसमे फ़िलहाल तोह सबकुछ अर्जुन हे देख रहा है लेकिन कानूनी हक़ साड़ी jameen-jayedad का सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे नाम है. मैं चाहता हु की तुम ये 10 प्रतिशत का लाभ अंजलि बिटिया के नाम कर दो इस नरिंदर वाली तरफ का. पावर ऑफ़ अटॉर्नी तुम्हारे हे नाम है जबतक अर्जुन 21 का नहीं हो जाता.", यहाँ रामेश्वर जी ने Roshni-Raman की बिटिया का नाम लिया तोह कोमल को जैसे हलकी सी उलझन हुई पर उसने जरा भी जाहिर न किया.

"मुझे क्यों ऐतराज होगा भला दादा जी? वैसे भी मुझे इस सबमे कोई इंटरेस्ट नहीं है. अर्जुन ने तोह मुझसे पुछा तक नहीं ऐसा करवाने से पहले और मुझे पता भी अभी लग रहा है. बताये कहा सिग्न करने है?"

"फाइल के आखिर में 2 और पेज है. उन्हें ाचे से पढ़ लो सिग्न करने से पहले. अब अर्जुन ने ऐसा क्यों किया है ये तोह वही बता सकता है. उसने मन नहीं किया सब सँभालने से और वो ध्यान देता है हर बात पर. सबके अकाउंट में टाइम से उनका हिस्सा देना और जहा भी किसी को जरुरत हो तोह वह अपनी तरफ से बढ़ा देना. कोई नया भागीदार जुड़ता है तोह अर्जुन खुद हे उसको एक उचित हिस्सा प्रदान करता है.", रामेश्वर जी बात करते हुए ये भी देख रहे थे की कोमल कैसे बिना कोई सवाल किये लेकिन बड़े ध्यान से उन पन्नो को जांच रही थी. पढ़ने के बाद उसने आगे पलटा तोह वह भी एक नया कागज़ था.

"यहाँ तोह राधिका दत्त लिखा है दादा जी. मतलब भाभी को भी अर्जुन ने .."

"नहीं नहीं बीटा. वो कागज तोह नाम में बदलाव और यहाँ के परिवार में शामिल करने के लिए है. राधिका अब इस घर की सदस्य है न तोह लगे हाथ मैंने ये कागज़ भी तैयार करवा लिए. हाँ एक सिग्न यहाँ पीछे खली पैन पर भी कर दो. वैसे तुमने ये नहीं पुछा बेटी की हम ऐसा क्यों कर रहे है? क्यों रौशनी और अंजलि को हम इधर से हिस्सेदारी दे रहे है जबकि तुम्हारे छोटे दादा के पास भी संपत्ति है और रौशनी के पति अलग जायदाद होगी.", रामेश्वर जी आदतन ऐसे सवाल कर हे लेते थे लेकिन यहाँ उनके सामने संजीव या अर्जुन न थे. ये कोमल थी जो be-wajah सवाल नहीं करती थी. और अगर वो करती तोह सवाल उम्मीद से कही ज्यादा हे बड़े होते.

"वो भी परिवार के सदस्य है दादा जी और आपने ऐसा फैंसला लिया है तोह जरूर वजह होगी हे. जब आपके हाथ किसी की मदद कर सके उस व्यक्ति के बुरे समय में तोह इस से बढ़ कर इंसानियत क्या होगी. वैसे भी यहाँ हम सबको आपने जरुरत से ज्यादा हे दिया है, अपने लिए कुछ न रखते हुए.", रामेश्वर जी गदगद हो चुके थे अपनी इस सुशिल पौती के जवाब से और कौशल्या जी भी चाय ले कर यहाँ आ चुकी थी.

"इनके पास फिर भी बहोत है बेटी. 25 हजार से ज्यादा तोह इनकी पेंशन आती है और पफ पर तोह ब्याज भी वसूल रहे है ये बैंक से. लेकिन तेरी बात भी ठीक है की जब अपने हाथ में 2 रोटी हो तोह अगर हम एक किसी जरूरतमंद को दे भी दे तोह वो एक रोटी हमारे लिए 2 के बराबर हे रहेगी. चाय पी कर तू आराम कर ले, फिर खाने के बाद ये लोग तोह गप्पे हांकने में लगे रहेंगे लेकिन तू अर्जुन को मार्किट ले जाना. महीने भर के लिए वो जाने वाला है तोह गर्मी के हिसाब से उसके लिए सही कपडे खरीद लेना. और उसकी खुराक बदलनी है तोह वो पर्ची भी मैं तुम्हे दे दूंगी. तेरी चची और ताई अब तैयार है तोह जो थोड़ा बहोत काम बच गया वो उन्हें करने दे. पिछली तरफ वाले कमरे से अगर 3 4 बजे के पहले तू बहार दिखी तोह फेर सोच लियो.", कौशल्या जी ने ये प्यार भरी घुड़की देते हुए एक कप चाय का अपने पति की तरफ बढ़ा दिया. कोमल भी फाइल एक तरफ रख चाय का आननद लेने लगी. सवाल पंडित जी के मैं में भी थे और कोमल के भी लेकिन ये दोनों हे दृढ मस्तिष्क इंसान खुद पहल नहीं करने वाले थे.

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माधुरी लगभग 10 बजे हे अपने ससुराल पहुंच गयी थी. अभिषेक जी के साथ दर्जन भर करो में ख़ास बाराती भी यहाँ तक आये थे. वैसे तोह इनके यहाँ सिर्फ 4 हे लोग थे जिसमे से एक शिल्पा जी का शिशु और हफ्ते में 5 दिन बहार रहने वाला गौरव. लेकिन इस बड़े घर की देखरेख अभिषेक जी के 2 विश्वासपात्र और उनकी 19 वर्षीया संतान पूरे दिल से करते थे. मुख्या ईमारत में कुछ ज्यादा हे बड़े आँगन के बाद 2 मंजिलो पर कुल 8 कमरे, 2 बड़े हॉल, एक रसोई और लगभग हर कमरे से जुड़ा बाथरूम था. घर की देखभाल और शिल्पा जी की मदद के लिए हमेशा उपलब्ध रहने वाली नेपाली मूल की बर्षा थापा (37) थी और घर के साथ बहार के काम के लिए उसका मेहनती एवं सरल स्वाभाव पति पशुपति थापा (40). इनकी एकलौती संतान किरण थापा (19), स्नातक के प्रथम वर्ष इम्तिहान दे चुकी थी और पढाई के साथ साथ वो अपनी माँ और शिल्पा जी की उचित मदद करती थी.

"छोटी मेमसाब तोह बिलकुल चाँद है अभिषेक बाबू. सच कहती थी शिल्पा मेमसाब की गौरव बाबू की किस्मत हे तेज है. आइये दुल्हन जी और अपने दाहिने पाँव से कलश पलट कर कदम रखिये अपने घर में. भगवन sukh-samridhi बनाये रखे.", आरती का थाल लिए बर्षा ने द्वार पर हे गौरव और माधुरी की नज़र उतरी. Taamra-kalash में भरे चावल बिखेर माधुरी ने अपने कदम भीतर रखे तोह पहले से मौजूद दर्जन भर मेहमानो ने फूल और चावल बरसते हुए दोनों का स्वागत किया. लेकिन इसके साथ साथ शिल्पा जी ने माधुरी के सर से शगुन वार कर बर्षा को देते हुए उलाहना भी दिया.

"कितने बार कहे आपसे बर्षा की हमको मेमसाब मत कहा कीजिये. अभिषेक आपके लिए बाबू है वो ठीक लेकिन हमे आप दीदी कहती है वही कहिये. और वो नटखट गुनगुन कहा है? अब तबियत ठीक है उसकी?", शिल्पा जी अपने रिश्तेदारों और devar-devrani को लिए आँगन में आयी तोह पशुपति ने पहले हे सबके बैठने और नाश्ते का इंतजाम कर रखा था. 3 लकड़ी के टेबल पर ठन्डे पानी और शरबत के गिलास सजे थे कुछ मिष्ठान और phal-namkeen के साथ. आँगन में छाया के लिए वैसे तोह आम के 2 वृक्ष पर्याप्त थे लेकिन शादी वाले घर में लगने वाला लाल शामयाना भी भरपूर छाया बनाये था. रसोई से chai-coffee की ट्रे लिए ये उजले सलवार कमीज में जरुरत से ज्यादा हे गोरी युवती इन लोगो को देख वो ट्रे पास वाले टेबल पर रख लगभग दौड़ती हुई शिल्पा जी के पास आ गयी.

"भाभी आप ने मेरा इन्तजार भी नहीं किया? माँ आप तोह बोलना भी मत अब मेरे साथ. आवाज तोह लगा सकती थी की छोटी भाभी घर आ गयी है?", तक़रीबन 5 फ़ीट की ये लड़की जिस तरह से अधिकार जाता रही थी वो देख अभिषेक जी और शिल्पा जी के चेहरे पर थकान के बावजूद असीम ख़ुशी थी.

"तुझे धुप लग जाती न गुनगुन इसलिए मैंने हे मन किया था. अब देख तेरे सामने है तेरी नयी भाभी और गौरव से नेग भी ले ले तेरी मर्जी का.", अभिषेक जी ने सभी मेहमानो को बैठने की गुजारिश करने के साथ साथ इस लड़की के भी सर को लाड से सहलाते हुए कहा.

"नेग नहीं चाहिए अभिषेक भैया. बुखार की वजह से पहले हे मैं शादी में न जा सकीय और फिर नयी भाभी के साथ गेट पे पहली फोटो भी खींचने से रह गयी. ाचा तोह आप न अभी मेरे साथ आओ नयी भाभी और गौरव भैया आप भी आ सकते हो.", ये लड़की लगभग माधुरी का हाथ खींचते हुए उसको वापिस हे ले जा रही थी और शिल्पा जी भी हँसते हुए अपने देवर को उनके पीछे ले गयी. बरात के साथ गए फोटोग्राफर का कैमरा खुद हे अभिषेक जी ने उठा लिया क्योंकि वो व्यक्ति हाथ मुँह धोने के बाद अभी पानी पीने लगा था.

"भैया जी ये लड़की तोह पागल है और आप इसको डांटने की जगह इसकी बात मान रहे हो.?", पशुपति गमछे से अपना चेहरा साफ़ करता हुआ घर के मालिक की बगल में हे चल रहा था.

"पशुपति जी, जब आपको भी पता है की किरण हमारे लिए घर की पहली बची है तोह ये टोका टोकि मत हे कीजिये. आप मेहमानो को देखिये और हम जरा इस शैतान की तसवीर खिंच ले. शुक्र है की ये इतने में हे मान रही है.", लेकिन अभिषेक जी की सोच हे गलत निकली जब किरण ने एक या 2 नहीं लगभग दर्जन फोटो उतरवाई और बाद में तोह अपने maa-baap को भी शामिल किया जब फोटोग्राफर खुद हे इधर चला आया. Aas-pados के लोग दोनों dulha-dulhan को शगुन के साथ शुभकामनाये देने के बाद नाश्ता करने लगे थे और शिल्पा जी ने माधुरी का परिचय करवाया.

"ये बर्षा दीदी है जो हमारे घर को घर बनाये रखती है, बिना हमसे कोई म्हणत करवाए और ये हमारी लाड़ली है गुनगुन. वैसे तोह इसका नाम किरण है लेकिन हर वक़्त बस ये फिल्मी गाने गुनगुनाती रहती है जिस वजह से तुम्हारे जेठ जी ने इसका नाम हे गुनगुन रख दिया. गौरव और इनके लिए गुनगुन हे घर की बेटी और इनकी बहिन है. अभिषेक जब भी घर होते है तोह उनकी सुबह की चाय हमेशा यही बनती है. और गुनगुन अबसे तुम्हे अपनी नयी भाभी का पूरा ध्यान रखना है.", माधुरी ने भी बड़े सलीके से किरण को अपने साथ लगा कर प्रेम दर्शाया.

"वो तोह सब ठीक है लेकिन आप तोह नेग के बारे में कुछ कह रही थी? मैं नयी भाभी को अपने साथ हे ले जाउंगी मार्किट तोह वही से आप मुझे रानी मुखर्जी वाली जीन्स दिलवा देना. कॉलेज में बहोत सी लड़कियां पहनती है लेकिन माँ तोह मुझे सलवार कमीज के अलावा कुछ दिलवाती हे नहीं.", किरण की बात सुन्न कर माधुरी के चेहरे पर भी मुस्कान आ गयी. अभिषेक जी ने बीच में दखल देते हुए कहा.

"अभी तुम्हारी नयी भाभी को आराम करने के लिए उनके कमरे में ले जाओ गुनगुन. हम खुद हे कल सबको मार्किट ले चलेंगे. जो दिल करे वो ले लेना और तुम्हारी माँ भी नहीं टोकेगी. गौरव तुम भी थोड़ा आराम कर लो.", बात भी सही थी जो साड़ी रात शादी में व्यस्त होने के बाद 4-5 घंटे का सफर और इधर घंटा भर मेहमानो के साथ लगाने के बाद शरीर को आराम की सख्त जरुरत थी. गुनगुन उर्फ़ किरण तुरंत हे अपनी माँ को आँख चिढ़ाती हुई माधुरी को लिए पहली मंज़िल पर बढ़ चली. कमरे निचे भी थे लेकिन गौरव हमेशा से हे ऊपर वाली मंज़िल पर अकेला रहता था. पहले कमरे को पार करके दोनों अगले कमरे में दाखिल होने लगी तोह किरण ने हे बताया.

"भाभी, ये पहले वाला कमरा भी गौरव भैया का हे है लेकिन उसमे सिर्फ किताबे हे किताबे है. वो तोह छुट्टी पर भी आते है तोह दिन भर किताबो में लगे रहते है. हाँ थोड़ा खेलने भी जाते है क्लब में लेकिन ज्यादातर कंप्यूटर या किताबे. ये कमरा बड़ा है जो अब आपका है. इसको मैंने हे सजाया है और सुबह जो गाडी आयी थी उस से सामान निकाल कर मैं इन दोनों अलमारी में लगा चुकी हु. हाँ ये आपके चैन वाले बैग मैंने नहीं खोले क्यूंकि ये आपका जरुरी सामान होगा.", माधुरी के घर से दहेज़ चाहे न भी आया हो लेकिन उपहार और बाकी सब सामान पहले हे पाउच चूका था. किरण की म्हणत और इस साफ़ सुथरे बड़े कमरे को देख माधुरी सहजता से मुस्कुराई.

"ये मेरी तरफ से नेग समझ कर रख लो गुनगुन. घर में सबसे छोटी तुम्ही हो तोह मन मैट करना. और इधर बाथरूम है?", माधुरी ने निचे मिले शगुन के दर्जन लिफाफे बिना जांचे हे किरण के हवाले कर दिए थे जो वो बड़ी हैरानी से देख रही थी. माधुरी ने बाथरूम देखा तोह वो लगभग एक कमरे जितना हे बड़ा था और बिलकुल साफ़. जैसे वो आजकल में हे बनाया गया हो या आधुनिक सामान उसमे लगवा कर दुरुस्त किया हो. ऐसा बाथरूम उनके घर भी था लेकिन ये वाला तोह कमरे के भीतर उसका निजी था.

"आपने देखा भी है भाभी के ये कितने रुपये होंगे? माँ मुझे बहोत मारेगी और ये शगुन आपके है तोह आप हे रखिये."

"शिल्पा दीदी को बता देना की ये मैंने अपनी मर्जी से तुम्हे दिए है. वो संभल लेंगी अपने आप. और ये कितने है इस से क्या फरक पड़ता है? तुम्हारे काम हे आएंगे तोह समझदारी से प्रयोग करना. अब तुम इजाजत दो तोह क्या मैं फ्रेश हो कर थोड़ा आराम कर लू?", माधुरी अभी तक उन भरी वस्त्रो में थी और गुनगुन उसको पसीने में देख अपने सर पे हाथ मरती हुई रिमोट की तरफ लपकी.

"ये ऐरकण्डीशन चलना भी याद नहीं रहा. हाँ आप फ्रेश हो कर आराम कीजिये. वैसे भी यहाँ ज्यादा लोग नहीं आते तोह आपको परेशानी नहीं होगी. गौरव भैया भी आ गए शायद.", किरण ने कदमो की आहात सुन्न ली थी जो बिलकुल सही थी. पर गौरव अकेला नहीं आया था. उसके साथ शिल्पा जी भी थी जो अपने बेटे को निचे सुला कर आयी थी.

"बड़ी भाभी ये नयी भाभी ने अपने आप हे मुझे दिए है. उन्होंने देखा भी नहीं की ये कितने है. मैंने लेने से मन किया था.", किरण की बात सुन्न कर शिल्पा जी ने उसका गाल खींचते हुए कहा.

"रख ले जब दिए है तोह. और कितने है ये तोह तू हे देख जब तुझे दिए है. बैंक में डलवा लियो अगर ज्यादा हो तोह. चल अब जा के आराम कर तू भी. बुखार उतरा नहीं की तेरी मस्ती शुरू हो गयी. माधुरी, तुम्हे कुछ भी चाहिए हो toh..Mujhse मत कहना. ये घर तुम्हारा भी है तोह किसी को भी बोल सकती हो. और जैसे दिल करे वैसे रहना. यहाँ कोई पंचायती राज नहीं है. गौरव, तुम भी कपडे बदल कर आराम कर लो. फिर शाम को डिनर पर इनके कुछ फ्रेंड्स आने वाले है तुम दोनों से मिलने. माधुरी, तुम्हारा सब सामान किरण ने लगा दिया है बर्षा के साथ मिल कर. देख लेना.", शिल्पा जिस तरह से मुस्कुरा कर वापिस गयी थी उस पर माधुरी की तोह नजर नहीं पड़ी लेकिन गौरव जरूर झेंप गया. फिर वो भी दिवार में बानी उन अलमारी की तरफ बढ़ते हुए बोलै.

"माधुरी, मैं बगल वाले कमरे में नहाने जा रहा हु. तुम चाहो तोह कमरा बंद कर सकती हो."

"आप नाहा के आ जाइये और दरवाजा बहार से हे लगा दीजियेगा. ये आपका भी कमरा है.", माधुरी ने गौरव से पहले हे अलमारी खोल कर सलीके से लगे गौरव के कपड़ो से एक kurta-pyjama, टोलिया निकल कर नजरे झुकाये हे उसकी और बढ़ा दिया. गौरव के गंभीर चेहरे पर हलकी सी मुस्कान आयी थी ये देख की अभी माधुरी को आये चाँद घंटे हे हुए है और वो पत्नी वाले कार्य करने लगी है.

"वो मेरे ुंडेरवेअर्स मैं खुद ले लेता हु.", गौरव आगे बढ़ा तोह अलमारी के दोनों पल्लो के बीच अब वो माधुरी के शरीर से बिलकुल सत् कर एक दराज से katcha-baniyaan निकलने लगा. न चाहते हुए भी दोनों के शरीर में हल्का घर्षण हुआ था और माधुरी का वो विशाल उभार एक तरफ से गौरव की कोहनी को छो गया. माधुरी को अभी तक अपने जिस्म पर सिर्फ अर्जुन का हे स्पर्श अनुभव था लेकिन गौरव उसका पति था जो एक तरह से जीवनभर अब उसके साथ बिस्टेर साँझा करने वाला था. चेहरे पर हलकी सी लाली और शर्म आ हे गयी थी इस स्पर्श से. गौरव को जब उसके वो कपडे न मिले तोह माधुरी ने झुक कर बगल वाली दराज को देखा. अब दोनों मिया बीवी एक जैसी मुद्रा में थे और गौरव तोह सब भूल कर बस उस कुदरत के हुनर को निहार रहा था. माधुरी के चिकने भरे भरे गाल, चेहरे पर ख़ास चमक के साथ नाक में बलि और गाल से लटकती वो बालो की घुमावदार लत्त. माधुरी ने दोनों वस्त्र निकल लिए तोह नजरे आपस में टकराई. गौरव हिचकिचाता हुआ पलट कर सीधा हो गया.

"थैंक यू."

"वेलकम.", माधुरी के जवाब को सुन्न कर वो जाने से पहले अचानक हे उसके गाल को सेहला कर कमरे से निकल गया. वो भी गौरव की इस हरकत पर कुछ पल हैरान हुई फिर सर झटकते हुए बोली.

'खुद हे कह रहे थे की तुम शादी से मन कर दो और अब जनाब के चेहरे की ख़ुशी कल से कुछ और बता रही है.', माधुरी अपने कपडे भी ले कर उस बाथरूम में घुस गयी. आराम करने से पहले नाहा लेना जरुरी था. और जबतक वो बाथरूम से नाहा कर सलवार कमीज में कमरे में आयी दरवाजा बंद हे था लेकिन बिस्टेर पर गौरव जरूर करवट के बल लेता दिखा. शायद वो थकने की वजह से जल्द हे सो गया था जैसा माधुरी को प्रतीत हुआ. आईने में खुद को सँवारने के बाद उसने पहले गौरव को चादर दी कमरे में ठंडक की वजह से और फिर खुद भी एक तरफ के खली हिस्से में गौरव की तरफ पीठ करके लेट गयी. नयी जगह और अपने bhare-poore परिवार से दूर माधुरी को अब इस बिस्टेर पर नींद नहीं आ रही थी. बगल में सोया व्यक्ति बस आज हे तोह ज़िन्दगी में आया था और ऐसे ढेरो विचार लिए माधुरी ने 3-4 बार करवट ली.

"तुम ठीक हो न माधुरी? जानता हु के तुम्हे अंदर हे अंदर ये अजीब लग रहा होगा. एक नया परिवार और ऊपर से घर से दूर. माँ जी (ललिता) ने बताया था के तुम अपने जीवन में कभी भी घर से दूर नहीं रही हो. वह हैं भी तोह ढेर सारे बहिन भाई जिनके बिना तुम्हे ऐसा लग्न जायज भी है. जीवन में बहोत कुछ पहली बार हे होता है माधुरी और जरुरी नहीं के वो बुरा हे हो. धीरे धीरे से हे सही लेकिन कदम बढ़ने से हम एक वैसा हे संसार बना सकते है. अपना संसार, जैसा तुम्हे पसंद है.", गौरव ने ऐसा कहते हुए माधुरी के सर को हलके हाथो से सहलाया तोह वो बड़ी बड़ी आँखों से अब पहली बार इस व्यक्ति को गौर से देख रही थी. माधुरी को यु खामोश खुद की तरफ देखता प् कर गौरव ने हामी भरी.

"मैं तैयार नहीं था माधुरी जैसा मैंने पहली मुलाकात पर बताया था तुम्हे की तुम मन कर दो. भैया ने अपने लिए कभी कुछ नहीं किया और शादी होने बाद भी उनकी प्राथमिकता सिर्फ मैं और हमारे पिता का खोया नाम वापिस बनाना हे थे. मुझे काबिल बनाने के लिए उन्होंने कभी खुद पर ध्यान नहीं दिया और जब उन्होंने चाहा की ये घर और भी pahle-phule तोह मैंने एक आशंका की वजह से तुम्हे वो कहा था. मुझे डर था की कही मेरी वजह से तुम्हारा जीवन बेमतलब में न खराब हो. पर मैं गलत था माधुरी. परिवार बढ़ने से समस्याएं ख़तम होती है और एकाकीपन सिर्फ खुद को तसल्ली देना भर है. सभी खुश थे इस शादी में जबकि उन्हें तोह कुछ मिल भी नहीं रहा था. वो नसीबवाला मैं था जिसके लिए सभी खुश थे और मुझे तुम मिली हो. सपनो पे काम करना तोह नहीं रोकूंगा लेकिन तुम्हे भी शिकायत नहीं होने दूंगा. मुझसे पहले इस घर को तुम्हारी जरुरत है. भाभी को तुम्हारी जरुरत है माधुरी और सबको. इत्मीनान से बस आराम करो और ये ख़याल निकल दो अपने दिल से की तुम नयी जगह हो. ये तुम्हारी जगह है.", गौरव ने जिस तरह से लगातार सर सहलाते हुए माधुरी से अपने जज्बात जाहिर किये थे वो कुछ सरक कर अपने पति के करीब हो गयी. इसके बाद कुछ ज्यादा बात न हुई दोनों में और इस बार माधुरी भी चैन से सो गयी. गोरव ने बीच में थोड़ा फैसला फिर बरक़रार किया और उसको भी ज्यादा समय न लगा.

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शंकर घर से तोह हॉस्पिटल में काम का बोल कर निकले थे लेकिन ये जगह किसी भी सूरत में हॉस्पिटल जैसी नहीं थी. शहर के अगले बाईपास पर बना ये आलिशान होटल और उसके बहार से भीतर तक की ati-vishisht सुरक्षा कुछ और हे कहानी बयान करती थी. यहाँ इस समय में किसी भी राहगीर को रुकने की साफ़ मनाही थी और वजह साफ़ थी. होटल में प्रवेश करते हे कुछ महंगी करो का काफिला और उनके बीच वो एकमात्र साधारण एस्टीम कार. ये व्यक्तित्व अपने आप में एक हे था और वो था डॉ शंकर शर्मा. होटल में आज ये महत्वपूर्ण मुलाकात इस बड़े हॉल में हो रही थी जहा किसी वेटर तक को जाने की मनाही थी. सर्विस का भार भी सुरक्ष देखने वालो पर हे था. 23-24 लोग इस हॉल में मौजूद थे जिनमे से सिर्फ 3 हे यहाँ से सम्बन्ध रखते थे. डॉ शंकर, डॉ धर्मवीर सांगवान और दिल्ली से पधारे श्रीमान रौनकलाल. बाकी 20 लोगो में से ज्यादातर coat-pant पहने मैनेजर जैसे या कारोबारी थे और सिर्फ 3 लोग ठीक इन तीनो के सामने. एक हत्ता कट्टा 35 बरष का पहलवान सा युवक जिसके गाल कश्मीरी सेब से लाल और शरीर दैत्य सा. दूसरा गंभीर, महंगी सफ़ेद कमीज पहने दरमियाने से कद का घुंगराले बाल वाला लेकिन सबसे रोबीला अधेड़ और उनके बीच बैठा वो 55-60 बरस का एक sant-bheshbhusha वाला लेकिन इनका मुखिया. गले में रुद्राक्ष की माला, हाथ में सोने की जंजीरे और शरीर फक्क सफ़ेद वर्स्त्रो में.

"ये रौनकलाल जिस मर्जी सरकार में हो लेकिन इसको हमारी ताक़त का ाचे से पता है. और तुम धर्मवीर सांगवान, कहने को तोह इस शंकर के शिक्षक हो और कुछ छोटे मोठे हॉस्पिटल के मालिक लेकिन बेवजह बहोत सी जगह तुम अपनी टांग अड़ाने से बाज नहीं आते. खैर तुम भी यहाँ इसलिए बुलाये गए हो की दिल्ली और उसके नजदीक हमारे 5 हॉस्पिटल में अपनी सेवा दे सको. जगह हमारी होगी, पैसा रौनकलाल और तुम बराबर लगाओगे. हाँ ये गजेंद्र भल्ला जैसे छुटभैया के साथ काम तुम दोनों नहीं करोगे.", उस अधेड़ से घुंगराले बालो वालो ने सिगार को जलने से पहले थोड़ा मुँह में दबा कर तोडा और फिर जलने के बाद अपनी बात कही. जिन्हे वो नाम से पुकार रहा था वो दोनों हे उसके बाप की उम्र के थे. इस व्यक्ति का नाम था सूर्यवीर सिंह राणा, S.V. ग्रुप ऑफ़ कम्पनीज का मालिक और देश विदेश में खासे रसूख वाला. शंकर इसकी बात को दरकिनार करते हुए इत्मीनान से काली कॉफ़ी की चुस्कियां ले रहा था.

"मेरे पास 10 हॉस्पिटल है राणा और मुझे नहीं लगता की मुझे फ़िलहाल कोई नया काम शुरू करना चाहिए.", धर्मवीर सांगवान के इतने से जवाब पर वो हत्ता कट्टा सा आदमी नाखुश दिखा लेकिन राणा ने इशारे से उसको खामोश हे रखा.

"वैसे तोह तुम्हारी ये बात मेरे भाई को नागवार गुजरी है धारवीर लेकिन चलो तुम्हारी ये पहली गुस्ताखी है और डॉक्टर के साथ तुम एक शिक्षक भी रहे हो इसलिए मैं तुम्हे माफ़ करता हु. वो 10 हॉस्पिटल हे तोह तुम हमारे साथ मिला रहे हो. उनमे से 5 हम बंद करेंगे और बाकी पहचो पर पैसा लगा कर वो आलिशान ईमारत तैयार करेंगे की पूरे उत्तर भारत में फिर उनके सामान कोई हॉस्पिटल न होगा. तुमसे कुछ पैसा वैसा नहीं ले रहे और न तुम्हारी हैसियत है की ट्रको के हिसाब से तुम हमारा खजाना भर सको. रौनकलाल, तुमने समझाया नहीं था क्या इसको? मेरे हर मिनट की कीमत 5 लाख है.", राणा के चेहरे पर कोई गुस्सा न था लेकिन आवाज बता रही थी की उसको गुरूर भी था और वो ताक़तवर भी.

"फैंसले धर्मवीर भाई साहब नहीं लेते राणा साहब. शंकर हे आधिकारिक मालिक है शेयर के हिसाब से और गजेंद्र भल्ला के साथ दिल्ली में नए व्यपार का बड़ा भागीदार भी. कहा काम करना है, क्या काम करना है और किसके साथ करना है ये सिर्फ शंकर हे तये करता है और अगर शंकर उपलब्ध न हो तोह उमेद सिंह.", रौनकलाल दिल्ली में रसूखवाला था लेकिन यहाँ तोह वो भी इस आदमी को 'जी' के साथ सम्बोधित कर रहा था. शंकर अभी भी डायरी पर कुछ लिखता हुआ वो काली कॉफ़ी में लगा रहा.

"शंकर. डॉ शंकर शर्मा सुपुत्र रामेश्वर शर्मा. इसका बाप पुलिस अफसर था जो अब रिटायर्ड है? 3 भाई और एक बहिन. पत्नी से 3 औलाद जिनमे सबसे छोटा एक लड़का बाकी दोनों लड़कियां. छोटा मोटा गुंडा भी है ये सफ़ेद कपड़ो के पीछे लेकिन इसको इतनी भी क्या एहमियत दे राखी है धर्मवीर जो ये मालिक बना हुआ है? और रौनकलाल, तुम तोह जानते हो मेरे भाई के सामने सभी गुंडों की पतलून कैसे गीली हो जाती है. ये छोटे मोठे शहर वाले बस गली मोहल्ले में अपने बाप के नाम पर 2-3 के हाथ पाँव टॉड कर रौब जमा लेते है. यहाँ सामने वाला आवाज बाद में करता है, पहले उसके माथे के बीच बिंदी बन्न जाती है.", राणा जैसे बोल रहा था उसके दर्जन भर coat-pant पहने वो छद्दम गुंडे दांत दिखने लगे.

"21 मिनट हुए है और इस हिसाब से तुम्हारी नौटंकी के हुए 85 लाख. ये तोह कुछ ज्यादा हे हो गए लेकिन चलो तुम यहाँ आये हो तोह खली हाथ तोह नहीं भेजूंगा तुम्हे. ये चेक बना दिया है मैंने और अगर तुम्हे इसको भुनाने में कोई परेशानी है तोह मेरी गाडी में एक करोड़ पड़ा है.", शंकर पेन और चेक लिए मजे से टहलता हुआ टेबल के दूसरी तरफ उन तीनो के पीछे जा रुका लेकिन उसकी जुबान सुन्न कर राणा का चेहरा लाल हो चूका था. उसका वो पहलवान गुंडा भाई भी अकड़ कर कुछ कहने हे लगा था लेकिन उस से पहले शंकर ने वो चेक राणा के मुँह पर दे मारा और पेन उस पहलवान के कंधे में, जो शायद महंगा था इस्पात से बना हुआ. लगभग आधा पेन उस गैंडे जैसे आदमी के कंधे की निचली हड्डी के बराबर से शरीर में घुस चूका था. कोई भी हरकत में आता उस से पहले शंकर का पसंदीदा हथियार इस हाल में चमक रहा था जो राणा के भाई के गले पर टिका था.

"रंडी की औलाद साले यहाँ एक चुटिया गंडमारे को अपना स्वामी बना कर आ पहुंचे. और इन्हे लगता है की 5000 करोड़ की दलाली करके ये मादरचोद किसी के भी सर पर मूतने लगेंगे. ए रौनकलाल अंकल. इन्हे बताया नहीं था क्या के मेरी फीस क्या है?", शंकर ने पेन वाला हाथ हटा लिया था लेकिन उसकी कोहनी की गिरफ्त इतनी मजबूत थी की वो गैंडा टास से मास्स न हो सका.

"तुम कर क्या रहे हो? वीरेंदर को छोड़ दो और हम तुम्हारी सजा काम कर देंगे.", राणा के साथ साथ उसकी बगल में बैठे बुजुर्ग को भी इस वातनूकलित हॉल में पसीने आ चुके थे. शंकर ने सिग्रत्ती निकल कर एक हाथ से हे पहले मुँह पर लगाईं और फिर उसी हाथ से लाइटर जला कर सुलगा ली. टेबल के सामने बैठे सांगवान जी और रौनकलाल मुस्कुरा रहे थे.

"3 बातें बता देता हु मैं तुम्हे राणा. एक तोह ये की अगर शंकर ने अपनी फीस कभी बताई है तोह मरीज ज़िंदा नहीं बचा लेकिन ये फीस ले कर रहता है. दूसरी बात, इनके पिता के नाम के साथ पंडित जी लगाओ या काम से काम जी तोह लगा हे लो और शिक्षक भी इसके लिए पिता सामान है तोह ये उनका कभी अनादर नहीं होने देता. अक्सर ऐसे लोगो की ये कलम पकड़ने वाली ऊँगली और अंगूठा काट देता है. लेकिन तुम निश्चिंत रहो क्योंकि ये घर आये लोगो की पहली बार में जान नहीं लेता. और तीसरी बात जो की तुम्हे सबसे ज्यादा याद रखनी चाहिए थी, गलती से भी लक्कड़बग्गो के झुण्ड को शेरो की मांड में नहीं घुसना चाहिए. शंकर अकेला हे शेर नहीं है इधर लेकिन यही अकेला तुम्हारी मांड में घुस कर हर पिल्लै की सांस रोक देगा.", डॉ धर्मवीर सांगवान अपनी जगह से उठ कर खड़े हो गए थे. राणा को वो मजबूत सा भाई लड़खड़ा रहा था कमजोर पकड़ और बहते हुए खून की वजह से. शंकर के शरीर को देख कर राणा ने उसका आंकलन बहोत गलत हे लगाया था. लेकिन गुरूर फिर भी थोड़ा भरी है उस पर.

"देख रहे हो धर्मवीर यहाँ कितने लोग है? मेरे भाई को छोड़ दो शंकर और माफ़ी मांग लो. मैं जरुरत से ज्यादा दयावान हु तोह तुम्हे सजा में सिर्फ इतना हे करना होगा की कभी भी दिल्ली का रुख मैट करना. और हाँ रौनकलाल, तुम्हे अब दुगनी पेनल्टी लगेगी.", राणा अंदर हे अंदर अपने भाई की हालत देख तिलमिला रहा था और उसके करीब बैठा वो बुजुर्ग उसके कान में कुछ कहने की कोश्शि करना चाहता था लेकिन इस माहौल में जैसे सबका ध्यान शंकर पर हे था.

"ये मिलावट वाला बीज है चाचा, न सुधरने वाला. वैसे तुम दिल्ली की बात कर रहे थे न राणा तोह सजा सुन्न लो. दिल्ली में नजर मैट आना आइंदा क्योंकि मैं आज हे शाम दिल्ली के लिए निकलने वाला हु. जिसको तुम गुंडों का शहजादा बता रहे हो ये लड़कियों वाला पाउडर खिला कर बड़ा किया है तुमने, इसको मैं अपने पास हे रखूँगा. हाँ इसका धड़ ले कर जा सकते हो जब तुम्हारे ये बाकी लकड़बग्घे इस होटल से 10 कोस दूर जा चुके हो.", शंकर ने ठान लिया था के वो इस पहलवान को ज़िंदा नहीं छोड़ने वाला.

"शंकर वीरेंदर को ज़िंदा जाने दो. बात बढ़ सकती है. राणा के पिता.."

"रौनकलाल जी, इस गंडमारे के बाप पिता और मेरे पापा? उन्होंने हमेशा सिखाया है के अपनी िज्जात्त अपने हाथ. आप क्या चाहते हो मैं अपने करम से na-insaafi करके ये ऑपरेशन ब्लेड वापिस जेब में रख लू.?", अब रौनकलाल के साथ साथ राणा और उस बुजुर्ग के भी गोटे मुँह में आ गए थे. शंकर का चेहरा तमतमा रहा था और उस ब्लेड की पकड़ ज्यादा मजबूत दिखने लगी.

"बात यही ख़तम करते है और इसके बदले हम एक और मीटिंग रखेंगे. इस तरफ की दिल्ली तुम्हारी और उधर की हमारी. मेरे भाई को छोड़ दो शंकर नहीं तोह यहाँ से कोई भी ज़िंदा नहीं जाने वाला. मैं अपनी बात का पक्का हु और आज पहली बार सामने वाली की बात मान रहा हु. मेरे भाई को छोड़ दो..", राणा न उठ प् रहा था और न हे वो अपने आदमियों को आदेश दे सका. शंकर सिर्फ धर्मवीर जी को हे देख रहा था जो मुस्कुराते हुए ख़ामोशी से इस मंजर को जेहन में समेटने लगे.

"वो ऐसा है राणा की शंकर मेरा सबसे काबिल बीटा है इसलिए ये अकेला 40 प्रतिशत का मालिक है और मेरे बाकी तीन लफंगे 60% के बराबर भागीदार. तुम सोच रहे हो के बहार तुम्हारी सुरक्षा है लेकिन वो तुम्हारी सोच है. अब वह सिर्फ हम है और जो ये नौंने गर्मी में भी कोट पंत पहने बैठे है या तोह ये यहाँ से ख़ामोशी से निकल जाए नहीं तोह वो लोग अंदर आये तोह मैं रौनकलाल की बात से भी इत्तेफ़ाक़ नहीं रखने वाला. दिल्ली में अब 5 हॉस्पिटल बनेंगे और वो सभी तुम्हारी जगह पर जिसमे तुम्हारा कोई हिस्सा नहीं होने वाला क्योंकि तुम न तोह इधर की तरफ दिखोगे और न हे उधर की तरफ. ये कागज़ है तुम्हारी उन जगह के और ये नौ है. कीमत तुम्हारी ज़िन्दगी. सिग्न कर दो.", सांगवान जी ने फाइल ऐसे खिसकाई थी की वो सीधा राणा के सामने जा रुकी. वो तोह हैरान सा अपनी हे जमीन के कागज़ देख रहा था जिनके सही सही कागज़ ये लोग पहले से हे लिए थे.

"ऐसे क्या देख रहा है भोस्डिके? मेरा भाई पहले पहले कागज़ बनवाता है फिर उसके मालिक को बुलवाता है. शुक्र कर इन्दर यहाँ नहीं आया. चल पेन चला नहीं तोह..", शंकर ने इतना कहने के साथ ब्लेड का दबाव बनाया तोह वीरेंदर राणा के गले से पतली से खून की धार रिसने लगी और हॉल में दाखिल हुए भुप्पी, दीपक, दलीप और राजेश के साथ 4 लोग. सभी के हाथ में स्वचालित तमंचे चमक रहे थे मुस्कराहट के साथ.

"मतलब रौनकलाल, तुमने ये जाल बिछाया था?"

"भोस्डिके मैंने बोलै न मेरे भाई ने किया था ये सब. उसको पंजाब में मजा नहीं आ रहा था और मैं सरकारी डॉक्टर हु इसलिए दिल्ली में क्या करूँगा.? हाँ उन दोनों को दिल्ली चाहिए थी और ये 100-200 करोड़ वाले काम नहीं करने थे. इस चक्कर में सांगवान चाचा ने बोलै के उन्हें अब कुछ बड़े हॉस्पिटा भी वह बनाने पड़ेंगे तोह तुझसे मिलने आ गए. तू हरेक को चुटिया समझ रहा था और यही तुझसे गलती हो गे. चल सिग्न कर और निकल. इसके बदले मैं सचमुच तेरे भाई को साबुत सौंप दूंगा.", बाकी सभी को दलीप एंड पार्टी ने एक एक करके चलता कर दिया था. शंकर की बाहों में वीरेंदर तोह कबका बेहोश हे हो चूका था जिसकी हालत देख राणा ने बिना देखे सभी कागजो पर लगातार हस्ताक्षर कर दिए.

"मेरे भाई को छोड़ दो और मैं दिल्ली से दूर रहूँगा."

"वो तोह तू रहेगा हे लेकिन तेरा बाप.. सॉरी तुम्हारे आदरणीय पिता जी थोड़े ढीठ है. तुम मुझे मेरी कुंडली आधी अधूरी बता रहे थे न तोह उस से पहले जरा अपने पिता जी से मेरे पापा के बारे में पूछ लेते. वीर सिंह राणा की पतलून गीली हो जाती उस नाम से अगर तुमने पंडित जी बोल दिया होता तोह. ए दीपक, इस स्वामी के ठीक बीच में गोली मार. स्वर्ग से पहले ये रुका न तोह तुझे देखने के लिए पीछे भेजूंगा.", शंकर की गर्जना ख़तम भी नहीं हुई थी की सीलेंसर लगी पिस्तौल से बस पित्त की आवाज आयी और वो रुद्राक्षधारी स्वामी कुर्सी पर लुढ़क गया. खून के छींटे राणा के चेहरे पर भी गिरे थे जिस से वो सेहम कर हैरत से सबको देख रहा था. शंकर ने राणा के भाई का शरीर जमीन पर गिरते हुए स्वामी की गर्दन उठा कर बड़े हे गौर से वो गोली का निशाँ देखा जहा से खून बेहटा हुआ टेबल को भिगो रहा था.

"ये स्वर्ग से भी आगे गया बीटा. तू तोह चैंपियन हो गया दीपक सेण्टर पॉइंट का. चल राणा तुझे मैं पूरे 5 मिनट दे रहा हु और अगर उतनी देर में तू अपने भाई को ले कर यहाँ से निकल गया तोह तुम दोनों ज़िंदा रहोगे नहीं तोह गेट यहाँ से 250 गज दूर है और तुम्हारी लाश इस सरहद में हे किसी बगीचे में दफ़न मिलेगी.", शंकर की बात सुन्न कर राणा ने पहले तोह हॉल को देखा जहा अब उसका कोई भी आदमी नहीं था लेकिन यहाँ जितने थे सबके हाथो में हथियार. उसका भाई जो शरीर में उस से दुगना था वो मूर्छित पड़ा था. राणा ने जैसे तैसे उसको उठाने की भरपूर कोशिश की लेकिन सवा 100 किलो से ज्यादा का वो पहलवान टास से मास्स न हुआ. राणा के चेहरे से पसीना पानी की तरह फर्श पर जल्दी हे गिरने लगा और समय तेजी से काम होता गया.

"2 मिनट", दलीप के इतना कहते हे राणा ने अपने भाई को वही छोड़ा और बहार की तरफ दौड़ लगा दी.

"जाने डोज इसको शंकर?"

"हाँ चाचा इसको तोह जाने हे दूंगा. अभी तोह ये बहोत काम आने वाला है जैसा इन्दर ने कहा था. ये वीरेंदर को अपने कब्जे में रखना है हमे इसलिए मुझे ऐसा करना पड़ा. भुप्पी इसकी ाचे से खातिर करना और जो भी चाहिए हो वो मुहैय्या करवाना. आपने ाचा काम किया रौनकलाल अंकल और बाकी सब ने भी.", शंकर ने पानी की बोतल उठा कर एक लम्बा घूँट भरा तोह उसके करीब आ खड़े हुए धर्मवीर जी ने बड़े हे स्नेह से कन्धा थपथपाया.

"आज पहली बार देखा के मेरा शंकर शिकार करने का रिवाज सीख रहा है. मुझे तोह लगा था यहाँ 20-25 लाश गिरने वाली है लेकिन वो हीरो शायद कुछ बदल सा गया.", उनकी बात सुन्न कर रौनकलाल ने भी गर्दन हाँ में हिलाई.

"ये सही कहा आपने भाई साहब. मुझे भी लगा था के आज इनके साथ साथ हम लोग भी swag-sidharne वाले है. और शंकर की हीरोगिरी से तोह खुद पंडित जी भी डरते है."

"बात ऐसी है की मेरे दोनों भाई (Umed-Narinder) ने मुझे बताया था यहाँ आने से पहले. उनका कहना था की जरुरी नहीं की खून बेमतलब बहाया जाए अगर काम बातों से हो सकता हो तोह. उस जानवर को बचा कर रखो उस दिन के लिए जब खून ज्यादा बहाना पड़े. वीर सिंह राणा से इन्दर खुद मिलना चाहता है वो भी पापा की तरफ से और ऐसे मसलो के बीच शंकर कभी नहीं आता."

"तोह इस स्वामी को क्यों मारा?"

"मैंने मारा? मैं कौन होता हु चाचा जी किसी को मारने वाला? दीपक तड़फ रहा था रिवॉल्वर लिए और मुझसे ये देखा न गया तोह इसके निशाने की परीक्षा लेनी चाही मैंने. वैसे ये शरमन मुनि था, हवाला वाला और इसके जाने से वीर सिंह राणा के हाथ अब आधे तोह काट चुके है. ये पहली मुलाकात ाची रही राणा परिवार के साथ और अब मैं घर जा कर अपने बेटे को सरप्राइज देना चाहता हु.", शंकर ने वो सिग्रत्ती जूते के निचे दबा कर बुझाने के बाद अपने ब्लेड और हथेली को पानी से वही साफ़ किया.

"तोह आज तुम अर्जुन के साथ वक़्त बिताने वाले हो?", राजेश ने ये कहा था जो अपने जीजा के साथ हे आगे चलने लगा. सांगवान जी उस फाइल को लिए रौनकलाल को कुछ समझा रहे थे हँसते हुए और बाकी लोगो ने उस स्वामी की लाश को ठिकाने लगाने के लिए एक कपडे में लपेट लिया. राजेश के साथ दलीप भी था.

"मेरा बीटा है राजेश वो और उसको भी चाहत रहती है की मैं उसको अपनी बगल में बैठा कर थोड़ा घुमाऊ फिरौ. वैसे भी उसने मुझसे अपनी माँ के लिए बहोत सवाल किये थे और जब उसने अपनी माँ का हाथ देखा तोह मुझे जिस तरह अपने गले लगाया वो सिर्फ मैं हे महसूस कर सकता हु. एक महीने के लिए वो घर से दूर जाने वाला है. मुझे भी कमी खलेगी हे उसकी चाहे मैं घर पे उतना नहीं रहता.", दलीप बड़े गौर से शंकर को देख रहा था जो चलते हुए अपने बेटे को याद करके जिस तरह खुश था वो सचमुच शंकर की ख़ास मुस्कान थी, एक गहरी मुस्कान किसी निस्चल प्यार की.

"जीजा मैंने तोह आपको कभी इतने सेंसिटिव होते नहीं देखा. और वो बस एक महीने के लिए जा रहा है जबकि पहले भी वो 8-9 साल घर से दूर रहा था. वैसे ाची बात है की आप उसको समझते हो."

"8-9 साल नहीं राजेश 8 साल 137 दिन या फिर यूँ कहु की 3060 दिन तोह बेहतर रहेगा. ये मैंने पहले नहीं जाना था के हम इतने दूर रहे है. कुछ दिन पहले हे मैंने गिनती की थी की मेरा बीटा मुझसे कितने समय दूर रहा. उसका महत्व मुझे थोड़ा देरी से पता चला लेकिन एक वही है जो पापा के संसार की नीव बरकरार रख सकता है. अभी यहाँ से जाते हे मैं उसको अपने साथ मार्किट ले जाने वाला हु. Ritu-Alka भी जाएंगी हे लेकिन मैं चाहता हु की तू और दलीप भी मेरे साथ चलो. तू रेखा, रुपाली, आरती और कोमल को ले चलना. दलीप अपने साथ मंजू, पिंकी, कृष्णा और इन्दर को. उमेद भी तैयार मिलेगा.", शंकर के ऐसा कहने पर दलीप को कुछ खटका सा हुआ मंजू का नाम सुन्न कर.

"वो बाकी लोग?"

"जो आराम करना चाहते है उन्हें करने दे न यार और संजीव को भी तोह टाइम देना है. बाकी भाभी और राजू भाई ने बहनो के साथ गीत हे गाने है संजीव राधिका के. मैं चाहता हु के किसी को ये न लगे की वो अर्जुन के साथ समय नहीं बिता सका. खाने का बिल आज मेरी ससुराल की तरफ से."

"हाहाहा.. जीजा. मेरी हे गांड मार ली न?"

"राजेश डार्लिंग, इसको गांड मारना नहीं सेवा का मौका देना कहते है. तेरी हे तोह ख़ुशी बढ़ा रहा हु मैं.", शंकर की बात का अर्थ समझ कर राजेश उसके गले लग गया.

"दीदी के लिए."

"हाँ तेरी दीदी के लिए. वो चाहती है की तू उस से मिलने स्पेशल घर आये. चल फिर आज यही गिफ्ट सही.", शंकर ने ऐसा कहने के साथ राजेश को पीछे आने का इशारा दिया दलीप के साथ और एस्टीम निकाल कर घर की तरफ बढ़ चला. यहाँ वो सुरक्षा अब हवा हो चुकी थी जिसके दम पर S.V. राणा मुलाकात करने आया था.
 
ये अपडेट पहले से लिखा हुआ था इसलिए कोशिश करके किसी दूसरे माध्यम से यहाँ पोस्ट किया है. अगला अपडेट कब आएगा और मैं कबतक लौट सकूंगा ये फ़िलहाल अनिश्चित है. जैसा अक भाई ने बताया, हाल वैसा हे है और मैं फ़िलहाल किसी भी मंच पर उपलब्ध नहीं हु. सन्देश यहाँ पर छोड़ सकते है, जल्द से जल्द जवाब देने की कोशिश रहेगी.

शुभरात्रि

आपका

एनिग्मा
 
सेलेक्ट ा नाम:

ऋतू

आकांक्षा

अफसाना

प्रीती

अन्नू वालिए

मंजूबाला

एंड लेट में क्लियर ओने थिंग. ओनली 3 विल रीच 2007. बाकी मैं कब वापिस आऊंगा ये क्लियर नहीं है. मई टेक ओने मंथ और ओने ईयर
 
जागने की उम्मीद में अक्सर हम कुछ सवाल छोड़ देते है..

सोने से पहले हम उनके जवाब भूल जाते है..!!

गूडनिघत गाइस
 
सबसे पहले तोह आप सभी को नमस्कार. और साथ हे देरी से सन्देश के लिए खेद है.

कुछ परेशानी की वजह से एक छोटा सा समय अपने लिए चाहता था और इस दौरान हे टाइफाइड हो गया. शरीर अभी भी कमजोर है लेकिन मैं कल तक घर लौट जाऊंगा. वैसे भी इस तरफ हालात कुछ ठीक नहीं है ऊपर से ये बीमारी. फ़ोन बंद रख कर अपने लिए कुछ समय निकलना चाहता था जो हो न सका.

आप सभी से कल शाम तक मुलाक़ात होगी, अगर सब ठीक रहा तोह. जिसकी पूरी उम्मीद है की सब सही रहेगा.

हाँ फ़िलहाल किसी अन्य प्लेटफार्म पर भी मैं उपलब्ध नहीं हु और इस अंतराल की वजह से किताब भी मई महीने के आखिर तक हे आ सकेगी. आप यहाँ मुझे मैसेज कर सकते है जिनका जवाब मैं कल दूंगा.

अनुपस्थित रहने के लिए फिर से एक बार क्षमा चाहूंगा.

आपका अपना

एनिग्मा 💚🙏
 
अपडेट आज रात 10 बजे तक.
 
अपडेट 193 (2)

पहली मुलाकात

"भाभी, आप? मुझे हे आवाज लगा देती, आप क्यों आयी?", राधिका कुनमुनाती हुई सी उठी तोह बिस्टेर पर सिर्फ खुद को देख कुछ पल अपने हे खयालो में खोयी रही. फिर कमरे का जायजा लेने के बाद एक दिलकश मुस्कान के साथ उठ कर खुद को सही करती हुई कमरे से बहार आयी तोह hall-kamre को भी अंदर से बंद पाया. अर्जुन की तरफ न जा कर उसने वो किवाड़ खोला तोह सामने हे छोटे आँगन में ऋतू और प्रियंका को साफ़ सफाई करते पाया. वो लोग शायद अपने कमरे साफ़ करवाने के बाद चादरे धुलने के लिए निकाल कर निचे ले जा रही थी. ऋतू ने दरवाजे पर कड़ी अपनी भाभी को देख सामान प्रियंका को थमाया और खुद राधिका की तरफ चली आयी. इस उजाले में राधिका का स्वरुप किसी स्वर्णिम मृगया सा प्रज्वलित था, श्रृंगार और ख़ूबसूरती के साथ साथ.

"आवाज लगा देना सही रहता क्या? वैसे भी मुझे आये देर हे कितनी हुई है जो आवाज लगाने लागु? तुम आराम करने की जगह अभी भी काम में लगी हो?", राधिका को लिए ऋतू वापिस हॉल कमरे में हे चली आयी. एक चालू करने के साथ उसने टेबल से बोतल उठा कर एक गिलास पानी का राधिका की तरफ बढ़ाया और मुस्कुराते हुए जवाब दिया.

"मैं शायद आपसे ज्यादा हे सोई होंगी भाभी. वो तोह बस अब हम लोग हमारे कमरे ठीक कर रही थी जिस से हम और आराम कर सके. हाहाहा.. वैसे आपको शायद ठीक से नींद नहीं आयी होगी, पहला दिन है आपका इस घर में.", राधिका ने सुर्ख होंठो से उस कांच के गिलास से पानी पिया तोह कुछ लाली वह भी जम्म गयी. काजल लगी बड़ी बड़ी आँखों में ख़ास चमक थी राधिका के जैसे वो इस घर में अभी से खुश हो बस चेहरे पर कुछ अलग सी पशोपेश.

"नींद तोह सचमुच गहरी हे आयी थी यार लेकिन ये कपडे कुछ ज्यादा हे भरी है. वैसे तुम्हे नाम से बुला सकती हु न? या नानन्द जी कहना पड़ेगा?", राधिका को ऐसे बोलते देख ऋतू ने उसका वो मेहँदी रचा खूबसूरत हाथ थाम लिया. बेहतरीन तराशे हुए नख, लम्बी बारीक माँ सी उँगलियाँ जो कुछ ठोस थी लेकिन नरम एहसास.

"आप मुझे हमेशा नाम से हे बुलाना. और यहाँ पर जैसे सब एक दूसरे को बुलाते है आपको भी वही करना है. दादी को दादी, दादा जी को दादा जी या बौ जी या बड़े पापा भी कह देंगी तोह वो खुश हे होंगे. विन्नी दीदी शायद आपकी उम्र की है तोह मुझे नहीं लगता के वो आपको जी कहेंगी. खैर जरुरी भी नहीं ऐसा लेकिन ये जान लीजिये के आप इस घर के एकमात्र pautra-vadhu है तोह सभी आपके आगे पीछे रहने वाले है. वैसे कपड़ो के बारे में मैं क्या बोल सकती हु? कमरे में आपका जो दिल करे वो पहन लिया कीजिये लेकिन दादी कुछ दिन जरूर आपको दुल्हन जैसे हे बनाये रखेगी.", ऋतू की ऐसी साफ़ बातें देख राधिका मंद मंद खुश हो रही थी और जैसे वो कुछ कहना चाहती थी लेकिन कुछ याद करके उसने खुद को रोक लिया ऐसा करने से.

"वैसे ये तुम्हारे भैया किधर निकल गए? ये कमरा तोह मैंने हे खोला था अभी और वो मेरे कमरे में भी नहीं थे जब मैं उठी.", राधिका की बात सुन्न कर अब ऋतू ने हँसते हुए अपने सर पे हाथ रख लिया. उसकी ये जीवंत मुस्कान जैसे राधिका को भी सम्मोहित कर गयी जो एकटक बस उन सफ़ेद एकसार तराशे हुए दांतो और प्राकृतिक सुर्ख होंठो को देखती रही, जिनका भराव अलौकिक सा था.

"कुछ लोगो को आदत बदलनी पड़ेंगी अब लेकिन ये कोशिश भी आपको हे करनी पड़ेगी. आइये जरा मेरे साथ.", ऋतू ने सां दुरुस्त करते हुए अपनी भाभी को हाथ पकड़ कर उठाया और सीधा अर्जुन के कमरे को खोल वह दाखिल हो गयी. उस ast-vyast से बिस्टेर पर अर्जुन के पाँव लम्बाई की वजह से तिरछे जरूर थे पर वो किसी छोटे बचे की तरह अपने बड़े भाई के सीने में मुँह दबाये चैन से सोया था. संजीव भी पिछले कुछ दिनों की म्हणत से हुई थकान से चूर पायजामे और सफ़ेद बनियान में अपने छोटे भाई के ऊपर एक ब्याह रखे जैसे उसको दुनिया से इस पल में भी बचाये था. इन्हे कोई भान न था के घर में अब बदलाव होने लगे है. संजीव को शायद आगे से अब इस तरह राधिका को हे अपने पहलु में सुलाना होगा लेकिन काम से काम इस वक़्त नहीं. राधिका ने बड़े गौर से ये दृश्य देखा और इस बार वो खुद ऋतू को यहाँ से लिए अपने कमरे में चली आयी, जो पहले सिर्फ संजीव का होता था.

"वाओ. ये दोनों क्या हमेशा हे? मतलब वो बीएड से भी लम्बा है लेकिन तुम्हारे भैया से अभी तक बचे की तरह.. मतलब तुम ये जानती हे होगी?"

"हाँ.. वो इस घर का सबसे छोटा बचा है भाभी और संजीव भैया अगर घर पे होते है तोह अक्सर वो जितना हो सके अर्जुन के हे साथ रहते है. वैसे तोह अर्जुन कल हे गाँव जा रहा है एक महीने के लिए लेकिन मैं उसको कहूँगी की वो अपना सामान हमारी तरफ वाले किसी कमरे में शिफ्ट कर ले.", ऋतू ने जो भी कहा था वो बहोत हे रुक रुक कर और साढ़े हुए शब्दों में कहा था जैसे वो ऐसा कुछ सोच कर हे कह रही हो.

"इधर बैठो तुम और जैसा तुमने थोड़ी देर पहले कहा था न के अब तुम लोगो में सबसे बड़ी मैं हु तोह ये डीडे भी मैं हे करुँगी. नयी भाभी आयी और आते हे देवर को पति से अलग कर दिया.. हँ.. कितना सोचती हो यार तुम bina-wajah.? अर्जुन.. अर्जुन तुम्हारे भैया के लिए इतना ख़ास है की वो शायद उसको मेरे साथ भी साँझा नहीं करना चाहते थे. हाँ एक उपहार की तरह मुझसे मुलाकात भी ऐसे करवाई की मैं हैरान हुए बिना न रह सकीय लेकिन मैंने देखा की संजीव अर्जुन के पास होने पर मुस्कुराते है, बोलते है और खुद को जाहिर भी करते है. रही बात समय बिताने की तोह आगे से अर्जुन पर उनसे पहले मैं हक़ जमा कर रखूंगी. उन्होंने अपने हिस्से का कर लिया अब अर्जुन की भाभी की बारी है. अब जगा दो जरा अपने भैया को और अर्जुन को सोने देना.", राधिका ने बात कहते कहते हे दराज के ऊपर रखा अपना सोने का एक कंगन ऋतू की कलाई में पहना दिया था जिसको वो हैरत से देख रही थी.

"ऐसे क्या देख रही हो? होता तोह ये है की छोटी ननद अपनी भाभी के कमरे में आते हे अपनी मर्जी से एक उपहार लेती है लेकिन तुम मुझे बिलकुल भी ऐसी नहीं लगी जिसको किसी चीज की जरुरत हो. तोह ये मैंने अपनी पसंद से तुम्हे पहना दिया."

'मेरे पास तोह पूरी दुनिया है भाभी, फिर ये एक कंगन उसमे बदलाव करेगा. लेकिन आप सचमुच बहोत प्यारी है.'

"कुछ कहा तुमने?", ऋतू को बस होंठ हिलाते देख राधिका ने अचरज से पुछा.

"आप बहोत प्यारी है भाभी और ये दूसरा कंगन मुझे मजबूरी में लेना पड़ेगा अब. वैसे जगाने आप हे jao.",Ritu में जिस तरह के चंचल बदलाव आये थे राधिका हैरानी से उसको देखने लगी और इतनी हे देर में वो हंसती हुई कमरे से दौड़ गयी, दोनों कंगन लिए. राधिका ने भी माथे पर हाथ रख लिए.

'ये लड़की समझ से हे बहार है. पहले तोह दादी अम्मा लग रही थी और अब देखो जैसे पांचवी में पढ़ती हो. मेरा भाई कुछ ठीक होता तोह इसको तोह मैं जाने न देती. चलो देखते है इन Ram-Lakhan को.', राधिका ने इस बार सर पे वो दुपट्टा सही से लिया और खुद हे अर्जुन के कमरे में चली गयी. लाख कोशिशों के बावजूद पायल की chamm-chamm और संजीव को हिलने पर चूड़ियों की छनक से अर्जुन ने भी आँखें खोल कर अपने ऊपर झुकी ये swapan-sundai ुनिनीडी आँखों से देखि.

"भैया.. ाची बात है. आप मत हे उठो. भाभी, आप हे मेरी जगह सो जाओ. मैं चला इस कमरे से.", अर्जुन हिलता डुलता सा बहार वाले दरवाजे से होता हुआ वैसी हे हालत में निचे चला गया और राधिका ये एक और रास्ता देख रही थी ऊपर वाले इस हिस्से में aane-jane का. दरवाजा बंद होते हे संजीव ने फुर्ती से राधिका को कमर से खिंच कर इस तरह अपनी बगल में लिटाया की वो आँखे बड़ी बड़ी करती बस हैरान हे रह गयी.

"मेरा भाई मुझे बता चूका था के तुम आ रही हो और फिर वो चला जायेगा. हो गयी नींद तुम्हारी?"

"ए.. क्या करते हो संजीव? उधर वाले दरवाजे भी खुले है और अर्जुन क्या पता बहार हे खड़ा हो?"

"वो जा चूका है कही और सोने के लिए और उधर का दरवाजा मैंने खुद हे लगाया था तोह चिंता मैट करो. वैसे अभी तक वो खुशबु आ रही है?", संजीव ने थोड़ा कस कर राधिका को अपने सीने से लगाया तोह उसके सख्त बदन में अपना नरम सीना दबता महसूस करके राधिका की साँसे उखाड़ने लगी थी. ये दिन के उजाले में हो रहा था और दो तरफा खुले दरवाजो में. संजीव की कस्ती हुई गिरफ्त और गाल पर तपिश करते होंठो से राधिका आनंदित होने की जगह सदमे में जाने लगी थी. संजीव जैसे ये समझ कर उसको छोड़ हे रहा था की ये आवाज सुनाई पड़ी.

"ओह बेशरम. बहु को रिवाज भी करने है थोड़े. तेरा कमरा काम है तोह कोई बात नई ये भी ले ले. दरवाजे लगा ले बीटा और थोड़ा समय का भी ध्यान रख.", ये थी आदरणीय ललिता जी और उनके ऐसे तंज से संजीव तोह बिस्टेर छोड़ उस तरफ हे भाग खड़ा हुआ जहा अर्जुन गया था. पीछे रह गयी तोह सिमटी हुई सर झुकाये बिस्टेर पर बैठी राधिका. ललिता जी हॉल कमरे का दरवाजा ढाल कर मुस्कुराती हुई अपनी बहु की बगल में आ बैठी.

"अरे मेरी बची तू तोह ऐसे घबरा रही है जैसे खून कर दिया हो? हाहाहा.. देखा कैसे डूम दबा के भगा तेरा खसम? मैंने आवाज इसलिए की जिस से तुम सजग हो जाओ. तुम्हारी nanad-saas अभी कुछ समय में जाने वाली है और उनसे तुम्हे मिलना भी होगा. रही बात तुम्हारे इस tota-maina वाले खेल की तोह जितना दिल करे उतना खेलो, बस दरवाजे लगा लिया करो. हो तुम सचमुच बहोत प्यारी मेरी बची.. बिलकुल किसी फिल्मी गुड़िया जैसी.", ललिता जी ने जिस तरह से अंतिम बात कहते हुए राधिका का चेहरा ऊपर करके दोनों हाथ में लिया और फिर माथा चूमा तोह वो उनके गले जा लगी. शर्म की जगह अब एक आदर और maa-samaan अभिव्यक्ति थी इस पल में. कमरे के बहार दिवार से सत्ता संजीव ये सुन्न कर भगवन को धन्यवाद् कर रहा था के उसकी माँ ने शायद सबकुछ न देख कर इस मामले को उतनी तवज्जो न दी थी और वैसे भी दोनों ने कुछ ऐसा वैसा तोह किया नहीं था.

"आप सचमुच बहोत ाची हो मम्मी जी और मुझे नहीं पता था के आप इतनी ओपन होंगी ऐसी बात पर."

"ओपन की बात करती है बीटा? संजीव के बाद माधुरी और अलका पैदा कर दी मैंने तोह इस से ज्यादा क्या ओपन होउंगी. चल आजा तुझे तैयार करती हु.", ललिता जी राधिका को ले कर उठी हे थी की मधु बुआ के साथ साथ शालिनी भी ऊपर चली आयी.

"तुम्हे एक सास के साथ साथ माँ, भाभी, devarani-jethani, सहेली जैसा सबकुछ सिर्फ ललिता भाभी के रूप में मिल रहा है राधिका. हमारी ये बड़ी भाभी तुम्हे कभी ये एहसास नहीं होने देगी की तुम इनकी बहु हो. हाँ सामाजिक नियम तोह खैर हमारी माँ के हे कण्ट्रोल में है जिसका कोई कुछ नहीं कर सकता लेकिन घर के अंदर तुम्हे हमेषा हक़ है अपनी बात कहने का और विचार रखने का. संजीव सचमुच बहोत किस्मतवाला है जो तुम जैसी बीवी मिली है.", मधु बुआ ने शालिनी के हाथ से वो कपड़ो के बैग ले कर राधिका को उपहार स्वरुप दिए तोह वो झुक कर उनका आशीर्वाद लेने लगी.

"रहने दे बीटा. मधु को अपनी उम्र आज भी 25 लगती है. वैसे मैं भी तुम्हारी बुआ हे लगती हु और नाम है शालिनी सिंह. बेटियां पाँव नहीं छुआ करती और काम से काम इस घर की तोह बिलकुल भी नहीं.", शालिनी ने भी नेग देने के साथ राधिका को गले लगते हुए परिचय दिया था. अब वो तीनो उसको तैयार करके निचे ले जाने लगी थी जहा से विशिष्ट मेहमानो ने भोजन के बाद अब निकलना था.

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"तू रेखा भाभी को एक बार दिखा लाना मार्किट जाते समय भोले. मैं जरा माँ और शालिनी को हवेली छोड़ औ और फिर हम शाम को निकलते है दिल्ली के लिए.", सभी का भोजन होने के बाद ये लोग बैठक में थे और भीतर अभी भी aas-pados के जानकार Radhika-Sanjiv को बधाई देने आये हुए थे. उमेद के कहे अनुसार पूर्णिमा जी ने भी अपनी बहु, बेटी को तयारी के लिए समझा दिया था जो सबकुछ कर चुकी थी अब तक.

"मैं तोह सभी को मार्किट लेके जाना चाहता था यार गज्जू. चची, आप आज हे जाना चाहती हो?", शंकर ने ये बात कहते हुए एक बार अपने पिता को भी देखा जबकि पूर्णिमा जी के चेहरे पर aasha-anuroop हे ममता थी शंकर के लिए.

"बीटा, शादी का घर सिर्फ यही तोह नहीं है? कल Sanjiv-Radhika ने हवेली भी आना है तोह इंतजाम करने होंगे या नहीं? और नियम भी जरुरी है बरक़रार रखने. शालिनी ने परसो वापिस जाना है और Aaisha-Vinita भी थोड़ा सा रस्मे देखे जो आगे उन्हें भी निभानी पड़ेंगी. तू भी कल सीधा वही आएगा इस उमेद के साथ.", रामेश्वर जी ने भी अपनी सहमति जताई थी उनकी बात सुन्न कर.

"हाँ तोह ये सब इतना जल्दी जल्दी हो रहा है न इसलिए मैंने ऐसा कहा. वैसे भी परसो से तोह मुझे भी ड्यूटी लगनी पड़ेगी. पापा, अर्जुन परसो जा रहा है?", शंकर ने जैसे पुख्ता करने के लिए गलत दिन बताया था जिस पर रामेश्वर जी ने अपनी पत्नी की तरफ देखा जो ये सब सुनते हुए भी कृष्णा से कुछ बैग तैयार करवा रही थी उमेद की गाडी में रखवाने के लिए.

"वो कल हे निकल रहा है और तेरे चाचा भी. विनोद तोह कपडे बांध चूका है प्रेमप्रताप के साथ आज शाम हे जाने के लिए. दामिनी और आँचल जा रही रही है लेकिन रौशनी को मैंने कुछ दिन अपने पास हे रखना है. और कुछ डॉक्टर साहब?", कौशल्या जी ने शगुन के मॉटे लिफाफे शालिनी, दामिनी, देवकी और राजेश्वरी को बरी बरी से पकड़ाए जिन्होंने कोई आनाकानी नहीं की. ऐसा को उन्होंने अपनी गॉड में बैठा कर शगुन के साथ साथ सोने का एक हार, जो नीले बक्से में बंद था वो भेंट दिया. वो डब्बे को खोलने के बाद बड़ी हैरानी से अपनी माँ और फिर कौशल्या जी को देखने लगी. शंकर जी तोह बस मुस्कुरा गए थे अपनी माँ के जवाब पर. मुस्कान हे अंदर वाले कमरे से सामान ला कर इधर रख रही थी.

"ये मैंने कैसे ले सकती हु नानी?"

"इसमें कोई कानून थोड़ी न है जो तुम ले नहीं सकती. और अपनी माँ को देखने से कुछ नहीं होने वाला. पूर्णिमा इस बैग को याद से शालिनी के सामान के साथ रख देना. दामाद जी और बाकी घरवालों के उपहार है इसमें. अगली बार आइशा आएगी तोह मैं पूरा वक़्त वही हवेली रहूंगी इसके साथ.", कौशल्या जी ने माथा चूम कर आइशा से स्नेह जताया तोह वो भी गले लग कर मुस्कुराई.

"वैसे मैं इधर हे आ जाउंगी नानी. वह तोह कमरे ज्यादा और लोग काम है. डॉक्टर मां, आप कल आएंगे तोह आपके साथ सभी लोग आएंगे न?", आइशा जो जवाब चाहती थी वो शायद नहीं मिलने वाला था उसको.

"हाँ बीटा. सब लोग आएंगे और अगर तुझे कुछ दिल्ली से भी चाहिए तोह बता मैं लेता आऊंगा मेरी आशु के लिए?", शंकर जी ने भी उतने हे लाड से जवाब दिया जिस पर रामेश्वर जी ने जो कहा सभी की हंसी निकल गयी.

"बरखुरदार, तुम हे पहुंच जाना समय से. इसके लिए वही सबसे बड़ा गिफ्ट होगा. और उमेद, थोड़ा जल्दी करो बीटा तुम लोग. सतीश के मेहमान (अलीशा) ने भी तुम्हारे साथ जाना है. उनकी फ्लाइट 11 बजे की है तोह इसका पूरा ध्यान रखना पड़ेगा.", रामेश्वर जी की बात सुन्न कर शंकर का चेहरा न्यास हे लटक गया. उमेद के कुछ कहने से पहले हे कमरे में दाखिल होते अर्जुन ने 3-4 बैग उठाये और बहार निकल गया. उसको भान था के ये सब कहा रखना है लेकिन कुछ चेहरे निरंतर उसकी ख़ामोशी और अनदेखी को देख रहे थे.

"मैं तोह अर्जुन को मार्किट ले जाने वाला था पापा. कल ये जा रहा है तोह सोचा था के उसको कपडे दिलवा दूंगा और रेखा को भी एक बार दिखवा दूंगा. राजेश और दलीप ने भी फिर निकलना था घर वापिस."

"तुम्हारी माँ जा रही है तुम्हारे साथ. रेखा बहु के साथ रेणुका बिटिया को भी कुछ जांच की आवशयकता है. अर्जुन कही विदेश नहीं जा रहा शंकर और पहले भी तुम उसके लिए कपडे लाते रहे हो. तुम्हे जो पसंद हो, वही लेना.", रामेश्वर जी ने जो भी कहा था उसका जवाब शंकर ने सिर्फ सर हिला कर हाँ में दिया.

"विनि बीटा, अपनी चची को देखो जरा. और कोमल को बोल देना के वो लोग भी तैयार हो कर साथ हे आ जाये.", शंकर जी ने अर्जुन को दूसरा चक्कर लगते देखा तोह बस उसकी पीठ हलके से थपथपा दी जिस पर वो उतने हे विश्वास से मुस्कुराया.

"कुछ भी कह शंकर, तू सचमुच एक बेहतरीन पिता है. Rok-tok सभी करते है लेकिन तुझमे जो ख़ास बात है वो मैंने बहोत काम देखि है. तू बचो पर मर्जी नहीं डालता.", पूर्णिमा जी ने अपनी जगह से उठ कर लड्डू का एक टुकड़ा शंकर के मुँह में डालने का प्रयास किया तोह वो टुकड़ा शंकर ने खुद हे उन्हें खिला दिया.

"चची, मेरा न इन टुकड़ो से कुछ नहीं बनता. पूरा हे लड्डू एक बार में खाये बिना तोह ये न पता चलता के वो बूंदी का था के बेसन का. और रही बात बचो की तोह, इनके सपने रंगने वाला मैं कोई चित्रकार नहीं. ये खुद उन्हें अपने रंगो में साकार करे तोह हे बेहतर है. बाकी मैं ाचा पिता हु या नहीं ये तोह समय हे बताएगा. फ़िलहाल तोह मैंने पापा को हे कई बार कहते सुना है की वो कोशिश करते है आजतक.", शंकर के जवाब पर पंडित जी को ठसका लगा तोह बाकी सभी हंस दिए. अशोक जी का भी परिवार आ चूका था अब और इनके साथ साथ उन सभी से भी पंडित जी का परिवार पूरे riti-riwaaj से मुलाकात करने लगा. राधिका संजीव को बुलाया गया और उन्हें आशीर्वाद देने के साथ हे ये 2 प्रमुख परिवार अपने अपने वाहन लिए इधर से निकल चले. कहा तोह मधु ने आज रुकने का विचार बनाया था और कहा सब एकदम हुआ की वो इस बारे में कुछ कर हे न सकीय. अगले आधे घंटे में तोह यहाँ रिश्तेदारों के नाम पर सिर्फ कृष्णेश्वर जी का परिवार हे बचा था.

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"हाँ तोह laat-sahab, अब बताओ के आपके सवाल क्या है और जो be-waqti ख़ामोशी धारण की हुई है इसकी वजह?", बैठक के दीवान पर पंडित जी सर के निचे गोल तकिया लगाए लेते थे और उनके पाँव की तरफ बैठा अर्जुन दोनों हाथो से अपने दादा जी की पिंडलियों की मालिश करता हुआ जैसे कुछ सुकून पंहुचा रहा हो. अभी तक log-baag भीतर Sanjiv-Radhika को देखने आ रहे थे और ललिता जी के साथ घर की बच्चियां भी इस देख रेख में लगी थी. कौशल्या जी को भी उधर हे हाजिर रहना था घर की प्रमुख होने के नाते. बैठक में दरवाजे भिड़ा कर पर dada-paute के बीच हे ये ख़ास समय आरक्षित हो गया था जैसे.

"सवाल तोह क्या हे होंगे दादा जी जब मैं कुछ जानता हे नहीं वह के बारे में.? जो भी सुना है या पता है वो सब आपकी बातों या फिर दीदी या दादी जी के वह जा कर आने के बाद बताये वृत्तांत से हे पता है. और मैं खामोश नहीं हु बौ जी, बस दुविधा में हु.", अर्जुन ने कटोरी में रखे तेल से अपनी हथेली को भिगोने के बाद इस बार अपने दादा जी के सख्त तलवो को घिसना शुरू किया. बनियान पहनी होने की वजह से उसकी वो बेजोड़ मासपेशिया खासी उभर रही थी म्हणत की वजह से. पंडित जी का शरीर कोई फूल तोह न था. ज़माने भर को कानून सिखाते सिखाते वो बूढा जिस्म भी अयस्क (मेटल) बराबर मजबूत था और हथेली से तलवो के बीच रगड़ वही ऊर्जा पैदा कर रही थी जैसा अक्सर 2 धातु घिसने पर होता है.

"दुविधा यही की इस बूढ़े की देखभाल कौन करेगा तेरे जाने के बाद? या तेरे बगीचे को पानी मिलेगा भी या नहीं? मेरी हर चीज के लिए तुझे आवाज लगाने पर कौन जवाब देगा इस बात से चिंतित है? अपनों से दूर तू एक नयी जगह जा रहा है जो असलियत में इस घर की नीव रखे जाने से भी बरसो पहले तक हमारा असली घर रही है. अब तोह मैं भी चाहता हु न बीटा के तुम उधर जरूर जाओ. हाँ एक महीने के लिए जा रहे हो तोह कमी तोह जरूर खलेगी.", रामेश्वर जी ने सिरहाने के पास से छोटा टोलिया अर्जुन की तरफ बढ़ाया तोह उसने अपने दोनों हाथ उस कपडे से साफ़ करने के बाद अपने दादा जी के तलवो से भी अतिरिक्त तेल पूछा. फिर से वो घुटनो तक उनके पाँव दबाने लगा लेकिन थोड़े नरम हाथो से.

"आप बूढ़े नहीं हो और आजकल तोह आप आवाज लगते भी नहीं. हाँ मैं थोड़ा बहोत वही सोच रहा था लेकिन दादा जी, क्या वह मुझे कोई परेशानी होने वाली है? मतलब सभी तोह जाते रहते है पंजाब. यहाँ तक की रुपाली दीदी भी हो आयी लेकिन मेरी बारी में मैंने देखा की दादी भी थोड़ा चिंतित थी. मैं गलत कर रहा हु क्या वह जा कर?", अर्जुन के सवाल सुन्न कर रामेश्वर जी ने कमर सीधी कर ली. थोड़ा सा तक लगा कर बैठते हुए उन्होंने हाथ के इशारे से उसको रुकने को कहा तोह अर्जुन आगे खिसक गया. अब वो हलके हाथो से अपने दादा जी ब्याह दबाने लगा था.

"तुम्हारी दादी इसलिए चिंतित नहीं थी की तुम्हे वह कोई खतरा होगा. और बाकी सभी तुम्हारे बारे में एक राये रखते है इसलिए तुम्हे कभी वह नहीं जाने दिया. बीटा, खतरा तुम्हे नहीं है और वो पुश्तैनी घर है हमारा. वह जब किसी को ये पता लगेगा के तुम स्वर्गीय मोतीलाल जी के padd-paute हो तोह वो चाहे तुम्हारे पिता की उम्र का हो या मेरी, तुम्हे सर आँखों पर बैठा लेगा. और जितना log-baag से सुना है, तुम दीखते भी कुछ हमारे पिता की तरह हो.", रामेश्वर जी के कथन से अर्जुन कुछ झेंप सा गया लेकिन फिर संयत हो कर वो बोलै.

"तोह जब वह किसी से खतरा नहीं है तोह नाहक हे सभी इतनी चिंता करते है?"

"हाहाहा.. खतरा तुम खुद हो बरखुरदार. ाचा चलो ये बताओ के घर में तुम सबसे करीब किसके को? ऐसा नहीं है के मैं कोई तर्क दे रहा हु, बस फिर भी हर व्यक्ति किसी न किसी के तोह कुछ ज्यादा हे करीब होता है. जिसको सबकुछ पता होता है हमारे बारे में और जिसके साथ लगभग हर बात साँझा होती है.", पंडित जी ने तोह अर्जुन को हे धर्मसंकट में दाल दिया था इस सवाल से. वो तोह अर्जुन को हे खतरा बता रहे थे और अब एक नाम सुझाने पर वो और भी सोच में डूब गया.

"मैं तोह सभी के साथ स्वाभाविक हर बात कर लेता हु दादा जी. और जैसा आप कह रहे है तोह मेरे बारे में आप, दादी, माँ, कोमल दीदी, संजीव भैया सबकुछ जानते हे है.", यहाँ वो ऋतू का नाम लेने से जाने क्यों कटरा रहा था. रामेश्वर जी ने एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ जैसे अर्जुन के दिमाग को हे पढ़ लिया था पर ठहर कर उन्होंने ये सुझाव दिया.

"ऐसा करना के तुम जरा ऋतू या अपने पिता से पूछना के वो तुम्हारे बारे में क्या सोचते है. वो अगर इस बात को न समझे तोह बस उनसे अपने बारे में राये लेना. और उनसे पहले जरा मेरी भी सुन्न लो.", इन 2 नामो में एक तोह वो थी जिसको अर्जुन की धड़कन तक का पता रहता था और दूसरा व्यक्ति जैसे कुछ जानता हे नहीं था अर्जुन की सोच के मुताबिक.

"हाँ तोह आप बताइये.", अर्जुन ने संक्षेप सा जवाब दिए.

"तुम्हारा किरदार इस घर के हर सदस्य से कुछ ज्यादा हे भिन्न है बीटा. बचपन से हे या पैदाइशी हे समझ लो. गुण है या अवगुण ये तोह ऊपरवाला हे जानता है लेकिन तुम कभी भी एकमत नहीं रहते. संस्कार अपनी जगह है और उस वजह से तोह हमे तुम पर हमेशा हे नाज रहा है. मेहनती भी हो और लगन के पक्के भी. लेकिन तुम विरोधाभासी, अंतर्मुखी और gehan-tark रखने वाले विषम व्यक्ति हो जिसको मुसीबत खुद हे ढून्ढ लेती है. तुम्हे अकेला छोड़ना मतलब ऐसा है जैसे किसी अत्यधिक ऊर्जावान पशु को बिना प्रयोजन खुला छोड़ देना. ऐसे पशु को जब कोई काम नहीं मिलता तोह वो खुद हे काम ढून्ढ लेता है. फिर चाहे वह काम मुसीबत हे क्यों न बढ़ा दे. दिल से तुम संवेदनशील भी हो और भावुक भी. अगर वो प्यार का स्पर्श तुम्हे समय से न मिले तोह एक अंजना डर खुद अभिभावक को लगा रहता. इन बूढी आँखों ने ज़माने का ऐसा कोई दर्द नहीं जो न देखा हो अर्जुन लेकिन एक तुम हे हो जिसने इस घर के हर सदस्य की आँखों में नमी पैदा की है और वो हर शक्श बस यही दुआ करता है की तुम हमेशा इस चाव में महफूज रहो.", अपने दादा की बात सुन्न कर अर्जुन के चलते हाथ एकाएक हे रुक गए. वो एक पल में हे भावशून्य सा हो गया. बोर्डिंग जाते हुए घर के बहार कोमल, माधुरी दीदी की नम्म आँखें. ऋतू का सबसे दूर हो कर आंसू बहाना. उसकी माँ का वो मूक रुदन जब वो घर वापिस आया था. संजीव भैया का उस से लिपट कर हॉस्पिटल में रोना और खुद उसकी दादी.. उसने अपनी दादी को सिर्फ 2 वक़्त हे कमजोर देखा था. घर में कोई मजबूत शक्श था तोह वो उसके चाचा, पापा और दादा जी हे तोह थे.

"हाँ ये बात तोह भाई साहब ने 16 आने सही कही. मैंने इनकी आँखों में उस वक़्त भी कोई नमी न देखि थी जब तेरा बाप अचेत था या खुद इनके गोली लगी थी. तुम्हारे हॉस्पिटल में भर्ती होने पर जरूर ये ठन्डे पड़े थे और रोये भी. शंकर.. वो नीरा निर्दयी डॉक्टर है बीटा और आंसू क्या बाला है ये तोह जैसे उसको और इन्दर को पता भी नहीं लेकिन जब तेरी धड़कन चलती महसूस हुई थी न उन दोनों को तोह वो भी रोये थे. हैरानी की बात है और वो कभी इस बात पर सहमत नहीं होंगे लेकिन ये सच है. उस रात रेखा तोह बेहोश थी और हम सब दूर लेकिन शंकर ने पूरी रात 5 सेर का वो मुन्ना अपने छाती पर हे सहेज कर रखा जबतक मैं न पहुंच गया भाभी को साथ लिए. सजा तोह फिर भी दी मैंने उन दोनों को क्योंकि कही न कही उनकी हे गलती भी थी लेकिन तभी एक बात साबित हो गयी थी की तुम्हे अकेला नहीं छोड़ा जा सकता.", छोल पूरी ने अंदर आने पर जैसे इनकी थोड़ी बहोत चर्चा सुन्न ली थी और अपने धरम भाई की बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने जो बताया वो अर्जुन के लिए भी नया था. रामेश्वर जी निम्बू पानी का घूंट लेने के बाद गिलास एक तरफ रख कर बस मुस्कुरा रहे थे. इस मुस्कराहट के क्या मायने थे ये तोह बस उन्हें हे पता था.

"लेकिन मैं अब ऐसा कुछ नहीं करने वाला छोटे दादू की जिस से किसी को कोई परेशानी हो. मैं तोह ये भी सोच चूका हु की अपने सवाल जवाब भी सिमित राखु और जितना हो सके परिवार में राहु. पंजाब जाने के पीछे और ढेरो वजह है और ये समय भी सही लगा मुझे क्योंकि सबकी कुछ और प्राथमिकताएं भी है haal-filhal में."

"बीटा तू परेशां नहीं करता और सच कहु तोह हम लोग हे कुछ ज्यादा चिंता करते है. सवाल जवाब जरुरी है और तू किया कर जबतक सामने वाला सहज लगे. लेकिन तू है तोह मुन्ना हे और ये तू इंकार नहीं कर सकता. तेरा बाप 5 कक्षा में जीप लेके भाग गया था. उमेद की टांग आठवीं तक 3 बार टूट चुकी थी और इन्दर ने तोह उस समय तक 2 बार तेरे दादा जी से हवालात में पत्ते भी खा लिए थे. संजीव.. संजीव भी अपने चाचा जैसा हे था जबतक रेखा बहु ने उसके बास्ते को नहीं थमा. लेकिन तू.. तू आजतक अपनी बहिन का खिलौना, माँ का मुन्ना और इनका वही पौता है जिसको नंगा करके ये तेल मालिश करके फर्श पर अपने पास लिटाये रखते थे. मैं भाई साहब के साथ उस वक़्त से hum-kadam हु जब इस वर्तमान परिवार की नीव भी नहीं राखी गयी थी. 50 बरस लगभग होने को आये होंगे पर इन्होने कभी कोई चाहत न राखी और इनकी चाहत बानी भी तोह वो तुम्हारे रूप में इनके करीब हे है.", छोल साहब ने जितनी तफ्सील से हर बात कही थी, वो सुन्न कर अर्जुन जैसे दांग हे रह गया. रामेश्वर जी जैसे इशारे से उन्हें आगे कुछ बताने से रोकना चाहते थे लेकिन छोल साहब ने भी उन्हें आश्वस्त सा कर दिया.

"आप सबकुछ जानते है फिर तोह? और आप तोह फ़ौज में थे जहा तक मुझे याद है. मेरे सामने हे तोह आपकी वो काली कार आती थी हर रोज शाम में या रात को. आप कब रहे दादा जी के साथ?"

"तुम फ़िलहाल तोह मुद्दे से हे भटक रहे हो बीटा लेकिन कोई बात नहीं. यहाँ तुम पंजाब जाने वाली बात पर चर्चा कर रहे थे और तुमने शायद सही सवाल अभी तक नहीं किया. क्यों तुम्हे वह पहले जाने नहीं दिया गया?", अर्जुन ने अब हामी भरी.

"तुम्हारे लिए पंडित रामेश्वर शर्मा के क्या मायने है अर्जुन?", पहली बार जैसे छोल साहब ने अपने बड़े भाई साहब का नाम लिया था लेकिन इस सवाल में जो गंभीरता थी उसको सुन्न कर अर्जुन के शरीर में सार्ड झुरझुरी सी दौड़ गयी. आज उस से पुछा जा रहा था उस व्यक्ति के बारे में जिसके लिए अर्जुन अपना सर्वस्व त्याग सकता था, सिर्फ कहने की देर थी.

"मेरे भगवन है ये छोटे दादू. अर्जुन शर्मा को कभी मंदिर जाने की जरुरत नहीं हुई क्योंकि मैं अपने भगवन के साये में रहा हु और आज भी मुझे कोई परेशानी महसूस नहीं होती क्योंकि दादा जी होने हे नहीं देते. 'गुरु गोबिंद दोउ खड़े, काके लागू पाए... बलिहारी गुरु आपने गोबिंद दियो मिलाये..'. ये मुहावरा भी अतिश्योक्ति लगेगा क्योंकि मेरे शिक्षक भी यही है. मैंने सिर्फ अपने हे साथ इनका अलग व्यक्तित्व महसूस किया है जैसा किसी और के साथ कदापि नहीं देखा. कब वो छोटे छोटे char-bhar के खेल गहरी शतरंज में बदल कर इन्होने मुझे जीवन के जटिल से जटिल रस्ते समझा दिए? कैसे एक गुस्सैल से लड़के को aatmgyaan-buddhi के साथ साथ असीम कौशल प्रदान किया? वो सब भी अगर काम नहीं तोह आप हे देखे की मैं एक bhavna-prakhar इंसान बना सिर्फ इनकी हे कठोर म्हणत और आदर्शो से. इंसान तोह वनवास में अपने मोक्ष पर केंद्रित रहता है लेकिन दादा जी ने तोह यहाँ भी तपस्या मुझ पर हे कर दी. मुझे सभी से एकसार प्रेम है छोटे दादू और ये आपके लिए भी सामान हे है लेकिन बौ जी और माँ के त्याग के समकक्ष कोई नहीं. यकीन मानिये मैं इस से ज्यादा खुल कर भी बयान कर सकता हु लेकिन शब्द फिर भी सही सही न्याय नहीं कर पाएंगे की मेरा जीवन है तोह उसकी वजह बस दादा जी हे है.", अर्जुन अपनी रौ में बेहटा हुआ गंभीर लफ्ज़ो से जो शुरू हुआ तोह आखिर में जुबान अटकने हे लगी थी. शब्द लड़खड़ाने लगे तोह रामेश्वर जी ने हे उसको सहलाते हुए थोड़ा धनदास बंधाया.

"सब जानता है ये तेरा छोटा दादा लेकिन छोल रहा है न तोह आदत नहीं जाती. मैं ाचे से जानता हु अपनी परवरिश को बीटा और तू भी तोह बराबर खेलने लगा है मेरे साथ. मेरे हे मोहरो से तू बाकी सबको उलझता रहा और फिर मुझे हे फांस लिया. तभी मुझे यकीन हो गया था के मेरा दिल क्यों तुझे हे सबसे ज्यादा महसूस करता है. सतीश, ये एक छोटे से सबूत के साथ जब खोजबीन करता निकला तोह न इसने सिर्फ चारो परिवार खंगाल दिए. बल्कि उनकी हर एक तेह खोल कर वह तक पहुंच गया जहा तक तुम्हारी भाभी भी नहीं जान पायी. अब हमारे lallu-lal को लगा की खेल कुछ ज्यादा हे पेचीदा हो गया है तोह कदम पीछे ले जाना हे बेहतर होगा. और एक सही राजा हमेशा ऐसा हे करेगा. खैर अब तुम चाहो तोह अपने छोल दादा जी से भी सवाल पूछ सकते हो. और तुम्हारा जैसा दिल करे तुम वैसे रहना वह पंजाब जा कर.", रामेश्वर जी ने पीठ थपथपाने के बाद उठ कर अलमारी का दरवाजा खोला और कुछ ढूंढ़ने लगे. छोल साहब भी अब तन्मयता से मुस्कुरा रहे थे अर्जुन को निहारते हुए.

"आप जानते है सबकुछ?"

"बस परख रहा था बीटा और जवाब तोह मुझे भी पहले से हे पता था. बस भाभी जी थोड़ा डर्टी है क्योंकि उनके तीनो बेटे तोह पहले हे दुनियादारी में हे लगे रहे जैसे बचपन से हे उन्हें वो सब करना था जो आज भी करते रहते है. बहु और paute-pautiyon का सुख मिला लेकिन तुम में उन्हें फिर से एक बेटे जैसा हे सुख मिला. वो हमेशा हे चाहती है के तुम ठीक अपने दादा जी जैसे बनो.. नहीं.. इन जैसे नहीं बल्कि हमारे ताऊजी स्वर्गीय मोतीलाल जी जैसे. पर फिर उन्हें ये भी दर रहता है के कही तुम्हे नजर न लग जाए, कोई तुम्हे कुछ कर न दे.. कही तुम बदल न जाओ किसी घटना से .. और जाने कितनी सेंकडो तरह की सोच चलती रहती है. लेकिन इंसान सब तरह के समय और दौर से गुजरने के बाद ऐसा तोह सोच हे सकता है. खैर.. क्या तुमने देखा भी था अपने पड़ दादा जी को या उनकी तस्वीर को?", छोल साहब के कहने के बाद हे पंडित जी ने वो shwet-shyaam से तस्वीर अर्जुन के हाथो में रख दी. इस घर में स्वर्गीय रघुवीर सिंह जी की बड़ी सी तस्वीर तोह यही बैठक में लगी थी लेकिन अजीब बात थी की पंडित जी के पिता जी की एक भी तस्वीर न थी कही और जो थी वो अभी अभी अर्जुन के हाथो में खुद पंडित जी ने हे राखी थी. अर्जुन अपलक उस चित्र को निहारता रहा.

"इसका नाम था अमावस और नेसल से बखारवाल. पिता जी जहा भी जाते थे ये हमेशा हे उनके साथ साथ रहता था. माँ ने हे इसको अमावस नाम दिया था क्योंकि पिता जी के घर आने के बाद भी ये किसी को उनके पास ज्यादा रहने नहीं देता था. देख रहे हो यहाँ भी ये कैसे पंजा उठा रहा है? जो फोटो ले रहा था, अमावस उसको दूर कर रहा था.", अर्जुन तोह उस झबरैले बड़े से कुत्ते को अनदेखा करके बस जैसे खुदको हे देख रहा था उस तस्वीर में. शायद वो व्यक्ति अर्जुन से भी अधिक दिलकश और प्रभावी था. चूड़ीदार पजामा और जिस्म पर कैसा हुआ kurta-jacket. गले में सच्चे मोतियों की माला और ठीक कंठ से निचे दीखता रुद्राक्ष. ललाट को कुछ ढके वो खूबसूरत सी पगड़ी उस व्यक्ति की आभा में इजाफा हे कर रही थी. चेहरे में कुछ फरक था तोह वो थी मूछे और गाल तक लम्बी कतार जैसी कलम. वो भालू जैसा कुत्ता हे जैसे उस मोहक मुस्कान की वजह था जो इस तस्वीर पंडित मोतीलाल जी के चेहरे पर आयी हुई थी. और इस मुस्कान की हे वजह से शायद रामेश्वर जी के लिए ये तस्वीर अनमोल थी जिसको वो कभी साँझा नहीं करते थे.

"मैं तोह बिलकुल इनके हे जैसा हु. वो दरवाजा कोई 8 फ़ीट ऊँचा होगा.. ये शायद मुझसे भी लम्बे थे और तगड़े भी.. पापा आपके जैसे लगते है दादा जी और मैं पापा जैसा सिर्फ बालो और आँखों से.. बल्कि ये तोह..."

"पीढ़ी दर पीढ़ी कोई न कोई तोह किसी से मिलता हे है बीटा. हाँ तुम बिलकुल पिता जी जैसे दीखते हो और कद भी सामान हे होगा. जैसे जैसे तुम बड़े हो रहे थे, तुम्हारी दादी को यही चिंता सत्ता रही थी और अब तोह वो डरने भी लगी है के कही अतीत से कोई निकल कर न आ जाए इस चेहरे की वजह से.. हाहाहा..", रामेश्वर जी ने हँसते हुए दिल को बाहरी तौर पर हल्का दिखाना चाहा था और अर्जुन अभी भी उस फोटो पर हाथ फिरता हुआ जैसे कुछ महसूस करने में लगा रहा.

"इनका देहांत कब हुआ था?"

"बहोत पहले.. विनोद को भी नहीं देख पाए थे पिता जी. माँ इनके एक साल बाद हे चल बसी थी.", रामेश्वर जी ने वो तस्वीर हाथ में ले कर जैसे अतीत को याद किया तोह छोल साहब ने उनका हाथ थाम लिया.

"तुम जा रहे हो तोह ऐसे जाओ जैसे कुछ जानते हे नहीं अर्जुन. तभी तोह मजा आएगा तुम्हे भी जानकारी लेने में. लोगो से मिलोगे, उनसे बातें करोगे और वो तुम्हे खुद बताएँगे की तुम्हे हर बात. पहली मुलाकात तोह तुम्हारी करवा हे दी है तुम्हारे padd-dada जी से और अब आगे तुम खुद हे उनके बारे में पता करना. बस इतना याद रखना के तुम कौन हो.", छोल साहब के इतना कहने के साथ हे दरवाजे पर दस्तक हुई तोह पंडित जी ने वो तस्वीर फिर से वही छुपा दी जहा से निकली थी. शायद ताले में राखी थी उन्होंने वो और दवाजा खुलने पर नजर आयी प्रीती.

"बीटा, मैं बस आ हे रहा था. तुम लोग क्या अभी निकलने वाले हो?", छोल साहब ने भांग हुई महफ़िल में जैसे हे ये कहा तोह प्रीती ने ना में गर्दन हिला दी.

"दादू मैं तोह अर्जुन को बुलाने आयी थी. चंडीगढ़ तोह हम कल जा रहे है.", प्रीती के जवाब पर छोल साहब ने एक गहरी सांस भरी और प्रीती के करीब से हे उसको आशीर्वाद देते हुए शास्त्री जी चले आये. अर्जुन उनके गले मिल कर जल्दी आने का बोलता हुआ प्रीती के साथ हे बहार चल दिया

"शायद हम इस महफ़िल में जरा जल्दी तोह नहीं आ गए भाई साहब?"

"शास्त्री जी, महफ़िल शुरू हुए कुछ देर हो गयी है. लेकिन आप सही समय आये हो क्योंकि चाय बानी नहीं अभी.", छोल साहब ने हाथ मिला कर हँसते हुए कहा था और रामेश्वर जी भी ऐसा करके अब सोफे पर आ बैठे उनके बगल में.

"चाय तोह मिलने भी नहीं वाली भाई. हाँ निम्बू पानी जरूर अभी हाजिर हो जायेगा. वैसे मैं फ़ोन करने हे वाला था आपको शास्त्री जी.", रामेश्वर जी ने तकिये के निचे से निकली हुई फाइल उनके सामने हे रख दी.

"ये क्या है पंडित जी?"

"राज्यवर्धन की कुंडली और उसमे बैठे grah-nakshatra. हम वादा नहीं भूले भाई और देख लो ब्याह के अगले हे दिन हाजिर है आपके सामने.", पंडित जी की बात सुन्न कर शास्त्री जी कभी फाइल देखते तोह कभी उनका चेहरा.

"हैरान मैट होइए भाई साहब. परिवार में हमेशा एक दूसरे का हाथ पकड़ कर हे रहा जाता है.", छोल साहब ने एक और पन्ना उनकी तरफ बढ़ा दिया जिस पर जैसे फ़ौज की कुछ मोहर लगी थी.

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"हम कहा जा रहे है?", अर्जुन प्रीती के पीछे पीछे बहार आया तोह गली में लगे शामियाने अभी उतारे जा रहे थे. असगर जैसे कुछ समय बाद हे निकलने वाला था. प्रीती के घर के बहार उसकी स्कूटी पहले से कड़ी थी जिसके करीब आ कर वो दोनों हे रुक चुके थे.

"मुझे न कोई परेशां कर रहा है.", प्रीती ने स्कूटी में चाबी लगाईं हे थी की अर्जुन उस से पहले स्कूटी का हैंडल पकड़ कर जा बैठा.

"उसकी तोह.. तुम बैठो और देखो मैं क्या करता हु उसका हाल."

"वही तोह करने वाली हु मैं.. तुम्हारा हाल हे बिगड़ना है मिस्टर और अब चुपचाप स्कूटी घुमा कर मंजू के घर की तरफ चलो नहीं तोह अंजाम बहोत बुरा होने वाला है. ऐसे तोह काबू आ नहीं रहे थे तोह फिर यही रास्ता ठीक.", प्रीती ने हे पीछे से हाथ हैंडल पर रखते हुए रेस बधाई तोह अर्जुन मैं हे मैं खुश होता हुआ उस तरफ बढ़ चला जहा प्रीती उसको ले जाना चाहती थी.

"तुम्हे अब घरवालों का भी दररर नहीं..?"

"भाड़ में जाए सब.. बहोत हो गया और अब तुम देखो मैं तुमसे कितने बदले लेने वाली हु.", प्रीती का वही पुराण अंदाज और उसके कठोर उभारो का ये मनचाहा दबाव पीठ पर महसूस करते हे अर्जुन जैसे एक बार फिर से हार गया था उसके सामने. शायद वो भी ये हिम्मत न कर पता लेकिन प्रीती आखिर प्रीती थी. अपने प्यार को नकेल दाल वो खुद हे उस घर की तरफ चल पड़ी जो फ़िलहाल खामोश था, ताले से बंद.
 
एक भाई ने राणा का जीकर किया था. और मैं बता चूका हु की आगे तीसरे अध्याय में कहानी रामेश्वर जी और शंकर के जीवनकाल में भी जायेगी. वह वीर सिंह राणा जरूर होगा.
 
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