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पहली मुलाकात
"भाभी, आप? मुझे हे आवाज लगा देती, आप क्यों आयी?", राधिका कुनमुनाती हुई सी उठी तोह बिस्टेर पर सिर्फ खुद को देख कुछ पल अपने हे खयालो में खोयी रही. फिर कमरे का जायजा लेने के बाद एक दिलकश मुस्कान के साथ उठ कर खुद को सही करती हुई कमरे से बहार आयी तोह hall-kamre को भी अंदर से बंद पाया. अर्जुन की तरफ न जा कर उसने वो किवाड़ खोला तोह सामने हे छोटे आँगन में ऋतू और प्रियंका को साफ़ सफाई करते पाया. वो लोग शायद अपने कमरे साफ़ करवाने के बाद चादरे धुलने के लिए निकाल कर निचे ले जा रही थी. ऋतू ने दरवाजे पर कड़ी अपनी भाभी को देख सामान प्रियंका को थमाया और खुद राधिका की तरफ चली आयी. इस उजाले में राधिका का स्वरुप किसी स्वर्णिम मृगया सा प्रज्वलित था, श्रृंगार और ख़ूबसूरती के साथ साथ.
"आवाज लगा देना सही रहता क्या? वैसे भी मुझे आये देर हे कितनी हुई है जो आवाज लगाने लागु? तुम आराम करने की जगह अभी भी काम में लगी हो?", राधिका को लिए ऋतू वापिस हॉल कमरे में हे चली आयी. एक चालू करने के साथ उसने टेबल से बोतल उठा कर एक गिलास पानी का राधिका की तरफ बढ़ाया और मुस्कुराते हुए जवाब दिया.
"मैं शायद आपसे ज्यादा हे सोई होंगी भाभी. वो तोह बस अब हम लोग हमारे कमरे ठीक कर रही थी जिस से हम और आराम कर सके. हाहाहा.. वैसे आपको शायद ठीक से नींद नहीं आयी होगी, पहला दिन है आपका इस घर में.", राधिका ने सुर्ख होंठो से उस कांच के गिलास से पानी पिया तोह कुछ लाली वह भी जम्म गयी. काजल लगी बड़ी बड़ी आँखों में ख़ास चमक थी राधिका के जैसे वो इस घर में अभी से खुश हो बस चेहरे पर कुछ अलग सी पशोपेश.
"नींद तोह सचमुच गहरी हे आयी थी यार लेकिन ये कपडे कुछ ज्यादा हे भरी है. वैसे तुम्हे नाम से बुला सकती हु न? या नानन्द जी कहना पड़ेगा?", राधिका को ऐसे बोलते देख ऋतू ने उसका वो मेहँदी रचा खूबसूरत हाथ थाम लिया. बेहतरीन तराशे हुए नख, लम्बी बारीक माँ सी उँगलियाँ जो कुछ ठोस थी लेकिन नरम एहसास.
"आप मुझे हमेशा नाम से हे बुलाना. और यहाँ पर जैसे सब एक दूसरे को बुलाते है आपको भी वही करना है. दादी को दादी, दादा जी को दादा जी या बौ जी या बड़े पापा भी कह देंगी तोह वो खुश हे होंगे. विन्नी दीदी शायद आपकी उम्र की है तोह मुझे नहीं लगता के वो आपको जी कहेंगी. खैर जरुरी भी नहीं ऐसा लेकिन ये जान लीजिये के आप इस घर के एकमात्र pautra-vadhu है तोह सभी आपके आगे पीछे रहने वाले है. वैसे कपड़ो के बारे में मैं क्या बोल सकती हु? कमरे में आपका जो दिल करे वो पहन लिया कीजिये लेकिन दादी कुछ दिन जरूर आपको दुल्हन जैसे हे बनाये रखेगी.", ऋतू की ऐसी साफ़ बातें देख राधिका मंद मंद खुश हो रही थी और जैसे वो कुछ कहना चाहती थी लेकिन कुछ याद करके उसने खुद को रोक लिया ऐसा करने से.
"वैसे ये तुम्हारे भैया किधर निकल गए? ये कमरा तोह मैंने हे खोला था अभी और वो मेरे कमरे में भी नहीं थे जब मैं उठी.", राधिका की बात सुन्न कर अब ऋतू ने हँसते हुए अपने सर पे हाथ रख लिया. उसकी ये जीवंत मुस्कान जैसे राधिका को भी सम्मोहित कर गयी जो एकटक बस उन सफ़ेद एकसार तराशे हुए दांतो और प्राकृतिक सुर्ख होंठो को देखती रही, जिनका भराव अलौकिक सा था.
"कुछ लोगो को आदत बदलनी पड़ेंगी अब लेकिन ये कोशिश भी आपको हे करनी पड़ेगी. आइये जरा मेरे साथ.", ऋतू ने सां दुरुस्त करते हुए अपनी भाभी को हाथ पकड़ कर उठाया और सीधा अर्जुन के कमरे को खोल वह दाखिल हो गयी. उस ast-vyast से बिस्टेर पर अर्जुन के पाँव लम्बाई की वजह से तिरछे जरूर थे पर वो किसी छोटे बचे की तरह अपने बड़े भाई के सीने में मुँह दबाये चैन से सोया था. संजीव भी पिछले कुछ दिनों की म्हणत से हुई थकान से चूर पायजामे और सफ़ेद बनियान में अपने छोटे भाई के ऊपर एक ब्याह रखे जैसे उसको दुनिया से इस पल में भी बचाये था. इन्हे कोई भान न था के घर में अब बदलाव होने लगे है. संजीव को शायद आगे से अब इस तरह राधिका को हे अपने पहलु में सुलाना होगा लेकिन काम से काम इस वक़्त नहीं. राधिका ने बड़े गौर से ये दृश्य देखा और इस बार वो खुद ऋतू को यहाँ से लिए अपने कमरे में चली आयी, जो पहले सिर्फ संजीव का होता था.
"वाओ. ये दोनों क्या हमेशा हे? मतलब वो बीएड से भी लम्बा है लेकिन तुम्हारे भैया से अभी तक बचे की तरह.. मतलब तुम ये जानती हे होगी?"
"हाँ.. वो इस घर का सबसे छोटा बचा है भाभी और संजीव भैया अगर घर पे होते है तोह अक्सर वो जितना हो सके अर्जुन के हे साथ रहते है. वैसे तोह अर्जुन कल हे गाँव जा रहा है एक महीने के लिए लेकिन मैं उसको कहूँगी की वो अपना सामान हमारी तरफ वाले किसी कमरे में शिफ्ट कर ले.", ऋतू ने जो भी कहा था वो बहोत हे रुक रुक कर और साढ़े हुए शब्दों में कहा था जैसे वो ऐसा कुछ सोच कर हे कह रही हो.
"इधर बैठो तुम और जैसा तुमने थोड़ी देर पहले कहा था न के अब तुम लोगो में सबसे बड़ी मैं हु तोह ये डीडे भी मैं हे करुँगी. नयी भाभी आयी और आते हे देवर को पति से अलग कर दिया.. हँ.. कितना सोचती हो यार तुम bina-wajah.? अर्जुन.. अर्जुन तुम्हारे भैया के लिए इतना ख़ास है की वो शायद उसको मेरे साथ भी साँझा नहीं करना चाहते थे. हाँ एक उपहार की तरह मुझसे मुलाकात भी ऐसे करवाई की मैं हैरान हुए बिना न रह सकीय लेकिन मैंने देखा की संजीव अर्जुन के पास होने पर मुस्कुराते है, बोलते है और खुद को जाहिर भी करते है. रही बात समय बिताने की तोह आगे से अर्जुन पर उनसे पहले मैं हक़ जमा कर रखूंगी. उन्होंने अपने हिस्से का कर लिया अब अर्जुन की भाभी की बारी है. अब जगा दो जरा अपने भैया को और अर्जुन को सोने देना.", राधिका ने बात कहते कहते हे दराज के ऊपर रखा अपना सोने का एक कंगन ऋतू की कलाई में पहना दिया था जिसको वो हैरत से देख रही थी.
"ऐसे क्या देख रही हो? होता तोह ये है की छोटी ननद अपनी भाभी के कमरे में आते हे अपनी मर्जी से एक उपहार लेती है लेकिन तुम मुझे बिलकुल भी ऐसी नहीं लगी जिसको किसी चीज की जरुरत हो. तोह ये मैंने अपनी पसंद से तुम्हे पहना दिया."
'मेरे पास तोह पूरी दुनिया है भाभी, फिर ये एक कंगन उसमे बदलाव करेगा. लेकिन आप सचमुच बहोत प्यारी है.'
"कुछ कहा तुमने?", ऋतू को बस होंठ हिलाते देख राधिका ने अचरज से पुछा.
"आप बहोत प्यारी है भाभी और ये दूसरा कंगन मुझे मजबूरी में लेना पड़ेगा अब. वैसे जगाने आप हे jao.",Ritu में जिस तरह के चंचल बदलाव आये थे राधिका हैरानी से उसको देखने लगी और इतनी हे देर में वो हंसती हुई कमरे से दौड़ गयी, दोनों कंगन लिए. राधिका ने भी माथे पर हाथ रख लिए.
'ये लड़की समझ से हे बहार है. पहले तोह दादी अम्मा लग रही थी और अब देखो जैसे पांचवी में पढ़ती हो. मेरा भाई कुछ ठीक होता तोह इसको तोह मैं जाने न देती. चलो देखते है इन Ram-Lakhan को.', राधिका ने इस बार सर पे वो दुपट्टा सही से लिया और खुद हे अर्जुन के कमरे में चली गयी. लाख कोशिशों के बावजूद पायल की chamm-chamm और संजीव को हिलने पर चूड़ियों की छनक से अर्जुन ने भी आँखें खोल कर अपने ऊपर झुकी ये swapan-sundai ुनिनीडी आँखों से देखि.
"भैया.. ाची बात है. आप मत हे उठो. भाभी, आप हे मेरी जगह सो जाओ. मैं चला इस कमरे से.", अर्जुन हिलता डुलता सा बहार वाले दरवाजे से होता हुआ वैसी हे हालत में निचे चला गया और राधिका ये एक और रास्ता देख रही थी ऊपर वाले इस हिस्से में aane-jane का. दरवाजा बंद होते हे संजीव ने फुर्ती से राधिका को कमर से खिंच कर इस तरह अपनी बगल में लिटाया की वो आँखे बड़ी बड़ी करती बस हैरान हे रह गयी.
"मेरा भाई मुझे बता चूका था के तुम आ रही हो और फिर वो चला जायेगा. हो गयी नींद तुम्हारी?"
"ए.. क्या करते हो संजीव? उधर वाले दरवाजे भी खुले है और अर्जुन क्या पता बहार हे खड़ा हो?"
"वो जा चूका है कही और सोने के लिए और उधर का दरवाजा मैंने खुद हे लगाया था तोह चिंता मैट करो. वैसे अभी तक वो खुशबु आ रही है?", संजीव ने थोड़ा कस कर राधिका को अपने सीने से लगाया तोह उसके सख्त बदन में अपना नरम सीना दबता महसूस करके राधिका की साँसे उखाड़ने लगी थी. ये दिन के उजाले में हो रहा था और दो तरफा खुले दरवाजो में. संजीव की कस्ती हुई गिरफ्त और गाल पर तपिश करते होंठो से राधिका आनंदित होने की जगह सदमे में जाने लगी थी. संजीव जैसे ये समझ कर उसको छोड़ हे रहा था की ये आवाज सुनाई पड़ी.
"ओह बेशरम. बहु को रिवाज भी करने है थोड़े. तेरा कमरा काम है तोह कोई बात नई ये भी ले ले. दरवाजे लगा ले बीटा और थोड़ा समय का भी ध्यान रख.", ये थी आदरणीय ललिता जी और उनके ऐसे तंज से संजीव तोह बिस्टेर छोड़ उस तरफ हे भाग खड़ा हुआ जहा अर्जुन गया था. पीछे रह गयी तोह सिमटी हुई सर झुकाये बिस्टेर पर बैठी राधिका. ललिता जी हॉल कमरे का दरवाजा ढाल कर मुस्कुराती हुई अपनी बहु की बगल में आ बैठी.
"अरे मेरी बची तू तोह ऐसे घबरा रही है जैसे खून कर दिया हो? हाहाहा.. देखा कैसे डूम दबा के भगा तेरा खसम? मैंने आवाज इसलिए की जिस से तुम सजग हो जाओ. तुम्हारी nanad-saas अभी कुछ समय में जाने वाली है और उनसे तुम्हे मिलना भी होगा. रही बात तुम्हारे इस tota-maina वाले खेल की तोह जितना दिल करे उतना खेलो, बस दरवाजे लगा लिया करो. हो तुम सचमुच बहोत प्यारी मेरी बची.. बिलकुल किसी फिल्मी गुड़िया जैसी.", ललिता जी ने जिस तरह से अंतिम बात कहते हुए राधिका का चेहरा ऊपर करके दोनों हाथ में लिया और फिर माथा चूमा तोह वो उनके गले जा लगी. शर्म की जगह अब एक आदर और maa-samaan अभिव्यक्ति थी इस पल में. कमरे के बहार दिवार से सत्ता संजीव ये सुन्न कर भगवन को धन्यवाद् कर रहा था के उसकी माँ ने शायद सबकुछ न देख कर इस मामले को उतनी तवज्जो न दी थी और वैसे भी दोनों ने कुछ ऐसा वैसा तोह किया नहीं था.
"आप सचमुच बहोत ाची हो मम्मी जी और मुझे नहीं पता था के आप इतनी ओपन होंगी ऐसी बात पर."
"ओपन की बात करती है बीटा? संजीव के बाद माधुरी और अलका पैदा कर दी मैंने तोह इस से ज्यादा क्या ओपन होउंगी. चल आजा तुझे तैयार करती हु.", ललिता जी राधिका को ले कर उठी हे थी की मधु बुआ के साथ साथ शालिनी भी ऊपर चली आयी.
"तुम्हे एक सास के साथ साथ माँ, भाभी, devarani-jethani, सहेली जैसा सबकुछ सिर्फ ललिता भाभी के रूप में मिल रहा है राधिका. हमारी ये बड़ी भाभी तुम्हे कभी ये एहसास नहीं होने देगी की तुम इनकी बहु हो. हाँ सामाजिक नियम तोह खैर हमारी माँ के हे कण्ट्रोल में है जिसका कोई कुछ नहीं कर सकता लेकिन घर के अंदर तुम्हे हमेषा हक़ है अपनी बात कहने का और विचार रखने का. संजीव सचमुच बहोत किस्मतवाला है जो तुम जैसी बीवी मिली है.", मधु बुआ ने शालिनी के हाथ से वो कपड़ो के बैग ले कर राधिका को उपहार स्वरुप दिए तोह वो झुक कर उनका आशीर्वाद लेने लगी.
"रहने दे बीटा. मधु को अपनी उम्र आज भी 25 लगती है. वैसे मैं भी तुम्हारी बुआ हे लगती हु और नाम है शालिनी सिंह. बेटियां पाँव नहीं छुआ करती और काम से काम इस घर की तोह बिलकुल भी नहीं.", शालिनी ने भी नेग देने के साथ राधिका को गले लगते हुए परिचय दिया था. अब वो तीनो उसको तैयार करके निचे ले जाने लगी थी जहा से विशिष्ट मेहमानो ने भोजन के बाद अब निकलना था.
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"तू रेखा भाभी को एक बार दिखा लाना मार्किट जाते समय भोले. मैं जरा माँ और शालिनी को हवेली छोड़ औ और फिर हम शाम को निकलते है दिल्ली के लिए.", सभी का भोजन होने के बाद ये लोग बैठक में थे और भीतर अभी भी aas-pados के जानकार Radhika-Sanjiv को बधाई देने आये हुए थे. उमेद के कहे अनुसार पूर्णिमा जी ने भी अपनी बहु, बेटी को तयारी के लिए समझा दिया था जो सबकुछ कर चुकी थी अब तक.
"मैं तोह सभी को मार्किट लेके जाना चाहता था यार गज्जू. चची, आप आज हे जाना चाहती हो?", शंकर ने ये बात कहते हुए एक बार अपने पिता को भी देखा जबकि पूर्णिमा जी के चेहरे पर aasha-anuroop हे ममता थी शंकर के लिए.
"बीटा, शादी का घर सिर्फ यही तोह नहीं है? कल Sanjiv-Radhika ने हवेली भी आना है तोह इंतजाम करने होंगे या नहीं? और नियम भी जरुरी है बरक़रार रखने. शालिनी ने परसो वापिस जाना है और Aaisha-Vinita भी थोड़ा सा रस्मे देखे जो आगे उन्हें भी निभानी पड़ेंगी. तू भी कल सीधा वही आएगा इस उमेद के साथ.", रामेश्वर जी ने भी अपनी सहमति जताई थी उनकी बात सुन्न कर.
"हाँ तोह ये सब इतना जल्दी जल्दी हो रहा है न इसलिए मैंने ऐसा कहा. वैसे भी परसो से तोह मुझे भी ड्यूटी लगनी पड़ेगी. पापा, अर्जुन परसो जा रहा है?", शंकर ने जैसे पुख्ता करने के लिए गलत दिन बताया था जिस पर रामेश्वर जी ने अपनी पत्नी की तरफ देखा जो ये सब सुनते हुए भी कृष्णा से कुछ बैग तैयार करवा रही थी उमेद की गाडी में रखवाने के लिए.
"वो कल हे निकल रहा है और तेरे चाचा भी. विनोद तोह कपडे बांध चूका है प्रेमप्रताप के साथ आज शाम हे जाने के लिए. दामिनी और आँचल जा रही रही है लेकिन रौशनी को मैंने कुछ दिन अपने पास हे रखना है. और कुछ डॉक्टर साहब?", कौशल्या जी ने शगुन के मॉटे लिफाफे शालिनी, दामिनी, देवकी और राजेश्वरी को बरी बरी से पकड़ाए जिन्होंने कोई आनाकानी नहीं की. ऐसा को उन्होंने अपनी गॉड में बैठा कर शगुन के साथ साथ सोने का एक हार, जो नीले बक्से में बंद था वो भेंट दिया. वो डब्बे को खोलने के बाद बड़ी हैरानी से अपनी माँ और फिर कौशल्या जी को देखने लगी. शंकर जी तोह बस मुस्कुरा गए थे अपनी माँ के जवाब पर. मुस्कान हे अंदर वाले कमरे से सामान ला कर इधर रख रही थी.
"ये मैंने कैसे ले सकती हु नानी?"
"इसमें कोई कानून थोड़ी न है जो तुम ले नहीं सकती. और अपनी माँ को देखने से कुछ नहीं होने वाला. पूर्णिमा इस बैग को याद से शालिनी के सामान के साथ रख देना. दामाद जी और बाकी घरवालों के उपहार है इसमें. अगली बार आइशा आएगी तोह मैं पूरा वक़्त वही हवेली रहूंगी इसके साथ.", कौशल्या जी ने माथा चूम कर आइशा से स्नेह जताया तोह वो भी गले लग कर मुस्कुराई.
"वैसे मैं इधर हे आ जाउंगी नानी. वह तोह कमरे ज्यादा और लोग काम है. डॉक्टर मां, आप कल आएंगे तोह आपके साथ सभी लोग आएंगे न?", आइशा जो जवाब चाहती थी वो शायद नहीं मिलने वाला था उसको.
"हाँ बीटा. सब लोग आएंगे और अगर तुझे कुछ दिल्ली से भी चाहिए तोह बता मैं लेता आऊंगा मेरी आशु के लिए?", शंकर जी ने भी उतने हे लाड से जवाब दिया जिस पर रामेश्वर जी ने जो कहा सभी की हंसी निकल गयी.
"बरखुरदार, तुम हे पहुंच जाना समय से. इसके लिए वही सबसे बड़ा गिफ्ट होगा. और उमेद, थोड़ा जल्दी करो बीटा तुम लोग. सतीश के मेहमान (अलीशा) ने भी तुम्हारे साथ जाना है. उनकी फ्लाइट 11 बजे की है तोह इसका पूरा ध्यान रखना पड़ेगा.", रामेश्वर जी की बात सुन्न कर शंकर का चेहरा न्यास हे लटक गया. उमेद के कुछ कहने से पहले हे कमरे में दाखिल होते अर्जुन ने 3-4 बैग उठाये और बहार निकल गया. उसको भान था के ये सब कहा रखना है लेकिन कुछ चेहरे निरंतर उसकी ख़ामोशी और अनदेखी को देख रहे थे.
"मैं तोह अर्जुन को मार्किट ले जाने वाला था पापा. कल ये जा रहा है तोह सोचा था के उसको कपडे दिलवा दूंगा और रेखा को भी एक बार दिखवा दूंगा. राजेश और दलीप ने भी फिर निकलना था घर वापिस."
"तुम्हारी माँ जा रही है तुम्हारे साथ. रेखा बहु के साथ रेणुका बिटिया को भी कुछ जांच की आवशयकता है. अर्जुन कही विदेश नहीं जा रहा शंकर और पहले भी तुम उसके लिए कपडे लाते रहे हो. तुम्हे जो पसंद हो, वही लेना.", रामेश्वर जी ने जो भी कहा था उसका जवाब शंकर ने सिर्फ सर हिला कर हाँ में दिया.
"विनि बीटा, अपनी चची को देखो जरा. और कोमल को बोल देना के वो लोग भी तैयार हो कर साथ हे आ जाये.", शंकर जी ने अर्जुन को दूसरा चक्कर लगते देखा तोह बस उसकी पीठ हलके से थपथपा दी जिस पर वो उतने हे विश्वास से मुस्कुराया.
"कुछ भी कह शंकर, तू सचमुच एक बेहतरीन पिता है. Rok-tok सभी करते है लेकिन तुझमे जो ख़ास बात है वो मैंने बहोत काम देखि है. तू बचो पर मर्जी नहीं डालता.", पूर्णिमा जी ने अपनी जगह से उठ कर लड्डू का एक टुकड़ा शंकर के मुँह में डालने का प्रयास किया तोह वो टुकड़ा शंकर ने खुद हे उन्हें खिला दिया.
"चची, मेरा न इन टुकड़ो से कुछ नहीं बनता. पूरा हे लड्डू एक बार में खाये बिना तोह ये न पता चलता के वो बूंदी का था के बेसन का. और रही बात बचो की तोह, इनके सपने रंगने वाला मैं कोई चित्रकार नहीं. ये खुद उन्हें अपने रंगो में साकार करे तोह हे बेहतर है. बाकी मैं ाचा पिता हु या नहीं ये तोह समय हे बताएगा. फ़िलहाल तोह मैंने पापा को हे कई बार कहते सुना है की वो कोशिश करते है आजतक.", शंकर के जवाब पर पंडित जी को ठसका लगा तोह बाकी सभी हंस दिए. अशोक जी का भी परिवार आ चूका था अब और इनके साथ साथ उन सभी से भी पंडित जी का परिवार पूरे riti-riwaaj से मुलाकात करने लगा. राधिका संजीव को बुलाया गया और उन्हें आशीर्वाद देने के साथ हे ये 2 प्रमुख परिवार अपने अपने वाहन लिए इधर से निकल चले. कहा तोह मधु ने आज रुकने का विचार बनाया था और कहा सब एकदम हुआ की वो इस बारे में कुछ कर हे न सकीय. अगले आधे घंटे में तोह यहाँ रिश्तेदारों के नाम पर सिर्फ कृष्णेश्वर जी का परिवार हे बचा था.
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"हाँ तोह laat-sahab, अब बताओ के आपके सवाल क्या है और जो be-waqti ख़ामोशी धारण की हुई है इसकी वजह?", बैठक के दीवान पर पंडित जी सर के निचे गोल तकिया लगाए लेते थे और उनके पाँव की तरफ बैठा अर्जुन दोनों हाथो से अपने दादा जी की पिंडलियों की मालिश करता हुआ जैसे कुछ सुकून पंहुचा रहा हो. अभी तक log-baag भीतर Sanjiv-Radhika को देखने आ रहे थे और ललिता जी के साथ घर की बच्चियां भी इस देख रेख में लगी थी. कौशल्या जी को भी उधर हे हाजिर रहना था घर की प्रमुख होने के नाते. बैठक में दरवाजे भिड़ा कर पर dada-paute के बीच हे ये ख़ास समय आरक्षित हो गया था जैसे.
"सवाल तोह क्या हे होंगे दादा जी जब मैं कुछ जानता हे नहीं वह के बारे में.? जो भी सुना है या पता है वो सब आपकी बातों या फिर दीदी या दादी जी के वह जा कर आने के बाद बताये वृत्तांत से हे पता है. और मैं खामोश नहीं हु बौ जी, बस दुविधा में हु.", अर्जुन ने कटोरी में रखे तेल से अपनी हथेली को भिगोने के बाद इस बार अपने दादा जी के सख्त तलवो को घिसना शुरू किया. बनियान पहनी होने की वजह से उसकी वो बेजोड़ मासपेशिया खासी उभर रही थी म्हणत की वजह से. पंडित जी का शरीर कोई फूल तोह न था. ज़माने भर को कानून सिखाते सिखाते वो बूढा जिस्म भी अयस्क (मेटल) बराबर मजबूत था और हथेली से तलवो के बीच रगड़ वही ऊर्जा पैदा कर रही थी जैसा अक्सर 2 धातु घिसने पर होता है.
"दुविधा यही की इस बूढ़े की देखभाल कौन करेगा तेरे जाने के बाद? या तेरे बगीचे को पानी मिलेगा भी या नहीं? मेरी हर चीज के लिए तुझे आवाज लगाने पर कौन जवाब देगा इस बात से चिंतित है? अपनों से दूर तू एक नयी जगह जा रहा है जो असलियत में इस घर की नीव रखे जाने से भी बरसो पहले तक हमारा असली घर रही है. अब तोह मैं भी चाहता हु न बीटा के तुम उधर जरूर जाओ. हाँ एक महीने के लिए जा रहे हो तोह कमी तोह जरूर खलेगी.", रामेश्वर जी ने सिरहाने के पास से छोटा टोलिया अर्जुन की तरफ बढ़ाया तोह उसने अपने दोनों हाथ उस कपडे से साफ़ करने के बाद अपने दादा जी के तलवो से भी अतिरिक्त तेल पूछा. फिर से वो घुटनो तक उनके पाँव दबाने लगा लेकिन थोड़े नरम हाथो से.
"आप बूढ़े नहीं हो और आजकल तोह आप आवाज लगते भी नहीं. हाँ मैं थोड़ा बहोत वही सोच रहा था लेकिन दादा जी, क्या वह मुझे कोई परेशानी होने वाली है? मतलब सभी तोह जाते रहते है पंजाब. यहाँ तक की रुपाली दीदी भी हो आयी लेकिन मेरी बारी में मैंने देखा की दादी भी थोड़ा चिंतित थी. मैं गलत कर रहा हु क्या वह जा कर?", अर्जुन के सवाल सुन्न कर रामेश्वर जी ने कमर सीधी कर ली. थोड़ा सा तक लगा कर बैठते हुए उन्होंने हाथ के इशारे से उसको रुकने को कहा तोह अर्जुन आगे खिसक गया. अब वो हलके हाथो से अपने दादा जी ब्याह दबाने लगा था.
"तुम्हारी दादी इसलिए चिंतित नहीं थी की तुम्हे वह कोई खतरा होगा. और बाकी सभी तुम्हारे बारे में एक राये रखते है इसलिए तुम्हे कभी वह नहीं जाने दिया. बीटा, खतरा तुम्हे नहीं है और वो पुश्तैनी घर है हमारा. वह जब किसी को ये पता लगेगा के तुम स्वर्गीय मोतीलाल जी के padd-paute हो तोह वो चाहे तुम्हारे पिता की उम्र का हो या मेरी, तुम्हे सर आँखों पर बैठा लेगा. और जितना log-baag से सुना है, तुम दीखते भी कुछ हमारे पिता की तरह हो.", रामेश्वर जी के कथन से अर्जुन कुछ झेंप सा गया लेकिन फिर संयत हो कर वो बोलै.
"तोह जब वह किसी से खतरा नहीं है तोह नाहक हे सभी इतनी चिंता करते है?"
"हाहाहा.. खतरा तुम खुद हो बरखुरदार. ाचा चलो ये बताओ के घर में तुम सबसे करीब किसके को? ऐसा नहीं है के मैं कोई तर्क दे रहा हु, बस फिर भी हर व्यक्ति किसी न किसी के तोह कुछ ज्यादा हे करीब होता है. जिसको सबकुछ पता होता है हमारे बारे में और जिसके साथ लगभग हर बात साँझा होती है.", पंडित जी ने तोह अर्जुन को हे धर्मसंकट में दाल दिया था इस सवाल से. वो तोह अर्जुन को हे खतरा बता रहे थे और अब एक नाम सुझाने पर वो और भी सोच में डूब गया.
"मैं तोह सभी के साथ स्वाभाविक हर बात कर लेता हु दादा जी. और जैसा आप कह रहे है तोह मेरे बारे में आप, दादी, माँ, कोमल दीदी, संजीव भैया सबकुछ जानते हे है.", यहाँ वो ऋतू का नाम लेने से जाने क्यों कटरा रहा था. रामेश्वर जी ने एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ जैसे अर्जुन के दिमाग को हे पढ़ लिया था पर ठहर कर उन्होंने ये सुझाव दिया.
"ऐसा करना के तुम जरा ऋतू या अपने पिता से पूछना के वो तुम्हारे बारे में क्या सोचते है. वो अगर इस बात को न समझे तोह बस उनसे अपने बारे में राये लेना. और उनसे पहले जरा मेरी भी सुन्न लो.", इन 2 नामो में एक तोह वो थी जिसको अर्जुन की धड़कन तक का पता रहता था और दूसरा व्यक्ति जैसे कुछ जानता हे नहीं था अर्जुन की सोच के मुताबिक.
"हाँ तोह आप बताइये.", अर्जुन ने संक्षेप सा जवाब दिए.
"तुम्हारा किरदार इस घर के हर सदस्य से कुछ ज्यादा हे भिन्न है बीटा. बचपन से हे या पैदाइशी हे समझ लो. गुण है या अवगुण ये तोह ऊपरवाला हे जानता है लेकिन तुम कभी भी एकमत नहीं रहते. संस्कार अपनी जगह है और उस वजह से तोह हमे तुम पर हमेशा हे नाज रहा है. मेहनती भी हो और लगन के पक्के भी. लेकिन तुम विरोधाभासी, अंतर्मुखी और gehan-tark रखने वाले विषम व्यक्ति हो जिसको मुसीबत खुद हे ढून्ढ लेती है. तुम्हे अकेला छोड़ना मतलब ऐसा है जैसे किसी अत्यधिक ऊर्जावान पशु को बिना प्रयोजन खुला छोड़ देना. ऐसे पशु को जब कोई काम नहीं मिलता तोह वो खुद हे काम ढून्ढ लेता है. फिर चाहे वह काम मुसीबत हे क्यों न बढ़ा दे. दिल से तुम संवेदनशील भी हो और भावुक भी. अगर वो प्यार का स्पर्श तुम्हे समय से न मिले तोह एक अंजना डर खुद अभिभावक को लगा रहता. इन बूढी आँखों ने ज़माने का ऐसा कोई दर्द नहीं जो न देखा हो अर्जुन लेकिन एक तुम हे हो जिसने इस घर के हर सदस्य की आँखों में नमी पैदा की है और वो हर शक्श बस यही दुआ करता है की तुम हमेशा इस चाव में महफूज रहो.", अपने दादा की बात सुन्न कर अर्जुन के चलते हाथ एकाएक हे रुक गए. वो एक पल में हे भावशून्य सा हो गया. बोर्डिंग जाते हुए घर के बहार कोमल, माधुरी दीदी की नम्म आँखें. ऋतू का सबसे दूर हो कर आंसू बहाना. उसकी माँ का वो मूक रुदन जब वो घर वापिस आया था. संजीव भैया का उस से लिपट कर हॉस्पिटल में रोना और खुद उसकी दादी.. उसने अपनी दादी को सिर्फ 2 वक़्त हे कमजोर देखा था. घर में कोई मजबूत शक्श था तोह वो उसके चाचा, पापा और दादा जी हे तोह थे.
"हाँ ये बात तोह भाई साहब ने 16 आने सही कही. मैंने इनकी आँखों में उस वक़्त भी कोई नमी न देखि थी जब तेरा बाप अचेत था या खुद इनके गोली लगी थी. तुम्हारे हॉस्पिटल में भर्ती होने पर जरूर ये ठन्डे पड़े थे और रोये भी. शंकर.. वो नीरा निर्दयी डॉक्टर है बीटा और आंसू क्या बाला है ये तोह जैसे उसको और इन्दर को पता भी नहीं लेकिन जब तेरी धड़कन चलती महसूस हुई थी न उन दोनों को तोह वो भी रोये थे. हैरानी की बात है और वो कभी इस बात पर सहमत नहीं होंगे लेकिन ये सच है. उस रात रेखा तोह बेहोश थी और हम सब दूर लेकिन शंकर ने पूरी रात 5 सेर का वो मुन्ना अपने छाती पर हे सहेज कर रखा जबतक मैं न पहुंच गया भाभी को साथ लिए. सजा तोह फिर भी दी मैंने उन दोनों को क्योंकि कही न कही उनकी हे गलती भी थी लेकिन तभी एक बात साबित हो गयी थी की तुम्हे अकेला नहीं छोड़ा जा सकता.", छोल पूरी ने अंदर आने पर जैसे इनकी थोड़ी बहोत चर्चा सुन्न ली थी और अपने धरम भाई की बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने जो बताया वो अर्जुन के लिए भी नया था. रामेश्वर जी निम्बू पानी का घूंट लेने के बाद गिलास एक तरफ रख कर बस मुस्कुरा रहे थे. इस मुस्कराहट के क्या मायने थे ये तोह बस उन्हें हे पता था.
"लेकिन मैं अब ऐसा कुछ नहीं करने वाला छोटे दादू की जिस से किसी को कोई परेशानी हो. मैं तोह ये भी सोच चूका हु की अपने सवाल जवाब भी सिमित राखु और जितना हो सके परिवार में राहु. पंजाब जाने के पीछे और ढेरो वजह है और ये समय भी सही लगा मुझे क्योंकि सबकी कुछ और प्राथमिकताएं भी है haal-filhal में."
"बीटा तू परेशां नहीं करता और सच कहु तोह हम लोग हे कुछ ज्यादा चिंता करते है. सवाल जवाब जरुरी है और तू किया कर जबतक सामने वाला सहज लगे. लेकिन तू है तोह मुन्ना हे और ये तू इंकार नहीं कर सकता. तेरा बाप 5 कक्षा में जीप लेके भाग गया था. उमेद की टांग आठवीं तक 3 बार टूट चुकी थी और इन्दर ने तोह उस समय तक 2 बार तेरे दादा जी से हवालात में पत्ते भी खा लिए थे. संजीव.. संजीव भी अपने चाचा जैसा हे था जबतक रेखा बहु ने उसके बास्ते को नहीं थमा. लेकिन तू.. तू आजतक अपनी बहिन का खिलौना, माँ का मुन्ना और इनका वही पौता है जिसको नंगा करके ये तेल मालिश करके फर्श पर अपने पास लिटाये रखते थे. मैं भाई साहब के साथ उस वक़्त से hum-kadam हु जब इस वर्तमान परिवार की नीव भी नहीं राखी गयी थी. 50 बरस लगभग होने को आये होंगे पर इन्होने कभी कोई चाहत न राखी और इनकी चाहत बानी भी तोह वो तुम्हारे रूप में इनके करीब हे है.", छोल साहब ने जितनी तफ्सील से हर बात कही थी, वो सुन्न कर अर्जुन जैसे दांग हे रह गया. रामेश्वर जी जैसे इशारे से उन्हें आगे कुछ बताने से रोकना चाहते थे लेकिन छोल साहब ने भी उन्हें आश्वस्त सा कर दिया.
"आप सबकुछ जानते है फिर तोह? और आप तोह फ़ौज में थे जहा तक मुझे याद है. मेरे सामने हे तोह आपकी वो काली कार आती थी हर रोज शाम में या रात को. आप कब रहे दादा जी के साथ?"
"तुम फ़िलहाल तोह मुद्दे से हे भटक रहे हो बीटा लेकिन कोई बात नहीं. यहाँ तुम पंजाब जाने वाली बात पर चर्चा कर रहे थे और तुमने शायद सही सवाल अभी तक नहीं किया. क्यों तुम्हे वह पहले जाने नहीं दिया गया?", अर्जुन ने अब हामी भरी.
"तुम्हारे लिए पंडित रामेश्वर शर्मा के क्या मायने है अर्जुन?", पहली बार जैसे छोल साहब ने अपने बड़े भाई साहब का नाम लिया था लेकिन इस सवाल में जो गंभीरता थी उसको सुन्न कर अर्जुन के शरीर में सार्ड झुरझुरी सी दौड़ गयी. आज उस से पुछा जा रहा था उस व्यक्ति के बारे में जिसके लिए अर्जुन अपना सर्वस्व त्याग सकता था, सिर्फ कहने की देर थी.
"मेरे भगवन है ये छोटे दादू. अर्जुन शर्मा को कभी मंदिर जाने की जरुरत नहीं हुई क्योंकि मैं अपने भगवन के साये में रहा हु और आज भी मुझे कोई परेशानी महसूस नहीं होती क्योंकि दादा जी होने हे नहीं देते. 'गुरु गोबिंद दोउ खड़े, काके लागू पाए... बलिहारी गुरु आपने गोबिंद दियो मिलाये..'. ये मुहावरा भी अतिश्योक्ति लगेगा क्योंकि मेरे शिक्षक भी यही है. मैंने सिर्फ अपने हे साथ इनका अलग व्यक्तित्व महसूस किया है जैसा किसी और के साथ कदापि नहीं देखा. कब वो छोटे छोटे char-bhar के खेल गहरी शतरंज में बदल कर इन्होने मुझे जीवन के जटिल से जटिल रस्ते समझा दिए? कैसे एक गुस्सैल से लड़के को aatmgyaan-buddhi के साथ साथ असीम कौशल प्रदान किया? वो सब भी अगर काम नहीं तोह आप हे देखे की मैं एक bhavna-prakhar इंसान बना सिर्फ इनकी हे कठोर म्हणत और आदर्शो से. इंसान तोह वनवास में अपने मोक्ष पर केंद्रित रहता है लेकिन दादा जी ने तोह यहाँ भी तपस्या मुझ पर हे कर दी. मुझे सभी से एकसार प्रेम है छोटे दादू और ये आपके लिए भी सामान हे है लेकिन बौ जी और माँ के त्याग के समकक्ष कोई नहीं. यकीन मानिये मैं इस से ज्यादा खुल कर भी बयान कर सकता हु लेकिन शब्द फिर भी सही सही न्याय नहीं कर पाएंगे की मेरा जीवन है तोह उसकी वजह बस दादा जी हे है.", अर्जुन अपनी रौ में बेहटा हुआ गंभीर लफ्ज़ो से जो शुरू हुआ तोह आखिर में जुबान अटकने हे लगी थी. शब्द लड़खड़ाने लगे तोह रामेश्वर जी ने हे उसको सहलाते हुए थोड़ा धनदास बंधाया.
"सब जानता है ये तेरा छोटा दादा लेकिन छोल रहा है न तोह आदत नहीं जाती. मैं ाचे से जानता हु अपनी परवरिश को बीटा और तू भी तोह बराबर खेलने लगा है मेरे साथ. मेरे हे मोहरो से तू बाकी सबको उलझता रहा और फिर मुझे हे फांस लिया. तभी मुझे यकीन हो गया था के मेरा दिल क्यों तुझे हे सबसे ज्यादा महसूस करता है. सतीश, ये एक छोटे से सबूत के साथ जब खोजबीन करता निकला तोह न इसने सिर्फ चारो परिवार खंगाल दिए. बल्कि उनकी हर एक तेह खोल कर वह तक पहुंच गया जहा तक तुम्हारी भाभी भी नहीं जान पायी. अब हमारे lallu-lal को लगा की खेल कुछ ज्यादा हे पेचीदा हो गया है तोह कदम पीछे ले जाना हे बेहतर होगा. और एक सही राजा हमेशा ऐसा हे करेगा. खैर अब तुम चाहो तोह अपने छोल दादा जी से भी सवाल पूछ सकते हो. और तुम्हारा जैसा दिल करे तुम वैसे रहना वह पंजाब जा कर.", रामेश्वर जी ने पीठ थपथपाने के बाद उठ कर अलमारी का दरवाजा खोला और कुछ ढूंढ़ने लगे. छोल साहब भी अब तन्मयता से मुस्कुरा रहे थे अर्जुन को निहारते हुए.
"आप जानते है सबकुछ?"
"बस परख रहा था बीटा और जवाब तोह मुझे भी पहले से हे पता था. बस भाभी जी थोड़ा डर्टी है क्योंकि उनके तीनो बेटे तोह पहले हे दुनियादारी में हे लगे रहे जैसे बचपन से हे उन्हें वो सब करना था जो आज भी करते रहते है. बहु और paute-pautiyon का सुख मिला लेकिन तुम में उन्हें फिर से एक बेटे जैसा हे सुख मिला. वो हमेशा हे चाहती है के तुम ठीक अपने दादा जी जैसे बनो.. नहीं.. इन जैसे नहीं बल्कि हमारे ताऊजी स्वर्गीय मोतीलाल जी जैसे. पर फिर उन्हें ये भी दर रहता है के कही तुम्हे नजर न लग जाए, कोई तुम्हे कुछ कर न दे.. कही तुम बदल न जाओ किसी घटना से .. और जाने कितनी सेंकडो तरह की सोच चलती रहती है. लेकिन इंसान सब तरह के समय और दौर से गुजरने के बाद ऐसा तोह सोच हे सकता है. खैर.. क्या तुमने देखा भी था अपने पड़ दादा जी को या उनकी तस्वीर को?", छोल साहब के कहने के बाद हे पंडित जी ने वो shwet-shyaam से तस्वीर अर्जुन के हाथो में रख दी. इस घर में स्वर्गीय रघुवीर सिंह जी की बड़ी सी तस्वीर तोह यही बैठक में लगी थी लेकिन अजीब बात थी की पंडित जी के पिता जी की एक भी तस्वीर न थी कही और जो थी वो अभी अभी अर्जुन के हाथो में खुद पंडित जी ने हे राखी थी. अर्जुन अपलक उस चित्र को निहारता रहा.
"इसका नाम था अमावस और नेसल से बखारवाल. पिता जी जहा भी जाते थे ये हमेशा हे उनके साथ साथ रहता था. माँ ने हे इसको अमावस नाम दिया था क्योंकि पिता जी के घर आने के बाद भी ये किसी को उनके पास ज्यादा रहने नहीं देता था. देख रहे हो यहाँ भी ये कैसे पंजा उठा रहा है? जो फोटो ले रहा था, अमावस उसको दूर कर रहा था.", अर्जुन तोह उस झबरैले बड़े से कुत्ते को अनदेखा करके बस जैसे खुदको हे देख रहा था उस तस्वीर में. शायद वो व्यक्ति अर्जुन से भी अधिक दिलकश और प्रभावी था. चूड़ीदार पजामा और जिस्म पर कैसा हुआ kurta-jacket. गले में सच्चे मोतियों की माला और ठीक कंठ से निचे दीखता रुद्राक्ष. ललाट को कुछ ढके वो खूबसूरत सी पगड़ी उस व्यक्ति की आभा में इजाफा हे कर रही थी. चेहरे में कुछ फरक था तोह वो थी मूछे और गाल तक लम्बी कतार जैसी कलम. वो भालू जैसा कुत्ता हे जैसे उस मोहक मुस्कान की वजह था जो इस तस्वीर पंडित मोतीलाल जी के चेहरे पर आयी हुई थी. और इस मुस्कान की हे वजह से शायद रामेश्वर जी के लिए ये तस्वीर अनमोल थी जिसको वो कभी साँझा नहीं करते थे.
"मैं तोह बिलकुल इनके हे जैसा हु. वो दरवाजा कोई 8 फ़ीट ऊँचा होगा.. ये शायद मुझसे भी लम्बे थे और तगड़े भी.. पापा आपके जैसे लगते है दादा जी और मैं पापा जैसा सिर्फ बालो और आँखों से.. बल्कि ये तोह..."
"पीढ़ी दर पीढ़ी कोई न कोई तोह किसी से मिलता हे है बीटा. हाँ तुम बिलकुल पिता जी जैसे दीखते हो और कद भी सामान हे होगा. जैसे जैसे तुम बड़े हो रहे थे, तुम्हारी दादी को यही चिंता सत्ता रही थी और अब तोह वो डरने भी लगी है के कही अतीत से कोई निकल कर न आ जाए इस चेहरे की वजह से.. हाहाहा..", रामेश्वर जी ने हँसते हुए दिल को बाहरी तौर पर हल्का दिखाना चाहा था और अर्जुन अभी भी उस फोटो पर हाथ फिरता हुआ जैसे कुछ महसूस करने में लगा रहा.
"इनका देहांत कब हुआ था?"
"बहोत पहले.. विनोद को भी नहीं देख पाए थे पिता जी. माँ इनके एक साल बाद हे चल बसी थी.", रामेश्वर जी ने वो तस्वीर हाथ में ले कर जैसे अतीत को याद किया तोह छोल साहब ने उनका हाथ थाम लिया.
"तुम जा रहे हो तोह ऐसे जाओ जैसे कुछ जानते हे नहीं अर्जुन. तभी तोह मजा आएगा तुम्हे भी जानकारी लेने में. लोगो से मिलोगे, उनसे बातें करोगे और वो तुम्हे खुद बताएँगे की तुम्हे हर बात. पहली मुलाकात तोह तुम्हारी करवा हे दी है तुम्हारे padd-dada जी से और अब आगे तुम खुद हे उनके बारे में पता करना. बस इतना याद रखना के तुम कौन हो.", छोल साहब के इतना कहने के साथ हे दरवाजे पर दस्तक हुई तोह पंडित जी ने वो तस्वीर फिर से वही छुपा दी जहा से निकली थी. शायद ताले में राखी थी उन्होंने वो और दवाजा खुलने पर नजर आयी प्रीती.
"बीटा, मैं बस आ हे रहा था. तुम लोग क्या अभी निकलने वाले हो?", छोल साहब ने भांग हुई महफ़िल में जैसे हे ये कहा तोह प्रीती ने ना में गर्दन हिला दी.
"दादू मैं तोह अर्जुन को बुलाने आयी थी. चंडीगढ़ तोह हम कल जा रहे है.", प्रीती के जवाब पर छोल साहब ने एक गहरी सांस भरी और प्रीती के करीब से हे उसको आशीर्वाद देते हुए शास्त्री जी चले आये. अर्जुन उनके गले मिल कर जल्दी आने का बोलता हुआ प्रीती के साथ हे बहार चल दिया
"शायद हम इस महफ़िल में जरा जल्दी तोह नहीं आ गए भाई साहब?"
"शास्त्री जी, महफ़िल शुरू हुए कुछ देर हो गयी है. लेकिन आप सही समय आये हो क्योंकि चाय बानी नहीं अभी.", छोल साहब ने हाथ मिला कर हँसते हुए कहा था और रामेश्वर जी भी ऐसा करके अब सोफे पर आ बैठे उनके बगल में.
"चाय तोह मिलने भी नहीं वाली भाई. हाँ निम्बू पानी जरूर अभी हाजिर हो जायेगा. वैसे मैं फ़ोन करने हे वाला था आपको शास्त्री जी.", रामेश्वर जी ने तकिये के निचे से निकली हुई फाइल उनके सामने हे रख दी.
"ये क्या है पंडित जी?"
"राज्यवर्धन की कुंडली और उसमे बैठे grah-nakshatra. हम वादा नहीं भूले भाई और देख लो ब्याह के अगले हे दिन हाजिर है आपके सामने.", पंडित जी की बात सुन्न कर शास्त्री जी कभी फाइल देखते तोह कभी उनका चेहरा.
"हैरान मैट होइए भाई साहब. परिवार में हमेशा एक दूसरे का हाथ पकड़ कर हे रहा जाता है.", छोल साहब ने एक और पन्ना उनकी तरफ बढ़ा दिया जिस पर जैसे फ़ौज की कुछ मोहर लगी थी.
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"हम कहा जा रहे है?", अर्जुन प्रीती के पीछे पीछे बहार आया तोह गली में लगे शामियाने अभी उतारे जा रहे थे. असगर जैसे कुछ समय बाद हे निकलने वाला था. प्रीती के घर के बहार उसकी स्कूटी पहले से कड़ी थी जिसके करीब आ कर वो दोनों हे रुक चुके थे.
"मुझे न कोई परेशां कर रहा है.", प्रीती ने स्कूटी में चाबी लगाईं हे थी की अर्जुन उस से पहले स्कूटी का हैंडल पकड़ कर जा बैठा.
"उसकी तोह.. तुम बैठो और देखो मैं क्या करता हु उसका हाल."
"वही तोह करने वाली हु मैं.. तुम्हारा हाल हे बिगड़ना है मिस्टर और अब चुपचाप स्कूटी घुमा कर मंजू के घर की तरफ चलो नहीं तोह अंजाम बहोत बुरा होने वाला है. ऐसे तोह काबू आ नहीं रहे थे तोह फिर यही रास्ता ठीक.", प्रीती ने हे पीछे से हाथ हैंडल पर रखते हुए रेस बधाई तोह अर्जुन मैं हे मैं खुश होता हुआ उस तरफ बढ़ चला जहा प्रीती उसको ले जाना चाहती थी.
"तुम्हे अब घरवालों का भी दररर नहीं..?"
"भाड़ में जाए सब.. बहोत हो गया और अब तुम देखो मैं तुमसे कितने बदले लेने वाली हु.", प्रीती का वही पुराण अंदाज और उसके कठोर उभारो का ये मनचाहा दबाव पीठ पर महसूस करते हे अर्जुन जैसे एक बार फिर से हार गया था उसके सामने. शायद वो भी ये हिम्मत न कर पता लेकिन प्रीती आखिर प्रीती थी. अपने प्यार को नकेल दाल वो खुद हे उस घर की तरफ चल पड़ी जो फ़िलहाल खामोश था, ताले से बंद.