Incest Pyaar - 100 Baar - Page 10 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट नहीं दे पाउँगा भाई . सॉरी. कुछ ट्रेजेडी हो गई है. इन अहमदाबाद नाउ फ्रॉम नार्थ. सॉरी. नेक्स्ट 2 डेज ी ऍम ुनाबले तो रिप्लाई
 
भाई आज रात को अपडेट दूंगा. एक part लिखे लिए है लेकिन कंटिन्यू है सेकंड भी.
 
अपडेट 62

बेसबर (1)



स्वाति पहले की तरह हे निश्चिंत सोइ हुई थी, जैसे अर्जुन उसको छोड़ कर गया था. अभी रात के इस आखिरी पहर वह कमरे में आया और दरवाजे को आराम से लगते हुए बिस्टेर पर आ लेता. स्वाति के हाथ के नीचे से तकिया निकल कर अपने से चिपकते हुए उसने भी आँखें बंद कर ली थी. स्वाति इस गर्माहट से खुद भी अर्जुन के चौड़े सीने में धंस गई लेकिन पूर्ववत हे नींद में रही.

'जब सामने ऐसे सवाल आ खड़े हो जिनके जवाब विचलित करे या वह अनैतिक लगे तोह sach/jhooth पर विचार करने की जगह सवाल के गर्भ को टटोलना चाहिए. सवाल हे जवाब होता है लेकिन हमारा होशियार दिमाग इसको पढ़ने की बजाये विवेक पर हावी हो कर नए जवाब ढूंढ़ने में लग जाता है. बस सवाल के साथ बने रहने से वही तुम्हे उसके जवाब तक ले जाता है. मंदबुद्धि बने रहकर भी हालात पढ़े जा सकते है.', आचार्य जी की ये बात याद करते हुए अर्जुन एक मुस्कान लिए नींद में जा चूका था. घर में रात के इस पहर अब सिर्फ शान्ति हे पसरी थी जिसमे कही कही टाइगर के भोंकने की आवाज आ जाती थी जो शायद अब बहार वाले आँगन में सचेत था.

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"आज का क्या विचार है बिटिया?", कुन्दनलाल जी सुबह 6 बजे घर के पिछले आँगन में अपनी बेटी रेखा, बड़ी भाभी अंजना और पत्नी सुनंदा जी के साथ बैठे थे. सैर, nahane-dhone आदि से फारिग होने के बाद यहाँ चाय का कार्यक्रम चल रहा था. घर के बचे सभी सोये हुए थे या अगर जाग भी रहे थे तोह अपने कमरों में हे थे.

"पापा, कुछ पता नहीं अभी तोह. बचे तोह सभी कह रहे थे अभ्यारण्य और महल देखने के लिए लेकिन आज कुछ मेहमान भी आने है घर पर.", रेखा जी भी नाहा धो कर एक सादा salwar-kameej पहने अपनी ताईजी के सान्निध्य में बैठी थी. "ऊपर से अगर मैं बचो के साथ गई तोह फिर मनोज या कैलाश को काम से छुट्टी करनी पड़ेगी. क्योंकि बचे तोह मोटरसाइकिल स्कूटी पर जा सकते है लेकिन अगर हम भी जाएंगे तोह गाडी के साथ किसी को तोह चलना हे पड़ेगा.", रेखा जी ने अपनी बात रखते हुए एक बार अपनी भाभी ममता की तरफ भी देखा, जो तुलसी में पानी देने के बाद उन्हें देख कर मुस्कुरा रही थी.

"गाडी तोह पूजा और ममता बिटिया भी ले जा सकती है. कल शायद मुझे अर्जुन को अपने साथ ले जाना पड़े और रिश्तेदारों से तुम दोपहर बाद भी मिल हे सकते हो. और वैसे अगर तुम्हे किसी पुरुष सदस्य को साथ हे लेकर जाना है तोह फिर मई कह देता हु मनोज को, कैलाश तोह खेत चला गया मनोहर को लेकर.", कुन्दनलाल जी की बात पर सुनदंडा जी ने भी सहमति जाता दी. इधर सोहनलाल जी भी फक्क सफ़ेद कुरता पजामा पहन कर आ बैठे araam-kursi पर सभी के पास.

"हाँ तोह हर्ज हे क्या है जाने में. छोटा सा हमारा शहर है और लोग भी भले है. पूजा ले जाएगी तुम सभी को और बचे अगर अपने से जाना चाहे तोह वह चले जाएंगे. और कुंदन, भाई चलो जल्दी जरा आज काम भी है वह.", सोहनलाल जी ने भी खुली इजजत्त दे दी थी और अब अपने छोटे भाई के चलने की प्रतीक्षा कर रहे थे.

"पूजा बिटिया, बचे उठ गए क्या? एक घंटे तक सभी निकल जाओगे तोह दोपहरी से पहले आराम से वापिस आ सकते हो.", कुंदन जी ने अपनी बड़ी बहु को ावा देते हुए कहा.

"जी पापा. स्वाति और कंचन तैयार हो रही है और समय रसोई में अनीता के साथ काम देख रही है. अर्जुन भी कसरत से फारिग होने हे वाला होगा.", चमड़े का एक बैग लाकर अपने ससुर जी को पकड़ती पूजा जी ने सभी बचो के बारे बता दिए था. कुन्दनलाल जी अर्जुन की कसरत की बात सुनकर अपनी बेटी की तरफ देखने लगे.

"ये इधर आने के बाद भी अपनी कसरत नहीं भूला क्या?", हलके हैरान से होते वह कहने लगे.

"बिट्टू भैया ने स्टोर में मशीन लगा राखी है तोह उसने देख लिए. बहार का ज्यादा पता नहीं है तोह फिर थोड़ा बहोत व्यायाम यही कर रहा है वह. और उसकी दिनचर्या के बारे में बस इतना पता है के वह इसके लिए थोड़ा सख्त हे है पापा.", रेखा जी ने उठते हुए कहा और फिर अपने पिता और ताऊजी से बात करती हुई वह भी बहार आँगन की तरफ चल दी. आज एक हे कार में मनोज, सोहनलाल जी और कुंदन जी चले गए थे. एक कार खेत जा चुकी थी और 2 यहाँ अभी आँगन में कड़ी थी.

"प्रकाश भैया, जरा ये वाली गाडी धो दीजियेगा. बहार लेकर जानी है कुछ हे देर में.", रेखा जी ने गेट पर खड़े प्रकाश को समझाया और फिर टाइगर को अपने साथ हे वह से घर के अंदर लेकर चली आई.

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रेणुका सफ़ेद साड़ी में लिपटी मेजर कौशल के शव के पास बैठ अश्रुधारा बहा रही थी जहाँ परिवार के सभी लोग और उनके पिता छोल सतीश जी के साथ हे रामेश्वर जी और कौशल्या जी भी थे. आज सुबह 5 बजे हे उनका शव ताबूत में दिल्ली से इधर उनके घर पंहुचा था. सभी ग़मगीन थे लेकिन कौशल जी के माँ का बुरा हाल था. नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में उनका बीटा और एक सहकर्मी शईद हुए थे. कौशल्या जी उन्हें हौसला दे रही थी और बाकी सभी लोग भी पार्थिव शरीर के दर्शन करते हुए आत्मा की शान्ति की दुआ करते हुए परिवार से मिल रहे थे.

अभिमन्यु तोह जैसे यहाँ भी शायद रेणुका का हाल देखने हे आया था. लेकिन फिर भी खुद को दुरुस्त रखते हुए वह घर के काम करवाता अपनी हे जुगत में लगा रहा. माहौल शायद ठीक नहीं था इसलिए हे वह ऐसा दिखावा कर रहा था लेकिन अंदर हे अंदर अब उसको ख़ुशी थी की रेणुका का सुहाग जवानी में हे उसका साथ छोड़ गया है और अकेली विधवा लड़की से कमजोर शिकार शायद हे उसके लिए कोई हो. बस उस अर्जुन नाम को शख्स को दूर रखना था रेणुका से. अगले 4 दिन तोह काम से काम अब रेणुका उसकी आँखों के सामने रहने वाली है, कोई तरकीब तोह वह चला हे लेगा.

जो बात सिर्फ दोनों परिवार को हे पता थी वह शायद अभिमन्यु या किसी और को बिलकुल इल्म न था के रेणुका और कौशल के रिश्ते को ख़तम करने का फैंसला पहले हे लिए जा चूका था. बस उन दोनों के विवाह का गवाह उनका बीटा अब अपने dada-daadi के पास रहने वाला था और रेणुका भी इधर सिर्फ antim-sanskaar तक हे थी.

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***** गाँव में भी ऐसा हे दृश्य था जहा मेघना सिंह के हाथो से चूड़ियां नदारद थी, मांग खाली और शरीर पर सफ़ेद वस्त्र थे. पूरा गाँव और रिश्तेदार एकत्रित थे इनके घर जहा लुईटननट सिंह का शव सफ़ेद कपडे में लिप्त आखिरी दर्शन के लिए रखा हुआ था. फ़ौज के हे कुछ अधिकारी और सैनिक भी इधर उपस्थित थे antim-sanskaar के लिए.

दोनों की कोई औलाद न थी तोह सभी कर्तव्य घर का छोटा बीटा निभा रहा था. मेनका की शादी जो 5 साल भी न चली थी आज उसकी खुशियों को भी ग्रहण लग चूका था लेकिन गाँव में शहीद की इजाजत सबसे ज्यादा हे रहती है तोह ग़मगीन होने के साथ हे सभी को इस शहीद पर नाज भी था. गाममो के बादल चाटने में शायद अभी समय लगेगा लेकिन एक बेहतर कल भी शायद बुरे वक़्त के बाद हे आता है.

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"मैं तेरे साथ चलूंगी और बाकी जिसको जैसे जाना हो जा सकता है.", स्वाति नाश्ता करती हुई भी अर्जुन के बगल में हे थी. सभी तैयार हो चुके थे जाने के लिए सिवाए संगीता जी के, जो पाँव में मोच का बहाना किये अपने चुदाई का दर्द और मजा लेती कमरे में पड़ी थी.

"लेकिन मैं क्यों नहीं जा सकती अर्जुन के साथ? तू तोह वैसे भी कल गई हे थी मार्किट.", कंचन भी मुँह बनाते हुए स्वाति के साथ जिद्द लगाए बैठी थी. अर्जुन अपना खाना खाते हुए इस nok-jhok के मजे लेने में लगा था.

"कार में 4 लोग जाएंगे. माँ, चची, बुआ, छोटी चची. तोह स्कूटी भी लेके जानी पड़ेगी और उसपर तुम दोनों जाओगी. अर्जुन के साथ मैं जा रही हु.", समय की बात पर अब दोनों लड़किया ख़ामोशी से एक दूसरे को देख रही थी. और उन्हें भी पता था के दीदी ने जो कहा है वही होगा. समय अपने कमरे की और चल दी कुछ सामान लेने और इधर इन दोनों की khusur-phusur फिर शुरू हो गई.

"जाते टाइम तू आ जाती और अभी मैं चली जाती. लेकिन नहीं तुझे तोह कबाड़ा हे करना होता है jor-jor से बोलकर. अब कर म्हणत मेरे साथ हे.", स्वाति की इस बात पर कंचन नजरे झुकाये चुपचाप पानी पीने लगी.

सभी लोग तैयार हो चुके थे और ज्यादा चलना फिरना होना हे था इसलिए सभी salwar-kameej और दुपट्टे लिए हे थी. स्वाति और कंचन ने jeans-tshirt पहना था और वैसे हे चुस्त कपड़ो में अर्जुन था. नीली जीन्स और हलके पीले रंग की वह ढीली सी टीशर्ट भी अर्जुन की बाजू और चौड़े सीने पर ाचे से कासी हुई थी. वैसा हे नजारा रेखा जी के शरीर पर था. कॉटन का वह हलके रंग का सूट जिसपर काले और लाल प्रिंट थे, उनके शरीर का हर भूगोल ाचे से दिखा रहा था. भारी सीना, सपाट पेट और गुदाज नितम्भ. कमर पर से सूट ढीला होने के बावजूद पिछवाड़ा उभर कर दिख हे रहा था. उनके बाद अगर किसी का शरीर थोड़ा बहुत उनके aas-pas था तोह वह ममता जी हे थी और कुछ उनकी हे तरह थी पूजा जी. हलके gulabi-safed सूट में ममता का सौन्दर्य भी ाचे से नजर आ रहा था वही पूजा जी तोह वैसे हे प्रतिष्ठित और आधुनिक घर में बड़ी हुई थी, उनके कमीज की फिटिंग और गले का कटाव बहोत था किसी का भी दिल घायल करने के लिए.

Khaane-Peene का हल्का फुल्का सामान गाडी की डिक्की में रखवाने के बाद जैसे तये हुआ था सभी उसी क्रम में निकल चले घर से. कार के साथ हे Swati-Kanchan स्कूटी पर निकल लिए, रास्ता तोह सभी को पता था अर्जुन को छोड़कर लेकिन उसके साथ भी समय दीदी जा रही थी तोह सभी ने पहले वन्न देखने का हे विचार बनाया था. थोड़ी धुप के बाद वह लोग आराम से Quila-Mehal देख सकते थे. इधर अर्जुन की नजर जब बहार आँगन में आती समय दीदी पर गई तोह एक पल तोह वह भी बस उन्हें हे देखता रह गया. सुर्ख जामुनी रंग के तंग कमीज के निचे सफ़ेद पटिआला सलवार में वह गुलाबी चेहरे वाली लड़की और दिन से ज्यादा हे आकर्षक लग रही थी. कमर के बीच तक आते उनके घने बाल बस एक ढीले से सफ़ेद कपडे के रबर में क़ैद थे, जो इस खूबसूरती को यकायक और बढ़ा दे रहे थे.

"हीरो, देखते हे रहोगे या यहाँ से चलोगे भी? सभी निकल लिए है और बस हम दोनों हे है इधर.", अर्जुन उनकी बात सुनकर झेंपता हुआ मोटोरोसीक्ले पर किक लगाने लगा. समय अपनी आँखों पर एक कला चस्मा लगाती मुस्कुरा रही थी अर्जुन के hav-bhav देखती. अर्जुन जैसा गबरू जवान भी अपनी इस बहिन को देख मोहित हो गया था और समय को इस बात से ख़ुशी भी थी की उसका यु सजना काम आ हे गया.

"यहाँ से कितना दूर है दीदी ये अभ्यारण्य?", अर्जुन मुख्या सड़क पर आने के बाद पूछ रहा था. समय उसके साथ जुड़ कर बैठी बस इधर उधर नजर दौड़ा रही थी. सुबह के साढ़े 7 बजे थे और मौसम भी बेहतर हे था.

"बस यहाँ ये सीढ़ी सड़क पर 5-6 किलोमीटर के बाद एक राइट और हम पहुंच जाएंगे. वैसे तेरी ये मोटरसाइकिल है बढ़िया. मुझे तोह पहले इसका शोर अजीब लग रहा था लेकिन ये चलती काफी ाची है.", रास्ता समझती वह खुद हे अर्जुन से आकर्षित हो चुकी थी लेकिन ध्यान हटाने के लिए वह ऐसा कह रही थी. समय से छुपा न था संगीता चची का किस्सा. अनीता चची ने बिना कहानी सुनाये बता दिए था के अर्जुन ने उनके साथ रात में कर लिए है और दीदी खुश है. समय पहले हैरान थी की अर्जुन इतनी काम उम्र में कैसे एक bhari-puri औरत को बिस्टेर पर बिठा आया लेकिन दिल में एक रोमांच तोह भर हे गया था अपनी छोटी चची जो सहेली भी थी उनकी बातों से.

"वैसे आपका शहर है बड़ा शांत और hara-bhara. हमारे शहर में तोह सिर्फ थोड़ा बहोत हे ऐसा होगा नहीं तोह मार्किट या कॉलेज की तरफ भरपूर भीड़ हे मिलती है.", अर्जुन को भी यहाँ ाचा लग रहा था. पीछे बैठी समय के उभार बेख्याली से उसकी पीठ से हलके हलके टकरा रहे थे. जवान लड़की थी वह और ऐसे स्पर्श से मैं में गुदगुदी होना भी स्वभावी हे था. अर्जुन ने जब उनका वह मुस्कुराता चेहरा और कला चस्मा देखा तोह कुछ पल वह यूँही उन्हें देखने लगा था. सुर्ख लाल होंठ, गोरा रंग, कला चस्मा.. किसी खूबसूरत अभिनेत्री सी जान पड़ती थी. समय ने भी इस चुप्पी को समझते हुए जब ध्यान दिए तोह अर्जुन को ऐसे खुद को निहारते देख बस शर्माती सी उसकी पीठ से लगते हुए मुँह छुपा कर बैठ गई.

"सीधे सड़क पर देखो. ऐसे कही मोटरसाइकिल मत भिड़ा देना.", हंसती हुई वह इतना बोलकर खुद पर हे इत्र रही थी. अर्जुन को भी पता था के उसकी हरकत दीदी ने देख ली है.

"वैसे आज हे पता लगा के आप कितनी ाची दिखती हो. इतने ध्यान से पहले नहीं देखा था इसलिए कह रहा हु.", अर्जुन ने भी तारीफ के साथ हे सफाई देते हुए कहा. अब वह वन्न की तरफ जाती उस सुनसान सड़क पर मदद चुके थे. यहाँ दोनों हे तरफ घने पेड़ लगे थे और पीछे भी थोड़ा जंगल सा हे थे. 12-13 फ़ीट चौड़ी इस सड़क पर फिलहाल तोह उन्हें कोई नजर नहीं आ रहा था और जहा तक बाकी परिवार का सवाल था वह वैसे भी उनसे कही आगे थे और शायद पहुंच भी चुके थे. ये 30 की रफ़्तार से सफर का आनंद उठाते चल रहे थे.

"क्यों, कल नहीं देखा था क्या दिन में? वैसी हे हु आज भी बस ये चस्मा लगा लिए है क्योंकि आँखें थोड़ी सेंसिटिव है.", समय को भी मजा आ रहा था ऐसे अर्जुन के हलके शब्दों में तारीफ sun-na और उसका हिचकिचाना.

"ध्यान से नहीं देखा था न. वैसे भी कल कहा आपसे ढंग से बात हो पाई थी. वैसे आप हमारे हे उधर हो न कॉलेज में? आपका कॉलेज किधर है?", अर्जुन ने बात का रुख घूमते हुए कहा.

"देव कॉलेज है हमारा, वह यूनिवर्सिटी रोड पर. कभी टाइम लगे तोह आना कॉलेज के बाद. सरकारी क्वार्टर पुलिस लाइन में है कॉलेज से 3 किलोमीटर दूर हे. काम कुछ होता नहीं है उधर तोह अगर तुम आओगे तोह ाचा लगेगा, खली समय में.", अर्जुन समझ गया था के घर और कॉलेज किधर पड़ते है. कुछ इधर उधर के बातें करते दोनों हे अपनी दिल की बातें न कहते हुए अगले 10 मिनट में हे दोनों अपने गंतव्य पर आ पहुंचे थे. गाड़ियों के लिए अलग से बनाये इस साफ़ मैदान में मोटरॉयचले खड़ा करते हुए अर्जुन वापिस वही आ गया जहा उसकी माँ और मामिया पहले से टिकट लिए उन्ही का इंतजार कर रही थी.

"चलो अब अंदर चलते है. 11-साढ़े 11 तक यहाँ से चल पड़ेंगे फिर किले की तरफ.", पूजा मामी के इतना कहते हे सभी कतार से प्रवेश द्वार से होते हुए अंदर चल दिए. एक बुजुर्ग सा व्यक्ति टिकट चेक करने के बाद उन्हें आगे का थोड़ा रास्ता समझने लगा. पथरर की बानी अंदर की सड़क कोई 8-10 फ़ीट चौड़ी थी और 2 तरफ को जाती थी. शुरू के इधर वाले हिस्से में एक पानी की छोटी झील जिसमे पाँव से चलने वाली नौका थी, का लुत्फ़ 1-2 लोग ले रहे थे और 5-6 नौका जो rang-birangi थी किनारे पर कड़ी थी. हर तरफ चेतवानी या नियम के निशाँ बने थे. कुछ दुरी पर एक रेस्ट्रा भी था खुली हरी भरी जगह में लेकिन ikka-dukka हे लोग दिख रहे थे.

"मैं तोह बोटिंग करुँगी और उसके बाद जीप से हे चक्कर लगा लुंगी जितना दिल चाहेगा.", अनीता मामी की ऐसी बात पर अर्जुन के साथ हे बाकी सब भी हंस दिए. वो किसी बची की तरह उन नौकाओं को देख रही थी. लेकिन उन्हें भी यहाँ साथ मिल गया था कंचन और ममता जी का. और न चाहते हुए भी स्वाति को उनके साथ जाना पड़ा क्योंकि एक नौका में 2 लोग हे बैठ सकते थे.

"तू चल लेगी न समय बेटी?", पूजा ने अपनी बेटी से पैदल आगे चलने के लिए पुछा. आगे रास्ता थोड़ा दूर भी था तोह उन्हें फ़िक्र थी की समय इतना चल सकेगी या नहीं.

"माँ, मैं पहली भी आई हु न. वह अलग बात है के कभी ज्यादा भीतर नहीं गए लेकिन अगर थकान हुई भी तोह चची के साथ हे जीप से वापिस आ जायेंगे.", रेखा जी भी मुस्कुराती हुई उसके जवाब से संतुष्ट थी. अर्जुन इन तीनो के साथ हे आगे बढ़ चला. पूजा मामी पर्स से कोडक का फिल्म वाला कैमरा निकलती उसमे सेल देख रही थी. उन्होंने 4 सेल अतिरिक्त भी लिए थे अपने साथ और अर्जुन उन्हें ये करता देख रहा था.

"मामी, आपको लगता है तस्वीर खींचने का ाचा शौक है?", पानी की बोतल हाथ में लिए चलता वह भी सब तरफ देख रहा था. यहाँ आगे कुछ अलग माहौल था. लोहे की साधारण तारो से तक़रीबन 2 मीटर ऊँची जाली सी दिवार बानी थी इस तरफ सड़क के दोनों और.

"यादें रह जाती है तोह मुझे ाचा लगता है उन्हें संभल कर रखना.", पूजा मामी की मुस्कान भी किसी खिले गुलाब सी हे थी. 2 बचो के बावजूद वह आज तक अपना शरीर बरक़रार किये थी. चाल में चपलता और चेहरे पर चमक.

"अर्जुन वह देख", अपनी माँ की आवाज सुनकर अर्जुन ने अपनी निगाहे बताई दिशा में लगाई तोह कोई 5-7 हिरन एक झुण्ड में मस्ती करते दिखे. भूरे रंग के उनके शरीर पर वह सफ़ेद बिंदिया और छोटे सींग. बड़े हे फुर्तीले और आकर्षक जीव लगे अर्जुन को. तार पर उंगलिया टिकाये वह उन्हें निहारने लगा साथ हे उसके एक तरफ उसकी माँ और दूसरी तरफ समय भी ये दृश्य देख रही थी. एक छोटा हिरन कुलांचे मारता उनसे थोड़ी हे दुरी से निकला और उसके हे पीछे बाकी सभी. अर्जुन ने पहले कभी ऐसा दृश्य नहीं देखा था. ये जीव अपने शरीर से 3-4 गुना ज्यादा लम्बी छलांग लगते उनकी आँखों से ओझल हो गए थे.

"सच में माँ. ये बड़े हे प्यारे है और कितने तेज भी.", अर्जुन वह से नजारा हटते हुए फिर से सभी के साथ आगे बढ़ने लगा.

"मैंने तेरे लिए उनकी फोटो उतार ली है.", पूजा मामी ने मुस्कुराते हुए अर्जुन का हाथ पकड़ कर आगे चलते हुए कहा. रेखा जी और समय अभी तक बड़े ध्यान से दोनों तरफ देखते चल रहे थे. बातें करते और प्रकृति का आनंद लेते हुए वह लोग अब उस जगह थे जहा एक तरफ पानी के तालाब थे और दूसरी तरफ जंगल. बीच में वही ठंडी सड़क.

पानी के तालाब में कुछ बत्तखे तैर रही थी और कोई 100 गज दूर लम्बे सींग वाला एक काळा रंग का हिरन पानी पीने लगा हुआ था. पूजा मामी ने एहतियात से जाली के उस खाली बाग़ पर कैमरा रखते हुए उसको 2-3 तस्वीर उतार ली. अर्जुन बड़े ध्यान से देख रहा था के ये हिरन उनसे बिलकुल भी डर नहीं रहा था. कुछ देर उन्हें देखे के बाद वह ारामे से गहरे जंगल की और चला गया.

"इनको अब आदत हो गई है इंसानो को देखने की. जो बड़े हिरन है वह ज्यादा डरते नहीं अब.", पूजा मामी ये बता रही थी और समय सड़क किनारे बने बेंच पर बैठी दूसरी तरफ कुछ ध्यान से देख रही थी. अब अर्जुन ने भी उसका अनुसरण किआ तोह वह मुस्कुरा उठा. 2 छोटे हिरन एक दूसरे के साथ हे खेल में लगे हुए थे. किसी स्प्रिंग की तरह इधर उधर फुदकते हुए वह मस्ती करने में लगे थे और उन्हें देख कर अब अर्जुन और समय मजे कर रहे थे.

"माँ, आप तोह कह रही थी के यहाँ जानवर खुले में रहते है. लेकिन यहाँ तोह हर तरफ ये लोहे की जाली है.", अर्जुन और समय जब खड़े हुए तोह उसने अपनी माँ के पास आते हुए ये कहा. उसको थोड़ी निराशा थी की जानवरो और उनके बीचे ये अवरोध था लोहे का.

"यहाँ आसपास हे सब सुरक्षा है बीटा. अंदर थोड़ी दूर पर सफारी जीप मिलती है जो वन्न के अंदर की सैर करवाती है. बस कुछ हे आगे चलने पर वह किराये पर ले लेंगे.", रेखा जी ने अर्जुन को आगे के बारे में बताया और फिर ऐसे हे चारो लोग आगे बढ़ते चल दिए. कोई 500 कदम के बाद वह इस खुले से चौक जैसी जगह पर थे जहा 3 जाली वाली जीप कड़ी थी. 50 रुपये हरेक के हिसाब से लेने के बाद सभी लोग उनपर बैठ गए और एक लकड़ी के फत्ते नुमा दरवज्जे से पार होने के बाद अब खुले जंगल के अंदर आ चुके थे. अर्जुन और समय एक सीट पर और रेखा जी पूजा के साथ उनके सामने वाली सीट पर बैठ थे, जीप के पिछले हिस्से में. ड्राइवर के साथ हे एक व्यक्ति बैठा था जो उन्हें यहाँ के बारे में बता रहा था.

"यहाँ तक़रीबन 40 से ज्यादा स्पॉटेड deer(sadharan हिरन) है और उतने हे ब्लैक बुक्क (काला hiran-Sambhar)bhi दिखेंगे. कुछ प्रजातियां जो खतरे में है जैसे चीतल, बहरहसिंघा भी यहाँ पर लाइ जाती है संरक्षण के हिसाब से. साथ हे इस 1500 एकड़ के गहरे जंगल में जंगली सूअर, बन्दर, goh-badi छिपकलियाँ भी देखने के मिलेंगे. लेकिन जो ख़ास बात है वह यहाँ की झील में आने वाले प्रवासी पक्षी है. साथ हे झील में matsya-palan और कछुआ संरक्षण भी एक ाची वजह है इस सारे prakriti-sutra को बनाये रखने में.", ये व्यक्ति किसी समाचार सुनते पत्रकार की तरह सब बता रहा था.

जब भी उन्हें कोई जानवर या ाचा दृश्य दीखता तोह वह गाडी को रोक देते. अर्जुन यहाँ अब करीब से देख रहा था इन जानवरो को. साथ हे कई बार समय के शरीर से उसका शरीर भी ाचे से टकरा जाता था. जब भी वह कुछ दिखने के लिए अर्जुन को हिलती या दोनों गाडी से बाहर आते. कोई एक घंटे बाद जीप उस झील के पास रोक कर ड्राइवर के साथ वह व्यक्ति भी उतर गया.

"यहाँ आप विश्राम कर सकते है और झील का नजारा कर सकते है. घबराने की बात नहीं है क्योंकि इस हिस्से में अगर कोई जानवर पानी पीने भी आता है तोह वह दूसरी तरफ हे आएगा. इस तरफ ये सैलानियों के बैठने के हिसाब से हे बनाई गई है.", एक सिग्रेटे जलने के बाद इतना बोलकर वो दोनों लोग एक तरफ चल दिए और अर्जुन इस विशाल पानी की झील को निहारता किनारे की तरफ आ पंहुचा.

"यहाँ तोह सीढिया बानी हुई है.?", अपनी माँ की तरफ देख कर उसने बताया. झील यहाँ से किसी नदी के घात जैसी थी तक़रीबन 50-60 गज किनारे पर. पानी के अंदर तक कुछ सीढिया, जैसा सरोवर या घा पर होता है लेकिन बाकी पूरी प्राकृतिक झील.

"हाँ बीटा. यहाँ बैठने और मछलिया देखने के लिए ये हिस्सा बाद में बनाया गया था. मैं भी यहाँ बहोत बार आई हु, मामी के साथ भी और मां के साथ भी.", रेखा जी चलती हुई उस तरफ हे आ गई. यहाँ सच में हे बड़ा सकूं था और कोई गर्मी नहीं थी. अर्जुन अपने पाँव लटका कर किनारे बैठा बगुलों को देख रहा था जो पानी में शांति से खड़े रहते फिर अचानक हे चोंच पानी में मारते कुछ खाने का उपक्रम करने लगते. मामी तोह फोटो हे उतारने में लगी थी और रेखा जी भी उधर बैठी हुई कभी मोर तोह कभी उनसे दूर कुलांचे भरते हिरणो को देखने लगती.

"पता है यहाँ आने का सबसे ाचा समय है बरसात वाला महीना. झील यहाँ ऊपर तक भरी होती है और सभी जानवर आसानी से दीखते है. अभी तोह खली खली हे यहाँ. बगुले और बतख हे दिखेंगे फ़िलहाल लेकिन तब मछलियां भी ऊपर दिखती है और बाहर से आने वाले पक्षी भी शोर मचाते ाचे लगते है.", समय अर्जुन के बिलकुल साथ बैठी कंकर पानी में मारती बता रही थी.

"मतलब हम सही मौसम में नहीं आये?", अर्जुन ने हैरान होते हुए कहा.

"तुमने खुद हे नहीं देखा के हमारे सिवा यहाँ है हे कोण? बारिश और सर्दियों में हे तोह सब बहार होते है. अभी तोह फिर भी थोड़ा बहोत दिख रहे है ये हिरन और सांभर. अगले तीन महीने ये सिर्फ रात या घने जंगल में हे आराम करेंगे.", समय ने वजह बताई तोह अर्जुन को समझ आया.

"माँ, मतलब हमे यहाँ सावन में आना चाहिए था?", अर्जुन ने थोड़ी तेज आवाज में अपनी माँ से कहा जो खुद भी कुछ दूर कड़ी झील में कंकर मारने में लगी थी. पूजा मामी यहाँ भी चुपके से उनकी तस्वीर लेने में लगी थी.

"हाँ. मौसम तोह वही होता है बेहतर. लेकिन फिर भी जितना सुकून यहाँ आने पर मिलता है उसका कोई मौसम नहीं है.", रेखा जी किसी दार्शनिक अंदाज में फिर से झील की तरफ देखते हुए बोली. एक पल के लिए अर्जुन की नजर उनके मांसल पृष्टभाग रुक सी गई. कैसे उनके वह नितम्भ हाथ की हरकत के साथ हिलते जानलेवा लग रहे थे. लेकिन अर्जुन की नजरो को पूजा ने भी पहचान लिए था और उनके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान चा गई ये देखते हे.

"हम भी आ गए", स्वाति की चहकती आवाज से सबकी तन्द्रा भांग हो गई थी. एक जीप और वही आ कर कड़ी हो गई थी और उसमे से हे स्वाति, कंचन, ममता जी और अनीता उतर कर उनके पास चली आई. फिर से सबकुछ 2 भाग में बाँट गया था. जहा साडी बड़ी महिलाये एक साथ बैठ कर बतियाने लगी थी वही स्वाति और कंचन अब Arjun-Somya के पास हे सीढ़ियों से पाँव नीचे करते हुए अपने नाव के अनुभव बताने लगी थी.

अर्जुन बहार से शांत बस उनकी बातें सुनता सामने झील और जंगल देखने में मगन था वही समय लगातार अर्जुन को निहारती और अपनी छोटी बहनो की अनदेखी करती कुछ सोच रही थी. अर्जुन को यहाँ आना ाचा लगा था लेकिन अब वह एक तन्हाई में अपनी माँ के साथ कुछ पल रहना छह रहा था जो मुमकिन न था.

कोई आधे घंटे बाद सभी दोनों जीप में सवार होते हुए बहार बने रेस्ट्रा की तरफ आ चुके थे. यहाँ भी अर्जुन सबकी नजरो से अनभिज्ञ सा कुछ देर बाद अपनी माँ को देखने लगता था जैसे वह और कोई न हो और इस प्रेमी की प्रेमिका को भी उसके होने का पता न हो. हलके फुल्के खाने के बाद सभी बहार निकल चले.

"तुम सभी किले पहुँचो हम भी उधर हे आते है.", ममता मामी ने पार्किंग में आने के साथ हे ये बात कही चारों बचो से और पहले उनकी कार, फिर स्वाति और कंचन, आखिर में अर्जुन समय को साथ लिए एक बार फिर नयी मंज़िल की तरफ चल दिए. 2-3 मिनट में हे अर्जुन जैसे रेखा जी के सम्मोहन से बहार निकलता अब अपने पीछे बैठी समय दीदी के हुस्न को महसूस करने लगा था.

"आप नाराज है क्या मुझसे?, अर्जुन की इस बात पर समय के सपाट चेहरे पर हलकी ख़ुशी आ गई थी.

"मुझे लग रहा था के ये मैं तुमसे कहूँगी. कही अनजाने में शायद तुम्हे कुछ गलत न लग गया हो इसलिए मुझसे बात नहीं कर रहे.", समय अब रहत में दोनों हाथ अर्जुन पर रखती कहने लगी.

"ऐसा तोह नहीं है कुछ. वह बस जगह ऐसी थी जैसे हम घूमने की जगह ध्यान लगाने आये हो. ऐसी जगह सिर्फ 2 हे लोगो को आना चाहिए.", अर्जुन ने आखिरी पंक्ति गहरी मुस्कान के साथ कही थी. आज उसका मैं चंचल हो चूका था, शायद ये समय का उसके साथ इतना करीब आना और फिर उसकी माँ के जिस्म की चाह हे वजह थी.

"ऐसा है तोह फिर तुम्हे यहाँ निराशा नहीं होगी. किले में महल, बॉडी, बगीचे और खँडहर बहोत है. 2 लोग ाचे से घूम सकते है.", समय को जहा पहले ये लग रहा था के वह जल्दी कर रही है, वही अर्जुन का भी उसके प्रति आसक्त होना जानकार वह खुश हो गई थी. मतलब आग दोनों तरफ बराबर लगी थी. इस ख़याल में वह कुछ ज्यादा हे उसकी पीठ से जा लगी और अर्जुन भी अपनी पीठ पर वह 2 नरम उभार दबते पा कर अलग हे उत्तेजना में आ गया था. कोई 15 मिनट में एक बार फिर दोनों हे उस जगह खड़े थे जहा एक जीर्ण हालत में ऊँची किले की दिवार थी. लेकिन इधर टिकट नहीं थी और कुछ लोग अंदर आते जाते दिख रहे थे. पेड़ के नीचे मोटरसाइकिल कड़ी करने के बाद दोनों हे उस खस्ताहाल प्रवेश द्वार से अंदर आये तोह सामने हे खुली जगह में बाकी सभी को खड़े पाया.

"आप काम से काम यहाँ तोह इन्तजार मत कीजिये. सभी ने देखा हुआ है तोह अर्जुन को मैं हे घुमा देती हु, जो पहले यहाँ नहीं आया.", समय ने हक़ से ये बात बाकि सबके सामने कही तोह जैसे 2 लोगो को छोड़कर सभी मुस्कान देते आश्वस्त हो गए थे.

"ाची बात है न. वैसे भी हमने सिर्फ ये बगीचे और महल के सामने कुछ फोटो करने थे और वापिस घर जाना था क्योंकि तुम्हारे मौसेरे nana-naani आ गए होंगे. और फिर कुछ कपडे सिलवाने के लिए मास्टरनी जी को भी बुलाया हुआ है.", पूजा जी ने सब बताने के बाद किले की इमारत के सामने सभी को खड़ा किआ और कैमरा swa-chalit सिस्टम पर करते हुए खुद भी आ कड़ी हुई उनके पास. एक तस्वीर उतारने के बाद उन्होंने फिर खुद हे 2-3 और तस्वीरें खींची.

"चलो तुम्हारा जैसा मैं करे वैसे घूम लो लेकिन समय से वापिस आ जाना.", पूजा जी ने अपनी देवरानियों और ननद की और कदम बढ़ाते हुए बच्चों से कहा. ये सभी औरत महल की तरफ बढ़ रही थी जो कुछ बेहतर हालत में था. लेकिन Swati-Kanchan फ्रूटी पीती हुई एक तरफ को ऊपर जाती बढ़ी सीढिया चढ़ती ऊपर जा रही थी.

"आओ पहले हम महल के पीछे बानी बॉडी और सरोवर की तरफ चलते है. ये जगह इतनी बड़ी है के अगर ढंग से पता न हो तोह एक दूसरे को ढूंढ़ना मुश्किल हो जाये.", समय अब अर्जुन का हाथ थामे किले के दिवार के साथ चलती हुई महल के बराबर से जा रहे रस्ते पर बढ़ गई. कही कही दीवारों पर ladka-ladki के नाम लिखे थे. कुछ लोग बगीचे के नाम पर सिर्फ घास और झाड़ियों जैसी जगह पर लगे बेंच पर बैठे थे. ज्यादातर गाँव के स्कूल या सरकारी कॉलेज के लड़के और कुछ जोड़े हे थे.

"इस जगह को सुरक्षित क्यों नहीं रखते.? हालत तोह पहले से खराब है ऊपर से लोग भी यहाँ कचरा कर रहे है.", अर्जुन दीवारों पर कोयले, काली स्याही से लिखे वह नाम, दिल के आकर के चित्र देखता हुआ समय से पूछ रहा था. दोनों अब महल की दिवार से विपरीत जाते एक गलियारे से गुजर रहे थे. ऊपर लम्बी छत्त और गलियारा तंग होने से हल्का अँधेरा सा था अभी इस जगह.

"क्योंकि अब ये जरुरत से ज्यादा खराब हालत में है. लेकिन शायद महल का कुछ जरूर होगा क्योंकि वह अब saaf-safaai होने लगी है और चौकीदार भी रख दिए गए है.", समय अभी 2 कदम आगे हे चल रही थी की सामने से किसी को आता देख दिवार से सत् कर रुक गई थी.

"भाई चिड़िया तोह घनी सुथरी ले रिहा है चोर्रा. मार न देवे कड़े भीतर ले जा के.", ये शरारती से 2 लड़के स्कूल की वर्दी में उनके पास से फब्तियां कस्ते गुजरे लेकिन अर्जुन मुस्कुराते हुए उन्हें देखने के बाद समय का हाथ थाम आगे बढ़ चला.

"ये गंवार बस यही करने आते है इधर. लोगो को परेशां करना और आवारागर्दी करना.", समय को बुरा लगा था उनकी भाषा सुनकर.

"क्यों गुस्सा करती आप? वो गए न?", अर्जुन ने नरमी से बात कहते हुए उसका हाथ थामे रखा.

"Ok.", समय ने भी शांत होते हुए कहा. दोनों अब इस पिछले हिस्से में आ गए थे जहा खुली जगह थी और एक तरफ सीढिया बानी थी. जैसे बहार वाले बगीचे के पास थी.

"ये सीढिया?", अर्जुन ने इशारा करते हुए पुछा.

"वही है जो बहार थी. यहाँ से भी aana-jaana हो सकता है लेकिन मुझे तुम्हारे साथ ये रास्ता ठीक लगा, सिवाए उन लड़को की बात के.", समय मुस्कुरा रही थी और अब उसकी बात सुनकर अर्जुन भी. दिवार की किनारे कुछ झाड़ काफी ऊँचे उग्ग चुके थे और इस काफी खुली जगह पीपल और नीम के दरख्त भी थी, एक प्राकृतिक दिवार जैसे. दोनों अब एक हद्द तक खुलने के बाद युगल की तरह हर तरफ देखते आगे चलने लगे.

"ये है बॉडी. वैसे तोह अब पूरी तरह सूख चुकी है, लेकिन 30 सीढिया नीचे है ये.", कोई 100क्ष60 फ़ीट की ये जमीन में गहरी जाती बॉडी ाची हालत में थी. सीढिया जरूर kaali-laal दिख रही थी और साथ हे 3 जोड़े भी इधर उधर कुछ दुरी पर वह बैठे बतिया रहे थे लेकिन अर्जुन ध्यान से इस जगह को देख रहा था.

"ये और भी गहरी रही होगी. देखो कैसे मिटटी से बंद किआ हुआ इसको.", अर्जुन ने अपना हाथ समय के कंधे पर रखते हुए कहा. दोनों हे नीचे देख रहे थे लेकिन समय जैसे अर्जुन के स्पर्श का पूरा लुत्फ़ ले रही थी.

"ठीक कहते हो. लेकिन ऐसा भी बहोत पहले हे किआ होगा. चलो अगर नीचे चलना है तोह ठीक है नहीं तोह पीछे सरोवर की तरफ चलते है. उधर भी सीढिया है जो ऊपर जाती है और वह से जंगल का नजारा भी आता है. किले के ठीक पीछे खाई जो है.", समय की बात पर अर्जुन भी बाकी जोड़ो को उनके हाल पर करते हुए वह से समय के साथ आगे चल दिए. इधर कई रास्ते आगे की तरफ जा रहे थे. लेकिन समय ने आखिर वाले मार्ग पर बढ़ते हुए अर्जुन का हाथ थोड़ा सख्ती से थाम लिए था. ये भी वैसा हे गलियारा था लेकिन मिटटी और घास की महक थी अँधेरे के साथ हे.

"डर नहीं लगता?", अर्जुन ने इतना हे कहा था के समय बिलकुल चिपक कर हे चलने लगी थी.

"लगता है थोड़ा. इधर सिर्फ एक हे बार आई हु, वह भी पापा और माँ के साथ. तभी तोह किसी और रस्ते को नहीं चुना.", अपनी बात कहने के साथ हे वह अर्जुन के गले लग गई.. "मेरे पाँव के ऊपर से कुछ गुजरा अभी.", वह सच में हे डर गई थी लेकिन अर्जुन के सीने में दबे उसके उभार अर्जुन को अंदर तक हिला गए थे. आज जैसे उसका सैय्याम उसके साथ न था.

"सिर्फ लम्बी घांस है इधर. डरो मत मई हु साथ में.", अर्जुन ने एक बार पीठ सहलाने के बाद अपनी बात समय की कमर के गिर्द लपेट कर आहिस्ता आहिस्ता चलना शुरू किआ. समय अभी भी हलकी घबराई हुई थी लेकिन अर्जुन का साथ उसको सुकून दे रहा था.

"एक बात कहु?", दोनों हे अब एक toote-footte सरोवर के पास आ गए थे. चारो किनारो पर गोलाकार पत्थर के खम्बे और बीच में बारिश के ठहरे हुए गंदे पानी से भरा वह सरोवर था. इधर भी ये जगह कोई 300 फ़ीट से ज्यादा चौड़ी थी जहा ये 60-70 फ़ीट चौड़ा सरोवर बीच में बना था. तभी सामने खंडहर में बने एक कमरे जैसे भाग पर अर्जुन की नजर गई.

कोई 27-28 साल का व्यक्ति एक सरकारी स्कूल की लड़की की पजामी नीचे किये हुए जैसे मिलान के लिए जबरदस्ती मन रहा था. कमीज को एक हाथ से दबाये वह लड़की दूसरे हाथ से अपनी पजामी का एक सिरा पकडे थी. ये सब अर्जुन से कुछ कदम दूर सरोवर के उस पार हो रहा था.

"क्या हुआ?", समय ने अर्जुन को ऐसे शांत खड़े देख पुछा लेकिन अर्जुन हाथ छुड़ाता बस उस तरफ चल दिए.

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"तुमने कहा था के रवि ने यहाँ बुलाया है. अब तुम ठीक नहीं कर रहे मेरे साथ. मुझे जाने दो, मैं किसी को कुछ नहीं कहूँगी.", वो लड़की अभी जैसे परिपक्व न थी लेकिन ये आदमी जैसे उसको मजबूर कर रहा था.

"रवि से ज्यादा मजे दूंगा. नखरे न कर और बस या सलवार निकाड दे. 10 मिनट बाद चली जैव नहीं तोह फिर देख मैं तेरी खबर सारे गाम में बता दूंगा.", कमीज के ऊपर से हे लड़की का छोटा सा उभार वह बेदर्दी से दबाते हुए सलवार को नीचे करवाने में सफल हो गया था लेकिन अब लड़की की आँखों में आंसू थे और वह चाह कर भी चीख नहीं रही थी.

"डर न ऋ, रवि ने थोड़ी बेरा पाटेगा. ार एक बार चस्का लाग गया तोह खुद मेरे ढोर आके छुडवावेगी तू.", आदमी का हाथ उसकी जांघो की तरफ पंहुचा हे था के जोरदार लात उसकी कमर में लगी.

"बलात्कार कर रहा है कमीने इस naa-samajh का? मुश्किल से ## साल को होगी अभी और तू खुद को देख.", अर्जुन का प्रहार इतना तेज था के सर पर खून आने के बावजूद वह आदमी पेट पकड़ कर जमीन पे लेता तड़फ रहा था. दिवार से सर ज्यादा हे जोर से तक्र्य था क्योंकि इसके लिए वह तैयार जो नहीं था.

"गुड़िया ये कपडे पहनो और बहार जाओ. डरना मैट इस जैसे आदमी से कभी और इसकी हरकत घर पे जरूर बताना.", वह लड़की भी जैसे सदमे में हे थी इस घटनाक्रम से लेकिन खुद के नंगा होने का आभास होते हे जल्दी से सलवार ऊपर चढ़ती वह बिना रुके बहार निकल भागी.

"बड़ा मजा आ रहा था ऐसे एक लड़की को मजबूर करने में तुझे? चल अब मैं जलील करूँगा तुझे और फिर खुद महसूस करना के इज़्ज़त्त जाने पर कैसा महसूस होता है.", मुँह पर ठोकर मारने के साथ हे अर्जुन ने 2-3 तेज प्रहार छाती पर किये. उस व्यक्ति की चीख इस वीराने में पहली बार जोर से गुंजी. इसके साथ हे 10 कदम पीछे कड़ी समय हैरान सी जड़ हो कर उस जगह कड़ी बस देख रही थी की क्या हो रहा है.

अर्जुन ने उस आदमी की कमीज पूरी तरह से फाड़ते हुए जिस्म से अलग कर दी थी और कुछ पल बाद हे पतलून भी जिस्म से जुड़ा हो कर अर्जुन के हाथो में थी. कच्चा नहीं पहना था जिस वजह से अब वह मादरजात नग्न अवस्था में हाथ जोड़े गिड़गिड़ा रहा था.

"भाई रे. छोड़ दे मैंने और मेरे कपडे देदे. वा छोर्री मेरी साली लागे है लेकिन मेरे तेह गलती हो गई. आइंदा कुछ न करूँगा लेकिन कपडे देदे रे.", उसकी गिड़गिड़ाहट के साथ कबूल की हुई सचाई सुनकर समय को माजरा समझ में आया के यहाँ क्या हुआ होगा और वह लड़की जो भागती निकली उसकी वजह क्या थी.

"इस नुन्नी को लिए तू मर्द बना फिर रहा था क्या? मर्द यहाँ से नहीं इंसान अपने दिल और हिम्मत से होता है. अब पड़ा रह यहाँ और तेरे कपडे सरोवर से निकल लेना अगर वह तक जा सके तोह.", अर्जुन पीछे मुदा हे था के समय नजर आ गई. वह अब अपने व्यवहार और इस माहौल पर थोड़ा झेंप गया था.

"तुमने कुछ गलत नहीं किआ. ऐसे इंसान के साथ यही होना चाहिए था.", नीचे गिरे उस आदमी को धिक्कारती समय भी अर्जुन के साथ बहार निकल चली. उसको बड़ा नाज था इस इंसान पर जिसको पहले वह पसंद कर चुकी थी लेकिन अब इस घटना से वह उसके दिल में बस गया था. लेकिन इधर अर्जुन फिर से एक बेसब्रपन महसूस कर रहा था अपने शरीर में. क्यों आज उसका शरीर ये देगा कर रहा था? क्यों आज उसका ध्यान भी काम नहीं आ रहा था.? जिस्म की चाह ने बेसबर कर दिए था उस इंसान को जिसमे सय्यम हे भरा था आज से पहले.
 
अपडेट 63

बेसबर (2)


"आपने कुछ गलत तोह नहीं कर दिए न अर्जुन को वह दवा दे कर?", अनीता बहार निकलते हुए अपनी जेठानी पूजा से कह रही थी. ममता और रेखा को आगे चलता देख यहाँ ये दोनों हे धीमी आवाज में बतियाती आ रही थी.

"बिलकुल भी नहीं. लेकिन बहोत कुछ पता जरूर चल गया उसके बारे में. अनीता, ये दवा वह इतने आराम से झेल गया के मैं खुद हैरान हु. एक बार जरूर लगा था के वह रेखा दीदी को अलग निगाहो से देख रहा था लेकिन बस सिर्फ एक पल. जहा तक मुझे इस दवा के बारे में पता है ये किसी को भी कुकर्म करने की हद्द तक भड़का सकती है तोह वो देखना भी जैसे कुछ भी नहीं था. ऐसा इंसान एक बेहतरीन औलाद देने के साथ हे लम्बे समय तक टिकने वाला हे होगा.", पूजा बिलकुल गंभीर थी इस समय वही अनीता हैरान थी उनके ये सब करने के पीछे.

"मैंने आपको बता तोह दिए हे था तोह फिर ये करने की क्या जरुरत थी. संगीता दीदी को उसने कोई 35-40 मिनट तोह रगड़ा हे था और जैसा उनकी सहेली का हाल किआ है वह देख कर हे पता चल जाता है के ऐसा हथियार जेठ जी का भी नहीं होगा. लेकिन अगर ये डाव उल्टा पड़ जाता तोह आप कैसे संभालती ये सब.?", अनीता अब पूरी तरह अपनी बड़ी जेठानी का मकसद समझना चाहती थी.

"तेरे जेठ जी का अब असर नहीं करता ऋ और वह 7-8 मिनट से आगे कभी नहीं गए. जैसा तूने बताया मुझे तोह मैं संतुष्ट होना चाहती थी की इसमें वह सब गुण है भी या नहीं जो एक परिपक्व खिलाडी में होते है. एक नादानी बहोत कुछ बिखेर सकती है अनीता और उस लड़के को लोग सिर्फ बचा कह कर छोड़ देंगे लेकिन मैं कही की नहीं रहूंगी. अगर डाव उलट जाता तोह उसको घबराहट होती और फिर kaam-jwar आने लगता. फिर मैं अपनी बेटी की जगह तुझे उसके साथ आने को कहती ताकि वह सुबह सवेरे हे तेरे kass-bal ढीले कर दे इस महल के खँडहर में. और अपनी कोशिश वही बंद कर देती.", अनीता इतना सब सुनकर जैसे सन्न रह गई थी. उसकी जेठानी की गलती की सजा उसको मिलने वाली थी, अगर कुछ गलत हो जाता. और कोनसी कोशिश में है वह जो ऐसी परीक्षा ले रही है एक जवान लड़के की.? लेकिन अब के लिए अनीता ने चुप रहना हे मुनासिब समझा. अर्जुन बुरा लड़का तोह बिलकुल न था और ऊपर से कितने प्यार से उसने संगीता दीदी को तृप्त किआ था.

"अब आ भी जाओ तुम दोनों या वही खड़े रहना है? 1 बजने वाला है पूजा.", कार के बहार कड़ी रेखा जी ने आवाज देते हुए कहा. उनकी बात पर पूजा ने हाँ में सर हिलाया और धीमी आवाज में अनीता से कहा.

"ये लड़का अब जरुरत बन गया है अनीता. ऐसा मर्द किसी भी हाल में चाहिए.", और पर्स से चाबी निकलती वह कार को खोलती अंदर आ बैठी. साथ वाली सीट पर हे रेखा जी और पीछे अनीता के साथ ममता जी के सवार होते हे वह इस सुनसान जगह से वापिस निकल लिए. जहा रेखा जी अपने बेटे को उनकी खास जगह दिखने लाइ थी, वही पूजा एक मकसद से. अर्जुन की तस्वीर लेना जैसे एक बहाना था हर वक़्त उस पर नजर रखने का. बस अनीता थी जो खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही थी किसी अनजान खेल में महज एक प्यादे की तरह. इस दौरान सबसे अलग और शांत सिर्फ ममता थी जो सिर्फ घर से बहार जैसे समय बिताने हे आई थी.

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"कल रात स्वाति के साथ सोये थे न? आज मैं तुम्हारे कमरे में रहूंगी.", समय जितनी तेजी से अर्जुन पर आसक्त हो रही थी उसको खुद को भी इसका अंदाजा न था. और इधर अर्जुन जैसे कामवेग में बह रहा था लेकिन कैसे भी करके वह सब रोके हुए था. दोनों अब उस अँधेरे गलियारे से गुजर रहे थे, एक साथ जुड़े हुए से लेकिन इस बार अर्जुन का हाथ समय की कमर पर था.

"अब तोह डर नहीं लग रहा न आपको? और वैसे भी आपका जहा दिल करे सो सकती है, मुझे तोह ऐतराज नहीं कोई लेकिन घर में किसी को हो जाए तोह?"

"वो मैं देख लुंगी. अब ऊपर चलो वो दोनों महारानियाँ दिवार पर बैठी गप्पे हाँक रही होंगी.", समय की इस बात पर अर्जुन ने मुस्कुराते हुए हाथ थाम लिए और दोनों उस जर्जर रस्ते से किले की पहली मंजिल पर आ गए. महल से परे लेकिन उसके चारो तरफ ये एक मंजिल पर घूमी हुई छत्त saaf-suthri और ाची हालत में थी. सरोवर और बॉडी भी बनेरे से नजर आती थी यहाँ से. कुछ हे दुरी पर उन्हें स्वाति और कंचन एक छड़ी दिवार पर बैठी बतियाती दिखी. वह वही थी जहा से बहार का बगीचा नजर आता था.

"देख लिए ये खँडहर? हर तरफ सिर्फ टूटी दीवारे और घास हे तोह है. अब चलो यहाँ से भूख लगी है.", स्वाति ने भी खड़े होते हुए उनकी और आते कहा. उसके साथ हे कंचन भी अर्जुन को घूरती चली आ रही थी. स्वाति जहा चहक रही थी वही कंचन के चेहरे पे ख़ामोशी और गंभीरता थी. अर्जुन ने ये भाप लिए था लेकिन वो भी सभी के साथ नीचे चल दिए. घर जाने के बाद वह किसी भी हाल में संगीता मामी के पास जाना चाहता था या कुछ भी करके उसको अपने अंदर लगी ये आग शांत करनी हे थी.

"यहाँ से घर पास हे है तोह है दीदी. आप चाहो तोह स्कूटी ले जा सकती हो कंचन के साथ.", स्वाति बड़ी मिंनट सी करती नजर आ रही थी स्कूटी में चाबी लगाती. उसने कितना सोचा था के वह अर्जुन के साथ हे आज ज्यादा रहेगी लेकिन एक पल भी नसीब न हुआ था अभी तक.

"चल ठीक है, मैं चला लेती हु इधर. लेकिन फिर दोपहर का खाना भी तू हे देने जाएगी इसके साथ?", समय ने स्कूटी के पास आते कहा और सीट पर आगे बैठ गई. स्वाति भी शोखी से मुस्कुराती अर्जुन के पीछे चली आई.

"स्कूटी न बिलकुल कम्फर्टेबले नहीं दीदी, इतनी देर चलने के बाद हिम्मत नहीं थी इसलिए मैंने कहा. कंचन तोह चलाएगी नहीं क्योंकि अगर कही स्कूटी गिरी तोह उसके शरीर पर निशान हे ना आ जाये.", मुस्कान बिखेरती वह जैसे अपनी दीदी को धन्यवाद् कर रही थी. समय भी स्वाभाविक मुस्कान से देने के बाद साथ हे आगे बढ़ चली. कंचन ने जैसे आँखों में हे कुछ इशारा सा किआ था स्वाति को लेकिन अर्जुन पीछे बैठी स्वाति का चेहरा देख न पाया था.

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"कही अकेले चल सकते है?", अर्जुन ने पीछे बैठी स्वाति से इतना हे कहा और वैसे हे मोटरसाइकिल धीमी रफ़्तार में चलने लगा. स्वाति उसकी बात सुनकर अंदर से इतनी खुश हो गई थी जैसे मैं मांगी मुराद मिल गई हो. लेकिन एक लड़की थी तोह कुछ स्वाभाविक भी था उसका शर्माना और पूछना.

"कहा अकेले चलना है? और वैसे अकेले क्यों?", लहजा थोड़ा सपाट रखते हुए वह भी अर्जुन के दिल को टटोल रही थी.

"बस तुम्हारे साथ कुछ समय एकांत में बिताना है.", अर्जुन जैसे ज्यादा बात कर हे नहीं पा रहा था.

"फिर पहले घर से मैं खाना ले लेती हु उसके बाद.", स्वाति की इस बात पर अर्जुन ने रफ़्तार बढ़ा दी थी बिना कोई और सवाल किये. उसकी जीन्स भी अब जैसे पर्याप्त नहीं थी उत्तेजना छुपाने के लिए. स्वाति भी अर्जुन को ऐसा करते देख मुस्कुरा उठी थी. कोई 5 मिनट बाद हे मोटरसाइकिल घर के बहार कड़ी थी और स्कूटी उनसे कोई आधा किलोमीटर पीछे रह गई थी.

"मैं यही खड़ा हु.", स्वाति इतना सुनते हे अंदर निकल गई और अर्जुन प्रवेश द्वार के बहार गाये को रोटी खिलाती बिंदिया को देख रहा था. वो सांवली सी भारी शरीर की औरत भी इस समय जैसे अर्जुन के दिमाग से खिलवाड़ हे करती दिख रही थी. बिंदिया ने अर्जुन द्वारा खुद को ऐसे गहराई से देखते पाया तोह वह अनुभवी औरत भी उन आँखों का मतलब समझ गई. 'नाना जैसी हरकत हे कर रहा है. बस शरीर तगड़ा है. देखती हु इसको भी दोपहर के बाद.'

"भैया, अगर बुरा न मानो तोह एक काम था.", इतना कह कर बिंदिया अर्जुन पर नजर डालती हर तरफ भी देख रही थी.

"कहिये.", अर्जुन मद्दिम चेतना से बोल पड़ा.

"आज हमारा घरवाले तोह मंडी वाली दूकान पर है नहीं तोह वह कर देते. आपको टेलीविज़न का तार लगाना आता है तोह खाने के बाद जरा हमारे कमरे के टेलीविज़न को देख लीजियेगा. ऐन्टेना सिग्नल नहीं पकड़ रहा है.", पल्लू से अपना चेहरा साफ़ करती वह अपने बड़े पपीते ब्लाउज के ऊपर से दिखती बोलने लगी.

"खेत में खाना देके आता हु थोड़ी देर में.", अर्जुन जैसे खुद हे अपने लुंड के वशीभूत था. जिस इंसान के चारो तरफ इतनी प्रेमिकाए रहती थी उसको आज बिंदिया जैसी औरत भी अपने दर्द की दवा लग रही थी. ये साफ़ था के बिंदिया पक्की खेली खाई औरत थी और अर्जुन जैसे उसका एक नया शिकार था. कुछ पल बाद हे स्वाति हाथ में बैग लिए बहार निकली और साथ हे समय स्कूटी लिए अर्जुन के बराबर से घर के अंदर चली आई.

"हम आते है दीदी खाना दे कर.", स्वाति ने जल्दी से पीछे बैठते हुए इतना हे कहा और अर्जुन ने मोटरसाइकिल की किक लगते हे खेत की तरफ वाली सड़क पकड़ ली.

"वैसे कुछ अलग लग रहे हो तुम. कुछ हुआ है क्या?", दोनों जब गली से बहार निकलते मुख्या सड़क पर आये तोह स्वाति सहज होती अर्जुन के कमर में हाथ डालने के बाद पूछने लगी.

"पता नहीं क्या हो रहा है मेरे साथ. पिछले 5-6 घंटो से शरीर में जैसे आग सी लगी हुई है. ऐसा कभी नहीं हुआ मेरे साथ पहले. और बोलते समय भी जैसे जीभ सूख रही है.", अर्जुन ने अब अपनी हालत स्वाति को बताना हे बेहतर समझा.

"तुम्हे बुखार तोह नहीं है?", स्वाति भी अब थोड़ा चिंतित हो गई थी.

"बुखार? एक हे जगह बुखार है फ़िलहाल मुझे लेकिन मैंने इतना सय्यम रखा है खुदमे की मई किसी वस्त्रहीन लड़की के सामने भी खुदको शांत रख सकता हु. आज जैसे मेरे बस में कुछ है हे नहीं.", अर्जुन अब बाई तरफ जाती उस सुनसान सड़क पर आ गया था जहा उनके खेत लगते थे.

"कहा बुखार है.?", स्वाति के इस छोटे से प्रश्न पर अर्जुन ने मुँह से कुछ कहे बिना हे अपने उलटे हाथ से स्वाति का भी उल्टा हाथ आगे करते हुए अपने जीन्स में बने उभार पर रख दिए.

"ये ऐसी हालत में पिछले 4 घंटे से है. बहोत कोशिश की, बाथरूम करने की भी जब रेस्ट्रा में खाना खाने गए थे. लेकिन कोई फरक नहीं.", अर्जुन सब बता रहा था लेकिन स्वाति तोह उस मॉटे बांस जैसे उभर पर हाथ लगते हे जैसे शुन्य हो गई थी. किसी पुरुष के अंग का स्पर्श, बेशक कपडे के ऊपर से हे किआ था लेकिन ये पहला अनुभव हे जैसे अंदर तक हिला गया था.

"क्या ये इस वजह से हे इतना बड़ा हो गया है? जरूर कुछ गलत हुआ है तुम्हारे साथ. ये ऐसा नहीं होता जहा तक मुझे जानकारी है.", स्वाति ने ाचे से उस अंग को महसूस करने के बाद हाथ धीरे से हटते हुए वापिस कमर पर रख लिए था.

"पता नहीं लेकिन कुछ गड़बड़ जरूर है और मुझे ऐसा लग रहा है के जैसे अगर मैं हल्का नहीं हुआ तोह किसी के भी साथ शायद कुछ जबरदस्ती कर सकता हु.", अर्जुन मोटरसाइकिल धीमी करने लगा था मोड़ने के लिए जहा से कल अनीता मामी उसको लेकर आई थी उस पगडण्डी पर जाने के लिए.

"यहाँ से नहीं. सीधा हे चलो थोड़ी दूर. पक्की सड़क बाई और हमारे खेत के साथ हे मुड़ेगी. फिर देखते है तुम्हे ठीक करने का उपाए.", अर्जुन निर्देशानुसार हे चल रहा था. एक जगह सड़क से नीचे मिटटी की पक्की जगह पर उनकी हे कार कड़ी थी जो कैलाश मां लाये होंगे. उसके बगल से हे 10 फ़ीट की पक्की सड़क खेत के साथ हे जा रही थी.

"बस इधर हे पेड़ के पास रोक लो. मैं खाना मजदुर को देकर आई.", इस सड़क पर 400-500 मीटर आते हे स्वाति ने एक जगह रोकने का इशारा किआ तोह अर्जुन ने वैसा हे किआ. नीचे उतरने के साथ हे स्वाति ने उसका चेहरा देखा जो सच में लाल हो चूका था. जल्दी से वह एक पगडण्डी पर चलती हुई कुछ कदम दूर हे काम करती एक महिला को बैग पकड़ने के बाद वापिस चली आई.

"सुबह शायद खाने के समय हे तुम्हारे साथ कुछ हुआ है. पूजा ताईजी ने जब खाना लगाया था तोह मैं कटोरी उठाने लगी थी. उन्होंने वह कटोरी तुम्हारे सामने रखते हुए मुझे दूसरी कटोरी वाली सब्जी परोसी थी. ये सब अजीब नहीं लगा था उस समय लेकिन ताईजी वैसी नहीं है जैसी वह दिखती है.", एक बार शांत होती वह फिर से बोली, "और रही बात तुम्हारे हल्का होने की तोह यही आगे हमारा एक कमरा है, वह अब मोटर नहीं है तोह तुम जो चाहे मेरे साथ कर सकते हो.", मोटरसाइकिल पर पीछे बैठने के बाद स्वाति ने अर्जुन को एक ब्याह से जकड़ते हुए कहा. अर्जुन बेशक अपनी ज़िन्दगी के सबसे बड़े उनन्माद के नशे में था लेकिन स्वाति का ऐसा समर्पण देखते हुए उसने मोटरसाइकिल बताये गई जगह पर रोक कर उतारते हुए कहा.

"तुमने इतना कह दिए मेरे लिए वही बहोत है. मैं कभी नशे या मज़बूरी में तुम्हारे साथ वह सब नहीं करना चाहता जो हम दोनों को एक प्यार भरे माहौल में करना चाहिए.", उस सुनसान जगह जहा तीन तरफ सिर्फ गन्ने लगे थे, अर्जुन ने स्वाति को गले लगाने के बाद उसके लबों पर गहरा चुम्बन करते हुए अपना प्यार भी जाहिर कर दिए था. अर्जुन की बातों और ऐसे प्यार करने से स्वाति की आँखें खुदबखुद बंद हो गई थी. उसने भी अपना शरीर उसके साथ लगते हुए बराबर चुम्बन करते ये स्वीकार कर लिए. 2 मिनट बाद दोनों अलग हुए तोह एक बार फिर वह घर की तरफ चल दिए थे.

"फिर इसका इलाज कैसे होगा?", शरमाते हुए स्वाति ने इतना हे पुछा था.

"वह मैं देख लूंगा. बस जब घर में जाओ तोह बता देना के मुझे कुछ काम था तोह मैं पैदल हे बहार गया हु.", स्वाति ने कोई विरोध नहीं किआ था इस बात पर.

"पूजा ताईजी की बात पर गौर करना जरूर. बेशक वह और माँ पक्की सहेली है लेकिन उन्हें समझना आसान नहीं है. और मेरा दिल कह रहा है अभी जो भी तुम्हारे साथ हो रहा है उसके पीछे जरूर वही है. शाम को शायद हम खुलकर बात कर पाएंगे.", स्वाति घर के आँगन में उतर कर बहार वाले गलियारे से अंदर चली गई थी. टाइगर गेट पर इस समय लम्बी जंजीर से बंधा एक तरफ बैठा था और बाकी सब बिलकुल शांत था.

अर्जुन के कदम अपने आप हे भैंस के बाड़े के साथ निकलते उस तंग रस्ते पर बढ़ गए. इधर आने के बाद उसको एक तरफ वो सब्जियों का बगीचा और दूसरी तरफ 2 कमरे दिखाई दिए. कमरे का दरवाजा भिड़ा हुआ देख उसने हलके हाथो सी उसको थपथपाया.

"आओ. अंदर आ जाओ.", बिंदिया इस समय एक गेहरो ब्लाउज और वैसा हे पेटीकोट पहने थी. साड़ी चारपाई के साथ वाली दिवार पर किल्ली पर लटकी हुई थी, जो अर्जुन ने अंदर आते हे देख ली थी.

"मैं टेलीविज़न बाद में ठीक करूँगा पहले मुझे वही करना है जो रात को छोटे नाना कर रहे थे.", अर्जुन की ऐसी सीढ़ी बात सुनते हे एक पल के लिए हैरान होती बिंदिया फिर कुटिल मुस्कान देती हुई दरवाजे की कड़ी लगाने लगी.

"मतलब जवानी आने लगी है तुम पर भी. लेकिन मेरे जैसी औरत से कही ज्यादा बढ़िया लड़किया मिल सकती है तुम्हे तोह फिर मैं हे क्यों.?", बिंदिया अभी उस निवार वाली चारपाई की तरफ मुड़ी हे थी ये कहते हुए की अर्जुन ने पीछे से उसको बाहों में भर लिए.

"प्यासी तुम भी हो क्योंकि नाना तोह 2 मिनट में तुम्हे खुश कर नहीं सकते और रही बात आपके पति की तोह अगर वह खुस कर सकते तोह आप नाना के साथ ये करती नहीं. अब बातें नहीं.", अर्जुन ने एक हाथ से वह भारी सतांन दबोचते हुए दूसरे हाथ से पेटीकोट का नाडा खींच दिए. इसके साथ हे बिंदिया का भरा हुआ भारी शरीर नीचे से अल्फ नंगा हो चूका था. अर्जुन का लुंड जो जाने कब से अकड़ा था वह अब उन भारी नितम्भो पर दबाव दे रहा था.

"देख लेती हु तुम में भी कितना जोश है. शरीर से हे ऐसे हो या सच में किसी औरत को खुश कर सकते हो.", बिंदिया की बात ख़तम हुई और इधर अर्जुन ने जीन्स का बटन और चैन खोलते हुए झट्ट से अपना अकड़ा हु लुंड बहार निकल लिए. इस वक़्त वह भयंकर तरीके से फूला हुआ और अकड़ रहा था. बिंदिया की पीठ को नीचे की तरह चारपाई पर झुकाते हुए अर्जुन ने पल भर के लिए इस 5 फ़ीट की भारी गांड वाली औरत के चूतडो के बीच देख और फिर उस लाल रंग की बहार की तरफ निकली हुई फांखौ के बीच अपना वह कलाई जैसा मोटा लुंड टिका दिए.

"मुँह में कपडा ठूस लो.", अर्जुन ने हलकी चेतावनी दी थी इस पल में. लेकिन बिंदिया ने ना में गर्दन हिलाते हुए हँसते हुए कहा.

"जाने दे ऐसे हे. देखु जरा कितना जोर है... आह्हः.. मययययआआआ..

बिंदिया की बात ख़तम होते हे अर्जुन ने दोनों चूतड़ फैलते हुए एक भीषण धक्का जड़ दिए था उसकी पहले से चूड़ी हुई छूट में. लेकिन ऐसा लुंड तोह बिंदिया ने सपने में भी नहीं लिए था आज से पहले. छूट के कपाट फाड़ते हुए एक हे धक्के में लुंड 6 इंच अंदर जा बैठा. अर्जुन जैसे छूट की गर्माहट अपने लुंड पे महसूस करते हे बेलगाम घोड़े सा हो गया था. ब्लाउज के हुक तोड़ता वह उस कपडे को बिंदिया के शरीर से अलग करते हुए अब उसके लटके पपीते कास के दबोच कर फिर से तेज झटका लगा बैठा. बिंदिया इस धक्के को सेहन न करती हुई नीचे की तरफ गिरने लगी थी लेकिन अर्जुन ने वैसे हे उसको मजबूती से थामे जड़ तक लुंड घुसाए हुए हे उन नरम चुचो का मर्दन शुरू कर दिए था.

बिंदिया की छूट ने खून की बुँदे टपका दी थी और जैसे वह ये सेहन न करती हलकी मूर्छित हो गई थी. लेकिन अर्जुन ने इसकी परवाह न करते हुए दोनों निप्पल मसलते हुए आधा लुंड बहार खींचा और फिर थोक दिए. 5-6 करारे धक्के छूट में लगते हे बिंदिया को जैसे होश आया.

"दिया रे हुंका कोई बचा लो.. आह.. मार दिए रे सांड ने हमर बुर फॉर दिए.", वो दर्द में रोने हे लगी थी लेकिन अर्जुन उन्माद में पागल हुआ बिंदिया की गांड पर धक्के लगता जितना मुमकिन था उतना लुंड छूट में भरने में लगा था. ढीले चुके कोई 10 मिनट बाद हलके सख्त होने लगे थे और बिंदिया भी दर्द के साथ मजे की मिली जुली सीत्कार ले रही थी.

"मुफ्त का माल समझ कर हमारी बुर फॉर दी तुमने तोह. इतना बड़ा लौड़ा कोई ऐसे डालता है क्या? आह.. लेकिन पहली बार पेट तक कुछ महसूस हुआ.. मया ऋ जानवर है यह लड़का.", अर्जुन ने अब बिंदिया को चारपाई पर पीठ के बल बिछा दिए था. उसकी भारी मोटी जंघे फैलते हुए एक बार फिर उसने एक भरपूर धक्के से समूचा लुंड उसकी छूट में उतार दिए.

"आह.. भीतर दर्द करता है रे. आराम से करो कही नहीं जा रही मैं.", वह निवार का पलंग chu-chu की आवाजे कर रहा था और बिंदिया के मॉटे दूध दबा कर पीते और निचोड़ते हुए अर्जुन इस मुद्रा में पूरा जड़ तक लुंड उसके गर्भ तक पंहुचा रहा था. बिंदिया के पाँव कांपने लगे थे लेकिन उसकी परवाह किये बिना हे अर्जुन लगातार चुदाई करता रहा.

"हम हो गए हैं.. आठ.. तनिक रुको जरा. फट गई है और दर्द भी हो रहा है.. ाह्ममम..", बिंदिया स्खलित होते हुए अपनी टाँगे कमर पर लपेट कर कर अर्जुन को रोकने लगी थी लेकिन वह निरंतर चुदाई में लगा रहा.

सांवले चुके भी दर्द से अकड़ने लगे थे, निप्पल सूजन से दोगुने होने लगे लेकिन अर्जुन जुनूनी तरीके से बिंदिया जैसे खेली खाई औरत की छूट को फैलता रहा.

"ओममममम.. मैया.. छोटे पंडित तुम इंसान नहीं हो आठ.. हमारी चूचिया तोह बक्श दो.", दर्द में भी बिंदिया को ऐसा मजा न मिला था. वह घोड़े सा लुंड जैसे उसको एक नयी दुनिया की सैर करा रहा था. उसके चुचो में इतना कड़ापन तोह शादी की पहली रात न आया था जितना आज अर्जुन के हाथो और मुँह में लेने से आया था. अर्जुन का उसको ये टाँगे चौड़ाई छोड़ना और गांड के उस अनछुए भाग में ऊँगली करना बिंदिया की जान ले रहा था, मजे से.

"अननननहहहहहहह", एक हुंकार के साथ अर्जुन ने बिंदिया की टाँगे 150 डिग्री के कोण तक खोलते हुए तूफानी गति से 10-12 धक्के लगाने के बाद जड़ तक अंदर भरते हुए उसकी फटती छूट को अपने वीर्य से भरना शुरू कर दिए. आज उसको अपने सखलन में भी दर्द और अलग सा हल्कापन महसूस हो रहा था. कितनी हे देर तक वह छूट में पिचकारियां लगता रहा. जब वीर्य छूट से बहार टपकने लगा तोह लुंड भी बहार निकलते हुए अर्जुन ने आखिरी 2 पिचकारियां बिंदिया के पेट पर मारी और बिना कुछ कही सुने चैन बंद करने के बाद वह दरवाजा खोल बहार वाले आँगन के बाथरूम में घुस गया. एक घंटे चली इस चुदाई में बिंदिया अनगिनत बार चरम पर पहुंची थी और छूट फटने के दर्द के साथ हे भारी थकान से वह नंगी हे बिस्टेर पर पड़ी सो हे गई.

अर्जुन ने 2 बाल्टी पानी अपने बदन पर डालने के बाद तोलिये से खुद को साफ़ किआ और कपडे पहन कर अंदर चला आया. 4 बजने को थे अभी और यहाँ आँगन में सिवाय अनीता मामी के कोई न दिखा.

"मेरे कमरे में बैठो तुम, मैं हमारा खाना लेकर वही आ रही हु.", अनीता मामी की आवाज में स्पष्ट निर्देश था लेकिन आवाज संतुलित हे थी. अर्जुन अभी कुछ बेहतर महसूस कर रहा था बेशक उसको अभी कुछ देर पहले हुई घटना का सही जायजा नहीं था. मामी की बात मानते हुए वह उनके कमरे में चला गया. नरम बिस्टेर पर तक लगाए वह आँखें बंद किये सुबह उठने के बाद से हुए सरे घटनाक्रम को स्मरण कर रहा था.

कैसे पूजा मामी ने खुद हे उसको स्टोर में राखी मशीन और कसरत के बाकी सामान के बारे में बताया था. फिर आज उन्होंने ने हे दूध और लड्डू लाकर दिए थे. कैसे खाने के समय वह उसका पूरा ध्यान रख रही थी. समय दीदी को उसने आज घर से निकलते समय हे एक अलग नजर से देखा था, जो उसके स्वाभाव से बिलकुल अलग था. ये तोह ाची बात थी की समय दीदी खुद उसकी तरफ आकर्षित थी अन्यथा कुछ बुरा जरूर हो जाता. इस सारे घटनाक्रम में अगर देखा जाये तोह वह खुली हवा और शारीरिक श्रम के समय वह कुछ हद्द तक बेहतर रहता था लेकिन लिंग में उठान पूरे समय बरकरार रहा था. रही सही कसार बिंदिया के साथ पूरी हो गई जब उसने खुद हे अर्जुन को न्योता दिए था अपने कमरे में आने का. आखिरी बातें उसको जो सही से याद थी वह बिंदिया का उसको उकसाना, फिर उसके कमरे से निकल कर बाथरूम जाना और अब यहाँ आना.

वह तक़रीबन एक घंटे से अधिक बिंदिया के कमरे में था जिसकी वजह से अभी उसके लिंग में सुबह से बरक़रार अकड़न न थी लेकिन कही कही हलकी उत्तेजना जरूर महसूस हो रही थी.

"कर आये फिर बिंदिया का काम तमाम? बड़े निर्दयी नहीं थे कल रात के मुक़ाबले अभी कुछ देर पहले उस बेचारी के साथ.?", कमरे के दरवाजे को बंद करती अनीता मामी ने खाना पहले बिस्टेर पर रख दिए था. एक हे प्लेट में वह दोनों के लिए खाना लगा लाइ थी.

"मैं आपसे कुछ जरुरी बात करना चाहता हु.", अर्जुन ने सब बातें नजरअंदाज करते हुए अनीता मामी को बिस्टेर पर बैठने का इशारा करते हुए कहा.

"हाँ. तुम मेरे साथ कैसी भी बात कर सकते हो और यकीन रखो वह मेरे तक हे सिमित रहेगी. फिर मैं भी तुम्हे कुछ बताना चाहती हु.", अनीता मामी ने अर्जुन की बगल में आकर बैठते हुए कहा. उनके चेहरे पर हलकी मुस्कान के साथ हे शर्म भी थी. अर्जुन ने भी वह देख लिए था लेकिन वह अभी पहले बात करना चाहता था.

"वजीर है पूजा मामी. और इस सबमे ममता मामी बिलकुल भी नहीं है जहा तक मैं समझता हु. बेशक उन्होंने अगर आप लोगो से मेरा जीकर किआ होगा तोह वह एक मजाक में हो सकता है या उन्होंने ऐसा इसलिए कहा हो के मेरे शरीर या व्यक्तित्व के बारे में माँ से कुछ सुना हो. लेकिन पूजा मामी एकदम अलग हे खेल खेलने में लगी है जिसका पता मुझे नहीं लगता किसी को होगा.", अर्जुन गौर से अनीता मामी के चेहरे को देखने लगा जहा कुछ भाव aa-jaa रहे थे.

"मैं यही बात करने वाली थी तुमसे. ममता दीदी और पूजा दीदी तुम्हारी माँ से ाचे से खुली है और इनकी बात लगभग हर हफ्ते होती हे रहती है. आज भी पूजा दीदी के हे घर से परिवार वाले आये हुए है तोह तुम्हारी माँ और पूजा दीदी उन्ही के साथ आराम कर रही है. पूजा दीदी के पिताजी मंडी गए हुए है हमारी दूकान पर. लेकिन जो बात मुद्दे की है वह ये की उन्हें कुछ अलग हे तरह की दिलचस्पी जगी है तुम में. आज शायद उन्होंने कोई दवा भी दी थी सुबह खाने के वक़्त.", अर्जुन के चेहरे पर हलकी नाराजगी चा गई थी इतना सुनकर. लेकिन वह पूरी बात jaan-na चाहता था.

"उन्होंने मुझे दबाव माँ ला दिए था ये कहकर की अगर मैंने तुम्हे कुछ भी कहा या बताया तोह वह घर में तुम्हारी और संगीता दीदी वाली घटना बता देंगी, जिसमे सीधा नाम वह मेरा हे लेंगी. लेकिन जब दोपहर में हम किल्ले से बहार निकल रहे थे तोह उन्होंने मुझे उस दवा के बारे में बताया के वह कैसी बाला है और इंसान को किस हद्द तक उकसा या उत्तेज्जित कर सकती है. वो ये सब इसलिए कर रही थी की अगर कालको तुम उनके साथ सम्बन्ध बनाओ तोह कितने सेयंम और दिमाग से काम लोगे.", अर्जुन की नाराजगी जैसे choo-mantar हो गई थी ये बात सुनते हे. आँखों में अलग हे चमक उतर आई थी लेकिन साथ हे एक नया सवाल भी. पूजा मामी का मकसद?

"अब आप बस निश्चिन्त रहिये और ज़िन्दगी का मजा लीजिये. उन्हें मैं देख लूंगा अपने तरीके से.", अर्जुन ने अपने हाथ से एक निवाला उन्हें खिलते हुए कहा. अनीता मामी जैसे अर्जुन पर जान हार गई उसका ये अंदाज और प्यार देख कर. कितने आराम से उसने ये भी भुला दिए था के वह जानती थी दवा के बारे में लेकिन बता नहीं सकीय. वो निवाला एक अमृत का स्वाद दे गया था. फिर उन्होंने भी प्यार से अर्जुन को अपने हाथो से खाना खिलाया और बर्तन उठा कर बहार निकल आई. एक बार घर का जायजा लेने के बाद जब सभी कमरे शांत दिखे तोह फिर पानी और गिलास लेकर अपने कमरे में वापिस आ गई.

"दरवाजा बंद कर दीजिये न मामी. अभी तोह वैसे भी 5 साढ़े 5 तक ये लोग उठने वाले नहीं. 3 बजे खाना खाया होगा और फिर घूमने की थकान होगी.", अर्जुन की ऐसी बात पर नजरे झुकाती अनीता ने चिटकनी लगा दी और बिस्टेर के किनारे पर सिमटी सी बैठ गई.

"अभी कोई नाराजगी है क्या?", अर्जुन ने उनका हाथ अपने हाथ में लेते हुए उन्हें नजदीक लाते हुए कहा. जवाब में अनीता ने सिर्फ "ना" में अपनी गर्दन हिलाई. शरीर के रोये खड़े हो गए थे लेकिन दिल भी यही चाहता था के अर्जुन उन्हें अपने आगोश में भर ले.

"वैसे तोह कितना बोलती हो और जाने क्या क्या जुगत लगाती फिरती हो, अभी जब हमारे पास अपना कुछ समय है तोह दूर बैठी हो आप.", अनीता पास आने के बावजूद पाँव मोड हुए बिस्टेर को हे देख रही थी. लेकिन अर्जुन की ऐसी बात सुनकर अपनी बड़ी काली आँखों से प्यार से अर्जुन को निहारने लगी. Chui-mui सी अनीता अभी तक एक नवयौवना थी और कच्ची उम्र में अर्जुन एक बलिष्ट शरीर के साथ परिपक्व अनुभवी हो चूका था.

मामी को ऐसे प्यार से देखते पा कर अर्जुन ने उन्हें अपने सीने पर खींच लिए. खुद वह पाँव पसरे हुए बिस्टेर से तक लगाए था. अनीता किसी हलकी गुड़िया सी अपने ऊपरी भाग समेत अर्जुन के आगोश में आ चुकी थी.

"दिन का समय है. कोई गलती से भी आ गया तोह?"

"तोह क्या मैं अपनी मामी के पास उनके कमरे में भी नहीं आ सकता.?", अर्जुन ने उनके शरीर की महक लेते हुए हलके से गोरी गर्दन पर अपने होंठ रख दिए. इतने में हे अनीता की आँखें बंद हो चुकी थी और एक हलकी सिसकी मजे की उनके मुँह से फुट गई.

"कर तोह नहीं रहे हो भांजे वाली हरकत.", थोड़ा नटखट होते हुए अनीता ने भी अर्जुन का साथ देना शुरू कर दिए था. वैसे भी एक कुंवारी ब्याहता थी वह पिछले 3 साल से. अर्जुन का उसको ये प्यार के लम्हे देना एक नए जीवन सामान था उसके लिए.

"अब वही करता हु फिर मामी. मामी में भी माँ आता है न तोह भांजा वही करेगा जो छोटा बचा अपनी माँ के साथ करता है.", अर्जुन की शरारत भरी बात सुनकर अनीता की छूट तक एक गुदगुदी सी दौड़ गई थी. वह समझ गई थी की अर्जुन अब क्या करने वाला है. अगले हे पल अर्जुन के दोनों हाथो में अनीता के मौसम्बी के अकार के वह दोनों सतांन आ चुके थे. ना में गर्दन हिलती वह मुस्कुरा रही थी और अर्जुन भी उनकी ये swikrati-samarpan देखते हुए ब्लाउज के ऊपर से हे उन्हें मुँह में भरने लगा.

"आह्ह्ह्हह.. प्यार से. रात हे इन्हे किसी मर्द का पहला स्पर्श मिला था. अब एकदम से इतना प्यार मत देना की फिर रहना मुश्किल हो जाये.", उनकी तड़प साफ़ जाहिर थी और जाहिर था ये भी की कही कल अर्जुन ने प्यार करना हे छोड़ दिए तोह.

"ऐसा नहीं होगा. बेशक साल में 10 बार मिले या 20 बार, लेकिन आपको उतना सुख जरूर मिलेगा जितना आपको खुश रख सके.", स्टैनो को छोड़कर उनके चेहरे की तरफ देखते हुए अर्जुन ने कहा और फिर अपने होंठो में उनके नरम गुलाबी होंठ भर लिए. अनीता तोह जैसे सपने में थी क्योंकि आज उसको वो सब एक एक कर मिल रहा था जो कभी न मिला था. अब अर्जुन के हाथ ब्लाउज को खोलते हुए भी जैसे सुख दे रहे थे अनीता को. इन पर कैलाश का हक़ था हे नहीं कभी लेकिन आज इन्हे इनका मालिक मिल चूका था. कुछ हे देर में वह ऊपर से निर्वस्त्र अर्जुन की गॉड में बैठी थी. नाजुक सी अनीता जैसे पूरी तरह चुप्प सी गई थी. अर्जुन उन खूबसूरत ांचुहे चुचो को निहार रहा था जो माधयम आकर के बिलकुल तने उसकी हथेली के ऊपर थे. Laal-gulabi चुचुक किसी 18 बरस की लड़की से और चमकदार.

अर्जुन की जीभ अपने निप्पल पर महसूस करते हे अनीता ने जोर से अपनी टाँगे अर्जुन की कमर पर कस ली थी. उसके शरीर का शायद यही भाग सबसे संवेदनशील था जिसको चूमने भर से अनीता को एक छोटा सा चरम सुख प्राप्त हो गया था. इधर अर्जुन ने भी उनकी कोमलता को समझते हुए बड़े प्यार से चुस्काकना शुरू किआ. साथ हे वह दूसरे को हलके हलके दबते हुए निप्पल ऊँगली से कुरेद रहा था.

"उम्म्म्म.......... ये तुम्हारे हे है. बस ऐसे हे प्यार देना. मेरा शरीर सेह नहीं पायेगा तुम्हारे हाथो की सख्ती. आह.. मई अधूरी हु अर्जुन.", उसका सर सहलाती एक हाथ से वह खुद हे साड़ी की गाँठ खोलती कपडे ढीले करने लगी थी. अब जैसे कोई डर, शर्म या संकोच नहीं था अर्जुन को लेकर. अर्जुन भी उन गोर उन्नत्त स्टैनो को भरपूर प्यार देते काफी हद्द तक मुँह में भरते हुए पी रहा था. एक पल के लिए अनीता ने अर्जुन को रोका तोह अर्जुन भी समझ गया के मामी अपने निचले वस्त्र भी ढीले कर चुकी है. उन्हें पीठ के बल बिस्टेर पर करने के बाद खुद हे अर्जुन ने उन्हें पूर्ण निर्वस्त्र कर दिए. इस पल में अनीता ने अपनी दोनों जाँघे आपस में भिड़ा ली थी, छूट को छुपाते हुए.

उनकी इस हरकत को देख अर्जुन ने भी मुस्कुराते हुए अपने कपड़ो की तिलांजलि दे दी. अनीता उस भयंकर लिंग को ध्यान से देख रही थी जो अर्जुन की मजबूत जांघो के बीचे सर उठाये खड़ा था.

"आपने तोह पहले हे मैदान साफ़ किआ हुआ है.", अर्जुन ने मामी के ऊपर झुकते हुए एक बार उनके चिकने पेट के निचले भाग को देखा और फिर गर्दन के नीचे एक हाथ डालते हुए उनके होंठो को पीने लगा. दूसरा हाथ पेट को सहलाता हुए अब उनकी नरम और ांचुडी छूट के मुहाने घूम रहा था.

"ये भी अभी करोगे क्या? हमारे पास आधा हे घंटा है. सोच लो कर पाओगे? नहीं तोह जैसे तुम चाहो.", अनीता का बिलकुल मैं नहीं था के अर्जुन अभी रुके लेकिन घडी दिखा रही थी की पौने पांच हो चुके है.

"देखा जायेगा. पहले आप कोई क्रीम तोह दीजिये या फिर मैं वह अपना मुँह लागू?", अर्जुन की ऐसी बात सुनते हे अनीता शर्म से दोहरी हो गई.

"नहीं. वह मुँह नहीं. क्रीम यहाँ राखी है इस शीशे के पास.", इशारे से बीएड के साथ लगे आईने की तरफ क्रीम दिखते हुए उन्होंने कहा तोह अर्जुन ने हाथ बढ़ा कर वह गोल डब्बी उठा ली. डब्बी खोल कर 2 उंगलिया ाचे से क्रीम में भरते हुए वह फिर से उनके ऊपर आ लेता.

फूली हुई छूट की उस नरम दरार को खोलते हुए वह क्रीम से मालिश करता उनका एक सतांन निरंतर पी रहा था. इधर अनीता बिस्टेर पर तड़प रही थी अर्जुन की उंगलिया छूट के छेड़ मर महसूस करने के बाद.

"मामी, आपने तोह जैसे कभी ऊँगली भी नहीं की लगता है."

"धत्त.. ये सब नहीं करती मैं."

"फिर अगर कभी गरम होती है तोह?"

"उम्म्म.. आह्हः.. एक दो बार सिर्फ हाथ से रगड़ा है लेकिन ये सब नहीं ाचा लगता. आज तुम्हारा यु करना.. उम्मम्मम मजा दे रहा है."

इधर जब छूट का छेड़ ाचे से चिकना हो गया तोह अर्जुन ने अपने लुंड को भी ाचे से क्रीम लगते हुए चिकना कर लिए. ये पल था जब अनीता को डर महसूस हो रहा था.

"ये अंदर कैसे जायेगा? मेरी वह तोह इतनी संकरी है के कभी ऊँगली नहीं गई और तुम्हारा ये तोह बेलन से भी मोटा है."

"मामी, दर्द होगा. लेकिन सिर्फ एक बार होगा. मैं झूट नहीं कहूंगा की प्यार से करूँगा, पता नहीं चलेगा. पहली बार में दर्द अवश्य होगा लेकिन छूट ऐसी जगह है जो कितने भी मॉटे लुंड को अपने अंदर झेल लेती है, थोड़े कष्ट के बाद.", खुद को पूरी तरह उनकी जांघो के बीच लाते हुए अर्जुन दोनों स्टैनो को मुट्ठी में लिए था.

"दीदी तोह अभी तक चल नहीं पाई...", सिसक पड़ी अनीता जब उसकी नन्ही छूट पर वह मोटा सूपड़ा अर्जुन ने ऊपर नीचे फिरते हुए छूट के छेड़ पर भिड़ाया.

"वह समय कुछ और था मामी, यहाँ कोई बद्तमीज नहीं हैं.", होंठो को दबाते हुए अर्जुन ने अनीता की छूट पर पहले हल्का दबाव बनाते हुए सूपड़ा ाचे से जमाया. इस गरम एहसास से दोनों हे एक पल के लिए उत्तेजना की परकाष्ठा पर आ पहुंचे थे लेकिन अगले हे क्षण अर्जुन ने एक करारा धक्का लगते हुए उस नरम छूट को उसके सीमा से परे तक फैलते हुए 4 इंच लुंड अंदर बिठा दिए. ये पर्याप्त था योनि पटल को भेदने के लिए और अनीता की आँखें भी छूट की तरह चौड़ी हो गई थी.

"बआहर निकालूऊओ..", आँखें दबदबा गई और जैसे हे अर्जुन ने उन्हें सांस लेने के लिए होंठो को आजाद किआ, अनीता की दर्द भरी आवाज निकली. बेशक दर्द असहनीय था लेकिन आवाज धीमी और पीड़ा से भरपूर थी. शरीर तड़प गया था इस मूसल के अंदर जाने से.

"बस मामी. थोड़ी हिम्मत रखो आप.", उनके दूध दबाते हुए अर्जुन आराम से उनके गाल और गले को चूमते हुए दर्द काम करने की चेष्टा करने लगा. स्वाभाविक था अनीता का यु दर्द में तड़पना. जिस छूट में ऊँगली न गई हो वह एक माध्यम आकर का टमाटर जितना मोटा सूपड़ा फस्स चूका था.

लगातार उन नरम स्टैनो के मर्दन और कामुक चुम्बन से अनीता 5 मिनट में हे कुछ ठीक महसूस करने लगी थी लेकिन जो हे अर्जुन ने हल्का सा लुंड बहार निकला, हलकी सी दर्द की लहर फिर से शरीर में भर गई.

"आह.. ये अंदर गया हे कैसे? माहहहहह.. बहार निकलते हुए भी दुखता है.", आँखों को बंद किये वह अगले धक्के के लिए तैयार कर रही थी लेकिन अर्जुन ने ऊपर लेट कर बस 2 इंच लुंड हे उस कासी छूट में आगे पीछे करना शुरू कर दिए. ये घर्षण बेशक दर्द दे रहा था लेकिन वो उतना हे अंदर जा रहा था जितनी छूट खुली थी पहले धक्के से. इस तरह आराम से चुदाई करने से 5 इंच तक लुंड जगह बना चूका था लेकिन इस से आगे नहीं जा रहा था.

"उम्म्म.. आह्हः.. अर्जुनंन.. दर्द के साथ ाचा भी लग रहा है थोड़ा.", उनकी बात को अनसुना करते हुए अर्जुन बस उनके वह पतले निप्पल चूसता निरंतर कमर हिलता रहा. जब फिसलन भरपूर हुई तोह थूक से गीले हो चुके निप्पल को मुँह से निकल उसने अपनी मामी को देखा.

"बस अभी फिर एक बार और दर्द होगा."

"अभी हे क्यों? मुझे ाचा लग्न शुरू हुआए..", बात को ख़तम करते हुए अर्जुन ने उनके होंठ दबाये और दोनों हाथो से उनके टाँगे फैलते हुए सुपडे की जड़ तक लुंड बहार निकल एक भरपूर वार इस तजा चूड़ी छूट पर कर दिए. जहा संगीता मामी की छूट में 7 इंच के बाद सुरंग ख़तम हो गई थी वही अनीता मामी की छूट में उसका वह मोटा डंडा 8 इंच पार करता हुआ उस नरम दिवार से जा लगा जहा गर्भाशय शुरू होता है. लुंड nut-bolt की तरह छूट में फिट हो गया था और अनीता की आँखों में लगा काजल आंसुओ के साथ गालो से नीचे आ गया था.

"मामी, अब आप लड़की नहीं रही.", अर्जुन ने उन्हें अपनी बाहो में लेते हे जोरदार तरीके से चूमना शुरू कर दिए था. उनके होंठ चूसते हुए वह उनके mulayam-sakht अनार अपनी छाती से दबाता थोड़ा थोड़ा लुंड अंदर बहार चलने लगा.

अनीता को असीम दर्द के साथ हे इस बात का संतोष था की अर्जुन ने सिर्फ खुद का आनंद नहीं लिए था. वो बराबर उनकी परवाह कर रहा था. छूट के नाजुक भीतर की दीवारों पर सुपडे की रगड़ अर्जुन को मजे की इन्तहा पार करा रही थी लेकिन अभी कुछ समय था उसके पास..

"अर्जुन, सच में तू तेरी उम्र की किसी लड़की को इस से मार हे सकता है.. आह्ह्ह्हह.. जल्दी ख़तम कर उम्म्म..", आधा लुंड जब छूट में सरपट दौड़ने लगा तोह अनीता की छूट में दर्द काम था और चेहरे पर लाली ज्यादा. उनकी लचकदार जाँघे ऊपर उठाते हुए अर्जुन छूट की अंतिम हद्द तक्क अपना लुंड मार रहा था. हर धक्के पर हिलते वह नरम दूध और सिसकती अनीता इस जोश को और बढ़ा रहे थे. छूट ने एक बार फिर से लुंड को अंदर जकड़ना शुरू किआ तोह लुंड भी मस्ती से फूलने लगा.

"मामी, मजा आ रहा है न आपको?", अर्जुन के धक्के उनके कैसे कूल्हों से टकराते ठप्प ठप्प की आवाज कर रहे थे. और जड़ तक अंदर बहार जाता लुंड चिकनाई की वजह से अलग हे गीत गुनगुना रहा था.

"आठ.. मजा तोह सच में आ रहा है.. आह लेकिनननन. जाएं निकल रही haii.....re..", अर्जुन को कास के अपने सीने से चिपकाती अनीता ने अपने नाख़ून जोर से उसकी पीठ में गदा दिए थे. इधर लुंड ने भी गहराई में रुकते हुए लगातार अपना माल खाली करना शुरू कर दिए था. गरम वीर्य की धार से अंदर की सिकाई होते हे अनीता का चरम और भी बढ़ गया था. नंगी टंगे अर्जुन के पिछले भाग से चिपक कर जैसे उसको हे अंदर करने की नाकाम कोशिश कर रही थी.

"उम्म्म.. आह.. गई री..", निढाल होती वह कुछ पल के लिए बेसुध हे हो गई थी, इतना मजा सम्भोग करने से मिलता होगा ये उन्हें सपने में भी भान न था. अर्जुन भी अपना जोश छूट में खाली करने के बाद उनके ऊपर हे पड़ा था. 50-55 किलो की वह नाजुक युवती सी अनीता अपने ऊपर इतने भारी शरीर को भी बड़े आराम से लिए अपना प्रथम सम्भोग सुख याद कर रही थी.

"मामी, सच कहु तोह दिल नहीं भरा अभी. लेकिन अभी कुछ हो भी नहीं सकता ये पता है. पर घर जाने से पहले एक बार आपको तबियत से जरूर करूँगा वह भी खुले आसमान के नीचे. इस बार आपका ये पिछले हिस्सा तोह मुमकिन नहीं लेकिन जब भी अगली बार मिलूंगा तोह इसको भी तैयार रखना.", अर्जुन अपने कपडे पहनते हुए अनीता मामी से कह रहा था. छूट से सफ़ेद वीर्य के साथ हे हल्का लाल पानी भी बेहटा हुआ चादर को भिगो रहा था. अपने कपडे पहन ने के बाद अर्जुन ने हे उनकी छूट साफ़ करते हुए उनके अंतःवस्त्र उन्हें पहनाये और ब्लाउज भी.

"अभी तोह इसका ऐसा हाल कर दिए है. ऊपर से ऐसी जगह करने को कह रहे हो जहा सोचना भी पाप है.", शर्माती सी वह अभी तक टाँगे फैलाये लेती थी.

"इस बार मुँह नहीं लगाया मैंने वह आपके. अगली बार जरूर करूँगा बस अगला मिलान खुली छत्त पर होगा, नहाने के बाद.", उनके होंठ चूमता वह उन्हें बाहों में लिए खड़ा हो गया. पास हे राखी टेबल पर उन्हें बिठाते हुए वह चादर बदल कर फिर से उन्हें बिस्टेर पर लिटाते हुए अर्जुन ने दोनों दूध हलके से दबाये.

"िसष्ठ.. मैं नहीं भरा इतना करने के बाद?", नखरे से उन्होंने अर्जुन को देखा.

"मैं नहीं भरेगा. और हाँ, को पेनकिलर ले लीजियेगा और समय मिले तोह सोने से पहले सिकाई. वैसे थोड़ा चल फिर लीजिये कमरे में नहीं तोह टाँगे जाम हो जाएँगी. अभी मई ऊपर चलता हु फिर देखूंगा पूजा मामी मेरा शिकार करती है या मैं उनका.", आँख मारता वह बहार निकल आया दरवाजा ढाल कर.
 
अपडेट 64

आने वाला कल


अनीता को कमर के निचले हिस्से में ये नया दर्द अलग हे मजा दे रहा था. कितने वर्ष बाद उसका कौमार्य भांग हुआ था, वह भी दिन के उजाले में और एक ऐसे इंसान के साथ जो उसका पति न था. लेकिन अर्जुन की एक गहरी चाप दिल में छप्प चुकी थी अनीता के. उसके लुंड से बड़ा दिल था और उतना हे बेहतरीन था अर्जुन प्यार के मामले में.

'हर रोज ऐसा दर्द बर्दाश्त कर सकती हु अगर इतना प्यार मिले तोह.', छूट से रिश्ते वीर्य को साफ़ किये बिना हे वह बिस्टेर पर लेती खुद से कह रही थी. इस सम्भोग के बाद दर्द के हे साथ चेहरे पर एक अलग हे तेज प्रज्वल हो आया था अनीता के. फिर कुछ निर्णय लेने के बाद लड़खड़ाती सी वह कड़ी हुई और दवा के डिब्बे से एक गोली खाने के बाद कमरे में टहलने लगी.

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"बीटा, एक बार मेरे साथ सरोज के घर चलेगा? और हाँ घर से ऋतू का फ़ोन आया था तेरे लिए दोपहर में, कल भी कोमल और तेरी दादी ने फ़ोन किआ था. एक बार बात भी कर लेना.", अर्जुन नाहा के बिस्टेर पैर लेता अब बेहतर महसूस कर रहा था. उसके शरीर में वह उत्तेजना रत्तीभर न थी अब लेकिन 10 मिनट बाद हे अपनी माँ को सामने खड़ा देख वह मुस्कुरा दिए.

"पहले आप मेरे पास बैठो, इधर. फिर चलते हैं.", अर्जुन ने लेते हुए हे मुस्कुरा कर कहा और उसकी मुस्कान का आशय रेखा जी को भी समझ आ गया था. दरवाजा लगाती वह भी अर्जुन को निहारती उसके बिस्टेर के एक तरफ आ बैठी. अर्जुन ने बिस्टेर पर लेते हुए हे शरीर को घूमते हुए उनकी गॉड में सर रख लिए.

"2 दिन से समय हे नहीं लगा तेरे पास आने का.", उसका सर प्यार से सहलाती वह प्यार से अपने बेटे को निहार रही थी.

"मतलब 2 दिन से आपके ये दुखे नहीं?", अर्जुन ने कमीज के सामने वाले पल्ले को ऊपर की तरफ उठाते हुए कहा और उसकी ऐसी हरकत पर रेखा जी हलकी लाज के साथ हे शर्माने लगी. स्टैनो के पास आते हे कपडा वही रुक गया. उन भारी चुचो के नीचे हे उनका कमीज इतना तंग था के एक सेंटीमीटर भी वह अपनी जगह से ऊपर न हुआ.

"कितना दुःख रहे है और भरे पड़े है तू खुद देख ले. लेकिन अब सबको बता तोह नहीं सकती न के 45 की उम्र में भी इनमे दूध आता है.", अपने कमीज की ज़िप पीछे से खुद हे खोलती रेखा जी ने सामने से भी कपडा गले तक ऊपर उठा लिए. सफ़ेद ब्रा में जकड़े वह गोल और सख्त उभार उनकी उम्र वाली बात से जरा भी इत्तेफ़ाक़ न रखते हुए बिलकुल तन्ने हुए थे. ब्रा 2/3 गोलों को हे अंदर समेटे थी और बाकी ऊपर की गोलाई इतनी कामुक थी की अर्जुन उन्हें कुछ देर पहले देखता तोह पक्का वह अपनी माँ के साथ यही sambhog-ratt हो जाता.

लेकिन दिमाग में अब सिर्फ उत्तेजना न थी अर्जुन के. वह अपनी खूबसूरत माँ से प्यार करता था और उनके सामने वह सेयंम की मजबूत जंजीर में हे रहता था. उस पतली ब्रा को एक तरफ से नीचे करते हुए अर्जुन ने जैसे हे उनका दया चुका अनावृत किया, उनका सूजा हुआ निप्पल अकड़ा हुआ खड़ा दिखा. हलके कठै रंग को निप्पल किसी छोटे मूंगफली के दाने सा हो रखा था. लेकिन और भी हैरत हुई अर्जुन को जब एक गोल रूई का गीला टुकड़ा उसके चेहरे पर आ गिरा.

"आप इस से खुद को छुपा रही थी?", अर्जुन ने वह रूई का टुकड़ा हाथ में लेते हुए माँ की तरफ देखा.

"अब तुम उतने छोटे नहीं हो सबके लिए की कभी भी तुम्हारे मुँह में इन्हे लगा दू. और मैं उतनी जवान नहीं की इस टपकते दूध का राज खोल साखू. अब इन्हे कुछ हल्का कर फिर हम चलते है.", रेखा जी की बात 100 प्रतिशत सच थी. ये बातें बंद कमरे तक हे सही थी. अर्जुन ने भी ये स्वीकार कर लिए था और फिर जैसे हे मुँह खोला तोह माँ ने खुद हे झुकते हुए वह निप्पल उसके मुँह से लगा दिए.

'सीई... आह्ह्ह्ह.' एक सिसकी जो ये बता रही थी की उन्हें अर्जुन के स्पर्श की जाने कब से तलाश थी, बता रही थी की उन्हें अब कितना ाचा लगा था. अर्जुन भी आँखें बंद किया ाचे से दूध चूसता हुआ अपने दूसरे हाथ को उनकी ब्रा में ढके बाए सतांन को टटोल रहा था. रेखा जी के चेहरे पर राहत के भाव उभर आये थे. सफ़ेद चमकते उभारो की अकड़न उनका बीटा बड़े प्यार से दूर जो करने लगा था. दूसरा सतांन भी खुद हे बहार निकल उन्होंने अर्जुन के हाथो में दे दिए जिसको बिना समय गवाए अर्जुन ने पकड़ते हुए कड़े निप्पल को सहलाना शुरू कर दिए.

"आह्हः.. वैसे यहाँ आने से पहले तेरी बहिन ने भी अपना हक़ जाता दिए है इनपर. अभी कुछ देर पहले उसने मुझे याद भी दिला दिए था उसने के घर आने के बाद वो हे मेरे पास सोयेगी अबसे. उम्म्म.", अर्जुन, जो पहले बड़े मजे से उस गरम मीठे दूध की धार को गले से निचे उतार रहा था अब आँखें खोल कर अपनी माँ के चेहरे को हैरानी से देख रहा था. ये कैसे मुमकिन है? यही सवाल उसके मैं में किसी बम की तरह लगा.

"वह तेरी बहिन और मेरी छोटी सी बची है. तू जबतक घर रहा तूने बचपन में हर रोज मेरा दूध पीया है लेकिन ऋतू के समय तोह जैसे इनमे दूध बना हे नहीं था. तोह अब अगर फिर से बन गया तोह उसका भी तोह हक़ है न इनपर.?", बड़ी धीमी आवाज में वह अर्जुन को सब समझती हुई जैसे उसका भी निर्णय jaan-na चाहती थी. अर्जुन ने पहले वाला दूध मुँह से निकलते हुए उस गीले निप्पल को उँगलियों से पकड़ा और हल्का सा चुबलाते हुए बोलै.

"ाची बात है न लेकिन इसका ये मतलब नहीं की वह हे आपके पास सोयेंगी. ऐसा नहीं हो सकता के एक तरफ मैं और एक तरफ दीदी आपका दूध पी सके?", इतना कहकर किसी भूखे बचे की तरह जल्दी से उसने वह दूसरा दूध भी अपने होंठो में जकड लिए. मजे से उसको किसी पानी के गुब्बारे की तरह दबाते हुए अलग हे मस्ती में अपनी माँ का दूध निचोड़ कर उन्हें आराम दे रहा था. इधर अपने बेटे की ऐसी बात सुनकर रेखा जी के चेहरे पर लम्बी मुस्कान तैर गई थी.

"वह तुझे पीने नहीं देगी. इस से ज्यादा ठीक ये रहेगा की एक दिन तू और एक दिन वह.", और इतना कहने के बाद कमीज अर्जुन के मुँह पर गिरते हुए वह बिस्टेर से तक लगाती अपने चरम पर पहुँच चुकी थी. उनके शरीर की अकड़न अर्जुन से चिप्प न सकीय थी लेकिन वह वैसे हे उन दूध से भरे कलश के साथ चिपका रहा अपनी माँ के चरम को होने दे रहा था. कोई 5 मिनट बाद रेखा जी ने अपनी आँखें खोली, जहा अब गहरी शर्म और चेहरे पर लाली चाय थी.

"ाचा अब उठ तू और तैयार हो. मुझे भी कपडे बदलने दे फिर चलते है.", उन्होंने बिना अर्जुन को हटाए कहा. लेकिन अर्जुन ने निप्पल मुँह से हटाने के बाद भी दोनों स्टैनो को हाथो में थामे रखा.

"वो मुझे क्यों नहीं पीने देंगी?", अर्जुन का चेहरा कपडे से बहार था लेकिन वह निप्पल और नरम चुके हलके हलके मसलते हुए बोल रहा था.

"क्योंकि वह तुझसे भी तेज है और उसको भी दोनों हे एक साथ चाहिए होते है. चल अब छोड़ मुझे जल्दी से. कोई आ गया तोह तेरी माँ जवाब नहीं दे पायेगी इस हालत का.", अर्जुन ने भी अब उन्हें छोड़ना हे बेहतर समझा लेकिन आखिरी बार कास के दोनों निप्पल दबाते हुए वह हँसता हुआ एक तरफ हो गया.

"आई.. पागल. ऐसे क्यों किआ?", मस्ती और दर्द से उनके चेहरे पर एक अलग हे दिलकश मंजर बन्न गया था.

"ये बताने के लिए की आप अब मेरे पास नहीं सोती और मैं कितना मारा जा रहा हु आपके लिए.", रेखा जी ने नजरे शर्म से झुका ली थी ये बात सुनते हे. उन्हें पता लग गया था जो अर्जुन कहना चाह रहा था.

"घर चलने के बाद या कल दोपहर के खाने के बाद.", कपडे ठीक करती रेखा जी मुस्कुराती हुई बहार चल दी दरवाजा खोलती हुई. अर्जुन ने ाचा खासा पानी निकाल दिए था उनका सिर्फ दूध निचोड़ कर हे. उनके जाते हे अर्जुन भी मुस्कुराता हुआ तैयार होने लगा. दूध पीने के बाद अब शरीर में जैसे नयी ऊर्जा भर गई थी. 10 मिनट बाद हे वह तैयार हो कर नीचे आँगन में चला आया. यहाँ बड़ी नानी और सुनदंडा जी के साथ हे एक और भी महिला बैठी चाय पी रही थी. उम्र से वह अर्जुन को अपनी नानी के बराबर हे लगी थी. कपडे और शरीर बता रहा था के ये कोई ुचे खानदान की सभ्रांत और विशिष्ट महिला हे थी.

"ये है रेखा का बीटा, अर्जुन और बीटा ये है बड़ी मामी की माँ और तुम्हारी नानी.", सुनंदा जी की मुस्कान इतनी दिलकश थी की अर्जुन अपनी नानी को हे देखता रह गया. वह परिचय करवा रही थी लेकिन अर्जुन को तोह जैसे एक पल के लिए वह उनके सिवा कोई दिख हे नहीं रहा था.

"बड़ा प्यारा बचा है सुनंदा ये तोह.", उनकी खनकती आवाज ने जैसे इस सम्मोहन को भांग किआ. अर्जुन ने अब गौर से उन महिला को देखा और हाथ जोड़ने के बाद पाँव छु कर आशीर्वाद लिए. इतने में हे पूजा मामी भी अपनी चाय लेकर वही आ कर बैठ गई.

"पापा चाय नहीं लेंगे. वह अभी बड़े पापा के साथ बैठक में रहेंगे थोड़ी देर.", पूजा मामी ने अपनी माँ से ये बात कहते हुए एक मसूकान के साथ अर्जुन को भी ाचे से निहारा. और उनके कहने का मतलब था के पूजा के पिताजी भी madira-paan के लिए कुन्दनलाल जी के साथ बैठ गए थे.

"ाची बात है. उन्हें रहने दे वह. वैसे तुम कोनसी कक्षा में हो बीटा?", पूजा जी की माता ने अर्जुन से पुछा जो वही कुर्सी पर बैठ गया था उन लोगो के हे पास.

"जी अभी इलेवेंथ में हुआ हु.", अर्जुन के सामने हे एक छोटा स्टूल करते हुए ममता मामी ने 2 लड्डू और एक गिलाश दूध रख दिए. और सर पर हाथ फेर कर वापिस जाने लगी. लेकिन अंजना जी ने सवाल पूछ हे लिए.

"बेटी ममता, अनीता नहीं दिख रही है?"

"माजी वह अनीता की तबियत कुछ ठीक नहीं है तोह मैंने उसको आराम करने का बोल दिए है. संगीता है मेरे साथ तोह काम की कोई चिंता नहीं. वैसे भी पूजा दीदी ने कहा है के रात सब्जी और पुलाव वही बनाएंगी आज.", ममता जी की बात सुनकर सुनंदा जी ने भी एक बार उनकी तरफ और पूजा की तरफ देखा. जैसे वह कुछ पूछना चाहती हो लेकिन फिर शांत हे रही. ममता जी भी जवाब देने के साथ हे सीढिया चढ़ती ऊपर रसोईघर की तरफ चली गई.

"हुआ क्या है अनीता को? दोपहर तक तोह ाची भली थी.", अंजना जी ने अपनी बड़ी बहु से कहा. दिन में अनीता ने हे सभी को खाना परोसा था तोह ऐसे एकदम से बिस्टेर पकड़ लेने से उन्हें थोड़ी चिंता हुई.

"थकान हो गई होगी माँ जी. सुबह जल्दी उठी थी और रात देरी से सोई थी. फिर बहार भी ज्यादा चलना फिरना हो गया था और आते हे खाना बनाने लगी थी.", पता तोह पूजा को भी नहीं था की देवरानी को हुआ क्या एकदम से लेकिन जो ठीक लगा उसने वही कहा. अर्जुन इत्मीनान से लड्डू खता उनकी बातें सुन्न रहा था.

"वैसे बीटा ये कुछ अलग मिठाई नहीं है?", पूजा जी की माँ ने पास में बैठे अर्जुन को ऐसे लड्डू खाते देखा जो उन्होंने पहले नहीं देखे थे. इसलिए जिज्ञासा से पूछ लिए उन्होंने.

"नानी जी ये मेरी दादीजी ने बनाये है सिर्फ मेरे लिए. लड्डू तोह मीठे होते है लेकिन इनमे तोह जहाँ भर की jadi-butiyan और कड़वाहट है.", अर्जुन ने निराश स्वर में जवाब दिए लेकिन सुनंदा जी के साथ अंजना जी भी मुस्कुरा उठी. लेकिन पूजा जी की माँ अभी भी हैरान थी की भला ऐसी खुराक वह भी एक जवान हो रहे लड़के को.

"बहिन जी अपनी कौशल्या जी के पिताजी जाने माने वैद थे और उनसे हे उन्होंने ये सब सीखा था. अर्जुन का शरीर ठीक नहीं था बचपन से इसलिए उन्होंने इसकी ाची सेहत के लिए ये सब शुरू किआ और अर्जुन भी नियम से इन्हे रोजाना खता है.", सुनंदा जी के बताने से अब उन्हें बात समझ आई थी. लेकिन शायद मैं में विचार अभी भी दौड़ रहे थे.

"बीटा वैसे अब तोह तुम उम्र से आगे लगने लगे हो तोह इनका कोई दुष्प्रभाव न हो जाये तुम्हारे शरीर पर."

"नानी जी, ये अभी 20 दिन पहले हे तोह शुरू किये है. और शरीर तोह मेरा ये आखिरी 2 साल में ऐसा हुआ है. रोज 10 किलोमीटर दौड़ता था लेकिन अब कसरत के साथ हे बॉक्सिंग भी खेलता हु इसलिए दादी ने ये बना के दिए है जिस से शरीर में कमजोरी न हो और मासपेशिया जल्दी उबार जाये म्हणत करने के बाद.", अर्जुन अपना दूध और लड्डू ख़तम कर चूका था. इतने में हे उसकी माँ भी कपडे बदल कर और शायद नहाने के बाद वह आ गई थी. समय 7 बजे से थोड़ा ऊपर हो गया था.

"ओहो तोह ये बात है. मैं भी कहु बीटा के अगर सिर्फ शरीर ठीक करने की हे खुराक है तोह फिर मुझे तोह कही से कम् नहीं लगता तू. सुनंदा जी, आपका नाती मुझे तोह बड़ा पसंद आया. हो सके तोह आप हे सम्बन्धी जी से जीकर करना के हमारी पीहू भी बड़ी हो गई है तोह एक बार देख परख ले. अभी बाहरवीं में हुई है तोह जल्दी तोह बिलकुल नहीं है लेकिन ऐसा लड़का ढूंढ़ने से भी नहीं मिलने वाला.", अर्जुन खड़ा होता हुआ बस मुस्कुरा रहा था. उसका चेहरा देख पूजा के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान आ गई थी जिसको रोकने की कोई कोशिश किये बिना उन्होंने अपनी माँ की बात बढ़ाते हुए कहा.

"लड़का तोह रिश्ते के नाम से हे मुस्कुरा रहा है. लगता है ये भी बड़ा हो गया है."

उन्हें क्या मालूम था इस हंसी का राज वह तोह रेखा जी ने भी मुस्कुराते हुए उत्तर दिए.

"वह शायद इस बात पर हंस रहा है पूजा की उसकी मामी को कुछ नहीं पता. और मौसी जी, आपने बड़ी इज़्ज़त्त दी रिश्ते की बात करके लेकिन अर्जुन का रिश्ता पहले हे तये हो चूका है और रसम भी की जा चुकी है. लड़की jaan-pehchaan की हे है तोह मैं भी कुछ नहीं कर सकती.", पूजा मामी का तोह चेहरा सपाट हो गया था ये बात सुनते हे लेकिन फिर भी वह अपनी निराशा छुपाते हुए बोली.

"दीदी, माँ भी तोह मजे ले रही थी. वैसे एक बात कह देती हु की अगर ये पीहू को देख ले तोह फिर बाकी सभी लड़किया पानी लगेंगी उसके बाद. हमारी पीहू किसी सरदारनी जैस गोरी लम्बी है.", अर्जुन उनकी बात सुनकर थोड़ा ज्यादा हे मुस्कुराता हुआ वह से चल दिए. उसकी शैतानी ख़ुशी देख पूजा मामी के अंदर तक जैसे आग लग गई थी लेकिन वह कुछ कर नहीं सकती थी इस वक़्त.

"पूजा जब वह आएगी तोह मई दिखाउंगी तुझे एक ऐसी लड़की जिसको शायद तू भी ज़िंदगीभर याद रखेगी. बेशक पीहू खूबसूरत समझदार हो सकती है, और क्या पता अपनी ऋतू या कोमल से ज्यादा सुन्दर हो लेकिन प्रीती ऐसी लड़की है जिसको अर्जुन के लिए हे बनाया गया है. ाचा माँ, मई जरा सरोज के घर जा कर आती हु. उसको आज आने का मैं बोल कर आई थी.", रेखा जी भी मुस्कुराती हुई गलियारे से अपने बेटे के पीछे निकल चली.

"माँ जी, जहा तक मैं जानती हु ऋतू शायद वैसी हे है जैसी आप थी. तोह ऐसी कोनसी लड़की हो गई जो उस से भी सुन्दर होगी.?", पूजा के तोह गले से हे ये बात नीचे नहीं उतर रही थी. वही अब उनकी माँ बिलकुल शान्ति से भुजिया खा रही थी.

"कोई 3 साल पहले हे देखा था मैंने भी उस लड़की को. और सच कहु तोह उसका चेहरा आज तक याद है मुझे बहु. कौशल्या जी के mooh-bole देवर की पौती है वह लेकिन देखने में जरा भी हिंदुस्तानी नहीं सिवाए जुबान के, उसमे भी वह आधी अंग्रेजी हे बोलती थी उस समय. Neeli-hari आँखें, हमारे यहाँ अगर रंग गोरा सबसे साफ़ होता है तोह उसके सामने वह भी काम लगेगा. लम्बाई तोह ऋतू के बराबर थी शायद अब उस से ज्यादा हो चुकी हो. चल छोड़ ये सब बातें जब बहिन जी ने बात मजाक में हे कही थी तोह क्या लेना उस लड़की के बारे में जान के. अपने घर की बहु हे तोह बनेगी वह कुछ साल में. तेरी बड़ी माँ के दवा का समय हो गया जरा पानी ले आ.", पूजा जी शालीनता से वह से निकल कर ऊपर चल दी.

'ये लड़का समझ से बहार है. एक तोह वह ऐसी दवा झेल गया जो ाचे ाचे को पागल कर दे. ऊपर से समय भी फ़ैल हो गई उसको फ़साने में और रही सही कसार की इस बात ने पूरी कर दी की कमीने का रिश्ता पहले हे हो चूका है. अब डाव मुझे खुद हे खेलना होगा, देखती हु मेरे से कैसे बचता है. आगे पीछे टाइगर की तरह नहीं घुमाया तोह मैं भी पूजा नहीं.'

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अर्जुन अपनी माँ रेखा जी के साथ पैदल हे आ गया था मंजू के घर. घंटी बजाते हे अंदर का दरवाजा खोलती हुई मंजू बहार आँगन में आती दिखी.

"नमस्ते मौसी. कैसी हो आप?", मंजू आज बिलकुल भी झिझक नहीं रही थी. उसकी चाल भी चपलता से भरी थी. अर्जुन को देख कर बस हल्का सा मुस्कुराई लेकिन दरवाजा खोलने के बाद रेखा जी के पाँव छूने लगी लेकिन उन्होंने गले लगाया.

"मैं ाची हु लेकिन तेरी माँ कहा है? और आज तोह शायद तू बहार गई थी.", दोनों हे मंजू के साथ घर के अंदर आ गए. मंजू ने फिर से ये बैठक वाला दरवाजा लगा लिए था.

"गई थी मौसी लेकिन जिस काम से गई थी वह नहीं हुआ लेकिन अब परसो या उस से अगले दिन शायद जाना पड़े. माँ, रेखा मौसी आई है.", रेखा जी भी अंदर के आँगन में आ गई थी जहा सरोज जी भी रसोई से बहार आती दिखी. शायद कुछ काम कर रही थी वह.

"ाचा हुआ तू आ गई रेखा, और तू कैसा है मेरे बचे?", अर्जुन को अपनी छाती से लगाने के बाद उन्होंने दोनों को वही बिठाया, चारपाई पर और खुद सामने प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठ गई. मंजू रसोईघर में चली गई थी.

"तू परेशान है? क्या बात हुई है?", रेखा जी ने भांप लिए था के उनकी सहेली को कोई परेशानी है. लेकिन सरोज जी ने सिर्फ पलके झपकाई जिस से वह भी सबर करती चुप हो गई.

"पहले जरा चाय पी ले 2 घूँट. मैं खाने की तैयारी हे कर रही थी अपने बेटे के लिए. इसकी पसंद की हे सब्जी बनाई है और अब खीर राखी थी चूल्हे पर.", लाड से अर्जुन के सर पर हाथ फेरती हुई बता रही थी.

"जीजा जी नहीं दिख रहे?", रेखा जी ने सभी तरफ नजर फिरते हुए कहा.

"कार भी तोह नहीं कड़ी बहार. दोपहर को हे गए है ***** गाँव. मंजू, तेरी मौसी को और मुझे चाय पकड़ा दे. और अर्जुन को जरा घर दिखा, पहली बार आया है और फिर मुझे कुछ बातें भी करनी है रेखा से.", आखिरी बात कहते हुए सरोज जी की आवाज में कुछ अधिक हे नरमी थी. मंजू भी 2 कप चाय और खाने का सामान एक ट्रे में लिए उधर आ गई.

"बीटा यहाँ नहीं, मेरे कमरे में रख दे. और जरा थोड़ी देर तुम दोनों बैठो तुम्हारे कमरे या ड्राइंग में. माफ़ करना अर्जुन बीटा तुम भी कहोगे कैसी मौसी है जो माँ को हे अपने साथ ले गई. मंजू ज्यादा परेशां नहीं करेगी तुम्हे. बस आधा घंटा तुम दोनों गप्पे मारो या टेलीविज़न देखो." इतना कहती वह उठकर रेखा जी के साथ आँगन के उस पार कोने वाले कमरे में चली गई मंजू के पीछे. इधर उनकी बात सुनकर ख़ामोशी से बैठा अर्जुन खुश हो गया था उनके जाते हे.

"आओ हम ऊपर मेरे कमरे में चलते है. यहाँ बैठे रह कर तुम क्या करोगे?", मंजू ने आँख मारते हुए लेकिन बोलने का लहजा सपाट रखा. रसोई में चूल्हा बंद करने के बाद मंजू बगल हे बानी सीढ़ियों से ऊपर चल दी और ठीक उसके पीछे अर्जुन भी.

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"वैसे बड़ी प्यारी लग रही हो और आज तुम.", दोनों जैसे हे ऊपर कमरे में पहुंचे मंजू ने दरवाजा बंद कर दिए और अर्जुन के गले लग गई. दोनों हे लगभग एक सामान कद के थे और पकड़ भी मजबूत थी. मंजू अर्जुन से ऐसी लिपटी जैसे बरसो बाद मिले हो दोनों और वह उसको कही जाने नहीं देगी अब.

"बहोत गंदे हो तुम. सुबह मिलने तोह आ हे सकते थे मुझसे. कल साड़ी रात मुझे नींद नहीं आई सिर्फ यही सोच कर की तुम कुछ घर दूर हे हो मुझसे." मंजू का इस क़दर अपने प्रति प्यार देख अर्जुन ने भी उसकी पतली कमर अपने हाथो में लेते हुए उसकी बड़ी काली आँखों में देखा. सिर्फ गले लगने भर से हे वह हलकी नमी सी आ गई थी. मंजू का गले लग्न हे अर्जुन को इस दुनिया से दूर ले जाता था, जहा सिर्फ वह 2 हे लोग हो.

"हमारे घर हे आ जाती अगर इतनी हे याद आ रही थी तोह. वैसे भी वह मेरे लिए अलग कमरा है.", अर्जुन ने मस्ती करते हुए कहा तोह मंजू हलके गुस्से से उसकी छाती पर हाथ मारने लगी.

"मेरा बस नहीं चलता नहीं..", और उसके पतले रसीले होंठ अर्जुन ने अपने मुँह में भर लिए. उसको पता था के उन दोनों के पास आधा घंटा है तोह इसको बातो में जाया नहीं करना. मंजू की भी आँखें बंद हो गई थी और अब वह भी अर्जुन के सर को पकड़ती जीभ से जीभ लड़ा रही थी. दीवांवर से दोनों हे दरवाजे से लगे एक दूसरे के मुँह को जीभ से टटोल रहे थे. अर्जुन के हाथ सलवार के कपडे के अंदर से होते हुए मंजू के गोलाकार गुदाज कूल्हों पर जा ठीके. बास्केटबॉल खेलने और तैराकी की वजह से पूरा शरीर हे लचीला, सही अनुपात में मांसल और नरम था मंजू का. कूल्हे तोह जैसे फूटबाल के ब्लैडर से नरम और बिलकुल गोल थे, जिन्हे हलके हलके मसलते अर्जुन बड़ी तन्मयता से मंजू का मुखरास पीने में लगा था.

मंजू भी इतनी हे देर में पूरी सुलग चुकी थी और इस वजह से खुदसे हे उसने अर्जुन की जेनस का बटन और चैन खोल कर उसके लुंड को एक हाथ से हे क़ैद से बहार निकल लिए था. अपने कड़े चुके उसकी छाती से भिड़ती वह कस के अर्जुन के मूसल जैसे लुंड को अपनी लम्बी हथेली में पकड़ कर दबा रही थी. अर्जुन ने भी कूल्हों की दोनों फांके फैलते हुए उंगलिअ वह धंसा दी. उसको भी मंजू का ये हिस्सा naram-garam एहसास देते हुए उत्तेजित कर रहा था.

"कुछ गड़बड़ हो गई तोह?", अर्जुन ने होंठ अलग करते हुए तड़पती मंजू के चेहरे को देखते हुए पुछा. उसका हाथ मंजू की सलवार के नाड़े पर रखा था, जैसे उसकी हाँ या ना की प्रतीक्षा हो.

"बेफिक्र रहो माँ नहीं आने वाली.", फिर से भूखी शेरनी की तरह मंजू उसके होंठो को खाने लगी और अर्जुन ने वह गाँठ खोलते हुए मंजू की सलवार भी नीचे गिरा दी. कमीज के अंदर पहनी ब्रा से भी उन चूचियों की सख्ती का अंदाजा भरपूर हो रहा था अर्जुन को. लेकिन उसका सारा ध्यान बस मंजू की कच्ची में छिपी कॉमर्स से भरी नरम छूट पर था. उंगलियों से उस फूली हुई कामकुंड को सहलाते हुए अर्जुन ने छूट के सामने वाली पट्टी को एक तरफ सरका दिए. निर्वस्त्र छूट दिखाई तोह नहीं दे रही थी लेकिन उंगलिया उस नरम lij-liji फूली खाल को महसूस करते हे गीली दरार में फिरने लगी. मंजू ने भी कमर आगे सरकते हुए उंगलियों को अंदर लेने की कोशिश की. इधर जब सांस टूटने लगी तोह दोनों ने चेहरे अलग किये.

"जल्दी करो अब सबर नहीं हो रहा है.", खुद हे मंजू ने पाँव में पड़ी सलवार और कच्ची उतार कर एक तरफ पड़े संदूक पर रख दी. नीचे से उसकी लम्बी चिकनी जाँघे और गुदाज फूली हुई छूट अब अर्जुन के सामने थी. उसने भी लुंड को 2-3 बार छूट की दरार पर ऊपर नीचे करते हुए चिकना किआ और दूसरे हाथ को उसकी कमर के पीछे रख कर दबाव देते हुए अपनी कमर को जोर से आगे धकेल दिए. होंठो से मंजू को मुँह दबाया था इसलिए उसकी कराहने की आवाज वही घुट्ट गई और फूल सी नाजुक छूट की पंखुडिया फैलते हुए सूपड़ा अंदर घुस गया. इतनी हे देर में दोनों के शरीर का तापमान अधिकतम हो चूका था.

सूपड़ा घुसते हे अर्जुन ने दोनों हाथ से मंजू के कूल्हे थपथपये और फिर अगला धक्का लगते हुए 7 इंच तक़रीबन लुंड उस संकरी गरम जगह में फंसा दिए. मंजू हिम्मत बंधे अपनी चीख रोक के इस धक्के को भी सेहन कर गई थी लेकिन दर्द की अधिकता से अर्जुन का होंठ जरूर अपने दांतो से काट लिए था. लुंड फसाये हुए हे अर्जुन ने दोनों कूल्हे आते की तरह गूंथने शुरू कर दिए.

"कुछ दिन लगातार नहीं कर सकते क्या? ाः.. इतना तंग करता है न ये तुम्हारा सत्ता पहली बारी में. उम्.. ", दोनों के अंगो का आपस में तालमेल कुछ ज्यादा हे था जो इतना तगड़ा लुंड भी उस नाजुक छूट में जल्दी हे सेट हो गया था.

"लगातार करने के लिए तोह फिर हमे साथ रहना पड़ेगा.", अर्जुन ने हलके से घुटने मोड़ते हुए अपनी दोनों बाजु मंजू की चिकनी जांघो में फंसे और उन्हें चौडाते हुए हवा में उठा लिए. मुस्कराहट आ गई थी मंजू के दर्द भरे चेहरे पर ये हरकत देख कर. उसने भी अपनी लम्बी टाँगे कमर पर लपेट ली अर्जुन के और बाहे गले में दाल कर खुद हे गांड आगे धकेलते हुए bacha-khucha लुंड भी अंदर सम्माहित कर लिए.

"उईईईईई.. माहहहहह. पूरा चला गया ना..?", कंधे पर सर टिकाये दर्द और मस्ती में भरी मंजू ने अर्जुन के कान में सरगोशी करते हुए बड़ी मादकता से पुछा.

"आवाज मत करो और मुझे कसरत करने दो.", मंजू के गाल को प्यार से होंठो से दबाते हुए अर्जुन ने खड़े हुए गॉड में लिए हे धक्के लगाने शुरू कर दिए. पूरी तरह से फैली जांघो की वजह से अंडकोष भी छूट के बाहर वाले पहले हे हिस्से से टकरा रहे थे. मंजू भी मस्ती में खुद अपनी गांड आगे पीछे करती अर्जुन की ताल से ताल मिलती इस अनूठे आसान में चुदाई का सुख लेने लगी.

अर्जुन की बाजू की मछलिया पूरे आकर में आ गई थी और आधी ब्याह की वह टीशर्ट इस तरह कस गई थी डोले पर की अभी फटी. संदूक से विपरीत दिशा में लगे लम्बे आईने में दोनों का अक्स देखते हे अर्जुन के धक्के और तेज हो गए. यहाँ से लुंड का कुछ हिस्सा हे नजर आ रहा था लेकिन दोनों के हिलते शरीर अर्जुन को अलग मजदे रहे थे. हलकी thapp-thapp की आवाज इस कामुक मिलान को और बढ़ा रही थी.

"उधर देखो न मंजू.", अर्जुन ने उसका ध्यान आईने की तरफ दिलाया तोह मंजू ने एक बार देखते हे नजरे फेर ली. शर्म और मस्ती से अर्जुन के कंधे पर हल्का काट ते हुए वह बोली..

"आह.. बड़े गंदे हो तुम.. उम्म्म.. शर्म नहीं आती.. आह आराम से.. आह.. रुको और पकडे रहो.", अर्जुन ने लुंड जड़ तक डालते हुए चुदाई रोक ली और मंजू ने तुरंत हे कमीज उतार कर उसको भी संदूक की तरफ उछाल दिया. कमीज के पीछे हे वह पतली सफ़ेद ब्रा भी जा गिरी. अब वह पूरी तरह निर्वस्त्र अर्जुन की गॉड में कमर से लिपटी थी.

"अब ज्यादा ाचा लगेगा तुम्हे.", मस्ती से आँखें बंद करती मंजू ने कंधे पर सर टिका लिए और इधर अर्जुन को भी मंजू का इस तरह उसकी हर ख्वाहिश पूरा करना दिल को छु गया. अब आईने में सब साफ़ दिख रहा था. चिकने गोल नितम्भो के ठीक नीचे छूट की पतली फांको के बीच अंदर बहार होता वह साढ़े 3-4 इंच मोटा लुंड चमकता हुआ अंदर बहार हो रहा था. एक गोल सतांन इस तरफ से अर्जुन की छाती से चिपका हुआ हर धक्के पर आगे पीछे हो रहा था.

"तुम सच में मेरे हिसाब से हे बानी हो मंजू. आह.. हर बार जब ये तुम्हारे अंतिम हिस्से में लगता है.. आह्हः.. अलग नशा से शरीर में भर जाता है.", दोनों फिर से एक दूसरे को चूमने लगे लेकिन मंजू की छूट ने कस के पकड़ लिए था अर्जुन के सुपडे को. वह पकड़ इतनी अधिक थी की वह कमर हिलने के बावजूद लुंड न हिला सका. गरम तरल जब लुंड पर महसूस हुआ और मंजू का शरीर भी अकड़ गया तोह अर्जुन को पता लगा उसके सखलन का. आईने में जैसे हे उसका लुंड छूट से थोड़ा बहार आया, वही शहद की एक लम्बी सी पतली धार छूट और लुंड से चिपकी नीचे जमीन की तरफ बढ़ चली. लेकिन लुंड के वापिस छूट में घुसत हे वह टूट कर कुछ वापिस शरीर पर जा लगी बाकी जमीन पर.

"आह्ह्ह्ह.. मार दिए.. थक्क गए होंगे न? बिस्टेर पर चलो.", मंजू की बात मानते हुए अर्जुन ने लुंड अंदर डाले हुए हे उसको बिस्टेर पर लिटा दिए. अब कही उसने वह दोनों नंगे सतांन निहारे थे जो जाने कितनी देर से उसकी छाती से दबे पीस रहे थे. गुलाबी lambe-patle निप्पल को मुँह में लेते हुए अर्जुन ने मंजू के चेहरे को देखा तोह दोनों हे मुस्कुरा दिए. मंजू ने खुद हे उसका सर अपने कैथोड मुलायम दूध पर दबा दिया.

"पता है मुझे की तुम कबसे इनके लिए तरस रहे थे. आह्हः.. प्यार से.. काटो नहीं ना. आह.." दूसरे वाले को मुट्ठी में दबाते हुए अर्जुन सुपडे तक लुंड बहार करता जड़ तक बाद रहा था. हर बार सूपड़ा बच्चेदानी से टकराता और मंजू गांड को ऊपर उचका लेती.

"आह.. मेरा फिर से होने वाला है.. उम्म्म. जल्दी करो.. आह.. लेकिन बहार निकलना.. आह.. माँ..", उसकी सिसकिया और बात सुनते हे अर्जुन ने मंजू के पत् ऊपर उठाते हुए सटासट लुंड चलना शुरू कर दिए. लुंड पर भी नस्से भयंकर हद्द तक फूल चुकी थी, दिन की तीसरी चुदाई जो थी और ये वाली तोह उस इंसान के साथ जिस से अर्जुन भी सही मायने में प्यार करने लगा था. सूपड़ा जब ज्यादा हे फूल कर छूट को रौंदने लगा तोह दोनों पागल हे हो चले. बिस्टेर की choo-choo की आवाज भी उन्हें सुनाई नहीं दे रही थी और न उन्हें समय की परवाह थी कोई. दोनों उभारो को कुछ ज्यादा हे जोर से दबाते हुए अर्जुन तूफानी धक्के लगता चरम तक आ पंहुचा था. इधर मंजू की छूट की चिकनाहट भी बता रही थी की वह भी अंतिम पालो में है.

"मई गई.. माँ.. ाः...", होंठो को दबाते हुए मंजू की आहे अर्जुन ने दबा ली थी क्योंकि उसका सखलन अर्जुन को महसूस हो गया था. इस बार तोह मंजू ने जैसे हल्का पेशाब कर दिए हो इतना choot-ras बहार टपका दिया था. फच्च की आवाज से सूपड़ा भी छूट से बहार कूद आया और अर्जुन ने 2-3 बार उसको छूट के बहार रगड़ा और उसके लुंड से ruk-ruk कर गाढ़ी सफ़ेद धार 5 बार मंजू के पेट और चुचो पर जा गिरी, थोड़ा बचा हुआ वीर्य छूट के बहार चिकने होंठो पर गिराने के बाद अर्जुन भी बगल में लुढ़क गया.

"पता नहीं तुम्हारे साथ हे ऐसा होता है. जान निकल लेती हो तुम जैसे लेकिन फिर भी ये तैयार रहता है.", प्यार से उसके खड़े निप्पल सहलाता वह बोलै तोह मंजू दुखती छूट के बावजूद मुस्कुरा कर अर्जुन के लुढ़के चेहरे को देखने लगी.

"ाचा सुनो, आज यही रुक जाओ न. मैं मौसी को बोलती हु फिर रात को कुछ न कुछ कर हे लेंगे.", होंठो को चूमने के बाद मंजू एक साफ़ कपडे से अर्जुन का लुंड और खुद पर गिरा वीर्य साफ़ करती बोली. कपडे को फिर से हल्का गीला कर एक बार और उसने दोनों को साफ़ किआ और अपने कपडे पहन ने लगी. अर्जुन का gulabi-bhoora लुंड भी थोड़ा नरम पड़ने लगा था. मंजू ने हे उसको जीन्स के अंदर करने के बाद बटन लगाया और एक खुशबूदार स्प्रे कमरे में छिड़कने के साथ हे दरवाजा खोलती बहार निकल गई. अर्जुन अब ठीक तरीके से बिस्टेर पर तक लगाए बैठ गया था.

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जब अर्जुन और मंजू ऊपर sambhog-kriya में डूबे थे नीचे सरोज और रेखा कमरा बंद किये संजीदगी से बातें कर रही थी.

"अब बता न के क्या बात हो गई है जिस से तू परेशां है इतना?", रेखा जी ने चाय का कप उठाते हुए कहा.

"मंजू के लिए रिश्ता पक्का किया था लेकिन लड़के के बड़े भाई की इत्छा थी की एक बार मंजू की होने वाली ननद, जो की अगले शहर में हे ब्याही हुई है, पहले उस से मिल ले. वह पिछले ऐतवार भी आई थी ##### गाँव जब हम सवामणी लगाने वही थे मेरी बहिन और देवर के घर. लेकिन उस दिन सभी बहार थे और मंजू शायद aas-pados गई हुई थी तोह मिल नहीं पाई. आज फिर से उन्होंने मिलने बुलाया हुआ था लेकिन यहाँ मंजू शहर निकली और उधर आधे घंटे बाद हे फ़ोन आ गया उनके घर से की ननद के पति शहीद हो गए है." सरोज ने बात रोकते हुए सांस ली और फिर आगे कहना शुरू किआ.

"अब लड़के की माँ ने कहा है के जब रिश्ता परिवार को देख कर हुआ है तोह शादी हे कर दी जाएगी, तेहरवी के बाद कोई शुभ दिन देख कर. बस dhol-baraat नहीं हो पायेगा. उन्हें अपनी बेटी की भी चिंता है क्योंकि मंजू की होने वाली ननद ससुराल से खुश नहीं थी और उसका पति भी शादी के 5 साल में संतान सुख न दे पाया था. अब ये तय हुआ है की लड़का ट्रेनिंग से 5 दिन छुट्टी लेकर आएगा बताये मुहूर्त पर और उस बीच हे विवाह करके मंजू को तुम्हारे शहर हे ले जायेंगे. ननद के साथ हे रहेगी वह क्योंकि पति तोह अभी एक साल पुलिस ट्रेनिंग में रहेगा और फिर बहिन की नौकरी भी शहर में लगी है तोह मंजू उनके साथ हे रहेगी. तेरे जीजा सभी बातें करने के बाद आज उनके हे घर गए है. कल चौथा है तोह दोपहर बाद हे वापिस आएंगे.", सरोज की चिंता जायज हे थी.

"ये तोह सच में बहुत बुरा हुआ सरोज. एक हे बेटी है और वह भी जीजाजी की लाड़ली. ऐसे ब्याह होगा ये तोह सोचा न था और बेचारी के सारे अरमान अधूरे रह जायेंगे. ताल नहीं सकती थी क्या एक साल? मुझे उनके घर जो हुआ उस से सहानुभूति है लेकिन देख वह मेरी भी बची है और उसके साथ ऐसा होगा तोह मुझे ाचा नहीं लगेगा.", रेखा जी अपनी सहेली का हाथ पकड़ते हुए कह रही थी.

"मंजू से बात करि थी इन्होने. लेकिन उसने खुद हे कहा के वह भी कोई tadak-bhadak नहीं चाहती लेकिन उसके कोई नेशनल है इस साल और कॉलेज का आखिरी साल भी है तोह वह शादी के बाद ये एक साल अपना ध्यान वही लगाएगी. अगर ससुराल वाले ये बात मानते है तोह ठीक नहीं तोह फिर jai-ram जी की.", सरोज द्वारा मंजू की कही बात सुनकर इस गंभीर समय भी रेखा जी के चेहरे पर मुस्कान आ गई.

"तू भी हंस ले. उन्हें भी ऐसे हे हंसी आई थी. बता अब शादी के बाद भी घुटनो से ऊपर की स्कर्ट पहन कर खेलती ाची लगेगी क्या?"

"सरोज, तू न कभी उसकी सहेली बांके देख. हर लड़की के अरमान होते है. परिवार के लिए उसने बिना लड़का देखे शादी की हाँ कर दी, ऊपर से बिना dhoom-dham वाले समारोह के लिए मान गई और साथ हे अपनी पढाई के लिए भी संजीदा है. अरे ऐसी लड़की पर तुझे नाज होना चाहिए. सच कहती हु मैं तोह चाहती थी उसको अपनी बहु बना लू लेकिन एक सच और भी है के मंजू को अभी देखने से पहले हे अर्जुन का रिश्ता पक्का हो चूका था. वैसे ये कहना ज्यादा बेहतर होगा की उसका तोह रिश्ता बहोत पहले हे हो गया था. लेकिन मुझे वह लड़की और मंजू दोनों हे अपने बेटे के लिए पसंद है. दोनों ने हे दूध पीया है मेरा.", अब कही सरोज के चेहरे पर भी हलकी मुस्कान तैर गई थी ये सुनकर.

"सच कहु तोह मुझे तोह अर्जुन एक नजर में भ गया था लेकिन अपने यहाँ ये jaat-biradari और ऊपर से पता नहीं ऐसी गुस्सैल लड़की तेरे कुनबे जैसे परिवार में निभा पाए या नहीं. तेरे बेटे जैसा हे लड़का संभल सकता है मंजू को, किसी आम लड़के के तोह बस आने वाली नहीं. ये होने वाले सम्बन्धी भी देखने में thik-thak है लेकिन दामाद मंजू के सामने 19 हे है. बस सरकारी नौकरी और अपने जैसा परिवार देख कर ये रिश्ता हुआ.", सँभालने वाली बात पर रेखा जी के भी पेट में हलचल हो गई थी. अर्जुन सच में भरपूर तगड़ा और प्यार करने वाला इंसान था. खुद उनके जैसी महिला को भी कैसे एक लड़की की तरह एहसास करवा दिए था उनके हे बेटे ने.

"कहा खो गई.?"

"कही नहीं ऋ. बस यही सोच रही हु की इस लड़के का क्या होगा. लेकिन अभी तोह तू पहले एक बार जीजा जी से बात करवा और पता करते है के वह सब कैसा है.", सरोज जी के कमरे में हे रखे be-taar फ़ोन को उठाते हुए रेखा जी ने सरोज को पकड़ाया. सरोज जी ने भी फिर पास राखी डायरी से एक नंबर निकाल कर मिलाया. 3-4 घंटी जाने के बाद हे किसी ने फ़ोन उठाया.

"नमस्कार जी. जी मैं ##### शहर से दलीप जी की धर्मपत्नी बोल रही. उनसे बात हो पायेगी.?", सामने वाले ने कुछ कहा और वह कान से फ़ोन लगाए बैठी रही. कुछ हे देर बाद उनके पति लाइन पर आये.

"हांजी, सब सही से हो रहा है वह? रेखा आई थी तोह अपनी मंजू की बात पूछ रही थी." फिर दलीप जी ने कुछ बताया और सरोज सुनती रही. थोड़ी बातें होने के बाद उन्होंने फ़ोन रेखा जी की तरफ बढ़ा दिए.

"नमस्कार जिया जी. आपसे मिलने घर आये थे लेकिन ये खबर मिली सरोज से. कल भी हम यही है तोह एक बार जरूर घर आइयेगा.", रेखा जी ने haal-chal पूछने के बाद कुछ और बातें की. कोई 4-5 मिनट उन्होंने बात करने के बाद एक बार फिर सरोज को फ़ोन पकड़ाया. तक़रीबन 5 मिनट उन्होंने भी बात करि और फ़ोन रख दिए.

"फिर क्या कहा जीजा जी ने?"

"जैसे तूने नहीं सुना कुछ? कुछ अलग नहीं कहा और साथ हे ये कहा है के ाचे से खातिरदारी करना जैसे मैं तुझे सुखी रोटी खिलने वाली थी.", सरोज जी ने छेड़ते हुए हे जवाब दिए.

"अरे मेरी माँ. मेरा मतलब है की अपनी मंजू वाली बात.", रेखा जी ने सर पर हाथ रखते पुछा.

"हाँ. दामाद जी तोह खुद कह रहे है के ट्रेनिंग के बाद भी ड्यूटी 3 साल पुलिस सेण्टर हे रहेगी तोह शादी के बाद मंजू उनकी बड़ी बहिन मेनका के साथ हे शहर रहेगी. चाहे तोह आगे भी पढाई कर सकती है और खेलना बरकरार रखना चाहे तोह वह भी ठीक है.", सरोज जी को अब थोड़ा रहत मिली थी और उनकी बात सुनकर रेखा जी भी खुश हुई.

"वैसे मुझे तोह कह रहे थे की कल तुम भी जा रही हो उनके वह.", रेखा की बात पर सरोज उठने लगी.

"हाँ कल तू मंजू का ध्यान रखिओ अगर जरुरी काम न हो तोह. और तेरे मुन्ना को बोल डीओ के सुबह मुझे बस अड्डे तक छोड़ आये 6 बजे, रूपया दे दिए है इन्होने आज लड़के को तोह अब से दामाद हो गया. चौथ की रसम निभानी पड़ेगी. चल अब खाना देखते है और तू ऊपर जा कर मंजू को बुला ला. काम तोह क्या करेगी वह 2 कपडे हे बैग में रख देगी.", रेखा जी बिस्टेर से उठी और गले लग कर अपनी सहेली को मुबारकबाद दी.

"मतलब तोह रिश्ते की बात इतनी रूखी तरह करेगी.? सही कह रहे थे जीजाजी की अब घर रह कर वह करे भी तोह क्या, बीवी तोह उनकी सन्यासी हो चुकी है.", रेखा जी इतना बोलकर दरवाजा खोल बहार आँगन में चली आई. पीछे हे हंसती हुई सरोज भी निकल कर बोलने लगी.

"हाँ, उनसे कुछ होता हो तोह ये नौबत न आती. निरे नंदलाल है, मस्ती जो मर्जी करवा लो असल मुद्दे पर आते हे होली खेल लेते है 1 मिनट में. संन्यास न लू तोह क्या करू.", इधर वह रसोई में घुसी हे थी की उछलती सी मंजू सीढ़ियों से नीचे आती रेखा जी के सामने आ कड़ी हुई.

"कूद ले जितना तेरा दिल करे और शादी के बाद भी ऐसे हे रहेगी तू. चल मजे कर.", रेखा जी ने उसको बाहों में लेते हुए कहा और इधर सरोज जी ने आवाज दी.

"ये लड़की वह भी नाक हे कटवायेगी देख लिओ. अर्जुन को परेशां तोह नहीं किआ न तूने? और चल मेरी अलमारी से 2 जोड़ी कपडे निकल के बैग में रख दे."

"माँ सुबह 6 वाली से जा रही हो ***** गांव?", मंजू ने मुस्कुराते हुए ये बात कही तोह रेखा जी के साथ हे रसोई से बहार निकलती सरोज जी ने भी उसकी तरफ देखा.

"ये तुझे कैसे पता? हमारी आवाज इतनी तेज थी क्या?"

"आप रसोई में थी जब पापा से बात हुई थी. उन्होंने मेरी साड़ी शर्त मान ली है. 4 साल से पहले तोह ऋषभ सिंह को समय लगने वाला नहीं है तोह मई इतने कॉलेज के साथ बास्केटबॉल भी जारी रख सकती हु. आज पापा ने रूपया पकड़ा दिए था होने वाली सास को और आपके दामाद को तोह इन्ही छुट्टियों में ब्याह कर डोज आप लोग. मौसी के शहर में हे अब अपनी ननद के साथ रहना है जिसकी स्कूल में नौकरी लगी है. तोह मेरा हॉस्टल का खर्चा भी बचेगा और जब भी मैं यहाँ आपसे मिलने आया करुँगी तोह थोड़ी इज़्ज़त्त भी मिला करेगी.", एक सांस में सब कुछ बताती वह अपनी माँ के कमरे में चल दी. उनके कपडे बैग में रखने.

"देख ले रेखा इस लड़की को. नाम लेकर बात कर रही अपने होने वाले पति का और तेरे जीजा ने ये बात पहले इसको हे बताई लेकिन शर्माने की जगह कैसे उछलती कूदती फिर रही है ये.", सरोज माथा पकड़ के बोल रही थी लेकिन रेखा जी हंस रही थी. कुछ हे देर बाद खाना तैयार हो गया तोह मंजू हे आँखे बंद करके लेते अर्जुन को चूमने के बाद नीचे ले आई.

खीर, सब्जी और रायता अर्जुन की पसंद के हे बने थे. उसने भरपेट खाया और अपनी मौसी के खाने की तारीफ भी की. मंजू ने जब उन्हें अपने यहाँ रुकने को कहा तोह रेखा जी ने प्यार से मन कर दिए और कल सुबह के खाने से शाम तक उसके साथ रहने का वादा करती फिर कुछ देर और बैठ कर अर्जुन के साथ वापिस घर की तरफ चल दी.

मंजू ने उनके जाते हे ऊपर अपने कमरे में दरवाजे लगा लिए. सारे कपडे उतार कर वह नंगी हे चादर में जा घुसी. Rom-rom शरीर का हिला दिया था अर्जुन ने उसका लेकिन उसको ख़ुशी थी की अभी कुछ साल और वह अर्जुन के साथ ज़िन्दगी जी सकती है. अपने स्टैनो पर हलके से हाथ फेर कर जैसे वो अर्जुन के स्पर्श को याद करने लगी थी. ऐसे हे कुछ हे पालो में वह नींद में जा चुकी थी.
 
बंग ों :क्राई2:

ी विल नॉट कमेंट ों आईटी, फॉर नाउ. वो बात याद रह गई थी? आईटी वास् जस्ट ा स्माल फ्रेज. बूत अनीहौ I'm अमज़द विथ योर रीडिंग एंड मेमोरीज़िंग स्किल्स. वो बात 20+ उपदटेस के बाद सामने आएगी
 
अपडेट 65

बिगड़ैल घोड़ी


घर आते हुए अर्जुन और रेखा जी को तक़रीबन 10 बज चुके थे. दोनों हे कुछ बातें करते हुए यहाँ पहुंच गए. घर के प्रवेश द्वार पर हे प्रकाश दिख गया जो शायद टाइगर को घुमा कर वापिस आ रहा था अभी. टाइगर ने भी रेखा जी को देखते हे उछलना शुरू कर दिए. उन्होंने भी इस समझदार जीव को दुलार किआ और इधर अर्जुन ध्यान से सब तरफ देखने लगा.

"आप क्या साड़ी रात यहाँ पहरा देते है क्या?", अर्जुन को और कुछ नहीं सूझा तोह उसने यही बोल दिए.

"नहीं भैया, हम तोह सिर्फ सुबह और रात में हे कुछ देर यहाँ होते है. वह बस टाइगर को घुआंने लेके गए थे भोजन करने के बाद. घर पे बिंदिया रहती है और हम दूकान या खेत के काम देखते है दूध दुहने की साथ हे.", प्रकाश ने अपना पूरा kaam-kaaj जल्दी से बता दिए.

"फिर सोते कब हो आप? सारा समय तोह doodh-dukaan में हे निकल जाता होगा आपका. सुबह 5 से रात के 11 बजे और फिर घर के भी काम रहते होंगे.", अर्जुन ने देखा की उसकी माँ अंदर चली गई तोह वह थोड़ा खुलकर बात करने लगा था. प्रकाश को भी ाचा लगा के घर के छोटे मालिक उसके साथ बात कर रहे है. बिंदिया जहा 24-25 साल की एक गदराई औरत थी वही प्रकाश एक साधारण शरीर का 27-28 साल का मेहनती आदमी था.

"सोने का क्या है भैया, कभी तोह दिन में हे झपकी ले लेते है और फिर रात तोह बेपरवाह हो कर 6-7 घंटे आँख हे नहीं खोलते. बस एक चिल्लूम लगते है थकान मिटने को.", दरवाजा बंद करते हुए वह भैंसो के बाड़े के साथ बने चारा रखने वाले कमरे की तरफ चल दिए तोह अर्जुन भी कोथुल वश उसके साथ हो लिए.

प्रकाश ने वही एक तरफ प्लास्टिक में लिपटी मिटटी की पाइप जैसी चिल्लूम निकल ली और kapde-dandi से उसको साफ़ करने लगा.

"वैसे ये सेहत के लिए बड़ी खराब चीज है भैया. आप बड़े है तोह ज्यादा समझते होंगे.", अर्जुन ने देखा की प्रकाश अपनी जेब से एक और पुड़िया निकल रहा था. फिर कुछ देर वह मुस्कुराता हुआ चिल्लूम तैयार करने लगा और अलाव से एक अंगार चिल्लूम पर रखते हुए काश लगाने के बाद बोलै.

"आप छोटे मालिक है लेकिन जवान है तोह एक बात बता देते है, आपके काम आएगी. ये चिल्लूम बुरी चीज नहीं है लेकिन तम्बाखू जरूर है.", सच में उस धुएं की महक अजीब थी. अर्जुन ने 2 कदम पीछे कर लिए और फिर बोलै.

"मतलब ये तम्बाखू नहीं है क्या?"

"नहीं भैया जी. ये तोह भोले बाबा की बूटी है जो शरीर को आराम पहुँचती है. इसके 4-5 काश लेने के बाद फिर मस्त नींद आती है और कमजोरी नहीं होती. लेकिन एक बात कहूंगा की आप कभी मत करना इसको, एक नशा लग जाता है इसका.", एक लम्बा काश लेने के बाद प्रकाश ने वह चिल्लूम भुजा दी और जमीन पर पड़े खली लौटे को वही रखे मटके से भरते हुए अपना गाला टर्र करने लगा. अभी वह और बातें करते की बिंदिया उधर चली आई. चाल में साफ़ लड़खड़ाहट थी और अर्जुन को देखते हे जैसे झूठा गुस्सा चेहरे पर ले आई वह.

"चलिए जी. बहोत रात हो गई है अब सोने का वक़्त हो चूका. सुबह फिर जल्दी निकल जाओगे.", अर्जुन देख रहा था के कैसे एक हाथ साड़ी के ऊपर से छूट दबाये कड़ी बिंदिया उसको हे देख रही थी. अर्जुन के चेहरे पर मुस्कान आ गई. बिंदिया नजरे फेरती नीचे बैठे अपने पति को देखने लगी.

"चलिए भैया जी. अब हम चलते है सोने नहीं तोह हमारी जोरू कल खाना नहीं देंगी. बिंदिया वह भैंसे को पानी देखती आ जाना तुम", 4 काश खींचने से हे प्रकाश की जुबान और चाल हिल गई थी. अर्जुन देख रहा था के कैसा प्रभाव था इस नशे का उस जवान व्यक्ति पर. बिंदिया की क्या गलती थी अगर पति हे ऐसा नशेड़ी हो और प्रकाश को समझ क्यों नहीं आती की वह अपनी औरत के साथ क्या खिलवाड़ कर रहा है.

"ाचा भैया, शुभरात्रि.", अर्जुन जाने हे लगा था के बिंदिया को अपनी तरफ देखते हुए रुक गया. बिंदिया बाल्टी उठती हुई पास लगी टूंटी के नीचे रख उसको भरने लगी.

"आपने ठीक नहीं किआ आज दोपहर मेरे साथ.", बिना अर्जुन को देखे वह बड़ी धीमी आवाज में कह रही थी.

"मैंने ऐसा क्या कर दिए? अगर तुम्हे मेरे साथ नहीं करना था तोह मन कर देती. और सही बताऊ तोह मुझे इतना याद है के मैं तुम्हारे कमरे में आया था और फिर गया.", अर्जुन ने थोड़ा पानी हाथो पर डालकर उन्हें साफ़ करते हुए कहा.

"याद नहीं? फाड़ के रख दिए है सबकुछ तुमने मेरा. आधा घंटा बाद भी खून रिस्ता रहा बुर के अंदर से और तुम्हे याद नहीं. हथियार दिखाए होते तोह मैं मजाक भी नहीं करती छुड़वाने की बात तोह दूर. ये पानी डालो वह मुझसे नहीं उठने वाली ये.", अर्जुन ने ध्यान से देखा तोह पाया की बिंदिया की टाँगे सच में चौड़ा गई थी. उसको इतना पता था के ये बेचारी ज्यादा चूड़ी नहीं थी और ऊपर से उसके लुंड का आकर.

"माफ़ कीजियेगा आगे से ऐसा नहीं होगा.", अर्जुन ने वह बाल्टी भैंस के सामने बानी प्याऊ में खली करते हुए कहा.

"बात माफ़ी की नहीं है. प्यार से भी कर सकते थे न.? मैंने तोह खुद हे बुलाया था लेकिन तुम तोह बिना सुने बस घंटे भर तक रौंदते रहे. चूचिया तक दुःख रही है. पति या तुम्हारे नाना ने हाथ लगाया तोह पता चल जायेगा, इसलिए माहवारी का बहाना करना पड़ा.", बिंदिया हल्का सा शर्माती हुई बाल्टी फिर से टूंटी के नीचे रखती कहने लगी.

"वैसे सच कहु तोह प्रकाश भैया की किस्मत ाची है जो आप जैसी बीवी मिली है.", अर्जुन ने एक बार और ध्यान से बिंदिया को देखते हुए कहा. भरी कूल्हे, मॉटे दूध और पहले हुए गाल. रंग बेशक सांवला था लेकिन वह एक भरपूर जवान औरत थी.

"मेरे वह अगर ठीक होते तोह क्या मैं तुम्हारे नाना के नीचे आती? या तुमसे करवाने की भूल करती.? किस्मत खराब है मेरी जो अभी तक पेट से ना हो पाई.", बात गंभीर थी लेकिन बिंदिया के चेहरे पर उस हलकी रौशनी में भी मुस्कान थी. अर्जुन ने बाल्टी उठाते हुए फिर से खाली की और जब वापिस आया तोह ब्लाउज के ऊपर से हे एक उभर को दबाते हुए बोल कर निकल गया.

"कल आराम से इलाज करता हु.", बिंदिया अपनी छाती सहलाती दर्द और सिसकारी से बस अर्जुन को जाते हुए देखने लगी.

'कल. हाँ इस बार देखती हु ाचे से. शठ.. जालिम कही का... आह.' और अपने कमरे की तरफ हंसती हुई चल दी.

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"कहा थे तुम? और मैंने कितना इन्तजार किआ खाने पर तुम्हारा.", समय दीदी अर्जुन को अंदर वाले आँगन में हे मिल गई. वह अभी कोई न था क्योंकि पौने ग्यारह का समय हो चला था. 2 मामिया तोह जल्दी बिस्टेर पर जा चुकी थी तबियत की वजह से. कुन्दनलाल जी अपने सम्बन्धी के साथ आज ज्यादा हे पी गए थे तोह वह भी खाने के बाद सो चुके थे. ऐसा हे कुछ सुनंदा जी, अंजना जी और पूजा मामी की माँ का हाल था. भोजन के बाद वह लोग भी सोने चली गई थी.

"आज वह मौसी के घर खाना था तोह उधर समय लग गया. फिर कुछ देर बहार प्रकाश भैया से बातें करने लगा था.", अर्जुन भी सीढ़ियों के पास हे समय के साथ खड़ा हो गया. समय एक रेशमी सफ़ेद पजामा और काली नरम टीशर्ट पहने थी. बालो में रबर लगाए हुए वह साधारण लिबास में भी गज़ब की दिख रही थी इस समय. अर्जुन को अपनी तरफ इस तरह ध्यान से देखते पा कर थोड़ी शर्म से गर्दन झुकाते हुए बोली.

"ाचा कोई बात नहीं. लेकिन आज मैं तुम्हारे कमरे में आउंगी माँ के सोने के बाद. नानी तोह कंचन के साथ सोई है हमारे कमरे में लेकिन अभी माँ का पता नहीं है क्योंकि वह बुआ से बातें कर रही है. स्वाति भी ममता चची के कमरे में थी अभी तोह वही सोयेगी.", इतना कहती वह ऊपर चढ़ने लगी और उसके पीछे हे अर्जुन भी चल दिए. पाजामे से समय के हिलते नितम्भ देख अर्जुन कुछ पल के लिए उनमे खो गया लेकिन ऊपर आने से पहले हे नजरे हटते हुए वह अपने कमरे की तरफ बढ़ गया और समय अपनी माँ के कमरे की और. टोलिया लेते हुए वह बाथरूम में घुस गया जो कमरे से बहार बना था.

दिनभर के हादसे याद करता वह ठन्डे पानी से खुद को ाचे से साफ़ करते हुए नाहा रहा था..

'ये सच में पहले से बड़ा हो गया है. और हलके बाल भी आने लगे इधर.' अर्जुन ने जैसे हे अपने लुंड को साबुन से साफ़ करना शुरू किआ वह खुद भी थोड़ा हैरान हुआ. उसका शरीर बढ़ रहा था अब. दिवार पर लगे डेढ़ फ़ीट के शीशे में खुद को देखा तोह पाया के छातियां भी बहार को उभरने लगी थी और उस पर मासपेशिया ाचे से दिखने लगी थी. ऐसा हे हाल उसकी बाजुओं का था जो पूरी मछली बना रही थी. पेट सपाट तोह था लेकिन वह भी अब सख्ती आ चुकी थी 6 डब्बे से उभर आये थे.

'म्हणत और सही खुराक.' बस इतना बुदबुदा कर वह फिर पानी के नीचे खड़ा हुआ और तक़रीबन 15 मिनट बाद सिर्फ पाजामे में बहार निकल आया. बाल सूखते हुए कमरे में आने के बाद एक बिना ब्याह के टीशर्ट पहन वह टहलने के हिसाब से तीसरी मंजिल की खुली छत्त पर आ गया.

मौसम ाचा था इस समय. चाँद की रौशनी भी थी और आसमान में तारे भी जगमग थे. छत्त पर लम्बाई की तरफ chahal-kadmi करते हुए वह एक तरह से सैर कर रहा था.

"अकेले क्या कर रहे हो यहाँ? नींद नहीं आ रही थी क्या?", ये पूजा मामी थी जो आज एक गहरे रंग के gown-nighty में थी.

"नहीं ऐसा कुछ नहीं है. वह थोड़ी आदत है न सोने से पहले खुली हवा में टहलने की तोह सोचा यहाँ हे घूम लेता हु. आप बताइये मामी जी, आप नहीं सोई अभी तक? थक गई होंगी इतनी म्हणत के बाद.", अर्जुन भी सँभालते हुए उनके हे लहजे में बात का जवाब दे रहा था.

"ऐसा तोह कुछ किआ हे कहा जो थकान होती मुझे. घूमने भी कार में गए थे फिर घर पर तोह आराम हे किआ है. हाँ तुमने ज्यादा म्हणत की थी तोह लगा के शायद तुम सोने चले गए होंगे.", दिवार के साथ दोनों हाथ टिकाये वह एक कामुक तरीके से कड़ी हो गई थी. भारी सतांन इस तरह दोनों हाथो के बीच से और भी उभर के दिखने लगे.

"मैं म्हणत से नहीं घबराता मामी जी. अब शरीर ऐसा है तोह आदत भी हो गई. वैसे यहाँ तोह कुछ म्हणत करने को है नहीं लेकिन अपने घर होता हु तोह बहोत सख्त नियम है.", अर्जुन ने उनका ऐसे खड़ा होना najar-andaaj कर दिए था. पूजा को भी उसके द्वारा ऐसे तिरस्कार करना ाचा न लगा लेकिन वह बड़ी थी और अनुभवी भी. संभाल लिए अपने गुस्से और जलन को.

"वैसे सुना है के म्हणत तोह यहाँ भी काफी की है तुमने. कल रात हे कोई कह रहा था के छत्त पर ज्यादा कसरत की तुमने.", जुबान में मिठास के साथ हे जेहरीले तीर चला रही थी पूजा. अपने हे भांजे से जाने कैसा gila-shikwa था उनको. अर्जुन भी समझ गया था के वह संगीता मामी की बात कर रही है लेकिन लफ्ज़ो को रोक रखा है.

"मामी जी मेरा तोह स्वाभाव हे ऐसा है. जगह ाची हो, मौसम भी वैसा हे हो तोह मैं mehnat-kasrat कर हे लेता हु. आपकी जानकारी के लिए बता दू की कल रात के बाद आज भी 2 बार म्हणत कर चूका हु.", उसने जानभूझ कर 2 कहा 3 नहीं. और उसके ऐसे जवाब पर पूजा जड़ होती हुई उसके चेहरे को देखने लगी. वह कोई मुस्कान न थी बस एक स्पष्ट गंभीरता और तेज. अर्जुन अब तक का सबसे परिपूर्ण व्यक्ति था जो पूजा ने देखा था. 40 पार होने के बावजूद पूजा खुद इस स्कूल जाने वाले लड़के की और आसक्त हो चुकी थी. लेकिन वह सीधा कुछ भी नहीं करना चाहती थी. बस अर्जुन के ये 2 बार कसरत वाले शब्द उसको झिंझोड़ रहे थे.

"साफ़ कहो न कोण 2?", पूजा से और कुछ न कहा गया तोह वह सीधा हे मुद्दे पर आ गई.

"कोण मतलब?", अर्जुन भी अब दिवार के साथ हे आ खड़ा हुआ. वो बहार देख रहा था और पूजा अपने भांजे को.

"मेरे मुँह से हे sun-na चाहते हो तोह सुनो. रात तुमने संगीता के साथ सबकुछ किआ ये मुझे पता है और हम दोनों हे उस कसरत की बात कर रहे है. तोह बताओ के आज 2 कोण थे.?", धैर्य जवाब दे गया था पूजा का जो अपने बेटे की उम्र वाले भांजे से वह ये बात करने लगी थी.

"नाम जान कर क्या करेंगी आप? चलो फिर भी इतना बता देता हु की एक कुंवारी थी और एक शादीशुदा.", अर्जुन इतना कहने के साथ हे सीढ़ियों से नीचे की और चल दिए बिना पूजा मामी पर नजर फिराए. पूजा को एक और झटका लगा ये सुनकर की अर्जुन ने एक कुंवारी और एक शादीशुदा के साथ किआ है.

'अनीता के साथ तोह पता है मुझे की इसने शाम को हे किआ है. दूसरी, दूसरी कही समय तोह नहीं? नहीं वह हरगिज़ ऐसा नहीं करेगी लेकिन वह आज सारा दिन नजर नहीं आई थी. खाना भी सबसे आखिर में खाया था उसने. हे भगवन ये क्या गलती कर बैठी मैं.', पूजा के तोह कान हे गरम हो गए सब सोच कर. कुछ देर वह वैसे हे कड़ी हुई जाने क्या सोचती रही लेकिन फिर चेहरा ठीक करती नीचे चल दी.

सभी कमरों के लाइट बंद थी इस समय ऊपर सिर्फ अर्जुन और खुद उसके कमरे को छोड़ कर. अपने कमरे में निगाह डाली थी तोह देखा की समय पाँव पर चादर किये बगल में तकिया लगाए लेती हुई थी. थोड़ा निश्चिंत होती वह दरवाजा हल्का से ढाल कर दबे पाँव अर्जुन के कमरे की और चल दी. गेट के पास ठिठक कर उसने हलके से दरवाजा बजाय.

"खुला है. अंदर आ जाओ समय दीदी.", अर्जुन ने वैसे हे आवाज लगाई लेकिन पूजा की तोह sitti-pitti गम हो गई अपनी बेटी का नाम सुनते हे. वह सोचने लगी की कही उसकी बेटी का अब रात का तोह कार्यक्रम नहीं बना हुआ इसके साथ. दर्द से सर भारी हो चला था सब सोचते हुए. हिम्मत करती वह दरवाजा खोल कर अंदर दाखिल हुई जहा अर्जुन सिर्फ पाजामे में बिस्टेर से तक लगाए कोई किताब पढ़ रहा था. अपनी मामी को सामने देख कर भी उसको कोई हैरानी नहीं हुई.

"समय क्यों कहा तुमने, बिना देखे हे.?"

"समय दीदी रात को बात करने का बोल रही थी तोह लगा वही होंगी. वैसे तोह कोई आता नहीं इस कमरे. लेकिन ाची बात है के आप आई. बैठिये", अर्जुन ने किताब का एक पन्ना मोड़ते हुए उसको बंद करते हुए एक तरफ रख दिए. अर्जुन की समझदारी और आवाज से गंभीरता देख कर पूजा लाजवाब रह गई थी. फिर भी अपनी नीले रंग की निघ्त्य को ठीक करती वह बिस्टेर के किनारे पर बैठ गई. एक नजर किताब पर डाली जो अब बंद पड़ी थी. 'फंडामेंटल ऑफ़ फिजिक्स' शीर्षक की किताब देख कर वह थोड़ी आश्वस्त हुई के ये लड़का अपने मतलब की किताब हे पढ़ रहा है.

"तुमने नाम क्यों नहीं बताये?", पूजा का स्वर बहोत धीमा था.

"आपको नाम जाकर क्या मिलेगा? इतनी जिज्ञासा क्यों हो रही है मामी आपको? आप खुद से खुश नहीं है या दूसरे लोगो की ज्यादा फ़िक्र रहती है आपको.", अर्जुन का सवाल सटीक था. पूजा कुछ देर खामोश रही और फिर एक बार उसकी तरफ नजर करती कहने लगी.

"तुम्हे नहीं लगता के तुम इन सब चीजों के लिए छोटे हो? ये सब गलत नहीं लगता तुम्हे जो भी तुम यहाँ कर रहे हो?", अर्जुन इस बात पर मुस्कुराते हुए उनके चेहरे को निहारने लगा. पूजा मामी के चेहरे पर गंभीरता जरूर थी लेकिन भरे गाल, उलझी हुई घनी जुल्फे, तीखी बोहेन, बड़ी आँखें और लाल सुरक बड़े होंठ बताते थे के वह सच में एक खूबसूरत और कामुक स्त्री थी. अर्जुन को यु अपनी तरफ निहारते देख अगले हे पल वह नजरे नीची करती चादर पर एक ऊँगली चलने लगी.

"ख़ुशी हर इंसान के लिए जरुरी है न मामी? फिर क्यों किसी को ज्यादा और किसी को बिलकुल भी नहीं मिलती? और सही या गलत का फैंसला कौन करता है? आपके 2 बचे है लेकिन ऐसे भी लोग है जिनके वर्षो बाद भी कोई औलाद नहीं. आपके पास अपने पति है लेकिन ऐसी बहोत सी महिलाये है जिनका सुहाग नहीं है. जितना इंसान का हक़ होता है ज़िन्दगी जीने के लिए उतना उसको देना कोई गलती या अपराध नहीं. अपराध या गलत वह है जो दुसरो के हिस्से की ख़ुशी भी चीन ले. जो दुसरो को दुःख दे या उन्हें सताए. आप बताओ जरा क्या मैंने ऐसा कुछ किआ? आप एक उचित तर्क दीजिये और मैं मान लूंगा की मैं गलत हु.", अर्जुन अब बिलकुल सामने बैठ चूका था अपनी पूजा मामी के जो उसकी कही हर बात को समझ रही थी.

कुछ हे पल बीते थे की उनकी आँखों से tap-tap करते आंसू चादर पर गिरने लगे. वह सुबकना चाहती थी लेकिन आवाज दबाये बस वह अपने आंसुओ को गिरने से नहीं रोक पा रही थी.

"इंसान जब आहात या जख्मी होता है तोह वह 2 तरह के फैंसले करता है. या तोह सबको जख्मी करने का, या फिर कुछ ऐसा करने का जिस से बाकी सब उन जख्मो से बचे रहे जो उसने सही हो. और देखा जाये तोह दोनों अपनी जगह ठीक है. आपको दुःख था कोई तोह वह इतना बढ़ गया की आपने खुद के साथ मुझे भी दर्द देने का फैंसला कर लिए. खुश नहीं हो अपनी ज़िन्दगी से आप? आप बात कर सकती है मेरे साथ मैं बिलकुल बुरा नहीं मानूंगा. आपकी दी हुई दवा भी तोह झेल हे ली थी.", अर्जुन ने आगे बढ़कर रोटी हुई अपनी मामी का चेहरा एक हाथ से ऊपर किआ जहा वह खूबसूरत आंखें रोने से लाल हो चुकी थी, गोर गाल पानी से भीग चुके थे. इस समय वह बिलकुल अलग हे पूजा थी.

"मैं सच में बहोत बुरी हु अर्जुन. दीदी ने मुझे बहोत प्यार दिए और कभी एहसास नहीं होने दिए के मैं उनके घर में बहु हु या बहार से हु. लेकिन मेरे भाई की वजह से मुझे तुम्हारे पिता और परिवार पर बहोत नाराजगी थी. ये कब बदले की भावना में बदल गई पता नहीं चला. फिर तुम्हे देखा तोह अपनी ज़िन्दगी के पुराने दिन याद आ गए. संगीता के साथ तुम्हारे मिलान की बात ने मुझे इतना जला दिए था के मैं सब भूल कर बस तुम्हे अपना गुलाम बना लेना चाहती थी. जिस से सिर्फ तुम मेरे हे आगे पीछे रहो, जब भी हम मिले और साथ हे मैं तुम्हारे परिवार से भी अपने भाई के अपमान का बदला ले सकू. तुम्हारे जिस्म को परखने के लिए हे मैंने वह दवा तुम्हे दी थी की तुम उस काबिल भी हो या इस घर के बाकी सभी मर्दो की तरह तुम्हे भी औरत से परहेज है. मैं बहोत बुरी हु अर्जुन, मुझे माफ़ तोह नहीं कर सकते लेकिन मैं हर सजा की हक़दार हु. आइंदा से खोशिस करुँगी की कभी तुम्हारे सामने न औ.", हाथ जोड़ती हुई पूजा मामी रोये जा रही थी. फिर उठने लगी तोह अर्जुन ने उनके दोनों हाथ पकड़ते हुए वापिस अपने पास बिठा लिए.

"पहली बात तोह ये है की मुझे कोई शिकायत नहीं है आपसे. जो भी किआ उसमे मेरा कोई नुक्सान नहीं हुआ. दूसरा अगर कोई विवाद हुआ है आपके भैया का हमारे परिवार से तोह उन्हें ये बात समझदारी से करनी चाहिए थी क्योंकि गलती उनकी हे होगी ये मैं अभी कह देता हु. क्योंकि मेरे दादाजी गलती करते नहीं और पापा ऐसे है की गलती कोई साबित करने के लिए रहता नहीं. और अब आते है मुझे परखने वाली बात पर तोह अब जरा ये बता दीजिये के परिणाम क्या मिला आपको? उसको बाद मैं सजा पर आऊंगा.", अर्जुन ने परिवार की बात संजीदा हो कर कही थी लेकिन फिर मसखरी करते हुए उसने उनके चेहरे को ऊपर उठाते हुए पुछा. उसकी ऐसी बात पर रोटी हुई पूजा मामी के चेहरे पर भी एक छोटी सी मुस्कान आ गई.

"ऐसा क्या है तुम्हारे दादाजी और पापा में?", अर्जुन का मतलब समझती वह नजरे झुकाये आँखें साफ़ करती पूछने लगी. अर्जुन भी उनके गाल साफ़ कर रहा था अपनी उंगलियों से.

"आप खुद हे मिल लेना कभी क्योंकि मैं तोह छोटा हु न अभी.", शरारत से अर्जुन ने हलके से उनका गाल दबाते हुए कहा.

"ाचा अब तुम आराम करो, मैं चलती हु.", वह बिना अपना चेहरा दूर किये इतना हे बोली. अर्जुन की हरकत उन्हें ाची लग रही थी लेकिन मैं दुखी भी था खुद के ऐसे व्यवहार पर वह भी इस लड़के के साथ जो बड़े दिल के साथ हे समझदार भी था. कितनी बड़ी गलती की थी वह दवा देने वाली लेकिन अर्जुन ने पता होने के बावजूद उन्हें एहसास तक नहीं करवाया. गलत करने पर भी उल्टा अर्जुन ने उन्हें हे सही कहा. ये सब सोचती वह फिर से भर्र गई थी लेकिन अर्जुन ने जैसे ये महसूस कर लिए था.

"सजा दिए बिना तोह मैं आपको जाने नहीं दूंगा मामी. आपने इतना कुछ किआ है मेरे साथ तोह अब मेरी बारी है.", माथे पर हाथ फेरते हुए उनके बिखरे बाल सही करता वह उठा और दरवाजा बंद करता फिर से उनके साथ हे बिस्टेर के किनारे आ बैठा. पूजा मामी किसी nav-byaahta की तरह सेहम सी गई थी दरवाजा बंद होने पर और अब जैसे हे अर्जुन ने उनका हाथ अपने हाथ में लिए तोह सिर्फ एक बार नजरे उठा कर उन्होंने अपने सामने बैठे मुस्कुराते अर्जुन को देखा और अपनी नजरे झुका ली.

"मैं तुम्हारी मामी हु. ये ठीक नहीं होगा.", वह निघ्त्य के कपडे को ऊँगली में लपेट रही थी दूसरे हाथ से. शरीर हल्का कांप रहा था और धड़कन जैसे रेलगाड़ी हो चुकी थी.

"कानून की नजर में कोई रिश्ता नहीं होता, मामी और फिर आपका गुनाह कितना संगीन है. मुझ जैसे जंगली घोड़े को अपने दरवाजे बाँधने वाली थी आप तोह जरा मैं भी देखु मेरी मामी कितनी कुशल घुड़सवार है.", अर्जुन आजतक ऐसे अंदाज में नहीं आया था. बेबाक, बेख़ौफ़ और पूरी तरह बेफिक्र. घुड़सवारी वाली बात सुनते हे पूजा मामी अपना नीचे वाला होंठ काटने लगी.

"वह तोह वैसे हे कह दिए था. मैं इस अर्जुन को नहीं जानती थी उस वक़्त और शायद इस कमरे में आने से पहले मैं अपने पहले परिवार के साये से बहार भी नहीं आ पाई थी. अब मुझे ऐसा कुछ नहीं करना.", अर्जुन उनकी बात सुनता हुआ अपनी मामी की एक ऊँगली को मुँह में लेके चूसने लगा. पूजा मामी की त्वचा पर बाल तोह नहीं थे लेकिन अर्जुन की इस हरकत से सारे रोये जरूर खड़े हो गए थे. सिर्फ ऊँगली को मुँह में लेकर 2-3 बार चूसने भर से उसने पूजा का वजूद हिला दिए था.

"मतलब मैं अब आपको पसंद नहीं?", अर्जुन जिस तरह से बीएड के किनारे उनके साथ बैठा था उसका बया पत् मामी के दाए जांघ से सत्ता हुआ था. कोहनी अर्जुन के जांघ पर तिकी थी जिस हाथ की उंगलिया वह अपनी उंगलियों में जकड़े था.

"मैंने ऐसा तोह नहीं कहा न. मेरा मतलब था के मैं तुम्हे गुलाम नहीं बनाना चाहती अब. और पता लग गया के बना भी नहीं सकती.", उनके पति तेजपाल से पूजा को 2 खूबसूरत बेतिया हुई थी, शादी से पहले भी दिल्ली में उनका एक प्रेमी था लेकिन जो एहसास उन्हें अभी हुआ था वह उनके शरीर में पहले कभी न हुआ था. बिस्टेर में वह खुद अपने पति पर 21 रहती थी और यही वजह थी की उनके पति 15-20 दिन में हे कभी कभार थोड़ा बहोत करते थे और वह भी 10 मिनट बाद या तोह मुँह पलट कर सो जाना या फिर उठकर ड्यूटी चले जाना.

"लेकिन अब मुझे आपको ये तोह यकीन दिलाना हे होगा के मैं सच में क़ाबिल हु या आप सही थी.", अर्जुन ने पहल करते हुए उनका दूसरा हाथ पकड़ कर मामी को अपनी तरफ खींच लिए. पूजा मामी बिलकुल ढीली बैठी थी तोह इस तरह अर्जुन द्वारा अपनी तरफ करने पर सीधा उसके सीने से जा लगी. उनके वह भारी चुके निघ्त्य के अंदर आजाद थे और अर्जुन की छाती से लगते हे किसी नरम गुब्बारे से हिलते हुए डब्ब गए.

पूजा ने अभी तक सुना और देखा था के अर्जुन बहोत हे सय्यम और शांत स्वाभाव वाला लड़का है लेकिन ये अंदाज़ बिलकुल जुड़ा था. आज जैसे पूजा जैसी tej-taraar शिकारी खुद शिकार बन चुकी थी. अर्जुन ने बड़े आराम से बिस्टेर पर बैठे हुए हे अपनी गदराई और सुगठित मामी को अपनी गॉड में बिठा लिए. मखमली कमर को अपनी बाहो में लपेटे वह उन्हें खुद से लगाए चेहरे से 6 इंच दूर था.

"मैंने तोह सुना था के आप हावी होने वाली शक्शियत है लेकिन यहाँ ऐसा क्यों लग रहा है जैसे आप मेरे अधीन हो चुकी है.?", पूजा को उस बारीक निघ्त्य के अंदर अपने नंगे कूल्हों पर अर्जुन के ardh-uttejit लुंड का एहसास हुआ तोह वह शुन्य हे हो गई थी लेकिन उसकी आवाज से वह थोड़ा संभालती हुई शर्माती हुई बोलने लगी.

"आज सजा दे लो और अगर तुम्हे लगे की उसके बाद भी हमे मिलना चाहिए तोह फिर अगली बार जरूर मैं वैसे हे मिलूंगी जैसा तुमने सुना है.", अर्जुन ने उस गहरे नीले रेशमी कपडे में हिलते नारियल से चुके को एक हाथ से दबाते हुए उनकी गर्दन पर होंठ रख दिए. अर्जुन के सख्त और बड़े हाथ में अपना सतांन महसूस करते हे पूजा ने जाँघे कस ली लेकिन गर्दन पर होंठ की तपिस मिलते हे मुँह से सिसकारी निकलती वह खुद हे गर्दन पीछे लुढ़कती अर्जुन के हाथो में झूल गई.

"मैं वह रूप आज हे देखना चाहूंगा. समझ लीजिये वही सजा का हिस्सा है. आपको तोह पता हे होगा के मैं प्यार से करता हु लेकिन मैं देखना चाहता हु के आप कितना साथ देती है.", निघ्त्य के सामने लगी कपडे की बेल्ट खोलने के साथ हे वह लगे सार बटन कपडे से जुड़ा करता वह उन्हें निर्वस्त्र करके बीच बिस्टेर पर ले आया. 5 फ़ीट 6 इंच लम्बी, गोरी और बेदाग़ जिस्म वाली पूजा के शरीर पर चर्बी सिर्फ 2 जगह हे थी, भारी नितम्भ जो बिलकुल सही आकर में थे और बड़े कड़क चुके, जो कही से भी 38-इ या फ से कम् न थे. गोल भूरे दायरे में मटर के दाने से चूचक जो कड़े हो चुके थे, सपद नरम पेट और गहरी नाभि से 2 इंच नीचे ताज़ी साफ़ की हुई पेडू और 4 इंच लम्बा छूट का गुलाबी चीरा उन मॉटे छूट के बहार वाले होंठो के बीच. गुलाबी नुकीले पत्ते थोड़ा बहार को निकले बता रहे थे की वह कितनी कामुक और संसर्ग में कितनी अग्रणी है.

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अर्जुन ने दोनों मॉटे चुचो को कास के पकड़ते हुए उनके ऊपर झुक कर दोनों होंठ अपने मुँह में भर लिए. ये काफी था पूजा को मर्यादा से निकलने के लिए. हमेशा हे कामातुर रहने वाली पूजा अर्जुन की मजबूत पकड़ अपने मॉटे दूध की मटकियों पर पा कर खुद भी सबकुछ भूल उसको बड़ी शिद्दत्त से चूमने लगी. लम्बी जीभ अर्जुन के मुँह में डालती वह कमर भी उठाने लगी थी. इतनी गरम औरत को अपने नीचे पड़ा देख एक पल अर्जुन भी पूर्ण उत्तेजित हो गया था लेकिन उसको पता था के ऐसी महिला को सामने से टक्कर दे कर हे तृप्त किआ जा सकता है.

निप्पल को चुटकी में लेकर मसलते हुए वह भी अपनी जीभ उनके गरम मुँह में डालने लगा जिसको पूजा मामी मजे से चूसने लगी थी. दोनों को हे जब सांस लेने में दिक्कत होने लगी तोह एक पल को अलग हुए और भीगे होंठ उनके मॉटे चूचक पर लगते हुए अर्जुन ने एक हाथ उनकी गीली छूट की दरार पर रख दिए. होंठो में पकड़ कर वह उन्हें बहार की तरफ खींच रहा था और 2 उंगलियों से दरार को फैलते हुए मध्यमा ऊँगली से छूट के छेड़ को कुरेदने लगा.

"आह्ह्ह्ह.. कोई रेहम नहीं करना.. अपने कपडे भी निकल लो ना.. आठ.. और ये लाइट बुझा दो उम्म्म..", अपनी एक टांग अर्जुन के ऊपर करती वह छूट फैलाये ungli-chodan का मजा लेती आहें भर रही थी. अर्जुन ने उनकी बात अनसुनी करते हुए दूसरा चुका मुँह में भरते हुए अपने दूसरे हाथ की 2 उंगलिया उनके मुँह में दाल दी. नीचे छूट में भी 2 लम्बी उंगलिया अंदर बहार होती ाचे से रगड़ रही थी. 3-4 मिनट की इस तेज रगड़ाई और दूध चूसै से हे पूजा मामी bhal-bhal कर अर्जुन के हाथ पर हे झड़ने लगी. उनका yoni-ras कुछ अर्जुन के हाथ पर लगा और बाकी छूट से नीचे गांड तक जाने लगा.

पूजा मामी निढाल होने की जगह जैसे और भड़क गई थी. खुद हे अपना दूसरा सतांन दबती वह एक हाथ से अर्जुन की पीठ सहलाती जैसे उसको और जोर से करने को कह रही थी. अर्जुन बिना कुछ कहे फुर्ती से खड़ा हुआ और बड़ी लाइट भुजते हुए बिस्टेर पर लगे एक लैंप को जलने के बाद पजामा उतार सीधा पूजा की छूट के सामने आ बैठा. दोनों टाँगे फैलते हुए उसने लुंड को उस धीमी रौशनी में हे मामी की मखमली गीली छूट पर घिसते हुए चिकना किआ और पत् को थपथपाते हुए इशारे से अपनी टाँगे वही रोक कर रखने का बोलते हुए एक हाथ से लुंड के सुपडे को छेड़ पर टिकते हुए दबाव देने लगा.

हैरानी से आँखें चौड़ी होने लगी थी मामी की जब वह दहकता हुआ मोटा सूपड़ा छूट के प्रवेश द्वार को फैलता अंदर जाने लगा. कोई आधा इंच सूपड़ा जब स्थिर हुआ तोह अर्जुन ने उनका वह दूसरा पाँव ऊपर उठाते हुए कमर जोर से आगे चला दी.

"ओह्ह्ह्ह... बहनचोद.. आह्हः.. क्या कर दिए रे.. मर्डर गई मैं.. आह..", चार इंच लुंड अंदर जाते हे पूजा मामी और उनकी छूट को अपनी औकात पता चल गई थी अर्जुन के लुंड के सामने. एक खुली हुई छूट को भी इस लड़के के लुंड ने सोच से परे तक चौड़ा करते हुए जैसे अंदर तक भेद दिए था.

"मामी बड़ी कासी हुई हो अभी तक.", उनकी मखमली चिकनी जाँघे फैला कर ऊपर उठाये अर्जुन ने कटाक्ष सा किआ. पूजा मामी के चेहरे पर दर्द की हलकी लहर देख वह समझ गया था के ये अभी और भी ले सकती है.

"संगीता सही थी.. आह्हः.. तेरा इंसान का तोह नहीं.. आह्ह्ह्हह माआ.. बचा..." बाकी सब उनके मुँह में दबा रह गया जब अर्जुन के दूसरे तगड़े धक्के ने पिछली साड़ी गहराई ख़तम करते हुए उनकी छूट के अनछुए हिस्से में दस्तक देते हुए बच्चेदानी से चुम्बन किआ. पूजा को तोह अपनी नाभि तक उसका वह 4 इंच मोटा और बीतते से लम्बा लुंड महसूस हो रहा था. अर्जुन अपनी मामी के होंठ जकड़े था और वही मामी उसको पीछे धकेलने की कोशिश कर रही थी. फटी छूट से भी 2 बूँद खून की चल्लाकक आई थी इस प्रहार से. उनके सख्त मुलायम स्टैनो को कस के मींजते हुए अर्जुन ने 1 मिनट बाद हे मुँह होंठो से हटाया और आधा लुंड उस कासी छूट से झटके से बहार निकलते हुए फिर से जड़ तक अंदर दे मारा.

"माँ.. मर्डर गई मैं.. ऐसी सजा.. आह.. देगा क्या."

"नहीं मामी, ये तोह मजे की शुरुआत है. सजा बाद में दूंगा.." उनके कूल्हे सहलाते हुए वह उनकी चिकनाई और भराव का मजा ले रहा था. लुंड जड़ तक छूट में धंसा और अंडकोष छूट के बाहर ठीके थे. "वैसे सच में आप टक्कर की हो जो 2 झटको में झेल गई. अब तैयार हो जाओ जरा.", अर्जुन ने बात आगे कहते हुए तेजी से आधा लुंड अंदर बहार करते हुए उनकी चीखे भी निरंतर करवा दी. हर धक्के पर जैसे पूजा को छूट और चौड़ी होती महसूस होने लगी. 5-6 मिनट बाद हे लुंड सुपडे तक बहार आता और फिर अंतिम चोरर तक चोट पहुंचने लगा था. चुके लाल हो गए थे जोरदार मर्दन से.

"आह... ये मेरी छूट है कोई बदला लेने की जगह नहीं.. पेट दुख दिए मेरा.. आठ... संगीता -अनीता ने कैसे झेला था इस हब्शी के लुंड को?", अर्जुन की छाती पर नाख़ून गदति वह सिसक रही थी. कूल्हों से लेकर चेहरे तक हर भाग अर्जुन के तगड़े धक्को पर हिल रहा था.

"मामी चलो अब आप ऊपर आओ मेरे.", अर्जुन ने जैसे हे सूपड़ा निकला तोह एक पल के लिए पूजा ने रहत की सांस लेते हुए टाँगे पसरी बिस्टेर पर. छूट से चिपचिपाहट किसी तार सी अर्जुन के लुंड तक लगती अंतत में टूट कर आधी छूट पर और आधी लुंड से जा लगी. सच में अर्जुन ने छूट को ाचे से कूटा था जो वह ऐसा गधा कॉमर्स निकल रही थी.

बिस्टेर पर पीठ के बल लेट कर अर्जुन ने जबरदस्ती उन्हें ऊपर की तरफ खींचा तोह बड़ी अदा से वह मुट्ठी में लुंड की जकड पकड़ती उसको निहारने लगी और फिर गप्प से सूपड़ा होंठो के भीतर. अर्जुन ये देखते हे मुस्कुरा उठा और अपनी मामी के सर पर हाथ रखते हुए सहलाने लगा. पूजा मामी भी अपने मुँह को फैलाये उस सुपडे को धीमी रफ़्तार से गीला करने लगी. परेशानी तोह बहोत हो रही थी लेकिन ऐसा लुंड देख कर वह खुद को रोक न पाई थी. अर्जुन ने थोड़ा सा सर नीचे दबाया तोह आधा लुंड मुँह से होता गले की घंटी पर जा भिड़ा. आँखे बहार निकलने को होने लगी तोह पूजा ने गर्दन को एक ख़ास कोण पर लुंड के सीधे अनुसार ऊँचा कर लिए. हिम्मतत दिखती वह उतने हे लुंड को अब होंठो में कैसे चूस रही थी. 1 मिनट से कुछ हे सेकंड ज्यादा चली ये चूसै सांस लेने की दिक्कत से ख़तम हो गई.

"तुम्हारे मां का मैं पूरा अंदर ले लेती हु लेकिन ये आधे से आगे नहीं ले पाई. जाड नहीं दुखती तोह कुछ देर और करती.", फिर अपने लचीले भारी कूल्हे फैलाती मामी उस मॉटे सुपडे पर धीरे धीरे बैठने लगी और 5-6 इंच के बाद हे ऊपर नीचे होती मजे से चिल्लाने हे लगी थी. उनके साथ हे वह बड़े बड़े चुके भी फुदक रहे थे. जिन्ह पकड़ते हुए अर्जुन ने अपनी कमर नीचे आती मामी के साथ हे ऊपर उठा दी..

"आह्ह्ह्हह.. सच में निर्दई इंसान हो. सब झूठ बोलती है.. आह... फाड़ दी तुमने ये.. माँ." धम्म से वह अर्जुन की छाती पर दोनों पंजे टिकती बैठ हे गई. अर्जुन ने स्टैनो को छोड़ कर उनके लचीले कूल्हे मसलने शुरू कर दिए.

"चूसना कहा से सीखा आपने मामी? क्या मां के सिवा.", अर्जुन ने कूल्हों को बहार खींचते हुए पुछा. उसको उनके ये रबर से नरम और मुलायम कूल्हे कुछ ज्यादा हे भा गए थे.

"नहीं यार. ऐसा नहीं है. हाँ कॉलेज में था एक मेरे साथ लेकिन उसके साथ ऊपर ऊपर से हे सब किआ था. तेरे मां हे हैं जिन्होंने मेरी सील खोली थी लेकिन तूने तोह टूटी सील से भी खून निकल दिए.. उफ़.. सकिंग मैंने वीडियो कैसेटटे से और खली समय में खीरा और गाजर मुँह में लेकर सीखी है. लेकिन तेरा तोह देसी खीरे से भी मोटा है. अभी तक दुःख रहा है मेरा मुँह. और ये भी.", अर्जुन ने उनकी बात सुनकर उन्हें अपने ऊपर झुकाते हुए खुद हे नीचे से धक्के लगाने शुरू कर दिए. गांड पर लगते धक्के से अब दोनों हे मजे में उड़ने लगे थे. लेकिन 2-3 मिनट में हे पूजा मामी फिर से अकड़ गई थी और इस बार वह पसीने में भीगी उसकी छाती पर निढाल हे हो गई थी. आधे घंटे में दूसरी बार झड़ी थी वह लेकिन अर्जुन इस बार जल्दी नहीं होने वाला था. वह वैसे हे 3 बार खाली हो चूका था तोह इस बार शायद उसका होना मुमकिन हे न था.

"मामी कड़ी हो जाओ अब.", उन्हें बिस्टेर पर मुँह के बल लिटाते हुए वह खड़ा हुआ और अलमारी से नारियल के तेल की डब्बी लेकर उनके पुष्ट पिछवाड़े के पास आ बैठा. सखलन से बेजान से पड़ी पूजा को तोह गुमान तक न था के अर्जुन आगे क्या करेगा. अर्जुन ने दोनों हाथो पर ाचे से तेल लगते हुए दोनों कूल्हों के साथ पीठ तक मालिश करते हुए उन्हें आराम देना शुरू किआ जिस से वह और भी आनंद में जाने लगी लेकिन फिर चुत्तड़ो की उस गहरी दरार में तेल की ठंडी धार महसूस करते हे दिमाग कोंढा. लेकिन उनके गोल सुडोल पत्तों को दबाये अर्जुन अपनी ऊँगली से उनका वह पीछे का छेड़ कुरेदने लगा.

"वह नहीं अर्जुन.. प्लीज.. आह.", वह नरम लेकिन तंग चीड़ ाचे से चिकना करने के बाद अर्जुन ने तेल से चुपड़ी अपनी तर्जनी ुंली अंदर पेल दी. सच में उनकी गांड बहुत हे नरम और नाजुक सी थी. ऊँगली को भी उनके छेड़ ने कस लिए था लेकिन अर्जुन ने परवाह न करते हुए अंदर बहार करते हुए ाचे से उसमे नारियल का तेल भर दिए. लुंड पर दूसरे हाथ से ढेर सारा तेल चुपड़ने के बाद उसने सूपड़ा उनके गदराये कूल्हों के बीच धंसते हुए उस khulte-sikudte छेड़ पर टिकते हुए अंदर की तरफ दबाया तोह पूजा मामी ने तकिया अपने चेहरे के पास करते हुए मुँह में दबा लिए.

"मामी ढीली छोड़ दो नहीं तोह दर्द ज्यादा होगा.", लुंड फिसल कर ऊपर चला गया तोह अर्जुन ने अपनी मामी को चेताया. सूपड़ा भयंकर फूल कर अँधेरे में भी चमक रहा था. उसकी बात मानते हुए और ज़िद्द के सामने हारती हुई पूजा ने गांड को ढील दे दी.

"अभी तक इधर सिर्फ एक बार हे हुआ है वह भी शादी के बाद. 20 साल से भी पहले. प्लीज आराम से.", अर्जुन ने दोनों कूल्हे एक हाथ से चौडाते हुए दूसरे हाथ से लुंड फिर से उस बंद छेड़ पर लगाया और पूरा दबाव देते हुए वह फूला हुआ सूपड़ा आगे सरका दिए. छेड़ को एक बार mootra-surakh ने चूमा और अगले हे पल कच से किसी गरम छुरी की तरह वह उनकी मक्खन जैसी गांड को काट कर अंदर धंस गया.

कटी कबूतरी की तरह पूजा मामी हाथ पाँव पटकने लगी बिस्टेर पर. आँखों से अश्रुधारा बह निकली और गांड में ऐसा महसूस होने लगा जैसे किसी ने बंद मुट्ठी ठूस दी हो.

"उन्न्नन... आह्ह्ह्ह.. धीरे.. मई नहीं ले सकती.. आह..", रोटी हुई वह गांड को कसने लगी तोह अर्जुन ने चटाक से एक थप्पड़ उनके भारी कूल्हे पर लगाया. वह किसी कुशल नर्तक से थिरक उठे और एक हलकी चीख पूजा के मुँह से निकल गई.

"आह मार क्यों रहे हो... माँ..", थप्पड़ लगने से उन्होंने गांड ढीली की थी और अर्जुन ने बैठे हुए हे धक्का लगते हुए पौने लुंड उस संकरी तंग गली में उतार दिए.

"मामी.. आठ.. यहाँ सच में आप कुंवारी हे हो.. आपके कूल्हे देखते हे मेरा दिल आ गया था आपकी गांड पर.", अब वह भी खुलकर ऐसे शब्द बोल रहा था.

"आह.. तेरा साइज देख.. माँ.. तेरे मां को क्या जवाब दूंगी.. ये भी फट गयी..", अर्जुन ने उनकी बात ख़तम होते हे उनपर लेट कर बिस्टेर पर दबे दोनों चुके पकड़ लिए. आराम से थोड़ा सा लुंड बहार करते हुए फिर से आगे तेल दिए. गांड का चला किसी छोटे रबर की तरह उस मॉटे लुंड पर कैसा था. अर्जुन भी जबड़े भींच कर आराम से आगे पीछे करता उनकी गांड मारने लगा. चुके कसके दबाने से दर्द अब 2 भाग में विभाजित हो गया था पूजा का.

"मामी खड़े हो के करे?, अर्जुन ने जब आधा लुंड चलना शुरू कर दिए तोह अपनी कराहती मामी से पुछा. इस तरह उसका पूरा लुंड उनकी गांड की गहराई में नहीं जा प् रहा था.

"आज रात तू जैसे मर्जी कर ले. कल नहीं आने वाली मैं तेरे आसपास.", उनकी बात पर अर्जुन उन्हें ऐसे लिए हे बिस्टेर पर 2 बार पलट गया. बिस्टेर के किनारे आते हे बिना गांड से लुंड निकले उसने मामी को पेट से पकडे हे अपने साथ जमीन पर खड़ा कर दिए. उनका कद्द अर्जुन से आधा फुट काम था तोह अर्जुन वैसे हे उन्हें जकड कर उठाये अलमारी के सामने आ खड़ा हुआ. एक तरफ से बड़ी लाइट जलाते हुए उसने मामी के एक पाँव को कुर्सी पर रखते हुए थोड़ा झुकाया और आईने में देखते हुए बचा खुचा लुंड भी गांड में पेलते हुए अपने अंडकोष कूल्हों से मिला दिए.

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"आह मामी.. सच में मजेदार हो आप. उधर देखो न.", शर्म से आँखें बंद करती पूजा पहले आराम से कड़ी थी लेकिन सार मूसल गांड में उतारते हे वह कराह उठी. अर्जुन ने छूट सहलाते हुए जब उन्हें एक तरफ लगे अलमारी के बड़े दर्पण में देखने को कहा तोह वह भी अपनी हालत देख गरम हो गई. उनकी सोच से भी मोटा वह चिकना लुंड जिसपर मोटी नसे उभरी हुई थी, तरबूज जैसे चूतड़ों के बीच किसी मशीन सा अंदर बहार हो रहा था. नीचे लटकते bhari-bharkam चुके आगे पीछे हिलते इस दृश्य को और कामुक बना रहे थे. उंगलिया छूट चुदाई का अलग सुख देती पूजा को मजे से चीखने पर मजबूर कर रही थी.

"आह.. और तेज मार.. आह.. तू सच में जंगल घोडा है रे.. आह.. फाड़ दे सबकुछ.. माँ छुड़ाए तेरा मां. आह.. आज तोह जान भी लेले तोह कोई गम नहीं. आम.. तू पहले क्यों नहीं मिला रे.. माँ. आठ.." छूट से निकला हल्का फुल्का खून पानी के साथ जांघो पर आ कर सुख चूका था. इधर हर धक्के पर दोनों हे अपने चरम के और पास पहुंच रहे थे.

"मामी अगली बार चिकना नहीं karunga..Aah क्या दूध है आपके.. इनमे दूध नहीं आता बस यही कमी है..", तीन तरफ़ा हमला करता अर्जुन उनकी चिकनी पीठ पर दांत गाड़ते हुए बुरी तरह मामी से लिप्त उनके कूल्हों को और भारी करने लगा था.

"चुदाई ऐसी करता है तोह बचा भी कर हे सकता है.. आह.. तेरे मां के उसमे तोह अब दम रहा नहीं.. तोह तू हे कर कुछ.. मममम मई गई रे..", उनकी बात सुनते हे अर्जुन ने सटाक से लुंड बहार खींच लिए और उन्हें पलट कर झटके में हे लुंड एक बार में हे छूट में पेल दिए. सूपड़ा गांड से निकलता भी दर्द दे गया और छूट के अंदर घुसते हुए भी. "आह जालिम.. आज हे नीव रखेगा क्या?" अर्जुन उन्हें बिस्टेर पर पटकते हुए ताबड़तोड़ धक्के बरसाने लगा. छूट जो चरमसुख से पहले हे गीली हो चुकी थी अब सटासट चलते इस लुंड को भी मजे से निगल रही थी. फिर जब सूपड़ा उत्तेजना से अपनी औकात में आया तोह छूट की नरम दीवारे भी सेहन न कर पाई. 2 मिनट में हे छूट फिर से आंसू बहाने लगी साथ हे अर्जुन ने उनकी दोनों टाँगे फैला कर ऊपर उठाई और हुंकार भरते हुए सीधा गर्भ से सूपड़ा भिड़ा दिए..

"आह्ह्ह्ह.. मामी.. ये हुई सजा आठ.. हम्म्म", हुंकार के साथ हे उसने आज के दिन की सबसे बड़ी वीर्य बौछार उनके बच्चेदानी पर कर दी. गरम गाढ़े वीर्य को अंदर महसूस करते हे पूजा भी चीखती हुई अकड़ गई.

"आह.. भर दे मुझे आठ.. मां की जमीन पर तूने हे खेत जोट दिए.. आह.. ", 5 मिनट तक वह उनके पाँव हवा में उठाये रहा. जैसे गर्भ के अंदर एक के कटरा भर रहा हो. फिर उनकी बगल में लेती कर दोनों चुके प्यार से दबाते हुए बोलै.

"आज से आप मेरी व्यक्तिगत घोड़ी हो आप.", एक निप्पल को कास के मुँह में भर लिए इतना कहने के बाद. पूजा मामी भी उसकी तरफ पलट कर नंगी हे उसकी पीठ सहलाने लगी. अब वह गधा वीर्य बेहटा हुआ छूट से एक धार में बहार निकल रहा था.

"तेरी गुलाम घोड़ी हु अब से मैं. और वडा रहा के अगर तू आँगन के बीच भी नंगा होने को कहेगा तोह वह भी छुड़वा लुंगी. आह.. अब जाने दे न मुझे. डेढ़ घंटे में भी दिल नहीं भरा क्या तेरा.?" रात के साढ़े 12 हो रहे थे.

"यही सो जाओ न." अर्जुन ने एक कूल्हे को दबाते हुए कहा तोह दर्द से सिसक उठी पूजा.

"नहीं... आह.. आज नहीं. शहर में पक्का.. आह..", फिर खुद हे उन्होंने अपनी निघ्त्य पहनी और लंगड़दी कराहती दरवाजा खोल निकल गई. अर्जुन ने भी पजामा पहना और बड़ी लाइट बंद करते बिस्टेर पर आ लेता. वह अँधेरे में हे मुस्कुरा रहा था ये सोच कर की अभी यहाँ क्या हो गया. कहा तोह मामी उसको गुलाम बनाने लगी थी और कहा आज उसने पहली बार में हे उनके तीनो छेड़ खोल लिए. कोई 20 मिनट वह शांति से आँखे बंद किये पड़ा रहा लेकिन फिर अंदर से दरवाजा बंद होने की आवाज सुनते हे एक बार आँख थोड़ी सी खोल कर दबे पाँव आती समय को देख फिर से आँखे बंद कर ली.

"तोह जनाब सो गए. चलो कोई बात नहीं अब डिस्टर्ब नहीं करेंगे.", हलकी आवाज में वह इतना बोलती बड़ी अदा से उसकी नंगी छाती से आ लिपटी. उसको क्या मालूम था के अर्जुन देख चूका है. जब अर्जुन ने करवट लेते हुए उसको बाहों में भरा तोह समय ने आँखें खोल कर देखा.

"जनाब आपका इन्तजार कर रहे थे. मुँह मीठा करके हे सोऊंगा अब.", कमीज के अंदर से नरम पतले पेट को हलके से पकड़ते हुए अर्जुन ने समय के होंठो पर अपने होंठ जोड़ दिए. हैरान होती समय अगले हे पल अपने पहले चुम्बन का मजा लेती उस पर एक तंग रखती चिपक गई. कुछ देर एक दूसरे को इस तरह चूमने के बाद अर्जुन ने पाजामे के ऊपर से हे कूल्हों पर हाथ रखते हुए खुद से चिपका लिए.

"अब सो जाइये. 1 बज चूका है. बाकी प्यार कल करेंगे.", अर्जुन ने समय के कमीज से हाथ अंदर करते हुए नंगी पीठ सहलाते हुए एक बार फिर गाल को चूमा और दोनों ऐसे हे चिपके लेट गए. समय तोह जैसे उस से लिपटने के बाद हे सपनो में चली गई थी. बस तब उसकी आँखें खुली थी लेकिन अब चिपकने और अर्जुन के इस तरह थपकने से आँखें बंद हो गई थी. बिना हिले दोनों ऐसे हे चिपके सो चुके थे.

आज अर्जुन ने वह बिगड़ैल घोड़ी साध ली थी जो उसको कुत्ता बना के रखना चाहती थी. और उसने फैंसला कर लिए था पूजा को अपने बचे की माँ बनाने का.
 
उपदटेस आज शाम को.

कल सुबह से हे दिल्ली हु, कंपनी प्रोजेक्ट पर. सॉरी फॉर देलायिंग
 
अपडेट 66

शीघ्रपतन


सुबह का पहला पहर था ये और आज सुनंदा जी की आँख समय से पहले हे 4 बजे खुल गई थी. अजीब से बेचैनी में वह बिस्टेर से उठकर अपने कमरे से बहार चलती आँगन में आ गई. अभी अँधेरा था आसमान में और यहाँ आँगन में एक सफ़ेद बल्ब जल रहा था जिस से कोने में बने बाथरूम और गलियारे तक रौशनी थी. बाथरूम में जा कर नित्यक्रिया से फारिग होने के बाद उन्होंने स्नान लिया और साफ़ साड़ी पहन कर तुलसी में पानी डालने के बाद सीढिया चढ़ती दूसरी मंजिल पर चली आई.

60 बरस पार होने के बावजूद वह अभी तक शरीर से एक भरपूर स्त्री थी, कही भी उम्र की वजह से कमजोरी या ढीलापन नजर नहीं आता था सुनंदा जी पर. और जिस तरह से वह सीढिया चढ़ कर ऊपर आई थी तोह साफ़ पता चलता था के अभी तक वह ऊर्जा से भरी थी. टहलती हुई वह अपनी दोनों बहुओ के कमरे के आगे से गुजरने लगी तोह पूजा के कमरे का दरवाजा आधा खुला और बत्ती जलती देख उन्होंने वही रुकते हुए सरसरी नजर अंदर डाली.

बड़े बिस्टेर पर पूजा अकेली ast-vyast सी लेती हुई थी. निघ्त्य जांघो से ऊपर थी और सामने सिर्फ कपडे की बेल्ट बंधी थी. दोनों सतांन बहार को निर्वस्त्र झाँक रहे थे.

'ये जाने कब बड़ी होगी? 22 बरस हो गए शादी हुए लेकिन अभी तक सोने तक का तरीका नहीं आया.', हलकी मुस्कान के साथ उन्होंने दरवाजे का दूसरा पल्ला बंद करते हुए अपने कदम छत्त की तरफ जाने वाली सीढ़ियों पर बढ़ा दिए. ऊपर ठंडी हवा में खुली छत्त पर टहलते हुए वह इस खामोश सुबह को देख रही थी. आज कोई 2 महीने बाद वह यहाँ ऊपर आई थी तोह हर तरफ जितना दिख रहा था ध्यान दे रही थी. सूरज उगने में तोह काफी समय था लेकिन साढ़े 4 बजे आसमान में अब काला अंधकार न था.

चलती हुई वह छत्त पर वह कमरे के ऊपर वाले हिस्से की तरफ आई तोह एक उजला सफ़ेद कपडा सीमेंट की टंकी के नीचे वाले खली हिस्से से झांकता दिख गया. सुनंदा जी ने उत्सुकता वश घुटनो के भार बैठ कर उस कपडे को बहार निकला तोह वह एक सफ़ेद चादर थी.

'अब इतनी लापरवाह हो गई है ये सब की साफ़ सुथरी चादर भी यहाँ गुठमूठ पड़ी दिखाई नहीं देती इन्हे. मैली हो गई होगी और जाने कब से राखी है.', चादर को सही तरह से समेटने के लिए उन्होंने उसको फैलाया तोह एक गहरा धब्बा नजर आया उसके ठीक बीच में.

'ख़राब हो गई है तोह फेंक देनी थी, ये जगह है कोई रखने की.', धब्बे को जैसे हे ध्यान से देखा तोह चेहरे पर असमंजस के भाव आ गए. फिर से चादर समेत कर वह साढ़े कदमो से नीचे चल दी. जब दूसरी मंजिल पर पहुंची तोह नीचे वाले आँगन में अपनी जेठानी अंजना जी को बाथरूम जाते देख अपने कदम वही रोक लिए. उनके अंदर जाते हे वह कुछ सोच कर रसोईघर की तरफ चल दी.

रौशनी में जब उस उजली चादर पर वह भूरा सूखा हुआ खून का धब्बा और वीर्य की पपड़ी जमी देखि तोह माथा ठनका गया सुनंदा जी का.

"इस घर में ये सब. किसने किसके साथ किआ होगा? मोनू रिंकू तोह नहीं हो सकते, जिनको खुद होश न रहता हो वह क्या करेंगे. बिट्टू रुका हे कब तोह उसका भी सवाल नहीं पैदा होता. बस मनोहर बचा पीछे लेकिन ये कुंवारी लड़की कोण हुई भला?" वह उधेड़बुन में जितना सोच सकती थी उतने अनुमान लगाती कपडे पर कड़क हुई जगह पर उंगलिया फिर रही थी.

"नहीं. मनोहर अपनी पौती के साथ ऐसा हरगिज़ नहीं करेगा. वह जैसा भी है लेकिन रिश्तो के पूरी इज़्ज़त्त करने वाला इंसान है. प्रकाश की इतनी हिम्मत नहीं और वह छत्त पर आज तक नहीं गया तोह ये किसका काम हो सकता है?", तभी रसोईघर में नहा धो कर संगीता चली आई. अपनी सास के हाथ में प्रथम मिलान की गवाह उस चादर को देखते हे चेहरा सफ़ेद हो गया जो सुनंदा जी से चिप्प न सका.

"संगीता बेटी, तुम्हे कुछ कहना है इस बारे में?", चादर को संगमरमर की स्लैब पर रखती सुनंदा जी ने धीमी लेकिन सख्त आवाज में संगीता से पूछते हुए दरवाजा अंदर से लगा लिए. संगीता का तोह दिल जैसे धड़कना हे बंद हो गया था उनकी बात सुनकर. रसोईघर में 2 मिनट तक ख़ामोशी रहने के बाद संगीता के फफक कर रोने की आवाज ने जैसे माहौल को भांग किआ. सुनंदा जी अनुशाषित महिला थी लेकिन उन्हें अपनी बहुओ पर भी पूरा भरोसा और नाज था.

"तुम बता सकती हो जो भी तुम जानती हो इसके बारे में. जो भी होगा उसको कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी लेकिन तुमसे कुछ नहीं पुछा जायेगा. बस उन दोनों का नाम बता दो.", सर पर हाथ फेरती वह शायद ये सोच रही थी की कुछ जबरदस्ती हुआ होगा और संगीता जानती होगी वो कोण थे.

"माँ जी.. ये मेरा हे है.", मुँह साड़ी के पल्लू में छुपाती वह अपनी पीठ सुनंदा जी तरफ करती इतना बोल कर फिर से रोने लगी.

"ये क्या कह रही हो संगीता? तुम कैसे? और किसके साथ? लेकिन तुम?", सुनंदा जी भौचक्की रह गई संगीता का कबूलनामा सुनकर. दिवार के साथ रखे स्टूल पर बैठ कर वह जैसे सुन्न पड़ गई थी. संगीता को भी अपनी माँ सामान सास की आवाज फिर न आई तोह वह घबराती हु मुड़ी और उन्हें ऐसे बैठे देख उनके घुटने पर हाथ रख रोटी हुई बोली.

"है माँ जी. ये मेरे हे कौमार्य के निशान है. मेरे पति मुझे औरत ना बना सके थे 3 साल तक. औरत बनाना तोह दूर उन्होंने तोह आजतक मुझे ठीक से हाथ भी नहीं लगाया. आप जो सजा देना चाहे मुझे मंजूर है. चाहे घर से निकल दीजिये या गुलामी करवा लीजिये मैं उफ़ नहीं करुँगी. बस मुझे माँ ban-ne का सुख चाहिए था इसलिए मैं खुद को रोक ना पाई.", आंसुओ से संगीता ने उनका घुटने के ऊपर का वस्त्र भिगो दिए था और अपना jurm-galti खुद कबूल कर ली थी.

"बात पूरी नहीं बताई तुमने बहु. सजा तभी निर्धारित होगी जब मुझे पता हो के ऐसा कोण सा शख्स इस शहर में पैदा हो गया जो हमारे खंडन की इज़्ज़त्त के साथ हमारे घर में हे खेल गया. तुम्हे बाद में सजा मिलेगी लेकिन पहले उस इंसान का नाम बताओ जिसने खुद हे अपनी बर्बादी लिख दी है.", गुस्सा अपने चरम पर था और जबड़े भींच चुके थे सुनंदा जी के ये सुनकर की संगीता ने उनके घर में हे ये घटना अंजाम दे दी और कैसे कबूल भी कर रही है.

"आप चाहे तोह मुझे मार दीजिये लेकिन मैं नाम नहीं लुंगी उनका. और अगर आपको अभी भी समझ नहीं आया तोह मैं साफ़ कह देती हु की मेरे पति नामर्द है लेकिन जिसने मुझे अपने औरत होने का एहसास करवाया वह मेरे लिए सबसे बढ़कर है तोह उनका नाम मैं बताने से रही. मार दीजिये या निकल दीजिये घर से.", अपने आंसू पोछने के बाद संगीता ने सार्ड और हलकी आवाज में अपनी सास को जवाब दिए और दरवाजा खोलती बहार निकल गई.

संगीता पर जैसे जनों सवार हो गया था सुनंदा जी के मुँह से ये सुनकर की वह उस इंसान को बर्बाद कर देंगी. लेकिन बहार निकलते हे अनीता ने उनका हाथ पकड़ा और अपने साथ हे अंदर ले आई वापिस. अनीता ने सबकुछ सुन लिए था बहार खड़े हो कर, बेशक अंदर से आवाज धीमी आ रही थी लें खामोश वातावरण में sun-ne लायक स्वर तोह थे हे.

"माँ जी आपको सच में महसूस नहीं हो रहा दीदी ने जो दर्द सहा है तीन सालो में? हर रात शराब के नशे में जेठ जी का आना और फिर दिन निकलते हे नजरे फेर कर बहार निकल जाना. इनकी कोई इत्छा नहीं या इन्हे औरत होने की सजा मिली है.? आप भी तोह एक औरत, माँ और परिवार की बड़ी हैं, कैसा लगे के आगे आपका कोई वंश न हो और सब आपको बाँझ कहे. कोई आपके पति से सवाल नहीं कर सकता क्योंकि वह तोह मर्द है. माफ़ करना मेरे शब्दों के लिए लेकिन हम दोनों की हे शादी ऐसे व्यक्तियों की साथ करवा दी गई जो पुरुष हे नहीं है. सजा तोह पहले हे मिल रही है इतने सालो से लेकिन घर से बहार तोह इज़्ज़त्त नहीं ख़राब की परिवार की. मुझे भी वही सजा दीजिये जो आपने दीदी के लिए सोची है.", संगीता और अनीता ने इस घर में 3 साल किसी और को काम नहीं करने दिया था और पूरी जी जान से सुबह से रात तक सबका ख्याल रखा. कभी जबान तक नहीं खोली थी किसी के सामने लेकिन आज वह सर उठाये कड़ी थी अपनी सास के सामने.

सुनंदा जी ने एक पल अनीता को देखा और फिर खुद हे नजर नीचे करते हुए बोली.

"ये बात तुमने हमारे साथ नहीं की? कोई हल निकल सकता था जिस से इज़्ज़त्त बहार नहीं जाती.", स्वर में भरपूर दुःख था उनके. सच हे तोह कह रही थी वह की अगर पति पुरुष हे न हो तोह फिर नारी होना तोह एक अभिशाप जैसा हुआ. कौन गलत और कौन सही ये फैंसला मुश्किल था लेकिन साथ हे परिवार की आबरू का पलड़ा भरी था.

"छोटे पिताजी और छोटी माँ जी को तोह पता हे है सब कुछ. साथ हे बड़े पिताजी और सभी दीदी को खबर है इस बात की के घर के दोनों छोटे सुपुत्र कितने काबिल है. आपको कैसे नहीं पता फिर? क्या हल निकलती माँ जी आप? आपका हल बता दीजिये और मैं नाम बता दूंगी.", अनीता नीचे बैठ कर उनका हाथ थाम कर कहने के बाद चुप हो गई. सुनंदा जी ने गहरी सांस लेने के बाद नजरे झुकाये हे कहा.

"घर की इज़्ज़त्त घर में रेहनी चाहिए थी मैं यही कहूँगी. गलती हमारी हैं की तुम्हारा रिश्ता अपने ऐसे बेटो के साथ किआ लेकिन तुम दोनों समझदार हो, पढ़ी लिखी होने के साथ हे संस्कारी भी हो. बस ये इस तरह नहीं होना चाहिए था. औरत अधूरी हे होती है bina-aulaad के और बाँझ का तमगा कोई औरत अपने सर नहीं लेना चाहती. लेकिन दिल में तीस सिर्फ इस बात की हे है के जिस तरह हुआ है वह ठीक नहीं हुआ. कल को वह इंसान कुछ भी कर सकता है, कोई नाजायज़ मांग या हरकत कर सकता है ऐसा इंसान. एक बचे के लिए फिर न जाने कितनो के सामने इज़्ज़त्त उतार दे.", सुनंदा जी का दिल भर्र आया तोह आँखे भी भर गई.

"माँ जी, इतना भी जमीर मत गिराए हमारा की हम ऐसा कुछ करेंगी जो बात घर की िज्जात्त तक जाये. ये आपके हे परिवार से है और शायद सबसे समझदार और सही मायने में प्यार की समझ रखने वाला purn-purush.", अनीता ने जैसे गुजारिश करते हुए उनका हाथ दबाया.

"और माँ जी ये सब सिर्फ और सिर्फ औलाद के सुख के लिए हे किआ गया है, कोई जिस्मानी इत्छा के अधीन नहीं. इस चादर से बड़ा सबूत क्या होगा की 3 साल तक कौमार्य का बोझ संभल के रखा लेकिन ये इस घर में हे रही."

"तेजपाल तोह नहीं..", सुनंदा जी ने दूसरे हाथ से अनीता का हाथ दबाते हुए कहा. आँखें अभी भी नम्म थी.

"अर्जुन.", इतना कहती अनीता ने सर उनकी गॉड में रख दिए और संगीता भी उनका हाथ पकड़ कर नीचे बैठ गई. इस एक शब्द को सुनते हे सुनंदा जी हैरत में पड़ गई साथ हे आवाज भी जैसे बंद हो गई थी उनकी.

"आप बस उस इंसान को कुछ नहीं कहेंगी माँ जी. हम दोनों के लिए अब वह हमारे पति से बढ़कर है. बेशक आपके लिए वह एक बचा या लड़का हे होगा लेकिन सच कहती हु की औरत को इज़्ज़त और प्यार देने में उस से बढ़कर इंसान कोई नहीं हो सकता.", संगीता ने भी अपनी सास की ख़ामोशी को समझते हुए सचाई बताई.

"चाय बनाओ और अपनी सेहत का ध्यान रखो.", बिना कुछ और कहे वह कड़ी होने के बाद दोनों के सर पर प्यार से हाथ रखती बहार निकल गई. सामने के गलियारे में हे अर्जुन सिर्फ पजामा और बनियान पहने पसीने में भीगा कसरत करने के बाद नीचे जाता दिखा. सुनंदा जी ने भी पहली बार अपने दोहते को मुंडेर से खड़े हो कर निहारा. कैसा फौलाद सा तगड़ा जिस्म, चौड़ी तराशी हुई छाती, मांसल भुझाये और चमकता हुआ gora-gulabi चेहरा.

अर्जुन को देख कर कोई भी ladki-aurat नजरअंदाज नहीं कर सकती थी. सुनंदा जी ने उसकी नादान सूरत देखि तोह स्वतः से चेहरे से परेशानी गायब हो गई.

'इन बेचारियो की क्या गलती है जो मेरे इस राजकुमार मर वारी गई.', उन्हें शायद सबसे अजीज अर्जुन हे था, अपनी बेटी रेखा से भी ज्यादा. कैसे बस उसके नाम से हे उन्होंने दोनों को माफ़ कर दिए था. लेकिन मैं में उथल पुथल मच गई थी बस ये सोचकर हे की 2 जवान औरत कितनी तारीफ कर रही थी एक kam-umar लड़के की. समझदार है ये तोह उन्हें भी पता था लेकिन कोई औरत जब purn-purush कहे अपने से 10 साल छोटे लड़के को तोह लाज़मी है की वह ख़ास तोह होगा हे.

"माँ कहा थी आप? कमरे में देखा और बहार भी. लेकिन आपका तोह कोई पता हे नहीं चला.", रेखा जी अपनी माँ से गले लगते मिली तोह उन्होंने भी अपनी बेटी के गाल चूम कर सर पर हाथ फेरा.

"रसोई देखने गई थी की संभल भी रखती है मेरी बहुएं या सब बिखरा रहता है. लेकिन तू इतनी सुबह तैयार कैसे है.?", अपनी जेठानी के पाँव के हाथ लगाने के बाद सुनंदा जी भी वही तख़्त पर बैठ गई और साथ हे रेखा जी भी.

"तैयार कहा माँ बस आँख समय से खुल गई तोह नाहा कर नीचे आ गई. पूजा के mummy-papa ने भी जाना है तोह सोचा के थोड़ा समय से फारिग हो जाऊ."

"और ये पूजा अभी तक नीचे नहीं आई?", ये बात अंजना जी ने कही थी. उनकी बात सुनकर सुनंदा जी को सुबह का दृश्य याद आ गया.

"आ जाएगी दीदी, तैयार हो रही होगी. समय बिटिया, तेरी माँ अभी तक नीचे नहीं आई?", सुनंदा जी ने जेठानी से बात करते हुए जब नीचे उतरती अपनी पोती को देखा तोह पूछने लगी.

"माँ के बुखार है थोड़ा दादी. बस अभी आ रही है नीचे दवा लेकर.", सुनंदा जी का माथा ठनका ये सुनकर की आज पूजा के बुखार चढ़ आया है. पिछले दिन उनकी दोनों छोटी बहु बिस्टेर पकड़ गई थी. 'हे भगवन कही इधर भी अर्जुन तोह नहीं? उन दोनों की तोह मज़बूरी थी लेकिन कही पूजा.' मैं में ये सब सोचती वह सीढ़ियों पर हे नजर लगाए देखने लगी.

रेखा जी अपनी ताई जी और पूजा जी की माँ से बात करने लगी थी, जो अब तैयार हो कर आ बैठी थी वह. उनकी गाडी का ड्राइवर अटैची उठता बहार चला गया था गाडी में रखने.

और फिर सीढ़ियों से धीमी चाल में संभल कर आती पूजा पर नजर पड़ते हे सुनंदा जी का शक यकीन में बदल गया. हर कदम रखते हुए चेहरे पर कुछ परेशानी आ रही थी पूजा के और ध्यान से देखती सुनंदा जी ने उस माथे की शिकन को बखूभी पढ़ लिए था.

'तोह इसलिए ऐसे पड़ी थी ये भी. ये लड़का किस रफ़्तार से जा रहा है?', माहौल को देखते हुए उन्होंने चुप रहना हे उचित समझा. आज अर्जुन की तीसरी सुबह थी यहाँ उनके घर और तीन बहु उसके नीचे आ चुकी थी. फिर उनकी नजर नाहा कर बहार निकलते अर्जुन पर पड़ी जो एक हलकी सलेटी टीशर्ट और काली जीन्स में था. घुंगराले गीले बाल उंगलियों से ठीक करता वह उनकी तरफ आया और सभी बड़ो के पाँव छूने के बाद एक कुर्सी पर बैठ गया.

ममता मामी भी उसके पीछे हे एक बड़ा गिलास और वह लड्डू लिए आ गई.

"लो बीटा और आराम से पीना थोड़ा गरम है दूध.", ममता मामी ने मुस्कुराते हुए उसके सर पर हाथ रखा लेकिन सुनंदा जी को तोह अपनी चौथी बहु भी अर्जुन के बिस्टेर की राह जाती दिखने लगी थी. अर्जुन ने अपना ध्यान लड्डू पर लगाया और रेखा जी ने जैसे उसको याद दिलाया.

"आराम से नहीं जल्दी ख़तम कर. तेरी मौसी राह देख रही होगी बस अड्डे जाने की."

"ये छोड़ने जा रहा है क्या सरोज को? सरोज कहा जा रही है इतनी सुबह?", सुनंदा जी ने अपनी बेटी से पुछा.

"वह मंजू का रिश्ता पक्का हो गया है तोह जीजाजी उनके हे गाँव है. सरोज भी वही जा रही है माँ.", संगीता सबके लिए चाय और बिस्कुट ले आई जो तख़्त पर रखने के बाद बिना कुछ कहे वापिस चली गई.

"ाचा. वैसे इसको ज्यादा बहार मत भेजा कर. नजर लग सकती है इधर किसी की भी.", अब क्या कहती वह भी अपनी बेटी से की घर में तोह ये अपनी सभी मामियो का नंबर लगा चूका है, ममता बची हो शायद. अब कही बहार न किसी पर चढ़ जाए.

"नानी, मेरी माँ का प्यार हर नजर से बढ़कर है. उनके होते तोह मुझे कुछ होने नहीं वाला.", अर्जुन ने उठते हुए अपने माँ के माथे पर प्यार किआ और वैसे हे नानी को करने के बाद मुस्कुराता हुआ गलियारे में गायब हो गया.

"देख लिए आपने इसको. बिलकुल बचा है अभी.", रेखा जी अपने बेटे की नजर वार्ति अपनी माँ से बोली. सुनंदा जी तोह अंदर तक बेचैन हो गई थी उसके स्पर्श से. आज उन्हें अर्जुन का ऐसे प्यार जाताना भी कुछ और हे लगा. फिर सब ख़याल झटकती वह भी मुस्कुरा दी.

"आज ब्याह दे न तेरे लाल को तोह अगले साल तेरी गॉड में बचा रख दे. अपने नाना से लम्बा हो चूका है वह और तुझे बचा दीखता है. हाँ नादान है थोड़ा दुनियादारी से लेकिन ाचा बचा है.", एक तसल्ली थी उनको की अर्जुन ने ये सब उन्ही के साथ किआ जो ब्याही हुई थी और उनकी इत्छा के साथ. उनकी पोटिया तोह सब सामने हे हंसती खेलती दिखी थी. मतलब साफ़ हे था के सब मज़बूरी में हुआ है.

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"माँ तैयार हो रही है अंदर. तुम उन्हें छोड़ने के बाद वापिस यही आ जाना.", मंजू ने दरवाजा खोलने के बाद उसको अपने साथ अंदर ले जाते हुए कहा. नजरे बता रही थी की वह कितनी खुश थी लेकिन चेहरे को सपाट हे रखे थी जैसे वह हमेशा लोगो के सामने रहती थी. अर्जुन भी तोह सभी की नजरो में मंजू के लिए एक नया हे व्यक्ति था.

"सोच लो. कही मेरी माँ आ गई इधर तोह फिर हो गया हमारा काम.", अर्जुन ने सोफे पर बैठने से पहले चेतावनी दी लेकिन मंजू आँख मारती अंदर चली गई.

"माँ, अर्जुन आया है और बैठक में आपका इन्तजार कर रहा है.", थोड़ी ऊँची आवाज में ये कह कर वह रसोई में चली गई और 2 मिनट बाद हे सरोज जी एक हलके रंग के सूट और उसके साथ का दुपट्टा लिए बैठक में आ गई. उन्हें ऐसे घर जाना था जहा जवान मौत हुई थी इसलिए सादे कपडे से बेहतर क्या पहनावा होता. फिर भी सरोज जी एक bhare-poore शरीर की सुघड़ महिला थी और ये सलवार कमीज भी उनके दोनों ख़ास जगह ठीक से कैसा हुआ था.

"चले बीटा? यहाँ से 10 मिनट तोह लगेंगे हे काम से काम.", एक कपडे का कला बैग लिए वह बैठक में अर्जुन के सामने आई तोह अर्जुन ने भी पाँव के हाथ लगाया. सरोज जे ने आशीर्वाद देने के बाद उसको गले लगते 'सदा खुश रहो' कहा और एक मुस्कान देती उसके साथ हे बहार निकल आई.

मंजू ऊपर वाली छत्त पर कड़ी अर्जुन को मोटरसाइकिल पर बैठते देख रही थी.

"घर का ध्यान रखना और कोई शरारत नहीं. शाम तक वापिस आये तोह ठीक नहीं कल सुबह आ जायेंगे. तेरी मौसी को बोल दूंगी अगर नहीं आ सके तोह.", अर्जुन के पीछे बैठने से पहले उन्होंने छत्त पर कड़ी अपनी बेटी से कहा जो कपडे सूखने वाली तार पर चादर दाल रही थी.

"ाचा ठीक है माँ. ध्यान से जाना.", इतना बोलकर वह दूसरे कपडे उठाने लगी और सरोज जी अर्जुन के पीछे बैठ अपने गंतव्य की तरफ चल दी.

"यहाँ से राइट ले लेना. राइट हे कहते है न सज्जे हाथ को?", सड़क पर देखने के चक्कर में वह अपना सीना अर्जुन की पीठ पर दबा रही थी और अर्जुन बस चुपचाप मुस्कुरा रहा था.

"क्यों टांग खींच रही हो मौसी? माँ ने बताया था के आप दोनों कॉलेज साथ हे गई है.", अर्जुन कही दिशा में अब मुख्या सड़क पर आ गया था.

"और क्या बताया हुआ है रेखा ने? मुझे भी तोह पता चले.", उलटे हाथ में बैग था तोह उन्होंने अपना सीधा हाथ उसके कंधे पर रखते हुए नजर सामने हे राखी.

"यही की आप दोनों शुरू से हे साथ रही हैं. आपका घर यही है पास में हे और मौसा जी के भाई के साथ हे आपकी छोटी बहिन की शादी हुई है, जो ##### गांव में रहते है.", अर्जुन साधारण जानकारी हे दे रहा था जो उसकी माँ ने बताई हुई थी.

"हाहाहा. ये तोह सभी को हे पता है. लगता है तेरी माँ तुझसे ज्यादा बात नहीं करती.", सरोज जी के चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी.

"नहीं मौसी. ऐसा बिलकुल नहीं है. मेरी माँ मुझे बहोत कुछ बताती है लेकिन अभी आपसे पहली बार हे मिला हु और ऊपर से माँ के साथ इन दिनों ज्यादा बात नहीं हुई न तोह जितना उन्होंने बताया वही गनीमत है.", अर्जुन को भी ाचा लग रहा था उनसे ऐसे बातें करना और उनका अर्जुन के साथ यु चिपकना.

"तेरी माँ अब बिलकुल भी वैसी नहीं रही जैसे वह कॉलेज के समय थी. हाँ बस स्वाभाव आज भी उसका वही है. साफ़, प्यार से बात करने वाली और समझदार. लेकिन पहले तोह वह ये समझ ले की राजकुमारी थी जैसे. तेरे तीनो नाना की जान बस्ती है अभी भी तेरी माँ में. घूमने, किताबे पढ़ने और एक से के कपडे pehan-ne के साथ हे मस्ती भी बहोत करती थी वह.", सरोज जी तोह जैसे 25 साल पीछे चली गई थी.

"माँ बिलकुल इसके उलट हो गई है मौसी. वह हमारे घर में वह सुबह 5 से रात 10 तक तोह सबका ख़याल, खाना बनाना, saaf-safaai में निकल देती है. मैंने तोह यहाँ तक सुना है की उन्होंने जो बोलना भी शुरू किआ है थोड़ा बहोत वह भी मेरे घर वापिस आने के बाद.", अर्जुन मोटरसाइकिल को अब बिलकुल हे धीमी रफ़्तार से चला रहा था. उसको अपनी माँ के बारे में सबकुछ जान न था जिस से वह उन्हें आगे वह हर ख़ुशी दे सके जो वह चाहती है.

"रेखा बहोत भोली है वैसे इस लिए ज्यादा बात नहीं करती किसी के साथ. और काम करना शायद उसको पसंद है तभी तोह आज भी 30 से एक दिन ऊपर नहीं दिखती. यहाँ मैं 4 महीने छोटी हु तेरी माँ से लेकिन अभी से 50 पार लगती हु.", सरोज जी ने जैसे बात का रुख हे मदद दिए था .

"कहा मौसी. अब खुद को इतना बूढा भी मैट कहो. आप और माँ मेकअप भी नहीं करती फिर भी लगता नहीं के 20-21 साल के बचे होंगे आपके.", अर्जुन ने भी सोचा के जैसा वह चाहती है वैसी हे बात करना ठीक है. लेकिन सरोज जी की मुस्कान थोड़ी लम्बी हो गई थी खुद की तारीफ सुनकर.

"चल अब तू मुझे चने के झाड़ पे चढाने लगा. कहा वह gori-gulabi और कहा मैं kaali-kaluti. ऊपर से देख जरा मेरी तोह लड़की का भी ब्याह होने लगा.", सरोज जी का रंग चमकदार गेंहुआ था और चेहरा भी बिलकुल साफ़. मंजू को आँखें भी जैसे माँ से हे मिली थी. काली और बड़ी खूबसूरत.

"मौसी आप मेरी टांग खींच रही है न.? माँ का रंग मान लिए की गोरा है लेकिन आपका स्वर्णिम है. खुद हे देखिये इस सुबह की रौशनी में आप कैसे चमक रही है.", गोल शीशे में उनका मुस्कुराता चेहरा निहारते हुए अर्जुन ने कहा तोह उन्होंने भी उसकी नजर का रुख किआ जहा वह उन्हें ध्यान से देख रहा था. हलकी लाली आ गई थी उनके चमकते गाल पर.

"सामने देख कर चला. बात करनी पड़ेगी रेखा से की उसका मुन्ना बड़ा हो गया है और अपनी मौसी से हे चुहल करने लगा है अब. जल्दी से देख ले कोई तेरे लिए.", उनको भी मजा आ रहा था अर्जुन की बातो से. दोनों अब bus-stand के बहार पहुंच गए थे.

"यहाँ मत रोक. सीधा वही ले चल जहा बस रूकती है. अड्डे पर ज्यादा बस नहीं आती तोह gaadi-scooter कही भी लगा सकते है.", उन्होंने अर्जुन को स्टैंड की तरफ हे चलने को कहा. अर्जुन भी बात मानते हुए अंदर की तरफ जाते मार्ग पर बढ़ गया. हरयाणा परिवहन की safed-neeli कुछ बस कड़ी थी अपने निर्धारित स्टैंड पर लेकिन 12-13 स्टैंड वाले इस अड्डे पर मुश्किल से 4 हे बस थी और उनमे से भी 3 बंद थी.

"6 नंबर है अपना लेकिन वह अभी बस नहीं है.", उनकी बात सुनकर अर्जुन ने अड्डे पर लगी गोल घडी को देखा जिसमे 6:10 का समय हो चूका था.

"मौसी हमारी बस निकल गई है. देखो जरा घडी की तरफ.", अर्जुन कुछ परेशां हो गया था ये देख कर की धीमी रफ़्तार की वजह से उसने मौसी की बस निकलवा दी.

"अरे तोह इसमें क्या बात हुई? वह के लिए तोह बहोत बस है. रुक जरा.", इतना कहती वह उतारकर एक कंडक्टर से बात करने लगी और फिर 1 मिनट में हे वापिस चली आई.

"वह बस भी वही से जायेगी और निकलने वाली है. ाचा मैं सीट लेती हु तू अपना ख़याल रखना और हो सके तोह जाते हुए मंजू को भी लेते जाना.", सर पर हाथ फेरने के बाद एक बार अर्जुन को गले लगाया और 2 स्टैंड दूर कड़ी उस बस में बैठ गई. उनके बैठते हे कंडक्टर ने सीटी बजे और बस निकल चली.

"शुक्र है भगवन का.", अर्जुन इतना कह कर वापिस घर की तरफ चल दिए. आज उसको अपने नाना के साथ मंडी भी जाना था और वह 8 साढ़े 8 निकल जाते थे. अभी सवा 6 का समय था तोह उसको कोई जल्दी नहीं थी. लेकिन थोड़ी रफ़्तार से मोटरसाइकिल चलते हुए वह 10 मिनट में हे वापिस मंजू के घर के बहार आ खड़ा हुआ.

"इसको अंदर खड़ा कर लो.", शायद वह पहले से हे बैठक में अर्जुन की प्रतीक्षा कर रही थी और मोटरसाइकिल की आवाज सुनते हे गेट पर आ कड़ी हुई. अर्जुन ने भी मुस्कुराते हुए मंजू की तरफ देखा और मोटरसाइकिल को अंदर दिवार के साथ खड़ा करने के बाद चुपचाप अंदर चल दिए.

"आह.... अब सिर्फ हम दोनों है यहाँ.", दरवाजा ाचे से बंद करते हे किसी जोंक की तरह वह अर्जुन से लिपट गई. मंजू को इतना बेताब देख कर अर्जुन ने भी उसको बाहों में भरा और दोनों अनार पकड़ते हुए उसके गुलाबी होंठ पीने लगा. नरम टीशर्ट और रेशमी पाजामे के नीचे उसने कुछ नहीं पहना था जो अर्जुन को उसके सतांन पकड़ते हे पता चल गया था. निप्पल कितनी देर से उत्तेजित हुए कठोर हुए पड़े थे ये साफ़ पता चला जब उनकी चुभार उसको अपनी हथेली पर हुई.

"तुम सच में पागल हे हो.", अर्जुन ने 2 मिनट बाद होंठ अलग किये तोह दोनों के होंठ हे गीले हो चुके थे. मंजू की आँखों में तेज चमक और अर्जुन के लिए सिर्फ प्यार भरा था. वह भी हलके हलके उसके चुके दबाता इस कामुक लड़की से जुड़ा खड़ा था.

"अब जिसने पागल किआ है वही इलाज करे मेरा.", इतना कहने के साथ हे मंजू ने उसके कंधे पर दांत गाड़ते हुए अपनी छूट को अर्जुन की जीन्स में पहले हुए हिस्से से रगड़ना शुरू कर दिए. पतले कपडे में उसकी गदराई छूट अर्जुन को भी उकसाने लगी थी. स्टैनो को छोड़ कर उसने दोनों हाथो में मंजू को रेशमी मुलायम कूल्हे पकड़ लिए. उन्हें मसलते हुए वह अपना लुंड भी मंजू की गीली होती छूट पर दबा रहा था.

"मुझे पता है के तुम्हे मेरे ये बहोत पसंद है. लेकिन इनके लिए तुम्हे 2 हफ्ते रुकना पड़ेगा. शादी के बाद यहाँ भी अपना नाम लिख देना.", अर्जुन की ाँहों में देखती मंजू ने अपनी गांड की क़ुरबानी का समाया भी निर्धारति कर दिए था. चेहरा उत्तेजन से गरम हो कर लाल हो चूका था उसका. अर्जुन ने भी देरी न करते हुए उसका पजामा नीचे खींच दिए और मंजू ने वह पतली टीशर्ट भी एक तरफ उछाल दी.

गुरुत्वाकर्षण को चुनौती देते उसके कड़े संतरे अब हवा में सांस ले रहे थे. दमकता मुलायम शरीर अब निर्वस्त्र अर्जुन के सामने था. उसने भी कुछ सोचकर अपनी टीशर्ट उतार दी साथ हे मंजू ने जीन्स खोलते हुए अर्जुन को भी अपने समकक्ष कर दिए. एक लम्बी छरहरी खूबसूरत युवती और दूसरा मजबूत शरीर का उसके लिए तैयार युवक. सच में हे दोनों एक दूसरे के पूरक हे थे.

मंजू ने अर्जुन की आँखों में देखते हुए छत्त की तरफ सर उठाये मॉटे लुंड को पकड़ा और नीचे होती ठीक सुपडे के सामने आ गई. 2-3 बार आगे पीछे करते हे kaam-raj की चिकनाई से वह टमाटर सा सूपड़ा फूल कर सामने आ गया.

"ये सच में बड़ा प्यारा है. बस पहली बार डर लगा था लेकिन अब मैं छाती हु ये हमेशा मेरे अंदर हे रहे. आह.. ", दूसरे हाथ से अपनी छूट पर ऊँगली करते हुए मंजू की सिसकारी निकल गई. सुपडे पर थूक टपकते उसके होंठ क़यामत लग रहे थे. और उसका धीमे धीमे हाथ चलना आज अर्जुन को बर्दाश्त नहीं हो रहा था.

"इसको अंदर हे करते है. ज्यादा समय नहीं है.", किसी फूल की तरह मंजू को ऊपर उठाते हुए अर्जुन ने बैठक में रखे दीवान पर लिटाया और टांगो को फैलते हुए कुछ पल उस सिंधुरी और कॉमर्स से भरपूर छूट का दीदार करने लगा. Baal-vihin और मलाई सी नरम छूट देखते हे स्वतः अर्जुन के होंठ उन गुलाबी पत्तो से जा लगे. ाचे से मुँह में भरने के बाद जैसे वह वह भी दूध चूसने लगा हो. मंजू की उत्तेजना चरम पर पहोच गई थी और उसके साथ हे वह अर्जुन को धकेलने लगी लेकिन अर्जुन जङ्गली भालू की तरह उसके शहद को छत्ते से चाटने के बाद हे हटा.

"की.. गंदे कही के.", शर्माती हुई वह बिस्टेर पर पड़ी नजरे चुराने लगी और अर्जुन ने हँसते हुए दोनों टंगे अपने कंधे पर रख कर उसकी छूट पर टिकाया और प्यार से धकेल दिए. 10 घंटे पहले हे चूड़ी छूट में आधा लुंड कसवत से बैठ गया.

"आह्हः.. उम्.. सारा कर दो.", और इतना सुनते हे अर्जुन ने अपने अण्डकोषी छूट की दिवार से मिला दिए.

"माह... आयी.. एक मिनट बस.. aah.",Himmat दिखती वह अर्जुन की ब्याह पकड़ कर खुद को सँभालने लगी. संकरी छूट में वह प्रचंड लुंड लिए गहरी सांस ले रही थी. और छूट लुंड को जकड़े जैसे कभी जुड़ा न होने का वडा करती दिख रही थी. अर्जुन ने दोनों अनार मुट्ठी में भरते हुए झुक कर मंजू को चूमा, साथ हे हलके से लुंड बहार निकल उतना हे आगे कर दिए. छूट ने भी इस लुंड को मालिक मान लिए था जो उसकी ताल पर जल्द हे ताल मिलाने लगी.

"सच कहु मंजू. एक तुम हो जो मुझे झेल लेती हो. जैसे इसके लिए हे ये तुम्हारी सहेली बानी है." सुपडे तक लुंड छूट में लगातार फिसल रहा था. दोनों हे मजे से आहे भरते हुए एक दूसरे को kaat-choom रहे थे. थोड़ी देर बाद अर्जुन नीचे और मंजू कुशलता से उसके लुंड पर कूदती उसकी घुड़सवारी कर रही थी. दोनों चूचिया दबा दबा के लाल कर दी थी अर्जुन ने और कुछ ऐसा हे हाल मंजू ने अर्जुन की छाती का कर दिए था. नाख़ून और दांत के निशान बन चुके थे लेकिन वह दोनों हे जैसे सबकुछ बुला कर इस तूफानी चुदाई में लगे रहे.

गांड के छेड़ को ऊँगली से कुरेदा तोह मंजू दूसरी बार झाड़ गई लेकिन अर्जुन बिना रुके अब मंजू को नीचे दबाते हुए छूट के anjar-panjar ढीले कर रहा था. बहार को दीखते छूट के होंठ में इस भयंकर चुदाई से और फूल कर लाल हो चुके थे लेकिन चेहरे पर पसीने के बावजूद अर्जुन लगा रहा. हर धक्का जड़ तक पहुंच रहा था और मंजू की चीखे बता रही थी की वह जन्नत में पहुंच चुकी थी.

"अंदर हे डालना.. अह्ह्ह.. जोर से.. आह.. मुझे महसूस करना है.. aahh..maaa..",Arjun का सूपड़ा फटने को हुआ तोह मंजू भी समझ गई की वह होने वाला है. आज वह उसका वीर्य अंदर महसूस करना चाहती थी.

"पागल हो?", अर्जुन ने कंधे पकड़ते हुए धक्के गहरे लेकिन थोड़ा धीरे करते पुछा.

"सेफ है आज. aahh..jaisa कहा करो..", अर्जुन ने भी 8-10 धक्के ऐसे लगाए के अंडकोष जैसे छूट में हे करके हटेगा. इसके साथ हे लुंड ने अपना लावा उगलना शुरू कर दिए. निढाल हो कर वह मंजू के ऊपर लेट गया और मंजू ने भी अपने होंठो में उसका मुँह लेकर स्वागत किआ. टाँगे कमर से लपेट वह हर गरम पिचकारी का आनंद ले रही थी साथ हे पीठ सहलाती उसको बड़े प्यार से चूम रही थी.

"मैं इतनी जल्दी बाप नहीं ban-na चाहता.", अर्जुन ने बगल में करवट लेते हुए एक अनार सहलाते हुए मंजू से कहा. वो भी उसकी तरफ देखती मुस्कुरा रही थी.

"लेकिन मैं तोह चाहती हु की तुम मुझे जल्दी से भारी कर दो. शादी के बाद अगले हे दिन मुझे तुम्हारे नीचे आना है. और मैं नहीं जानती तुम ये कैसे करोगे.", अभी बात ख़तम हे हुई थी की बहार किसी ने घंटी बजा दी. अर्जुन घबरा गया लेकिन मंजू हंसती हुई कपडे लेकर अंदर चली गई. अर्जुन ने जल्दी से जीन्स टीशर्ट पहनी और अपनी जुराब से हे चादर पर गिरी वह 2 सफ़ेद बुँदे साफ़ करने के बाद जूते पहन लिए. मंजू ने दूसरी तरफ के गलियारे से बहार निकल कर देखा जहा गेट पर समय कड़ी थी.

"क्या हाल है तेरे? और ये अर्जुन की मोटरसाइकिल यहाँ कड़ी है.", समय ने अंदर आते हुए कहा. अर्जुन भी उनकी बात सुन रहा था. मंजू की रफ़्तार देख अर्जुन अब बेहतर महसूस कर रहा था के शुक्र है लड़की तेज है.

"मैं ठीक हु बस मशीन लगा राखी थी पहले कपड़ो की और अभी अर्जुन के साथ तुम्हारे हे घर आने लगी थी कपडे बदल कर. वह बैठक में अकेला हे बैठा है.", समय को उस तरफ से वह अंदर लाइ और इधर अर्जुन बैठक दुरुस्त कर चूका था. समय ने प्यार से अर्जुन को देखा और अर्जुन ने भी वैसे हे जवाब दिए.

"ाचा दीदी आप आ गई हो तोह मैं चलता हु फिर. आप हे लेती आना इन्हे घर.", अर्जुन ने इतना कहा और समय ने भी सर हाँ में हिला दिए. वह चुपचाप बहार खिसक गया. मोटरसाइकिल के बहार निकलने की आवाज सुनते हे समय बोल उठी.

"इसने 2 दिन में हे तेरे जैसी शेरनी बिस्टेर पर कैसे ला दी? झूठ मत बोलना और जो भी हुआ वह मुझे सब बता ाचे से.", मंजू उसकी बात सुनकर हैरान नहीं थी और फिर उसने अपनी कहानी सुना दी समय को की कैसे अर्जुन ने उसको शर्त के चक्कर में पकड़ लिए था. वह उसी दिन उसको पसंद करने लगी थी. फिर मौसी घर आई कल और रात दोनों में हलक फुल्का प्यार हुआ. सुबह माँ को बस अड्डे छोड़ने के बाद कैसे हालात बने और दोनों ये कर बैठे.

समय बड़ी हैरानी से सब सुन रही थी. उसको विश्वास नहीं हो रहा था के उसकी सहेली इतनी जल्दी उसके हे भाई के नीचे आ जाएगी. लेकिन उसने तोह खुद देखा था के कैसे वह नीचे लेती थी. बस बातें नहीं सुन पाई थी उनकी बहार से. अंदर तोह बहार की आवाज ाचे से सुनती थी लेकिन बहार इसका विपरीत था.

"यार उसका इतना बड़ा था और तूने पहली बार में हे ले लिए? पता है अर्जुन ने चची के साथ भी किआ था लेकिन वह तोह 10 घंटे बिस्टेर पर पड़ी रही थी. क्या तेरा किसी और के साथ भी?", समय कुछ सोच कर बोल रही थी.

"नहीं नहीं रे. ऐसा है न के मैं उसके बराबर की हु शरीर में और खेलने की वजह से hymen-seal वैसे हे टूट चुकी है. शुरू में दर्द हुआ था लेकिन इतनी लम्बी पारी के बाद दर्द अपने आप हे ख़तम हो गया. वैसे कुछ भी कह तेरे भाई जैसा मर्द हो नहीं सकता.", मंजू को थोड़ी हैरानी हुई थी ये सुनकर की अर्जुन ने अपनी मामी के साथ हे कर दिए था.

"वैसे ये चची का क्या चक्कर है?", उसने भी उत्सुकता ख़तम करने के लिए समय से पूछ लिए.

"अरे उनकी कहानी बड़ी दुःख भरी है यार. तुझे तोह पता हे है के उनको औलाद नहीं इसलिए उन्होंने अर्जुन के साथ किआ. अर्जुन करना नहीं चाहता था और चाची में ऐसी वैसी नहीं है लेकिन और क्या करती. फिर अर्जुन घर का हे तोह है और ऊपर से तू तोह प्यार करती है तोह जानती हे होगी कितना ाचा है दिल से. बस एक जगह उसकी कुछ ज्यादा खतरनाक है.", सब बताने के बाद वह थोड़ा हंसी और मंजू भी निश्चिन्त हो गई की अर्जुन ने बेवजह कुछ ऐसा नहीं किआ था. फिर शरारत से समय का एक उभर दबती बोली.

"कही अब तेरा दिल तोह नहीं आ गया अपने भाई पर.?"

"आउच.. क्या करती है यार. और मैं भाई नहीं मानती उसको.. हाँ.. कह देती हु.", छाती को सहलाती वो थोड़ा तल्खी से बोली और मंजू उसके सर पर चपत लगाती कपडे बदलने का बोल अंदर चली गई.

'हे राम.. सच में हे जानवर जैसा था उसका. और मंजू कैसे मजे से ले रही थी. चीख तोह रही थी लेकिन.. उफ़ क्या सोचने लगी मैं भी. पूरा नहीं लुंगी कभी भी.' समय खुद को समझती हुई मुस्कुरा रही थी और सोच कर हे पंतय में बूंदे आ गई थी की अर्जुन जब उसके साथ करेगा तोह उसको कितना मजा आएगा. थोड़ी हे देर बाद दोनों लड़किया घर की तरफ निकल चली.

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हर तरफ एक जैसी हे दुकाने और बीच में खली सड़क का मैदान देखता अर्जुन अपने नाना जी से अनिगिनत सवाल करता उनकी अनाज मंडी वाली दूकान पर पहुंच गया था. उसका ये पहला मौका था किसी मंडी में आने का और यहाँ की हवा में भी अनाज की महक थी, जो अजीब लग रही थी.

"बीटा अपने ज़िले के साथ आसपास के भी बहोत से किसान यही अपनी फसल हमको बेचते है जो हम आगे अपने हिसाब से भिजवा देते है. और हमारी खुद की फसल तोह है हे गुजरा करने के लिए.", कुछ मजदुर आदमी और औरत lohe-lakdi के छाज से फसल साफ़ करते हुए तूड़ी की धेरी अलग और अनाज अलग कर रहे थे. अर्जुन देख रहा था के यहाँ एक अलग हे दुनिया है. अनाज का जैसे रेगिस्तान था वह.

"वैसे नानाजी, यहाँ कितनी दूकान होंगी.?", दोनों अभी कार के बहार हे खड़े थे और मनोज मां सोहनलाल जी का सामान लेकर प्रकाश के साथ दूकान में चले गए थे.

"बीटा हमारे पिताजी ने जब यहाँ दुकान लगाई थी तब 4 हे आढ़ती थे इधर लेकिन अब 226 पक्की दुकाने है. साथ हे Khaad-urea और कुछ खाने पीने की भी है. ाचा पहले दूकान पर चलते है बाकी बातें वही करेंगे और तुम्हे फिर जल्द हे फ्री करते है.", कंधे पर हाथ रख वह 50 कदम दूर दुकान की और चल रहे थे और आसपास से गुजरते मजदुर, किसान, सेठ उनको नमस्कार कर रहे थे.

"Ram-Ram पंडित जी. सब कुशल मंगल? और आज अपने सबसे छोटे बेटे को लाये है साथ?", एक 55 साल का साफ़ कपडे पहने व्यक्ति हाथ मिलाने के बाद कुन्दनलाल जी से बोलै. वह अर्जुन को बड़े ध्यान से देख रहा था.

"सब कुशल मंगल है गुप्ता जी. और ये है अर्जुन, मेरा एकलौता नाती.", अर्जुन ने उन्हें नमस्कार किआ.

"क्या बात करते हो पंडित जी? हमको तोह लगा के जवानी वाले पंडित जी आपके साथ आ रहे है. बस थोड़ा ज्यादा चौड़ा शरीर है.", अर्जुन को बिलकुल करीब से देख कर गुप्ता जी फिर से कुंदन जी को देखने लगे.

"हाहाहा.. गुप्ता जी घर का बचा घरवालों पर हे जाता है. इसके पिताजी भी इतने हे चौड़े है, तुम तोह जानते हे हो अपने शंकर को. और हाँ चेहरा मेरे पर चला गया लेकिन लगता है लम्बाई ऊपर जा चुकी."

"अरे भूल गया था के शंकर जी दामाद है. वह हमेशा आपके बेटे हे लगते है न. उनका बचा है ये. तभी बाल और शरीर वैसा है. जग जग जियो बीटा. भगवान् हर बाला से तुम्हारी रक्षा करे.", गुप्ता जी आशीर्वाद देने के बाद आगे कुछ कहे बिना हे चले गए.

"तोह क्या पापा आते रहते है आपसे मिलने?", अर्जुन अब नानाजी के साथ दूकान के बहार खड़ा था.

"हाँ तोह यहाँ चक्कर लगता है कभी तोह मिलने आ जाते है तुम्हारे पिता कभी 2-3 महीने में. लेकिन ज़िन्दगी बड़ी व्यस्त है उनकी बीटा.", एक आह लेते हुए वह अंदर आये तोह फर्श पर पूछा लगाती एक ग्रामीण वेशभूषा वाली महिला हाथ जोड़ी अपनी बाल्टी और कपडा लेकर निकल गई. अर्जुन ने ज्यादा ध्यान नहीं दिए. वह तोह इस बड़ी दूकान या बेहतर रहेगा की बड़े गोदाम के सामने दुकान को देख रहा था. आसपास की सभी दुकानों से दोगुनी चौड़ी और पीछे तक बोरियो से भरी थी. नीचे साफ़ सफ़ेद गद्दे लगे थे और एक बड़ी तिजोरी, गल्ला और टेलीविज़न लगा था. वैसे हे कुछ कुर्सियां, एक सोफे और दीवान था. मनोज मां तोह आते हे जाने कहा चले गए थे लेकिन प्रकाश dhoop-batti कर रहा था और बड़े नाना भी तिजोरी के सामने बने छोटे मंदिर में हाथ जोड़ कर बैठे थे.

"मुनीम जी आज बोली में उठवाया कुछ माल?", एक सफ़ेद कमीज और नीली पंत में ये व्यक्ति एक फाइल लिए खड़े थे.

"जी पंडित जी. वही 2 धेरी अभी साफ़ हो रही है. Hisab-kitab भी चढ़ा दिए है सबका, दीवान पर रखा है. ये फाइल जो आपने कही थी बनवाने के लिए वह भी तैयार है.", कुछ कागज बहार झाँक रहे थे उस फाइल से.

"ाची बात है. फाइल मैं देख लेता हु तुम पैसे का हिसाब किताब देखो और फिर मैं बताऊंगा बाद में.", कुन्दनलाल जी ने वह फाइल लेने के बाद अर्जुन को अपने साथ हे वह दीवान पर बिठा लिए. दूसरी तरफ हे सोहनलाल जी भी बैठ गए. पैन पलट कर देखते हुए उन्होंने फिर अपने बड़े भाई साहब को वह सभी कागज़ देखने के लिए फाइल आगे कर दी.

सोहनलाल जी ने चस्मा लगते हुए फिर गहराई से सभी पन्नो का अवलोकन किआ और बोले.

"हाँ सब ठीक है भाई. मनोहर कब आ रहा है?", सोहन जी ने फाइल बंद करते हुए चस्मा उतरा और गोल तकिये पर तक लगते से बैठ गए.

"वह इधर हे है, गंगाराम की दुकान पर होगा और कहा जाना है. प्रकाश जरा बुलाकर लाना.", कुंदन जी की बात सुनते हे सोहनलाल जी के चेहरे पर थोड़ी परेशानी आ गई. लेकिन अर्जुन की वजह से कुछ नहीं बोले. प्रकाश भी बिना देरी किये बहार निकल गया. अर्जुन अभी भी दूकान को देख रहा था.

"नाना जी, ऐसी छोटी अलमारी तोह फिल्मो में देखि है मैंने.", तिजोरी की तरफ इशारा करते हुए उसने अपना बड़े नानाजी से पुछा. उसको सही नाम याद नहीं आया था.

"हाँ बीटा. अपने काम में तिजोरी होना भी जरुरी है. नगद रूपया पैसा और कागजात इसमें हे रखे जाते है. हर रोज तोह बैंक खुलते नहीं, थोड़ा बहोत पैसा जरुरत के समय देना पड़े तोह सुरक्षित रहता है इसमें.", मुस्कुराते हुए सोहनलाल जी ने अर्जुन को जवाब दिए और इतनी हे देर में मनोहरलाल जी भी आ गए. चिरपरिचित धोती और कुरता पहने थे.

"जी भाई साहब.", और एक सरकंडो का मोद्धा लेते हुए वही बैठ गए. सोहनलाल जी ने बिना कुछ कहे फाइल आगे बधाई तोह उन्होंने हाथ जोड़ दिए.

"क्या भाई साहब अब आपको तोह पता है जो भी आप कहेंगे वो मेरे लिए पत्थर की लकीर है. कबि कुछ गलत तोह किआ नहीं आपने.", फाइल सोहनलाल जी ने अर्जुन की गॉड में रखते हुए अपने छोटे भाई से कहा.

"हमारी साड़ी बात कहा मानते हो तुम. और बीटा ये कागजात है कुछ जो वैसे तोह तुम्हारी माँ के लिए थे लेकिन रेखा ने साफ़ मन कर दिए था तोह अब जिस चीज के वारिस तुम हो क़ानूनी तरीके से तुम्हारे हे नाम कर रहे है. जैसे कुंदन कहे वह अपने अंगूठे का निशान और नाम लिख दो. फिर एक बार अपने छोटे नाना के साथ चले जाना और निगाह मार लेना उन जगह पर जिनके ये कागज़ है.

अर्जुन थोड़ा हैरान हुआ एक ये क्या करवा रहे थे उसके नाना जी.

"लेकिन अगर माँ ने मन कर दिए तोह मैं कैसे ये ले सकता हु. नहीं नानाजी मुझे कुछ नहीं चाहिए और वैसे हे मेरे पास बहोत कुछ है पहले से हे.", अर्जुन के इंकार को सुनकर कुन्दनलाल जी हंसने लगे.

"बीटा, रेखा ने अपने नाम कुछ नहीं करवाना, वह चाहती है के उसको मिलने वाला सबकुछ तुम्हारे नाम हो और तुम अपने अनुसार आगे अपनी बहनो को देना चाहो या पड़ा रहने देना चाहो वह तुम्हारी इत्छा है. और इतना कुछ नहीं है इसमें बस कुछ कागज़ ज्यादा है.", अर्जुन ने उनकी बात सुनकर हाँ में गर्दन हिला दी. कोई 9 के लगभग अँगेथे के नील निशान और उतनी हे बार अपना नाम लिखने के बाद अर्जुन से उन्होंने सब कागज़ ले लिए.

"ऐसा है बीटा इस दूकान से जो भी मुनाफा होता है उसके 5 हिस्से है. 4 तुम्हारे मां के और एक रेखा का जो अबसे तुम्हारे खाते में जाएगा. खेत की जमीन का एक टुकड़ा पहले हे तुम्हारे नाम जा चूका है तोह उसके बाद बाकी जमीन में ये तुम्हारे हिस्से के 15 एकड़ जमीन रहती है लेकिन उसका बंटवारा नहीं होगा. बस वह से जो भी आये होगी उसका एक भाग तुम्हे मिलेगा. तुम्हारे 4-4 दस्तखत इन्ही जायदाद के है और एक कागज में लिखा है की अगर आगे कोई वारिस नहीं होता दूकान का, मतलब तुम्हारे मां लोगो के बाद तोह उसकी देखरेख भी तुम्हारे ऊपर रहेगी. जैसे अगर किसी के भी कोई वारिस न हुआ दुकान और जायदाद सँभालने के लिए तोह ये देखभाल तुम्हे करनी पड़ेगी अगर तुम्हारे मां गैरहाज़िर है तोह.", कुन्दनलाल जी ने सबकुछ एक हे सांस में कह दिए और अर्जुन हैरानी से उन्हें देखने लगा.

"नानाजी, आपको लगता है के आप ठीक कर रहे है? मतलब अभी आप लोग है, फिर सभी मामाजी है और आगे समय दीदी, कंचन और स्वाति है. कुछ समय बाद दोनों छोटी मामी के बे बचे होंगे. ये वसीयत बेवजह है और फिर ये भी सोचिये के मैं हे अगर कल को कही चला जाऊ या खुद का हे काम करने लागु तोह ये ज़िम्मेदारी नहीं निभा सकूंगा.", मनोज मां का सर झुक गया था और मनोहरलाल जी के साथ उनके दोनों बड़े भाई भी अपने दोहते को ध्यान से देख रहे थे.

"किस्मत का क्या कह सकते है. और अगर आगे वारिस आता है तोह ाची बात है. तुम्हे दूकान पर थोड़ी बैठना है, इसको कोई भी देख सकता है लेकिन अगर कभी ऐसा वक़्त आता है तोह बस उसके लिए ये लिखवाया है. भगवन करे तुम्हारी बात सही निकले. घर में वारिस पैदा हो और फिर वो आगे ये सब संभाले.", कुन्दनलाल जी इतना बोलते हुए अपने भतीजे मनोज को देखने लगे जो बहार चला गया था.

"हाँ तोह सही बात है. कल को अगर सभी बचो में तुम्ही बड़े हो तोह कोई झगड़ा नहीं करेगा न. वैसे भी परिवार में किसी चीज का बंटवारा कभी होगा नहीं इसलिए बस उन्हें कमाई का बराबर हिस्सा मिलना है जो तुम कही भी रहकर देख सकते हो. अभी तोह 30-40 साल तुम्हारे मां लोग है और 10 साल तोह हम भी कही नहीं जा रहे.", मनोहरलाल जी देहाती थे लेकिन बात भी मजे की करते थे. अर्जुन ने भी दिल रखने के लिए ये बात मान ली की कभी अकस्मात कुछ हो जाये दोनों छोटे मां को तोह वह उनके परिवार को देखेगा.

"अभी ये छोटा है और काम हम लोग हे देख रहे है तोह हिसाब बताने की जरुरत नहीं लेकिन कॉलेज जाने लगेगा तोह इसको सब समझा देना कुंदन. या फिर मोनू ये जिम्मेदारी लेगा. रामेश्वर जी के पास पहले हे संजीव है तोह कुछ हक़ तोह हमारा भी होता है इसपर, जब और कोई है हे नहीं हमारे घर में. कल की कल देखेंगे, अर्जुन मन तोह करेगा नहीं अगर कोई छोटा भाई मिलता है इसको आगे अपने मां से.", सोहनलाल जी भी थोड़े मजाक में कहने लगे. सभी मुस्कुरा दिए थे.

मां चाय और ठंडा लेकर आ गए थे दुकान पर काम करने वाले लड़के के साथ. सभी को चाय देने के बाद अर्जुन ने भी ठंडा पीया और वैसे हे थोड़ी जानकारी लेने लगा अपने नानाजी से. मनोहरलाल जी चुपचाप खिसक लिए जब कुछ लोग उनके बड़े भाई से मिलने वह आये. मुनीमजी भी सोहनलाल जी को कुछ हिसाब किताब देने लगे थे. अर्जुन ने मंडी देखने की इत्छा प्रकट की तोह कुन्दनलाल जी ने भी उसको आसपास घूमने का कह दिए लेकिन साथ हे जल्दी वापिस आने को बोलै क्योंकि कोई वकील साहब को उन्होंने बुलवाया हुआ था.

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10 बजे काफी चहल पहल थी हर तरफ. कही tractor-trolly खड़े थे कही टाटा सेंटर और ट्रक. हर दूकान के बहार खली मैदान सी जगह में फैसले साफ़ हो रही थी या धुप लगवाई जा रही थी. दुकानों के सामने वाले गलियारे में घूमता हुआ अर्जुन कौतहुल वश हर चीज को ध्यान से देख रहा था. कुछ छोटे उम्र के लड़के idhar-udhar चाय पकड़ा रहे थे और कही गाँव की दिहाड़ी वाली औरते शरीर लापरवाही से किये अनाज साफ़ कर रही थी. जिन्हे ड्राइवर या वैसे हे लोग ताड़ रहे थे. अर्जुन थोड़ा मुस्कुराता हुआ अब दूसरे गलियारे में आ गया जहा एक चाय का खोखा था और फिर वैसी हे दुकाने थी.

'गंगाराम & संस' नाम लिखी दूकान के पास से गुजर हे रहा था तोह व्है औरत नजर आई जो उनकी दूकान में सफाई कर रही थी जब वह आया था. लेकिन अभी उसके कपडे थोड़े ast-vyast थे और अर्जुन के सामने से गुजरती वह अपना कमीज छाती से ठीक करती अर्जुन को देख नजरे फेर कर बराबर से निकल गई.

दुकान के मुहाने पहुंचते हे उसके छोटे नाना ने भी अर्जुन को देखते हुए आवाज लगाई. वह वही बैठे हुए अपने दोस्त से बात कर रहे थे और साथ हे धोती के ऊपर कुरता ठीक कर रहे थे.

"अरे बीटा जरा इधर तोह आओ.", उनकी बात सुनकर अर्जुन भी उस दुकान में आ गया. यहाँ भी सामने की तरफ 2 गद्दे, तिजोरी, और छोटा लकड़ी का काउंटर लगा था गड्डो के गिर्द. नाना की उम्र का हे एक व्यापारी सा दीखता हलके शरीर का व्यक्ति भी बैठा था जिसको अर्जुन ने नमस्कार किआ.

"ये अपने दोहता है मांगेराम भाई. आज दुकान दिखने भाई साहब लिया लाये और अभी कुछ देर में मेरे साथ हे वापिस जायेगा. और बीटा ये हमरे परम मित्र और तुम्हारे भी नाना सामान हे है.", वह आदमी भी ज़िंदादिली से अर्जुन से मिले और वही अपने पास बिठाया.

"भाई मनोहर लड़का तोह 16 आने खरा है तुम्हारा नाती. भाई साहब से भी 21 हे लग रहा. तोह बीटा अभी क्या करते हो?", प्रशंशा के भाव थे उनकी जुबान में और अर्जुन के साथ हे मनोहरलाल जी भी मुस्कुरा दिए.

"जी अभी तोह ग्याहरह कक्षा में हुआ हु. अभी स्कूल खुले नहीं थे तोह कुछ समय के लिए सबसे मिलने आये थे.", अर्जुन ने तहजीब से जवाब दिए. मांगेराम जी ने thanda-garam पुछा लेकिन अर्जुन ने इंकार कर दिए.

"बीटा आज मंडी का chana-kulcha खा कर देखो, याद करोगे के कभी कुछ ऐसा खाया है. सीटू, जरा 3 कुलचे की प्लेट बनवा के लाना.", दुकान के बहार खड़े युवक ने उनकी बात सुनकर हाँ में सर हिलाया और निकल गया.

मनोहर जी जाने कैसी बातें कर रहे थे जो अर्जुन के पल्ले नहीं पड़ रही थी लेकिन कुछ हेर बाद वह लड़का कागज़ की तीन प्लेट में गोल ब्रेड के बीच भरे चने वाले कुलचे लेकर आ गया. नाना जी ने पहले अर्जुन को दिए फिर एक खुद लिए और साथ हे उनके मित्र ने भी एक कुलचा लेते हुए सीटू को भी अपने लिए खाने को कह दिए.

"वाह नाना जी. ये सचमुच ाचा है. वैसे मैं बहार का कुछ भी नहीं खता लेकिन ऐसे छोले मैंने कभी नहीं खाये.", अर्जुन ने जैसे हे एक हिस्सा खाया उसको वह चटपटा और गरम कुलचा भा गया. उसकी बात पर दोनों हंस दिए.

"तभी तोह कह रहा था बीटा. ये शहर में 2 हे जगह ाचा मिलता है. सरकारी कॉलेज के बहार या हमारी मंडी में.", कुछ हे देर बैठे थे की फिर वह पर मनोज मां आ गए उन्हें बुलाने. 11 बज चुके थे अभी तोह मनोहरलाल जी ने भी अपने दोस्त से हाथ मिलते हुए विदा ली और अर्जुन ने नमस्कार करते हुए. मांगेराम जी ने 100 रुपये शगुन के तौर पर अर्जुन को जबरदस्ती पकड़ा दिए.

"यार जरा इधर अपनी दुकान पर भी रह लिए करो कभी महीने में ek-aadh घंटा.", कुन्दनलाल जी ने अपने छोटे भाई के आते हे कहा. लेकिन मनोहरजी बस मुस्कुरा दिए जैसे उन्हें दुकान से कोई मतलब न हो. वही एक सफ़ेद कमीज में चस्मा लगाए वकील साहब बैठे थे.

"बीटा जरा इन 2 कागज पर भी दस्तखत कर दो. और वकील साहब बाकी आप देख लेना क्या कैसे करना है. ये अभी कुछ समय फिर नहीं आ पायेगा.", सोहनलाल जी ने पैसे गिनते हुए कहा और फिर वापिस सामने बैठे व्यक्ति की तरफ हो गए. रुपये gin-ne के बाद आदमी से एक bahi-khaate में दस्तखत करवाए तोह वह आदमी हाथ जोड़ कर पैसे लेता चला गया.

अर्जुन ने भी हरे रंग के उन लम्बे कागज़ पर दस्तखत किये तोह वैकिल जे ने बता दिया के इतना बहोत है. अब जरुरत पड़ी तोह बता देंगे लेकिन फ़िलहाल सब ठीक है.

अर्जुन भी फिर अपने छोटे नाना और मनोज मां के साथ बहार आ गया.

"मनोज बीटा, पहले मुझे खेत छोड़ दो और वही से अर्जुन घर चला जायेगा कैलाश के साथ. थोड़ी देर रह लेगा अपने खेतो में भी.", मां ने भी हाँ में सर हिला दिया और एक बार फिर से अपने ताऊजी को बोल कर वह दोनों के लेकर निकल लिए.

"मामाजी, आप कभी फुर्सत नहीं लेते क्या दूकान से?", अर्जुन कुछ सोचकर बोलै था. गाडी में वह अपने मां के साथ आगे बैठा था और छोटे नाना पिछली सीट पर.

"बीटा, यहाँ कोनसा कुछ बड़ा काम करता हु मैं. बस हलके काम हे रहते है या थोड़ी देर गद्दी संभल लेता हु. और छुट्टी लेकर करना भी क्या है?", अर्जुन आगे कुछ नहीं बोलै. वह कहने लगा थे कभी मामी की घुमा लाया कीजिये लेकिन अपने नाना की वजह से चुप हो गया. 15 मिनट बाद वह खेत के सामने खड़े थे.

"ाचा पिताजी मैं चलता हु और अगर आते हुए कुछ यहाँ पकड़ा के जाना हो तोह बता द्जिये.", मनोज मां ने भी गाडी से उतारते हुए कहा.

"हाँ, एक हरी वाली पकड़ा देना बीटा जब समय लगे. और थोड़ा भुने काजू मिले तोह देख लेना.", उनकी बात पर मनोज ने हामी भरी लेकिन अर्जुन फिर से सोच में पड़ गया के ये हरी वाली क्या चीज होती है. लेकिन मां के जाने के बाद उसने अपने नाना से पूछ हे लिए.

"अरे बीटा अंग्रेजी में तोह "सिनटुरे" कहते है बहिस्की की उस बोतल को लेकिन मैं यही कहता हु. रात ऐसे नींद नहीं आती तोह 2 घूँट लगा लेता हु खाने के साथ.", उन्होंने सिग्नेचर सही से नहीं बोलै था लेकिन अर्जुन को समझ आ गया था के वह शराब की हे बात कर रहे है. मुस्कुराते हुए वह पगडण्डी पर उनके साथ चलता वही आ गया जहा अनीता मामी के साथ खाना लेकर आया था.

आज भी बहोत से लोग खेतो में काम कर रहे थे लेकिन इस तरफ कमरे के पास एक 35-36 साल की औरत पानी के पाइप पर झुकी बर्तन साफ़ कर रही थी. उसके लटकते चुके देख कर छोटे नाना के चेहरे पर चमक साफ़ दिख रही थी अर्जुन को और वह मुस्कुराते हुए चुपचाप साथ चलता उधर आ गया.

"लीला, जरा कमरा भार देना मेरा. थोड़ा आराम कर लेता हु और मुन्नी को कह दो के अर्जुन बेटे को सामने वाले खेत दिखा लाये.", कमरे में चले गए मनोहर जी बिना हे अर्जुन को देखे और इस औरत ने मुँह बनाते हुए के तरफ आवाज दी तोह उस दिन वाली लड़की हे अर्जुन को आती दिखी. थोड़ा झिझकती हुई वह उस औरत और अर्जुन को देख रही थी. फूलो वाला भूरा कमीज और खुली भूरी सलवार पहने, मुन्नी ने दुप्पट्टा सीने के सामने से कमर पर बंधा हुआ था.

"हाँ फूफा के काम से?", मुन्नी नाम की उस लड़की ने लीला से पूछा. रिश्ते में शायद वह उसकी बुआ लगती थी इसलिए फूफा कह कर सम्भोधित कर रही थी.

"कुछ न ऋ. तू जरा छोटे मालिक को अगले खेत दिखा ला मैं यहाँ धार उतार दू.", ये बात कुछ अलग तरीके से उस महिला ने कही थी. लेकिन अब मुन्नी के चेहरे पर वह निराशा न थी जब उसने सुना की छोटे मालिक को कहते दिखने ले जाना है.

"हाँ तोह िब्बी ले जाती हु. थाम करो काम मालिक का.", और फिर अर्जुन को हाथ से साथ चलने का कहती वह आगे चल निकली और यहाँ लीला झाड़ू उठाने का नाटक करती कमरे में निकल चली.

'मालिक के है यो आदमी शीघ्रपतन से. खामखा चढ़े और चढ़ने से पहले उलट दे है.' धीमी आवाज में मुन्नी ने ये कहा. उसको लगा था के अर्जुन शहरी लड़का है तोह पीछे होगा थोड़ा लेकिन अर्जुन उसके दुपट्टे के पास हे था.

"शीघ्रपतन?", मुन्नी ये आवाज सुनते हे चौंक गई थी. आधे रस्ते के बीच में ृक्क कर वह थोड़ी दरी सी अर्जुन को देख कर जैसे सजा का इन्तजार करने लगी. यही तोह मिलती थी उसको अपने मालिक से.
 
गाइस आईटी सेक्टर में कुछ रेस्ट्रिक्शन्स है और उनमे से एक है पर्सनल कंटेंट टाइपिंग. सब साफ़ करके पकड़ा दिए मेरे लैपटॉप का तोह अबसे स्टोरी सिर्फ घर आने के बाद हे टाइप करूँगा. जैसा मैंने स्टोरी के इंडेक्स पेज पर कहा था के वीकली 3 उपदटेस तोह अब अल्टेरनाते डेज पर हे पोस्ट करूँगा स्टोरी के चैप्टर्स.

एक chapter ात लीस्ट 4-6 हॉर्स ले लेता है साथ हे मल्टीप्ल सिटिंग्स. मतलब ये है की इतना समय अब रात को घर पर हे निकलना पड़ेगा और अभी एक महीना तोह जॉब भी शफल नहीं कर सकता क्योंकि नोव एन्ड तक बांड कम्पलीट होगा.

प्रोजेक्ट से वापिस आने के बाद लैपटॉप ब्लेंक मिला तोह रिपीट टाइपिंग में भी लगभग उतना हे समय लग गया. फ़ोन पे पॉसिबल नहीं इतना लिखना और न हे फ़ोन अल्लोवेद है हर समय. स्टे कनेक्टेड बिकॉज़ ी विल नेवर क्विट राइटिंग. आईटी मई डिले बूत विल नेवर स्टॉप.

थैंक यू एंड सॉरी.
 
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