अपडेट 91
गड़े मुर्दे -2
"चची आप कैसे रास्ता भूल गई.?", शंकर जी ने बहार आँगन का नजारा देखा तोह सब परेशानी छु मंतर हो गई. अर्जुन अपनी चची को बाहों में उठाये ख़ुशी जहरी करता उन्हें घुमा रहा था.
"ाचा ाचा अब मैं आ गई हु मेरे बेटे के पास. नीचे तोह उतार पहले.", कृष्णा जी भी उतनी हे खुश थी इतने साल बाद अपने लाडले से मिलकर. एकदम सफ़ेद रंग था उनका, पतली लम्बी और साफ़ सफ़ेद सलवार कमीज पहने हुए वह बेहद अलग हे थी. अर्जुन उन्हें निचे उतरने की जगह अंदर ले चला और नरिंदर जी के साथ सामान उठा कर संजीव भैया अंदर उनके पीछे चल दिए.
"भाई, आने में कोई परेशानी तोह नहीं हुई?", शंकर जी बड़े जोश से अपने भाई से गले लगे थे और वह भी बराबर वैसे हे. नरिंदर शर्मा उम्र के इस पड़ाव पर भी एक तंदुरुस्त और ऊर्जा से भरपूर इंसान थे, परिचित मुस्कान के साथ.
"परेशानी और नरिंदर एक साथ कहा रहते है? तुम जरूर परशान हो भाई.", कैसा जुड़ाव था के अभी गले हे मिले थे की मुस्कुराते शंकर की धड़कन नरिंदर समझ गया था.
"ये उल्लू का पट्ठा कहा भाग गया? ऐसे चीख रहा था जैसे भूत देख लिए हो.", रामेश्वर जी भी कभी कभी अदाकारी कर लेते थे और अब भी नाटक करते बहार आये और अपने दोनों बेटो को देख कर मुस्कुरा उठे. नरिंदर जी ने बाबा के पाँव छूने के बाद गले लगते हुए कुछ कहा और वह हँसते हुए दोनों को साथ लिए अंदर चल दिए.
"तेरी बीवी अगर मेरा पौता ले गया तोह मैं क्या कर सकता हु भाई. रिटायर्ड हु और अपने पौटे के साथ जुर्म में शामिल.", उनको बात सुनकर शंकर जी भी हंसने लगे थे.
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"अब आप यहाँ मेरे पास बैठो सब आपकी सेवा करेंगे और हम करवाएंगे.", अर्जुन अंदर आँगन में अपनी चची को कुर्सी पर बिठाते हुए बोलै और बाकी सब भी कृष्णा जी से मिलने लगे. आरती दीदी तोह अपनी माँ से मिलते हे रोने लगी थी. अर्जुन ने उनके कान में कुछ कहा तोह वह उसके ब्याह मर हाथ मरती अपनी माँ से लिपट गई.
"देखो ये छोटा है फिर भी आपके सामने मुझे तंग कर रहा है.", आरती को सबसे ज्यादा प्यार अपनी माँ से हे था लेकिन शायद कुछ डर और दर्द उसको दूर रखता था.
"एक हे तोह है छोटा भाई तुम सबका. अब ये परेशां करेगा तोह तुम्हे होना पड़ेगा. वैसे ये अब छोटा नै रहा, बहार से हे मुझे गॉड में उठा के यहाँ ले आया.", अर्जुन के कान हलके से खींचती वह मुस्कुरा रही थी.
"उठो तुम दोनों यहाँ से. चल कृष्णा मेरे साथ चल तू, कमरे में आराम कर मैं वही चाय नाश्ता करवाती हु.", रेखा जी ऐसे अर्जुन को कभी नहीं कहती थी लेकिन वह बिना कुछ कहे हँसता हुआ बैठा रहा. चची उसकी माँ के साथ अंदर चल दी. अर्जुन बड़े ध्यान से उन्हें देख रहा था.
"आरती दीदी, एक बात पुछु?", अर्जुन की ऐसी बात सुनकर जैसे आरती भी उसका सवाल समझ गई थी.
"नहीं. मैं अपने कमरे में चली तू कर शरारते."
"हुआ क्या है सबको?", अर्जुन हैरान सा उठने लगा तोह संजीव भैया ने उसको वापिस बिठा दिए.
"तोह आज अपने भाई को भी भूल गया तू."
"कहा भैया, आँखों से हे चरण स्पर्श कर लिए थे मैंने आपके.", अर्जुन उनके गले लगते हुए शरारत से बोलै.
"तेरी आँखों की तोह.. बड़ा हो जा थोड़ा सा. वैसे तू किस बात पर हैरान था अभी?", अलका दीदी ने उन्हें पानी दिए तोह वह रुकने लगी लेकिन फिर भैया को देख कर अंदर चल दी.
"आपको कैसे पता के मैं हैरान था.? वैसे मैं ये देख रहा हु के कृष्णा चची बहोत बदल गई है. उनका वजन 50 भी नहीं होगा अब तोह लेकिन पहले वह आरती दीदी जैसी दिखती थी, छोटा था तोह इतना हे ध्यान है लेकिन हाइट उनकी कही ज्यादा है. और अब उनका रंग जैसे उन्हें कुछ जरूर हुआ है.", अर्जुन की बात पर संजीव भैया भी पल भर के लिए सकुचा गए. दिवारगढ़ी पर समय देखा तोह दिन के 11:30 बता रही थी.
"चल आजा बहार चलते है मैं भी काफी देर से बंधा हुआ था गाडी चलते हुए. दोपहर का खाना तोह अपने समय से बनेगा.", अर्जुन उनके साथ उठ कर बहार चल दिए.
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"तुम्हे किसने खबर दी थी इस घटना की?", नरिंदर और शंकर अब यहाँ एकांत में बैठे थे, बहार वाले ड्राइंग हाल में. शंकर जी अपने छोटे भाई को कल शाम की घटना बता रहे थे.
"बिट्टू ने बताया था के ऐसा हुआ है और मैंने हॉस्पिटल भेजा था गुलाटी को सब बारीकी से देखने के लिए. उसने जो बताया वह, वह सच में हैरान करने वाली बात है.", शंकर जी के चेहरे पर अब भी anishchit-ta थी जैसे.
"क्या बताया मेहुल ने? और पक्का अर्जुन अकेले हे ये कर गया?", नरिंदर जी के चेहरे पर अब हल्का सा पसीना था लेकिन शांत चेहरा.
"सुदर्शन कोई छोटा इंसान तोह नहीं है. साढ़े 6 फ़ीट लम्बा और उमेद से ज्यादा बड़ा समझ ले. उसके अपराध मुझे पता है लेकिन तू जानता है के मैं खुद उलझना नहीं चाहता इन लफड़ो में जो कल को कुछ और करवा दे. वैसे भी पहले कभी aamna-saamna नहीं हुआ. और जो 4 लोग थे वह भी अर्जुन से बड़े और तगड़े हे थे, उनके नाम भी जुर्म दर्ज़ है कोई दर्ज़न भर. गुलाटी ने बताया के एक पाँव और हाथ तोह नाकारा हो गया है. रोड डालके भी मूवमेंट नहीं आ पायेगी. सर पे 12 टांके, दूसरे पेअर की घुटने से निचली हड्डी और पीठ की 5 पसलिया टूटी है. रीढ़ की हड्डी का कूल्हे के पास से जॉइंट हिला है और काफी छोटे है. बाकी 4 लोगो का हाल भी कुछ अलग नहीं है. जिस हिसाब से मारा है तोह वह जान भी ले सकता था लेकिन सिर्फ बड़ी हड्डिया तोड़ी और दिल, दिमाग, गुप्तांग जैसे हिस्से सलामत रखे.", शंकर ने एक हे सांस में पूरी जानकारी दे दी.
"उसने अकेले किआ ये सब? हमारे अर्जुन ने और फिर वह कोई बीच में नहीं आया?"
"हाँ जो बीच में आये वह उसके दोस्त थे जिन्हे उसने एक तरफ उछाल दिए. बिट्टू की गर्दन भी पकड़ ली थी. लेकिन उसकी वजह शायद ये होगी की बिट्टू ने पीछे से उसको रोका होगा. मैं जानता हु की उसमे शायद तुम्हारे जवान जिस्म और दिमाग से ज्यादा बल होगा लेकिन उमेद को तुमने कभी सर से ऊपर उठा कर 10 फ़ीट दूर फेंका और फिर मान लो 5 उमेद सिंह एक साथ हो.?", शंकर की ऐसी बात पर नरिंदर ताली मार के हंसने लगे.
"ये तोह यार असंभव सी बात हो गई. मतलब तुम कह रहे हो की अर्जुन ने न सिर्फ उनकी इतनी बुरी हालत की बल्कि वह अभी से ये जानता है के कहा चोट मारनी है, रफ़्तार भी उसके पास, दिमाग भी और इतने लोगो के बीच वह अकेला. पूरी बात नहीं पता शायद हमको. वैसे चंद्रो तै ने इतनी आसानी से बात ख़तम कर दी.?"
"हाँ. वह भी कल से हे जानती थी इस हादसे के बारे में. प्रीती और उसके मां की लड़की पर हाथ डाला था सुदर्शन ने, किडनैप करने के इरादे से तोह अपने छोटे नवाब नीले हो गए, तै तोह सिर्फ उसको देखने के लिए वह से यहाँ इस घर में आ गई."
"भाई, अगर ये सब सच है जैसा एक बार पहले भी वह कर चूका है तोह इसका कोई हल करना जरुरी है.", नरिंदर की बात पर शंकर जी की गर्दन ना में हिलने लगी.
"गलती भी नहीं कर सकते. मैंने उसपर नजर रखने की कोशिश की थी लेकिन वह कही ज्यादा शातिर है. लाइब्रेरी में किताबे कोनसी पढता है वह पता है?"
"बताओ जरा?", इसमें नरिंदर जी की रूचि बढ़ गई.
"एस्ट्रल ट्रैवेलिंग, ह्यूमन बॉडी एंड it's सीक्रेट्स, बॉडी मैकेनिज्म, ध्यान, योग और हर तरह की गहरी किताबे. और तुम्हे प्रमोद जी याद है?", शंकर द्वारा बताई गई किताबे और फिर ये नाम सुन्न कर निन्दर बस भाई को देखता रहा.
"प्रमोद शास्त्री उर्फ़ आचार्य हंस? वह तोह सालो पहले हे कैलिफ़ोर्निया चले गए थे. बीच में ek-do बार उनके बारे में पढ़ा था कुछ किताबो में लेकिन अब उनका क्या चक्कर है इस सबमे.? वह इतने खाली इंसान नहीं के ऐसे मामलो पर ध्यान देने लगे.
"वह अर्जुन के मार्गदर्शक है जितना मैं समझता हु. कई बार दोनों को साथ देखा गया है सुबह के वक़्त. आखिरी बार 2-3 दिन पहले.", शंकर जी अब जैसे सबकुछ बता चुके थे जितना वह बताना चाहते थे.
"अगर इंसान खुद की क्षमता और इन्द्रिओ को पहचान हे गया हो तोह फिर hum-tum कुछ नहीं कर सकते. और आचार्य हंस के पास इतना समय है तोह सच में अर्जुन ख़ास हे है नहीं तोह उस इंसान को sunn-ne के लिए 200 डॉलर तक देने पड़ते है और ध्यान शिविर में 500 से 2000 तक. आज मैं अर्जुन के साथ हे सोऊंगा.", नरिंदर की बात सुनकर शंकर जी कुछ सोचने लग गए.
"आज नहीं. कल सो जाना. आज हम चल रहे है गुलाटी के यहाँ. थोड़ी हे देर में और वह काम भी है कुछ."
"ाची बात है फिर इस तुलसी की माला को यही रख देता हु. वैसे बड़ी भाभी ने क्या कहा?", यहाँ नरिंदर के चेहरे पर बचो सी हंसी थी.
"दरवाजा खुल्ला है. कुछ चाहिए हो तोह आ के ले लेना.", शंकर भी हँसते हुए भाई के साथ हे खड़े हो गए.
"तुम्हारी सोच की भनक थानेदार साहब को भी नहीं लग सकती. क्या कहते थे प्रमोद जी, शंकर वह चांडाल है जिसके ऊपर लिंग और नीचे दिमाग लगा है. देखने वाला मरवाता भी है और उसको खबर भी नहीं होती की आगे क्या गुल खिलने वाला है ये. हाहाहा.", दोनों भाई हँसते हुए बहार निकल गए.
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"मुझे यही उतार दो भैया और आप घर चलो मैं 2 बजे तक आ जाऊंगा.", अर्जुन मार्किट में हे रुक गया था संजीव भैया से बातें करने के बाद और वह भी इत्मीनान से घर की तरफ निकल चले स्कूटर लिए. पैदल चलता हुआ वह अपनी चची के बारे में हे सोच रहा था.
'कितनी हंसमुख है वह और इतनी गंभीर बीमारी के बावजूद कुछ पता नहीं चलने देती. कितनी हिम्मत होगी चाचा में भी की जिस से प्यार करते है वह धीरे धीरे कमजोर हुआ जा रहा है लेकिन दोनों हमेशा खुश रहते है. भगवन उन्हें लम्बी ज़िन्दगी दे.', पैदल हे वह चलता हुआ मेनका के घर आ खड़ा हुआ. अंदर कार कड़ी थी और मंजू की स्कूटी नहीं थी जो उसके सामने हे उनके घर की तरफ जाती देखि थी.
दरवाजा खोलता वह अंदर चल दिए तोह यहाँ ड्राइंग हाल का दरवाजा अंदर से बंद नहीं था. अर्जुन आराम से इधर आ कर हर तरफ देखने लगा. मेनका कही नजर नहीं आ रही थी. चिटकनी लगता वह कमरे के अंदर आया तोह बिस्टेर पर उसका दिलवाया हुआ सूट, ब्रा, पंतय पड़े थे और बाथरूम में पानी चलने की आवाज वह सुन्न चूका था. बीएड के सिरहाने वह तक लगाने हे लगा था की दिमाग में हल्का सा झटका लगा. ये तस्वीर उलटी राखी हुई थी चौकोर कंप्यूटर के छपु पर. अर्जुन ने ध्यान से उस तस्वीर को देखा तोह यहाँ 3 महिलाये थी जिनमे से बीच वाली अधेड़ औरत जैसे उसने कही देखि हो, लेकिन ये shwet-shyaam तस्वीर उतनी साफ़ नहीं थी. बाए तरफ वाली थोड़ी जवान थी जिसकी गॉड में एक बचा, शायद लड़की और पाँव के सहारे खड़ा 4-5 साल का लड़का था. अर्जुन ने फ़िलहाल वह तस्वीर वैसे हे रख दी और अपनी जगह वापिस आ कर सामने वाले दरवाजे को देखने लगा. पानी की आवाज बंद हो गई थी.
"तुम.", मेनका गुनगुनाती हुई भीगे बाल और शरीर पर एक लाल टोलिया लपेटे बहार निकली तोह सामने नजर पड़ते हे पांव जड़ हो गए. गोर चिकने पत् आधे से ज्यादा अर्जुन की आँखों के सामने निर्वस्त्र थे और वैसे हे सीने का ऊपर हिस्सा. अर्जुन अगले हे पल उसकी कमर में हाथ डेल साथ खड़ा था.
"अंदर जाने से क्या होगा? अब जिसके लिए तैयार हो रही हो वह खुद बहार तुम्हारा इन्तजार कर रहा है." मेनका का चेहरा बाथरूम के दरवाजे की तरफ था और पीछे वह अर्जुन के तगड़े जिस्म के आगोश में.
"शर्म नाम की कोई चीज होती है मिस्टर. ऐसे बंद घर में घुसना भी जुर्म है.", वह हल्का मचलती हुई हिल रही थी. लेकिन बेखबर की उस तोलिये का ऊपर हिस्सा खुलने से वह दोनों रेशम से मुलायम चुके उजागर हो चुके थे. अर्जुन का एक हाथ जो कमर पर था अब वह थोड़ा निचे खिसका और दूसरे से उसने ये गीला उभर दबोच लिए. 'आह्हः.", इस सिसकी के साथ हे मेनका सब भूलती उसके सीने से लिपट गई. टोलिया फर्श पर पड़ा था.
"दरवाजा खुल्ला रखोगी तोह ऐसा जुर्म हर रोज होगा.", अर्जुन थोड़ी बेशर्मी से मेनका का सबसे ख़ास भाग, उसके बड़े कूल्हे दोनों हाथो से दबाते हुए जैसे ऊपर उठा लगा था. मुँह ऊपर उचकती वह अपने लाल आधार अर्जुन के होंठो में देती खुद उसका साथ देने लगी. अब वह हाथ कूल्हों से फिंसटले बहार से उभरी अंदर गहरी दरार में घुस गए. दोनों बड़े कूल्हों की दरार में उंगलिया गड़ाए वह आज खुलकर मेनका के शरीर को टटोल रहा था.
"आह्हः.. क्या देख कर आये हो यहाँ जो ऐसे उतावले हो रहे हो.?", अर्जुन के गले तक हे होंठ पहुंच प् रहे थे और वह दांत गदति मेनका अपनी जाँघे भींचती हुई मदहोशी में अकड़ रही थी, अर्जुन की ऊँगली जल्द हे उसकी गीली गली में उतर गई जहा अभी तक अर्जुन सिर्फ 2 बार उतरा था, एक रात में हे.
"अभी से इतनी गीली हो और मुझे कह रही हो के उतावला मैं हो रहा हु.", अर्जुन ने वह गीला उभरा हुआ हिस्सा ऊँगली से हल्का सा रगड़ा और मेनका ने वही ऊँगली दबा ली.
"उम्म्म.. परसो से तड़प रही हु और तुम अब आ रहे हो.. आठ.. आते हे हाथ भी कहा लगा दिए.. माह.", सच में वह बुरी तरह पानी छोड़ रही थी. कहा तोह मेनका को दिक्कत थी की वह सम्भोग के वक़्त अपने पति के साथ हमेशा सूखी रहती थी और दर्दभरा संसर्ग होता था, यहाँ वह एक ऊँगली लगने से हे अंदर तक हिलती हुई बरसात कर रही थी.
"देखो कैसे तड़प काम होती है ये.", अर्जुन वैसे हे मेनका की योनि को कुरेदता दिवार से लगाए खड़ा हो गया. बेसुध सी वह भी निर्वस्त्र अवस्था में दिवार से लगी धनुष की तरह बलखाई सी अपने कूल्हे भिड़ाये अर्जुन को जैसे चुचो पर म्हणत का न्योता देने लगी. कच्ची मुसम्बी से मेनका के चुके फूले हुए अपने छोटे निप्पल उकेरे अर्जुन की प्रतीक्षा कर रहे थे. बिना समय गंवाए वह भी मेनका की नंगी पतली कमर को हथेली में भरता दोनों मुसंबिया होंठो में भरके पीने लगा.
"आठ.. बहुत दर्द दिए है इन्होने तुम्हारी याद में. आह्हः.. उम्म्म. जिस्म पर कपडा लगते हे ये आग भड़का देते थे.. पी लो इन्हे.. उम्", मस्ती में वह खुद अर्जुन का सर अपनी छाती पर दबती अपने अवयस्क सतांन बड़े करवाने पर आमादा थी. अर्जुन को भी उनमे वैसा हे स्वाद आ रहा था जैसे किसी नयी यौवन से भरी कुंवारी लड़की के स्टैनो पर होता है. जल्द हे कमर पे रखो दोनों हाथो में एक ने पूरी फूली हुई छूट को मुट्ठी में भर कर मसलना शुरू कर दिए.
"उम्मम्मम.. आठ एक बार कर दो.. आठ.. भर दो मुझे अर्जुन.. इस्सस..", रगड़ते हुए हे अर्जुन ने छूट रास सनी 2 लम्बी उंगलिया छूट के अंदर धंसा दी. नरम अंदरूनी मांस मजे से दोनों उंगलियों की रगड़ खता शरीर को हल्का करने लगा. जीन्स का बटन खोलकर जांघो से नीचे करने के बाद अर्जुन ने कच्चा भी हटा दिए. मेनका जितनी उत्तेजित और गीली थी उतना हे सही ये मौका था उसकी आग काम करने का. हलके घुटने मदद कर वह लुंड को ठीक मेनका की गीली छूट के सामने करता होंठो से उसकी आवाज बंद करके रुक गया. अगले हे क्षण मेनका के नाख़ून उसकी पीठ में टीशर्ट के ऊपर से हे पेवस्त हो गए. किसी देसी खीरे से ज्यादा हे मोटा वह लिंग पर्याप्त फिसलन की वजह से आधा अंदर घुस चूका था. दर्द से मेनका हलकी शांत सी हो गई लेकिन जल्द हे दोनों चुचो के मसलने पर वह अर्जुन के होंठ चूसती हुई अपनी टाँगे ढीली करने लगी.
"बहोत अंदर तक दुखता है जब तुम पहला धक्का लगते हो.. आठ.. देखो कैसे फंसा हुआ है ये.", मॉटे लुंड की hari-neeli उभरी नस्से देखती वह अर्जुन को भी ध्यान करने लगी की कैसे उसकी छूट का बुरा हाल करता है अर्जुन का मूसल.
"और फिर क्या करता है ये?", अर्जुन ने सीने से लगते हुए थोड़ा बहार खींच कर फिर से अंदर पेलते हुए पुछा..
"उम्. ाःह.. फिर थोड़ा काम दर्द देता है ाःह... लेकिन आठ इसमें अलग मजा है", 2-3 बार आधा लुंड हे छूट में आगे पीछे करते अर्जुन के साथ हे मेनका का जिस्म में लरजने लगा.
"तुम सच में प्यारी हो और बड़ी हिम्मतवाली भी. दर्द होने पर भी रोकती नहीं हो.", अर्जुन हलके धक्के देता अब फिर से उसके मॉटे कूल्हों की खाई में उंगलिया भर रहा था. छूट के बहार से हलकी चिकनाई लेता वह गांड के नरम छेड़ को दबाता अब 3/4 लुंड उस संकरी छूट में मजे से पेलता मेनका को उसके दूसरे चरम पर पहुंचने लगा.
"अहह.. अह्ह्ह.. हहहहहह.. ये बड़ा है तब भी प्यारा है. जैसे तुम हो वैसे हे तुम्हारा ये. उम्म्म.. मुझे पकड़ लो अर्जुन.", काम्पटी टाँगे वह अर्जुन के पंजो पर दबती जैसे गिरने हे लगी हो. अर्जुन ने भी कूल्हों को मजबूती से पकडे मेनका को थामे रखा. इस चरम उन्माद में मेनका को हल्का झटका सा लगा जब आधी ऊँगली उसकी गांड के गरम लचीले छेड़ के अंदर सरक गई. हल्का सा उछलती वह अर्जुन से अमरबेल सी लिपटी दोहरे मजे का लुत्फ़ उठती हांफ रही थी.
"वह क्यों करते हो तुम? आठ.. ाचा लगता है लेकिन उम्म्म.. वह ऐसे नै करना.", अर्जुन उसकी बात पर मुस्कुराता हुआ लुंड उस गीली छूट में फसाये हुए हे मेनका को लेकर हाल में आ गया. आज कोई डर या शर्म नहीं थी दोनों में. दिन के उजाले में मेनका पूरी निर्वस्त्र अर्जुन का मूसला लिए सोफे के किनारे कमर टिकाये अब अर्जुन के लम्बे धक्को से चुड़ रही थी. हर धक्का फैली हुई जांघो की जड़ में लगता और दोनों कूल्हों के बीच उसके बड़े अंडकोष टकराते.
"आठ.. कर दो ढीला इस कामिनी को.. आह्ह्हम्म्म. चुड़ते वक़्त रोटी है और अकेले में तुम्हे याद करती है. आठ. पूरा भर दो अंदर तक..", छोटे चुके बेरहमी से मसलता अर्जुन ऊपर झुकता मेनका के शरीर का हर हिस्सा हिला रहा था.
"अहह.. पलट जाओ यही.", अर्जुन ने लुंड बहार खींचा तोह इस बार भी मेनका अपनी गुलाबी छूट की फांके सहलाती उसकी हालत देख रही थी. छूट का छेड़ अर्जुन ने खोल दिए था और अंदर की लाल गहराई कॉमर्स से चमकती अपनी खुसी बता रही थी. धीरे धीरे वह सोफे के ऊपर हे घुटने मोड चौपाया आसान में आई तोह अर्जुन बड़े ध्यान से उन हेल भूरे सुडोल कूल्हों को पकड़ कर देखने लगा.
"वह अभी कुछ मत करना, प्लीज.", अपनी टांगो के बीच से वह अर्जुन को देख रही थी. मेनका को यकीन था के वह पक्का उसका पिछले छेड़ भी खोल देगा.
"तोह यहाँ कब करू?", अर्जुन ने मुस्कुराते हुए छूट पर गीला सूपड़ा भिड़ाया लेकिन अंदर करने की बजाय हल्का सा सेहला कर हटा लिए. मेनका कमर पीछे करती तड़प रही थी लेकिन वह बार बार छूट से चिपकने के बाद लुंड हटा रहा था.
"पहले यहाँ की चुदाई पूरी करो फिर जहा मर्जी बाद देना. मुँह में या पीछे.", हलकी नाराजगी में मेनका ने कहा लेकिन फिर मुँह एक पल के लिए खुल्ला हे रह गया जैसे हे जड़ तक लुंड सरसराता हुआ छूट में भर गया.
"आईई.. कमीने.. बिना बताया तोह मत मारो.. आह्हः.. ", अब अर्जुन ने बिना तरस खाये मेनका की छूट को जैसे और खोलना शुरू कर दिए था. हर बार सुपडे तक लुंड बहार निकलता उस गुलाबी मोरी में पूरा समां जाता. मादक सिसकारिओ से पूरा घर गूँज रहा था. ये thap-thap की आवाज हर गुजरते सेकंड से भड़ती अब मेनका की चीखे निकलवाने लगी थी. चरम होने के बावजूद अर्जुन बिना रुके उसके पेल रहा था.
"मर जाउंगी... रुक जाओ.. आठ.. फट गई है.. माहहह.. " वह निकलने हे लगी थी की अर्जुन ने लुंड बहार खींच कर गांड के छेड़ पर दबा दिए. शरीर ढीला पड़ने से सुपडे का एक चौथाई हिस्सा उस चिकने छेड़ में धंसता गरम लावा गांड में भरने लगा. अर्जुन भी इस खास अंग की गरमी और जकड़न का मजा लेता 4-5 लम्बी पिचकारियां अंदर भरने के बाद छोटे सोफे पर बैठ गया. मेनका मुँह के बल सोफे पर लेती अपनी बड़ी गांड हवा में उठाये मजे और दर्द से आँखे बंद किये थी.
"ये लास्ट में क्या किआ था तुमने?", वह लड़खड़ाती हुई कड़ी हुई और फ्रिज से बारग का टुकड़ा ले कर छूट के ऊपर रखती सोफे पर पसर गई. हमेशा शरीर को हद्द से ज्यादा ढकने वाली मेनका अब पूरी जन्मजात हालत में अपनी दुखती हुई फैली छूट पर बर्फ से टकोर कर रही थी.
"तुमने हे कहा था के पहले चुदाई करो फिर जहा मर्जी दाल देना. मुँह तुम्हरा दूर था तोह इधर खाली कर दिए. लेकिन अंदर नहीं किआ मैंने. अगर करता तोह ये बर्फ वह लगा रही होती.", अर्जुन हँसता हुआ अपनी जीन्स ठीक करके पानी की बोतल ले कर फिर बैठ गया. मेनका के चुचो की घुंडी अभी भी सूज कर अकड़ी हुई थी. पूरे जिस्म पर अर्जुन ने ाची म्हणत की थी.
"लुंगी तुम्हारा मुँह में और पीछे.? सपने लेते रहना. तुम्हे तोह यहाँ भी नहीं करने दूंगी.", मेनका ने जो कहा था वह नखरे से कहा था और अर्जुन भी जानता था.
"मुझे नहीं करने डौगी? ाची बात है अगर कोई और पसंद आ गया है तुमको. मैं िज्जात्त करता हु के तुमने साफ़ साफ़ कह दिए.", अर्जुन ने गंभीर लहजे में ऐसा कहा और बोतल फ्रिज में रखता टीशर्ट ठीक करने हे लगा था के अपना दर्द भूलती मेनका भीगी आँखों से उसकी कमर से लिपट गई.
"मेनका ने इस शरीर के साथ अपनी आत्मा भी तुम्हरे हवाले कर दी है अर्जुन. तुम मुझे जलील भी कर दो तोह मैं कुछ नहीं कहूँगी लेकिन किसी और के साथ मैं कभी सोच भी नहीं सकती.", अर्जुन ने भी दोनों बाहे पकड़ कर उठाते हुए मेनका को अपने सीने से लगा लिए.
"पगली खुद हे तुमने ये बात कही. जानता हु मजाक में कही थी की तुम्हे तोह यहाँ भी नहीं करने दूंगी. मतलब मुझे नहीं करने डौगी. तोह मैंने भी मजाक हे किआ था. लेकिन सच ये भी मेनका के अगर तुम्हे प्यार हो जाए किसी और से तोह हमेशा याद रखना के तुम एक आजाद इंसान हो. अर्जुन तब भी तुम्हारे साथ खड़ा रहेगा.", अर्जुन ने अब जैसे होंठो को चूमा था उसके प्यार को मेनका भी समझ गई थी. वह साफ़ था बिलकुल बहते पानी सा.
"लेकिन जो भी हुआ हो फिर कभी ऐसा मत कहना. मैं जिन्दा हु, तुम्हारे साथ होने पर खुद को सबसे खुशकिस्मत मानती हु. और कुछ नहीं चाहिए. हाँ लेकिन मुँह में मैं फिर भी नहीं लुंगी.", रट हुए भी वह भोली सूरत बनाते हुए अर्जुन के सीने पर हाथ रखती हुई कह रही थी.
"अगली बार मैं शुरू हे तब करूँगा जब तुम मुँह में लोगी.", अर्जुन भी हँसता हुआ उसका एक उभर कस्ते हुए बोलै.
"आह्हः. ष्ही. गंदे दुःख रहे है ये. चलो फिर खोलो इसको."
"न बाबा न. तुम तैयार हो जाओ हम घर चल रहे है.", अर्जुन ने दोनों कूल्हों पर थपकी देते हुए मेनका को आजाद किआ.
"पौने एक हुआ है, घंटे भर में चलते है.", मेनका की गांड से निकलता सफ़ेद रास पिंडली तक आ गया था.
"ठीक है तुम नाहा लो मैं सोने लगा हु.", अर्जुन टीशर्ट बिस्टेर पर फेंकता धम्म से नरम गद्दे पर लुढ़क गया. निर्वस्त्र मेनका इस चुदाई के मजे को फिर से जागृत करती अपनी छूट सहलाते हुए अंदर नहाने चली गई.
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अर्जुन घर आया तोह मंजू खुद अपनी बड़ी ननद को लिए सबसे मिलवाने लगी और वह अपनी माँ के कमरे में जा घुसा. कृष्णा चची यहाँ अकेली बिस्टेर पर लेती कोई किताब पढ़ रही थी.
"मैं अंदर आ सकता हु चची?"
"बिस्टेर के पास खड़े हो तुम. चलो इधर आओ मेरे पास.", हंसती हुई वह अर्जुन का हाथ पकड़ कर पास बैठने लगी तोह वह भी उनकी बगल में बिस्टेर से पीठ लगता बैठ गया. अर्जुन ने अब ध्यान दिए था के चची के हाथ बर्फ से ठन्डे है.
"क्या पढ़ रही हो आप? ये कोई इंग्लिश नावेल है?"
"नहीं नावेल तोह नहीं है लेकिन शार्ट स्टोरीज है. मेरी फवौरीते बुक है और तुम्हारे चाचा ने हमारी दसवीं सालगिरह पर ये भेंट की थी. इतने साल इसकी तरफ ध्यान नहीं गया लेकिन अब मैं हमेशा इसको अपने पास रखती हु.", उनका हर लफ्ज़ दोनों के अथाह प्यार का वर्णन कर रहा था, बिना नाम लिए.
"चची आपको चाचा से प्यार हुआ था या उन्हें आपसे? मुझे सबने यही बताया था के आप दोनों की शादी एकदम हे हो गई थी, mummy-papa के साथ हे.", अर्जुन की बात पर उस सफ़ेद चेहरे पर अलग हे नूर आ गया था. अर्जुन ने अब ध्यान से देखा था की उनकी चमकती आँखों के अंदर भी बहोत दर्द हो जैसे.
"तेरे चाचा बस 3 साल तक दूर दूर से देखते रहे मुझको. मैं हे हर बार नोट्स के बहाने उनसे बात करती थी. पहले साल तोह उन्हें पसीजना आने लगता था लेकिन फिर वह भी खुद मेरा इन्तजार करते के मैं उनसे नोट्स लेने औ. 3 साल में एक बार कैंटीन में चाय हमने साथ में पी थी वह भी मेरे जन्मदिन पर. शंकर भाई साहब को जब पता चला था हमारे बारे में तोह उन्होंने ऐसा ड्रामा किआ था के हम दोनों हे फंस गए थे. लेकिन फिर जल्द हे शादी करवा दी गई हमारी और तुम्हारे चाचा अब हर रोज मेरे लिए चाय बनाते है.", कृष्णा चची की बात कितनी सीढ़ी सी थी. अर्जुन हैरान था के वाह ये भी प्यार था.
"ऐसा प्यार आजकल तोह देखने नहीं मिलता चची. यहाँ तोह लोग इंसान की कदर तक नहीं करते, सच्चा प्यार क्या करेंगे.", अर्जुन क्या बोल गया उसको खुद मालूम न चला. लेकिन चची अपने लादले को ध्यान से देखने लगी.
"बीटा प्यार करने से नहीं हो जाता है. ये छोटी छोटी बातें, स्वाभाव, अलग खिंचाव और एक चुम्बक सा होता है. मतलब की ये आपको खुद ढून्ढ लेता है. तुम समझ लो चुम्बक का उत्तरी ध्रुव हो और वह प्यार दक्षिणी. शुरू में तुम शायद ध्यान भी न दो लेकिन कभी वह आकर्षण तेज होता है तोह कभी धीमा. लेकिन अगर दोनों पहचान लेते है तोह फिर मिलते जरूर है. है 2 टुकड़े साथ जुड़े रहेंगे या नहीं वह एक्सटर्नल सुररौनडिंग पर भी देपेंद करता है इंटरनल के साथ.", चची हलकी आँख दबती हुई हंसने लगी. कितने ाचे से उन्होंने ये परिभाषा दी थी. अर्जुन भी मुस्कुराने लगा.
"सच बात है चची के चाचा की किस्मत सबसे बढ़िया है जो आप जैसी इंटेलीजेंट और फ्रेंडली वाइफ उन्हें मिली. आप हंसती हुई तोह और भी ाची लगती हो शायद इस लिए हे चाचा आपको बहार नहीं लाते.", अर्जुन की बात एक बार तोह उन्हें प्यारी लगी फिर कुछ सोचते हे वह दुखी होने लगी लेकिन उनका हाथ अर्जुन ने थोड़ा मजबूती से थाम लिए.
"इंसान अंदर से मरता है क्योंकि वह कमजोर होता है. आपके पास जो है जरा उस पर गौर कीजियेगा. तकलीफ khud-ba-khud काम हो जाएगी. वह आप अकेली नहीं होंगी, आपका वही प्यार साथ होगा जिसको एक्सटर्नल सुररौनडिंग से कोई फरक नहीं पड़ता, इंटरनल और म्यूच्यूअल से पड़ता है. ये जिस्म प्यार और एहसास से चलता है. कहने को सब जिन्दा है लेकिन जो अपनी जुंग उस शक्श के लिए जीते जो उसका सबकुछ है तोह असली जीना वही है बाकी बस सांस लेना हे है जिसमे कोई जोर नहीं लगता. आपका ये बीटा दर्द भी समझता है प्यार भी. आपके पास दोनों भरपूर है लेकिन किसी ने मुझे सिखाया था के पीड़ा हमेशा नहीं रहती, प्यार रहता है. वह बस आप चाचा पर वही भरोसा और प्यार रखना जो शादी की बात से पहले आपने किआ होगा.", अर्जुन मस्ती करता हुआ एकदम से इतनी प्यारी और गहरी बातें कर गया था की कृष्णा खुद को रोक न सकीय उसका माथा गाल चूमने से. आँखों में नमी थी लेकिन दर्द काम था.
"गलती करदी रे मैंने. तेरे पास हे आ जाती 4-5 साल पहले तोह तेरी ये चची इस हाल में होती हे नहीं. मेरा बचा इतना समझदार हो गया है ये मुझे नहीं पता था. वह थोड़ी देर पहले वाला शरारती भी पसंद था मुझे लेकिन ये वाला और बेहतर है.", अर्जुन को वह सीने से लगाना चाहती थी लेकिन उस से पहले अर्जुन ने हे अपनी चची का सर छाती से लगते हुए उनके आंसू साफ़ करने शुरू कर दिए.
"उस वक़्त तोह मैं हे ठीक नहीं था और बोर्डिंग में बंद था. लेकिन अब बस 25 साल के प्यार के सामने इस दर्द को बड़ा मत होने देना. एयरपोर्ट लेने मैं आऊंगा आपको वह भी एक महीने में. बस जाने से पहले एक किताब मैं आपको दूंगा, वह पढ़ना. हाँ चाचा को फिर काम प्यार करोगी लेकिन इतना चलता है अपने बेटे के लिए.", फिर से गंभीर बात को वह हलकी मस्ती से ख़तम करते हुए उनका मूड ाचा कर चूका था.
"तेरी माँ से पूछूँगी ये गुस्सैल लड़का जो हर समय kit-kit करता था आज इतना समझदार और बड़ा कैसे हो गया. वैसे सच कहु तोह इन कुछ पालो में हे मैं कुछ बेहतर महसूस कर रही हु."
"तू फिर इधर आ गया मुन्ना. कहा था न चची को तंग नहीं करना.", अपनी माँ की आवाज सुनकर वह उठने हे लगा था के चची ने हाथ पकड़ कर फिरसे साथ बिठा लिए.
"रेखा ये यही रहेगा हाँ तू चाहती है के मैं उठ जाओ तोह फिर चल बीटा हम यहाँ से चलते है."
"कृष्णा, बैठी रह. ये शरारती है और दिमाग खता रहेगा तेरा. इसलिए इसको मन कर रही थी. और कोई बात नहीं है."
"तेरा ये शरारती बहोत प्यारा है रेखा. ये मुझको देदे तोह मैं वैसे हे ठीक हो जाउंगी.", अपनी सहेली और देवरानी की बात सुनकर रेखा जी भी पाँव के पास बैठ कर अर्जुन का हाथ पकड़ कर उनके हाथ पर रखती बोली.
"ऐसे 100 अर्जुन कुर्बान है कृष्णा, बस तू ठीक हो जाये. ये पहले हे मुझे किस्मत से ज्यादा खुशियां दे चूका है.", रेखा जी स्नेह और गंभीरता के साथ बोली थी और कृष्णा जी को भी महसूस हुआ था के रेखा का दिल सचमुच कही ज्यादा बड़ा है.
"रेखा तू शुरू से ऐसी हे है रे. निर्मल और दिलदार. ये जितना तेरा है उतना हे तोह मेरा है. बस आज एहसास हुआ के मैं खुद हे इतने सालो से हारी हुई थी लेकिन अब तेरे अर्जुन ने मुझे जीने का तरीका सीखा दिए है."
"ओह चची, अभी तोह माँ ने कहा के अब मैं आपका हु. फिर ये तेरे मेरे क्या हुआ. और अब आराम करो आप, एक दिन में हे ठीक हो गई तोह इज़्ज़त्त और परवाह नहीं मिलने वाली ज्यादा. शाम को मिलता हु आपसे.", उनके गाल चूमने के बाद वह माँ को भी गले लगता बहार दौड़ गया.
"सच में तू खुद हे देख इसको. छोटा सा हे तोह है लेकिन जीवन का सार 2 पंक्तियों में समझा गया. मेरा नाम दे रही थी इसको तू लेकिन ये भीष्म पितामह का अर्जुन बन बैठा. है तोह कृष्णा हे.", रेखा ने भी इस बात पर कृष्णा को गले लगा लिए था.
"तू शादी से पहले से हे मेरी आदर्श थी, बड़ी बहिन की तरह. रिश्ता मेरा बड़ा करवा दिए बस. कृष्णा मतलब जिसके पास हर समाधान हो. खैर अब नहीं मिला वह नाम तोह क्या हुआ कृष्णा के साथ अर्जुन भी thik-thak लगता है.", रेखा जी की इस चुहल को वह भी समझ गई थी.
"Thik-thak की बची, देर से हे सही पार्थ मिले तोह सही. हाहाहा."
"तू स्कूल में भी कृष्णा हे बनती थी 8-9 क्लास की बात होगी, मैं सरोज से कहती थी की दीदी कही लड़का हे तोह नहीं है."
"हंस ले हंस ले. वह हमारी जमीन काम पानी वाली थी न तोह तेरी तरह पूरा पानी नहीं मिला था उस वक़्त. शादी के बाद पंजाब में हे थोड़ा khaad-pani डाला. लेकिन तुझे देख कर पता चलता है के दिन रात सिंचाई होती रही है तेरी, उपजाऊ तोह पहले से हे थी तू.", कृष्णा की बात पर रेखा हंसती हुई हाथ पर हाथ मरती उठने लगी.
"चल तू बैठ 2 मिनट मैं तेरा खाना लेके आई. भूल हे गई थी इन चक्करो में की कोमल ने यही कहने के लिए भेजा था. मैक्सी पहन ले आराम रहेगा.", रेखा जी ने अलमारी से अपनी ये हलकी नीली मैक्सी निकाल कर उन्हें दी और दरवाजा बंद करती चली गई उनका खाना लेने.
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"सुना है कल गौशाला जा रहे हो तुम?", खाने की मेज पर अब बस यही आखिरी लोग थे. बाकी सब दोपहर का भोजनत करके अपने काम में लग गए थे या कमरे में आराम कर रहे थे. इस वक़्त कौशल्या जी, रेणुका बुआ, मधु बुआ, मेनका और अर्जुन हे यहाँ बैठे थे. मधरुई दीदी और कोमल दीदी खाना परोस रही थी, गरम रोटियां ला रही थी. ये बात रेणुका बुआ ने कही थी जो मधु बुआ और मेनका के बीच बैठी थी.
"हाँ. चलो अगर चलना है आपने भी. मैं भी पहले नहीं गया हु इसलिए ाचा रहेगा के कोई साथ हो.", अर्जुन ने दही खाते हुए हे जवाब दिए. थोड़ी दही होंठो से नीचे आ लगी थी जिसको सामने बैठी तीनो देवियां खयालो में अपने तरीके से साफ़ करने का सोचने लगी थी लेकिन कौशल्या जी ने साड़ी के पल्लू से मुँह साफ़ करते हुए अर्जुन के सर पे हाथ फेरा.
"ले जा अपनी बुआ को. आजकल दिल अशांत रहता है इसका और सुबह की हवा में घूम भी आएगी और वह जा कर ाचा भी लगेगा. तेरे छोटे दादा बता रहे थे की घर का माहौल अभी जम्म नहीं रहा रेणुका को, अंतर्मुखी है थोड़ी.", कौशल्या जी की बात पर न अर्जुन के चेहरे पर खास भाव आये न रेणुका ने खुद पर आने दिए.
"ये आपकी अंतर्मुखी अर्जुन से और आपसे तोह बड़ा घुलमिल के बात करती है और मैं बात करने लगती हु तोह बिदक कर भाग जाती है.", मधु बुआ की इस बात पर जो लाली रेणुका बुआ के चेहरे पर चाय वह कौशल्या जी से न चिप्प सकीय.
"सुधर जा थोड़ी. वह क्यों भागती है और तू क्या बातें करती है तेरी माँ को पता है. और अब ये तेरे पास हे रहने वाली है अगले एक हफ्ते तक, रात को. वह इसका देखभाल सही नहीं हो रही.", कौशल्या जी की ऐसी बात सुनकर मधु और मेनका ने रेणुका को देखा जो खुद भी थोड़ी हैरान थी.
"बड़ी माँ, ऐसा कुछ नहीं है. बस वह तोह वैसे हे थोड़ा बहोत तोह इस समय होता हे है. मैं ठीक हु वही पर.", रेणुका सफाई देने लगी थी लेकिन कौशलया जी के चेहरे के भाव बता रहे थे की वह उसकी बात से सरोकार नहीं रखती.
"हुआ क्या है इसको माँ? देख तोह मैं भी रही हु की ये थोड़ी अजीब जरूर हो गई है.", इस बार मधु के स्वर में भी बेहद चिंता थी. बेशक वह दोनों हे अलग थी लेकिन प्यार और जुड़ाव तोह दोनों में था हे.
"पेट से है ये और वह अपने कमरे में या तोह अकेली रहती है या फिर प्रीती के साथ, जो खुद बची है. रोमिला भी दिन में देखभाल कर सकती है लेकिन रात में? इसलिए मैंने इसके बाप को भी कह दिए है के जितने दूसरा महीना ख़तम नहीं हो जाता ये तेरे साथ ऊपर वाले कमरे में रहेगी. तारा वैसे हे Alka-Ritu के साथ वाले कमरे में आ गई है और 2 नए ैरकाणस्तर संजीव लेने गया हुआ है तोह इन लड़कीओ के कमरे में भी अब ठंडी हवा रहेगी.", कौशल्या जी जैसे हर काम पहले हे कर चुकी थी और मधु थोड़ी हैरान थी लेकिन मेनका ये देख रही थी की गर्भवती होने पर रेणुका अलग क्यों नहीं दिख रही.
"और ये बात अब पता लग रही है? वैसे गलत हुआ इस समय के हिसाब से.", मधु कुछ और भी बोलती लेकिन रेणुका ने नीचे से हाथ कस कर पकड़ लिए. हलके थपथपाते हुए जैसे वह अपनी इस बड़ी बहिन को कोई गुप्त इशारा कर रही थी.
"ठीक है अब ये ऊपर हे रहेगी मेरे साथ. लेकिन अपने दोनों लाड़लो को बोल देना के वह ऊपर वाला बाथरूम उसे करना बंद कर दे अब.", मधु बुआ की बात पर कौशल्या जी हंसने लगी.
"एक तोह अबसे बैठक में सोने वाला है क्योंकि हफ्ते में एक रात हे वह आता है और दूसरे को तू जाने. उसको मैं कुछ कहने से रही. वैसे मेनका बीटा तुम कुछ पूछना चाहती हो?", मेनका भी बच न सकीय थी कौशल्या जी की नजरो से.
"जी आंटी लेकिन पूछना ठीक रहेगा बस यही दुविधा है.", मेनका की उंगलिया आपस में रगड़ खा रही थी शर्म और झिझक से.
"बीटा ये तेरी बहनो जैसी है और मैं माँ जैसी, अगर तू मानती है तोह. और पूछ ले कुछ भी अब यहाँ मर्द तोह कोई है नहीं घर में इस समय.", उनकी बात से आश्वस्त होती वह रेणुका की तरफ देख कर कहने लगी.
"ये प्रेगनेंसी में कैसा महसूस होता है? और सच में परेशानी या कुछ ज्यादा प्रॉब्लम होती है? मुझे सचमुच इसका कोई आईडिया नहीं है.", मेनका ने जितना भी कहा था लड़खड़ाते शब्दों से हे कहा था.
"बीटा एक बात समझ ले के औरत सही मायने में तभी औरत बनती है जब वह बचे को जनम देती है. अब कोख में 9 महीने एक और जीवन पनप कर बड़ा होगा तोह बदलाव आएंगे हे, लेकिन वह बदलाव खास होते है और औरत को हर बदलाव का पूरा एहसास होता है. शरीर बड़ा होता है, खुराक बढ़ती है, मैं विचलित रहने लगता है लेकिन परेशानी सिर्फ दूसरे महीने और फिर आठवे महीने ज्यादा होती है. ममता ौलात खुद माँ को पेट में हे सीखा देती है. 4-4 पैदा किये है मैंने और वह भी तब जब ये सुविधा नहीं थी. बस दूसरे महीने में पति या घर का वह सदस्य जिस से प्यार हो और वह साथ रहे तोह ये घभराहट, जी मचलना, नींद टूटना काम हो जाता है या होता हे नहीं. अकेले में मुश्किल है. इस मधु ने काम तारे दिखाए सबको तारा की बरी में? शंकर से ज्यादा जुड़ाव था और वह काम छोड़ कर इसके लिए rabri-faluda 3-3 बार घर देके जाता था. रात में पाँव सूज जाते थे क्योंकि काम कभी किआ नहीं था पहले तोह सबकी बारी लग जाती थी इसके पांव दबाने की.", अपनी माँ की बात सुनकर मधु झूठा गुस्सा दिखने लगी और मेनका गहराई से सोचने लगी.
"पहली बार तोह मुझे कुछ पता भी नहीं लगा था बड़ी माँ. अजीब लगता था लेकिन तब आदत थी अकेले रहने की फिर ससुराल का तोह आपको भी पता है. लेकिन अब तोह जिस दिन से पता चला था हर रोज कुछ अलग लगता है और मैं खुश भी हु इसके साथ", रेणुका की बात पर कौशल्या जी थोड़ा भावुक हो गई.
"ये सतीश की गलती थी तेरी नहीं जो कौशल से शादी करवा दी थी. अपने भाई साहब की बात भी न सुनी उस समय. लेकिन अब तू यहाँ है अपने परिवार में और मेरी बची के लिए किसी चीज की कमी न होने दूंगी. घर के बड़े यहाँ रहते हो या न रहते हो लेकिन तेरे ताऊजी और अर्जुन हमेशा यही है. और अर्जुन समझदार है, नींद भी कच्ची है उसकी तोह ज्यादा सोचना मत कभी भी कुछ परेशानी हो तोह जगा लेना उसको. बस अगर खुराक समय पर नहीं ली तोह फिर मधु भी जानती है और रेखा भी की मैं कोई लिहाज नहीं रखती. चलती हु नहीं आवाज आ जाएगी की चाय किधर रह गई.", कौशल्या जी के साथ हे मेनका भी कड़ी हो गई. उनके जाते हे मधु ने रेणुका के गले में एक ब्याह दाल ली.
"सब पूछूँगी और तू सब बताएगी, बिना कुछ छुपाये.", मधु की ऐसी बात सुनकर रेणुका की धड़कन हलकी सी तेज हो गई थी.
"क्या पूछना है आपको?", अपनी उंगलिया आपस में उलझती वह नीचे देख रही थी.
"अरे पागल परेशां मत हो. अगर तू नहीं बताना चाहती तोह कोई बात नहीं, मुझे लगा था के तू भी बात करना चाहती है. दिल हल्का करने के लिए.", रेणुका ने उनका हाथ थाम लिए.
"दीदी, ऊपर चलते है."
"चल आजा.", मधु हाथ पकडे हुए रेणुका के साथ सीढिया चढ़ती ऊपर चल दी.
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आज स्टेडियम में थोड़ा दृश्य बदल चूका था. जो भी अर्जुन को देखता वह या तोह अपने रस्ते हो लेता या फिर मुस्कुरा कर अभिवादन करता. अर्जुन शांतचित्त बस अपनी जगह आ गया. प्रीती और मंजू आज भी साथ आई थी लेकिन विक्य नहीं दिखी थी. कसरत के समय दोनों में पहले जैसी हे बातें हो रही थी. बलबीर खुश था सुमन के साथ और वही बातें वह अर्जुन को बता रहा था. दोनों अभ्यास के लिए किट के पास आये तोह यहाँ जोगिन्दर जी तोह नहीं थे लेकिन चारुल और सिम्मी जरूर आ कड़ी हुई थी.
"तुमने सिम्मी को मार्किट ले जाने का वादा किआ था?", चारुल की बात सुनकर अर्जुन पलट कर उन्हें देखने लगा और अपना हाथ सर पे रख लिए.
"वह याद नहीं रहा. लेकिन मैंने शायद संडे का कहा था."
"नहीं. तुमने saturday-sunday दोनों कहा था और साथ हे अन्नू ने चलने की है भरी थी.", सिम्मी नाराजगी भरे नखरे से कह रही थी.
"कपडे बदल लो अब. बहार अन्नू कार लिए कड़ी है क्योंकि कल न सिम्मी के पास वक़्त है और न तुम पकड़ में आने वाले हो, जैसे तुमने अभी सामने हे बहाना कर दिए था.", चोरल की बात सुनकर अर्जुन चुपचाप जहा से आया था उधर चल दिए. सिम्मी के चेहरे के ख़ुशी बता रही थी की उसको कितना ाचा लग रहा था अब.
"देखा तुम्हारी दीदी का कमाल. अब कल भी इसकी खबर लेंगे. सही किआ न अन्नू को साथ हे ले आये.", अर्जुन भी 2-3 मिनट में हे आ गया कपडे बदल कर.
"चलिए मैडम. मैं मेरी मोटरसाइकिल से आता हु.", अर्जुन उनके साथ आगे चलते हुए बोलै तोह चारुल ने तल्खी से कहा.
"कार में 4 लोग आराम से बैठ सकते है. और हमने घंटे में वापिस आना है तोह यही छोड़ देंगे तुम्हे, पौने पांच हुए है 6 बजे तक.", अर्जुन इधर उधर देखता चल रहा था के जिसका डर था वही हुआ.
"ोये हीरो, किधर?", प्रीती ने उसको दोनों लड़कीओ के पीछे चलते देख कर आवाज हे लगा दी थी.
"मार्किट जा रहा हु, मैडम के साथ. कपड़ो वाली दुकान पर.", अर्जुन ने भी प्रतिउत्तर में कहा और आगे चलती दोनों लड़किया ृक्क कर देखने लगी.
"साथ हे ले चलते है.", चारुल ने अर्जुन को घूरते हुए कहा.
"प्रीती मैडम पूछ रही है के साथ में हे चलो.", चारुल को ऐसी बिलकुल उम्मीद नहीं थी की अर्जुन ऐसा करेगा.
"Bye bye. हम मंडे चलेंगे, तारा के साथ.", प्रीती ने बॉल उछाल कर गेम शुरू करने से पहले कहा और लग गई अपने काम.
"तुम बड़े अजीब हो यार. मतलब सबकुछ बता देते हो अपनी गर्लफ्रेंड को? और ये आसपास सभी तुम्हे देख रहे जैसे हीरो हो. चल क्या रहा है?"
"चारुल जी इतना मत सोचो वह सामने देखो कैसे लाल हो रही है धुप में कड़ी. और मैं किसी से कुछ नहीं छुपता. उसने पुछा बता दिए लेकिन ये क्यों ऐसे देख रही है.?", अर्जुन तेज कदमो से स्टेडियम के बहार कड़ी कार के पास आया और मुस्कुरा कर अन्नू को देखा.
"तुम घर आने वाले थे."
"हाँ, यहाँ से सीधा वही आने वाला था. दिन में समय नहीं निकल पाया वह घर में chachi-chacha आये है आज.", अर्जुन भोली शकल बनाते हुए अन्नू को देखने लगा. इधर ड्राइवर सीट के बराबर वाली सीट पर सिम्मी बैठ चुकी थी. अन्नू जैसे तैसे गुस्सा शांत करती अंदर बैठी और पीछे अर्जुन चारुल के साथ.
"वह लड़की कौन थी?", सिम्मी ने ये सवाल किआ तोह अन्नू सामने देख कर गाडी चलती रही और अर्जुन बहार देख रहा था.
"इसकी गर्लफ्रेंड.", चारुल ने अनमने भाव से कहा और अन्नू ने शीशे से ये देख लिए था.
"अन्नू दीदी जब गर्लफ्रेंड है तब भी? वैसे लड़की बहोत सुन्दर थी, है न दीदी?"
"हम्म.", चारुल ने अर्जुन की तरफ देखा जो उन्हें नजरअंदाज किये सड़क पर देख रहा था.
"वैसे सुन्दर तोह आप भी बहोत हो दीदी. किस्मत देखो लड़के की 2-2 गर्लफ्रेंड और दोनों हे एक से बढ़कर एक.", सिम्मी चुप नहीं होने वाली थी.
"2 नहीं 3 गर्लफ्रेंड है इसकी, सिम्मी.", चारुल से भी चुप न रहा गया. अर्जुन से जाने वह क्यों चिद्द रही थी.
"3? कही तीसरी आप तोह नहीं हो?", और उसकी इतनी बात सुनते हे अन्नू के साथ अर्जुन की हंसी भी चूत गई. दोनों के इस तरह हंसने से जहा सिम्मी हैरान हुई वही चारुल का चेहरा फूल गया. होंठ नखरे से बनती वह पीछे बैठी हुई हे सिम्मी को घूरने लगी.
"हाँ सिम्मी, तेरी बड़ी दीदी अर्जुन की तीसरी गर्लफ्रेंड है, साइलेंट एंड पोसेस्सिवे. हाहाहा.", अन्नू हंसी पर काबू हे नहीं कर प् रही थी. लेकिन चारुल का गुस्सा थोड़ा ज्यादा चेहरे पर आते देख अर्जुन ने अपनी हथेली में उसका हाथ ले लिए.
"छोटी है वह और हम सभी मजाक हे कर रहे है.", अर्जुन ने धीमी आवाज में कहा लेकिन उसके ऐसे हाथ पकड़ने से चारुल की रीढ़ की हड्डी तक में सिहरन दौड़ गई. स्पोर्ट्स में होने के बावजूद बड़े मुलायम हाथ थे चारुल के और वही अर्जुन का वह मरदाना हाथ जाने कहा कहा असर दिखा गया था. पल में हे वह शांत हो गई लेकिन हाथ पकडे रही.
"It's ऑलराइट.", चारुल ने हलके से इतना कहा और दूसरी तरफ चेहरा करती वह बहार देखने लगी.
"क्या बात है अन्नू दीदी. मतलब जहा 3-3 हो सकती है वह मैं क्यों नहीं? पसंद तोह ये मुझे भी पहली बार में आ गया था लेकिन तब मुझे लगा के आपकी वजह से कोई चांस नहीं मेरा. क्या बोलती हो?", सिम्मी आवाज जरूर हलकी कर रही थी लेकिन कार में बाकि तीनो सुन्न प् रहे थे.
"मुझे क्या प्रॉब्लम होगी. हाँ पहले अपनी दीदी से पूछ लेना, वह ज्यादा सीरियस है उसके लिए.", अन्नू जैसे चारुल का पीछा हे नहीं छोड़ रही थी.
"चारुल दीदी..", सिम्मी ने इतना हे कहा था के चारुल ने पलट कर आगे बैठी सिम्मी को थोड़ी हैरानी से देखा.
"चुपचाप सामने देखो सिम्मी.", इधर अर्जुन ने थोड़ी शरारत से चारुल की हथेली को हौले हौले सेहला दिए. हैरान चेहरे पर एक दिलकश मुस्कान लिए वह वैसे हे बहार देखने लगी, पहले की तरह.
"अन्नू दीदी, ये तोह सच में इसके लिए सीरियस है. वह स्टेडियम में भी परसो जानबूझ कर मुझे अपने साथ ले गई थी और तय जी के सामने मेरा नाम लगा दिए. फिर अर्जुन के साथ अकेली चली गई थी. हाँ नहीं तोह.", अन्नू ने गाडी मार्किट के अंदर वाले पार्क के पास रोकती और फिर से हंसने लगी.
"पता है मुझे ये तेरी दीदी आजकल कहा ध्यान लगाए है. गाडी रुकी हुई है फिर भी ये बहार देख कर मुस्कुरा रही है. ओह चारुल मैडम, वह कब का उतर के बहार जा चूका.", अन्नू के ऐसा कहते हे चारुल ने अपने हाथ की तरफ देखा. अर्जुन सचमुच वह नहीं था.
"कुछ भी बोलती रहती है ये सिम्मी. अर्जुन इतना भी खास नहीं के मैं उसको देखती फिरू.", वह भी दरवाजा खोलती बहार निकली तोह सिम्मी की अगली बात का जवाब न दे सकीय.
"हाँ, पीछे हाथ पकड़ के तोह अन्नू दीदी बैठी थी अर्जुन का. आप कुछ भी बोलती हो.", अर्जुन सड़क के पर खड़ा था जिधर ये तीनो बढ़ चली. थोड़ी देर बाद हे वह लोग सुधीर की दूकान पर थे. लड़किया आदतन कपडे देख कर उनमे हे खो गई वही अर्जुन सुधीर के साथ कुछ गहरी बातचीत में लग गया.
"ये कैसा है अर्जुन?", अन्नू एक चुस्त सा laal-safed गाउन लिए उसके पास आ कड़ी हुई. अर्जुन को वह एक नजर में हे भ गया था. सुधीर की तरफ देखते हे वह बोल उठा.
"ये इम्पोर्टेड है भाई और सच कहु तोह ऐसा फैब्रिक और डिज़ाइन हम भी पहली बार बेच रहे है."
"अन्नू पैक करवा लो.", अर्जुन ने जितने प्यार से उसको सुधीर के सामने बैठे हुए हे देखा था अन्नू के लिए जैसे वही पैसे वसूल हो गए थे. थोड़ी हे देर में 4-5 बैग लिए सभी बहार आ चुकी थी.
"बैग पकड़ो.", अन्नू ने अपना बैग थमाया तोह अर्जुन करीब से उसके प्यारे चेहरे को निहारने लगा. वह रुमाल से चेरा साफ़ कर रही थी, शायद गर्मी की वजह से. सिम्मी और चारुल भी इन दोनों को हे देख रही थी. संकरी गली में तेज रफ़्तार स्कूटर बेफिक्र सी अन्नू के करीब से निकलने हे वाला था या टकरा भी जाता, समय रहते अर्जुन ने उसको अपने पास खींच लिए. स्कूटर सचमुच इतने करीब से गुजरा था की दूसरी तरफ कड़ी सिम्मी के पैकेट से हल्का टकरा के निकला. उसके सीने से लगी वह हैरानी से सबको देखने लगी.
"अभी हो गया था तेरा काम, अन्नू की बची. चेहरा साफ़ करती करती सड़क के बीच में कड़ी हो गई थी.", चारुल की ऐसी बात और खुद को अर्जुन के सीने लगे देख वह मुस्कुरा दी.
"देख रही है न मैं कितनी सुरक्षित हु.", अर्जुन ने नजर बचते हुए हलके से अन्नू के पिछले हिस्से पर चपत लगा दी.
"सुरक्षित की बची, मेरा ध्यान भी तुम पर था. स्कूटर पे नहीं. आवाज की वजह से ऐसा किआ मैंने.", अर्जुन ने धीरे से कहा था और फिर चारो वैसे हे आगे चल दिए. उन्हें कुछ और भी खरीदी करनी थी लेकिन दुकान सिर्फ महिलाओ के लिए थी तोह अर्जुन बहार रुक गया.
'लकी भैया है ये तोह और वही कार. इनकी दूकान है खुदकी तोह संजीव भैया के बॉस की कार में ये.', अर्जुन ने वही काली कार अपने से थोड़ी दुरी पर कड़ी देखि और अब वह पार्क की ग्रिल पर बैठा बिना नजरो में आये सब ध्यान से देखने लगा.
2 पोलिसवाले लकी के सामने खड़े कुछ कागज दिखा रहे थे. और hav-bhav से लकी उनके सीनियर सा लग रहा था. अर्जुन ने इतने दिन से कई ख़ास बाते देखि थी लेकिन उस दिन संजीव भैया के झूठ और फिर कमर में दबाई रिवॉल्वर से वह समझ गया था के माजरा कुछ और हे है. दोनों पोलिसवाले सफ़ेद स्प्लेंडर मोटरसाइकिल पर बैठ कर निकल लिए और लकी सड़क पर उस पीसीओ बूथ में, जहा पैसे बहार बैठा व्यक्ति मशीन देख कर लेता था. अर्जुन इतनी दूर से बस देख सकता था और पास जाने का जोखिम उठाना गलत कदम होता.
'हो गई बात? अब करो इन्तजार जाने का.', अर्जुन वैसे हे ध्यान से देखने लगा. लकी ने इधर उधर सतर्कता से देखा और फिर सीधा निकल चला उस आदमी को 10 रुपये दे कर. अर्जुन एक अलग सी मुस्कान लिए उस और चल दिए.
"भाई एक मिनट.", अर्जुन ने फुर्ती से उस लड़के को बूथ से बहार खींच लिए जो अभी अंदर हे जाने लगा था.
"कर ले भाई अगर ज्यादा जल्दी है. बुर्शट तोह न पाद.", वह लड़का झल्लाता हुआ एक तरफ हो गया तोह अर्जुन ने दरवाजा बंद करते हे 'र' बटन दबा दिए
"पता था तुजे इतनी जल्दी याद नहीं रहेगा. #### गांव में दलीप सिंह गौशाला के पास मिलेगा. उसको बोलना मोहर Singh-Sushila सिंह की फाइल. मोहर सिंह वाली यहाँ घर ले आना और सुशीला सिंह वाली चाचा तुझसे खुद लेंगे. अब सब ऐसे हे करना गलती से सुशीला वाली फाइल इधर नहीं आ जाये.", दोनों तरफ से फ़ोन लाइन साथ में काट गई थी.
'संजीव भैया अभी घर है. इस वक़्त दादाजी होंगे बगीचे में. दलीप सिंह मतलब मौसा जी और चाचा मेरे पापा. यही 4 लोग उस दिन वह एक साथ थे. लेकिन संजीव भैया ने ये क्यों कहा के सुशीला की फाइल गलती से इधर न आ जाये? मतलब कुछ ऐसा जिसमे पापा शामिल है लेकिन दादा जी को खबर नहीं है. लेकिन वह सब बाद में पहले ये सब हो क्या रहा है? भैया, भैया करते क्या है? जवाब दादाजी से मिलेगा लेकिन सीधे बात करने से कोई फायदा नहीं.', अर्जुन इतनी हे देर में समझ चूका था के कुछ बड़ा है जो सिर्फ इन लोगो के बीच हे है. घर में किसी और को भनक तक नहीं.
"चलो अब. कितनी आवाज लगाई के इधर आ कर सामान पकड़ लो.", अन्नू की ऊँची आवाज से अर्जुन की तन्द्रा टूटी.
"क्या लिए?", वह बिना सोचे हे ये कह गया था.
"अब यही दिखाऊ? कल घर आओगे तोह कमरे में देख लेना खुद.", अन्नू ने होंठ भींच कर धीमी आवाज में कहा.
"बता दे इसको क्या लिए है अन्नू. शायद इसके काम की चीज हो.", चारुल ने ये बात मजे लेने के लहजे में कही थी लेकिन उम्मीद नहीं थी की अर्जुन ऐसा जवाब देगा.
"आप हे दिखा दो, ये तोह बता कर गई थी क्या लेने वाली है मेरी पसंद का.", सिम्मी के बंद होंठ पूरे खुल गए उसकी बात सुनकर.
"हाहाहाहा.. क्या बात कही है.. दिखा दो अब चारुल दीदी वैसे भी गर्लफ्रेंड का बॉयफ्रेंड से क्या छुपाना. देखा नहीं अन्नू दीदी ने ब्लैक और रेड के खास डिज़ाइन लिए है, अर्जुन की पसंद के.", अन्नू थोड़ी शर्मा गई थी लेकिन चारुल तेज कदमो से गाडी की तरफ बढ़ गई.
"बस बस. सॉरी बोल दो नहीं तोह आज तुम्हारी सहमत पक्की है. अर्जुन ने भी धीमे कदमो से उधर हे चलते हुए सिम्मी से कहा तोह वह भी उसकी बात समझ गई.
"सॉरी दीदी. वह बस मस्ती मजाक में हो गया. कोई इंटेंशन नहीं थी ऐसी मेरी."
"हंस तोह तेरे साथ कोई और भी रहा था.", हल्का गुस्सा था चारुल की आवाज में और उसने चेहरा भी इस तरफ नहीं किआ था.
"उसने हे कहा था के सॉरी बोलू आपको. मतलब वह आलरेडी सॉरी फील कर चूका है.", सिम्मी की बात सुनकर चारुल कुछ शांत हुई लेकिन फिर भी बहार देखने लगी. अन्नू ने गाडी स्टार्ट की और मार्किट से बहार चल दिए.
"ये पिंक भी ाचा है.", अर्जुन ने इतना कहा था के गाल लाल हो गया था उसका. हाथ में पकड़ा गुलाबी रुमाल कार के मत पर गिर चूका था. गाडी एकदम ब्रेक लगते हे सड़क के बीच रुक गई.
"चलता हु अन्नू. घर मिलता हु कल.", अर्जुन ने बिना पालते हे कार से निकल कर अन्नू के गाल को छुआ और ऑटो हाथ दे कर रुकवाता उसमे बैठ गया. 'स्टेडियम की लाइट पर उतार देना भैया.', अर्जुन के इतना कहते हे वैसी हे रफ़्तार में वह teen-pahiya उसको लिए निकल चला.
"अब ये क्या था? पता है तूने क्या कर दिए चारुल? मजाक की शुरुवात भी तूने की थी और सहा भी तुझसे नहीं गया.", अन्नू ने इस से ज्यादा कुछ न कहते हुए रेस पर पंजा दबा लिए. वह जैसे उस थप्पड़ के लिए खुद को गुनेहगार मान रही थी. गुस्सा रोके वह जितनी तेज उन दोनों को घर छोड़ सकती थी वह छोड़ कर बिना कुछ कहे निकल गई. सिम्मी हाथ में बैग पकडे अन्नू को रुकने को कह भी रही थी लेकिन जैसे उसको कुछ सुनाई हे न दिए. अपने घर के सामने जैसे तैसे गाडी कड़ी करती अन्नू अपने कमरे में आ कर रुकी.
दरवाजा पूरी तेज हाथ से भिड़ते हे उसकी आँखों का बांध टूट चूका था और गुस्से में रोटी हुई बीएड पर सजे हर नरम खिलोने को फेंक, बीएड पर बैठ foot-foot कर रोने लगी. घर में कोई था भी नहीं जो उसको ऐसी हालत में देखता या चुप करवाता.
"ऐ.. तुम्हारी क्या गलती है इसमें?", अर्जुन की रफ़्तार भी शायद वैसी हे रही होगी अन्नू की कार इतनी तेज जाते देख, जो वह 3-4 मिनट बाद हे उसको बहो में लिए बिस्टेर पर बैठा था.
"वह सहेली नहीं होती तोह मैं हाथ काट कर अलग कर देती उसका. मारा कैसे उसने तुम्हे? और तुम भी मुझको छोड़ कर चल दिए वह से.", अन्नू अभी भी गुस्सा करती रोये जा रही थी.
"छोड़ कर नहीं गया था. याद भी है के बोलने के बाद चला था के कल मिलेंगे, यही घर पर. लेकिन तुम्हारी गाडी ने मुझे इतनी जल्दी पंहुचा दिए.", अर्जुन अब भी मजाक करता हुआ उसको चुप करवा रहा था.
"ये तुम्हारा हाथ गीला है.", कुछ महसूस करते हे अन्नू ने खड़े हो कर लाइट जलाई.
"इडियट. ये क्या करवा लिए तुमने?", वह हाथ पकडे उसके साथ हे बाथरूम में घुस गई. कलाई से हल्का ऊपर आधे इंच के लगभग कट लगा था जहा से खून रिस रहा था अर्जुन की बाए हाथ पर.
"इतना कुछ नहीं हुआ है अन्नू. रुको तोह सही और सुनो.", थोड़ा सख्ती सी अन्नू को पकड़ते हुए अर्जुन ने सीधा किआ और फिर अपना हाथ धोने के बाद अन्नू की मदद से रुमाल बांध कर बहार बीएड पर आ गया.
"कितना बोलती हो और साथ में हे रोटी भी हो. तुम्हारे पीछे आने के चक्कर में बहार वाला दरवाजा लग गया और कुछ नहीं. अब जरा इधर देखो.", अर्जुन ने भरे हुए गाल पर हाथ रखते हुए अन्नू का चेहरा अपने सामने किआ.
"सॉरी अर्जुन. मैं इन दिनों में तुम्हारे सिवा किसी से मिलना भी नहीं चाहती थी और देखो क्या हो गया.", सुबकियां लेती अन्नू को अब हिचकियाँ आने लगी थी. अर्जुन ने बिस्टेर के पास राखी बोतल उसके होंठो से लगते हुए थोड़ा पानी पिलाया और फिर से अपने से लगते हुए पीठ सहलाने लगा.
"कुछ नहीं हुआ है. बस चारुल को लगा के शायद मैं उसके ख़रीदे कपडे देख रहा होऊंगा. हो गई गलती उस से भी और वैसे भी वह कौन है, तुम्हारी बचपन की दोस्त है. वैसे मैं सोच रहा था के आधा घंटा पड़ा है हमारे पास तोह अगर तुम्हे रोना है मैं बैठ जाता हु. बाकी कोई इस गरीब को प्यार करे तोह ाचा होगा.", अर्जुन समझने के बाद अन्नू की आंसुओ से भीगी नाक पर नाक रखते हुए शरारत से कहने लगा.
"मैं तोह चाहती हे यही थी की तुम स्टेडियम से जल्दी हे घर आ जाओ. अब तक प्यार कर भी लेते.", वह जैसे कह रही थी अर्जुन को थोड़ी हंसी और बहोत सारा प्यार आ रहा था उसकी बचो जैसी शकल बानी देख.
"उम्म्माह.. आज मीठी नहीं लग रही.", अर्जुन ने दोनों होंठो को चूमने के बाद हलकी गुदगुदी करती हुए अन्नू को बिस्टेर पर लिटा लिए.
"बॉर्न्विटा मम्मी बनती है और वह हैं नहीं, मैंने गैस नहीं चलाई कभी."
"चलो आज फिर सिर्फ मीठा दूध पीते है.", अर्जुन ने मुस्कुराते हुए दोनों उभर कपड़ो पे से हे थाम लिए. अन्नू भी हंसती हुई उसको अपने ऊपर खींचने लगी.
"गंदे हो तुम. यहाँ कोई दूध नहीं आता बद्तमीज.", अन्नू के लाल गाल कुछ सोच कर और गहरे हो गए थे.
"ये मैं क्या देख रहा हु, अन्नू?", अर्जुन ने कान की लौ चूमते हुए धीमे से कहा.
"चुप बिलकुल चुप. की.. कहा दिमाग घुमा दिए तुमने? हंसी आ रही है खुद पर हे.", अन्नू उसको जोर से कसके खुद से लगाती शर्मा रही थी.
"तुमने दूध आने की पूरी प्रोसेस सोच ली थी अभी. हैं न?", अर्जुन दोनों उभर प्यार से सहलाते हुए अन्नू को भरपूर छेड़ रहा था.
"सुधर जाओ. गलती से आ गया दिमाग में जैसे हे तुमने कहा. ऐसा कुछ हो गया न तोह.."
"तोह क्या अन्नू? पिलाओगी या नहीं?"
"की यार बस करो. बिन ब्याही माँ बनाने पर तुले हुए हो. कहा न गलती से सोच लिए था.", उसकी बार सुनकर अर्जुन थोड़ा शांत हो गया.
"अगर ऐसा हुआ तोह मैं कैसे तुम्हे रोक सकती हु? तुम्हारे हे है ये.", इस बार अन्नू ने ये बात बड़े प्यार से कही थी. जैसे सच में वह ये सुख चाहती थी लेकिन मज़बूरी हे आड़े आ रही थी.
"पता है मुझे लेकिन फ़िलहाल के लिए ऐसा सोचना भी मत. ये बाप bann-na मेरे बस की बात नहीं है.", अर्जुन कुछ सोचने के बाद ऐसा बोलै था. और धीरे धीरे दोनों एक दूसरे को मसलते हुए ऊपरी कपड़ो को खोलने लगे. अर्जुन ने ब्रा के ऊपर से हे उभर बहार निकलते हे मुँह में भर लिए.
"आह्हः.. उम्म्म्म.. बिलकुल वक़्त नहीं गवाते न तुम.. आह्हः.. साडी रात से तुम्हे हे याद करती रही हु. आठ. अब सुकून देने आये हो...", अन्नू सच हे कह रही थी. पिछली रात वह बस अर्जुन को हे अपने निर्वस्त्र जिस्म पर लिप्त महसूस करके हे सोई थी, खयालो में हे सही.
"इस अगले हफ्ते को महीने में बदलने की नाकाम कोश्शिह कर रहा हु. वक़्त जितना है उतने में हे.", अर्जुन कैसे ये बोल रहा था वह अन्नू भी समझ गई थी. खुद हे अपने बाकी कपडे हटती वह उसका भी ट्रैक और टीशर्ट जिस्म से जुड़ा करके अर्जुन की कमर पर आ बैठी.
"मेरे लिए ये साल भर तक हम दोनों की यादें रहने वाले है. ये पल जो अब कहने को चाँद लम्हे है अर्जुन.", बालो को खोलती वह उसके चेहरे पर झुक गई. इस बार का mookh-milan जैसे घनघोर बरसात सा था. एक दूसरे में डूबे दोनों हे प्रेमी बताशा जीभ चूसते हुए एक दूसरे से रगड़ खाते हुए बिस्टेर पर बिछी चादर इकट्ठी करने लगे. बड़े मुलायम उभर अर्जुन के सीने पर दबते हुए दोनों को उत्तेजना की सीमा पर ले जा रहे थे, जहा से अगली मंजिल वही जाती थी जिसके लिए अन्नू पूरी रात अर्जुन का नाम लेती रही थी.
"मत जाओ फिर. उमंमाहः..", अर्जुन ने नरम चिकनी कमर को पकड़ते हुए कहा और निचे लटकते लाल निप्पल को होंठो में दबा लिए.
"आह्हः.. बस ये एक साल कोई सवाल नहीं अर्जुन फिर तुम चाहोगे तोह ज़िन्दगी भर मैं तुम्हारे लिए अकेली रहने को तैयार हु.. उम्म्म.. फिर कभी नहीं रोकूंगी तुम्हे सवाल पूछने से या इनमे दूध भरने से.", आँखें बंद करती वह उत्तेजना में भी अर्जुन के लिए अपना अंतहीन प्यार जाहिर कर रही थी. वह मॉटे बांस सा अर्जुन का लिंग अब भरी नरम जांघो के बीच अन्नू की गीली छूट के घिसने से और चमकने के साथ हे फूल रहा था.
"बस याद रखना के अर्जुन हमेशा तुम्हारे पास है. हर तकलीफ में, मुसीबत में और अकेलेपन में.", अर्जुन का ध्यान कही और था हे नहीं जैसे. वो स्टैनो को छोड़कर फिरसे उसके चेहरे को चूमने लगा. अन्नू भी पूरी उसपर लेट कर अपने हाथ से उस मूसल को निशाने पर रखती जबड़े भींचे पीछे सरक गई.
"आह्हः.. .. तुम अलग हो हे नहीं सकते इस दिल से अर्जुन.. आआह्ह्ह..", किसी नशे सी हालत में वह 2 बार में हे आधे ज्यादा वह मोटा हिस्सा अपनी नरम छूट में सम्माहित कर चुकी थी. दर्द को रोके रखती वह कुछ पल वैसे हे उसके सीने से चिपकी पड़ी रही.
"ये पागलपन है अन्नू. दर्द से प्यार मत करो.", अर्जुन जैसे उसकी स्थिति समझ रहा था.
"जहा तुम हो वह दर्द हो हे नहीं सकता. बस अपने पूरे होने की चाहत समझ लो इसको.", उसका चेहरा पकड़ती वह खुद अपने कूल्हे हिलती अपने ख़ास हिस्से की लचक में अर्जुन का लिंग कस कर आगे पीछे करने लगी. अब जैसे दोनों हे चुप रहते हुए इस मिलान को पूर्ण करने लगे. आज कमान अन्नू के हाथ में थी और अर्जुन भी उसका साथ दे रहा था, अन्नू को मनमानी करने की छूट देते हुए.
"इनने फिर से कल जैसा कर दो.. आह्हः.. दबाओ या मुँह में लो लेकिन इन्हे सुकून से भर दो.. उम्..", फिर से दोनों उभर उसके हवाले करती वह तेजी से कमर घिसती अपनी फैले हुए मोटो कूल्हों के बीच वाले हिस्से में पूरा जड़ तक लुंड ले रही थी. जिद्द हे तोह थी जो सखलन के बावजूद वह पसीने में नहीं कामदेवी रुकना नहीं चाहती थी. गोरी दूध सी बंद फांके फ़ैल कर 3 इंच छोड़ और लाल हुई उस मॉटे लुंड से बुरी तरह चिपकी ऊपर नीचे हो रही थी.
"गलत हो रहा है ..आह्हः...", लुंड के फूलने पर अन्नू ने अर्जुन को कास के जकड लिए था. उसकी छूट के अंदर होते संकुचन के साथ हे वह मोटी गरम धार छूट की आखिरी दिवार पर टकराने लगी. हरेक कटरा अंदर लेने के बाद अन्नू पलट कर पीठ के बल लेट गई. उसकी फांके लाल हो चुकी था और अंदर का छेड़ लगातार khul-band होने लगा. जल्द हे वह सफ़ेद सा पानी बहार निकलने लगा और अन्नू पलट कर अर्जुन से लिपट गई.
"प्यार में कुछ गलत नहीं होता. मुझे बस ये अपने अंदर हे लेना था. कैसा लगता है इसका ये गरम सा एहसास जो दर्द ख़तम कर देता है.", प्यार से दोनों होंठो को चूमती वह अपनी पंतय से छूट साफ़ करती हुई दराज तक घुटनो के बल चली आई. 2 गोलियों वाला ये अलग सा पत्ता निकलती वह पानी के साथ एक गोली जातक कर सिरहाने से तक लगाए बैठ गई. वह खूबसूरत पाँव दर्द की वजह से काफी फैले हुए थे. पंतय को एक तरफ रखती वह आँखें बंद करके जैसे सब याद करने लगी हो.
"तुम anti-pregnancy टेबलेट ले रही हो?", अर्जुन भी बराबर आ बैठा और एक हाथ उसकी कमर में दाल लिए. अन्नू अपना सर उसके कंधे पर रखती चौड़ी छाती पर हाथ फिरने लगी.
"अभी माँ बनाने के चक्कर में हो क्या मुझे?", फिर से वही शरारती अन्नू देख अर्जुन की मुस्कान भी लौट आई.
"मुझे तोह सच में यही लग रहा था के तुम ऐसा हे कुछ करने लगी हो."
"नहीं अर्जुन ये बस प्यार था जिसमे मैं कुछ भी खराब नहीं करने देना चाहती थी. और जब बचा प्लान करना पॉसिबल हुआ तोह ऐसे दिन में आधा घंटा नहीं मिलने वाले. सुबह से रात और रात से सुबह बस रिपीट होता रहेगा जब तक टेस्ट पॉजिटिव न आ जाये.", वह आँख दबती हुई अर्जुन के निप्पल को चुटकी से मसल कर बाथरूम में दौड़ गई. बीच में दर्द की आह भर्ती हुई.
"ध्यान से अन्नू.", अर्जुन भी कपडे लिए अंदर आया तोह उसको कोड पे बैठे देख मुँह घुमा के खड़ा हो गया. 'शरररर' की आवाज बहोत थी बताने के लिए की अन्नू क्यों भागी थी.
"सॉरी. जब गाडी में थे तबसे रोके हुए थी.", शर्म से वह भी वैसे हे बैठी रही .
"पहले बताना था. बाथरूम में कर लेते.", अर्जुन ने कपडे पहन कर पलट ते हुए कहा. तोह अन्नू वैसे हे टाँगे भींचे बैठी रही.
"अब शर्म आ रही है तुम्हे.? थिस इस नेचुरल अन्नू."
"वह आवाज अजीब आने लगी है कल से. और तुम बहार जाओ, गंदे कही के. मुझे बेशरम बना कर छोड़ोगे पक्का.", अर्जुन इस बात पर हँसता हुआ बहार आ गया. आईने में खुद चेहरा दुरुस्त करने के बाद कलाई को देखा तोह वह खून जमा होने के बाद सूख चूका था. रुमाली ड्रेसिंग टेबल पर रखते हुए वह बिस्टेर ठीक करने लगा और अन्नू ने भी अलमारी से एक घुटने तक की ढीली फ्रॉक पहन ली.
"चलता हु. और सब भुला कर बस ये ध्यान रखना के हम वैसे हे है जैसे कल थे.", अर्जुन ने चेहरे को चूमने के बाद अन्नू को गले लगते हुए कहा. वह भी थोड़ा कस के लिपट गई थी. इतने में हे बहार की घंटी बजी और दोनों अलग हो गए.
"कल कब मिलोगे?", दोनों साथ हे बहार आ रहे थे और दरवाजे पर वही पड़ोस वाली बुजुर्ग आंटी कड़ी थी.
"कुछ कह नहीं सकता. पापा आये हुए है और कल सुबह काम से बहार जाना पड़ेगा मुझे. तरय करूँगा.", अर्जुन ने प्यार से देखा और बहार आ गया. अन्नू भी उसके साथ हे आई थी लेकिन आँगन में उन आंटी को कुछ बता कर धीमी चाल से वापिस अपने कमरे में आ गई.
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आज शंकर जी अपने भाई के साथ समय से हे घर लौट आये थे, जैसा अक्सर होता नहीं था. कुछ समय बहार बगीचे में छोल साहब, रोमिला और रामेश्वर जी के साथ बिताने के बाद शंकर और नरिंदर घर की छत्त पर आ गए. 2 बियर की बोतल बहार निकली शर्ट को ऊपर करके नरिंदर ने बहार निकली तोह शंकर ने हाथ लगा एक तापमान देखा.
"अब तक ठंडी है यार."
"ये पीछे अख़बार भी लगा है भाई. ठंडी तोह रेहनी हे थी ऊपर से जमी हुई ली थी. सोच अंदर क्या हाल हो रहा होगा.", नरिंदर की बात पर हँसते हुए उन्होंने एक बोतल दांत से खोल कर अपने भाई को थमाई और दूसरी खोलने के बाद दोनों आपस में बोतल टकराते टंकी से पीठ लगा कर बैठ गए.
"वैसे तुमने इंजेक्शन दिए तोह चलो समझ में आया लेकिन मेहुल कैसे तैयार हो गया था?", नरिंदर की बात पर शंकर अलग तरह से मुस्कुराया.
"पत्रं ने गुलाटी को chota-mota डॉक्टर बताया था जब गुलाटी उसके घर गया था उसकी बहु को देखने. लेकिन उसको तू काम मत समझ, बस उसको ऐसी हे पसंद है जैसी पत्रं की बहु है. हमेशा एक में रहने वाली और नाजुक घमंडी अमीरजादी.", शंकर की बात सुनकर निन्दर हँसते हुए लम्बा घूँट भरने लगा.
"कैसे चूतिये को मेरे पास बिठा गए तुम लोग. और वह मान कैसे गई यार?", नरिंदर हमेशा ये सवाल पूछता था लेकिन खुद कोई दिलचस्पी न थी इस सब में.
"ये जितनी भी इस तरह की होती है न, कपडे उतार कर बस निरिक्षण का कह कर ऊँगली दाल दो. बाकी उनके खस्सी मर्द एक बड़ी वजह बन जाते है पाँव फ़ैलाने के लिए. 2-2 बार लिए दोनों को फिर भी घर बुला के गई है. गुलाटी तोह अभी से अपना हफ्ते का सचेडूले उसके हिसाब से बनाने में लगा है."
"ाचा वह दलीप की लड़की का क्या चक्कर है? हमारी बात बीच में हे रह गई अभी आते हुए.", नरिंदर को अब इसमें दिलचस्पी थी.
"अर्जुन की राधा है वह."
"राधा कृष्ण की थी बे."
"ये अर्जुन है, निशाना लगाने से पीछे नहीं हटा. और वह लड़की जान दे सकती है अर्जुन के लिए इतना समझ ले. स्टेडियम वाली लड़ाई में इसने हे सुदर्शन का हाथ रोका था. आज तोह फोटो भी देख लिए तूने उस जानवर के."
"सच में शंकर वह कही ज्यादा खूंखार नजर आ रहा था. बाकी चारो भी किसी भी सूरत में काम नहीं थे. और उनकी हालत अपनी आँखों से न देखता तोह मुझे तेरी बात पर पूरा यकीन नहीं था. ये चीज क्या है यार.?"
"ये वह चीज है जिस से चंद्रो ताई का पहाड़ सा सपना चूर चूर हो गया. बेशक वह कभी हमारे साथ बुरा नहीं करती लेकिन सुदर्शन को वह ऐसे तैयार कर रही थी की आगे चल कर वह फिर से उनके परिवार को वही रुतबा दिला सके जो कभी था. और ुंखी आँखों में जरा भी दुःख न आया उनके पौटे का ये हाल करने वाले को देख कर. बस ढीली पड़ गई थी अर्जुन के गले लगती लेकिन वह भी उन्हें संभल गया. अब उन्हें डर है बिंदु और सुशीला का. ताई खुद कुछ नहीं करेगी लेकिन वह सुशीला को सामने रखते हुए बिंदु से झटका लगवायेगी और मेरी चिंता बस बिंदु है."
"तू अभी अर्जुन के बारे में बताता हुआ किधर आ गया.? बिंदु इंग्लैंड में है और वह यहाँ क्या करेगी? मोहर सिंह पर खुद तेरी बेटियां नजरे जमाये है और सुशीला अब ठंडी है मट्टू की मौत के बाद."
"बिंदु मेरे हाथ कभी नहीं आई इन्दर लेकिन वह तुझे पसंद करती थी.", शंकर ने बोतल 2/3 ख़तम कर दी थी इतना कहते हे.
"मैं कृष्णा से प्यार करता था लेकिन तू मुझे कहता तोह मैं वह भी करने को तैयार था. शादी के बाद मैंने अग्नि को साक्षी मान लिए था शंकर.", नरिंदर की आवाज में जो कम्पन्न थी वह शंकर समझता था.
"और मैं तेरे प्यार के लिए कुछ भी कर सकता हु. अर्जुन का हाल भी तेरे जैसे है और बस इस वजह से हे वह मेरा वजीर न बन्न सका.", शंकर की बात इतनी बड़ी थी जो नरिंदर को सकते में दाल गई.
"मतलब क्या है इसका? अर्जुन का प्यार प्रीती से है लेकिन अगर वह इतना तैयार है तोह क्या दिक्कत है भाई? शादी तोह 5-6 साल से पहले नहीं होती."
"वह जिस से सच्चा प्यार किये बैठा है न नरिंदर खुद उसको नहीं मालूम. बेशक अर्जुन शरीर से दलीप की बेटी या किसी और के साथ भी हो सकता है लेकिन वह उस जगह पहुंच चूका है आत्मा से जहा मैं कुछ नहीं कर सकता. पहली बार मैं तेरे से एक राज राज की तरह रखना चाहता हु मेरे भाई. अगर मैंने कुछ भी किआ तोह मैं घर के बहार और थानेदार घर के अंदर भी रह कर कुछ कर न सकेंगे. वह क्या है उसकी झलक तोह तुम्हे भी मिल गई और मैंने दूसरी झलक देखि है. दिल कहता है के वह उसको भी पंडित रामेश्वर के हाथ से हे पा ले गए. और दोनों में से कोई भी तड़पा फिर मैं नहीं जानता के मेरा वजूद भी बचेगा या नहीं.", शंकर की हालत एकाएक अलग हो गई थी. जैसे वह कुछ ज्यादा हे गहराई में डूबा एक अलग इंसान हो.
"ये कैसा चक्रव्यूह है भाई जिसमे तू हे उलझ गया है? लेकिन अगर इस तरह से वह रुका रहेगा तोह ठीक है मैं भी नहीं पूछता.", नरिंदर की बात पर अब शंकर के चेहरे पर मुस्कान आ गई थी.
"अरे मैं तोह खुद उसके साथ हु. तू और मैं संभल लेंगे सबकुछ. संजीव ाचा सीख चूका है हमारी तरह हे. सब सही चलता रहेगा और भी बहोत लोग है जो शुभचिंतक है." नरिंदर की आधी बोतल बची थी जो अब ख़तम करता वह कमीज खोल कर दिवार पर रखते हुए शरीर लचका रहा था.
"तुझे शीला देवी याद है इन्दर?", शंकर भी अब अपने भाई की तरह मजबूत चौड़ा सीना निर्वस्त्र किये दिवार पर बैठ गया था.
"हाँ. याद कैसे न होगी भाई? साला पापा के कहने पर बड़ी सेवा करनी पड़ी उसकी. लेकिन आज कैसे याद आ गई तुझे वह ठरकी औरत.?"
"अरे उसकी बेटी मेनका, अर्जुन के पीछे है आजकल. दलीप की बेटी उस लड़के से हे ब्याही है जिसको तू थमा के आया था."
"क्या बात कर रहा है? तूने ये पहले क्यों नहीं बताया रे? तू जानता है न शीला देवी कैसी है?"
"हाँ रे. लेकिन तू अर्जुन को जान ले पहले. मेनका अभी तक हमारे हे हिसाब से है और भीम भी. ऋषभ पर संजीव नजर रखे हुए है. लेकिन लव स्टोरी बानी हुई है इनकी. मैडम शायद तेरे चेहरे की याद में अर्जुन की हो गई है या हो जाएँगी."
"बहनचोद. ये लड़कीबाजी करता है? खुलेआम? अब आँख न दुःख रही थानेदार साहब की जो तुझे पेल दिए था लता भाभी के वक़्त?"
"वह घर हे लेके आ रहा है nanad-bhabhi को. लेकिन वह लड़का समझदार है. अभी तक उसने ऐसा वैसा कुछ नहीं किआ."
"सही है. लेकिन ध्यान रखना अगर किसी को पकड़ लिए इसने तोह तेरे पास वापिस नहीं आने वाला वह."
"अब जानता हु इसको थोड़ा बहोत और दुरी भी रखूँगा. पागल है वह. Manju-Preeti की बात पर इतना संजीदा हो गया तोह जिस से प्यार किये बैठा है अगर उसपर नजर रखवाई तोह मुझे हे मार देगा." इधर संजीव ऊपर आ गया था हाथ में एक थैला लिए.
"ये लो आपकी दवा और मेरी दारू.", तीनो अब सहज हो कर जमीन पर बैठ गए थे.
"तू बियर नहीं पीटा?", नरिंदर ने अपने भतीजे से पुछा
"मैं माइल्ड सिग्रत्ती भी नहीं पीटा.", संजीव ने अपने बड़े चाचा को आँख मारते हुए जवाब दिए था.
"हाँ इसकी आँखें माइल्ड हो गई थी मट्टू के टाइम.", शंकर ने जैसे हे याद दिलाया संजीव शांत हो गया.
"पागल है चाचा ये आपके बड़े भाई साहब. दारू में खून मिलने पर भी नहीं छोड़ते."
"सिर्फ खून पिया है बीटा कभी.?", नरिंदर चाचा की बात पर संजीव प्लास्टिक के गिलास में पानी डालते हुए रुक गया.
"राममेहर की कलाई अलग करके नरिंदर ने वही बैठ कर पूरा गिलास पिया था.", शंकर चाचा की बात सुनकर पहली बार संजीव को अंदर तक डर लगा था.
"तेरी चची की मोहब्बत शंकर से काम है बीटा जो मैं घर से दूर हु. आज तू खुल के नौकरी करता अगर ये कसम न देता.", नरिंदर ने माहौल ठीक करते हुए गिलास में बियर के साथ दारू मिलते हुए कहा. शंकर भी वही कर रहा था.
"पहले बोल देते के दारू पीनी है."
"तू बीटा क्वार्टर पीटा है, बाकी हम ले रहे है.", छोटे चाचा की बात सुनकर अब संजीव को इत्मीनान हो गया था एक 4 पेग अकेले ले सकता था वह.
"तोह दारू पीने के बाद क्या ख़याल है."
"तू खाना यही लाएगा. नरिंदर कृष्णा से मिलकर आएगा और मैं सोचूंगा.", शंकर ने स्पष्ट किआ तोह अब तीनो सुरूर में लग गए बेपरवाह.
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"तुम मिले मेरे बेटे से?", नरिंदर चाचा कोई साढ़े 10 बजे नीचे आये तोह सीधा अपनी बड़ी भाभी के कमरे में दाखिल हुए. उन्हें पता था के उनका प्यार कहा मिलेगा. हलके नीले गाउन में लिपटी कृष्णा अपना सर अर्जुन की ब्याह पर रखे लेती थी जो उन्हें कहानिया सुना रहा था. नरिंदर कुछ देर उन्हें देखने के बाद हे अंदर आये थे.
"तोह तुम्हारे लादले ने एक दिन में हे तुम्हे इतना ठीक कर दिए की अब तुम्हे दर्द भी पता नहीं लग रहा?"
"सच कहु तोह अभी तक दवाई की जरुरत हे नहीं पड़ी. नरेन्, तुम्हे सच में इसके साथ रहना चाहिए." कृष्णा चची ने हाथ पकड़ कर उन्हें अपने पास हे बिठा लिए और अर्जुन भी उठ कर सामने गोल मेज के साथ वाली कुर्सी पर बैठ गया.
"थैंक यू सो मच अर्जुन.", नरिंदर जी ने उल्टा हाथ अर्जुन के हाथ में रखते हुए अपनी बीवी को निहारा लेकिन वह उनके हाथ को पकडे बस अपने चाचा को देखने लगा.
"वह कही नहीं जाएँगी. डरो मत आप चाचा और आज यही रहो. माँ तै जी के कमरे में सो जाएँगी.", अर्जुन बहार निकल गया उन्हें hakka-bakka चोदे.
"ये क्या बोल गया कृष्णा?", चाचा अपनी बीवी से पूछ रहे थे.
"हाथ मत देने उसके हाथ में. मेरा दर्द पढ़ कर मुझे हे प्यार का पथ पढ़ा गया. चलो अगर तुम्हे खाना खाना है तोह अपने भाई के पास चले जाओ नहीं तोह कृष्णा नरेन् के साथ है.", नरिंदर ने भी बिना सोचे दरवाजा बंद करने के बाद लाइट बुझा दी थी. सीढ़ियों से नीचे आते शंकर और संजीव अपनी दिशा में चल दिए थे जैसा उनका बीटा छत्त पर बता कर आया था. संजीव ड्राइंग हाल में और शंकर जी ऋतू के कमरे में जहा रेखा थी.
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"ऋचा एक बार शबनम को जाने से पहले समझा डीओ. मैंने जो देखा है वह शंकर और नरिंदर के साथ तेरे दादा को भी मिला दे तोह ज्यादा आगे है. बाप के लिए हे सही लेकिन कोशिश कर के सब रुक जाये." चंद्रो देवी के शब्द अलग थे, जिनमे डर था.
"दादी वह खुद जान जाये तोह बेहतर रहेगा. इंग्लैंड की फ्लाइट में अभी हफ्ता पड़ा है शबनम की. अर्जुन के बारे में कोमल भी यही कह रही थी की वह सब जानता है और शीला दादी को भी. लेकिन अगर वह मरना चाहती है तोह मेरा भाई तैयार है." ऋचा ने जैसे बात ख़तम कर दी थी.
"शंकर की जनि है है तू."
"जो मेरे पापा से नहीं जाना वह खड़ा कर के देख लो आप फिर. भाई पर तोह आंच मैं भी न आने दूंगी.
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अर्जुन ऊपर पंहुचा हे था की दरवाजा लगती मधु बुआ ने उसको बिस्टेर पर धकेल कर दूसरे कमरे का रुख कर लिए. वह भौचक्का सा बिस्टेर पर गिरा एक पहचान के आलिंगन में लेता घबरा रहा था.