अपडेट 104
Milna-Bichadna
अर्जुन समय से 10 मिनट पहले हे कॉलेज की जमीन पर मंजू के साथ पहुँच गया था. यहाँ का माहौल इतनी सवेरे हे gehma-gehmi वाला देख वह मंजू को साथ लिए हे इस बड़े पंडाल में आ गया जहा एक पुजारी के साथ सोहनलाल जी और कुन्दनलाल जी वेदी बनवा रहे थे. परिवार के सभी लोग यही बैठे थे और साथ हे कुछ विशिष्ट मेहमान भी.
"आओ भाई, सही टाइम पर आ गए.", अर्जुन को स्नेह से मिलने के साथ राजेश मां ने उसको परिचय 3-4 लोगो से करवाया और साथ हे पूजा मामी हाथ पकड़ कर उसको इन 3 लोगो के पास ले आई. एक आकर्षक रोबीले व्यक्ति थे कोई 60-62 उम्र के और साथ हे 40 के आसपास का ये गोरा लम्बा आदमी. महिला भी 35-36 की हे लग रही थी.
"पापा, ये है अर्जुन अपनी रेखा का बीटा और अर्जुन ये है मेरे पापा, भैया और भाभी.", अर्जुन ने मामी के भैया भाभी को हाथ जोड़ कर नमस्कार किआ और उनके पिता के चरण स्पर्श किये. मामी की भाभी बड़े ध्यान से अर्जुन को देख रही थी. सफ़ेद कैसा हुआ खाड़ी का कुरता और पयजामा, गले में सोने की अलग सी जंजीर और घुंगराले कुंडली वाले आकर्षक बाल. पंडाल में अर्जुन के बराबर लम्बाई सिर्फ कुन्दनलाल जी के हे थी, शायद वह भी एक इंच काम हे थे अपने नाती से.
"ाचा लगा तुम्हे देख कर बीटा. बड़े हो गए हो और अब जल्दी हे राजेश के साथ बिज़नेस भी करने वाले हो. कुछ खास प्लान्स है आगे के लिए?", गौर साहब का बात करने का तरीका नरम और ख़ास हे था.
"जी अभी तोह ये सब सिर्फ मां जी हे देखने वाले है. मेरी ज़िन्दगी के सभी फैंसले मेरे दादाजी करते है. पढाई पूरी होने के बाद हे कुछ सोच पाउँगा. वैसे आपके बारे में मामी जी से बहोत सुना है.", अर्जुन ने nape-tule शब्दों में हे उनकी प्रशंशा कर दी.
"बिज़नेस के लिए ख़ास खून होता है जो सबके पास नहीं होता. वैसे भी तुम अभी कोरे बचे हे हो जाने क्या सोच कर राजेश ने इतने बड़े प्रोजेक्ट में तुम्हे भागीदार बनाया. हम तोह सामने से पूरा पैसा लगाने को त्यार थे. ऐसी छोटी मोती बिल्डिंग्स तोह 4-6 महीने का खेल है गौर डेवेलपर्स के liye.",Ye महानुभाव शायद बाप की शोहरत के नशे में ज्यादा हे डूबे रहते थे. पूजा मामी के भाई का ऐसा कहना इन सबको बुरा लगा लेकिन अर्जुन बस मुस्कुराता हुआ चुप रहा.
"हाँ देखा है मैंने तुम्हारा ख़ास खून और कितने बड़े बिल्डर हो तुम सुरेश. अंकल जी की म्हणत को अपना कहना कहा की महारथ है? वैसे जो जमीन तुम खरीदना चाहते हो न बिपास वाली, उसका मालिक हे तुम्हारे सामने खड़ा है.", राजेश मां जैसे किसी की परवाह नहीं करते थे. कौन बड़ा है कौन अमीर या ताक़तवर. और उनके इस तनज़्ज़ को सुनते हे पूजा के पिता जी ने विनम्रता से अर्जुन से बात की.
"देखो सुरेश थोड़ा अलग है और हमेशा काम में रहने की वजह से काम हे बातचीत करता है. इसकी बात का बुरा नहीं maan-na."
"बुरा तब लगेगा न जब बात गलत कही हो. इन्होने ठीक कहा है के मुझे तोह तजुर्बा है नहीं और वैसे भी मैं इस सबके लिए ठीक भी नहीं हु. आज्ञा चाहता हु आपसे, हवन का समय हो गया है.", अर्जुन ने तीनो को हाथ जोड़ कर नमस्कार किआ और हवन की वेदी के पास चला गया.
"भैया थोड़ा सोच कर बात किआ करो आप. मेरी परवाह नहीं तोह पिताजी की इज़्ज़त्त का ख़याल कीजिये. शंकर जीजा जी तक बात गई या उनके पिता तक तोह फिर से पापा को शर्मिंदा होना पड़ेगा.", पूजा मामी ने इतना कहा और अपनी छोटी भाभी को लेकर वह भी अपनी जगह आ बैठी. कुछ हे देर में मंत्रोचारण के साथ हवन शुरू हो गया. घर के सभी लोग आहुति दे रहे थे और अर्जुन की बाई तरफ मंजू बैठी थी, जिसको ये स्थान खुद अर्जुन ने दिए था जैसे राजेश मां के साथ ममता मामी और कुन्दनलाल जी के साथ सुनंदा जी. आधे घंटे बाद सभी ने बारी बारी से अग्नि में आहुति देकर हवन कार्य को संपन्न किआ. अब तक कोई 500 लोग तोह एकत्रित हो हे गए थे.
"मुबारक हो राजेश बीटा, मुबारक हो कुंदन जी.", ये कोई मंत्री जी थे और उनके साथ 3-4 काली वर्दी वाले कमांडो. फूलो का गुलदस्ता देने के बाद उन्होंने दोनों से हाथ मिलाया. गौर साहब ने भी उनसे मुलाकात की और ऐसे हे अगले आधे घंटे में राजेश मां अर्जुन को 15-20 लोगो से मिलवा चुके थे. घर के बड़े एक तरफ खाने का इंतजाम देख रहे थे और हवन के अलग कोई 4 बड़े पंडाल लगाए गए थे जहा कुर्सी और बड़ी मेज लगी थी.
"मां आपसे कुछ बात करनी थी.?", अर्जुन ने संकोचवश ये कहा. वैसे वह काफी देर से अपने मां के फारिग होने का इन्तजार कर रहा था लेकिन मौका अब कही मिला.
"हाँ, बेहिचक कहो क्या बात है? तुम मेरे दोस्त हो, ये याद रखना.", राजेश मां खुद हे उसका हाथ पकड़ कर एक तरफ ले आये. कूलर का शोर और लोगो की बातचीत से दूर वह एक कोने में खड़े थे.
"मैं क्या कह रहा था के जैसे प्रीती को आपने शामिल किआ क्या वह मेरी जगह मंजू हो सकती है?", अर्जुन जो कहना चाह रहा था वह मां समझ गए. उन्होंने कोई संदेह या सवाल नहीं किआ इतनी बड़ी बात सुन्न कर.
"पहले हे ऐसा हो चूका है. तुमने शायद कल फाइल को ाचे से स्टडी नहीं किआ था. प्रीती ने पढ़ा था तुम्हारे अंगूठा लगाने के बाद. तुम दोनों 50% के हिस्सेदार हो लेकिन एक्टिव बोर्ड मेंबर मंजूबाला है तुम दोनों की जगह. ये क्लॉज़ भी जीजा जी ने हे आड़ करवाया था. ये समझ लो की तुम्हारी सैलरी मंजू को और प्रॉफिट प्रीती और तुम्हे मिलेगा. आगे तुम कुछ और भी करना चाहो तोह कर सकते है, जगह के मालिक तुम्ही हो.", राजेश मां ने हँसते हुए बात कही और अर्जुन के चेहरे पर एक संतुष्टि थी की उसके पिता जी कही ज्यादा हे सोच कर चलते है.
"नहीं बस इतना बहोत है मां जी. थैंक यू सो मच."
"वैसे एक बात तोह बता दे दोस्त की तरह.", मां जी के चेहरे पर शरारत थी.
"पूछिए."
"चल छोड़ यार. फिर कभी बात करेंगे. वैसे दोनों का ाचा ख़याल रखना.", मां इतना कह कर उनको बुलाने आई ममता मामी के साथ चले गए. अर्जुन भी हँसता हुआ इधर उधर टहल कर हर तरफ देखने लगा. लोग नाश्ता कर रहे थे, कही झुण्ड में ठहाके तोह कही हुक्का भी चल रहा था.
"अर्जुन बीटा.", सुनंदा नानी की आवाज सुन्न कर वह उनकी तरफ चल दिए. 5-7 महिलाये उनके साथ बातें कर रही थी. कुछ उनकी हमउम्र और कुछ बहु जैसी.
"ये अपनी रेखा का बीटा है अर्जुन और अर्जुन ये है तुम्हारी ममता मामी की माँ और ये पूजा मामी की. उर्वशी से तोह तुम मिल चुके हो और ये तुम्हारी सरोज मौसी की छोटी बहिन है.", अर्जुन ने सभी को नमस्कार किआ और सरोज मौसी भी मंजू के साथ उनके पास आ गई. एक लड़का जो कैटरिंग की तरफ से था सबके लिए nimbu-paani लेके आया था उनके हे साथ.
"देख ले गुड्डो, ऐसा लड़का पहले देखा है क्या पहले?", मौसी ने अपनी बहिन से कहा तोह उन्होंने भी ना में सर हिला दिए. ममता मामी की माता जी तोह अर्जुन के सर पर हाथ फिरने के बाद आँख से काजल निकाल कर उसके कान पर लगाती हुई बोली.
"सच कहा सरोज, रेखा तोह अपनी माँ पर गई लेकिन ये तोह उनसे भी अलग और प्यारा है. भगवन नजर न लगने दे किसी की."
"माँ जी, इसको नजर कैसे लग सकती है. शंकर जी का लाडला है तोह नजर वैसे हे कोसो दूर रहती है.", ममता मामी की इस चुटकी ने सबके चेहरे पर हंसी ला दी.
"वैसे हवन तोह ये मंजू के साथ कर रहा था.", पूजा मामी की माँ भी कुछ अलग न थी. Mooh-fatt और ऐश्वर्या से लबरेज. जहाँ भर के गहने पहने वह गर्मी में भी चहक रही थी.
"मंजू मेरी भागीदार है आंटी जी और मेरे से बड़ी है तोह एक तरह से वही मेरा ध्यान रखती है.", अर्जुन द्वारा इतना खुलकर कहना कैयो को हैरान कर गया. सिवाए सुनंदा जी और सरोज मौसी के. एक पल तोह मंजू भी हैरत से उसको देख रही थी.
"हाँ तोह रेखा और सरोज में जब कुछ फरक नहीं तोह फिर इन दोनों में कैसे हो सकता है. दोनों मेरे बचे है और मंजू अर्जुन का ध्यान रखती है तोह ये परिवार को मजबूत हे करता है.", सुनंदा जी ने मंजू को अपने साथ लगते हुए जवाब दिए. लेकिन पूजा मामी की माँ के चेहरे पर कुछ और हे रंग थे.
"वैसे बेटी तोह उर्वशी की भी समझदार है."
"हाँ. ाची लड़की है और हमको भी पसंद है. अर्जुन की होने वाली बीवी से भी मिलवाउंगी तुम्हे मैं, वह रेखा से भी प्यारी है.", सुनंदा जी तोह पहले भी उनका मुँह बंद करवा चुकी थी और फिर से याद दिला दिए था के उनके बचो से वह दूर हे रहे.
"माँ जी आप लोग खाना खा लीजिये फिर ड्राइवर आप लोगो को घर ले जायेगा. मंजू तुम भी माजी और भाभी का ख्याल रखो थोड़ी देर.", संगीता मामी ने आते हे सबसे कहा तोह सुनंदा जी ने भी सहमति जताई.
"हाँ बेटी, मैं भूल हे गई थी की किसी ने भी नाश्ता नहीं लिए है. वैसे मनोज और कैलाश कहा है? खेत पर तोह देवर जी भी नहीं गए.", सुनंदा जी की बात पर संगीता मामी इधर उधर देखने लगी.
"अभी यही थे वह भी. उनके साथ वह नारायण जी का बीटा था, शायद महफ़िल..", संगीता मामी ने बात अधूरी छोड़ दी.
"करने दो मनमानी आज. एक छुट्टी मिली है न दोनों को तोह जश्न मनाये बिना तोह रहेंगे नहीं. राजेश और बिट्टू ने मन करने के बाद भी जाम चलवा दिए तोह छोटे भाइयों का तोह लाज़मी हक़ है. लेकिन एक बार फसल पर नजर मार आना किसी के साथ. चारा देखने की तोह जरुरत नहीं लेकिन बाग़ वाला हिस्सा और जीरी पर मजदूर लगे है.", सुनंदा जी तोह वैसे भी शराब के लिए किसी को नहीं रोकती थी. सब मर्जी के मालिक जो थे. फिर कंचन, समय और स्वाति भी उनकी तरफ चली आई जो अपनी 4-5 सहेलियों के साथ हे थी.
"अर्जुन, तुम चल सकते हो?", संगीता मामी के इतना कहते हे अर्जुन ने हाँ कर दी.
"ोये तुम भाग नहीं सकते. प्रॉमिस किआ था न कल.", स्वाति तुनक कर बोली तोह मंजू हंसती हुई वह से चली गई अर्जुन को ऐसी हालत में छोड़ कर.
"बाबा, मैं यही हु. अपनी फ्रेंड्स के साथ ब्रेकफास्ट करो और थोड़ा घूमो फिरो मैं बस खेत का चक्कर लगा कर वापिस आया.", अर्जुन ने लाचारी दिखते हुए कहा.
"मुझसे बुरा कोई नई होगा अगर इस बार ज्यादा दिमाग चलाया तोह.", ये कंचन थी जो ऊँगली दिखा कर अर्जुन को सावधान कर रही थी.
"हाँ मेरी माँ. जब तुम लोग कहोगे मैं तभी वापिस जाऊंगा. यहाँ से सब काम ख़तम होने के बाद तुम दोनों के साथ शॉपिंग और फिर ice-cream."
"ठीक है. वैसे भी हम अभी बिजी है. ले जाओ चाची इसको, आलसी कही का.", स्वाति ने तुनक कर कहा और अर्जुन हँसता हुआ संगीता मामी के साथ पंडाल से बहार चल दिए. मोटरसाइकिल के नीम के पेड़ के नीचे कड़ी थी.
"आज आप कुछ ज्यादा हे सुन्दर लग रही हो.", मैदान से सड़क पर मोटरसाइकिल ले जाते हुए अर्जुन ने गोल शीशा ठीक करते हुए संगीता मामी का दिलकश मासूम सा चेहरा देखते हुए कहा. मेहरून रंग का ये ख़ास salwar-kameej और जाली वाली चुन्नी उन पर खूब फैब रही थी. युवती जैसी तोह वह वाइज हे थी और ऐसे चुस्त आकर्षक कपड़ो में सौन्दर्य निखार का आ रहा था.
"बस भी करो. इतनी सुन्दर भी नहीं लग रही हु. वह सब तुम्हे हे देख रही थी. चाहे वह पूजा दीदी की भाभी हो या फिर समय की सहेलियां. ाचे लग रहे हो.", मामी की बात पर अर्जुन सामने देखने लगा.
"अनीता मामी नहीं दिखी कही भी?"
"हवन में तुमने ध्यान नहीं दिए. तुम्हारे पीछे वही बैठी थी सुमित्रा माँ के साथ. थोड़ी देर पहले हे वह घर चली गई थी काम से.", बातें करते हुए दोनों अब खेत की सीढ़ी सड़क पर आये तोह अर्जुन मोटरसाइकिल धीमी करने लगा.
"यहाँ नहीं. आगे लो थोड़ा, उधर ये कच्ची सड़क आएगी. हाँ ये वाली. इस पर सीधा.", बाग़ और बड़े खेत तोह पीछे रह गए थे. अब अर्जुन 10 की रफ़्तार पर इस समतल कच्ची सड़क पर मोटरसाइकिल चला रहा था. 7-8 फ़ीट चौड़ी ये सड़क दोनों तरफ से 5 फ़ीट ऊँचे हरे चारे से घिरी थी. बीच बीच में छायादार पेड़ भी थे.
"इधर आने का रास्ता दूसरी तरफ से भी है न?"
"हाँ है तोह लेकिन वह पैदल के लिए है. और फ़िलहाल वह पानी होगा, जीरी की वजह से.", मामी ने समझाया. अर्जुन पहले भी उस पगडण्डी वाले रस्ते पर आया था. कुछ आगे चलते हे मामी ने पीठ पर थपकी देते हुए रुकने को कहा. एक साफ़ हिस्से में पानी की मोटर और खुली टंकी बानी थी. ईंटो का कमरा जहा तीन की चादर थी और 5-6 छायादार पेड़ जो कमरे के ऊपर भी छाए थे. कुलमिला कर ये एक बढ़िया जगह थी. छोटे नाना के 2 कमरे तोह अर्जुन देख चूका था लेकिन यहाँ वह भी पहली बार आया था.
"छोटे नाना तोह दूसरी तरफ रहते है. ये कमरा और मोटर.?"
"ये अपने हे खेत है और कमरा अभी तैयार किआ है कुछ दिन पहले. इधर कूलर भी है है और बीएड भी. तुम्हारे मां ने दारु पीने का सही ठिकाना बनाया है आने वाली बरसात के बहाने.", मोटरसाइकिल एक ओट में कड़ी करवाने के बाद मामी उसको लेके आगे चलने लगी तोह अर्जुन ने देखा यहाँ भी एक क्यारी तैयार की गई थी. शायद मूली, टमाटर जैसी सब्जियां. मामी ने दरवाजा हलके से थपकाया तोह वह अपने आप हे खुल गया. अनीता मामी बिस्टेर पर जैसे गहरी नींद में थी. कूलर की वजह से ाची ठंडक थी लेकिन आवाज भी ाची खासी कर रहा था. साधारण सा डबल बीएड जो 2 तख़्त जोड़ कर बनाया गया था, एक तरफ 2 निवार वाली कुर्सियां और लकड़ी का काम चलौ छोटा टेबल रखा था. दिवार पर बहार की तरफ से कोई प्लास्टर न था लेकिन अंदर समतल सीमेंट के प्लास्टर पर सफ़ेद रंग किआ हुआ था. लोहे की 4 रोड वाली 2 खिड़की खुली थी जो हवा की निकासी के लिए जरुरी भी थी.
"छोटी मामी यहाँ पहले से हे है." अर्जुन ने दरवाजा बंद करती संगीता मामी से पुछा.
"हाँ तोह आपकी इत्छा मतलब हमारी भी इत्छा हुई. अनीता घंटा भर पहले यहाँ आई थी घर से.", दरवाजा बंद होते हे कमरे में माहौल शांत हो गया था. दोनों कुछ पल चुप्प रहे और अनीता वैसे हे सो रही थी. सिर्फ कूलर की आवाज थी जो सुनाई पड़ रही थी. इस ख़ामोशी को संगीता मामी ने हे तोडा.
"आप सहज नहीं है क्या? मैं बहार इन्तजार करती हु फिर.", वह इतना बोल कर पलटी और अर्जुन ने दोनों हाथ उनकी कमर पर लपेट लिए.
"बात ऐसी है के यहाँ घर से दूर हमने कुछ किआ तोह कुछ गड़बड़ न हो जाये. आपको दिक्कत नहीं होनी चाहिए.", अर्जुन वैसे हे उनकी पतली कमर पर हाथ लपेटे उनके पीछे खड़ा था.
"अगर ऐसा होता तोह मैं यहाँ नहीं आती. उस तरफ शायद फिर भी कोई देख सकता था लेकिन यहाँ मजदूर भी बिना पूछे नहीं आते.", मामी की आँखें बंद हो गई थी अपने गले पर अर्जुन के तपते होंठ लगते हे. हलकी फुलकी सी संगीता एक बछड़ी (काफ) की तरह इस लम्बे चौड़े शेर के शिकंजे में भी आनंद ले रही थी. अर्जुन के बड़े पंजे रेंगते हुए उन अनारो तक आ पहुंचे जहा सिर्फ उसका हे हाथ लगा था. अनीता और संगीता मामी हे ऐसी milan-saathi थी अर्जुन की जो उसके मुक़ाबले इतनी दुबली लगती थी. साधारण इंसान के लिए वह एक जायज संगिनी थी.
"फिर हमको देर नहीं करनी चाहिए. नानी या मां वह से फारिग होने के बाद जरूर मेरे बारे में पूछ सकते है.", ख़ास अवसर पर पहने इस सलवार कमीज को खराब करना भी सही नहीं था. कमर से कमीज के किनारे पकड़ते हुए अर्जुन ने जरा भी देरी न की. संगीता मामी का सुत्वा बेदाग शरीर ऊपर से बस उस काली ब्रा में क़ैद था. सपाट नरम पेट सहलाते हुए अर्जुन उनकी चिकनी पीठ को चूमता नीचे झुका और दांतो से हे ब्रा के हक्क खोलते हुए वह नाजुक अनार बेपर्दा कर दिए.
"आह्हः.. ये कैसे किआ.?", ब्रा ढीली हो कर सामने लटकी थी लेकिन हाथ बड़े आराम से उन दोनों 32-बी अकार के स्टैनो को हथेली में दबोचे गूंथ रहे थे. दोनों वैसे हे खड़े थे और अर्जुन के झुकने की वजह से पजामी का कपडा कूल्हों में घुसने लगा था उस मॉटे लुंड के दबाव से.
"सिर्फ ब्रा हे खोली है अभी. कपडे साफ़ रखने होंगे न.", अर्जुन ने भी सफ़ेद कुरता उतारने के बाद मामी को अपनी तरफ घुमा लिए. शर्म से वह आँखे झुकाये बस उसके इशारे पर हे चल रही थी. लम्बी पलके देख कर अर्जुन कुछ पल उन्हें हे देखता रहा. हाथो ने सलवार का नाडा ढीला किआ और संगीता मामी उसके सीने से लिपट गई. काली कच्ची में क़ैद उनके गोल सुडोल नितम्ब ाचे उभरे हुए थे अनीता के मुक़ाबले. सुघड़ कूल्हों को दोनों हाथो से मसलता अर्जुन उनके शरीर का हर बिंदु जागृत कर रहा था.
"बीएड पर चलिए. ऐसे खड़े खड़े करना ठीक रहेगा?", संगीता मामी का मैं भी पूरी तरह से अर्जुन को प्यार करना चाहता था. उनकी बात मानते हुए उसने खुद हे मामी को इस तरफ लिटा दिए. अनीता मामी की बगल में थोड़ी दुरी पर. नंग्नता का एहसास इतना था की टाँगे जोड़े वह आँखे भी मूँद कर लेती थी. उनके जिस्म से आती इत्र की महक और चमकता बदन देख कर अर्जुन ने भी फुर्ती से वह काली पंतय निकलते हुए पूर्ण निर्वस्त्र कर दिए.
"आपने यहाँ कुछ ख़ास काम किआ है?", छूट तोह सुडोल जांघो में चुप्प गई थी लेकिन उभर और पूरा जिस्म उसके सामने हे था. पेडू बालविहीन था जैसे आज हे इस हिस्से को चमकाया गया हो. अनीता मामी के कल हलके रोये थे जैसे उन्होंने कुछ दिन पहले वह सफाई की थी लेकिन यहाँ तोह त्वचा बाकी के हिस्से सी चिकनी और साफ़ थी
"सुबह होते हे क्रीम से हटा लिए थे.", उनका जवाब अर्जुन के चेहरे पर मुस्कान ले आया. पाजामे को उतार कर कुर्सी पर रखने के बाद अंडरवियर भी वही दाल दिए. पहला हु लिंग अब पूरे उठान पर था. जड़ पे बानी एक नीली रबर सी लकीर ऋतू दीदी के प्यार का जोर दिखा रही थी लेकिन अर्जुन को परवाह नहीं थी. दोनों नाजुक पाँव पकड़ कर मोड़ते हुए अर्जुन ने उस साफ़ छूट पर मुँह लगाया और संगीता मामी ने सोई हुई अनीता की ब्याह जोर से पकड़ ली. अर्जुन ाचे से उस लकीर को चूम रहा था और जीभ की नोक दरार से निकलता खट्टा रस चख रही थी.
"आठ.. गन्दा है वह.. आठ.. क्या कर रहे हो उम्म्म..", दूसरा हाथ अर्जुन का सर नीचे दबाने लगा जिसका मतलब था के मामी के शब्द और शरीर विपरीत बात कह रहे थे. उन्हें भी ये छूट चुसाई जादू सी लग रही थी. ाचे से गीला करने के बाद अर्जुन उनके ऊपर चा गया. कच्ची कैरी (आम) से उनके चुके मसलता वह उनके होंठो की लाली उतरने लगा. सूपड़ा अपनी नयी सहेली के साथ chooma-chaati करता आग भड़का रहा था.
"प्यार में गन्दा क्या होता है? और जब आपने इतने प्यार से सफाई की है तोह मेरा भी फर्ज है के वह भी प्यार जातौ. वैसे आप भी छोटी मामी जैसी हे हो, ये हलके से बड़े है और यहाँ थोड़ा सा अतिरिक्त उभर है.", अर्जुन एक चुके के साथ हे दूसरे हाथ से ठोस कूल्हे को भी पकड़ कर दबा रहा था.
"आह्हः.. कर दो बड़े जितना चाहो.. उम्म्म.. तुम्हारे मां ने तोह म्हणत की नहीं अब जमीन तुम्हारी है तोह हल तुम्ही चलाओ. आह्हः.. आराम से बाबा.. ये दुखते है.. आदत नहीं है इन्हे.", निप्पल ऊँगली की भरपूर रगड़ से अकड़ चुके थे जिन्हे अर्जुन चूम भी रहा था. दोनों हे एक दूसरे में लगे थे और इधर अनीता मामी सिर्फ ब्रा में लेती उनकी तरफ करवट लिए दोनों का मिलान देख रही थी.
"क्रीम या ऐसे हे?", अर्जुन ने उनके ऊपर लेते हुए हे हाथ से लुंड को छूट की पतली नाजुक फांको पर रगड़ते हुए पुछा.
"लगा लो, दीदी झेल नहीं पाएंगी. मोटा ज्यादा हो गया है पहले से.", अनीता की आवाज सुन्न कर दोनों ने उधर देखा तोह संगीता मामी शर्म से मुँह फेर कर लम्बी सांसें लेने लगी और अर्जुन ने उनके हाथ से क्रीम लेने की जगह होंठो पर चुम्बन कर दिए.
"आप हे तैयार करो. देखता हु कितना प्यार है आप दोनों में.", अनीता मामी ने जरा संकोच न किआ इस बार. कड़ी होती हुई वह उन दोनों की कमर के पास आ गई. 'पोंड्स' की वह सफ़ेद डिब्बी खोल कर ढेर साडी क्रीम वह अर्जुन के लम्बे मॉटे लुंड पर अपने नाजुक हाथो से मसलने लगी और अर्जुन भी ऊँगली क्रीम से भरते हुए उस तंग दरार में लगाने लगा. अनीता मामी और अर्जुन इस बीच एक दूसरे के होंठो को बड़े इत्मीनान से चूस रहे थे और संगीता मामी ऊँगली चुदाई से आहे भर रही थी. जल्द हे 2 उंगलिअ उस कासी हुई छूट को ढीला करने लगी और इधर अर्जुन दूसरे हाथ से अनीता मामी की फूली हुई छूट को भी रगड़ने लगा. ये तीनो का हे bahu-prem का पहला अवसर था लेकिन कोई भी संकोच नहीं दिखा रहा था.
"दीदी को करो.", एक बार कस के लुंड को दबाने के बाद अनीता ने हाथ हटा लिए. अर्जुन छूट के मुहाने सूपड़ा लगा रहा था और अनीता मामी संगीता के ऊपर झुक गई. ये कैसा दृश्य था? अनीता मामी बेहिचक संगीता के होंठो को चूसती एक सतांन को मसल रही थी. इतनी कामुकता देख कर अर्जुन ने भी कमर को ाचा झटका दिए और कासी हुई छूट को चौडाता आधा लुंड चिकनाहट से अंदर जा फंसा. संगीता मामी का शरीर बुरी तरह कांप रहा था लेकिन अनीता ने कोई ढील न दी. छोटी मामी के ऐसे ऊपर झुके होने का फायदा लेते हुए अर्जुन उनकी पीठ चूमता आधे लुंड से हे संगीता मामी की छूट ढीली करने लगा. 2 जोड़ी आँखें ये नजारा जाने कब से देख रही थी.
'ये देख जरा, हमसे छोटी है दोनों और इतना बड़ा कितनी दिलेरी से ले रही है. खोल कर रख दी है पूरी और अनीता ने आखिर कर हे दिखाया.', खिडके के चाय वाले हिस्से से पूजा और ममता ये दृश्य देख रही थी. अंदर संगीता के ऊपर अब अनीता लेती थी और जमीन पर खड़ा अर्जुन घुटने मोड संगीता की चुदाई करते हुए अनीता के गुलाबी छूट भी सेहला रहा था. 5-6 मिनट में हे छूट गीली होने पर कॉमर्स से भीगा लुंड अब कूल्हे ऊपर उठाये अनीता की छूट पर जा भिड़ा. बड़ी नजाकत से अर्जुन ने थोड़ा थोड़ा करते हुए आधा लुंड अंदर भर दिए था. दोनों बहने अब खुलकर एक दूसरी को चूम रही थी और साथ हे उनके हाथ चुचो को मसल रहे थे.
"आपकी फिल्मे किसी का भी दिमाग खराब कर सकती है. लेकिन सचमुच जरा देखो तोह कैसे चौड़ी हो गई है दोनों की. खून हे निकलना बाकी है बस. और ये अर्जुन की पीठ पर नाखून के निशाँ शायद बहोत कुछ कह रहे है. ाची ज़िन्दगी जी रहा है लड़का.", ममता मामी का दिल तोह कर रहा था के वह खुद जा कर उन दोनों की जगह लेट जाए पर पत्नीव्रता का रूप वह ऐसे नंगा नहीं करना चाहती थी.
"इसलिए हे फिल्म दिखाई थी दोनों को. वह घोडा अकेले क्या हाल कर सकता है ये पता है न. थोड़ा खुल कर रहेंगी तोह अर्जुन की कमी भी नहीं खलेगी और दोनों मिलकर बरी बरी से उसको झेल सकती है. लेकिन मेरा बड़ा दिल कर रहा है यार. आज अनीता यहाँ नहीं होती तोह मैं सीधा जा कर लेट जाती संगीता के साथ. अर्जुन भी खुश हो जाता अपनी पसंद का पिछवाड़ा देखते हे.", पूजा मामी ने साड़ी के ऊपर से हे छूट को रगड़ना शुरू कर दिए था. अंदर अर्जुन अब अनीता मामी को घोड़ी बनाये कास के धक्के लगा रहा था. उनके अनार थामे जैसे कमर चला रहा था अनीता की चीखे बहार तक आ रही थी, कूलर के बावजूद.
"आअह्ह्ह्ह.. आराम se..aahhh मैं गई didiiiii..aahhh..", अनीता झुक कर औंधे मुँह बिस्टेर पर गिरी और अर्जुन उनसे अलग हो कर बिस्टेर पर लेट गया.
"मामी आप ऊपर आ जाओ.", संगीता मामी को बेशरम तोह इस बंद कमरे में बना हे दिए था. अब वह बिना न नुकुर किये अनीता को आराम करने देती हुई अर्जुन के ऊपर आ गई. होंठो को चूमते हुए अर्जुन ने वह नरम कूल्हे ऊपर उठाये और संकरी छूट में लुंड धीरे धीरे अंदर सरकने लगा.
"आह्हः.. माहहह.. आराम से अर्जुन.. तुम्हारा पूरा नहीं जाता मेरे andar..aahh.", बहार कड़ी दोनों अब ाचे से देख पा रही क्योंकि ये हिस्सा बिलकुल उनके सामने था. गुलाबी फांके फ़ैल कर बुरी तरह लुंड से लिपटी थी और एक इंच का आखिरी हिस्सा अभी भी बहार हे था. अर्जुन अपने हाथो से हे उन्हें ऊपर निचे हिलने लगा और कुछ हे देर बाद खुद संगीता मामी अर्जुन को चूमती हुई 8 इंच लुंड मस्ती में झेलने लगी. हर बार नीचे होने पर कॉमर्स के कतरे छूट से बहार निकल कर अंडकोष की तरफ आ जाते. लुंड की खाल पर अब हलकी सफेदी आने लगी थी, शायद संगीता मामी का ये स्खलन कुछ ज्यादा हे बड़ा था. निढाल हो कर वह 6-7 मिनट में हे उसके सीने पर गिर गयी. लुंड बहार निकलने के बाद छूट का अठन्नी जितना खुला मुँह बहोत था Pooja-Mamta को बताने के लिए की वह हथियार उम्मीद से कही ज्यादा घातक है.
"अब आपके अंदर हे फारिग होऊंगा.", बिस्टेर पर आराम से लेती अनीता मामी को अपने नीचे दबाते हुए अर्जुन चुचो को मसलता हुआ अब लम्बे धक्के लगाने लगा. 35-40 मिनट में उसने दोनों का हे बुरा हाल कर दिए था. कूलर के बावजूद पसीने की बुँदे तीनो पर दिखाई दे रही थी. कल तक किसी कुंवारी से बंद दोनों छूट आज बुरी तरह फ़ैल कर मिलान का वर्णन चीख चीख कर कर रही थी.
"आह्हः.. मर्डर गई.. मायआ.. ारामममम से आह्हः.. "
"आह्हः.. मामी.... आअह्ह्ह उम्मम्मम.", मामी के होंठो चूमता वह उनकी दोनों टंगे ऊपर उठाये छूट की गहराई में खाली होने लगा. जाने कितना वीर्य बनता था उसका शरीर. ऋतू दीदी ने भी उसको ाचे से निचोड़ा था और फिर मंजू ने भी. लेकिन अनीता मामी की छूट को भी अर्जुन ने निराश न किआ और 30 सेकंड तक शरीर वह हलके झटके लेता रहा. अनीता मामी की गांड के नीचे तकिया लगा कर वह दोनों के बीच हे लेट गया. इतनी म्हणत के बाद तीनो हे थकान से चूर थे. अनीता मामी की छूट जितना ले सकती थी उतना वीर्य रखने के बाद बाकी बहार निकलने लगी. 2-3 मिनट बाद अनीता ने बिस्टेर का सहारा लेते हुए खड़े हो कर छूट को साफ़ किआ तोह ाचा खासा वीर्य जमीन पर उलट गया. और फिर वह वापिस अर्जुन से लिपट कर लेट गई.
"देखा क्या हालत बनाई उसने दोनों की? सच में ममता ऐसे घोड़े को न ये दोनों नहीं झेल सकती लेकिन तू और मैं मिलके इसको बराबर टक्कर दे सकती है. और उसको भी ज्यादा मजा आएगी गदराये शरीर मसल कर, तेरी तोह वैसे भी पीछे से कुंवारी है.", पूजा हँसते हुए पगडण्डी से होती हुई दूसरी तरफ चलने लगी ममता के साथ.
"उसने आपके पीछे भी किआ है?"
"हाँ तभी तोह तीन दिन बैठ नहीं पाई थी. तेरी तोह मेरे से ाची है."
"दिमाग खराब नहीं है मेरा. मैं उसका सामने भी नहीं लेने वाली. इसका लेने के बाद राजेश का पता भी नहीं चलने वाला. आप ढीला करवाओ खुदको मैंने तोह बस देखना था और इतने से मैं खुश हु. उन दोनों की भी मज़बूरी है इसलिए करना पड़ रहा है उन्हें. माँ बन्न ने का सुख क्या नहीं करवा देता.", कार तक आते आते दोनों की पंतय पूरी गीली हो चुकी थी लेकिन पूजा जहा बिंदास थी वही ममता शैलंटा का नक़ाब हटा हे नहीं रही थी.
"कसम खा के बोल के तेरा दिल नहीं मचला सब देख कर? तू उसके साथ कुछ नहीं करना चाहती?", पूजा ने कार में बैठते हुए पुछा तोह ममता भी बराबर बैठ गई थी. कुछ पल वह बस चुपचाप सामने देखती रही.
"पता है अर्जुन बहोत मासूम है और वह ये सब उनकी ख़ुशी के लिए कर रहा है. मेरा उसके साथ सम्बन्ध बनाना ठीक नहीं होगा बेशक वह एक समझदार और िज्जात्त करने वाला लड़का है लेकिन वासना में मैं उसके साथ ऐसा कुछ नहीं करना चाहती."
"अगर वह खुद तेरे साथ करे तोह?"
"आप सुन्न नहीं सकेंगी जो मैं कहूँगी?", ममता मामी का स्वर अजीब हो चला था.
"बोल."
"स्वाति ने उसके साथ यही सब करना चाहा था लेकिन अर्जुन ने उसको बर्बाद नहीं किआ. यही सब कंचन ने भी दोहराया जो मैंने उन दोनों की बातों में सुना लेकिन नतीजा स्वाति वाला हे रहा. खुद हे सोचो की 2 जवान कमसिन लड़किया खुद सामने से चल कर उसके पास गई लेकिन अर्जुन ने उन्हें रुस्वा किये बिना एक समझदार इंसान की तरह खुश करते हुए बस उनका ध्यान रखा. ऐसे प्यारे लड़के के साथ मैं कैसे ये कर सकती हु? और कही ऐसा हो भी जाता है और मेरी बेटी को ये पता चला तोह जानती हो उसके दिल में अर्जुन की क्या छवि बनेगी? मेरी क्या िज्जात्त रह जाएगी? दिल मेरा तभी कर गया था जब मैंने उसको अंदर से नहीं जाना था. वह है हे इतना प्यारा के बस हाँ कहने भर से मैं कपडे उतार दू लेकिन स्वाति के साथ जो समझदारी उसने दिखाई उसके बाद मैं बस यही चाहती हु के वह मेरी बेटी को ऐसे हे बचाये रखे. बहार वाले अजनबी लड़को से ाचा है के वह उसकी ज़िन्दगी में रहते हुए ऐसे हे ऊपर से उसको खुश करता रहे.", पूजा मामी के चेहरे पर कई रंग आ जा रहे थे ये सुन्न कर.
"वह अगर उनका ऐसे ध्यान रखता है तोह खुदको भी तोह कष्ट दे हे रहा होगा. क्या उसकी जरुरत नहीं होगी कुछ? और चलो उसने खुदको रोक लिए स्वाति या कंचन के साथ आगे बढ़ने से, क्या वह दोनों इतने पर हे रुक जाएँगी? भूल मत ममता के लड़की हर बार अगला कदम लेती हे है एक बार बंधन से बहार निकलने के बाद. वह भी मौके बना हे रही होंगी और अर्जुन के शहर में सही मौका मिलते हे वह हमारी नजरो से दूर ऐसा जरूर करेंगी. अर्जुन भी पीछे नहीं हटेगा अगर वह उनकी परवाह करता है.", पूजा ने इतना कहने के बाद कोई और बात नहीं की और गाडी चलती दूसरे रस्ते से घर की तरफ जाती सड़क पर हो ली. ममता जितनी सफाई दे चुकी थी वह सब पूजा ने पल में हे निरस्त कर दी थी. मुख्या मार्ग पर आते हे ममता ने हे जुबान खोली.
"सही कहती हो आप. अर्जुन पीछे नहीं हटेगा अगर इन्होने ऐसा कुछ किआ. बचो पर सख्ताई करने से मामला हाथ से बहार निकल सकता है. फ़िलहाल वह यहाँ से चला जायेगा तोह उसके बाद सोचते है.", ममता इतना बोल कर बहार देखने लगी.
"उर्वशी ने बोलै के वह अर्जुन के साथ रात बिताना चाहती है.", पूजा मामी ने मुस्कुराते हुए गाडी चलते हुए हे कहा.
"वह पागल है क्या?"
"सुरेश उसकी जवानी संभल नहीं पता और मेरी चुदाई मैंने उर्वशी को बता दी थी, ड्रिंक के समय. वह तोह पहले हे कोई ऐसा मर्द ढून्ढ रही है जो विश्वास के काबिल हो. लेकिन उसको सिर्फ एक हवस मिटने वाला चाहिए इसलिए मैंने ना कह दिए. बेशक मैं अर्जुन के लिए लाख bura-bhala कहु लेकिन मुझे प्यार भी है उस लड़के से. तुझे पता है मैं उसकी गुलाम हु, असली वाली गुलाम.", पूजा ने बंद कमरे के सच्चाई सामने रख दी.
"गुलाम? कैसे?"
"वह भाई के कहने पर मैं उसके साथ कुछ गलत करने जा रही थी जिस से यहाँ हमारे घर में उसका नाम खराब हो जाये और पंडित जी के परिवार पर इसका असर पड़े. लेकिन जानती है अर्जुन ने पता होते हुए भी मेरी चाल को झेला. सेक्स ड्रग को बर्दाश्त किआ और मेरे सामने हे मेरा कच्चा चिटठा खोल कर रख दिए, बंद कमरे में पूरी िज्जात्त के साथ. उस दिन अर्जुन ने जो मेरी आत्मा को प्यार दिए मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती. कहा तोह मैं बेवजह उस मासूम को बर्बाद करने चली थी और कहा उसने हे मुझे इस परिवार में नंगा होने से बचने के साथ मुझे प्यार किआ. बस उस दिन मैंने खुदको हमेशा के लिए उसके हवाले कर दिए. रात मैंने झूट कहा था के तेरे जेठ जी को 15 दिन बाद मैंने हाथ लगाने दिए. मैं अब उनके साथ नहीं सोती और वैसे भी वह अब हमेशा थके रहते है तोह मुझे कोई परेशानी नहीं.", ममता ने कभी पूजा को गलती मानते नहीं देखा था. और आज तोह वह सब घमंड छोड़ कर एक दीवानी सी बात कर रही थी.
"तोह तू अर्जुन के साथ फिर से करेगी?"
"हाँ लेकिन जब वह कहेगा तब. उनके यहाँ शादी है जल्द हे तोह अर्जुन पक्का ध्यान रखेगा मेरी जरुरत का. तेरा भी अगर तू चाहे तोह.", गाडी आँगन में सही से कड़ी करती वह दोनों हे अंदर चली गई..
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एक घंटा सोने के बाद अर्जुन की आँख खुली तोह वह कुछ बेहतर महसूस कर रहा था. पजामा पहन कर वो बहार हौदी पर आया. हाथो मुँह धोने के बाद अब कुछ ताजगी आई थी शरीर में. संगीता मामी को उठाते हुए अब वह तैयार भी हो गया था.
"मामी उठिये और कपडे पहन लीजिये. डेढ़ बज गया है और घर पर कोई भी पूछ सकता है. अनीता मामी को भी उठा लीजिये, साथ जाने से कोई कुछ नहीं पूछेगा.", संगीता की छूट में दर्द था लेकिन वह उठ गई और अनीता को भी जगा दिए. कुछ देर तक दोनों हे बाल संवारती अर्जुन को देख रही थी. शरीर अभी भी बेपर्दा हे थे.
"हमको बेशरम कर हे दिए तुमने.", अनीता मामी ने चेहरा भी दुरुस्त करने के बाद पंतय और ब्रा पहन ली.
"ाचा है न मामी. ये बेशर्मी हम तीनो में है तोह बेहतर है. आप दोनों को नहीं लगता के अब आप ज्यादा ाचे से एक दूसरे का ध्यान रख सकेंगी? वैसे सचमुच आप दोनों एक जैसी है और सुन्दर भी."
"सुन्दर? जरा देखो इनकी हालत क्या की है तुमने. हाथ लगाने भर से चीख निकल रही है.", संगीता मामी के चूचक जमुनी हो चले थे. क्रीम लगाने के बाद काली bra-panty पहन कर वह भी कपडे सीधे करने लगी.
"जब बचा दूध पीयेगा तब देखना. वैसे मैं भी तोह बचा हे हु आपके लिए.", अर्जुन मस्ती से बोलै तोह मामी शर्मा गई.
"बचे का इतना बड़ा है के पूरा नहीं लिए जाता. जाने और कोई कैसे लेगी.", अनीता मामी भी तैयार हो चुकी थी और चूड़ियां दाल रही थी अपनी कलाई में.
"जब ये मॉटे हो जायेंगे तोह देखना आगे और पीछे दोनों तरफ से पूरा लेने लगोगी आप.", सलवार के ऊपर से हे अर्जुन ने वह कसाव लिए कुल्हा मसल दिए.
"आउच.. दीदी देख रही हो आप? ज़माने भर की गन्दी बातें सीखने वाले है ये साहब. इतने नेक विचार."
"कोई बात नहीं, अर्जुन का हक़ है. और मैं वादा करती हु की माँ बनते हे खुद वह करुँगी जो ये चाहता है. अब चल तू हमारे हे साथ, तीनो साथ होंगे तोह ठीक रहेगा.", संगीता मामी ने बड़े प्यार से अर्जुन के होंठो को चूमा और बहार निकल गई.
"देखा?"
"लो देखो.", अनीता मामी तोह गॉड में बैठ कर मस्ती में होंठ हे चूसने लगी थी. खुद हे हाथ अपने चुचो पर रखवाती वह फिर से गरम होने लगी.
"चलो मामी, नहीं तोह काम खराब हो जायेगा. मेरा ये अब खड़ा नहीं होने वाला.", अर्जुन ने तुरंत उन्हें अलग किआ तोह वह हंसती हुई उसके साथ हे चल दी. दरवाजा बंद करने के बाद दोनों मामी अर्जुन के पीछे बैठ कर घर के लिए चल दी. उनका मिलान सोच से कही ज्यादा मस्ती भरा और प्यारा था. .
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"तू सच में पागल है ऋतू. ऐसे कौन प्यार करता है यार? हालत देखि थी तेरी और नाखून में खून.", दोपहर में यहाँ सभी खाने से फारिग हो कर अपने काम कर रहे थे और ऊपर अलका ऋतू बंद कमरे में बिस्टेर पर बैठी थी. ऋतू आज सो कर 9 बजे उठी थी लेकिन अलका ने उसकी हालत देख कर उसके पास किसी को आने नहीं दिए था.
"याद हे नहीं यार क्या हुआ था रात में. जब कुछ समझ आया तोह सुबह होने वाली थी और मैं नीचे आ कर सो गई. अर्जुन का हाल भी मेरे हे जैसा था. वैसे सच कहु तोह जो भी हुआ वह जरुरत से ज्यादा हे वाइल्ड था. नेल्स में उसका खून और स्किन तक फांसी हुई मिली. मेरी वागिना भी दर्द कर रही है, आइस रख कर बैठना पड़ रहा है.", ऋतू ने पजामा हल्का से उठा कर अंदर रखा प्लास्टिक दिखाया जिसमे बर्फ थी.
"बाप रे. तुम दोनों पागल हो क्या? लेकिन उसने तोह तेरे साथ पहले भी किआ है फिर इतना बुरा हाल?"
"पता नहीं रात को उसने क्या किआ. और सचमुच वह अपनी लिमिट से भी बड़ा था उस टाइम. बूब्स तोह इतने सेंसिटिव हो गए है के ये टीशर्ट भी जान ले रही है. या तोह वह फिर से मेरी हालत बुरी कर दे नहीं तोह हफ्ते तक तोह मैं उसके पास भी नहीं जाने वाली. और उसकी क्या हालत होगी? सोया भी नहीं तह और इतनी जल्दी चला भी गया.", ऋतू परेशां होने लगी थी सोच सोच कर.
"वह अलग है और उसको कुछ नहीं हुआ. परेशां मत हो मेरी जान और ये बता तूने प्रकाशन ली न?"
"हाँ ले ली और अब फिर से नाहा लेती हु. तू बस अर्जुन के आने के बाद एक बार चेक कर लेना.", ऋतू जैसे तैसे उठ कर बाथरूम में चली गई, शायद ठंडा पानी कुछ आराम पंहुचा दे.
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दोपहर में खाने से फारिग हो कर अर्जुन अब ऊपर वाले कमरे में आराम कर रहा था. तीनो नाना भी खाने के बाद बहार चले गए थे सम्बन्धिओ के साथ और दोनों छोटी मामी भी आराम कर रही थी. पूजा और ममता मामी से भी कुछ खास बात नहीं हुई थी इस बीच लेकिन सरोज मौसी ने जरूर अर्जुन को घर आने का निमंत्रण दिए था. थकान की वजह बता कर अब वह यहाँ बिस्टेर पर आँखें बंद किये लेता था.
"सो रहे हो तोह बाद में औ?", ये समय थी जो अंदर आने के बाद अर्जुन को ऐसे देख वापिस जाने लगी थी.
"नहीं बस वैसे हे लेता था दीदी. आ जाइये, बात तोह कर हे सकते है.", अर्जुन ने उन्हें निराश नहीं किआ. इस वक़्त वह सुबह वाली tadak-bhadak से अलग एक चुस्त जीन्स और कार्टून प्रिंट वाली टीशर्ट में थी.
"मैं बस कुछ कहने आई थी.", समय ने खड़े हुए हे कहा.
"आपको पूछने की क्या जरुरत पड़ी? जो कहना चाहती है वह आराम से कहिये."
"अभी 3 बजे है और तुम थोड़ी देर आराम कर लो फिर डेढ़ घंटे बाद मेरे साथ दरगाह चलना. अकेले मुझे भी जाने को नहीं मिलेगा लेकिन तुम साथ चलोगे तोह कोई मन भी नहीं करेगा.", समय दीदी ने बात कहते हुए नजरे झुका ली थी. जैसे उन्होंने कुछ बड़ी हे मांग कर दी हो.
"आपको तोह पता हे है मैं धार्मिक जगह नहीं जाता लेकिन अगर आपकी आस्था की हे बात है तोह मैं साथ चलूँगा. उस से पहले मैं Swati-Kanchan के साथ मार्किट घूम आता हु.", अर्जुन ने खड़े हो कर तैयार होने हे ठीक समझा. समय भी ख़ुशी ख़ुशी बहार चली गई. थोड़ी देर बाद हे अर्जुन अपनी दोनों लाड़ली बहनो के साथ बहार चला गया. समय काम था और चाहत पूरी न होने के बावजूद स्वाति कंचन खुश थी की अर्जुन ने उन्हें वक़्त दिए और ढेर साडी खरीदी करवाई. कभी कभी उम्मीद से अलग होने वाले काम भी सुकून दे हे देते है.
"थैंक यू सो मच भाई. लव यू.", घर आते हे दोनों ने उसके गाल चूमे, Mamta-Pooja मामी के सामने और हंसती हुई अपने बैग लेकर कमरे में चली गई.
"क्या बात है, आज तोह तुमने सबको खुशिया देने का जिम्मा लिए हुआ है.", पूजा मामी ने संतरे के जूस का गिलास देते हुए अर्जुन से कहा और वह भी दोनों मामी के पास बैठ गया.
"दुनिया खुशियों से हे तोह चलती है मामी जी. मेरी बहने खुश तोह मैं भी. हाँ इस बार आपके साथ वक़्त न बिता सका लेकिन जल्द हे ये कमी भी दूर कर दूंगा."
"पूजा दीदी हे नजर आती है तुम्हे बस.?"
"मेरी प्यारी मामी आपको कैसे भूल सकता हु. आपने जल्द हे वह आना है क्योंकि माँ के साथ भी तोह कोई होना चाहिए न. फिर आपको भी साथ लेके चलूँगा शोपपकिंग करवाने.", अर्जुन ने स्नेह से ममता मामी का हाथ थाम कर कहा तोह उन्होंने भी उसके सर पर दुलार दिए.
"चलो फिर तुम भाग जाओगे.", समय क्या खूब लग रही थी इस हलके पीले सलवार कमीज में. सर पर दुपट्टा जो सीने को भी सही से छुपाये था और पूरी ब्याह की कमीज, चुस्त सलवार और पाँव में जूती. सच हे था के वह जितनी अल्हड़ पाश्चात्य वेशभूषा में लगती थी उस से लाख गुना ज्यादा वह अब दिख रही थी. पूजा मामी भी अपनी बेटी की ख़ूबसूरती निहारती बैठी रही. उन्हें शायद आज पहली बार अपनी बेटी के इस रूप का नजारा हुआ था.
"चलिए दीदी. वैसे दोनों मां नजर नहीं आ रहे.", अर्जुन ने खड़े होते हुए कहा तोह पूजा मामी की तन्द्रा भांग हुई.
"शोरूम गए थे कार लेने और तुम्हारी वाली तोह वही से चली जाएगी क्योंकि तुम्हारे नाना चाहते है के अर्जुन खुद चला कर वह कार यहाँ लेके आएगा.", पूजा मामी कड़ी होने के बाद समय के पास आई और अपनी गोल बिंदी उतार कर उसके माथे पर लगा दी. साथ हे कान के पीछे कला टीका, नजर का. दोनों बहार चल दिए.
"समय जरा भी तुम दोनों पर नहीं गई. सुन्दर तोह तुम भी हो लेकिन आज देखा के उसके सामने शायद पूरी फीकी लगने लगी थी तुम.", ममता की बात पर पूजा हंसने लगी.
"सच कहा तुमने. मेरी बेटी बड़ी कब हो गई पता भी नहीं चला और इतनी सुन्दर है ये भी आज देखा. वैसे गई मेरे पर हे है, हाँ नहीं तोह.", दोनों हंसने लगी और उधर अर्जुन कुछ सोच कर काली वाली बुलेट लेके समय के साथ चल दिए.
"ये क्यों लेके आये? तुम्हे तोह इस से ज्यादा लाल वाली पसंद है न."
"आपको नजर न लगे और वैसे भी आप काले रंग पर बैठी ज्यादा सुन्दर लग रही हो. रास्ता बताते रहना.", अर्जुन शीशे में वह चेहरा देखता हुआ खुश हो रहा था. दोनों की नजरे बार बार लड़ रही थी. हाय और मुस्कान समय के चेहरे से जाने का नाम नहीं ले रही थी. कमर पर हाथ रख के वह बस खुद को छुपाने लगी. ये खामोश पल भी 10 मिनट में ख़तम हो गए.
"मैं इधर हे इन्तजार करता हु.", दरगाह वाली जगह आते हे अर्जुन ने मोटरसाइकिल स्टैंड पर लगते हुए कहा.
"अंदर मछलियों को दाना दे सकते हो. दरगाह मत आना लेकिन जगह देख हे सकते हो, ाचा लगेगा तुम्हे.", अर्जुन हामी भरता उनके साथ अंदर आया और कुछ सोच कर सर के ऊपर रुमाल बाँध लिए. छोटी सी दूकान से फूल, अगरबत्ती, प्रशाद लेने के साथ हे एक पैकेट मछलियों के लिए दाना भी ले कर दोनों अंदर आ गए. हरे रंग की वह इमारत कोई 200 मीटर दूर थी द्वार से. संगेमरमर का ये चौड़ा रास्ता तीन तरफ जाता था. सीधा दरगाह को, बाए बड़े सरोवर पर जहा किनारे किनारे घने पेड़ लगे थे और दाए तरफ भी फलो के वृक्षों से सजा बड़ा बगीचा. बचे खेल रहे थे, बड़े टहल रहे थे या प्रतीक्षा कर रहे थे अपनों की जो दरगाह को गए थे.
"उस तरफ सरोवर है और सीढ़ियों पर बैठ कर तुम आराम से समय व्यतीत कर सकते हो. मुझे 10 मिनट लगेंगे.", समय दीदी ने समझाया लेकिन अर्जुन नंगे पाँव उनके साथ हे आगे चलता रहा. भीनी भीनी सुगंध आने लगी थी जैसे जैसे वह करीब पहुंचे. समय से आने की वजह से वह भीड़ नहीं थी जो अमूमन प्रसिद्ध जगह होती है लेकिन फिर भी log-bag कतार से अंदर जा रहे थे. द्वार के पास आते हे दीदी ने उसका हाथ थाम लिए.
"मैं आपको यहाँ तक लेके आया हु और अब आगे आप अपना ध्यान वही लगाए जहा होना चाहिए.", अर्जुन की बात सुन्न कर दीदी ने चेहरे को देखा तोह वह सिर्फ मुस्कान थी.
"ाची बात है, लेकिन देख लेना एक दिन अंदर भी आना पड़ेगा.", दीदी माथे तक दुपट्टा करती अंदर चली गयी और अर्जुन उस और जहा उसके अनजान दोस्त पानी में थे. हर तरफ एक अलग सी ऊर्जा और शान्ति थी. बहार से बिलकुल विपरीत समां. इधर सरोवर किनारे आते हे अर्जुन खुश हो गया. ऐसा हे सरोवर उसने एक बार गुरुद्वारे साहिब में देखा था लेकिन यहाँ पर मछलियों की तादाद बेशुमार थी. रंग बिरंगी, छोटी बड़ी और हर तरह की. ज्यादातर किनारे किनारे चाय में घूम रही थी.
"चलो अब तुम सबके खाने का समय हो गया.", चौकड़ी लगता वह उस चौड़ी सीढ़ी पर बैठ कर थोड़ा थोड़ा चारा फेंकने लगा और अब हलचल तेज हो गई थी.
"नास्तिक तोह नहीं दीखते तुम.", ये आवाज बराबर से हे आई थी और पक्के रंग का ये व्यक्ति kaale-hare कपडे पहने हाथ से आता टॉड कर अंदर दाल रहा था. अलग हे चमक और शान्ति थी चेहरे पर. कानो में चांदी के कुण्डल और गले में 3 माला.
"आस्था के लिए किसी स्वरुप को पूजना मुझे ठीक नहीं लगता. भगवन हर तरफ है तोह किसी ख़ास जगह बेमतलब दर्शन मुझे ठीक नहीं लगता.", अर्जुन ने पानी में हाथ डाला और चारा फ़ैलाने लगा. ये मछलियाँ निडर थी जो aas-pas हे रही.
"हिम्मत मिलती है लोगो को इस से क्योंकि उन्हें एक स्वरुप और स्थान पता लगता है. साधारण मैं ऐसा हे होता है बीटा. वह सरल तरीके से चलता है. हाँ तुम्हारी भी बात अपनी जगह ठीक है. Khuda-bhagwan या रब्ब तोह हर जगह है. वैसे तुम अपनों का साथ देने भर के लिए तोह अंदर जा हे सकते थे.", एक छोटा सा प्लास्टिक सरोवर में देख कर इस व्यक्ति ने डंडे पर लगे हक्क की मदद से वह कुशलता से निकल लिए.
"साथ हे तोह हु लेकिन जो उन्हें करना है वह अकेले हे सही रहेगा. वैसे ये जगह है बड़ी खूसूरत और शांत."
"यही तोह खासियत होती है ऐसी जगह की. परेशान इंसान जहा आ कर सुकून प् सके और ज़िन्दगी की मुश्किलों का सामना करने के लिए हिम्मत मिले.", अर्जुन को ाचा लगा ये सुन्न कर की इस व्यक्ति ने कोई वैसा प्रवचन नहीं दिए जैसी उम्मीद थी.
"सही कहा आपने. लेकिन मैं ये हिम्मत और सुकून अपने परिवार में रह कर हर पल पाटा हु. मेरी माँ के पास."
"हम तुम कौन है सही गलत बताने वाले. संसार भरा है कीचड से, तू चल फकीरा अपनी राह. अंधे का सुख धन और लालच, तेरी दौलत तेरी माँ.", इतना बोलकर वह व्यक्ति उठ कर आगे चला गया और एक देसी काले रंग का श्वान (डॉग) उसके पीछे पीछे. जाने कहा से चिलम हाथो में आ गई थी जिसको दियासलाई से जलाते वह धुआं उड़ाते घने वृक्षों के बीच गायब हो गया.
"बड़े किस्मत वाले हो यार तुम तोह. यहाँ लोग दरगाह के साथ साथ मलंग बाबा से भी भेंट करने की इत्छा लिए आते है लेकिन हजारो में से कोई एक हे होता है जिन्हे वह कभी समय देते है. और वह तोह तुम्हारी बगल में बैठे तुमसे गप्पे लड़ा रहे थे.", समय चलती हुई पीछे आ कड़ी हुई तोह अर्जुन ने उनको पास बैठने का कहा.
"दरगाह पर मलंग बाबा?", अर्जुन ने वैसे हे पूछते हुए चारा समय के हाथो में दाल दिए. वह भी आराम से मछलियों को चारा खिलने लगी.
"यहाँ सिर्फ दरगाह हे नहीं है. उधर राइट साइड में बगीचे से आगे मंदिर भी है, बहोत पुराण. सोमवार को अगर मैं यहाँ होती हु तोह दादी के साथ आती हु. मलंग बाबा जब मूड में होते है तोह माहौल बना देते है अपनी आवाज में लेकिन मूड हो तभी नहीं तोह वह बस अपने में हे लगे रहते है. दादा जी के सर पर हाथ रख दिए था उन्होंने और फिर सब तुम्हारे सामने है."
"कितनी उम्र होगी? कोई 45-50 साल और नाना जी तोह शुरू से हे अमीर है.", अर्जुन समय के मुँह से सब सुन्न न चाहता था.
"10-11 साल से तोह मैं उन्हें ऐसे देख रही हु. दादी यहाँ तबसे आ रही है जब बुआ की शादी नहीं हुई थी और यहाँ दरगाह भी छोटी सी थी और मंदिर की जगह एक बरगद का पेड़ जिसके नीचे शिवलिंग था. बाबा तबसे इधर है. दादा जी अमीर तोह है लेकिन समृद्धि सब बाद में आई. वो छोडो और ये बताओ के तुमसे क्या बातें कर रहे थे."
"कुछ नहीं बस यही कह रहे थे के इतनी सुन्दर लड़की को अकेले छोड़ आये.", अर्जुन के हंसने पर समय झूटी नाराजगी दिखते हुए हल्का मुक्का मरती हुई चेहरा दूसरी तरफ करके बैठ गई.
"सचमुच सुन्दर हो तोह झूठ क्यों कहु. और बस वैसे हे इधर उधर की बातें कर रहे थे. वैसे तुमने क्या मन्नत मांगी?"
"मैं कुछ मांगती नहीं कभी बस दिल करता है इधर आने का और आज यहाँ तुम्हारे साथ आना चाहती थी. और तुम्हे तुम्हारा प्रॉमिस याद है?", समय ने अब हाथ थाम लिए था लेकिन देख पानी में रही थी.
"कौनसा प्रॉमिस?"
"ठीक है कोई प्रॉमिस नहीं किआ था. चलो यहाँ से.", गुस्से में तुरंत हे उठ कर समय बहार की तरफ चल दी और अर्जुन हँसते हुए उसको जाते देखने लगा. लेकिन फिर पीछे चल पड़ा. समय मोटरसाइकिल से कुछ दुरी पर मुँह फुलाए कड़ी थी.
"बैठिये.", अर्जुन ने ज्यादा कुछ न कहते हुए मोटरसाइकिल स्टार्ट करके सामने ला कड़ी की और समय चुपचाप बैठ गई, दुरी बनाते हुए. अभी थोड़ी हे आगे बढे थे की अर्जुन ने बात शुरू की.
"मैंने प्रॉमिस इसलिए नहीं किआ था के आपने मुस्कान वाले मामले में मदद की थी. आप मुझसे प्यार करती है इसलिए मैंने वादा किआ था और नेक्स्ट संडे हम दोनों हॉस्टल में मिलेंगे.", गुस्सा तोह रेत की तरह चेहरे से पल में हे फिसल गया था समय के चेहरे से. ख़ुशी के मारे वह बिना किसी की परवाह किये दोनों हाथ अर्जुन की कमर में दाल कर पीठ से लिपट गई.
"उमाह.. तुमने मेरी जान हे निकाल दी थी. लेकिन हम हॉस्टल नहीं कही और चलेंगे.", समय चहक रही थी और अर्जुन भी इस शाम के साथ उसका प्यार दिल तक महसूस करने लगा था.
"कहा चलेंगे? हॉस्टल में मैंने साल भर के लिए रूम ले लिए है. इंटरनेशनल हॉस्टल में हे, मुस्कान से निचले फ्लोर पर."
"वह फिर कभी लेकिन इस बार हम मेरी पसंद की जगह चलेंगे."
"ये जगह है कहा पर?"
"मेरे घर. और टेंशन मत लेना किसी की. पापा और माँ सैटरडे को हे देहरादून जा रहे है, माँ का बर्थडे हैं संडे को. Swati-Kanchan ने भी प्लान बनाया हुआ है अपनी फ्रेंड के जाने का जहा वह सुबह से शाम तक रहने वाली है. और मैंने तुम्हे अपना कमरा भी दिखाना है.", समय विस्तार से सब बताने लगी तोह अर्जुन ने सवाल नहीं किआ. बात सही थी की घर से बहार दोनों मिलते तोह बात खराब होने की सम्भावना थी. और हॉस्टल का कमरा किसी और वजह से लिए था वो भी मुस्कान ने शबनम के नाम से अर्जुन के लिए.
"फिर ठीक है. अब यहाँ बस सबसे मिलने के बाद मैं घर निकलता हु.", दोनों वापिस आये तोह अंदर आँगन में इस समय सभी लोग थे और अर्जुन ने काले रंग की चमचमाती इलो कार बहार देख ली थी.
"पहले हे बता देता हु आप सबको. कोई भी कुछ नहीं देगा और मैं लेकर जा भी नहीं सकता. मामी बस दूध पीला दीजिये फिर मैं निकलता हु. घर पहुंचते पहुंचते 7 बज जायेंगे.", अर्जुन राजेश मां के साथ हे बैठ गया. पूजा मामी ने तोह उसकी बात सुन्न कर अलग हे मुस्कान दी जो सिर्फ अर्जुन को समझ आई थी.
"ठीक है लेकिन जो सगुन है वह हमने पहले हे भिजवा दिए था गाडी के साथ. लेकिन ये तुम्हे लेना हे होगा.", कुन्दनलाल जी ने शगुन का लिफाफा अर्जुन को पकड़ते हुए कहा. साथ हे बरी बरी से सबने यही किआ. उसके हाथो में अब 10 लिफाफे थे. सरोज मौसी भी एक छोटा सा बैग लिए आ गई थी.
"ाचा हुआ तुम यही हो अभी. मंजू को साथ लेके जा सकते हो?", सरोज मौसी के साथ हे मंजू भी वही आ गई थी. आँगन में पूरा परिवार मौजूद था और अर्जुन फिर भी मंजू को हे देखने में लगा था.
"हाँ मौसी ले जाऊंगा और मंजू का दिल करे तोह हमारे हे घर रुक जाएगी."
"नहीं, मेनका दीदी वह अकेली है तोह घर हे जाना है. कल से मेरी प्रैक्टिस स्टार्ट है ट्रायल्स के लिए और घर के काम भी दीदी अकेली कर रही होंगी.", मंजू ने 2 टूक जवाब दिए और समय के साथ बैठ कर बातें करने लगी.
"पंजाब से आने के बाद तुम मसरूफ होने वाले हो. ाचे से जिम्मेवारी निभाना और कुछ भी परेशानी हो तोह मुझसे बात करना. बाकी तुम समझदार हो.", कुन्दनलाल जी ने स्नेह से अर्जुन को समझते हुए हिदायते दी और ऐसे हे सभी ने अपना प्यार जताया. घर से निकलते हुए 6 से थोड़ा ऊपर वक़्त हो गया था. मंजू दोनों पाँव एक तरफ किये अर्जुन के पीछे बैठी और आचार्य जी द्वारा दिए हेलमेट पहन कर अर्जुन सबको हाथ हिलने के बाद निकल लिए अपने घर की तरफ.
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"परमवीर, ये मत भूलो के ये एक पोलिसवाले है. मैं खुद हे जब काम कर रहा हु तोह तुम्हे इस सब से दूर रहना चाहिए.", क्रिमब्रांच के खास कमरे में ये जेलर अमरीक सिंह कुर्सी पर बैठा था और छोटे सांगवान ने तैश में उसके गाल लाल कर दिए थे. अब दिग द्वारा रोकने पर वह एक तरफ खड़ा गुस्से में जेलर को घूर रहा था.
"आप जानते है न इसने क्या किआ है? फिर भी आप इसको बचा रहे है?"
"देखो इसको ससपेंड करने के बाद मैं खुद हे यहाँ क़ैद किये हुए हु. पूछताछ चल रही है और बाकी लोगो भी मेरी हिरासत में हे है. तुम उनके साथ जो भी करो लेकिन राजपाल (शो) और इसको तुम छूना भी मैट. एक गलत कदम और फिर जो तुम्हारे साथ है वही खिलाफ हो जायेंगे.", निर्मल सिंह की आवाज शांत लेकिन चेतावनी भरी थी.
"कर लो अपनी मर्जी आप भी. शंकर खुद जब इसकी गर्दन अलग करेगा तब मैं वही मौजूद रहूँगा और आप भी. फिर हम ये बात यही से शुरू करेंगे.", छोटे सांगवान को जैसे कही न कही निर्मल सिंह की बात चुभ गई थी.
"मेरा ये मतलब नहीं था परमवीर. तुम्हारे पिता जी और रामेश्वर जी जैसा छह रहे है वैसा हे हो रहा है. इनसे अभी बहुत कुछ पूछना है जो बड़े खतरे को ताल सकता है. शंकर इसमें शामिल हुआ तोह मुझे कदम पीछे लेने हे पड़ेंगे लेकिन हम वह नहीं जान पाएंगे जो ज्यादा जरुरी है.", दिग के स्वर इतनी जल्दी बदल जायेंगे ये सांगवान ने भी नहीं सोचा था. बात ठीक थी की ये मामला उनके पिता और पंडित जी देख रहे थे.
"लेकिन बहन सिंह का कोई आदमी बहार नजर आया तोह फिर बात शंकर हे करेगा.", परम इतना कह कर फिर से उस जेलर को घूरने लगा जिसके होंठ से खून आ रहा था.
"वैसे तुम्हारी बात सही है. कल शंकर के आते हे अमरीक को मैं उसके हे हवाले कर देता हु. यहाँ मैं ज्यादा दिन तक इसकी सेवा नहीं कर पाउँगा. तुम शंकर को सूचित कर देना के कल आते हे यहाँ आ जाये और इसको ठिकाने लगा दे.", रुमाल से चेहरा साफ़ करते हुए दिग ने पानी की बोतल मुँह से लगा ली.
"नहीं नहीं. मेरा इसमें कोई लेना देना नहीं है. सर आप एक पोलिसवाले के साथ ऐसा कैसे कर सकते है? दसप दुष्यंत के कहने पर हे बहन सिंह का साथ मज़बूरी में देना पड़ा. सर आप जानते है के मेरा रिकॉर्ड क्लीन है लेकिन दसप साहब के दबाव में हे राजपाल और मुझे ये करना पड़ा. प्लीज शंकर को इसमें शामिल मत कीजिये. मैं स्टेटमैंट देने को तैयार हु.", अमरीक सिंह रट्टू तोते का सब बोलने लगा और इसके साथ हे बहार से कागज पेन लिए रामेश्वर जी अंदर आ गए. साथ हे राजपाल को भी 2 पोलिसवाले पकडे हुए थे. वीडियो कैमरा सामने लगा कर दोनों के बयान लेते हुए हे क्राइम ब्रांच की एक टीम दसप को लेने निकल गई.
"लो भाई परम, ये बाद और गुड वाला एक और सफल परिक्षण कामयाब रहा. अब देखते है के दुष्यंत मालिक क्या चाहता है.", निर्मल सिंह ने हँसते हुए छोटे सांगवान से हाथ मिलाया लेकिन रामेश्वर जी अभी भी कुछ सोच रहे थे. तीनो बहार हॉल में आये तोह धर्मवीर जी टेलीफोन पर किसी से बात कर रहे थे. फारिग होते हे वह रामेश्वर जी के पास आ गए.
"पंडित जी, क्या सोच रहे हो? उन्होंने नाम नहीं बताया क्या?"
"दुष्यंत मालिक."
"हहहह.. कीड़ा सांप बन्न हे गया. कोई बात नहीं हम देखते है इसको भी. आज वह निर्मल की जगह होता अगर आदत ाची होती तोह. रिटायरमेंट के वक़्त भी अकाल काम नहीं कर रही उसकी.", बड़े सांगवान जी चश्मे का शीशा साफ़ करते हुए बहार खली मैदान देखने लगे. जैसे बहुत पुराण कुछ याद आ गया हो.
"मोहर सिंह के भाई का जिगरी. पता नहीं कैसे अभी तक ये बचा रहा.", रामेश्वर जी भी अतीत के पैन पढ़ रहे थे.
"देखिये पंडित जी, अब सबूत भी है और वह पकड़ में भी आ जायेगा.", निर्मल सिंह भी साधारण कमीज पतलून में हे थे और चेहरे पर निश्चय लिए थोड़े मजबूत दिख रहे थे.
"निर्मल भाई, वह सोनू rape-murder केस भी खुलवा हे लो जरा. परम सबूत बनाओ बेटे और मेहुल को कहना के जांच किसी जूनियर डॉक्टर से करवाना. खेल खेलने वाले को भी उसकी हे बाजी दिखने का वक़्त आ गया.", धर्मवीर जी ने जो बात कही थी वह सिर्फ रामेश्वर जी समझ पाए थे.
"यही ठीक रहेगा.", रामेश्वर जी ने भी सहमति दे दी और निर्मल सिंह भी समझ गया के दुष्यंत की रिटायरमेंट पार्टी रंगीन होने वाली है. बहन सिंह का साथ देने पर सिर्फ नौकरी जाती लेकिन एक 21 साल की लड़की के rape-murder बेहद संगीन जुर्म था. अतीत में कई बार बक्श दिए गया व्यक्ति अगर नहीं सुधर रहा है और अब वह बदला लेने के लिए परिवार को मौत देने पर आमादा हो तोह रामेश्वर जी हलके में नहीं लेने वाले.
"गवाह भी हाजिर हो जायेंगे पंडित जी. वैसे भी बहोत ठु ठु हुई थी उस केस में पुलिस की. नारी संगठन ने तोह पुलिस के हे खिलाफ याचिका दायर कर दी थी. सांगवान जी का सही फैंसला है. चलिए मैं आप लोगो को छोड़ देता हु.", निर्मल सिंह के कहने पर दोनों लोग बहार चले आये. गाडी के पास खड़े होते हे पुलिस की टीम मुँह पर कपडा पहनाये दुष्यंत को लेकर अंदर चली गई थी.
"चलो सिंह साहब आप इसकी खातिरदारी करो हम चलते है. वैसे जल्द हे इस सब से फारिग हो जाइये, शादी के कार्यक्रम आपकी प्रतीक्षा करेंगे.", रामेश्वर जी ने कार में बैठने से पहले हाथ मिलाया तोह निर्मल सिंह ने भी मुस्कुराते हुए हामी भरी.
"जी आपके पास रहने का हर अवसर मेरे लिए बहुमूल्य है. 2 लोग बाकी है, बस उसके बाद मैं 2 हफ्ते की लीव ले रहा हु."
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मंजू को छोड़ने के बाद कुछ वक़्त मेनका से बातें करके अर्जुन अपने घर आ गया. बगीचे से आगे ये लम्बी कार काले रंग का लबादा ओढ़े कड़ी थी जिसको देख कर वह मुस्कुरा दिए. अभी कार देखने के चाव छोड़ कर सबसे पहले अपनी दादी के पास आ गया.
"ये प्रशाद और शगुन दादी. आज बड़े दिन बाद थकान हुई है.", बिस्टेर पर पसारता हुआ वह मधु बुआ की गॉड में सर रखते हुए दादी को पूरे दिन का बखान करने लगा. कौशल्या जी भी खुश थी और उसकी बातें सुन्न रही थी. रामेश्वर जी के आते हे अर्जुन नहाने के बाद आराम करने का बोल कर पिछले आँगन में आ गया.
"माँ मेरे कपडे रख दो बाथरूम में. नहाने के बाद थोड़ा आराम करूँगा.", जूते खोल कर वह खड़ा हुआ कपडे निकलने के लिए लेकिन याद आ गया था के ऐसा करना गाला होगा. बेटे की आवाज सुन्न कर रेखा जी उसके कपडे लिए पास आ गई.
"आज तोह तू बहोत थक गया होगा? जल्दी खाना खा के सो जाना फिर कल अपनी दीदी को लेके भी जाना है.", उन्होंने अपने बेटे को सीने से लगाया तोह अर्जुन की थकान पल में हे दूर हो गई.
"पार्टी कब देगा तू?", अलका दीदी की आवाज सुन्न कर अर्जुन अलग हुआ और उनके साथ ऋतू दीदी और प्रीती को देखने लगा.
"हाँ पार्टी तोह बनती है. इतनी बड़ी कार वह भी अर्जुन की खुदकी.", प्रीती ने नाम से हे पुकारा तोह अर्जुन ने सहमति दे दी.
"जब आप लोग कहो लेकिन गाडी पर से कवर तभी उतरेगा जब मैं चलना सीख जाऊंगा.", अर्जुन ने पार्टी देने की बात कही तोह तारा और रुपाली भी वही आ गई.
"कवर तोह मैं कल हे उतार लुंगी. मुझे चलनी आती है और तुझे सीखा भी दूंगी. लेकिन पार्टी घर पे नहीं लेंगे हम.", तारा ने कमर पर हाथ रख कर तुनक कर कहा.
"ख़बरदार किसी ने अर्जुन से पहले हाथ भी लगाया तोह. उसने जब ये कहा की वह सीखने के बाद हे कवर उतरना चाहता है तोह तुम्हे उसकी बात मान नई चाहिए. पार्टी दे रहा है न वह.", मधु बुआ के गुस्से के सामने सबकी हालत खराब हो गई थी. तारा की मस्ती पल में हे छु हो गई थी.
"ओह मेरी प्यारी बुआ, इन सबका हक़ है उस गाडी पे. जिसको चलनी है वह चलाये बस आप न गुस्सा मत करो. ये सब खुश रहती है तभी तोह घर घर जैसा लगता है. और आप भी हंसती हुई ज्यादा ाची लगती हो, गुस्से में नहीं.", अर्जुन बुआ का गाल चूम कर बाथरूम में भाग गया. मधु बुआ रेखा जी की तरफ देखने लगी.
"तुम्हारा भतीजा है तोह मैं बीच में नहीं पड़ने वाली.", रेखा जी ने हँसते हुए कहा तोह बुआ भी हंसने लगी.
"अरे भाभी वह बैलबुद्धि हे है. सबसे प्यार करता है लेकिन इतनी समझ भी नहीं है के उपहार के साथ ऐसा नहीं किआ जाता. और इस तारा को भी क्या कहु, इसके लिए वह मुझे हे सुना के चला गया.", तारा अपनी माँ से आ कर लिपट गई.
"मस्ती में कहा था माँ. अलका कह रही थी की ऐसा कहने पर अर्जुन का जवाब सुन्न न है बस. लेकिन वह तोह कभी झूटी नाराजगी भी नहीं दिखता. ऐसे कैसे मैं वह गाडी चला सकती हु?"
"बुआ वैसे आजकल वह आपका ज्यादा लाडला हो गया है. मुझे भी दांत दिए आपने.", ऋतू झूठा नखरा दिखा रही थी.
"ओह तुम सभी न कितनी बड़ी नौटंकी हो सब खबर है मुझे. चलो थोड़ा काम करवा लो अब और आरती तैयारी कर ली जाने की?", मधु बुआ ने ऊपर जाते हुए आरती से जाने के लिए पुछा.
"हांजी बुआ. हो गई है तैयारी. दादा जी ने कहा है की सरकारी गाडी जा रही है तोह सुबह 7 बजे हम निकल जायेंगे. और परसो वही ड्राइवर शाम को हमे वापिस ले आएगा.", आरती के जवाब से बुआ संतुष्ट हो कर ऊपर चली गई.
"चल प्रीती तेरी मम्मी का दिमाग खाते है थोड़ा. यहाँ हमारी कोई कदर हे नहीं है.", अलका की बात सुन्न कर ऋतू ने ब्याह पकड़ ली.
"चुपचाप रसोई में जाओ मैडम. कोमल दीदी और प्रियंका दीदी के पास. प्रीती को मैं छोड़ कर आ रही हु, घंटे तक आ जाउंगी.", ऋतू दीदी आँख मार कर तुरंत बहार निकल गई.
"चल तारा, यही किस्मत है अपनी तोह.", अलका ने तारा का हाथ पकड़ा तोह रुपाली भी उनके साथ रसोईघर में चली गई. ललिता जी आज बहार गयी हुई थी राजकुमार जी के साथ. और लड़कियां आपस में हस्ती बातें काम कर हे लेती थी. इधर अर्जुन नाहा धो कर साफ़ पजामा टीशर्ट पहने सीधा अपनी माँ के कमरे में चला गया. रेखा जी ने भी उसको आराम करने दिए और सर की मालिश करते हुए जल्द हे सुला दिए. यही तोह कहा था बाबा मलंग ने, अर्जुन की असली दौलत रेखा जी हे थी जहा वह ज़माने भर को भूल कर निश्चिंत सो जाता था. 8 बजे हे उसके सोने से माहौल शांत पड़ गया था.
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"तू कल चले जौना पुत्तर थे अर्जुन तनु मिलान वि नयी आया? डोवा विच कोई नाराजगी तह नहीं होइ?", अन्नू की माताजी 2 बड़े बैग में अपनी बेटी के साथ सामान सही से रखवा रही थी. अन्नू का आखिरी दिन था आज अपने घर में. कल अर्जुन ने इत्मीनान से दिल भर के प्यार किआ था लेकिन आज के लिए बताया भी था के वह आ नहीं पायेगा.
"बेबे मैं कल मिली स ओसनु. घर दे काम तोह अज्ज बहार गया होया है नहीं तह पक्का आना स उसने. लेकिन मेरी जाए बाद वि ओह तुहानू मिलान ांडा रहेगा. तुहाडे नाल गल्लां करना तेह लूडो खेलना ज्यादा पसंद है. बाकी वेखो जे सवेरे आवे तह.", अन्नू का भी दिल था के जाने से पहले बस एक बार अर्जुन आ जाये तोह दिल की तड़प थोड़ी काम हो.
"मुंडा सच्ची भोत प्यारा हैगा. कड़े ओप्रा नै करदा तेह मेरे नाल किचन वच वि लगया रेह्न्दा है. तेरा प्रायः कड़े ेंज ध्यान नै रखड़ा स लेकिन अर्जुन आप हे चा बना डंडा है मेरे वास्ते. सच्ची तू चली जाएगी ताः घर सुन्ना हो जाना कुड़िये. तेरे बहाने तह मैं वि खुश रेहँदी आ लेकिन हुन्न लगदा है बुढ़ापा चंगा नई होना.", बात करते हुए रात गहरा रही थी.
"तुस्सी वि न हर वेले ेहियो गल्ला करदे हो. मैं सदा वास्ते नहीं चली, आया करना मैं हर 6 महीने वच. डिग्री करना मेरा सपना है बेबे और तुस्सी हूँ ेहड़ा करोगे तह पीड़ होगी. डैडी ने तुहाडे कॉल, गवांद वि चंगा है सद्दा तेह ओह पागल वि मिलदा रहुगा. नंबर मैं लिख दिता डायरी तेह, कर लिया कार्यो गल्लां अर्जुन नाल.", अन्नू अपनी माता जी के गले लगी तोह सरदार जी भी अंदर आ गए.
"पुत्तर जी सादे 9 हो गए. बाकी पैकिंग सवेरे कर लिओ या सौं तोह पहला. फ्लाइट शाम दी है लेकिन लगदा आज रोटी नहीं मिलनी. मेहमान वि आये होये ने.", सरदार जी बात सुन्न कर अन्नू के माता जी चेहरा ठीक करती तुरंत उनके साथ बहार चली आई.
"अन्नू खाना तैयार हुन्दे मैं बुला लवंगी. तू आराम कर सारा दिन बहोत कम् कित्ता अज्ज.", जाने से पहले उन्होंने कहा. चारुल के परिवार वाले आज यहाँ रात्रिभोज पर आये हुए थे. संधू जी yada-kada शराब पी लेते थे और आज वैसा हे दिन था. उनकी श्रीमती जी भी अन्नू की माता जी से गले लग कर मिली और फिर उनके साथ हे रसोई में चली गई.
"Parul-Charul, तुस्सी बीटा जी अंदर चले जाओ अन्नू कॉल.", ये सब अभी आये थे. और पहले हॉल में हे बैठे थे लेकिन सरदार जी के कहने पर दोनों बहने अन्नू के कमरे में चली गई. पारुल हमेशा की तरह खुश थी और चारुल सहज.
"वाह मैडम, फाइनली लंदन जा रही हो?", पारुल की आवाज सुन्न कर अन्नू मुस्कुरा उठी. वह बाथरूम से बहार हे आई थी कपडे बदल कर. चेहरा गीला था जो नरम तोलिये से साफ़ करने के बाद वह दोनों सहेलियों से गले लग कर मिली.
"तू भी चल साथ. वैसे चारुल तोह शुरू से हे बहार जाना चाहती थी."
"मैं तोह कभी अपने मिया जी के साथ गयी तोह गयी लेकिन चारुल अपनी ज़िन्दगी के फैंसले लेने के लिए आजाद है.", पारुल पंजाबी सलवार कमीज में पूरी सरदारनी लग रही थी और चारुल ने एक काले टॉप के साथ सफ़ेद माखन जीन्स पहन राखी थी. शरीर के ख़ास उभार ाचे से नजर आ रहे थे.
"यार जैसा यहाँ है वैसा हे वह होगा. फिर क्या करना इंग्लैंड जा कर. लेकिन अन्नू ने अपनी डिग्री करनी है तोह उसका जाना सही है. वैसे याद बड़ी आएगी तेरी.", चारुल ने अन्नू का हाथ थाम कर कहा.
"कोई न डार्लिंग याहू ज़िंदाबाद. और कौनसा सदा के लिए जा रही हु. बस पारुल की शादी मिस हो जाएगी."
"चारुल की भी हो जानी है तीन साल में तोह.", पारुल ने हँसते हुए आँख मारी और इधर अन्नू के माता जी ट्रे में 4 गिलास लिए अंदर आ गयी.
"मम्मी, 3 तिगाड़ा जैसा कुछ नहीं होता.", गिलास देख कर अन्नू ने कहा तोह माता जी हंसने लगी.
"पुत्तर जी मैं पढ़ी लिखी हु. चार बन्दे तोह चार गिलास हे लाऊंगी."
"आपको कहा था न और किसी को नहीं बुलाना.", अन्नू ने नाराजगी से कहा लेकिन माता जी ट्रे रख कर बहार चली गयी.
"कोई बात नहीं, तेरा गुस्सा कम् कर ले जरा. कोई आया है तोह जरुरी हे होगा. प्यार और परवाह करने वाले लोग जितने ज्यादा हो उतना ाचा है.", पारुल ने अन्नू के पत् पर हाथ रखते हुए समझाया.
"वह बात नहीं है यार. तुझे भी पता है के मैं इस कमरे में सभी को अल्लोव नहीं करती.", अन्नू बात कहते हुए भी दरवाजे पर देख रही थी. कोई नहीं था.
"अर्जुन को तोह पूरी फ्रीडम है. शायद इतनी तोह आंटी को भी नहीं दी होगी कही tu-ne.", चारुल ने यहाँ भी अर्जुन को घुसा हे दिए. अन्नू ने ख़ास तवज्जो नहीं दी इस बात को लेकिन पारुल ने ये मौका लपक लिए.
"ये बात तोह आज हे पता लगी की इस कमरे में अर्जुन आया हुआ है. वैसे इसमें 2 राये नहीं की तू जब उसके साथ होती है तोह एक अलग हे चमक रहती है तेरे चेहरे पर. न पहले कभी वह देखि थी न अब दिख रही है.", पारुल की बात वाजिब थी. अर्जुन के आने से हे तोह वह महकता गुलाब लगने लगती थी.
"हाँ और इसलिए तोह मैं अन्नू के लिए ख़ास हु.", कमरे के अंदर आते हे अर्जुन धम्म से बिस्टेर पर बैठ गया. तीनो चेहरे हैरत से उसको देख रहे थे. रात के इस वक़्त और वह ऐसे जैसे आसमान से टपका हो, अर्जुन उनके सामने था. अन्नू को यकीन नहीं आ रहा था लेकिन उसकी नरम लम्बी उंगलिया अपनी उंगलिओं में लेते हुए अर्जुन बाकी दोनों को देखने लगा.
"तुम यहाँ, इस वक़्त, ऐसे अचानक कैसे?", अन्नू की धड़कन बढ़ गई थी. दरवाजा खुल्ला था और ये लड़का उनके कमरे में.
"आंटी ने फ़ोन किआ तोह मैं आ गया. वैसे भी घर पे सबने खाना खा लिए था तोह अकेले मेरा भी दिल नहीं था. कोल्ड कॉफ़ी मैंने हे बनाई है ये और अंकल तोह बैठे है अपने पटिआला पीने.", अन्नू कस के उसके सीने से लग गई लेकिन फिर माहौल देख कर एक तरफ हो कर सही से बैठ गई.
"माँ ने कब फ़ोन किआ?"
"15 मिनट पहले और कोच सर की भी आवाज आ रही थी साथ हे अंकल जी की भी. कह रहे थे के 'Parul-Charul तुस्सी बीटा अंदर चले जाओ.' और मैं एक मिनट में हे आ गया.", अर्जुन ने अब पारुल से हाथ मिलाया और फिर चारुल से भी.
"वैसे कोल्ड कॉफ़ी भी खराब हो जाती है.", अर्जुन ने याद दिलाया तोह दोनों बहनो ने गिलास उठा लिए लेकिन अन्नू उठ कर बहार चली गयी. उनकी माता जी अपनी सहेली के साथ सब्जी काट रही थी बातें करते हुए, चूल्हे पर कुकर चढ़ा था और स्लैब देख कर लग रहा था के बहुत काम हो रहा है. सरदार जी की टेबल पर सलाद, नमकीन के साथ जाम लगे थे जिसका मतलब था के अभी आधा पौने घंटा तोह सब व्यस्त रहने वाले है. संधू जी को नमस्कार करने के बाद वह आंटी जी से भी मिल कर अंदर आ गई. अपनी माँ के चेहरे की मुस्कान देख कर वह भी खुश थी.
"अर्जुन, अब तोह तुम्हे भी अन्नू के बगैर रहना पड़ेगा.", पारुल मजे ले रही थी
"आप दोनों हो तोह सही. वैसे अन्नू हमेशा साथ है और मेरे घर से इंटरनेशनल कॉल भी हो जाती है तोह जब दिल करेगा बात कर लेंगे.", अर्जुन ने बीएड के किनारे रखे खाली फूलदान में कमीज के अंदर से निकाल कर 2 लाल गुलाब रखे और खड़ा हो कर बाथरूम में चला गया. दरवाजे पर कड़ी अन्नू मुस्कुरा रही थी. बाथरूम से बहार आते हे अर्जुन ने अन्नू को देखा और अन्नू ने उसके हाथ में वह कांच का फूलदान जिसमे पानी के अंदर दोनों लम्बी डांडिया डूबी थी, बहार सुर्ख गुलाब.
"थैंक यू.", अन्नू ने वह हाथ से लेते हुए बिस्टेर की इस तरफ रखा और बैठते हे कॉफ़ी का गिलास उठा लिए.
"सही कह रही थी तू पारुल. देख जरा मैडम की चमक, कहा तोह थोड़ी देर पहले ये गोरी थी अब गुलाबी हो गई है.", चारुल भी माहौल में शामिल हो गई थी.
"वैसे कॉफ़ी ाची बनाई है तुमने.", पारुल ने तारीफ की एक घूँट लेते हुए.
"थैंक यू. ये सब इनकी मेहरबानी है जो रसोई के भी काम सीखने पड़ रहे है.", अर्जुन ने गिलास निचे रखते हुए फिर से हाथ थाम लिए और अन्नू भी थोड़ा सरक कर अर्जुन से सत् कर बैठ गई.
"वैसे ये तोह बताओ के तुम दोनों घर में हे मिलने कैसे लगे?", पारुल भी देख रही थी और चारुल भी.
"माँ को अर्जुन पसंद है और उन्हें पता है के ये मेरा दोस्त है. पापा के साथ भी बॉन्डिंग है इसकी. वह ड्रिंक नहीं कर रहे होते तोह ये वही बैठा होता. मेरा नंबर 3रद है इस घर में अर्जुन की प्रायोरिटी के हिसाब से.", अन्नू ने जैसे समझाया तोह चारुल ने भी हाँ में सर हिलाया.
"Mummy-papa को पटना जरुरी है नहीं तोह गेट से बहार.", अर्जुन ने हँसते हुए कहा और अन्नू को प्यार से अपने साथ साइड से लगा लिए.
"चालू हो तुम पक्के. मैं तोह शरीफ समझती थी.", पारुल ने मस्ती करते कहा.
"रहने दो भाभी, आपसे तोह कुछ छुपाया भी नहीं मैंने. सगाई पर हे बता दिए था मैंने आपको. लेकिन ये सचमुच ख़ास है.", अन्नू की तरफ देखते हुए अर्जुन ने पारुल को भाभी कह कर बुलाया तोह पारुल ने भी हँसते हुए हाथ पर हाथ मारा. अर्जुन कुछ देर वैसे हे हंसी मजाक करता रहा और फिर उठ कर बहार चला गया.
"बड़ा ाचा लड़का है ये अन्नू. कमी हरेक में होती है लेकिन ये कुछ छुपता नहीं है. साफ़ बोलना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है लेकिन ये लड़का न अपनी कमिया खुद बता देता है."
"ये जरा इसको समझा. ये पागल न इंट्रोवर्ट होती जा रही है. और जो दिल में है उसको कभी सामने नहीं कहती.", अन्नू ने उठ कर अपनी अलमारी खोली और कपडे निकलने लगी. अर्जुन आ गया था तोह पजामा टीशर्ट बदलना अब जरुरी था. दोनों को 5 मिनट का बोल कर वह बाथरूम में चली गयी.
"देख ले चारुल, मैं न कहती थी की अन्नू भी समझदार है और अब तेरी बारी है. दिल की बात को कहना कोई जुर्म नहीं है. उस लड़के के गाल पर थप्पड़ तूने मारा लेकिन वह सामने से तेरे साथ हाथ मिलता है और बात भी ाचे से करता है. अन्नू के जाने के बाद तुझे मौका नहीं मिलेगा और मैं तोह वैसे भी इस सबमे नहीं पड़ने वाली.", पारुल ने कलाई पर बंधा धागा ठीक करते हुए अपनी बहिन को समझया.
"यार ये इतना आसान नहीं. मेरी फीलिंग्स अलग है और मुझे कोई अट्रैक्शन या वह प्यार वाली फीलिंग नहीं है उसके साथ. बस अलग सा है जो कभी ठीक लगता है कभी बुरा.", चारुल नासमझ होने का दिखावा अपनी जुड़वाँ के साथ कर रही थी.
"चल मेरे साथ भी झूठ बोल ले. मैं कौनसा तेरी परवाह करती हु. लेकिन वह अजीब सा लग्न भी तू आज हे जाहिर कर सकती है.", पारुल कही ज्यादा हे समझती थी इंसान और प्यार को.
"लीव आईटी. अगर पॉसिबल हुआ तोह बात कर लुंगी नहीं तोह वह मेरे लिए कोई इतना मायने नहीं रखता. अन्नू उसके साथ है, और भी जाने कितनी लड़कियों के साथ सम्बन्ध है उसके तोह ऐसा लड़का मैं कभी सेलेक्ट नहीं करने वाली. मेरे से प्यार करने वाला किसी और को कभी देखेगा नहीं.", चारुल का यु झूठा इतराना देख पारुल ने फीकी हंसी दी.
"अन्नू के बॉयफ्रेंड पर नजर तू रखे, दूसरी लड़कियों के साथ उसका होना देख जलन तुझे हो, मेरा हाथ पकड़ना भी तुझे शक्क करने को मजबूर करे और फिर तू ऐसा इंसान चाहती है जो सिर्फ तेरे से प्यार करे? विकास के साथ पूरे 4 साल बिताये मैंने लेकिन हम दोनों के बीच अटूट प्यार के बावजूद मैं ये नहीं कह सकती की वह किसी और से कभी प्यार नहीं करेगा. हर चीज तेरे स्पोर्ट जैसी नहीं होती की तूने एक खेल पसंद किआ और वह खेल की तरह ज़िन्दगी बन्न जाये. बदलाव कुदरत का नियम है और जो बेहतर है वह हमेशा चाहने वालो से घिरा रहेगा.", पारुल ने अपनी बात ख़तम की तोह चारुल अब नजरे झुकाये थी. इधर अन्नू बाथरूम से नीली कमीज और सफ़ेद पंजाबी सलवार पहने बहार आई तोह पारुल मुस्कुराने लगी.
"तोह मैचिंग कर हे ली उसकी सफ़ेद शर्ट और नीली जीन्स के साथ. सच कहु तोह तू सबसे खूबसूरत लड़की है जितना मैंने देखा है उनमे से. कैमरा तैयार रख, सही मौका है आज.", पारुल के इतना कहते हे चारुल ने भी अन्नू को देखा और फिर अन्नू ने दराज से 'कोडक' का कैमरा निकाल कर उसमे बत्त्र्य दाल दी.
"तननननाआ. रेडी.", अन्नू ने चहकते हुए कहा और इधर Charul-Parul की मम्मी खाने के लिए बुलाने आ गयी. दोनों बहनो ने हाथ धोने के बाद अन्नू के साथ हे हॉल में कदम रखा तोह अर्जुन वह पहले हे खाने का सामान सजा चूका था. कांच के बर्तन में रायता, छोले, भरवा बैंगन, पुलाव, palak-paneer, सलाद, पापड़, चटनी के साथ हे 8 लोगो के लिए plate-katori-chammach तक व्यवस्थित था.
"पुत्तर जी ने अकेले सब कर दिए और तुम तीनो अब नजर आ रही हो.", सरदारजी ने तीनो लड़कियों से अर्जुन की तारीफ के साथ हे उनकी शिकायत भी कर दी.
"अंकल जी अन्नू ने कल चले जाना है तोह बातें भी जरुरी है. और मुझे आंटी के साथ काम करना ाचा लगता है. सर अपना गिलास भी अब दे दीजिये, खाना तैयार है.", संधू जी शायद एक और जाम लेते लेकिन जैसे प्यार से अर्जुन ने गिलास माँगा तोह उन्होंने भी हँसते हुए आगे बढ़ा दिए.
"यह सच्ची मेरा बिबा पुत्तर है. अंदर गर्मी दे विच वि आप हे चटनी तैयार कित्ती, सलाद वि कटेया और सारा खाना सोहने तरीके नाल सजाया है. चल पुत्तर हूँ हाथ मुँह धो ले मैं टोलिया फडनी है.", अन्नू के माता जी के कहने पर अर्जुन ने रसोई में लगी टूंटी पर हे हाथ धोये और छोटे तोलिये से हाथ साफ़ करने के बाद सबके बैठने पर हे आखिर में कुर्सी ली. संयोग से अन्नू के बराबर वाली कुर्सी हे मिली. सामने चारुल, पारुल, आंटी जी के बाद संधू साहब. इस तरह हे इधर सभी बैठे थे.
"वैसे ाचा लगा तुमसे स्टेडियम के बहार परिवार में मिल कर. और ये देख कर भी के मेरे जिगरी दोस्त के परिवार में तुम्हारी भी खास एहमियत है.", संधू जी ने बात शुरू की थी अर्जुन को देख कर.
"दोस्त है अन्नू का लेकिन आता मुझसे मिलने है. कुछ हे दिनों में इतना जुड़ गई हु इस से भाई साहब की बता नहीं सकती.", अन्नू की माता जी ने अर्जुन से पहले जवाब दिए.
"सही बात कही भगवान. पुत्तर जी के परिवार से तोह पुराणी पहचान है लेकिन जबसे ये आने लगा है तोह घर का माहौल हमेशा खुश रहता है. अर्जुन यार तुझसे जलन भी होने लगती है, मेरी जननी न तेरे सामने मुझे भूल जाती है. हाहाहाहा.", सरदारजी जिंदादिल और मजाकिया इंसान थे और इसलिए अर्जुन को भी उनके यहाँ ाचा लगता था.
"बात ऐसी है अंकल जी की मुझे न आंटी जी बहोत पसंद है. 2-3 बार परांठे खाये है मैंने तोह अब अपने आप हे इधर चला आता हु जब वक़्त मिलता है. अन्नू को तोह मैंने कभी रसोई में देखा नहीं तोह इस से बात करनी अब बंद सी है.", अर्जुन ने भी मजाक में साथ दिए और अन्नू ने टेबल के निचे से उसको कोहनी मारी.
"हाहाहा.. यार ये चीज मैं बड़ी मिस करता हु. अर्जुन को सिर्फ मैंने खेल में डूबा हे देखा है लेकिन यहाँ वाला रूप इसका ज्यादा पसंद आया.", संधू जी भी खाने के साथ बातों का मजा ले रहे थे.
"कुछ भी कहो आंटी जी चटनी इस रियली अवेसमे. आपने कमाल की बनाई है.", चारुल ने 2 चम्मच चटनी और डालते हुए कहा.
"बीटा जी आप तोह कभी रसोई गए नहीं हो. वैसे चटनी अर्जुन ने बनाई है और मैंने भी इस तरह की चटनी बनाना आज इस से सीख लिए है.", चारुल के साथ पारुल भी अर्जुन को देखने लगी लेकिन अन्नू की मुस्कान जैसे बता रही थी की मेरे बॉयफ्रेंड ने शाम नाम कर ली है.
कुछ वक़्त hansi-majaak के बीच हे खाना हो गया तोह अर्जुन सबसे पहले उठ खड़ा हुआ.
"अब इजाजत दीजिये अंकल जी. दादा जी को एक घंटे का बोल कर आया था और अब तोह 11 बज गए."
"पुत्तर जी 10 मिनट देरी के लिए तोह पंडित जी कुछ नहीं कहने वाले. ज्यादा है तोह जैसे पहले तुम्हरी आंटी ने इजाजत ली थी वैसे हे अब फ़ोन कर देंगी. सबके साथ हे उठना अब.", अंकल जी बात मान कर अर्जुन बैठ गया और 5 मिनट बाद हे सब फारिग हो गए. इस बार Parul-Charul बर्तन उठा कर टेबल खली कर रही थी और अन्नू ने अर्जुन को रेतुर्न गिफ्ट देने का बोल कर अपने कमरे में आने का कहा. और वह भी पीछे चला गया.
"थैंक यू सो मच.", अन्नू ने कमरे में आते हे अर्जुन को जकड लिए. ये कशिश भरा चुम्बन ऐसा था जैसे अन्नू इस पल में दुनिया भी छोड़ दे तोह कोई शिकवा न हो. एक मिनट बाद होंठ जुड़ा हुए तोह अर्जुन खुद हे अन्नू को जकड़े खड़ा था. फिर से उन लाल अधरों का रस पीते हुए अब अन्नू के जन्नत से कूल्हों को मसलता उसमे डूबने लगा.
"बस्सस... फिर रुका नहीं जायेगा.", अन्नू ने हालत समझते हुए निर्णय लिए और कैमरा चालू करके दराज पर सही से रखने के बाद अर्जुन को अपने साथ लगा लिए. लगातार 5 बार सफ़ेद चमक से पता लगा था के अन्नू ने उतनी हे तस्वीर उन दोनों की क़ैद की थी. इनमे से 2 में वह उसके गाल और होंठ चूम रही थी. एक बार ाचे से गले मिलने के बाद अन्नू ने उसका चेहरा ठीक किआ और एक चमकदार कागज में बंद किताब जैसा उपहार उसको देते हुए साथ हे बहार आ गयी. सब लोग मीठा खा रहे थे लेकिन जो इन दोनों ने खाया था उसके सामने जैसे ये कुछ भी न था.
"जल्द आऊंगा आपसे मिलने आंटी जी. चलता हु अंकल. गूडनिघत सर. ाचा आंटी जी. अर्जुन ने चारो बड़ो के पाँव छूने के बाद Charul-Parul को भी bye कहा तोह आंटी के कहने पर अन्नू बहार तक अर्जुन को छोड़ने आई.
"याद आएगी.", अन्नू की आँखों में अपने आप हे पानी आ गया था.
"मैं तुमसे अलग तोह नहीं हु. ऐसे विदा करोगी?", अर्जुन ने दरवाजे पर ृक्क कर अन्नू के चेहरे पर हाथ रखते हुए पुछा. ना में गर्दन हिलाते हुए अन्नू ने आँखें साफ़ की और अर्जुन ने दुनिया भूलते हुए यही खड़े हुए अन्नू के हिलते होंठो पर एक छोटा सा चुम्बन कर दिए.
"ी लव यू अन्नू. हमेशा ऐसी हे रहना और हम हर वीकेंड बात करेंगे."
"ी लव यू तू. इन्तजार रहेगा तुम्हारी ईमेल का.", अन्नू उसको जाते देखने लगी और तब तक वह कड़ी रही जबतक वह गली के आखिर में पहुंचने के बाद एक बार फिर हाथ हिला न गया.
"पता नहीं था के इतना गहरा प्यार है.", पारुल भी बहार आ गई थी और देख रही थी अन्नू को गली में खड़े. देख तोह उसने चुम्बन भी लिए था और उसको ाचा लगा था दोनों को एक दूसरे की इतनी परवाह करना.
"मुझे भी कहा पता था. लेकिन सच कहु तोह ज़िन्दगी क्या है ये पता लग गया.", अन्नू के चेहरे पर मुस्कान आ गई थी और पारुल के साथ वह अंदर चली आई. यहाँ अभी तक सारे लोग गप्पे लड़ा रहे थे और गुलाबजामुन का डब्बा आधा खली हो चूका था.