Incest Pyaar - 100 Baar - Page 24 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Incest Pyaar - 100 Baar

दोस्तों बात कर रहे है तोह मैं कुछ चरितार्थ करना चाहता हु. मिडलमें की तरह, जिसमे कोई लेखक या रीडर नहीं है.

कहानी में 6 पल ऐसे आएंगे जहा मैं लिखना वो चाहूंगा जो आज तक नहीं लिख पाया. उनमे से एक की धारणा यहाँ बता रहा हु के जब शंकर और मुन्नी का वो सन्निधिया होगा जब गलतिया दोनों को पता होंगी लेकिन स्वछंद प्रेम की परिभाषा फिर कभी मैं लिख न पाउँगा.

'तुम आओगे' असलियत में अपने आप में एक कहानी थी कविता के माध्यम से. अपडेट होगी 200 समथिंग. लेकिन बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिल्या कोई... जब मैं आपने देखता , मुझसे बुरा न कोई.

आओ बस पढ़िए और सवाल कीजिये. हम यहाँ है और किसी का प्यार मिले न मिले अपना रहेगा
 
अपडेट 131

चाहत (1)


अभी ठीक से रात ख़तम भी न हुई थी और सही 4 बजे पूर्णिमा जी की आँख खुल गयी. बाथरूम से पानी चलने की आवाज सुन्न कर उन्होंने अपने बिस्टेर पर देखा तोह वह कौशल्या जी नदारद थी. उन्होंने मुस्कुराते खुद के वस्त्र ठीक किये और अलमारी से अपनी dharam-behan के लिए साड़ी निकलने लगी. इन दोनों में devrani-jethani वाला रिश्ता कभी बना हे न था और वो मायने भी नहीं रखता था जितना प्यार परस्पर था. यहाँ कपडे रखने के बाद वो बहार हॉल की तरफ चल दी जहा उनकी सेविका सो रही थी.

"मीणा बिटिया, थोड़ी देर में तैयार हो जाना.", ये 25-26 वर्षयिया महिला इनकी विश्वासपात्र और ख़ास थी. मीणा भी उनका अभिवादन करने के बाद नहाने धोने के लिए बहार वाले बाथरूम की और चल दी तब तक कौशल्या जी भी कमरे में अपने वस्त्र धारण करने लगी थी. यहाँ आने पर इनका भी दिन थोड़ा जल्दी हे शुरू हो जाता था. वही इनसे पहले उठ कर चाचा भतीजा बाथरूम के कार्य से फारिग हो कर इस खुले मैदान में आ चुके थे.

"चाचा जी, आपको देख कर नहीं लगता के 70 के हो गए हो आप. वैसे घुड़सवारी रहने हे दीजिये, चची जी मेरी हे टांग न टॉड दे.", पंडित जी इस shwet-shyaam घोड़े को सहलाने के साथ साथ उसपर काठी भी कस रहे थे. सबसे ख़ास था के किंग उनके आने के बाद से हे बिना चैन के बस उन्ही के aas-pas घूम रहा था, किसी साधारण कुत्ते की तरह. बस रोमियो को वो रामेश्वर जी के नजदीक नहीं आने दे रहा था.

"बीटा, याद है तुम कितने बरस के थे जब मैंने हे तुम्हे घोड़े पर बैठाया था? 9 साल के और तुम डर रहे थे की कही वो घोड़ी तुम्हे पटक न दे. लेकिन न उसने तुम्हे गिराया और न तुम उस दिन के बाद डरे. यही देख लो तुम्हारा भेड़िया, इसको भी समझ है मैं कौन हु और ये कौन. चलो देखे तुम्हारा विदेशी तेज है या मेरा ये काठियावाड़ी.", उमेद का वो दूसरा घोडा सचमुच कुछ अधिक ऊँचा और चमकदार था इस वाले से. उमेद नजदीक आ कर अपने चाचा की मदद करना चाहता था लेकिन वो तोह देखते हे देखते सवार हो गए इस वाले की पीठ पर.

"मतलब आप कहते हो के ये निगरानी करने वाला बदल इस पैदाइशी दौड़ने वाले नील से तेज है? वापिस यही आना है उस खेत की सरहद से चाचा जी. आधे रस्ते से मात देने वाला हु और फिर आपकी थोड़ जानकारी में इजाफा भी हो जायेगा.", उमेद रेलिंग पर लटके घुटना बचने वाले पद दोनों तरफ बांधते हुए हाथ पाँव खोलने के बाद इस घोड़े की गर्दन थापक कर सवार हो गया. देखने में हे पता लगता था के ये ऊँचा घोडा कितना मजबूत और छरहरा है. लेकिन रामेश्वर जी ने कोई जवाब न देते हुए अपने वाले की लगाम मजबूती से थाम ली. दूसरी मंजिल पर कमरे से शंकर भी उत्सुकता से ये दृश्य देख रहा था.

"Get-Set-Go", उमेद ने जैसे हे दौड़ शुरू की नील अपनी रफ़्तार से सरपट भाग लिया लेकिन 10 गज का फैसला रामेश्वर जी ने आगे बढ़ने न दिया. घास के मैदान से आगे जैसे हे दोनों घोड़े गुड़ाई की हुई जमीन पर आये तोह रामेश्वर जी ने नील और बदल की बीच का फैसला और काम कर दिया. इस तरफ से 800 गज के लगभग लम्बाई थी मैदान की और ये सब डेढ़ मिनट में हे हुआ था.

"फास्टर Neel-Faster.", वापिस मुड़ते हुए उमेद ने अपने विदेशी घोड़े को कही छोटे घेरे में हे घुमाया था और दूसरी तरफ रामेश्वर जी बदल की गर्दन पर झुके उसको अर्धगोलाकार तरीके से घुमा कर दोनों के बीच 50 गज से ज्यादा की दुरी बनाते आगे निकल रहे थे. इस जोताई की गयी जमीन पर ये देसी घोडा बेहतर सिद्ध हुआ था उमेद के नील से और घास वाला मैदान आने पर उमेद ने ये फांसला ख़तम करने में कोई कोशिश न छोड़ी लेकिन अपने घोड़े की लम्बाई जितनी दुरी से वो ये दौड़ हर चूका था.

"मान गए चाचा जी. ये मुमकिन नहीं था और अगर मैदान रेसकोर्स वाला होता तोह बदल कही न टिकता.", उमेद घोड़े से निचे उतर कर अपने चाचा को सावधानी से उतरने लगा. रामेश्वर जी के चेहरे पर पसीना आ चूका था और सांस थोड़ी तेज चल रही थी. नीचे जमीन पर बैठते हुए उन्होंने तोलिये से मुँह पौंछने के बाद 1 मिनट तक बस खुद को दुरुस्त किया. उम्र का असली प्रभाव साफ़ दिख रहा था लेकिन वो फिर भी बेहतर थे अपने समकक्ष व्यक्तियों से.

"बीटा, मैंने भी मैदान देख कर हे दांव खेला था. काठियावाड़ी के खुर्र देखो जरा, ये है तोह रेस वाले हे लेकिन प्रयोग रेगिस्तानी बॉर्डर पर भी होता है इनका. तुम्हारा दूसरा घोडा भी बेहद उम्दा है जो सिर्फ उचित सतह पर हे भाग सकता है लेकिन वह फिर कोई टक्कर हे नहीं. इसको सजा कर मैट रखा करो अस्तबल में, खुला छोडो सुबह शाम और माहौल में ढलने दो. यार अब तोह लग रहा है के सचमुच उम्र हो हे गयी है.", रामेश्वर जी खड़े हुए तोह हवेली की तरफ से शंकर चलता हुआ इधर आ गया.

"ये सब आप दोनों के बस का नहीं है पापा. आप आराम करो और गज्जू तू बस इन्हे खरीद कर शौक पूरा करता रह. कभी दिल करे तोह मेरे पास आ जाना, सीखा दूंगा के ये ghode-khacharr कैसे दौड़ने होते है.", शंकर ने फुर्ती से उमेद वाले घोड़े को पकड़ा और पीठ पर सवार होते हे सामने वाली दोनों टाँगे ऊपर उठवा दी नील की. इतनी कुशलता से एक हे जगह घोडा घूमते हुए शंकर बिना जवाब सुने ले भगा इस घोड़े को. रामेश्वर जी के साथ साथ उमेद की आँखों में भी प्रशंशा थी शंकर के लिए. अब कही लग रहा था के घोड़े को सही घुड़सवार मिला है. जुताई की हुई जगह वो घोडा अब गर्दन टेढ़ी करता भाग रहा था जैसे शंकर ने खुद को दिशा दी हुई थी.

"वाह.. ये भोले न सचमुच दक्ष घुड़सवार है चाचा जी. इतनी उम्र में भी किसी नौजवान जैसी फुर्ती और इसका कॉन्फिडेंस जानवर को मजबूर कर देता है परिणाम देने पर. याद है ये मेले में भी घोडा जीत लाया था शरत लगा कर वह पंजाब में?"

"हाँ भाई, शंकर के शौक उसकी जिद्द की तरह है और उनसे वो कोई ढील नहीं करता. मेरे पिता हमेशा एक साधारण शांत व्यक्ति थे लेकिन उनका एक हे शौक था और वो शंकर ने अपने दादा से हे अपनाया. आगे बनवारी की सोहबत ने शौक को जिद्द बना दिया क्योंकि वो खुद भी सनकी था. बस में दम घुटने का बहाना करके 150 कोस (300 कम) तक वो घोडा लेके निकल पड़ता था. पता नहीं ये लड़का डॉक्टर कैसे बना, हरकते तोह आज भी वही कक्षा 12 वाली है इसकी.", रामेश्वर जी खुलासा करते हुए भी अपने बेटे को हे देख रहे थे जो थोड़ी हे देर में कही का कही निकल गया था.

"ये गया घोडा ले कर क़स्बा घूमने चाचा जी. इसको चैन न मिलने वाला जितने नील उसकी हर बात नहीं समझ लेता. चलो अंदर चल कर चाय पीते है फिर नाहा कर देखते है आज क्या करना है.", उमेद ने किंग को बाड़े में बंद करने के बाद अपने चाचा के साथ हवेली का रुख किया और वैसे हे दोनों अपनी गुफ्तगू करने लगे. 5 बज चुके थे और अब नाहा धो कर सभी ने अपने काम करने थे.

.

.

"उम्म्म.. सोने दे न यार, अभी तोह किया था अब फिर से करने की हिम्मत नहीं है.", 5 बजे बबिता इस बड़े बिस्टेर पर nang-dhadang पसरी थी, चादर के अंदर. रात 3 बजे भी अर्जुन और उसने एक लम्बा संसर्ग गया था और अब जैसे बबिता का अंग अंग टूट रहा था. चादर कई जगह से guth-muth थी और दोनों के हे काम रास की छाप ने 3-4 गहरे निशाँ बना दिए थे उस पर. गुलाबी चुचकों में सूजन आ गयी थी और वैसा हे हाल कुछ छूट और होंठो का भी था. गोर बदन पर अनंत मरदाना निशाँ दाल दिए थे अर्जुन ने और बबिता को तोह इसमें भी मजा हे आया था. अब शरीर घंटे भर से आराम कर रहा था के अक्षरा ने आ कर हिला दिया. अर्जुन नाहा रहा था और इसलिए हे अक्षरा इधर चली आयी थी.

"जीजी, ो बबिता जीजी. उठ जाओ नहीं तोह मुसीबत आ जाएगी. दूसरे घर चल कर आपने वापिस बुआ (सुशीला) के पास भी जाना है घंटे बाद.", अक्षरा ने बबिता को उठते न देख एक चुका हलके से दबा दिया.

"अह्ह्ह.. एक हे रात में ज़िन्दगी बदल दी ऋ मेरी. सोने को भी न मिल रहा अब, तू चाय रख मैं आती हु नाहा के. घर जा के सोऊंगी अब अपनी माँ के पास.", बबिता ने अंगड़ाई ली तोह चादर उन पहाड़ो से सरक कर निचे आ गिरी. अक्षरा का तोह मुँह हे खुला रह गया चुचो की हालत और सूजे हुए निप्पल देख कर.

"आपका तोह बुरा हाल है जीजी."

"डार्लिंग, हाल तोह दिखा नहीं सकती तुझे की कितना बुरा है. रात भर में 3 बार आगे खूंटा ठोका और एक बार पीछे. पता नहीं अब क्या जवाब दूंगी सबको. चल तुझे तोह संतुष्टि हो हे गयी न देख कर.", बबिता शरीर पर चादर लपेट कर कड़ी हो गयी. आज तोह उसकी जाँघे हे समस्या बन गयी थी उसके लिए. इतनी तगड़ी चुदाई से पंजे खोलने पड़ रहे थे.

"ओह्ह्ह.. सचमुच हालत खराब है आपकी जीजी. मेरी मानो तोह पद लगा लो, सवाल ज्यादा नहीं होंगे. वैसे संतुष्टि की जगह आग और भी भड़का दी है आपने मेरी. चाय बनती हु मैं.", अक्षरा ने ाची सलाह दी थी बबिता को और वो भी मुस्कुरा दी. तन्न पर चादर लपेटे हुए वो बाथरूम के दरवाजे पर आयी तोह वो चिटकनी से बंद न था. अंदर घुस कर बबिता ने हे चिटकनी लगाईं और चादर उतार कर हक्क पर टांग दी. अर्जुन गीले बदन हे बबिता से लिपट गया.

"ाःह.. छोडो भी, देखो न क्या हालत है मेरी और तुम फिर से शुरू हो रहे हो.", बबिता ने अपने निप्पल के निचे हाथ रखते हुए अर्जुन का ध्यान करवाया तोह उसने वह पर अपने गीले होंठ रखने के साथ हे छूट को भी सेहला दिया.

"कोई बात नहीं, अब प्यार से ठंडक दे देता हु इन्हे. वैसे सुबह तोह खुद हे इसको अंदर ले कर ऊपर बैठी थी.", अर्जुन का लुंड पीछे से गांड पर चुभता हुआ महसूस करके हे बबिता की आँखें बंद हो गयी.

"उफ्फ्फ.. प्लीज, अभी टाइम नहीं है नहीं तोह फिर ले लेती. और तब नींद में भी मुझे यही दिख रहा था तोह गुस्ताखी कर ली. चलो हटो अब और मुझे तैयार होने दो.", बबिता की ऐसी बातों पर अर्जुन को भी बहोत प्यार आया और साथ हे उतने देखा की वो हर कोशिश करती है उसको खुश रखने की.

"टब में पानी भरा है, थोड़ी देर आराम करो उसमे फिर नाहा कर आ जाना. पैन किलर चाहिए है तोह वो भी ले लेंगे लेकिन पहले कुछ खा लेना.", अर्जुन ने अपनी बात कहने के साथ हे प्यार से बबिता के होंठो को चूमा और सहारा दे कर उस बड़े टब में बैठने में मदद की.

"कोई गोली नहीं लेनी मैंने. अब रात 3 बार सब अंदर हे लिया है तोह मुझे बस अब बचा हे चाहिए. गोली शरीर पर गलत प्रभाव होता है और मुझे तोह ये दर्द सबसे प्यारा लगा. जाओ तैयार हो जाओ, अक्षरा भी उठ गयी है और चाय बना रही है.", एक पल को तोह अर्जुन की धड़कन हे बढ़ गयी अक्षरा का नाम सुन्न कर. अगर उन्होंने कुछ देख लिया या सुना तोह.

"इतना परेशां मत हो. वो बहार वाले कमरे में थी रात और बीच के दोनों कमरे तोह बंद हे थे. जाओ अब बहार.", बबिता के कहने पर अर्जुन टोलिया लपेटे वापिस कमरे में आया तोह बिस्टेर व्यवस्थित था, उसके कपडे एक तरफ कुर्सी पर सही से रखे थे जिन्हे पहनते हुए अर्जुन हर छोटी मोती चीज ध्यान से देख रहा था. कुछ भी निशाँ नहीं थे अब इस कमरे में उन दोनों की rati-krida के लेकिन फ़ोन का हैंडल अलग रखा देख वो उसके पास चला गया. कोई लाइन चालू नहीं देख वो निश्चिन्त हो गया. फ़ोन ठीक से रखने के बाद घडी, पर्स और रुमाल अपनी जगह रख कर वो पिछले आँगन से हे हवेली के अगले हिस्से की और बढ़ गया.

"उठ गए अर्जुन? अरे तुम तोह तैयार भी हो गए हो. चलो यही बैठो मैं noon-ajwain के पराठे बना रही हु, अभी रसोई ाचे से सेट नहीं हुई है न तोह बस यही बनेगा फ़िलहाल तोह.", गुलाबी salwar-kameej में dubli-patli सी अक्षरा उमस गर्मी में परेशां होती नाश्ता बना रही थी. दुपट्टा दरवाजे के हैंडल पर टेंगा था और इन तीनो के अलावा अब ये महिला अर्जुन को दिखी जो दूर कोने में आँगन की सफाई के बाद kooda-karkat एकत्रित कर रही थी. अर्जुन ने प्रेम भाव से रसोई में आते हे अक्षरा के भीगे चेहरे और गले को रुमाल से साफ़ करते हुए कहा.

"आप इतनी म्हणत क्यों कर रही है दीदी? देखो अपनी हालत जरा.", अक्षरा के हाथ पराठा पलटने के साथ हे रुक गए अर्जुन को ऐसे उसका पसीना साफ़ करते देख. अर्जुन ने दूसरी तरफ चल कर वो बड़ी खिड़किया खोल दी जिस से धुआं और गर्मी बहार निकल सके.

"थैंक यू और मेरे लिए ये नयी बात नहीं है. वह तोह रोज हे करती थी लेकिन अब दादी ने कहा है के जितने मेरा एडमिशन चंडीगढ़ नहीं हो जाता इतने मैं बबिता दीदी का ख्याल राखु और उनके हे पास राहु. तुम आये तोह मुझे भी ाचा लगा लेकिन शायद रात तुम भी जल्दी सो गए थे और मुझे भी नींद चढ़ी थी, इसलिए बात नहीं कर सके.", अक्षरा के हाथ जब बेलन को हिलाते पराठा बेलते वक़्त तोह वो कांच की चूड़ियों की खनन खनन होने लगती. अर्जुन का ध्यान भी इधर गया तोह गोरी पतली कलाई में दर्जन गुलाबी चूड़ियां बेहद आकर्षक लग रही थी.

"आप हमारे उधर भी आ जाना, वह हम जितनी देर आप चाहेंगी उतनी देर साथ बातें कर सकते है. वैसे भी आप तोह बड़ी दीदी है और कल पापा ने अनुपमा दीदी की रस्मे की तोह ये रिश्ता और भी पक्का हो गया हमारा.", अक्षरा को ये सुन्न कर इतनी ख़ुशी हुई के वो अर्जुन के सीने लगने से खुद को रोक न सकीय. अब सिर्फ आखिरी पराठा हे तवे पर था और एक पल के लिए अर्जुन भी अक्षरा की इस हरकत से थोड़ा हैरान हुआ लेकिन वो खुश थी, उदास नहीं.

"इतनी बड़ी बात कह कर तुमने मेरा दिन हे बना दिया अर्जुन. अब मेरा भी एक भाई है वो भी मुझसे छोटा.", अक्षरा के ऐसा कहने पर अर्जुन ने भी उसको बाहों में कस लिया लेकिन इतनी dubli-patli पा कर वो चुहल करने से खुद को रोक हे न सका.

"मुझे छोटा बता रही हो आप लेकिन ये क्या है? इतनी कमर तोह 12-13 साल के बचे की होती है और लगता है आपका वजन 40 भी नहीं होगा.", अर्जुन का यु दोनों तरफ से अपनी कमर को मापना अक्षरा को अंदर से अलग हे ख़ुशी दे रहा था. दुविधा जरूर थी लेकिन फ़िलहाल वो बस खुश थी.

"वो सारा doodh-malaai बबिता दीदी हजम कर जाती थी न, तोह मुझे कुछ मिला हे नहीं. अब कोशिश करुँगी लेकिन बता देती हु के शरीर हल्का है पर कमजोर नहीं. पराठा जल गया, तुम बहार बैठो में मैं खाना लगाती हु.", अक्षरा ने तुरंत अलग होते हुए चूल्हे पर ध्यान दिया. पराठा बच गया था जलने से और अर्जुन भी मुस्कुरा रहा था. इस बीच बबिता भी कमरे में तैयार हो गयी थी. सुर्ख लाल सलवार कमीज पहन कर अपने सीने पर दुपट्टा करती वो पूरा श्रृंगार कर रही थी. बिंदी, काजल, सुर्खी, लाल चूड़ियां और भारी झांझर के साथ साथ बबिता ने आज कानो में झुमके भी पहने थे. वो हमेशा इस सबसे दूर हे रही थी लेकिन आज उसको ये सब पसंद आ रहा था. मांग में सिन्दूर भरते हुए चेहरे पर अलग हे मुस्कान आ गयी थी.

'मांग तोह अब जिसके नाम की भी हो लेकिन मेरा तोह सबकुछ अब तू हे है. खागड कही का, उमाह.' शीशे की तरह अपने लाल होंठो से चुम्मा बनती वो तैयार हो कर बहार आयी तोह अर्जुन के गले में निवाला अटक गया. अक्षरा ने भी आँखों से बताया के वो कितनी सुन्दर लग रही है.

"मुँह बंद कर ले, अब बबिता सिंह ऐसे हे रहा करेंगी. ी ऍम मैरिड एंड ा वुमन नाउ.", बबिता ने जिस अदा से ये कहा और उनके हे बीच कुर्सी पर बैठ कर चाय का कप उठा लिया. अर्जुन ने नजरे सही करते हुए नाश्ते पर ध्यान देना बेहतर समझा.

"सचमुच आप गुलाब सी लग रही हो जीजी. मैंने तोह आज हे देखा के आप ये सब करना भी जानती हो और कितना जाँच रहा है सबकुछ आप पर.", बबिता के लिए प्लेट लगते हुए अक्षरा ने तारीफ की और बबिता ने खाना वापिस डब्बे में रख दिया.

"बेबे, चाय पी सकती हु लेकिन अन्न ग्रहण नहीं करना अभी. मंदिर में धोक लगनी है सासु माँ के साथ जा कर और उसके बाद सीधा अपने पीहर.", बबिता ने ना करने का सही कारण दिया तोह अक्षरा को भी बुरा न लगा. इनकी बातें इस हवेली को हे ले कर होती रही जहा बबिता बहोत कुछ समझा रही थी अक्षरा को और वो भी पूछ रही थी की क्या कुछ और होना बाकी है यहाँ. अर्जुन नाश्ते से फारिग हो कर कार का षीषा साफ़ करने लगा था और बबिता उस सेविका को सब समझने के बाद मुख्या कमरों को टाला लगाती हुई अक्षरा को लिए कार के पास आ गयी.

"आप दोनों इस पिछली सीट पर बैठिये, ड्राइवर आगे रहेगा.", जिस अंदाज से अर्जुन ने सर झुका कर दरवाजा खोला था बबिता ने हँसते हुए उसकी पीठ पर चपत लगा दी.

"बस बस, इतने नाटक नहीं. पता है के अगली सीट पर तू किसी को नहीं बिठायेगा और मुझे भी कदर है तेरी बात की. अगला आधा घंटा तुम पकने वाले हो वैसे.", बबिता का मतलब सभी riti-riwajo से था जो होने वाले थे लेकिन अर्जुन ने कार हवेली से बहार निकलते हुए ना में गर्दन हिला दी.

"मैं आराम करने वाला हु और बस आप न जल्दी फारिग होना, पौने 6 हुए है और हमको समय से पहुंचना होगा.", अर्जुन के निकलते हे वो बड़ा दरवाजा बंद कर लिया गया था. और बबिता की बात सही निकली जो अगले आधे घंटे अर्जुन बस इधर से उधर हे होता रहा. लेकिन उसके बाद भी 15 मिनट और लग गए सितारा देवी के पास. यहाँ से विदा लेते हुए साढ़े 6 बजे अर्जुन ने अपना सफर शुरू किया.

"देखो इस तरफ से जाने की जगह कार लेफ्ट साइड मोड़ लो. ये रास्ता सीधा हमारे गाँव की तरफ निकलेगा और न शहर आएगा बीच में और तुम्हारे 20 किलोमीटर भी बचेंगे.", बबिता ने मुख्या सड़क पर आने से पहले हे अर्जुन को ये अलग रास्ता बताया.

"मतलब यहाँ से हम उलटी दिशा में जा कर भी सही जाएंगे?", शीशे में पीछे देखते हुए अर्जुन ने बबिता के बताये रस्ते पर हे कार घुमा दी. बबिता भी आईने में हे सहमति में गर्दन हिला कर बताने लगी.

"यहाँ से तुम्हारा शहर है 25 किलोमीटर और आगे गाँव भी 30 है लेकिन यहाँ से सीधा हम गाँव के दूसरी तरफ निकलेंगे. समझ लो जैसे त्रिभुज (ट्रायंगल) जैसा कुछ लेकिन बस एंटर हम मंदिर वाली तरफ से करेंगे और ये सड़क बिलकुल खाली रहती है. 35 किलोमीटर के बीच 4 गाँव पड़ते है वो भी अंदर.", बबिता पीछे बैठे हुई भी अर्जुन के पास सरक आयी थी. अर्जुन ने मुस्कुराते हुए गाल चूमा और बबिता भी हंसने लगी.

"खाली रहता है से कुछ और मतलब तोह नहीं है न आपका?"

"मतलब है तभी तोह समझा रही हु लेकिन भविष्य के लिए. आज कुछ नहीं करने वाले और हाँ, यहाँ से तुम्हे बहोत कुछ जान ने को मिलने वाला है.", अर्जुन ने इतना सुन्न कर हाँ में गर्दन हिलाई जैसे इन दोनों के बीच बहुत कुछ ऐसा भी था जो किसी और को नहीं पता था. सवेरे का समय और दूर तक घने वृक्षों के बीच ये खाली सड़क. कार की गति बंद शिशु की वजह से इतनी भी पता नहीं लग रही थी लेकिन 100 पर सुई स्थिर थी.

"आपने कहा था के एक ख़ास गाँव भी पड़ता है आपके कसबे के पास. कही वो इस तरफ हे तोह नहीं?"

"सचमुच समझदार हो तुम. हमारे कसबे से 10 किलोमीटर इधर हे वो गाँव है जहा तुम्हारी तलाश से जुड़ा बहोत कुछ मिल सकता है लेकिन दूसरी ख़ास बात है के तुम कसबे में अभी एक हे तरफ से आये हो और ये रास्ता तुम्हे बाकी का एरिया भी दिखा देगा.", बबिता ने और भी विस्तार से इधर से आने का मकसद बताया और बढ़ते सफर में दोनों के बीच बहोत सी बातें होने लगी. जहा कही सड़क से कोई रास्ता निचे उतरता बबिता अर्जुन को वह के बारे में बताने लगती. आगे एक तरफ बड़े स्कूल की ईमारत देखते हुए अर्जुन ने इस बारे में पुछा तोह बबिता मुस्कुराने लगी.

"लड़कियों का नामी स्कूल है ये, हॉस्टल के साथ साथ aas-pas के अमीर घरो की नखरे वाली भी यही पढ़ती है. तुम्हे इसके बारे में बिलकुल नहीं पता था?"

"फिर तोह आप भी शायद यही पढ़ी हो.", अर्जुन ने हँसते हुए एक और बार इस ाचे खासे बड़े स्कूल पर निगाह मारी. लाल ईमारत, घने वृक्ष और सामने वाली दिवार भी कोई आधा किलोमीटर लम्बी थी. जल्द हे कार आगे निकल गयी.

"नखरे वाली बात पर तुमने ऐसा कहा न? कमीने हो तुम पक्के वाले. हाँ मैं इधर हे आती थी पढ़ने और सच कहु तोह यहाँ की लड़कियां लड़कों को भी मात देती है उन मामलो में. और ये है वो गाँव जिसकी मैं बात कर रही थी. मुन्नी काकी और बिंदिया (बिंदु) से जुड़े कुछ राज तुम्हे यही मिलेंगे और शायद उनके मददगार भी.", अर्जुन ने कार धीमी करते हुए ध्यान दिया तोह सड़क किनारे हे 3-4 एक जैसे रंग की पुराणी सी दुकाने थे और उसके आगे टायर बनाने वाला और एक चाय का खोखा. गाँव शायद उस पतली सड़क पर अंदर की तरफ था. उसके मतलब की भी एक दूकान थी लेकिन फिलहाल वो वापिस सड़क देखता आगे हो लिया. 6-7 मिनट तक दोनों कुछ और भी बातें करते रहे और यहाँ सड़क चौराहा सी हो गयी. बीच में बड़ा हाईवे था.

"देख कर ये हाईवे पार करो, आगे अपने कसबे की हद्द शुरू हो जाती है.", बबिता ने हिदायत दी और अर्जुन ने भी दोनों तरफ देखने के बाद कार उस दिशा में हे बढ़ा दी. इतनी बड़ी हवेली देख कर वो कार को 10 की रफ़्तार पर करते बस उसमे हे खो गया. सदका से निचे उतर कर वो हवेली अंदर की तरफ थी, काम से काम 500 गज अंदर.

"वो महल किसका है? लगता है जैसे aas-pas के सब जमीन उनकी हे है.", बबिता अर्जुन की इस बात पर हंसने लगी.

"तुम अपने चाचा के हे घर कभी नहीं गए क्या? मैं तोह बहोत बार गयी हुई हु और सचमुच ये हवेली एक महल हे है. उमेद चाचा इधर हे रहते है. पहले ये क्सक्सक्सक्स खुर्द गाँव होता था. गाँव से आगे खेत फिर गाँव और उसके आगे हमारा गाँव. अब तीनो मिल कर एक बड़ा क़स्बा बन्न चुके है. ये आगे जो इलाका है वो तुम्हारी मुन्नी काकी का पीहर है, पहले गाँव की ढाणी थी ये.", अर्जुन सब बड़े गौर से देख रहा था. उमेद चाचा के साथ वो इतने सालो से जुड़ा था लेकिन वो कभी उनके घर नहीं आया ये ख्याल उसको बड़ा अजीब लग रहा था. कार आराम से चल रही थी और फिर बबिता ने वो एक मंजिला बड़ा सा घर दिखाया जिसके बहार बड़ा पीपल का वृक्ष लगा था.

"तो हे है मुन्नी काकी का घर?"

"सही समझे तुम, यही है उनका घर और अब यहाँ सिर्फ उनकी माँ लाजवंती जी रहती है. फ़िलहाल तोह वो भी अपने पीहर गयी हुई है किसी करीबी की मौत पर.", बबिता भी अर्जुन के साथ ऐसे हे पहेलियाँ बुझथि रहती थी.

"मतलब वो गाँव जो इधर से 10 किलोमीटर था वही पीहर है उनका? मुन्नी काकी का ननिहाल?"

"मेरा घोडा तोह सचमुच बहुत तेज है. इधर ध्यान से, ये रेलवे की लाइन इतने सालो के बाद भी नहीं सुधरी किसी ने. एक हे ट्रैन आती है इधर लेकिन पूरे गाँव का सत्यानाश कर रखा है इसने.", बबिता के कहने के साथ हे अर्जुन ने बड़ी सावधानी से ये खुला हुआ फाटक पार किया. ये लाइन जैसे ठीक किनारे से आ रही थी अगले गाँव से और इधर वो शायद आगे भी इस गाँव के हे किनारे से बहार जा रही थी.

"ट्रैन एक हे आती है सी पटरी पर? बड़ी अजीब बात है?"

"अरे ट्रैन तोह और भी आती है लेकिन उनका समय या तोह बहुत सवेरे का है या बहुत रात का. दोपहर में 3:30 वाली गाडी एक्सप्रेस है.", बबिता कुछ भी वैसे हे नहीं बोलती थी और अर्जुन समझ तोह गया था के ये बात भी ख़ास हे होगी.

"पता करते है फिर उस टाइम का जी और उस गाडी का भी जो 3:30 पर आती है. देखे हमारी बबिता जी की ये पहेली क्या तस्वीर दिखाएगी."

"जानकारी थोड़े पुराने समय से निकलवाना और हो सके तोह 25-26 साल पहले की. पता तोह मुझे भी सही से नहीं है लेकिन वो गाडी अगर तुमने पकड़ ली न अर्जुन तोह समझ लो कितने हे लोग नंगे मिलने वाले है तुम्हे उसके अंदर.", बबिता के चेहरे पर गुस्सा और दर्द देखते हुए अर्जुन ने कार एक तरफ हे रोक दी.

"आप ठीक हो न? इस चेहरे से घर जाएंगी?"

"चल एक चुम्मी दे फिर.", बबिता ने जल्द हे खुद को दुरुस्त कर लिया था और वही नटखट चेहरा अर्जुन को दिखा तोह उसने बिना हिचकिचाए बबिता को चूम लिया.

"हमेशा ऐसे हे रहना आप. गाडी तोह समझ लो किसी भी हाल में पकड़ कर हे रहूँगा मैं लेकिन आपके चेहरे पर दुख नहीं आना चाहिए. मैं समझ सकता हु के कितने साल आपने दर्द और अपनों से अलग गुजरे है लेकिन अब वैसा कुछ नहीं होगा.", अर्जुन ने गाल को सहलाया और आगे से एक तरफ कार मदद दी जहा बबिता ने बताया. ये सड़क अब दूसरी हवेली की तरफ जा रही थी.

"तोह बबिता के साथ आने का फायदा मिला न पूरा तुम्हे?", हवेली के बड़े गेट के बहार पहुंचते हे बबिता ने मुस्कुराते हुए अर्जुन से पुछा

"वो तोह हमेशा हे मिलता है, फिर चाहे एक पल का मिलना हो या ाचे से पूरी रात तक."

"धत्त, पागल कही के. अब आ जाओ छोटे भाई के किरदार में, आशिक़ करो दफा थोड़ी देर.", कार का हॉर्न सुनते हे छोटे किवाड़ से मधुलता ने हे झाँक कर देखा था और इस चमचमाती काली को वो भी पहचान गयी थी, बेशक आज ाची धुल जमा हो गयी थी इसके ऊपर. बड़ा दरवाजा खोला हवेली के सेवक ने और अर्जुन ने भी आराम से कार में आँगन में वृक्ष के निचे कड़ी करते हुए बबिता की तरफ का दरवाजा खोला.

"वाह, मेरी लाड़ली तोह रानी की तरह आ रही है. जग जग जियो बीटा, तुझे परेशानी उठानी पड़ी लेकिन इसमें मैं कुछ कर भी नहीं सकती. सुशीला का अब दूसरा बीटा तोह तू हे है.", चंद्रो देवी दोनों से गले लग कर मिली थी और फिर अर्जुन ने मधुलता के भी पाँव छुए और कार से बबिता का सामान निकल कर आँगन की तरफ आ गया. बिजेन्दर ने सामान लेते हुए अर्जुन को एक तरफ से अपने साथ लगा लिया.

"तुम तोह बड़े तेज हो यार. थोड़ी हे देर पहले तोह फ़ोन किया था मैंने हवेली पर और पता लगा के तुम एक मिनट पहले हे निकले हो."

"भैया वो बबिता दीदी ने हे कहा के जल्दी पहुंचना है.", अर्जुन ने ये बात हंस कर कही लेकिन दूसरे रस्ते वाली बात छुपा कर. गुड्डी काकी पानी ले कर आयी तोह अर्जुन ने उनके भी चरण स्पर्श किये.

"जीते रहो और सदा खुश रहो.", गुड्डी काकी तोह ज्यादा बोलती भी नहीं थी लेकिन अर्जुन उन्हें भी ाचा लगा था. ऋचा के साथ सुशीला सिंह इधर चली आयी तोह सबसे ज्यादा जोश से वही अर्जुन से मिली थी. कास कर गले लगाने के बाद उन्होंने उसका माथा चूम लिया.

"मेरा लायक बचा. आ बैठ मेरे पास, सवेरे सवेरे हे इतनी भागदौड़ करनी पड़ गयी.", बराबर हे राखी कुर्सी पर अर्जुन को उन्होंने बैठा लिया और दुलार करने लगी.

"बस बीटा है दिखे है माँ तन्ने तोह. या छोरी न नजर आयी जो इतनी सवेरे तेरे से हे मिलान आयी है?", बबिता ने नौटंकी से कहा था लेकिन उसको गले लगाया चंद्रो देवी ने.

"कर लेने दे लाड, फेर तोह तू हे है उसके पास. और मेरी लाड़ली तोह एक हे दिन में कितनी बदल गयी, ाचे से जी भर के देखने तोह दे. सुशीला भी इतनी सुन्दर न थी जब वो हवेली आयी थी ब्याह के. बहार न निकलियो तू घर से, कह देती हु.", चंद्रो देवी कही से भी गलत न थी. लाल सलवार कमीज और श्रृंगार के साथ साथ उस असाधारण शरीर पर अर्जुन के प्यार ने कही ज्यादा हे निखार ला दिया था.

"सच कह रही हो माँ आप. लगता हे नहीं ये मेरी वही बबिता है, क्यों बिजेन्दर तूने भी तोह अपनी बहिन को इतने साल देखा. कही से भी ये वैसी दिख रही है?", सुशीला भी निहार रही थी बबिता को, अर्जुन को अपने साथ लगाए हुए. बिजेन्दर कुछ झेंप सा गया था लेकिन माहौल को ठीक करने के मकसद से जो बात कही वो सुन्न कर एक बारी तोह मुन्नी और गुड्डी काकी ने मुँह पर हाथ रख लिया लेकिन बाकी सभी की हंसी छूट गयी.

"मैंने तोह लगया माँ के अर्जुन अपनी दुल्हन लेके आया है यहाँ. वो तोह आवाज सुन्न के पता चला के बबिता दीदी है. सचमुच पूरी कायाकल्प हो गयी और पहले से भी ज्यादा सुन्दर."

"हाहाहा.. देख ले अर्जुन, बिजेन्दर तेरी हे टांग खींच रहा है. वैसे ऋचा ने आज खीर बनाई है स्पेशल अर्जुन के लिए.", चंद्रो देवी ने भी अपनी जगह बैठ कर ये बताया तोह अर्जुन को ध्यान आया के वो तोह ऋचा से मिला हे नहीं. खड़े हो कर नजर पीछे की तोह ऋचा मुस्कुरा रही थी लेकिन एक पल को उसकी भी सांस अटक गयी जब अर्जुन ने ऐसे उसको गले लगा लिया.

"सॉरी दीदी, आप तोह दिखी हे नहीं मुझे. कैसी है आप?", मधुलता भी ये देख रही थी की उसकी बेटी के गाल एक बार लाल कैसे हुए थे और अर्जुन कितने अपनेपन से मिल रहा था ऋचा से.

"मैं ाची हु और अब दीदी की शादी हो गयी है तोह वही अकेलापन हो जायेगा इनके वापिस जाते हे. वैसे एक प्यारी भाभी भी मिल गयी है. तुम बैठो मैं खीर लेके आयी."

"नहीं, आप भी कुछ देर यही बैठिये फिर खीर टिफिन में दाल के दे देना. मैं फ्रिज में रखने के बाद आराम से खाऊंगा घर जा कर.", ऋचा ये सुन्न कर अपनी दादी की बगल में हे बैठ गयी.

"तू अकेला नहीं जा रहा वापिस, तेरे dada-daadi इधर हे आ रहे है अभी. उनको लेके जाना है बीटा तुम्हे, इतने ठंडी लस्सी पी ले.", सुशीला ने अर्जुन को ये बताया और इधर बबिता अनुपमा से मिलने कमरे में चली गयी.

"बुआ, लस्सी नहीं हाँ अगर पिलाना है तोह ठंडा निम्बू पानी पीला दो.", अर्जुन की मांग सुन्न कर अलग हे मुस्कान आ गयी थी चंद्रो देवी और सुशीला के चेहरे पर.

"मैं बना कर लाती हु भाई तेरे लिए, पुदीना दाल कर शिकंजवी.", ऋचा झट्ट उठ कड़ी हुई और रसोई की और चल दी. चंद्रो देवी ने इशारे से लता को भी अपने हे बराबर बैठने को कहा तोह वो सकुचाती हुई निचे बैठने लगी.

"बराबर में आजा मुन्नी, मैं कितनी बार कहु के मुखिया तेरा भतीजा है अब और वैसे भी तू घर की मालकिन की माँ है. आज से तू और गुड्डी सिर्फ चूल्हा देखोगी और साड़ी सफाई काम बनने और उसकी घरवाली देखेंगे. बाकी बिजेन्दर जिनकी जहा ड्यूटी लगाए वह वो लोग करेंगे. तुम लोग कपडे भी नहीं धोने वाली अब से.", चंद्रो देवी की इस बात पर अर्जुन को भी उतनी हे ख़ुशी हुई जितनी बाकी सबको. उमेद भी कार ले कर अंदर आ गया था जहा उसके साथ विन्नी, कौशल्या जी और रामेश्वर जी भी थे. सेवक ने वही एक बड़ी चारपाई लगाने के बाद एक टेबल बीच में रख दी थी. अर्जुन बस मुस्कुरा कर वही बैठा रहा किसी के पास न जा कर.

"लगता है भाभी और सुशीला ने अर्जुन बाँध हे लिया है.", रामेश्वर जी के ऐसा कहने पर सुशीला भी हंसने लगी. अब अर्जुन सबसे गले लगा और आखिर में विनीता से कुछ ज्यादा हे ाचे से.

"हाँ हमने हे बाँध लिया तेरा अर्जुन रामेश्वर. उल्टा इसने हे सारे बांध दिए, देख ले तेरे सामने हे है."

"ये तोह सही कहा भाभी आपने, कितने हे समय बाद मैं सबको ऐसे बैठा देख रहा हु. वैसे ये क्या लेके आयी है मेरी बची?", रामेश्वर जी ने ऋचा को वो एक लीटर का लौटा टेबल पर रखते देखा, जिसके बहार बर्फ की वजह से पानी आ गया था. और अर्जुन ने फुर्ती से गिलास के साथ लौटा उठा लिया कुछ भी होने से पहले.

"ये दीदी ने मेरे लिए शिकंजवी बनाई है, दादा जी आप तोह चाय पीते हो और सभी ने खाना खा रखा है तोह ये मेरी है.", ये सुन्न कर अब उमेद सिंह की भी हंसी निकल गयी थी बाकी सभी बड़ो के साथ साथ.

"कर बीटा मौज तू दिल खोल कर. फिर तेरे ऐसी रस्सी बांधूंगी न सारे स्वाद भूल जायेगा.", कौशल्या जी ने मजाक अर्जुन का कान खींचा था लेकिन चंद्रो देवी ने ना में सर हिलाया. यहाँ ये बड़े आपस में बात करने लगे और अर्जुन ने एक गिलास विन्नी को देने के बाद टेबल से दूसरा गिलास बिजेन्दर को थमा दिया. ऋचा कड़ी देख रही थी लेकिन उसको भी अर्जुन ने निराश नहीं किया

"तुम्हारे पास तोह बची नहीं होगी.", ऋचा ने गिलास अर्जुन की तरफ हे रखा तोह उसने लौटा दिखा दिया.

"कांच के 4 गिलास बनते है दीदी इसमें, हमारे वह भी ऐसा लौटा है जिसमे दादा जी पानी पीते है. वैसे सचमुच ाची बनाई है आपने. थकान हे दूर कर दी."

"हाँ ये बात खरी कही अर्जुन ने लेकिन अब ऋचा ये म्हणत रोज करनी पड़ेगी बहिन तुझे. खेत जाऊंगा तोह एक बोतल यही लेके जाया करूँगा साथ अपने.", बिजेन्दर भी दिल से सरल और बड़ा साफ़ व्यक्ति था. इन चारो में अलग हे बातें हो रही थी और 8 बजने हे वाले थे तोह रामेश्वर जी ने इजाजत मांगी.

"अब नहीं रोक सकती क्योंकि मुझे पता है के तुम्हारे बहोत से काम रुक चुके होंगे. समय मिले तोह चक्कर लगते रहना रामेश्वर और कौशल्या अब तोह तुम ये भी नहीं कह सकती के कोई लेके आने वाला नहीं है.", चंद्रो देवी ने कौशल्या जी को गले से लगाया और उमेद को भी. ऋचा अर्जुन को बता रही थी की उसको दीदी ने अंदर बुलाया है. अर्जुन भी बताई जगह चल दिया जहा अगले कमरे से बबिता हे उसका हाथ पकड़ कर एक तरफ ले गयी. एक बार अपने सीने से कास कर लगाने के बाद खुद हे अर्जुन के होंठो को चूम लिया.

"ये यहाँ का नंबर है और निचे वाला मेरी हवेली का. 3 दिन मैं इधर हे हु, मिलने का दिल हो तोह आ जाना और बाकी हम बात कर हे सकते है.", अर्जुन ने भी हामी भरी. दोनों हे अलग हो गए थे क्योंकि अर्जुन को डर था के कोई भी देख सकता है. वो बहार आ गया तोह पिछले दरवाजे से ऋचा बबिता के पास पहुंच गयी.

"वह दीदी, कमाल हे हो आप तोह. इतनी हिम्मत कैसे है आप में?"

"प्यार में बस दिल लगाना होता है ऋचा, ऐसी हिम्मत तोह फिर कुछ भी नहीं जब लोग मरने से हे न डरे. प्यार हो चूका है मुझे इस से लेकिन अब इजहार करना जरुरी नहीं है क्योंकि सम्बन्ध तोह बन्न हे चूका है. इसमें हांसिल क्या और खोना क्या. जितना मिले खुश रहो और बाकी बात बाद में करेंगे. चल दादा से भी मिल लेते है और विनीता को यही रुकवा ले आज.", बबिता भी बहार हे आ गयी जहा सभी जाने लगे थे.

"चाचा, विन्नी को यही छोड़ दो आज. रात को लेके जाना हो तोह ले जाना नहीं तोह सवेरे बिजेन्दर हे छोड़ देगा.", बबिता को देख कर कौशल्या जी खुद चल कर उस तक आयी. गले से लगा कर उन्होंने ढेरो आशीर्वाद दिए बबिता को और उमेद को भी बोल दिया के आज विन्नी यही रुक जाएगी जो खुद भी तैयार थी. अर्जुन अपने दादा दादी को ले कर निकल चला और उमेद चाय पीते हुए कुछ अलग हे khet-khalihaan की बातें कर रहा था अपनी ताई से.

.

.

घर पहुंचते हे अर्जुन ने अपनी दादी के लिए दरवाजा खोला और उनके साथ हे अंदर चला आया. बहुत दिनों के बाद उसको हलकी थकान हो रही थी लेकिन मैं शांत था. प्रियंका दीदी तीनो के लिए पानी ले आयी और संजीव भैया भी इधर आ गए थे दादा जी के कमरे में.

"मैं तोह चला दादी सोने और आप जो भी काम हो 12 बजे के बाद हे करवाना.", अर्जुन की हालत वो भी समझ सकती थी क्योंकि कल शादी में भी उसने काम करवाया था और फिर गाँव जाना और आज इतना सफर तये करना थकने वाला हे काम था.

"हाँ, तू आराम कर ले और तुझे कोई परेशां नहीं करेगा. शाम को दिल करे तोह स्टेडियम चले जाना नहीं तोह जो ठीक लगे वो करना. दोपहर के खाने पर आज संजीव के ससुराल से लोग आने वाले है. ठीक लगे तोह मिल लेना नहीं तोह सोया रहियो.", कौशल्या जी ने तोह आजादी दे दी थी लेकिन पंडित जी इस बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते थे.

"हाँ 3 घंटे आराम कर ले लेकिन उसके बाद अपने भाई के साथ मार्किट चले जाना क्योंकि मेहमान आएंगे तोह काम करना हे पड़ेगा. स्टेडियम न जाना हो तोह अपनी माँ और बहनो के साथ करीबी लोगो को निमंत्रण पत्र देने के काम निबटा देना. परसो के बाद तोह तुम हिलने नहीं वाले अपने चची माँ के पास से.", अर्जुन इस बात को सुन्न कर प्रसन्न हो गया था.

"हाँ दादा जी, कुछ लोगो को तोह इनविटेशन देने जाना है मुझे और माँ को भी साथ ले हे जाऊंगा. फिर सचमुच मेरा दिल नहीं करने वाला कही जाने का."

"तेरे दिल को मैं समझा दूंगी जो स्टेडियम से छुट्टी की तोह कल से. दूसरे घर में भी बिस्टेर लगने है और ब्याह के घर में ढेरो काम पड़े है जो तू कर या न कर लेकिन तेरा रूटीन खराब हुआ तोह फिर तेरे दादा और तेरा सामान बगीचे में मिलेगा. जा कर थकान उतार अपनी और फिर ठीक 12 बजे यही आ जाना.", अर्जुन लाचारी से अपने दादा को देखने लगा जो खुद भी खामोश थे.

"हाँ अब यही तोह करना है मुझे.", अर्जुन निकलने हे लगा था के फिर से आवाज आयी दादी की.

"चाबी ऋतू के हवाले कर दियो कार की और अगर संजीव ने तुझे कार दी तोह मैं इसको भी तुम दादा पौटे के साथ बहार करुँगी. आप मुस्कुराओ जी, ये 100 पे कार चला के लेके आया है लेकिन कोई कुछ नहीं कहेगा."

"मैडम वो सड़क के हिसाब से तोह चला रहा था, तुम्हारा चाँद 150 पे भगाये तोह शाबाशी देती हो. तू जा बीटा अर्जुन, ये मोहतरमा आज इधर आना नहीं चाहती थी इसलिए भड़क रही है. संजीव बीटा तुम एक बार मल्होत्रा जी के घर चले जाओ, उनसे कहना के फाइल मंगवा ले मैं शाम को मिलने आऊंगा.", रामेश्वर जी ने जूते खोलते हुए सब बताया और उधर अर्जुन अपनी ताई जी और माँ से मिल कर ऊपर ऋतू दीदी के कमरे में चला गया जहा इस वक़्त वो अकेली थी.

"ये रखो चाबी और जगह दो.", अर्जुन ने कुरता उछाल कर एक तरफ रेणका और धम्म से किताब पढ़ती ऋतू की बगल में जा पसरा. चाबी ऋतू के सीने पर रखते हुए अर्जुन ने कस कर उसको भी साथ हे लगा लिया.

"ओह hello, कमरा खुला है और तुम din-dahade मस्ती में लगे हो.", चाबी एक तरफ रखती वो तुरंत कड़ी होती हुई दरवाजा बंद करने लगी. फिर एक नजर औंधे लेते अर्जुन पर डालने के बाद चिटकनी लगा कर खुद हे उसकी ब्याह के नीच आ लेती.

"आमने सामने मुँह करके सोते है न. मैं भी सारा काम करके अभी हे आयी थी ऊपर.", अर्जुन उनकी बात सुन्न कर खुश हो गया. अब दोनों हे एक दूसरे के साथ चिपक गए थे. 2-3 प्यार भरे चुम्बन करने के बाद अर्जुन तुरंत हे सो गया जिस से ऋतू समझ गयी थी की वो सचमुच सोने हे आया था. अकेले सोने का दिल नहीं होगा शायद.

"ी लव यू. चल अब दिन में हे सपने देखते है.", ऋतू ने भी अर्जुन की कमर पर हाथ रखते हुए आँखें बंद कर ली.

.

.

दत्त का परिवार का एक परिचय

सोमनाथ दत्त (55)राधिका के ताऊजी /Vidhayak-Karbori

मिनाक्षी दत्त (50) राधिका के ताईजी /कारोबारी महिला

मोहित दत्त (30) beta/karobar में maa-baap के साथ

विद्या दत्त (29) बहु

निकिता दत्त (27) beti/Naami 5 सितारा होटल की मालकिन

सुभाष चन्दर दत्त (51) राधिका के Pita/Prakhyat दवा कारोबारी

देविका दत्त (47) राधिका की Maa/Karobari महिला

राधिका दत्त (26) beti/Police अधिकारी

अखिल दत्त (24) बीटा/ मनमौजी

बाकी सदस्य समय आने पर सामने आएंगे.

.

.

दोपहर 12 बजे तक पूरे घर को दोनों कामवालियों के साथ रेखा जी और ललिता जी ने चमकवा दिया था और रसोई में कोमल और प्रियंका के साथ रुपाली भी जुट गयी थी. सम्बन्धी खाने पर आ रहे थे तोह हर चीज का उचित ध्यान रखा जा रहा था. कौशल्या जी ने इधर आते हे आँगन में बैठी आरती से अर्जुन को उठाने को कहा और वो भी रसोई में काम देखने लगी. आरती सब तरफ अर्जुन को देखने के बाद कुछ सोच कर ऊपर वाली मंजिल पर पिछले हिस्से में आ गयी. ऋतू का दरवाजा बंद देख दूसरी तरफ से तारा और अपने कमरे में दाखिल होती वो बीच का दरवाजा खोल कर अंदर आयी तोह मुस्कुराने लगी.

ऋतू को यु अर्जुन से लिपटे हुए सोया देख आरती को भी ाचा लग रहा था. दोनों के हे चेहरे एक दूसरे की तरफ थे और ऋतू का एक पाँव अर्जुन के ऊपर. कुछ भी गलत नहीं था वह. पूरे कपडे और सिर्फ आलिंगन में सोये वो प्रेमी कहो या bhai-behan.

"ऋतू, इसको उठा कर निचे भेज दे. दादी बुला रही है के सवा 12 हो गए है. संजीव भैया के ससुराल से लोग 1 बजे आ जायेंगे.", अर्जुन का ख्याल रखते हुए आरती ने सिर्फ ऋतू को हे हिलाया था जो मुस्कुराती हे आँखे खोल कर आरती को देखने लगी.

"चल मैं आयी इसको ले कर.", आरती भी बिना कुछ कहे चली गयी और ऋतू ने अपने नरम होंठो को अर्जुन के होंठो पर रखते हुए ाचे से चूम लिया.

"उठ जा ारु, दादी बुला रही है. रात को साथ सो जायेंगे अगर तेरा इतना हे दिल है तोह.", ऋतू जगाने लगी और अर्जुन ने आराम से उसको अपने साथ कस लिया.

"एक रात सोने से क्या होगा ऋतू, हर रात सोना है मुझे ऐसे हे. पता है मैं सपना देख रहा था."

"शहहह.. बताना मैट अगर वो हम दोनों का था और ाचा भी."

"उम्माह.. पूरा हे करूँगा अब तोह. वैसे आपकी खुशबु सबसे अलग और ख़ास है, मीठी मीठी सी.", अर्जुन ने भी बदले में एक किश करने के बाद खड़े हो कर खुद को व्यवस्थित किया और बाथरूम में चला गया. ऋतू ने तकिये के निचे से अपनी सफ़ेद ब्रा निकल कर पहनी और बालो में रबर लगाने के बाद दरवाजा खोल कर निचे चली गयी. अर्जुन 5 मिनट बाद अपनी दादी के सामने था.

"हो गयी नींद पूरी या और सोना है अभी? ये सामान ले आ जल्दी से, तेरी भाभी का शगुन का है. इधर उधर न चला जईओ, सामान ले कर सीधा वापिस घर."

"हाँ दादी सीधा यही आऊंगा वापिस. वैसे भाभी भी आएँगी क्या?", अर्जुन ने लिस्ट और पैसे लेते हुए पुछा तोह कौशल्या जी ने सर पे हाथ रख लिया.

"बैलबुद्धि है तू भी. अब होने वाली बहु कही खुद आती है क्या शादी का कार्ड देने अपनी ससुराल? चल जल्दी जा और जल्दी वापिस आना. मॉडल टाउन से मिल जायेगा ये सब तुझे.", अर्जुन हँसता हुआ अपनी रानी ले कर निकल चला सामान लाने और कौशल्या जी भी मुस्कुराने लगी. ऋतू के साथ आरती अब बैठक को व्यवस्थित कर रही थी. साफ़ चादर, सोफे के नए कवर और छोटे तकिये रखने के साथ साथ कालीन भी टेबल के निचे बिछा दिया गया था. वही रसोई में भी अब जिम्मेदारी रेखा जी ने संभल ली थी कोमल के साथ. ललिता जी खाने की मेज पर आरती के साथ काम करवाने के बाद कपडे बदलने के लिए अपने कमरे में चली गयी. आज राजकुमार जी भी ाचे से तैयार हो कर घर पे हे थे और संजीव भी shave-cutting करवा कर अब उजले कपडे पहने बार बार घडी देख रहा था.

"आज कुछ ख़ास है क्या?", शंकर जी जैसे हे हॉस्पिटल से वापिस आये तोह उनकी कार की चाबी ले कर संजीव बहार चल दिया और 2 मिनट में हे वापिस आ गया.

"अबे तू मेरी कार कहा कड़ी कर आया और यहाँ सिर्फ ये अर्जुन की दोनों कार हे कड़ी है?"

"वो राधिका के mummy-papa आ रहे है चाचा जी.", संजीव ने झेंपते हुए कहा तोह शंकर जी हंसने लगे.

"साले तू अभी से हमको बहार निकाल रहा है, बीवी आ गयी तोह पता नहीं के शहर में रहने भी देगा या नहीं. चल तेरे लिए तोह जान भी हाजिर है. वैसे ये दोनों कार अंदर क्यों कड़ी है?", शंकर जी तोह पेशे की वजह से हमेशा तैयार हे दीखते थे. संजीव के कंधे पर हाथ रखे वो छाया में आये तोह रुपाली उनके लिए पानी ले आयी.

"हटा तोह वो भी रहा था लेकिन दादी ने कहा के अर्जुन की हर चीज यही रहेगी. Scooter-cycle तक न हिलने दिया आप हे देखलो.", संजीव की बात पर शंकर जी मुस्कुराते हुए मजे लेने लगे.

"देखियो कही कल को कह दे के तू और कोई ले आ, राधिका अर्जुन को पसंद है."

"क्या चाचा जी आप भी. पसंद आएगी तोह ले लेगा वो, मैं नहीं रोकने वाला उसको. वैसे मुझे भी ये आज हे पता चला के वो लोग आ रहे है. दादा जी ने हे बोलै था के आँगन खाली रखना."

"मुझे भी तोह 10 मिनट पहले बुलाया है माँ ने. ले आ गए तेरे रिश्तेदार.", शंकर जी आँगन में खड़े हुए बहार हे देख रहे थे और 2 लम्बी कार इनके घर के सामने आ रुकी. शीशे भी काले थे और ये देखते हे चाचा भतीजा गेट की तरफ चल दिए. ड्राइवर को अगली गाडी अंदर लगाने का कहते हुए शंकर जी भी साथ वापिस गए और संजीव ने दूसरी वाली को बहार छाया में हे लगवा दिया. 2 कार में 5 लोग आये थे, ड्राइवर छोड़ कर.

"कैसे हो शंकर भाई?", अंदर वाली कार में सुभाष जी के साथ देविका जी पहले शंकर जी से हे मिले. ये दंपत्ति हमेशा की तरह शालीन और रौबदार थे. शंकर जी भी दोनों से बड़े प्रेम से मिल कर बाकी लोगो का इन्तजार करने लगे तोह ये 24 वर्षीया gol-matol सा गोरा लड़का इनकी कार से निकला और शंकर जी ने इसके साथ भी हाथ मिलाया.

"और भाई अखिल, कैसे हो यार? लगता है mummy-papa ने ज्यादा हे सख्ती दिखा दी तुम पर."

"अले अंकल पूछो हे मैट. कोल्डड्रिंक पीये एक हफ्ता हो गया है और गेम तोह इस महीने खेलने को भी नहीं मिली. कुछ समझाओ न इन्हे, जब मैंने काम नहीं करना तोह क्यों नहीं पीछा छोड़ देते.", ये इनका लाडला बीटा था अखिल, जो शंकर जी के साथ ाचे से पेश आता था. पिछली बार घर पर नहीं था तोह मिलना नहीं हो पाया.

"इसके साथ तोह इतनी ज्यादती मत किया कीजिये देविका जी. एक हे तोह प्यारा बचा है और टाइम आने पर देख लेना खुद सब संभल लेगा. चलो भाई तुम्हे आज कोल्डड्रिंक हे पिलाते है सबसे पहले.", शंकर जी उसको अपने साथ हे बैठक में ले आये और राजकुमार जी के साथ साथ पंडित जी भी इनसे मुलाकात करते हुए बैठक में आ गए. यहाँ भी अब ठंडक थी वातानुकूलन की वजह से. ऋतू हे ट्रे में paani-cola लेकर आयी थी और आते हे देविका जी ने उसको अपने साथ हे बैठा लिया था. वही बहार वाली कार से 2 युवतिया कुछ समय के बाद निकली. शायद खुद को सुधर रही थी इतनी देर तक. संजीव को देखते हे इस आधुनिक युवती ने गर्मजोशी से हाथ मिलाया

"कैसे हो संजीव? सॉरी यार वेट करवाने के लिए. ये है विद्या भाभी, मोहित भैया की वाइफ. भाभी ये है जीजा जी या जीजू फॉर शार्ट, संजीव शर्मा.", ये रेशमी साड़ी में खिलती गुलाब सी महिला भी रौबीली थी खूबसूरत होने के साथ साथ. लेकिन जिसने संजीव से हाथ मिलाया था वो कुछ ज्यादा हे ख़ास थी. गुलाबी रंगत, छरहरी काया पर हलकी भूर चुस्त जीन्स और एक सफ़ेद कमीज, आधी आस्तीन की. भूरे खुले बाल जो करने से सेट थे, पीठ तक लम्बाई लिए.

"मैं ाचा हु निक्की. नमस्ते भाभी. चलिए सभी आप लोगो का हे इन्तजार कर रहे थे.", संजीव भैया इन्हे ले कर अंदर चले और बाकी सबसे भी परिचय करवाया. सभी ठंडा पीते हुए औपचारिक बातें हे कर रहे थे और निमंत्रण सुभाष जी ने पूरे मान के साथ रामेश्वर जी को सौंप दिया था.

"देविका बीटा, तुम और बहु घर भी देख लो और ऋतू तुम्हे अपनी माँ और ताई जी से भी मिलवा देगी.", कौशल्या जी को निक्की के बारे में कुछ ज्यादा पता नहीं था तोह इतना हे कहा लेकिन निकिता भी साथ कड़ी हो गयी.

"दादी जी, मेरा नाम निकिता है और मैं आपकी बहु की बड़ी बहिन हु. ताऊजी की बेटी और आप न टेंशन हे न लो, मैं अपने आप घर भी देख लुंगी और खुद परिचय दे दूंगी.", कौशल्या जी को भी ऐसे हे बिंदास लोग पसंद आते थे और उन्होंने निक्की के सर पर हाथ फेरते हुए जो दिल करे वो करने का कह दिया.

"ये बड़े भाई साहब की बेटी है और सबसे ज्यादा व्यस्त किसी का जीवन है तोह वो निकिता का हे है माता जी. भाई साहब ने होटल लिया था और वो संभल नहीं प् रहे थे अपने बाकी कारोबार के साथ साथ राजनीती की वजह से. निक्की ने पढाई भी होटल प्रबंधन में की है और 3 साल से यही उसको चला रही, उम्मीद से भी बहोत बेहतर तरीके से. 3 साल में शायद 10 हे छुट्टियां ली हो इस लड़की ने अपने काम से. बचो के साथ बचा होना भी जरुरी है अगर हालत ऐसे हो तब."

"सुभाष, वो इस घर में है तोह मेरी बची हे है बीटा. निश्चिन्त रहो यहाँ तुम्हारी बेटी हमारी बेटी है, बहु तोह वो शायद 30 साल बाद हे बने.", कौशल्या जी के ऐसे कहने पर माहौल खुशनुमा हो गया था.

"शंकर भाई सही कहते है आपके बारे में. देविका ने भी बताया था लेकिन उस दिन के लिए शमा चाहता हु के घर नहीं आ पाया था."

"कोई न बीटा, काम से ऊपर तोह कुछ है हे नहीं. ये 35 साल में 5 महीने हे घर आये होंगे, जबकि साल में 60 अवकाश होते है पुलिस के. परिवार ऐसे हे चलता है और इसमें कुछ गलत नहीं.", कौशल्या जी की बात सुभाष जी को भी उचित लगी और इधर देविका जी अंदर सबसे मिल कर बड़ी खुश हुई थी. इतना मेलजोल और भरा भरा परिवार किसको पसंद ना आये. ललिता जी ने भी उन्हें रेखा के हे कमरे में बैठा लिया था और फिर उनके पास हे रेखा को छोड़ जल्दी आने का कह करो वो चली गयी.

"तुम शंकर भाई की बीवी हो? मतलब सचमुच तुम उनकी वाइफ हो और वो बहार जो तुम्हारे जैसी लड़की थी वो तुम्हारी बेटी है? और ऋतू भी तुम्हारी हे बेटी है?", देविका को ऐसे हैरान देख कर रेखा जी ने बस हाँ में सर हिला दिया.

"हाउ ओल्ड अरे यू? It's ुंबलीवबले."

"बिलीव में, ी ऍम मदर ऑफ़ फोर एंड ी गेस वे बोथ अरे अप्प्रोक्सिमाटेली शामे. यू अरे मोरे वेल मैनटैनेड थान एनीवन विथ ा डॉटर थिस ओल्ड.", यहाँ देविका जी के लिए भी अलग हे झटका था. एक घरेलु खूबसूरत महिला के साथ साथ रेखा जी उतना हे ाचा बोल लेती थी जितना कोई भी ाची शिक्षा लिए व्यक्ति.

"क्या बात है यार. मैं तोह खुद को फिट रखने के लिए जाने क्या क्या उपाए करती फिरती हु चाहे इस चक्कर में कमजोरी हे न आ जाये लेकिन तुम बहोत खूबसूरत हो और फिट भी. मेरा नाम देविका दत्त है, आपकी सम्बन्धी.", उन्होंने हाथ मिलते हुए कहा तोह रेखा जी ने भी उतने हे अपनेपन से स्वागत किया.

"रेखा शर्मा. सॉरी, आप बैठिये मैं कुछ ले कर आती हु आपके लिए.", अभी वो इतना हे कह रही थी की कोमल एक ट्रे में शरबत, काजू नमकीन ले कर आ गयी. देविका जी तोह कोमल से भी बहोत प्रभावित हो रही थी.

"यार सच कहु तोह मुझे अब लगता है के गेन्स बहोत ख़ास है तुम्हारे रेखा. She's रियली ब्यूटीफुल. बीटा तुम क्या करती हो?"

"आंटी अभी ग्रेजुएशन कम्पलीट किया है और ब में एडमिशन लिया है. थैंक यू सो मच.", कोमल इतना कह कर बहार चली गयी थी और ललिता जी इधर इनके साथ शामिल हो गयी. विद्या को भी माधुरी, प्रियंका में बोलने वाले लोग मिल गए थे और रसोई ऋतू रुपाली ने संभल ली थी. अर्जुन घर में आया तोह आरती को बहार से सब सामान दादी को पकड़ने का बोल कर ऊपर दौड़ गया कपडे बदलने.

"ये है संजीव भैया का कमरा, पहले ये हॉस्टल रूम जैसा हे था दीदी. वेइट्स, बुक्स और जाने क्या क्या कबाड़ रहता था लेकिन देखो अब तोह table-chair, मैनटैनेड बीएड, कर्टेंस और एक भी.", ऋतू निकिता को घर दिखा रही थी. यहाँ आने से पहले निक्की ने इन लड़कियों के कमरे, गयम भी देखि थी जो उसको बेहद पसंद आयी थी. वो खुद भी एक आधुनिक के साथ साथ शरीर का ध्यान रखने वाली एक मॉडल सी लड़की थी और ऋतू को साधारण चप्पल में भी अपने से एक इंच ऊँचा और इतना सुन्दर देख प्रभावित थी.

"यार तुम सही हो. साथ मिल कर रहते हो, सभी की प्राइवेसी भी है और जरुरत की हर चीज अपनी जगह पर. यहाँ तोह एक आदमी के पीछे 2 नौकर न हो तोह ऐसा लगता है गलत घर में आ गए. आदत थोड़ी बदलनी पड़ेगी मुझे. वैसे ये भी कमरा है या बस बहार निकलने का दरवाजा.?", ये कमरा अर्जुन का था जिसके बहार दोनों कड़ी थी.

"इधर जो रहता है उसका कोई अत पता नहीं होता. देखते है के ये खाली है या जनाब घर पे है.", ऋतू ने दरवाजा ठेला तोह वो पूरा हे खुल गया. सामने अर्जुन ने जीन्स के ऊपर अभी वो चुस्त नीली टीशर्ट फसाई हे थी और उसके तगड़े शरीर और छुपे चेहरे को निक्की उत्सुकता से देखने लगी लेकिन जल्द हे चेहरे भी सामने आ गया और वो पेट भी छुप गया जहा बड़े बड़े कटाव बने हुए थे. अब अर्जुन हैरान था के ये क्या हो गया है.

"सॉरी, ये भाभी की कजिन सिस्टर है निकिता है. मुझे नहीं पता था के तुम अंदर हे हो.", ऋतू ने हँसते हुए कहा और अर्जुन के परेशां चेहरे को देखने लगी.

"नीस तो मीट यू.", अर्जुन ने इतना हे कहा और बहार वाले रस्ते से हे निचे चला गया.

"बड़ा शर्मीला पहलवान है. संजीव से छोटा लग रहा है चेहरे से तोह लेकिन ये है कौन?", निक्की भी हंस रही थी.

"मेरी माँ का मुन्ना है ये दीदी. ारु. और ये शर्मीला तोह नहीं है बस टाइमिंग थोड़ी गलत हो गयी हमारी. वैसे ये इसका हे कमरा अगर इसने सोना हो तोह. बाकी ये कही भी पाया जा सकता है इस घर में. ख़ास तौर पर संजीव भैया यहाँ हो तोह उनके हे साथ.", ऋतू के साथ साथ सभी बहनो को हिदायत दी थी संजीव भैया ने की वो लोग अर्जुन का पूरा नाम न हे ले. लेकिन ऐसा बड़ो के साथ तोह मुमकिन हे न था. अर्जुन बैठक के अंदर आया तोह संजीव भैया कुछ कहते उस से पहले रामेश्वर जी ने हे परिचय करवा दिया.

"ये है जी मेरा छोटा पौता और शंकर का बीटा अर्जुन. अर्जुन ये है तुम्हारे अंकल और संजीव भैया के father-inlaw.", इस वक़्त सुभाष जी की आँखों में जो चमक अर्जुन को देख कर आयी थी उसका मतलब तोह किसी को भी नहीं पता चला लेकिन शंकर जी के साथ राजकुमार जी भी खुस हुए थे अर्जुन के आने और यु सुभाष जी को पूरी इज्जत के साथ अर्जुन द्वारा मिलने पर.

"चरण स्पर्श अंकल जी. शमा चाहता हु घर के हे काम से थोड़ा बहार था तोह आते हे नहीं मिल पाया आपसे.", अर्जुन के ऐसा कहने पर उन्होंने उसको अपने साथ हे बैठा लिया.

"शंकर भाई, ये क्या बाला है? पंडित जी माफ़ कीजियेगा लेकिन लड़का हमको पसंद आ गया है आपका तोह इसका रिश्ता हमारी भांजी से करवा देंगे तोह बड़ी कृपा होगी.", पहली हे बात ऐसी सुन्न कर जहा अर्जुन हैरान हुआ वही शंकर जी हंसने लगे.

"सुभाषी जी, आपकी भांजी किस कक्षा में है?"

"देखो शंकर भाई, मीनल थोड़ी आधुनिक लड़की है लेकिन पूरी संस्कारी हमारी निक्की और राधिका की तरह. ब पूरा किया है और बहिन उसके लिए उचित लड़का भी देख रही है. आपका परिवार और ऐसा लड़का मैं हाथ से नहीं जाने दे सकता.", अखिल दूसरी तरफ बैठा गौर से सब देख सुन्न रहा था.

"हाहाहा.. ये अभी 18 का है सुभाष जी, जितने लोग यहाँ बैठे है सभी थाने पहुंच जाएंगे अगर इसकी शादी करवाई तोह.", अब बारी सुभाष जी की थी हैरान होने की.

"क्या बात कर रहे हो शंकर भाई? बीटा तुम्हारे पापा मजाक कर रहे है न?"

"अंकल वो सच हे कह रहे है और ऊपर से मैं तोह हु भी इलेवेंथ क्लास में. अर्जुन ने शरमाते हुए ऐसा कहा तोह सुभाष जी भी हंसने लगे.

"पंडित जी, अब मैं खुद शर्मिंदा हु अपनी बात पर. लेकिन सच कहता हु के इसके लिए आपको लड़की नहीं खोजनी पड़ेगी."

"हाँ बीटा, वो ऐसा है के इनकी पौती है प्रीती और अर्जुन के साथ बचपन से रही है. छोल साहब ने तोह मजाक में कहा था के लड़का लड़की ज़िन्दगी भर साथ रहेंगे और हमने ये फैंसला कर हे लिया. आपको शंकर ने सीधा ना इस वजह से भी नहीं किया की आप घर आये है तोह ऐसा ाची बात नहीं के सम्बन्धी को नाराज करे. लेकिन दूसरी बात है रिश्ते की तोह अब उस से बेहतर हो या कोई भी लेकिन ये लड़का बांध चूका है.", छोल जी भी अपने भाई साहब के ऐसे कहने पर खुश थे और सुभाष जी को भी ये साफ़दिली पसंद आयी.

"बीटा, अब तोह हम भी देखना चाहेंगे शंकर भाई की होने वाली बहु को. एक बेटी के लिए इस घर आये है तोह दूसरी को देखना चाहेंगे. हमारे लिए आज से तुम भी दामाद जैसे हे हो क्योंकि मुँह से निकल गया तोह आज से हे प्रीती हमारे लिए बेटी सामान है. छोल साहब गुस्ताखी हो तोह माफ़ कीजियेगा."

"अरे कैसे बात करते है सुभाष आप. बेटी हमेशा मान होती है और ाचा है के आप मेरा भी सर ुचा कर रहे है, एक तरह से हमारे बेटे बन्न रहे है तोह गुस्ताखी कहा हुई. प्रीती भी यही है और आती होगी. देख लीजियेगा.", ये बातें करने लगे तोह अखिल ने इशारे से अर्जुन को अपने बराबर आने को कहा. सामने से हे Ritu-Priyanka के साथ प्रीती भी टेबल पर खाना लगाने आ गयी थी. देविका जी को भी इधर हे बुलवाया गया था लेकिन उन्होंने रेखा और ललिता जी के साथ खाने का फैंसला लिया.

"ये है जी प्रीती, और बीटा ये हैं संजीव के होने वाले ससुर जी.", शंकर जी ने हे परिचय करवाया तोह प्रीती ने दोनों हाथ जोड़ दिए ट्रे रखने के बाद.

"इधर आओ हमारे पास. तुम तोह सचमुच लाखों में एक हो बीटा. मुझे अब लग रहा है के ये अर्जुन के लायक तुमसे बेहतर तोह मैं भी ढून्ढ नहीं सकता था.", प्रीती थी भी तोह ऐसी की देखने वाला पहले आँखों में खो जाता था फिर उसके विलक्षण रूप पर जिसके साथ भारतीय संस्कृति का मिश्रण उसको बेजोड़ बना देता था. प्रीती शर्माने लगी और इधर सुभाष जी ने अपने बटुए से एक चंडी की तस्वीर निकाल कर उसके हाथ पर रख दी.

"दुर्गा उपासक है हम बेटी और तुम्हे यही आशीर्वाद दे सकते है के जीवन में हमेशा श्रेष्ट बनो, nidar-chanchal और स्वामिनी. अर्जुन 49 और तुम 51. इस से बढ़कर तू फ़िलहाल मेरे पास देने के लिए कुछ है नहीं बेटी लेकिन तुम ख़ास हो.", प्रीती ने भी उस चांदी की durga-tasvir को मुट्ठी में बंद कर लिया.

"थैंक यू सो मच अंकल. और बाकी मुझे नहीं पता के मैं क्या कहु.", प्रीती की मुस्कान देख वो भी गदगद हो गए.

"तुम कुछ मत कहो बेटी बस खुश रहो.", उन्होंने सर पर हाथ फेरते हुए कहा और प्रीती अंदर चली गयी. यहाँ सबका ध्यान अखिल पर गया इतने ाचे माहौल और सुभाष जी के ऐसे अपनेपन को देखने के बाद.

"यार तुम बर्गर नहीं खाते क्या? बॉडी ाची बनाई है लेकिन लाइफ में स्वाद भी होना चाहिए. मुझे तोह मैगी, बर्गर, कोल्ड ड्रिंक बहोत पसंद है. मम्मी अब मन करती है के मैं मोटा हो जाऊंगा.", अखिल पहले हे मोटा था और थोड़ा भोला भी. अर्जुन अब क्या जवाब देता उसकी बात का.

"पसंद तोह मुझे भी है लेकिन महीने में 1-2 बार खा लेता हु. वो दादा जी म्हणत करवाते है तोह करनी पड़ती है."

"यही तोह. बस यही सब ाचा नहीं लगता यार. तुम मेरे घर आना फिर मैं तुम्हे ले कर चलूँगा मार्किट. एक बार में 6 से काम बर्गर कोई नहीं खायेगा, कह देता हु.", अखिल की बात सुन्न कर सभी हंसने लगे तोह वो घूर कर अपने पिता को देखने लगा.

"बीटा तुम अब उसको वो करने को कह रहे हो जो तुम्हे पसंद है. मैं चाहता हु तुम वो करो जे अर्जुन करता है. बताओ अपने छोटे भाई को की तुम कब उठते हो?"

"इसमें क्या बुरी बात है? भाई मैं 2 बजे उठता हु, क्या करू नींद ऐसी हे है मेरी."

"इसमें क्या गलत है अंकल, मैं भी 4 बजे उठता हु."

"बीटा वो दोपहर के 2 बजे उठता है. आज रिक्वेस्ट की थी तब ये 10 बजे उठा वो भी अपनी दीदी के कहने पर. चलो अब खाना खाया जाये फिर, चलना भी है.", खाने का नाम सुनते हे अखिल तोह अर्जुन को भूल हे गया. और अर्जुन उठ कर अपने भैया के पास आ गया.

'ये सचमुच इंसान है?', अर्जुन ने बहोत हे हलकी आवाज में कहा तोह संजीव भैया ने मुश्किल से हंसी रोकी. इन दोनों को छोड़ कर सभी ने अपनी प्लेट लगा ली थी. अखिल बिना कटोरी हे एक प्लेट में पनीर की सब्जी, छोले, सलाद और दही डालने के बाद सबके लिए राखी गरम रोटियों की प्लेट अपने पास करके शुरू हो गया. एक गिलास कोला का भी कोमल दीदी उसके लिए वह रख गयी थी.

'बहार चल मेरी हालत ख़राब हो रही है.', संजीव भैया से कण्ट्रोल नहीं हो रहा था अब. दोनों हे वह से निकल लिए और गेट से इधर आते हे हंसने लगे.

"ओह बाप रे. ये आपका साला है या घटोत्कच? मुझे तोह हैरानी हो रही है के वो सिर्फ खाने की बात करता है और उठने का टाइम 2 बजे."

"हाहाहा. तुम्हारी भाभी यही कह रही थी की अखिल एक बचा हे है लेकिन अब पता लगा के भैंस का बचा है वो. मैं तोह खाना हे नहीं खा सकता उसके सामने बैठ कर. चल अंदर हे चलते है यार, भूख तोह लगी है.", संजीव भैया की बात सुन्न कर अर्जुन को यही करना ठीक लगा. 6 बजे 2 पराठे खाये थे उसने तोह भूख तोह उसको भी लग गयी थी लेकिन अखिल जितनी नहीं. दोनों भाई अनादर आये तोह टेबल पर फ़िलहाल कोई नहीं था.

"अलका हम दोनों का खाना यही लगवा दो.", संजीव भैया के इतना कहते हे टेबल पर 6 प्लेट प्रीती ने हे लगा दी. अर्जुन ने कुछ नहीं कहा लेकिन वो सोच रहा था के अब यहाँ वो लड़की न आ जाये बस. और वैसा हे हुआ.

"तोह ये है तुम्हारा छोटा भाई? यार संजीव सबके बारे में बताया था तुमने लेकिन इसको क्यों छुपा के रखा. भाभी आप भी इधर हे आ जाओ.", निकिता ने विद्या को एक तरफ बैठाया और खुद अर्जुन के पास आ गयी. अर्जुन ने नजरो से हे विद्या का स्वागत किया और उनके बराबर हे माधुरी प्रीती भी बैठ गयी.

"ये ख़ास है तोह इसको मिलने पर हे पता लग्न चाहिए न निक्की. शादी में तोह वैसे भी सबने मिलना हे था.", संजीव के ऐसे छुपाने पर सभी के चेहरे पर मुस्कान थी.

"वैसे तुम तोह संजीव से भी ज्यादा शर्मीले हो यार."

"मैं गॉड में बैठ जाता हु, इसलिए भैया ने नहीं बताया होगा.", अब जो अर्जुन ने कहा तोह निक्की भी हैरान हो गयी लेकिन बाकी सबकी हंसी छूट गयी थी इस बात को सुन्न कर विद्या के साथ साथ.

"वाह. ये टेढ़ी खीर है ननद जी, आप दूर हे रहो. इसलिए हे शायद संजीव जी ने इनके बारे में जीकर नहीं किया होगा.", विद्या भाभी की बात सुन्न कर निक्की ने अर्जुन को गौर से देखा और फिर बाकी सबको.

"तुम न बच्चू अभी मुझे जानते नहीं हो. कभी no man's लैंड पर मिलना फिर देखना के गॉड में बैठती हु या उल्टा लटकती हु.", निक्की ने भी ये शरारत से कहा था और प्रीती हंस रही थी. अर्जुन ने प्रीती की ये अनुमति मिलते हे भैया को भी देखा जो उसको उत्साहित कर रहे थे.

"ऐसा है न आप बस जगह, समय और दिन बता दो. रस्सी भी मैं ले कर आ जाऊंगा, अगर लटकाना चाहो तोह. लेकिन लगता नहीं आपसे रस्सी सम्भलेगी और फिर होगा डबल नुक्सान जो मैं आपके हे ऊपर आ गिरा तोह.", ये द्विअर्थी मजाक इतना भद्दा भी नहीं था जो ऐसे मौको पर कही ज्यादा हो सकता है. लेकिन निक्की ने तोह नजरे से बदल ली.

"अब निक्की ये मैट कहना के क्रेन लेके आणि पड़ेगी? बात दोनों के बीच है तोह तीसरा नहीं आएगा. भाभी भी नहीं और इधर से भी कोई नहीं.", संजीव भैया को सबके साथ शामिल होते देख माधुरी दीदी के साथ प्रियंका दीदी भी खुश हो रही थी. वो टेबल पर सब्जी के बर्तन रखने के साथ साथ इस चुहल का मजा ले रही थी.

"हाँ हाँ क्यों नहीं. इसको तोह होटल के पांचवे माले से निचे लटकाऊँगी मैं और मुझे किसी की हेल्प नहीं चाहिए. निकिता दत्त नाम है मेरा, ऐसी वैसी लड़की नहीं hu.",Sanjiv भैया भी कुछ वैसा हे सोच रहे थे जैसा इस वक़्त प्रीती. दोनों को पता था के मुसीबत मोल ले रही है. मजाक ज्यादा हुआ तोह निक्की का बुरा हाल होने वाला है.

"मंजूर है और मैं खुद हे लटक जाऊंगा बस बात वही है. गॉड में लेके चलना मुझे फिर दसवे से हे लटका देना चाहे."

"बड़े हे दीठ हो यार तुम, गॉड के पीछे हे पड़ गए."

"आपने हे कहा था मैं शर्माता हु. अब बताये क्या बात मानु मैं.", अर्जुन मासूम सा चेहरा बनाते हुए निक्की को देखा तोह एक पल वो भी उन सलेटी आँखों में खो सा गया था और निक्की भी लेकिन दोनों हे टूररत प्लेट में खाना डालने लगे.

"संजीव यार, तुम्हारा घर बहोत ाचा है. मुझे तोह सचमुच बड़ा ाचा लगा यहाँ आ कर. उतनी हे ाची है तुम्हारे सभी बहने.", निक्की ने विषय बदल दिया था लेकिन हालत थोड़ी बुरी थी अंदर से. वही अर्जुन ने प्लेट लगाने के बाद विद्या भाभी की तरफ कर दी और ऐसे हे प्रीती और माधुरी दीदी को देने के बाद अपने भैया के लिए लगाने लगा. प्रीती ने भी एक प्लेट अलग से लगाने के बाद बिना चावल के अर्जुन की तरफ कर दी. निक्की के साथ साथ विद्या भी ये देख रही थी.

"राधिका यही रहने वाली है और तुम दोनों बहनो के साथ बेस्ट फ्रेंड्स भी हो तोह जब दिल करे आ जाना. वैसे इनविटेशन देना गलत हे होगा, तुम्हे तोह फुर्सत मिलने नहीं वाली अपने काम से. आज पता नहीं ये करिश्मा कैसे हो गया. शायद भाभी जी ने कहा होगा."

"भाभी को तोह मैं साथ ले कर आयी हु. दिल्ली पास में है लेकिन होटल संभालना यू क्नोव. न न करते हुए भी कभी कभी 15-16 घंटे तक स्टाफ और सर्विस पर लगाम कसके रखनी पड़ती है. फ़िलहाल सीजन नहीं है तोह थोड़ा फ्री हु. लेकिन अब समय निकला करुँगी क्योंकि बहोत स्ट्रेस ले लिया. मोहित भैया को टाइम नहीं है तोह अब भाभी मेरे साथ देखेंगी सब."

"आपका होटल है दिल्ली में?", अर्जुन ने सलाद निक्की की तरफ बढ़ाया तोह उसको भी ाचा लगा के ये लड़का हर चीज का ख्याल भी रखता है और बातें भी ाची कर लेता है.

"हाँ है तोह सही लेकिन होटल काम आफत है यार. वैसे बड़ी म्हणत से मैंने उसको दिल्ली के टॉप 5 में पंहुचा दिया है वो अलग बात है के 5तह पोजीशन है. होटल क्सक्सक्सक्स और एक 5 स्टार होटल है. कभी दिल्ली आओ तोह सीधा होटल आना और किसी से कुछ नहीं कहना बस बोल देना तुम कौन हो."

"यहाँ तोह मेरी उड़ान ननिहाल से आगे तक नहीं है और आप कह रही हो दिल्ली आने की. ज्यादा से ज्यादा दूर मैं मार्किट हे जाता हु अपने घर से. लेकिन कभी भैया या दादा जी के साथ गया तोह आपसे मिलने और होटल देखने जरूर आऊंगा.", अब निक्की को हैरत हुई थी के ये लड़का दुनिया हे नहीं देखता. उसने संजीव की तरफ नजर की तोह संजीव भैया ने हे बात संभाली.

"ऐसा है न मेरी इन्शुरन्स वाली जॉब की वजह से मैं भी घर नहीं रहता ज्यादा और papa-chacha भी. अर्जुन हे घर संभालता है और यहाँ के सारे काम देखता है. लेकिन ये जल्दी हे दिल्ली भी जायेगा मेरे साथ और बाकी हर जगह जहा इसका दिल करेगा जाने का.", निक्की ने अब सहमति में सर हिलाया जब वजह साफ़ हुई.

"तोह अर्जुन जी, आप खाली समय में क्या करते है?", ये विद्या भाभी ने पुछा था जो माहौल में बेहतर महसूस कर रही थी.

"एक तोह भाभी जी मैं बहोत छोटा हु तोह 'जी' मत लगाए. और दूसरा मेरे पास फ्री टाइम देख कर कोई न कोई मुझे काम में लगा हे देता है. वैसे मैं भी चालाक हु, या तोह कही जा कर सो जाता हु या फिर सामने हे नहीं आता किसी के.", अर्जुन के ऐसे जवाब पर भैया ने उकसे सर पर थपकी लगा दी.

"वाह. मतलब सचमुच इंटेलीजेंट हो तुम. लेकिन जब सामने नहीं आते तोह क्या करते हो?", अब अर्जुन क्या कहता के वो ऐसे समय में किसी के साथ क्या करता है.

"बस यूनिवर्सिटी घूमने चला जाता हु, दोस्तों से मिल लेता हु या फिर खली सड़क पर मोटरसाइकिल चलता हु.", अभी यहाँ ये सब बात कर रहे थे और बहार गेट पर एक और कार आ रुकी. ड्राइवर को हे बहार वाले व्यक्ति ने सन्देश दिया तोह ड्राइवर बैठक में चला गया.

"सर, बहार कोई शास्त्री जी आये है और अर्जुन बाबा को बुलाया है.", ये सुन्न कर रामेश्वर जी अपनी जगह से खड़े हो गए. टेबल से बर्तन जा चुके थे और साफ़ किया जा चूका था.

"हम खुद हे आ रहे है भाई.", रामेश्वर जी को ऐसे बीच में उठते देख सुभाष जी थोड़ा हैरान हुए.

"ये शास्त्री जी?"

"आपने सुना होगा उनके बारे में सुभाष जी, आचार्य हंस उर्फ़ आचार्य प्रमोद शास्त्री जी.", शंकर जी ने नाम लिया तोह सुभाष जी के साथ साथ राजकुमार जी को भी हैरत हुई. छोल साहब ने हां भरते हुए अपने भतीजे की बात की पुष्टि की तोह सुभाष जी भी खड़े होने लगे.

"बैठे रहिये भाई, पापा गए है तोह वो उन्हें अंदर हे ले कर आएंगे. आज हे वो बहार से आये है और शायद आते हे अर्जुन से मिलने चले आये.", शंकर जी ने बताया के वो अर्जुन से मिलने आये है तोह दत्त साहब को और जिज्ञासा हो गयी.

"वो किसी से खुद मिलने भी आते है? और इतना लगाव की बहार से आने के बाद इंसान jet-leg से उबरने की जगह मिलने चले आये. सचमुच आचार्य जी की हे बात कर रहे हो ना आप? देविका के साथ साथ मैं भी उनकी jiwan-shaili का अनुसरण करता हु. 2 बार उनके शिविर में भी गया हु लेकिन व्यक्तिगत भेंट नहीं हुई.", इतने पैसेवाला व्यक्ति और हैरान हो गया जब आचार्य जी नीली जीन्स, बटन वाली टीशर्ट और सांडले पहने कमरे में दाखिल हुए. शंकर जी ने हाथ जोड़ कर उन्हें जगह दी तोह वह कंधे पर हाथ रख कर मुस्कुराते हुए दीवान पर हे बैठ गए.

"यार आप लोगो की महफ़िल खराब करने का उद्देश्य कदापि नहीं था लेकिन अर्जुन के लिए कुछ लाया था और बिना फ़ोन किये चला आया. ऊपर से पंडित जी ने भाभी जी के हाथ की बानी चाय की रिश्वत पेश कर दी तोह अंदर आना पड़ा.", उन्होंने छोल साहब से हाथ मिलते हुए उनका एक हाथ दोनों हाथ में पकड़ कर प्रेम जताया और फिर सुभाषजी की तरफ भी नमस्कार किया.

"हाँ तोह अब देवर जी चाय के हे नाम से अगर आते है तोह मैं 3 बार बनाने को तैयार हु.", कौशल्या जी इधर चली आयी तोह शास्त्री जी ने इन्हे भी भाभी का मान देते हुए हाथ जोड़े.

"सच कहता हु भाभी जी के 10 वर्षो से मैंने चाय नहीं पी थी और जब पी तोह वो आपके हे घर. और प्राण भी यही है के ये नियम ऐसा हे रहे."

"आप बैठो, सभी के लिए मैं चाय ले कर आती हु."

"आप है आचार्य प्रमोद शास्त्री जी और शास्त्री जी ये है सुभाष चन्दर दत्त जी, हमारे जयेष्ठ पौत्र को कन्यदान करने वाले आप हे है.", रामेश्वर जी ने बड़े निराले अंदाज में परिचय दिया तोह शास्त्री जी ने भी हाथ जोड़ दिए.

"सर आपको देखने की लालसा वर्षो से थी लेकिन इस घर में कदम रखते हे जैसे मनोकामना पूरी हो गयी. विएना में भी मिलना नहीं हो पाया था और हृषिकेश में भी नहीं.", सुभाष जी इधर चरण स्पर्श करने लगे तोह उन्होंने खुद हे रोक दिया.

"भाई, पाप का भागी मत बनाओ हमे. एक तोह पहले हे बिना बुलाये हम यहाँ खुद को आमंत्रित कर बैठे है और ऊपर से फ़िलहाल हम पंडित जी के मित्र है.", वो आगे कुछ कहते उस से पहले अर्जुन बेधड़क आता उनके गले लग गया.

"तोह आप अब आ रहे है मिलने? पहले कहा था के एक दिन के लिए बहार जा रहा हु, मैं हिमानी दीदी का एडमिशन करवा दू बस. लेकिन फिर गायब हो गए आप. अब जितने मेरी छुट्टियां है आप भी छुट्टी पर रहेंगे.", अर्जुन को तोह जैसे यहाँ अब कोई दिखा हे न था और वैसे हे स्नेह से आचार्य जी भी उसको देखने के बाद सीने से लगाए कुछ महसूस करने लगे.

"नहीं जाता अब कही भी 15 जुलाई तक. इसलिए बहार गया था के तुम्हे और हिमानी को समय दे सकू. आ तोह मैं सवेरे 9 बजे हे जाता लेकिन भाभी जी ने बताया के तुम सोने लगे हो तोह मैंने इन्तजार करना हे बेहतर समझा. जानते हो हम तुम्हारे लिए क्या ले कर आये है?", आचार्य जी ने जिस भाव से अर्जुन को अपने साथ लगाया हुआ था कमरे में बैठे सभी व्यक्तियों को एहसास हो गया था के इनका रिश्ता बहोत ख़ास है. रामेश्वर जी तोह भली भाँती जानते थे के ये छाया भी अर्जुन को सुरक्षित रखने वाली है.

"ये देखो क्या लाये है लेकिन इसको मैं मेरे घर ले जाने वाली हु.", प्रीती ने वो छोटा सा पिल्ला जो टोकरी में रखा था कमरे में आते हे दिखाया तोह अर्जुन फिर से उनके गले लग गया और रामेश्वर जी ने उस टोकरी को थामते हुए जैसे कुछ जांच की और वैसे हे सुभाष जी ने भी बड़े ध्यान से इस महीने भर के पिल्लै को देखा.

"हाँ अब ये तुम दोनों बचो की जिम्मेवारी है की इसका ाचे से ख़याल रखना. प्रशिक्षण देने के लिए तोह पंडित जी है हे हमारे पास.", प्रीती फिर से वो टोकरी ले कर अंदर चली गयी थी.

"थैंक यू सोऊ मच. मैं इसका पूरा ध्यान रखूँगा."

"बीटा वो रखना भी पड़ेगा तुम्हे और ये आपने सचमुच जैसे मेरी एक समस्या हे हल कर दी शास्त्री जी. ये रॉटवेलर हिंदुस्तानी नहीं है और ख़ास है."

"जी पंडित जी वही मैं भी देख रहा था के ये अलग है. मेरे फार्म पर भी 2 श्वान है इस नेसल के लेकिन ये अलग है."

"सुभाष जी अपने बचे को मैं मिलावट नहीं दे सकता था पहले उपहार स्वरुप. इसने बताया था के एक सुलतान है तोह हमने भी जर्मनी की ये वफादार नेसल चुनन ली. यही देने के लिए मैं आया था और इस से तोह मैं सवेरे 4-5 बजे मिल हे लूंगा. जाओ बीटा अब तुम अंदर बैठो हम यहाँ चाय पी लेते है.", आचार्य जी ने खुद हे माहौल से अर्जुन को बहार किया था क्योंकि यहाँ मेहमान थे उनके पास.

"आचार्य जी कभी इन्दर से भी मिल लीजियेगा. आखिरी बार वो कॉलेज में हे आपसे मिल पाया था और फिर आप यहाँ दिखाई हे नहीं दिए.", शंकर जी की ये बात सुन्न कर रामेश्वर जी भी थोड़ा हैरान थे.

"इन्दर. नरिंदर शर्मा, वो ख़ास है शंकर और अब तोह भाई मैं यही हु तुम्हारे पड़ोस में. नरिंदर से मिल कर मुझे भी ाचा लगेगा और हो सके तोह मुझे उस व्यक्ति से भी मिलवा देना जो उसके साथ हमेशा दीखता था. वो तेजस्वी लड़का था और निर्मल भी. तुम लोग उसको अज्जू बुलाते थे न?", शास्त्री जी ने ये जीकर किया और इधर मेज पर चाय की ट्रे रखती कौशल्या जी के हाथ हलके से हिल गए.

"वो तोह अब मुमकिन नहीं है आचार्य जी. नरिंदर हे बता देगा आपको इस बारे में. खैर हॉस्पिटल तोह आपको आमंत्रित नहीं करना लेकिन कभी घुड़सवारी के लिए टाइम निकल सकते है.", शंकर के ऐसा कहने पर उन्होंने तुरंत हाँ कह दी.

"शनिवार को चलते है भाई, हम लेने आ जायेंगे. तुम घडी देख रहे हो मतलब वापिस ड्यूटी जाना है.", उनके जवाब पर शंकर जी भी प्रसन्न हो गए और सबसे इजाजत ले कर वापिस ड्यूटी पर चल दिए.

"सुभाष जी, आपका जब भी दिल करे आप मिलने आइये और मुझे भी ाचा लगेगा आपके साथ यहाँ पर चाय पीना. Ba-sharat पंडित जी और छोल साहब हमको बगीचे में बैठने की अनुमति दे तोह.", चाय की चुस्की लेते हुए उन्होंने कौशल्या जी की भी तारीफ की जो यही बैठी थी.

"घर की मालकिन मैं हु देवर जी. आप आने वाले बनो बस और इन्हे भी ाचा लगता है के अर्जुन के अलावा आप इस घर को भी अपना समझते है."

"भाभी जी डोर ऐसी बांध चुकी है के लोगो को शिक्षा और सबक सीखने वाला खुद याचक बन गया है. आपने जिस तरह मेरी हिमानी को प्यार दिया है, वो उपकार हे है इस फ़कीर पर. अर्जुन जो है सो है और उसके साथ जुड़ाव जीवन भर रहने वाला है लेकिन आज मैं आपको और पंडित जी के दिए संस्कारो को नमन करने आया हु. मेरी बची अब निर्भीक रहती है घर पर और ये परियां जो आपके घर को स्वर्ग बनाये रखती है वह भी इन्होने सब माहौल जिवंत बना दिया है. आपका हरिणी हु मैं इसके लिए."

"अब वो सिर्फ आपकी कहा रही शास्त्री जी, प्रीती और ऋतू तोह खुद हिमानी से मिलने को तैयार रहती है. कॉलेज में भी कोमल प्रियंका साथ रहेंगी बिटिया के तोह अब आप इस बात के लिए तोह कुछ सोचिये भी मैट. वो हमारी उतनी हे है जितना आपके लिए अर्जुन.", ये बात छोल साहब ने कही थी और इधर अंदर आती देविका जी के साथ साथ निक्की भी इन महानुभाव को देख कर जड़ हो गयी.

"सर, आप योग गुरु आचार्य..

"बेटी सिर्फ अर्जुन का एक और दादा जी कहेंगी तोह उचित रहेगा. तोह आपकी सुपुत्री है पंडित जी के इस खूबसूरत बगीचे का अगला विशेष फूल.? भगवन आपको खुश रहखए और दीर्घायु बनाये.", आचार्य जी ने खड़े हो कर खुद हे उनका स्वागत किया और 3-4 मिनट बाद इजाजत ले कर चले गए. इस बार छोल साहब ने वादा किया था उनके यहाँ पंडित जी के साथ आने का और अर्जुन उनके साथ हे बहार निकल गया. अभी उनकी बातें हुई हे कहा था.

"पड़ती जी, सच कहे तोह हमारा आना सचमुच सफल हो गया. जिन्हे कहा कहा नहीं देखा और मिल न पाए आज वो सामने से मुझे बेटी बोल कर गए है.", देविका जी के तोह चेहरे पर नूर हे आ गया था. निक्की अभी तक हैरान थी लेकिन विद्या को कुछ ख़ास नहीं पता था.

"बेटी, उनका मोह अर्जुन के साथ है और अर्जुन भी उनके साथ आत्मिक तौर पर जुड़ा है. व्यक्ति दिल जुड़ने पर बाहरी आडम्बर और ओहदे से परे हो जाता है. मैं भी पहली बार जानकारी मिलने पर इतना हे हैरान था लेकिन शास्त्री जी ने तोह मेरी धर्मपत्नी को हे भाभी बना कर खुद को मुझसे छोटा कर लिया. प्रेम इंसान को हर सांचे में ढाल देता है किसी तरल की तरह.", रामेश्वर जी भी कुछ कुछ शास्त्री जी की तरह हे बतियाने लगे थे.

"सत्यवचन. मुझे तोह पहले समझ हे नहीं आया था लेकिन फिर अर्जुन और उनका स्नेह देखा था मैं भी लाजवाब हो गया देविका. पता नहीं बेटी के घर अब कितनी चाय पीनी पड़ेगी निकट भविष्य में.", सुभाष जी के कथन पर पंडित जी के साथ साथ छोल साहब भी हंस दिए.

"वैसे अंकल जी, मेरा दिल है के पर्सनली उनसे मिलु. उनकी बुक्स मैं पढ़ती हु और योग को भी फॉलो करती है. मेरी तोह आवाज हे नहीं निकली उन्हें देख कर. वो फिर कब आएंगे?", निक्की की जिज्ञासा का जवाब कौशल्या जी ने दिया.

"अर्जुन ले जायेगा तुम्हे बीटा, मिल लेना जितना दिल करे. हाँ अभी भी दोनों बहार कार में बैठे है लेकिन इस वक़्त तोह शायद वो किसी से न मिले.", कौशलय जी ने अर्जुन का जीकर ाचे से किया था और देविका जी ने उसको देखा भी नहीं था. आचार्य जी चले गए तोह अर्जुन इधर आ गया जिसको देख कर देविका की नजरे वैसे हे गड्ड गयी जैसे सुभाष जी की पहली बार गाड़ी थी.

"नमस्ते आंटी जी.", अर्जुन इतना बोल कर दादी की बगल में जा बैठा.

"ये हैं जी अर्जुन, घर का सबसे छोटा बचा. बीटा ये है तुम्हारी भाभी की माता जी.", कौशल्या जी ने परिचय दिया तोह देविका जी ने भी स्नेहा से उसको देखा.

"तुम्हारे मित्र तोह बीटा उम्र में काफी बड़े है तुमसे.", छेड़ते हुए या बात कही गयी थी लेकिन अर्जुन आज खुश था

"मित्रता तोह उम्र से नहीं होती आंटी जी विचारो से होती है. मेरे सबसे ख़ास मित्र तोह मेरे दादा जी और दादी है, ये कभी कुछ थोपते नहीं मुझे पर लेकिन सही गलत ऐसे सिखाते है जैसे hum-umar समझदार. आचार्य जी भी इनके हे जैसे है बस वो मुझे मुझसे बेहतर बनाने में लगे रहते है. तोह है तोह वो भी दादा जी हे. वैसे आप भी योग करती है न?", अर्जुन ने मित्रता का सबक सीखने के साथ हे सवाल कर लिया.

"हाँ और वह भी लगता है उतना असर नहीं कर रहा क्योंकि सब खुद हे करना पड़ता है. तुम्हारे जैसे मित्र नहीं है हमारे पास."

"हाहाहा. मैं इस पर कुछ नहीं कह सकता. लेकिन आप जब चाहे आचार्य जी से मिल सकती है, वो 15 जुलाई तक तोह मेरे साथ हे है इधर.", अर्जुन के इस निमंत्रण को उन्होंने भी स्वीकार कर लिया.

"शादी के बाद जरूर आएंगे बीटा हम तुमसे मिलने. शायद कुछ ज्ञान पहले तुमसे लेना होगा तभी आचार्य जी से मिलना ठीक रहेगा. उनका व्यक्तिगत जीवन किसी को भी नहीं पता लेकिन तुम उस जीवन में जरूर हो. अभी हमको इजाजत दीजिये, जल्द हे मिलते है शादी के अवसर पर.", सभी उनके साथ हे बहार चल दिए और अखिल कार के अंदर हे सोया पड़ा था एक चला कर.

"मैं इधर हे हु मौसी के घर तोह कल हे वापिस आउंगी चाचा जी.", निक्की अपनी भाभी के साथ कार में जाने से पहले हे ये बता गयी थी और एक इशारा संजीव से भी किया था फ़ोन करने का. जाने से पहले संजीव भैया ने भी कुछ बातें देविकाजी और सुभाष जी से की thi.Wo सभी अर्जुन को गले लगा कर वापिस निकल चले. आमंत्रित करने आये थे और कुछ ख़ास ले कर चले गए. इस सबमे शाम के 4 बज चुके थे और घर में बहोत काम बाकी थी. अर्जुन ने भी अपनी माँ के साथ 4 ख़ास जगह जाना था आज कार्ड देने.

.

.
 








अर्जुन के घर का नक्शा Raguhalkal भाई
 




बस एक कलम वो कमाल कर गयी

हसरते हजार शब्द बयां न कर सके
 
अपडेट 132

चाहत (2)


"तोह बबिता दीदी अब तोह बता दो न के क्या ख़ास हुआ? शादी हो गयी तोह सुहागरात भी हुई होगी?", हवेली पर सभी आराम कर रहे थे लेकिन ऊपर वाली मंजिल पर बंद कमरे में विन्नी और ऋचा ने बबिता को घेर रखा था जो एक तकिया गॉड में लिए मुस्कुरा रही थी. पहले तोह ऋचा और विन्नी अपने में हे लगी रही थी और बबिता ने आराम किया था. कुछ समय दोनों ने अनुपमा के साथ बिताया था और दोपहर में खाने के बाद सभी के सोने पर ये तीनो यहाँ बैठी थी. ऋचा को तोह मजा आ रहा था विन्नी के इस सवाल से क्योंकि अब बबिता दीदी फंस गयी थी.

"तू ब्याह करवा ले विन्नी फेर देख लियो. वैसे क्या पता तूने तोह ये खेल बहार हे खेल लिया हो किसी Gore-Kaale के साथ."

"ना दीदी, बिलकुल भी नहीं. सच कहती हु मैं कुंवारी हु और कोई बॉयफ्रेंड नहीं रहा कभी मेरा. ये ऋचा भी तोह ऐसी हे है बस आपको एक्सपीरियंस हो गया न तोह बता दो. झूठ मैट बोलना के कुछ नहीं हुआ, चाल बता रही है आपकी तभी आप यहाँ छुपी हो सारा दिन से.", विन्नी ने चाल पर ध्यान दिलाया तोह बबिता की मुस्कान बड़ी हो गयी.

"हुआ ऋ, बहोत कुछ हुआ कल रात. और सच कहु तोह एक राउंड तोह ऋचा को भी सुनवाया और उधर अक्षरा ने तोह खिड़की से लाइव देखा भी था सबकुछ. निहाल हे हो गयी हु मैं तोह लेकिन सवेरे हिम्मत हे जवाब दे गयी उस मर्दानगी के सामने.", बबिता बेबाक थी और विन्नी को ये पता था. लेकिन अब सुन्न न था क्योंकि दिल तोह विन्नी का भी किसी के लिए मचल हे रहा था. उसको क्या पता था के दोनों एक हे इंसान से जुडी है.

"क्या? अक्षरा ने सब देखा और इसने सुना भी?", अब ऋचा झेंप गयी.

"विन्नी ये तोह बहोत खुल्लम खुल्ला बोल रहे थे, गन्दी लैंग्वेज में और सच कहु तोह मैं बहक गयी थी बस आवाज सुन्न कर हे.", ऋचा को सब याद आ गया था.

"वाओ. बबिता दीदी खुल के बताओ न और सचमुच जीजू पहलवान हे होंगे जो आपको थका दिया और चाल हे हिला दी.", विन्नी के जीजू कहने पर ऋचा और बबिता हंसने लगी.

"सचमुच पहलवान हे है. लेकिन एक बात कहती हु याद रखना, मिलान न दिल से होता है और फिर सामने वाला कौन या कैसा है मायने नहीं रखता जब दोनों भरपूर प्यार करे. एक रात में हे मैंने वो सब कर लिया जो हर किसी के लिए मुमकिन नहीं विन्नी. आगे, पीछे और होंठो से भी. लेकिन तू याद दिला रही है तोह मेरे हलचल मच रही है. अब उस जैसा तोह कही कोई मिलने हे नहीं वाला. 5-10 मिनट वाला खेल तोह खेलता हे नहीं, कभी पौने घंटा तोह कभी पूरा घंटा. और ाचे दिल के साथ साथ औजार भी ऐसा के आखिरी हद्द तक जाकर लगता है. तू उसके निचे आ गयी तोह बुखार हो जायेगा पक्का और ऋचा जैसी तोह शायद मोहल्ला इकट्ठा कर ले.", ये सुन्न कर तोह विन्नी का दिमाग हिल गया के उसको और ऋचा को निचे लाने की बात. वही ऋचा तोह झेंप हे गयी.

"मैं उसके साथ कैसे कर सकती हु दीदी?", ऋचा के मुँह से अचानक निकल गया. और विन्नी ने भी ये बात पकड़ ली.

"विन्नी अपनी हे बहिन है और जैसे मैंने किया वैसे हे तू भी कर सकती है."

"कोई बताएगा यहाँ बात किसकी हो रही है?", विन्नी के ऐसा कहने पर ऋचा बबिता की तरफ देखने लगी.

"अर्जुन की हो रही है. गोलू तोह हॉस्पिटल हे चला गया था और पहले पूरी बात सुन्न ले विन्नी फिर जो मर्जी सोचती रहियो.", बबिता ने शुरुआत से ले कर आज सुबह तक का सब विवरण आधे घंटे में दे दिया. विन्नी के भाव बदलते रहे हर बात सुन्न कर लेकिन आखिर में वो भी मान गयी की बबिता को उसको प्यार करना जायज है. और फिर उसने अपने दिल की बात भी कह दी.

"मेरा बॉयफ्रेंड अर्जुन है बबिता दीदी. हमने किश किया है और मैं उसके साथ सिर्फ सोई भी हु. मतलब उसने हे अभी कुछ करने से मन कर दिया लेकिन अगली बार मैं वह जाउंगी तोह वह मुझे पूरा प्यार करेगा, जैसा मैं चाहती हु. और मैं जानती हु के उसकी शादी प्रीती से हे होगी जिसको वो सबसे ज्यादा चाहता है लेकिन प्यार करने में हर्ज तोह nahi.",Vinni के खुलासे से जहा बबिता खुश थी वही ऋचा सोच में पड़ गयी.

"तू क्यों सदमे में है? तेरा दिल तोह नहीं आ गया उस पर?"

"आ तोह गया है दीदी लेकिन वो कितनो के साथ है ये समझ नहीं आ रहा. प्रीती, आप, मुस्कान और जो 2 लोग आपने देखे जिनमे मेनका भी थी. फिर लाइन में अक्षरा, विन्नी और अब मैं भी उसके लिए कुक फील करती हु. लेकिन ये गलत नहीं हो रहा?"

"या तोह आम जिन्न ले या फिर टॉड ले जो तेरे हिस्से आये. देख बावली, वो है पंचायती झोटा और साड़ी भैंसे उसके aas-pas. जोणसि सामने जाएगी वो उस पर चढ़ेगा लेकिन ख़ास बात पता है के वो हवसी नहीं है. प्यार करेगा, समय बिताएगा और सामने वाला पहल करेगा तोह पूरा सुख देगा. हाँ विचार बदल रही है तोह तेरी मर्जी लेकिन विन्नी का मैं कह देती हु के अर्जुन ने अगर सोने के बावजूद इसके साथ कुछ नहीं करा तोह वो इसको प्यार करने लगा है. ये भी एक अलग हे सिस्टम है, दर्द नहीं देना चाहता वो इसको. खैर दर्द तोह वो मुझे भी न देता लेकिन इतना बड़ा है उसका.", बबिता ने हाथ का इशारा किया तोह दोनों ने मुँह पर हाथ रख लिया.

"कुछ कहूँगी तोह बुरा मैट मान न दीदी.", ऋचा ने ये बात कही तोह बबिता मुस्कुरा दी.

"बोल मेरी कबूतरी, कुछ भी बोल. ये बबिता अब कभी गुस्सा करेगी हे नहीं ज़िन्दगी में."

"वो कल रात मैंने बिजेन्दर भैया और अनुपमा भाभी का सन देखा, मतलब पूरा नहीं क्योंकि दिखा नहीं. वो दर्द में थोड़ा रोई और भैया ने वह गरम पानी से साफ़ किया. लेकिन जो कहना चाहती हु वो ये है की भैया और भाभी का तोह 10 मिनट भी नहीं चला. आप अलग बता रही हो.", ऋचा का चेहरा लाल हो चूका था विनीता भी मुस्कुरा रही थी.

"खून तोह आता हे है फिर चाहे मोमबत्ती से टॉड ले झिल्ली. और टाइमिंग अलग चीज है जैसे औजार का साइज. जितना तू बता रही है वह सही है लेकिन अर्जुन के जाने क्या फिट हो रखा है? वो मुझे इतनी देर में 3-4 बार करवा देता है फिर कही जा कर रुकता है. तभी तोह कह रही हु के उसका कण्ट्रोल और ताक़त बिस्टेर में बेजोड़ है और तेरी चीखे निकलवा देगा अगर जबरदस्ती करे तोह. लेकिन वो इस से अलग बड़े प्यार से करेगा. बाकी तेरी मर्जी है जिसके साथ तेरा दिल लगे उसके साथ कर लियो. और विन्नी से तोह प्यार अंधे को भी हो जाए, इसकी फिगर तोह देख जरा.", विन्नी सचमुच थी भी ख़ास लेकिन ऋचा काम नहीं थी.

"ऋचा भी सुन्दर है दीदी और कुछ कुछ ऋतू जैसी है."

"मैं हाथ नहीं लगाने देने वाली किसी को अपने आप के. अगर अर्जुन ने किया तोह ठीक नहीं तोह जो किस्मत में हुआ वो मंजूर. अब विन्नी को करने दो फिर आप दोनों मेरी हेल्प करोगी, बता देती हु."

"तेरी माँ को पता भी चला न तोह वो चाचा का जीना हराम कर देगी. तू विन्नी के साथ हे जा उनके वह और अर्जुन के साथ रह थोड़ा.", बबिता इतना हे बोली थी और दरवाजे पर thak-thak की आवाज सुन्न कर सभी एक दूसरे को देखने लगी. अगर किसी ने ये सुन्न लिया होगा तोह तीनो का हे काम हो गया. बबिता ने ऋचा को इशारा किया खोलने का तोह सेहमी हुई ऋचा दरवाजे तक जा रुकी. धीरे से एक तरफ का पल्ला खोलते हे वह उनकी तरह हे सेहमी अनुपमा कड़ी थी.

"अरे मेरी बलूंगड़ी, आजा अंदर आजा. लो जी शिकारी की जगह शिकार हे आ गया." बबिता के इस कथन पर विन्नी ऋचा को ज्यादा समझा नहीं आया लेकिन अनुपमा सलवार कमीज और सर पे चुन्नी लिए सेहमी हुई सी बबिता की बगल में आ बैठी.

"ओह बभीता जीजी, आपसे जरुरी बात करनी है.", बबिता ने ऋचा को वापिस दरवाजा बंद करने के लिए कहा और फिर अनुपमा की कमर में हाथ डालते हुए अपने साथ लगा लिया.

"घबरा क्यों रही है तू? भाभी बाद में बानी है, पहले तोह मेरी डार्लिंग है तू अनुपमा. और ये भी दोनों तेरी सहेली है जैसे मुस्कान और अक्षरा.", बबिता ने नरम पेट को सहलाते हुए अनुपमा का गाल चूम लिया तोह भोली भली युवती मुस्कुराने लगी. विन्नी और ऋचा ने भी हाथ मिलते हुए अनुपमा की सुंदरता की तारीफ की तोह वो पूरी निश्चिन्त हो गयी.

"फिर ठीक है जीजी और न अगर यहाँ अक्षरा होती तोह मुझे ज्यादा ाचा लगता. वो हमेशा संभल लेती है न सब बात."

"ाचा अब तेरी परेशानी तोह बता, तभी मैं समाधान करुँगी और तू थोड़ी देर बाद जाने वाली है वापिस तोह अक्षरा भी मिल जाएगी. चल बता क्या हुआ."

"जीजी, वो न कल रात उन्होंने तोह मेरा खून हे निकल दिया और अभी भी करने को कह रहे थे. मैंने बताया के डर लगता है और दर्द भी होता है तोह मुँह फिर कर सो गए. अब बताओ न जीजी मैं क्या करू?", अनुपमा की इतनी साफ़दिली देख कर जहा विन्नी को उस पर तरस आ रहा था वही ऋचा भी हैरान थी.

"तू न सच में पागल है मेरी भोली. मरद है वो तेरा और हर बार थोड़ी खून निकलेगा. वो तुझे गरम नहीं करता क्या जैसे अक्षरा तेरे साथ करती थी.?", बबिता की बात अनुपमा को तोह समझ आ रही थी लेकिन ऋचा को यकीन नहीं हो रहा था के जो बबिता ने उसको बताया था वो सच था.

"जीजी, अक्षरा ने कभी तीती (छूट) में तोह कुछ न घुसेड़ा था. वो तोह चुकी पीया करती, दबाया करती थी और होंठ चूमा करती थी मेरे. तीती तोह हाथ से हे सहलाती थी जिसमे मजा आता था. इन्होने तोह उघड़ी (नंगा) किया और वह तेल लगा कर बड़ी सी नुन्नी घुसा दी. मुझे दर्द हुआ तोह मुँह से मुँह बंद कर दिया और सफ़ेद सीन्द जैसा गन्दा कुछ तीती में गिरा दिया. कह रहे थे उस से मैं माँ बन्न जाउंगी.", अब जा कर बबिता को सबकुछ समझ आया तोह उसने प्यार से अनुपमा को अपने सीने से लगा लिया. ऋचा भी समझ गयी थी की अनुपमा को एक तोह पूरा ज्ञान नहीं है और दूसरा बिजेन्दर भैया ने शायद सबकुछ प्यार से नहीं किया.

"ये सचमुच गलत हुआ बबिता दीदी. मतलब इन्हे तोह शायद ठीक से सेक्स के बारे में पता भी नहीं है और जैसा हुआ है तोह डर तोह लग्न हे है.", विन्नी नादान तोह नहीं थी जो वो समझ न पाती.

"हाँ ये हैं भी दिल की बड़ी भोली और नाजुक. वह अक्षरा और मैं थे इसके पास तोह संभल लेते थे सबकुछ. अब बिजेन्दर को तोह मैं क्या हे कहु, खुद सांड सा है काम से काम हर चीज आराम से तोह करता. चल तू परेशां न हो और 5 मिनट इनके पास बैठ मैं अभी आयी. तुझे दिक्कत में नहीं देख सकती मैं.", बबिता ने हमदर्दी से अनुपमा का गाल चूम कर बहार का रुख किया. जैसे उसने बहोत कुछ सोच लिया था और तेज कदमो से चलती वो निचे उतर कर सीधा बिजेन्दर के कमरे में आ कड़ी हुई. वो करवट के बल लेता आराम कर रहा था.

"ओह सांड, खड़ा हो के बैठ.", बबिता ने हिलाया तोह बिजेन्दर तुरंत खड़ा हो गया. वो अपनी बड़ी बहिन को दरवाजा लगते देख थोड़ा हैरान भी था.

"क्या हुआ बेबे? कुछ मसला है जो दरवाजा बंद कर रही हो?"

"शांत बैठ मैं जरुरी बात करने आयी हु. हैं तोह हम bhai-behan लेकिन बचपन से साथ भी रहे है और अब दोनों शादीशुदा भी है.", बिजेन्दर थोड़ा हड़बड़ा रहा था ये सब ऐसे अचानक होते देख. कुछ समझ नहीं आ रहा था लेकिन बबिता ने पानी का गिलास उसको पकड़ने के बाद उसके सामने हे कुर्सी खिसका ली.

"ऐसी कोनसी बात है और ये शादीशुदा का मतलब?"

"ओह कभी कभी ध्यान से सुन्न लिया कर, ज़िन्दगी संवर जाया करती है अगर बड़ी बहिन कोई शिक्षा दे रही हो तोह. होता तोह ऐसा है के कोई बड़ा दोस्त, चाचा या करीबी आदमी ये सब तेरे को समझाता लेकिन गोली मार उस सबको और ये बता के तू सचमुच अनुपमा से प्यार करता है न?"

"हाँ बेबे. तभी तोह ब्याह किया है उसके साथ और वो तोह शुरू से मुझसे प्यार करती है. मैं दुनिया की साड़ी खुशिया भर ढुङ्गा उसकी झोली में.", बिजेन्दर अनुपमा का जीकर होते हे जैसे सबकुछ भूल हे गया था.

"देख बिज्जू, तू 30 का है और पढ़ा लिखा भी है थोड़ा. पहलवानी एक तरफ रख के सोच के कोई व्यक्ति अपने प्यार के साथ कैसे पेश आता है? एक तोह अनुपमा है बिलकुल कोरी, pati-patni के एकांत की उसको उतनी समझ नहीं है उस बिन माँ की बची को. और मैं ये भी जानती हु के मेरा भाई भी 30 बरस तक लंगोट का पक्का रहा है. अब दोनों जाने एक हो और साड़ी ज़िन्दगी इस प्यार को बढ़ाना है तुम्हे मिल कर.", बबिता सचमुच किसी माँ की तरह समझा रही थी बिजेन्दर को. बिजेन्दर भी लंगोट वाली बात होने पर समझ गया था के बात किस दिशा में जा रही है.

"वो बेबे, गलती हो गयी थी बस क्योंकि पहली बार....", बिजेन्दर गर्दन झुका कर बैठ गया तोह बबिता मुस्कुराने लगी. अपने भाई का सर सहलाती हुई वो उसकी हे बात पूरी करने लगी.

"एक्साइट होना नेचुरल है बिज्जू लेकिन इसके साथ साथ थोड़ा फिल्मी होने में क्या दिक्कत है? विनोद खन्ना की फिल्म तोह तू भी देखे करता, इतना तोह मुझे ध्यान है. देख भाई तुझे न दोस्त की तरह एक बात कहती हु. जो तूने किया वह बस 33 प्रतिशत था pati-patni के मिलान में और वो भी बीच का भाग. 10 मिनट उस से बोल बतला, तारीफ कर उसकी चाहे जैसी भी कर उसको तोह तू हे ाचा लगता है. फिर उसको एहसास करवा के वो तेरे लिए क्या है, तुझे भी ऐसे प्यार करना ाचा हे लगेगा. वो भोली है और ज्यादा पता नहीं लेकिन मिल कर सीखो अगर तुझे भी जीरो ज्ञान है. फिर वो कर जो किया था लेकिन बात उस वक़्त भी करियो और होने के बाद भी उसको अपने साथ रखियो जिस से उसको लगे के तुझे कितना ख़याल है उसका. मैं चाहती हु के तुम दोनों न इस हवेली को आबाद करो मिल कर और बिजेन्दर सिंह ऐसा कर सकता है.", बबिता ने बिजेन्दर के तकले पर आये हलके बालो में उंगलियों की रगड़ की तोह बिजेन्दर शर्म के साथ साथ सर हिला रहा था.

"थैंक यू बेबे. बेरा है मैंने शुरू से पता था के मेरी बबिता जीजी बहोत समझदार है और सबका ख्याल रखती है चाहे अकेले रहती हो अपने कमरे में या गुस्सा करती हो सब पे. आज देख भी लिया के मेरी बड़ी बहिन घर बसना भी जानती है और प्यार की समझ भी है. आइंदा मैं अनुपमा के आँख में आंसू न आने देता. लेकिन अगर बुरा न मानो तोह एक सवाल मेरा भी है."

"तेरी झिझक बता रही है के सवाल तोह है तेरे पास लेकिन छोटा है और सोचे है के बात गलत न लगे मुझे. बबिता सिंह ने गुस्सा करना बंद कर दिया बिज्जू और नाराजगी भी किसी से नहीं होने वाली बात अगर एक हद्द तक बुरी हो तोह भी. प्यार से हे तोह ऐसे बदलाव आते है भाई जिसमे आपको लगता है के आपकी कदर है किसी को, कोई है जो आपका अकेलापन समझता है और वो आपको सुख देने के साथ साथ आपके दुःख भी बराबर लेता है. हाँ मैंने ये सब महसूस किया है बिज्जू.", बबिता का चेहरा तोह वैसे हे अर्जुन को याद करके चमक उठता था लेकिन अभी वो बेहद संजीदा दिख रही थी.

"अर्जुन.", बिजेन्दर ने इतना कहते हे गर्दन निचे झुका ली जैसे गलती कर दी हो.

"तेरी शरत थी, माँ की नयी ज़िन्दगी और मेरा वादा था बिज्जू. लेकिन वो सब अलग बात है और मैं उसका कर्ज नहीं उतार सकती या तू या फिर माँ भी नहीं कर सकती कुछ. लेकिन मेरे अंदर भी उसने एक मासूम लड़की देखि, दिल देखा और वो िज्जात्त दी जो हर लड़की चाहती है के उसको मिले लेकिन मिलती नहीं इन हवेलियों में कभी. मुझे हो गया प्यार उस लड़के से क्योंकि यही तोह कर सकती हु मैं. लेकिन उसने मर्जी के बिना तोह मेरे पर नजर भी की कभी. बस हर चाहत की वो मंजिल नहीं होती जो दिल मांगता है.", बबिता ने अपने छोटे भाई को जो भी बताया वो सुन्न कर बिजेन्दर भी मान गया के अर्जुन ने हे उन्हें एक नयी ज़िन्दगी दी है.

"आप कभी गलत कर भी नहीं सकती और वो लड़का बहोत ख़ास है बेबे बस कभी उसकी चिंता हो जाती है. वैसे आपने सोचा नहीं के गोलू की जगह आप उसके साथ.."

"ओह पागल, गोलू ाचा व्यक्ति है और मेरा सही ध्यान रखेगा. अर्जुन किसी एक का न हो सकता फ़िलहाल तोह और यहाँ मैं उसको पाना नहीं चाहती. वैसे एक बात बता, तुझे अज्जू चाचा याद है?", बबिता ने बात हे बदल कर ऐसी तरफ कर दी की बिजेन्दर का सर ऊपर उठ गया.

"हाँ बेबे, उनको तोह कोई नहीं भूल सकता. बस जो उनके साथ मेरी यादें है वो पतंग और लट्टू घूमने वाली या फिर साइकिल के डंडे पर बैठ कर उनके घर तक जाने की है. बहोत प्यार करते थे वो मुझे लेकिन जल्दी हे सब को छोड़ कर चले गए."

"वो अकेले ऐसे थे जिन्हे हर मुखिया और हर माँ प्यार करती थी. याद हो तोह सबसे बड़े तोह हमारे दादा थे लेकिन अज्जू चाचा तोह उनके साथ भी dosti-majaak करते थे. उन्हें दुनिया का अलग हे ज्ञान था भाई जिसमे सिर्फ प्यार और सबके लिए इज्जत थी. ये अर्जुन वैसा हे है जमा अज्जू चाहा जैसा. तू ताक़त की बात करे तोह न उनकी टक्कर में कोई था न इसकी में कोई है, प्यार की बात करे तोह जितने लोग उन्हें चाहते थे उतने या ज्यादा हे इस अर्जुन को पसंद करते है. दोनों हे सबके साथ भी रह कर खुश और अकेले में भी. ऐसे इंसान पर अधिकार नहीं किया जा सकता मेरे भाई. चल मैं चलती हु और अनुपमा ने फिर 2 घंटे बाद जाना भी है", बात अधूरी हे छोड़ दी थी बबिता ने शायद वो बिजेन्दर को भी अप्रत्यक्ष रूप से किसी खोजबीन में शामिल करने लगी थी. और 1 मिनट बाद हे कमरे में अनुपमा को खड़े देख बिजेन्दर सब भूल गया.

"सॉरी कल रात के लिए. आओ तुम्हे मैं हमारे बचपन की कहनी सुनाता हु.", बिजेन्दर ने दरवाजा बंद करने के बाद अनुपमा को गॉड में उठा कर बड़े प्यार से बिस्टेर पर लिटा दिया. अब वो कहानी को वैसे हे सुनाने वाला था जैसे उसकी बड़ी बहिन समझा कर गयी थी.

.

.

ठीक 5 बजे अर्जुन अपनी दादी को बता कर घर से निकला तोह कार में उसकी माँ रेखा भी पिछली सीट पर बैठी थी और ऋतू आगे अर्जुन के बराबर. पिछली सीट पर माँ के बराबर हे 4 आकर्षक निमंत्रण पत्र और चमकदार मिठाई के डब्बे बता रहे थे वो लोग क्यों बहार आये है.

"माँ ारु की कार बहोत हे ाची है न? और आज पहली बार आप इसके साथ बैठी हो, ये गाडी सही से चलने लगा है.", ऋतू को चहकते देख रेखा जी भी खुश थी और वो बहार भी देख रही थी.

"इसके दादा जी इसको हमेशा वही देते है जो इसके लिए उत्तम हो. वैसे तुमने तोह उस सीट पर अपना नाम हे लिख दिया है, रुपाली बता रही थी मुझे.", रेखा जी की बात पर अर्जुन भी मुस्कुरा रहा था अपनी बहिन के साथ.

"हाँ नहीं तोह मेरी जगह इसके बराबर हे है माँ. दादी ने साफ़ कहा है के ये कार मेरी और ारु की बराबर है. वैसे ये हमको लेके कहा जा रहा है?", ऋतू ने भी देखा की वो लोग सेक्टर तोह पार कर चुके है और कार अब मोडल टाउन के रस्ते बढ़ चली थी.

"माँ को मंदिर जाना था दीदी तोह हम वही जा रहे है. पहले ये अपने भगवन को निहार ले फिर हम कुछ जरुरी लोगो से मिलने चलेंगे.", यहाँ प्रख्यात श्री श्याम मंदिर था और कभी कभी कौशल्या जी के साथ रेखा जी इधर आया करती थी लेकिन अब तक़रीबन 2 साल बाद वो इधर आयी थी. उन्हें भी नहीं पता था के अर्जुन कैसे उन्हें इधर ले आया. कार एक तरफ रोकते हुए उसने माँ के लिए दरवाजा खोला और उनके बहार आते हे बटुए से 500 का नोट पकड़ते हुए बोलै.

"मिल लीजिये अपने मित्र से आप और ये कोमल दीदी की तरफ से भंडारे में उनका योगदान.", अर्जुन के ऐसा कहने पर रेखा जी ने अपनी हिचक परे करते हुए पैसे ले लिए. वो बहार लगी phool-samagri की दुकान देखती उस तरफ बढ़ी तोह अर्जुन और ऋतू भी यहाँ तक आ गए. सामान लेने के बाद यहाँ भी अर्जुन ने हे पैसे दिए और फिर कार के पास वापिस चल दिया.

"इसको यही तक आना होता है माँ. मत देखिये वो अंदर नहीं जाने वाला, चलिए हम चलते है.", ऋतू ने सर पर दुपट्टा लिया और phool-samagri की टोकरी लिए अपनी माँ को बताने लगी अर्जुन के बारे में.

"वो अंदर क्यों नहीं आता इसकी क्या वजह है ऋतू? जब ारु छोटा था तोह इधर उधर दौड़ता फिरता था यहाँ तुम्हारे साथ, अब वो दूर रहता है. माँ बता रही थी की ये उधर भी बस हवं में बैठा था लेकिन pooja-aarti में शामिल नहीं हुआ.", रेखा जी इस लम्बे प्रांगण में सर ढके चल रही थी और बेटी का एक हाथ भी थमा हुआ था. सामने 100 गज पर हे इस विशाल प्रांगण के बाद वो भव्य मंदिर था. लोगो के होने के बावजूद एक शान्ति थी यहाँ के वातावरण में.

"वो उसकी सोच अब बदल गयी है माँ. उसकी भगवान् आप हो और वो बाकी किसी dharam-pooja की जगह जाता नहीं. ज्यादा से ज्यादा ये होता की वो यहाँ आँगन में बैठ जाता. लेकिन वो आपको और मुझे यहाँ लेके आया है क्यूंकि हमको भगवन में विश्वास है.", ऋतू की ये बात सुन्न कर उन्होंने कुछ नहीं कहा लेकिन सोच वो भी रही थी. बेटे के लिए आज प्यार कही ज्यादा बढ़ चूका था जिसकी पहले भी कहा कोई सीमा थी. वही बहार अर्जुन समय बिताने के लिए एक गुब्बारे बेचने वाले के पास जा खड़ा हुआ.

"भैया, ये गुब्बारे बेच कर कितना कमा लेते हो? गलत मैट समझना बस वैसे हे पूछ रहा हु. मैं तोह बचपन में घर के सामने से निकलने वाले हर गुब्बारेवाले अंकल को रुकवा लेता था. ये सेब (एप्पल) वाले गुब्बारे मुझे बहोत पसंद थे तब.", Neele-peele, laal-hare और सभी तरह के रबर बंधे वो गुब्बारे जितने सुन्दर थे उसके विपरीत हालत थी इस व्यक्ति की जो बांस पर बंधे गुब्बारे गली गली घूम कर बेचता था. 2 बटन नदारद थे कमीज के और पतलून कमर को छोड़ कर हर तरफ से ढीली. पाँव में पहनी चप्पलें भी सिल्वर तार से जोड़ी हुई थी और शरीर दुबला पतला.

"भैया जी काम तोह काम है. पढाई लिखे किये नहीं हम और उस वक़्त धंदे के लिए जमा पूँजी भी नहीं थी. ये 10 पैसे का गुब्बारा 2 रुपये का बिक जाता है. दिन भर में कभी 50 बिक जाते है तोह कभी 60. म्हणत तोह हर काम में लगती है और मेरे लिए आसान भी है और बचो के चेहरे खुश देख कर ज्यादा ख़ुशी मिलती है. आपके घर अगर बचे है तोह आप भी ले लो एक दो गुब्बारे.", व्यक्ति ये भी मेहनतकश और साफदिल था, वैसे ये दोनों हे खूबी हो तोह इंसान को इंसान बनती है. मंदिर के बहार हे बैठे 7-8 बचे बड़ी आस से गुब्बारों को देख रहे थे लेकिन शायद पेट की आग इनसे ज्यादा जरुरी थी. आने जाने वाले लोग उन्हें प्रशाद, chavanni-atthanni दे देते तोह वो उन्हें ज्यादा ठीक लगता.

"ये 24 गुब्बारे है न भैया, सभी दे दीजिये.", अर्जुन ने जैसे हे ये कहा वो हैरानी से देखने लगा के इतने गुब्बारे ले कर ये क्या करेगा. अर्जुन ने इशारे से उन बच्चो को पास आने को कहा तोह मैले कुचले कपड़ो के बावजूद उनके चेहरे पर बहुमूल्य मुस्कान आ गयी थी.

"किसी के लिए 2 रुपये भी बहुत ज्यादा हो सकते है भैया लेकिन इनके बदले अगर वो खुश तोह सब खुश.", अर्जुन ने 2-2 गुब्बारे सभी बचो को पकड़ाए तोह वो बचे एक दूसरे को आँखें चमका कर देखने लगे जैसे कोई खजाना हे मिल गया हो. 3-4 बचे दूसरी तरफ से भी आ गए और सारे गुब्बारे उस बांस पर से गायब हो गए. अलग हे रंग बिरंगा सा दृश्य था ये और अर्जुन बस उनके नंगे पाँव देख रहा था जिन्हे न सख्त सड़क की परवाह थी और न dhool-mitti की.

"बहुत बढ़िया सोच है भैया जी आपकी. हम भी यही ख़ुशी देखते है बचो की लेकिन घर में 50 का खर्चा तोह रोज का है और आने वाले समय में 100 हो जायेगा इसलिए बाँट नहीं सकते."

"अरे भैया ये आपका व्यापार है और म्हणत भी. लीजिये 50 रुपये.", अर्जुन से पैसे लेते हुए वो दुविधा में था लेकिन फिर जेब से 10 रुपये वापिस करने लगा तोह अर्जुन ने मन कर दिया. 2 का सिक्का ले कर अर्जुन ने अपनी जेब में डाला और वापिस मदद गया.

"वैसे भैया जी ये पैसे आप इनमे 5-5 रुपये करके भीख दे सकते थे.", इस बात का अंदेशा था शायद अर्जुन को और ऐसा हर कोई कह सकता था.

"ऐसा हैं भैया के मैं कमाता नहीं हु और उनकी तरह maa-baap का बचा हु. जेब खर्ची से भीख नहीं दी जाती बस सही से खरच कर सकता हु. जरुरी तोह नहीं के जो पैसे मैं इन्हे दू उसका सही प्रयोग हो.", अब वो गुब्बारेवाले निरुत्तर था और सर हिलने लगा जैसे उसको समझ आ गया था के वो कितनी बड़ी बात कह गया. अर्जुन एक बचे के सर पर हाथ फिरने के बाद वापिस कार की तरफ आ गया. सभी बचे एक दूसरे को अपने अपने गुब्बारे दिखा कर बता रहे थे के उसका वाला क्यों ाचा है और दूसरे का रंग क्यों खराब.

"हो गया खुश इन्हे बल्लोंस दिलवा कर? चल अब चलते है जहा चलना है और उसके बाद तू मुझे एविएटर ले कर देगा जैसे तूने बताये थे मोटरसाइकिल के लिए.", ऋतू ने आते हे फरमाइश बताई तोह अर्जुन ने हँसते हुए हाँ कर दी. माँ को वापिस कार में बैठने के बाद वो भी सीट पर आया तोह अब माँ ने भी दिल की कह दी.

"ये कमाता नहीं है ऋतू, तुम्हे मैं दिलवा देती हु जो चाहिए."

"माँ, मेरी जेबखर्ची बहोत है दीदी के लिए. और 2 महीने से तोह मुझे इतने पैसे मिल रहे है के हमेशा बोझ सा रहता है पर्स में. आपने भी कुछ लेना हो तोह देख लीजियेगा. फ़िलहाल तोह हम पूर्वी दीदी के घर चल रहे है.", अर्जुन ने सावधानी से कार वापिस अपने सेक्टर की तरफ घुमा ली थी. पूर्वी सोलंकी के घर के बाद उसने आकांक्षा और फिर वालिए जी के घर भी जाना था. समय बचने पर हे वो संधू जी के घर जाने वाला था जहा जाने के लिए दादा जी ने कहा था.

.

.

"आप लोग तोह बड़ा खुश है माँ. कार्ड हे देने गए थे या कही और निकल गए थे?", दत्त साहब अपने घर वापिस आये तोह बैठक में हे अपनी बेटी के स्वागत करने पर देविका के साथ साथ खुद भी मुस्कुरा दिए. बहादुर पानी ले कर आ गया था और अखिल तोह इतनी थकान की वजह से सीधा ऊपर अपने कमरे में सोने चला गया था, बहादुर को कुछ खाने के लिए ले कर आने का आदेश देते हुए.

"कही नहीं गए थे पंडित जी के घर के सिवा राधिका लेकिन उनका परिवार बहोत पसंद आया हमे बेटी. शंकर भाई अलग शश्सियत है और वो वैसे भी दिल के बड़े ाचे है लेकिन तुम्हारा ससुराल ऐसा है जैसा नसीब से हे मिले किसी को.", गद्देदार सोफे पर बैठ कर सुभाष जी ने जूते उतरे और बहादुर ने नरम चप्पल उनके पास रख दी. देविका जी भी सामने की तरफ आराम से पीठ लगा कर बैठ गयी थी.

"हाँ वह संजीव की ढेर साड़ी बहने, चची जी और दादी जी है जो बहोत मिलनसार लोग है. Ritu-Tara से तोह मैं मिल भी चुकी हु. लेकिन आप तोह ऐसे खुश है जैसे कुछ और भी हुआ वह. माँ आप हे बोलिये, पापा तोह वर्ड्स इधर उधर घूमते रहते है. निक्की ने भी कुछ नहीं बताया और वो मौसी के घर है वही उनके शहर में.", राधिका एक घुटने तक की निक्कर और लम्बी टीशर्ट पहने बिलकुल आरामदायक अवस्था में थी. चेहरे पर वही नूर और गहरी चमकती आँखें उसको ख़ास बनती थी.

"आज हम आचार्य जी से मिले, वो भी पंडित जी के ड्राइंगरूम में. जानती हो उन्होंने मुझे बेटी भी कहा और इनसे हाथ मिलाया. वो साधारण व्यक्ति नहीं है और हमेशा लोगो को उनसे 10 मीटर दूर हे रखा जाता है. आज वो बराबर बैठे थे वो भी आम कपड़ो में सबके बीच हँसते बोलते हुए.", राधिका भी जानती थी की आचार्य जी कौन है.

"वाओ. सीरियसली? Yog-guru आचार्य जी आपको संजीव के घर बैठे मिले? ुंबलीवबले. वो तोह इसलैंड्स और फिर यूरोप टूर पर थे न और आगे भी उनके सभी सेशंस वही है. इंडिया और वो भी उनके शहर में वो क्या कर रहे है?", राधिका तोह अपनी माँ की बगल में हे आ बैठी और उसकी छोड़ी हुई जगह वही काली बिल्ली आ पसरी.

"उन्होंने अपने सारे शिविर कैंसिल कर दिए या फिर शिष्यों के हवाले. बताया के वो 15 जुलाई तक अब वही है, संजीव के पड़ोस में हे घर बताया है उनका. जानती हो इस सबके पीछे वजह है शंकर भाई का बीटा ारु. आचार्य जी के साथ उसका जुड़ाव शायद सबसे ख़ास है, दोस्ती से भी ज्यादा.", सुभाष जी ने कलाई घडी उस काले कांच की टेबल पर राखी और पानी का एक घूँट ले कर अपनी बीवी को देखने लगे.

"संजीव का कजिन बरोथेर, ऋतू ने बताया था के वो उसका छोटा भाई है और बेहद ख़ास भी. संजीव ने कुछ नहीं बताया लेकिन. चलो ाचा है के आप लोगो की तमन्ना पूरी हो गयी. और ये लड़का कही शंकर अंकल जैसा तोह नहीं है या फिर संजीव जैसा? पता लगे लाडले को मुझे हे सुधारना पड़े अगर सबने बिगाड़ रखा हो तोह.", राधिका अपने पुलिसिया लहजे में मुस्कुराती हुई बोली तोह देविका जी ने अपने बेटी के सर पर हलकी सी चपत लगा दी.

"प्यारा बचा है वो तोह और मैं तोह सोच रही थी की उर्वशी की बेटी दिया के लिए बात करू. लेकिन ये बात मैं रेखा बहिन से हे करुँगी और फिर बात ठीक रही तोह देख लेंगे. वैसे तुम संभल कर रहना, पता लगे वो तुम्हे हे सुधार दे.", देविका जी की बात पर सुभाषजी का हंसना बता गया था के वो सही कह रही थी.

"2 घंटे में बड़ा समझ आ गया वो लड़का आपको. अब तोह शादी के बाद हे मिलूंगी इस से और देखु कौन फन्ने खान है ये लड़का जिसके लिए मेरे mom-dad तारीफ कर रहे है. वैसे ख़ास हे होगा ये जब आचार्य जी का लगाव है इसके साथ और संजीव की फॅमिली में बाकि सभी ाचे है.", राधिका भी अपनी हे बात से खुद मुकर गयी बोलते बोलते.

"वैसे तुम्हारी माँ का सपना मैं हे टॉड देता हु बेटी. ारु का रिश्ता हो चूका है और जिस लड़की से हुआ है उसको हमने आज अपनी बेटी मान लिया है. बिलकुल पारी सी है वो लड़की, प्रीती नाम है उसका. सच कहु तोह तुम्हारे ननिहाल या दादा के परिवार में भी वैसी लड़की नहीं होगी. और देविका, उर्वशी की भाभी भी तोह शंकर भाई के ससुराल में विवाहित है. वो रिश्ता वैसे भी मुमकिन नहीं है."

"ठीक तोह है जी, जब आपने हे बेटी मान लिया है तोह फिर अर्जुन बनेगा तोह दामाद हे. यही इत्छा थी नहीं तोह मेरी सगी बेटी होती उसकी उम्र की तोह मेरा दिल जरूर दुखता. कही वो लड़की नीली आँखों वाली तोह नहीं थी जिसके पास पप्पी था?"

"वही लड़की प्रीती है देविका. आचार्य जी ने वो पप्पी उपहार में देते हुए भी अर्जुन और प्रीती से यही कहा था वो दोनों मिल कर उसकी संभाल करे. एक बार जरूर अजीब लगा था जब राधिका ने पहली बार संजीव का जीकर किया था क्योंकि कितने हे बड़े बड़े घराने इस आस में बैठे थे के मेरी बेटी का रिश्ता उनके वह होगा. मेरे कारोबारी दोस्त भी ऐसा हे चाहते थे लेकिन जब पंडित जी और शंकर भाई के घर का लड़का निकला तोह मैंने आँखे मूँद कर हां कर दी थी. आज गर्व है के मेरी बेटी ने सही फैंसला लिया.", राधिका भी इस बात पर एक पल को मुस्कुराई फिर सवाल कर बैठी.

"वो लड़की ऋतू से भी सुन्दर है क्या माँ?"

"ऋतू से सुन्दर मैं कैसे बताऊ? हाँ ऋतू की माँ जरूर बहोत ज्यादा हे सुन्दर है और वो लड़की प्रीती शायद अभी से उस परिवार का हिस्सा है. मिल कर देख हे लेना, देवरानी तोह वही होगी तुम्हारी. घर में 2 हे तोह लड़के है. वैसे तुमने अपनी छोटी ननद को एक पैमाना तोह नहीं बना लिया सुंदरता का?", देविका जी की हंसी भी आकर्षक थी.

"सुन्दर तोह आप भी बहोत हो माँ, तभी तोह डैड आपको हमेशा साथ रखते है. लेकिन सच कहु तोह मैं खुद को बेस्ट मानती थी इवन निक्की को भी अपने बाद. लेकिन तारा हे मुझसे ज्यादा सुन्दर है और ऋतू मासूमियत तारा पर भरी. ख़ास हे ब्लूद्लिने होगी जो उनकी माँ को आप उनसे भी सुन्दर कह रही हो. शंकर अंकल भी तोह कैसे तगड़े रौबीले है. ाचा है न मैं उनके हे बीच जा रही हु. वैसे डैड, टूजी का फ़ोन आया था. बात कर लीजिये आप इतने मैं माँ का दिमाग खाती हु.", सुभाष जी जैसे हे उठ कर गए राधिका ने माँ का हाथ थाम लिया.

"आप कुछ भूल रही है?", अब देविका जी को याद आया के कौशल्या जी ने बहु का शगुन भी भेजा था.

"ाचा बड़ी जल्दी है तुम्हे शगुन देखने की. वैसे तुमने कुछ ख़ास भी मंगवाया है क्या उसमे जो उन्होंने भी सिर्फ तुम्हे देने का कहा?"

"आप बस वो पैकेट दीजिये माँ, पापा देखते तोह उनके सामने हे खोलना पड़ता. प्लीज."

"फ़िक्र मैट कर, बहादुर कार से वो सामान ले कर तुम्हारे कमरे में हे रख चूका है. और सचमुच मेरी बेटी पर मुझे नाज है जो इतना ाचा घर खुद हे ढून्ढ लिया. बस अब ये सोच रही हु के तेरे पापा ने 500 कार्ड्स देने का फैंसला ले कर कुछ गलत तोह नहीं कर दिया? 7-800 लोग हमारे, 200 के करीब दूसरी तरफ से और पंडित जी के भी हमारे हे जितने मेहमान हो सकते है.", देविका जी ने अपनी बेटी का इस तरफ ध्यान दिलवाया तोह एक पल के लिए राधिका भी सोचने लगी.

"वैसे संजीव पापा को बता रहा था के 2000 लोगो के लगभग का इंतजाम आराम से हो जायेगा. और ख़ास लोगो को रहने के साथ साथ पूरी सिक्योरिटी भी रहेगी वह. लेकिन अब मुझे भी लग रहा है के इतने लोग और ऊपर से ताऊजी हमारे अपने आप में हे एक काफिला लिए चलते है.", राधिका की बात मजाक थी लेकिन माँ के चेहरे पर अलग भाव आ गए थे.

"उस से ज्यादा चिंता की बात है तेरे ताऊजी की सांगत. एक तोह पहले हे तेरे prem-vivah पर आपत्ति कर रहे थे जिसके लिए तेरे पापा को क्या कुछ नहीं सुन्न ने को मिला और ऊपर से उनका हमेशा पैसे और पावर का रौब. Dost-yaar और चमचे भी वैसे हे है उनके लेकिन पंडित जी का परिवार कही ज्यादा हे सरल और मिलनसार है. लड़कीवालों को भी वो अपने से ज्यादा मान देने वाला परिवार है और अगर ऐसे में कुछ ऊंच नीच हो गयी तोह?"

"तुम बिना वजह चिंता कर रही हो देविका. भैया की नेचर अलग जरूर है लेकिन वो भी सब समझते है और पंडित जी का तोह गुणगान अभी भी फ़ोन पर कर रहे थे. अब घर में एक तोह ऐसा होता हे है जो अलग होता है. उनके वह शंकर भाई है ऐसे और इधर राधिका के ताऊजी."

"एक्साक्ट्ली डैड. ताऊजी ने मुझे कुछ भी नहीं कहा था, वो बड़े भोले है बस घर के बड़े है तोह आपको दांत लेते है जब मूड ख़राब हो तोह. वैसे प्यार भी सबसे ज्यादा ताऊजी का आपके और माँ के साथ है. छोटी भाभी होने के साथ साथ सलहज भी तोह लगती है माँ ताऊजी की.", राधिका के ऐसे कहने पर देविका जी हंसती हुई उठ कर चली गयी.

"वैसे बेटी सच कहु तोह ये 500 कार्ड देने के बाद भी मैं और तुम्हारे ताऊजी 2000 लोगो की शिकायत लेने वाले है. जीजा हमारे छोटे जरूर है लेकिन अब परिवार उनका भी बड़ा है और वो तोह कह रहे है के अगर विवाह ऐसे हो रहा है तोह शादी के बाद एक रिसेप्शन हम भी रखे तुम लोगो के लिए."

"थी थिंग्स अरे सो बोरिंग डैड. मुझे तोह कोर्ट मैरिज पसंद थी, कौन इतना लम्बा taam-jhaam करे अब. मेरी फ्रेंड्स अभी से पूछ रही है के लेडीज संगीत और मेहंदी के फंक्शन्स कहा रखने वाले हो आप लोग. फार्महाउस पर या होटल में? बताओ मैं क्या जवाब दू इस बात का की मुझे ये naach-gana नहीं लोगो की हड्डियां तोड़ने में ज्यादा मजा आता है.?"

"हाहाहा, मेरी शेरनी हो तुम. चलो कारोबारियों के घर से तुम वही जा रही हो जहा लोग jan-seva में हे रहे है. वैसे निक्की ने क्या कहा उसकी शादी के लिए? वो लड़की जैसे ज़िन्दगी से कुछ और हे चाहती है. तुम्हारे टूजी उसके हे बारे में बात कर रहे थे की अगर निक्की को भी कोई पसंद है तोह वो भी स्वीकार कर लेंगे बेटी के लिए.", सुभाष जी द्वारा ये चर्चा करने पर राधिका के चेहरे पर भी चिंता के बादल छ गए.

"निक्की का तोह मेरी समझ में भी नहीं आ रहा डैड. पहले वो मेरे सिवा किसी से बात नहीं करती थी, फिर होटल सँभालने के बाद और भी ज्यादा गुमसुम रहने लगी. हर बात पर गुस्सा आ जाता था उसको लेकिन जबसे वो पंजाब से आयी है तोह बदल भी गयी है और हंसती बोलती भी है सबके साथ. मैंने पुछा था के वह कोई लड़का अगर पसंद आ गया है तोह मैं हे टूजी से बात कर लेती हु लेकिन उसका कोई सही जवाब नहीं आया. विद्या भाभी भी हमारी फ्रेंड है और उन्हें भी कुछ खबर नहीं. देखते है अगर कल वो कुछ बता दे तोह नहीं तोह फिर जब दिल होगा और जो वो करना चाहे करने दीजिये. सुनेगी तोह वो किसी की भी नहीं."

"हाँ, ये बात मैंने भी नोट की इसलिए तुमसे पुछा. निक्की बदल गयी है और लोगो से मिलने जुलने लगी है. ऐसा बदलाव तोह सिर्फ इस वजह से हे आता है कोई स्पेशल मिल गया हो उसको. Let's सी कब बताती है वो. मैं चलता हु बेटी, एक मीटिंग है तोह रात देर से आऊंगा.", राधिका ने ध्यान दिया तोह उसके पापा तैयार हो कर हे इधर आये थे. मतलब आज भी वो काम पर जा रहे थे वो भी साढ़े 6 बजे. उनके बहार जाते हे देविका जी एक सभ्य सा गाउन पहने बेटी के पास आ गयी.

"माँ, क्या यही आप लोगो की लाइफ है? डैड के पास एक दिन भी पूरा फ्री नहीं होता. आप 6 दिन हफ्ते में ओफ्फसीए संभालती है 9 से 7 बजे तक और ऐसा 15 साल से हो रहा है. हम तोह मान लिए आपस में हे रह कर बड़े हो गए लेकिन आप लोग हस्बैंड वाइफ है माँ. पैसे अगर जरुरी है तोह प्यार भी उतना हे इम्पोर्टेन्ट है लेकिन आप दोनों कभी कपल की तरह साथ होते हे नहीं सिवाय इवनिंग टिया के या ब्रेकफास्ट के. देखिये मैं आपकी बेटी और सहेली भी हु जैसा आप हमेशा कहती है. समथिंग इस नॉट राइट बिटवीन यू तवो.", राधिका ने अनजाने में हे एक बड़ी बात शुरू कर दी थी और देविका जी उठने लगी तोह उसने हाथ पकड़ लिया.

"बेटी, हम कोशिश कर सकते है बस. तुम्हे क्या लगता है के मैं अखिल को 8-9 साल की उम्र में छोड़ कर क्यों तुम्हारे पापा के ऑफिस जाने लगी थी.? इसलिए न के हम ज्यादा से ज्यादा साथ रहे और अगर उन्हें मुझमे कुछ नापसंद है तोह वो इसको बदले, मुझे बताये. लेकिन रिजल्ट ये निकला के मैं वह की मद बन्न गयी और इन्होने एक और कंपनी शुरू कर ली. आज ये रात को 1 या 2 बजे तक आते है और कमरा भी अलग है हमारा 8 साल से. मेरे पास खुद इसका कोई जवाब नहीं है तोह मैं तुम्हे क्या बताऊ. जितनी बार इनसे बात करने की कोशिश की तोह वही जवाब हर बार मिलते है. 'बचे बड़े हो गए है. काम का बहुत प्रेशर है. मैं तुम्हे परेशां नहीं करना चाहता रात को देरी से आने के लिए.' तुम्ही बताओ अब मैं क्या करू, इनके साथ मैं भी इस लाइफ को एक्सेप्ट कर चुकी हो.", देविका जी के चेहरे पर भाव सपाट थे लेकिन दिल कौन देख सकता था जिसमे अलग हे शोर था.

"माँ, पापा और आपने हमेशा सबका ख़याल रखा है एक आइडियल पेरेंट्स से भी ज्यादा. अब मैं ये देखती हु तोह उनसे ज्यादा मुझे आपके लिए दुःख होता है. कही पापा का बहार?", राधिका के इस छोटे से सवाल ने देविका जी को कुछ पल खामोश कर दिया.

"वो ऐसे नहीं है राधिका. तुम्हारे पापा हमेशा से आइडियल रहे है तोह वो कभी भी ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिस से उनकी इमेज के साथ साथ इस परिवार पर कोई आंच आये. चलो तुम अपने कमरे में आराम करो मैं चाय ले कर वही आती हु.", देविका जी ने दिल पर पत्थर रख कर आज अपनी जुबान रोक ली थी. त्याग तोह इन्होने भी बहोत किये थे और अब मैं आहात था लेकिन बचो के सामने वो ये छवि नहीं आने देना चाहती थी.

"क माँ. इतने मैं भी जरा अपने ससुराल से आया गिफ्ट देख लू. दूर नॉक मैट करना, दरवाजा खुला हे होगा.", राधिका मटकती हुई अपने कमरे की तरफ निकल गयी.

.

.

सरकारी हॉस्पिटल में इस वक़्त तक सभी प्रमुख स्टाफ जा चूका था और सिर्फ इमरजेंसी और रात की ड्यूटी वाले लोग हे बचे थे. डॉ शंकर एक एक्सीडेंट केस देखने के बाद अपनी जूनियर डॉक्टर, जो करीब 30 वर्ष की एक भरे शरीर वाली महिला थी को ले कर shav-sangrah की और चल दिए. महिला डॉक्टर के हाथ में एक फाइल थी और वो बातें पूछती हुई इस प्रमुख बिल्डिंग से निकल कर इस खाली मैदान से आगे उस जगह देख रही थी जहा लाश राखी जाती थी.

"सर, आपको आदत हे हो गयी होगी न अब तक तोह ऐसी ब्रूटल डेड बॉडीज देखने की? मुझे रेगुलर डेड बॉडीज से तोह प्रॉब्लम नहीं होती लेकिन जैसी अभी देखि थी उस से थोड़ा नर्वस जरूर हो जाती हु.", सवा 5 फ़ीट लम्बी इस डॉक्टर ने 2 इंच ऊँची हील पहन राखी थी और गोल चेहरे पर नजर का चस्मा भी जाँच रहा था. सफ़ेद कोट ऊपरी जिस्म को धक् रहा था लेकिन भारी कूल्हे अलग हे नजर आ रहे थे जो घांस पर कदम रखने से कही ज्यादा थिरक रहे थे.

"जीनत, ये सब तोह हमारे लिए रोज का हे काम है. Roji-roti से कैसी नर्वस्नेस. हाँ अजीब लगता है तोह दिन में 20 बार हाथ धोना. हाहाहा. चलो अब ये िडेंटीफ़्य हो गया है तोह इसपर डिटेल्स चिपका देते है.", इस तरफ जैसे चौकीदार गायब था और कमरे के अंदर प्रवेश करते हे वही स्पिरिट की महक और जरुरत से ज्यादा ठंडक. फ़िलहाल इस ठन्डे कमरे में यही 2 लोग जीवित थे और 6 लाश ाचे से सफ़ेद चादर में लिपटी लोहे के अलग अलग टेबल पर राखी थी. 15-16 कड़ब आगे आने पर डॉ शंकर ने आखिरी वाली लाश की तरफ इशारा किया तोह डॉ जीनत ने फाइल में से 2 स्टीकर निकलते हुए एक को इस टेबल पर सर की तरफ चिपका दिया. एकाएक वो अपनी एड़ी पर कड़ी हो गयी थी.

"आउच.. सर, बता कर भी तोह कर सकते थे न? मैं डर गयी थी की ये किसने हाथ लगा दिया.", जीनत का चेहरा शर्म से लाल हो गया था इस मंद रौशनी वाले ठन्डे कमरे में शंकर के हाथ द्वारा अपने एक कूल्हे हो मसले जाने से.

"डर हे तोह दुर्र करने आया हु तुम्हारा मैं इधर. ये सब dead-bodies है और हम जिन्दा. वैसे ये डर किसी और ने तोह दूर नहीं किया न पहले तुम्हारा?", डॉ शंकर अब पूरी तरह जीनत के पीछे चिपक चुके थे. फाइल उस मुर्दा के ऊपर पड़ी थी और सिसकारी लेती जीनत ने वही टेबल थाम ली अपनी सलवार के निचे होते हे.

"आह्हः.. सर, बॉयफ्रेंड जरूर था मेरा लेकिन 4 साल पहले वो भी चला गया. आह्हः.. अजीब सा लग रहा है sir.",Jeenat ने अपनी कच्ची निचे उतारते हे डॉ शंकर द्वारा छूट मसले जाने पर होंठो को काट लिया.

"लगता है उसने भी ज्यादा म्हणत नहीं करि तुम पर. ऐसी बॉडी तोह हर रोज मसलने के लिए होती है जीनत. वह ोपड में कैसे वो लड़के लार टपका रहे थे तुम्हारे ये बड़े हिप्स देख कर.", डॉ शंकर ने चैन खोल कर अपना सख्त लुंड बहार निकल लिया. हलके दबाव से जीनत को निचे झुकाते हुए सही मुद्रा बनाई और उन मोटी जांघो के बीच नरम छूट के मुहाने सूपड़ा टिका दिया.

"उफ़.. सर वो तोह देख हे रहे थे लेकिन आप तोह इंजेक्शन हे लगा रहे हो सीधा.. आह्ह्ह्ह.. मर्डर गयीईइ.. बहोत मोटा है सर आपका.", डॉ शंकर भी एक तेज धक्का लगते हे जैसे नशे में भर गए. बिना रुके दूसरा धक्का लगते हुए पूरा लुंड इस काम चूड़ी नरम छूट में उतार कर दोनों हाथ कोट के अंदर से जीनत के चुचो पर रख दिए.

"बड़ी गरम हो यार तुम तोह. हफ्ता लगेगा तुम्हे ठीक करने में.. आह्हः.. ये चुके भी शायद सही से नहीं मसले नहीं तोह इतने टाइट न होते ये.", जीनत तोह इतनी ठंडक में भी जैसे बुखार से पीड़ित हो गयी थी और डॉ शंकर किसी इंजन की तरह एक लाये में लगातार गहरे धक्के मारते हुए इस जूनियर डॉक्टर को ख़ास सबक सीखने लगे.

"उफ़.. आह्ह्ह्ह.... धीरे सर.. आठ.. सचमुच डॉ कविता ठीक कहती है के आप आठ.. मर्द हो पूरे.. उफ़.. उन्हें भी आप यही लेके आते थे न.. आठ.?"

"कविता तोह अनल भी करवाती थी और मुँह में लेना तोह ख़ास पसंद है उसको. नेक्स्ट टाइम गेली साथ लेके आना ... हो तुम कविता से भी कमाल और इस गांड पर दिल आ गया है मेरा.. ुह्ह्ह्ह..", धक्के इतने तेज लग रहे थे की मुर्दाघर में जैसे भूचाल आ गया था. टेबल chi-chi की आवाज कर रही थी वही गांड पर लगातार thapp-thapp की आवाज धक्को से निकलती अलग शोर मचा रही थी. 10 मिनट में हे डॉ शंकर ने इस डॉक्टर जीनत की हालत दुरुस्त कर दी. छूट में गाढ़ा माल महसूस करते हे वो मुर्दे के ऊपर झुकती हुई अपनी सांसें ठीक करने लगी और डॉ शंकर ने सिग्रत्ते निकलते हुए बहार का रुख किया. डॉ जीनत ने जैसे तैसे कच्ची और सलवार ऊपर चढ़ाई और धीमे से बड़बड़ाई, 'काम हो गया तोह बाकी सब माँ छुड़ाओ. सही है सर आपका ये अंदाज, किसी दिन कोई माँ बन्न गयी न तोह तारे दिखा देगी. उफ़.. '

बहार मैदान में सिग्रत्ते पीते हुए डॉ शंकर ने दूर खड़े चौकीदार को बुलाया और 100 की एक हरी पट्टी दे कर अपनी जगह बैठने को कहा. जीनत भी तब तक बहार निकल आयी थी और बहार चौकीदार को बैठे देख डॉ शंकर से बोली, "सर, स्टीकर लगा दिया है और फाइल मैं सुबह आपके पास भिजवा दूंगी."

'ऐसे स्टीकर तोह ये डॉक्टर सहा आये दूसरे दिन लगते है. 5 साल बाद वापिस आये है लेकिन आदत आज भी वही. शुक्र है मेरी लुगाई क्वार्टर से बहार न निकलती नहीं तोह उसके भी सुई लगा देते ये साहब.', चौकीदार पुराण था और डॉ शंकर के इस किरदार से ाचे से वाकिफ था. थोड़ी हे देर में डॉ यही से सीधा पार्किंग की तरफ निकल चले. डॉ परमवीर सांगवान के घर आज रात का न्योता था और खाने से पहले जाम का लम्बा दौर भी चलने वाला था.

.

.

"आइये जी, धनभाग जो इतने साल बाद आपके कदम हमारे घर पड़े. और ये तोह ऋतू बिटिया है शायद, मेरी बची कितनी बड़ी हो गयी है.", रेखा जी और ऋतू सबसे आखिर में वालिए जी के घर पहुंचे तोह समय 7 के पास हो चूका था. इस से पहले तोह आकांक्षा हे ऋतू दीदी को जाने नहीं दे रही थी और ऋतू को भी वो लड़की पसंद आयी थी. लेकिन अन्नू की माता जी ने तोह आते हे उसको गले से लगा लिया था. वही रेखा जी से भी वो पूरे अपनेपन से मिली थी.

"आंटी जी आप न मुझे तोह भूल गयी माँ और दीदी से मिलने पर. मेरे तोह बस यहाँ अंकल जी हे है और वो लगता है अभी आये नहीं.", अर्जुन अंदर आया तोह अन्नू की माता जी ने सब छोड़ कर पहले अपने इस लाडले बेटे को गले लगाया और रेखा जी के साथ ऋतू को वही सोफे पर बैठा लिया. यहाँ अर्जुन खुद हे रसोई से 3 गिलास पानी ट्रे में रख के इधर आया तोह ऋतू थोड़ा हैरानी से देखने लगी.

"ये घर में आता है तोह ऐसा लगता है रेखा के रौशनी हो गयी. नहीं तोह अब दार जी और मैं बस रात इन दीवारों में क़ैद अपनी हे बातें करते रहते है. वैसे तुमने भी तोह खुद को बंद हे कर लिया घर में, पहले तोह ललिता के साथ आ जाती थी.", अन्नू की माता जी ने हालचाल के बाद बातें शुरू की तोह अर्जुन फिर से गायब था. ऋतू की नजर इस ड्राइंग हॉल में सामने वाली दिवार पर लगी उस सुन्दर युवती की तस्वीर पर जा रुकी. कुछ पल बस वो उसकी ख़ूबसूरती निहारती रही.

"दीदी, अब बचे बड़े हो गए है और घर में काम भी उनके साथ वैसे हे बढ़ गए है. आप भी तोह इतने समय से आयी नहीं और ये आज अर्जुन हे हैं जो माँ जी को बोल कर हमे यहाँ ले आया. माधुरी और संजीव की शादी है 21 तारीख को, बाद में क्या पता फुर्सत मिले न मिले, अपनों को तोह पहले हे कहना पड़ता है.", रेखा जी और अन्नू के माता जी में प्रेम तोह था लेकिन इस अलगाव का जीकर दोनों ने हे नहीं किया था बचो के सामने.

"वो आपकी बेटी है न आंटी जी? बहोत सुन्दर है और लगता है मैंने इन्हे कही देखा है.", ऋतू ने जैसे हे ये कहा तोह आंटी हंसने लगी.

"अन्नू इस घर की जान है बिटिया और अब पढ़ने इंग्लैंड गयी है बड़ा कोर्स करने. मुझे तोह पहले ये भी नहीं पता था के अर्जुन उसका स्टूडेंट है, दोस्त हे समझती थी मैं तोह उसको लेकिन अर्जुन ने हे बाद में बताया के अन्नू से उसकी पहचान स्कूल से पहले मेनका और चारुल की वजह से है. टीचर तोह फिर बाद में हे हुई, पहले दोस्त. अर्जुन अकेला दोस्त रहा है अन्नू का और सच कहु तोह तुम्हारे अंकल भी नाज करते है के अर्जुन ने अन्नू को एक सही बदलाव दिया. अन्नू अब नवंबर में आएगी तोह तुम भी मिलना.", आंटी जी ने तोह दोनों का पूरा चिटठा हे खोल दिया था.

"सचमुच अन्नू दीदी बहोत सुन्दर है. वैसे आंटी जी आपका एक बीटा भी है न? अब मुझे याद आया के ये दीदी और वो भैया हमारे यहाँ आते थे. संजीव भैया और वो पतंग उड़ाते होते थे साथ में.", रेखा जी बस देख रही थी अपनी बेटी को और अन्नू की माता जी को. उन्हें यहाँ आ कर सचमुच ख़ुशी हुई थी.

"जस्सी. उसने तोह वही गोरी के साथ ब्याह कर लिया और इधर अन्नू के ऊपर सारा बोझ दाल दिया. उसकी शरारते हद्द से बढ़ने लगी थी तोह बहार भेजना हे ठीक लगा तेरे अंकल को लेकिन देख ले खुद हे के ब्याह में maa-baap भी न जा सके. इसलिए अन्नू मेरा बीटा है और ये मेरी बिटिया.", अर्जुन चाय बना कर ले आया था और कुर्सी सरका कर वही बैठ गया अपना बॉर्न्विटा वाला गिलास ले कर.

"ये वह घर पर तोह एक दक्का नहीं तोड़ता और इधर देखो तोह हर काम कर रहा है. माँ देख रही हो न आप इस ारु के बचे को?"

"ये वह इसलिए नहीं करता क्योंकि वह इसके पास तुम सब हो और यहाँ दीदी अकेली है तोह ाची बात है ने ये उनका ध्यान रखता है. वैसे भाई साहब हर रोज इस समय तक बहार होते है दीदी?"

"आज कुछ काम था इन्हे तोह बताया के 8 बज जायेंगे नहीं तोह अन्नू के जाने के बाद तोह साढ़े 6 बजे तक हे आ जाते है. बीटा तुम चाहो तोह अन्नू का कमरा देख सकती हो, उसको बुरा नहीं लगेगा.", अन्नू की माता जी के कहने पर अर्जुन ने भी खुश हो कर ऋतू को आने के लिए कहा तोह वो भी चल दी. उसको तोह अन्नू को ाचे से jaan-na था. और यहाँ शायद इन्हे कुछ गहरी बातें करनी थी जो सालो में नहीं हो पायी थी.

"वाह.. ये तोह ऐसा है जैसे महीनो से कोई इधर आया नहीं लेकिन एकदम साफ़. और ये इतने सारे टेडी बेअर्स है इधर. वो कंप्यूटर है न?", ऋतू अंदर आयी तोह अर्जुन ने पीछे दरवाजा बंद कर दिया.

"हाँ, वैसे इस कमरे में न अन्नू ज्यादा किसी को कभी आने नहीं देती थी. ये देखो अन्नू की सही फोटो.", अर्जुन ने एक तरफ दिवार पर वो चेहरा दिखाया जहा अर्जुन का वो गुलाबी चेहरा, बड़ी बड़ी आँखें, उभरे होंठ और बहोत हलके घुंगराले बाल गाल का कुछ हिस्सा छुपाये थे. ऋतू ने तस्वीर पर हाथ रखते हुए सहलाया और फिर अर्जुन की तरफ देखने लगी.

"तुम्हे भी अन्नू से प्यार है न? मुझे कोमल दीदी ने बताया था के तुम दोस्त बने थे और अन्नू ने तुम्हे प्रोपोज़ किया था. वाकई बड़ी सुन्दर है ये.", ऋतू ने जिस सहज भाव से कहा था अर्जुन बस हलके से मुस्कुरा दिया था. तबतक कंप्यूटर चालू हो चूका था और स्क्रीन पर वह अर्जुन की हे तस्वीर थी.

"इधर आओ मैं आपको कुछ और दिखता हु.", इंटरनेट चालू होने का सिग्नल मिलते हे अर्जुन ने याहू मैसेंजर खोल कर दोनों की बातचीत ऋतू के सामने करते हुए उसको कुर्सी पर बैठा दिया. ऋतू पीछे जाती रही उस बातचीत में और कही भी कोई अश्लील बात या प्यार व्यार वाला लफ्ज तक न था. हाँ दोनों ने एक दूसरे को याद करने और अपना ख़याल रखने का हर जगह जीकर किया था. बस एक जगह अन्नू का मैसेज था के यहाँ रहना थोड़ा मुश्किल है और उसको अपने कमरे की बहोत याद आती है जहा अर्जुन उसके साथ कितनी मस्ती करता रहता था. आखिरी दिन का घर पे डिनर अब तक की सबसे खूबसूरत याद थी अन्नू के लिए क्योंकि वो उसका इन्तजार कर रही थी और उम्मीद जरा भी नहीं थी.

"सॉरी, मुझे लगा के तुम अन्नू के साथ फिजिकल आत्ताच हो."

"वो भी हु तभी तोह आपको यहाँ लेके आया हु. पता है मैं आपके और प्रीती के साथ अपनी ज़िन्दगी देखता हु लेकिन तबतक के लिए बस अन्नू के लिए मुझे थोड़ा समय जरूर निकलने देना. ये दिल की बड़ी ाची है और सच कहु तोह जीना सीख हे रही थी और बहार चली गयी. आपसे मैं कुछ नहीं छिपा सकता कभी भी."

"चिल. तुमने पहली बार तोह कुछ माँगा है और इसका मतलब ये सचमुच ख़ास है. वैसे 6 महीने बाद दर्शन होंगे, कुछ ज्यादा हे दूर नहीं है?"

"हाँ 3 साल में हर 6 महीने बाद. लेकिन मुझे कमी महसूस नहीं होती और आप तोह हमेशा हे मेरे पास हो. जब कभी 3-4 दिन में समय लगता है तोह इधर आ जाता हु आंटी के पास लूडो खेलने और अन्नू को उसके हे कंप्यूटर से मैसेज करता हु. मैं वैसे यहाँ इसलिए लेके आया था के ये सभी बुक्स आपके लिए है, फिजिक्स और केमिस्ट्री के नोट्स भी.", अर्जुन ने वो ख़ास किताबे ऋतू के सामने रखने के बाद कंप्यूटर बंद कर दिया और वापिस ढकने के बाद ऋतू को देखने लगा जो 5 किताबे उसके सामने थी वो जैसे बहोत ख़ास थी.

"ये अन्नू ने मेरे लिए भेजी है? ये वही के मेडिकल कॉलेज की बुक्स है. यार ये तोह सचमुच बड़े काम की है ारु."

"थैंक यू बोल देना आप जब ये आये तोह. चलो अब चलते है मैं तोह बस आपको यही बताने और बुक्स दिखने लेके आया था यहाँ.", अर्जुन ने हे वो किताबे उठाई और सबकुछ पहले जैसा करके बहार आ गया. ऋतू के चेहरे पर चमक के साथ ख़ुशी थी की अर्जुन हर जगह उसका ख्याल पूरा रखता है. बहार इनकी भी बातें हो हे गयी थी तोह ऋतू ने खुद ट्रे उठा कर रसोई में रख दी जो बिलकुल व्यवस्थित थी.

"अबसे तोह मैं हे आया करुँगी आंटी आपके पास. ये बुक्स दीदी ने मेरे लिए भिजवाई है माँ वह से.", ऋतू को खुश देख कर आंटी जी ने भी उसको गले से लगा लिया.

"अब तोह मैं भी तेरे से मिलने आती रहूंगी वह. और तू पंजाबी सीख ले तोह फिर मजा दुगना हो जाये, लगती तोह सरदारनी हे है तू भी. अन्नू तेरे से एक इंच हे ऊपर होगी ज्यादा से ज्यादा बस तू ज्यादा सोहनी है.", आंटी जी ने एक सलवार कमीज जो पैकेट में था वो ऋतू के हाथ में पकड़ा दिया, पहली बार घर आयी थी लड़की.

"ाचा दीदी, अब इजाजत दीजिये और भाई साहब से भी कहना के आपके साथ घर आये. शादी के हर कार्यक्रम तोह आपको शामिल होना हे होगा.", रेखा जी कड़ी हुई तोह आंटी जी उनसे फिर से गले मिली.

"जरूर आउंगी मैं रेखा और दार जी तोह वैसे भी अंकल जी से मिलते हे रहते है. बाकी दिक्कत हुई तोह ये लेने आ जायेगा मुझे.", उन्होंने अर्जुन को एक तरफ से अपने साथ लगाया तोह अर्जुन भी बोल पड़ा.

"जड़ तुस्सी हुकुम करो आंटी जी, बाँदा तुहाडी खिदमत वच हाजिर राहु. ेहना कम् तह रोज हे कर सकदा, हूँ तुस्सी सलाद कटान दी तैयारी करो. दार जी ने ांडे हे कहना 'भगवान, ला फेर कच्ची सब्जी हे खिला दे, कुक्कड़ ता तू बनौनो हट गई'. हाहाहा."

"मोय पूरा बदमाश हो गया यह मुंडा रेखा, वेख तेरे सामने हे शिफ्ट लाइ जांदा है. ाँ दे दार जी न, ोहना डा ऐ सलाद वाला प्रोग्राम भी बंद करवा देना मैं. जेयून्डा रह पट, रब्ब तनु हमेशा खुश रखे.", आंटी जी के पाँव छूने के बाद अर्जुन पहले हे बहार निकल गया और ऋतू भी. थोड़ी हे देर में रेखा जी के साथ वो गेट तक आयी और उनके जाने के बाद हे मुस्कुराती हुई वापिस कमरे में आ गयी.

"ाची पंजाबी बोलने लगे हो और दीदी का ाचा ख्याल भी रखा है तुमने. मुझे इसलिए हमेशा तुम पर नाज है बीटा के तुम्हारे दिल में सभी के लिए बराबर प्यार है.", रेखा जी अर्जुन से बहोत खुश थी.

"वैसे माँ, मुझे लगता है के वो जो लड़की थी न अंशु उसकी माँ अपने ारु को दामाद हे न बनाने की सोच रही हो."

"क्या दीदी, सुषमा आंटी को पता है के हम दोनों बहोत ाचे दोस्त है."

"तेरी बहिन तुझे तंग कर रही है लेकिन मुझे लगता है ये अब प्रीती को जरूर भड़काने वाली है.", घर ज्यादा दूर नहीं था और जल्द हे तीनो पहुंच गए लेकिन रेखा जी के मजाक करने पर ऋतू जरूर खिलखिला रही थी. अर्जुन भी बस मुस्कुरा रहा था और कार कड़ी करते हे सामने सजे सांवरे संजीव भैया उसके हे इन्तजार में थे जैसे शायद.

"चची सॉरी लेकिन इसको मेरे साथ चलना है तोह जरा इसके कपडे आप हे निकाल दीजिये, डिनर की इजाजत दादा जी ने दे दी है. उन्हें वैसे भी नया खिलौना मिल गया है और वो प्रीती को ज्ञान दे रहे है. छोटे 15 मिनट में आजा भाई तैयार हो कर.", इतना बोल कर वो वापिस बैठक में चले गए जहा से प्रीती और पंडित जी की आवाज आ रही थी हंसने की. आज वो प्रीती को श्वान पालने का पहला सबक दे रहे थे और ऋतू को तोह वो खुद पसंद था.

"माँ, अपने मुन्ना को निक्कर शर्ट पहना के जॉनसन पाउडर लगाने के बाद हे जाने देना. उउउउउउउ.", अर्जुन चिढ़ाती हुई वो ये भी भूल गयी थी की जो चीज उसने अर्जुन से मांगी थी वो लोग वो लेने हे नहीं गए थे. रेखा जी भी मुस्कुराती हुई अपने बेटे को लिए गलियारे से अंदर चल दी.

"अब आप मुझे मुन्ना बोलती हो माँ. ये दीदी तोह खुद हे लल्ली है अभी तक."

"चल तू अंदर, संजीव इन्तजार कर रहा है मतलब वो जरुरी जगह लेके जा रहा है तुझे. वैसे आज मुझे पता लगा के मेरा बीटा बहार भी अपनी माँ का सर ुचा करे रखा है. और तुम ऐसे हे रहना बीटा, दिल से चलने वाले नुक्सान बहोत झेलते है लेकिन उनका सफर बस प्यार से हे भरा होता है.", रेखा जी ने आज बेहिचक अपने बेटे के गाल को चूम लिया था कमरे में आते हुए जो ललिता जी और अलका ने भी देखा था. अलका जहा ऋतू के आने का पता लगने पर प्रीती के पास चल दी वही ललिता जी अपनी देवरानी के कमरे में आ गई.

"तोह मेरे लल्ला ने आज कमाल हे कर दिया जो अपनी माँ को काम से काम बहार तोह ले गया. रेखा, तू थोड़ा जीना सीख बहिन और अर्जुन आइंदा जब भी तुझे लगे तेरी माँ तेरे साथ जा सकती है तोह लेके जाया कर. तेरी दादी भी कह रही थी की आज उन्हें ाचा लगा के रेखा ने समय निकला.", राय जी की बात सुन्न कर अर्जुन भी मुस्कुरा दिया और अपनी माँ से कपडे लेने के बाद ललिता जी का गाल चूम कर ऊपर कमरे में भाग गया. माँ ने आज उसको एक सभ्य पतलून और कमीज दी थी और बाकी उसको पता था के क्या पहन न है.

"दीदी, अब तोह यही करना होगा. माँ जी ने कहा है के जहा उन्हें जाना होगा वह का सब मैं पता कर के राखु. अर्जुन को वही भेजेंगी मेरे साथ काम से. लेकिन जानती हो ये लड़का न खोये हुए अपनों को भी साथ जोड़े हुए है, चाहे इसको नहीं पता लेकिन उन सबके साथ ाचा रिश्ता बनाया हुआ है अर्जुन ने. सुषमा तोह शर्मिंदा थी वही किरण दीदी (अन्नू की माँ) तोह बार बार माफ़ी मांग रही थी आज मुझसे. वो मिलने आएँगी आपसे कल और आप भी हो सके तोह ाचे से बात करना. पुराणी बातें जो उतनी बड़ी भी नहीं थी, अब मायने नहीं रखती.", रेखा जी ने अपनी जेठानी को अलमारी से एक बिंदी का पत्ता निकल कर देने के साथ हे प्रशाद का लिफाफा भी पकड़ा दिया.

"किरण मेरे लिए बहिन हे है रेखा बस वो स्वाभिमानी है जो जस्सी की छोटी सी गलती पर खुद हे पीछे हट गयी. वैसे अर्जुन वह तक कैसे पहुंच गया?"

"आपका लाडला सबके दुःख खुद दूर करने की सोचे बैठा है तोह मैं रोक कैसे दू.? वो तोह आज की तारीख में इसको हे अपना सबकुछ माने हुए है और जितना प्यार आपसे और मुझसे करती थी उस से ज्यादा अब अर्जुन से उन्हें लगाव है."

"और किरण की बेटी भी तोह थी? वो मिली क्या तुझे? मेरा तोह सपना था के वो संजीव की दुल्हन बनती तोह ाचा होता."

"अन्नू? वो इंग्लैंड चली गयी और सुना है के उसका भी अर्जुन ने बड़ी सावधानी से ख़याल रखा है. वो लड़की तोह कभी इधर आती भी नहीं थी लेकिन दीदी ने बताया के अर्जुन और वो बहोत ाचे दोस्त है.", इस बात पर ललिता जी अलग हे तरह मुस्कुराई.

"लल्ला ने कही ज्यादा न संभल दिया हो छोटी सरदारनी को रेखा."

"दीदी, कुछ भी बोलती हो आप. बचा है वह और आप कोई मौका नहीं छोड़ती मजा लेने का."

"हाँ कुछ ज्यादा हे छोटा बचा है ये लल्ला. चल ाची बात है के वो कल आ रही है. और ये संजीव कुछ ज्यादा हे उड़ने लगा है, समझा दियो जरा उसको. रात को घर से बहार खाने पर जा रहा है वो भी एक बोतल लेके. हरे रंग की थी, और अगर आते हे मुँह न सुंघाया तोह मैं इसकी टाँगे टॉड दूंगी.", एकाएक ललिता जी ने ये बात छेड़ी तोह रेखा जी हंसने लगी.

"वाइन या चम्पाने होगी दीदी. गिफ्ट देने के लिए लेके जा रहा होगा वो. एक पल के लिए किसी और पर गुस्सा हो सकती हु लेकिन संजीव सबसे लायक बचा है जिसकी दुनिया सिर्फ अर्जुन और इस घर की खुशियां है. चलता है ये सब और आप कुछ मैट कहना अगर वो ड्रिंक करके भी आये. अर्जुन साथ है उसके तोह वह ध्यान रखेगा. ये चेक जेठ जी को दे देना आप, अलका के पैसे है तोह जमा करवा देंगे.", एक कागज में लिप्त वो 3 लाख का चेक देख कर ललिता जी हैरान हे हो गयी.

"ये तोह खेत से ना आये होंगे रेखा. वह की रकम तोह 32000 होती है."

"दीदी, ऋतू, आरती और अलका के आये है. नीचे ऋतू और आरती का है और जेठजी एक साथ हे लगवा देंगे. अर्जुन ने छोटे पापा से मिला हिस्सा इन तीनो के नाम करवा दिया था इस बार. पता नहीं क्या सोचा है उसने लेकिन जो भी है वो गलत नहीं करेगा.", रेखा जी की बात सुन्न कर ललिता जी ने ाचे से पूरा लिफाफा खोला तोह वह तीनो के हे नाम के बराबर रकम के चेक थे.

"ये 9 लाख उसने इन तीनो को दे दिए रेखा?"

"दीदी, ना आपको पैसे की जरुरत है न मुझे तोह फिर और किसको देगा वो? हर साल ये ऐसे हे तीनो को मिलते रहेंगे. मैंने पुछा था के उसकी 3 और बहने भी है, उनके नाम क्यों नहीं किया तोह उसका जवाब था के आपके पापा ने संजीव के कहने पर पहले हे ऐसा कर दिया है.", अब ललिता जी झेंप गयी थी.

"दोनों ऐसे हे है ये. इनके बीच में नहीं बोलना चाहिए. जैसा संजीव वैसा हे लल्ला है. लेकिन मेरे पिता जी ने इतने तोह नहीं दिए थे रेखा."

"दीदी, इधर जरा ये देखो आप. ये कृष्णा ने जाने से पहले मुझे सौंपी थी. सबकुछ अर्जुन के नाम, कही भी आरती और प्रियंका का जीकर तक नहीं है. घर तक के कागज नरिंदर ने उसके नाम बनवा रखे है. मैं क्या बोलू अब? इस लड़के को हर चीज का मालिक बनाया जा रहा है लेकिन कभी कोई वजह हे नहीं बताई गयी. डर लगने लगा है मुझे अब.", रेखा की चिंता देख कर ललिता जी बराबर बैठ गयी. वो उनको हिम्मत दे रही थी जैसे.

"कुछ संकट जैसा समझ ले इसको रेखा. अर्जुन की सिवा सबमे कुछ न कुछ कमी या लत्त है. कृष्णा तोह वैसे भी तेरी तरह अर्जुन को हे अपना सबकुछ मानती है. नरिंदर और शंकर के साथ साथ इनका (राजकुमार) जी का भी विश्वास किसी को नहीं है के ये कब होश खो दे. संजीव के लिए इस घर में बस लल्ला हे है तोह वह अपनी चाहत बिना बोले ऐसे हे जाहिर करता है. देख लेना के ये अर्जुन साड़ी महाभारत ख़तम करेगा. जानती तुम भी बहोत कुछ हो और मैं भी. लेकिन डाव सभी ने ठीक लगाया है.", ललिता जी ने खुद हे वो कागज अलमारी में रखे और बहार चली गयी.

.

.

आज जैसे वर्षो के बाद सांगवान जी का घर जगमग था और उनके सभी लाडले बेटे इस बड़े ड्राइंग हॉल में बैठे गप्पे लगा रहे थे. है कोई आते हुए अपने साथ तोहफे, फूल लेकर आया था. हमेशा की तरह धर्मवीर सांगवान जी अपने प्रमुख स्थान पर अकेले विराजित थे और कांच की टेबल के दोनों तरफ 2-2 लोग बड़े सोफों पर. गुलाटी और भुप्पी की जोड़ी एक तरफ और उनके सामने परमवीर और शंकर. टेबल पर जाम, khan-paan के साथ साथ सभी के लाये तोहफे रखे थे.

"अब लगता है न के ये घर है, ये नकली जाट पहले हे दिल की हालत समझ लेता तोह ऐसा हर हफ्ते हे होता.", आज तोह जोरावर भी बिना पत्ते के रसोईघर के सामने टकटकी बांधे बैठा था और गब्बर सांगवान जी की धर्मपत्नी के आगे पीछे हे मंडरा रहा था रसोई में. इतनी हे देर में सामने वाली चमकदार सीढ़ियों से उतरती ये 23-24 साल की 6 फ़ीट लम्बी रुस्सियन लड़की एक जमीन तक लम्बे गाउन में नजाकत से टेबल तक आ गयी. उसके पीछे हे मिली (रॉटवेलर) थी. आते हे ये युवती अपने बड़े सांगवान जी के गले में बाहें डालती गॉड में हे बैठ गयी.

"सचमुच चाचा जी, अब लगता है जैसे हम कितने सालो के बाद यहाँ आये है. ये मरीना तोह परम से भी लम्बी हो गयी है और प्यारी तोह शुरू से हे है ये गुड़िया.", मेहुल के ऐसा कहते हे मरीना ने अपने दादा का गाल चूमने के बाद मेहुल को जवाब दिया.

"आप भोत ाचे है मेहुल अंकल. और ग्रैंडपा के लिए मरीना हमेशा डॉल हे रहेगी. ग्रैंडपा ये प्रेजेंट्स एंड फ्लावर मेरे लिए हे है न?", धर्मवीर जी भी बचे की तरह अपनी लाड़ली के साथ नाक से नाक लगा रहे थे. उसकी बात सुन्न कर मुस्कुराते हुए उन्होंने हाँ भरी.

"ये सब और किसके लिए होगा, मेरी प्यारी सी मन्नू का है सबकुछ. सब इस बीएड पर ले जा कर देख लो फिर आपक केक टाइम है.", वो प्यार से अपनी पौती को मन्नू बुलाते थे और इतना सुन्नते हे मरीना ने ख़ुशी से बाकी सबको थैंक्स कहा और टेबल से वो सभी उपहार उठा कर करीब हे बीएड पर रख दिए जहा उसके पीछे हे मिली भी जा चढ़ी.

"इतना टाइम आप कैसे रहे चाचा जी? इस गधे को भी ये एहसास नहीं हुआ की मरीना आपकी ज़िन्दगी का हम हिस्सा है? आपके साथ आज भी ये वैसी हे है जैसे 7 साल पहले थी और हिंदी तोह कही ज्यादा ाची हो गयी है इसकी.", शंकर के ऐसा कहने पर परम का चेहरा झुक गया था शर्मिंदगी सी.

"पापा गधे नहीं है चाचू, वो नकली जाट है. He's बेस्ट डैड इन था वर्ल्ड एंड ी लव हिम मोस्ट. Okay ग्रैंडपा से थोड़ा सा काम. हाँ.", मरीना को शायद नहीं पता था के नकली जाट का मतलब क्या है लेकिन उसके ऐसा बोलने पर सबके ठहाके निकल गए. लेकिन अगली आवाज सुनते हे सिर्फ परमवीर के चेहरे पर थोड़ी ख़ुशी आयी थी.

"और दो आधा अधूरा ज्ञान इस नादान सी लड़की को आप. कितनी बार कहा है के उसके सामने मैट झिड़का करो मेरे बचे को लेकिन आदत नहीं बदले उम्र बदल गयी जी आपकी. भूपिंदर वो डोंगा इधर दे बीटा, मैं दाल लेके आती हु. इन्हे वही पसंद है अपनी दूसरी प्रेमिका के साथ.", ये यशोदा जी थी परम की माँ और धर्मवीर जी की एकमात्र प्रेमिका.

"भगवान् इतनी शिक्षा इसको भी दिया कीजिये के जिम्मेवार बने. देखो कैसे दांत दिखा रहा है बाप की खिंचाई होती देख. वैसे शंकर, दाल आजतक तुम्हारी चची जितनी बढ़िया कोई बनता न देखा मैंने. वैसे एक बात और बता देता हु के 7 साल ये अकेला हे दूर रहा है biwi-beti से. मैं और इसकी माँ तोह बहाने से हर दूसरे महीने मिल आते थे ांनी और मन्नू se.",Is खुलासे पर वापिस आती यशोदा जी भी हंसने लगी और बाकी सब भी छोटे सांगवान को देख कर. वही हैरान था बस.

"यस. तहत इस व्हाई माय ग्रैंडपा एंड ग्रैनी अरे बेस्ट. मेरे ग्रेजुएशन डे पर भी ग्रैंडपा साथ थे वह.", मरीना की ख़ुशी देख कर परमवीर भी सबकुछ भूल गया.

"तुम्हारे ग्रैंडपा से ज्यादा बेस्ट मेरे पापा है मरीना. वो हमेशा मेरे साथ होते है, चाहे दिखाई दे या नहीं. अपनी माँ को भी बुला लो बीटा, मंतोष अंकल ने देखो केक भी लगा दिया है.", एक तरफ खाने की लम्बी मेज पर सजावट के साथ वो 3 मंजिला केक सही से रख दिया था मंतोष ने, ख़ास सुरक्षाकर्मी था ये सांगवान जी का और घर के बाकी काम भी करता था. मरीना तुरंत एक तरफ के उस बंद कमरे में चली गयी जहा उसकी माँ ांनी तैयार हो रही थी शायद.

"शंकर, नाराजगी तोह हमे तुमसे भी है बीटा. अकेले नहीं आना था तुम्हे इस अवसर पर. किसी ख़ास समारोह में अगर हम तुम्हारी चची के बिना वह आ जाये तोह पंडित जी से पहले भाभी हमको बहार का रास्ता दिखा देंगी यशोदा के लेके आने के लिए.", उनकी बात भी सही थी क्योंकि कमरे से 4 खूबसूरत महिलाये बहार आयी थी जिनमे ांनी अलग हे छटा दिखा रही थी. लाल salwar-kurti जिसकी बाहें नहीं थी लेकिन गले में दुपट्टा और हाथो में सोने के पतले कड़े, चूड़ियों जैसे. वो मरीना जितनी लम्बी या छरहरी तोह नहीं थी लेकिन एक सांचे में ढले खूबसूरत शरीर की मालकिन जरूर थी. ऐसी अप्सरा पर तोह परमवीर सांगवान का मरना तये हे था.

"चाचा जी, अभी उस घटना की वजह से मैं रेखा को आराम हे देना चाहता हु. उसको थोड़ा समय तोह लगेगा हे चाचा जी उबरने में, बेशक वो न दिखाए लेकिन घटना मामूली नहीं थी और असर तोह हुआ हे है.", शंकर की दलील पर बस वो मुस्कुरा दिए और देखने लगे जैसे गब्बर उनकी श्रीमती जी के साथ हे टेबल तक आ रहा था. टेबल के ऊपर अगले पाँव रखते हुए वो खूंखार कुत्ता भी मासूम सा हे लग रहा था इस वक़्त.

"वैसे आज पहली बार मैं इन चारो को खुला देख रहा हु चाचा जी. और ख़ास बात है के जोरावर भी इनके साथ आराम से घुलमिल रहा है.", मेहुल ने जिज्ञासवश पूछ हे लिया. वो गब्बर और जोरावर से थोड़ा दूर हे रहता था और वो दोनों थे भी ऐसे की सिर्फ कुछ हे लोगो को नजदीक आने देते थे.

"माँ के सामने क्या जोरावर और क्या गब्बर भाई. एक दिन तोह मेरे पर हे पंजा रख दिया था इसने और ऊपर से माँ भी मुझे हे डांटने लगी. पता नहीं इनका दिमाग कैसा है लेकिन ांनी और मरीना के साथ ये आराम से है जबसे माँ ने उन्हें मिलवाया है और फिर बंधा हे नहीं.", परम की बात सुन्न कर शंकर ने भी बताया के जोरवार और गब्बर के साथ तोह उनका भी थोड़ा दुरी वाला हे रिश्ता है.

"तुम्हारी माँ यशोदा ने शीशी से दूध पिलाया है इन दोनों को बीटा. वो कभी मांस के हाथ नहीं लगाती थी लेकिन इनके लिए सबकुछ किया और बदले में इन दोनों ने भी उसको हे अपना सबकुछ मान लिया. मिली और तीसों को शिक्षा पंडित जी से मिली है और वो हमेशा ड्यूटी और परिवार को समझते हो. गब्बर जोरावर जरा अनपढ़ रह गए लेकिन कभी गलत नहीं करते. देख रहे हो कैसे तुम्हारी में के हाथ पर पंजा मारते हुए केक मांग रहा है.", सचमुच हे वो भोला लगा रहा था इस वक़्त और ये 5 लोग भी खड़े हो कर टेबल के पास चले आये और उनके साथ हे हत्ता कट्टा जोरवार सभी के ird-gird घूमने लगा. मरीना ने उस रिबन लगे तेजधार चाकू को उठाया तोह दोनों तरफ से यशोदा जी और धर्मवीर जी ने उसका हाथ थाम लिया.

"वेलकम होम आवर प्रिंसेस मरीना.", उनके ऐसा कहते हे केक का एक हिस्सा तिकोना काट कर मरीना ने अपने दादा दादी को खिलाया और सभी ने तालियों से इस पल को ख़ास बना दिया. मंतोष लगातार तस्वीरें निकाल रहा था, इन अनमोल पालो को. उसके बाद दादा दादी ने अपनी लाड़ली को खिलाया और मरीना ने बारी बारी से सभी को अपने हाथ से हे केक का जायका दिया, मंतोष को भी. यशोदा जी ने 4 बड़े टुकड़े अलग निकलते हुए अपने श्वान बचो को भी इस दावत में शामिल करते हुए उनकी अलग अलग प्लेट में केक परोसा तोह सबसे ज्यादा खुश यहाँ वही दिखे.

"वेलकम होम ांनी भाभी. ये एक छोटा सा प्रेजेंट मेरी तरफ से.", शंकर ने वो नीले कागज में लिपटी डिबिया ांनी के सामने की तोह मुस्कुराते हुए बस वो इतना हे कह सकीय. "थैंक यू वैरी मच शंकर." और अब रसोईघर में हलचल ज्यादा हे हो गयी थी लेकिन मर्द सभी वापिस अपनी जगह.

"शंकर चाचा आपके घर मैरिज सेरेमनी है. ऍम ी इन्वितेद तेरे?", मरीना के भोलेपन को देख उन्होंने ना में सर हिला दिया.

"मेरी बेटी अपने हे घर में कैसे इन्विते कर सकता हु? यू अरे part ऑफ़ थे फॅमिली लिटिल प्रिंसेस. हाँ तुम्हारे पापा को कार्ड देना पड़ा क्योंकि इनके पास टाइम नहीं होता."

"माँ, ये फेर चालु हो गए सब मिल कर. मैं न बैठता बेइज्जत्ती कारवां.", परम की नौटंकी देख कर यशोदा जी उसकी हे टांग खींचने लगी.

"बैठ के नहीं करवानी तोह पसर जा. 2 गिलास बाद वो भी हो हे जाना है तेरा हाल. बेइज्जत्ती हो रही है laat-saab की जैसे बहार तू कही का महाराजा है. ाँ दे कल रूचि को, तेरी बेइज्जत्ती ाचे से वो हे करेगी.", माँ की झाड़ और फिर अपनी बहिन का नाम सुन्न कर तोह परमवीर भीगी बिल्ली हे बन्न गया.

"पापा, वो पागल यहाँ क्यों बुला ली आपने? बड़ी बहिन न हैं वो फिर भी हाथ चलती रहती है अब तक. मैं थोड़े दिन शंकर के साथ हे रह लूंगा जितने वो इधर रहने वाली है.", इतनी दयनीय हालत देख कर भूपिंदर पहली बार जोरो से हंसा था और उसको खांसी होने लगी थी हंसी रोकते समय.

"वैसे चाचा जी बात सही है इसकी भी. रूचि इसको और हमको कुछ भी नहीं समझती, वैसे मैं तोह काम में हे बिजी रहने वाला हु तोह एक बार मिलने आ जाऊंगा लेकिन इसको जरूर घर पे हे रखना.", शंकर के ऐसा कहने के साथ एक बार फिर सब हंसने लगे थे सिवाए परम के.

"वो अपने बाप को कुछ नहीं समझती तोह तुम सब तोह बड़े भाई हो बस. मन्नू और ांनी से उसका लगाव है तोह मिलने आना हे था. वैसे रूचि 2 महीने इधर हे रहने वाली है अब. बचो की छुट्टिया हो गयी है और विशेष (दामाद) ताइवान जा रहा है काम से. तुम सब उसके भाई हो और वो इसलिए सब पर रौब मारती है, नहीं तोह रूचि जैसा दिल का साफ़ और नरम इस घर में तोह कोई है भी नहीं."

"ले लो आप भी मजे चाचा जी, जगह पक्की कर रहे हो बस अपनी बेटी की नजरो में. आज तक याद है जब उसने सर्दियों में आम मांग लिए थे और ना मिलने पर मेरी मोटरसाइकिल गिरा कर जो खरी खोटी सुनाई थी उसने. तौबा मेरे बाप की भी तौबा. कुछ दिन मैं भी आराम हे करूँगा, हाँ शंकर के घर ले जाना. वह माहौल सही मिलेगा और उधर भी जिसका जोर हो उसकी सुनी जाती है.", भुप्पी ने पुरानी बात याद दिलाई थी और शंकर मंद मंद हंस रहा था.

"माँ को वैसे भी रुचिता पसंद है लेकिन मुझे लगता है एक बार अर्जुन को जरूर उसके हाथे चढ़ना चाहिए.", शंकर ने जो कहा था वो परम बड़े ध्यान से सुन्न रहा था.

"सुना पापा रुचिता. इसकी भी तोह सहमत कई बार आयी है लेकिन पूरा नाम ले कर ये भी बच रहा है. खैर तेरे साथ वो झगड़ा उतना नहीं करती क्योंकि दोनों एक जैसे हे हो लेकिन मेरा डाव अर्जुन पर है शंकर अगर तू सोच रहा है के रुचिता का उस से पन्गा हुआ तोह वो उसकी रेल बना देगी. तेरा छोरा स्नाइपर है अगर पापा की लाड़ली एक47 है तोह.", छोटे सांगवान के इस कथन पर शंकर को थोड़ी हैरत हुई थी और उसके साथ साथ भप्पी और गुलाटी को भी.

"कहा न के ये कभी कभी सही बात करता है. अर्जुन के साथ ाची जमेगी मेरी बेटी की भी और दोनों बचो की भी. अविनाश और ख़ुशी उसके बराबर हे है बस क्लास में एक साल आगे है दोनों bhai-behan. परसो आऊंगा मैं सबको ले कर उधर, तुम्हारी चची ने भी मार्किट से सामान लेना है भाभी के साथ तोह काम भी हो जायेंगे.", इनकी बातें कुछ देर और ऐसे हे चली फिर खाने के बाद 11 बजे तक सभी लोग जा चुके थे.

"ख़ुशी बड़ी हो गयी न ग्रैंडपा? मैंने तोह उसको तभी देखा था जब वो पोयटाइल्स करती थी और मय्बे 11 इयर्स की थी. अवि तोह बस बुइ के साथ फिक्स रहता है, होप हे इस ग्रोन तू.", मरीना कपडे बदल कर अब पजामा कमीज में थी और गूडनिघत कह कर जाने हे लगी थी.

"हाँ वो अभी भी वैसा हे है मन्नू बीटा. स्टिल mumma's बेबी. बूत वैरी सून यू गोंना मीट सम गुड फ्रेंड्स. शंकर चाचा है न तुम्हारे, उनकी दौघतेर्स भी बहोत ाची है. वह और भी लोगो से तुम्हे मिलवाऊंगा एंड यू विल डेफिनाटेली फील गुड इन तहत एनवायरनमेंट. नाउ it's 11, ब्रश योर टीथ एंड स्लीप वेल. ुम्हा .. गूडनिघत प्रिंसेस."

"गूडनिघत डॉक्टर. हाहाहा. bye bye.", हंसती मुस्कुराती वो लड़की सचमुच ख़ास थी डॉ धर्मवीर सांगवान के लिए और उनके इस आशियाने में भी इसके आने से रौशनी हो गयी थी.
 
मॉडरेटर्स, काइंडली वाच थे राटन एग्स. िफ़ माय रिप्लाई वास् वर्थ देलेटिंग, सो वास् तहत पर्सन. बूत ओनली वार्निंग इवन िफ़ तहत गाए गोज स्ट्रैट ों में? एव्री पर्सन है सम लिमिट ऑफ़ पेशेंस एंड ी बलिन्डली बिलीव इन मॉडरेटर्स, ऑलवेज िग्नोरिंग सुच वगबोन्डस.

िफ़ एनीवन एवर रिपीट सुच थिंग्स, बन में फर्स्ट. Story Collector
 
भाई अपडेट 12 बजे तक दूंगा. दवाई के असर से दोपहर और शाम नींद में निकल गयी.
 
Back
Top