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पुष्पक
घर में गीत और शगन का कार्यक्रम अपने स्वरुप हे चल रहा था. केशव मां ने सबके तिलक इत्यादि करके अपने दोनों प्रमुख bhanja-bhanji को कपडे, गहने आदि से भात भर कर वो सब भी दिखाया जो वो अपने साथ ले कर आये थे इन्हे शादी में देने के लिए. ये रिवाज हे थे जिसमे मां हे अपने bhanje/bhanji को पहला शगुन भेंट करते है.
आदतन सभी महिलाये कपडे, गहनों आदि में रूचि ले रही थी और सभी के चेहरों पर खूब waah-wahi थी की केशव जी ने इतना कुछ किया है. रामेश्वर जी से लेकर प्रीती तक सभी के लिए कुछ न कुछ जरूर था. शगुन अभी और आगे बढ़ा जब खुद सोहनलाल जी अपनी बीवी अंजना जी के साथ पधारे. एक पल तोह कौशल्या जी ने हैरत से उनके पीछे सामान लिए आये बिट्टू और राजेश को मन किया लेकिन उन्होंने हे खुद केशव के सर पे हाथ रखने के बाद इजाजत मांगी.
"बहिन जी, बचे तोह हमारे लिए भी सभी बराबर है. संजीव हे तोह पहला बचा था जो हमारे यहाँ रेखा के साथ आया था. केशव बड़ा है और उसके बाद बिट्टू का भी तोह हक़ है. मन करके हमे बहार मैट कीजिये और सरपंच जी भी आये है.", सोहनलाल जी के शब्दों का प्रभाव गहरा हे हुआ कौशल्या जी पर और वही रामेश्वर जी की आँखों में भी हल्का सा गीलापन उभर आया, ख़ुशी से.
"हाँ तोह सोहन भाई वैसे भी यदा कड़ा तोह कोई पुण्य काम करते है. केशव बीटा, आपके साथ अब pita-tulya सोहन भाई है और ये सरपंच पे जुरमाना लगेगा, लाजमी.", अपनी जगह से खड़े हो कर रामेश्वर जी ने कृष्णा जी के पिता और सोहनलाल जी का गले लग कर आभार प्रकट किया. माहौल और भी बेहतर हो गया था जब घर की पहली शादी में वो रिश्तेदार भी जिनकी अपनी अलग अलग बेटियां यहाँ ब्याही गयी थी, उन्होंने भी ललिता जी को बाप की कमी खेलने न दी.
"इस सरपंच की पंचायत तोह मेहमानखाने में लगेगी थानेदार, तुम्हे कुंदन बुला रहा वही पे. यहाँ बेटियों और बचो के बीच दिल्लगी तुम कहा कर रहे हो हमे ाचे से खबर है.", ऐसा मजाक पंडित जी के साथ या तोह खुद कौशल्या जी कर सकती थी या फिर सोहनलाल जी और बस 2-3 उनके hum-umar करीबी. सोहनलाल जी का साथ खुद कौशल्या जी ने दिया इन हंसी के ठहाको के बीच.
"सही कहा भाई साहब आपने. पूर्णिमा तोह चलो इनकी नजरो के aas-pas हे रहती है और आज सुनंदा के साथ साथ अंजना दीदी भी आयी है इसलिए ख़ुशी देखते हे बनती है इनकी.", मधु के साथ साथ रेणुका, राजेश्वरी, रोमिला इत्यादि की भी हंसी की आवाज बुलंद हो गयी थी. वही जिन जिन के नाम कौशल्या जी ने लिए थे वो सभी चेहरा पल्लू में दबाये शर्मसार होने लगी. खिसियाते हुए पंडित जी तोह हाथ जोड़ कर जो वह से निकले पलट कर देखा भी नहीं.
"दादी, अब मुझे समझ आया ये ऋतू क्यों इतनी हंसोड़ है और बेबाक भी. आपने हे घुट्टी दी थी न इसको?", अलका हँसते हुए कौशल्या जी से बोली और ऋतू उसको घूर कर चुप रहने का कहने लगी. हंसी ख़ुशी के इन्ही लम्हो में एक बार फिर से वही शगुन और गीत गूंजने लगे थे. Riti-riwaaj का सही मकसद क्या है ये वही समझ सकते है जिन्हे bhare-poore परिवार को एकत्रित रखने की समझ हो. इनकी जरुरत इतनी हे होती है की अपने के प्रति खुलकर प्रेम जाहिर किया जा सके और निरंतर चलती ज़िन्दगी से कुछ क्षण अपनों के बीच व्यतीत किया जा सके.
"अर्जुन बीटा, अब संजीव को पिछले घर ले जा अपनी किसी भी बुआ के साथ. हमारा पहला घर वही है और तेरी बुआ इसकी छाप वही उतारेगी. नजर बांधने के बाद तुम घर से अकेले बहार नहीं जाओगे इसके बाद संजीव.", कौशल्या जी ने अपनी जगह से उठ कर एक किनारे वाली थाली अर्जुन को पकड़ते हुए दोनों को हिदायत दी. अर्जुन को अब समझ आया था की दादी उस घर को इतना क्यों मानती है.
"माँ, नजर और छाप रेनू को करने दो. माँ बन्न ने वाली है ये तोह बचा भी नजर में शामिल होगा.", मधु ने अपनी जगह रेणुका को आगे कर दिया था और यही महफ़िल में बात खोल भी दी थी की रेणुका गर्भवती है. कृष्णा जी ने एक लाल चुनरी, जो ख़ास थी वो ललिता जी को इशारे से रेणुका को उड़ाने को कहा. अब भात की हे रसम के बीच रेणुका को भी सभी बड़ो का आशीर्वाद मिल गया था.
"ललिता, नेग तैयार रखियो मेरी बेटी के लिए. तेरे छोरे की नजर करके आएगी तोह मर्जी का वचन लेगी तुझसे.", यहाँ ये आवाज पूर्णिमा जी की तरफ से आयी थी जिन्होंने साफ़ कह दिया था उनके लिए भी रेणुका वैसी हे है जैसे Madhu-Shalini.
"वचन है माँ जी, इसकी गोदभरे भी ऐसी हे करुँगी और शगुन रेणुका के भाई साहब जाने.", ललिता जी भी आज उस पीली साड़ी भी बसंत का मौसम लग रही थी जिन्हे बचो के ब्याह से ज्यादा ख़ुशी थी की सभी दिल से यहाँ शामिल है और उन्हें पूरा सत्कार भी मिला. अर्जुन ने अपने बड़े भैया को भी उठने में मदद की और इनके साथ हे प्रीती भी अपनी बुआ के पीछे अफसाना को लिए.
"हम भी जा सकते है न दादी?", उठने के बाद हे प्रीती ने वापिस मदद कर कौशल्या जी से पुछा तोह उन्होंने भी हँसते हुए हाथ के इशारे से जाने को कहा. थाली अब प्रीती के हाथ थी और अर्जुन ने खुद भैया और बाकी सबके लिए दरवाजे खोल सबके बैठने के बाद इलो बहार निकली.
"तुमने ये कार क्यों निकली?", सवाल न चाहते हुए भी प्रीती के मुँह से निकल हे गया जिसका जवाब खुद संजीव भैया ने दिया.
"ऐसा है प्रीती की अर्जुन चाहे जितना भी खुद को नास्तिक या अलग बताये पर जैसा दादी कहती है ये वैसा हे करता है. शुभ काम के लिए जा रहे है इसलिए इसने ब्लैक कार की जगह ये गाडी निकली. देख लो भगवान् में नहीं मानता पर किरशन जी का चला चाबी में रखता है ये.", संजीव भैया भी खुलकर बोलने लगे है ये अब प्रीती के लिए नयी बात नहीं रही थी पर रेणुका को ख़ुशी हुई की उसका बड़ा भतीजा वो गंभीर व्यक्ति नहीं रहा जिसकी आवाज हे यदा कड़ा सुनाई पड़ती थी.
"इस अर्जुन ने तोह तुम्हे भी बोलना सीखा दिया संजीव.", रेणुका बुआ की बात पर एक पल तोह संजीव सकपका गया लेकिन मोर्चा अर्जुन ने अपने हाथ लिया.
"क्यों बुआ, आपको नहीं सिखाया मैंने? आप तोह हमेशा दादी के हे चिपकी रहती थी लेकिन अब देखो तोह लोगो के सामने खुद को प्रीती की बड़ी बहिन बताने लगी हो.", ये बात खुदसे हे जोड़ी थी अर्जुन ने, बहिन वाली. और इसके साथ हे रेणुका बुआ ने उसका हलके से कान खिंच दिया. अकेले होते तोह वो ऐसा कदापि न करती लेकिन इस पल में ये भी जाताना था की बुआ भतीजा भी है ये लोग.
"देखा संजीव इस शैतान को?", बुआ ने ऐसा कहा हे था की अर्जुन ने आईने से एक नजर रेणुका को देखा और जब दोनों की नजरे मिली तोह अर्जुन ने आँख दबा दी. माहौल एकदम हे शांत हो गया था. संजीव मुँह दबाये हंसी रोक रहा था, रेणुका की नजरे शर्म से झुकी थी और अर्जुन की हरकत प्रीती से भी न बची थी जो अब संजीव भैया जैसे हंसी दबा कर बहार देख रही थी.
"अचानक हुआ क्या है?", अफसाना जो इतनी देर से ये सब ख़ुशी से देख रही थी, वो चुप न रह सकीय और इसके बाद बस प्रीती, संजीव और अर्जुन के हंसने की आवाज हे जवाब में मिली. कार रुक चुकी थी और प्रीती ने उचक कर बहार देखा.
"यहाँ तोह पहले से हे अंकल लोग है.", उमेद, राजेश की कार इधर वाले घर के बहार हे कड़ी देख प्रीती ने कहा था. अर्जुन ने उतर कर बड़ा गेट खोला और एक पल के बगीचे की तरफ हैरत से देख वापिस कार में बैठ उसको घर के अंदर हे ले आया.
"यहाँ तोह भैया खुश्ती चल रही है.", अर्जुन के ऐसा कहते हे कार से उतरने वाले सभी के चेहरे उस तरफ गए जहा घांस तैयार करने वाली कच्ची जगह को कुछ ज्यादा हे पोला करके अखाडा सा हे बना दिया था इन लोगो ने. प्रीती ने भी अफसाना की तरह सर से घुमा कर गले में दुपट्टा करते हुए घर के अंदर वाले हिस्से का रुख किया. ये लोग अंदर चले गए और अर्जुन इस अखाड़े की तरफ खिंचा आया जहा दलीप मौसा और धर्मपाल जी अखाड़े के बीच थे वही बहार पूरे जोश में हौंसला बढ़ाते उसके पिता, इन्दर चाचा, उमेद चाचा, राजेश मां, अशोक फूफा के साथ साथ छोटा सांगवान, मेहुल गुलाटी और भूपिंदर भी मौजूद थे.
"मेरे 2000 धर्मपाल भाई पे.", ये इन्दर चाचा ने बोलै हे था की दलीप जी ने अपने सामान तगड़े धर्मपाल जी को काख की तरफ से हाथ दाल कर मिटटी में पीठ के बल पटक दिया और इसके साथ हे चाचा की जगह अब अर्जुन के पिता चहक रहे थे.
"इन्दर, धर्मपाल भाई में अब वो बात न रही जो पहले थी. तब दलीप एक मिनट नहीं टिकता था और आज देख पिछले 10 मिनट में खेल 50-50 रहा लेकिन जीत दलीप की हुई. 5000 हरा है तू, 3 उमेद से और 2 मेरे से.", शंकर की बात सुन्न कर जहा इन्दर का चेहरा थोड़ा मायूस था वही दलीप जी खुद धर्मपाल जी का हाथ थामे अखाड़े के दूसरी तरफ आ बैठे. ये लोग यहाँ पूरी तैयारी से आये थे जैसे उनके पास कपडे थे और साफ़ सफाई के साधन भी.
"भाई, शंकर अगर उमेद के साथ अखाड़े में उतरता है तोह मेरे 10 हजार शंकर पे.", अशोक जी ने ये पेशकश राखी तोह जीजा की बात सुन्न कर तुरंत हे शंकर ने अपनी कमीज उतार कर राजेश को पकड़ा दी. उमेद बगले झाँक रहा था.
"मेरे 15 गज्जू पे जीजा. चल बे गज्जू, नाक न कटवा दियो.", उमेद साफ़ सुथरे कुर्ते पाजामे में था जो इन्दर की बात सुन्न कर झिझकता हुआ खड़ा हुआ. अर्जुन उनसे 20 कदम दूर इधर आँगन में बैठा ये सब देख रहा था. उसके baap-chacha और मां लोग इस उम्र में भी इतने चुस्त और तगड़े है. घर के अंदर रेणुका बुआ वही सब कर रही थी जो उन्हें कौशल्या जी ने समझाया था.
"यार कपड़ो का पन्गा है मेरे नहीं तोह लड़ लेता. तू हे भीड़ ले इन्दर इसके साथ.", उमेद की बार सुन्न कर बाकी सभी के चेहरों पे मुस्कान आयी वही इन्दर के निराशा.
"देख शंकर ने भी तोह शर्ट खोल दी. तू भी कुरता उतार और पाजामे की जगह ये ट्रैक पहन ले जो राजेश लाया है.", यहाँ तोह जितने भी ट्रैक एक तरफ पड़े थे वो सभी प्लास्टिक के लिफाफों में बंद थे, जैसे अभी तक प्रयोग हे न हुए हो. उमेद एक ट्रैक पजामा लिए गाये वाले कमरे में जा घुसा.
"जीजा, ये ट्रैक पाजामे आपके पापा ने अर्जुन के लिए मंगवाए थे और मुझे नई लगता एक भी सही सलामत पहुंचेगा.", राजेश के स्वर में जो विनती थी उसको देख शंकर के साथ साथ बाकी सभी हंसने लगे.
"तू पहले बता देता के ये अर्जुन के हैं. अब कुश्ती का प्रोग्राम भी तुम लोग बनाओ और बाद में रोना भी तुम्हारा. कोई न, 10 और ले आईओ बाद में. तेरा हे भांजा है."
"हाहाहा.. आज तोह वैसे राजेश को भी 2-2 हाथ करने हे चाहिए. साले साहब ने जाने आखिरी बार कब पटखनी खायी होगी?", नरिंदर ने बात को घूमते हुए राजेश को हे लपेट लिया था.
"हाँ, सही कहा इन्दर भाई. ये अपना भुप्पी भी कह रहा के इसको मिटटी का स्वाद बहोत पसंद. एक मुकाबला तोह राजेश भाई और भुप्पी का फिक्स और मेरे पहले से हे 5000 राजेश पे.", ये सांगवान था जो मजे लेने में इनके हे समकक्ष था. दूसरी तरफ बैठा भुप्पी नाराजगी से इन्हे देखने लगा.
"आजा बे भोले, तू भी क्या याद करेगा.", उमेद सिर्फ ट्रैक पाजामे में इधर आया था और उसका जिस्म कही से शंकर से काम न था बल्कि सुघड़ और कुछ चौड़ा हे था शंकर से. वही किसी अरबी घोड़े सा कैसा हुआ शंकर बेशक आधा फुट कद में काम था लेकिन कंधे बताते थे की क्यों बाकी सभी की नजरो में ताक़त का दूसरा नाम था वो.
"मेरे 10 शंकर पे और धरम भाई के 10 उमेद पे.", दलीप ने दोनों की तरफ से जब दांव लगाया तोह धर्मपाल जी भी हंस दिए. इधर इन्दर के 'स्टार्ट' कहते हे वो दोनों तगड़े शरीर एक दूसरे की हथेलियां जकड़े भीड़ गए. सचमुच जोर बराबर हे था इनमे और अर्जुन गौर से देख रहा था के उसके पिता के पत् और पंजे कितने मजबूत है. उमेद के पाँव पीछे सरक रहे थे और इसके बाद अचानक हे शंकर का शरीर हवा में उठा और फिर पीठ मिटटी में.
"ओह बहनचोद.. ये क्या था उमेद भाई?", सांगवान की मुँह से न्यास हे निकला था ये जब उसने शंकर को चित्त देखा.
"टेंशन नहीं परम भाई. इन दोनों का फैंसला ऐसे नहीं होता. गज्जू गरम कर रहा है अभी शंकर को और इनका बेस्ट ऑफ़ 5 है. मतलब जो 3 पटकनी दे गया वो जीतेगा.", नरिंदर के खुलासे से उमेद पर दांव लगाने वाले थोड़े नाखुश दिखे थे लेकिन वो मान रहे थे की उमेद जीतेगा हे. इसके साथ हे फिर से शुरू हुआ दौर लेकिन शंकर ने इस बार पंजे पकड़ने की जगह किसी सांड की तरह झुक्क कर उमेद की कमर गिरफ्त में लेते हुए करारी पटखनी दी. अशोक जी को भी उम्मीद न थी की इस उम्र भी शंकर इतना फुर्तीला होगा.
"ओह भाई.. ये क्या था?"
"जीजा, अभी देखना शंकर की दुनिया कैसे पलट टी है.", नरिंदर को जैसे पहले हे पता था के आगे क्या होना है और इसके बाद के लगातार 2 दांव उमेद ने चतुराई से जीत कर 3-1 से मुकाबला अपने नाम कर लिया. इन दोनों के बीच हर बार बस एक हे डाव में पटखनी हो जाती थी, जैसे क्रिकेट में हर बॉल पर 6 या आउट वाला हिसाब हो. शंकर का जिस्म इतनी देर में हे जैसे कुछ फूल गया था.
"आठ.. साला ये सब अब अपने बस का नहीं रहा.", उमेद एक तरफ हे पसर गया था और शंकर ने पानी पीते हुए मुस्कुरा कर इन्दर की तरफ देखा.
"पता है गज्जू ऐसा क्यों कह रहा है? शंकर की बैटरी चार्ज हो चुकी है अब और अगर इस वक़्त मैं भी इस से भिड़ा तोह गर्दन कल तक दुखती रहेगी.", नरिंदर को गहराई से पता था आपस में हर भाई का हिसाब.
"चाचा जी अगर सिर्फ खेल हे है तोह मेरी तरफ से अर्जुन दावेदार है.", ये आवाज संजीव भैया की थी जो कितनी देर से इधर खड़े थे खुद अर्जुन को खबर न हुई. जैसे प्रीती उनकी बगल में कड़ी थी मतलब साफ़ था के अर्जुन को बलि का बकरा बनाया गया था.
"पैसे वैसे है क्या दूल्हे राजा या ऐसे हे अपना घोडा रेस में उतारने चले आये. रेनू, तू तोह उधार नहीं दे रही इन्हे. देख ले एक नौकरी नहीं करता और दूसरे की जेब फ़िलहाल खाली है.", नरिंदर जी का जवाब सुन्न कर रेणुका बुआ ने हँसते हुए ना में सर हिलाया लेकिन अर्जुन तोह उठ कर कार की तरफ हे चल दिया.
"ओह तेरा घोडा तोह रिवर्स गियर पकड़ गया संजीव. हाहाहा.. पैसे बाद में दे देना भाई, एक हे घर में रहते है सब.", राजेश मां ने टांग खिंचाई की थी और संजीव भैया ने अर्जुन को वापिस बुलाया.
"भैया, पापा और चाचा लोगो में मैं कही भी फिट नहीं बैठता. और घर पे काम भी है अभी.", वो धीमी आवाज में ये सब कह रहा था.
"कोई काम नहीं है अभी घर पे.", अब प्रीती ने भी तिल्ली लगा दी थी
"कोई जुगाड़ बिठा रहे हो क्या तुम सब मिल कर? ाचा जाओ जाओ, कोई बात नहीं. बचो को भी जोश आ जाता है और अपना संजीव तोह वैसे हे हर टाइम अर्जुन अर्जुन करता है.", नरिंदर जी ने तोह ठान हे लिया था बचो को उकसाने का चाहे शंकर और उमेद नजरो से उन्हें मन भी करते रहे.
"मैं तैयार हु चाचा जी लेकिन पापा और फूफा जी के साथ कुश्ती नहीं खेलूंगा.", अर्जुन ने कदम आगे बढ़ाते हुए अपनी शर्त राखी तोह शंकर जी ने भी स्वीकृति दी एक सहयोगी पिता के साथ.
"मेरे 10 नरिंदर पे और शंकर के अर्जुन पे.", उमेद ने अब लपेटा भी तोह खुद मजे लेने वाले नरिंदर को जिसको कटाई उम्मीद नहीं थी अब ये होगा.
"हाँ और मेरे भी 5 इन्दर पे और संजीव के अर्जुन pe.",Ye थे अशोक फूफा जिन्होंने मैं बना लिया था के अब चाचा भतीजा हे मुकाबला करे. कुछ सोच कर धर्मपाल जी ने भी अर्जुन पे दांव लगाया और दलीप की तरफ से नरिंदर पर.
"बीटा अब आ हे जा मैदान में, देखु तोह हमारे थानेदार जी और इस गज्जू ने तुझे कितना तैयार किया है.", नरिंदर जी ने तोह पालक झपकते थे अपनी टीशर्ट उतार कर एक तरफ कुर्सी पर फेंक दी थी. 6 फ़ीट के इन्दर का शरीर आज भी पहलवान सरीखा कैसा हुआ और तगड़ा था. भुयजो पर सख्त मछलिया और 44 का सीना बहुत था बताने के लिए की क्यों उमेद पर वो हमेशा भारी पड़ते रहे.
"चाचा जी के साथ इन्हे मुकाबला नहीं करने दे प्रीती. हमे मालूम है वो क्या हालत करेंगे इनकी.", अफसाना ने बड़ी हे धीमी आवाज में प्रीती के कान में ऐसा कहा था. नरिंदर जी की दहशत से वो वाकिफ थी जब बात उसकी बड़ी पहन पर आयी थी और कैसे नरिंदर जी ने वो शक्श हे गायब कर दिए थे.
"मस्ती मजाक हे है अफसाना जी और चाचा जी प्यार भी बहोत करते है अर्जुन से.", प्रीती ने जवाब देने के साथ साथ एक नजर अर्जुन को देखा जो बिना कोई कपडा ढीला किये जमीन की मिटटी मस्तक से लगा कर नंगे पाँव अखाड़े में उतर आया था. ये सब अभी तक घर वापिस नहीं लौटे थे जिस वजह से तारा को कौशल्या जी ने इधर भेजा था और उसके साथ साथ पंडित जी भी ये घर दिखने के लिए अपने साथ आचार्य जी, हिमानी और छोल साहब को लेते आये.
"अब ये क्या चल रहा है भाई इधर? मैदान कच्चा करने को भेजा था एक को और इधर ये मुस्टंडे मजमा लगाए बैठे है. यहाँ bhaaji-mithaai के लिए हलवाई लगाना था लेकिन ये तोह खुद हे nang-dhadang से लौट लगा रहे है. ऊपर से दामाद को शामिल किया हुआ.", रामेश्वर जी थोड़ा हैरत में थे लेकिन छोल साहब ने उन्हें मुस्कुरा कर दखल देने से रोक दिया. तारा भी इतराती हुई प्रीती के करीब हे आ कड़ी हुई.
"देखते है पंडित जी ये क्या खेल खेल रहे है. वैसे भी वह घर में तोह आज महिलाओ के हे काम है और भोजन के बाद चलो यही मनोरंजन सही.", ये सभी आँगन से इतर हे खड़े थे और अखाड़े वाले लोगो का पूरा ध्यान बस बीच में खड़े अर्जुन और नरिंदर पर था.
"हमने देखा है बे इन्दर चाचा जी को कुश्ती करते और सच कहु न तोह तुमसे भी 2 गुना बेहतर थे वो उस टाइम. पापा उनसे 2 पटकनी की छूट लेते थे.", उमेद ने और हवा भरी मुकाबले में.
"हाँ तोह बीटा अर्जुन तुम्हे 4 पटकनी की छूट. मतलब मैं तभी जीतूंगा जब तुम 5 बार धरती के गले लग चुके होंगे. गज्जू महाराज, ये बगड़ बिल्ला अब मेरे हत्थे चढ़ा है और देखना क्या हाल बनता हु इसका. चल बीटा ये टीशर्ट उतार दे नहीं तोह तेरे साथ बाकी..", अब नरिंदर की नजर अपने पिता और बाकी लोगो पर पड़ चुकी थी और बात अधूरी हे रह गयी.
"लगे रहो भाई... लगे रहो. हम भी देखना चाहते है के 3 साल तक इन्दर क्यों अपराजित रहा Inter-college में. भूल जाओ के हम लोग भी इधर मौजूद है.", आचार्य जी ने उन्हें आश्वासन दिया तोह नरिंदर कुछ सहज हो गया लेकिन अब हालत ये थी की बाकी सभी ऐसे ाचे बचो की तरह अखाड़े के बहार बैठ गए थे जैसे गणित का पीरियड हो और किसी ने भी काम पूरा न किया हो.
"देख कर खेलना बस इन्दर. विवाह का समय है और कोई toot-foot हुई तोह तुम काम काज कैसे करोगे.", रामेश्वर जी ने ये कहा तोह अर्जुन पहली बार मुस्कुराया. बाकी सभी जो अखाड़े से दूर थे वो भी हंस दिए थे पंडित जी के मखौल पर. अर्जुन ने दोनों हाथो में मिटटी ाचे से मसली तोह इस बार खुद शंकर जी ने कहा.
"बीटा, टीशर्ट उतार दो. दांव सही से नहीं लगेगा और इन्दर की पकड़ तुम पर ज्यादा कसेगी अगर कपडे में रहोगे.", अपनी पिता की गहरी बात समझते हे अर्जुन ने अपने कंधे पर लगी पट्टी की परवाह न करते हुए वो कासी हुई टीशर्ट खोल कर कुर्सी पर रख दी. अब जो जिस्म अखाड़े में था उसकी प्रशंशा वह बैठे और खड़े सभी व्यक्तियों की आँखों में थी. हिमानी के तोह मुँह से न्यास हे निकल गया.. 'वाओ' और अफसाना को जब पता लगा की प्रीती उसको हे घूर रही है तोह नजरे झुका ली.
"देख लो देख लो, मजे ले रही हु बस आपके. वो उतना भी कमजोर नहीं है जितना आपको लग रहा था."
"हमने ये तोह नहीं कहा लेकिन इन्दर चाचा के पास अनुभव है. अर्जुन kam-umar है उनके सामने.", अफसाना दबी आवाज में हे गुफ्तगू कर रही थी और रामेश्वर जी चलते हुए नजदीक जा खड़े हुए. उन्होंने भी डॉक्टर टेप से लगी वो पट्टी देख ली थी जिस पर अखाड़े में मौजूद सबकी नजर थी.
"शुरू.", रामेश्वर जी ने हे आवाज दी और अर्जुन जब तक कुछ समझ पता वो इन्दर चाचा का एक हाथ उसकी काख के निचे से गुजरा और फिर वो बस जमीन पर चित्त पड़ा था. तुरंत वो उठ खड़ा हुआ और इधर उधर देखने लगा जैसे अभी ये हुआ क्या था.
"3 मौके और मिलेंगे अभी. टेंशन मत लो बीटा जानी, सीख जाओगे की हर मुकाबले हाथ पकड़ के नहीं होता.", नरिंदर जी ने फिर से उसके सामने खड़े होते हुए कहा और हंस दिए.
"मतलब free-style खेलनी है चाचा जी? चलिए तोह इस बार मेरी पीठि नहीं लगेगी.", अर्जुन थोड़ा संजीदा हो गया था और जिस तरह से उसने अपने दोनों पाँव विभिन्नि कोण पर जमाये थे शंकर जी का ध्यान उधर हे गया. एक बार फिर आवाज आई शुरू और नरिंदर जी गर्दन झुका कर जैसे हे अर्जुन की दूसरी काख की तरफ लपके उनका पूरा जिस्म 180 घूम कर कमर की तरफ से अर्जुन के हाथो में था. सर निचे और पाँव ऊपर. अर्जुन ने उनकी पीठ या सर जमीन पर न लगते हुए करवट के बल मिटटी में गिरा दिया.
"ाचा बच्चू.. लेकिन तगड़े शरीर को गिराने का सिर्फ यही एक दांव नहीं है.", नरिंदर जी को उम्मीद नहीं थी की ऐसा होगा और अर्जुन ने उन्हें चित्त न करके मौका क्यों दिया वो ये भूल कर ज्यादा हे उत्साहित हो गए.
"इन्दर.. ध्यान से..", शंकर ने अपने भाई को चेताया जैसे वो समझ रहे हो की यहाँ अर्जुन क्या करने की चाह रहा है. 1-2 बार यही उपक्रम होता तोह इन्दर अपनी ताक़त से लड़ने वाला था जो शायद सही न होता. लेकिन अर्जुन अपने पिता की बात सुन्न कर जैसे सोच बदल चूका था. मुकाबला शुरू हुआ तोह इस बार चाचा भतीजे की उंगलिया आपस में फांसी थी. शारीरिक बल का उचित प्रदर्शन था जिसमे अर्जुन को एहसास हुआ की सचमुच उसके चाचा अबतक जितने भी लोगो से वो भिड़ा था उनमे शक्तिशाली है. नरम मिटटी में अर्जुन के पाँव इंच इंच पीछे सरक रहे थे और दोनों के सीने चेहरे के साथ साथ एक दूसरे से बस इंच भर दूर.
पीठ व् अकार में खिंच कर ऐसी मांसपेशिया दिखा रही थी जो सांगवान, मेहुल समेत खुद शंकर की कल्पना से परे थी. एक पल ऐसा आया की दोनों स्थिर हो चुके थे. इन्दर इस से आगे जोर लगाने में असमर्थ था पर अर्जुन को रोके रखा.
"तेरा लोंदा सचमुच तगड़ा है शंकर. देख तोह यार कही से लगता है ये 18 का है.? वैसे लगता तोह नरिंदर भी 30 से ऊपर नहीं और हैं भी तुझसे 21 लेकिन अर्जुन ने शरीर चोखा बना रखा.", सांगवान शंकर से बात कर हे रहा था के शंकर की नजर उस सफ़ेद पट्टी के बदल रहे रंग पर पड़ी.
"इन्दर रोक दे बस.. बहोत हुआ.", वो तेजी से उठ कर दोनों के बीच आ खड़ा हुआ और जिस तरह से दोनों को अलग किया था वो दृश्य बताने को बहुत था की इस वक़्त ताक़त में शंकर अपने चरम पर था जिसके एक झटके से अर्जुन मिटटी में औंधे बल गिरा और इन्दर पीठ के. शंकर ने अपने बेटे का हाथ पकड़ कर खड़ा करते हुए जख्म पर ध्यान दिया.
"आप लोग चलिए, हम भी आते है यही से नाहा धो कर.", नरिंदर ने भी देख लिया था के किस वजह से शंकर को इतना ताव आया था. संजीव ने भी प्रीती इत्यादि को कार में बैठने को कहा और पंडित जी मुस्कुरा कर घर के भीतर दाखिल हो गए आचार्य जी और छोल साहब के साथ.
"उतनी बड़ी चोट नहीं है पापा, वैसे हे तार लग गयी थी जाली वाले गमले की.", अर्जुन ने पिता को वो पट्टी खोलते देखा तोह उन्हें रोकना चाहा. बाकी सभी लोग हाथ मुँह धोने लगे थे.
"बीटा, वो तार न इतनी मजबूत नहीं होती की ऐसे पार हो जाए. डॉक्टर हु चुटिया नहीं. जब चोट कंधे की हो तोह जोर कंधे का लगाना भी नहीं चाहिए. किस उल्लू के पाते ने ये ड्रेसिंग की थी?", शंकर ने और कोई सवाल नहीं किया था के कहा से चोट लगी, क्यों बताया नहीं.. बस घाव को ध्यान से देखने के बाद साफ़ रुमाल को गीला करके जखम और ाचे से देखा.
"वो मॉडल टाउन वाले डॉ मक्कड़ के क्लिनिक से.", अर्जुन ने झेंपते हुए जवाब दिया.
"बहनचोद ये बांस वाले भी बाज नहीं आते. मेहुल तू ले जा इसको अपने साथ और गाडी में हे ड्रेसिंग कर दे. लोहे की मोटी कील या वैसा हे कुछ लगा है तोह इंजेक्शन भी दे डीओ. और तुम अभी 4-5 दिन gym-boxing कुछ नहीं करना.", शंकर जी ने वो रुमाल वही कंधे पर दबाने के बाद अर्जुन को वो पकडे रखने का कहा और मोटर पर नहाने चल दिए.
"सॉरी यार पता नहीं था के जख्म गहरा है रिसने भी लगा. ठीक हो जा फिर पटखनी दूंगा तुझे.", नरिंदर जी ने परवाह के साथ साथ मखौल किया था और इधर मेहुल गुलाटी जब अर्जुन को लिए बहार अपनी कार की तरफ बढ़ा तोह संजीव को वह अकेले खड़ा देख अर्जुन ने नजरे झुका ली.
"अंकल आप ड्रेसिंग कर दो इसकी, फिर मैं इसके इंजेक्शन खुद लगवा लाऊंगा.", संजीव के पास अब मौका था अर्जुन से ढेरो सवाल करने का और 10 मिनट बाद हे ये दोनों पैदल घर की तरफ चल दिए.
"इंजेक्शन तोह तेरे महीने पहले हे लगा है जो 6 महीने तक असर रखता है. अब ये बता की तेरे ये चोट लगी कैसे?", अर्जुन इस बात से बच रहा था लेकिन संजीव ने जब उसको अखाड़े में उतरवाया तोह यही जान ने के लिए की आखिर उसके चोट लगी है तोह वो छिपा क्यों रहा है और चोट लगी कैसे.
"अभी बताना जरुरी है क्या भैया?"
"देख फिर मुझे घर से बहार जाने नहीं देंगे, इसलिए तू स्कूटर निकाल और nimbu-jeera के साथ सिग्गट के दौरान अब पूरी कहानी बता.", अर्जुन अब बेबस हो चूका था और संजीव भैया को वो झूठ कभी कहने नहीं वाला था.
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"साला मेरी तोह समझ से हे बहार है ये लड़का. काण्ड कब कर देता है कुछ खबर हे नई होती. तू घर हे था न इन्दर और ये कही गया था इस बीच?", शंकर हाथ मुँह धो कर अब साफ़ कपड़ो में था फिर से. नरिंदर ने एक बार उमेद की तरफ देखा और फिर जवाब दिया.
"ये तोह घर हे था सारा टाइम और चोट इसके कील से हे लगी है जो घर वाली गयम में पता नहीं कैसे बेंच पर पड़ी थी. अर्जुन ने बताया था मुझे पर ऐसी छोटी मोती चोट लगती रहती है यार. चल अब काम धाम देखते है कुछ नहीं तोह थानेदार ने उल्टा लटका देना सबको.", नरिंदर खुद हे बात गोल कर गया था कुछ सोच कर.
"दिमाग से पैदल हे ये उल्लू का पट्ठा.. चल चलते है घर, रोटी के बाद मैं जरा डायमंड पैलेस चक्कर लगा औ राजेश के साथ. तू गज्जू को ले जा कम्युनिटी सेण्टर और फिर एक बार इस कैटरिंग वाले का भी मामला देख लियो. मिलनी के कम्बल और कपडे परम लेने जा रहा भुप्पी के साथ. दलीप भाई, वो हलवाई इधर हे आएंगे भाजी बनाने वाले. खाने के बाद इधर देख लेना थोड़ा क्योंकि बचे भी अबसे इधर हे रहने आएंगे. कही इधर उधर उन्होंने नजर.."
"टेंशन न ले यार, हलवाई की माँ की छूट. इस आँगन में भी नजरे कढ़ाई से ऊपर उठी तोह गांड में पीतल भर दूंगा. चल वैसे भी तगड़ी भूख लगी है और आज रात का कोई सन मत बनाना. धर्मपाल भाई ने कहा है की कल संजीव पार्टी दे रहा है तोह वालिए जी के साथ हे गिलसि खड़केगी.", मस्तमौला दलीप भी इनके साथ हे तैयार हो कर चल दिया. सभी एक साथ हे घर के लिए निकले थे और इस बीच भुप्पी ने ये सवाल नरिंदर से कर हे लिया जो इतनी देर से उसके जेहन में था.
"इन्दर भाई, अर्जुन के बारे में क्या राये है? मेरा मतलब है की तुमने तोह परखा हे होगा उसकी ताक़त को?", नरिंदर ने सफारी का दरवाजा खोलने से पहले जवाब देना हे बेहतर समझा.
"वो एक सेकंड से पहले हे मुझे बराबर कर देता भूपी भाई. जिस तरह से उसने मुझे चरखे की तरह घुमा कर आराम से मिटटी में रखा था उस से साफ़ था के यहाँ बैठा कोई व्यक्ति उसकी टक्कर का नहीं. दूसरी बात ये की वो एक तरह से मेरी हे ताक़त की लिमिट जान गया था लेकिन उसने जोर नहीं लगाया. हाँ शंकर शायद 1 मिनट टिक सके उसके सामने, वो भी अगर ये पहले से तैयार हो. देखा नहीं बेटे का खून देख कर कितनी जान आ गयी थी एकदम से इसमें.? दुनिया के लिए कसाई डॉक्टर है अपना शंकर लेकिन बचो की एक खून की बूँद इसको बर्दाश्त नहीं.", और सफारी की सीट पर इन्दर तुरंत बैठ गया, शंकर को लपेटे में लेने के बाद.
"ये तोह सही कहा भाई. पहली बार देखा की शंकर भी घबराता है और अर्जुन तोह बाप के सामने आज भी नन्हे मुन्ने की तरह सेहम रहा था.", अशोक जी पिछली सीट पर बैठते हुए इस टांग खिंचाई में शामिल हो गए.
"अशोक भाई, बात ये नहीं है की वो अर्जुन का खून था.. वो खून उसमे मुझसे और मुझमे मेरे पिता से आया है. उस खून के एक कतरे के बदले मुझे खुद नहीं पता के मैं किस हद्द तक जा सकता हु."
"शांत रह बे भोले. तू तोह सीरियस हे हो गया. खेल कूद में होता रहता है ये सब.", उमेद अगली सीट पर इन्दर के बराबर आ बैठा था. पिछली पर टांग हे नहीं आणि थी उसकी.
"हाँ ये सही कहा तूने गज्जू. तेरी तोह खेल कूद में टांग 6 बार टूटी है न.. हाहाहा.. ", नरिंदर कहा किसी को बख्शता था और यही उसने उमेद के साथ भी किया. सभी ऐसी हे चुहल करते हुए वापिस घर लौट आये थे जहा आज लगभग 100 लोगो का खाना चल रहा था और गर्मी में भी इंतजाम ऐसा रखा था की किसी के चेहरे पर पसीने की झलक तक न दिखे. इस वक़्त सभी लोग घर में मौजूद थे और घुलमिल रहे थे. गायब थे बस 2 लोग जिनकी तरफ किसी का ध्यान भी न गया.
मार्किट से संजीव भैया के साथ आने के बाद अर्जुन गायब था और वैसे हे वालिए जी और उनकी श्रीमती के व्यस्त होने पर अन्नू भी नदारद थी. इन दोनों की गुमशुदगी सिर्फ एक इंसान की नजर में थी, कोमल दीदी के.
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मरीना अभी माधुरी दीदी के कमरे में थी जहाँ उनकी शादी के गहने और कपडे आदि सभी लड़कियां देखने में लगी थी और बीच बीच में माधुरी दीदी के मजे भी लिए जा रहे थे. विक्की इधर प्रीती के साथ अंदर आयी और सबसे पहले मरीना से वैसे हे मिली जैसा रूस का रिवाज था, गाल चूम कर. अफसाना, जो पहले शादी का लाल जोड़ा देख रही थी अब हैरत से प्रीती और मरीना का मिलना देख रही थी.
"टेंशन मैट लो अफसाना बेगम ये दोनों विदेशी है. वैसे तोह आप भी मोरक्को से है तोह विक्की आपसे वैसे हे मिल लेगी. क्यों विक्की?", अलका कहा आदत से बाज आती थी और हँसते हुए उसने अफसाना की खिंचाई की तोह वो घबराती हुई कोमल की तरफ सरक गयी.
"नहीं नहीं.. हमे ये सब पसंद नहीं."
"ये तुमसे मजाक कर रही है अफसाना. अलका, थोड़ा काम कर दो ये मजाक.", कोमल दीदी ने झूठी दांत लगाईं थी और अलका हंसती हुई विक्की से गले लग कर मिलने के बाद उसके पिछवाड़े पर हाथ फिरती हुई अफसाना को आँख मार दी.
"हां..", अफसाना ने मुँह पर हाथ रखने से पहले बस यही कहा था और अब मरीना भी हँसते हँसते एक तरफ से अफसाना की बगल में आ बैठी.
"तुम बहोत ज्यादा सुन्दर हो अफसाना.", मरीना के मुँह से ये जुबान सुन्न कर अफसाना के होश हे उड़द गए थे.
"आप हिंदी बोलती है? और हम सुन्दर नहीं है इतने, बस चश्म आपके हे जैसे है बस.", अफसाना इतने हे समय में काम से काम घुल मिल कर बोलने तोह लगी थी. और मरीना ने बिना बताये उसका गाल चूम लिया.
"तुम भी हिंदी बोलती हो, हम भी. दोस्त बन गए न इस बात पर?", मरीना की इस बात पर अफसाना ने मुस्कुरा कर नजरे झपका दी. अब जहा बाकी सब गहने कपड़ो में लगे थे वही प्रीती खिसक कर मरीना और अफसाना के पास आ बैठी.
"वैसे आप काम हे उर्दू उसे करना अफसाना जी मरीना दीदी के साथ. हिंदी तोह इन्हे ठीक ठाक आती है लेकिन उर्दू जरा भी नहीं. वैसे मरीना दीदी आपके मुम्मा कहा है?"
"मुम्मा तोह तुम्हारे घर गए है अभी लेकिन तुम्हारा लवर बॉय कहा है? घर में इतने लोग है और वही मिसिंग है. अलका तुम्हे पता है अर्जुन कहा है?", मरीना ने ये नाम ले कर कमरे में मौजूद हर लड़की का ध्यान अपनी तरफ करवा दिया था और विक्की का सबसे पहले. जो शायद यहाँ आयी भी इस आस में थी लेकिन प्रीती जानती थी की अर्जुन नहीं है और वो कहा है ये कोमल को पता था.
"आपने कही जाना था क्या अर्जुन के साथ?"
"वो तोह घायल थे और उन्होंने किसी को खबर भी नहीं लगने दी.", अफसाना और प्रीती ने एक साथ अपनी अपनी बात कही थी और अफसाना के बताने पर कोमल की आँखें बड़ी हो गयी.
"तुम्हे कैसे पता अफसाना की अर्जुन के चोट लगी है? और सुबह से तोह वो बिलकुल सही लग रहा tha.",Komal को चिंता होते देख अफसाना को अपनी गलती का एहसास हो चूका था और वही आरती के चेहरे पर भी परेशानी साफ़ नजर आ रही थी.
"वो दिख तोह सलामत हे रहे थे आपि लेकिन हमने वो दूसरे घर.. ", अफसाना को ऐसे बोलते देख प्रीती ने हे बात संभाली उसका हाथ दबाते हुए.
"नहीं दीदी, ऐसी कोई चोट नहीं थी और वो पिछले घर गए थे न हम लोग तोह वह इन्दर चाचा जी के साथ अर्जुन खेल रहा था. बस वही उसके कंधे पर लगा बैंडेज दिखा था और अफसाना के साथ साथ सभी ने देखा था. शायद काम करते टाइम हे कुछ लगा होगा.", दरवाजे पर खामोश कड़ी ऋतू ये सब सुन्न भी चुकी थी और अब उसको सुबह अर्जुन के घर से जाने का कुछ कुछ समझ भी आ चूका था.
"चलो छोडो ये सब और अब ये बताओ के आज रात उधर वाले घर में क्या धमाल किया जाए?", ऋतू ने अंदर आने के साथ हे ये किस्सा यही निबटा दिया और उसके दरवाजा बंद करने पर बाकी सभी लड़कियां भी समझ गयी की आज कुछ तोह गड़बड़ घोटाला करने का इरादा है ऋतू का.
"ऐसा है रात में खाना यहाँ कोई नहीं खायेगा और जो भी हमारे साथ वह जा रहा है उतने लोगो के हिसाब से खाना पैक होगा.", ये अलका थी, ऋतू की हर खुराफात में उसकी 50:50 की भागीदार.
"प्रीती के पास वोडका है और विन्नी दीदी ने एक बॉक्स बियर सही जगह छिपा राखी है.", तारा ने प्लान को थोड़ा और खोल कर बताया जिसके साथ हे एक बार फिर अफसाना हैरानी से देखने लगी.
"आप घबराये नहीं, आपको नहीं पिलायेंगे. वैसे इस कमरे में जितने भी है इनमे से किसी को अलकोहल का एक्सपीरियंस नहीं है. बस ये एक हे बार करके देखने का दिल था ऋतू दीदी और हम सबका. बाकी पता नहीं कौन कौन एग्री होता है.", प्रीती भी थोड़ा घबरा रही थी कोमल दीदी के साथ साथ माधुरी दीदी के भी यहाँ होने से.
"मैं तोह सबसे पहले हु इसमें और कीर्ति भी.", जसलीन ने चहकते हुए सहमति दी और उसके साथ हे मरीना ने भी हाथ उठा दिया.
"I'm आल्सो इन. मैं आज रात को यही रहने वाली हु एंड वोडका इस माय ड्रिंक.", मरीना के बाद आरती ने भी हाथ उठाया तोह प्रियंका हैरान हे हो गयी. उसकी छोटी बहिन सचमुच अब छोटी नहीं रही थी.
"देखो अब ये मौका फिर शायद हे मिले कभी लाइफ में तोह मेरी भी हां है. सिर्फ एक गिलास बियर.", ये आवाज थी सबको हैरान करने वाले शख्स की, जिसकी उम्मीद यहाँ बैठी घर की किसी भी लड़की ने नहीं की थी. कोमल दीदी ने पार्टी में शामिल होने का फैंसला किया था और अलका उनका चेहरा हाथ से सेहला कर जैसे बुखार देखने लगी.
"कमाल हे हो गया ये तोह फिर. पिंकी दीदी फिर तोह आपका भी बनता है."
"नहीं नहीं.. तुम लोग हे करो ये सब और वैसे भी मुझे माधुरी दीदी के साथ हे रहने का आदेश है. उस घर में मैं नहीं जा सकती और वैसे भी शराब के हाथ नहीं लगाना."
"मुँह लगा लेना पिंकी डार्लिंग, हाथ में पकड़ लुंगी. यार देखो हम सब एकसाथ फिर कभी हो न हो, क्या पता. दादी को मैं बोल दूंगी की आज माधुरी दीदी के साथ रुपाली एडजस्ट कर लेगी."
"मैं भी जा रही हु, मैं नहीं एडजस्ट करने वाली.", ख़ामोशी से सबकी सुनती हुई रुपाली ने तुरंत मन किया और सभी हंसी निकल गयी.
"चलो फिर दोने है की हम सभी लोग आज वह धमाल करने वाले है. लेकिन इसके साथ पूरी बात भी सुन्न लो.", अलका जैसे कुछ बड़ा हे बताने वाली थी और माहौल एकदम शांत हो गया लेकिन उसकी बात को आगे बढ़ाया तारा ने.
"गेम्स भी होंगी और पीने वाले को वो खेलनी भी पड़ेंगी. कोमल दीदी आप सोच लीजियेगा एक बार फिर से और बाकी सभी जो बाद में कही न नुकुर करने लगे. एक रात के लिए सभी बराबर होंगे तोह No लिहाज."
"ज्यादा से ज्यादा कौनसी गेम्स होंगी तारा? Truth-Dare, बोतल घुमा कर टास्क देना या ब्लैंडफोल्ड & गेस? बस इतना जरूर ध्यान रखना की वो हद्द पार न हो जिस से सुबह उठने पर किसी को बुरा लगे.", कोमल दीदी ने तोह एक और बम गिरा दिया था ये खेलो के नाम ले कर और उनकी बात सुन्न कर तारा ने हैरत के साथ हे हाँ में सर हिला दिया.
"मतलब साफ़ है फिर की गेम्स, बियर और पार्टी. 9 बजे यहाँ से चलेंगे और फिर पूरा घर हमारा."
"अगर हम पीयेंगे नहीं तोह क्या हम शरीक नहीं हो सकते आप लोगो के साथ? वो ऐसा है कोमल आपि के इस्लाम में शराब गुनाह hai.",Afsana की इतनी मासूमियत से कही बात और खुद हे उसका शामिल होने का दिल देख कोमल दीदी ने उसका गाल सहलाते हुए कहा.
"बिलकुल, तुम साथ हे चलोगी हमारे और जो तुम्हे ाचा लगे वही करना.", अब अफसाना के चेहरे पर भी एक दिलकश मुस्कान नुमाया थी. इस बीच दरवाजे पर हुई thak-thak से अलका ने सभी को शांत रहने का इशारा दिए और दरवाजा खोलते हे गहरी सांस भरी.
"सब लोग ऐसे क्यों देख रहे हो यार? मैं हे हु और जैसा अलका ने कहा था मैं सामान भी ले आयी.", हिमानी के एक हाथ में कपडे का बैग और दूसरे में वो धुप का चस्मा था जो वो ज्यादातर पहने रहती थी. बैग अलका को पकड़ते हुए उसने खुद हे दरवाजा वापिस लगा दिया. जसलीन की नजर बड़े गौर से हिमानी का अवलोकन करने लगी थी.
"अरे हैरान मत हो यार, बीमारी नहीं है ये बस मेरी आँखें न इस Alka-Ritu के साथ साथ प्रीती जैसी है. प्यार हे इतना ज्यादा है न मेरा इनके साथ.", हिमानी ने खुद हे अपना परिचय देने के साथ साथ पंजाब वाली हर लड़की से हाथ मिलते हुए अपनी दो रंगी आँखों का चटपटा किस्सा सुना दिया. अलका ने बैग खोल कर देखा तोह अंदर हरे कांच की 3 बोतल थी.
"अरे हम लोग शराबी नहीं है जो इतनी बॉटल्स जुगाड़ ली. और तुम यहाँ क्यों ले आयी हिमानी, फंस जाएंगे यार अगर किसी ने गलती से भी देख लिया तोह.", हिमानी अभी उन सबमे हे व्यस्त थी और अलका न तुरंत बैग बंद करके अलमारी में छुपा दिए.
"वो वाइन है अलका दीदी, बियर से भी लाइट.", ऐसा प्रीती ने कहा था और अब जैसे वही फंस गयी थी.
"तुझे बड़ा पता है ये लाइट और स्ट्रांग का? कही तू भी दादा जी की बोतल से चोरी चोरी नशा तोह नहीं करती?", आरती का ऐसा कहना था और प्रीती ने तुरंत ना में सर हिला दिया.
"हाहाहा... कितनी प्यारी हो तुम प्रीती. वैसे ये ठीक कह रही है अलका. वाइन में उतना अलकोहल नहीं होता और ये बोतल मेरे मां जी के बार से उठाई है मैंने. उन्हें तोह पता भी नहीं होगा की 3 बोतल गायब हुई है. वैसे आपसे हम नहीं मिले, शायद वह घर पे देखा जरूर था जब प्रीती के साथ थी.", हिमानी बड़े आराम से प्रीती के पास हे बैठते हुए अफसाना से ru-ba-ru हुई जो खुद हैरान थी की एक खूबसूरत लड़की और वो भी दोनों अलग अलग नैनों वाली उसके सामने थी.
"हम अफसाना हुसैन है आपि और आप तोह जैसे खुदा का करिश्मा हे है. ऐसे चश्म हमने आज सिर्फ दूसरी हे बार देखे है ज़िन्दगी में.", अफसाना हाथ जोड़ कर मिलने लगी थी और हिमानी ने उसको गले लगा कर परिचय दिया.
"यार ये सब छोडो और अब पार्टी का मामला जमाओ. मैं तोह बहोत एक्ससिटेड हो रही हु और लाइफ में पहली बार कुछ चोरी किया है लेकिन दुःख नहीं है.", हिमानी ने ऋतू से कहा था जो कुछ सोच रही थी.
"पार्टी तोह होगी हे हिमानी लेकिन हम लोग पार्टी कर तोह माधुरी दीदी की शादी की ख़ुशी में रहे है और यही वह होंगी नहीं. अजीब नहीं रहेगा?", अब पहली बार माधुरी दीदी के चेहरे पर थोड़ी चमक आयी थी जो पहले इसलिए हे खामोश थी की किसी ने उनसे पुछा हे नहीं था.
"हम्म्म. सही कहा यार.. लेकिन बिल्ली के गले में घंटी कौन बंधेगा?", अलका के ऐसा कहने पर विन्नी ने भी हाथ खड़े कर दिए जो यहाँ सबसे बड़ी थी.
"अर्जुन..", सुझाव आया था रुपाली की तरफ से और उसके मैं में क्या चल रहा था इसकी खबर किसी को नहीं थी.
"पागल है रुपाली. वो भला क्यों और कैसे कर सकता है ऐसा? और ये शराब वाली बात उसको पता चली तोह समझ ले गए काम से.", आरती ने असहमति दिखाई थी इस सुझाव पर.
"तुम्हारे पास कोई सुझाव है? नहीं है न. इसलिए मेरी बात सुनो और इसमें थोड़ा सच और बाकी झूठ बोलना पड़ेगा. अर्जुन से ये कहना है की हम सभी लोग खाने, डांस की पार्टी कर रही है माधुरी दीदी के साथ. उसने तोह वैसे भी हमारी सेफ्टी के लिए उस घर में सोना हे है लेकिन वो रहेगा छत्त पर और निचे से हम रखेंगे सबकुछ बंद. अर्जुन की हेल्प के बिना तोह वैसे भी पॉसिबल नहीं क्योंकि हम इतना सामान वह लेके कैसे जाएंगे? तारा या कोई भी कार तोह चला लेगा लेकिन वह कार ले जाने की परमिशन? घर तोह पास में हे है.", रुपाली ने असलियत से सबका सामना करवाया तोह कोमल दीदी ने जवाब दिया.
"मैं बात करुँगी उस से और वो सबकुछ करेगा. बस उसको पूरा सच बताना जरुरी है. और दादी जरुरी माधुरी दीदी से पूछेंगी तोह दीदी आप उन्हें इतना कह देना की आपका भी दिल है सबके साथ घुलने मिलने का. उनके सामने ये बियर वाला मामला नहीं जाना चाहिए बस.", अब सबके दिमाग में बात घुस चुकी थी की ये काम किस तरीके से होगा.
"दोने.", आरती खुश होते हुए बोली और बाकी सबके साथ अब माधुरी दीदी भी उत्साहित थी. शाम के 6 बज चुके थे और हलके से शोर के साथ हे सबका ध्यान बहार गया.
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"शंकर, शांत मेरे भाई शांत. देख वो खुद आया है हमारे घर और वो भी अकेला.", घर के बहार ये लम्बी शाही कार रुकी तोह जो शानदार शक्श उस से उतरा था उसको देखते हे बगीचे के पास इन्दर, उमेद, दलीप से बातचीत में मशगूल शंकर की भानवे उठ गयी. बेशक इन लोगो में कभी कोई तनाव या ख़ास बातचीत न हुई थी पर दुश्मनी तोह अगली पीढ़ी तक आ हे चुकी थी. पुष्पक 2 हे कदम आगे बढ़ा था और उसका सामना अपने से भी 2-3 इनके और उतने हे तगड़े युवक से हुआ.
"दोस्त, हम श्री रामेश्वर शर्मा जी से मिलने की चाहत रखते है. आप परिवार से हे है शायद.?", अर्जुन भी दांग था उस व्यक्ति को सामने देख जिसकी janam-kundli कुछ समय पहले हे उसके हाथ लगी थी. लेकिन इतना नरम व्यवहार और बात करने की तमीज से वो इतना तोह समझ हे चूका था की पुष्पक किसी गलत उद्देश्य से नहीं आया.
"पापा से तुम्हे क्यों मिलना है पुष्पक?", शंकर ने अर्जुन को एक तरफ करते हुए पुष्पक के सामने खड़े होते हुए सवाल देगा. स्वर में गुस्सा नहीं था लेकिन दिमाग हल्का अभी भी गरम था.
"प्रणाम शंकर भाई साहब. ये तोह नहीं कहेंगे की मिल कर ख़ुशी हुई क्योंकि आज हम खुश नहीं हो सकते. हाँ आप यकीनन ाचे दिख रहे है. ताऊ जी से आवश्यक काम है हमे और अगर आप चाहे तोह मुलाकात के वक़्त शामिल रह सकते है.", शंकर का तोह सारा गुस्सा हे हवा हो गया जब पुष्पक ने उसके सामने हाथ जोड़ कर भाई साहब के साथ साथ पंडित जी के लिए ताऊ जी कहा.
"आओ, मेरे साथ चलो पिंटू. पापा बैठक में हे है और घर में बचो का विवाह है इसलिए शंकर थोड़ा डिस्टर्ब है.", इन्दर ने माहौल को समझते हुए पुष्पक को अपने साथ लिया लेकिन बाकी सब भी उन दोनों के पीछे हे चल दिए. अर्जुन को भी अब जान न था के ये शक्श उनके घर कैसे और क्यों.
"प्रणाम ताऊ जी. क्षमा चाहते है की ऐसे shub-avsar पर हम आपके niwas-sthaan पर समस्या लेकर आये.", बैठक में फ़िलहाल सिर्फ कौशल्या जी और रामेश्वर जी के साथ उनके छोटे भाई और मधु हे थे. एकके ये सजीला सा व्यक्ति इन्दर के साथ उनके सामने आया और दोनों हाथ उनके चरणों पर रखते हुए मुखातिब हुआ. ऐसा हे उसने कौशल्या जी के साथ के किया था और उनके सिवा किसी और को देखा तक नहीं. रामेश्वर जी तोह जैसे इस व्यक्ति को सबसे बेहतर पहचानते थे और उन्होंने पुष्पक को दोनों कंधे पर हाथ रख कर अपने गले से लगाया.
"कैसे हो तुम पिंटू बीटा? और जो भी अवसर हो तुम हमारे पास be-jhijhak आ सकते हो. हाँ हमारी बंदिश अलग है लेकिन तुमसे हमे शिकायत नहीं. इन्दर, भाई के लिए खाना लगवाओ.", रामेश्वर जी ने बाकी सभी को ऊँगली के इशारे से बहार जाने को कहा लेकिन अर्जुन के चेहरे को देख उसको अपने हे करीब बैठने को कहा.
"ताऊ जी, क्षमा कीजियेगा लेकिन हम अन्न ग्रहण नहीं कर सकते. समय का अभाव है और आपका ये भोजन हम पर उधार रहा."
"शांत रहो बीटा.. तुम घर पे हो और तुम्हारी जो भी समस्या है हम उसका उचित निदान करेंगे. एक चाय हे पी लो हमारे साथ?", रामेश्वर जी के ऐसा कहने पर उसने सिर्फ हाँ में सर हिलाया लेकिन आँखों से झरर झरर आंसू गिरने लगे थे पुष्पक के और उसके दूसरी तरफ बैठी कौशल्या जी ने बिना देरी किये सीने से लगा लिया.
"न मेरे बचे न.. तू हमेशा से हमारे लिए वही पिंटू है जो बचपन में था. चाहे दुःख हो या सुख, तेरे ताऊ जी और तेरी ये ताई, हमेशा तेरे लिए मौजूद है. आ नहीं सकते बस जो तुझे ाचे से पता है.", कौशल्या जी के सर सहलाने से जल्द हे पुष्पक संभल गया.
"टा जी, आपने हे नाम दिया था हमे और सच कहु तोह मेरे ख़ुशी के वही दिन मुझे याद है जिनमे आप और ताऊजी शामिल थे. पंजाब से राजस्थान क्या गए, हम बंधन में ऐसे बंधे की लौट न पाए.", पुष्पक का चेहरा खुद कौशल्या जी ने अपने पल्लू से साफ़ किया और अब कही उसका ध्यान अपने सामने बैठे उसी युवक पर गया जिस से वो बहार मिला था. इधर ललिता जी 2 कप चाय और कुछ मिष्ठान वह रख कर जैसे ख़ामोशी से आयी थी वैसे हे लौट गयी.
"ये तुम्हारे चाचा है अर्जुन. पुष्पक और बीटा ये हमारे पौत्र अर्जुन है, अपने शंकर के सुपुत्र.", अर्जुन ने अब हाथ जोड़ कर अभिवादन किया था जब पुष्पक को चाचा बताया गया.
"खुशनसीब है आप अर्जुन जो इनकी छाया में बड़े हो रहे हो. हमारे ताऊ जी से बेहतर राजा और साधू हमने जीवनकाल में नहीं देखा. आपके चाचा है लगते है हम और आप बेजिझक हमारे पास आ सकते है.", पुष्पक ने ज्यादा और कुछ नहीं कहा. कौशल्या जी ने चाय का कप सामने किया तोह पुष्पक ने भी सलीके से थाम लिए. कौशल्या जी अपने पति के इशारे से अभी आने का बोल कर बहार चली गयी
"अब हमारे युवराज अपने आने का प्रयोजन बताएँगे? तुम्हारी हालत बहोत कुछ बयान कर रही है पिंटू और तुम जल्दी में भी हो.", रामेश्वर जी ने अर्जुन को एक बार देख कर चाय उठा ली. यहाँ बस अब यही 3 लोग थे और अंदर वाले कमरे का दरवाजा कौशल्या जी बंद कर चुकी थी. पुष्पक ने भी अब कही ध्यान दिया था माहौल पर लेकिन अर्जुन के वह बैठने से समझ चूका था की ये लड़का पंडित जी का अजीज है.
"बुआ जी का देहांत हो गया है ताऊ जी. कुमारी अनामिका ने अपनी 2 अंतिम इतछाये हमसे कही थी क्योंकि उन्होंने कभी हमे माँ की कमी महसूस नहीं होने दी थी."
"दुर्भाग्य.. क्षमा करना बेटे ये हमको बिल्कुल ज्ञात न था. प्रभु उन जैसे दिव्या आत्मा को अपने चरणों में जगह दे.", रामेश्वर जी की आँखों में एक पल में हे पानी भर आया था जो इन दोनों से छिपा न रह सका.
"आप इसका असर न होने दे ताऊ जी. घर का माहौल बरकरार रखिये और जो रिश्ते अदृश्य है वो वैसे हे रहे तोह सबके लिए ठीक होगा. उन्होंने आपका शुक्रिया कहा था उन्हें महफूज रखने के लिए और हर मुसीबत से बचने के लिए. दूसरी ख्वाहिश थी की कुमारी बिंदिया के साथ शबनम बिटिया भी उनके संस्कार में शामिल हो. हम चाहते है के हमारे ताऊजी ये ख्वाहिश पूरी करे.", अभी पुष्पक की बात ख़तम हे हुई थी और रामेश्वर जी ने अर्जुन को फ़ोन इधर खिसकने को कहा. एक नंबर जो उन्हें भली भाँती याद था मिलते हुए उन्होंने बात शुरू की.
"कपूर साहब, शबनम मिर्ज़ा के सभी चार्ज तत्काल प्रभाव से हटवा दिए जाए. ब्रिटिश एम्बेसी में इसकी सूचना एक क्लीन चित के साथ भिजवाए, ये आवश्यक है.", दूसरी तरफ से भी ज्यादा कुछ नहीं कहा गया सिवाए हाँ के.
"तुम्हारे पास शबनम का नंबर है?", रामेश्वर जी ने ये सवाल अर्जुन से किया था और उसने झेंपते हुए हाँ कहा और आँखे मूँद कर जैसे कुछ याद किया और antar-rashtriya नंबर मिलाने लगा. पुष्पक भी हैरान था अर्जुन के ऐसा करने पर लेकिन रामेश्वर जी ज्यादा हैरान हुए जब अर्जुन खुद हे बात करने लगा.
"नमस्ते चची, मैं अर्जुन. जी..", अर्जुन ने परिचय दिया और सामने से बिंदिया ने भी उसका ख़ुशी से स्वागत किया था.
"हाँ बात कुछ ऐसी थी चची जी की आपको शबनम दीदी के साथ इंडिया निकलना होगा, तुरंत. हाँ.. दीदी के चार्ज हटवा दिए है बाउजी ने और आपको दिल्ली नहीं उतरना.", अर्जुन वैसे हे उनकी बात सुन्न ने लगा जो बिंदिया कह रही थी. चिंता लाजमी थी ऐसे बात करने से.
"जी पुष्पक चाचा जी यही सामने बैठे है उनसे बात कर लीजिये. आगे वही बता देंगे आपको.", अर्जुन शोक समाचार खुदसे नहीं देना चाहता था और हैंडल पुष्पक की तरफ बढ़ा दिया.
"प्रणाम दीदी. आप तत्काल पिता जी के niwas-sthaan के लिए निकालिये. बुआ नहीं रही और उनकी अंतिम इत्छा थी की आप दोनों उनके संस्कार में शामिल हो. ताऊजी के यहाँ मंगल अवसर पर हम ऐसी बात कर रहे है. चाहे तोह संस्कार के बाद हे वापिस लौट सकती है.", पुष्पक ने उम्मीद के विपरीत बात कहने के साथ हे फ़ोन काट दिया था.
"आज्ञा दीजिये ताऊ जी. संस्कार के 13 दिन पूरे होते हे हम आपके पास आएंगे. सफर अधिक है और समय से पहुंचना है.", पुष्पक ने एक बार फिर उनके चरण स्पर्श करने के बाद हाथ जोड़ कर इजाजत मांगी. कोई शुक्रिया नहीं कोई laag-lapet नहीं, जैसे ख़ास अधिकार हो
"हम आते तुम्हारे साथ बीटा बस."
"आपको तोह कुंवर सा हे नहीं रोक सकते ताऊ जी लेकिन फ़िलहाल आप घर देखिये और हम ये जिम्मेवारी निभाते है. जल्द मिलेंगे आपसे. अर्जुन आप एक ख़ास व्यक्ति है और इतना हमे भी अनुमान हो गया है की बदलाव की बयार लाने वाले सैलाब हो. शुक्रिया.", ये बात उसने अर्जुन से कही थी और पंडित जी खुद पुष्पक को साथ लिए बहार निकले जहा आँगन में उनके दोनों बेटे खड़े थे उमेद और दलीप के साथ. कौशल्या जी ने पुष्पक को विदा करने से पहले उसका तिलक जरूर किया था, परंपरा.
"तै जी, भोजन पर जल्द आएंगे. आज्ञा दीजिये.", कार में बैठने से पहले पुष्पक ने फिर से दोनों के चरण स्पर्श किये थे और कुछ सोच कर अपने पाँव से जूती उतार कर अर्जुन की तरफ सरका दी.
"आपके लिए हम कुछ ला न सके लेकिन चाचा और भतीजे में दोस्त का रिश्ता भी रहता है. हमारी मौजरी को पहन कर सम्मान दीजियेगा अर्जुन.", नंगे पाँव हे वो अपनी कार में बैठ कर जिस तरफ से आया था वापिस उस तरफ निकल चला. मुश्किल से वो 30 मिनट भी नहीं रुका था लेकिन अर्जुन को जरूर दुविधा में छोड़ गया था.
"पहन लो बीटा पहन लो इन्हे. उसने तुम्हे अपना वारिस बनाया है जूती सौंप कर. पुष्पक का अहित मैट करना और वो तुम्हारा उचित ध्यान भी रखेगा, जब तुम्हे जरुरत होगी.", रामेश्वर जी के कहने भर से अर्जुन ने चप्पल उतार कर वो sone-chaandi के तार वाली जूती पहन ली थी, रत्ती भर भी अकार अलग न था उनका अर्जुन के पाँव के लिए.
पुष्पक
घर में गीत और शगन का कार्यक्रम अपने स्वरुप हे चल रहा था. केशव मां ने सबके तिलक इत्यादि करके अपने दोनों प्रमुख bhanja-bhanji को कपडे, गहने आदि से भात भर कर वो सब भी दिखाया जो वो अपने साथ ले कर आये थे इन्हे शादी में देने के लिए. ये रिवाज हे थे जिसमे मां हे अपने bhanje/bhanji को पहला शगुन भेंट करते है.
आदतन सभी महिलाये कपडे, गहनों आदि में रूचि ले रही थी और सभी के चेहरों पर खूब waah-wahi थी की केशव जी ने इतना कुछ किया है. रामेश्वर जी से लेकर प्रीती तक सभी के लिए कुछ न कुछ जरूर था. शगुन अभी और आगे बढ़ा जब खुद सोहनलाल जी अपनी बीवी अंजना जी के साथ पधारे. एक पल तोह कौशल्या जी ने हैरत से उनके पीछे सामान लिए आये बिट्टू और राजेश को मन किया लेकिन उन्होंने हे खुद केशव के सर पे हाथ रखने के बाद इजाजत मांगी.
"बहिन जी, बचे तोह हमारे लिए भी सभी बराबर है. संजीव हे तोह पहला बचा था जो हमारे यहाँ रेखा के साथ आया था. केशव बड़ा है और उसके बाद बिट्टू का भी तोह हक़ है. मन करके हमे बहार मैट कीजिये और सरपंच जी भी आये है.", सोहनलाल जी के शब्दों का प्रभाव गहरा हे हुआ कौशल्या जी पर और वही रामेश्वर जी की आँखों में भी हल्का सा गीलापन उभर आया, ख़ुशी से.
"हाँ तोह सोहन भाई वैसे भी यदा कड़ा तोह कोई पुण्य काम करते है. केशव बीटा, आपके साथ अब pita-tulya सोहन भाई है और ये सरपंच पे जुरमाना लगेगा, लाजमी.", अपनी जगह से खड़े हो कर रामेश्वर जी ने कृष्णा जी के पिता और सोहनलाल जी का गले लग कर आभार प्रकट किया. माहौल और भी बेहतर हो गया था जब घर की पहली शादी में वो रिश्तेदार भी जिनकी अपनी अलग अलग बेटियां यहाँ ब्याही गयी थी, उन्होंने भी ललिता जी को बाप की कमी खेलने न दी.
"इस सरपंच की पंचायत तोह मेहमानखाने में लगेगी थानेदार, तुम्हे कुंदन बुला रहा वही पे. यहाँ बेटियों और बचो के बीच दिल्लगी तुम कहा कर रहे हो हमे ाचे से खबर है.", ऐसा मजाक पंडित जी के साथ या तोह खुद कौशल्या जी कर सकती थी या फिर सोहनलाल जी और बस 2-3 उनके hum-umar करीबी. सोहनलाल जी का साथ खुद कौशल्या जी ने दिया इन हंसी के ठहाको के बीच.
"सही कहा भाई साहब आपने. पूर्णिमा तोह चलो इनकी नजरो के aas-pas हे रहती है और आज सुनंदा के साथ साथ अंजना दीदी भी आयी है इसलिए ख़ुशी देखते हे बनती है इनकी.", मधु के साथ साथ रेणुका, राजेश्वरी, रोमिला इत्यादि की भी हंसी की आवाज बुलंद हो गयी थी. वही जिन जिन के नाम कौशल्या जी ने लिए थे वो सभी चेहरा पल्लू में दबाये शर्मसार होने लगी. खिसियाते हुए पंडित जी तोह हाथ जोड़ कर जो वह से निकले पलट कर देखा भी नहीं.
"दादी, अब मुझे समझ आया ये ऋतू क्यों इतनी हंसोड़ है और बेबाक भी. आपने हे घुट्टी दी थी न इसको?", अलका हँसते हुए कौशल्या जी से बोली और ऋतू उसको घूर कर चुप रहने का कहने लगी. हंसी ख़ुशी के इन्ही लम्हो में एक बार फिर से वही शगुन और गीत गूंजने लगे थे. Riti-riwaaj का सही मकसद क्या है ये वही समझ सकते है जिन्हे bhare-poore परिवार को एकत्रित रखने की समझ हो. इनकी जरुरत इतनी हे होती है की अपने के प्रति खुलकर प्रेम जाहिर किया जा सके और निरंतर चलती ज़िन्दगी से कुछ क्षण अपनों के बीच व्यतीत किया जा सके.
"अर्जुन बीटा, अब संजीव को पिछले घर ले जा अपनी किसी भी बुआ के साथ. हमारा पहला घर वही है और तेरी बुआ इसकी छाप वही उतारेगी. नजर बांधने के बाद तुम घर से अकेले बहार नहीं जाओगे इसके बाद संजीव.", कौशल्या जी ने अपनी जगह से उठ कर एक किनारे वाली थाली अर्जुन को पकड़ते हुए दोनों को हिदायत दी. अर्जुन को अब समझ आया था की दादी उस घर को इतना क्यों मानती है.
"माँ, नजर और छाप रेनू को करने दो. माँ बन्न ने वाली है ये तोह बचा भी नजर में शामिल होगा.", मधु ने अपनी जगह रेणुका को आगे कर दिया था और यही महफ़िल में बात खोल भी दी थी की रेणुका गर्भवती है. कृष्णा जी ने एक लाल चुनरी, जो ख़ास थी वो ललिता जी को इशारे से रेणुका को उड़ाने को कहा. अब भात की हे रसम के बीच रेणुका को भी सभी बड़ो का आशीर्वाद मिल गया था.
"ललिता, नेग तैयार रखियो मेरी बेटी के लिए. तेरे छोरे की नजर करके आएगी तोह मर्जी का वचन लेगी तुझसे.", यहाँ ये आवाज पूर्णिमा जी की तरफ से आयी थी जिन्होंने साफ़ कह दिया था उनके लिए भी रेणुका वैसी हे है जैसे Madhu-Shalini.
"वचन है माँ जी, इसकी गोदभरे भी ऐसी हे करुँगी और शगुन रेणुका के भाई साहब जाने.", ललिता जी भी आज उस पीली साड़ी भी बसंत का मौसम लग रही थी जिन्हे बचो के ब्याह से ज्यादा ख़ुशी थी की सभी दिल से यहाँ शामिल है और उन्हें पूरा सत्कार भी मिला. अर्जुन ने अपने बड़े भैया को भी उठने में मदद की और इनके साथ हे प्रीती भी अपनी बुआ के पीछे अफसाना को लिए.
"हम भी जा सकते है न दादी?", उठने के बाद हे प्रीती ने वापिस मदद कर कौशल्या जी से पुछा तोह उन्होंने भी हँसते हुए हाथ के इशारे से जाने को कहा. थाली अब प्रीती के हाथ थी और अर्जुन ने खुद भैया और बाकी सबके लिए दरवाजे खोल सबके बैठने के बाद इलो बहार निकली.
"तुमने ये कार क्यों निकली?", सवाल न चाहते हुए भी प्रीती के मुँह से निकल हे गया जिसका जवाब खुद संजीव भैया ने दिया.
"ऐसा है प्रीती की अर्जुन चाहे जितना भी खुद को नास्तिक या अलग बताये पर जैसा दादी कहती है ये वैसा हे करता है. शुभ काम के लिए जा रहे है इसलिए इसने ब्लैक कार की जगह ये गाडी निकली. देख लो भगवान् में नहीं मानता पर किरशन जी का चला चाबी में रखता है ये.", संजीव भैया भी खुलकर बोलने लगे है ये अब प्रीती के लिए नयी बात नहीं रही थी पर रेणुका को ख़ुशी हुई की उसका बड़ा भतीजा वो गंभीर व्यक्ति नहीं रहा जिसकी आवाज हे यदा कड़ा सुनाई पड़ती थी.
"इस अर्जुन ने तोह तुम्हे भी बोलना सीखा दिया संजीव.", रेणुका बुआ की बात पर एक पल तोह संजीव सकपका गया लेकिन मोर्चा अर्जुन ने अपने हाथ लिया.
"क्यों बुआ, आपको नहीं सिखाया मैंने? आप तोह हमेशा दादी के हे चिपकी रहती थी लेकिन अब देखो तोह लोगो के सामने खुद को प्रीती की बड़ी बहिन बताने लगी हो.", ये बात खुदसे हे जोड़ी थी अर्जुन ने, बहिन वाली. और इसके साथ हे रेणुका बुआ ने उसका हलके से कान खिंच दिया. अकेले होते तोह वो ऐसा कदापि न करती लेकिन इस पल में ये भी जाताना था की बुआ भतीजा भी है ये लोग.
"देखा संजीव इस शैतान को?", बुआ ने ऐसा कहा हे था की अर्जुन ने आईने से एक नजर रेणुका को देखा और जब दोनों की नजरे मिली तोह अर्जुन ने आँख दबा दी. माहौल एकदम हे शांत हो गया था. संजीव मुँह दबाये हंसी रोक रहा था, रेणुका की नजरे शर्म से झुकी थी और अर्जुन की हरकत प्रीती से भी न बची थी जो अब संजीव भैया जैसे हंसी दबा कर बहार देख रही थी.
"अचानक हुआ क्या है?", अफसाना जो इतनी देर से ये सब ख़ुशी से देख रही थी, वो चुप न रह सकीय और इसके बाद बस प्रीती, संजीव और अर्जुन के हंसने की आवाज हे जवाब में मिली. कार रुक चुकी थी और प्रीती ने उचक कर बहार देखा.
"यहाँ तोह पहले से हे अंकल लोग है.", उमेद, राजेश की कार इधर वाले घर के बहार हे कड़ी देख प्रीती ने कहा था. अर्जुन ने उतर कर बड़ा गेट खोला और एक पल के बगीचे की तरफ हैरत से देख वापिस कार में बैठ उसको घर के अंदर हे ले आया.
"यहाँ तोह भैया खुश्ती चल रही है.", अर्जुन के ऐसा कहते हे कार से उतरने वाले सभी के चेहरे उस तरफ गए जहा घांस तैयार करने वाली कच्ची जगह को कुछ ज्यादा हे पोला करके अखाडा सा हे बना दिया था इन लोगो ने. प्रीती ने भी अफसाना की तरह सर से घुमा कर गले में दुपट्टा करते हुए घर के अंदर वाले हिस्से का रुख किया. ये लोग अंदर चले गए और अर्जुन इस अखाड़े की तरफ खिंचा आया जहा दलीप मौसा और धर्मपाल जी अखाड़े के बीच थे वही बहार पूरे जोश में हौंसला बढ़ाते उसके पिता, इन्दर चाचा, उमेद चाचा, राजेश मां, अशोक फूफा के साथ साथ छोटा सांगवान, मेहुल गुलाटी और भूपिंदर भी मौजूद थे.
"मेरे 2000 धर्मपाल भाई पे.", ये इन्दर चाचा ने बोलै हे था की दलीप जी ने अपने सामान तगड़े धर्मपाल जी को काख की तरफ से हाथ दाल कर मिटटी में पीठ के बल पटक दिया और इसके साथ हे चाचा की जगह अब अर्जुन के पिता चहक रहे थे.
"इन्दर, धर्मपाल भाई में अब वो बात न रही जो पहले थी. तब दलीप एक मिनट नहीं टिकता था और आज देख पिछले 10 मिनट में खेल 50-50 रहा लेकिन जीत दलीप की हुई. 5000 हरा है तू, 3 उमेद से और 2 मेरे से.", शंकर की बात सुन्न कर जहा इन्दर का चेहरा थोड़ा मायूस था वही दलीप जी खुद धर्मपाल जी का हाथ थामे अखाड़े के दूसरी तरफ आ बैठे. ये लोग यहाँ पूरी तैयारी से आये थे जैसे उनके पास कपडे थे और साफ़ सफाई के साधन भी.
"भाई, शंकर अगर उमेद के साथ अखाड़े में उतरता है तोह मेरे 10 हजार शंकर पे.", अशोक जी ने ये पेशकश राखी तोह जीजा की बात सुन्न कर तुरंत हे शंकर ने अपनी कमीज उतार कर राजेश को पकड़ा दी. उमेद बगले झाँक रहा था.
"मेरे 15 गज्जू पे जीजा. चल बे गज्जू, नाक न कटवा दियो.", उमेद साफ़ सुथरे कुर्ते पाजामे में था जो इन्दर की बात सुन्न कर झिझकता हुआ खड़ा हुआ. अर्जुन उनसे 20 कदम दूर इधर आँगन में बैठा ये सब देख रहा था. उसके baap-chacha और मां लोग इस उम्र में भी इतने चुस्त और तगड़े है. घर के अंदर रेणुका बुआ वही सब कर रही थी जो उन्हें कौशल्या जी ने समझाया था.
"यार कपड़ो का पन्गा है मेरे नहीं तोह लड़ लेता. तू हे भीड़ ले इन्दर इसके साथ.", उमेद की बार सुन्न कर बाकी सभी के चेहरों पे मुस्कान आयी वही इन्दर के निराशा.
"देख शंकर ने भी तोह शर्ट खोल दी. तू भी कुरता उतार और पाजामे की जगह ये ट्रैक पहन ले जो राजेश लाया है.", यहाँ तोह जितने भी ट्रैक एक तरफ पड़े थे वो सभी प्लास्टिक के लिफाफों में बंद थे, जैसे अभी तक प्रयोग हे न हुए हो. उमेद एक ट्रैक पजामा लिए गाये वाले कमरे में जा घुसा.
"जीजा, ये ट्रैक पाजामे आपके पापा ने अर्जुन के लिए मंगवाए थे और मुझे नई लगता एक भी सही सलामत पहुंचेगा.", राजेश के स्वर में जो विनती थी उसको देख शंकर के साथ साथ बाकी सभी हंसने लगे.
"तू पहले बता देता के ये अर्जुन के हैं. अब कुश्ती का प्रोग्राम भी तुम लोग बनाओ और बाद में रोना भी तुम्हारा. कोई न, 10 और ले आईओ बाद में. तेरा हे भांजा है."
"हाहाहा.. आज तोह वैसे राजेश को भी 2-2 हाथ करने हे चाहिए. साले साहब ने जाने आखिरी बार कब पटखनी खायी होगी?", नरिंदर ने बात को घूमते हुए राजेश को हे लपेट लिया था.
"हाँ, सही कहा इन्दर भाई. ये अपना भुप्पी भी कह रहा के इसको मिटटी का स्वाद बहोत पसंद. एक मुकाबला तोह राजेश भाई और भुप्पी का फिक्स और मेरे पहले से हे 5000 राजेश पे.", ये सांगवान था जो मजे लेने में इनके हे समकक्ष था. दूसरी तरफ बैठा भुप्पी नाराजगी से इन्हे देखने लगा.
"आजा बे भोले, तू भी क्या याद करेगा.", उमेद सिर्फ ट्रैक पाजामे में इधर आया था और उसका जिस्म कही से शंकर से काम न था बल्कि सुघड़ और कुछ चौड़ा हे था शंकर से. वही किसी अरबी घोड़े सा कैसा हुआ शंकर बेशक आधा फुट कद में काम था लेकिन कंधे बताते थे की क्यों बाकी सभी की नजरो में ताक़त का दूसरा नाम था वो.
"मेरे 10 शंकर पे और धरम भाई के 10 उमेद पे.", दलीप ने दोनों की तरफ से जब दांव लगाया तोह धर्मपाल जी भी हंस दिए. इधर इन्दर के 'स्टार्ट' कहते हे वो दोनों तगड़े शरीर एक दूसरे की हथेलियां जकड़े भीड़ गए. सचमुच जोर बराबर हे था इनमे और अर्जुन गौर से देख रहा था के उसके पिता के पत् और पंजे कितने मजबूत है. उमेद के पाँव पीछे सरक रहे थे और इसके बाद अचानक हे शंकर का शरीर हवा में उठा और फिर पीठ मिटटी में.
"ओह बहनचोद.. ये क्या था उमेद भाई?", सांगवान की मुँह से न्यास हे निकला था ये जब उसने शंकर को चित्त देखा.
"टेंशन नहीं परम भाई. इन दोनों का फैंसला ऐसे नहीं होता. गज्जू गरम कर रहा है अभी शंकर को और इनका बेस्ट ऑफ़ 5 है. मतलब जो 3 पटकनी दे गया वो जीतेगा.", नरिंदर के खुलासे से उमेद पर दांव लगाने वाले थोड़े नाखुश दिखे थे लेकिन वो मान रहे थे की उमेद जीतेगा हे. इसके साथ हे फिर से शुरू हुआ दौर लेकिन शंकर ने इस बार पंजे पकड़ने की जगह किसी सांड की तरह झुक्क कर उमेद की कमर गिरफ्त में लेते हुए करारी पटखनी दी. अशोक जी को भी उम्मीद न थी की इस उम्र भी शंकर इतना फुर्तीला होगा.
"ओह भाई.. ये क्या था?"
"जीजा, अभी देखना शंकर की दुनिया कैसे पलट टी है.", नरिंदर को जैसे पहले हे पता था के आगे क्या होना है और इसके बाद के लगातार 2 दांव उमेद ने चतुराई से जीत कर 3-1 से मुकाबला अपने नाम कर लिया. इन दोनों के बीच हर बार बस एक हे डाव में पटखनी हो जाती थी, जैसे क्रिकेट में हर बॉल पर 6 या आउट वाला हिसाब हो. शंकर का जिस्म इतनी देर में हे जैसे कुछ फूल गया था.
"आठ.. साला ये सब अब अपने बस का नहीं रहा.", उमेद एक तरफ हे पसर गया था और शंकर ने पानी पीते हुए मुस्कुरा कर इन्दर की तरफ देखा.
"पता है गज्जू ऐसा क्यों कह रहा है? शंकर की बैटरी चार्ज हो चुकी है अब और अगर इस वक़्त मैं भी इस से भिड़ा तोह गर्दन कल तक दुखती रहेगी.", नरिंदर को गहराई से पता था आपस में हर भाई का हिसाब.
"चाचा जी अगर सिर्फ खेल हे है तोह मेरी तरफ से अर्जुन दावेदार है.", ये आवाज संजीव भैया की थी जो कितनी देर से इधर खड़े थे खुद अर्जुन को खबर न हुई. जैसे प्रीती उनकी बगल में कड़ी थी मतलब साफ़ था के अर्जुन को बलि का बकरा बनाया गया था.
"पैसे वैसे है क्या दूल्हे राजा या ऐसे हे अपना घोडा रेस में उतारने चले आये. रेनू, तू तोह उधार नहीं दे रही इन्हे. देख ले एक नौकरी नहीं करता और दूसरे की जेब फ़िलहाल खाली है.", नरिंदर जी का जवाब सुन्न कर रेणुका बुआ ने हँसते हुए ना में सर हिलाया लेकिन अर्जुन तोह उठ कर कार की तरफ हे चल दिया.
"ओह तेरा घोडा तोह रिवर्स गियर पकड़ गया संजीव. हाहाहा.. पैसे बाद में दे देना भाई, एक हे घर में रहते है सब.", राजेश मां ने टांग खिंचाई की थी और संजीव भैया ने अर्जुन को वापिस बुलाया.
"भैया, पापा और चाचा लोगो में मैं कही भी फिट नहीं बैठता. और घर पे काम भी है अभी.", वो धीमी आवाज में ये सब कह रहा था.
"कोई काम नहीं है अभी घर पे.", अब प्रीती ने भी तिल्ली लगा दी थी
"कोई जुगाड़ बिठा रहे हो क्या तुम सब मिल कर? ाचा जाओ जाओ, कोई बात नहीं. बचो को भी जोश आ जाता है और अपना संजीव तोह वैसे हे हर टाइम अर्जुन अर्जुन करता है.", नरिंदर जी ने तोह ठान हे लिया था बचो को उकसाने का चाहे शंकर और उमेद नजरो से उन्हें मन भी करते रहे.
"मैं तैयार हु चाचा जी लेकिन पापा और फूफा जी के साथ कुश्ती नहीं खेलूंगा.", अर्जुन ने कदम आगे बढ़ाते हुए अपनी शर्त राखी तोह शंकर जी ने भी स्वीकृति दी एक सहयोगी पिता के साथ.
"मेरे 10 नरिंदर पे और शंकर के अर्जुन पे.", उमेद ने अब लपेटा भी तोह खुद मजे लेने वाले नरिंदर को जिसको कटाई उम्मीद नहीं थी अब ये होगा.
"हाँ और मेरे भी 5 इन्दर पे और संजीव के अर्जुन pe.",Ye थे अशोक फूफा जिन्होंने मैं बना लिया था के अब चाचा भतीजा हे मुकाबला करे. कुछ सोच कर धर्मपाल जी ने भी अर्जुन पे दांव लगाया और दलीप की तरफ से नरिंदर पर.
"बीटा अब आ हे जा मैदान में, देखु तोह हमारे थानेदार जी और इस गज्जू ने तुझे कितना तैयार किया है.", नरिंदर जी ने तोह पालक झपकते थे अपनी टीशर्ट उतार कर एक तरफ कुर्सी पर फेंक दी थी. 6 फ़ीट के इन्दर का शरीर आज भी पहलवान सरीखा कैसा हुआ और तगड़ा था. भुयजो पर सख्त मछलिया और 44 का सीना बहुत था बताने के लिए की क्यों उमेद पर वो हमेशा भारी पड़ते रहे.
"चाचा जी के साथ इन्हे मुकाबला नहीं करने दे प्रीती. हमे मालूम है वो क्या हालत करेंगे इनकी.", अफसाना ने बड़ी हे धीमी आवाज में प्रीती के कान में ऐसा कहा था. नरिंदर जी की दहशत से वो वाकिफ थी जब बात उसकी बड़ी पहन पर आयी थी और कैसे नरिंदर जी ने वो शक्श हे गायब कर दिए थे.
"मस्ती मजाक हे है अफसाना जी और चाचा जी प्यार भी बहोत करते है अर्जुन से.", प्रीती ने जवाब देने के साथ साथ एक नजर अर्जुन को देखा जो बिना कोई कपडा ढीला किये जमीन की मिटटी मस्तक से लगा कर नंगे पाँव अखाड़े में उतर आया था. ये सब अभी तक घर वापिस नहीं लौटे थे जिस वजह से तारा को कौशल्या जी ने इधर भेजा था और उसके साथ साथ पंडित जी भी ये घर दिखने के लिए अपने साथ आचार्य जी, हिमानी और छोल साहब को लेते आये.
"अब ये क्या चल रहा है भाई इधर? मैदान कच्चा करने को भेजा था एक को और इधर ये मुस्टंडे मजमा लगाए बैठे है. यहाँ bhaaji-mithaai के लिए हलवाई लगाना था लेकिन ये तोह खुद हे nang-dhadang से लौट लगा रहे है. ऊपर से दामाद को शामिल किया हुआ.", रामेश्वर जी थोड़ा हैरत में थे लेकिन छोल साहब ने उन्हें मुस्कुरा कर दखल देने से रोक दिया. तारा भी इतराती हुई प्रीती के करीब हे आ कड़ी हुई.
"देखते है पंडित जी ये क्या खेल खेल रहे है. वैसे भी वह घर में तोह आज महिलाओ के हे काम है और भोजन के बाद चलो यही मनोरंजन सही.", ये सभी आँगन से इतर हे खड़े थे और अखाड़े वाले लोगो का पूरा ध्यान बस बीच में खड़े अर्जुन और नरिंदर पर था.
"हमने देखा है बे इन्दर चाचा जी को कुश्ती करते और सच कहु न तोह तुमसे भी 2 गुना बेहतर थे वो उस टाइम. पापा उनसे 2 पटकनी की छूट लेते थे.", उमेद ने और हवा भरी मुकाबले में.
"हाँ तोह बीटा अर्जुन तुम्हे 4 पटकनी की छूट. मतलब मैं तभी जीतूंगा जब तुम 5 बार धरती के गले लग चुके होंगे. गज्जू महाराज, ये बगड़ बिल्ला अब मेरे हत्थे चढ़ा है और देखना क्या हाल बनता हु इसका. चल बीटा ये टीशर्ट उतार दे नहीं तोह तेरे साथ बाकी..", अब नरिंदर की नजर अपने पिता और बाकी लोगो पर पड़ चुकी थी और बात अधूरी हे रह गयी.
"लगे रहो भाई... लगे रहो. हम भी देखना चाहते है के 3 साल तक इन्दर क्यों अपराजित रहा Inter-college में. भूल जाओ के हम लोग भी इधर मौजूद है.", आचार्य जी ने उन्हें आश्वासन दिया तोह नरिंदर कुछ सहज हो गया लेकिन अब हालत ये थी की बाकी सभी ऐसे ाचे बचो की तरह अखाड़े के बहार बैठ गए थे जैसे गणित का पीरियड हो और किसी ने भी काम पूरा न किया हो.
"देख कर खेलना बस इन्दर. विवाह का समय है और कोई toot-foot हुई तोह तुम काम काज कैसे करोगे.", रामेश्वर जी ने ये कहा तोह अर्जुन पहली बार मुस्कुराया. बाकी सभी जो अखाड़े से दूर थे वो भी हंस दिए थे पंडित जी के मखौल पर. अर्जुन ने दोनों हाथो में मिटटी ाचे से मसली तोह इस बार खुद शंकर जी ने कहा.
"बीटा, टीशर्ट उतार दो. दांव सही से नहीं लगेगा और इन्दर की पकड़ तुम पर ज्यादा कसेगी अगर कपडे में रहोगे.", अपनी पिता की गहरी बात समझते हे अर्जुन ने अपने कंधे पर लगी पट्टी की परवाह न करते हुए वो कासी हुई टीशर्ट खोल कर कुर्सी पर रख दी. अब जो जिस्म अखाड़े में था उसकी प्रशंशा वह बैठे और खड़े सभी व्यक्तियों की आँखों में थी. हिमानी के तोह मुँह से न्यास हे निकल गया.. 'वाओ' और अफसाना को जब पता लगा की प्रीती उसको हे घूर रही है तोह नजरे झुका ली.
"देख लो देख लो, मजे ले रही हु बस आपके. वो उतना भी कमजोर नहीं है जितना आपको लग रहा था."
"हमने ये तोह नहीं कहा लेकिन इन्दर चाचा के पास अनुभव है. अर्जुन kam-umar है उनके सामने.", अफसाना दबी आवाज में हे गुफ्तगू कर रही थी और रामेश्वर जी चलते हुए नजदीक जा खड़े हुए. उन्होंने भी डॉक्टर टेप से लगी वो पट्टी देख ली थी जिस पर अखाड़े में मौजूद सबकी नजर थी.
"शुरू.", रामेश्वर जी ने हे आवाज दी और अर्जुन जब तक कुछ समझ पता वो इन्दर चाचा का एक हाथ उसकी काख के निचे से गुजरा और फिर वो बस जमीन पर चित्त पड़ा था. तुरंत वो उठ खड़ा हुआ और इधर उधर देखने लगा जैसे अभी ये हुआ क्या था.
"3 मौके और मिलेंगे अभी. टेंशन मत लो बीटा जानी, सीख जाओगे की हर मुकाबले हाथ पकड़ के नहीं होता.", नरिंदर जी ने फिर से उसके सामने खड़े होते हुए कहा और हंस दिए.
"मतलब free-style खेलनी है चाचा जी? चलिए तोह इस बार मेरी पीठि नहीं लगेगी.", अर्जुन थोड़ा संजीदा हो गया था और जिस तरह से उसने अपने दोनों पाँव विभिन्नि कोण पर जमाये थे शंकर जी का ध्यान उधर हे गया. एक बार फिर आवाज आई शुरू और नरिंदर जी गर्दन झुका कर जैसे हे अर्जुन की दूसरी काख की तरफ लपके उनका पूरा जिस्म 180 घूम कर कमर की तरफ से अर्जुन के हाथो में था. सर निचे और पाँव ऊपर. अर्जुन ने उनकी पीठ या सर जमीन पर न लगते हुए करवट के बल मिटटी में गिरा दिया.
"ाचा बच्चू.. लेकिन तगड़े शरीर को गिराने का सिर्फ यही एक दांव नहीं है.", नरिंदर जी को उम्मीद नहीं थी की ऐसा होगा और अर्जुन ने उन्हें चित्त न करके मौका क्यों दिया वो ये भूल कर ज्यादा हे उत्साहित हो गए.
"इन्दर.. ध्यान से..", शंकर ने अपने भाई को चेताया जैसे वो समझ रहे हो की यहाँ अर्जुन क्या करने की चाह रहा है. 1-2 बार यही उपक्रम होता तोह इन्दर अपनी ताक़त से लड़ने वाला था जो शायद सही न होता. लेकिन अर्जुन अपने पिता की बात सुन्न कर जैसे सोच बदल चूका था. मुकाबला शुरू हुआ तोह इस बार चाचा भतीजे की उंगलिया आपस में फांसी थी. शारीरिक बल का उचित प्रदर्शन था जिसमे अर्जुन को एहसास हुआ की सचमुच उसके चाचा अबतक जितने भी लोगो से वो भिड़ा था उनमे शक्तिशाली है. नरम मिटटी में अर्जुन के पाँव इंच इंच पीछे सरक रहे थे और दोनों के सीने चेहरे के साथ साथ एक दूसरे से बस इंच भर दूर.
पीठ व् अकार में खिंच कर ऐसी मांसपेशिया दिखा रही थी जो सांगवान, मेहुल समेत खुद शंकर की कल्पना से परे थी. एक पल ऐसा आया की दोनों स्थिर हो चुके थे. इन्दर इस से आगे जोर लगाने में असमर्थ था पर अर्जुन को रोके रखा.
"तेरा लोंदा सचमुच तगड़ा है शंकर. देख तोह यार कही से लगता है ये 18 का है.? वैसे लगता तोह नरिंदर भी 30 से ऊपर नहीं और हैं भी तुझसे 21 लेकिन अर्जुन ने शरीर चोखा बना रखा.", सांगवान शंकर से बात कर हे रहा था के शंकर की नजर उस सफ़ेद पट्टी के बदल रहे रंग पर पड़ी.
"इन्दर रोक दे बस.. बहोत हुआ.", वो तेजी से उठ कर दोनों के बीच आ खड़ा हुआ और जिस तरह से दोनों को अलग किया था वो दृश्य बताने को बहुत था की इस वक़्त ताक़त में शंकर अपने चरम पर था जिसके एक झटके से अर्जुन मिटटी में औंधे बल गिरा और इन्दर पीठ के. शंकर ने अपने बेटे का हाथ पकड़ कर खड़ा करते हुए जख्म पर ध्यान दिया.
"आप लोग चलिए, हम भी आते है यही से नाहा धो कर.", नरिंदर ने भी देख लिया था के किस वजह से शंकर को इतना ताव आया था. संजीव ने भी प्रीती इत्यादि को कार में बैठने को कहा और पंडित जी मुस्कुरा कर घर के भीतर दाखिल हो गए आचार्य जी और छोल साहब के साथ.
"उतनी बड़ी चोट नहीं है पापा, वैसे हे तार लग गयी थी जाली वाले गमले की.", अर्जुन ने पिता को वो पट्टी खोलते देखा तोह उन्हें रोकना चाहा. बाकी सभी लोग हाथ मुँह धोने लगे थे.
"बीटा, वो तार न इतनी मजबूत नहीं होती की ऐसे पार हो जाए. डॉक्टर हु चुटिया नहीं. जब चोट कंधे की हो तोह जोर कंधे का लगाना भी नहीं चाहिए. किस उल्लू के पाते ने ये ड्रेसिंग की थी?", शंकर ने और कोई सवाल नहीं किया था के कहा से चोट लगी, क्यों बताया नहीं.. बस घाव को ध्यान से देखने के बाद साफ़ रुमाल को गीला करके जखम और ाचे से देखा.
"वो मॉडल टाउन वाले डॉ मक्कड़ के क्लिनिक से.", अर्जुन ने झेंपते हुए जवाब दिया.
"बहनचोद ये बांस वाले भी बाज नहीं आते. मेहुल तू ले जा इसको अपने साथ और गाडी में हे ड्रेसिंग कर दे. लोहे की मोटी कील या वैसा हे कुछ लगा है तोह इंजेक्शन भी दे डीओ. और तुम अभी 4-5 दिन gym-boxing कुछ नहीं करना.", शंकर जी ने वो रुमाल वही कंधे पर दबाने के बाद अर्जुन को वो पकडे रखने का कहा और मोटर पर नहाने चल दिए.
"सॉरी यार पता नहीं था के जख्म गहरा है रिसने भी लगा. ठीक हो जा फिर पटखनी दूंगा तुझे.", नरिंदर जी ने परवाह के साथ साथ मखौल किया था और इधर मेहुल गुलाटी जब अर्जुन को लिए बहार अपनी कार की तरफ बढ़ा तोह संजीव को वह अकेले खड़ा देख अर्जुन ने नजरे झुका ली.
"अंकल आप ड्रेसिंग कर दो इसकी, फिर मैं इसके इंजेक्शन खुद लगवा लाऊंगा.", संजीव के पास अब मौका था अर्जुन से ढेरो सवाल करने का और 10 मिनट बाद हे ये दोनों पैदल घर की तरफ चल दिए.
"इंजेक्शन तोह तेरे महीने पहले हे लगा है जो 6 महीने तक असर रखता है. अब ये बता की तेरे ये चोट लगी कैसे?", अर्जुन इस बात से बच रहा था लेकिन संजीव ने जब उसको अखाड़े में उतरवाया तोह यही जान ने के लिए की आखिर उसके चोट लगी है तोह वो छिपा क्यों रहा है और चोट लगी कैसे.
"अभी बताना जरुरी है क्या भैया?"
"देख फिर मुझे घर से बहार जाने नहीं देंगे, इसलिए तू स्कूटर निकाल और nimbu-jeera के साथ सिग्गट के दौरान अब पूरी कहानी बता.", अर्जुन अब बेबस हो चूका था और संजीव भैया को वो झूठ कभी कहने नहीं वाला था.
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"साला मेरी तोह समझ से हे बहार है ये लड़का. काण्ड कब कर देता है कुछ खबर हे नई होती. तू घर हे था न इन्दर और ये कही गया था इस बीच?", शंकर हाथ मुँह धो कर अब साफ़ कपड़ो में था फिर से. नरिंदर ने एक बार उमेद की तरफ देखा और फिर जवाब दिया.
"ये तोह घर हे था सारा टाइम और चोट इसके कील से हे लगी है जो घर वाली गयम में पता नहीं कैसे बेंच पर पड़ी थी. अर्जुन ने बताया था मुझे पर ऐसी छोटी मोती चोट लगती रहती है यार. चल अब काम धाम देखते है कुछ नहीं तोह थानेदार ने उल्टा लटका देना सबको.", नरिंदर खुद हे बात गोल कर गया था कुछ सोच कर.
"दिमाग से पैदल हे ये उल्लू का पट्ठा.. चल चलते है घर, रोटी के बाद मैं जरा डायमंड पैलेस चक्कर लगा औ राजेश के साथ. तू गज्जू को ले जा कम्युनिटी सेण्टर और फिर एक बार इस कैटरिंग वाले का भी मामला देख लियो. मिलनी के कम्बल और कपडे परम लेने जा रहा भुप्पी के साथ. दलीप भाई, वो हलवाई इधर हे आएंगे भाजी बनाने वाले. खाने के बाद इधर देख लेना थोड़ा क्योंकि बचे भी अबसे इधर हे रहने आएंगे. कही इधर उधर उन्होंने नजर.."
"टेंशन न ले यार, हलवाई की माँ की छूट. इस आँगन में भी नजरे कढ़ाई से ऊपर उठी तोह गांड में पीतल भर दूंगा. चल वैसे भी तगड़ी भूख लगी है और आज रात का कोई सन मत बनाना. धर्मपाल भाई ने कहा है की कल संजीव पार्टी दे रहा है तोह वालिए जी के साथ हे गिलसि खड़केगी.", मस्तमौला दलीप भी इनके साथ हे तैयार हो कर चल दिया. सभी एक साथ हे घर के लिए निकले थे और इस बीच भुप्पी ने ये सवाल नरिंदर से कर हे लिया जो इतनी देर से उसके जेहन में था.
"इन्दर भाई, अर्जुन के बारे में क्या राये है? मेरा मतलब है की तुमने तोह परखा हे होगा उसकी ताक़त को?", नरिंदर ने सफारी का दरवाजा खोलने से पहले जवाब देना हे बेहतर समझा.
"वो एक सेकंड से पहले हे मुझे बराबर कर देता भूपी भाई. जिस तरह से उसने मुझे चरखे की तरह घुमा कर आराम से मिटटी में रखा था उस से साफ़ था के यहाँ बैठा कोई व्यक्ति उसकी टक्कर का नहीं. दूसरी बात ये की वो एक तरह से मेरी हे ताक़त की लिमिट जान गया था लेकिन उसने जोर नहीं लगाया. हाँ शंकर शायद 1 मिनट टिक सके उसके सामने, वो भी अगर ये पहले से तैयार हो. देखा नहीं बेटे का खून देख कर कितनी जान आ गयी थी एकदम से इसमें.? दुनिया के लिए कसाई डॉक्टर है अपना शंकर लेकिन बचो की एक खून की बूँद इसको बर्दाश्त नहीं.", और सफारी की सीट पर इन्दर तुरंत बैठ गया, शंकर को लपेटे में लेने के बाद.
"ये तोह सही कहा भाई. पहली बार देखा की शंकर भी घबराता है और अर्जुन तोह बाप के सामने आज भी नन्हे मुन्ने की तरह सेहम रहा था.", अशोक जी पिछली सीट पर बैठते हुए इस टांग खिंचाई में शामिल हो गए.
"अशोक भाई, बात ये नहीं है की वो अर्जुन का खून था.. वो खून उसमे मुझसे और मुझमे मेरे पिता से आया है. उस खून के एक कतरे के बदले मुझे खुद नहीं पता के मैं किस हद्द तक जा सकता हु."
"शांत रह बे भोले. तू तोह सीरियस हे हो गया. खेल कूद में होता रहता है ये सब.", उमेद अगली सीट पर इन्दर के बराबर आ बैठा था. पिछली पर टांग हे नहीं आणि थी उसकी.
"हाँ ये सही कहा तूने गज्जू. तेरी तोह खेल कूद में टांग 6 बार टूटी है न.. हाहाहा.. ", नरिंदर कहा किसी को बख्शता था और यही उसने उमेद के साथ भी किया. सभी ऐसी हे चुहल करते हुए वापिस घर लौट आये थे जहा आज लगभग 100 लोगो का खाना चल रहा था और गर्मी में भी इंतजाम ऐसा रखा था की किसी के चेहरे पर पसीने की झलक तक न दिखे. इस वक़्त सभी लोग घर में मौजूद थे और घुलमिल रहे थे. गायब थे बस 2 लोग जिनकी तरफ किसी का ध्यान भी न गया.
मार्किट से संजीव भैया के साथ आने के बाद अर्जुन गायब था और वैसे हे वालिए जी और उनकी श्रीमती के व्यस्त होने पर अन्नू भी नदारद थी. इन दोनों की गुमशुदगी सिर्फ एक इंसान की नजर में थी, कोमल दीदी के.
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मरीना अभी माधुरी दीदी के कमरे में थी जहाँ उनकी शादी के गहने और कपडे आदि सभी लड़कियां देखने में लगी थी और बीच बीच में माधुरी दीदी के मजे भी लिए जा रहे थे. विक्की इधर प्रीती के साथ अंदर आयी और सबसे पहले मरीना से वैसे हे मिली जैसा रूस का रिवाज था, गाल चूम कर. अफसाना, जो पहले शादी का लाल जोड़ा देख रही थी अब हैरत से प्रीती और मरीना का मिलना देख रही थी.
"टेंशन मैट लो अफसाना बेगम ये दोनों विदेशी है. वैसे तोह आप भी मोरक्को से है तोह विक्की आपसे वैसे हे मिल लेगी. क्यों विक्की?", अलका कहा आदत से बाज आती थी और हँसते हुए उसने अफसाना की खिंचाई की तोह वो घबराती हुई कोमल की तरफ सरक गयी.
"नहीं नहीं.. हमे ये सब पसंद नहीं."
"ये तुमसे मजाक कर रही है अफसाना. अलका, थोड़ा काम कर दो ये मजाक.", कोमल दीदी ने झूठी दांत लगाईं थी और अलका हंसती हुई विक्की से गले लग कर मिलने के बाद उसके पिछवाड़े पर हाथ फिरती हुई अफसाना को आँख मार दी.
"हां..", अफसाना ने मुँह पर हाथ रखने से पहले बस यही कहा था और अब मरीना भी हँसते हँसते एक तरफ से अफसाना की बगल में आ बैठी.
"तुम बहोत ज्यादा सुन्दर हो अफसाना.", मरीना के मुँह से ये जुबान सुन्न कर अफसाना के होश हे उड़द गए थे.
"आप हिंदी बोलती है? और हम सुन्दर नहीं है इतने, बस चश्म आपके हे जैसे है बस.", अफसाना इतने हे समय में काम से काम घुल मिल कर बोलने तोह लगी थी. और मरीना ने बिना बताये उसका गाल चूम लिया.
"तुम भी हिंदी बोलती हो, हम भी. दोस्त बन गए न इस बात पर?", मरीना की इस बात पर अफसाना ने मुस्कुरा कर नजरे झपका दी. अब जहा बाकी सब गहने कपड़ो में लगे थे वही प्रीती खिसक कर मरीना और अफसाना के पास आ बैठी.
"वैसे आप काम हे उर्दू उसे करना अफसाना जी मरीना दीदी के साथ. हिंदी तोह इन्हे ठीक ठाक आती है लेकिन उर्दू जरा भी नहीं. वैसे मरीना दीदी आपके मुम्मा कहा है?"
"मुम्मा तोह तुम्हारे घर गए है अभी लेकिन तुम्हारा लवर बॉय कहा है? घर में इतने लोग है और वही मिसिंग है. अलका तुम्हे पता है अर्जुन कहा है?", मरीना ने ये नाम ले कर कमरे में मौजूद हर लड़की का ध्यान अपनी तरफ करवा दिया था और विक्की का सबसे पहले. जो शायद यहाँ आयी भी इस आस में थी लेकिन प्रीती जानती थी की अर्जुन नहीं है और वो कहा है ये कोमल को पता था.
"आपने कही जाना था क्या अर्जुन के साथ?"
"वो तोह घायल थे और उन्होंने किसी को खबर भी नहीं लगने दी.", अफसाना और प्रीती ने एक साथ अपनी अपनी बात कही थी और अफसाना के बताने पर कोमल की आँखें बड़ी हो गयी.
"तुम्हे कैसे पता अफसाना की अर्जुन के चोट लगी है? और सुबह से तोह वो बिलकुल सही लग रहा tha.",Komal को चिंता होते देख अफसाना को अपनी गलती का एहसास हो चूका था और वही आरती के चेहरे पर भी परेशानी साफ़ नजर आ रही थी.
"वो दिख तोह सलामत हे रहे थे आपि लेकिन हमने वो दूसरे घर.. ", अफसाना को ऐसे बोलते देख प्रीती ने हे बात संभाली उसका हाथ दबाते हुए.
"नहीं दीदी, ऐसी कोई चोट नहीं थी और वो पिछले घर गए थे न हम लोग तोह वह इन्दर चाचा जी के साथ अर्जुन खेल रहा था. बस वही उसके कंधे पर लगा बैंडेज दिखा था और अफसाना के साथ साथ सभी ने देखा था. शायद काम करते टाइम हे कुछ लगा होगा.", दरवाजे पर खामोश कड़ी ऋतू ये सब सुन्न भी चुकी थी और अब उसको सुबह अर्जुन के घर से जाने का कुछ कुछ समझ भी आ चूका था.
"चलो छोडो ये सब और अब ये बताओ के आज रात उधर वाले घर में क्या धमाल किया जाए?", ऋतू ने अंदर आने के साथ हे ये किस्सा यही निबटा दिया और उसके दरवाजा बंद करने पर बाकी सभी लड़कियां भी समझ गयी की आज कुछ तोह गड़बड़ घोटाला करने का इरादा है ऋतू का.
"ऐसा है रात में खाना यहाँ कोई नहीं खायेगा और जो भी हमारे साथ वह जा रहा है उतने लोगो के हिसाब से खाना पैक होगा.", ये अलका थी, ऋतू की हर खुराफात में उसकी 50:50 की भागीदार.
"प्रीती के पास वोडका है और विन्नी दीदी ने एक बॉक्स बियर सही जगह छिपा राखी है.", तारा ने प्लान को थोड़ा और खोल कर बताया जिसके साथ हे एक बार फिर अफसाना हैरानी से देखने लगी.
"आप घबराये नहीं, आपको नहीं पिलायेंगे. वैसे इस कमरे में जितने भी है इनमे से किसी को अलकोहल का एक्सपीरियंस नहीं है. बस ये एक हे बार करके देखने का दिल था ऋतू दीदी और हम सबका. बाकी पता नहीं कौन कौन एग्री होता है.", प्रीती भी थोड़ा घबरा रही थी कोमल दीदी के साथ साथ माधुरी दीदी के भी यहाँ होने से.
"मैं तोह सबसे पहले हु इसमें और कीर्ति भी.", जसलीन ने चहकते हुए सहमति दी और उसके साथ हे मरीना ने भी हाथ उठा दिया.
"I'm आल्सो इन. मैं आज रात को यही रहने वाली हु एंड वोडका इस माय ड्रिंक.", मरीना के बाद आरती ने भी हाथ उठाया तोह प्रियंका हैरान हे हो गयी. उसकी छोटी बहिन सचमुच अब छोटी नहीं रही थी.
"देखो अब ये मौका फिर शायद हे मिले कभी लाइफ में तोह मेरी भी हां है. सिर्फ एक गिलास बियर.", ये आवाज थी सबको हैरान करने वाले शख्स की, जिसकी उम्मीद यहाँ बैठी घर की किसी भी लड़की ने नहीं की थी. कोमल दीदी ने पार्टी में शामिल होने का फैंसला किया था और अलका उनका चेहरा हाथ से सेहला कर जैसे बुखार देखने लगी.
"कमाल हे हो गया ये तोह फिर. पिंकी दीदी फिर तोह आपका भी बनता है."
"नहीं नहीं.. तुम लोग हे करो ये सब और वैसे भी मुझे माधुरी दीदी के साथ हे रहने का आदेश है. उस घर में मैं नहीं जा सकती और वैसे भी शराब के हाथ नहीं लगाना."
"मुँह लगा लेना पिंकी डार्लिंग, हाथ में पकड़ लुंगी. यार देखो हम सब एकसाथ फिर कभी हो न हो, क्या पता. दादी को मैं बोल दूंगी की आज माधुरी दीदी के साथ रुपाली एडजस्ट कर लेगी."
"मैं भी जा रही हु, मैं नहीं एडजस्ट करने वाली.", ख़ामोशी से सबकी सुनती हुई रुपाली ने तुरंत मन किया और सभी हंसी निकल गयी.
"चलो फिर दोने है की हम सभी लोग आज वह धमाल करने वाले है. लेकिन इसके साथ पूरी बात भी सुन्न लो.", अलका जैसे कुछ बड़ा हे बताने वाली थी और माहौल एकदम शांत हो गया लेकिन उसकी बात को आगे बढ़ाया तारा ने.
"गेम्स भी होंगी और पीने वाले को वो खेलनी भी पड़ेंगी. कोमल दीदी आप सोच लीजियेगा एक बार फिर से और बाकी सभी जो बाद में कही न नुकुर करने लगे. एक रात के लिए सभी बराबर होंगे तोह No लिहाज."
"ज्यादा से ज्यादा कौनसी गेम्स होंगी तारा? Truth-Dare, बोतल घुमा कर टास्क देना या ब्लैंडफोल्ड & गेस? बस इतना जरूर ध्यान रखना की वो हद्द पार न हो जिस से सुबह उठने पर किसी को बुरा लगे.", कोमल दीदी ने तोह एक और बम गिरा दिया था ये खेलो के नाम ले कर और उनकी बात सुन्न कर तारा ने हैरत के साथ हे हाँ में सर हिला दिया.
"मतलब साफ़ है फिर की गेम्स, बियर और पार्टी. 9 बजे यहाँ से चलेंगे और फिर पूरा घर हमारा."
"अगर हम पीयेंगे नहीं तोह क्या हम शरीक नहीं हो सकते आप लोगो के साथ? वो ऐसा है कोमल आपि के इस्लाम में शराब गुनाह hai.",Afsana की इतनी मासूमियत से कही बात और खुद हे उसका शामिल होने का दिल देख कोमल दीदी ने उसका गाल सहलाते हुए कहा.
"बिलकुल, तुम साथ हे चलोगी हमारे और जो तुम्हे ाचा लगे वही करना.", अब अफसाना के चेहरे पर भी एक दिलकश मुस्कान नुमाया थी. इस बीच दरवाजे पर हुई thak-thak से अलका ने सभी को शांत रहने का इशारा दिए और दरवाजा खोलते हे गहरी सांस भरी.
"सब लोग ऐसे क्यों देख रहे हो यार? मैं हे हु और जैसा अलका ने कहा था मैं सामान भी ले आयी.", हिमानी के एक हाथ में कपडे का बैग और दूसरे में वो धुप का चस्मा था जो वो ज्यादातर पहने रहती थी. बैग अलका को पकड़ते हुए उसने खुद हे दरवाजा वापिस लगा दिया. जसलीन की नजर बड़े गौर से हिमानी का अवलोकन करने लगी थी.
"अरे हैरान मत हो यार, बीमारी नहीं है ये बस मेरी आँखें न इस Alka-Ritu के साथ साथ प्रीती जैसी है. प्यार हे इतना ज्यादा है न मेरा इनके साथ.", हिमानी ने खुद हे अपना परिचय देने के साथ साथ पंजाब वाली हर लड़की से हाथ मिलते हुए अपनी दो रंगी आँखों का चटपटा किस्सा सुना दिया. अलका ने बैग खोल कर देखा तोह अंदर हरे कांच की 3 बोतल थी.
"अरे हम लोग शराबी नहीं है जो इतनी बॉटल्स जुगाड़ ली. और तुम यहाँ क्यों ले आयी हिमानी, फंस जाएंगे यार अगर किसी ने गलती से भी देख लिया तोह.", हिमानी अभी उन सबमे हे व्यस्त थी और अलका न तुरंत बैग बंद करके अलमारी में छुपा दिए.
"वो वाइन है अलका दीदी, बियर से भी लाइट.", ऐसा प्रीती ने कहा था और अब जैसे वही फंस गयी थी.
"तुझे बड़ा पता है ये लाइट और स्ट्रांग का? कही तू भी दादा जी की बोतल से चोरी चोरी नशा तोह नहीं करती?", आरती का ऐसा कहना था और प्रीती ने तुरंत ना में सर हिला दिया.
"हाहाहा... कितनी प्यारी हो तुम प्रीती. वैसे ये ठीक कह रही है अलका. वाइन में उतना अलकोहल नहीं होता और ये बोतल मेरे मां जी के बार से उठाई है मैंने. उन्हें तोह पता भी नहीं होगा की 3 बोतल गायब हुई है. वैसे आपसे हम नहीं मिले, शायद वह घर पे देखा जरूर था जब प्रीती के साथ थी.", हिमानी बड़े आराम से प्रीती के पास हे बैठते हुए अफसाना से ru-ba-ru हुई जो खुद हैरान थी की एक खूबसूरत लड़की और वो भी दोनों अलग अलग नैनों वाली उसके सामने थी.
"हम अफसाना हुसैन है आपि और आप तोह जैसे खुदा का करिश्मा हे है. ऐसे चश्म हमने आज सिर्फ दूसरी हे बार देखे है ज़िन्दगी में.", अफसाना हाथ जोड़ कर मिलने लगी थी और हिमानी ने उसको गले लगा कर परिचय दिया.
"यार ये सब छोडो और अब पार्टी का मामला जमाओ. मैं तोह बहोत एक्ससिटेड हो रही हु और लाइफ में पहली बार कुछ चोरी किया है लेकिन दुःख नहीं है.", हिमानी ने ऋतू से कहा था जो कुछ सोच रही थी.
"पार्टी तोह होगी हे हिमानी लेकिन हम लोग पार्टी कर तोह माधुरी दीदी की शादी की ख़ुशी में रहे है और यही वह होंगी नहीं. अजीब नहीं रहेगा?", अब पहली बार माधुरी दीदी के चेहरे पर थोड़ी चमक आयी थी जो पहले इसलिए हे खामोश थी की किसी ने उनसे पुछा हे नहीं था.
"हम्म्म. सही कहा यार.. लेकिन बिल्ली के गले में घंटी कौन बंधेगा?", अलका के ऐसा कहने पर विन्नी ने भी हाथ खड़े कर दिए जो यहाँ सबसे बड़ी थी.
"अर्जुन..", सुझाव आया था रुपाली की तरफ से और उसके मैं में क्या चल रहा था इसकी खबर किसी को नहीं थी.
"पागल है रुपाली. वो भला क्यों और कैसे कर सकता है ऐसा? और ये शराब वाली बात उसको पता चली तोह समझ ले गए काम से.", आरती ने असहमति दिखाई थी इस सुझाव पर.
"तुम्हारे पास कोई सुझाव है? नहीं है न. इसलिए मेरी बात सुनो और इसमें थोड़ा सच और बाकी झूठ बोलना पड़ेगा. अर्जुन से ये कहना है की हम सभी लोग खाने, डांस की पार्टी कर रही है माधुरी दीदी के साथ. उसने तोह वैसे भी हमारी सेफ्टी के लिए उस घर में सोना हे है लेकिन वो रहेगा छत्त पर और निचे से हम रखेंगे सबकुछ बंद. अर्जुन की हेल्प के बिना तोह वैसे भी पॉसिबल नहीं क्योंकि हम इतना सामान वह लेके कैसे जाएंगे? तारा या कोई भी कार तोह चला लेगा लेकिन वह कार ले जाने की परमिशन? घर तोह पास में हे है.", रुपाली ने असलियत से सबका सामना करवाया तोह कोमल दीदी ने जवाब दिया.
"मैं बात करुँगी उस से और वो सबकुछ करेगा. बस उसको पूरा सच बताना जरुरी है. और दादी जरुरी माधुरी दीदी से पूछेंगी तोह दीदी आप उन्हें इतना कह देना की आपका भी दिल है सबके साथ घुलने मिलने का. उनके सामने ये बियर वाला मामला नहीं जाना चाहिए बस.", अब सबके दिमाग में बात घुस चुकी थी की ये काम किस तरीके से होगा.
"दोने.", आरती खुश होते हुए बोली और बाकी सबके साथ अब माधुरी दीदी भी उत्साहित थी. शाम के 6 बज चुके थे और हलके से शोर के साथ हे सबका ध्यान बहार गया.
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"शंकर, शांत मेरे भाई शांत. देख वो खुद आया है हमारे घर और वो भी अकेला.", घर के बहार ये लम्बी शाही कार रुकी तोह जो शानदार शक्श उस से उतरा था उसको देखते हे बगीचे के पास इन्दर, उमेद, दलीप से बातचीत में मशगूल शंकर की भानवे उठ गयी. बेशक इन लोगो में कभी कोई तनाव या ख़ास बातचीत न हुई थी पर दुश्मनी तोह अगली पीढ़ी तक आ हे चुकी थी. पुष्पक 2 हे कदम आगे बढ़ा था और उसका सामना अपने से भी 2-3 इनके और उतने हे तगड़े युवक से हुआ.
"दोस्त, हम श्री रामेश्वर शर्मा जी से मिलने की चाहत रखते है. आप परिवार से हे है शायद.?", अर्जुन भी दांग था उस व्यक्ति को सामने देख जिसकी janam-kundli कुछ समय पहले हे उसके हाथ लगी थी. लेकिन इतना नरम व्यवहार और बात करने की तमीज से वो इतना तोह समझ हे चूका था की पुष्पक किसी गलत उद्देश्य से नहीं आया.
"पापा से तुम्हे क्यों मिलना है पुष्पक?", शंकर ने अर्जुन को एक तरफ करते हुए पुष्पक के सामने खड़े होते हुए सवाल देगा. स्वर में गुस्सा नहीं था लेकिन दिमाग हल्का अभी भी गरम था.
"प्रणाम शंकर भाई साहब. ये तोह नहीं कहेंगे की मिल कर ख़ुशी हुई क्योंकि आज हम खुश नहीं हो सकते. हाँ आप यकीनन ाचे दिख रहे है. ताऊ जी से आवश्यक काम है हमे और अगर आप चाहे तोह मुलाकात के वक़्त शामिल रह सकते है.", शंकर का तोह सारा गुस्सा हे हवा हो गया जब पुष्पक ने उसके सामने हाथ जोड़ कर भाई साहब के साथ साथ पंडित जी के लिए ताऊ जी कहा.
"आओ, मेरे साथ चलो पिंटू. पापा बैठक में हे है और घर में बचो का विवाह है इसलिए शंकर थोड़ा डिस्टर्ब है.", इन्दर ने माहौल को समझते हुए पुष्पक को अपने साथ लिया लेकिन बाकी सब भी उन दोनों के पीछे हे चल दिए. अर्जुन को भी अब जान न था के ये शक्श उनके घर कैसे और क्यों.
"प्रणाम ताऊ जी. क्षमा चाहते है की ऐसे shub-avsar पर हम आपके niwas-sthaan पर समस्या लेकर आये.", बैठक में फ़िलहाल सिर्फ कौशल्या जी और रामेश्वर जी के साथ उनके छोटे भाई और मधु हे थे. एकके ये सजीला सा व्यक्ति इन्दर के साथ उनके सामने आया और दोनों हाथ उनके चरणों पर रखते हुए मुखातिब हुआ. ऐसा हे उसने कौशल्या जी के साथ के किया था और उनके सिवा किसी और को देखा तक नहीं. रामेश्वर जी तोह जैसे इस व्यक्ति को सबसे बेहतर पहचानते थे और उन्होंने पुष्पक को दोनों कंधे पर हाथ रख कर अपने गले से लगाया.
"कैसे हो तुम पिंटू बीटा? और जो भी अवसर हो तुम हमारे पास be-jhijhak आ सकते हो. हाँ हमारी बंदिश अलग है लेकिन तुमसे हमे शिकायत नहीं. इन्दर, भाई के लिए खाना लगवाओ.", रामेश्वर जी ने बाकी सभी को ऊँगली के इशारे से बहार जाने को कहा लेकिन अर्जुन के चेहरे को देख उसको अपने हे करीब बैठने को कहा.
"ताऊ जी, क्षमा कीजियेगा लेकिन हम अन्न ग्रहण नहीं कर सकते. समय का अभाव है और आपका ये भोजन हम पर उधार रहा."
"शांत रहो बीटा.. तुम घर पे हो और तुम्हारी जो भी समस्या है हम उसका उचित निदान करेंगे. एक चाय हे पी लो हमारे साथ?", रामेश्वर जी के ऐसा कहने पर उसने सिर्फ हाँ में सर हिलाया लेकिन आँखों से झरर झरर आंसू गिरने लगे थे पुष्पक के और उसके दूसरी तरफ बैठी कौशल्या जी ने बिना देरी किये सीने से लगा लिया.
"न मेरे बचे न.. तू हमेशा से हमारे लिए वही पिंटू है जो बचपन में था. चाहे दुःख हो या सुख, तेरे ताऊ जी और तेरी ये ताई, हमेशा तेरे लिए मौजूद है. आ नहीं सकते बस जो तुझे ाचे से पता है.", कौशल्या जी के सर सहलाने से जल्द हे पुष्पक संभल गया.
"टा जी, आपने हे नाम दिया था हमे और सच कहु तोह मेरे ख़ुशी के वही दिन मुझे याद है जिनमे आप और ताऊजी शामिल थे. पंजाब से राजस्थान क्या गए, हम बंधन में ऐसे बंधे की लौट न पाए.", पुष्पक का चेहरा खुद कौशल्या जी ने अपने पल्लू से साफ़ किया और अब कही उसका ध्यान अपने सामने बैठे उसी युवक पर गया जिस से वो बहार मिला था. इधर ललिता जी 2 कप चाय और कुछ मिष्ठान वह रख कर जैसे ख़ामोशी से आयी थी वैसे हे लौट गयी.
"ये तुम्हारे चाचा है अर्जुन. पुष्पक और बीटा ये हमारे पौत्र अर्जुन है, अपने शंकर के सुपुत्र.", अर्जुन ने अब हाथ जोड़ कर अभिवादन किया था जब पुष्पक को चाचा बताया गया.
"खुशनसीब है आप अर्जुन जो इनकी छाया में बड़े हो रहे हो. हमारे ताऊ जी से बेहतर राजा और साधू हमने जीवनकाल में नहीं देखा. आपके चाचा है लगते है हम और आप बेजिझक हमारे पास आ सकते है.", पुष्पक ने ज्यादा और कुछ नहीं कहा. कौशल्या जी ने चाय का कप सामने किया तोह पुष्पक ने भी सलीके से थाम लिए. कौशल्या जी अपने पति के इशारे से अभी आने का बोल कर बहार चली गयी
"अब हमारे युवराज अपने आने का प्रयोजन बताएँगे? तुम्हारी हालत बहोत कुछ बयान कर रही है पिंटू और तुम जल्दी में भी हो.", रामेश्वर जी ने अर्जुन को एक बार देख कर चाय उठा ली. यहाँ बस अब यही 3 लोग थे और अंदर वाले कमरे का दरवाजा कौशल्या जी बंद कर चुकी थी. पुष्पक ने भी अब कही ध्यान दिया था माहौल पर लेकिन अर्जुन के वह बैठने से समझ चूका था की ये लड़का पंडित जी का अजीज है.
"बुआ जी का देहांत हो गया है ताऊ जी. कुमारी अनामिका ने अपनी 2 अंतिम इतछाये हमसे कही थी क्योंकि उन्होंने कभी हमे माँ की कमी महसूस नहीं होने दी थी."
"दुर्भाग्य.. क्षमा करना बेटे ये हमको बिल्कुल ज्ञात न था. प्रभु उन जैसे दिव्या आत्मा को अपने चरणों में जगह दे.", रामेश्वर जी की आँखों में एक पल में हे पानी भर आया था जो इन दोनों से छिपा न रह सका.
"आप इसका असर न होने दे ताऊ जी. घर का माहौल बरकरार रखिये और जो रिश्ते अदृश्य है वो वैसे हे रहे तोह सबके लिए ठीक होगा. उन्होंने आपका शुक्रिया कहा था उन्हें महफूज रखने के लिए और हर मुसीबत से बचने के लिए. दूसरी ख्वाहिश थी की कुमारी बिंदिया के साथ शबनम बिटिया भी उनके संस्कार में शामिल हो. हम चाहते है के हमारे ताऊजी ये ख्वाहिश पूरी करे.", अभी पुष्पक की बात ख़तम हे हुई थी और रामेश्वर जी ने अर्जुन को फ़ोन इधर खिसकने को कहा. एक नंबर जो उन्हें भली भाँती याद था मिलते हुए उन्होंने बात शुरू की.
"कपूर साहब, शबनम मिर्ज़ा के सभी चार्ज तत्काल प्रभाव से हटवा दिए जाए. ब्रिटिश एम्बेसी में इसकी सूचना एक क्लीन चित के साथ भिजवाए, ये आवश्यक है.", दूसरी तरफ से भी ज्यादा कुछ नहीं कहा गया सिवाए हाँ के.
"तुम्हारे पास शबनम का नंबर है?", रामेश्वर जी ने ये सवाल अर्जुन से किया था और उसने झेंपते हुए हाँ कहा और आँखे मूँद कर जैसे कुछ याद किया और antar-rashtriya नंबर मिलाने लगा. पुष्पक भी हैरान था अर्जुन के ऐसा करने पर लेकिन रामेश्वर जी ज्यादा हैरान हुए जब अर्जुन खुद हे बात करने लगा.
"नमस्ते चची, मैं अर्जुन. जी..", अर्जुन ने परिचय दिया और सामने से बिंदिया ने भी उसका ख़ुशी से स्वागत किया था.
"हाँ बात कुछ ऐसी थी चची जी की आपको शबनम दीदी के साथ इंडिया निकलना होगा, तुरंत. हाँ.. दीदी के चार्ज हटवा दिए है बाउजी ने और आपको दिल्ली नहीं उतरना.", अर्जुन वैसे हे उनकी बात सुन्न ने लगा जो बिंदिया कह रही थी. चिंता लाजमी थी ऐसे बात करने से.
"जी पुष्पक चाचा जी यही सामने बैठे है उनसे बात कर लीजिये. आगे वही बता देंगे आपको.", अर्जुन शोक समाचार खुदसे नहीं देना चाहता था और हैंडल पुष्पक की तरफ बढ़ा दिया.
"प्रणाम दीदी. आप तत्काल पिता जी के niwas-sthaan के लिए निकालिये. बुआ नहीं रही और उनकी अंतिम इत्छा थी की आप दोनों उनके संस्कार में शामिल हो. ताऊजी के यहाँ मंगल अवसर पर हम ऐसी बात कर रहे है. चाहे तोह संस्कार के बाद हे वापिस लौट सकती है.", पुष्पक ने उम्मीद के विपरीत बात कहने के साथ हे फ़ोन काट दिया था.
"आज्ञा दीजिये ताऊ जी. संस्कार के 13 दिन पूरे होते हे हम आपके पास आएंगे. सफर अधिक है और समय से पहुंचना है.", पुष्पक ने एक बार फिर उनके चरण स्पर्श करने के बाद हाथ जोड़ कर इजाजत मांगी. कोई शुक्रिया नहीं कोई laag-lapet नहीं, जैसे ख़ास अधिकार हो
"हम आते तुम्हारे साथ बीटा बस."
"आपको तोह कुंवर सा हे नहीं रोक सकते ताऊ जी लेकिन फ़िलहाल आप घर देखिये और हम ये जिम्मेवारी निभाते है. जल्द मिलेंगे आपसे. अर्जुन आप एक ख़ास व्यक्ति है और इतना हमे भी अनुमान हो गया है की बदलाव की बयार लाने वाले सैलाब हो. शुक्रिया.", ये बात उसने अर्जुन से कही थी और पंडित जी खुद पुष्पक को साथ लिए बहार निकले जहा आँगन में उनके दोनों बेटे खड़े थे उमेद और दलीप के साथ. कौशल्या जी ने पुष्पक को विदा करने से पहले उसका तिलक जरूर किया था, परंपरा.
"तै जी, भोजन पर जल्द आएंगे. आज्ञा दीजिये.", कार में बैठने से पहले पुष्पक ने फिर से दोनों के चरण स्पर्श किये थे और कुछ सोच कर अपने पाँव से जूती उतार कर अर्जुन की तरफ सरका दी.
"आपके लिए हम कुछ ला न सके लेकिन चाचा और भतीजे में दोस्त का रिश्ता भी रहता है. हमारी मौजरी को पहन कर सम्मान दीजियेगा अर्जुन.", नंगे पाँव हे वो अपनी कार में बैठ कर जिस तरफ से आया था वापिस उस तरफ निकल चला. मुश्किल से वो 30 मिनट भी नहीं रुका था लेकिन अर्जुन को जरूर दुविधा में छोड़ गया था.
"पहन लो बीटा पहन लो इन्हे. उसने तुम्हे अपना वारिस बनाया है जूती सौंप कर. पुष्पक का अहित मैट करना और वो तुम्हारा उचित ध्यान भी रखेगा, जब तुम्हे जरुरत होगी.", रामेश्वर जी के कहने भर से अर्जुन ने चप्पल उतार कर वो sone-chaandi के तार वाली जूती पहन ली थी, रत्ती भर भी अकार अलग न था उनका अर्जुन के पाँव के लिए.