Incest Pyaar - 100 Baar - Page 36 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 174

हल्दी और ज़ख्म



लाडो रोवे मैट न

दिल तोड़े मैट न

तुम्हे जाना है..

वह जेठ मिले, जेठानी मिले

वह मिले सभी परिवार..

रे अब छोड़ लड़कपन पीहर का..

लाडो रोवे मैट न

दिल तोड़े मैट न

तुम्हे जाना है..

वह पति मिले, वह प्यार मिले

वह मिले घर संसार..

रे अब छोड़ लड़कपन पीहर का..

पिछले आँगन में शामियाने की छाव में ये लोकगीत शुरू हुए थे और घर की महिलाओ के साथ साथ aas-pados की stree-ladkiyan भी शामिल थी. नयी पीढ़ी जहा कोरस में हंसती हुई गीतों का आनंद ले रही थी वही riti-riwajo से परिचित महिलाएं माधुरी को लकड़ी के पात पर बैठने के साथ हे पूरे उत्साह से हल्दी रसम में जुट गयी.

"दीदी, आपकी तरफ तोह ये रसम ब्याह से पहले दिन नहीं होती?", श्रीमती मल्होत्रा जी ने ख़ुशी में शामिल हुए हे ये सवाल कौशल्या जी से किया. रस्मे तोह मधु ने शुरू करनी थी क्योंकि घर में भाभी तोह अभी थी नहीं. मधु, रेणुका, रूचि सबसे आगे माधुरी के पास बैठी हुई हल्दी में सरसो का तेल और पानी मिला कर घोल तैयार करती हुई अलग बतिया रही थी.

"वो बाटना भी लगेगा जिस दिन ब्याह है उस दिन सवेरे. मेरी तोह माँ थी नहीं जब ब्याह हुआ और इनकी (रामेश्वर जी) माँ जी ने ब्याह से पहले जो रिवाज समझाए वही मैंने आज तक बरकरार रखे है.", कौशल्या जी अपने आँगन में सभी के बीच खासी उत्साहित थी और विचारो का आदान प्रदान यहाँ भी वैसा हे था जैसे हर mele-mulakaat में अक्सर होता है.

"कौशल्या बहिन जी, मैं तोह कहती हु ये रस्मे 2 दिन और पहले शुरू कर देते आप. हाहाहा.. देखो तोह सही बचो को कितना आनंद उठा रहे है. वैसे 5 दिन की रस्मो का रिवाज अब तोह घरानो में हे बचा है. पहले तोह 11-11 दिन पहले हे लोकगीत और ढोलकी शुरू हो जाती थी ब्याह के घर में और आज तोह सुबह हल्दी, दोपहर में मेहंदी फिर सीधा रात को शादी. ाचा है काम से काम आपने तोह ये फटफटी वाला रास्ता नहीं अपनाया.", यशोदा सांगवान जी भी पूरी तरह शामिल दिखी इस विवाह पूर्व पर्व में और वो देख रही थी कैसे मरीना भी सलवार कमीज में घूंगट निकल कर मस्ती कर रही थी कोमल और विन्नी के साथ. ललिता जी लाल बंधेज की साड़ी में स्वयं मन्दाकिनी को मात देती लगी. गौरवर्ण ललिता जी पर लाल रंग काले से भी कही ज्यादा फबता था बेशक उम्र 50 के नजदीक लेकिन आज भी सुघड़, हंसमुख और खूबसूरत थी वो.

"कौशल्या क्या कहेगी यशोदा? इसके तोह पीहर में रिवाज 3 दिन में निबटे लेकिन ब्याह के आयी तोह सास ने 10 दिन मुँह दिखाई की लूट मचाई थी. हाँ और भाई साहब (रामेश्वर जी) को तोह सौभाग्य 11 दिन बाद मिला था अपनी बीवी को देखने का. वैसे कौशल्या की तोह बनती भी थी इतनी भारी मुँह दिखाई.", इस माहौल में कौशल्या जी को फंसा था उनकी अभिन्न सहेली और behan-samaan पूर्णिमा जी ने. उनकी बात सुन्न कर पहली बार किसी ने कौशल्या जी को शरमाते हुए देखा और वो नजरे झुकाती हुई पूर्णिमा के घुटने पर झूठा थप्पड़ मारने लगी.

"वाह.. ये तोह आपने बहोत हे राज की बात बताई दादी. हमारी थानेदारनी जी के तोह जलवे थे अपने टाइम पर इसका मतलब?", ऋतू कब इधर चली आयी थी किसी का ध्यान न गया लेकिन उसने ये चर्चा सुन्न ली थी और अपनी दादी की बगल में लिपट कर जो बात उसने मस्ती में कही उस पर बाकी सभी वृद्धा कहकहा लगाने लगी. दूसरी तरफ से इन्हे घेरा था सुनंदा जी ने, जिन्हे ऋतू हे अंदर लेके आयी थी.

"ऋतू बिटिया पुराणी बात न भी करे तोह ये जलवे तोह तब भी बरकरार थे जब तेरी माँ का ब्याह हुआ था. ऐसे न हमारी संधान जी चेहरे पर गुस्सा लिए रहती है. इनके साथ फाग खेलने की हिम्मत मैंने तोह किसी में न देखि आजतक. दिल सबका करता था लेकिन जितने भी रिश्ते में देवर लगते है किसी की मजाल जो पाँव छू कर गाल में गुलाल के सिवा पानी की एक बूँद छुवा दे.", सुनन्दा जी ने सभी को प्रणाम करने के बाद देवकी, कौशल्या जी, पूर्णिमा जी और यशोदा जी से गले लग कर मुलाकात की. आज वो भी आसमानी रंग की साड़ी में jawaan-adhed सभी को मात दे रही थी. सुनंदा जी का भी अलग हे सम्मोहन था और व्यक्तित्व Kaushalya-Purnima जी के समकक्ष.

"इसके साथ तोह होली जो खेल गया वो खेल गया सुनंदा लेकिन चर्चे तोह तेरे भी काम नहीं सुने मैंने. संधान तुम बाद में बानी लेकिन korde-haudi का खेल तोह थानेदार जी के साथ तेरा खुद कौशल्या ने बताया था मुझे.", पूर्णिमा जी ने एक और राज की बात खोली थी और ऋतू अपने मुँह पर हाथ रखे अपनी daadi-naani को देखने लगी जो अब थोड़ा खुल कर हंसने लगी थी.

"हाँ तोह न खेलती क्या? वही थानेदार जी 25 साल आपके साथ खेले और मेरे साथ 4 बार में हे किस्सा बन्न गया? वैसे सभी को बहोत बधाई हो हल्दी की. ये जॉन, हल्दी और मौली मेरी तरफ से आपके लिए कौशल्या जी.", अपनी दादी के साथ समय भी आयी थी और उसके हाथ से चंडी की थाली ले कर सुनंदा जी ने कौशल्या जी को बड़े आदर से सौंपी. ऋतू का तोह बड़ा दिल था ये किस्से सुन्न ने का लेकिन माहौल हल्दी का था तोह बड़े बखूबी जानते थे की कैसे बचो को अपनी बातो से दूर रखा जाए.

"ये तोह नहीं कहूँगी की इसकी जरुरत नहीं थी लेकिन सबसे जरुरी था तुम्हारा आना. अपने हाथ से हे हल्दी मिलवा दो सुनंदा, धुलवा मैं दूंगी या कहो तोह थानेदार जी को कहु?", अंत में भी कौशल्या जी ने अपनी संधान को लपेट हे लिया था जिस पर सुनंदा जी की वो शर्म से भरी मुस्कराहट बेहद प्यारी दिखी. एक खुशाल परिवार में ाची जीविका से कही ज्यादा बेहतर है सबका आपस में इतना प्यार, सम्मान और मनचाहे hansi-majaak जो परस्पर दिल को पसंद हो. उम्र एक मिथ है जो इन बुजुर्ग महिलाओ ने हमेशा हे दर्शाया था जब कभी ये एकत्र रही.

"गुड्डी, जा बेटी देख chai-paani का क्या इंतजाम है? इतने रिश्तेदार और मेहमान है लेकिन वो कामवाली भी नजर न आ रही और हलवाई वाले लड़के भी न दिख रहे.", देवकी जी ने पहली बार कुछ समझदारी की बात कही थी और आज तोह वो भी खुश दिखी. वजह थी कौशल्या जी का उन्हें देवरानी होने पर रेशम की साड़ी, गले का हार और 2 कड़े देना. कौशल्या जी ने खुद ऐसा नियम बनाया था की जब भी उनके परिवार में कोई विवाह अवसर हो तोह अपनी देवरानी को छोटी बहिन का नेग दे कर हे पहली रसम शुरू की जाए.

"जी दादी जी मैं देखती हु और लड़को को मैंने हे मन किया है इधर आने से. अलका, चल मेरे साथ.", अलका सीढ़ियों पे हिमांशु के साथ कड़ी उसको तस्वीरें लेने में लगाए थी. हिमांशु किसी भी मेहमान से ज्यादा घुलने मिलने की जगह या तोह अपने पिता या फिर आना नाना के साथ हे रहता. जबसे कैमरा हाथ लगा था, उसको अब इधर उधर घूमना भी बहाने लगा.

"यार तू काम करवाएगी अब?", अलका की लम्बाई कुछ ज्यादा हे लगती थी जब वो ऐसे चुस्त सलवार कमीज पहन लेती थी. लम्बी छोटी सीढ़ियों से उतारते वक़्त हे नागिन सी लहराती हुई उसके नितम्ब सेहला गयी. रेखा के साथ रोमिला अभी माधुरी के बाल सही कर रही थी और सलवार घुटनो से ऊपर. लेकिन अलका को इतने गौर से देख कर जाने क्या चमक आयी थी उसकी आँखों में और एक गहरी मुस्कान. प्रशंशा के साथ साथ बहोत कुछ था उसके चेहरे पर लेकिन गलत कुछ नहीं.

"काम तोह करना हे पड़ेगा मैडम. अंदर वह लेडीज के साथ साथ सभी लड़कियां है और ये वेटर लोग मुझे कही से भी ऐसे नहीं लग रहे जिन्हे गैलरी से आगे जाना देना चाहिए. कामवाली दीदी ऊपर के दोनों हिस्से साफ़ करने में लगी है तोह chai-paani हम दे तोह ठीक रहेगा.", ऋतू ने बहार आने के साथ हे अपना दुपट्टा सलीके से ले लिया था, जैसा अक्सर अफसाना या कोमल दीदी करके रखती थी.

"हाँ ये भी ठीक है लेकिन मैंने ये ड्रेस इसलिए नहीं पहनी थी.", बगीचे के पास आते आते अलका ने मुँह टेढ़ा करते हुए बचकाना चेहरा बनाया तोह दोनों हे हंसने लगी.

"कमीनी, तेरी इस ड्रेस ने जो केहर मचाया हुआ न उसका असर लड़को पे तोह छोड़ लड़कियों पे भी हो रहा है. रोमिला आंटी तोह शायद तुझे नजरो में हे खा चुकी. यही रुक, मैं पानी की ट्रे तुझे इधर हे ला कर देती हु.", प्रीती ने हँसते हुए अलका को घर से बहार आने से हे रोक दिया था. गुलाबी कमीज और सफ़ेद चिपकी हुई सलवार में अलका के शरीर का हर अंग पूर्ण कटाव के साथ दर्शित थी. सही मायने में अलका थी भी कुदरत की अनुपम जिवंत कृति.

"भैया, एक ट्रे में पानी के गिलास रख दीजिये और दूसरी में चाय के कप. हाँ जितने आये उतने रख दे, मैं खुद ले जाउंगी.", सभी को नाश्ता करवाने के बाद असगर और उसके साथी भी भोजन से फारिग हो कर बड़े पतीले में चाय बना चुके थे. बैठक की तरफ बैरे सेवा में लगे थे और अंदर के लिए उन्हें ऋतू ने स्पष्ट मन कर दिया था. बड़ी ट्रे में 15-16 गिलास एक व्यक्ति ने पानी के रख दिए थे और दूसरी में कप सजाने के साथ असगर खुद हे चाय बड़ी नजाकत से भरने लगा.

"बिटिया, आप कहे तोह हम भिजवा देते है. 2 ट्रे मुश्किल होगा लेकर जाना और मेरे पास ये 2 लड़के अभी खली हे है.", असगर ने शिष्टाचार से हे कहा था जिस पर अगली मधुर आवाज प्रीती की सुनाई दी.

"अंकल जी, 3 लोग 2 ट्रे आराम से ले कर जा सकते है. वैसे तीसरी ट्रे में नमकीन और मिठाई लगवा दीजिये.", प्रीती ठीक वैसे हे अंदाज में प्रकट हुई थी जैसा उसको ऋतू ने बनाया था इन गुजरे दिनों में. सफ़ेद सलवार कमीज और उसके ऊपर सतरंगी दुपट्टा. कलाई में दर्जनभर चूड़ियां और माथे पर छोटी सी लाल बिंदी. हमेशा खुले रहने वाले bhoore-badami बाल अब सलीके से एक रबर में बंधे थे. ऋतू उसको देख कर मुस्कुराई और उसके साथ कड़ी आकांक्षा को देख कर बड़े प्यार से अपने संग लगा लिया. आकांक्षा अपने chir-parichit अंदाज में थी, घुटने से 6 इंच निचे की लम्बाई तक की फूलो वाली फ्रॉक और naam-matra सी सज्जा के साथ. असगर ने भी इन बच्चियों को स्नेह से एक नजर देखा और फिर ध्यान दिया उस लड़के पर जिसको यहाँ सेवा में लगाया गया था.

"ओह लाला, तनिक 2 प्लेट लगाओ. एक में काजू बर्फी और दूसरे में दाल के समोसे. हाथ थोड़ा तेज और नजर काम पर.", फटाफट उसकी बात का अनुसरण हुआ और ये तीनो हे लड़कियां ट्रे उठा कर आगे बढ़ चली. अलका अब नदारद थी जो की होना हे था जब घर में इतने लोग आये हुए हो तोह. लेकिन इन तीनो के घर में जाते हे एक 'चटाक' की ाची खासी आवाज गूंजी और असगर बड़ी सख्त नजरो से उस युवक को घूर रहा था जिस से अभी अभी उसने 2 प्लेट लगवाई थी. वो युवक अपने गाल पर हाथ रखे बड़े आश्चर्य और दर्द से असगर को देख रहा था.

"देखो बीटा एक बात कान खोल कर सुन्न लो. जब घर से बहार काम के लिए निकले हो तोह भलाई इसमें हे है की दिल लगा कर अपना काम करो और aas-pas क्या है कौन है इस पर नजर नहीं. वो मालिक है जिन्होंने हमे काम दिया और हम सेवक है जो उनकी मेहरबानी से ghar-pariwar को रोटी खिला रहे है. बिटिया समझदार है जो तुम जैसे को मेहमानो की खातिर में नहीं लगवाया लेकिन तुम हो बेगैरत जो नजरो से हे namak-haraami दिखा रहे हो.", अभी तक असगर के 4-5 लोग भी काम छोड़ कर थोड़ा नजदीक आ खड़े हुए थे. युवक जैसे कुछ उद्दण्ड हे था, उम्र का वही गरम खून.

"तुम हो हलवाई उस्ताद जी और हम है होटल की तरफ से. पहली बात तोह हमने किसी का हाथ नहीं पकड़ा, दूसरा की देखने पर कोई पाबन्दी नहीं है और अब कान खोल कर सुन्न लो मेरी बात. कैंप में रहता हु और एक मिनट नहीं लगेगा तुम्हारे साथ इन चलो को ठिकाने लगाने में.", असगर उसके जोश को देख फीकी मुस्कान दिखता लड़के के कंधे पर हाथ रखते हुए बोलै. उसके साथी असगर से कुछ कहना चाहते थे लेकिन उसने उन्हें नजरो से हे मन कर दिया.

"या तोह काम कर लो बीटा या फिर बदमाशी. लेकिन जो भी करो अपने गूदे के दम पर करो. अब यहाँ से तित्तर हो जाओ इस से पहले की ब्राह्मण परिवार में मैं खाना लकड़ी की जगह तुम्हारे जिस्म को चूल्हे में लगा कर पकौ.", असगर sakht-jaan व्यक्ति था और उतना हे mridu-bhashi एक दिल का नरम इंसान भी. लड़का गुस्से में जाने के लिए पलटा हे था.

"और ये जब तुम्हारे पहचान वाले आ जाये तोह अकेले आ जाना मुझे बुलाने के लिए. इस घर के नजदीक कोई तमाशा नहीं चाहिए.", असगर ने तोह साफ़ साफ़ कह दिया था के वो जिन्हे चाहे बुला ले लेकिन मुलाकात विवाह वाले घर से कुछ दूर हे होगी.

"आ रहा हु और फिर माफ़ी न मंगवाई तोह नाम बदल देना. लेकिन तुम्हारी तबियत से तुड़ाई करने के बाद.", युवक अपना गाल सहलाता हुआ पैदल हे निकल लिया. असगर अपनी गलती के लिए ऊपर वाले से माफ़ी मांग कर मुस्कुराता हुआ काम में वापिस जुट गया. ऐसे अनिगिनत हादसे वो जीवन में देख चूका था जहा जोशीले लेकिन भटके हुए नौजवान गलतियां करने के बाद भी बदतमीजी करते थे.

घर के अंदर वही geet-ullaas का माहौल था जो अब कही बेहतर होता जा रहा था. पड़ोस वाली सरोज भाभी और मल्होत्रा जी की बेटी अब माधुरी के चेहरे पर हल्दी लेप रही थी और इस बीच हंसी मजाक भी जोरो पर था. विन्नी के साथ प्रियंका आगे आयी हल्दी लगाने तोह सरोज भाभी ने चुहल मस्ती में बाटी कही.

"बस आज माधुरी के लगा कर खुश हो लो तुम दोनों. ये हल्दी जब तुम्हे लगेगी न विन्नी तब समझ आएगा बकरी को इतना सजाया क्यों जाता है.", एक पल तोह सबको हे लगा था की ये बहोत बड़ी बात हे कह दी भाभी ने लेकिन ललिता जी ने तोह नहले पर दहला बहोत पहले हे सीख लिए था. कौशल्या जी कुछ कहती भी क्या इन बचो के बीच. बस मुस्कुरा दी.

"सरोज ने लगवाई थी हल्दी और आज बकरी से गाये बन्न गयी. सरोज, तू कहे तोह एक बार और लगवा दू तेरे हल्दी. विन्नी का देखा जाएगा जब लगेगी तब लगेगी, तेरा निखार जरुरी है.", सरोज के तोह शर्म से हाथ हे काँप गए इस निखार वाली बात पर और दबे मुँह सभी हंस रहे थे.

"ललिता भाभी, पहले ये तोह पक्का कर लो सरोज की जमीन पर हल्दी टिकेगी या तैयार करना पड़ेगा. हाँ सरोज, तू हे बता दे जरा.", मधु ने जो चुकहल की थी उस से कृष्णा जी की भी हंसी न रुकी क्योंकि ये द्विअर्थी संवाद बस यही लोग समझ सकती थी. सरोज तोह शर्माती हुई अपनी नामधारी सरोज मौसी और रेखा जी की बगल में जा बैठी.

"वह क्या लुक रही है ऋ? उस सरोज की छोरी ने भी इधर से हे हल्दी लगवाई है. बुलाओ हल्दी लगाने वाले को.", ये सब बात इतनी धीमी हो रही थी की बस आसपास के गिने चुनो को हे सुनाई दी. अब तोह रेखा जी भी शर्माने लगी थी अपनी जेठानी की बात पर. सरोज मौसी ने भी मुँह पर हाथ रख लिया था और एक नजर अपने से दूर कड़ी मंजू को देखा जो रुपाली के साथ किसी चर्चा में लगी थी.

"देखो ये आप लोगो का मजाक तोह हमारी समझ में आ नहीं रहा. ऐसी बात करो जो पता तोह चले. हल्दी, जमीन क्या है ये सब?", विन्नी की बात पर बाकी सभी ने मुस्कुरा कर एक दूसरे को देखा और ये मजाक यही रोक दिया. एक बार फिर से गीत और रिवाज जारी हुए. पुराने सलवार कमीज में बैठाई हुई माधुरी के घुटनो, बाहों, गर्दन और चेहरे पर सभी ने हल्दी लगाईं थी. संजीव के तोह ये रसम विवाह वाले हे दिन करनी थी जिसके लिए सरोज भाभी को पहले हे बताया जा चूका था.

"कोई अर्जुन को भी बुलाओ, उसकी बहिन है बड़ी.", कौशल्या जी ने जब देखा की अब रुपाली और ऋतू का क्रम आ चूका है तोह ध्यान आया के अर्जुन तोह यहाँ आया हे नहीं.

"ारु बैठक में है दादी, नाना जी और दादा जी के पास.", ऋतू ने माधुरी दीदी की पिंडलियों पर लेप लगते हुए जवाब दिए.

"जा रेनू, बुला दे जरा उसको भी.", कौशल्या जे ने अपने करीब हे कड़ी रेणुका से कहा तोह वो तुरंत हे उधर की तरफ चल दी. लेकिन कौशल्या जी के तोह जैसे मैं में कुछ और हे चल रहा था और वो मुस्कुरा रही थी.

"ओह छोरियों, पता है न उस बैलबुद्धि के साथ क्या करना है? सबके बीच आ तोह रहा है लेकिन पीला हो कर वापिस न गया तोह तुम सबकी खैर नहीं.", अर्जुन के लिए खुद दादी ने ऐसा कहा तोह सभी हैरत से उन्हें देखने लगी और जवाब ललिता जी ने दिया.

"ये भी शगुन है जिसमे लड़की के छोटे भाई को ऐसे हल्दी रंगने का मतलब है की बहिन के जीवन के साथ उसका भी एक अटूट रिश्ता बन्न जाता है जब विवाह हो रहा हो. ये भाई का हे कर्त्तव्य है की अब वो पहली बार खुद हे अपनी बड़ी बहिन को उसके ससुराल छोड़ कर आये और जब भी lana-lejana हो तोह ये जिम्मेवारी उस छोटे भाई की हे रहेगी. हाँ अगर अर्जुन इस हल्दी से अगर बच गया न तोह समझ लेना तुम सब फ़ैल हो.", ललिता जी ने इस masti-majaak के पीछे एक गहरी बात भी कह सुनाई थी. सभी लड़कियां जुट गयी उस तगड़े घोड़े पर नकेल डालने में. इधर अर्जुन मुस्कुराता हुआ आया तोह स्वागत हुआ कटीले बानो से.

"आया कपूत अपनी बहिन की रसम में..

न खोज न खबर, फिर मलंग जग भर में..

बननी देख ले ये तेरा ख़याल कैसे रखेगा..

कल ब्याह के तू ससुराल चली जायेगी..

अपनी बहिन भुला के लुगाई ले आएगा..

देरी से आया कपूत, अपनी बहिन की रसम में.."

अर्जुन तोह ये गीत सुन्न कर हे हैरान था और बाकी सभी मंद मंद मुस्कुरा रहे थे उसकी हालत पर.

"दादी, मुझे यहाँ क्यों बुलाया? आप तोह कह रही थी की यहाँ सिर्फ लेडीज हे रहेंगी.", अर्जुन इस घेरे के पहले हे रुक कर कौशल्या जी से पूछने लगा. 15-16 औरतो का झुण्ड और फिर उसके आगे ढोलक बजती हुई रूचि जो हंस भी रही थी मधु के साथ साथ. जहा माधुरी सबसे आगे और बीच में बैठी थी उसके ird-gird तैयारी के साथ बाकी सभी लड़किआं खामोश हे रही. सीढ़ियों पर बैठी Jasleen-Gurdeep भी मजा ले रहे थी इस सबका.

"अरे तोह मर्दो को मन किया था न लेकिन तू तोह घर सबसे छोटा है और हल्दी तेरे हाथ से भी लगेगी तेरी बहिन के. जा के आशीर्वाद ले माधुरी का और तेरी ताई का. फिर हल्दी लगा."

"ताई जी के भी लागू?", अर्जुन ने एक बार अपनी खिली हुई ललिता ताई को देखा और फिर अपनी दादी से जो सवाल किया तोह सभी हंसने लगे.

"ओह बैलबुद्धि. ताई तेरी behan-bhabhi नहीं है जो उसके हल्दी लगाएगा. आशीर्वाद ले उसका और फिर माधुरी के हल्दी लगनी है.", अर्जुन को जब रेणुका अंदर लेके आयी थी तभी संजीव को मामला संगीन लगा. वो जाली वाले दरवाजे के उस पार से ये सब देख रहा था. अर्जुन इन सभी को लांघ कर मुस्कुराता हुआ ताई के करीब आया और झुक कर आशीवार्द लेने हे लगा था की भैया की आवाज सुनाई दी.

"छोटे तुरंत निकल वह से.", अर्जुन को तोह कुछ समझ हे नहीं आया और उसके झुकते हे मधु बुआ ने सरसों के तेल की भरी गड़वी उसके सफ़ेद कुर्ते पर उलट दी. रुचिता ने उस तरल के ऊपर पूरी थाली सूखी हल्दी की और जबतक अर्जुन कुछ समझता दोनों बुआ ने उसके लिपाई कर दी थी उसके बाल समेत.

"ये क्या है?", अर्जुन इधर उधर देख कर भोचक्का से पूछ रहा था. लेकिन ललिता जी के दोनों हाथ से आशीर्वाद की जगह मुठी भर भर के हल्दी ने उसके चेहरे को पॉट दिया जो गर्दन से सीने तक गया. और इस से पहले की वो हिलता या निकलने की कोशिश करता 2 बुआ ने उसको बगल से घेरा और पीछे से जाने कितने हे हाथ उसको तसल्ल्ली से haldi-teil में रंगते हे चले गए.

"अभी भी बोल रहा हु वह से निकल ले अर्जुन.", हंस तोह संजीव भी रहा था उस पीले रंग के मुजससम्मे को देख कर लेकिन जैसे उसको पता था की अभी बहोत कुछ होने वाला है. सरोज भाभी ने थोड़ा नखरे से कहा.

"छोड़ो आंटी जी मेरे देवर को. ऐसे थोड़ी न करते है इतने ाचे लड़के के साथ. देखो ऐसे करते है हल्दी लड़की के भाई की.", सभी हंसती हुई दूर हुई थी और अर्जुन को भी लगा था के शायद सरोज भाभी उसको बचा रही है लेकिन उन्होंने तोह हल्दी, तेल और पानी का घोल उसके पाजामे के अंदर तक उड़ेल दिया. चेहरे से पाँव तक अब वो हल्दी तेल में सना था जिसकी लाजवाब तस्वीरें हिमांशु ने कैमरा में क़ैद कर ली थी.

"दादी... देखो अब इन सबकी क्या हालत करता हु.", अर्जुन किसी छोटे बचे की तरह गुस्सा हुआ था क्योंकि ये सब उस अकेले के साथ इतने लोगो ने क्या था, धोखे से.

"अरे.. आप तोह इतने में हे रोने लगे मुन्ना. कल को तोह तुम्हारे नाम के साथ साला जुड़ेगा, तुम्हारी लुगाई आएगी तोह वो भी साली बनेगी. तब भी गुस्सा करोगे? अब ये अकड़ दिखानी बंद कर दो देवर जी. एक बहिन के लिए भाई का ऐसा समर्पण होना चाहिए जिस से वो कभी आहात न हो. और हमने तोह सिर्फ हल्दी लगाईं है, कपडे थोड़ी उतार दिए.", सरोज भाभी ने मजे मजे में हे अर्जुन को व्यंग के साथ एक सच्चाई से परिचित करवा दिया था. उसके चेहरे पर भी चमक आ गयी कुछ सोच कर.

"सही कहा भाभी जी आपने. और दादी जी सॉरी.", अर्जुन की माफ़ी भी हँसते हुए देख कौशल्या जी को आभास हो गया था के ये जरूर कुछ ऐसा करने वाला है जिसकी किसी को खबर नहीं. और अर्जुन ने अपने चेहरे, गर्दन पर लगी हल्दी ाचे से उतार कर सरोज भाभी के चेहरा पर पॉट दी. अभी मधु बुआ कुछ समझती उस से पहले हे उनके भी गाल सरसों के तेल और हल्दी से पीले हो चुके थे. ऐसा हे अर्जुन ने पीछे हैट रही रुचिता के साथ किया और फिर तुरंत फुर्ती से माधुरी के पीछे जा खड़ा हुआ.

"बहनो के साथ हल्दी नहीं खेल सकता लेकिन जिन्होंने फंसाया उन्हें तोह सबक सीखा हे सख्त हु.", पूर्णिमा जी भी उसकी हरकत देख गदगद हो गयी. अब भी सभी लोग हंस रहे थे लेकिन इस बार शकल उतरी थी अर्जुन की जगह उन तीनो की.

"माँ, यु छोरा मेरे हाथ चढ़ गया तोह रेल बना दूंगी मैं इसकी. अर्जुन बीटा दत्त जा तू, मैं बताऊ देख तन्ने.", रुचिता को इस मस्ती में झूठा गुस्सा करते देख अर्जुन ने रसम वाली थाली उठा ली जिसमे ढेर सारा लेप बचा हुआ था.

"बुआ, तन्ने मैंने छोडो और जो अगर आप पास भी आयी न तोह आपके कपड़ो के साथ साथ बाल भी पीले कर दूंगा. डॉक्टर दादी जी, फिर आप मैट कहना मुझे कुछ.", अर्जुन ने यशोदा जी को चेताया जो हंस रही थी इनका हुड़दंग देख कर.

"माँ ने के पूछे है? तू हाथ तोह चढ़ फेर देख या थाली कड़े कड़े रगडूंगी.", रुचिता भी आगे बढ़ने में हिचक रही थी लेकिन अर्जुन को सिर्फ उस पर नजर रखने की तगड़ी कीमत चुकानी पड़ी. मरीना कब फर्श पे घुटनो के बल बैठती हुई ठीक अर्जुन के करीब आ गयी उसको पता न लगा लेकिन बाकी सभी मुँह पर हाथ रखे अर्जुन के साथ होने वाली घटना का सोच हे हंस रहे थे.

"बुइ.. थिस इस नॉट राइट.. युक...", मरीना ने थाली को अपने ऊपर हे खींच लिया था जिस से सारा घोल उसके चेरे से होता हुआ सलवार कमीज तक को भिगो गया.

"हाहाहा.. ये जयचंद वाले काम करोगी मरीना तोह ऐसा हे होगा.", अर्जुन के ऐसा कहते हे रुचिता बुआ भी गाला फाड़ के हंसने लगी. सभी का वैसा हे हाल था और मरीना पाँव पटकती हुई अपनी बुआ की तरफ बढ़ी तोह उन्होंने भी उसको रोक दिया.

"न न मेरी लाडो. पहले न तू कपडे बदल ले जे मेरे गले लग के रोना है तोह. ांनी भाभी, देख ले इसके खातिर भी ेब कोई जाट या रुस्सियन. हल्दी ले गयी या तोह अर्जुन से.", माहौल जितना खुशनुमा अभी हुआ था इसकी उम्मीद तोह खुद कौशल्या जी को भी नहीं थी. यहाँ कोई किसी से नाराज होने वाला था हे नहीं. हंसी ख़ुशी से भरे इस पल में फिर अर्जुन ने भी उतने हे प्रेम से अपनी बड़ी बहिन के चरणों और चेहरे पर थोड़ी हल्दी लगा कर इस रसम को पूरा किया. कुछ और गीति गाये गए थे जिनके बाद माधुरी नहाने गयी और अर्जुन भी ऊपर वाले अपनी तरफ के बाथरूम में चल दिया. आँगन की सफाई में तुरंत काम वाली बाई लगा दी गयी थी और बहार अब दोपहर के खाने का समय होने हे लगा था.

"देख ये सही मौका है तेरे पास. जा और कर ले प्यार ारु के साथ. वैसे भी उसको जरुरत है और तुझे भी.", ऋतू ने बड़े हे धीमे स्वर में अलका से कहा था. लड़कियां अपने हिस्से की तरफ या फिर बहार वाले आँगन में भोजन के लिए जाने लगी थी. ये दोनों हे इधर आँगन में एक तरफ कड़ी थी.

"पागल है क्या यार तू? गलती से कोई भी उधर आ गया न तोह. ऊपर से संजीव भैया भी घर पे मौजूद है.", अलका का दिल तोह ऋतू की बात सुन्न कर हे खुशो हो गया था लेकिन डर अपनी जगह सही था.

"चिंता क्यों करती है? भैया अभी एक घंटे से पहले तोह फ्री नहीं होने वाले क्योंकि लकी भैया आये हुए है और ये सभी अब लंच करेंगी और उसके बाद कपडे बदल कर आराम. अर्जुन ने हे कहा था मुझे की वो तुझे उस से मिलने के लिए भेजे. बाकी इस तरफ से कुण्डी लगा लियो अंदर से. मैं तेरे साथ हे लंच करुँगी."

"दिल तोह तेरा भी है. फिर मैं क्यों?", अलका के प्रश्न पर ऋतू ने अपने माथे पर हाथ रख लिए.

"तू जा न यार. वो मैं आज रात उसके हे पास रहने वाली हु लेकिन तू अभी जा.", अलका इतना सुन्न कर हिरणी की तरह कुलांचे भर्ती हुई सीधा उधर दौड़ गयी जिधर अर्जुन गया था. टेबल के पास कड़ी प्रीती ने बोहेन उचका कर ऋतू को इशारा दिया तोह ऋतू ने शर्म से नजरे झुका ली और उसकी हे तरफ चल दी.

"आपका भी पता नहीं चलता कुछ. वैसे सही किया जो अलका दीदी को कहा.", प्रीती की बात पर ऋतू ने सवालिया नजरो से देखा जैसे पूछ रही हो की इसका क्या मतलब हुआ.

"वो मेरी मामी फुल लट्टू है ारु पे और देख लेना मेरी माँ उन्हें अर्जुन के साथ शाम को मार्किट भेजने वाली है.", प्रीती की बात सुन्न कर ऋतू को चिंता होने लगी थी.

"ये रोमिला आंटी का भी दिमाग हिल गया है यार. मुझे तोह समझ भी नहीं आ रहा के वो ऐसा कर हे क्यों रही है."

"क्यों का तोह मुझे भी नहीं पता लेकिन आप कैसे भी करके अर्जुन को बिजी कर दो. अर्जुन ने एक बार कहा था के अलीशा मामी बहोत सुन्दर लगी उसको. और वो एक मातुरे लेडी है तोह अर्जुन का क्या हो सकता है आप समझ सकती हो.", ऋतू ने हामी भरी जैसे वो समझ रही हो.

"तुमने ऐसा क्यों कहा की अलका को भेज कर सही किया?"

"उन्हें मेरी माँ बड़ा नोटिस कर रही थी. देख लेना वो जरूर पूछने वाली है अलका के बारे में और जहा तक मेरा दिमाग कहता है वो उनकी पेंटिंग बनाने वाली है. मतलब पता नहीं उनकी ये क्या फंतासी है?", प्रीती की पूरी बात समझ आ गयी थी ऋतू को.

"ठरकी है रोमिला आंटी, सीधा बोल न. मुझे भी पता है लेकिन विन्नी दीदी की तोह उन्होंने राजकुमारी वाली पेंटिंग बनाई थी."

"हाँ तोह वो खुश करने के लिए बना दी होगी या फिर प्रोजेक्ट होगा. लेकिन आप अगर अभी मेरे साथ चलो तोह मैं दिखती हु उनके वो कैनवास जो हमारे कभी हाथ हे नहीं लगे थे. मरीना की माँ तक की नुदे पेंटिंग है उनके पास.", ऋतू अलग हे तरह मुस्कुराई ये सुन्न कर और प्रीती के गाल लाल हो गए थे.

"तू भी न काम नहीं है कुछ. चल अभी तोह हमको यही रुकना पड़ेगा और अगर तू चाहे तोह लंच कर ले इतने. आकांक्षा और अफसाना तेरा इन्तजार कर रही होंगी. मैं जरा चौकीदारी कर लू उन दोनों की.", ऋतू की बात सुन्न कर प्रीती भी हंसने लगी. उसको भी यही ठीक लगा की आकांक्षा और अफसाना को व्यस्त हे रखा जाए. उधर ऊपर वाले बाथरूम में दरवाजा हलके से बजने पर अर्जुन ने एहतियात से खुद को ढकते हुए दरवाजा खोला तोह आँखें चुंधियाँ गयी. अलका पूर्णतया निर्वस्त्र ऐसे कड़ी थी जैसे शेरनी शिकार से पहले जंगली सांड को निहार रही हो.

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"होनी को कौन ताल सकता है कुमार? ऊपर से कुमारी अनामिका में जीने की आस हे नहीं थी. तुमने कितनी सेवा की चाहे रो रिश्ता रखने लायक थी या नहीं लेकिन एक भाई का सही फ़र्ज़ तुमने फिर भी निभाया.", महल के इस बड़े से आँगन में हुक्के सजे थे और हर तरफ दीवान, मुद्दे पर 8-9 करीबी लोग बैठे थे और सारंग इस व्यक्ति की बात सुन्न कर कुछ खामोश हे रहा. ये 70 बरस के आसपास का हलकी तोंद वाला व्यक्ति था सारंग का बड़ा जीजा रमाकांत सिंह, तहसीलदार. सफ़ेद कुर्ते और धोती में वो अकेला उस दीवान पर बैठा शिद्दत से हुक्का गुदगुदाते हुए अपने विचार रखने लगा.

"जीजा जी, हमने जो किया वो कभी एक भाई नहीं कर सकता और आप ये सबसे बेहतर जानते है. तब जोश कही और था और परवाह तोह आज तक हम किसी की नहीं करते लेकिन गलतियां अनगिनत हुई उस वक़्त.", सारंग हुक्के की जगह सिग्गट के काश लगा रहा था. एक मेहरी सभी के सामने चाय रखने के बाद अंदर चली गयी. बाकी जो भी व्यक्ति यहाँ बैठे थे वो या तोह रमाकांत की तरफ से उनके मित्र थे या सारंग के. वो सभी इनसे कुछ दुरी पर अपनी हे चर्चा में लगे थे, अलग हुक्के के साथ.

"ऐसा तोह नहीं कुमार की उम्र के इस पड़ाव पर आने के बाद तुम पछतावा कर रहे हो? जो नियम तोड़ेगा वो बहार या सजा का हक़दार होगा. हम तोह यहाँ इसलिए आये है की तुम्हे शौक है और वो घराने में जन्मी थी जहा के हम दामाद है. हमारी तरफ कुछ ऐसा हो तोह नौबत इतनी नहीं आती. मौके पर हे फैंसला और सजा. चलो जो हुआ सो हुआ, अब आगे क्या करना है इस पर विचार करो.", रमाकांत की बात गलत थी और सारंग रिश्ते की कदर करता था जैसा जीवन भर करते आया था. लेकिन ये शौक का समाया था जहा ऐसी बातें रमाकांत को करनी नहीं चाहिए थी.

"नियामत तोह अतीत में भी ढेरो टूटे है जीजा जी और आप भी तोह उनकी जड़ में आये थे. क्या फैंसला हुआ और किसको सजा मिली?", सारंग ने ये बात बड़े हे नरम लहजे में कही थी लेकिन रामकांत कुछ पल खामोश हो गया. फिर एक गहरी सांस भरते हुए उसने झूठी हंसी से कहा.

"रघुबीर ने भुगति तोह थी वो भयानक सजा. 2-2 बार भुगति और मान लेते है की इसमें हमने नीलिमा को खोया लेकिन वो हमारे हाथ लग जाती तोह ज़िंदा उसको भी दफना देते.", रामकांत के ऐसे तेवर अगर कोई बहार व्यक्ति देख लेता तोह सेहम जाता. एक बाप अपनी खुद की बेटी को मारने की बात सोच भी कैसे सकता था.

"रघुबीर सिंह को हम भी नहीं गिरा पाए थे जीजा और वो सजा तोह कही से भी सजा नहीं लगती जिसमे एक युवक अनगिनत लाशें गिरा दे. वो युवक असाधारण था, हमारा गिरेबान पकड़ने वाले किसी शक्श के लिए ये खुद हम कह रहे है की वो अर्जुन सिंह सचमुच असाधारण था जीजा जी. जिस बेटी को आप दफ़नाने की बात कर रहे है, उसकी हे वजह से शायद हम और आप जीवित है. उस योद्धा ने बलिदान दिया था, बलिदान. हम आज भी रघुबीर सिंह के परिवार को नेस्तोनाबूद करना चाहते है और पंडित रामेश्वर जी के भी परिवार के हर वारिस को मिटाना चाहते है लेकिन इसका खेद रहेगा की हमे मात देने वाले से हमारी कभी दूसरी मुलाकात न हो सकीय.", सारंग की बात पर रामकांत पलभर के लिए झेंपा लेकिन फिर कुटिलता से मुस्कुरा दिया

"शेर का शिकार कैसे भी हो कुमार, शिकार तोह हुआ हे. उसके बाद बस मलाल रहा तोह वो रघुबीर सिंह का रहा. उसका गरूर तोड़ने में नाकामयाब हुए तोह वजह बस तुम्हारा पीछे हटना था. नीलिमा को हम खयालो से निकाल चुके है और अर्जुन सिंह के जाने से रघुबीर असहाये था जिसके घुटने टिकवाने की चाहत पूरी न हुई.", रमाकांत ने चाय का कप उठाने से पहले वही रखे जग से पानी जातक कर कुल्ला करके अंगोछे से मुँह साफ़ किया और चाय सुड़कने लगा.

"वो समय हमे भी याद है जीजा जी और पंजाब के राजघराने की खटपट, पंडित रामेश्वर जी की दखल से हम उतने मजबूत नहीं थे. वह टकराव हो जाता तोह शायद वो दोनों दुनिया से रुखसत हो सकते थे लेकिन वजूद हमारा भी न रहता. नील उतना योग्य नहीं था और पुष्पक स्कूल का विद्यार्थी था. और कही मुठभेड़ में वो बच जाते तोह शायद हम हे raaj-gharane में पूरी तरह दोषी साबित हो जाते. अब हम सक्षम है लेकिन रघुबीर सिंह नहीं है.", सारंग को मलाल था लेकिन ये पूरी तरह सत्य भी नहीं था के वो उतना सक्षम है या नहीं.

"रामेश्वर तोह है लेकिन तुम्हे अब व्यापार और रसूख ने बाँध कर लाचार कर दिया है."

"हमारी पहल से पुष्पक खिलाफ हो जाएगा जीजा जी. उसने ये स्पष्ट कहा था की जो सीमा लंगेघा वो दूसरे की तरफ चला जाएगा. इंद्रनील ने दहशत फैलाई है, राज अब उसको जारी रख सकता है लेकिन संगठन और बाहुबल में ये दोनों हे पुष्पक के सामान नहीं है. हम बस प्रतीक्षा कर रहे है की बस एक बार उनकी तरफ से पहल हो जाए और मेरा ये शेर फिर हमारी तरफ से लड़ेगा."

"एक राजा हो कर तुम साधारण परिवार से टकराने में हिचक रहे हो कुमार. ऐसा क्या है उस रामेश्वर के पास? रिटायर्ड पोलिसवाले जिसके पिता तुम्हारे हे पिता के मुंशी थे. या फिर रघुबीर सिंह का वो बीटा जो जैसे तैसे परिवार बचा रहा है अपना?"

"आप जानते है हम आज इस घराने के वारिस क्यों है? बात साधारण की है तोह देख रहे है की हम उन्हें आज भी 'जी' लगाए बिना सम्बोधित नहीं करते.?", सारंग हल्का सा तैश में आ चूका था जिस पर रमाकांत गौर करने लगा.

"क्या वजह है? यही की वो कभी तुम्हारे साथ बड़े भाई की तरह रहा है या साथ शिकार किया, खेले कूड़े. कृष्णेश्वर तोह आज भी तुम्हारे हे करीब है जिसके पास मुंशी की वो साड़ी संपत्ति है.", सारंग ने इतना सुन्न कर एक बार गहरी सांस भरी.

"उस घराने में असली वारिस है पंडित रामेश्वर शर्मा जी. महारानी प्रभा देवी, उनकी बहु के साथ साथ कुमारी लक्षिका की हत्या के अपराध से हमे विमुक्त करने की सजा थी हम ख़ामोशी से वो घरना छोड़ कर निकल जाए.", ये सच जैसे कभी किसी को मालूम हे न था और रमाकांत की आँखें हे फ़ैल गयी.

"वो राजा है?"

"नहीं, उन्होंने खुद को संरक्षाक मान लिया लेकिन राजमाता के अधिकार से वो कभी भी मालिक बन्न सकते है. कृष्णेश्वर भी सिर्फ उस जमीन का मालिक है जो मुंशी जी को मिली थी और दोनों भाई के बीच बराबर बाँट दी गयी थी.", सारंग अतीत की ये बात कह कर खामोश सा हो गया. कुछ पल रमाकांत भी सोचता रहा की ये रामेश्वर शर्मा कैसा इंसान है.

"फिर भी मालिक तोह नहीं बनाया जा सकता ऐसे किसी को?"

"कुमारी लक्षिका विवाहित थी उनसे जिसका तकाजा हमे नहीं था. वो जब 13 बरस की थी तभी उनके लिए पंडित रामेश्वर जी को रोक लिया गया था. फ़ौज से इसलिए हे वापिस बुलवाया गया था की एक बार उनका विवाह सार्वजनिक किया जाए और शाही तरीके से धूम धाम से पंडित रामेश्वर जी को भावी राजा घोषित किया जा सके. हम नासमझ थे उस समय और जोश में वो सब कर गए जो कभी भी नहीं होना चाहिए था. बस आजतक ये नहीं पता चला की वो ऐसे ख़ामोशी से कैसे विवाहित थे.", सारंग के चेहरे पर दुःख के भाव आये और पल में हे गायब भी हो गए.

"तहकीकात करवाओ फिर तोह कुमार. वैसे यही वजह थी जिस से तुम रामेश्वर से नफरत करते हो?"

"हाहाहा.. इस सबका तोह कभी जीकर भी नहीं हमारे बीच. मुझे बड़ी ख़ुशी होने लगी थी ये सोच सोच कर की जब उन्हें पता लगेगा की उनकी बीवी का कातिल मैं हु तोह वो बदला लेने आएंगे और फिर मैं उन्हें दिखाऊंगा की उन्होंने कितनी बड़ी गलती की थी कुमार सारंग पर हाथ उठा कर."

"ये जीकर तोह तुमने आजतक हमसे नहीं किया?", यहाँ ये दोनों भूल गए थे की एक शौक सभा चल रही है जिसमे खुद सारंग की हे बहिन का संस्कार कुछ समय पहले हुआ है. लेकिन आज जैसे सारंग अपने दर्द को बहार निकलने की ठान चूका था.

"रघुबीर सिंह को जब अपमानित किया था न जीजा जी तबतक मामला सही था. अगले दिन पंडित रामेश्वर जी ने वो किया था जिसका दर्द हमारे दिल में नासूर बन्न कर हर पल उभरता है. उनके वो शब्द की राजा रामेश्वर तुम्हे हुकुम देता है की अगर आइंदा उनकी रियासत में मैंने कदम भी रखा तोह कुत्ते का पत्ता मेरे गले में होगा और उनकी जूती मेरे सर पे. किसी ने भी कुमार सारंग के चेहरे को बिंजा इजाजत छुआ तक नहीं लेकिन पंडित... रेश्वर ने हमारे चेहरे को लहूलुहान कर दिया था.. जीजा वो तोहमत और जलालत आजतक हमारे दिल में किसी फांस की तरह चुबती है. एक कुमार को गिरेबान से घसीट कर उसने मुझे सरहद के इस पार भेज दिया. हम 100 हत्या करे या 1000 लेकिन उनकी सजा भी इतनी बड़ी नहीं जितनी रामेश्वर ने मुझे दी.", सारङग के नथुने फूल चुके थे और कनपटी से पसीना रिस्ता हुआ उसका उग्र गुस्सा साफ़ बयां कर रहा था. इस गर्जना को सुन्न कर एक बार तोह वह बैठे वो लोग भी सेहम गए जिन्हे पहले इनकी बात सुनाई तक न दे रही थी. कुमारी लतिका भी इस तरफ के दरवाजे आ कड़ी हुई तोह एकाएक सारंग बर्फ सा ठंडा पड़ गया.

"आप यहाँ से जाए कुमारी लतिका.", सारंग शांत हो गया था और बेटी भी कुछ कहे बिना वापिस चली गयी.

"हमे माफ़ करना हमारे व्यवहार के लिए जीजा. अब तोह आप जान गए होंगे की पंडित रामेश्वर जी कौन है? हाँ उन्होंने कुछ समय पहले राजपरिवार का वो ghosna-patra बदलवा कर सबकुछ उन्हें हे सौंप दिया सिवाए कुछ जमीनों के. लेकिन फिर भी वो साधारण नहीं है. उनके तीन में से 2 बेटे तोह उस वक़्त भी सनकी हत्यारे थे और आज बड़े ओहदे पे होने के बाद भी उनकी मारकाट जारी है. वह हमारी दखल नहीं और इधर उनकी दखल नहीं. जब नियम टूटेगा तोह परहाह भी करेंगे. चलिए भोजन का समय हो गया है, हाथ मुँह धुलवा देते है.", सारंग अतीत को याद करने के बाद अंदर से असहज हो चूका था और रमाकांत हैरान था की कोई इतना बड़ा raaj-paat कैसे त्याग सकता है. क्यों रामेश्वर शर्मा ने सबकुछ जान ने पर भी सारंग से बदला न लिया? इन्ही विचारो के साथ ये लोग दूसरी तरफ चल दिए जहा भोजन व्यवस्था थी.

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उस गुलाबी कमनीय काया को गॉड में लिए अर्जुन हॉल कमरे के हे बड़े बिस्टेर तक चला आया. नहाने के समय halki-fulky प्यार भरी मस्ती ने ऐसा असर दिखाया था की अलका के कंधारी अनार से बड़े और सख्त चुचो के गुलाबी निप्पल कड़क हो कर सुई से तन्न चुके थे. एक अलौकिक सा असाधारण खूबसूरत जिस्म जिस से स्वयं कामदेवी भी ईर्ष्या करे, उतने हे बेजोड़ और purn-kataav लिए मांसल जिस्म के मालिक की गॉड में था.

"तुम्हे मेरी याद भी आती है? याद है इस कमरे में हे तुम कैसे मुझे स्मूच करते थे जब भी मौका मिलता था? हर ड्रेस की तारीफ करते थे और बर्थडे पे भी सबसे पहले अपने पास आने की ज़िद्द की थी..", अलका को बड़े हे प्यार से उस नरम बिस्टेर पर लिटा कर अर्जुन भी बगल में लेता उसके जिस्म की वो कस्तूरी से ज्यादा मादक गंध साँसों में समेटने लगा. गोल सुडोल स्टैनो से निचे 3-3 पसलिया भरपूर नुमाया थी अलका की. पेट कुछ अंदर की तरफ और उतनी हे रेशमी गुलाबी त्वचा. लम्बी सुडोल टांगो के बीच हलके हलके रोये बता रहे थे के अब वो उतना ध्यान नहीं रख रही जितना अर्जुन के लिए पहले रखती थी.

"मैं वो पल नहीं आने देना चाहता जब तुम्हे लगे की मेरा दिल भर गया है. दिल कभी नहीं भरता अलका बस ऐसे लगातार मिलान से कुछ समय की विरक्ति दोनों में हो सकती है. अब जो पहले गर्लफ्रेंड थी वो कुछ ज्यादा हो चुकी है. मेरी तारीफ करना तुम्हे हे भारी पड़ेगा.", अर्जुन ने एक उभार को सहलाने के साथ साथ लम्बी सुराही सी गर्दन से बाल हटते हुए अपने होंठ टिका दिए. इस स्पर्श मात्रा से अलका की एक सुदल टांग अर्जुन के ऊपर आ गयी. सिसकारी लेती हुई वो पूरी तरह तैयार थी लेकिन अर्जुन जैसे अभी सतना चाहता था उसको. थोड़े अतिरिक्त दबाव से एक उभर को दबाते हुए वो गुलाबी चूचक उमेठा तोह अलका धनुषाकार सी बिस्टेर से कमर उठाने लगी. जांघ के जोड़ो के बीच 3 इंच की सुर्ख लकीर और पहले हुए लैब लालायित थे एक गहरे मिलान के लिए.

"आह्ह्ह्हह.. थोड़ा आराम से दबाओ इन्हे.. उम्मम्मम", उत्तेजित हो कर वो खुद हे अर्जुन को अपने ऊपर लाने लगी जो मुश्किल काम था. बाथरूम में पहले हे अर्जुन ने उसके दोनों उभार चूस चूस कर सख्त कर दिए थे और अब जैसे वो उनकी सख्ती कुछ नरम करने में लगा था. दिल में अलग सा डर भी था की इस घर में ढेरो लोग है और इस बीच वो अमर्यादित kaam-krida में लिप्त.

"ऋतू से मैंने खुद हे कहा था के वो तुम्हे मेरे पास आने को कहे. अभी भी लगता है मैं तुम्हारी अनदेखी कर रहा हु?", अर्जुन थोड़ा उचक कर अलका के चेहरे पर आया तोह वो मस्ती में गर्दन ना में हिलती हुई उसके सर को झुका कर तन्मयता से होंठो को पीने लगी. अलका चुम्बन में अब जैसे अर्जुन से आगे हो चली थी जो खुद अर्जुन ने मेहसुस किया जब उसकी जिव्हा की जड़ तक अपने होंठो में भर कर अलका ने सम्पूर्ण मुखरास निचोड़ लिया. किसी कुल्फी की तरफ वो पूरी जीभ को एक सिरे से जोड़ तक अपने दांतो में दबा कर पीने के साथ निचले हाथ से अर्जुन के vajra-ling को कास के दबती हुई तैयार करने लगी.

"उम्मम्मम्म.. ज्यादा टाइम नहीं है.. और तुम जल्दी जल्दी फ्री भी नहीं hote...aahh..", अलका के कथन पर अर्जुन झेंपता हुआ सा उसकी टांगो के बीच आ बैठा. दोनों टाँगे घुटने मोड अलका ने पाँव बिस्टेर पर टिकाये थे. अब तोह उसको अर्जुन से रत्तीभर शर्म न थी क्योंकि दिल से वही उसका सर्वोसर्वा था. अर्जुन को भी उतना हे प्रेम था बस खुद को रोके रखना कोई मज़बूरी. इस पल में वो आँखें मूंदे अलका की चिकनी जांघो को ऐसे सहलाने लगा जैसे वो इनका स्पर्श अपने साथ मफूज रखना चाहता हो. महीनो की कसरत और भरपूर देखभाल ने हे अलका को इस हुस्न की मालकिन बनाया था.

"टाइम वास्ते कर रहे हो तुम.", अलका को मजा आ रहा था लेकिन अर्जुन ने आग इतनी भड़का दी थी की उसने अपनी एक ऊँगली से खुद हे योनि पटल सेहला दिया.

"हाथ हटाओ तो सही.", अर्जुन का चेहरा अपनी जांघो के बीच झुकते देख अलका ने नजरे घुमा ली. उसके मुख से जल्द हे ये मादक सिसकारी निकली और अर्जुन ने मजबूती से दोनों टाँगे फैला कर उठाते हुए उस रसभरे kaam-kund को होंठो में भर लिया. अलका की योनि का बाहरी रंग भी जिस्म से एकसार था और ये समानता जैसे प्रीती के सिवा अर्जुन की बहनो में हे थी. योनि शांत होने की जगह कही ज्यादा जलने लगी अर्जुन की जिव्हा और होंठो की चुसाई से. अलका का चेहरा लाल हो कर पसीने से गीला होने लगा था और अर्जुन का लिंग भी अकड़ता हु ऐंठने लगा.

"तैयार हो न?", अर्जुन के हटने के बाद भी अलका को ऐसा लग रहा था के वो अभी तक उसकी छूट पे होंठ लगाए है. आवाज सुन्न कर जैसे तन्द्रा भाग हुई और लम्बी सांसें लेती हुई वो अर्जुन को एक कशिश से देख रही थी जैसे धन्यवाद कर रही हो.

"पता है फिर भी पूछ रहे हो?"

"आउच... stupid..aahhh..", अर्जुन तोह पहले हे सूपड़ा योनि पर टिका चूका था. अलका के जवाब देते हे वो उसके ऊपर झुकता चला गया. रेशम सी मुलायम और भीगी छूती की दीवारों ने ये तगड़ा लुंड पहले भी झेला था पर इसकी अभ्यस्त जरा भी न हुई थी. मांसपेशिया बुरी तरह फैलती चली गयी और एक पल तोह ऐसा आया जब अलका ने दर्द से खुद हे अर्जुन की छाती पर अपना हाथ रखते हुए रुकने को कहा. अभी भी एक तिहाई लुंड बहार था.

"माँ... आराम से नहीं कर सकते.. उफ़.. कमीनी ऋतू.. इसलिए ाःह... मुझे पहले करने को कहा..?", अर्जुन ने बिना मुस्कुराये बड़े हे प्यार से अलका का चेहरा सहलाते हुए कहा.

"झटका तोह मारा हे नहीं क्योंकि ज्यादा दर्द होता. तभी तोह मैंने पहले वो तैयार की थी जिसके लिए तुम मन भी करती रही. ऋतू को भी ऐसे हे दर्द होता है शुरू में. अभी ठीक हो जाएगा, उमाहहह..", अर्जुन ने छाती से हाथ हटने के बाद अलका के होंठो को कस के चूमते हुए अगले धक्के में उसकी बच्चेदानी तक की सुरंग माप दी. वो चटपटा रही थी लेकिन अर्जुन के होंठो ने वो शोर जज्ब कर लिया. कुछ देर पहले जो योनि लकीर सी थी अब वो बुरी तरह फैला हुआ एक रबर सा प्रतीत हो रही जिसने उस अत्यधिक मॉटे लिंग को कस कर जकड़ा हुआ था. अलका के दोनों उभर मसलते हुए अर्जुन ने कुछ हे समय में उसको शांत कर दिया.

"उफ़.. सचमुच घोड़े हो.. जाने क्या सोच कर तुमसे प्यार कर बैठी मैं? अब शुरू में धक्के तेज लगाए तोह गर्दन नोच लुंगी, कह देती hu.",Alka को अपने पेट तक वो मूसल ाचे से पता चल रहा था. अर्जुन भी उसकी बात मान कर बड़े आराम से थोड़ा हे लिंग बहार निकल कर अंदर करने लगा. योनि जल्द हे अभ्यस्त हुई और दोनों एक दूसरे को बेतहाशा चूमते हुए बराबर कमर हिलने लगे. उस चौड़े सीने के निचे अपने उभारो के दबने का यही आनंद अलका ने जाने कबसे महसूस न किया था. अर्जुन जब भी उसके साथ मिलान करता था, कोई हिस्सा अधूरा नहीं छोड़ा था. अलका का दूसरा सखलन जोरदार था और इस पल में अर्जुन के कूल्हों पर उसके नाखुनो ने भरपर वॉर किया.

"आह्हः.. क्या करती हो yaar..Waha तोह नहीं मारो..", अर्जुन ने झटके से लुंड बहार खिंचा तोह दर्द अलका को भी हुआ.

"ये तोह छोटा सा नेल लगा है तुम्हारे. जब तुम इतना बड़ा ये डंडा अंदर डालते हो tab..uff.. आज जाओ अब अपने फवौरीते स्टाइल पे, नखरे छोड़ कर.", ये उचित प्रेमिका थी जो अर्जुन पर हुकुम चलने के साथ साथ उसका ख़याल भी रख रही थी. अलका के गोलाकार कूल्हे भी उसको विशेष्ता थे. पानी से भरे गुब्बारों से लचीले और पूर्णतया गोल. दोनों तरह चुम्बन करने के बाद अर्जुन ने एक झटके में हे घोड़ी बानी अलका की नीव हिला दी.

"आअह्ह्ह्ह.. मा.. जालिम्पॉङ बंद करो.. उफ़.. ये बूब्ड जोर से दबाये न तोह देख लेना..", अलका अभी तैयार भी न थी और अर्जुन ने सरपट धक्के जड़ने शुरू कर दिए. इस मुद्रा में भी अलका के मॉटे उभरा जरा भी झूले न थे जिन्हे पकड़ कर अर्जुन पूरी मस्ती में अलका की कासी हुई छूट को निरंतर रौंदने लगा.

"आअह्ह्ह तुमने कहा था के मैं.. आह.. जल्दी आउट नहीं होता.. उम्.. और किसको करते देखा तुमने.. ? आह्ह्ह्ह..", अर्जुन की इस बात पर दर्द और मस्ती से भरी अलका भी मुस्कुराने लगी.

"उम्.. इतना.. मरे क्यों जा रहे हो? आअह्ह्ह.. फाड़ना बंद करो न.. "

"वैसे हे पूछ रहा हु.. उम्म्म.. और कल से एक्ससिटेड हु मैं तोह रुकने का दिल नहीं कर रहा..", पहले हे मरीना ने हालत खराब कर दी थी और अब समय भी काम था. अर्जुन पीछे से उस चिकनी पीठ पर झुका अलका के गाल चूमते हुए गहरे धक्के लगा रहा था. Patt-patt की बहार आवाज के साथ योनिरस की वजह से fach-fach की हलकी ध्वनि भी साफ़ गूँज रही थी. अलका के लम्बे बाल दूसरी तरफ से बिस्टेर पर गिरे झूल रहे थे और दोनों के जिस्म पसीने में तरोबर.

"उम्.. देखि नहीं.. आह्हः.. सुना था मैंने वो भी 3-4 से.. सबके जवाब 10 मिनट थे ज्यादा से ज्यादा.. उफ़.. और सभी ने अपने bhai-bhabhi या रिश्तेदार को हे छुप कर देखा था सेक्स करते हुए... उम्म्म.. जो मैंने फिल्म देखि थी.. आह्हः. बस उसमे हे 20 मिनट का सेक्स सन था.. उफ़.. वैसे एक बात बताओ..", अलका ने अपने अगले सखलन को झेलने के साथ हे अर्जुन के लुंड पर कसाव बढ़ा दिया था. अर्जुन भी गर्मी से भरा नजदीक हे था लेकिन अभी वो अलका के साथ कुछ और पल रुकना चाहता था.

"आठ.. हाँ पूछो..", अर्जुन ने थोड़ा और जोर से अलका के अनार दबाये तोह उसकी हलकी से चीख निकल गयी.

"मरवाओगे तुम.. आठ.. मेरी आवाज इस कमरे से जा सकती है bahar..aahh.. मैं पूछ रही थी की तुमने विन्नी दीदी को मन क्यों किया?", अलका के इतने स्पष्ट सवाल पर अर्जुन जहा का तहा रुक गया. उसको ये उम्मीद न थी की विन्नी दीदी वाली बात अलका उस से पूछ लेगी.

"बस उनके साथ दिल नहीं था ऐसा करने का."

"तुम एक तोह लगे रहो और दूसरी बात झूठ तोह बोलो हे मैट.. मैं मन थोड़ी कर रही हु बस इतना कह रही हु की कल तुम्हारे पास सही टाइम है.. आह्हः.. ऐसे हे बस.. होने वाली हु मैं..", अलका की आँखें बंद होने लगी थी अब और ऊपर से अर्जुन का वजन धोना अलग म्हणत.

"कल ऐसा क्या है?", अर्जुन भी हांफने लगा था जैसे नजदीक हो.

"उम्माह.. बहार निकाल लेना होने से pehle..aahhhhh.. कल सभी लड़कियों के लिए पार्लर वाली आएँगी तोह तुम निकल सकते हो. उफ़.. ", अलका जैसे हे झड़ने के बाद औंधे मुँह गिरी अर्जुन ने भी अपना बहार निकाल कर हाथ से हिलाते हुए उसकी पीठ पर हे सारा सफ़ेद लावा उड़ेल दिया. थक्क कर वो अलका की बगल में हे बिस्टेर पर लेता गहरी सांसें ले रहा था.

"ले कर कहा जाऊंगा.. आह्ह्ह्ह..", अलका कुछ शांत थी और अर्जुन का सवाल सुन्न कर कड़ी होती हुई बाथरूम की और चल दी.

"मंजू के घर.. और अब जल्दी से खुद को भी साफ़ कर लो.", अलका की बात पर अर्जुन भी धीमे कदमो से बाथरूम में चला आया. अलका बड़े गौर से अपनी योनि को देख रही थी. चलते वक़्त हल्का सा हे दर्द था लेकिन जांघो में मीठी जलन. योनि पर पानी की ठंडी फुहार डालने के बाद पीठ को साफ़ करके वो शरीर पौंछने लगी. अर्जुन ने भी शरीर को फुहारे के निचे कुछ आराम दिया और अलका को देखने लगा. बालो निचोड़ती हुई वो कमाल लग रही थी. आईने से उसने भी अर्जुन की नजरो को देखा तोह पलट कर उसके होंठो को चूमने लगी.

"बस करो अब. और जो कहा है वो ध्यान रखना. कल सभी लेडीज और लड़कियां बिजी रहेंगी, परसो भी. तोह टाइम से दोनों जा सकते हो और वो हमारे से बड़ी भी है और समझदार भी. हक़ तोह बराबर हे है अगर देखा जाए तोह. हाँ, अब अपने कमरे में जा कर दरवाजा बंद कर लेना. मैं जा रही हु त्यार होने के बाद.", अलका बाथरूम से बहार चली आयी जहा उसके अंगवस्त्र और बाकी कपडे रखे थे. जितने वो त्यार हुई उस से पहले हे अर्जुन अपने कमरे में जा चूका था.

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"ऐसा है रामेश्वर, मेरा अब दिल है के बाकी जीवन थोड़ा अलग बिताऊं. सुकून से और इस ghar-pariwar वालो झमेलों से दूर.", बैठक में चंद्रो देवी दीवान पर आसीन थी और उनके हे करीब बैठे थे पंडित जी. एक तरफ सोफे पर शंकर के मां हंसमुख उर्फ़ बिल्लू थे जिनके साथ छोल साहब और शंकर बैठे थे और सामने राजकुमार जी, अशोक और नरिंदर. उमेद बहार था सांगवान जी और आचार्य जी के साथ किसी काम से.

"ऐसा क्या विचार बना भाभी एकदम से?", पंडित जी भी थोड़ा हैरान थे ये सुन्न कर.

"वकील से मिल के आयी हु यहाँ आने से पहले. और 4 बराबर हिस्से कर दिए साड़ी जमीन के हवेली छोड़ के. अब बिंदु तोह रही नई यहाँ और कल को ऋचा का भी ब्याह हो जाना है. गुड्डी चाहे है सुदर्शन को एक नयी जगह बढ़िया माहौल दिया जाए. जमीन और भत्ते बिजेन्दर संभाल रहा है जो बाकी तीनो को भी बराबर हिस्सा देता रहेगा. और मैं थोड़ा दूर रहना चाहती हु इस सबसे. तेरी जानकारी में कोई ऐसी जगह हो जहा शांति हो, ठीक जमीन हो तोह मैं वह चली जाऊ.", चंद्रो देवी ने अपनी बात खुल कर बताई तोह यहाँ बैठे लोगो में से सबसे पहले हैरान शंकर हे हुआ.

"ताई, आपके पास thik-thaak पैसा है और जीवन की जानकारी है. कोई anaath-aashram ले लो हिमाचल या उत्तरांचल में. अपने रहने की जगह जैसी चाहो वैसे तैयार कर लेना और गरीब अनाथ बचे दूसरी तरफ रहेंगे, पढ़ेंगे तोह आपकी छाया में उनका भी भविष्य बनेगा. सरकारी मामले पापा देख लेंगे और कहो तोह मैं भी आपका साथ देने को त्यार हु.", नरिंदर ने एक हे बात बोली थी और चंद्रो देवी ठुड्डी पे हाथ रखती बड़े गौर से उसको देखने लगी. बाकी सभी खामोश रहे और रामेश्वर जी ने भी सर हिला कर सहमति दिखाई.

"तेरी बात 16 आने सही है इन्दर बीटा. बचे हो, उनके खेलने पढ़ने के साधन हो तोह मैंने भी ाचा लगेगा वह रह कर उनकी देखभाल करना. और जब मर्डर गयी फेर कौन देखेगा वो सब?"

"मैं देखूंगा फेर ताई और ऐसे मामलो में ट्रस्ट बनाई जाती है जिसमे सभी तरह के लोग होते है. वैसे तोह आप मरती न अभी अगले 10-15 साल लेकिन इंसान को सुकून तभी मिलता है जब वो किसी को बेहतर जीवन जीने में मदद करे. भविष्य बनाये उनका और आप भी एक आत्मीयता महसूस करे उन सबके साथ जिनका बेचारो का कोई नहीं. जगह तोह पापा चुटकियों में दिलवा देंगे, हैं न पापा?", नरिंदर बोले हे जा रहा था और उसने ध्यान भी न दिया की शंकर उसको रुकने का इशारा कर रहा था.

"हाँ, बाप तोह तेरा पूरे भारत का पटवारी लगा है न.? लेकिन अगर भाभी आप सहमत होती हो तोह ये सब देखा जा सकता. लेकिन अकेले रहना और वो भी बढ़ती उम्र में थोड़ा मुश्किल रहता है. काम से काम 5-6 महीने तोह इस सबमे भी लग जाएंगे.", रामेश्वर जी ने अपनी इत्छा बताते हुए बाकी वर्णन भी दिया.

"जमा अकेली न रह रही है मैं रामेश्वर. गुड्डी रहेगी मेरे साथ और सुदर्शन का भी जीवन सुधारना है. इतने समय में वो भी चलने फिरने लगेगा, शबनम को भी उसकी जायदाद सौंप दूंगी और फेर जाउंगी तोह सबके विवाद ख़तम करके हे जाउंगी. मुन्नी का तोह गाँव में रहना danva-dol है लेकिन सुशीला हवेली में हे रहेगी और बिजेन्दर अपने baap-dada की जमीन से दूर न रहने वाला. जगह देख और किसी पहचान के आदमी को लगा इस सबमे. मैं इन्दर की बात से सहमत हु और सबकुछ ऐसा हे करना है जैसे इसने कहा.", चंद्रो देवी ने तोह निर्णय हे बना लिया था.

"ठीक है भाभी फेर ऐसे हे सही. ये विवाह से फारिग होने के बाद मैं खुद इन्दर के साथ पता करता हु आपके लिए उचित जगह. सुदर्शन बचो में रहेगा तोह सकरात्मक विकास करेगा. वैसे भी अब वो बेहतर है लेकिन माहौल सदा और शांत मिलेगा तोह स्वयं निर्माण में केंद्रित रहेगा. खैर कोई विवाद है तोह साँझा कर सकती हो आप? या मैं मिलने उधर आ जाऊंगा.", रामेश्वर जी ने अब ये बात पोलिसिअ लहजे में कही थी.

"21 का ब्याह है और 23-24 को टाइम लगे तोह आ जाना. विवाद तोह कोई नहीं और कोई करके तोह देखे जरा फिर चंद्रो देवी अपने तरीके से समझाएगी. ले बबिता बिटिया भी आ गयी. आजा मेरी लाडो.", चंद्रो देवी के चेहरे पर एकदम से हे ख़ुशी छ गयी थी बबिता को अंदर आते देख. वो भी अपनी दादी से गले लग कर मिली और फिर रामेश्वर जी के चरण स्पर्श करने लगी तोह उन्होंने रोक कर आशीर्वाद दिया.

"बेटियां पाँव के हाथ नहीं लगाती. और तुम्हारे पतिदेव अब बेहतर है?", आज गहरे लाल सलवार सूट में बबिता पूरे श्रृंगार के साथ थी, मांग भैर हुई और नाक में बाली. उसकी काया से तोह साधारण व्यक्ति वैसे हे प्रभावित हो कर दूर से आहें भरता रहे.

"सब ठीक है नाना लेकिन आप बताओ मेरी दादी के चुगली करे है आड़े बैठी?", बबिता ने मुस्कुरा कर अपनी दादी की मजे लेते हुए रामेशवर जी को नाना कहा तोह नरिंदर को भी ठसका लगा ये सुनते हे. वो मंद मंद हंस रहा था और बबिता सबको हाथ जोड़ कर मुस्कुराती हुई फिर नरिंदर जी को देख हंसने हे लगी.

"तेरे नाना कबसे हो गए मेरे पापा?"

"जड़ से मेरी माँ अर्जुन की बुआ बानी और मेरे ब्याह के रिवाज आपका बड़े भाई साहब श्रीमान शंकर मां ने किये. ेब आपने मैं चाचा कहु के मां, यु आप डीडे कर लो.", बबिता तगड़ी हे mooh-fatt थी और उसकी ख़ुशी देख नरिंदर जी भी खुश हुए.

"तेरा तोह मैं मां हे ठीक फेर. न्यू बता तू ेक्लि किस तरिया आयी अपने पीहर.?", नरिंदर जी भी उतनी हे बागड़ी में बोले और बबिता अपनी दादी की बगल में बैठती हुई कोमल से पानी लेते हुए बोली.

"पीहर से लेके जाए करे है मां लेकिन आज तोह मैं बस विकास भाई और मुस्कान गइल आयी हु तोह उलटी जाउंगी थोड़ी हाँ में. परसु आउंगी फेर ब्याह के बाद जाउंगी. नाना आपने बताया कोणी के मेरी दादी के चुगली करे थी?", बबिता को तोह जैसे जानकारी लेनी हे थी.

"ताई तोह घर छोड़ के जा रही है. बोले थी के मेरी लाडो घर से गयी ेब मेरा जी न लाग्दा. ओर्फनेज होम खोलन का विचार है दूर कही. बता तेरे के विचार है.?", यहाँ फिर से माहौल में जैसे बस यही 2 लोग बातें करने लगे और बाकी सब या तोह मुस्कुराते दिखे या अपनी हे धीमी बात में.

"यु कार्य ने दादी चोखा काम. मेरा भी कंट्रीब्यूशन रावेगा इसमें लेकिन जे कल ने तू मर्डर गयी तोह बेरा किस तरिया चलेगा?", बबिता ने जितनी गंभीरता से बात कही थी रामेश्वर जी ने हलके से उसके चपत लगा दी.

"शुभ शुभ बोलै कर बेटी. कुछ भी बोलित है और इतना तोह सुशीला की जुबान न चलती थी उसके टाइम. चल अब तू अंदर जा कौशल्या के पास और बाकी सबसे मिल."

"सुशीला की जुबान के टेम होर था नाना. व एक घर की थी और मैं 3-3 की हु. ाचा दादी जे मेरे से पहले जावे तोह मिल लिए और मैं गयी तोह बता के कोणी जॉन.", बबिता गिलास वही टेबल पर रखती हुई धड़ल्ले से अंदर की तरफ चली गयी.

"ताई, ये लड़की तोह मेरी भी समझ से बहार है. एक तोह मेरे जितनी लम्बी ऊपर से जुबान सुशीला से भी. वो बेचारा तोह ब्याह करके शायद इसलिए ठीक न हो रहा के इसको सेहन कैसे करेगा.", नरिंदर ने बबिता को जाने के बाद लपेटा था और शंकर समझ चूका था.

"एक बार उसके सामने बोलियों, फेर तू अगली बार न मजे लेने वाला. वैसे ताई आपको मुस्कान से तोह मिलना चाहिए.", शंकर ने ये नाम अनजाने हे लिया और चंद्रो देवी ने हामी भरी भी

"हाँ बीटा सही कहा. शबनम न आ सकती तोह इस बेटी को हे सौंप दूंगी. बहने तोह हैं हे दोनों सगी.", एकदम से नरिंदर के हृदय में पीड़ा सी उठी जिसको बहार न आने दिया.

"ये मुस्कान कौन है शंकर? और शबनम तोह इंग्लैंड में नहीं रह रही?"

"ये भी इंग्लैंड में रहती है इन्दर बीटा लेकिन कॉलेज है इसका अभी इधर. पूरा हो गया तोह वापिस चली जायेगी या फेर बबिता के साथ हे रहेगी जबतक चाहे. अभी भी उसके साथ हे है बस कभी कभी यूनिवर्सिटी आती है विकास के साथ गाँव से. रुक मैं मिलवाती हु. मधु बिटिया, मुस्कान होगी तोह बुलाइयो.", इधर से कौशल्या जी के कमरे में बात करती मधु पर उनकी नजर पड़ी तोह उसको हे आवाज दे दी. शायद बबिता और मुस्कान इधर हे थी जो मुस्कान तुरंत हे थोड़ी सेहमी सी दरवाजे पर आ रुकी. उसने वही से सबको नमस्ते की जैसे मैं में झिझक हो.

"मेरी प्यार बिटिया अपने हे घर में सेहमी क्यों है? इधर आओ.", रामेश्वर जी ने बड़े हे स्नेह से उसको बुलाया था और मुस्कान भी अपने नाम के हिसाब से एक दबी हुई मुस्कान और बहोत साड़ी बेचैनी लिए उनके करीब आ गयी. चंद्रो देवी ने सर सहलाते हुए अपना परिचय दिया जिन्हे वो जानती थी. रामेश्वर जी तोह पहले भी 2-3 बार मुलाकात कर चुके थे और शंकर जी से भी वो परिचित थी.

"नमस्ते अंकल.", सभी से नजरो और हाथ से अभिवादन करके वो अपनी तरफ कुछ हैरत से देख रहे नरिंदर जी को हे देखने लगी.

"नमस्ते बीटा. तोह तुम्हारा नाम है मुस्कान मिर्ज़ा? मिल कर ख़ुशी हुई."

"जी मुझे भी."

"यहाँ कबसे हो बीटा आप?", ये तीसरा शख्स था जिसके साथ लगातार इन्दर हे बात कर रहे थे.

"लास्ट ईयर से हु अंकल और अभी कॉलेज का फर्स्ट ईयर कम्पलीट हुआ है. यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में हे रहती हु पर अभी वकेशंस है तोह बबिता दीदी के पास उनके वह. मैंने आपको कही देखा है अंकल.", मुस्कान की आखिरी बात सुन्न कर नरिंदर जी मुस्कुरा भर दिए.

"तुम्हारा जब दिल करे तुम यहाँ भी आ सकती हो रहने के लिए. गाँव से पास तोह ये घर भी है. घर में और किसी को जानती हो?", मुस्कान ने बड़े हे मासूम तरह से गर्दन हिलाई थी और उसकी हाँ देख कर नरिंदर जी ने भी गर्दन हिला कर हे पूछा किसको.

"अर्जुन को, कोमल दीदी को, शंकर अंकल को, दादा जी को..

"बस बस बीटा. बहोत है बहोत है. सभी प्रमुख लोगो को जानती हो और बाकी सबसे हम खुद मिलवा देंगे. और ये अर्जुन भी आ गया. नवाब साहब, घर में तुम्हारी पहचान के मेहमान आये हो तोह थोड़ा बहोत मिल लिया करो. और इस संजीव से इतना चिपकना बंद कर दो भाई, इसकी भी शादी होने वाली है.", नरिंदर कुछ हल्का महसूस करने लगे थे और संजीव मुस्कान से हाथ मिला कर मिला. अर्जुन की वजह से दोनों की पहचान भी ाची थी अब.

"अभी तोह मैंने और भैया ने सुना था के आप मुस्कान को कह रहे थे की ये घर उसका भी है. फिर ये मेहमान कैसे हु? बताओ दादा जी ab.",Arjun ने अनजाने हे सबको लपेटने वाले नरिंदर जी को हे लपेट लिया था. सभी हंसने लगे और अर्जुन मुस्कान के साथ अंदर की तरफ चल दिया.

"वो बहार आप सभी को खाने के लिए उमेद चाचा जी और आचार्य जी बुला रहे है.", संजीव ने जानकारी दी तोह उसके चाचा, फूफा और पापा उठ कर बहार हे चल दिए.

"सतीश, तेरा ड्राइवर बुलवा दे मुझे छोड़ने के लिए.", चंद्रो देवी भी उठ कड़ी हुई.

"आप तोह रुको भाभी शाम तक."

"न रामेश्वर, सबसे मिल ली और ाचे से खाना भी खा लिया. तेरे साथ सुख दुःख बतला के मैं हल्का हो गया तोह अब बस हवेली चालू. शादी पे आउंगी अब तोह.", अगले कमरे में वो अपनी रिश्ते की सभी देवरानियों से मिलने लगी थी और संजीव छोल साहब के ड्राइवर को गाडी लाने के लिए बुलाने चल दिया.

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"ये तोह चलता फिरता पहाड़ है यार ऋतू?", अलका तोह हैरान थी अपने सामने बबिता को आज ाचे से देख कर. वो सबसे हंसी ख़ुशी मिल रही थी. रेखा जी और ललिता जी ने तोह बबिता को ब्याह कर पीहर आयी बेटी जैसा दुलार दिया था. वही अलका की बात सुन्न कर ऋतू ने एक गहरी सांस भरी

"अपने kishan-kanhaiya ने इस पहाड़ की सुरंग भी खोद दी है. ऋचा से पता लगा था के ये दीदी प्रेग्नेंट है और इनके पतिदेव के गोली लगी है जबकि शादी हुए महीना नहीं हुआ.", अलका के तोह होश हे उड़द गए ये जान कर.

"तुझे ऋचा ने कहा ये सब?"

"नहीं मुझसे थोड़ी ने वो ऐसी बात करेगी. विन्नी दीदी और वो जब कोमल दीदी के कमरे में सोई थी तब आपस में विन्नी दीदी के ख़याली पुलाव मैंने बाथरूम एक अंदर से सुने थे. ऋचा कह रही थी कही अर्जुन ने उनके साथ किया और वो बबिता दीदी की तरह पेट से हो गयी तोह? अब ये अपना ारु पता नहीं कहा कहा अकाउंट खोले बैठा है?", इधर इनके करीब से हे अर्जुन और मुस्कान आये तोह उसने इन दोनों से मुस्कान को मिलवाया जो बड़ी सहजता से हे मुस्कुरा कर Alka-Ritu से मिली. बबिता आदतन अर्जुन से कास के गले लगी तोह अलका के मुँह से निकल हे गया.

"बी गॉड, तू सही कह रही थी."

"क्या सही कह रही थी अलका? मैंने कुछ बोलै क्या जो मुझे हे नहीं पता लगा.?", मुस्कान का बुद्धि प्रदर्शन देख ऋतू खुद को हंसने से न रोक सकीय.

"तुम भी बहोत प्यारी हो यार. मतलब मैंने ऐसा कहा था के मुस्कान बहोत सुन्दर है तोह तुमसे मिल कर अलका ने वही कहा के मैं सच कह रहे थी.", अब मुस्कान फिर से शर्माने लगी थी और जब अर्जुन इनके पास से गुजरा तोह उसकी नजरो के पीछे Alka-Ritu की भी नजरे गयी. दोनों में हे फिर से हैरानी वाला इशारा हुआ.

"मुस्कान, माँ और चची से भी मिल लो यार.", ऋतू ने उसका ध्यान बाकी सबकी तरफ करवाया तोह वो झेंपती हुई सी कृष्णा जी की तरफ चल दी.

"ये भी गयी.", ऋतू ने अजीब से सूरत बनाते हुए कहा और फिर मुस्कुराने लगी जैसे अलका कर रही थी.

"अब तू गलत है ऋतू. ये पहले हे जा चुकी है डार्लिंग.", बबिता के मामले में अलका हैरान थी और यहाँ मुस्कान वाले में ऋतू.

"सचमुच."

"बिलकुल. कोमल दीदी को भी पता है और शायद बबिता को भी.", ऋतू इतना सुन्न कर उस कमरे की तरफ चल दी जहा पहले वो रहती थी और अब कृष्णा चची.

"आजा, आराम हे कर ले थोड़ा.", उसने कमरा खाली देख अलका को भी बुला लिया. ये इनके लिए सही समय था अपनी ख़ास बातें करने का.

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"रात का सन तोह संजीव कुछ सोच के बना लेता मेरे भाई. ये चाचा लोग वह होंगे तोह...", विकास थोड़ा आशंकित था शराब पार्टी को ले कर और उसकी बगल में हे अर्जुन था जिसके कंधे पर विकास का हाथ रखा था.

"उनके साथ पीने में ज्यादा मजा आएगा भाई. और टेंशन की बात हे नहीं है क्योंकि उनकी महफ़िल अलग हॉल में लगेगी 1-2 पेग के बाद और हम सबकी अलग. वैसे बिजेन्दर का फ़ोन आया था की तू जा रहा है उसको लेने और अंदर सुना है बबिता दीदी ने वापिस भी जाना है.", संजीव ने उसको भरोसा दिलाया तोह अर्जुन बड़े गौर से सब सुन्न रहा था.

"नजरो की तोह शर्म है हे भाई क्योंकि खिलाडी आदमी पीटा नहीं और जब थोड़ी चढ़ा ले तोह फिर ट्रेक्टर की आवाज पे भी झूमना शुरू. ये छोटे उस्ताद भी चलेंगे क्या?", अर्जुन का नाम लेते हे वो संजीव की तरफ आशा से देखने लगा.

"न न.. इसको ले गए तोह फिर हो गयी पार्टी. जूते मिलेंगे सुबह हमारे थानेदार से. पता जिस दिन कॉलेज जाने लगेगा उस से पहले दिन ऐसी हे पार्टी रखूँगा मैं इसके लिए.", निराश होते अर्जुन के चेहरे पर ख़ुशी आ गयी थी ये सुन्न कर. संजीव का प्यार अपने इस भाई के लिए सर्वोपरि थी.

"ये बात भी ठीक लेकिन मैंने तोह सुना है ऐसी पारी में कुछ काण्ड भी होते है. देखियो भाई मेरी शादी होने वाली है और इस सबसे तोह 10 कोस दूर हे सही."

"मेरी भी शादी हे होने वाली है विकास और वैसा कुछ नहीं होने वाला. हाँ पंडितो की इस पार्टी में मेनू जरूर थोड़ा machli-murge वाला होगा क्योंकि ज्यादातर लोगो को वही पसंद है मेरे सिवा. अब पहले वो समस्या हल कर जो पूछी थी.", संजीव ने बबिता का जीकर बिना नाम लिए किया.

"हम्म्म. मुस्कान तोह कह रही थी वो दोनों हॉस्टल रुक जाएंगी लेकिन जीजी बोल रही की 5 बजे हे वापिस निकलना है. गोलू अब बेहतर है और उसको अकेला न छोड़ने वाली बबिता. कोई बात नई मैं चला जाऊंगा और फिर उधर से हे बिजेन्दर को लिया लाऊंगा."

"अर्जुन तू चला जइयो उन्हें छोड़ने और बिजेन्दर को मैं इधर हे बुला लेता हु. रात शराब के बाद कोई कार नहीं चलाएगा. विकास की जरुरत पड़ेगी उधर और मैं इसके हे साथ चला जाऊंगा.", संजीव जैसे बहोत कुछ तैयारी किये बैठा था. अर्जुन तोह मन कर नहीं सकता था कभी.

"हाँ चला जाऊंगा भैया. आधे घंटे का तोह सफर है और टाइम से मैं वापिस. आप निश्चिंत हे रहो.", विकास भी खुश था संजीव की समझदारी और परवाह देख कर.

"चल भाई फेर rotti-tuk टॉड लेते है, इतने अर्जुन उन्हें बता देगा. ठीक है छोटे भाई?"

"हाँ आप निश्चिंत रहिये. मेरे लिए कोई ज्यादा बड़ा काम नहीं.", अब उसको बबिता या मुस्कान में से एक तोह मिलनी तये हे थी. मुस्कान ने तोह साफ़ साफ़ कह भी दिया था के आज वो हॉस्टल रहने वाली है लेकिन अब प्रोग्राम गाँव का बन्न चूका था. गोलू के वह होने से बबिता का मौका काम था पर वो मुस्कान का तोह कुछ करवा हे सकती थी. बाकी किस्मत मेहरबान रही तोह क्या पता कुछ भी हो जाए.
 
अबे बन हो जाओगे तुम तीनो अगर इतने कमेंट करोगे. 🙏

Billi420 Fâķîřă और swadu भाई ये इतने जज्बात एक बार में मत दिखाओ 🤣🤣🤣

मॉडरेटर 5-6 पेज गायब कर देंगे वार्निंग के साथ.
 
अपडेट 175

Kisse-Kahani (1)



"तू इतना दूर दूर क्यों रहे थे भीतर?", अर्जुन तैयार हो कर अपनी कार निकाल रहा था और वही उसके करीब कड़ी बबिता ने धीमी आवाज में उसके ऐसे व्यवहार की वजह पूछ ली. गेट के बहार शंकर जी ने उस वेटर को पकड़ा हुआ था जो सुबह असगर को धमकी दे कर गया था.

"आप कार में बैठो, रस्ते में बताऊंगा. एक बार ये देख लू के बहार क्या हो रहा है.", अर्जुन ने बबिता की बात najar-andaaj करते हुए कदम बहार बढ़ा दिए. बबिता अभी मुस्कान का हे इन्तजार कर रही थी जो कृष्णा जी और कौशल्या जी से बातें कर रही थी कुछ दुरी पर. बबिता के पास विन्नी और ऋचा चली आयी थी. अभी अर्जुन अपने पिता के करीब हे पंहुचा था की 'चटाक' की आवाज सुनाई पड़ी. ये थप्पड़ लगाने वाले शंकर जी नहीं थे, संजीव था.

"भैया, क्या कर रहे हो आप?", संजीव के करीब हे विकास और शंकर जी भी खड़े थे. अर्जुन तेजी से वेटर और संजीव के बीच आ खड़ा हुआ.

"छोटे तू साइड में हो भाई जरा. ये पैदा हुआ नहीं और पतलून में चाक़ू लिए इधर आ खड़ा हुआ. है कौन बे तू? और ज्यादा गर्मी है तेरे खून में?", इतने में शंकर जी भी मुस्कुराते हुए संजीव को हटाने लगे. वेटर के तोह होंठ के किनारे से खून हे निकल आया था एक थप्पड़ में.

"जाने दे संजीव, उम्र का जोश है. असगर से बहस कर रहा था तोह उसने धमका कर इसको काम से निकल दिया. बचपना है जो ऐसे आलू काटने वाले चाकू ले कर इधर आ गया. जा बीटा, जहा से आया है वही चला जा. रुक, ये 100 रुपये रख और मलहम लगवा लियो गुटखा लेने के साथ साथ.", वो लड़का सेहम जरूर गया था लेकिन अभी भी संजीव को निरंतर घूरे जा रहा था. शंकर जी इधर से असगर की तरफ चल दिए जहा इन्दर और उमेद उस से पकोड़े बनवा रहे थे.

"नजर निचे कर नहीं तोह 100 रुपये में तेरी पट्टी नहीं होने वाली.", अर्जुन ने अपने पिता के जाते हे बड़ी सार्ड आवाज में ऐसा कहा था.

"अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है. गरीब हु लेकिन तू जानता नहीं बदमाशी में भी काम नहीं.", संजीव, जो कुछ पीछे हुआ था वो आगे आने लगा तोह विकास ने हे रोक लिया.

"देख मुझे कोई फरक नहीं पड़ता की तू बदमाश है या बेवकूफ. गली में तुझे मैंने तोह बुलाया नहीं और ज्यादा गर्मी है तोह कही और जा कर दिवार में टक्कर मार. लेकिन इस घर के सामने फिर नजर नहीं आना चाहिए.", अर्जुन ने हलके से उसके गाल को दबाते हुए पीछे धकेला तोह उतने में हे उस लड़के के पाँव लड़खड़ा गए. अर्जुन भी कार की तरफ बढ़ने लगा था की वो बेवकूफ फिर से बोल उठा.

"दम हो तोह कभी कैंप में कदम रखियो. अभी तोह जा रहा हु लेकिन तू नजरो में चढ़ गया मेरी.", जोर वो इधर आने से पहले नशा हे करके आया था.

"आप रुको भैया, मैं जरा इसके कान में 2 शब्द कह दू. हाँ तोह अब सुन्न मेरी बात ध्यान से. सोनू या मंगल से पूछ लियो की अर्जुन कौन है? और तू कैंप में भी मेरे सामने आया तोह तेरे घर के सामने पटक के मारूंगा और जो बीच में आया उसको भी.", ये सब अर्जुन बहोत हे धीमी आवाज में कह रहा था बिलकुल उसके चेहरे के करीब से. और इस बीच उस लड़के के चेहरे पे जैसे कुटिल सी मुस्कान आ गयी कुछ देख कर. अर्जुन ने महसूस किया था के वो कुछ नशा जरूर करके आया है लेकिन नजरो का पीछा किया तोह संजीव भैया को बुलाने आयी ऋतू को वो लड़का वासना से देख रहा था.

'थाड्ड' की ये आवाज संजीव के चांटे से 8-10 गुना ज्यादा हे तेज होगी और अर्जुन के पीछे खड़े 5 लोगो का मुँह खुला हे रह गया जब वो युवक उस जोरदार थप्पड़ से सीधा जमीन से टकराया, जैसे कोई कड़ी लकड़ी जा गिरी हो. संजीव ने तुरंत लपक कर अर्जुन को जकड़ा जो शायद फिर से प्रहार करने वाला था. विकास भी उसके सामने आ खड़ा हुआ. वो कभी जमीन पर गिरे उस युवक को देखता तोह कभी अर्जुन के सुर्ख हो चुके चेहरे को. निचे गिरा हुआ वो लड़का लड़खड़ाता हुआ खड़ा होने लगा लेकिन जैसे तैसे वही घुटनो पर बैठ गया. गाल सीमेंट के रैंप पे टकराने से इतनी जल्दी फूल गया था और अंदर की तरफ दांत चुभने से लहू होंठो पे आने लगा. सर चकराना लाजमी था ऐसे भरपूर प्रहार से.

"पागल है क्या तू अर्जुन? चल जा तू यहाँ से इस से पहले की चाचा और इधर आये. ऋतू लेके जा इसको, बाकी मैं देखता हु. विकास, पानी लेके आ यार और इसके सर पे दाल. कान की तरफ से देख खून आने लगा है.", संजीव थोड़ा चिंतित हो गया था और विकास भी तुरंत नलके की तरफ बढ़ गया.

"ऋतू दीदी को देख रहा था ये कमीना. और इसलिए हे सुबह मारा होगा अंकल ने इसको. साले तू मिल मुझे फिर कभी.", अर्जुन का रूद्र ऋतू के हाथ थामने भर से दूर हो चूका था लेकिन गुस्सा अभी भी था. ऐसे हे वो गुस्से में भरा कार में जा बैठा. बबिता और मुस्कान भी चुपचाप पिछली सीट पर आ बैठी थी क्योंकि कृष्णा जी और कौशल्या जी तोह तभी जा चुकी थी.

"अर्जुन, होश न खोया करते छोटी मोती बात पे. चल अब गुस्सा बंद कर और निकल इधर से.", बबिता ने उसके सर पे हाथ फेरते हुए कहा तोह अर्जुन भी कार लिए चुपचाप चल दिया. विकास ने उस युवक के चेहरे को गीला करने के बाद एक तरफ बैठा दिया. लड़के के होश लौटने लगे तोह वो हाथ भी जोड़ रहा था.

"भैया जी, गलती हो गयी. आइंदा न करता मैं ऐसा कुछ भी, बस मुझे जाने दो यहाँ से. गुस्से में सोफ़िया पी के इधर आ गया था उस्ताद से लड़ने. जाने दो मुझे.", पानी में भीगे चेहरे पर भी उसके आंसू साफ़ दिख रहे थे. कान पर एक तीखा कट लगा था जहा संजीव ने अपना रुमाल दबा दिया.

"समझा तोह रहा था चूतिये तुझे की निकल जा. दारु पी के यही हाल होता तुझ जैसे का जो अंदर का शेर तोह जगा लेते है लेकिन देखते नहीं की शरीर साला बिल्ली वाला भी नहीं है. दिल तोह मेरा भी कर रहा है तुझे मार के तेरी खाद इस बगीचे में बिछा दू. अब तुझे भिजवाओ या चला जाएगा यहाँ से?", संजीव ने गौर से देखा तोह दूसरे गाल पर चेहरे से बड़ा पंजा पूरा छप्प चूका था. अभी वो लड़का दर्द में जवाब देने हे लगा था की पकोड़े की प्लेट लिए शंकर, इन्दर और उमेद भी इस तरफ चले आये. वो लोग बातें करते हुए ऐसे हे पकोड़े खा रहे थे.

"ोये तू गया नै अभी तक? और तू इसकी क्या पड़ताल कर रहा है संजीव? दारु पी के यही गिर गया था क्या ये? पहले हे कह रहा था के चला जा बीटा, लच्छन हे ठीक नहीं तेरे. गर्मी का टाइम और 5 बजे हे तू देसी चढ़ा के केश्टो मुककेरजी बना फिर रहा. अबे इसका तोह गाल हे सूज चूका और ये कान पे ब्लीडिंग भी हो रही.", शंकर ने पकोड़े खाते हुए हे ट्रे इन्दर को दे कर खुद मुआयना किया तोह दूसरे गाल पर पंजा देख सब समझ गए.

"विकास तेरा काम है ये?"

"चाचा वो गुड़िया को घूर रहा था ये तोह जड़ दिया. सवेरे भी शायद इस बात पे हे लिकड़ा था इसको काम से, अभी पता लगा बस.", शंकर जी को तरस आ चूका था उस लड़के पर नहीं तोह ऐसी हरकत पर वो जिन्दा को लाश हे बना देते.

"जा बीटा चला जा और ध्यान से जाइयो. सर का मामला है और मेरे बेटे न थोड़ा ज्यादा हे ढंग से जड़ दिया तेरे. दिल लगा के म्हणत कर और जब थोड़े फालतू पैसे हो तोह रात को खाने से पहले क्वार्टर लगा लिया कर. मुकेश बीटा, जरा इसको छोड़ दियो ये अगले चौक तक.", शंकर जी ने छोल साहब के नौकर की साइकिल रुकवा कर उसको प्यार से गुजारिश की तोह वो भी दांत निकलता हुआ एक तरफ रुक गया. ये लड़का तोह अभी भी काँप रहा था लेकिन जैसे तैसे पिछले करियर पर बैठ मुकेश के साथ निकल चला.

"आप तोह बड़े हे ठन्डे होने लगे हो चाचा जी. मतलब मैं देख रहा हु के आप बदल रहे हो.", संजीव झेंपता हुआ मुस्कुराया और वैसे हे हाल विकास के थे.

"चाचा हु बे तुम्हारा, चुटिया नहीं हु. ये बगल वाले प्लाट में हे था, दिल्ली नहीं. अर्जुन ने तोह मुझे देखा भी नहीं जब तू उस से उलझ रहा था. मेरे जाते हे उसने जड़ दिया क्योंकि वो हटने तोह वाला था नहीं जब उस लड़के ने तुझसे tu-tadaak की. और ये देख इस विकास को, अपने ऊपर ले रहा उस बेवकूफ का इल्जाम. समझा दियो अर्जुन को की ऐसे हाथ न ढीला करा करे, थानेदार जी देख लेते तोह दिल्ली का टिकट पक्का था उसका. चल गज्जू, पनीर ठंडा हो उस से पहले ये ख़तम करने है.", इन्दर और उमेद तोह इतने में हे मुस्कुराते हुए आधे पकोड़े छत्त कर चुके थे.

"चाचा घाना हे कूल आदमी है यार संजीव. मतलब आप हे हट गया जब बेरा था के अर्जुन उसके धरेगा जरूर? ी रियली लिखे आईटी. लेकिन एक बात न समझ आयी, अर्जुन एकदम ठंडा किस तरिया हो गया? मैं जड़ उसने देखु था उस टाइम तोह वो भड़क रहा था.", विकास उसी जग से पानी पीने लगा था और संजीव अभी भी अपना सर खुजाते हुए सोच रहा था के अभी जो हुआ वो था क्या और क्यों हुआ?

"ऋतू के लिए वो बर्दाश्त नहीं करता विकास भाई, बचपन से ऐसा हे है. लेकिन वही उसको रोक भी लेती है पर चाचा कभी ऐसा नहीं करते. हाँ वो अलग बात है की वो कभी मेरे और अर्जुन के प्यार के बीच नहीं आते. अर्जुन पहले सिर्फ गुस्सा था और बाद में जैसे वो भूल हे गया की वो खड़ा कहा है. सचमुच बचाव हो गया जो दादा जी इधर नहीं थे या घर का कोई और.", संजीव ने मल्होत्रा जी की बेटी की शादी में भी अर्जुन का ये रूप देखा था और तब भी वह ऋतू के हे कहने अर्जुन रुका था.

"फेर तोह भाई ऋतू को इसके साथ हे रखा कर. स्टेडियम में तोह मैं खुद भुगत चूका हु इसका पागलपन. जानवर मानस है पूरा और उस दिन तोह चाचा भी इसके सामने फ़ैल था. शायद उन्हें भी बेरा है इसका पतंदर का हिसाब.", अब संजीव थोड़ा खुल के मुस्कुराया जब स्टेडियम का जीकर हुआ.

"उन्हें तोह कही ज्यादा पता है विकास इसके बारे में. अगर अर्जुन इधर से बिना कुछ किये गुस्से में चला जाता तोह वो कही न कही भीड़ जाता. इसलिए चाचा खुद हे अलग हो लिए. पागल नहीं है अर्जुन, जज्बाती है और भावुक भी. एक बार जब ये छोटा था न तोह मेरी किसी से लड़ाई हो गयी थी. मैं भी स्कूल में था उस टाइम और ये होगा कोई 7-8 साल का. फिर भी इसने अपने से 8 साल बड़े लड़के के सर में पठार मार दिया था क्यूंकि वो 2 थे और मैं अकेला. पहले ज़िद्दी था लेकिन अब समझदार हो गया पर जज्बाती बहोत है.", विकास भी बड़े ध्यान से सुन्न रहा था ये सब और वो महसूस कर रहा था की संजीव के लिए अर्जुन कितना ख़ास है.

"मैंने तोह वैसे हे छोटा भाई बनाया था अनजाने हे इसको. खागड ने अपने बिजेन्दर को हे थोक दिया था जबकि बिजेन्दर आज भी मेरे से 21 हे है. लेकिन बिना शिक्षा तोह लड़ना भी नहीं आता चाहे कितना मजबूत शरीर हो."

"वो उमेद चाचा इसके द्रोणाचार्य है तोह शिक्षा अर्जुन उनसे 6 साल से ले रहा है भाई. उसके गुस्से को किताबो और कसरत ने हे काबू किया. तू पहलवानी करता है स्टेडियम में और शायद 7-8 साल से कर रहा होगा. अर्जुन सीख रहा है कच्ची उम्र से और वो भी इतने बड़े शरीर के व्यक्ति से जो कोई केटेगरी नहीं बनती. उमेद चाचा की बस होने के बाद हे उसको बॉक्सिंग और कसरत में लगवाया गया. पता नहीं जज्बात कब काबू करेगा?", संजीव की भी वही चिंता थी जो आचार्य जी और खुद शंकर जी की थी.

"रहने चाहिए जज्बात संजीव भाई. बन्दूक गोली से भरी दिवार पे तंगी किसी काम की नहीं क्योंकि वो सही समय पर चलनी चाहिए. चल छोड़ भाई जो हुआ सो हुआ. अब लकी भाई से भी फ़ोन करके पूछ ले के laal-pari लेने गया है या नहीं.", संजीव भी हँसते हुए विकास के साथ घर के अंदर चल दिए. लकी अरोरा को फ़ोन करके रात का haal-chal भी लेना था.

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"रेखा, थोड़ा इस मुन्ना को समझा बहिन. आज मैंने उसका अलग हे रूप देखा 5 मिनट पहले. वो जैसे अपने papa-chacha जैसा है जो घर में देखने से पता नहीं चलता.", कृष्णा जी ने शायद वो दृश्य देख हे लिया था, चाहे दूर से और थोड़ा हे सही. अभी वो रेखा के कमरे में थी जहा मधु और ललिता जी भी बैठी थी रोमिला, अलीशा के साथ.

"हुआ क्या है दीदी? अब उसने ऐसा क्या कर दिया जो वो इनके जैसा लगा आपको?", रेखा के कुछ देर पहले मुस्कुराते चेहरे पर चिंता साफ़ नजर आयी. मधु भी बड़े ध्यान से सुन्न रही थी कृष्णा की बात.

"हाँ भाभी, अभी कुछ ऐसा वैसा हुआ क्या?", मधु ने भी जान न चाहा था और रोमिला अपनी भाषा में अलीशा को वो सब बात समझने लगी जो ये लोग कह रही थी.

"मुझे नहीं पता की बहार क्या हुआ था लेकिन एक लड़के से संजीव कुछ बात कर रहा था और फिर अर्जुन ने उसको बुरी तरह मारा. एक हे बार मारा लेकिन इतनी जोर से जैसे जेठ जी या इन्दर किसी को मारते है. वो बेचारा बहार चौखट पर हे गिरा, मुँह के बल. ये गलत था लेकिन अर्जुन कभी ऐसा नहीं करता. उस से बात करना या फिर मैं पूछूँगी जब वो आएगा.", रेखा को भी अब घबराहट हुई क्योंकि ये बात उनके घर के सामने हे घाटी थी. लेकिन मधु और ललिता जी जैसे उन्हें हे आँखें दिखने लगी.

"भाभी ये क्या बात हुई? अगर अर्जुन ने ऐसा संजीव के सामने किया है तोह मतलब वो लड़का हे गलत होगा न? अर्जुन कभी गलत काम नहीं करता और मैं यकीन से कह सकती हु की बात हे ऐसी होगी. क्या संजीव ने अर्जुन को डांटा था या रोका?", मधु के सवाल के दौरान रोमिला भी थोड़ी हैरान थी क्योंकि ऐसी उम्मीद उसको भी कटाई नई थी. लेकिन इस दौरान जब यही सब उसने अलीशा को ग्रीक भाषा में समझाया तोह वो मुस्कुराती हुई वो सब बताने लगी जो विक्की ने अपनी माँ को बताया था. रोमिला की आँखें और भी बड़ी हो गयी जो ललिता जी और कृष्णा जी ने भी देखा.

"तुम कुछ कहना चाहती हो रोमिला? जैसे तुम्हे कुछ और भी पता हो?", ललिता जी ने पुछा तोह बात का रुख अब रोमिला पर चला आया.

"अलीशा बता रही है की अर्जुन ने इसकी बेटी की िज्जात्त भी बचाई थी कुछ गुंडों से. मतलब वो ये सब भी हैंडल कर सकता है लेकिन मुझे नहीं पता था.", ये बात कृष्णा जी और रेखा को भी पता थी और दोनों ने हे गहरी सांस ली.

"रोमिला, किसी को बचाना अलग बात है और यहाँ ये बात घर के सामने हुई. ऋतू, इधर आ जरा.", बहार आँगन में ऋतू को कोमल दीदी से बात करते देख कृष्णा जी ने आवाज लगा कर इधर बुलाया. उन्होंने ऋतू को भी देखा था अर्जुन का हाथ पकड़ कर अंदर लाते हुए.

"जी चची.", ऋतू ने अंदर आते हे सबकी तरफ देखा और कृष्णा जी से मुखातिब हुई. पीछे हे उसकी बड़ी बहिन कोमल भी दाखिल हुई, जो शायद खुद भी अभी पूरी बात जान न चाहती थी.

"अर्जुन ने अभी बहार क्या किया था?", ऋतू एक बार तोह अपनी माँ की तरफ देखने लगी ये सवाल सुन्न कर लेकिन मधु बुआ ने भी आँखों से वही सवाल किया तोह ऋतू फर्श पे ऊँगली गदति हुई बताने लगी.

"कोई वेटर था जो 2 दिन से यहाँ काम कर रहा था. सुबह उसको हलवाई अंकल ने काम से निकाल दिया था और अब वो शराब पी कर लड़ने आया था. संजीव भैया ने उसको समझा कर भेजना चाहा था और तब पापा और दोनों चाचा भी उधर थे. उसने नाइफ निकाल लिया था तब भैया ने थप्पड़ मार के वो नाइफ ले लिया. नशे में था वो लड़का इसलिए उल्टा सीधा बोलने लगा और बाद में पापा लोगो के जाते हे ारु ने उसके थप्पड़ मार दिया क्योंकि वो पहले भैया और फिर मेरे बारे में कुछ उल्टा बोलै था. वो शायद और भी मारता लेकिन विकास भैया बीच में आ गए और मैं उसको अंदर ले आयी. यही हुआ था चची और पापा को भी पता है लेकिन उन्होंने कुछ कहा नहीं. संजीव भैया से इतना हे बोलै के ारु के इमोशंस कण्ट्रोल करवाए. सच में ारु की गलती नहीं है चची, वो लड़का सुबह मुझे भी ऐसे देख रहा था जिस वजह से हलवाई अंकल ने उसको काम से निकला था.", ऋतू एक सांस में हे सब कुछ कह गयी और सच्चाई सुन्न कर कृष्णा जी ने उसको इशारे से जाने का कहा और खुद वही कुर्सी पर बैठ गयी.

"मैं बोल रही थी न भाभी की वो गलत काम नहीं करता. शंकर भाई को भी पता है और जब उन्होंने हे इस पर कोई गुस्सा नहीं किया तोह मतलब अर्जुन ने ठीक हे किया.", मधु को तोह जैसे ये सब भी ाचा लगता था इंसान के व्यक्तित्व में.

"कृष्णा की चिंता नहीं समझी तुम मधु. पिता जी या कोई और मेहमान ये सब देखता तोह बात बिगड़ जाती. माँ जी ने कहा भी था की उनकी देवरानी के सामने कोई ऐसी वैसी बात न हो जिस से वो तना दे. चलो तुम लोग कुछ भी न कहना उसको, मैं हे बात करती हु लल्ला से जब आएगा.", ललिता जी ने खुद हे फैंसला लिया था अर्जुन से बात करने का. उन्हें भी अर्जुन की परवाह थी, कही न कही संजीव से भी ज्यादा वो अर्जुन पर स्नेह लुटाती थी. छोटा बीटा जो था वो.

"अलीशा कह रही है की उसको अर्जुन पसंद है अपनी बेटी के लिए और उसको दिक्कत भी नहीं प्रीती की.", रोमिला ने माहौल की गंभीरता इस मजाक से तुरंत हे हवा कर दी. सबके चेहरे पर हंसी आ गयी थी और अलीशा को जैसे कुछ पता भी नहीं था. लेकिन अंदर हे अंदर रेखा जी को जरूर चितना होने लगी थी इस प्रकरण से. अर्जुन की ऐसी हे कोई गलती भारी पड़ सकती थी और जो समझ नहीं आ रहा था वो उनके पति का इस बात के लिए सकरात्मक होना.

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"अभ्यास जो है ये अगर नियमित न हो तोह आप किसी भी मनचाहे कार्य में परिपक्व नहीं हो सकते. हम तोह इत्तेफ़ाक़ रखते है जी छोल साहब की बात से और यहाँ आपसे वैचारिक मतभेद रहेगा चंद्रकांत जी, जिसके लिए क्षमा कीजियेगा.", पिछले घर में एक तरफ हलवाई लोग विवाह के लिए मिठाई बना रहे थे तोह दूसरी तरफ शिकंजिवि के साथ यहाँ इन बुजुर्गो की चर्चा जारी थी. डॉ सांगवान, किर्ष्नेश्वर, रामेश्वर जी, आचार्य जी, मल्होत्रा जी, निर्मल सिंह और कुछ 3-4 लोग कुर्सियों पर विराजमान थे.

"अब गुरु जी हे हमारे से सहमत नहीं है तोह जरूर कही तोह गलती हुई होगी हमसे. हाहाहा.. भाई साहब हमारा तोह कहने का बस ये मतलब था के जब आप विशेष न हो तोह काम से काम अवशेष भी न बनो. हमसे किसानी हुई नहीं, व्यापार में फ़ैल हुए और फिर नौकरी की उम्र निकल चुकी थी. राजनीति में हमने जाना की आप कभी कभी कुछ किये बिना भी विशेष बन सकते है. माफ़ी चाहता हु रामेश्वर भाई लेकिन आप खुद जानते है की हमारे में गुण तोह कोई हैं नहीं. इसलिए जो सच्चा है और हमारी समझ से है वही कहेंगे.", चंद्रकांत उर्फ़ चंदू आज यहाँ सिर्फ एक ड्राइवर के साथ पधारे थे.

"यहाँ तोह विधायकी छोड़ दे यार चंदू. मतलब हमको हे बना रहे हो वो भी हमारी कुर्सी पे बैठ के.? सांगवान जी, ये बड़ा हे अभ्यस्त आदमी है और बातें ऐसी करता है के इंसान के मधुमेह कर दे. रही बात अभ्यास की तोह चंद्रकांत शुरू से हे स्पष्ट और सीधी गली चलने वाला इंसान है. तोह आज हर समुदाय किस वजह से साथ है? इसको व्यक्तित्व और jan-maanas का तभी से पता है जब ये स्कूल में था. हुआ न अभ्यास चंदू? वैसे इस मामले में हम किरशन की भी तारीफ करते है जो जमीन देख कर पैदावार बता देता है कड़ी फसल की.", रामेश्वर जी ने चंदू की खुल कर प्रशंशा की थी जिस से साफ़ जाहिर था के ये दोनों एक दूसरे से बरसो से परिचित है. कृष्णेश्वर अपनी तारीफ पर बाद दोनों हाथ जोड़ कर अभिवादन करने लगे.

"ये है इंसान की पहचान उस से ज्यादा करने वाले. हम तोह सोचते है की पंडित जी ने पुलिस की नौकरी करके सही किया, हमारे पेट पर लात लग जाती जो अगर ये आचार्य बन्न जाते. हाहाहा.. वैसे छोल भाई साहब आपकी बात से कुछ याद आ गया. बड़ी हे पुराणी घटना है अगर आप लोगो ने सुनी हो तोह. आप शायद इत्तेफ़ाक़ रखते हो डॉक्टर साहब. 1970 के aas-pas एक sub-inspector ने राज्य स्तरीय निशानेबाजी में फाइनल पहुंचने के बाद नाम वापिस ले लिया था. सबका कहना है की वो अचूक थे और निश्चित विजेता भी.", आचार्य जी की इस बात पर सांगवान जी तोह बस मुस्कुराये लेकिन छोल साहब और कृष्णेश्वर बोल उठे.

"भाई साहब हे तोह थे.", दोनों ने एक साथ कहा था और इस मजेदार जवाब पर सभी हंसने लगे थे सिवाए पंडित जी के, जो अपने सर पे हाथ रखे झेंप गए.

"कहा गड़े मुर्दे उखाड़ रहे हो शास्त्री जी? वक़्त का तकाजा कुछ और था और haar-jeet के लिए तोह खेलना भी सही नहीं लगता. हाँ इतना भी ख़ास निशानची नहीं था मैं जो प्रथम हे आता.", रामेश्वर जी बात को taal-matol करते दिखे लेकिन उनके छोटे भाई साहब और सेल साहब ने ना में सर हिला दिया.

"हम बताते है आप सभी को क्योंकि भाई साहब को तोह 14 बरस की उम्र में हे चंडी चढ़ी बन्दूक इनाम में मिली थी. साइकिल के टीप (तुबे) से गुलेल बना कर ये 20 गज दूर लटकी कैरी (आम) एक बार में गिरा देते थे और वो भी जब हम थे 7-8 के और ये रहे होंगे 12 के. बड़े पिता जी ने इन्हे ेक्नाली ला कर दी थे जी जब उन्होंने इनके निशाने देखे. ईख (गणना) के अगर तीसरे पोरे पर 10-12 गज से निशाना लगाने बोलो तोह वही से काट देते थे. फिर जब राम भैया और रघु भैया बन (जंगल) में अपना अलग हे अभ्यास कर रहे थे तोह उधर साथ लगते उपवन में तेंदुआ घुस गया. जो हल्ला मचाया दासियों ने और राजकुमारियों ने. लेकिन जाहि एक कला कुत्ता लपका उस तेंदुए पे और वही भेजे में आ धंसी गोली उस तेंदुए के. Ek-naal से 40-45 गज का निशाना भैया हे लगाए थे और कालू को छोड़ा था रघु भैया ने. राजा जी तोह आप इनाम में चंडी की विदेशी बन्दूक दी इन्हे और रघु भैया को शाही खंजर. निशाने में काम वो भी न थे लेकिन राम भैया अभ्यास करते peid-diwar या लट्टू (बल्ब) पे तोह रघु भैया bater-siyaar या जो चीज उड़ती भागती दिखे गिरा देते. इनके जैसे निशानेबाज हमने तोह न देखे 60 बरस में. बाकी कुछ गलत कहा हो तोह माफ़ी.", कृष्णेश्वर की बातें सुन्न कर जहाँ सभी भौचक्के थे, आँखों में असीम प्रशंशा के साथ वही रामेश्वर जी किसी अतीत के उस धुंदले पैन में खो गए जहा उनके स्वर्णिम दिन थे.

"भाई साहब ये तोह मतलब स्वाद हे ला दिया आपने तोह. छोटू जरा शिकंजी और लेके आ एक एक गिलास. किरशन भाई और भी कुछ बताओ यार हमे इनके इस अनजाने से जीवन के बारे में. हमको तोह पता हे नहीं था के हमारे पंडित जी गुलेल वाले शरारती लड़के भी थे कभी और मतलब जंगल में इतनी काम उम्र में कैसा अभ्यास करते थे आप लोग?", सांगवान जी तोह जूती उतार कर ाचे से कुर्सी पर पाँव रख कर बैठ गए ये किस्से सुन्न कर. छोल साहब को भी जैसे इतना कुछ पता नहीं था और उन्होंने फिर से सबके लिए शिकंजी बनाने का कह दिया वह काम करते लड़के को.

"अब तोह बात हम पंडित जी से हे सुनेंगे क्योंकि यहाँ एक और नाम सुना है हमने. रघु मतलब स्वर्गीय रघुबीर जी से है न?", आचार्य जी ने भी उत्सुकता दिखाई थी और मल्होत्रा जी ने तोह टेबल पर पड़ी ट्रेक्टर छाप ताश को एकता करके डिब्बी में रख दिया. रामेश्वर जी को भी जैसे आज भावनाये दिखने का उचित अवसर मिला था जो वो किसी के सामने नहीं करते थे.

"यार डॉक्टर साहब अब हम भी कभी छोटे थे, सीधे तोह हवलदार लगे नहीं थे. जैसे आप दिवार फांद के रात को घर से निकल जाते थे लोगो के बाड़े खोलने हमे भी कुछ ऐसे काम करने में मजा आता था.", रामेश्वर जी ने शुरुआत सांगवान जी से हे की.

"हाहाहा.. मतलब हमारी धर्मपत्नी जी ने ये भी बता दिया जो उन्हें हमारी माता जी सुनती थी. लेकिन आज तोह हम आपके और रघुवीर सिंह जी के बारे में जान ने के िट्छुक है भाई साहब. जब भी हम उमेद को देखते है तोह हमे भी वो चेहरा याद आता है जो मुश्किल से 2-3 बार देखा था लेकिन बरसो पहले."

"आपने तोह देखा था, हमने तोह सही से सुना भी नहीं भाई. लेकिन अगर उमेद को देख कर उनके पिता की याद आती है तोह मतलब वो व्यक्ति कही विशेष हे थे.", ये थे अपने चंदू जी.

"अब वो बचपन था और हमारे पिता जी के बड़े धरम भाई थे रघुबीर के पिता जी, जिन्हे किरशन बड़े पिता जी बुलाता था. याद भी नहीं की हमारी मुलाकात किस उम्र में हुई होगी क्योंकि 5 बरस में तोह दोनों स्कूल भी साथ जाते थे. एक साइकिल पर सेवक हमे छोड़ कर आता था और लेके भी. उमेद का व्यक्तित्व रघुवीर के सामने शायद आधा हे हो. हमारी तरफ के बड़ी नहर निकलती थी जिसके किनारे भी कच्चे थे और बहाव नदी सा. तैरना दोनों को नहीं आता था लेकिन मुझे लेके वो कूद गया अंदर, जब 9-10 बरस के होंगे. मुझे तोह यमराज नजर आने लगे लेकिन रघुबीर हाथ पाँव चला रहा. किस्मत से राहगीर ने देख लिया और दोनों को बहार निकाल लिए. मैं तोह वही बैठ के रोने लगा लेकिन वो कम्बख्त फिर कूद गया. और ये उसकी जिद्द थी या निश्चय लेकिन वो बहाव के साथ कुशलता से आगे निकल गया. मेरे जीवन का सबसे पहला पथ मेरे उस भाई ने हे सिखाया था के डर के रोना है या फिर समझ कर सीखना. एक हफ्ते उसने मुझे प्याऊ में हाथ पाँव चलने सिखाये और फिर वापिस नहर में. उसके बाद दिल में वो डर हे न रहा.", रामेश्वर जी ने जीवन का अपना पहला किस्सा सुनाया और फिर एक घूँट पानी पी कर जैसे रघुबीर को याद करने लगे.

"वो शिकार वाला है किश ले लीजिये शास्त्री जी. लोग कहते है की मैं कुत्तो को पढ़ाने में दक्ष हु, फैलाने इनाम मिले या जो भी. व्यावहारिक ज्ञान रघुबीर को था और जिस समय का किस्सा किरशन ने बताया है तब वो एक देसी श्वान तेंदुए पर बेखौफ झपट पड़ा क्योंकि रघुबीर ने उसका डर हे निकाल दिया था. जब कभी मैं किसी फौजी को देखता या कोई दरोगा तोह दिल करता था के ऐसा बनूँगा क्योंकि हम सभी बचे उन्हें हाथ जोड़ ते थे. वो समय था जब हर इंसान उन्हें दिल से सम्मान देता था. तोह रघुबीर ने मुझे लगा लिया निशाने में जिसकी शुरुआत गुलेल से हे हुई. हाहाहा.. वो मुझे वो हर चीज सिखाता था जो सरल लगती थी लेकिन अभ्यास करने पर बड़ी असाधारण. जीवन में एक वही शक्श था जिसको हमने डरते नहीं देखा और उस से ज्यादा dridh-nischya वाला भी. बाकी ये खेलना कूदना तोह उस वक़्त 15-16 की उम्र में हे ख़तम हो जाता था. रियासत में नौकर थे पिता जी तोह जिम्मेवारी जल्द हे मिल गयी. बाकी वही आप लोगो ने जिया और वही हमने.", रामेश्वर जी की यादों से भरी मुस्कान देख सभी के चेहरे गदगद हो गए. उन्हें तोह यकीन हे न था के ऐसे मर्यादित और प्रतिष्ठित व्यक्ति का जीवन ऐसा था और उनसे भी बढ़कर उनका वो भाई कहो या दोस्त, रघुवीर सिंह था.

"फिर तोह जीवन के पथ पर आपको अलग होना पड़ा होगा रघवीर से? बचपन के ऐसे दोस्त तोह नसीब से हे मिलते है पंडित जी.", आचार्य जी को तोह जैसे अभी और भी जान न था उस व्यक्ति के बारे में.

"नहीं नहीं शास्त्री जी, रघुवीर ने मेरे लिए सबकुछ छोड़ दिया था. विवाह एक दिन, पंजाब से इस तरफ एक दिन आये और फिर हमारे बचे तक अवकाश समय एक दूसरे से अलग नहीं रहे. बस कुछ बरस पहले उसने खुद हे कह दिया के अब मैं तोह चला इस दुनिया से, तू अकेले देख ये सब. आज मैं जीवित हु, ऐसे भरे पूरे परिवार और 6 बचो का पिता और धरम पिता हु तोह ये सब रघुवीर की वजह से हो पाया.", रामेश्वर जी अपनी रौ में कहते कहते चुप हो गए.

"उधर कोई डकैत था जी महेन्दरगढ़ से आगे पहाड़ी वाली तरफ, जब जीजा जी की ड्यूटी लगी थी वह. एक बार आमना सामना हो गया था और इनके साथ का सिपाही और ये जख्मी हो गए. बनना (बनवारी), हमारा छोटा भाई समाचार लेके पंहुचा रघुवीर जीजा के पास के ऐसे ऐसे हो गया और जीजी उस बख्त पेट से थी. ऐसा शिकार किया न उसका रघुवीर जीजा ने बस एक न जिन्दा छोड़ा 13 में से. और वो डाकू निहाल सिंह, जिसने हुम्ला किया था उसको तोह जोंगा जीप के आगे बांध के थाने हे उठा लाये. जीजा तोह फेर भी किसी को गोली न मारते थे और मजबूरी भी हो तोह पाँव में. लेकिन वो तोह अगर तड़पाने की सोच लेते तोह पाँव पे चीरा मार के उस आदमी को भगा देते और फेर पीछे लगा देते अपने शिकारी कुत्ते. पर निर्दयी न थे वो, बहोत हंसी मजाक करने वाले और ज़िन्दगी जीने वाले व्यक्ति थे. शंकर उनका लाडला था और अर्जुन इनका. बाकी बचे अपनी अपनी काकी के.", ये हसमुख था जो अपनी yaad-dasht से पुराने किस्से निकल कर जाहिर करने लगा.

"वाह भाई.. बड़े हे अनोखे व्यक्ति थी. मतलब अपने पंडित जी कानून के हितेषी और वो कानून जब काम न करे तोह फिर सब अपने हिसाब से करने वाले. वो बैठक में जिनकी तस्वीर लगी है, वही है न रघुवीर सिंह जी?", मल्होत्रा जी के शब्दों में व्यंग, प्रशंसा और आदर भरा था.

"और वो 1970 में जो किस्सा हम याद दिला रहे थे की इन्होने अंतिम मुकाबले में भाग नहीं लिया था उसकी वजह भी स्वर्गीय रघुवीर सिंह जी हे थे. पंडित जी, आप शायद हमको पहचाने नहीं. भाई, हम भी उस पार्टी में थे जहाँ रघुवीर सिंह ने आपको नचाया था अपने साथ. और आपने उनके कहने भर पे मुकाबला छोड़ कर उनके साथ पार्टी में आना मंजूर किया था.", आचार्य जी के ऐसे याद दिलाते हे रामेश्वर जी अपनी जगह से खड़े हो कर उनके सामने आ गए. आचार्य जी भी उठ चुके थे और दोनों कास कर गले मिले.

"माफ़ करना शास्त्री जी, उसके साथ होता था तोह ध्यान कभी कही और जाता हे नहीं था. मुझे तोह बस पासपोर्ट वाली घटना हे याद है. ओह... मतलब वो जरुरी व्यक्ति भी आप हे थे उस समय?", रामेश्वर जी की बात सुन्न कर आचार्य जी ने उनका हाथ पकड़ के बस सर झुका दिया.

"हमे आप हमेशा हे याद थे पंडित जी, हमेशा. वो अर्जुन हमसे ज्यादा न मिला लेकिन आपके दूसरे अर्जुन ने आज हमे इस काबिल तोह बनाया की आप हमे याद रख सके. पजब 2 नंबर इम्पाला हमने आपको भी चलते देखा और रघुवीर जी को भी. अमेरिका से सब chhod-chhad के लौटा था तोह मैंने वही प्लाट लिया जहा आज मेरा घर है, आपके एक और परम मित्र सप कुलवंत सिंह गिल की जगह. समय देखिये की हम सांगवान जी से भी मिलते थे क्योंकि इनके कॉलेज में लेक्चर देने जाते थे, चंद्रकांत जी से भी मिलते रहे है जब ये स्टेट कांग्रेस के सेक्येटरी थे लेकिन जो सबसे पुराने जानकार है उनसे कुछ समय पहले हे ढंग से मिले है.", आचार्य जी के रहस्योद्घाटन से जहा चंदू और बड़े सांगवान जी मुस्कुरा रहे थे वही अब रामेश्वर जी झेंप रहे थे.

"और एक हम है शास्त्री जी, जो आपको सामने देख के सोच रहे है की फोटो हे करवा ले आपके साथ. पता नहीं आप साक्षात् सामने कैसे बैठे है.", मल्होत्रा जी की बात पर छोल साहब ताली बजाते हुए हंसने लगे.

"अपने भाई साहब को पुलिस ने आजाद कर दिया लेकिन सिस्टम ने इन्हे आज भी सेवा में रखा हुआ है शास्त्री जी. गलती इनकी नहीं है अगर आप ध्यान दे तोह. घर में 2-2 बचो का विवाह है लेकिन आज भी लगे हुए थे कुछ केस की chhan-bin में. अपने जीवन में एकमात्र व्यक्ति देखा है दोस्तों जिनोह्णे शराब, मांसाहार तो दूर की बात लहसुन तक को हाथ नहीं लगाया. हुक्का भी गुदगुदाया है लेकिन पहले रघुवीर भाई सहा के साथ और अगर अब कभी मौका लगता है तोह अपने समधी के साथ, जो खुद किसी और के साथ या अकेले नहीं पीते."

"और मेरी औलाद ये सभी काम धड़ल्ले से करती है. आज रात मुझे छोड़ के तोह आप सभी लोग जा हे रहे हो वह?", रामेश्वर जी के ऐसा कहते हे सिर्फ आचार्य जी ने हे मन किया लेकिन बाकी सभी ऐसे दिखने लगे जैसे चोरी पकड़ी गयी हो.

"ाची बात है पंडित जी, बचो के साथ ये सब भी बचे बने. वैसे मैं नहीं मान सकता की आपने कभी भी शराब के हाथ न लगाया हो. हाँ नियम के आप सचमुच सख्त है.", आचार्य जी ने तगड़ा लपेटा था रामेश्वर जी को. शाम गहराने लगी थी लेकिन इनकी चर्चा निरंतर जारी थी.

"ाचा तोह फिर सभी से शुरू करते है और मैं आखिरी में जवाब दूंगा शास्त्री जी. बताओ भाई किरशन तुमने पहली बार शराब कब पी थी और क्या तुम आज भी पीते हो? और तुम्हारे बाद ऐसे हे अगला व्यक्ति बताएगा."

"भैया, वो .. वो हम उस बखत 15 के थे और सन्तु ने सोमरस कह के पीला दी थी. कभी कभी खेत में ज्यादा म्हणत हो जाती है तोह पव्वा लगा लेते है. आपको बताया भी था के घर पे नहीं पीते.", कृष्णेश्वर की तोह जैसे ग#### हे फट गयी थी लेकिन डरते डरते वो बोल गया बाकी सब मुस्कुरा रहे थे.

"मैं तोह जब आर्मी में गया तभी पता चला था के शराब भी होती है. और वो क्वार्टर वाला नियम आजतक है जी अपना.", छोल साहब ने भी स्पष्ट कर दिया था.

"डॉक्टर की पढ़ाई के दौरान किसी ने कहा था के एक घूँट लगा लो और वो एक घूँट तोह आजतक ख़तम हे नहीं हो रही. कई बार तोह बढ़ती उम्र की वजह से ऑपेरशन करने से पहले भी 2 गिलास लगाने पड़ते है. माफ़ करना पंडित जी, जो है सो है. मतलब 19 की उम्र से आज तक जारी है कार्यक्रम."

"अपने मल्होत्रा जी का तोह हमे पता है भाई. ये तोह सिर्फ रविवार को पीते है और वो भी 2 पेग. हाहाहा.", छोल साहब ने हे मल्होत्रा जी का जवाब दे दिया जिस पर वो खिसियानी हंसी हंसने लगे.

"मैंने शराब तोह पंडित जी बहोत जल्दी शुरू कर दी थी जब देहात में था और पिता जी खेत में हे भट्टी लगा लेते थे. लेकिन आज 20 बरस लगभग हो गए हाथ तक नहीं लगाया. जिस दिन पौता होगा, बोतल खाली कर दूंगा.", ये थे अपने कश्यप साहब, सरोज भाभी के ससुर और थोड़े अंतर्मुखी.

"हाँ भी हसमुख. तू क्यों चुप है?"

"जीजा जी, मैं तोह हुक्का भी न पीटा अब. शराब तोह कभी जमी हे नहीं मेरे. एक गिलास में ढेर हो जाता था, वो तोह बनना था जो जी लगा के पीटा था.", हसमुख की सचमुच गांड फट चुकी थी जो मिमियाता हुआ बोलने लगा.

"हाँ तोह पंडित जी, अब जवाब दीजिये. हम कहते है की आपने जीवन में इसका स्वाद जरूर चखा होगा. रघुवीर जैसा दोस्त रहा हो और एक बार भी चख कर नहीं देखा? आपसे पहले मैं बता देता हु चलिए. 50 की उम्र तक मैंने कभी भी madira-sevan नहीं किया था लेकिन जिस दिन हमारी अर्धांगिनी रुखसत हुई, उस रात हमने तब तक पी जबतक मूर्छित न हो गए. दुनिया हम दोनों ने साथ में घूमी लेकिन कभी उनके प्रेम के सामने किसी नशे की जरुरत हे नहीं पड़ी. फिर जीवन अगली सुबह हे बदल गया और अगर बरसो बाद फिर दिल किया है की कभी जाम उठाये तोह वो आप सभी के साथ जो यहाँ मौजूद है.", आचार्य जी ने तोह अनजाने हे सबको न्योता दे दिया था. लेकिन उनकी वजह सुन्न कर जैसे पंडित जी को भी कुछ याद आ गया.

"हमने सिर्फ एक बार इस बाला को हाथ लगाया है भाई और उसकी वजह बताना बहोत मुश्किल है. लेकिन जिस भाई ने बरसो मुझे कहा के एक बार तोह पी ले, उस दिन वो मुझे रोकता रहा और मैंने तबतक पी जबतक सेहन हो सकती थी. हमने उस दिन हमारी माँ की दी हुई ये tulsi-mala उतार कर रख दी थी. और एक बार फिर आज रात उतर रहे है, अपने शास्त्री जी के लिए. आप सभी के लिए और हमारे पौटे के लिए.", रामेश्वर जी ने ये बात दुःख की जगह मुस्कुराते हुए कही थी. जिस पर छोल साहब तोह ऐसे तालियां बजने लगे जैसे किसी को परमवीर चक्र मिला हो. मतलब साफ़ था की आज वो होने वाला था जिसकी कल्पना न संजीव ने की थी और न हे शंकर ने. रात होने चली थी और ये मंडली अब बस घर जाने लगी थी तैयार होने के लिए.

"सतीश भाई, हमे लेने आ जाना पंडित जी के साथ. आज हम भी दूसरी बार की प्रतीक्षा में हैं. किस्से अभी और होंगे और आप सभी लोग तैयार हे रहना जी, जो सोया वो मोर और जो भगा वो चोर.", आचार्य जी ने एक बार फिर माहौल मनोरंजक कर दिया था इस जुमले से.
 
अपडेट 176

Kisse-Kahani (2)


बबिता और मुस्कान को लिए अर्जुन ख़ामोशी से चला जा रहा था. वो दोनों पिछली सीट पर बैठी थी और मुस्कान को भी बुरा लग रहा था अर्जुन का यु खामोश रहना. बबिता ने हे बातों का सिलसिला शुरू किया जैसा वो ज्यादा चुप रह हे नहीं सकती थी.

"तेरे जीजा से पहली बार खली हाथ मिलेगा अर्जुन?", अर्जुन ने ये बात सुनकर आईने से पीछे देखा जहा बबिता का वो गोल खूबसूरत चेहरा और हलकी सी लाल भरी हुई मांग उसको और भी आकर्षक बनती थी. चेहरे पर हर वक़्त ये चमक रहने लगी थी जिसकी वजह शादी से ज्यादा अर्जुन का प्यार था.

"सॉरी, भूल गया था के हम जहा जा रहे है अब वह जीजा जी भी होंगे. कोई बात नहीं मैं वो अगले टर्न से हे शहर की तरफ ले लेता हु.", अर्जुन बस गाँव वाली सड़क पर पहुंचने हे वाला था. मुस्कान भी सोच रही थी की बबिता के मैं में आखिर चल क्या रहा है.

"न न. वह जाने की लोड न है और गोलू अभी ज्यादातर बिस्टेर पे हे रहता है. थोड़ा बहोत टहलता भी है तोह शाम को यार दोस्त मिलने आते है तोह बहार आँगन में जमघट लगा लेते है. वो उलटे हाथ की तरफ ठेका है तेरे और गाडी थोड़ी आगे रोक के उधर से कला कुत्ता ले लियो. जाट खुश हो जे गए देख के."

"ये कला कुत्ता शराब की दूकान पे?"

"इडियट, ब्लैक डॉग व्हिस्की की बोतल. बिजेन्दर को भी गिफ्ट में मिली थी ब्याह में तोह मैंने हवेली पे देखि. गोलू जबसे घर आया है, 2-3 पेग लगाने लगा है शाम को. देसी आदमी विदेशी देख के घाना हे खुश होये करे है क्योंकि देसी तोह हर टाइम मिल जाये है. ले पैसे लेता जा.", बबिता ने हैरान परेशां अर्जुन को 500 के 2 नोट देते हुए कहा लेकिन अर्जुन ने मन करते हुए अपना पर्स उठाया और कार से उतर कर 20 कदम पीछे उस शराब की दुआकान की तरफ चल दिया.

'बस यही बाकी था करना अब. आज पहली बार शराब ले रहा हु वो भी गिफ्ट में देने के लिए.', यहाँ 2 दुकाने थी एक साथ: "देसी शराब का ठेका" और "अंग्रेजी theka/thandi बियर भी मिलती है", अर्जुन बड़े ध्यान से देखने लगा और देसी वाले पर ाची खासी भीड़ देख कर उसके बगल वाले पर चल दिया जो लगभग खाली हे था.

"एक ब्लैक डॉग व्हिस्की की बोतल. लिफाफे में दाल देना अगर है तोह.", अर्जुन को घबराहट हो रही थी और वो हर तरफ ध्यान दे रहा था के कही कोई उसको देख तोह नहीं रहा. ठेके वाला वो पतला सा अधेड़ ऐसे घूर रहा था जैसे अर्जुन ने उसकी किडनी मांग ली हो. लाल आँखें जैसे वो ग्राहक न होने की वजह से हर बोतल से थोड़ा थोड़ा चख रहा हो.

"850 रुपये. नया नया है के?", बड़े जोश से वो गट्टे के डिब्बे में बंद बोतल काउंटर पर रखते हुए उसने अर्जुन को घूर के पुछा. अर्जुन ने बटुए से 1000 सामने रखते हुए बोतल उठा ली. वो समझ गया था के यहाँ लिफाफा नहीं मिलता.

"किन नए ग्राहक को लिफाफा नहीं देते क्या? शहर से और ये क्सक्सक्सक्स गाँव जा रहा हु अपने जीजा से मिलने, उनके लिए हे ली है ये.", अर्जुन की बात सुन्न कर वो व्यक्ति दिल से मुस्कुराया और बोतल वापिस लेते हुए अखबार पे लपेट कर एक ख़ास प्लास्टिक में दाल दी.

"देख के हे पता लगे है के तू दारु न पीटा इसलिए पूछ लिया. और शायद पहली बार शराब लेने आया है तोह एक पते के बात बता देता हु. ठेको पे लिफाफे, मोमजामे न मिलते और न मांगने चाहिए. ये ले तेरा बकाया 150 और ये ताश की गद्दी इसके साथ मुफत.", आदमी ने काउंटर के निचे से वैसा हे ताश का पैकेट निकाल कर दिया जैसी तस्वीर बोतल के डिब्बे पर बानी थी. अर्जुन भी अब मुस्कुराया और हाथ मिला कर धन्यवाद करता हुआ वापिस लौट चला.

"ये आप हे पकड़ो.", कार में बैठते हे अर्जुन ने बोतल वाला पैकेट पीछे बबिता को पकड़ा दिया जो उसमे देखने लगी और फिर ताश की गद्दी हाथ में लेके मुस्कुरायी.

"तू तोह सिर्फ ठेके जाने से हे खुश हो गया रे खागड. लोग दारु पी के खुश होते है.. हाहाहा.. वैसे एक और कहावत है gaanv-dehat में. दारु और बाजारू की िज्जात्त नहीं होती लेकिन मर्द दोनों पे मरता है.", बबिता ने कार के चलते साथ हे पैकेट अपने और मुस्कान के बीच रख लिया.

"पता नहीं ये कहावत कितनी ठीक है लेकिन मैंने सुना है की शराब के साथ ताश, घर का सत्यानाश.", अर्जुन ने आगे इस छोटी सी साफ़ सड़क पे ध्यान देते हुए ऐसे कहा था और अब मुस्कान पहली बार बोली थी.

"ये भी ठीक कहा अर्जुन जी आपने. दुनिया जानती है पांडव जुए में तभी सबकुछ हारे थे जब वो साथ में मदिरा पी रहे थे. हैं तोह दोनों हे काम गलत लेकिन फ़ित्रतन इनसे कोई भी बचता नहीं. तुम जरा इन दोनों से दूर हे रहना.", अर्जुन थोड़ा हैरान हुआ लेकिन फिर आइना थोड़ा ठीक करते हुए मुस्कान को देखा तोह उसकी सादगी और वो आँखें जो उसपे हे केंद्रित थी, उन्हें देख दिल में सुकून सा पनप उठा. अलग हे प्यार था मुस्कान का जिसने कभी इत्छा हे नहीं जताई थी अर्जुन से और आज भी वो खामोश तबियत थी बिना किसी शिकवे के.

"बस कर मेरी बहिन को घूरना. मिल लियो ाचे से वह घर पे और ये तोह इतनी देर से बस इन्तजार हे कर रही थी के तू कब इसके ऊपर ध्यान दे. जो हो रहा है उसका मुझे भी नहीं पता के वो सही है या गलत क्योंकि गलत कहूँगी तोह फिर खुद को देख न सकुंगी और सही कहूँगी तोह तुम दोनों के लिए बुरा लगेगा.", बबिता ने इतनी गहरी बात कह दी थी की मुस्कान ने उसका हाथ हे दबा दिया, थोड़ा जोर से. और अर्जुन खामोश हो कर फिर से सामने देखने लगा.

"देखो इस बात पर ज्यादा मत सोचो. हम दोस्त है और दोस्ती में कोई बंधन नहीं होता. बबिता दीदी जैसा सोच रही है मैं उस पर क्या कहु लेकिन जब आप खुश हो तोह फिर सब ठीक है. गलत तब होगा जब तुम खुद पछतावा करो और अगर मेरी दोस्ती से तुम्हे पछतावा हुआ तोह फिर कुछ बचता हे नहीं.", मुस्कान ने जैसे बात अपने दिल पर हे ले ली थी और अर्जुन ने गाँव से 5-6 किलोमीटर पहले हे कार एक तरफ रोक दी.

"आगे आओ तुम, यहाँ मेरी बगल में. और इन्हे बैठने दो अपने सही गलत के विचारो के साथ.", अर्जुन ने बबिता पर मजाकिया तंज करते हुए कहा जो झूठे गुस्स्से से उसको देखने लगी लेकिन मुस्कान का हाथ अर्जुन द्वारा पकड़ने पर वो भी खिलखिला उठी.

"जा मेरी कबूतरी, बैठ जा इसकी बगल में. वैसे भी ड्राइवर जैसी फीलिंग आ रही होगी बेचारे को इतनी देर से.", मुस्कान थोड़ा शर्माती हुई पिछली सीट से उतर कर अब अर्जुन की बगल में आ बैठी थी. कार चलते हे अर्जुन ने मुस्कान का वो नाजुक नरम हाथ अपनी हथेली में लेते हुए उँगलियों के बीच उँगलियाँ फंसा ली. मुस्कान शीशे से बहार देखती हुई शर्मा भी रही थी और ख़ुशी से उसके गाल लाल भी होने लगे थे. बबिता खुश थी की चाहे कुछ पल हे सही लेकिन जब आप किसी को उसके होने और इतने ख़ास होने का एहसास करवाते हो तोह ये लम्हे जीवन भर याद रहते है.

"एक मजे की बात बताती हु तुम दोनों को.", बबिता ने ऐसे हे लम्हो के बीच कुछ साँझा करने का सोचा.

"हाँ जरूर. वैसे भी आपको तोह सुन्न कर हे मजा आता है और अब तोह जैसे सचमुच कुछ मजेदार हे बताने वाली हो लगता है.", अर्जुन ने मुस्कान की तरफ वाला एक का बंद ढक्कन खोलते हुए ठंडी हवा उसके चेहरे की तरफ करने के साथ हे एक बार आईने में पीछे सड़क पर ध्यान दिए. दूर दूर तक वीरान थी लेकिन सड़क saaf-suthri.

"माँ का तोह सबको हे पता है लेकिन मेरे बापू भी बहोत हे lambe-chaude थे. सारे कसबे और आसपास के गाँव में नाम था फ़तेह सिंह का, बदमाशी में भी और गुस्से में भी. लेकिन जब बापू कभी माँ के सामने आया करते तोह सुशीला जी कहके बात करते थे, वो बी नजरे झुका के. हाहाहा..", बबिता के हंसने से उसके खूबसूरत चेहरे और दमकते एकसार दांतो को देख अर्जुन भी चहक उठा. मुस्कान भी हंस रही थी मंद मंद और इस बार उसने खुद हे अर्जुन का हाथ थाम लिया था.

"मतलब जो व्यक्ति आसपास इतना नामचीन था वो बीवी के सामने बेबस.. क्या बात है? वैसे बुआ इतनी भी खतरनाक नहीं है.", अर्जुन हौले हौले मुस्कान के हाथ को सहलाता हुआ बात भी कर रहा था. ये दोतरफा ध्यान वही रख रहा था बस.

"अरे तू न जानता फेर सही से माँ को अर्जुन. मैं तब 7-8 बरस की और फाग के दिन दादी वाली हवेली में खूब hudd-dang मचा हुआ था. Rang-gulaal, पानी, कोरडे सब चल रहे थे bhabhi-devar वाले उस खेल में. गुड्डी काकी छोटी भाभी थी और उसको सभी रंग रहे थे या फिर दादी (चंद्रो) बहोत माहिर थी देवर कूटने में और खेलती भी बहोत थी. उनकी ननद और जीजा आये हुए थे और आँगन में फूल ढोल के साथ हो हल्ला मचा था. बिजेन्दर भी छोटा था और सुदर्शन तोह दादा के साथ हे गॉड चढ़ा रहता था जो खेलते न थे, बस थोड़ा गुलाल का तिलक लगवा लिया या ज्यादा से ज्यादा गाल पे.", अर्जुन का एकके ध्यान बबिता की बात पर कुछ गहरा हे चला गया.

"ाचा फिर?", अर्जुन ने अभी सुना था की चंद्रो देवी की ननद और जीजा. मतलब सोमबीर सिंह की बहिन भी थी जिसका आज से पहले उसको पता हे न था.

"हाहाहा.. पापा का एक दोस्त था जो पहले तोह गुड्डी काकी के साथ होली खेला, फिर aas-pados की जो भाभी आयी होई थी उनके साथ. फेर उसकी नजर पड़ी मेरी माँ पे जो saaf-suthri इन सबसे थोड़ी दूर खाट पे बैठी नाश्ता कर रही थी. उस आदमी ने बिना सोचे समझे माँ के चेहरे पर पक्का रंग लगा दिया और फेर वो वैसे हे जमीन पे गिरा जैसे आज घर के बहार वो छोरा तूने गिराया था. हाहाहा.. एक बार तोह सारा हे खेल रुक गया था आँगन में और बापू की तोह हिम्मत भी न हुई के अपना दोस्त जा के उठा ले. वो आदमी जैसे तैसे खड़ा हुआ और माँ को गुस्से में देखने लगा."

"फेर आपके पापा बीच में ना आये?"

"अरे उनकी इतनी मजाल हे न थी. माँ ने उसका गिरेबान पकड़ के बस इतना कहा था, 'हाथ काट के बहार फेंक दूंगी जे आइंदा मेरे धोरे भी लखाया.' और इतनी टेम में दादा दौड़े आये वह और उस आदमी को एक तरफ करते हुए मेरी माँ से बोले के बीटा थोड़ा लिहाज भी करे कर. भांजी ब्याह राखी है दामाद जी के अपनी. लेकिन दादा भी ऊँची आवाज में न बोलै था माँ से. माँ ने देख्या के मैं डर गयी हु तोह फेर मुँह साफ़ करके मैंने उठा के छात पे चली आयी. रात बापू ने दारु पी के कितनी बार माफ़ी मांगी होंगी लेकिन माँ ने साफ़ कह दिया के होश में बात करियो काल सवेरे. बापू ने एक हफ्ता लगया फेर सोफी बात करके माफ़ी माँगन में.", बबिता भी उस समय को याद करके अजीब सी दिख रही थी.

"आप मिस करती हो अपने पापा को? करती हे होगी क्योंकि एक पिता अपनी बेटी का सबकुछ होता है. और उतना हे प्रेम पिता के दिल में बेटी के प्रति क्योंकि वो उसकी राजकुमारी जो होती है.", अर्जुन ने बात कहने के साथ मुस्कान को देखा जो इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखती थी जैसे. लेकिन बबिता के चेहरे पर अलग हे भाव उभर आये.

"न अर्जुन ऐसा तोह कभी न लगा. लड़की चाहे गरीब घर में पैदा हो या चौधरी के कुनबे में, उसको लाड करने वाले ज्यादा न होते थे. मेरी माँ, गुड्डी काकी और दादी हे थी जिन्होंने मेरी परवाह की. एक वो कमीनी शीला थी उस टाइम, जिसने रही सही आग लगा के रख दी थी हँसते खेलते परिवार में. लेकिन मेरी माँ ने कभी एहसास तक न होने दिया के मैं कोई बोझ हु और कोई मुझे पसंद नई करता.", बबिता अभी भी मुस्कुरा रही थी.

"दीदी ये नाम तोह मैंने भी कही सुना है. शीला देवी..!!", मुस्कान ने सवाल किया था लेकिन अर्जुन ने बात बीच में काट कर अपना सवाल पूछ लिया.

"वो आपने कहा था के बुआ ने जिसके थप्पड़ मारा था वो आपकी बुआ दादी का दामाद था. कौन था वो आदमी? आप जानती हो क्या उसको?", अब गाँव की तरफ जाने वाली उस सड़क पर कार उतर चुकी थी.

"हाँ, मेघराज नाम हैं उसका लेकिन उसके परिवार से कोई लेना देना नहीं अब अपना. वो लोग दिल्ली से आगे क्सक्सक्सक्स शहर में बस गए थे और अभी उधर हे उनका ट्रांसपोर्ट का काम है जो 2 बेटे सँभालते है और वो खुद कोई पार्षद है या पता नहीं वैसा हे कुछ. आखिर बार वो तभी आये थे हवेली जब दादा जी का देहांत हुआ था. Daadi-Bua जरूर इधर नानी से बात करती थी पीछे कोई 8-9 साल पहले तोह बस इतना हे पता है. बाकी तुम संजय मां से बात कर सकते हो. लो जी आ गया गाँव और शाम भी होने लगी है.", बातों में हे वक़्त जल्दी गुजर गया था और अर्जुन सब गुस्सा भुला कर अब फिर से सहज था.

"तुम्हे अंदर वाली हवेली छोड़ना है क्या?", अर्जुन ने आगे जाने से पहले मुस्कान से पूछा.

"क्यों? मैं तोह इधर हे रहती हु दीदी के साथ. अभी इधर ज्यादा लोग भी नहीं रहते तोह मैं खाली टाइम आराम से पढ़ती भी हु और दीदी के साथ टाइम भी बिताती हु.", उस शुरुवात की बड़ी हवेली की तरफ कच्चे रस्ते पर कार उतारते हुए अर्जुन ने सर हिलाया. जगह कुछ ज्यादा हे साफ़ सुथरी हो चुकी थी. न कोई झाड़ थे और न हे मिटटी. हवेली का बड़ा गेट थोड़ा खुला था और मुस्कान ने उतर कर वो पूरा खोल दिया कार के लिए. अंदर ईंट के बने आँगन में एक तरफ 4-5 लोग बैठे थे और 2 ने मुस्कान को थोड़ा सा ख़ुशी से देख जबकि मुस्कान ने उन्हें कोई तवज्जो न दी. बबिता की तरफ का दरवाजा खोल कर अर्जुन ने वो पैकेट लिया और फिर बबिता के उतरने के बाद गाडी बंद कर दी.

"राम राम भाभी.", 4 युवको ने ये एक साथ कहा था और अब बबिता के सर पे दुपट्टा था, सिर्फ बाल ढकने तक. वो युवक देखने से हे hatte-katte और गोलू के ख़ास दोस्त लग रहे थे.

"राम राम जी. लागे है मैफिल जमाये बैठे हो? अर्जुन मिल ले तेरे जीजा से और ये उनके दोस्त है.", अर्जुन ने ध्यान दिया तोह गोलू ने ख़ुशी से उसको देखा. कंडे पर सूती अंगोछा था और कमर पर पूरे गहराव लिए ढेर साड़ी पत्तियां. गोलू एक आराम कुर्सी पर बैठा था जबकि आँगन से दूसरी तरफ रसोई में शायद कामवाली कुछ बना रही थी.

"नमस्ते जीजा जी. ये आपके लिए मेरी तरफ से छोटी सी भेंट.", अर्जुन ने उन चार युवको को नजर अंदाज करते हुए पैकेट गोलू को सौंपते हुए हाथ जोड़ कर अभिवादन किया.

"रे जीजा के तोह पाँव पे सर झुककये करे है. शहर में सिखाया कोणी के?", एक मजबूत सा खिचड़ी दाढ़ी वाला युवक थोड़े मजे में ऐसा बोलै था लेकिन चेहरा रौब सा बनता हुआ. गोलू ने उसको आँख दिखाई लेकिन देर तोह हो हे चुकी थी. अर्जुन झुकने हे लगा था की बबिता ने सबके सामने उसका कन्धा पकड़ कर ऐसा करने न दिया.

"दीपे, तू कड़े झुक्या के मेरे जूती पे? आरर न्यू न समझिये के यु बिजेन्दर से घात है. तू बैठ 5 मिनट अर्जुन, मैं लट्टे (कपडे) बदल के औ हु. चाल मुस्कान, तू भी हाथ मुँह धो ले.", बबिता ने अर्जुन को वही राखी एक खली कुर्सी पर बैठने को कहा और फिर सीधा गलियारे से पिछली तरफ चली गयी. कमरे का रास्ता तोह इधर से भी था लेकिन वो वही से गयी.

"ये मेरे दोस्त है अर्जुन, बचपन से हे साथ है लेकिन तुझे नहीं जानते. सॉरी आज आ न सका क्योंकि अभी थोड़ा परहेज है चलने में लेकिन ब्याह पे जरूर रहूँगा. ये कुलदीप है, ये अनिल जिसको नीलू भी बुलाते है. ये पहाड़ जैसा जानवर है बालशरण उर्फ़ बल्ली और ये मुँहफट है दीपा. अपने साथ हे अखाड़े में थे और बिजेन्दर के भी दोस्त है.", अर्जुन ने सभी से हाथ मिलकर मुलाकात की थी और दीपा थोड़ा नाराज सा लगा.

"भैया, बबिता दीदी न ऐसी हे है bol-baani से तोह उनकी बात का बुरा न मानो. मैं इसलिए नहीं झुका था क्योंकि इनके घुटने पर भी चोट है और कमर में भी. हिलते तोह दुखता.", अर्जुन के इतना स्पष्ट बोलने पर बल्ली हंसने लगा.

"भाई तू भी एनडी मानस है और देख गिफ्ट भी ल्याया तोह अंग्रेजी की बोतल. वाह रे छोरे. वैसे तेरा जीकर पहले भी सुना है.", बल्ली ने बात शुरू की थी और इस दौरान कामवाली वह लकड़ी के मेज पर पानी का जग, 5 गिलास और सलाद रख गयी. एक गिलास पानी का उसने अर्जुन को दिया जो धन्यवाद् के साथ उसने पकड़ लिया. एक 17-18 बरस की लड़की जो शायद कामवाली की हे बेटी थी, वो बर्फ और नमकीन वह रख कर वैसे हे वापिस हो गयी. मतलब साफ़ था के इनका पहले से हे दारु का कार्यक्रम था.

"यार बल्ली यही है वो जिसने पहले बिजेन्दर की कारवाही की थी और फेर मेरी, बिजेन्दर की जान भी बचाई. वो रच (राक्षश) था न भीम सिंह? उसका हिसाब भी इसने हे कार्य था उस लड़ाई में. चेहरे पे न जाइये और भी भतेरे काण्ड है इसके.", अब अर्जुन वह मजूद हर नजर का आकर्षण बन्न चूका था. Jeans-kameej में इनसे कुछ अलग मासूम से चेहरे और लम्बे घुङ्राले बालो वाला ये लड़का ऐसे काम कर चूका होगा उन लोगो को जैसे विश्वास न हुआ.

"मतलब तू भाई अर्जुन शर्मा है जो बिजेन्दर ने बताया था वो लड़का, स्टेडियम वाला. छोटी की खाल इसने हे भरी थी मतलब?", गोलू ने तोह बोतल खोल कर 5 गिलास में शराब उडेलनि शुरू कर दी थी. अर्जुन ने बस इशारे से अपने लिया मन कर दिया.

"सुदर्शन सिंह भी बड़े भाई है मेरे लेकिन उस वक़्त पता नहीं था. और मैंने कोई जान नहीं बचाई इनकी या बिजेन्दर भैया की, वो तोह ये मुझे बचने लगे थे जो वो सब हो गया.", अर्जुन अभी बोल रहा था की अनिल ने कमरे से कपडे बदल कर बहार निकलती हुई मुस्कान को देखा जो सफ़ेद salwar-kameej में अब कही ज्यादा हे खिली हुई दिख रही थी.

"गोलू भाई तेरी साली गइल सेटिंग करवा दे यार. या तोह भाव हे कोणी देवे लेकिन तू जीजा लागे है के बेरा बात कर ले. सच कहु हु या हाँ कर दे तोह 40 किल्ले मेरे हिस्से के इसके नाम करके ब्याह कर लूंगा.", ये कुलदीप था और इसकी बात सुन्न कर जहा गोलू थोड़ा घबराया वही अर्जुन बस मुस्कुरा दिया. मुस्कान ने बिना किसी की तरफ ध्यान दिए शरबत मिला ठन्डे दूध का बड़ा सा गिलास अर्जुन के सामने रखा और साथ हे हाथ साफ़ करने के लिए सफ़ेद अंगोछा उसकी जांघ पर रखते हुए अंदर चली गयी.

"कुलदीप जो कहे है वो मैं भी चहु हु भाई. और मैं तोह कॉलेज से पास भी हु इसके बराबर जमीन के साथ साथ.", ये दूसरा दावेदार था अनिल जो गिलास में पानी भरने के साथ साथ एक एक बर्फ का टुकड़ा भी रख रहा था.

"बबिता ने सुन्न लिया तोह मेरी खाट भी घर से बहार जावेगी. थोड़ा होली बोल लिया करो मलंगो. व कोई बकरी है जो तुम कहो और मैं उसकी जेवड़ी (रस्सी) थारे हाथ में दे द्यौ के ले जाओ भाई.? इंग्लैंड की है और ghar-pariwar में यहाँ बैठे सारे परिवार से ज्यादा अमीर. आंख्या ने आराम द्यौ रे झकोईयों, बबिता लेथ मारते टेम न लगान वाली. मुस्कान ेब किसी ने कोणी देखे तोह फेर आप हे समझ लो.", गोलू ने एक बार अर्जुन का गिलास देखा और फिर नमकीन की प्लेट सामने खिसका दी.

"मैंने तोह लगे है के वो पहले हे सेट है भाई और जिसके सेट है उसके सामने तोह थाम दोनों टीको कोणी. क्यों भाई अर्जुन, गलत कही के?", ये बल्ली था जो हर बात पर ध्यान दे रहा था. अर्जुन ने थोड़ा शर्मा के नझरे झुका ली और फिर दूध का घूँट लेते हुए जैसे najar-andaaj करने लगा. गोलू अब हैरत से अर्जुन को देख रहा था और Kuldeep-Anil के चेहरों पर मिश्रित भाव थे, नाकामी और जलन के.

"सच में ऐसा है रे अर्जुन?", गोलू ने गिलास टकराने के बाद एक सांस में हे जाम निबटा दिया था, बाकी सबकी तरह.

"वो मेरी ख़ास दोस्त है जीजा जी और सच कहु तोह ऐसी सभी बातों से दूर रेहनी वाली लड़की. पढाई, बास्केटबॉल और बस अपने में खुश. मेरे साथ वो थोड़ा आराम समझती है बाकी ज्यादा मैं क्या हे कहु.?", अर्जुन ने गिलास के बाहरी पानी से गीले हाथ अंगोछे से साफ़ करते हुए जवाब दिया.

"इसका मतलब फेर कुछ जुगाड़ नहीं मेरा? टोटल ना समझू या कुछ हो सके है चाहे थोड़ा बहोत हे?", कुलदीप ने ये बात जिस तरह से कही थी वो सुन्न कर अनिल तोह हंसने लगा लेकिन अर्जुन के चेहरे को देख गोलू को भये लगने लगा था और अपने दोस्त को देख बल्ली और दीपा भी उन दोनों को शांत रहने का इशारा करने लगे. अनिल इसके उलट आगे बोल गया.

"बात तोह जमा सही कही भाई कुल्लू. जे ब्याह न हो सकता और यो अर्जुन भी दोस्त है तोह फेर दोस्त की साली सत्ती naram-garam तोह हो हे सके है.? क्यों भाई अर्जुन, तन्ने बुरा तोह न लाग रहा?", वो ढिटाई से बोतल गिलासों में उड़ेलता हुआ अर्जुन को कुटली मुस्कान से देख रहा था लेकिन सामने से एक सार्ड मुस्कान ने जैसे उसकी हंसी वही रोक दी.

"अब मजाक तोह जीजा साली का होता है अनिल जी, कुनबे और मोहल्ले का नहीं. रही बात naram-garam वाली तोह उसका ऐसा है की पानी से नरम कुछ नहीं और शराब से गरम भी. दोनों पहले से हे आपके पास है. जिसके लिए आप ऐसे विचार रख रहे हो वो बस अभी तक थे. आइंदा इस घर में आओ तोह ये याद रखना की आपके दोस्त का घर है जहा मजूद सभी लोगो को िज्जात्त देना आपका कर्त्तव्य.", अर्जुन ने लहजा फिर भी नरम हे रखा था और बबिता कपडे बदल कर इधर चली आयी. एक बार को तोह मुद्दा यही रुक गया था चर्चा का.

"घर पे बता दिया है के तू थोड़ी देर रुकेगा यहाँ. पौने 6 हुए है तोह आराम से 7-8 बजे निकलियो. मैं जरा रसोई का काम समझा दू और तेरा यहाँ दिल न लगे तोह मुस्कान के पास बैठ जा, कंप्यूटर लगा है उसके कमरे में बस इंटरनेट नहीं है.", बबिता ने दूध का गिलास खुद हे उठाया था 2-2 कामवाली होते हुए भी. ढीले से कुर्ते में भी उसका जिस्म का वो ख़ास उभार कैसा हुआ था. उसके जाते हे अनिल धीमी आवाज में हंसने लगा.

"तू तोह यार कोई मोड़ा (साधु) लागे है. मतलब कर्त्तव्य, विचार, िज्जात्त.. अपने यहाँ तोह साझा होता सबकुछ."

"तुम्हारी बहिन है क्या घर में?", अर्जुन ने एकाएक उसकी हंसी पर विराम लगा दिया. गोलू गिलास आधा पी कर थोड़ा घबराहट से दोनों को देखने लगा था. अनिल के साथ साथ दीपक और कुलदीप के चेहरे पर भी गुस्से के भाव उभर आये.

"इतने में हे हो गया न पारा हाई? जब बोलते हो तोह सोच के बोलना चाहिए क्योंकि घूम कर समय तुम्हारी तरफ भी आ सकता है. एक बात तुम तीनो हे सुन्न लेना कान खोल के, जिस तरह अभी तुम लोग गुस्सा दिखा रहे हो इस से ज्यादा मैं अपने अंदर रोके हुआ हु इतनी देर से. बहार निकल आया तोह यही पटक के तब तक धुलाई करूँगा जब तक आँगन की हर ईंट लाल न हो जाए. ये दोस्त है साले? माफ़ करना गोलू जीजा जी, शराब पीनी है तोह रिक्वेस्ट हे करूँगा की बगल वाले नोहरे में महफ़िल लगाया करो, कोई ऊंच नीच हो गयी तोह बेवजह आप बुराई लोगे अपने सर. अपने घर के maa-beti पे कोई नई सुनता लेकिन दुसरो की देख कर जवानी चलेंगे मारती है.", अर्जुन बड़े आराम से उठ कर पहले बबिता की तरफ गया और फिर 2 कमरे पार करके आखिर वाले में जहा मुस्कान बिस्टेर पे तक लगाए जैसे उसका हे इन्तजार कर रही थी.

'बंद कर दो दरवाजा. कोई नहीं आने वाला अब इधर और तुम्हारा गुस्सा देखो मैं कैसे दूर करती हु.', मुस्कान की मुस्कान ने पल में हे अर्जुन को नरम कर दिया था. लेकिन बहार अभी माहौल थोड़ा गरम हो चूका था.

"देख भाई गोलू, बात 16 आने खरी है लड़के की. बगल में इतना बड़ा घेरा (प्लाट) खाली है, हुक्का है, चूल्हा भी और बैठक खातिर तखत कुर्सी सबकुछ. फेर नीम की छाया में अलग हे मजा. घर में 4 लेडीज है जिनके सामने यु सब ठीक कोणी.", बालशरण ने अपनी बात रखते हुए कहा. वो सचमुच शरीर के साथ साथ दिल और दिमाग से भी बड़ा था.

"या तोह गलती है भाई लेकिन पहले कोई होया न करता इसलिए बैठने लगे थे. लेकिन लड़का घाना बोल गया जो ठीक बात कोणी. खैर काल अड्डा बगल में हे लगावेंगे.", दीपे ने जाम खाली किया और 6 बजते देख सभी से कल मिलने का बोल कर निकल गया.

"घाना? वो तोह यु भी न सोच्या के हम उसके जीजा के दोस्त है. गोलू भाई, बात शराब वाली कोणी लेकिन थोड़ा बड़े छोटे का ख्याल रखना चाहिए. अर्जुन ने तेरी जान बचाई तोह उपकार हो गया लेकिन न्यू बेइजत्ती करना कौनसा सही है? जमींदारी अपनी भी है और 8 साल अखाड़े में भी लगाए है. यु बात कोई और कहता तोह मिटटी में दाब देता.", अनिल ने तुरंत 4 गिलास फिर से बनाये और अपना गिलास एक सांस में गले से निचे उतार कर सलाद चबाने लगा. बल्ली मुस्कुरा रहा था ना में गर्दन हिलता हुआ और गोलू भी अब कुछ सहज था क्योंकि बालशरण अर्जुन की बात से सहमत था और अर्जुन ने जो भी कहा था वो उदहारण के साथ कहा था.

"देखो भाई अनिल और कुल्लू, बात यही ख़तम करो और अबसे नोहरे में हे बैठा करेंगे वो भी एक दिन छोड़ के. रही बात अर्जुन ने ज्यादा बोलै या काम और बुरा लगा तोह भाई खुद भी सोचो की लंगोट बाँड्ने वाला व्यक्ति ब्याह की बात करे तोह मानी भी जाए. लेकिन तुम दोनों ने जो चुटिया बात करि थी naram-garam वाली मतलब लड़की के साथ सिर्फ जिस्मानी चाहत वाली तोह ये कहा से सही हुई? वो जो बोल के गया है वैसा कर भी देगा और मैं तोह क्या बल्ली भी न बचा सकेगा क्योंकि सुदर्शन छोटी और उसके वो 4 बदमाश ऐसे थे जिनके सामने हम सबकी नाद (गर्दन) नीची रहती थी चाहे फेर बिजेन्दर भी क्यों न हो. ये अकेला उन्हें लगभग मौत दे चूका था, विकास से भी पूछ लियो. साली है लेकिन बहिन जैसी इसलिए थोड़ा तोह मर्यादा में रहना हे पड़ेगा.", गोलू ने बात 2 टूक न कहते हुए समझदारी से करि. दोनों हे युवक अपनी अपनी जगह से उठ खड़े हुए.

"चल भाई गोलू, गलती महारी भी है और उसकी भी. बात यही ख़तम और फेर अगर बैठेंगे तोह नोहरे में हे सही.", कुलदीप इतना बोल कर दोनों से हाथ मिलते हुए अनिल के साथ यहाँ से चल दिया. अनिल अभी भी कुछ उखड़ा हुआ था क्योंकि वो अर्जुन द्वारा बहिन वाली बात को दिल पे ले चूका था और उसने एक बार भी बाकी बात समझने की जेहमत न उठाई. बालशरण थोड़ा गुर्दे वाला और शांत तबियत व्यक्ति था जिसकी गोलू के साथ अंदरूनी दोस्ती थी.

"भाभी, दाल की एक कटोरी दियो जरा.", उसने दोनों के सही से जाम बनाते हुए बबिता से कहा जो कामवाली से सब्जी कटवा रही थी.

"ल्याई बल्ली भाई और थोड़ी ककड़ी गांठ (प्याज) काट डीयू के?", बबिता ने अंदर से हे पुछा था. और इसका साफ़ मतलब था की बालशरण की वो भी िज्जात्त करती थी.

"न पड़ा है और गुड्डी के हाथ भिजवा दो. बस इसके बाद आप कर लो अपना काम.", बल्ली और बबिता की बातें सुन्न कर गोलू का भी मैं अब बेहतर था. और हवेली के उस आखिरी कमरे में मुस्कान तबियत से अर्जुन का गुस्सा ख़तम करने में जुट चुकी थी. सिर्फ सलवार पहने वो उसकी गॉड में बैठी हुई अपने गोर सुडोल सतांन अर्जुन के मुँह में दिए सिसकती हुई उसका सर सेहला रही थी. इन्हे कोई मतलब न था के बहार क्या चल रहा है और क्यों.

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उधर से 2 घंटे आगे का हाल.

"अरे वालिए जी, बहोत कुक्कड़ कुक्कड़ करते रहते हो, आज आपको अहुना मटन खिलते है और आपकी फवौरीते सफ़ेद मछली. क्या हाल है जोगिन्दर पाह जी.?", कम्युनिटी सेण्टर बहार से उतना सजा न था जितनी चहल पहल यहाँ अंदर के 2 बड़े बड़े हॉल में थी. किसी की भी उम्मीद से इतर यहाँ पर बाकायदा दिल्ली से मधुशाला चलने वाले बुलवाये गए थे. करने से 3 जगह 4-4 सोफे और उनके बीच बड़ी टेबल सजी थी. 20 फ़ीट लम्बे बार के सामने 20क्ष20 का हे नाचने के लिए मंच लगा था लेकिन फ़िलहाल सिर्फ धीमा संगीत वातावरण को अलग हे खुशनुमा एहसास दे रहा था.

यहाँ सबसे पहले पहुंचे थे शंकर, इन्दर, उमेद, दलीप, धर्मपाल और राजेश. सब तैयारी देखने के बाद ठीक 8 बजे हे मेहमान आने लगे थे और वालिए जी के साथ कोच जोगिन्दर जी भी पधारे जिनसे राजकुमार जी के बाद बाकी सभी गले लग कर मिले. परम, मेहुल, भूपिंदर भी तैयार हो कर पहुंचे जिनके साथ कुछ और भी शंकर जी के सहकर्मी थी. हरी झिलमिल साड़ी और लाल दमकते ब्लाउज में बार बालाये सभी मेहमानो का फूलो से स्वागत करती हुई उन्हें उन सोफों की तरफ ले चली.

"शंकर यार, शुक्र है तुमने बहार इतना उजाला नहीं करवाया जितना अंदर है. कसम से इनकम टैक्स वाले हम सबको दबोच लेते. हाहाहा.", वालिए जी तोह हैरान थे की ये कैसी छोटी सी दारी पार्टी जिसमे लाखो का खर्चा कर दिया है. ऐसे हे भाव बाकी सभी के थे जो बस औपचारिकता समझ कर आये थे.

"सरदार जी, शंकर ने न किया ये सब. वो तोह अपना गज्जू किसी नेता से मिला था दिल्ली में और उसने गिफ्ट में ये पार्टी अर्रंगे करवा दी. हमारे पास तोह आपको भी पता है के हिसाब के गिने चुने पैसे होते है.", नरिंदर आदतन यहाँ भी मसखरी करने लगा था और वो जानकार वालिए जी भी उसकी पीठ पर थप्पड़ लगते हुए हस्ते हुए गले लग गए.

"भाई जिसकी पार्टी है वो तोह नजर नहीं आ रहा. ओह भाई यहाँ तोह ये दोनों सितारे भी मौजूद है डिपार्टमेंट के.", राजेश और दलीप भी ये सुन्न कर उनसे आ कर औपचारिकता से मिलने लगे थे लेकिन उन्हें भी वही सम्मान देते हुए जोगिन्दर जी और वालिए जी ने गले लगाया. एक तरफ 15 से ज्यादा स्टाल पर shakahaar-mansahaar सबके सामने हे पाक रहा था. सलाखों में पनीर, गोभी, मुर्गा, मटन और मछली के साथ जाने क्या क्या था लेकिन दोनों हिस्से अलग अलग थे एक दूसरे से.

"लो भाई जिसको याद किया वो भी आ गया और जरा मंडली भी देखो.", राजकुमार जी ने अपने बेटे के अंदर आते हे उसको सबसे मिलवाना शुरू किया. संजीव के साथ विकास, बिजेन्दर, लकी, दीपक, मल्होत्रा जी का बीटा और और भी तक़रीबन 12-13 युवक आये थे. हॉल में अब भरपूर रौनक होने लगी थी 40-50 लोगो के होने से. संजीव को गुलदस्तों के साथ साथ जाने क्या क्या उपहार दिए जा रहे थे और फिर वो वक़्त भी आया जब खुद राजकुमार जी ने गाना चलते हुए युवक से मिछ लिया और आज पहली बार वो इतने लोगो में खुल कर कुछ कहने वाले थे.

वो उस जगमग नाचने वाले मंच की लाइट बंद करवाते हुए ठीक बीच में आ खड़े हुए तोह दरवाजे से भीतर आते तेजपाल उर्फ़ बिट्टू के साथ कुन्दनलाल जी और सोहनलाल जी को देख कुछ वक़्त रुक गए. जो युवा मंडली थी उन्होंने खुद को एक तरफ कर लिया था और बाकी सब भी इन्हे देख अपनी जगह से उठ खड़े हुए. मदिरा का दौर अभी शुरू करने से रोका हुआ था.

"माइक तुम बाद में पकड़ना राजू बीटा. आज की महफ़िल कोई और शुरू करने वाला है.", कुन्दनलाल जी तोह बड़े मजे से एक तरफ के 4 खाली सोफों में से एक पर विराजमान हो गए. हॉल में धर्मवीर सांगवान जी के साथ कृष्णेश्वर, छोल साहब, आचार्य जी, मल्होत्रा जी, िग कपूर, दिग निर्मल सिंह, रत्द सप गिल, चंद्रकांत का ये प्रभावी समूह आया तोह लगा जैसे हॉल के वो असंख्य जगमग बत्तियां भी इनकी चमक के आगे अधूरी है. हॉल में तगड़ी ख़ामोशी चा चुकी थी इन डिग्गाज्जो को देख लेकिन 6-7 बार बाला और वेटर बड़ी चपलता से सबको सीट दिखते हुए ठंडा पानी और जूस पेश कर रहे थे.

"फिर तोह मुझे लगता है की सांगवान चाचा जी या आचार्य जी आप हे इस मंगल काम को शुरू करे.", अब राजकुमार जी को तोह पता भी न था के ये काम मंगल होता है या कुछ और लेकिन उनकी हालत पर पूरे हाल में हंसी के ठहाके गूँज उठे थे. तालियां बजने लगी थी की सांगवान जी या आचार्य जी 2 शब्द कहे लेकिन धर्मवीर सांगवान जी ने खड़े हो कर हाथ से सबको शांत रहने का कहा. बलबीर भी यहाँ मौजूद था जो विकास के कान में कुछ कहता हुआ हंस रहा था.

"ऐसा है भाई, अब सब जवान लोग जब एकसाथ यहाँ शगल मेले में पहुंच हे गए है तोह फिर जो एक दो लोग बाकी है उनको भी आने दो. ाचा रहेगा की हमसे पहले हमसे बड़े हे कुछ बात कह दे.", अब सांगवान जी ने अपने से भी बड़ा कहा तोह इन्दर का माथा ठनका लेकिन उसको तोह यकीन था के ऐसा हो हे नहीं सकता.

"कौन भजन मां आ रहे है क्या?", शंकर ने मस्ती में ऐसा कहा था और उधर दरवाजे से अंदर दाखिल हुए हसमुख मां और कश्यप जी. जिनके पीछे हे संजीव के 2 और दोस्त थे.

"शंकर बीटा, अब तेरे मां से तोह मैं बड़ा हु. हाँ मेरे बड़े भाई साहब भी है और लो जी वो भी आ गए अपने पौटे के निमंत्रण पर.", इधर इन सबकी फट चुकी थी बात और व्यक्ति की समझते हे. पंडित रामेश्वर शर्मा जी सफ़ेद कुर्ते पयजामे में अपनी पूरी आभा के साथ पधारे थे और उनके साथ हे आया था उनका छोटा पौता अर्जुन.

'ओह बहनचोद, लग गए बे अपने सबके तोह. बापू हे आ गया दारु की महफ़िल में. अब होगा प्रवचन.", शंकर तोह दुबकने की नाकाम कोशिश कर रहा था और वैसा हे हाल बाकी सबका था जो हमउम्र थे. पंडित जी ने सबका हे हाथ जोड़ कर अभिवादन किया और अर्जुन को वही पीछे एक कुर्सी पर बैठने का इशारा करके आगे बढ़ चले. संजीव भी नजरे झुकाये था क्योंकि उसने तोह भनक तक न लगने दी थी अपने दादा को. और पंडित जी उसको हे हाथ पकड़ कर अपने साथ मंच की और ले चले. माइक राजकुमार से लेते हुए उन्होंने सबकी तरफ थोड़ा नाराजगी से देख.

"भाई इतना सन्नाटा क्यों है? ऐसा शोले में था न एक डायलाग.?", इस बात पर हे उनकी बुजुर्ग युवा मण्डली ठहाका मार कर हंसने लगी और पंडित जी भी.

"अरे माफ़ करना वो ऐसा है की हमको निमंत्रण नहीं मिला था लेकिन घुसपैठ की पुराणी आदत है तोह अपनी टीम को लिए जबरदस्ती आ पहुंचे.", एक बार फिर से हंसी का शोर गूंजा और इस बार उनके साथ घर के लड़को को छोड़ बाकी सभी थे.

"ये राजू, बचपन से हे खामोश तबियत है लेकिन शंकर, उमेद और नरिंदर ने इसको शराब पीनी तोह सीखा दी पर बोलना न सीखा पाए. हाँ तोह मैं सही कह रहा हु न माँ के लाडले?", रामेश्वर जी ने इधर इन्दर को सबके सामने लपेट कर बता दिया थे के वो उसके बाप है. इन्दर तोह खिसिया गया था और शंकर की बाजू पकड़ कर नजरे चुराने लगा.

"आप सभी यहाँ पधारे तोह इस सबकी वजह है ये प्याली या प्याला जो भी कहो. अब जीवन में जब आप कभी दोस्त न बना पाओ तोह अकेले कभी किसी ठेके पर बैठ जाना पव्वा ले कर. बहार निकलोगे तोह मैं हल्का हो चूका होगा 2-3 अनजान दोस्तों के साथ. सोमरस, मदिरा, शराब बुराई नहीं है जब ये शगल मेले में प्रयोग हो. हमारे बचो के इतने मित्र और शुब्चिन्तक देख हम खुदको देखते है के भाई ये तोह बहोत भरी गलती हो गयी. लेकिन गलती सुधरने आ गए हम आज. ये है हमारा लायक बचा संजीव, बचपन में इसको कभी जीवा तोह कबि कालू बुला देते थे तोह गुस्सा हो जाता था. आज ये होनहार और काबिल युवक बन चूका है जिसकी खुद की एक मजबूत पहचान है. धर्मवीर भाई साहब बरसो से सर्जन है और उनकी छाया में हजारो डॉक्टर बने. वालिए मेरा बीटा हे है और आज तक कभी किसी केस में विफल नहीं रहा. बहोत बड़ा नाम है अपने डिपार्टमेंट में. बिजेन्दर मेरा पौता, पहलवान है, विकास भी. इनके कोच खुद राष्ट्रीय प्रतिभा और द्रोणाचार्य है. सबमे कुछ भी एक जैसा नहीं है लेकिन आज सब एक साथ है. क्यों?"

"शराब अंकल ji.",Ye था अपना बलबीर आदतन बोल हे गया.

"वाह मेरे लाडले तू है तोह 5 फुट का लेकिन ज्ञान बहोत है. हाहाहा.. सही कहा इस बेटे ने की सभी एकत्रित है और सबमे एक शौक सामान है. ज्यादा वक़्त न बर्बाद करते हुए मैं अपने पौटे संजीव को जीवन के उस नए क्षण की ढेरो शुबकामनाएं देता हु जिसमे आने वाले समय में वो एक पति, पिता और आगे ऐसा हे जिम्मेवार इंसान बरकरार रहे. ये हमारे पौटे के नए जीवन की ख़ुशी में.", बार बाला को अपने पास बुला कर आचार्य जी ने समझा दिया था के क्या करना है. वो ट्रे में एक गिलास उचित शराब का बना कर पंडित जी के करीब आ कड़ी हुई. वही गिलास सबको दिखते हुए रामेश्वर जी ने संजीव के लबो से लगा दिया. फिर से ट्रे में रख कर अपने पौटे को गले लगाया तोह अब तालियों के शोर से पूरा हॉल गूँज उठा. इन्दर तोह सोफे पर खड़ा हो कर सीटियां मार रहा था.

"ोये बस कर कमलिया, मेरी पंजाबी बहार आयी तेह तुस्सी सारे दफा हो जाने. बह जा थल्ले, लगाया मवालियाँ वांग शैदाई.", रामेश्वर जी ने मीठी झिड़की लगाईं थी अपने बेटे को जिस पर माहौल फिर से मजेदार हो गया.

"आप लोग इस तरफ अपने मजे करो बचो. हम ये बगल वाले हॉल में हमारे किस्से कहानी बतियाते है. संजीव बीटा, मेजबान हो और आखिर तक बरकरार रहना है. और हमारा अंगरक्षक अब वापिस लौट सकता है, जूस नास्ते के बाद.", अर्जुन की तरफ ये इशारा था पंडित जी का जो बहोत खुश था अपने दादा जी के इस नए पहलु को देख कर. सभी बुजुर्ग बगल वाले हॉल में चले गए थे जिनकी सेवा में खुद उमेद ने 5 वेटर चेतावनी के साथ तैनात किये थे. और अभी तोह जैसे जिनका अनुमान तक न था वो शक्श भी पधारे. ये रौनक और गजेंद्र भल्ला थे जो एक बार अपने सुरक्षाकर्मियों के साथ अंदर दाखिल हुए लेकिन फिर उन्हें बहार जाने का कह कर अपनी तरफ बढ़ते उमेद और शंकर से आधे रस्ते में हे गर्मजोशी से मिले.

"भाई साहब, मतलब आपने कीमती समय निकाल हे लिया फिर.?", ये शंकर ने कहा था और उनके हे करीब खड़े अर्जुन को एक बार ाचे से देख कर गजेंद्र भल्ला ने जो कहा वो सुन्न कर खुद शंकर का सीना चौड़ा हो गया.

"एहसान करके आपने तोह हमे खरीद हे लिया है डॉक्टर साहब. ये आपके छोटे जनाब ने हमको जो खुशिया लौटाई है इसकी भरपाई भल्ला मरते दम तक न कर सकेगा. कैसे हो अर्जुन मिया?", गजेंद्र भल्ला ने ख़ुशी ख़ुशी अपने गले की चैन अर्जुन को पहनाते हुए सीने से लगाया था. ऐसा हे रौनक ने भी किया जो पंडित जा का ख़ास और इन सभी से उम्र में बड़ा था.

"वाह भाई, मतलब प्रदेश के इस हिस्से में तुम लोगो ने अपनी हे दिल्ली बना दी. बहोत खूब उमेद और जरा हमे ये भी बता दो की पंडित जी के दर्शन करने पहले जाए या उसके लिए रात भर रुकना होगा.?", रौनक का हाथ अभी भी अर्जुन के कंधे पर था.

"दादा जी भी आये है अंकल और वो उस तरफ है अपने दोस्तों के साथ.", अर्जुन ने रौनक को बताया तोह उमेद खुद हे उन दोनों को अपने साथ पहले वही ले चला जहा बुजुर्ग मण्डली जमा थी.

"मतलब तुम बाज नहीं आओगे बरखुरदार? चलो आज मेरे साथ बैठो और सबको अपना परिचय भी दो.", शंकर जी अपने सुपुत्र को हाथ पकड़ कर उधर हे ले चले जहा उनकी मित्र मण्डली बैठी थी. अर्जुन थोड़ा घबरा रहा था क्योंकि उसके पिता ने कही उसको शराब चखा दी तोह जाने क्या हो. इस तरफ वाले 4 सोफों पर एक पे वालिए, जोगिन्दर, राजकुमार थे, दूसरे पर सांगवान, भुप्पी, गुलाटी.. तीसरे पर 2 सर्जन के साथ राजेश और एक पर सिर्फ राजकुमार जी. दूसरी तरफ वाले 4 सोफों पर भी इनके हे हमउम्र थे और दोनों तरफ मेज पर अब जाम लगाए जा चुके थे कई तरह के व्यंजनों के साथ.

"ये है जी हमारे पिता जी का सेनापति.. Hahaha..Actually हे इस अर्जुन, माय यंगेस्ट चाइल्ड एंड family's 9तह प्राउड. इस से पहले हमारे घर में 8 बचे है और सबसे बड़ा संजीव, सबसे छोटा ये. ज्यादातर तोह इस से वाकिफ होंगे लेकिन डॉ कार्तिक और डॉ परेश आप आज पहली बार मिले है.", अर्जुन को वो लोग भी बाकी सभी के साथ प्रशंशा से देख रहे थे.

"बीटा पापा जैसे हे हो, बस थोड़े से ज्यादा लम्बे. होप यू अरे नॉट इंटरेस्टेड इन मेडिकल लिखे हिम.", ये डॉ परेशा था जो शंकर जी से ाचे से वाकिफ था. इस बार जाम सभी तरफ उठे और संजीव के नाम पर खूब कांच टकराये. गाने फिर धीमी आवाज में बजने लगे थे और शंकर जी ने खुद हे एक वेटर से जूस का गिलास ले कर अपने बेटे की तरफ बढ़ाया.

"भाई परेश, ये मेडिकल के म से भी कोसो दूर है और मुझे इस बात की बहोत ख़ुशी है. अपने संधू साहब भी वाकिफ होंगे अर्जुन से और इसका मां तुम्हारी बगल में हे बैठा है जो वाकिफ नहीं होगा.", शंकर जी की बातों में शायद अपने पिता का असर था जो हास्य पट दर्शा रहे थे.

"संधू क्या बताएगा शंकर. ये मेरा पुत्तर है जिसको मैं तुम सबसे ज्यादा जानता हु. गलत कहा क्या अर्जुन बीटा?", वालिए जी की बात पर अर्जुन बस झेंप गया था.

"चल बीटा तू मौज ले उधर अपने भाई के साथ क्योंकि मैं जानता हु तू खुश तोह है लेकिन मजे में नहीं.", द्वारपाल जी ने ऐसा कहा तोह शंकर जी ने भी इजाजत दी क्योंकि बलबीर और विकास के साथ संजीव भी अर्जुन को इशारा कर रहे थे. अर्जुन सबसे हाथ जोड़ कर अपना गिलास लिए चल दिया.

"शंकर यार तुम्हारी ब्लूद्लिने में कुछ अलग है क्या? तुम्हारा वो भाई तोह दैत्याकार है हे ऊपर से ये इन्दर और फिर तुम्हारे साथ साथ ये अर्जुन भी.", डॉ कार्तिक ने सिग्गट सुलगाई और इतने में हे टेबल पर वेटर ash-tray रख गया.

"कार्तिक, ब्लूद्लिने का तोह पता नहीं लेकिन सभी को ब्लड से बहोत लगाव है. हाहाहा...", इनके किस्से भी शुरू हो चुके थे और अंदर की तरफ भी बुजुर्ग मंडली के ठहाके गूंजने शुरू थे. संजीव का काफिला भी उसको लपेट चूका था और ढ़ढ़ढ़ गिलास टकराये जा रहे थे. अभी ये रात शुरू हुई थी जिसके तराने गुजरते वक़्त के साथ तेज होने थे.

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उस बिस्टेर पर अब मुस्कान पूरी तरह मदहोश सी होती हुई अर्जुन से बुरी तरह लिपटी थी. अगल में बगल लेते वो दोनों सब भुला कर निरंतर बस होंठो को इस कदर चूम रहे थे की इसके बाद शायद मुस्कान को सूजे हुए होंठ का जवाब देना पड़ता. मजबूत मरदाना हाथ उन कोमल उभारो को कभी मसलते तोह कभी माध्यम अकार के उस उभरे हुए लचीले से कूल्हे को. मुस्कान के मासूम से चेहरे पर जमाने भर का प्यार और समर्पण था अर्जुन के प्रति.

"सॉरी.", अर्जुन थोड़ा पीछे होते हुए मुस्कान के चेहरे पर आये बालो को पीछे करता अपने निचले हाथ से उसका चेहरा थामे निहार रहा था बस.

"कोई जरुरत नहीं सॉरी की. मैंने कभी ज़िद्द नहीं की और तुमने कभी जबरदस्ती. देखो आज मेरा दिल था और तुमने भी मुझे अपने सीने से लगाया. अब बस इस मुस्कान की तरफ ध्यान दो, सिली थॉट्स छोड़ कर. ये जो इतनी देर से निचे कूद रहा है न, इसको जगह दिखती हु मैं.", मुस्कान ने अपने होंठो फिर से अर्जुन के होंठो पर लगते हुए बड़ी हे हिम्मत का प्रदर्शन किया. अर्जुन रोकना चाहता था लेकिन मुस्कान की ख़ुशी से ज्यादा नहीं. भरी भरी मांसल जांघ अर्जुन के ऊपर लाते हुए मुस्कान ने वो लोखंड सा मजबूत और गरम लिंग अपने गुलाबी योनि कुंड से मिला दिया.

उस दहकते हुए सुपडे को कुछ पल महसूस करने के बाद आहिस्ता से कमर का दबाव बढ़ाया तोह हलके अवरोध के बाद आधा सूपड़ा उस छोटे से छेड़ को फैलता हुआ अंदर समां गया. मुस्कान का जिस्म थरथराया लेकिन अर्जुन के कंधे को मजबूती से पकड़ते हुए उसने पूरी ताक़त से अपना शरीर जैसे अर्जुन की तरफ दे मारा.

"इससष्ठ.. aahhh...Ummm",Bas ऐसे हे दबे घुटे लफ्ज़ सुनाई दिए और मुस्कान बिस्टेर पर करवट के बल लेती हुई अब और ज्यादा जोश से अर्जुन के होंठ लगभग खाने हे लगी. भयंकर पीड़ा को वो बर्दाश्त कर रही थी क्योंकि आधे से ज्यादा लिंग उसकी नाजुक रेशमी छूट को भेंड़ चूका था. 2 महीने के अंतराल में ये तीसरा हे संसर्ग था.

"आराम से बाबा, आराम से. मैंने कहा भी था के दर्द होगा. बस अब हिलना नहीं.", अर्जुन ने होंठ अलग करते हुए पसीने में नहीं मुस्कान के माथे को सहलाते हुए दोनों आँखों को चूम कर कहा. हलकी नम्म आँखों से वो मुस्कुरा रही थी जैसे दर्द अर्जुन को हुआ हो.

"तुम न इसलिए ये नहीं करते क्योंकि मुझे दर्द में देख नहीं सकते. लेकिन ऐसे दूर होने से क्या कुछ अलग हो जायेगा? सपनो में न, तुम मुझे ऐसे हे अपने साथ चिपका लेते हो. अब तोह डर भी नहीं लगता तोह दर्द क्यों होने लगा. बस थोड़ा सा तोह होगा हे न, इतना बड़ा है ये. Umaahhh.",Uski बातें भी उतनी हे मासूम थी जितनी खुद मुस्कान. एकदम भोली और दिल की साफ़. अर्जुन अब उसकी अपने ऊपर राखी जांघ को सहलाता हुआ बड़े हे धीमे से कमर को गति देने लगा. कोई जोर का दिखावा नहीं था और न चाहत की आखिरी हिस्से को मापना हे है. बस उन तराशे हुए लचीले कूल्हों को हल्का सा दबा कर हर धक्के के साथ मुस्कान को करीब कर लेता.

"आह्हः.. ऐसे हे बस .. देखो.. उम्म्म.. बहार दीदी और जीजा जी .. है और हम यहाँ.. अर्जुन.. होल्ड me..",Baat कहते कहते हे मुस्कान झड़ने लगी थी और अर्जुन के गाल पर गाल टिकती वो इस सुख को अपने भीतर भरने लगी थी जिसमे अर्जुन उसकी आत्मा तक बस चूका था. यहाँ अर्जुन भी शांत था जो बिना मुद्रा बदले बस मुस्कान को सहलाता रहा. जब फिर से कमर हिलने लगी तोह मुस्कान ने शरारत से उसको देखा.

"दीदी ने बहोत मजे लेने है तुम्हारे जाने बाद.. उफ़.. अरे बाबा.. धीरे न.. आठ.. वाइल्ड सेक्स सिर्फ हॉस्टल में.. उम्मम्मम.", ऐसे एक टांग पूरी तरह से ऊपर चढ़ाने पर मुस्कान की गीली योनि लगभग पूरा हे लुंड अंदर ले रही थी और ek-saar से धक्के बस 2-3 इंच अंदर बहार करते. कॉमर्स निचले कूल्हे की चिकनाहट से चादर तक आने लगा.

"तुम बहोत प्यारी हो मुस्कान और शायद कभी ऐसा हो जब मुझे तुमसे दूर जाना होगा.", अर्जुन कुछ रुका तोह मुस्कान उसको प्यार से पीठ के बल करती हुई बिना अलग हुए अर्जुन के ऊपर आ लेती. इस तरह जो बाकी बचा था वो हिस्सा भी मुस्कान के काम द्वार के अंतिम छोर तक जाने लगा. लेकिन इसमें जरा भी वासना न था और न हे कोई जल्दी हल्का हो कर अलग होने की. अर्जुन उसकी इस हरकत पर मंद मंद हंसने लगा था.

"देखा, मेरा नाम हे मुस्कान नहीं है. मैं तुम्हे स्माइल करवा देती हु. उफ़.. बस ये नहीं हँसता कभी.. आठ.. और ये दूर जाना, पास आना जैसा अभी मत सोचो. मेरी शादी वही होगी जहा पापा कहेंगे और तुम्हारी तुम बता हे चुके हो. आह्ह्ह्हह.. ऐसे हे बस.. जितने दिन यहाँ है मुझे बस कुछ घंटे की चाहत है तुम्हारे साथ, लेकिन तुमसे कोई वादा नहीं चाहिए. उम्..", मुस्कान भली भांति समझ रही थी की अर्जुन जोर से नहीं करने वाला. उसने हे अपनी योनि को कस्ते हुए पूरी हिम्मत के साथ कमर तेज कर दी. उत्तेजना अर्जुन की तरफ बढ़ी तोह सर उठा कर उसने फिर से एक निप्पल मुँह में ले लिया..

"उम्म्म्म.. बचे वाले आअह्ह्ह... तुम्हारे ये काम.. हर रात याद आते है.. आराम से काटो नहीं.. आह्हः..", गुलाबी योनि से हल्का सफ़ेद तरल बहने लगा था. घर्षण अभी भी कसाव से भरा और उतना हे तेज. मुस्कान के गले से पसीने की लकीर दोनों चुचो के बीच पहुंची तोह वो नमकीन पानी अर्जुन ने जीभी फिरते हुए निचे से गर्दन तक साफ़ कर दिया.

"पता नहीं कुछ तोह अलग सा कनेक्शन है हम दोनों में मुस्कान. जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है की तुम्हारे दर्द की वजह मैं हु या शायद तुम्हारा दर्द काम कर सकता हु.", अर्जुन की बात सुन्न कर मुस्कान की आँखों में आंसू आ गए लेकिन ख़ुशी भी चेहरे पर साफ़ थी.

"मैं तुमसे दूर जा कर भी दूर नहीं हो सकती अर्जुन. माँ का फ़ोन आया था कुछ देर पहले.. आठ.. मैं 22 को उनके साथ वापिस जा रही हु.. हमेशा के लिए नहीं, बस जुलाई एन्ड तक. एंड ी लव यू.. शहहह.. तुम कुछ मत कहना..", अर्जुन को चुप करवा कर मुस्कान थोड़ा तेजी से हिलने लगी और एक बार फिर वो चरम प्राप्त करती उसके सीने पर लुढ़क गयी. अभी वो खुद को संभाल हे रही थी की दरवाजे पर हलकी दस्तक होने लगी.

"मैं देखता हु?", अर्जुन ने मुस्कान को बड़े आराम से खुद से अलग किया लेकिन उसके खड़े होने से पहले मुस्कान ने उसको वापिस बिस्टेर पर लिटा दिया. बदन पर चादर लपेट कर वो बड़ी अदा से बोली.

"दीदी है बहार और दरवाजा खोल कर मैं चली बाथरूम और तुम अपने होने वाले बचे की अम्मा को सम्भालो.", अर्जुन जहा हैरान होने के बाद मुस्कुराया वही मुस्कान लंगड़ाती हुई दरवाजे की चिटकनी खोल कर बिना बबिता से कुछ कहे कमरे में हे एक तरफ बने बाथरूम में चली गयी.

"नाहा लियो कबूतरी और तेरा दरवाजा बहार से बंद कर रही हु.", बबिता ने कमरा बंद करने के साथ हे आगे चल कर मुस्कान के बाथरूम का दरवाजा बहार से लगा दिया. अर्जुन को अब गोलू का ध्यान आया लेकिन बबिता तोह इत्मीनान से उसको देखती हुई अपना वो ढीला कमीज उतार कर सिर्फ उस असाधारण ब्रा और पजामी में कड़ी थी. पजामी का नाडा ढीला करती हुई वो अर्जुन को हवाई चुम्मा देती हुई बोली.

"गोलू की टेंशन न ले डार्लिंग. वो गया नोहरे में और अब हुक्का चलेगा एक घंटा लेकिन अकेली मेरी कबूतरी इस खागड को न संभल सकती और न तू उसपे जोर लगावेगा. 10-15 मिनट अपनी इस झोत्ती पे भी चढ़ाई कर ले, दूध का सवाल है.", बबिता ने आगे बढ़ कर तुरंत हे उस अकड़े हुए मूसल को थाम लिया. मुस्कान के चुतरस से लिथड़ा वो लाल सूपड़ा हलके से चूम कर वो अर्जुन के ऊपर आने लगी थी.

"अरे ऐसे कैसे?"

"लुब्रीकेंट तोह आलरेडी हो चूका डार्लिंग, चुदाई हम भी देख रहे थे जिस तरह तुम tota-maina लिपट के वो रोमांटिक सेक्स कर रहे थे. हमारे साथ बनो जंगली और दिखाओ अपनी ताकत.. आह्ह्ह्ह.. बहनचोद गोलू.. देख असली खागड.. आठ हहहह.", बबिता की तोह एक बार सांस हे अटक गयी थी जब धम्म से वो उस गीत से बड़े मूसल पर एकदम आ बैठी. अब अर्जुन हंस रहा था और बबिता फड़फड़ा रही थी. ये मुठभेड़ जोरदार होने वाली थी.

और अर्जुन को अंदाजा न था के एक मुठभेड़ इस हवेली से बहार भी होने वाली है. इस सबसे अनभिज्ञ वो अब तूफानी दौर के लिए तैयार हो चूका था.
 
अपडेट अगले एक हफ्ते तक नहीं आ पायेगा. असुविधा के लिए खेद है. आज अपडेट जरूर देना था परन्तु कुछ काम के प्रति मसला हो गया है तोह वो सब सोल्वे करना बहोत ज्यादा जरुरी है. माफ़ करना दोस्तों इतना इन्तजार करवाने के लिए लेकिन अभी कुछ काम से जुडी परेशानी है इसलिए लिखना मुमकिन नहीं होगा. एक हफ्ते तक वापिस कहानी पर आने की पूरी कोशिश रहेगी. 🙏
 
अपडेट 177

Kisse-Kahani (3)

"हम कॉलेज में थे तोह शंकर सिर्फ शरीर ठीक रखने के लिए हे कुश्ती खेलता था भाई. और वह इसकी टक्कर में भी सिर्फ 3 लोग होते थे जिनमे से 2 तोह यहाँ मौजूद हे है.", जोगिन्दर जी ने जाम के साथ पुराने दिनों की चर्चा शुरू करते हुए कहा. अशोक जी भी बड़े गौर से सुन्न रहे थे और वैसे हे बाकी सभी. नरिंदर हल्का मुस्कुरा रहा था जैसे उसको पता था के आगे बात कहा जाने वाली है. 2-2 जाम के बाद अब 8 सोफे आपस में एक घेरा बना चुके थे.

"मैंने तोह सुना था शंकर मुक्केबाजी में खिलाडी था.", ये बात वालिए जी ने कही थी और उनके समर्थन में 2-3 और गर्दन हिली. शंकर की बगल में बैठे हुए उमेद और गजेंद्र भल्ला भी तबियत से किस्सा सुन्न रहे थे.

"अरे भाई साहब, अपना शंकर कुश्ती इसलिए खेलता था की उमेद, इन्दर और विष्णु को प्रैक्टिस करवा sake.Fir अगले साल इन्दर के साथ बलवान आ गया था जो इन सभी के समकक्ष था. शंकर ने एकाग्रता के लिए मेरे साथ बॉक्सिंग सीखनी शुरू कर दी. जानते हो ये पहला व्यक्ति था जो एक हे साल में अन्तर यूनिवर्सिटी खेला और जीता. मेरी और इसकी केटेगरी अलग न होती तोह जाने ये मेरी क्या दुर्गति करता.. हाहाहा.. वैसे विष्णु और बलवान से कभी फिर मुलाकात हुई क्या तुम्हारी इन्दर?", संधू जी ने जो नाम लिए थे वो सुन्न कर एक पल को तोह शंकर का भी दिमाग घूम गया था. भल्ला को अब जान पड़ा था की ये लोग जीवन में व्यापारी नहीं है, एक खून है जैसे.

"न संधू जी. आखिरी बार बलवान तोह हमारी शादी में आया था लेकिन विष्णु उस हादसे के बाद अंतिम वर्ष के पेपर दिए बिना हे गायब हो गया था. गज्जू ने तोह पापा से बोल कर jaanch-padtal भी करवाई थी लेकिन उसका कुछ पता न चल सका. हीरा था विष्णु लेकिन उसके साथ किस्मत ने बड़ा हे भयंकर खेल खेला.", नरिंदर की बात सुन्न कर जैसे परम और गुलाटी को भी कुछ याद आ गया.

"ये गज्जू कौन है भाई?", भल्ला बीच में हे बोल उठा.

"हाहाहा.. गजेंद्र भाई लगता है आपका प्यार का नाम भी गज्जू है.? ये भी देखो किस्मत का खेल. दोनों पार्टनर का छोटा नाम गज्जू. ये उमेद है न अपना इसका नाम हे गज्जू है और हमारे दादा इसको गजराज बुलाते थे.", नरिंदर ने माहौल को ठीक करना चाहा पर जिज्ञासा तोह सभी को थी इन दोनों नाम को जान ने की. भल्ला मुस्कुराया लेकिन फिर उसने भी वही सवाल किया जो सभी जान न चाहते थे.

"हाहाहा.. सही कहा भाई इन्दर तुमने, हमारे पिता हमको गज्जू हे बुलाते थे. वैसे जब किस्सा सुना हे रहे हो जो दिलचस्प लग रहा है तोह फिर पूरा बताओ न भाई. तुम्हारे बारे में तोह हमको पता लग हे चूका है, किसी पौराणिक योद्धा सा जीवन रहा है तुम्हारा और भोले भाई का. ये बलवान और विष्णु की क्या कहानी है.?", अशोक जी ने इशारे से एक वेटर को 24 गिलास भरने का कहा और 2 वेटर वह सजी प्लेट में गरम गोश्त, नमकीन आदि परोसने लगे. धीमा संगीत निरंतर चल रहा था जिसमे खोये शंकर ने हे जवाब देना बेहतर समझा. इस बीच अर्जुन भी इनसे कुछ हे दुरी पर कुर्सी घुमा कर आ बैठा, बलबीर के साथ.

"छोटा मुँह और बड़ी बात लगेगी गजेंद्र भाई. ये गुलाटी, जाट, भुप्पी और ये दोनों (डॉक्टर दोस्त) मेरे हुंसाथ थे, डॉक्टरी में. संधू वह इन्दर का सीनियर और मेरा दोस्त था. उमेद भी इसकी हे कक्षा में था और हम सब का मेलजोल कॉलेज से भी पहले से हे था आपस में. जोश निकलने के लिए kushti,kabaddi या बॉक्सिंग में लगभग हम सभी शामिल रहते थे. इन्दर स्टेट चैंपियन बना था कुश्ती में लेकिन इसने वो ट्रॉफी कभी स्वीकार नहीं की थी. क्योंकि हम सबसे बेहतरीन खिलाडी था विष्णु वर्धन. मैं बड़ाई नहीं करूँगा लेकिन उसने मुझे और गज्जू को 30 सेकंड से ज्यादा कभी टिकने नहीं दिया था. बलवान इनके समक्ष था और घर परिवार से भी ठीक था हम सबके जैसे. विष्णु खेल कोटे में दूसरे वर्ष में आया था और थोड़ा गरीब परिवार से था.", शंकर ने सिग्रत्ते सुलगते हुए डब्बी गुलाटी की तरफ बधाई और दूसरी तरफ भल्ला और दलीप ने भी धुआं उठाया.

"मतलब सचमुच वो इतना ख़ास था क्या शंकर? अपने इन्दर से भी ज्यादा? और फिर क्या हुआ उसके जीवन में.", दलीप को भी जैसे इस सबका पता न था.

"फिर तीसरे वर्ष में इन्दर को विष्णु के बारे में सब पता चला. इसने और अज्जू ने कोशिश भी की थी की उसको पता लगे बिना उसकी हालत में सुधर किया जाए. उस से पहले हे हमारी एक बहोत बड़ी मुठभेड़ हुई जिस से बहोत कुछ बदल गया.", शंकर ने सोमबीर सिंह वाला प्रकरण साफ़ न बताते हुए कुछ विराम लिया.

"सबको पता है भाई उस बात का और गजेंद्र को फिर कभी बता देंगे. मुझे भी याद है की विष्णु और इन्दर हम दोनों के पीछे आये थे वह.", उमेद ने बात आगे बधाई. इन्दर ने भी सर हाँ में हिलाया.

"आप लोग समझते हो की हम 3 लोगो ने वो कारनामा कर दिखाया था लेकिन उसका दूसरा सच ये भी है की इन्दर और विष्णु समय रहते न आते तोह बात बदल जाती. उस घटना के बाद विष्णु कुछ समय सिर्फ इन्दर के साथ हे रहा और एक दिन खबर आयी की उसके परिवार को ख़तम कर दिया गया है. बाप, माँ, छोटा भाई और 2 बहने थी उसकी जिनको सोये में हे मार डाला था कुछ दरिंदो ने. फिर वो एक बार कॉलेज आया लेकिन इम्तिहान नहीं दिए. उसकी खबर हे नहीं लगी और वो गाँव भी नहीं गया वापिस.", शंकर ने बात को काम शब्दों में हे निबटा दिया था क्योंकि माहौल ख़ुशी का था लेकिन बात अतीत की कुछ दर्द और दिल से जुडी.

"बहोत बुरा हुआ था बेचारे के साथ और जानते हो शंकर उसके बाद बलवान के परिवार के साथ भी कुछ वैसा हे हुआ था. लेकिन इन्दर तब जा चूका था और तुम डॉक्टर बन गए थे.", संधू जी ने एक और धमाका किया.

"चलो इस पर फिर कभी चर्चा करेंगे सरदार जी. आज तोह दस्तूर अलग है, मामला भी यारों के साथ हसीं शाम वाला है तोह आपको हे लपेट लेते है. भाइयों, अपने जोगिन्दर संधू जी बॉक्सिंग के द्रोणाचार्य है लेकिन इनके इश्क़ की भी मजेदार कहानी है. अब सरदार जी, जरा किस्सा अपने लफ्ज़ो में सुनाओ नहीं तोह हमारा मिर्च मसाला ज्यादा हो जायेगा.", नरिंदर ने आदतन उन्हें लपेटा तोह तालियां बजने लगी थी. सभी का चेहरा अब संधू जी की तरफ था जिन्हे वालिए जी भी चुटकी काट रहे थे.

"ओह भरवा (भाई) कित्थे फंसा तह यार? लो जी फिर बिना मिर्च मसाले के सुनाता हु आप लोगो को. कहने को तोह मैं जाट फॅमिली से हु लेकिन वो दौर कुछ और था. हमारी श्रीमती जी थी पटिआल की और हम क्सक्सक्सक्स शहर पंजाब के. कॉलेज से पहले साल छुट्टियों में घर के लिए निकला था और इन्दर मुझे लेके आया अपने शहर और इधर से हम दोनों गए bus-adde.", अब बाकी सबके साथ कुछ दूर बैठा अर्जुन भी मंद मंद मुस्कुरा रहा था.

"फिर भाई साहब?", तेजपाल ने अपने आप हे पूछ लिया.

"फिर भाई मैंने देखि पीले सलवार कमीज में बसंत की पतंग से लहराती हुई वो सीखनी जो हाथ में जाली वाली पति लिए पसीना पांच रही थी. बस का इन्तजार करती हुई वो थोड़ा घबराई हुई जैसे किसी को इधर उधर ढूंढ़ने में लगी थी. इन्दर बहोत शरती था और इसने देखा उसको और मुझे उसको देखते हुए. जाने इसने क्या कहा था उसके पास जा कर की वो और भी घबरा कर थोड़ा आगे चली गयी. फिर बस आयी तोह किस्मत से अड्डे पर उसमे जाने वाले हम 2 हे सवार थे. सीट भी 2 लोगो वाली एक हे खाली और जैसे हे मैं उस सोहने गुलाब के पास बैठा उसने मेरा गाल इतनी जोर से लाल किया था की बस की ब्रेक भी लग गयी.", बात कहते हुए हे संधू जी ने अपने गाल पर हाथ रख लिया जैसे वो पल अभी तजा तजा हुआ हो.

"हाहाहा... ये कैसी लव स्टोरी सुना रहे भाई? मतलब एक शब्द शुरू होने से पहले हे थप्पड़ खा बैठे सरदार जी? वैसे इन्दर भाई ने कहा क्या था जो आपकी इतनी ijjat-afjaai हुई?"

"ये तोह इसको हे पता है. मुझे तोह आज हे याद आया के काण्ड में इसका भी हाथ था और मैं पूछना भूल गया."

"अरे जोगिन्दर भाई, आपने हे तोह कहा था उस वक़्त के 'इन्दर, इस कुड़ी दे विच न पहले टॉड दी दारु तोह वि वध नशा है' और मैंने उन्हें बताया था के वो जो सरदार युवक है उसने नशा किया हुआ है और वो मैंने कुछ दिन पहले थाने में भी देखा था. आप संभल कर जाना.", नरिंदर के खुलासे पर जोरो से हंसी की आवाज गूँज उठी थी.

"ओह तेरी तोह.. घर का इन्दर लंका लगाए. देख ले शंकर इसके काण्ड. और भाइयों उसके बाद धुप में लाल गाल पे थप्पड़ लगते हे मेरी आँखों में पानी आ गया था जिसको हमारी बेगम ने शायद नशा हे समझा. लोग तोह मौका देख रहे थे मेरी ठुकाई करने का लेकिन नशे की बात सुन्न कर उन्होंने मेरा बस्ता देखा तोह उसमे बॉक्सिंग के ग्लव्स, मैडल और कॉलेज का कार्ड आदि मिला उन्हें. मैं रब्ब दी सौ चुक्की की मैं खिलाड़ी हु और जीवन में कभी कोई नशा पत्ता नहीं किया, बौ जी मेरे गुरुघर में पाती है. फेर सब शांत हुए लेकिन अब सरदारनी जी तोह रोने हे लग पड़ी और अगले 4 घंटे बस मैं गाल पे हाथ रख उन्हें ख़ामोशी से खड़ा हुआ देखता रहा. पटिआला बस अड्डे से मोटर बदलनी थी मुझे लेकिन मैं रुक गया कुछ देर. वो रिक्शे पर बैठ के निकली तोह भी मुझे मदद के देखती जा रही थी. पैसे ढेले ज्यादा न थे मेरे पास इसलिए एक एक गली दुरी रखता मैं उसके पीछे दौड़ा. घर ज्यादा दूर न था और उसने भी मुझे आखिर में देख लिया जब वो घर में जाने लगी. उस दिन किस्मत सचमुच मेहरबान थी.", संधू जी ने यादों में हे खुश होते हुए अपना प्रेम विवरण सुनाया तोह सबको आगे सुन्न ने की जल्दी हुई. हर व्यक्ति पूरा जाम एक घूँट में गले से उतार गया.

"फिर?"

"किस्मत ऐसे कैसे मेहरबान हुई?"

"हुआ ये भाई के हमारी बिल्लो का जो घर था उसके साथ वाला हे मेरी सगी बुआ का था जो मुझे एकदम से अपने सामने देख ख़ुशी से गलियारे से भागती बहार आयी और गले लगा कर अपने साथ अंदर ले गयी. वो टाइम था जब रिश्तेदार saal-mahino में मिलने आते तोह दिल से सत्कार होता था. 20 दिन मैं बुआ के रहा और फिर बुआ की बेटी ने हे बिल्लो से मेरी बात करवाई. 2 साल, मई हर छुट्टी में पहले बुआ के जाता और फिर कुछ दिन बाद अपने घर. बुआ ने तोह मेरे कहने से पहले हे उनके यहाँ बात कर ली थी और लव स्टोरी को अर्रंगे मैरिज बनवा दिया. सच कहु तोह अगर इन्दर वो कारनामा न करता तोह हमारी बेगम तोह शायद कभी ध्यान भी न देती की एक सरदार लड़का, उसको दिल में बसा चूका है. वो थप्पड़ और मेरा करैक्टर जान कर हे उसने मेरे बारे में सोचना शुरू किया."

"देखा सरदार जी, मतलब मानते हो न के मैं कभी भी कुछ गलत नहीं करता.? इस बात पर कॉलेज वाला पहलवानी नाच सरदार जी के साथ करेंगे अपने शंकर भाई और .... सबके चाहते भुप्पी उर्फ़ भूपेंदर भैया. ओह भाई संगीतकार, गण लगा दे 'जीजा तू कला मैं गोरी घनी'.", इन्दर ने ये रुक्का जोर से लगाया था और शराब के हलके सुरूर में झूमते संधू जी तोह अपने साथ सांगवान को भी लिए उस मंच पर चल दिए. शंकर और भुप्पी को धक्के दे दे कर वह भेजा गया और फिर इस हरियाणवी गाने के महिला बोल पर संधू जी के ठुमके और पुरुष वाणी पर शंकर जाम पकडे किसी पहलवान सरीखे एक टांग एक हाथ ऊपर उठा कर झूमने लगा. कुछ हे देर में वो सभी 2 दर्जन लोग वह गिलास लिए उछाल कूद करने लगे थे. समय जैसे 25-26 साल पीछे चला गया हो और ये कॉलेज का varshik-utsav हो जहा दारु शामिल थी बस अनुशाशन से परे.

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बबिता के वो सुघड़ और हाहाकारी गोर नितम्भ aaj-tak बेदाग़ थे. फूली हुई छूट का अंदरूनी गुलाबी भाग किसी रबर की तरह फैल कर अर्जुन के सख्त और मॉटे लंग को पूरा अंदर समाहित किये कैसा हुआ था. सचमुच वो दुधारी जर्सी गाये सी बबिता बस इस तगड़े जंगली घोड़े के लिए हे बानी थी और उसके लटकते हुए दोनों मॉटे दूध दबोचे अर्जुन ने कमर को गति प्रदान की तोह कमरे से बबिता की जोरदार सिसकारियां गूँज उठी.

"आह्हः... खागड.. उम्म्म.. तेरा जोर देख के तोह एक बार मेरी भी हिम्मत न होती.. आईई.. आराम से दबा मेरे बोब्बे, अभी दूध न आता इनमे.", बबिता का चेहरा इतनी हे देर में सुर्ख लाल हो चूका था. मुस्कान के साथ आधी चुदाई से हे अर्जुन का लुंड फूल कर कही ज्यादा मोटा और भयंकर हो चूका था. बबिता की नरम छूट की सुरंग इन गहरे धक्को और सख्त रगड़ से इतनी जल्दी पनियाने लगी थी की कॉमर्स अर्जुन के अंडकोष भिगोने लगा. अर्जुन भी आसक्त था बबिता के प्रति क्योंकि इसके साथ हे वो इतनी घनघोर चुदाई कर पता था, जहा कोई बंदिश या डर न था.

"हहहह.. दूध भी निकलेगा बब्बू डार्लिंग.. आह्हः.. सचमुच तुम्हे ऐसे देख कर खुद पर काबू नहीं रहता.. आह्हः.. और ये गुब्बारे कुछ बड़े भी होने लगे है..", अर्जुन दूध मसलता पूरी जान से बबिता की ठुकाई करने में जूता रहा. हर धक्के पर बबिता के वो असाधारण कूल्हे रबर के गोलों से हिलने लगते. Thapp-thapp का मधुर संगीत इतना तेज था की बाथरूम में बंद मुस्कान भी इसको सुन्न कर पानी के निचे कड़ी अपने तजा चूड़ी छूट को सहलाने लगी. बबिता के हलके भूरे निप्पल बुरी तरह मसले जाने से जमुनी होने लगे थे और गोर चुके लाल. हर बार वो मूसल अंदर बहार होता कुछ ज्यादा चमकने लगता. बबिता के शरीर को समझते हुए अर्जुन ने कॉमर्स से अपनी ऊँगली चिकनी करके एक हे बार में उस laal-phool से बंद छेद में उतार दी.

"ोोीी माँ रे.. यो न करे नहीं तोह गोलू .. आह्हः... कर और जोर से कर.. आह्हः..", अपनी हे बात को नकारती हुई बबिता अब इस 3 तरफ़ा हमले का पूरा मजा लेने लगी. एक हाथ से उसका एक उभर मसलता अर्जुन चुदाई के साथ साथ ऊँगली से बबिता के गांड का छल्ला भी ढीला करने लगा. शरीर में जोरदार कम्पन्न होते हे बबिता चुचो के बल हे बिस्टेर पर ढेर हुई और उन मॉटे चुत्तड़ो के बीच की नरम खाई में अर्जुन ने एक झटके में हे पूरा लुंड उतार दिया. गांड लचीली न होती तोह बुरी तरफ फट कर चीरना तये था. एक जोरदार चीख के साथ बबिता ने अपन सर इधर उधर पटका लेकिन जल्द हे अर्जुन के निरंतर धक्को ने उसकी गांड को भी अपना गुलाम बना लिया.

"आआआईई.. फाड़ दी रे मेरी raam-pyaari.. आह्ह्ह्ह.. तेरा सत्ता (डंडा) बहोत जालिम है अर्जुननननन.. और कसके मार या निगोड़ी.. आह्हः.. ऐसे हे..", बबिता मदहोश होती हुई अपना एक हाथ छूट पर दबाये 2-3 उँगलियाँ अंदर करने लगी. अर्जुन भी उतने हे जोश से उस कैसे हुए guda-dwaar का जर्रा जर्रा हिलता हुआ अपने अंतिम पल के करीब था.

"आअह्ह्ह्ह.. आया मैं बब्बू.. उम्मम्मम", इस बार उसने गांड की दोनों फांके फैलते हुए अपने अंडकोष तक उस छेड़ के बहार टिका दिए. इतनी गहराई में वो पहले कभी न गया था. बबिता को अपने पेट तक उसके वीर्य की गरम धराये गोली सी लगती महसूस हुई तोह छूट ने एक बार फिर पानी उगल दिया. वो चीखती हुई झाड़ रही थी और अर्जुन हुंकारता हुआ पसीने में लथपथ अपने वीर्य की अंतिम बूँद तक बबिता के उस कैसे हुए छेड़ की गहराई में गिरता बुरी तरह बबिता को जकड़े था. अगले 3-4 मिनट तक दोनों वैसे हे ढेर रहे और बबिता ने होश सँभालते हुए धीमी आवाज में कहा.

"उठ जा खागड.. आह्हः.. आज मैं गोलू के सामने न जा सकती.. उफ़ मर्डर गयी रे मुस्कान तेरे चक्कर me..aahhh.", लुंड पुक्क की आवाज करता बहार निकल वापिस उन मॉटे कूल्हों पर लंबवत टिक गया. गधा सफ़ेद तरल रिस्ता हुआ छूट की तरफ जा रहा था और अर्जुन बबिता की बगल में लेता उसके एक मॉटे दूध को हलके हलके होंठो से पीटा जैसे बबिता से अलग होना हे नहीं चाहता था.

"हट जा मलंग.. उफ़.. जा के लुंड धो ले बाथरूम में और 2-3 बार जल्दी जल्दी सर्विस कर दे अगले कुछ दिनों में. आअह्ह्ह्हह.. गोलू और मैं फेर शिमला जा रहे एक महीने के लिए.", बबिता ने बिना हे सफाई किये जमीन पर गिरी अपनी सलवार पहनी और फिर bra-kameej पहन कर लंगड़ाती हुई वापिस बीएड पर आ के पसर गयी. अर्जुन भी मुस्कुराता हुआ बाथरूम की चिटकनी खोल अंदर गया तोह भीगी कड़ी मुस्कान को बाहों में लिए उसके साथ हे हलकी chhed-chaad करता नाहा कर पहले खुद बहार आया और कपडे पहन कर हवेली से चल दिया. बबिता के होंठ भी चूस चूस कर उसने उतने हे फुला दिए थे जितने मुस्कान के.

"देख तेरे चक्कर में मेरी दुर्गति भी हो गयी.. ाःह.. हंस क्या रही है वह कड़ी कड़ी? अब अपने जीजा को रोटी दाल दियो और बता दियो मेरी तबियत ढीली है थोड़ी.", मुस्कान कपडे पहने बहार आयी तोह उसको हँसता देख बबिता भी शर्माने के साथ साथ हंस रही थी. अर्जुन ने मुस्कान के साथ जहा पूरे प्यार से संसर्ग किया था वही बबिता की दोनों तरफ से बुरी तरह चुदाई करके उसका हर अंग झकझोर दिया था.

"वैसे आप इतनी बड़ी हो फिर भी शोर बहोत मचा रही थी.", मुस्कान बाल सूखती हुई खुद को आईने में देखती हुई बोली.

"जिस दिन तेरे पिछवाड़े में वो लोहा भरेगा न फिर पूछूँगी तेरे से. आयी बड़ी की बची. तेरे साथ बहोत नरमी है उसकी, दिल से प्यार करता है तुझे और परवाह भी. वैसे थोड़ा बहोत मिला कर अर्जुन से टाइम निकाल के. मैंने देखा था के वो तेरे साथ टाइम बिताना पसंद करता है. कल मार्किट चलियो, तेरे लिए लेहंगा और चोली लेने.", बबिता ने 2 तकिये बगल में रखते हुए बड़े हे स्नेह से ऐसा कहा था.

"शबनम दीदी कह रही थी की जब प्यार की कोई मंज़िल न हो तोह पीछे हैट जाना हे सही है. लेकिन बबिता दीदी, ये जरुरी तोह नहीं न की प्यार जो अभी हांसिल है उस पर कब्ज़ा दिखाया जाए? इसमें कोई कॉन्ट्रैक्ट सिग्न थोड़ी न होता है. मुझे भी पता है की अर्जुन मुझसे प्यार करता है और जब वो मेरे साथ होता है तोह सिर्फ मेरी हे बात करता है. मैं इसमें हे खुश हु लेकिन शबनम दीदी जिस तरह कह रही थी, मुझे ाचा नहीं लगा.", मुस्कान ने अपने बालो को एक ढीले रबर से बाँध कर बबिता की बगल में आते हुए कहा. उसके चेहरे की चमक अब कही ज्यादा थी लेकिन कुछ गंभीरता आ चुकी थी बड़ी बहिन का जीकर करके.

"वो बावली है मुस्कान. शबनम को मैं भली भांति जानती हु और अर्जुन का नाम लेके ऊँगली भी करती रही वो नानी वाली हवेली में. अब अर्जुन ने इतने एहसान कर दिए उसपे तोह दिल से चाहने भी लगी होगी. और एक सच ये भी है के अर्जुन न कभी तेरा हो सकता न उसका. लेकिन उसका दिल है न उसमे सबके लिए जगह है. रही बात कब्जे वाली बात तोह वो एक प्लाट पे होता है, पूरे शहर पे नहीं. अर्जुन पे जान देने वाली कोई हम 3 हे है क्या? वैसे तूने जो भी कहा वो सच है मुस्कान. जब किसी पर हक़ जाताना हो तोह वो भी पूरी तरह से आपका होना चाहिए. बाकी प्यार तोह एहसास है और एक एहसास को याद करके पूरी ज़िन्दगी ख़ुशी से गुजारी जा सकती है, बस उसमे मिलावट न हो. चल मैं भी तेरे साथ हे चलती हु आँगन में.", बबिता भी पूरी गहराई से इजहार कर रही थी और मुस्कान को भी ाचा लगा था की अर्जुन के साथ उसके प्यार को बबिता भी सही से समझती है.

उधर इस हलके अँधेरे में कार को गाँव के बहार वाली सड़क पर लिए बस कुछ हे आगे आया था की 50 कदम सामने बीच सड़क लाल स्प्लेंडर मोटरसाइकिल लगाए खड़े अनिल और कुलदीप नजर आये. अर्जुन ने एक गहरी सांस लेते हुए उनसे कुछ हे फांसले पर कार रोकते हुए आसपास नजर दौड़ाई और बहार निकल आया.

"माफ़ी मांग ले और फेर चला जा यहाँ से. आइंदा इस तरफ नजर भी न ाइयो और बाकी तेरी मर्जी.", अर्जुन को अपने सामने स्पॉट चेहरे खड़ा देख ये बात कुलदीप ने कही थी लेकिन अनिल के चेहरे पर तोह जैसे जमाने भर का गुस्सा व्याप्त था. अर्जुन ने बात सुन्न कर हामी भरी.

"आपको मेरी बात गलत लगी तोह इसके लिए मुझे माफ़ कर दीजिये. और कोशिश रहेगी की मैं इस तरफ न हे आऊं.", अर्जुन ने हाथ जोड़ कर एक बार कुलदीप की तरफ देखा और फिर अनिल को. इतना बोल कर वो अभी मुड़ने हे लगा था की अनिल बिफर पड़ा.

"आड़े सड़क के बीच नाक रगड़ मेरी जूती के सामने. मेरी बहिन खातिर भुण्डा बोल्या था ने तोह खैरियत या से के जमीन पे हाथ धार. नहीं तोह अपने पाँव पे चालान जोगा तोह मैं छोड़ू कोणी.", अनिल मोटरसाइकिल से आगे आता हुआ अर्जुन के अब ठीक सामने खड़ा था. Kad-kaathi उसकी भी 6 फ़ीट थी और उतना हे मजबूत शरीर. लेकिन अब अर्जुन के चेहरे पर जो सार्ड मुस्कान आयी वो बताने के लिए पर्याप्त थी की सामने वाला जरुरत से ज्यादा हे बोल गया है.

"तुम जरा भी समझदार इंसान नहीं हो. कुलदीप अगर तुम अपने दोस्त की दुर्दशा नहीं चाहते तोह इसको अभी यहाँ से ले जाओ. वैसे भी मैं कुछ जल्दी में हु और जल्दी में काम गलत हो हे जाता है.", अर्जुन इतना बोल कर पलटा हे था की अनिल का धैर्य जवाब दे गया. उसने पहलवानी के असूल से विपरीत अर्जुन के पीठ पर वार करने की कोशिश की थी लेकिन शीशे में उसके अक्स को देखता अर्जुन कही ज्यादा हे तेज निकला. कुलदीप जबतक कुछ समझता उसका ये पागल दोस्त सड़क पर अर्जुन की जूती के निचे पड़ा था. सर पे जोरदार चोट लगी थी अनिल के और अब उसका शरीर तड़फ रहा था.

"मैंने कहा था के जल्दी में काम गलत हे होता है. और कैसे पहलवान हो जो पीठ पीछे वार करते हो? कुलदीप, मोटरसाइकिल एक तरफ करो और फिर इसको किसी डिस्पेंसरी में दिखने ले जाना. बाकी अगर तुम भी ऐसा हे कुछ करने का विचार रखते हो तोह मुझे ज्यादा से ज्यादा एक मिनट लगेगा लेकिन इधर तुम दोनों को इलाज के लिए लेके जाने वाला मुझे कोई नजर नहीं आ रहा. गाँव में तोह मैं जब दिल करेगा तब आऊंगा लेकिन ये अगर मुझे हवेली के आसपास भी दिखा न तोह जो मैंने कहा था वो मैं करके दिखाऊंगा.", अर्जुन ने अनिल की छाती से पाँव हटते हुए के बार कुलदीप को घूर के देखा जो अभी तक हैरत में था की 100 किलो वजनी उसके दोस्त के साथ पल भर में ये क्या हो गया. कार का दरवाजा खुलते हे सड़क से मोटरसाइकिल भी एक तरफ हो चुकी थी. अर्जुन ने अपनी बगल वाली सीट पर रखा अंगोछा अनिल के चेहरे पर फेकते हुए इशारे से कुलदीप को समझाया की वो इस कपडे से इसका खून रोक ले.

"चलता हु और अगर ये सब कभी अखाड़े में करो तोह बेहतर होगा. बाकी किसी से ये कहना नहीं की ऐसा मैंने किया है.", अर्जुन ने कुलदीप को मुस्कुरा कर आखिरी बात कही थी जो अनिल के सर पे अंगोछा बांड रहा था. कार निकल चुकी थी और अनिल दर्द से कराह रहा था.

"बहनचोद मन भी करू था के बीच में टांग न अड़ाइयो अपनी. वो मान भी गया था और जावे भी था chup-chaala. समझ भी कोणी आया तू कद्द सड़क पे जा लाग्या और मैंने साफ़ पता है के वो चाहता तोह तेरी आरर मेरी भुंडी दुर्गति कर देता. खप्पर (सर) खुलवाए बिना चैन न आया न तन्ने भी?", कुलदीप ने थोड़ा कसके वो गमछा अनिल के सर पे लपेटा तोह वो कराहता हुआ पाँव पसरे सड़क पर हे बैठ गया. कुछ समय तक तोह उसको सबकुछ घूमता हुआ हे लग रहा था और फिर आँखों का धुंदलापन काम हुआ तोह बहोत धीमी आवाज में बोलै.

"के होया था?"

"माँ चुद गयी और हम देखते हे रह गए. बावलबूच, तेरी हालत देख जरा. वो तोह काम करके निकल लिया और ेब तू चल मेरे साथ डॉक्टर धोरे. थोड़ा कस के पकड़ लिए मैंने.", कुलदीप ने मोटरसाइकिल इधर ला कर पहले अनिल को मुश्किल से बैठाया और फिर एक हाथ से उसका हाथ पकडे दूसरे से मोटरसाइकिल आराम से चलता हुआ अपनी मंजिल की तरफ बढ़ चला. उन्होंने किस्से कहानी समझ कर अर्जुन का विश्वास न करके ये भारी गलती की थी लेकिन फिर भी ज्यादा नुक्सान न हुआ.

"बिजेन्दर या विकास ने बोल के समझौता करवा लिए कुल्लू.. आह माँ ऋ, कद्द भी दुखन लागि मेरी तोह. दारु उतरे बाद तोह बहोत दुखेगा भाई."

"किसे ने कुछ न कहिये अनिल, वो बोल के गया है. बस कोई पूछे तोह बोलना है स्प्लेंडर तिसाल (फिसल) गयी थी. ले ेब आड़े तेरी marham-patti करवा के फेर मैं तन्ने घर छोड़ दूंगा.", इनकी ये दर्दभरी दास्ताँ अभी ऐसे हे चलने वाली थी और उधर अर्जुन ये गीत sunta-gungunata हुआ घर की तरफ पहुंचने लगा था. "छोटी सी कहानी से, बारिशो के पानी se....saari बातें धूल गयी... ना जाने क्यों दिल भर गया."

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"आप एक बार सोच लो जी. कही ये फैंसला लेना भारी न पर जाए आपको. वो दिन कुछ और था और उस समय आपके साथ रघुबीर भाई साहब भी थे. आज यहाँ माला उतार कर आप वो काम करने जा रहे हो जिसकी इजाजत आपके असूल भी नहीं देते.", घर से सभी पुरुष संजीव की शराब वाली मैफिल के लिए निकल चुके थे और बस रामेश्वर जी हे कमरे में खड़े अपने कुर्ते पयजामे के साथ वो सब धारण कर रहे थे जो उनका धरम भाई और आत्मा रघुबीर सिंह पहना करते थे.

"थानेदारनी जी, आज यही समझ लो की रघुबीर जा रहा है अपने पौटे को शुभकामनाये देने. रही बात पीने पिलाने की तोह वह रामेश्वर ध्यान रख लेगा इस बात का की कही भी ज्यादा न हो. अर्जुन को साथ लिए जा रहा हु और अगर थोड़ा भी अधिक हुआ तोह वो समय से वापिस आ जायेगा घर और मैं उधर हे कमरे में आराम कर लूंगा.", रामेश्वर जी की छटा देख एक पल तोह खुद कौशल्या जी भी मोहित हो चुकी थी. आज बरसो बाद हे वो इतने खुश थे और ऐसे माहौल में उन्होंने ज्यादा कुछ न कहते हुए उठ कर अलमारी से वो सोने की घडी निकाल कर उनकी तरफ बढ़ा दी जिसके ऊपर Raghu-Ram अंकित था.

"फिर तोह आज अपने चारो बेटो (उमेद सहित) को भी मिलवा देना इस रूप से. जानते हो न रघुबीर भाई साहब महफ़िल में किसी को अपने से ऊपर नहीं जाने देते थे, सिवाए आपके? आज सबको एहसास होना हे चाहिए की ये पंडित जी नहीं है. शराब से ज्यादा मायने है मेरे लिए आपके और रघुबीर भाई साहब के प्रेम के. रात वही रुकना और लगता है अर्जुन भी आ गया. भजन ने यहाँ सामान भिजवाने के साथ साथ लोग भी लगवा दिए है अपने तोह आप निश्चिन्त हे जाए.", कार की आवाज से कौशल्या जी ने उन्हें सचेत किया तोह पंडित जी भी मुस्कुरा दिए.

"हाँ भाई अब ये अर्जुन महाराज भी साथ जाएंगे हे. पहले भी एक अर्जुन पहुंच जाता था ऐसी जगह लेकिन अब इसको तोह साथ हे लेके जाऊंगा. जरा वो लाल रुमाल भी देदो जिस से तुम्हारी भी कमी न लगे.", रामेश्वर जी की ऐसी चुहल सुन्न कर कौशल्या जी भरपूर शरमाई लेकिन फिर उन्होंने भी सफ़ेद किनारे वाला एक लाल रुमाल खुदसे अपने पति की दायी जेब में रख दिया.

"Nar-Narayan तोह कभी अलग हो नहीं सकते. ले जाओ अपने धनुर्धर को और पहले हे बता देती हु की शंकर के माहौल में वो रमा तोह आपका हुक्का पानी फिर बगीचे में मिलेगा."

"हाँ जैसे मैं हुक्का पीटा हु? चलो अब अपना ध्यान रखना और आज शास्त्री जी के भी कुछ दुःख दूर करते है. रघुबीर का उनसे भी बहोत प्रेम था और अब तोह वो चाय भी तुम्हारे हाथ की पीने आते है जैसे रघुबीर कहता था हमेशा."

"निकलो अब यहाँ से. आये बड़े चाय वाले. आप भूल गए लेकिन मुझे याद है प्रमोद शास्त्री इसलिए उन्होंने मुझे सीधा भाभी कहा था. बस थोड़ा समय लगा याद आने में लेकिन मैं और पूर्णिमा उनसे मिले थे जब शालिनी का 15व जन्मदिन था.", कौशल्या जी ने उन्हें विदा किया क्योंकि अर्जुन भी आ चूका था यहाँ. अपने दादा को ऐसे देख वो बस मुस्कुराता हुआ फिर से कार के स्टीयरिंग पर जा बैठा. आज रामेश्वर जी उसकी बगल में बैठे थे. किस्से कहानी से भरी रात की शुरुआत घर से हे शुरू हुई.
 
ये अपडेट सिर्फ और सिर्फ फ़ोन से लिखा है. इस से ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा. शुभरात्रि
 
11 बजे तक पोस्ट कर दूंगा दोस्तों



 
अपडेट 178

Fer-Badal (1)

रात 11 बजते बजते इस बड़े हॉल में नजारा पूरी तरह बदल चूका था. क्या जवान और क्या अधेड़, सभी बस पूरे जोश से तेज बजते गांव पर उधम मचाते झूम रहे थे. वालिए जी विकास को उठाये नाच रहे थे और कही शंकर को उठाये उनका पहलवान भतीजा बिजेन्दर पसीने में भीगा झूम रहा. नरिंदर तोह सबसे हे अलग किसी दक्ष निरतक सा ठुमके लगता हुआ बार वाले गोर लड़के को भी नाचने लगा. जिसको नाचना नहीं आता था आज तोह वो भी सब कुछ भूल कर बस धमाल मचने में लगा रहा. पूरी आवाज में बड़े बड़े स्पीकर पर 7 समंदर पार गण बज रहा था और शराब परोस रही वो कमसिन बालाये भी हंसती मुस्कुराती हुई ये सब देख कर लुत्फ़ ले रही थी.

संजीव ने तोह जेब से पूरी नोटों की गद्दी हे अपने पिता पे से वार कर हवा में बिखेर दी. अमूमन यही लड़का था जो सबसे शांत और मर्यादित लगता था. राजकुमार जी ने भी अपने बेटे को गॉड में ुचा उठा लिया.

"हर्रायःहहह.. आज मेरे भतीजे की पार्टी है.. मैं तोह रात भर दारु उड़ाऊंगा...", उमेद ने दलीप के साथ ठुमकते हुए 500-500 के नोट उस बड़े मंच पर हर तरफ उड़ा दिए. देखते हे देखते ऐसा हे जलवा अब हर हाथ दिखने लगा था. ज्यादा नहीं तोह फिर भी 5-6 लाख के नोट हर तरफ बिखेर दिए गए थे. अर्जुन अपना भोजन करके यहाँ से 30 मिनट पहले हे जा चूका था और दूसरी तरफ वाले हॉल के बीच वाला दरवाजा यहाँ से ताले से बंद था.

"अरे भाई बस करो यार.. आह्हः.. बहनचोद सुबह तोह क्या कल दोपहर तक नहीं उठा जाने वाला अगर थोड़ी देर और ये सब किया.", अशोक जी के स्टेज से उतारते वक़्त कहे गए शब्दों से कुछ हे पल में सभी लोग पसीने से नहाये हुए अपनी अपनी जगह आने लगे. नरिंदर और शंकर ने सबसे पहले अपनी अपनी कमीज उतार कर एक तरफ उछाल दी जैसे कल पहन नई हे न हो. वातानुकूलन में भी जिस्म पर इतना पसीना और सबके चेहरे लाल हे थे.

"ये तोह मैं भी कह रहा था भाई. बिटिया अब बस सबके लिए एक एक पेग बनवा दो फिर खाना लगवाओ.", राजकुमार जी ने एक लड़की को सब समझाया और इधर उनकी बगल में संजीव मजे से बैठा मुस्कुरा रहा था. लगभग हर व्यक्ति ऊपर या तोह बनियान में था या फिर बटन खोले हुए.

"यार शंकर, पहले पता होता न के तुम्हारे यहाँ सभ्य पार्टी का अंजाम ऐसे होगा तोह मैं निक्कर में हे आता. अब तोह लगता है स्विमिंग पूल न मिला तोह नींद नहीं आने वाली.", गजेंद्र भल्ला किसी हाथी सा हांफ रहा था और हालत बाकी सभी की कुछ वैसी हे थी.

"पीछे स्विमिंग पूल भी है गजेंद्र. शंकर और उसके जोड़ीदार कपडे ऐसे हे नहीं उतारे बैठे.", राजकुमार जी ने जैसे हे बताया शंकर और 8-9 लोग अपने अपने जाम उठाये भल्ला को लिए एक तरफ निकल चले.

"मतलब बस कहने की देर है.", भल्ला ने मस्ती में कहा था और नरिंदर ने घास पर पतलून एक तरफ फेंकते हुए वैसे हे जवाब दिया.

"गजेंद्र भाई साहब, आप कह के तोह देखो. गांड छोड़ कर सब हाजिर हो जाएगा.", अपना गिलास शंकर को थमा कर वो Bhuppi,Gulati और सांगवान के साथ छपाक की आवाज करता तरणताल में जा कूड़ा. शंकर और उमेद के साथ साथ गजेंद्र भी हंसने लगा. ये लोग आराम से कपडे खोल कर पानी में उतर चुके थे. इन सबकी dhama-chaukdi से परे उस दूसरे हॉल में माहौल ज्यादा रोचक और जहां था.

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"अब तक तोह हमने रौनक भाई का भी अतीत सुन्न लिया, अपने शास्त्री जी भी आज दिल की जाने कितनी हे गहराई खोल गए और छोल साहब का तोह जीवन सचमुच हे किसी फ़साने से काम नहीं. पंडित जी, नारायण चर्चा भी हुई और Raghu-Ram की भी. लेकिन अपने त्रिदेवो के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिली. वैसे तोह मैं शंकर और इन्दर को तभी से जानता हु जबसे वो दसवीं करके आये थे और शंकर मेरे लिए परम से भी बढ़कर है, जिस पर आप भी संदेह नहीं करेंगे. यहाँ उनके मां भी है, चाचा भी और गुरु भी. तोह कुछ जानकारी इनके भी बचपन या अनजान समय की दीजिये.", यहाँ इस बुजुर्ग मंडली में सभी 4-4 पेग लगा चुके थे सिवाए आचार्य जी और पंडित जी के जो अभी इन सबके साथ हे तीसरा बनाने लगे थे और बाकी पांचवा. धर्मवीर जी ने ये बात कहते हुए आचार्य जी, कृष्णेश्वर और हंसमुख को भी देखा था.

"त्रिदेव.. डॉक्टर साहब, एक तरह से आप इन्हे ऐसा इसलिए कह रहे है क्योंकि राजू खामोश तबियत है जो अध्ययन, जीवन की सीढ़ी रेखा और अंतर्मन में खुश रहने वाला व्यक्ति है. शंकर बिलकुल विपरीत है क्योंकि वो हमेशा कौशल्या से लिप्त रहा और इस वजह से लाडला कहो या जज्बाती पर दुनिया को बिलकुल अलग नजर से देखने वाला बना. इन्दर इन सबसे अलग है या बेहतर है. वो दुःख में भी खुश और खुश में तोह ज्यादा हे खुश. राजू बचपन से सिर्फ 2 लोगो के करीब था. सोमबीर भाई साहब के दूसरे बेटे भूरा के या फिर अपने hum-umar धर्मपाल के. भूरा के जाने के बाद राजू जैसे स्वयं से भी दूर हो गया. खैर, नियति को कभी भी ब्रह्मा पसंद नहीं आये लेकिन बाकी दोनों महादेव के हे अंश है तोह नारायण इनमे से कोई नहीं.", पंडित जी ने सबके जाम खुद हे बनाने के पश्चात उनमे बर्फ के टुकड़े डाले तोह पानी भरने का काम हंसमुख ने किया. आज पहली बार वो अपने जीजा के सामने पी रहा था लेकिन पंडित जी ने खुद हे उन्हें आराम से मजा लेने को कहा था, औपचारिकता भूल कर.

"बुरा न मानियेगा मेरी बात का भाई साहब लेकिन मैंने महसूस किया है की जहा इन्दर कही ज्यादा हे परिपक्व है वही शंकर में शायद कुछ अलग है.", शास्त्री जी ने अपने गिलास को चम्मच से हिलाते हुए जैसे ठंडा करने का प्रयास करते हुए कहा. उनकी बात सुन्न कर कृष्णेश्वर और चन्दर्कांत ने भी गर्दन हिलाई जैसे उन्हें भी कुछ पता हो.

"उसको पहले कॉलेज के समय भी और उसके बाद 15-16 साल तक कई बार जोर का सरदर्द होते मैंने भी देखा है. ऐसा तभी ज्यादा होता था जब वो लगातार काम में लगा रहता था या फिर जब वो अकेला होता. एक या दो बार तोह मैंने पाया की वो जैसे वो इंसान है हे नहीं जिसको मैं जानता हु. लाशो से भी बातें करता रहता था वो जब उसको कोई मिलता नहीं था अपने नजदीकी या दोस्त.", सांगवान जी की इस बात पर कुछ वक़्त तोह ज्यादातर लोगो को सांप हे सूंग गया जैसे बस पंडित जी और छोल साहब मंद मंद मुस्कुरा रहे थे या जैसे कटाक्ष कर रहे हो.

"5 बरस का रहा होगा शंकर शायद उस समय. उसका घर का नाम लड्डू था क्योंकि हर वक़्त बस उसको वही खाने होते थे और था भी gol-matol सा. मेरी माँ जब सरकारी क्वार्टर रहने आती थी तोह उसको मालिश करके ऐसे हे चड्ढी पहना कर खुला छोड़ देती थी. शंकर बहोत हे ज्यादा भोला था भाई साहब, मतलब इतना ज्यादा की किसी चीज से चोट लग सकती है तोह वो दूसरी बार भी उसी चीज से टकरा जाता था. पता नहीं उस समय क्या हुआ था या उसने शायद कुछ ऐसा देखा जो इसके दिमाग में घर कर गया. इन्दर 2 या ढाई साल का था और कौशल्या घर में उसको नेहला रही थी. शंकर बहार से आया और एकदम अपनी माँ के पल्लू को पकड़ता हुआ वही बेहोश हो गया. Aanan-faanan में उसको रघुबीर हे हॉस्पिटल ले गया क्योंकि घर पे तोह बस महिलाये थी और मैं ड्यूटी.", बात कहते कहते रामेश्वर जी ने एक हलकी सी चुस्की ली शराब की और आखें मूँद कर जैसे कुछ याद करने लगे. सभी की नजर उनके हे चेहरे पर थी और कोई अतिरिक्त आवाज तक नहीं.

"जिस्म नीला पड़ने लगा था और डॉक्टर हाथ खड़े करने लगे. बड़े हॉस्पिटल ले कर गए तोह उन्होंने कहा के ज्यादा से ज्यादा एक घंटा और सांस चलेगी. आप लोग इसको ले जाओ और मुझे सुचना मिली तोह मैं भी निकल पड़ा. रघुबीर चाहता था के इस अंतिम समय में शंकर अपनी माँ के सीने से लगा रहे इसलिए वो भी नम्म आँखों से उसको लिए घर आ गया क्योंकि कसोहळ्या को साथ नहीं ले जाया गया था. मैं भी काँप गया था के कौशल्या कैसे जी सकेगी अपने इस लड्डू के बिना और हाथ में कुछ था भी नहीं.", शंकर के उस अनजाने भाग को बताते हुए पंडित जी के चेहरे पर फीकी हंसी आ गयी.

"चमत्कार हम मानते नहीं और ख़ास कर पोलिसिये तोह बिलकुल भी नहीं. निर्मल जी से हे पूछ लीजिये. लेकिन उस दिन हुआ ये चमत्कार. वो महात्मा जी जिन्होंने हमारा विवाह करवाया था और उसके बाद वो सिर्फ एक हे बार नजर आये थे उस दिन वो जाने कहा से हमारे घर के बहार आ खड़े हुए. कौशल्या उन्हें पिता हे कहती है आज भी और वो भी उसको बेटी. कम्बल में लिपटे शंकर के चेहरे पर कोई 5 मिनट उन्होंने हाथ फिराया था और मेरे बेटे ने होंठ खोल दिए. कुछ दवा थी या जो भी था जो उन्होंने शंकर के पूरे जिस्म पर लगाया और 2 घंटे बाद वो पहले सा उठ कर बड़े आराम से लड्डू खाने लगा. बस यही बोल रहा था के दर्द है और कोई उसको दांत रहा है. बचे की जान बच गयी तोह सभी के आँखों में ख़ुशी के आंसू थे लेकिन महात्मा जी ने सबको वह से भेज कर कौशल्या और मुझे वह बैठा लिया. उनका कहना था के शंकर जीवित तोह बच गया है लेकिन अब वो कुछ बदल गया है. कभी कभी उसको सर दर्द होगा, वो आप खोयेगा और हो सकता है वो बहुत से अवरोध टॉड दे.", रामेश्वर जी बात को जैसे हलके हे शब्दों में बता रहे थे और जो शंकर को जानते थे उन्हें वो समझ भी आ रहा था.

"तोह उस दिन के बाद से हे वो अलग सा दिखने लगा पंडित जी? मतलब सरदर्द के साथ साथ जैसे वो अकेलेपन में परेशां हो जाता है?"

"नहीं नहीं डॉक्टर साहब. शंकर की दवा उसको साल में एक बार मिलती रही और इन्दर उसका हंसाया रहा इसके बाद या उमेद होता था अगर इन्दर न हो तोह. शंकर का सर तभी दुखता था जब वो कुछ करना चाहे और उसको रोका जाए. अकेलेपन में थोड़ा अधिक अवसर रहते थे ऐसा होने के लेकिन उसका सबसे रूद्र स्वरुप तब सामने आया था जब किसी ने अज्जू के साथ hatha-paayi की. वो 12 का होगा तब और शंकर 14-15 का लेकिन शंकर ने 22-23 बरस के 3 लड़के अकेले हे बुरी तरह जख्मी कर दिए थे. उसके बाद तोह आप लोगो ने बहोत से किस्से सुने हे होंगे और शायद शंकर ने अपना वो स्वरुप जान लिया. इन्दर ने अपने भाई की हिफाजत के लिए हे खुदको उस से ज्यादा मजबूत बनाया लेकिन फिर भी जब शंकर का नियंत्रण खुद पर नहीं रहता तोह इन्दर और उमेद भी उसको रोक नहीं सकते. वैसे वो दोनों तोह कभी भी उसको नहीं रोकते.", ये सब सुन्न कर शास्त्री जी की जिज्ञासा थोड़ी भद्द चुकी थी लेकिन कुछ लोगो के तोह होश उड़द चुके थे.

"मतलब यही वजह है की आप शंकर को ..?", निर्मल सिंह बात कहते कहते रुक सा गया जैसे कुछ गलत बोल दिया हो.

"पर्सनालिटी डिसऑर्डर में पंडित जी भी बेबस है सिंह साहब. और इन्हे भी पता है की शंकर कभी सबूत नहीं छोड़ता और उसके aas-pas ऐसा नेटवर्क है जो इस बात की 2-3 बार तसल्ली खुद भी कर लेता है.", सांगवान जी ने जैसे अब निर्मल सिंह को बिलकुल खामोश कर दिया था. और झेंपते हुए बस वो मुस्कुरा दिए.

"हाँ और दूसरी बात है की मैं उसको रोक हे नहीं सकता. मेरे से ज्यादा बड़े कानून के संरक्षक उसका साथ देते है तोह इस रिटायर्ड आदमी की क्या बिसात. क्यों चंदू, गलत कहा क्या मैंने? तुम्हारे मुखिया भजन जी के साथ साथ तुम भी तोह उसके हर काम की फाइल गायब करवा देते हो.", चंद्रकांत के मुँह से थोड़ी से शराब बहार छलक आयी थी और वो खींसे निपोरता हंस दिया.

"तोह अर्जुन?", शास्त्री जी ने बस ये 2 लफ्ज़ कहे और इस बार पंडित जी से पहले जवाब छोल साहब ने दिया.

"संस्करण कही ज्यादा हे बेहतर और खतरनाक है शास्त्री जी अपने पूर्वज से. शंकर अपने उस स्वरूप को स्वीकार कर चूका है लेकिन उस से कही भयंकर है अर्जुन का अनियंत्रित हो जाना. हम लोग इस बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते थे और सच कहु तोह अभी भी ये कहना अजीब हे लगता है. इंसान का दूसरा पहलु भी हो सकता है जो डरावना हो और साधारण से कही ज्यादा ताक़तवर. लेकिन जो मेडिकल टर्म सांगवान जी ने शंकर के बारे में कही वो अगली पीढ़ी में नहीं जा सकती. अर्जुन पैदा होने के समय भी बड़ी मुश्किल से बचा था और फिर 8-9 महीने बाद उसका जीवन संकट में था. 5-6 बरस का होने पर तोह वो उग्रता की हद्द पार कर जाता था. उसके साथ ऐसा क्या हुआ इसकी वजह तोह नहीं पता लेकिन ऋतू ने उसका एक और नाम रखा था रूद्र. पर ये लड़का अगर शंकर से कही ज्यादा विध्वंसक है तोह उतना हे समझदार भी.", छोल साहब भी अर्जुन के अलग पहलु को जानते थे लेकिन ये सब उन्होंने कभी घर में कहा नहीं था.

"मतलब अर्जुन भी.. ? ये ट्रीट किया जा सकता है अगर सही कंसल्टेशन और थेरेपी मिले.", सांगवान जी हैरान थे ये जानकार.

"वो खुद को ठीक कर चूका है धर्मवीर भाई. हॉस्टल में उसके गुस्से को कैसे काबू करना है ये वो जान चूका है. और जहा शंकर अपराधी को दण्डित करने में विश्वास करता है वही अर्जुन अपने रूद्र को नियंत्रण में रख कर होश से काम लेता है. सतीश ने ठीक कहा है की वो शंकर से कही ज्यादा हे विध्वंसक है और ऐसा आपको कुछ मामलो में पता भी लगा होगा लेकिन तब भी अर्जुन ने होश नहीं खोये. उसको बुरा लगता है जहा शंकर को इस सबमे मजा आता है. तभी मैं कहता हु की वो लड़का व्यस्त रहे तोह बेहतर है. और ाची बात ये है की पूरे परिवार ने पहले उसमे विश्वास दिखाया और अब वो परिवार से ऊपर किसी को नहीं रखता. उसका रूद्र भी प्रेम से वाकिफ है और गहरे ज्ञान से आज अर्जुन ने वो दिल का दर्द या जख्म ख़तम हे कर लिया है जिसकी वजह से उसमे वो सब बदलाव आये. शंकर बस यही चूक गया लेकिन अब जो है सो है.", रामेश्वर जी ने घडी में समय देखा तोह बाकी सभी ने एक पेग का और समय माँगा.

"3 तोह वैसे भी नहीं लगते भाई. बैठे है तोह 4 तोह करेंगे हे, क्यों शास्त्री जी? वैसे जो अतिरिक्त हो वो वरदान बनाना है या अभिशाप, ये स्वयं के हाथ है. इसमें न नारायण कुछ कर सकते न नर. हाहाहा.."

"सही कहा भाई साहब.. अपने लिए तोह वरदान हे है ये बचे. वैसे अब तोह शायद वो महात्मा जी पूरे हो गए हो, लेकिन जिन्दा होते तोह हम भी दर्शन के िट्छुक थे.", निर्मल सिंह जी की इस बात पर 3 लोग ठहाका मार हंसने लगे.

"भाई, जिसने खुद दर्शन देने हो वो बुलाने पर तोह आने से रहे. और अब रही बात उनके जीवन की तोह वो हमारे पिता के समय भी उनसे उम्र कुछ बड़े थे और आज भी वैसे हे है. आये थे कुछ दिन पहले और बता भी गए थे के शंकर का सरदर्द अब जा चूका है. फिर जाने कब आएंगे और किस्मत रही तोह क्या पता तुम्हे भी फुर्सत दिलवा दे."

"अरे..? क्या सचमुच इतने वृद्ध है.?"

"मैंने कहा न निर्मल भाई की वो तब भी हमारे पिता जैसे दीखते थे और आज भी. उम्र का असर तोह देखा हे नहीं हमने उन पर सिवार्य थोड़े ज्यादा सफ़ेद बालो के. जिस्म आज भी पौने 7 फ़ीट से ऊपर होगा और उतना हे मजबूत. ये सब छोडो और देखो पीने के साथ खाना भी जरुरी है. किरशन, तुम तोह भाई शराब से अलग भी कुछ चखो.", रामेश्वर जी ने माहौल को इतर करते हुए महफ़िल को थोड़ा खुशनुमा करते हुए अपने भाई से चुहल की.

"भाई साहब.. आपके इधर शराब ाची है. वैसे अपने कुंदन जी तोह कुछ बोल हे नहीं रहे.", सचमुच कुन्दनलाल जी बस सबकी सुने जा रहे थे और कपूर साहब की सोहबत में उनके जाम अपनी रफ़्तार से चालु थे.

"अब भाई हम तोह do-dhaari तलवार के करीब बैठे है. ये जनाब तोह हमारी बीवी के साथ होली खेलते आये है और इनके सुपुत्र हमारे दामाद है. ऐसे अवसर पर गलती से भी हमने कुछ कहा तोह समझो शामत आयी. यहाँ बहक कर कुछ कह बैठे थे ये हमारी श्रीमती जी को भड़का देंगे और यहाँ से जाने के बाद मुँह खोला तोह हमारी बेगम की बात इनसे होगी. बेहतर यही है की आढ़ती अपनी फसल बचाये और थानेदार की नजर में न आये.", कुंदन जी की बात पर जोरदार ठहाका लगा था हर तरफ.

"हाँ ले लो भाई तुम भी मजे ले लो. थानेदार के साथ छोल को भी घेरकर मारते है ये आढ़ती. वैसे इनका भी कुछ इतिहास है जरा गौर फरमाइयेगा.", पंडित जी ने अपने समधी को आँख मारते हुए चर्चा शुरू की थी.

"Irshaad-Irshaad.", सोहनलाल जी जैसे प्रतीक्षा में थे और छोल साहब ने भी गिलास से घूँट भर कर हाथ ऊपर किया.

"लग गयी सीप हमारी तोह. किरशन, भाई अब न तुम्हे दंड मिलेगा हमारी होने वाली फजीहत का. दंड है की ये पूरी प्लेट सलाद की इस जाम के साथ ख़तम करो. अब पंडित जी दूसरे पंडित की कर दो ऐसी तैसी.", कुन्दनलाल जी भी उतने हे उन्मुक्त और खुशनुमा व्यक्ति थे.

"बात ऐसी है की जवानी में इन्हे घर में क़ैद रखा जाता था. आज भी यहाँ बैठे हम सभी में इनसे ज्यादा असरदार तोह कोई होगा नहीं. सफ़ेद दाढ़ी और पूरे बाल के साथ जिस्म पर हलकी वासा तक नहीं है भाई साहब के. तोह उस समय ये जनाब अपने फ़िरोज़ खान से भी बेहतर दीखते थे. अगले गाँव के सरपंच की लड़की ने इन्हे देख लिया मेले में और दीवानगी में इनके गले पड़ गयी. कुंदन जी सर पे हाथ रख कर दौड़े थाने में और पीछे पीछे सरपंच और उनकी वो बेटी.", ये सुन्न कर बाकी सभी लोटपोट होने लगे थे और कुंदन जी के चेहरे पर शर्म भरपूर.

"रामेश्वर भाई, वो जीकर तोह करो इसकी हालत कैसी थी थाने में.", सोहनलाल जी ने थोड़ा और तड़का लगाया था अब जिस पर कुंदन जी उन्हें रोक भी रहे थे

"हाहाहा.. तोह थाने में आ कर ये खुद हे हवालात में जा घुसे. बोल रहे की मुझे एक दिन के लिए अंदर कर दो और कोई पूछे मेरे बारे तोह बताना नहीं. अब उस समय क़स्बा छोटा था और वैसा हे थाना. इधर एक नेता जी, जो की मेले की वजह से वह पधारे थे हमारे थाने चले आये. इनके पिता को मेले वाली बात पता चली और सरपंच का भी तोह वो भी इधर पहुंच गए. फिर तोह एक कमाल हे हो गया.", रामेश्वर जी एकके रुके तोह अब कुन्दनलाल जी चेहरे पर शर्म की लाली छा गयी जिसको सब देखते हुए मुस्कुरा रहे थे.

"फिर क्या हुआ भाई साहब? ऐसे बात न रोकिये, निवेदन है.", सांगवान जी के कहने पर पंडित जी ने सलाद का एक टुकड़ा चबाने के बाद कहा.

"फिर डॉक्टर साहब गिरी बिजली. इनके पिता जी को वो नेता जी जानते थे और उनके साथ थी सुश्री सुनंदा जी, पुत्री. महानुभाव जल्दी से बहार आये और सभी के सामने बोल उठे की पिता जी हम तोह विवाह करना चाहते है इनके साथ. सरपंच वह आया लेकिन 2 बड़े दिगज्जो के बीच हाथ जोड़े खड़ा रहा. जगह कुछ और, शर्मा जी के बेटे की चाहत गलत जगह और ऊपर से ये सबकुछ gair-iradtan. वही से कान पकड़ कर इनके पिता जी इन्हे ले चले और हमारे सामने हे नेता जी ने अपनी पुत्री से पुछा था के वो इस लड़के को पसंद करती? वो ाचा परिवार है और जान पहचान भी है. पानी पी कर वो भी निकल चले और फिर हमारा हो गया तबादला. हवलदार जो थे उस वक़्त. फिर काफी समय बाद मुलाकात हुई थी वो भी अनाज मंडी किसी काम से गए थे. दिन याद किये तोह पता लगा की वही इनकी धर्मपत्नी है अब और उनसे एक प्यारी सी बिटिया है जो कक्षा 9 में जाने लगी थी. सच कहे थे बस हमने तये कर लिया था के वक़्त आने पर आज हुई दोस्ती को रिश्ते में बदल कर रहेंगे. आज शंकर की धर्मपत्नी वही है और सम्बन्धी से पहले हम सोहन जी के अनुज और कुंदन भाई के समकक्ष दोस्त.", रामेश्वर जी ने मस्ती मजाक वाली बात को भी अपनेपन और आदर पे समाप्त किया.

"वाह भाई साहब. रोमांचक.. सचमुच कुंदन भाई आप तोह यार बड़े हे जिंदादिल इंसान निकले.", सांगवान जी ने तारीफ की तोह पंडित जी फिर से बोल उठे.

"वो इतना भी जिंदादिल नहीं है. कुंदन भाई बता देंगे इनके कारनामे. लोग विवाह से पहले दबंगई करते है ये जनाब तोह उसके बाद शुरू हुए. ये जाम आप सभी के नाम और ाची सेहत के लिए.", रामेश्वर जी ने गिलास खाली करने के बाद उलट कर रखा तोह बाकी सभी ने वैसा हे किया सिवाए हंसमुख और कृष्णेश्वर के.

"इन दोनों जीजा सालो को लगे रहने दो. दुनिया भर के गम बस इन्हे हे तोह हैं.", पंडित जी के ऐसा कहने पर वो बस खिसिया गए लेकिन इशारे से उन्होंने बस इतना हे कहा के जब तक दिल करे पीयो. महफ़िल यहाँ से भांग हो चली थी अब खाने की मेज की तरफ. इसके बाद सभी के सोने की व्यवस्था ऊपर वाले कमरों में थी और जिनके साथ ड्राइवर था वो जाने वाले थे.

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"तुम अब काफी बेहतर लग रहे हो सुदर्शन.", रात स्याह हो चुकी थी और इस multi-speciality हॉस्पिटल के ख़ास कक्ष में बिस्टेर पर पसरे असाधारण से सुदर्शन उर्फ़ छोटी के समीप ये अधेड़ सा रसूखदार व्यक्ति कुर्सी पर बैठा था. छोटी के शरीर पर अभी बही सपोर्ट के लिए फ्रेम लगे थे लेकिन जख्म बहार से भर चुके थे.

"काका जी, एक महीना mal-tyaag भी बिस्टेर पर किया है. इस कलाई की हड्डी चूरा हो चुकी थी जिसमे रोड डाली है और ये जांघ शायद jiwan-bhar न सही हो. होश आया तोह लगा था के इस से बेहतर तोह मैं मर्डर हे जाता लेकिन डॉक्टर्स ने हिम्मत दी और ाचा इलाज हो रहा है मेरा. आप बहोत जल्दी haal-chal लेने आये?", अब जैसे सुदर्शन में वो अकड़ न थी जैसी हमेशा चेहरे पर रहती थी. लेकिन ये व्यक्ति कुछ अलग हे तरह मुस्कुराया जैसे बहोत कुछ दिल में हो.

"जानते हो तुम्हारा ये हाल किसने किया है? और तुमसे मिलना इतना आसान भी नहीं था जो तुम आज उलाहना दे रहे हो. एक इंसान तुम्हे लगभग मार देता है और और उसका बाप तुम्हे बचने का ढोंग करके वाहवाही ले रहा है.", काका जी का मकसद क्या था वो तोह वही जानता था लेकिन सुदर्शन कुछ सोच में डूब गया. फिर चाँद मिनट बाद उसने मुँह खोला.

"मिनट, साबू, जोगी और नरेश ने मेरे साथ रहते हुए 15-16 तक की पहलवानो वाली भीड़ को घुटने टिकवाये है काका जी. कालू पहलवान का मर्डर आपके कहने पर जब मैंने किया था तब मैं 25 का था और कालू मुझसे भी 3 इंच ुचा. बहोत गुमान था मुझे की मैं वो पर्वत हु जिसको कोई कानून, मंत्री या फौलाद झुका नहीं सकता. याद है एक बार आपके पीछे ##### गाँव में लोगो को हुजूम दौड़ा था और मैंने कितने हे अपाहिज कर दिए थे?", सुदर्शन बात कहते हुए अपनी सही हाथ से तकिया बगल में लगते हुए काका जी की तरफ देखने लगा.

"वही हम तुम्हारे मुरीद बने थे सुदर्शन और तुम्हारे दम के साथ साथ जिगर का मुरीद वो हर व्यक्ति है जो तुम्हे संरक्षण देता रहा है. लेकिन इस सबका क्या मतलब है अभी कहने से? मैं तुम्हे बता रहा हु के असलियत कुछ और है."

"आपको पता है न की उन चारो की भी हालत ठीक मेरे जैसी है और शायद जोगी तोह कभी भी हाथ से खाना न खा सके? जो झुण्ड इतना प्रभावी और बेख़ौफ़ था उसको एक 18 साल का निहथा लड़का ताश के पत्तो की तरह फाड़ कर बिखेर गया. आपको तोह पता हे है के वो किसका खून है और उसने 100 से ज्यादा लोगो के सामने इस काम को अंजाम दिया, वो भी चाँद मिंटो में?",

"साफ़ साफ़ कहो सुदर्शन की तुम चाहते क्या हो? मैं तुम्हारे कहने पर उस लड़के का naamo-nishaan मिटा सकता हु बस तुम अपनी बात खुलकर कहो.", काका जी के चेहरे पर गर्मी भड़ती देख सुदर्शन ने अपनी दुखती गर्दन को थोड़ा सा हिलाया और तार चढ़े दांतो से मुस्कुराया.

"ये काम तोह आप हमसे करवाते थे काका जी और जहा तक मैं जानता हु हमारे बाद आपके पास इतने दम वाला तोह कोई और है नहीं. मेरी दादी है न चंद्रो देवी, उसने हमेशा मुझे ऐसे बड़ा किया की मैं शंकर चाचा जैसा बनु और न बन सका तोह काम से काम उमेद चाचा के समकक्ष हो सकू. उसने कभी ये न कहा के मैं मेरे दादा या tau-pita जैसा बनु. जबकि वो तीनो भी असाधारण हे थे लेकिन उन सबको सजा देने वाला था शंकर चाचा. मेरी दादी का हीरो कह सकते हो उस व्यक्ति को. और मुझे भी हर पल लगता था के एक दिन मैं शंकर चाचा के घुटने टिकवा दूंगा लेकिन पहले अपना जोर इतना बढ़ा लू की उनके बराबर राजनैतिक और कानूनी ताक़त हो मेरे पास. इस बीच मुझे पता हे न चला के मैं खुला सांड कब एक जंजीर में बंधा पागल कुत्ता बन्न गया. ताक़त के साथ साथ नशा, जिस्म और पैसे की भूख ने वो मकसद ख़तम हे कर दिया. लोगो की नजरो में खौफ देखना पसंद आने लगा था और इसको बढ़ाते बढ़ाते मैं दादी की बात भूल गया. वो कहती थी मुझे परिवार का नाम कायम रखना है असली चौधरी की तरह और ताक़त का भद्दा प्रदर्शन नहीं करना.", सुदर्शन अतीत याद करता हुआ जैसे खुदको कोस रहा था.

"मतलब तुम्हे अब उस लड़के से बदला नहीं लेना और शायद अब तुम हवेली के भीतर रहने वाले वो सहलाये जाने वाले बड़े कुत्ते का जीवन जीना चाहते हो.", काका जी के चेहरे पर आयी निराशा देख सुदर्शन नई कोई अभद्रता नहीं की.

"जब मेरी दादी का हीरो शंकर चाचा आजतक है तोह उनका खून भी उन्हें उतना हे प्यारा होगा न काका जी? अर्जुन खुद चल कर आया था हॉस्पिटल में और उसके साथ मेरी माँ और दादी भी थी. वो लड़का मेरा हाथ पकड़ कर आँखों में आंसू लिए मेरी दुर्दशा देखता रहा और जुबान से जैसे लफ्ज़ निकले हे नहीं उसकी. मेरी माँ ने तोह यहाँ तक कह दिया था के वो कही से भी गलत नहीं है. उसने मुझसे माफ़ी मांगी और कहा की वो जिस से भी प्यार करता है उसको मुसीबत या दर्द में नहीं देख सकता. मेरी गलती थी की मैंने उसके प्यार पर हे हाथ रख दिया और फिर भी वो अपने अंदर के जानवर को काबू में किये था जब उसने मेरी ये हालत बनाई. आज मेरी दादी का हीरो भी बदल चूका है और मेरा भी. आप पहले भी आये थे लेकिन चाचा ने मन किया हुआ था किसी को भी मेरे से मिलने से लेकिन आज मैंने खुद उन्हें कहा था की आप मुझसे मिल सकते है. अब आप बताओ के मुझे क्या करना चाहिए और आप जो करना चाहते है उस से मैं आपको जरा भी न रोकूंगा.?", सुदर्शन के द्वारा पूरी बात बताने पर काका जी ने समीप रखे पानी के गिलास से एक घूँट भरा और कुछ पल खामोश रहने के बाद बोलै.

"तुमने आसानी से घुटने तक दिए अपने से आधी उम्र के लड़के के सामने. और रही बात शंकर शर्मा की तोह आने वाले इलेक्शन के बाद उसको भी वो ताक़त न मिलेगी जब हमारी सरकार होगी. फिर इस अर्जुन को भी निबटा सकते है और उसके बाप को भी. मैं चाहता था के तुम हमारे साथ हे रहो चाहे वो सब न करो जो पहले करते रहे हो."

"उमेद सिंह सचिव बनेंगे और सरकार फिर से उनकी हे आने वाली है. मजे की बात भी सुना देता हु आपको, शंकर शर्मा क्मो बनेंगे चुनाव के बाद. मेरे लिए दादी ने एक गुरुकुल का विचार किया है जहा की देखरेख आदरणीय पंडित रामेश्वर जी करेंगे. और वो लोक दाल वाला तोह 5-6 साल से पहले आने वाला नहीं है. उमेद चाचा ने दिल्ली में दखल दे दी है जिसका नतीजा सुना हो की 4-5 बड़े बाहुबली नाम अब गायब हो गए है.", सुदर्शन की बात सुन्न कर एक पल के लिए तोह काका जी की हवा हे खिसक चुकी थी और वो हैरान था के ये बिस्टेर पर लाचार पड़ा इंसान इतना सबकुछ कैसे जानता है.

"तुम्हे ये सब खबर कैसे है?"

"काका जी माफ़ करना, एक पूरी लिस्ट मुझसे भी पंडित जी ने ली थी चाँद रोज पहले. आपको फिर नहीं देख पाऊंगा लेकिन चलो मैं अपने दिल को समझा लूंगा. अलविदा.", सुदर्शन ने आँखें मूँद कर काका जी की परवाह न की लेकिन ये शक्श जैसे अभी और भी जवाब चाहत था पर उस से पहले एक भरपूर वार उसकी गर्दन और चेहरे के ठीक निचे हथोड़े सा लगा.

"मुझे पार्टी से इसलिए तोह बहार रखते है सब. तंग आ गया हु ये उमेद चाचा के ऐसे काम करता करता. गूडनिघत सुदर्शन भाई.", काका जी का बेहोश शरीर अपने कंधे पर डालता ये युवक जब सुदर्शन से मुखातिब हुआ तोह उसने बिना देखे हे एक हाथ उठा कर मुस्कान दी. अब वो बिस्टेर खाली था जिसपे जाने कबसे ये मरीज का भेष धरे तगड़ा युवक पसरा हुआ था. उमेद सिंह ने अपने तरीके से सचिव बन्न ने से पहले हे हर मुमकिन सफाई शुरू करवा दी थी.

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"कभी पागलपन की हद्द देखि है तुमने?", पिछले घर में जैसे लड़कियों को अभी नींद नहीं आ रही थी. विन्नी बेचैन थी क्योंकि अर्जुन से मुलाककट न हो प् रही थी और ऋचा ने तोह समय बिताने के बावजूद सही समय बिताया हे न था. जसलीन के दिल में भी विचारो का अलग हे द्वन्द चल रहा था जिसको वो किसी से कह न प् रही थी. अफसाना आज प्रीती के घर थी और उसके साथ हे आरती भी. यहाँ इन तीनो के साथ अभी अलका और ऋतू हे थी. कीर्ति समय से हे कोमल और प्रियंका के कमरे में उनके साथ सो चुकी थी. कल का दिन ख़ास होने वाला था और दूसरे घर भी सब तैयारी के बाद सभी सोने जा चुके थे. यहाँ बात जसलीन ने शुरू की थी.

"पागलपन से क्या मतलब है आपका?", अलका ने जैसे सवाल किया तोह विन्नी भी देखने लगी थी की जसलीन क्या कहना चाहती है.

"मतलब माइए कुछ आशिक़ देखे है पंजाब में जो सोसाइटी की परवाह किये बिना सबसे लड़ कर लड़की ले निकले. या फिर जाने क्या क्या हद्द पार की हो और कुछ तोह शायद मारे भी गए. तुमने कभी प्यार किया है जिसमे बगावत तक शामिल हो या पागलपन?"

"मैंने प्यार किया है? पागलपन हे न हो तोह प्यार हे क्या जसलीन जी और जरुरी तोह नहीं इसके लिए हद्द गलत तरीके से पार की जाए? पता है laila-majnu की शादी हो भी जाती तोह वो खुश नहीं रहते. ज़िन्दगी में प्यार को हांसिल करने के लिए दिल के साथ साथ दिमाग भी बरकरार रखना जरुरी है. सबर तोह सबसे हे ज्यादा.", ऋतू के जवाब पर विन्नी और ऋचा एक दूसरे को देख रही थी जैसे उन्हें यकीन नहीं था के ऋतू किताबो और लड़कियों के बीच हंसी मजाक के साथ इतनी संवेदनशील भी हो सकती है.

"ओहो.. मतलब कही तोह चिंगारी जाली हुई है चाहे अभी पता न हो. लेकिन अपने पंजाब में एक कहावत है की वो जाट हे क्या जो जट्टी को डंके की चोट पर ले न उड़े. शहीद बहोत होते है इश्क़ में, रांझे न सही रक़ीब हे बन्न जाओ. कई बार तोह मज़बूरी में ऐसा हो हे जाता है.", जसलीन लूडो का गिट्टा घूमती हुई उसको बोर्ड पर गिरती हुई गोटी आगे सरकने लगी.

"प्यार तोह मुझे भी हुआ है जसलीन लेकिन सच कहु तोह उसमे ये सब झंझट नहीं है. जाना घरवालों की मर्जी से है और वो दबाव देंगे नहीं फिलहाल और जिसको चाहती हु उसको पाना नहीं है. वो खुदगर्जी होगी.", विन्नी ने गिट्टा हाथ में लेते हुए कहा तोह अब ऋचा और जसलीन गौर से उसको देख रही थी. ऋतू बस मुस्कुरा रही थी और वैसा हे हाल था अलका का.

"मेरे इरादे मजबूत है विन्नी दीदी, ऐसे मजबूत की जीवन में या तोह कुछ चाहा नहीं और अब अगर चाहत है तोह बिना हक़ीक़त बनाये मेरा कोई वजूद नहीं. रही बात जसलीन वाले फिकरे की तोह जिस से प्यार करती हु, वो इतनी कुवैत तोह रखता है की मुसीबत आने पर एक तोह क्या हजार रुकावट हँसते हुए सेह ले. लेकिन प्यार सबकी मर्जी से हांसिल हो तोह वो सिद्ध होता है वार्ना ये उजाड़ना बर्बाद करने के लिए तोह मेरे पापा अकेले बहोत है सौ लोगो के लिए. सबर इसलिए कहा था क्योंकि वो खुद मेरी शादी उस से करवाएंगे जो मेरी धड़कन है. वेट, अर्जुन की कार आ गयी. मैं आती हु गेट खोल कर.", इन सभी को तोह भनक तक न लगी थी और ऋतू कमरे से तुरंत उठ कर आँगन से बहार की तरफ निकल चली.

"कमाल के कान है यार इस ऋतू के और क्या अंकल जी सचमुच इतने डेंजरस है?", जसलीन हैरान थी और ऋतू के अंदेशे पर बाकी सभी सिवाए अलका के.

"ारु नींद में भी हिल जाए तोह ऋतू बता देगी. आजतक उसने सिवाए अपने छोटे भाई की ख़ुशी के कोई दुआ नहीं की और अर्जुन के लिए भी ऋतू से बढ़कर शायद बस घर के बड़े हे हो. वैसे शंकर चाचा सचमुच ऋतू या घर के किसी भी सदस्य की आँख में पानी नहीं देख सकते. जसलीन, तुम्हे एक किस्सा बताती हु. संजीव भैया, जिनकी शादी होने वाली है न. वो तब 15-16 साल के होंगे और घर आये तोह सर से खून आ रहा था. उन्होंने ये बात सिर्फ चाचा से हे कही और वो जो भी लोग थे इस शहर में कभी दिखे नहीं. 7-8 नंबर घर अगर संसार कहलाता है तोह उसके असली संरक्षक है शंकर चाचा, जिनके बस नाम से ज़िले का हर सरकारी व्यक्ति नजरे झुका लेता है. हमारे दादा जी की भरपूर िज्जात्त है लेकिन शंकर चाचा, उमेद चाचा और इन्दर चाचा जो है इनके किस्से दादा जी से ज्यादा मशहूर है. रांझे नहीं है वो और रही बात घर मिटाने की तोह शहर तक खामोश किये थे इन तीनो ने कभी. अर्जुन उन तीनो का सामान बीटा है. और छुपाना जरा भी नहीं क्योंकि मैं जानती हु तुम अर्जुन से प्यार करती हो. हो जाता है और दिल पे मत लेना बस की वो जीवन भर नहीं मिला.", अलका ने गिट्टा लेके एक ख़ास अंदाज से घुमाया और लगातार 6-6-3 लाने के बाद जसलीन, ऋचा और विन्नी की गिट्टी काट कर फिर से उन्हें 3 बार बोनस का इशारा कर दिया.

"ओह बाप रे. तुम तोह कमाल हे हो अलका.", ऋचा ने खामोश सी जसलीन की तरफ न देखते हुए अलका के ऐसे करने की तारीफ की तोह वो एक अदा से मुस्कुराई.

"ऋचा दीदी, ये जो डाइस (गिट्टा) है न इसको कण्ट्रोल करना मैंने ऋतू से सीखा है. जब वो घूमती है तोह वो बता देगी क्या नंबर लाएगी. अब आप हे देखो की जसलीन की ये अगली गोटी 6-2 पे कटेगी और मैं ये काटने वाली हु. और उसके बाद ये जो विन्नी दीदी की घर के ठीक बहार राखी है न 4 कदम दूर, ये भी बंद. लो फिर.", अलका के ऐसा कहने पर सबकी नजर पिछली बात से हट चुकी थी और लगभर उसने वही कर दिखाया था जो कहा था. जसलीन की गिट्टी काट कर उसके 3 अंक आये थे.

"शीट.. हर बार परफेक्ट नहीं आता है अलका. ओवर कॉंफिडेंट हो तुम.", ऋचा ने थोड़ा मायूसी से देखा क्योंकि विन्नी की गिट्टी एक अंक से बच गयी थी.

"ऐसा है ऋचा दीदी, कई बार मंजिल से पहले वाले भी हटाने पड़ते है. ये आपकी आखिरी जो बहार थी, 3 पे ये गयी अंदर और अब देखो आया 4.", अलका ने फिर सी गिट्टा घुमा कर बोर्ड पे गिराया और उठ कड़ी हुई. इस लूडो में सिर्फ उसकी हे चारो गिट्टी बहार थी अब और बाकी तीनो की सभी वो बंद कर चुकी थी.

"ओह तेरी.. तुम तोह यार kaat-peet बहोत करती हो.", विन्नी दीदी ने ऐसा कहा क्योंकि इस सबके बीच अलका हे अकेली थी जिसकी आजाद गिट्टियां लगभग घर के नजदीक थी.

"कहा तोह था मैंने की ऋतू से सीखा है दीदी. Kaat-peet का काम वो इतने ाचे से करती है की एक दिन शंकर चाचा को भी फकर होगा. मैं तोह मैनेजमेंट जानती हु और हम दोनों एक दूसरे को अपने अपने सब्जेक्ट सिखाते है. प्रैक्टिस के लिए. बाकी जसलीन जी, मौका मिले तोह अर्जुन से बात कर लेना. इतनी दूर आयी हो और ऐसे गीति की तरह बंद रहने से कुछ होने नहीं वाला. गूडनिघत. आप लोग भी आराम करो और पानी यहाँ रख दिया था मैंने.", अलका कमरे से बहार निकल चली इठलाती हुई और पीछे छोड़ गयी इन तीन चेहरों को हैरान.

"वाओ. She's अमेजिंग यार विन्नी. जसलीन, कोमल जो है वो चैस और कर्रम में माहिर है लेकिन आज देखा की ये लड़की डाइस को कण्ट्रोल करती है जो इसने ऋतू से सीखा है. सोच के साथ साथ कितनी प्रैक्टिस की होगी न इन दोनों ने भी?"

"आपने शायद सुना नहीं ऋचा. ऋतू ने सबर कहा था और अलका ने मैनेजमेंट. ये दिल लगाने के साथ साथ बहोत हे फोकस वाली लड़कियां है. मैंने तोह जाहिर भी नहीं किया की मुझे अर्जुन पसंद है लेकिन इसने तोह साफ़ हे बता दिया. बड़ा खुला दिल है इसका.", जसलीन हतप्रभ थी अभी जो भी हुआ. कमरे में चल रहे एक और रात गहराने की वजह से उसने गद्दे पर पसरते हुए चादर ऊपर कर ली. ऋचा और विन्नी भी उठ कर बगल वाले गद्दे पर आ लेती जबकि बीएड खाली था.

"इंसान तभी नार्मल लेवल से आगे बढ़ता है जब चाहत सोच से कही ज्यादा हो और सेहन बहोत कुछ किया हो. ऋतू किसी से प्यार करती है और उसका कहना ये था की वो शादी हे करेगी न की मेरी तरह सिर्फ प्यार जब तक मिले तब तक सही. इस से इतना तोह पता चल हे गया की वो हद्द से ज्यादा हे चिंतित और मेहनती है, सबर के साथ साथ. इस बीच वो किसी को नाराज भी नहीं करना चाहती.", विन्नी तोह उलझ हे गयी थी ये सब सोच सोच कर लेकिन ऋचा के इरादे कुछ और हे थे.

"वो अमर होना चाहती है."

"क्या मतलब ऋचा?", विन्नी ने एक बार जसलीन की तरफ देखा और फिर बड़ी धीमी आवाज में पुछा. जसलीन जैसे थकान की वजह से नींद में जा चुकी थी और विन्नी अभी भी कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी उसको सुना कर.

"वो वही तोह नै चाह रही जो मुझे लगता है की सबको जिसकी आस है? इतनी म्हणत, हर बात और क्षमता पर पकड़ होने के साथ साथ ऋतू हर मामले में यहाँ मजूद किसी भी लड़की से बेहतर है विन्नी. और अलका के भी कान ऋतू के साथ हे खड़े हुए थे जो अजीब था. शायद मेरा वहां हो लेकिन जो मैं सोच रही हु उसके हिसाब से बाकी सब कुछ समय चाहते है और ऋतू पूरा जीवन. पापा के पर्स में मेरी फोटो भी उसके निचे हे है और उन्होंने खुद भी कहा था के वो अगर किसी के लिए जान दे सकते है तोह वो है मेरी छोटी बहिन ऋतू. उसके बाद मैं.", ऋचा भी उतनी हे धीमी आवाज में ये सब विन्नी को बता रही थी जो सोई हुई जसलीन के कान तक नहीं जा सकता था.

"मतलब? अर्जुन और ऋतू?", विन्नी ने जैसे हे कहा ऋचा ने उसके होंठो पर ऊँगली रख दी.

"फिर कभी मत कहना विन्नी ये नाम. इतनी म्हणत अगर वो कर रही है न तोह वो उसको मिलना चाहिए. भँवरे लाख सही एक फूल की तरफ खींचे चले आये लेकिन जो मिटटी खुद को तैयार करती है न उस फूल को उस लायक बनाने के लिए, उसका दर्द और त्याग कोई नहीं समझता. हमको घंटा न सुनाई दिया था कुछ जबतक कार गेट पर न आ गयी और ऋतू एक मिनट से भी पहले सब दरवाजे खोल बहार जा चुकी थी. दिल है वो विन्नी दीदी, आकर्षण नहीं. अर्जुन सबको प्यार कर सकता है क्योंकि सभी उस से प्यार करते है. लेकिन ऋतू उसकी जड़ है शायद जिसके बिना खुद अर्जुन भी अर्जुन नहीं.", ऋचा के इस गहरे आंकलन से एक बात तोह साफ़ हो चुकी थी की वो सचमुच हे कोमल और ऋतू की हे बहिन है बात को बारीकी से समझने के मामले में. दूसरा था विन्नी के चेहरे पर आयी गंभीरता.

"मतलब मैं पीछे हट जाऊ.?", विन्नी अभी भी दूसरी हे सोच में गम थी जिस पर ऋचा मुस्कुरा उठी.

"न न.. तुम तोह बबिता दीदी से भी ज्यादा मजे लो उसके साथ. दिल खोल के करेगा वो तुम्हारी हसरत पूरी. प्यार जो करता है तुमसे. वो सभी से करता है विन्नी है लेकिन मेरा दिल कहता है के इस वक़्त वो सुकून से होगा तोह ऋतू की बाहों में होगा.", ऋचा की बात पर विन्नी ने भी बस गहरी सी आह भरी.

"इनकी शादी हो जायेगी क्या? तोह प्रीती का क्या होगा?"

"मैं गलत भी तोह हो सकती हु? प्रीती से तोह शादी होनी हे है लेकिन मुझे लगता है के वो दोनों से करेगा. दोनों लड़कियों के हाथ में शामे अंगूठी थी जब मैंने देखा तोह और वो लगती भी जैसे एक जैसी या पता नहीं .. दिमाग की माँ चुड़ गयी है यार विन्नी... चूड.. मेरी तोह माँ भी इनके हे बाप ने छोड़ राखी तोह मैं क्या बोलू. हु तोह मैं ऋतू और कोमल की बहिन हे.", ऋचा भी दिमाग से हार कर अपना दूसरा पक्ष साबित कर चुकी थी.

"हाहाहा.. मतलब है तोह तू कोमल और ऋतू से थोड़ा काम हे... ?", विन्नी खिलखिला कर हंसने लगी तोह ऋचा भी हंस दी.

"और क्या कहु? मेरी माँ रेखा चची जैसी होती तोह बात अलग थी. अब खुद हे सोच के मैं तोह खुद अर्जुन के निचे आना चाहती हु और तू तोह मजे भी ले चुकी आधे अधूरे. ये बगल में जो पसरी हुई ये भी उस पे लट्टू और साला इन सबके बीच मेरी सोच भी ऋतू को अर्जुन के साथ जोड़ गयी. भूल गयी थी की वो पंडित रामेश्वर जी न कानून है. चुद सभी सकते है लेकिन वो मिलेगा सिर्फ प्रीती को. चल छोड़ ये सब और कल तू जा उसके साथ और फिर मेरा नंबर लगवा. मैंने न इन ढकोसलो में पड़ती, सीधा अंदर चाहिए वो मुझे और उसके बाद करुँगी प्यार. हाँ नहीं तोह.", ऋचा ने जैसे विन्नी को कल के लिए आगाह कर दिया था क्योंकि अर्जुन विन्नी को मंजू के घर जो ले जाने वाला था.

इधर अलका ने दोनों तरफ से बड़ी सफाई से दरवाजे बंद कर दिए थे, बाहर वाला और सीढ़ियों की तरफ का भी जो दूसरी तरफ से खुद ऋतू ने लगा दिया था. उसकी बाहों में आज अर्जुन था जिसके लिए ऋचा अनिश्चित थी और ऋतू कल्पना से भी अधिक आगे बढ़ कर वो सब कर सकती थी जो हीर को भी पानी भरवा दे. एक उजले माँ की तरह अर्जुन बस इन मनचाहे आगोश में खुद को पिघलने के लिए त्यार था इस रात ऋतू की बाहों में. ये रात बस इन दोनों की थी और उनके अनजाने जाने प्रेम की.
 
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