Incest Pyaar - 100 Baar - Page 38 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

एक दिन जरूर वह जाऊंगा

तुम जहा जाने से रोकती रही मुझे..

किस्मत ताल दे या वक़्त..

तुम मिलोगी, जहा चाहा था मुझे..
 
कहानी 10-12 फेब तक रोकने के लिए माफ़ी चाहता हु. व्यक्तिगत समस्या की वजह से फ़िलहाल लिखना मुमकिन नहीं होगा. ये नव वर्ष सोच से विपरीत शुरू हुआ है.

आप सभी की भावनाओ और प्रेम की दिल से कदर करता हु लेकिन फ़िलहाल मानसिक तनाव और कार्य सम्बन्धी अड़चनों से लिखना कटाई मुमकिन नहीं.

आपका

एनिग्मा

🙏
 
कहा से लिखना शुरू करू ये समझ नहीं आ रहा फिर भी आप सभी को नमस्कार और प्रेम. फिलहाल तोह आप सभी के कमैंट्स हे पढ़े है जिस से इतना तोह साफ़ जाहिर है की आप लोग कितना लगाव रखते है इस कहानी से और इतने अंतराल के बावजूद भी किसी ने अपशब्द नहीं लिखे. भीतर से उम्मीद भी होगी की जल्द हे कहानी सुचारु रूप से जारी होगी.

मैं खुद भी ऐसा हे चाहता हु की निरंतर बिना अविलम्ब इस उपन्यास रुपी कहानी को लिखू और इसके मुकाम तक ले कर जाऊ. चित्रकला के सामान लेखन भी सुकून देता है और यही वजह थी की मैंने अनगिनत चिरत्रो को एक साकार रूप देने की कोशिश की थी प्यार 💯 बार लिखने के साथ.

मेरे लिए कभी भी ये लेखन सिर्फ vaasna-purn अभिव्यक्ति भर नहीं रहा बेशक शुरुवात सिर्फ कामुकता से भरा रहा हो. आज कीबोर्ड के हाथ लगाए लगभग 3 हफ्ते हो चुके है और हर रोज सोने से पहले मैं एक निगाह लैपटॉप पर डालकर यही सोचता हु की कब मैं फिर से लिखना शुरू कर सकूंगा. अगर दिन के किसी भी लम्हे में मुझे अपने लिए समय मिलता है तोह कैनवास से अतिरिक्त सिर्फ प्यार 💯 बार के हे अगले दृश्य गढ़ने लगता हु. हाँ ऐसा किसी कागज़ या कंप्यूटर पर नहीं करके ये सिर्फ ख्यालों में हे होता है.

एक हे व्यक्ति के जीवन में इंद्रधनुषी कैनवास सामान अनिगिनत रंगो का समावेश रहता है और इतने हे किरदारों के सामान वो एक जीवन. बस हम जो दिखाना नहीं चाहते या देखते नहीं है वो है श्वेत और श्याम, जो एक और कटु सत्य है मनुष्य जीवन का.

हाल फिलहाल इन्ही 2 रंगो के सामान वर्तमान जीवन में सफ़ेद और काले के सिवा और कोई रंग उपलब्ध नहीं है. कार्य और व्यक्तिगत जीवन में असहनीय उथल पुथल से सबकुछ सहने की क्षमता से कही अधिक हे प्रभावित हुआ है. जीवन 2 हे तरह से जिया जा सकता है. सरल और जो चल रहा है चलने दिया जाए. दूसरा ऐसे की आप बदलाव के लिए म्हणत और प्रयत्न करे क्योंकि सरल जीवन से आप सहमत नहीं होते. इसमें भी किस्मत का हम किरदार है चाहे जितनी मर्जी कोशिश की जाए. मैं हमेशा से हे दूसरे पहलु का समर्थक रहा हु और यही वजह है जिस से वर्तमान इतना अधिक प्रभावित हो रहा है. कभी म्हणत के साथ किस्मत भी रही है तोह कभी परिणाम विपरीत.

अब ये तोह समय के हे गर्भ में है की आगे क्या होगा लेकिन हाल फिलहाल मई आप सभी से कोई भी वादा न करते हुए बस इतना हे कहूंगा की सकरात्मक स्थिति बानी तोह मैं जल्द हे कहानी आगे बढ़ाऊंगा और ... और .. फिर सबकुछ अपने हाथ में तोह है हे कहा 😅

आप सभी लोगो से जितना प्यार, सम्मान और लगाव मिला शायद यही वजह रही की ाचे और बुरे, हर हालात को सिर्फ और सिर्फ सकरात्मक दृष्टिकोण से हे लिया. आगे भी यही प्रयास रहेगा अगर कहानी पुनः प्रारम्भ कर पाया तोह.

आप सभी दोस्तों को इतने अपनेपन और स्नेह के लिए नमन. जीवन के सुनहरे पथ के लिए शुभकामनाये और प्रार्थना.

आप सभी का जीवन मंगलमय हो और सफलता के साथ साथ अपनों का प्यार मिले.

आपका

एनिग्मा

🙏





what's the resolution of my monitor
 
मेरा तोह बस नहीं चल रहा दोस्तों. जितनी उत्सुकता आप सभी को कहानी पढ़ने की है, उस से कही ज्यादा मुझे लिखने की है. अगर समय का एक दृश्य बताऊ तोह मैं इतना खाली हु की 15-16 घंटे हर दिन लिख सकता हु. दूसरा सच ये है की चाह कर भी लिख नहीं सकता.

मैं की कल्पना से तोह असंख्य दृश्य लिखे और बने है पर कही भी छाप नहीं पाया. बस एक हे डर है की कही इतना विवश न हो जाऊ जिस से मैं खुद हे इन किरदारों को अपने से दूर न कर दू.

दिल चाहता है एक बार फिर उन्मुक्त होना, फिर अतीत के वो अविस्मरणीय किस्से कहानियां साँझा करना जिन्हे जाने कब से समेटे हु. शायद कुछ वक़्त लगेगा क्योँकि फिलहाल तोह जैसे मैं हे अतीत के उस दौर पे पहुंच चूका हु जहा से शुरुवात हुई थी. हाँ उम्रदराज हो कर वापिस जाना थोड़ा कष्टदायक जरूर है 😅😅

जीवन में एक बात को जरूर याद रखियेगा की परिस्थिति जितनी चाहे दुर्गम और दुश्वार हो जाए, चेहरे पर मुस्कान संजोये रखना.

प्यार 💯 बार को तोह यकीनन जारी रखूँगा चाहे ये अवकाश कुछ दिनों या महीने भर और चले. अधूरा रहना तोह एक हे सूरत में होगा लेकिन मैं स्वस्थ हु और बाकी उपरवाले की मेहरबानी🤣🤣.

ाचा लगा आप सभी को यु माहौल बनाये हमेशा की तरह हंसी मजाक करते देख. यहाँ सिर्फ कहानी हे नहीं, हम सभी अपने दिल की बातें भी बिफिकर साँझा करते है. अपडेट हो या न हो, लेकिन एक अनकहा सा तालमेल सभी के बीच जरूर बन चूका है जिसका प्रमाण है की 180 उपदटेस पर लगभग 2300 पेज और इनमे असंख्य भावनाये, मस्ती मजाक और shikve-shikayte. यही सब वजह है की मैं अगर चाहु भी तोह कहानी पर 🔒 नहीं लगा सकता. इसको बंद करने का मतलब जैसे असंख्य लोगो के बीच बने संपर्क को ख़तम कर देना.

ऐसे हे आप सभी इस मंच को बरकरार रखिये और मैं भी कोशिश करूँगा की हालात जितनी जल्दी बेहतर कर सकू करू. फिर आप सभी के साथ कहानी और चर्चा पुनः प्रारम्भ करूँगा.

ढेर सारा प्यार और शुभकामनाये 🙏🌱

आपका

एनिग्मा
 
कुछ समय से बेरोजगार था दोस्तों 🤦

ये काम मिला भी तोह बहोत छोटी सी डेडलाइन के साथ. 14-17 मतलब आज का दिन भी व्यस्त है. अपनी हे कहानी को 2-3 दिन पढ़ने के बाद आगे लिखने हे लगा था की ये सब हो गया.

हाँ जिस दिन लगेगा की मैं इस कहानी के किरदार भूल चूका हु तोह स्पष्ट बता दूंगा की अब लिखने में असमर्थ हु.

उतार चढ़ाव है जीवन के और बस यही वजह है अतिरिक्त देरी की. 🙏
 
अपडेट 181

Swayam-Avlokan

मार्किट गए सभी लोग घर वापिस आ चुके थे और अर्जुन को साथ में लिए विन्नी दीदी अपनी माँ को ढूंढ़ती हुई कौशल्या जी की तरफ आयी तोह वह पहले हे जोशीला माहौल था. सभी बुजुर्ग महिलाओ के बीच राजेश्वरी जी, Ruchita-Shalini-Renuka-Madhu बुआ आदि महफ़िल लगाए बैठी थी. उमेद जी के साथ नरिंदर जी भी विवाह स्थल पर जा चुके थे जहा ढेरो तैयारी देखनी थी.

"ये आ गयी तेरी लाडो, भाभी. हो गया तेरा लेहंगा टाइट विन्नी?", रुचिता ने मस्ती से ये द्विअर्थी बात कही और उसके साथ बाकी सभी बुआ भी हंसने लगी. कौशल्या जी ने हंसी में साथ दिया पर यशोदा सांगवान जी ने हंसने के साथ हे रुचिता को नजरो से घुड़की दे डाली.

"अरे चची, रूचि को क्यों आँख दिखा रही हो? माधुरी के बाद अब इसका हे नंबर लगने वाला है तोह लेहंगा टाइट रखना पड़ेगा न?", मधु ने एक कदम और आगे बढ़ाते हुए कहा जिस पर कौशल्या जी ने उसके सर पर चपत लगा दी.

"थोड़ा देख भी लिया कर गुड्डू.. भतीजा भी खड़ा है तेरा. हाँ विनीता बेटी, जरुरी काम था क्या कुछ?", पूर्णिमा जी ने अर्जुन का सर पुचकारते हुए बोलै जो हैरान भी था और समझने में भी लगा था के ये सब ऐसे मजाक भी करती है.

"वो दादी मैं तोह पूछने आयी थी माँ से की ये कौनसे रूम में रुकी है. इनके पास हे मेरा सामान रख देती या फिर जहा कहो.", विन्नी के गाल हलके गुलाबी तोह हो गए थे लेकिन वो इन सबके बीच खुद को ऐसे मासूम बनाये हुए थी जैसे उसको कुछ पता हे न हो.

"तेरा सामान तेरी माँ के पास न रखियो विन्नी. जमाना खराब है.", रूचि ने फेर द्विअर्थी बात कही जिस पर मधु उसके साथ ताली मारती हँसते हुए दोहरी हो गयी. राजेश्वरी जी को अब इतनी शर्म आ रही थी की पल्लू मुँह पर हे रख लिया.

"अरे बस भी करो छोरियों. हाँ बीटा, वो तेरी माँ रेखा के हे कमरे में रुकी है. और अगर तू चाहे तोह सामान रेखा को पकड़ा दे नहीं तोह वो सामने अलमारी में रख दे जब लेना हो निकल लेना.", कौशल्या जी ने गोदरेज की चाबी विन्नी की तरफ बढ़ाते हुए कहा. मुस्कराहट उनके भी चेहरे पर थी इस हंसी मजाक के माहौल में. विन्नी चाबी लेती स्टोर की तरफ बढ़ी थी और शालिनी बुआ उठ कड़ी हुई.

"ऐ मधु, तू ऊपर वाले कमरे में हे रुकी है?"

"न, मंजू के घर. तेरे जीजा साथ है न तोह ऐसे माहौल में लोग आवाज सुन्न लेते है. तू चलेगी क्या?", मधु ने यहाँ शालिनी को भी लपेट लिया था जिस पर वो अब अपनी चची कौशल्या जी की तरफ मासूमियत से देख रही थी.

"हाहाहा.. वैसे भी ये साली वाला फ़र्ज़ है शालिनी.", रूचि ने भी कसार न छोड़ी थी.

"तोह साली तोह तू भी है रूचि और ये रेणुका भी. तुम दोनों देख आओ आज और अगर रिजल्ट सही लगा तोह कल मैं देख लुंगी. चल अर्जुन, तेरे कमरे में मेरा सामान रखवा. और रेणुका, तू चाहे तोह मेरे पास सोने आ जाना. अनामिका तोह Aanchal-Damini के साथ है फेर अकेले मुझे भी नींद न आती.", शालिनी ने उन दोनों को चुप करवाते हुए कमरे से जाने का रुख किया तोह मधु भी उठ कड़ी हुई.

"मैं भी चलती हु तेरे साथ और वैसे मैं यही रुकूंगी आज मेहंदी लगवाने के लिए. उनका (अशोक) तोह कुछ ata-pata नहीं और हिमांशु या तोह अपने नाना के साथ होता है या इधर उधर. रेणुका भी रहेगी अपने साथ में.", मधु बुआ शालिनी के साथ हे कमरे से निकली और अर्जुन भी. आँगन से दोनों बैग उठा कर वो अपनी दोनों बुआ के पीछे चल दिया. हर कमरे में मेहमानो की आवाजे आ रही थी और घर के सदस्य उनके हे साथ व्यस्त थे. शालिनी सबसे आगे थी और उसके बाद मधु. सीढ़ियां चढ़ते वक़्त न्यास हे अर्जुन की नजर सलवार में कैसे मधु बुआ के बड़े बड़े कूल्हों पर चली गयी. उनकी लचक और थिरकन के साथ कामुक गोलाई ने पल में हे अर्जुन को सम्मोहित सा कर दिया था जो मधु बुआ से छिपा न रह सका. शालिनी जहा दरवाजा खोल कर अंदर घुसी, मधु बुआ एकदम से अपनी जगह रुक गयी चलते चलते. अर्जुन कूल्हों की लचक में खोया सीधा हे बुआ के नरम पिछवाड़े से टकराया और इतने हे समय में मधु बुआ ने उसके उभर को ाचे से सेहला कर आँख मारी और तुरंत अंदर चली गयी.

'बच गया. ये पता नहीं एकदम क्या हो गया था.', अर्जुन ने होश में आते हे इधर उधर देखा तोह पिछले हिस्से वाले कमरों के दरवाजे बंद था और आँगन लगे शामियाने की वजह से निचे से तोह किसी की नजर पड़ने का सवाल हे न था. गहरी सांस भरता हुआ वो haal-kamre को लांघ कर अपने कमरे में आया तोह शालिनी बुआ साड़ी के पल्लू से हे चेहरा साफ़ करती हुई खुदको आईने में निहार रही थी. इस बार अर्जुन की नजर आईने में हे उनके ठोस उभारो पर पड़ी जिन्हे उस ब्लाउज ने मजबूती से कैसा हुआ था. देख कर हे लगता था की शालिनी बुआ ने जैसे अपने शरीर को समझा हे न था और उनके पतिदेव ने जैसे वो म्हणत हे नहीं की थी जिसके होने पर शरीर की मांसलता बढ़ती है और ख़ास जगह पर भरपूर भराव आता है.

"हाँ.. अब रख दे इसका सामान यहाँ.", मधु बुआ ने कुटिलता से अर्जुन को देखा था और उसकी चोरी पकड़ ली थी जिस पर शर्मिंदा होता अर्जुन नजरे झुकाये वो दोनों बैग बिस्टेर के एक तरफ रखने आगे बढ़ा और वापिस आने लगा तोह बेध्यानी में उसका वो सख्त उभरा हुआ हिस्सा शालिनी बुआ की निर्वस्त्र पीठ से एक सिधाई में लगता हुआ निकला. अर्जुन तोह इसके बाद एक पल भी न रुका अपने कमरे में और मधु बुआ ने हैरान सी शालिनी को देखा तोह हंसी छूट गयी.

"हाहाहा.. मुन्ना अब बड़ा हो गया है शालिनी और देख तेरे सिर्फ पल्लू हटने से हे उसका चेहरा लाल हो गया था. हाहाहा.. चेहरा देखने वाला था अर्जुन का जैसे कोई पंछी फड़फड़ा रहा हो क़ैद में और फिर जगह मिलते हे उड़द जाए.", शालिनी तोह अर्जुन को पहले भी ाचे से महसूस कर चुकी थी लेकिन आज ये एहसास किसी की उपस्थिति में हुआ था इसलिए समय लगा सहज होने में. लेकिन उसके भी चेहरे पर हंसी आ गयी.

"गबरू हो चूका है वो मधु और मुझे लगता है इसमें भी तेरी हे शरारत होगी. दुपट्टा तोह तूने भी नहीं लिया और झुक कर उसको ये पहाड़ दिखाएगी तोह बेचारा मेरे करीब से भागेगा हे. तू आज तक वैसी हे शरारती है जो लड़की क्या लड़को को भी नहीं बख्शती थी. वैसे मुझे नहीं लगता की अर्जुन को मेरे पल्लू हटने से फरक भी पड़ा होगा.", दरवाजा लगाती हुई शालिनी ने अपने बैग से सलवार कमीज निकालने के बाद साड़ी को जिस्म से अलग करना शुरू किया तोह मधु उसके छरहरे जिस्म को लगातार ध्यान से देख रही थी.

"तू न शालू, ब्याह के 20 साल में भी जैसे अधखिली सी है. सुन्दर तोह उतनी हे है जितनी कॉलेज में थी लेकिन लगता है जीजा ने khaat-kabaddi जैम कर नहीं खेली तेरे साथ.", मधु आईने में देख कर मुस्कुराती हुई अपनी उन्नत्त छाती से कमीज ठीक करके वही बिस्टेर पर हे बैठ गयी. शालिनी भी कुछ उन्मुक्त मुस्कुराती हुई दरवाजे के पल्ले लगा कर वही बगल में हे पसर गयी.

"मधु, जीवन में ठहराव रुपी समय जो ग्रहण लगा देता है न उस से उबार पाना हरेक के वश का नहीं. जिन हालात में भैया का विवाह हुआ और फिर जैसे मुझे जीवन का नया दौर शुरू करना पड़ा वो सब तू सबसे बेहतर समझती है. भैया (उमेद) तोह फिर भी सामंजस्य बैठा गए राजेश्वरी भाभी के साथ क्योंकि उनके dukh-dard में वो सहभागी बानी. राजेश्वरी भाभी ने घर संभाला और उमेद भैया को Shankar-Inder भैया के रूप में बराबर सहयोग मिला. लेकिन मेरा क्या मधु?", शालिनी के दमकते चेहरे के पीछे एक अदृश्य दर्द साफ़ महसूस किया था मधु ने. ये जहां पीड़ा इतनी सफाई से संजोये रखना हरेक के वश की बात न थी.

"सॉरी यार शालू. अपनी रौ में बहकर मैं भूल हे गयी थी की तेरे दिल के घाव नासूर है. वो सब होने के बाद कितनी जल्दी तेरा ब्याह हो गया था और उसके बाद आइशा को जनम देते समय कितनी परेशानियां सही थी तूने. एक तरह से तोह तुझमे और रेणुका में कुछ ख़ास फरक हे नहीं है सिवाए इस बात के की तुझे सम्मान तोह मिलता है ससुराल में.", हंसोड़ और मनचली सी मधु के चेहरे पर आयी शिकन देख शालिनी ने माहौल सँभालते हुए अपने गुलाबी लबों को फैलते हुए प्रेम जाहिर किया.

"रहने दे इस सबको अब और मेरी लाइफ उतनी भी बुरी नहीं है. बस ये gharane-varane में शिष्टाचार का दिखावा ज्यादा हे होता है. लेकिन तुझे देख के तोह साफ़ लगता है के तेरी गाडी की सर्विस तबियत से होती है. मैकेनिक एक हे है या फिर..."

"धत्त.. कामिनी कही की.. सर्विस वही करता है जिसका हक़ है. वैसे तेरे लिए अगर ाचा मैकेनिक चाहिए तोह मैं मदद कर सकती हु.", अब मधु भी पुराने अवतार में लौट चुकी थी और दोनों behne-sakhi जीवन के वो पल एकांत में बतिया रही थी जहा का वर्णन अक्सर सिमित हे रहता है.

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"छत्त पर गद्दे लगवा दिए नवाब साहब?", अभी अर्जुन गलियारे से बहार वाले आँगन में पंहुचा हे था की हुक्के के तम्बाखू की महक के बाद अपने दादा जी की तंजीअ आवाज सुनाई पड़ी. यहाँ धर्मपाल सांगवान जी भी मौजूद थे 5-6 व्यक्तियों के साथ. शिष्टाचार से सभी को प्रणाम करता अर्जुन अपने दादा जी के हे करीब आ खड़ा हुआ.

"10 लोगो के बिस्टेर तोह लगा दिए है दादा जी और कूलर का कनेक्शन भी कर दिया. वैसे इतने लोग नजर तोह नहीं आ रहे जो ऊपर सोने वाले है.", अर्जुन बात तोह पंडित जी से कर रहा था लेकिन उसका ध्यान फर्श पर उकडू बैठे विनोद पर हे था. किसी ाचे बचे की तरह उसका विनोद चाचा अपने पिता और ताऊजी के समीप हे था.

"तेरे tau-chacha सभी ऊपर हे सोने वाले है बीटा और ाचा किया कूलर भी लगा दिया. कुछ वक़्त इधर हमारे साथ भी बैठ और इनसे मिल.", अपने दादा जी की बात सुनते हे अर्जुन घुटनो के भर उनके करीब हे बैठ गया. देहाती वेशभूषा में 2 व्यक्ति बड़े हे गौर से अर्जुन को निहार रहे थे. उनकी उम्र भी लगभग उसके दादा जी के सामान हे थी. उनकी बगल में हंसमुख, कृष्णेश्वर जी थे.

"जी."

"ये भी तुम्हारे दादा जी हे लगते है बीटा. अपने पंजाब वाले गाँव के सरपंच है धनीराम जी और आप है मोहन शर्मा, हमारे सहपाठी एवं बचपन के मित्र. कपिल के घर पे परिवार रुका है तोह कल तुम्हे उनका भी ध्यान रखना है. मार्किट और बाकी सभी काम के साथ.", गाँव का जीकर होते हे अर्जुन ने जहां मुस्कराहट के साथ दोनों के हे चरण स्पर्श किये. जैसे इन 2 व्यक्तियों के रूप में उसको बहोत कुछ मिल गया था.

"जग जग जियो मुन्ना. सुना था के Shankar-Inder जैसे दीखते हो लेकिन गलत सुना था. बड़े पंडित जी का अक्स हो hu-ba-hu kad-kaathi से बस चेहरा अपने दादा से विरासत में पहले तुम्हारे पिता को मिला और अब तुम्हे. कार्यक्रम के बाद अपनी मिटटी देखने आ रहे हो तोह वही तुमसे इत्मीनान से बात चित करेंगे.", ये धनीराम जी थे जिन्होंने मोहन जी के साथ हे अर्जुन के सर पे हाथ फिरने के बाद चेहरा गौर से देखते हुए आशीर्वाद भी दिया.

"जी जरूर दादा जी. महीना भर वही रहूँगा छोटे दादा जी के पास तोह आप सभी के साथ वक़्त ाचा गुजरेगा.", अर्जुन ने गेट के समीप कड़ी ज़ुबैदा और विन्नी को देखा तोह तुरंत उठ खड़ा हुआ. रामेश्वर जी भी समझ गए के वो उन्हें ले कर दूसरे घर जाने वाला है. मैं तोह उनका भी उथल पुथल से भर चूका था अर्जुन के मुलाकात करने के तरीके से लेकिन जाहिर न करते हुए उन्होंने भी जाने की आज्ञा दी. इसके साथ हे विनोद भी अचानक हे उठ खड़ा हुआ.

"अर्जुन बीटा, मैं भी चलता हु तुम्हारे साथ. 10-15 मिनट टहल के लौट आऊंगा और जबतक शंकर भैया भी आ जायेंगे.", अर्जुन ने सर हिला कर इस घाघ का भी स्वागत किया. ये 4 लोग यहाँ से रुखसत हुए तोह हंसमुख और कृष्णेश्वर जी भी छत पे टहलने का बोल कर पतली गली से निकल लिए. अब यहाँ सांगवान जी के साथ साथ ये 2 लोग और छोल साहब हे बाकी थे पंडित जी के सम्मुख.

"राम भाई, ये बचा गाँव आ रहा है?", धनीराम के ऐसा कहने में जैसे कुछ गहरा राज छिपा था जिसका भान सिर्फ पंडित जी को हे था.

"एक न एक दिन तोह उसने वह जाना हे था धनि बेशक मैं या तुम्हारी भाभी कितना भी taal-matol करते रहे. वैसे तोह अर्जुन काफी समझदार और सुलझा हुआ लड़का है लेकिन ..", 4 जोड़ी आँखें बड़ी उत्सुकता से पंडित जी पर लगी थी जो अपनी बात कहते कहते रुक गए.

"अर्जुन आजतक पुश्तैनी घर नहीं गया है भाई साहब? और लेकिन से आपका क्या अभिप्राय है?", सांगवान जी का सवाल जायज था क्योंकि रामेश्वर जी अक्सर अपनी बात पूरी हे कहते थे. आज उनके इतना धीमे बोलने और बीच में हे रुकने पर संशय तोह छोल पूरी को भी हुआ पर वो कभी सवाल नहीं करते थे.

"हहहहहहहह.. धनीराम ने जो अर्जुन का वर्णन किया था डॉक्टर साहब वो सटीक है. पहले तोह गाँव इसलिए नहीं भेज पाए की बोर्डिंग, स्वभाव और उसकी शिक्षा आदि कारण थे. वो घुलने मिलने वाला भी नहीं था उस समय लेकिन जैसे जैसे शरीर बढ़ने लगा वैसे वैसे इसको अपने हे दायरे में रखना मजबूरी बन्न गयी. खैर अब वो भी जाना चाहता है और मैं मन भी नहीं कर सकता. नियति को जो मंजूर होगा वो देखा जायेगा.", रामेश्वर जी जैसे मान हे चुके थे की अब अवरोध लगाना गलत हे होगा और इस्पे बाकी सभी ने सहमति भी जाता दी.

"ठीक कहा राम भाई आपने और जिनसे आपको परहेज है वो लोग विवाह में शामिल होने हे वाले है तोह यकीनन यहाँ भी वो आपके पौत्र को देखेंगे हे.", मोहन शर्मा के ऐसा कहने भर से हे रामेश्वर जी के जिस्म में एक झुरझुरी सी दौड़ गयी. गर्मी के मौसम में ये सार्ड एहसास के साथ पेशानी पर पसीने की बूंदे छलकती हुई साफ़ बता गयी थी की ये पक्ष तोह वो भूल हे गए थे.

"रानी अमृता और कुमार आ रहे है मोहन?", बस वो इतना हे पूछ सके थे.

"राम भाई, आपने बेशक खुद अपने हाथ से निमंत्रण न दिया हो लेकिन भिजवाया तोह था हे. कुमार महेंद्र पिछले हफ्ते हे पंचायत और हलके का जायजा लेने आये थे. उनके साथ एक साहूकार भी था जिसको कारखाने के लिए आपकी हे जमीन पसंद आयी थी. कुमार ने स्पष्ट हे मन कर दिया था उसको ये कह कर की पंडित जी गरीब को घर बसने के लिए बिना मूल्य ये जमीन दे सकते है परन्तु किसी व्यापारी को मिटटी पर कदम भी नहीं रखने देंगे. बाकी रानी अमृता आपको pita-tulya हे मानती है तोह देश में रहे चाहे विदेश में, विवाह में तोह शामिल होंगी हे.", डॉ धर्मवीर सांगवान जी तोह इस कथन को सुन्न कर हे अचंभित थे वही छोल साहब भी अपने बड़े धरम भाई की तरह गहरी कश्मकश में खोये अपना हे गणित लगाने में व्यस्त दिखे.

"बस वही लोग आये तोह कोई बात नहीं मोहन. उन्होंने न हमारे पिता जी को देखा है सही से और न हे वो अर्जुन को उस निगाह से देख सकेंगे.", पंडित जी ने एक निगाह बहार डाली तोह उस तरफ बस गुजरती हुई कार हे थी. कुछ आश्वस्त हो कर चेहरा साफ़ करके 2 घूँट पानी गले से उतार वो छोटी सी मुस्कान से छोल पूरी को देखने लगे.

"पंडित जी, सच कहु तोह इतने जटिल तोह मैंने ऑपरेशन नहीं देखे जितने जीवन के रंग आप दिखा देते हो. हाहाहा.. अब राजघराने से अगर आपके शुब्चिन्तक आएंगे तोह इसमें परेशानी हे क्या है.?", सांगवान जी ने बात के दौरान हे ठहाका लगते हुए सबको कुछ हल्का माहौल देने की कोशिश की थी जिसकी आवश्यकता भी थी जैसे.

"हाहाहा.. डॉक्टर साहब, अपने राम भाई साहब को उनके आने से परेशानी नहीं है. ये महल की देहलीज पर नहीं जाते फिर भी महल वाले इनके गाँव चले आते है इनके आने पर. उनका बाकी किसी से को राब्ता नहीं है सिवाए तथाकथित पंडित रामेश्वर मोतीलाल शर्मा जी के और चिंता की बात है बड़ी रानी सौंदर्य जी. स्वर्गीय कुमारी लक्षिका की छोटी बहिन और अपने बड़े पंडित जी की सबसे लाड़ली. उन्होंने ये चेहरा देखा तोह वो अर्जुन की मांग हे न कर बैठे राम भाई से. कुमार महेंद्र ने विवाह न करने का प्राण लिया हुआ है और रानी अमृता खुद भी अपने भाई के नक़्शे कदम पर है. खैर मांग तोह नहीं करेंगी लेकिन अगर बचा वह mel-jol भी करने गया तोह समस्या हो सकती है.", मोहन शर्मा के बयान पर रामेश्वर जी ने सहमति में गर्दन हिला दी.

"मतलब कुछ ऐसा जो अर्जुन को नहीं jaan-na चाहिए?"

"बिलकुल सही और वो कुछ बताये चाहे न बताये लेकिन सांगवान जी आप तोह भली भांति परिचित हो हमारे natwar-lal से. धागे का एक सिरा भी नजर आ जाता है तोह वो पूरे जले को खोले बिना तोह हटेगा नहीं. हर haveli-mehal में हजारो ऐसे किस्से दफ़न होते है जिनपे सामान्य नजर नहीं पड़ती.", अभी ये चर्चा आगे भी चलती लेकिन घर के बहार 2-3 कार रुकने पर छोल साहब ने इशारे से हे इस मंत्रणा को भांग करने का निर्देश दिया.

"ये चर्चा फिर कभी करेंगे भाई साहब और आज धर्मवीर भाई साहब हमारे गरीबखाने में रुकेंगे.", छोल साहब के कहने भर से बड़े सांगवान जी हामी भरते हुए उनके साथ हे हो लिए. सबसे विदा लेने के बाद उन्होंने बहार गौर किया तोह उनके बेटे के साथ शंकर, इन्दर, उमेद और घर के दामाद लोग आ चुके थे. संजीव भी लकी अरोरा को गेट तक छोड़ने आया, जो उसके साथ घर की छत्त पर जाने कितनी हे देर से गुफ्तगू में व्यस्त था.

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"इम्तिहान तोह ाचे हे गए होंगे तुम्हारे? अब परीक्षाफल भी आनेवाला है.", अपनी आदत से विपरीत विनोद बजाये अपने से आगे चलती उन 2 जवान लड़कियों को घूरने के बेहद संजीदगी के साथ अर्जुन से बात करता चल रहा था. ज़ुबैदा को कुछ निराशा जरूर हुई थी की दिनभर से वो अर्जुन के साथ थोड़ा बहोत भी समय व्यतीत न कर सकीय थी लेकिन अभी हालात से समझौता हे सही था. अर्जुन भी अपने इस चाचा के साथ जैसे निजी बातचीत का ितचुक था जो सबकुछ भुला कर विनोद से कदम मिलता हुआ उसकी बात बड़े गौर से सुन्न रहा था.

"जी चाचा जी. इम्तिहान तोह सभी के ाचे हे जाते है बस ये परीक्षाफल हे फैंसला करता है की उम्मीद सही थी या म्हणत. अगले महीने परिणाम आ जायेगा या फिर इस महीने के आखिर में. वैसे इस बार मैं आपके हे पास बाकी के avkaash-din बिताने वाला हु अगर आपको ऐतराज न हो.", अर्जुन ने एक नजर तनेजा निवास पर करने के बाद विनोद के चेहरे के भाव पढ़ने की कोषसिंह की जहाँ दिखावे की ख़ुशी साफ़ जाहिर थी. आकांक्षा के घर में अंदर की बत्तियां जलने का मतलब था के वह वो लोग अभी जाग हे रहे थे.

"हाँ भाई क्यों नहीं और वो क्या सिर्फ मेरा घर है? मुझे तोह ाचा हे लगेगा अगर मेरा भतीजा हमारे साथ समय बिताये तोह. वैसे अकेले हे आओगे या?", विनोद जितना चाहे धूर्त था लेकिन दिमाग की अधिकतर नस बंद हे थी उसकी. अर्जुन को आंकना शायद समझ से परे था.

"सोच तोह रहा हु चाचा जी की ऋतू दीदी को भी साथ ले चालू लेकिन उन्हें गाँव का माहौल जंचेगा भी या नहीं. वैसे दादा जी बता रहे थे की कहने भर को हे वो गाँव है लेकिन किसी बड़े कसबे से काम नहीं. आपका तोह वह रुतबा भी बहोत है.", अर्जुन ने जानबूझ कर ऋतू का जीकर करने के साथ विनोद की बड़ाई की. और तारीफ सुन्न कर लाजमी विनोद का सीना 1 इंच चौड़ा हो गया.

"तुम वह आओगे तोह जान जाओगे भतीजे की हम भी कुछ रसूख रखते है. हाँ ताऊजी या शंकर भाई का जैसा इस शहर में है उतना तोह नहीं लेकिन हमारे नाम के साथ 'जी' हर व्यक्ति लगता है. परिवार राजघरने का समकक्ष नहीं है लेकिन उतना हे सम्मान है कसबे और 10 गाँव में. पुराने व्यवहार के लिए मुझे खेद है क्योंकि तुमसे पहचान नहीं थी उस वक़्त.", विनोद और अर्जुन के कदम इस घर के बहार हे ठिठक गए जहा विन्नी दीदी के साथ ज़ुबैदा भीतर दाखिल हुई. छत्त पर कड़ी ऋतू और जसलीन भी इन्हे देख लिया था.

'मैं कुछ देर तक आता हु दीदी, आप लोग दरवाजा लगा लीजिये.', अर्जुन ने विनोद को जवाब देने से पहले विन्नी को निर्देश देने के साथ हे कदम उस तरफ बढ़ा लिए जहा अगली गली में पार्क था. विन्नी भी छोटे दरवाजे की सांकल अंदर से लगाती हुई चली गयी.

"जाने अनजाने जो होता है उसका क्या बुरा maan-na चाचा जी? आप बड़े है और आपने अगर कुछ किया होगा तोह उसकी वजह होगी. मिले तोह हम वैसे भी पहले हे बार थे और आप पिछली पीढ़ी के सबसे छोटे और लाडले सदस्य है तोह इतना चलता है. मेरे दिल में उस बात के लिए कोई द्वेष नहीं है. अगर आपको देरी न हो तोह कुछ वक़्त इस पार्क में बैठे?", सोलंकी के घर के सामने वाले पार्क में दाखिल होते हुए अर्जुन ने विनोद को भी अंदर आने का रास्ता दिया. दोनों ख़ामोशी से चलते हुए लोहे के उस बेंच पर आ बैठे जहा अर्जुन ने सोलंकी को सही रास्ता दिखाया था.

"मैं भी शहर में रहता हु भतीजे तोह सोने का कार्यक्रम देरी से हे रहता है. बातें तोह करने से हे होंगी और यहाँ व्यवधान पहुंचने वाला भी कोई नहीं."

"जी चाचा जी. यहाँ व्यवधान कोई नहीं पहुचायेगा.", अर्जुन अंगड़ाई लेता हुआ विनोद की तरह हे बेंच पर फ़ैल के बैठा.

"तुमने कहा की मैं घर का सबसे लाडला रहा हु तोह इस बात पर हे मैं विचार कर रहा था. आधा सच है ये और आधा सच तुम्हे पता नहीं.", विनोद कुछ उदासी से आसमान को देखता हुआ बोल रहा था जिस पर अर्जुन भी कुछ पल खामोश रहा.

"हो सकता है क्योंकि मैं उतना घर में रहा भी नहीं और आपकी तरफ तोह रहने का मौका भी नहीं मिला. वैसे बाकी सच क्या है?"

"तुम्हे बुरा लगेगा लेकिन मैं बताऊंगा."

"जरूर. मैं जान न चाहता हु चाचा जी.", अर्जुन भी नब्ज टटोल रहा था अपने इस निस्तेज चाचा की जिसके mann-mastishk में जाने कौनसे आघात थे.

"अगर लाडला हे होता तोह तुम मुझे यहाँ वाले घर में साल-6 महीने में देखते हे लेकिन ऐसा तोह हुआ नहीं. सियासत या राजनीति कही बाहर से शुरू नहीं होते भतीजे. इसकी जन्मभूमि होती है परिवार और जैसे ताऊजी मुखिया है गाँव से दूर रह कर भी और मेरे पिता मात्रा संरक्षक उस जमीन पे रहते हुए भी तोह इस से बेहतर उदहारण क्या होगा? मुनीम जी का बड़ा बीटा मालिक और छोटा मुनीम भी न रहा. हाहाहा.. महाभारत हर घर में व्यापत है भतीजे और मेरी बात तुम्हारी समझ में आ भी गयी होगी."

"हाँ लेकिन मेरा नजरिया जरा अलग है चाचा जी इस पर. राजा होना बहार से जितना वैभवशाली होता है उस से ज्यादा दुखदाई और त्याग से भरा रहता है भीतर से. आपने हे कहा था न के बड़े दादा जी ने परिवार से ज्यादा इस समाज को अपना परिवार मन? उन्होंने त्याग किया जिसमे दादी जी ने माँ के साथ साथ पिता की भूमिका भी निभाई. सरकारी नौकरी पर रहते हुए भी उन्होंने एक पैसा गलत नहीं कमाया. रिटायरमेंट के 10 साल बाद जो इंसान समाज में, कानून में व्यस्त हो उसके ऊपर आरोप लगाना सही होगा? खेती की कमाई, जमीन या papa-tauji की कमाई का एक रूपया वो नहीं लेते, सब बचो में बराबर बाँट देते है. निकेतन के नाम भी तोह 2 दिन पहले उन्होंने गाँव की एक चौथाई कमाई के कागज़ बनवाये है. तोह ऐसे व्यक्ति पर संदेह करना भर पाप होगा. बाकी आप बड़े है तोह आपको बेहतर पता होगा महाभारत है या रामायण.", विनोद को इस बात का जरा भी भान न था के उसके ताऊ रामेश्वर शर्मा ने सभी बचो से ज्यादा उसके हे बेटे के नाम कमाई का इतना बड़ा हिस्सा कर दिया है. अर्जुन के साथ इस चर्चा में वो जो सोच कर आया था उसके उलट हे नतीजे निकल रहे थे.

"ये तुम क्या कह रहे हो? मेरे बेटे के नाम एक चौताई?"

"वो भी तोह उनका हे वंश है न चाचा जी? मैं गलतियां करता हु, आप भी करते होंगे और मेरे पापा भी लेकिन दादा जी नहीं."

"तुम्हारे साथ किये गए बर्ताव और गलती के लिए मुझे माफ़ करना.", विनोद बेंच से उठते हुए हल्का लड़खड़ा रहा था जैसे आज उस से कमजोर व्यक्ति दुनिया में कोई और हो हे नहीं. अर्जुन उसका हाथ थामे धीमे कदमो से बहार की तरफ चल दिया.

"आपने एक बात तोह सही कही थी चाचा जी. राजनीति और जुंग अक्सर परिवार से हे शुरू होती है. आपने जो किया वो शायद इस उद्देश्य से किया होगा की किसी ख़ास को नुक्सान पहुंचे लेकिन जब समय आपको इशारा करे की अभी आपका वक़्त नहीं है तोह ऐसे कदम नहीं उठाने चाहिए. मंजू ाची लड़की है और अगर आपकी रंजिश उसके पिता से है तोह आपको उनसे बात करनी चाहिए थी. अगली पीढ़ी तक हम हे तोह गलतियां लेके जाते है. वैसे क्सक्सक्सक्स होटल के मैनेजर अनूप से आपको पता चल जायेगा की मैंने हे उस होटल पर टाला लगने से रोका है. और एक सलाह दूंगा की जितना हो सके उतना दुरी रखियेगा रमन शर्मा जी से. आपके छोटे जीजा और कंट्री इन् के संचालक से. बाकी मैं तोह आपका भतीजा हे हु तोह आपके लिए मेरे दिल में कोई द्वेष नहीं है.", अर्जुन ने जिस तरह से धीमी आवाज में ये बड़े बड़े खुलासे किये थे विनोद के dil-dimaag में गहरा दर्द उठने लगा था. कहा तोह वो पप शर्मा के साथ मिल कर अर्जुन को हे ठिकाने लगाना चाहता था और उसी मंशा से वो उसके करीब होने का दिखावा कर रहा था कुछ समय पहले. लेकिन इस लड़के ने उसको हे आइना दिखा दिया था जिसमे विनोद की तस्वीर बेहद खराब थी.

"तुम रमन जीजा को जानते हो?"

"मैं किसी को नहीं जानता चाचा जी लेकिन आप कोशिश कीजिये. थोड़ी म्हणत लगेगी और हो सकता है मुश्किलें भी आये लेकिन सही रास्ता मिल हे जाएगा. ाचा अब मैं वापिस चलता हु पिछले घर. मेरी ड्यूटी उधर हे है सभी बहनो और आयी हुई उनकी सहेलियों की वजह से. आपसे बात करके ाचा लगा और जब भी समय मिलेगा हम ऐसे हे समय बिताएंगे. गूडनिघत चाचा जी.", अर्जुन ने जाने से पहले झुक कर विनोद के पाँव छुए तोह विनोद ने सर पे हाथ रखते हुए अपना चेहरा घुमा लिया.

'गूडनिघत बीटा', इस से तेज वो बोल हे न पाया क्योंकि रुंधे गले और आँखों के किनारे आया वो पानी अँधेरे में भी अर्जुन को दिख जाता. दुश्मनी और बदले की भावना में जलते हुए विनोद पर अर्जुन ने आज जैसे क्षित चादर ुधा कर शांत कर दिया था. परिवार और सदस्यों की बेहतर परिभाषा के साथ साथ राजा का त्याग और न्याय विनोद समझ तोह चूका था लेकिन अभी ये निश्चित न था के वो किस राह पर जाने वाला है.
 




प्रोपोसड कवर ऑफ़ क्लीन वर्शन, फर्स्ट part. एक्सपेक्टेड लेंथ- 550 पेज.

सबकुछ सही रहे तोह 15-20 अप्रैल तक कम्पलीट होगा लेकिन अकेले मुमकिन नहीं हो पायेगा. बाकी कोशिश रहेगी की जैसे तैसे इसको स्वरुप दे सकू
 
अपडेट 182 (ा)

अंताक्षरी

"आओ हुज़ूर तुमको... सितारों में ले चालू..

दिल झूम जाये ऐसी बहारों में ले चालू..."

हर लफ्ज़ इतना खनकता सा गूँज रहा था की जैसे कान से सीधा दिल में उतर रहा हो. कल का दिन व्यस्त होने वाला था जिस वजह से अधिकतर लड़कियां अपने अपने बिस्टेर पर जा चुकी थी लेकिन इस घर की छत्त पर भी कुछ बिस्टेर लगे थे जहा से ये मधुर आवाज खामोश वातावरण में शहद सी मिठास भर्ती लगी. अर्जुन हॉल लांघ कर अपने सोने की जगह पंहुचा तोह उसके बिस्टेर के इतर 4 और गद्दे लगे थे. ये सुरीली आवाज थी ज़ुबैदा हुसैन की और उसके गिर्द उतनी हे मुस्तैदी से बैठी अलका, ऋतू, विन्नी और गुरदीप के साथ राजेश मां की बेटी स्वाति श्रोता बानी हुई.

"वाह.. आप तोह गण भी चित्रकारी की तरह बेहद कमाल का जाती है ज़ुबैदा बाजी. एक पल को तोह लगा की कही गलती से आज अलका दीदी का हे मूड तोह नहीं बन्न गया पर इनकी आवाज भी इतना विस्तार नहीं रखती.", पानी का जग एक तरफ रखता हुआ अर्जुन चौकड़ी मारे बैठी ऋतू की बगल में हे गद्दे पर जा लेता. उसकी तारीफ ने तोह ज़ुबैदा के हसीं चेहरे पर अलग हे नूर खिला दिया था, हलकी सी लाली के साथ. ऋतू ने भी स्नेह से अर्जुन के बाल बिखेर कर हँसते हुए अपनी भाई की बात को आगे बढ़ाया.

"सच कहा ारु ने दीदी. अलका अक्सर गुनगुनाती है और आवाज भी बहोत ाची है इसकी लेकिन आप तोह जैसे गाते हुए यहाँ थी हे नहीं. और मुझे तोह लगता था के इस गाने पर आशा जी (भोंसले) के सिवा कोई आवाज कभी खरी उतर हे नहीं सकती. लेकिन बेहद हे उम्दा गया है आपने.", ऋतू की बात सुन्न कर ज़ुबैदा ने मजाक में हाथ जोड़ कर सर झुकाते हुए अभिवादन किया तोह बाकी सभी मुस्कुरा उठे.

"तारीफ के लिए शुक्रिया लेकिन नाचीज इतनी भी कुछ ख़ास नहीं है. खैर अब तोह अलका बेगम आपकी आवाज सुने बिना ये रात नहीं गुजरने वाली. क्या कहती हो विनीता?", ज़ुबैदा की बात पर विन्नी ने भी अलका को गाने का इशारा किया जो बगले झांकती दिखी.

"जरूर जाएगी ये भी और नियम के हिसाब से बारी भी तोह इसकी हे थी लेकिन अब इसके बाद स्वाति और फिर अर्जुन आ गया है तोह आज ये भी बचेगा नहीं. कोई बहाना नहीं चलेगा किसी का.", विन्नी ने जैसे हे अर्जुन का जीकर किया वो तोह तकिये में मुँह दबाने लगा.

"ऐ आलू (अलका), जरा वो किशोर कुमार का तेरे स्टाइल में फीमेल वर्शन सुना न. अजनबी तुम जाने पहचाने से लगते हो...", ऋतू से बेहतर भला अलका को कौन जानता था और उसकी बात तोह जैसे अलका के लिए पत्थर की लकीर थी.

"नहीं नहीं.. अलका दीदी इतना पुराण गण नहीं. मुझे ये दर्द भरे गाने ाचे नहीं लगते.", स्वाति ने चेहरा लटकते हुए जैसे हे ये कहा ऋतू और अलका के साथ बाकी सभी हंस दिए.

"ाचा बाबा तू बता तुझे कौन सा गण सुन्न न है? फिर तोह तेरी हे बारी है.", ऋतू ने भी स्वाति को स्नेह से पुछा. अर्जुन जानता था की उसकी बहनो में सबसे ख़ास बात थी उनका सुलझा हुआ चरित्र और दुसरो को पहल देना.

"वो एक फिल्म है 'सपने' और उसका सांग चंदा रे चंदा रे . मुझे वो सांग बहोत पसंद है.", स्वाति ने ज्यादा सोचे बिना हे ऐसे गाने की फरमाइश रख दी थी जिस से यहाँ बैठे अधिकतर परिचित थे सिवाए अर्जुन के.

"हाँ ये मैंने भी नहीं सुना कभी. जरा सुनाओ तोह अलका दीदी अगर आपको इसकी लाइन्स याद हो तोह.", अर्जुन ने तकिया सही से दबा कर अपना सर थोड़ा उचकते हुए कहा. ऋतू अब उसके सीने से पीठ सताए आराम से बैठी थी.

"हाँ क्यों नहीं. जब सभी ने गण है तोह मुझे क्या परेशानी. वैसे गण ाचा सेलेक्ट किया है तुमने स्वाति.", और इसके बाद अलका ने चेहरा रुमाल से साफ़ करके पानी से गाला टर्र किया और एक गहरी सांस भर के जो सुर से सुर मिलाये अर्जुन की भी गर्दन ऊँची उठ गयी.

'गुलशन गुलशन.. वादी वादी बहती है रेशम जैसी हवा...

जंगल जंगल, पर्वत पर्वत.. है नींद में सब एक, एक मेरे सिवा...

चंदा.. चंदा..

आजा सपनो की नीली नदियां में नहाये

आजा ये तारे चूंकि हम, घर बनाये

इन धुंदली धुंदली राहों में, आ दोनों हे खो जाए..

चंदा रे चंदा रे..'

अलका ने कोई कसार न छोड़ी थी इस गीत को गाने में और उसके dhime-tej बदलते सुरो के साथ आवाज को बदलने की कला ने जैसे सभी को बाँध सा दिया था. वो सिर्फ होंठो से हे संगीत प्रदर्शन न करके, हाथ और चेहरे की भाव भंगिमाएं भी हर लफ्ज़ से बदलती किसी रूहानी से पल में समां गयी थी. बोल ख़तम होते होते जैसे वह कोई और बाकी हे न रहा हो.

"ओह भाई.. क्या हो यार तुम? एक पल के लिए तोह लगा हे नहीं के ये किसी घरेलु सी लड़की की आवाज होगी. हाँ तुम घरेलु तोह बिलकुल नहीं लगती लेकिन कसम खुदा की अलका, तुम खुद नहीं जानती की तुम्हारा ये हुनर कितना क़यामत खेज है. सुभानअल्लाह.", ज़ुबैदा की तारीफ और हैरानी पर जहाँ अलका शर्मा रही थी वही ऋतू जैसे फकर कर रही थी की अलका उसकी हमदम है.

"बिलकुल सही कहा दीदी और मैं न वॉकमेन पे ये सांग बहोत सुनती हु लेकिन अलका दीदी ने तोह बिना हे म्यूजिक के कमाल कर दिया."

"थैंक यू थैंक यू.. वैसे हर लड़की बाथरूम सिंगर होती हे है और ये ऋतू ने हे मुझे बाथरूम से रूम सिंगर बनाया है. अब मुझे गण ाचा लगता है और इसको सुन्न न... हाहाहा.. चलो अब मेरी बहोत तारीफ हो चुकी, स्वाति तुम्हारी बारी है. और न गाने पर सजा याद है न?", अर्जुन सजा शब्द सुनते हे अपनी जगह से उठ कर ऋतू के बराबर आ बैठा.

"ये सजा वजा का क्या सन है? मैं तोह सोने लगा हु इसके बाद."

"बच्चू, यहाँ नहीं सो सकते अगर नहीं गए सकते तोह. सजा तुम्हे बता देंगे पहले जरा स्वाति की आवाज भी सुन्न ले.", विन्नी ने साफ़ साफ़ अर्जुन को धमका हे दिया था मीठे लफ्ज़ो में. मुँह पर हाथ रख कर वो ख़ामोशी से बैठा तोह ऋतू ने एक बार फिर उसके सर पे हाथ फिराया लेकिन इस बार ये स्पर्श था हौंसला और तसल्ली वाला. ऋतू की छाया टेल तोह अर्जुन खुद अर्जुन बन्न रहा था. स्वाति ने भी thik-thak आवाज और सुरो में अपनी पसंद का गण सुनाया तोह अब बारी अर्जुन की थी.

"देखो मैंने कभी भी गण नहीं गया है बस सुने है."

"देख ारु, सच मुझे भी पता है के तू कितना जाता है और कौन गवाह है जिसको तूने फ़िरोज़ खान की फिल्म के गाने सुनाये है. चल चाहे 2 हे लाइन सुना दे लेकिन बस गए. सजा पता है क्या है? जो नहीं जाएगा वो कल रात संगीत में शामिल नहीं होगा.", अलका ने बड़े हे प्यार से अर्जुन को समझाया और विन्नी के साथ साथ ज़ुबैदा और गुरदीप ने भी नजरो से उसको उत्साहित किया गाने के लिए.

"कुछ भी गए सकता हु न? देखो मैं संगीत पार्टी मिस नहीं करना चाहता अगर यही सजा है तोह.", अर्जुन ने अपने लम्बे कुण्डल से बाल दोनों हाथो से समेत कर पीछे करते हुए एक नजर सभी को देखा.

"हाँ लेकिन बस कोई देशभक्ति वाला या स्कूल की पोएम न हो. बाकी जो दिल करे वो गए देना. मुझे नहीं लगता के तुम इस से बेहतर कुछ सुना पाओगे.", विन्नी ने अर्जुन की खिंचाई करते हुए कहा जिस पर वो थोड़ा झेंपता सा अपनी बहिन ऋतू की तरफ लाचारी से देखने लगा जैसे कह रहा हो के ये कहा फंस गया.

"हाँ तोह आपने ारु को इतना फ़िज़ूल समझा है क्या दीदी. ये लिस्टनेर है लेकिन नॉलेज ाची है इसकी भी म्यूजिक में. दादा जी भी अक्सर रेडियो पे इसके साथ हे गाने सुनते देखे है हमने.", अलका ने अर्जुन का पक्ष लेते हुए कहा तोह ऋतू ने भी उसकी हथेली पर ताली मारते हुए कहा.

"हाँ नहीं तोह.", और ऋतू की बात के बाद अर्जुन ने दबी हुई आवाज में बड़ी सरल आवाज में ये पंक्तियाँ शुरू की.

'हम तेरे शहर में आये है... मुसाफिर की तरह..

हम तेरे शहर में आये है मुसाफिर की तरह..

सिर्फ एक बार मुलाक़ात का मौका दे दे..

हम तेरे शहर में..

मेरी मंज़िल है कहाँ

मेरा ठिकाना है कहाँ..(2)

सुबह तक तुझसे बिछड़ कर,

मुझे जाना है कहाँ..

सोचने के लिए एक रात का मौका दे दे..

हम तेरे शहर में आये है मुसाफि की तरह."

"ओहो, जनाब बेशक सुर में ढीले है लेकिन पसंद की दाद देनी पड़ेगी. गुलाम अली खान साहब को सुन्न न बताता है की सचमुच गहराई वाले इंसान हो. खैर अब गण सुना है और कल नाच भी देखेंगे.", ज़ुबैदा के एकसार सफ़ेद दमकते दांत और मुस्कान बहोत कुछ कह रही थी जो गाने से कुछ अलग था. अर्जुन भी एक बार फिर बिस्टेर पर पसर चूका था अपनी बारी ख़तम करके.

"वह कोई मजबूरी या सजा थोड़ी न होगी. और मैं सबकुछ सुनता हु जो सुना दे. ये दादा जी को पसंद है और अलका दीदी ने उनका जीकर किया था इसलिए ये सुना दिया. बाकी कल संगीत नहीं लेडीज संगीत है जिसमे मैं नहीं नाचने वाला.", अर्जुन बात ख़तम करके थोड़ा पीछे हुआ जो साफ़ इशारा था ऋतू के लिए जगह बनाने का.

"ोये तुम दोनों एकसाथ सो रहे हो?", विन्नी ने जिस तरह से ये कहा था वो कोई कटाक्ष न था, बस चाहत थी जैसे वो उस जगह सोना चाहती हो.

"हाँ तोह आपको और कोई जगह खली दिख रही है? वैसे भी ये हर जगह सो जाता है तोह आज मैं इसकी जगह क्यों नहीं?", ऋतू ने अपने बालो से वो कपडे का रबर निकाल कर सिरहाने रखने के बाद टीशर्ट को दुरुस्त करते हुए चादर सही से फैलाई और सबकी तरफ चेहरा करती अर्जुन के सामने लेट गयी. अलका बस मुस्कुरा रही थी, जिसने ठीक वैसे हे अपने कमर तक लम्बे बालो को रबर से आजाद करने के बाद बिछावन सही करके सोने का उपक्रम किया.

"मेरा मतलब था के इस तरफ जगह खाली है और मुझे यहाँ डर लगेगा.", विन्नी ने आखिरी कोशिश की लेकिन यहाँ गुरदीप ने अनजाने हे ऋतू का साथ दे दिया.

"दीदी, मैं भी अकेले नहीं सोना चाहती. आपके हे साथ जोड़ लेती हु अपना बिस्टेर क्योंकि ज़ुबैदा बाजी तोह अलका और स्वाति के बीच है.", ऋतू मुँह दबाये इस बात पर हंसने लगी थी जिस पर अर्जुन ने भी मंद मंद हँसते हुए पीछे से ऋतू के ऊपर अपनी ब्याह रख दी. थोड़ा सिकुड़ती हुई ऋतू अब पूरी तरह अर्जुन से जुड़ चुकी थी. दोनों शरीर पर चादर लेते हुए उसने स्वाति से कूलर चालू करने का कह दिया.

"वैसे ये तोह सचमुच मजेदार है ऋतू. ऐसे खुले में सोना और वो भी सबके साथ कितना ाचा लगता है न?", स्वाति ने कूलर चालू करने के बाद अपना पजामा सही किया और पानी पी कर अलका के करीब हे आ गयी.

"हाँ.. अब लगता है क्योंकि ऐसे हंसी ख़ुशी के मौके बार बार तोह नहीं आते.", चादर के भीतर ऋतू ने अपने ऊपर आया अर्जुन का हाथ सही करते हुए अपने उभार पर ाचे से रख लिया था. जैसे ये भी एक चाहत थी ऋतू की जिसमे वो इतने लोगो की मौजदगी में भी अर्जुन के साथ आत्मीयता से जुड़ सके. अर्जुन ने भी वासना परे करके आहिस्ता से उसके सीने को सेहला कर हाथ पतली कमर पर टिका दिया, टीशर्ट के भीतर निर्वस्त्र कमर पे.

"वैसे आप लोगो में से किसी के पास कल थोड़ा समय हो तोह मेरी ड्रेस का कुछ काम करवाना है.", ज़ुबैदा की बात का जवाब अलका ने हे दिया.

"हाँ आप ले जाना ारु को दोपहर में संजीव भैया की हल्दी के बाद. और फिलहाल तोह मुझे नींद आ रही है, सभी को गूडनिघत.", अलका ने चेहरे तक चादर करके शुबरात्रि बोलै तोह कई स्वर में वही जवाब मिला. रात के गहराने पर कुछ हे समय बाद यहाँ माहौल शांत हो चूका था. ऋतू और अर्जुन भी एक दूसरे के आगोश में मीठी नींद में जा चुके थे, अगले बड़े दिन से पहले आराम करने के लिए.

.

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"मैं क्या कह रहा था भोले, वो विष्णु का पता लगवाया जाए?", घर की छत पर आधी रात में भी इन लोगो की आँखों से नींद जैसे कोसो दूर थी. सारा दिन bhaag-daud के बाद ये मित्र मंडली बोतल खोल कर जाम के साथ वही पुराने किस्से कहानी शुरू किये थे जो संजीव की पार्टी में अधूरा रह गया था. उमेद के जिस्म पर एक लुंगी थी और वही इन्दर घुटनो तक का ढीला कच्चा सा पहने हुए सबके गिलास भरने में लगा था. राजकुमार जी भी आज इनमे शामिल थे और हैरानी की बात थी की उन्होंने संजीव को भी रात का खाना न खाने देते हुए अपने साथ यहाँ बैठाया हुआ था.

"अगर ये व्यक्ति ख़ास है तोह आप मुझे डिटेल्स दीजिये उमेद चाचा जी, मेरे पास बहोत से लायक खोजी है जो सरकारी न होते हुए भी बड़े मुस्तैद है.", संजीव ने जैसे तैसे अपनी सिग्गट की तालाब रोक राखी थी शंकर जी को पीते हुए देख. अजीब हे दस्तूर है समाज में जहा शराब बाप बीटा साथ पी सकते है लेकिन धूम्रपान जैसे adhed-awastha तक एक परदे में रहता है.

"इसलिए तोह गज्जू ने जीकर किया है संजीव लल्ला. बात ऐसी है की हमारे कॉलेज में 2 लोग थे और दोनों हे बहोत ख़ास. ज़िन्दगी की bhaag-daud में हम उनसे दूर हो गए और शायद उनकी जरुरत के समय उनका साथ भी न दे पाए. बलवान और विष्णु थे वो 2 लोग लेकिन विष्णु का एहसान है हम सब पर. शंकर ने कोशिश की लेकिन काफी देरी से और मैं तोह कभी भी समाज में था हे नहीं. अब ये गज्जू की सूई अटक गयी है तोह जैसे तैसे विष्णु को ढूंढ़ना हे होगा. लेकिन गज्जू यार तुझे विष्णु की चाहत कैसे हो गयी इतने समय बाद? अब तोह ghar-pariwar के साथ साथ kaam-dhande के लिए भी पूरा वक़्त नहीं है फिर विष्णु मिल भी गया तोह क्या करेगा?", नरिंदर का तर्क अपनी जगह सही था और शंकर गहरी सोच में लगातार काश पे काश लगाए जा रहा था. सिग्रत्ती ख़तम करके उमेद की जगह जवाब शंकर ने दिया.

"बात ऐसी है इन्दर की अक्सर दुश्मन उसको हे हथियार बना लेते है हमारे खिलाफ जो हमारे करीब रहा हो और हमसे ताक़तवर भी. विष्णु के परिवार के साथ बहोत बुरा हुआ लेकिन उस से पहले वो बड़ी घटना में हमारा साथी था. क्या लगता है तुम्हे की अगर वो किसी गलत व्यक्ति की शरण में गया तोह कितना नुक्सान कर सकता है? तुम भली भांति परिचित हो इस बात से की कई दुश्मन ऐसे है जो 15-20 बरस से खामोश है. वो दुश्मन लागत हे नहीं अब लेकिन कुछ भी संभव है. विष्णु के बाद बलवान भी गायब हुआ और दोनों के हे परिवार नहीं रहे.", शंकर की बात सुन्न कर एक पल को तोह नरिंदर के साथ साथ राजकुमार जी और संजीव तक के होश उड़द चुके थे लेकिन उमेद सहमत था.

"मतलब आप लोगो से भी ताक़तवर थे वो 2 लोग? मैंने बहोत कुछ जाना है शंकर चाचा आपके और इन्दर चाचा के बारे में. वो कहानियां लगती है लेकिन हैं सच. उन सभी में उमेद चाचा आपका भी पूरा जीकर रहा है जिस से साफ़ पता चलता है की आप लोगो के कारनामे कटाई साधारण नहीं थे. फिर ये विष्णु और बलवान के लिए आप लोगो का इतना सतर्क होना तोह बहोत कुछ चेतावनी जैसा हे लगता है.", संजीव ने सबसे आखिर में अपने गिलास से चुस्की लेते हुए बात कहने से पहले राजकुमार जी की तरफ देख कर हे कहा.

"हर इंसान से बेहतर इंसान हमे मिल हे जाता है संजीव. तुम बहोत छोटे हो और जैसे तुमने इनके किस्से सुने है, हम सभी भाइयों ने तुम्हारे दोनों दादा (Rameshwar/Raghuvir) के. जो इनसे कही बेहतर और बेहद हे सुनियोजित तरीके से अंजाम दिए गए होते थे. विष्णु नाम से तोह मैं भी वाकिफ हु लेकिन कभी राब्ता न हुआ सिवाए एक छोटी सी मुलाकात के जब उसके साथ अज्जू था. अर्जुन सिंह, तुम्हारा चाचा.", राजकुमार जी भी जैसे अब भाग लेने लगे थे इन परस्पर गुफ्तगू में. शंकर ने भी अपने बड़े भाई की बात को सही ठहराया.

"अगर तुमने किस्से सुने है तोह फिर हमारा अनुभव भी सुन्न हे लो संजीव. विष्णु के समकक्ष खुद अज्जू और इन्दर, एकसाथ भी नहीं थे. उस समय अज्जू और विष्णु को वैसे हे सम्बोधित किया जाता था जैसे Nar-Narayan को. विष्णु के ख़ास भी अज्जू और इन्दर हे थे. बलवान हमारा था. शंकर की जो चिंता है वही मेरी भी है. अगर वो उनका दूर होना एक time-bomb निकला तोह फिर समझ लो की ये मिश्रा, ताराचंद, लोकदल लुंड कुछ भी नहीं उनके सामने. जिसमे संयम हो और ताक़त भी ख़ामोशी के साथ साथ, उसको कभी हलके में नहीं आंकना चाहिए.", उमेद ने जाम खाली करने के बाद तुरंत हे सभी गिलास बोतल से फिर से बना दिए. अब वो राजकुमार जी से ले कर काश लगा रहा था. इन सबके बीच नरिंदर अब बेहद खामोश था जैसे वो कुछ सोच रहा हो और इन सबसे अलग हे मनोस्थिति हो.

"फिर तोह मैं हर हाल में पता लगा के रहूँगा चाचा जी. शादी के बाद मेरा सबसे पहला केस यही होगा. एक गुमशुदा विद्यार्थी का जो बरसो से गायब है. कानूनी तौर पर न सही लेकिन केस यही होगा. जोइनिंग अगस्त में है और वादा करता हु उस से पहले मैं ये दोनों व्यक्ति आपसे मिलवा के रहूँगा, हर कीमत पर अगर वो ज़िंदा हुए तोह.", संजीव जज्बाती नहीं होता था लेकिन आज जैसे वो भी सेहन नहीं कर प् रहा था के उसके मजबूत स्तम्भ भी किसी इंसान के सामने खुद को कमतर बता रहे हो.

"पंडित जी के स्टाइल में हे रहना भतीजे श्री. नहीं तोह तुम मिलवाओ या न मिलवाओ, विष्णु तुम्हे जरूर दूसरी दुनिया से मिलवा देगा. अगर वो गलत राह पे हुआ तोह.", हँसते हुए नरिंदर ने ये कहा तोह बाकी सभी ने संजीव की भावुकता और बचकाना बात पर हंस दिया. वो भी झेंपता हुआ अनजाने में उमेद चाचा से सिग्रत्ती लेता काश लगा बैठा जिस पर फिर से ठहाका लगा लेकिन राजकुमार जी ने अपने बेटे की पीठ सेहला कर आश्वस्त किया की अब वो उसके पिता से बेहतर दोस्त है.

"वैसे तुम्हे कुछ करने की जरुरत नहीं अगर मेरी सलाह मानो तोह.", अब कही नरिंदर जी ने एक रहस्यमयी बात से शुरुआत की थी और बाकी सभी निगाहे उन पर हे जा तिकी.

"ये बिलकुल मत कहना इन्दर की अर्जुन को इशारा करना है?", उमेद तुरंत लपका इसके विरोध में और राजकुमार जी तोह हैरान हो गए जब इस महफ़िल में घर के सबसे छोटे सदस्य का जीकर हुआ.

"अर्जुन? क्या मतलब इसका उमेद?", उनका सवाल वाजिब था और अब इस पारस्परिक गुफ्तगू में उन्हें ये बताना जरुरी हो गया था के जाने अनजाने इन सबके लिए अर्जुन भी काम कर हे रहा था. बेशक अर्जुन की सबको परवाह थी पर वो लड़का आदत से मजबूर था, खून की खासियत की वजह से.

"वो बचा नहीं है राजू भाई. मतलब वो बचा है लेकिन नहीं है..", उमेद से तोह कुछ कहते हे नहीं बना और शंकर को तोह अब बेचैनी होने लगी थी क्योंकि ऐसे किसी भी जोखिम भरे काम पे उनके एकलौते बेटे को लगाना कटाई मंजूर न था.

"क्या लगा रखा है ये की वो बचा है, बचा नहीं है? अरे साफ़ साफ़ बोलो की बात क्या है और ये अर्जुन कही संजीव के साथ तोह मिलीभगत नहीं कर रहा?", राजकुमार जी झुंझला गए थे क्योंकि उन्हें भी अपना वो भतीजा उतना हे प्यारा था जितना हर वो शक्श जिसके लिए वो कुछ भी कर गुजरे. अर्जुन उनका अजीज था चाहे वो दर्शाते नहीं थे.

"वो मेरे साथ नहीं पापा, दादा जी के साथ काम करता है. मतलब वो खोजी है और इस से ज्यादा कुछ नहीं. जैसे दादा जी लोअर लेवल से ले कर हायर तक सभी जगह अपने विश्वासपात्र बना कर रखते थे ठीक वही हिसाब अर्जुन का है. नेटवर्क. तोह इन्दर चाचा जी का मतलब था के उसको अनजाने में हे हिंट दी जाए जिस से वो इन लोगो के बारे में कुछ पता करे लेकिन उसके पूरा होने से पहले कमान अपने हाथ में मैं ले लू.", संजीव ने बात सँभालने की भरपूर कोशिश की थी. इस बीच सभी के गिलास फिर से ख़तम हो चुके थे पर राजकुमार जी जैसे संतुष्ट न थे इस दलील से.

"वो मासूम है और अगर समझदार भी है तोह उसको इस सबसे दूर रखो शंकर. ऐसा इंसान जो दिल से मासूम हो और एक पारिवारिक दायरे में हो अगर उसने कुछ गलत भोग लिया तोह वो तुम्हारे इस विष्णु, बलवान या यु कहो की अपने पिता जी से भी ज्यादा खूंखार बन्न गया तोह रोके न रुकेगा. उसकी मासूमियत मैट ख़तम करना मेरे भाई किसी ऐसी चाहत में जिस से उसका दिल हे पलट जाए. जिसके पास संयम और ताक़त हो ख़ामोशी के साथ साथ उसका दुरपयोग भी नहीं करते.", आज तोह राजकुमार जी ने जैसे इन सभी के चक्षु हे खोल दिए थे इतनी बड़ी बात कह कर. उन्होंने नरिंदर और शंकर का भी कथन उनके ऊपर हे दे मारा था. अब कुछ पल ख़ामोशी रहने के बाद उन्होने हे बात शुरू की.

"वो पहले भी कुछ काण्ड कर चूका है?"

"हाँ. बहोत सारे और उनमे हमरा दोष नहीं है राजू भाई. भीम से ले कर छोटी और उसके बाद तोह जाने किस किस की मांजी वो लड़का अकेला हे थोक चूका है मैं बता नहीं सकता. आपकी बात का हे डर मुझे भी है और शंकर को भी. अगर अर्जुन मदमस्त हठी बना तोह वो बहोत कुछ तबाह कर सकता है लेकिन आपको ये भी बता दू की उसमे अधिकतर गुण चाचा जी वाले है या उस से भी पुराने. वो भोले जैसा नहीं है और शायद भोले जैसा भी है.", उमेद ने जिस तरह से ये कहा था राजकुमार जी समझ चुके थे की वो शंकर जैसा कैसे है.

"फिर तोह मैं तुम सबके बीच में बस एक अनादि आदमी हु उमेद. मुझे दुनिया की सिर्फ इतनी समझ है जितनी एक गृहस्थ इंसान को होनी चाहिए. संजीव बीटा, वो तुम्हारी जिम्मेवारी है और मैं जानता हु के तुम त्याग का पर्याय हो अगर बात अर्जुन की है तोह. निराश मैट करना.", कितनी बड़ी बात कह दी थी आज राजकुमार जी ने और जाम खाली करते हे वो निचे चल दिए, अपनी बीवी के पास.

"आपको अर्जुन की काबिलयत पर शक है चाचा जी?", संजीव ने अपने पिता के जाते हे अलग सिग्रत्ती सुलगा ली थी. अब उसका सवाल था उमेद सिंह से.

"हे इस प्रेसियस तो में बिकॉज़ हे रमिंडस में ऑफ़ माय फादर. हिज पोटेंशियल इस स्टिल ुँतौचेड बूत यू नेवर क्नोव व्हाट हप्पेंस नेक्स्ट. बीटा एक बात कहूंगा ध्यान से सुन्न न.", आज उमेद ने अंग्रेजी में कुछ कहा था और बाकी सभी बड़े ध्यान से उसको सुन्न रहे थे.

"जी."

"अर्जुन ने बहोत काम उम्र में एकाकीपन के साथ साथ बदलाव झेले है. वो परिपक्व होने के बाद मासूम हुआ है. ऐसे व्यक्ति को काम पे लगाना भी जरुरी है और नियंत्रण में रखना भी. कल को अगर यही कुत्ते खोल कर दुश्मनो के पीछे छोड़ने लगा तोह तुम नहीं जानते की ये क्या क्या करेगा. वो Raghu-Ram मिल कर करते थे जिसने हमे शिक्षा दी लेकिन इसका खून तोह जैसे सबकुछ सीख कर हे इस दुनिया में आया है. जिस दिन इसने तरस खाना बंद किया तोह समझ लो Shankar-Umed-Inder इतिहास होंगे. तुम एक ाचे सारथि हो संजीव, ठीक उस कृष्ण की तरह जो अर्जुन की ताक़त से परिचित था फिर भी उसको सिमित ताक़त के साथ कुरुक्षेत्र में लेके उतरा. वही अर्जुन बिना कृष्ण की पहले भी एक युद्ध में उतरा था सुभद्रा को सारथि बनाये. अनगिनत सेनापति, आधा दर्जन Karan-bhrata, हर शूरवीर समेत कारन, दुर्योधन, सुकुमार, द्रोणाचार्य तभी हार चूका था जब वो सुभद्रा को लिए निकल गया था. मतलब साफ़ है की कोई ऐसा भी होना जरुरी है जो ताक़त को सिमित करे. विष्णु से हमारा यही अभिप्राय है लेकिन तुम्हे इस अर्जुन को सिमित इस्तेमाल में रखना है.", उमेद ने एक लम्बी चौड़ी दलील दे डाली इतिहास सुनते हुए और संजीव सिर्फ मुस्कुराता रहा.

"चलो एक बात आज कर हे लेता हु आप सभी के सामने. ये मैट कहना की शराब के नशे में बोल रहा हु क्योंकि मैं अधः पीने वाला पव्वे से पहले सेट नहीं होता. अर्जुन, जिसको उमेद चाचा आपने शारीरिक शिक्षा दी. जीवन के लक्ष्य शंकर चाचा आपने दर्शाये और सबसे ख़ास बेटे का एहसास इन्दर चाचा आपने दिया. वो आखिर है कौन? वो हमेशा से हे इन सबसे अलग एक शिकारी है जो आप लोग न भी सिखाते तोह पारंगत हे होता. यहाँ एक विज्ञान की बात करूँगा और उस पर आप ध्यान दीजियेगा. शंकर चाचार और इन्दर चाचा में दादा जी खून है तोह ये निर्भीक है ठीक वैसे हे जैसे उमेद चाचा आप रघुवीर दादा जी की वजह से. लेकिन अर्जुन.. उसमे इसके साथ हे कुछ विशिष्ठ है. वो अपने pad-dada के साथ साथ अपने नाना से मेल खता है. कुन्दनलाल जी की सच्चाई कोई नहीं जानता लेकिन दादा जी जानते है. थोड़ी बहोत मैं भी और वो इशारा करती है की सामान दिमाग वाले व्यक्ति बहोत पहले से एकसाथ रहे है. वो कुछ क्षेत्र में आप लोगो से कही बेहतर है और इसका प्रमाण आपको रेखा चची की दिमाग से मिल हे जायेगा. वो किताब एक बार पढ़ते हे याद कर लेती है. मेरे इम्तिहान से पहले उन्हें वो सबकुछ याद हो चूका था जो वो मुझे पढ़ा रही थी. 2 काफी ख़ास खून मिलने पर सबसे बेहतरीन संस्करण अर्जुन के रूप में हमारे सामने है जिसको झुठलाया नहीं जा सकता. ताक़त पिता से और दिमाग माँ से. इसके साथ साथ उस पर हर किसी ने ध्यान दिया लेकिन ध्यान रोकने पर. उसको आजादी दो थोड़ी तभी वो ठहर पायेगा नहीं तोह be-lakshya वो अपनी हे धुरी में घूमता रह जायेगा. मेरा gair-sarkari ख़ास व्यक्ति वही है और उसका प्रमाण मैं आप सभी को अगर दूंगा तोह पाँव के निचे से जमीन न खिसक गयी तोह नाम संजीव राजकुमार शर्मा नहीं.", इतने लम्बे चौड़े विश्लेषण के बाद संजीव ने एक हे घूँट में जाम खली करके नमकीन पहली बार मुँह में ली. बाकी तीनो जैसे अभी तक उसके कहे शब्दों को टोल रहे थे.

"तुम ाचे से जानते हो न अपने इस छोटे भाई को?", ये तंज था खुद शंकर जी का.

"हो सकता है कुछ ज्यादा हे देख लिया हो तुमने.", इसके साथ हे इन्दर जी ने प्रहार किया शब्दों का.

"वो बहोत भावुक और समझौता करने वाला इंसान है संजीव. हाँ मजबूत है अगर किसी घेरे में मल्ल्युद्ध हो या फिर लड़ाई जैसे भीम के वक़्त हुई. वो लड़ना जानता है लेकिन क्या वो अभिमन्यु से आगे अर्जुन बन्न चूका है?", उमेद ने भी दोनों का तिरस्कार न करते हुए यहाँ अर्जुन के खिलाफ पहली बार बात कही जो शायद चाल हे थी लेकिन एक भरी चाल.

"आप लोग हे अगर बवंडर चाहते हो तोह मैं क्या कहु.", संजीव ने सिर्फ अपना हे जाम बनाते हुए कहा

"मतलब?", नरिंदर जी ने सवाल किया

"जो भी बात यहाँ होगी चाचा जी वो यही रहेगी तोह मैं आगे कहूंगा. कसम लीजिये उस ख़ास की आप सभी जिसके जाने का दुःख आपको सेहन न हो तभी मैं आगे बात करूँगा.", संजीव ने बिना पानी मिलाये हे वो जाम गले से निचे उतार लिया. वो आज अपने भाई के लिए जैसे समाज से बाघी हो चूका था और अगर बात किसी एक को चुनन ने की आती तोह तोह निश्चित कर चूका था की इनकी कसम टूटने को वो याद रखेगा.

"माँ कसम.", शंकर

"पापा हमेशा सामने है.", उमेद

"परिवार से ऊपर कुछ नहीं.", नरिंदर

और तीनो हे तुरंत कसम उठाने के बाद वैसे हे नेट पेग लगा कर टकटकी से संजीव को देखने लगे.

"जीवन कटाई वैसा नहीं है चाचा जी जैसा हम सभी देखते या चाहते है. इंद्रधनुष के दृश्य में रहने वाला अक्सर काले सफ़ेद का मोहताज रहता है.", संजीव अब जैसे विचार बना चूका था कुछ बड़ा कहने का.

"मतलब.?", यहाँ पेग बनाते हुए इस बार शंकर जी ने खुद हे सोडा पानी डाला क्योंकि नेट पीना खतरनाक था ऐसे जज्बाती माहौल में.

"प्यार.... छोटा सा लफ्ज़ लेकिन मायने बहोत बड़े है इसके चाचा जी और मैंने जाना ये जब खुद महसूस किया. मैं उस इंद्रधनुष से बहार था सब राण होते हुए भी लेकिन जो काले घेरे में रहा उसके पास सप्तरंग थे. अर्जुन.. अर्जुन के पास सबकुछ था जबकि कोई चाहत भी नहीं."

"मुझे इसका कोई भान नहीं.", नरिंदर जी ने थोड़ा करीब होते हुए गिलास में बर्फ के टुकड़े दाल कर संजीव को देखा. उन्हें अलग हे झुरझुरी हो रही थी जैसे वो कुछ नया जान ने वाले थे.

"अर्जुन के आदर्श है स्वयं शंकर चाचा. मजबूत निर्णय भी वैसा हे व्यक्ति ले सकता है. वो सबसे ज्यादा किसी को मानता है तोह कृष्णा चची को और अगर बात आये कुर्बान होने की तोह फिर उमेद चाचा. आपने कही देखि है ऐसी विविधता?", संजीव ने सभी को लपेट लिया था और खुद शंकर जी जानते थे की उनका बीटा कभी उनके विरुद्ध नहीं हो सकता.

"तुम सही हो इस मामले में और मैं समर्थन करता हु की वो ऐसा हे है. लेकिन हम विष्णु को भूल रहे है.", नरिंदर जी ने बात काटनी चाही.

"विष्णु आपके पास होगा मेरी जोइनिंग से पहले लेकिन बात पूरी नहीं हुई चाचा जी. मेरी शादी का गिफ्ट हे समझ लो.", आज संजीव ने इन तीनो को जैसे लपेट हे लिया था और उपहार के जीकर पर वो खामोश हे हो गए.

"बोलो भी आप लोग. खामोश क्यों हो? सवाल तोह बहोत होंगे."

"तुम अर्जुन की हरेक जिरह नहीं जानते संजीव. समय बहोत कुछ बिगाड़ देगा.", शंकर के अंतर्मन से निकली इस बात पर संजीव थोड़ा गंभीर हो गया.

"वही डर है है चाचा जी की तब मैं आपके खिलाग रहूँगा या आप मेरा साथ देंगे.?", ये अलग हे विस्फोट था जो संजीव ने किया था उन पर.

"क्या मतलब की मैं तुम्हारे खिलाफ?"

"जाने दीजिये इस बात को चाचा जी. जिसने दूध नहीं पीया वो ख़ास और जिसने पीया वो अनदेखा.", संजीव ने ऐसा करारा प्रहार किया था अपने शंकर चाचा पर की वो कुछ पल तक बस सोचते हे रह गए.

"ऋतू के लिए बोल रहे हो?", जल्दबाजी में मुँह से निकल हे गए शंकर लेकिन यहाँ नरिंदर की बोहेन तन्न गयी.

"मतलब की आपको ठीक से पता है? वो असली कृष्ण है चाचा जी और सच कहु तोह पहले मुझे भी असहनीय सा लगा फिर जब ज्ञान चक्षु खुले तोह उस से बेहतर कुछ था हे नहीं. क्यों उमेद चाचा जी? सुभद्रा और अर्जुन से बेहतर कोई rann-neeti में रहा है क्या?", ये अजीब संवाद था जिसमे संजीव ने साफ़ जाहिर कर दिया था के Ritu-Arjun का रिश्ता उसको स्वीकार भी है लेकिन वो असलियत में कुछ और भी है.

"हाँ बीटा. सब सही है. मैं अब बस सोने हे लगा हु.", उमेद तोह वह से उठ कर एक तरफ हे चल दिया लेकिन नरिंदर अभी भी शंकर को घूर रहा था के ये कौनसी अंताक्षरी है जिसका उसको नहीं पता. गहरी रात के साथ हे संजीव भी ख़ामोशी से निकल चला अपने बिस्टेर की तरफ, शंकर नरिंदर को छोड़ कर.

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क्रमश
 
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