- Joined
- Dec 5, 2013
- Messages
- 31,768
अपडेट 193 (3)
पहली मुलाकात
"तू तोह बड़ा समझदार हो गया है शंकर. पहले क्यों नहीं देखा मैंने तेरा ये रूप?", मार्किट में सभी के साथ हल्का फुल्का नाश्ता और ठंडा आदि लेने के बाद शंकर ने दलीप के परिवार के साथ साथ राजेश को भी कई उपहार दे कर विदा किया था. उसने ढेरो सामान अपनी सभी बेटियों, भतीजियों और बहिन रेणुका के लिए भी ख़रीदे और उन्हें दिए. रेखा इस दौरान अपने पति की बगल में हे रही थी और सबसे आखिर में शंकर ने अपनी पसंद से अपनी बीवी और माँ के लिए भी एक बेहतरीन साड़ी खरीदी. बचे खुश थे और उन्हें खुश देख कौशल्या जी ने भी अपने बेटे का माथा चूम कर ऐसा कहा तोह पिछली सीट पर बैठी रेखा और रेणुका भी मुस्कुराई.
"माँ, जनता हु की मेरे जीवन में समय का हमेशा से हे अभाव रहा है और ऐसा आगे भी रहना वाला है क्योंकि डॉक्टर होना सिर्फ नौकरी नहीं एक कर्त्तव्य है. लेकिन ये भी सच है की आज मैं जो भी हु वो अपने परिवार की वजह से हु और ख़ास कर आपकी वजह से. दलीप भी तोह परिवार है और राजेश.. राजेश एक दोस्त से बढ़कर वो इंसान है जो कभी भी मुझसे सवाल तक नहीं करता लेकिन परवाह उस से ज्यादा करता है. और ये मेरी गूंगी गुड़िया भी तोह बरसो से इस कलाई पर बिना शर्त राखी बांधती आयी है.", शंकर ने रेणुका के बाल बिखरने के बाद स्टीयरिंग घुमाया तोह रेणुका ने झूठे दिखावे से पीठ पर मुक्का जड़ दिया. कोमल बगल में बैठी हुई ख़ामोशी से मुस्कुरा रही थी. उसकी गॉड में भी अपने पिता द्वारा दिलवाया उपहार था और सरोज मौसी ने जो सूट दिया वो भी.
"हाँ बीटा ये तोह सही कहा तूने. राजेश तुझमे सिर्फ अपना गुरु देखता है और रिश्ते बाद में. वैसे मंजू भी ाची लग रही थी अब और मेनका तोह जैसे अब उसके बिना कही जाती हे नहीं. चल अब घर भी चलना है. रेखा के बारे में क्या बताया डॉक्टर ने, ये तोह मैं पूछना हे भूल गयी?", कौशल्या जी ने आगे नजर की तोह तारा खिड़की से हाथ निकाल उन्हें अंगूठा दिखा रही थी. इलो में उसके साथ रुपाली, अलका, ऋतू और अफसाना थी. शंकर जी की सफारी में अंतिम सीट पर मुस्कान के साथ प्रियंका भी इन सबके बीच थी.
"पहले उन्हें देख लो माँ कैसे बचपना करती रहती है. और आप कुछ ज्यादा हे नहीं सर चढ़ा रही ऋतू को?", फ़िलहाल तोह ऋतू उस कार में आराम से पिछली सीट पर बैठी अफसाना से हे बातों में लगी थी लेकिन शंकर का आशय कही और था.
"वो हे मुझपे हुकुम चलती है जैसे तू करता आया है अब तक. मेरा जोर नहीं चलता उसके सामने तोह मैं क्या करू? पहले तूने उसको सर चढ़ाया और अब वो मेरे आ छड़ी है. वैसे वो मजबूत दिल और सही निर्णय लेने वाली लड़की है शंकर. सही गलत की पहचान कही ज्यादा है उसको इसलिए मुझे भी उसका रौब रखना पसंद है. रही बात मोटरसाइकिल वाली तोह ऐसा तू भी अपने समय कर चूका है. मधु को कार चलना सीखने के मैं खिलाफ थी लेकिन तू हे था न उसकी ज़िद्द पूरी करने वाला? चल अब बता के रेखा के लिए क्या बताया डॉक्टर ने?", शंकर जी अपनी माँ की बात सुन्न कर मुस्कुरा रहे थे. उनकी भांजी तारा तोह अब तक उस कार को हवा से बातें करवाती हुई नजरो से ओझल भी हो गयी थी.
"हम्म्म.. मैं भी तोह डॉक्टर हे हु माँ. वैसे फ़िलहाल कंडीशन ठीक है हथेली की और अगर निशाँ गहरा लगा तोह सर्जरी से थोड़ा बेहतर कर देंगे. पट्टी के लिए तोह मैं भी मन करता हु पर गर्मी है और पसीना या पानी लगा तोह परेशानी हो सकती है. रेखा, जख्म सूखने की दवा नियम से लेती रहना और जो जो ताक़त की दवा बताई है वो भी.", शंकर जी ने आईने में देख कर बीच वाली सीट पर बैठी अपनी बीवी से कहा तोह उन्होंने बस हामी में सर हिला दिया. एक पल तोह शंकर वो चेहरा हे निहारते रहे जो इतने दर्द में होने के बावजूद कितना निस्चल और खूबसूरत था. फिर मैं को संयतत करके निगाह सड़क पर स्थिर की.
"रेणुका, तेरी शिकायत आयी है मुझे.", कौशल्या जी ने अब थोड़ा डपट कर कहा था जिस पर रेणुका अपनी भाभी की तरफ देखने लगी.
"बड़ी माँ, सबकुछ तोह टाइम से खा पी रही हु."
"खुराक फिर भी काम है और डॉक्टर बोल रही थी की तू नींद सही से नहीं ले रही. कोमल बीटा, तुम जरा ध्यान देना अपनी बुआ पर. तुम्हारे साथ तोह फिर भी ये सहेली जैसी है. वैसे तू दिल्ली क्या करने जा रहा है शंकर?", कौशल्या जी अमूमन ऐसे सवाल अकेले में करती थी लेकिन यहाँ बातों में उन्होंने ये भी पूछ हे लिए. माहौल ाचा था इसलिए शंकर जी ने भी माँ की बात का जवाब देना सही समझा.
"इन्दर और उमेद ने काम शुरू किया है न माँ दिल्ली में. गजेंद्र भाई साहब से कल आपको मिलवाया था न, बस उनके साथ हे एक मीटिंग है मेरी. कागज जरुरी है और इन्दर चाहता है के पहला काम मैं अपने हाथ से करू. वैसे भी आज वो हुसैन भाई साहब के साथ व्यस्त है और कल पापा के काम से कही जाना है उसको. सुबह जल्दी आ जाऊंगा वापिस लेकिन फिर नौकरी के साथ साथ सांगवान चाचा के भी हॉस्पिटल्स में बहोत से केस सँभालने है. अगले महीने यूरोप भी जाना है सरकारी टूर पे तोह भरपाई करनी पड़ेगी.", कार नए सेक्टर वाली खुली सड़क की तरफ आयी तोह उन्हें तारा वाली गाडी एक किनारे कड़ी दिखी जहा ice-cream वाला उन्हें बचे हुए पैसे वापिस पकड़ा रहा था. शंकर जी ने एक निगाह कार की खुली खिड़की से डाली तोह तारा ने उन्हें हरे रंग की कुल्फी सनी जीभ चिढ़ा दी.
"ये न सुधरने वाली. तू इसको भी बिगड़ चूका है शंकर.", कौशल्या जी को भी अपनी नातिन से उतना हे स्नेह था और ये ऊपरी दिखावा बाकी सभी जानते थे.
"इनके यही तोह दिन है माँ. आपने देखा कितने सलीके से कार एक तरफ कड़ी करके वो लोग बिना बहार निकले बैठी थी? बचे समझदार है और वैसे भी इस शहर में आजकल उन्हें किसी का डर भी नहीं रहा."
"हाँ तोह तेरे पापा ने नाम काम कमाया है जो मेरे बचे किसी से डरे?"
"वो तोह अपने लाल से हे पूछना आप. ये डर या नाम उसका ज्यादा हो रखा है आजकल. पता हे नहीं चलता वो कब क्या काण्ड कर देता है? वैसे उसके कपडे आपको पसंद तोह आये न?", शंकर का इशारा समझ तोह चुकी थी कौशल्या जी लेकिन उन्होंने नाम वाली बात पर कोई टिपण्णी नहीं की. पर दूसरी बात से जैसे उन्हें एक अलग हे मौका मिल गया था अपने बेटे की खिंचाई करने का, थोड़ी बहोत रेखा की भी.
"हाँ उसको यकीनन कपडे पसंद आएंगे शंकर. ऋतू उसके लिए हमेशा सही है.. मेरा मतलब वो उसके लिए हमेशा सबसे सही चीज हे लेती है. और वो एक नजर में बता देगा की वो किसने लिए है.", अब तोह सचमुच रेखा को भी झुरझुरी सी महसूस हुई ऋतू के साथ अर्जुन का सुन्न कर. वही कोमल ने तोह चेहरा हे बहार कर लिया और आज जैसे वो हंसी रोकने की भरपूर कोशिश कर रही थी कुछ समझ कर. शंकर अब बोले भी तोह क्या हे बोले.
"हाँ माँ. वो बड़ा हे नहीं हुआ जैसे, ऋतू की मानो तोह. उसकी मौजदगी में अर्जुन अपने से कुछ कर हे नहीं सकता और न वो उसको करने देती है. दुनिया के लिए वो सवा 6 फ़ीट का पहलवान हो गया लेकिन ऋतू की नजरो में वो आज भी वही है जो बचपन में था. चलो ाचा है न माँ के उनमे इतना विश्वास और प्यार है. ऋतू कभी उसको भटकने नहीं देगी.", शंकर ने कार चलते हुए हे पिछले शीशे से वो कार देखने की कोशिश की जिसमे उसकी बेटी थी. शायद वो लोग अभी भी चली नहीं थी. और उसके जवाब पर कौशल्या जी सर हिलाते हुए हलके से मुस्कुराई.
"वो नहीं भटकने देगी ये मैं जानती हु शंकर. ऋतू कुछ मामलो में सचमुच शायद निर्दयी भी है अर्जुन के साथ जैसे पढाई और सामाजिक व्यवहार. मैंने देखा है वो कैसे कान खिंच देती है उसके वो भी बिना किसी की परवाह के. ज़िन्दगी भर काबू में रहने वाला है वो.", और यहाँ फिर से कौशल्या जी ने चूल्हे हिला दी थी शंकर और रेखा की लेकिन इस बार शंकर हांसे बिना न रह सके.
"चलो माँ आपको मुबारक हो फिर तोह. ऋतू के सामने आपकी चलती नहीं और अर्जुन तोह वैसे भी आपका प्यारा है. आप जानो और आपके लाडले. कोमल बीटा तुम जरा अपनी बुआ से सामान ले लेना निचे उतर कर. रेखा, मैं खोलता हु तुम्हारी तरफ का दरवाजा.", घर के सामने हे गाडी रोक कर शंकर जी ने इतना कहा लेकिन मुस्कान उनसे पहले उतर कर कौशल्या जी और रेखा जी की तरफ के दरवाजे खोल चुकी थी. मुस्कान ने हे रेखा जी की ब्याह के निचे से हाथ दाल कर उन्हें सहारा देते हुए उतरा तोह करीब आये शंकर जी ने अपनी माँ से वो बैग लेने के बाद मुस्कान के सर को चूमते हुए धन्यवाद किया.
"It's ऑलराइट अंकल. आंटी है दोने ा लोट फॉर में एंड थिस इस नथिंग िफ़ कपरेड़."
"यू अरे आलरेडी कॅल्क्युलेटिवे िफ़ आईटी इस सो, मुस्कान. I'm ा मदर एंड यू आल डेसेर्वे रिज़नेबल अफेक्शन एंड केयर. िफ़ यू विश ी विल बे स्लिंगटली फॉर्मल टुवर्ड्स यू.", रेखा जी के मुँह से फर्राटेदार अंग्रेजी सुन्न कर उनकी सास मुस्कुराती हुई शंकर का हाथ पकड़ कर अंदर बढ़ चली जो खुद भी हंस रहे थे. मुस्कान ने जो भी सुना था अब वो शायद गलती समझ चुकी थी. कोमल भी रेणुका बुआ को उतरवाने के बाद सामान ले कर प्रियंका के साथ अंदर जाने से पहले रुक कर अपनी माँ और मुस्कान को हे देख रही थी.
"सॉरी. It's रियली माय मिस्टेक एंड यू अरे राइट आंटी तहत ी वास् बिट कॅल्क्युलेटिवे बिकॉज़ ी ऍम नॉट उसे तो विथ सुच हार्ट वार्मिंग केयर. ी थॉट िफ़ ी एक्सप्रेस माय फीलिंग्स इन इतर लैंग्वेज, यू मिगहत नॉट चेक आउट. एंड तेरे ी वास् रॉंग अगेन."
"हे.. It's ऑलराइट. थे ओने हु हद बीन ट्रेवल्ड अंडर हैलस्टोरंस, उसुअल्ल्य डाउट क्लीन स्काई. मुझे फ्रेंच नहीं आती और सुना है तुम्हे फ्रेंच कुछ ज्यादा हे पसंद है. जब मुझसे कुछ ऐसा कहना हो जो मैं समझ न सकू तोह कोशिश करना. लेकिन अब लगता है जरुरत नहीं पड़ेगी. मेरे लिए तुम अलग नहीं हो बीटा और माँ कोई भी हो वो हर बचे से ममता रखती है. तुमने भी तोह बिना कहे मेरा इतना ध्यान रखा.", रेखा जी वैसे हे मुस्कान के कंधे पर हाथ रखे धीमे कदमो से आगे बढ़ने लगी तोह मुस्कान भी उनको थामे चल पड़ी.
"अर्जुन सच कहता है की आप सबसे ख़ास है और दिल की भी सबसे ाची. वैसे ये फ्रेंच वाली बात आपसे किसने कही?", मुस्कान घर में दाखिल हो चुकी थी उनके साथ.
"उस किताब का यही नाम है न, 'थे बाइसिकल'? इंग्लिश संस्करण पर भी ठीक वही फोटो थी जो मैंने पढ़ा था. तुम्हारी कृष्णा आंटी के पास तोह कॉलेज में फ्रेंच ऑप्शनल सब्जेक्ट भी था और उनके पास वैसी बहोत सी किताबे भी मिल जाएँगी अगर तुम पढ़ना चाहो. बस बदले में तुम्हे उन्हें भी अपनी किताबे देनी पड़ेंगी.", रेखा जी के हाथ पर अब नयी पट्टी पढ़ी थी और वो हाथ सही रखने के लिए गले में अलग से एक पट्टी दाल कर कलाई को ऊँचा रखा गया था.
"हाहाहा.. मुझे सचमुच नहीं पता था आंटी जी की आप लोगो की एजुकेशन इतनी ाची भी हो सकती है. ऐसा नहीं है की ये मैं अपने आप से कह रही हु. वो हवेली पर ज्यादातर औंटीएस स्कूल हे नहीं गयी कभी और जो गयी है उनके बोलने से पता भी नहीं चलता. आज रात मैं आपको अपनी फवौरीते बुक रीड करके सुनाऊँगी. फिर देखते है कृष्णा आंटी जी की कलेक्शन कैसी है.", मुस्कान अब रेखा जी के कमरे में आ चुकी थी जहा रोमिला पहले से हे विराजमान थी और शंकर जी से कुछ बातचीत करते हुए हंस रही थी. रेखा को सहायता दे कर कोमल के साथ उन्होंने बिस्टेर पर बैठाया तोह कोमल ने अपने पिता का तैयार छोटा सा सूटकेस उन्हें पकड़ाया.
"अर्जुन नजर नहीं आया. उसकी कार और मोटरसाइकिल तोह घर में हे हैं.", शंकर जी ने वो सूटकेस एक तरफ रख कर पहले कलाई पर घडी पहनी और फिर डॉक्टर द्वारा बताई सभी दवाई कोमल को भी ाचे से समझा दी. ऋतू भी कमरे में दाखिल हो चुकी थी, जिसने रोमिला का गाल चूमने के बाद अपनी माँ की गॉड में हे सर टिका लिया. उसकी बचकानी हरकत पर सभी मुस्कुरा रहे थे.
"प्रीती उसको मार्किट ले कर गयी है शंकर. मुझे भी उसने ज्यादा कुछ नहीं बताया के वो क्या लेने गयी है पर कल चंडीगढ़ जा रहे है तोह जरूर कुछ न कुछ चाहिए हे होगा उसको. वैसे रेखा ने अभी तक सही से बताया नहीं की ये चोट लगी कैसे है?", रोमिला के जवाब के बाद वाले सवाल ने सबकी नजरे रेखा की बजाये शंकर पर हे कर दी थी.
"रेखा बेहतर जानती है की ये चोट कैसे लगी रोमिला. मुझे इतना पता है की ये जख्म 3 हफ्ते से पहले सही नहीं होने वाला. मैं सिर्फ आज रात हे बहार हु, बाकी ध्यान मैं रख लूंगा. चलता हु अब. रोमिला, अलीशा को देख लो अगर तैयार हो गयी हो तोह.", शंकर जी ने जाने से पहले ऋतू को अपने सीने से लगाया और उसका माथा चूम कर कमरे से निकल गए अपनी माँ की तरफ. कोमल ने दवा बना कर मुस्कान को पकड़ा दी थी अपनी माँ को पिलाने के लिए और खुद वो सबके लिए कॉफ़ी बनाने चली गयी.
"तुम मेरी समझ से बहार हो रेखा. पूरी हथेली ऐसे कटी है जैसे अगर थोड़ा और प्रेशर दिया होता तोह सैंडविच की तरह 2 त्रिकोण बन्न जाते. तुम्हारे हाथ में अब 3 लकीरो की जगह 4 हो गयी है वैसे.", रोमिला की बात सुन्न कर एक बार को तोह मुस्कान भी काँप सी गयी थी. उसको नहीं पता था की चोट इतनी गहरी लगी होगी. ऋतू बहार से अलका की आवाज आने पर चली गयी मुस्कान को वही रुकने का बोल कर.
"सच सिर्फ यही है रोमिला की ये बस एक ज़ख्म है जो जल्द भर जायेगा. किसने किया या कैसे लगी तोह इसका जवाब यही है की उस को न बताने से फरक नहीं पड़ने वाला. हाँ तुम्हारी वो चार लकीरो वाली बात तोह मैंने भी सोची नहीं. पहले मेरी हथेली में किस्मत की लकीर नहीं थी. अब है.", वो दवा जितनी भी कड़वी थी लेकिन रेखा के चेहरे पर आयी मुस्कराहट फीकी न हुई.
"तुम और तुम्हारे ये लॉजिक रेखा. मैं चली अपनी किस्मत से ग्रहण हटाने. कोमल को बोलना के 5 मिनट में आ रही हु, मेरी कॉफ़ी रख ले और ललिता दीदी को भी बुला ले.", रोमिला के जाते हे रेखा जी पीठ के पीछे 2 तकिये लगा कर आराम से बैठ गयी.
"सचमुच रोमिला आंटी सही बोल रही थी. वैसे अब आपको आराम करना चाहिए आंटी. मैं रात में बैठती हु आपके पास."
.
.
"हहहह... आराम से maano....aahhhh.. क्या कर रही हो ये तुम..?", यहाँ मंजू के कमरे में दृश्य सोच से भी परे था. पूरे घर को ाचे से बंद करने के बाद जब दोनों प्रेमी युगल एक दूसरे को choom-choom कर भी संतुष्ट न हुए तोह प्रीती लगभग खिंच कर अर्जुन को इस बिस्टेर पर आ चढ़ी. पिछले कुछ समय से अंतर्मनन के द्वन्द में डूबा अर्जुन अब खुद को जीवित महसूस करने लगा था और इसका सबूत था वो निर्वस्त्र अकड़ा हुआ भुजंग. प्रीती अपनी कलाई से मोठे उस लिंग को हथेली में मजबूती से पकडे हुए जहा ऊपर निचे करती हुई और भयंकर स्वरुप दे रही थी तोह उसका दूसरा हाथ अर्जुन की गर्दन को दबाता हुआ जैसे अर्जुन को बिस्टेर के भीतर दबाये जा रहा था. बिखरे हुए वो हलके भूरे बाल और उनके पीछे पसीने में नहाया वो सुर्ख गोरा चेहरा. प्रीती इस पल में सचमुच अर्जुन को जैसे वो कटु सच दिखला रही थी जिसकी कल्पना तक वो न करता अगर यहाँ कोई और लड़की होती.
"शह्ह्ह्ह.. गुस्सा, अकेलापन, डर और बेमतलब के ख्याल इस कमरे से बहार अर्जुन.. उम्म्म्म", प्रीती ने लगभग फाड़ने के इरादे से अर्जुन की टीशर्ट ऊपर खींची थी जिसको समय रहते अर्जुन ने अपने जिस्म से जुड़ा कर दिया. अब वो ऊपरी हिस्से से भी निर्वस्त्र था और अगले हे पल उसकी आँखें फिर से मूँद गयी. चौड़ी छाती पर उभरे हुए वो लागु चूचक प्रीती के दांतो के बीच थे. हलके हलके उन्हें काट कर जिस तरह से वो अपनी गरम गीली जीभ वह फिर रही थी, अर्जुन के पेट की सभी मांसपेशिया आपस में जुड़ कर जिस्म ऊपर उठाने लगी. वो इस अध्भुत्त मजे से पागल हुआ जा रहा था लेकिन प्रीती ने तोह जैसे ये खेल अभी शुरू हे किया था. जिस्म का बाकी रक्त तोह जैसे उस दहकते सुपडे में एकत्रित हो गया था जिसको प्रीती मजबूती से हिलती हुई अपनी सीमा से कही ज्यादा भयंकर बना रही थी. नीली रागे उभर कर उस 9 इंच से कुछ अधिक लम्बे कामदण्ड को अर्जुन के बाकी जिस्म सामान मांसल बना चुकी थी. एक पल बाद सिर्फ लाल ब्रा में क़ैद अपने कठोर उभारो को अर्जुन के चेहरे पर दबती हुई प्रीती अर्जुन के जिस्म पर किसी चादर सी चढ़ी थी. फडकता हुआ लिंग उस लाल पंतय की गर्माहट लेता हुआ दोनों गोरी जांघो के बीच फंसा था.
"सांस तोह लेने दो जान.. आह्हः..", अर्जुन का जिस्म तिथिल पड़ने लगा था लेकिन प्रीती के इरादे कुछ और थे. थोड़ा निचे सरक कर उसने अर्जुन के होंठो को अपने मुँह में ऐसे दबोच लिया जैसे बिल्ली किसी चूहे को. तराशे हुए नाखून हर तरफ अर्जुन के सीने, कमर और पीठ को कुरेद रहे थे. वो वक़्त भी आ पंहुचा जब अर्जुन उखड़ी साँसों के बाद उस दौर में पहुंच चूका था जहा हर धावक हवा में उड़ता महसूस करता है. ये स्वर्गिक अनुभूति थी और शहद से मीठे प्रीती के नरम होंठो का रास चकता हुआ अर्जुन अपने दोनों हाथ उस लाल रेशमी पंतय में घुसता हुआ दोनों मलाई से कूल्हों को मसलने लगा. अब साँसों का शोर न था. बस धड़कने आपस में बतला रही थी और ढीली हुई ब्रा बिस्टेर से निचे फर्श पर तनहा पड़ी अपनी किस्मत कोसती लगी.
"तुम जानते हो की तुम मुझसे नहीं भाग सकते. फिर भी कोशिश करते रहते हो. उम्म्म्म.. धीरे से चुसो पागल..", अर्जुन के चेहरे से थोड़ा उठकर प्रीती उसको समझने हे लगी थी की उन दोनों कठोर नारंगियों को मुठी में भरता अर्जुन के निप्पल समेत आधे सतांन को मुँह में भर कर पीने हे लगा. प्रीती के उरोज किसी पत्थर से ठोस थे और जाने उनमे कैसा रास निकलता था जो अर्जुन हमेशा उन्हें मुँह में भरने को आतुर रहता. पंतय के भीतर आया गीलापन अर्जुन के साथ साथ उसके लुंड ने भी ाचे से महसूस किया. प्रीती अपने आप हे इस उन्माद में अपनी योनि अर्जुन के लुंड पर घिसने लगी थी. जितना पहले वो अर्जुन को सत्ता रही थी, अब अर्जुन भी उसके जिस्म पर उतने हे हमले करने लगा. मुलायम स्टैनो की अकड़ को काम करने में जूता अर्जुन बारी बारी से दोनों चूचक चूसता हुआ उन्हें मसल भी रहा था.
"आह्ह्ह्हह.. उफ्फ्फ... वेट..", प्रीती ने मजबूती से अर्जुन का चेहरा बिस्टेर पर भिड़ा दिया. फुर्ती से पंतय निकाल वो पलट कर अर्जुन के चेहरे पर अपनी योनि टिकती हुई दोनों हाथो में उस मूसल को दबोच कमर चलने लगी. अर्जुन न वो गुलाबी योनि देख सका और न प्रीती ने कोई मौका दिया. एक अध्भुत महक नथुनों में भर उठी. कच्चे संतरे की तजा महक जो यक़ीनन प्रीती के उस पुष्प से उर्जित थी जो अर्जुन के चेहरे पर टिका था. कमर एक इंच निचे सरकते हे अर्जुन के होंठो ने वो स्वाद चख हे लिया. बेशक वो प्रीती का पुष्परस हे था लेकिन विलक्षण, ठीक उसकी हे तरह. नरम रेशमी पहली हे फांको के बीच से टपकता वो मधुर रास अर्जुन की जिव्हा से होता हुआ उसके गले में उतरता गया. होंठ स्वतः हे इस रास को और पीने के लिए उन फांको के बीच जा धंसे. दूसरी और मजे में हिलती झूलती प्रीती ने भी समय गवाए बिना वो बड़े टमाटर सा सूपड़ा एक पल में हे मुँह के भीतर उतार लिया. अर्जुन ने खुद ऐसी चुसाई की कल्पना तक न की थी जैसी प्रीती ने करनी शुरू की. एक मुठी में लिंग की जड़ थामे वो लगभग आधा लिंग एक ताल में अंदर बहार करती हुई मुखरास से चमकाने लगी. होंठ अपनी सीमा तक फ़ैल गए और उतनी हे तीव्रता से वो अपने मांसल कूल्हे ऊपर निचे पटकती हुई अर्जुन को वो शहद चखती रही जिसके लिए वो सांस लेना तक भूल चूका था. अर्जुन का जोश उसके लिंग में जमा होने लगा था और यही प्रीती ने चुसाई रोक कर अपने पत् उसके चेहरे पर बुरी तरह कस दिए. रह रह कर वो झटके खाती रही और अर्जुन हर कतरे को हजम करके मदहोश हो गया. वो अब झड़ना चाहता था लेकिन प्रीती उसके जिस्म से फिसल कर बगल में आ लेती. हर सांस के साथ उसके दुग्ध ऊपर निचे हिलने लगे. दोनों चूचक सूई से अकड़े बता रहे थे की ये बिल्ली अभी और शिकार करने वाली है.
"तुम्हारा हो गया? हहहहहह..", अर्जुन का चेहरा लाल हो कर प्रीती की बरसात में भीगने से अलग हे चमक रहा था. बाल ast-vyast और आँखों में एक असीम चाहत कुछ पाने की.
"अभी 2 बार हे हुआ है... कैसा लगा मेरे फत्तू?", प्रीती की आँखों की वो चमक साफ़ बता रही थी की अर्जुन आज बचने वाला नहीं.
"फत्तू? अब देखो मैं तुम्हारी क्या हालत करता hu..aahhhh.. आराम से पागल.. ", अर्जुन लपक कर प्रीती पर चढ़ने हे लगा था की उसके दोनों अंडकोष प्रीती ने मुठी में दबोच लिए.
"शह्ह्ह्ह.. तुम भूल रहे हो डार्लिंग की आज इस बिस्टेर के मालिक हम है और तुम्हारे भी. चुपचाप.. बस पड़े रहो.", प्रीती ने बड़े आराम से अर्जुन को धकेल कर एक तरफ कर दिया था. पानी पीती हुई वो जानबूझ कर आधा अपने होंठो से उड़ेलती हुई बाकी जिस्म को गीला करने लगी. अर्जुन बेबसी से कभी अपने लिंग तोह कभी मुस्कुराती प्रीती को देखने लगा. आज वो सचमुच कुछ अलग थी और उस पर पूरी तरह भरी.
"ये कहा सीखा?"
"सवाल हे गलत है तुम्हारा. पूछना चाहिए था के ये मैंने कब सीखा और जवाब है जब मुझे जरुरत महसूस हुई. शादी के बाद तुम्हारा ये अजगर हमेशा पिटारे में रहने वाला मर अर्जुन शर्मा. उमाहहह.. हो तुम भी बहोत मीठे.", अर्जुन के जिस पर आराम से लेट कर वो अब तल्लीनता से उसको चूम रही थी. इस पल में प्रीती ने अर्जुन को ज्यादा नहीं तड़पाया और अपनी कमर उचकते हुए वो भीगी हुई yoni-lakeer उस जीरो बल्ब से सुपडे पर टिका दी. अर्जुन अगर आम इंसान होता तोह इस दहकती योनि के स्पर्श से हे पिघल कर खली हो जाता. फिर भी एक आह उसके होंठो से निकल गयी.
"बहोत भड़की हुई हो यार.. आह्ह्ह्ह.. दर्द.."
"शहहह.. दर्द वार्ड को कब तक बीच में लाते रहोगे? जो पता है वो बोलना जरुरी है अर्जुन? अब बस मेरी आँखों में देखो...", उन नीली हरी आँखों ने एक जादू तोह जरूर था. गोरा चेहरा सुर्ख हो चूका था और वो आँखें अर्जुन की आत्मा तक उतर कर बिना कोई और एहसास दिलाये जैसे अर्जुन को सम्मोहन में बांध चुकी थी. दोनों की कमर के निचे दृश्य जरूर हाहाकारी था. प्रीती की योनि के बाहरी लैब जैसे अभी तक अखिल थे और पहले हुए हिस्से के बिच की वो लकीर एक पल के लिए उस गर्दभ लिंगमुण्ड के पीछे छिपने के बाद कुछ फैली और फिर किसी गुरुत्वाकर्षण की तरह सहने सहने उसको अपने अंदर सामने लगी. लकीर फैल कर इतनी चौड़ा चुकी थी जैसे अभी राखत टपक पड़े. वो कसाव अध्भुत्त था और इनका ये मिलान भी. एक पल जिस्म वही रुक गए और अगले हे पल विधुत गति से प्रीती कमर को पटकती हुई वो पूरी लम्बाई अपनी योनि में उतार गयी.
"Aaaiiiiiiiiiiiii... कंठ से ये चीख निकलते हे अर्जुन भी चेतना में लौटा लेकिन देर हो चुकी थी. प्रीती किसी कटे वृक्ष सी उसके ऊपर गिरी थी, बुरी तरह सिसकती हुई. वो लिपट कर अपने ठन्डे होते जिस्म को अर्जुन के शरीर से गर्मी खींचने के प्रयास में थी और वो विकराल लिंग जैसे अब प्रीती के गर्भ को चूम कर बता रहा था के ऐसा कुछ वक़्त तक होता रहेगा.
"ओह प्रीती.. ये जल्दी नहीं करनी थी.. बस.. अब मत हिलना.. आठ.. तुम पागल हो.. पूरी पागल.", प्रीती की पीठ सहलाता हुआ अर्जुन भी हल्का हल्का तरल अपने लिंग पर महसूस कर प् रहा था. शायद पिछले समागम से वो प्रीती को पूरी तरह खोलने में असफल रहा होगा. इस पल में अर्जुन को सिर्फ उसकी परवाह थी, कामाग्नि तोह पहले भी उसके और प्रीती के दमियन मायने न रखती. जिस्म पर रोये उभरने लगे तोह नम्म आँखों से मुस्कुराती हुई प्रीती ने आहिस्ते आहिस्ते कमर हिलनी शुरू की. कस्सी के मूठ से भी मोटा वो लिंग फंस फंस कर हिल रहा था उस सूक्ष्म से छिद्र में.
"आह्हः.. ऐसे हे करते रहो.. करते रहो... मजा आ रहा है..", जाने ये कैसा मजा था जिसमे अर्जुन खुद हे दर्द महसूस कर रहा था क्योंकि प्रीती दर्द में थी. लेकिन वो तबतक न रुकी जबतक आधे से ज्यादा लिंग अंदर बहार होना शुरू न हो गया. उचित फिसलन और नमी पनपने में 10 मिनट तोह लग हे गए. हर धक्के पर योनि का मांस लिंग से चिपक का खिंच जाता. आवाज न करके अब वो एक बार फिर एक दूसरे के होंठो को खाने चबाने लगे. प्रीती एक बार फिर से हावी हो चुकी थी अर्जुन पे. ठप्प ठप्प का मधुर संगीत और उस विकराल लिंग को सूपड़ा तक बहार निकल वापिस अंदर समाहित करती हुई प्रीती ने अर्जुन नामक अपने अश्व को साध हे लिया था. जल्द हे वो उसके सीने को काटने के बाद चूमती तोह अर्जुन सिसक उठता. अंतरंग पालो की ये नौसिखिया प्रेमिका अर्जुन को उस माउद पर ले हे आयी जहा वो जानवर की तरह लगभग रौंदने हे लगा था.
"उम्म्म्म... क्या कर दिया तुमने? आह्हः.", प्रीती को पलट कर अपने निचे लता अर्जुन उसकी अक्षत गुदा पर उँगलियाँ दबाते हुए गहरे धक्के मार रहा था. दोनों लम्बे पाँव हवा में फैलाये वो प्रीती की योनि के आखिरी हिस्से तक चोट करता हुआ जैसे खुदको हे भूल गया. प्रीती भी उन्मुक्त बरसात करती हुई उसके लिंग को भिगोती हुई ये दौड़ अपनी रफ़्तार पर पंहुचा चुकी थी. सटासट अंदर बहार होता वो कलाई से मोटा औजार अकड़ता हे गया. आखिर में वो पल भी आ हे गया जब अर्जुन प्रीती के दोनों कंधो के निचे हाथ रख कर उसके जिस्म से जुड़ हे गया. हुंकार भरता हुआ वो ऐसे झड़ने लगा था जैसे बरसो से उसके लिंग ने वीर्य न बहाया हो.
"ओह्ह्ह्हह्हह.. मार दिया... इसशहहहह..", प्रीती भी चीख न रोक सकीय उस गरम तरल गोलियों की बौछार योनि के हर हिस्से में महसूस करते हुए. जीवन का एक और अकल्पनीय सखलन जो 25-30 सेकंड निरंतर चलने के बाद हे धीमा हुआ. अर्जुन गिरने की जगह प्रीती को चूमता हे रहा. गर्दन, गाल, होंठ, नाक... कुछ नहीं छोड़ा और उतना हे प्रेम प्रीती ने दर्शाया प्रतिउत्तर में उसके दोनों कूल्हों पर नाखून गदा कर खुद से चिपकते हुए. पसीने में भीगे वो दोनों कुछ पल ऐसे हे रहे. अलग होने पर भी एक दूसरे को बाहों में लिए वो लेते रहे. सफ़ेद गधा तरल प्रीती की बंद गुलाब सी योनि के होंठो से पिघलता हुआ बिस्टेर पर टपक रहा था.
"आज तोह लगता है प्रेग्नेंट हे कर डोज.", प्रीती ने चुहल की तोह अर्जुन ने चेहरा दोनों चुचो के बीच धंसा लिया. वो बस उसको सहलाती रही जैसे सुलाना चाहती हो.
"तुम्हे ऐसा नहीं करना चाहिए था प्रीती."
"तुम्हे भी इसकी जरुरत थी और मुझे भी. वैसे घबराने की बात नहीं है, मैं गोली ले लुंगी और सेफ भी हु. अब बताओ तुम्हे क्या बात परेशां कर रही है? माँ पर हुम्ला हुआ ये बात या मधुलता आंटी ने मुझे डांटा वो? या कुछ ऐसा हो रहा है जो तुम सिर्फ अपने तक रखे हुए हो? जानती हु यही सब रात को ऋतू दीदी पूछने वाली है लेकिन उनके सामने झूठ नहीं चलेगा. प्रैक्टिस करके देख लो चाहे.", प्रीती सबकुछ जानती थी और इस बात पर अर्जुन ने उसको थोड़ा और कसके चिपका लिया. जिस्म से पसीना सूखने लगा था और इनके मिलान की महक कमरे में ज्यादा हे बस चुकी थी. अर्जुन कुछ पल बस प्रीती के सीने को हलके हलके चूमता रहा ख़ामोशी से.
"उनकी आँखों में भी यही सब देख चूका है मैं प्रीती और इसलिए मैं बचता फिर रहा हु. और अब तुमने जिस तरह से बंदी बना लिया है वैसे हे वो भी करेंगी. लेकिन तुम्हे ये कैसे पता की माँ को चोट नहीं लगी, उन पर हुम्ला हुआ है? मधुलता आंटी को तोह मैं जल्दी हे रेतुर्न गिफ्ट दूंगा लेकिन माँ वाली बात पर मैंने किसी को बात करते नहीं देखा."
"ऋतू दीदी जानती है की माँ बहोत हे ज्यादा फोकस वाली औरत है, तुमसे भी ज्यादा. उन्हें चोट लग्न तोह दूर, सामने से कोई ऐसे नुक्सान भी नहीं पंहुचा सकता. ऊपर से जिस तरह के इंतजाम थे तोह ऐसी कोई भी चीज वह नहीं हो सकती जो उनकी हथेली को इस तरह काट दे की स्टीट्चेस लगाने पड़े. सर्विस ट्रे तक गोल किनारो वाली थी वह अर्जुन और छुरी कांटे भी सिर्फ हॉल एरिया तक सिमित थे. मैं नहीं जानती की हर बात पर इतना नोटिस क्यों रखा गया लेकिन दादा जी को ये सब निर्देश देते हुए मैंने हफ्ता पहले हे सुना था. ऊपर से सिक्योरिटी भी इतनी थी जो बाद में साफ़ हो गया के क्यों थी. मुझे पूरी बात का नहीं पता लेकिन ऋतू दीदी कहती है की माँ पर हुम्ला हुआ है और माँ उस इंसान को पहचान भी गयी है. बस बता नहीं रही. लेकिन उतनी सुरक्षा में कोई ऐसा कैसे कर सकता है? तुम तोह उनके पास भी नहीं जा रहे कल रात से.", प्रीती की हर बात वाजिब थी और अर्जुन कमर के बल अब सीधा लेता पंखे को देख रहा था.
"माँ.. माँ सबसे मजबूत इंसान है प्रीती, हमारे तुम्हारे घर में. और जब वो इरादा कर ले की वो नहीं बोलने वाली तोह फिर वो नहीं बोलने वाली. उनके दर्द सहने की क्षमता भी उतनी हे ज्यादा है जितनी मुँह बंद रखने की. और रही बात की उन्हें ये चोट अनजाने हे आयी है या हुम्ला हुआ है तोह ऋतू सही कह रही है. उलटे हाथ में हर वक़्त कुछ न कुछ था हे उनके और सीधे में इतना बड़ा कट लग्न वैसे हालात में मुमकिन नहीं. सुरक्षा बहार के लिए थी, अंडरवालो के लिए नहीं. ाची बात है के पापा ने वो सब संभाला, खुद से. माँ के झूठ को वो तभी पकड़ चुके है क्योंकि वो जखम के साथ साथ उसके बन्न ने की वजह मेरे दादा जी से भी बेहतर जानते है. मैं खुद 2 बार फंस चूका हु उनके सामने. वो जख्म की वजह ढून्ढ रहे है और मैं जख्म देने वाले को. सुबह तक पता कर हे लूंगा और फिर पंजाब जाने से पहले माँ को वो नाम बता कर और उनसे ाचे से मिल कर हे निकलूंगा.", अर्जुन का विश्लेषण सुन्न कर प्रीती अंदर हे अंदर फकर महसूस कर रही थी लेकिन बहार से वो बस उसके सर को सहलाती रही.
"हम्म्म.. और ऋतू दीदी से क्या कहोगे?"
"उनके सवाल कही ज्यादा है प्रीती. जवाब नहीं होंगे और वो सवाल भी अपनी मर्जी से करती है."
"मतलब वो कुछ और भी पूछने वाली है?"
"पता नहीं. शायद वो सवाल करे हे न लेकिन इतना मुझे पता है की आज रात मैं उनसे भाग नहीं सकता. अभी तक तोह उन्होंने इंतजाम भी कर लिए होंगे मुझे दबोचने के. वैसे तुम इतनी गरम क्यों हो राखी थी आज?", अर्जुन ने विषय बदल कर प्रीती का एक कुल्हा जोर से दबाते हुए उसकी योनि को फिर से अपने लिंग पर दबाया तोह वो उचक उठी.
"आउच.. ये दूर हे रखो अभी वह से. पेट तक टक्कर मरता है और वह बहोत जलन हो रही है अभी. और कोई गरम नहीं हो रही थी मैं. ये नेचुरल है. पता नहीं कब नार्मल लगने लगेगा ये? बुरा न मानो तोह एक सवाल और था लेकिन पर्सनल थोड़ा?"
"दीदी झेल लेती है और उन्हें मैं नहीं झेल पता. आज तुम भी मुझ पर हावी हे रही थी बहोत देर तक. और मैं ये चाहता हु की हम ऐसा महीने में 2 से ज्यादा बार न करे.", अर्जुन प्रीती के सुर्ख होंठो को चूम कर निर्वस्त्र हे उठ कर बाथरूम की तरफ जाने लगा.
"तुम्हे कैसे पता के मैं यही पूछने वाली थी? और तुम्हे अजीब नहीं लगा ये बताना?"
"इस से ज्यादा अजीब है की तुम मेरे और ऋतू के बारे में जानती हो, जैसे वो तुम्हे बता देती है. और तुम उन्हें बता डौगी जो यहाँ हुआ. अजीब ये है की तुम दोनों और भी बहोत सी बातें जानती हो जिनके बारे में मैं शायद बात भी न कर सकू लेकिन तुम दोनों के साथ आपसी बात में मुझे प्रॉब्लम नहीं है.", अर्जुन दरवाजे के पीछे टेंगा टोलिया उतारने लगा था और प्रीती टाँगे फैलाये बस मुस्कुरा रही थी.
"अलका?"
"गर्लफ्रेंड है मेरी. सॉरी तुम दोनों हे हो. सच कहु तोह बस एक वही है जिनके साथ होने वाले हर एहसास को मैं बस हम दोनों तक रखना चाहता हु. तुम फिर भी सब जानती हो प्रीती क्योंकि मैं तुमसे कुछ नहीं छिपा सकता. ऋतू और अलका मेरे और तुम्हारे लिए वो घनी छाव है प्रीती जिनके साये टेल हम हमेशा महफूज रहेंगे. वो दोनों एक हे है बस ऋतू को पहली हे बार में अर्धांगिनी मान लिया था तोह गर्लफ्रेंड वाली भूमिका अलका की हो गयी. वैसे वो दोनों इस तरह हे तोह मिल कर काम करती है.", अर्जुन दरवाजा खोल कर टोलिया गीला करने लगा तोह प्रीती उसकी बातें सुन्न कर हंसने हे लगी.
"उल्लू हो तुम पूरे के पूरे. मैं तोह ये पूछ रही थी की अलका दीदी से मिलोगे क्या जाने से पहले?"
"बताया तोह एक बीवी है दूसरी गर्लफ्रेंड. दोनों साथ रहती है तोह वो पहले हे सब प्लान कर चुकी होंगी. अब तुम्हारे साथ दोनों दोनों किरदार तुम अकेली हे कर सकती हो इसलिए biwi-girlfriend एक बार में हे खुश. उनके साथ बहोत बुरा फंसता हु. ऋतू से बचा तोह अलका के सामने फंस जाऊंगा और नहीं तोह vice-versa."
"और हम तीनो एक साथ हुए तोह? आह्हः... आराम से.", प्रीती की ख़ास उभर ली हुई योनि को हलके से फैला कर साफ़ करता अर्जुन ये भी देख रहा था के कहा कहा घर्षण से खाल पर गहरी रगड़ लगी है. इतनी प्यारी योनि को उसके लिंग ने बुरी तरह रगड़ा था फिर भी उसको करीब करीब सलामत देख वो खुश था. वीर्य का हर कटरा साफ़ करने के बाद उसने एक हल्का सा चुम्बन दिया था प्रीती सिसक उठी, मस्ती में बेशक.
"आजतक वो दोनों हे एक साथ मेरे सामने नहीं आयी. तुम आ सकती हो ऋतू दीदी के साथ?"
"छी... गंदे कही के. ऐसा इस जनम में कभी नहीं होने वाला और तुम बेशरम होते जा रहे हो."
"ये भी मैं हे बोल रहा था? ाची बात है के ऐसा इस जनम में न हे हो. मैं तुम्हे झेल लेता हु यही बहोत है और ऋतू के सामने हाथ जुड़े हुए है मेरे. खैर अब घर चलना चाहिए हमे और यहाँ एक बार कल चक्कर लगा लेना तुम. मेरे जाने के बाद हो सके तोह ऋतू दीदी के साथ थोड़ा ज्यादा समय रहना.", अर्जुन बिस्टेर के किनारे बैठ पहले प्रीती को उसके अंतर्वस्त्र पहनाने लगा जो प्रीती को खुश करने के लिए बहोत था. अर्जुन की यही बात तोह ख़ास थी की उसको प्रीती के लिए सबकुछ करना ाचा लगता था. फिर अपने कपडे पहन कर अगले 5 मिनट में वो भी दुरुस्त था. पहले से कही ज्यादा चमकता और अब बेहतर भी.
"उनका ध्यान मैं रख लुंगी लेकिन तुम वह जाने के बाद हर रोज एक बार तोह फ़ोन करोगे हे. चाहे मेरे घर या दीदी को. बाकी मंजू और मेनका दीदी 2-3 दिन वही रहने के बाद वापिस आएँगी.", प्रीती ने भी बाल रबर में सही से बाँध कर चादर ठीक की. उसकी चाल में भरपूर लड़खड़ाहट थी जो अर्जुन देख न सका. दोनों घर से निकल कर स्कूटी पर सवार थे और इस बार प्रीती उसके पीछे बैठ कर ाचे से चिपकी हुई थी.
.
.
"ये 2-2 गाडी वाली बात न समझ आयी मेरे भोले. हम कितने लोग वह जा रहे है?", उमेद सिंह समय पर हे लौट आया था लेकिन शंकर को सफारी की पिछली सीट पर बड़ा सूटकेस और बैग रखते देख वो कुछ हैरान हुआ.
"ये गाडी एयरपोर्ट जा रही है गज्जू लेकिन अपने पीछे हे चलेगी, निगरानी में. विशेष की साली और वालिए जी की बिटिया ने अपनी अपनी फ्लाइट पकड़नी है तोह मैंने हे वालिए जी से बोल दिया था के वो अन्नू को भेज दे. आ गए वालिए जी भी बहार.", घर के भीतर से सरदार जी के साथ हे उनकी धर्मपत्नी जी और अन्नू बहार निकले तोह शंकर ने आखिरी बैग भी पिछली सीट पर सही से रख दिया.
"आप रेखा से मिल लो भाभी जी. यहाँ से अन्नू मेरी जिम्मेवारी है.", मुनीर छोल साहब के घर से निकल कर इधर हे आ रहा था जिसके दोनों हाथो में अलीशा का सामान था. अलीशा के साथ उसकी बेटी और खुद रोमिला भी आयी थी. वो लोग भी अन्नू और उसकी माता जी से मिले. गाडी में बैठने से पहले अन्नू की नजरो से 2 बूँद आंसू जरूर निकले लेकिन मुस्कराहट के साथ.
"दिल लगा के पढ़ना बीटा और मैं फकर से कह सकती हु की वह भी तेरा ख़याल भरपूर रखा जाता है.", श्रीमती वालिए जी का इशारा अर्जुन से हे था जिस पर माँ बेटी दोनों हे हंस दी.
"तुस्सी फ़िक्र न करो बेबे. चंगा पापा जी, हूँ सर्दियाँ विच हे मिलदे हाँ. फ़ोन करदी है पहुचड़े हे. चंगा बीजी.", अन्नू ने कौशल्या जी को दादी कह कर हे बुआलया था जिन्होंने उसको गले लगा कर आशीर्वाद दिए. अलीशा की तरफ इतना कुछ न हुआ और वो रोमिला से मिलने के बाद अपनी बेटी के सर पे हाथ रखती हुई बीच वाली सीट पर जा बैठी. मुनीर इन दोनों मेमसाब को बैठने के बाद शंकर जी से चाबी ले कर ड्राइवर की जगह जा बैठा.
"शंकर, तुम फ़ोन करोगे मुझे.", रामेश्वर जी ने उनके करीब आते हे पिता वाली बात कर दी. उमेद सर हिलता हुआ शंकर को लिए अपनी काली मेरसेदेज़ में जा बैठा. हाथ हिलने के कुछ उपक्रम हुए और उसके बाद मुनीर चुस्ती से उमेद की कार के पीछे निकल चला. बेटी के रुखसत होते हे अन्नू की माता जी ने चुन्नी से अपने आंसू साफ़ किये.
"भगवान् तुस्सी थोड़ा समां रेखा डा हाल चल ले लावो. मैं पंडत जी नाल कुछ गल्लां करनी.", वालिए जी भी इतना कह कर बगीचे में चले आये रामेश्वर जी के पीछे जो छोल साहब के हे साथ थे. एक बार फिर कुछ लोग घर से रुखसत हो चुके थे. अंदर शाम का समय होने पर ललिता जी खुद हे अपनी बहु को सजाने में लगी थी. आज रात राधिका ने रसोई में कदम जो रखना था. वही उमेद और शंकर की बातचीत भी सफर के साथ हे शुरू हो गयी.
"इन्दर को चाचा जी ने रोका है भोले?", उमेद एक सरसरी निगाह पिछली गाडी पे दाल कर अपनी गति को संयत कर रहा था. शहर में वो अक्सर 50-60 पर हे चलता था. मुनीर दक्ष था लेकिन फ़िलहाल तेज चलना ठीक नहीं था.
"इन्दर ने ज्यादा कुछ नहीं बताया भाई. वो बोलै के आज वो हुसैन भाई के परिवार के साथ है और कल उसको किसी जरुरी काम से बहार जाना. दोपहर तक लौट भी आएगा.", शंकर जी को खुद इल्म न था के उनके पिता कैसे अपने बचो को सँभालते है. उमेद कुछ जानता था तोह बस मुस्कुरा दिया.
"वैसे तू आँख नहीं सेक रहा था इस विदेशी हूर पर? देख तेरे से बच के जा रही है अपने देश वापिस.", उमेद पिछले कुछ दिनों की व्यस्त स्थिति से उबरें के लिए शंकर से हे मस्ती कर रहा था.
"इसके देश में जा कर पेल दूंगा अगर दिल किया तोह. फ़िलहाल दिल नहीं है मेरा इसके साथ कुछ करने का. लेकिन तूने कब देखा बे मुझे इसको जांचते?", शंकर ने खिड़की निचे करनी चाही तोह उमेद ने कोई बटन दबा दिया. हवा अब कही और से बहार निकल रही थी और भीतर सिग्रत्ती जल चुकी थी.
"तेरे लिए ये कोई नयी बात तोह है नहीं. मैंने तोह ऐसे हे कहा था क्योंकि ये तेरे टाइप की जो है. अब सच भी बोल दे प्यारे.", अब शंकर भी हंस दिया जैसे उसकी चोरी पकड़ी गयी हो.
"ये मुझे पसंद नहीं गज्जू इसलिए बस इशारे तक हे सिमित है इसके साथ. चालू चीज है और विवान की सेटिंग भी है ये. हाँ रोमिला जरूर पसंद है लेकिन उसकी जुबान जितनी ढीली है स्कर्ट उतनी हे टाइट. बात तक सब ठीक लेकिन उसके आगे वो न बोतल में उतरती है न बातों में.", शंकर ने एक ठंडी आह भरते हुए धुआं बहार उगला तोह उमेद खिलखिला उठा.
"मतलब जो चाहिए वो मिलती नहीं और जो मिल रही है वो चाहिए नहीं.. वाह मेरे भोले.. वैसे फिर तोह रोमिला की दाद हे देनी पड़ेगी यार जो तेरे जैसे शिकारी को हार मनवा गयी. खैर ाची बात है और तू पहले से ज्यादा समझदार हो गया है अब."
"रोमिला बस आकर्षक है भाई और अब मैं भी सम्बन्ध साफ़ हे रखना चाहता हु. अर्जुन की सास होने से पहले वो रेखा की गहरी दोस्त भी है और सबसे घुल मिल कर रहती है. वैसे भल्ला क्या चाहता अब?", शंकर ने दराज खोल कर कुछ कागज बहार निकल कर देखते हुए काम की बात शुरू की. बिपास वाला रोड आ चूका था अब और यहाँ से कार दुगनी गति पर चलने वाली थी.
"भल्ला अपना सारा काम हमारी तरह एक नंबर में करने का विचार कर रहा है लेकिन उसका कहना है की वो चाह कर भी कब्जे और समझौते वाले काम बंद नहीं कर सकता. लम्बा चौड़ा संगठन है और लोग भी बहोत है उसके निचे. अब वो सब बंद करने का मतलब है उसकी जगह कोई और सर उठाएगा. तोह पूछ रहा था के इस से हमारे व्यापार में तोह कोई परेशानी नहीं आएगी. मैंने भी कह दिया के वो अपना पुराण हे चरित्र बरकरार रखे. डर रहना जरुरी है. वैसे राणा वाला काम तुमने ाचे से हैंडल किया भोले. अब भल्ला हमारी पूरी पकड़ में है तोह बॉर्डर एरिया में हम अपना अलग काम आराम से करेंगे. चाचा जी तक फिर भी बात जाएगी और वीर सिंह राणा का नाम सुन्न कर तुझ पर दिक्कत आ सकती है.", उमेद ने एक इशारा मुनीर को दिया जिसके बाद दोनों गाड़ियां 100 पर दौड़ने लगी. सड़क लगभग खाली हे थी और यातायात नियोजित.
"तुझे नहीं पता लेकिन इस मीटिंग में मैं मेरी मर्जी से नहीं बल्कि पापा के कहने पर गया था गज्जू. तुझे क्या लगता है मैं एक भी नहीं मारता अगर हालात वैसे होते तोह? दिल में तोह मैंने वह 10 गर्दन काट दी थी लेकिन असलियत में तोह बस एक बेहोश, जो सांगवान चाचा की निगरानी में पापा ने हे रखवाया है. पता नहीं उन्हें क्या हुआ जो वो गड़े मुर्दे खुद हे उखड़ते फिर रहे है. विनोदिया भी उनके हे पास गया था मदद के लिए और उन्होंने ज़िंदा भी न रहने दिया किसी को. कुछ अजीब नहीं लगता तुझे?", शंकर के सवाल और खुलासे वाजिब थे जिन पर सोचता हुआ उमेद सर खुजाने लगा.
"वो .. मेरी बात का कुछ गलत मतलब मत लियो भोले लेकिन मुझे लगता है चाचा जैसे वो सभी नाम मिटाना चाहते है जो अतीत में दुखदायी रहे हो. शायद वो नहीं चाहते की उनके जाने के बाद कोई भी दुश्मन परिवार का अहित करे. बेशक वो आज भी सजग है और बेहतर हालत है उनकी लेकिन बुजरुग होता व्यक्ति सोचता बहोत है.", उमेद की बात सुन्न कर शंकर को एहसास हुआ के उसके पिता बूढ़े हो गए है. वो फिर भी म्हणत में लगे है और ऐसी म्हणत जिसमे कुछ फैंसले तोह कानून से परे भी है.
"रेखा पर भी हुम्ला हुआ था उमेद. रात वाले टाँके खोल कर आज दिन में मैंने बत्रा के साथ फिर से उसकी हथेली को बेहतर सिला है. मेहुल के हिसाब से रेखा जख्म धोने बाथरूम नहीं गयी थी बल्कि उसको चोट वही लगी. रेखा ने बताया के उसका हाथ एल्युमीनियम से कटा लेकिन जख्म के अंदर कही भी कोई कानन न मिला. तोह उसकी दोनों बात यहाँ गलत साबित होती है. वह कोई ऐसा इंसान नहीं था जिस से दुश्मनी हो और रेखा पर दूसरी बार ऐसा हो रहा है. वो अगर हुम्ला करने वाले को देख नहीं पायी थी तोह वो साफ़ बताती की ऐसा हुआ. लेकिन वो ताल रही है जिसका मतलब है की उसको इंसान का पता है.", शंकर ऐसी बातों पर अब अपने भाई की तरह सोचने लगा था, खुद के किरदार से विपरीत. उमेद भी हैरान हुआ उसको सोचते और इन पहलुओं को गौर से सुन्न कर.
"महिलाओं वाले बाथरूम के आसपास पुरुष प्रसाधन नहीं था शंकर. और अगर मैं किसी पर शक करू भी तोह वो सभी व्यक्ति कल कही भी अकेले नहीं रहे. और ये जो भी हुआ है ये किसी ऐसे व्यक्ति ने किया है जो महिला है.. काफी समय से रेखा के करीब रहा है शादी के दौरान.. जो कोई आसपास रहा होगा उसको खुद व्यस्त किया जिस से घटना को अंजाम देते समय रेखा पूरी तरह अकेली हो.. और वो जो भी इंसान है, ओहदे या रिश्ते में बड़ा है. रेखा का स्वभाव हे है सबको एकसाथ बरकरार रखने का जिसका उस व्यक्ति को गहराई से पता होगा इसलिए देखे जाने की सूरत में नाम प्रकट होने का डर काम हो जाता है. और रेखा बिलकुल वैसा हे तोह कर रही है. भोले, अगर वार करने वाली कोई महिला रही है तोह इसका मतलब कुछ और भी हो सकता है.", उमेद जैसे लगभग काँप हे गया था अपनी सोच को विराम देते हुए.
"क्या मतलब है गज्जू?"
"कितना गहरा था जख्म?"
"दोनों किनारो पर लगभग पौने इंच लेकिन हथेली के ठीक बीच में 3-4 सूट. मतलब काफी गहरा था और ..."
"और अगर ऐसा जख्म हथेली की जगह कलाई पर दिया जाए.. दरवाजा बंद कर दिया जाए बहार से जख्मी व्यक्ति को अंदर बंद करके तोह परिणाम क्या होगा?", उमेद की धारणा सुन्न कर खुद शंकर को भी पसीने आ गए. और इरादे तोह वैसे हे थे अपराधी के.
"कलाई ऐसे वार से अलग हे हो जाती गज्जू और अगर वो व्यक्ति dhwani-badhit दरवाजे को बंद कर देता वैसा करके तोह 10-15 मिनट में रेखा बेहोश होने के बाद मर्डर भी सकती थी. लेकिन कोई महिला चाक़ू से ऐसा वार करने का जोखिम नहीं ले सकती. इतना तीखा खंजर सहेजना आसान भी तोह नहीं.", शंकर खुद हे अपनी सोच को गलत बता रहा था लेकिन उमेद का दिमाग बढ़ती स्पीड के साथ कही ज्यादा हे तेज चल रहा था.
"वो shahi-khanjar जो हमको मिला था वो याद है तुझे? उसकी धार ऐसी थी जो ऑपरेशन ब्लेड को मात दे दे. बहार का कवच भी आलिशान कारीगरी और फल की ऊंचाई कही से एक इंच तोह कही से 3-4 सूट. देख भोले ऐसा मेरा सिर्फ अनुमान हे है. बाकी परिस्थिति और हमलावर कुछ भी या कोई भी हो सकता है. बस इतना यकीन है के कोई अनजान बाहरी व्यक्ति ये नहीं कर सकता. बाकी अंदेशा मैं दे हे चूका हु जितना रेखा को जानता हु. वैसे इतनी बड़ी घटना हो गयी लेकिन न तोह इसकी आवाज चाचा जी तक गयी और न हे अर्जुन को मैंने किसी खोजबीन में हे देखा. वो था कहा?", उमेद ने जिन अंदेशो से शंकर को झकझोरा था वो उन्ही में खोया था जैसे कुछ कुछ समझ गया हो. अर्जुन का जीकर होने पर फीकी सी मुस्कान जरूर चेहरे पर आयी.
"वही तोह पता लगाना चाहता था मैं गज्जू. ये साला तोह मेरी सोच से भी टेढ़ा है. न ये रात में अपनी माँ के करीब गया और न हे आज वो कोई हालचाल लेता देखा. हाँ पापा के आसपास जरूर दिखाई दिया जैसे सारे काम वो उस से हे करवा रहे हो. लड़का समझदार है और जितना मुझे पता है वो अपनी माँ से अटूट प्यार करता है और फ़िक्र कितनी ये तोह पूछ हे मैट. लेकिन वर्तमान हिसाब देखा जाए तोह वो इसके विपरीत नजर आ रहा है. कही वो जुट तोह नहीं चूका तहकीकात करने में? साला ये दोनों माँ बीटा जाने कैसे है जो समझ हे नहीं आते."
"इसका मतलब यही है भोले की अर्जुन व्यस्त होने का दिखावा कर रहा है और अगर वो चाचा जी के आसपास है तोह मतलब वो काम पर हे है. खैर छोड़ ये सब और ये सोच के अब हमारी अगली महफ़िल जाने कब होने वाली है."
"हाहाहा.. मुझे भी लगता है के आने वाले समय में आज के बाद हम लोग शायद हे एक महीने तक एकसाथ बैठ सके. तू और इन्दर तोह बिज़नेस में व्यस्त रहने वाले हो. मेरा काम भी बहोत पड़ा है जिसके साथ साथ घर भी देखना पड़ेगा. संजीव भी केरला जा रहा है और अर्जुन के न रहने से रात घर हे गुजारनी पड़ेंगी. जैसे तू करता है."
"मेरा तोह हमेशा से हे ऐसा है भोले. बिज़नेस दिल्ली में हे नहीं करना. जो पहले से है उसको भी देखना है और हफ्ते में 5 रात हवेली पर हर हाल में. चल ाची बात है के तू भी चाचा जी के डंडे टेल रहेगा. इन्दर के रहते तुझे महफ़िल की परेशानी तोह नहीं होने वाली. बाकी संजीव अर्जुन ाचा काम करते है यार जो तुझे खुद महसूस हुआ के वो नहीं रहेंगे तोह तुझे रहना पड़ेगा.", उमेद गहराती शाम को देख रहा था. जल्द हे ये रात में तब्दली हो जायेगी और विरानो से आगे फिर से महानगर की चकाचौंध में तलाश होगी कुछ शांत लम्हो की. पिछली गाडी में अन्नू आदतन सो चुकी थी और अलीशा अपने जीवन के बारे में सोचती danva-dol.
.
.
"तू इतना बड़ा है, गॉड में चढ़ के बैठेगा? चल सही से सामने बैठ अपनी भाभी के.", कौशल्या जी ने अंदर वाले आँगन में जब राधिका की ख़ास रस्मे शुरू की तोह devar-bhabhi की रसम होने पर अर्जुन सुर्ख साड़ी में सजी अपनी भाभी की गॉड में हे बैठने लगा. संजीव भी हंस रहा था अपने पिता, माँ और बहनो के साथ साथ. राधिका कुछ लम्बा हे घूंगट निकले थी जिसको खुद कौशल्या जी ने माथे तक ऊँचा किया. लाल बिंदी, भरी हुई मांग, सोने का टिका और गले में मंगलसूत्र के साथ संजीव द्वारा दी गयी सोने की खूबसूरत चैन. कैसा हुआ ब्लाउज जिसमे उभर अपने अकार को बखूबी दर्शा रहे थे. मेहंदी लगे गोर गोर हाथ में लाल कंगन और sunehari-laal चूड़ियां. राधिका हर नजर में एक दिलकश युवती थी और अब संजीव की jiwan-sangini.
"मैं छोटा हु दादी और बहोत छोटा. फिल्मो में भी देखा है की देवर भाभी की गॉड में हे बैठता है. नहीं तोह मैं नेग नहीं लेने वाला. और ये इतनी नाजुक भी नहीं होंगी. मैं तोह कृष्णा चची और कोमल दीदी तक की गॉड में बैठ चूका हु.", अर्जुन भी फटकार को दरकिनार करता अपनी ज़िद्द में ऐड गया. उसकी बहने जोश बढ़ा रही थी और सरोज भाभी टांग खिंचाई.
"बैठने दो न दादी. वैसे भी मुन्ना अभी बड़ा कहा हुआ है.", अब अर्जुन आँखें दिखा कर जैसे सरोज भाभी को याद करवा रहा था के उस मुन्ना का नन्हा मुन्ना लेते हुए वो भी रो कर बीच में हे भाग गयी थी. सरोज भाभी नजरो में हे झेंप कर बगले झाँकने लगी.
"बीटा, तेरी भाभी कुछ नाजुक भी है तेरे मुकाबले और तैयार हो कर बैठी तोह कपडे गहने सब खराब हो जायेंगे. चल तू संजीव की गॉड में बैठ जा.", ललिता जी ने अपना मैट रखा लेकिन अर्जुन टास से मास्स न हुआ. प्रियंका पीतल की परात में लाल रंग भर के इधर ले आयी थी जिस से अगला खेल होने वाला था.
"भाभी, आप हे बोल दो के मुझे बिठा सकती हो या नहीं. बस ये याद रखना के आज आपके पास ये एक हे मौका है खुदको संजीव भैया की मजबूत जोरू साबित करने का."
"ए.. पागल ये जोरू क्या होता है? उल्लू कही का.. राधिका इसकी बात का बुरा मैट मान न और तुम मन कर दो.", कृष्णा जी ने हँसते हुए अर्जुन की पीठ पर ढोल जमा दी.
"छोटा देवर मतलब तोह पहली औलाद हे होता है न माँ जी? इनके लिए ये पहले से हे इनका सबकुछ है तोह आज से मेरे लिए भी. और भाभी कभी haa-naa नहीं कहती अर्जुन. वो बस अपने देवर की हर चाहत का ख़याल रखती है. कमजोर भी हुई तोह कोई बात नहीं.", राधिका ने अर्जुन की कलाई पकड़ कर पूरे हक़ से उसको अपनी गॉड में आने को कहा. अर्जुन हिचकिचा रहा था और वो बैठने भी लगा, अपना भार जमीन पर करते हुए. कौशल्या जी तोह राधिका का जवाब सुन्न कर हे गदगद हो उठी थी जबकि ललिता जी ने नजर उतार कर वो पैसे एक तरफ रख दिए. कृष्णा जी ने लाल धागा टॉड कर टुकड़ा राधिका की बायीं हथेली में रखा और वह अर्जुन का हाथ रखने के बाद बोली.
"यही उम्मीद है सबको राधिका और तुम्हारी हर इत्छा भगवन पूरी करे. देवर सही मायने में पहली औलाद के साथ साथ छोटा भाई, मित्र और सेवक भी होता है. अब से अर्जुन पर तुम्हारा भी पूर्ण अधिकार.", आरती द्वारा आगे बढ़ाया शगुन का सामान भी कृष्णा जी ने राधिका संजीव के बीच रख दिया. अर्जुन उठने लगा तोह राधिका ने कन्धा दबा कर उसको वैसे हे बैठे रहने को कहा. कृष्णा जी के बाद रेखा जी ने भी कोमल की मदद से दोनों के शगुन किये और फिर राधिका ने भी अपनी सभी ननद को अपनी पसंद के कपडे भेंट किये.
"अब तोह उठ जा रे कपूत अपनी भाभी की गॉड तोड़ेगा क्या?", कौशल्या जी ने खिंच कर अब अर्जुन को अलग तोह कर दिया लेकिन वो उनके करीब हे बैठा. थाल सामने रखा गया और नियम भी समझाए की जो पहले अंगूठी पकड़ेगा वो दूसरे से एक वचन या उपहार ले सकता है. गहरे लाल रंग के पानी में तारा ने हे अंगूठी दाल कर फिराई और हाथ बहार निकल लिए. अभी से 2 गुट बन चुके थे जिसमे पहली बार अर्जुन संजीव की जगह अपनी भाभी की तरफ था.
"भाभी, तारा ने चीटिंग की है. आप भैया वाली तरफ ढूंढो.", अर्जुन हाथ पकड़ कर राधिका को खुद हे अंगूठी धुदनवाने लगा तोह ऋतू ने उसको वही रोक लिया.
"दादी, आपके सामने हे चीटिंग. ये लोग 2 हाथो से ढून्ढ रहे है तोह फिर हम भी भैया की तरफ से शामिल हो जाए?", एक बार और अर्जुन दांत खा कर हटा. संजीव की ऊँगली अंगूठी को छो गयी थी और जबतक वो वापिस हाथ पीछे करता राधिका ने हथेली ऊपर उठा ली.
"मेरी बची जीत गयी रे बिमा कंपनी. चल अब तैयार हो जा ज़िन्दगी भर बांग देने के लिए.", कौशल्या जी तोह संजीव के हे मजे ले रही थी और अर्जुन ख़ुशी मनाता हुआ अपनी भाभी को बाहों में भरे चीख रहा था.
"भाभी, आप बचा कर रखो ये प्रॉमिस. यहु.. भैया तोह फंस गए पक्के वाले.", राधिका तोह इस मजबूत जकड में जैसे ये भी भूल गयी थी की वो हैं कहा पर. कृष्णा जी ने हे अर्जुन को शांत किया.
"दम घुट जायेगा बीटा उसका. चल संजीव अब बता तू क्या करेगा?"
"गिफ्ट?"
"न न.. भाभी आप वचन हे मांगो. और दादी आपने कहा था के जो जीतेगा उसको आप अपनी तरफ से गिफ्ट डौगी.", अर्जुन ने ये नया हे फरमान सुना दिया जो हुआ हे नहीं था. कौशल्या जी हंसती हुई सर हिला कर ये भी मान गयी.
"राधिका एक साल तक चूल्हे पर नहीं जायेगी. और एक महीना तक बर्तन उठाने की भी सख्त मनाही है. सजा उसको जिसके सामने ऐसा होता दिखा.", अब थानेदारनी ने एक बार फिर साबित किया था के वो अपनी बेटियों में फरक नहीं करती और एक nav-vadhu को जीवन का महत्व बताना उन्हें ाचे से आता था.
"देखा भाभी मेरी दादी का दिल. ये बस मेरे साथ हे सख्त है और थोड़ा बहोत मेरे पापा के.", अर्जुन का तंज सुन्न कर एक बार फिर उसके सर पर चपत पड़ी जिस पर पहली बार राधिका खुल कर हंसी थी. ये सारा घटनाक्रम कोई न कोई कैमरा में क़ैद करता रहा. 7 बजे शुरू हुआ ये समां तभी थमा जब 9 बजे रामेश्वर जी की आवाज आयी.
"अज्ज रोटी दी हड़ताल सी?", पंजाबी सुनते हे अर्जुन झट्ट उठ गया.
"लग जाओ सब काम पे. मैं तोह चला ऊपर अपने कमरे में. एसएसपी साहब की पंजाबी मतलब जो सामने आया उसकी शामत. रोटी बन्न जाये तोह आवाज लगा देना कोमल दीदी.", जिस तरह अर्जुन मैदान छोड़ कर भगा था सभी हंस रहे थे. कोमल, प्रियंका और तारा सीधा रसोई में चली गयी. सब्जी पहले हे बन्न चुकी थी और अब बस रोटी बनानी थी. राजकुमार जी संजीव को साथ लिए बहार की तरफ चल दिए तोह सरोज भाभी के साथ अलका, आरती और रुपाली राधिका को लिए उसके कमरे की तरफ. आज राधिका की सुहागरात जो थी और कुछ वैसी हे तैयारी माधुरी के ससुराल में चल रही थी. एक हे रात में 2 अलग अलग जगह nav-dampatya जीवन के पहला अंतरंग समय घटने वाला था, जिसके गवाह भी सिर्फ वही होने वाले थे जो कमरे में बंद होंगे.
पहली मुलाकात
"तू तोह बड़ा समझदार हो गया है शंकर. पहले क्यों नहीं देखा मैंने तेरा ये रूप?", मार्किट में सभी के साथ हल्का फुल्का नाश्ता और ठंडा आदि लेने के बाद शंकर ने दलीप के परिवार के साथ साथ राजेश को भी कई उपहार दे कर विदा किया था. उसने ढेरो सामान अपनी सभी बेटियों, भतीजियों और बहिन रेणुका के लिए भी ख़रीदे और उन्हें दिए. रेखा इस दौरान अपने पति की बगल में हे रही थी और सबसे आखिर में शंकर ने अपनी पसंद से अपनी बीवी और माँ के लिए भी एक बेहतरीन साड़ी खरीदी. बचे खुश थे और उन्हें खुश देख कौशल्या जी ने भी अपने बेटे का माथा चूम कर ऐसा कहा तोह पिछली सीट पर बैठी रेखा और रेणुका भी मुस्कुराई.
"माँ, जनता हु की मेरे जीवन में समय का हमेशा से हे अभाव रहा है और ऐसा आगे भी रहना वाला है क्योंकि डॉक्टर होना सिर्फ नौकरी नहीं एक कर्त्तव्य है. लेकिन ये भी सच है की आज मैं जो भी हु वो अपने परिवार की वजह से हु और ख़ास कर आपकी वजह से. दलीप भी तोह परिवार है और राजेश.. राजेश एक दोस्त से बढ़कर वो इंसान है जो कभी भी मुझसे सवाल तक नहीं करता लेकिन परवाह उस से ज्यादा करता है. और ये मेरी गूंगी गुड़िया भी तोह बरसो से इस कलाई पर बिना शर्त राखी बांधती आयी है.", शंकर ने रेणुका के बाल बिखरने के बाद स्टीयरिंग घुमाया तोह रेणुका ने झूठे दिखावे से पीठ पर मुक्का जड़ दिया. कोमल बगल में बैठी हुई ख़ामोशी से मुस्कुरा रही थी. उसकी गॉड में भी अपने पिता द्वारा दिलवाया उपहार था और सरोज मौसी ने जो सूट दिया वो भी.
"हाँ बीटा ये तोह सही कहा तूने. राजेश तुझमे सिर्फ अपना गुरु देखता है और रिश्ते बाद में. वैसे मंजू भी ाची लग रही थी अब और मेनका तोह जैसे अब उसके बिना कही जाती हे नहीं. चल अब घर भी चलना है. रेखा के बारे में क्या बताया डॉक्टर ने, ये तोह मैं पूछना हे भूल गयी?", कौशल्या जी ने आगे नजर की तोह तारा खिड़की से हाथ निकाल उन्हें अंगूठा दिखा रही थी. इलो में उसके साथ रुपाली, अलका, ऋतू और अफसाना थी. शंकर जी की सफारी में अंतिम सीट पर मुस्कान के साथ प्रियंका भी इन सबके बीच थी.
"पहले उन्हें देख लो माँ कैसे बचपना करती रहती है. और आप कुछ ज्यादा हे नहीं सर चढ़ा रही ऋतू को?", फ़िलहाल तोह ऋतू उस कार में आराम से पिछली सीट पर बैठी अफसाना से हे बातों में लगी थी लेकिन शंकर का आशय कही और था.
"वो हे मुझपे हुकुम चलती है जैसे तू करता आया है अब तक. मेरा जोर नहीं चलता उसके सामने तोह मैं क्या करू? पहले तूने उसको सर चढ़ाया और अब वो मेरे आ छड़ी है. वैसे वो मजबूत दिल और सही निर्णय लेने वाली लड़की है शंकर. सही गलत की पहचान कही ज्यादा है उसको इसलिए मुझे भी उसका रौब रखना पसंद है. रही बात मोटरसाइकिल वाली तोह ऐसा तू भी अपने समय कर चूका है. मधु को कार चलना सीखने के मैं खिलाफ थी लेकिन तू हे था न उसकी ज़िद्द पूरी करने वाला? चल अब बता के रेखा के लिए क्या बताया डॉक्टर ने?", शंकर जी अपनी माँ की बात सुन्न कर मुस्कुरा रहे थे. उनकी भांजी तारा तोह अब तक उस कार को हवा से बातें करवाती हुई नजरो से ओझल भी हो गयी थी.
"हम्म्म.. मैं भी तोह डॉक्टर हे हु माँ. वैसे फ़िलहाल कंडीशन ठीक है हथेली की और अगर निशाँ गहरा लगा तोह सर्जरी से थोड़ा बेहतर कर देंगे. पट्टी के लिए तोह मैं भी मन करता हु पर गर्मी है और पसीना या पानी लगा तोह परेशानी हो सकती है. रेखा, जख्म सूखने की दवा नियम से लेती रहना और जो जो ताक़त की दवा बताई है वो भी.", शंकर जी ने आईने में देख कर बीच वाली सीट पर बैठी अपनी बीवी से कहा तोह उन्होंने बस हामी में सर हिला दिया. एक पल तोह शंकर वो चेहरा हे निहारते रहे जो इतने दर्द में होने के बावजूद कितना निस्चल और खूबसूरत था. फिर मैं को संयतत करके निगाह सड़क पर स्थिर की.
"रेणुका, तेरी शिकायत आयी है मुझे.", कौशल्या जी ने अब थोड़ा डपट कर कहा था जिस पर रेणुका अपनी भाभी की तरफ देखने लगी.
"बड़ी माँ, सबकुछ तोह टाइम से खा पी रही हु."
"खुराक फिर भी काम है और डॉक्टर बोल रही थी की तू नींद सही से नहीं ले रही. कोमल बीटा, तुम जरा ध्यान देना अपनी बुआ पर. तुम्हारे साथ तोह फिर भी ये सहेली जैसी है. वैसे तू दिल्ली क्या करने जा रहा है शंकर?", कौशल्या जी अमूमन ऐसे सवाल अकेले में करती थी लेकिन यहाँ बातों में उन्होंने ये भी पूछ हे लिए. माहौल ाचा था इसलिए शंकर जी ने भी माँ की बात का जवाब देना सही समझा.
"इन्दर और उमेद ने काम शुरू किया है न माँ दिल्ली में. गजेंद्र भाई साहब से कल आपको मिलवाया था न, बस उनके साथ हे एक मीटिंग है मेरी. कागज जरुरी है और इन्दर चाहता है के पहला काम मैं अपने हाथ से करू. वैसे भी आज वो हुसैन भाई साहब के साथ व्यस्त है और कल पापा के काम से कही जाना है उसको. सुबह जल्दी आ जाऊंगा वापिस लेकिन फिर नौकरी के साथ साथ सांगवान चाचा के भी हॉस्पिटल्स में बहोत से केस सँभालने है. अगले महीने यूरोप भी जाना है सरकारी टूर पे तोह भरपाई करनी पड़ेगी.", कार नए सेक्टर वाली खुली सड़क की तरफ आयी तोह उन्हें तारा वाली गाडी एक किनारे कड़ी दिखी जहा ice-cream वाला उन्हें बचे हुए पैसे वापिस पकड़ा रहा था. शंकर जी ने एक निगाह कार की खुली खिड़की से डाली तोह तारा ने उन्हें हरे रंग की कुल्फी सनी जीभ चिढ़ा दी.
"ये न सुधरने वाली. तू इसको भी बिगड़ चूका है शंकर.", कौशल्या जी को भी अपनी नातिन से उतना हे स्नेह था और ये ऊपरी दिखावा बाकी सभी जानते थे.
"इनके यही तोह दिन है माँ. आपने देखा कितने सलीके से कार एक तरफ कड़ी करके वो लोग बिना बहार निकले बैठी थी? बचे समझदार है और वैसे भी इस शहर में आजकल उन्हें किसी का डर भी नहीं रहा."
"हाँ तोह तेरे पापा ने नाम काम कमाया है जो मेरे बचे किसी से डरे?"
"वो तोह अपने लाल से हे पूछना आप. ये डर या नाम उसका ज्यादा हो रखा है आजकल. पता हे नहीं चलता वो कब क्या काण्ड कर देता है? वैसे उसके कपडे आपको पसंद तोह आये न?", शंकर का इशारा समझ तोह चुकी थी कौशल्या जी लेकिन उन्होंने नाम वाली बात पर कोई टिपण्णी नहीं की. पर दूसरी बात से जैसे उन्हें एक अलग हे मौका मिल गया था अपने बेटे की खिंचाई करने का, थोड़ी बहोत रेखा की भी.
"हाँ उसको यकीनन कपडे पसंद आएंगे शंकर. ऋतू उसके लिए हमेशा सही है.. मेरा मतलब वो उसके लिए हमेशा सबसे सही चीज हे लेती है. और वो एक नजर में बता देगा की वो किसने लिए है.", अब तोह सचमुच रेखा को भी झुरझुरी सी महसूस हुई ऋतू के साथ अर्जुन का सुन्न कर. वही कोमल ने तोह चेहरा हे बहार कर लिया और आज जैसे वो हंसी रोकने की भरपूर कोशिश कर रही थी कुछ समझ कर. शंकर अब बोले भी तोह क्या हे बोले.
"हाँ माँ. वो बड़ा हे नहीं हुआ जैसे, ऋतू की मानो तोह. उसकी मौजदगी में अर्जुन अपने से कुछ कर हे नहीं सकता और न वो उसको करने देती है. दुनिया के लिए वो सवा 6 फ़ीट का पहलवान हो गया लेकिन ऋतू की नजरो में वो आज भी वही है जो बचपन में था. चलो ाचा है न माँ के उनमे इतना विश्वास और प्यार है. ऋतू कभी उसको भटकने नहीं देगी.", शंकर ने कार चलते हुए हे पिछले शीशे से वो कार देखने की कोशिश की जिसमे उसकी बेटी थी. शायद वो लोग अभी भी चली नहीं थी. और उसके जवाब पर कौशल्या जी सर हिलाते हुए हलके से मुस्कुराई.
"वो नहीं भटकने देगी ये मैं जानती हु शंकर. ऋतू कुछ मामलो में सचमुच शायद निर्दयी भी है अर्जुन के साथ जैसे पढाई और सामाजिक व्यवहार. मैंने देखा है वो कैसे कान खिंच देती है उसके वो भी बिना किसी की परवाह के. ज़िन्दगी भर काबू में रहने वाला है वो.", और यहाँ फिर से कौशल्या जी ने चूल्हे हिला दी थी शंकर और रेखा की लेकिन इस बार शंकर हांसे बिना न रह सके.
"चलो माँ आपको मुबारक हो फिर तोह. ऋतू के सामने आपकी चलती नहीं और अर्जुन तोह वैसे भी आपका प्यारा है. आप जानो और आपके लाडले. कोमल बीटा तुम जरा अपनी बुआ से सामान ले लेना निचे उतर कर. रेखा, मैं खोलता हु तुम्हारी तरफ का दरवाजा.", घर के सामने हे गाडी रोक कर शंकर जी ने इतना कहा लेकिन मुस्कान उनसे पहले उतर कर कौशल्या जी और रेखा जी की तरफ के दरवाजे खोल चुकी थी. मुस्कान ने हे रेखा जी की ब्याह के निचे से हाथ दाल कर उन्हें सहारा देते हुए उतरा तोह करीब आये शंकर जी ने अपनी माँ से वो बैग लेने के बाद मुस्कान के सर को चूमते हुए धन्यवाद किया.
"It's ऑलराइट अंकल. आंटी है दोने ा लोट फॉर में एंड थिस इस नथिंग िफ़ कपरेड़."
"यू अरे आलरेडी कॅल्क्युलेटिवे िफ़ आईटी इस सो, मुस्कान. I'm ा मदर एंड यू आल डेसेर्वे रिज़नेबल अफेक्शन एंड केयर. िफ़ यू विश ी विल बे स्लिंगटली फॉर्मल टुवर्ड्स यू.", रेखा जी के मुँह से फर्राटेदार अंग्रेजी सुन्न कर उनकी सास मुस्कुराती हुई शंकर का हाथ पकड़ कर अंदर बढ़ चली जो खुद भी हंस रहे थे. मुस्कान ने जो भी सुना था अब वो शायद गलती समझ चुकी थी. कोमल भी रेणुका बुआ को उतरवाने के बाद सामान ले कर प्रियंका के साथ अंदर जाने से पहले रुक कर अपनी माँ और मुस्कान को हे देख रही थी.
"सॉरी. It's रियली माय मिस्टेक एंड यू अरे राइट आंटी तहत ी वास् बिट कॅल्क्युलेटिवे बिकॉज़ ी ऍम नॉट उसे तो विथ सुच हार्ट वार्मिंग केयर. ी थॉट िफ़ ी एक्सप्रेस माय फीलिंग्स इन इतर लैंग्वेज, यू मिगहत नॉट चेक आउट. एंड तेरे ी वास् रॉंग अगेन."
"हे.. It's ऑलराइट. थे ओने हु हद बीन ट्रेवल्ड अंडर हैलस्टोरंस, उसुअल्ल्य डाउट क्लीन स्काई. मुझे फ्रेंच नहीं आती और सुना है तुम्हे फ्रेंच कुछ ज्यादा हे पसंद है. जब मुझसे कुछ ऐसा कहना हो जो मैं समझ न सकू तोह कोशिश करना. लेकिन अब लगता है जरुरत नहीं पड़ेगी. मेरे लिए तुम अलग नहीं हो बीटा और माँ कोई भी हो वो हर बचे से ममता रखती है. तुमने भी तोह बिना कहे मेरा इतना ध्यान रखा.", रेखा जी वैसे हे मुस्कान के कंधे पर हाथ रखे धीमे कदमो से आगे बढ़ने लगी तोह मुस्कान भी उनको थामे चल पड़ी.
"अर्जुन सच कहता है की आप सबसे ख़ास है और दिल की भी सबसे ाची. वैसे ये फ्रेंच वाली बात आपसे किसने कही?", मुस्कान घर में दाखिल हो चुकी थी उनके साथ.
"उस किताब का यही नाम है न, 'थे बाइसिकल'? इंग्लिश संस्करण पर भी ठीक वही फोटो थी जो मैंने पढ़ा था. तुम्हारी कृष्णा आंटी के पास तोह कॉलेज में फ्रेंच ऑप्शनल सब्जेक्ट भी था और उनके पास वैसी बहोत सी किताबे भी मिल जाएँगी अगर तुम पढ़ना चाहो. बस बदले में तुम्हे उन्हें भी अपनी किताबे देनी पड़ेंगी.", रेखा जी के हाथ पर अब नयी पट्टी पढ़ी थी और वो हाथ सही रखने के लिए गले में अलग से एक पट्टी दाल कर कलाई को ऊँचा रखा गया था.
"हाहाहा.. मुझे सचमुच नहीं पता था आंटी जी की आप लोगो की एजुकेशन इतनी ाची भी हो सकती है. ऐसा नहीं है की ये मैं अपने आप से कह रही हु. वो हवेली पर ज्यादातर औंटीएस स्कूल हे नहीं गयी कभी और जो गयी है उनके बोलने से पता भी नहीं चलता. आज रात मैं आपको अपनी फवौरीते बुक रीड करके सुनाऊँगी. फिर देखते है कृष्णा आंटी जी की कलेक्शन कैसी है.", मुस्कान अब रेखा जी के कमरे में आ चुकी थी जहा रोमिला पहले से हे विराजमान थी और शंकर जी से कुछ बातचीत करते हुए हंस रही थी. रेखा को सहायता दे कर कोमल के साथ उन्होंने बिस्टेर पर बैठाया तोह कोमल ने अपने पिता का तैयार छोटा सा सूटकेस उन्हें पकड़ाया.
"अर्जुन नजर नहीं आया. उसकी कार और मोटरसाइकिल तोह घर में हे हैं.", शंकर जी ने वो सूटकेस एक तरफ रख कर पहले कलाई पर घडी पहनी और फिर डॉक्टर द्वारा बताई सभी दवाई कोमल को भी ाचे से समझा दी. ऋतू भी कमरे में दाखिल हो चुकी थी, जिसने रोमिला का गाल चूमने के बाद अपनी माँ की गॉड में हे सर टिका लिया. उसकी बचकानी हरकत पर सभी मुस्कुरा रहे थे.
"प्रीती उसको मार्किट ले कर गयी है शंकर. मुझे भी उसने ज्यादा कुछ नहीं बताया के वो क्या लेने गयी है पर कल चंडीगढ़ जा रहे है तोह जरूर कुछ न कुछ चाहिए हे होगा उसको. वैसे रेखा ने अभी तक सही से बताया नहीं की ये चोट लगी कैसे है?", रोमिला के जवाब के बाद वाले सवाल ने सबकी नजरे रेखा की बजाये शंकर पर हे कर दी थी.
"रेखा बेहतर जानती है की ये चोट कैसे लगी रोमिला. मुझे इतना पता है की ये जख्म 3 हफ्ते से पहले सही नहीं होने वाला. मैं सिर्फ आज रात हे बहार हु, बाकी ध्यान मैं रख लूंगा. चलता हु अब. रोमिला, अलीशा को देख लो अगर तैयार हो गयी हो तोह.", शंकर जी ने जाने से पहले ऋतू को अपने सीने से लगाया और उसका माथा चूम कर कमरे से निकल गए अपनी माँ की तरफ. कोमल ने दवा बना कर मुस्कान को पकड़ा दी थी अपनी माँ को पिलाने के लिए और खुद वो सबके लिए कॉफ़ी बनाने चली गयी.
"तुम मेरी समझ से बहार हो रेखा. पूरी हथेली ऐसे कटी है जैसे अगर थोड़ा और प्रेशर दिया होता तोह सैंडविच की तरह 2 त्रिकोण बन्न जाते. तुम्हारे हाथ में अब 3 लकीरो की जगह 4 हो गयी है वैसे.", रोमिला की बात सुन्न कर एक बार को तोह मुस्कान भी काँप सी गयी थी. उसको नहीं पता था की चोट इतनी गहरी लगी होगी. ऋतू बहार से अलका की आवाज आने पर चली गयी मुस्कान को वही रुकने का बोल कर.
"सच सिर्फ यही है रोमिला की ये बस एक ज़ख्म है जो जल्द भर जायेगा. किसने किया या कैसे लगी तोह इसका जवाब यही है की उस को न बताने से फरक नहीं पड़ने वाला. हाँ तुम्हारी वो चार लकीरो वाली बात तोह मैंने भी सोची नहीं. पहले मेरी हथेली में किस्मत की लकीर नहीं थी. अब है.", वो दवा जितनी भी कड़वी थी लेकिन रेखा के चेहरे पर आयी मुस्कराहट फीकी न हुई.
"तुम और तुम्हारे ये लॉजिक रेखा. मैं चली अपनी किस्मत से ग्रहण हटाने. कोमल को बोलना के 5 मिनट में आ रही हु, मेरी कॉफ़ी रख ले और ललिता दीदी को भी बुला ले.", रोमिला के जाते हे रेखा जी पीठ के पीछे 2 तकिये लगा कर आराम से बैठ गयी.
"सचमुच रोमिला आंटी सही बोल रही थी. वैसे अब आपको आराम करना चाहिए आंटी. मैं रात में बैठती हु आपके पास."
.
.
"हहहह... आराम से maano....aahhhh.. क्या कर रही हो ये तुम..?", यहाँ मंजू के कमरे में दृश्य सोच से भी परे था. पूरे घर को ाचे से बंद करने के बाद जब दोनों प्रेमी युगल एक दूसरे को choom-choom कर भी संतुष्ट न हुए तोह प्रीती लगभग खिंच कर अर्जुन को इस बिस्टेर पर आ चढ़ी. पिछले कुछ समय से अंतर्मनन के द्वन्द में डूबा अर्जुन अब खुद को जीवित महसूस करने लगा था और इसका सबूत था वो निर्वस्त्र अकड़ा हुआ भुजंग. प्रीती अपनी कलाई से मोठे उस लिंग को हथेली में मजबूती से पकडे हुए जहा ऊपर निचे करती हुई और भयंकर स्वरुप दे रही थी तोह उसका दूसरा हाथ अर्जुन की गर्दन को दबाता हुआ जैसे अर्जुन को बिस्टेर के भीतर दबाये जा रहा था. बिखरे हुए वो हलके भूरे बाल और उनके पीछे पसीने में नहाया वो सुर्ख गोरा चेहरा. प्रीती इस पल में सचमुच अर्जुन को जैसे वो कटु सच दिखला रही थी जिसकी कल्पना तक वो न करता अगर यहाँ कोई और लड़की होती.
"शह्ह्ह्ह.. गुस्सा, अकेलापन, डर और बेमतलब के ख्याल इस कमरे से बहार अर्जुन.. उम्म्म्म", प्रीती ने लगभग फाड़ने के इरादे से अर्जुन की टीशर्ट ऊपर खींची थी जिसको समय रहते अर्जुन ने अपने जिस्म से जुड़ा कर दिया. अब वो ऊपरी हिस्से से भी निर्वस्त्र था और अगले हे पल उसकी आँखें फिर से मूँद गयी. चौड़ी छाती पर उभरे हुए वो लागु चूचक प्रीती के दांतो के बीच थे. हलके हलके उन्हें काट कर जिस तरह से वो अपनी गरम गीली जीभ वह फिर रही थी, अर्जुन के पेट की सभी मांसपेशिया आपस में जुड़ कर जिस्म ऊपर उठाने लगी. वो इस अध्भुत्त मजे से पागल हुआ जा रहा था लेकिन प्रीती ने तोह जैसे ये खेल अभी शुरू हे किया था. जिस्म का बाकी रक्त तोह जैसे उस दहकते सुपडे में एकत्रित हो गया था जिसको प्रीती मजबूती से हिलती हुई अपनी सीमा से कही ज्यादा भयंकर बना रही थी. नीली रागे उभर कर उस 9 इंच से कुछ अधिक लम्बे कामदण्ड को अर्जुन के बाकी जिस्म सामान मांसल बना चुकी थी. एक पल बाद सिर्फ लाल ब्रा में क़ैद अपने कठोर उभारो को अर्जुन के चेहरे पर दबती हुई प्रीती अर्जुन के जिस्म पर किसी चादर सी चढ़ी थी. फडकता हुआ लिंग उस लाल पंतय की गर्माहट लेता हुआ दोनों गोरी जांघो के बीच फंसा था.
"सांस तोह लेने दो जान.. आह्हः..", अर्जुन का जिस्म तिथिल पड़ने लगा था लेकिन प्रीती के इरादे कुछ और थे. थोड़ा निचे सरक कर उसने अर्जुन के होंठो को अपने मुँह में ऐसे दबोच लिया जैसे बिल्ली किसी चूहे को. तराशे हुए नाखून हर तरफ अर्जुन के सीने, कमर और पीठ को कुरेद रहे थे. वो वक़्त भी आ पंहुचा जब अर्जुन उखड़ी साँसों के बाद उस दौर में पहुंच चूका था जहा हर धावक हवा में उड़ता महसूस करता है. ये स्वर्गिक अनुभूति थी और शहद से मीठे प्रीती के नरम होंठो का रास चकता हुआ अर्जुन अपने दोनों हाथ उस लाल रेशमी पंतय में घुसता हुआ दोनों मलाई से कूल्हों को मसलने लगा. अब साँसों का शोर न था. बस धड़कने आपस में बतला रही थी और ढीली हुई ब्रा बिस्टेर से निचे फर्श पर तनहा पड़ी अपनी किस्मत कोसती लगी.
"तुम जानते हो की तुम मुझसे नहीं भाग सकते. फिर भी कोशिश करते रहते हो. उम्म्म्म.. धीरे से चुसो पागल..", अर्जुन के चेहरे से थोड़ा उठकर प्रीती उसको समझने हे लगी थी की उन दोनों कठोर नारंगियों को मुठी में भरता अर्जुन के निप्पल समेत आधे सतांन को मुँह में भर कर पीने हे लगा. प्रीती के उरोज किसी पत्थर से ठोस थे और जाने उनमे कैसा रास निकलता था जो अर्जुन हमेशा उन्हें मुँह में भरने को आतुर रहता. पंतय के भीतर आया गीलापन अर्जुन के साथ साथ उसके लुंड ने भी ाचे से महसूस किया. प्रीती अपने आप हे इस उन्माद में अपनी योनि अर्जुन के लुंड पर घिसने लगी थी. जितना पहले वो अर्जुन को सत्ता रही थी, अब अर्जुन भी उसके जिस्म पर उतने हे हमले करने लगा. मुलायम स्टैनो की अकड़ को काम करने में जूता अर्जुन बारी बारी से दोनों चूचक चूसता हुआ उन्हें मसल भी रहा था.
"आह्ह्ह्हह.. उफ्फ्फ... वेट..", प्रीती ने मजबूती से अर्जुन का चेहरा बिस्टेर पर भिड़ा दिया. फुर्ती से पंतय निकाल वो पलट कर अर्जुन के चेहरे पर अपनी योनि टिकती हुई दोनों हाथो में उस मूसल को दबोच कमर चलने लगी. अर्जुन न वो गुलाबी योनि देख सका और न प्रीती ने कोई मौका दिया. एक अध्भुत महक नथुनों में भर उठी. कच्चे संतरे की तजा महक जो यक़ीनन प्रीती के उस पुष्प से उर्जित थी जो अर्जुन के चेहरे पर टिका था. कमर एक इंच निचे सरकते हे अर्जुन के होंठो ने वो स्वाद चख हे लिया. बेशक वो प्रीती का पुष्परस हे था लेकिन विलक्षण, ठीक उसकी हे तरह. नरम रेशमी पहली हे फांको के बीच से टपकता वो मधुर रास अर्जुन की जिव्हा से होता हुआ उसके गले में उतरता गया. होंठ स्वतः हे इस रास को और पीने के लिए उन फांको के बीच जा धंसे. दूसरी और मजे में हिलती झूलती प्रीती ने भी समय गवाए बिना वो बड़े टमाटर सा सूपड़ा एक पल में हे मुँह के भीतर उतार लिया. अर्जुन ने खुद ऐसी चुसाई की कल्पना तक न की थी जैसी प्रीती ने करनी शुरू की. एक मुठी में लिंग की जड़ थामे वो लगभग आधा लिंग एक ताल में अंदर बहार करती हुई मुखरास से चमकाने लगी. होंठ अपनी सीमा तक फ़ैल गए और उतनी हे तीव्रता से वो अपने मांसल कूल्हे ऊपर निचे पटकती हुई अर्जुन को वो शहद चखती रही जिसके लिए वो सांस लेना तक भूल चूका था. अर्जुन का जोश उसके लिंग में जमा होने लगा था और यही प्रीती ने चुसाई रोक कर अपने पत् उसके चेहरे पर बुरी तरह कस दिए. रह रह कर वो झटके खाती रही और अर्जुन हर कतरे को हजम करके मदहोश हो गया. वो अब झड़ना चाहता था लेकिन प्रीती उसके जिस्म से फिसल कर बगल में आ लेती. हर सांस के साथ उसके दुग्ध ऊपर निचे हिलने लगे. दोनों चूचक सूई से अकड़े बता रहे थे की ये बिल्ली अभी और शिकार करने वाली है.
"तुम्हारा हो गया? हहहहहह..", अर्जुन का चेहरा लाल हो कर प्रीती की बरसात में भीगने से अलग हे चमक रहा था. बाल ast-vyast और आँखों में एक असीम चाहत कुछ पाने की.
"अभी 2 बार हे हुआ है... कैसा लगा मेरे फत्तू?", प्रीती की आँखों की वो चमक साफ़ बता रही थी की अर्जुन आज बचने वाला नहीं.
"फत्तू? अब देखो मैं तुम्हारी क्या हालत करता hu..aahhhh.. आराम से पागल.. ", अर्जुन लपक कर प्रीती पर चढ़ने हे लगा था की उसके दोनों अंडकोष प्रीती ने मुठी में दबोच लिए.
"शह्ह्ह्ह.. तुम भूल रहे हो डार्लिंग की आज इस बिस्टेर के मालिक हम है और तुम्हारे भी. चुपचाप.. बस पड़े रहो.", प्रीती ने बड़े आराम से अर्जुन को धकेल कर एक तरफ कर दिया था. पानी पीती हुई वो जानबूझ कर आधा अपने होंठो से उड़ेलती हुई बाकी जिस्म को गीला करने लगी. अर्जुन बेबसी से कभी अपने लिंग तोह कभी मुस्कुराती प्रीती को देखने लगा. आज वो सचमुच कुछ अलग थी और उस पर पूरी तरह भरी.
"ये कहा सीखा?"
"सवाल हे गलत है तुम्हारा. पूछना चाहिए था के ये मैंने कब सीखा और जवाब है जब मुझे जरुरत महसूस हुई. शादी के बाद तुम्हारा ये अजगर हमेशा पिटारे में रहने वाला मर अर्जुन शर्मा. उमाहहह.. हो तुम भी बहोत मीठे.", अर्जुन के जिस पर आराम से लेट कर वो अब तल्लीनता से उसको चूम रही थी. इस पल में प्रीती ने अर्जुन को ज्यादा नहीं तड़पाया और अपनी कमर उचकते हुए वो भीगी हुई yoni-lakeer उस जीरो बल्ब से सुपडे पर टिका दी. अर्जुन अगर आम इंसान होता तोह इस दहकती योनि के स्पर्श से हे पिघल कर खली हो जाता. फिर भी एक आह उसके होंठो से निकल गयी.
"बहोत भड़की हुई हो यार.. आह्ह्ह्ह.. दर्द.."
"शहहह.. दर्द वार्ड को कब तक बीच में लाते रहोगे? जो पता है वो बोलना जरुरी है अर्जुन? अब बस मेरी आँखों में देखो...", उन नीली हरी आँखों ने एक जादू तोह जरूर था. गोरा चेहरा सुर्ख हो चूका था और वो आँखें अर्जुन की आत्मा तक उतर कर बिना कोई और एहसास दिलाये जैसे अर्जुन को सम्मोहन में बांध चुकी थी. दोनों की कमर के निचे दृश्य जरूर हाहाकारी था. प्रीती की योनि के बाहरी लैब जैसे अभी तक अखिल थे और पहले हुए हिस्से के बिच की वो लकीर एक पल के लिए उस गर्दभ लिंगमुण्ड के पीछे छिपने के बाद कुछ फैली और फिर किसी गुरुत्वाकर्षण की तरह सहने सहने उसको अपने अंदर सामने लगी. लकीर फैल कर इतनी चौड़ा चुकी थी जैसे अभी राखत टपक पड़े. वो कसाव अध्भुत्त था और इनका ये मिलान भी. एक पल जिस्म वही रुक गए और अगले हे पल विधुत गति से प्रीती कमर को पटकती हुई वो पूरी लम्बाई अपनी योनि में उतार गयी.
"Aaaiiiiiiiiiiiii... कंठ से ये चीख निकलते हे अर्जुन भी चेतना में लौटा लेकिन देर हो चुकी थी. प्रीती किसी कटे वृक्ष सी उसके ऊपर गिरी थी, बुरी तरह सिसकती हुई. वो लिपट कर अपने ठन्डे होते जिस्म को अर्जुन के शरीर से गर्मी खींचने के प्रयास में थी और वो विकराल लिंग जैसे अब प्रीती के गर्भ को चूम कर बता रहा था के ऐसा कुछ वक़्त तक होता रहेगा.
"ओह प्रीती.. ये जल्दी नहीं करनी थी.. बस.. अब मत हिलना.. आठ.. तुम पागल हो.. पूरी पागल.", प्रीती की पीठ सहलाता हुआ अर्जुन भी हल्का हल्का तरल अपने लिंग पर महसूस कर प् रहा था. शायद पिछले समागम से वो प्रीती को पूरी तरह खोलने में असफल रहा होगा. इस पल में अर्जुन को सिर्फ उसकी परवाह थी, कामाग्नि तोह पहले भी उसके और प्रीती के दमियन मायने न रखती. जिस्म पर रोये उभरने लगे तोह नम्म आँखों से मुस्कुराती हुई प्रीती ने आहिस्ते आहिस्ते कमर हिलनी शुरू की. कस्सी के मूठ से भी मोटा वो लिंग फंस फंस कर हिल रहा था उस सूक्ष्म से छिद्र में.
"आह्हः.. ऐसे हे करते रहो.. करते रहो... मजा आ रहा है..", जाने ये कैसा मजा था जिसमे अर्जुन खुद हे दर्द महसूस कर रहा था क्योंकि प्रीती दर्द में थी. लेकिन वो तबतक न रुकी जबतक आधे से ज्यादा लिंग अंदर बहार होना शुरू न हो गया. उचित फिसलन और नमी पनपने में 10 मिनट तोह लग हे गए. हर धक्के पर योनि का मांस लिंग से चिपक का खिंच जाता. आवाज न करके अब वो एक बार फिर एक दूसरे के होंठो को खाने चबाने लगे. प्रीती एक बार फिर से हावी हो चुकी थी अर्जुन पे. ठप्प ठप्प का मधुर संगीत और उस विकराल लिंग को सूपड़ा तक बहार निकल वापिस अंदर समाहित करती हुई प्रीती ने अर्जुन नामक अपने अश्व को साध हे लिया था. जल्द हे वो उसके सीने को काटने के बाद चूमती तोह अर्जुन सिसक उठता. अंतरंग पालो की ये नौसिखिया प्रेमिका अर्जुन को उस माउद पर ले हे आयी जहा वो जानवर की तरह लगभग रौंदने हे लगा था.
"उम्म्म्म... क्या कर दिया तुमने? आह्हः.", प्रीती को पलट कर अपने निचे लता अर्जुन उसकी अक्षत गुदा पर उँगलियाँ दबाते हुए गहरे धक्के मार रहा था. दोनों लम्बे पाँव हवा में फैलाये वो प्रीती की योनि के आखिरी हिस्से तक चोट करता हुआ जैसे खुदको हे भूल गया. प्रीती भी उन्मुक्त बरसात करती हुई उसके लिंग को भिगोती हुई ये दौड़ अपनी रफ़्तार पर पंहुचा चुकी थी. सटासट अंदर बहार होता वो कलाई से मोटा औजार अकड़ता हे गया. आखिर में वो पल भी आ हे गया जब अर्जुन प्रीती के दोनों कंधो के निचे हाथ रख कर उसके जिस्म से जुड़ हे गया. हुंकार भरता हुआ वो ऐसे झड़ने लगा था जैसे बरसो से उसके लिंग ने वीर्य न बहाया हो.
"ओह्ह्ह्हह्हह.. मार दिया... इसशहहहह..", प्रीती भी चीख न रोक सकीय उस गरम तरल गोलियों की बौछार योनि के हर हिस्से में महसूस करते हुए. जीवन का एक और अकल्पनीय सखलन जो 25-30 सेकंड निरंतर चलने के बाद हे धीमा हुआ. अर्जुन गिरने की जगह प्रीती को चूमता हे रहा. गर्दन, गाल, होंठ, नाक... कुछ नहीं छोड़ा और उतना हे प्रेम प्रीती ने दर्शाया प्रतिउत्तर में उसके दोनों कूल्हों पर नाखून गदा कर खुद से चिपकते हुए. पसीने में भीगे वो दोनों कुछ पल ऐसे हे रहे. अलग होने पर भी एक दूसरे को बाहों में लिए वो लेते रहे. सफ़ेद गधा तरल प्रीती की बंद गुलाब सी योनि के होंठो से पिघलता हुआ बिस्टेर पर टपक रहा था.
"आज तोह लगता है प्रेग्नेंट हे कर डोज.", प्रीती ने चुहल की तोह अर्जुन ने चेहरा दोनों चुचो के बीच धंसा लिया. वो बस उसको सहलाती रही जैसे सुलाना चाहती हो.
"तुम्हे ऐसा नहीं करना चाहिए था प्रीती."
"तुम्हे भी इसकी जरुरत थी और मुझे भी. वैसे घबराने की बात नहीं है, मैं गोली ले लुंगी और सेफ भी हु. अब बताओ तुम्हे क्या बात परेशां कर रही है? माँ पर हुम्ला हुआ ये बात या मधुलता आंटी ने मुझे डांटा वो? या कुछ ऐसा हो रहा है जो तुम सिर्फ अपने तक रखे हुए हो? जानती हु यही सब रात को ऋतू दीदी पूछने वाली है लेकिन उनके सामने झूठ नहीं चलेगा. प्रैक्टिस करके देख लो चाहे.", प्रीती सबकुछ जानती थी और इस बात पर अर्जुन ने उसको थोड़ा और कसके चिपका लिया. जिस्म से पसीना सूखने लगा था और इनके मिलान की महक कमरे में ज्यादा हे बस चुकी थी. अर्जुन कुछ पल बस प्रीती के सीने को हलके हलके चूमता रहा ख़ामोशी से.
"उनकी आँखों में भी यही सब देख चूका है मैं प्रीती और इसलिए मैं बचता फिर रहा हु. और अब तुमने जिस तरह से बंदी बना लिया है वैसे हे वो भी करेंगी. लेकिन तुम्हे ये कैसे पता की माँ को चोट नहीं लगी, उन पर हुम्ला हुआ है? मधुलता आंटी को तोह मैं जल्दी हे रेतुर्न गिफ्ट दूंगा लेकिन माँ वाली बात पर मैंने किसी को बात करते नहीं देखा."
"ऋतू दीदी जानती है की माँ बहोत हे ज्यादा फोकस वाली औरत है, तुमसे भी ज्यादा. उन्हें चोट लग्न तोह दूर, सामने से कोई ऐसे नुक्सान भी नहीं पंहुचा सकता. ऊपर से जिस तरह के इंतजाम थे तोह ऐसी कोई भी चीज वह नहीं हो सकती जो उनकी हथेली को इस तरह काट दे की स्टीट्चेस लगाने पड़े. सर्विस ट्रे तक गोल किनारो वाली थी वह अर्जुन और छुरी कांटे भी सिर्फ हॉल एरिया तक सिमित थे. मैं नहीं जानती की हर बात पर इतना नोटिस क्यों रखा गया लेकिन दादा जी को ये सब निर्देश देते हुए मैंने हफ्ता पहले हे सुना था. ऊपर से सिक्योरिटी भी इतनी थी जो बाद में साफ़ हो गया के क्यों थी. मुझे पूरी बात का नहीं पता लेकिन ऋतू दीदी कहती है की माँ पर हुम्ला हुआ है और माँ उस इंसान को पहचान भी गयी है. बस बता नहीं रही. लेकिन उतनी सुरक्षा में कोई ऐसा कैसे कर सकता है? तुम तोह उनके पास भी नहीं जा रहे कल रात से.", प्रीती की हर बात वाजिब थी और अर्जुन कमर के बल अब सीधा लेता पंखे को देख रहा था.
"माँ.. माँ सबसे मजबूत इंसान है प्रीती, हमारे तुम्हारे घर में. और जब वो इरादा कर ले की वो नहीं बोलने वाली तोह फिर वो नहीं बोलने वाली. उनके दर्द सहने की क्षमता भी उतनी हे ज्यादा है जितनी मुँह बंद रखने की. और रही बात की उन्हें ये चोट अनजाने हे आयी है या हुम्ला हुआ है तोह ऋतू सही कह रही है. उलटे हाथ में हर वक़्त कुछ न कुछ था हे उनके और सीधे में इतना बड़ा कट लग्न वैसे हालात में मुमकिन नहीं. सुरक्षा बहार के लिए थी, अंडरवालो के लिए नहीं. ाची बात है के पापा ने वो सब संभाला, खुद से. माँ के झूठ को वो तभी पकड़ चुके है क्योंकि वो जखम के साथ साथ उसके बन्न ने की वजह मेरे दादा जी से भी बेहतर जानते है. मैं खुद 2 बार फंस चूका हु उनके सामने. वो जख्म की वजह ढून्ढ रहे है और मैं जख्म देने वाले को. सुबह तक पता कर हे लूंगा और फिर पंजाब जाने से पहले माँ को वो नाम बता कर और उनसे ाचे से मिल कर हे निकलूंगा.", अर्जुन का विश्लेषण सुन्न कर प्रीती अंदर हे अंदर फकर महसूस कर रही थी लेकिन बहार से वो बस उसके सर को सहलाती रही.
"हम्म्म.. और ऋतू दीदी से क्या कहोगे?"
"उनके सवाल कही ज्यादा है प्रीती. जवाब नहीं होंगे और वो सवाल भी अपनी मर्जी से करती है."
"मतलब वो कुछ और भी पूछने वाली है?"
"पता नहीं. शायद वो सवाल करे हे न लेकिन इतना मुझे पता है की आज रात मैं उनसे भाग नहीं सकता. अभी तक तोह उन्होंने इंतजाम भी कर लिए होंगे मुझे दबोचने के. वैसे तुम इतनी गरम क्यों हो राखी थी आज?", अर्जुन ने विषय बदल कर प्रीती का एक कुल्हा जोर से दबाते हुए उसकी योनि को फिर से अपने लिंग पर दबाया तोह वो उचक उठी.
"आउच.. ये दूर हे रखो अभी वह से. पेट तक टक्कर मरता है और वह बहोत जलन हो रही है अभी. और कोई गरम नहीं हो रही थी मैं. ये नेचुरल है. पता नहीं कब नार्मल लगने लगेगा ये? बुरा न मानो तोह एक सवाल और था लेकिन पर्सनल थोड़ा?"
"दीदी झेल लेती है और उन्हें मैं नहीं झेल पता. आज तुम भी मुझ पर हावी हे रही थी बहोत देर तक. और मैं ये चाहता हु की हम ऐसा महीने में 2 से ज्यादा बार न करे.", अर्जुन प्रीती के सुर्ख होंठो को चूम कर निर्वस्त्र हे उठ कर बाथरूम की तरफ जाने लगा.
"तुम्हे कैसे पता के मैं यही पूछने वाली थी? और तुम्हे अजीब नहीं लगा ये बताना?"
"इस से ज्यादा अजीब है की तुम मेरे और ऋतू के बारे में जानती हो, जैसे वो तुम्हे बता देती है. और तुम उन्हें बता डौगी जो यहाँ हुआ. अजीब ये है की तुम दोनों और भी बहोत सी बातें जानती हो जिनके बारे में मैं शायद बात भी न कर सकू लेकिन तुम दोनों के साथ आपसी बात में मुझे प्रॉब्लम नहीं है.", अर्जुन दरवाजे के पीछे टेंगा टोलिया उतारने लगा था और प्रीती टाँगे फैलाये बस मुस्कुरा रही थी.
"अलका?"
"गर्लफ्रेंड है मेरी. सॉरी तुम दोनों हे हो. सच कहु तोह बस एक वही है जिनके साथ होने वाले हर एहसास को मैं बस हम दोनों तक रखना चाहता हु. तुम फिर भी सब जानती हो प्रीती क्योंकि मैं तुमसे कुछ नहीं छिपा सकता. ऋतू और अलका मेरे और तुम्हारे लिए वो घनी छाव है प्रीती जिनके साये टेल हम हमेशा महफूज रहेंगे. वो दोनों एक हे है बस ऋतू को पहली हे बार में अर्धांगिनी मान लिया था तोह गर्लफ्रेंड वाली भूमिका अलका की हो गयी. वैसे वो दोनों इस तरह हे तोह मिल कर काम करती है.", अर्जुन दरवाजा खोल कर टोलिया गीला करने लगा तोह प्रीती उसकी बातें सुन्न कर हंसने हे लगी.
"उल्लू हो तुम पूरे के पूरे. मैं तोह ये पूछ रही थी की अलका दीदी से मिलोगे क्या जाने से पहले?"
"बताया तोह एक बीवी है दूसरी गर्लफ्रेंड. दोनों साथ रहती है तोह वो पहले हे सब प्लान कर चुकी होंगी. अब तुम्हारे साथ दोनों दोनों किरदार तुम अकेली हे कर सकती हो इसलिए biwi-girlfriend एक बार में हे खुश. उनके साथ बहोत बुरा फंसता हु. ऋतू से बचा तोह अलका के सामने फंस जाऊंगा और नहीं तोह vice-versa."
"और हम तीनो एक साथ हुए तोह? आह्हः... आराम से.", प्रीती की ख़ास उभर ली हुई योनि को हलके से फैला कर साफ़ करता अर्जुन ये भी देख रहा था के कहा कहा घर्षण से खाल पर गहरी रगड़ लगी है. इतनी प्यारी योनि को उसके लिंग ने बुरी तरह रगड़ा था फिर भी उसको करीब करीब सलामत देख वो खुश था. वीर्य का हर कटरा साफ़ करने के बाद उसने एक हल्का सा चुम्बन दिया था प्रीती सिसक उठी, मस्ती में बेशक.
"आजतक वो दोनों हे एक साथ मेरे सामने नहीं आयी. तुम आ सकती हो ऋतू दीदी के साथ?"
"छी... गंदे कही के. ऐसा इस जनम में कभी नहीं होने वाला और तुम बेशरम होते जा रहे हो."
"ये भी मैं हे बोल रहा था? ाची बात है के ऐसा इस जनम में न हे हो. मैं तुम्हे झेल लेता हु यही बहोत है और ऋतू के सामने हाथ जुड़े हुए है मेरे. खैर अब घर चलना चाहिए हमे और यहाँ एक बार कल चक्कर लगा लेना तुम. मेरे जाने के बाद हो सके तोह ऋतू दीदी के साथ थोड़ा ज्यादा समय रहना.", अर्जुन बिस्टेर के किनारे बैठ पहले प्रीती को उसके अंतर्वस्त्र पहनाने लगा जो प्रीती को खुश करने के लिए बहोत था. अर्जुन की यही बात तोह ख़ास थी की उसको प्रीती के लिए सबकुछ करना ाचा लगता था. फिर अपने कपडे पहन कर अगले 5 मिनट में वो भी दुरुस्त था. पहले से कही ज्यादा चमकता और अब बेहतर भी.
"उनका ध्यान मैं रख लुंगी लेकिन तुम वह जाने के बाद हर रोज एक बार तोह फ़ोन करोगे हे. चाहे मेरे घर या दीदी को. बाकी मंजू और मेनका दीदी 2-3 दिन वही रहने के बाद वापिस आएँगी.", प्रीती ने भी बाल रबर में सही से बाँध कर चादर ठीक की. उसकी चाल में भरपूर लड़खड़ाहट थी जो अर्जुन देख न सका. दोनों घर से निकल कर स्कूटी पर सवार थे और इस बार प्रीती उसके पीछे बैठ कर ाचे से चिपकी हुई थी.
.
.
"ये 2-2 गाडी वाली बात न समझ आयी मेरे भोले. हम कितने लोग वह जा रहे है?", उमेद सिंह समय पर हे लौट आया था लेकिन शंकर को सफारी की पिछली सीट पर बड़ा सूटकेस और बैग रखते देख वो कुछ हैरान हुआ.
"ये गाडी एयरपोर्ट जा रही है गज्जू लेकिन अपने पीछे हे चलेगी, निगरानी में. विशेष की साली और वालिए जी की बिटिया ने अपनी अपनी फ्लाइट पकड़नी है तोह मैंने हे वालिए जी से बोल दिया था के वो अन्नू को भेज दे. आ गए वालिए जी भी बहार.", घर के भीतर से सरदार जी के साथ हे उनकी धर्मपत्नी जी और अन्नू बहार निकले तोह शंकर ने आखिरी बैग भी पिछली सीट पर सही से रख दिया.
"आप रेखा से मिल लो भाभी जी. यहाँ से अन्नू मेरी जिम्मेवारी है.", मुनीर छोल साहब के घर से निकल कर इधर हे आ रहा था जिसके दोनों हाथो में अलीशा का सामान था. अलीशा के साथ उसकी बेटी और खुद रोमिला भी आयी थी. वो लोग भी अन्नू और उसकी माता जी से मिले. गाडी में बैठने से पहले अन्नू की नजरो से 2 बूँद आंसू जरूर निकले लेकिन मुस्कराहट के साथ.
"दिल लगा के पढ़ना बीटा और मैं फकर से कह सकती हु की वह भी तेरा ख़याल भरपूर रखा जाता है.", श्रीमती वालिए जी का इशारा अर्जुन से हे था जिस पर माँ बेटी दोनों हे हंस दी.
"तुस्सी फ़िक्र न करो बेबे. चंगा पापा जी, हूँ सर्दियाँ विच हे मिलदे हाँ. फ़ोन करदी है पहुचड़े हे. चंगा बीजी.", अन्नू ने कौशल्या जी को दादी कह कर हे बुआलया था जिन्होंने उसको गले लगा कर आशीर्वाद दिए. अलीशा की तरफ इतना कुछ न हुआ और वो रोमिला से मिलने के बाद अपनी बेटी के सर पे हाथ रखती हुई बीच वाली सीट पर जा बैठी. मुनीर इन दोनों मेमसाब को बैठने के बाद शंकर जी से चाबी ले कर ड्राइवर की जगह जा बैठा.
"शंकर, तुम फ़ोन करोगे मुझे.", रामेश्वर जी ने उनके करीब आते हे पिता वाली बात कर दी. उमेद सर हिलता हुआ शंकर को लिए अपनी काली मेरसेदेज़ में जा बैठा. हाथ हिलने के कुछ उपक्रम हुए और उसके बाद मुनीर चुस्ती से उमेद की कार के पीछे निकल चला. बेटी के रुखसत होते हे अन्नू की माता जी ने चुन्नी से अपने आंसू साफ़ किये.
"भगवान् तुस्सी थोड़ा समां रेखा डा हाल चल ले लावो. मैं पंडत जी नाल कुछ गल्लां करनी.", वालिए जी भी इतना कह कर बगीचे में चले आये रामेश्वर जी के पीछे जो छोल साहब के हे साथ थे. एक बार फिर कुछ लोग घर से रुखसत हो चुके थे. अंदर शाम का समय होने पर ललिता जी खुद हे अपनी बहु को सजाने में लगी थी. आज रात राधिका ने रसोई में कदम जो रखना था. वही उमेद और शंकर की बातचीत भी सफर के साथ हे शुरू हो गयी.
"इन्दर को चाचा जी ने रोका है भोले?", उमेद एक सरसरी निगाह पिछली गाडी पे दाल कर अपनी गति को संयत कर रहा था. शहर में वो अक्सर 50-60 पर हे चलता था. मुनीर दक्ष था लेकिन फ़िलहाल तेज चलना ठीक नहीं था.
"इन्दर ने ज्यादा कुछ नहीं बताया भाई. वो बोलै के आज वो हुसैन भाई के परिवार के साथ है और कल उसको किसी जरुरी काम से बहार जाना. दोपहर तक लौट भी आएगा.", शंकर जी को खुद इल्म न था के उनके पिता कैसे अपने बचो को सँभालते है. उमेद कुछ जानता था तोह बस मुस्कुरा दिया.
"वैसे तू आँख नहीं सेक रहा था इस विदेशी हूर पर? देख तेरे से बच के जा रही है अपने देश वापिस.", उमेद पिछले कुछ दिनों की व्यस्त स्थिति से उबरें के लिए शंकर से हे मस्ती कर रहा था.
"इसके देश में जा कर पेल दूंगा अगर दिल किया तोह. फ़िलहाल दिल नहीं है मेरा इसके साथ कुछ करने का. लेकिन तूने कब देखा बे मुझे इसको जांचते?", शंकर ने खिड़की निचे करनी चाही तोह उमेद ने कोई बटन दबा दिया. हवा अब कही और से बहार निकल रही थी और भीतर सिग्रत्ती जल चुकी थी.
"तेरे लिए ये कोई नयी बात तोह है नहीं. मैंने तोह ऐसे हे कहा था क्योंकि ये तेरे टाइप की जो है. अब सच भी बोल दे प्यारे.", अब शंकर भी हंस दिया जैसे उसकी चोरी पकड़ी गयी हो.
"ये मुझे पसंद नहीं गज्जू इसलिए बस इशारे तक हे सिमित है इसके साथ. चालू चीज है और विवान की सेटिंग भी है ये. हाँ रोमिला जरूर पसंद है लेकिन उसकी जुबान जितनी ढीली है स्कर्ट उतनी हे टाइट. बात तक सब ठीक लेकिन उसके आगे वो न बोतल में उतरती है न बातों में.", शंकर ने एक ठंडी आह भरते हुए धुआं बहार उगला तोह उमेद खिलखिला उठा.
"मतलब जो चाहिए वो मिलती नहीं और जो मिल रही है वो चाहिए नहीं.. वाह मेरे भोले.. वैसे फिर तोह रोमिला की दाद हे देनी पड़ेगी यार जो तेरे जैसे शिकारी को हार मनवा गयी. खैर ाची बात है और तू पहले से ज्यादा समझदार हो गया है अब."
"रोमिला बस आकर्षक है भाई और अब मैं भी सम्बन्ध साफ़ हे रखना चाहता हु. अर्जुन की सास होने से पहले वो रेखा की गहरी दोस्त भी है और सबसे घुल मिल कर रहती है. वैसे भल्ला क्या चाहता अब?", शंकर ने दराज खोल कर कुछ कागज बहार निकल कर देखते हुए काम की बात शुरू की. बिपास वाला रोड आ चूका था अब और यहाँ से कार दुगनी गति पर चलने वाली थी.
"भल्ला अपना सारा काम हमारी तरह एक नंबर में करने का विचार कर रहा है लेकिन उसका कहना है की वो चाह कर भी कब्जे और समझौते वाले काम बंद नहीं कर सकता. लम्बा चौड़ा संगठन है और लोग भी बहोत है उसके निचे. अब वो सब बंद करने का मतलब है उसकी जगह कोई और सर उठाएगा. तोह पूछ रहा था के इस से हमारे व्यापार में तोह कोई परेशानी नहीं आएगी. मैंने भी कह दिया के वो अपना पुराण हे चरित्र बरकरार रखे. डर रहना जरुरी है. वैसे राणा वाला काम तुमने ाचे से हैंडल किया भोले. अब भल्ला हमारी पूरी पकड़ में है तोह बॉर्डर एरिया में हम अपना अलग काम आराम से करेंगे. चाचा जी तक फिर भी बात जाएगी और वीर सिंह राणा का नाम सुन्न कर तुझ पर दिक्कत आ सकती है.", उमेद ने एक इशारा मुनीर को दिया जिसके बाद दोनों गाड़ियां 100 पर दौड़ने लगी. सड़क लगभग खाली हे थी और यातायात नियोजित.
"तुझे नहीं पता लेकिन इस मीटिंग में मैं मेरी मर्जी से नहीं बल्कि पापा के कहने पर गया था गज्जू. तुझे क्या लगता है मैं एक भी नहीं मारता अगर हालात वैसे होते तोह? दिल में तोह मैंने वह 10 गर्दन काट दी थी लेकिन असलियत में तोह बस एक बेहोश, जो सांगवान चाचा की निगरानी में पापा ने हे रखवाया है. पता नहीं उन्हें क्या हुआ जो वो गड़े मुर्दे खुद हे उखड़ते फिर रहे है. विनोदिया भी उनके हे पास गया था मदद के लिए और उन्होंने ज़िंदा भी न रहने दिया किसी को. कुछ अजीब नहीं लगता तुझे?", शंकर के सवाल और खुलासे वाजिब थे जिन पर सोचता हुआ उमेद सर खुजाने लगा.
"वो .. मेरी बात का कुछ गलत मतलब मत लियो भोले लेकिन मुझे लगता है चाचा जैसे वो सभी नाम मिटाना चाहते है जो अतीत में दुखदायी रहे हो. शायद वो नहीं चाहते की उनके जाने के बाद कोई भी दुश्मन परिवार का अहित करे. बेशक वो आज भी सजग है और बेहतर हालत है उनकी लेकिन बुजरुग होता व्यक्ति सोचता बहोत है.", उमेद की बात सुन्न कर शंकर को एहसास हुआ के उसके पिता बूढ़े हो गए है. वो फिर भी म्हणत में लगे है और ऐसी म्हणत जिसमे कुछ फैंसले तोह कानून से परे भी है.
"रेखा पर भी हुम्ला हुआ था उमेद. रात वाले टाँके खोल कर आज दिन में मैंने बत्रा के साथ फिर से उसकी हथेली को बेहतर सिला है. मेहुल के हिसाब से रेखा जख्म धोने बाथरूम नहीं गयी थी बल्कि उसको चोट वही लगी. रेखा ने बताया के उसका हाथ एल्युमीनियम से कटा लेकिन जख्म के अंदर कही भी कोई कानन न मिला. तोह उसकी दोनों बात यहाँ गलत साबित होती है. वह कोई ऐसा इंसान नहीं था जिस से दुश्मनी हो और रेखा पर दूसरी बार ऐसा हो रहा है. वो अगर हुम्ला करने वाले को देख नहीं पायी थी तोह वो साफ़ बताती की ऐसा हुआ. लेकिन वो ताल रही है जिसका मतलब है की उसको इंसान का पता है.", शंकर ऐसी बातों पर अब अपने भाई की तरह सोचने लगा था, खुद के किरदार से विपरीत. उमेद भी हैरान हुआ उसको सोचते और इन पहलुओं को गौर से सुन्न कर.
"महिलाओं वाले बाथरूम के आसपास पुरुष प्रसाधन नहीं था शंकर. और अगर मैं किसी पर शक करू भी तोह वो सभी व्यक्ति कल कही भी अकेले नहीं रहे. और ये जो भी हुआ है ये किसी ऐसे व्यक्ति ने किया है जो महिला है.. काफी समय से रेखा के करीब रहा है शादी के दौरान.. जो कोई आसपास रहा होगा उसको खुद व्यस्त किया जिस से घटना को अंजाम देते समय रेखा पूरी तरह अकेली हो.. और वो जो भी इंसान है, ओहदे या रिश्ते में बड़ा है. रेखा का स्वभाव हे है सबको एकसाथ बरकरार रखने का जिसका उस व्यक्ति को गहराई से पता होगा इसलिए देखे जाने की सूरत में नाम प्रकट होने का डर काम हो जाता है. और रेखा बिलकुल वैसा हे तोह कर रही है. भोले, अगर वार करने वाली कोई महिला रही है तोह इसका मतलब कुछ और भी हो सकता है.", उमेद जैसे लगभग काँप हे गया था अपनी सोच को विराम देते हुए.
"क्या मतलब है गज्जू?"
"कितना गहरा था जख्म?"
"दोनों किनारो पर लगभग पौने इंच लेकिन हथेली के ठीक बीच में 3-4 सूट. मतलब काफी गहरा था और ..."
"और अगर ऐसा जख्म हथेली की जगह कलाई पर दिया जाए.. दरवाजा बंद कर दिया जाए बहार से जख्मी व्यक्ति को अंदर बंद करके तोह परिणाम क्या होगा?", उमेद की धारणा सुन्न कर खुद शंकर को भी पसीने आ गए. और इरादे तोह वैसे हे थे अपराधी के.
"कलाई ऐसे वार से अलग हे हो जाती गज्जू और अगर वो व्यक्ति dhwani-badhit दरवाजे को बंद कर देता वैसा करके तोह 10-15 मिनट में रेखा बेहोश होने के बाद मर्डर भी सकती थी. लेकिन कोई महिला चाक़ू से ऐसा वार करने का जोखिम नहीं ले सकती. इतना तीखा खंजर सहेजना आसान भी तोह नहीं.", शंकर खुद हे अपनी सोच को गलत बता रहा था लेकिन उमेद का दिमाग बढ़ती स्पीड के साथ कही ज्यादा हे तेज चल रहा था.
"वो shahi-khanjar जो हमको मिला था वो याद है तुझे? उसकी धार ऐसी थी जो ऑपरेशन ब्लेड को मात दे दे. बहार का कवच भी आलिशान कारीगरी और फल की ऊंचाई कही से एक इंच तोह कही से 3-4 सूट. देख भोले ऐसा मेरा सिर्फ अनुमान हे है. बाकी परिस्थिति और हमलावर कुछ भी या कोई भी हो सकता है. बस इतना यकीन है के कोई अनजान बाहरी व्यक्ति ये नहीं कर सकता. बाकी अंदेशा मैं दे हे चूका हु जितना रेखा को जानता हु. वैसे इतनी बड़ी घटना हो गयी लेकिन न तोह इसकी आवाज चाचा जी तक गयी और न हे अर्जुन को मैंने किसी खोजबीन में हे देखा. वो था कहा?", उमेद ने जिन अंदेशो से शंकर को झकझोरा था वो उन्ही में खोया था जैसे कुछ कुछ समझ गया हो. अर्जुन का जीकर होने पर फीकी सी मुस्कान जरूर चेहरे पर आयी.
"वही तोह पता लगाना चाहता था मैं गज्जू. ये साला तोह मेरी सोच से भी टेढ़ा है. न ये रात में अपनी माँ के करीब गया और न हे आज वो कोई हालचाल लेता देखा. हाँ पापा के आसपास जरूर दिखाई दिया जैसे सारे काम वो उस से हे करवा रहे हो. लड़का समझदार है और जितना मुझे पता है वो अपनी माँ से अटूट प्यार करता है और फ़िक्र कितनी ये तोह पूछ हे मैट. लेकिन वर्तमान हिसाब देखा जाए तोह वो इसके विपरीत नजर आ रहा है. कही वो जुट तोह नहीं चूका तहकीकात करने में? साला ये दोनों माँ बीटा जाने कैसे है जो समझ हे नहीं आते."
"इसका मतलब यही है भोले की अर्जुन व्यस्त होने का दिखावा कर रहा है और अगर वो चाचा जी के आसपास है तोह मतलब वो काम पर हे है. खैर छोड़ ये सब और ये सोच के अब हमारी अगली महफ़िल जाने कब होने वाली है."
"हाहाहा.. मुझे भी लगता है के आने वाले समय में आज के बाद हम लोग शायद हे एक महीने तक एकसाथ बैठ सके. तू और इन्दर तोह बिज़नेस में व्यस्त रहने वाले हो. मेरा काम भी बहोत पड़ा है जिसके साथ साथ घर भी देखना पड़ेगा. संजीव भी केरला जा रहा है और अर्जुन के न रहने से रात घर हे गुजारनी पड़ेंगी. जैसे तू करता है."
"मेरा तोह हमेशा से हे ऐसा है भोले. बिज़नेस दिल्ली में हे नहीं करना. जो पहले से है उसको भी देखना है और हफ्ते में 5 रात हवेली पर हर हाल में. चल ाची बात है के तू भी चाचा जी के डंडे टेल रहेगा. इन्दर के रहते तुझे महफ़िल की परेशानी तोह नहीं होने वाली. बाकी संजीव अर्जुन ाचा काम करते है यार जो तुझे खुद महसूस हुआ के वो नहीं रहेंगे तोह तुझे रहना पड़ेगा.", उमेद गहराती शाम को देख रहा था. जल्द हे ये रात में तब्दली हो जायेगी और विरानो से आगे फिर से महानगर की चकाचौंध में तलाश होगी कुछ शांत लम्हो की. पिछली गाडी में अन्नू आदतन सो चुकी थी और अलीशा अपने जीवन के बारे में सोचती danva-dol.
.
.
"तू इतना बड़ा है, गॉड में चढ़ के बैठेगा? चल सही से सामने बैठ अपनी भाभी के.", कौशल्या जी ने अंदर वाले आँगन में जब राधिका की ख़ास रस्मे शुरू की तोह devar-bhabhi की रसम होने पर अर्जुन सुर्ख साड़ी में सजी अपनी भाभी की गॉड में हे बैठने लगा. संजीव भी हंस रहा था अपने पिता, माँ और बहनो के साथ साथ. राधिका कुछ लम्बा हे घूंगट निकले थी जिसको खुद कौशल्या जी ने माथे तक ऊँचा किया. लाल बिंदी, भरी हुई मांग, सोने का टिका और गले में मंगलसूत्र के साथ संजीव द्वारा दी गयी सोने की खूबसूरत चैन. कैसा हुआ ब्लाउज जिसमे उभर अपने अकार को बखूबी दर्शा रहे थे. मेहंदी लगे गोर गोर हाथ में लाल कंगन और sunehari-laal चूड़ियां. राधिका हर नजर में एक दिलकश युवती थी और अब संजीव की jiwan-sangini.
"मैं छोटा हु दादी और बहोत छोटा. फिल्मो में भी देखा है की देवर भाभी की गॉड में हे बैठता है. नहीं तोह मैं नेग नहीं लेने वाला. और ये इतनी नाजुक भी नहीं होंगी. मैं तोह कृष्णा चची और कोमल दीदी तक की गॉड में बैठ चूका हु.", अर्जुन भी फटकार को दरकिनार करता अपनी ज़िद्द में ऐड गया. उसकी बहने जोश बढ़ा रही थी और सरोज भाभी टांग खिंचाई.
"बैठने दो न दादी. वैसे भी मुन्ना अभी बड़ा कहा हुआ है.", अब अर्जुन आँखें दिखा कर जैसे सरोज भाभी को याद करवा रहा था के उस मुन्ना का नन्हा मुन्ना लेते हुए वो भी रो कर बीच में हे भाग गयी थी. सरोज भाभी नजरो में हे झेंप कर बगले झाँकने लगी.
"बीटा, तेरी भाभी कुछ नाजुक भी है तेरे मुकाबले और तैयार हो कर बैठी तोह कपडे गहने सब खराब हो जायेंगे. चल तू संजीव की गॉड में बैठ जा.", ललिता जी ने अपना मैट रखा लेकिन अर्जुन टास से मास्स न हुआ. प्रियंका पीतल की परात में लाल रंग भर के इधर ले आयी थी जिस से अगला खेल होने वाला था.
"भाभी, आप हे बोल दो के मुझे बिठा सकती हो या नहीं. बस ये याद रखना के आज आपके पास ये एक हे मौका है खुदको संजीव भैया की मजबूत जोरू साबित करने का."
"ए.. पागल ये जोरू क्या होता है? उल्लू कही का.. राधिका इसकी बात का बुरा मैट मान न और तुम मन कर दो.", कृष्णा जी ने हँसते हुए अर्जुन की पीठ पर ढोल जमा दी.
"छोटा देवर मतलब तोह पहली औलाद हे होता है न माँ जी? इनके लिए ये पहले से हे इनका सबकुछ है तोह आज से मेरे लिए भी. और भाभी कभी haa-naa नहीं कहती अर्जुन. वो बस अपने देवर की हर चाहत का ख़याल रखती है. कमजोर भी हुई तोह कोई बात नहीं.", राधिका ने अर्जुन की कलाई पकड़ कर पूरे हक़ से उसको अपनी गॉड में आने को कहा. अर्जुन हिचकिचा रहा था और वो बैठने भी लगा, अपना भार जमीन पर करते हुए. कौशल्या जी तोह राधिका का जवाब सुन्न कर हे गदगद हो उठी थी जबकि ललिता जी ने नजर उतार कर वो पैसे एक तरफ रख दिए. कृष्णा जी ने लाल धागा टॉड कर टुकड़ा राधिका की बायीं हथेली में रखा और वह अर्जुन का हाथ रखने के बाद बोली.
"यही उम्मीद है सबको राधिका और तुम्हारी हर इत्छा भगवन पूरी करे. देवर सही मायने में पहली औलाद के साथ साथ छोटा भाई, मित्र और सेवक भी होता है. अब से अर्जुन पर तुम्हारा भी पूर्ण अधिकार.", आरती द्वारा आगे बढ़ाया शगुन का सामान भी कृष्णा जी ने राधिका संजीव के बीच रख दिया. अर्जुन उठने लगा तोह राधिका ने कन्धा दबा कर उसको वैसे हे बैठे रहने को कहा. कृष्णा जी के बाद रेखा जी ने भी कोमल की मदद से दोनों के शगुन किये और फिर राधिका ने भी अपनी सभी ननद को अपनी पसंद के कपडे भेंट किये.
"अब तोह उठ जा रे कपूत अपनी भाभी की गॉड तोड़ेगा क्या?", कौशल्या जी ने खिंच कर अब अर्जुन को अलग तोह कर दिया लेकिन वो उनके करीब हे बैठा. थाल सामने रखा गया और नियम भी समझाए की जो पहले अंगूठी पकड़ेगा वो दूसरे से एक वचन या उपहार ले सकता है. गहरे लाल रंग के पानी में तारा ने हे अंगूठी दाल कर फिराई और हाथ बहार निकल लिए. अभी से 2 गुट बन चुके थे जिसमे पहली बार अर्जुन संजीव की जगह अपनी भाभी की तरफ था.
"भाभी, तारा ने चीटिंग की है. आप भैया वाली तरफ ढूंढो.", अर्जुन हाथ पकड़ कर राधिका को खुद हे अंगूठी धुदनवाने लगा तोह ऋतू ने उसको वही रोक लिया.
"दादी, आपके सामने हे चीटिंग. ये लोग 2 हाथो से ढून्ढ रहे है तोह फिर हम भी भैया की तरफ से शामिल हो जाए?", एक बार और अर्जुन दांत खा कर हटा. संजीव की ऊँगली अंगूठी को छो गयी थी और जबतक वो वापिस हाथ पीछे करता राधिका ने हथेली ऊपर उठा ली.
"मेरी बची जीत गयी रे बिमा कंपनी. चल अब तैयार हो जा ज़िन्दगी भर बांग देने के लिए.", कौशल्या जी तोह संजीव के हे मजे ले रही थी और अर्जुन ख़ुशी मनाता हुआ अपनी भाभी को बाहों में भरे चीख रहा था.
"भाभी, आप बचा कर रखो ये प्रॉमिस. यहु.. भैया तोह फंस गए पक्के वाले.", राधिका तोह इस मजबूत जकड में जैसे ये भी भूल गयी थी की वो हैं कहा पर. कृष्णा जी ने हे अर्जुन को शांत किया.
"दम घुट जायेगा बीटा उसका. चल संजीव अब बता तू क्या करेगा?"
"गिफ्ट?"
"न न.. भाभी आप वचन हे मांगो. और दादी आपने कहा था के जो जीतेगा उसको आप अपनी तरफ से गिफ्ट डौगी.", अर्जुन ने ये नया हे फरमान सुना दिया जो हुआ हे नहीं था. कौशल्या जी हंसती हुई सर हिला कर ये भी मान गयी.
"राधिका एक साल तक चूल्हे पर नहीं जायेगी. और एक महीना तक बर्तन उठाने की भी सख्त मनाही है. सजा उसको जिसके सामने ऐसा होता दिखा.", अब थानेदारनी ने एक बार फिर साबित किया था के वो अपनी बेटियों में फरक नहीं करती और एक nav-vadhu को जीवन का महत्व बताना उन्हें ाचे से आता था.
"देखा भाभी मेरी दादी का दिल. ये बस मेरे साथ हे सख्त है और थोड़ा बहोत मेरे पापा के.", अर्जुन का तंज सुन्न कर एक बार फिर उसके सर पर चपत पड़ी जिस पर पहली बार राधिका खुल कर हंसी थी. ये सारा घटनाक्रम कोई न कोई कैमरा में क़ैद करता रहा. 7 बजे शुरू हुआ ये समां तभी थमा जब 9 बजे रामेश्वर जी की आवाज आयी.
"अज्ज रोटी दी हड़ताल सी?", पंजाबी सुनते हे अर्जुन झट्ट उठ गया.
"लग जाओ सब काम पे. मैं तोह चला ऊपर अपने कमरे में. एसएसपी साहब की पंजाबी मतलब जो सामने आया उसकी शामत. रोटी बन्न जाये तोह आवाज लगा देना कोमल दीदी.", जिस तरह अर्जुन मैदान छोड़ कर भगा था सभी हंस रहे थे. कोमल, प्रियंका और तारा सीधा रसोई में चली गयी. सब्जी पहले हे बन्न चुकी थी और अब बस रोटी बनानी थी. राजकुमार जी संजीव को साथ लिए बहार की तरफ चल दिए तोह सरोज भाभी के साथ अलका, आरती और रुपाली राधिका को लिए उसके कमरे की तरफ. आज राधिका की सुहागरात जो थी और कुछ वैसी हे तैयारी माधुरी के ससुराल में चल रही थी. एक हे रात में 2 अलग अलग जगह nav-dampatya जीवन के पहला अंतरंग समय घटने वाला था, जिसके गवाह भी सिर्फ वही होने वाले थे जो कमरे में बंद होंगे.

