Incest Pyaar - 100 Baar - Page 46 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 193 (3)

पहली मुलाकात

"तू तोह बड़ा समझदार हो गया है शंकर. पहले क्यों नहीं देखा मैंने तेरा ये रूप?", मार्किट में सभी के साथ हल्का फुल्का नाश्ता और ठंडा आदि लेने के बाद शंकर ने दलीप के परिवार के साथ साथ राजेश को भी कई उपहार दे कर विदा किया था. उसने ढेरो सामान अपनी सभी बेटियों, भतीजियों और बहिन रेणुका के लिए भी ख़रीदे और उन्हें दिए. रेखा इस दौरान अपने पति की बगल में हे रही थी और सबसे आखिर में शंकर ने अपनी पसंद से अपनी बीवी और माँ के लिए भी एक बेहतरीन साड़ी खरीदी. बचे खुश थे और उन्हें खुश देख कौशल्या जी ने भी अपने बेटे का माथा चूम कर ऐसा कहा तोह पिछली सीट पर बैठी रेखा और रेणुका भी मुस्कुराई.

"माँ, जनता हु की मेरे जीवन में समय का हमेशा से हे अभाव रहा है और ऐसा आगे भी रहना वाला है क्योंकि डॉक्टर होना सिर्फ नौकरी नहीं एक कर्त्तव्य है. लेकिन ये भी सच है की आज मैं जो भी हु वो अपने परिवार की वजह से हु और ख़ास कर आपकी वजह से. दलीप भी तोह परिवार है और राजेश.. राजेश एक दोस्त से बढ़कर वो इंसान है जो कभी भी मुझसे सवाल तक नहीं करता लेकिन परवाह उस से ज्यादा करता है. और ये मेरी गूंगी गुड़िया भी तोह बरसो से इस कलाई पर बिना शर्त राखी बांधती आयी है.", शंकर ने रेणुका के बाल बिखरने के बाद स्टीयरिंग घुमाया तोह रेणुका ने झूठे दिखावे से पीठ पर मुक्का जड़ दिया. कोमल बगल में बैठी हुई ख़ामोशी से मुस्कुरा रही थी. उसकी गॉड में भी अपने पिता द्वारा दिलवाया उपहार था और सरोज मौसी ने जो सूट दिया वो भी.

"हाँ बीटा ये तोह सही कहा तूने. राजेश तुझमे सिर्फ अपना गुरु देखता है और रिश्ते बाद में. वैसे मंजू भी ाची लग रही थी अब और मेनका तोह जैसे अब उसके बिना कही जाती हे नहीं. चल अब घर भी चलना है. रेखा के बारे में क्या बताया डॉक्टर ने, ये तोह मैं पूछना हे भूल गयी?", कौशल्या जी ने आगे नजर की तोह तारा खिड़की से हाथ निकाल उन्हें अंगूठा दिखा रही थी. इलो में उसके साथ रुपाली, अलका, ऋतू और अफसाना थी. शंकर जी की सफारी में अंतिम सीट पर मुस्कान के साथ प्रियंका भी इन सबके बीच थी.

"पहले उन्हें देख लो माँ कैसे बचपना करती रहती है. और आप कुछ ज्यादा हे नहीं सर चढ़ा रही ऋतू को?", फ़िलहाल तोह ऋतू उस कार में आराम से पिछली सीट पर बैठी अफसाना से हे बातों में लगी थी लेकिन शंकर का आशय कही और था.

"वो हे मुझपे हुकुम चलती है जैसे तू करता आया है अब तक. मेरा जोर नहीं चलता उसके सामने तोह मैं क्या करू? पहले तूने उसको सर चढ़ाया और अब वो मेरे आ छड़ी है. वैसे वो मजबूत दिल और सही निर्णय लेने वाली लड़की है शंकर. सही गलत की पहचान कही ज्यादा है उसको इसलिए मुझे भी उसका रौब रखना पसंद है. रही बात मोटरसाइकिल वाली तोह ऐसा तू भी अपने समय कर चूका है. मधु को कार चलना सीखने के मैं खिलाफ थी लेकिन तू हे था न उसकी ज़िद्द पूरी करने वाला? चल अब बता के रेखा के लिए क्या बताया डॉक्टर ने?", शंकर जी अपनी माँ की बात सुन्न कर मुस्कुरा रहे थे. उनकी भांजी तारा तोह अब तक उस कार को हवा से बातें करवाती हुई नजरो से ओझल भी हो गयी थी.

"हम्म्म.. मैं भी तोह डॉक्टर हे हु माँ. वैसे फ़िलहाल कंडीशन ठीक है हथेली की और अगर निशाँ गहरा लगा तोह सर्जरी से थोड़ा बेहतर कर देंगे. पट्टी के लिए तोह मैं भी मन करता हु पर गर्मी है और पसीना या पानी लगा तोह परेशानी हो सकती है. रेखा, जख्म सूखने की दवा नियम से लेती रहना और जो जो ताक़त की दवा बताई है वो भी.", शंकर जी ने आईने में देख कर बीच वाली सीट पर बैठी अपनी बीवी से कहा तोह उन्होंने बस हामी में सर हिला दिया. एक पल तोह शंकर वो चेहरा हे निहारते रहे जो इतने दर्द में होने के बावजूद कितना निस्चल और खूबसूरत था. फिर मैं को संयतत करके निगाह सड़क पर स्थिर की.

"रेणुका, तेरी शिकायत आयी है मुझे.", कौशल्या जी ने अब थोड़ा डपट कर कहा था जिस पर रेणुका अपनी भाभी की तरफ देखने लगी.

"बड़ी माँ, सबकुछ तोह टाइम से खा पी रही हु."

"खुराक फिर भी काम है और डॉक्टर बोल रही थी की तू नींद सही से नहीं ले रही. कोमल बीटा, तुम जरा ध्यान देना अपनी बुआ पर. तुम्हारे साथ तोह फिर भी ये सहेली जैसी है. वैसे तू दिल्ली क्या करने जा रहा है शंकर?", कौशल्या जी अमूमन ऐसे सवाल अकेले में करती थी लेकिन यहाँ बातों में उन्होंने ये भी पूछ हे लिए. माहौल ाचा था इसलिए शंकर जी ने भी माँ की बात का जवाब देना सही समझा.

"इन्दर और उमेद ने काम शुरू किया है न माँ दिल्ली में. गजेंद्र भाई साहब से कल आपको मिलवाया था न, बस उनके साथ हे एक मीटिंग है मेरी. कागज जरुरी है और इन्दर चाहता है के पहला काम मैं अपने हाथ से करू. वैसे भी आज वो हुसैन भाई साहब के साथ व्यस्त है और कल पापा के काम से कही जाना है उसको. सुबह जल्दी आ जाऊंगा वापिस लेकिन फिर नौकरी के साथ साथ सांगवान चाचा के भी हॉस्पिटल्स में बहोत से केस सँभालने है. अगले महीने यूरोप भी जाना है सरकारी टूर पे तोह भरपाई करनी पड़ेगी.", कार नए सेक्टर वाली खुली सड़क की तरफ आयी तोह उन्हें तारा वाली गाडी एक किनारे कड़ी दिखी जहा ice-cream वाला उन्हें बचे हुए पैसे वापिस पकड़ा रहा था. शंकर जी ने एक निगाह कार की खुली खिड़की से डाली तोह तारा ने उन्हें हरे रंग की कुल्फी सनी जीभ चिढ़ा दी.

"ये न सुधरने वाली. तू इसको भी बिगड़ चूका है शंकर.", कौशल्या जी को भी अपनी नातिन से उतना हे स्नेह था और ये ऊपरी दिखावा बाकी सभी जानते थे.

"इनके यही तोह दिन है माँ. आपने देखा कितने सलीके से कार एक तरफ कड़ी करके वो लोग बिना बहार निकले बैठी थी? बचे समझदार है और वैसे भी इस शहर में आजकल उन्हें किसी का डर भी नहीं रहा."

"हाँ तोह तेरे पापा ने नाम काम कमाया है जो मेरे बचे किसी से डरे?"

"वो तोह अपने लाल से हे पूछना आप. ये डर या नाम उसका ज्यादा हो रखा है आजकल. पता हे नहीं चलता वो कब क्या काण्ड कर देता है? वैसे उसके कपडे आपको पसंद तोह आये न?", शंकर का इशारा समझ तोह चुकी थी कौशल्या जी लेकिन उन्होंने नाम वाली बात पर कोई टिपण्णी नहीं की. पर दूसरी बात से जैसे उन्हें एक अलग हे मौका मिल गया था अपने बेटे की खिंचाई करने का, थोड़ी बहोत रेखा की भी.

"हाँ उसको यकीनन कपडे पसंद आएंगे शंकर. ऋतू उसके लिए हमेशा सही है.. मेरा मतलब वो उसके लिए हमेशा सबसे सही चीज हे लेती है. और वो एक नजर में बता देगा की वो किसने लिए है.", अब तोह सचमुच रेखा को भी झुरझुरी सी महसूस हुई ऋतू के साथ अर्जुन का सुन्न कर. वही कोमल ने तोह चेहरा हे बहार कर लिया और आज जैसे वो हंसी रोकने की भरपूर कोशिश कर रही थी कुछ समझ कर. शंकर अब बोले भी तोह क्या हे बोले.

"हाँ माँ. वो बड़ा हे नहीं हुआ जैसे, ऋतू की मानो तोह. उसकी मौजदगी में अर्जुन अपने से कुछ कर हे नहीं सकता और न वो उसको करने देती है. दुनिया के लिए वो सवा 6 फ़ीट का पहलवान हो गया लेकिन ऋतू की नजरो में वो आज भी वही है जो बचपन में था. चलो ाचा है न माँ के उनमे इतना विश्वास और प्यार है. ऋतू कभी उसको भटकने नहीं देगी.", शंकर ने कार चलते हुए हे पिछले शीशे से वो कार देखने की कोशिश की जिसमे उसकी बेटी थी. शायद वो लोग अभी भी चली नहीं थी. और उसके जवाब पर कौशल्या जी सर हिलाते हुए हलके से मुस्कुराई.

"वो नहीं भटकने देगी ये मैं जानती हु शंकर. ऋतू कुछ मामलो में सचमुच शायद निर्दयी भी है अर्जुन के साथ जैसे पढाई और सामाजिक व्यवहार. मैंने देखा है वो कैसे कान खिंच देती है उसके वो भी बिना किसी की परवाह के. ज़िन्दगी भर काबू में रहने वाला है वो.", और यहाँ फिर से कौशल्या जी ने चूल्हे हिला दी थी शंकर और रेखा की लेकिन इस बार शंकर हांसे बिना न रह सके.

"चलो माँ आपको मुबारक हो फिर तोह. ऋतू के सामने आपकी चलती नहीं और अर्जुन तोह वैसे भी आपका प्यारा है. आप जानो और आपके लाडले. कोमल बीटा तुम जरा अपनी बुआ से सामान ले लेना निचे उतर कर. रेखा, मैं खोलता हु तुम्हारी तरफ का दरवाजा.", घर के सामने हे गाडी रोक कर शंकर जी ने इतना कहा लेकिन मुस्कान उनसे पहले उतर कर कौशल्या जी और रेखा जी की तरफ के दरवाजे खोल चुकी थी. मुस्कान ने हे रेखा जी की ब्याह के निचे से हाथ दाल कर उन्हें सहारा देते हुए उतरा तोह करीब आये शंकर जी ने अपनी माँ से वो बैग लेने के बाद मुस्कान के सर को चूमते हुए धन्यवाद किया.

"It's ऑलराइट अंकल. आंटी है दोने ा लोट फॉर में एंड थिस इस नथिंग िफ़ कपरेड़."

"यू अरे आलरेडी कॅल्क्युलेटिवे िफ़ आईटी इस सो, मुस्कान. I'm ा मदर एंड यू आल डेसेर्वे रिज़नेबल अफेक्शन एंड केयर. िफ़ यू विश ी विल बे स्लिंगटली फॉर्मल टुवर्ड्स यू.", रेखा जी के मुँह से फर्राटेदार अंग्रेजी सुन्न कर उनकी सास मुस्कुराती हुई शंकर का हाथ पकड़ कर अंदर बढ़ चली जो खुद भी हंस रहे थे. मुस्कान ने जो भी सुना था अब वो शायद गलती समझ चुकी थी. कोमल भी रेणुका बुआ को उतरवाने के बाद सामान ले कर प्रियंका के साथ अंदर जाने से पहले रुक कर अपनी माँ और मुस्कान को हे देख रही थी.

"सॉरी. It's रियली माय मिस्टेक एंड यू अरे राइट आंटी तहत ी वास् बिट कॅल्क्युलेटिवे बिकॉज़ ी ऍम नॉट उसे तो विथ सुच हार्ट वार्मिंग केयर. ी थॉट िफ़ ी एक्सप्रेस माय फीलिंग्स इन इतर लैंग्वेज, यू मिगहत नॉट चेक आउट. एंड तेरे ी वास् रॉंग अगेन."

"हे.. It's ऑलराइट. थे ओने हु हद बीन ट्रेवल्ड अंडर हैलस्टोरंस, उसुअल्ल्य डाउट क्लीन स्काई. मुझे फ्रेंच नहीं आती और सुना है तुम्हे फ्रेंच कुछ ज्यादा हे पसंद है. जब मुझसे कुछ ऐसा कहना हो जो मैं समझ न सकू तोह कोशिश करना. लेकिन अब लगता है जरुरत नहीं पड़ेगी. मेरे लिए तुम अलग नहीं हो बीटा और माँ कोई भी हो वो हर बचे से ममता रखती है. तुमने भी तोह बिना कहे मेरा इतना ध्यान रखा.", रेखा जी वैसे हे मुस्कान के कंधे पर हाथ रखे धीमे कदमो से आगे बढ़ने लगी तोह मुस्कान भी उनको थामे चल पड़ी.

"अर्जुन सच कहता है की आप सबसे ख़ास है और दिल की भी सबसे ाची. वैसे ये फ्रेंच वाली बात आपसे किसने कही?", मुस्कान घर में दाखिल हो चुकी थी उनके साथ.

"उस किताब का यही नाम है न, 'थे बाइसिकल'? इंग्लिश संस्करण पर भी ठीक वही फोटो थी जो मैंने पढ़ा था. तुम्हारी कृष्णा आंटी के पास तोह कॉलेज में फ्रेंच ऑप्शनल सब्जेक्ट भी था और उनके पास वैसी बहोत सी किताबे भी मिल जाएँगी अगर तुम पढ़ना चाहो. बस बदले में तुम्हे उन्हें भी अपनी किताबे देनी पड़ेंगी.", रेखा जी के हाथ पर अब नयी पट्टी पढ़ी थी और वो हाथ सही रखने के लिए गले में अलग से एक पट्टी दाल कर कलाई को ऊँचा रखा गया था.

"हाहाहा.. मुझे सचमुच नहीं पता था आंटी जी की आप लोगो की एजुकेशन इतनी ाची भी हो सकती है. ऐसा नहीं है की ये मैं अपने आप से कह रही हु. वो हवेली पर ज्यादातर औंटीएस स्कूल हे नहीं गयी कभी और जो गयी है उनके बोलने से पता भी नहीं चलता. आज रात मैं आपको अपनी फवौरीते बुक रीड करके सुनाऊँगी. फिर देखते है कृष्णा आंटी जी की कलेक्शन कैसी है.", मुस्कान अब रेखा जी के कमरे में आ चुकी थी जहा रोमिला पहले से हे विराजमान थी और शंकर जी से कुछ बातचीत करते हुए हंस रही थी. रेखा को सहायता दे कर कोमल के साथ उन्होंने बिस्टेर पर बैठाया तोह कोमल ने अपने पिता का तैयार छोटा सा सूटकेस उन्हें पकड़ाया.

"अर्जुन नजर नहीं आया. उसकी कार और मोटरसाइकिल तोह घर में हे हैं.", शंकर जी ने वो सूटकेस एक तरफ रख कर पहले कलाई पर घडी पहनी और फिर डॉक्टर द्वारा बताई सभी दवाई कोमल को भी ाचे से समझा दी. ऋतू भी कमरे में दाखिल हो चुकी थी, जिसने रोमिला का गाल चूमने के बाद अपनी माँ की गॉड में हे सर टिका लिया. उसकी बचकानी हरकत पर सभी मुस्कुरा रहे थे.

"प्रीती उसको मार्किट ले कर गयी है शंकर. मुझे भी उसने ज्यादा कुछ नहीं बताया के वो क्या लेने गयी है पर कल चंडीगढ़ जा रहे है तोह जरूर कुछ न कुछ चाहिए हे होगा उसको. वैसे रेखा ने अभी तक सही से बताया नहीं की ये चोट लगी कैसे है?", रोमिला के जवाब के बाद वाले सवाल ने सबकी नजरे रेखा की बजाये शंकर पर हे कर दी थी.

"रेखा बेहतर जानती है की ये चोट कैसे लगी रोमिला. मुझे इतना पता है की ये जख्म 3 हफ्ते से पहले सही नहीं होने वाला. मैं सिर्फ आज रात हे बहार हु, बाकी ध्यान मैं रख लूंगा. चलता हु अब. रोमिला, अलीशा को देख लो अगर तैयार हो गयी हो तोह.", शंकर जी ने जाने से पहले ऋतू को अपने सीने से लगाया और उसका माथा चूम कर कमरे से निकल गए अपनी माँ की तरफ. कोमल ने दवा बना कर मुस्कान को पकड़ा दी थी अपनी माँ को पिलाने के लिए और खुद वो सबके लिए कॉफ़ी बनाने चली गयी.

"तुम मेरी समझ से बहार हो रेखा. पूरी हथेली ऐसे कटी है जैसे अगर थोड़ा और प्रेशर दिया होता तोह सैंडविच की तरह 2 त्रिकोण बन्न जाते. तुम्हारे हाथ में अब 3 लकीरो की जगह 4 हो गयी है वैसे.", रोमिला की बात सुन्न कर एक बार को तोह मुस्कान भी काँप सी गयी थी. उसको नहीं पता था की चोट इतनी गहरी लगी होगी. ऋतू बहार से अलका की आवाज आने पर चली गयी मुस्कान को वही रुकने का बोल कर.

"सच सिर्फ यही है रोमिला की ये बस एक ज़ख्म है जो जल्द भर जायेगा. किसने किया या कैसे लगी तोह इसका जवाब यही है की उस को न बताने से फरक नहीं पड़ने वाला. हाँ तुम्हारी वो चार लकीरो वाली बात तोह मैंने भी सोची नहीं. पहले मेरी हथेली में किस्मत की लकीर नहीं थी. अब है.", वो दवा जितनी भी कड़वी थी लेकिन रेखा के चेहरे पर आयी मुस्कराहट फीकी न हुई.

"तुम और तुम्हारे ये लॉजिक रेखा. मैं चली अपनी किस्मत से ग्रहण हटाने. कोमल को बोलना के 5 मिनट में आ रही हु, मेरी कॉफ़ी रख ले और ललिता दीदी को भी बुला ले.", रोमिला के जाते हे रेखा जी पीठ के पीछे 2 तकिये लगा कर आराम से बैठ गयी.

"सचमुच रोमिला आंटी सही बोल रही थी. वैसे अब आपको आराम करना चाहिए आंटी. मैं रात में बैठती हु आपके पास."

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"हहहह... आराम से maano....aahhhh.. क्या कर रही हो ये तुम..?", यहाँ मंजू के कमरे में दृश्य सोच से भी परे था. पूरे घर को ाचे से बंद करने के बाद जब दोनों प्रेमी युगल एक दूसरे को choom-choom कर भी संतुष्ट न हुए तोह प्रीती लगभग खिंच कर अर्जुन को इस बिस्टेर पर आ चढ़ी. पिछले कुछ समय से अंतर्मनन के द्वन्द में डूबा अर्जुन अब खुद को जीवित महसूस करने लगा था और इसका सबूत था वो निर्वस्त्र अकड़ा हुआ भुजंग. प्रीती अपनी कलाई से मोठे उस लिंग को हथेली में मजबूती से पकडे हुए जहा ऊपर निचे करती हुई और भयंकर स्वरुप दे रही थी तोह उसका दूसरा हाथ अर्जुन की गर्दन को दबाता हुआ जैसे अर्जुन को बिस्टेर के भीतर दबाये जा रहा था. बिखरे हुए वो हलके भूरे बाल और उनके पीछे पसीने में नहाया वो सुर्ख गोरा चेहरा. प्रीती इस पल में सचमुच अर्जुन को जैसे वो कटु सच दिखला रही थी जिसकी कल्पना तक वो न करता अगर यहाँ कोई और लड़की होती.

"शह्ह्ह्ह.. गुस्सा, अकेलापन, डर और बेमतलब के ख्याल इस कमरे से बहार अर्जुन.. उम्म्म्म", प्रीती ने लगभग फाड़ने के इरादे से अर्जुन की टीशर्ट ऊपर खींची थी जिसको समय रहते अर्जुन ने अपने जिस्म से जुड़ा कर दिया. अब वो ऊपरी हिस्से से भी निर्वस्त्र था और अगले हे पल उसकी आँखें फिर से मूँद गयी. चौड़ी छाती पर उभरे हुए वो लागु चूचक प्रीती के दांतो के बीच थे. हलके हलके उन्हें काट कर जिस तरह से वो अपनी गरम गीली जीभ वह फिर रही थी, अर्जुन के पेट की सभी मांसपेशिया आपस में जुड़ कर जिस्म ऊपर उठाने लगी. वो इस अध्भुत्त मजे से पागल हुआ जा रहा था लेकिन प्रीती ने तोह जैसे ये खेल अभी शुरू हे किया था. जिस्म का बाकी रक्त तोह जैसे उस दहकते सुपडे में एकत्रित हो गया था जिसको प्रीती मजबूती से हिलती हुई अपनी सीमा से कही ज्यादा भयंकर बना रही थी. नीली रागे उभर कर उस 9 इंच से कुछ अधिक लम्बे कामदण्ड को अर्जुन के बाकी जिस्म सामान मांसल बना चुकी थी. एक पल बाद सिर्फ लाल ब्रा में क़ैद अपने कठोर उभारो को अर्जुन के चेहरे पर दबती हुई प्रीती अर्जुन के जिस्म पर किसी चादर सी चढ़ी थी. फडकता हुआ लिंग उस लाल पंतय की गर्माहट लेता हुआ दोनों गोरी जांघो के बीच फंसा था.

"सांस तोह लेने दो जान.. आह्हः..", अर्जुन का जिस्म तिथिल पड़ने लगा था लेकिन प्रीती के इरादे कुछ और थे. थोड़ा निचे सरक कर उसने अर्जुन के होंठो को अपने मुँह में ऐसे दबोच लिया जैसे बिल्ली किसी चूहे को. तराशे हुए नाखून हर तरफ अर्जुन के सीने, कमर और पीठ को कुरेद रहे थे. वो वक़्त भी आ पंहुचा जब अर्जुन उखड़ी साँसों के बाद उस दौर में पहुंच चूका था जहा हर धावक हवा में उड़ता महसूस करता है. ये स्वर्गिक अनुभूति थी और शहद से मीठे प्रीती के नरम होंठो का रास चकता हुआ अर्जुन अपने दोनों हाथ उस लाल रेशमी पंतय में घुसता हुआ दोनों मलाई से कूल्हों को मसलने लगा. अब साँसों का शोर न था. बस धड़कने आपस में बतला रही थी और ढीली हुई ब्रा बिस्टेर से निचे फर्श पर तनहा पड़ी अपनी किस्मत कोसती लगी.

"तुम जानते हो की तुम मुझसे नहीं भाग सकते. फिर भी कोशिश करते रहते हो. उम्म्म्म.. धीरे से चुसो पागल..", अर्जुन के चेहरे से थोड़ा उठकर प्रीती उसको समझने हे लगी थी की उन दोनों कठोर नारंगियों को मुठी में भरता अर्जुन के निप्पल समेत आधे सतांन को मुँह में भर कर पीने हे लगा. प्रीती के उरोज किसी पत्थर से ठोस थे और जाने उनमे कैसा रास निकलता था जो अर्जुन हमेशा उन्हें मुँह में भरने को आतुर रहता. पंतय के भीतर आया गीलापन अर्जुन के साथ साथ उसके लुंड ने भी ाचे से महसूस किया. प्रीती अपने आप हे इस उन्माद में अपनी योनि अर्जुन के लुंड पर घिसने लगी थी. जितना पहले वो अर्जुन को सत्ता रही थी, अब अर्जुन भी उसके जिस्म पर उतने हे हमले करने लगा. मुलायम स्टैनो की अकड़ को काम करने में जूता अर्जुन बारी बारी से दोनों चूचक चूसता हुआ उन्हें मसल भी रहा था.

"आह्ह्ह्हह.. उफ्फ्फ... वेट..", प्रीती ने मजबूती से अर्जुन का चेहरा बिस्टेर पर भिड़ा दिया. फुर्ती से पंतय निकाल वो पलट कर अर्जुन के चेहरे पर अपनी योनि टिकती हुई दोनों हाथो में उस मूसल को दबोच कमर चलने लगी. अर्जुन न वो गुलाबी योनि देख सका और न प्रीती ने कोई मौका दिया. एक अध्भुत महक नथुनों में भर उठी. कच्चे संतरे की तजा महक जो यक़ीनन प्रीती के उस पुष्प से उर्जित थी जो अर्जुन के चेहरे पर टिका था. कमर एक इंच निचे सरकते हे अर्जुन के होंठो ने वो स्वाद चख हे लिया. बेशक वो प्रीती का पुष्परस हे था लेकिन विलक्षण, ठीक उसकी हे तरह. नरम रेशमी पहली हे फांको के बीच से टपकता वो मधुर रास अर्जुन की जिव्हा से होता हुआ उसके गले में उतरता गया. होंठ स्वतः हे इस रास को और पीने के लिए उन फांको के बीच जा धंसे. दूसरी और मजे में हिलती झूलती प्रीती ने भी समय गवाए बिना वो बड़े टमाटर सा सूपड़ा एक पल में हे मुँह के भीतर उतार लिया. अर्जुन ने खुद ऐसी चुसाई की कल्पना तक न की थी जैसी प्रीती ने करनी शुरू की. एक मुठी में लिंग की जड़ थामे वो लगभग आधा लिंग एक ताल में अंदर बहार करती हुई मुखरास से चमकाने लगी. होंठ अपनी सीमा तक फ़ैल गए और उतनी हे तीव्रता से वो अपने मांसल कूल्हे ऊपर निचे पटकती हुई अर्जुन को वो शहद चखती रही जिसके लिए वो सांस लेना तक भूल चूका था. अर्जुन का जोश उसके लिंग में जमा होने लगा था और यही प्रीती ने चुसाई रोक कर अपने पत् उसके चेहरे पर बुरी तरह कस दिए. रह रह कर वो झटके खाती रही और अर्जुन हर कतरे को हजम करके मदहोश हो गया. वो अब झड़ना चाहता था लेकिन प्रीती उसके जिस्म से फिसल कर बगल में आ लेती. हर सांस के साथ उसके दुग्ध ऊपर निचे हिलने लगे. दोनों चूचक सूई से अकड़े बता रहे थे की ये बिल्ली अभी और शिकार करने वाली है.

"तुम्हारा हो गया? हहहहहह..", अर्जुन का चेहरा लाल हो कर प्रीती की बरसात में भीगने से अलग हे चमक रहा था. बाल ast-vyast और आँखों में एक असीम चाहत कुछ पाने की.

"अभी 2 बार हे हुआ है... कैसा लगा मेरे फत्तू?", प्रीती की आँखों की वो चमक साफ़ बता रही थी की अर्जुन आज बचने वाला नहीं.

"फत्तू? अब देखो मैं तुम्हारी क्या हालत करता hu..aahhhh.. आराम से पागल.. ", अर्जुन लपक कर प्रीती पर चढ़ने हे लगा था की उसके दोनों अंडकोष प्रीती ने मुठी में दबोच लिए.

"शह्ह्ह्ह.. तुम भूल रहे हो डार्लिंग की आज इस बिस्टेर के मालिक हम है और तुम्हारे भी. चुपचाप.. बस पड़े रहो.", प्रीती ने बड़े आराम से अर्जुन को धकेल कर एक तरफ कर दिया था. पानी पीती हुई वो जानबूझ कर आधा अपने होंठो से उड़ेलती हुई बाकी जिस्म को गीला करने लगी. अर्जुन बेबसी से कभी अपने लिंग तोह कभी मुस्कुराती प्रीती को देखने लगा. आज वो सचमुच कुछ अलग थी और उस पर पूरी तरह भरी.

"ये कहा सीखा?"

"सवाल हे गलत है तुम्हारा. पूछना चाहिए था के ये मैंने कब सीखा और जवाब है जब मुझे जरुरत महसूस हुई. शादी के बाद तुम्हारा ये अजगर हमेशा पिटारे में रहने वाला मर अर्जुन शर्मा. उमाहहह.. हो तुम भी बहोत मीठे.", अर्जुन के जिस पर आराम से लेट कर वो अब तल्लीनता से उसको चूम रही थी. इस पल में प्रीती ने अर्जुन को ज्यादा नहीं तड़पाया और अपनी कमर उचकते हुए वो भीगी हुई yoni-lakeer उस जीरो बल्ब से सुपडे पर टिका दी. अर्जुन अगर आम इंसान होता तोह इस दहकती योनि के स्पर्श से हे पिघल कर खली हो जाता. फिर भी एक आह उसके होंठो से निकल गयी.

"बहोत भड़की हुई हो यार.. आह्ह्ह्ह.. दर्द.."

"शहहह.. दर्द वार्ड को कब तक बीच में लाते रहोगे? जो पता है वो बोलना जरुरी है अर्जुन? अब बस मेरी आँखों में देखो...", उन नीली हरी आँखों ने एक जादू तोह जरूर था. गोरा चेहरा सुर्ख हो चूका था और वो आँखें अर्जुन की आत्मा तक उतर कर बिना कोई और एहसास दिलाये जैसे अर्जुन को सम्मोहन में बांध चुकी थी. दोनों की कमर के निचे दृश्य जरूर हाहाकारी था. प्रीती की योनि के बाहरी लैब जैसे अभी तक अखिल थे और पहले हुए हिस्से के बिच की वो लकीर एक पल के लिए उस गर्दभ लिंगमुण्ड के पीछे छिपने के बाद कुछ फैली और फिर किसी गुरुत्वाकर्षण की तरह सहने सहने उसको अपने अंदर सामने लगी. लकीर फैल कर इतनी चौड़ा चुकी थी जैसे अभी राखत टपक पड़े. वो कसाव अध्भुत्त था और इनका ये मिलान भी. एक पल जिस्म वही रुक गए और अगले हे पल विधुत गति से प्रीती कमर को पटकती हुई वो पूरी लम्बाई अपनी योनि में उतार गयी.

"Aaaiiiiiiiiiiiii... कंठ से ये चीख निकलते हे अर्जुन भी चेतना में लौटा लेकिन देर हो चुकी थी. प्रीती किसी कटे वृक्ष सी उसके ऊपर गिरी थी, बुरी तरह सिसकती हुई. वो लिपट कर अपने ठन्डे होते जिस्म को अर्जुन के शरीर से गर्मी खींचने के प्रयास में थी और वो विकराल लिंग जैसे अब प्रीती के गर्भ को चूम कर बता रहा था के ऐसा कुछ वक़्त तक होता रहेगा.

"ओह प्रीती.. ये जल्दी नहीं करनी थी.. बस.. अब मत हिलना.. आठ.. तुम पागल हो.. पूरी पागल.", प्रीती की पीठ सहलाता हुआ अर्जुन भी हल्का हल्का तरल अपने लिंग पर महसूस कर प् रहा था. शायद पिछले समागम से वो प्रीती को पूरी तरह खोलने में असफल रहा होगा. इस पल में अर्जुन को सिर्फ उसकी परवाह थी, कामाग्नि तोह पहले भी उसके और प्रीती के दमियन मायने न रखती. जिस्म पर रोये उभरने लगे तोह नम्म आँखों से मुस्कुराती हुई प्रीती ने आहिस्ते आहिस्ते कमर हिलनी शुरू की. कस्सी के मूठ से भी मोटा वो लिंग फंस फंस कर हिल रहा था उस सूक्ष्म से छिद्र में.

"आह्हः.. ऐसे हे करते रहो.. करते रहो... मजा आ रहा है..", जाने ये कैसा मजा था जिसमे अर्जुन खुद हे दर्द महसूस कर रहा था क्योंकि प्रीती दर्द में थी. लेकिन वो तबतक न रुकी जबतक आधे से ज्यादा लिंग अंदर बहार होना शुरू न हो गया. उचित फिसलन और नमी पनपने में 10 मिनट तोह लग हे गए. हर धक्के पर योनि का मांस लिंग से चिपक का खिंच जाता. आवाज न करके अब वो एक बार फिर एक दूसरे के होंठो को खाने चबाने लगे. प्रीती एक बार फिर से हावी हो चुकी थी अर्जुन पे. ठप्प ठप्प का मधुर संगीत और उस विकराल लिंग को सूपड़ा तक बहार निकल वापिस अंदर समाहित करती हुई प्रीती ने अर्जुन नामक अपने अश्व को साध हे लिया था. जल्द हे वो उसके सीने को काटने के बाद चूमती तोह अर्जुन सिसक उठता. अंतरंग पालो की ये नौसिखिया प्रेमिका अर्जुन को उस माउद पर ले हे आयी जहा वो जानवर की तरह लगभग रौंदने हे लगा था.

"उम्म्म्म... क्या कर दिया तुमने? आह्हः.", प्रीती को पलट कर अपने निचे लता अर्जुन उसकी अक्षत गुदा पर उँगलियाँ दबाते हुए गहरे धक्के मार रहा था. दोनों लम्बे पाँव हवा में फैलाये वो प्रीती की योनि के आखिरी हिस्से तक चोट करता हुआ जैसे खुदको हे भूल गया. प्रीती भी उन्मुक्त बरसात करती हुई उसके लिंग को भिगोती हुई ये दौड़ अपनी रफ़्तार पर पंहुचा चुकी थी. सटासट अंदर बहार होता वो कलाई से मोटा औजार अकड़ता हे गया. आखिर में वो पल भी आ हे गया जब अर्जुन प्रीती के दोनों कंधो के निचे हाथ रख कर उसके जिस्म से जुड़ हे गया. हुंकार भरता हुआ वो ऐसे झड़ने लगा था जैसे बरसो से उसके लिंग ने वीर्य न बहाया हो.

"ओह्ह्ह्हह्हह.. मार दिया... इसशहहहह..", प्रीती भी चीख न रोक सकीय उस गरम तरल गोलियों की बौछार योनि के हर हिस्से में महसूस करते हुए. जीवन का एक और अकल्पनीय सखलन जो 25-30 सेकंड निरंतर चलने के बाद हे धीमा हुआ. अर्जुन गिरने की जगह प्रीती को चूमता हे रहा. गर्दन, गाल, होंठ, नाक... कुछ नहीं छोड़ा और उतना हे प्रेम प्रीती ने दर्शाया प्रतिउत्तर में उसके दोनों कूल्हों पर नाखून गदा कर खुद से चिपकते हुए. पसीने में भीगे वो दोनों कुछ पल ऐसे हे रहे. अलग होने पर भी एक दूसरे को बाहों में लिए वो लेते रहे. सफ़ेद गधा तरल प्रीती की बंद गुलाब सी योनि के होंठो से पिघलता हुआ बिस्टेर पर टपक रहा था.

"आज तोह लगता है प्रेग्नेंट हे कर डोज.", प्रीती ने चुहल की तोह अर्जुन ने चेहरा दोनों चुचो के बीच धंसा लिया. वो बस उसको सहलाती रही जैसे सुलाना चाहती हो.

"तुम्हे ऐसा नहीं करना चाहिए था प्रीती."

"तुम्हे भी इसकी जरुरत थी और मुझे भी. वैसे घबराने की बात नहीं है, मैं गोली ले लुंगी और सेफ भी हु. अब बताओ तुम्हे क्या बात परेशां कर रही है? माँ पर हुम्ला हुआ ये बात या मधुलता आंटी ने मुझे डांटा वो? या कुछ ऐसा हो रहा है जो तुम सिर्फ अपने तक रखे हुए हो? जानती हु यही सब रात को ऋतू दीदी पूछने वाली है लेकिन उनके सामने झूठ नहीं चलेगा. प्रैक्टिस करके देख लो चाहे.", प्रीती सबकुछ जानती थी और इस बात पर अर्जुन ने उसको थोड़ा और कसके चिपका लिया. जिस्म से पसीना सूखने लगा था और इनके मिलान की महक कमरे में ज्यादा हे बस चुकी थी. अर्जुन कुछ पल बस प्रीती के सीने को हलके हलके चूमता रहा ख़ामोशी से.

"उनकी आँखों में भी यही सब देख चूका है मैं प्रीती और इसलिए मैं बचता फिर रहा हु. और अब तुमने जिस तरह से बंदी बना लिया है वैसे हे वो भी करेंगी. लेकिन तुम्हे ये कैसे पता की माँ को चोट नहीं लगी, उन पर हुम्ला हुआ है? मधुलता आंटी को तोह मैं जल्दी हे रेतुर्न गिफ्ट दूंगा लेकिन माँ वाली बात पर मैंने किसी को बात करते नहीं देखा."

"ऋतू दीदी जानती है की माँ बहोत हे ज्यादा फोकस वाली औरत है, तुमसे भी ज्यादा. उन्हें चोट लग्न तोह दूर, सामने से कोई ऐसे नुक्सान भी नहीं पंहुचा सकता. ऊपर से जिस तरह के इंतजाम थे तोह ऐसी कोई भी चीज वह नहीं हो सकती जो उनकी हथेली को इस तरह काट दे की स्टीट्चेस लगाने पड़े. सर्विस ट्रे तक गोल किनारो वाली थी वह अर्जुन और छुरी कांटे भी सिर्फ हॉल एरिया तक सिमित थे. मैं नहीं जानती की हर बात पर इतना नोटिस क्यों रखा गया लेकिन दादा जी को ये सब निर्देश देते हुए मैंने हफ्ता पहले हे सुना था. ऊपर से सिक्योरिटी भी इतनी थी जो बाद में साफ़ हो गया के क्यों थी. मुझे पूरी बात का नहीं पता लेकिन ऋतू दीदी कहती है की माँ पर हुम्ला हुआ है और माँ उस इंसान को पहचान भी गयी है. बस बता नहीं रही. लेकिन उतनी सुरक्षा में कोई ऐसा कैसे कर सकता है? तुम तोह उनके पास भी नहीं जा रहे कल रात से.", प्रीती की हर बात वाजिब थी और अर्जुन कमर के बल अब सीधा लेता पंखे को देख रहा था.

"माँ.. माँ सबसे मजबूत इंसान है प्रीती, हमारे तुम्हारे घर में. और जब वो इरादा कर ले की वो नहीं बोलने वाली तोह फिर वो नहीं बोलने वाली. उनके दर्द सहने की क्षमता भी उतनी हे ज्यादा है जितनी मुँह बंद रखने की. और रही बात की उन्हें ये चोट अनजाने हे आयी है या हुम्ला हुआ है तोह ऋतू सही कह रही है. उलटे हाथ में हर वक़्त कुछ न कुछ था हे उनके और सीधे में इतना बड़ा कट लग्न वैसे हालात में मुमकिन नहीं. सुरक्षा बहार के लिए थी, अंडरवालो के लिए नहीं. ाची बात है के पापा ने वो सब संभाला, खुद से. माँ के झूठ को वो तभी पकड़ चुके है क्योंकि वो जखम के साथ साथ उसके बन्न ने की वजह मेरे दादा जी से भी बेहतर जानते है. मैं खुद 2 बार फंस चूका हु उनके सामने. वो जख्म की वजह ढून्ढ रहे है और मैं जख्म देने वाले को. सुबह तक पता कर हे लूंगा और फिर पंजाब जाने से पहले माँ को वो नाम बता कर और उनसे ाचे से मिल कर हे निकलूंगा.", अर्जुन का विश्लेषण सुन्न कर प्रीती अंदर हे अंदर फकर महसूस कर रही थी लेकिन बहार से वो बस उसके सर को सहलाती रही.

"हम्म्म.. और ऋतू दीदी से क्या कहोगे?"

"उनके सवाल कही ज्यादा है प्रीती. जवाब नहीं होंगे और वो सवाल भी अपनी मर्जी से करती है."

"मतलब वो कुछ और भी पूछने वाली है?"

"पता नहीं. शायद वो सवाल करे हे न लेकिन इतना मुझे पता है की आज रात मैं उनसे भाग नहीं सकता. अभी तक तोह उन्होंने इंतजाम भी कर लिए होंगे मुझे दबोचने के. वैसे तुम इतनी गरम क्यों हो राखी थी आज?", अर्जुन ने विषय बदल कर प्रीती का एक कुल्हा जोर से दबाते हुए उसकी योनि को फिर से अपने लिंग पर दबाया तोह वो उचक उठी.

"आउच.. ये दूर हे रखो अभी वह से. पेट तक टक्कर मरता है और वह बहोत जलन हो रही है अभी. और कोई गरम नहीं हो रही थी मैं. ये नेचुरल है. पता नहीं कब नार्मल लगने लगेगा ये? बुरा न मानो तोह एक सवाल और था लेकिन पर्सनल थोड़ा?"

"दीदी झेल लेती है और उन्हें मैं नहीं झेल पता. आज तुम भी मुझ पर हावी हे रही थी बहोत देर तक. और मैं ये चाहता हु की हम ऐसा महीने में 2 से ज्यादा बार न करे.", अर्जुन प्रीती के सुर्ख होंठो को चूम कर निर्वस्त्र हे उठ कर बाथरूम की तरफ जाने लगा.

"तुम्हे कैसे पता के मैं यही पूछने वाली थी? और तुम्हे अजीब नहीं लगा ये बताना?"

"इस से ज्यादा अजीब है की तुम मेरे और ऋतू के बारे में जानती हो, जैसे वो तुम्हे बता देती है. और तुम उन्हें बता डौगी जो यहाँ हुआ. अजीब ये है की तुम दोनों और भी बहोत सी बातें जानती हो जिनके बारे में मैं शायद बात भी न कर सकू लेकिन तुम दोनों के साथ आपसी बात में मुझे प्रॉब्लम नहीं है.", अर्जुन दरवाजे के पीछे टेंगा टोलिया उतारने लगा था और प्रीती टाँगे फैलाये बस मुस्कुरा रही थी.

"अलका?"

"गर्लफ्रेंड है मेरी. सॉरी तुम दोनों हे हो. सच कहु तोह बस एक वही है जिनके साथ होने वाले हर एहसास को मैं बस हम दोनों तक रखना चाहता हु. तुम फिर भी सब जानती हो प्रीती क्योंकि मैं तुमसे कुछ नहीं छिपा सकता. ऋतू और अलका मेरे और तुम्हारे लिए वो घनी छाव है प्रीती जिनके साये टेल हम हमेशा महफूज रहेंगे. वो दोनों एक हे है बस ऋतू को पहली हे बार में अर्धांगिनी मान लिया था तोह गर्लफ्रेंड वाली भूमिका अलका की हो गयी. वैसे वो दोनों इस तरह हे तोह मिल कर काम करती है.", अर्जुन दरवाजा खोल कर टोलिया गीला करने लगा तोह प्रीती उसकी बातें सुन्न कर हंसने हे लगी.

"उल्लू हो तुम पूरे के पूरे. मैं तोह ये पूछ रही थी की अलका दीदी से मिलोगे क्या जाने से पहले?"

"बताया तोह एक बीवी है दूसरी गर्लफ्रेंड. दोनों साथ रहती है तोह वो पहले हे सब प्लान कर चुकी होंगी. अब तुम्हारे साथ दोनों दोनों किरदार तुम अकेली हे कर सकती हो इसलिए biwi-girlfriend एक बार में हे खुश. उनके साथ बहोत बुरा फंसता हु. ऋतू से बचा तोह अलका के सामने फंस जाऊंगा और नहीं तोह vice-versa."

"और हम तीनो एक साथ हुए तोह? आह्हः... आराम से.", प्रीती की ख़ास उभर ली हुई योनि को हलके से फैला कर साफ़ करता अर्जुन ये भी देख रहा था के कहा कहा घर्षण से खाल पर गहरी रगड़ लगी है. इतनी प्यारी योनि को उसके लिंग ने बुरी तरह रगड़ा था फिर भी उसको करीब करीब सलामत देख वो खुश था. वीर्य का हर कटरा साफ़ करने के बाद उसने एक हल्का सा चुम्बन दिया था प्रीती सिसक उठी, मस्ती में बेशक.

"आजतक वो दोनों हे एक साथ मेरे सामने नहीं आयी. तुम आ सकती हो ऋतू दीदी के साथ?"

"छी... गंदे कही के. ऐसा इस जनम में कभी नहीं होने वाला और तुम बेशरम होते जा रहे हो."

"ये भी मैं हे बोल रहा था? ाची बात है के ऐसा इस जनम में न हे हो. मैं तुम्हे झेल लेता हु यही बहोत है और ऋतू के सामने हाथ जुड़े हुए है मेरे. खैर अब घर चलना चाहिए हमे और यहाँ एक बार कल चक्कर लगा लेना तुम. मेरे जाने के बाद हो सके तोह ऋतू दीदी के साथ थोड़ा ज्यादा समय रहना.", अर्जुन बिस्टेर के किनारे बैठ पहले प्रीती को उसके अंतर्वस्त्र पहनाने लगा जो प्रीती को खुश करने के लिए बहोत था. अर्जुन की यही बात तोह ख़ास थी की उसको प्रीती के लिए सबकुछ करना ाचा लगता था. फिर अपने कपडे पहन कर अगले 5 मिनट में वो भी दुरुस्त था. पहले से कही ज्यादा चमकता और अब बेहतर भी.

"उनका ध्यान मैं रख लुंगी लेकिन तुम वह जाने के बाद हर रोज एक बार तोह फ़ोन करोगे हे. चाहे मेरे घर या दीदी को. बाकी मंजू और मेनका दीदी 2-3 दिन वही रहने के बाद वापिस आएँगी.", प्रीती ने भी बाल रबर में सही से बाँध कर चादर ठीक की. उसकी चाल में भरपूर लड़खड़ाहट थी जो अर्जुन देख न सका. दोनों घर से निकल कर स्कूटी पर सवार थे और इस बार प्रीती उसके पीछे बैठ कर ाचे से चिपकी हुई थी.

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"ये 2-2 गाडी वाली बात न समझ आयी मेरे भोले. हम कितने लोग वह जा रहे है?", उमेद सिंह समय पर हे लौट आया था लेकिन शंकर को सफारी की पिछली सीट पर बड़ा सूटकेस और बैग रखते देख वो कुछ हैरान हुआ.

"ये गाडी एयरपोर्ट जा रही है गज्जू लेकिन अपने पीछे हे चलेगी, निगरानी में. विशेष की साली और वालिए जी की बिटिया ने अपनी अपनी फ्लाइट पकड़नी है तोह मैंने हे वालिए जी से बोल दिया था के वो अन्नू को भेज दे. आ गए वालिए जी भी बहार.", घर के भीतर से सरदार जी के साथ हे उनकी धर्मपत्नी जी और अन्नू बहार निकले तोह शंकर ने आखिरी बैग भी पिछली सीट पर सही से रख दिया.

"आप रेखा से मिल लो भाभी जी. यहाँ से अन्नू मेरी जिम्मेवारी है.", मुनीर छोल साहब के घर से निकल कर इधर हे आ रहा था जिसके दोनों हाथो में अलीशा का सामान था. अलीशा के साथ उसकी बेटी और खुद रोमिला भी आयी थी. वो लोग भी अन्नू और उसकी माता जी से मिले. गाडी में बैठने से पहले अन्नू की नजरो से 2 बूँद आंसू जरूर निकले लेकिन मुस्कराहट के साथ.

"दिल लगा के पढ़ना बीटा और मैं फकर से कह सकती हु की वह भी तेरा ख़याल भरपूर रखा जाता है.", श्रीमती वालिए जी का इशारा अर्जुन से हे था जिस पर माँ बेटी दोनों हे हंस दी.

"तुस्सी फ़िक्र न करो बेबे. चंगा पापा जी, हूँ सर्दियाँ विच हे मिलदे हाँ. फ़ोन करदी है पहुचड़े हे. चंगा बीजी.", अन्नू ने कौशल्या जी को दादी कह कर हे बुआलया था जिन्होंने उसको गले लगा कर आशीर्वाद दिए. अलीशा की तरफ इतना कुछ न हुआ और वो रोमिला से मिलने के बाद अपनी बेटी के सर पे हाथ रखती हुई बीच वाली सीट पर जा बैठी. मुनीर इन दोनों मेमसाब को बैठने के बाद शंकर जी से चाबी ले कर ड्राइवर की जगह जा बैठा.

"शंकर, तुम फ़ोन करोगे मुझे.", रामेश्वर जी ने उनके करीब आते हे पिता वाली बात कर दी. उमेद सर हिलता हुआ शंकर को लिए अपनी काली मेरसेदेज़ में जा बैठा. हाथ हिलने के कुछ उपक्रम हुए और उसके बाद मुनीर चुस्ती से उमेद की कार के पीछे निकल चला. बेटी के रुखसत होते हे अन्नू की माता जी ने चुन्नी से अपने आंसू साफ़ किये.

"भगवान् तुस्सी थोड़ा समां रेखा डा हाल चल ले लावो. मैं पंडत जी नाल कुछ गल्लां करनी.", वालिए जी भी इतना कह कर बगीचे में चले आये रामेश्वर जी के पीछे जो छोल साहब के हे साथ थे. एक बार फिर कुछ लोग घर से रुखसत हो चुके थे. अंदर शाम का समय होने पर ललिता जी खुद हे अपनी बहु को सजाने में लगी थी. आज रात राधिका ने रसोई में कदम जो रखना था. वही उमेद और शंकर की बातचीत भी सफर के साथ हे शुरू हो गयी.

"इन्दर को चाचा जी ने रोका है भोले?", उमेद एक सरसरी निगाह पिछली गाडी पे दाल कर अपनी गति को संयत कर रहा था. शहर में वो अक्सर 50-60 पर हे चलता था. मुनीर दक्ष था लेकिन फ़िलहाल तेज चलना ठीक नहीं था.

"इन्दर ने ज्यादा कुछ नहीं बताया भाई. वो बोलै के आज वो हुसैन भाई के परिवार के साथ है और कल उसको किसी जरुरी काम से बहार जाना. दोपहर तक लौट भी आएगा.", शंकर जी को खुद इल्म न था के उनके पिता कैसे अपने बचो को सँभालते है. उमेद कुछ जानता था तोह बस मुस्कुरा दिया.

"वैसे तू आँख नहीं सेक रहा था इस विदेशी हूर पर? देख तेरे से बच के जा रही है अपने देश वापिस.", उमेद पिछले कुछ दिनों की व्यस्त स्थिति से उबरें के लिए शंकर से हे मस्ती कर रहा था.

"इसके देश में जा कर पेल दूंगा अगर दिल किया तोह. फ़िलहाल दिल नहीं है मेरा इसके साथ कुछ करने का. लेकिन तूने कब देखा बे मुझे इसको जांचते?", शंकर ने खिड़की निचे करनी चाही तोह उमेद ने कोई बटन दबा दिया. हवा अब कही और से बहार निकल रही थी और भीतर सिग्रत्ती जल चुकी थी.

"तेरे लिए ये कोई नयी बात तोह है नहीं. मैंने तोह ऐसे हे कहा था क्योंकि ये तेरे टाइप की जो है. अब सच भी बोल दे प्यारे.", अब शंकर भी हंस दिया जैसे उसकी चोरी पकड़ी गयी हो.

"ये मुझे पसंद नहीं गज्जू इसलिए बस इशारे तक हे सिमित है इसके साथ. चालू चीज है और विवान की सेटिंग भी है ये. हाँ रोमिला जरूर पसंद है लेकिन उसकी जुबान जितनी ढीली है स्कर्ट उतनी हे टाइट. बात तक सब ठीक लेकिन उसके आगे वो न बोतल में उतरती है न बातों में.", शंकर ने एक ठंडी आह भरते हुए धुआं बहार उगला तोह उमेद खिलखिला उठा.

"मतलब जो चाहिए वो मिलती नहीं और जो मिल रही है वो चाहिए नहीं.. वाह मेरे भोले.. वैसे फिर तोह रोमिला की दाद हे देनी पड़ेगी यार जो तेरे जैसे शिकारी को हार मनवा गयी. खैर ाची बात है और तू पहले से ज्यादा समझदार हो गया है अब."

"रोमिला बस आकर्षक है भाई और अब मैं भी सम्बन्ध साफ़ हे रखना चाहता हु. अर्जुन की सास होने से पहले वो रेखा की गहरी दोस्त भी है और सबसे घुल मिल कर रहती है. वैसे भल्ला क्या चाहता अब?", शंकर ने दराज खोल कर कुछ कागज बहार निकल कर देखते हुए काम की बात शुरू की. बिपास वाला रोड आ चूका था अब और यहाँ से कार दुगनी गति पर चलने वाली थी.

"भल्ला अपना सारा काम हमारी तरह एक नंबर में करने का विचार कर रहा है लेकिन उसका कहना है की वो चाह कर भी कब्जे और समझौते वाले काम बंद नहीं कर सकता. लम्बा चौड़ा संगठन है और लोग भी बहोत है उसके निचे. अब वो सब बंद करने का मतलब है उसकी जगह कोई और सर उठाएगा. तोह पूछ रहा था के इस से हमारे व्यापार में तोह कोई परेशानी नहीं आएगी. मैंने भी कह दिया के वो अपना पुराण हे चरित्र बरकरार रखे. डर रहना जरुरी है. वैसे राणा वाला काम तुमने ाचे से हैंडल किया भोले. अब भल्ला हमारी पूरी पकड़ में है तोह बॉर्डर एरिया में हम अपना अलग काम आराम से करेंगे. चाचा जी तक फिर भी बात जाएगी और वीर सिंह राणा का नाम सुन्न कर तुझ पर दिक्कत आ सकती है.", उमेद ने एक इशारा मुनीर को दिया जिसके बाद दोनों गाड़ियां 100 पर दौड़ने लगी. सड़क लगभग खाली हे थी और यातायात नियोजित.

"तुझे नहीं पता लेकिन इस मीटिंग में मैं मेरी मर्जी से नहीं बल्कि पापा के कहने पर गया था गज्जू. तुझे क्या लगता है मैं एक भी नहीं मारता अगर हालात वैसे होते तोह? दिल में तोह मैंने वह 10 गर्दन काट दी थी लेकिन असलियत में तोह बस एक बेहोश, जो सांगवान चाचा की निगरानी में पापा ने हे रखवाया है. पता नहीं उन्हें क्या हुआ जो वो गड़े मुर्दे खुद हे उखड़ते फिर रहे है. विनोदिया भी उनके हे पास गया था मदद के लिए और उन्होंने ज़िंदा भी न रहने दिया किसी को. कुछ अजीब नहीं लगता तुझे?", शंकर के सवाल और खुलासे वाजिब थे जिन पर सोचता हुआ उमेद सर खुजाने लगा.

"वो .. मेरी बात का कुछ गलत मतलब मत लियो भोले लेकिन मुझे लगता है चाचा जैसे वो सभी नाम मिटाना चाहते है जो अतीत में दुखदायी रहे हो. शायद वो नहीं चाहते की उनके जाने के बाद कोई भी दुश्मन परिवार का अहित करे. बेशक वो आज भी सजग है और बेहतर हालत है उनकी लेकिन बुजरुग होता व्यक्ति सोचता बहोत है.", उमेद की बात सुन्न कर शंकर को एहसास हुआ के उसके पिता बूढ़े हो गए है. वो फिर भी म्हणत में लगे है और ऐसी म्हणत जिसमे कुछ फैंसले तोह कानून से परे भी है.

"रेखा पर भी हुम्ला हुआ था उमेद. रात वाले टाँके खोल कर आज दिन में मैंने बत्रा के साथ फिर से उसकी हथेली को बेहतर सिला है. मेहुल के हिसाब से रेखा जख्म धोने बाथरूम नहीं गयी थी बल्कि उसको चोट वही लगी. रेखा ने बताया के उसका हाथ एल्युमीनियम से कटा लेकिन जख्म के अंदर कही भी कोई कानन न मिला. तोह उसकी दोनों बात यहाँ गलत साबित होती है. वह कोई ऐसा इंसान नहीं था जिस से दुश्मनी हो और रेखा पर दूसरी बार ऐसा हो रहा है. वो अगर हुम्ला करने वाले को देख नहीं पायी थी तोह वो साफ़ बताती की ऐसा हुआ. लेकिन वो ताल रही है जिसका मतलब है की उसको इंसान का पता है.", शंकर ऐसी बातों पर अब अपने भाई की तरह सोचने लगा था, खुद के किरदार से विपरीत. उमेद भी हैरान हुआ उसको सोचते और इन पहलुओं को गौर से सुन्न कर.

"महिलाओं वाले बाथरूम के आसपास पुरुष प्रसाधन नहीं था शंकर. और अगर मैं किसी पर शक करू भी तोह वो सभी व्यक्ति कल कही भी अकेले नहीं रहे. और ये जो भी हुआ है ये किसी ऐसे व्यक्ति ने किया है जो महिला है.. काफी समय से रेखा के करीब रहा है शादी के दौरान.. जो कोई आसपास रहा होगा उसको खुद व्यस्त किया जिस से घटना को अंजाम देते समय रेखा पूरी तरह अकेली हो.. और वो जो भी इंसान है, ओहदे या रिश्ते में बड़ा है. रेखा का स्वभाव हे है सबको एकसाथ बरकरार रखने का जिसका उस व्यक्ति को गहराई से पता होगा इसलिए देखे जाने की सूरत में नाम प्रकट होने का डर काम हो जाता है. और रेखा बिलकुल वैसा हे तोह कर रही है. भोले, अगर वार करने वाली कोई महिला रही है तोह इसका मतलब कुछ और भी हो सकता है.", उमेद जैसे लगभग काँप हे गया था अपनी सोच को विराम देते हुए.

"क्या मतलब है गज्जू?"

"कितना गहरा था जख्म?"

"दोनों किनारो पर लगभग पौने इंच लेकिन हथेली के ठीक बीच में 3-4 सूट. मतलब काफी गहरा था और ..."

"और अगर ऐसा जख्म हथेली की जगह कलाई पर दिया जाए.. दरवाजा बंद कर दिया जाए बहार से जख्मी व्यक्ति को अंदर बंद करके तोह परिणाम क्या होगा?", उमेद की धारणा सुन्न कर खुद शंकर को भी पसीने आ गए. और इरादे तोह वैसे हे थे अपराधी के.

"कलाई ऐसे वार से अलग हे हो जाती गज्जू और अगर वो व्यक्ति dhwani-badhit दरवाजे को बंद कर देता वैसा करके तोह 10-15 मिनट में रेखा बेहोश होने के बाद मर्डर भी सकती थी. लेकिन कोई महिला चाक़ू से ऐसा वार करने का जोखिम नहीं ले सकती. इतना तीखा खंजर सहेजना आसान भी तोह नहीं.", शंकर खुद हे अपनी सोच को गलत बता रहा था लेकिन उमेद का दिमाग बढ़ती स्पीड के साथ कही ज्यादा हे तेज चल रहा था.

"वो shahi-khanjar जो हमको मिला था वो याद है तुझे? उसकी धार ऐसी थी जो ऑपरेशन ब्लेड को मात दे दे. बहार का कवच भी आलिशान कारीगरी और फल की ऊंचाई कही से एक इंच तोह कही से 3-4 सूट. देख भोले ऐसा मेरा सिर्फ अनुमान हे है. बाकी परिस्थिति और हमलावर कुछ भी या कोई भी हो सकता है. बस इतना यकीन है के कोई अनजान बाहरी व्यक्ति ये नहीं कर सकता. बाकी अंदेशा मैं दे हे चूका हु जितना रेखा को जानता हु. वैसे इतनी बड़ी घटना हो गयी लेकिन न तोह इसकी आवाज चाचा जी तक गयी और न हे अर्जुन को मैंने किसी खोजबीन में हे देखा. वो था कहा?", उमेद ने जिन अंदेशो से शंकर को झकझोरा था वो उन्ही में खोया था जैसे कुछ कुछ समझ गया हो. अर्जुन का जीकर होने पर फीकी सी मुस्कान जरूर चेहरे पर आयी.

"वही तोह पता लगाना चाहता था मैं गज्जू. ये साला तोह मेरी सोच से भी टेढ़ा है. न ये रात में अपनी माँ के करीब गया और न हे आज वो कोई हालचाल लेता देखा. हाँ पापा के आसपास जरूर दिखाई दिया जैसे सारे काम वो उस से हे करवा रहे हो. लड़का समझदार है और जितना मुझे पता है वो अपनी माँ से अटूट प्यार करता है और फ़िक्र कितनी ये तोह पूछ हे मैट. लेकिन वर्तमान हिसाब देखा जाए तोह वो इसके विपरीत नजर आ रहा है. कही वो जुट तोह नहीं चूका तहकीकात करने में? साला ये दोनों माँ बीटा जाने कैसे है जो समझ हे नहीं आते."

"इसका मतलब यही है भोले की अर्जुन व्यस्त होने का दिखावा कर रहा है और अगर वो चाचा जी के आसपास है तोह मतलब वो काम पर हे है. खैर छोड़ ये सब और ये सोच के अब हमारी अगली महफ़िल जाने कब होने वाली है."

"हाहाहा.. मुझे भी लगता है के आने वाले समय में आज के बाद हम लोग शायद हे एक महीने तक एकसाथ बैठ सके. तू और इन्दर तोह बिज़नेस में व्यस्त रहने वाले हो. मेरा काम भी बहोत पड़ा है जिसके साथ साथ घर भी देखना पड़ेगा. संजीव भी केरला जा रहा है और अर्जुन के न रहने से रात घर हे गुजारनी पड़ेंगी. जैसे तू करता है."

"मेरा तोह हमेशा से हे ऐसा है भोले. बिज़नेस दिल्ली में हे नहीं करना. जो पहले से है उसको भी देखना है और हफ्ते में 5 रात हवेली पर हर हाल में. चल ाची बात है के तू भी चाचा जी के डंडे टेल रहेगा. इन्दर के रहते तुझे महफ़िल की परेशानी तोह नहीं होने वाली. बाकी संजीव अर्जुन ाचा काम करते है यार जो तुझे खुद महसूस हुआ के वो नहीं रहेंगे तोह तुझे रहना पड़ेगा.", उमेद गहराती शाम को देख रहा था. जल्द हे ये रात में तब्दली हो जायेगी और विरानो से आगे फिर से महानगर की चकाचौंध में तलाश होगी कुछ शांत लम्हो की. पिछली गाडी में अन्नू आदतन सो चुकी थी और अलीशा अपने जीवन के बारे में सोचती danva-dol.

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"तू इतना बड़ा है, गॉड में चढ़ के बैठेगा? चल सही से सामने बैठ अपनी भाभी के.", कौशल्या जी ने अंदर वाले आँगन में जब राधिका की ख़ास रस्मे शुरू की तोह devar-bhabhi की रसम होने पर अर्जुन सुर्ख साड़ी में सजी अपनी भाभी की गॉड में हे बैठने लगा. संजीव भी हंस रहा था अपने पिता, माँ और बहनो के साथ साथ. राधिका कुछ लम्बा हे घूंगट निकले थी जिसको खुद कौशल्या जी ने माथे तक ऊँचा किया. लाल बिंदी, भरी हुई मांग, सोने का टिका और गले में मंगलसूत्र के साथ संजीव द्वारा दी गयी सोने की खूबसूरत चैन. कैसा हुआ ब्लाउज जिसमे उभर अपने अकार को बखूबी दर्शा रहे थे. मेहंदी लगे गोर गोर हाथ में लाल कंगन और sunehari-laal चूड़ियां. राधिका हर नजर में एक दिलकश युवती थी और अब संजीव की jiwan-sangini.

"मैं छोटा हु दादी और बहोत छोटा. फिल्मो में भी देखा है की देवर भाभी की गॉड में हे बैठता है. नहीं तोह मैं नेग नहीं लेने वाला. और ये इतनी नाजुक भी नहीं होंगी. मैं तोह कृष्णा चची और कोमल दीदी तक की गॉड में बैठ चूका हु.", अर्जुन भी फटकार को दरकिनार करता अपनी ज़िद्द में ऐड गया. उसकी बहने जोश बढ़ा रही थी और सरोज भाभी टांग खिंचाई.

"बैठने दो न दादी. वैसे भी मुन्ना अभी बड़ा कहा हुआ है.", अब अर्जुन आँखें दिखा कर जैसे सरोज भाभी को याद करवा रहा था के उस मुन्ना का नन्हा मुन्ना लेते हुए वो भी रो कर बीच में हे भाग गयी थी. सरोज भाभी नजरो में हे झेंप कर बगले झाँकने लगी.

"बीटा, तेरी भाभी कुछ नाजुक भी है तेरे मुकाबले और तैयार हो कर बैठी तोह कपडे गहने सब खराब हो जायेंगे. चल तू संजीव की गॉड में बैठ जा.", ललिता जी ने अपना मैट रखा लेकिन अर्जुन टास से मास्स न हुआ. प्रियंका पीतल की परात में लाल रंग भर के इधर ले आयी थी जिस से अगला खेल होने वाला था.

"भाभी, आप हे बोल दो के मुझे बिठा सकती हो या नहीं. बस ये याद रखना के आज आपके पास ये एक हे मौका है खुदको संजीव भैया की मजबूत जोरू साबित करने का."

"ए.. पागल ये जोरू क्या होता है? उल्लू कही का.. राधिका इसकी बात का बुरा मैट मान न और तुम मन कर दो.", कृष्णा जी ने हँसते हुए अर्जुन की पीठ पर ढोल जमा दी.

"छोटा देवर मतलब तोह पहली औलाद हे होता है न माँ जी? इनके लिए ये पहले से हे इनका सबकुछ है तोह आज से मेरे लिए भी. और भाभी कभी haa-naa नहीं कहती अर्जुन. वो बस अपने देवर की हर चाहत का ख़याल रखती है. कमजोर भी हुई तोह कोई बात नहीं.", राधिका ने अर्जुन की कलाई पकड़ कर पूरे हक़ से उसको अपनी गॉड में आने को कहा. अर्जुन हिचकिचा रहा था और वो बैठने भी लगा, अपना भार जमीन पर करते हुए. कौशल्या जी तोह राधिका का जवाब सुन्न कर हे गदगद हो उठी थी जबकि ललिता जी ने नजर उतार कर वो पैसे एक तरफ रख दिए. कृष्णा जी ने लाल धागा टॉड कर टुकड़ा राधिका की बायीं हथेली में रखा और वह अर्जुन का हाथ रखने के बाद बोली.

"यही उम्मीद है सबको राधिका और तुम्हारी हर इत्छा भगवन पूरी करे. देवर सही मायने में पहली औलाद के साथ साथ छोटा भाई, मित्र और सेवक भी होता है. अब से अर्जुन पर तुम्हारा भी पूर्ण अधिकार.", आरती द्वारा आगे बढ़ाया शगुन का सामान भी कृष्णा जी ने राधिका संजीव के बीच रख दिया. अर्जुन उठने लगा तोह राधिका ने कन्धा दबा कर उसको वैसे हे बैठे रहने को कहा. कृष्णा जी के बाद रेखा जी ने भी कोमल की मदद से दोनों के शगुन किये और फिर राधिका ने भी अपनी सभी ननद को अपनी पसंद के कपडे भेंट किये.

"अब तोह उठ जा रे कपूत अपनी भाभी की गॉड तोड़ेगा क्या?", कौशल्या जी ने खिंच कर अब अर्जुन को अलग तोह कर दिया लेकिन वो उनके करीब हे बैठा. थाल सामने रखा गया और नियम भी समझाए की जो पहले अंगूठी पकड़ेगा वो दूसरे से एक वचन या उपहार ले सकता है. गहरे लाल रंग के पानी में तारा ने हे अंगूठी दाल कर फिराई और हाथ बहार निकल लिए. अभी से 2 गुट बन चुके थे जिसमे पहली बार अर्जुन संजीव की जगह अपनी भाभी की तरफ था.

"भाभी, तारा ने चीटिंग की है. आप भैया वाली तरफ ढूंढो.", अर्जुन हाथ पकड़ कर राधिका को खुद हे अंगूठी धुदनवाने लगा तोह ऋतू ने उसको वही रोक लिया.

"दादी, आपके सामने हे चीटिंग. ये लोग 2 हाथो से ढून्ढ रहे है तोह फिर हम भी भैया की तरफ से शामिल हो जाए?", एक बार और अर्जुन दांत खा कर हटा. संजीव की ऊँगली अंगूठी को छो गयी थी और जबतक वो वापिस हाथ पीछे करता राधिका ने हथेली ऊपर उठा ली.

"मेरी बची जीत गयी रे बिमा कंपनी. चल अब तैयार हो जा ज़िन्दगी भर बांग देने के लिए.", कौशल्या जी तोह संजीव के हे मजे ले रही थी और अर्जुन ख़ुशी मनाता हुआ अपनी भाभी को बाहों में भरे चीख रहा था.

"भाभी, आप बचा कर रखो ये प्रॉमिस. यहु.. भैया तोह फंस गए पक्के वाले.", राधिका तोह इस मजबूत जकड में जैसे ये भी भूल गयी थी की वो हैं कहा पर. कृष्णा जी ने हे अर्जुन को शांत किया.

"दम घुट जायेगा बीटा उसका. चल संजीव अब बता तू क्या करेगा?"

"गिफ्ट?"

"न न.. भाभी आप वचन हे मांगो. और दादी आपने कहा था के जो जीतेगा उसको आप अपनी तरफ से गिफ्ट डौगी.", अर्जुन ने ये नया हे फरमान सुना दिया जो हुआ हे नहीं था. कौशल्या जी हंसती हुई सर हिला कर ये भी मान गयी.

"राधिका एक साल तक चूल्हे पर नहीं जायेगी. और एक महीना तक बर्तन उठाने की भी सख्त मनाही है. सजा उसको जिसके सामने ऐसा होता दिखा.", अब थानेदारनी ने एक बार फिर साबित किया था के वो अपनी बेटियों में फरक नहीं करती और एक nav-vadhu को जीवन का महत्व बताना उन्हें ाचे से आता था.

"देखा भाभी मेरी दादी का दिल. ये बस मेरे साथ हे सख्त है और थोड़ा बहोत मेरे पापा के.", अर्जुन का तंज सुन्न कर एक बार फिर उसके सर पर चपत पड़ी जिस पर पहली बार राधिका खुल कर हंसी थी. ये सारा घटनाक्रम कोई न कोई कैमरा में क़ैद करता रहा. 7 बजे शुरू हुआ ये समां तभी थमा जब 9 बजे रामेश्वर जी की आवाज आयी.

"अज्ज रोटी दी हड़ताल सी?", पंजाबी सुनते हे अर्जुन झट्ट उठ गया.

"लग जाओ सब काम पे. मैं तोह चला ऊपर अपने कमरे में. एसएसपी साहब की पंजाबी मतलब जो सामने आया उसकी शामत. रोटी बन्न जाये तोह आवाज लगा देना कोमल दीदी.", जिस तरह अर्जुन मैदान छोड़ कर भगा था सभी हंस रहे थे. कोमल, प्रियंका और तारा सीधा रसोई में चली गयी. सब्जी पहले हे बन्न चुकी थी और अब बस रोटी बनानी थी. राजकुमार जी संजीव को साथ लिए बहार की तरफ चल दिए तोह सरोज भाभी के साथ अलका, आरती और रुपाली राधिका को लिए उसके कमरे की तरफ. आज राधिका की सुहागरात जो थी और कुछ वैसी हे तैयारी माधुरी के ससुराल में चल रही थी. एक हे रात में 2 अलग अलग जगह nav-dampatya जीवन के पहला अंतरंग समय घटने वाला था, जिसके गवाह भी सिर्फ वही होने वाले थे जो कमरे में बंद होंगे.
 
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पहली मुलाकात

"आज कुछ जानकारी ले सकता हु आपसे दादा जी? ये समझ लीजिये की आज मैं एक नौसिखिया अभ्यर्थी हु और आप शिक्षक अपने महकमे के.", अपनी दादी के पाँव की मालिश करता हुआ अर्जुन बगल में हे बैठे अपने दादा जी से पूछ रहा था. रामेश्वर जी अभी भी डायरी में जाने कौनसे खर्चे और hisaab-kitab में लगे हुए थे अपनी नजदीक की ऐनक लगाए. उसके ऐसे सवाल पर उन्होंने कलम डायरी में रख कर डायरी टेलीफोन वाले स्टूल पर रख दी. घर में ज्यादातर लोगो का खाना हो चूका था और सभी अपनी नींद पूरी करने के लिए कमरों में जा चुके थे. हुसैन साहब भी लौट आये थे नरिंदर के साथ और उनका परिवार Ritu-Tara वाले 2 कमरों में सोने की तयारी कर रहा था. रौशनी, अंजलि भी घर में हे थी जो माधुरी वाले कमरे में ठहरी थी जबकि कोमल के पास प्रियंका और रुपाली ने Aarti/Tara के साथ डेरा जमाया था. मुस्कान रेखा जी के पास थी जहा ऋतू और अलका भी थी. इस तरह से संजीव की तरफ आज सिर्फ वो और राधिका हे थे.

"इस नौसिखिये की शारीरिक शिक्षा का हे परिणाम नहीं आया तोह अगले पाठ कैसे शुरू हो सकते है? लेकिन अगर तुम कुछ व्यावहारिक बात करना चाहते हो तोह मैं सुन्न रहा हु. जितना मुनासिब लगेगा उतना जरूर बताऊंगा.", रामेश्वर जी को जाने क्या दिलचस्पी जगी थी अर्जुन के सवाल से जो वो करवट ले कर उसको देखते हुए बोले. बेशक कौशल्या जी इसके खिलाफ थी क्योंकि अर्जुन के सवाल से उनका जी घबराने लगता था.

"दादी, कुछ ऐसा वैसा नहीं पूछ रहा जो आप अपनी नींद ख़राब करने का सोच रही है. आप आराम करो और वैसे भी हम गाँव की इतनी बातें जब कर चुके है तोह आपको क्या लगता है मैं कोई ऐसा वैसा करने वाला हु?", अर्जुन द्वारा बिना पूछे हे सब बताने पर कौशल्या जी समझ गयी की इसके दिमाग में कुछ न कुछ तोह चल हे रहा है. फिर भी वो बस 'है' बोल कर अपने पति को देखने लगी.

"मैं जान न चाहता हु की किसी दुर्घटना की जांच का सबसे पहला नियम क्या है?", एक पंक्ति में हे अर्जुन ने जो पुछा था वो सुन्न ने में तोह साधारण सी बात लगती थी और ये कोई बड़ा सवाल भी न था परन्तु रामेश्वर जी को जैसे इसकी उम्मीद नहीं थी. वो अपने पौटे के दिमाग से भली भांति परिचित थे और इस सवाल को सिर्फ टरकाया नहीं जा सकता था.

"घटना के बारे में कुछ जानकारी देना चाहोगे बरखुरदार? मतलब ऐसी घटना जिसकी प्राथमिकी दर्ज हो या फिर सामाजिक दायित्व के निर्वहन पर अनलिखी घटना को सुलझाना? दोतरफा मुठभेड़, हादसा या फिर कुछ और?", अब वो ठीक पोलिसिअ लहजे में थे और अर्जुन मैं हे मैं खुश था की उसके सवाल ने उबासी लेते उसके दादा जी को सजग कर दिया.

"पब्लिक प्लेस पर bhid-bhaad में अगर कोई दुर्घटना हुई हो, बिना लोगो की नजरो में आये और भुगतने वाला न इसकी रिपोर्ट करे और न हे वो कोई भविष्य जांच में सहयोग देना चाहे तोह क्या इसको नैतिक जिम्मेवारी समझ कर हल करना चाहिए? और अगर करना आवश्यक हो जैसा की इसके साथ किसी बड़े अपराधी के सम्मिलित होने की संभावना हो तोह जांच के नियम क्या होंगे?", अब कौशल्या जी भी उत्साहित दिखी ऐसे गंभीर सवाल सुन्न कर. वो उठ कर बिस्टेर से कमर टिकती हुई अपने पति को देख रही थी जैसे उन्हें भी इनके जवाब चाहिए हो. रामेश्वर जी ने इन दोनों को देखा तोह वो समझ गए की अब जवाब जरूर देना होगा.

"ऐसे मामलो में 90 प्रतिशत तोह मामला ख़ारिज हे कर दिया जाता शीर्मअं नौसिखिया जी. पुलिस के पास पहले हे लंबित अपराधों और जाँच का लम्बा चौड़ा पिटारा रहता है. लेकिन.. जैसा तुमने इसमें संभावना का उल्लेख किया तोह पहले एक ठोस rekha-lekha बनाया जाता है जिसमे वो वंचित अपराधी घटना के करीब दर्शया जाए. उसके बाद सर्किल अफसर से इस बारे में विचार करके जांच को दो भिन्न तरीको में से किसी एक से करने की अनुमति ली जाती है जिसमे अधिकतर निर्विरोध लेकिन दायरे से बहार हे swayam-sakshamta से चार्ज लिया जाता है. बड़े बड़े प्रभावी लोगो के मामलो में भी यही निति अपनायी जाती है जिस से ज्यादा लोगो को तकलीफ न हो और पुख्ता सबूत जूता कर गुप्त रिपोर्ट पेश करने के बाद हे कोर्ट से नोटिस बनवाया जाता है, अगर दोषी के खिलाफ हर सबूत हो. अब इसमें भी एक पेच है. पूछो क्या?", रामेश्वर जी के ऐसा कहने पर जवाब कौशल्या जी ने दिया. वो भी बरसो से अपने इस पुलिस जीवनसाथी के साथ रही थी.

"वो व्यक्ति जिसके साथ दुर्घटना हुई थी वो न पेश होने वाला कायरत में जी. और वो हे मुकर गया तोह फेर जाँच किस बिना पर? स्वतंत्र जांच में भी अपराधी का पिछले रिकॉर्ड देखा जाएगा और उस से जुड़े सबूत भी. मतलब जांच सिर्फ इस घटना की हे नहीं होगी बल्कि उस मुलाजिम को मुजरिम का इतिहास भी खंगालना होगा, सबूत के साथ. फिर कही पुराने केस की फाइल खुलवाने के साथ ये घटना भी जोड़ी जायेगी और यहाँ प्रत्यक्षदर्शी की जरुरत होगी बजाये की बिक्टीम (विक्टिम) या पीड़ित के.", रामेश्वर जी सर हिलाते हुए मुस्कुराये तोह अर्जुन हैरत से अपनी दादी को देखने लगा.

"आप तोह सचमुच थानेदारनी हो दादी. मुझे लगा था के सब आपको बौ जी की वजह से ऐसा बोलते है. कानून की बड़ी समझ है आपको तोह. फिर आप हे बताओ के अगर प्रत्यक्षदर्शी न हो तोह क्या होगा?"

"बीटा तेरी दादी अक्सर केस की फाइल पढ़ा करती थी जब जब मैं घर आता. बहोत बार तोह मैं देर रात को इस से हे सब जानकारी साँझा करता था सुझाव के लिए. एक गृहस्थ महिला अक्सर बारीक पहलुओं को naukri-pesha से बेहतर देख सकती है. वैसे बात काटना चाहूंगा तुम्हारी. लेकिन तुम अपना पूरा सवाल पूछो.", रामेश्वर जी ने अर्जुन या कौशल्या जी को आगे कोई मौका न दिया चर्चा बदलने का.

"स्वतंत्र प्रभाव से किसी अलिखित जुर्म जिसमे पीड़ित की गवाही शामिल न हो तोह उसकी जांच कैसे शुरू करनी चाहिए? अपराधी के बारे में भी कोई जानकारी नहीं है और घटनास्थल से भी शायद मुख्या सबूत गायब हो चुके हो. इतना हो सकता है की पीड़ित से जानकारी जुताई जा सकती है, अप्रत्यक्ष.", अर्जुन अब अपने दादा जी के पाँव की उँगलियों के पोरो को मालिश दे रहा था. बढ़ती उम्र के साथ वह का मांस अक्सर सख्त हो जाता था.

"मजेदार केस है ये तोह. पीड़ित डरा हुआ है या वो बचाव करना चाहता है. अपराधी शातिर है और वो निर्भीक भी अगर वो जिस पर हुम्ला कर रहा है उसके मानसिक क्षेत्र को जानता है, तभी तोह रिपोर्ट नहीं होने वाली. सबसे जरुरी बात है की घटनास्थल पर सबूत जरूर होंगे अगर मामला हमले का है. ऐसा कोई अपराधी नहीं होता जो सारे सबूत मिटा दे और काबिल इंसान बारिश के पानी से भी राखत की 2 बूँद अलग कर के सबूत जूता हे लेते है. मामला लूटपाट का है तोह उन चीजों का ब्यौरा बनाओ जो तुम्हे लगता है की पीड़ित के पास से गायब हुई, अप्रत्यक्ष जरिये से और उनकी तलाश करो जिस पर संदेह हो उनके आसपास. मिलान होने पर उनमे से कुछ सामान खुद गायब करो या किसी प्राइवेट की सेवा लो. उँगलियों के मिलान की रिपोर्ट आने के बाद तुम आगे कार्यवाही कर सकते हो. इस सबमे 2 दिन भी लग सकते है और 2 साल भी. जाँच ऐसे हे तोह चलती है.", रामेश्वर जी के कहे ौंसर अर्जुन दिमाग में हे उस घटना का खाखा तैयार करके सोचने लगा.

"मामला अगर हमले या शारीरक क्षति पहुंचने का हो तोह दादा जी?"

"वो पेचीदा हो सकता है बीटा. क्योंकि यहाँ मिलाने के लिए तुम्हारे पास ज्यादा सामान नहीं होता. फिर तोह बस जख्म और उसको देने वाला हथियार हे किसी मुकाम तक ले जाता है. लेकिन उस से पहले करनी होती है घटनास्थल की बारीकी से जांच. एक धागा भी कई बार बड़े बड़े मामले सुलझा जाता है जो सही से नजर आ जाये तोह. Log-baag अक्सर chaku-chura, बन्दूक हथियार साफ़ कर देते है. गोली के खोल उठा ले जाते है लेकिन इस सबमे भी वो पीछे कही जूते के निशान तोह कही जख्म छोड़ हे जाते है. गोली कैसी थी, तलवार से हुम्ला हुआ या खंजर से, शनिदे की सूई चुभाई गयी तोह वो कैसा था और कहा मिल सकता है. अगर कोई मामला सुलझाने की सोच लो तोह फिर समझो तुम आधी जीत उस सोच पर हे पा गए. बाकी तुम्हारे हाथ कुछ सबूत तोह लगने हे वाले है. जनता से घिरी जगह के मामलो में दबी छुपी सपोर्ट भी मिल हे जाती है अगर तुम सही से अवलोकन करो तोह. वैसे तुम इंजीनियर बन्न ने की तैयारी कर रहे हो या .."

"हाहाहा.. वो मैं करमचंद पढ़ रहा था और उसमे एक केस था जिसमे एक व्यक्ति की हत्या ऐसे हथियार से की जाती है जो होता हे नहीं. शरीर में चाकू जैसा घाव होता है और विक्टिम मारा हुआ, वो भी बंद कमरे में. दरवाजे को खोलने के भी निशाँ नहीं मिलते और कही कोई फिंगरप्रिंट भी नहीं."

"और ये वाकया जरूर शिमला में हुआ होगा?", रामेश्वर जी जैसे मुस्कुराये थे अर्जुन समझ गया था के वो उतना भी तेज नहीं.

"लेकिन इसमें वो जांच वाली बात तोह नहीं आयी जी जैसी ये कर रहा था इतनी देर से."

"कौशल्या तेरा ये बैलबुद्धि बर्फ के चाकू वाला वो ख़याली किस्सा सुना कर भटकना छह रहा है जो पूरे भारतवर्ष ने सुना होगा. विज्ञान का प्रयोग, चुम्बक और ठण्ड का सही इस्तेमाल एक अपराध को अंजाम देने के लिए और उसके बाद अपराधी का पकड़ा भी जाना तोह उस 555 सिग्रत्ती के टुकड़े से जो जमी हुई घास के ऊपर फंसा रह जाता है. ाची बात है न के अर्जुन घटनाओ के पहलु समझना चाहता है कौशल्या. हम अक्सर वही पर तोह गलती कर जाते है और najar-andaaj कर देते है उन छोटी छोटी बातों को सिर्फ ये सोच कर की जुर्म तोह हो चूका, अपराधी हाथ न लगा... बीटा तुम जो भी बनो, जैसा दिल चाहे वैसा करो लेकिन विचार रखना बंद मैट करना. चर्चा करना बंद मैट करना कभी भी. अब सो जाओ और सुबह 5 बजे मेरे पास आना.", रामेश्वर जी ने तेल की शीशी निचे फर्श पर एक तरफ रखने के बाद लैंप जगाया और पाँव सीधे कर लिए. अपने दादा दादी के पाँव छू कर अर्जुन भी अपनी बहनो को बुलाने उनकी तरफ चल दिया. Ritu-Alka ने कहा था के वो लोग पिछले घर में सोने वाली है. पंजाब से आयी लड़किया भी जा चुकी थी तोह वह आज बस उनका हे कब्ज़ा था, वो बात अलग थी की कौशल्या जी की नजरो में उधर 4-5 लड़कियां सोने वाली थी.

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"तुम कुछ बताना चाहते थे संजीव लेकिन अपनी बहनो की वजह से तुमने खाने के वक़्त जैसे उस बात को ताल दिया. सुबह तक तोह तुम ठीक थे और चैन से अर्जुन के साथ भी सोये हुए थे. फिर दोपहर के बाद तुम अपनी परेशानी को छुपाते दिख रहे हो. लवर की तरह न सही पर दोस्त की तरह तोह बता हे सकते हो.", राधिका ने वो सुर्ख लाल साड़ी बाथरूम से उतार कर अब बिना ब्याह का लेकिन पाँव तक पूरी लम्बाई का ये उजला हुआ रेशमी गाउन पहन लिया था जिसमे वो बाला की खूबसूरत लग रही थी. गहनों के नाम पर सिर्फ मंगलसूत्र और कलाई में सुहागन की निशानी थी. बाल सही से रबर में बांध कर वो एक चादर अपने ऊपर डालती हुई अपने पति की बगल में हे आ लेती, पीठ बीएड की पुष्ट पर टिकते हुए. संजीव भी कुर्ते पयजामे में कुछ बेहतर महसूस कर रहा था और कमरे में एक की भरपूर ठंडक बहार की गर्मी झुटला रही थी.

"ऐसी बात नहीं है राधिका, बस मैं ये सोच रहा हु की रेखा चची के चोट आयी है और वो भी शादी के वक़्त. न हे अर्जुन ने कुछ बताया और न हे किसी और ने. अर्जुन को भी ज्यादा नहीं पता होगा इसलिए उसने नहीं बताया लेकिन रेखा चची मेरे लिए माँ से काम नहीं है. तुम्हे मैंने बताया था न मेरी गुरु के बारे में? वो रेखा चची हे है जिन्होंने मुझमे उस संजीव को देखा और साकार किया जो तुम्हे पसंद आया.", संजीव की बात सुन्न कर राधिका कुछ हैरान हुई और वो पूछने से रोक भी न पायी खुदको.

"मतलब ये रेखा चची जी वो है जिन्होंने तुम्हे पढ़ाया और सिविल सर्विसेज तक ले गयी? मुझे लगा था के वो कोई तुम्हारे कॉलेज की टीचर होंगी. और उन्हें प्रवेश प्रक्रिया के बारे में भी इतना कुछ पता था? और चोट... लग गयी होगी भीड़ में संजीव. मेरा पहला हे दिन है इसलिए मैंने भी नहीं पुछा."

"हाहाहा.. तुम पूछती और सही जवाब मिल जाता? और रही बात कॉलेज टीचर की तोह वो ज़िन्दगी के जाने कितने टीचर्स को पानी भरवा दे. मैं 19 का था उस समय जब कॉलेज में था और चची के साथ उनके पीहर गया था. तबतक उन्होंने पढ़ाई के साथ साथ दादी जी से बोल कर मेरी sharirik-raksha की कक्षाएं चालू करवा दी थी. रेखा चची न सिर्फ किसी भी शिक्षा के विषय में बल्कि हर संभावित क्षेत्र में जिज्ञासा और ज्ञान रखती है. जब मैं उधर गया था तोह मैंने उनके पिता जी के साथ बिट्टू मां (तेजपाल) को लिसेंसी असले की सफाई करते देखा था. कारोबारी परिवार है और मां तोह खुद शो भी है क्सक्सक्सक्स थाने के जो उस समय ऐसी थे. चची वह जो होती है वो यहाँ नहीं होती और यहाँ जो है वो भी उनका एक सच है.", संजीव जैसे उधेड़बुन में था और बात को सही से कहने के लिए लफ्ज़ ढून्ढ रहा था.

"एक बार में एक किस्सा बताओ न संजीव. या तोह परिवार के बारे में या चची के बारे में.", संजीव अपनी बीवी की बात पर झेंप सा गया.

"हाँ तोह मैं कह रहा था के चची हंसमुख होने के साथ हे गंभीर इंसान है लेकिन उनको सही से जान पाना बहोत मुश्किल. मतलब उन्होंने मेरे सामने एक स्वचालित पिस्तौल एक मिनट से पहले खोल कर पूरा बंद भी कर दिया और जोड़ने के बाद मैगज़ीन लोड भी. इतना हे नहीं उनके निशाने इतने सटीक थे की बिट्टू मां भी आसपास न दिखे, जबकि प्रशिक्षित निशानेबाज होने के साथ साथ वो इस महकमे के ख़ास है. हर गोली 10 गज से ज्यादा दुरी पर भी एक हे जगह वो भी हर बार.", संजीव ने जैसे बहोत बड़ा रहस्य खोल दिया था और राधिका किसी बचे की तरह एकटक सुन्न रही थी.

"मतलब अर्जुन की माँ जो हैं वो त्रिनेड शूटर है? क्या इनकी खुद की शूटिंग रेंज भी है?"

"हाहाहा.. अरे लक्ष्मीबाई ऐसा नहीं है. घर जरूर बड़ा है और पहले एक हॉल होता था उधर ननिहाल में जहा अर्जुन के मां लोग कसरत करते थे और कभी कभी हथियारों की प्रैक्टिस भी. राजेश मां भी तोह क्राइम ब्रांच में अफसर है. बाद में अर्जुन की वजह से उस माहौल को हे गायब कर दिया गया. लेकिन रेखा चची ने वो इसलिए किया था जिस से मैं समझ सकू की जीवन में हर काम की सीमा हम खुद बनाते है. तेरे इस no सुच लिमिट िफ़ वे थिंक एंड एक्ट प्रक्टिकली. उनका मतलब था के प्रशिक्षण भी हमारे हे प्रयास से मुमकिन होता है और काबिल व्यक्ति सहारे नहीं ढूंढ़ता. मैं जो समझाना छह रहा हु वो ये है की swayam-jiwan में वो खुद एक रहस्य है लेकिन उस से ज्यादा वो एक सुलझी हुई इंसान है जो सबकी परवाह करती है और उन्हें ताक़त या काबिलियत का कोई गुमान हे नहीं. एक सन्यासी की तरह निर्मल और नरम. और अब दूसरा पहलु सुनो और वो है उनका सजग रहना. तोह गलती से भी वो ऐसे हे चोट नहीं खा सकती और दृढ इतनी है की अगर कुछ नहीं बताना चाहती तोह हमारी क्या शंकर चाचा की भी मजाल नहीं जो जवाब ले ले. अर्जुन सुबह निकल जाएगा और ये बात यही अधूरी रह जायेगी.", राधिका के साथ संजीव ने ये तोह बयान दिया की अर्जुन को ध्यान में रखते हुए सिर्फ इस घर में हे नहीं और कई जगह भी बदलाव किये गए. बहोत से सच जो लगभग हर व्यक्ति जानता था उन्हें अर्जुन से छुपाया गया और कुछ सच ऐसे भी थे जिन्हे अर्जुन के साथ साथ घर के भी बहोत से लोग नहीं जानते थे. जैसा की रेखा के जीवन के अनकहे या अनखुले राज.

"तुम क्यों नहीं कुछ करते? और ये अर्जुन क्या हमारी वजह से जा रहा है और उसने क्यों कोशिश नहीं की सब जान ने की.?", राधिका के सवाल पर संजीव ने हाथ उसकी कमर में दाल कर थोड़ा करीब खिंच लिया.

"आज इस कमरे में हम दोनों का ये रिश्ता शुरू हो रहा है राधिका और मैंने तुमसे वो बात सिर्फ इसलिए साँझा की है जिस से मैं हमारे बीच विश्वास की मजबूत नीव रख सकू. अर्जुन को भी चची के इस पहलु की जानकारी नहीं है और उन्होंने उस दिन के बाद पिस्तौल को छुआ भी नहीं. मतलब तुम्हे ये बात यही दफ़न करनी है और चची को कभी भी आंकना नहीं. वो हमारी छोटी माँ है और हमेशा प्यार करनी वाली माँ. अर्जुन उत्साहित और जज्बाती है जिसको तुम एकदम नहीं समझ सकोगी. साथ वक़्त गुजरो और खुद समझो. हाँ जो तये हुआ है वो सब उस से दूर हे रखना. कबर के निचे से भी कबर खोद लेता है वो, तुम्हे यकीन नहीं होगा पर यही सच है. दादा जी, रेखा चची और Alka-Ritu के बारे में जितना हो सके काम से काम उसके साथ बात करना. वो धरना बना भी लेगा तोह तुम समझ नहीं पाओगी और फिर कुछ नहीं होने वाला. बचा है और एक प्यारा साफदिल बचा.", संजीव कुछ सोचता हुआ मुस्कुराने लगा था और उसका हाथ लगातार राधिका की पतली कमर को सहलाता रहा. रेशमी वस्त्र के निचे जैसे पंतय की पतली पट्टी का एहसास बात को कही और ले जा रहा हो.

"तुम जानते हे हो की मैं राज दफ़न रखना ाचे से जानती हु संजीव और मेरी लाइफ में तुम्हारे सिवा पहले कोई चाहत थी हे नहीं. अपनी एकलौती चाहत की हर चाहत मुझे बिना सवाल मंजूर. वैसे मुझे तुम्हारा घर, परिवार और हर सदस्य पसंद आया. सबसे ज्यादा तोह दादी जी.", राधिका को ठंडक महसूस हो रही थी जिस वजह से वो कुछ आगे सरक कर संजीव के जिस्म के करीब हो गयी. निचले हाथ पर राधिका के ठोस उभारो का एहसास संजीव के अंदर तक उतर गया. वो मामूली सा स्पर्श था लेकिन आखिर ये स्पर्श उस चाहत का था जो जीवन में नए रंग भरने आये थी. हाथ रंगतरा हुआ kataav-dar रेशमी कूल्हों पर आ रुका तोह राधिका का जिस्म झुरझुरी लेने लगा. वो इस पल में स्वाभाविक शर्म से पीछे होना चाहती थी लेकिन उस कठोर हथेली का प्रभाव इतना था जैसे वो गोलाकार कूल्हों के भीतर धंसती जा रही हो. जब ये कोशिश विफल होने लगी तोह राधिका ने चेहरा संजीव की गर्दन के करीब करते हुए कहा.

"तुम... क्या कर रहे हो संजीव? देखो... िस्सशहठ.. इतना जोर से नहीं.. वो दूध.. दूध भेजा था .. पी कर सो.. उम्मम्मम्म.", और यही संजीव अपनी सभी चिंता को दरकिनार करता हुआ निचले हाथ से करीब आये उस माध्यम से सतांन को दबा कर राधिका का चेहरा ऊपर करवा गया. रूई के गोले सा वो सतांन जैसे पहली बार ऐसा स्पर्श प् रहा था और हलके दर्द, नए एहसास और एक खुमारी में राधिका ने चेहरा ऊपर किया तोह उसकी बोलते होंठ अब संजीव के मुँह में समां गया. कूल्हे को दबा कर उसने राधिका अपने साथ हे चिपका ली थी और इत्मीनान से वो उन रसभरे अछूते होंठो को इत्मीनान से पीने लगा. ये होंठ किसी शिकार के नहीं थे और न हे सिर्फ एक युवती के. इन मदभरे लबों की मालकिन संजीव की चाहत, उसका अर्द्धक्षेत्र थी.. राधिका शर्मा. कूल्हों की भागवत का जायजा लेता हुआ वो लगातार दूसरे हाथ से एक सतांन को दबा रहा था जिसके प्रभाव से राधिका मचलती रही लेकिन बोल न सकीय. मदहोशी से उसके जिस्म ने जैसे संजीव का हे साथ दिया और चेहरा ढीला पड़ते हे वो खुद संजीव की जीभ अपने मुँह में भर्ती हुई साथ देने लगी.

"उह्ह्ह.. ये गलत है.. आह्हः..", संजीव तोह पल में हे उस मखमली जिस्म के ऊपर आ चूका था. नरम स्टैनो का उस इस्पात से सीने के निचे दबना और संजीव के निरंतर गहरे चुम्बन चेहरे और गर्दन पर होते देख राधिका की टाँगे विपरीत फैलने लगी.

"तुम मेरा प्यार हो राधिका और आज ये गलत वाली बात तुम्हारे काम नहीं आने वाली. आज तुम पूरी मेरी और मैं तुम्हारा.", चर्रर्र... और इस आवाज के साथ हे राधिका का सफ़ेद गाउन सीने से फट कर उन दोनों गोलाइयों को दिखा रहा था जो रेशमी हलकी नीली ब्रा में क़ैद थे. आधे कप की ब्रा के बहार से आधे उभारो का कटाव और वो नरम गोश्त. संजीव के होंठो ने देरी न करते हुए अपनी मोहर दोनों तरफ जड़ दी.

"Iss...ooiii.. मुझे लगा था.. आह्हः.. के हनीमून.. पर .. उम्म्म्म", बात फिर से अधूरी रह गयी जब संजीव अपना कुरता फेंक कर फिर से राधिका पर टूट पड़ा. वो पिछली शाम से हे उसके रूप और यौवन में झुलस रहा था और राधिका ने भी खूब तड़पाया था उसको अपनी अदाओ और इशारो से. लेकिन यहाँ वो अब उसकी गिरफ्त में थी. होंठो की साड़ी लाली संजीव रगड़ रगड़ कर खा चूका था और अब हर गुजरते पल के साथ राधिका हथियार डालती गयी.

"लाइट तोह बंद कर .."

"अब न लाइट बंद होगी और न प्यार करना. हनीमून पर तोह कमरे में कपडे भी नहीं मिलने वाले. इन्हे दबाने पर तुमने मुझसे 2 हफ्ते बात नहीं की थी न?", संजीव ने वो दोनों सफ़ेद कबूतर सामने हक्क वाली ब्रा से आजाद किये तोह एक बार उसका चेहरा भी जड़ हो गया. कितने खूबसूरत उभार थे राधिका के. किसी नारियल को बीच से काट दिया गया हो ठीक वैसे गोलाकार और भरपूर कसावट लिए. उन्हें और खूबसूरत बनता था रक्तिम घेरा और कठै चने के दाने जितने चूचक. वो अब अकड़ रहे थे जैसे पहले संजीव ने महसूस न किये जब हाथ लगाया था. राधिका कौतहूल वश अपने पति को कुछ न करता देख उसकी आँखों को देखने लगी तोह शर्म से नजरे घुमा ली. संजीव किसी चुम्बक की तरह खींचता हुआ एक चूचक पर होंठ रख कर ठंडा सा हो गया. वो कसाव और कड़ापन जिसके निचे मांस के नरम गोले का मंच. जीभ से चूचक कुरेदते हे राधिका ने चादर मुठी में भर कर खिंच ली.

"उफ़.. पागल क्या करते हो.. आह्हः माँ.. आराम से..", लेकिन संजीव किसी भूखे बचे की तरह जैसे किशमिश को अंगूर बनाने की असफल कोशिश करने लगा. होंठो के बाद जीभ और फिर दांत.. राधिका को सनसनाहट सी होने लगी और पेट में अकड़न. वो धकेलना चाहती थी संजीव को अपने ऊपर से लेकिन जिस्म जैसे ये एहसास भी चाहता था. दूसरा उभर किसी भोंपू की तरह दबाता हुआ संजीव खली हाथ से राधिका का गाउन कमर की तरफ चढ़ाता हुआ उसके मलाई से चिकने पाँव सहलाते हुए जांघ तक चला आया. यही वो पल था जब राधिका ने गर्दन पटकनी शुरू कर दी. बाल ast-vyast हो चुके थे और एक की ठंडक में भी तापमान बढ़ता गया.

"बोलता था की बड़ी हो जाओ थोड़ा. देखो 5 मिनट में तुम्हारा काम हो गया.", राधिका का शरीर झटके लेने लगा था और संजीव मुस्कुरा कर एक पल अलग हुआ लेकिन राधिका जबतक शर्म से उबार पाती उसकी टांगो के बीच संजीव जैसे खो सा गया.

"छी... गंदे कही के वह से बहार निकलो.. आउच.. सुना नहीं.. ओह्ह्ह्ह माँ..", और यहाँ वो इलास्टिक वाली पंतय ठीक योनि भाग के सामने से टॉड कर संजीव गीले हुए योनिकुंड को हे खाने लगा. राधिका अब कुछ जोर आजमाइश कर रही थी जबकि संजीव उसकी दोनों जंघे मजबूती से दूर किये निरंतर वो रास पीटा गया जो राधिका ने पहली बार बहाया था अपने पति की छेड़छाड़ से. एक पल वो भी आया जब राधिका कमजोर हो चली. योनि की दरार में लगातार चलती संजीव की जीभ ने उसको नयी दुनिया का एहसास करवाया था और वो खुदसे उसका सर अपने गुप्तांग पर दबती हुई भलभला कर जहदने लगी. ये सखलन सचमुच तीव्र था और सही मायने में रसभरा. संजीव ने जांघो से हाथ हटा कर निर्वस्त्र चुचो पर टिका कर तबतक मुखमैथुन किया जबतक योनि की दरार सहज न हो गयी.

"गुस्सा काम किया करो डार्लिंग नहीं तोह वह से भी कड़वे हो जाओगी. फ़िलहाल तोह मीठी हे हो बस जोर ज्यादा लगता है.", संजीव पायजामा खोल कर राधिका के जिस्म पर आ लेता तोह राधिका उस खुमार से बहार निकली. उसकी पंतय जिस्म से नदारद थी और गाउन 2 पल्लो में फैला था बिस्टेर पर.

"ोये.. बेशरम कही के.. बीवी के साथ ऐसा करता है क्या कोई? की.. ये सब न तुम लड़के वो घटिया पोर्न से सीखते हो जो बिना लेबल की कसेट्टी में छुपा के रखते है. और तुम्हे जरा भी शर्म नहीं है.."

"वो प्रो शायद तुम भी देखती हो डार्लिंग नहीं तोह इतनी डिटेल नहीं बताती. और ऐसा मैंने इतिहास में पढ़ा देखा है न की नीली फिल्म से. सचमुच तुम इस मामले में अनारी हे हो राधिका लेकिन एक मीठी अनारी जो आज लड़की से औरत बन्न ने वाली है, मेरी औरत.", संजीव ने हलके प्रयास से राधिका की एक जांघ ऊपर उठाते हुए तकिया खिंच कर कूल्हों के निचे फंसाया तोह वो हैरत से देख रही थी. अब शर्म के साथ साथ लालसा भी थी जान ने की आखिर ये सब होता क्या है.

"मैं नहीं देखती वो सब और मान लिया हम ऐसा कर सकते है लेकिन बेशर्मी तोह नहीं."

"तुम जो कह रही हो खुद मानती नहीं हो. अभी सुना था मैंने जब तुम बोल रही थी की 'ओह्ह संजीव जोर से.. आठ.. संजीव खा जाओ..',", ये बात संजीव अपनी तरफ से हे कह रहा था जिस से राधिका आँखें बड़ी बड़ी करके जैसे उस से लड़ने हे वाली हो लेकिन बोलने से पहले हे एक जोर हिचकी लगी और आवाज की जगह तेज चीख ने ले ली जिसको संजीव ने अपने होंठो में भर लिया. संजीव ने ध्यान भटका कर अपने सख्त लिंग को सही मुद्रा में करते हुए ये जोरदार वार किया था जिस से राधिका को बेचैनी न हो और जितना दर्द होना हो वो एक बार में हे हो जाए. अनुभव ने काम किया था और एक धक्के में हे नरम मांस की फांको के बीच की बंद दरार को फाड़ता हुआ संजीव का आधा लिंग अंदर जा घुसा. राधिका को ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उसके वह पर चाक़ू उतार दिया हो. लेकिन संजीव ने धैर्य से काम लेते हुए कुछ वक़्त उसका चेहरा सहलाने के साथ साथ होंठो को पीना जारी रखा. राधिका दर्द से उबार कर कुछ शांत होने लगी तोह माखन में आधी उतरी वो गरम छुरी इस धक्के से जड़ तक जा धंसी. अंडकोष फैली हुई जाएंगे के बीच योनि के रक्तिम मुहाने जा टकराये और वो लड़की से औरत बन्न गयी.

"बस हो गया राधिका.. शठ. हो गया जितना दर्द होना था.... अब तुम्हे और दर्द नहीं दूंगा जान.", संजीव मस्ती बंद करके बड़े प्यार से चेहरा ऊपर करके रोटी हुई राधिका का माथा सेहला रहा था. जिस्म स्थिर एक जगह और दिल में अपनी प्रेमिका के लिए सिर्फ और सिर्फ संवेदना. राधिका की आँखों से काजल ाँसों के साथ बह कर गाल और फिर बिस्टेर पर आ चला था. जिस्म का वो हिस्सा जैसे सुन्न पड़ गया था जिधर संजीव का सख्त लिंग खूंटे सा गदा था.

"बहोत गंदे हो तुम.. आठ.. बातों में लगा कर जान ले ली और अब बोल रहे हो की जो होना था हो गया. मैं नहीं बोलती तुम्हारे साथ.. जानवर हो पूरे.", संजीव बिचारे की तोह पूरी पीठ हे नोच ली थी राधिका ने 8 खून बहती लकीरे राधिका को नजर न आयी. लेकिन वो मुस्कुराने लगा ये सुन्न कर.

"एक न एक दिन तोह ये होना हे था जान और ऐसा काम मैं किसी होटल के बिस्टेर पर करके इस कमरे को तुच्छ नहीं बनाना चाहता था. ये हम दोनों की जीवन शय्या है जो हमारे पहले मिलान की याद रहेगी. तुम खूबसूरत होने के साथ साथ बहोत हिम्मतवाली भी हो. ी लव यू राधिका.", संजीव ने इस बार बहोत हे प्यार से हलके हलके कई चुम्बन उन होंठो पर जड़ दिए जिन्हे प्यार की बहोत जरुरत थी. गोरी बाहों के निचे से हाथ निकाल कर जैसे हे कमर ने गति पकड़ी राधिका ने एक बार फिर तीव्र दर्द महसूस किया. वो सख्त अंग जैसे उसकी योनि को चौड़ा करता लगातार अंदर बहार होने लगा था. संजीव उसके दोनों स्टैनो का मर्दन करता तोह दर्द का एहसास काम हो जाता और फिर वो पल भी आया जब राधिका की दोनों टैंगो ने संजीव की कमर को लपेट लिया. 'उम्म्म्म' की आवाज करती वो हर धक्के के साथ अब सिसकने लगी थी. योनि में अलग हे विस्फोट हो रहे थे और संजीव द्वारा स्टैनो को पीना, दबाना जैसे ाचा लगने लगा था.

"उम्म्म्म.. संजीवववव.. आह्ह्ह्ह... बाबू... आराम से.. आह्हः.. ये सब अलग है .. कुछ हो रहा है मुझे.. मैं मर्डर जाउंगी... मार दो मुझे.. खा जाओ इन्हे.. आह्हः माँ..", राधिका इतनी जोरो से चिल्लाई थी की उसकी आवाज अगर बगल के कमरे में अर्जुन होता तोह जरूर सुन्न लेता. संजीव ने भी बुरी तरह जकड़ते हुए अपने धक्के तेज कर दिए. दोनों के शरीर पसीने में लथपथ हो चुके थे और निचे बिछी चादर एक जगह से हलकी लाल. कई चूड़ियां तोह चटक कर बिखर चुकी थी लेकिन संजीव हुंकारता हुआ इस मिलान को वह ले चला जहा उसका भी जोर ख़तम होने वाला था.

"ुह्ह्ह्ह.. राधिकाआआ..", ये आखिर धक्का ऐसा था की वो दोनों हे एक दूसरे से जोंक की तरह लिपट गए. संजीव अपना पौरुष राधिका के गर्भ में उड़ेलता रहा और उसके एहसास मात्रा से राधिका एक बार फिर झाड़ गयी. दोनों अगले कुछ मिनट बस खामोश से ऐसे हे पड़े रहे. लिंग तिथिल हो कर बहार निकला तोह संजीव अलग हुआ.

"सॉरी. मैं सब ठीक करता हु.", संजीव निर्वस्त्र हे उठ कर खड़ा हुआ तोह राधिका ने शर्म के बावजूद नीची नजरो से उसके निर्वस्त्र जिस्म को देखा. कई जगह पुराने जख्मो के निशाँ और हर मांसपेशी उभरी हुई. बहार से वो एक साधारण इंसान था लेकिन कपड़ो से अलग होने पर जैसे इस्पात का बना हुआ एक मोहक पुरुष. सही मायने में एक भरपूर मर्द और जल्द हे राधिका का जिस्म दोनों बाँहों में उठा कर वो जिस्म बाथरूम चल पड़ा. शर्म से डुबकी सिमटी राधिका को ाचे से साफ़ करने के बाद वो टोलिया लपेट ऐसे बहार आया और कपडे ले जा कर वापिस दे कर कमरा ठीक करने लगा. चादर समेत कर पूरा बिस्टेर व्यवस्थित करने के बाद संजीव खुद हे राधिका को गॉड में लिए कमरे में लौटा.

"अब दर्द ज्यादा तोह नहीं है?"

"होगा कुछ समय तक तोह और तुमने किया भी बहोत जोर से था. आगे से तोह ऐसे नहीं होगा?"

"एक बार हे तोह होता है ऐसा. और ये दर्द भी थोड़ी देर में चला जाएगा और फिर तुम खुद हे ज्यादा जोर से करने को कहोगी. मैं ध्यान न हटाता तोह तुम्हे ज्यादा दर्द होता राधिका लेकिन फिर भी मुझे माफ़ करना. वैसे भी मुझे हर रात इस वक़्त के हे ख्वाब आते थे.", राधिका इस बार सिर्फ गाउन में हे थी और दोनों एक चादर के भीतर जहा संजीव के जिस्म पर बस टोलिया. दोनों एक दूसरे के आगोश में जहा राधिका को अब इस जिस्म का एहसास सुकून दे रहा था लेकिन वो बोल कर संजीव को हवा नहीं देने वाली थी.

"अगली बार तोह भूल हे जाओ. तुम ऐसे सपने देखते थे? छियई.. आने दो अर्जुन को फिर मैं उसको बताउंगी की उसके भैया कितने गंदे और बेशरम है."

"क्या कहोगी अर्जुन को की मैंने क्या किया तुम्हारे साथ? वो देवर है और तुमसे पहले कही वो हे न तुम्हे छेड़ दे. लड़खड़ाती चाल देख कर.", संजीव ने हँसते हुए एक चुकी को प्यार से दबाया तोह राधिका ने जोरदार चपत उसके कूल्हों पर टिका दी.

"हाथ कण्ट्रोल में रखो अपने और वो समझदार लड़का है तुम्हारी तरह बेशरम नहीं. उसको तोह मैं क्या हे कहूँगी पहले घर के लोगो से तोह बच जाऊ. क्या बहाना करुँगी जब चलने में दिक्कत होती उन्हें दिखेगी तोह?"

"बहाना काम नहीं करेगा लेकिन अगर हम एक और बार करेंगे तोह तुम ठीक हो जाओगी.", संजीव ने फिर से अकड़ा हुआ निप्पल मसला तोह राधिका मचल कर अलग हो गयी. वो पीठ करके लेटने लगी थी उसकी तरफ लेकिन संजीव कहा बाज आता.

"ऐसे तोह एक हे रात में आगे पीछे दोनों तरफ काम हो जाएगा तुम्हरा."

"भगवन कसम अगर तुम चुप न हुए तोह मैं पहली बीवी होउंगी जो सुहागरात में हे पति का कतल कर देगी. ये पीछे क्या बोले तुम?", अब संजीव भी हाथ खड़े कर गया था.

"कुछ नहीं जान.. बस पीछे से आगे हे करने.. लेकिन तुम आराम से सो जाओ. मैं तुम्हारा ख़याल रखूँगा.", संजीव सकपकाता हुआ ऐसे हे पीछे से उसको बाहों में भर के लेट गया और मुँह चिपटी राधिका बस मुस्कुराती रही. सचमुच उसका पति उसको दिलोजान से प्यार करने के साथ साथ उसकी उतनी हे परवाह भी करता था. वो खुद हे अपने नितम्ब ाचे से संजीव के लिंग पर दबती हुई उसकी बाहों के भीतर सिकुड़ गयी.

'अर्जुन क्यों जा रहा है इसका तुम्हे क्या जवाब दू राधिका? हर 'क्यों' की सही वजह होती तोह फिर 'क्यों' होता हे क्यों?', अपने मैं में हे संजीव उस सवाल का जवाब दे रहा था जो राधिका न इस मिलान से पेले किया था. संजीव अर्जुन के लिए एकमत और एकतरफा था जिसकी कोई बात राधिका से साँझा करना शायद उसको गंवारा न था. कुछ हलके चुम्बन थकी हुई राधिका की गर्दन पर करने के बाद संजीव वैसे हे उसको अपने आगोश में लिए सो गया.

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इस ख़ास दिन पर वैसा हे ख़ास समां अभिषेक जी के बंगले पर था. उनके कुछ करीबी युवा व्यापारी और राजनैतिक मित्र अपनी अपनी सहचरी के साथ यहाँ भोजा पर पधारे थे. Nav-dampatti को शुभकामनाये देने के साथ ढेरो उपहार भी Gorav-Madhuri को उनके इस नए जीवन की पहल पर भेंट किये गए. दर्जन भर ख़ास लोगो के लिए ख़ास भोजन व्यवस्था भी थी और इस दौरान हलके मनोरंजन के साथ अभिषेक जी ने एक कुशल मेजबान की भूमिका में आमंत्रित मित्रो को मदिरा सुख भी प्रदान करवाया.

हर युवती या महिला, जो भी माधुरी से मुलाकात करती वो जरूर उसके सौंदर्य की प्रशंशा करने से न चूकती. शिल्पा जी भी नाज कर रही थी अपनी इस मिलनसार देवरानी को पा कर. पंजाब के रिवाज अनुसार माधुरी को सुर्ख सलवार कमीज में उन्होंने हे सजाया था और कोहनी तक धारण किये लाल चूड़े माधुरी के सौंदर्य में इजाफा करते रहे. सर पे सलीके से लिया गया वो ख़ास दुपट्टा और सहज होने की कोशिश में मुस्कुरा कर मिलती माधुरी बरबस हे महिलाओं के साथ साथ Gorav/Abhishek के दोस्तों में भी ईर्ष्या या प्रशंशा की पत्र बन्न रही थी.

जीवनभर नियम और अनुशाशन में रहने वाले गौरव को आज उसके बड़े भाई और दोस्तों ने मजबूर कर दिया था 2 घूँट गले में उतरने के लिए. भीतर हे भीतर जैसे गौरव को भी इसकी सख्त जरुरत थी. इतनी उम्र गुजरने और एक शशक्त बड़े भाई के होने के बावजूद गौरव अभी तक लंगोट का पक्का था. वो हमेशा हे एकाकी जीवन चाहता था जिसमे वो अपने बनाये हर लक्ष्य को प्राप्त कर सके लेकिन माधुरी जीवन संगिनी के रूप में उस मेनका की तरह आयी जिसने गौरव नामक इस विश्वामित्र को घुटनो पर हे ला खड़ा किया. बचो और महिला मेहमानो को स्वयं माधुरी ने हे अपनी जेठानी के पहलु में ाचे मेजबान की तरह खाना परोसा था और उसका बनाया मीठा तोह चर्चा का केंद्र हे रहा. संयक्त परिवार की एक मेहता ये भी होती है की बचे paak-kala में भी माहिर हो जाते है बड़ो के साथ रसोई सीखते हुए.

"शिल्पा जी, हम तोह आपके राजमाह चावल के मुरीद थे और मीठे से जैसे अपना कोई वास्ता हे नहीं. लेकिन आज मैं दूसरी कटोरी भी ख़तम कर चुकी हु.", एक और महिला मेहमान ने मीठे की तारीफ की थी जिस पर शिल्पा जी ने उन्हें माधुरी से मिलवाया. माधुरी भी मेहमान दम्पतियों के साथ आये बचो की उचित देखभाल कर रही थी जिसमे किरण (गुनगुन) के साथ उसकी माँ बर्षा भी पूरा सहयोग करती रही. कहने को तोह किरण इस घर के मुलाजिम की लड़की थी लेकिन उचित देखभाल और बराबरी के दर्जे स्वरुप वो खूबसूरत लड़की भी ाचे खासे इंसान का चरित्र बदलने का भरपूर माद्दा रखती थी. आज भी चुस्त सलवार कमीज, बिना दुपट्टे के पहने वो जब भाग भाग कर काम करती तोह दूर हॉल से भी कुछ नजरे लगातार उसके जिस्म का जायजा लेती.

"गौरव यार तू गबरू जवान है लेकिन भरजाई (भाभी) अपनी वि तेरे तोह 21 लगदी. नाक न कटवा दियो भाई जल्दी पिघल कर.", गौरव का ये दोस्त शादीशुदा था और दिखने में भी ाची सेहत का धनि. वो यहाँ अपनी बीवी के साथ पधारे था जो दूसरी तरफ खाने की मेज पर बाकी महिलाओं के संग थी.

"इसमें नाक कहा से आ गयी जीत? माधुरी सुन्दर है और उसको बीवी के रूप में प् कर मैं खुद को भाग्यशाली हे मानता हु.", गौरव भी कनखियों से माधुरी को ताड़ता रहा, यदा कड़ा समय मिलते हे. अभिषेक जी के कहने और दोस्त की वजह से उसने ये दूसरा जाम लिया था. शराब बिना दुर्गन्ध वाली उच्चकोटि की थी लेकिन असर तोह हर व्यसन करता है. उस पर जब माधुरी के roop-lavanya ने पहले हे घायल किया हो तोह शराब दुगनी प्रभावी.

"मानता हु तेरी बात भाई लेकिन बंद कमरे में भी जिसका जोर पहली बार में साबित हो जाए फिर साड़ी उम्र दूसरा हर बात मानता है. आज तू अगर झंडा गाड़ गया तोह फिर साड़ी उम्र भाभी तेरे आगे पीछे होगी नहीं तोह तू. हाहाहा.. सचमुच तेरी किस्मत का जवाब नहीं दोस्त जो ऐसी संस्कारी और ाची बीवी पायी.", ये मित्र देख चूका था के माधुरी ने एक पल भी सीने के सामने से दुपट्टा न सरकने दिया था और वैसे हे सर को धक् कर भी रखा. ऐसा नहीं था के शिल्पा जी खूबसूरत नहीं थी. वो एक भरपूर गदराई हुई जवान महिला थी जिनके शरीर के कटाव भी जानलेवा थे लेकिन एक तोह परिवार की महिला मुखिया और दूसरा सबके सामने उनका हंसमुख लेकिन अनुशशासित रवैय्या. उनसे मजाक सिर्फ महिलाये हे कर सकती थी.

"चल खाना खाते है यार. मुझे तोह गर्मी लगने लगी है 2 गिलास से हे. तुम लोग जाने कैसे aadhi-pauni बोतल तक जातक जाते हो. भैया भी लगे हुए लेकिन कितने नार्मल दीखते है अभी तक.", गौरव तगड़ी dil-dol के बावजूद शराब के असर में जल्द हे आ गया. वो इसका शुअकीन हे कहा था आज से पहले.

"ाची बात है भाई और तू इसकी आदत लगाइयो भी मैट. शराब तभी ठीक है जब दोस्तों में बैठकर ख़ुशी से पी जाए. लेकिन कभी कभी और आज तुझे देख कर लगता है की क्सक्सक्सक्स क्लब में आगे से तू भी मेरा साथ दिया करेगा.", दोनों दोस्त अपने अपने गिलास ख़तम करके खाने पर बैठ गए. पशुपति के साथ एक सेवक यहाँ के इंतजाम देख रहा था. धीरे धीरे सभी लोग फुर्सत हुए तोह बर्षा के मन करने के बावजूद माधुरी ने मिल कर रसोई समिति. शिल्पा जी ने बाकी काम देखे और अपने पति का खाना होने के बाद उन्होंने माधुरी को उसके कमरे में भिजवा दिया. पशुपति भी बहार का दरवाजा लगा कर अपने क्वार्टर की तरफ बढ़ चला. रात के वक़्त घर के आँगन में ये डोबर्मन कुत्ता खुला घूम रहा था जो दिनभर नजर नहीं आया था. हाँ इसके साथ शिल्पा जी ने माधुरी को जरूर मिलवा दिया था और वो बेजुबान उतना समझदार भी था जितना सजग.

"गुनगुन, भैया के कमरे में ये दूध का गिलास रख के फिर तुम भी सोने चली जाना. आज तुमने बहोत काम किया है तोह कल मार्किट में मेरी तरफ से तुम्हे नया हैंडबैग और नेलपॉलिश गिफ्ट.", हँसते हुए उन्होंने किरण को खुश किया तोह वो भी कुलांचे भर्ती हुई ऊपर कमरे में चली गयी. यहाँ हलकी रौशनी थी जीरो बल्ब और निघटलैम्प की. बिस्टेर पर गौरव चेहरे पर हाथ रखे सीधा लेता था और माधुरी शायद hath-mooh धोने के बाद कपडे बदलने बाथरूम में. किरण ने आहिस्ता से वो ढाका हुआ गिलास बिस्टेर किनारे रखा तोह हलकी आवाज होने पर गौरव ने उसकी कलाई अंदाजे से हे थाम ली.

"भैया, वो बड़ी भाभी ने दूध भिजवाया था. बस यही रखने आये थी मैं. सॉरी.", किरण को तोह जैसे इसकी उम्मीद हे नहीं थी जबकि गौरव को लगा था के माधुरी होगी. एक युवती अक्सर ऐसी पकड़ को समझ हे जाती है और किरण मैं हे मैं घबरा रही थी इस स्पर्श के पीछे छिपे एहसास से.

"हाँ.. मैं जानता था के ये तुम हे हो शैतान गुनगुन. मैं तोह बस थैंक यू बोलना चाहता था तुम्हे और कल तुम तैयार रहना मार्किट चलने के लिए अपनी नयी भाभी के साथ.", गौरव सहज था क्योंकि वो गलत नहीं था बस उसने बिना देखे हे ऐसा कर दिया था. तड़प या उत्साह, कुछ भी वजह हो सकती थी. किरण भी प्रतिउत्तर में 'थैंक यू एंड गूडनिघत भैया' बोल कर बहार भाग गयी. एक बार फिर कमरे में वही ख़ामोशी लौट आयी जिस से उक्त कर गौरव थक चूका था. शराब हर गुजरते लम्हे के साथ उसको बेचैन करती जा रही थी और माधुरी का इतना समय लगाना इसमें इजाफा. और वो घडी भी आयी जब बाथरूम समेत कर माधुरी कमरे में दाखिल हुई. कमर तक खुले बाल हलके गीले थे जिसका मतलब वो अभी नहीं थी, बिस्टेर पर जाने से पहले जिस्म को आराम देने के लिए. अतिरिक्त गहने वो पहले हे उतार कर सही जगह रख चुकी थी और इस मद्धिम रौशनी में दोनों बाँहों और चेहरे पर ख़ास क्रीम लगाने के बाद शिल्पा जी के कहे अनुसार आरामदायक निघ्त्य पहन जब वो बिस्टेर पे आयी तोह गौरव को अपनी और कोहनी टिकाये टकटकी लगाए पाया.

"आप सोये नहीं? मुझे तोह लगा था के सो चुके है. कमरे में आयी थी तब आप लेते हुए थे.", माधुरी के मैं में anishchit-ta साफ़ थी क्योंकि गौरव का किरदार हे कुछ वैसा था.

"क्या हमको इतनी जल्दी सो जाना चाहिए माधुरी?", जिस तरह से गौरव ने उसकी कलाई थाम कर अपने करीब किया था nari-sulabh माधुरी शर्म से विपरीत दिशा में देखने लगी. सकुचाती सिमटी सी वो बिस्टेर पर बैठ तोह गयी थी लेकिन दिल और दिमाग का अंतर्द्वंद सोचने समझने की शक्ति हे ले बैठा. वही गौरव इस मंद रौशनी में वो आकृति भरपूर बारीकी से देख सकता था जो खुद नीली रौशनी में नीलिमा सी प्रज्वलित थी. माधुरी के बालो की वो गीलापन लिए महक, जिस्म से आती फलो सी खुशबु और ढीले परिधान में भी सुडोल बड़े बड़े स्टैनो का विलक्षण कटाव. गौरव तोह खुदके हे बस में न रहा तोह वो माधुरी की स्थिति क्या समझता.

"आप दूध पी लीजिये और दीदी कह रही थी की आप 5 बजे उठ जाते है.. ", इतना कहने के बाद माधुरी हल्का सा सिसकी लेकिन जैसे वो आवाज उसने बहार न आने दी. उस मजबूत पकड़ ने जैसे हे उसको अपनी तरफ खिंचा वो संभल न सकीय. माधुरी का समूचा जिस्म तजा पिनाई रूई सा नरम था जो गौरव के सीने पर लगा तोह पहली बार उसने महसूस किया के उसने क्या पाया है. सुघड़ और कामकाजी माधुरी ने बहोत म्हणत की थी इस जिस्म को ये पैमाना देने में जिसको reit-ghadi या अंग्रेजी में hour-glass कहा जाता था. उन थिरकते सुडोल स्टैनो का दाब और नरमी काफी थी गौरव को बेसबर करने में.

"मुझे गलत मैट समझना माधुरी लेकिन जाने मुझे क्या हो रहा है. आज पहली बार मैंने सिर्फ यही सोच कर शराब के हाथ लगाया की खुद को नियंत्रण में रख सकू. ऐसे कमजोर सहारे की आदत नहीं है लेकिन जब जब तुम्हे देखता हु, खुद को बेकाबू करने का दिल करता है. मुझे बस तुम्हे पाना है जिस से ये आग जिस में मैं झुलस रहा हु, वो शांत हो जाए. तुम बहोत खूबसूरत हो माधुरी. हुस्न की दौलत के साथ साथ तुम्हारी हर अदा..", गौरव की जुबान जब उसके काम न आयी तोह उसने बेकरारी में माधुरी को दबोचते हुए उसके होंठो पर होंठ टिका दिए. किसी नौसखिखिये की तरह वो कभी उन नाजुक लबो को चूमता तोह कभी होंठो से रगड़ कर अदृश्य परत चढाने की कोशिश करता. इस प्रयास में उसके सीने के निचे दबते माधुरी के खरबूजे से चुके ज्यादा गहरी रगड़ खा रहे थे. हर गुजरती कोशिश के बाद गौरव पूरी तरह माधुरी के ऊपर आने में कामयाब हो हे गया.

"उफ़... आराम से गौरव.", माधुरी की कलाई उन प्लास्टिक और धातु के चूड़े से रगड़ती हुई कुछ जख्मी हुई तोह जवाब में वो बस इतना हे वो कह सकीय. अपना नसीब वो जान चुकी थी इस पल में क्योंकि गौरव बेशक समझदार था लेकिन अभी खुद वो आसक्त था माधुरी के लिए. ऐसे हाल में वो तोह होना हे था जो माधुरी naari-sulabh तर्कणा चाहती थी.

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"सबके सामने दीदी और अकेले में ऋतू. तुम कुछ ज्यादा नहीं बिगड़ रहे.", ठंडी हवा के बीच छत पर सिर्फ अर्जुन और ऋतू हे थे. अलका निचली मंज़िल पर आराम से पसरी थी क्योंकि अर्जुन ने जाने से पहले उसके पास आने का वादा किया था. छत पर भी दृश्य अजीब था जहा अर्जुन निचे लेता था और उसके ऊपर बैठी ऋतू प्यार की जगह जैसे उसको झंझोड़ रही थी.

"मैं अगर आप से बहार हुआ न तोह फिर .."

"तबियत तोह ठीक है न तुम्हारी या फिर ऐसा चीरा लागू की खड़ा होना बंद हो जाए. ये गर्मी बचा कर रखो और जबतक मैं न कहु निकलना भी मैट.", ऋतू ने तोह उसके शरीर को छुआ भी न था के जैसे अंडकोष दबाना लेकिन उसकी नसीहत सुन्न कर अर्जुन समझ गया की वो किसके सामने है.

"सॉरी. क्या करू आप हे बताओ? सचमुच सिचुएशन या कहो की परिस्थिथिति ऐसी हो गयी है की जवाब हे नहीं मिल रहा. आपको पटक कर छोड़ दू तोह बस जाने की ख़ुशी मिल सकेगी.", अर्जुन व्यथित था और उसके शब्द कही ज्यादा.

"तुम न मुझसे दूर हे रहना. ये क्या बोलै तुमने? चुदाई? प्यार हो इसलिए वो नहीं बोल प् रही जो कह सकती थी लेकिन अभी भी पूछ रही हु की प्रॉब्लम क्या है. अर्जुन कण्ट्रोल करना सीखो और ऐसा न हो के जल्दबाजी में तुम गलत व्यक्ति से मिल बैठो. निक्कर उतार सकते हो.", ऋतू ने समझते हुए अर्जुन को थोड़ा काबू में किया तोह वो भी सोचने पर मजबूर हो गया. लाल ढीली टीशर्ट में ऋतू ने ब्रा नहीं पहनी थी जिसका भान अर्जुन को सुरु में हे हो गया था लेकिन ये ऋतू थी जिसके ऊपर हाथ डालना मतलब वजह जरुरी होनी चाहिए.

"ऋतू मुझे मार हे दो.", अर्जुन जैसे जज्बाती हो गया था.

"तोह बड़ी जल्दी घर के खिलाफ जाने का विचार बना गए तुम? हे... अर्जुन.. मैं हु न यहाँ. तुम डर रहे हो और खोजबीन के बाद हार क्यों मान रहे हो? बात करो न मुझसे.", ऋतू ने ऐसा कहने के साथ हे उन तराशे हुए स्टैनो को अनावृत कर दिया. अक्सर ये काम तभी होता था जब सचमुच चुदाई होती हो. अर्जुन के हाथ अपने सीने पर रखते हुए वो उसको निरंतर देख रही थी.

"माँ.."

"तोह तुमने क्या ढूंढा जब प्रीती को वह ले कर गए थे?", ऋतू सब जानती थी और अर्जुन ये भूल गया लेकिन उसको याद दिलाने में म्हणत नहीं लगी. मंजू के घर से वो सीधा वही तोह गया था सबूत ढूंढ़ने.

"ज्यादा कुछ नहीं क्योंकि उस तरफ कैमरा थोड़ी था. उधर कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला ऋतू.", अर्जुन अपने हाथ ऋतू के झुके हुए चुचो पर रखने लगा तोह उसने खुद हे वो हटा दिए.

"ऐसा है मुन्ना जी की आप सचमुच श्री श्री रामेश्वर जी की तरह सोचते हो. दुनिया उतनी चुटिया नहीं रही.", ऋतू ने सरासर अपने दादा जी की सोच को हे धत्ता बता दिया. अर्जुन तैश में कुछ बोलने हे लगा था के ऋतू ने उसको रोक दिया.

"सुनो तोह सही डार्लिंग. दादा जी वाला तरीका सही होगा लेकिन उसमे जवाब नहीं मिलने वाला. माँ गयी बाथरूम और वह उन पर हुम्ला हुआ. लेडीज टॉयलेट कैमरा में नहीं रख सकते. लेकिन कोई तोह लेडी के साथ जाएगा. जिस पर हुम्ला हुआ उसने तोह नहीं बुलाया लेकिन जिसने हुम्ला किया उसको डर तोह हो सकता है न? वो डर ढूंढ़ना है अर्जुन और जिसके चेहरे पर वो डर दिखेगा मतलब वही अपराधी है.", ऋतू जिस तरह अर्जुन को समझा रही थी वो देखने वाला दृश्य था लेकिन अर्जुन ढिटाई से हंसा.

"यहाँ भी चाल चल गयी दीदी. दीदी हे बुलाऊँ न इस पल में?", अर्जुन ने जैसे हे बात करनी चाहि ऋतू ने अपनी निक्कर उतार कर एक तरफ फेंक दी.

"जो होना है वो होगा और तुम रोक भी नहीं सकते. बस अब नाम बताओ."

"दामिनी ने माँ पर हुम्ला किया ऋतू और अधूरा यही है की उसने ऐसा क्यों किया और किसके कहने पर. ये रहा सबूत जो उसने खुद हे गलती से छोड़ दिया.", अर्जुन ने ऐसे पलट कर ऋतू को अपने निचे लिया था के वो तोह अवाक हे रह गयी. एक जोरदार संसर्ग जरूर होने वाला था लेकिन इसमें ऋतू पराजित थी और विजेता अर्जुन उसको कैसे भी भोग सकता था.

"ारु.. माँ मतलब ... बेस. तू अभी भी जाएगा."

"हाँ और अभी तुम बस आखिरी सवाल पूछ सकती हो."

"माँ और मुझे बचा लोगे बिना परिवार को क्षति पहुचाये?", ऋतू ने एक सवाल में हे अर्जुन को बांध दिया था.

"तुम्हारी बाहों में मरना आसान नहीं रहेगा मरस अर्जुन शर्मा? कसम खता हु की प्रीती तुम्हारी देवरानी बनेगी इस मामले में. और बात मेरी माँ की है तोह तुम बस बहु की तरह दूर हे रहो. इस अलका से जवाब मिलेंगे जो बातें सुन्न रही है.", अर्जुन उठ कर खड़ा हुआ तोह ऋतू हैरत से देखने लगी

"इसके बाद आऊंगा न यहाँ. मेरा घर यही है ऋतू और तुमसे अलग कोई घर हे नहीं. न प्रीती वह होगी न अलका. क्योंकि अकेले में तुम हे तोह हो."

'और तुम अकेले रहोगे इसका मतलब', ऋतू ने मैं में इतना ह
 
Sidhu saab जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाये. जीवन में हर चाहत पूरी हो और सदा खुश रहो भाई. 🙏🌱💚
 
गांव के दृश्य चालू होते हे ये भाग समाप्त. 195 अपडेट से भाग 3 चलेगा. कल और परसो में 2 अपडेट दे दूंगा.
 
भाई लोग अगर कोई भाई टाइम का सदुपयोग करना चाहता है तोह वो Tim's वेर्मीर, संसार, थे ग्रेट हैक, सत्यकाम देख सकता है. ये सिर्फ फिल्म हे नहीं है, नजरिया बदलने वाली मास्टरपीस है. सत्यकाम इसलिए क्योंकि धर्मेंद्र देओल की ये फिल्म आज के समय का सही अवलोकन है. दुनिया की खूबसूरती संसार से बेहतर कोई नहीं दिखा सकता जो आजतक की बेस्ट पिक्चर है. हर दृश्य खूबसूरत और जीवंत. लेकिन ये 4जब से कुछ अधिक है.
 
कुछ कहना चाहता हु और सोच रहा हु के यही ठीक समय है. अगले भाग में बहोत कुछ तेजी से घटने वाला है जैसे पंजाब सिर्फ 20 अपडेट में जहा अर्जुन क्या खोजेगा वो आधा भविष्य में रहेगा. बात होगी रामेश्वर जी की और उनके जीवन की, Shankar,Umed, अज्जू और इन्दर की. उन पर भी 20 अपडेट होंगे इस से अतिरिक्त.

बेटी के हाथ पिता का संस्कार भी शामिल रहेगा लेकिन स्कूल इस भाग में तेजी से निबटेगा. फिर कॉलेज शुरू होगा 250 के आसपास. अर्जुन को चुनौती देने वाले सरताज, बुनती, अबीर, मांगू और आशुतोष. वो मजेदार दृश्य जिनमे हम खुदको देखते है या पाते है वो सभी कॉलेज में होंगे और वो भी ऐसे जिनमे अर्जुन खुद सीखेगा. मतलब वो हीरो नहीं होगा बल्कि किस्सेदार माहौल रहेगा. शंकर की असली काबिलियत और परिवार के प्रति निष्ठां, रामेश्वर जी का वो सच जो कोई नहीं जानता और क्यों Inder/Ajju श्रेष्ठ थे ये भाग 3 में होगा. नहीं भूलेंगे तोह प्रीती का प्यार, ऋतू का जीवंत समय और सबसे ख़ास क्यों रेखा वो रेखा है जिसको लांघने पर तबाही होगी.

अभी तक तोह कहानी सिर्फ मुद्दे और 4 महीने में हे रही लेकिन भाग 3 जाएगा 1950, 1965, 1971, 2000 और 2003 तक.

नायक होंगे रघु, राम, कौशल्या, अज्जू, मालिनी, पुष्पक, शास्त्री जी, प्रीती, ऋतू और अर्जुन की कॉलेज गैंग. बीच में कुछ दर्द भरे लम्हे भी आएंगे जिन्हे मैं अभी नहीं कह सकता लेकिन जीवन यही तोह है. दर्द के बाद नयी सुबह प्यार की.
 




ी ोुतलीनेड थिस एंड माय फोर इयर्स ओल्ड पेंटेड थिस अंडर माय गाइडेंस. हे इस दोंग आईटी सीन्स 1 ईयर.
 
अपडेट 194

हक़ और हक़ीक़त



"परेशां हो वो भी जाने कितनी बातों से!! मैं समझ सकती हु लेकिन उतना भी नहीं जितना तुम. आखिर कुछ तोह ऐसा है न ारु जिसमे मैं तुम्हारे साथ शामिल नहीं हु.?", वो उग्रता जाने कहा चली गयी थी अर्जुन की. अब वो आवेशित न हो कर बस एक थके हारे मुसाफिर की तरह ऋतू के निर्वस्त्र सीने पर सर टिकाये लेता था. अर्जुन के बालो में उंगलिया फिरती ऋतू भी संसर्ग भुला कर बस अपने भाई को शांत रख रही थी. उसके सहलाने से हे जैसे अर्जुन आधा dukh-dard भूल गया था.

"मेरी उथल पुथल तुम जैसा गहरा समंदर हे समेत सकता है ऋतू और मैं जानता हु की सिर्फ सम्मान की वजह से तुम खुल कर नहीं बोल रही.", अर्जुन का जिस्म जैसे ऋतू के लिए मायने हे नहीं रखता था और वो उसका भार बड़ी आसानी से लिए सर थपकती हुई मुस्कुराई.

"तुम जो अश्लील शब्द बोल रहे थे कुछ देर पहले, उनको कहने वाली भी तोह तुम्हे याद कर रही होगी? तुमसे सेहन नहीं हो रहा न उनका अब किसी और का हो जाना? लेकिन यही नियति है अर्जुन और इसमें तुम्हारा कोई दखल नहीं. अभी तोह सिर्फ एक की कमी तुम्हे अंदर हे अंदर परेशां कर रही है लेकिन आने वाले समय में ज्यादातर के साथ यही होगा.", माधुरी का नाम लिए बगैर ऋतू ने अर्जुन को समझा दिया था के उसका अनकहा सच और परेशानी क्या है. और कही न कही ये सच भी था के अर्जुन के दिल में आज पहली बार तीस उठी जब उसको वास्तविकता का आभास ऋतू ने करवाया.

"मेरा भी तोह हक़ है न ऋतू?"

"हाँ बिलकुल है.. तुम्हारा हक़. बस वो कितना है और कब तक इसको समझ जाओ तोह दर्द काम होगा ारु. इतना वादा करती हु की मैं अपनी आखिरी सांस तक सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे पहलु में रहूंगी. कई बार हालात के सामने झुकना भी पड़ेगा और टूटना भी लेकिन जो नाम तुमने मुझे एकांत में दिया है वो mera-hamara पूरा भविष्य होगा. तबतक तुम हर जाने वाले का किरदार मुझे दे सकते हो. यकीन करो इसमें भी बहोत मजा आने वाला है. हाहाहा..", ऋतू की बात सुन्न कर अर्जुन ने सर उठा कर उसको हँसते देखा तोह वो भी मुस्कुराने लगा. ऋतू माधुरी दीदी का किरदार निभाने की बात कर रही थी और उसके बस इस मजाक मात्रा से अर्जुन का दिल हल्का हो गया. सरक कर वो बराबर आ लेता. ऋतू को दोनों बाँहों में पीछे से भर कर पंजे उन खुली हवा में सांस लेते वक्षो पर रख उनका अकार जांचते हुए.

"दामिनी बुआ के बारे में तुम्हारी क्या राये है? वो वैसा कर सकती है इस बात को मैं अभी तक हजम नहीं कर प् रहा हु.", ऋतू ने अपने वक्षो को सहलाते हाथ को वही दबाते हुए कमर ाचे से अर्जुन के जिस्म से चिपका ली. चेहरा पलट कर एक बार अपने नरम होंठो से अर्जुन के होंठ चूम कर वो बताने लगी अपने अनुमान.

"एक रिश्ता और भी है उनका और पापा का जो अनजाने हे शायद माँ भी जान चुकी है जब वो उधर गयी थी विनोद चाचा के बेटे के समय. मुझे ये अलका ने बताया था जब माँ और ताई जी बात कर रही थी और उसको थोड़ा बहोत सुनाई दे गया. ताई जी के हिसाब से तोह वो रिश्ता तब से है जब दामिनी बुआ की शादी भी नहीं हुई थी. लेकिन क्या ये एक सहमति वाला या प्यार से बना हुआ रिश्ता होगा?", ऋतू के एक ख़ास बात ये भी थी की गंभीर बातचीत के वक़्त वो शब्दों का चुनाव बहोत अनुशाषित तरह से करती थी. एक बार भी उसने ये न कहा था के दामिनी के साथ शंकर के अवैध सम्बन्ध थे. अर्जुन बस सुन्न रहा था जैसे उसको भी ये बात पता हो.

"अगर ये सहमति वाला न हुआ तोह? इस से वो सच तोह नहीं बदलेगा न की उन्होंने हे माँ को जख्मी किया?"

"जज्बाती बहोत जल्दी हो जाते हो तुम और किसी दिन यही मार खा जाओगे. अब बुआ की शादी से पहले अगर वैसा कुछ हुआ है तोह जरूर उसके पीछे वजह होगी न ? पापा ऐसे नहीं है ारु और वो किसी भी इंसान को कभी अपने तक नहीं आने देते. किस्से दबे छिपे हम सभी ने सुने होंगे लेकिन बात नहीं करते इस बारे में. और मुझे अभी भी अजीब लग रहा है लेकिन यहाँ मैं तुम्हारे साथ हु इसलिए हिम्मत कर प् रही हु और हम खुल कर बात नहीं करेंगे.", ऋतू ने एक पाँव अर्जुन पर चढ़ाते हुए सर उसकी मजबूत ब्याह पर टिका लिया.

"हाँ सही कहा और मैं भी वो बात नहीं करना चाहता.", अर्जुन ने ऋतू के गाल पर आये बालो को फिर से पीछे करते हुए जवाब दिया.

"नादान उम्र में या तोह गलती होती है या फिर कोई सिचुएशन हे ऐसी बन्न जाए जिसमे दोनों के कदम बहक जाए तोह वैसा हो जाता है. लेकिन अगर मामला प्यार का होता तोह मिलना जुलना लगा रहता जो की नहीं हुआ जितना मैं समझती हु. अब जो बात मेरा दिल कह रहा है लेकिन दिमाग उसको सही नहीं बता रहा वो ये है की पापा को वैसी सिचुएशन में लाया गया होगा जैसे शिकारी के सामने शिकार रख कर बड़ा शिकारी उसका हे शिकार करे. उमेद चाचा पापा को भोले बुलाते है क्योंकि ये उनका सच है ारु और मेरा मैं कह रहा है की दामिनी बुआ शिकार भी नहीं थी और उनको परोसने वाला कोई छोटी सोच वाला तोह बिलकुल नहीं हो सकता. खेल बरसो पुराण है जिसके पीछे जो भी है वो परिवार के हर सदस्य को जानता है, कमजोरी और ताक़त को भी.", ऋतू के समझने पर अर्जुन जैसे कुछ उलझ सा गया.

"वो फिर माँ नाम न बता कर उसको बचा क्यों रही थी? बात खुलती और दामिनी बुआ का सच सामने आता तोह क्या पता उनके पीछे जो भी हो वो भी पकड़ा जाता.", अर्जुन से असहमति जताती ऋतू ने हँसते हुए उसको अपने गले से लगा लिया.

"माँ इतनी बेवकूफ भी नहीं है डार्लिंग और उनके लिए परिवार सबसे ऊपर है. पहली बात तोह ये है की अगर हुम्ला दामिनी बुआ ने किया है तोह वो जल्दबाजी कर गयी और उन्हें उम्मीद नहीं है की माँ उन्हें पहचान गयी होगी. दूसरी बात ये है की ऐसा बहोत जल्दी से हुआ होगा और माँ सलामत है जैसा मुझे नहीं लगता की दामिनी को उम्मीद होगी उस समय और माँ का घाव मैंने ाचे से देखा था जिसका मतलब कोशिश तोह उन्हें जान से मारने की हे होगी पर हो न सका और होता भी नहीं क्योंकि माँ संभल सकती है 2-3 दामिनी बड़े आराम से. अब जब दामिनी को हे नहीं पता के उसको वो देख चुकी है या जैसे तुमने पता लगा लिया छोटी से चूक से तोह वो निश्चिंत है. माँ भी ख़ामोशी से बस इन्तजार हे करेंगी जिसमे वो माहिर है लेकिन उस समय पर उनके साथ उस बड़े शिकारी की तरह टक्कर का शिकारी जरूर होगा.", ऋतू बार बार शिकारी वाली बात कर रही थी जिस पर अर्जुन को हलकी सी झुँझलात हुई.

"कौन शिकारी और माँ का साथ कौन दे सकता है? जैसे वो बता हे नहीं रही तोह आगे भी वैसा हे करेंगी."

"ोुह्ह्ह मेरा ारु तोह गुस्सा हो गया.. तुम समझदार हो भी या बस सबने बोल बोल कर तुम्हारे दिमाग में फिट कर दिया.? खेल आज का नहीं है तोह मतलब दामिनी बुआ को प्रयोग किया होगा देवकी दादी या छोटे दादा जी ने लेकिन ये एक नाजुक पहलु है जिस पर तुम या मैं हाथ नहीं दाल सकते. दादा जी कभी इस से सहमत नहीं होंगे क्योंकि उनके लिए छोटे दादा जी सिर्फ भाई न हो कर उनकी माँ की आखिरी nishani/jimmewari है. हाँ यहाँ वो बड़े शिकारी से बड़ा अगर कोई है तोह वो है दादी, जिनके सामने बाकी किसी की नहीं चलती और उनमे इतना धैर्य है की हम तुम सचमुच वैसे कभी नहीं बन्न सकते. समय आने पर जरूर वो माँ से बात करेंगी और उन्हें जैसे बहोत कुछ पहले से पता है जिस वजह से वो हमको गाँव वाले परिवार से ज्यादा घुलने मिलने नहीं देती. अब तुम वह जा रहे हो और वो चिंतित है क्योंकि तुम हो भी तोह घटना किस्म के इंसान. जहा जाते हो मुसीबत भी पैदा कर देते हो बिना वजह. अभी भी तुमने प्लान बना रखे होंगे जो तुम बताने नहीं वाले लेकिन मैं याद दिला दू की ऐसा कुछ मत कर देना की दादा जी हे तुम्हे वनवास दे दे.", ऋतू कब अर्जुन को सीधा करते हुए उसके जिस्म पर छ गयी, इस चर्चा में खोया अर्जुन देख न सका. वो लाजवाब था अपनी इस behan/premika के दिमाग के सामने. ऋतू हर एक बात का पहलु गहराई से समझती थी और उतना हे बेहतर बयान भी करती थी. यही एक और बात थी जिस वजह से अर्जुन हमेशा उसके सामने घुटने तक देता था.

"तोह मैं माँ को वो नाम बता दू जाने से पहले?", अर्जुन ये म्हणत इसलिए तोह कर रहा था.

"बिलकुल और उनके सिवा किसी को भी नहीं. वो शायद अपने आप तक हे सिमट चुकी है और तुम्ही उन्हें एहसास करवा सकते हो की सबको उनकी परवाह भी है और जरुरत भी.", ऋतू की बात अर्जुन भली भांति समझ चूका था. और शायद वो सब भी जिस वजह से उसकी माँ ने नाम न लेने का इरादा किया था.

"ऐसा भी हो सकता है न की माँ इसलिए खामोश है की पापा को सामने किया जा सकता है और उनको हे गलत दिखा कर दादा जी का स्वाभिमान.", अर्जुन ने गहरी होती हुई इस रात में आसमान को देखा तोह वह चाँद तोह नहीं था लेकिन टिमटिमाते तारो का वरश्चैव जरूर था. शायद आज आसमान की जगह चाँद की जरुरत अर्जुन को अधिक थी. अपना हृदय शांत रखने के लिए.

"तुम्हे अब कॉलेज में होना चाहिए था लेकिन देखो इलेवेंथ में पहुंचे हो. अब मुझे सोने दो और बाकी बात सुबह.", ऋतू ने संसर्ग की चाहत न दिखते हुए अर्जुन से चिपक कर सोने को प्राथमिकता दी. ऐसा जरूर था के वस्त्रो के नाम पर दोनों के जिस्म बस उस पतली सी सफ़ेद चादर में सीने तक धक् चुके थे. अर्जुन मंद मंद मुस्कुरा रहा था अपनी बड़ी बहिन से ये मीठी झिड़क खा कर. ऋतू ने जो जवाब दिया था उसका मतलब यही था की अर्जुन बात को देरी से समझता है या प्रकट करता है जबकि अर्जुन ऐसा सिर्फ ऋतू के हे सामने करता था, इस मीठी झिड़क और प्यार के लिए. अपने सीने पर ऋतू को सुलाए वो हलके हाथो से थपकी देता हुआ खुद भी गहरी नींद में चला गया. माधुरी दीदी फ़िलहाल उसकी सोच से बहार हो चुकी थी लेकिन माधुरी की ससुराल में वैसा बिक्लुल न था.

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"तुम्हारी ये खुशबु माधुरी, मुझे पागल बना रही है. और कितनी हसीं हो तुम.", गौरव पूरी तरह ऊपर छ चूका था माधुरी के जिस्म पर. उसकी उत्तेजना देख अंदर हे अंदर माधुरी हैरान थी और जैसे आज उसने देखा था शराब का अलग हे प्रभाव. उन पर्वत से विशाल चुचो को दबाना बेशक गौरव के लिए एक नया और मजेदार एहसास था परन्तु आज माधुरी सिवाए तीस और अपने पति की जल्दबाजी के कुछ महसूस हे नहीं कर रही थी. आनन् फानन में कब गाउन के बटन अलग हुए और कब उस ढीली ब्रा से वो मॉटे खरबूजे से सतांन बहार निकले, माधुरी को खबर तक न लगी. गौरव तोह उनके आफरीन जाल में ऐसा क़ैद हुआ की बिना देरी किये किसी भूखे बचे सा टूट पड़ा.

"ओह्ह्ह.. तुम क्या बाला हो माधुरी.? अब और नहीं रुक सकता.", चुचो को चूसता हुआ एक हाथ निचे ले जा कर अपना पायजामा खोलने लगा और माधुरी निर्विरोध उसके निचे वैसे हे रही. वो खुद को मैं हे मैं समझा रही थी की गौरव गलत नहीं है और शायद ये उसके जीवन में पहला अवसर है शारीरिक मिलान का जिस वजह से वो इतना उत्साहित है. गर्दन एक तरफ करती हुई माधुरी ने आँखें हे मूँद ली जब उसकी फैली हुई टांगो के बीच गौरव ने टटोल कर पहली हुई योनि के होंठो को जांचा. वो उसकी संरचना समझने की कोशिश करने के साथ हे अपने अकड़े हुए लिंग से भी जूझ रहा था. मजबूत जिस्म के साथ हे औसत से बेहतर लिंग का मालिक था गौरव और उसका प्रयास रंग लाया जब वो योनि की दरार पर अपना कुकुरमुत्ते सा सूपड़ा भिड़ने में कामयाब रहा. उस गरम स्पर्श से एक पल को तोह माधुरी काँप सी गयी जिसको नशे के बावजूद गौरव समझा.

"शठ.. दर्द होगा लेकिन पहली बार ऐसा होता है. मैंने किताब में भी पढ़ा था और व्यस्क फिल्म में भी ऐसा देखा हुआ है माधुरी. बस गलत मत समझना.", गौरव के ऐसे खुलासे पर माधुरी को कुछ बेहतर लगा की वो अभी भी उसकी परवाह कर रहा है लेकिन सोच से बहार आती उस से पहले हे उसके जिस्म को तेज झटका लगा. गौरव ने अनाड़ीपन दिखते हुए एक हे झटके में अपना समूचा लिंग अंदर थोक दिया था.

"एआईई.. रुको आह्हः..", माधुरी की चीख कुछ तोह सूखी योनि में वो 7 इंची लिंग एक बार सामने से और कुछ गौरव की उँगलियाँ कंधे में धंसने से निकली. कुछ ऐसा हे हाल उसके पति का भी था जिसने न तेल प्रयोग किया और न माधुरी को तैयार. लिंग का टंका इस उम्र में टूटा था गौरव का जिसका मतलब था की वो हस्थमैथुन का भी आदि न था. कुछ पल दोनों हे इस मुद्रा में ख़ामोशी से अपना दर्द काम करते रहे और माधुरी के हाथ अपने आप हे गौरव की चौड़ी पीठ पर. इसको एक मूक सहमति समझ गौरव ने शुरुआत में हे जोरदार धक्के जड़ दिए. वो बेक़रार था और उसको कैसे भी खुद को हल्का करना था, माधुरी के जिस्म पर हक़ ज़माने के साथ साथ.

"उह्ह्ह.. धीरे गौरव.. आठ.. ", माधुरी की सिसकियाँ मिली जुली थी लेकिन उसको बस मजे की जगह गौरव का अनाड़ीपन ज्यादा दुःख दे रहा था. किसी बेलगाम घोड़े सा गौरव अगले 3-4 मिनट ताबड़तोड़ धक्के लगता हुआ माधुरी की नाजुक मांसल क्योंकि को जीतने में लगा रहा. ठप्प ठप्प की आवाज बस उसके बाद तभी ख़तम हुई जब हांफता हुआ वो माधुरी के जिस्म पर लुढ़क गया. कितने हे समय से संजोया हुआ वीर्य वो माधुरी की योनि में उदल कर हांफता रहा. सांसें कुछ दुरुस्त हुई तोह नशा उतर चूका था.

"मुझे माफ़ करना माधुरी. ओफ्फो ये क्या कर दिया मैंने?", गौरव उठते हे वो जगह देखने लगा जहा सफ़ेद वीर्य के साथ साथ हल्का लहू लगा था. अपने साफ़ पायजामे से हे वो उस योनि को साफ़ करते हुए बार बार माधुरी से माफ़ी मांग रहा था जबकि माधुरी ने बस इतना हे कहा.

"फ़िक्र मत कीजिये. सब ठीक है बस आप जैसे अपने आप में हे नहीं थे. शायद शराब की वजह से. मैं बाथरूम से आती हु और आप भी साफ़ कर लीजिये.", माधुरी अपने जिस्म पर गाउन दुरुस्त करती हुई हलकी लड़खड़ाहट से चलती हुई गयी तोह गौरव ने एक बार उसको और फिर अपने लिंग को देखा जो अब तिथिल हो चूका था.

"भोग हे लिया न तूने बेचारी को? सब प्यार से करना था लेकिन न तू काबू में था और साली ये शराब का बेडा गरक हो. कितनी मासूम है मेरी बीवी और मैंने बस अपनी मनमानी हे की.", गौरव ये खुद से हे कह रहा था और कुंठित मैं से कपडे पहन कर उसने बिस्टेर ठीक किया. माधुरी से नजरे मिलाने की हिम्मत नहीं थी इसलिए करवट लेता वो आँखे मूँद कर उसके आने से पहले हे सो गया. साफ़ सफाई के साथ हे माधुरी को अपने बदन पर जगह जगह छिली हुई खाल पर भी क्रीम लगनी पड़ी. योनि का हाल उतना बुरा न था लेकिन ये पहला संसर्ग था जिसमे उसको एक पल भी ऐसा न लगा जैसे लग्न चाहिए था. हाँ गौरव की बातों ने कुछ हद तक मलहम का काम किया और अब जीवनभर वो उसकी पत्नी थी इसलिए जिस्म पर हक़ भी उसका था. जबतक वो बहार आयी गौरव सो चूका था. नए घर में पहली रात ऐसी रहने का मलाल अब उतना न था. गौरव को चादर ुधा कर माधुरी भी बगल में जा लेती. जाने कितनी हे देर वो खयालो में खोयी जागती रही और जब नींद आने का समय हुआ तोह घडी ने 4 बजने का शोर मचा दिया.

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"जी ये इन्दर आज इतनी सुबह तैयार हो कर किधर जा रहा है?", घर में सुबह हे chehal-pehal शुरू हो गयी थी और ऐसा हर रोज हे होता था लेकिन आज शायद वजह ये भी थी की कृष्णेश्वर जी ने अपनी बीवी और बहु के साथ वापिस निकलना था. हुसैन साहब भी नाहा कर नमाज से फारिग होने के बाद चाय की प्याली अपने दोस्त नरिंदर और उनके पिता के साथ फार्मा रहे थे. कौशल्या जी बहार आयी तब तक नरिंदर एक चमड़े का बैग लिए घर से निकल चूका था.

"कुछ नहीं कौशल्या बस एक जरुरी काम था उसको जमीन का दूसरे शहर में. शाम तक लौट आएगा और अभी हुसैन भी निकलने लगा है. तुम जरा बहु (हुसैन साहब की बीवी) और बचो से मिल लो. फिर अर्जुन भी आता होगा और कृष्ण भी तैयार हो रहा है.", रामेश्वर जी ने सलीके से जवाब दिया था और कौशल्या जी भी इस मामले में ज्यादा सवाल नहीं करती थी. उनके भीतर जाते हे हुसैन साहब ने अचरज से पंडित जी को देखा तोह वो मुस्कुराने लगे.

"हर बात की जानकारी तोह हमको हे नहीं रहती बीटा फिर ये तोह हमारी गृहस्थी की नीव है जिसका बोझ हम बढ़ाना नहीं चाहते. वैसे सुना के तुम हैदराबाद में भी ट्रांसपोर्ट का दफ्तर खोल रहे हो?", रामेश्वर जी ने जिस तरह मुद्दा पलटा था यक़ीनन हुसैन इस से वाकिफ था.

"जी चाचा जी. इधर एक ट्रांसपोर्ट है और मेरे साथ 4 रिश्तेदार भी जुड़े हुए है तोह काम उतना नहीं है. उधर भी परिचित है और ज़ुबैदा के एक मां भी काफी आरसे से जमे हुए है तोह काम फैलाना बेहतर हे होगा. वैसे bhara-poora घर कितनी जल्दी खली सा महसूस होने लगा है.", कृष्णेश्वर जी की गाडी में ड्राइवर सामान रखने लगा था और इतना सामान देख हुसैन को भी थोड़ा ताज्जुब था.

"मेले कभी न कभी तोह ख़तम होते हे है बीटा. और घर परिवार अक्सर subah-raat खाली लगते है पर होते नहीं. शंकर भी आता होगा और बाकी इतने बचे बहु है घर में तोह एक छोटा सा मेला हर वक़्त लगा रहता है.", प्रीती ने घर में कदम रखा तोह उसके साथ सजी संवरी अफसाना भी थी. गुलाबी सलवार कमीज और सर को दुपट्टे से ढके अफसाना उतनी हे मासूम लग रही थी जितनी पहले दिन. बस अब उसके चेहरे पर डर की जगह ख़ुशी रहती थी. जीना सीखने की ख़ुशी. रामेश्वर जी को नमस्ते करती हुई वो दोनों अंदर जाने लगी तोह उन्होंने प्रीती को रोक लिया.

"बीटा, देखना जरा संजीव उठ गया हो तोह. अर्जुन अभी तक नहीं आया जबकि वो 5 से पहले हे जाग जाता है. संजीव को बोल देना की उसको बुला लाये.", घडी में साढ़े 5 बज रहे थे और अपने पौटे को नदारद देख रामेश्वर जी को कमी लगी. प्रीती ने संजीव को न जागते हुए खुद हे उसको बुला कर लाने पर विचार किया लेकिन एकदम से पंडित जी को अर्जुन का पता न बता कर. पहले वो अंदर गयी जहा रेखा जी का हालचाल लिया और फिर कोमल दीदी से बात करके वापिस बहार आ गयी.

"दादा जी, अर्जुन रात में पिछले घर गया था. ऋतू और अलका दीदी की वजह से. मैं हे बुला कर आती हु अभी.", प्रीती ने आगे उनका जवाब न सुना और वैसे हे बहार निकल गयी.

"सोच रहा हु के वो घर भी आबाद कर दू लेकिन पहले टेलीफोन का कनेक्शन करवाना पड़ेगा हुसैन. घर ये भी बड़ा है और अमूमन 20-25 लोग आराम से रह लेते है पर सभी को अपना कमरा चाहिए जैसे जैसे बड़े हो रहे है. वैसे तुम मिले होंगे इस बची से?", रामेश्वर जी का मैं हल्का हो गया ये जान कर की अर्जुन घूमने नहीं गया.

"वो घर भी बहोत बड़ा है चाचा जी लेकिन कमरे आपने 4-5 हे बनवाये है उधर. अब तोह आलिशान दिखने लगा जबसे rang-rogan करवाया है और मैंने देखा था के sukh-suvidha भी पूरी है. लेकिन वह कौन रहेगा इतना प्यारा घर छोड़ कर?", हुसैन साहब का भी दिल लगा था इस परिवार में और उनकी बात भी सही थी.

"हाँ ये तोह बात है की वह कौन रहेगा. बात करता हु तीनो बेटो से की अगर उनमे से कोई चाहे तोह वह चला जाए. घर में रहने से हे घर आबाद रहता है नहीं तोह 2-3 महीने में हे फिर जले लग जायेंगे और घास बड़ी. कोई नहीं गया तोह फिर अर्जुन को हे वह सोने भेज दिया करूँगा. संभल रहेगी.", रामेश्वर जी की बात होते हे गलियारे से बैग उठाये अनामिका और देवकी जी आये. उनके साथ हे कौशल्या जी, प्रियंका, कृष्णा, राजकुमार जी थे. राजकुमार जी ने स्वयं हे वो बैग गाडी में रखवाए और नन्हे बचे को सबने शगुन दिए. अनामिका पाँव छूने बढ़ी तोह रामेश्वर जी ने मन कर दिया.

"बीटा, बस खुश रहो और भगवन तुम पर अपनी कृपा सदा बनाये रखे. अर्जुन वह जा रहा है और मुझे पूरी उम्मीद है की तुम समय समय पर उसकी खिंचाई करती रहोगी. वैसे वो बन्दर कुछ नहीं करता इसलिए काम में लगाए रखना उसको. कृष्ण, वो तुम्हारे साथ नहीं जा रहा?", रामेश्वर जी जैसे इस बात से अनजान थे की अर्जुन कैसे जाने वाला है. लेकिन अपने बड़े ससुर जी के ऐसे संवाद पर न चाहते हुए भी अनामिका के चेहरे पर जरूर ख़ुशी आयी.

"भाई साहब भाभी बता रही थी की अर्जुन मोटरगाड़ी से खुद हे आने वाला है. जब हम लोग वही जा रहे है तोह वो भी साथ हे चलता."

"नहीं नहीं. अगर उसने यही सोचा है और तुम्हारी भाभी को जानकारी है तोह उसको करने दो. वो अपना साधन ले जा रहा है तोह जरूर उसको जरुरत रहेगी वह. खैर मैं तोह अब सावन के बाद हे आऊंगा तुम्हारे पास लेकिन तुम नियम से टेलीफोन जरूर करते रहना. अर्जुन के बारे में कुछ भी बात हो, पहले मुझे बताना. अब धुप होने लगेगी और पौता नाजुक भी है.", रामेश्वर जी के कहने का मतलब कृष्णेश्वर भली भांति समझ रहा था. भैया भाभी का आशीर्वाद लेते हुए वो खुद गाडी की अगली सीट पर बैठे और देवरानी जेठानी की औपचारिक मुलाकात के बाद देवकी भी अपनी बहु के साथ पिछली सीट पर. कौशल्या जी ने कार घर से रुखसत होने से पहले गड़वी से जल जमीन पर अर्पित करते हुए मंगल कामना की और उसके बाद कृष्णेश्वर जी सपरिवार विदा हुए.

"घर में आजकल बहोत कुछ हो रहा है जिसकी जानकारी हम तक नहीं आती.", रामेश्वर जी ने वापिस कदम बैठक की तरफ ले जाते हुए अपनी अर्धांगिनी से सवाल किया.

"ऐसा तोह आप भी करते है लेकिन मैं सवाल नहीं करती. और रही बात अर्जुन की वह मोटरसाइकिल ले जाने वाली तोह वो मैंने हे कहा था. आप जानते हे हो के शहर और जमीन कुछ दुरी पर है और बचा वह घूमेगा तभी तोह जानेगा. हाँ सफर लम्बा है लेकिन ऐसे हे वो दुनिया देखेगा. और मैं नहीं चाहती की वो विनोद या कृष्ण की गाडी इस्तेमाल करे.", 2 टूक बात कह कर कौशल्या जी से फिर से अंदर की तरफ बढ़ गयी और रामेश्वर जी सर खुजाते हुए तैयार होने लगे. अर्जुन की आवाज उन्हें सुनाई दे गयी थी जो अपनी बड़ी बहिन कोमल से बात करता हुआ घर के पिछले हिस्से में जाते गलियारे से गुजर रहा था.

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"तुमसे तोह भाई हमने ज्यादा बात की भी नहीं और देखो अब निकलना पद रहा है. फुर्सत मिले तोह अब कुछ वक़्त बिताने तुम भी आना बीटा हमारे घर.", हुसैन साहब और उनके परिवार से मिलते हुए अर्जुन ने उनके चरण स्पर्श किये. गले लगा कर हुसैन साहब ने इस भरपूर तगड़े युवक को जांचा तोह उन्हें ाचा लगा के अर्जुन उनके दोस्त जैसा हे है. अफसाना नजरे बचती हुई अपना व्यवस्थित सामान फिर से देख रही थी या जैसे वो वह रुकना चाहती थी फ़िलहाल जबतक अर्जुन था.

"जरूर आऊंगा अंकल लेकिन रुकने का तोह पता नहीं अभी. आपके पास से तोह क्सक्सक्सक्स भी 70-75 किलोमीटर हे है. शहर आना हुआ तोह आपसे भी मिल कर जाऊंगा और आंटी जी के हाथ का नाश्ता भी जरूर करूँगा. आप सचमुच खाना बहोत ाचा बनती है आंटी बस ये ज़ुबैदा दीदी न मुझसे ज्यादा खाती है तोह इनके साथ नहीं बांटने वाला. अलग प्लेट में खाऊंगा.", अर्जुन के ऐसे मजाक पर सभी हंसने लगे थे और कौशल्या जी ने मुँह बनती हुई ज़ुबैदा को सर सेहला कर बताया की यही अर्जुन का तरीका है उसको सताने का.

"दादी जी, ये एक बार आये तोह सही हमारे घर फिर देखना मैं इसकी क्या हालत करती हु. मैं इसको खाने नहीं देती? उल्टा ये दर्जन के हिसाब से पूड़ियाँ डकार जाता है. अम्मी, जिस दिन ये जनाब आये उस दिन रसोई हमको सँभालने देना. गलती से भी आइंदा ये ऐसी गुस्ताखी नहीं करेगा. हँ..", ज़ुबैदा की नौटंकी देख कर कृष्णा जी ने उसके सर पर चपत लगा दी.

"सीधा बोल न के अब तू भी रसोई सीखना चाहती है. ाची बात है और साल या 2 साल में तेरा निकाह भी हो जाना है."

"अफसाना बेगम का होगा मेरा नहीं चची. हमारी ज़िन्दगी के फैंसले तोह हम हे लेंगे और ये shaadi-niqaah जैसे मामले तोह हमे पसंद नहीं. बाकी मैं तोह और रुकना चाहती थी लेकिन हमारी अम्मी जान कहती है के अभी जाना होगा. ाचा तोह दादी जी वो आप क्या कहती है, आज्ञा दीजिये. हाँ अब आज्ञा दीजिये हम सभी को.", शंकर जी इतनी तेज आती आवाजों की तरफ कब चले आये उन सभी को खबर भी नहीं हुई पर ज़ुबैदा की बात उन्होंने भी सुनी.

"इजाजत दीजिये भी काम कर जाता है बेटी. माँ को उर्दू भी ाचे से आती है. और हुसैन यार तुम अकेले इन्दर के साथ पार्टी करके निकल रहे हो. मुझे तोह मौका भी नहीं दिया.", लड़कियों को ख़ास उपहार सौंपते हुए उन्होंने हुसैन से भी हाथ मिलाया और माँ के हमेशा की तरह गले लगे. अर्जुन ताई जी की आवाज पर बहार निकलने लगा तोह उसने अफसाना की उन चमकती आखों में खुदका हे अक्स देखा, एक क्षण के लिए सही लेकिन वो नजरे आपस में टकराई थी. अंदाज ऐसा था जैसे उस एक पल में हजारो सवाल कर गयी जिनके जवाब अर्जुन के पास होते भी कैसे जब सवाल हे समझ न आये. और ये देखा किसी और ने भी लेकिन अर्जुन बहार निकल आया.

"बीटा, तेरे भाई को उठा दे.", रसोई में ललिता जी के पास सजी संवरी राधिका भाभी को देख अर्जुन जैसे उनकी बात हे अनसुनी कर गया. बार बार साड़ी को सही करती हुई राधिका ऐसे परेशां चेहरे में भी खूबसूरत लग रही थी. रसोईघर में नाश्ते की महक के बावजूद खुशबु बिखेरती राधिका भाभी का ये अवतार अर्जुन के दिमाग में बस गया. दोनों की नजरे मिली तोह अर्जुन ने आगे बढ़ कर घुटने टेकते हुए साड़ी की प्लेट खुद हे सही कर दी.

"भाभी गुड मॉर्निंग. लगता है आपको साड़ी की आदत नहीं है? ताई जी, आप हे सीखा देना क्योंकि साड़ी में भाभी ाची लगती है.", अर्जुन इतना बोल कर अपनी ताई का गाल चूमता हुआ ऊपरी मंजिल की और दौड़ गया. जहा उसका बड़ा भाई अभी तक रात की म्हणत से थका रंगीन खवाब देख रहा था. रसोईघर में शर्माती हुई राधिका झुकी पलकों से मंद मंद मुस्कुरा भी रही थी.

"मेरा लल्ला न कुछ पूछता नहीं राधिका बिटिया और उसकी ऐसी हरकतों का बुरा भी नहीं मान न. बात उसकी सही है के तुम साड़ी में ाची लगती हो लेकिन चाहो तोह सलवार कमीज भी पहन सकती हो. किसी को आपत्ति नहीं होगी. वैसे तुम्हे यहाँ देख कर माँ जी जरूर मुझे टोक देंगी. तुम रेखा के पास बैठो, मैं चाय ले कर उधर हे आती हु. पहले तुम्हारे चाचा ससुर को पानी दे दू.", ललिता जी से पहले प्रियंका हे गिलास भर के ले जाती हुई बोली.

"ताई जी, बड़े पापा को मैं पानी दे रही हु. और भाभी आप भी अंकल आंटी से मिल लो. दादी जी ने कहा है.", राधिका को हाथ पकड़ कर प्रियंका साथ ले गयी तोह ललिता जी ने चाय की ट्रे लेते हुए अपनी देवरानी के कमरे का रुख किया. अर्जुन भी सीढ़ियों से दौड़ता सा निचे आ रहा था. संजीव शायद उठ गया होगा. रेखा जी के कमरे में भी वो अपनी ताई से पहले प्रवेश करता सीधा अपनी माँ की बगल में जा पसरा. रेखा जी अभी भी बिस्टेर पर थी लेकिन आदतन नहाने के बाद. हाथ की पट्टी बचा कर.

"माँ, आप काम से काम आज तोह नहाना ताल देती. ताई जी आप हे इन्हे रोक दिया करो.", अर्जुन को अपने साथ ऐसे लिप्त देख रेखा जी बस मुस्कुराई और उसके चेहरे को ताकती रही. अनजाने हे उनकी आँखें भीग गयी अपने बेटे का चेहरा इतने करीब देख और ललिता जी चाय की ट्रे टेबल पर रखती हुई ख़ामोशी से बहार चली गयी. इस लम्हे में वो भी शामिल नहीं होना चाहती थी. अपनी माँ को ऐसे मुस्कुराने के साथ साथ भीगी आँखों में देख अर्जुन ने पहले तोह कमरे को देखा और फिर वापिस उनकी ब्याह पर सर रख लिया.

"आप खुश है या दुखी? खुश तोह नहीं हो सकती क्योंकि मैं महीने भर आपसे दूर रहूँगा और दुखी होंगी तोह बताएंगी नहीं. जानती हो माँ, आपके जैसा दिल शायद पापा का भी नहीं है क्योंकि वो इजहार तोह करते है चाहे कभी कभी सही.", अर्जुन ने उस नमी को अपने हाथ से साफ़ करते हुए वो आंसू अपने सीने पर पांच लिए. उसकी ये हरकत देख रेखा जी ने आहिस्ता से उसके माथे पर होंठ रख कर खामोश इजहार कर हे दिया.

"अब तुम बड़े हो गए हो और आजकल सभी काम अपनी मर्जी से करने लगे हो तोह मैं क्या बात करू तुमसे? जानती हु की नाराज हो तुम मुझसे लेकिन क्या मुझे इतना भी हक़ नहीं की मैं अपने बचे को परशानी से दूर राखु? तुम मुझे महीना तोह क्या एक पल भी दूर नहीं हो सकते अर्जुन. मेरी सांसें अपने इस बेटे में बस्ती है और सांस तोह चलेंगी हे. बस तुम्हे एक महीना देख न सकुंगी इसलिए आंसू आ गए लेकिन तुम्हारे चेहरे पर जो जीत है उसकी ख़ुशी भी है मुझे.", ये जाने क्या अदृश्य ताक़त थी एक माँ में जो अपने बेटे को इतनी गहराई से पढ़ लेती थी.

"और जीत की वजह नहीं जान न चाहोगी माँ?", अर्जुन ने वो पट्टी बंधा हाथ अपने दोनों हाथो में लेते हुए देखा जहा उसकी माँ को एक घर के हे सदस्य ने जख्म दे दिया था.

"बोलना जरुरी तोह नहीं अर्जुन? नाम अक्सर सुनाई दे जाते है और अभी ख़ामोशी हे बेहतर है बीटा.", रेखा जी ने वही हाथ अर्जुन के सीने पर रख दिया जैसे उन्हें जख्म हुआ हे न हो.

"लेकिन ऐसा क्यों माँ? अक्सर घर को बचते बचते हम देख नहीं पाते की जमीन भी धंसती रहती है बहार की मार से. आप क्या आत्मरक्षा में भी विश्वास नहीं करती?", अर्जुन उनकी कलाई को अभी भी हाथो में लिए था और अपनी माँ के पहलु में किसी बचे सा लेता वो चेहरे से गंभीर था.

"बड़ी बड़ी बातें करने लगे हो तुम. लेकिन मैं चाहती हु अभी तुम बस ये समय खुल कर जियो. अपने लिए और दुनिया देखो. घर तोह सुरक्षित हाथो में है और तुम्हारे पापा इसको बरकरार रखेंगे. मेरा ख़याल रखने के लिए भी माँ जी से ले कर तुम्हारी बहने और सभी लोग है. बस तुम अपना समय गलत उम्र में जाय कर रहे हो ऐसे बेमतलब पहेलियाँ सुलझाने में."

"तोह आप नहीं चाहती की मैं आपके पास राहु? आपका ख़याल राखु और अगर आपको परेशानी हो तोह मैं कुछ भी न करू?", अर्जुन baal-sulabh गुस्सा दिखा रहा था जिसको देख रेखा जी के चेहरे पर वही हंसी छ गयी जो अर्जुन का मैं पल में हल्का कर देती थी. माँ को खुश देख वो मुँह फेरने लगा तोह उसके गाल को चूम कर रेखा जी ने खुदसे उसको दोनों बाहों में भर लिया.

"तुम हमेशा ऐसे गुस्सैल हे रहोगे? मैं जानती हु तुम मेरी परवाह करते हो और ख़याल भी रख सकते हो. बस अभी तुम इन छोटी मोती बातों पर ध्यान मैट दिया करो. वैसे तुम्हारे जाने से माँ जी, कृष्णा दीदी और ऋतू सबसे ज्यादा दुखी रहने वाली है. और मैं ये भी देख सकती हु की ऋतू बहार कड़ी हुई सब सुन्न कर रो भी रही है.", रेखा जी ने आधे ढले दरवाजे के बहार परछाई से हे पता कर लिया था के वो ऋतू है और माँ की थोड़ी तेज आवाज सुन्न कर वो तेज कदमो से अंदर दाखिल होती हुई उनकी दूसरी तरफ जा लिपटी. ऋतू सचमुच रो रही थी और अपनी माँ की पीठ में चेहरा छुपाये वो थोड़ा कस कर लिपट गयी.

"वो मेरे जाने से नहीं, आपकी हालत से दुखी है माँ. आप हर समय कितना पॉजिटिव रहती है जबकि ऐसा करके शायद आप खुद को हे भुला रही है. दीदी, पापा ने देख लिया तोह मेरी शामत आ जायेगी. अब रोना बंद करो.", ऋतू को हिलाते हुए अर्जुन ने ये याद दिलाया की घर में उसके पिता भी है. ऋतू झट्ट से उठ कर मुँह साफ़ करने लगी थी और उसके लाल गालो को देख अर्जुन मुँह चिढ़ाने लगा. रेखा जी ने उसको बाहों से निकाल कर अपनी इस बेटी को सीने पर लगाया तोह ऋतू ने उनके हाथ का ख़याल रखा.

"माँ, अबसे मैं हर रात आपके हे पास सोने वाली हु. हाँ पापा को भी बोल देना आप और इस बन्दर से कह दो की हमे इसकी कोई परवाह नहीं. ये चाहे महीने के लिए जाए या फिर साल के लिए. पहले भी तोह 8 साल के लिए भाग गया था और तब इसको चिंता नहीं हु.", ऋतू बात को जिधर ले गयी थी वो सुन्न कर एक पल तोह अर्जुन भी काँप गया. उसके चेहरे पर आते इन भाव को बाकी दोनों ने पढ़ लिया था.

"ारु, ये तुझे परेशान कर रही है और ऐसा इसलिए क्योंकि अब न ये पढ़ाई करेगी और न कोई काम. ऋतू, माँ को उठने दे और चाय पीने दे फिर दवा भी खानी है इन्होने.", कोमल चाय आगे करती हुई अपने भाई बहिन को माँ से हटा कर वही बैठ गयी. दोनों भाई बहिन ख़ामोशी से अलग हो गए और इनके पापा भी कमरे में आ कर साथ चाय पीते हुए haal-chaal लेने लगे. शंकर जी अर्जुन के लिए कुछ कपडे और सामान लाये थे जो उन्होंने मेज पर रख दिया था. ऋतू से हे उन्होंने रेखा जी के हाथ की तजा पट्टी करवाई थी और अर्जुन इस दौरान बस वो काले धागे गिनता रहा जो हथेली पर टाँके के रूप में स्थित थे. ऋतू ये सब बड़े उत्साह से कर रही थी जबकि कोमल इस दृश्य से नजरे बचती हुई अपने पिता के लिए अलमारी से कपडे निकलने लगी.

"वह मोटरसाइकिल से जा रहे हो तोह हेलमेट जरूर पहन लेना. सफर थोड़ा लम्बा है तोह सही जगह 10-15 मिनट रुकना बेहतर होगा. बाकी मोटरसाइकिल पर बैग के साथ सफर करना ठीक नहीं. कार ले जाओ.", शंकर जी ऐसे हे बात शुरू कर रहे थे अपने बेटे से.

"जी बैग पिछली सीट पर बांध जायेगा आराम से. और मैं बिपास वाली रोड से जाऊंगा जो ज्यादा भीड़भाड़ वाली नहीं है. दादी कह रही थी की आपने भी वह आना है बीच में?", अर्जुन सकुच रहा था इस वक़्त लेकिन शंकर जी उसके चेहरे को देखने के बाद चाय का घूँट भर कर अख़बार पर नजर डालते हुए बोले.

"2 हफ्ते बाद आना है लेकिन थोड़ी देर का हे काम है मेरा. और जिसको तुम बिपास कह रहे हो पहले वही main-road थी या समझ लो वही एक रास्ता होता था. गाँव अब गाँव नहीं रहा अर्जुन, क़स्बा है. लोग तोह हमेशा ाचे हे दीखते है लेकिन फिर भी संभल कर रहना थोड़ा और देर रात कही निकलना भी नहीं. बाकी समय मिले तोह माधुरी से मिलने चले जाना और अपने जीजा से मेलजोल बढ़ाना ाचा हे होता है. उधर तुम्हारे padd-dada जी के नाम से धर्मशाला है और उसके साथ हे अखाडा भी. शाम को ाचा टाइम गुजरेगा और जरुरी नहीं के पूरा महीना हे रहना है. जब दिल करे आ जाना.", शंकर जी जिस तरह उसको ये छोटी छोटी बातें समझा रहे थे वो कही न कही अर्जुन की मंशा भी जान न चाहते थे.

"ये वह भी कुछ न कुछ जलवा दिखने से नहीं हटने वाला पापा. कान खिंच दो नहीं तोह मुझे बोलो मैं कर देती हु. एक महीना ये उधर क्या करेगा?", ऋतू ने बीच में टांग अढ़ाई तोह अर्जुन लाचारी से अपनी माँ की तरफ देखने लगा जो बस खुश थी इन्हे आपस में लगा देख.

"अब इसका दिल है तोह करने दो और जहा तक मैं जानता हु तुम इसको अभी मन कर दो तोह ये नहीं जाने वाला. नौटंकी मैं भी किया करता था लेकिन अब मैं तुम्हारा बाप हु बीटा. तुम खुश हो की ये कुछ सीखना चाहता है और आदत नहीं है दूर रहने की इसलिए परवाह भी कर रही हो. वैसे बीटा तुम एक महीना करने क्या वाले हो उधर?", अर्जुन को इस सवाल की उम्मीद थी लेकिन ऋतू ये जान कर सकपका गयी की उसके पिता ने जैसे कोई चोरी पकड़ ली हो.

"मुझे दादा जी ने वह के बारे में बहोत कुछ बताया है पापा. जैसे हमारी हवेली, जमीन और बगीचे जहा aam-angoor लगते है. फिर आसपास स्कूल, डिस्पेंसरी और जाने क्या क्या उनके पापा ने भी बनवाया था जहा मैं जाना चाहता हु और अपने परिवार की हिस्ट्री देखने की चाहत है बस. वो रानी जी भी बुला कर गयी थी तोह एक महल भी देखने को मिलेगा. बुआ ने भी बहोत कुछ बताया था तोह करने के लिए तोह शायद महीना भी काम पड़े. लेकिन एक वजह और भी है उधर जाने की.", अर्जुन ने बात को बीच में रोकक कर गहरी नजर ऋतू पर डाली.

"और वो वजह?", शंकर जी भी जैसे कुछ कुछ समझ रहे थे.

"दीदी का एग्जाम है न इंग्लैंड वाले कॉलेज के लिए जून के आखिर में? संजीव भैया भी टूर पे जाने वाले है कल रात को. मैं इधर रहूँगा तोह इतना कुछ करने के लिए मेरे पास है नहीं की व्यस्त रह सकू पर दीदी का एग्जाम जरूर प्रभावित हो जाएगा. अब यहाँ न रुकने की इस से बड़ी वजह और क्या हो सकती है.", ऋतू ये देख कर हैरान थी की जिस बात का जीकर करना तक उसको डरा रहा था वो अर्जुन ने हे खोल दी थी. वो भी उसके पिता के सामने जो अब ये याद आते हे ऋतू को देखने लगे.

"मई सोच रही थी की दिसंबर वाला एग्जाम दे दूंगी. एडमिशन तोह अगले साल हे पॉसिबल होगा न पापा.?", लेकिन शंकर जी से पहले जवाब रेखा जी की तरफ से आया.

"बीटा जून में हे अगर परीक्षा दी जाए तोह काम से काम दिसंबर के लिए भीतर तैयारी तोह कर सकोगी. अर्जुन ठीक कह रहा है की तुम्हे ये परीक्षा देनी चाहिए और पूरी तैयारी के साथ. आखिर ये तुम्हारा अपना फैंसला है एक काबिल डॉक्टर बन्न ने का. तुम्हारे पापा ने तोह कभी परीक्षा को नहीं टाला था.", रेखा की बात सुन्न कर शंकर जी को भी हैरानी हुई लेकिन वो जान गए की कृष्णा जी ने बताया होगा.

"माँ, इंडिया में भी तोह ाचे.."

"दीदी, एग्जाम तोह आप देने वाली हो और मैं दिसंबर नहीं जून में हे आपको क्लियर करते देखना चाहता हु. अगले साल आप चली जाओगी और उसके अगले साल अलका दीदी. बस अपना फोकस वैसा हे रखना जैसा कॉलेज एक पहले साल में था. पापा जरूर अब ये चैलेंज देखना चाहते है.", अर्जुन ने जैसे ऋतू को हाँ कहने के लिए फंसा हे दिया था.

"तुम्हारे सांगवान दादा जी भी बोल रहे थे की ऋतू क्लियर कर सकती लेकिन मुझे डाउट है जिस तरह तुम एग्जाम से भाग रही हो. माइग्रेशन तोह मैं पैसो से भी करवा दूंगा बीटा लेकिन हक़ से जाओगी तोह ज्यादा ाचा लगेगा. चलो मैं नहाने चला और अर्जुन तुम भी तैयारी करो. रेखा, सिर्फ चाय नहीं नाश्ता भी कर लो. दवा तभी मिलेगी खाने के लिए और कोमल बीटा इस बात का ध्यान रखना.", शंकर जी ने तोह दूसरी राह भी सुझाई तोह एक ताने के साथ जिस पर ऋतू कुछ रुस्वा होती लगी लेकिन अर्जुन की आँखों में उसके लिए सिर्फ सम्मान था और नाज.

"दोने. एग्जाम दूंगी भी और क्लियर भी करुँगी. लेकिन मैं रहूंगी माँ के कमरे में.", ऋतू की बात सुन्न कर बहार जाते हुए शंकर जी ने सहमति दे दी.

"मैं भी चाहता हु के तुम अपनी माँ के पास हे रहो. नजर रहेगी.", अब ये कौनसी नजर रखवा रहे थे ये तोह उन्हें हे पता था. अर्जुन तोह जा हे रहा था घर से जो उन्हें अक्सर परेशां करता था कभी दामाद वाला भविष्य दिखा कर तोह कभी ऋतू को हे उनकी बहु बनाते हुए. लेकिन एक हक़ तोह मिल चूका था उसको और शंकर जी चाहते थे की बचे अब खुदको साबित करते जाए बस.

क्रमश
 
एक बात कहना चाहता हु मैं आप सभी से. पढ़ने के बाद विचार रख कर हे बताइयेगा.

देखिये ये थ्रेड मेरा अकेले का नहीं है और न प्यार 💯 बार. पहले हे दिन से जब किसी एक व्यक्ति ने अपना लिखे या कमेंट किया था तभी कहानी सांझी हो गयी थी. देखते हे देखते 60-70 अपडेट तक पहला mel-jol चल निकला और एक अज्ञातवास से अगर मैं वापिस लौटा तोह उसकी वजह बस आप सभी लोग थे. मैं नहीं जानता की मैं इतना काबिल हु या प्यार का हक़दार लेकिन ये मंच जरूर अब मेरे दिल के बहोत करीब है, आप सभी की वजह से.

सिर्फ कहानी की अपडेट देने हे नहीं आता बल्कि आप सभी से बातचीत करना भी एक नियम है.

कभी कभी हम लोग उत्तेजित हो जाते है और कभी थोड़ा परेशां लेकिन ऐसा हर समय नहीं होता. हाँ इसका निदान जरूर कर सकते है आपस में बातचीत करके.

कहने का मतलब यही है की जब हम एक अदृश्य परिवार के जैसे बन चुके है तोह सभी को अपनी बात भी रखनी चाहिए और दूसरे की समझनी भी. जहा आपत्ति हो या तर्क लगे उधर प्रश्न भी करना लाजमी है.

अब किसी व्यक्ति को एकांत में भोजन की आदत होती है तोह किसी को सबके साथ मिल कर खाने में मजा आता है और ऐसा हे साहित्य के साथ भी होता. अंतर्मुखी चर्चा नहीं करते और बहुमुखी सवाल उठाने के साथ साथ आपस में विचार भी प्रकट करते है. गलत तोह कोई नहीं क्योंकि स्वाद निजी मामला है.

आप सभी लोग कभी भी नकरात्मक विचार मत लाये और अगर गलती से भी उत्तेजित बात करे तोह उसको नजरअंदाज कीजिये ता फिर रिपोर्ट. लेकिन हमेशा अपने विचार रखिये और ऐसा बिलकुल नहीं की हंसी मजाक नहीं कर सकते. कहानी से सभी जुड़े है और ये भी आप सभी का इजहार का एक तरीका है तोह इसको रोक कर खाने के बाद वाले मीठे से पृथक मत कीजिये. ये चर्चा और हंसी मजाक जो कहानी के किरदारों से जुड़ा होता है वही कहानी की जान है. अक्सर लोग कमैंट्स और रेविएवस गहराई से पढ़ते है चाहे वो साइलेंट रीडर हो.

2800 पैन और 28000 कमैंट्स में कहानी तोह 220 कमैंट्स में हे होगी, जो इंडेक्स में सीधा उपलब्ध है. लेकिन बाकी के विचार और प्यार हे वजह है इस विशाल अंतहीन यात्रा के. बस आपसी मूक तालमेल जरूर बनाये जब कोई अंतर्मुखी किसी बहुमुखी से भेंट करे तोह. इंडेक्स मेरी जिम्मेवारी है जो हमेशा सही मिलेगा. ये आपका मंच है और सभी यहाँ विचार रख सकते है, जुबान मीठी रख कर. 😅🙌

हाँ कोई बात बुरी लगी हो तोह उसको दिल पर जरूर लीजियेगा क्योंकि तभी हम हालात बदल सकते है. शायद ये एक बेहतर तरीका होता है जीवन में अधिक सुधार लाने का लेकिन हिम्मत रख कर सभी के साथ शामिल होने से हे बदलाव आते है. अकेला एनिग्मा तोह इस कहानी को 4 पन्नो पर लिया भटक रहा था. बुरा लगा तभी तोह इधर आया.

धन्यवाद आप सभी का

आपका

एनिग्मा 🤗🙏
 
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