Incest Pyaar - 100 Baar - Page 47 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 194

हक़ और हक़ीक़त

आगे...


"दादा जी कह रहे है की वो दादी और मुझे कुछ दिनों के लिए गाँव ले कर जाएंगे. साथ हे माँ और प्रियंका दीदी भी जा सकती है.", अर्जुन तैयार हो कर खाने की मेज पे आया हे था जहा उसके पिता, ताऊजी और दादा जी पहले से विराजमान थे. पंडित जी yada-kada हे ऐसे सबके साथ शामिल होते थे लेकिन आज वो भी तैयार थे और राजकुमार जी भी. रुपाली ने आरती, तारा और प्रीती के लिए भी वह प्लेट लगते हुए ये बात कही तोह बाकी सभी उसको हे देखने लगे और फिर रामेश्वर जी को. कौशल्या जी भी अपने पति की बगल में आ बैठी जिनके चेहरे पर कुछ संतुष्टि थी.

"ये प्रोग्राम कब बना दादा जी? और अगर पापा के मां जी के घर जा हे रहे है तोह संजीव भैया के लौटने के बाद भी जा सकते है. भाभी और भैया भी घूम आएंगे.", अर्जुन जगह ढूंढ़ता आखिर में अकेला हे इस तरफ आ बैठा जहा उसकी अगल बगल में 2 पंक्तियों में बाकी सभी बैठे थे. इस तरह जैसे वो मुखिया वाली कुर्सी पर जा बैठा हो पर वैसा था नहीं.

"ोये नंदलाल, तेरे भैया भाभी अब हर जगह तोह न चिपके रहेंगे हमारे साथ साथ? वो तोह मैंने हे तेरे दादा जी से कहा था के हंसमुख उधर से अगले महीने शहर चला जाएगा तोह उस से पहले थोड़ा ghar-khet देखभाल आये. तेरी माँ के लिए खुद शंकर ने कहा है की 15 से 20 दिन हाथ सही होने में लगने वाले है और रेखा काम करने से हटने वाली नहीं. इसलिए उसको साथ लेके चलते है और 3-4 दिन की हे तोह बात है. चौथे दिन वापिस भी लौट आएंगे. और अभ नहीं जा रहे, 29 या 30 को जाना है. रुपाली ने भी अपना कुछ सामान ले कर आना है तोह घूम आएगी साथ.", कौशल्या जी ने बात कहने के साथ साथ अर्जुन को नरम शब्दों में झाड़ भी दिया था जो अब बगले झांकता इधर उधर देख रहा था अपने बचाव में लेकिन बाकी सभी उस पर हे हँसते लगे. संजीव भी तैयार हो कर ख़ामोशी से उसकी हे बगल वाली कुर्सी पर बैठ गया. शायद उसकी अलग हे परेशानी थी कोई.

"हाँ तोह ाची बात है न दादी लेकिन ध्यान रखना बस. गर्मी बढ़ने लगी है और गाँव में ..", अर्जुन की बात फिर से कौशल्या जी ने काट दी.

"तू ये बात अपने बारे में सोच बीटा कही वह गलियों में भटकता फिर और धुप में कोयला हुआ वापिस आये. ज़िन्दगी शहर से ज्यादा मैंने gaanv-dehat में हे बिताई है और वह हम लोग क्या सिखर धुफेरी में सड़क पे रहने वाले है? कोमल बीटा संजीव का भी नाश्ता लगा दे. ये इधर बैठ गया लेकिन इसकी बीवी इन्तजार में अभी तक भूखी है.", ये संजीव भी आ फंसा था अपनी दादी के घेरे में जिसको बात सुनते हे ठसका लगा लेकिन सबको हँसता देख वो अर्जुन की और प्रश्नात्मक देखने लगा.

"भैया आज न दादी थोड़ी परेशां है क्योंकि उनसे शायद दादा जी ने कुछ छुपाया जो उन्हें पता चल गया. आप बस आराम से नाश्ता करो और भाभी मेरी माँ के कमरे में उनके साथ हे नाश्ता कर रही है.", अर्जुन ने इस बार कौशल्या जी को हे लपेट लिया था बेशक मजाक में हे. जो अपने पति को घूरने के बाद फिर मुस्कुरा उठी.

"घर फिर घर कहा लगता बीटा जब तुम लोग आसपास नहीं होते? सोचा था ये राजकुमार और शंकर अब इधर है तोह अपनी माँ से 2 घडी बतिया लिया करेंगे लेकिन इनके साथ वो नासपीटा इन्दर खुद हे गायब रहने लगा. लेकिन करो तुम लोग अपनी मर्जी और मैं अपने बचो बहु में खुश हु. प्रीती बीटा तू तोह सब देख रही है इसलिए पहले से हे तैयार रहियो. ये अर्जुन भी कही मटरगस्ती करने निकला तोह तू काम से काम मेरे पास हे रहना.", प्रीती के तोह मुँह में पानी का घूँट हे रुक गया अपना नाम सुन्न कर जिस पर रामेश्वर जी ने हे अपनी बीवी को खामोश करवया.

"ओह भगवान, खाना तोह खाने दो बचो को. तू जिन जिन के नाम ले रही है उन्होंने 10 पराठे साफ़ कर दिए. लेकिन ये छोटे पंछी दाना चुग रहे है इन्हे आवाज से मत डराओ. प्रीती बीटा, चंडीगढ़ जाते हे अपने पापा को याद करवा देना की मैंने कुछ कहा था.", रामेश्वर जी ने अब कही भोजन शुरू किया तोह अगले 10 मिनट ख़ामोशी बरकरार रही. कौशल्या जी स्वयं खाने की जगह सबकी प्लेट में उनकी पूरी खुराक का ध्यान रखती रही. उन्हें हमेशा अपने बचो के नाश्ते पर ध्यान देना पसंद जो था. अर्जुन 2 हे पराठे खा कर हाथ साफ़ करने लगा तोह ये ख़ामोशी भांग हुई.

"चुपचाप से 2 और पराठे ख़तम करो. Kad-kathi के हिसाब से वो भी काम है बीटा. दोपहर या रात में काम खा लो लेकिन सुबह पूरा भोजन. और ये लस्सी ऐसे हे पड़ी है?"

"दादी, सफर भी करना है और अभी तोह दूध और वो लड्डू खाये थे इसलिए लस्सी नहीं. मैं रस्ते में कुछ खा लूंगा या जूस पी लूंगा."

"एक पराठा खा ले बीटा. ला ये लस्सी इधर दे दे.", शंकर जी ने बिना देरी किये वो गिलास अपने वाले में पलट लिया. एक पराठा अर्जुन को देने के साथ उन्होंने जैसे हे अपने लिए भी पराठा उठाया कौशल्या जी ना में गर्दन हिलती हंसने लगी.

"दर्जन पराठे खा चूका है शंकर. अब बस कर बीटा और समय देख.", कौशल्या जी ने कहने के साथ साथ खुद हे मक्खन अपने बेटे की और सरका दिया. वो जानती थी की अब पूरा दिन उनका बीटा शायद हे भोजन करे. इस बीच ऋतू ने ये महफ़िल भांग की.

"दादी आपके लिए पूर्णिमा दादी जी का फ़ोन है. होल्ड पर हे रखा है बात कर लीजिये."

"हाँ सही किया जो फ़ोन कर लिया. राजू बीटा, तुम्हे हे अपने पिता के साथ सब देखना है. आज दोपहर का कार्यक्रम वही हवेली पर रखा है. शंकर, देख लेना बीटा अगर समय निकाल सको तोह. संजीव, कही जाना नहीं अब.", कौशल्या जी उठ कर जाने से पहले सबको हिदायत दे गयी थी. शंकर जी ने बस सर हिला दिया. सभी लोग लगभग एक साथ हे अपने स्थान से उठने लगे थे और संजीव जैसे कुछ समय अर्जुन से बात करना चाहता था लेकिन उस से पहले हे शंकर जी ने अपनी बात रख दी.

"अर्जुन, तुम जरा अपनी माँ के कमरे से मेरा हॉस्पिटल वाला बैग ले कर बहार मिलो. मैं कार निकाल रहा हु.", संजीव ने इन्तजार करना हे ठीक समझा और अर्जुन बिना देरी किये अपनी माँ की तरफ बढ़ चला जिसके साथ संजीव भी था. चची का हाल लेने के इरादे से. कुछ हे समय बाद बाप और बीटा घर के बहार कार में बैठे थे. अपना सामान सही से रखने के साथ हे शंकर जी स्टीयरिंग को साफ़ करते हुए जैसे मैं हे मैं शब्दों को बुन्न ने लगे लेकिन जल्द हे बात शुरू की.

"ाचा लग रहा है के तुम उत्साहित भी हो और तैयार भी. लेकिन मैं आज तुमसे एक बात करना चाहता हु अर्जुन और ये बात एक बाप के हक़ से नहीं बल्कि वो हक़ीक़त याद करके जिसने बहोत कुछ बदल कर रख दिया था. मुझे हमेशा ऐसा लगता है की शायद मैं तुम्हे बाप की तरह प्यार नहीं दे पाया लेकिन जब तुम्हे देखता हु साथ रह कर तोह वो बात मायने नहीं रखती. उमेद तुम्हे शायद मुझसे बेहतर जानता है और प्यार तोह वो करता हे है. ऐसा हे नरिंदर के साथ है और कही न कही संजीव बची खुची कसार भी पूरी कर देता है. लेकिन एक और बात है जो मैं कहना चाहता हु. तुमसे मुझे लगाव है इसलिए मैं तुम्हे प्रभावित नहीं करना चाहता. क्या ये जरुरी है की मैं तुम पर एकाधिकार जातौ?", शंकर जी ने बात कहते हुए अपने पर्स से तमाम पैसे निकाल कर अर्जुन की ऊपर वाली जेब में खोंस दिए. लेकिन वो तोह बस अपने पिता के चेहरे को देख रहा था जहा अब धुप का कला चस्मा चढ़ा था. अर्जुन की नजरो में उसके पिता हमेशा हे एक आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक थे लेकिन बातचीत अक्सर सिमित हे होती थी.

"मैं ये महसूस करता हु पापा और आपको इसके लिए शब्दों की जरुरत हे नहीं पड़ती. मैं कभी किसी के पास गया क्या नम्म आँखे ले कर सिवाए आपके? चाहे वो बोर्डिंग जाने से पहले गुस्से में रट हुए आपके पास खड़े रहना या अभी कुछ वक़्त पहले. मैं जानता हु की आप हे हैं जो मेरी परेशानी हल कर सकते है बिना मेरे कहे. ये कलाई घडी आपके और मेरे बीच हमेशा एक मजबूत सम्बन्ध का प्रतीक है.", अब शंकर जी ने उसके बालो को सहलाते हुए परिचित मुस्कान दी.

"तुमने अभी परिवार के भीतर का जीवन देखा है बेटे लेकिन बहार आजाद निकल कर जब फैंसले लेना सीखोगे तोह गलतियों पर ध्यान मैट देना क्योंकि वो तोह होती रहेंगी. बस जो फैंसले तुम अपनी मर्जी से लो, उन्हें बदलने की कोशिश मैट करना. फिर तुम कभी भी खुद को वापिस नहीं पा सकोगे. मैं दुनिया के बारे में पापा जितना तोह नहीं जानता अर्जुन लेकिन मझदार में खड़े हो कर दोनों किनारे जोड़ने वाला सही नियत तोह रखता है लेकिन वो किनारे एक नहीं कर पता. कीमत कुछ भी चुकानी पड़ सकती है. मुझे तुम्हारी चिंता नहीं है क्योंकि तुम सक्षम हो लेकिन मेरी इस बात पर गौर करना बीटा.", शंकर जी की बात अमूमन हलकी और तंजिया रहती थी लेकिन आज बिलकुल अलग था. वो गंभीर थे और उनका ज्ञान किसी aatmik-shikshak जैसा.

"आप जानते है ऐसे किसी व्यक्ति को पापा जिसने वैसा किया था? मैं समझ रहा हु और मेरी तरफ से आपको शिकायत का मौका भी नहीं मिलने वाला लेकिन बस सुना है मैंने की पहले आप खुद को इतना व्यस्त नहीं रखते थे. पहले मतलब बहोत पहले.", अर्जुन डैशबोर्ड को खोलता तोह कभी बंद करता. उसको जैसे इस बचपने में मजा आ रहा था. मुद्दा गंभीर था और अपने बेटे की हरकत के साथ ऐसा सवाल सुन्न कर शंकर जी ने शीशे ऊपर चढ़ाते हुए एक चालू कर दिया.

"जानते तोह होंगे हे तुम क्योंकि तुम्हारा नाम जो हैं इसके मैं खिलाफ था जब ये तुम्हे दिया गया. तुमसे शिकायत नहीं थी लेकिन उस नाम का बोझ आजतक मेरे दिल पर है अर्जुन. जिस तरह कई बार तुम अपने फैंसले लेते हो और माहौल ऐसा बनाते हो न जिस से शक्श कोई और हे नजर आता है, वैसा हे वो इंसान भी था. तुम्हारा अज्जू चाचा. तुमने तोह बस यही बिखरी हुई नाराज हवेलियां आपस में फिर से जोड़ी, जानता हु आसान नहीं था लेकिन अज्जू. अज्जू ने वो सब जीत रखा था किसी सिकंदर की तरह. न उसके सामने सोमबीर ताऊ जी की कोई बिसात थी और न किसी अफसर की. वो छोटी छोटी नेहरू को आपस में एक करता चला गया और कभी विफल नहीं हुआ जबतक.. जबतक वो समंदर से न जा टकराया. उसने वह भी सबके घुटने टिकवा दिए थे बीटा और कमी बस यही रह गयी की उसके तीन भाई उसकी पीठ न बचा सके. थोड़ा बेवकूफ था वो दिल के मामले में और अक्सर दिल से सोचने वाले सभी होते है जैसे मैं भी कुछ अलग नहीं. पर समंदर के किनारे कभी एक नहीं होते ये वो जान कर भी लहर पे सवार हो गया. पापा के सिध्दांत, माँ का अनुशाशन, रघुवीर चाचा जी की ताक़त और हमारे मजबूत कंधे बस झुक कर रह गए, जो उसके काम तक क्या उसको बचा भी न सके. मैं पापा के चेहरे पर उस समय वाली चिंता आजकल देखने लगा हु चाहे ाची तरह न सही लेकिन वो इतिहास के िट्छुक नहीं है. तुम बस इतना करना मेरे बचे की ये नाम सार्थक मैट करना उस व्यक्ति से जिसकी याद में तुम्हे ये मिला है. गाँव जाओ और जी भर के मौज मस्ती करो. घूमो फिरो और अगर ऊर्जा बढ़ती लगे तोह अखाड़े में उसको प्रयोग करो. तुम्हारी जेड इस घर से है, उस गाँव से नहीं बस इतना याद रखना. आऊंगा तोह तुमसे मिल कर जाऊंगा. अपना ध्यान रखना.", इतनी तल्लीनता से अपनी पूरी बात कहने के बाद शंकर जी ने अर्जुन को जवाब तक देने का मौका न दिया. और उसकी तरफ का दरवाजा खुद हे खोल कर इशारा दे दिया की वो अब जाना चाहते है.

"जैसा आप चाहते है वैसा हे होगा पापा. मुझे भी इतिहास पसंद नहीं. साइंस ाचा सब्जेक्ट है और दिमाग शांत रखने के लिए उसमे थोड़ा मैथमेटिक्स भी मिला लिया गया. माँ ने कहा था के आपकी कफ और जूस बैग में दाल दिया है उन्होंने.", अर्जुन बहार निकल कर दरवाजा वापिस बंद करते हुए घर में दाखिल हो गया. शंकर जी ने अपने पर्स की गुप्त जेब से वो 3 इंच बी 2 इंच की श्वेत श्याम तस्वीर निकाल कर गहराई से देखि जिसमे लम्बे घुंगराले बालो वाला युवक शंकर जी के जवान चेहरे के साथ चेहरा जोड़े उनकी पीठ पर चढ़ा था. अगल बगल में नरिंदर और उमेद मुस्कुरा रहे थे. वो यक़ीनन अज्जू हे था जिसको आजतक शंकर अपने दिल में संजोये था.

'हक़ीक़त तोह मुझे भी नहीं पता अर्जुन लेकिन अब जान ने का फायदा भी नहीं.', आक्रामक व्यक्ति खुद नहीं चाहता था के और तबाही हो. अब सभी के परिवार जो थे और जिम्मेवारियां भी. शायद वो समंदर और शंकर जी अनजान थे की रामेश्वर जी ने दिल से इतिहास निकला नहीं था. वो चिंतित तोह थे लेकिन वजह कुछ और थी.

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घर के भीतर अलग हे नजारा था अब. कौशल्या जी पूर्णिमा जी से बातचीत होने के बाद अपनी बड़ी बहु और कोमल को सब समझने में लगी हुई थी. ऋतू के साथ स्वयं कृष्णा जी ने अर्जुन का बैग पैक किया था जिसमे उसकी ख़ास खुराक, कपड़ो के साथ साथ 3-4 किताबे और आवश्यक सामान था. अर्जुन ने पहले हे बता दिया था के सिमित कपडे और 2-3 पोषक बहार अंदर के लिए हे राखी जाए. तारा भी इसमें उनकी मदद कर रही थी और मुस्कान प्रियंका के साथ राधिका भाभी के कमरे में. घर के अंदर आते हे अर्जुन का सामना प्रीती से हुआ जो तबसे वह कड़ी थी जब अर्जुन अपने पिता को बैग देने आया था.

"तोह तुमने ऋतू दीदी की वजह से ऐसा किया?", प्रीती के स्वर में ठहराव सा था जैसे बात कुछ और हो. लेकिन अर्जुन आँगन खली देख प्रीती का हाथ पकड़ कर उसको बगीचे की तरफ ले चला.

"अब ये बताओ प्रीती की यहाँ कौनसा ऐसा पौधा है जिसकी जरुरत नहीं?"

"सब ज़िंदा है और तुमने दादा जी के साथ मिल कर इन्हे बड़ा किया अर्जुन. जरुरत से पहले जरुरी बात है इनका जीवित होना और सभी की अपनी अपनी विशेस्ता है.", प्रीती इतना तोह जानती थी की अर्जुन निरर्थक कुछ भी नहीं कहता.

"देखो यहाँ हम सभी का अपना एक ख़ास असर या खासियत होती है. लेकिन कभी कभी ज्यादा हे मेहरबान जीव अपनी विशेस्ता छोड़ देते है दुसरो के लिए. अब ये घाना होता संतरा हे देख लो जिसकी छाया में कई फूल पनप रहे है. इस तरफ के पत्तो में इसकी स्वाभाविक महक है.", अर्जुन ने एक पत्ता टॉड कर उसको मसलते हुए प्रीती के चेहरे के सामने किया तोह उसने भी सुगंध पहचान ली.

"लेकिन यहाँ निचे की तरफ तुम्हे इसके पत्तो से वैसी महक नहीं मिलने वाली क्योंकि इधर तोह तुम खिल रही हो. तुम्हारी खुशबु इस से ज्यादा नहीं होगी लेकिन यही तोह साइट्रस की विशेस्ता है जो वो अपनी छाया में रहने वालो को अवसर देते है खुद की खासियत बढ़ने का. यहाँ इनमे तुम्हारी महक के अवशेष है.", सचमुच उस तरफ के पत्ते में प्रीती ने मिली जुली सुगंध पायी.

"ऋतू दीदी के लिए मैंने वो नहीं किया. मैं गाँव जाना चाहता था और उनकी खासियत को सलामत रखना मेरी जिम्मेवारी है. अब तुमने भी तोह कोचिंग लेनी है न एक महीने के लिए? तभी तुम चंडीगढ़ जा रही हो अपने कॉलेज से पहले हे किताबे लेने जिस से तुम तैयारी कर सको. ये सब जरुरी है प्रीती और मैं सबके साथ इस बगीचे की तरह हे रहना चाहता हु बिना बलिदान मांगे. तुम्हे यहाँ भी हिफाजत से रखा है और परिवार में भी हमेशा ऐसे हे रहने वाली हो. बस मेरी यही ख्वाहिश है की अकेले ऐसा कोई फैंसला न लेना जिस से कोई त्याग करना पड़ा.", प्रीती की नजरो में आज अपने प्यार के लिए इजत्त और गहरी हो चली थी.

"जानती हु फंदेबाज मैं तुम्हे. तुम इसलिए भी वह भाग रहे हो जिस से तुम्हारी ऐश में कमी न हो. बहोत मेहनत जो की है तुमने पिछले कुछ दिनों में. वैसे कॉलेज वाला प्रॉमिस याद रखना.", रोमिला जी को घर में आते देख उसने जल्दी से ये बात कही और अर्जुन के जवाब देने से पहले रोमिला की आवाज भी आयी.

"तोह तुम दोनों यहाँ mel-jol बढ़ने में लगे हो? प्रीती तुम्हारे पापा त्यार हो कर तुम्हारा हे इन्तजार कर रहे है. अर्जुन, मुझे ाचा लगेगा अगर तुम वह जाने के बाद कभी टेलीफोन करोगे तोह. चाहे प्रीती को हे कर लेना.", रोमिला के चेहरे की अलग हे कशिश थी जिसको प्रीती के सामने अर्जुन नजरअंदाज करने की कोशिश में लगा था.

"हनननन. हाँ आंटी जी मैं करूँगा फ़ोन. वैसे आप लोग वापिस कब आओगे?"

"पहले प्रीती जाने के लिए त्यार तोह हो. ये तोह तुम्हारे घर से वापिस अपने घर आना हे नहीं चाहती. लेकिन हम लोग कल हे लौट आएंगे और तुम्हारे पीछे से मैं रेखा का ध्यान ाचे से रखूंगी.", रोमिला ने अपनी हे बेटी को परेशां किया तोह प्रीती तेज कदमो से वह से निकल कर अपने घर की तरफ बढ़ने लगी. रोमिला उस से पहले हे चल चुकी थी जिस पर प्रीती ने एक बार पलट कर अर्जुन की तरफ देखा और होंठो को गोल करते हुए ऐसा सन्देश दिया की अर्जुन आसपास देखने लगा. प्रीती की ऐसी खुली हरकत देख वो सकपका गया था और हंसती हुई प्रीती अपनी माँ का हाथ पकड़ती हुई अपने घर में जा घुसी.

'पागल लड़की.'

"अब तू सफर के लिए एक्स्ट्रा ऑक्सीजन ले रहा है क्या यहाँ पे?", ये आवाज संजीव भैया की थी और उन्हें अपने पास आता देख अर्जुन हे उनकी और लपका.

"ओह नहीं भैया बस जाने से पहले देख रहा था के सब सही है न. वैसे आप थके थके लग रहे हो."

"तू ठहर जा बदमाश. हाहाहा.. बस यार तेरे सामने हे है 3-4 दिन से आराम कहा मिला था. फिर भी कल रात सोया लेकिन अभी एक दिन और लगेगा थकान मिटने में. तोह गाडी चमका ली जाने के लिए?"

"न न भैया अपनी रानी पर जा रहा हु. वो देखो मैंने ये हक्क लगवा लिए बैग रखने के लिए पीछे. कार हर जगह नहीं जा सकती और ये ज्यादा जगह भी नहीं घेरती और मुझे अकेले इसको चलना ज्यादा पसंद है. कार आप चला लेना तबतक.", अर्जुन अपने भैया का हाथ पकडे हुए बहार वाली सीढ़ियों से हे ऊपर चल दिया.

"नहीं छोटे. कार तोह तू पहले हे मुझे एक दे चूका है और काली वाली का स्टीयरिंग बस तू तेरे तक हे रख. हाँ वह पर मोटरसाइकिल तेरे काम ज्यादा आएगी लेकिन हाईवे पर कार ठीक नहीं थी?", अर्जुन के कमरे में नयी चादर बिछी थी और अब वह सामान भी दुरुस्त था. जैसे हे दोनों बिस्टेर पर बैठने लगे, तारा तकियों के ऊपर नए लिहाफ चढ़ा कर यहाँ रखने आ गयी.

"तोह तुमने अकेले हे सब सेट कर दिया?", अर्जुन ने पानी की बोतल टेबल से उठा कर वैसे हे घूँट भरने के बाद तारा को प्रशंशा से देखते हुए कहा.

"हाँ और थैंक यू मैट हे बोलना तुम. तुम्हारा बैग भी निचे तैयार है. वैसे जब तुम वापिस आओगे तब भी कमरा ऐसे हे मिलेगा. संजीव भैया, नानी कह रही है की आप भी एक बार उनसे मिल लेना.", तारा खली बोतल अर्जुन के हाथ से लेती हुई अपनी कमर हिलती हुई चली गयी जिस पर अर्जुन ने भैया की मौजदगी में ध्यान न दिया.

"आज तोह उमेद चाचा की तरफ आपकी पार्टी है भैया. भाभी भी हवेली देख कर खुश हो जाएंगी.", अर्जुन ने हवेली का जीकर किया तोह संजीव ने उठ कर अंदर से दरवाजा बंद कर लिया जिस पर अर्जुन थोड़ा हैरान हुआ.

"देख मैं तुझसे एक जरुरी बात करना चाहता था लेकिन शादी की वजह से और तेरे aas-pas अकेले न मिलने की वजह से बता नहीं पाया. अब तूने हवेली का जीकर किया तोह मुझे भी याद आ गया की क्या बात करनी थी.", संजीव भैया की इतनी दबी हुई आवाज और गंभीर चेहरा देख अर्जुन उनके बिलकुल करीब जुड़ कर हे बैठ गया.

"कैसी हवेली और क्या बात थी भैया जो आप अकेले में हे कर सकते थे?"

"छोटे मुझे शादी वाले दिन हे पता चला था की दादा जी के पिता जी हमेशा से हे उस गाँव में नहीं रह रहे थे. हाँ मतलब जहा छोटे दादा जी रहते है वही उनकी शादी हुई और वो पुश्तैनी घर हे है. लेकिन जहा रियासत थी मतलब आज भी महल है, वह पर एक हवेली बंद पड़ी है पिछले 50 से ज्यादा साल से. पंडित जुगलाल जी की हवेली, जहा हमारे दादा जी पैदा हुए और कुछ साल वो लोग उधर रहे भी. जुगलाल जी अपने दादा जी के दादा थे. तेरा उस सेहर जाना हुआ तोह क्या तू उसको देखने का जुगाड़ करेगा?", ये एक बहोत हे बड़ा राज था अर्जुन के लिए और संजीव भैया का उसको ऐसे बताना इशारा करता था किसी और भी बड़े राज की तरफ.

"जग्गी भैया तोह कह रहे थे की दादा जी के पिता जी शुरू से हे अपनी जगह से रियासत देखते रहे थे और वो कसबे के मालिक हे थे जिन्होंने वही पर सब काम करवाए लोगो के लिए. दादा जी के जनम का ब्यौरा तक वह की पंचायत कॉपी में दर्ज है. फिर ये दूसरी हवेली कहा से आ गयी और वो भी महल के पास.?"

"यही तोह समझ नहीं आ रहा भाई लेकिन जिसने जानकारी दी है वो इंसान 100 प्रतिशत सच कह रहा है. सोच मैं तोह अभी haal-filhaal में घर से बहार नहीं निकला तोह मुझे क्या सपना आएगा उस हवेली का? रही बात दादा जी का नाम पंचायत में दर्ज होने का तोह शाही मुंशी कोई छोटा व्यक्ति नहीं होता था और ऊपर से पंडित विद्वान व्यक्ति को तोह अलग सम्मान मिलता था. उन्होंने किसी वजह से हे ये सब करवाया होगा.", अर्जुन बड़े ध्यान से ये जानकारी ले रहा था.

"तोह ऐसी बात अगर कोई बता सकता है तोह वो खुद पड़ती रामेश्वर जी यानी हमारे आदरणीय थानेदार साहब. लेकिन आपको कैसे पता चला ये और उन्होंने ये बात किस से करि थी? ऐसी हवेली होती तोह क्या वो कभी इसकी चर्चा नहीं करते या कोई और करता."

"वो रानी साहिबा आयी थी न शादी में? जब वो मुझे आशीर्वाद देने के बाद दादा जी से एक तरफ हो कर बात कर रही थी तभी मैंने उनके मुँह से ये सुना था के हवेली के लिए कोई नोटिस आया था जिसको उन्होंने हे वापिस लौटा दिया अपनी संपत्ति बता कर. और दादा जी ने कहा के उन्हें उस हवेली की कोई जरुरत नहीं. पंडित जुगलाल जी खुद हे वह नहीं रहना चाहते थे तभी उन्होंने वो shahi-pariwar को लौटा दी थी 50 बरस पहले. उनके लिए उस हवेली का कोई वजूद हे नहीं है. और इस छोटी से बात के सिवा इस बारे में और कोई चर्चा नहीं हुई. मैं नहीं जानता की वह कुछ मिल सकता है या नहीं लेकिन तुम्हे एक बार कोशिश करनी चाहिए उस जगह को देखने की. खंडहर अक्सर बहोत कुछ समेटे रहते है और ये तोह 50 बरस से बंद है.", अर्जुन भी इस बात से सहमत दिखा.

"हाँ हो भी सकता है की वह कुछ काम की चीज मिल जाए और मैं तोह वैसे भी महल देखने जाने हे वाला हु. रानी जी ने तोह खुद हे मुझे न्योता दिया था और मैंने जाने कहा सुना था के दादा जी का बचपन महल के हे पास बिता था. मतलब दादा जी यही 70 के और हवेली बंद है 50 साल से या कुछ ज्यादा मान लो. तोह उनसे जुड़ा तोह उधर कुछ न कुछ हो हे सकता है. और अगर वो कसबे में रहते रहे तब भी चांस है की वह सिर्फ खंडहर तोह नहीं मिलने वाले. देखते है भैया की ये कैसी हवेली है जिसको दादा जी के दादा जी भी पसंद नहीं करते थे."

"और क्या पता के वह से कुछ ज्यादा जुड़ाव हो इसलिए उसको छोड़ दिया गया हो? अब होने को तोह कुछ भी हो सकता है छोटे और अक्सर हम अपना हक़ प्यार की वजह से हे छोड़ते है. मेरा दिल तोह कहता है की वह बहुत कुछ मिल सकता है और नहीं भी मिला तोह कोई बात नहीं. तुम्हे उस पीढ़ी से जुड़ना तोह नसीब होगा हे.", संजीव भैया की ऐसी सकरात्मक बातें सुन्न कर अर्जुन मुस्कुरा उठा.

"8 बज गए है भैया और अब मुझे सबसे मिल कर निकलना चाहिए. हवेली का क्या है? किस्मत गाँव ले जा रही है तोह क्या पता ये हवेली हे असली मंज़िल हो. चलो आप भी थानेदारनी जी से मिल लो कही आपका हे बंद न बजा दे दादी भाभी के हे सामने.", अर्जुन की बात सुन्न कर संजीव को भी तारा का पैगाम याद आ गया.

"चल भाई और तू आराम से चलना मोटरसाइकिल. 5 घंटे की जगह 7 लगा लियो पर ध्यान से. और मैं फ़ोन करूँगा शाम को.", अर्जुन अपने भैया को हॉल कमरे में हे छोड़ पिछली तरफ चला गया. अभी सबसे मिलने मिलाने में उसको 15-20 मिनट लग हे जाने थे.

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"हमने कहा था न अंकल जी की आप हम पर विश्वास तोह करके देखो, जान तक की परवाह नहीं. आपने थोड़ा लम्बा रास्ता बताया था लेकिन मैंने सोचा की क्यों न सीधा हे हाथ दाल दिया जाए. ये रही रेणुका और पंडित जी के साथ बातचीत की चाबी.", कुलदीप उस बगीचे में सबसे घने भाग पर छाया में एक कुर्सी पर गर्भवती रेणुका को कुर्सी पर कलाई से बांध कर हटा था जब उसके 4 आदमियों के साथ आनंद, लल्लन, संग्राम और सबसे घाघ व्यक्ति अभिमन्यु ने कदम रखे. इस जगह 5-6 सफ़ेद प्लास्टिक की कुर्सियां पहले हे राखी थी, एक लकड़ी के साधारण से मेज के ird-gird. रेणुका दुत्कार भरी नजरो से उस घृणित व्यक्ति को घूर रही थी जो अतीत में कभी उसका जीजा था.

"बड़ा हे भरी काम अकेले हे अंजाम दे दिया तुमने तोह बिटवा. वह उस भरे पूरे माहौल में उनके घर की बेटी उड़ा ले आये और किसी को खबर तक न लगने दी? यही है वो औरत अभिमन्यु?", लल्लन सिंह रेणुका से वाकिफ न था इसलिए कुर्सी पर रेणुका के सामने बैठते हुए उसने एक बार सुनिश्चित करना चाहा. अभिमन्यु के चेहरे पर आयी कुटिलता ने जवाब भी दे दिया. आनंद सिंह ख़ामोशी से उस मेज पर वो बस्ता रखने के साथ लल्लन की हे बगल में जा बैठा.

"सचमुच तुमने बड़ा शिकार अंजाम दिया है लड़के. क्यों बहु, चाचा ससुर याद है या अपने चरित्र की तरह हमे भी साफ़ कर दिया? कुलदीप, इसमें कागज़ और 20 लाख नगद है. इसके आगे अब हम लोग देख लेंगे. तुमने अपना काम किया और हमने हमारा.", आनंद सिंह के जबड़े से निकलती आवाज कुछ ज्यादा हे सख्त थी.

"न अंकल न. करो चाहे जो मर्जी लेकिन बाद में. 20 लाख के बदले 2 रात तोह इसको बंद कमरे में रख कर अरमान तोह पूरे करू अपने.", अभिमन्यु रेणुका की बगल में बैठने लगा तोह कुलदीप ने उसको छाती पर हाथ रखते हुए पहले हे रोक दिया. संग्राम सिंह ये देख आगे बढ़ा तोह कुलदीप ने मुस्कुराते हुए उसको ना में गर्दन हिला कर ऐसा करने से मन किया.

"उनले जी, लगता है आप लोगो को डील करने का अनुभव नहीं है और दूसरी बात की आपने तोह वो देख लिया जो मेरे हिस्से था लेकिन मुझे मिलने वाला हिस्सा देखे बिना कोई इस पर हाथ नहीं रख सकता. काम से काम इस बगीचे में तोह नहीं. और ये तमंचा जो तुम जेब से झलका रहे हो संग्राम, इसका उपयोग करने की सोचना भी मैट. मेरे मैं में मेल न है लेकिन लगता है आप लोग कुछ अलग विचार ले कर यहाँ आये हो.", कुलदीप खुद रेणुका की बगल में बैठ उस बास्ते को खोलने लगा. उसके आदमी बेशक बगीचे में काम करने वाले लोग थे लेकिन सबके हाथो में बांस का मजबूत लेथ और चेहरे पर अपने मालिक के प्रति वफादारी. इस जवान लड़के के तेवर और उसकी बातें सुन्न कर लल्लन ने संग्राम और अभिमन्यु को इशारे से बैठने को कहा.

"देख लो इत्मीनान से बीटा और कही गड़बड़ लगे तोह हमे बताओ."

"गड़बड़ तोह है अंकल जी. इस अभिमन्यु ने 50 एकड़ के बराबर पैसे की बात की थी और आपने 28 किल्ले जिसके बराबर उतना हे लल्लन जी ने कहा था देने को. यहाँ है ये रद्दी सी 15 किल्ले बंजर जमीन, जो हमारी तहसील के सबसे ख़राब हिस्से में है और दूसरे कागज़ है 13 किल्ले क्सक्सक्सक्स कसबे के पास. और पैसे के नाम पर सिर्फ 20 लाख. मान लिया आप सभी उम्र और अनुभव में मुझसे कही ज्यादा हो लेकिन बड़े इंसान को अपनी बात पर कायम रहना चाहिए. बचे गलती कर सकते है.", बचे वाली बात कुलदीप ने संग्राम की तरफ देखते हुए कही थी लेकिन उसके इस तरह से उस बास्ते को Aanand/Lallan की तरफ सरकने पर चारो एक दूसरे को देखने लगे. जैसे कोई ख़ास इशारा हो आपस में.

"काम हमारे अनुमान से कही पहले कर दिया तुमने कुलदीप. घर की हे बात है इसलिए अभी ये सब रख लो और बाकी संपत्ति एक महीने के भीतर तुम्हारे हवाले होगी.", आनंद सिंह ने लाचारी का दिखावा किया और उसके बाद अभिमन्यु अपने सुर अलापने लगा.

"वैसे भी मैंने तुम्हे उस अर्जुन को भी फांसने के लिए कहा था. आधे काम के लिए आधी हे कीमत मिलती है. बात को यही ख़तम करो और इस रंडी को हम ले जा रहे है.", और यही कुलदीप से चूक हो गयी जो अभिमन्यु के तेवर देखने में व्यस्त हुआ तोह संग्राम सिंह ने फुर्ती से उसकी बगल में खड़े व्यक्ति के पाँव में गोली मारने के बाद रिवॉल्वर रेणुका पर तान दी.

"भोस्डिका ये न समझता जज्बात हमारे. जो दे रहे थे वो इसको काम लग रहा था लेकिन अब पैसे की जगह मिलेगी मौत. मां, बस्ता उठा और अभिमन्यु भाई ले चल तेरी मैना.", संग्राम को ऐसे फुफकारते देख कुलदीप घबरा गया था और उसका एक आदमी जमीन पर अपना जखम दबाये दर्द के मारे चीख कर इस सुनसान बाग़ को दहलाने का विफल प्रयास करने लगा. लल्लन ने वो बस्ता उठाया हे था की उसमे हाथ के करीब से निकल कर वो जलता पीतल संग्राम की हथेली के aar-par जा निकला. तमंचा आनंद के भी पास था लेकिन उसकी गाडी में वो गलती से छूट गया था. अब इस बगीचे में 2 लोग चिल्ला रहे थे और रेणुका अपने हाथ ढीले करके इत्मीनान से उठ कर एक तरफ जा कड़ी हुई.

"वो ऐसा है आनंद सिंह की तुमने हमारे बारे में कुछ पता न करवाया था. हमने हे वो सब खबर तुम्हारे तक पहचे थी जिसके लिए तुम्हारे 5 आदमी भी जान से गए और 20 लाख मेरी जेब में. वैसे जिस पिस्तौल पर तुम इतना उछाल रहे थे लड़के, वो जान नहीं ले सकती. सब अपनी अपनी जगह वापिस बटिह जाओ.", अपने ठीक सामने इस 6 फ़ीट ऊँचे भूत को देख आनंद और लल्लन की तोह घिग्गी हे बांध गयी थी लेकिन अभिमन्यु जैसे कोशिश करके देखना चाहता था. अभी वो उस खंजर को रेणुका के जिस्म के करीब करने हे वाला था की नरिंदर के जिस्म में ज़माने भर की बिजली भर उठी. कोई और कुछ समझ भी पता उस से पहले वही खंजर अभिमन्यु की कलाई को काट कर नरिंदर के दूसरे हाथ में था.

"जब मैं कहता हु तब उस बात को मान लेना चाहिए. देखो जरा इन दोनों चिड़ीमारों को कैसे दुबक कर बैठे है लेकिन नहीं तुम में ज्यादा जोश भरा है. हाँ तोह दीपू बीटा फिर कितना इंतजाम हुआ तुम्हारी बहिन की शादी के लिए.?", एक आकर्षक आधुनिक पिस्तौल का मागज़ीने खोल कर उसको मेज पर रखने के बाद नरिंदर ने अपने दोनों पाँव भी कैंची बनाते हुए लंबवत टिका दिए. इतना बेफिक्र होना दर्शाता था नरिंदर की निर्भीकता और हर अपराधी को उसकी औकात दिखाना. अब दृश्य ऐसा था की संग्राम जमीन पर बैठा अपने बहते खून पर रुमाल दबा कर उसको रोकने में लगा था तोह अभिमन्यु तड़पता हुआ अपनी कटी हुई कलाई को बगल में दबाये था. रेणुका पसीना पौंछती हुई उधर चली गयी जिस तरफ से नरिंदर प्रकट हुआ था.

"म्हणत और आपकी वजह से बहोत कुछ है अंकल जी और मैं अपनी बहिन पर हराम का एक पैसा भी नहीं खरचने वाला. वैसे आप इन्हे पुलिस के हवाले करोगे या हाथ पाँव तोड़ने है?", कुलदीप एक मजबूत नौजवान था लेकिन तीन लोगो के बहते खून से विचलित हो कर वो यहाँ खड़ा भी नहीं हो प् रहा था.

"ए भाई, ले जाओ अपने साथी को और डॉक्टर से कहना के शिकार करते हुए हादसा हुआ. बाकी मैं देख लूंगा और ये पैसे रख लो. बाकी तुम दोनों उस तरफ एक घंटे तक गद्दा खोदते रहो. एक फ़ीट गहराई का एक लाख दूंगा तोह जितना गहरा उतना हे चौड़ा होना चाहिए. 6 फ़ीट के 6 लाख जो तुम चारो के होंगे.", नरिंदर के तेवर देख जख्मी आदमी को उसका एक साथी ले चला और बाकी दोनों अपने बांस वही गिरा कर कस्सी कुदाल लिए गद्दा खोदने दौड़ पड़े.

"नरिंदर बीटा, ये ठीक नहीं है. मैं किसी की जान लेने के पक्ष में नहीं था बस अपने भांजे (अजीत) के लिए इन्साफ की चाहत भर थी. अब तुम्हे ये पसंद नहीं है तोह मुझे भी कुछ नहीं चाहिए. आनंद भाई आप भी पाँव पकड़ लो तोह क्या पता नरिंदर जी हमको जाने दे.", लल्लन का गिड़गिड़ाना देख नरिंदर ताली बजाते हुए ऐसे अट्टाहास करने लगा जैसे कोई बचा खुश हो कर किलकारियां मारता है. आनंद सिंह अभिमानी व्यक्ति था और गुरूर से भरा भी.

"मर्द हु मैं लल्लन और ऐसे कई Narinder-Dharminder देखे है मैंने. तुम क्या डरने की कोशिश कर रहे हो ये गद्दा खुदवा कर और पिस्तौल सामने बिखेर कर? जान नहीं ले सकते तुम हम में से किसी की और वो भी ऐसे भरे उजाले."

"जान.. मैं जान नहीं लेता आनंद सिंह और तुम दोनों के भांजे भतीजे कुकर्मी लोग थे जिनके माथे पर मैंने वो तिलक किया जिसके ताप को वो झेल न सके. मैं न अंधेरो की परवाह करता हु और न उजालो की. जगह, समय और इंसान अगर मुझे प्रभावित करते तोह तुम लोगो की जगह मैं होता. इस लड़के का सीना चीयर कर मैं देखूंगा की दिल मजबूत है की नहीं. और ये हरामी हिजड़ा जिसकी अकाल मेरे बेटे से मार खाने के बाद भी न सुधरी, ये मेरी बहिन पर वही गन्दा हाथ रखना चाहता था तोह इसकी कलाई अलग करके मैं खुद इसको दिखाऊंगा इसका गन्दा खून कैसे जिस्म से निकाल कर मैं इसकी शुद्धि करता हु. लल्लन ने मेरे कदमो में सर झुकाया है तोह इसको दर्द नहीं दूंगा लेकिन तुम एहंकारी हो आनंद सिंह और ऐसे व्यक्ति की आवाज खोखली होती है. मेरे पिता, भाई और मुझे मारना चाहते थे तुम वो भी बहिन और बेटे को कब्ज़ा कर? ऐसा तोह वो भी नहीं सोचता जिसके खिलाफ जाने के लिए मेरे पिता ने मन किया है.", और नरिंदर सिग्रत्ती को सुलगने के बाद जिस तरह साढ़े कदमो से संग्राम के सर के पास आ खड़ा हुआ, बाकी तीनो की नजरे वही जम्म गयी. मेज पर वो आलिशान पिस्तौल बिखरी पड़ी थी लेकिन उसके हाथ में अब एक विशेष खंजर था जिस पर ख़ास चिन्ह अंकित था.

"आआ माँ रीई....", किसी मैंने की तरह संग्राम जोरो से फड़फड़ाया था और उसका रुदन सुन्न कर दूर वृक्षों में छिपे अनगिनत पंछी शोर करते हुए उड़ने लगे. हर जीव की आँख हैरत से फटी रह गयी थी जब संग्राम के सीने की वो 22 हड्डियां खाल छोड़ कर इतना घिनोना मंजर दिखने लगी. पेट से आँतड़ियों के साथ साथ लहू ऐसे बह कर निकला जैसे बड़े गुब्बारे में भरा हो जो अचानक फट जाए. उसके जिस्म को खिंच कर नरिंदर ने लल्लन की झाली में ला फेंका. लगातार चीखने से संग्राम का गाला फटने हे लगा था और उसकी हालत देख बाकी तीनो की.

"घर पर नजर नहीं रखते तोह मैं सिर्फ माथे पर तिलक करके मामला एक मिनट में ख़तम कर देता. खैर अब तुम खुद देख रहे हो की मैंने एक मिनट पहले कुछ भी गलत नहीं कहा था.", लल्लन कांपता हुआ अपनी गॉड में फड़फड़ाते हुए उस विक्षिप्त से जिस्म को देख रहा था जिसके अंदर के अंग भी फड़क रहे थे. खून में लिसड़ा वो गुब्बारे सा जिगर, हड्डियों के पिंजरे में क़ैद सुर्ख दिल और इधर उधर लटकती मोती पतली आंतड़िया. नरिंदर की हैवानियत जैसे अभी बाकी थी और उसने दूसरे हाथ से वो धड़कता हुआ दिल पकड़ कर ऐसे खिंचा जैसे लटकती दाल से कोई बड़ा आम. और वो aam-roopi दिल उसने ानदण्ड सिंह की झोली में फेंक दिया.

"देख को इसमें सिर्फ हवा भरी थी और परमात्मा तुम्हारी आत्मा को नरक में महफूज रखे लल्लन. जय शीर्षाये नमः..", आनंद सिंह मुँह दबाये अभी उल्टियां हे करने लगा था और उसकी साँसों को तड़पते हुए नरिंदर ने किसी माहिर कसाई की तरह सूई के एक कांटा हिलने भर की देरी में लल्लन की सेहमी हुई आँखों समेत उसकी मुंडी काट कर अभिमन्यु की तरफ फेंक दी. कुर्सी पर टिका हुआ जिस्म फुहारे की तरह लहू फेंक रहा था और आनंद सिंह लड़खड़ा कर भागने की नाकाम कोशिश करता उस रक्तिम जमीन पर जा गिरा.

"मुझे जाने दो ... मेरे बीवी बचे है नरिंदर.. भगवन के लिए मुझे जाने दो. मैं कभी अपने घर से भी कदम बहार नहीं .. भगवान् के लिए बक्श दो मुझे.", आनंद सिंह काँप रहा था और हाथ जोड़ता हुआ वो अपने मिट्टी से साणे चेहरे के साथ आंसू बहता गिड़गिड़ा कर भीख मांगने लगा जान की. अभिमन्यु का कलेजा इतना मजबूत न तोह और वो बेहोश था इतने घृणित भयानक दृश्य देख कर. जब नरिंदर अपनी जगह स्थिर खड़ा हो कर बस सिग्गट के काश लगता रहा तोह हिम्मत जमा करते हुए आनंद ने वो विदेशी पिस्तौल उठा ली. नरिंदर अभी भी वैसे हे खड़ा उसको देख रहा था और आनंद ने अपनी कनपटी पर टिकते हुए ऊँगली दबायी तोह यहाँ भी किस्मत देगा दे गयी.

"खाली पिस्तौल से तुम्हे गति नहीं मिलेगी और न मैं तुम्हे मरने दूंगा इतनी जल्दी. मेरे पिता मुझे डाकिए भी बुलाते है और मैं वो सन्देश ले कर उनके पास जाऊंगा जो तुमने अपने दिल में दबाया हुआ है. भाग तुम सकते नहीं हो आनंद और गोली भरने का वक़्त मेरी दूसरी पिस्तौल तुम्हे देगी नहीं. जल्दी से नाम बता दो और ऊपर जा कर अपने भतीजे से मेरी शिकायत लगाओ. Haal-chal भी देना यहाँ के और बताना के तुम्हे भी उसी आदमी ने भेजा है जिसने उसको आजाद किया था.", सिग्रत्ते एक तरफ फेंक नरिंदर ने एक पतली लेकिन मजबूत रस्सी का सही फंदा बनाते हुए उसमे अभिमन्यु के दोनों पाँव फांस दिए. जिस्म कोई हरकत न कर रहा था और उसको घिसते हुए नरिंदर ने रस्सी का दूसरा सीरा इस घने वृक्ष की लंबवत दाल के पार कुशलता से घुमा कर झटका दिया तोह वो जिस्म जमीन से रगड़ खाने के बाद अब हवा में था. जमीन की सतह से 2 फ़ीट ऊपर. रस्सी तने से बाँधने के बाद नरिंदर ने अभिमन्यु का मुँह भी मजबूती से एक कपडे से जकड दिया जिस से वो चीख न सके.

"मुझे और भी बहोत से काम है आनंद सिंह जिन्हे निबटा कर मुझे मेरे घर ठीक 3 बजे तक पहुंचना है.", अगली चीख सुनाई न पड़ी लेकिन जमीन पर कलाई से पृथक हुए 2 हाथ पड़े थे. ज़माने भर का दर्द उन फैली हुई आँखों में था जो अभिमन्यु के जिस्म पर थी. खून एकसार धार में बेहटा हुआ जमीन पर 2 गोलाकार घेरे बना कर बड़े करता गया लेकिन नरिंदर को जब इस से भी संतोष न हुआ तोह उसने गले पर भी एक चीरा दे दिया.

"नाम बोल दो और मैं तुम्हे आजाद कर दूंगा. देखो मैंने लल्लन को दर्द नहीं दिया और तुम्हे तोह मैं शायद बख्स भी दू. क्योंकि मुझे लगता है तुम्हारी जरूर मजबूरी रही होगी इस सबके पीछे. अभिमन्यु रेणुका की वजह से अपना उल्लू साध रहा था, लल्लन इस संग्राम और अजीत की डॉयलट के चक्कर में लेकिन तुम मुझे इनसे अलग लगते हो.", नरिंदर चलते हुए आनंद के करीब आ रुका. मेज पर रखा पानी का जग उठा कर उसने अपने हाथो से हे आनंद का मैला चेहरा धोया तोह नरिंदर की रहस्यमयी आँखों को देख आनंद सिंह की जुबान हिली.

"हिम्मत सिंह ने 5 करोड़ कीमत लगाईं थी. एक करोड़ मेरी गाडी में रखा है और बाकी रेणुका या अर्जुन को सौंपने पर वो देने वाला था. मैंने पैसो के लिए नहीं किया ये सब. मुझे बस रामेश्वर से नफरत है... वो भगवान् नहीं की उस पर कोई ऊँगली न उठा सके... आठ", और इसके बाद नरिंदर ने ठीक वैसा हे किया जैसा कहा था. आनंद सिंह की ठुड्डी पकड़ कर अपनी दूसरी बेआवाज पिस्तौल से उसने दिल में छेड़ कर दिया.

"मेरे भगवान् है वो मूरख, मेरे भगवन. उन पर ऊँगली तोह क्या कोई बेअदबी से भी उनका जीकर करे तोह मैं उसको यही सजा दूंगा.", अब खूबसूरत अंगूर का बाग़ जैसे दुनिया की सबसे वीभत्स जगह में तब्दील हो चूका था. एक कुर्सी पर sar-kata लल्लन का जिस्म जिसकी गॉड में खुला हुआ संग्राम सिंह तोह दूसरी तरफ वृक्ष से झूलता वो lahu-viheen बिना दोनों हथेली का अभिमन्यु का शव और सबसे साफ़ सुथरा मृत आनंद अपने नाम स्वरुप एक बेहतर मौत प्राप्त करने वाला.

"ये 4 जिस्म भी साफ़ कर देना तुम लोग, कपडा मुँह पर बांध कर. और ये 6 लाख आपस में बाँट लेना. पता लगा की हिसाब बराबर नहीं किया तोह यही हाल तुम्हारा भी करूँगा.", नरिंदर ने हँसते हुए उन दोनों को चेतावनी दी और अपनी पिस्तौल सही से जोड़ कर अब उन दोनों से अपनी निगरानी में हे साफ़ सफाई करवाने लगा. रेणुका उसकी तरफ आने लगी तोह हाथ से उसको वही रुकने का बोल वो खुद बस्ता लिए बढ़ गया.

"वह की हालत तुम्हारे देखने लायक नहीं है बहिन. अब हम चलते है यहाँ से क्योंकि मामला शायद ख़तम नहीं हुआ. दीपू बीटा, यहाँ की निगरानी भादवा दूंगा आज हे और तुम्हारे आदमी शायद डर की वजह से 2-3 दिन छुट्टी पर रहेंगे. बाकी तुम्हे किसी तरह की परेशानी नहीं होने दूंगा.", बस्ता कंधे पर लटकाये नरिंदर एक हाथ में रेणुका का हाथ थाम कर उस कच्चे पक्के कमरे के बहार खड़े कुलदीप को सब हिदायत देता हुआ हमेशा की तरह बेफिक्र सा बाग़ से बहार चल दिया. कुलदीप एक बार अपने आदमियों को काम में लगा देखने के बाद खुद भी नरिंदर जी के पीछे हो लिया. वो रेणुका से कुछ हंसी मजाक करते हुए उस कार तक चले आये जिसमे वो मुर्दा लाशें जीवित आयी थी, हक़ीक़त से अनजान.

"हम इस कार से जाने वाले है?", रेणुका ने नरिंदर को दरवाजा खोलते देख सवाल किया.

"नहीं बहना हम अपनी हे कार से जाएंगे. इसमें कुछ पाप की कमाई राखी है बस वो लेने के बाद निकलते है अपने शहर. आजकल पैसो की भी बहुत जरुरत है और पापा जेबखर्ची नहीं दे रहे इतने काम के बावजूद. वैसे तुम इस बचे को रख कर कुछ गलत तोह नहीं कर रही?'", सचमुच कार की डिक्की में नोटों का बड़ा बैग था और अगली सीट की दराज में भरा हुआ रिवॉल्वर.

"ये पहले दिन से हे हमारे परिवार में है भैया तोह ये हक़ रखता है दुनिया में आने का. देखना इसको मैं बिलकुल अर्जुन जैसा बनाउंगी या आपके जैसा.", नरिंदर जी अर्जुन का नाम सुन्न कर हँसते हुए उस बैग को अपनी कार की तरफ लिए चल दिए.

"लड़की होनी चाहिए बिलकुल तुम्हारी तरह. मेरी प्यारी चुटकी समझदार भी है और दिलेर भी. अर्जुन तीसरी ऑप्शन है मेरे बाद. लेकिन पापा कहते है की मेरे जैसा और कोई नहीं हो सकता तोह फिर बस जो भी हो वो तुम्हारे जैसा हो. बाकी शंकर से तुम्हे दिक्कत है जो उसका नाम नहीं लिया.?", कुलदीप को इशारे से कार ठिकाने का बोलते हुए नरिंदर ने पहले रेणुका को गाडी में बैठाया और फिर खुद स्टीयरिंग संभाला. रेणुका यहाँ पर शंकर भैया के जीकर से हंसने लगी थी.

"उनके जैसा हुआ तोह फिर आप खुद हे सोचो क्या होगा? घर से बोल कर निकलेगा कलेगा का और मिलेगा उनके पास हे निशाने लगता जैसा भैया अक्सर करते थे जब हम कैंट में रहते थे. वैसे आपकी बात सही है. जो भी होगा उस से फरक नहीं पड़ता. बस होगा तोह हमारे परिवार में हे.", रेणुका की बात सुन्न कर नरिंदर ने अपना धुला हुआ हाथ उसके सर पर सहलाते हुए गाडी स्टार्ट की.

"शंकर जैसा तोह बस एक वही है रेनू. और उस जैसा न कोई बीटा हो सकता है न भाई. अगर तुम्हे बीटा हुआ न तोह उसको एक बार माँ की गॉड में रख देना. क्या पता उनके दिल से शंकर का हे कोई पर्याय निकल आये. अब तुम्हारी अतीत से जुडी हर तार मैंने काट दी है. बस इसकी परवरिश पर ध्यान देना अपनी सेहत के साथ.", गाडी कुछ धुल उड़ाती हुई निकल चुकी थी और पीछे खड़ा कुलदीप देख रहा था उसकी मोटरसाइकिल पर टंगे उस बास्ते को जिसमे 14 लाख के लगभग रुपये थे.

'चलो अब अगर ये जिम्मवारी दे हे दी है तोह धरम करम में योगदान दे देते है. अंगूर खतरनाक थे.'
 
अपडेट पर काम जारी है दोस्तों और इस बार मैं अपडेट का हर दृश्य पूरा लिखूंगा बिना शैडो की लम्बाई देखे. आज भी सिमित समय में 3 दृश्य लिख चूका हु लेकिन अपडेट कल हे दूंगा पूरे दिन का लेखा जोखा दाल कर.

अर्जुन के रूद्र रूप के दर्शन भी होंगे लेकिन 6-7 अपडेट पश्चात और बाकी किरदारों पर भी ज्यादा विस्तृत दृश्य होने वाले है.
 
अपडेट 195 (ा)

पहला पन्ना

"इतना परेशां क्यों हो रही हो कौशल्या? तुम तोह इतनी कमजोर न थी कभी!", घर के बाकी कमरों सा हाल हे यहाँ पंडित जी के कक्ष में था. अर्जुन को सभी ने विदा तोह हँसते मुस्कुराते किया था लेकिन उसके रुखसत होते हे ज्यादातर चेहरों पर अलगाव के भाव उभर आये. रेखा जी के साथ कृष्णा जी तोह कमरे में हे रही थी लेकिन ललिता जी को अर्जुन का जाने से पहले गाल चूमना और आशीर्वाद लेना अब उतना हे सत्ता रहा था. आखिर उन्होंने भी तोह उसको अपने बचो से बढ़कर प्यार दिया था. तारा जैसी लड़की भी इस पल में खुद को alag-thalag करती हुई कमरे में बंद हो गयी थी. अब उसको भी हर पल कमी जो महसूस होनी थी अर्जुन की शरारतो और अठखेलियों की. कोमल जज्बात प्रकट नहीं करती थी लेकिन जिस तरह वो रसोईघर में व्यस्त होने का दिखावा कर रही थी, कही न कही वो दर्शा रही थी की उसका जीवन भी अर्जुन के बिना अधूरा है. लेकिन आज पहली बार हो रहा था की कौशल्या जी कमरे में आने के बाद अपने अश्रु रोक न सकीय. चेहरा साफ़ करके वो बस बिस्टेर पर बैठी थी और उनके सामने रामेश्वर जी.

"आप थे क्या जी उस कमजोर समय में घर पर? हर जगह बातें और नियम नहीं चलते. उस समय तोह माँ और पिता दोनों के कर्त्तव्य मैं हे निभा रही थी इसलिए आपको लगता है मैं मजबूत हु. लेकिन ये भी मेरा हे बचा है जिसके साथ मैंने खुल कर ममता लुटाई और अर्जुन ने कभी मुझे माँ से काम समझा भी नहीं. आपका क्या है 4 पोलिसवाले या 2 संगी साथी मिले नहीं, अपने किस्सों से दिल भर लेते हो. सबको एक एक करके आपने हे काम के नाम पर बहार किया तोह मैं अपना माँ का दिल किसको दिखती? अब जब अर्जुन मिला तोह क्या मैं फिर से समझौता करू?", दुखी मैं के साथ साथ वो अपनी भावनाये भी खुल कर दिखा रही थी और उनके तंज सुन्न कर पंडित जी ने बड़े हे स्नेहभाव से अपना हाथ उनके सर पे रखते हुए जवाब दिया.

"तुम कभी गलत नहीं कहती कौशल्या और हम जानते है की हमेशा बलिदान के वक़्त तुमने हमसे पहले कदम आगे बढ़ाये. लेकिन अब अर्जुन घर से बहार घूमने के लिए निकला है, दुनिया देख कर वापिस उसने तुम्हारे हे पास तोह आना है. इतना bhara-poora परिवार है तोह एक महीना पता भी नहीं चलेगा. उसकी कमी तोह मुझे भी अभी से महसूस होने लगी है. कोई दिन गुजरता है भला जब सुबह उसकी बेवकूफी से शुरू न हुई हो और रात उसका तुमसे मुझसे बेमतलब के किस्सों पर बहस करते हुए सेवा करना? लेकिन वो बड़ा हो रहा है कौशल्या और हमेशा तोह वो इस घर में नहीं रहेगा. दिल हल्का करो और उसने कहा है न के वो रोज 2 वक़्त तुम्हे फ़ोन करता रहेगा.?", रामेश्वर जी ने पानी का गिलास आगे बाध्य तोह कौशल्या जी ने पकड़ कर वापिस एक तरफ रख दिया.

"आप देख नहीं रहे या जान कर अनजान बन्न रहे हो जी? उस मासूम का दिमाग दोतरफा है और जबतक वो आसपास है तोह सब ठीक लेकिन आपकी शिक्षा ने उसको भी शिकारी न सही लेकिन खोजी तोह बना हे दिया है. मेरा दिल दुखी नहीं है चिंतित है क्योंकि उसको नहीं पता के संसार के बहार भी इस संसार के लोगो की कोई दबी हुई दुनिया है. वो गाँव जाना चाहता था और आपने हाँ भर दी? खुद जानते हो की वो कितनी काम उम्र से बिना जाने क्या क्या सीख रहा है. इस बार मैं चुप नहीं रहूंगी बोल देती हु.", कौशल्या जी ने बात ख़तम करने के इरादे से कही थी लेकिन उनकी ऊँगली देख कर रामेश्वर जी को भी अपनी गलती का बखूबी एहसास हो गया. पर उनके आदर्श भी थे जिस वजह से वो पीछे न हेट.

"जानता हु मैं और तुम्हारे सामने हे था के मैंने खुद कभी उसको वह जाने नहीं दिया. इस बार उसने खुद हे फैंसला किया था और तब भी मैंने हाँ नहीं कही थी कौशल्या लेकिन सबने उसका साथ दिया तोह मुझे भी लगा की अब ज्यादा रोकने टोकने से उसका मैं व्यथित न हो जाए. वैसे उधर उस पर कोई संकट तोह आने नहीं वाला. बस ज्यादा से ज्यादा वो कुछ पुराने लोगो से मिल लेगा, अपने dada-padd-dada के naam/kaam देख लेगा और ये सब तोह आगे होना भी था. मैंने इतना बंदोबस्त तोह किया है की वो उन लोगो से ज्यादा न मिल जल सके जिनसे कुछ जानकारी ले सकता है. और raaj-pariwar में उसको बचे से ज्यादा कोई क्या अहमियत देगा?", रामेश्वर जी भरसक कोशिश कर रहे थे अपनी बीवी को मानाने की जो अब कुछ शांत हो चुकी थी.

"आपने मुझसे ज्यादा दुनिया देखि है जी और ज्यादा सच तोह मुझे भी कहा पता है. लेकिन मैंने और आपने दोनों अर्जुन बड़े किये हैं. वो वाला मस्तमौला था और ये ज़िद्दी लेकिन कारनामे दोनों के एक जैसे. वो बाल की खाल प्यार से निकलता था और ये तोह बम्ब महकमे वाला बना दिया आपने. सूंघता हुआ बंजर जमीन से भी दफ़न राज खोल लता है. रोक न सकोगे पंडित जी आप इस वाले को जैसे उसके प्यार में आपकी आँखों पे पट्टी बंधी रहती थी सब जानते हुए भी. आपने इसको शंकर से दूर रखा, परिवार से दूर रखा लेकिन कही न कही सब बताते भी आप हे गए. इस बार ऐसा क्या हो गया के अर्जुन ने खुदसे गाँव जाने की ज़िद्द की? जवाब दो तभी मैं हवेली जाउंगी.", अब रामेश्वर जी धर्मसंकट में आ चुके थे और जीत कौशल्या जी गयी थी. ठंडी ाः भरते हुए उन्होंने कबूलना शुरू किया.

"मैंने कभी उसको अज्जू के बारे में नहीं बताया कौशल्या और न कभी इतिहास के. वो अज्जू के नाम से इसलिए वाकिफ था क्योंकि रघुवीर ने अपना आखिरी समय इसके साथ ज्यादा बिताया. अब उन 3-4 बरस में हुई मुलाकातों में भाई ने इसको अतीत की कौन कौन सी कहानिया सुनाई ये वो जानते थे या ये अर्जुन. हाँ बुलाते वो इसको भी अज्जू थे और तुम्हे पता है के उनकी याददास्त लगभग जा चुकी थी. वो मेरे अलावा सिर्फ भाभी और तुम्हे हे ाचे से पहचानते थे. उनके जाने के बाद अर्जुन भी गंभीर रहने लगा और मुझे महसूस हो गया था के ऐसा ज्यादा देर चला तोह वो एकाकीपन का शिकार हो जाएगा. इसलिए मैं उसको वापिस घर हे ले आया. एक बरस तुम्हारे सामने निकला था अर्जुन ने जिसमे वो ज्यादातर हम दोनों के साथ रहा और संजीव के. बाकी सबके साथ उसने जुड़ाव बहोत आहिस्ता आहिस्ता बढ़ाया था कौशल्या. अब पहले से प्रशिक्षित इंसान को मैं क्या सीखा सकता हु? कही शंकर से चूक हुई तोह कही उमेद से. नहीं तोह बिल्ली के भाग से छींका टूटा और किस्मत से कोई सुराग तुम्हारे लाडले के हाथ लगता गया. मैं इसको शिलादेवी वाले मामले में रजामंदी से शामिल न करता तोह इसने अकेले हे कुछ कर बैठना था. मैंने सचमुच इसका पूरा ध्यान रखा कौशल्या.", रामेश्वर जी ने अपनी सफाई पूरे दिल से पेश की थी.

"किया होगा जी लेकिन बीज भी तोह आपके और आपकी सन्तानो के बोये हुए है. अब रघुवीर भाई साहब के साथ ये इतना समय रहा है तोह बस इस ख़ुशी से हे मैं बात ख़तम करती हु लेकिन उधर ये क्या गुल खिलायेगा इस पर नजर आप रखोगे.", कौशल्या जी कड़ी होते होते फिर से बैठ गयी.

"नहीं रख सकता कौशल्या लेकिन इतना सुनिश्चित कर सकता हु की वो उस तरफ नहीं जाएगा जहा की चिंता तुम्हे परेशां कर रही है. और रही बात अतीत की तोह वो अर्जुन बहोत हद्द तक जानता है और उस से आगे वो नहीं जाने वाला. उसके लिए आज का उसका परिवार सबसे जरुरी है. वो डरता है अतीत से इसलिए वो ऐसा कुछ नहीं करने वाला. परिस्थितयों का सामना करने की हिम्मत है उसमे तोह मुझे इस बात का डर नहीं की वह कोई उसको नुक्सान पंहुचा सकता है. चलो अब तैयारी करो हवेली चलने की और तुम्हारा लाडला खुद तुम्हे रोज बताएगा की उसने क्या किया. नजर वो हे रखवा रहा है खुद पर तोह तुम चिंता क्यों करती हो?", रामेश्वर जी आखिर में हंस हे दिए थे लेकिन कौशल्या जी ने भी खड़े होते हुए कटाक्ष कर हे दिया

"उसने उधर जा कर गलती से भी कही धोती और कुरता पहन लिया न थानेदार साहब तोह assi-nabbe वाले 3-4 बुजुर्ग तोह डर के हे प्राण त्याग देंगे. फ़िक्र आप करो क्योंकि उसकी शकल आपके पिता जी से मिलती है मेरे से नहीं. और मेरा बीटा है तोह फ़ोन मुझे हे करेगा. आप वाले तोह कब आते है और कहा जाते है मुझे नहीं बताते. पढ़ लो अपना अख़बार, शायद कोई किस्सा कही छूट गया हो.", तुनकती हुई कौशल्या जी अंदर आँगन की तरफ चली गयी लेकिन रामेश्वर जी को मायूस जरूर कर गयी थी.

"जब वो कोई काण्ड कर दे तोह तुम्हारे लायक बेटे और जब कुछ न करे तोह मेरे. तुम्हारा सही है कौशल्या और अब अर्जुन हमारे पिता की तरह दीखता है तोह इसमें भी हमारा कसूर. लेकिन मैं कृष्ण को पहले हे बता दूंगा की अर्जुन को भूल से भी ऐसे कपडे न पहनाये.", और उसके बाद उन्होंने किया भी वही जो उनकी धर्मपत्नी ने कहा था. ट्रिब्यून अखबार का आखिरी पन्ना पलट कर उसको गहराई से पढ़ने लगे.

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"ये वाला उपहार अर्जुन दे कर गया है संजीव. मैं ले नहीं रही थी फिर भी उसने मुझे पकड़ा दिया. तुम खोलना चाहोगे?", राधिका अभी कमरे में आयी थी और संजीव कुछ कागज़ पढता हुआ मसरूफ था. राधिका की कपड़ो की अलमारी कुछ वक़्त पहले हे व्यवस्थित हुई थी और कुछ सामान बड़े बड़े बैग में बंद था. अलमारी से सुनहरे पैकेट को निकाल कर उसने संजीव के सामने रखा तोह वो जवाब में अपनी बीवी के खूबसूरत चेहरे को देख मुस्कुरा भर दिया. जैसे कुछ दिला रहा हो.

"तुम उतने भी शरीफ नहीं हो जितने बनते हो. अब खोलो इसको."

"अर्जुन ने ये तुम्हे दिया है राधिका तोह तुम्ही खोलो. मुझे उसने वो नीली कार गिफ्ट की थी तोह मैंने तुमसे कहा की उसकी चाबी अपने पास रखो.? वैसे चाहो तोह कपडे बदल सकती हो."

"ख़बरदार अगर अब कुछ भी ऐसा वैसा कहा तोह. बगल वाले कमरे में हे आपकी 2 बहने टेलीविज़न देख रही है. और आपके भाई ने गिफ्ट दिया है इसलिए पूछ रही थी. मुझे दिया है तोह फिर मेरा हे सही.", राधिका ने वो चमकदार परत हटाई तोह अंदर गट्टे का छोटा सा डिब्बा था. नरम उँगलियों से ढक्कन हटते हे उसके चेहरे पर हैरत के साथ साथ ख़ुशी भी थी. संजीव बस दोनों को देख रहा था.

"ये कितना खूबसूरत है संजीव और शायद इसमें कुछ लिखा है.", कांच के गोले के भीतर पानी के साथ हे 2 नन्ही मूरत भी थी. एक लड़का और एक लड़की. रौशनी में वो पानी से भरा गोला विभिन्न रंगो को प्रकाशित कर रहा था और ध्यान देने पर राधिका ने पाया की लड़के पर संजीव और लड़की के पाँव के निचे वाली आधारशिला पर राधिका लिखा था. दोनों एक दूसरे का हाथ पकडे खड़े एकटक देख रहे थे.

"इसके निचे जो बटन है उसको दबाने से पानी के साथ साथ लड़की भी घूमेगी. देखो जरा.", संजीव ने जैसा कहा राधिका ने किसी बचे की तरह खुश होते हुए वैसा हे किया. और हुआ भी ठीक संजीव के कहे अनुसार. Neeli-safed रौशनी दोनों मूरत पर गिरती हुई एक अलग हे समां बाँध रही थी. वो युवती गोलाकार घेरे में बहोत धीमी रफ़्तार से हिलती नृत्य का दृश्य बनती दिखी. संजीव ने उस कृति को राधिका से ले कर बिस्टेर किनारे रखे चौकोर मेज पर टिका दिया.

"मैंने ये एक बार बस ऐसे हे देख लिया था जब अर्जुन के साथ मार्किट था. फिर भूल गया लेकिन जैसे उसने याद रखा और अपनी तरफ से नाम भी लिखवा डाले. वैसे ये तुम्हे मैं देना चाहता था पर याद नहीं रहा. और अर्जुन तुम्हारे लिए कुछ और भी दे कर गया है.", राधिका ये सुन्न कर संजीव की बगल में हे आ बैठी. उसका लगाव बढ़ने लगा था अर्जुन से और संजीव के लिए उसकी निष्ठां एवं प्यार देखा ऐसा होना स्वाभाविक भी था.

"जल्दी बताओ न क्या दिया है? मैं खुद हे देख लेती हु बस बताओ तुमने कहा रखा है वो गिफ्ट."

"ऐसे नहीं डार्लिंग. रिवॉर्ड के बदले रिवॉर्ड. बस एक बार अपने होंठो को चूमने दो फिर मैं गिफ्ट दे दूंगा.", संजीव की बात सुन्न कर राधिका गुस्से से देखने लगी फिर दरवाजा जांच कर उसने जल्दी से एक छोटा सा चुम्बन संजीव के होंठ और गाल पर जड़ दिया.

"ये क्या था?"

"तुमने जो कहा मैंने किया. अब गिफ्ट और कोई डिमांड नहीं."

"रात को मैं अपनी मर्जी से करूँगा. मंजूर हो तोह बताओ.", अब रात का जीकर होते हे राधिका पीछे हटने लगी लेकिन संजीव ने उसकी कलाई मजबूती से पकड़ ली.

"छोडो भी और वो सब बात मुझसे मैट करो."

"बोलो हाँ."

"ाचा हाँ. अब खुश? जल्दी से गिफ्ट दो?", राधिका ने हाथ छुड़ाते हुए बात मान ली थी और अब उसको उपहार देखना था. संजीव ने एक काम मोटाई का सलेटनुमा पैकेट उसकी तरफ बढ़ा दिया. राधिका ने जैसे हे वो खोला तुरंत बंद कर दिया.

"छियई.. ये सब क्या है? अर्जुन ने ये मेरे लिए दिया?", उसमे काले रंग की पारदर्शी निघ्त्य थी जिसके aar-paar सबकुछ दीखता था.

"ये तोह मैं ले कर आया हु जान, आज रात के लिए. अर्जुन का गिफ्ट भी तुम्हे तभी मिलेगा जब ये पहन कर बिस्टेर पर आओगी. मैं चलता हु, पापा के साथ जाने की तैयारी भी देखनी है.", संजीव राधिका के बोलने से पहले हे लगभग भागता हुआ कमरे से निकल गया.

"चेटर कही के.", राधिका ने गुस्से में वो ख़ास उपहार वाला डिब्बा फर्श पे फेंक दिया. डोरी वाली पंतय, वक्षो को ढकने के नाम पर कमर तक का जालीदार कपडा और बस 2-3 बटन. ऐसा कपडा तोह राधिका ने पहली बार हे देखा था लेकिन अब उसको किसी और ने भी देख लिया. भीतर आयी आरती और अलका की नजर भाभी के साथ साथ फर्श पर पड़ी तोह वो एक दूसरे को देखने लगी. कमरे में स्थिति पूरी तरह बदल चुकी थी. मैं हे मैं जहा वो दोनों हंस रही थी, उधर राधिका के तोह चेहरे का रंग हे सफ़ेद हो गया था.

"ये अलमारी के ऊपर से निचे गिर गया क्या भाभी? कोई बात नहीं मैं उठा देती हु. वैसे ये है क्या? वो तरबूज पर ढकने वाली जाली नहीं लग रही आरती?", अलका ने जिस तरह वर्णन किया था उसको सुन्न कर राधिका तोह शर्म से साड़ी का पल्लू उँगलियों में घूमने लगी वही आरती हंसी रोकने के चक्कर में मुँह पर एक हाथ रखती हुई दूसरे से उसको उठाने लगी.

"रहने दो मैं उठा लेती हु. वो मैं हे अलमारी सेट कर रही थी तोह नस खींचने की वजह से ये फिसल गया हाथो से.", राधिका ने तुरंत वो अंगवस्त्र वापिस पैकेट में भरने के बाद अलमारी में रख दिया. अलका देख रही थी उनके जिस्म की फुर्ती.

"लगता है नस जल्दी ठीक हो गयी भाभी. वैसे गर्मी में फलो को फ्रिज में हे रखना ठीक है. इस से ढकने से तोह जल्दी खराब हो जाएंगे.", अलका ने फिर से फिरकी ली तोह राधिका की न चाहते हुए भी हंसी निकल गयी.

"अलका, ये वो नहीं है जो तुम समझ रही हो. ये इनरवेअर के ऊपर पहन ने के लिए है."

"ओह निघ्त्य का कमीज है ये? लेकिन फिर इसकी पजामी नहीं ली आपने?", राधिका कहा जानती थी की वो अफसर होते हुए भी इन लड़कियों के सामने मुजरिम से ज्यादा कुछ नहीं थी. एक मजेदार मुजरिम.

"हाँ.. वो इसलिए ये अभी तक पैक था. दूकान वाले की गलती से दूसरा part रह गया होगा. जब मेरे यहाँ जाउंगी तोह बदलवा लुंगी. वैसे तुम दोनों किसी काम से भी आई थी?", राधिका बात पलटने लगी लेकिन अलका के इरादे नेक न थे.

"नहीं भाभी वैसे हे आ गयी हम दोनों. टेलीविज़न पे कुछ आ नहीं रहा था और बाकी सब अपने अपने में लगे हुए है तोह सोचा आपसे हे गपशप लगा ले. इधर आपके तोह खुदके काम बिगड़े हुए है. अर्जुन भी चला गया नहीं तोह कोई नयी फिल्म मंगवा कर देख लेते. खैर जब आप निघ्त्य बदलवाने जाओगी तोह 2 पीेछे और भी लेती आना. ऐसा है न के आरती और तारा को निघ्त्य ज्यादा पसंद है रात में. मेरा और ऋतू का चल जाता है ऐसे हे लेकिन इन दोनों को ज्यादा गर्मी सताती है आपकी तरह.", अलका बिस्टेर पर पसर गयी थी और उसकी बात सुन्न कर आरती शर्माने लगी.

"देखो भाभी ये बहिन खुदसे नहीं बोलती इसलिए मैंने कहा. हमारे शहर में ये सब मिलता नहीं और Aarti-Tara बड़े शहर से है तोह कुछ मॉडर्न भी है. आप भाभी होने के साथ दोस्त भी तोह हो हमारी. के नहीं?", अलका ने लाचारी से देखा तोह राधिका हंसती हुई उसके पास हे आ बैठी.

"बिलकुल जी. हम आपकी भाभी होने के साथ साथ दोस्त भी है. लेकिन हमने आजतक ऐसा कुछ लिया नहीं अपने आप से. निक्की के हे साथ जाना पड़ेगा. वो जरूर आरती और तारा की तरह मॉडर्न है."

"मतलब आप भी रात में बस पिंजरा हटा कर टीशर्ट पाजामे में सोती है?", अलका की ऐसी बेबाकी देख राधिका के पसीने हे छूट गए. वो हैरानी से उसको देखने लगी तोह बात आरती ने संभाली.

"भाभी आपने हे तोह कहा न के हम लोग दोस्त है. और कॉलेज के सेकंड में आ चुके है तोह ये सब आपस में डिसकस कर हे सकते है."

"बूत ये पिंजरा क्या हुआ? मतलब ब्रा?", राधिका के होंठ ब्रा बोलते हुए हे काँप गए.

"देखो हैं न इजी वर्ड भाभी? कॉलेज में आपकी सहेलियों ने बताया होगा जैसे हमको पता चला. तोह फिर ठीक है जब ये निक्की दीदी आएँगी तोह हम उनसे बात कर लेंगे. वो मॉडर्न भी है और उनकी तोह पहले से तारा से जमती है. बस प्रीती से जाने क्यों उन्होंने ज्यादा बात नहीं की. अर्जुन के साथ तोह कर रही थी और उसको तोह अपनी गॉड में भी बैठा लिए था उन्होंने.", अलका यहाँ अपने शब्दों से प्रहार कर रही थी और राधिका इनके चंगुल में पूरी तरह फंस कर बस सुनती रही.

"अर्जुन शायद फ्रेंड है निक्की का. और मेरे सामने तोह निक्की ने कहा था के उसको प्रीती बहोत पसंद आयी थी शादी में. प्रीती से हे अर्जुन की शादी पक्की की गयी है, ऐसा मैंने सुना है."

"अर्जुन का वो हे जाने भाभी और जाने कब शादी होगी उसकी. अभी वो खुद हे बचा है तभी तोह निक्की दीदी तक की गॉड में जा बैठा. लेकिन शादी में कुछ ऐसा हुआ था जो आपको नहीं पता.", अलका ने आरती को आँख दबा कर इशारा किया और फिर राधिका की तरफ देखने लगी बात अधूरी रख कर.

"क्या हुआ था शादी में?"

"आपके सामने बताना ठीक रहेगा या नहीं भाभी? दोस्ती अपनी जगह है और रिश्ता अपनी. और अपने भाई से जुडी बात करके हम खामख्वाह आपके दिल में उसकी या किसी और की इमेज खराब नहीं करना चाहते.", आरती की बात सुन्न कर राधिका कुछ पल खामोश रही फिर खुद हे बोल उठी.

"देखो जब दोस्त मान लिया तोह मान लिया. पक्की दोस्ती.", हाथ मिलते हुए राधिका ने पहल की तोह आरती ने उनका हाथ पकड़ कर कहा.

"तोह आप ऐसी कोई बात बता कर दोस्ती मजबूत कीजिये जिसका पता और किसी को न हो. फिर हम भी वैसा हे करेंगे."

"वो.. वो ऐसा है की निक्की.. निक्की दोस्त है अर्जुन की और ये बात उसने पहले हे दिन मुझे बता दी थी. पर मुझे अर्जुन के बारे में बिलकुल नहीं पता था की वो कैसा दीखता है और कौन है. तुम्हारे छोटे भाई को मैं ारु के नाम से जानती थी जैसा ऋतू ने और बाकी सभी ने बस जीकर किया था. लेकिन निक्की बिलकुल भी वैसी लड़की नहीं है और उसको प्रीती के साथ अर्जुन की जोड़ी पसंद भी है. हाँ अट्रैक्शन है और वो तोह नेचुरल बात होती है न 2 मातुरे लोगो के बीच.?", राधिका खुदको हे अपराधी मान रही थी जैसे.

"हहहह... ये तोह है भाभी और आपकी बात भी सही है. लेकिन हमने जो देखा वो दोस्ती से ज्यादा था और बाकी हम तोह घर में रही है ज्यादातर कॉलेज के सिवा. ये दोस्ती और लव अट्रैक्शन का ज्यादा पता नहीं. निक्की दीदी उधर आप लोगो के रुकने वाली जगह अर्जुन के साथ लिप तो लिप देखि थी. फिर अर्जुन हे वह से निकल कर भाग गया. अब ये शायद मॉडर्न लोग करते होंगे. हैं न आरती? तेरे सेहर में ऐसा होता होगा न?", अलका की बात सुन्न कर राधिका के कपडे भीतर से गीले हो चुके थे.

"किसिंग बोलते है अलका उसको और लिप्स पे तोह तभी करते है जब दोस्ती गहरी हो या दोनों एक दूसरे को पसंद करते हो. पर अर्जुन को इस सबका पता नहीं इतना यकीन है मुझे. निक्की दीदी शायद उसको कुछ और न बता रही हो अलका जिसे हमने ये समझ लिया. वैसे भी हम लोग कुछ दूर थे वह से.", आरती ने एक बार और घटना को बदला तोह राधिका की सांसें काबू होने लगी. वो चेहरे पे आया पसीना साफ़ करती हुई बोली.

"हाँ दोस्ती में गाल पे किश कर सकते है और क्या पता वह ऐसा कुछ न हुआ हो. पर्सपेक्टिव ऐसा बना हो की देखने में किश जैसा लगा. वैसे अर्जुन भी बड़ा हो रहा है और जानकारी रखता होगा थोड़ी बहोत. बोर्डिंग में भी पढ़ा है न वो?", राधिका को सफाई देते देख अलका मुस्कुराने लगी.

"हमको क्या लेना भाभी इस सबसे. बस खाली थे तोह सोचा बातचीत कर लेते है आपसे. क्या पता कुछ नया पता चले. अर्जुन की अपनी लाइफ है और निक्की दीदी की अपनी. चलो छोडो ये सब और आप तैयार हो तोह हम निचे चलते है.", अलका ने बिस्टेर से उठते हुए फिर से आरती को इशारा दिए.

"हाँ भाभी अब दोस्ती पक्की और मैं फ्रैंक हु तोह दोस्ती समझती हु. आप निक्की दीदी से इस बारे में बात करके उनका दिल मत दुखाना."

"ठीक है नहीं करुँगी बात और वो निघ्त्य भी लेती आउंगी जब निक्की के साथ मार्किट जाना होगा.", राधिका तोह उलझ के हे रह गयी थी और अब उसके दिमाग में कई बातें चल रही थी.

"क्या भाभी ऐसे ले कर आना ाचा लगेगा? वैसे भी ये सब तोह शादी के बाद खुद पति ला कर देते है. इस घर में हमारे पास अगर ये सब माँ या चची ने देख लिया तोह समझो खैर नहीं. आओ निचे चलते है और आपको तोह पसीना भी बहोत आ रहा है.", अलका ने माथे पर हाथ लगा कर दिखाया राधिका को और फिर खुद हे उन्हें पकड़ कर साथ ले चली. राधिका मैं हे मैं कह रही थी की आज संजीव की वजह से उसकी बहनो ने जम्म कर खिंचाई की है और ये निक्की अर्जुन का झंझट अलग सुना दिया और फिर पलट भी गयी. एक तरह से अलका ने इस पहली हे दोसतीनुमा मुलाकात में राधिका को मीठी पटखनी देने के साथ कुछ हद्द तक वश में कर लिया था.

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अर्जुन के शहर से ये पंजाब वाला पुश्तैनी kasba/gaanv तक़रीबन 300 किलोमीटर था और जिस रस्ते को उसने इस सफर के लिए चुना था वो 10-15 ज्यादा. घर से निकलने के बाद वो आकांक्षा, वालिए जी और शास्त्री जी से एक लघु भेंट करना नहीं भूला था. ेखारी 16 फ़ीट चौड़ी उस सड़क पर सचमुच naam-matra यातायात था और इस रस्ते से वो चाचा वाले शहर भी जा चूका था जिसके लिए बस एक अलग माउद लेना पड़ता था जबकि सीधा जाने पर ये उसको क्सक्सक्सक्स शहर पहुँचता जो उसकी मंज़िल से कुछ हे आगे था.

पहचान के रस्ते और naam-matra वाहनों की आवाजाही से अर्जुन सर पे शास्त्री जी द्वारा उपहार स्वरुप दिया हेलमेट और आँखों पर भूरा चस्मा लगाए गतिसीमा से कुछ अधिक तेज जा रहा था. उसको ये खाली सड़क और दोनों तरफ खड़े छायादार वृक्षों की कतार में अपनी रानी को आजमाने में अलग हे मजा मिलने लगा. एक पल ऐसा भी आया जब सूई ने हिलना बंद कर दिया और ये bhari-bharkam लाल दुपहिया 130 पर चलती हुई हर गुजरते मिनट के साथ 2 किलोमीटर पीछे छोड़ने लगी. Ikka-dukka जगह राहगीरों ने उसको जरूर नजर किया लेकिन ज्यादा नहीं. धुप पत्तो से छान कर अपनी गर्मी खो चुकी थी और अर्जुन के जेहन में इस क्षण में अगर कोई था तोह वो ऋतू. घर से निकलने से पहले जिस तरह उसने ऋतू को बाहों में ले कर सीने से लगाया था, उसकी ठंडक अभी तक वो महसूस कर रहा था. आज पहली बार ऋतू की नजरो में उसने पत्नी सम्बन्ध की छवि पायी थी जब उस हलके से चुम्बन से वो काँप रही थी. फिर कास कर अर्जुन से लिपटना और फिर अलग हो कर चेहरा साफ़ करते हुए अभी आने का बोल कर उसको चले जाना.

'एहसास... ये हमेशा ऐसा हे रहेगा.. हमेशा.', अर्जुन मुस्कुरा रहा था सब याद करता हुआ और इस बीच लगभग डेढ़ या 2 घंटे गुजर चुके थे. वो उस ti-raahe से पहले रफ़्तार काम करता हुआ थोड़ा हैरान हुआ.

'कितना टाइम हो गया घर से चले?', मील के पत्थर पर क्सक्स शहर दायी तरफ 25 कम और सामने क्सक्सक्सक्स शहर 107 देख उसने मोटरसाइकिल उस चौक को पार करके सड़क से निचे उतार ली. यहाँ ाची खासी चलता मार्कीट थी खुले bus-adde की वजह से. महिंद्रा की सलेटी जीप भी नजर आ रही थी aas-pas के गाँव में सवारी धोने का काम करती.

"भाई, एक गिलास गाने का रास बना दो. पुदीना और निम्बू ज्यादा, नमक काम.", अर्जुन इस जगह को भी ऐसे देख रहा था जैसे नक्शा दिमाग में बैठा रहा हो. अमूमन यहाँ तक आने में उसको 3 या पौने 3 घंटे लगे थे पहले पर आज जैसे ऋतू के साथ उसको सफर का पता हे न चला. बेशक उसका शरीर वही घर पे था लेकिन अर्जुन के जेहन में उसका बेहतर वजूद समाहित था. गन्ने का रास निकलने वाले युवक ने प्लास्टिक के पानी भरे कनस्तर से पहले अपने हाथ धोये और फिर कुछ टुकड़े गन्ने के. इस दौरान वो अर्जुन को भी देख रहा था और रेहड़ी के करीब छाया में खड़े जूस पीते अन्य ग्राहकों को भी. वो लोग ज्यादातर aas-pas से हे थे.

"कित्थो आ रहे हो वीर जी? गद्दी बड़ा सका मार रही.", उस रेहड़ी वाले ने भी सीलेंसर की गर्मी भाप ली थी और अर्जुन को रुमाल से चेहरा साफ़ करते हुए चश्मे के निशाँ भी.

"यही से आ रहा हु भाई और पास में हे जाना है. तुम काफी आरसे से इधर हे खड़े होते हो क्या?", गन्ने पहली पिसाई में अपना रस बहार तक उछाल रहे थे और उनको दूसरे सिरे से पकड़ कर वापिस उस नीली इस्पात की मशीन में पिरोने से पहले युवक ने उन्हें मोड़ते हुए आधे कटे 2 निंबूए और ाचा ख़ासा तजा पुदीना भर दिया. अब मशीन उनकी मोटाई से दाब लेने लगी थी और युवक थोड़ा ज्यादा जोर लगाने लगा.

"हमने कहा जाना वीर जी? इस फसल की कटाई के बाद गन्ने की रेहड़ी और अगली कटाई पे moongphali-gajjak की लेकिन ठिकाना 7 बरस से यही है. बोलचाल से इधर पंजाब के तोह नहीं हो.", मतलब साफ़ था के tooti-footi पंजाबी बोलने वाला ये परदेसी युवक अर्जुन को थोड़ा जान गया था के वो मुसाफिर है.

"ेहड़ा नहीं है भरवा, रेहान तेह पैदाइश मेरी इत्थे दी हे है. ओह गाल वैखरी है की शहर यह नहीं. क्सक्सक्सक्स शहर दे कॉल दादा जी डा पिंड है तह बस घुम्मन निकल्या घरो.", अब जिस तरह फर्राटेदार पंजाबी अर्जुन ने बोली थी रेहड़ी पर एक हाथ रखते हुए वो युवक ठगा सा महसूस करने लगा. अब वो भली भांति देख रहा था लम्बा चौड़ा शरीर जिसका वजन उस से दुगना हे होगा. ऊपर से dhara-pravaah पंजाबी जो कही से भी हरयाणवी झलक न दे रही थी.

"वीर जी, भूलेख हो हे जांदा है. तुस्सी बुरा न मणयो लगदे वि तुस्सी पंजाबी हो. मैं तह बुलट (बुलेट) वेख के हे समझ गया स.", अब गन्ने के रस को गिलास में छान ने से पहले उसने थोड़ा नमक गिराया और बर्फ हिलाते हुए पतीले से रास गिलास में भर दिया. अर्जुन उसकी पीठ पर हाथ रखते हुए हंसने हे लगा था और उसकी बातें सुन्न कर दिलचस्पी लेते हुए एक सरदार जी और उनकी बीवी भी ये देख रही थी.

"ओह भैया.. पहले आप सही थे और सॉरी मैंने मजाक किया. लेकिन एक सच ये भी है की मैंने गलत नहीं कहा था. कभी 500 रियासते थी फिर 18 हुई और अब 24. लोग तोह वही है और देश भी. आप शायद बिहार से हो लेकिन देखो पंजाबी ाची बोलते हो और यक़ीनन बचे पढ़ते भी होंगे पंजाबी. खुद हे सोचो क्या हम एक दूसरे से अलग है? ये रास मेरी तरफ भी ऐसा हे मिलेगा और आपकी तरफ भी. हो सकता गणना कही ज्यादा मीठा हो कही थोड़ा काम लेकिन कहलायेगा तोह गन्ने का रास हे. लाओ पिलाओ.", अर्जुन ने कहने के साथ साथ गिलास भी उठा लिया और उसकी बात हंसी मजाक सुन्न कर वो दंपत्ति भी हंस दिए रेहड़ीवाले के साथ.

"बहुत सही कहे हो भैया जी. हमारी तरफ तोह गन्ने का रास 12 महीने मिलता है और उधर का गणना मीठा भी ज्यादा होता, आपकी तरह. आगे शहर से पहले पिंड तोह 2 हे है और दोनों सड़क उतरने के बाद. हाँ क्सक्सक्स बड़ा पिंड (गाँव) भी है जिधर जाने वाली सड़क से पहले छोटा अड्डा मिलेगा जैसे ये है. जूस तोह बढियाँ है न भैया जी?", अर्जुन को गाला गीला करते देख युवक ने सब जानकारी दे दी थी और राये लेते वक़्त उसके चेहरे पर प्रशंशा थी.

"एक नंबर बनाया है भैया. थोड़ी सुस्ती होने लगी थी लेकिन अब एकदम आपके जूस की तरह taro-taja हो गया. ऊपर से जो पूछना चाहता था वो आपने खुद हे बता कर पूरा काम कर दिया.", अर्जुन की हलकी मुचो पर रास का सफ़ेद झाग चिपक गया था जिसको साफ़ करते हुए उसने जेब से 10 रुपये निकाल कर युवक को दिए तोह उसने गल्ले से सिक्के निकाल कर 5 रपये उसकी तरफ बढ़ा दिए.

"ये जमा कर लो भैया, वापसी में गिलास पी कर हे जाऊंगा. शुक्रिया इतने बढ़िया रास के लिए और जानकारी के लिए.", एक बार फिर सर पे हेलमेट और आँखों पर चस्मा लगा कर वो मोटरसाइकिल चालू करने हे लगा था की नीली टीशर्ट और गहरा नीला पायजामा पहने ये तगड़ा सा युवक उसके सामने आ रुका.

"पाह जी, ऊँचे पिंड जा रहे हो? मेरी बस पहला निकल गयी तेह अगली 2 घंटे बाद ाउनि.", लड़का चेहरे से हे खिलाडी और भला लग रहा था बेशक वो अर्जुन से कुछ बड़ा हे होगा उम्र में.

"बैठ जाओ भाई लेकिन मेरा बैग हम दोनों के बीच रख लेना रस्सी खोल कर. कंधे पे लटकने से कुछ टूट न जाए. वैसे हेलमेट की जरुरत नहीं होगी?", अर्जुन के कहने के साथ हे उस लड़के ने बड़े सलीके से दोहरी लिपटी रस्सी का टाला खोल कर सीट सही की और कहे मुताबिक बैठ गया.

"बाई, हेलमेट तोह छोडो इधर क्सक्सक्सक्स सेहर तक नका भी नहीं लगता सिवाए साल भराई के. बाकी कल्ली रोड है और आराम नाल चलाओ तोह वि एक घंटे में पहोच जाना हमने.", अर्जुन की हिंदी एक बार फिर आड़े आ रही थी वार्तालाप के लेकिन वो ऐसी मिली जुली बातों से उसको मजा भी आ रहा था. मोटरसीले चलने की स्वाभाविक आवाज आयी और एक बार सड़क पर दबाव बनाते हुए रानी अपने रस्ते बढ़ चली. हाँ अब रफ़्तार जरूर 40-50 की थी और इस बार उसके साथ एक और शरीर भी था जो बहोत भली बातें कर रहा था.

"नाम क्या है बाई जी आपका? मेरा ना है निहाल सिंह और दोस्त मुझे नीला बुलाते है. इधर सरकारी कॉलेज में हु और आजकल प्रैक्टिस चल रही है हमारी कबड्डी की.", युवक ने बैग को बड़ी हे हिफाजत से थाम रखा था अपने दोनों पत् पर रखते हुए. उसका नाम सुन्न कर अर्जुन ने गोल शीशे में देखते हुए आभार से नजरे हिलाई.

"मेरा नाम अर्जुन है भैया और दोस्त भी यही बुलाते है क्योंकि इसका छोटा नाम तोह कुछ नहीं हो सकता. अभी पेपर देने के बाद कुछ फ्री था इसलिए गाँव देखने जा रहा हु और थोड़ा टाइम रहूँगा आप लोगो के गाँव में. हो सकता है इस दौरान आपसे और मुलाकात हो."

"जरूर अर्जुन बाई क्यों नहीं होनी. वैसे क्सक्सक्सक्स पिंड नहीं है, छोटा शहर हे है. हाँ खुला दुला है और आधा इलाका पुराण पर साफ़ सुथरा और बाकी नया बना हुआ पिछले 15-20 साल में. मेरे बापू जी किसान है और thik-thaak जमीन भी है सड़क के परली तरफ. बड़ा भाई जम्मू कैंटीन में ड्यूटी करता है और बाकी पीछे मेरी बेबे, निम्मो दीदी और मैं. छोटा सा हैप्पी परिवार है जी हमारा. मैं भी स्पोर्ट कोटे में या तोह फ़ौज में जाऊंगा या रेलवे में. बेबे कहती है के वो जाने नहीं देंगी क्योंकि फेर तोह घर सुन्ना हो जाना है. हहहह.. मैं ज्यादा हे बोल रहा हु अर्जुन बाई और तुम सोचते होंगे कैसा बाँदा है!", अर्जुन देख सकता था उस युवक के चेहरे पर ख़ुशी के बाद हलकी सी झिझक.

"मुझे ाचा लगा भैया जान कर की आपकी एक ाची हैप्पी फॅमिली है. सबसे जरुरी तोह यही होता है. है के नहीं? वैसे बेबे अगर चाहती है तोह उनकी बात मान लेनी चाहिए. खेलने की वजह से जाना चाहते हो तोह वो तोह स्टेट से भी जा सकते हो. मेरे पापा डॉक्टर है और बेबे मेरा ध्यान रखती है. बाकी मैं भी खेलता हु थोड़ा बहोत और दादा जी ने बताया था के आपके गाँव.. सॉरी टाउन में अखाडा, कबड्डी का मैदान और बहोत कुछ है. टाइम मिला और किसी ने खेलने दिया तोह जरूर कोशिश करूँगा."

"ओह क्यों नहीं जी. रोज शाम को पम्ल सेण्टर में हम लोग मैच लगते है. उधर हे अखाडा है और chidi-chikka (बैडमिंटन) के साथ हे हॉकी का मैदान भी. कोच बड़े नहीं है लेकिन जो भी है वो खिलाडी रह चुके है या मास्टर जी. बहोत वाडिया लगता है बाई वह मिटटी में मिटटी होना. वैसे तुम बाई किसके यहाँ आ रहे हो? मेरे बापू जी का नाम गुरदयाल सिंह है और उन्हें जो भी जानता है मंजे वाले दार जी के नाम से जानता है या गुरी उनके यार बेली बोलते है. वो हमारे घर के बहार और खेत में मोटर पे हमेशा मांजा दाल के बैठे होते है न तोह लोग बाग़ बुलाने लग पड़े.", सचमुच ये किरदार बहोत हे खुशमिजाज और साफदिल था. अर्जुन को यहाँ मिलने वाला पहला हे शख्स दिल का साफ़ और हंसमुख मिला था.

"भैया मैं यहाँ कृष्ण शर्मा जी के यहाँ रुकने वाला हु. आप जानते है उन्हें? और ये एमपीएल का क्या मतलब हुआ?", अर्जुन को जैसे ये शब्द सही से सुनाई न दिया था.

"एमपीएल नहीं बाई पम्ल. पंडित मोती लाल जी सेण्टर और उनका हे तोह बसाया पिंड था ये अपना नया टाउन. अब आबादी 15000 की है चाहे गाँव कहो या टाउन तोह इसमें 4-5 कृष्ण शर्मा है. मैं तोह 2 को जानता हु एक जो शहर में आढ़ती है, स्वीटी के पापा और दूसरे अपने हे बैंक के मैनेजर. बहोत जालिम आदमी है बाई और वो कोई काम नहीं करता बस अपने अलग दफ्तर में बैठा रहता है ठाठ से कूलर चलवा के.", अर्जुन देख रहा था के निहाल सिंह अपनी बात कहने के साथ मिलते जुलते भाव भी बना रहा था.

"फिर तुम इन कृष्ण शर्मा जी को नहीं जानते भैया जिनके यहाँ मैं जा रहा हु. वैसे इनके पिता के नाम पर हे पम्ल सेण्टर बना है.", इतना सुनते हे निहाल चलती मोटरसाइकिल पे हे अर्जुन के चेहरे के करीब आ कर उसको ध्यान से देखने लगा लेकिन उसके चेहरे पर कुछ अलग तोह था नहीं.

"सच्ची बाई. तुम प्रधान जी की हवेली आये हो? उनके दूर के रिश्तेदार हो तभी पहले नहीं देखा. न वो वार्ड के चुनाव में खड़े होते और न पंचायत के. लेकिन पूरे हलके में उनके सामने कोई न बोलता अर्जुन बाई. पंचायत में भी उनकी गद्दी है लेकिन वो वार त्यौहार हे दीखते है उधर. जमीन बहोत है बाई आग लगाए न मुके और छोटे प्रधान विनोद जी, उनका तोह कई मंजिलो को होटल है अगले सेहर में. पंचायत घर, बड़ा स्कूल, ये बैंक वाली जगह और गुरुघर के साथ मजीद (मस्जिद) तक उनके फादर साहब या उनके बाद इन्होने बनवाई. बापू बताते है की सड़क से नाली तक का नक्शा बड़े प्रधान जी ने तैयार करवाया था और असलियत में तोह वही मालिक भी है इस हलके के लेकिन वो कभी कभी आते है और बस बड़े बुजुर्गो या सरकारी लोगो से मिल कर चले जाते है. उनको पंडित जी बोलते है सभी, तुम उनके यहाँ जा रहे हो तोह थोड़ा जानते भी होंगे. पुलिस के बड़े अफसर थे कुछ टाइम पहले और उनके भी छोटे प्रधान जी नरिंदर जी 3-4 महीने में आते है. वो बढ़िया आदमी है बिलकुल अफीम. मैं नशा नहीं करता अर्जुन बाई, अफीम का मतलब परफेक्ट."

"हाँ भैया वो तोह है और बड़े प्रधान जी को वैसे ज्यादातर लोग पंडित जी के नाम से बेहतर जानते है. वैसे इतना नाम है और काम के नाम पे बस खेती और बेटे का होटल? चलो हमको क्या, हम तोह मेहमान है और छुट्टियां बिता कर चले जाएंगे. वैसे कसबे का इतना नाम है तोह मार्किट वार्केट भी ठीक थक होगी? सिनेमा भी है क्या कोई निहाल भैया?"

"अर्जुन बाई इधर न कोई सिनेमा है और न शहरी मार्किट. दूकान भी वही खोल सकता जो गाँव का हो या हलके का और ओहदे विच कोई नशा पत्ता नहीं बेच सकदा. जेहड़े करदे है ओह आसपास तोह daaru-bhukki ले ांडे है लेकिन अपने कसबे विच न सरकारी ठेका है न कोई feem-bhukki डा अड्डा. बाकी अब आ गए हो तोह ज्यादा ाचे से खुद देख लेना बाई. सारा क़स्बा 2 सीढ़ी सड़क और फेर 5 चौराहो के बीच है जिसमे से इस तरफ के चौराहे वाली जगह नवी (नयी) हैगी और अग्गे वाली ेहड़ी नीव रखे टाइम तोह. मतलब इस्टार्टिंग से बाई. उस से आगे एक तरफ भोत साड़ी जमीन प्रधान जी की है लेकिन पता नहीं कितनी होगी और परली तरफ बाकी लोगो की. 2 छोटे पिंड भी है मतलब 40-50 घरो वाले लेकिन उनकी जमीन नहीं है. वो खेतो में काम करते है जा फेर palledari-majduri. जे अपना बस अड्डा है बाई.", बातों हे बातों में ये लोग उस चौराहे आ रूखे थे जहा एक तरफ लोकल अड्डा था और दूसरी तरफ कुछ तीन की चादर ढकी दर्जनों दुकाने. अब इधर ठीक छुअरहा था और अर्जुन ने निहाल के द्वारा सड़क दिखने के बावजूद मोटरसाइकिल रोक कर हर तरफ ध्यान से देखा.

"तोह वो सामने की तरफ भी कोई गाँव या क़स्बा है? बोर्ड तोह लगा है उधर. मुझे तोह बताया था के आप वाला हे क़स्बा लगता है शहर से पहले.", अर्जुन ने मुआयना करने के बाद देख लिया था की कुछ लोकल बस और गाड़ियां विपरीत सड़क पर भी जा रही थी.

"हाँ लेकिन बाई वो भी देखो जो हरे बोर्ड पे लिखा है. ये सड़क सीढ़ी क्सक्सक्सक्स बड़े सेहर और इस तरफ हमारे क़स्बा. परली तरफ दूसरा डिस्टिक (डिस्ट्रिक्ट) और उसमे आता ुचा पिंड मतलब टाउन. बाकी अपनी तरफ raaj-shahi और कानून दोनों है लेकिन उधर जिसकी लाठी उसकी भैंस. वो गाडी जा रही छोटे प्रधान जी की. शुक्र है उन्होंने देखा नहीं.", ये दोनों सड़क पर मुड़ने से पहले हे खड़े थे जबकि कृष्णेश्वर जी की कार सामने क्सक्सक्सक्स शहर की और से आने के बाद कसबे की और मदद गयी थी. उनकी नजर में ये दोनों नहीं आये थे.

"देख लेते तोह क्या कहते वो भैया? यहाँ खड़े होना कोई गलत बात है क्या? और आप तोह मेरी मदद हे कर रहे हो. वैसे इनको जाने हे दो आगे, फिर हम चलते है. प्यास भी लगी है भैया.", अर्जुन मोटरसाइकिल से उतर कर भरपूर अंगड़ाई लेता हुआ इधर उधर देखने लगा.

"ठंडा पानी तोह ये अड्डे के अंदर भी मिल जाएगा. मशीन लगी है उधर अर्जुन बाई. आओ मुझे भी पानी की जरुरत है. और प्रधान जी तोह फेर भी कुछ न कहते सिवाए haal-chal के लेकिन दादी (देवकी) को सबसे दिक्कत है. उन्हें लगता के हम लड़कियां ताड़ने रुके है इधर.", अर्जुन उसकी बात सुन्न कर हंस दिया. दोनों बरी बरी से मुँह धोने के बाद ाचे से पानी पी कर चेहरा साफ़ करते हुए वही छाया में बैठ गए.

"मतलब दादी सभी जवान लड़को को झाड़ देती है?"

"नहीं ऐसा भी नहीं है बाई लेकिन इस अड्डे पर अगर 2-3 लड़के खड़े हो वो भी अपने कसबे के और गलती से उन्होंने देख लिया तोह जरूर. तभी तोह हवेली, गर्ल्स स्कूल, आंगनबाड़ी की तरफ कोई लड़का जाता नहीं और जो जाए वो बस अपने काम से जाए. बाकी पूरे कसबे में लोग mil-jul के रहते है. गुरुघर के बहार भी मांजी दिखेगी और मजीद के बहार भी. सांझ सवेरे बेले बुजुर्ग गप्पे लड़ते है और बचे कही भी खेलते कूदते. अर्जुन बाई अब जल्दी से चलो इधर से.", हरे रंग की छोटी लोकल बस वह आयी थी की निहाल उठ का मोटरसाइकिल की तरफ बढ़ चला. अर्जुन उसके पीछे जबकि बैग निहाल के हे कंधे था.

"हाँ वि निलय, कित्थे घुमाई हो रही?", अधेड़ सा ये आदमी बस से हे उतरा था और neeli-safed वर्दी में कई लड़कियां भी. निहाल ने औपचारी मुस्कराहट के साथ जवाब दिया.

"चाचा, मैं तह कॉलेज तोह हे आ रहा. ऐ अर्जुन बाई है, प्रधान जी डा मेहमान. राह पूछ रहा सी तेह मैनु मिल गया. पानी पी के घर ने हे जा रहा चाचा. तुस्सी वि पिंड न जाना?", एक सांस में उसका ऐसा कहना साफ़ बता रहा था के उसको कुछ डर था इधर मौजूद होने पर. लेकिन अर्जुन का जो परिचय दिया था उसको सुन्न कर उस व्यक्ति को जवाब मिल चूका था. धुप का चस्मा पहने सवा 6 फ़ीट का लम्बा चौड़ा और गौरवर्ण अर्जुन उनके करीब हे था.

"नमस्ते जी. भैया चले हम?", अर्जुन ने उस व्यक्ति को संक्षिप्त जवाब देते हुए निहाल को चलने का कहा.

"नमस्ते जी नमस्ते. निहाल ध्यान नाल लेके जाई जनाब जी न तेह देहलीज तक छड़ के ौना. चलो वि कुड़ियों बैठो अपने टेम्पू विच.", और इसके बाद वो आधा दर्जन लड़कियां शायद इसी आदमी के उस rassi-chalit auto-rikshaw में जा बैठी और गमछे से चेहरा साफ़ करने के बाद वो आदमी भी ड्राइवर की गद्दी पर.

"भैया, ये आपके चाचा जी थे?", अर्जुन बहोत धीमी रफ़्तार से चला रहा था और उसकी मंजिल इधर से 4 किलोमीटर आगे थी.

"ओह सेज चाचा जी नहीं है बाई लेकिन सभी बचे उन्हें चाचा हे बोलते है. वैसे तोह ये दिन में अड्डे से अपने टाउन टेम्पू चलते है लेकिन आज शायद शहर गए थे. अब तुम्हारी जगह मेरे साथ गाँव या कॉलेज का दोस्त होता तोह चित्तर पड़ने थे लेकिन देखो प्रधान जी का नाम सुन्न कर चाचा कैसे ठन्डे पड़ गए. आजकल छुट्टियां चल रही है तोह सारे बचे गाँव में हे होते है और dasvi-baarvi वालो के 3 घंटे की क्लास लगती है. ये लड़कियां अपनी हे तरफ की है और नर्स की पढाई करने रोज शहर जाती है. इनका टेम्पू फिक्स है. हाँ यहाँ से अपना क़स्बा.. टाउन शुरू बाई.", अब ये लोग एक और सड़क पर मुड़े थे जो 25 फ़ीट चौड़ी थी और बरगद का विशाल वृक्ष प्रारम्भ में हे था. अर्जुन ने पढ़ा के उसके padd-dada जी का नाम यहाँ भी चिन्हित था.

कुछ लोग इस वक़्त भी बरगद की छाया टेल खड़े थे और 2-3 टेम्पू भी. रंग बिरंगे एक या ज्यादा से ज्यादा 2 मंजिल के पक्के घर दोनों तरफ और उनसे पहले कही कही छोटी मोती दूकान. निहाल अर्जुन को सब बताये जा रहा था लेकिन वो तोह 10 की रफ़्तार में चलता जैसे खो सा गया था. खुले घर, जगह जगह घने वृक्ष और खली मैदान. कही कही gaye-bhainse भी बंधी थी और दिन के 11 बजे गर्मी की दोपहर में भी इधर उतनी गर्मी न थी.

एक पक्की ईंटो की सड़क दायी तरफ मुड़ती सन्देश लिए थी पंडित मोतीलाल महिला विद्यालय का और मुस्कुराता हुआ अर्जुन आगे देखने लगा तोह ठीक चौराहे के बीच इतना घाना वृक्ष जिसने उस छुअरहे को हे सहेज रखा था. हुक्का और चाय पीने के साथ ताश खेलते 8-9 adhed/bujurg उसकी छाया टेल थे और उन्होंने हवा में हे हाथ उठा कर अर्जुन का जैसा मूक स्वागत किया.

"ये है बाई अपने पिंड डा मजमा. गुरुघर इस तरफ और मजीद (मस्जिद) ठीक सामने. आगे पुराण पिंड और इस तरफ धर्मशाला, अखाडा और मंदार (मंदिर). थोड़ी दूर है लेकिन नए और पुराने के ठीक बीच में. खब्बे (लेफ्ट) पास मार्किट है जहा सब्जी, राशन और बाकी सबकुछ मिल जाता है. मेरा घर भी इधर हे है वो जिसके बहार मांजी राखी है. कोने वाला बड़ा घर शहीद मेजर रणदीप सिंह का है. सभी बहोत मान करते है उन पर और इनके परिवार का और अब यहाँ बीजी रहती है अपनी एक बहु के साथ क्योंकि इनके बेटे ने 2 ब्याह कर रखे. ऐसा नहीं है की आपस में बनती नहीं पर जगतार बाई जी बड़े शहर में पढ़ाई करते है और उनकी बेबे वही रहती है. छुट्टी में तोह वो हर साल आते है तोह अब भी आएंगे. रब्ब उनकी उम्र लम्बी रखे, बड़े हे दिलदार आदमी है अर्जुन बाई अपने जगतार बाई जी. तुम अग्गे चलो मैं हवेली तक छोड़ के वापस आ जाऊंगा.", अब अर्जुन उसको क्या बताता की यही जग्गी भैया है उसके और उसको ख़ुशी हुई की वो यहाँ भी उनसे मिल पायेगा.

"वैसे आप यही उतर जाओ भैया, धुप में वापिस यहाँ तक आओगे फिर."

"नहीं नहीं. मुझे तोह अब छोड़ के आना हे पड़ेगा बाई. चाचा ने सख्ती से कहा था तोह बाद में 2 बात कह देंगे अगर उन्हें खबर लगी तोह. चलो आगे बढ़ाओ अपनी गद्दी.", अर्जुन ने भी सहमति से रानी आगे बढ़ा दी. अभी वो कुछ आगे हे आये थे की ये मुख्या सड़क भी पक्की ईंट वाली सड़क में बदल गयी. इधर घर कुछ पुराने हिसाब के थे लेकिन बहोत बेहतर हाल में. कही वृक्ष के निचे पालतू जानवर बंधे थे तोह कही सब्जी की क्यारियां. गाये को टोकरी से हरा चारा खिलाती उस महिला पर नजर पड़ते हे अर्जुन की तीव्र इत्छा जगी उसका चेहरा देखने की. पीले सफ़ेद सलवार कमीज में वो सुडोल भरा हुआ जिस्म और मांसल बाहें जिनमे सोने की 2-2 चूड़ी थी और सर पे सफ़ेद दुपट्टा लिए वो जवान महिला हाथो से हे गाये को खिलने में व्यस्त थी. करीब आती मोटरसाइकिल की आवाज ने उसका भी ध्यान भांग किया तोह अर्जुन को वो गेंहुआ खूबसूरत चेहरा नजर आया.

"दीपा भाभी, तुस्सी हर वेले बस इसदि सेवा विच लगी रेहँदी हो. दलबीर पाह जी दी उडीक कर रहे जी?", अर्जुन तोह पहले से हे कीड़ी की चाल सा चल रहा था और निहाल के ऐसा बोलने पर जाने क्यों उसने मोटरसाइकिल उस घर के सामने हे रोक दी. वो महिला भी अपने एकसार मोतियों से दांत दिखती हुई एक मोहक मुस्कराहट के साथ 2 कदम आगे चली आयी.

"वे तू अज्ज किथे चल्या नीलू? मैं तह बस निम्मी न उडीक रही सी. स्कूल तोह ाँ वाली है न. तेरे पाह जी और उन्हे दी जमीन भली. ऐ गबरू कौन ऐ? कॉलेज तोह नाल आया?", अर्जुन की नजरे वो कैसे देखती जब उसके चेहरे पर वो धुप का चस्मा और सर पे हेलमेट था? लेकिन दीपा भाभी ने तोह पहली नजर में हे अर्जुन की उत्सुकता बढ़ा दी थी. सुत्वा शरीर जिसके साथ लम्बाई भी तक़रीबन साढ़े 5 फ़ीट से कुछ एक इंच ज्यादा. ढीले वस्त्रो में भी शरीर के ख़ास उभारो का विशिस्ट कसाव और इतनी नैसर्गिक मुस्कान के साथ बेबाक बात करना.

"भाभी ऐ प्रधान जी दे घर मेहमान ने. संगी चचे ने कहा स के हवेली तक छड़ के ौना जनाब जी न तह ोथे हे चालल्या स. निम्रत डा स्कूल होने पूरा होया होना तह 10 मिनट तक आ जाना उसने. तुस्सी बाली फ़िक्र करदे हो नाल धुप विच रंग पक्का करि जाने हो. बेबे पुछदी सी आप जी न.", निहाल अपनी बातों के बीच हे संदेसा भी दे रहा था और अर्जुन ने हाथ जोड़ कर अभिवादन किया तोह पहले ठुड्डी पर हाथ रख कर उसको देखती दीपा भाभी ने प्रतिउत्तर में नमस्कार किया.

"जी आया न (वेलकम). पहले तह नहीं वेख्या आप जी न?", उनकी आवाज भी उतनी हे खनकदार थी जितनी वो खुद.

"शुक्रिया भाभी जी. वो पहली बार हे आया हु न इधर तोह इसलिए नहीं देख पाए आप. चलता हु.", अर्जुन ने जिज्ञासा बढ़ा कर निकलना हे बेहतर समझा और उसकी बात का मतलब समझती हुई दीपा भाभी वही कड़ी रही. पूरे 5 मिनट बाद हे निहाल पैदल आता दिखाई दिया तोह करीब आने पर उन्होंने उसको वही रुकवा लिया.

"वे प्रधान जी दे घर ऐ नया मेहमान कौन होया जेहड़ा पहले कड़ी पिंड विच दिस्य नई?" (प्रधान जी के घर ये कौनसा मेहमान आया है जिसको पहले गाँव में देखा नहीं. आगे ज्यादा बातचीत हिंदी में लिखूंगा दोस्तों)

"भाभी दूर शहर से आया है और kad-kathi में तोह मुझसे 4-5 उंगल ऊँचा होगा लेकिन मुझसे छोटा है. आप तोह मेरे पैदा होने के टाइम से हो यहाँ फिर मुझे ज्यादा कैसे पता होगा. अर्जुन नाम है और भला लड़का है. घूमने आया है छूती में शहर से इधर. मैं हवेली से पहले हे उतर गया था लेकिन आप तोह वह जाती रहती हो. बोलै है की शाम को अखाड़े की तरफ आएगा.", दीपा भाभी सुन्न कर बस हामी भर्ती रही.

"दिल्ली से होना जरूर. ले निम्मी भी आ गयी. तेरी बेबे और बहिन से कह दियो के मैं 4 बजे आती हु उधर. ये रोटी खाने आएंगे तोह काम निबटा के. और तू थोड़ी खुराक पे ध्यान दे. पीर साहब के मेले से अपने हे पिंड का नाम सुनाई देना चाहिए. भूत और बिल्ला तेरे पाह जी को बता रहे थे की इस बार परली तरफ वालो ने आवाज लगवाई है. प्रधान जी ने भी रेडर को पक्की नौकरी दिलवाने की जुबान की है बाकी सभी को 5-5 हजार के साथ. निम्मी तू कपडे बदल ले मैं खाना लगाती हु तेरा.", भाभी निहाल से बातचीत करके घर में चली गयी और ये साफदिल इंसान उनसे विदा ले कर किनारे किनारे चलता हुआ अपने आप से हे बातें करता जाने लगा. पानी की शुद्ध धार सा साफ़ इंसान था निहाल और इस गाँव में वो अर्जुन का पहला दोस्त बना तोह.

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"मिल आया फिर ताई से?", शंकर अपने ऑफिस में अकेला हे बैठा था जब दरवाजा खोल कर नरिंदर अकेले हे अंदर दाखिल हुआ. मेज पर रखा टिफ़िन देख नरिंदर ने सटीक अंदाजा लगते हुए पुछा था और अपने भाई की बगल में राखी कुर्सी पर पसर गया. शंकर के चेहरे पर एक पल तोह हैरानी के भाव आये फिर मुस्कुरा दिया.

"हाँ कुछ काम था उन्हें और फिर ऋचा से बात करनी थी. तू सवेरे से कहा गायब था और अकेला आया है?"

"ऋचा की माँ से भी मुलाकात हो गयी होगी लगे हाथ? और मैं अकेला नहीं आया. रेनू भी साथ हे आयी है लेकिन उसको परम ने किसी महिला डॉक्टर के साथ थोड़े टेस्ट्स करवाने भेज दिया. पता नहीं कल हे तोह दिखाया था उसको तूने माँ के साथ लेकिन उसको और भी कुछ परेशानी है शायद. वैसे तुझसे कुछ बात करनी थी यार.", नरिंदर द्वारा मधुलता पर तंज करना शंकर को ाचा हे लगा था क्योंकि ऐसा वो कभी कभी शंकर के मजे लेने के लिए करता था. और सामने पड़े टिफ़िन को आराम से खोलते हुए नरिंदर ने प्लास्टिक की वो बोतल भी उठा ली जिसमे ठंडी लस्सी भरी थी. चूरमे की खुशबु लेने के साथ हे उसने हाथो से हे खाना शुरू कर दिया.

"आराम से खा भाई मैं तोह घर से हे ठूस कर निकला था. तेरे हिस्से का भी खा लिया आज तोह. वैसे कोई गंभीर बात है क्या?", टेबल के दूसरी तरफ से निकल कर शंकर ने दरवाजा अंदर से लगा दिया. अब आवाज बहार नहीं जा सकती थी और नरिंदर ने लस्सी की बोतल मुँह से लगते हुए हे सर हिला दिया.

"हहहहह. तू कई बार तोह ग़दर मचा देता है यार और कभी कभी ऐसे आदमी को छोड़ देता है जो साला बवासीर बन सकता है हमारे लिए. नैतिक वाले मामले के बाद जब तू क्सक्सक्सक्स गया था तोह आधा दर्जन जान ली थी लेकिन उसके बावजूद वो आदमी बच गया जो साला सबसे पहले ख़तम होना चाहिए था. लेकिन ताज्जुब की बात है की वो साला 18 साल बाद हे क्यों वजूद में आया?", नरिंदर ने घुट फिर से भरने के बाद फिर से चूरमे का भोग चालू किया और शंकर एक हाथ से सर खुजाता हुआ दफ्तरी कागज पर पेन से डब्बे बनाने लगा.

"ये कौनसा मुर्दा ज़िंदा हो गया बे और तुझे कैसे पता चला? तूने ये भी नहीं बताया के तू था कहा और अब ये क्या मामला है.?"

"..मत.. हींग.. उह्ह्ह.. हिम्मत सिंह भाई.. वो भोसड़ीवाले कबर से कैसे बहार आ गया? और मैं बस पापा के काम से गया था नजदीक हे. जमीन देखने के लिए भेजा था उन्होंने और वो जमीन काम की न लगी मुझे. अब तू बता के इस झाँटु का क्या करे? तुझे कुछ करना नहीं लेकिन पता लगाना है के ये अब हैं कहा और इसकी बैक कौन है. 18 साल ऐसे तोह वो बचा न रह सकता जबतक कोई सही हाथ उसके सर के ऊपर न हो. बहोत बार कहा है मैंने के लाश खराब करने से पहले चेहरे सलामत रखा कर लेकिन तुझे तोह बस चेहरे से ाँद तक बस चीरे लगाने में मजा आता है."

"यार इन्दर वो टाटा अगर किसी तरह ज़िंदा भी है तोह इतना माल न भरा उसके अंदर की वो अपना सामना कर सके या कोई नुक्सान. और इतनी जल्दी क्यों है तुझे उसको पकड़ने की? अभी तोह एक सर्जरी भी है मेरी 2 बजे, मतलब घंटे बाद हे और उसके बाद उमेद के यहाँ भी जाना जो की टाइम पे होने वाला नहीं. हिम्मत सिंह ज़िंदा है और साला?", शंकर ने टांग पसर कर दोनों हाथो की उँगलियों को आपस में जोड़ लिया. वो जैसे उस समय को याद करने लगा था और घटनाक्रम भी. नरिंदर कुछ वक़्त खता रहा और जब लस्सी की पूरी बोतल ख़तम हुई तोह डकार लेता हुआ शंकर के रुमाल से हे गंदे हाथ साफ़ करके अपने भाई जैसे टेबल पर दोनों पाँव रख कर आराम की मुद्रा में पसर गया.

"देख भाई शंकर जो इंसान तेरे वार से बच गया वो होगा तोह कुछ मजबूत हे. इरादे भी तगड़े होंगे उसके जो इतने समय तक शांत रहा. मेरे सूत्रों से मुझे इसकी जानकारी लगी है और उसने तेरी, मेरी और थानेदार जी की सुपारी दी थी वो भी 5 करोड़ की. अब धंदे में पता तोह चल हे जाता है की किसकी सुपारी उठी है लेकिन लेने वाले का नाम नहीं आता. बहार संजीव की कार की डिक्की में पूरा एक करोड़ पड़ा है सबूत के तौर पर जो अपना हे है क्योंकि शूटर मैंने क्लोज कर दिया. अब हफ्ते के भीतर काम न हुआ तोह सुपारी किसी और के पास जायेगी. तब किस्मत इतनी हे मेहरबान होगी इसकी प्रोबेबिलिटी बहोत काम है. हाँ हिम्मत सिंह को हे हटा दिया जाए तोह बात ख़तम. और वो है अपने प्रदेश में हे क्योंकि काम भी यही होना था और पैसे भी यही बरामद हुए है.", इतना ब्यौरा मिलते हे शंकर के जिस्म में ऊर्जा भर उठी. सामने रखे फ़ोन पर 5 विभिन्न नंबर दबाने के बाद हे उसने घंटे के बाद आयी आवाज से बातचीत शुरू की.

"भारत भाई शंकर बोल रहा हु."

"हाँ भाई नंबर से हे जान गए होंगे. ाचा एक काम था.", शंकर के इतना बोलते हे दूसरी तरफ से कुछ कहा गया तोह शंकर ने आगे बात बधाई.

"पता लगाना है एक ज़िंदा लाश का. और जब आपके पास टाइम हो तोह बता दीजिये मेरा भाई साड़ी डिटेल्स के साथ आपसे मिलने आ जायेगा.", शंकर ने बात कहने के बाद सामने वाले के बोलने पर पेन से कागज़ पर कुछ लिखना शुरू कर दिया.

"ठीक है भारत भाई कल सुबह 8 बजे इन्दर, मेरा मतलब नरिंदर आपके पास पहुंच जाएगा. मामला संगीन भी है और अर्जेंट भी तोह आप पर हे भरोसा कर सकता हु. मेरी टीम उतनी तेज नहीं है इस मामले में और वक़्त की हे कमी है अपने पास.", शंकर जिस तरह से सामने वाले को इज्जत दे रहा था ये अमूमन देखने को नहीं मिलता था. कुछ और बातचीत के बाद फ़ोन रख दिया गया.

"ये भारत भाई कही छोल चाचा वाला सनकी तोह नहीं है?", नरिंदर मुस्तैदी से बात सुन्न रहा था और अब कागज पर लिखा हुआ पढ़ने के बाद उसके सवाल पर शंकर भी हंसने लगा.

"इसको न तोह चाचा बोल सकते और न सिर्फ नाम से. सबका भाई है ये लेकिन आदमी खरा सोना है इन्दर. तू इस से कल मिल ले इस जगह सुबह 8 बजे. देख मिलने के लिए जगह भी क्या बताई है. मूनलाइट सिनेमा के पिछली तरफ बायीं गली में बीज भंडार के ऊपर वाली दरजी की दूकान. चाय के खोखे से पता चल जाएगा. बहनचोद है तोह करमचंद जासूस हे पूरा. खैर ये आदमी हे 24 घंटे में उसको ढून्ढ सकता है. और इस बार मैं गर्दन अलग करके हे रहूँगा उस हरामी की."

"रहने दे न भाई बड़ी मुश्किल से तेरी इमेज ठीक कर रहे है मैं और उमेद मिल कर. मैं देख लूंगा ये सब और तू अब समझदार हो रहा है. नहीं तोह मुझे लग रहा था तू राजेश या दलीप को इसमें शामिल करेगा."

"बाप को तोह तू मुझे ज्यादा जानता है इन्दर. तब भी उन्होंने अपने मीठे बोल सुनाये थे और अगर उन्हें पता लगता की साला ये ज़िंदा है तोह एक बार और मार लेते मेरी. राजेश का भी अपना परिवार है यार और मैंने पहले हे उसको बहोत उलझाया है. अब तेरी सलाह पर मैं सीख रहा हु की हमेशा बहार से सेवा लेनी चाहिए और काम खुद करना बेहतर. वैसे तेरे साहबजादे गाँव पहुंच चुके है. माँ का फ़ोन आया था तेरे आने से पहले हे. बता रही थी की विनोद अर्जुन की वजह से घर पे हे है और बाकी सब लोग भी खुश थे उधर उसके जाने पर. लेकिन तूने मुझसे ये अखाड़े वाली बात क्यों कहलवाई अर्जुन को?", अचानक हे शंकर को आज सुबह वाला घटनाक्रम ध्यान आ गया जिस पर नरिंदर मुस्कुराने लगा.

"विनोद दिल का बुरा नहीं है बस चुटिया है थोड़ा. और तुझे ये नहीं पता होगा की वो अर्जुन से डर महसूस करता है अब लेकिन ाची बात है की वो कोशिश कर रहा है घुलने मिलने की. हम तोह उसको समझा नहीं पाए पर अपने पहलवान के पास शरीर से ज्यादा दिमाग है और उस से बढ़िया है उसकी सोच. वो बुरे को ख़तम नहीं करता शंकर, हमारी तरह. बुराई को ख़तम करता है वो भी गहराई में उतर कर. वैसे तुझे मेला याद है जहा तू और अपना जिगरी मां घोडा जीत के आये थे?", नरिंदर ने यहाँ अपने स्वर्गीय मां बनवारी का जीकर करके शंकर को मीठी याद दिलवा दी थी.

"हाँ भाई अपना खासमखास था तोह कोई वो बनवारी मां हे तोह था बचपन से. पहला गुरु और डर को भी मजाक से डरने वाला घुड़सवार. बनने मां जैसा आदमी तोह कोई हो हे नहीं सकता. हॉस्टल में कैसे ताश खिला खिला कर 40 लोगो की सुप्प्लि लगवा दी थी मां ने और डीन.. उसकी तोह क्लास ऐसी ली थी की बेचारा हाथ जोड़ कर माफ़ी मांगने लग पड़ा था.", शंकर तोह सब भूल कर हंस हंस के दोहरा हे हो गया.

"ओह रुक जा बे मेरे भोले भंडारी रुक जा और वापिस आ वर्तमान में प्यारे. तुझे मेला याद है न?"

"हाँ भाई याद है और याद क्यों नहीं होगा आखिर घोडा जीते थे हम mama-bhanja वह. लेकिन पापा ने पहली बार गांड सुजै थी उस टाइम. मेरी छोड़ तेरी और अज्जू की भी तोह पतलून उतरवा दी थी उन्होंने उस टाइम. तुम लोगो ने वह कुश्ती करि थी न?", अब नरिंदर ने सहमत हंसी दिखाई थी.

"जे बात मेरे भाई. अब आयी न तेरे छोटे भेजे में सही बात. हम दोनों को सजा कुश्ती नहीं कबड्डी खेलने की वजह से मिली थी. और अज्जू ने वह दरगाह से अगले गांव की टीम को भिड़ने की चुनौती दे दी थी. कबड्डी की पूरी टीम और सामने हम दोनों. पागल था वो और उसके साथ मैं जो बात मान गया. जीत भी गए लेकिन घर आये तोह वो साला तोह भाग खड़ा हुआ पापा को गुस्से में देख लेकिन मैं हाथे चढ़ गया थानेदार के. भाई उस पतली से बेंट से एक इंच चुत्तड़ ऊपर उठा दिए थे उन्होंने मेरे और अज्जू साला मेरी पतलून जमीन पे देख अपनी भी उतार के उनके पास जा खड़ा हुआ. उधर से आ गए तुम मां भांजा जो उसकी जगह फंस गए. अज्जू के तोह मार हे न पड़ी थी क्योंकि पापा सभी को सजा दे सकते थे लेकिन उसको नहीं. बाद में बस इतना हे कहा था के अब कभी मेले में नहीं जाओगे. और जाना भी हुआ तोह माँ साथ जायेगी, जो की उनसे ज्यादा खतरनाक है. बस तभी से, न हम लोग मेले में गए और न उधर वाले अखाड़े में.", अज्जू का भी जीकर चला तोह शंकर फिर से खुश होने लगा ये भूल कर की बात क्या चल रही है.

"तू और तेरी यादों का पिटारा शंकर. अबे हम अखाड़े की बात कर रहे है."

"हाँ भाई हाँ. बस आज यार अर्जुन के साथ थोड़ा वक़्त अकेले रहा था और बातचीत करते हुए अज्जू का जीकर हो आया. कुछ भी कह इन दोनों के बीच एक बड़ी सामान बात जरूर है. इसको भी सभी बराबर चाहते है और कोई कुछ कहने नहीं देता और उसके साथ भी ऐसा हे था. और दोनों कब क्या कर जाए ये तबतक नहीं पता चलता जबतक घटना सामने आ न जाए. लेकिन यार इन्दर इसका मतलब अर्जुन को अखाड़े के बारे में बताना नहीं चाहिए था. पापा फिर से भड़केंगे और माँ इसका जिम्मेवार हमे हे बता देगी."

"यार तू न सचमुच नीरा झंडू हे है शंकर. अबे पापा ने मेले में जाने से तोह मन हे नहीं किया था और अर्जुन को कसरत की जरुआत पड़ती है खुद को नियंत्रित और सुचारु रखने के लिए तोह पापा को उसका अखाड़े जाना भला हे लगेगा. लेकिन मजेदार बात ये है की आज 23 है और 28 को वार्षिक मेला लगेगा दरगाह पे. अर्जुन को पता लगेगा घर से भी और अखाड़े से भी. जबसे मेरा और अज्जू वाला काण्ड हुआ था उसके बाद हर साल चुनौती उठ रही है और उसको कोई भी अखाडा नहीं ले रहा. पापा ने अपने गाँव को मन किया हुआ और बाकी हलके के जो 14-15 गाँव है वो भी शांति बनाये हुए है. बस दरगाह के परली तरफ वाले उस हार को भूल नहीं पाए और हर बार स्पीकर पे बाजवा देते है. चुनौती भी अज्जू वाली हे रखते है पर बड़ा बदलाव करके. या तोह उनके 2 पहलवान एक से भिड़ेंगे एक समय में और सामने वाला 5 भेज सकता है. मतलब 2 लोगो से 5 लोग भिड़ेंगे लेकिन बारी बारी से अकेले. नहीं तोह इसका उल्टा करो. उस हार को उन लोगो ने इतना गंभीरता से लिया था शंकर की वह लगभग हर घर में एक तगड़ा कबड्डी का खिलाडी है जो देसी पहलवान भी है और प्रशिक्षण के लिए एक से बढ़कर एक coach-suvidhaye. पंचायते आपसी सौहार्द बनाये हुए है और कही भी कोई मतभेद नहीं है."

"फिर तुम ऐसा करना हे क्यों चाहते हो यार? और अगर गलती से ये वह भीड़ बैठा तोह इसकी रेल बना देंगे 2 दक्ष पहलवान. कुश्ती का घंटा पता है इसको और वो भी देसी अखाड़े में.? लेकिन अगर तू ऐसा चाहता है तोह वजह जरूर होगी.", शंकर के सवाल और अपने बेटे को कमतर आंकने पर नरिंदर ने अपना सर हे पीट लिया.

"बिना वजह तोह हमने भी वो चुनौती न दी थी भाई. तुझे लगता है अज्जू ऐसे हे उलझ जाता था? तब मुद्दा ये था की राम और रघु के बाद क्या मोतीलाल जी के परिवार ने सुरमा पैदा करने बंद कर किये? क्योंकि पापा और चाचा दंगल करते थे दरगाह के अखाड़े में लेकिन फिर उन्होंने किसी वजह से ये एकदम बंद कर दिया. माँ से मैंने बात की थी लेकिन उन्हें भी इसका कुछ पता नहीं और न पूर्णिमा चची को. कृष्ण चाचा का कहना है की तब कुछ शाही खेल और नियम शामिल होते थे ऐसी कुश्ती में और बहार से शाही मेहमान भी आमंत्रित होते थे. उन्हें ाचे से याद नहीं था क्योंकि उनकी उम्र काम थी लेकिन कुश्ती में पापा या चाचा के हाथो बड़ा काण्ड हो गया था, जोश जोश में. और उसके बाद अपने बचो की बात पर दादा जी ने राजघराने से बात करके इस आयोजन को बस अपने हलके और पीर साहब के मेले तक सिमित रखने की अर्जी दी थी. कुश्ती होती रही लेकिन सही कायदे के साथ और पापा या रघुवीर चाचा कभी भी मैदान में नहीं उतरे. उनके ऐसा करने पर गाँव के बाकी घरो से भी किसी ने अखाड़े में न उतरने का फैंसला किया जो उस दिन तक बरक़रार रहा जिस दिन तक उन लोगो ने अज्जू और मुझे चुनौती दी. हमने कर लिया जो करना था लेकिन पापा को इस बात का बहोत बुरा लगा था. उन्होंने बाद में उस आयजन स्थल से दादा जी के नाम का स्मारक पत्थर भी हटवा दिया.", अतीत का लेखा जोखा बताते हुए नरिंदर ने टेबल पर राखी सिग्रत्ती की डिब्बी उठाते हुए एक धूम्रपान दंडिका सुलगा ली.

"और तू फिर भी अर्जुन को कैसे न कैसे इसमें उतरना चाहता है.? अज्जू को पापा ने चाहे कुछ न कहा हो लेकिन अर्जुन को सजा दे सकते है वो. और ऐसा करके क्या मिलेगा हमे?"

"सुकून मिलेगा भाई. वो नाम वह से हटाने का दुःख है पापा को क्योंकि उन्हें पूरी बात बाद में पता चली थी की ऐसा हुआ क्यों था. लेकिन जुबान तोह वो पलटने से रहे लेकिन अगर अर्जुन ने चैलेंज ले लिया तोह वो अवश्य साबित करेगा की क्यों पंडित मोतीलाल जी का खून ख़ास रहा है. तुझमे या मुझमे पापा जैसे गुण नहीं है शंकर और अज्जू कुछ उनके जैसा था भी तोह सिर्फ बातचीत में. उस से बड़ा सनकी तोह तू भी नहीं है. अर्जुन हर बात पर गौर करता है और फिर उसके सवाल शुरू होते है जो वो यक़ीनन गाँव या किशन चाचा से पूछेगा. जवाब भी मिलेंगे और जब पता लगेगा की उस जगह से एक ख़ास नाम गायब है तोह वो यक़ीनन अखाड़े में उतरेगा. उबाल सामने वाले भी रहे होंगे क्योंकि बेचारे इतने बरस से म्हणत कर रहे है ये सोच कर की कब वो दिन आएगा जब उनकी झंडी पकड़ने सामने से कोई आये. वो लोग ये देखेंगे की इस बार उनके सामने ख़ास इंसान है तोह ये बात अखाड़े के बाद फिर नहीं उठेगी. बेचारो पर सरकारी और शाही डंडा भी चला है उस नाम के हटने की वजह से. पंचायत ग्रांट आधी भी नहीं मिलती और जो सहायता हो रही है वो पापा के कहने पर मैं देखता हु या कुमार महेंद्र. पापा शायद गुस्सा करे लेकिन जब वो अपने पिता का नाम वापिस वह पाएंगे तोह दर्द ख़तम हो जायेगा उनका और ये ुद्धघोष भी वह होना बंद. क्या बोलता है?", नरिंदर अभी भी सहमति ले रहा था क्योंकि शंकर की इजाजत जरुरी थी.

"पूछ क्या रहा है भाई? भिजवा फिर छोटे छोटे नग्मे अखाड़े के अर्जुन के कानो तक. लेकिन वह किसी अपने को जरूर मौजूद रखना पड़ेगा. कही उम्मीद से अलग काण्ड हुआ न तोह भीड़ का चेहरा नहीं होता और अपना एक हे लोंदा है. फिर थानेदार ने हम दोनों की तख्ती टांग देनी जो उसके साथ ऊंच नीच हो गयी."

"ये पापा के नाम पे तू अपने दिल की बात कर रहा है भोले भंडारी. और मेरा भी बीटा है वो तोह अपनी हिफाजत में रखूँगा. हाँ उसको पास्ट होने तक मौका जरूर दूंगा क्योंकि खून तोह अपना है और ये कमजोर नहीं."

"वैसे खून वाली बात से याद आया के दादा जी तोह पहलवान थे लेकिन पापा को तोह बस सभी शिकारी के नाम से बुलाते थे. वो ये कुश्ती जैसे खेल खेलने वाले लगते है तुझे?", शंकर झेंप गया था जब नरिंदर ने उसकी चोरी पकड़ ली थी बेटे की परवाह वाली. बात बदल कर मुद्दा अब पिता पर आ गया.

"यकीन तोह मुझे भी नहीं हुआ लेकिन उनका थप्पड़ इस गाल पे लगता था तोह सुनाई दूसरे से भी नहीं देता था. वो मारते भी नहीं थे हाथ से जहा तक मुमकिन होता. याद नहीं छोल चाचा बताते थे की एक मजनू के टिकाया था उन्होंने खुले हाथ का और बाद में गाल पर टाँके लगवाने भी खुद हे ले कर गए थे उसको. इस उम्र भी वो आशीर्वाद देने से कतराते है बचो को. हथोड़े जैसा हाथ और मेरे जितना कद. शिकार से ऐसा शरीर थोड़ी बनता है. हाँ दादा तगड़े दीखते थे इसलिए पापा को हमने काम हे आँका. चल अब अपने दादा जैसा अपना बीटा है तोह इसको हे देख के खुश हो लेंगे. मैं करता हु इंतजाम अर्जुन तक पहेलियाँ भिजवाने का और रेणुका इन्तजार कर रही होगी तोह उसको ले कर जाता हु घर. गज्जू के पास मिलते है फिर. भल्ला वाला मटर भी समझना है.", नरिंदर ने आधी सिग्रत्ते शंकर को देने के बाद ऐसे हे दरवाजा खोल दिया.

"अबे मैं सीनियर डॉक्टर हु और सबको दिखायेगा की यहाँ काश लगा रहा हु?"

"वार्निंग लिखी होती है हॉस्पिटल में तोह इसका मतलब ये नहीं हाथ पकड़ रखे है. तेरा केबिन, तेरी सिग्रत्ते तोह तू देख. शाम को मिलता हु.", हँसते हुए नरिंदर तोह निकल गया और उसकी बात पर मुस्कुराते हुए शंकर ने उस सिग्रत्ती को एक बार देखने के बाद होंठो से लगा कर केबिन फिर से बंद कर लिया. दोनों भाइयों ने बहोत चर्चा कर ली थी और कुछ फैंसले भी लेकिन होना न होना उनके हाथ नहीं था.

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"नमस्ते चाचा जी. नमस्ते फूफा जी. आप भी समय से आ गए थे लगता है छोटे दादा ji.?",Arjun को तोह दूर से हे वो ईमारत दिख गयी थी जिसकी भव्यता किसी प्रकार से सोमबीर सिंह या राममेहर वाली हवेली से काम न थी. निहाल ने भी उसको कुछ पहले हे रुकवा का बस उसकी मंज़िल दिखा दी थी और बाद में मिलने का बोल कर चला गया था. मोटरसाइकिल घर के बहार हे रोकने वाला था अर्जुन की उस से पहले एक सेवक ने लकड़ी और लोहे का वो एक मंज़िला दरवाजा खोल कर अंदर लाने की जगह दी. उसके शहर वाले घर जितना तोह सिर्फ यहाँ ये आँगन हे था वो भी पक्का भाग. बाकी दोनों तरफ साधारण sabji-phulo के बगीचे और कुछ घने वृक्ष. उलटे 'ु' के अकार में आँगन के तीन तरफ अनगिनत कमरे और वैसा हे भाग ऊपरी मंज़िल का. हवेली का प्लास्टर भी वैसा हे था जैसा अमूमन इतिहासिक इमारतों का रहता है. दाखिल होते हे उसने सबसे पहले विनोद चाचा और पप शर्मा से भेंट की और आवाज सुन्न कर कृष्णेश्वर जी भी गॉड में निकेतन को लिए एक कक्ष से बहार चले आये. अर्जुन के चेहरे के भाव देख उन्हें भी ाचा लगा.

"यार इतनी बढ़िया कार राखी है तुमने वो भी 2-2 और आये भी लम्बे सफर पर तोह पंजाबी गाडी पे. वैसे जचती है तुम्हारे ऊपर. माँ, नजर उतरो अर्जुन की.", विनोद ने उसको चारपाई पर बैठने से पहले हे अपनी माँ को आवाज दी. अर्जुन का बैग कृष्णेश्वर जी के इशारे भर से वो सांवला लेकिन मजबूत सा सेवक एक चारपाई पर रख कर वापिस द्वार पर जा बैठा. देवकी जी रसोईघर से एक पीतल की बड़ी थाली में दिया, पानी और मीठा लिए आयी जिनके पाँव छू कर अर्जुन ने आशीर्वाद लिया और उसकी नजर उतारी घूंगट ओढ़े कड़ी अनामिका चची ने.

"बीटा, देख रहे है की तुम्हे कुछ अलग सा लग रहा है अपनी हे मिटटी में आने पर. सफर की थकान है या कुछ और वजह?", कृष्णेश्वर जी ने हे तिलक करके उसको गुड़ खिलाया और चंडी की गिलसि से पानी देवकी ने.

"नहीं छोटे दादा जी ऐसी बात नहीं है और सफर तोह कुछ भी नहीं लगा. लेकिन मुझे नहीं पता था के ये घर इतना ज्यादा बड़ा होगा. यहाँ तोह शहर वाला परिवार भी रहने आ जाए तोह सबको एक एक कमरे देने के बाद भी कमरे बच सकते है. और 2 मंज़िल भी इतनी ऊँची जैसे 3 हो. वैसे इसको बरक़रार रखने का श्रेय तोह छोटी दादी जी को जाता है क्योंकि इतना बड़ा घर संभालना हरेक के बस की बात तोह नहीं.", अर्जुन अभी भी खड़ा तोह और ये देख कर कृष्णेश्वर जी उसको चारपाई पर बैठने लगे तोह विनोद ने कन्धा दबा कर उसको लकड़ी की एक शानदार लेकिन पुराणी कुर्सी पर बैठा दिया.

"आराम से बैठो और पहले शरीर को आराम दो बीटा. और ये हवेली बानी हे परिवार के लिए है. आगे चल कर समय आएगा जब तुम्हे अपने इस छोटे भाई के साथ मिल कर बरक़रार रखना होगा. वैसे ये सिर्फ इतनी हे बड़ी नहीं है जितनी दिख रही है. पिछले भाग दूसरी सड़क तक जाता है. कभी वह पर हम भाई बहिन अठखेलियां mauj-masti किया करते थे और अम्मा सबकी सुताई.", अनजाने हे कृष्णेश्वर जी के मुँह से बहिन निकल गया जो अर्जुन के मैं में बैठ गया लेकिन अभी उसने सवाल नहीं किया. लेकिन पिछली कई मुलाकातों के बाद पहली बार हुआ था के देवकी के चेहरे पर ख़ुशी आयी थी. अर्जुन ने आते हे उन्हें जो मान दिया था.

"फिर तोह मैंने देरी करदी आने में यहाँ दादा जी. और मुझे पूरी उम्मीद है मेरे इस नन्हे भाई पर जो इसको ाचे से संभालेगा. अब हम खेलेंगे यहाँ.. ूई.. मुझे जानता है न किट्टू?", अर्जुन निकेतन को दुलारते हुए हंसाने लगा तोह वो बचा भी उसके पास आ कर किलकारी मार कर ख़ुशी दिखने लगा. ये देख घूंगट में भी अनामिका के चेहरे पर बहुमूल्य हंसी आ गयी और अर्जुन के कहे हर शब्द ने बाकी सबको प्रभावित हे किया. पप शर्मा खामोश तबियत था लेकिन साथ बैठा वो भी शामिल रहा इनके साथ. अब एक लगभग 30 उम्र की महिला ओढ़नी घागरे में सधी चाल से इनके करीब आयी और बड़ी ट्रे को लकड़ी के मेज पर रखने के बाद वापिस चली गयी. सभी के लिए चाय, नमकीन, बिस्कुट और मीठा था. एक गिलास ठंडाई भी जो अर्जुन के लिए थी.

"तुम्हारा सामान मैं पापा वाले कमरे में हे रखवा देता हु अर्जुन. यहाँ अक्सर बिजली जाती रहती है और पापा को जनरेटर पसंद नहीं इसलिए 4 कमरों में बैटरी का कनेक्शन किया हुआ है. जीजा जी, दामिनी और आँचल एक कमरे में रुक जाएंगे आज और पापा माँ वाले में. बाकी तुम्हारे लिए तोह लगता है ये जनरेटर भी लगवा लेंगे.", विनोद ने ये बात अपने पिता को देखते हुए मस्ती में कही थी और वो हाथ के इशारे से उसको कह रहे थे के तू जो मर्जी कर.

"वैसे साइलेंट जनरेटर भी आता है चाचा जी लेकिन जब गाँव आया हु तोह इस सबसे दूर हे रहूँगा. सामान के नाम पर एक बैग हे है मेरे पास और इसको कही भी रखवा दीजिये. सोना तोह मुझे आँगन या छत पर हे है, खुली हवा और आसमन के निचे. न बिजली जाने का चक्कर और न गद्दे की वजह से पसीने का. जरूरते तोह जितनी मर्जी बढ़ा सकते है लेकिन सुकून का नियम बिलकुल अलग है. गलत तोह नहीं कह रहा न छोटे दादा जी?"

"बड़े भैया सही कहते है तुम्हारे बारे में बीटा. तुम न उनके जैसे हो न मेरे या किसी और जैसे. चलते भी हमारे पिता की तरह हो और बातें भी वैसी हे. उन्हें मैं सूचित कर देता हु की तुम सकुशल आ गए हो और जहा तुम्हारा दिल करे वह रहो. स्नानघर 3 है यहाँ और चाहो तोह नाहा कर तरावट ले लो. एक यहाँ बहार, दूसरा ऊपरी मंज़िल पर लेकिन उसको मैं साफ़ करवा देता हु और एक पिछले भाग में है. विनोद ने सेहरी हिसाब से बनवाया है वो वाला. कमरों में सिर्फ स्नान का प्रबंध जुड़ा है. अभी आराम करो थोड़ा और चाहो तोह फ़ोन पर बात करने मेरे साथ हे चलो. विनोद तुम्हे शाम को गाँव दिखने ले जाएगा. कल ये शहर निकल जाएगा तोह वापिस फिर बृहस्पतवार हे आने वाला है. 28 को. बहु, इसकी मर्जी से जहा ये कहे वह सामान रखवा दो और मीणा को बोल कर फिर से सफाई करवा देना.", कृष्णेश्वर जी के चरित्र और बातचीत से ये तोह साफ़ था के वो व्यक्ति कही भी ढीले नाड़े का नहीं लगता था और भाषा बिलकुल मर्यादित एवं पारिवारिक. अर्जुन को काफी मशक्कत करनी पड़ेगी ये वो जान चूका था दामिनी, देवकी और बाकी सभी को समझने पर. लेकिन आख़िरकार वो मंज़िल पर तोह पहुंच हे गया था जैसा उसके और पंडित जी के बीच तये हुआ था.
 
इतना हे कहूंगा की एक दिल यही चाहता है की सब सामान्य हो जाए. विश्वास, दम, स्वाभिमान की इस जुंग में खिलाडी हैं रामेश्वर जी और उनका चुना हुआ प्यादा जो राजा बन सकता है वो है अर्जुन. कौशल्या जी, इन्दर, शंकर और संजीव भी इस बात को नहीं जानते.
 
अब सही जवाब नहीं दूंगा. चर्चा कर सकते हैं
 
अपडेट 195 (बी)

पहला पन्ना

"तू भी बात कर ले, अर्जुन हे है लाइन पे.", फ़ोन उमेद सिंह की हवेली पर मिलाया था अर्जुन ने और अपनी दादी से ढेर साडी बातें करने के बाद वो फ़ोन रखने हे वाला था की खुद कौशल्या जी ने उसको रोक कर ऋतू को बुलवा लिया. वो वह आयी तोह कुछ सकुचा सी गयी अपनी दादी की बात पर. उन्होंने सिर्फ उसको हे बुलवाया वो भी अर्जुन से फ़ोन पर बात करने के लिए?

"मैं बाद में कर लुंगी न दादी. वैसे भी आज हे तोह गया है और क्या बात करुँगी मैं इस भोंदू से.?", अर्जुन लाइन के दूसरी तरफ ये आवाज सुन्न कर हे खुश हो रहा था और ऋतू द्वारा दिए गए हर नाम से उसको ख़ुशी हे मिलती थी.

"मैं क्या जानू के तुझे क्या बात करनी है? हाँ तू आराम से बात कर मैं जरा देखु पूर्णिमा कहा उलझी है.", कौशल्या जी ने जिस अंदाज में ये कहा था ऋतू का कलेजा हे मुँह को आ गया. फ़ोन का हैंडल पकड़ते हुए उसके हाथ हलके से कांपे जो उसकी दादी ने भी देखे पर वो मंद मंद मुस्कुराती हुई यहाँ से बहार चली गयी.

"ही.. हल्लूओ.", ऋतू ने जिस तरह से कहा था अर्जुन ने अदृश्य चुम्बन कर दिया उस आवाज पर.

"क्या कर रही हो? और भोंदू बुला रही थी मुझे?", अर्जुन ने थोड़ी गंभीर आवाज में बोलै.

"हो नहीं क्या तुम? वैसे तैयार हे हुई हु अभी और यहाँ बहोत सारे लोग आये है. हवेली से भी सभी लोग है और कुछ गाँव के भी. तुम मोटरसाइकिल क्यों ले कर गए?", ऋतू बात करते हुए इधर उधर भी देख रही थी जैसे कोई उसको देख न रहा हो.

"वही गुलाबी ड्रेस पहनी है न जो मैंने दी थी? तुम उसमे सचमुच प्यारी लगती हो. और इधर मेरे पास भी तुम्हारी तरह और कोई नहीं है.", अर्जुन ने सिर्फ अपनी कही थी और सवाल का जवाब दिए बिना. ऋतू दूसरी तरफ ठीक उसी परिधान में थी जैसा अर्जुन ने कहा था. उसकी बात सुन्न कर गालो पर अलग हे गुलाबीपन उभर आया ऋतू के. एक बार फिर दरवाजे की तरफ किसी के न होने की पुष्टि करते हुए उसने धीमे से होंठो से आवाज की जगह चुम्बन किया.

"मुझे देखने के सिवा कोई और काम भी कर लिया करो. यहाँ सभी है अर्जुन और तुम कल दिन में फ़ोन करना प्रीती के घर वाले नंबर पर. उधर पीसीओ है कोई?", अर्जुन ये सुन्न कर मुस्कुराने लगा की ऋतू को घबराहट होती है ऐसे प्रेमिका की तरह बात करने में.

"तुम्हे मोटरसाइकिल क्यों चाहिए tha?",Arjun ने दूसरी बात हे कर दी.

"वो बबिता दीदी पूछ रही थी तुम्हारे बारे में. उनसे बात करवौ क्या?", ऋतू ने गलियारे से आती बबिता को देख कर कहा लेकिन फिर बबिता किसी की आवाज से पलट कर वापिस चली गयी तोह ऋतू ने ठंडी सी आह भरी.

"मतलब वो चली गयी? हाँ तोह प्रीती के घर रह कर पढ़ने वाली हो?"

"हँ. अब रखती हु और ये दादी कैसे बात कर रही थी?", ऋतू ने जीकर किया तोह अर्जुन को भी ठसका लगा याद करते हे.

"उनका वही जाने और माँ का ख़याल रखना. कल दोपहर में बात करते है प्रीती के घर."

"थोड़ी देर सो जाना ारु और माँ घर जाने के बाद बात कर लेंगी.", ऋतू ने आगे कोई जवाब सुने बिना लाइन काट दी. अर्जुन भी उठ कर वापिस बहार चला आया जहा अनामिका चची ने उसके लिए टोलिया निकाल रखा था. अब उनका घूंगट चेहरे तक नहीं था, सिर्फ सर ढाका था.

"मतलब आँगन में चेहरा ढकना पड़ता है आपको? और चाचा कहा गए?", अर्जुन ने देखा की कृष्णेश्वर जी एक तरफ उस आम के वृक्ष की छाव में किसी ख़ास व्यक्ति के साथ बैठे हुक्का गुदगुदा रहे थे और देवकी जी विपरीत दिशा में बने बाड़े में अपनी देखरेख में मीणा से पशुओ को चारा खिलवा रही थी. वो दरवाजे पर रहने वाला व्यक्ति इधर नहीं था. अनामिका चची का सरल और खूबसूरत चेहरा अर्जुन की बात पर दमक उठा.

"नजर उतारते समय मेरी नजर भी लग सकती है. बहार की हु न इसलिए चेहरा ढाका हुआ था.", कितनी सरलता से उन्होंने ऐसा कह दिया की वो इस घर को वंश देने के बावजूद बहार की है. अर्जुन की पेशानी पर लकीरे उभर आयी ये सुन्न कर.

"आइंदा ऐसा मत कहना चची की आप बहार की हो. इस घर की असली लक्ष्मी हो आप जिसकी वजह से ये घर एक परिवार है, खंडहर नहीं. आप भी जानती है की हमारा अनकहा रिश्ता देवर भाभी जैसा है और जिस दिन आपका लगन हुआ उसी दिन आप परिवार का चेहरा बन गयी थी. अब निकेतन भी बहार का होगा फिर इस हिसाब से?", अर्जुन के ऐसे तुनकने पर अनामिका की हंसी छूट गयी और वो हंसी देख अर्जुन बस उनके चेहरे में हे खो गया. इसका भान होते हे अनामिका ने टोलिया खिंच कर उसको होश दिलाया.

"नाहा लो जा कर और तुम सचमुच बहोत हे भोले हो जो मजाक नहीं समझते. घूंगट के लिए तोह बड़ी माँ (कौशल्या जी) ने वही पर माँ जी को समझा दिया था. लेकिन शगुन के समय तोह इतना कर हे सकते है. इधर वाले कमरे में तुम्हारा सामान रखवा दिया है और नहाने के बाद खाना जब कहो लगा दूंगी. अब जाओ, मेरे चेहरे पर कुछ नहीं लगा जो देखे जा रहे हो.", अनामिका सचमुच जीना सीख गयी थी पंडित जी के संसार में रहने के बाद. अर्जुन भी उनके द्वारा धकेले जाने पर हँसता हुआ सा पिछले हिस्से की और चल दिया. अनामिका को जैसे हे कुछ याद आया तोह वो अर्जुन को टोकने हे वाली थी लेकिन इधर वो जा चूका था और उधर देवकी ने आवाज लगा दी.

"बहु, तेरे पिता जी के लिए चाय रख दे. दामिनी ने सब्जी काट दी होगी, वो भी चढ़ा दियो.", और अनामिका के दिमाग से अर्जुन एक पल में हे निकल गया जिसको वो कुछ कहने वाली थी. अपनी सास को जी माँ जी कहती हुई वो उस बड़े से रसोईघर में घुस गयी जहा पात पर बैठ के दामिनी करेलो पर चीरा लगा रही थी. एक तरफ तजा कटी लोकि राखी थी और उसके बराबर पानी में काट कर भिगोये आलू. अनामिका दक्षता से चूल्हे के दोनों तरफ बर्तन रखती हुई काम में जुट गयी. उधर अर्जुन उस लम्बे गलियारे में गुनगुनाता हुआ जा रहा था और उस से निकल कर वो पिछले हिस्से में आया तोह जैसे उस दृश्य में खो हे गया. सचमुच छोटा सा hara-bhara जंगल हे था वो और उनसे आगे भी कुछ ईमारत बानी हुई थी जो थोड़ी बहोत दिखती थी इन वृक्षों की वजह से. फर्श पर कदम स्थिर थे और फिर उसको स्नानघर का ध्यान आया तोह अगल बगल में दोनों तरफ हे कमरे जैसे बने थे लेकिन एक में सूखा चारा भरा था और दूसरे का किवाड़ लगा था.

'यही बाथरूम होगा.', और वो दायी तरफ बढ़ता हुआ दरवाजे तक आया और बेफिक्री से उसको ठेलता हुआ अंदर आने से पहले हे टीशर्ट उतार कर हाथ में ले चूका था. लेकिन यही अनहोनी हो गयी जिसके लिए शायद अनामिका उसको टोकना छह रही थी.

पानी की फिसलती हुई लकीरे उस tamra(Bronze) जिस्म से फर्श पर जा रही थी. भीगे हुए कमर से कुछ ऊपर तक आते केश जिस्म की हरकत से इधर उधर हिल रहे थे. सुडोल कूल्हों को ढके वो गीला एकमात्र वस्त्र बुरी तरह चिपक कर कूल्हों की दरार तक दिखा रहा था. झुकने की वजह से वो बड़े नारंगी से थोड़ा बड़ा एक हे सतांन दिख रहा था जिसका कठै चूचक शायद पानी की वजह से उभर कर काबुली चने से कुछ छोटा हे था. बाथरूम में अचानक हुई इस बाहरी रौशनी से वो जिस्म भी हरकत में आता हुआ पलटा तोह अर्जुन की तरह बस अपनी जगह पट्ठा सा रह गया. दोनों की नजरे बस एक दूसरे से एक क्षण के लिए हे टकराई थी और अर्जुन तुरंत सॉरी बोलता हुआ बहार के लिए मदद गया. आँचल के पास तोह अपना जिस्म ढकने के लिए कोई आँचल तक करीब न था. उसके वस्त्र भी दरवाजे के पीछे टंगे थे और अब अर्जुन उसके जिस्म को देख कर जा भी चूका था.

'नाना जी को बोलै भी था की ये दरवाजा फंसता है और कड़ी मुश्किल से लगती है. अर्जुन क्या सोच रहा होगा मुझे ऐसे देख कर? कही गलत न सोच बैठे की मैं जानबूझ कर दरवाजे की कुण्डी लगाए नाहा रही थी! ऊपर से वो सबकुछ देख भी गया.', आँचल गीले बदन को जल्दी जल्दी में साफ़ करती हुई जैसे तैसे कपडे पहन रही थी. अब उसको अर्जुन का सामना करने का डर अलग सत्ता रहा था. वही अर्जुन इस घटना को भुलाने की नाकाम कोशिश करता उस तरफ चल दिया जहा बेतरतीब बगीचे और जगह जगह सूखे पत्ते जमीन पर बिछे थे. उसके चलने से पत्तो का चरमराने के अलग हे शोर हो रहा था लेकिन उस ज्यादा हलचल उसके dilo-dimaag में थी. अभी तक वो आँचल से ज्यादा मिला हे कहा था और एकांत में सामना हुआ भी तोह जगह स्नानघर और दोनों लोग ऊपर से निर्वस्त्र. दरवाजे से निकल कर बहार आती आँचल की पायल की आवाज से इस बार दोनों की नजरे खुले में मिली जहा अर्जुन मूक माफ़ी मांग रहा था और वैसा हे हाल घबराई हुई आँचल का था.

"अनजाने में हो गया. कोई आवाज भी नहीं आ रही थी और आपका दरवाजा भी अंदर से लगा हुआ नहीं था. सॉरी."

"सॉरी मुझे कहना चाहिए और दरवाजे में प्रॉब्लम है. वो फंसता है और कड़ी नहीं लगती सही से. गलत मत समझना.", आँचल ने अभी भी कमीज के ऊपर से टोलिया सीने पर डाला हुआ था और उसकी बात सुन्न ने के बाद जैसे हे अर्जुन का ध्यान उधर गया तोह इस बार आँचल के चेहरे पर शर्म कही ज्यादा हे बढ़ गयी. नजरे फिर से एक हुई तोह वो एक पल भी वह ठहर न सकीय लेकिन उसका भागने से पहले शर्माना और मुस्कुराना बहोत कुछ कह गया.

'पंडित जी ये आपने कहा फंसा दिया? मैं काण्ड करना नहीं चाहता लेकिन अब होते भी कहा मेरी मर्जी से है. कोशिश करूँगा जितना बच सकू उतना बच्चू.', अर्जुन अपने आप को समझाता हुआ एक बार फिर से बाथरूम में दाखिल हो चूका था. टीशर्ट टांगते हुए उसकी नजर काली ब्रा पर पड़ी तोह फिर से मैं अशांत होने लगा. जल्दबाजी में आँचल जैसे अपनी उतारी हुई ब्रा भूल गयी थी. अर्जुन ने तुरंत नजर हटा कर दरवाजे पर ध्यान दिया. पानी लगने की वजह से वो निचली तरफ से फूल गया था थोड़ा और पूरी तरह बंद करने पर काफी जोर लगता था जो शायद हे महिलाओं के बस की बात नहीं थी और बंद होने पे खोलने में ज्यादा मशक्कत.

'साला ये हे गड़बड़ की वजह है और सबसे पहले इसको हे सुधरता हु.', अर्जुन उसी हालत में चारा रखने वाले कमरे के बहार पड़ी लकड़ी की पति तक आया और उसको खोल कर औजारों को टटोलने लगा. इस तरह का बक्सा उसके दादा जी के भी पास था लेकिन इसमें ज्यादा औजार थे वह वाले से. बगीचे के साथ खेती बाड़ी और गाये भैंसो की वजह से. हथोड़ी और चौकसी मिलते हे वो वापिस अपनी जगह चला आया.

'अब देखता हु के ये कैसे आराम से बंद नहीं होता.', अर्जुन ने चौकसी का पैना भाग दरवाजे के अधिक उभरे हिस्से पर रख कर हथोड़ी के वार से उसको हल्का हल्का छीलना शुरू किया था thak-thak की आवाज होना लाजमी था. लेकिन ज्यादा म्हणत नहीं लगी थोड़े से भाग को समतल ek-samaan करने में. छिली हुई लकड़ी को बटोर कर वो बगीचे की तरफ फेंक कर वापिस आया तोह अब ब्रा फर्श पर गिरी हुई थी.

'हाथ लगाए बिना तोह ये भी नहीं उठने वाली.', अर्जुन अपनी किस्मत को कोस्टा हुआ उस ब्रा को अभी उठा कर सीधा हे हुआ था की अनामिका चची से टकरा गया. अब वो यहाँ क्यों आयी थी.? शायद शोर सुन्न कर.

"ये.. ये मेरी है.. यही लेने आयी थी. सोचा तुम नाहा चुके होंगे अब तक. तुम क्यों इसको..", वो तोह बेचारी खुद घिघिया रही थी और अर्जुन पसीने में tar-batar खड़ा हुआ उनके जिस्म को अपने साथ लगभग टकराने पर अलग सदमे में था. चची ने हिम्मत करके ब्रा के निचे लटकते हिस्से को पकड़ा तोह उनकी नजर अर्जुन से एक बार फिर मिली. अर्जुन तोह भूल हे गया था के उसने ब्रा को कास कर पकड़ा हुआ है और ये आँचल की नहीं चची की ब्रा है.

"वो.. वो शायद ये आँचल यही भूल गयी चची और मैं तोह दरवाजा हे ठीक कर रहा था जिस से ये हिलने की वजह से निचे गिर गयी. मेरे थोड़ी न किसी काम की है ये.", अर्जुन की दशा देख कर न चाहते हुए भी अनामिका चची के चेहरे पर हंसी आ गयी. उन्होंने झटका दिया तोह अर्जुन ने भी ब्रा छोड़ दी.

"सचमुच बड़ी माँ तुम्हे सही बुलाती है बैलबुद्धि. मैं कह रही हु न के ये मेरी है जो मैं भूल गयी थी. और तुम इसका क्या कर रहे थे ये मुझे कैसे पता होगा. नाहा लो अब अगर थोड़ी अपनी हालत पता है तोह.", अनामिका चची की बात सुन्न कर अर्जुन ने खुदको देखा तोह हाथो पर मिटटी, जिस्म पर पसीना और जीन्स में वो तगड़ा उभार. अर्जुन की नजरो के साथ चची की भी नजर उभर पर गयी तोह वो पलट कर सीधा गलियारे में निकल ली. अर्जुन सर खुजाता हुआ दरवाजा बंद करके फुहारे के हे निचे खड़ा हो गया.

"झंड.. अब दिमाग कहा से काम करेगा जब पहले हे इतना कुछ जल्दी जल्दी हो गया. जीन्स भी भीग गयी..", अर्जुन ने जल्दी से अपनी जीन्स उतार कर उसको जांचा तोह वो गीली हो चुकी थी. जैसे तैसे नहाने के बाद वो कमर पर टोलिया बाँध कर बहार निकला तोह सीने पर पुराणी टीशर्ट हे पहन न बेहतर समझा. सकुचाते हुए वो उस कमरे तक आया जो चची ने बताया था और खुशकिस्मती से इस बीच किसी से भी टकराव न हुआ. कपडे बदल कर अपने बाल और चेहरा ठीक करने के बाद अर्जुन सीढ़ियां चढ़ता हुआ दूसरी मंज़िल पर चला आया. गीला टोलिया और अपनी धोयी हुई जीन्स को तार पर डालने के बाद कुछ देर वो यही से बहार का नजारा लेता रहा. हवेली की इस मंज़िल से हे लगभग आधा गाँव दिख रहा था. दूर दूर तक घर बेस थे और कही कही log-baag भी चलते नजर आते.

"ये वाला कमरा शंकर भैया का है अर्जुन. और उधर ठीक सामने वाला राजू भैया का. पहले मधु जब आती थी तोह वो इस वाले में रूकती थी लेकिन अब तोह वो लोग आते भी है तोह ऊपर नहीं आते. मैं भी जब यहाँ आयी होती हु तोह कुछ समय इधर बैठ कर गाँव देखती रहती हु. शाम को तोह और भी ाचा लगता है. वैसे छत से तोह पूरा हे गाँव दिखाई पड़ता है दूर खेत भी और दरगाह भी.", ये दामिनी थी जो शायद रसोई का काम करने के बाद यही ऊपर वाले बाथरूम से नाहा कर इधर आयी थी. तार पर कपडे उसने भी सुखाये थे जिनकी तरफ अर्जुन ने ध्यान नहीं दिया. लेकिन दामिनी के भरे हुए जिस्म को जरूर एक भरपूर नजर दी थी.

"हाँ बुआ कह तोह आप सही रही हो. बड़ा खूबसूरत गाँव है और बहोत बड़ा भी. कैसे हर धार्मिक स्थान एक दूसरे के साथ जुड़े हुए है. वैसे बुआ आप तोह अक्सर आती जाती होंगी न यहाँ और सब जगह देखि भी होंगी आपने?", अर्जुन वही छाया में राखी निवार वाली कुर्सी पर बैठ गया और दामिनी भी तोलिये से बाल सुलझती हुई उसके सामने वाली कुर्सी पर. इस दौरान gulabi-safed सूती कमीज में क़ैद वो बड़े बड़े उभर थिरकते हुए अपना अकार bhali-bhaanti दिखा रहे थे लेकिन अर्जुन उनसे बचता हुआ दूर स्थित एक ऊँची ईमारत पर फहराती पताका देखने लगा.

"हाँ मेरा घर दूर हे कितना है यहाँ से? मुश्किल से आधा घंटा लगता होगा और अब तोह माधुरी भी उधर हे आ गयी है तोह तुम चाहो तोह मेरे साथ चल सकते हो. Shaniwar-eitwar को मैं आँचल के साथ यहाँ आ जाती हु. पापा और माँ को भी ाचा लगता है जब घर में कुछ लोग रहते है नहीं तोह पीछे से यहाँ इतने बड़े वीराने में होते हे कितने लोग है. पापा gaanv-dehat और खेत में समय बिताते है तोह माँ घर या aas-pados में. अनामिका भी मेहनती है लेकिन वो बेचारी ज्यादा बोलती नहीं. और मैं तोह इस गाँव क्या आसपास की सभी जगह पर अनिगिनत घूमी हु. बचपन से खेतो पर पापा का खाना लेके जाती रही हु और इतना रसूख तोह है की बेफिक्र घूम सकू. कल सुबह तुम्हे लेके चलूंगी खेत और बगीचे दिखने. शाम को कुछ दिखेगा नहीं और दोपहर में गर्मी से भगवन हे बचाये. वैसे तुम पहले यहाँ क्यों नहीं आये?", अर्जुन कितना संयम वाला था ये इस बात से साफ़ पता चलता था की वो उस दामिनी के सामने ख़ुशी से बैठा हुआ था जिसने उसकी माँ को क्षत पहुंचे थी. उसकी हर बात सुन्न कर वो मुस्कुराता या हामी भरता.

"सुबह का मतलब 5-6 बजे बुआ? यहाँ तोह दिन भी जल्दी निकल जाता होगा."

"इतनी भी जल्दी नहीं बाबा. 5 बजे तोह सिर्फ पापा हे उठते है या मीणा और भले सिंह. मीणा गाये दुहती है न और भले सिंह बहार अंदर के सभी काम करने के साथ साथ पापा के साथ हे रहता है. हम 7 बजे तक चलेंगे और आराम से घूम फिर के 2-3 घंटे में लौट आएंगे. तुम्हे गाँव वाले बहोत पसंद करेंगे जब जानेंगे की तुम कौन हो. बड़े बुजुर्ग आराम से पहचान लेंगे क्योंकि तुम हो हे ख़ास."

"ख़ास तोह सभी है बुआ. आप भी तोह हो. और आपने नौकरी क्यों छोड़ दी?", नौकरी वाली बात सुन्न कर दामिनी को हैरानी हुई. और खुद को ख़ास सुन्न कर ख़ुशी भी.

"तुम्हे कैसा पता के मैं नुकरि करती थी?"

"क्यों आप क्या परिवार में नहीं हो? आप टीचर थी न? इतना बढ़िया पेशा छोड़ना नहीं चाहिए था बुआ.", अर्जुन के जवाब से दामिनी दमक उठी.

"सही कहते हो तुम और समझदार भी बहोत हो. पहले तोह यही गाँव के स्कूल में पद्धति थी मैं फिर शहर में कुछ समय सरकारी स्कूल में और उसके बाद B.Ed. पूरी करके कॉलेज में भी 2 साल. आँचल बड़ी होने लगी तोह उसका ध्यान रखना भी जरुरी हो गया और तुम्हारे फूफा ने भी काम बढ़ा लिया तोह क़ुरबानी मुझे हे देनी पड़ी. हाहाहा.. अपनी मर्जी से बंद किया था पढ़ना मैंने लेकिन घर ज्यादा जरुरी है मेरी नौकरी से.", दामिनी ने बाल सूखा लिए थे और अब वो उन्हें जुड़े की तरह बांधने लगी तोह अर्जुन की नजर उन कही ज्यादा उभर आये खरबूजों पर कुछ पल के लिए रुकी रह गयी. दामिनी ने ये देख कर भी अनदेखा किया जैसे उसको इसमें अलग हे मजा मिल रहा हो.

"हाँ ये भी सही कहा आपने. तोह यहाँ आने के बाद आप अब घर में हे रहती है आसपास aana-jana होता है आपका? आँचल दीदी तोह लगता है अपने में हे रहती है. उन्हें मैंने शादी में भी ज्यादा घुलते मिलते नहीं देखा."

"वो ऐसी हे है बिलकुल बोरिंग. समझा समझा के थक गयी मैं उसको लेकिन वो बस किताबो और अपने में हे रहती है. यहाँ आने पर भी ज्यादा से ज्यादा वो अपने नाना या फिर अनामिका से बातचीत करती है. शुरू से हे अंतर्मुखी है पर कोमल और पिंकी के साथ तोह उसकी ाची जमती है. मैं उसके जैसी नहीं हु. यहाँ गाँव में हे मेरी दर्जनों सहेलियां है और इधर आती हु तोह दिन में घर पे तोह खाना होता हे नहीं मेरा. वैसे तुमने जवाब नहीं दिया के तुम यहाँ पहले क्यों नहीं आये?", दामिनी ने कुछ ऐसा किया जिस से अर्जुन का कंठ सूख गया. जुड़ा बनाने के बाद उसने कमीज के ऊपर से हे पहले तोह दोनों उभारो से ब्रा को सही किया और फिर एक हाथ गले में दाल कर ब्रा की तानी खींची. कुछ समय के लिए तोह दया उभर कुछ कुछ बहार हे निकल आया था.

"मैं उधर भी कितना हे घर में रहा था बुआ जो यहाँ आता? 8 साल से थोड़ा ज्यादा हे बोर्डिंग में और फिर बोर्ड की क्लास थी. बचपन में शायद ज्यादा ज़िद्दी और जल्दी जल्दी बीमार पड़ने की वजह से मुझे इधर नहीं लाये होंगे. अब देखो मैं फ्री हुआ तोह अकेला हे भाग आया और वो भी जब तक छुट्टियां रहेंगी तब तक के लिए. इसका मतलब ये भी है की काम से काम 4 शनिवार तोह आपसे मिलना होगा.", अर्जुन यहाँ से उठना चाहता था क्योंकि दामिनी का दोहरा रूप उसको परेशां कर रहा था. चेहरा स्वाभिक और अनजान बन्न कर जिस्म से लुभाना अलग. परन्तु बात करना भी जौरी था जिस से वो उसके करीब हो सके.

"ज्यादा भी हो सकता है अगर तुम शहर मुझसे मिलने आओ. बुआ के घर आने की मनाही तोह नहीं है न?", जानबूझ कर इस बार दामिनी ने टोलिया निचे गिराया और फिर झुक कर उसको उठाने का अभिनय करती हुई वो अर्जुन को अपने विशाल चुके और उनकी गहराई का जलवा परोसने लगी. अब अर्जुन ने ठान हे लिया की वो ऐसे खेलना चाहती है तोह यही ठीक. अपनी टाँगे फैलते हुए अर्जुन ने भी लम्बी टीशर्ट को जीन्स के उभार पर से उठा कर चेहरा साफ़ करते हुए ऐसा दर्शया की उसको पसीना आया हो लेकिन तरकीब कारगर रही जब दामिनी की आँखों ने उसके पत् तक जाता वो गोलाकार उभर देखा. एक बिलांत भी काम हे पड़ता उसके नाजुक हाथ का इस मूसल उभर को मापने में.

"मन कौन करेगा बुआ और मैं तोह जब इधर तक आ गया तोह आपका घर भी ाचे से देख कर वापिस जाऊंगा. दीदी से मिलने तोह जाना हे है हफ्ते दस दिन में और दिन वह गुजार कर शाम आपके घर. वैसे आपको भी गर्मी लग रही है क्या? मुझे तोह लग रही है और इधर की तरफ हवा भी नहीं चल रही. निचे हे चलते है. फिर खाना खाने के बाद कुछ देर सो कर टाइम ख़राब करता हु.", अर्जुन ने लगातार दूसरा वार किया जब वो अंगड़ाई लेता हुआ खड़ा हुआ और उसका उभर दामिनी के चेहरे के सामने आया. दामिनी ने तुरंत नजरे उठा कर झूटी गर्मी का इजहार करते हुए तोलिये से चेहरा साफ़ किया और अब उसकी नजरे अर्जुन की अध्भुत भुजाओं और सीने पर थी जो अंगड़ाई की मुद्रा में बखूबी सामने थे.

"गर्मी है भी इधर और दोपहर है न तोह चाहे 3 बार नाहा लू, आराम बस एक या कूलर के सामने हे आएगा. वैसे तुमने बॉडी ाची बनाई है और मैंने देखा था की उधर वाले घर में तुमने छोटी सी गयम भी बना राखी है.", दामिनी कड़ी होती हुई अर्जुन से आगे चलने का दिखावा करने के बहाने उसकी बाजू से अपना उभर रगड़ कर जिस्म की नरमी दर्शा दी. अर्जुन पीठ पीछे मुस्कुराने लगा था ये तेवर देख कर. दामिनी सीढिया उतरने के बहाने पृष्ठ भाग भी नाचती हुई तेज कदमो से गयी जैसे उसको अर्जुन एक नौसिखिया और कामकला का अनादि दिखाई दिया हो. वो कहा जानती थी की उसने इस अर्जुन नामक ग्रन्थ का पहला पन्ना तक सही से नहीं पढ़ा. और खेल दामिनी का नहीं अर्जुन का था जिसमे दामिनी khud-ba-khud फंसने लगी थी.

"आ गया बीटा. चल तू भी आँचल के साथ बैठ जा और गरमा गरम खाने का स्वाद ले. तेरा चाचा और फूफा पता नहीं कहा निकल गए. दादा जी तोह खेत निकल गए और सांझ से पहले उनका लौटना नहीं होगा.", देवकी जी ने आँगन में हे अर्जुन को पुकार लिया था और कूलर की ठंडी हवा के सामने राखी चारपाई पर बैठा कर खुद उसके लिए खाना लगाने चली गयी. आँचल बहोत धीमे धीमे खा रही थी जो अर्जुन को करीब देख कुछ ज्यादा हे धीमा हो गया.

"परेशां मैट होइए दीदी. आप ऐसे फील करवाएंगी तोह अनिगिनत बार मैं खुदको दोष देता रहूँगा. किसी की भी गलती नहीं थी और मैंने दरवाजा भी ठीक कर दिया.", अभी वो दरवाजा हे बोलै था की थाली और लस्सी का गिलास लिए उसकी छोटी दादी वापिस आ गयी. अर्जुन के सामने खाना और मेज पर वो लस्सी का बड़ा गिलास रख कर वो भी उनके करीब हे कुर्सी पर बैठ गयी.

"तोह वह का दरवाजा तुमने ठीक किया है? थोड़ी khat-pat तोह सुनी थी लेकिन मुझे लगा वैसे हे शोर होगा किसी चीज का. लेकिन क्या जरुरत थी बीटा खुदसे ये सब करने की? तुम्हे खरोच भी आयी तोह बड़ी जीजी ने मेरी हालत ख़राब कर देनी है.", देवकी के सहज व्यवहार से अर्जुन भी खुश था.

"दादी जी ये छोटे मोठे काम तोह करने हे चाहिए घर पे. और आप दादी जी की तरफ से फीका न कीजिये, वो तोह मुझे क्यारी में कस्सी तक चलवा देती है. एक बार दादा जी ने गटर में हे उतार दिया था जब पिछली बारिश में रोड भर गयी थी. स्कूल में ये सब सिखाते थे और वक़्त be-waqt जरुरत पड़ हे जाती है. दीदी से दरवाजा नहीं लग रहा था और इन्हे परेशानी हो तोह भाई होने के नाते मुझे मदद करनी चाहिए न?", अर्जुन ने जब बात को इस तरफ घुमाया तोह आँचल नजरे झुकाती शर्म से मुस्कुराने लगी थी.

"हाँ तोह ये बहुत ाचा किया बीटा तुमने. काम की आदत तोह होनी चाइये लेकिन संसाधन हो तोह उनका भी प्रयोग कर लेना गलत नहीं. आँचल की परेशानी दूर की तोह फिर मैं कुछ न कहूँगी. बीटा, मुझे पता नहीं के तुझे क्या पसंद है खाने में इसलिए लस्सी जीरे नमक वाली है. मीठी चाहिए तोह बदल देती हु."

"नहीं नहीं दादी मुझे मीठा काम हे पसनद है. और खाना तोह जो भी हो बस घर में पका है और शाकाहारी है तोह मुझे पसंद हे आएगा. वैसे दीदी देखो कितना काम खाती है. मेरी ये तीसरी रोटी है और ये पहली को हे कुतर कुतर का खा रही है.", दामिनी ने तजा रोटी अर्जुन को परोसी तोह इस समय उसके सीने पर दुपट्टा आ चूका था. मतलब वो सबके सामने कुछ ज्यादा हे शरीफ थी. आँचल अपना नाम सुन्न कर फिर से झेंप गयी लेकिन इस बार वो भी बोली.

"मुझे चोरी खानी थी लेकिन नानी ने मन कर दिया. और रोटी का साइज देखो जरा, तवे जितना बड़ा है.", आँचल ने अपनी नानी की शिकायत की तोह देवकी मुँह पर हाथ रख कर उसको हैरानी से देखने लगी.

"मैंने चोरी के लिए मन किया था? एक कटोरी शक्कर डलवाती है तू बीटा जो गलत है लड़की के लिए. गलत तोह खैर सबके लिए हे है पर ये तोह सरासर गलत आदत. 2 रोटी में एक कटोरी शक्कर. तुझे मीठी चोरी नहीं मिलेगी मतलब नहीं मिलेगी. रोटी नहीं खाई जा रही तोह मैं तेरे लिए चावल बनवा दूंगी शाम को और भी नमकीन. गुड़ वाले नहीं.", अब अर्जुन को पता चला की आँचल मीठे की ज्यादा शौक़ीन है जो उसके स्वाद से बिलकुल विप्र्ति गुण था.

"हाहाहा.. दीदी आप पिछले जनम में चींटी थी क्या? शक्कर तोह वही कहती है इतनी.", अब देवकी भी हंसी और अर्जुन को रोटी देने आयी दामिनी भी लेकिन इस बार अर्जुन ने रोटी लेने से मन कर दिया. उधर आँचल ने मुँह बना लिया था अर्जुन की बात सुन्न कर.

"ये क्या अर्जुन सिर्फ 3 रोटी? तुम्हारी उम्र में इन्दर भैया तोह 10 से काम नहीं खाते थे."

"बुआ, अनाज मतलब सिर्फ शरीर की जरुरत. ये जितनी मर्जी बढ़ा लो लेकिन ज्यादा से नुक्सान हे होगा. अब लस्सी भी है मेरे पास और फिर शाम को मैं दूध भी पीटा हु लड्डू के साथ. रात में फिर खाना है जबकि काम ये शरीर उतना करता हे नहीं. जब वर्जिश करता हु तोह ज्यादा खुराक लेता हु लेकिन तब भी भिगोये चने, कुछ बादाम, मौसमी फल लेकिन अनाज काम से काम.", अर्जुन ने लस्सी का गिलास उठा कर तगड़ा घूँट भरा और दामिनी उसकी बात सुन्न कर तौबा करती हुई वापिस रसोई में चली गयी.

"बीटा मांसाहार तोह नहीं करते तुम? देखो तुम्हारे pita-chacha करते है ये मैं जानती हु. लेकिन घर पे नहीं बनता और गाँव में दूकान भी नहीं है.", देवकी ने जब ये बात कही तोह आँचल भी जान न चाहती थी की अर्जुन क्या जवाब देता है.

"दादी, मांस खाने से मांस नहीं बढ़ता और मैं जीव हत्या के खिलाफ हु. बाकी खाना एक ऐसी जरुरत है जो सबकी निजी है. जिसको जो पसंद वो खाये लेकिन मैं पसंद नहीं करता.", आँचल ने पहली बार उसको प्रशंशा भरी नजरो से देखा था और इस बार दोनों ने बिना शर्माए एक दूसरे को मुस्कुरा कर देखा.

"भली बात है बीटा और विचार भी उत्तम. लेकिन अगर तुम खाते तोह तुम्हे खेत जाना पड़ता या दिलबाग के घर से बन कर आता जो तुम्हे अलग बर्तन में खाना पड़ता. विनोद और उसके जीजा भी शौक़ीन है लेकिन तुम्हारे दादा और उनके पिता भी इस सबसे सदा दूर रहे. दूध बता देना कैसा पीते हो. बादाम मैं अभी भीगने रखवा देती हु और सुबह का नियम बड़ी जीजी मुझे बता चुकी है तोह वो यहाँ भी रहेगा.", देवकी उठ कर भोजन करने चल दी. वो रसोईघर के फर्श पर हे खाना खाती थी चटाई बिछा कर.

"मैं कभी बहार घूमने नहीं गयी सिवाए मंदिर के.", आँचल ने धीमी आवाज में ये कहा था और अर्जुन से.

"आप तोह अक्सर आती रहती है न यहाँ? और आप उधर भी अपने में हे रहती थी."

"कोई पूछता भी कहा है और वह तोह मुझे कुछ पता हे नहीं था. कोमल के साथ मार्किट गयी थी और ाचा भी लगा था लेकिन यहाँ किसके साथ जाऊ? माँ तोह जहा जाती है वही जम्म जाती है. मां के साथ तोह जाने का कोई सवाल हे नहीं और यहाँ आने के बाद पापा तोह रहते हे उनके साथ है. नानी माँ से अलग नहीं और मामी तोह हवेली से बहार जाती हे कहा है? जाने कैसे वो तुम्हारी तरफ चली गयी या उन्हें ले गए. दरगाह तोह देखि थी लेकिन तब 20 लोग थे साथ. मुझे फालूदा भी बहोत पसंद है लेकिन अगर खाने की बात करो तोह पैक करवा के घर मंगवा लेंगे. वो किसको ाचा लगता है. हमारी तरफ पापा ले जाते है मुझे या कॉलेज से मेरी सहेली के साथ मैं चली जाती हु महीने में एक या दो बार. अब इधर तुम हो और तुमने भी गाँव देखना है जितना मुझे पता है. तुम्हारे साथ जाने से नानी टोकेंगी भी नहीं.", आँचल ने जिस मासूमियत से अपनी दशा बताई थी अर्जुन समझ गया की वो अंतर्मुखी नहीं है बल्कि उसको सही माहौल हे नहीं दिया गया. मिलता कहा से जब दामिनी को सिर्फ अपने मजे की पड़ी हो और पप शर्मा तोह जैसे अलग दुनिया में रहता था.

"मैंने अखाडा देखने तोह जाना हे है तोह आप भी चलना साथ. लेकिन मुझे भी नहीं पता के फालूदा कहा मिलेगा."

"मुझे पता है बस तुम इतना कह देना की तुम मुझे ले कर जा रहे हो."

"विनोद चाचा ने कहा की मैं उनके साथ जाऊ तोह?"

"फिर उनको बोल देना के तुम आराम करना चाहते हो घर पे हे. वो तोह वैसे भी रात को हे लौटेंगे लड़खड़ाते हुए. कब से देख रही हु और एक दिन ऐसा नहीं गुजरा के वो होश में आये हो.", आँचल जैसे सबको ाचे से जानती थी इसलिए उसका एकाकीपन ज्यादा हो गया था.

"ठीक है फिर जब चलना हो तोह मुझे उठा देना. मैं चला सोने अपने कमरे में. और उस बात को दिमाग से निकाल देना.", अर्जुन ने ऐसा कह कर फिर से याद दिलवा दिया.

"भूलने दो पहले. ऐसे बात करोगे तोह फिर रहने हे दो."

"मजाक कर रहा था आप से. सॉरी. ठीक 5 बजे उठा देना या चची को बोल देना अगर मेरे कमरे में आने में आपको परेशानी हो.", अर्जुन वही उसको हैरत में छोड़ कमरे में चल दिया. अंदर जाते हे कपडे बदल कर सिर्फ निक्कर पहन वो बिस्टेर पर ऐसे गिरा जैसे काफी समय से सोया न हो.

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"फिर आपने भेज हे दिया अपने जिगर के टुकड़े को नए सफर पर पंडित जी?", हवेली में सोमबीर सिंह के परिवार के साथ साथ और विशिष्ट जो आमंत्रित थे उनमे शास्त्री जी भी एक महतवपूर्ण व्यक्ति थे. ये परिवार का वो अटूट हिस्सा बन चुके थे जिनका वक़्त रामेश्वर जी के साथ अक्सर गुजरने लगा था. अपने सब काम पृथक करते हुए वो भी बस एक बार कहने पर हे उनके सम्मुख उपस्थित रहते थे और आज भी यहाँ वो इस कक्ष में पंडित जी और छोल साहब के साथ मौजूद थे जहा बंद दरवाजे के बितर यही तीन लोग थे. बहार Sanjiv-Radhika को सबसे मिलवाया जा रहा था और लगभग शादी जितना तामझाम था. रसम थी इधर भी गृहप्रवेश की और मंदिर दर्शन की.

"जरुरी हो गया था शास्त्री जी और सतीश भी जानता है की ये करते हुए मुझे क्या कुछ नहीं सहना पड़ा. आपकी भाभी ने तोह अभी से जीना मुहाल किया हुआ लेकिन कर्त्तव्य और परिवार के उचित सम्मान के आगे मैं भी तोह अदना सा सदस्य हु. आपकी मंज़िल भी इस से जुडी है बस किसी तरह अर्जुन खुद पहला पन्ना खोल ले.", रामेश्वर जी की बातें ऐसी हे गूढ़ होती थी और उनके रहनुमा ये जल्द समझ जाते थे क्योंकि वो खुद वैसे जो थे.

"भाई साहब ने ये कैसे किया ये तोह मैं भी नहीं जानता शास्त्री जी. लेकिन इतनी बड़ी कीमत शायद हे इन्होने कभी दांव पर लगाईं हो. अर्जुन तोह आपसे कुछ महीनो से हे जुड़ा है तब भी आप उसके लिए अपना व्यक्तिगत जीवन त्याग कर उसकी हर उचित अनुचित बात में साथ होते हो तोह भाई साहब के लिए आज अगर उनकी दुनिया है भी तोह सिर्फ उसके स्वरुप में. लेकिन और कोई हल भी तोह नहीं था जितनी समझ मुझे है. अर्जुन को जितनी बार भी आजमाया गया वो उम्मीद से भी परे निकला. खुद आप, मई या भाई साहब भी अभी तक उसकी असली क्षमता नहीं जान सके.", छोल साहब के जवाब पर शास्त्री जी ने सहमति जताई वही पंडित जी गंभीर ख़ामोशी से बस देखते रहे.

"मैंने समझने की कोशिश की थी उस उलझे हुए नौजवान को जो रफ़्तार में यकीन रखता है सतीश भाई लेकिन वो आपसे आपका हे गुण चुरा लेता है बिना पता लगे. एक बार उसने कुछ ऐसा कहा था के वो दीमक लगे उस बड़े जंगल को फिर से आबाद करना चाहता है जिसका हिस्सा था वो कभी. शत्रु भीतर भी है और बहार भी लेकिन कोशिश तोह करनी हे होगी. मैं नहीं समझा था की वो नादान इसको किस घटना से जोड़ कर कह रहा है. सचमुच पंडित जी अपने जीवनकाल में मैंने बहुत कुछ देखा है और मुझे नरिंदर, अज्जू या स्वयं रघुवीर जी तक को जान ने का मौका मिला लेकिन इसको जान ने के लिए स्वयं मेरे कदम इसकी तरफ बढे और इसने मुझे हे शागिर्द बना लिया. आप कुछ बड़े मंच पर तोह नहीं आजमाने वाले उसको और मुझे लगता है की वो उस जंगल में उतर चूका है जिसकी बात नासमझी से वो कर रहा था.", शास्त्री जी की बात सच भी थी और स्पष्ट सवाल भी.

"वही तोह उस जंगल का मालिक है शास्त्री जी. मैं संरक्षक मात्रा हु और एक था जो पाने की चाहत तोह नहीं रखता था लेकिन अनजाने में हे उसने वो जंगल साफ़ करने की ठान ली. हर बंबई फोड़ने लगा लेकिन अंत में कही कोई नाग था घात लगाया जिसने धोखे से हुम्ला करके उस अनमोल आत्मा के प्राण हर लिए. वो सीख रहा था हमे बिना बताये इसलिए अभिमन्यु रहा लेकिन ये वाला तोह पहले से सीख कर पैदा हुआ है. इसको उसने शिक्षा दी है जो अब नहीं रहा हमारे बीच. मैं रोकना चहु भी तोह नहीं रोक सकता क्योंकि रघुवीर ने 3 वर्ष इसके साथ बिताये थे अपने जीवन के अंत समय me.Mere भाई ने इसको क्या कहानिया सुनाई है या कौन कौन से राज खोले, ये या तोह वो हे जानता था या अर्जुन के दिल में वो गहराई में दबे है. इतना जरूर है की उस समय में भी रघु को मैं याद था तोह बातें परिवार और अतीत की हुई होंगी. सतीश ने ठीक कहा की मैं भी इसकी क्षमता नहीं जानता.", रामेश्वर जी ने इस संवाद से हे बहोत से राज खोल कर रख दिए थे की वो कितना बेहतर अर्जुन से वाकिफ है. हैरान छोल साहब भी थे रघुवीर जी वाली बात सुन्न कर.

"कही कोई अतीत का वचन तोह अधूरा नहीं रह गया पंडित जी? और हमने सुना है की आपके पिता से अर्जुन की तुलना होने लगी है. उन्हें हमने नहीं देखा लेकिन क्या कुछ समानता है?", ये सवाल उठना लाजमी भी था जब विवाह में शामिल होने पर उन्होंने भी कुछ बड़े बुजुर्गो से अर्जुन के बारे में सुना होगा.

"पूरी समानता न हे हो तोह बेहतर है शास्त्री जी. उनका सच तोह मैं भी नहीं जानता लेकिन वो नाम के हे मुंशी थे. होंगे भी क्योंकि दिमाग तोह सचमुच इतना तेज था की आजकल के कैलकुलेटर भी विफल रहे उनके सामने. भूलते नहीं थे कुछ भी. किस दिन, किस वक़्त और फैलाने साल में क्या किसने किया ये सब उन्हें मूजबानी रहता था. वो चलचित्र वाले जीवन जैसे मुंशी कदापि नहीं थे. देख के हे दहशत भर उठती थी उन्हें क्योंकि सचमुच वो अर्जुन से एक ऊँगली ऊपर हे होंगे जो वो भी जल्द बराबर होने वाला है. माँ चटनी बनाने लगती तोह मुट्ठी से प्याज नरम करके पकड़ा देता थे. कुण्डल वाले बाल, कोयले की इस्त्री से कड़क किया कुरता और बायीं तरफ झुकी सफ़ेद फक्क धोती पहन कर वो 365 दिन एक नियम में हे चलते. उनके सिवा raaj-kaksh में कोई नहीं जा सकता था शाही खानदान से पृथक. पता नहीं उन्हें मुंशी हे क्यों कहा जाता था जबकि वो काम तोह सारे हे देखते थे? मुझे और रघु को तोह मनाही थी उनके पेशे पर जाने की और वो सख्त भी थे लेकिन आप हे सोचो की हमारा गठबंधन शाही खून से हुआ था. हम आजतक अनभिज्ञ है अपने पिता के पूरे वजूद से, अगर उनके सभी पहलु की बात करे. लेकिन थे बड़े हंसमुख इंसान पारिवारिक मामले में. सबकी हाँ में हाँ और सबके दुःख में दुखी. सतीश से जब पहली बार मिले थे तोह इसका गाल खिंच कर कहा था के फ़ौज में मौज नहीं होती लल्ला. करनी पड़ती है. और मैं उस बात को आज तक नहीं समझ पाया.", रामेश्वर जी जिस तरह से मुस्कुराये उनकी बात सुन्न कर बाकी दोनों भी.

"मतलब काम की जगह परिवार वर्जित और परिवार के समय परिवार.? बहोत खूब भाई साहब. ाचा लगा जान कर की वो एक इतने बेहतरीन पिता और पेशेवर थे. लेकिन समानता अर्जुन में आयी उनके जैसी तोह मतलब नियति भी कुछ तोह कहना चाहती है.", शास्त्री जी ने इतनी सी बात पर हे दिमाग घुमा कर रख दिया था पंडित जी का.

"हो सकता है. यकीनन. वो कभी कभी गंभीर होता है तोह उनके जैसे हे बोलता है. और जैसा मैंने बताया की मैं भी सबकुछ नहीं जानता और जब जान ने की उम्र हुई तोह उन्होंने खुद हे स्वयं को हमसे दूर कर लिया. मैं आपकी भाभी के साथ यहाँ चला आया और कृष्ण माँ के पास उधर रहा. अंतिम समय में थोड़ा समय गुजरा था उनके साथ और वही मेरे कंधो पर ऐसा बोझ दाल दिया गया जो आजतक मुझे झुकाये हुए है. महसूस होता है के उनके वचन न हुए खुद की अर्थी थी और मैं आज तक उसको लिए हुए हु. कौशल्या चाहती थी की मैं कोशिश करू लेकिन रघु उधर जाना नहीं चाहता था और उसके मोह में कौशल्या ने उल्टा मुझे हे सौगंध उठवा दी. सब कहते है की मैं बड़ा होनहार और काबिल पुलिस अधिकारी रहा हु लेकिन कोई नहीं जानता की इस रामेश्वर ने तोह अपने जीवन का पहला केस हे आजतक नहीं सुलझाया. रानी माँ की हत्या हुई और जिन्होंने की उनकी गर्दन तक हाथ पहुंचने हे वाले थे की पिता जी ने हमे नए जीवनसाथी के साथ बांध दिया और ड्यूटी शुरू. फिर षडयंत्रो से लड़ते भिड़ते आपके सामने आज रिटायर हुए 10 साल हो गए. अब आजाद भी किया उस सौगंध से तोह मेरी हालत देखो आप. क्या कर सकता हु? इन मूर्खो की टोली से उम्मीद भी नहीं कर सकता क्योंकि कुछ गहरा दर्द जुड़ा है उस दौर से.", रामेश्वर जी ने अपनी हालत बयान की तोह शास्त्री जी ने साफ़ महसूस किया की हमेशा मजबूत दिखने वाले ये व्यक्ति सचमुच बहोत जगह से खुद को संजोये है किसी तरह. इतना टूटने के बावजूद वो हालात से झुके नहीं चाहे कमजोर हो गए.

"भाई साहब ने अनकहे मौके दिए थे सभी लड़को को लेकिन इनकी बात सही है की वो maa-baap का जहा जीकर हो जाए उधर सवाल करने से पहले गाँव उजाड़ देंगे. नरिंदर कुछ हद्द तक काबिल है लेकिन वो भी मौका मिलते हे बेलगाम हो जाता है. मैं तोह फ़ौज में रहा हु भाई साहब और मुझे तोह पहले आर्डर मिलते हे गोली चलनी आती थी और बाद में मैं हे आर्डर देने लग गया. इस से ज्यादा काबिलियत मुझमे भी नहीं.", छोल साहब का ऐसा कहना रामेश्वर जो को हंसने पर विवश कर गया.

"सारंग क्या इस अतीत से जुड़ा है पंडित जी?"

"सभी जुड़े शास्त्री जी, सभी जुड़े है और तभी तोह दिमाग कहता है की दूर हे रहो इस सबसे. दिल कहता है की दूर तोह कबसे रह रहा हु लेकिन क्या कुछ फायदा हुआ? अपने परिवार की तहकीकात करो तोह कोई कड़ी महल में जायेगी तोह कोई किसी दूसरे शमशान. जब उधर जाओ तोह फिर 4 नए और ठिकाने जिनमे से 3 ऐसे होंगे जहा संधि की वजह से पाँव रुक जाते है. पिता जी ने उस दौरान भी अगर 2 साल का वक़्त दिया होता तोह मैं बहोत कुछ रोक सकता था लेकिन क्या कर सकते है. कुछ ठिकाने है जहा मैं छह कर भी जा नहीं पाया लेकिन अब अर्जुन जायेगा और वो धुल हटाएगा वह से बिना एक भी पत्ता हिलाये. शंकर के हाथ में टोर्च दे दो तोह वो उसके शीशे से एक का गाला काटेगा, इस्पात वाला हिस्सा कही मुँह में थोक देगा और यहाँ तक की बैटरी भी जिस्म में भर देगा. तोह मेरे पास बचा हे कौन क्योंकि उसके भाई उस से अलग तोह है नहीं. संजीव समझदार बीटा है घर का और अर्जुन उस से सलाह करता है. ऐसे हे लोग तोह मंजिल प् सकते है न शास्त्री जी जो दिल की तपिश जाहिर न होने दे और अँधेरे में भी रौशनी बिना देख सके? वो जब सब ढून्ढ लेगा फिर मोर्चा आखिरी बार हम अपने हाथ लेंगे, उसको सबसे दूर महफूज रख कर.", रामेश्वर जी ने अपने इरादे जाहिर कर दिए थे और साथ हे बाप बेटे के काम करने का तरीका भी बता दिया की क्यों वो इतने अलग है.

"आपने सब पहलु शायद बरसो से हे सोच रखे है पंडित जी तोह इतना जानते है की आप चूक नहीं सकते. हमारी भी मदद करके आपने हमको वैसे हे कर्जदार बना दिए है. बस आप हुकुम कर दीजियेगा और आपका ये बेवकूफ भाई ज्यादा शिकायत का मौका दिए बिना रणन में साथ होगा. मैं भी इन्तजार कर रहा हु की कब राज्यवर्धन से एक मुलाकात हो. वो समय जब आएगा तोह बस वही पल होगा जब हम शिक्षा और मूल्यों को एक तरफ रख देंगे.", शास्त्री जी भी बरसो से एक आग दिल में लिए थे चाहे वो थे एक yog-guru लेकिन अरमान और दर्द उन्हें भी था.

"राज्यवर्धन पहले से हे राजद्रोही है शास्त्री जी लेकिन संधि की वजह से हम उसको उधर से ला नहीं सकते और वो घाग आदमी अपने बड़े भाई की चाय से अगर दूर भी होता है तोह विदेश निकल जाता है वही अपने ठिकाने से हे. Delhi-Bombay से उड़ान भरता तोह दबोच भी लेते लेकिन जबतक संधि ख़तम करने की बहोत बड़ी वजह हमारे पास न हो तब तक हम वह कदम नहीं रख सकते. Maut-afsos अलग बात है लेकिन ऐसे हरगिज नहीं. इस का भी हल निकाल चुके है पर समय आने पर हे अमल किया जाएगा. अभी तोह बस अर्जुन अपने दिल के कर ले और वापिस लौट कर मुझसे सवाल. बक्के पैन तभी खुलेंगे.", रामेश्वर जी की बात इस से आगे बढ़ती उस से पहले हे दरवाजे पर दस्तक हो गयी.

"भाई साहब, आप भी इनकी तरह हो गए? यहाँ riwaj-rasam हो रहे है और आप इनके साथ बंद कमरे में. चलो जी आपको अलग से कहना पड़ेगा? मंदिर लेके जाना है बचो को और चंद्रो बहिन जी कबसे पूछ रही है आपको. कुंदन भाई साहब भी आये है सरपंच जी के साथ. अभी रेखा का हाल ले रहे है वो तोह मिल लो सभी से. पता नहीं कौनसी पंचायत है जो 10 साल से ख़तम नहीं होने आयी?", कौशल्या जी का ये अवतार देख कर तोह पहली बार शास्त्री जी खिसियाते दिखे लेकिन बाकी दोनों को हँसते देख उन्होंने बस एक नजर कौशल्या जी को देखा बहार आने से पहले.

"बुरा न मान लेना भाई साहब, देवर हो तोह कान भी खिंच सकती हु. बस लम्बे थोड़े ज्यादा हो. इनके साथ ज्यादा न बैठा करो ऐसे अकेले में. किसी दिन आपका हे बेडा पार करवा देंगे.", अब शास्त्री जी ने हे हँसते हुए हाथ जोड़ दिए थे.

"भगवान बस भी करो. बहार सभी बचे और जवान थे इसलिए 2 पल हम लोग इधर आ गए. चलो मंदिर चलते है."

"पहले मिल तोह लो जी सबसे. मंदिर चलते है!", कौशल्या जी के जाते हे शास्त्री जी ने अपने कानो के हाथ लगा लिया.

"ाअदत हो चुकी है शास्त्री जी हम दोनों को हे एक दूसरे की. बस रिश्ता एक और भी है जिसमे ये थानेदारनी है और हम बिना कोई जुर्म किये लेकिन इनके मुजरिम."

"हाहाहा... मैं भी मजाक हे कर रहा था भाई साहब. भाभी जी ने तोह पहले हे चेता दिया था के वो सिर्फ आपको सुनाने वाली है. वैसे मंदिर से हे मुझे वापिस निकलना होगा. आपसे मिलने की इत्छा थी जाने से पहले. 5 बजे दिल्ली के लिए निकल रहा हु और वह का काम पूरे करके 2 हफ्ते के लिए देश से बहार.", शास्त्री जी के ऐसे अपनेपन से पंडित जी भी गदगद हो उठे. अब सभी से मिलने के बाद ये लोग मंदिर जाने लगे थे जैसा रिवाज था.

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"बहु, देख तोह अर्जुन उठा या नहीं. दिन में ज्यादा सोयेगा तोह रात में क्या करेगा?", आँगन में इस वक़्त देवकी जी मीणा से कपडे तेह लगवा रही थी और दामिनी भी गाँव की हे 2 महिलाओं के साथ अपनी गुफ्तगू करती हंसने बोलने में. विनोद अभी कुछ वक़्त पहले हे लौटा था और अब निकेतन को गॉड में उठाये वो सबसे नजर बचता हुआ चोरी चोरी आँचल को ताड़ रहा था जो नीम की दाल पे बंधे झूले पर अकेली पींग ले रही थी. अनामिका मेहमानो और दामिनी को शरबत देने के बाद अपना पल्लू कमर में खोंसती हुई सहजता से अर्जुन के कमरे की और बढ़ चली. विनोद कातर निगाहो से कभी आँचल के सीने को नजरो में भरता तोह कभी उसके मासूम से चेहरे को. सबको तोह यही दिख रहा था के वो अपने बेटे को सीने से लगाए वक़्त बिता रहा है.

'लगता है बिस्टेर भी छोटा पद गया और सोया भी कैसे है तकिये दबोचे हुए.', अनामिका चची कमरे में दाखिल हुई तोह अर्जुन काफी गहरी नींद में औंधे मुँह तिरछा सो रहा था. जिस्म पर कपड़ो के नाम पर वो कासी हुई बनियान जो शरीर पर जैसे तैसे फांसी हुई थी और घुटने से कुछ ऊपर लम्बाई की सूती निक्कर. करीब आने पर अनामिका बस उसको देखते हुए जैसे उद्देश्य हे भूल गयी. चेहरे पर आये उसके लम्बे बाल जहा कुछ पसीना भी था और नींद में भी होंठो पर मुस्कान. हाथ मुड़ने की अवस्था में भी बाजू की मछली इतनी बड़ी जैसे किसी किशोर की जांघ हो. कमर से डेढ़ गुना चौड़ा seena-peeth और उन पर उभरी हलकी मासपेशिया जो शायद नींद में बदन ढीला होने की वजह से पूरा कटाव जाहिर न कर रही थी. अनामिका ने कभी भी करीब से पर पुरुष नहीं देखा था लेकिन अर्जुन के सीने पर सर टिका कर एक मीठी नींद का अनुभव उसको भी था. आज सही से वो देख प् रही थी की ये युवक विलक्षण है.

"माँ जी कह रही है और कितना सोना है अर्जुन? रात को कीर्तन करोगे फिर?", शरारत करते हुए अनामिका ने अर्जुन का गाल खींचते हुए उसको उठाने की कोशिश की तोह वो तकिया सीने से लगाए हे पलट कर सीधा हो गया. उनींदी आँखों को थोड़ा खोल कर फिर वापिस बंद करते हुए अर्जुन ने जवाब दिया.

"कीर्तन में और कौन कौन जा रहा है चची?", अनामिका उसके जवाब पर हंसती उस से पहले हे आवाज मुँह में हे रह गयी जब निक्कर का कपडा एक तरफ से इतना उभरा हुआ दिखा. पतले कपडे के निचे कोई अन्य वस्त्र नहीं था अर्जुन की कमर पर. एक बार उस उभर और फिर उसके शांत चेहरे को देखने के बाद अनामिका थोड़ा पीछे हट गयी.

"वो.. वो सब बाद में लेकिन पहले मुँह हाथ धो कर बहार आ जाओ. 5 बजने वाले है और मैं तुम्हारे लिए दूध तैयार करती हु.", सांसें हे अस्थिर हो गयी थी कल्पना मात्रा से की आखिर ऐसा भुजंग वो अपने साथ लिए फिरता है? अनामिका को इस सबका चाहे इतना ज्ञान नहीं था लेकिन वो एक पत्नी थी जो माँ भी बन चुकी थी. हिम्मत हे नहीं हुई थी की वो अर्जुन पर फिर से नजर दाल सके. कदम ख़ामोशी से रसोईघर की तरफ बढ़ गए और अर्जुन करवट लेता हुआ खुद को उठने के लिए तैयार करने लगा. थोड़ा आलस तोह जिस्म में रहना हे था.

"बहु, मैं जरा शबाना के यहाँ जा रही हु. अर्जुन को दूध पिलाने के बाद रात के लिए देख लेना क्या बनाना है. इधर दे निक्कू को बीटा, ये भी थोड़ा घूम आएगा. वह इसकी उम्र की सीरत की बिटिया भी है जिसके साथ ये भी गुडहलि खेलता है. हर वक़्त गॉड चढ़ाये रखना भी ठीक नहीं.", निकेतन को विनोद से ले कर देवकी पड़ोस के एक परिचित घर चल दी. विनोद ने इस दौरान एक बार अपनी माँ को हवेली से जाते देखा और फिर आँचल को जो करीब से गुजर कर अर्जुन के कमरे की तरफ बढ़ गयी.

"हो गया तैयार चची बस 2 मिनट.", कमरे के भीतर वाले स्नानघर से अर्जुन ने आवाज दी जब कमरे में कदमो की आहात सुनी. जवाब में आँचल ने भी फिक्र कैसा.

"तुम्हारी चची के सिवा इस कमरे में किसी और का आना मन है क्या? 5 बज चुके है मिस्टर और मां भी बहार हे है. संभल लेना नहीं तोह अगली बार बात नहीं होगी.", आँचल ने कौतहूल वश बिस्टेर किनारे राखी वो गुड़िया उठा कर देखि और उसको हर तरफ से छूने के बाद वापिस वही रख कर लड्डू का डब्बा देखने लगी. गहरे रंग के वो लड्डू और उनकी jadi-booti वाली महक से हे उसको उबाक हो उठी. अर्जुन भी मुँह धोने के बाद निक्कर में हे बहार निकला तोह आँचल को बिस्टेर किनारे बैठे पाया.

"वो दादी जी ने बना कर दिए है दीदी. स्मेल ाची नहीं है न उनकी?"

"ये खाने के लिए है? और तुम कोई लड़की हो जो गुड़िया रखते हो अपने कमरे में.?"

"हाहाहा.. खाने के लिए है तभी तोह साथ लाया हु. और ये सिर्फ गुड़िया नहीं है, कोमल दीदी का वो पहला उपहार है जो उन्होंने ऋतू दीदी को दिया था और उनसे मैंने ले ली थी. हॉस्टल में भी साथ रहती थी ये मेरे और आज भी साथ रखता हु.", अर्जुन का ऐसा जवाब सुन्न कर आँचल ने एक बार फिर से उस गुड़िया को उठा कर ध्यान से देखा. एक बार्बी गुड़िया जिसके कपडे बदले गए थे और कही कही nail-polish और लाली के निशाँ. यकीनन वो बरसो पुराणी थी लेकिन आजतक saaf-suthri.

"बहोत ज्यादा मानते हो कोमल को?", अर्जुन निक्कर के ऊपर हे जीन्स पहनता हुआ बस मुस्कुरा दिया. आँचल उठ कर उसके पीछे हे बहार आँगन से रसोई में चली गयी.

"हाँ भी शेर, उठ गए आराम करके? मैं तोह उम्मीद कर रहा था के आज तुम बस आराम हे करने वाले हो. दूध की इत्छा नहीं हो तोह बहार हे देख लेंगे कुछ.", विनोद का क्या इरादा था ये अर्जुन समझ चूका था.

"नहीं चाचा जी वो तोह बस सफर की वजह से थोड़ा सो गया और आज यही ठीक हु घर पे. दादी जी मेरी खुराक के मामले में कौताही नहीं करने देती तोह बहार वाली बात तोह बस जाने हे दीजिये. आपने भी कल निकलना है शहर और इतने दिन उधर जाने की वजह से यहाँ के आपके दोस्त भी इन्तजार करते होंगे आपसे मिलने का?", अर्जुन ने अब खुले आँगन में देखा था उसी महिला को जो निहाल के साथ आते हुए मिली थी. वो भी उसको हे देख रही थी और उसके साथ एक और महिला थी जो उम्र में कुछ बड़ी लेकिन दामिनी जितनी हे थी.

"यार तुम साथ हे चलते और मैं सभी से परिचय करवाता अपने भतीजे का. चाचा भतीजा दोस्त भी तोह होते है और सच कहु तुमने जो भी किया है मेरे लिए उसका कर्ज मैं कभी उतार न सकूंगा. जानते हुए भी कही मैं गलत था तुम्हारे साथ.", विनोद ने आखिर बात अर्जुन का हाथ अपने दोनों हाथो में भरते हुए जिस तरह से कही थी वो कही से भी कोई चालाकी नहीं थी. वो एक सच था जो विनोद के दिल से निकला था.

"चाचा जी, दोस्त तोह है हे लेकिन रिश्ता भी खून का है और बड़ा भी. मैं आपके साथ चलूँगा लेकिन अभी नहीं जब आप वापिस आओगे तब और रही कर्ज वाली बात तोह वो आप शहर घुमा कर उतार देना.", अर्जुन ने जो माँगा था वो विनोद को खुश करने के लिए बहोत था.

"हाँ भाई ऐसा तोह मैं हर रोज कर सकता हु. और सचमुच कई दिन हुए न बिज़नेस नहीं संभाला और बहोत से लोगो को पैसा दिया हुआ है तोह जीजा के साथ जा कर उगाही भी करनी थी. रात में थोड़ा देरी से आऊंगा लेकिन जानता हु तुम जल्दी नहीं सोते. तभी बात करते है. ाचा दीदी, मैं जा रहा हु और जीजा पंचायत वाली तरफ हे है तोह उन्हें ले कर थोड़ा अगले गाँव जाना होगा. देरी हो जाएगी.", विनोद अबतक अर्जुन को उनके करीब हे ले आया था जहा ये तीनो महिलाये बैठी थी चारपाई और कुर्सी पर. खुली छत वाली 4क्ष4 जीप में बैठने से पहले विनोद ने दर्ज में पिस्तौल की जांच की और फिर आँखों पर कला चस्मा चढ़ा कर हवेली से निकल चला. अर्जुन ने पाया था की विनोद ने एक बार भी उन दोनों महिलाओं पर बुरी नजर न की थी. क्या वो बदल रहा था या ... नहीं आदमी सुधर सकता है लेकिन आदत जल्दी नहीं बदलती.

"Dipa-Indu, इस से मिलो ये है अर्जुन, मेरा भतीजा और शंकर भैया का बीटा. अर्जुन, िन्दु मेरी बचपन की सहेली है और बचो की छुट्टियां है इसलिए अभी गाँव आयी हुई है. दीपा दिलबाग सिंह की वाइफ है जो विनोद के साथ बड़ा हुआ है बचपन से.", अर्जुन को परिचय होने पर दामिनी की बगल में बैठना हे पड़ा. दीपा भाभी तोह अब और ज्यादा हैरानी से उसको देख रही थी लेकिन प्रतिउत्तर में उन्होंने बस मूक अभिवादन दिया. अनामिका चची उसके लिए दूध और वो 2 लड्डू ले आयी थी जिन्हे पहली बार देखने वाला हर व्यक्ति सवाल करता था.

"इतने बरस में पहली बार दिखाई पड़े तुम तोह बीटा. क्यों शहर ज्यादा पसंद है? और देखने में तोह अभी से 25 के लगते हो जबकि जितना मुझे याद है तुम 18 के आसपास होंगे.", ये िन्दु थी और मीणा वह से खली शरबत वाले गिलास लेके गयी तोह अर्जुन ने उन्हें जवाब दिया.

"शहर में लोग अलग नहीं होते आंटी जी. बाकी जैसी परवरिश करो वैसा इंसान बनेगा. शरीर विरासत में मिला है तोह अब इसका मैं क्या कहु. दीपा भाभी जी से तोह मैं आते वक़्त मिला था लेकिन ज्यादा बातचीत नहीं हो सकीय.", अर्जुन ने दीपा को चर्चा में जोड़ हे लिया था जो कभी उसके चेहरे तोह कभी उन गहरे रंग के कसैले से लड्डू को देख रही थी.

"अजनबी थे कुछ देर पहले जब मिले थे. मैं इसलिए तोह ध्यान से देख रही थी की तुम्हे कही न कही देखा है. शंकर जी जैसे तोह हो थोड़े थोड़े पर किसी और से ज्यादा मिलते हो. वैसे मुझे भाभी क्यों और दीदी को आंटी?", अब झेंपने की बारी अर्जुन की थी और उसकी शर्म देख िन्दु दामिनी भी हंस दी.

"निहाल भैया ने भाभी बुलाया था न आपको इसलिए बस. बाकी आप जो कहो वो ठीक. वैसे आप भी यहाँ काफी समय से रहती है?", अर्जुन जाने क्या पूछने वाला था जो दामिनी उसकी तरफ ध्यान देने लगी. लेकिन वो साधारण भाव से हे थोड़ा थोड़ा दूध पीने लगा.

"अभी तक दूध पीते हो?", िन्दु ने अलग हे राग शुरू कर दिया जिस पर दामिनी ने हलके हाथ से उसकी ब्याह पर चपत जड़ दी, मजाक में.

"तुम्हारे जितनी तोह मेरी निम्मी है, 2 बरस काम होगी लेकिन उसके पैदा होने से एक साल पहले से इस गाँव में ब्याह कर आयी थी मैं. हाँ जगत भाभी हे हु अब तोह अपने पति और गाँव में उनके चाहते बचो की वजह से. वैसे निहाल से पहली बार में दोस्ती हो गयी तुम्हारी? ाचा लड़का है और दिल का भोला भी. बोल रहा था की तुम उसके साथ अखाड़े में जाने वाले हो. जुगराज जी तोह तुम्हे देखते हे टीम में ले लेंगे.", दीपा भाभी को जैसे ाची जानकारी थी. और अखाड़े का जीकर हुआ तोह चटाई पर बैठ कर दाल साफ़ करती अनामिका चची ने भी सर उठा कर अर्जुन को देखा जैसे जान न चाहती हो की उसकी क्या इत्छा है.

"ये नहीं जाने वाला कबड्डी खेलने और अगर जाना भी है तोह बस कसरत तक ठीक है अर्जुन.", दामिनी ने जरा तल्खी से कहा था जिस पर अर्जुन ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया.

"जुगराज जी कोच होंगे उनके और ये कबड्डी का इतना चर्चा क्यों है भाभी? हाँ बुआ बताओ जरा आप भी की मुझे खेलना क्यों नहीं चाहिए.?", आँचल तैयार हो कर कमरे से आ गयी थी और अर्जुन की प्लेट में अभी भी एक लड्डू बाकी देख उसने ख़ामोशी से अपनी मामी के पास बैठना हे सही समझा.

"तुम्हारे भैया भी खेलते आये है बरसो से लेकिन और जुगराज जी ने हे उनको भी तैयार किया था. सभी उनको मास्टर जी बोलते है. कभी खिलाडी भी थे और बाद में शारीरिक शिक्षा के मास्टर जी भी. पिछले 3 साल से दरगाह के परली तरफ वाले हे कप उठाते आये है जबकि पहले वो हमेशा दूसरे नंबर पर आने की कोशिश करते थे. तुम्हे देख के लगता है की खिलाडी तोह तुम भी हो पर कबड्डी कभी खेली है या सिर्फ पहलवानी हे करते हो?", दीपा भाभी बेबाक न हो कर सुलझी हुई हंसमुख महिला थी और गाँव की जड़ से जुडी हुई.

"बॉक्सिंग करता आया हु भाभी मैं और बाकी कसरत. कबड्डी और खो खो जैसे खेल स्कूल में थे इसलिए उतने हे खेले है लेकिन ये टूर्नामेंट का क्या चक्कर है?", अर्जुन को उत्सुक देख अनामिका ने गर्दन हिला कर बिना बोले उसको मन किया लेकिन बात तोह वो कह हे चूका था. दामिनी ने भी देखा था की अनामिका अर्जुन को मन कर रही है जो उसके लिए हैरानी वाली बात थी क्योंकि अनामिका कभी किसी की बातचीत में दखल नहीं देती थी और बोलती तोह वो थी हे काम.

"माँ, अर्जुन मुझे गाँव दिखने के लिए बोल रहा था दिन में.", आँचल ने मुस्तैदी से बात को वही रोक दिया.

"जाओ घूम आओ तुम दोनों. बाकी अब यही हो तोह जान हे जाओगे क्या होने वाला है.", दामिनी कुछ व्यथित दिखी लेकिन किसकी वजह से ये कहना थोड़ा मुश्किल था. अर्जुन दूध को एक सांस में ख़तम करके गॉड में रखे रुमाल से अपना मुँह साफ़ करता हुआ उठ खड़ा हुआ. चाबी मोटरसाइकिल में हे लगी थी जिस पर बैठते हे उसने आँचल को पीछे बैठने को कहा. वो थोड़ा झिझकती हुई दोनों पाँव एक तरफ करके कुछ दुरी से बैठी तोह अर्जुन को जो रास्ता याद था वो उसपे हे बढ़ गया.

"अनामिका तुम क्यों अर्जुन को मन कर रही थी?", उनके जाते हे दामिनी ने आवाज नरम रखते हुए ये तयशुदा सवाल पूछ लिया. अनामिका को जवाब भी देना जरुरी था और वह दो लोग और भी मौजूद थे जिन्हे अभी पता चला के अर्जुन को कोई मन भी कर रहा था.

"दीदी, कुछ ऊपर निचे हो गया तोह बात माँ जी पर आ जाएगी. अर्जुन के लिए बड़ी माँ जी ने भी कहा था की ये ज़िद्दी है maan-sammaan के मामले में. दरगाह के khel-mele में उसके जाने से तोह यहाँ सबकी jawaab-dehi बन जाएगी. आप भी तोह अर्जुन का ख़याल रखती है?", अनामिका का इतना भोलेपन से जवाब देना दामिनी के गुस्से को ठंडा कर गया जो वो मैं में दबाये थी. लेकिन िन्दु को ये अजीब लगा की जो लड़का दिखने से हे इतना hatta-katta और इस परिवार का अंश है उसको हे गाँव के गौरव से दूर रखा जाएगा.

"मुझे तोह वो कही से बचा न लगता अनामिका. बाकी देख दामिनी सच बात तोह ये है की आज अर्जुन गाँव में आया है और कल तक ये बात सभी को पता होगी. प्रधान जी से लोग खुद कहेंगे तोह क्या वो इंकार कर देंगे की उनका पौता कबड्डी नहीं खेलेगा?"

"पहले पानी चढ़ाया नहीं और चाय छान लो तुम लोग. इंदुमती जी, उसको देखने दो सब और लोगो से घुलने मिलने दो. वैसे भी वो जुगराज जी ने टीम में नहीं लेना. 5 दिन बाद मेला है और लड़के सुबह शाम म्हणत में लगे है. ऐसे में अपने तैयार लड़को में से किसी एक को हटा कर वो अर्जुन को लेने का जोखिम नहीं उठाने वाले. लेकिन अर्जुन ने प्रधान जी से ये कहा की वो खेलना चाहता है तोह जरूर बेड़ागर्क हो जाना. क्योंकि फिर मास्टर जी भी मन नहीं कर सकते. और 3 साल से दूसरे नंबर पर आ रहे है जो इस साल भी होना सुनिश्चित है. तुम nanad-bhabhi तोह इस्पे बात हे मैट करो. वैसे तुम्हारा भतीजा अपने भूत से भी तगड़ा है, काम उम्र के बावजूद. इतने तोह शंकर जी और नरिंदर जी भी नहीं दीखते. कद भी हमारी चौखट जितना होगा.", दीपा भाभी ने अर्जुन के जिस्म की तारीफ जिस तरह की थी दामिनी मंद मंद हंसने लगी. अनामिका मीणा की तरफ जा चुकी थी जहा दूध निकला जा रहा था.

"दिलबाग से दिल तोह नहीं भर गया जो मेरे भतीजे को इतने ध्यान से देख रही थी. और अब भी उसकी हे बात कर रही है.? कच्चा है इन मामलो में वो और िन्दु से ऐसी उम्मीद कर सकती हु लेकिन तू कबसे ऐसी हो गयी?", िन्दु नखरे से दामिनी को झिड़कने लगी और दीपा ने हँसते हुए अपने मुँह पर दुपट्टा रख लिया.

"इतनी कमजोर नहीं हु की ऐसे चिकने से पहलवान पर फिसल जाऊ दीदी. मुझसे तोह आज तक ये भी पार न प् सके तोह किसी नौसिखिये पे तोह मैं आँख तक न राखु. िन्दु दीदी का कुछ कह नहीं सकती, मांजी वाले पाह जी भी कभी पसंद थे इनको. उनके बस का नहीं था वो बात अलग है. हाहाहा...", यहाँ सहेलियों के हंसी मजाक में जिसका जीकर किया गया था वो निहाल के पिता जी थे.

"तब मैं नयी नयी जवानी में आयी थी और पाह जी तगड़े तोह थे हे. बस वो देखने तक हे था क्योंकि आगे गुंजाइश न थी. अब दामिनी जैसी आग तोह मुझमे है नहीं और तू तोह ज्यादा सफाई दे हे न दीपा. दिन में 4 बार जो तू नहाती है वो सब पता है. जोगी से शादी कर ली तूने गलती से जिसको या तोह खेत या फिर खिलाडियों से फुर्सत नहीं मिलती. इतनी बड़ी बेटी होने के बाद तोह ाचा ाचा जिस्म नरम पड़ जाता लेकिन तेरा सही से न तोडा दिलबाग ने. हाँ दामिनी तुड़वाती है और फिर ख्याल भी रखती है. क्या पता जोरदार जोड़ीदार इसको भी न मिला अभी तक. भतीजे को तोह नहीं जांच रही?", िन्दु के इतने खुले वर्णन से दीपा का चेहरा झुक गया जैसे दुखती राग पर सामने वाले ने जानबूझ कर हाथ रख दिया हो. दामिनी इस अंतरंग चर्चा के मजे ले रही थी जैसे इनके बीच ऐसा अक्सर चलता था.

"जिस्म का क्या है, खुराक मिलती रहे तोह बढ़िया रहता है और बढ़ता भी. लेकिन अपना ये पहलवान थोड़ा कच्चा है इन मामलो में तोह मेरे किसी काम का नहीं. बाकी दीपा को तोह पक्का पसंद आ गया लगता है. देख एकदम सुन्न बैठी है."

"कुछ भी बोलती हो दीदी. मैं तोह अभी भी सोच रही हु की इसको कहा देखा है लेकिन ये जब आया हे पहली बार है तोह शायद वहां होगा. बाकी कच्चे को पकाना तोह तुम्हे आता हे है. वो बात अलग है की शायद काम न बने अगर वह से नरम निकला तोह.", दीपा ने पिछली बात जल्द भूलते हुए फिर से चेहरे को हंसी से धक् लिया था.

"ढीला भी इतना बड़ा था जितना सपने में भी न देखा हो. कच्चा इसलिए कह रही हु की वो इन सबसे दूर रहता है तभी जिस्म ऐसा घोड़े जैसा है और घोड़े वाला हे लगा हुआ है उसके. खुली सुरंग भी गुफा बना देगा अगर सही गुरु मिल गया तोह. बाकी शहर में रहा है तोह क्या पता पटाखा बड़ा धमाका छोटा हो. पापा की वजह से रिस्क नहीं ले रही नहीं तोह अभी तक तोह लपेट लिया होता मैंने.", दामिनी ने जल्द हे अपने दिल की बात खोल कर रख दी थी इनके सामने और जैसे िन्दु उसकी बचपन की सखी थी तोह वो तोह सभी काण्ड जानती हो सकती थी दामिनी के लेकिन दीपा अवाक रह गयी.

"मैं चलती हु दीदी. तुम लोग करो अपने kisse-kahani. निहाल की माँ ने बुलवाया था और मुझे भी काम है उनसे.", दीपा भाभी के कदम बिना जवाब लिए हवेली से बहार निकल गए.

"इसको क्या हुआ?"

"दीपा दिल की भली है और मजाक भी कर लेती है. पर आज जैसे वो थोड़ी परेशां है किसी वजह से नहीं तोह ऐसे उठ कर नहीं जाती. दिलबाग से हुआ होगा कुछ rola-rappa. दारु पीने के बाद वैसे भी तोह वो पागल कुछ ध्यान नहीं देता. कल और परसो वो रात में भी खेत हे था और आज दिन में आया था घर खाना खाने. दीपा मुँह से तोह नहीं बताती लेकिन मैं विचलित तोह होगा हे. चल छोड़ उसका तोह जो लिखा है वो वैसा हे रहेगा. तू घोड़े की बात कर रही थी. शहर वाले सरदार से भी तगड़ा था क्या?", अब जैसे बातचीत में किसी का डर हे न रहा था और कितने पैन थे इन दोनों के ऐसे जो par-purush सम्बन्धो से भरे थे वो तोह कहना हे मुश्किल था.

"सरदार तगड़ा था िन्दु लेकिन पता लगा के वो अब इस दुनिया में नहीं रहा. तेरे जीजा का तोह तू जानती हे है. लेकिन आज जब ये नहाने के बाद ऊपर कुर्सी पर बैठा था तब इसको थोड़ा रिझाने की कोशिश की. कर तोह मजाक हे रही थी दोस्ती करने के हिसाब से लेकिन जैसे उसने पहली बार वो नजारा देखा था तोह टाइट हो गया. यकीन कर इतना बड़ा तोह होगा और मोटा किसी बांस सा. पता नहीं आँखों का धोका था या कुछ और लेकिन जब वो खड़ा हुआ तोह चेहरे करीब करके देखा तोह वो धोखा नहीं था. दिमाग ने तोह साफ़ हे इंकार कर दिया की ऐसी चीज अंदर जा भी सकती है लेकिन दिल कह रहा के एक बार जांचना तोह बनता है. लेकिन सवाल है की कैसे?", दामिनी कितनी kaam-vasna से भरी थी ये तोह उसके अनगिनत सम्बन्ध बताते थे लेकिन वो असंतुष्ट रहती है ये भी अलग कहानी थी.

"खेत घुमा ला फिर तोह एक बार. और खेल खेल में देख लियो की मौका बन्न सकता है या नहीं. तू पुराणी खिलाडी है दामिनी और बगीचे में कब मिटटी लग जाए और कपडे गंदे हो जाए क्या कहा जा सकता है. वैसे भी आम वाली तरफ पानी लगा हुआ है. और जवान खून अगर नौसिखिया हुआ तोह तेरे जैसी नागिन की पकड़ में खुद फंसता जाएगा."

"मैं नागिन? कामिनी कही की... नाग तोह उसके पास है लेकिन देखना है मेरा पिटारा उसको समेत सकता है या नहीं. लेकिन तेरी बात सही है. वैसे भी कल सुबह उसको वही लेके जाने वाली थी मैं पर घूमने के लिए. अब जरा हौदी में नहाने का मजा ले हे लेती हु लगे हाथ. वैसे तू भी साथ चल, नजर रखने वाला भी कोई हो तोह..", दामिनी के ऐसे प्रस्ताव ने िन्दु को सोचने पर विवश कर दिया था. एक जवान तगड़ा पहलवान सा युवक और उसकी वो खासियत जो उसके जैसी औरत की कमी थी.

"एक काम कर दामिनी. जैसा तू सोच रही है उसमे जल्दबाजी मैट कर. कल तोह तू हे जा और इसके साथ थोड़ा हंस बोल कर खुलने की कोशिश कर. आज जैसे जलवे दिखाए है थोड़ा उस से ज्यादा दिखा पर बस इतना की वो सामने से इत्छा दिखाए. अगर लड़का सबर और कायदे वाला निकला तोह काम बिगड़ सकता है और जिस तरह से अनामिका कह रही थी, वो सुन्न कर तोह मुझे लगता है की सतर्क रहना बहोत जरुरी है ऐसे मामले में. सही बीन बजाएगी तोह बाद में तेरी ऊँगली पर नाचेगा. निचे की गर्मी एक तरफ रख कर ठन्डे दिमाग से सोच. फिर तोह मैं तेरी चाकरी जब कहेगी करने को तैयार हु.", िन्दु ने कामवेग से भरी दामिनी को होश में ला दिया था. अब वो समझ रही थी की कपडे पहली बार में हे उतार दिए तोह बाद के लिए कुछ बचने वाला नहीं, फिर गलती हो या नाग पिटारे में.

"तभी मैं तुझसे बात करती हु मेरी जान. साला एक्सपीरियंस भी तोह होश में रहने से आता है. मुझे तोह ऐसे समय में बस एक हे चीज दिखती है लेकिन तू मुझसे बड़ी नागिन है जो निशाँ तक न छोड़ती है. चल थोड़ी देर ऊपर चलते है.", दामिनी ने ऊपर जाने का ख़ास इशारा दिया तोह िन्दु हंसती हुई कड़ी हो गयी.

"गर्मी निकाल लेना हे सही रहेगा. ाची बात है और वैसे भी स्वाद चखे ज्यादा वक़्त हो गया.", अनामिका को वही से आवाज दे कर ये दोनों महिलाये अपने ख़ास काम को अंजाम देने सीढ़ियां चढ़ती हुई ऊपरी भाग पर चली गयी. लेकिन वो इस बात से बेखबर थी की इनकी चर्चा अनामिका ने सही से सुन्न ली थी क्योंकि गाये का दूध तोह मीणा निकाल रही थी, अनामिका नहीं. और अब परेशानी वाली बात ये थी की अर्जुन को आगाह कैसे किया जाए.

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"यहाँ तोह बहोत भीड़ है और ये कैसा फालूदा है?", अर्जुन निकला तोह हवेली से ऐसे था जैसे उसको रास्ता पता हो लेकिन आँचल उसको कहा से घुमा फिर कर लायी थी ये देख कर सर हे चक्र गया. और जब मंज़िल पर पहुंचे तोह वो एक ठेला था जिधर बचो के साथ दर्जन भर युवक उस ठेले को घेरे खड़े थे. यहाँ तक के सफर में हे अनिगिनत लोगो ने अर्जुन को पहचान ने की कोशिश की थी क्योंकि वो वह पर पहले कभी दिखा नहीं था और उसके पीछे जो बैठी थी वो प्रधान जी की नातिन थी. ठेले से एक तरफ मोटरसाइकिल रोक कर अर्जुन आँचल को वही बैठने का बोल कर आगे बढ़ा तोह वो उसके साथ हे चल दी.

"जैसा है ये मुझे पसंद है. और मैं वह अकेली क्यों राहु?", आँचल का व्यवहार अर्जुन की समझ से बहार हे हो चला tha.Kaha तोह वो पहले उसके सामने तक नहीं आ रही थी उस हादसे के बाद और अब वो अलग होने का नाम नहीं ले रही थी. जैसे तैसे उसने ठेले वाले को एक प्लेट बनाने का कहा और ख़ामोशी से आसपास देखने लगा.

ये जगह गाँव में उनकी हवेली से विपरीत दिशा में थी और इसके पास हे वो khel-bhwana और धर्मशाला भी थे लेकिन आये वो लोग दूसरी गली से थे. लकड़ी के इस्पात लगे फल पर वो व्यक्ति कुशलता सा बर्फ ghis-ghis कर अनगिनत कटोरियाँ भरता रहा और फिर बाद में उनके ऊपर लच्छे गिरा कर लाल मीठे रास से रंग कर सभी बढ़ते हाथो में सौंपता रहा. अर्जुन को भी जल्द हे उसकी प्लेट मिल गयी.

"देख के पहलवान. कमीज खराब करेगा.?", ये युवक कुछ ज्यादा जल्दी में था और उसके धक्के से वो प्लेट कुछ हिली तोह मीठा पानी चालक गया.

"माफ़ करना भाई. भीड़ है तोह हो जाता है.", अर्जुन ज्यादा बहस किये बिना आँचल के पास लौट आया जो उसके हाथ से प्लेट लेती मोटरसाइकिल पर बैठ बड़े चाव से वो बर्फ वाला फालूदा खाने में जुट गयी.

"देख क्या रहे हो? एक और बनवा लो लेकिन मीठा शरबत ज्यादा डलवाना.", अर्जुन जी हुजूरी करता वापिस रेहड़ी पर आया तोह हाल पहले वाला हे था लेकिन अब कुल्फी खाते कुछ युवको का झुण्ड उसको घूर रहा था. मशक्कत करता वो फिर से आँचल के पास लौटा और सब पहले जैसा हे हुआ. इस दौरान 4 प्लेट खाने के बाद भी हटने का नाम न लेती दिखी तोह अर्जुन ने झुंझलाते हुए जबरदस्ती उसको मोटरसाइकिल पर बैठाया और वह से चलने लगा.

"वीर जी, वि (20) रुपये डंडे जाओ.", अर्जुन ये भी भूल गया था के उसने पैसे नहीं दिए है. उसका मैं इतनी जल्दी विचलित हो गया था लेकिन वजह इतनी सी तोह नहीं हो सकती थी. गुस्से में 50 का नोट रेहड़ी वाले को थमा कर वो बिना छुट्टे पैसे वापिस लिए आँचल से ज्यादा बात किये बिना वापिस हवेली की तरफ बढ़ चला.

"सॉरी अर्जुन. मेरे से गलती हो गयी शायद लेकिन तुम गुस्सा तोह मैट करो. गाँव देखने नहीं जाना था तुम्हे? हम स्पोर्ट्स सेण्टर चलते है न."

"मैं खुद चला जाऊंगा और मैं आपसे गुस्सा नहीं हु लेकिन कुछ तोह आपने जानबूझ कर किया होगा. जब याद आ जाये तोह बात करेंगे इस बारे में.", अर्जुन ने इसके आगे आँचल की किसी भी बात का कोई जवाब न दिया. इस सबमे हे लगभग आधा पौने घंटा लग गया था और हवेली के बहार हे आँचल को उतार वो बिना उसकी तरफ देखे वापिस मदद गया. मोटरसाइकिल एक बार फिर वही आ रुकी थी जहा वो आया था. अब वो लड़को का झुण्ड करीब हे बानी 2 फ़ीट ऊँची दिवार पर पिछवाड़ा टिकाये बैठे थे और अर्जुन को देख चेहरे से हे गुस्सा जाहिर करने लगे.

"एक प्लेट बनाओ तोह. पैसे जमा है मेरे 30 रुपये.", अर्जुन इस बार औपचारिक तरीके से न गया था. जिस लड़के से पहले वो टकराया था उसको कन्धा लगा कर एक तरफ सरकता हुआ रेहड़ी वाले के सामने खड़ा हो गया. उसके चेहरे को देख रेहड़ी वाला बर्फ घिसने लगा.

"पहले वि कहा स पहलवान की दीदा (आईज) खोल के चल. लगदा घट्ट सुनाई डंडा है घट्ट सुनन दे नाल. तेरा शहर नई हैगा, साहड़ा पिंड है तेह मैं है सरपंच केवल सिंह डा मुंडा नवाब सिंह.", लड़का वो भी गबरू था पूरा, तक़रीबन 6 फ़ीट और भरे हुए देसी शरीर वाला.

"नै खुल दिन मेरी आंखों काका. दस् तू किथे डॉक्टर लगेया जेहड़ा बाला ध्यान दे रेया? होवेगा नवाब अपने घर, पिंड तेरे कल्ले डा नै. पारा हो तेह अपना कम् कर.", अर्जुन के मुँह से ठेठ देसी पंजाबी सुन्न कर और ऐसी जलालत लेने के बाद वो युवक कांपती गर्दन के साथ उस दिवार की तरफ बढ़ चला जहा बाकी 6-7 युवक बैठे थे.

"बाई जी, यह तह सरपंच साहब डा मुंडा है लेकिन ओह सारे लागे दे पिंड दे शरारती मूंदे ने. तुस्सी शहरी बन्दे हो तेह यह इत्थे दे, नाल कालेज (कॉलेज) तोह. पन्गा वध जाऊ, तुस्सी कल्ले हो.", रेहड़ी वाला व्यक्ति भी समझदार था लेकिन अर्जुन अपनी समझ एक तरफ रखता वो मीठे फलूदे की प्लेट लिए धीरे धीरे खाने लगा. नजरे उन युवको पर टिकाये जो अपनी जगह से उठ चुके थे. उनमे से सिर्फ एक युवक अर्जुन की तरफ चलता हुआ आया.

"वड्डा हीरो है तू किथे डा? गलत पन्गा ले लिया तू काका. पिंड डा नहीं है ेसलाई एक मौका डंडा है. तित्तर हो जा होने नहीं तह घर दिया न था छड़ प्रधान दी पौती न वि तू नयी मिलना. परले ऊँचे पिंड तोह है मैं.", वो लड़का इतना बोल गया और अर्जुन ने उसका गाल खींचते हुए ऐसे जवाब दिया की वो देखता हे रह गया.

"ोयी.. डरना है तू मैनु? उम्म्म्म.. वड्डा हो गया काका तू तह. चल अपने सारे नयने (बचे) समेत तेह तित्तर तू हो जा. ओह जेहड़ा काले कुर्ते विच है न उसने छड्ड के. बाकी ऐ नवाब डा पट था इत्थे डा हे है. ेह्णु मैं आराम न वेख लेना. चलो बीटा, शाबाश.. अन्हेरा हो रहा.", अर्जुन ने एक हाथ में प्लेट और दूसरे से उस युवक की पतलून पिछवाड़े की तरफ से पकड़ कर जिस तरह घुमा दिया तोह वो असहाये सा वैसे हे मदद गया. पता तोह चल गया था उसको की ये पहलवान निडर भी है और कुछ सोच के तैयार भी. और कहते कुछ बना हे नहीं जवाब में. एक बार फिर वो सभी एकत्रित थे और अर्जुन को घूर रहे थे.

"अर्जुन बाई जी. ाचा हुआ बाई जी आप यही मिल गए. आओ चले अखाड़े, मास्टर जी और अपने दोस्तों से आपको मिलवाता हु. दीपा भाभी ने बताया की आप तोह वड्डे प्रधान जी के पौटे हो. पहले हे बता देते बाई जी. मैं तोह आपको दूर का रिश्तेदार समझ रहा था.", निहाल आदत से मजबूर अर्जुन को देखे हे खुश हो गया था और ऊँची आवाज में ये बात जैसे उसने सभी को सुना दी थी जो आसपास थे, उन युवको समेत.

"भैया अब इसमें कोई राज थोड़ी न है. और देखो हम दोस्त बन चुके है तोह वैसे हे बने रहो. ये आप वाप मैट कहो मुझे. आप बड़े हो और दोस्त है तोह फिर कोई फालतू िज्जात्त नहीं. अखाड़े चलते है लेकिन पहले मुझे इस काले कुर्ते वाले से बात करनी है साथ हे सरपंच के शहजादे से."

"शहजादा नै बाई नवाब है. ोये नवाब बाई, इधर तोह आ जरा. और इस बाइंडर को भी बुला, अमली न हो तोह किसे था डा.", निहाल की पुकार सुन्न कर वो सभी लड़के सकते में आ चुके थे और रेहड़ी वाला तोह खुद सकते में था की वो जिसको सलाह दे रहा है वो लोगो को सलाह देता है.

"इन्हे जाना है निहाल अपने पिंड. मैं भी बाद में मिलता हु.", अब नवाब खिसकना चाहता था और 2 युवक उन hare-saleti चेतक स्कूटर की तरफ बढे लेकिन अब अर्जुन खुद हे उनके सामने आ चूका था.

"एक तरफ हो जा नहीं तोह यही नवाबी इस नाली में मिला दूंगा. और फिर दार जी भी बचने नहीं आने वाले.", नवाब अर्जुन के सामने आने लगा था उस युवक के बचाव में लेकिन एक हलके धक्के से हे वो उन स्कूटर वाले युवको की तरफ भटक गया. हलकी खिचड़ी दादी, आँखों में ज्यादा हे लाली और कड़ा पतला जिस्म था उस युवक का जो अर्जुन को खटक चूका था. घूर वो भी रहा था अर्जुन को जैसे उसको उम्मीद हो अपने दोस्तों से. निहाल मामले को समझ पता उस से पहले हे थप्पड़ की जोरदार आवाज के साथ उस युवक का जिस्म पिछली दिवार के सहारे टिक गया. होंठ फट चूका था और बाकी सब बस दर्शक की तरह समझने की कोशिश कर रहे थे की हुआ क्या.

"तू बोल रहा था न की जैसे वो खा रही है तू उसको अपना खिलायेगा. और भी कुछ कह रहा था.. हाँ जरा बोल तोह क्या कह रहा था तू? लुंड पर मीठा गिरा के चटवायेगा? निकाल बे देखु ऐसी कौनसी टॉप लिए तू घूमता है जो घमंड है.", अर्जुन ने पयजामे की डोरी हे खिंच कर टॉड दी थी उस युवक की लेकिन बाकी समझ चुके थे की इस फसाद की जड़ क्या है. निहाल अर्जुन के समीप आ गया.

"बाई इसने यह गाल किस्ड बारे कही स?", और जिस तरह उस भोले सरदार ने गर्दन दबोची थी बाकी सभी वह से और दूर हो गए.

"दीदी के लिए बोलै था इसने. क्या बहिन को हक़ नहीं निहाल भाई मार्किट में अपनी मर्जी से आने का और जैसा सब करते है वैसा घूमने खाने का? सुना था के ये गाँव बहोत अलग है. व्यवस्था है पूरी और लोग ऐसा वैसा गलत काम नहीं करते.", अर्जुन एक कदम पीछे हट गया था लगाम निहाल के हाथो देख.

"सही सुनिया स तुस्सी बाई. ये बाइंडर साला इतना वड्डा हो गया के पिंड विच सरे -राह साडी बहिन लायी पूठा बोलेगा? चल पुत्र तू तह अखाड़े हे चल. बुलाने है तेरे घर दिया न.", लेकिन बोलने के साथ साथ निहाल ने तोह उसको वही पटक भी दिया था. अब उस युवक ने गिरते हे उसके पाँव पकड़ लिए और नवाब भी हिम्मत करता अपने दोस्त के बचाव में आ गया.

"जाने दे निहाल. मई गलती मैं डा है बाई तुहाडे तोह भी. मेरे दोस्त ने लेकिन हूँ पिंड नहीं बुलंद ेहना न. एक वारि छड़ दो बस. वेखो भीड़ काठी हो गयी तह मुश्किल हो जाना.", वो युवक तोह गिरने के बाद से जमीन पर पड़ा था, निचे से लगभग निर्वस्त्र टांगो के साथ. हाथ उसके भी जुड़ चुके थे.

"जाने दो निहाल बाई. मुझे भी गुस्सा ज्यादा आ गया था जो ठीक नहीं. कभी कभी रोक नहीं पता न जब कोई गलत बात करे वो भी ऐसी जगह जहा उम्मीद न हो. निकल जाओ तुम लोग जिस भी ऊँचे निचे पिंड से. आइंदा नजर भी आये तोह फिर पक्का अखाड़े ले जाऊंगा और वह कोई नियम नहीं होगा.", अब 2 और युवक करीब आये और अपने उस दोस्त को उठाने के बाद जैसे तैसे पजामा ठीक करके स्कूटर में बीच बैठा कर निकल लिए. दूसरा स्कूटर भी उनके पीछे चल दिया जिस पर 4 लोग थे सरपंच के लड़के को मिला कर.

"चलो निहाल भाई, कही आराम से बैठते है."

"बाई तुम अखाड़े हे चलो. वही बैठना और मास्टर जी से बात करना. बड़े जुल्मी आदमी है बाई वो. मजा आ जायेगा उनसे मिल कर तुम्हे. वैसे समझदार हो जो बात नहीं बधाई. प्रधान जी तक जाती तोह इसकी गर्दन अलग हो जानी थी. विनोद जी तोह गोली हे मार देते लेकिन तुम बाई ताक़त के साथ साथ ठन्डे आदमी भी हो. बुलट यही रहने दो, पैदल चलते है.", निहाल निक्कर और बिना ब्याह की टीशर्ट में था तोह उसका जिस्म साफ़ दिख रहा था अभी. ाची म्हणत की थी उसने ये तगड़ा शरीर बनाने में. चाहे वो काम था अर्जुन से लेकिन था मजबूत. दोनों पक्के दोस्तों की तरह हँसते बतियाते उस तरफ चल दिए जिधर खेल स्थल था. लेकिन गाँव में पहले हे दिन ऐसी हरकत करके अर्जुन दर्जन भर युवको की नजर में तोह आ हे चूका था.

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हवेली वापिस लौटने तक अँधेरा गहराने लगा था और 8 बजे अर्जुन जब वह दाखिल हुआ तोह हाथ में जीन्स और टीशर्ट लिए था. अब वो ठीक निहाल वाली हे पोषक में था जो उसको मास्टर जी ने खुद दी थी. आँगन में हे चारपाई पर पसरे कृष्णेश्वर जी हुक्का गुदगुदा रहे थे और 2 देसी श्वान उनके करीब फर्श पर ऐसे बैठे थे जैसे किसी की प्रतीक्षा हो.

"आ गया बीटा? बड़ी देर लगा दी तुमने और आँचल बता रही थी की तुम उसको बता कर भी नहीं गए. ये खिलाडी वाले कपडे?" देवकी जी ने तोह प्रश्नो की झड़ी हे लगा दी थी अर्जुन के आते के साथ. कृष्णेश्वर जी ने जगह बनाते हुए अर्जुन को अपनी हे चारपाई पर बैठाया और वो हे जवाब देने लगे.

"खेलने कूदने पतलून में तोह नहीं जाएगा जी. और जुगराज ने दिए होंगे ये. तोह बीटा पसनद आया हमारा krida-sthal?"

"जी छोटे दादा जी और वो कोच साहब तोह बड़े हे बेहतरीन इंसान है. पहले तोह वो काफी समय तक मुझसे बात करते रहे और उन्हें पता था की मैं कौन हु. फिर बाकी सब कबड्डी की प्रैक्टिस कर रहे थे तोह उन्होंने मुझे शहीद भैया के साथ कुश्ती का अभ्यास करवाया. उनका कहना है की मुझे तोह 2 घंटे काम से काम कसरत की जरुरत है. लेकिन पहला दिन था इसलिए उन्होंने काम हे अभ्यास करवाया.", अर्जुन जैसे बहोत साड़ी बातें करना चाहता था लेकिन उसके लिए पानी ले कर आयी मीणा ने जब मुँह पर कपडा रखा तोह ध्यान आया की जिस्म पर अखाड़े की मिटटी लगी है और पसीना भी.

"शहीद सिर्फ अभ्यास हे करता है बीटा. वो बहोत बढ़िया खिलाडी था कभी लेकिन बाए पाँव में चोट आने की वजह से वो आगे खेल न पाया. सुबह अभ्यास करने जाओ तोह तुम्हे सही जोड़ीदार मिल सकता है. नवीन तुम्हारे मुकाबले का भी है और शहीद की तरह कुश्ती का वाकिफ भी. वैसे तुम्हे अभ्यास हे करना है तोह जिस मर्जी के साथ करो. कबड्डी वालो से भी jaan-pehchan रखना, भले लड़के है."

"जी दादा जी. वैसे आप वह पर नए ज़माने की थोड़ी मशीन लगवा दीजिये अगर मुमकिन हो. इतने बेहतरीन संस्थान और कोच है वह लेकिन कुश्ती वाले सभी खिलाडी मशीन होने से और बेहतर होंगे. मैं नाहा कर आता हु. फिर खाना खाते है.", अर्जुन के हाथो से देवकी जी हे उसके कपडे ले गयी थी. उन्हें अनामिका ने बता दिया था की दिन में अर्जुन ने स्वयं कपडे धो लिए थे.

"नहाने कहा जाना है बीटा? वो पंप चल रहा है और टोलिया बांध के बैठ जा ठन्डे पानी के निचे. मशीन के लिए विनोद को बोल देता हु, तुम देख आना उसके साथ सेहर जा कर और फिर वो भिजवा देंगे. दामिनी बिटिया, अर्जुन को यही अंगोछा ला दो और टोलिया भी.", अर्जुन को ये निराला अंदाज भी भय कृष्णेश्वर जी का. पूर्ण देहाती जिसमे कोई लाग लपेट न था. अर्जुन वही जूते खोल कर बनियान उतारता हुआ उस बड़ी हौद के पास चल दिया जहा मोटर चालू थी.

"बीटा, ये इधर घुमा ले और यहाँ से इसको चालू कर. बैठा जा फिर इसके निचे और रगड़ के नाहा.", दामिनी जिस तरह से उस हलकी अँधेरे वाली जगह पर अर्जुन के सर पर झुकी थी उसने लगभग अपने वो भरी चुके उसके सर पे हे टिका दिए थे. जबतक अर्जुन कुछ समझता वो हंसती हुई दूर हट गयी और पानी का तेज बहाव सीधा अर्जुन के चेहरे पर.

"सुधर जा ऋ सुधर जा. तेरा बचपना न जा रहा बचपन गुजरे 25 साल बाद भी. बीटा इसका बुरा न मान न, ये है हे उद्दंड.", देवकी जी उन कुत्तो के लिए हारे से दूध लिए करीब से गुजरी थी और शायद उन्होंने वो हरकत भी देख ली थी जो सिर्फ अर्जुन ने महसूस की. पर उनका ऐसे नजरअंदाज करना मतलब जैसे कुछ हुआ हे न हो. दामिनी टोलिया तार पे टांगने के बाद दिखावे के लिए अर्जुन की सहायता करने लगी. पहले साबुन देते हुए और फिर वापिस लेते हुए.

"ऐ दामिनी, ये आँचल बिटिया कहा गायब है? बुला ले उसको जरा. उसकी पसंद के मीठे चावल बनाये है गुड़ वाले, नारियल दाल कर. और आप भी भोजन कर लो जी.", देवकी की आवाज से दामिनी को जाना हे पड़ा और अर्जुन म्हणत से लगी हुई मिटटी धुलने के बाद कमर पर टोलिया लपेट निक्कर धो कर तार पे डालने के बाद वह से अपने कमरे की तरफ चल दिया. वो हैरान रह गया जब ढला हुआ दरवाजा खोल कर अंदर आया. अँधेरे को काम करने के लिए वह सिर्फ जीरो का बल्ब जगमगा रहा था और बिस्टेर पर कमर टिकाये कोई शक्श पहले से बैठा था.
 
अपडेट 196 (1)

बाघ

"इधर बैठो मेरे पास और दरवाजा बंद कर दो पहले. माँ की परवाह छोडो.", कमरे में ये आँचल थी और उसके गंभीर लहजे को देख अर्जुन वैसे हे गीला टोलिया लपेटे हुए उसके सामने कुछ दुरी पर आ बैठा. पाँव जमीन पर टिकते हुए.

"मेरे कमरे में और वो भी ऐसे काम रौशनी में?", अर्जुन को समझ नहीं आ रहा था के अब वो और क्या कहे. पहले हे शाम को हुई घटना की वजह से वो अब आँचल से कुछ कटरा रहा था.

"मैं बस देखना चाहती थी की तुम सचमुच भले इंसान हो या बाकी सभी की तरह भेद की खाल में सियार. भेड़िया इसलिए नहीं कहा क्योंकि वो ज्यादा पारिवारिक जीव होता है अर्जुन. दिल का साफ़ और सच्चा. बड़ी हु तुमसे तोह ek-aadh गलती करने का हक़ है न मुझे?", अर्जुन ये सुन्न कर हे सकते में आ गया था के आँचल उसको आजमा रही थी तब और उसका ऐसा कहना की बाकी सभी सियार है तोह सोच से हे अलग था. इसलिए वो दरवाजा बंद करवाया था आँचल ने.

"तोह मैं भेड़िया हु या सियार? और ऐसी गलती हर रोज भी कर सकती हो लेकिन मैं किसी भी गलत जुबान को बर्दाश्त नहीं कर सकता, खास कर जब वो मेरे अपनों के लिए वैसा कहे.", अर्जुन शांत था अपनी बात कहने के दौरान.

"तुम बाघ हो. और मैं जान गयी थी की तुम वह वापिस जाओगे और कुछ न कुछ जरूर करोगे. यही डर मुझे इतनी देर से इस कमरे में बंद किये है लेकिन तुम सलामत हो तोह मैं भी अब बेफिक्र हु. वैसे हर जगह ताक़त का प्रदर्शन तुम्हारे खिलाफ जा सकता है. अगर तुमने वह कुछ भी जोशीला किया होगा तोह कल तक बात फ़ैल जायेगी."

"नहीं फैलेगी और वो गुस्सा ज्यादा देर तक बरकरार नहीं था. मिटटी में पसीने के साथ उसको ख़तम करके आया हु मैं. लेकिन आप जैसे बहोत कुछ अपने भीतर समेटे हुए हो और मुझे आजमाने की अभी भी ठोस वजह नहीं दी आप. कौन सियार है यहाँ?", अर्जुन अपनी जगह स्थिर बैठा था जिसका हाथ पकड़ कर आँखों के इशारे से हे आँचल ने उसको करीब होने को कहा. वो सरक कर अब बिलकुल आँचल के करीब आ चूका था.

"दीवारे खोखली हो जाती है ऐसी हवेलियों की और उनका स्थान अदृश्य कान ले लेते है. मैं तुम्हारे बारे में कुछ भी नहीं जानती लेकिन यहाँ कुछ लोग है जिनकी थोड़ी पहचान तुम्हे जरूर होनी चाहिए. मेरे नाना जी अपने नियम में रहते है, सबसे हंस बोल कर जीने वाले मेहनती इंसान. ज्यादा समय उनका khet-khalihaan, पंचायत और गाँव सुधार में गुजरता है. जितना वक़्त आज वो घर है उतना अक्सर नहीं होते. भोले भी है कुछ तोह उनके साथ तुम सुरक्षित हो. नानी बिलकुल उनके जैसी नहीं है और मैं नहीं जानती की वो कैसी है लेकिन मैं अपनी माँ को बेहतर जानती हु और माँ का सम्बन्ध नानी से बहोत गहरा है. इतना गहरा की तुम उसको नापने की कोशिश भी मैट करना.", आँचल बहार कुछ आवाज सुन्न कर एक पल रुकी और अर्जुन के मुँह पर भी उसने हाथ रख दिया जैसे वो जवाब देने वाला हो.

"गलत समझ सकते है अगर उन्हें पता लगा की आप मेरे कमरे में हो और मैं इस हालत में था आपके साथ.", अर्जुन के कहने का मतलब समझते हे आँचल ने गौर किया तोह उसका कहना बिलकुल सही था. अब मुँह पर रखा वो हाथ कांपता हुआ बिस्टेर पर टिका. एक तरह से तोह आँचल अर्जुन के पीछे हे छिपी हुई थी अगर कोई दरवाजे से डेक्था. और अर्जुन बिना कमीज या बनियान के सिर्फ एक पतले से तोलिये में.

"हँ.. रात को बात करते है.", आँचल उठने लगी तोह अर्जुन भी साथ हे खड़ा हुआ कपडे पहन ने के लिए लेकिन उसको पता भी नहीं चला के उसका टोलिया पहले हे घिसटने की वजह से ढीला हो चूका था जो अब फर्श पे गिरा था. अर्जुन ने आँचल को शांत रहने का इशारा करते हुए कड़ब कपडे लेने के लिए बढ़ाया. आँचल की आँखें अपनी सीमा तक फ़ैल चुकी थी अर्जुन की टांगो के बीच झूलते उस भुजंग को देख. सुप्त मुद्रा में भी 6 इंच से ऊपर था वो अंग जिसकी मोटाई असाधारण. अर्जुन को इसका एहसास हे न था और जब वो पीठ किये हुए अपनी सूती निक्कर पहन ने लगा तोह अब बारी उसकी थी.

"सॉरी.. अपनी आँखें बंद कर लो आप.", और जिस फुर्ती से अर्जुन ने अपना जिस्म कपड़ो में छुपाया था न चाहते हुए भी आँचल मुँह छिपा कर हंसने हे लगी. अर्जुन की तोह समझ से हे बहार हो गया था इस माहौल में कुछ भी कहना.

"टोलिया मैं ले कर जा रही हु और ठीक 11 बजे गलियारे से दूसरी तरफ मिलना. नंगे पांव आना और कपडे पहन कर.", आँचल दरवाजा खोलने के लिए आगे जाने लगी तोह अर्जुन ने टोक हे दिया

"सुबह बात नहीं कर सकते? देख रहा हु की आपसे 3 बार मुलाकात हुई है आज एक हे दिन में और तीनो बार कुछ न कुछ घटना ऐसी हुई है जिसका मलाल दोनों को है. दिन के उजाले में यही कही खुली जगह बात कर लेते है."

"देखा जाए तोह हिसाब बराबर हो गया. हाहाहा.. लेकिन तुम्हे नहीं लगता के और भी कुछ हुआ होगा इस एक दिन में तुम्हारे साथ? जहा मैं नहीं थी? सुबह तक देर न हो जाए अर्जुन इसलिए मैं चाहती हु की तुम हालात और इंसान को ाचे से समझ लो. मैं तोह शायद कल चली भी जाऊ वापिस.", आँचल के जाने के जीकर पर अर्जुन ने सहमति जाता दी.

"ठीक है फिर. 11 बजे गलियारे के आखिर में. वैसे ऊपर छत्त पर ज्यादा सुरक्षित नहीं?"

"वह से निकलने का एक हे रास्ता है लेकिन गलियारे के आखिर में बगीचे की दोनों तरफ से बहार आँगन में आने के 2 और गलियारे है और आगे बगीचे की तरफ भी रास्ता है. जगह ऐसी होनी चाहिए न जा फंसना मुमकिन न हो?", अब आँचल के दिमाग में क्या चल रहा था ये तोह वही बता सकती थी लेकिन अर्जुन उसकी समझदारी से खासा प्रभावित हुआ.

"ठीक है. और आप बहार जा कर कह देना की मैं फ़ोन पर बात करके आता हु.", अर्जुन कमरे से उसके साथ हे बहार निकला लेकिन फुर्ती से बैठक में जा घुसा जो बगल में हे थी. ऐसा लुका छिपी का खेल वो क्यों खेल रहे थे ये भी वही बता सकते थे. दामिनी फिलहाल रसोईघर में हे थी.

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"मैंने एक चीज पर गौर किया दादा जी की घर में 2-2 टेलीविज़न है लेकिन देखता कोई भी नहीं.", खाना होने के बाद जैसा अक्सर gaanv-dehat में रहता है वैसा हे इधर भी था. 9 से कुछ ऊपर हे वक़्त था की सभी लोग अपने अपने कमरों में जा चुके थे. मीणा भी पशुओ को देख कर पिछली तरफ हे बने कुछ कमरों में से अपने कमरे में चली गयी. उसका कोई परिवार नहीं था जैसा प्रतीत होता था और वो इधर कबसे थी ये अर्जुन ने जान ने की कोशिश भी नहीं की थी. बहार खुले आँगन में हे वो बड़ी सी चारपाई पर लेता आसमान में निकले तारो को देखता हुआ बगल वाली चारपाई पर आराम करते कृष्णेश्वर जी से बातचीत में लगा था. अभी विनोद और पप शर्मा वापिस नहीं लौटे थे.

"ऐसा नहीं बीटा. जब घर में कोई भी वास्तु है तोह उसका प्रयोग भी होता है. मैं तोह कभी कभार खबर देख लेता हु या कोई कृषि सम्बन्धी कार्यक्रम आता हो तोह वो. घर पे रहता भी कितना हु आखिर और खेत में रेडियो रहता है मेरे पास. तुम्हारी छोटी दादी अपनी पसंद के देखती है शनिवार ऐतवार को. हाँ विनोद को जरूर चस्का है लेकिन वो भी यहाँ ज्यादा नहीं होता तोह उसके कमरे वाले की तोह मैंने आवाज हे यदा कड़ा सुनी. बहु चला देती है बचो वाले बाबू के मनोरंजन के लिए. और ाची बात है की ये डब्बा ज्यादा नहीं चलता. लोगो से मिलना और बातें करना इस से कही बेहतर है. कल मेरे साथ चौपाल चलोगे या baag-khet देखने?"

"दामिनी बुआ कह रही थी की आप जल्दी वह चले जाते है और मैं उनके साथ हे जाऊ जिस से उनकी भी बोरियत काम हो जाए.", अर्जुन ने यहाँ भी दामिनी के कंधे पर बन्दूक चलाई जिस पर कृष्णेश्वर जी ने हामी भर दी.

"ाची बात है. उसको शुरू से हे बड़ा चाव है कुदरत और baag-bagiche देखने का. छोटी थी तोह मैं कंधे पर लेके जाता था उसको और वो वह मिटटी के घरोंदे बनती, फल बटोरती तोह कभी बड़ी हौद में हे डुबकी लगा लेती. बचो को यही सब करना चाहिए जिस से उनका सही विकास हो. रौशनी भी जाती थी लेकिन वो आज भी नादान और थोड़ी दब्बू है. बिनोद सबसे छोटा है तोह वो अपनी माँ के आँचल से लगा रहा 15 बरस और उसके बाद सीधा शहर की उड़ान भरी उसने. खैर जिसका जो दिल करे वो करो. बस परिवार के सम्मान को बरकार रखना जरुरी है. बड़े भैया इस मामले में ज्यादा अनुशाषित है और मेरा गठजोड़ थोड़ा नासमझ उम्र में हे हो गया जिस वजह से मैं उनके जैसा नहीं बन पाया."

"ऐसी बात नहीं है दादा जी. बड़े दादा जी तोह हमेशा आपकी तारीफ हे करते है की आप भी नियम और कर्त्तव्य के पक्के हो. इतना काम आप अकेले हे कितने सालो से देखते आ रहे हो जबकि उधर तोह दादा जी की मदद के लिए कितने हे लोग है और papa-chacha-tauji भी. ऐसे में परेशानी तोह आपको हे ज्यादा होती होगी.?", अर्जुन कहा उलझा रहा था उन्हें ये वो खुद भी नहीं जानते थे.

"हाहाहा.. ये भी कोई कठिन काम है बीटा? 4 दर्जन आदमी है खेत सँभालने के लिए और उसके आधे बगीचों की देखरेख करते है जब सीजन होता है. नहीं तोह उधर के भी लोग मैं खेतो में लगा देता हु. Hisab-kitab के लिए भी मुनीम है वह और सामान तोह फ़ोन पे बता दो तोह beej-khaad यहाँ पहुंच जाता है. इसकी कोई अलग शिक्षा नहीं होती जब आप जमीन पर रह कर हे पीला बढे हो. बड़े भैया को तोह मुझसे भी गहरी जानकारी है फसल, बीज और खेती बाड़ी की. बस जैसा सब चाहते थे वैसा हो न पाया और वो यहाँ से दूर नौकरी पे चले गए. वैसे तुम्हे अगर दरगाह के मेले में होनी वाली प्रतिस्पर्धा में भाग लेना हो तोह याद दिला देना. जुगराज को मैं बोल दूंगा तोह वो तुम्ही किसी की जगह खिला लेगा. अनुभव लेना चाहिए ऐसे अवसर का.", हवेली का एक कपाट खुला और जीप भीतर दाखिल होती हुई अपनी जगह जा रुकी. विनोद और पप शर्मा लौट आये थे जिनकी चाल बता रही थी की पप ने कुछ ज्यादा हे पी राखी है लेकिन विनोद बेहतर था.

"सोये नहीं भतीजे? पापा आप भी जाग रहे हो आज?", विनोद ने वही नल चला कर कुल्ला किया तोह उसके ढूंढ़ने से पहले हे अनामिका टोलिया लिए मजूद थी. चेहरा साफ़ करके विनोद ने वापिस टोलिया अपनी बीवी को थमा दिया. पप शर्मा तोह रुके बिना सीधा कमरे के भीतर हो लिया. अनामिका ने खाने का पुछा तोह जवाब मिला के खा चुके है.

"बस चाचा सोने हे वाले है. दादा जी से khet-bagiche की बात कर रहा था. सुबह जल्दी उठ कर घूम आऊंगा वह भी और फिर आपके साथ नाश्ता करूँगा.", अर्जुन विनोद को यहाँ से चलता करना चाहता था और विनोद का भी अलग हिसाब था जैसे.

"हाँ भाई मुझे भी नींद लगी है. कल रात भी घर 2 बजे लौटना हुआ था इसलिए सोया नहीं. सुबह आराम से नाश्ते साथ करेंगे और फिर मैं तुम्हे कुछ जरुरी लोगो से मिलवाने के बाद शहर निकल जाऊंगा. पापा आपने भी जल्दी उठना है और आराम करते भी नहीं.", विनोद की बात सुन्न कर उन्होंने करवट लेते हुए जवाब दिया.

"बोलना बंद करोगे तभी सो सकूंगा प्रधान जी. राम तुम्हारा भला करे. शुभरात्रि अर्जुन बीटा.", ये तोह कमाल की बात थी. कृष्णेश्वर जी सचमुच जल्द हे सो गए थे, मजाक करने के बाद. विनोद के कमरे से बचे के रोने की आवाज हुई तोह अनामिका पहले वह पहुंची और फिर विनोद भी. 10 बजने से पहले हे हवेली खामोश हो चुकी थी लेकिन कुछ लोग थे जिनकी आँखों में नींद नहीं थी. अर्जुन ख़ामोशी से आँखे मूंदे अपने सरहाने राखी कलाई घडी की tik-tik, हवा से हिलते पत्तो की हाली char-char और दूर कही भोंकते कुत्तो की वो धीमी आवाज सुनता हुआ निर्जीव आसान में पड़ा रहा. इन सभी आवाजों में अब एक तेज सुर जुड़ चूका था, कृष्णेश्वर जी के खर्राटों का लेकिन अर्जुन वो भी मजे से झेलने लगा कान सजग किये.

'काट... चररर... काट', ये ध्वनि इतनी धीमी थी की साधारण इंसान शायद हे इस पर गौर करता. लेकिन अर्जुन सतर्क हो गया था इस दरवाजे के खुलने से जो किसी के भी कमरे का हो सकता था. कदमो की भी ख़ास आहात न हुई लेकिन कुछ हे लम्हा गुजरा होगा जब ऐसी दूसरी आवाज हुई और इस बार जो भी था वो विनोद के कमरे से निकला था. कदमो की हलकी सी आहात इतनी करीब से तोह अर्जुन सुन्न हे सकता था. वो कदम स्थिर हो कर जैसे इन दोनों शख्स को देख रहे थे. फिर पुष्टि होने के बाद इनके भी जाने की आवाज धीरे धीरे विलुप्त हो गयी. अब अर्जुन ने ज्यादा हरकत न करते हुए बस घडी का बटन दबा कर समय देखा.

'10:40. लेकिन आँचल दीदी ने 11 कहा था. वही इन्तजार कर लूंगा इतने और ये भी देखु के ये 2 लोग कौन है.', अर्जुन ने मच्छर से बचने के लिए दी गयी चादर 2 तकियो को लंबवत करके उन पर ुधा दी. ये ज्यादा कारगर नहीं था लेकिन कुछ हद तक तोह अँधेरे में बचाव कर हे सकता था. अभी वो गलियारे की तरफ बढ़ता उस से पहले हे दामिनी वाले कमरे से एक साया निकल कर बिल्ली की तरह मुस्तैदी से गलियारे में दाखिल हो गया. उसने अर्जुन की तरफ देखा तक नहीं था और उसकी नजर से बचने के लिए अर्जुन पहले हे आउट ले चूका था. लेकिन दुरी ज्यादा होने की वजह से अर्जुन साये को पहचान न सका.

'जो भी हो, देखना तोह पड़ेगा हे की माजरा क्या है?', अर्जुन सामने वाले तरफ से आउट लेता हुआ अँधेरे से जा रहा था. कदम धीमे लेकिन बेआवाज. बंद गलियारे में तोह वो ऐसे माहौल में अपनी हे सांसें सुन्न सकता था और इधर अँधेरा कुछ गहराने लगा था क्योंकि आँगन की रौशनी कमरों तक हे सिमित थी जिस से ये पूरी तरह ढाका गलियारा इस वक़्त किसी सुरंग सा था. अंतिम छोर तक वो पहुंच चूका था जहा से एक तरफ चारा रखने वाला कमरा और दूसरी तरफ स्नानघर था. सामने खुले बगीचे से आती प्राकृतिक रौशनी ने अब दृश्य कुछ हद तक साफ़ कर दिया था जहा अर्जुन चेहरे न सही लेकिन जिस्म बखूबी देख सकता था. दोनों तरफ के दरवाजे खुले थे जिसका मतलब था के वो लोग इधर नहीं गए. सतर्कता बरकरार रखता हुआ वो चारे वाले कमरे के करीब आ खड़ा हुआ. अभी तक उसने आँगन की रौशनी में कदम न रखा.

'ये तोह bhool-bhulayya हे लगता है ऐसे समय पर. कमाल है 3 लोग थे और तीनो हे गायब है.', मैं में खुदसे बात करता हुआ अर्जुन आँखें मूँद कर यहाँ की छोटी से छोटी ध्वनि को खोजने लगा. ये भी एक तरह का ध्यान था जिसका अभ्यास वो अक्सर करता था. Ikka-dukka पत्तो का हिलना, झींगुर आवाज और फिर ये उनसे हलकी इंसानी. अर्जुन ने समझ चूका था के वो लोग किस दिशा में है. कमरे से आगे बगीचे की तरफ जाने की बजाये वो दिवार से सत्ता हुआ हे गलियारे की तरफ झाँकने लगा. ये इधर आने का दूसरा रास्ता था जो बहार आँगन से हो कर आता था, खुले आसमान के निचे. चारे वाले कमरे के पीछे भी कमरा था जिसका दरवाजा इस गलियारे में थे और ऐसे कुछ और भी कमरे थे. सीमेंट की गोलाकार 5 फ़ीट ऊँची टंकी के पीछे ये आकृति उसके सामने हे छिपी हुई इस कमरे में हे देख रही थी. अर्जुन बिलाव सी मुस्तैदी से ठीक उस आकृति के पीछे जा पंहुचा. वो एक स्त्री थी और उसके पलटने से पहले हे अर्जुन ने अपना हाथ उसके मुँह पर दबा दिया.

"श..", बहोत धीमे से कान में की गयी सरगोशी से वो दरी हुई बड़ी बड़ी आँखें कुछ सँभालने लगी. अर्जुन ने दबाव काम किया लेकिन हाथ नहीं हटाया. यहाँ से उस कमरे का पूरा दृश्य साफ़ साफ़ दिख रहा था जिधर मद्दिम पीली रौशनी में 2 लोग आपस में लगे थे. वो इधर देखते भी तोह बहार खड़ा व्यक्ति नजर नहीं आता लेकिन वो तोह अपने में हे लगे थे इन दोनों से 5 फ़ीट दूर.

"अब बताओ तुम इतनी क्या बेकरार थी जो कल तक रुका नहीं गया? आग बुझाने वाला नहीं मिला क्या दीदी जो इस be-gairat आदमी को बुलाना पड़ा वो भी अपने हे घर में जहा पति भी मौजूद है.?", ये विनोद था जो पीठ किये बैठा था और सामने झुकी हुई वो महिला सीढ़ी हुई तोह वो पूरी तरह बेपर्दा थी. एक कटरा तक नहीं था दामिनी के गठीले निर्वस्त्र बदन पर. इस दृश्य को देख अर्जुन की पकड़ में आगे कड़ी आँचल फड़फड़ाई तोह अर्जुन ने उसको फिर से दबा दिया. शायद ये बेटी अपनी माँ का ये रूप अर्जुन की मौजूदगी में कटाई देखना नहीं चाहती थी.

"तू हमेशा से मेरे आगे पीछे मंडराता रहता बिनोदिये और सोई हुई अपनी इस बहिन के बदन को अनिगिनत बार तूने बड़ी बेशर्मी से सहलाया भी है. आज जब मैं खुद तुझे मौका दे रही हु तोह तेरे इरादे नहीं दिख रहे इसको पाने के. मैं अब वैसी नहीं रही क्या जैसी कॉलेज टाइम थी?", इतनी बेशर्मी से दामिनी ने विनोद का हाथ पकड़ कर अपने सीने रख दिया था. विनोद जैसे असमंजस में था इस से पहले तक लेकिन उन बड़े गुब्बारे से चुचो को अपने हाथ में महसूस करते हे कास कास के निचोड़ने हे लगा. दामिनी ने दूसरे हाथ से विनोद का लिंग कपडे के ऊपर से हे पकड़ उत्तेजित करना शुरू कर दिया.

"इतनी मेहरबानी की वजह क्या है मेरी रंडी बहिन? तुम ऐसे तोह अपने बाप को भी नहीं बुलाती जबतक दिमाग में कोई खिचड़ी न चल रही हो. 27 साल.. मुझे याद है की 27 साल में इस जिस्म पर मेरे सिवा लगभग हर उस व्यक्ति ने मोहर लगाईं है जिस से तुम्हे काम पड़ा सिवाय एक-2 को छोड़ कर. जिनके निचे लेटने में तुम्हे सचमुच मजा मिलता था.", विनोद ने कमर उचका कर अपना पजामा ढीला कर दिया था लेकिन पाँव से बहार न किया. दोनों चुचो का जोरदार मर्दन भी जैसे दामिनी को जरा सा भी दर्द न दे सका. हाँ निप्पल फूल कर अंगूर जितने बड़े बड़े हो गए थे और दामिनी ने एक कदम और आगे बढ़ाते हुए दोनों पाँव फैला कर खुद को विनोद की गॉड में बैठा लिया. चेहरे आमने सामने और छूट का दबाव लुंड पर बनती उसकी हिलती कमर. दामिनी के कूल्हे इतने विशाल थी की कुर्सी के दोनों तरफ आधा आधा फुट उसका जिस्म बहार था. विनोद तोह जैसे उसके अधीन हे हो गया था इस हरकत के बाद. बिना कुछ आगे बोले उसने एक चुका मुँह में भर के चूसना शुरू कर दिया

"अपनी बड़ी दीदी को रांड बोलता हुए तेरे संस्कार कहा गए बिनोदिये.. ? समझदार भी होने लगा है तू तोह. उम्.. और थोड़ा सख्त भी. कुंवारी सील खोलने को मिलेगी तोह बदले में क्या कर सकता है?", दामिनी ने अब मुद्दे की बात की थी जब उसको लगा की विनोद उसके वश में आ चूका है. इधर आँचल ने थोड़ा जोर से अर्जुन का हाथ निचे की तरफ दबाया तोह वो टास से मास्स न हुआ लेकिन दोनों ने एक दूसरे को देखा तोह उस लड़की पर तरस खाते हुए अर्जुन ने मुँह आजाद कर दिया. यहाँ वो भी आँचल के जिस्म से पूरी तरह चिपका था जिसकी वजह भी यही सुरक्षित जगह थी जिदर से वो लोग इन्हे देख न सके. पर जिस्म ये भी दोनों जवान थे और अर्जुन फिर भी संयम से बस उन दोनों की बात सुन्न रहा था लेकिन आँचल ऐसे गरम दृश्य को एक तगड़े मर्द के जिस्म से सत् कर देखते हुए बेचैन हो रही थी लेकिन आधा ध्यान उसका भी अंदर वालो की बात पर था.

"कुंवारियों की दुनियां में कमी नहीं है बहिन लेकिन अगर कोई ख़ास है तोह सोच सकता हु. आठ.. धीरे कर बहोत वजन है तुझमे.. बोलो क्या चाहती है बदले में अगर कोई ऐसी है तुम्हारे पास जिसके लिए मैं ना नहीं कह सकता.", विनोद जैसे दामिनी के बस में होना नहीं चाहता था लेकिन उसके भरी शरीर की नरमी और ख़ास गीली मालिश अपना केहर ध रही थी. इधर मुँह खुलने के बाद आँचल की भी सांसें नाक की जगह मुँह से निकलने लगी और धड़कन किसी घंटे की तरह. अर्जुन का हाथ उसके सीने से थोड़ा ऊपर हे था जो पहले मुँह को ढके था. झुके होने की वजह से कूल्हों के बीच ardh-uttejit उसके लिंग का दबाव भी एक वजह थी आँचल के बदहवास होने के. इस सबसे अनजान अर्जुन बस दामिनी की बात ध्यान से सुन्न ने में लगा था. उसको अपने आसपास भी सजगता बरकरार रखनी थी.

"अर्जुन.. अर्जुन को दंगल तक ले जाना होगा तुम्हे. उम्म्म्म..", दामिनी ने जिस बुरी तरह विनोद के होंठो को मुँह में भर कर चूसा था आँचल ने इधर अर्जुन का हाथ अपने हाथ से दबा लिया. वो खुद हे उसके हाथ को अपने सीने पर उभरे उन 36 अकार के कच्चे खरबूजों पर ले आयी थी. लेकिन अर्जुन तोह जैसे बस कमरे में हे उलझा हुआ था. उसका नाम लिया था दामिनी ने और वो दंगल में क्यों पहुंचना चाहती थी.

"नहीं हो सकता. ये हरगिज नहीं करूँगा दामिनी चाहे फिर तुम ये अपनी फटी हुई फुद्दी तश्तरी में रख कर हे क्यों न परोसो या दर्जनों गाँव की कुंवारियां मेरे ऊपर वार दो. अर्जुन को मैं कटाई वह नहीं ले जाऊंगा जहा पापा और ताऊजी नहीं गए.", विनोद को ऐसे एकदम बिदकते देख अंदर उसके ऊपर बैठी दामिनी के साथ साथ बहार खड़ा अर्जुन भी हैरत में था.

"सोच ले बिनोदिये आराम से सोच ले. मेरी फुद्दी फटी हुई है या फुड्डा बन्न गयी है लेकिन बदले में मैं तुझे आँचल दे सकती हु. वो आँचल जिसको तू हर वक़्त लार टपकता घूरता रहता है. वो आँचल जिसको पाने के लिए तू किसी हद्द तक जा सकता है.. बिनोदिये तेरी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा सपना है न उसकी सील टॉड कर पूरी बेरहमी से भोगना? मैं सपने को हक़ीक़त में बदल सकती हु अगर तू ये काम कर दे. नहीं तोह फिर कोई और करेगा लेकिन एक बार और तेरी बहिन को किसी गैर के निचे बिछना पड़ेगा. मर्द मन नहीं करेगा लेकिन तुझे ाचा लगेगा अपने हाथ आयी इस माँ बेटी को ऐसे खोना? देख तेरा लुंड अकड़ कर हाँ बोल रहा है और तू कुछ भी नहीं. मेरी भी एक जगह आज तक कोरी है, उसका अकेला मालिक तू बनेगा बिनोद.. उम्..", आँचल का भी हाल अर्जुन जैसा हो गया था ये बात सुन्न कर. वो भी बदन में उठते कामुक एहसास को परे करती हुई अपनी माँ का एक और घिनौनापन देख रही थी जहा वो उसको हे दांव पर लगा रही थी.

"हाँ.. हाँ मुझे किसी भी कीमत पर आँचल चाहिए दीदी.. लेकिन अर्जुन को अगर कुछ हुआ तोह.. देखो तुम नहीं जानती वो लड़का गलत नहीं है. ऐसा करने से वो ताऊ जी की नजरो में गिर भी सकता है.. आह्हः.. क्यों करना चाहती हो तुम उसके साथ ऐसा? आह्हः..", दामिनी ने आगे जवाब थोड़ा उचक कर विनोद का वो 4-5 इंची लम्बा और मजबूत ऊँगली से थोड़ा हे मोटा लुंड अपनी गीली छूट के भीतर करने के बाद उछलते हुए दिया.

"पसंद तोह वो मुझे भी आ गया है बिनोदिये.. आह्हः.. और किसको नहीं आएगा जब तेरे जैसा सपोला भी उसकी तरफदारी करने लगे? उम्म्म्म.. मैंने तोह इरादा भी बना लिया है की उसके सट्टे (डंडे) से अपनी फुद्दी कुतवा के रहूंगी. घोडा है रे हमारा भतीजा, पूरा जंगली घोडा जिसका लुंड भी वैसा हे है. आह्हः.. तू बुरा न मान बिनोदिये.. उम्.. गांड मेरी तू हे खोलेगा लेकिन दामिनी ऐसे घोड़े की घुड़सवारी का मजा ले कर हे रहेगी चाहे वो आजतक कोरा हे क्यों न हो.. आअह्ह्ह...", दामिनी पूरी बेशर्मी से अपने दोनों चुके खुद हे दबती हुई एक laye-taal से विनोद के लुंड पर उछाल रही थी. विनोद इस लम्हे में ज्यादा देर सिर्फ हैरत की वजह से टिका था और वो झड़ने के करीब भी था.

"फिर .. चुड़ लो लेकिन .. अखाड़े में गया तोह उसके साथ कुछ भी हो सकता है.. ताऊ जी तोह एक बार को उसको माफ़ भी कर देंगे लेकिन ज़िंदा रहा तोह.. वो लोग प्रतीक्षा में है दीदी ऐसे मौके की और हमारे परिवार का लड़का देख शायद असूल भी भुला दे.. आह्ह्ह्ह...", विनोद इसके बाद बुरी तरह दामिनी को जकड़ता हुआ हिलने लगा. वो झाड़ चूका था लेकिन दामिनी उछलती रही जबतक की विनोद की लुल्ली छूट से बहार हे न निकल गयी. एक पाँव विनोद की जांग पर रख कर दामिनी बुरी तरह अपनी छूट को मसलने लगी जैसे वो अधूरी रह गयी हो और जल्द हे उसकी पहली हुई छूट ने कॉमर्स उड़ेल दिया.

"हाय रे बिनोदिये.. तू कैसे संतुष्ट कर सकता है किसी खेली हुई औरत को? इसलिए तू कच्ची अम्बियों के पीछे भागता है न? और फ़िक्र मैट कर अर्जुन मरेगा नहीं. इतना तोह नाम है अपने परिवार का और सुरक्षा भी रहती है चाहे gaanv-panchayat की हे सही. मुझे वजह नहीं पता इस सबकी लेकिन तू वैसा करेगा अब. उधर मेले के अखाड़े में अर्जुन उतरेगा और दूसरी तरफ तू आँचल पर चढ़ेगा. और तू ये मैट सोचना की अब तू पलट सकता है. ये चुदाई इसमें रिकॉर्ड हो गयी है बेआवाज.", इधर अर्जुन ने ये सब देखने के साथ हे उस रोशनदान को भी देखा जहा से 2 आँखें यही दृश्य देख रही थी. उनकी नन्ही सी चमक हे वो देख सका था लेकिन जान गया था के कोई चारे वाले कमरे में भी है. और उन आँखों ने भी अर्जुन को देखा जिसके बाद वो गायब हो गयी. अंदर विनोद के हालत तोह धोबी के कुत्ते सी हो गयी थी रिकॉर्डिंग वाली बात सुन्न कर. दामिनी उस वीडियो कैमरा को कुशलता से धक् कर बहार आने लगी तोह अर्जुन ने आँचल के कंधे दबाते हुए अपने साथ उस कोने में हे दुबका लिया. दामिनी ने भी तेज कदमो से उस जगह को छोड़ा और गुसलखाने का दरवाजा बंद होने की आवाज ने बता दिया था के वो वह गयी है. विनोद तोह अभी तक दोहरे सदमे में था की वो ख़ुशी मनाये या दुःख. परन्तु उस से ज्यादा विचलित थी आँचल, जिसको अर्जुन अपने बाहुपाश में ऐसे भरा था जैसे वो उसको कुछ होने नहीं देगा.

'हमे अपनी जगह वापिस पहुंचना होगा इन दोनों से पहले.', अर्जुन ने विनोद को झाँक कर देखने के बाद फुर्ती से सदमे में बैठी आँचल को किसी बची की तरह अपनी गॉड में उठाया और इधर से हे दबे पाँव बहार आँगन में जा पंहुचा. कार और जीप की आउट में आने के बाद उसने आँचल को जमीन पर खड़ा किया. ये जगह महफूज थी और सबसे ाची खासी दूर.

"डरना मैट जरा भी और गलती से भी ये जाहिर न होने पाए की हम दोनों कुछ भी जानते है. तुम्हे खरोच तक नहीं आने दूंगा आँचल, ये वादा करता हु. फिर चाहे एक क्या दस अखाड़े हे क्यों न उजाड़ने पड़े लेकिन तुम्हे न दामिनी छू पाएगी और न विनोद. तुम्हारी माँ के पीछे जो खिलाडी खेल रहा है उसको हे खोजने आया हु मैं यहाँ.", अर्जुन ने ऐसा आँचल के दोनों गाल अपने हाथो में ले कर कहा था. वो बस उसको सुनती रही जिस तरह से एक ख़ास हक़ से अर्जुन ये कह रहा था. आँचल ने अनजाने हे उसको बाहों में भर लिया.

"शठ.. शांत रहो और अपने कमरे में जाओ. मैं तोह नजर में आ गया तोह बच भी जाऊंगा. तुम बाथरूम का बहाना भी नहीं कर सकती ऐसे सटीक समय पर.", दामिनी अलग हुई तोह उसकी आँखों में पानी था और जबतक वो कुछ समझती अर्जुन ने बरी बरी से दोनों आँखे चूम ली.

"जाओ और सब भूल जाओ. ये बाघ इन सियारो से ज्यादा कुशल शिकारी है. बस तुम जरुरत में साथ देना.", अर्जुन ने उसको पलटा तोह पहली बार आँचल कुछ बोली.

"मैं तोह तुमसे 11 बजे मिलने वाली थी कुछ बताने के लिए. और भी कुछ है जो जरुरी है. लेकिन अब तोह कल मैं चली जाउंगी पापा के साथ."

"मन कर देना जाने से लेकिन अभी जल्दी से निकलो. बोल देना इधर वाले बाथरूम गयी थी.", अर्जुन ने समय ज्यादा होता देख ये बहाना सुझाया था और आँचल को गुम कर ये बहार वाले बाथरूम के सामने से जाने का कहा. उसने किया भी वैसा हे लेकिन अर्जुन उस जगह हे स्थिर खड़ा रहा. जब उसको लगा की आँचल पक्के आँगन तक पहुंच चुकी होगी, वो भी दिवार के किनारे चलता हुआ अपनी चारपाई तक जा पंहुचा. ठीक चारपाई पर बैठते थे गलियारे की शुरुआत में विनोद दाखिल होता नजर आया तोह अर्जुन जानबूझ कर हाथो पर खारिश का दिखावा करने लगा. विनोद थका हरा अपने कमरे में जाने लगा तोह अर्जुन को खुजाते देख यही आ गया.

"मच्छरों ने परेशां कर दिया क्या भतीजे? अगरबत्ती भी एक हे जलाई तुम लोगो ने वो भी पापा वाली तरफ. ऊपर से हवा भी नहीं चल रही. कमरे में सो जाओ चाहे मेरे वाले में. मैं माँ के कमरे में सो जाऊंगा.", विनोद अर्जुन के बराबर बैठा था अब और बाथरूम से निकल कर हाथ धोने के बाद उनकी तरफ आती आँचल को देख कर दोनों हे मैं मैं हैरान हुए. अर्जुन को तोह लगा था के वो कमरे में जा चुकी होगी और विनोद तोह बस उसके सामने होने से हे खुश हो जाता था.

"नहीं चाचा, आप मेरी वजह से परेशां न होये. मैं छत पर सो जाऊंगा. यहाँ मेरी तरफ ये हौद भी लगती है न तोह शायद इसलिए मच्छर है. आँचल दीदी आप भी जाग रही हो.?", अर्जुन ने खड़े हो कर चादर तकिये समेटने के साथ आँचल को भी बातचीत में ले लिया. क्योंकि अपने कमरे में जाने की बजाये दामिनी भी जिस्म पर पानी गिराने के बाद यही चली आयी थी.

"बाथरूम करने गयी थी मैं तोह. उधर अँधेरा रहता है न तोह डर लगता है. जब गयी थी तोह तुम सोये हुए थे और मां भी यहाँ नहीं थे. माँ तुम भी जाग रही हो?", अब आँचल ने भी अर्जुन के दिमाग के साथ अपना दिमाग उपयोग करते हुए ये दृश्य सही संवाद के साथ प्रस्तुत किया.

"लूडो खेलने की तैयारी तोह नहीं कर रहे तुम लोग?", दामिनी की नौटंकी सचमुच अलग हे स्तर की थी.

"नहीं बुआ इधर मचार काट रहे थे तोह उठ कर छत पे जाने लगा हु बस. चाचा टहल रहे थे तोह मुझे देख कर पूछने आ गए. आप भी बाथरूम से आ रही है?", अर्जुन ने सीढ़ियों की तरफ कदम रखने से पहले ये बेतुका सवाल किया.

"हाँ. गर्मी ज्यादा लगती है मुझे जैसे मैंने दिन में बताया भी था. नहाने गयी थी बीटा बस. जहा दिल करे वह सो जाओ तुम.", आँचल कमरे में जा चुकी थी क्योंकि उसका किरदार तोह इस दृश्य में बस इतना हे था.

"मैं बोल भी रहा हु की मेरे कमरे में सो जाए, वह पंखा चालू है. लाइट तोह जाने कब आएगी? कल जनरेटर लगवा हे दूंगा इस से ाचा."

"नहीं चाचा मैं वह भी छत पे ज्यादा सोता हु और आप भी आराम कीजिये फिर सुबह काम भी करने है. गूडनिघत बुआ.", अर्जुन तोह चादर, दरी और तकिये लिए बिना आगे कोई बात किये सीढ़ियां चढ़ गया.

"तेरे सामने उठा था?"

"मेरे आने पर हे उठा और हाथ खुजा रहा था इन मच्छरों की वजह से. वो भी इस बाथरूम से हे निकली थी मेरे सामने जब यहाँ आ कर बैठा तोह.", विनोद धीमी आवाज में जवाब देने के बाद नाराजगी से अपने कमरे की जगह सामने वाली कतार में अपनी माँ के कमरे में चला गया. वो ऐसा अक्सर करता था जब घर होता. दामिनी भी निश्चिन्त हो कर गुनगुनाती हुई जा छड़ी अपने बिस्टेर पर.

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"मुझे ये सब अजीब लग रहा है इन्दर और ठीक भी नहीं. भोले, देख गलत मत समझियो पर हमारे पास खोने के लिए अब गुंजाइश नहीं है. ऐसे में अर्जुन को दांव पर लगा कर क्यों वंश का अंत करवाने पर तुले हो तुम दोनों? काम से काम मुझसे तोह पूछ लेते एक बार भाई.", सभी घरवाले हवेली से विदा ले कर शहर जा चुके थे Sanji-Radhika का grih-pravesh, मंदिर और रात के भोज पश्चात. उमेद ने इन दोनों को रोक लिया था जरुरी बातचीत के लिए. उसका मैं व्यथित हो उठा था जबसे नरिंदर ने अर्जुन और दरगाह वाले मेले की बात कही थी. शंकर तोह बस चर्चा में बैठा था जैसे इस मामले की जिम्मेवारी स्वयं नरिंदर की हो.

"और ये बात बोल भी कौन रहा है? तुझसे तोह हम दोनों नसीहत और ताक़त लेते है गज्जू और तू हे हक़ की खिलाफत कर रहा. और कौनसा वंश? उधर संजीव है इस से पहले और वो यहाँ भी उतना हे है. अर्जुन को भी मौत के सामने नहीं खड़ा किया जो तुझे आज डर लगने लगा. देख शंकर, ये कैसी बार कर रहा hai?",Narinder जाम को एक हे सांस में पूरा जातक कर अपना हे सर सहलाने लगा.

"पानी तोह दाल लेता बे गोन्चुलाल. और मैं 2 हे बात कहना चाहता हु. पहली, की वंश बेटियों से भी बरक़रार रहता है जो की हमारे परिवार की सबसे बड़ी दौलत है और दूसरी है गज्जू का डर क्योंकि वो जायज है इन्दर. तू खुद हे सोच भाई जरा के उस तरफ तोह अपना हर बाल सलामत रहा लेकिन यहाँ तोह बचा हे क्या था? ये फिर भी पीछे नहीं हटा था जब मामला teri-meri औकात से बहार हो चला. आखिरी तोह ये था हवेली पैर जिसकी एक महीने बाद शादी होने वाली थी. उस दिन गज्जू को कुछ हो जाता तोह हवेली में ये थोड़ी बहोत जीवन की सांसें क्या सुनाई देती.? लेकिन ये तेरे जैसा हे तोह है जो या तोह बहोत गहराई से सोचता है या फिर बिलकुल भी नहीं. आज इसको शायद वैसा हे महसूस हो रहा होगा जैसा उस वक़्त हुआ था लेकिन आज ये चाचा की जगह है तोह डर लग्न हे है.", यहाँ बात उस दौर की हो रही थी जब वो भीषण nar-sanhaar हुआ था जिसमे सभी के परिवार भिखरे थे. नरिंदर को अब अपनी गलती का एहसास हो गया था और बिना देरी किये उसने उमेद का हाथ अपने दोनों हाथो में पकड़ लिया

"भाई से भी तोह गलती होती रहती है बे गजराज? और यार तू जानता है की मैं उसको कुछ होने नहीं दूंगा. मैंने आजकल पापा को करवट लेते देखे है रात में. वो सो नहीं रहे है ज्यादा जैसे उन्हें असंख्य दीमक din-raat अंदर हे अंदर खा कर खोखला कर रही हो. वो हाथी है और जाहिर होने नहीं देते जैसे ये जाहिर नहीं होने दिया की वो हम सभी से कितना प्यार करते है. सच कहु तोह अपनी पीड़ा ख़तम करने के लिए उन्होंने हम में से किसी को भी इसकी भनक तक नहीं लगने दी. यार अब तू हे बता के ाचे बेटे का फ़र्ज़ क्या है?", नरिंदर द्वारा अपने पिता के पीड़ा में होने की बात जानकार अब बारी शंकर की थी विचलित होने की जबकि नरिंदर ये बता उमेद को रहा था.

"माँ छोड़ के र..."

"शांत बे भोले शांत. चाचा जी को यही उम्मीद है तुझसे और हमसे की हमारे बस का बस ये सब है जो अभी तू अपने इस अनमोल मुख से प्रकट कर रहा था. कितनी रसभरी बातें करता है न इन्दर ये पूजनीय चिकित्सक? ठंडा रह भोले क्योंकि इन्दर जो कह रहा है वो ज्यादा बड़ा सच है तेरे मेरे या किसी और के आपसी लगाव जुड़ाव से. बोल इन्दर तेरी खोजबीन क्या कहती है?", उमेद आखिर था तोह इनका भी सेज से बढ़ कर और उसको तोह कटाई ये माफ़ी स्वीकार नहीं थी.

"इसने बताया न की मेले में अर्जुन जाएगा और चुनौती लेगा. बस उसको जीतना है और हमारे दादा जी का नाम वापिस वह लगाना है. पापा इन सब बातों की फ़िक्र करते है जो तुझे तोह पता हे है गज्जू.", शंकर ने तोह इतनी सरलता से जो समझा था वही कह दिया लेकिन उमेद अपना हंसना न रोक सका. और शंकर के जवाब पर अब नरिंदर बगले झाँक रहा था. आखिर शंकर गणित में ज्यादा से ज्यादा सीढ़ी लकीर हे समझता था.

"इसको बोलने तोह दे भोले. जो तू कह रहा है वो भी बात है लेकिन सिर्फ उतनी हे नहीं. अब तू मत झिझक और पूरी बात बता. शंकर के हजम होने जितनी मुझे भी पता है.", अब शंकर घूर रहा था इन दोनों को.

"हाँ.. वो मैंने पता लगाया है कुछ अपने सूत्रों से. पापा ने अपने अधिकारीयों से अलग कुछ ख़ास गुप्तचर सेवाएं भी ली थी जैसे वो कुछ खोज रहे हो. ज्यादा तोह पता नहीं लग पाया क्यूंकि बात पुराणी थी और जो व्यक्ति मुझे जानकारी दे रहा था वो सिर्फ जूनियर था. मुख्या व्यक्ति का इंतकाल हो गया था किसी दुर्घटना में. शंकर गाँव का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति कौन है जरा बता तोह याद हो तुझे?", नरिंदर जानता था कैसे शंकर को ये एहसास करवाना है की वो लोग उसको किसी तरह से भी काम नहीं आंकते. खैर ये मुद्दा था तोह पक्षपात वाला लेकिन दोनों प्यार भी करते थे अपने इस saral-buddhi से.

"हाँ मुझे वह के हर आदमी का पता है. एक तोह मेजर रणदीप के बड़े भाई सुच्चा सिंह जी है जो पापा से भी 10 साल बड़े होंगे. एक वो सरपंच लोदु है न केवल? अरे जिसकी लुगाई मैंने पहली होली पे हे पटक के छोड़ दी थी और तू बोल रहा था के पक्का वो सबको बता देगी. लेकिन बाद में वो खुद आयी थी न मेरे पास?", इन्दर हंसी को रोकने की कोशिश में असमर्थ हो गया था और जब हसना तोह उमेद उसके साथ.

"तू भी न शंकर. अबे मैंने जो सवाल किया उसका जवाब देते देते तू कहा पहुंच गया? उस टाइम वह अगली तरफ 20 घर थे और तूने हर घर में ठप्पा लगा रखा था. ये गज्जू को भी पता है और मुझे. नाम बता न के वह सबसे पुराने जिन्दा बन्दे कौन कौन है?", अब शंकर खिसियाता सा हंसने लगा अपने हे जवाब पर.

"हाँ वो केवल का बाप बहोत पुराण आदमी है. हम्म्म.. एक वो दार जी जो गुरुघर में ग्रंथि भी थे और टीचर भी.. प्यारेलाल जी.. वो तोह शायद सेंचुरी मार चुके न इन्दर? लेकिन आज भी अकेले पूरा गाँव घुमते रहते है. उनसे पुराण तोह कोई ज़िंदा नहीं होना. जुगराज के बापू जी भी अपने पापा जितने है और वो बड़े हे भले आदमी है यार. बहोत दुःख हुआ था मुझे जब उनकी बीवी का देहांत हुआ था वो बिजली की तार गिरने से. जब भी उनके घर जाना होता था न तोह जुग्गे की बेबे अपने हाथ से हे लस्सी पे आया तजा अलूणि (माखन) मुझे खिलाती थी. मैं भी उनके कहने से पहले हे भैंसे जोहड़ ले जाता था नहलाने. वह मेरा हे फायदा जो होता था. भैंसे 2-3 घंटे पड़ी रहती थी पानी में और इतना टाइम बहोत होता था..", शंकर इतनी जल्दी फिर से भटक उठा.

"साला इसके कौनसी नलकी फिट हो गयी थी बचपन में इन्दर.? ये तभी छुट्टियों में हमारे साथ काम और ऐसे aaltu-faltu जुगाड़ में ज्यादा लगा रहता था. और वह चाचा जी आ जाते थे तोह ये ननिहाल निकल जाता था यही सब मजे करने. तेरा उन मामलो में सर नहीं दुखता था भोले? और तू सचमुच देसी मुर्गा हे था जो छोटी बड़ी, भाभी हो या काकी सबको फांस लेता था. लगता है ये उस जहर का हे दुष्परिणाम है जो तू मस्तिष्क की जगह अपने लिंग से ज्यादा सोचता है. हाँ तोह इन्दर इसको तोह जितने नाम पता थे वो इसने बता दिए. उस दौर की जवानियों के नाम पूछेगा तोह ये बिना भटके 50 गिना देगा वो भी एक सांस में.", उमेद अब शंकर के हे मजे ले रहा था जो इन से नाराजगी दिखता हुआ बस पेग पिए जा रहा था.

"ना तोह सही बताएं है भी गज्जू इसने, लेकिन डॉक्टर है न तोह सभी डिटेल दे देता है. तोह सुन्न भाई बात ऐसी है की सुच्चा सिंह, दार जी (प्यारेलाल जी) और वो पहलवान है न शहीद, उसके दादा जी. ये लोग है जिनके साथ पापा संपर्क में रहे थे उस दौरान लेकिन ड्यूटी की वजह से मिलना तभी होता था जब फुर्सत लगती थी जो की साल में एक या ज्यादा से ज्यादा 2 बार. उन्होंने भी जितना पता था वही बताया पापा को लेकिन वो जानकारी भी उन्हें कही न ले जा सकीय. कुछ जुड़ा हुआ है सारंग और महल से भी लेकिन माँ ने तोह उन्हें खोजबीन और गाँव के मामलो में शामिल न होने की सौगंध पहले हे दे राखी थी इसलिए पापा के हाथ बंधे रह गए पूरी जिंदगी. अब शायद उम्र बढ़ने के साथ साथ उनके पास परिवार के प्यार और अतीत की यादों के सिवा कुछ बचा नहीं है. ाचे बेटो की जिम्मेवारी क्या होती है गज्जू?"

"की अपने परिवार को हमेशा कायम और खुश रखे, हर मुसीबत से उनकी हिफाजत रखते हुए."

"बिलकुल ठीक लेकिन इसमें ये भी जोड़ दे भाई की जब mata-pita सहारे की उम्र में पहुंच जाए तोह उनका ये समय chinta-heen हो. औलाद कर्जा नहीं चूका सकती अपने mata-pita का लेकिन उन्हें चैन तोह दिला सकती है न भाई. अज्जू तोह जैसे पापा की बेचैनी तभी समझ गया था और ऊपर से रघुवीर चाचा से वो उनकी बगल में लेट कर हर बात उगलवा लेता था. वो मामला भी इधर से जुड़ा हुआ है क्योंकि पापा और चाचा उधर से इधर आये. चाचा वह वापिस गए हे नहीं फिर लेकिन अज्जू हर बार बहाने ढून्ढ हे लेता था मुझे वह ले जाने के. खोज वो भी रहा था कुछ न कुछ और यही वजह है की पापा और चाचा ने उसकी ज़िन्दगी जाने पर केस आधा अधूरा वही छोड़ दिया. हमने तोह जितने सामने आये सभी उजाड़ दिए क्योंकि हमको तोह यही लगा न के हमने हे सबसे बड़ा दुःख झेला है. चाचा संभल भी गए थे या वो पापा की वजह से दिखावा करते रहे सही होने का लेकिन पापा उस दिन के बाद जैसे हमसे दूर हे होते गए. सबको दिख रहा था के चाचा आश्रम में है जबकि पापा भी तोह खुद को मानसिकता में वही ले जा चुके थे. माँ और चची हे दिलेर निकली हम सबसे तोह, जिन्होंने घर बिखरने न दिया चाहे अकेले में दिन रात आंसू बहती रही. अबे हम लोग न आज भी वैसे हे है जो अपने दुःख का रोना लिए रहते है या अपने नाम को बढ़ने में लगे है जिस से फिर से वैसा हे अतीत सामने सर न उठा सके. लेकिन अतीत गया हे कहा है जो लौट के आएगा? पापा के दिल मैं है वो अतीत, चची के अकेलेपन है वो दर्द जो खुश होने का दिखावा इसलिए करती रहती है की बचे खुश रहे. गज्जू तेरे न सोने के पीछे है वो दुःख जो ख़तम होने का नाम हे नहीं ले रहा चाहे जितना मर्जी भाग ले तू उस से. वैसा हे हाल इसका है और मेरा. अब वक़्त है सभी जिम्मेवारियां पूरी करते हुए अपना असली धरम निभाने का. फिर चाहे इसके लिए अपने साथ साथ अर्जुन को हे क्यों न दांव पे लगाना पड़े, मैं तोह कदम पीछे नहीं ले जाने वाला.", नरिंदर ने यहाँ बैठे तीनो का हे सच खोल कर रख दिया था जिसमे वो खुद भी एक था. शंकर भी ठंडी आह भरता हुआ थोड़ा गमगीन सा हो चला जिसके हाथ पर हाथ रखते हुए उमेद ने धनदास बंधाया.

"सही बोलता है ये गज्जू. साला जितना मर्जी दिखावा कर लू व्यस्त होने का, लेकिन अकेले में आज भी मैं न अज्जू को भुला पाया हु न खुद को माफ़ कर सका हु. मैं दोहरा हो जाता है जब अर्जुन को देखता हु. वो सबको प्यार में बंधे रखता है और पापा भी उसके साथ जैसे बाकी सबकुछ भूल जाते है चाहे कुछ वक़्त के लिए सही. तू भी उसमे अपना सबकुछ देखता है और ये इन्दर भी. वो kam-umar जब जिम्मेवारी समझ सकता है तोह अब मैं भी उसकी ढाल बनूँगा. बहोत हुआ बहनचोद ये रंडीरोना और दारु. मेरा लोंदा अखाडा फ़तेह करेगा उसके बाद हे हाथ लगाऊंगा मैं इस बोतल के.", शंकर जज्बाती हो चला था जबकि सिर्फ 2 पेग हे ख़तम हुए थे.

"करना क्या है?"

"पहले तोह वही करना है जो हम हमेशा से करते आये है गज्जू. याद है न गेंद (बॉल) से maar-dhaad कैसे खेलते थे गली मुकाबले में? एक जाना बहार निकलता था जिस से सामने वाले उस के लिए बहार निकल आये. और फिर उनको हम घेरते थे. बस फिलहाल दिखावा करना है की हम लोग बहोत व्यस्त है और गाँव से हमारा कुछ लेना देना नहीं. इस दौरान मैं वह पर नजर रखूँगा और देखना होगा की अर्जुन चुनौती कैसे स्वीकार करता है? उसके कान तक तोह बात मैं पहुंचने का जुगाड़ कर चूका हु. सब उस पर हे निर्भर करता है. या तोह सुराग वही पर हाथ लग जाएगा नहीं तोह अर्जुन महल में सेंध लगाने की जुगत जरूर भिड़ायेगा. पर चुनौती भी समस्या है.", नरिंदर की समस्या वाली बात से शंकर सहमत था लेकिन उमेद को जैसे ये मामला समझ नहीं आया.

"उसको पता लगेगा की ये करना जरुरी है तोह वो हर हाल में करेगा इन्दर. फिर समस्या कैसी?"

"पहली बात है की पापा ये रोकना चाहेंगे क्योंकि वो उसको खतरे में नहीं जाने देंगे. चलो अर्जुन उन्हें मन भी लेगा क्योंकि वो उनसे बिना पूछे ऐसा करने वाला भी नहीं तोह दूसरी समस्या है की या तोह उसको एक साथी की जरुरत होगी जो चुनौती दे सके उसके साथ क्योंकि अखाड़े में 2 पहलवान हे मिल कर थाप दे सकते है. अगर वह पहले हे 2 पहलवान झंडी कड़ी करते है तोह फिर अर्जुन को चाहिए होगी पूरी टीम जो इस से भी ज्यादा मुश्किल काम है. 4 और लोग होने चाहिए उसके साथ. बरी बरी से ये लोग उन 2 लोगो से भिड़ेंगे जिसमे अगर अर्जुन जीत भी जाए तोह बाकी 4 में से 2 को भी हर हाल में उन्हें हराना होगा. और वो किसी पर भरोसा नहीं कर सकता. सबसे हम है की हमारे गाँव से एक भी खिलाडी उसका साथ नहीं देगा तोह अब वो कैसे भाग लेगा?", नरिंदर ने ब्यौरा देने के साथ साथ दोनों को हे इस जरुरी पहलु से अवगत करवाया जिसका हल जैसे उमेद के पास था.

"मैं उधर के नियम जानता हु इन्दर और मैं तोह बस ये जान न चाहता था की तुम अर्जुन का प्रयोग कैसे करने वाले हो और अगर कोई अतिरिक्त जानकारी तुम्हारे पास है तोह वो बताओगे. तोह तुम्हारी खोज भी तभी आगे बढ़ेगी जब अर्जुन ये निर्णय लेता है? इसका हल तोह हमेशा हे चाचा जी के परिवार में रहा है इन्दर. मैं तुम लोगो के साथ उधर नहीं जाता था क्योंकि वजह तुम जानते हे हो लेकिन दरगाह के मेले में लगने वाले अखाड़े का अज्जू से पहले से मुझे पता था. माँ ने हे तोह उसको कहानी सुनाई थी लेकिन सिर्फ पापा और चाचा वाली. तुम्हे याद है न की तुम दोनों ने वह कबड्डी की टीम को चुनौती दे डाली थी और वैसा इसलिए कर पाए क्योंकि अखाड़े में तुम खड़े थे. अज्जू ऐसा नहीं कर सकता था इसलिए वो तुम्हे ले कर गया. वो लेके तोह शंकर को जाना चाहता था पर ये जनाब कही और व्यस्त थे. अखाड़े का सबसे जरुरी नियम है की इसमें ललकारने का प्रथम हक़ बड़े पंडित जी के खून को है जो की चाचा जी ने भी किया और उनके साथ पापा भी होते थे. लेकिन तब या तोह dur-daraaj के घराने, रसूखदार जमींदार और बड़े व्यापारी तबके से चुनौती उठा सकता था या समकक्ष गाँव जो की ज्यादा नहीं थे. तब ये 5 और 2 वाला हिसाब नहीं था. 2 के साथ 2-2 के जोड़े में 5 भिड़ंत होती थी. माँ ने आखिरी मुक़ाबला देखा था मेरे नाना जी के साथ और वो उस समय 14 या 15 बरस की रही होंगी.", उमेद इतने बरसो में वो बात आज इन्हे बता रहा था जबकि ये बचपन से साथ रहे थे.

"फिर आगे क्या बताया उन्होंने?", इन्दर ने शंकर को शांत रखते हुए पूरी जानकारी लेनी चाही. जैसे उसको नयी उम्मीद दिख रही हो.

"माँ लाड़ली थी अपने पापा की और बड़े पंडित जी ने उनके साथ पापा के रिश्ते की बात चलाई थी इसलिए नाना जी माँ की सहमति लेने के हिसाब से उन्हें भी अपने साथ मेले ले गए. मुलाकात तोह शादी से पहले करवाई नहीं जाती थी लेकिन दूर से दिखा कर समाज का नियम भी नहीं टूटने वाला था. माँ ने बताया की उसके बाद जो हुआ वो उसको देख कर डर गयी थी. अखाड़े में कुश्ती के ख़ास नियम नहीं थे. पापा और चाचा उस आखिरी जोड़ी से लड़ने वाले थे जो बाकी थी, 4 को हारने के बाद. किसी शाही सेवक ने चाचा के कान में कुछ बताया था और वो तभी बहार निकलने लगे थे की प्रतिद्वंदी ने उन्हें पीछे से जकड लिया. फिर माँ बेहोश हो गयी ये देख कर की चाचा ने उस पहलवान का सर मिटटी में हे दबा दिया था उठा कर पटकते हुए. दूसरे वाले के साथ पापा ने क्या किया उन्हें नहीं पता लेकिन जब माँ होश में आयी तोह वो अपने घर थी और उन्होंने कहा की वो किसी से भी शादी कर लेंगी लेकिन उस जानवर से नहीं जो इंसान को इंसान नहीं समझता. बाद में अक्सर पापा उन पर तंज करते तोह वो कहती थी की उनके साथ धोखा हो गया. पापा तोह चाचा से भी बढ़कर निकले उस मामले में.. हाहाहा", उमेद का भी दिमाग थोड़ा बहोत तोह शंकर जैसा हे था जो वो कहानी सुनते हुए उसमे हे खो गया.

"वाह यार ये बात तोह हमको भी नहीं पता थी. अज्जू ने भी कभी नहीं कही.", शंकर की जिज्ञासा और ख़ुशी देख नरिंदर ने अपने हे थप्पड़ मार लिया.

"सारे ढीले मेरे पल्ले. ोये शंकर, वो नियम बताने वाला था और शादी दिखने लगा अपने माँ बाप की. अबे गज्जू तू तोह सचमुच इसका हे भाई निकला. अबे मुद्दे की बात तोह बताई हे नहीं? और तूने पहले ये क्यों नहीं बताया कभी?"

"माँ ने मन किया था भाई और वो कहती थी की ये सब पापा को भी पता नहीं चलना चाहिए. हाँ उस शाही सेवक ने क्या कहा था चाचा के कान में ये तोह उन्हें पता नहीं लगा कभी. पुछा भी था उन्होंने पापा और चाचा से तोह पापा ने उन्हें ये बात कभी न पूछने की कसम दे के चुप करवा दिया. नियम ये है की अर्जुन अकेला भी चुनौती उठा सकता है. लेकिन फिर नियमानुसार या तोह वो 5 जोड़ीदारों से भिड़ेगा या फिर अकेला रहा तोह वो एक एक करके 5 लोग आ सकते है. रिवर्स भी हो सकता है. और मैंने वो कहानी इसलिए सुनाई क्योंकि अखाड़े में हे कुछ हुआ होगा तभी फिर चाचा जी वह नहीं गए. उस आदमी ने क्या सन्देश दिया होगा उन्हें जिसको सुन्न कर वो मैदान हे छोड़ कर जाने लगे थे?"

"हाँ ये तोह गौर हे नहीं किया मैंने? मतलब उस दिन कुछ हुआ था और छोटे चाचा यही तोह बता रहे थे बे शंकर की दुर्घटना हुई थी लेकिन उन्हें याद नहीं ाचे से. फिर papa-chacha वह कभी वापिस कुश्ती करने नहीं गए. अज्जू के साथ मैं गया था इसलिए मार भी मुझे हे पड़ी थी क्योंकि वो मैं था. और ये नियम वाली बात बहोत सही है. अर्जुन 2 को तोह लपेट हे सकता है जितना मैं जानता हु. बस बाकी ये जो पहेलियाँ पापा के दिल में दबी है इनका राज खोलना है. सारंग भी कही न कही शामिल होगा इसमें और महल में भी राज जरूर दफ़न होंगे. दादा जी को जान ने वाले है तोह वो मौलवी साहब है या फिर दार जी. अब उम्र की वजह से उन्हें कितना पता होगा ये कह नहीं सकते. अर्जुन से सीढ़ी बात करना हमारे हे खिलाफ जाएगा क्योंकि तब पापा ने हमको दबोच लेना है.", नरिंदर बोल बोल कर अपने दिल की बात कर रहा था.

"अर्जुन पर हे नजर रखवा इन्दर और ऐसे की बस उसके गाँव से बहार होने का पता हमे लगता रहे. सतर्क इतना रहना होगा जितना तू अज्जू के मामले में था या जितना ज्यादा तू आज हो सकता है अपने अनुभव की वजह से.", उमेद ने सही राये दी थी.

"हम्म्म.. गाँव से बहार हे खोजबीन होगी क्योंकि गाँव तोह पापा की जड़ में है हे. मतलब वह कुछ ख़ास नहीं मिलने वाला और मिलेगा तोह ऐसी जगह जहा पापा भी नहीं सोच सकते. लेकिन क्या अर्जुन इतना ज्यादा चौकन्ना है की उस से दुरी रखनी पड़े?"

"बहनचोद पक्का बघीरा है बे वो इन्दर. मोगली वाला बघीरा जिसके कान बाकी जिस्म से ज्यादा तेज और नजर झुरमुट के पीछे से हर तरफ देखती रहती है. मैंने भी कभी कोशिश की थी और मुझपे हे भरी पड़ा वो फैंसला. संजीव ने chupan-chupaai खेलनी चाही तोह उसने उसको हे दबोच लिया सुधा उसकी असलियत. गज्जू सही कह रहा है की अगर नजर रखनी है तोह बहोत दूर से और कही भी उसको शक न होने पाए. तेरी असलियत जान गया तोह फिर तू भी घर न रहने वाला.", शंकर का पुराण अनुभव बोल रहा था और उमेद हंसने लगा.

"तू तोह कहता था के वो मोगली है बे शंकर. Nanga-punga रहने वाला मोगली तोह फिर बघीरा कैसे हो गया?", नरिंदर अपने हे राग अलाप रहा अब.

"तोह दोनों कोई अलग अलग थोड़ी न थे वो तोह हम लोगो को उल्लू बनाने के लिए कहानी ऐसे लिखी थी की मोगली उसमे दाल दिया. असल में रुडयार्ड किपलिंग सनकी आदमी था जो जानवरो में रहा बरसो तक. उनकी जानकारी इकठी करने के साथ साथ उसने अलग कहानी भी लिख डाली और ये मोगली किरदार बस आत्मा जैसा था कुछ जो बघीरा का हे वो रूप था जो बाकी सबको उलझाए रखता. क्या बोलता था वो बघीरा के लिए, जंगल में रेहनी वाली परछाई जिसको चप्पे चप्पे का पता था और नजर रखता था हर घटना पर. शेरखान तक उस परछाई को पकड़ न सका. भला ऐसा मुमकिन भी था? इसलिए शेरखान से मोगली की भिड़ंत दिखाई क्योंकि बघीरा को ज़िंदा रखना था, जंगल की आत्मा के रूप में.", शंकर 1967 में बने उस चलचित्र का वर्णन करने लगा जो उन्होंने साथ देखा था कॉलेज से पहले. उमेद तोह लगभग लोटपोट हे हो गया उसकी गंभीर नौटंकी देख.

"बस कर भाई बस कर. और इन्दर तू इसको खुद अतीत में ले जाएगा तोह फिर ये पीछे क्यों हटेगा. अब मुद्दे की बात है की तुझे अर्जुन पर नजर रखनी है, मुमकिन हो तोह मेले में उपस्थित हो जाना. मेरा दिल कह रहा है की अनिष्ट हो सकता है वह पर. और शंकर जैसा इन्दर ने कहा, हमको अब घरवालों के जितना सामने हो सके उतना रहना है. उन्हें नहीं लग्न चाहिए की हम कुछ कर रहे है. मैं मेरे जुगाड़ लगता हु इस महल के इतिहास खंगालने की और सारंग का चिटठा दलीप निकाल हे देगा. वैसे जानकारी पहले से भी है हमारे पास लेकिन जितनी ज्यादा हो उतना बेहतर. पर हम में से कोई भी एक दूसरे से बिना सलाह किये कोई कदम नहीं उठाएगा. इन्दर ये तेरे पर ज्यादा लागू है. मैं भी इस महीने दारु नहीं पीने वाला अब."

"बचे भी कितने दिन है महीने में? तू दिल्ली और अपने पेट्रोल पंप संभल. हम चले घर. कल माधुरी ने आना है दामाद के साथ और फिर संजीव के saas-sasur ने भी. बचे घूमने चले जाएंगे तोह घर भी देखना होगा. कल तू हे ले आईओ चची और भाभी को वह. मैं इस चुनौती का करवाता हु कुछ सुबह और एक मीटिंग भी है मेरी सनकी भैया के साथ. चल शंकर उठ और तू हे गाडी चलाएगा घर तक. बड़ा तू है और जिम्मेवारी तेरी मुझे सही सलामत घर पहुंचने की. मोगली और बघीरा एक है.. हाहाहाहा.. जंगल की आत्मा.. अबे ये डॉक्टर कैसे बना?", नरिंदर चलते चलते पेट पकड़ के हंसने लगा था लेकिन जल्द हे वो खामोश हो गया जब पूर्णिमा जी की आवाज सुनाई दी.

"ोये बस करो तुम तीनो. बीवी बचे हो गए लेकिन बचपना बढ़ता जा रहा है तुम्हारा. शंकर बीटा इन्हे समझा थोड़ा.", अब शंकर क्या कहता की वो हे वजह है इसके पीछे.

"हाँ चची ये दोनों मुझे मंदबुद्धि बोल कर मेरा मजाक उदा रहे थे. मैं घर जा रहा हु इन्दर को लेके और माँ से शिकायत करूँगा इसकी. गज्जू को आप हे समझाना, मुझ पर रौब मारता है बड़ा होने का.", जबतक पूर्णिमा जी गलियारे में आती ये दोनों जा चुके थे.

"तू क्यों सताता है रे उसको? भोला है तोह है लेकिन भाई है तेरा. तेरे साथ साथ इस इन्दर के भी कान खींचूंगी मैं क्यूंकि तुम दोनों मिल जाते हो तोह वो अकेला हो जाता है. रोटी नहीं खायी न उन्होंने?"

"हाँ वो घर जा के हे खाएंगे. और मैं मजाक नहीं उडाता वो बात हे ऐसी करता है माँ लेकिन आप बस उसका हे पक्ष लेना. चलो मेरी रोटी लगवा दो अपनी बहु को बोल कर. कल कल हु यहाँ फिर 3 दिन काम देखूंगा.", उमेद अपनी माँ को एक तरफ से अपने साथ लगाए अंदर चल दिया. यही इनका हंसी मजाक था जो दुःख सुख में हमेशा बरक़रार रहता था. कितनी पीढ़ियां गुजर चुकी होंगी साथ और कितनी आगे साथ चलनी थी. दिल से रिश्ते थे और ये खून से ज्यादा मजबूर एवं गहरे थे.

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संजीव आज अर्जुन की अनुपस्थिति में अपने दादा दादी की सेवा करके जब कमरे में लौटा तोह व्यस्त दिन और भागदौड़ की वजह से बुरी तरह थक चूका था. उसको तोह ये भी याद नहीं रहा की सुबह उसने राधिका से कुछ चाहत जताई थी. उसको पूरा करने के बदले में राधिका भी वो उपहार पाना चाहती थी जो उसके देवर ने अपने भाई को दिया था इस प्यारी भाभी के लिए. हनीमून पे जाने की तैयार भी राधिका लगभग पूरी कर चुकी थी और संजीव की प्रतिसखा करती हुई वो कब सो गयी उस ठंडी हवा में उसको पता हे नहीं चला. कमरे में दाखिल होने के बाद संजीव दरवाजा लगा कर कपडे भी बदल चूका था लेकिन मद्दिम रौशनी में गहरी नींद सोई राधिका के चेहरे पर शिकन तक न आयी. गले तक जिस्म चादर में ढके वो कितनी प्यारी दिख रही थी इसको संजीव के शब्द ब्यान न कर सके.

'ी लव यू एंड सॉरी.', गाल को हलके से चूमने के बाद वो उसकी बगल में हे पिछली तरफ लेट गया. एक हाथ राधिका की कमर में लपेट कर सही से चिपकते हुए. राधिका अलसाई सी पलट कर कच्ची नींद में हे संजीव के होंठो को चूमने के बाद उसके सीने पर हाथ फिरने लगी.

"तोह नींद खुल गयी तुम्हारी.? सॉरी यार मैं तुम्हे जगाना नहीं चाहता था और दादा जी से बात करने के साथ साथ दोनों के पाँव दबाते हुए वक़्त का पता भी नहीं चला. तुम आराम करो और मैं भी सोता हु.", अब दोनों एक दूसरे की तरफ चेहरा किये थे.

"उम्म्म.. मेरा वो गिफ्ट देने के बाद तुम सो जाना."

"हे प्रभु ये लड़कियां और इनके गिफ्ट. सुबह देख लेना यार राधिका, क्यों मशक्कत करवाना चाहती हो. और मैंने भी बदले में कुछ माँगा था."

"हाँ तोह क्या ये चादर वैसे हे ओढ़ के लेती हु मैं? लेकिन बात बस पहन ने की हुई थी तोह मैंने सोने से पहले ये पहन लिए अब तुम मुझे मेरे देवर का गिफ्ट दो.", राधिका तोह पीछा हे नहीं छोड़ रही थी बेशक आँखें अलसाई सी और बदन थकान से चूर. उसके नाखून अपने सीने पर चलते देख संजीव ने फुर्ती से वो चादर उठा दी. लेकिन राधिका ने वापिस खींचने की जगह अपना चेहरा संजीव के सीने में दफ़न कर लिया.

"देखने तोह दो की क़यामत कितनी हसीं हो सकती है?", अब वो पीछे खिशक कर उस जालीदार सूक्ष्म परिधान में राधिका का सबकुछ देख प् रहा था. कपडा था हे किधर उस जालीनुमा कमीज में. बाकी जिस्म अल्फ प्राकृतिक रूप में था.

"बस देख लिया न अब लाओ गिफ्ट.", राधिका ने चादर वापिस ऊपर लेने से पहले अपने उभार तक संजीव को ाचे से नजर करवाए. संजीव भी उसके बदन को सही से चादर में छिपाने के बाद उठ कर अपनी वाली अलमारी तक पंहुचा. कुछ समय लगाने के बाद वो वापिस बिस्टेर पर लौटा तोह हाथ में एक फाइल, एक सील बंद लिफाफा और गट्टे का लम्बा चौकोर डिब्बा था. इतना सब देख कर राधिका भी सीने पर चादर लपेट उत्सुकता से लगभग बैठ हे गयी.

"ये सबकुछ अर्जुन ने दिया है? और फाइल जैसा उपहार?"

"खुद हे देख लो तुम राधिका क्योंकि इस मामले में अर्जुन के प्यार ने मुझे भी बांध दिया है तोह मैं देवर भाभी के बीच नहीं पड़ने वाला.", राधिका ने मेज पर रखे लैंप को जला कर सबसे पहले वो फाइल हे खंगालनी शुरू की. सबसे पहला कागज़ कोई एफिडेविट जैसा था स्टाम्प पेपर लगा. उसके बाद कुछ 2 और पैन. आखिर में बैंक की कॉपी जिसके साथ एक चिट्ठी भी थी. राधिका वो सब बड़े गौर से पढ़ती रही.

"ये सब क्या है संजीव? और तुम्हे ये अर्जुन कैसे दे सकता है? क्या इतने अधिकार है उसके पास और छोटे भाई से तुम ले भी कैसे सकते हो?"

"खुद पढ़ने के बाद भी सवाल कर रही हो यार तुम? और वो कितने अधिकार रखता है ये तुम बस 2 रात में नहीं जान सकती. उसने जो दिया है वो तुम्हे दिया है जैसे अपनी बाकी सभी बहनो को और जिनका हक़ बनता है. उपहार समझ कर नहीं लेना चाहती तोह जिम्मेवारी समझ लो क्योंकि वह दादाजी और रेखा चची की भी गवाही है. यहाँ सबकी पढ़ाई और शादी तक का इंतजाम पहले से कर दिया गया है और जिधर दादा जी daan-kalyaan करना चाहते है वो अर्जुन के हाथो वो करवाते है. अब तुम परिवार का अटूट हिस्सा हो राधिका तोह ये तुम्हारा हक़ है जो उसने दिया है. अकाउंट हनीमून से आने के बाद पक्का करवा लेना ब्रांच जा कर. अब ये भी देख लो जिस पर कॉन्फिडेंटिअल लिख कर सील तक लगा राखी है मेरे भाई ने. जाने क्या धमाका बंद कर रखा है उसने इसमें.", संजीव ने फाइल राधिका से ले कर एक तरफ रख दी थी. वो तकिये से तक लगाए उस कागज़ को खुलते हुए देखने लगा.

"हाहाहा.. ये तुम हो संजीव?", Shwet-shyaam तस्वीर थी वो जिसमे छोटा बचा पानी की पाइप लिए हँसता हुआ किसी पर पानी दाल रहा था. वो नंगा था बेपरवाह सा. संजीव ये देखते हे उस फोटो की तरफ झपटा लेकिन राधिका ने हाथ पीछे हटा लिया. उस लिफाफे से 4-5 और तस्वीरें निकल कर बिस्टेर पर गिर गयी. संजीव भी उन्हें देखने लगा पहले वाली को भुला कर.

"ये सब अर्जुन ने कहा से जमा की? माँ के पास भी नहीं थी ये तोह! ये मैं हु और मेरी गॉड में जो बचा है वो अर्जुन. दादी के साथ मैं मंदिर गया था और ये रेणुका बुआ है. कैसी दिखती थी बुआ भी उस टाइम.. हाहाहा.. मुंडन हुआ था तब अर्जुन का.", राधिका भी ख़ुशी से देख रही थी वो फोटो.

"ये बचे का हाथ जो तुम्हारी कमीज खिंच रहा है?"

"ये ऋतू है जो अपना आलू वापिस मांग रही थी. गुस्से में नाखून तक मार देती थी अगर कोई भी अर्जुन को उस से लेने की कोशिश करता. ारु बुलाती थी लेकिन साफ़ नहीं बोल पाने के वजह से बस आलू आलू करते रहना इसने. पर इसका चेहरा नहीं है इसमें. फट गयी न इधर से शायद संभल कर नहीं राखी होगी ये.", संजीव हाथ फिर कर जैसे महसूस करना छह रहा था उस समय को.

"यहाँ तुम स्कूल की वर्दी में किसी सिपाही जैसे खड़े हो. फोटो खिंचवाते हुए तुम सहज नहीं दीखते. अर्जुन के साथ तोह बिलकुल बदल जाते हो मिस्टर."

"वो सबको बदल हे देता है. तुम भी नहीं बचने वाली. 8तह में कान्वेंट में दाखिल हुआ था मैं और ये पिछले घर की फोटो है. सुबह दिखा के लाऊंगा तुम्हे. ये वाली जब नया स्कूटर लिया था दादा जी ने मेरे लिए. अर्जुन इसको हे सबसे ज्यादा चलता है. मतलब जब मैं होता हु उसके साथ तोह इस्पे हे घुमते है. बड़ा पतला था यार मैं तोह उस वक़्त."

"आज भी पहलवान नहीं हो बस सही जगह से थोड़े ठीक दिखने लगे हो. ये तस्वीरें बहोत ख़ास है क्योंकि इनका तुम्हे पता नहीं और अर्जुन ने जैसे इन्हे खोजने के बाद संभल कर रखा. यहाँ वो भी ाचा दिख रहा है और सभी पुरुष है इस फोटो में दादी जी aas-pas."

"पिछली दिवाली की फोटो है ये. बहोत टाइम बाद इस दिन सब एक साथ थे. 8 दिवाली इस घर में अर्जुन के बिना रही है जिनमे रौशनी तोह थी लेकिन कोई ज्यादा ख़ुशी नहीं. अब एक दिन इस घर में उसके बिना अजीब लगता है.", संजीव सीधा लेट गया था बिना बाकी तस्वीरें देखे और राधिका ने भी सभी फोटो समेत कर वो लिफाफा मेज पर रख दिया. गट्टे वाला डिब्बा खोल कर देखा तोह उसमे साड़ी का पूरा सेट था. जारजट की एक बेहतरीन साड़ी जो समंदर के रंग सी थी बिना अतिरिक्त saaj-sajja के. सुनहरी ब्लाउज जैसा साड़ी का बॉर्डर था और मेल खाते कान के बूंदे, चांदी की पायल और एकरंगी चूड़ियां.

"संजीव.. उठो तोह सही.. ये देखो जरा कितनी प्यारी साड़ी है. ये ऋतू ने पसंद की होगी या फिर चची ने? देखो तोह सबकुछ साथ है इसके.", संजीव को हिला हिला कर राधिका ने उठा हे लिया. अब वो चौकस हो कर बैठा हंस रहा था.

"जानता हु ये बेहतरीन है और वो अपनी भाभी के लिए खुद लेके आया था. हर चीज सिर्फ और सिर्फ अर्जुन ने खरीदी है वो भी पंजाब वाले शहर से. वह से लौटने पर हे उसने इसको मेरी इस अलमारी में रख दिया था टाला लगा कर. इसको वापिस रख देना बंद करके राधिका. जब पहनो तोह अर्जुन होना चाहिए सामने. वो अपनी भाभी से उस वक़्त से हे प्यार करने लगा है जबसे मेरी शादी का महूरत निकला था. वो जाता भी नहीं एकदम से लेकिन अब तुमने मुझे उठा हे दिया है तोह मैं एक सच और बता देता हु मेरे भाई का.", राधिका उत्तेजित थी जान ने के लिए वो वजह और अर्जुन का अलग सच.

"ठीक है मैं फिर तभी पहनूंगी ये लेकिन अर्जुन का सच? वो तोह सबसे छोटा मेंबर है घर का जितना सामने है और लाडला भी. ध्यान भी रखता है सबका तोह ऐसा होना जरुरी भी है. इतनी सी उम्र में और क्या सच होगा?"

"निक्की ने तुम्हे कुछ बताया?"

"उम्म्म.. लीव तहत. ये सब बातें हम नहीं कर सकते. उनका मामला है संजीव और थोड़ा अजीब भी बात करना इस पर."

"okay okay. मतलब वो बचा नहीं है जो तुम छोटा समझ रही हो. सवा साल पहले तोह घर भी घर नहीं लगता था. अर्जुन ने अपने प्यार और एक एक इंसान पर म्हणत करके इसको फिर से वैसा हे आबाद कर दिया जैसा उसके बचपन में उसने देखा था. वो दुनिया की समझ कही ज्यादा रखता है लेकिन भावुक है परिवार के मामले में. तुम्हे ध्यान है कुछ टाइम पहले जब मैं एक मिशन से जख्मी हो कर बीएड पे था हॉस्पिटल में."

"हाँ और मैं मिलने भी तोह आयी थी."

"उस दिन मुझे जीवन देने वाला इंसान मेरा अर्जुन हे था राधिका. अर्धांगिनी हो और उसकी एकलौती भाभी भी तोह तुम्हे पता होना चाहिए क्योंकि वो सम्मान का भी हक़दार है. जो वह पहलवान सा आया था बिजेन्दर भाई. उसका पूरा परिवार 2 पीढ़ी से पहले से साथ जुड़ा है लेकिन कुछ दुश्मनी हो गयी थी जो 24-25 वर्ष रही और समझौता होने की जगह परिवार पर खतरा दिन बा दिन बढ़ता गया. एक वक़्त वो भी आया की मेनका का अपहरण करके अर्जुन को उसके साथ हे मारने की कोशिश की गयी जिसमे पेशेवर कातिलों की टोली शामिल थी. अर्जुन ने अपना खून बहा कर भी उनकी जान नहीं ली. उसने सुशीला बुआ को वापिस इस घर की बेटी बनाया, दोनों हवेलिया वापिस परिवार से जोड़ी. मैं उसको बचने वह गया था लेकिन उसने मुझे खरोच पहुंचने वालो की ऐसी दुरगति की थी की जिस्म की हड्डी सलामत नहीं बची. व्हीलचेयर वाला वो राक्षसश जैसा व्यक्ति, वो भी अर्जुन के हाथे चढ़ा था जब उसने प्रीती के साथ अभद्रता करने की कोशिश की. मैं बढ़ा चढ़ा कर कुछ नहीं बता रहा और तुमने तोह मेरी हालत खुद देखि थी. रिपोर्ट भी पढ़ी थी न कितने लोग मारे गए थे.?"

"मतलब उसके हाथ?"

"साफ़ है क्योंकि वो जान लेने में यकीन नहीं रखता राधिका और तुम कानून हटा कर वो समझो जो मैं कह रहा हु. तुमसे बड़े कानून के रखवाले हमारे दादा जी तक उस समय के बाद से अर्जुन से विचार विमर्श कर लेते है, नजरे बचा कर. लोग कहते है की बाघ एकाकी जीवन बीतता है परन्तु सच ये है की वो जंगल को बचाये रखने में इतना व्यस्त रहता है की परिवार में हर समय मौजूद नहीं रह सकता. अब सभी घर है तोह वो बहार कोई गुल खिलने गया होगा."

"और तुम कैसे बड़े भाई हो जो ये जानते हुए भी इतने निश्चिंत बैठे हो?"

"मिनट से पहले हे पलट गयी तुम तोह? घबराओ मैट वह भी चलेंगे वापिस आने के बाद. पूरा गाँव हे अपना है उधर तोह वो सेफ है. बस पहली बार गया है न उधर तोह खुल के मजे लेगा. कोई न कोई शेरनी मिल हे जानी उसको वह भी निक्की jaisi.",Sanjiv ने लपक कर राधिका को गिरफ्त में भर लिया था.

"आउच.. छी.. गंदे कही के. एक तरफ तोह उसको इतना समझदार बताते हो और फिर वो ये सब भी करता है... बहोत गंदे हो तुम दोनों भाई.."

"अरे डार्लिंग मैं तोह सिर्फ तुम्हारा हु और वो गन्दा नहीं है samaaj-sewi है. दुखी लोगो को प्यार से खुश करने वाला... निक्की से पूछ लेना जिस दिन वो मिलेगी अर्जुन से उसके अगले दिन. अभी हम हनीमून की प्रैक्टिस करते है. आज sher-sherni वाला स्टाइल.", संजीव मस्ती कर रहा था क्योंकि उसका ऐसा कुछ करने का इरादा नहीं था.

"रहने दो संजीव.. प्लीज मैं थकी हुई हु और तुम बहोत गंदे हो. जानवरो वाले स्टाइल मतलब कुछ भी.?"

"उमाहहह. पागल कही की शेर 20 घंटे सोते है लेकिन जोड़ा साथ हो तोह आधा टाइम. बस ऐसे हे मेरे सी लिपट कर रहो. और मैं मजाक कर रहा था तुम्हारे देवर के बारे में वो प्यार वाली बात. लेकिन बाघ वाली सच थी. Umaaah..",Gehra चुम्बन धीमा भी उतना हे था और कुछ देर ऐसे हे ऊपरी प्यार के बाद दोनों एक दूसरे से लिपट कर सो चुके थे. नींद में जाने से पहले तक राधिका के मैं में अब कौतहुल उठ चूका था इस व्यक्ति को जान ने का जो उसके पति का भाई और अब इसका देवर था. आखिर ये लड़का है क्या जो उस से भी एक साल बड़ी निक्की तक के दिल को चुराए बेफिक्र घूम रहा है. और इतने बड़े बड़े काण्ड करने वाला लगता तोह शकल से शरीफ है. पर उसके पति ने खुद कहा की नया जीवन भी अर्जुन का दिया हुआ है तोह एहसान तोह वो भी अपने दिल में मान बैठी थी अर्जुन का. जंगल का शांत बाघ जिसका असली चरित्र और स्वभाव कोई नहीं जान पाया पर प्रशंशा दुश्मन भी करते है.

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पंछियों का मधुर कलरव जैसी प्रकृति से घिरे इस कस्बेनुमा बड़े गाँव में कुछ जल्दी शुरू हो जाता था. रात के अन्धकार में तोह अर्जुन इस छत को सही से देख न सकता था लेकिन आंखूं खुलते हे सबसे पहले हल्का रोशन होता वो आसमान और सामने कुछ हे दुरी पर छत पर विचरण करते कुछ mor-morniya. ये छत तोह इतनी बड़ी थी की अनिगिनत लोग पसर सकते थे. जितनी ईमारत निचे बानी थी उतनी हे बड़ी और वैसे हे 'ु' अकार में समतल एक सार सी साफ़ सुथरी. कही तोतो (पररयस) की taaye-taaye तोह कोयल की को को इस सुबह को और खूबसूरत बनती लगी. अर्जुन को अंगड़ाई के साथ अपनी तरफ देखते प् कर वो mor-morni का जोड़ा कुछ दूर चल दिया.

'शायद ज्यादा हे सो लिया आज. वैसे भी रात देर हो हे गयी थी सोने में.', घडी का बटन दबा कर समय देखा तोह अभी 4:45 हे हुए थे. अर्जुन बिस्टेर समेत कर निचे वाली दूसरी मंज़िल की और हो लिया. इधर भी एक बाथरूम था जो वैसे हे गलियारे से होता ठीक निचले वाले के ऊपर बना था. नित्यक्रम के साथ साथ नहाने के बाद अर्जुन उन्ही ढीले कपड़ो में आँगन तक चला आया. यहाँ भी naam-matra हलचल थी 5 बजने के बाद भी. कृष्णेश्वर जी हौदी के करीब बैठे दातुन करने के बाद नहाने में लगे थे और तबेले की और उनका सेवक पशुओ का चारा बनाने में व्यस्त था.

"राम राम दादा जी. आप तोह जैसे तैयार भी हो गए हो.", अर्जुन वही चारपाई पर बैठ अपने बाल सूखने लगा था और कृष्णेश्वर जी मुस्कुराते हुए उसकी ram-ram का जवाब देने के बाद मॉल मॉल कर शरीर रगड़ने लगे. इस उम्र में भी उनका जिस्म मजबूत था भले हे सर पे सफ़ेद और कमर के करीब थोड़ा चर्बी आ चुकी थी.

"तुम भी त्यार हो जाओ बीटा, बहु ने कपडे तुम्हारे बिस्टेर पर रख दिए है. बड़े भैया का टेलीफोन आया था बस अभी 10 मिनट पहले तोह उनका फरमान है तुम्हे चौपाल पर ले जाया जाए. सोचा तोह मैंने भी था ऐसा लेकिन उनकी अनुमति बिना मैं ऐसा करने से रहा बीटा. सभी बड़े बुजुर्गो और जरुरी व्यक्तियों से तुम्हारी मुलाकात का बहोत महत्व है बीटा. फिर कल तुम्हे शहर भी जाना होगा, रानी जी से मिलने. हफ्ते के 6 दिन तोह वो व्यस्त रहती है लेकिन सोमवार को महल में. अब उनका बुलावा है तोह जाहिर सी बात है की पालन तोह करना हे होगा. लेकिन वह मैं तुम्हारे साथ नहीं जा सकता इसलिए तुम्हे ड्राइवर के साथ अकेले हे जाना होगा.", अर्जुन का तोह इतनी सुबह हे मस्तिष्क चक्र गया था ये सब सुन्न कर. ऐसा उसके दादा जी ने करने के लिए कहा भी तोह सीधा उसको नहीं कहा और ये महल वाली मुलाकात तोह वो अपने बूते करना चाहत था बिना किसी को बताये.

"ठीक है दादा जी जैसा आप कह रहे है वैसा हे होगा. तोह कब जाना है चौपाल पर?"

"मैं तोह नाहा लिया बीटा और जितना समय मुझे कपडे पहन ने में लगेगा उतना तुम लगा लो. फिर शीश नवना हो तोह ठीक नहीं तोह मंदिर उधर भी है.", ये अलग धर्मसंकट में दाल रहे थे कृष्णेश्वर जी उसको.

"मैं मंदिर नहीं जाता दादा जी और इसलिए क्षमा चाहता हु आपका सुन्न कर बुरा लगा हो तोह. कपडे पहन कर मैं आता हु.", अर्जुन मुड़ने के बाद देवकी को प्रणाम करता हुआ 3 कमरे लांघ अपनी जगह आ पंहुचा. दिल तोह कर रहा था की वो अपने दादा को फ़ोन मिला कर इस सबकी जानकारी ले, लेकिन ऐसा करने से छोटे दादा की avmaan-na करना भी कटाई ठीक न था. उधेद्बुण में उसने दरवाजा ढाल कर हे इस्त्री करके बिस्टेर पर रखा हुआ सफ़ेद कुरता पजामा पहना और बालो में हल्का तेल पानी लगा कर उन्हें सही से व्यवस्थित किया. अभी वो आईने में खुद को देख हे रहा था की भीतर अनामिका चची चली आयी. खूबसूरत सुबह की तरह हे उनकी मुस्कान थी जो हलकी सी होने पर भी सीधा हृदय तक उतरती जाती. लाल साड़ी और सर को ढके हुए वो अर्जुन के समीप आयी तोह उसने देखा की चची के हाथो में लोहे का छोटा बक्सा था.

"ये पिता जी ने भिजवाए है. बोलै है ख़ास है और पूरे आये तोह पहन लो.", अर्जुन उन्हें गुड मॉर्निंग बोलने के साथ उस बक्से को खोल कर देखने लगा की ऐसा क्या ख़ास है इसमें. भूरे चमड़े की वो जूती सचमुच ख़ास हे थी. अंदर का चमड़ा आजतक नरम और बहार ख़ास कारीगरी. नोक को ऊपरी भाग पर सील का साथ जोड़ा हुआ था जैसे किसी शाही व्यक्ति की मोजरी हो. उनका अकार भी जूते के हिसाब से 11-12 रहा होगा.

"ये सचमुच ख़ास है चची और आप जानती है ये किनकी है?"

"मुझे क्या पता अर्जुन लेकिन खासियत तोह इंसान में होती है न फिर ऐसी वस्तुए?"

"ये बड़े पंडित जी की जूती है चची. दादा जी के पिता जी की जूती जो आज भी ऐसी है की जैसे इन्हे कभी पहना हे न गया हो. बस ये निशाँ बताते है की इनका कोई मालिक रह चूका है. देखते है की आएँगी भी या नहीं.", अर्जुन सावधानी से बिस्टेर किनारे बैठ एक जूती को पहन ने की कोशिश करने लगा तोह शुरू में उसका पाँव थोड़ा फंसा लेकिन चची ने अपनी ऊँगली भीतर की तरफ थोड़ा घुमा कर उसको फिर पाँव डालने को कहा तोह वो पूरी तरह सही बैठी उसके पंजे पर. जैसे वो थी हे अर्जुन के माप की. झुकने की वजह से हल्का सा आँचल उन दुग्ध कालसो से सरक गया था जो नजरे मिलने पर अनामिका को देरी से पता चला.

"दूसरी वाली खुद हे पहन लेना अब. मैं दूध त्यार करती हु तुम्हारा.", चेहरे पर शर्मिंदगी की जगह सुलभ मुस्कान थी उनके कुछ हलकी लाली के साथ.

"दूसरी वाली पहन ने में परेशानी हुई तोह चची?", अर्जुन भी सब जान कर मस्ती कर रहा था. लेकिन वो तुरंत लौट आयी.

"ाचा मैं हे पहना देती हु."

"पाँव के हाथ मैट लगाओ ऐसे चची. आप बड़ी हो और पहले मुझे समझने के लिए आपने वैसा किया था. बस नजरे मेरी टिकती नहीं."

"कोई बात नहीं अर्जुन. पाँव के हाथ लगाने का भी अधिकार है जिस रिश्ते से हम दोनों बंधे है उसमे. और उलटे पाँव में तोह परेशानी आणि हे थी.", इस बार थोड़ी मशक्कत यक़ीनन हुई अनामिका को क्योंकि उल्टा पाँव उतना लचीला नहीं था और जूती सहेजे रखने की वजह से थोड़ी कड़क हो गयी थी. आखिर वो कामयाब हो कर उठी तोह अर्जुन ने नजरे झुकाये हुए हे कहा.

"धन्यवाद चची और आशा करता हु की लौटने के बाद आपसे मैं कुछ पल अकेले में बात कर सकूंगा.?"

"रात तुम मेरे कमरे में सो जाना जैसे तुम्हारे यहाँ सोते थे. ये तोह होंगे नहीं.", सचमुच सामाजिक ज्ञान थोड़ा काम था उनका और दिल की भोली वो थी भी चाहे पढ़ी लिखी स्त्री थी.

"आप जानती है मैं किस बारे में बात करना चाहता हु? वो बात आपको पूरी रात सताती रही होगी और शायद अभी भी आपका मैं कुछ विचलित है जो मुझे तैयार करने के बावजूद खुद उल्टा ब्लाउज पहने हो और सिर्फ एक पाँव में पायल है आपके.", अर्जुन इतना बोल कर कमरे से बहार चला गया अनामिका को इस मस्ती से परेशां और थोड़ा उलझा कर.

'बातें रात में हे हो तोह बेहतर है अर्जुन. दिन के उजालो में तोह सभी गोर है यहाँ. उनके दिल का कालापन बस रात में दीखता है जो तुमने पहले हे दिन देख लिया. तुम्हे बचने के लिए मर्यादा से बहार भी होना पड़ा तोह तकलीफ सहने को तैयार हु.', वो 2 आँखें अनामिका की हे थी जिन्होंने एक घिनोना सच खुद देखा था 2 और लोगो के साथ जिसमे से एक उसको पहचान गया था. अर्जुन के जाने का भान होते हे वो भी तेज कदमो से बहार आँगन में होती हुई रसोईघर में चली गयी उसके लिए दूध तैयार करने. अर्जुन सेवक को वो अजीब सी जीप साफ़ करते देख रहा था. जीप का शिक्षा लोहे के फ्रेम से घिरा हुआ सीधा खड़ा न हो कर बोनट पर लिटा था. टायर कुछ अलग और अकार थोड़ा छोटा था कमांडर जीप से.

"अब ये क्या बाला है दादा जी? घर में ये भी मौजूद थी और देख के तोह लगता है की जैसे ये मॉडल बहोत पुराण हो पर साफ़ भी बहोत है.", अर्जुन घूम घूम कर उसको सब तरफ से देख या कहो जांच रहा था. सामने सिर्फ 2 हे सीट थी जो शायद नए ज़माने के हिसाब से त्यार करवा कर लगवाई गयी थी. पीछे भी 2 हे लोगो की जगह थी बैठने की और कोई छत न थी सिवाए आगे पीछे की सीटों के बीच लगे उस गोलाकार पाइप के.

"बिल्ली (विल्लिस) है बीटा ये और ये हमेशा से हे इस घर की सदस्य है जिस दिन पिता जी ये ले कर आये थे यहाँ. तब कुछ और दिखती थी लेकिन बड़े भैया ने इस पर जैसा काम कहा वैसा करवा कर इसको थोड़ा बेहतर बनाया गया. चालू करके पिछले हिस्से से इधर तक और इधर से वापिस इसकी जगह चलने तक मैं इसको कही नहीं लेके गया. भैया आते है तोह जरूर खेत तक जाती है ये साल में 2 बार. पिता जी को थोड़ा ज्यादा लगाव था इस से लेकिन खुद चलने की जगह वो अपने साथ लिछमन काका को रखते थे. भैया कहते है की जितनी जरुरी ये हवेली है उतनी हे ये बिल्ली. चलती है न मैदान वाली तरफ कच्चे में तोह बिल्ली की तरह उछलती है इसलिए मैं इसको यही कहता हु और अब तोह भैया भी. हाँ बहु, दूध पीला तोह अपने भतीजे को और मैं इसको फिर साथ ले जा रहा हु. आधे पौने घंटे तक लौट आएंगे. खाना तैयार रखना फिर मैं खेत निकलूंगा. काम चल रहा है उधर भी.", अनामिका ने अपने ससुर को चाय और अर्जुन को दूध परोसने के बाद बस 'जी' कह कर जवाब दिया और अपने काम में लग गयी. दामिनी, Vinod,Aanchal और पप शर्मा अभी तक बिस्टेर पर थे, गहरी नींद में. जबकि निकेतन को पानी भरे तसले में बैठा कर उसकी दादी नहलाने के साथ साथ उस से अपनी हे अलग भाषा में बातें करती हंस रही थी.

"तोह आज इसको हम लेके जाने वाले है?", अर्जुन ने समय पर दूध ख़तम करके कुल्ला किया और कृष्णेश्वर जी से चर्चा पुनः प्रारम्भि की.

"तुम हे चलाओगे बीटा इसको. जब जूती तुम्हारे पास है तोह इस पर भी अधिकार तुम्हारा. मैं तोह संरक्षक मात्रा हु वो भी भैया की gair-maujdgi में.", चाबी उन्होंने अर्जुन के हवाले करने के बाद अंगोछा गले में पहना और अगली सीट पर अर्जुन की बगल में जा बैठे. अब उनके हाथ में भी एक अलग लाठी थी जिस के किनारो पर स्वर्णिम तारो से निशाँ बने थे. अर्जुन फीकी मुस्कान से ये बात देख कर najar-andaaj करता हुआ जीप का मजबूत गियर दाल चल निकला चौपाल पर.

'सत्यानाश हो इसका.. एक दिन हुआ नहीं और सब हड़पना शुरर. कर लो मजे 2-3 दिन, फिर भुगतना भी पड़ेगा.'

'देख लिया कर मुँह खोलने से पहले नहीं तोह अगली बार जुबान काट दूंगी. पहले वह तू gudd-gobar कर आयी और अब ये जान ले की इसको फंसना आसान नहीं. Chir-faad देगा जितना पता किया है मैंने और वैसे हे दिखने तेरे दादा जैसा है, पूरा बाघ. घेरने से काबू आएगा.'
 
सच जबतक सामने न हो तब तक फैंसला नहीं लेना चाइये. ये शब्द है पंडित जी के अर्जुन को. आप भी समझियेगा.
 
अपडेट 196 (बी)

बाघ

"आप सभी gram-pramukh और jiwan-shikshako को अर्जुन शर्मा तहे दिल से शीश नवता है. Vatt-vriksh और पीपल की घनी छाया जितनी मेहता हे आप सभी रखते है और आपके होने से हे इस खूबसूरत एवं शिक्षित समाज का अस्तित्व है जहा सभी एक सामान है.", चौपाल वो दूसरा चुरहा था जो निहाल ने अर्जुन को गाँव में आते हुए बताया था. ठीक पहले वाले की तरह यहाँ भी ये घाना बरगद का वृक्ष था लेकिन दूसरे वाले से भी कुछ ज्यादा फैला हुआ. खासियत एक और थी इस वृक्ष की. बरगद के बीचो बीच हे पीपल और नीम का वजूद भी था और इसलिए इसका नाम त्रिवेणी प्रचलित हुआ. चबूतरे पर कुल 6 लोग विराजमान थे जिनकी बूढी आँखों में अर्जुन को देखते हे अलग चमक ने जनम लिया था और वो अब कही ज्यादा जीवंत लगने लगी थी. लोग और भी थे वह लेकिन सभी उस मंच के ird-gird बैठे थे या खड़े हुए. सभी के चरण स्पर्श करने के बाद हे अर्जुन ने हाथ जोड़ कर पहली बार कुछ कहा. सबके हाथ अपने आप हे उसके सर पे आशीर्वाद दे गए थे और भूमि पर हाथ जोड़े उनके सामने खड़ा अर्जुन आगे अपने दादा का इन्तजार करने लगा परिचय करवाने का.

"आप है चाचा प्यारेलाल जी, प्रथम शिक्षक जिन्होंने पिता जी के साथ इस गाँव की शुरुआत की थी. आज भी हमारे दार जी नियम से सभी की खैर खबर लेते रहते है. ग्राम सञ्चालन में उतना हे योगदान दिया चाचा हक़ीक़त चौधरी जी ने जिन्हे सभी प्यार और मान से मौलवी जी या बाबा बुलाते है. आप है बड़े भाई सुच्चा सिंह जी, जिन्होंने पिता जी द्वारा बनाये उस पहले विद्यालय से यहाँ शिक्षा देना प्रारम्भ किया था हमारे मौलवी जी के साथ. कृपाराम जी ग्राम प्रबंधक है और यहाँ जो भी थोड़ा बहोत विकास हम करवा पाए है वो इनकी हे दें है. जुगराज जैसा होनहार इंसान इनके हे वृक्ष की मजबूत टहनी है. लाला धनपत जी हमारे बड़े भाई साहब के सहपाठी रहे है और इन्होने यहाँ की खेती का नक्शा बदला जिस से प्रदेश भर में हमारे ग्राम और इसके अंदर आने वाले बाकी 5 गाँव आर्थिक रूप से सक्षम और बेहतर कहलाये जाते है. फसलों और फलो की खरीदी तक के लिए इन्होने हे शहर से पृथक एक और मंडी हमारे हलके में बनवाने का कार्य करवाया. और ऐसे हे महत्वपूर्ण व्यक्ति है हमारे रजनीश जी और इन्हे ज्यादातर लोग प्यार से मैनेजर साब बुलाते है. 3 विद्यालय, गुरुघर, मंदिर, मस्जिद, खेलशला और बाकी सभी महत्वपूर्ण इमारते इनकी देखरेख में सुचारु और मजबूत है.", जिस आदर के साथ कृष्णेश्वर जी ने एक एक करते हुए सभी का परिचय अर्जुन से करवाया था वो देख कर हे लगता था की इस graam-chaupal में ये लोग सरपंच और पांचो से भी ज्यादा महत्वपूर्ण थे.

"मतलब आजादी से पहले हे यहाँ पर सर्वधर्म एक घर का नैरा लग चूका था. माफ़ कीजियेगा इस मजाक के लिए परन्तु आप सभी के सिर्फ नाम जान लेने भर से दिल अलग हे ठंडक महसूस कर रहा है. आप सभी ने अपना पूरा जीवन हे एक निर्जन जमीन को bhara-poora संसार बनाने में लगा दी. उम्र के इस पड़ाव में भी आप लोग सुचारु है और मैं यही कामना करता हु की ऐसा हमेशा रहे."

"तुस्सी बीटा जी बोलदे वि वड्डे पंडत जी वांग हो. नाल केहड़ा कोई धर्म साहड़ी ब्याह फाड़ के रोकड़ा है की ेहड़ा न करो, ओहदा करो. ओह जेहड़ा रसस्य जा बैठ्या न ओह विलायत खान है. कल शामी किसे ने एस्डा हुक्का लुको तह, हुन्न तक यह हल्का नई होया ओह्दी याद विच.", किरपाराम जी के ऐसे मजाक पर वो बुजुर्ग पहले तोह मुँह बना कर इन्हे देखता रहा और फिर ताली मारते हुए हंसने लगा. बाकी बुजुर्ग पहले हे हंसने लगे थे और अर्जुन गौर से देख रहा था की ये क्या मस्ती चल रही है.

"ेहड़ा है वाई की वड्डे पंडत जी सामने कोई हुक्का नहीं सी पि सकदा और तू पुत्तर लगदा वि ोहना वर्ग. मैं तह डर के एत्थे आ बैठ्या सी की किथे कानन हे लाल न कर देवे मेरा. हाहाहा.. प्रधान जी, लगदा पुराण हे समां फेर आ गया.", ये व्यक्ति जो बता रहा था उसको सुन्न कर अर्जुन भी जीवंत हो उठा हँसते हुए और तभी एक 50 से कुछ ऊपर दीखते व्यक्ति ने अर्जुन के गले में गैंडे के फूलो की बड़ी सी माला पहना दी. कुरता पजामा पहना वो व्यक्ति रौबदार चेहरे के साथ साथ ाची kad-kathi का भी था.

"तुहाडा स्वागत है gram-sangat विच पंडत जी. मैं आप दे इस हलके दे निक्का जा सेवक केवल सिंह तेह यह 5 बन्दे इस सांगत विच ऑन वाले पिण्डा दे पांच ने.", अर्जुन को हैरानी हो रही थी की उसके पिता से भी बड़ी उम्र का व्यक्ति कैसे हाथ जोड़ कर उसके सामने खड़ा था और उसके पीच खड़े 5 लोग भी बारी बारी से वैसे हे माला पहनाने के बाद खड़े हो गए. बाकी लोग सहमति से अर्जुन को इस स्वागत को स्वीकारने का कह रहे थे.

"शुक्रिया एहने मान लायी अंकल जी पर मैं कोई हक़ नहीं रखड़ा. यह मैं बस एक करके स्वीकार कर लेना है की पहली भेंट है तेह तुस्सी ेसनु सही तरीके नाल पूरा करो.", अर्जुन ने केवल सिंह के चरण स्पर्श करने चाहे तोह वो पीछे हट गया.

"न न बरखुरदार. तुहाडी गल्ल मैं ली गयी है पर यह जुल्म न करो. तुस्सी सांगत दे आलावा किसे दे सामने नहीं झुक सकदे, ख़ास करके सहदे बाबा जी दी जुटती पा के तह नहीं. रसूख डा वि सत्कार होना चाहिदा तेह वड्डे प्रधान जी इत्थे हुन्दे तह अप्पा धोवे उन्हे सामने माफ़ी मांगनी सी.", केवल सिंह ने खुद हे अर्जुन के कंधे पर हाथ रखते हुए उसका सीधा करने के बाद जिस सच्चाई से अवगत करवाया वो उचित भी थी.

"फेर तह ओह वि कुछ नई कह सकदे सी सरपंच साहब.", अर्जुन ने थोड़ी गंभीरता से ऐसा कहा तोह इतनी देर से ख़ामशी से मुस्कुरा रहे वो चांदी सी सफ़ेद लम्बी दाढ़ी वाले संत व्यक्ति प्यारेलाल जी बोल हे उठे.

"रामेश्वर क्यों नहीं कुछ कह सकदा सी पट? दादी डा पूरा हक़ है."

"मैं जूती उन्हे दे पियो दी पायी होई है वड्डे दादा जी. ेहड़ा मान तेह ओह वि कारन तेह मजबूर हुन्दे.? मैं किथे गलत तह नई कह्या बाबा जी?", अर्जुन के ठहाका लगाने की देरी थी की पूरी चौपाल अनगिनत लोगो के हंसने से इतनी सुबह हे रोशन हो उठी.

"बाँदा जमा अपने पंडत जी वर्ग है दार जी. ओहि हंसना तेह ओहि बोल बानी. तगड़ा लगदा कुछ घट्ट है जा इस उम्र दे ोहना ने दाढ़ी राखी होई सी.", ये मौलवी जी थे जिनकी बात पर दार जी और सुच्चा सिंह जी ने भी हामी भरी. कृष्णेश्वर जी तोह अब जमीन पर उनके लिए लगाईं गयी चारपाई पर बैठे ये सब देखते हुए 2 और लोगो के साथ हुक्का गुदगुदाने लगे थे.

"लो वाई सब सुन्न लो अपने दार जी कुछ कहना चहन्दे है. ोये मांजी आलिया, तू वि ध्यान दे तेह दिलबाग पुत्तर कानन इत्थे.", ये केवल सिंह हे था जो उन बुजुर्गो के बुलाने पर दार जी के पास आने के बाद अब कुछ कहना चाहता था. माहौल एकदम शांत हो गया था इस आवाज से और जमघट भद्द कर कुछ 60-65 लोगो का हो चूका था. कुछ महिलाएं थोड़ी दुरी से सब देख सुन्न रही थी, जितना सुन्न सकती थी.

"हाँ वि इस प्यारेलाल दे प्यारेयों, मैं बस एक स्नेहा (सन्देश) देना चौंदा है जो की मन्नू कल सांझ हे अपने maan-niya पंडत रामेश्वर ने फ़ोन करके दित्ता सी.", इस एक पंक्ति ने हे अर्जुन के कान खड़े कर दिए थे क्योंकि नाम उसके दादा जी का था जिन्होंने दार जी को फ़ोन किया था. वैसे भी वो अकेला हे था इस हुजूम के बीच खड़ा हुआ. ज्यादतर लोग तोह अपनी अपनी जगह बैठे थे या अर्जुन को घेरे.

"तुस्सी सब जांदे हो की जित्थे अज्ज अस्सी 6 बन्दे beda-garak कर रहे है एत्थे सहदे ऊपर आपसी सहमति दे बाद फैंसला वड्डे पंडत जी करदे हुन्दे सं. जिन्हे दे जान दे बाद ओह कुर्सी कड़े वि न भरी गयी. सलाह अज्ज वि ओहदा हे हुंडई ने तेह फैंसला ें 5 बंदेया ने मेरे उत्ते पाया होया. छोटे प्रधान कृष्ण हर काम न अपनी निगरानी विच वेखदे ने जिद्दा सहदे कहे मुताबिक रामेष्वर इन्हे न दसदे. अज्ज दे बाद भी ज्यादा कुज नहीं बदलन वाला पर.. ुह्ह्ह्ह. पंडित अर्जुन शर्मा फैंसला लें दे नाल नाल ॉडी रखमत्त सहदे बिना कर सकदे ने. यह मैं जा बाकी 5 बुजुर्ग नहीं कह रहे अपने वालो. एस्डा पक्का कागज़ महल तोह आया होया बन्न के. पंडित मोतीलाल जी दी chal-achal जायदाद डा संरक्षण रामेश्वर जी दे जिम्मे ओहदो तक है जिहने पंडित अर्जुन शर्मा 25 डा नहीं हो जांदा. एक पिंड संपत्ति तोह लेहड़ा है जिथे जिथे जमीन किसे डा ना कित्ती गयी है. बाकी जगह, सेवाघर तेह इस्कूल दी हर जानकारी मालिकाना हक़ तोह पंडित अर्जुन मांग सकदे सं ते काबिल बन्दे दे एक मौलिक जिम्मेवारी रहेगी की ओह आप जी दी कही गाल मुकावे.", ये सिर्फ अर्जुन हे नहीं, जितने लोग वह मौजूद थे उनके लिए भी घोर आश्चर्य की बात थी. लेकिन किसी ने भी सवाल नहीं उठाया.

"माफ़ी चाहता हु लेकिन मैं भी कुछ कहना चाहता हु.", अर्जुन ने विचार करने के बाद हे मुँह खोला

"बीटा जी तुस्सी बस कह देयो, माफ़ी अपने आप कोई होर मांग लू.", ये विलायत खान साहब थे जो अब उन्ही बुजुर्गो में बैठ चुके थे ऊपर चबूतरे पे. और जैसे बाकी सभी ने हंस कर सहमति दी थी अर्जुन ने हाथ जोड़ कर सबकी तरफ एक निग़ाब भरी.

"मैं यहाँ हमेशा नहीं रहने वाला और जहा तक मुझे जानकारी मिली है, उस हिसाब से जैसा अभी हाल फिलहाल चल रहा है वैसा हे चलते रहने चाहिए. दादा जी के बाद छोटे दादा जी सब देखते है आप लोगो के साथ और यही देखेंगे आगे भी. हाँ साल में 2 बार मैं यहाँ जरूर आने का वादा करता हु लेकिन आप सभी के bete-paute की तरह. इस गाँव के बचे की तरह न की कोई मालिक. राजशाही कबसे ख़तम हो चुकी है और जितनी बची है वो सिर्फ महल और किताबो में. आपने हे तोह ये गाँव बसाया और बनाया है फिर फैंसले लेने वाला मैं कौन होता हु जो कल हे यहाँ आया.?"

"तुम तोह सबसे पहले आये थे बीटा इस गाँव में. और राजशाही तोह उसदिन हे यहाँ से अलग हो गयी थी जिस दिन इसके स्वामी पंडित मोतीलाल जी बने थे. गाँव उनकी जमीन पर बना है और उन्होंने सभी को पहले हे इतना दे दिया की जरुरत से ज्यादा है. लेकिन तुमने जो फैंसला दिया है उसका सम्मान करते हुए हम सेवा करते रहेंगे लेकिन एक न एक दिन तोह प्रभु चरणों में हमको भी जाना होगा. फिर तोह तुम्हे देखरेख करनी पड़ेगी न.? नियुक्ति तुम करोगे चाहे रामेश्वर जी की तरह यहाँ रहना नहीं.", लाला जी की खरी बात सुन्न कर अब अर्जुन लाजवाब था.

"ठीक है फिर ये भी सही. अब मैं कोई फैंसला ले सकता हु तोह फिर आज पहले दिन हे देखते है की मैं जो फैंसला करने वाला हु उस हिसाब से मैं लायक हु भी या नहीं. तोह आप सभी मुझे सही से सुन्न प् रहे है?", अर्जुन अब चलते हुए चबूतरे पर जा बैठा, ठीक उन 7 लोगो के कदमो में और बीच में बैठे प्यारेलाल जी की छाया टेल. अर्जुन की साफ़ आवाज दूर तक के घरो में गयी थी इस चौपाल के बहार और वो कौनसा फैंसला लेने वाला है इसने उत्सुकता बढ़ा दी थी.

"मैं अर्जुन शर्मा सुपुत्र शंकर शर्मा और इस चौपाल का नया नियुक्त, दरगाह पर लगने वाले वार्षिक मेले में अखाड़े की चुनौती उठता हु. सुना है वह बरसो से इसकी प्रतीक्षा हो रही है तोह जब मैं आ हे गया हु तोह इन्तजार ख़तम. Gram-sanrakshak और सरपंच आदरणीय केवल सिंह से गुजारिश है की वो स्वयं इस घोषणा की पुष्टि के लिए वह संदेसा लगवा दे. तोह आप सभी ने देख लिया की मैं कैसे फैंसले लेता हु? आशा करता हु की दूसरा फैंसला लेने से पहले मुझे बर्खास्त कर दिया जाएगा, संरक्षक आदरणीय पंडित रामेश्वर जी द्वारा जो की मेरे दादा जी भी है.", अर्जुन के एलान ने तोह एक पल के लिए सभी को मूरत बना दिया था पर जैसे हे उसने ये जताया की वो कितने गलत फैंसले लेता है सभी तरफ से जोरदार तालियों की गड़गड़ाहट शुरू हो गयी. कुछो ने तोह नारे हे लगा दिए थे जो युवा थे और उनमे निहाल सिंह भी था.

"जियो पुत्तर जी.. एह कित्ती न तुस्सी वड्डे पंडत जी वर्गी गल्ल. बाई आप हे वेख लो की दलेरी शेर माँ दे पति तोह सीख के ौंदा. पूरे ऊँचे पिंड न मान ऐ आप जी ते. दिलबाग, कद्द तेरा फोर्ड तेह चलिए फेर दरगाह लॉन परचा. बुजुर्गो आप सब दी इजाजत है?"

"मान है साहनु केवल सिंह इस पट ते. अर्जुन बीटा जी, यह बस तुस्सी दुरी बस तुस्सी मुका सकदे सी. और मैं सलाह दे तौर तेह कहना चाह्न्दा के ऐ चुनौती दे बाद अखाड़े विच अग्गे कोई वि झंडी न दे सके. नियम तुस्सी आप बदल सकदे हो ओहथे डा वसीयत दे मुताबिक.", मौलवी जी ने पीठ थपथपा दी थी उलझन में बैठे अर्जुन की.

"आप हे बोल दीजिये बात दादा जी. मैंने तोह बोल के देख लिया की मुझ पर हे उल्टा पड़ गया पहला हे फैंसला.", अर्जुन जिस तरफ से मुस्कुराया था बाकी सभी ने उसको स्नेह से आशीर्वाद दिया.

"केवल सिंह, यह वि याद नाल बता दित्ता जाए की पड़ती अर्जुन शर्मा झंडी बरक़रार रखें दे बाद नहीं चहन्दे की भविष्य विच फेर कड़े कोई होर मुनादी करवाए. बीटा जी, अपने पड़ दादा जी ना वि फेर तुस्सी लगौना ओस पवित्र दरगाह तेह. तुहाडी मुराद बहु ने उठे हे मांगी सी. तुहाडे परिवार तोह कोई वि पुरुष आखिरी झंडी हों दे बाद ोथे नहीं गया इस वजह तोह. छोटे प्रधान जी वि नई गए फेर कड़े. कबड्डी, घोड़े दे दौड़, कुश्ती दे नाल नाल रंग बिरंगे झूले वि लगदे ने ोथे पर बिना इस पहले परिवार दे किसे बन्दे दे शरीक होये ओह सब चंगा नई लगदा. तुस्सी बीटा जी हिम्मत दिखाई है नाल मैं उम्मीद करदा के उस मेले दे रंग तुस्सी भर सकदे हो.", सुच्चा सिंह जी की ऐसी बात सुन्न कर अर्जुन के मैं में ढेरो सवाल तोह उठे लेकिन उसने उन्हें बाद के लिए बचा लिया.

"सब आएंगे दादा जी सब आएंगे अब वह. लोगो को ख़ुशी देने के लिए हे तोह शायद padd-dada जी ने ये मेला शुरू करवाया होगा तोह घरवाले हे ख़ुशी में शामिल न हो फिर कैसा मेला? मेरी चिंता में हे समझ लीजिये की उन्हें आना पड़ेगा अब. वैसे मैं आप लोगो से कभी आराम से बैठ कर बातचीत भी कर सकता हु?"

"जरूर बीटा जी जब दिल करे. मैं दिन में यही होता हु गुरुघर से फुर्सत लेने के बाद. और बाकी सब भी. तुम चाहो तोह सुबह हमारी तरफ भी आ सकते हो."

"न यही ठीक है दादा जी या फिर आपके ghar-khet में. गुरुघर, मंदिर या मस्जिद में हमारी बातें ऊपरवाला सुन्न सकता है और मैं जरा उनसे बच कर हे रहता हु.", अर्जुन के ऐसे पलटी मारने से ये सभी लोग हंस दिए और फिर हक़ीक़त जी बोले.

"तुम्हारे पड़ दादा जी भी बचते थे बीटा वह आने से. सेवा पूरी करते थे लेकिन अंदर कभी नहीं गए. वैसे तुमने मुनादी तोह करवा दी लेकिन अब इसकी चर्चा जोर पकड़ती हुई महल तक जाने वाली है. छोटे प्रधान बता रहे थे तुम्हे वह भी बुलावा आया हुआ? थोड़ा ध्यान से जाना लेकिन ऐसे की तुम हे राजा हो. वो जंगल का बाघ पता है न कैसे चलता है, तुम चलते वैसे हे हो और उधर इसमें बदलाव भी मैट करना. बातचीत के समय प्रभाव तुम्हारा हे रहना चाहिए.", प्यारेलाल जी हिंदी में भी ाची बातचीत कर लेते थे और उन्होंने जिस तरह वर्णन किया था अर्जुन समझ चूका था के वो बहोत कुछ जानते है. अर्जुन ने हामी भरी हे थी की जुगराज जी के साथ हे निहाल भी उधर आ खड़ा हुआ.

"दार जी यह मंजे ाले डा मुंडा कुछ कहना चौंदा? आप जी दी इजाजत हो तोह.", जुगराज जी ने अर्जुन की तरफ भी हाथ जोड़ने की कोशिश की तोह उसने दोनों हाथो से उनके हाथ थाम लिए.

"बोझ मैट बढ़ाये आप मेरा गुरु जी. शिक्षक सबसे ऊपर स्थान रखता है और मैं बचा हे ठीक हु. बोलो निहाल भैया आप क्या कहना चाहते हो?"

"मैं कहना की दार जी के अखाड़े दे विच जोड़ीदार चाहिदा हुँदा फेर मैं अर्जुन बाई नाल भाग ले सकदा.?", दार जी के जवाब देने से पहले हे अर्जुन ने कहा.

"बड़े भैया, आप हो कबड्डी के खिलाडी जिनका लक्ष्य भी एकमात्र वही है. और ये चुनौती मैंने उठाई है जिसमे सिर्फ और सिर्फ मैं हे उतरूंगा. मेरी वजह से किसी के साथ भी कोई अनहोनी नहीं होनी चाहिए. बोझ मेरा है तोह इसको मुझे हे उठाने दो, विनती है बस.", अर्जुन के ऐसे स्पष्ट इंकार और तर्क से जुगराज जी भी लाजवाब हो गए.

"शहीद ठीक कहता है बीटा तुम्हारे बारे में की तुम उसके अनुभव को भी एक मिनट से पहले धुल में मिला गए थे. ये आत्मिक गुण है तुम्हारा और कई बार खिलाडी लाख कोशिश भी कर ले तोह ख़ास हुनर में महारथ हांसिल नहीं कर सकता. कहने का तात्पर्य है की बाज, बाघ और बरगद में उनके ख़ास गुण जनम से होते है जो उन्हें सबसे श्रेष्ठ बनाते है. खैर शेर तोह हमारा नीला भी है पर ये फरक नहीं समझेगा की दोनों भाई क्यों अलग है. हुन्न चल नीले अपनी थाह तेह. प्रैक्टिस डा समां निकल रहा. मिलदे है अर्जुन पुत्तर शाम न.", चौपाल तोह मिश्रित भाव और अत्यधिक ख़ुशी से पूरी हो चुकी थी. सभी से भेंट करने में अर्जुन को अगला आधा घंटा और लगा. इस बीच दीपा भाभी सर पे दुपट्टा ओढ़े कृष्णेश्वर जी को प्रणाम करने के बाद हालचाल ले रही थी. अर्जुन को वो इस नए दिन में नयी तरह नजर कर रही थी.

"तोह कर ली अपने मैं की तुमने मौका मिलते हे? मैं कल से यही सोच रही थी की तुम्हे कहा देखा है और अब पता चला के तुम उनका हे रूप हो जिनकी फोटो हमारे घर भी है. वैसे तोह यहाँ सभी के घर में होगी. गुड मॉर्निंग हे बोल लो अगर रब्ब का नाम लेने में दिक्कत है?"

"नहीं नहीं भाभी जी कोई दिक्कत नहीं है. बस मुझे लगा आप छोटे दादा जी से कुछ जरुरी बात कर रही होंगी. और आपकी गाये कैसी है?", अर्जुन ने उसके साथ हे तोह देखा था दीपा भाभी को पहली बार. और वो माथे पे आया दुपट्टा थोड़ा पीछे करती हुई स्वाभाविक मुस्कुराई तोह अनजाने हे अर्जुन की नजर उस laal-neeli लकीर पर पड़ी जो ऊपरी सीने से कंधे तक थी. थोड़ा सा हिस्सा हे वो देख सकता था लेकिन दीपा भाभी ने जब उसकी निगाह का पीछा किया तोह वो भी गंभीर हो गयी.

"खुश रहना सबसे जरुरी है देवर जी और वो सिर्फ गाये नहीं है, राणो नाम है उसका. एक माँ की तरह उसको बड़ा किया है मैंने और जब कोई नहीं मिलता तोह उस से बात कर लेती हु. तुम्हे परेशां नहीं होना चाहिए इस उम्र में. दुःख अगर किसी और का हो तोह बिलकुल भी नहीं."

"फिर जीवन का सार हे गलत हुआ न भाभी? दुःख का नाम दे कर अवसाद और पीड़ा को छुपाना तोह गुनाह से भी काम नहीं. आप के दर्द को आपकी बेटी न समझ पाए तोह हम भी बात कर सकते है. वैसे भी झूठ नहीं बोलूंगा लेकिन जब कल पहली बार आपको उस पेड़ की छाया में देखा था तभी सोच लिया था के मुमकिन हुआ तोह आपसे बात जरूर करूँगा. जिस तरह आप अपने हाथ से उस बेजुबान को चारा और प्यार खिला रही थी, वैसी चाहत तोह हरेक जीव रखता है.", अर्जुन किस तरह इतना कुछ कह गया था ये उसको खुद पता नहीं लगा. दीपा में हे कुछ अलग था जो अर्जुन को खिंच गया अपनी और. उसकी बात सुन्न कर दीपा भाभी के चेहरे से वो दर्द तुरंत दूर हो कर मुस्कराहट में बदल चूका था. अर्जुन का सर सहलाने के लिए थोड़ी मशक्कत तोह हुई उन्हें पर उन्होंने किया.

"वड्डी वड्डी गल्लां करदे हो तुस्सी मुखिया जी. तुहानू इंकार कीड़ा कर सकदे अस्सी गरीब? जड़ो वेळ लगे, अपना घर समझ के आ जइयो. मांजी डाह के अपने हाथो चोरी तुहाने वि खिला सकदी है."

"जरुरत तोह पड़ेगी हे चोरी की अब. अखाड़े जो जाना है भाभी. दोपहर में मिलता हु आपसे, अभी तोह निकलना होगा. निम्मी से भी मुलाकात हो जायेगी फिर.", अर्जुन अपने दादा जी को अभी भी हुक्के से चिपका हुआ देख हैरान था. उन्हें घर जाने की तोह जैसे कोई जल्दी हे नहीं थी.

"निम्मो नई ौंडी शाम तोह पहला. संडे है इस करके अपनी बुआ दे घर गयी पहली बस तोह. नीला हे बस चढ़ा के आया सी. चंगा मैं वि चलदी हां, फेर तुहाडे भाई साहब ने अपनी जमीन तेह वि जाना है."

"दिलबाग भैया को थैंक यू बोल देना मेरी तरफ से. वही गए है सरपंच जी के साथ दरगाह."

"शाम को अखाड़े में दिख जायेंगे तोह खुद हे बोल देना. यहाँ का एक नियम ये भी है की जिसको जिस से बात करनी हो वो खुद करे. संदेशे महलो में चलते है, गाँव में नहीं.", कमर से निचे का हिस्सा और हलके पीले सलवार कमीज में जिस तरह कैसा था यक़ीनन दीपा भाभी 35-36 की उम्र में भी जवान लड़को के होश उदा देती थी. अर्जुन ने बस एक हे पल वो जलवा देखा था और जैसे उसका ऐसा करना भी आगे जाती दीपा भाभी ने पकड़ लिया. वो बस बिना वापिस पालते मुस्कुराती हुई अपने घर की तरफ बढ़ चली.

"चलो बीटा, चलते है. अब तोह जहा चाहे आजादी से घूमो फिरो और लोगो से मिलो. सबको पता चल गया है की तुम कौन हो."

"आपकी हे राह देख रहा था दादा जी. विनोद चाचा से भी मिलना है और बुआ के साथ baag-bagiche देखने भी जाना है.", जीप में बैठते हे दोनों जहा से आये थे उधर वापिस निकल चले. अब तोह सिर्फ इतना चलने भर से हे अर्जुन को ये जीप भा चुकी थी. जैसे ये हमेशा से उसकी हे थी. कृष्णेश्वर जी भी बगल में बैठे इस सवारी का मजा लेते उसको हर घर का विवरण देते जा रहे थे. 10 मिनट में हे वो गाडी अपनी जगह थी और ये लोग आँगन में. घर लौटने पर हे 7 बज चुके थे जबकि कृष्णेश्वर जी आधा घंटा बता कर निकले थे यहाँ से.

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"हो क्या रहा है जी वह? आप इतनी देर से फ़ोन पे लगे हो और 3 फ़ोन आ चुके गाँव से लेकिन तीनो ने आपसे हे बात करि. लाला का बोल रहे थे? अरे मैं कुछ पूछ रही हु जी और जवाब देने की जगह मूक बने हुए हो.", ये कौशल्या देवी थी जो कुछ अधीरता दिखती हुई खामोश बैठे गंभीर रामेश्वर जी से लगातार पूछ रही थी इन आने वाले फ़ोन का.

"वो.. वो कौशल्या तुम सही कह रही थी. हमको रोकना चाहिए था अर्जुन को वह जाने से."

"हे भगवान् क्या हुआ मेरे लाल को? वो ठीक तोह है न जी और फिर कृष्ण ने अभी तक फ़ोन नहीं किया? आप गाडी बुलवाओ शंकर से मैं वह बात करती हु."

"कौशल्या तुम समझ नहीं रही हो. अर्जुन ठीक है लेकिन उसने वह जाते हे एक दिन में अपनी लीला दिखा दी. दरगाह वाले मेले में उतरने की मुनादी करवा दी तुम्हारे इस लाल ने. उस मेले में जहा इन्दर के जाने पर मैंने बेंट से उसका जिस्म लाल कर दिया था. उस मेले में जहा हम खुद कभी नहीं गए उनकी गुस्ताखी के बाद. पहले जीवनलाल ने बताया की ऐसा किया है अर्जुन ने. अब विलायत भाई और लाला उसके कसीदे पढ़ रहे थे की वो फलाना ढिमका बाघ शेर... इस चरखे को मैं जब वह चौपाल से इधर तक छड़ी से कुटाई करता हुआ लाऊंगा न तभी इसकी शेखी ख़तम होगी. तुम्हारे और मेरे लाड प्यार का नतीजा ये दिया है उसने.", रामेश्वर जी के गंभीर चेहरे और उनके गुस्से को देखते हुए एक पल तोह कौशल्या भी दांग रह गयी और उन्हें वो मंजर भी याद आ गया जब नरिंदर और अज्जू ने दुस्साहस किया था.

"ठन्डे दिमाग से काम लो जी, बचा है न तोह किसी के बहकावे में आ कर ऐसा कर दिया होगा. हम खुद वह जा कर बोल देते है की बचे से गलती हो गयी. मैं बात कर लुंगी पंचायत में और दरगाह पर. उसको कुछ मैट कहना जी, भोला है और आप कह रहे है न की गाँव के लोग खुश है तोह उनकी ख़ुशी के लिए उसने ऐसा कर दिया होगा. वैसे अखाड़े में जाने पर मनाही है क्या जो पहले आपने इन्दर को भी सजा दे दी थी?"

"वो अखाडा नहीं है कौशल्या, मेले में लगने वाला एक खतरनाक जलसा है. 50 बरस से ज्यादा होने को आया था जब उधर चुनौती सिर्फ एक बार उठाई गयी थी. 28 साल पहले तुम्हारे दोनों सपूत वो कारनामा करके आये थे और अब ये दूसरी बार होने लगा है जिसमे फिर से तुम्हारा हे एक और लाडला है भागीदार है. पता नहीं ये औलाद दर्द हे क्यों देती है?"

"कोई दर्द नहीं देती जी, मान हे बढाती है. आपने अज्जू को तोह नहीं मारा था तब और ये बैलब्धि वह भी आपका नाम नहीं झुकने देगा. परवरिश मेरी है और खुराक मेरे हाथो की. आप नहीं गए वह तोह न सही लेकिन अगर गाँव वाले खुश है और अर्जुन सब जान कर ऐसा कर रहा है तोह मैं तोह मेला देखने जाऊंगा. आप रहो अपने इस संसार के बगीचे में. बड़ी इत्छा थी मेरी की मैं अपने बचो को नाम रोशन करते हुए खुद देखु. आजतक तोह नसीब न हुआ लेकिन अब मैं जरूर देखना चाहूंगी. रेखा को बोल देती हु के वो तैयारी कर ले. शंकर व्यस्त हुआ तोह सतीश ले जाएगा हमे. कब है जी मेला?", कौशल्या जी का ये पहलु तोह रामेश्वर जी को हे हैरत में दाल रहा था.

"हम कह रहे है न की अर्जुन को सजा मिलेगी इसकी. और तुम हमारे बिना वह जाने वाली हो कौशल्या? ये जानते हुए भी की हम मेले में नहीं जाते?"

"तोह तलाक देके नहीं जा रही जी आपको. और जानती हु आपको और आपकी सजा को. उसको देखते हे भूल जाना है आपने की वो कोई गलती भी कर सकता है. मेला कब होने वाला है बस ये बता दो जी? न बताओ, मैं पता कर लुंगी. सुबह निकलेंगे और मेला देख के वापिस शाम को वापिस. वैसे दरगाह जाने पर तोह आपने रोक न लगाईं कभी?", कमरे से निकलते हुए वो ृक्क कर रामेश्वर जी का चेहरा ध्यान से देखने लगी.

"भगवन के घर जाने की रोक थोड़ी है कौशल्या. और मेला इसी गुरुवार को है, ठीक चौथे दिन. वह उसको चोट भी लग सकती है क्योंकि प्रतिद्वंदी ज्यादा बड़े और परिपक्व होने के साथ साथ एक से ज्यादा होंगे. कोशिश करता हु कैसे भी करके ये रुक जाए."

"ख़बरदार जी अगर आपने ऐसा करने की सोची तोह. जरूर इसके पीछे कोई बड़ी बात है नहीं तोह वो ऐसा हरगिज नहीं करता.", अभी वो आगे कुछ बोलती की टेलीफोन घनघना उठा. पंडित जी से पहले उन्होंने हे फ़ोन झपटा. दूसरी और अर्जुन हे था जो खुश हो कर उन्हें सबकुछ बताये जा रहा था. रामेश्वर जी के माथे पर पसीना आने लगा था की अब ये लड़का जाने क्या ज्ञान देने वाला है अपनी दादी को. 10 मिनट बाद जब फ़ोन रखा गया तोह कौशल्या जी चहकते हुए बोली.

"मैं न कह रही थी की वो ऐसे कुछ भी नहीं करता. आपके पिता जी का नाम उस जगह वापिस लिखवा कर वो ये चुनौती वाला किस्सा इस बार के बाद हमेशा के लिए ख़तम करने वाला है. उसने कहा है की वो डर की वजह से आपसे बात नहीं करना चाहता लेकिन बाद में माफ़ी मांग लेगा. जी, बचे ने ख्वाहिश राखी है की हम दोनों अगर.. वैसे वो कर तोह आपके पिता के लिए हे रहा है तोह इसमें मैं क्यों झिझक रही हु. मैं तोह वैसे भी जाने हे वाली थी उधर और अब वो खुद हम दोनों को बुला रहा है उस दिन. आप इतने सजा सोच लो जी क्या देने वाले हो उसको. नाम भी आपके पिता का ऊँचा करने में लगा है तोह उसके हिसाब से हे सोचना. मैं बोल देती हु तीनो बहुओं को और संजीव को नहीं बताने वाली. फिर वो अपना प्रोग्राम बदल देगा ये सुन्न कर. हाँ प्यार तोह वही करता है मेरे बाद सबसे ज्यादा अर्जुन से.", इतने तगड़े तंज करने के बाद कौशल्या जी ये ख़ुशी बांटने रसोईघर में चली गयी. उनके जाते हे रामेश्वर जी ने पसीना पोंछने के बाद मुस्कुराते हुए अपने आप से कहा.

'मेरा बिल्ला मुझे हे फंसा रहा है. बहोत सही अर्जुन मिया, मान गए की हमारे वार का तगड़ा जवाब दिया है. और ये कौशल्या बेचारी न मुझे पढ़ सकीय और न उसके जाल में फंसने से बच सकीय. शुरुआत तोह उम्मीद से भी ाची हुई है दिन की, अब आगे देखना है की आग कहा तक जाती है.'

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"ये मैं क्या सुन रहा हु भतीजे की तुमने चुनौती उठा ली है? यार ऐसा वैसा कुछ करने से पहले थोड़ा तोह सलाह मश्वरा कर लिया करो. पापा, आप बात करके ये सब रोक भी सकते है.", नाश्ते के वक़्त विनोद भी तैयार था और आज इतनी सुबह उसको साथ में बैठा देख कृष्णेश्वर जी से ज्यादा ताज्जुब Devaki-Damini हुई. लेकिन उसकी बातचीत ने तोह उनपे और बड़ा धमाका किया. दामिनी रुक कर सुन्न न चाहती थी लेकिन देवकी ने उसको खाना देने के बाद रसोईघर जाने का इशारा किया.

"क्यों रुकवा दू बीटा जरा एक कारण तोह दो? और तुम्हे क्या लगता है की अर्जुन ऐसा कैसे कर गया?"

"ताऊ जी क्या कहेंगे इस पर जब उन्हें खबर लगेगी? वो हमेशा हे मेले से दूर रहे है और मैं भी तोह उधर नहीं जा सका इस वजह से. फिर अर्जुन ने किसके कहने में आ कर ये गलती कर दी?", विनोद को इस तरह अर्जुन की चिंता करते देख देवकी का दिल तोह किया की वो उसको वही झापड़ जड़ दे लेकिन ऐसा कभी पहले किया हो तोह करती. अर्जुन मुस्कुराता हुआ बस खाना चबाने में लगा रहा क्योंकि जवाबदेही के लिए कृष्णेश्वर जी जो थे यहाँ.

"बड़े भैया ने पिता जी का हक़ इसके सुपुर्द कर दिया जैसा सभी ने मिल कर फैंसला किया था. इस हिसाब से गाँव के हर मसले, kaam-sudhar और पंचायत का मुखिया यही है. इसने फ़िलहाल तोह शामिल होने से इंकार कर दिया लेकिन मेले की मुनादी पिता जी के नाम को वह फिर से स्थापित करने के लिए इसने करवाई है. शेर बचा है ये जो जीत कर हमारा मान हे बढ़ाएगा. बिनोद बीटा, बड़े भैया अपना गुस्सा भूल जायेंगे जब पिता जी का नाम वह देखेंगे. वो आएंगे मेले पे भाभी के साथ उस दिन जैसा अभी इसकी बात होने पर भाभी ने कहा है. सम्मान की रक्षा के लिए औलाद हे तोह सामने कड़ी होती है. 28 बरस पहले वो नाम वह से हटा था जो मेरा ये पौता वापिस लगाएगा.", कृष्णेश्वर जी ने उठने से पहले प्यार से अर्जुन का सर सहलाया और सेवक के साथ गाडी में बैठ कर खेतो की और निकल गए. भोजन साथ ले गए थे और रात शायद वापिस नहीं आने वाले थे काम की वजह से.

"भतीजे, ाचे और बुरे दोनों लोग यही चाहते थे बरसो से. लेकिन इसका परिणाम वैसा नहीं निकलने वाला जैसी सबको आशा है. अखाड़े में होगी भीड़ जहा तुम्हे नुक्सान पहुंचने वाले कितने हे अनजान चेहरे हो सकते है. ऊपर से 5 से 10 पहलवानो से तुम्हे भिड़ना होगा, ज्यादा ख़ास नियमो के बिना. सब उतना साफ़ नहीं है जितना तुम्हे सुन्न कर लगता है. कोई आम मेला, वह बस कुश्ती का खेल जिसमे जीतने वाले को लंगोट, गदा और पैसा मिले. इधर 5 बड़े गाँव और उस से दुगने छोटे गाँव शामिल होने वाले है. दूसरी तरफ वाले बड़े गाँव को तोह इस दिन का हे इन्तजार था जब उनकी ख्वाहिश पूरी हो.", वो आगे कुछ बोलता की देवकी जी ने टोक दिया.

"चैन से उसको खाना खाने दे बिनोद. बताया न तेरे पिता जी ने की वो अब मालिकाना हक़ रखता है और चौपाल में इसने हे ये फैंसला लिया है. मेले से पहले वाले दिन हे सांझ को आ जाना. तेरे ताऊ -ताई ने भी सुबह इधर होना है. कुछ कमी न रहे ये देख लेना. अर्जुन बीटा, थोड़ा माखन लगा ले पराठे पर. खुराक ाची रख अपने जिस्म के मुताबिक.", पता नहीं ये माखन वो पराठे पर लगा रही थी या अर्जुन पर. कोशिश व्यर्थ थी दूसरे मामले में तोह और विनोद भी ख़ामोशी से नाश्ता करने लगा. पप शर्मा ने इनसे पहले खा लिया था जो अब अपना थोड़ा बहोत सामान समेत कर कार में रख रहा था.

"आँचल तुम्हारा बैग नहीं दिखा बीटा मुझे?"

"पापा मैं मेले तक यही रहने वाली हु. कंप्यूटर सेण्टर पर फ़ोन कर दूंगी थोड़ी देर में और आपके खाने की परेशानी है तोह मां इंतजाम कर देंगे. क्यों मां, हो जाएगा न?", विनोद की जगह आँचल ऐसा अर्जुन की तरफ देखते हुए बोली थी और उसकी ये अदा देख अर्जुन मंद मंद मुस्कुरा उठा. दामिनी अपनी बेटी की बात सुन्न कर रसोईघर से बहार आयी तब तक विनोद जवाब देने हे लगा था.

"हाँ आँचल तुम जीजा जी की टेंशन न लो. वैसे भी हम लोग साथ हे रहते है तोह कोई परेशानी नहीं. तुम वह अकेली भी घर में क्या करोगी?", इस जवाब को सुन्न कर दामिनी विनोद को घूर रही थी जो अर्जुन की मौजदगी की वजह से अपने दिल की न कह पाया था.

"अकेले से क्या मतलब है तेरा? वह घर पे कितना काम रहता है और इसने पढ़ाई भी करनी होती है. घर का खाना तेरे जीजा के साथ तुझे भी नसीब होगा अगर ये वह रहेगी तोह. इधर कंप्यूटर भी नहीं है जिस से ये तैयारी कर सके. मैं कपडे पैक करती हु तेरे."

"अपने पैक कर लो तोह और भी ाचा होगा माँ क्योंकि मैं मेले तक यही रहने वाली हु तोह रहने वाली हु. मेरे पापा मेरी हर बात पूरी करते है और मां भी अपनी भांजी की बात से इंकार नहीं करेंगे. वैसे कंप्यूटर तोह मंगवाया है मां से अर्जुन ने शहर से. जाते हे भिजवा देनेगे मां और मैं उस पर हे काम कर लुंगी. सेण्टर है कोई बोर्ड का इम्तिहान नहीं.", आँचल के ऐसे तेवर से दामिनी हार मान चुकी थी क्योंकि और बहस करने पर तोह वो बिदक कर शायद उसका कोई कला सच हे न उगल देती. पप शर्मा तोह बेटी की बात सुन्न कर फुला नहीं समाया.

"रहने दे न इसको यही पे दामिनी. बचे छुट्टियां तोह आजादी से मनाये अपनी और आज से पहले कभी इसने कुछ माँगा है? बिनोद भिजवा दियो जो वो कह रही थी और गेंटटर भी.", देवकी का इशारा भी मेल खता था दामिनी की सोच से.

"वो जनरेटर होता है माँ और फ़िक्र न करो 2 घंटे तक दोनों चीज पहुंच जाएंगी यहाँ. अर्जुन, तुम्हे मैंने जिन लोगो से मिलवाना था उनसे तोह तुम खुद हे मिल लिए. फिर भी केवल सिंह और दिलबाग को मैं याद दिलाता जाऊंगा की वो तुम्हारा उचित ध्यान रखे गाँव और आसपास. धुप में ज्यादा बहार मैट घूमना और रात को अपनी चची की तरफ हे सोना, निकेतन भी तुम्हे पसंद करता है और अनामिका सो भी गयी तोह तुम अपने छोटे भाई का ध्यान रख सकते हो. ठीक है माँ, निकलता हु मैं भी. चौपाल पर थोड़ा काम है उसके बाद ये काम करके होटल देखता हु.", अर्जुन ने भी हाँ में सर हिलाया तोह जाने से पहले विनोद ने उस से हाथ मिला कर अपना ध्यान रखने का फिर से कहा. अजीब बात ये थी की वो न तोह अपने बेटे से मिल कर गया था और न अनामिका से मुलाकात की. अर्जुन हाथ मुँह धोने के बाद कपडे बदलने कमरे में चला गया. उनसे दामिनी के साथ बगीचे देखने जो जाना था.

"कभी कभी तोह इतना मान देते हो की लगता है एक तुम हो जो मुझे समझते हो और मेरी परवाह करते हो. फिर दूसरे हे पल ऐसा कर देते हो की दिल फिर से दुखी हो जाता है.", अनामिका अर्जुन की कल वाली जीन्स उसके बिस्टेर पर रखते हुए वही बैठ गयी. अर्जुन पाजामे के ऊपर टीशर्ट पहन ने लगा था. आज अनामिका उसके कैसे हुए चौड़े जिस्म को न देख कर बस चेहरा झुकाये बैठी थी. अर्जुन ने वो जीन्स टोलिया लपेट कर ऐसे पहनी की अनामिका को कुछ न दिखे जिसकी उसने कोई कोशिश भी न की थी. ये देख कर वो समझ गया था के चची सचमुच दुखी है.

"ऐ मेरी प्यारी गुड़िया सी चची. मैं आपको दुःख कैसे पंहुचा सकता हु जरा बताओ तोह? एक आप हे तोह हो इस हवेली में जिन्हे मेरी परवाह है और आप हर छोटी बड़ी बात का इतना ख़याल रखती हो की मुझे लगता हे नहीं मैं घर से दूर हु.", अर्जुन जमीन पर घुटने मोड़ कर बैठा दोनों हाथो में चची का चेहरा लिए उन्हें मानाने में जूता था. पूरी कोशिश करने के बावजूद उन डबडबाती आँखों के किनारो से बांध फुट पड़ा. आंसू लुढ़क कर गोर गाल पर आते हे अर्जुन ने उन्हें ऊँगली से साफ़ करते हुए इनकी वजह बस आँखों के इशारे से हे पूछी.

"एक तुम हे तोह जिसने मुझे एहसास दिलवाया की मेरी ज़िन्दगी मशीन जैसी नहीं है. कोई है जो मेरी भी परवाह करता है और मुझे दुखी नहीं कर सकता. फिर क्यों तुमने वैसा किया जैसा ये लोग चाहते है? खुद तुमने अपनी आँखों से देखा था न इस हवेली का कला सच? ये जो चाहते थे वो तुम्हे खुद हे कर दिया अर्जुन, जान लेने के बाद भी. अब फिर से मैं वही बहु रह गयी जिसकी हैसियत बस रसोईघर में 3 वक़्त की चाकरी और बाकी अंतहीन अकेलापन है.", आंसू दोबारा उभरे तोह अर्जुन ने बेपरवाही दिखते हुए चची के उन नरम पतले पतले होंठो को चूम लिया. वो तोह जैसे सदमे में हे आ गयी थी इस अप्रयक्ष घटना और अर्जुन के दुस्साहस से. आंसू की जगह उन आँखों में अब हैरत और गुस्सा था. थप्पड़ मारने के लिए हाथ उठाया हे था की अर्जुन ने गाल सामने कर दिया.

"रोना बंद हो गया आपका देखो और ये गाल तोह जितना चाहे लाल कर लो आप. दुःख हे तोह दिया है न मैंने आपको और मुझे इन षडयंत्रो की पुराणी आदत है लेकिन खेलता खुल कर हु चची. आपने सबकुछ कहा लेकिन ये नहीं कहा के ऐसा हे किश खुद आपने मुझे किया था उस सुबह उठने से पहले जब निकेतन मेरे सीने पर सोया हुआ था और आप मेरी ब्याह पर. इसको प्यार कहते है चची जो मैं भी आपसे करता हु क्योंकि आप दिल की बहोत साफ़ है. इतनी साफ़ की आप कुछ बोलती हे नहीं चाहे घुटन से मर्डर हे न जाओ किसी दिन. मैंने चुनौती इसलिए दी की सब जो चाहते है वो करके उन्हें जवाब दे सकू की मैं पीठ पर हुम्ला नहीं करता, अंधेरो में जिस्म के सौदे पर दोहरा चेहरा नहीं दिखता. उस दिन मेरा तिलक आप हे करेंगी कदम बहार रखने से पहले, घूंगट बिना. आपका ये अर्जुन इन जैसो को तोह वही निबटा देता लेकिन नियम, परिवार और प्यार में विश्वास रखता हु. देखना जब यहाँ से जाऊंगा तोह आप सबके सामने मुझे गले लगाएंगी और जो लोग पीठ पीछे षड़यंत्र बनाते आये है ये बेबसी से बस खड़े देख रहे होंगे की उन्हें श्री श्री अर्जुन स्वामी से ये प्यार क्यों नहीं मिला.", इतने कुछ गंभीर लहजे में बयान करने के बाद अर्जुन में आखिर में थोड़ा मस्ती करते हुए अपना नाम बढ़ा चढ़ा कर बताया तोह सब भुला कर अनामिका चची ने मुस्कुराते हुए अपना सर निचे झुकाते हुए माथा उसके माथे से सत्ता दिया. मांग से जैसे तिलक कर रही हो और उसका चेहरा उनकी दोनों हथेलियों में.

"सब जानते हो फिर भी सताने से नहीं हैट ते तुम स्वामी जी. बहोत बड़ी बातें करते हो लेकिन कुछ मैं भी बताना चाहती हु जो फ़िलहाल मुमकिन नहीं. आइंदा आंसू रोकने के लिए रुमाल काम में ले लेना, तुम्हारा तरीका कही से भी नियम वाला नहीं था.", इतने करीब से जब वो बोल रही थी अर्जुन आँखें मूंदे बस उनके प्यार और इस अपनेपन को हे महसूस करता रहा. दोनों ये भी भूल गए थे की ये एक हवेली का कमरा है जिसके दरवाजे पूरे बंद भी नहीं. अनामिका समझदारी से अलग हो गयी.

"स्वामी? देख लो चची अब आप हे नियम बदल रही हो. वैसे इतने कीमती आंसू बार बार नहीं बहाने दूंगा. एक मामूली कपडे की किस्मत नहीं इन्हे छूने की. मेरी ये घडी अपने पास हे रख लो वह कमरे में, दामिनी के साथ बगीचे देखने जा रहा हु कही खराब न हो जाए. पापा का गिफ्ट है ये.", वो कलाई घडी अनामिका को सुपुर्द करके उसने ये साफ़ बता दिया था के उसके जीवन में वो हम है और परिवार भी.

"बुआ से सीधा दामिनी? तुम तोह काम से काम रिश्ते मैट बदलो. और जब ये इतनी ख़ास है तोह यहाँ क्यों नहीं रखते?"

"आपके साथ तोह सच हे बोलूंगा न चची. बुआ वाला रिश्ता उन्हें अब कामना होगा जिसमे बहोत म्हणत लगनी पड़ेगी उन्हें. और ये घडी मैंने आपको इसलिए सौंपी है क्योंकि मैं घर पे भी ऐसा हे करता हु. जब तैयार हो कर कही जाने लागु तोह रुमाल के साथ पकड़ा देना.", अर्जुन सीधा खड़ा हो कर चमड़े की अंगूठे वाली चप्पल पहन कर बाल ठीक करने लगा तोह अनामिका ने हाथ घुमा कर वो और ज्यादा बिगाड़ दिए.

"अपनी बीवी से करवाना ये रुमाल, घडी, बटुआ देने वाले काम. चची हु और वही रहूंगी.. हँ..", वो जल्दी से मदद कर भागने हे लगी थी की कलाई अर्जुन के दाए हाथ में आ गयी.

"पहले अपनी हरकते भी आप देख लेना थोड़ी. ऐसे नहीं भागने दूंगा, चल कर आराम से जाओ.", अनामिका का तोह सीना हे बहार निकल आया था कुछ और हे सोच कर पर अर्जुन ने आसानी से कलाई छोड़ दी थी.

"दिन में क्या बनाऊ खाने में?", अनामिका दरवाजे के करीब आते साये को देख संभल कर उसके कपडे समेटने का दिखावा करने लगी. ये दामिनी थी जिसको अर्जुन ने भी दरवाजे पर खड़े हुए आईने से हे देख लिया.

"मैं दोपहर को जरा गाँव की छुअपाल और कुछ खिलाडियों से मिलने जाऊंगा चची. लगता नहीं निहाल या शहीद भैया मुझे बिना खिलाये वापिस आने देंगे. हाँ रात में अगर हो सके तोह अजवाइन वाली तुरई की सब्जी बना लेना, aalu-tamatar के रायते के साथ. बुआ, चले.?", अर्जुन के जवाब पर अनामिका घर की बहु वाले अवतार में सजगता से बिस्टेर से कपडे उठा कर सही जगह रखने के बाद बहार चली गयी.

"पैदल चलेंगे."

"बुआ मोटरसाइकिल पर चलते है न. 8 बजे हे बहार धुप तोह देखो आप. हाँ घूम पैदल लेंगे वह."

"और क्या बगीचे में भी फटफटिया ले जाओगे? खेत नहीं है वो, घने बगीचे है फलो के और चाहो तोह टोलिया उठा लो. पिछली तरफ नहर भी है अगर नहाना होगा तोह."

"ये अंगोछा पसीने से बचने के लिए साथ है. मुँह हाथ भी धोना हुआ तोह ये बहोत है. चलो चलते है.", फिरोज़ी चुस्त सलवार कमीज में दामिनी ने अपना जिस्म छुपाने से ज्यादा उसके कटाव दिखा ज्यादा रही थी. चुन्नी कुछ सर पर और एक हिस्सा कंधे से पीठ की और. छोटा सा बना हुआ बैग हाथ में पकडे वो बहार आने के बाद अर्जुन की मोटरसाइकिल पर इस तरह से आ बैठी की सीने का थोड़ा हिस्सा पीठ पर ाचे से सत्ता था. आँचल ने दूसरी मंजिल पर खड़े हो कर ये दृश्य गौर से देखा. वो प्रार्थना कर रही थी की उसकी माँ अर्जुन को बक्श दे. लेकिन दामिनी तोह इरादा पक्का किये निकल चुकी थी शिकार पर.

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"इस सड़क पर बस सीधा चलते चलो. बहार निकलते हे आगे से बायीं तरफ पर रास्ता जाता दिखेगा नीम के पेड़ की बगल से. वैसे कैसी लगी चौपाल यहाँ की? हम तोह आजतक उसमे शामिल नहीं हुए.", दामिनी हवेली से थोड़ा आगे निकलते हे और सत् कर बैठ चुकी थी. उसके भरी स्टैनो की नरमी और दबाव अर्जुन ाचे से महसूस करता हुआ मंद मंद हंस रहा था. सड़क ज्यादा चौड़ी नहीं थी इधर लेकिन लगभग खाली. दुपट्टा हवा में लेहरानी से बचते हुए दामिनी ने एक हाथ से दूसरा सिरा भी पीछे लपेट लिया.

"बड़ी साफ़ सुथरी सड़क है बुआ ये और दोनों तरफ हे खेत है. ये किनारे लगे इतने दरख्त तोह ाचा खासा जंगल हे बनाते है. और चौपाल में तोह ज्यादा कुछ ख़ास नहीं हुआ. बस कल वह अखाड़े में ये मेले वाली बात सुनी थी और प्रतियोगिता वाला मामला सामने आया तोह सोचा चलो ये तरय करते है. बस फिर कुछ लोगो ने चौपाल में मेरा नाम ले दिया, सरपंच के साथ साथ. पता लगा के चाचा का ाचा दोस्त है वो. वैसे ये इधर वाले खेत किसके है? झोपडी भी बानी है और कमरा भी.", अर्जुन दामिनी को सही उलझा रहा था जिस से वो अंदर हे अंदर फूली न समां रही थी.

"ये वाले तोह दिलबाग के है और उसका पक्का ठिकाना है ये क्योंकि घर तोह वो जाता भी कितना है. इधर वाले सारे हमारे जहा तक नजर जाती है. पापा यही होंगे या मदद से अगले वालो में. मुझे भी नहीं पता ये कितने है पर अगले गांव जहा मजदूर भी रहते है वह तक की जमीन अपनी हे है. िन्दु सरपंच की हे बहिन है, चचेरी बहिन. इधर से निचे उतार लो.", ऐसा कहते हुए दामिनी का हाथ अर्जुन की मांसल जांघ पर थोड़ा ऊपर तक आ चला. वो सोच रही थी की अर्जुन को ऐसे उत्तेजित कर देगी और वो जान भी न सकेगा.

"हँ.. वो आंटी भी ाची है व्यवहार से लेकिन आपके बराबर नहीं बुआ. आप तोह समझदार भी हो और मेरा इतना ख़याल भी रखती हो. फूफा जी खुशकिस्मत है.", कच्ची सड़क कुछ 10 फ़ीट चौड़ी थी लेकिन नरम नहीं. उसको वैसे हे पकाया हुआ था. दोनों तरफ घनी छाया देते वृष और खेत. अर्जुन द्वारा अपनी तारीफ होने से दामिनी और जोश से भर उठी. मोटरसाइकिल थोड़ा झटके कहती जिसका फायदा उठा कर दामिनी ने हाथ उस कुछ नरम लेकिन पहले हुए हिस्से पर रख दिया जो अर्जुन का लिंग था. दूसरा हाथ पीठ से कंधे पर रखे हुए वो थोड़े नखरे से बोली.

"हाँ बस यही है मुझमे क्योंकि उम्र ढलने से बूढी जो दिखने लगी हु. अनामिका तुम्हे ज्यादा पसंद है क्योंकि वो खूबसूरत और जवान भी है."

"कैसी बात करती हो बुआ? वो तोह पता नहीं कैसी है जो हर समय बस अपने में हे लगी रहती है. खाना और कपडे के सिवा मेरा उनसे बातचीत का कोई अनुभव नहीं. लेकिन बूढी वाली बात आप जानबूझ के बोली न? कोई कह भी नहीं सकता के आप चाचा की बड़ी बहिन हो और दीदी जितनी बड़ी बेटी भी होगी आपकी. सबसे ाची बात है की खूबसूरत होने के साथ साथ आप हंसी मजाक करती रहती हो. इतना काम और जिम्मेवारिया उठाने के साथ साथ अपने आप को फिट भी रखना और खुश भी रहना बहोत बड़ी बात है.", अर्जुन हॉली से कोई 3 कोस दूर आ चूका था अब तक और आगे उसको घने जंगल जैसा नजारा दिख रहा था.

"तुम मजाक कर रहे हो न? इतना भद्दा शरीर है मेरा और उम्र भी देखो. वो सामने हे बाग़ शुरू होते है हमारे लेकिन सीधा नहीं जाना. इधर से अगले बाग़ की तरफ चलो. वह घूमने में ज्यादा मजा आएगा. उधर तोह इतनी छाया है की धुप भी नजर आती. आड़ू, लीची लगने शुरू हो गए होंगे पर खाने लायक नहीं. हाँ जामुन और aalu-bukhare जरूर पके होंगे. पापा बचपन में कहानियां सुनते थे तोह बताते थे की इधर कभी कभी तेंदुए आ जाते है. तुम डरते तोह नहीं न?"

"डर किसको नहीं लगता बुआ पर अगर ऐसा कुछ हुआ भी तोह मैं आपको कुछ नहीं होने दूंगा. वैसे आप खुद की तारीफ सुन्न ने के लिए वो भद्दे वाली बात बोल रही थी न? अगर आप ज्यादा उम्र का हे जीकर कर रही हो तोह मेरा मान न है की आपसे सुन्दर कोई हो भी नहीं सकता इतनी उम्र में. वह शादी में भी मैंने देखा था की लोग आपकी तारीफ़ कर रहे थे, पर रुतबे की वजह से ज्यादा खुल कर नहीं. लो अब तोह रास्ता हे बंद हो गया.", अर्जुन ने रानी को रोक हे दिया जब वह कटीली तारे देखि. सड़क तोह ख़तम हे हो चुकी थी बिना मंजिल के द्वार पहुंचे. खुश हो रही दामिनी चपलता से मोटरसाइकिल से उतारते वक़्त भी अपने चुके रगड़ना नहीं भूली उसके जिस्म से. अर्जुन का लिंग भी वो कड़ा करवा चुकी थी हलके हाथो से अनजान दिखावा करते हुए.

"ये अपनी फटफटिया यही कड़ी कर दो और ये देखो रास्ता.", उस घने बगीचे में जाने के लिए दामिनी ने कुछ दूर बाढ़ के साथ चलने के बाद एक सीमेंट के खम्बे से हुक निकाल कर तीनो तार हटा दी. अर्जुन उसकी कारस्तानी देख मुस्कुरा उठा. मतलब वो चोर रस्ते से अंदर जा रहे थे, सामने वाला बगीचा लगभग 500 मीटर लांघ कर. इसके पीछे भी जरूर उसकी कोई अलग हे मंशा होगी. अर्जुन अंगोछा सर पे ढकते हुए उस रस्ते हे अंदर आया और तार उनकी जगह सही से लगा दी.

"सामने से भी तोह आ सकते थे बुआ?"

"आ तोह सकते थे लेकिन मैं नहीं आती उधर से. एक तोह वह जो रखवाली पे है वो मुझे पसंद नहीं और ऊपर से मुनीम काका हुए तोह 4 लोगो को सेवा में लगा देंगे. हम पहरे में थोड़ी न मौज मस्ती करते घूम सकते है? वैसे इस तरफ तोह कोई आता भी नहीं इस समय. बाकी लोग पापा ने खेतो पे बुलवा रखे है तोह सामने वाली तरफ हे 2 लोग होंगे जो दोपहर से पहले तोह आराम भी नहीं करते, मुनीम काका के डर से. आओ मैं तुम्हे पहले ये वाला हिस्सा दिखती हु जो सबसे पुराण है.", दामिनी की बात उचित थी की यहाँ दिन में भी इतनी घनी छाया थी की कही कही से हे धुप की किरणे पाटो को चिर कर जमीन पर दिखती थी. जामुन जगह जगह बिखरे थे जो पक्षियों या पकने की वजह से. लेकिन ज्यादातर फल बटोरे जा चुके थे. अर्जुन देख रहा था की अब दामिनी का दुपट्टा जिस्म की बजाये उस थैले में था जो वो साथ लिए आयी थी. कमीज कंधो पर से थोड़ा ढीला, जैसे जानबूझ कर बाद में सिलाई खुलवा कर ढीला कराया गया हो. और जिस तरह वो चल रही थी अपने हर भरे हिस्से को नाचती हुई.

"इधर तोह आम और अमरुद के भी पेड़ है बुआ. और ये बहते पानी की आवाज?", अर्जुन भी बराबर चलने लगा था उत्तेजना काम करने के हिसाब से पर दामिनी जैसे ज्यादा हे जोश में थी. उसका हाथ पकड़ कर वो उस दिशा में बढ़ चली जहा से ये हलकी आवाज आ रही थी.

"पेड़ तोह यहाँ पहले सिर्फ जंगली हे थे अर्जुन, जैसे ये बड़े पत्तो वाला और ये पीपल, झाड़... नहर का किनारा है न साथ लगता है. ये देखो. हैं न यहाँ ठंडक?", कोई 6-7 फ़ीट चौड़ी ये नहर कुछ हद्द तक पक्की हे थी लेकिन पानी का बरसो से होता प्रहार ईंटो को आधा घिस चूका था. इस हिस्से से अर्जुन देख सकता था की दूसरी तरफ घाना जंगल जैसा हे था और नहर दूर तक एक सीध में बहती जा रही थी. पानी साफ़ जिसमे पत्ते और बीज वृक्षों से गिर कर साथ बह जाते. गहराई ज्यादा नहीं थी.

"बड़ी सही जगह चुनी है इस बाग़ के लिए दादा जी ने. और या किनारे आपने हे साफ़ करवाए होंगे छोटे दादा जी से बोल कर बुआ?", अर्जुन janc-padtaal के साथ मुद्दा नहीं भूला था, दामिनी को खुश करने का मुद्दा.

"मैं तोह हौद में हे नाहा लेती थी जब छोटी थी. फिर जब बड़ी हुई तोह अपनी सहेलियों के साथ इधर आती तोह mauj-masti के लिए पानी में कूदने का दिल करता पर हौद सही जगह नहीं थी. बस इतने से हिस्से में जमीन साफ़ करवा दी और ये झाड़ घने रखे परदे का काम करने के लिए. िन्दु और रौशनी तोह अभी तक आती रहती है मेरे साथ जब कभी फुर्सत लगती है.", दामिनी जानबूझ कर अर्जुन के सामने झुकती हुई एक कंकर उठाने का दिखावा करती हुई उस ढीले गले से अपने पके हुए खरबूजों का दीदार करवाने लगी. गोर बड़े बड़े मांसल चुचो के बीच हलकी पसीने की नमी उन्हें ज्यादा चमका रही थी. ब्रा भी कुछ ज्यादा हे ढीली थी जो उनका भर त्याग कर भूरे गोलों की हलकी मौजदगी तक दिखा गयी. सीढ़ी कड़ी होने के बाद वो चुने हुए 3-4 कंकर ऐसे पानी में बहाने का दिखावा करने लगी जैसे उसको इसमें मजा आता हो. वो मॉटे मॉटे खरबूजे दाए बाए हिलते हुए अपना जलवा साफ़ साफ़ अर्जुन को दिखा कर जैसे परेशां कर रहे हो.

"तुम भी करके देखो, बहोत मजा आता है. और मैं तोह जब छोटी थी तब 5 बार टप्पा खिलवा देती थी हर पत्थर को."

"हाँ वो तोह हो सकता है बुआ और ये है भी मजेदार खेल लेकिन मैं तोह ठीकरी से खेलता था जो यहाँ नहीं होंगी. वैसे इधर चाचा या कोई उनके दोस्त भी आते रहते है?", अर्जुन ने भी अनुसरण करते हुए अपने टीशर्ट का खिचाव दिखते हुए कुछ कंकर बहाये तोह दामिनी बड़ी हसरत से उस लोखंड से मजबूत और तगड़े जिस्म को निहारने लगी. जीभ पर पानी उभरने लगा था मुँह के भीतर अर्जुन का ये रूप देख. उस से पौने फुट ऊँचा और सचमुच जंगली घोड़े सा तगड़ा था ये युवक. जो भरपूर माद्दा रखता था दामिनी जैसे भरे शरीर को निचोड़ कर पूर्ण संतुष्टि देने का. उसकी हर हरकत से कपडा खींचता चला जाता जैसे अभी फटा की तभी.

"न.. तुम्हे तभी तोह उधर से लेके आयी मैं. ये ख़ास जगह है जहा उनकी मनाही है पापा द्वारा. खुद हे देख लो की जो थोड़े बहोत फलो वाले पेड़ इधर है इनके फल बरकरार है. हाँ दूसरी तरफ एक और जगह है इस नहर के मदद पर जहा वो टंकी बानी है पानी लेने की. उधर ये लोग रात में अपनी दारूबाजी कर लेते है जितना मैंने सुना है. तोह कैसा लगा नजारा?", एक और बार दामिनी झुकी तोह अर्जुन इस दृश्य को हैरत से देखने लगा जैसा दामिनी चाहती थी. वो बड़े बड़े झूलते मांस के गोले उन मॉटे चूचक तक अर्जुन की नजरो में समां चुके थे और वो हैरान था की इतनी गहराई तक दिख कैसे सकता है. दामिनी को लगता था के वो सफल हो चुकी है इस घोड़े को पागल करने में. बेशक उसके जिस्म को इक़बाल, शंकर के साथ साथ ek-do लोगो ने और भोगा था पर पूर्ण न्याय ऐसे खिले हुए बदन के साथ वो भी न कर सके थे. शायद नियमित संसर्ग न होना भी वजह थी.

"जवाब नहीं दिया की नजारा कैसा लगा?"

"कल्पना से भी कही ज्यादा हे सुन्दर. क्या ये सच है?", अर्जुन एकटक उस गहरी खाई को देख रहा था और उसकी हालत पर कुटिलता से मुस्कुराती हुई दामिनी ने वैसी हे अवस्था में जब कंकर बिना नहर की तरफ देखे फेंका तोह उन चुचो का ऐसे थिरकना तोह क़यामत हे था. फिर दामिनी कुछ सोच कर नहर किनारे हे जा बैठी. सलवार घुटनो तक ऊपर चढ़ा कर पाँव उस ठन्डे पानी में डालती. गोरी पिंडलियाँ उस साफ़ बहते पानी में कांच जैसी चमकने लगी. धीरे धीरे उन्हें हिलाते हुए दामिनी ने बड़ी हे शोखी से अर्जुन को पुकारा.

"तुम भी बैठो इधर. पानी में पाँव डालने से कितनी भी थकान क्यों न हो, पल में दूर हो जाती है. पर तुम जीन्स में हो तोह शायद ये सुख न ले सको.", अर्जुन ने झिझकते हुए जवाब दिया.

"वो मैंने निचे निक्कर पहनी हुई है बुआ लेकिन क्या वैसे बैठना सही रहेगा? मेरा मतलब कोई आ गया और उसने हमको ऐसे एकसाथ देख लिया तोह परेशानी नहीं हो जायेगी?"

"हाहाहा.. फिर भी इतना सोच रहे हो जब मैं बता चुकी हु के यहाँ गलती से भी कोई नहीं आने वाला. और शर्माने की क्या बात है इसमें. घर पे भी तोह मोटर पे नहाते हुए तुम बस अंगोछे में हे थे. मैं तोह सोच कर आयी थी की कई दिन हुए इधर इस ठन्डे पानी का आनंद लिए. गर्मी भी भरपूर है तोह ऐसा मौका नहीं गवाना चाहिए. इसलिए मैं तोह नहाने के लिए कपडे भी लायी थी और तुमसे भी कहा था टोलिया रखने के लिए. पर कोई बात नहीं अगर तुम मेरी वजह से परेशां हो तोह रहने देते है.", दामिनी अपने चेहरे पर झूठी नाराजगी के भाव लाती हुई पानी को देखने लगी. अर्जुन ने झिझकने का दिखावा करते हुए कुछ दूर जा कर जब जीन्स खोलने का उपक्रम किया था दामिनी उस आवाज से हे मुँह दबाये कुटिलता से हंसने लगी. और थोड़ी देर बाद हे अर्जुन उस पतले कपडे की निक्कर में दामिनी से 2 फ़ीट दुरी पर आ बैठा. पानी सचमुच शीतल और खास एहसास से भरा था.

"मैंने गलत थोड़ी कहा था. आया न मजा इस गर्मी में ऐसे ठन्डे ठन्डे पानी में पाँव हिलने में.? पर तुम बुआ की दोस्ती से ऐतराज करते लग रहे हो.", दामिनी ने तोह ऐसा कुछ पहले कहा भी नहीं था जो इतनी जल्दी ऐसा तना दे दिया. अर्जुन शरमाते हुए बोलने लगा.

"नहीं बुआ ऐसी बात नहीं है. उधर घर में सभी बस अपनी अपनी बात मुझे कहते रहते है न तोह मुझे आदत नहीं है ज्यादा खुले माहौल की. घर से बहार मेरे दोस्त हे कितने है? एक संदीप हे है जो क्लास में पढता है और प्रीती. आपकी बात भी सही है के अपनों के बीच इतना नहीं शर्माना चाहिए पर यहाँ हम घर से बहार है न इसलिए सोच रहा था के कोई कुछ गलत बात न बना ले."

"हाहाहा.. कितने भोले हो तुम अर्जुन? ये हमारी जमीन है और घर से भी ज्यादा सुरक्षित जैसे मैं बता चुकी हु. और ये लो तुम्हारी सजा बात न मान ने की.", दामिनी क्या करने जा रही है ये अर्जुन भली भाँती भांप गया था लेकिन उसने उसके धक्के को अपनाते हुए खुदका शरीर उस नहर में जाने दिया. वो पंजो के भर कुशलता से संभल गया था खुदको लेकिन घुटने मदद कर डुबकी लगते हुए उसने ऐसा दिखाया जैसे दामिनी ने सचमुच उसको अचानक गिरा दिया हो. भीगे बाल हिलता हुआ वो सीधा खड़ा हुआ तोह टीशर्ट बदन से चिपक कर पारदर्शी हे दिख रही थी. गहराई ठीक उसके सीने के मध्य तक थी पानी की.

"ओह बुआ आप भी न.. देखो पूरा हे भिगो दिया मुझे. अब मैं घर कैसे जाऊँगा इन गीले कपड़ो में?"

"वो छोडो और ये बताओ तुम्हे अब ाचा नहीं लग रहा इतने ठन्डे पानी में खड़े हो कर? कपडे सूख हे जाने है और जीन्स तोह है हे तुम्हारे पास.", दामिनी ने पाँव से पानी अर्जुन की तरफ उछलते हुए मस्ती में कहा और अर्जुन उन भरी भरी जांघो के साथी चिकनी गोरी पिंडलियों की हरकत से गंगना उठा. दामिनी का बदन जितना साफ़ और जानलेवा था अगर उसका दिल भी वैसा हे होता तोह यक़ीनन अर्जुन उसपे प्यार की बारिश कर देता. अब वो बस एक मकसद मात्रा थी.

"लग तोह बिलकुल स्वर्ग सा रहा है बुआ और जब आपने मुझे भिगो दिया है तोह मेरा भी फर्ज है की ऐसा मैं आपके भी साथ करू.", अर्जुन नाटक करता हुआ बहोत धीमे से आगे बढ़ा तोह दामिनी हंसती हुई तुरंत उठ कर उस दूर जा कड़ी हुई.

"ठेंगा मेरा. इतनी जल्दी हाथ नहीं लगने वाली मैं. ये हिस्सा मेरा है और यहाँ मेरा राज है छोटे पंडित जी.", अब वो ये हाथ लगने वाली बात किस लहजे में कह रही थी वो दोनों अपनी अपनी सोच से समझ रहे थे. अर्जुन बहार निकलने का प्रयास करता दिखा तोह दामिनी ने पेंटर बदला.

"रुको रुको बाबा. देखो ये कपडे मैं घर से पहन कर आयी हु तोह सभी ध्यान देंगे अगर ये भीग गए तोह. मैं बदल कर आती हु इन्हे बस तुम नहर में रहना और उधर मैट देखना.", जगह दिखा कर भी दामिनी जिस तरह मन कर रही थी वो जैसे ऐसा होने देना चाहती थी. अर्जुन ने भी सर हिला दिया.

"बस जल्दी आना बुआ और चीटिंग नहीं. आपको पानी में मैं हे गिराऊंगा जैसे आपने मुझे गिराया था."

"हाहाहा.. देखेंगे कौन किसको गिरता है छोटे पंडित जी. बस तुम इधर मैट देखना, गलत बात होगी नहीं तोह.", वो वृक्ष इतना चौड़ा भी नहीं था की दामिनी के केहर ढाते भरे हुए बदन को छिपा सकता. लेकिन ये नजारा बस अर्जुन हे कर सकता था. दूसरी और तोह jhaad-vriksh दामिनी को दुनिया की नजरो से पूर्णतया सुरक्षित रखे थे. सलवार जमीन पर गिरने से पहले हे उसके लचीले बड़े कूल्हों की आधी गोलाई इस तरफ से अर्जुन देख प् रहा था या वो खुद परोस रही थी ये नजारा. अगला वस्त्र भी सलवार के ऊपर आ गिरा तोह वो भूरे चूचक और चुचो का आधा उभार भी नुमाया हुआ. अब सचमुच अर्जुन के ख़ास अंग में रक्त दुगनी रफ़्तार से दौड़ने लगा था. जाने दामिनी कहा रुकने वाली थी जो वो झुक कर इस मुद्रा में कपडे उठाने लगी तोह एक तरफ से उसकी गोरी बड़ी गांड और दूसरी और दोनों खरबूजे से चुके निर्वस्त्र लटक कर अपना पूरा आकर दिखा रहे थे. दामिनी ने कनखियों से देखा तोह पाया की अर्जुन उसके आकर्षण में बुरी तरह से खो कर अपने उठते हुए लिंग को दबाने में लगा था. कुटिलता से मुस्कुराते हुए उसने अपने जिस्म को सफ़ेद झीने से लेकिन कैसे हुए गाउन में लापता और बाकी कपडे समेत कर नहर की तरफ आने लगी. अर्जुन नजरे पलट कर पानी में डुबकी लगाने का ढोंग करने लगा.

"तुम तोह सचमुच बड़े समझदार और बात मान ने वाले लड़के निकले अर्जुन. नहीं तोह कुछ लोग ऐसा मौका ढूँढ़ते रहते है. आउच... उठ.. हाहाहा.. तोह तुमने मुझे फंसा हे लिया..", वो भी जानबूझ कर अर्जुन के बिलकुल करीब आ कर ऐसी मुद्रा में बैठी की अर्जुन उसको घसीट ले अंदर और हुआ भी वैसा हे लेकिन अर्जुन ने फुर्ती से उसको संभल कर अपनी मजबूत बाहों के घेरे में भर लिया था. अब तोह दामिनी का वो वस्त्र भी जैसे छुपाने की जगह सब दिखा रहा था. अर्जुन उसके हंसी देख थोड़ा शर्मसार सा होने लगा.

"अब इतना भी बुरा नहीं की अपनी बुआ को चोट लगने दू. वैसे पानी आपके तोह गले तक आ रहा है बुआ.", दामिनी तोह अपनी नाभि से ऊपर तक लंबवत चिपके उस गरम ashwa-ling से हे शुन्य हो चुकी थी अर्जुन की बाहों के घेरे में क़ैद. इतने करीब होने की वजह से अर्जुन देख न सका था उन लगभग निर्वस्त्र बड़े बड़े चुचो को जिनके दीवाने अनगिनत थे. जब दामिनी की छूट ने पानी के भीतर हे पानी का कटरा गिराया तोह वो जैसे होश में आयी.

"तुम तोह मेरी उम्मीद से भी ज्यादा तगड़े और मजबूत निकले अर्जुन. फिसल जाती या मुँह के बल गिरती तोह चोट लग्न सुनिश्चित था पर देखो जरा इन मजबूत बाजुओं को, कितनी सख्त और बड़ी बड़ी है ये. ओह अर्जुन सचमुच तुमने तोह मुझे थाम कर ाचा हे किया. वैसे पकडे हे रहोगे तोह मस्ती कैसे करोगे?", खिलखिलाती हुई वो पीछे होने लगी तोह पानी से विपरीत जाने की वजह से उसके पाँव जमीन छोड़ गए. इस बार पानी के भीतर गिरती दामिनी को बचने के लिए अर्जुन भी वैसे हे गिरता हुआ पानी में पलट गया उसका सीना अपनी छ्हाती में दबाते हुए. एक पल को दोनों की आँखों ने पानी के भीतर हे करीब से देखा और दामिनी लिपट हे गयी. कुछ मशक्कत के बाद दोनों फिर से अपने पाँव पर खड़े थे लेकिन बुरी तरह से भीगे और ast-vyast. दामिनी हांफ रही थी और उसके हिलते चुके काफी हद्द तक गौनके गले से बहार निकल कर चमक दिखने लगे.

"आपको भागना हे था तोह इस तरफ भागती न बुआ. अभी सर लगता न जमीन से तोह सचमुच चोट लगती.", इसके बाद अर्जुन आगे कुछ बोल न सका जब उसने उन गुब्बारों की पूरी गोलाई अपने से 2 फ़ीट दुरी पर देखि. वो मांस से भरे नरम पहाड़ स्प्रिंग से थिरक रहे थे. बालो को वैसे हे गोल घुमा कर जुड़े की तरह बांधती दामिनी जान चुकी थी बस एक और सही हुम्ला करना है उसके बाद अर्जुन उसके निचे होगा. िन्दु ने जो चेतावनी दी तोह उसको भुला कर वो बस जल्द से जल्द उस मूसल को निर्वस्त्र अवस्था में थामना चाहती थी जिसने आज उसको इस तरह बेपर्दा होने पर मजबूर कर दिया था.

"लगता है तुम्हे चोट लगी है कोई जो तुम गूंगे हो गए हो.", बानी दोनों हाथो से उछलने में दामिनी को मशक्कत तोह हो रही थी पर ये करके वो अपने जिस्म को और ज्यादा उसके सामने खोलने में लगी थी. अर्जुन भी वैसा हे करता दामिनी को भिगोने लगा तोह वो हार मानती हुई हाथ खड़े करने लगी. गाउन की सिलाई बस उसके निप्पल के उभारो पर तिकी थी और अर्जुन के रुकते हे वो शर्माने का दिखावा करती हुई एक हाथ चुचो के सामने रखती हुई पलट के कड़ी हो गयी. अब हिलते पानी में उसके कूल्हे कुछ हद्द तक हे अर्जुन देख प् रहा था.

"क्या हुआ बुआ तुम्हे चोट लगी है क्या या आँख में कुछ चला गया.?"

"तुम बोलो हे मैट बदमाश कही के. मुझे बताया भी नहीं के मेरा सीना दिख रहा है.?"

"Wo..wo बुआ उतना नहीं दिख रहा था पानी में थी न आप उधर se..Shayad आपने ये कुछ ज्यादा हे ढीला गाउन दाल लिया जो भरी हो कर सरक गया. ऐसा करना गलत होता है क्या बुआ?", अर्जुन की नादानी देख वो उसकी तरफ पीठ किये हे मुस्कुराई.

"यही तोह िज्जात्त होती है औरत की और चाहे थोड़े दिखे या ज्यादा, पर बताना तोह चाहिए था न. ढीला नहीं है बस गिरने की वजह से सिलाई उधड़ गयी कंधे से. तुम तोह समझोगे मैं हे बेहया हु."

"नहीं तोह बुआ और आप ऐसा क्यों कह रही हो. मैं भी तोह देखो अब निक्कर में हे हु. अगर नहीं नहाना तोह हम चलते है बहार. पर कंधे से गाउन फट गया है तोह आप बहार कैसे आएँगी? आपकी िज्जात्त मैं फिर से देख लूंगा तोह?"

"बिलकुल हे बुद्धू हो तुम तोह. ठीक है तुम बेटे जैसे हो तोह तुम िज्जात्त के लिए खतरा नहीं हो. लेकिन इसका जीकर भूल के भी किसी से मैट करना नहीं तोह फिर जरूर मेरी बदनामी होगी.", सीने पर हाथ रखे हे वो शर्माने का ढोंग करती हुई अर्जुन के करीब आने लगी. अर्जुन तोह सीने से टीशर्ट उतारने के बाद निचोड़ कर वही झाडी पर दाल चूका था. दामिनी के सामने अब उसका जंगली घोडा अपने असली रूप में था. चेहरे पर आयी लाली दिखावा नहीं थी जो उत्तेजना की निशानी थी.

"नहीं करूँगा बुआ और दुधु तोह सभी लेडीज के होते है."

"बुद्धू कही के होते तोह सबके है पर वो इन्हे दिखती नहीं फिरती. चल छोड़ ये सब और मेरी मदत कर बहार निकलने में.", अर्जुन ने सर हिलाते हुए अपनी बाहे पेश की तोह दामिनी जैसे इस इन्तजार में हे थी. धीरे धीरे उसके चौड़े निर्वस्त्र सीने को अपने सीने से लगाने के लिए ऊपर उठती वो बहार निकलने की जगह जैसे अर्जुन पर चढ़ रही थी. अर्जुन कदम किनारे बढ़ने लगा तोह एक पल के लिए उसके भीषण लिंग की ठोकर दामिनी की जांघो के बीच जा लगी. मखमली मांस को अंदर ठेलता वो कामदण्ड दामिनी की उत्तेजना चरम पर ले गया था. अनजाने हे एक सिसकी सी फूट बड़ी और बाहों में अर्जुन को जोरो से भींच वो जिस्म को सँभालने की कोशिश करने लगी. स्पर्श से हे उसका ये हाल था तोह जब ये उसके अंदर जायेगा तोह क्या हालत hogi.?Damini सुधबुध खो चुकी थी लेकिन जैसे हे उसके नितम्ब किनारे पर ठीके तोह उसने आँखें खोली. सब नीला नीला सा लग रहा था और बदन रूई सा हल्का.

"आपको कही चोट लगी है बुआ? शायद यहाँ चीरा लगा है आपके पर खून तोह नहीं दिख रहा.", जरुरत से ज्यादा हे पहली हुई योनि के ठीक ऊपर वस्त्र बुरी तरह चिपका था जहा से उसका लम्बा चीरा उभर कर साफ़ बता रहा था के यही वो जगह है जिसका सामाजिक नाम औरत की इजत्त है. अर्जुन के इस सवाल और गंभीर चेहरे को देख दामिनी ने ने उसकी ऊँगली की दिशा में देखा तोह अपना हाथ छूट पर रखती वो शर्म के साथ साथ हांसे बिना न रह सकीय.

"बेवकूफ कही के ये चोट नहीं छूट है और तुम्हे शर्म आणि चाहिए इसको देखने से पहले. अब पलट जाओ जबतक मैं कपडे बदल कर न लौट आऊं."

"बुआ आप तोह अजीब हो? देखो अब दुधु सामने पूरे निर्वस्त्र है जिन्हे पहले आप िज्जात्त बोल रही थी. तब भी यही कहा के शर्म आणि चाहिए. फिर ये जो गाली वाला शब्द आपने इस चीरे के लिए उपयोग किया उसपे भी कह रही है की शर्म आणि चाहिए. आप बताओ फिर कौनसी बात मानु?", सचमुच दामिनी के दोनों मांसल चुके बेपर्दा थे जिनके निप्पल पूरे अकड़े हुए चूसे जाने को तैयार. दामिनी जैसे तैसे उन्हें आधा अधूरा ढकती हुई कड़ी हुई तोह उसकी विशाल गांड अर्जुन के सामने आ गयी.

"जो हुआ और जो तुमने देखा वो बस यही रहना चाहिए अर्जुन. तुम्हारी बुआ और दोस्त की इज्जत का सवाल है, सोच लेना. और उधर मैट देखना या देख भी लेना, बचा हे क्या है अब. हो तोह बुधुराम हे तुम जो अंगो के नाम नहीं समझते अभी तक.", अर्जुन उसके जाने के बाद पानी में खड़ा बस मुस्कुरा रहा था दामिनी की बेशर्मी पर. वो इतनी जल्दी इस हद्द तक बढ़ जायेगी ये बस दामिनी के हे बस का था. उस पेड़ की आउट में जाते हे दामिनी ने वो भीगा कपडा जिस्म से जुड़ा कर दिया. उत्तेजना से उसकी मोती मांसभरी छूट इतनी फूल चुकी थी की बस ऊँगली अंदर जाते हे दामिनी झाड़ जाती. लेकिन वो तोह जैसे कृत्रिम सहारा प्रयोग करने में यकीन हे नहीं करती थी. जैसे तैसे उसने बदन सूखने के बाद पहले वाले वस्त्र पहने और उस जगह से थोड़ा बहार निकली तोह अर्जुन के तैरने की आवाज बंद जान पड़ी. अगला दृश्य देखते हे बिना छूट सहलाये वो अपनी जगह कड़ी हे झड़ती हुई कांपने लगी. नहर के दूसरी तरफ अर्जुन उस भयंकर लिंग को थामे जैसे मूत्र त्यागने की कोशिश कर रहा था. इस जगह से दोनों के बीच हद से हद 10 फ़ीट की दुरी थी जिस से दामिनी साफ़ देख रही थी उस 9 इंच से भी लम्बे मूसल को जिसका आधे से ज्यादा हिस्सा अर्जुन की मुट्ठी से बहार था.

'ओह मेरी माँ ये क्या बाला है? इंसान का लुंड तोह नहीं लगता ये कही से भी और ये बेवकूफ लड़का करने क्या लग रहा है?', वृक्ष का सहारा लिए दामिनी अपने आप को रोकने की भरसक कोशिश कर रही थी पर उसके हर जिस्मानी वार से ज्यादा तगड़ी थी अर्जुन की ये हरकत.

"मैं आ रही हु अर्जुन. तुम नाहा लिए न?"

"नहीं बुआ आप रुको वही. मुझे थोड़ी परेशानी हो रही है. जब कहु तब आना.", अर्जुन हलके हाथो से अपना मूसल सहलाते हुए जैसे उसको ढीलना करना चाहता था. दामिनी के हाथ खुद बा खुद उसके दिल के तरफ वाले मॉटे चुके को मांसलने लगे थे इस दृश्य को देख. जिस्म में अनगिनत चींटियां रेंगने लगी थी जिनका स्त्रोत उसकी रास बहती छूट थी. उसने फिर से आवाज दी जिसमे लडख़ड़ात का समावेश था.

"तुम बहोत देर लगा रहे हो और कैसी परेशानी? मैं आती हु और देखती हु क्या हुआ है.", अर्जुन ने थोड़ी प्रतीक्षा की और कनखियों से नहर किनारे आयी दामिनी को देख डरते हुए निक्कर ऊपर चढ़ा ली.

"वो.. वो बुआ कुछ नहीं हुआ बस थोड़ा दर्द हो रहा है."

"इधर आओ मेरे पास और देखने दो. जिधर दर्द हो रहा है वो मैंने भी देख लिया.", अर्जुन की नौटंकी दामिनी से कही बेहतर दर्जे की थी जो ना में सर हिलता हुआ पानी में वापिस आ खड़ा हुआ.

"देखो अगर तुम नहीं आये तोह फिर मैं आ जाउंगी पानी में. तुम चाहते हो फिर घरवाले मुझसे पूछे की ये सब कैसे हुआ? दोस्त समझ कर हे मुझे देखने दो."

"आप किसी से कुछ कहना मत बुआ. वो मेरी नुनु में दर्द हो रहा है और पहले तोह पानी दाल देता था तोह ये ठीक हो जाती थी लेकिन आज तोह पानी में रहने पर ये ऐसी हो गयी. सुसु भी नहीं आ रहा.", कितना मासूम था ये बचा जो अभी तक नुनु, सुसु तक सिमित था.

"हाहाहा.. वैसे तोह तुम मुखिया बने फिरते हो और सब कहते है की बड़े बड़े काम चुटकी बजाते कर देते हो लेकिन ये नुनु सुसु तुम्हारा आजतक वैसा हे रहा. लुंड बोलते है इसको और ये कभी कभी ऐसे कड़क हो हे जाता है. पहले तुम क्या सिर्फ पानी दाल कर हे इसको ठीक करते थे? लाओ देखने दो जरा.", दामिनी ने जैसे हे वो अजगर निर्वस्त्र किया उसका दिल काँप उठा. करीब से तोह वो सचमुच जानलेवा था. पूरी हथेली लपेटने पर भी उसका घेरा न माप सकीय, उल्टा दिल की धड़कन ने जैसे साथ हे छोड़ दिया उसकी सख्ती और गर्मी के सामने. कोई दुर्गन्ध नहीं और गेंहुआ तसाफ त्वचा के साथ हे जड़ से डेढ़ गुना मोटा गुलाबी लाल सूपड़ा. दामिनी तोह अपना किया सवाल हे भूल गयी थी इस विलक्षण हथियार के सामने. हाथो का कंम्पन देख अर्जुन अंदर हे अंदर दामिनी की हालत पर हंस रहा था.

"कभी कभी ज्यादा दुखता है तोह मैं इसको आगे पीछे हिला लेता हु बुआ. फिर कुछ सफ़ेद सा निकलता है जिसको मेरे दोस्त ने स्पर्म बताया था. फिर ये ठीक हो जाता है लेकिन आज नहीं हो रहा. आप भी किसी को मैट की मुझे ये सब पता है. मेरे दोस्त ने कहा था के ये बातें सबसे नहीं कर सकते. सिर्फ दोस्तों के बीच हे ठीक रहती है. वो भी इसको लुंड हे बोलता है पर कितना गन्दा नाम है न?"

"गन्दा नहीं है रे अर्जुन, ाचा और सही नाम है लुंड लेकिन तेरे जैसे लुंड को तोह लुंड कहना भी गलत हे है. स्पर्म को माल या वीर्य भी बोलते है. देख मेरे हाथ नरम है तोह इनकी मालिश से ये ठीक हो जाएगा. तू बस ये बात.."

"किसी से नहीं कहूंगा बुआ और आप भी मैट कहना की आपने मेरी िज्जात्त देखि है. हांण.. बुआ ाचा लग रहा है.", दामिनी तोह kaam-jwala में जलती हुई उस मूसला को एक हाथ से सहलाने के साथ दूसरे हाथ से अर्जुन के बड़े बड़े अंडकोष जांचने लगी. वो यही सोच रही थी की इनमे कितना वीर्य भरा होगा. अर्जुन मजे में आँखें मूंदे इस हस्तमैथुन का मजा ले रहा था और उसकी स्थिति देख दामिनी ने भी एक कदम आगे बढ़ने की सोची.

"आँखें बंद हे रखना अर्जुन, तुम्हे ज्यादा मजा आएगा और जल्दी सब ठीक भी लगेगा.", एक हाथ पर मुँह से थूक गिराने के बाद दामिनी ने वही हाथ अब उस मूसल की मालिश में लगा दिया. सूपड़ा मुँह के करीब होने से उसका बड़ा दिल था की वो उसको मुँह में भरे लेकिन एक तोह उसका भयंकर रूप और दूसरा गलत जल्दबाजी. बस वो यही सब ध्यान में रखते हुए जितना हो सकता था उतनी कुशलता से हस्तमैथुन करने में जुटी रही. हाथ हे दुखने लगे थे कुछ समय बाद दामिनी के.

"इंसान हे हो न तुम?"

"मैंने कहा था बुआ के मैं कर लूंगा खुदसे. आपके हाथ नरम है पर ये नार्मल होने में मेरे हाथ भी दुख देता है. मैं करता हु इसका कुछ, आप रहने दो बस इधर ध्यान रखना.", अर्जुन भूखी बिली से वो मलाई भरा डंडा खिंच फिर से पानी में जा कूड़ा. दामिनी सदमे जैसी हालत में बस देखती रह गयी अपने खाली हाथो को और पानी के भीतर मछली से तैरते उस बाघ को जिसको वो घोडा, जानवर या बेवकूफ समझ रही थी. वो कुछ हे क्षणों में नजरो से ओझल हो चूका था. अर्जुन पानी के भीतर ध्यान लगाए तैरता हुआ कोई आधा किलोमीटर निकल गया था. वापिस लौटने पर उसने किनारे किनारे चलना हे सही समझा. अब वो और उसका विलक्षण हथियार पूरी तरह स्वाभाविक अवस्था में थे.

"चलो बुआ आप भी हाथ मुँह धो लो, मैं कपडे पहन लेता हु फिर चलते है यहाँ से. धुप ज्यादा बढ़ गयी है इस बगीचे से बहार.", शरीर से पानी को हाथो से हे झड़ते हुए अर्जुन अपना गमछा उठाये ऐसे जा रहा था जैसे वह कुछ हुआ हे न हो. दामिनी तोह सवाल करने की अवस्था में हे नहीं थी अब और कपडे पहन ने के बाद बिना बगीचा घूमे वो अपनी इस बुआ को पहले से भी अधिक भूखी हालत में लिए हवेली निकल चला. दामिनी जब थोड़ा बेहतर हुई तोह वो आधे रस्ते आ चुके थे.

"आइंदा वो अकड़न हो तोह मेरे पास पक्का इलाज है अर्जुन."

"कामयाब इलाज बुआ या फिर मुझे बीच में हे छोड़ डौगी थकने की वजह से?", अर्जुन अभी भी खेल रहा था द्विअर्थी अंदाज में जबकि दामिनी उस लिंग की गुलाम हो कर सच बोल रही थी, शब्दों को संकोच से सिमित करती हुई.

"यकीन करो फिर तुम्हारा दिल अपनी इस बुआ से दूर जाने का नहीं करेगा. मैं देख रही थी की तुम साधारण इलाज से हे ठीक हो सकते हो या नहीं. गलत थी मैं और तुम्हारी परवाह भी करती हु. दूसरा इलाज कुछ ज्यादा हे मुश्किल और गुप्त है लेकिन पूरी तरह कारगर. अगर तुम्हे लगता है की तुम्हारा शांत करने का तरीका बस कुछ समय का है तोह हम मेरे वाले इलाज की कोशिश कर सकते है."

"बुआ, आपने दोस्त बनाया है तोह मैं भी झूठ नहीं बोलूंगा. ऐसा मुझे अक्सर रोजाना हे होता है और रात में सोने से पहले जबतक नुनु पर पानी न गिरा लू ये वैसी हे रहती है. कभी कभी ज्यादा सख्त हो जाए तोह बहोत म्हणत काके हिलना पड़ता है. बाथरूम की गर्मी में तोह बुरा हाल हो जाता है पर आराम भी जरुरी है. अगर आपको अपने इलाज पर विश्वास है की वो काम करेगा तोह जरूर मैं आजमाना चौंगा. गुप्त रखने की जिम्मेवारी हम दोनों हे निभाएंगे.", अर्जुन गाँव में बस दाखिल होने हे वाला था.

"तुम मुझे इस तरफ िन्दु के घर हे उतार दो अर्जुन. कुछ जरुरी सामान चाहिए होगा मुझे उस इलाज के लिए और िन्दु के पास वो मौजूद है. उसके पति को भी ऐसी परेशानी थी जिस वजह से उसने कुछ दिन पहले हे वो सामान सेहर से लिया था जो इसमें इस्तेमाल होता है. दोपहर के खाने के बाद तुम ऊपर उस कमरे में आ जाना जो मैंने तुम्हे कल दिखाया था. बस उस पीले मकान के सामने रोक दो और माँ से कह देना रस्ते में िन्दु मिल गयी थी और उस से मिल कर मैं जल्दी हे आती हु.", अर्जुन ने देखा की ये मकान दो मंजिला और पक्का था, पूरी चारदीवारी के साथ. बुआ को वही उतार कर वो वैसा हे करने का कहता हुआ हवेली के आँगन में जा कर रुका. दामिनी को बगीचे की सैर करवाने में पूरे तीन घंटे लगे थे, सफर मिला कर. और अब यहाँ पर कुछ लोग जनरेटर फिट करने के बाद वापिस जा रहे थे. देवकी हे उन्हें बहार तक छोड़ने आयी थी जबकि चची कही दिखाई न दी और उसके कमरे से स्पीकर पर गाने चलने की आवाज साफ़ सुनाई दे रही थी.

"ओह तोह ये कंप्यूटर इसलिए मंगवाया गया है?", अर्जुन ने दरवाजे पर खड़े खड़े हे आँचल और अनामिका चची को कंप्यूटर के साथ खेलते देख आवाज दी. आँचल उन्हें गाने चलना सीखा रही थी. अर्जुन की आवाज सुन्न कर एक बार तोह वो सकपका हे गयी फिर मुस्कुरा कर वापिस स्क्रीन पर देखने लगी.

"बीटा, ये कांउटर तोह छोटा दूरदर्शन हे है. ये तोह पहले से न थे यहाँ 2-2?", देवकी जिस तरह ठुड्डी पर हाथ धरे अर्जुन की बगल में कड़ी वही देख रही थी जो अर्जुन.

"हाँ दादी है तोह ये कुछ और चीज लेकिन आप सही कह रही हो की अब ये बन वही रहा है. दादी, मैं चची वाले कमरे में थोड़ा सो रहा हु बस आप एक बजे से पहले मुझे उठा देना.", अर्जुन अंदर दाखिल हुए बिना हे विनोद वाले कमरे की तरफ चला गया.

"ाची बात है बीटा उठा दूंगी. बहु कांउटर, क्या गलत नाम है इसका.. बहु, मैं जरा पड़ोस में जा रही हु निक्कू को ले कर. मीणा, दरवाजा लगा ले.", ये भी निकल ली अपने ठिकाने और मामी भांजी उस अध्भुत दूरदर्शन से चिपकी रही.

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