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हक़ और हक़ीक़त
आगे...
"दादा जी कह रहे है की वो दादी और मुझे कुछ दिनों के लिए गाँव ले कर जाएंगे. साथ हे माँ और प्रियंका दीदी भी जा सकती है.", अर्जुन तैयार हो कर खाने की मेज पे आया हे था जहा उसके पिता, ताऊजी और दादा जी पहले से विराजमान थे. पंडित जी yada-kada हे ऐसे सबके साथ शामिल होते थे लेकिन आज वो भी तैयार थे और राजकुमार जी भी. रुपाली ने आरती, तारा और प्रीती के लिए भी वह प्लेट लगते हुए ये बात कही तोह बाकी सभी उसको हे देखने लगे और फिर रामेश्वर जी को. कौशल्या जी भी अपने पति की बगल में आ बैठी जिनके चेहरे पर कुछ संतुष्टि थी.
"ये प्रोग्राम कब बना दादा जी? और अगर पापा के मां जी के घर जा हे रहे है तोह संजीव भैया के लौटने के बाद भी जा सकते है. भाभी और भैया भी घूम आएंगे.", अर्जुन जगह ढूंढ़ता आखिर में अकेला हे इस तरफ आ बैठा जहा उसकी अगल बगल में 2 पंक्तियों में बाकी सभी बैठे थे. इस तरह जैसे वो मुखिया वाली कुर्सी पर जा बैठा हो पर वैसा था नहीं.
"ोये नंदलाल, तेरे भैया भाभी अब हर जगह तोह न चिपके रहेंगे हमारे साथ साथ? वो तोह मैंने हे तेरे दादा जी से कहा था के हंसमुख उधर से अगले महीने शहर चला जाएगा तोह उस से पहले थोड़ा ghar-khet देखभाल आये. तेरी माँ के लिए खुद शंकर ने कहा है की 15 से 20 दिन हाथ सही होने में लगने वाले है और रेखा काम करने से हटने वाली नहीं. इसलिए उसको साथ लेके चलते है और 3-4 दिन की हे तोह बात है. चौथे दिन वापिस भी लौट आएंगे. और अभ नहीं जा रहे, 29 या 30 को जाना है. रुपाली ने भी अपना कुछ सामान ले कर आना है तोह घूम आएगी साथ.", कौशल्या जी ने बात कहने के साथ साथ अर्जुन को नरम शब्दों में झाड़ भी दिया था जो अब बगले झांकता इधर उधर देख रहा था अपने बचाव में लेकिन बाकी सभी उस पर हे हँसते लगे. संजीव भी तैयार हो कर ख़ामोशी से उसकी हे बगल वाली कुर्सी पर बैठ गया. शायद उसकी अलग हे परेशानी थी कोई.
"हाँ तोह ाची बात है न दादी लेकिन ध्यान रखना बस. गर्मी बढ़ने लगी है और गाँव में ..", अर्जुन की बात फिर से कौशल्या जी ने काट दी.
"तू ये बात अपने बारे में सोच बीटा कही वह गलियों में भटकता फिर और धुप में कोयला हुआ वापिस आये. ज़िन्दगी शहर से ज्यादा मैंने gaanv-dehat में हे बिताई है और वह हम लोग क्या सिखर धुफेरी में सड़क पे रहने वाले है? कोमल बीटा संजीव का भी नाश्ता लगा दे. ये इधर बैठ गया लेकिन इसकी बीवी इन्तजार में अभी तक भूखी है.", ये संजीव भी आ फंसा था अपनी दादी के घेरे में जिसको बात सुनते हे ठसका लगा लेकिन सबको हँसता देख वो अर्जुन की और प्रश्नात्मक देखने लगा.
"भैया आज न दादी थोड़ी परेशां है क्योंकि उनसे शायद दादा जी ने कुछ छुपाया जो उन्हें पता चल गया. आप बस आराम से नाश्ता करो और भाभी मेरी माँ के कमरे में उनके साथ हे नाश्ता कर रही है.", अर्जुन ने इस बार कौशल्या जी को हे लपेट लिया था बेशक मजाक में हे. जो अपने पति को घूरने के बाद फिर मुस्कुरा उठी.
"घर फिर घर कहा लगता बीटा जब तुम लोग आसपास नहीं होते? सोचा था ये राजकुमार और शंकर अब इधर है तोह अपनी माँ से 2 घडी बतिया लिया करेंगे लेकिन इनके साथ वो नासपीटा इन्दर खुद हे गायब रहने लगा. लेकिन करो तुम लोग अपनी मर्जी और मैं अपने बचो बहु में खुश हु. प्रीती बीटा तू तोह सब देख रही है इसलिए पहले से हे तैयार रहियो. ये अर्जुन भी कही मटरगस्ती करने निकला तोह तू काम से काम मेरे पास हे रहना.", प्रीती के तोह मुँह में पानी का घूँट हे रुक गया अपना नाम सुन्न कर जिस पर रामेश्वर जी ने हे अपनी बीवी को खामोश करवया.
"ओह भगवान, खाना तोह खाने दो बचो को. तू जिन जिन के नाम ले रही है उन्होंने 10 पराठे साफ़ कर दिए. लेकिन ये छोटे पंछी दाना चुग रहे है इन्हे आवाज से मत डराओ. प्रीती बीटा, चंडीगढ़ जाते हे अपने पापा को याद करवा देना की मैंने कुछ कहा था.", रामेश्वर जी ने अब कही भोजन शुरू किया तोह अगले 10 मिनट ख़ामोशी बरकरार रही. कौशल्या जी स्वयं खाने की जगह सबकी प्लेट में उनकी पूरी खुराक का ध्यान रखती रही. उन्हें हमेशा अपने बचो के नाश्ते पर ध्यान देना पसंद जो था. अर्जुन 2 हे पराठे खा कर हाथ साफ़ करने लगा तोह ये ख़ामोशी भांग हुई.
"चुपचाप से 2 और पराठे ख़तम करो. Kad-kathi के हिसाब से वो भी काम है बीटा. दोपहर या रात में काम खा लो लेकिन सुबह पूरा भोजन. और ये लस्सी ऐसे हे पड़ी है?"
"दादी, सफर भी करना है और अभी तोह दूध और वो लड्डू खाये थे इसलिए लस्सी नहीं. मैं रस्ते में कुछ खा लूंगा या जूस पी लूंगा."
"एक पराठा खा ले बीटा. ला ये लस्सी इधर दे दे.", शंकर जी ने बिना देरी किये वो गिलास अपने वाले में पलट लिया. एक पराठा अर्जुन को देने के साथ उन्होंने जैसे हे अपने लिए भी पराठा उठाया कौशल्या जी ना में गर्दन हिलती हंसने लगी.
"दर्जन पराठे खा चूका है शंकर. अब बस कर बीटा और समय देख.", कौशल्या जी ने कहने के साथ साथ खुद हे मक्खन अपने बेटे की और सरका दिया. वो जानती थी की अब पूरा दिन उनका बीटा शायद हे भोजन करे. इस बीच ऋतू ने ये महफ़िल भांग की.
"दादी आपके लिए पूर्णिमा दादी जी का फ़ोन है. होल्ड पर हे रखा है बात कर लीजिये."
"हाँ सही किया जो फ़ोन कर लिया. राजू बीटा, तुम्हे हे अपने पिता के साथ सब देखना है. आज दोपहर का कार्यक्रम वही हवेली पर रखा है. शंकर, देख लेना बीटा अगर समय निकाल सको तोह. संजीव, कही जाना नहीं अब.", कौशल्या जी उठ कर जाने से पहले सबको हिदायत दे गयी थी. शंकर जी ने बस सर हिला दिया. सभी लोग लगभग एक साथ हे अपने स्थान से उठने लगे थे और संजीव जैसे कुछ समय अर्जुन से बात करना चाहता था लेकिन उस से पहले हे शंकर जी ने अपनी बात रख दी.
"अर्जुन, तुम जरा अपनी माँ के कमरे से मेरा हॉस्पिटल वाला बैग ले कर बहार मिलो. मैं कार निकाल रहा हु.", संजीव ने इन्तजार करना हे ठीक समझा और अर्जुन बिना देरी किये अपनी माँ की तरफ बढ़ चला जिसके साथ संजीव भी था. चची का हाल लेने के इरादे से. कुछ हे समय बाद बाप और बीटा घर के बहार कार में बैठे थे. अपना सामान सही से रखने के साथ हे शंकर जी स्टीयरिंग को साफ़ करते हुए जैसे मैं हे मैं शब्दों को बुन्न ने लगे लेकिन जल्द हे बात शुरू की.
"ाचा लग रहा है के तुम उत्साहित भी हो और तैयार भी. लेकिन मैं आज तुमसे एक बात करना चाहता हु अर्जुन और ये बात एक बाप के हक़ से नहीं बल्कि वो हक़ीक़त याद करके जिसने बहोत कुछ बदल कर रख दिया था. मुझे हमेशा ऐसा लगता है की शायद मैं तुम्हे बाप की तरह प्यार नहीं दे पाया लेकिन जब तुम्हे देखता हु साथ रह कर तोह वो बात मायने नहीं रखती. उमेद तुम्हे शायद मुझसे बेहतर जानता है और प्यार तोह वो करता हे है. ऐसा हे नरिंदर के साथ है और कही न कही संजीव बची खुची कसार भी पूरी कर देता है. लेकिन एक और बात है जो मैं कहना चाहता हु. तुमसे मुझे लगाव है इसलिए मैं तुम्हे प्रभावित नहीं करना चाहता. क्या ये जरुरी है की मैं तुम पर एकाधिकार जातौ?", शंकर जी ने बात कहते हुए अपने पर्स से तमाम पैसे निकाल कर अर्जुन की ऊपर वाली जेब में खोंस दिए. लेकिन वो तोह बस अपने पिता के चेहरे को देख रहा था जहा अब धुप का कला चस्मा चढ़ा था. अर्जुन की नजरो में उसके पिता हमेशा हे एक आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक थे लेकिन बातचीत अक्सर सिमित हे होती थी.
"मैं ये महसूस करता हु पापा और आपको इसके लिए शब्दों की जरुरत हे नहीं पड़ती. मैं कभी किसी के पास गया क्या नम्म आँखे ले कर सिवाए आपके? चाहे वो बोर्डिंग जाने से पहले गुस्से में रट हुए आपके पास खड़े रहना या अभी कुछ वक़्त पहले. मैं जानता हु की आप हे हैं जो मेरी परेशानी हल कर सकते है बिना मेरे कहे. ये कलाई घडी आपके और मेरे बीच हमेशा एक मजबूत सम्बन्ध का प्रतीक है.", अब शंकर जी ने उसके बालो को सहलाते हुए परिचित मुस्कान दी.
"तुमने अभी परिवार के भीतर का जीवन देखा है बेटे लेकिन बहार आजाद निकल कर जब फैंसले लेना सीखोगे तोह गलतियों पर ध्यान मैट देना क्योंकि वो तोह होती रहेंगी. बस जो फैंसले तुम अपनी मर्जी से लो, उन्हें बदलने की कोशिश मैट करना. फिर तुम कभी भी खुद को वापिस नहीं पा सकोगे. मैं दुनिया के बारे में पापा जितना तोह नहीं जानता अर्जुन लेकिन मझदार में खड़े हो कर दोनों किनारे जोड़ने वाला सही नियत तोह रखता है लेकिन वो किनारे एक नहीं कर पता. कीमत कुछ भी चुकानी पड़ सकती है. मुझे तुम्हारी चिंता नहीं है क्योंकि तुम सक्षम हो लेकिन मेरी इस बात पर गौर करना बीटा.", शंकर जी की बात अमूमन हलकी और तंजिया रहती थी लेकिन आज बिलकुल अलग था. वो गंभीर थे और उनका ज्ञान किसी aatmik-shikshak जैसा.
"आप जानते है ऐसे किसी व्यक्ति को पापा जिसने वैसा किया था? मैं समझ रहा हु और मेरी तरफ से आपको शिकायत का मौका भी नहीं मिलने वाला लेकिन बस सुना है मैंने की पहले आप खुद को इतना व्यस्त नहीं रखते थे. पहले मतलब बहोत पहले.", अर्जुन डैशबोर्ड को खोलता तोह कभी बंद करता. उसको जैसे इस बचपने में मजा आ रहा था. मुद्दा गंभीर था और अपने बेटे की हरकत के साथ ऐसा सवाल सुन्न कर शंकर जी ने शीशे ऊपर चढ़ाते हुए एक चालू कर दिया.
"जानते तोह होंगे हे तुम क्योंकि तुम्हारा नाम जो हैं इसके मैं खिलाफ था जब ये तुम्हे दिया गया. तुमसे शिकायत नहीं थी लेकिन उस नाम का बोझ आजतक मेरे दिल पर है अर्जुन. जिस तरह कई बार तुम अपने फैंसले लेते हो और माहौल ऐसा बनाते हो न जिस से शक्श कोई और हे नजर आता है, वैसा हे वो इंसान भी था. तुम्हारा अज्जू चाचा. तुमने तोह बस यही बिखरी हुई नाराज हवेलियां आपस में फिर से जोड़ी, जानता हु आसान नहीं था लेकिन अज्जू. अज्जू ने वो सब जीत रखा था किसी सिकंदर की तरह. न उसके सामने सोमबीर ताऊ जी की कोई बिसात थी और न किसी अफसर की. वो छोटी छोटी नेहरू को आपस में एक करता चला गया और कभी विफल नहीं हुआ जबतक.. जबतक वो समंदर से न जा टकराया. उसने वह भी सबके घुटने टिकवा दिए थे बीटा और कमी बस यही रह गयी की उसके तीन भाई उसकी पीठ न बचा सके. थोड़ा बेवकूफ था वो दिल के मामले में और अक्सर दिल से सोचने वाले सभी होते है जैसे मैं भी कुछ अलग नहीं. पर समंदर के किनारे कभी एक नहीं होते ये वो जान कर भी लहर पे सवार हो गया. पापा के सिध्दांत, माँ का अनुशाशन, रघुवीर चाचा जी की ताक़त और हमारे मजबूत कंधे बस झुक कर रह गए, जो उसके काम तक क्या उसको बचा भी न सके. मैं पापा के चेहरे पर उस समय वाली चिंता आजकल देखने लगा हु चाहे ाची तरह न सही लेकिन वो इतिहास के िट्छुक नहीं है. तुम बस इतना करना मेरे बचे की ये नाम सार्थक मैट करना उस व्यक्ति से जिसकी याद में तुम्हे ये मिला है. गाँव जाओ और जी भर के मौज मस्ती करो. घूमो फिरो और अगर ऊर्जा बढ़ती लगे तोह अखाड़े में उसको प्रयोग करो. तुम्हारी जेड इस घर से है, उस गाँव से नहीं बस इतना याद रखना. आऊंगा तोह तुमसे मिल कर जाऊंगा. अपना ध्यान रखना.", इतनी तल्लीनता से अपनी पूरी बात कहने के बाद शंकर जी ने अर्जुन को जवाब तक देने का मौका न दिया. और उसकी तरफ का दरवाजा खुद हे खोल कर इशारा दे दिया की वो अब जाना चाहते है.
"जैसा आप चाहते है वैसा हे होगा पापा. मुझे भी इतिहास पसंद नहीं. साइंस ाचा सब्जेक्ट है और दिमाग शांत रखने के लिए उसमे थोड़ा मैथमेटिक्स भी मिला लिया गया. माँ ने कहा था के आपकी कफ और जूस बैग में दाल दिया है उन्होंने.", अर्जुन बहार निकल कर दरवाजा वापिस बंद करते हुए घर में दाखिल हो गया. शंकर जी ने अपने पर्स की गुप्त जेब से वो 3 इंच बी 2 इंच की श्वेत श्याम तस्वीर निकाल कर गहराई से देखि जिसमे लम्बे घुंगराले बालो वाला युवक शंकर जी के जवान चेहरे के साथ चेहरा जोड़े उनकी पीठ पर चढ़ा था. अगल बगल में नरिंदर और उमेद मुस्कुरा रहे थे. वो यक़ीनन अज्जू हे था जिसको आजतक शंकर अपने दिल में संजोये था.
'हक़ीक़त तोह मुझे भी नहीं पता अर्जुन लेकिन अब जान ने का फायदा भी नहीं.', आक्रामक व्यक्ति खुद नहीं चाहता था के और तबाही हो. अब सभी के परिवार जो थे और जिम्मेवारियां भी. शायद वो समंदर और शंकर जी अनजान थे की रामेश्वर जी ने दिल से इतिहास निकला नहीं था. वो चिंतित तोह थे लेकिन वजह कुछ और थी.
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घर के भीतर अलग हे नजारा था अब. कौशल्या जी पूर्णिमा जी से बातचीत होने के बाद अपनी बड़ी बहु और कोमल को सब समझने में लगी हुई थी. ऋतू के साथ स्वयं कृष्णा जी ने अर्जुन का बैग पैक किया था जिसमे उसकी ख़ास खुराक, कपड़ो के साथ साथ 3-4 किताबे और आवश्यक सामान था. अर्जुन ने पहले हे बता दिया था के सिमित कपडे और 2-3 पोषक बहार अंदर के लिए हे राखी जाए. तारा भी इसमें उनकी मदद कर रही थी और मुस्कान प्रियंका के साथ राधिका भाभी के कमरे में. घर के अंदर आते हे अर्जुन का सामना प्रीती से हुआ जो तबसे वह कड़ी थी जब अर्जुन अपने पिता को बैग देने आया था.
"तोह तुमने ऋतू दीदी की वजह से ऐसा किया?", प्रीती के स्वर में ठहराव सा था जैसे बात कुछ और हो. लेकिन अर्जुन आँगन खली देख प्रीती का हाथ पकड़ कर उसको बगीचे की तरफ ले चला.
"अब ये बताओ प्रीती की यहाँ कौनसा ऐसा पौधा है जिसकी जरुरत नहीं?"
"सब ज़िंदा है और तुमने दादा जी के साथ मिल कर इन्हे बड़ा किया अर्जुन. जरुरत से पहले जरुरी बात है इनका जीवित होना और सभी की अपनी अपनी विशेस्ता है.", प्रीती इतना तोह जानती थी की अर्जुन निरर्थक कुछ भी नहीं कहता.
"देखो यहाँ हम सभी का अपना एक ख़ास असर या खासियत होती है. लेकिन कभी कभी ज्यादा हे मेहरबान जीव अपनी विशेस्ता छोड़ देते है दुसरो के लिए. अब ये घाना होता संतरा हे देख लो जिसकी छाया में कई फूल पनप रहे है. इस तरफ के पत्तो में इसकी स्वाभाविक महक है.", अर्जुन ने एक पत्ता टॉड कर उसको मसलते हुए प्रीती के चेहरे के सामने किया तोह उसने भी सुगंध पहचान ली.
"लेकिन यहाँ निचे की तरफ तुम्हे इसके पत्तो से वैसी महक नहीं मिलने वाली क्योंकि इधर तोह तुम खिल रही हो. तुम्हारी खुशबु इस से ज्यादा नहीं होगी लेकिन यही तोह साइट्रस की विशेस्ता है जो वो अपनी छाया में रहने वालो को अवसर देते है खुद की खासियत बढ़ने का. यहाँ इनमे तुम्हारी महक के अवशेष है.", सचमुच उस तरफ के पत्ते में प्रीती ने मिली जुली सुगंध पायी.
"ऋतू दीदी के लिए मैंने वो नहीं किया. मैं गाँव जाना चाहता था और उनकी खासियत को सलामत रखना मेरी जिम्मेवारी है. अब तुमने भी तोह कोचिंग लेनी है न एक महीने के लिए? तभी तुम चंडीगढ़ जा रही हो अपने कॉलेज से पहले हे किताबे लेने जिस से तुम तैयारी कर सको. ये सब जरुरी है प्रीती और मैं सबके साथ इस बगीचे की तरह हे रहना चाहता हु बिना बलिदान मांगे. तुम्हे यहाँ भी हिफाजत से रखा है और परिवार में भी हमेशा ऐसे हे रहने वाली हो. बस मेरी यही ख्वाहिश है की अकेले ऐसा कोई फैंसला न लेना जिस से कोई त्याग करना पड़ा.", प्रीती की नजरो में आज अपने प्यार के लिए इजत्त और गहरी हो चली थी.
"जानती हु फंदेबाज मैं तुम्हे. तुम इसलिए भी वह भाग रहे हो जिस से तुम्हारी ऐश में कमी न हो. बहोत मेहनत जो की है तुमने पिछले कुछ दिनों में. वैसे कॉलेज वाला प्रॉमिस याद रखना.", रोमिला जी को घर में आते देख उसने जल्दी से ये बात कही और अर्जुन के जवाब देने से पहले रोमिला की आवाज भी आयी.
"तोह तुम दोनों यहाँ mel-jol बढ़ने में लगे हो? प्रीती तुम्हारे पापा त्यार हो कर तुम्हारा हे इन्तजार कर रहे है. अर्जुन, मुझे ाचा लगेगा अगर तुम वह जाने के बाद कभी टेलीफोन करोगे तोह. चाहे प्रीती को हे कर लेना.", रोमिला के चेहरे की अलग हे कशिश थी जिसको प्रीती के सामने अर्जुन नजरअंदाज करने की कोशिश में लगा था.
"हनननन. हाँ आंटी जी मैं करूँगा फ़ोन. वैसे आप लोग वापिस कब आओगे?"
"पहले प्रीती जाने के लिए त्यार तोह हो. ये तोह तुम्हारे घर से वापिस अपने घर आना हे नहीं चाहती. लेकिन हम लोग कल हे लौट आएंगे और तुम्हारे पीछे से मैं रेखा का ध्यान ाचे से रखूंगी.", रोमिला ने अपनी हे बेटी को परेशां किया तोह प्रीती तेज कदमो से वह से निकल कर अपने घर की तरफ बढ़ने लगी. रोमिला उस से पहले हे चल चुकी थी जिस पर प्रीती ने एक बार पलट कर अर्जुन की तरफ देखा और होंठो को गोल करते हुए ऐसा सन्देश दिया की अर्जुन आसपास देखने लगा. प्रीती की ऐसी खुली हरकत देख वो सकपका गया था और हंसती हुई प्रीती अपनी माँ का हाथ पकड़ती हुई अपने घर में जा घुसी.
'पागल लड़की.'
"अब तू सफर के लिए एक्स्ट्रा ऑक्सीजन ले रहा है क्या यहाँ पे?", ये आवाज संजीव भैया की थी और उन्हें अपने पास आता देख अर्जुन हे उनकी और लपका.
"ओह नहीं भैया बस जाने से पहले देख रहा था के सब सही है न. वैसे आप थके थके लग रहे हो."
"तू ठहर जा बदमाश. हाहाहा.. बस यार तेरे सामने हे है 3-4 दिन से आराम कहा मिला था. फिर भी कल रात सोया लेकिन अभी एक दिन और लगेगा थकान मिटने में. तोह गाडी चमका ली जाने के लिए?"
"न न भैया अपनी रानी पर जा रहा हु. वो देखो मैंने ये हक्क लगवा लिए बैग रखने के लिए पीछे. कार हर जगह नहीं जा सकती और ये ज्यादा जगह भी नहीं घेरती और मुझे अकेले इसको चलना ज्यादा पसंद है. कार आप चला लेना तबतक.", अर्जुन अपने भैया का हाथ पकडे हुए बहार वाली सीढ़ियों से हे ऊपर चल दिया.
"नहीं छोटे. कार तोह तू पहले हे मुझे एक दे चूका है और काली वाली का स्टीयरिंग बस तू तेरे तक हे रख. हाँ वह पर मोटरसाइकिल तेरे काम ज्यादा आएगी लेकिन हाईवे पर कार ठीक नहीं थी?", अर्जुन के कमरे में नयी चादर बिछी थी और अब वह सामान भी दुरुस्त था. जैसे हे दोनों बिस्टेर पर बैठने लगे, तारा तकियों के ऊपर नए लिहाफ चढ़ा कर यहाँ रखने आ गयी.
"तोह तुमने अकेले हे सब सेट कर दिया?", अर्जुन ने पानी की बोतल टेबल से उठा कर वैसे हे घूँट भरने के बाद तारा को प्रशंशा से देखते हुए कहा.
"हाँ और थैंक यू मैट हे बोलना तुम. तुम्हारा बैग भी निचे तैयार है. वैसे जब तुम वापिस आओगे तब भी कमरा ऐसे हे मिलेगा. संजीव भैया, नानी कह रही है की आप भी एक बार उनसे मिल लेना.", तारा खली बोतल अर्जुन के हाथ से लेती हुई अपनी कमर हिलती हुई चली गयी जिस पर अर्जुन ने भैया की मौजदगी में ध्यान न दिया.
"आज तोह उमेद चाचा की तरफ आपकी पार्टी है भैया. भाभी भी हवेली देख कर खुश हो जाएंगी.", अर्जुन ने हवेली का जीकर किया तोह संजीव ने उठ कर अंदर से दरवाजा बंद कर लिया जिस पर अर्जुन थोड़ा हैरान हुआ.
"देख मैं तुझसे एक जरुरी बात करना चाहता था लेकिन शादी की वजह से और तेरे aas-pas अकेले न मिलने की वजह से बता नहीं पाया. अब तूने हवेली का जीकर किया तोह मुझे भी याद आ गया की क्या बात करनी थी.", संजीव भैया की इतनी दबी हुई आवाज और गंभीर चेहरा देख अर्जुन उनके बिलकुल करीब जुड़ कर हे बैठ गया.
"कैसी हवेली और क्या बात थी भैया जो आप अकेले में हे कर सकते थे?"
"छोटे मुझे शादी वाले दिन हे पता चला था की दादा जी के पिता जी हमेशा से हे उस गाँव में नहीं रह रहे थे. हाँ मतलब जहा छोटे दादा जी रहते है वही उनकी शादी हुई और वो पुश्तैनी घर हे है. लेकिन जहा रियासत थी मतलब आज भी महल है, वह पर एक हवेली बंद पड़ी है पिछले 50 से ज्यादा साल से. पंडित जुगलाल जी की हवेली, जहा हमारे दादा जी पैदा हुए और कुछ साल वो लोग उधर रहे भी. जुगलाल जी अपने दादा जी के दादा थे. तेरा उस सेहर जाना हुआ तोह क्या तू उसको देखने का जुगाड़ करेगा?", ये एक बहोत हे बड़ा राज था अर्जुन के लिए और संजीव भैया का उसको ऐसे बताना इशारा करता था किसी और भी बड़े राज की तरफ.
"जग्गी भैया तोह कह रहे थे की दादा जी के पिता जी शुरू से हे अपनी जगह से रियासत देखते रहे थे और वो कसबे के मालिक हे थे जिन्होंने वही पर सब काम करवाए लोगो के लिए. दादा जी के जनम का ब्यौरा तक वह की पंचायत कॉपी में दर्ज है. फिर ये दूसरी हवेली कहा से आ गयी और वो भी महल के पास.?"
"यही तोह समझ नहीं आ रहा भाई लेकिन जिसने जानकारी दी है वो इंसान 100 प्रतिशत सच कह रहा है. सोच मैं तोह अभी haal-filhaal में घर से बहार नहीं निकला तोह मुझे क्या सपना आएगा उस हवेली का? रही बात दादा जी का नाम पंचायत में दर्ज होने का तोह शाही मुंशी कोई छोटा व्यक्ति नहीं होता था और ऊपर से पंडित विद्वान व्यक्ति को तोह अलग सम्मान मिलता था. उन्होंने किसी वजह से हे ये सब करवाया होगा.", अर्जुन बड़े ध्यान से ये जानकारी ले रहा था.
"तोह ऐसी बात अगर कोई बता सकता है तोह वो खुद पड़ती रामेश्वर जी यानी हमारे आदरणीय थानेदार साहब. लेकिन आपको कैसे पता चला ये और उन्होंने ये बात किस से करि थी? ऐसी हवेली होती तोह क्या वो कभी इसकी चर्चा नहीं करते या कोई और करता."
"वो रानी साहिबा आयी थी न शादी में? जब वो मुझे आशीर्वाद देने के बाद दादा जी से एक तरफ हो कर बात कर रही थी तभी मैंने उनके मुँह से ये सुना था के हवेली के लिए कोई नोटिस आया था जिसको उन्होंने हे वापिस लौटा दिया अपनी संपत्ति बता कर. और दादा जी ने कहा के उन्हें उस हवेली की कोई जरुरत नहीं. पंडित जुगलाल जी खुद हे वह नहीं रहना चाहते थे तभी उन्होंने वो shahi-pariwar को लौटा दी थी 50 बरस पहले. उनके लिए उस हवेली का कोई वजूद हे नहीं है. और इस छोटी से बात के सिवा इस बारे में और कोई चर्चा नहीं हुई. मैं नहीं जानता की वह कुछ मिल सकता है या नहीं लेकिन तुम्हे एक बार कोशिश करनी चाहिए उस जगह को देखने की. खंडहर अक्सर बहोत कुछ समेटे रहते है और ये तोह 50 बरस से बंद है.", अर्जुन भी इस बात से सहमत दिखा.
"हाँ हो भी सकता है की वह कुछ काम की चीज मिल जाए और मैं तोह वैसे भी महल देखने जाने हे वाला हु. रानी जी ने तोह खुद हे मुझे न्योता दिया था और मैंने जाने कहा सुना था के दादा जी का बचपन महल के हे पास बिता था. मतलब दादा जी यही 70 के और हवेली बंद है 50 साल से या कुछ ज्यादा मान लो. तोह उनसे जुड़ा तोह उधर कुछ न कुछ हो हे सकता है. और अगर वो कसबे में रहते रहे तब भी चांस है की वह सिर्फ खंडहर तोह नहीं मिलने वाले. देखते है भैया की ये कैसी हवेली है जिसको दादा जी के दादा जी भी पसंद नहीं करते थे."
"और क्या पता के वह से कुछ ज्यादा जुड़ाव हो इसलिए उसको छोड़ दिया गया हो? अब होने को तोह कुछ भी हो सकता है छोटे और अक्सर हम अपना हक़ प्यार की वजह से हे छोड़ते है. मेरा दिल तोह कहता है की वह बहुत कुछ मिल सकता है और नहीं भी मिला तोह कोई बात नहीं. तुम्हे उस पीढ़ी से जुड़ना तोह नसीब होगा हे.", संजीव भैया की ऐसी सकरात्मक बातें सुन्न कर अर्जुन मुस्कुरा उठा.
"8 बज गए है भैया और अब मुझे सबसे मिल कर निकलना चाहिए. हवेली का क्या है? किस्मत गाँव ले जा रही है तोह क्या पता ये हवेली हे असली मंज़िल हो. चलो आप भी थानेदारनी जी से मिल लो कही आपका हे बंद न बजा दे दादी भाभी के हे सामने.", अर्जुन की बात सुन्न कर संजीव को भी तारा का पैगाम याद आ गया.
"चल भाई और तू आराम से चलना मोटरसाइकिल. 5 घंटे की जगह 7 लगा लियो पर ध्यान से. और मैं फ़ोन करूँगा शाम को.", अर्जुन अपने भैया को हॉल कमरे में हे छोड़ पिछली तरफ चला गया. अभी सबसे मिलने मिलाने में उसको 15-20 मिनट लग हे जाने थे.
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"हमने कहा था न अंकल जी की आप हम पर विश्वास तोह करके देखो, जान तक की परवाह नहीं. आपने थोड़ा लम्बा रास्ता बताया था लेकिन मैंने सोचा की क्यों न सीधा हे हाथ दाल दिया जाए. ये रही रेणुका और पंडित जी के साथ बातचीत की चाबी.", कुलदीप उस बगीचे में सबसे घने भाग पर छाया में एक कुर्सी पर गर्भवती रेणुका को कुर्सी पर कलाई से बांध कर हटा था जब उसके 4 आदमियों के साथ आनंद, लल्लन, संग्राम और सबसे घाघ व्यक्ति अभिमन्यु ने कदम रखे. इस जगह 5-6 सफ़ेद प्लास्टिक की कुर्सियां पहले हे राखी थी, एक लकड़ी के साधारण से मेज के ird-gird. रेणुका दुत्कार भरी नजरो से उस घृणित व्यक्ति को घूर रही थी जो अतीत में कभी उसका जीजा था.
"बड़ा हे भरी काम अकेले हे अंजाम दे दिया तुमने तोह बिटवा. वह उस भरे पूरे माहौल में उनके घर की बेटी उड़ा ले आये और किसी को खबर तक न लगने दी? यही है वो औरत अभिमन्यु?", लल्लन सिंह रेणुका से वाकिफ न था इसलिए कुर्सी पर रेणुका के सामने बैठते हुए उसने एक बार सुनिश्चित करना चाहा. अभिमन्यु के चेहरे पर आयी कुटिलता ने जवाब भी दे दिया. आनंद सिंह ख़ामोशी से उस मेज पर वो बस्ता रखने के साथ लल्लन की हे बगल में जा बैठा.
"सचमुच तुमने बड़ा शिकार अंजाम दिया है लड़के. क्यों बहु, चाचा ससुर याद है या अपने चरित्र की तरह हमे भी साफ़ कर दिया? कुलदीप, इसमें कागज़ और 20 लाख नगद है. इसके आगे अब हम लोग देख लेंगे. तुमने अपना काम किया और हमने हमारा.", आनंद सिंह के जबड़े से निकलती आवाज कुछ ज्यादा हे सख्त थी.
"न अंकल न. करो चाहे जो मर्जी लेकिन बाद में. 20 लाख के बदले 2 रात तोह इसको बंद कमरे में रख कर अरमान तोह पूरे करू अपने.", अभिमन्यु रेणुका की बगल में बैठने लगा तोह कुलदीप ने उसको छाती पर हाथ रखते हुए पहले हे रोक दिया. संग्राम सिंह ये देख आगे बढ़ा तोह कुलदीप ने मुस्कुराते हुए उसको ना में गर्दन हिला कर ऐसा करने से मन किया.
"उनले जी, लगता है आप लोगो को डील करने का अनुभव नहीं है और दूसरी बात की आपने तोह वो देख लिया जो मेरे हिस्से था लेकिन मुझे मिलने वाला हिस्सा देखे बिना कोई इस पर हाथ नहीं रख सकता. काम से काम इस बगीचे में तोह नहीं. और ये तमंचा जो तुम जेब से झलका रहे हो संग्राम, इसका उपयोग करने की सोचना भी मैट. मेरे मैं में मेल न है लेकिन लगता है आप लोग कुछ अलग विचार ले कर यहाँ आये हो.", कुलदीप खुद रेणुका की बगल में बैठ उस बास्ते को खोलने लगा. उसके आदमी बेशक बगीचे में काम करने वाले लोग थे लेकिन सबके हाथो में बांस का मजबूत लेथ और चेहरे पर अपने मालिक के प्रति वफादारी. इस जवान लड़के के तेवर और उसकी बातें सुन्न कर लल्लन ने संग्राम और अभिमन्यु को इशारे से बैठने को कहा.
"देख लो इत्मीनान से बीटा और कही गड़बड़ लगे तोह हमे बताओ."
"गड़बड़ तोह है अंकल जी. इस अभिमन्यु ने 50 एकड़ के बराबर पैसे की बात की थी और आपने 28 किल्ले जिसके बराबर उतना हे लल्लन जी ने कहा था देने को. यहाँ है ये रद्दी सी 15 किल्ले बंजर जमीन, जो हमारी तहसील के सबसे ख़राब हिस्से में है और दूसरे कागज़ है 13 किल्ले क्सक्सक्सक्स कसबे के पास. और पैसे के नाम पर सिर्फ 20 लाख. मान लिया आप सभी उम्र और अनुभव में मुझसे कही ज्यादा हो लेकिन बड़े इंसान को अपनी बात पर कायम रहना चाहिए. बचे गलती कर सकते है.", बचे वाली बात कुलदीप ने संग्राम की तरफ देखते हुए कही थी लेकिन उसके इस तरह से उस बास्ते को Aanand/Lallan की तरफ सरकने पर चारो एक दूसरे को देखने लगे. जैसे कोई ख़ास इशारा हो आपस में.
"काम हमारे अनुमान से कही पहले कर दिया तुमने कुलदीप. घर की हे बात है इसलिए अभी ये सब रख लो और बाकी संपत्ति एक महीने के भीतर तुम्हारे हवाले होगी.", आनंद सिंह ने लाचारी का दिखावा किया और उसके बाद अभिमन्यु अपने सुर अलापने लगा.
"वैसे भी मैंने तुम्हे उस अर्जुन को भी फांसने के लिए कहा था. आधे काम के लिए आधी हे कीमत मिलती है. बात को यही ख़तम करो और इस रंडी को हम ले जा रहे है.", और यही कुलदीप से चूक हो गयी जो अभिमन्यु के तेवर देखने में व्यस्त हुआ तोह संग्राम सिंह ने फुर्ती से उसकी बगल में खड़े व्यक्ति के पाँव में गोली मारने के बाद रिवॉल्वर रेणुका पर तान दी.
"भोस्डिका ये न समझता जज्बात हमारे. जो दे रहे थे वो इसको काम लग रहा था लेकिन अब पैसे की जगह मिलेगी मौत. मां, बस्ता उठा और अभिमन्यु भाई ले चल तेरी मैना.", संग्राम को ऐसे फुफकारते देख कुलदीप घबरा गया था और उसका एक आदमी जमीन पर अपना जखम दबाये दर्द के मारे चीख कर इस सुनसान बाग़ को दहलाने का विफल प्रयास करने लगा. लल्लन ने वो बस्ता उठाया हे था की उसमे हाथ के करीब से निकल कर वो जलता पीतल संग्राम की हथेली के aar-par जा निकला. तमंचा आनंद के भी पास था लेकिन उसकी गाडी में वो गलती से छूट गया था. अब इस बगीचे में 2 लोग चिल्ला रहे थे और रेणुका अपने हाथ ढीले करके इत्मीनान से उठ कर एक तरफ जा कड़ी हुई.
"वो ऐसा है आनंद सिंह की तुमने हमारे बारे में कुछ पता न करवाया था. हमने हे वो सब खबर तुम्हारे तक पहचे थी जिसके लिए तुम्हारे 5 आदमी भी जान से गए और 20 लाख मेरी जेब में. वैसे जिस पिस्तौल पर तुम इतना उछाल रहे थे लड़के, वो जान नहीं ले सकती. सब अपनी अपनी जगह वापिस बटिह जाओ.", अपने ठीक सामने इस 6 फ़ीट ऊँचे भूत को देख आनंद और लल्लन की तोह घिग्गी हे बांध गयी थी लेकिन अभिमन्यु जैसे कोशिश करके देखना चाहता था. अभी वो उस खंजर को रेणुका के जिस्म के करीब करने हे वाला था की नरिंदर के जिस्म में ज़माने भर की बिजली भर उठी. कोई और कुछ समझ भी पता उस से पहले वही खंजर अभिमन्यु की कलाई को काट कर नरिंदर के दूसरे हाथ में था.
"जब मैं कहता हु तब उस बात को मान लेना चाहिए. देखो जरा इन दोनों चिड़ीमारों को कैसे दुबक कर बैठे है लेकिन नहीं तुम में ज्यादा जोश भरा है. हाँ तोह दीपू बीटा फिर कितना इंतजाम हुआ तुम्हारी बहिन की शादी के लिए.?", एक आकर्षक आधुनिक पिस्तौल का मागज़ीने खोल कर उसको मेज पर रखने के बाद नरिंदर ने अपने दोनों पाँव भी कैंची बनाते हुए लंबवत टिका दिए. इतना बेफिक्र होना दर्शाता था नरिंदर की निर्भीकता और हर अपराधी को उसकी औकात दिखाना. अब दृश्य ऐसा था की संग्राम जमीन पर बैठा अपने बहते खून पर रुमाल दबा कर उसको रोकने में लगा था तोह अभिमन्यु तड़पता हुआ अपनी कटी हुई कलाई को बगल में दबाये था. रेणुका पसीना पौंछती हुई उधर चली गयी जिस तरफ से नरिंदर प्रकट हुआ था.
"म्हणत और आपकी वजह से बहोत कुछ है अंकल जी और मैं अपनी बहिन पर हराम का एक पैसा भी नहीं खरचने वाला. वैसे आप इन्हे पुलिस के हवाले करोगे या हाथ पाँव तोड़ने है?", कुलदीप एक मजबूत नौजवान था लेकिन तीन लोगो के बहते खून से विचलित हो कर वो यहाँ खड़ा भी नहीं हो प् रहा था.
"ए भाई, ले जाओ अपने साथी को और डॉक्टर से कहना के शिकार करते हुए हादसा हुआ. बाकी मैं देख लूंगा और ये पैसे रख लो. बाकी तुम दोनों उस तरफ एक घंटे तक गद्दा खोदते रहो. एक फ़ीट गहराई का एक लाख दूंगा तोह जितना गहरा उतना हे चौड़ा होना चाहिए. 6 फ़ीट के 6 लाख जो तुम चारो के होंगे.", नरिंदर के तेवर देख जख्मी आदमी को उसका एक साथी ले चला और बाकी दोनों अपने बांस वही गिरा कर कस्सी कुदाल लिए गद्दा खोदने दौड़ पड़े.
"नरिंदर बीटा, ये ठीक नहीं है. मैं किसी की जान लेने के पक्ष में नहीं था बस अपने भांजे (अजीत) के लिए इन्साफ की चाहत भर थी. अब तुम्हे ये पसंद नहीं है तोह मुझे भी कुछ नहीं चाहिए. आनंद भाई आप भी पाँव पकड़ लो तोह क्या पता नरिंदर जी हमको जाने दे.", लल्लन का गिड़गिड़ाना देख नरिंदर ताली बजाते हुए ऐसे अट्टाहास करने लगा जैसे कोई बचा खुश हो कर किलकारियां मारता है. आनंद सिंह अभिमानी व्यक्ति था और गुरूर से भरा भी.
"मर्द हु मैं लल्लन और ऐसे कई Narinder-Dharminder देखे है मैंने. तुम क्या डरने की कोशिश कर रहे हो ये गद्दा खुदवा कर और पिस्तौल सामने बिखेर कर? जान नहीं ले सकते तुम हम में से किसी की और वो भी ऐसे भरे उजाले."
"जान.. मैं जान नहीं लेता आनंद सिंह और तुम दोनों के भांजे भतीजे कुकर्मी लोग थे जिनके माथे पर मैंने वो तिलक किया जिसके ताप को वो झेल न सके. मैं न अंधेरो की परवाह करता हु और न उजालो की. जगह, समय और इंसान अगर मुझे प्रभावित करते तोह तुम लोगो की जगह मैं होता. इस लड़के का सीना चीयर कर मैं देखूंगा की दिल मजबूत है की नहीं. और ये हरामी हिजड़ा जिसकी अकाल मेरे बेटे से मार खाने के बाद भी न सुधरी, ये मेरी बहिन पर वही गन्दा हाथ रखना चाहता था तोह इसकी कलाई अलग करके मैं खुद इसको दिखाऊंगा इसका गन्दा खून कैसे जिस्म से निकाल कर मैं इसकी शुद्धि करता हु. लल्लन ने मेरे कदमो में सर झुकाया है तोह इसको दर्द नहीं दूंगा लेकिन तुम एहंकारी हो आनंद सिंह और ऐसे व्यक्ति की आवाज खोखली होती है. मेरे पिता, भाई और मुझे मारना चाहते थे तुम वो भी बहिन और बेटे को कब्ज़ा कर? ऐसा तोह वो भी नहीं सोचता जिसके खिलाफ जाने के लिए मेरे पिता ने मन किया है.", और नरिंदर सिग्रत्ती को सुलगने के बाद जिस तरह साढ़े कदमो से संग्राम के सर के पास आ खड़ा हुआ, बाकी तीनो की नजरे वही जम्म गयी. मेज पर वो आलिशान पिस्तौल बिखरी पड़ी थी लेकिन उसके हाथ में अब एक विशेष खंजर था जिस पर ख़ास चिन्ह अंकित था.
"आआ माँ रीई....", किसी मैंने की तरह संग्राम जोरो से फड़फड़ाया था और उसका रुदन सुन्न कर दूर वृक्षों में छिपे अनगिनत पंछी शोर करते हुए उड़ने लगे. हर जीव की आँख हैरत से फटी रह गयी थी जब संग्राम के सीने की वो 22 हड्डियां खाल छोड़ कर इतना घिनोना मंजर दिखने लगी. पेट से आँतड़ियों के साथ साथ लहू ऐसे बह कर निकला जैसे बड़े गुब्बारे में भरा हो जो अचानक फट जाए. उसके जिस्म को खिंच कर नरिंदर ने लल्लन की झाली में ला फेंका. लगातार चीखने से संग्राम का गाला फटने हे लगा था और उसकी हालत देख बाकी तीनो की.
"घर पर नजर नहीं रखते तोह मैं सिर्फ माथे पर तिलक करके मामला एक मिनट में ख़तम कर देता. खैर अब तुम खुद देख रहे हो की मैंने एक मिनट पहले कुछ भी गलत नहीं कहा था.", लल्लन कांपता हुआ अपनी गॉड में फड़फड़ाते हुए उस विक्षिप्त से जिस्म को देख रहा था जिसके अंदर के अंग भी फड़क रहे थे. खून में लिसड़ा वो गुब्बारे सा जिगर, हड्डियों के पिंजरे में क़ैद सुर्ख दिल और इधर उधर लटकती मोती पतली आंतड़िया. नरिंदर की हैवानियत जैसे अभी बाकी थी और उसने दूसरे हाथ से वो धड़कता हुआ दिल पकड़ कर ऐसे खिंचा जैसे लटकती दाल से कोई बड़ा आम. और वो aam-roopi दिल उसने ानदण्ड सिंह की झोली में फेंक दिया.
"देख को इसमें सिर्फ हवा भरी थी और परमात्मा तुम्हारी आत्मा को नरक में महफूज रखे लल्लन. जय शीर्षाये नमः..", आनंद सिंह मुँह दबाये अभी उल्टियां हे करने लगा था और उसकी साँसों को तड़पते हुए नरिंदर ने किसी माहिर कसाई की तरह सूई के एक कांटा हिलने भर की देरी में लल्लन की सेहमी हुई आँखों समेत उसकी मुंडी काट कर अभिमन्यु की तरफ फेंक दी. कुर्सी पर टिका हुआ जिस्म फुहारे की तरह लहू फेंक रहा था और आनंद सिंह लड़खड़ा कर भागने की नाकाम कोशिश करता उस रक्तिम जमीन पर जा गिरा.
"मुझे जाने दो ... मेरे बीवी बचे है नरिंदर.. भगवन के लिए मुझे जाने दो. मैं कभी अपने घर से भी कदम बहार नहीं .. भगवान् के लिए बक्श दो मुझे.", आनंद सिंह काँप रहा था और हाथ जोड़ता हुआ वो अपने मिट्टी से साणे चेहरे के साथ आंसू बहता गिड़गिड़ा कर भीख मांगने लगा जान की. अभिमन्यु का कलेजा इतना मजबूत न तोह और वो बेहोश था इतने घृणित भयानक दृश्य देख कर. जब नरिंदर अपनी जगह स्थिर खड़ा हो कर बस सिग्गट के काश लगता रहा तोह हिम्मत जमा करते हुए आनंद ने वो विदेशी पिस्तौल उठा ली. नरिंदर अभी भी वैसे हे खड़ा उसको देख रहा था और आनंद ने अपनी कनपटी पर टिकते हुए ऊँगली दबायी तोह यहाँ भी किस्मत देगा दे गयी.
"खाली पिस्तौल से तुम्हे गति नहीं मिलेगी और न मैं तुम्हे मरने दूंगा इतनी जल्दी. मेरे पिता मुझे डाकिए भी बुलाते है और मैं वो सन्देश ले कर उनके पास जाऊंगा जो तुमने अपने दिल में दबाया हुआ है. भाग तुम सकते नहीं हो आनंद और गोली भरने का वक़्त मेरी दूसरी पिस्तौल तुम्हे देगी नहीं. जल्दी से नाम बता दो और ऊपर जा कर अपने भतीजे से मेरी शिकायत लगाओ. Haal-chal भी देना यहाँ के और बताना के तुम्हे भी उसी आदमी ने भेजा है जिसने उसको आजाद किया था.", सिग्रत्ते एक तरफ फेंक नरिंदर ने एक पतली लेकिन मजबूत रस्सी का सही फंदा बनाते हुए उसमे अभिमन्यु के दोनों पाँव फांस दिए. जिस्म कोई हरकत न कर रहा था और उसको घिसते हुए नरिंदर ने रस्सी का दूसरा सीरा इस घने वृक्ष की लंबवत दाल के पार कुशलता से घुमा कर झटका दिया तोह वो जिस्म जमीन से रगड़ खाने के बाद अब हवा में था. जमीन की सतह से 2 फ़ीट ऊपर. रस्सी तने से बाँधने के बाद नरिंदर ने अभिमन्यु का मुँह भी मजबूती से एक कपडे से जकड दिया जिस से वो चीख न सके.
"मुझे और भी बहोत से काम है आनंद सिंह जिन्हे निबटा कर मुझे मेरे घर ठीक 3 बजे तक पहुंचना है.", अगली चीख सुनाई न पड़ी लेकिन जमीन पर कलाई से पृथक हुए 2 हाथ पड़े थे. ज़माने भर का दर्द उन फैली हुई आँखों में था जो अभिमन्यु के जिस्म पर थी. खून एकसार धार में बेहटा हुआ जमीन पर 2 गोलाकार घेरे बना कर बड़े करता गया लेकिन नरिंदर को जब इस से भी संतोष न हुआ तोह उसने गले पर भी एक चीरा दे दिया.
"नाम बोल दो और मैं तुम्हे आजाद कर दूंगा. देखो मैंने लल्लन को दर्द नहीं दिया और तुम्हे तोह मैं शायद बख्स भी दू. क्योंकि मुझे लगता है तुम्हारी जरूर मजबूरी रही होगी इस सबके पीछे. अभिमन्यु रेणुका की वजह से अपना उल्लू साध रहा था, लल्लन इस संग्राम और अजीत की डॉयलट के चक्कर में लेकिन तुम मुझे इनसे अलग लगते हो.", नरिंदर चलते हुए आनंद के करीब आ रुका. मेज पर रखा पानी का जग उठा कर उसने अपने हाथो से हे आनंद का मैला चेहरा धोया तोह नरिंदर की रहस्यमयी आँखों को देख आनंद सिंह की जुबान हिली.
"हिम्मत सिंह ने 5 करोड़ कीमत लगाईं थी. एक करोड़ मेरी गाडी में रखा है और बाकी रेणुका या अर्जुन को सौंपने पर वो देने वाला था. मैंने पैसो के लिए नहीं किया ये सब. मुझे बस रामेश्वर से नफरत है... वो भगवान् नहीं की उस पर कोई ऊँगली न उठा सके... आठ", और इसके बाद नरिंदर ने ठीक वैसा हे किया जैसा कहा था. आनंद सिंह की ठुड्डी पकड़ कर अपनी दूसरी बेआवाज पिस्तौल से उसने दिल में छेड़ कर दिया.
"मेरे भगवान् है वो मूरख, मेरे भगवन. उन पर ऊँगली तोह क्या कोई बेअदबी से भी उनका जीकर करे तोह मैं उसको यही सजा दूंगा.", अब खूबसूरत अंगूर का बाग़ जैसे दुनिया की सबसे वीभत्स जगह में तब्दील हो चूका था. एक कुर्सी पर sar-kata लल्लन का जिस्म जिसकी गॉड में खुला हुआ संग्राम सिंह तोह दूसरी तरफ वृक्ष से झूलता वो lahu-viheen बिना दोनों हथेली का अभिमन्यु का शव और सबसे साफ़ सुथरा मृत आनंद अपने नाम स्वरुप एक बेहतर मौत प्राप्त करने वाला.
"ये 4 जिस्म भी साफ़ कर देना तुम लोग, कपडा मुँह पर बांध कर. और ये 6 लाख आपस में बाँट लेना. पता लगा की हिसाब बराबर नहीं किया तोह यही हाल तुम्हारा भी करूँगा.", नरिंदर ने हँसते हुए उन दोनों को चेतावनी दी और अपनी पिस्तौल सही से जोड़ कर अब उन दोनों से अपनी निगरानी में हे साफ़ सफाई करवाने लगा. रेणुका उसकी तरफ आने लगी तोह हाथ से उसको वही रुकने का बोल वो खुद बस्ता लिए बढ़ गया.
"वह की हालत तुम्हारे देखने लायक नहीं है बहिन. अब हम चलते है यहाँ से क्योंकि मामला शायद ख़तम नहीं हुआ. दीपू बीटा, यहाँ की निगरानी भादवा दूंगा आज हे और तुम्हारे आदमी शायद डर की वजह से 2-3 दिन छुट्टी पर रहेंगे. बाकी तुम्हे किसी तरह की परेशानी नहीं होने दूंगा.", बस्ता कंधे पर लटकाये नरिंदर एक हाथ में रेणुका का हाथ थाम कर उस कच्चे पक्के कमरे के बहार खड़े कुलदीप को सब हिदायत देता हुआ हमेशा की तरह बेफिक्र सा बाग़ से बहार चल दिया. कुलदीप एक बार अपने आदमियों को काम में लगा देखने के बाद खुद भी नरिंदर जी के पीछे हो लिया. वो रेणुका से कुछ हंसी मजाक करते हुए उस कार तक चले आये जिसमे वो मुर्दा लाशें जीवित आयी थी, हक़ीक़त से अनजान.
"हम इस कार से जाने वाले है?", रेणुका ने नरिंदर को दरवाजा खोलते देख सवाल किया.
"नहीं बहना हम अपनी हे कार से जाएंगे. इसमें कुछ पाप की कमाई राखी है बस वो लेने के बाद निकलते है अपने शहर. आजकल पैसो की भी बहुत जरुरत है और पापा जेबखर्ची नहीं दे रहे इतने काम के बावजूद. वैसे तुम इस बचे को रख कर कुछ गलत तोह नहीं कर रही?'", सचमुच कार की डिक्की में नोटों का बड़ा बैग था और अगली सीट की दराज में भरा हुआ रिवॉल्वर.
"ये पहले दिन से हे हमारे परिवार में है भैया तोह ये हक़ रखता है दुनिया में आने का. देखना इसको मैं बिलकुल अर्जुन जैसा बनाउंगी या आपके जैसा.", नरिंदर जी अर्जुन का नाम सुन्न कर हँसते हुए उस बैग को अपनी कार की तरफ लिए चल दिए.
"लड़की होनी चाहिए बिलकुल तुम्हारी तरह. मेरी प्यारी चुटकी समझदार भी है और दिलेर भी. अर्जुन तीसरी ऑप्शन है मेरे बाद. लेकिन पापा कहते है की मेरे जैसा और कोई नहीं हो सकता तोह फिर बस जो भी हो वो तुम्हारे जैसा हो. बाकी शंकर से तुम्हे दिक्कत है जो उसका नाम नहीं लिया.?", कुलदीप को इशारे से कार ठिकाने का बोलते हुए नरिंदर ने पहले रेणुका को गाडी में बैठाया और फिर खुद स्टीयरिंग संभाला. रेणुका यहाँ पर शंकर भैया के जीकर से हंसने लगी थी.
"उनके जैसा हुआ तोह फिर आप खुद हे सोचो क्या होगा? घर से बोल कर निकलेगा कलेगा का और मिलेगा उनके पास हे निशाने लगता जैसा भैया अक्सर करते थे जब हम कैंट में रहते थे. वैसे आपकी बात सही है. जो भी होगा उस से फरक नहीं पड़ता. बस होगा तोह हमारे परिवार में हे.", रेणुका की बात सुन्न कर नरिंदर ने अपना धुला हुआ हाथ उसके सर पर सहलाते हुए गाडी स्टार्ट की.
"शंकर जैसा तोह बस एक वही है रेनू. और उस जैसा न कोई बीटा हो सकता है न भाई. अगर तुम्हे बीटा हुआ न तोह उसको एक बार माँ की गॉड में रख देना. क्या पता उनके दिल से शंकर का हे कोई पर्याय निकल आये. अब तुम्हारी अतीत से जुडी हर तार मैंने काट दी है. बस इसकी परवरिश पर ध्यान देना अपनी सेहत के साथ.", गाडी कुछ धुल उड़ाती हुई निकल चुकी थी और पीछे खड़ा कुलदीप देख रहा था उसकी मोटरसाइकिल पर टंगे उस बास्ते को जिसमे 14 लाख के लगभग रुपये थे.
'चलो अब अगर ये जिम्मवारी दे हे दी है तोह धरम करम में योगदान दे देते है. अंगूर खतरनाक थे.'
हक़ और हक़ीक़त
आगे...
"दादा जी कह रहे है की वो दादी और मुझे कुछ दिनों के लिए गाँव ले कर जाएंगे. साथ हे माँ और प्रियंका दीदी भी जा सकती है.", अर्जुन तैयार हो कर खाने की मेज पे आया हे था जहा उसके पिता, ताऊजी और दादा जी पहले से विराजमान थे. पंडित जी yada-kada हे ऐसे सबके साथ शामिल होते थे लेकिन आज वो भी तैयार थे और राजकुमार जी भी. रुपाली ने आरती, तारा और प्रीती के लिए भी वह प्लेट लगते हुए ये बात कही तोह बाकी सभी उसको हे देखने लगे और फिर रामेश्वर जी को. कौशल्या जी भी अपने पति की बगल में आ बैठी जिनके चेहरे पर कुछ संतुष्टि थी.
"ये प्रोग्राम कब बना दादा जी? और अगर पापा के मां जी के घर जा हे रहे है तोह संजीव भैया के लौटने के बाद भी जा सकते है. भाभी और भैया भी घूम आएंगे.", अर्जुन जगह ढूंढ़ता आखिर में अकेला हे इस तरफ आ बैठा जहा उसकी अगल बगल में 2 पंक्तियों में बाकी सभी बैठे थे. इस तरह जैसे वो मुखिया वाली कुर्सी पर जा बैठा हो पर वैसा था नहीं.
"ोये नंदलाल, तेरे भैया भाभी अब हर जगह तोह न चिपके रहेंगे हमारे साथ साथ? वो तोह मैंने हे तेरे दादा जी से कहा था के हंसमुख उधर से अगले महीने शहर चला जाएगा तोह उस से पहले थोड़ा ghar-khet देखभाल आये. तेरी माँ के लिए खुद शंकर ने कहा है की 15 से 20 दिन हाथ सही होने में लगने वाले है और रेखा काम करने से हटने वाली नहीं. इसलिए उसको साथ लेके चलते है और 3-4 दिन की हे तोह बात है. चौथे दिन वापिस भी लौट आएंगे. और अभ नहीं जा रहे, 29 या 30 को जाना है. रुपाली ने भी अपना कुछ सामान ले कर आना है तोह घूम आएगी साथ.", कौशल्या जी ने बात कहने के साथ साथ अर्जुन को नरम शब्दों में झाड़ भी दिया था जो अब बगले झांकता इधर उधर देख रहा था अपने बचाव में लेकिन बाकी सभी उस पर हे हँसते लगे. संजीव भी तैयार हो कर ख़ामोशी से उसकी हे बगल वाली कुर्सी पर बैठ गया. शायद उसकी अलग हे परेशानी थी कोई.
"हाँ तोह ाची बात है न दादी लेकिन ध्यान रखना बस. गर्मी बढ़ने लगी है और गाँव में ..", अर्जुन की बात फिर से कौशल्या जी ने काट दी.
"तू ये बात अपने बारे में सोच बीटा कही वह गलियों में भटकता फिर और धुप में कोयला हुआ वापिस आये. ज़िन्दगी शहर से ज्यादा मैंने gaanv-dehat में हे बिताई है और वह हम लोग क्या सिखर धुफेरी में सड़क पे रहने वाले है? कोमल बीटा संजीव का भी नाश्ता लगा दे. ये इधर बैठ गया लेकिन इसकी बीवी इन्तजार में अभी तक भूखी है.", ये संजीव भी आ फंसा था अपनी दादी के घेरे में जिसको बात सुनते हे ठसका लगा लेकिन सबको हँसता देख वो अर्जुन की और प्रश्नात्मक देखने लगा.
"भैया आज न दादी थोड़ी परेशां है क्योंकि उनसे शायद दादा जी ने कुछ छुपाया जो उन्हें पता चल गया. आप बस आराम से नाश्ता करो और भाभी मेरी माँ के कमरे में उनके साथ हे नाश्ता कर रही है.", अर्जुन ने इस बार कौशल्या जी को हे लपेट लिया था बेशक मजाक में हे. जो अपने पति को घूरने के बाद फिर मुस्कुरा उठी.
"घर फिर घर कहा लगता बीटा जब तुम लोग आसपास नहीं होते? सोचा था ये राजकुमार और शंकर अब इधर है तोह अपनी माँ से 2 घडी बतिया लिया करेंगे लेकिन इनके साथ वो नासपीटा इन्दर खुद हे गायब रहने लगा. लेकिन करो तुम लोग अपनी मर्जी और मैं अपने बचो बहु में खुश हु. प्रीती बीटा तू तोह सब देख रही है इसलिए पहले से हे तैयार रहियो. ये अर्जुन भी कही मटरगस्ती करने निकला तोह तू काम से काम मेरे पास हे रहना.", प्रीती के तोह मुँह में पानी का घूँट हे रुक गया अपना नाम सुन्न कर जिस पर रामेश्वर जी ने हे अपनी बीवी को खामोश करवया.
"ओह भगवान, खाना तोह खाने दो बचो को. तू जिन जिन के नाम ले रही है उन्होंने 10 पराठे साफ़ कर दिए. लेकिन ये छोटे पंछी दाना चुग रहे है इन्हे आवाज से मत डराओ. प्रीती बीटा, चंडीगढ़ जाते हे अपने पापा को याद करवा देना की मैंने कुछ कहा था.", रामेश्वर जी ने अब कही भोजन शुरू किया तोह अगले 10 मिनट ख़ामोशी बरकरार रही. कौशल्या जी स्वयं खाने की जगह सबकी प्लेट में उनकी पूरी खुराक का ध्यान रखती रही. उन्हें हमेशा अपने बचो के नाश्ते पर ध्यान देना पसंद जो था. अर्जुन 2 हे पराठे खा कर हाथ साफ़ करने लगा तोह ये ख़ामोशी भांग हुई.
"चुपचाप से 2 और पराठे ख़तम करो. Kad-kathi के हिसाब से वो भी काम है बीटा. दोपहर या रात में काम खा लो लेकिन सुबह पूरा भोजन. और ये लस्सी ऐसे हे पड़ी है?"
"दादी, सफर भी करना है और अभी तोह दूध और वो लड्डू खाये थे इसलिए लस्सी नहीं. मैं रस्ते में कुछ खा लूंगा या जूस पी लूंगा."
"एक पराठा खा ले बीटा. ला ये लस्सी इधर दे दे.", शंकर जी ने बिना देरी किये वो गिलास अपने वाले में पलट लिया. एक पराठा अर्जुन को देने के साथ उन्होंने जैसे हे अपने लिए भी पराठा उठाया कौशल्या जी ना में गर्दन हिलती हंसने लगी.
"दर्जन पराठे खा चूका है शंकर. अब बस कर बीटा और समय देख.", कौशल्या जी ने कहने के साथ साथ खुद हे मक्खन अपने बेटे की और सरका दिया. वो जानती थी की अब पूरा दिन उनका बीटा शायद हे भोजन करे. इस बीच ऋतू ने ये महफ़िल भांग की.
"दादी आपके लिए पूर्णिमा दादी जी का फ़ोन है. होल्ड पर हे रखा है बात कर लीजिये."
"हाँ सही किया जो फ़ोन कर लिया. राजू बीटा, तुम्हे हे अपने पिता के साथ सब देखना है. आज दोपहर का कार्यक्रम वही हवेली पर रखा है. शंकर, देख लेना बीटा अगर समय निकाल सको तोह. संजीव, कही जाना नहीं अब.", कौशल्या जी उठ कर जाने से पहले सबको हिदायत दे गयी थी. शंकर जी ने बस सर हिला दिया. सभी लोग लगभग एक साथ हे अपने स्थान से उठने लगे थे और संजीव जैसे कुछ समय अर्जुन से बात करना चाहता था लेकिन उस से पहले हे शंकर जी ने अपनी बात रख दी.
"अर्जुन, तुम जरा अपनी माँ के कमरे से मेरा हॉस्पिटल वाला बैग ले कर बहार मिलो. मैं कार निकाल रहा हु.", संजीव ने इन्तजार करना हे ठीक समझा और अर्जुन बिना देरी किये अपनी माँ की तरफ बढ़ चला जिसके साथ संजीव भी था. चची का हाल लेने के इरादे से. कुछ हे समय बाद बाप और बीटा घर के बहार कार में बैठे थे. अपना सामान सही से रखने के साथ हे शंकर जी स्टीयरिंग को साफ़ करते हुए जैसे मैं हे मैं शब्दों को बुन्न ने लगे लेकिन जल्द हे बात शुरू की.
"ाचा लग रहा है के तुम उत्साहित भी हो और तैयार भी. लेकिन मैं आज तुमसे एक बात करना चाहता हु अर्जुन और ये बात एक बाप के हक़ से नहीं बल्कि वो हक़ीक़त याद करके जिसने बहोत कुछ बदल कर रख दिया था. मुझे हमेशा ऐसा लगता है की शायद मैं तुम्हे बाप की तरह प्यार नहीं दे पाया लेकिन जब तुम्हे देखता हु साथ रह कर तोह वो बात मायने नहीं रखती. उमेद तुम्हे शायद मुझसे बेहतर जानता है और प्यार तोह वो करता हे है. ऐसा हे नरिंदर के साथ है और कही न कही संजीव बची खुची कसार भी पूरी कर देता है. लेकिन एक और बात है जो मैं कहना चाहता हु. तुमसे मुझे लगाव है इसलिए मैं तुम्हे प्रभावित नहीं करना चाहता. क्या ये जरुरी है की मैं तुम पर एकाधिकार जातौ?", शंकर जी ने बात कहते हुए अपने पर्स से तमाम पैसे निकाल कर अर्जुन की ऊपर वाली जेब में खोंस दिए. लेकिन वो तोह बस अपने पिता के चेहरे को देख रहा था जहा अब धुप का कला चस्मा चढ़ा था. अर्जुन की नजरो में उसके पिता हमेशा हे एक आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक थे लेकिन बातचीत अक्सर सिमित हे होती थी.
"मैं ये महसूस करता हु पापा और आपको इसके लिए शब्दों की जरुरत हे नहीं पड़ती. मैं कभी किसी के पास गया क्या नम्म आँखे ले कर सिवाए आपके? चाहे वो बोर्डिंग जाने से पहले गुस्से में रट हुए आपके पास खड़े रहना या अभी कुछ वक़्त पहले. मैं जानता हु की आप हे हैं जो मेरी परेशानी हल कर सकते है बिना मेरे कहे. ये कलाई घडी आपके और मेरे बीच हमेशा एक मजबूत सम्बन्ध का प्रतीक है.", अब शंकर जी ने उसके बालो को सहलाते हुए परिचित मुस्कान दी.
"तुमने अभी परिवार के भीतर का जीवन देखा है बेटे लेकिन बहार आजाद निकल कर जब फैंसले लेना सीखोगे तोह गलतियों पर ध्यान मैट देना क्योंकि वो तोह होती रहेंगी. बस जो फैंसले तुम अपनी मर्जी से लो, उन्हें बदलने की कोशिश मैट करना. फिर तुम कभी भी खुद को वापिस नहीं पा सकोगे. मैं दुनिया के बारे में पापा जितना तोह नहीं जानता अर्जुन लेकिन मझदार में खड़े हो कर दोनों किनारे जोड़ने वाला सही नियत तोह रखता है लेकिन वो किनारे एक नहीं कर पता. कीमत कुछ भी चुकानी पड़ सकती है. मुझे तुम्हारी चिंता नहीं है क्योंकि तुम सक्षम हो लेकिन मेरी इस बात पर गौर करना बीटा.", शंकर जी की बात अमूमन हलकी और तंजिया रहती थी लेकिन आज बिलकुल अलग था. वो गंभीर थे और उनका ज्ञान किसी aatmik-shikshak जैसा.
"आप जानते है ऐसे किसी व्यक्ति को पापा जिसने वैसा किया था? मैं समझ रहा हु और मेरी तरफ से आपको शिकायत का मौका भी नहीं मिलने वाला लेकिन बस सुना है मैंने की पहले आप खुद को इतना व्यस्त नहीं रखते थे. पहले मतलब बहोत पहले.", अर्जुन डैशबोर्ड को खोलता तोह कभी बंद करता. उसको जैसे इस बचपने में मजा आ रहा था. मुद्दा गंभीर था और अपने बेटे की हरकत के साथ ऐसा सवाल सुन्न कर शंकर जी ने शीशे ऊपर चढ़ाते हुए एक चालू कर दिया.
"जानते तोह होंगे हे तुम क्योंकि तुम्हारा नाम जो हैं इसके मैं खिलाफ था जब ये तुम्हे दिया गया. तुमसे शिकायत नहीं थी लेकिन उस नाम का बोझ आजतक मेरे दिल पर है अर्जुन. जिस तरह कई बार तुम अपने फैंसले लेते हो और माहौल ऐसा बनाते हो न जिस से शक्श कोई और हे नजर आता है, वैसा हे वो इंसान भी था. तुम्हारा अज्जू चाचा. तुमने तोह बस यही बिखरी हुई नाराज हवेलियां आपस में फिर से जोड़ी, जानता हु आसान नहीं था लेकिन अज्जू. अज्जू ने वो सब जीत रखा था किसी सिकंदर की तरह. न उसके सामने सोमबीर ताऊ जी की कोई बिसात थी और न किसी अफसर की. वो छोटी छोटी नेहरू को आपस में एक करता चला गया और कभी विफल नहीं हुआ जबतक.. जबतक वो समंदर से न जा टकराया. उसने वह भी सबके घुटने टिकवा दिए थे बीटा और कमी बस यही रह गयी की उसके तीन भाई उसकी पीठ न बचा सके. थोड़ा बेवकूफ था वो दिल के मामले में और अक्सर दिल से सोचने वाले सभी होते है जैसे मैं भी कुछ अलग नहीं. पर समंदर के किनारे कभी एक नहीं होते ये वो जान कर भी लहर पे सवार हो गया. पापा के सिध्दांत, माँ का अनुशाशन, रघुवीर चाचा जी की ताक़त और हमारे मजबूत कंधे बस झुक कर रह गए, जो उसके काम तक क्या उसको बचा भी न सके. मैं पापा के चेहरे पर उस समय वाली चिंता आजकल देखने लगा हु चाहे ाची तरह न सही लेकिन वो इतिहास के िट्छुक नहीं है. तुम बस इतना करना मेरे बचे की ये नाम सार्थक मैट करना उस व्यक्ति से जिसकी याद में तुम्हे ये मिला है. गाँव जाओ और जी भर के मौज मस्ती करो. घूमो फिरो और अगर ऊर्जा बढ़ती लगे तोह अखाड़े में उसको प्रयोग करो. तुम्हारी जेड इस घर से है, उस गाँव से नहीं बस इतना याद रखना. आऊंगा तोह तुमसे मिल कर जाऊंगा. अपना ध्यान रखना.", इतनी तल्लीनता से अपनी पूरी बात कहने के बाद शंकर जी ने अर्जुन को जवाब तक देने का मौका न दिया. और उसकी तरफ का दरवाजा खुद हे खोल कर इशारा दे दिया की वो अब जाना चाहते है.
"जैसा आप चाहते है वैसा हे होगा पापा. मुझे भी इतिहास पसंद नहीं. साइंस ाचा सब्जेक्ट है और दिमाग शांत रखने के लिए उसमे थोड़ा मैथमेटिक्स भी मिला लिया गया. माँ ने कहा था के आपकी कफ और जूस बैग में दाल दिया है उन्होंने.", अर्जुन बहार निकल कर दरवाजा वापिस बंद करते हुए घर में दाखिल हो गया. शंकर जी ने अपने पर्स की गुप्त जेब से वो 3 इंच बी 2 इंच की श्वेत श्याम तस्वीर निकाल कर गहराई से देखि जिसमे लम्बे घुंगराले बालो वाला युवक शंकर जी के जवान चेहरे के साथ चेहरा जोड़े उनकी पीठ पर चढ़ा था. अगल बगल में नरिंदर और उमेद मुस्कुरा रहे थे. वो यक़ीनन अज्जू हे था जिसको आजतक शंकर अपने दिल में संजोये था.
'हक़ीक़त तोह मुझे भी नहीं पता अर्जुन लेकिन अब जान ने का फायदा भी नहीं.', आक्रामक व्यक्ति खुद नहीं चाहता था के और तबाही हो. अब सभी के परिवार जो थे और जिम्मेवारियां भी. शायद वो समंदर और शंकर जी अनजान थे की रामेश्वर जी ने दिल से इतिहास निकला नहीं था. वो चिंतित तोह थे लेकिन वजह कुछ और थी.
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घर के भीतर अलग हे नजारा था अब. कौशल्या जी पूर्णिमा जी से बातचीत होने के बाद अपनी बड़ी बहु और कोमल को सब समझने में लगी हुई थी. ऋतू के साथ स्वयं कृष्णा जी ने अर्जुन का बैग पैक किया था जिसमे उसकी ख़ास खुराक, कपड़ो के साथ साथ 3-4 किताबे और आवश्यक सामान था. अर्जुन ने पहले हे बता दिया था के सिमित कपडे और 2-3 पोषक बहार अंदर के लिए हे राखी जाए. तारा भी इसमें उनकी मदद कर रही थी और मुस्कान प्रियंका के साथ राधिका भाभी के कमरे में. घर के अंदर आते हे अर्जुन का सामना प्रीती से हुआ जो तबसे वह कड़ी थी जब अर्जुन अपने पिता को बैग देने आया था.
"तोह तुमने ऋतू दीदी की वजह से ऐसा किया?", प्रीती के स्वर में ठहराव सा था जैसे बात कुछ और हो. लेकिन अर्जुन आँगन खली देख प्रीती का हाथ पकड़ कर उसको बगीचे की तरफ ले चला.
"अब ये बताओ प्रीती की यहाँ कौनसा ऐसा पौधा है जिसकी जरुरत नहीं?"
"सब ज़िंदा है और तुमने दादा जी के साथ मिल कर इन्हे बड़ा किया अर्जुन. जरुरत से पहले जरुरी बात है इनका जीवित होना और सभी की अपनी अपनी विशेस्ता है.", प्रीती इतना तोह जानती थी की अर्जुन निरर्थक कुछ भी नहीं कहता.
"देखो यहाँ हम सभी का अपना एक ख़ास असर या खासियत होती है. लेकिन कभी कभी ज्यादा हे मेहरबान जीव अपनी विशेस्ता छोड़ देते है दुसरो के लिए. अब ये घाना होता संतरा हे देख लो जिसकी छाया में कई फूल पनप रहे है. इस तरफ के पत्तो में इसकी स्वाभाविक महक है.", अर्जुन ने एक पत्ता टॉड कर उसको मसलते हुए प्रीती के चेहरे के सामने किया तोह उसने भी सुगंध पहचान ली.
"लेकिन यहाँ निचे की तरफ तुम्हे इसके पत्तो से वैसी महक नहीं मिलने वाली क्योंकि इधर तोह तुम खिल रही हो. तुम्हारी खुशबु इस से ज्यादा नहीं होगी लेकिन यही तोह साइट्रस की विशेस्ता है जो वो अपनी छाया में रहने वालो को अवसर देते है खुद की खासियत बढ़ने का. यहाँ इनमे तुम्हारी महक के अवशेष है.", सचमुच उस तरफ के पत्ते में प्रीती ने मिली जुली सुगंध पायी.
"ऋतू दीदी के लिए मैंने वो नहीं किया. मैं गाँव जाना चाहता था और उनकी खासियत को सलामत रखना मेरी जिम्मेवारी है. अब तुमने भी तोह कोचिंग लेनी है न एक महीने के लिए? तभी तुम चंडीगढ़ जा रही हो अपने कॉलेज से पहले हे किताबे लेने जिस से तुम तैयारी कर सको. ये सब जरुरी है प्रीती और मैं सबके साथ इस बगीचे की तरह हे रहना चाहता हु बिना बलिदान मांगे. तुम्हे यहाँ भी हिफाजत से रखा है और परिवार में भी हमेशा ऐसे हे रहने वाली हो. बस मेरी यही ख्वाहिश है की अकेले ऐसा कोई फैंसला न लेना जिस से कोई त्याग करना पड़ा.", प्रीती की नजरो में आज अपने प्यार के लिए इजत्त और गहरी हो चली थी.
"जानती हु फंदेबाज मैं तुम्हे. तुम इसलिए भी वह भाग रहे हो जिस से तुम्हारी ऐश में कमी न हो. बहोत मेहनत जो की है तुमने पिछले कुछ दिनों में. वैसे कॉलेज वाला प्रॉमिस याद रखना.", रोमिला जी को घर में आते देख उसने जल्दी से ये बात कही और अर्जुन के जवाब देने से पहले रोमिला की आवाज भी आयी.
"तोह तुम दोनों यहाँ mel-jol बढ़ने में लगे हो? प्रीती तुम्हारे पापा त्यार हो कर तुम्हारा हे इन्तजार कर रहे है. अर्जुन, मुझे ाचा लगेगा अगर तुम वह जाने के बाद कभी टेलीफोन करोगे तोह. चाहे प्रीती को हे कर लेना.", रोमिला के चेहरे की अलग हे कशिश थी जिसको प्रीती के सामने अर्जुन नजरअंदाज करने की कोशिश में लगा था.
"हनननन. हाँ आंटी जी मैं करूँगा फ़ोन. वैसे आप लोग वापिस कब आओगे?"
"पहले प्रीती जाने के लिए त्यार तोह हो. ये तोह तुम्हारे घर से वापिस अपने घर आना हे नहीं चाहती. लेकिन हम लोग कल हे लौट आएंगे और तुम्हारे पीछे से मैं रेखा का ध्यान ाचे से रखूंगी.", रोमिला ने अपनी हे बेटी को परेशां किया तोह प्रीती तेज कदमो से वह से निकल कर अपने घर की तरफ बढ़ने लगी. रोमिला उस से पहले हे चल चुकी थी जिस पर प्रीती ने एक बार पलट कर अर्जुन की तरफ देखा और होंठो को गोल करते हुए ऐसा सन्देश दिया की अर्जुन आसपास देखने लगा. प्रीती की ऐसी खुली हरकत देख वो सकपका गया था और हंसती हुई प्रीती अपनी माँ का हाथ पकड़ती हुई अपने घर में जा घुसी.
'पागल लड़की.'
"अब तू सफर के लिए एक्स्ट्रा ऑक्सीजन ले रहा है क्या यहाँ पे?", ये आवाज संजीव भैया की थी और उन्हें अपने पास आता देख अर्जुन हे उनकी और लपका.
"ओह नहीं भैया बस जाने से पहले देख रहा था के सब सही है न. वैसे आप थके थके लग रहे हो."
"तू ठहर जा बदमाश. हाहाहा.. बस यार तेरे सामने हे है 3-4 दिन से आराम कहा मिला था. फिर भी कल रात सोया लेकिन अभी एक दिन और लगेगा थकान मिटने में. तोह गाडी चमका ली जाने के लिए?"
"न न भैया अपनी रानी पर जा रहा हु. वो देखो मैंने ये हक्क लगवा लिए बैग रखने के लिए पीछे. कार हर जगह नहीं जा सकती और ये ज्यादा जगह भी नहीं घेरती और मुझे अकेले इसको चलना ज्यादा पसंद है. कार आप चला लेना तबतक.", अर्जुन अपने भैया का हाथ पकडे हुए बहार वाली सीढ़ियों से हे ऊपर चल दिया.
"नहीं छोटे. कार तोह तू पहले हे मुझे एक दे चूका है और काली वाली का स्टीयरिंग बस तू तेरे तक हे रख. हाँ वह पर मोटरसाइकिल तेरे काम ज्यादा आएगी लेकिन हाईवे पर कार ठीक नहीं थी?", अर्जुन के कमरे में नयी चादर बिछी थी और अब वह सामान भी दुरुस्त था. जैसे हे दोनों बिस्टेर पर बैठने लगे, तारा तकियों के ऊपर नए लिहाफ चढ़ा कर यहाँ रखने आ गयी.
"तोह तुमने अकेले हे सब सेट कर दिया?", अर्जुन ने पानी की बोतल टेबल से उठा कर वैसे हे घूँट भरने के बाद तारा को प्रशंशा से देखते हुए कहा.
"हाँ और थैंक यू मैट हे बोलना तुम. तुम्हारा बैग भी निचे तैयार है. वैसे जब तुम वापिस आओगे तब भी कमरा ऐसे हे मिलेगा. संजीव भैया, नानी कह रही है की आप भी एक बार उनसे मिल लेना.", तारा खली बोतल अर्जुन के हाथ से लेती हुई अपनी कमर हिलती हुई चली गयी जिस पर अर्जुन ने भैया की मौजदगी में ध्यान न दिया.
"आज तोह उमेद चाचा की तरफ आपकी पार्टी है भैया. भाभी भी हवेली देख कर खुश हो जाएंगी.", अर्जुन ने हवेली का जीकर किया तोह संजीव ने उठ कर अंदर से दरवाजा बंद कर लिया जिस पर अर्जुन थोड़ा हैरान हुआ.
"देख मैं तुझसे एक जरुरी बात करना चाहता था लेकिन शादी की वजह से और तेरे aas-pas अकेले न मिलने की वजह से बता नहीं पाया. अब तूने हवेली का जीकर किया तोह मुझे भी याद आ गया की क्या बात करनी थी.", संजीव भैया की इतनी दबी हुई आवाज और गंभीर चेहरा देख अर्जुन उनके बिलकुल करीब जुड़ कर हे बैठ गया.
"कैसी हवेली और क्या बात थी भैया जो आप अकेले में हे कर सकते थे?"
"छोटे मुझे शादी वाले दिन हे पता चला था की दादा जी के पिता जी हमेशा से हे उस गाँव में नहीं रह रहे थे. हाँ मतलब जहा छोटे दादा जी रहते है वही उनकी शादी हुई और वो पुश्तैनी घर हे है. लेकिन जहा रियासत थी मतलब आज भी महल है, वह पर एक हवेली बंद पड़ी है पिछले 50 से ज्यादा साल से. पंडित जुगलाल जी की हवेली, जहा हमारे दादा जी पैदा हुए और कुछ साल वो लोग उधर रहे भी. जुगलाल जी अपने दादा जी के दादा थे. तेरा उस सेहर जाना हुआ तोह क्या तू उसको देखने का जुगाड़ करेगा?", ये एक बहोत हे बड़ा राज था अर्जुन के लिए और संजीव भैया का उसको ऐसे बताना इशारा करता था किसी और भी बड़े राज की तरफ.
"जग्गी भैया तोह कह रहे थे की दादा जी के पिता जी शुरू से हे अपनी जगह से रियासत देखते रहे थे और वो कसबे के मालिक हे थे जिन्होंने वही पर सब काम करवाए लोगो के लिए. दादा जी के जनम का ब्यौरा तक वह की पंचायत कॉपी में दर्ज है. फिर ये दूसरी हवेली कहा से आ गयी और वो भी महल के पास.?"
"यही तोह समझ नहीं आ रहा भाई लेकिन जिसने जानकारी दी है वो इंसान 100 प्रतिशत सच कह रहा है. सोच मैं तोह अभी haal-filhaal में घर से बहार नहीं निकला तोह मुझे क्या सपना आएगा उस हवेली का? रही बात दादा जी का नाम पंचायत में दर्ज होने का तोह शाही मुंशी कोई छोटा व्यक्ति नहीं होता था और ऊपर से पंडित विद्वान व्यक्ति को तोह अलग सम्मान मिलता था. उन्होंने किसी वजह से हे ये सब करवाया होगा.", अर्जुन बड़े ध्यान से ये जानकारी ले रहा था.
"तोह ऐसी बात अगर कोई बता सकता है तोह वो खुद पड़ती रामेश्वर जी यानी हमारे आदरणीय थानेदार साहब. लेकिन आपको कैसे पता चला ये और उन्होंने ये बात किस से करि थी? ऐसी हवेली होती तोह क्या वो कभी इसकी चर्चा नहीं करते या कोई और करता."
"वो रानी साहिबा आयी थी न शादी में? जब वो मुझे आशीर्वाद देने के बाद दादा जी से एक तरफ हो कर बात कर रही थी तभी मैंने उनके मुँह से ये सुना था के हवेली के लिए कोई नोटिस आया था जिसको उन्होंने हे वापिस लौटा दिया अपनी संपत्ति बता कर. और दादा जी ने कहा के उन्हें उस हवेली की कोई जरुरत नहीं. पंडित जुगलाल जी खुद हे वह नहीं रहना चाहते थे तभी उन्होंने वो shahi-pariwar को लौटा दी थी 50 बरस पहले. उनके लिए उस हवेली का कोई वजूद हे नहीं है. और इस छोटी से बात के सिवा इस बारे में और कोई चर्चा नहीं हुई. मैं नहीं जानता की वह कुछ मिल सकता है या नहीं लेकिन तुम्हे एक बार कोशिश करनी चाहिए उस जगह को देखने की. खंडहर अक्सर बहोत कुछ समेटे रहते है और ये तोह 50 बरस से बंद है.", अर्जुन भी इस बात से सहमत दिखा.
"हाँ हो भी सकता है की वह कुछ काम की चीज मिल जाए और मैं तोह वैसे भी महल देखने जाने हे वाला हु. रानी जी ने तोह खुद हे मुझे न्योता दिया था और मैंने जाने कहा सुना था के दादा जी का बचपन महल के हे पास बिता था. मतलब दादा जी यही 70 के और हवेली बंद है 50 साल से या कुछ ज्यादा मान लो. तोह उनसे जुड़ा तोह उधर कुछ न कुछ हो हे सकता है. और अगर वो कसबे में रहते रहे तब भी चांस है की वह सिर्फ खंडहर तोह नहीं मिलने वाले. देखते है भैया की ये कैसी हवेली है जिसको दादा जी के दादा जी भी पसंद नहीं करते थे."
"और क्या पता के वह से कुछ ज्यादा जुड़ाव हो इसलिए उसको छोड़ दिया गया हो? अब होने को तोह कुछ भी हो सकता है छोटे और अक्सर हम अपना हक़ प्यार की वजह से हे छोड़ते है. मेरा दिल तोह कहता है की वह बहुत कुछ मिल सकता है और नहीं भी मिला तोह कोई बात नहीं. तुम्हे उस पीढ़ी से जुड़ना तोह नसीब होगा हे.", संजीव भैया की ऐसी सकरात्मक बातें सुन्न कर अर्जुन मुस्कुरा उठा.
"8 बज गए है भैया और अब मुझे सबसे मिल कर निकलना चाहिए. हवेली का क्या है? किस्मत गाँव ले जा रही है तोह क्या पता ये हवेली हे असली मंज़िल हो. चलो आप भी थानेदारनी जी से मिल लो कही आपका हे बंद न बजा दे दादी भाभी के हे सामने.", अर्जुन की बात सुन्न कर संजीव को भी तारा का पैगाम याद आ गया.
"चल भाई और तू आराम से चलना मोटरसाइकिल. 5 घंटे की जगह 7 लगा लियो पर ध्यान से. और मैं फ़ोन करूँगा शाम को.", अर्जुन अपने भैया को हॉल कमरे में हे छोड़ पिछली तरफ चला गया. अभी सबसे मिलने मिलाने में उसको 15-20 मिनट लग हे जाने थे.
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"हमने कहा था न अंकल जी की आप हम पर विश्वास तोह करके देखो, जान तक की परवाह नहीं. आपने थोड़ा लम्बा रास्ता बताया था लेकिन मैंने सोचा की क्यों न सीधा हे हाथ दाल दिया जाए. ये रही रेणुका और पंडित जी के साथ बातचीत की चाबी.", कुलदीप उस बगीचे में सबसे घने भाग पर छाया में एक कुर्सी पर गर्भवती रेणुका को कुर्सी पर कलाई से बांध कर हटा था जब उसके 4 आदमियों के साथ आनंद, लल्लन, संग्राम और सबसे घाघ व्यक्ति अभिमन्यु ने कदम रखे. इस जगह 5-6 सफ़ेद प्लास्टिक की कुर्सियां पहले हे राखी थी, एक लकड़ी के साधारण से मेज के ird-gird. रेणुका दुत्कार भरी नजरो से उस घृणित व्यक्ति को घूर रही थी जो अतीत में कभी उसका जीजा था.
"बड़ा हे भरी काम अकेले हे अंजाम दे दिया तुमने तोह बिटवा. वह उस भरे पूरे माहौल में उनके घर की बेटी उड़ा ले आये और किसी को खबर तक न लगने दी? यही है वो औरत अभिमन्यु?", लल्लन सिंह रेणुका से वाकिफ न था इसलिए कुर्सी पर रेणुका के सामने बैठते हुए उसने एक बार सुनिश्चित करना चाहा. अभिमन्यु के चेहरे पर आयी कुटिलता ने जवाब भी दे दिया. आनंद सिंह ख़ामोशी से उस मेज पर वो बस्ता रखने के साथ लल्लन की हे बगल में जा बैठा.
"सचमुच तुमने बड़ा शिकार अंजाम दिया है लड़के. क्यों बहु, चाचा ससुर याद है या अपने चरित्र की तरह हमे भी साफ़ कर दिया? कुलदीप, इसमें कागज़ और 20 लाख नगद है. इसके आगे अब हम लोग देख लेंगे. तुमने अपना काम किया और हमने हमारा.", आनंद सिंह के जबड़े से निकलती आवाज कुछ ज्यादा हे सख्त थी.
"न अंकल न. करो चाहे जो मर्जी लेकिन बाद में. 20 लाख के बदले 2 रात तोह इसको बंद कमरे में रख कर अरमान तोह पूरे करू अपने.", अभिमन्यु रेणुका की बगल में बैठने लगा तोह कुलदीप ने उसको छाती पर हाथ रखते हुए पहले हे रोक दिया. संग्राम सिंह ये देख आगे बढ़ा तोह कुलदीप ने मुस्कुराते हुए उसको ना में गर्दन हिला कर ऐसा करने से मन किया.
"उनले जी, लगता है आप लोगो को डील करने का अनुभव नहीं है और दूसरी बात की आपने तोह वो देख लिया जो मेरे हिस्से था लेकिन मुझे मिलने वाला हिस्सा देखे बिना कोई इस पर हाथ नहीं रख सकता. काम से काम इस बगीचे में तोह नहीं. और ये तमंचा जो तुम जेब से झलका रहे हो संग्राम, इसका उपयोग करने की सोचना भी मैट. मेरे मैं में मेल न है लेकिन लगता है आप लोग कुछ अलग विचार ले कर यहाँ आये हो.", कुलदीप खुद रेणुका की बगल में बैठ उस बास्ते को खोलने लगा. उसके आदमी बेशक बगीचे में काम करने वाले लोग थे लेकिन सबके हाथो में बांस का मजबूत लेथ और चेहरे पर अपने मालिक के प्रति वफादारी. इस जवान लड़के के तेवर और उसकी बातें सुन्न कर लल्लन ने संग्राम और अभिमन्यु को इशारे से बैठने को कहा.
"देख लो इत्मीनान से बीटा और कही गड़बड़ लगे तोह हमे बताओ."
"गड़बड़ तोह है अंकल जी. इस अभिमन्यु ने 50 एकड़ के बराबर पैसे की बात की थी और आपने 28 किल्ले जिसके बराबर उतना हे लल्लन जी ने कहा था देने को. यहाँ है ये रद्दी सी 15 किल्ले बंजर जमीन, जो हमारी तहसील के सबसे ख़राब हिस्से में है और दूसरे कागज़ है 13 किल्ले क्सक्सक्सक्स कसबे के पास. और पैसे के नाम पर सिर्फ 20 लाख. मान लिया आप सभी उम्र और अनुभव में मुझसे कही ज्यादा हो लेकिन बड़े इंसान को अपनी बात पर कायम रहना चाहिए. बचे गलती कर सकते है.", बचे वाली बात कुलदीप ने संग्राम की तरफ देखते हुए कही थी लेकिन उसके इस तरह से उस बास्ते को Aanand/Lallan की तरफ सरकने पर चारो एक दूसरे को देखने लगे. जैसे कोई ख़ास इशारा हो आपस में.
"काम हमारे अनुमान से कही पहले कर दिया तुमने कुलदीप. घर की हे बात है इसलिए अभी ये सब रख लो और बाकी संपत्ति एक महीने के भीतर तुम्हारे हवाले होगी.", आनंद सिंह ने लाचारी का दिखावा किया और उसके बाद अभिमन्यु अपने सुर अलापने लगा.
"वैसे भी मैंने तुम्हे उस अर्जुन को भी फांसने के लिए कहा था. आधे काम के लिए आधी हे कीमत मिलती है. बात को यही ख़तम करो और इस रंडी को हम ले जा रहे है.", और यही कुलदीप से चूक हो गयी जो अभिमन्यु के तेवर देखने में व्यस्त हुआ तोह संग्राम सिंह ने फुर्ती से उसकी बगल में खड़े व्यक्ति के पाँव में गोली मारने के बाद रिवॉल्वर रेणुका पर तान दी.
"भोस्डिका ये न समझता जज्बात हमारे. जो दे रहे थे वो इसको काम लग रहा था लेकिन अब पैसे की जगह मिलेगी मौत. मां, बस्ता उठा और अभिमन्यु भाई ले चल तेरी मैना.", संग्राम को ऐसे फुफकारते देख कुलदीप घबरा गया था और उसका एक आदमी जमीन पर अपना जखम दबाये दर्द के मारे चीख कर इस सुनसान बाग़ को दहलाने का विफल प्रयास करने लगा. लल्लन ने वो बस्ता उठाया हे था की उसमे हाथ के करीब से निकल कर वो जलता पीतल संग्राम की हथेली के aar-par जा निकला. तमंचा आनंद के भी पास था लेकिन उसकी गाडी में वो गलती से छूट गया था. अब इस बगीचे में 2 लोग चिल्ला रहे थे और रेणुका अपने हाथ ढीले करके इत्मीनान से उठ कर एक तरफ जा कड़ी हुई.
"वो ऐसा है आनंद सिंह की तुमने हमारे बारे में कुछ पता न करवाया था. हमने हे वो सब खबर तुम्हारे तक पहचे थी जिसके लिए तुम्हारे 5 आदमी भी जान से गए और 20 लाख मेरी जेब में. वैसे जिस पिस्तौल पर तुम इतना उछाल रहे थे लड़के, वो जान नहीं ले सकती. सब अपनी अपनी जगह वापिस बटिह जाओ.", अपने ठीक सामने इस 6 फ़ीट ऊँचे भूत को देख आनंद और लल्लन की तोह घिग्गी हे बांध गयी थी लेकिन अभिमन्यु जैसे कोशिश करके देखना चाहता था. अभी वो उस खंजर को रेणुका के जिस्म के करीब करने हे वाला था की नरिंदर के जिस्म में ज़माने भर की बिजली भर उठी. कोई और कुछ समझ भी पता उस से पहले वही खंजर अभिमन्यु की कलाई को काट कर नरिंदर के दूसरे हाथ में था.
"जब मैं कहता हु तब उस बात को मान लेना चाहिए. देखो जरा इन दोनों चिड़ीमारों को कैसे दुबक कर बैठे है लेकिन नहीं तुम में ज्यादा जोश भरा है. हाँ तोह दीपू बीटा फिर कितना इंतजाम हुआ तुम्हारी बहिन की शादी के लिए.?", एक आकर्षक आधुनिक पिस्तौल का मागज़ीने खोल कर उसको मेज पर रखने के बाद नरिंदर ने अपने दोनों पाँव भी कैंची बनाते हुए लंबवत टिका दिए. इतना बेफिक्र होना दर्शाता था नरिंदर की निर्भीकता और हर अपराधी को उसकी औकात दिखाना. अब दृश्य ऐसा था की संग्राम जमीन पर बैठा अपने बहते खून पर रुमाल दबा कर उसको रोकने में लगा था तोह अभिमन्यु तड़पता हुआ अपनी कटी हुई कलाई को बगल में दबाये था. रेणुका पसीना पौंछती हुई उधर चली गयी जिस तरफ से नरिंदर प्रकट हुआ था.
"म्हणत और आपकी वजह से बहोत कुछ है अंकल जी और मैं अपनी बहिन पर हराम का एक पैसा भी नहीं खरचने वाला. वैसे आप इन्हे पुलिस के हवाले करोगे या हाथ पाँव तोड़ने है?", कुलदीप एक मजबूत नौजवान था लेकिन तीन लोगो के बहते खून से विचलित हो कर वो यहाँ खड़ा भी नहीं हो प् रहा था.
"ए भाई, ले जाओ अपने साथी को और डॉक्टर से कहना के शिकार करते हुए हादसा हुआ. बाकी मैं देख लूंगा और ये पैसे रख लो. बाकी तुम दोनों उस तरफ एक घंटे तक गद्दा खोदते रहो. एक फ़ीट गहराई का एक लाख दूंगा तोह जितना गहरा उतना हे चौड़ा होना चाहिए. 6 फ़ीट के 6 लाख जो तुम चारो के होंगे.", नरिंदर के तेवर देख जख्मी आदमी को उसका एक साथी ले चला और बाकी दोनों अपने बांस वही गिरा कर कस्सी कुदाल लिए गद्दा खोदने दौड़ पड़े.
"नरिंदर बीटा, ये ठीक नहीं है. मैं किसी की जान लेने के पक्ष में नहीं था बस अपने भांजे (अजीत) के लिए इन्साफ की चाहत भर थी. अब तुम्हे ये पसंद नहीं है तोह मुझे भी कुछ नहीं चाहिए. आनंद भाई आप भी पाँव पकड़ लो तोह क्या पता नरिंदर जी हमको जाने दे.", लल्लन का गिड़गिड़ाना देख नरिंदर ताली बजाते हुए ऐसे अट्टाहास करने लगा जैसे कोई बचा खुश हो कर किलकारियां मारता है. आनंद सिंह अभिमानी व्यक्ति था और गुरूर से भरा भी.
"मर्द हु मैं लल्लन और ऐसे कई Narinder-Dharminder देखे है मैंने. तुम क्या डरने की कोशिश कर रहे हो ये गद्दा खुदवा कर और पिस्तौल सामने बिखेर कर? जान नहीं ले सकते तुम हम में से किसी की और वो भी ऐसे भरे उजाले."
"जान.. मैं जान नहीं लेता आनंद सिंह और तुम दोनों के भांजे भतीजे कुकर्मी लोग थे जिनके माथे पर मैंने वो तिलक किया जिसके ताप को वो झेल न सके. मैं न अंधेरो की परवाह करता हु और न उजालो की. जगह, समय और इंसान अगर मुझे प्रभावित करते तोह तुम लोगो की जगह मैं होता. इस लड़के का सीना चीयर कर मैं देखूंगा की दिल मजबूत है की नहीं. और ये हरामी हिजड़ा जिसकी अकाल मेरे बेटे से मार खाने के बाद भी न सुधरी, ये मेरी बहिन पर वही गन्दा हाथ रखना चाहता था तोह इसकी कलाई अलग करके मैं खुद इसको दिखाऊंगा इसका गन्दा खून कैसे जिस्म से निकाल कर मैं इसकी शुद्धि करता हु. लल्लन ने मेरे कदमो में सर झुकाया है तोह इसको दर्द नहीं दूंगा लेकिन तुम एहंकारी हो आनंद सिंह और ऐसे व्यक्ति की आवाज खोखली होती है. मेरे पिता, भाई और मुझे मारना चाहते थे तुम वो भी बहिन और बेटे को कब्ज़ा कर? ऐसा तोह वो भी नहीं सोचता जिसके खिलाफ जाने के लिए मेरे पिता ने मन किया है.", और नरिंदर सिग्रत्ती को सुलगने के बाद जिस तरह साढ़े कदमो से संग्राम के सर के पास आ खड़ा हुआ, बाकी तीनो की नजरे वही जम्म गयी. मेज पर वो आलिशान पिस्तौल बिखरी पड़ी थी लेकिन उसके हाथ में अब एक विशेष खंजर था जिस पर ख़ास चिन्ह अंकित था.
"आआ माँ रीई....", किसी मैंने की तरह संग्राम जोरो से फड़फड़ाया था और उसका रुदन सुन्न कर दूर वृक्षों में छिपे अनगिनत पंछी शोर करते हुए उड़ने लगे. हर जीव की आँख हैरत से फटी रह गयी थी जब संग्राम के सीने की वो 22 हड्डियां खाल छोड़ कर इतना घिनोना मंजर दिखने लगी. पेट से आँतड़ियों के साथ साथ लहू ऐसे बह कर निकला जैसे बड़े गुब्बारे में भरा हो जो अचानक फट जाए. उसके जिस्म को खिंच कर नरिंदर ने लल्लन की झाली में ला फेंका. लगातार चीखने से संग्राम का गाला फटने हे लगा था और उसकी हालत देख बाकी तीनो की.
"घर पर नजर नहीं रखते तोह मैं सिर्फ माथे पर तिलक करके मामला एक मिनट में ख़तम कर देता. खैर अब तुम खुद देख रहे हो की मैंने एक मिनट पहले कुछ भी गलत नहीं कहा था.", लल्लन कांपता हुआ अपनी गॉड में फड़फड़ाते हुए उस विक्षिप्त से जिस्म को देख रहा था जिसके अंदर के अंग भी फड़क रहे थे. खून में लिसड़ा वो गुब्बारे सा जिगर, हड्डियों के पिंजरे में क़ैद सुर्ख दिल और इधर उधर लटकती मोती पतली आंतड़िया. नरिंदर की हैवानियत जैसे अभी बाकी थी और उसने दूसरे हाथ से वो धड़कता हुआ दिल पकड़ कर ऐसे खिंचा जैसे लटकती दाल से कोई बड़ा आम. और वो aam-roopi दिल उसने ानदण्ड सिंह की झोली में फेंक दिया.
"देख को इसमें सिर्फ हवा भरी थी और परमात्मा तुम्हारी आत्मा को नरक में महफूज रखे लल्लन. जय शीर्षाये नमः..", आनंद सिंह मुँह दबाये अभी उल्टियां हे करने लगा था और उसकी साँसों को तड़पते हुए नरिंदर ने किसी माहिर कसाई की तरह सूई के एक कांटा हिलने भर की देरी में लल्लन की सेहमी हुई आँखों समेत उसकी मुंडी काट कर अभिमन्यु की तरफ फेंक दी. कुर्सी पर टिका हुआ जिस्म फुहारे की तरह लहू फेंक रहा था और आनंद सिंह लड़खड़ा कर भागने की नाकाम कोशिश करता उस रक्तिम जमीन पर जा गिरा.
"मुझे जाने दो ... मेरे बीवी बचे है नरिंदर.. भगवन के लिए मुझे जाने दो. मैं कभी अपने घर से भी कदम बहार नहीं .. भगवान् के लिए बक्श दो मुझे.", आनंद सिंह काँप रहा था और हाथ जोड़ता हुआ वो अपने मिट्टी से साणे चेहरे के साथ आंसू बहता गिड़गिड़ा कर भीख मांगने लगा जान की. अभिमन्यु का कलेजा इतना मजबूत न तोह और वो बेहोश था इतने घृणित भयानक दृश्य देख कर. जब नरिंदर अपनी जगह स्थिर खड़ा हो कर बस सिग्गट के काश लगता रहा तोह हिम्मत जमा करते हुए आनंद ने वो विदेशी पिस्तौल उठा ली. नरिंदर अभी भी वैसे हे खड़ा उसको देख रहा था और आनंद ने अपनी कनपटी पर टिकते हुए ऊँगली दबायी तोह यहाँ भी किस्मत देगा दे गयी.
"खाली पिस्तौल से तुम्हे गति नहीं मिलेगी और न मैं तुम्हे मरने दूंगा इतनी जल्दी. मेरे पिता मुझे डाकिए भी बुलाते है और मैं वो सन्देश ले कर उनके पास जाऊंगा जो तुमने अपने दिल में दबाया हुआ है. भाग तुम सकते नहीं हो आनंद और गोली भरने का वक़्त मेरी दूसरी पिस्तौल तुम्हे देगी नहीं. जल्दी से नाम बता दो और ऊपर जा कर अपने भतीजे से मेरी शिकायत लगाओ. Haal-chal भी देना यहाँ के और बताना के तुम्हे भी उसी आदमी ने भेजा है जिसने उसको आजाद किया था.", सिग्रत्ते एक तरफ फेंक नरिंदर ने एक पतली लेकिन मजबूत रस्सी का सही फंदा बनाते हुए उसमे अभिमन्यु के दोनों पाँव फांस दिए. जिस्म कोई हरकत न कर रहा था और उसको घिसते हुए नरिंदर ने रस्सी का दूसरा सीरा इस घने वृक्ष की लंबवत दाल के पार कुशलता से घुमा कर झटका दिया तोह वो जिस्म जमीन से रगड़ खाने के बाद अब हवा में था. जमीन की सतह से 2 फ़ीट ऊपर. रस्सी तने से बाँधने के बाद नरिंदर ने अभिमन्यु का मुँह भी मजबूती से एक कपडे से जकड दिया जिस से वो चीख न सके.
"मुझे और भी बहोत से काम है आनंद सिंह जिन्हे निबटा कर मुझे मेरे घर ठीक 3 बजे तक पहुंचना है.", अगली चीख सुनाई न पड़ी लेकिन जमीन पर कलाई से पृथक हुए 2 हाथ पड़े थे. ज़माने भर का दर्द उन फैली हुई आँखों में था जो अभिमन्यु के जिस्म पर थी. खून एकसार धार में बेहटा हुआ जमीन पर 2 गोलाकार घेरे बना कर बड़े करता गया लेकिन नरिंदर को जब इस से भी संतोष न हुआ तोह उसने गले पर भी एक चीरा दे दिया.
"नाम बोल दो और मैं तुम्हे आजाद कर दूंगा. देखो मैंने लल्लन को दर्द नहीं दिया और तुम्हे तोह मैं शायद बख्स भी दू. क्योंकि मुझे लगता है तुम्हारी जरूर मजबूरी रही होगी इस सबके पीछे. अभिमन्यु रेणुका की वजह से अपना उल्लू साध रहा था, लल्लन इस संग्राम और अजीत की डॉयलट के चक्कर में लेकिन तुम मुझे इनसे अलग लगते हो.", नरिंदर चलते हुए आनंद के करीब आ रुका. मेज पर रखा पानी का जग उठा कर उसने अपने हाथो से हे आनंद का मैला चेहरा धोया तोह नरिंदर की रहस्यमयी आँखों को देख आनंद सिंह की जुबान हिली.
"हिम्मत सिंह ने 5 करोड़ कीमत लगाईं थी. एक करोड़ मेरी गाडी में रखा है और बाकी रेणुका या अर्जुन को सौंपने पर वो देने वाला था. मैंने पैसो के लिए नहीं किया ये सब. मुझे बस रामेश्वर से नफरत है... वो भगवान् नहीं की उस पर कोई ऊँगली न उठा सके... आठ", और इसके बाद नरिंदर ने ठीक वैसा हे किया जैसा कहा था. आनंद सिंह की ठुड्डी पकड़ कर अपनी दूसरी बेआवाज पिस्तौल से उसने दिल में छेड़ कर दिया.
"मेरे भगवान् है वो मूरख, मेरे भगवन. उन पर ऊँगली तोह क्या कोई बेअदबी से भी उनका जीकर करे तोह मैं उसको यही सजा दूंगा.", अब खूबसूरत अंगूर का बाग़ जैसे दुनिया की सबसे वीभत्स जगह में तब्दील हो चूका था. एक कुर्सी पर sar-kata लल्लन का जिस्म जिसकी गॉड में खुला हुआ संग्राम सिंह तोह दूसरी तरफ वृक्ष से झूलता वो lahu-viheen बिना दोनों हथेली का अभिमन्यु का शव और सबसे साफ़ सुथरा मृत आनंद अपने नाम स्वरुप एक बेहतर मौत प्राप्त करने वाला.
"ये 4 जिस्म भी साफ़ कर देना तुम लोग, कपडा मुँह पर बांध कर. और ये 6 लाख आपस में बाँट लेना. पता लगा की हिसाब बराबर नहीं किया तोह यही हाल तुम्हारा भी करूँगा.", नरिंदर ने हँसते हुए उन दोनों को चेतावनी दी और अपनी पिस्तौल सही से जोड़ कर अब उन दोनों से अपनी निगरानी में हे साफ़ सफाई करवाने लगा. रेणुका उसकी तरफ आने लगी तोह हाथ से उसको वही रुकने का बोल वो खुद बस्ता लिए बढ़ गया.
"वह की हालत तुम्हारे देखने लायक नहीं है बहिन. अब हम चलते है यहाँ से क्योंकि मामला शायद ख़तम नहीं हुआ. दीपू बीटा, यहाँ की निगरानी भादवा दूंगा आज हे और तुम्हारे आदमी शायद डर की वजह से 2-3 दिन छुट्टी पर रहेंगे. बाकी तुम्हे किसी तरह की परेशानी नहीं होने दूंगा.", बस्ता कंधे पर लटकाये नरिंदर एक हाथ में रेणुका का हाथ थाम कर उस कच्चे पक्के कमरे के बहार खड़े कुलदीप को सब हिदायत देता हुआ हमेशा की तरह बेफिक्र सा बाग़ से बहार चल दिया. कुलदीप एक बार अपने आदमियों को काम में लगा देखने के बाद खुद भी नरिंदर जी के पीछे हो लिया. वो रेणुका से कुछ हंसी मजाक करते हुए उस कार तक चले आये जिसमे वो मुर्दा लाशें जीवित आयी थी, हक़ीक़त से अनजान.
"हम इस कार से जाने वाले है?", रेणुका ने नरिंदर को दरवाजा खोलते देख सवाल किया.
"नहीं बहना हम अपनी हे कार से जाएंगे. इसमें कुछ पाप की कमाई राखी है बस वो लेने के बाद निकलते है अपने शहर. आजकल पैसो की भी बहुत जरुरत है और पापा जेबखर्ची नहीं दे रहे इतने काम के बावजूद. वैसे तुम इस बचे को रख कर कुछ गलत तोह नहीं कर रही?'", सचमुच कार की डिक्की में नोटों का बड़ा बैग था और अगली सीट की दराज में भरा हुआ रिवॉल्वर.
"ये पहले दिन से हे हमारे परिवार में है भैया तोह ये हक़ रखता है दुनिया में आने का. देखना इसको मैं बिलकुल अर्जुन जैसा बनाउंगी या आपके जैसा.", नरिंदर जी अर्जुन का नाम सुन्न कर हँसते हुए उस बैग को अपनी कार की तरफ लिए चल दिए.
"लड़की होनी चाहिए बिलकुल तुम्हारी तरह. मेरी प्यारी चुटकी समझदार भी है और दिलेर भी. अर्जुन तीसरी ऑप्शन है मेरे बाद. लेकिन पापा कहते है की मेरे जैसा और कोई नहीं हो सकता तोह फिर बस जो भी हो वो तुम्हारे जैसा हो. बाकी शंकर से तुम्हे दिक्कत है जो उसका नाम नहीं लिया.?", कुलदीप को इशारे से कार ठिकाने का बोलते हुए नरिंदर ने पहले रेणुका को गाडी में बैठाया और फिर खुद स्टीयरिंग संभाला. रेणुका यहाँ पर शंकर भैया के जीकर से हंसने लगी थी.
"उनके जैसा हुआ तोह फिर आप खुद हे सोचो क्या होगा? घर से बोल कर निकलेगा कलेगा का और मिलेगा उनके पास हे निशाने लगता जैसा भैया अक्सर करते थे जब हम कैंट में रहते थे. वैसे आपकी बात सही है. जो भी होगा उस से फरक नहीं पड़ता. बस होगा तोह हमारे परिवार में हे.", रेणुका की बात सुन्न कर नरिंदर ने अपना धुला हुआ हाथ उसके सर पर सहलाते हुए गाडी स्टार्ट की.
"शंकर जैसा तोह बस एक वही है रेनू. और उस जैसा न कोई बीटा हो सकता है न भाई. अगर तुम्हे बीटा हुआ न तोह उसको एक बार माँ की गॉड में रख देना. क्या पता उनके दिल से शंकर का हे कोई पर्याय निकल आये. अब तुम्हारी अतीत से जुडी हर तार मैंने काट दी है. बस इसकी परवरिश पर ध्यान देना अपनी सेहत के साथ.", गाडी कुछ धुल उड़ाती हुई निकल चुकी थी और पीछे खड़ा कुलदीप देख रहा था उसकी मोटरसाइकिल पर टंगे उस बास्ते को जिसमे 14 लाख के लगभग रुपये थे.
'चलो अब अगर ये जिम्मवारी दे हे दी है तोह धरम करम में योगदान दे देते है. अंगूर खतरनाक थे.'