Intehah................(A टेल ऑफ़ लस्ट) - Page 3 - SexBaba
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Intehah................(A टेल ऑफ़ लस्ट)

अपडेट- 14 (बी) (मेघा अपडेट)

" अरे aap........aaiye छोटे मालिक........." और रघु अपना एक हाथ बढ़ता हुआ फ़ौरन राम का हाथ थम लेता हैं और उसे अंदर लेजाकर वहीँ कुर्सी पर बैठता hain.......wahin कुछ दूर पर जीतू बैठा हुआ बीड़ी पी रहा tha.......wo कमरा पूरी तरह से बंद था जिसके कारन जीतू के मुँह से निकला बीड़ी का धुवां अभी भी उस कमरे में मौजूद tha.......jissey राम का दम घुटा हुआ सा महसूस हो रहा tha..........magar वो किसी से कुछ बोल नहीं रहा था.......

" छोटे malik...........kahin मेमसाहेब को आपके आने का पता तो नहीं चला naa........agar उन्होंने आपको यहाँ आता हुआ देख लिया तो वो न जाने क्या sochegi........ho सकता हैं वो आप पर गुस्सा भी करे........." और रघु हौले से बोल पड़ता हैं वहीँ राम जवाब में ना में अपना सर धीरे से हिला देता हैं.......

" नहीं भाभी सू रही thi.........kum से कम वो एक दो घंटे के बाद hi उठेंगी........." और राम इस बार मुस्कुराते हुए हौले से बोल पड़ता hain........wahin जीतू उसकी तरफ बड़े गौर से देखे जा रहा था.........

" मालिक मैं आपके लिए एक ख़ास चीज़ लाया hoon........isey देखने के बाद आपकी तबियत रंगीन हो jayegi............fir वो दिन दूर नहीं जब आप दिन रात अपनी भाभी के साथ चिपके rahengey..........aur एक पल के लिए भी उन्हें अपने से दूर कहीं नहीं जाने dengey............waise मेमसाहेब और आपके बीच कुछ बात बढ़ी की नहीं!!!! " इस बार रघु राम का हाथ थामे हुए हौले से बोल पड़ता हैं वहीँ राम उसकी बाटिओं को सुनकर धीरे से मुस्कुरा पड़ता हैं........

" हाँ kaka.........baat बढ़ी naa..........aapko मालूम हैं भाभी कल शाम को मेरे कमरे में आयी thi........aur मैंने तो उनसे दोस्ती भी कर li......dosti hi नहीं बल्कि मैंने उन्हें अपना गर्लफ्रेंड भी बना liya........unhone मेरी ख़ुशी के लिए मेरी गर्लफ्रेंड बनाना मंज़ूर कर liya.......pata हैं kyon.......bhabhi कहने लगी की तुम गर्लफ्रेंड खुद कहीं से अपने लिए ढूंढ lo........to मैंने कहा की मुझे कहाँ कोई गर्लफ्रेंड milegi........bus फिर मैंने उन्हें इसके लिए ऑफर कर di......aur उन्होंने ख़ुशी ख़ुशी मेरा ऑफर एक्सेप्ट कर liya...........meri भाभी सच में बहुत ाची हैं........" और राम भोलेपन में साडी बातें रघु और जीतू को बताता चला जाता हैं वहीँ रघु और जीतू की आँखें चमक जाती हैं...........

उन्हें अब राम के ज़रिये काव्य को छोड़ने का एक सुनेहरा मौका नज़र आने लगा tha..........wahin अब रघु काव्य के नेचर को भी बहुत ाचे से समझने लगा tha.........aab उसे ऐसा महसूस हो रहा था की अब मंज़िल ज़्यादा दूर nahin......bahut जल्द काव्य उसके नीचे hogi.........magar उसके लिए उसे राम को मोहरा बनाना padega.......aur वो राम को मोहरा भी बना रहा tha........aur राम उसकी चिकनी चुपड़ी बाटिओं में लगभग पूरा आ गया था..........

" ाचा ये तो बहुत ाची खबर हैं छोटे malik.........memsaheb आपकी गर्लफ्रेंड बन gayi........tab तो वो हर रोज़ आपकी रातें रंगीन किया karegi...........aapke हर सुख दुःख का पूरा ख्याल rakhegi.......aur हर रात आपकी बीवी बनकर आपसे रोज़ छुड़वाया करेगी........." जीतू के मुँह से ऐसे वर्ड्स सुनकर राम उसके तरफ सवाल भरे नज़रियों से देखने लगता hain......ek बार फिर से जीतू की कुछ बातें उसकी समझ में नहीं आयी thi.........wahin रघु मंद मंद मुस्कुरा रहा था........

" आप फ़िक्र कहे को करते हैं malik.......main हूँ naa........main आपको सब कुछ सीखा dunga.........magar धीरे dheere...........bus मैं जो बोलता हूँ आप वो करते jaiye......jaisa करता हूँ आप वो kijiye.......dekh लीजियेगा एक दिन आपकी भाभी खुद आपके इशारों पर nachegi........agar आप उसे खड़ा रहने को कहेंगे तो वो कड़ी rahegi.......baithney को कहेंगे तो वो baithegi........sab कुछ वो आपके एक इशारों पर karegi........magar प्यार से..........

" आपको पता हैं गर्लफ्रेंड क्या क्या कर सकती हैं अपने यार के liye.........main आपको सब कुछ सीखा dunga..........dekhtey जाइएगा फिर आपकी गर्लफ्रेंड आपको पाने के लिए हर वक़्त पागल rahegi..........ye लीजिये ये किताब इसे रात में अकेले में hi kholiyega.........isey देखने के बाद आपको पता चल जायेगा की औरत चीज़ होती क्या हैं........." और रघु एक एनवेलप बिस्टेर से निकलकर राम के हाथों में दे देता hain............ram वहीँ उस किताब को बड़ी अजीब नज़रियों से देख रहा tha.........wiase वो किताब पूरी तरह से फिलहाल पैक्ड था.........

" इसे जल्दी से अपने शर्ट के अंदर छुपा lijiye.......nahin तो मेमसाहेब को पता चल गया तो आफत आ जाएगी...." और रघु धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ राम बिना कोई सवाल जवाब किये उस किताब को अपने शर्ट के अंदर छुपा लेता हैं.......

" एक बात कहूं malik.........aapko आपकी भाभी कैसी लगती hain.......mera मतलब उनमें ऐसी क्या चीज़ ख़ास बनती हैं जो आपको अपनी तरफ हर पल आखरषित करती hain......jise उनकी बड़ी बड़ी chuchiyaan.....unki गोल गोल gand.......unki लचकती kamar........wagerah ...वगैरह......" और रघु हौले से राम के तरफ देखता हुआ बोल पड़ता hain.......wahin उसके लुंड में भी सनसनाहट होने लगी thi.........aisi बातें उसके लुंड को और भी आग लगा रही थी.........

" jeee.....mujhe उनके में सब कुछ ाचा लगता hain.......wo सर से लेकर पवन तक बहुत सूंदर हैं......" और राम के भी लुंड में थोड़ी सी अकड़न होने लगती hain.......sach तो ये था की उसे ऐसी बातें ाची लग रही thi........aisi बाटिओं को सुनने के लिए hi तो वो यहाँ आया tha...........wahin रघु और जीतू उसकी बाटिओं को सुनकर मुस्कुरा देते हैं.......

" क्या कभी आपको मेमसाहेब की चूचियां दबाने का मुन्न नहीं karta.........apne दोनों हाथों से उनकी बड़ी बड़ी चूचियों को पकड़कर उन्हें पूरी ताक़त से मसलने का मज़ा hi कुछ और hain..........kya आपको ऐसा कभी कुछ मुन्न नहीं karta..........kya कभी ऐसा नहीं लगता की वो कहीं कड़ी हो और पीछे से जाकर आप उनकी साड़ी के अंदर हाथ डालकर उनकी कमसिन छूट को अपनी मुट्ठी में कसकर जकड lein.......apne सख्त हाटों से उन्हें कैद कर le............aur उनकी गांड को अपने दोनों हाथों से masaley.......unki गांड के अंदर अपनी ऊँगली dale.........apne उँगलियों से उनकी छूट और गांड को ाचे से छोड़े.........." और रघु का लुंड पूरा अकड़ जाता hain...........jahan उसको ये सब बातें मज़ा दे रही थी वहीँ राम के लुंड में भी गीलापन बढ़ता जा रहा tha.......raghu की ऐसी बाटिओं को सुनकर उसकी आँखें चमक गयी thi.........hawas के लाल डोरे साफ़ उसकी आँखों से छलकने लगे थे.......

" गर्लफ्रेंड बनाने में तुम्हें ये सब फायदे मिल सकते hain......agar तुम चाहो तो......." और जीतू अपने पीले दांत दिखता हुआ हंस पड़ता हैं वहीँ राम हैरत से जीतू को तो कभी रघु को एक तुक देखे जा रहा था.......

" क्या ऐसा सच में हो सकता hain........magar मैंने अगर कोई ऐसी वैसी हरकत भाभी के साथ की to......kahin वो मुझे थप्पड़ तो नहीं मारेगी naa........ya भैया से तो नहीं kahegi........na जाने क्यों मुझे उनसे बहुत दुर्र लगता hain.........sach तो ये हैं की मुझे भी उनके साथ ये सब करने का बहुत मुन्न करता hain.......magar कभी ऐसी हिम्मत नहीं होती........." और राम के चेहरे पर थोड़ी सी मायूसी चालक पड़ती हैं वहीँ रघु अपना एक हाथ धीरे से उसके कंधे पर रख देता hain.......jaise वो उसे सांत्वना दे रहा हो..........

" अब आपको डरने की कोई ज़रुरत नहीं हैं malik............kyon की अब मेमसाहेब तो आपकी गिलफ्रेंड बन चुकी hain........aur दुनिया जानती हैं की गर्लफ्रेंड बस ाइश के लिए होती hain.......aur तो मेमसाहेब ने खुद आपको ये सुनेहरा मौका दिया tha........to वो आपको मारेगी तो बिलकुल nahin.....aur न hi वो किसी से कुछ kahegi.........haan आप इस काम में कोई भी जड़ली मुट्ठ kijiye........bus जब भी वो आपके नज़दीक आये किसी बहाने आप उनकी चूचियों को छूने की कोशिश kijiye..........unki गांड पर हाथ फेर dijiye.........unke बदन के किसी भी हिस्से को टच kijiye..........aisa कुछ कीजिये की आपकी भाभी ज़्यादा से ज़्यादा आपके पास समय de.........fir देखिएगा mailk..........malkin हर रोज़ आपसे अपनी चूचियां खुद masalwayengi.......apni गांड खुद marwayengi.........wo दिन फिर ज़्यादा दूर नहीं जब आप खुद अपनी भाभी के ऊपर hongey..........aur आपका ये लुंड उनकी छूट की गहराई नाप रहा होगा........." और रघु का लुंड और सख्त होता चला जाता hain........aaj उसे ये सब बातें करने में बहुत मज़ा आ रहा tha.........wo वहीँ कल्पना कर रहा था की वो नज़ारा कैसा होगा जब राम उसपर चढ़ा होगा.......

" ठीक हैं जैसा आप कहेंगे मैं वैसा करूँगा........" और राम हौले से मुस्कुरा देता hain.......wahin जीतू भी जवाब में हंस पड़ता हैं........

" एक बात और malik.......is किताब को अगर आपकी भाभी ने कभी देख भी लिया तो आप उनसे हमारे बारे में कभी ज़िक्र मुट्ठ kijiyega........keh दीजियेगा की आपके किसी दोस्त ने दिए hain........warna हमें तो यहाँ से बहार जाना padega.......humesha हमेशा के liye.......aur कल आप फिर से aaiyega......main कल एक और नयी किताब आपको लेकर dunga.......aur कुछ नयी बातें भी सिखाऊंगा.........

वो किताब इस किताब से कहीं ाचा और मज़ेदार hoga......tab तक आप इतने में hi काम चलाइये.........." और जीतू अपनी बात पूरी करता हैं और अपने जेब से एक सस्ती वाली बीड़ी निकलता हैं और एक ज़ोर का काश लेने लगता हैं वहीँ राम भी अपने बंगलो के तरफ चल पड़ता hain.........aab उसके चेहरे पर एक अलग hi कॉन्फिडेंस नज़र आ रहा tha.......dekhna था की आगे वक़्त कौन सा मोड़ लेकर आने वाला था..................................

कंटिन्यू........................................................................
 
अपडेट-15 (ा) (मेघा अपडेट)

वो किताब इस किताब से कहीं ाचा और मज़ेदार hoga......tab तक आप इतने में hi काम चलाइये.........." और जीतू अपनी बात पूरी करता हैं और अपने जेब से एक सस्ती वाली बीड़ी निकलता हैं और एक ज़ोर का काश लेने लगता हैं वहीँ राम भी अपने बंगलो के तरफ चल पड़ता hain.........aab उसके चेहरे पर एक अलग hi कॉन्फिडेंस नज़र आ रहा tha.......dekhna था की आगे वक़्त कौन सा मोड़ लेकर आने वाला था..................................

अब आगे..........................................................................................

शाम का वक़्त tha..........kavya किचन में चाय बना रही थी और फ़ोन पे राहुल से बातें भी कर रही thi.......humesha की तरह उसने आज भी साड़ी पहन रखा tha.......waise भी काव्य साड़ी में अपने आपको ज़्यादा कम्फर्टेबले फील करती thi..........magar आज उसने पीले (येलो) रंग की साड़ी पहन रखा tha....us साड़ी का बॉर्डर सफ़ेद था और उसपर डिज़ाइन बने हुए they...........dekhney से वो साड़ी बहुत कीमती मालूम पड़ती thi........aur वैसे भी काव्य को सस्ती चीज़ें पसंद भी कहाँ आती thi.........shuru से वो बड़े घर में रहती आयी थी और उसका ससुराल भी वैसा hi मिला था जिससे उसकी शौक भी hi-fi बन गयी thi...........magar आज तक उसने कभी दौलत का गुर्रर नहीं kiya.........aur न hi कभी अपने आपको अमीर घराने होने का कभी किसी से दिखावा karti.........wo अक्सर सिंपल में hi रहना ज़्यादा पसंद करती थी........

सादगी में hi वो इतनी हसीं लगती तो जिस दिन वो मेकउप करके कहीं बहार निकलती उस दिन मर्दों के दिल पर छुरियां ज़रूर चल jati.......har मर्द के मुँह से बस आआआह्ह्ह्हह्ह्ह्हह nikalti.........aisi थी लाखों में एक हमारी काव्य...........

उधर राम अंदर hi अंदर बहुत बेचैन tha.........jab से रघु ने उसे वो किताब दी थी वो उसे देखने के लिए मचल उठा था........ औरत का नंगा बदन कैसा होता हैं ये सोच सोचकर उसका लुंड और भी सख्त होता जा रहा tha.......badi हिम्मत करके वो उस एनवेलप को अपने किताबों के बीच रखता हैं और सामने के दरवाज़े के तरफ बड़े गौर से देखने लगता hain.......haar आहात पे उसे ऐसा लगता मनो उसकी भाभी आ गयी ho...........jaise तैसे वो उस एनवेलप को खोलता हैं और जैसे जैसे वो उसे बहार निकलता हैं उसकी बेचैनी और बेकरारी भी पल पल बढ़ने लगती hain.......sansein धीरे धीरे बेकाबू हो चले थे..........

उस फ्रंट पेज पर एक विदेशी लड़की की हाफ पोज़ में फोटो thi.........aur हाफ कपड़ों में bhi.........ram कुछ देर तक उस कवर फोटो को देखने लगता हैं फिर जैसे जैसे वो उस किताब के पन्ने पलटने लगता हैं वैसे वैसे उसकी बेचैनी भी बढ़ती चली जाती hain........har पेज में एक लड़की की रंगीन तस्वीर थी जिसमें वो कई पोज़ में कड़ी thi........shuru में वो लड़की उन्देर्गर्मेन्ट्स में थी फिर धीरे धीरे उसका ब्रा खुलता चला gaya......aur नीचे से भी वो पूरी नंगी thi........magar कहीं भी कोई ऐसी तस्वीर नहीं थी उस किताब में जिसमें उस लड़की की छूट दिखाई गयी ho......haan उन लड़कियों की चूचियां अलग अलग पोज़ में एक्सपोज़ हो रही thi........ram जैसे नए खिलाडी के लिए इतना सब कुछ बहुत था........

वो जैसे जैसे तस्वीर देखता जा रहा था वैसे वैसे उसका लुंड और भी सख्त होता जा रहा tha.......trouser के ऊपर से hi वो धीरे धीरे अपने लुंड को मसल रहा tha............aur न जाने क्यों अब उसे इन सब में बहुत मज़ा भी आने लगा tha......sex का खुमार उसपर तेज़ी से हावी होता जा रहा था..........

हर तस्वीर हर एक फोटो को वो बड़े ध्यान से देख रहा tha.........apni नज़रियों से परख रहा tha........aur एहि सोच रहा था की हर लड़की की चूचियां क्या ऐसी hi दिखती hogi.........aab उसे उस तस्वीर में काव्य नंगी नज़र आ रही thi.........to क्या भाभी की भी चूचियां ऐसी hi hongi.........kavya का ख्याल आते hi उसका लुंड और भी उबाल मरने लगता hain..............ek नशा सा उसपर पल पल छठा जा रहा था और वो बीते लम्हे के साथ मदहोशी के आलम में डूबता जा रहा था......

वो उस पन्ने पर अपने हाथ धीरे धीरे फेर रहा था और महसूस कर रहा था जैसे वो उनकी चूचियों को आपने हाथों से मसल रहा ho.........ek बार फिर से उसका लोअर भीगता हुआ सा महसूस हो रहा था मगर मज़े की आज कोई सीमा नहीं thi..........wo एक एक कर उस तस्वीर को देखता जा रहा था तभी उसके कानों में पायल की झंकार सुनाई देती हैं और अगले hi पल उसे समझ आ जाता हैं की उसकी भाभी आ रही hain..........kavya के आने का ख्याल आते hi उसपर से हवस का सारा नशा एक hi झटके में पूरा उतर जाता हैं......

वो फ़ौरन उस किताब को बीएड के नीचे दाल देता हैं और अपने लोअर के उस हिस्से को जो अभी अभी कुछ गीला सा नज़र आ रहा था...... वहीँ रखे चादर से उसे फ़ौरन धक् लेता hain.......tabhi काव्य अंदर आ जाती हैं और राम थोड़ा सा हड़बड़ा जाता hain.......aab इस लुंड का क्या करे जो अभी तक खड़ा था और उस चद्दर में भी उसकी उभार साफ़ नज़र आ रही thi........durr से उसकी गांड फुट रही थी की कहीं ये सब उसकी भाभी ने अगर देख लिया तो न जाने वो उसके बारे में क्या sochegi.........sochegi nahin.......balki दो थप्पड़ तो ज़रूर lagayegi...........wo इसी असमजनेश में था तभी काव्य आती हैं और हमेशा की तरह आकर वहीँ दरवाज़े के सामने कड़ी हो जाती hain........uske हाथ में चाय की ट्रे थी और उसमें कुछ स्नैक्स वगैरह भी थे........

राम की नज़र एक बार फिर से काव्य के बड़े बड़े चूचियों पर जाकर टिक जाती hain........photo में जो अभी अभी नंगी लड़कियों की जो चूचियां देख रहा था अब वो काव्य के चूचियों से कपरिसिओं कर रहा tha...........uski नज़रें एक पल के लिए भी काव्य के चूचियों से अब तक नहीं हटी thi.......wahin काव्य मुस्कुराते हुए राम के तरफ देख रही thi......aur शायद अब उसे एहसास हो गया था की राम की नज़रें कहाँ पर hain.........magar कहीं न कहीं अब उसे भी राम का यु शरारती अंदाज़ ाचा लग रहा तह.........

" ऐसे क्या देख रहे हो ram..........kya तुम्हें भूख लगी हैं........" और इस बार काव्य अपना साड़ी का आँचल ठीक करती हैं और राम के तरफ देखते हुए शरारती अंदाज़ में हौले से मुस्कुरा देती hain......wahin इस बार राम झेप सा जाता हैं और फ़ौरन अपनी नज़रें नीचे की तरफ झुका लेता hain.........durr साफ़ उसके चेहरे पर नज़र आ रहा tha.........wahin काव्य बड़े गौर से कभी राम के चेहरे के taraf.......to कभी चद्दर के अंदर छुपे उसके उभर के तरफ अजीब नज़रियों से देख रही thi.........aab उसे भी एहसास हो गया था की लड़का अब जवान हो गया हैं.........

" नाअहिछ्ठ्हीीी bhhhaaabbbhhhhiiiiii..wwwwoooo...kuuuuucchhhhh....nahhhhhhiiinnn......bbbbbbuussssssss....hhhhiiiiiiii." और राम जैसे फिर से हकलाने लगता hain......wahin काव्य धीरे धीरे राम के करीब आती हैं और आकर उसके बाजु में बैठ जाती hain.......jo लुंड अभी कुछ देर पहले काव्य को देखकर मुरझा सा गया था वहीँ लुंड अब काव्य के करीब बैठने से फिर से हरकत करने लगा tha........wahin राम को अपने ऊपर भी गुस्सा आ रहा था.........

" ram........tum ठीक तो ho........kya हुआ तुम्हें......." और काव्य राम के तरफ देखते हुए हौले से बोल पड़ती हैं वहीँ राम फिर से हड़बड़ा सा जाता hain........ram कुछ कहता इससे पहले काव्य फ़ौरन अपना एक हाथ राम के गलों पर रख देती हैं और हौले हौले से उसके गलों पर अपने नाजुक उंगलियां फेरने लगती hain..........wahin राम के अंदर थोड़ी सी हिम्मत आ जाती हैं और वो काव्य को देखकर हौले से मुस्कुरा पड़ता हैं.......

" bhabhi.......main ठीक hoon.......magar........" और राम इतना कहकर दुबारा से खामोश हो जाता hain......is वक़्त उसका दिल बहुत ज़ोरों से धड़क रहा tha......wahin काव्य उसे hi देखे जा रही thi.........magar सिर्फ आँखों में........

" मगर क्या ram.........kya तुम्हें मुझसे अब भी दुर्र लगता hain..........agar तुम्हें मुझसे कोई प्रॉब्लम हैं तो मुझे साफ़ साफ़ बता do......agar मेरा यहाँ आना तुम्हें बुरा लगता हैं तो मैं आज के बाद यहाँ दुबारा नहीं ावुंगी........" और काव्य हौले से बोल पड़ती hain...........wahin वो इस वक़्त कुछ सीरियस नज़र आ रही thi..........kuch देर तक राम खामोश रहता हैं फिर वो अपना एक हाथ हौले से आगे बढाकर काव्य के दूसरे हाथ को थम लेता hain..........wahin काव्य बस एक तुक राम के तरफ देखती रह जाती हैं........

" ीाम सॉरी bhabhi.........main नहीं चाहता की मेरी वजह से कभी आपको कोई तकलीफ ho........aur आपका आना तो मुझे इतना ाचा लगता हैं की मेरा अगर बस चले तो मैं आपको अपने से कभी दूर न जाने doon..........pata नहीं क्यों आज कल मैं दिन रात आप hi के बारे में सोचता रहता hoon......sach कहूं तो आप मुझे बहुत ाची लगती हैं.........." और राम एक hi सांस में सब कुछ कहता चला जाता हैं वहीँ काव्य इस बार राम की बाटिओं को सुनकर मुस्कुराये बिना नहीं रह पति..........

" तुम na......poorey बुद्धू ho.........badmash कहीं ke........aur मैं देख रही हूँ तुम दिन बा दिन शैतान होते जा रहे ho.......kuch अपनी पढ़ाई पर भी ध्यान दिया करो........." और काव्य धीरे से मुस्कुरा पड़ती हैं वहीँ अब राम का दुर्र पूरी तरह से निकल गया था.......

" एक बात पूछूं भाभी....." अगले hi पल राम काव्य की आँखों में देखते हुए हौले से बोल पड़ता हैं.......

" एक नहीं हज़ार बात पूछों........" और काव्य भी हौले से जवाब देती hain........wahin राम आगे बोल पड़ता हैं......

कॉन्टिनोएड.....................................................................................
 
Update-15(B) (मेघा अपडेट)

" गर्लफ्रेंड क्या सब कुछ कर सकती हैं अपने बॉयफ्रेंड की ख़ुशी के लिए......." और राम हामी भरते हुए धीरे से बोल पड़ता hain......aab उसकी नज़रें काव्य के चेहरे पर hi तिकी हुई thi......wo काव्य के रिएक्शन को पढ़ने की लगतार कोशिश कर रहा था..........

" haan........sab kuch........wo अगर चाहे तो वो उसके लिए अपनी जान भी दे सकती hain.......agar उनके बीच सच्चा प्यार रहा तो........" और काव्य बड़ी ऐडा से बोल पड़ती hain.....wahin राम धीरे से मुस्कुरा पड़ता हैं........

" तो क्या आप भी मेरे लिए कुछ भी कर सकती hain.......agar जो चीज़ मुझे पसंद हैं और मैं अगर आपसे मांगू to.......kya आप मेरी ख़ुशी के लिए वो सब कर sakengi.........aap तो अब मेरी गर्लफ्रेंड हैं ना......." और राम इस बार भोलेपन में अपने सवाल काव्य से करता हैं और इंतज़ार करता हैं की काव्य उसके इस सवाल का क्या जवाब degi.......kuch देर की ख़ामोशी के बाद आखिर काव्य हौले से बोल पड़ती हैं.......

" इसमें कोई शक हैं क्या ram..........tum एक बार मुझसे कुछ मांगकर तो dekho.......maine अगर इंकार किया तो जो तुम चाहे मुझे सजा देना........" और काव्य का दिल ज़ोरों से धड़कने लगता hain.........usney राम से कह तो दिया था मगर अब वो अंदर hi अंदर दुर्र भी रही थी की कहीं राम उससे कुछ ऐसा वैसा न मांग ले जो वो उसे कभी न दे paye.........fir तो वो उसकी नज़रियों में हमेशा के लिए गिर jayegi.........aur वो किसी भी हाल में उसे शर्मिंदा नहीं करना चाहती थी..........

" bhabhi.......mujhe वो chahiye.........mera matlab........aisi चीज़ जो सिर्फ आप hi के पास hain.........aur आप hi मुझे दे सकती हैं........" और राम का कलेजा ज़ोरों से धड़कने लगता hain.......wo कहना तो बहुत कुछ चाहता था मगर जो बात वो कहना चाह रहा था आज उसकी जुबान पर नहीं आ रही thi...........wahin काव्य उसे अजीब नज़रियों से देखे जा रही थी..........

" ऐसी कौन सी चीज़ हैं मेरे पास जो मैं तुम्हें hi सिर्फ दे सकती hoon......tum न राम पेहलियाँ बहुत बुझाते ho.....sach में मुझे तुम्हारी बातें कुछ समझ में नहीं aati..........aur हाँ अगले हफ्ते तुम्हारे एक्साम्स hain.........tum ाचे से जाकर उसकी तैयारी karo.......main तुमसे वादा करती हूँ की इस बार तुम अगर ाचे मार्क्स लेकर आवोगे तो मैं तुम्हें किसी भी चीज़ के लिए इंकार नहीं karungi..........tumhari हर ख्वाहिश मैं पूरी karungi.......it's माय प्रॉमिस......." और काव्य धीरे से बोल पड़ती हैं वहीँ राम भी खामोश हो जाता हैं और चुप चाप से काव्य के तरफ एक तुक देखने लगता हैं.......

" साची bhabhi......jo मैं चाहूंगा वो मुझे क्या मिलेगा........" और राम जैसे काव्य से कन्फर्मेशन चाहता हैं वहीँ इस बार काव्य हौले से राम के हाथों में अपना हाथ रख देती हैं और हाँ में धीरे से जवाब देती hain..........wahin राम मुन्न hi मुन्न ख़ुशी से झूम उठता हैं अब उसे ऐसा लगने लगा था की अब शायद उसकी मंज़िल ज़्यादा दूर नहीं.......

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रात के करीब 11 बजे they.........humesha की तरह राम अपने कमरे में बिलकुल अकेला सोया हुआ tha..........kavya राहुल से फ़ोन पर बातें कर रही थी और साथ hi साथ अपनी साड़ी के अंदर से अपनी छूट में ऊँगली भी कर रही thi..........rahul की बाटिओं से वो काफी गरम हो जाया करती और हर रात अपनी ऊँगली से अपने दहकते छूट की प्यास को शांत किया karti.............wahin राहुल भी अपने लुंड हिलाकर काम चला leta.......thode देर बाद उधर से राहुल अपने फ़ोन रख देता हैं और काव्य हमेशा की तरह खुद प्यासी रह जाती हैं.........

सच तो ये था की अब उसे ऊँगली से बिलकुल मज़ा नहीं आता tha.......magar वो कर भी क्या सकती thi.........poorey दो तीन साल तक उसे अब अपनी ऊँगली से hi काम जो चलना tha........aab इस बीच वो लुंड का इंतेज़ाम कहाँ से kare.........jee तो उसका करता था की वो कहीं बहार जाकर किसी से जी भर के छुड़वा aaye.......magar इसमें बदनामी भी thi.....aur तो वो राहुल को कभी धोखा नहीं देना चाहती thi........par जब किस्मत में कुछ और hi अगर लिखा हो तो भला कौन क्या कर सकता हैं..........

काव्य इसी उधेरबुन में डूबी हुई थी और आज उसे नींद भी नहीं आ रही thi.........aati भी kaise.......uski प्यास आज भड़क जो उठी thi...........wo इस वक़्त अपने बिस्टेर पर बहुत बेचैन थी और इधर से उधर करवटें बदल रही thi.........soona तो वो चाहती थी मगर आज उसे नींद भी नहीं आ रही thi........tabhi उसके कानों में राम की चीख सुनाई देती हैं और वो फ़ौरन अपने बिस्टेर से हड़बड़ाकर उठ जाती hain..........aur उस कमरे का लाइट ों करके सीधा राम के कमरे की तरफ चल पड़ती हैं...........

राम का कमरा बंद नहीं था मगर दरवाज़ा हल्का सा सत्ता हुआ ज़रूर tha........wahin राम बिस्टेर पर बैठा हुआ लुम्बी लुम्बी सांसें ले रहा tha........chehrey पर उसके खौफ्फ़ साफ़ नज़र आ रहे they........aur वो पसीने से बुरी तरह भीग गया tha........kavya को समझते देर नहीं लगती की उसने ज़रूर कोई बुरा सपना देखा hain.........kavya को देखकर राम थोड़ा चैन की सांस लेता हैं वहीँ काव्य बोतल में रखा पानी राम के तरफ बढ़ा देती हैं और राम अगले hi पल उस पानी को एक hi सांस में पूरा पी जाता hain........fir वो हमेशा की तरह राम के बाजु में जाकर बैठ जाती हैं और राम इस बार फ़ौरन काव्य से किसी छोटे बाचे की तरह उससे लिपटता चला जाता hain....wahin काव्य न hi उसे कुछ बोल पति हैं और न किसी चीज़ से इंकार कर पति hain........wo बड़े प्यार से राम के सर पर अपने हाथ फेर रही थी.......

" क्या हुआ राम!!!!!! तुम ठीक तो हो naa......tumne क्या कोई बुरा सपना देखा........." और काव्य हौले से बोल पड़ती हैं वहीँ राम कुछ देर में पूरी तरह नार्मल होता हैं और फिर वो काव्य से दूर हुत्त जाता hain........magar उसकी धड़कनें अभी भी तेज़ी से चल रही थी........

" हाँ bhabhi.......bahut डरावना सपना tha........aisa लग रहा था की वो मुझे जान से मार dalega......aap प्लीज कहीं मुट्ठ jaiye......mujhe बहुत दुर्र लग रहा hain........aaj की रात आप यहीं पर मेरे पास सू जाइये ना......." और राम भोलेपन से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य की नज़रें अभी भी उसपर hi तिकी हुई thi..........kuch सोचकर वो हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं.....

" ाचा baba.......main यहीं तुम्हारे बगल में hi आकर सो jawungi..........magar पहले मैं अपने कमरे की लाइट तो बंद कर आवुन..........." और काव्य मुस्कुराते हुए सीधा बहार निकल जाती हैं और कुछ देर बाद वो वापस राम के कमरे में दुबारा लौट कर आती hain.......kamrey का दरवाज़ा हल्का सा सत्ता देने के बाद एक जीरो कलर का नीला बल्ब अब भी उस कमरे में जाल रहा tha......fir वो उस कमरे की लाइट ऑफ करती हैं और राम के बगल में आकर वहीँ लेट जाती हैं..........

अब काव्य और राम के बीच करीब 5 फ़ीट का फासला tha.........doublebed होने की वजह से एक कोने पर राम सोया हुआ tha......to दूसरी कोने पर kavya.........kuch देर तक राम वहीँ सीधा लेता हुआ न जाने क्या क्या सोचता रहता हैं और उधर काव्य करवट घूमकर फ़ौरन सू जाती hain.........aaj राम की आँखों में नींद उससे कोसों दूर thi........aur उसे नींद आती भी kaise..........aaj काव्य जो उसके बगल में सोई हुई thi.......kuch सोचकर वो फ़ौरन करवट घूम जाता हैं और एक तुक काव्य के तरफ बड़े ध्यान से देखने लगता हैं........

काव्य की पीठ उसकी तरफ थी और कमर थोड़ी नंगी नज़र आ रही thi.......aur जब राम की नज़र काव्य के गांड पर जाती हैं वो टकटकी लगाए बस काव्य के गांड को घूरता रहता hain........ek अलग सा josh.......excitement धीरे धीरे उसके अंदर बढ़ता जा रहा tha.........uska जी तो कर रहा था की वो अपना हाथ बढाकर फ़ौरन काव्य के बदन के हर हिस्से को छु le........magar उसके अंदर काव्य का दुर्र भी तो tha...........wo इस बीच कभी दिमाग से तो कभी अपने लुंड से सोच रहा tha......aur उस बीतते रात की गहरी ख़ामोशी में उसका दिमाग पल पल कमज़ोर पड़ता जा रहा था और लुंड हावी होता ज़्यादा नज़र आ रहा tha.........wo इसी असमाजश में डूबा हुआ था की वो अब क्या kare......kya न kare.......aakhir जीत लुंड की hi होती हैं........

कुछ सोचकर वो फ़ौरन करवट बदलता हैं और सीधा काव्य के तरफ घूम जाता hain...........aab राम और काव्य के बीच बस एक फ़ीट का फासला मात्रा रह गया tha.........uska दिल इस वक़्त ज़ोरों से धड़क रहा था वहीँ वो अब काव्य के जिस्म को चूना चाहता tha......uske चूचियों को अपने हाथों में लेकर मसलना चाहता tha.........ehsaas करना चाहता था की जब किसी लड़की की चूचियां दबायी जाती हैं तो उस वक़्त कैसा फील होता hain.........apne कठोर हाथों से मसलने पर कैसा सुख मिलता hain........ye सब सोचकर उसका लुंड तेज़ी से अपना आकर बदल रहा tha........wahin उसकी सांसें भी तेज़्ज़ हो चली थी.........

दिमाग बार बार कह रहा था की ये सब गलत हैं मगर लुंड हर बार दिमाग पर हावी होता जा रहा tha.......aakhir राम थोड़ी और हिम्मत करके अपना हाथ इस बार हौले से काव्य के नंगे कमर पर हौले से रख देता hain.......aur बिना अपने हाथों को कोई हरकत किये वो चुप चाप उसी अवस्था में बिस्टेर पर पड़ा रहता hain........aankhein उसकी बंद थी मगर वो चोर नज़रियों से बार बार काव्य के तरफ देखे जा रहा tha...........durr और एक्ससिटेमेंट से उसका गाला बार बार सुख रहा tha......wahin काव्य अभी भी उसकी पोजीशन में सोई हुई thi........bina हिले डुले............

जब काव्य करीब 5 मिनट तक जब कोई हरकत नहीं करती तब राम हौले से अपना हाथ धीरे धीरे हरकत करने लगता hain......wo बहुत आहिस्ता से अपनी एक एक उँगलियों को उसके कमर पर चला रहा tha......aur उसे बहुत आहिस्ता से सरकते हुए उसके पेट और कमर पर फेर रहा tha.......waise तो उसे ये सब में बहुत मज़ा आ रहा था और वो बार बार काव्य के तरफ भी देख रहा था की कहीं काव्य जग न jaye...........ye सब उसका पहला एक्सपीरियंस था और इस वक़्त उसका लुंड पूरे उफान पर था........

वो अपनी बीच की ऊँगली को धीरे से सरकते हुए और आगे की तरफ ले जाता hain........uski नैवेल के taraf.......fir वो उस ऊँगली को बहुत आहिस्ता से उस नैवेल के चरों तरफ गोल गोल धीरे धीरे घूमने लगता hain.........aur उसकी नैवेल के साथ धीरे धीरे खेलने लगता hain.........kuch देर तक राम अपनी ुंलियों को काव्ये के नैवेल पर ाहिष्ता ाहिष्ता फेरता रहता हैं मगर दिल में जोश जैसे जैसे बढ़ता जाता हैं उसकी हिम्मत भी धीरे धीरे बढ़ती चली जाती hain.......dil तो कर रहा था की वो अपनी मुट्ठी से काव्य की नरम चूचियों को कसकर कैद कर le.........aur उन्हें तब तक मसलता रहे जब तक उसका जी न भर जाये..........

मगर ऐसा करना रिस्क तो था hi और काव्य के जागने की चान्सेस 100% thi........magar इंसान साबरा करना अगर सीख जाये तो क्या बात thi.......kuch वैसा hi हाल राम का भी अब tha........aab वो काव्य के नरम चूचियों को अपने हाथों में लेकर मसलना चाहता tha........mehsoos करना चाहता था की चूचियां मसलते वक़्त कैसा फील होता hain.....wahin उसका लुंड और भी सख्त होता जा रहा tha......kuch सोचकर वो अपना हाथ ऊपर की तरफ ले जाने लगता hain......magar बहुत धीरे dheere.......aur जैसे जैसे उसके हाथ ऊपर की तरफ बढ़ रहे थे वैसे वैसे राम की धड़कनें भी बढ़ती जा रही thi..........wo इस बात का पूरा ख्याल रख रहा था की उसके किसी हरकत पर कहीं काव्य न जग जाये..........

जैसे जैसे वो अपने हाथ ऊपर ले जाता जा रहा था वैसे वैसे उसकी बेचैनी भी बढ़ती जा रही thi.........aur जिस चीज़ का उसने इंतज़ार था आखिर अब वो घडी आ चुकी thi.........jaise hi उसका हाथ काव्य के राइट चूचियों पर जाता हैं राम की धड़कनें बहुत तेज़्ज़ होती चली जाती hain.......uska गाला सूखने लगता हैं और चेहरे पर पसीने की चाँद बूँदें भी साफ़ नज़र आने लगती hain........wo बहुत हल्के हाथों से काव्य के चूचियों पर अपने हाथ रख देता हैं और अपने पूरे पंजे से उसे पूरी तरह अपनी हथेली में जकड लेता hain.......mano कहीं वो उसकी कैद से चूत न jaye.......ya फिर जैसे वो उसका साइज नाप रहा हो.........

वहीँ अब उसका लुंड पूरी तरह बेकाबू हो चूका tha...wo अपना दूसरा हाथ अपने लुंड पर ले जाता हैं और तेज़ी से अपने लुंड को लोअर के ऊपर से hi मसलने लगता hain..........aaj उसके मज़े की कोई सीमा नहीं thi......wo काव्य के चूचियों को थामे अपने दूसरे हाथ से लुंड मसल रहा tha........jee तो कर रहा था की वो उसकी गोरी पीठ पर अपने होंठ रख de....aur उसके नंगी पीठ को अपने जीभ से चाटता चला jaye........magar फिलहाल उसके लिए इतना hi बहुत था.......

राम तेज़ी से अपना लुंड हिला रहा था और अपना एक हाथ काव्य की चूचियों को थामे हुआ tha.......jab उसके लुंड पर प्रेशर बढ़ने लगता हैं वो अपने हाथों पर थोड़ा सा दबाव बनता हैं और थोड़ा कसकर इस बार काव्य की चूचियों को दबा देता hain.........issey पहले की वो कुछ संभालता तभी काव्य अपना एक हाथ उसके हाथों पर हौले से रख देती hain........................jahan पर इस वक़्त राम का दूसरा हाथ tha........................yani की उसकी चुकी par.....................................................dekhna था की आगे वक़्त कौन सा करवट बदलने वाला था............................................

कंटिन्यू.........................................................................
 
अपडेट-16 (ा) (मेघा अपडेट)

राम तेज़ी से अपना लुंड हिला रहा था और अपना एक हाथ काव्य की चूचियों को थामे हुआ tha.......jab उसके लुंड पर प्रेशर बढ़ने लगता हैं वो अपने हाथों पर थोड़ा सा दबाव बनता हैं और थोड़ा कसकर इस बार काव्य की चूचियों को दबा देता hain.........issey पहले की वो कुछ संभालता तभी काव्य अपना एक हाथ उसके हाथों पर हौले से रख देती hain........................jahan पर इस वक़्त राम का दूसरा हाथ tha........................yani की उसकी चुकी par.....................................................dekhna था की आगे वक़्त कौन सा करवट बदलने वाला था............................................

अब आगे....................................................................................

राम की तो जैसे जान hi निकल गयी thi......durr से उसका कलेजा ज़ोरों से धड़क रहा tha........aisa लग रहा था जैसे जिस्म से किसी ने पूरा खून निचोड़ लिया ho.........durr से मनो हाथ पवन फूल गए they.......wo वहीँ फ़ौरन अपनी आँखें बंद कर लेता हैं और अपने जिस्म को उसी पोजीशन में बिलकुल स्थिर छोड़ देता hain.........kavya फ़ौरन करवट बदलती हैं और राम का हाथ सबसे पहले अपने चूचियों पर से हटतति hain.........fir वो अपना चेहरा उसकी तरफ करके एक तुक उसके चेहरे को बड़े गौर से देखने लगती hain.......mano वो ये जानना चाहती हो की क्या राम ये सब जान बूझकर तो नहीं कर raha................ya फिर अनजाने में........

दो तीन मिनट तक काव्य राम के चेहरे को ऐसी hi घूरती रहती हैं वहीँ राम दुर्र से एक पल के लिए भी अपनी आँखें नहीं kholta.........thode देर बाद काव्य हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं और फिर अपनी आँखें बंद करके वहीँ सू जाती हैं.....................

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दूसरे दिन हमेशा की तरह राम अपने कॉलेज चला जाता hain.........aur काव्य नास्ता बनाकर हमेशा की तरह t.v देख रही thi......ghadi में इस वक़्त सुबह के 8:45 हो रहे they........aabhi रघु के आने में थोड़ा समय था...........

उधर रघु और जीतू अपना काम कुछ ख़तम करके आराम कर रहे they..........wahin आज जीतू का मूड रघु पर पूरा बिगड़ा हुआ tha........wo गुस्से से रघु को घूरे जा रहा tha......wahin रघु उसे देखकर मंद मंद मुस्कुरा रहा था.......

" तेरा दिमाग क्या घास चरने गया hain..........akal नाम की चीज़ तुझमें ज़रा भी हैं की nahin.........maa छुड़ाने गया तेरा ये सदा हुआ plan.........aur तेरा ये बकवास idea..........mujhe नहीं सुनना और kuch..........tu तो राम को ट्रेनिंग दिए जा रहा hain.....usey चुदाई की क्लास करवा रहा hain.........arey मैं तुझसे पूछता हूँ की ये सब करके हमें क्या milega..........bata क्या हासिल कर लेगा तू और क्या main............kahin ऐसा न हो की तेरे इस ट्रेनिंग के चाकर में वो नादाँ और भोला भला सा दिखने वाला मासूम लड़का हमसे पहले कहीं वो बजी न मार जाये..........

अगर ऐसा हो गया तो काव्य की छूट की प्यास तो राम बुझा hi दिया karega........fir हम दोनों की ज़रुरत hi यहाँ क्या रह jayegi..........zindagi भर झाड़ू पुछा करते रहना यहाँ bus...............sala मुझे तो ऐसा लगता हैं जैसे ज़िन्दगी भर हमें यहाँ अपने हाथ से hi हिलाकर काम चलना padega.........kyon की काव्य हमें कोई भाव नहीं देने wali.........aur मुझे कहीं से भी ऐसा नहीं लगता की वो हम दोनों में से किसी में 1% का भी इंट्रेस्ट रखती हैं.........100% तो दूर की बात hain.........sala हम दोनों के अंदर ऐसी खाशियत भी क्या hain......wo कहाँ महलों की रहने वाली पढ़ी लिखी hi-fi मॉडर्न अमीर घराने की ladki.....aur साला हम दोनों थर्ड क्लास के naukar........na साला हमारा आगे का कुछ पता हैं ........न पीछे ka..........aur हमारे पास हैं भी क्या उसे देने ko..........hum जैसे को तो वो चुकती में खरीद सकती हैं.......

हम जैसे 10 नौकर तो उसके यहाँ आसानी से काम कर सकते hain......sali के पास इतना पैसा hain........aur हमारे पास हैं hi क्या!!!!!! " और जीतू जैसे रघु पर अपना सारा गुस्सा निकल देता हैं वहीँ रघु उसकी बाटिओं को सुनकर हौले से मुस्कुरा पड़ता हैं.........

" हमारे पास वो हैं जो हमारे साहेब के पास तो ज़रूर हैं मगर हमसे उनका कोई मुक़ाबला nahin............janana चाहता हैं ऐसा क्या हैं हम दोनों के paas..........wo हैं lund............aur ये लुंड जब किसी कुंवारी छूट के अंदर जाता हैं तब लड़की हो या औरत उसकी ाचे से फुट जाती hain........aur उसके बाद जो औरत इस लुंड का स्वाद एक बार चख लेती हैं वो बार बार इसकी दीवानी बानी रहती हैं.........." और रघु एक बार फिर से अपने मूछों पर ताव देते हुए अपनी बातों पर ज़ोर देता hain.......wahin जीतू उसकी बाटिओं को सुनकर हंसी लगता हैं.........

" तू naa......chutiya hain..........wo भी बड़ा wala..........sala बात करता hain.......ek चीज़ तू bata.....tune कब देखा की साहेब का लुंड हमसे छोटा hain...........ya वो अपनी मेमसाहेब को ाचे से खुस नहीं रख paate........sala बस हवा में बात करता hain.......koi टेप लेकर बैठा था क्या तू अपना और साहेब का नापने........." और जीतू का गुस्सा जैसे एक बार फिर से रघु पर बरस पड़ता hain.......wahin रघु अभी भी अपनी बतासी दिखा रहा था..........

" जो समझ le.......magar ये बड़े घराने के लोग का लुंड अक्सर छोटा hi पाया जाता hain..........aisa अक्सर सुंनने में आता hain.........kyon की सेल ये लोग तो कुछ काम करते हैं nahin.....mehnat करने को कुछ कहो तो सैलून की गांड फुट जाती hain.......din भर अंग्रेजी और चुदाई वाली पिक्टूरें देख देखकर और मूठ मर मरकर उनका लुंड बढ़ने के बजाये एक सीमा तक रह जाता hain.....aur तो साला इन लोगों में दम भी नहीं hota.......jahan छूट में लुंड सत्ता दिया समझ ले की लौड़ा तय तय फिस्स हो गया........

इस लिए अकसर बड़े घराने की औरतें घर के बहार जाकर अपनी गांड मरवाती hain..........kabhi घर के नौकरों se........to कभी बाहरी छोटे मोठे मज़दूरों se...........kyon की उन्हें उनकी औकात पता होती hain.........hain न मेरी बाटिओं में सच्चाई......." और रघु फिर से अपनी बतासी दिखने लगता हैं वहीँ जीतू का पारा और भी हाई हो जाता हैं..........

" तुझसे तो कोई नहीं जीत sakta...........pata नहीं कहाँ कहाँ से ये सादे हुए आइडियाज तेरे दिमाग में आते hain..........aab कुछ करेगा भी या यु hi बातें बनता rahega.........chota लुंड और बड़ी baatein..........kahin ऐसा न हो की हमसे पहले कोई बाज़ी और मार jaye..........aur हम बस अपना लुंड पकड़कर यहाँ बस हिलाते रहे.........." और जीतू के चेहरे पर परेशानी के बदल साफ़ नज़र आने लगते हैं वही रघु कुछ देर तक चुप रहता हैं फिर वो आगे बोलना शुरू करता हैं........

" चल तू भी क्या याद रखेगा की तेरा पाला किस्से पड़ा hain........maine सब कुछ सोच लिया hain..........aur मैं ये बात भी ाचे से जनता हूँ की हमारी मेमसाहेब को हम दोनों में ज़रा भी दिलचप्सी नहीं hain........agar उसे छुड़वाना भी होगा तो वो राम से hi अपनी छूट marwayegi........hum दोनों कितने भी हैं तो आखिर हैं तो इस घर के ..............सिर्फ नौकर hi..........magar हीरे को सिर्फ जोहरी hi परख सकता hain...........baki की नज़र में तो वो सिर्फ एक कांच का टुकड़ा hi रहता हैं......." और रघु के चेहरे पर एक गन्दी सी मुस्कान तैर जाती hain.........wahin जीतू उसे सवाल भरे नज़रियों से देखे जा रहा tha......raghu की बातें उसके ऊपर से निकल गयी थी..........

" matlab..........tu कहना क्या चाहता हैं......." और जीतू के चेहरे पर सवाल और भी गहराने लगते hain......wahin रघु जीतू के तरफ देखकर मंद मंद मुस्कुरा रहा था.......

कॉन्टिनोएड............................................................................
 
अपडेट-16 (बी) (मेघा अपडेट)

" तेरी समझ में कुछ नहीं आएगा........ चल फिर भी मैं तुझे सब कुछ ाचे से समझा देता hoon........ram को मैंने सिर्फ एक मोहरा बनाया hain.........waise भी वो चुदाई के बारे में कुछ नहीं janta........do चार ज्ञान की बातें हमसे सीख जायेगा तो हमारा कुछ घिस तो नहीं जायेगा naa......wo तो हमेशा गरम रहेगा hi........aur जब हर वक़्त लुंड में गर्मी रहेगी तो वो मेमसाहेब के साथ भी कोई न कोई ऐसी वैसी हरकत ज़रूर करता rahega.........memsaheb एक बार बोलेगी दो बार बोलेगी और आख़िरकार वो खुद अपने आपको राम के हवाले कर देगी.........

क्यों की उसकी छूट की आग बुझाने वाला तो राहुल यहाँ हैं hi nahin.........aur जब छूट की आग दहकने लगेगी तो हमें बस इसी चीज़ का फायदा उठाना hain........hum गन्दी गन्दी हरकतें मेमसाहेब के सामने अगर करेंगे भी तो वो हमें मन नहीं कर payegi........aur धीरे धीरे हम लोग उसे भी अपने रंग में रंगते चले jayengey......ismein खतरा तो बहुत हैं मगर बिना जोखिम के कोई काम नहीं हो sakta........aur कुछ ऊंच नीच हुई तो उसके लिए हमारे छोटे मालिक हैं naa.......aakir वो कब काम aayengey.....aakhir हमारी गुरु दक्षिणा किस दिन काम आएगी..........

मुझे आज क्या करना हैं ये सब मैंने सोच लिया hain..........tu बस देखे jaa.......bus एक हफ्ता aur......uske बाद काव्य मैडम खुद अपनी छूट की आग बुझाने के लिए हमसे वो सब कुछ करवाएगी जो तू कभी सपने में भी नहीं सोच sakta.........choot की आग क्या होती हैं तूने अभी देखा hi कहा hain.........main उसके साथ सिर्फ चुदाई का खेल hi नहीं khelunga......balki मैं उसके साथ वो सब कुछ करूँगा जो तू कभी इसका अंदाज़ा भी नहीं लगा sakta.........main उसे इस हुड्ड तक नीचे गिरा दूंगा की वो एक दिन खुद अपनी नज़रियों में हमेशा के लिए गिर जाएगी..........

उसके बाद ...............वही होगा जो हम chahengey...........aab तू बस तमाशा देखता jaa.........kavya अगर एक हफ्ते के अंदर मेरे नीचे न आ गयी तो मेरा नाम भी रघु नहीं........." और रघु फिर से अपने मूछों पर ताव देते हुए अपनी बात ख़तम करता hain......wahin जीतू के अंदर का सारा गुस्सा एक hi पल में मनो गायब हो जाता hain.......aab तो उसे भी इंतज़ार tha......us एक हफ्ते ka..........pata नहीं आखिर रघु इस एक हफ्ते में ऐसा क्या करने वाला था .........ये तो बस आने वाला वक़्त hi बता सकता था.......

थोड़े देर बाद रघु कमरे में जाता हैं और वहीँ उसके पीछे पीछे जीतू भी चला जाता hain.......aab उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही thi.......wo काव्य को हर हाल में पाना चाहता tha.......uski गांड और छूट में अपना लुंड पेलना चाहता tha.........uski चूचियों से जी भर के खेलना चाहता tha......apna छुम उसे चखना चाहता tha.....na जाने और भी बहुत से उसके सपने थे वो सब सपने एक एक कर काव्य से पूरा करना चाहता tha.......kavya का ख्याल आते hi उसका लुंड फिर से सानना उठता hain........wahin रघु अभी भी मुस्कुराये जा रहा tha...........janta था की इस वक़्त जीतू क्या सोच रहा होगा........

रघु फ़ौरन अपना हाथ अपनी लुंगी के अंदर ले जाता हैं और अगले hi पल वो अपने अंडरवियर को बहार की तरफ निकलने लगता hain.......wahin कुछ दूर पर जीतू खड़ा हैराइनि से उसके तरफ देख रहा tha........usey न hi रघु की बातें कुछ समझ में आ रही thi........aur न रघु की कोई चाल........

" अब ये किस लिए तू अपने अंडरवियर उतर रहा हैं.........." जीतू अगले hi पल बिना सोचे समझे रघु के तरफ देखकर हौले से बोल पड़ता hain.......wahin रघु उसे देखकर ज़ोरों से हंस पड़ता हैं.....

" तू साला बुद्धू का बुद्धू hi rahega..........maine कहा था न की हीरे की परख केवल ज़ोहरी hi कर सकता hain........heera समझ ले मेरा ये 10 इंच का lauda.......aur ज़ोहरी मतलब अपनी काव्य memsaheb..........aakhir ये लुंड उन्ही के लिए एक दिन तो काम aayega........jo एक दिन वो अपनी छोटी सी चीड़ में इसे पूरा legi..........aakhir जब वो मेरा लौड़ा देखेगी नहीं तो फिर लेगी क्या............." और रघु इतना कहकर अपने मुँह में एक पान का टुकड़ा डालता हैं और उसे अपने डेंटन के एक कोने में रखकर धीरे धीरे चबाने लगता hain......wahin जीतू की आँखें चमक सी जाती hain......aab उसे लगने लगा था की रघु सिर्फ बातें नहीं बोल रहा हैं बल्कि वो पूरे प्लान के साथ सब कुछ कर रहा हैं........

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घडी में इस वक़्त सुबह के 9 बजे they...........raghu उसी अंदाज़ में आज भी काव्य के मैं गेट पर खड़ा tha........mooh में पान चबाते हुए वो अपनी लुंगी को ाचे से अपनी कमर पर लपेट लेता हैं और सामने के शीशे पर अपना चेहरा देखे हुए मुस्कुराने लगता hain........aaj भी उसने खूब सारा तेल अपने सर पर लगाया हुआ था और बाल हमेशा की तरह उलटी मांग थी.......

थोड़े देर बाद मैं दूर का दरवाज़ा खुलता हैं और काव्य हमेशा की तरह चलती हुई आती हैं और आकर दरवाज़ा खोलती hain........aaj काव्य ने ब्लैक रंग की साड़ी पहना हुआ था और हमेशा से कहीं ज़्यादा सूंदर आज वो इन कपड़ों में लग रही thi..........wahin रघु उसे देखकर एक गन्दी सी स्माइल देता हैं जिसे काव्य देखकर बिलकुल इग्नोर कर देती hain...........jaise hi काव्य दो कदम आगे जाती हैं रघु हमेशा की तरह उसके पीछे पीछे चल पड़ता hain..........aab ये बताने की ज़रुरत नहीं थी की इस वक़्त उसकी नज़रें कहाँ पर thi.........wo काव्य के गांड के उस हिस्से को ऐसे देख रहा था जैसे वो ये अंदाज़ा लगा रहा हो की क्या इस छोटे से छेद में मेरा लौड़ा क्या पूरा फिट बैठेगा.......

उसकी थिरकती हुई गांड को वो एक तुक देखे जा रहा tha........jaise जैसे काव्य चल रही थी उसकी गांड ऊपर नीचे की तरफ हो रही thi.........wahin रघु की नज़रें मनो वहीँ टिक गयी thi.....kuch देर बाद वो उसकी लचकती कमर को बड़े गौर से देखने लगता hai.....aur आखिर में उसकी नज़र उसकी नंगी और गोरी पीठ पर जाती हैं जिसे उसकी आँखें सुर्ख लाल हो जाती hain.....ek नशा सा उसकी आँखों में इस वक़्त साफ़ नज़र आ रहा tha......kavya कुछ दूर चलकर फ़ौरन पीछे पलटती हैं और रघु को अपनी तरफ घूरता हुआ पाकर उसकी नज़रें फ़ौरन नीचे की तरफ झुक जाती hain.......sharam की लाली अब उसके चेहरे पर नज़र आने लगी थी.......

" memsaheb.......aap आज इन कपड़ों में बहुत hi ज़्यादा हसीं लग रही hain........jee करता हैं मैं बस आपको ऐसे hi देखता रहूं......" और रघु पान चबाते हुए हौले से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य न चाहते हुए भी रघु की बाटिओं को सुनकर हौले से मुस्कुरा पड़ती hain......na जाने क्यों रघु का ऐसे टैरिफ करना अब उसे भी ाचा लग रहा tha........wo वैसे hi कुछ देर तक खामोश कड़ी रहती हैं तभी रघु उसके करीब आता हैं और आकर काव्य के ठीक सामने खड़ा हो जाता hain.......uske चेहरे पर अभी भी गन्दी सी स्माइल thi.......wahin काव्य की सांसों में एक बार फिर से रघु के बदन से उठने वाली बदबू समां जाती हैं.......

मगर आज वो उससे दूर नहीं hatati.........wo बदबू अब उसे पल पल मदहोश बनती जा रही thi........ek अजीब सी kasish....ek अजीब सा नशा था उस बदबू mein........jo काव्य अपने सांसों के ज़रिये अपने रगों में पल पल उतर रही thi........uspar धीरे धीरे एक अजीब सा nasha...ek खुमार सा छठा जा रहा tha..........wahin एक बार उसकी धड़कनें तेज़्ज़ हो चली thi......sanson की रफ़्तार भी बढ़ते जा रहे थे..........

" memsaheb......jhadoo कहाँ पर हैं......" और रघु के मुँह से ये लफ्ज़ सुनकर काव्य को जैसे होश आता हैं और वो उस खुमार को तोड़कर जैसे बहार निकलती hain.......uski आँखें सुर्ख लाल हो चुकी थी और ऐसा लग रहा था जैसे उसपर कोई नशा सा चा रहा हो..........

" wwwwooooo....saaaammmnnneeeyy......" और काव्य मनो हड़बड़ा सी जाती hain......uski बेचैनी फिर से धीरे धीरे बढ़ने लगती hain......wahin रघु उसकी हालत पर मुस्कुरा देता hain.......wahin काव्य के चेहरे पर शर्म की लाली साफ़ नज़र आने लगती हैं.......

" आपका बहुत बहुत शुक्रिया memsaheb...........agar आज कुछ नाश्ता मिल जाता तो आपका बहुत एहसान hota........wo क्या हैं की आप खाना बहुत ाचा बनती hain.......aisa खाना तो मेरी घरवाली भी कभी नहीं बनती thi.........aapke हाथों में तो जैसे जादू हैं मेमसाहेब......." और रघु इतना कहकर अपने काळा पीले दांत दिखता हुआ धीरे से हंस पड़ता hain........wahin काव्य भी इस बार उसकी बाटिओं को सुन्करर मुस्कुराये बिना नहीं रह pati.........wo ाचे से जानती थी की रघु जाहिर hain......ganwar hain.....magar न जाने क्यों अब उसे उसकी बातें ाची लगने लगी thi.......uske मुँह से अपनी तारीफ उसे गुदगुदाने लगी थी......

" ठीक हैं तुम यहीं पर ruko.....main तुम्हारे लिए कुछ नास्ता लेकर अभी आती हूँ......." और काव्य फिर से किचन की तरफ चल पड़ती हैं वहीँ रघु की नज़रें एक बार फिर से काव्य पर thi........kavya के जाते hi वो अपने लुंगी के ऊपर से अपने लौड़े को धीरे से मसल देता hain.....wahin अब उसे यकीन हो चला था की ये बुलबुल बहुत जल्द उसके बिछाये जाल में fansegi.......aur जब वो फंसेगी तो वो उस बुलबुल का शिकार बहुत आराम से karega.........jaisa मर्ज़ी वैसा उसके साथ karega............dekhna था की कौन किसका शिकार करता hain......aur कौन खुद शिकार बनता hain..........aur कौन किसके जाल में फंसता hain..........khel वहीँ पुराण tha..........shikar भी नया tha........................aur शिकारी bhi...........................................bus वक़्त को मालूम था की कौन शिकार banega.......................aur कौन शिकारी...................................

कंटिन्यू............................................................
 
अपडेट 17(ा) (मेघा अपडेट)

" ठीक हैं तुम यहीं पर ruko.....main तुम्हारे लिए कुछ नास्ता लेकर अभी आती हूँ......." और काव्य फिर से किचन की तरफ चल पड़ती हैं वहीँ रघु की नज़रें एक बार फिर से काव्य पर thi........kavya के जाते hi वो अपने लुंगी के ऊपर से अपने लौड़े को धीरे से मसल देता hain.....wahin अब उसे यकीन हो चला था की ये बुलबुल बहुत जल्द उसके बिछाये जाल में fansegi.......aur जब वो फंसेगी तो वो उस बुलबुल का शिकार बहुत आराम से karega.........jaisa मर्ज़ी वैसा उसके साथ karega............dekhna था की कौन किसका शिकार करता hain......aur कौन खुद शिकार बनता hain..........aur कौन किसके जाल में फंसता hain..........khel वहीँ पुराण tha..........shikar भी नया tha........................aur शिकारी bhi...........................................bus वक़्त को मालूम था की कौन शिकार banega.......................aur कौन शिकारी...................................

अब आगे............................................................................................

काव्य के अंदर जाते hi रघु अपनी लुंगी को घुटनों तक ऊपर की तरफ फोल्ड कर लेता हैं और अपना एक पवन थोड़ा सा मोड़कर दूसरा पवन सीधा करके वहीँ फर्श पर आराम से जाकर बैठ जाता hain.........wo इस अंदाज़ में बैठा हुआ था जिससे जब भी काव्य उसके पास नास्ता देने के लिए आये और वो जब भी jhuke........uske झुकते hi उसके लुंगी के अंदर कला और मोटा लुंड उसे साफ़ नज़र aaye.........ye ख्याल आते hi एक बार फिर से रघु के चेहरे पर एक गन्दी मुस्कान तैर जाती hain...........wo इन्ही सब ख्यालों में गम था तभी काव्य उसे सामने से आती हुई नज़र आती हैं........

काव्य को देखते hi वो अपनी नज़रें t.v स्क्रीन की तरफ गदा लेता हैं जैसे वो कुछ जनता hi न ho..........wahin काव्य ट्रे में नास्ता लेकर आती hain........tray में इडली और सांभर tha.........aur साथ में चाय की एक कप bhi.......aur पीने का पानी bhi........kavya उस ट्रे को जैसे hi रघु के पास लेकर आती हैं और वो जैसे hi उस ट्रे को रघु के पास फर्श पर झुकने के लिए रखती हैं उसकी नज़र सामने की तरफ चली जाती hain..........raghu की लुंगी की तरफ.......

जैसी hi उसकी नज़रें उस लुंगी के अंदर की तरफ जाती हैं काव्य के चेहरे का रंग बिलकुल फीका सा पढ़ जाता hain.........ander रघु का कला नाग उसकी नज़रियों से नहीं चुप सका tha.......jo इस वक़्त उसकी झांटों से पूरी तरह घिरा हुआ tha...........lund सोया हुआ होने की वजह से वो थोड़ा छोटा ज़रूर नज़र आ रहा था मगर फिर भी कम से कम 3 से 4 इंच तक तो होगा hi.........aur मोटा भी करीब 2 इंच तक hoga.........kavya की तो जैसे सांसें रुक गयी thi.....wo एक तुक रघु के उस काळा नाग को घूरे जा रही thi........saath hi साथ बड़े मुस्खिलों से अपना थूक भी गले के नीचे जातक रही thi......usey तो एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे वो खुली आँखों से कोई सपना देख रही हो........

इंसान का लुंड क्या इतना बड़ा भी होता हैं उसने आज जाना tha.......jab उसका लुंड मुर्झाहया में इतना मोटा और बड़ा नज़र आ रहा था तब जब उसका लुंड पूरी तरह से खड़ा होगा तब कितना बड़ा hoga........ye ख्याल आते hi काव्य के चेहरे पर पसीने की चाँद बूँदें झलक पड़ती hain..........wahin उसकी सांसें और बेचैनी भी बढ़ती चली जाती hain........wo बड़े मूषकहिलों से अपने बेकाबू सांसों को पल पल संभल रही thi.........magar उसे ऐसा लग रहा था जैसे अब कुछ भी उसके बस में नहीं था..........

जैसे वो थोड़ी सी ऊपर की तरफ उठती हैं उसकी नज़रें रघु के तरफ जाती hain.........magar रघु तो अनजान बनते हुए बस चुप चाप से t.v देख रहा tha.........wahin काव्य न चाहते हुए फिर से रघु की लुंगी की तरफ देखने लगती hain..........wahin एक बार फिर से उसकी बेचैनी धीरे धीरे बढ़ने लगती hain,.........bade मुस्खिलों से वो अपने आप पर काबू पति हैं और अपनी नज़रें रघु से चुराते हुए फ़ौरन सामने के सोफे पर जाकर बैठ जाती hain.......aur ख़ामोशी से t.v देखने लगती hain.......halanki उसकी नज़रें अब t.v स्क्रीन पर ज़रूर थी मगर दिमाग में जैसे तूफ़ान उठा हुआ था........

वो एक पल के लिए भी रघु के लुंड को नहीं भुला पा रही thi...........dimag जैसे उसका कुछ पल के लिए मनो सोचना बंद कर दिया ho........nazrein बार बार उसके काळा मोठे लुंड पर hi घूम रही thi.........sansein अब तक पूरी तरह काबू में नहीं they........wahin रघु अंदर hi अंदर काव्य के हालत पर बहुत खुस हो रहा था..........

" तू बस देखती जा मेरी rani........aabhi तो तुझे अपने लुंड का कुछ हिस्सा hi दिखाया hain..........bahut जल्द मैं तुझे पूरा लुंड दिखाऊंगा भी और उससे तेरी छूट और गांड दोनों ाचे से marunga..........magar आहिस्ता aahista..........khel तो अब शुरू हो चूका hain......aur इस खेल को मैं hi अपने तरीके से ख़तम karunga......tujhe पूरी तरह बर्बाद करने के बाद........" और रघु जैसे मुन्न hi मुन्न हंस पड़ता hain.......uske दिमाग में भी जैसे तूफ़ान सा उठा हुआ था........

" memsaheb............mujhe माफ़ कर दीजिये............" और रघु हौले से बोल पड़ता hain........wahin काव्य जैसे अपने सोच से बहार निकलती hain..........aur सवाल भरे नज़रियों से रघु की तरफ ऐसे देखती हैं जैसे वो उससे पूछ रही हो की वो आखिर किस बात की उससे माफ़ी मांग रहा hain........kahin उसने जानबूझकर तो अपना लुंड उसे नहीं दिखाया naa........kahin माफ़ी वो उसकी वजह से तो नहीं मांग raha.........kavya अभी भी उलझनों में फांसी हुई थी और उसका दिल इस वक़्त बहुत ज़ोरों से धड़क रहा tha.........uski पंतय के अंदर कुछ गीलापन सा अब उसे महसूस हो रहा tha............aur ये गीलापन धीरे धीरे अब बढ़ता जा रहा था.......

" जीईई........" और काव्य मनो एक बार फिर से हड़बड़ा सी जाती हैं और अपने बेकाबू सांसों को संभालने की पूरी कोशिश करती hain.......magar न hi उसकी सांसें उसके बस में thi........aur न hi दिल की dhakdan..........wo अभी भी वहीँ बैठी हुई लुम्बी लुम्बी सांसें ले रही thi........jissey उसकी बड़ी बड़ी चूचियां तेज़ी से ऊपर नीचे की तरफ हो रहे they......jinhein रघु बड़े गौर से देख रहा था.......

" memsaheb..........us दिन मैंने आपके यहाँ नास्ता किया था तो मैंने आपका फर्श पूरा गन्दा कर दिया tha.......magar आज मैं अपने हाथों से इस फर्श को साफ़ कर dunga..........meri वजह से आपको उस दिन फर्श साफ़ करना पड़ा उसके लिए मैं आज बहुत शर्मिंदा हूँ ........" और रघु फिर से इडली और सांभर एक साथ खाने लगता hain.........pehle भी वो जानवरों की तरह खा रहा था और आज भी उसके अंदर कोई बदलाव नहीं आया tha.......haath पवन हमेशा की तरह गंदे और मैले they..........jagah जगह इडली पर भी काळा काळा निशान साफ़ नज़र आ रहे they........aur कुछ पान के छोटे छोटे टुकड़े bhi.........kyon की रघु पान चबाने के बाद मुँह तक नहीं धोया tha.........kyon की उसने मुँह धोना भी ज़रूरी नहीं समझा........

काव्य हैरत से रघु के तरफ देखे जा रही thi.........wahin उसे कुछ सूझ नहीं रहा था की वो क्या bole..........dimag में तो जैसे लुंड अभी भी कुंडली मरकर बैठा हुआ tha.......to वो सोचती क्या!!!!!!! बड़े मुस्खिलों से वो अब अपने आपको पूरा नार्मल करती hain.......wahin रघु फ़ौरन शीशे की गिलास में रखा पानी एक hi सांस में पी जाता हैं और आधा बचा पानी वो फ़ौरन काव्य के तरफ धीरे से बढ़ा देता हैं.........

वहीँ काव्य बड़े गौर से कभी रघु के तरफ देख रही thi.....to कभी उसके मुँह से निकले उस पान के तैरते हुए उन छोटे छोटे टुकड़ों ko.......jo रघु के पानी पीने की वजह से कुछ पान के छोटे छोटे टुकड़े अभी भी उसपर तैर रहे they.......to कुछ इडली के टुकड़े नज़र आ रहे they.........kul मिलजुलकर अब उस पानी का रंग चेंज हो गया था और वो मटमैला कलर में नज़र आ रहा tha........wahin काव्य की नज़रें अभी भी उस पानी पर तिकी हुई thi........na तो वो पानी अब पीने लकय रह गया था और न काव्य उस पानी को पीना चाहती थी......

वो तो एहि सोचकर हैरान थी की कैसे रघु उसे अपना जोहता पानी पीने को पूछ रहा hain.......us नौकर की इतनी हिम्मत की वो उसे अपना जूठा पानी pilayega..........na जाने कितने दिनों से वो नहाया नहीं tha.....upar से उसके जिस्म से हमेशा ेज अजीब सी बदबू निकलती रहती thi........kahan wo......aur कहाँ मैं........" काव्य अभी भी रघु को लेकर जस्टिफाई कर रही thi.......ussey कपड़े कर रही thi......magar फिर भी न जाने क्यों उसे अब रघु पर ज़रा भी गुस्सा नहीं आ रहा tha........guzarte वक़्त के साथ अब उसके ख्यालात बदलते जा रहे they.......uski सोच अब बदल रही थी......

" ाचा कोई बात nahin.......nahin पीयेंगी तो मुट्ठ pijiye........mujhe लगा की आपको प्यास लगी hogi......is लिए मैंने ये गुस्ताखी की........." और रघु हौले से बोल पड़ता हैं और फिर से खाने लगता hain......wahin काव्य की नज़रें उस ज़ाहिर... गंवार पर thi..........wo उसे ज़रा भी समझ नहीं पा रही thi........ki ये बाँदा हैं क्या .........चीज़!!!!

" वैसे memsaheb.......aap खाना सच में बहुत ाचा बनती hain..........jee तो करता हैं की मैं आपके ये हाथ चूम loon.......kaash ऐसे hi खाना अगर मेरी बीवी बनती तो मुझे उससे कभी शिकायत नहीं rehta.........aacha हुआ जो साली मुरर gayi.........aise लोगों का मुर जाना hi ठीक हैं........" और रघु के चेहरे पर थोड़ा नफरत और थोड़ा गुस्सा झलक पड़ता hain.......wahin काव्य ख़ामोशी से रघु के तरफ बस एक तुक देखे जा रही थी.........

" ऐसा क्यों कहते ho.......wo तो तुम्हारी बीवी थी naa..........aab उसके न रहने से क्या तुम्हें तकलीफ नहीं hoti........agar वो आज रहती तो क्या तुम इसी तरह गंदे और इस हाल में rehtey.........har रोज़ वो तुम्हें nehlawati.......tumhari सेवा karti.......aur तुम्हारा ख्याल रखती....." और काव्य जैसे धीरे से बोल पड़ती hain.....wahin रघु के चेहरे पर नाराज़गी साफ़ नज़र आने लगती हैं.......

कॉन्टिनोएड.........................................................................
 
अपडेट- 17(बी) (मेघा अपडेट)

" उसका रहना न रहना मेरे लिए एक बराबर था memsaheb.......agar मैं देर रात कभी घर से लेट भी आता तो साली अपने खा पीकर आराम से सू जाया karti........jo कमर्कार मैं लता वो मुझसे चीन leti........aur दारू पीने को पैसे अगर मांगता तो मुझे खरी खोटी sunati..........sali पूरी ज़िन्दगी नरक करके राखी हुई thi.........din भर गांड घिस घिस कर काम करे और ऊपर से साली के रोज़ तने सुनने को मिलता tha......khana भी ऐसा बनती थी जैसे जेल का खाना मिल रहा ho.......behanchod..........." और रघु का चेहरा नफरत से भार जाता हैं वहीँ काव्य बिलकुल खामोश हो जाती hain........usey कुछ समझ में नहीं आ रहा था की वो रघु को samjhaye.......ya उसपर नाराज़गी दिखाए........

" memsaheb.......meri बीवी तो आपके पैरों की धुल भी नहीं हैं........" और रघु फिर से काव्य की तारीफ करने लगता हैं वहीँ काव्य हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं.........

" चाहे जैसी थी आखिर वो थी तो तुम्हारी बीवी hi.........khair......." और काव्य इतना कहकर खामोश हो जाती हैं वहीँ रघु कुछ देर तक खामोश tha.......aab उसका खाना भी ख़तम हो चूका था.........

" आप आराम कीजिये memsaheb.......main जल्दी से घर में झाड़ू पुछा लगा देता हूँ........." और रघु फ़ौरन अपनी जगह से उठ जाता हैं और घर के कामों में लग जाता hain......wahin काव्य फ़ौरन अपनी जगह से उठती हैं और रघु का खाया हुआ बर्तन समेटने लगती hain.......fir उसकी नज़र पानी के गिलास पर पड़ती हैं और वो कुछ देर तक टकटकी लगाए उस पानी के तरफ देखती रहती hain.......kuch सोचकर उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ जाती hain..........fir वो पानी का गिलास और सरे बटन समेटकर फ़ौरन किचन की तरफ चल पड़ती hain.........thode देर बाद वो वापस आकर वहीँ सोफे पर जाकर बैठ जाती हैं.........

झाड़ू लगाने के बाद रघु बाल्टी (बकेट) लेकर आता हैं और फर्श पर पुछा लगाने लगता hain.......magar baithkar........lungi अब उसने घुटन तक फोल्ड करके रखा हुआ tha.........jissey उसका लुंड काफी हुड्ड तक नज़र आ रहा tha.......kavya की नज़रें अब t.v के तरफ thi............magar बीच बीच में वो उसके तरफ भी देख रही thi.............jaise hi वो हाल में आता हैं वो उसी अंदाज़ में फर्श पर बैठकर पुछा लगाने लगता hain..........uske इस तरह से बैठने से एक बार फिर से उसका लुंड काव्य के सामने एक्सपोज़ हो जाता hain..........magar वो अब भी अपने काम में मस्त tha.......wo ाचे से जनता था की इस तरह बैठने से उसका लुंड काव्य को ज़रूर दिख रहा hoga.........aur एहि तो वो चाहता था.......

काव्य की नज़रें एक बार फिर से रघु के लुंगी के अंदर जाती हैं और एक बार फिर से उसकी सांसें अटक जाती hain......ek बार फिर से उसका मोटा कला लुंड उसकी नज़रियों के सामने tha.......wahin रघु मस्ती में काम किये जा रहा tha......kavya चोर नज़रियों से कभी उसके taraf....to कभी उसके लुंगी की तरफ देखे जा रही thi.........dil उसका एक बार फिर से ज़ोरों से धड़क उठा tha..........raghu तिरछी नज़र से काव्य के तरफ देख रहा था और उसके हालत पर मज़े ले रहा tha......wo ाचे से जनता था की इस वक़्त काव्य की क्या हालत हो रही hogi..........ek तरफ वो अपनी जीत पर जश्न मन रहा था वहीँ अब उसे काव्य अपनी मुट्ठी में आती हुई महसूस हो रही थी..........

काम ख़तम करने के बाद वो अपनी लुंगी नीचे कर देता हैं और फिर हाथ जोड़कर काव्य के सामने आकर खड़ा हो जाता hain........jaise किसी आज्ञाकारी नौकर की तरह........

" memsaheb.....agar मुझसे कोई भूल हुई हो तो मुझ गरीब को माफ़ कर dijiyega.......aab मैं चलता हूँ...... " और रघु मुस्कुराता हुआ फ़ौरन बहार की तरफ निकल जाता हैं वहीँ आज काव्य भी उसकी बाटिओं से मुस्कुरा पड़ी thi........aaj कहीं न कहीं उसने काव्य के दिल में थोड़ी सी जगह तो ज़रूर बना ली thi.......kahin न कहीं उसके प्रति काव्य के मुन्न में कुछ तो ख्याल आ hi गए they.......raghu के जाते hi काव्य फ़ौरन अपनी जगह से उठती हैं और जाकर लुम्बी लुम्बी सांसें लेने लगती hain.........uska दिल आज बहुत बेचैन हो गया tha..........aaj इतना सब कुछ रघु ने उसे दिखा दिया था की वो hi जानती थी की कैसे उसने खुद पर कण्ट्रोल किया tha.........jaise hi वो बाथरूम में जाती हैं वो अपनी साड़ी निकलने लगती hain........fir अपनी blouse...fir bra.........aur लास्ट में पंतय.....

पंतय उतरते hi उसकी छूट में लगा काम रूस कुछ पंतय पर भी लगा हुआ था जो साफ़ नज़र आ रहा tha........wo उसे देखकर मुस्कुराये बिना नहीं रह pati.....fir वो शावर ों करती हैं और अपने बदन को ाचे से भिगोती hain.....taki उसके बदन में जो गर्मी उठ रही हो .......शायद उस पानी से कहीं ठंडी हो jaye.......magar ये पानी कहाँ उस प्यास को बुझा रही thi......balki वो इस प्यास को और भी भड़का रही thi.......nahane के बाद वो अपने कपड़े चेंज करती हैं और फिर अपने बैडरूम में जाकर ाचे से सजने संवारने लगती हैं........

फिर उसे ख्याल आता हैं की किचन में अभी सारा काम वैसे hi पड़ा हुआ hain.........wo फ़ौरन किचन के तरफ चल पड़ती hain....magar उसके दिमाग से रघु का लुंड अब भी नहीं निकल रहा tha...baar बार उसका लुंड उसकी नज़रियों के सामने घूम रहा tha.....jaise hi उसकी नज़र सामने राखी ट्रे पर पड़ती हैं वो एक तुक उस ट्रे की तरफ बड़े गौर से देखने लगती hain.........us ट्रे पर और प्लेट के कई हिस्सों पर उसके गंदे हाथ के निशान अब भी साफ़ नज़र आ रहे थे.......

तभी उसकी नज़र सामने राखी कांच के गिलास पर पड़ती hain.......ye वही गिलास था जो अभी कुछ देर पहले रघु ने जिससे पानी पिया tha..........wo एक नज़र उस गिलास के तरफ अजीब नज़रियों से देखने लगती हैं फिर कुछ सोचकर उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान तैर जाती hain..........wo फ़ौरन उस गिलास को अपने हाथों में उठती हैं और बड़े गौर से उसमें रखा पानी को एक तुक देखने लगती hain........pani काफी देर से रखने की वजह से जो कुछ देर पहले पान और इडली के छोटे छोटे टुकड़े उसपर तैर रहे थे वो अब निचली सतह पर बैठ गए थे........

काव्य के इस तरह गिलास हिलने से जो पान और इडली की परत नीचे जमी हुई थी अब वो धीरे धीरे फिर से उस पानी में घुलने लगी thi........jo कुछ छोटे छोटे टुकड़े थे वो पानी के सतह पर नज़र आ रहे they...........kavya की नज़रें अभी भी उसपर hi तिकी हुई thi......kuch सोचकर वो अपनी एक ऊँगली उस पानी के अंदर हौले से डालती हैं और अपनी उसी ऊँगली से उस पानी को गोल गोल घूमने लगती hain..........gol गोल घूमने की वजह से अब पान के टुकड़े और इडली के छोटे छोटे डेन सब कुछ उस पानी में घुलते चले जाते हैं......

जब पानी पूरी तरह से घुल जाता हैं तब काव्य हौले से पानी ऊँगली बहार की तरफ निकलती हैं और एक तुक अपनी ऊँगली को देखने लगती hain......uspar भी पान के कुछ टुकड़े और इडली के डेन चिपक से गए they......wo अपनी ऊँगली को एक तुक देखे जा रही thi..........kuch सोचकर वो अपनी ऊँगली को अपने नाक के पास ले जाती हैं और उसमें से उठ रही उसकी खुसबू को अपने सांसों में धीरे धीरे उतरने लगती hain........ek अजीब सा महक अब उसकी सांसों में धीरे धीरे घुलने लगा tha......wo ऐसा कई बार करती hain......na जाने क्यों उसपर एक बार फिर से मदहोशी सी चा रही thi.........wo इस बार अपनी वही ऊँगली अपने लिप्स पर हौले से रख देती हैं और इस बार आहिस्ता से अपने मुँह को खोलने लगती hain.......aur धीरे धीरे वो उस ऊँगली को अपने मुँह के अंदर ले जाने लगती हैं......

लजात से उसकी ानकेहिं बंद सी होती जा रही thi........usey क्या होता जा रहा था अब उसे कोई होश नहीं tha........na कोई खबर thi.......magar जो भी था वो अब एक अजीब से नशे में खुद को महसूस कर रही thi......agle hi पल वो उस ऊँगली को अपने जीभ से चाट लेती हैं और आहिस्ता आहिस्ता उसे चाहती चली जाती hain......aisa लग रहा था जैसे उसकी ऊँगली पर सेहद लगा हुआ ho.......kuch पान और इडली का मिला जुला रूप उसे अजीब सा मज़ा दे रहा था.........

कुछ सोचकर इस बार वो सामने रखा पानी का गिलास अपने हाथों में उठती हैं और बड़े गौर से उस गिलास को देखने लगती hain.........aabhi भी पानी गोल गोल घूम रहा था और उसमें पान और इडली के छोटे छोटे टुकड़े तैरते हुए नज़र आ रहे they.......wo हौले से उस गिलास को अपने लबों पर ले जाती हैं और अपनी आँखें बंद करके उस गिलास में रखा गन्दा पानी जिसमें पान और इडली दोनों थी जिसे रघु ने कुछ देर पहले पिया tha.........wo उसे हौले हौले अपने गले के नीचे उतरने लगती hain..........uski सांसें तेज़्ज़ होती जा रही थी और जिस्म में एक बार जैसे बेचैनी सा महसूस होने लगी थी........

एक घूँट पीने के बाद उसका ख्याल आया की वो इसे न piye.......aur उठाकर फेंक de......magar वो ऐसा न कर saki........wo खुद को कमज़ोर सी महसूस कर रही thi.......na जाने उस पानी में ऐसा क्या था जो वो पीती जा रही थी तो उसपर एक नशा sa......khumaar सा छठा जा रहा tha......is बार वो तब तक नहीं रुकती जब तक उस पानी की आखरी बूँद उसकी हलक केन नीचे नहीं उतर jati...........pani ख़तम करने के बाद वो कुछ देर तक ख़ामोशी चुप चाप सी अपनी आँखें बंद किये रहती हैं और लुम्बी लुम्बी सांसें लेने लगती hain...........aaj काव्य बदली बदली सी नज़र आ रही thi......aaj सब कुछ जैसे बदल सा गया tha......aab देखना ये था की आगे वक़्त काव्य को और कितना बदलने वाला tha............ya उसका ये बदलाव काव्य की ज़िन्दगी में कौन सा मोड़ लेकर आने वाला था.....................................

कंटिन्यू....................................................................................
 
अपडेट- 18 (ा) (मेघा अपडेट)

एक घूँट पीने के बाद उसका ख्याल आया की वो इसे न piye.......aur उठाकर फेंक de......magar वो ऐसा न कर saki........wo खुद को कमज़ोर सी महसूस कर रही thi.......na जाने उस पानी में ऐसा क्या था जो वो पीती जा रही थी तो उसपर एक नशा sa......khumaar सा छठा जा रहा tha......is बार वो तब तक नहीं रुकती जब तक उस पानी की आखरी बूँद उसकी हलक केन नीचे नहीं उतर jati...........pani ख़तम करने के बाद वो कुछ देर तक ख़ामोशी चुप चाप सी अपनी आँखें बंद किये रहती हैं और लुम्बी लुम्बी सांसें लेने लगती hain...........aaj काव्य बदली बदली सी नज़र आ रही thi......aaj सब कुछ जैसे बदल सा गया tha......aab देखना ये था की आगे वक़्त काव्य को और कितना बदलने वाला tha............ya उसका ये बदलाव काव्य की ज़िन्दगी में कौन सा मोड़ लेकर आने वाला था.....................................

अब आगे.......................................................................................

वक़्त तेज़ी से गुज़र रहा tha........kavya अब धीरे धीरे बदल रही thi........wahin रघु और जीतू दोनों अपने मकसद को पूरा करने में जी जान से लगे हुए they........aur उन्हें उम्मीद भी था की वो दोनों एक न एक दिन सफल ज़रूर हो jayengey........magar kab....na ये रघु जनता tha..............aur न hi जीतू..........

उसी शाम को राम एक बार फिर से रघु और जीतू से मिलने उनके कमरे के तरफ चल पड़ता hain........usey भी अब उन लोगों की बातें ाची लगने लगी thi........khas कर जब वो काव्य के बारे में कुछ अश्लील बातें किया karte.......jissey सुनकर उसका भी लुंड खड़ा हो जाया करता ........थोड़े देर बाद राम उन दोनों के बीच बैठा हुआ था और जीतू और रघु दोनों वही बैठे हुए उसके सामने बीड़ी पी रहे they.........magar राम उन्हें कुछ नहीं बोल रहा tha......bolta भी kaise...........wo दोनों तो उसके सुख में भागिदार जो थे.........

" कैसी लगी आपको वो सरे photos.......chote मालिक........" जीतू बीड़ी की काश लेता हुआ राम की तरफ देखते हुए हौले से बोल पड़ता hain........wahin राम के चेहरे पर शर्म की लखरें साफ़ नज़र आने लगती hain........wo थोड़ा सा हड़बड़ा सा जाता हैं वहीँ रघु उसे देखकर हौले से मुस्कुरा पड़ता हैं.......

" इसमें शर्माने की क्या बात हैं malik.......aachi लगी तो बोल दीजिये की ाची hain......agar नहीं लगी तो मैं आपके लिए एक नया एल्बम लाया hoon......isey देखने के बाद मैं दावे से कहता हूँ की आपके लुंड से गरम गरम लावा तुरंत फुट padega........aur आप मस्त हो जाएंगे........." और रघु भी बीड़ी की काश लेता हुआ हौले से मुस्कुरा पड़ता हैं वहीँ राम भी जवाब में धीरे से ना में अपनी गुर्दें हिला देता हैं.........

" कोई बात nahin......tab तो आपका छुम भी नहीं निकला hoga.......hain ना......." और रघु फिर से बोल पड़ता हैं वहीँ राम अजीब नज़रियों से उसे एक तुक देखे जा रहा tha..........shayad अब उसे रघु की कुछ कुछ बातें समझ में आने लगी thi..........kyon उसका पेण्ट अक्सर भीग जाया karta......kyon उसके लुंड से हमेशा चिपचिप्सा सा कुछ निकलता rehta.......shayad इसे hi छुम बोलते हैं...........

" क्या हुआ छोटे malik......aap किस सोच में डूब गए........" इस बार जीतू राम की तरफ देखते हुए हौले से बोल पड़ता hain........wahin राम अपनी सोच से फ़ौरन बहार आता हैं.......

" तो kya.......ye cum......sabhi का निकलता hain.......mera matlab.......wahan से......" और राम इस बार फिर से मनो हड़बड़ा सा जाता hain.......wahin जीतू उसकी बाटिओं को सुनकर ठहाका मरकर ज़ोरों से हंसी लगता हैं........

" और नहीं तो kya.........hum लोग क्या आपको इंसान नहीं lagte.........arey ये छुम नहीं निकलगे तो बच्चे कैसे पैदा hongey..........aur औरत माँ कैसे बनेगी......" और जीतू फिर से हंसी लगता हैं वहीँ राम के चेहरे पर हैरानी के बदल अब भी साफ़ नज़र आ रहे they.........wahin रघु समझ जाता हैं की अभी इसे बहुत कुछ सीखना बाकि हैं.........

" हाँ ram........raghu ठीक hi तो कह रहा hain..........mera निकलता हैं .......जीतू का निकलता हैं और उसी तरह तुम्हारा भी छुम तुम्हारे लुंड से निकलता hoga.........dekha नहीं था क्या आपने उस दिन आपके पेण्ट पर चिपचिप्सा सा बढ़ गया tha.........ye छुम नहीं तो और क्या tha..........aapko पता हैं औरत की जब ठुकाई की जाती हैं तो मर्द का जब जोश चरम पर होता हैं तब ये छुम उसके लुंड के रास्ते बहार निकता hain.........aapko अंदाज़ा भी नहीं होगा की जब ये निकलता हैं उस वक़्त कितना मज़ा आता हैं क्या batun.......duniya की हर सुख इसके आगे फीकी लगने लगती hain........aur तो और इसी छुम से बाचे भी होते hain.......agar ये छुम औरत के छूट की गहराई में अगर दाल दिए जाये तो..........." और रघु इतना कहकर खामोश हो जाता hain.......wo ाचे से जनता था की राम उससे अगला सवाल ज़रूर karega......aur वो क्या सवाल करेगा उसे उसका अंदाज़ा भी था.........

" ये बाचे कैसे होते हैं kaka...........aur इस बाचे से छुम का क्या सम्भन्ध......" और राम भोलेपन से दुबारा बोल पड़ता hain......wahin रघु के चेहरे पर एक गन्दी सी मुस्कान तैर जाती हैं........

" तुम्हें तो पता हैं न औरत के पास छूट और मर्द के पास लुंड होता hain........chalo मैं तुम्हें ाचे से समझाता hoon..........maan लो की जब तुम्हारा लुंड खड़ा होता हैं उस वक़्त जब तुम अपनी भाभी की बुर में अपना लौड़ा पेल रहे होंगे और उसकी अपने लुंड से चुदाई कर रहे hoge.......us वक़्त जब तुम्हारा लुंड से जो गधा गधा सफ़ेद सफ़ेद छुम जब बहार निकलेगा .......और जब तुम उस छुम को अपनी भाभी की छूट के अंदर दाल रहे होंगे तब तुम्हारे छुम से तुम्हारी भाभी का गर्भ ठहर jayega........aur वो प्रेग्नेंट हो jayegi.......fir उसके पेट में तुम्हारा बाचा पालने lagega......aur नौ (9) महीने baad..............wo बच्चा bahar...........aayi बात समझ में......." और रघु के चेहरे पर फिर से एक गन्दी हंसी तैर जाती hain.......usney ये सब जान बूझकर काव्य और उसका एक्साम्प्ले दिया tha......itna सब कुछ कहने पर hi उसका लुंड फिर से अकड़ गया tha.......wahin राम का भी कुछ वैसा hi हाल था......

राम कुछ कहता तभी जीतू बीच में hi बोल पड़ता hain.........wahin राम को आज खुद पर गुस्सा भी आ रहा था की वो ये सब बातें आज तक जान क्यों नहीं paya.......shayad ये उसकी भी गलती नहीं thi.....kyon की वो जिस महलूल में पला बड़ा था उसे ये सब चीज़ें बताने या सीखने वाला कोई नहीं tha......isi वजह से वो हमेशा सबसे दूर रहा karta.........aaj उसे औरत और मर्द का फर्क समझ में आ गया था.........

" तब तो आप ये भी नहीं जानते होंगे छोटे मालिक की बाचा कहाँ से निकलता हैं........" और जीतू अपने लुंड पर धीरे से हाथ फेरते हुए कहता हैं वहीँ राम हमेशा की तरह ना में जवाब देता hain.........uske चेहरे पर उत्सुख्ता साफ़ ज़ाहिर हो रही thi........wahin वो दोनों भी पूरे मज़े ले रहे थे......

" आप भी न छोटे malik......bilkul na-samajh hain.......arey जब चुदाई छूट की होगी तो बाचा भी तो छूट से hi बहार आएगा ना........." और रघु अपने पीले काळा दांत दिखता हुआ हंस पड़ता hain........wahin राम उसे हैरत से देखे जा रहा था.....

" मगर........" और राम के चेहरे पर सवालों के बदल फिर से गहराने लगते hain.....wahin रघु हौले से राम के कंधे पर अपना हाथ रखता हैं और धीरे से मुस्कुरा देता हैं......

कॉन्टिनोएड.................................................................................
 
अपडेट- 18(बी) (मेघा अपडेट)

"इसमें इतना सोचने वाली बात कौन सी हैं malik.........mera एक ाचे डॉक्टर से जान पहचान hain........agar कभी किसी औरत की डिलीवरी हुई तो मैं आपको सामने दिखा dunga.........aur अगर संजोग ाचा हुआ और आपकी भाभी कभी माँ बानी तो उसकी डिलीवरी भी मैं उसी डॉक्टर से karwaunga........fir आप खुद देख लेना की कैसे बाचा तुम्हारी भाभी की छूट फाड़ता हुआ बहार को niklega.........us वक़्त उसका छूट छूट न होकर भोंसड़ा बन जायेगा...........

मगर एक बात और भी हैं malik..........jab तक छूट से बाचा नहीं निकलता उस छूट को छोड़ने का मज़ा hi कुछ और होता hain......jaise तुम्हारी भाभी की छूट इस वक़्त बहुत कासी हुई बहुत टाइट hogi...........kyon की उनका अभी तक कोई बाचा नहीं हुआ hain.......aur जब तुम्हारा लुंड उनकी कासी हुई छूट के अंदर जायेगा तब देख लेना तुम उस वक़्त अपने आपको जनात में महसूस कर रहे hoge..........kasam से तुम्हें मज़ा आ जायेगा तुम्हारी भाभी की कासी हुई छूट छोड़कर........" और रघु भी राम के सामने अपने लुंड पर धीरे से हाथ फेरने लगता हैं वहीँ राम का लुंड भी पूरी तरह सख्त हो गया tha......un दोनों की गरम बाटिओं से और काव्य के नाम की चुदाई कर करके वो तीनों मज़े की चरम पर they.........ram भी अब खुल चूका था इस वजह से वो काव्य का नाम कहीं भी ले lete......aur कुछ भी बोल dete......wahin राम को भी मज़ा आ jata.......aur वो कुछ न बोलता........

" एक बात कहूं malik........kabhi आप अपनी भाभी से ज़रूर पूछियेगा की बच्चे कैसे पैदा होते हैं और बाचा आखिर कहाँ से निकलता hain........dekhiyega वो आपके इस सवाल का क्या जवाब देती hain......agar उसने जवाब दिया तो कसम से कहता हूँ मेरा तो ये सुनकर लुंड से पानी निकल जायेगा........" और जीतू जैसे पूरी तरह से एक्ससिटेड हो जाता hain.......wahin राम की भी आँखें चलम गयी thi......wo पूछ तो सकता था मगर अब भी उसे काव्य से दुर्र लगता था.......

" magar......bhabhi ने मुझे कहीं थप्पड़ मर दिया तो......" और राम भोलेपन से दुबारा बोल उठता hain........wahin जीतू फिर से हंस पड़ता हैं.........

" आप भी कैसी बातें करते हैं छोटे malik......bhala वो आपको क्यों थप्पड़ maregi........wo तो अब आपकी गर्लफ्रेंड जो hain.......aur गर्लफ्रेंड से तो लड़के चुदाई की साडी बातें किया करते hain.........fir इसमें शर्म और झिझक वाली बात कहाँ से आ gayi......aap मेरी बात maniye........wo आपको भाभी के नाते न सही मगर गर्लफ्रेंड के नाते सब कुछ batayegi.........ye मेरा दावा हैं...." और जीतू फिर से अपनी बातों पार ज़ोर देते हुए कहता हैं वहीँ इस बार राम उसकी बातें मान लेता हैं और रघु के चिहरे पर भी शरती मुस्कान तैर जाती हैं........

" ये लीजिये मालिक एक और kitaab.........ismein वो सब कुछ हैं जो आप देखना चाहते hain......us किताब में तो आपको औरत की चूचियां hi केवल नज़र आयी hongi.....magar इसमें तो आपको वो सब कुछ देखने को मिलेगा जो आप चाहते hain.........saath hi साथ औरत की चुदाई होते वक़्त भी कई सरे रंगीन फोटोज भी milengey......jisey देखने के बाद आपका लुंड भी लावा उगलने lagega..........magar मालिक ज़रा संभल ke....agar मेमसाहेब जान गयी तो हमारी नौकरी तो गयी समझो......." और रघु हौले से बोल पड़ता hain.......wahin राम जवाब में धीरे से हाँ में अपनी गुर्दें हिला देता हैं........

" ऐसी नहीं होगा kaka........main इसे बहुत संभलकर रखूँगा........" और राम उस किताब को अपने हाथों में ले लेता हैं वही इन उसका दिल एक बार ज़ोरों से धड़कने लगता hain......jeee तो उसका कर रहा था की वो फ़ौरन उस किताब को वहीँ खोलकर देख ले मगर ऐसा करने की उसमें हिम्मत नहीं थी........

" आप जल्दी से मेमसाहेब को पता lijiye......aur ाचे मार्क्स से पास हो jaiye.......fir आप मेमसाहेब से उनकी छूट mangiyega......main दावे से कहता हूँ की वो आपको इंकार नहीं karengi.........aab आप जैसे मालकिन कभी भी इधर आ सकती हैं......." और रघु धीरे से अपनी बात ख़तम करता हैं वहीँ उसके चेहरे पर एक बार फिर से गन्दी हंसी झलक पड़ती hain........usey पूरा यकीन था की जो तीर उसने चलाया था उसका निशाना कभी भी खली नहीं जाने वाला tha..........kavya बहुत जल्द अब उसका शिकार बनाने वाली थी..........

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शाम को नास्ता करने के बाद राम फिर से अपने कमरे में चला जाता hain.........aab उसे पढ़ाई में बहुत म्हणत करनी thi.........aur उसे ाचे नम्बरों से पास जो होना tha.........aab वो काव्य कैसी हसीना को पाने के लिए कुछ भी कर सकता tha.......aur वैसे भी काव्य तो उसे बोल भी चुकी थी की जो तुम चाहोगे जो मांगोगे वो मैं सब कुछ तुम्हें dungi.........kuch सोचकर वो अपने किताबें उठता हैं और पढ़ने बैठ जाता hain.........halanki बार बार उसका ध्यान उस लिफाफे के तरफ जा रहा tha........magar वो बहुत सैयाम से काम ले रहा tha.......kareeb 7 बजे काव्य राम के कमरे में आती hain..........aaj भी उसकी हाथों में दूध की ग्लास थी जो वो अपने हाथों में लिए चुप चाप से दरवाज़े पर कड़ी thi..........cream कलर की साड़ी में......

जैसे hi राम की नज़रें काव्य पर पड़ती हैं वो उसे देखकर हौले से मुस्कुरा पड़ता hain......wahin एक बार फिर से उसकी नज़रें काव्य के चूचियों पर तो कभी उसके नंगी पेट पर चला जाता hain.......wo एक तुक उसके हसीं बदन को देखे जा रहा tha......shayad अब काव्य को भी राम का इस तरह से देखना बुरा नहीं लग रहा tha.......wo बस वही खड़े खड़े मुस्कुरा रही थी......

" अब तुम अगर जी भरकर मुझे देख लिए हो तो क्या मैं अंदर आ सकती हूँ........" काव्य राम के तरफ देखते हुए हौले से मुस्कुरा पड़ती हैं वहीँ राम इस बार बुरी तरह से झेप जाता हैं और फ़ौरन अपनी नज़रें नीचे की तरफ झुका लेता hain........wahin काव्य राम के पास आती हैं और आकर उसके बाजु में बैठ जाती hain......ram की नज़रें अभी भी नीचे की तरफ झुकी हुई thi.....wo अपना एक हाथ राम के चीन पर ले जाती हैं और बहुत आहिस्ता से उसके सर को ऊपर की तरफ उठती हैं वहीँ राम दुबारा से अपनी नज़रें दूसरी तरफ फेर लेता हैं.......

" क्या हुआ ram..........tumne क्या कोई चोरी की हैं जो तुम मुझसे नज़रें ऐसे फेर रही ho.......idher देखो मेरी taraf......meri इन आँखों में......." और काव्य एक तुक राम की आँखों में देखने लगती हैं वहीँ राम कुछ नहीं बोल पता और बस काव्य के तरफ दुर्र से देखने लगता hain.........sharmindagi साफ़ उसके चेहरे पर झलक रही थी.........

" भले hi तुम मुझसे कभी कुछ नहीं बोल pawogey......ram..........magar मैं ाचे से जानती हूँ की तुम्हारी नज़रें बहुत कुछ कहती hain.........main पढ़ सकती हूँ तुम्हारी इन नज़रियों ko.........kya कहना चाहती हैं तुम्हारी ये nazrein........magar किसी चीज़ को अगर पाना हो तो उसके लिए संघर्ष करना बहुत ज़रूरी होता hain......aur मुझे पाने के लिए तुम्हें भी उसी रेखा से गुज़ारना padega..........aur जिस दिन तुम उस संघर्ष की रेखा को पार कर logey........us दिन काव्य तुम्हारी हो jayegi..........aur मेरा ये जिस्म भी तुम्हारा हो jayega.........main तुम्हें वो सब कुछ दूंगी जो मैं अब तक राहुल को देती आयी hoon.........ya उससे भी कहीं zyada......jo तुम कभी सोचे नहीं hogey........magar तुम्हारी भाभी बनकर nahin.............balki तुम्हारी गर्लफ्रेंड bankar.........is लिए बेकार का दिमाग इधर उधर लगाने के बजाये बेहतर होगा की तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो.........

ी वांट 100% result..........aur याद रखना अगर तुम्हारा रिजल्ट ख़राब हुआ तो मुझे पाना तो door.......main तुम्हें हाथ तक नहीं लगाने dungi..........so योर टाइम स्टार्टस now.....aab केवल एक हफ्ता बचा hain........aur मैं अब तुमसे बीच बीच में आकर मिल लिया करुँगी मगर न तुम मेरे कभी पास sowogey......aur न बेवजह कहीं बहार घूमने जाया karogey......main तुम्हें कुछ दिनों से नोटिस कर रही हूँ की तुम शाम को अक्सर बहार घूमने निकल जाते हो.........

तुम कहाँ जाते हो और किस्से मिलते हो मुझे उससे मतलब नहीं hain.........magar......aaj से तुम्हारा सब कुछ band.....bus तुम अपने पढ़ाई पर ध्यान do........warna ...........तुम्हें पता हैं आगे क्या hoga.........aab मैं चलती hoon........tumhein डिस्टर्ब नहीं karungi........aur haan.........time से आकर खाना खा लेना...... मैं तुम्हारा डाइनिंग टेबल पर इंतज़ार करुँगी......." और काव्य जैसे हुकुम सुनते हुए बहार की तरफ निकल जाती हैं वहीँ राम की जैसे सांसें अटक गयी thi.........durr से उसके चेहरे पर पसीने की चाँद बूँदें साफ़ झलक रही थी.......

उसके सरे अरमानों पर पर पानी फिर गया tha.......wo तो आज रात के हसीं सपने भी देखने लगा था मगर सब पल भर में ख़तम हो गया tha............aab उसके पास कोई दूसरा ऑप्शन नहीं बचा tha.......wo ाचे से जनता था की काव्य कितनी सख्त hain........aur वो चाहे कुछ हो जाये वो अपने जुबान से कभी नहीं mukregi..........agar उसे काव्य को पाना हैं तो आज से वो जी तोड़ मेहनत karega.....aur जैसा रिजल्ट उसे चाहिए वो उसे लेकर dega.........kavya ने उसे क्लास में फर्स्ट आने को थोड़ी न कहा tha.........wo तो उसे बस फर्स्ट क्लास से पास होने को बोली thi........aab वो फ़ौरन उठता हैं और उस लिफाफे को अपनी अलमारी के अंदर दाल देता हैं और उसे ाचे से छुपा देता hain......mood तो उसका पूरा ऑफ हो चूका था मगर अब मूड ऑफ करने से कुछ नहीं होने वाला था......

वो अपने किताबें लेकर बैठ जाता हैं और फिर सच्चे मुन्न से पढ़ाई करने लगता hain.........ek हफ्ते बचे थे उसके एक्साम्स ko....aur उसके अगले हफ्ते रिजल्ट भी आने वाले they........aab उसने रघु और जीतू से न मिलने का फैसला भी कर चूका tha....na वो उन लोगों से मिलेगा और न hi उसका दिमाग डिस्टर्ब hoga.......jissey वो अपना सारा ध्यान पढ़ाई पर फोकस कर सकेगा.........

राम को तो काव्य ने मन कर दिया tha......magar वो अब रघु को कैसे रोक सकती thi.........raghu तो खुद अब उसे अपने इशारों पर नचा रहा tha.......har रोज़ उसकी छूट में वो धीरे धीरे आग भरता जा रहा tha...........wahin काव्य हर रोज़ उसके जाने के बाद एहि सोचती की ये सब गलत hain......aab वो रघु के बारे में और कुछ नहीं sochegi........magar जब भी रघु उसके पास aata......uski सोच भी समय के साथ बदल जाती...........

आज रघु बहुत खुस tha.............aaj भी उसने काव्य को सडके करने का पूरा इंतेज़ाम कर लिया tha..........magar उसका ये प्लान कितना कामयाब होने वाला था ये बस आने वाला वक़्त hi बता सकता tha..............................dekhna था की आगे वक़्त कौन सा मोड़ लेने वाला था.......................

कंटिन्यू............................................................
 
अपडेट- 19(ा) (मेघा अपडेट)

आज रघु बहुत खुस tha.............aaj भी उसने काव्य को सडके करने का पूरा इंतेज़ाम कर लिया tha..........magar उसका ये प्लान कितना कामयाब होने वाला था ये बस आने वाला वक़्त hi बता सकता tha..............................dekhna था की आगे वक़्त कौन सा मोड़ लेने वाला था.......................

अब आगे..............................................................................

हमेशा की तरह रघु आज भी काव्य के बंगलो के तरफ चल पड़ता hain........usi हाल mein.......uski अंदाज़ mein.........aaj भी वो अपने मुँह में पान चबा रहा tha..........magar आज वो काव्य के बदन के साथ खेलना चाहता tha..........us सिलसिले को अब वो और आगे बढ़ाना चाहता tha.......kuch ऐसा करना चाहता था जिससे काव्य की छूट उसे हासिल हो sake.........magar उसे ये भी ख्याल था की ज़्यादा जल्दीबाज़ी करने से उसका बना बनाया काम भी बिगड़ सकता था.........

हमेशा की तरह काव्य आज भी जाकर मैं दूर खोलती हैं मगर आज रघु के चेहरे पर वो मुस्कान नहीं thi......balki एक गहरी मायूसी thi.......khamoshi thi..............jo काव्य की नज़रियों से नहीं चुप सकीय thi.........wo उसे एक तुक देखे जा रही थी वहीँ रघु अपना सर नीचे की तरफ झुकाये हुए सीधा बंगलो के अंदर आ जाता hain.........aab भी वो पूरी तरह से चुप चाप था........

" memsaheb......kya आज भी मुझे आपके हाथों का बनाया नास्ता मिल सकता हैं........" रघु अपना सर नीचे की तरफ झुकाये हुए धीरे से बोल पड़ता हैं वहीँ काव्य एक नज़र फिर से रघु की तरफ देखती हैं और धीरे से हाँ में अपनी गुर्दें हिला देती hain........fir वो फ़ौरन किचन में चली जाती हैं और उधर रघु कल वाले अंदाज़ में फिर से जाकर फर्श पर वहीँ बैठ जाता hain......aaj भी उसने लुंगी के अंदर अंडरवियर नहीं पहना हुआ tha.......jissey उसका कला लौड़ा साफ़ नज़र आ रहा था........

काव्य थोड़े देर बाद नास्ता लेकर आती hain.........jaise जैसे उसके कदम रघु की तरफ बढ़ रहे थे वैसे वैसे उसका कलेजा ज़ोरों से धड़क रहा tha......kal की साडी घटनाएं एक एक कर उसके दिमाग में फिर से घूमने लगी thi......raghu का कला मोटा लुंड एक बार फिर से उसकी नज़रियों के सामने घूम रहा tha.........jaise hi वो हॉल में आती हैं रघु को उसी अंदाज़ में बैठा हुआ देखकर एक बार फिर से उसका गाला सूखने लगता hain........chehrey पर शर्म की लखीरें झलक रही थी मगर आँखें उस काळा नाग का दीदार करना चाहती थी........

जैसे hi काव्य नास्ता देने के लिए रघु के सामने की तरफ झुकाती हैं एक बार फिर से उसकी निगाहें रघु की लुंगी के अंदर चली जाती hain.......ek बार फिर से उसे रघु का मोटा कला लौड़ा नज़र आने लगता हैं जो की हमेशा से उसके काळा झांटों के बीच घिरा हुआ tha.........sansein फिर से बेकाबू हो चली thi........kavya एक तुक उसकी लुंगी की तरफ देखे जा रही थी वहीँ उसकी छूट में एक बार फिर से गीलापन बढ़ने लगा tha......lumbi लुम्बी सांसें लेते हुए वो एक बार फिर से जाकर वहीँ सामने के सोफे पर बैठ जाती हैं और अपनी बेकाबू सांसों को काबू में करने की लगातार कोशिश करती hain........raghu ाचे से जनता था की इस वक़्त काव्य की क्या हालत हो रही hogi......wahin वो मुन्न hi मुन्न बहुत खुस tha........thode देर बाद काव्य कुछ नार्मल होती हैं वहीँ रघु आज चुप चाप से बैठा हुआ नास्ते की तरफ एक तुक देख रहा tha......raghu का ऐसा अंदाज़ उसे थोड़ा अजीब सा लग रहा था........

" tum......kuch कहते क्यों नहीं raghu.........aise चुप चाप से बैठे क्यों ho.........kuch हुआ क्या!!!!! " और काव्य धीरे से बोल पड़ती hain........halanki अभी भी उसकी जुबान पूरी तरह से उसका साथ नहीं दे रही थी मगर जैसे तैसे वो अपने बेकाबू सांसों को संभालती hain..........wahin रघु इस बार अपनी गुर्दें धीरे से ऊपर की तरफ उठता हैं और एक तुक काव्य के तरफ देखने लगता hain.....mayoosi साफ़ उसके चिहरे से चालक रही थी........

" क्या करूँ memsaheb.......aaj मुझे मेरी घरवाली की बहुत याद आ रही hain........kaash वो अगर ज़िंदा होती तो मैं उसे कसकर अपने गले लगा leta........usey एक पप्पी देता....... उसके गलों को चूम leta......magar....." और रघु फिर से खामोश हो जाता हैं वहीँ काव्य उसकी बाटिओं को सुनकर मुस्कुरा पड़ती हैं......

" ऐसा kyon........kal तक तो तुम उसे गालियां दे रहे they......bura भला कह रहे they...........fir आज उसपर इतना प्यार कहाँ से आ गया........" और काव्य आहिस्ता से बोल पड़ती हैं वहीँ रघु फिर से मायूस हो जाता हैं.........

" प्यार इस लिए आ रहा हैं मेमसाहेब क्यों की आज मेरी शादी की सालगिरह जो hain.........aaj एहसास होता हैं की औरत का घर में न होना क्या होता hain.......mard चाहे तो हर एक काम कर सकता हैं मगर कुछ काम ऐसे भी हैं जो सिर्फ औरत hi कर सकती hain........aur औरत के बगैर वो काम पूरा नहीं हो sakta........aap समझ रही हैं न मैं आपसे क्या कहना चाहता hoon........aap भी तो इतने बड़े घर में बिलकुल अकेली रहती hain.........kya आपको रात की तन्हाई में साहेब की याद नहीं सताती होगी.........

बिलकुल सताती hogi.........theek उसी तरह मैं भी हर रात अपने बीवी के लिए तड़पता हूँ memsaheb.........aapke तो पति हैं तो आपका तो काम चल jayega.....magar मेरा क्या!!!!!! मेरी बीवी तो दुबारा लौट कर कभी नहीं aayegi......mujhe तो पूरा जीवन हिलाकर hi यहाँ काम चलना padega.......aur मैं कर भी क्या सकता हूँ.........." और रघु वहीँ रोने लगता hain.......uski आँखों से चाँद बूँद आंसूं चालक पड़े थे जो उसकी गलों से वहीँ काव्य उसे अजीब नज़रियों से देखे जा रही thi......usey कुछ समझ में नहीं आ रहा था की वो रघु से क्या bole........aur उसकी बाटिओं का उसे क्या जवाब दे.........

" please.....tum रोना बंद karo.......mujhe ाचा नहीं लगता जभ भी कोई मेरे सामने ऐसे रोटा हैं........." और काव्य हौले से बोल पड़ती हैं वहीँ रघु अपने आँखों से आंसूं पूछता हैं मगर उसकी आँखों से आंसूं नहीं थमते......

" कोई इसमें कर भी क्या सकता हैं memsaheb........agar किस्मत में दुःख लिखा हैं तो एहि sahi.........mera दुःख और कोई नहीं बाँट सकता......." और रघु फिर से फुट फुट कर रोने लगता हैं वहीँ काव्य ख़ामोशी से बस रघु के तरफ देखे जा रही thi.......uska दिमाग काम नहीं कर रहा tha....wo सोच नहीं पा रही थी की रघु के इस प्रॉब्लम का वो क्या सलूशन nikale......kuch सोचकर वो अपनी जगह से उठती हैं और सीधा रघु के पास चल पड़ती hain........chand कदम चलने के बाद आखिर वो रघु के सामने जाकर वहीँ उससे थोड़ी दूर पर जाकर बैठ जाती हैं और उसके कन्धों पर हौले से अपना एक हाथ रख देती hain.....wahin रघु अपने आँखों से बहते आंसूं फिर से पूछने लगता hain.....aur एक तुक काव्य के तरफ आस लगाए देखता रहता हैं........

" चुप भी हो जाओ raghu.....jo बीत गया उसे तो अब बदला नहीं जा सकता naa........aab जो हैं जैसा हैं उसी से तुम्हें काम चलना hoga........aab तुम्हें अपनी ज़िन्दगी से खुद hi समझौता करना padega........tumhare लिए एहि बेहतर हैं....." और काव्य आहिस्ता से बोल पड़ती hain....wahin रघु के करीब बैठने से एक बार फिर से रघु का लुंड उसकी आँखों के सामने नज़र आने लगा tha.....wahin एक बार फिर से उसकी धड़कनें बढ़ने लगी थी.......

" आप सच में बहुत ाची हैं memsaheb..........jitni आप हसीं हैं उतना hi खूबसूरत आपका दिल भी hain.........magar .......कभी कभी सोचता हूँ की वो मुरर गयी तो ाचा hua........kyon की उसने कभी मुझे पति होने का कोई सुख नहीं diya.........agar जब भी मेरा जी चाहता की मैं कुछ ऐसा वैसा उसके साथ karun......to वो मुझे कण्रेय से साफ़ इंकार कर deti..........pata हैं क्यों!!!!! " और रघु इस बार हौले से काव्य के तरफ देखने लगता हैं वहीँ काव्य की सांसें पल पल बढ़ती जा रही thi........ek तरफ तो रघु उसे अपना लुंड दिखा रहा tha......wahin दूसरी तरफ वो धीरे धीरे उससे अश्लील बातें भी कर रहा tha...........kavya जैसी संस्कारी और पति व्रत औरत के लिए अब खुद को संभल पाना बहुत मुश्किल हो रहा tha.......bade मुस्खिलों से वो खुद को अपने आपको संभाले हुई थी........

" ककययययूँनंन्न...." और काव्य की जुबान जैसे लड़खड़ा सी जाती hain.....wahin वो अब लुम्बी लुम्बी सांसें ले रही thi........uski बेचैनी पल पल बढ़ती जा रही thi........wahin रघु काव्य की मनोदशा बहुत ाचे से समझ रहा था............

कॉन्टिनोएड...............................................................
 
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