Romance भंवर (पूर्ण) - Page 68 - SexBaba
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Romance भंवर (पूर्ण)

Update:-93

दोनों की खट्टी मीठी नोक झोंक जारी रही। स्वस्तिका को जिस परिवार का ना होना खलता रहा उसे वो मेहसूस कर रही थी, और अपने अरमान भी साझा कर रही थी।….

अगली सुबह कुंजल सोई हुई थी और ऐसा लगा जैसे उसका दम घुट रहा है। आंख बड़ी होकर खुल गई। पूरा मुंह प्लास्टिक के बैग के अंदर घुसा हुआ था। कुंजल छटपटा कर पूरा जोड़ लगा रही थी, लेकिन वो कुछ भी करने में असमर्थ थी, हाथ पाऊं वो पूरी ताकत से पटक रही थी लेकिन वो खुद की छुड़ाने में विफल थी।

स्वास्तिक उसके पास बैठकर यह सब कर रही थी और कुंजल उसे मारती और पिटती रही लेकिन स्वस्तिका ने तबतक नहीं छोड़ा जबतक वो खुद छोड़ना नहीं चाहती थी। जैसे ही स्वस्तिका ने उसे छोड़ा, कुंजल अपने चेहरे से पलास्टिक हटाकर खांसती हुई खुद की श्वांस की सामान्य करने लगी।

काफी देर तक हांफती हुई वो श्वांस सामान्य करती रही। जैसे ही कुंजल में थोड़ी जान आयी वो रोते हुए अपने दोनो हाथ पटककर स्वस्तिका को मारने लगी… "सुबह सुबह ऐसा कौन करता है… जरा भी दया या रहम है कि नहीं"…

स्वास्तिका:- रोना धोना हो गया हो गया हो तो 10 मिनट में ट्रेनिंग एरिया में।

स्वास्तिका के जाते ही कुंजल नाकी धुनते उसे 2-4 गालियां दी और मन मारकर ट्रेनिंग एरिया में पहुंच गई। सुबह के 4.30 बजे से 8.30 बजे तक के कड़े अभ्यास के बाद कुंजल के लिए विश्राम की स्तिथि हुई और वो वापस आकर हॉट शॉवर लेकर फ्रेश होने के बाद बिछ गई अपने बिस्तर पर और सोने लगी।

स्वास्तिका भी कॉलेज जाने के लिए जल्दी से तैयार हुई और जाने के क्रम में जब कुंजल को सोती हुई पाई, तब उसके पास जाकर प्यार से उसके सर पर हाथ फेरती वहां से निकल गई।

कॉलेज में वो जैसे ही पहुंची उसके फ्रेंड योगेश और शाहीन ने उसे घेर लिया… "तुम दोनों ने मेरा रास्ता क्यों रोका है।"

योगेश:- बिना बताए जाओ तुम और वो डॉक्टर का बच्चा मेरा रास्ता रोक..

शाहीन:- साला एक दिन तो मेरे हॉस्टल भी पहुंच गया था।

स्वास्तिका को रोककर दोनों ने मिलकर 10 मिनट तक कम से कम सुनाया होगा। स्वास्तिका दोनों को काफी देर तक झेलने के बाद…. "बस, फ़्री पीरियड में चलते है आज उसकी खैर नहीं।"

शाहीन और योगेश एक दूसरे को ताली देते हुए "येस" कहे, वहीं से तीनों चल दिए क्लास। आज एक्स्ट्रा क्लास की वजह से कोई फ्री पीरियड ना मिल पाने की स्तिथि में तीनों 4 बजे क्लास खत्म करके मिले और तीनों ही निकले डॉक्टर से मिलने। तीनों को एक साथ ब्वॉयज हॉस्टल के ओर आते देख डॉक्टर का एक दोस्त निर्मल तेजी से डॉक्टर के रूम में पहुंचा, और जोड़-जोड़ से दरवाजा खटखटाया… "क्या हुआ निर्मल, ऐसे पागलों कि तरह दरवाजा क्यों खटखटाया"…

निर्मल:- डॉक्टर माना किया था ना उसके फ्रेंड्स को मत कुछ करना आ रही है इधर ही, और हां उसके हाथ में रॉड भी है।

निर्मल तो अपनी बात हड़बड़ी में डॉक्टर से बोल दिया लेकिन उन दोनों की बात हॉस्टल के एक अन्य छात्र ने सुनी और वो इन दोनों के भागने से पहले ही, हॉस्टल के हर दरवाजे को पीटकर सब की आगाह करते हुए सुना दिया… "स्वास्तिका आ रही है रॉड के साथ।"

इधर डॉक्टर जबतक अपने ऊपर कपड़े डालकर वहां से निर्मल के साथ रफूचक्कर होने कि फिराक में था, इतने में हॉस्टल के बाकी छात्रों ने उसका रास्ता ही रोक लिया… "अरे सालों रास्ता छोड़ दो, वरना मुझ से अच्छा कोई ना होगा".. डॉक्टर जोर से चिल्लाते हुए कहा।

भीड़ में से एक लड़का…. "डॉक्टर अपने लफड़े खुद ही संभालो, तुम्हारे चक्कर में हम क्यों पीटें।"

निर्मल:- कमिने सालों, एक साथ इतने लड़के होकर एक लड़की से पिट जाते हो, शर्म नहीं आती।

भीड़ से दूसरा लड़का:- भोसडीके तो तुम दोनों कहां भाग रहे थे। साले हमरे माथे पर चूतिया लिखा है क्या? दोस्तों दोनों को किधर भी नहीं निकलने देना है। और इस साले निर्मल के कहने पर डॉक्टर ने स्वास्तिका के दोस्तों को परेशान किया था यह भी बताना है।"

"यहां आप सीनियर्स कि कोई मीटिंग चल रही है क्या सर।"… बॉयज हॉस्टल की छोटी सी आने जाने वाली गाली के सबसे पीछे खड़ी होकर स्वास्तिका न बड़े ही प्रेम से आवाज़ लगाई… सभी छात्र बीच का रास्ता खाली करते… "माते दोनों भागने के इरादे से थे इसलिए हमने इन्हे रोके रखा है।"..

स्वास्तिका:- हम खुश हुए… इसके बदले मै आप सबका कोई 1 छोटा सा काम कर दूंगी…

सभी छात्र एक साथ…. "बस हमारा 1 टॉपिक संभाल देना बहुत समझने की कोशिश कर रहे है लेकिन क्लेरिटी नहीं मिल पाई है।"…

स्वास्तिका:- ठीक है आज शाम जरा मै डॉक्टर से हिसाब किताब समेट लूं, फिर आप सभी सर लोग कल ऑडिटोरियम में मिल लीजिएगा.. किसी को कोई आपत्ती..

छात्र:- आप से कैसी आपत्ति..

स्वास्तिका:- तो ठीक है आप सब अपने अपने कमरे में चले जाइए, मै जरा डॉक्टर और उसके इस निकम्मे दोस्त से मिल लूं।

छात्र:- माते आप के लिए छोटी सी सूचना भी है, शाहीन और योगेश के टॉर्चर के पीछे निर्मल का हाथ है।

निर्मल:- देखो स्वास्तिका मुझे जाने दो वरना मैं यहां से कूद जाऊंगा…

तभी उन छात्रों में से 2 छात्र ने उस निर्मल को पकड़ा और पकड़ कर डॉक्टर के साथ कमरे में डाला.. बीच का रास्ता खाली था स्वास्तिका और उसके दोस्त सीधा पहुंचे उसके कमरे में… "निर्मल ज्यादा विरोध नहीं करोगे तो सस्ते में छूट जाओगे वरना मजबूरन मुझे वो पिछली बार वाली पिछ्वाड़ा लाल थेरेपी देनी होगी।"..

स्वास्तिका ने आते ही अपना प्रस्ताव रखा और निर्मल मान गया। शाहीन ने हरी मिर्च का थैला आगे बढ़ाते… "चल बेटा ये मिर्ची खा ले"..

निर्मल:- स्वास्तिका, देखो डॉक्टर बहुत मायूस था और तुम्हारा कोई पता नहीं था इस चक्कर में हम बस इन दोनों से तुम्हारे बारे में पूछने गए थे।

योगेश:- साले ये भी बता ना शाहीन को क्या बोला था। यदि कल तक स्वास्तिका का पता ना चला तो हमारी प्रेम कहानी इसके खड़ूस बाप को बता देगा।

शाहीन:- योगेश जुबान कुछ ज्यादा लंबी नहीं हो गई तुम्हारी। अब्बू के बारे में तुमने उल्टा बोला ना… बाद में मै तुमसे निपटती हूं।

योगेश:- "अरे वो फ्लो में निकल गया था शाहीन, तुम भी ना"… कहते हुए योगेश, शाहीन को गले से लगाया और शाहीन उसे झटकती हुई… "तुम तो दूर ही रहो फिलहाल योगेश मुझसे।"..

स्वास्तिका:- जी तो कर रहा है तुम दोनों को ही पहले हौंक दूं। जब देखो तब पागलों कि तरह दोनों कहीं भी लड़ाई तो कहीं भी रोमांस करने लग जाते हो। अब जरा शांत होकर खड़े रहो, और दोनों से हिसाब किताब करनें दो।

डॉक्टर:- कम से कम तुमसे तो अच्छे है। रोमांस और लड़ाई का बैलेंस तो बनाए है। तुम्हारी तरह बात-बात पर रोड तो नहीं निकाल लेते। लड़ाकू विमान..

स्वास्तिका:- डॉक्टर तुमसे जरा मै बाद ने निपटती हूं, पहले इस कंजर निर्मल से निपट लूं, जो तुम्हे उल्टे-सीधे सलाह देते रहता है।

डॉक्टर:- वो भी मेरा दोस्त है और इसने मुझे कोई भी सजेशन नहीं दिया, बल्कि मै खुद गया था शाहीन और योगेश के पास। मै दोषी हूं, मुझे मारो.. हट तू निर्मल, बहुत हो गई इसकी हिटलर गिरी..

स्वास्तिका:- ठीक है डॉक्टर चूंकि तुम गुस्से में हो, इसलिए अपने दोस्त से कहो कि हमारी सुकून के लिए ये 10 मिर्ची एक साथ चबा जाए। वरना अभी तुम्हारे लिए छोड़ तो दूंगी, लेकिन क्या हर वक़्त तुम इसके साथ होगे।

निर्मल:- डॉक्टर रहने दे, सिर्फ 10 ही मिर्ची तो है।

बेचारा 10 मिर्ची एक साथ मुंह में डाला तो, लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे आंख कान, नाक हर जगह से धुआं निकल रहा हो। मिर्ची खाते ही स्वस्तिका ने सबको यह कहकर वापस भेज दिया कि अब वो, वन टू वन डॉक्टर के साथ मैटर सॉल्व करेगी।

सबके जाते ही… "क्या है डॉक्टर ये सब हरकतें"..

डॉक्टर:- क्या है यार बिना बताए ऐसे कैसे जा सकती हो?

स्वास्तिका:- तो इसके लिए तुम उन दोनों को परेशान करोगे।

डॉक्टर:- सॉरी, पर मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। बताकर तो जाना था, तुम्हे कुछ अंदाजा भी है मेरी हालत का?

स्वास्तिका:- लो बाबा कान पकड़ती हूं, दिल को सुकून मिला या अब भी मुंह लटकाए रहोगे। ओ भारद्वाज सर, सुनिए तो.. ओ दीपेश भारद्वाज... अब मान भी जाओ।

डॉक्टर:- तुम्हे पता है कैसे काटे है मैंने ये 20-21 दिन, पागल सा हो गया था मै। तुमने मुझे एहसास दिलाया कि किसी को इतना ना चाहो की ज़िंदगी मुश्किल लगने लगे…

स्वास्तिका:- मतलब अब तुम इस सीख के बाद अपनी चाहत कम करने वाले हो। ठीक है डॉक्टर कोई बात नहीं।

दीपेश स्वास्तिका के दोनों गाल खिंचते… "इसे कहते है बात को अपने हिसाब से घूमना, बहुत ही कठोर दिल की हो तुम स्वास्तिका।"

स्वास्तिका:- अच्छा गर्लफ्रेंड इतने दिनों बाद लौटी है और तुम उसे दूरी बनाए हो, अब कठोर कौन है।

दीपेश:- सभी साले दरवाजे पर ही नजर डाले होंगे की हम दोनों क्या कर रहे है। कल का गॉसिप मसाला जो होगा इनका। शाम को मिलते है ना, आज सिर्फ मै और तुम।

स्वास्तिका:- नाह। अच्छे से तैयार होकर जल्दी से घर आओ, किसी से मिलवाना है।

दीपेश:- किससे..

"वो जब आओगे तब खुद ही देख लेना।"… स्वास्तिका जाते-जाते अपनी बात कहती चली और दीपेश सस्पेंस में उलझकर रह गया। इधर स्वस्तिका जब लौटी तब भी कुंजल सोई हुई थी। स्वास्तिका उसे जागती हुई चली गई चेंज करने, जबतक स्वास्तिका लौटी, कुंजल टेबल पर खाना लगाकर उसका इंतजार कर रही थी। "

"तुमने अभी तक खाया नहीं था।"… स्वास्तिका बैठती हुई पूछने लगी..

कुंजल:- बदन पूरा टूट रहा है दीदी, इतनी मेहनत तो भाइयों ने भी नहीं करवाई थी।

स्वस्तिका:- हम्मम ! कोई नहीं तुम्हे एक अच्छी मसाज की जरूरत है।

कुंजल:- मुझमें बाहर जाने की भी हिम्मत नहीं बची।

स्वास्तिका:- कोई नहीं थोड़ा सा खा ले, फिर मै चलती हूं तुम्हे एक मसाज देने।

कुंजल:- नहीं रहने दो दीदी, मै मैनेज कर लूंगी।

दोनों बहने थोड़ा सा खाकर उठ गई। स्वास्तिका उसे बिठाकर पहले तो उसके सर को अच्छे से मसाज की, फिर लगभग डेढ़ घंटे तक उसे बॉडी मसाज देती रही और साथ में एक्यूपंक्चर थेरेपी भी दी। मसाज के बाद तो कुंजल को मज़ा टाइप आ गया। कुंजल एक बार फिर स्टीम बाथ लेकर वापस आयी और स्वास्तिका के पास बैठती हुई…. "अब मै समझी की मेरे भाई मुझे सस्ती ट्रेनिंग क्यों दे रहे थे।"

स्वास्तिका, मुस्कुराती हुई… "अब कैसा लग रहा है।"..

कुंजल:- आह मज़ा आ गया दी, आपके हाथों में तो जादू है। वैसे मेरा काम हुआ या नहीं..

स्वास्तिका:- कौन सा काम कुंजल..

कुंजल:- मेरे जीजू से आज मुझे मिलवा रही हो ना आप..

स्वास्तिका:- धत तेरे की मै तो भूल ही गई।

कुंजल:- ओ भूल गई.. झुटी, जानबुझ कर नहीं कहा होगा। लेकिन कोई बात नहीं मुझे पीजी कर रहे स्टूडेंट दीपेश भारद्वाज का हॉस्टल पता है।

स्वास्तिका:- चोर कहीं की, मेरा पूरा डेटा चोरी कर गई।

कुंजल:- हीहीहीही… या तो आप फोन करके उनको यहां बुलाओ या फिर मै खुद ही मिल लूंगी…

इतने में ही दरवाजे कि घंटी भी बजने लगी…. "जाकर दरवाजा खोल और मिल ले अपने होने वाले जीजू से।"…

कुंजल ने जैसे ही दरवाजा खोला थोड़े कंफ्यूज होते पूछने लगी… "दीदी यहां तो जीजू के साथ तुम्हारी सौतन भी है।"..

शाहीन:- हेय तुम कुंजल हो राईट, हमारी स्वास्तिका की बहन..

कुंजल:- दीदी अब तो और भी कन्फ्यूजन बढ़ गया है.. ये तुम तीनों के बीच चल क्या रहा है? यहां एक हॉट सी मॉडल "हमारी स्वास्तिका" कह रही है।

तभी पीछे से स्वास्तिका उसे एक हाथ मारती.. "झल्ली कहीं की.. ये दोनों तो मेरे दोस्त है। ये हैं शाहीन और ये है योगेश। पर तुम दोनों यूं अचानक.. आओ अंदर आओ।

शाहीन:- मुझे डाक्टर का फोन आया था उसने कहा तुम्हारी तबीयत खराब है।

"बहुत ही चालक हो गया डॉक्टर।" .. स्वस्तिका अपनी जगह से उठी और दरवाजे के खोल कर पैसेज में निकली… बाएं साइड में ही दीपेश खड़ा था… "यू डॉक्टर, बहुत ही चालक हो गए हां।"

दीपेश:- अब तुम जैसी खरनाक गर्लफ्रेंड मेनटेन करना है तो कदम फूंक-फूंक कर रखना ही परता है।

"हट पागल, आओ अंदर।"… दोनों हंसते हुए अंदर चले। अंदर हॉल में जबतक कुंजल स्वास्तिका के दोस्तों से बात करना शुरू ही की थी। जैसे ही स्वास्तिका के चेहरे की हंसी और साथ ने दीपेश दिखा, कुंजल को समझते देर न लगी।

वो भागकर दीपेश के पास पहुंची और उसका हाथ थाम कर कहने लगी…. "दीदी आज के शाम इन्हे मैंने बुक कर लिया है, आप लोग आपस में बातें करो, और आप चलिए मेरे साथ।"

दीपेश कुंजल के साथ चलते हुए स्वास्तिका से इशारों में पूछने लगा… "ये कौन है।"… स्वास्तिका भी उसे हाथों के इशारे में समझते हुई बताने लगी "छोटी बहन है।".. स्वास्तिका अाकर अपने दोस्तों के पास बैठ गई और कुंजल दीपेश के साथ।

कुंजल अपना हाथ आगे बढ़ाती हुई… "हेल्लो मिस्टर होने वाले जीजू, मै आपकी इकलौती साली, कुंजल।"..

दीपेश भी हाथ मिलाते…. "बहुत खुशी हुई तुमसे मिलकर कुंजल"

कुंजल:- तो दीपेश सर जरा, हमे भी अपनी प्रेम कहानी सुनाएं कि दोनों में आखिर प्यार कैसे हुआ..

दीपेश:- क्यों स्वास्तिका ने तुम्हे नहीं बताया क्या?

कुंजल:- दीदी से बातें करने के लिए मेरे पास हजार बातें है सर, कुछ तो आपसे भी बात करने के लिए टॉपिक चाहिए ना। तो बिना देर किए शुरू हो जाइए।

कुंजल:- दीदी से बातें करने के लिए मेरे पास हजार बातें है सर, कुछ तो आपसे भी बात करने के लिए टॉपिक चाहिए ना। तो बिना देर किए शुरू हो जाइए।
 
Update:-94

दीपेश:- "हम दोनों में से कोई भी ये नहीं बता सकता कि हमारे बीच लगाव कैसे हो गया। हमे पता ही नहीं चला कि कब हम करीब आ गए। हमारी पहली मुलाकात तकरीबन 4 साल पहले हुई थी। तब मै एमबीबीएस थर्ड ईयर में था और स्वास्तिका न्यू एडमिशन थी।"

"बिलो एवरेज सी दिखने वाली एक लड़की जो खुद में ही खुश रहती थी। उसपर बहुत ज्यादा किसी का ध्यान नहीं जाता था, लेकिन हमने उसके पूरे बैच को बहुत परेशान किया था। खासकर उसकी दोस्त शाहीन को, पूरे बैच कि टॉप मॉडल थी वो।"

"वैसे हम तो बस सामान्य रैगिंग और शाहीन के लिए हल्के-फुल्के कमेंट पास करते थे। उसी बीच एक दिन फाइनल ईयर के हमारे सीनियर्स ने शाहीन को बुरी तरह छेड़ दिया था। एक्सप्लेन नहीं किया जा सकता, वो कितना बुरा था। शाहीन तो जैसे पूरी तरह से सदमे में चली गई थी और एकमात्र लड़का योगेश बीच बचाव में आया, जिसकी टांगे सीनियर्स ने तोड़ डाली। और उसी शाम की बात की है, एक कहर बरसा था पूरे हॉस्टल में।"

"स्वास्तिका के साथ तुम्हारा भाई आरव भी था। केवल यही 2 लोग थे और हाथ में रॉड लिए पहले हमारे सीनियर के हॉस्टल में घुसे। हर एक कमरे में घुसकर जो ही पिटाई कि उनकी। जो शामिल थे उन्हें उसके कर्मो के लिए पिटाई परी थी और जो नहीं शामिल थे उन्हें चुपचाप खड़े होकर तमशा देखने के लिए।"

"उनकी पिटाई के बाद ये लोग थर्ड ईयर के हॉस्टल में घुसे, फिर वहां एक तरफ से सबको हौकना शुरू किया। आज भी वो मंजर पूरे हॉस्टल को याद है। इनकी बेरहम पिटाई देखकर कई लड़के तो फर्स्ट फ्लोर से कूद गए। तुम्हारी बहन और भाई ने पुलिस स्टेशन में भी खूब पैसे खिला आए थे, इसलिए नहीं कि उन्हें कोई पकड़कर ना ले जाए, बल्कि इसलिए कि जबतक ये दोनों भाई-बहन पिटाई कर रहे हो, तबतक उन्हें कोई परेशान ना करे।"

"3 घंटे तक दोनों का कहर बरसा था। फर्स्ट ईयर, थर्ड ईयर और फाइनल ईयर के हॉस्टल में घुसे थे दोनों। क्या लड़का, क्या लड़की, हर तमाशा देखने वालो को पीटा था। 5 मुख्य लड़के जो इस मामले को अंजाम दिए थे, उन पांचों को पीटने के बाद कैंपस के बीचों बीच टांग कर सख्त वार्निंग देते गए थे.. "कल जबतक पूरा कॉलेज इनका जुलुश ना देख ले, उससे पहले यदि किसी ने इनको उतरा तो उनसे ये दोनों प्रिसनली मिलेंगे।"

"पुलिस आयी इनको लेकर भी गई। सबको लगा था कि इतने बड़े-बड़े लोगों के बच्चों पर हाथ डाला है, दोनों तो अच्छे से लपेट लिए जाएंगे। लेकिन अगले दिन स्वास्तिका फिर से कॉलेज में दिख गई। 400 लोगों पर खौफ बरसा था तुम्हारी बहन और भाई का, केवल मै और मेरा दोस्त निर्मल बच गए थे।"

"कुछ दिन बाद जब मै लौटा और स्वास्तिका के बारे में सुना तब मुझे यकीन नहीं हुआ। यहां से शुरवात हुई थी स्वास्तिका को जानने की मेरी जिज्ञासा। मै अक्सर उसके आसपास मंडराता रहता, लेकिन उसने मुझपर कभी ध्यान नहीं दिया, ऐसा मुझे लगता था।"

"स्वास्तिका पहले ईयर से ही लेडी डॉन के नाम से मशहूर हो गई। साल दर साल निकलते चले गए। जिसे जानने की जिज्ञासा थी, अब उसे देखे बिना दिल नहीं लगता था। मेरा दोस्त निर्मल जो मेरे साथ रहता था, वह अक्सर मुझे कहता भी था कहां उस थकेली के पीछे परा है जबकि एक से बढ़कर एक लड़कियां है कॉलेज में। लेकिन मुझे तो वहीं चेहरा पसंद था, फिर और कभी कोई अच्छी लगी ही नहीं।"

"मज़े की बात जानती हो कुंजल, स्वास्तिका सेकंड ईयर के आखरी में थी, जब हमारा कॉलेज फंक्शन था। तब वो पहली बार बन सवर कर आयी थी। आज से पहले वो अपने चेहरे कर क्या पोत कर आया करती थी पता नहीं, लेकिन जब वो अपने चेहरे से वो पुराने स्वास्तिका के मास्क उतार कर आयी, कॉलेज में उसे कोई पहचान नहीं पाया।"

"लेडी डॉन को कोई भी पहचान नहीं पाया था और ऐसा लग रहा था पूरा कॉलेज ही उसके पीछे पड़ा हुआ है। उस दिन मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। मै योगेश और शाहीन का पीछा कर करके पूरा मायूस हो चुका था, लेकिन स्वास्तिका की एक झलक नहीं मिली।"

"ऑडिटोरियम में भी मै निर्मल के पास चुपचाप ही बैठा रहा। तभी स्वास्तिका वहां पहुंची और अपने ही अंदाज़ में निर्मल को उठकर कहीं और जाने बोली। वो ठीक मेरे पास बैठी थी, और आसपास के लोग नई स्वास्तिका से बात करने में लगे थे और मेरी नजर अपनी स्वास्तिका को पूरे ऑडिटोरियम में ढूंढ रही थी। 2 साल हो गए थे लेकिन मै कभी उससे बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था। मैं मायूस और उदास बैठा था तभी मेरे कानो में वो सब्द पड़े… "क्यों डॉक्टर आज थोड़े मायूस दिख रहे, बात क्या है?"

"उसकी आवाज़ जब कानो में पड़ी, मेरे चेहरे पर मुस्कान वापस आ गई, और मुड़कर जब देखा तो होश उड़े थे। आखों की यकीन नहीं हो रहा था, यह वही बीलो एवरेज लड़की है, जिसका मै दीवाना हूं। उसे देखने के बाद एक बार फिर मायूसी आ गई मेरे चेहरे पर, शायद यह बात स्वास्तिका ने भांप लिया और मुझसे कहने लगी…. "क्यों डॉक्टर हिम्मत नहीं जुटा पा रहे क्या परपोज करनें की।"..

"क्या ही बताऊं मेरा क्या हाल था उस वक़्त। कहना तो बहुत कुछ चाहता था उसे, लेकिन मेरे जुबान ने साथ नहीं दिया, लेकिन हाल-ए-दिल उसे सब पता था, और उसके दिल का हाल भी कुछ अपने जैसा ही था। अब तो बस एक ही फीलिंग रहती है, एक बस वो मिल गई अब भगवान से और कुछ नहीं चाहिए।"

कुंजल:- वाउ .. मतलब दोनों के दूसरे को पूरे शिद्दत से चाहते हो। तो बताओ आप कब आ रहे हो मां से शादी की बात करने।

दीपेश:- मै तो कब से तैयार ही हूं, लेकिन तुम्हारी बहन यह कहकर टाल जाती है कि अभी जल्दी क्या है?

कुंजल:- ठीक है आज से हम दोनों एक टीम में, आओ मेरे साथ बाहर..

दीपेश:- लेकिन तुम करने क्या वाली हो…

"आप चलो तो सही, इतना घबरा क्यों रहे हो।"… कुंजल दीपेश का हाथ खींचकर बाहर ले जाने लगी… जैसी ही कुंजल हॉल में पहुंची…. "दीदी ये क्या नाटक लगा रखा है।"..

स्वास्तिका:- कुंजल अंदर से तू जो भी सोचकर आयी है, उसपर हम अकेले में बात करेंगे ठीक है।

कुंजल:- ठीक है दीदी… पक्का ना, बात को टाल तो नहीं दोगी ना।

स्वास्तिका:- हां बाबा पक्का। अब आजा इधर दीपेश से ही केवल मिलेगी क्या, इनसे भी तो मिल लेे थोड़ा, और डॉक्टर साहब थोड़ा सी सफाई देंगे की आपने इन दोनों की एक शाम क्यों बिगड़ दी?

दीपेश:- मुझे लगा तुमने कहीं कोई खतरनाक सरप्राइज प्लान ना की हो, इसलिए बतौर सेफ्टी मै इन दोनों को मनाकर पहले यहां भेज दिया।

स्वास्तिका:- डॉक्टर आज भी तुम और तुम्हारे दोस्त केवल मेरी बहन की वजह से बच गए। ये मेरे पास है, तो लगता है कि क्यों झगड़ा करके मै अपना मूड खराब करू। फिर मै छोटी के पास खराब मूड से पहुंचूं। वरना खैर नहीं थी तुम्हारी..

कुंजल पहली बार स्वास्तिका के माहौल को भी देख रही थी। स्वास्तिका पूरी खुशमिजाज थी, जिसकी झलक वो दिल्ली में तो देख ही चुकी थी, यहां मुंबई में तो उस मिजाज में और भी निखार आ गए थे। खाते-पीते और खट्टे-मीठे नोक झोंक के साथ कब शाम बीती, पता भी नहीं चला।

अगली सुबह फिर से वही सब कुंजल के साथ दोहरा रहा था। एक बार फिर कुंजल वैसे ही छटपटाई और जब दम घुटने लगा तब स्वास्तिका ने कुंजल को छोड़ दिया। आज भी उसके चेहरे पर वहीं गुस्सा था लेकिन श्वांस सामान्य होने के बाद कुंजल ने खुद के गुस्से पर काबू किया और शांति से पूछने लगी… "उपाय बताइए"..

स्वास्तिका:- पहला उपाय यही है। गुस्सा हो, डर हो या घबराहट। कोई भी ऐसी बात जो मन को बेचैन करे पहले अपने दिमाग को नियंत्रित रखो। जान जाने की स्तिथि में सबसे बड़ी जो गलती होती है..…. एक तो श्वांस वैसे ही टूट रही होती है, ऊपर से फालतू की कोशिश शरीर कि बची ऊर्जा भी खत्म कर देती है। इसलिए जब भी जान जाने की स्तिथि लगे, अपने दिमाग को नियंत्रित करके केवल एक छोटा सा हमला करो। ऐसा हमला जो मजबूत से मजबूत शिकारी को भी चौंका दे। मकसद केवल और केवल चौकान होना चाहिए, ताकि छोटी सी कोशिश में काम बन जाए… आओ मेरे साथ कुछ दिखाती हूं…

कुंजल और स्वास्तिका दोनों ट्रेनिंग एरिया में पहुंचे जहां स्वास्तिका ने उसे टेक्नोलॉजी के साथ आर्टिफिशियल नाखून की ऐसी सीरीज दिखाई की उसका दिमाग घूम गया। कुंजल को पहली बार एहसास हो रहा था कि एक नाखून से कितना कुछ किया जा सकता है। सीखने के लिए तो सारा जहां परा है, बस सीखने कि चाह होनी चाहिए और कुंजल के अंदर भी कुछ नया सीखने की जिज्ञासा जाग उठी थी।

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राजस्थान, वीरभद्र का गांव...

ट्रेनिंग का पहला चरण पार्थ ने शुरू कर दिया था। भ्रम जाल फैलाना और सामने होकर भी छिपे रहने की कला को वीरभद्र बारीकी से समझ रहा था। वह एक बेहतरीन स्नाइपर था इसलिए सबसे पहले इसी विषय को उठाया गया कि कोई दूसरा स्नाइपर जब कहीं दूर से निशाना ले रहा हो, तब खुद का बचाव कैसे किया जाए।

भ्रम जाल की इस कड़ी में वीरभद्र के दिमाग की नशें हिल गई। कुछ सुरवाती भौतिक विज्ञान की जानकारी के बाद, जब आइने के प्रयोग वीरभद्र सुना, तो उसे ऐसा लगा जैसे अभी स्नाइपिंग में बहुत कुछ सीखना बाकी है। दूसरे स्नाइपर से बचने की कड़ी में आइने के प्रयोग को समझाने के बाद, पार्थ ने वीरभद्र को एक माइक्रो डिवाइस का प्रयोग भी सिखाया, जिसमे दूसरे स्नाइपर से बचने के लिए "बॉडी टारगेट डेविएशन" प्रोग्राम किया गया था, जहां इस डिवाइस की मदद से किसी के इंसान की वास्तविक स्थिति को वर्चुअली कुछ इंच का हेर-फेर किया जा सकता था।

पहले चरण के सेशन के बाद फिर दोनों फिजिकल एक्सरसाइज और "लौंग एंड शॉर्ट रेंज" टारगेट प्रैक्टिस करने लगे। निम्मी भी दोनों को छिपकर ट्रेनिंग करते देख रही थी और अपने काम कि बातों पर पूरा ध्यान दे रही थी। दिन के खाने के बाद फिर आया निम्मी के इंग्लिश क्लास की बारी।

बेचारा पार्थ डरा सहमा सा उसके सामने बैठा बिना अपने नजरें ऊपर किए उससे मूलभूत चीजें समझा रहा था। इसी क्रम में एक बार पार्थ की नजर जैसे ही ऊपर गई, निम्मी उसे टोकती हुई कहने लगी…. "आखें ही निकाल लूंगी दोबारा अगर नजर ऊपर करने के भी कोशिश किए तो।"

पार्थ:- सॉरी वो मैं नहीं चाहता था, लेकिन गर्दन अकड़ गई थी इसलिए ऊपर करनी पड़ी।

निम्मी:- अकड़ी गर्दन के साथ जिंदा रहा जा सकता है लेकिन गर्दन ही उतार गई फिर क्या करोगे।

बेचारा पार्थ दोबारा कुछ नहीं बोला और अपने काम में वो लग गया। आधे घंटे की क्लास खत्म होने के बाद निम्मी उसे टोकती हुई कहने लगी… "मुझे तुमसे कुछ सीखना है उसके लिए मुझे नियमित समय चाहिए।"

पार्थ:- ठीक है शाम के 4 बजे से शुरू करेंगे… एक दिन के ट्रेनिंग के बाद तय कर लेंगे की आगे का समय कितना लगना है।

निम्मी:- ठीक है, मुझे कार चलानी भी सीखनी है।

पार्थ:- कुछ ज्यादा ही तुम तो उम्मीद लगाए बैठी हो।

निम्मी:- एक ही विकल्प है इसलिए आश्रित होना पड़ता है, वरना घटिया लोग मेरे आसपास भी हो तो मुझे कतई बर्दास्त नहीं होता।

पार्थ:- यह कुछ ज्यादा नहीं हो रहा। तुम्हे नहीं लगता कि तुम कुछ ज्यादा ही बोल रही हो।

निम्मी:- हम्मम ! ये भी सही है, जितनी कम बातें और ज्यादा से ज्यादा काम कि बातें हो, वहीं फायदेमंद है। ठीक है मै कोई निजी बात नहीं करूंगी। कार कब सीखा रहे हो।

पार्थ:- अभी चलो। पहले ड्राइविंग फिर कला..

निम्मी:- ठीक है। तुम गाड़ी निकालो जबतक मै तैयार होकर अाई।

पार्थ गाड़ी निकालने चला गया और निम्मी तैयार होकर उतरी। निम्मी का चिढ़ पार्थ पर देखने को बनता था। पार्थ आगे बैठकर ड्राइविंग कर रहा था और निम्मी पीछे से बैठकर सीख रही थी। लौटते वक़्त जब लगा की निम्मी को खुद से कोशिश करनी चाहिए, फिर वो गांव के पास अपनी कार कुछ दूर ड्राइव करती अपने घर तक लाई।

पार्थ उसके सीखने कि ललक को बहुत ही गहराई से आकलन कर रहा था। ट्रेनिंग एरिया में भी निम्मी बहुत ही सधी और अपने जरूरतों कि चीजें सीखने में ज्यादा रुझान रख रही थी। जिसमे वो चाकू से क्लोज रेंज कॉम्बैट में अपने मूव्स को और कितना इफेक्टिव कर सकती है, उसपर विशेष ध्यान दे रही थी।

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पार्थ और स्वास्तिका, यूं तो वीरभद्र और कुंजल को 3 महीने में अपने दिए लक्ष्य तक सिखाने में उन्हें लगे हुए थे, लेकिन कुंजल और वीरभद्र को सिखाने के क्रम में, वो दोनों भी बहुत कुछ सीख रहे थे। जहां एक ओर पार्थ क्लोज कॉम्बैट में चाकू और खंजर के प्रयोग को अपने अंदर उतार रहा था, वहीं स्वास्तिका कुंजल से वो हाथ की सफाई सीख रही थी, जिससे आज तक सभी घरवाले अनजान थे।

हर दिन के साथ सबकी ट्रेनिंग में ज्यादा ही निखार आ रहा था। कुछ सीखने कि ललक ऐसी थी इन लोगों में कि ये सभी 2 दिन का ट्रेनिंग शेड्यूल एक दिन में पूरा कर रहे थे। वहीं अगर इन सबमें निम्मी की चर्चा हो तो वो 3 दिन का शेड्यूल 1 दिन में कवर कर रही थी, हां बस थोड़े संयम की कमी थी उसमें और जल्द ही किसी बात को लेकर गुस्सा हो जाया करती थी।

एंगेजमेंट को 28 दिन हो चुके थे, इस दौरान हर कोई पाने आज को खुशियों में जीते हुए, कल की तैयारियों में लगे हुए थे। अपस्यु से केवल नंदनी की लगातार बातें हुआ करती थी बाकी सबको शक्त हिदायत थी कि कुछ ज्यादा ही जरूरी हो तो ही संपर्क करने। 2014 की जुलाई भी लगभग अपने समापन के ओर थी और अपस्यु का एक छोटा सा संदेश ऐमी के पास पहुंचा। ऐमी उस संदेश को देखती हुई खुद से ही कहने लगी…. "ना जाने कब से इसका इंतजार था… लव यू.. उम्माह"…
 
Horror story ka socha nahi hai... Haan lekin apne pass kahaniyan bahut hai bhuton ki (dadi ki kahaniyan jo hume sunaya karti thi) .. to un kahaniyon me thode bahut thrill ke sath pesh ki ja sakti hai story ... Lekin abhi filhaal nahi... Abhi focus idhar...

Dusri baat ye ki koi bhi aakhri sach nahi hota isliye maine niche ka kuch padha hi nahi aur aap ne kya likhe wo maine dekha hi nahi :D
 
Update:- 95..

एंगेजमेंट को 28 दिन हो चुके थे, इस दौरान हर कोई पाने आज को खुशियों में जीते हुए, कल की तैयारियों में लगे हुए थे। अपस्यु से केवल नंदनी की लगातार बातें हुआ करती थी बाकी सबको शक्त हिदायत थी कि कुछ ज्यादा ही जरूरी हो तो ही संपर्क करने। 2014 की जुलाई भी लगभग अपने समापन के ओर थी और अपस्यु का एक छोटा सा संदेश ऐमी के पास पहुंचा। ऐमी उस संदेश को देखती हुई खुद से ही कहने लगी…. "ना जाने कब से इसका इंतजार था… लव यू.. उम्माह"…

अपस्यु लौट आया है इस बात की खबर किसी को नहीं थी सिवाय ऐमी के। दोनों एयरपोर्ट से ही साथ थे…. "तो क्या सब प्लान है मैडम के"

ऐमी:- पहले ठीक से तुम्हे देखने तो दो अपस्यु, जब से यूएसए से लौटी हूं, तुम्हे बहुत मिस कर रही थी।

अपस्यु, ऐमी की बात पर खामोश रहा, और बिना कुछ बोले बस "हम्मम" करके रह गया… "क्या हुआ, अचानक खामोश क्यों हो गए। बात क्या है अपस्यु।"..

अपस्यु:- अंदर गिल्ट फील हो रहा है।

ऐमी, मुस्कुराती हुई…. "इतना नहीं सोचते, निजी ज़िंदगी को अपने काम से दूर रखा करो। और हां स्माइल प्लीज"..

अपस्यु:- जी बिल्कुल। खैर छोड़ो ये सब, मुझे बताओ इस बीच क्या सब हुआ?

ऐमी:- पहला तो राजीव मिश्रा पागल हो गया था, वो सुसाइड मिशन पर निकला था। किसी तरह समझा बुझाकर उसे अपने पोस्ट पर काबिज करवाया। तुम्हे याद है वो झींगुर नील, जिसे तुमने डिस्को में मारा था, बेचारा बहुत डिप्रेस लग रहा था, उसे उसके बाप के मर्डर कि कहानी भी बताई। इसके अलावा बस तुम्हारा इंतजार…

अपस्यु:- मिश्रा तो अपना कर्मा झेलेगा। अच्छा की उसे बचाकर, वरना सस्ते में छूटने कि तैयारी कर रहा था। हां लेकिन वो नील अपने काम आ सकता है। उसपर नजर बनाए रखना।

ऐमी:- येस बॉस। अपस्यु… सुनो तो…

अपस्यु:- हां सुन रहा हूं…

ऐमी:- और कब तक ये ऑफिशयल बातें चलेगी…

दोनों बात करते जबतक तीसरे फ्लैट, कनॉट प्लेस के पास वाले मुक्ता अपार्टमेंट मे पहुंच गए थे। कार पार्क करने के बाद दोनों चल दिए… "बताओ ना अपस्यु, और कितनी देर ऑफिशयल बातें चलेंगी…

अपस्यु उसका हाथ पकड़कर खिंचते हुए अपने बाहों में लेकर गोद में उठाया और उसके होटों को चूमते हुए कहने लगा…. "अब बातें कर सकता हूं ऑफिशली, या अब भी कोई परेशानी होगी।"

ऐमी भी अपस्यु के गले में हाथ डालकर उसके होंठ को चूमती हुई कहने लगी… "हां ऐसे कोई परेशानी नहीं होगी। तुम चाहो तो पूरे दिन कोई भी बातें कर सकते हो।"..

अपस्यु उसे गोद में उठाए ही फ्लैट के अंदर पहुंचा.. "ऐमी, आज रुल ब्रेक कर दे क्या?"

ऐमी मुस्कुरा कर अपस्यु के चेहरे को पढ़ती हुई कहने लगी… "नीचे उतारिए सर, थोड़ी सी छूट क्या दे दी, आप तो नियम भंग करने पर उतर आए"..

अपस्यु ऐमी को नीचे उतारते हुए… "शर्म तो नहीं आयी होगी ना यह कहते हुए"..

ऐमी:- इस मामले की बॉस मै हूं अपस्यु और तुम्हे मेरे फैसले के खिलाफ कुछ भी बोलने का कोई हक नहीं..

अपस्यु, ऐमी की आंखों में झांकते हुए कहने लगा… "बहुत ही शरारत तुम्हे सूझ रही, अभी बताता हूं।"

अपस्यु अपनी बात कहकर ऐमी के ओर झपटा ही था, कि ऐमी पीछे हटती… "अन्ह हां ! ऐसे कैसे… आप अगर 12 साल से ट्रेनिंग कर रहे हैं सर, तो मै भी उतने ही वक़्त से कर रही हूं… जोर जबरदस्ती से काम नहीं बनेगा बाबू।"

अपस्यु:- ऐसी बात है क्या.. मतलब मुझे सिर्फ जोर आजमाइश के लिए मिस किया जा रहा था….

ऐमी, ट्रेनिग एरिया के ओर अपनी कदम बढ़ती अपने ऊपर के ढीले कपड़े निकाल कर ट्रेनिंग के टाईट कपड़ों में आती… "मै तो पहले से तैयार होकर भी आयी हूं। आ जाओ, तुम जोर लगाना और तुम्हे मै, आजमा तो लूंगी ही।"…

अपस्यु भी तेजी से ट्रेनिंग एरिया में अपने कदम बढ़ाते… "एक बार और सोच लो।"..

ऐमी:- मामला बातों से नहीं सुलझने वाला अपस्यु, और ना ही मै तुम्हारी बातों में आने वाली। रुल ब्रेक करना है तो पहले मुझे जितना होगा।

अपस्यु तेजी से ऐमी के ओर दौड़ लगाते हुए… "बदमाश कहीं की, मुझ से ही चालाकी।"..

ऐमी दौड़कर अपने हाथो में रोड उठती…. "कम ऑन बेबी, आई एम् रेडी।"..

अपस्यु भी तेजी से दौड़कर उसके पास पहुंच रहा था… ऐमी बिना कोई परवाह किए अपने हाथो का रॉड चला चुकी थी, और वो जानती थी कि आगे क्या होने वाला है, इसलिए दूसरे हाथ के रॉड को पहले से तैयार रखी थी। उसे यकीन था कि अपस्यु बचने के लिए या तो राइट मूव करेगा या फीर नीचे स्लाइड…

जैसे ही अपस्यु पर हमला हुआ, वो हमले को अपने कंधे पर झेलते हुए, ऐमी का हाथ पकड़ लिया और तेजी के साथ खुद उसके पीछे पहुंचकर, उसका हाथ पीछे की ओर मोड़ते हुए, उसके कानों के नीचे चूमते हुए… "इतना आसान नहीं मुझे प्रिडिक्ट करना बेबी।"

"ऐसी बात है क्या?".. ऐमी मुस्कुराती हुई अपनी बात कही और हवा में जैसे वो 360⁰ का फ्लिप करती थी, ठीक उसी प्रकार से फ्लिप करती वह अपस्यु के सर पर बैठ चुकी थी और अब स्तिथि उल्टी होने वाली थी, क्योंकि ऐमी का हाथ अब सीधा होकर ऊपर अपस्यु के सीने पर था। बिना देर किए ऐमी पीछे के ओर एक और फ्लिप ली, और मजबूरी में अपस्यु को अपना हाथ छोड़ना परा।

अपस्यु क्लैप करते…. "कमाल कर दिया तुमने।"..

ऐमी:- शुरू में ही बोली थी रुल तोड़ने के लिए पहले जितना होगा..

अपस्यु:- हम दोनों जानते है, इस फाइट के बाद हम रूल तोड़ने लायक ही नहीं बचेंगे।

ऐमी:- ओह मेरा बच्चा, मायूस हो गए.. अच्छा एक कोशिश तो कर लो कम से कम…

अपस्यु:- नहीं करनी कोशिश। घर ही चला जाता हूं… उस रात भी मैंने कहा चलो सेलिब्रेट करते है .. सिर्फ मै और तुम, तब भी नखरे और अब भी नखरे। दिखाती रहो नखरे, मै जा रहा हूं। बाद में कहती रहना आज मेरा मूड हो रहा है, फिर बताऊंगा…

ऐमी:- बोल तो ऐसे रहे हो जैसे एंगेजमेंट के अगले दिन मैंने अपनी इक्छा जाहिर की और तुमने मान लिया था। बताओगे क्या, पहले ही बता चुके हो। इसलिए ये भावनात्मक कोशिश की समझ है मुझे की किस मकसद से कहे जा रहे है। अच्छी कोशिश थी लेकिन मै इमोशनल ब्लैकमेल नहीं होने वाली। या तो कोशिश कर लो हराने की या फिर भूल जाओ की इस वक़्त मै किसी भी तरह के मूड से हूं, सिवाय तुम्हे परेशान करने के…

अपस्यु:- मेरा मूड नहीं अभी कोशिश करने की, आ जाओ बहुत परेशान कर ली।

ऐमी "हिही" करती हुई अपस्यु के पास पहुंची और उसे अपने गले से लगाकर भींचती हुई कहने कान में धीमे से कहने लगी… "अभी मेरी बायोलॉजिकल कंडीशन नहीं है, समझे बुद्ध।"… अपस्यु, ऐमी को खुद में और समेटकर उसके गले पर अपने दांत के निशान देते हुए कहने लगा… "सॉरी मुझे याद नहीं रहा।"..

दोनों अलग होकर एक दूसरे को हंसते हुए देखने लगे और होंठ से होंठ लगाकर चूमते हुए एक दूसरे के गले में हाथ डालकर खोते चले गए…. "आह ! तुम नौटंकी बंद करोगे अपस्यु।"…

"जो भी बात करनी है वो किस्स करते हुए करो".. अपस्यु अपनी बात कहते हुए जैसे ही होंठ आगे बढाने लगा, ऐमी बीच मे अपनी उंगली लगाती… "तुम अपने हाथ फिर ऊपर बढ़ाओगे और मुझे उत्तेजित करने की कोशिश करते रहोगे इसलिए नो मोर किस्स। कोई काम, प्लान करके आए हो तो बता दो 5 दिन प्लान पर काम कर लेते है।"..

अपस्यु:- काम तो प्लान किया है, लेकिन अलग-अलग करने का नहीं सोचा था।

ऐमी, अपस्यु की बेबसी पर हंसती हुई… "ओह हो, मतलब आउटसाइड सिटी प्लान करके भी आए थे सर।"..

अपस्यु अपना छोटा सा मुंह बनाते… "अब क्या फायदा 5 दिन तो वैसे ही निकल जाने है। और ये तुम मुंह फाड़ कर हंसना बंद करोगी, कब से मेरी हालत पर हंस रही हो।

ऐमी अपने दोनो कान पकड़ती हुई…. "ठीक है बाबा सॉरी, अब प्लान तो मेरा भी था, पर किया भी क्या जा सकता है।"..

अपस्यु, ऐमी को आंख मारते…. "खूनी भिड़ंत हो तो सकती है।"..

ऐमी:- पागल हो गए हो तुम। अपने अरमानों के पंख पर लगाम लगाओ।

अपस्यु:- हा वो तो करना ही होगा और कोई उपाय भी नहीं है।

ऐमी:- दैट्स माय स्वीटो… चलो अब बताओ कि बाहर के कौन सा प्लान कर आए हो?

अपस्यु:- पूछ तो ऐसे रही हो जैसे तुम्हे पता ही नाह हो।

ऐमी:- फिर भी आज तुम्हे सुनने का अलग ही मज़ा आ रहा है। इस सिचुएशन पर एक शायरी याद आ गई…

अपस्यु सुनने से पहले ही आने वाले व्यंग पर हंसते हुए… "जी इर्शाद"

अर्ज़ किया है…



वाह वाह … वाह वाह..

अर्ज़ किया है..

तेरी मुफ्ल्लासी और बेबसी ये बयान करती है..

वाह वाह… वाह वाह..

अजी अर्ज़ किया है…

तेरी मुफ्ल्लासी और बेबसी ये बयान करती है..


हसरतों की सेज सजी थी और उड़ रहे थे अरमान।

(नीला रंग अपस्यु की आवाज़ और लाल ऐमी की)


अपस्यु:- आगे भी तो बोलो..

ऐमी:- बस यही पूरा है.. आगे के नतीजा जानने के लिए कृपया अपने चहरे को आईने में देख लें..

अपस्यु:- उड़ा लो मज़ाक, इसका बदला तो मै लेकर रहूंगा.. अंदर से बहुत हंसी आ रही होगी ना…

ऐमी:- इसमें भी कोई शक की बात है क्या अपस्यु… एक लंबे वक्त तक मै तरपी थी, ये उसी का फल बीच-बीच में मिलता रहता है तुम्हे।

अपस्यु थोड़ा गंभीर हिते हुए… "हां जनता हूं… शायद मै समझकर भी नहीं समझना चाहता था और तुम सब कुछ समझकर भी बस मेरे वजह से इंतजार में रही। कितना कुछ हमने खोया है ना ऐमी।

ऐमी:- खोया कब था … मैंने जिसे चाहा वो शुरू से मेरे बिल्कुल करीब था। तुम नज़रों से दूर कब हुए… और कुछ चीजें सोचकर या समझकर नहीं होती.. बस हो जाती है और शायद इसलिए कभी उन चीजों को समझ नहीं पाते।

अपस्यु मुसकुराते हुए आगे बढ़ने लगा.. तभी ऐमी उसे आखें दिखती हुई… "फिर शुरू हो गए तुम। चलो अब डिस्टेंस मेंटेन किया जाए और काम निपटाकर आया जाए।"..

अपस्यु:- ठीक है बाबा समझ गया। अच्छा रण सज गया है… तुम्हे कहां जाना है।

ऐमी:- और तुम भी कह दो कि तुम्हे नहीं पाता मै कहां का रण चुनने वाली हूं।

अपस्यु:- सोच लो तुम्हे राजस्थान में सरप्राइज मिलने वाला है। पर्थ को धूल चटाने के चक्कर में इसबार कहीं तुम्हे हार का मुंह ना देखना परे…

ऐमी:- जब पहले से जीत सुनिश्चित हो, वहां क्या मज़ा आएगा? हारे भी तो एक कड़ी चुनौती के बाद, मज़ा तो उसी में है… वैसे मेरा तो 50-50 है, लेकिन मुंबई में तो तुम्हे निश्चित हार मिलने वाली है।

अपस्यु:- 4 बार रण में 2-2 की बराबरी पर है स्वास्तिका और आरव की टीमिंग.. इसलिए यहां भी 50-50 ही है।

ऐमी:- हीहीही… और कुंजल का क्या? तुम्हारे रण में तो ऐसा है की तरजू के दोनो पल्ले बिल्कुल बराबर पर है… एक पत्ते जितने वजन भी नतीजा तय कर देगी…

अपस्यु:- ठीक है फिर देखते हैं ऐमी.. तुम राजस्थान का रण सजाओ और वहां का पुरा आकलन करो। लगभग महीने दिन की ट्रेनिंग दोनो जगह हो ही चुकी है।

ऐमी:- हां लगभग महीना तो बित ही गया है… फिर आज ही निकलते है।

अपस्यु:- नहीं आज नहीं… आज तुम मेरे पास रहो… परसो की सुबह दोनो जगह सरप्राइज देंगे… मेरे ख्याल से तुम्हे आरव को सूचना भी नहीं देना परे.. वो राखी के लिए खुद दोनो बहनों को लेने कल निकल ही जाएगा…

सारी बातें तय करने के बाद दोनो फिर साथ में खाना खाए और एक दूसरे के साथ अपने प्यार को बांटते, मुसकुराते हुए अपनी खट्टी-मीठी बातों से एक दूसरे के चेहरे पर मुस्कान ला रहे थे।

आलम ऐसा था कि दिन से रात बीत चुकी थी, लेकिन अपस्यु और ऐमी की खिलखिलाती हंसी वहां के माहौल में लगातार गूंजती रही। रण सजना इन लोगों के ट्रेनिंग की परीक्षा के जैसा होता था, जिसमें किसी एक दिन एक छोटा सा झंडा ट्रेनिंग एरिया में लगाकर आपसी प्रतिद्वंद का आगाज करते थे।

2 दिन बाद बिल्कुल सुबह-सुबह का वक़्त था। पर्थ वीरभद्र के साथ सुबह-सुबह ट्रेनिंग करता था, और निम्मी वहीं आसपास खड़ी रहकर, अपने काम की चीज सीखने में काफी दिलचस्पी लेती थी।

पार्थ सुबह-सुबह दोनो (वीरभद्र और निम्मी) के साथ जैसे ही ट्रेनिंग एरिया में पहुंचा… ट्रेनिंग एरिया के बिल्कुल मध्य में, नीले और लाल रंग का झंडा देखकर पार्थ कहने लगा…. "तैयार हो जाओ यहां एक फाइट शुरू हो चुकी है, और किसी भी तरह का यदि हमला करना पड़े तो पीछे मत हटना।"
 
Update:-96

पार्थ सुबह-सुबह दोनो (वीरभद्र और निम्मी) के साथ जैसे ही ट्रेनिंग एरिया में पहुंचा… ट्रेनिंग एरिया के बिल्कुल मध्य में, नीले और लाल रंग का झंडा देखकर पार्थ कहने लगा…. "तैयार हो जाओ यहां एक फाइट शुरू हो चुकी है, और किसी भी तरह का यदि हमला करना पड़े तो पीछे मत हटना।"

वीरभद्र:- क्या हुआ पार्थ भाई आप इतने सारे हथियार के साथ खुद को तैयार क्यों कर रहे हो।

पार्थ:- क्योंकि यहां लड़ाई शुरू होने वाली है…

निम्मी, जो चाकू से लड़की छिल रही थी…. "लगता है इसका कोई बाप आया है जिससे पहले मार खा चुका है… तभी इतनी तैयारी के साथ आज उसे हराने कि सोच रहा है।"..

वीरभद्र:- निम्मी तुम्हे तमीज है कि नहीं बात करने की। यहां मै खड़ा हूं और तू ऐसे बात कर रही है।

निम्मी:- मुझे बाद में डांट लेना भैय्या, जाओ पहले अपने उस दुश्मन से भिड़ आओ। इसकी उत्सुकता और बेचैनी देखकर यही समझ में आता है कि ये फिर आज हारेगा…

पार्थ:- देखते है निम्मी, वैसे क्या तुम भी हमारे साथ लड़ोगी…

वीरभद्र:- क्या भाई वो तो अभी बच्ची है। उसे क्यों शामिल कर रहे हो इन सब में…

निम्मी:- कितने लोग आ रहे है वैसे लड़ने…

पार्थ:- कोई फौज थोड़े ना आयी है। सिर्फ एक है लेकिन वो काफी क्षमता वाली है…

निम्मी जोड़ से हंसती हुई…. "एक लड़की का सामना करने के लिए 2 लोग तैयार हो रहे हो जो खुद को प्रोफेशनल मानते है। मै तो बाहर से बैठकर देखूंगी कि ये क्या बला है…

"क्या पार्थ, क्या वीरे… लाली पाउडर के साथ चूड़ियां पहन कर तैयार तो नहीं हो रहे, जो बाहर आने में इतना वक़्त लगा रहे हो।"…

वीरे:- ये तो ऐमी जी की आवाज़ है… वो आयी है क्या?..

वीरभद्र अपने मेहमान के स्वागत के लिए उत्सुकता वाश निकल गया, पीछे से पार्थ माना करता रह गया, लेकिन वीरभद्र उसकी बात काटते हुए कहने लगा…. "घर में मेहमान आया है और आप भी ना पार्थ भाई, लड़ाई के लिए तैयार होने कह रहे।"…

उसे ट्रेनिग एरिया में जाते देख पार्थ भी उसके पीछे दौड़ा, और निम्मी क्या होने वाला है इसकी उत्सुकता में उनके पीछे गई। जैसे ही निम्मी ट्रेनिंग एरिया के सीमा पर पहुंची उसे बिल्कुल मध्य में खड़ी हुई एक लड़की दिखाई दी, जो दोनो हाथ में रॉड ली हुई थी… वीरे जैसे ही उसके पास पहुंचा..

ऐमी:- वीरे अभी मै तुम्हारी मेहमान नहीं हूं, और जब तुम्हे बताया गया है कि यहां लड़ाई शुरू होनी है, फिर ऐसे टहल कर आना… पहली बार है इसलिए छोड़ रही हूं, आगे ऐसी गलती नहीं होनी चाहिए…

जैसे ही वीरे वहां से हटा, ऐमी के चारो ओर छोटे-छोटे धमाके होने लगे, और उन धमाकों के साथ कई सारे कीलें ऐमी के बदन को भेदने के लिए हवा में उड़े। कच्ची खिलाड़ी तो कभी ऐमी थी ही नहीं, वीरभद्र से बातों के दौरान भी वो विश्राम की स्तिथि में नहीं आयी, और अपने चिर परिचित बैंक फ्लिप के साथ वो लगातार 3 फ्लिप लेकर धमाके से दूर तो हुई, लेकिन उतनी ही ज्यादा हैरान भी थी।

उससे अपस्यु की कहीं बात याद आने लगी…. "बेईमान कहीं के हिंट नहीं कर सकता था, अच्छा हो कि आरव और स्वास्तिका उस खडूस की अच्छी धुलाई करे।"…

बचने के क्रम में जब ऐमी अपने डिवाइस को एक्टिव मोड पर ला रही थी तब एक भी डिवाइस एक्टिव नहीं हुई। कुछ दिन पहले ही ऐमी ने अपस्यु के साथ अपने एक डिवाइस हैकिंग सॉफ्टवेर डेवलप कि जानकारी साझा की थी, जिसे अपस्यु पार्थ के साथ साझा कर चुका था।…

"क्या हुआ ऐमी कहीं डर तो नहीं लग रहा ना। बेचारी अब बिना अपने डिवाइस के कैसे रण में टिकेगी।"… पार्थ की आवाज़ आ तो रही थी लेकिन वो कहीं नजर नहीं आ रहा था।…

"मेरी डिवाइस निष्क्रिय करके, अपनी डिवाइस सक्रिय मोड पर डाले तो हो पार्थ लेकिन अभी से नतीजा निकालना… कोई नहीं आज आजमाइश हो ही जाए।"… ऐमी के पास बस अब हथियार के तौर पर केवल वो 2 रॉड ही थे।

ऐमी ट्रेनिग एरिया के बिल्कुल मध्य में खड़ी होकर गहरी श्वांस खींची, अपनी आखें मूंदकर अपस्यु की कुछ बातों को याद करती वो अपनी आखें खोल ली और पार्थ की गूंजती आवाज़ पर ना ध्यान देकर वहां के हवा के रुख को परखने लगी।

ऐमी बिल्कुल सावधान मुद्रा में तभी उसे लगा कि उसके बाएं से कुछ तेजी से उसके ओर बढ़ता आ रहा है। ऐमी पीछे के ओर पुरा झुककर, अपने दोनो हाथ पीछे ले जाती, रॉड को जमीन से लगाकर खुद को सहारा दी। स्नाइपर से गोली चली थी जो शायद वीरभद्र ने चलाया था।

अभी ऐमी इस हमले से संभली भी नहीं थी कि उसपर फिर से छोटे-छोटे बॉम्ब से हमले शुरू हुए। ऐमी हर संभव बचने का प्रयास तो कर रही थी लेकिन हर प्रयास कामयाब हो ऐसा मुमकिन तो नहीं। वहीं ट्रेनिंग एरिया से बाहर खड़ी निम्मी, ऐमी को देखकर इतना हर्षित थी कि वो तो बस जल्दी से सारा खेल खत्म होने के बाद मिलने के लिए बेकरार बैठी थी।

ऐमी को कहीं ना कहीं लगने लगा कि रण में उसकी स्तिथि मात्र खुद को बचाने जैसी हो गई है और दुश्मन छिप कर हमला कर रहे, जिस वजह से वो जवाबी हमले नहीं कर पा रही। कुछ देर खुद को और डिफेंड करने के बाद जब ऐमी को लगा कि यहां उसी की परीक्षा ली जा रही है, तब उसने अंधेरे पर ही दाव लगाना सही समझा और एक के बाद एक वहां स्मोक की पूरी चादर बिछा दी…

"तुम अपस्यु नहीं हो ऐमी, जो अंधेरे में भी देख सकती हो।"… पार्थ अपनी बात कहकर जोर-जोर से हंसने लगा। तभी एक जोर की चींख सुनाई दी जो वीरभद्र की थी। पार्थ के लिए कुछ भी देखना मुश्किल हो रहा था और समझ पाना तो उससे भी ज्यादा कठिन था, क्योंकि वीरभद्र के स्नाइपिंग पोजिशन के पास ऐमी पहुंच कैसे गई।

अभी पार्थ इन सब बातों का अवलोकन कर ही रहा था कि तभी उसके पीठ और कंधे पर दो रॉड परे और वो छटपटाकर इधर-उधर भागने लगा…. "क्यों बेटा मज़ा आया। तू जिस डिवाइस के दम पर अपना भ्रम जाल बनता है, उन सब की मां मै हूं। मुझे ही तू भ्रम जाल में फसा रहा था, मल्टीपल डिवाइस इस्तमाल करके।"

"तो क्या हुआ ऐमी, तुम भी फाइट अपने डिवाइस के दम पर ही जीता करती थी। देखा आज कैसे तुम्हे चौंका दिया।"… पार्थ हंसते हुए अपनी बात कह गया।

ऐमी, पार्थ की इस बेवकूफी पर हंसी और आवाज़ की दिशा तय हो जाने के बाद वो फौरन उस दिशा के ओर बढ़ गई। फिर तो जब एक बार धुएं के भीतर पार्थ फसा उसकी तो बस चीखने की आवाज़ ही आ रही थी। पार्थ जवाबी हमला तो कर रहा था लेकिन धुएं के अंदर पार्थ कहां हमला कर रहा था उसे खुद नहीं पता। पार्थ जब धुएं के कोहरे के बीच मार खा रहा था तब उसे यकीन कर पाना मुश्किल था, कि ऐमी सभी छलावे को भेदकर कोहरे के अंदर से उस तक पहुंच सकती है।

जब वहां का कोहरा हटा, पार्थ बुरी तरह से पीटकर वहीं नीचे जमीन पर बैठा था और वीरभद्र ट्रेनिंग एरिया में किसी बुद्धू की तरह इधर उधर भटक रहा था… "वीरे जी कहां ध्यान है, पीछे भी पलट जाओ।"… और जैसे ही वीरे पीछे पलटा ऐमी दौड़ कर हवा में उछालती अपना वार कर चुकी थी।

निम्मी वहीं नजदीक में ही खड़ी थी। हमला ट्रेनिंग एरिया कि सीमा पर ही हो रहा था। अपने भाई पर रॉड चलते देख, निम्मी अपने पूरे जोर लगाकर दौड़ी और अपने भाई को धकेल कर जैसे ही वो हटाई, वो बिल्कुल ऐमी के निशाने पर आ चुकी थी।

ऐमी अपने हमले के जगह को तेजी के साथ बदलाव करती दोनो रॉड को निम्मी के दाएं बाएं नीचे फ्लोर पर चला दी। ऐमी अपने हाथ निम्मी के ओर बढ़ती… "तुम ठीक तो हो ना।"

निम्मी, ऐमी के हाथ पकड़ कर खड़ी हुई और फुर्ती दिखती उसके गले पर चाकू रखती हुई कहने लगी…. "मुझे वो डंडे पर भी जाते तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था, लेकिन तब भी निशाना आपका गला ही होता। यूं समझो की आप हार चुकी हो, क्योंकि मैं गले पर चाकू रखकर बात करने में विश्वास नहीं रखती, बल्कि गले में चाकू उतारकर बात करने में विश्वास रखती हूं।

ऐमी:- क्या बात है, और तुम दोनो को कुछ सीखना चाहिए इस लड़की से।

निम्मी:- लड़की नहीं निम्मी..

ऐमी:- हां निम्मी से… पार्थ तुम्हारे केस में एक ही बात कह सकती हूं, तुम मशीन पर काफी डिपेंड हो। तुम्हारा भ्रम जाल टूटने के बाद, बेबस से हो जाते हो। वाकई तुम्हारा मूव चौंकाने वाला था, लेकिन तुम दोनो में से किसी ने फायदा नहीं लिया। निम्मी को देखो, एक छोटा लूप मिला और बाजी पलट गई।

निम्मी:- क्या आप मुझे सिखाएंगी, क्योंकि पता नहीं ये दोनो सारा दिन क्या करते हैं, लेकिन फिर भी आपका मुकाबला ना कर पाए। मुकाबला तो छोड़ो टक्कर भी कुछ दे देते तो सुकून मिलता।

ऐमी:- निम्मी तुम्हारी समीक्षा गलत है। पार्थ ने जिस काम में मेहनत कि है वो शारीरिक क्षमता या फिर लड़ाई के तरीकों से कहीं बढ़कर है। ये एक जाल बनता है जिसमें बड़े से बड़ा शिकारी भी फंस सकता है। चूंकि मै एक शिकारी हूं और पार्थ को मुझे फसाना था, और इसी बात की ट्रेनिंग वीरे को भी दी जा रही है।

निम्मी:- हां तो वो फंसा भी कहां पाया.. यह काम भी तो ठीक से नहीं हुआ..

ऐमी:- वो इसलिए क्योंकि उसने इतनी जल्दी लड़ाई की उम्मीद नहीं की थी। ये जब अपस्यु को फसा सकता है फिर मै क्या चीज हूं। हां लेकिन अचानक की स्तिथि के लिए भी पार्थ को एक तैयारी करनी चाहिए थी।

निम्मी:- लेकिन ये इतनी सारी तैयारियां क्यो.. आखिर आप लोग मेरे भाई से करवाने क्या वाले है?

ऐमी:- वीरे को बॉडीगार्ड की नौकरी करनी है, और जान बचाना इसका काम है। गोली कब कहां से किसे भेद दे किसे पता, दूसरों के साथ खुद की जान बचाना भी आना चाहिए। उम्मीद है तुम्हे बात समझ में आ गई होगी।

निम्मी:- समझ गई, लेकिन आपको मैंने हराया है, इसलिए मुझे इनाम तो मिलना चाहिए..

ऐमी:- तुम्हारे चेहरे की खुशी मुझे समझ में आ रही है, लेकिन जो तुम चाह रही हो वो नहीं हो पाएगा। मैं तुम्हे ट्रेंड नहीं कर सकती।

निम्मी:- लेकिन क्यों? मुझे भी आपकी तरह बनना है। यहां पर ये दोनों हैं पूछ लीजिए मैंने आज तक किसी से "आप" कहकर बात नहीं किया। मुझे भी आपकी तरह बनना है। प्लीज माना नहीं कीजिए..

ऐमी:- हम्म्म ! निम्मी मै तुम्हे नहीं सीखा सकती लेकिन हफ्ते में 1 दिन मै तुम्हे गाइड जरूर कर सकती हूं। अगर मंजूर हो तो बोलो…

निम्मी:- मुझे मंजूर है।

इसी के साथ ऐमी, वीरभद्र और निम्मी की मेहमाननवाजी स्वीकार करती 1 दिन के लिए वहीं रुक गई। निम्मी किसी पक्की चेली की तरह ऐमी के आगे पीछे कर रही थी। ऐमी उसकी जिज्ञासा देखकर खुद भी हैरान थी कि आखिर इस लड़की को लड़ाई की कला सीखने की इतनी ललक क्यों है।

लगभग 2 पूरे दिन ऐमी के साथ बिताने के बाद अपस्यु भी मुंबई पहुंच गया। अपस्यु से पहले वहां आरव पहुंचा हुआ था जो राखी के लिए अपनी दोनो बहनों को लेने आया था।

सुबह का वक़्त था आज स्वास्तिका ने कुंजल को ट्रेनिंग से छुट्टी दे रखी थी, और तीनों भाई बहन मस्त नींद में थे। तभी फ्लैट के अंदर तेज म्यूज़िक बजने के कारण सबसे पहले स्वास्तिका की नींद खुली और वो आधी जागी, आधी सोयी, की स्थिति में उठकर आयी और म्यूज़िक बंद करके जाने लगी..

जैसे ही वो जाने लगी, फिर से वापस पलटी और अपनी पूरी आंख खोलती वहां रखे झंडे को देखने लगी… केशरी और उजले रंग का छोटा सा झंडा… स्वास्तिका वो झंडा उठाकर आरव के रूम में पहुंची और आरव को जोर-जोर से हिलाकर जगाने लगी… "आरव उठ जा अपस्यु आया हुआ है"

आरव जैसे ही अपस्यु का नाम सुना वो उठकर बैठते हुए…. "साला भूत कहीं का, रण का झंडा लगा गया क्या?"

स्वास्तिका:- हां …

आरव:- साला पागल हो गया है… झंडा ही लगाना था तो दिन में लगा देता। ये सुबह के 4 बजे। छुट्टी के दिन में ही इसे भूत बनकर आना होता है। सुन तू आराम कर मै आता हूं उसे सबक सीखा कर्।

स्वास्तिका:- रुक मै भी चलती हूं, वरना वो चालक बहुत है तुझे फसा लेगा। दोनो साथ रहेंगे तो मिलकर सबक सिखाएंगे..

आरव:- ठीक है चल..

दोनो पहुंचे ट्रेनिंग एरिया में जहां अपस्यु पहले से खड़ा था। सुबह का जगाना आरव को इतना खाला की वो दौड़ गया अपस्यु के ओर। दोनो भाई में घमशान होने लगी। दोनो ही अपने-अपने दाव का प्रदर्शन करते हुए लड़ रहे थे। आरव कुछ ज्यादा ही मार खा रहा था और अपस्यु को बीच-बीच में कभी चोट लग जाय करती थी।

हालांकि आरव खाली हाथ लड़ रहा था और अपस्यु के हाथ में रॉड थी। स्वास्तिका की एंट्री ने फिर अपस्यु के काम को और मुश्किल में डाल दिया। अब उन दोनों के पास भी रॉड थे और अपस्यु पर दोनो ओर से हमले होने लगे।

पलरा अब स्वास्तिका और आरव का भाड़ी पड़ने लगा और अपस्यु बैकफुट पर चला गया था। जहां अपस्यु को 20 रॉड पर रहे थे, वहीं अपस्यु दोनो पर मुश्किल से 2-4 रॉड ही सफलतापूर्वक मार पा रहा था। इन लोगों की लड़ाई में शुरू से ही आरव और स्वास्तिका का पलड़ा भारी रहा है, लेकिन अपस्यु के पास लगातार घंटों तक हमला करते रहना और मार सहने की इतनी अद्भुत क्षमता थी, कि वो रॉड की मार खाकर भी जवाबी हमला करते रहता था।

लड़ाई लगातार चल रही थी और वही हुआ जो अपस्यु शुरू से करता आ रहा था, स्वास्तिका को पहले टारगेट करना। लेकिन आज आरव, अपस्यु को पूरी तरह से झटके देने वाला था। आरव को जब लगा की अपस्यु, स्वास्तिका के चढ़ती श्वांस को देखकर उसपर हमला करेगा, तुरंत ही वो इशारे से स्वास्तिका को अपने पीछे आने कहा…

"क्या बात है, आज तुम दोनो कमाल का प्रदर्शन कर रहे।"… अपस्यु अपने पूरे जोड़ से आरव पर हमले करते कहने लगा…

"भूत कहीं का… देखा जाए तो तू 400 रॉड खाकर हारा ही है… अब साला कोई 1000 रॉड खाकर भी नहीं गिरे और हम कुछ ही रॉड में नीचे गिर जाए, तब तो ये चीटिंग ही हुई ना।"… आरव भी जवाबी हमले करते कहने लगा… लेकिन लगातार मारते-मारते उसकी भी श्वांस चढ़ी हुई थी..

"क्या हुआ स्वास्तिका को अब आगे करके तू पीछे जाएगा क्या श्वांस बटोरने"… अपस्यु हंसते हुए पूछने लगा…

"अरे यार सच ही आरव कहता है कि तू भूत है। घंटे भर से लगातार रॉड चला रहा और हाफ भी नहीं रहा।"… स्वास्तिका झुंझलाकर बोलने लगी…

आरव को लगा कि अपस्यु अभी बातों में लगा है तबतक वो कुछ श्वांस बटोर लेगा, लेकिन अपस्यु को जैसे ही मौका मिला वो फाइनल शॉट लेने के लिए तैयार हो गया। किसी तरह स्वास्तिका को हमला के रास्ते से हटाकर आरव ने वो मूव कंप्लीट नहीं होने दिया। तीनों को लड़ते लड़ते सुबह के 6.30 बज चुके थे, इसी बीच कुंजल भी जाग कर ट्रेनिंग एरिया में पहुंच गई और सबको ऐसे लड़ते देखकर वो सिटी बजती हुई कहने लगी…. "वाह भाई आपने तो दोनो एक साथ संभाल रखा है। जरा जोड़ से मारो क्या आप दोनो को धीमे धीमे मार रहे।"…

स्वास्तिका और आरव, कुंजल को भी अंदर बुलाने की कोशिश की, लेकिन कुंजल दोनो के बात को टालती हुई बाहर ही खड़े रहने में अपनी भलाई समझी। कुछ देर और सबको लड़ते देख कुंजल उबासी लेती कहने लगी… "भैय्या भागकर शादी करना बुरा है या शादी करके भाग जाना।"..

तीनों जो आपस में लड़ रहे थे, एकदम से अपनी लड़ाई रोककर कुंजल को घूरने लगे…. "तीनों मुझे ऐसे लुक क्यों दे रहे हो। मैं तो दीदी के बारे में सोचकर ऐसा कह रही थी।"..

स्वास्तिका जैसे ही कुंजल की बात सुनी वो तेजी से उसके पास निकालने लगी लेकिन तभी पीछे से आरव उसका हाथ पकड़कर रोकते हुए कहने लगा… "अपस्यु देख तो ये छुटकी क्या कहना चाह रही है।"… अपस्यु की पूछने कि भी जरूरत नहीं हुई और कुंजल ने झट से दीपेश और स्वास्तिका के बारे में सब बता दी।… माहौल अब कुछ ऐसा था कि दोनो भाई हॉल में बैठकर स्वास्तिका को उस लड़के को बुलाने के लिए दबाव डालने लगे।
 
Prakash aur Vikarm dono kahani ke aham patr hain.. wo to bich bich me aate rahenge... Aur investigation ke bare me bhi pata chalta rahega... Tab tak aap kahani enjoy Karen aur apne comment dete rahiye ...

:thanks: for your awesome comment ... Aaj update pahle diya hai jo page number 457 par hai... 1st page ke index se bhi aap update 96 tak pahunch sakte hain ..
 
Koi na talli ko bol dunga miss naina ke pass subah subah chali jaye.. bachi ko baksh de :D

Hahaha ... Matlab bf ka hi sar phod de ... Drama to build up ke liye tha .. taki logon me dahshat bana rahe :D

Hahaha ... Chutiyadr sahab ke aane ke baad aisa lag rha hai jaise ab next time se doctor plot hi nahi karna ... :D ..lekin kya karen bina doctor se story likhne me maza bhi nahi aata :D
 
Hahaha ... Abhi to nimmi aayi hi hai story me enjoy aakash bhai..

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Thankoo aise pyare comment ke liye jisme andesha ka ek sawal hai aur usi andshe me khud hi jawab bhi de diye... I like it.. kash aap jaise sab hote... Reply ka mehnat bachta :D
 
Ji bilkul aman bhai aap ne sahi kaha chhipi rustam nikli waise sawastika ke doston ko pata hai dono ke bare me... Bus gharwalon se raaj chhipane ke jurm me main saza dunga usse :D
 
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