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- Dec 5, 2013
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Update:-91
वीरभद्र जो अबतक पूरे संतुलन के साथ गाड़ी चला रहा था, पार्थ के मुंह से यह सच सुनकर ऐसा संतुलन खोया की ब्रेक लगाते-लगाते एक चट्टान से जाकर गाड़ी भिड़ा दिया। उसका पूरा दिमाग ही जैसे काम करना बंद कर दिया हो और टुकुर टुकुर बस पार्थ को ही देखे जा रहा था।
वीरभद्र अपने चेहरे पर आए पसीने को पोछते हुए कहने लगा… " मेरे होश गुम है, मै समझ नहीं पा रहा की क्या सही है क्या गलत। दिमाग को पूरा चकरा डाला। एक तरफ दिमाग कहता है कि तुम सब भले लोग हो तो दूसरी तरफ दिमाग कहता है कि जब तुम लोग किसी को भी अपने जाल में फंसा सकते हो, तो क्या मेरे लिए जाल नहीं बुन सकते।"
एक थप्पड़ खींच कर जड़ते हुए पार्थ कहने लगा…. "तू एक बात बता, तुम्हे जाल में फंसना कितना आसान होता ना यदि तुम्हे हर तरीके से सोचने के लिए सिखाया ना गया होता। बेवकूफ अब आंटी को वापस लौटना है और यही.. बस तुम जैसे लोग जो कभी उन्हें देखे नहीं और ना ही जाने, पहले से यहां दुश्मन बनाए बैठे हो। ऐसे में उनकी सुरक्षा जरूरी है कि नहीं। बाकी साथ रहकर जज करते रहना नंदनी आंटी कैसी है, कुंजल कैसी है। लगे छालावा हुआ है तो दोनों को गोली मार देना। अब खुश…
वीरभद्र भी खींचकर एक थप्पड़ जड़ते हुए…. "इतनी छोटी सी बात समझाने के लिए दोबारा थप्पड़ मारा ना तो मै तुम्हारा खून कर दूंगा।"..
पार्थ:- ऐसी बात है क्या? चल दिखा खून करके।
वीरभद्र:- देखो मुझे उक्शा रहे हो, आगे परिणाम के लिए तुम खुद जिम्मेदार होगे।
पार्थ:- चल बे चिलगोजे डींगे मारना बंदकर और मुझे मारकर बता।
वीरभद्र खुद को थोड़ा शांत करते हुए…. "रहने दो, मै तुम्हे नहीं मार सकता।
पार्थ:- ठीक है मार नहीं सकता, घायल तो कर सकता है ना।
"ऐसा है क्या"… कहते हुए वीरभद्र ने अपने कमर से खंजर निकाला और पेट में सीधा घोपा। जैसे ही वीरभद्र ने चाकू चलाया वहां तेज-तेज हंसी की आवाज़ आना शुरू हो गया। वीरभद्र आश्चर्य से अपने पास वाली सीट की टटोल कर देखने लगा। वो पागल हुआ जा रहा था, अभी तो उसने पार्थ पर चाकू से हमला किया था, फिर वो पास की सीट से कहां गायब हो गया और ये चाकू सीट में कैसे लग गया।
वीरभद्र:- भाई तुम सब तांत्रिक हो क्या, या मेरी गाड़ी में सच का भूत है?
पार्थ:- इसे भ्रम कहते हैं बेटा.. जिसे तुमलोग जादू के नाम से भी जानते हो।
वीरभद्र फिर चौंक गया ऐसा लगा आवाज़ पास की सीट से आयी है लेकिन वहां पार्थ तो था ही नहीं।… "भाई एक ही दिन में मेरे दिमाग की इतनी ना बैंड बजाओ की मै अपना सर जाकर खुद ही फोड़ लूं। रानी मां (नंदनी) का झटका कम पर गया जो अब ये दूसरा झटका दे रहे हो।"
पार्थ पीछे और आगे की सीट के बीच की जगह से उठकर, उसके कांधे पर हाथ देते हुए कहने लगा…. "3 महीने में तुम्हारी सरिरीक क्षमता एक सीमित रूप तक बढ़ेगी। तीन महीने में लेकिन तुम्हे भ्रम काला सिखाया जा सकता है, और वही करने आया हूं मै यहां।"..
वीरभद्र:- क्या बात कर रहे हो भाई, मतलब मै जादूगर बन जाऊंगा। किसी को भी गायब कर सकता हूं। कहीं भी गायब होकर पहुंच सकता हूं।
पार्थ आगे वाली सीट पर अाकर बैठते हुए….. "अब मै सच में तुम्हारे पास बैठा हूं। तुम्हारी जिज्ञासा के हिसाब से तुम्हारा सवाल जायज है। ट्रेनिंग के आखरी में तुम खुद तय कर लेना की तुमने क्या सीखा। फिलहाल अब मुझे ये बताओ दिमाग में सब क्लियर है या कोई शंका और भी है।"..
वीरभद्र:- सोचने और सवाल पूछने के लिए अंदर दिमाग का संतुलित होना भी जरूरी है, जो कि अब होने से रहा। बस मुझे रानी मां और कुंजल की रखवाली का जिम्मा संभालना है बस।
पार्थ:- हां तो अब गाड़ी भी बढ़ा ना, रोके क्यों है।
वीरभद्र:- चट्टान से ठूकी है गाड़ी भाई। अंदर से कुछ टूट वाइग्रह गया होगा।
दोनों कार से बाहर आए। सुनसान सड़क और जुलाई की भीषण गर्मी, दोनों वहां धूप में जब पकने लगे तो वापस कार में अाकर एसी में बैठ गए। अंत में पार्थ ने पार्सल लाने वालों को ही अपने पास बुलवा लिया साथ में एक टो ट्रक भी।
कुछ देर में वो लोग उदयपुर से पार्थ के पास पहुंच गए। वो पार्थ और वीरभद्र को अपने साथ गांव तक ड्रॉप तो कर देते, लेकिन वीरभद्र को पता था कि यदि वो अपनी कार इस जगह छोड़ गया तो कुछ ही देर में इसके पार्ट-पार्ट गायब होने के पूरा अंदेशा है। इसलिए वो वहीं रुककर टो ट्रक के आने का इंतजार करने लगा और इधर पार्थ पार्सल के साथ गांव वापस आ गया।
पार्सल के अंदर आते ही पार्थ ने उस बिल्डिंग का नक्शा मांग लिया और ट्रेनिंग एरिया और स्टोर हाउस ढूंढ़ने लगा। नक्शा ठीक वैसा ही था जैसा पार्थ ने अनुमान लगाया था। पार्थ अपने सामान के साथ स्टोर रूम में पहुंच गया। स्टोर रूम के अंदर का नजारा देखकर तो वो आवाक रह गया। ऐसा लग रहा था देश विदेश के सारे चाकू और खंजर का कलेक्शन उसी स्टोर रूम में जमा है। ऐसा लग रहा था जैसे यहां चाकू और खंजर का कोई मुसियम खुला हुआ है।
पार्थ ने एक खंजर निकालकर अपने हाथ में लिया और उसे परखने लगा… "परफेक्ट बैलेंस"… पार्थ वो खंजर देख ही रहा था कि सायं से एक चाकू बिल्कुल उसके नाक के करीब से तेजी के साथ गुजरी और पार्थ चौंक गया… "ओ शहरी बाबू मेरी चीजे छूना खतरनाक हो सकता है।"
पार्थ जब अपनी नजर उठा कर देखा तो तकरीबन 60 फिट की दूरी पर ट्रेनिंग एरिया में निम्मी खड़ी थी। एक पल के लिए पार्थ ने आखें मूंदी.. दूरी, रफ्तार, चाकू को फेंकने का संतुलन और पूरे एकाग्रता से साधा गया निशान वो भी हवा की गति को ध्यान में रखकर… पार्थ के होटों से बस "अमेजिंग" शब्द ही निकला…
निम्मी:- ओ शहरी बाबू कितने सदमे में गए, डराया था कहीं मारा होता तो जुबान से आवाज़ नहीं आती और प्राण बाहर होते।
पार्थ वहां पड़े अपने बैग से हार्ड लैदर ग्लोब्स निकाला, जिसे खुद पार्थ ने डिज़ाइन किया था। यह बुलेटप्रूफ मेटरिल की बनी एक ग्लोब्स थी जो इस्तमाल में आसान और भेदने में काफी मुश्किल।
पार्थ अपने ग्लोब्स पहनते हुए कहने लगा… "तुम कमाल कि हो निम्मी और तुम्हारा बदन… उफ्फ ! क्या बनावट है।"..
निम्मी:- मेहमान हो मेहमान की तरह रहो शहरी बाबू, कहीं तुम्हारी जुबान की कीमत जान से ना चुकानी परे।
पार्थ:- 34 साइज के ब्रा लगते होंगे ना…
निम्मी पूरे जोड़ से चिल्लाई, उसके बाएं ओर पार्थ हंसते हुए एक-एक कदम धीरे-धीरे बढ़ाते आगे बढ़ते.. और पास के दाएं ओर के पिलर में कई चाकू और खंजर का सेट टंगा हुआ। निम्मी पूरे गुस्से का प्रदर्शन करती हुई एक के बाद एक पहले खंजर से हमला करती फेंकती चली गई।
हर फेके गए खंजर को पकड़ते वक़्त जुबान से बस इतना ही निकलता "कमाल है ये लड़की".. सायं, सायं करती एक के बाद दूसरी खंजर और हर खंजर लगभग एक ही निशाने पर, सीधा गले में वोकल कोर्ड को निशाना बनाते।
पार्थ हंस-हंस कर मानो उसे उक्सा रहा हो, उसके गुस्से को हवा दे रहा हो। ऐसी सूरत में अब निम्मी ने दूसरे पैटर्न से हमला शुरू किया। पहला खंजर सिर के मध्य में दूसरा खंजर वोकल कोर्ड, तीसरा खंजर सीने के बाएं हिस्से सीधा दिल पर और चौथी उसके टांगों के बीच में।
अपने दाएं ओर से खंजर निकालकर बाएं ओर निशाना लगाकर फेकने में एक सेकंड से भी कम वक़्त लग रहा था। मात्र 10 सेकंड में वो 18 खंजर फेंक चुकी होती। पार्थ जैसे-जैसे नजदीक पहुंच रहा था, निम्मी अब खंजर से चाकू पर आ चुकी थी।
एक कमाल कि चाकूबाजी जिसे पता था कितनी दूरी पर कितना वाजनी चाकू या खंजर से निशाना लगाना है। निम्मी बहुत विश्वास के साथ अपनी चाकू फेक रही थी, शुरू में तो वो अपने गुस्से की वजह से फेकी, लकीन कुछ खंजर के बेकार जाने के बाद निम्मी को भी समझ में आ गया कि पार्थ उसे उकसाकर बस उसके कला का परीक्षण कर रहा है।
वो अपनी पूरी कला का प्रदर्शन कर रही थी। यहीं कोई जब 10 फिट की दूरी बची हुई थी, तब पार्थ को भी अक्ल आयी की वो किससे पंगे ले चुका था। दूरी इतनी कम थी कि अब सबसे हल्के चाकू से निशाना लगाया जा सकता था। और यहीं उसके चाकूबाजी के कला का ऐसा नमूना प्रदर्शित हुआ कि पार्थ चारो खाने चित।
दोनों हाथ के अंगूठे की पकड़ के साथ 2 चाकू और बीच के हर 2 उंगलियों के बीच 1 चाकू फंसे थे। कुल 6 चाकू और निम्मी अपनी दोनों हाथ की कलाई को कैंची बनाकर निशाना साधी और अपने हाथ को झटक दी। पार्थ हमले के लिए तैयार तो था लेकिन ऐसा भी हमला होगा उसे पता नहीं था।
बचने का एक ही उपाय उसे लगा और वो चाकू के रास्ते से खुद को बड़ी तेजी से किनारे किया। लेकिन तबतक 2 चाकू, एक उसकी बांह और दूसरी उसके पेट में किनारे को हल्का चिड़ती हुई निकल गई। निम्मी जबतक दोबारा अपने हाथों में चाकू लगाती पार्थ ठीक उसके पीछे पहुंचकर उसके हाथों की मोड़कर समेट दिया।
निम्मी विजई मुस्कान मुस्कुराती तेज-तेज श्वांस लेे रही थी और पार्थ उसके कान के नीचे अपने होंठ ले जाते हुए कहने लगा… "यदि मेरी नजरों में तुम्हारे बदन के प्रति कोई गलत भावना ना दिखे"…. इतना कहते पार्थ ने उसकी चोली के एक धागे को चाकू से काट दिया और फिर आगे कहते…. "और तुम किसी भी अवस्था में मेरे सामने आओ और खुद को सुरक्षित समझो"… इतना कहते चोली के दूसरे धागे को भी काट दिया…. "तब हम एक दूसरे से बहुत कुछ सीख सकते है।".. और बात खत्म करके चोली के बचे धागे को काटकर पार्थ उसे छोड़ा, और वहीं बैठकर अपने पर लगे घाव का मुआयना करने लगा। और निम्मी पकड़ से छूटते ही अपने हाथो से अपनी चोली संभालती, वहां से भागी।
रात के 12 बज गए थे। पार्थ अपने मनचले अरमान को समेटे, और गांव में मिली मस्त जवाब भरे पूरे बदन की भाभी से रास लीला रचने पार्थ पूरे मूड बनाकर निकला। गली के अंदर थोड़ा आगे वो पहुंचा ही था कि रास्ते में ही कमला उसका इंतजार कर रही थी। कमला आगे-आगे और पार्थ पीछे-पीछे चल रहा था। कल रात वाली जगह पर ही दोनों पहुंच चुके थे, लेकिन आज कमला का पति वहां नहीं था बल्कि वो पीछे ही वीरभद्र के मकान में सो रहा था।
कमला उसका हाथ पकड़कर कमरे के अंदर ले गई। कमरे में हल्की दिए की रौशनी आ रही थी और अंदर हल्का धुआं भी जल रहा था जिसकी खुशबू काफी मनमोहक थी। कमला उसे कमरे में लाती, नीचे बिछी चटाई को दिखाती कहने लगी… "लेट जाओ बाबू"
पार्थ भी मचलते अरमान के साथ चटाई पर लेट गया। कमला अपना पीठ पार्थ के ओर करती, अपनी चोली को एक, एक कंधे से खिसकाती हुई अपने बदन से अलग कर दी। दिए की रौशनी में कमला का खुला पीठ पूरा चमक रहा था और उसकी चोली नीचे जमीन पर गिरी हुई थी।
कमला फिर पीछे पलटी और घुटनों पर बैठकर, अपने हाथ आगे बढ़कर पार्थ के लोअर को कमर से नीचे खिसकाकर, उसके आधे जागे, आधे सोए लिंग पर अपने हाथ फेरने लगी। पार्थ मज़े में आनंद लेता बस ये सब होते देख रहा था। जैसे ही लिंग पूरा अाकर लिया, कमला अपने घाघरा फैलाकर उसके लिंग पर बैठती हुई पार्थ के लिंग को अपने योनि के अंदर लेती हुई अपने आखें मूंद ली और अपने आखें मूंदे वो लिंग पर उछलकर सहवास के मज़े लेने लगी।
पार्थ भी अपने दोनो हाथ ऊपर के ओर बढाकर, उसके सुडोल वक्षों के हाथ में लेकर, नीचे से कमर हिलाने लगा… सहवास बिल्कुल अपने मध्य में था और दोनों कमर हिलाकर पूरे मज़े ले रहें थे।… तभी धड़ाम की आवाज़ के साथ दरवाजा खुला। इससे पहले कि दोनों को कुछ होश आता, कमला की छाती पर एक तेज लात पड़ी और वो पीछे जाकर जमीन पर गिरी।.. और पार्थ हैरानी से वहां का नजारा देखने लगा।
वीरभद्र जो अबतक पूरे संतुलन के साथ गाड़ी चला रहा था, पार्थ के मुंह से यह सच सुनकर ऐसा संतुलन खोया की ब्रेक लगाते-लगाते एक चट्टान से जाकर गाड़ी भिड़ा दिया। उसका पूरा दिमाग ही जैसे काम करना बंद कर दिया हो और टुकुर टुकुर बस पार्थ को ही देखे जा रहा था।
वीरभद्र अपने चेहरे पर आए पसीने को पोछते हुए कहने लगा… " मेरे होश गुम है, मै समझ नहीं पा रहा की क्या सही है क्या गलत। दिमाग को पूरा चकरा डाला। एक तरफ दिमाग कहता है कि तुम सब भले लोग हो तो दूसरी तरफ दिमाग कहता है कि जब तुम लोग किसी को भी अपने जाल में फंसा सकते हो, तो क्या मेरे लिए जाल नहीं बुन सकते।"
एक थप्पड़ खींच कर जड़ते हुए पार्थ कहने लगा…. "तू एक बात बता, तुम्हे जाल में फंसना कितना आसान होता ना यदि तुम्हे हर तरीके से सोचने के लिए सिखाया ना गया होता। बेवकूफ अब आंटी को वापस लौटना है और यही.. बस तुम जैसे लोग जो कभी उन्हें देखे नहीं और ना ही जाने, पहले से यहां दुश्मन बनाए बैठे हो। ऐसे में उनकी सुरक्षा जरूरी है कि नहीं। बाकी साथ रहकर जज करते रहना नंदनी आंटी कैसी है, कुंजल कैसी है। लगे छालावा हुआ है तो दोनों को गोली मार देना। अब खुश…
वीरभद्र भी खींचकर एक थप्पड़ जड़ते हुए…. "इतनी छोटी सी बात समझाने के लिए दोबारा थप्पड़ मारा ना तो मै तुम्हारा खून कर दूंगा।"..
पार्थ:- ऐसी बात है क्या? चल दिखा खून करके।
वीरभद्र:- देखो मुझे उक्शा रहे हो, आगे परिणाम के लिए तुम खुद जिम्मेदार होगे।
पार्थ:- चल बे चिलगोजे डींगे मारना बंदकर और मुझे मारकर बता।
वीरभद्र खुद को थोड़ा शांत करते हुए…. "रहने दो, मै तुम्हे नहीं मार सकता।
पार्थ:- ठीक है मार नहीं सकता, घायल तो कर सकता है ना।
"ऐसा है क्या"… कहते हुए वीरभद्र ने अपने कमर से खंजर निकाला और पेट में सीधा घोपा। जैसे ही वीरभद्र ने चाकू चलाया वहां तेज-तेज हंसी की आवाज़ आना शुरू हो गया। वीरभद्र आश्चर्य से अपने पास वाली सीट की टटोल कर देखने लगा। वो पागल हुआ जा रहा था, अभी तो उसने पार्थ पर चाकू से हमला किया था, फिर वो पास की सीट से कहां गायब हो गया और ये चाकू सीट में कैसे लग गया।
वीरभद्र:- भाई तुम सब तांत्रिक हो क्या, या मेरी गाड़ी में सच का भूत है?
पार्थ:- इसे भ्रम कहते हैं बेटा.. जिसे तुमलोग जादू के नाम से भी जानते हो।
वीरभद्र फिर चौंक गया ऐसा लगा आवाज़ पास की सीट से आयी है लेकिन वहां पार्थ तो था ही नहीं।… "भाई एक ही दिन में मेरे दिमाग की इतनी ना बैंड बजाओ की मै अपना सर जाकर खुद ही फोड़ लूं। रानी मां (नंदनी) का झटका कम पर गया जो अब ये दूसरा झटका दे रहे हो।"
पार्थ पीछे और आगे की सीट के बीच की जगह से उठकर, उसके कांधे पर हाथ देते हुए कहने लगा…. "3 महीने में तुम्हारी सरिरीक क्षमता एक सीमित रूप तक बढ़ेगी। तीन महीने में लेकिन तुम्हे भ्रम काला सिखाया जा सकता है, और वही करने आया हूं मै यहां।"..
वीरभद्र:- क्या बात कर रहे हो भाई, मतलब मै जादूगर बन जाऊंगा। किसी को भी गायब कर सकता हूं। कहीं भी गायब होकर पहुंच सकता हूं।
पार्थ आगे वाली सीट पर अाकर बैठते हुए….. "अब मै सच में तुम्हारे पास बैठा हूं। तुम्हारी जिज्ञासा के हिसाब से तुम्हारा सवाल जायज है। ट्रेनिंग के आखरी में तुम खुद तय कर लेना की तुमने क्या सीखा। फिलहाल अब मुझे ये बताओ दिमाग में सब क्लियर है या कोई शंका और भी है।"..
वीरभद्र:- सोचने और सवाल पूछने के लिए अंदर दिमाग का संतुलित होना भी जरूरी है, जो कि अब होने से रहा। बस मुझे रानी मां और कुंजल की रखवाली का जिम्मा संभालना है बस।
पार्थ:- हां तो अब गाड़ी भी बढ़ा ना, रोके क्यों है।
वीरभद्र:- चट्टान से ठूकी है गाड़ी भाई। अंदर से कुछ टूट वाइग्रह गया होगा।
दोनों कार से बाहर आए। सुनसान सड़क और जुलाई की भीषण गर्मी, दोनों वहां धूप में जब पकने लगे तो वापस कार में अाकर एसी में बैठ गए। अंत में पार्थ ने पार्सल लाने वालों को ही अपने पास बुलवा लिया साथ में एक टो ट्रक भी।
कुछ देर में वो लोग उदयपुर से पार्थ के पास पहुंच गए। वो पार्थ और वीरभद्र को अपने साथ गांव तक ड्रॉप तो कर देते, लेकिन वीरभद्र को पता था कि यदि वो अपनी कार इस जगह छोड़ गया तो कुछ ही देर में इसके पार्ट-पार्ट गायब होने के पूरा अंदेशा है। इसलिए वो वहीं रुककर टो ट्रक के आने का इंतजार करने लगा और इधर पार्थ पार्सल के साथ गांव वापस आ गया।
पार्सल के अंदर आते ही पार्थ ने उस बिल्डिंग का नक्शा मांग लिया और ट्रेनिंग एरिया और स्टोर हाउस ढूंढ़ने लगा। नक्शा ठीक वैसा ही था जैसा पार्थ ने अनुमान लगाया था। पार्थ अपने सामान के साथ स्टोर रूम में पहुंच गया। स्टोर रूम के अंदर का नजारा देखकर तो वो आवाक रह गया। ऐसा लग रहा था देश विदेश के सारे चाकू और खंजर का कलेक्शन उसी स्टोर रूम में जमा है। ऐसा लग रहा था जैसे यहां चाकू और खंजर का कोई मुसियम खुला हुआ है।
पार्थ ने एक खंजर निकालकर अपने हाथ में लिया और उसे परखने लगा… "परफेक्ट बैलेंस"… पार्थ वो खंजर देख ही रहा था कि सायं से एक चाकू बिल्कुल उसके नाक के करीब से तेजी के साथ गुजरी और पार्थ चौंक गया… "ओ शहरी बाबू मेरी चीजे छूना खतरनाक हो सकता है।"
पार्थ जब अपनी नजर उठा कर देखा तो तकरीबन 60 फिट की दूरी पर ट्रेनिंग एरिया में निम्मी खड़ी थी। एक पल के लिए पार्थ ने आखें मूंदी.. दूरी, रफ्तार, चाकू को फेंकने का संतुलन और पूरे एकाग्रता से साधा गया निशान वो भी हवा की गति को ध्यान में रखकर… पार्थ के होटों से बस "अमेजिंग" शब्द ही निकला…
निम्मी:- ओ शहरी बाबू कितने सदमे में गए, डराया था कहीं मारा होता तो जुबान से आवाज़ नहीं आती और प्राण बाहर होते।
पार्थ वहां पड़े अपने बैग से हार्ड लैदर ग्लोब्स निकाला, जिसे खुद पार्थ ने डिज़ाइन किया था। यह बुलेटप्रूफ मेटरिल की बनी एक ग्लोब्स थी जो इस्तमाल में आसान और भेदने में काफी मुश्किल।
पार्थ अपने ग्लोब्स पहनते हुए कहने लगा… "तुम कमाल कि हो निम्मी और तुम्हारा बदन… उफ्फ ! क्या बनावट है।"..
निम्मी:- मेहमान हो मेहमान की तरह रहो शहरी बाबू, कहीं तुम्हारी जुबान की कीमत जान से ना चुकानी परे।
पार्थ:- 34 साइज के ब्रा लगते होंगे ना…
निम्मी पूरे जोड़ से चिल्लाई, उसके बाएं ओर पार्थ हंसते हुए एक-एक कदम धीरे-धीरे बढ़ाते आगे बढ़ते.. और पास के दाएं ओर के पिलर में कई चाकू और खंजर का सेट टंगा हुआ। निम्मी पूरे गुस्से का प्रदर्शन करती हुई एक के बाद एक पहले खंजर से हमला करती फेंकती चली गई।
हर फेके गए खंजर को पकड़ते वक़्त जुबान से बस इतना ही निकलता "कमाल है ये लड़की".. सायं, सायं करती एक के बाद दूसरी खंजर और हर खंजर लगभग एक ही निशाने पर, सीधा गले में वोकल कोर्ड को निशाना बनाते।
पार्थ हंस-हंस कर मानो उसे उक्सा रहा हो, उसके गुस्से को हवा दे रहा हो। ऐसी सूरत में अब निम्मी ने दूसरे पैटर्न से हमला शुरू किया। पहला खंजर सिर के मध्य में दूसरा खंजर वोकल कोर्ड, तीसरा खंजर सीने के बाएं हिस्से सीधा दिल पर और चौथी उसके टांगों के बीच में।
अपने दाएं ओर से खंजर निकालकर बाएं ओर निशाना लगाकर फेकने में एक सेकंड से भी कम वक़्त लग रहा था। मात्र 10 सेकंड में वो 18 खंजर फेंक चुकी होती। पार्थ जैसे-जैसे नजदीक पहुंच रहा था, निम्मी अब खंजर से चाकू पर आ चुकी थी।
एक कमाल कि चाकूबाजी जिसे पता था कितनी दूरी पर कितना वाजनी चाकू या खंजर से निशाना लगाना है। निम्मी बहुत विश्वास के साथ अपनी चाकू फेक रही थी, शुरू में तो वो अपने गुस्से की वजह से फेकी, लकीन कुछ खंजर के बेकार जाने के बाद निम्मी को भी समझ में आ गया कि पार्थ उसे उकसाकर बस उसके कला का परीक्षण कर रहा है।
वो अपनी पूरी कला का प्रदर्शन कर रही थी। यहीं कोई जब 10 फिट की दूरी बची हुई थी, तब पार्थ को भी अक्ल आयी की वो किससे पंगे ले चुका था। दूरी इतनी कम थी कि अब सबसे हल्के चाकू से निशाना लगाया जा सकता था। और यहीं उसके चाकूबाजी के कला का ऐसा नमूना प्रदर्शित हुआ कि पार्थ चारो खाने चित।
दोनों हाथ के अंगूठे की पकड़ के साथ 2 चाकू और बीच के हर 2 उंगलियों के बीच 1 चाकू फंसे थे। कुल 6 चाकू और निम्मी अपनी दोनों हाथ की कलाई को कैंची बनाकर निशाना साधी और अपने हाथ को झटक दी। पार्थ हमले के लिए तैयार तो था लेकिन ऐसा भी हमला होगा उसे पता नहीं था।
बचने का एक ही उपाय उसे लगा और वो चाकू के रास्ते से खुद को बड़ी तेजी से किनारे किया। लेकिन तबतक 2 चाकू, एक उसकी बांह और दूसरी उसके पेट में किनारे को हल्का चिड़ती हुई निकल गई। निम्मी जबतक दोबारा अपने हाथों में चाकू लगाती पार्थ ठीक उसके पीछे पहुंचकर उसके हाथों की मोड़कर समेट दिया।
निम्मी विजई मुस्कान मुस्कुराती तेज-तेज श्वांस लेे रही थी और पार्थ उसके कान के नीचे अपने होंठ ले जाते हुए कहने लगा… "यदि मेरी नजरों में तुम्हारे बदन के प्रति कोई गलत भावना ना दिखे"…. इतना कहते पार्थ ने उसकी चोली के एक धागे को चाकू से काट दिया और फिर आगे कहते…. "और तुम किसी भी अवस्था में मेरे सामने आओ और खुद को सुरक्षित समझो"… इतना कहते चोली के दूसरे धागे को भी काट दिया…. "तब हम एक दूसरे से बहुत कुछ सीख सकते है।".. और बात खत्म करके चोली के बचे धागे को काटकर पार्थ उसे छोड़ा, और वहीं बैठकर अपने पर लगे घाव का मुआयना करने लगा। और निम्मी पकड़ से छूटते ही अपने हाथो से अपनी चोली संभालती, वहां से भागी।
रात के 12 बज गए थे। पार्थ अपने मनचले अरमान को समेटे, और गांव में मिली मस्त जवाब भरे पूरे बदन की भाभी से रास लीला रचने पार्थ पूरे मूड बनाकर निकला। गली के अंदर थोड़ा आगे वो पहुंचा ही था कि रास्ते में ही कमला उसका इंतजार कर रही थी। कमला आगे-आगे और पार्थ पीछे-पीछे चल रहा था। कल रात वाली जगह पर ही दोनों पहुंच चुके थे, लेकिन आज कमला का पति वहां नहीं था बल्कि वो पीछे ही वीरभद्र के मकान में सो रहा था।
कमला उसका हाथ पकड़कर कमरे के अंदर ले गई। कमरे में हल्की दिए की रौशनी आ रही थी और अंदर हल्का धुआं भी जल रहा था जिसकी खुशबू काफी मनमोहक थी। कमला उसे कमरे में लाती, नीचे बिछी चटाई को दिखाती कहने लगी… "लेट जाओ बाबू"
पार्थ भी मचलते अरमान के साथ चटाई पर लेट गया। कमला अपना पीठ पार्थ के ओर करती, अपनी चोली को एक, एक कंधे से खिसकाती हुई अपने बदन से अलग कर दी। दिए की रौशनी में कमला का खुला पीठ पूरा चमक रहा था और उसकी चोली नीचे जमीन पर गिरी हुई थी।
कमला फिर पीछे पलटी और घुटनों पर बैठकर, अपने हाथ आगे बढ़कर पार्थ के लोअर को कमर से नीचे खिसकाकर, उसके आधे जागे, आधे सोए लिंग पर अपने हाथ फेरने लगी। पार्थ मज़े में आनंद लेता बस ये सब होते देख रहा था। जैसे ही लिंग पूरा अाकर लिया, कमला अपने घाघरा फैलाकर उसके लिंग पर बैठती हुई पार्थ के लिंग को अपने योनि के अंदर लेती हुई अपने आखें मूंद ली और अपने आखें मूंदे वो लिंग पर उछलकर सहवास के मज़े लेने लगी।
पार्थ भी अपने दोनो हाथ ऊपर के ओर बढाकर, उसके सुडोल वक्षों के हाथ में लेकर, नीचे से कमर हिलाने लगा… सहवास बिल्कुल अपने मध्य में था और दोनों कमर हिलाकर पूरे मज़े ले रहें थे।… तभी धड़ाम की आवाज़ के साथ दरवाजा खुला। इससे पहले कि दोनों को कुछ होश आता, कमला की छाती पर एक तेज लात पड़ी और वो पीछे जाकर जमीन पर गिरी।.. और पार्थ हैरानी से वहां का नजारा देखने लगा।