Romance भंवर (पूर्ण) - Page 12 - SexBaba
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Romance भंवर (पूर्ण)

Update:-91

वीरभद्र जो अबतक पूरे संतुलन के साथ गाड़ी चला रहा था, पार्थ के मुंह से यह सच सुनकर ऐसा संतुलन खोया की ब्रेक लगाते-लगाते एक चट्टान से जाकर गाड़ी भिड़ा दिया। उसका पूरा दिमाग ही जैसे काम करना बंद कर दिया हो और टुकुर टुकुर बस पार्थ को ही देखे जा रहा था।

वीरभद्र अपने चेहरे पर आए पसीने को पोछते हुए कहने लगा… " मेरे होश गुम है, मै समझ नहीं पा रहा की क्या सही है क्या गलत। दिमाग को पूरा चकरा डाला। एक तरफ दिमाग कहता है कि तुम सब भले लोग हो तो दूसरी तरफ दिमाग कहता है कि जब तुम लोग किसी को भी अपने जाल में फंसा सकते हो, तो क्या मेरे लिए जाल नहीं बुन सकते।"

एक थप्पड़ खींच कर जड़ते हुए पार्थ कहने लगा…. "तू एक बात बता, तुम्हे जाल में फंसना कितना आसान होता ना यदि तुम्हे हर तरीके से सोचने के लिए सिखाया ना गया होता। बेवकूफ अब आंटी को वापस लौटना है और यही.. बस तुम जैसे लोग जो कभी उन्हें देखे नहीं और ना ही जाने, पहले से यहां दुश्मन बनाए बैठे हो। ऐसे में उनकी सुरक्षा जरूरी है कि नहीं। बाकी साथ रहकर जज करते रहना नंदनी आंटी कैसी है, कुंजल कैसी है। लगे छालावा हुआ है तो दोनों को गोली मार देना। अब खुश…

वीरभद्र भी खींचकर एक थप्पड़ जड़ते हुए…. "इतनी छोटी सी बात समझाने के लिए दोबारा थप्पड़ मारा ना तो मै तुम्हारा खून कर दूंगा।"..

पार्थ:- ऐसी बात है क्या? चल दिखा खून करके।

वीरभद्र:- देखो मुझे उक्शा रहे हो, आगे परिणाम के लिए तुम खुद जिम्मेदार होगे।

पार्थ:- चल बे चिलगोजे डींगे मारना बंदकर और मुझे मारकर बता।

वीरभद्र खुद को थोड़ा शांत करते हुए…. "रहने दो, मै तुम्हे नहीं मार सकता।

पार्थ:- ठीक है मार नहीं सकता, घायल तो कर सकता है ना।

"ऐसा है क्या"… कहते हुए वीरभद्र ने अपने कमर से खंजर निकाला और पेट में सीधा घोपा। जैसे ही वीरभद्र ने चाकू चलाया वहां तेज-तेज हंसी की आवाज़ आना शुरू हो गया। वीरभद्र आश्चर्य से अपने पास वाली सीट की टटोल कर देखने लगा। वो पागल हुआ जा रहा था, अभी तो उसने पार्थ पर चाकू से हमला किया था, फिर वो पास की सीट से कहां गायब हो गया और ये चाकू सीट में कैसे लग गया।

वीरभद्र:- भाई तुम सब तांत्रिक हो क्या, या मेरी गाड़ी में सच का भूत है?

पार्थ:- इसे भ्रम कहते हैं बेटा.. जिसे तुमलोग जादू के नाम से भी जानते हो।

वीरभद्र फिर चौंक गया ऐसा लगा आवाज़ पास की सीट से आयी है लेकिन वहां पार्थ तो था ही नहीं।… "भाई एक ही दिन में मेरे दिमाग की इतनी ना बैंड बजाओ की मै अपना सर जाकर खुद ही फोड़ लूं। रानी मां (नंदनी) का झटका कम पर गया जो अब ये दूसरा झटका दे रहे हो।"

पार्थ पीछे और आगे की सीट के बीच की जगह से उठकर, उसके कांधे पर हाथ देते हुए कहने लगा…. "3 महीने में तुम्हारी सरिरीक क्षमता एक सीमित रूप तक बढ़ेगी। तीन महीने में लेकिन तुम्हे भ्रम काला सिखाया जा सकता है, और वही करने आया हूं मै यहां।"..

वीरभद्र:- क्या बात कर रहे हो भाई, मतलब मै जादूगर बन जाऊंगा। किसी को भी गायब कर सकता हूं। कहीं भी गायब होकर पहुंच सकता हूं।

पार्थ आगे वाली सीट पर अाकर बैठते हुए….. "अब मै सच में तुम्हारे पास बैठा हूं। तुम्हारी जिज्ञासा के हिसाब से तुम्हारा सवाल जायज है। ट्रेनिंग के आखरी में तुम खुद तय कर लेना की तुमने क्या सीखा। फिलहाल अब मुझे ये बताओ दिमाग में सब क्लियर है या कोई शंका और भी है।"..

वीरभद्र:- सोचने और सवाल पूछने के लिए अंदर दिमाग का संतुलित होना भी जरूरी है, जो कि अब होने से रहा। बस मुझे रानी मां और कुंजल की रखवाली का जिम्मा संभालना है बस।

पार्थ:- हां तो अब गाड़ी भी बढ़ा ना, रोके क्यों है।

वीरभद्र:- चट्टान से ठूकी है गाड़ी भाई। अंदर से कुछ टूट वाइग्रह गया होगा।

दोनों कार से बाहर आए। सुनसान सड़क और जुलाई की भीषण गर्मी, दोनों वहां धूप में जब पकने लगे तो वापस कार में अाकर एसी में बैठ गए। अंत में पार्थ ने पार्सल लाने वालों को ही अपने पास बुलवा लिया साथ में एक टो ट्रक भी।

कुछ देर में वो लोग उदयपुर से पार्थ के पास पहुंच गए। वो पार्थ और वीरभद्र को अपने साथ गांव तक ड्रॉप तो कर देते, लेकिन वीरभद्र को पता था कि यदि वो अपनी कार इस जगह छोड़ गया तो कुछ ही देर में इसके पार्ट-पार्ट गायब होने के पूरा अंदेशा है। इसलिए वो वहीं रुककर टो ट्रक के आने का इंतजार करने लगा और इधर पार्थ पार्सल के साथ गांव वापस आ गया।

पार्सल के अंदर आते ही पार्थ ने उस बिल्डिंग का नक्शा मांग लिया और ट्रेनिंग एरिया और स्टोर हाउस ढूंढ़ने लगा। नक्शा ठीक वैसा ही था जैसा पार्थ ने अनुमान लगाया था। पार्थ अपने सामान के साथ स्टोर रूम में पहुंच गया। स्टोर रूम के अंदर का नजारा देखकर तो वो आवाक रह गया। ऐसा लग रहा था देश विदेश के सारे चाकू और खंजर का कलेक्शन उसी स्टोर रूम में जमा है। ऐसा लग रहा था जैसे यहां चाकू और खंजर का कोई मुसियम खुला हुआ है।

पार्थ ने एक खंजर निकालकर अपने हाथ में लिया और उसे परखने लगा… "परफेक्ट बैलेंस"… पार्थ वो खंजर देख ही रहा था कि सायं से एक चाकू बिल्कुल उसके नाक के करीब से तेजी के साथ गुजरी और पार्थ चौंक गया… "ओ शहरी बाबू मेरी चीजे छूना खतरनाक हो सकता है।"

पार्थ जब अपनी नजर उठा कर देखा तो तकरीबन 60 फिट की दूरी पर ट्रेनिंग एरिया में निम्मी खड़ी थी। एक पल के लिए पार्थ ने आखें मूंदी.. दूरी, रफ्तार, चाकू को फेंकने का संतुलन और पूरे एकाग्रता से साधा गया निशान वो भी हवा की गति को ध्यान में रखकर… पार्थ के होटों से बस "अमेजिंग" शब्द ही निकला…

निम्मी:- ओ शहरी बाबू कितने सदमे में गए, डराया था कहीं मारा होता तो जुबान से आवाज़ नहीं आती और प्राण बाहर होते।

पार्थ वहां पड़े अपने बैग से हार्ड लैदर ग्लोब्स निकाला, जिसे खुद पार्थ ने डिज़ाइन किया था। यह बुलेटप्रूफ मेटरिल की बनी एक ग्लोब्स थी जो इस्तमाल में आसान और भेदने में काफी मुश्किल।

पार्थ अपने ग्लोब्स पहनते हुए कहने लगा… "तुम कमाल कि हो निम्मी और तुम्हारा बदन… उफ्फ ! क्या बनावट है।"..

निम्मी:- मेहमान हो मेहमान की तरह रहो शहरी बाबू, कहीं तुम्हारी जुबान की कीमत जान से ना चुकानी परे।

पार्थ:- 34 साइज के ब्रा लगते होंगे ना…

निम्मी पूरे जोड़ से चिल्लाई, उसके बाएं ओर पार्थ हंसते हुए एक-एक कदम धीरे-धीरे बढ़ाते आगे बढ़ते.. और पास के दाएं ओर के पिलर में कई चाकू और खंजर का सेट टंगा हुआ। निम्मी पूरे गुस्से का प्रदर्शन करती हुई एक के बाद एक पहले खंजर से हमला करती फेंकती चली गई।

हर फेके गए खंजर को पकड़ते वक़्त जुबान से बस इतना ही निकलता "कमाल है ये लड़की".. सायं, सायं करती एक के बाद दूसरी खंजर और हर खंजर लगभग एक ही निशाने पर, सीधा गले में वोकल कोर्ड को निशाना बनाते।

पार्थ हंस-हंस कर मानो उसे उक्सा रहा हो, उसके गुस्से को हवा दे रहा हो। ऐसी सूरत में अब निम्मी ने दूसरे पैटर्न से हमला शुरू किया। पहला खंजर सिर के मध्य में दूसरा खंजर वोकल कोर्ड, तीसरा खंजर सीने के बाएं हिस्से सीधा दिल पर और चौथी उसके टांगों के बीच में।

अपने दाएं ओर से खंजर निकालकर बाएं ओर निशाना लगाकर फेकने में एक सेकंड से भी कम वक़्त लग रहा था। मात्र 10 सेकंड में वो 18 खंजर फेंक चुकी होती। पार्थ जैसे-जैसे नजदीक पहुंच रहा था, निम्मी अब खंजर से चाकू पर आ चुकी थी।

एक कमाल कि चाकूबाजी जिसे पता था कितनी दूरी पर कितना वाजनी चाकू या खंजर से निशाना लगाना है। निम्मी बहुत विश्वास के साथ अपनी चाकू फेक रही थी, शुरू में तो वो अपने गुस्से की वजह से फेकी, लकीन कुछ खंजर के बेकार जाने के बाद निम्मी को भी समझ में आ गया कि पार्थ उसे उकसाकर बस उसके कला का परीक्षण कर रहा है।

वो अपनी पूरी कला का प्रदर्शन कर रही थी। यहीं कोई जब 10 फिट की दूरी बची हुई थी, तब पार्थ को भी अक्ल आयी की वो किससे पंगे ले चुका था। दूरी इतनी कम थी कि अब सबसे हल्के चाकू से निशाना लगाया जा सकता था। और यहीं उसके चाकूबाजी के कला का ऐसा नमूना प्रदर्शित हुआ कि पार्थ चारो खाने चित।

दोनों हाथ के अंगूठे की पकड़ के साथ 2 चाकू और बीच के हर 2 उंगलियों के बीच 1 चाकू फंसे थे। कुल 6 चाकू और निम्मी अपनी दोनों हाथ की कलाई को कैंची बनाकर निशाना साधी और अपने हाथ को झटक दी। पार्थ हमले के लिए तैयार तो था लेकिन ऐसा भी हमला होगा उसे पता नहीं था।

बचने का एक ही उपाय उसे लगा और वो चाकू के रास्ते से खुद को बड़ी तेजी से किनारे किया। लेकिन तबतक 2 चाकू, एक उसकी बांह और दूसरी उसके पेट में किनारे को हल्का चिड़ती हुई निकल गई। निम्मी जबतक दोबारा अपने हाथों में चाकू लगाती पार्थ ठीक उसके पीछे पहुंचकर उसके हाथों की मोड़कर समेट दिया।

निम्मी विजई मुस्कान मुस्कुराती तेज-तेज श्वांस लेे रही थी और पार्थ उसके कान के नीचे अपने होंठ ले जाते हुए कहने लगा… "यदि मेरी नजरों में तुम्हारे बदन के प्रति कोई गलत भावना ना दिखे"…. इतना कहते पार्थ ने उसकी चोली के एक धागे को चाकू से काट दिया और फिर आगे कहते…. "और तुम किसी भी अवस्था में मेरे सामने आओ और खुद को सुरक्षित समझो"… इतना कहते चोली के दूसरे धागे को भी काट दिया…. "तब हम एक दूसरे से बहुत कुछ सीख सकते है।".. और बात खत्म करके चोली के बचे धागे को काटकर पार्थ उसे छोड़ा, और वहीं बैठकर अपने पर लगे घाव का मुआयना करने लगा। और निम्मी पकड़ से छूटते ही अपने हाथो से अपनी चोली संभालती, वहां से भागी।

रात के 12 बज गए थे। पार्थ अपने मनचले अरमान को समेटे, और गांव में मिली मस्त जवाब भरे पूरे बदन की भाभी से रास लीला रचने पार्थ पूरे मूड बनाकर निकला। गली के अंदर थोड़ा आगे वो पहुंचा ही था कि रास्ते में ही कमला उसका इंतजार कर रही थी। कमला आगे-आगे और पार्थ पीछे-पीछे चल रहा था। कल रात वाली जगह पर ही दोनों पहुंच चुके थे, लेकिन आज कमला का पति वहां नहीं था बल्कि वो पीछे ही वीरभद्र के मकान में सो रहा था।

कमला उसका हाथ पकड़कर कमरे के अंदर ले गई। कमरे में हल्की दिए की रौशनी आ रही थी और अंदर हल्का धुआं भी जल रहा था जिसकी खुशबू काफी मनमोहक थी। कमला उसे कमरे में लाती, नीचे बिछी चटाई को दिखाती कहने लगी… "लेट जाओ बाबू"

पार्थ भी मचलते अरमान के साथ चटाई पर लेट गया। कमला अपना पीठ पार्थ के ओर करती, अपनी चोली को एक, एक कंधे से खिसकाती हुई अपने बदन से अलग कर दी। दिए की रौशनी में कमला का खुला पीठ पूरा चमक रहा था और उसकी चोली नीचे जमीन पर गिरी हुई थी।

कमला फिर पीछे पलटी और घुटनों पर बैठकर, अपने हाथ आगे बढ़कर पार्थ के लोअर को कमर से नीचे खिसकाकर, उसके आधे जागे, आधे सोए लिंग पर अपने हाथ फेरने लगी। पार्थ मज़े में आनंद लेता बस ये सब होते देख रहा था। जैसे ही लिंग पूरा अाकर लिया, कमला अपने घाघरा फैलाकर उसके लिंग पर बैठती हुई पार्थ के लिंग को अपने योनि के अंदर लेती हुई अपने आखें मूंद ली और अपने आखें मूंदे वो लिंग पर उछलकर सहवास के मज़े लेने लगी।

पार्थ भी अपने दोनो हाथ ऊपर के ओर बढाकर, उसके सुडोल वक्षों के हाथ में लेकर, नीचे से कमर हिलाने लगा… सहवास बिल्कुल अपने मध्य में था और दोनों कमर हिलाकर पूरे मज़े ले रहें थे।… तभी धड़ाम की आवाज़ के साथ दरवाजा खुला। इससे पहले कि दोनों को कुछ होश आता, कमला की छाती पर एक तेज लात पड़ी और वो पीछे जाकर जमीन पर गिरी।.. और पार्थ हैरानी से वहां का नजारा देखने लगा।
 
Update:-92

पार्थ भी अपने दोनो हाथ ऊपर के ओर बकर उसके सुडोल वक्षों के हाथ में लेकर नीचे से कमर हिलाने लगा… सहवास बिल्कुल अपने मध्य में था और दोनों कमर हिलाकर पूरे मज़े ले रहें थे।… तभी धड़ाम की आवाज़ के साथ दरवाजा खुला और तेजी मे दरवाजा खुला। इससे पहले कि दोनों को कुछ होश आता, कमला की छाती पर एक तेज लात पड़ी और वो पीछे जाकर जमीन पर गिरी।.. और पार्थ हैरानी से वहां का नजारा देखने लगा।

"कुतीया कहीं की, दोबारा अपने डायान बनने की जिज्ञासा में किसी मर्द को फांसते हुए देख ली तुझे, तो नंगे ही पूरा गांव घुमा दूंगी। रंडी कहीं की, किसी कुएं में डूबकर मर क्यों नहीं जाती, तुझे मेरे ही खानदान में आना था।.. तुम क्या घुरे जा रहे हो, कपड़े ठीक करो और चलो, वरना तुम्हरा भी नंगे जुलुश निकालना होगा।".. पूरे गुस्से में और रोश दिखाती हुई निम्मी अपनी बात कही और पार्थ को वहां से उठाकर ले आयी।

दोनों खामोश साथ-साथ चल रहे थे। कुछ दूर जब पार्थ खुली हवा में चला होगा तभी निम्मी रुककर उसके सामने खड़ी हो गई और खींचकर उसके गाल में एक तमाचा जड़ती हुई कहने लगी…. "गांव ही मिला था तुम्हे हवस मिटाने के लिए। जवानी इतना ही जोश मार रहा था तो चले जाते किसी वैश्या के पास। मेरे जगह किसी और ने देख लिया होता ना तब तुम्हे पता चलता।"

पार्थ:- अब उसने सामने से निमंत्रण दिया था तो..

निम्मी:- वो तो है ही कुतिया। एक फूटी आंख ना सोहाती है मुझे। उसे डायान बनना है, उसी की विधि के लिए शिकार ढूंढ़ रही है। गांव में कुछ करेगी तो सबकी नजरों में आ जाएगी इसलिए कोई बाहर का मुर्गा हलाल करने की फिराक में थी। तुम्हे तो वो निमंत्रण देगी ही। जैसी वो त्रिया चरित्र वाली वैसे ही तुम। हवसी कहीं के निमंत्रण सामने से दी और चुलक अंदर से मचने लगा। मै वक़्त पर ना पहुंचती तो कलेजा निकाल ही चुकी थी तुम्हारा। तुमपर यह मेरा एहसान रहा..

पार्थ:- वो मेरे सीने पर ना जाने क्या-क्या रखकर, ऊपर अपने हाथों में खंजर लिए पता ना क्या ही कर रही थी, लेकिन मुझे पता क्यों नहीं चला..

निम्मी:- साले कुत्ते, नजर छाती से हटेगी तो ना पता चलेगा कि दाएं-बाएं क्या हो रहा है। कुत्ते की जात साले, नंगी लड़की दिखी नहीं की जात दिखा देते हो। और वो दिन में क्या बकवास करके मेरी चोली काट दी थी.. "जब मेरे नज़रों में खोट ना दिखे".. "जब तुम किसी भी अवस्था में रहो और खुद को सुरक्षित मेहसूस करो'".. यहां तुम्हारी नजर भी परख ली और तुम्हारा चरित्र भी। खुली टांग मिली नहीं की लार टपक आता है.. ये हैं नजरों के साफ इंसान। जी तो करता तेरी दिन की हरकत के लिए गले में चाकू घुसाकर यहीं राम नाम सत्य कर दू।

पार्थ:- तुम्हारा गुस्सा जायज है लेकिन एक बात बताओ घर में जो घुआं हो रहा था, क्या तुम जानती हो वो धुआं किस चीज का था।

निम्मी:- हां वो कोई वश में करने की विधि है, जो अक्सर डायन अपने शिकार फसाने के लिए करती है। घूएं से शिकार का पूरा दिमाग कब्जे में आ जाता है।

पार्थ:- मतलब तुम्हे पता था कि मै उसके वश में हूं, फिर भी मुझे इतना सुना रही हो।

निम्मी:- इसे हरामजादगी कहते है। अपनी ठनक और अरमान को निकालने उसके पीछे नहीं जाते थरकी तो वो धुआं के संपर्क में कैसे आते.. दिल तो किया कि मरने के लिए छोड़ दूं ताकि तुम्हे अपनी हवस की और कल सुबह उसे डायन बनने की सजा, दोनों मिल जाए.. लेकिन मुझे, तुमसे सीखने के स्वार्थ ने तुम्हे बचा लिया।

पार्थ:- जी बहुत-बहुत शुक्रिया आप का।

निम्मी:- सुनो मुझे तुमसे इंग्लिश के साथ कुछ कला में भी माहिर होना है कब से शुरू करोगे।

पार्थ:- कल से ही शुरू करते है।

निम्मी:- ठीक है, लेकिन अपनी थरक और अरमान कोठे वालियों पर लुटाकर आना। ना तो मुझे उकसाने के लिए कभी अपनी जुबान से गंदगी निकालना और ना ही मेरे करीब आने कि कोशिश करना।

पार्थ:- ठीक है बाबा समझ गया..

निम्मी:- करीबी नहीं हूं तुम्हारी जो बाबा, बेबी कर रहे हो। छी चरित्रहीन कहीं के.. जाओ अपने कमरे…

क्या गुस्सा था उसका। पार्थ तो दुबका कोई भिंगी बिल्ली बना हुआ था। हां इसमें कोई दो राय नहीं थी कि पार्थ पर निम्मी पूरा हावी थी और वो थोड़े भय में भी था। जैसे ही निम्मी से अलग हुआ तेज-तेज श्वांस लेने लगा। मानो ऐसा हुआ था कि निम्मी जब अपने तैश में थी, तब पार्थ की श्वांस भी कहीं अटकी हुई थी।

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राठौर मैंशन दिल्ली…

तीनों बाप बेटे, विक्रम, कंवल और लोकेश बड़ी से डायनिंग टेबल पर बैठे हुए थे। विक्रम के पास उसकी पत्नी भानुमती बैठी हुई थी, जो लगभग ना के बराबर ही बोला करती थी। भानुमती के पास ही उसकी सबसे छोटी बेटी कुसुम बैठी हुई थी। कंवल के पास उसकी पत्नी नम्रता और उसके पास उसका बेटा चिरंजीत बैठा हुआ था। और इस घर के सबसे रोमांटिक जोड़ी और हमेशा मुस्कुराने वाले लोकेश और मीरा दोनों साथ बैठे हुए थे। खाने के टेबल पर भी दोनों के प्यार भरे वारदात टेबल के नीचे से चलते रहते थे।

डायनिंग टेबल के पास एक मात्र नौकर खड़ा होता अलख सिंह, जो इस घर का सबसे वफादार था और बाकी के नौकर खाना डालकर सीधा अपने क्वार्टर में। एक भड़ा पूरा संयुक्त परिवार था, जो नियमित रूप से अपना भोजन एक साथ ग्रहण करते थे। इसी बीच यहां सब बैठकर, पूरे परिवार के लोग बातें भी किया करते थे।

लोकेश:- इन्हीं सब दिन के लिए मै शुरू से कह रहा हूं आप मायलो के वारिश को ढूंढो, लेकिन पापा आप मेरी सुनते ही नहीं।

विक्रम:- शुरू -शुरू में जरूरत पड़ी थी लेकिन अब उसकी क्या जरूरत, सबकुछ अच्छा चल तो रहा है। नंदनी के पैसे को भी तो अब हम इस्तामल कर ही रहे है ना।

लोकेश:- हां लेकिन कानूनन वो अपने नहीं है, यह क्यों भुल जाते है।

विक्रम की बड़ी बहू नम्रता… हां तो ढूंढ़ कर गांव ले जाओ और किस्सा ही खत्म करो, कबतक हम सेकंड थॉट के साथ काम करते रहेंगे।

कंवल:- शाबाश, मै भी यही सोच रहा था।

कुसुम:- क्या आप लोग भी हमेशा, इसको मारो उसको मारो। अब तो अपने परिवार के लोग को ही मारने का सोच रहे हो। ये कैसा कल्चर का बीज बो रहे हो आप लोग। लोकेश और कंवल भैय्या के नेक्स्ट जेनरेशन भी ऐसा करें तो कैसा रहेगा।

लोकेश:- दैट्स माय सिस्टर.. बिल्कुल सही कह रही है वो। वैसे भी मारना सॉल्यूशन थोड़े ना है। अब देखो श्वांस कैसे अटकी थी हमारी। 40000 करोड़ का प्रोजेक्ट बंद होने जा रहा था जिसमें से 30000 करोड़ बैंक के कर्ज थे। अब यदि बैंक की वसूली होती तो पहले हमारी संपत्ति कुर्की होती, क्योंकि पूरा प्रोजेक्ट हमनें अकेले के फैसले से शुरू किया था। वहीं अगर अभी मालिक के सिग्नेचर होते, तो वो जाने और उसका काम, हमारे पैसे और हिस्से तो सब सुरक्षित होते।

कुसुम:- क्या लोकेश भैय्या आप तो सकुनी के भी बाप हो। जो करना है करो मुझे क्या, खाली कल मुझे शॉपिंग के लिए पैसे चाहिए वो मुझे दे देना।

विक्रम:- अकाउंट में पैसे तो होंगे ही..

कुसुम:- मात्र 30 लाख है कहां से होगी इतने में शॉपिंग। कम से कम 2 करोड़ तो चाहिए ही।

विक्रम की छोटी बहू मीरा….. "लो हमारी बन्नो को 30 लाख रुपए मात्र लगते हैं। मैं तो 10000 में पूरी शॉपिंग कर आऊं।"

कुसुम:- भाभी यहां 10000 कह रही हो और आपके पड़ोस में जो बैठे है आप के प्यारे पति, मिस्टर लोकेश सिंह राठौड़, उनके क्रेडिट कार्ड के 22 करोड़ का लिमिट, एक ही दिन के ऑनलाइन शॉपिंग में चला गया, उसके बारे में मत बोलना। बड़ी आयी मुझे समझाने वाली। यहां सबसे ज्यादा शॉपिंग के खर्च आपके है।

मीरा:- हां तो मै अपने पति के पैसे उड़ती हूं, तुम भी अपने पति के पैसे उड़ाना।

मीरा की बात पर सब हंसने लगे और कुसुम चिढ़ कर नाक मुंह फुला ली। जबतक दोनों भाई ने मना नहीं लिया और मीरा से ज्यादा शॉपिंग के लिए उसके अकाउंट में 25 करोड़ नहीं डलवा दिए तबतक अपना मुंह फुलाए ही रही।

उनकी सभा कि समाप्ति के बाद ही लोकेश और विक्रम साथ निकल गये, जिसे देखते हुए नम्रता अपनी आंखें चढ़ा कर कंवल से कहने लगी… "वो दिन दूर नहीं जब आपका भी हाल आपका भाई, कुंवर सिंह के जैसा करेगा। जिस हिसाब से ये बिजनेस टेकओवर कर रहा है आप बस प्रॉफिट में शेयर ही लेते रहना बाकी पूरा एम्पायर तो वो लोकेश ले जाएगा।"..

कंवल अपनी पत्नी को आखें दिखाते हुए कहने लगा…. "कितनी बार कहा है अपनी लगाई-भिड़ाई दूर रखो। जहां विश्वास नहीं वहां कोई काम नहीं हो सकता। इसलिए अपनी फालतू राय मुझे मत दिया करो।

इधर विक्रम, लोकेश के साथ एक छोटा सा वॉक लेता बातें करने लगा…. "क्या नंदनी का होना इतना जरूरी है।"

लोकेश:- देखिए पापा इन पॉलिटीशियन का कोई भरोसा नहीं है। 4 कंपनी को बर्बाद जब करने में इन्हे एक मिनट का वक़्त नहीं लगा, क्या भरोसा कल को अपने फायदे के लिए हमे बर्बाद ना करें।

विक्रम:- बात में दम तो है, लेकिन नंदनी को ढूंढेंगे कहां।

लोकेश:- जब ढूंढ़ नहीं सकते तो उसकी जगह किसी और बिठा दीजिए।

विक्रम:- बच्चे हो तुम अभी। रियल वर्ल्ड में ऐसा नहीं चलता। एक छोटी सी भनक और समझो ये बेवकूफी भड़ा फ्राउड पूरे कारोबार को ले डूबेगा।

लोकेश:- कैसे पापा।

विक्रम:- मायलो ग्रुप में हमारा 0% का शेयर है। मुख्य मालिक नंदनी है और मै केयर टेकर हूं। कानून दाव पेंच से मैंने 25% की हिस्सेदारी ली है। अब यदि पता चल जाए कि मै गलत तरीके से किसी को ऑनर बना दिया हूं, फिर पूर्ण संपत्ति हड़पने का मामला चलेगा। ये इतना बड़ा एम्पायर अब बन चुका है कि यही राजनेता हमे गिध की तरह नोच देंगे।

लोकेश:- लेकिन पापा किसी को पता चलेगा तब ना।

विक्रम:- लोकेश किसी कि कितनी भी पहचान मिटा दो, कुछ ना कुछ निशानियां रह ही जाती है। फिर आज कल तो डीएनए टेस्ट भी होता है। हां ! लेकिन तुम्हारा सुझाव सही है। बेटा तुम्हे ही मै ये जिम्मा देता हूं ढूंढ़ निकालो नंदनी को।

लोकेश:- ठीक है पापा मै जल्द ही खुशखबरी देता हूं। हां लेकिन एक बात, भले अरबों खर्च हो जाए परवाह नहीं, लेकिन राठौड़ मैंशन उसे मत दीजिएगा। कहीं और बंगलो बनवा दीजिएगा।

विक्रम:- इस मैंशन से तो मुझे भी लगाव है .. ऐसा लगता है जैसे राजा हर्षवर्धन के वंशज अब भी राज कर रहे है।

लोकेश:- बिल्कुल सही कहा पापा।

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स्वस्तिका और कुंजल दोनों रात के 8 बजे तक मुंबई पहुंच गए थे। कुंजल अपने बैग पटक कर चारो ओर देखने लगी।… "दीदी अंदर से ये पूरा घर ऐसा लग रहा है जैसे जाना पहचाना है, ठीक वैसे ही जैसे दिल्ली का फ्लैट है।"

स्वस्तिका:- हां हमारा पूरा ठिकाना लगभग एक जैसा डिज़ाइन किया हुआ है। पार्थ ने ही डिज़ाइन किया था ऐसा, हमारे रूटीन के वर्कआउट के लिए।

कुंजल:- एक बात बताओ आप मुझे यहां ट्रेनिंग के लिए लाई हो ना।

स्वस्तिका:- सच कहूं या झूट।

कुंजल:- क्या दीदी, झूट बोलते अच्छा लगेगा क्या?

स्वस्तिका:- ठीक है सुन यहां तुम्हे ट्रेनिंग के लिए लाई हूं ये सत्य है, लेकिन कोई बहुत ज्यादा फिजिकल ट्रेनिंग नहीं होगी। बस यह सुनिश्चित करना है की विषम से विषम परिस्थतियों में तुम अपनी जान बचा सकती हो की नहीं।

कुंजल:- हे भगवान क्या मै मरने वाली हूं? दीदी मुझे नहीं मारना है अभी। अभी तो अपने भाइयों की शादी में नाचना है। जीजाजी के साथ तो छेड़छाड़ भी अभी करनी बाकी है। ये सब अरमान निकालें बैगर मै नहीं मर सकती।

स्वस्तिका उसके सर पर एक हाथ मारती…. "झल्ली कहीं की, ऐसा कुछ नहीं होगा, लेकिन ये एक कला है और मै चाहती हूं कि तुम जान बचाने की कला में माहिर हो जाओ।

कुंजल:- ओह तो ये डिपार्टमेंट आप का है।

स्वस्तिका:- पागल.. अब ये तुम्हारा दिमाग.. मतलब हम डिपार्टमेंट में बटें है?

कुंजल:- गलत थोड़े ना कहीं… ऐमी है वो कंप्यूटर वाली बिल्ली, आप है मेकअप वाली। बाकी सब मुझे लाठी चलाने वाले लगते है, आप के टीम के तीनों लड़के। वैसे दीदी मेरी एक छोटी सी ख्वाहिश है।

स्वस्तिका:- जी कहिए..

कुंजल:- मुझे होने वाले जीजू से मिलना है।

स्वस्तिका अपनी आखें शिकोड़ते…. "होने वाले जीजू हां, और ये साहब कहां है अभी।"..

कुंजल झट से स्वस्तिका का फोन उठकर भगति हुई उसका संदेश खोल कर पढ़ती हुई कहने लगी… "मिस यू सोना"… "मिस यू टू बेबी".... कुंजल मेरा मैसेज पढ़ना बंद कर, वरना मै सर फोड़ दूंगी तेरा…. "ओह रात नहीं कट रही, बाहों में लेकर.. छी,छी दीदी ये कैसे, कैसे मैसेज भेज रहा है।"…. "मार खा जाएगी कुंजल, मै कहती हूं मेरे मैसेज पढ़ना बंद कर।"…. "एक शर्त पर, मुझे मिलवाओगी"…

स्वस्तिका भागती-भागती परेशान होकर, सोफे पर सर पकड़कर बैठ गई.. कुंजल उसे उदास बैठे देखकर, वो भी उसके पास बैठ गई और फोन बढ़ाती हुई… "सॉरी दीदी"..

तभी स्वस्तिका उसपर झपटी और उसका हाथ उल्टा मोड़कर… "सॉरी की बच्ची, तुझे मेरे मैसेज पढ़ते शर्म ना आयी।"..

कुंजल:- अरे हाथ छोड़ दो, टूट जाएगा। आव.. दीदी सच में दुख रहा है।

स्वास्तिक उसके हाथ छोड़कर टिक कर बैठ गई… उसके पास ही कुंजल भी टिक कर बैठ गई…. "जानू तुम नहीं हो तो श्वांस तक नहीं लिया जा रहा है।"… जैसे ही कुंजल ने यह बोला.. दोनों जोर-जोर से हंसने लगी… "बसकर तू तो जीजाजी को छोड़कर, मुझे ही छेड़ने लगी।"….

कुंजल:- कब मिलवा रही हो।

स्वस्तिका:- छुटकी अभी हमारे रिलेशन ऐसे नहीं की परिवार से मिलवाया जाए..

कुंजल:- अच्छा अच्छा अच्छा.. मतलब सुनकर ही मानोगी..

स्वस्तिका:- चूपकर, मेरा फोन लेकर मेरी ही जासूसी कर ली मुझे पता भी नहीं चला। ब्लैकमेलर, ठीक है कल मिलवाती हूं, अब खुश।

कुंजल:- नाह !! पहले मुझे बताओ कि ये एंगेजमेंट में आपका मेकअप ना करना और जब कोई चाहने वाला मिलेगा तब करूंगी.. ये सब ड्रामे क्या थे?

स्वस्तिका:- आरव के लिए। उसे पता चल जाता तो वो अपनी एंगेजमेंट छोड़कर मेरी एंगेजमेंट करवाने लगता, और इस वक़्त मै नहीं चाहती कि मै किसी बंधन में फसू।

"मतलब मामला दो तरफा है.. आप भी चाहती है.. वूहू वूहू वूहू... मतलब यही है अपने होने वाले जीजू.. वो ओ ओ ओ ओ ओ"…... "कुंजल की बच्ची, इमोशनल ब्लैकमेलर, तुझे तो मै, रूक बताती हूं।"….. "नहीं नहीं दीदी .. छोड़ो .. मै किसी को नहीं बताउंगी सच्ची..

दोनों की खट्टी मीठी नोक झोंक जारी रही। स्वस्तिका को जिस परिवार का ना होना खलता रहा उसे वो मेहसूस कर रही थी, और अपने अरमान भी साझा कर रही थी।….
 
Update:-93

दोनों की खट्टी मीठी नोक झोंक जारी रही। स्वस्तिका को जिस परिवार का ना होना खलता रहा उसे वो मेहसूस कर रही थी, और अपने अरमान भी साझा कर रही थी।….

अगली सुबह कुंजल सोई हुई थी और ऐसा लगा जैसे उसका दम घुट रहा है। आंख बड़ी होकर खुल गई। पूरा मुंह प्लास्टिक के बैग के अंदर घुसा हुआ था। कुंजल छटपटा कर पूरा जोड़ लगा रही थी, लेकिन वो कुछ भी करने में असमर्थ थी, हाथ पाऊं वो पूरी ताकत से पटक रही थी लेकिन वो खुद की छुड़ाने में विफल थी।

स्वास्तिक उसके पास बैठकर यह सब कर रही थी और कुंजल उसे मारती और पिटती रही लेकिन स्वस्तिका ने तबतक नहीं छोड़ा जबतक वो खुद छोड़ना नहीं चाहती थी। जैसे ही स्वस्तिका ने उसे छोड़ा, कुंजल अपने चेहरे से पलास्टिक हटाकर खांसती हुई खुद की श्वांस की सामान्य करने लगी।

काफी देर तक हांफती हुई वो श्वांस सामान्य करती रही। जैसे ही कुंजल में थोड़ी जान आयी वो रोते हुए अपने दोनो हाथ पटककर स्वस्तिका को मारने लगी… "सुबह सुबह ऐसा कौन करता है… जरा भी दया या रहम है कि नहीं"…

स्वास्तिका:- रोना धोना हो गया हो गया हो तो 10 मिनट में ट्रेनिंग एरिया में।

स्वास्तिका के जाते ही कुंजल नाकी धुनते उसे 2-4 गालियां दी और मन मारकर ट्रेनिंग एरिया में पहुंच गई। सुबह के 4.30 बजे से 8.30 बजे तक के कड़े अभ्यास के बाद कुंजल के लिए विश्राम की स्तिथि हुई और वो वापस आकर हॉट शॉवर लेकर फ्रेश होने के बाद बिछ गई अपने बिस्तर पर और सोने लगी।

स्वास्तिका भी कॉलेज जाने के लिए जल्दी से तैयार हुई और जाने के क्रम में जब कुंजल को सोती हुई पाई, तब उसके पास जाकर प्यार से उसके सर पर हाथ फेरती वहां से निकल गई।

कॉलेज में वो जैसे ही पहुंची उसके फ्रेंड योगेश और शाहीन ने उसे घेर लिया… "तुम दोनों ने मेरा रास्ता क्यों रोका है।"

योगेश:- बिना बताए जाओ तुम और वो डॉक्टर का बच्चा मेरा रास्ता रोक..

शाहीन:- साला एक दिन तो मेरे हॉस्टल भी पहुंच गया था।

स्वास्तिका को रोककर दोनों ने मिलकर 10 मिनट तक कम से कम सुनाया होगा। स्वास्तिका दोनों को काफी देर तक झेलने के बाद…. "बस, फ़्री पीरियड में चलते है आज उसकी खैर नहीं।"

शाहीन और योगेश एक दूसरे को ताली देते हुए "येस" कहे, वहीं से तीनों चल दिए क्लास। आज एक्स्ट्रा क्लास की वजह से कोई फ्री पीरियड ना मिल पाने की स्तिथि में तीनों 4 बजे क्लास खत्म करके मिले और तीनों ही निकले डॉक्टर से मिलने। तीनों को एक साथ ब्वॉयज हॉस्टल के ओर आते देख डॉक्टर का एक दोस्त निर्मल तेजी से डॉक्टर के रूम में पहुंचा, और जोड़-जोड़ से दरवाजा खटखटाया… "क्या हुआ निर्मल, ऐसे पागलों कि तरह दरवाजा क्यों खटखटाया"…

निर्मल:- डॉक्टर माना किया था ना उसके फ्रेंड्स को मत कुछ करना आ रही है इधर ही, और हां उसके हाथ में रॉड भी है।

निर्मल तो अपनी बात हड़बड़ी में डॉक्टर से बोल दिया लेकिन उन दोनों की बात हॉस्टल के एक अन्य छात्र ने सुनी और वो इन दोनों के भागने से पहले ही, हॉस्टल के हर दरवाजे को पीटकर सब की आगाह करते हुए सुना दिया… "स्वास्तिका आ रही है रॉड के साथ।"

इधर डॉक्टर जबतक अपने ऊपर कपड़े डालकर वहां से निर्मल के साथ रफूचक्कर होने कि फिराक में था, इतने में हॉस्टल के बाकी छात्रों ने उसका रास्ता ही रोक लिया… "अरे सालों रास्ता छोड़ दो, वरना मुझ से अच्छा कोई ना होगा".. डॉक्टर जोर से चिल्लाते हुए कहा।

भीड़ में से एक लड़का…. "डॉक्टर अपने लफड़े खुद ही संभालो, तुम्हारे चक्कर में हम क्यों पीटें।"

निर्मल:- कमिने सालों, एक साथ इतने लड़के होकर एक लड़की से पिट जाते हो, शर्म नहीं आती।

भीड़ से दूसरा लड़का:- भोसडीके तो तुम दोनों कहां भाग रहे थे। साले हमरे माथे पर चूतिया लिखा है क्या? दोस्तों दोनों को किधर भी नहीं निकलने देना है। और इस साले निर्मल के कहने पर डॉक्टर ने स्वास्तिका के दोस्तों को परेशान किया था यह भी बताना है।"

"यहां आप सीनियर्स कि कोई मीटिंग चल रही है क्या सर।"… बॉयज हॉस्टल की छोटी सी आने जाने वाली गाली के सबसे पीछे खड़ी होकर स्वास्तिका न बड़े ही प्रेम से आवाज़ लगाई… सभी छात्र बीच का रास्ता खाली करते… "माते दोनों भागने के इरादे से थे इसलिए हमने इन्हे रोके रखा है।"..

स्वास्तिका:- हम खुश हुए… इसके बदले मै आप सबका कोई 1 छोटा सा काम कर दूंगी…

सभी छात्र एक साथ…. "बस हमारा 1 टॉपिक संभाल देना बहुत समझने की कोशिश कर रहे है लेकिन क्लेरिटी नहीं मिल पाई है।"…

स्वास्तिका:- ठीक है आज शाम जरा मै डॉक्टर से हिसाब किताब समेट लूं, फिर आप सभी सर लोग कल ऑडिटोरियम में मिल लीजिएगा.. किसी को कोई आपत्ती..

छात्र:- आप से कैसी आपत्ति..

स्वास्तिका:- तो ठीक है आप सब अपने अपने कमरे में चले जाइए, मै जरा डॉक्टर और उसके इस निकम्मे दोस्त से मिल लूं।

छात्र:- माते आप के लिए छोटी सी सूचना भी है, शाहीन और योगेश के टॉर्चर के पीछे निर्मल का हाथ है।

निर्मल:- देखो स्वास्तिका मुझे जाने दो वरना मैं यहां से कूद जाऊंगा…

तभी उन छात्रों में से 2 छात्र ने उस निर्मल को पकड़ा और पकड़ कर डॉक्टर के साथ कमरे में डाला.. बीच का रास्ता खाली था स्वास्तिका और उसके दोस्त सीधा पहुंचे उसके कमरे में… "निर्मल ज्यादा विरोध नहीं करोगे तो सस्ते में छूट जाओगे वरना मजबूरन मुझे वो पिछली बार वाली पिछ्वाड़ा लाल थेरेपी देनी होगी।"..

स्वास्तिका ने आते ही अपना प्रस्ताव रखा और निर्मल मान गया। शाहीन ने हरी मिर्च का थैला आगे बढ़ाते… "चल बेटा ये मिर्ची खा ले"..

निर्मल:- स्वास्तिका, देखो डॉक्टर बहुत मायूस था और तुम्हारा कोई पता नहीं था इस चक्कर में हम बस इन दोनों से तुम्हारे बारे में पूछने गए थे।

योगेश:- साले ये भी बता ना शाहीन को क्या बोला था। यदि कल तक स्वास्तिका का पता ना चला तो हमारी प्रेम कहानी इसके खड़ूस बाप को बता देगा।

शाहीन:- योगेश जुबान कुछ ज्यादा लंबी नहीं हो गई तुम्हारी। अब्बू के बारे में तुमने उल्टा बोला ना… बाद में मै तुमसे निपटती हूं।

योगेश:- "अरे वो फ्लो में निकल गया था शाहीन, तुम भी ना"… कहते हुए योगेश, शाहीन को गले से लगाया और शाहीन उसे झटकती हुई… "तुम तो दूर ही रहो फिलहाल योगेश मुझसे।"..

स्वास्तिका:- जी तो कर रहा है तुम दोनों को ही पहले हौंक दूं। जब देखो तब पागलों कि तरह दोनों कहीं भी लड़ाई तो कहीं भी रोमांस करने लग जाते हो। अब जरा शांत होकर खड़े रहो, और दोनों से हिसाब किताब करनें दो।

डॉक्टर:- कम से कम तुमसे तो अच्छे है। रोमांस और लड़ाई का बैलेंस तो बनाए है। तुम्हारी तरह बात-बात पर रोड तो नहीं निकाल लेते। लड़ाकू विमान..

स्वास्तिका:- डॉक्टर तुमसे जरा मै बाद ने निपटती हूं, पहले इस कंजर निर्मल से निपट लूं, जो तुम्हे उल्टे-सीधे सलाह देते रहता है।

डॉक्टर:- वो भी मेरा दोस्त है और इसने मुझे कोई भी सजेशन नहीं दिया, बल्कि मै खुद गया था शाहीन और योगेश के पास। मै दोषी हूं, मुझे मारो.. हट तू निर्मल, बहुत हो गई इसकी हिटलर गिरी..

स्वास्तिका:- ठीक है डॉक्टर चूंकि तुम गुस्से में हो, इसलिए अपने दोस्त से कहो कि हमारी सुकून के लिए ये 10 मिर्ची एक साथ चबा जाए। वरना अभी तुम्हारे लिए छोड़ तो दूंगी, लेकिन क्या हर वक़्त तुम इसके साथ होगे।

निर्मल:- डॉक्टर रहने दे, सिर्फ 10 ही मिर्ची तो है।

बेचारा 10 मिर्ची एक साथ मुंह में डाला तो, लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे आंख कान, नाक हर जगह से धुआं निकल रहा हो। मिर्ची खाते ही स्वस्तिका ने सबको यह कहकर वापस भेज दिया कि अब वो, वन टू वन डॉक्टर के साथ मैटर सॉल्व करेगी।

सबके जाते ही… "क्या है डॉक्टर ये सब हरकतें"..

डॉक्टर:- क्या है यार बिना बताए ऐसे कैसे जा सकती हो?

स्वास्तिका:- तो इसके लिए तुम उन दोनों को परेशान करोगे।

डॉक्टर:- सॉरी, पर मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। बताकर तो जाना था, तुम्हे कुछ अंदाजा भी है मेरी हालत का?

स्वास्तिका:- लो बाबा कान पकड़ती हूं, दिल को सुकून मिला या अब भी मुंह लटकाए रहोगे। ओ भारद्वाज सर, सुनिए तो.. ओ दीपेश भारद्वाज... अब मान भी जाओ।

डॉक्टर:- तुम्हे पता है कैसे काटे है मैंने ये 20-21 दिन, पागल सा हो गया था मै। तुमने मुझे एहसास दिलाया कि किसी को इतना ना चाहो की ज़िंदगी मुश्किल लगने लगे…

स्वास्तिका:- मतलब अब तुम इस सीख के बाद अपनी चाहत कम करने वाले हो। ठीक है डॉक्टर कोई बात नहीं।

दीपेश स्वास्तिका के दोनों गाल खिंचते… "इसे कहते है बात को अपने हिसाब से घूमना, बहुत ही कठोर दिल की हो तुम स्वास्तिका।"

स्वास्तिका:- अच्छा गर्लफ्रेंड इतने दिनों बाद लौटी है और तुम उसे दूरी बनाए हो, अब कठोर कौन है।

दीपेश:- सभी साले दरवाजे पर ही नजर डाले होंगे की हम दोनों क्या कर रहे है। कल का गॉसिप मसाला जो होगा इनका। शाम को मिलते है ना, आज सिर्फ मै और तुम।

स्वास्तिका:- नाह। अच्छे से तैयार होकर जल्दी से घर आओ, किसी से मिलवाना है।

दीपेश:- किससे..

"वो जब आओगे तब खुद ही देख लेना।"… स्वास्तिका जाते-जाते अपनी बात कहती चली और दीपेश सस्पेंस में उलझकर रह गया। इधर स्वस्तिका जब लौटी तब भी कुंजल सोई हुई थी। स्वास्तिका उसे जागती हुई चली गई चेंज करने, जबतक स्वास्तिका लौटी, कुंजल टेबल पर खाना लगाकर उसका इंतजार कर रही थी। "

"तुमने अभी तक खाया नहीं था।"… स्वास्तिका बैठती हुई पूछने लगी..

कुंजल:- बदन पूरा टूट रहा है दीदी, इतनी मेहनत तो भाइयों ने भी नहीं करवाई थी।

स्वस्तिका:- हम्मम ! कोई नहीं तुम्हे एक अच्छी मसाज की जरूरत है।

कुंजल:- मुझमें बाहर जाने की भी हिम्मत नहीं बची।

स्वास्तिका:- कोई नहीं थोड़ा सा खा ले, फिर मै चलती हूं तुम्हे एक मसाज देने।

कुंजल:- नहीं रहने दो दीदी, मै मैनेज कर लूंगी।

दोनों बहने थोड़ा सा खाकर उठ गई। स्वास्तिका उसे बिठाकर पहले तो उसके सर को अच्छे से मसाज की, फिर लगभग डेढ़ घंटे तक उसे बॉडी मसाज देती रही और साथ में एक्यूपंक्चर थेरेपी भी दी। मसाज के बाद तो कुंजल को मज़ा टाइप आ गया। कुंजल एक बार फिर स्टीम बाथ लेकर वापस आयी और स्वास्तिका के पास बैठती हुई…. "अब मै समझी की मेरे भाई मुझे सस्ती ट्रेनिंग क्यों दे रहे थे।"

स्वास्तिका, मुस्कुराती हुई… "अब कैसा लग रहा है।"..

कुंजल:- आह मज़ा आ गया दी, आपके हाथों में तो जादू है। वैसे मेरा काम हुआ या नहीं..

स्वास्तिका:- कौन सा काम कुंजल..

कुंजल:- मेरे जीजू से आज मुझे मिलवा रही हो ना आप..

स्वास्तिका:- धत तेरे की मै तो भूल ही गई।

कुंजल:- ओ भूल गई.. झुटी, जानबुझ कर नहीं कहा होगा। लेकिन कोई बात नहीं मुझे पीजी कर रहे स्टूडेंट दीपेश भारद्वाज का हॉस्टल पता है।

स्वास्तिका:- चोर कहीं की, मेरा पूरा डेटा चोरी कर गई।

कुंजल:- हीहीहीही… या तो आप फोन करके उनको यहां बुलाओ या फिर मै खुद ही मिल लूंगी…

इतने में ही दरवाजे कि घंटी भी बजने लगी…. "जाकर दरवाजा खोल और मिल ले अपने होने वाले जीजू से।"…

कुंजल ने जैसे ही दरवाजा खोला थोड़े कंफ्यूज होते पूछने लगी… "दीदी यहां तो जीजू के साथ तुम्हारी सौतन भी है।"..

शाहीन:- हेय तुम कुंजल हो राईट, हमारी स्वास्तिका की बहन..

कुंजल:- दीदी अब तो और भी कन्फ्यूजन बढ़ गया है.. ये तुम तीनों के बीच चल क्या रहा है? यहां एक हॉट सी मॉडल "हमारी स्वास्तिका" कह रही है।

तभी पीछे से स्वास्तिका उसे एक हाथ मारती.. "झल्ली कहीं की.. ये दोनों तो मेरे दोस्त है। ये हैं शाहीन और ये है योगेश। पर तुम दोनों यूं अचानक.. आओ अंदर आओ।

शाहीन:- मुझे डाक्टर का फोन आया था उसने कहा तुम्हारी तबीयत खराब है।

"बहुत ही चालक हो गया डॉक्टर।" .. स्वस्तिका अपनी जगह से उठी और दरवाजे के खोल कर पैसेज में निकली… बाएं साइड में ही दीपेश खड़ा था… "यू डॉक्टर, बहुत ही चालक हो गए हां।"

दीपेश:- अब तुम जैसी खरनाक गर्लफ्रेंड मेनटेन करना है तो कदम फूंक-फूंक कर रखना ही परता है।

"हट पागल, आओ अंदर।"… दोनों हंसते हुए अंदर चले। अंदर हॉल में जबतक कुंजल स्वास्तिका के दोस्तों से बात करना शुरू ही की थी। जैसे ही स्वास्तिका के चेहरे की हंसी और साथ ने दीपेश दिखा, कुंजल को समझते देर न लगी।

वो भागकर दीपेश के पास पहुंची और उसका हाथ थाम कर कहने लगी…. "दीदी आज के शाम इन्हे मैंने बुक कर लिया है, आप लोग आपस में बातें करो, और आप चलिए मेरे साथ।"

दीपेश कुंजल के साथ चलते हुए स्वास्तिका से इशारों में पूछने लगा… "ये कौन है।"… स्वास्तिका भी उसे हाथों के इशारे में समझते हुई बताने लगी "छोटी बहन है।".. स्वास्तिका अाकर अपने दोस्तों के पास बैठ गई और कुंजल दीपेश के साथ।

कुंजल अपना हाथ आगे बढ़ाती हुई… "हेल्लो मिस्टर होने वाले जीजू, मै आपकी इकलौती साली, कुंजल।"..

दीपेश भी हाथ मिलाते…. "बहुत खुशी हुई तुमसे मिलकर कुंजल"

कुंजल:- तो दीपेश सर जरा, हमे भी अपनी प्रेम कहानी सुनाएं कि दोनों में आखिर प्यार कैसे हुआ..

दीपेश:- क्यों स्वास्तिका ने तुम्हे नहीं बताया क्या?

कुंजल:- दीदी से बातें करने के लिए मेरे पास हजार बातें है सर, कुछ तो आपसे भी बात करने के लिए टॉपिक चाहिए ना। तो बिना देर किए शुरू हो जाइए।

कुंजल:- दीदी से बातें करने के लिए मेरे पास हजार बातें है सर, कुछ तो आपसे भी बात करने के लिए टॉपिक चाहिए ना। तो बिना देर किए शुरू हो जाइए।
 
Update:-94

दीपेश:- "हम दोनों में से कोई भी ये नहीं बता सकता कि हमारे बीच लगाव कैसे हो गया। हमे पता ही नहीं चला कि कब हम करीब आ गए। हमारी पहली मुलाकात तकरीबन 4 साल पहले हुई थी। तब मै एमबीबीएस थर्ड ईयर में था और स्वास्तिका न्यू एडमिशन थी।"

"बिलो एवरेज सी दिखने वाली एक लड़की जो खुद में ही खुश रहती थी। उसपर बहुत ज्यादा किसी का ध्यान नहीं जाता था, लेकिन हमने उसके पूरे बैच को बहुत परेशान किया था। खासकर उसकी दोस्त शाहीन को, पूरे बैच कि टॉप मॉडल थी वो।"

"वैसे हम तो बस सामान्य रैगिंग और शाहीन के लिए हल्के-फुल्के कमेंट पास करते थे। उसी बीच एक दिन फाइनल ईयर के हमारे सीनियर्स ने शाहीन को बुरी तरह छेड़ दिया था। एक्सप्लेन नहीं किया जा सकता, वो कितना बुरा था। शाहीन तो जैसे पूरी तरह से सदमे में चली गई थी और एकमात्र लड़का योगेश बीच बचाव में आया, जिसकी टांगे सीनियर्स ने तोड़ डाली। और उसी शाम की बात की है, एक कहर बरसा था पूरे हॉस्टल में।"

"स्वास्तिका के साथ तुम्हारा भाई आरव भी था। केवल यही 2 लोग थे और हाथ में रॉड लिए पहले हमारे सीनियर के हॉस्टल में घुसे। हर एक कमरे में घुसकर जो ही पिटाई कि उनकी। जो शामिल थे उन्हें उसके कर्मो के लिए पिटाई परी थी और जो नहीं शामिल थे उन्हें चुपचाप खड़े होकर तमशा देखने के लिए।"

"उनकी पिटाई के बाद ये लोग थर्ड ईयर के हॉस्टल में घुसे, फिर वहां एक तरफ से सबको हौकना शुरू किया। आज भी वो मंजर पूरे हॉस्टल को याद है। इनकी बेरहम पिटाई देखकर कई लड़के तो फर्स्ट फ्लोर से कूद गए। तुम्हारी बहन और भाई ने पुलिस स्टेशन में भी खूब पैसे खिला आए थे, इसलिए नहीं कि उन्हें कोई पकड़कर ना ले जाए, बल्कि इसलिए कि जबतक ये दोनों भाई-बहन पिटाई कर रहे हो, तबतक उन्हें कोई परेशान ना करे।"

"3 घंटे तक दोनों का कहर बरसा था। फर्स्ट ईयर, थर्ड ईयर और फाइनल ईयर के हॉस्टल में घुसे थे दोनों। क्या लड़का, क्या लड़की, हर तमाशा देखने वालो को पीटा था। 5 मुख्य लड़के जो इस मामले को अंजाम दिए थे, उन पांचों को पीटने के बाद कैंपस के बीचों बीच टांग कर सख्त वार्निंग देते गए थे.. "कल जबतक पूरा कॉलेज इनका जुलुश ना देख ले, उससे पहले यदि किसी ने इनको उतरा तो उनसे ये दोनों प्रिसनली मिलेंगे।"

"पुलिस आयी इनको लेकर भी गई। सबको लगा था कि इतने बड़े-बड़े लोगों के बच्चों पर हाथ डाला है, दोनों तो अच्छे से लपेट लिए जाएंगे। लेकिन अगले दिन स्वास्तिका फिर से कॉलेज में दिख गई। 400 लोगों पर खौफ बरसा था तुम्हारी बहन और भाई का, केवल मै और मेरा दोस्त निर्मल बच गए थे।"

"कुछ दिन बाद जब मै लौटा और स्वास्तिका के बारे में सुना तब मुझे यकीन नहीं हुआ। यहां से शुरवात हुई थी स्वास्तिका को जानने की मेरी जिज्ञासा। मै अक्सर उसके आसपास मंडराता रहता, लेकिन उसने मुझपर कभी ध्यान नहीं दिया, ऐसा मुझे लगता था।"

"स्वास्तिका पहले ईयर से ही लेडी डॉन के नाम से मशहूर हो गई। साल दर साल निकलते चले गए। जिसे जानने की जिज्ञासा थी, अब उसे देखे बिना दिल नहीं लगता था। मेरा दोस्त निर्मल जो मेरे साथ रहता था, वह अक्सर मुझे कहता भी था कहां उस थकेली के पीछे परा है जबकि एक से बढ़कर एक लड़कियां है कॉलेज में। लेकिन मुझे तो वहीं चेहरा पसंद था, फिर और कभी कोई अच्छी लगी ही नहीं।"

"मज़े की बात जानती हो कुंजल, स्वास्तिका सेकंड ईयर के आखरी में थी, जब हमारा कॉलेज फंक्शन था। तब वो पहली बार बन सवर कर आयी थी। आज से पहले वो अपने चेहरे कर क्या पोत कर आया करती थी पता नहीं, लेकिन जब वो अपने चेहरे से वो पुराने स्वास्तिका के मास्क उतार कर आयी, कॉलेज में उसे कोई पहचान नहीं पाया।"

"लेडी डॉन को कोई भी पहचान नहीं पाया था और ऐसा लग रहा था पूरा कॉलेज ही उसके पीछे पड़ा हुआ है। उस दिन मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। मै योगेश और शाहीन का पीछा कर करके पूरा मायूस हो चुका था, लेकिन स्वास्तिका की एक झलक नहीं मिली।"

"ऑडिटोरियम में भी मै निर्मल के पास चुपचाप ही बैठा रहा। तभी स्वास्तिका वहां पहुंची और अपने ही अंदाज़ में निर्मल को उठकर कहीं और जाने बोली। वो ठीक मेरे पास बैठी थी, और आसपास के लोग नई स्वास्तिका से बात करने में लगे थे और मेरी नजर अपनी स्वास्तिका को पूरे ऑडिटोरियम में ढूंढ रही थी। 2 साल हो गए थे लेकिन मै कभी उससे बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था। मैं मायूस और उदास बैठा था तभी मेरे कानो में वो सब्द पड़े… "क्यों डॉक्टर आज थोड़े मायूस दिख रहे, बात क्या है?"

"उसकी आवाज़ जब कानो में पड़ी, मेरे चेहरे पर मुस्कान वापस आ गई, और मुड़कर जब देखा तो होश उड़े थे। आखों की यकीन नहीं हो रहा था, यह वही बीलो एवरेज लड़की है, जिसका मै दीवाना हूं। उसे देखने के बाद एक बार फिर मायूसी आ गई मेरे चेहरे पर, शायद यह बात स्वास्तिका ने भांप लिया और मुझसे कहने लगी…. "क्यों डॉक्टर हिम्मत नहीं जुटा पा रहे क्या परपोज करनें की।"..

"क्या ही बताऊं मेरा क्या हाल था उस वक़्त। कहना तो बहुत कुछ चाहता था उसे, लेकिन मेरे जुबान ने साथ नहीं दिया, लेकिन हाल-ए-दिल उसे सब पता था, और उसके दिल का हाल भी कुछ अपने जैसा ही था। अब तो बस एक ही फीलिंग रहती है, एक बस वो मिल गई अब भगवान से और कुछ नहीं चाहिए।"

कुंजल:- वाउ .. मतलब दोनों के दूसरे को पूरे शिद्दत से चाहते हो। तो बताओ आप कब आ रहे हो मां से शादी की बात करने।

दीपेश:- मै तो कब से तैयार ही हूं, लेकिन तुम्हारी बहन यह कहकर टाल जाती है कि अभी जल्दी क्या है?

कुंजल:- ठीक है आज से हम दोनों एक टीम में, आओ मेरे साथ बाहर..

दीपेश:- लेकिन तुम करने क्या वाली हो…

"आप चलो तो सही, इतना घबरा क्यों रहे हो।"… कुंजल दीपेश का हाथ खींचकर बाहर ले जाने लगी… जैसी ही कुंजल हॉल में पहुंची…. "दीदी ये क्या नाटक लगा रखा है।"..

स्वास्तिका:- कुंजल अंदर से तू जो भी सोचकर आयी है, उसपर हम अकेले में बात करेंगे ठीक है।

कुंजल:- ठीक है दीदी… पक्का ना, बात को टाल तो नहीं दोगी ना।

स्वास्तिका:- हां बाबा पक्का। अब आजा इधर दीपेश से ही केवल मिलेगी क्या, इनसे भी तो मिल लेे थोड़ा, और डॉक्टर साहब थोड़ा सी सफाई देंगे की आपने इन दोनों की एक शाम क्यों बिगड़ दी?

दीपेश:- मुझे लगा तुमने कहीं कोई खतरनाक सरप्राइज प्लान ना की हो, इसलिए बतौर सेफ्टी मै इन दोनों को मनाकर पहले यहां भेज दिया।

स्वास्तिका:- डॉक्टर आज भी तुम और तुम्हारे दोस्त केवल मेरी बहन की वजह से बच गए। ये मेरे पास है, तो लगता है कि क्यों झगड़ा करके मै अपना मूड खराब करू। फिर मै छोटी के पास खराब मूड से पहुंचूं। वरना खैर नहीं थी तुम्हारी..

कुंजल पहली बार स्वास्तिका के माहौल को भी देख रही थी। स्वास्तिका पूरी खुशमिजाज थी, जिसकी झलक वो दिल्ली में तो देख ही चुकी थी, यहां मुंबई में तो उस मिजाज में और भी निखार आ गए थे। खाते-पीते और खट्टे-मीठे नोक झोंक के साथ कब शाम बीती, पता भी नहीं चला।

अगली सुबह फिर से वही सब कुंजल के साथ दोहरा रहा था। एक बार फिर कुंजल वैसे ही छटपटाई और जब दम घुटने लगा तब स्वास्तिका ने कुंजल को छोड़ दिया। आज भी उसके चेहरे पर वहीं गुस्सा था लेकिन श्वांस सामान्य होने के बाद कुंजल ने खुद के गुस्से पर काबू किया और शांति से पूछने लगी… "उपाय बताइए"..

स्वास्तिका:- पहला उपाय यही है। गुस्सा हो, डर हो या घबराहट। कोई भी ऐसी बात जो मन को बेचैन करे पहले अपने दिमाग को नियंत्रित रखो। जान जाने की स्तिथि में सबसे बड़ी जो गलती होती है..…. एक तो श्वांस वैसे ही टूट रही होती है, ऊपर से फालतू की कोशिश शरीर कि बची ऊर्जा भी खत्म कर देती है। इसलिए जब भी जान जाने की स्तिथि लगे, अपने दिमाग को नियंत्रित करके केवल एक छोटा सा हमला करो। ऐसा हमला जो मजबूत से मजबूत शिकारी को भी चौंका दे। मकसद केवल और केवल चौकान होना चाहिए, ताकि छोटी सी कोशिश में काम बन जाए… आओ मेरे साथ कुछ दिखाती हूं…

कुंजल और स्वास्तिका दोनों ट्रेनिंग एरिया में पहुंचे जहां स्वास्तिका ने उसे टेक्नोलॉजी के साथ आर्टिफिशियल नाखून की ऐसी सीरीज दिखाई की उसका दिमाग घूम गया। कुंजल को पहली बार एहसास हो रहा था कि एक नाखून से कितना कुछ किया जा सकता है। सीखने के लिए तो सारा जहां परा है, बस सीखने कि चाह होनी चाहिए और कुंजल के अंदर भी कुछ नया सीखने की जिज्ञासा जाग उठी थी।

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राजस्थान, वीरभद्र का गांव...

ट्रेनिंग का पहला चरण पार्थ ने शुरू कर दिया था। भ्रम जाल फैलाना और सामने होकर भी छिपे रहने की कला को वीरभद्र बारीकी से समझ रहा था। वह एक बेहतरीन स्नाइपर था इसलिए सबसे पहले इसी विषय को उठाया गया कि कोई दूसरा स्नाइपर जब कहीं दूर से निशाना ले रहा हो, तब खुद का बचाव कैसे किया जाए।

भ्रम जाल की इस कड़ी में वीरभद्र के दिमाग की नशें हिल गई। कुछ सुरवाती भौतिक विज्ञान की जानकारी के बाद, जब आइने के प्रयोग वीरभद्र सुना, तो उसे ऐसा लगा जैसे अभी स्नाइपिंग में बहुत कुछ सीखना बाकी है। दूसरे स्नाइपर से बचने की कड़ी में आइने के प्रयोग को समझाने के बाद, पार्थ ने वीरभद्र को एक माइक्रो डिवाइस का प्रयोग भी सिखाया, जिसमे दूसरे स्नाइपर से बचने के लिए "बॉडी टारगेट डेविएशन" प्रोग्राम किया गया था, जहां इस डिवाइस की मदद से किसी के इंसान की वास्तविक स्थिति को वर्चुअली कुछ इंच का हेर-फेर किया जा सकता था।

पहले चरण के सेशन के बाद फिर दोनों फिजिकल एक्सरसाइज और "लौंग एंड शॉर्ट रेंज" टारगेट प्रैक्टिस करने लगे। निम्मी भी दोनों को छिपकर ट्रेनिंग करते देख रही थी और अपने काम कि बातों पर पूरा ध्यान दे रही थी। दिन के खाने के बाद फिर आया निम्मी के इंग्लिश क्लास की बारी।

बेचारा पार्थ डरा सहमा सा उसके सामने बैठा बिना अपने नजरें ऊपर किए उससे मूलभूत चीजें समझा रहा था। इसी क्रम में एक बार पार्थ की नजर जैसे ही ऊपर गई, निम्मी उसे टोकती हुई कहने लगी…. "आखें ही निकाल लूंगी दोबारा अगर नजर ऊपर करने के भी कोशिश किए तो।"

पार्थ:- सॉरी वो मैं नहीं चाहता था, लेकिन गर्दन अकड़ गई थी इसलिए ऊपर करनी पड़ी।

निम्मी:- अकड़ी गर्दन के साथ जिंदा रहा जा सकता है लेकिन गर्दन ही उतार गई फिर क्या करोगे।

बेचारा पार्थ दोबारा कुछ नहीं बोला और अपने काम में वो लग गया। आधे घंटे की क्लास खत्म होने के बाद निम्मी उसे टोकती हुई कहने लगी… "मुझे तुमसे कुछ सीखना है उसके लिए मुझे नियमित समय चाहिए।"

पार्थ:- ठीक है शाम के 4 बजे से शुरू करेंगे… एक दिन के ट्रेनिंग के बाद तय कर लेंगे की आगे का समय कितना लगना है।

निम्मी:- ठीक है, मुझे कार चलानी भी सीखनी है।

पार्थ:- कुछ ज्यादा ही तुम तो उम्मीद लगाए बैठी हो।

निम्मी:- एक ही विकल्प है इसलिए आश्रित होना पड़ता है, वरना घटिया लोग मेरे आसपास भी हो तो मुझे कतई बर्दास्त नहीं होता।

पार्थ:- यह कुछ ज्यादा नहीं हो रहा। तुम्हे नहीं लगता कि तुम कुछ ज्यादा ही बोल रही हो।

निम्मी:- हम्मम ! ये भी सही है, जितनी कम बातें और ज्यादा से ज्यादा काम कि बातें हो, वहीं फायदेमंद है। ठीक है मै कोई निजी बात नहीं करूंगी। कार कब सीखा रहे हो।

पार्थ:- अभी चलो। पहले ड्राइविंग फिर कला..

निम्मी:- ठीक है। तुम गाड़ी निकालो जबतक मै तैयार होकर अाई।

पार्थ गाड़ी निकालने चला गया और निम्मी तैयार होकर उतरी। निम्मी का चिढ़ पार्थ पर देखने को बनता था। पार्थ आगे बैठकर ड्राइविंग कर रहा था और निम्मी पीछे से बैठकर सीख रही थी। लौटते वक़्त जब लगा की निम्मी को खुद से कोशिश करनी चाहिए, फिर वो गांव के पास अपनी कार कुछ दूर ड्राइव करती अपने घर तक लाई।

पार्थ उसके सीखने कि ललक को बहुत ही गहराई से आकलन कर रहा था। ट्रेनिंग एरिया में भी निम्मी बहुत ही सधी और अपने जरूरतों कि चीजें सीखने में ज्यादा रुझान रख रही थी। जिसमे वो चाकू से क्लोज रेंज कॉम्बैट में अपने मूव्स को और कितना इफेक्टिव कर सकती है, उसपर विशेष ध्यान दे रही थी।

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पार्थ और स्वास्तिका, यूं तो वीरभद्र और कुंजल को 3 महीने में अपने दिए लक्ष्य तक सिखाने में उन्हें लगे हुए थे, लेकिन कुंजल और वीरभद्र को सिखाने के क्रम में, वो दोनों भी बहुत कुछ सीख रहे थे। जहां एक ओर पार्थ क्लोज कॉम्बैट में चाकू और खंजर के प्रयोग को अपने अंदर उतार रहा था, वहीं स्वास्तिका कुंजल से वो हाथ की सफाई सीख रही थी, जिससे आज तक सभी घरवाले अनजान थे।

हर दिन के साथ सबकी ट्रेनिंग में ज्यादा ही निखार आ रहा था। कुछ सीखने कि ललक ऐसी थी इन लोगों में कि ये सभी 2 दिन का ट्रेनिंग शेड्यूल एक दिन में पूरा कर रहे थे। वहीं अगर इन सबमें निम्मी की चर्चा हो तो वो 3 दिन का शेड्यूल 1 दिन में कवर कर रही थी, हां बस थोड़े संयम की कमी थी उसमें और जल्द ही किसी बात को लेकर गुस्सा हो जाया करती थी।

एंगेजमेंट को 28 दिन हो चुके थे, इस दौरान हर कोई पाने आज को खुशियों में जीते हुए, कल की तैयारियों में लगे हुए थे। अपस्यु से केवल नंदनी की लगातार बातें हुआ करती थी बाकी सबको शक्त हिदायत थी कि कुछ ज्यादा ही जरूरी हो तो ही संपर्क करने। 2014 की जुलाई भी लगभग अपने समापन के ओर थी और अपस्यु का एक छोटा सा संदेश ऐमी के पास पहुंचा। ऐमी उस संदेश को देखती हुई खुद से ही कहने लगी…. "ना जाने कब से इसका इंतजार था… लव यू.. उम्माह"…
 
Update:- 95..

एंगेजमेंट को 28 दिन हो चुके थे, इस दौरान हर कोई पाने आज को खुशियों में जीते हुए, कल की तैयारियों में लगे हुए थे। अपस्यु से केवल नंदनी की लगातार बातें हुआ करती थी बाकी सबको शक्त हिदायत थी कि कुछ ज्यादा ही जरूरी हो तो ही संपर्क करने। 2014 की जुलाई भी लगभग अपने समापन के ओर थी और अपस्यु का एक छोटा सा संदेश ऐमी के पास पहुंचा। ऐमी उस संदेश को देखती हुई खुद से ही कहने लगी…. "ना जाने कब से इसका इंतजार था… लव यू.. उम्माह"…

अपस्यु लौट आया है इस बात की खबर किसी को नहीं थी सिवाय ऐमी के। दोनों एयरपोर्ट से ही साथ थे…. "तो क्या सब प्लान है मैडम के"

ऐमी:- पहले ठीक से तुम्हे देखने तो दो अपस्यु, जब से यूएसए से लौटी हूं, तुम्हे बहुत मिस कर रही थी।

अपस्यु, ऐमी की बात पर खामोश रहा, और बिना कुछ बोले बस "हम्मम" करके रह गया… "क्या हुआ, अचानक खामोश क्यों हो गए। बात क्या है अपस्यु।"..

अपस्यु:- अंदर गिल्ट फील हो रहा है।

ऐमी, मुस्कुराती हुई…. "इतना नहीं सोचते, निजी ज़िंदगी को अपने काम से दूर रखा करो। और हां स्माइल प्लीज"..

अपस्यु:- जी बिल्कुल। खैर छोड़ो ये सब, मुझे बताओ इस बीच क्या सब हुआ?

ऐमी:- पहला तो राजीव मिश्रा पागल हो गया था, वो सुसाइड मिशन पर निकला था। किसी तरह समझा बुझाकर उसे अपने पोस्ट पर काबिज करवाया। तुम्हे याद है वो झींगुर नील, जिसे तुमने डिस्को में मारा था, बेचारा बहुत डिप्रेस लग रहा था, उसे उसके बाप के मर्डर कि कहानी भी बताई। इसके अलावा बस तुम्हारा इंतजार…

अपस्यु:- मिश्रा तो अपना कर्मा झेलेगा। अच्छा की उसे बचाकर, वरना सस्ते में छूटने कि तैयारी कर रहा था। हां लेकिन वो नील अपने काम आ सकता है। उसपर नजर बनाए रखना।

ऐमी:- येस बॉस। अपस्यु… सुनो तो…

अपस्यु:- हां सुन रहा हूं…

ऐमी:- और कब तक ये ऑफिशयल बातें चलेगी…

दोनों बात करते जबतक तीसरे फ्लैट, कनॉट प्लेस के पास वाले मुक्ता अपार्टमेंट मे पहुंच गए थे। कार पार्क करने के बाद दोनों चल दिए… "बताओ ना अपस्यु, और कितनी देर ऑफिशयल बातें चलेंगी…

अपस्यु उसका हाथ पकड़कर खिंचते हुए अपने बाहों में लेकर गोद में उठाया और उसके होटों को चूमते हुए कहने लगा…. "अब बातें कर सकता हूं ऑफिशली, या अब भी कोई परेशानी होगी।"

ऐमी भी अपस्यु के गले में हाथ डालकर उसके होंठ को चूमती हुई कहने लगी… "हां ऐसे कोई परेशानी नहीं होगी। तुम चाहो तो पूरे दिन कोई भी बातें कर सकते हो।"..

अपस्यु उसे गोद में उठाए ही फ्लैट के अंदर पहुंचा.. "ऐमी, आज रुल ब्रेक कर दे क्या?"

ऐमी मुस्कुरा कर अपस्यु के चेहरे को पढ़ती हुई कहने लगी… "नीचे उतारिए सर, थोड़ी सी छूट क्या दे दी, आप तो नियम भंग करने पर उतर आए"..

अपस्यु ऐमी को नीचे उतारते हुए… "शर्म तो नहीं आयी होगी ना यह कहते हुए"..

ऐमी:- इस मामले की बॉस मै हूं अपस्यु और तुम्हे मेरे फैसले के खिलाफ कुछ भी बोलने का कोई हक नहीं..

अपस्यु, ऐमी की आंखों में झांकते हुए कहने लगा… "बहुत ही शरारत तुम्हे सूझ रही, अभी बताता हूं।"

अपस्यु अपनी बात कहकर ऐमी के ओर झपटा ही था, कि ऐमी पीछे हटती… "अन्ह हां ! ऐसे कैसे… आप अगर 12 साल से ट्रेनिंग कर रहे हैं सर, तो मै भी उतने ही वक़्त से कर रही हूं… जोर जबरदस्ती से काम नहीं बनेगा बाबू।"

अपस्यु:- ऐसी बात है क्या.. मतलब मुझे सिर्फ जोर आजमाइश के लिए मिस किया जा रहा था….

ऐमी, ट्रेनिग एरिया के ओर अपनी कदम बढ़ती अपने ऊपर के ढीले कपड़े निकाल कर ट्रेनिंग के टाईट कपड़ों में आती… "मै तो पहले से तैयार होकर भी आयी हूं। आ जाओ, तुम जोर लगाना और तुम्हे मै, आजमा तो लूंगी ही।"…

अपस्यु भी तेजी से ट्रेनिंग एरिया में अपने कदम बढ़ाते… "एक बार और सोच लो।"..

ऐमी:- मामला बातों से नहीं सुलझने वाला अपस्यु, और ना ही मै तुम्हारी बातों में आने वाली। रुल ब्रेक करना है तो पहले मुझे जितना होगा।

अपस्यु तेजी से ऐमी के ओर दौड़ लगाते हुए… "बदमाश कहीं की, मुझ से ही चालाकी।"..

ऐमी दौड़कर अपने हाथो में रोड उठती…. "कम ऑन बेबी, आई एम् रेडी।"..

अपस्यु भी तेजी से दौड़कर उसके पास पहुंच रहा था… ऐमी बिना कोई परवाह किए अपने हाथो का रॉड चला चुकी थी, और वो जानती थी कि आगे क्या होने वाला है, इसलिए दूसरे हाथ के रॉड को पहले से तैयार रखी थी। उसे यकीन था कि अपस्यु बचने के लिए या तो राइट मूव करेगा या फीर नीचे स्लाइड…

जैसे ही अपस्यु पर हमला हुआ, वो हमले को अपने कंधे पर झेलते हुए, ऐमी का हाथ पकड़ लिया और तेजी के साथ खुद उसके पीछे पहुंचकर, उसका हाथ पीछे की ओर मोड़ते हुए, उसके कानों के नीचे चूमते हुए… "इतना आसान नहीं मुझे प्रिडिक्ट करना बेबी।"

"ऐसी बात है क्या?".. ऐमी मुस्कुराती हुई अपनी बात कही और हवा में जैसे वो 360⁰ का फ्लिप करती थी, ठीक उसी प्रकार से फ्लिप करती वह अपस्यु के सर पर बैठ चुकी थी और अब स्तिथि उल्टी होने वाली थी, क्योंकि ऐमी का हाथ अब सीधा होकर ऊपर अपस्यु के सीने पर था। बिना देर किए ऐमी पीछे के ओर एक और फ्लिप ली, और मजबूरी में अपस्यु को अपना हाथ छोड़ना परा।

अपस्यु क्लैप करते…. "कमाल कर दिया तुमने।"..

ऐमी:- शुरू में ही बोली थी रुल तोड़ने के लिए पहले जितना होगा..

अपस्यु:- हम दोनों जानते है, इस फाइट के बाद हम रूल तोड़ने लायक ही नहीं बचेंगे।

ऐमी:- ओह मेरा बच्चा, मायूस हो गए.. अच्छा एक कोशिश तो कर लो कम से कम…

अपस्यु:- नहीं करनी कोशिश। घर ही चला जाता हूं… उस रात भी मैंने कहा चलो सेलिब्रेट करते है .. सिर्फ मै और तुम, तब भी नखरे और अब भी नखरे। दिखाती रहो नखरे, मै जा रहा हूं। बाद में कहती रहना आज मेरा मूड हो रहा है, फिर बताऊंगा…

ऐमी:- बोल तो ऐसे रहे हो जैसे एंगेजमेंट के अगले दिन मैंने अपनी इक्छा जाहिर की और तुमने मान लिया था। बताओगे क्या, पहले ही बता चुके हो। इसलिए ये भावनात्मक कोशिश की समझ है मुझे की किस मकसद से कहे जा रहे है। अच्छी कोशिश थी लेकिन मै इमोशनल ब्लैकमेल नहीं होने वाली। या तो कोशिश कर लो हराने की या फिर भूल जाओ की इस वक़्त मै किसी भी तरह के मूड से हूं, सिवाय तुम्हे परेशान करने के…

अपस्यु:- मेरा मूड नहीं अभी कोशिश करने की, आ जाओ बहुत परेशान कर ली।

ऐमी "हिही" करती हुई अपस्यु के पास पहुंची और उसे अपने गले से लगाकर भींचती हुई कहने कान में धीमे से कहने लगी… "अभी मेरी बायोलॉजिकल कंडीशन नहीं है, समझे बुद्ध।"… अपस्यु, ऐमी को खुद में और समेटकर उसके गले पर अपने दांत के निशान देते हुए कहने लगा… "सॉरी मुझे याद नहीं रहा।"..

दोनों अलग होकर एक दूसरे को हंसते हुए देखने लगे और होंठ से होंठ लगाकर चूमते हुए एक दूसरे के गले में हाथ डालकर खोते चले गए…. "आह ! तुम नौटंकी बंद करोगे अपस्यु।"…

"जो भी बात करनी है वो किस्स करते हुए करो".. अपस्यु अपनी बात कहते हुए जैसे ही होंठ आगे बढाने लगा, ऐमी बीच मे अपनी उंगली लगाती… "तुम अपने हाथ फिर ऊपर बढ़ाओगे और मुझे उत्तेजित करने की कोशिश करते रहोगे इसलिए नो मोर किस्स। कोई काम, प्लान करके आए हो तो बता दो 5 दिन प्लान पर काम कर लेते है।"..

अपस्यु:- काम तो प्लान किया है, लेकिन अलग-अलग करने का नहीं सोचा था।

ऐमी, अपस्यु की बेबसी पर हंसती हुई… "ओह हो, मतलब आउटसाइड सिटी प्लान करके भी आए थे सर।"..

अपस्यु अपना छोटा सा मुंह बनाते… "अब क्या फायदा 5 दिन तो वैसे ही निकल जाने है। और ये तुम मुंह फाड़ कर हंसना बंद करोगी, कब से मेरी हालत पर हंस रही हो।

ऐमी अपने दोनो कान पकड़ती हुई…. "ठीक है बाबा सॉरी, अब प्लान तो मेरा भी था, पर किया भी क्या जा सकता है।"..

अपस्यु, ऐमी को आंख मारते…. "खूनी भिड़ंत हो तो सकती है।"..

ऐमी:- पागल हो गए हो तुम। अपने अरमानों के पंख पर लगाम लगाओ।

अपस्यु:- हा वो तो करना ही होगा और कोई उपाय भी नहीं है।

ऐमी:- दैट्स माय स्वीटो… चलो अब बताओ कि बाहर के कौन सा प्लान कर आए हो?

अपस्यु:- पूछ तो ऐसे रही हो जैसे तुम्हे पता ही नाह हो।

ऐमी:- फिर भी आज तुम्हे सुनने का अलग ही मज़ा आ रहा है। इस सिचुएशन पर एक शायरी याद आ गई…

अपस्यु सुनने से पहले ही आने वाले व्यंग पर हंसते हुए… "जी इर्शाद"

अर्ज़ किया है…



वाह वाह … वाह वाह..

अर्ज़ किया है..

तेरी मुफ्ल्लासी और बेबसी ये बयान करती है..

वाह वाह… वाह वाह..

अजी अर्ज़ किया है…

तेरी मुफ्ल्लासी और बेबसी ये बयान करती है..


हसरतों की सेज सजी थी और उड़ रहे थे अरमान।

(नीला रंग अपस्यु की आवाज़ और लाल ऐमी की)


अपस्यु:- आगे भी तो बोलो..

ऐमी:- बस यही पूरा है.. आगे के नतीजा जानने के लिए कृपया अपने चहरे को आईने में देख लें..

अपस्यु:- उड़ा लो मज़ाक, इसका बदला तो मै लेकर रहूंगा.. अंदर से बहुत हंसी आ रही होगी ना…

ऐमी:- इसमें भी कोई शक की बात है क्या अपस्यु… एक लंबे वक्त तक मै तरपी थी, ये उसी का फल बीच-बीच में मिलता रहता है तुम्हे।

अपस्यु थोड़ा गंभीर हिते हुए… "हां जनता हूं… शायद मै समझकर भी नहीं समझना चाहता था और तुम सब कुछ समझकर भी बस मेरे वजह से इंतजार में रही। कितना कुछ हमने खोया है ना ऐमी।

ऐमी:- खोया कब था … मैंने जिसे चाहा वो शुरू से मेरे बिल्कुल करीब था। तुम नज़रों से दूर कब हुए… और कुछ चीजें सोचकर या समझकर नहीं होती.. बस हो जाती है और शायद इसलिए कभी उन चीजों को समझ नहीं पाते।

अपस्यु मुसकुराते हुए आगे बढ़ने लगा.. तभी ऐमी उसे आखें दिखती हुई… "फिर शुरू हो गए तुम। चलो अब डिस्टेंस मेंटेन किया जाए और काम निपटाकर आया जाए।"..

अपस्यु:- ठीक है बाबा समझ गया। अच्छा रण सज गया है… तुम्हे कहां जाना है।

ऐमी:- और तुम भी कह दो कि तुम्हे नहीं पाता मै कहां का रण चुनने वाली हूं।

अपस्यु:- सोच लो तुम्हे राजस्थान में सरप्राइज मिलने वाला है। पर्थ को धूल चटाने के चक्कर में इसबार कहीं तुम्हे हार का मुंह ना देखना परे…

ऐमी:- जब पहले से जीत सुनिश्चित हो, वहां क्या मज़ा आएगा? हारे भी तो एक कड़ी चुनौती के बाद, मज़ा तो उसी में है… वैसे मेरा तो 50-50 है, लेकिन मुंबई में तो तुम्हे निश्चित हार मिलने वाली है।

अपस्यु:- 4 बार रण में 2-2 की बराबरी पर है स्वास्तिका और आरव की टीमिंग.. इसलिए यहां भी 50-50 ही है।

ऐमी:- हीहीही… और कुंजल का क्या? तुम्हारे रण में तो ऐसा है की तरजू के दोनो पल्ले बिल्कुल बराबर पर है… एक पत्ते जितने वजन भी नतीजा तय कर देगी…

अपस्यु:- ठीक है फिर देखते हैं ऐमी.. तुम राजस्थान का रण सजाओ और वहां का पुरा आकलन करो। लगभग महीने दिन की ट्रेनिंग दोनो जगह हो ही चुकी है।

ऐमी:- हां लगभग महीना तो बित ही गया है… फिर आज ही निकलते है।

अपस्यु:- नहीं आज नहीं… आज तुम मेरे पास रहो… परसो की सुबह दोनो जगह सरप्राइज देंगे… मेरे ख्याल से तुम्हे आरव को सूचना भी नहीं देना परे.. वो राखी के लिए खुद दोनो बहनों को लेने कल निकल ही जाएगा…

सारी बातें तय करने के बाद दोनो फिर साथ में खाना खाए और एक दूसरे के साथ अपने प्यार को बांटते, मुसकुराते हुए अपनी खट्टी-मीठी बातों से एक दूसरे के चेहरे पर मुस्कान ला रहे थे।

आलम ऐसा था कि दिन से रात बीत चुकी थी, लेकिन अपस्यु और ऐमी की खिलखिलाती हंसी वहां के माहौल में लगातार गूंजती रही। रण सजना इन लोगों के ट्रेनिंग की परीक्षा के जैसा होता था, जिसमें किसी एक दिन एक छोटा सा झंडा ट्रेनिंग एरिया में लगाकर आपसी प्रतिद्वंद का आगाज करते थे।

2 दिन बाद बिल्कुल सुबह-सुबह का वक़्त था। पर्थ वीरभद्र के साथ सुबह-सुबह ट्रेनिंग करता था, और निम्मी वहीं आसपास खड़ी रहकर, अपने काम की चीज सीखने में काफी दिलचस्पी लेती थी।

पार्थ सुबह-सुबह दोनो (वीरभद्र और निम्मी) के साथ जैसे ही ट्रेनिंग एरिया में पहुंचा… ट्रेनिंग एरिया के बिल्कुल मध्य में, नीले और लाल रंग का झंडा देखकर पार्थ कहने लगा…. "तैयार हो जाओ यहां एक फाइट शुरू हो चुकी है, और किसी भी तरह का यदि हमला करना पड़े तो पीछे मत हटना।"
 
Update:-96

पार्थ सुबह-सुबह दोनो (वीरभद्र और निम्मी) के साथ जैसे ही ट्रेनिंग एरिया में पहुंचा… ट्रेनिंग एरिया के बिल्कुल मध्य में, नीले और लाल रंग का झंडा देखकर पार्थ कहने लगा…. "तैयार हो जाओ यहां एक फाइट शुरू हो चुकी है, और किसी भी तरह का यदि हमला करना पड़े तो पीछे मत हटना।"

वीरभद्र:- क्या हुआ पार्थ भाई आप इतने सारे हथियार के साथ खुद को तैयार क्यों कर रहे हो।

पार्थ:- क्योंकि यहां लड़ाई शुरू होने वाली है…

निम्मी, जो चाकू से लड़की छिल रही थी…. "लगता है इसका कोई बाप आया है जिससे पहले मार खा चुका है… तभी इतनी तैयारी के साथ आज उसे हराने कि सोच रहा है।"..

वीरभद्र:- निम्मी तुम्हे तमीज है कि नहीं बात करने की। यहां मै खड़ा हूं और तू ऐसे बात कर रही है।

निम्मी:- मुझे बाद में डांट लेना भैय्या, जाओ पहले अपने उस दुश्मन से भिड़ आओ। इसकी उत्सुकता और बेचैनी देखकर यही समझ में आता है कि ये फिर आज हारेगा…

पार्थ:- देखते है निम्मी, वैसे क्या तुम भी हमारे साथ लड़ोगी…

वीरभद्र:- क्या भाई वो तो अभी बच्ची है। उसे क्यों शामिल कर रहे हो इन सब में…

निम्मी:- कितने लोग आ रहे है वैसे लड़ने…

पार्थ:- कोई फौज थोड़े ना आयी है। सिर्फ एक है लेकिन वो काफी क्षमता वाली है…

निम्मी जोड़ से हंसती हुई…. "एक लड़की का सामना करने के लिए 2 लोग तैयार हो रहे हो जो खुद को प्रोफेशनल मानते है। मै तो बाहर से बैठकर देखूंगी कि ये क्या बला है…

"क्या पार्थ, क्या वीरे… लाली पाउडर के साथ चूड़ियां पहन कर तैयार तो नहीं हो रहे, जो बाहर आने में इतना वक़्त लगा रहे हो।"…

वीरे:- ये तो ऐमी जी की आवाज़ है… वो आयी है क्या?..

वीरभद्र अपने मेहमान के स्वागत के लिए उत्सुकता वाश निकल गया, पीछे से पार्थ माना करता रह गया, लेकिन वीरभद्र उसकी बात काटते हुए कहने लगा…. "घर में मेहमान आया है और आप भी ना पार्थ भाई, लड़ाई के लिए तैयार होने कह रहे।"…

उसे ट्रेनिग एरिया में जाते देख पार्थ भी उसके पीछे दौड़ा, और निम्मी क्या होने वाला है इसकी उत्सुकता में उनके पीछे गई। जैसे ही निम्मी ट्रेनिंग एरिया के सीमा पर पहुंची उसे बिल्कुल मध्य में खड़ी हुई एक लड़की दिखाई दी, जो दोनो हाथ में रॉड ली हुई थी… वीरे जैसे ही उसके पास पहुंचा..

ऐमी:- वीरे अभी मै तुम्हारी मेहमान नहीं हूं, और जब तुम्हे बताया गया है कि यहां लड़ाई शुरू होनी है, फिर ऐसे टहल कर आना… पहली बार है इसलिए छोड़ रही हूं, आगे ऐसी गलती नहीं होनी चाहिए…

जैसे ही वीरे वहां से हटा, ऐमी के चारो ओर छोटे-छोटे धमाके होने लगे, और उन धमाकों के साथ कई सारे कीलें ऐमी के बदन को भेदने के लिए हवा में उड़े। कच्ची खिलाड़ी तो कभी ऐमी थी ही नहीं, वीरभद्र से बातों के दौरान भी वो विश्राम की स्तिथि में नहीं आयी, और अपने चिर परिचित बैंक फ्लिप के साथ वो लगातार 3 फ्लिप लेकर धमाके से दूर तो हुई, लेकिन उतनी ही ज्यादा हैरान भी थी।

उससे अपस्यु की कहीं बात याद आने लगी…. "बेईमान कहीं के हिंट नहीं कर सकता था, अच्छा हो कि आरव और स्वास्तिका उस खडूस की अच्छी धुलाई करे।"…

बचने के क्रम में जब ऐमी अपने डिवाइस को एक्टिव मोड पर ला रही थी तब एक भी डिवाइस एक्टिव नहीं हुई। कुछ दिन पहले ही ऐमी ने अपस्यु के साथ अपने एक डिवाइस हैकिंग सॉफ्टवेर डेवलप कि जानकारी साझा की थी, जिसे अपस्यु पार्थ के साथ साझा कर चुका था।…

"क्या हुआ ऐमी कहीं डर तो नहीं लग रहा ना। बेचारी अब बिना अपने डिवाइस के कैसे रण में टिकेगी।"… पार्थ की आवाज़ आ तो रही थी लेकिन वो कहीं नजर नहीं आ रहा था।…

"मेरी डिवाइस निष्क्रिय करके, अपनी डिवाइस सक्रिय मोड पर डाले तो हो पार्थ लेकिन अभी से नतीजा निकालना… कोई नहीं आज आजमाइश हो ही जाए।"… ऐमी के पास बस अब हथियार के तौर पर केवल वो 2 रॉड ही थे।

ऐमी ट्रेनिग एरिया के बिल्कुल मध्य में खड़ी होकर गहरी श्वांस खींची, अपनी आखें मूंदकर अपस्यु की कुछ बातों को याद करती वो अपनी आखें खोल ली और पार्थ की गूंजती आवाज़ पर ना ध्यान देकर वहां के हवा के रुख को परखने लगी।

ऐमी बिल्कुल सावधान मुद्रा में तभी उसे लगा कि उसके बाएं से कुछ तेजी से उसके ओर बढ़ता आ रहा है। ऐमी पीछे के ओर पुरा झुककर, अपने दोनो हाथ पीछे ले जाती, रॉड को जमीन से लगाकर खुद को सहारा दी। स्नाइपर से गोली चली थी जो शायद वीरभद्र ने चलाया था।

अभी ऐमी इस हमले से संभली भी नहीं थी कि उसपर फिर से छोटे-छोटे बॉम्ब से हमले शुरू हुए। ऐमी हर संभव बचने का प्रयास तो कर रही थी लेकिन हर प्रयास कामयाब हो ऐसा मुमकिन तो नहीं। वहीं ट्रेनिंग एरिया से बाहर खड़ी निम्मी, ऐमी को देखकर इतना हर्षित थी कि वो तो बस जल्दी से सारा खेल खत्म होने के बाद मिलने के लिए बेकरार बैठी थी।

ऐमी को कहीं ना कहीं लगने लगा कि रण में उसकी स्तिथि मात्र खुद को बचाने जैसी हो गई है और दुश्मन छिप कर हमला कर रहे, जिस वजह से वो जवाबी हमले नहीं कर पा रही। कुछ देर खुद को और डिफेंड करने के बाद जब ऐमी को लगा कि यहां उसी की परीक्षा ली जा रही है, तब उसने अंधेरे पर ही दाव लगाना सही समझा और एक के बाद एक वहां स्मोक की पूरी चादर बिछा दी…

"तुम अपस्यु नहीं हो ऐमी, जो अंधेरे में भी देख सकती हो।"… पार्थ अपनी बात कहकर जोर-जोर से हंसने लगा। तभी एक जोर की चींख सुनाई दी जो वीरभद्र की थी। पार्थ के लिए कुछ भी देखना मुश्किल हो रहा था और समझ पाना तो उससे भी ज्यादा कठिन था, क्योंकि वीरभद्र के स्नाइपिंग पोजिशन के पास ऐमी पहुंच कैसे गई।

अभी पार्थ इन सब बातों का अवलोकन कर ही रहा था कि तभी उसके पीठ और कंधे पर दो रॉड परे और वो छटपटाकर इधर-उधर भागने लगा…. "क्यों बेटा मज़ा आया। तू जिस डिवाइस के दम पर अपना भ्रम जाल बनता है, उन सब की मां मै हूं। मुझे ही तू भ्रम जाल में फसा रहा था, मल्टीपल डिवाइस इस्तमाल करके।"

"तो क्या हुआ ऐमी, तुम भी फाइट अपने डिवाइस के दम पर ही जीता करती थी। देखा आज कैसे तुम्हे चौंका दिया।"… पार्थ हंसते हुए अपनी बात कह गया।

ऐमी, पार्थ की इस बेवकूफी पर हंसी और आवाज़ की दिशा तय हो जाने के बाद वो फौरन उस दिशा के ओर बढ़ गई। फिर तो जब एक बार धुएं के भीतर पार्थ फसा उसकी तो बस चीखने की आवाज़ ही आ रही थी। पार्थ जवाबी हमला तो कर रहा था लेकिन धुएं के अंदर पार्थ कहां हमला कर रहा था उसे खुद नहीं पता। पार्थ जब धुएं के कोहरे के बीच मार खा रहा था तब उसे यकीन कर पाना मुश्किल था, कि ऐमी सभी छलावे को भेदकर कोहरे के अंदर से उस तक पहुंच सकती है।

जब वहां का कोहरा हटा, पार्थ बुरी तरह से पीटकर वहीं नीचे जमीन पर बैठा था और वीरभद्र ट्रेनिंग एरिया में किसी बुद्धू की तरह इधर उधर भटक रहा था… "वीरे जी कहां ध्यान है, पीछे भी पलट जाओ।"… और जैसे ही वीरे पीछे पलटा ऐमी दौड़ कर हवा में उछालती अपना वार कर चुकी थी।

निम्मी वहीं नजदीक में ही खड़ी थी। हमला ट्रेनिंग एरिया कि सीमा पर ही हो रहा था। अपने भाई पर रॉड चलते देख, निम्मी अपने पूरे जोर लगाकर दौड़ी और अपने भाई को धकेल कर जैसे ही वो हटाई, वो बिल्कुल ऐमी के निशाने पर आ चुकी थी।

ऐमी अपने हमले के जगह को तेजी के साथ बदलाव करती दोनो रॉड को निम्मी के दाएं बाएं नीचे फ्लोर पर चला दी। ऐमी अपने हाथ निम्मी के ओर बढ़ती… "तुम ठीक तो हो ना।"

निम्मी, ऐमी के हाथ पकड़ कर खड़ी हुई और फुर्ती दिखती उसके गले पर चाकू रखती हुई कहने लगी…. "मुझे वो डंडे पर भी जाते तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था, लेकिन तब भी निशाना आपका गला ही होता। यूं समझो की आप हार चुकी हो, क्योंकि मैं गले पर चाकू रखकर बात करने में विश्वास नहीं रखती, बल्कि गले में चाकू उतारकर बात करने में विश्वास रखती हूं।

ऐमी:- क्या बात है, और तुम दोनो को कुछ सीखना चाहिए इस लड़की से।

निम्मी:- लड़की नहीं निम्मी..

ऐमी:- हां निम्मी से… पार्थ तुम्हारे केस में एक ही बात कह सकती हूं, तुम मशीन पर काफी डिपेंड हो। तुम्हारा भ्रम जाल टूटने के बाद, बेबस से हो जाते हो। वाकई तुम्हारा मूव चौंकाने वाला था, लेकिन तुम दोनो में से किसी ने फायदा नहीं लिया। निम्मी को देखो, एक छोटा लूप मिला और बाजी पलट गई।

निम्मी:- क्या आप मुझे सिखाएंगी, क्योंकि पता नहीं ये दोनो सारा दिन क्या करते हैं, लेकिन फिर भी आपका मुकाबला ना कर पाए। मुकाबला तो छोड़ो टक्कर भी कुछ दे देते तो सुकून मिलता।

ऐमी:- निम्मी तुम्हारी समीक्षा गलत है। पार्थ ने जिस काम में मेहनत कि है वो शारीरिक क्षमता या फिर लड़ाई के तरीकों से कहीं बढ़कर है। ये एक जाल बनता है जिसमें बड़े से बड़ा शिकारी भी फंस सकता है। चूंकि मै एक शिकारी हूं और पार्थ को मुझे फसाना था, और इसी बात की ट्रेनिंग वीरे को भी दी जा रही है।

निम्मी:- हां तो वो फंसा भी कहां पाया.. यह काम भी तो ठीक से नहीं हुआ..

ऐमी:- वो इसलिए क्योंकि उसने इतनी जल्दी लड़ाई की उम्मीद नहीं की थी। ये जब अपस्यु को फसा सकता है फिर मै क्या चीज हूं। हां लेकिन अचानक की स्तिथि के लिए भी पार्थ को एक तैयारी करनी चाहिए थी।

निम्मी:- लेकिन ये इतनी सारी तैयारियां क्यो.. आखिर आप लोग मेरे भाई से करवाने क्या वाले है?

ऐमी:- वीरे को बॉडीगार्ड की नौकरी करनी है, और जान बचाना इसका काम है। गोली कब कहां से किसे भेद दे किसे पता, दूसरों के साथ खुद की जान बचाना भी आना चाहिए। उम्मीद है तुम्हे बात समझ में आ गई होगी।

निम्मी:- समझ गई, लेकिन आपको मैंने हराया है, इसलिए मुझे इनाम तो मिलना चाहिए..

ऐमी:- तुम्हारे चेहरे की खुशी मुझे समझ में आ रही है, लेकिन जो तुम चाह रही हो वो नहीं हो पाएगा। मैं तुम्हे ट्रेंड नहीं कर सकती।

निम्मी:- लेकिन क्यों? मुझे भी आपकी तरह बनना है। यहां पर ये दोनों हैं पूछ लीजिए मैंने आज तक किसी से "आप" कहकर बात नहीं किया। मुझे भी आपकी तरह बनना है। प्लीज माना नहीं कीजिए..

ऐमी:- हम्म्म ! निम्मी मै तुम्हे नहीं सीखा सकती लेकिन हफ्ते में 1 दिन मै तुम्हे गाइड जरूर कर सकती हूं। अगर मंजूर हो तो बोलो…

निम्मी:- मुझे मंजूर है।

इसी के साथ ऐमी, वीरभद्र और निम्मी की मेहमाननवाजी स्वीकार करती 1 दिन के लिए वहीं रुक गई। निम्मी किसी पक्की चेली की तरह ऐमी के आगे पीछे कर रही थी। ऐमी उसकी जिज्ञासा देखकर खुद भी हैरान थी कि आखिर इस लड़की को लड़ाई की कला सीखने की इतनी ललक क्यों है।

लगभग 2 पूरे दिन ऐमी के साथ बिताने के बाद अपस्यु भी मुंबई पहुंच गया। अपस्यु से पहले वहां आरव पहुंचा हुआ था जो राखी के लिए अपनी दोनो बहनों को लेने आया था।

सुबह का वक़्त था आज स्वास्तिका ने कुंजल को ट्रेनिंग से छुट्टी दे रखी थी, और तीनों भाई बहन मस्त नींद में थे। तभी फ्लैट के अंदर तेज म्यूज़िक बजने के कारण सबसे पहले स्वास्तिका की नींद खुली और वो आधी जागी, आधी सोयी, की स्थिति में उठकर आयी और म्यूज़िक बंद करके जाने लगी..

जैसे ही वो जाने लगी, फिर से वापस पलटी और अपनी पूरी आंख खोलती वहां रखे झंडे को देखने लगी… केशरी और उजले रंग का छोटा सा झंडा… स्वास्तिका वो झंडा उठाकर आरव के रूम में पहुंची और आरव को जोर-जोर से हिलाकर जगाने लगी… "आरव उठ जा अपस्यु आया हुआ है"

आरव जैसे ही अपस्यु का नाम सुना वो उठकर बैठते हुए…. "साला भूत कहीं का, रण का झंडा लगा गया क्या?"

स्वास्तिका:- हां …

आरव:- साला पागल हो गया है… झंडा ही लगाना था तो दिन में लगा देता। ये सुबह के 4 बजे। छुट्टी के दिन में ही इसे भूत बनकर आना होता है। सुन तू आराम कर मै आता हूं उसे सबक सीखा कर्।

स्वास्तिका:- रुक मै भी चलती हूं, वरना वो चालक बहुत है तुझे फसा लेगा। दोनो साथ रहेंगे तो मिलकर सबक सिखाएंगे..

आरव:- ठीक है चल..

दोनो पहुंचे ट्रेनिंग एरिया में जहां अपस्यु पहले से खड़ा था। सुबह का जगाना आरव को इतना खाला की वो दौड़ गया अपस्यु के ओर। दोनो भाई में घमशान होने लगी। दोनो ही अपने-अपने दाव का प्रदर्शन करते हुए लड़ रहे थे। आरव कुछ ज्यादा ही मार खा रहा था और अपस्यु को बीच-बीच में कभी चोट लग जाय करती थी।

हालांकि आरव खाली हाथ लड़ रहा था और अपस्यु के हाथ में रॉड थी। स्वास्तिका की एंट्री ने फिर अपस्यु के काम को और मुश्किल में डाल दिया। अब उन दोनों के पास भी रॉड थे और अपस्यु पर दोनो ओर से हमले होने लगे।

पलरा अब स्वास्तिका और आरव का भाड़ी पड़ने लगा और अपस्यु बैकफुट पर चला गया था। जहां अपस्यु को 20 रॉड पर रहे थे, वहीं अपस्यु दोनो पर मुश्किल से 2-4 रॉड ही सफलतापूर्वक मार पा रहा था। इन लोगों की लड़ाई में शुरू से ही आरव और स्वास्तिका का पलड़ा भारी रहा है, लेकिन अपस्यु के पास लगातार घंटों तक हमला करते रहना और मार सहने की इतनी अद्भुत क्षमता थी, कि वो रॉड की मार खाकर भी जवाबी हमला करते रहता था।

लड़ाई लगातार चल रही थी और वही हुआ जो अपस्यु शुरू से करता आ रहा था, स्वास्तिका को पहले टारगेट करना। लेकिन आज आरव, अपस्यु को पूरी तरह से झटके देने वाला था। आरव को जब लगा की अपस्यु, स्वास्तिका के चढ़ती श्वांस को देखकर उसपर हमला करेगा, तुरंत ही वो इशारे से स्वास्तिका को अपने पीछे आने कहा…

"क्या बात है, आज तुम दोनो कमाल का प्रदर्शन कर रहे।"… अपस्यु अपने पूरे जोड़ से आरव पर हमले करते कहने लगा…

"भूत कहीं का… देखा जाए तो तू 400 रॉड खाकर हारा ही है… अब साला कोई 1000 रॉड खाकर भी नहीं गिरे और हम कुछ ही रॉड में नीचे गिर जाए, तब तो ये चीटिंग ही हुई ना।"… आरव भी जवाबी हमले करते कहने लगा… लेकिन लगातार मारते-मारते उसकी भी श्वांस चढ़ी हुई थी..

"क्या हुआ स्वास्तिका को अब आगे करके तू पीछे जाएगा क्या श्वांस बटोरने"… अपस्यु हंसते हुए पूछने लगा…

"अरे यार सच ही आरव कहता है कि तू भूत है। घंटे भर से लगातार रॉड चला रहा और हाफ भी नहीं रहा।"… स्वास्तिका झुंझलाकर बोलने लगी…

आरव को लगा कि अपस्यु अभी बातों में लगा है तबतक वो कुछ श्वांस बटोर लेगा, लेकिन अपस्यु को जैसे ही मौका मिला वो फाइनल शॉट लेने के लिए तैयार हो गया। किसी तरह स्वास्तिका को हमला के रास्ते से हटाकर आरव ने वो मूव कंप्लीट नहीं होने दिया। तीनों को लड़ते लड़ते सुबह के 6.30 बज चुके थे, इसी बीच कुंजल भी जाग कर ट्रेनिंग एरिया में पहुंच गई और सबको ऐसे लड़ते देखकर वो सिटी बजती हुई कहने लगी…. "वाह भाई आपने तो दोनो एक साथ संभाल रखा है। जरा जोड़ से मारो क्या आप दोनो को धीमे धीमे मार रहे।"…

स्वास्तिका और आरव, कुंजल को भी अंदर बुलाने की कोशिश की, लेकिन कुंजल दोनो के बात को टालती हुई बाहर ही खड़े रहने में अपनी भलाई समझी। कुछ देर और सबको लड़ते देख कुंजल उबासी लेती कहने लगी… "भैय्या भागकर शादी करना बुरा है या शादी करके भाग जाना।"..

तीनों जो आपस में लड़ रहे थे, एकदम से अपनी लड़ाई रोककर कुंजल को घूरने लगे…. "तीनों मुझे ऐसे लुक क्यों दे रहे हो। मैं तो दीदी के बारे में सोचकर ऐसा कह रही थी।"..

स्वास्तिका जैसे ही कुंजल की बात सुनी वो तेजी से उसके पास निकालने लगी लेकिन तभी पीछे से आरव उसका हाथ पकड़कर रोकते हुए कहने लगा… "अपस्यु देख तो ये छुटकी क्या कहना चाह रही है।"… अपस्यु की पूछने कि भी जरूरत नहीं हुई और कुंजल ने झट से दीपेश और स्वास्तिका के बारे में सब बता दी।… माहौल अब कुछ ऐसा था कि दोनो भाई हॉल में बैठकर स्वास्तिका को उस लड़के को बुलाने के लिए दबाव डालने लगे।
 
Update:-97

स्वास्तिका जैसे ही कुंजल की बात सुनी वो तेजी से उसके पास निकलने लगी लेकिन तभी पीछे से आरव उसका हाथ पकड़कर रोकते हुए कहने लगा… "अपस्यु देख तो ये छुटकी क्या कहना चाह रही है।"… अपस्यु की पूछने कि भी जरूरत नहीं हुई और कुंजल ने झट से दीपेश और स्वास्तिका के बारे में सब बता दी।… माहौल अब कुछ ऐसा था कि दोनो भाई हॉल में बैठकर स्वास्तिका को उस लड़के को बुलाने के लिए दबाव डालने लगे।

स्वास्तिका सब लोगों के बीच बैठकर कुंजल को ही देख रही थी। कुंजल अपने दोनो हाथ अपने कानो पर रखती हुई धीमे से "सॉरी" कहने लगी। स्वास्तिका दोनो भाइयों के बीच फसी बस अपने सर पर हाथ दिए सोच रही थी। उसकी हालत को समझते हुए आरव उसके करीब बैठकर…. "एंगेजमेंट से ठीक एक दिन पहले मुझे किसी ने कहा था, खुशियां और प्यार हमारी कमजोरी नहीं इसलिए मुस्कुराकर खुले दिल से स्वागत करो"..

स्वास्तिका आरव को सुनकर उससे लिपटकर रोटी हुई कहने लगी… "मुझे बहुत डर लग रहा है। मै नहीं समझ पा रही क्यों लेकिन मुझेमे सुसाइड करने की चाहत बढ़ने लगी है। मै बस मारना चाहती हूं।"..

"हेहेहे.. नॉटी, शुहहहहहहहहहहहह… शांत.. शांत… शुहहहहहहहहहहहह…"… स्वास्तिका लगातार रोए जा रही थी। आरव उसे लगातार शांत करते हुए, उसके भी आखें छलक आयी। आरव आश्चर्य से नजर उठाकर अपस्यु को देखने लगा। अपस्यु, स्वास्तिका के पास नीचे उसके पाऊं में बैठा और उसके दोनो हाथ थाम कर कहने लगा…. "मरना तो अंतिम मंज़िल है, हर किसी को वहीं पहुंचना है। तो सवाल यह है कि मरने से पहले हम कितना जीते है।"

स्वास्तिका, नजर उठाकर अपस्यु को देखती हुई उसके हाथ को जोर से थामती…. "मुझे भी जीना है अपस्यु लेकिन किसी का मारना अब बर्दाश्त नहीं होगा। दिल में नजाने डर सा पैदा होने लगा है, मै कमजोर पड़ने लगी हूं। मै बर्दाश्त नहीं कर सकती किसी का मरना।"..

अपस्यु:- तुम खुलकर जीना सीखो, और मै खुलकर मौत को देखता हूं। मेरा वादा है तुम सबसे .. तुम लोग खांसते हुए हॉस्पिटल या घर के बेड पर अपनी मौत मारोगे।

स्वास्तिका:- और तुम..

अपस्यु:- और मै उस वक़्त कई सारे बच्चों के बीच बैठकर, उसे तुम्हारी कहानी सुनाऊंगा… एक थी हमारी नॉटी.. जो ऊपर से शक्त अंदर से नरम। रोमांटिक मूवी देखकर जब कपल मिलते तो मुकुराने वाली, कपल जब बिछड़ते तो फुट-फुट कर रोने वाली। यदि कहीं कपल मर गए तो उसके वियोग में 13 दिन भूखे रहना और उनके श्राद करने के बाद खाना खाने वाली। किसी से इस डर से नहीं मिलना, कहीं वो गुम ना हो जाए उसकी ज़िन्दगी से। अरमान तो बहुत थे लेकिन खुलकर कभी किसी से कह ही नहीं पायी… ये कहानी है हमारी नॉट की, जो पिछले एक महीने से अपनी छोटी बहन के साथ रहने के बाद, यह सोचने पर मजबूर हो गई की क्या वाकई में उसकी बहन की जान खतरे में है… क्या वाकई ऐसी कोई अनहोनी होने वाली है… नहीं अभी प्यार का वक़्त नहीं.. अभी मुझे अपनी बहन को देखना है… क्यों सही कहानी सुना रहा हूं ना बच्चों को…

स्वास्तिका रोती हुई हसने लगी, वहीं कुंजल अपस्यु के पास बैठती हुई अपनें भाई को गले लगाती कहने लगी… "भैय्या, दीदी तो विदाई वाला रोना अभी से रोने लगी। लगता है विदाई के वक्त दिल्ली में बाढ़ ना ला दे।"..

आरव, स्वास्तिका के आशु पोच्छते… "दोबारा अगर सुसाइड कि बात सोची ना तो देख लेना नॉटी, बहुत ही गलत कह गई तुम।"..

अपस्यु:- अरे जहिलों अब अपना फैमिली ड्रामा सब बंद करो। अभी इस नॉटी ने गलत किया ना, अब इसके उस डॉक्टर, कुंजल क्या नाम है रे जीजा का..

कुंजल:- भैय्या डॉक्टर ही है..

स्वास्तिका:- हट पागल, दीपेश नाम है..

अपस्यु:- हां तो अब हम सब जरा परेड लगा दे उसकी…

स्वास्तिका:- अपस्यु प्लीज नहीं। बहुत प्यारा है वो..

आरव:- अच्छा वो प्यारा हो गया और हम सब तो खडूस है। सॉरी हम दोनों इस करेला का नहीं कह रहा मै।

बेचारी स्वास्तिका मना करती रहा गई लेकिन सभी भाई बहन, साथ में स्वास्तिका को लेकर उसके कैंपस निकल गए। रास्ते में कुंजल ने खुली जीप को रुकवाकर उसपर बोल्ड अक्षरों से लिखवा दिया… "द डेविल फैमिली".. और फिर खुली हुई जीप पर सवार सभी भाई बहन अपने हाथ में रॉड लिए मेडिकल कैंपस में घुसे।

स्वास्तिका से पूछताछ के बाद पता चला कि इस वक़्त दीपेश अपने हॉस्टल में ही होगा। पूरी पलटन ही चल दी हॉस्टल के ओर और आग की तरह ये बात तुरंत ही कैंपस में फ़ैल गई की स्वास्तिका अपने भाई के साथ और भी कुछ लोगों को लेकर हॉस्टल के ओर आ रहे है।

देखते ही देखते सबके व्हाट्स ऐप से संदेश फॉरवर्ड होने लगा, लेकिन कुछ लोग इन सब बातों से अनभिज्ञ, अपने होस्टल के रूम में बैठ कर सुबह से ही दारू का मज़ा ले रहे थे, वो भी सिर्फ इस बात को सोचकर की उसकी गर्लफ्रेंड आज कॉलेज नहीं आएगी और वो आज ही रखी के लिए अपने घर जा रही है।

उन अभागों के मित्र बार-बार आकर दरवाजा पिट रहे थे लेकिन उन्हें लग रहा था कोई उसकी दारू में शेयर मांगने आ रहा है, इसलिए दरवाजा क्यों खोलने लगे.. और थोड़ी देर बाद बड़े ही जोड़-जोड़ से दरवाजा पीटने की आवाज़… "चुतियों मर जाओ बाहर दरवाजा पिट-पिट कर आज तो महफ़िल समाप्त होने के बाद ही दरवाजा खुलेगा।"… दीपेश का दोस्त निर्मल चिल्लाते हुए कहने लगा।

जैसे ही महफ़िल की बात स्वास्तिका के कानो में गई वो चिंखती हुई कहने लगी… "अभी के अभी दरवाजा खोलो"… अंदर दोनो ही हड़बड़ा गए। निर्मल तो खिड़की के लगे ग्रिल को उखारकर भागने की फिराक में था और दीपेश अपने ऊपर जल्दी से कपड़ा डालकर दरवाजा खोला… "वो बेबी.. वो ओ ओ ओ ओ".. मुंह से कुछ शब्द निकले ही थे कि सामने आरव और कुंजल को देखकर फाटक से दरवाजा बंद करते हुए…. "निर्मल आज बजने वाली है रे, वो लेडी डॉन की छोटी बहन ने हमारे बारे में अपने भाई को बता दी, वो भी आया है।"..

निर्मल:- मां की आंख साले किसने कहा था इतनी खरनाक गर्लफ्रेंड रखने। तेरे चक्कर में कहीं कैंपस में मेरा झंडा ना फहरा दे आज।

तभी दरवाजे पर एक लात और दरवाजा खुल चुका था। सभी भाई बहन अंदर पहुंचे और स्वास्तिका दोनो को देखकर हैरान होती हुई पूछने लगी… "सुबह से कौन बैठता है पीने के लिए डॉक्टर जरा मुझे समझाओगे। मेरे दोनो भाई तुमसे मिलने आए थे.. और तुमने.."

अपस्यु:- सब शांत हो जाएंगे, तुम दोनो में से वो लड़का कौन है जो स्वास्तिका को चाहता है। आगे आओ..

दीपेश सिर झुकाए एक कदम आकर उसके सामने खड़ा होगा। अपस्यु के कहने पर उसने अपना चेहरा ऊपर किया… "हम्मम ! लड़का दिखता तो हैंडसम है। तुम्हारी डाक्टरी कैसी है डॉक्टर।

दीपेश:- सर हम दोनों (दीपेश और निर्मल) स्वास्तिका के तरह टॉपर तो नहीं लेकिन डिस्टिंक्शन मार्क ले आते है, और अपने विषय पर प्रैक्टिकली अच्छी पकड़ भी है।

अपस्यु:- हमें तुम्हारा प्रोफाइल पसंद आया। आरव सबको लेकर फ्लैट जाओ मैं जरा कुछ और निजी जानकारी इनकी निकलता हूं।

आरव:- बेवड़ा कहीं का ये क्यों नहीं कहते कि इनको टेस्ट करना है कि तुम्हारे साथ बैठक के लायक है कि नहीं।

अपस्यु:- एक बार में नहीं समझ में आती क्या, जाओ मै आता हूं।

स्वास्तिका:- अपस्यु खबरदार जो अपने लिए कोई नया पार्टनर के रूप में दीपेश को देखा तो। दीपेश तुम चलो हमारे साथ। अपस्यु तुम उस निर्मल की निजी जानकारी निकलते रहो आराम से।

"ठीक है गुप्त मतदान करते है। सब अपने अपने चिट लिखेंगे और हम किसी बाहर वाले से वो चिट पढ़ाएंगे। बोलो मंजूर"..

स्वास्तिका और आरव इसके लिए तैयार नहीं थे, लेकिन कुंजल के कहने पर चिट बनाया गया और बाहर के एक लड़के से पढ़ाया गया। मात्र 2 वोट थे "नहीं जाएंगे" बाकी 4 वोट जाने के थे। फिर क्या था अपस्यु दोनों को लेकर निकल गया और स्वास्तिका उसकी इस हरकत से पूरी तरह चिढ़ गई। उसके गुस्से का शिकार बेचारी कुंजल को भी होना पड़ा। वापस लौटकर स्वास्तिका चिढ़ती हुई सबको बैग पैक करने बोली और जो भी फ्लाइट मिली उसे पकड़ कर दिल्ली।

इधर अपस्यु जब दोनो को लेकर निकला, तीनों पैदल चलते हुए बात करते कैंपस के बाहर निकल आए। कुछ ही कदम अपस्यु साथ चला होगा लेकिन केवल दीपेश ही नहीं बल्कि निर्मल के बारे में भी बहुत कुछ पता चल गया। एक बात जो अपस्यु को सबसे ज्यादा अच्छी लगी वो थी दोनो की दोस्ती। दोनो के रिश्ते में गहराई और सच्चाई दोनो नजर आती थी।

पैदल ही तीनों निकले, और कैंपस के बाहर से टैक्सी में तीनों बैठ गए। निर्मल अपस्यु से पूछने लगा कि पहले कहां जाना है। अपस्यु ने टैक्सी वाले को लैंबोर्गिनी के शोरूम ले जाने के लिए बोल दिया। दीपेश और निर्मल को कुछ भी समझ में नहीं आया कि क्या हो रहा है।

अपस्यु वहां पहुंचकर दोनो को एक मस्त कार पसंद करने के लिए बोला। इसपर पहले दीपेश ने अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए अपस्यु को बहुत कुछ सुना दिया और उसी के नक्शे कदम पर निर्मल ने भी मेहनत कि कमाई के ऊपर अच्छा खासा भाषण दे दिया। अपस्यु दोनो की बड़े ध्यान से सुनता गया…

"ओ भाई राम मिलाए जोड़ी, कौन से ख्याली पुलाव पका रहे हो। तुम्हे क्या लगा यहां मै 4-5 कारोर की कार तुम्हे दिलवाने लाया हूं। और ये क्या कह रहे थे मेहनत कि कमाई, जब किसी मरीज को आर्थिक रूप से ना मारते हुए अपनी कमाई करोगे तब यह बात कहना, मुझे खुशी होगी। तुम डॉक्टर्स के पास पढ़ाई के वक़्त तो बहुत नैतिकता होती है लेकिन माफ करना 100 में से 90 की नैतिकता हॉस्पिटल में जाते ही उसके पिछवाड़े में घुस जाती है। भूल जाओ की किसी डॉक्टर को मै 5 रुपया का भी कोई गिफ्ट दूं। वो तो हमारी छुटकी को लैंबोर्गिनी बहुत पसंद है तो सोचा दोनो बहन के लिए ले लूं। अब ख्याली पुलाव पकाना बंद करो।"..

निर्मल:- यार अपना तो पुरा बलात्कार कर दिया तेरे साले ने..

दीपेश:- साला ऐसे ही ओवर रिएक्ट करते रहे तो ऐसे ही पोपट होना है।

कार की शॉपिंग के बाद तीनों फिर निकले। दोनो सोचकर तो निकले थे कि आज शायद अपस्यु के साथ बैठक हो, लेकिन अपस्यु ने दोनो को किसी कुली कि तरह खटाया और लगभग 3 घंटे वो दोनो से समान उठवाते रहा। अंत में जब अपस्यु उसे छोड़कर जाने लगा तब दीपेश से अकेले में मिलते हुए कहने लगा… "वैसे तो मुझे नॉटी की चॉइस पर कभी 2 राय नहीं रही लेकिन तुम से मिलने के बाद और भी अच्छा लगा। अपना एड्रेस मैसेज कर देना। जल्द ही मां के साथ आऊंगा तुम्हारे परिवार से मिलने।"..

अपस्यु के जाते ही निर्मल, दीपेश के कंधे पर हाथ रखते हुए कहने लगा… "साला 5 करोड़ की शॉपिंग अपनी बहन के लिए कर गया, हमें एक जूस के लिए नहीं पूछा। बड़ा ही कंजर परिवार है ये।"..

दीपेश:- यार 10 मिनट तक जो मेहनत पर भाषण दिए जाते, लगता है मेरे सले ने सच में दिल पर लगा लिया। हम तो कार के बारे में कह रहे थे.. थोड़े ना कुछ खिलाने-पिलाने के लिए मना किया था।

निर्मल:- साला इनके चक्कर ने 400 रुपए का खंबा भी फेंक दिया..

दीपेश:- चुतीया, पैसे भी नहीं है अब..

इधर अपस्यु भी फ्लाइट पकड़ कर दिल्ली आ गया और कुंजल के लिए भी पूरी खरीदारी करने के बाद लगभग 7 बजे शाम तक वापस पहुंच गया। अपस्यु को इतनी जल्दी वहां देखकर कुंजल उसके पास दौड़ कर पहुंची और दोनो (आरव और स्वास्तिका) की शिकायत करने लगीं। उसके नेगेटिव वोटिंग के कारन दोनो ने उसे खूब सुनाया था।

अपस्यु मुसकुराते हुए उसके माथे को चूमा…. "चल जल्दी नीचे तुझे कुछ दिखाना है।"

कुंजल:- क्या है भाई, मेरे लिए कोई सरप्राइज है क्या?

अपस्यु:- पहले चल तो सही..

ब्रांड न्यू पैक लंबोर्गिनी को देखकर कुंजल उछलती हुई अपस्यु के गले लगती कहने लगी… "थैंक्स थैंक्स थैंक्स भैय्या.. आप को याद था।"..

अपस्यु:- पागल, भुला ही कब था।

कुंजल:- हां लेकिन दोनो लंबोर्गिनी मेरी। मुझे जिस दिन जो चलाने का मन होगा मै वो चलाऊंगी।

अपस्यु:- ठीक है, हैप्पी ना अब..

कुंजल:- भैय्या सुनो ना..

अपस्यु:- अभी तो खुश थी, इतनी जल्दी मायूस क्यो..

कुंजल:- मै लालची तो नहीं होते जा रही जो ना जाने क्यों इतने बड़े -बड़े और कीमती गिफ्ट देखकर खुश होती हूं जबकि जीने के लिए तो 10000 में भी अच्छे से गुजरा हुआ करता था कभी।

"इधर आ मेरे पास".. कुंजल जैसे ही उसके पास पहुंची, उसके सर पर हाथ फेरने हुए अपस्यु कहने लगा…. "सबके लिए सोचना अच्छी बात होती है, लिए लेकिन हम सबके लिए कुछ नहीं कर सकते। यहां हर किसी को अपने और अपने परिवार के लिए खुद काम करना पड़ता है। रही बात लालच की तो थोड़े बहुत तो दुनिया लालची है लेकिन किसी चीज को पाने की चाहत में दूसरों को रौंद कर उस चाहत को पुरा करना असल लालच होती है।

"फिर वो किसी की फीलिंग को ही रौंदना क्यों ना हो। बस अब खुश हो जा और तुझे यदि ऐसा रहा हो कि जितने पैसे अकेले तुझ पर खर्च हो रहे है उतने में दूसरों के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है तो भगवान वो अवसर तुम्हे जल्द देगा जब तुम बहुत से लोगों को बहुत कुछ करने के लायक हो जाओगी। उस वक़्त खुद को मजबूत करते हुए दोनो हाथों से जितना कर सकती हो करते रहना।"

कुंजल फिर से "थैंक्स भैय्या" बोलकर चाभी हाथ में ले ली और दौड़ते हुए भागी। अंदर जाकर नाचती हुई सबके कमरे में जा जाकर अपनी नए कार के बारे में बताने लगी। ऐसा लग रहा था आज कुंजल का दिन ही खराब चल रहा था। जैसी ही वो खुश होकर नंदनी के कमरे में गई अपनी बात कहने, एक थप्पड़ खा गई, और कार के लिए डांट सुनी सो अलग।

इसी क्रम में सबको पता भी चल गया कि अपस्यु वापस लौट आया है। बाकी सब को तो पता था सिवाय नंदनी के इसलिए नंदनी अपस्यु से मिलने हॉल में चली आयी.. कुछ देर बाद पूरे परिवार की सभा बैठी। बात अभी अपस्यु और उसके शराब के बारे में चलना शुरू ही हुई थी, कि इतने में गुफरान का फोन आया।

घबराया वो कॉल करके बताने लगा कि एक छोटा सा ऐक्सिडेंट हो गया और कुंजल को कुछ लोग घेर लिए है। उनमें से कुछ ने उसपर हाथ भी उठाया.. अपस्यु ने जैसी ही ये बात सुनी, थोड़ा लड़खड़ा गया.. उसे ऐसी हालत में देख सब चौक कर खड़े हो गए..

अपस्यु अपने घबराए चेहरे को तुरंत ही ठीक करते हुए आरव और स्वास्तिका से कहने लगा… "एक दोस्त का ऐक्सिडेंट हुआ है, बहुत ही परेशान वो पहले से है, ऊपर से कुछ लोग और परेशान कर रहे है।"

नंदनी:- बहुत बुरा हुआ.. जल्दी जाओ अपस्यु अपने दोस्त की जल्द से जल्द सहायता करो।

आरव और स्वास्तिका भी कहने लगे.. "हम भी आ रहे है।" अपस्यु ने आरव को गाड़ी निकालने कहा और स्टोर रूम से जाकर अपना एक बैग निकाल लाया जिसमें पुरा हथियार भड़ा हुए था… जैसे ही अपस्यु कार में बैठा दोनो अपस्यु से हड़बड़ी में पूछने लगी… "कुंजल तो ठीक है ना।"..

"वो भले ही ठीक हो लेकिन इस वक़्त मै ठीक नहीं हूं। अगर मेरी बहन की गलती हुई तो उसका मार खाने का गम मै सह लूंगा.. वरना मै युद्ध आवाहन मंत्र शुरू कर चुका हूं। आरव कार को छोटी की जीपीएस लोकेशन पर ले.. जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी।"..
 
Update:-98

"वो भले ही ठीक हो लेकिन इस वक़्त मै ठीक नहीं हूं। अगर मेरी बहन की गलती हुई तो उसका मार खाने का गम मै सह लूंगा.. वरना मै युद्ध आवाहन मंत्र शुरू कर चुका हूं। आरव कार को छोटी की जीपीएस लोकेशन पर ले.. जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी।"..

आरव:- लेकिन जाऊं कहां, लोकेशन तो यहीं पार्किंग का आ रहा है। ये इतनी शरारती तो नहीं थी।

तीनों उतरे और पार्किंग में कुंजल को ढूंढने लगे… तभी सिटी की आवाज़ के साथ… "किसी को ढूंढ रहे है क्या?"..

सिटी के आवाज़ के साथ ही पार्किंग के दूसरे हिस्से में रौशनी हुई, जहां कुंजल अपनी नए कार के बोनट पर बैठकर आराम में अंगूर खा रही थी। आरव और स्वास्तिका दोनो गुस्से में उसके पास पहुंचे.. स्वास्तिका कुंजल के कान खींचती…. "ये आज कल तुम इतना शरारत कहां से सीख गई।"..

आरव:- एक थप्पड़ लगाओ फिर ये सुधरेगी..

अपस्यु:- अरे छोड़ो उसे, आज सुबह से बेचारी डांट खा रही है। कुंजल बाकी सब ठीक है लेकिन ये ऐक्सिडेंट वाली बात अच्छी नहीं थी।

कुंजल:- सॉरी भाई। बस मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था.. सोची थोड़ा परेशान कर लूं।

अपस्यु:- चल फिर मज़ा करके आते है। चलो तुम दोनो भी।

स्वास्तिका:- ना तुम दोनो जाओ, मै जरा डॉक्टर की क्लास लगा दूं।

आरव:- मै भी जरा लावणी से मिलकर आया।

कुंजल:- चलो भाई, ये दोनो बिज़ी लोग हैं।

अपस्यु कुंजल की बात पर हंसते हुए बैठ गया, और दोनो ड्राइव पर निकल गए। इधर स्वास्तिका और आरव भी अपने अपने होने वाले के साथ बिज़ी हो गए। कुंजल ड्राइव किए जा रही थी और अपस्यु उसे बड़े ध्यान से देख रहा था। .. "तो.."

कुंजल:- तो क्या ..

अपस्यु:- तो ..

कुंजल:- भाई आगे भी तो बोलो..

अपस्यु:- तो..

कुंजल:- भाई..

अपस्यु:- तो..

कुंजल:- क्यों परेशान कर रहे है?

अपस्यु:- तो..

कुंजल:- तो ये लो..

कुंजल कार को टॉप स्पीड में डाली और कर हवा में बात करने लगी।… "ठीक है सॉरी बेटा, ऐसे गुस्सा नहीं दिखते। वैसे मुझे बाहर लेकर आयी है, कुछ खिलाएगी या ऐसे ही ड्राइव करते रहना है।"

कुंजल:- क्या खाओगे बोलो। तुम भी क्या याद करोगे खडूस की किस दिलदार बहन से पाला परा है।

अपस्यु:- जी दीदी जी, बस मालिक आप को जो पसंद हो, वो खिला दो।

कुंजल:- ये हुई ना बात… तो फिर चलो..

कुछ दूर ड्राइव करने के बाद कुंजल कार को एक आलीशान होटल के पार्किंग में खड़ी की और अपस्यु का हाथ पकड़कर चलने लगी… "बच्चा नहीं हूं जो गुम हो जाऊंगा।"..

कुंजल:- ठीक है चलो फिर..

अपस्यु होटल के अंदर कदम बढ़ाने लगा और कुंजल पैदल-पैदल होटल के बाहर जाने लगी… अपस्यु ने जब कुंजल को साथ में नहीं देखा, वो तुरंत पलटा, लेकिन तबतक कुंजल कहीं नजर नहीं आ रही थी।… "कहां चली गई, मै होटल के गेट पर तेरा इंतजार कर रहा हूं।"..

कुंजल:- किसने कहा था मैं बच्चा नहीं। चुपचाप वहां से बाहर मेन गेट पर आओ मै इंतजार कर रही हूं..

"कार पार्क करके बाहर क्यों चली आयी"… पहुंचते ही अपस्यु ने पूछा।

कुंजल वापस से अपस्यु का हाथ पकड़कर चलती हुई… "अरे भाई यहां तो पार्किंग के लिए आयी थी बस। कौन बाज़ार के पास कार ले जाए, वहां पार्किंग की जगह थोड़े ना होती है। ..

कुंजल पकड़कर उसे एक पानीपुरी के ठेले के पास खड़ा की… "भैय्या हमारे लिए थोड़ी तीखी वाली बनवाइए"… दोनो के हाथ में प्लेट लग गई थी जैसे ही अपस्यु ने पहला पानीपुरी खाया, उसकी आखें बड़ी हो गई। बिल्कुल धीमे-धीमे चबाते वो कुंजल को देखने लगा और जबतक वो एक खाया, कुंजल 8-10 खा चुकी थी… "क्या हुआ पानीपुरी अच्छी नहीं लगी क्या?…भईया आपने कैसा पानीपुरी बनाया है देखिए मेरे भईया को पसंद नहीं आया, थोड़ी खटाई और मिर्ची, और डालिए इनमें।"..

अपस्यु:- पागल बस मेरा हो गया। इतना तीखा है, मै नहीं खाऊंगा, भईया आप पानी दीजिए मुझे।

"अरे रुको रुको रुको.. लो एक मेरे हाथ से खाओ"… कुंजल एक फुल्की उसके ओर बढ़ाती हुई…

"पक्का तू मरवाएगी आज".. अपस्यु ने कुंजल के हाथ का वो फुल्की खा लिया और फिर से उसी तीखेपन का शिकार हो गया, लेकिन चुकी इस बार वो पहले से तैयार था इसलिए तीखे के साथ फुल्की का भी कुछ आनंद उठाया।

उस दुकान से निकलने के बाद कुंजल उसे लेकर चूड़ी बाजार में आ गई, जहां वो अपने पसंद कि कुछ चूड़ियां खरीदने के बाद आइस क्रीम के ठेले पर खड़ी हो गयी। वहां से उसने 2 सामान्य पानी वाली आइसक्रीम खरीदी। एक खुद ली और दूसरा अपस्यु को…

दोनो चलते हुए… "इस उम्र में मेरे साथ घूम रही है, कोई घुमाने वाला तुम्हे क्यों नहीं मिला अब तक, या फिर मिल गया है और सबको बताने से घबरा रही है।..

कुंजल:- आपको मेरे साथ नहीं घूमना या बोर हो रहे तो सीधा बता दो। ऐसे ताने मत दिया करो।

अपस्यु:- अच्छा सॉरी बाबा नहीं कहता..

कुंजल:- मै ऐसे नहीं मानने वाली चलो यहां पहले नागिन डांस करो फिर मै मानूंगी।

अपस्यु:- लेकिन यहां इतनी भिड़ में, तुझे अच्छा लगेगा क्या?

कुंजल:- पहली बात इतने दिन तक गायब थे, लेकिन एक कॉल नहीं किए उसका गुस्सा। कब आए वो सब नहीं बताया उसका गुस्सा। फिर आज आए तो यह नहीं कि मुझे अलग से पहले पुरा वक़्त दो, तो कभी डॉक्टर के साथ चले गए तो कभी अकेले शॉपिंग कर रहे हो और घर आकर मां से बात करना याद रहा लेकिन मुझ से बैठकर बात करो वो ख्याल नहीं। बहाना बनाकर मुझे ही बुलाना परा तब आए हो वरना मेरा ख्याल तक नहीं।

कुंजल अपनी बात फ्लो में कह रही थी और जब नजर सामने दी तब पता चला कि अपस्यु जमीन में लेटा नागिन डांस कर रहा था। कुंजल कभी उसे देखती तो कभी वहां के भिड़ को। उसे अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था।

उसे नागिन डांस करते जो भिड़ जुटी थीं वो सब अपस्यु को देखकर हंस रहे थे, वहीं कुछ लड़के इसका लुफ्त उठाकर अपने-अपने रुमाल निकालकर अपस्यु के ऊपर चढ़कर नाच रहे थे। कुंजल भिड़ को साइड करती अपस्यु के पास पहुंचकर अपना हाथ देती उठाई और उसके कपड़े से धूल को झारती हुई कहने लगी… "हद है मै तो गुस्से में बोल गई।"

अपस्यु, कुंजल के गाल खींचते… "तू तो हम सब के लिए स्पेशल है यहां क्या तेरे लिए कहीं भी नागिन डांस कर सकता हूं। इतने से खुश है या और भी कोई डांस करना है।

कुंजल:- हीहीहीही… बस भाई नहीं, इतना ही काफी है।

"नाइस डांस सर, क्या आप मेरी शादी में भी ऐसा ही डांस करेंगे।"… पीछे से एक लड़की अपस्यु के कंधे पर हाथ देती हुई कहने लगी..

कुंजल:- सुनो तुम्हे कोई कन्फ्यूजन हुई है? वो भाई ने बस मेरे कहने पर डांस किया था। मेरे भाईया सुपर्ब है।

अपस्यु पीछे पलटकर देखते हुए… "ओह तुम... कुंजल यें है कुसुम और कुसुम ये है मेरी लाडली बहन कुंजल।"

कुसुम:- लाडली है उसका नमूना तो देख लिया मैंने। बहुत कम ऐसे भाई होंगे जो ऐसा कर सकते हैं।

अपस्यु:- अरे ऐसी कोई बात नहीं। खैर तुम्हारे 20 करोड़ के डोनेशन का थैंक्स। काश हर पैसे वाले तुम्हारे जैसे होते।

कुसुम:- मुझे सब से क्या मतलब है सर, बस मै अपने परिवार के ओर से जब उन लोगों के लिए करती हूं, जिन्हें वाकई में मदद की जरूरत है तो अच्छा लगता है। फिर आप जो कर रहे है वो हम लोग के दिए पैसे से कहीं उपर है। मै जितनी बार आप से मिलती हूं, आपको देखकर एक ही ख्वाहिश जागती है कि आप जैस कोई एक भी सदस्य मेरे परिवार में होता तो कितना अच्छा होता।

अपस्यु:- तुम इतनी नेक हो तुम्हारा परिवार भी बहुत अच्छा होगा, फिर वो लोग मेहनत करते है तभी तो तुम भी किसी दूसरों के लिए कुछ अच्छा करने में सक्षम हो कुसुम।

कुसुम:- हां ये भी है। ठीक है सर मै चलती हूं।

उसके जाते ही कुंजल… "अब ये कौन थी"..

अपस्यु:- हिरणाकश्यप के यहां जन्मी कोई प्रहलाद है ये।

कुंजल:- ओह !! पर भाई तुम कैसे कह सकते हो कि इसका परिवार जालिम किस्म का है।

अपस्यु:- मैंने अपने चिल्ड्रंस केयर में किसी के पैसे नहीं लेता। जब ये पहली बार दान करने के ख्याल से आयी थी तब मेरे मना करने पर रोती हुई कहने लगी… "मदद के पैसे सही जगह पर पहुंचने से लोगों की आत्मा बचाई का सकती है। प्लीज ये पैसे रख लो।"

कुंजल:- ओह बेचारी.. मतलब अपने परिवार के कुकर्म को ये समझती है और उसे बचाने की कोशिश भी कर रही है। भैय्या तो क्या सच में पैसे दान में देने से किसी की आत्मा बचाई का सकती है।

अपस्यु:- हाहाहाहा.. पागल है क्या? ये ट्रिक बाबा लोग इस्तमाल करते है पैसे निकलवाने के लिए। दान करने वाले अपने पाप काटते है और बाबा लोग थोड़े सुखी जीवन बिताते है।

कुंजल:- बेचारी.. वैसे किसकी बेटी है ये?

अपस्यु:- पता नहीं, ना ही मैंने कभी पूछा और ना ही कभी डिटेल पता करने की कोशिश की। बस इस बेचारी की आस्था ना टूटे इसलिए पैसे ले लिए। कुछ अच्छा करने के ख्याल से कम से कम ये तो खुश है ना।

कुंजल:- लेकिन आप तो अपने बच्चों के लिए पैसे नहीं लेते फिर इसके पैसे..

अपस्यु:- परिवार में 60 सदस्य और बढ़ गए है, जिसमें कुछ बच्चो की जिम्मेदारी मैंने इसे दे दी है।

कुंजल:- क्या बात है भईया आप तो छा गए।

अपस्यु:- छाने वाली कौन सी बात है, जहां लगता है करना चाहिए वाहां कर देता हूं। वैसे कुछ बच्चे मैंने तेरे ख्याल से भी लिए है।

कुंजल:- पर मै तो डोनेशन नहीं करती भैय्या।

अपस्यु:- फिर से वही बात कर दी ना। बाढ़ राहत में जाकर खाना बाटने वाला महान होता है क्योंकि वो जमीन पर जाकर काम करता है तभी किसी की मदद वहां तक पहुंचती है। ऐसे कई उदहारण मिल जाएंगे और हर उदहारण में एक ही बात होगी.. जो दिल से जमीन पर खड़ा रहकर करता है वो महान है, बाकी ज्यादातर तो सब फोटो खींचवाने वाले होते है।

कुंजल:- जी भईया समझ गई। मैं भी सब बच्चो के लिए जमीन पर खड़ी रहकर करूंगी।

दोनो लगभग 11 बजे तक वापस लौटे। नंदनी दोनो का इंतजार हॉल में ही कर रही थी। दोनो के आते ही अच्छी खातिरदारी हुई, फिर सब खाने के टेबल पर पहुंच गए।

खाना खाकर अपस्यु नंदनी से बात करने लगा और कुंजल सोने चली गई। दोनो मां-बेटे फुर्सत में काफी देर तक बातें करने के बाद वो लोग भी सोने चले गए। अगली सुबह घर में काफी हलचल थी। दोनो बहन सुबह से ही तैयार हो रही थी। घर में खुशी का माहौल था।

सभी लोग यहां से फिर सीधा चिल्ड्रंस केयर जाने वाले थे जहां बच्चों के साथ रखी का ग्रैंड फंक्शन रखा गया था।.. 9 बजे के आसपास दोनो बहने राखी बांधने आयी। कुंजल को देखकर हर कोई हैरान था, क्योंकि साड़ी में वो इस वक़्त कमाल कि लग रही थी। … आरव सिटी बजाते हुए कहने लगा.. "आज तो ये कमाल की लग रही है मां, खिड़की दरवाजे बंद रखो वरना इसके आशिकों की भीड़ यहां कभी भी हमला कर देगी।"..

बेचारी कुंजल शर्माकर अपनी मां में सिमट गई और नंदनी उसके गाल को पुचकारती हुई कहने लगी… "आज वाकई कमाल की लग रही हो।".. खैर पीछे से स्वास्तिका भी आयी और आते ही उसने आरव को बिठाकर उसे रखी बांधी… "छछूंदर, मुझे कुछ चाहिए तुझसे"..

आरव:- क्या चाहिए नॉटी बोल ना।

स्वास्तिका:- खडूस से बोल दे आज मै उससे बात नहीं करूंगी, इसलिए मुझे मानने कि कोशिश भी ना करे..

अपस्यु:- और जान सकता हूं क्यो? मां रात ही आपको बताया था ना, बस थोड़ा करीब से जानना था इसलिए दीपेश को साथ ले गया था। फिर ये नाराज क्यों है?

स्वास्तिका, पूरे गुस्से में आती… मां वो स्टूडेंट है ऊपर से घर से उनके पास लिमिटेड पैसे आते है.. साथ ले कर 3-4 घंटे घूमता रहा और दीपेश से खाना तो छोड़ो एक जूस के लिए नहीं पूछा।

स्वास्तिका की बात सुनकर सब लोग एक साथ हसने लगे… "मा कैसा लड़का है ये दीपेश, इन सब बातों की भी कोई शिकायत करता है।"

आरव:- ये तो औरतों वाले गुण है यार.. फलाने ने खाने को नहीं पूछा या चाय के लिए नहीं कहा।

स्वास्तिका:- हुंह ! उसने नहीं कहा मुझे, उसके दोस्त निर्मल ने बताया।

कुंजल:- फोन तो आपने जीजाजी को ही किया होगा ना। अब उनके फोन से अगर निर्मल ने ऐसी बातें आप से कही, मतलब जीजाजी और उसका दोस्त इन सब बातों पर डिस्कस कर रहे थे क्या?

कुंजल ने जैसे ही यह बात कही, गुस्से भरी नजर और झटके से घूमता सर कुंजल पर, तभी आरव ने चुटकी ले ली… "छी.. छी.. छी.., मतलब क्या औरतों का ग्रुप बनाया है जीजा ने। दूसरों के घर की हल्दी और नमक डिस्कस कर रहे।"

नंदनी स्वास्तिका का चेहरा देखकर उसके सर को अपने कंधे से लगाकर सबकी डांटती हुई कहने लगी… "मेरी बच्ची को किसी ने रुलाया तो देख लेना मै भूल जाऊंगी आज कोई त्योहार भी है। ये भी कोई बात हुई.. अब वो पारिवारिक लड़का बेचारा मां के पल्लू से ही चिपका रहा उसका बदला तुम स्वास्तिका से लोगे।"..

स्वास्तिका:- मै जा रही हूं वापस मुंबई। बोल क्यों नहीं देते की मेरा आना अच्छा नहीं लगा..

"रुल जा नॉटी रुक".. अपस्यु दौड़कर उसे पकड़ा और प्यार से सॉरी कहते हुए वापस लाने लगा… "पागल ऐसे कोई रूठकर जाता है क्या वो भी भूखे। कल को दोनो मियां बीवी कहोगे यहां खाने के लिए कोई पूछता ही नहीं।"…

बेचारी स्वास्तिका का रैगिंग हो गयी। सबने जितनी खिंचाई की थी, उतना ही हसाने के बाद फिर बारी आयी कुंजल की.. दोनो भाई को राखी बांधने के बाद कुंजल जोड़ से कहने लगी… "मुझे भी कुछ मांगना है।"
 
Update:-99

बेचारी स्वास्तिका का रैगिंग हो गयी। सबने जितनी खिंचाई की थी, उतना ही हसाने के बाद फिर बारी आयी कुंजल की.. दोनो भाई को राखी बांधने के बाद कुंजल जोड़ से कहने लगी… "मुझे भी कुछ मांगना है।"

अपस्यु और आरव.. "हम सुन रहे है।"..

कुंजल:- मुझे हम से नहीं बल्कि इस घर में बड़े बेटे, बड़े भाई और हर किसी के बाप से मांगना है।

अपस्यु:- मत मांग .. रहने दे प्लीज।

नंदनी:- बोलने से पहले ही माना कर रहा है। नाना कुंजल मांग बेटा..

अपस्यु:- तू भाई की लाडली है ना.. आजा 2 मिनट, कुछ भी मांगने से पहले थोड़ी प्राइवेट चैट कर लेते हैं।

स्वास्तिका:- नहीं नहीं.. जो भी बात होगी यहां होगी.. कुंजल की मांग अब तो मेरी भी मांग है।

नंदनी:- सब ख़ामोश.. मांग बेटा, बेझिझक अपनी भाभी मांग ले।

अपस्यु अपने सर पर हाथ मारते… "अरे यार जब कोई पसंद आ जाएगी तब मै सबको बता दूंगा, अब कोई फोर्स नहीं।

आरव:- तुझे कोई पसंद नहीं आ रही तो अरेंज मैरेज भी होती है और 80% शादियां आज भी अरेंज होती है।

कुंजल:- हद है सब अपने अपने हिसाब से थेओरी बना रहे। मेरी इक्छा है पहले मुझे तो बता लेने दो। कोई साइड डिस्कसन नही अब..

सब लोग एक साथ… "कितना वक़्त लगाएगी अब मांग भी लो"..

"मुझे बोलने दो और प्लीज कोई बीच में नहीं बोलेगा। कई दिनों से मुझे एक बात दिल में चुभते रहती है। मै खुद भी नहीं जानती कितनी लेकिन चुभन कुछ ऐसी है कि मै सबसे छिपकर ना जाने कितनी रोई हूं। मैं बस भाई से यह जानने कि इक्छा है, सबको सब कुछ देते हो, फिर ऐमी कें लिए ये दोहरा व्यवहार क्यों। सॉरी ऐमी नहीं.. मेरी बड़ी भाभी के साथ दोहरा व्यव्हार क्यों? मेरी इक्छा इतनी सी है कि बिना बात घुमाए आप हम सबको मेरी भाभी के लिए अपनी दिल की चाहत बता दो? कौन इतना चाहने वाले को पराए की तरह रखता है यार। आप को अपनी फीलिंग अच्छे से मारने आता है तो क्या उसकी फीलिंग भी मार दोगे.. क्यों आखिर क्यों.. मेरी इक्छा सिर्फ इतनी है कि की मुझे मेरे सवालों के जवाब चाहिए वो भी अभी।"

कुंजल की बातें सब खामोशी से सुनते रहे। अपस्यु के चेहरे को तो पढ़ पाना मुश्किल था, लेकिन कुंजल का चेहरे से उसके बातों कि विश्वसनीयता साफ झलक रही थी। उसके चेहरे से साफ पढ़ा जा सकता था कि अपस्यु और ऐमी के जिस रिश्ते के बारे में वो सवाल पूछ चुकी थी, कुंजल को अपने सवालों पर और दोनो के बीच बताए गए रिश्ते पर पूर्ण विश्वास था।

स्वास्तिका:- छोटी हमे इनके रिश्ते की गहराई का तो पुरा पता है और इन दोनों ने कभी किसी से छिपाया भी नहीं। अपने इतने नजदीकी रिश्ते में कभी इन दोनों ने जाहिर भी नहीं होने दिया… दोनो की एक दूसरे के प्रति चाहत कैसी है। हां बाहर से देखने वालों को हमेशा से ही दोनो में कपल वाली फीलिंग जरूर होती, लेकिन हम बस उसे गलतफहमी है मान लेते थे। छोटी तुझे पुरा यकीन तो है ना। कोई कन्फ्यूजन तो नहीं।

आरव:- बेहतर होगा अपस्यु बोले, क्योंकि मुझे कुंजल की बाते कोई गलतफहमी नहीं लग रही। ज़िन्दगी और लोगों को उसे देखने और समझने की परख पूरी है।

नंदनी:- बोल बेटा हम सब तुझे सुनना चाहते हैं।

अपस्यु:- मै चाहता हूं जब ऐमी मेरे साथ रहे तब मै इसका जवाब दूं, चलेगा क्या? कुंजल, बेटा कुछ समय इंतजार कर सकती है क्या सवालों के जवाब के लिए?

कुंजल, मुस्कुराती हुई अपस्यु से लिपटती… "भाई बस झूट बोलकर या बातें घुमा कर दिल मत तोड़ना।

"चल मेकअप ठीक कर, आज बहुत प्यारी लग रही है। चलते है चिल्ड्रंस केयर। और मां आपको अलग से इन्विटेशन देना होगा क्या? आप अबतक तैयार नहीं हुई। चलो-चलो, इमोशनल होकर जिस-जिस ने अपना चेहरा खराब किया है, सब जाकर चेहरे पर पानी मार आओ।"

अपस्यु की बात खत्म भी नहीं हुई थी कि दरवाजे पर लावणी और साची आकर खड़ी हो गई। दोनो को देखकर इस बार कुंजल ने सिटी बजाई… "आज तो लड़के पक्का कंफ्यूज होने वाले है, किसपर लाइन मारे और किसे जाने दे।"..

"गुड आइडिया कुंजल, तुम्हारी बड़ी सी फोटो के साथ एक बैनर चिपका देती हूं, भाई लोग हम सब बुक है सिवाय इस तस्वीर वाली लड़की के। हमे लाइन मारे तो राखी हाथ पर बंधने का पूरा चांस है, इसलिए ध्यान से।".. साची कुंजल के पास आकर बैठती हुई कहने लगी..

लावणी भी साथ में आयी थी, लेकिन बीच में ही आरव और लावणी के बीच नज़रों के इशारों से सूचना के आदान-प्रदान को देखकर अपस्यु लावणी का हाथ पकड़कर अपने पास बिठाते हुए कहने लगा… "बड़ी सी थाल में इतनी सारी राखीयां लेकर आयी है।"

लावणी:- जी भैय्या।

अपस्यु:- आज सबको पकड़-पकड़ कर राखी बांधना है।

लावणी:- नहीं भईया, वो बस चिल्ड्रंस केयर के लिए।

अपस्यु:- पैक करके लाती बैग में, साची की तरह। रास्ते से किसी को बांधती आयी हो क्या?

आरव:- हद है यार क्यों परेशान कर रहा है उसे..

लावणी, आरव को आखें दिखती… "ये चेहरा कैसा बना रखा है, जाओ पहले साफ करके आओ।"

आरव जबतक अपना चेहरा साफ करके आया, तबतक अपस्यु लावणी से बाते कर रहा था, इसी बीच नंदनी भी वहां आ गई और पूरे घर ही हॉल में जमा हो गया था… "लावणी वो सवाल का जवाब नहीं दी, रास्ते में किसी को बांधते आयी क्या राखी।"

लावणी:- नहीं भईया..

अपस्यु:- कोई बात नहीं, थाली सजी ही हुई है, यहां भी एक रखी बांधते जाओ..

लावणी:- क्यों नहीं भईया, लाओ हाथ आगे बढ़ाओ..

अपस्यु:- मुझे नहीं रे, आरव को बांधते हुए चलते है।

लावणी बड़ी से आखें किए… "आप सब यूं ही मेरे आरव को बदनाम किए रहते है, और कोई इस भोली शुरत वाले को कुछ कहता भी नहीं। भैय्या आप मेरी जितनी खिंचाई करते हो ना कभी मौका मिलने दो बदला तो लेकर रहूंगी।"

आरव:- मैंने तो बीच में टोका था बेबी, लेकिन तुम थी की उल्टा मुझे ही आखें दिखा रही थी।

लावणी:- सॉरी सोना, चलो हम लोग चलते है। वो सब आ जाएंगे।

"बाबू सोना.. हाहाहाहाहा"… इसी के साथ सब लोग भी हंसने लगे।.. थोड़ी देर बाद बाकी लोग भी अलग-अलग गाड़ियों में निकले। कुछ ही देर में सभी चिल्ड्रंस केयर में थे। माहौल पुरा खुशियों वाला था, और सभी लड़कियां छोटी-छोटी नोक-झोंक के साथ अपने-अपने भाई को राखी बांध रही थी, और हर भाई अपनी बहन को गिफ्ट बांट रहा था।

इसी बीच वैभव के साथ सिन्हा जी और ऐमी भी चिल्ड्रंस केयर पहुंचे… ऐमी को देखते ही स्वास्तिका और कुंजल ने उसे धर लिया। ऐमी को कुछ भी समझ में नहीं आया कि यहां हो क्या रहा है, लेकिन दोनो का व्यवहार कुछ अजीब था। ऐसा ही कुछ आरव और नंदनी के व्यवहार में भी नजर आ रहा था। यहां तक कि लावणी भी ऐमी से अजीब तरीके से मिली… "ये आज मुझे स्पेशल ट्रीटमेंट क्यों मिल रही है, कोई आइडिया है तुम्हे साची।"

साची:- शायद अपस्यु को रखी बांधने बोलेंगे, कुछ तो शरारत प्लान किया है इनके खानदान ने। वैसे अपस्यु से पता कर ले ना..

ऐमी:- इतनी देर से हूं, वो दिखा क्या मेरे पास..

साची:- नहीं..

ऐमी:- फिर.. वही है नाटक का रचयता, और वो जनता है, उसे देखकर मै अंदाज़ा लगा सकती हूं इसलिए वो सामने नहीं आएगा…

साची:- तुम उससे बहुत प्यार करती हो ना?

ऐमी:- अब ये बात करने के बाद गिल्ट फील करवाने वाली है क्या?

साची:- नहीं वो बात नहीं.. यहां खड़ा कोई भी उसके चेहरे को नहीं पढ़ सकता और तुम उसे देखकर समझ जाती हो…

ऐमी:- हेय साची, बात क्या है?

साची:- कुछ नहीं बस सोच रही थी, मेरे पास कुछ दिन था तब किसी दूसरे के साथ अपस्यु को देखकर मैं पागल हो उठी थी, फिर तुम्हारा अंदर क्या होता होगा। तुम तो सामने होकर भी उसके लिए पराई रहती हो।

ऐमी:- बाप रे कितना सोचती हो साची। बेसिकली मेरे अंदर लड़कियों वाली फीलिंग ही नहीं।

साची:- झुटी कहीं की, ये क्यों नहीं कहती की लड़कियों के लिए ही अब फीलिंग बचि है।

ऐमी:- मेरा मुंह मत खुलवा, चार दिन पहले किसका संदेश आया था .. आई मिस माय क्रेजी बॉय।

साची:- हां तो, अब वो ध्रुव ने ऐसी ऐसी बातें शुरू कर दी कि मै पागल हो रही थी। तो बस अपने दोस्त को ढूंढ रही थी, और खबरदार जो मेरे वर्चुअल फ्रेंड को रियल लाइफ में घुसेड़ी तो, सर फोड़ दूंगी मै।

इधर नंदनी और सिन्हा जी दोनो ऑफिस में बैठे थे… "क्या अनिरुद्ध जी, तैयार हैं रिश्ते में बांधने के लिए।"

सिन्हा जी हड़बड़ाते हुए… "कैसा रिश्ता"..

नंदनी:- आपको क्या हुआ इतने हड़बड़ा क्यों गए और घबरा क्यों रहे है?

सिन्हा जी:- हम दोस्त है वो तो समझ में आता है लेकिन राखी.. ये कुछ ज्यादा अजीब नहीं हो जाएगा। मतलब ऐसा लग रहा है जैसे किसी के तानों का जवाब ढूंढ रहे हो।

नंदनी, सिन्हा जी की बात पर जोर-जोर से हंसती हुई…. "वकील साहब कुछ ज्यादा आपको हमारे बारे में ख्याल रहता है। बेटी बड़ी हो गई है उसका भी कुछ ख्याल कीजिए। आज हमारे बच्चे एक दूसरे को परपोज करने वाले है। वैसे मेरे दिमाग में राखी का ख्याल तो नहीं आया था, लेकिन हम दोस्त है ये भी अभी-अभी पता चला"..

सिन्हा जी:- नहीं, इसमें समझना जैसा क्या है, आपको मेरी कंपनी अच्छी लगती है और मुझे आपकी, तो इसमें दोस्त ना होने जैसा कुछ भी नहीं। ये तो स्वाभाविक से समझ है जो अपने आप ही आ जाती है।

नंदनी:- अभी आपको देखकर मुझे ना एक टीवी ऐड याद आ गयी।

सिन्हा जी:- कौन सा..

नंदनी:- द मैन विल बी मैन…

बेचारे सिन्हा जी कुछ ज्यादा शर्माए और उससे भी कहीं ज्यादा घबराए वहां से निकले। डर ये भी था कि कहीं इस उम्र में नंदनी ने चिपका दिया तो भारी बेज्जती हो जाएगी…

बच्चों के साथ बैठकर सब लोग लंच करने के बाद लगभग 3 बजे लौट रहे थे। लौटने के क्रम में कुंजल, अपस्यु को पकड़कर अपनी कार में बिठाई, और दोनो साथ घर के लिए निकले… "भाई भाभी यहीं थी, फिर भी जवाब नहीं दिए।"

अपस्यु:- बेटा थोड़े बर्दाश्त की गोली खा ले, अभी घर चल रहे है ना.. वहीं पर बताऊंगा सब, बस साची और लावणी को चले जाने देना.. ठीक है।

कुंजल:- लेकिन छोटी भाभी को क्यों जाना होगा। वो भी तो परिवार से ही है ना।

अपस्यु:- हर किसी को सच जानने का हक है, लेकिन वक़्त मै तय करूंगा किसी को कब सच पाता चले… मै नहीं चाहता कि मै अपनी फीलिंग को बनावटी शब्दों से सजाऊं। इसलिए अभी के लिए सिर्फ वही लोग जो सब जानते हैं। समझ गई क्यों मैंने कुछ भी चिल्ड्रंस केयर में नहीं बताया।

कुंजल:- ठीक है भाई… वैसे नाराज तो नहीं हो ना..

अपस्यु:- नाराज तो हो जाता पर तुम्हे देखकर नाराज होने की झुटी इक्छा भी चली जाती है सच का नाराज कैसे हो सकता हूं।

कुंजल:- जल्दी से गले लग जाओ .. वरना मै स्टेरिंग छोड़ दूंगी।

अपस्यु हंसते हुए उसे "पागल" कहते गले लग गया।… "थैंक्स भाई मेरी लाइफ में आने के लिए… उन्हें कभी मत छोड़ना जिन्होंने हमें अलग किया। मैंने अपना पूरा बचपन खो दिया। हमारे घुटन के उन सालों का ऐसा हिसाब लेना की उनकी जिंदगी नासूर बन जाए… जितना हम बिछड़ कर एक दूसरे की नफरत मे रोए.. जितना हम मिलने के बाद रो रहे, उन बीते सालों को याद करके जिसमें हम कितना कुछ कर सकते थे… उन सबका बदला मुझे चाहिए।"

अपस्यु कुंजल से अलग होकर उसके आशु साफ करते हुए… "चल स्माइल कर, और केवल स्माइल। ठीक है"…

कुंजल:- हां कर रही हूं स्माइल.. ये आशु भी स्माइल वाले ही है। भाई मुझे आपसे दूर नहीं जाना।

अपस्यु:- हां ठीक है समझ गया.. एक घर जमाई कि डिमांड है यही ना..

कुंजल:- मैं उतना नहीं सोचती, जिससे कहोगे उससे शादी कर लूंगी.. इसके लिए भी कोई नखरे नहीं है और ना ही कोई लड़का है मेरी जिंदगी में। मुझे बस आप लोगों के साथ रहना है। सो आप क्या करते हो मुझे नहीं पता लेकिन मै छोड़कर नहीं जाने वाली…

अपस्यु:- ठीक है बाबा समझ गया… और कुछ डिमांड है, या इस राखी के लिए पर्याप्त हो गया..

कुंजल:- भाई.. हुंह.… . कोई इनको कुछ कहता क्यों नहीं.. सब मेरे आरव को बदनाम करते हैं।

अपस्यु:- हाहाहाहा.. कोई इस भोली सूरत वाले को कुछ कहता क्यों नहीं।

कुंजल:- हीहीहीही.. हां वो भी.. बेचारी भाभी का मुंह देखने लायक था। वैसे मैंने शरारत करना तो आपसे ही सीखा है। आप इतना टफ़ लुक के साथ इतनी शरारत कर सकते हो फिर मै तो मासूम हूं..

अपस्यु:- हां कल से देख रहा हूं मासूमियत… पहले स्वास्तिका को फसा दी। ..

कुंजल:- मेरा मुंह मत खुलवाओ.. मुझे पता है वोटिंग में कल दीदी जीती थी, आपने जज को पहले धमकी दिया था, तभी उसने रिजल्ट बदल दिया। मैंने भी दीदी के फेवर में वोट किया था, और जीजू का तो सवाल ही नहीं होता कि वो दीदी के लिए नेगेटिव वोटिंग कर दे…

अपस्यु:- नहीं ये झूट है माय लोर्ड मैंने धमकी नहीं दी थी, बस कुछ पैसे खिलाए थे जज को।

कुंजल:- अब दीदी को आपने परेशान किया था उसका फल तो आपको मिलना ही था। वैसे एक बात बताओ, आप इतनी देर तक उनके साथ घूमे, उन लोगों को खाने के लिए तो पूछना चाहिए था ना…

अपस्यु:- अरे मैंने तो कुछ शॉपिंग भी प्लान किया था.. सोचा जब पहली बार मिला हूं तो एक गिफ्ट तो बनता है। लेकिन जब मै स्वास्तिका के लिए कार ले रहा था, तब दोनो गलतफहमी की दुकान, उन्हें लगा मै उनके लिए कार खरीद रहा हूं.. मेहनत की कमाई पर अच्छा खासा लेक्चर मुझे सुना गया। मैंने भी कहा ठीक है भाई बचा ले अपना आत्मसम्मान।

कुंजल:- हीहीहीही… कुछ भी हो, बहुत गलत किया भैय्या… देखना दीदी आपको छोड़ेगी नहीं। वैसे.. वैसे.. वैसे....
 
Update:-100

अपस्यु:- अरे मैंने तो कुछ शॉपिंग भी प्लान किया था.. सोचा जब पहली बार मिला हूं तो एक गिफ्ट तो बनता है। लेकिन जब मै स्वास्तिका के लिए कार ले रहा था, तब दोनो गलतफहमी की दुकान, उन्हें लगा मै उनके लिए कार खरीद रहा हूं.. मेहनत की कमाई पर अच्छा खासा लेक्चर मुझे सुना गया। मैंने भी कहा ठीक है भाई बचा ले अपना आत्मसम्मान।

कुंजल:- हीहीहीही… कुछ भी हो, बहुत गलत किया भैय्या… देखना दीदी आपको छोड़ेगी नहीं। वैसे.. वैसे.. वैसे....

अपस्यु:- अब किस खतरे से आगाह किया जा रहा है..

कुंजल:- माय डियर ब्रो.. तुम्हे तो आरव भईया भी नहीं छोड़ने वाले..

अपस्यु:- नाह वो सबसे ज्यादा खुश होगा और वो कुछ नहीं कहेगा… क्योंकि ऐमी और आरव कट्टर दोस्त है, जो हमेशा झगड़ते पाए जाएंगे, लेकिन एक दूसरे से बहुत प्यार करते है। हां ऐमी की जगह कोई और होती तो वो मेरी खूब छिलाई करता, लेकिन ऐमी है तो वो कुछ नहीं कहेगा..

कुंजल:- वूहू… भाई.. बधाई हो अभी-अभी आपने ने पूरे दिल से कबूल कर लिया की आप दोनो के बीच क्या चल रहा है…

अपस्यु आश्चर्य से कुंजल की ओर देखते हुए कहने लगा… "कंप्लीट शातिर हां.. उगलवा ली मुझसे… तुम तो बहुत शातिर निकली"..

कुंजल:- तारीफ का शुक्रिया भाई, लेकिन मै भी आपकी बहन हूं और मै अपने दोनो भाई के बारे में एक चीज अच्छे से जानती हूं, जबतक दोनो कुछ बताना ना चाहे कोई कुछ उगलवा नहीं सकता… चलो स्पीच तैयार कर लो, अभी के हॉट टॉपिक तो आप और भाभी ही हो और मै आप दोनो के मुंह से आप दोनो की कहानी सुनने के लिए काफी एक्साइटेड हूं।

लगभग 1 घंटे बाद.. हॉल में एक छोटा सा अरेंजमेंट किया गया, जहां अपस्यु और ऐमी चेयर पर ठीक सबके सामने बैठे हुए थे। वहीं दोनो दरवाजे पर "डू नाट दिस्ट्रब" का बैनर लटक रहा था और सभी लोग… नंदनी, आरव, स्वास्तिका, कुंजल, और सिन्हा जी सब बड़े खुशी से अपस्यु और ऐमी के ओर देख रहे थे।

ऐमी को छोड़कर बाकी सभी लोगों को पता था कि किसलिए दोनो सामने बैठे है। हां लेकिन जब एमी, अपस्यु को देखी और बाकी सभी घरवालों को तो उसे अंदाज़ लगाते देर नहीं लगी कि मैटर क्या है?

ऐमी गहरी श्वांस लेती अपस्यु का हाथ थाम ली। उसके हाथ और पाऊं दोनो थोड़े कांप रहे थे। दिल जोरों से धड़क रहा था और नजरें बिल्कुल नीचे जमीन को ताक रही थी, जिनसे टप, टप, टप करती आशु की बूंदे जमीन पर गिर रही थी। अपस्यु ऐमी के हाथ पर अपने हाथ रखते उसे प्यार से सहलाते हुए….

"वो छोटी सी, बिल्कुल नन्ही बुलबुल जो उड़ती, फुदकती चहचहती थी। एक दिन वो नन्ही बुलबुल हमारे आश्रम आयी थी। बिल्कुल मासूम और निर्मल जल की तरह जो झरने से नीचे बहता है और मन मोह लेते है। मै भी उसकी पहली झलक पर मोहित हो गया। हां यह बात उसे भी अभी पता चली होगी। कई बार सोचा दिल के अरमान कह दूं, लेकिन शायद बाद, बाद और बाद में कह दूंगा, सोचते-सोचते हमारे रिश्ते गहरे हो गए पर जो कहना था, शायद वो सीने में कहीं दफन रह गए।"…

ऐमी अपना हाथ छुड़ाकर ऊपर देखी, अपस्यु के चेहरे को दोनो हाथ से थामकर उसके आशु पोछती "ना" में सर हिलाते आगे और कुछ कहने से मना करने लगी… अपस्यु ऐमी के आशु साफ करते "हां" में सर हिलाकर उसके बातों पर जैसे सहमति दे रहा हो, अपने चेहरे को उसके चेहरे के करीब ले गया और सर से सर को लगाकर दोनो एक दूसरे को देखते रहे।

बातें अभी ठीक से शुरू नहीं हुई थी, लेकिन वहां मौजूद हर कोई जो महसूस कर रहा था, वो उनका दिल ही जानता था। दबी सी अरमान आशुओं में बिखरी जा रही थी, लेकिन जुबान से कह पाने की हिम्मत ना तो अपस्यु जुटा पा रहा था और ना ही ऐमी।

आरव दोनो के पास नीचे बैठकर उनके हाथों को थामकर… "जो शुरू किया है उसे पुरा करो… ना तो अपस्यु और ना ही ऐमी, किसी काम को अधूरा छोड़ते है.. सो लेडीज एंड जेंटलमैन बस एक छोटे से पॉज के बाद स्टोरी फिर शुरू होगी..

"ये ऐसे नहीं सुनेग"… स्वास्तिका अपनी बात कहती दोनो के ऊपर पानी डाल दी। लेकिन दोनो फिर भी सर से सर को लगाए, एक दूसरे को देखकर आशु बजाए जा रहे थे। कुंजल और स्वास्तिका ऐमी को उठाकर ले गए और आरव अपने भाई को संभालते उसे कमरे तक लेकर गया… "मै शुरू से जनता था दोनो एक दूसरे के लिए पागल है, लेकिन इतना पागल होंगे आज महसूस हो रहा है।".. सिन्हा जी अपने आशु साफ करते हुए कहने लगे…

नंदनी भी अपनी आशु साफ करती हुई कहने लगी… "यहां पर हर कोई अपने किसी को खो चुका है, लेकिन ये दोनो एक दूसरे के सामने रहकर, एक दूसरे को खोते आ रहे थे। लेकिन ऐसा क्यों? दोनो ही समझदार है फिर भी इतना घुटन क्यों। फिर ये दबे से अरमान क्यों जो सामने से एक दूसरे को दिखा भी नहीं रहे थे?"

सिन्हा जी:- हमें ये बात उनसे ना ही पूछे तो बेहतर होगा। बड़े लक्ष्य को भेदने के लिए शायद इन दोनो ने कुछ सोच रखा होगा।

नंदनी:- हम्मम ! मै ना तो खुद भी रो सकती हूं और ना ही इन दोनों को रोते देख सकती हूं। अनिरुद्ध जी मै अपने बेटे के लिए अपनी बहू का हाथ आपसे मांगती हूं। क्या आपको यह रिश्ता मंजूर है।

सिन्हा जी:- हां लेकिन मै कोई दहेज नहीं दूंगा।

नंदनी, कुछ पल तो समझ नहीं पाई कि सिन्हा जी कहना क्या चाह रहे लेकिन कुछ पल बाद ही…… "ऐसे कैसे दहेज नहीं देंगे.. लाखों में एक है मेरा बेटा.. ऊपर से अच्छा खासा कमाता है। देखिए दहेज तो मै लेकर रहूंगी.. वो भी सवा दो सौ करोड़ (225 करोड़).."

सिन्हा जी थोड़ी ऊंची आवाज़ में बात करते हुए… "मुझे आप जैसे लालची के घर में नहीं रिश्ता करना। चलो ऐमी…"

सिन्हा जी और नंदनी की आवाज़ पर सभी अपने अपने कमरे से बाहर निकलकर आ चुके थे और इधर ये दोनो बिना किसी की बात पर ध्यान दिए, बस दहेज़ फाइनल करने में लगे हुए थे… इसी क्रम में नंदनी अपनी बात रखती हुई..

"एक ही तो बेटी है। एक-एक केस के कई करोड़ रुपया वसूल करते हो। मारोगे तो क्या लाद कर पैसे ले जाओगे।".. नंदनी भी पूरे मूड में आती हुई कहने लगी…

सिन्हा जी:- अजी छोड़िए मेरी कमाई, आपका बेटा तो करोड़ों में कमाता है फिर क्यों दहेज की लालच आ गई।

नंदनी:- इसे लालच नहीं अधिकार कहते है अनिरुद्ध जी।

सिन्हा जी:- कोर्ट में घसीट लूंगा फिर अधिकार समझते रहना आप.. चल ऐमी यहां नहीं रुकना एक भी मिनट..

"कितनी ओवर एक्टिंग करते हो दोनो, किसी मंच कर होते तो अबतक साल भर का टमाटर और अंडे बटोर रहे होते। और कहीं हमारी वो इवेंट ऑर्गनाइजर हटेली नैना आंटी होती, तो अबतक ₹50 ओवरेक्टिंग के काट लेती।".. ऐमी बाहर आती हुई कहने लगी। इधर अपस्यु भी अपने कमरे से निकाल और दोनो एक दूसरे को देखकर खुशी से आ रहे थे।

दोनो हॉल में वापस आकर अपनी जगह बैठ गए और एक दूसरे को देखकर मंद मंद मुस्कुराने लगे.. उन्हें देखकर बाकी के लोग भी मुस्कुरा रहे थे।… इस बार ऐमी अपस्यु का हाथ थामकर बोलना शुरू की…

"मेरे छोटे छोटे नखरे हुआ करते थे और दिन भर की बक-बक.. अपस्यु और मै बेफिक्र होकर हाथों में हाथ डाले दिन भर घुमा करते थे। मै पूरे साल जून आने का इंतजार करती थी। मेरे डैड, आप सब के चहेते सिन्हा जी, उस वक़्त अपस्यु से बहुत ही बैर रखा करते थे। वो अक्सर मेरी मां से यही सिकायत करते की मेरी बच्ची पर उस लड़के ने कुछ जादू टोना कर दिया है। मै केस करके उसे जेल भेज दूंगा।..

हाहाहा.... मेरे डैड .. जिन्हें कभी फुरसत ही नहीं मिल पाया अपने काम से, कि वो आराम से 10 मिनट मुझसे बात कर सके। सॉरी डैड ये मै शिकायत नहीं कर रही, बस सीने के अंदर उस वक़्त की कुछ दबी सी याद है। मेरी मां, वो दिन भर मेरे पास बैठी रहती थी और मै जुलाई से लेकर आने वाले मय महीने तक रोज उन्हें पकाती थी.. "मुझे अपस्यु के साथ ही रहना है".. "मुझे अपस्यु के साथ ही रहना है।" वो कभी-कभी हंसती हुई मुझे चिढ़ाने के लिए देती.. "लेकिन तुम उसके साथ कैसे रह सकती हो। तुम तो अपनी मम्मी की बेटी हो ना … तो अपनी मम्मा के पास ही रहोगी ना।" और जवाब में मै सिर्फ इतना ही कहती… "जैसे आप अपनी मम्मा को छोड़कर मेरे डैड के साथ रहते हो, ठीक वैसे ही।" बड़े हक से और सीधे शब्दों में।"..

अपस्यु….

मुझे कुछ भी होता उस वक़्त तो ऐमी सीधा हॉस्पिटल में होती थी। मेरी उंगली कट गई तो बेहोश। मुझे बुखार लगा तब बेहोश। आलम कुछ ऐसा था कि मै दर्द पर ज्यादा ध्यान नहीं देता था, लेकिन शायद मेरे सारे दर्द शुरू से ऐमी को महसूस होते थे, इसलिए मुझे कभी दर्द का एहसास ही नहीं हुआ।"

"बस मै ऐमी से बहुत सारी बातें करना चाहता था, लेकिन वो आती ही थी केवल 1 महीने के लिए, इसलिए सोचता अभी इसे ही सुन लेता हूं, बाद में तो बहुत सारा वक़्त ही वक़्त होगा, जब हम दोनों एक साथ होंगे एक परिणय सूत्र में।"

ऐमी:- ओय ये कब की बात है.. कबसे थे ये खयालात मुझे अभी बताओ....

अपस्यु:- 2004 की बात है शायद, जब वो मूवी वाला किस्सा हुआ था, ठीक उसके बाद..

ऐमी:- बेईमान मुझेसे कितनी बातें तुमने छिपाई, हां…

सभी घरवाले एक साथ और एक सुर में… "हमे भी सुनाओ वो मूवी वाला किस्सा।"…

अपस्यु और ऐमी दोनो को वास्तविकता का ज्ञान हुए और सबको देखकर दोनो हसने लगे…. "यह हमारे आपस की बात है और गलती से निकल गई। अब इसपर कोई सवाल नही।"… ऐमी सबको आखें दिखती कहने लगी..

"क्या वर्जिनिटी लूज हुई थी".. स्वास्तिका सवालिया नज़रों से देखते धीमे से पूछ दी।

उसके सवाल सुनकर हर कोई एक दूसरे को सवालिया नज़रों से देखने लगे और फिर सारी सवालिया नजर घूमकर दोनो पर ठहर गए… "अरे जाहिलो, वो 2004 था, कुछ तो शर्म करो, कुछ भी सोचने से पहले।".. अपस्यु ने सबके सवालों पर विराम लगाते हुए कहा…

"बस इतनी सी थी हमारी कहानी.. 2009 में हम दोनों मियामी में थे और तब वहां हमने अपने रिश्ते को नया आयाम दिया। कुछ कारन थे जिस वजह से शायद कुछ वक़्त और लगता सबको हमारे बाते में पता चलने में। कोई बात नहीं अब हर बात योजनाबद्ध हो, ऐसा संभव तो नहीं। अब हमारा हो गया.. सभा समाप्त, कहानी खत्म।"…. ऐमी खड़ी होती हुई कहने लगी..

कुंजल:- ऐसे कैसे इतनी जल्दी खत्म। अब दोनो किसी बात को लेकर इतना पर्सनल-पर्सनल करोगे, तो लोगों का क्या है दिमाग वहीं ठहर जाता है।

नंदनी:- सब बैठो चुपचाप.. और तुम दोनो भी बैठ जाओ.. अब से यदि किसी ने कुछ कहा ना तो देख लेना.. सिर्फ ये दोनो बोलेंगे और कोई भी सवाल नहीं करेगा.. चलो कंटिन्यू बेटा..

आरव:- अब तो दोनो समापन भी कर दिए मां जाने दो… हां लेकिन मैं सबके साथ कुछ साझा करना चाहता हूं।..

"हम सबको इन दोनों को देखकर अक्सर ये अफ़सोस होता था, कि ये दोनों एक दूसरे के लिए क्यों नहीं… शुरू-शुरू मे सबसे इमोशनल ऐमी हुआ करती थी। एक बार अपस्यु को गोली लगी थी, ट्रेनिंग पीरियड की घटना है।"

"अपस्यु को जैसे ही गोली लगी.. उसका पूरा चेहरा पसीने से भिंगा हुआ था.. खून ना दिखे, इसलिए अपने ऊपर कई सारे कपड़े डाले रखे थे इसने.. एक कतरा खून का इसका नहीं दिखा था। पाता नहीं अपस्यु कैसे कर रहा था ये सब, लेकिन चेहरे पर वहीं स्माइल थी और बड़ी तेजी में वो मेरे पास आकर धीमे से कहा कि.. "मुझे गोली लगी है, बिना किसी के जानकारी के ये बुलेट निकलवाओ।"..

"पता नहीं कैसे पर उस वक़्त ऐमी भी चली आयी और वो अपस्यु को देखकर थोड़ी परेशान हुई। उसने उसके ऊपर के कपड़े देखे फिर पूरी व्याकुलता से उसने ऊपर का कपड़ा हटाया और अंदर का नजारा देखकर ये बेहोश हो गई। अपस्यु एक हफ्ते में घर वापस आ गया था और ऐमी 12 दिन तक आईसीयू में रही थी।"

"अपस्यु को कुछ भी हो ना, तो हमे ऐमी को पहले देखने पड़ता था। मुझे और स्वास्तिका को हैरानी तब हो गई जब अपस्यु को 3 बुलेट लगी थी और हमारी ऐमी ने अकेले बिना मदद के, उसने अपस्यु के लिए वो सब कर दिया, जिसे हम लोग शायद बहुत सोचने के बाद भी नहीं कर पाते। इसने अपस्यु को सामने से हॉस्पिटल में एडमिट करवाया वो भी हॉस्पिटल प्रशासन के बिना नजर में आए की अपस्यु को बुलेट लगी है… क्यों नॉटी.. सही कहा ना मैंने"…

स्वास्तिका:- सही कहा आरव.. कुछ भी कर सकते है ये एक दूसरे के लिए।इन्हे इस रिश्ते में देखकर, शायद हम दोनों भी अपनी खुशी बयान नहीं कर सकते। छोटी ये तेरा एहसान रहा हम सब पर। ना जाने कब ये दोनो को ख्याल आता और ना जाने कब ये हम सबको बताता। लेकिन जब भी बताते इतना तो नहीं ही बताते। अब इनकी सजा का टाइम हो गया…

नंदनी:- कैसी सजा..

"मां आपको पता नहीं, केवल इस अपस्यु ने ही नहीं, बल्कि इस ऐमी की बच्ची ने भी हमे बहुत दर्द दिए है। एक किस्से हो इनके परेशान करने के तो मै बताऊं ना। जब भी मौका मिला है हमे ऐसे उलझकर बेबस कर देते जिसकी कोई सीमा नहीं। और हमे फसाकर दोनो बाहर बैठकर मज़े लेते रहते थे… आज मौका मिला है.. मै तो सोच रही हूं दोनो ने जब अपनी फीलिंग जाहिर कर दी है, उसके बाद तो हमेशा साथ ही दिखने वाले है… अब तो किसी के कहने से भी रुकने कहा वाले। मै तो कहती हूं 1 महीना दोनो को रूम म पैक कर दो और वो भी मोबाइल के बिना"..
 
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