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- Dec 5, 2013
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#45
“तो दुनिया को याद दिलाते है एक भूली हुई कहानी को ” मैंने मीता के हाथ को अपने हाथ में लेते हुए कहा .
मीता- कोई जरुरत नहीं है, वैसे भी दुनिया को अंधेरो से ज्यादा उजाले अच्छे लगते है .
मैं- पर दुनिया कहाँ जानती है अंधेरो की कहानिया.
मीता- तू साथ है ये भला कम है मेरे लिए
मैं - पर तेरी आँखों का सूनापन विचलित करता है मुझे, तेरी वो हसरत जिसे सबसे छुपाया है तूने मैं जानना चाहता हूँ . मैं अपनी मीता को पहचानना चाहता हूँ
मीता- तेरी मीता तेरे सामने है कर ले जो तहकीकात करनी है
मैंने उसका हाथ अपने सीने पर रखा और बोला- काश कुछ ऐसा इंतजाम हो जाये, जुबान पे बस तेरा नाम हो जाये.
मीता- ये दोस्ती बस दोस्ती तक ही रहे तो ठीक है, इसे आशिकी में मत बदल. आशिकी इम्तिहान लेती है .
मैं- तू डरती है क्या दुनिया से , इन फसानो से
मीता- मैं खुद से डरती हूँ .
मैं- तू चाहे लाख इंकार कर पर तेरा मेरा मिलना तकदीरो में लिखा था .
मीता- तेरी तक़दीर में क्या लिखा है मैं बता चुकी हूँ तुझे
मैं- तो क्या तू भी छोड़ जाएगी मुझे
मीता- तू जाने तेरा भाग्य जाने.
उसने दूसरी तरफ करवट ली और सो गयी. मैंने उसके पेट पर हाथ रखा और आँखे बंद कर ली. अगले दिन सुबह से दोपहर तक मैंने जमीन समतल करने के लिए खूब काम किया. पसीने से लथपथ , थकन से चूर पर मुझे ये करना ही था क्योंकि मुझे यही रहना था इसे ही घर बनाना था . पसलियों का दर्द जब काबू से बाहर हो गया तो मैं पानी की होदी में उतर गया . थोडा सकून सा मिला मुझे. पर दिल में एक आग जल रही थी .
मैंने इतना तो समझ लिया था की चाची, ताई और चाचा इन तीनो में से मैं किसी पर भी भरोसा नहीं कर सकता था . ये तीनो ही गुरु घंटाल थे. चाचा दो औरतो को पटाये हुए था, ताई न जाने किन किन का लंड ले चुकी थी और चाची अपने आप में उलझी थी. क्या ये मुमकिन था की ये तीनो मुझे चारे की तरह इस्तेमाल कर रहे थे, कितनी आसानी से ताई ने अपनी चूत मरवा ली थी मुझसे, क्या वो किसी के इशारे पर कर रही थी ये सब.
कहीं न कहीं ये ख़ामोशी मुझसे कह रही थी की कोई तूफ़ान आने वाला है . मेरा कमजोर दिल घबरा रहा था. दिलेर को मारने के बाद भी जब्बर की ख़ामोशी मुझे बेचैन कर रही थी . सुनार भी बहन का लोडा घर से नहीं निकल रहा था . खेतो से निकल कर मैं सीधा बैंक में गया और लाकर को दुबारा खोला.
मुझे उम्मीद थी की गहनों की गहन जांच करनी चाहिए, क्या मालूम मुझसे कुछ छूट गया हो. कहीं न कहीं मुझे महसूस होता था की ये शिवाले के श्रृंगार का लूटा हुआ हिस्सा है . और अगर ये सच था तो अर्जुन सिंह को इस पाप के लिए सजा मिलनी ही चाहिए थी. मैं समझ नही पा रहा था की मुझे अपने बाप से नफरत है ये आदर . सब कुछ छान मारा पर कुछ नहीं मिला. हताशा से भरा हुआ मैं घर की तरफ लौटा.
मैंने देखा की एक चमचमाती गाडी,हमारे घर से निकली .उसमे एक लड़का बैठा था , मेरी ही उम्र का या फिर मुझसे थोडा बड़ा. हमारी नजरे आपस में मिली , उसने मुझे मैंने उसे देखा और फिर उसने गाडी आगे बढ़ा दी. दरवाजे पर खड़ी संध्या चाची उसे जाते हुए देखती रही जब तक की गाडी नजरो से ओझल नहीं हो गयी.
“कौन था वो ” मैंने चाची से पूछा
चाची- मेरा भतीजा पृथ्वी .
मैं- पहले कभी देखा नहीं उसे,
चाची- कुछ महीने पहले ही विलायत से आया है
मैं- तो सोलह साल बाद संध्या ने दुबारा से पीहर वालो से रिश्ता जोड़ ही लिया
चाची ने घूर कर देखा मुझे और बोली- उसकी बुआ हूँ मैं उसका हक़ है मुझसे मिलना .
मैं- हक़ तो तुम्हारा भी है जो आजकल रोज ही रुद्रपुर के चक्कर लगये जा रहे है . मुझे समझ नहीं आता फिर ये झूठ का ड्रामा किसलिए करती हो.
चाची- कोई ड्रामा नहीं है
मैं- तो फिर ऐसी क्या वजह हो गयी जो अचानक से ही पीहर से इतनी मोहब्बत हो गयी तुम्हारी, क्या है उस शिवाले में और अब ये पृथ्वी जो पहले कभी नहीं आया अब अचानक से बुआ की याद आ गयी .
चाची- रक्षा बंधन आने वाला है वो चाहता है की मैं राखी बाँधने जाऊ
उफ़ ये रिश्ते नाते , ये बंधन मैं चाह कर भी चाची से इस मामले में कुछ नहीं कह सकता था ये बुआ और भतीजे के हक़ की बात थी. और कहने को तो ये धागा था पर इसकी कीमत बहुत बड़ी थी .
मैं- तुम्हे जाना चाहिए चाची,
चाची के होंठो पर एक फीकी मुस्कराहट आई और वो बोली- मैंने पृथ्वी को मना कर दिया है , मैं जीते जी उस घर में अपने पैर नहीं रखूंगी जिसे मैं ज़माने पहले छोड़ आई.
मैं- मेरी बुआ या बहन होती तो मुझे भी चाव होता इस दिन का . मेरी कलाई भी राखी से भरी होती.
मैंने अपनी कलाई देखते हुए कहा. दरसल ये वो पल था जिसमे भावनाए जोर तो मार रही थी पर उन्हें दबाये रखा था .
“मैं जानता हूँ तुम्हारे मन को. सोलह साल पहले न जाने क्या परिस्तिथिया रही होंगी जो तुमने ये निर्णय लिया पर मैं जानता हूँ अपनों की यादे जब आती है तो दिल पर क्या बीत ती है. मैंने तो बचपन में ही अपने माँ-बाप को खो दिया . तुम्हारा भतीजा आया है और फिर एक मामूली धागे की ही तो बात है न , कितनी तीज-त्यौहार, होली-दिवाली गयी मैंने दुनिया को देखा खुश होते हुए, काश मेरी माँ होती तो मैं भी ”
“मैं भी तेरी माँ ही ” चाची ने अपनी बात अधूरी छोड़ी और मुझे अपने सीने से लगा लिया. ना जाने क्यों मेरे आंशुओ से उसके आँचल को भिगो दिया. ये वो लम्हा था जिसमे मैं टूट गया था . मैंने कभी कहा नहीं था पर जिन्दगी के हर कदम पर मुझे माँ बाप की कितनी कमी महसूस होती थी बस मैं ही जानता था.
“कभी भी ये मत सोचना की तेरा कोई नहीं है , बल्कि तू तो खुशनसीब है तेरे पास तो दो दो माँ है ” ताई ने मेरे पास आते हुए कहा.
मैं चाची से अलग हुआ.
ताई- और हम सब को विश्वास है अर्जुन एक न एक दिन जरुर लौट आएगा.
ताई ने मेरे माथे को चूमा. सालो से सीने में दबे दर्द को मैंने आंसू बन कर बहने दिया.
“तो दुनिया को याद दिलाते है एक भूली हुई कहानी को ” मैंने मीता के हाथ को अपने हाथ में लेते हुए कहा .
मीता- कोई जरुरत नहीं है, वैसे भी दुनिया को अंधेरो से ज्यादा उजाले अच्छे लगते है .
मैं- पर दुनिया कहाँ जानती है अंधेरो की कहानिया.
मीता- तू साथ है ये भला कम है मेरे लिए
मैं - पर तेरी आँखों का सूनापन विचलित करता है मुझे, तेरी वो हसरत जिसे सबसे छुपाया है तूने मैं जानना चाहता हूँ . मैं अपनी मीता को पहचानना चाहता हूँ
मीता- तेरी मीता तेरे सामने है कर ले जो तहकीकात करनी है
मैंने उसका हाथ अपने सीने पर रखा और बोला- काश कुछ ऐसा इंतजाम हो जाये, जुबान पे बस तेरा नाम हो जाये.
मीता- ये दोस्ती बस दोस्ती तक ही रहे तो ठीक है, इसे आशिकी में मत बदल. आशिकी इम्तिहान लेती है .
मैं- तू डरती है क्या दुनिया से , इन फसानो से
मीता- मैं खुद से डरती हूँ .
मैं- तू चाहे लाख इंकार कर पर तेरा मेरा मिलना तकदीरो में लिखा था .
मीता- तेरी तक़दीर में क्या लिखा है मैं बता चुकी हूँ तुझे
मैं- तो क्या तू भी छोड़ जाएगी मुझे
मीता- तू जाने तेरा भाग्य जाने.
उसने दूसरी तरफ करवट ली और सो गयी. मैंने उसके पेट पर हाथ रखा और आँखे बंद कर ली. अगले दिन सुबह से दोपहर तक मैंने जमीन समतल करने के लिए खूब काम किया. पसीने से लथपथ , थकन से चूर पर मुझे ये करना ही था क्योंकि मुझे यही रहना था इसे ही घर बनाना था . पसलियों का दर्द जब काबू से बाहर हो गया तो मैं पानी की होदी में उतर गया . थोडा सकून सा मिला मुझे. पर दिल में एक आग जल रही थी .
मैंने इतना तो समझ लिया था की चाची, ताई और चाचा इन तीनो में से मैं किसी पर भी भरोसा नहीं कर सकता था . ये तीनो ही गुरु घंटाल थे. चाचा दो औरतो को पटाये हुए था, ताई न जाने किन किन का लंड ले चुकी थी और चाची अपने आप में उलझी थी. क्या ये मुमकिन था की ये तीनो मुझे चारे की तरह इस्तेमाल कर रहे थे, कितनी आसानी से ताई ने अपनी चूत मरवा ली थी मुझसे, क्या वो किसी के इशारे पर कर रही थी ये सब.
कहीं न कहीं ये ख़ामोशी मुझसे कह रही थी की कोई तूफ़ान आने वाला है . मेरा कमजोर दिल घबरा रहा था. दिलेर को मारने के बाद भी जब्बर की ख़ामोशी मुझे बेचैन कर रही थी . सुनार भी बहन का लोडा घर से नहीं निकल रहा था . खेतो से निकल कर मैं सीधा बैंक में गया और लाकर को दुबारा खोला.
मुझे उम्मीद थी की गहनों की गहन जांच करनी चाहिए, क्या मालूम मुझसे कुछ छूट गया हो. कहीं न कहीं मुझे महसूस होता था की ये शिवाले के श्रृंगार का लूटा हुआ हिस्सा है . और अगर ये सच था तो अर्जुन सिंह को इस पाप के लिए सजा मिलनी ही चाहिए थी. मैं समझ नही पा रहा था की मुझे अपने बाप से नफरत है ये आदर . सब कुछ छान मारा पर कुछ नहीं मिला. हताशा से भरा हुआ मैं घर की तरफ लौटा.
मैंने देखा की एक चमचमाती गाडी,हमारे घर से निकली .उसमे एक लड़का बैठा था , मेरी ही उम्र का या फिर मुझसे थोडा बड़ा. हमारी नजरे आपस में मिली , उसने मुझे मैंने उसे देखा और फिर उसने गाडी आगे बढ़ा दी. दरवाजे पर खड़ी संध्या चाची उसे जाते हुए देखती रही जब तक की गाडी नजरो से ओझल नहीं हो गयी.
“कौन था वो ” मैंने चाची से पूछा
चाची- मेरा भतीजा पृथ्वी .
मैं- पहले कभी देखा नहीं उसे,
चाची- कुछ महीने पहले ही विलायत से आया है
मैं- तो सोलह साल बाद संध्या ने दुबारा से पीहर वालो से रिश्ता जोड़ ही लिया
चाची ने घूर कर देखा मुझे और बोली- उसकी बुआ हूँ मैं उसका हक़ है मुझसे मिलना .
मैं- हक़ तो तुम्हारा भी है जो आजकल रोज ही रुद्रपुर के चक्कर लगये जा रहे है . मुझे समझ नहीं आता फिर ये झूठ का ड्रामा किसलिए करती हो.
चाची- कोई ड्रामा नहीं है
मैं- तो फिर ऐसी क्या वजह हो गयी जो अचानक से ही पीहर से इतनी मोहब्बत हो गयी तुम्हारी, क्या है उस शिवाले में और अब ये पृथ्वी जो पहले कभी नहीं आया अब अचानक से बुआ की याद आ गयी .
चाची- रक्षा बंधन आने वाला है वो चाहता है की मैं राखी बाँधने जाऊ
उफ़ ये रिश्ते नाते , ये बंधन मैं चाह कर भी चाची से इस मामले में कुछ नहीं कह सकता था ये बुआ और भतीजे के हक़ की बात थी. और कहने को तो ये धागा था पर इसकी कीमत बहुत बड़ी थी .
मैं- तुम्हे जाना चाहिए चाची,
चाची के होंठो पर एक फीकी मुस्कराहट आई और वो बोली- मैंने पृथ्वी को मना कर दिया है , मैं जीते जी उस घर में अपने पैर नहीं रखूंगी जिसे मैं ज़माने पहले छोड़ आई.
मैं- मेरी बुआ या बहन होती तो मुझे भी चाव होता इस दिन का . मेरी कलाई भी राखी से भरी होती.
मैंने अपनी कलाई देखते हुए कहा. दरसल ये वो पल था जिसमे भावनाए जोर तो मार रही थी पर उन्हें दबाये रखा था .
“मैं जानता हूँ तुम्हारे मन को. सोलह साल पहले न जाने क्या परिस्तिथिया रही होंगी जो तुमने ये निर्णय लिया पर मैं जानता हूँ अपनों की यादे जब आती है तो दिल पर क्या बीत ती है. मैंने तो बचपन में ही अपने माँ-बाप को खो दिया . तुम्हारा भतीजा आया है और फिर एक मामूली धागे की ही तो बात है न , कितनी तीज-त्यौहार, होली-दिवाली गयी मैंने दुनिया को देखा खुश होते हुए, काश मेरी माँ होती तो मैं भी ”
“मैं भी तेरी माँ ही ” चाची ने अपनी बात अधूरी छोड़ी और मुझे अपने सीने से लगा लिया. ना जाने क्यों मेरे आंशुओ से उसके आँचल को भिगो दिया. ये वो लम्हा था जिसमे मैं टूट गया था . मैंने कभी कहा नहीं था पर जिन्दगी के हर कदम पर मुझे माँ बाप की कितनी कमी महसूस होती थी बस मैं ही जानता था.
“कभी भी ये मत सोचना की तेरा कोई नहीं है , बल्कि तू तो खुशनसीब है तेरे पास तो दो दो माँ है ” ताई ने मेरे पास आते हुए कहा.
मैं चाची से अलग हुआ.
ताई- और हम सब को विश्वास है अर्जुन एक न एक दिन जरुर लौट आएगा.
ताई ने मेरे माथे को चूमा. सालो से सीने में दबे दर्द को मैंने आंसू बन कर बहने दिया.