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लेखक की जुबानी
PHOOLPUR
फूलपूर की पुलिया पर बिचोबीच स्कूटी खड़ी थी , दोनो की निगाहे 6 फीट के संकरे और करिब डेढ़ दो किमी लम्बी उबड़-खाबड़ वाले खड़न्जे पर गयी ।
जो खाली सिवान से होकर गाव तक रहा था ।
आने जाने को एक्का दुक्का लोग ही थे कोई साइकिल से तो कोई पैदल ,
सामने से आ रही साइकिल के पहिये की उछलकूद और उस साइकिल सवार के बिगड़े हुए चेहरे के बेचैन भाव को देख कर दोनो समझ गये थे ये छोटा सफ़र बहुत परेशान करने वाला है
ऐसे मे कमलनाथ ने नैतिकता दिखाते हुए - ऐसा करिये आप चलिये मै पैदल आता हु ।
शिला - अरे देर हो जायेगी , आप बैठीये और ..
कमलनाथ शिला के बात पूरी होने का इन्तेजार कर रहा था
शिला हिचक कर -और मुझे पकड लिजिए , अब क्या ही कर सकते है ।
कमलनाथ दिल ध्क्क से हुआ और अगले ही पल वो प्रफुल्लित हो गया
फिर वो जानबुझ कर शिला से थोड़ी दुरी रखते हुए अपने एक हाथ को शिला के कन्धे पर रखा ।
इस स्पर्श से दोनो ही सिहर गये और शिला की सासे तेज हो गयी , उसने एक गहरी सास ली और एक्सीलरेटर घुघूवाते हुए धीरे धीरे पुलिया से निचे उतरने लगी ।
ढलान पर लुढ़कती स्कूटी का कोण उपर से दो तीन हच्के की उछाल मे ही कमलनाथ शिला के पीछे आ गया और उसने शिला के कन्धे को जोर से पकड लिया ।
शिला भी स्कूटी की हैंडिल ताने हुए धीरे धीरे उतारे जा रही थी मगर कमलनाथ की सख्त हथेली ने उसके कंधो को कचोटना शुरु कर दिया था ।
प्रतिक्रिया स्वरुप शिला दर्द के मारे अपने कन्धे उचकाते हुए सिस्ककर - आउउउच ,
शिला की कराह सुनते ही कमलनाथ ने अपने हाथ की पकड ढीली कर उसके कन्धे सहलाता हुआ - सॉरी सॉरी ,
शिला अपने कूल्हो पर स्पर्श हो रहे कमलनाथ के जांघो को मह्सूस करती हुई मुस्कुरा कर - कोई बात नही , आप निचे पकड लिजिए क्योकि आगे रास्ता ऐसे ही है
कमलनाथ ने अपने हाथ सरका कर शिला के कमर मे हाथ डाल कर जांघो से जस्ट उपर उसके गुदाज कमर को कुरती के उपर से हल्के हाथो से पकड लिया ।
कमलनाथ के स्पर्श से शिला कापने लगी और धीरे धीरे उबड़-खाबड़ रास्ते ने कमलनाथ के सीने को शिला के पीठ से लग्भग चिपका दिया था ।
पजामे मे कमलनाथ का लण्ड शिला के गुदाज गाड़ मे हल्का फुल्का टच हो रहा था , शिला को पहले थोडा खटका अगले ही पल एक जोर का हचका लगा
शिला उछली और कमलनाथ आगे की ओर खिसका , जैसे ही शिला निचे हुए वो डिरेक्ट कमलनाथ के आधे लण्ड पर बैठ गयी ।
लण्ड का कड़ापन अपने गुदाज गाड़ मे पाते ही शिला की सासे अटक गयी और वही कमलनाथ की धडकन भी एक पल को थम सी गयी कि अगर जरा सा भी आगे पीछे हुआ होता तो अब उसके लिन्ग मे फैक्चर हो गया होता , जितनी जोर से शिला के चुतड के लण्ड पर गिरे थे ।
अगले ही जब उसको सब नोर्मल लगने लगा तो उसको अपनी वर्तमान स्थिति का याद आया और ये सोचते ही उसका लण्ड ठुमका, जिसका आभास शिला को हुआ और वो चिहुक कर उसके लण्ड से उतरते हु आगे हो गयी ।
अब शिला सीट के मुहाने पर बड़ी मुश्किल से बैठी हुई थी , पीछे पुरा एक लोग को बैठने की जगह खाली थी ।
इधर कमलनाथ को जैसे ही शिला की स्थिती का ज्ञान हुआ - आप ठिक से बैठी है ना , दिक्कत तो नही
शिला थोडा लजाती हुई - अह नही ये हच्के से मै एकदम आगे आ गयी हुई जरा आप थोड़ा पीछे हो जाईये
कमलनाथ ने पीछे हैंडल पकड कर अपने चुतड खिस्काता हुआ - हा हा आ जाईये
शिला ने उसी अवस्था मे स्कूटी को थोडा सा रोककर अपने कुल्हे खसकाते हुए पीछे जाने लगी और जैसे ही उसको कमलनाथ के मुसल का तनाव अपने चर्बीदार गाड़ मे स्पर्श हुआ वो रुक गयी ।
सफर फिर से शुरु हो गया और कमलनाथ ने अपने ढीले हाथ वापस से शिला के कमर पर रख दिया , धीरे धीरे वो सरक कर उसकी जांघो तक जाने लगे ।
हवा से पहले ही शिला की कुर्ती जांघो से उतरी हुई थी और नरम जान्घो का स्पर्श अपनी उंगलियो पर पाते ही कमलनाथ सतर्क हुआ और थोडी देर तक उसने वैसे ही शिला के जांघो पर हाथ रहने दिया ।
शिला भी सिहर उठी थी , स्कूटी की खड़बड़ाहट से कमलनाथ की उंगलियाँ उसके मुलायम चर्बीदार जांघो पर सरक रही थी ।
उसपे से पीछे गाड़ मे उसका सुपाडा चुभा हुआ था ।
शिला के निप्प्ल तन चुके थे और चुत पनियाना शुरु हो चुकी थी ।
इधर कमलनाथ ने खराब रास्ते का फाय्दा लेते हुए अपनी उंगलिया जांघो के भीतरी भाग पर सरकाने लगा था ।
शिला पूरी तरह समझ रही थी कि ये सब संयोग नही था इसमे कमलनाथ की भरपुर मनसा छिपी हुई है
लेकिन वो कामयाब होने से रही , सामने फुलपुर गाव आ चुका था ।
शिला चहक कर - अरे गाव आ गया
शिला के इतना कहने की देरी थी कि कमलनाथ ने अपने हाथ वापस खिच लिये और मुस्कुरा कर - शुक्र है आ गया , नही तो ये रोड उफ्फ्फ
शिला - अरे भी खतम कहा हुआ है , गाव के बाहर बाहर से दुसरी ओर जाना है , वहा है हमारा बाग ।
कमलनाथ - अच्छा
फिर शिला ने स्कूटी चलाती हुई हार्न बजाती हुई बाहर ही बाहर गाव के दुसरे तरफ आ गई जहा एक तरफ बागिया थी ।
बाग मे आते ही शिला को मिट्टी वाली अच्छी सडक मिल गयी तो वो पेड़ो के बिच से स्कूटी नचाते हुए बाग के आखिरी छोर पर एक सिन्गल कमरे का मकान बना था उसी के सामने रोक दी ।
उस तरफ खेतो का पुरा सिवान था ।
बगल मे एक नदी बह रही थी ,,जिसके ढलानो मे गाव के बच्चे भैस गाय चराने आये हुए थे ।
कमलनाथ और शिला दोनो उतर गये ।
कमलनाथ- तो क्या ये अपना खुद का बाग है ?
शिला - हा और यहा से वो पेड़ तक खेत भी ह्मारे है , ये सब जमुना भैया देखते है ।
ये मकान भी वही बनवाये है
शिला ने अपने घर के बारे मे तारिफ जोडने लगी , मगर कमलनाथ तो उसके जिस्मो को निहारने मे मशरफ था
कमलनाथ गहरी सास लेते हुए - वैसे यहा बहुत सुकून है , वहा शहर मे इतनी भीड़ होती है और यहा कोई देखने वाला नही है हमे हाहहह्हा
शिला कमलनाथ का दोहरे अर्थ को समझ रही थी लेकिन उसने बात को घुमाते हुए - हा मै भी सालो बाद आयी हु , चलिये अब जिस काम के लिए आये है वो कर ले ।
कमलनाथ - हा हा क्यू नही
फिर शिला ने स्कूटी से एक प्लास्टिक बोरा निकाला और उसको लेके एक ओर बढ़ गयी ।
कमलनाथ भी शिला के पीछे पीछे चल दिया उसके हिल्कोरे मारते चुतडो को निहारते हुए ।
शिला ने इधर उधर देख कर सुखी लकड़ीया उठानी शुरु कर दी और कमलनाथ भी उसकी मदद करने लगा ।
दोनो अब परिवार के बारे मे बाते करने लगे ।
कमलनाथ ने शिला के अकेले आने का कारण पुछा तो उसने घर के काम और बेटियो के बाहर पढ़ाई करने की बात बताई ।
शिला- मै भी हल्दी वाले दिन आने वाली थी लेकिन भाभी ने जिद करके बुलाया
कमलनाथ - क्यू ?
शिला - दरअसल आज मेरे जन्मदिन की पार्टी होने वाली थी, ऑफ़िस स्टाफ भी काफी जिद किये थे लेकिन मै रुक ना सकी ।
कमलनाथ शौक होकर- तो क्या सच मे आज आपका बर्थडे है
शिला थोडा शर्मा कर - जी ,
कमलनाथ उसके हाथ से लकड़ी वाला बोरा लेता हुआ- अरे छोडिए आप इसे , आपने बताया भी नही इतना खास दिन है आपका ।
शिला हस कर - इसमे बताने जैसा क्या हैं ..
कमलनाथ कुछ खोज रहा था कि उस की नजर उस मकान के पास लगे गुढ़हल के पेड़ पर गयी जिस्पे गुलाबी वाले गुडहल लगे हुए थे ।
कमलनाथ- रुकिये जरा
फिर वो भागता हुआ पेड़ के पास गया और वहा से एक सुन्दर गुडहल का फुल पत्तियो डंठल सहित लेके भागता हुआ आया और शिला को देते हुए - हैप्पी बर्थडे
शिला शर्म से लाल हो गयी और हस्ते हुए उसके हाथो से गुडहल लेते हुए- जी बहुत बहुत थैंक्यू
कमलनाथ - बस थैंक्यू ? इतना सुखा सुखा
शिला कमलनाथ का इशारा समझ गयी थी और वो मुस्कारा कर लपक उसके गालो को चूमते हुए - थैंक्यू हिहिही बस खुश
कमलनाथ को उम्मीद नही थी कि शिला ऐसा कुछ कर देगी लेकिन वो खुश था और उसका लण्ड बेकाबू हुआ जा रहा था ।
कमलनाथ अपने गीले गालो को सहलाते हुए - मै तो सोचा आप केक वेक खिलाएंगी , लेकिन ये भी ठिक है हिहिहिही
कमलनाथ की बाते सुन्कर शिला शर्म से लाल पड़ गयी और हसने लगी
तभी कमलनाथ का मोबाईल बजा और रन्गीलाल ने फोन पर जल्दी आने को कहा ।
कमलनाथ - अरे आपके भैया का फोन था जल्दी आने को बोला है
शिला - अरे अभी हुआ कहा , दो पेड़ की ही बस लकड़ीया हुई है ना
कमलनाथ - ऐसा करिये आप उधर मकान के पास देखीये मै उस ओर देखता हु , जल्दी हो जायेगा
फिर दोनो अलग हुए और जल्दी जल्दी लकड़ीया बटोरनी शुरु कर दी ।
कमलनाथ ने फुर्ती दिखाई और वो अपने हिस्से की लकड़ी इकठ्ठा कर शिला की ओर घुमा मगर वो मकान के पास नही थी
वो उसी ओर बढता हुआ आगे गया तो देखा कि शिला ने लकड़ीया इकठ्ठा कर स्कूटी पर रखे हुए थी मगर वो खुद कही नजर नहीं आ रही थी
कमलनाथ आगे बढ कर इधर उधर नजर मारा और अचानक से उसको मकान की दिवाल से लग कर शिला अपनी गाड फैलाये हुए मूत रही थी ।

कमलनाथ की आन्खे फैल गयी शिला की ये फैली हुई गाड़ देख कर , उसके गोरे गोरे चुतड मकान की छाव मे भी झलक रहे थे और चुतडो के बिच की फैली हुई दरार जो उसके भूरे सुराख तक जा रही थी ।
कमलनाथ अपना तनमनाया हुआ मुसल पकड कर उसको भींच रहा था
वही शिला उठी और अपने चुतडो पर पैंटी खिच कर चढाते हुए लेगी भी उपर कर की और अपना कुर्ती निचे करते हुए जैसे ही वो घूमी, सामने कमलनाथ अवाक होकर आन्खे फाडे उस्की ओर देखे जा रहा था ।
शिला का कलेजा धक करके रह गया और वो लाज के मारे सर निचे करती हुई आगे आई ।
कमलनाथ हड़बडी मे - सॉरी सॉरी वो आप दिखी नही तो मै आपको खोजता हुआ
शिला लाज से हस कर - छोडिए जाने दीजिये हम दोनो मे ना जाने ये कैसा सन्योग बना हुआ है कि हर बार .... हिहिहिह्ही
कमलनाथ भी शिला की बात पर हसता हुआ - हमम सही कह रही है आप , मगर इस बार संयोग पिछ्ली बार से ज्यादा ही बड़ा था
कमलनाथ की दोअर्थी बात सुनते ही शिला के कान खड़े हो गये और वो मुस्कुराती हुई - क्या !
कमलनाथ अब झेप सा गया कि क्या जवाब दे तभी
शिला हस कर - रज्जो भाभी सही कह रही थी मर्द लोग सच मे ऐसे ही होते है ।
शिला के मुह से रज्जो की बात सुन कर कमलनाथ आतुरता से - क्या ? क्या कहा रज्जो ने ?
शिला हस कर स्कूटी की ओर बढती हुई - जाने दीजिये और चलिये देर हो रही है ।
कमलनाथ - हा लेकिन आखिर ऐसा क्या करते है मर्द लोग भई हिहिहिही हम भी जाने
शिला नजरे झुकाये मुस्कुराते हुए नजरे उठाती हुई कमलनाथ को देख कर - क्यू आपको नही पता ?
कमलनाथ ने ना मे सर हिलाया
शिला हस कर - वही जो अभी आप घुर रहे थे , मर्द लोग मौका पाते ही वही नजरे गड़ा लेते है ।
कमलनाथ हस कर - अरे वो तो ...
शिला - क्या वो तो उम्म्ंम ... झुठ मत बोलिए । इत्ने शरीफ होते आप तो नजरे फेर नही लेते लेकिन आप तो ना उस दिन और ना ही आज ...।
शिला ये बोल कर शर्म से मुस्कराने लगी ।
कमलनाथ - हा हा सारा दोष तो हमी लोगो का है , आप लोग बड़ा दूध की धुली है , रिझाने का इतना सारा साधन लेके घूमती है और उपर से हमे ही दोषी कह रही है ।
शिला - कौन सा साधन हिहिहिही
कमलनाथ हस कर - यही जो है आपका , मतलब चलते फिरते इतना हिल्ता डूलता है कि किसी की भी नजर अटक जाये
शिला शर्म से लाल होकर - धत्त क्या आप भी चलिये बैठीये हिहिहिही
शिला ने वो बोरि आगे स्कूटी के खाली जगह पर रख दिया और दोनो बैठ कर निकल दिये ।
कमलनाथ इस बार पुरा का पुरा शिला से सट कर बैठा हुआ था उसका लण्ड शिला की गाड़ मे चुब रहा था । उसके हाथ शिला की जान्घो पर थे मगर इस बार कुर्ती के अंदर से ।
शिला समझ रही थी उसके एक चुंबन ने बहुत कुछ बदल दिया था , दोनो काफी ज्यादा खुल कर परिस्थतियो का मजा ले रहे थे ।
वो भी इस पल का मजा ले रही थी और कमलनाथ की उंगलिया अब उसके जान्घो को बड़ी बेफिकरि से सहला रही थी ।
हर हचके के साथ कमलनाथ एक हाथ से शिला का पेट पकड लेता था और उसको ज्यादा सम्भाल रहा था ।
धीरे धीरे वो हाथ भी दुपट्टे के निचे निचे चुचियो के करिब आ चुका था
शिला की सासे उखड़ रही थी और वो बहुत ज्यादा परेशान हो रही थी । उसे स्कूटी चलाने मे बहुत सम्स्या हो रही थी ।
कमलनाथ ने हाथ कभी कभी उसके छातियो को छू स्कते थे ऐसे ही उसने जोर का हार्न मारा और कमलनाथ का हाथ सरक गया ।
उसने सामने देखा तो कुछ दुर से एक साइकिल वाला आ रहा था ।
कमलनाथ समझ गया कि शिला ने उसे चेताया है , और जैसे ही साइकिल वाला निकल गया कमलनाथ के हाथ वापस उपर बढ़ने लगे ।
शिला मुस्कुरा उठी क्योकि वो दोनो अब मेन रोड पर गये थे ।
कमलनाथ ने अपने दोनो हाथ पीछे किये और सभ्यता दिखाते हुए पीछे भी हो गया ।
जल्द ही दोनो चमनपुरा चौराहे पर आ गये थे ।
स्कूटी खड़ी करके शिला ने उतर कर कमलनाथ को देखा और भी मुस्कुरा कर चली गयी ।

वही कमलनाथ उसके हिचकोले खाते चुतडो की वही खड़ा निहारता रहा और फिर बोरी लेके उपर छत पर चला गया ।
इधर सारे लोग आ चुके थे
दोपहर के 11 वज रहे थे और हवन शुरु हो गया ।
इधर कमलनाथ और शिला की आंख मिचौली जारी रही और दोनो मुस्कुरा रहे थे ।
इनसब से अलग निचे के फलोर पर सिर्फ रज्जो अकेली थी और वही किचन मे भी लगी हुई थी ।
वही अनुज की आंखे हर जगह उसी को खोजे जा रही थी ,
अनुज के लिए ये बहुत सुन्दर मौका था कि जब सारे लोग व्यस्त थे और वो अपनी मौसी के साथ थोडी बहुत मस्ती कर पाये ।
अनुज छत पर अपनी मौसी को खोजा और ना मिलने पर वो निचे आया तो देखा कि रज्जो किचन मे अकेली काम कर रही है और निचे कोई भी नही है ।
ऐसे मे अनुज ने लपक कर पीछे से अपनी मौसी को हग कर लिया और अपना लण्ड उसकी बड़ी सी गाड़ के गालो पर चुबोते हुए- आह कबसे खोज रहा हु आपको मौसी मै ।
रज्जो को समझते देर नही लगी कि अनुज उसे आखिर क्यू खोजेगा तो वो मुस्कुरा कर -हमम जान रही हु तू क्यू खोज रहा है मुझे ।
अनुज रज्जो की पीठ से अपना मुह लगा कर हौले से उसके पेट को सहलाते हुए - चलो ना मौसी मेरे रूम मे , प्लीज
रज्जो- क्या तु भी , देख नही रहा इतने मेहमान है और तु ।
अनुज - प्लीज ना मौसी , प्लीज
इससे पहले रज्जो कुछ बोलती तभी सीढियो से किसी के आने ही आहट हुई और वो झट से अनुज से अलग हो गयी ।
वो मुहल्ले की औरते थी जो हवन के लिए आई हुई थी अब प्रासाद लेके वापस जा रही थी
रज्जो ने थोडा सख्त रवैया अपनाया - देख नही रहा लोग आ जा रहे है और मुझे निचे रुक्ना जरुरी है
मौसी की कड़ा रुख देख कर अनुज का चेहरा उतर गया और वो बाहर जाने लगा
रज्जो उसके उदास चेहरे को देख कर मुस्कुराती हुई - अच्छा सुन ।
अनुज वैसे ही मुह लटकाये रज्जो की ओर पीठ किये ही - हमम बोलो !
रज्जो - आज रात
को मत सो जाना , कल की तरह
रज्जो की बात सुनते ही अनुज का मुरझाए गाल खिल उठे और भाग कर रज्जो से लिपट गया ।
रज्जो उसके सर मे हाथ फिराते हुए - मै तो कल रात में भो तेरा इन्तजार कर रही थी ,मगर तु आया ही नही
अनुज - सॉरी मौसी वो मै सो गया था
रज्जो हस कर - ठिक है अब जा और आज सो गया तो मुझे मत कहना ।
राज की जुबानी
पूजा समाप्त हुई और
धीरे धीरे सारे लोग घर के लिए निकल गये थे और बस मुख्य रिश्तेदार ही रुके थे
तभी मौसा जी ने मुझे बताया कि आज शिला बुआ का जन्मदिन है और क्यू ना उसकी तैयारी की जाये ।
मैने मौसा को हामी तो भर दी लेकिन ना जाने क्यू मुझे उनका उत्साहीपना देख कर थोडा शक लग रहा था ।
क्योकि अब तक तो मै समझ ही चुका था मौसा को जो आदमी अपनी बहन चोदने के लिए अपनी बीवी को अपने जीजा के सामने परोस सकता है उसका ऐसे ही शिला बुआ के प्रति इतनी उत्साही भावना दिखाना समान्य बात होने से रही
मै समझ गया कि मौसा की नजर बुआ पर है मगर सोचने वाली बात है कि क्या बुआ का भी कुछ रुझान है या नही ।
खैर मै बहुत खुश था कि मेरी सेक्सी चुदक्क्ड बुआ का जन्मदिवस था ।

मै भाग कर बुआ के पास गया और झुक कर उनकी कमर हाथ डाल कर पूरी ताकत से उठा कर हग करते हुए घूम गया और सबके सामने जोर से चिल्लाते हुए - हैप्पी बर्थडे बुआ
बुआ अचानक हुई हरकत से चौक गयी और चिल्लाती हुई मुझे निचे उतारने को कहने लगी और मै हस्ता हुआ उन्को निचे कर दिया
ऐसे मे उंहोने सबसे पहले तिरछे नय्नो से मौसा को मुसकराते हुए देखा ।
मै समझ गया कि कुछ ना कुछ दोनो के बीच मे खिचड़ी पक रही है जरुर ।
फिर क्या बारी बारी से सबने बुआ को विश किया ।
हर कोई बारी बारी से बुआ को विश करने लगा और इधर पापा ने चाचा को भी फोन करके सुचना दी
चाचा ने फोन बुआ को देने को कहा -
चाचा - हैप्पी बर्थडे दिदी
शिला हस कर - सारे लोग बस विश ही कर रहे हो किसी ने गिफ्ट नही दिया
चाचा - अरे दीदी आज आपको मै स्पेशल गिफ्ट दूँगा मेरी ओर से हिहिहिही
चाचा की बात सुनते ही बुआ के गाल लाल हो गये और मै भी समझ गया कि क्या गिफ्ट हो सकता था ।
इधर फिर पापा ने भी बुआ को रात मे गिफ्ट देने की बात कही जिसका मतलब मै और मम्मी साफ साफ समझ रहे थे ।
फिर क्या घर की बाकी महिलाओ ने मुझे घेर लिया कि मै बाजार से उनका गिफ्ट लेते आऊ
काफी चिल्लम-चिल्ली के बाद ये तय हुआ कि अभी खाना खा कर सारी महिला मंडली बाजार जायेगी और वही से जिसको बुआ को जो गिफ्ट देना है ले लेगी ।
ऐसे मे मौसा जी के चेहरे पर बेचैनी भरे भाव देखकर मै समझ गया कि वो भी कुछ ना कुछ बुआ को देना चाहते थे ,
मै - तब मौसा आप क्या दोगे बुआ को
मौसा - अरे बेटा देखते है बाजर मे क्या मिल सकता है ।
मै - हा हा आप भी चलियेगा ।
फिर क्या दो बजे तक सारे लोग खा पीकर तैयार होकर आ गये ।
जिसमे सोनल निशा , रीना भाभी , मौसी , चाची , मौसा , अनुज और राहुल थे ।
पापा मम्मी घर के कामो के लिए रुके थे वही शिला बुआ ने कल रात भर जागने और सुबह से भागा दौडी के कारण थोडा आराम करने के लिए रुक गयी ।
मै समझ गया कि पापा बुआ को गिफ्ट शायद इसी समय देने वाले थे ।
खैर हम सब निकल गये थे बाजार की ओर ।
जारी रहेगी
लेखक की जुबानी
PHOOLPUR
फूलपूर की पुलिया पर बिचोबीच स्कूटी खड़ी थी , दोनो की निगाहे 6 फीट के संकरे और करिब डेढ़ दो किमी लम्बी उबड़-खाबड़ वाले खड़न्जे पर गयी ।
जो खाली सिवान से होकर गाव तक रहा था ।
आने जाने को एक्का दुक्का लोग ही थे कोई साइकिल से तो कोई पैदल ,
सामने से आ रही साइकिल के पहिये की उछलकूद और उस साइकिल सवार के बिगड़े हुए चेहरे के बेचैन भाव को देख कर दोनो समझ गये थे ये छोटा सफ़र बहुत परेशान करने वाला है
ऐसे मे कमलनाथ ने नैतिकता दिखाते हुए - ऐसा करिये आप चलिये मै पैदल आता हु ।
शिला - अरे देर हो जायेगी , आप बैठीये और ..
कमलनाथ शिला के बात पूरी होने का इन्तेजार कर रहा था
शिला हिचक कर -और मुझे पकड लिजिए , अब क्या ही कर सकते है ।
कमलनाथ दिल ध्क्क से हुआ और अगले ही पल वो प्रफुल्लित हो गया
फिर वो जानबुझ कर शिला से थोड़ी दुरी रखते हुए अपने एक हाथ को शिला के कन्धे पर रखा ।
इस स्पर्श से दोनो ही सिहर गये और शिला की सासे तेज हो गयी , उसने एक गहरी सास ली और एक्सीलरेटर घुघूवाते हुए धीरे धीरे पुलिया से निचे उतरने लगी ।
ढलान पर लुढ़कती स्कूटी का कोण उपर से दो तीन हच्के की उछाल मे ही कमलनाथ शिला के पीछे आ गया और उसने शिला के कन्धे को जोर से पकड लिया ।
शिला भी स्कूटी की हैंडिल ताने हुए धीरे धीरे उतारे जा रही थी मगर कमलनाथ की सख्त हथेली ने उसके कंधो को कचोटना शुरु कर दिया था ।
प्रतिक्रिया स्वरुप शिला दर्द के मारे अपने कन्धे उचकाते हुए सिस्ककर - आउउउच ,
शिला की कराह सुनते ही कमलनाथ ने अपने हाथ की पकड ढीली कर उसके कन्धे सहलाता हुआ - सॉरी सॉरी ,
शिला अपने कूल्हो पर स्पर्श हो रहे कमलनाथ के जांघो को मह्सूस करती हुई मुस्कुरा कर - कोई बात नही , आप निचे पकड लिजिए क्योकि आगे रास्ता ऐसे ही है
कमलनाथ ने अपने हाथ सरका कर शिला के कमर मे हाथ डाल कर जांघो से जस्ट उपर उसके गुदाज कमर को कुरती के उपर से हल्के हाथो से पकड लिया ।
कमलनाथ के स्पर्श से शिला कापने लगी और धीरे धीरे उबड़-खाबड़ रास्ते ने कमलनाथ के सीने को शिला के पीठ से लग्भग चिपका दिया था ।
पजामे मे कमलनाथ का लण्ड शिला के गुदाज गाड़ मे हल्का फुल्का टच हो रहा था , शिला को पहले थोडा खटका अगले ही पल एक जोर का हचका लगा
शिला उछली और कमलनाथ आगे की ओर खिसका , जैसे ही शिला निचे हुए वो डिरेक्ट कमलनाथ के आधे लण्ड पर बैठ गयी ।
लण्ड का कड़ापन अपने गुदाज गाड़ मे पाते ही शिला की सासे अटक गयी और वही कमलनाथ की धडकन भी एक पल को थम सी गयी कि अगर जरा सा भी आगे पीछे हुआ होता तो अब उसके लिन्ग मे फैक्चर हो गया होता , जितनी जोर से शिला के चुतड के लण्ड पर गिरे थे ।
अगले ही जब उसको सब नोर्मल लगने लगा तो उसको अपनी वर्तमान स्थिति का याद आया और ये सोचते ही उसका लण्ड ठुमका, जिसका आभास शिला को हुआ और वो चिहुक कर उसके लण्ड से उतरते हु आगे हो गयी ।
अब शिला सीट के मुहाने पर बड़ी मुश्किल से बैठी हुई थी , पीछे पुरा एक लोग को बैठने की जगह खाली थी ।
इधर कमलनाथ को जैसे ही शिला की स्थिती का ज्ञान हुआ - आप ठिक से बैठी है ना , दिक्कत तो नही
शिला थोडा लजाती हुई - अह नही ये हच्के से मै एकदम आगे आ गयी हुई जरा आप थोड़ा पीछे हो जाईये
कमलनाथ ने पीछे हैंडल पकड कर अपने चुतड खिस्काता हुआ - हा हा आ जाईये
शिला ने उसी अवस्था मे स्कूटी को थोडा सा रोककर अपने कुल्हे खसकाते हुए पीछे जाने लगी और जैसे ही उसको कमलनाथ के मुसल का तनाव अपने चर्बीदार गाड़ मे स्पर्श हुआ वो रुक गयी ।
सफर फिर से शुरु हो गया और कमलनाथ ने अपने ढीले हाथ वापस से शिला के कमर पर रख दिया , धीरे धीरे वो सरक कर उसकी जांघो तक जाने लगे ।
हवा से पहले ही शिला की कुर्ती जांघो से उतरी हुई थी और नरम जान्घो का स्पर्श अपनी उंगलियो पर पाते ही कमलनाथ सतर्क हुआ और थोडी देर तक उसने वैसे ही शिला के जांघो पर हाथ रहने दिया ।
शिला भी सिहर उठी थी , स्कूटी की खड़बड़ाहट से कमलनाथ की उंगलियाँ उसके मुलायम चर्बीदार जांघो पर सरक रही थी ।
उसपे से पीछे गाड़ मे उसका सुपाडा चुभा हुआ था ।
शिला के निप्प्ल तन चुके थे और चुत पनियाना शुरु हो चुकी थी ।
इधर कमलनाथ ने खराब रास्ते का फाय्दा लेते हुए अपनी उंगलिया जांघो के भीतरी भाग पर सरकाने लगा था ।
शिला पूरी तरह समझ रही थी कि ये सब संयोग नही था इसमे कमलनाथ की भरपुर मनसा छिपी हुई है
लेकिन वो कामयाब होने से रही , सामने फुलपुर गाव आ चुका था ।
शिला चहक कर - अरे गाव आ गया
शिला के इतना कहने की देरी थी कि कमलनाथ ने अपने हाथ वापस खिच लिये और मुस्कुरा कर - शुक्र है आ गया , नही तो ये रोड उफ्फ्फ
शिला - अरे भी खतम कहा हुआ है , गाव के बाहर बाहर से दुसरी ओर जाना है , वहा है हमारा बाग ।
कमलनाथ - अच्छा
फिर शिला ने स्कूटी चलाती हुई हार्न बजाती हुई बाहर ही बाहर गाव के दुसरे तरफ आ गई जहा एक तरफ बागिया थी ।
बाग मे आते ही शिला को मिट्टी वाली अच्छी सडक मिल गयी तो वो पेड़ो के बिच से स्कूटी नचाते हुए बाग के आखिरी छोर पर एक सिन्गल कमरे का मकान बना था उसी के सामने रोक दी ।
उस तरफ खेतो का पुरा सिवान था ।
बगल मे एक नदी बह रही थी ,,जिसके ढलानो मे गाव के बच्चे भैस गाय चराने आये हुए थे ।
कमलनाथ और शिला दोनो उतर गये ।
कमलनाथ- तो क्या ये अपना खुद का बाग है ?
शिला - हा और यहा से वो पेड़ तक खेत भी ह्मारे है , ये सब जमुना भैया देखते है ।
ये मकान भी वही बनवाये है
शिला ने अपने घर के बारे मे तारिफ जोडने लगी , मगर कमलनाथ तो उसके जिस्मो को निहारने मे मशरफ था
कमलनाथ गहरी सास लेते हुए - वैसे यहा बहुत सुकून है , वहा शहर मे इतनी भीड़ होती है और यहा कोई देखने वाला नही है हमे हाहहह्हा
शिला कमलनाथ का दोहरे अर्थ को समझ रही थी लेकिन उसने बात को घुमाते हुए - हा मै भी सालो बाद आयी हु , चलिये अब जिस काम के लिए आये है वो कर ले ।
कमलनाथ - हा हा क्यू नही
फिर शिला ने स्कूटी से एक प्लास्टिक बोरा निकाला और उसको लेके एक ओर बढ़ गयी ।
कमलनाथ भी शिला के पीछे पीछे चल दिया उसके हिल्कोरे मारते चुतडो को निहारते हुए ।
शिला ने इधर उधर देख कर सुखी लकड़ीया उठानी शुरु कर दी और कमलनाथ भी उसकी मदद करने लगा ।
दोनो अब परिवार के बारे मे बाते करने लगे ।
कमलनाथ ने शिला के अकेले आने का कारण पुछा तो उसने घर के काम और बेटियो के बाहर पढ़ाई करने की बात बताई ।
शिला- मै भी हल्दी वाले दिन आने वाली थी लेकिन भाभी ने जिद करके बुलाया
कमलनाथ - क्यू ?
शिला - दरअसल आज मेरे जन्मदिन की पार्टी होने वाली थी, ऑफ़िस स्टाफ भी काफी जिद किये थे लेकिन मै रुक ना सकी ।
कमलनाथ शौक होकर- तो क्या सच मे आज आपका बर्थडे है
शिला थोडा शर्मा कर - जी ,
कमलनाथ उसके हाथ से लकड़ी वाला बोरा लेता हुआ- अरे छोडिए आप इसे , आपने बताया भी नही इतना खास दिन है आपका ।
शिला हस कर - इसमे बताने जैसा क्या हैं ..
कमलनाथ कुछ खोज रहा था कि उस की नजर उस मकान के पास लगे गुढ़हल के पेड़ पर गयी जिस्पे गुलाबी वाले गुडहल लगे हुए थे ।
कमलनाथ- रुकिये जरा
फिर वो भागता हुआ पेड़ के पास गया और वहा से एक सुन्दर गुडहल का फुल पत्तियो डंठल सहित लेके भागता हुआ आया और शिला को देते हुए - हैप्पी बर्थडे
शिला शर्म से लाल हो गयी और हस्ते हुए उसके हाथो से गुडहल लेते हुए- जी बहुत बहुत थैंक्यू
कमलनाथ - बस थैंक्यू ? इतना सुखा सुखा
शिला कमलनाथ का इशारा समझ गयी थी और वो मुस्कारा कर लपक उसके गालो को चूमते हुए - थैंक्यू हिहिही बस खुश
कमलनाथ को उम्मीद नही थी कि शिला ऐसा कुछ कर देगी लेकिन वो खुश था और उसका लण्ड बेकाबू हुआ जा रहा था ।
कमलनाथ अपने गीले गालो को सहलाते हुए - मै तो सोचा आप केक वेक खिलाएंगी , लेकिन ये भी ठिक है हिहिहिही
कमलनाथ की बाते सुन्कर शिला शर्म से लाल पड़ गयी और हसने लगी
तभी कमलनाथ का मोबाईल बजा और रन्गीलाल ने फोन पर जल्दी आने को कहा ।
कमलनाथ - अरे आपके भैया का फोन था जल्दी आने को बोला है
शिला - अरे अभी हुआ कहा , दो पेड़ की ही बस लकड़ीया हुई है ना
कमलनाथ - ऐसा करिये आप उधर मकान के पास देखीये मै उस ओर देखता हु , जल्दी हो जायेगा
फिर दोनो अलग हुए और जल्दी जल्दी लकड़ीया बटोरनी शुरु कर दी ।
कमलनाथ ने फुर्ती दिखाई और वो अपने हिस्से की लकड़ी इकठ्ठा कर शिला की ओर घुमा मगर वो मकान के पास नही थी
वो उसी ओर बढता हुआ आगे गया तो देखा कि शिला ने लकड़ीया इकठ्ठा कर स्कूटी पर रखे हुए थी मगर वो खुद कही नजर नहीं आ रही थी
कमलनाथ आगे बढ कर इधर उधर नजर मारा और अचानक से उसको मकान की दिवाल से लग कर शिला अपनी गाड फैलाये हुए मूत रही थी ।

कमलनाथ की आन्खे फैल गयी शिला की ये फैली हुई गाड़ देख कर , उसके गोरे गोरे चुतड मकान की छाव मे भी झलक रहे थे और चुतडो के बिच की फैली हुई दरार जो उसके भूरे सुराख तक जा रही थी ।
कमलनाथ अपना तनमनाया हुआ मुसल पकड कर उसको भींच रहा था
वही शिला उठी और अपने चुतडो पर पैंटी खिच कर चढाते हुए लेगी भी उपर कर की और अपना कुर्ती निचे करते हुए जैसे ही वो घूमी, सामने कमलनाथ अवाक होकर आन्खे फाडे उस्की ओर देखे जा रहा था ।
शिला का कलेजा धक करके रह गया और वो लाज के मारे सर निचे करती हुई आगे आई ।
कमलनाथ हड़बडी मे - सॉरी सॉरी वो आप दिखी नही तो मै आपको खोजता हुआ
शिला लाज से हस कर - छोडिए जाने दीजिये हम दोनो मे ना जाने ये कैसा सन्योग बना हुआ है कि हर बार .... हिहिहिह्ही
कमलनाथ भी शिला की बात पर हसता हुआ - हमम सही कह रही है आप , मगर इस बार संयोग पिछ्ली बार से ज्यादा ही बड़ा था
कमलनाथ की दोअर्थी बात सुनते ही शिला के कान खड़े हो गये और वो मुस्कुराती हुई - क्या !
कमलनाथ अब झेप सा गया कि क्या जवाब दे तभी
शिला हस कर - रज्जो भाभी सही कह रही थी मर्द लोग सच मे ऐसे ही होते है ।
शिला के मुह से रज्जो की बात सुन कर कमलनाथ आतुरता से - क्या ? क्या कहा रज्जो ने ?
शिला हस कर स्कूटी की ओर बढती हुई - जाने दीजिये और चलिये देर हो रही है ।
कमलनाथ - हा लेकिन आखिर ऐसा क्या करते है मर्द लोग भई हिहिहिही हम भी जाने
शिला नजरे झुकाये मुस्कुराते हुए नजरे उठाती हुई कमलनाथ को देख कर - क्यू आपको नही पता ?
कमलनाथ ने ना मे सर हिलाया
शिला हस कर - वही जो अभी आप घुर रहे थे , मर्द लोग मौका पाते ही वही नजरे गड़ा लेते है ।
कमलनाथ हस कर - अरे वो तो ...
शिला - क्या वो तो उम्म्ंम ... झुठ मत बोलिए । इत्ने शरीफ होते आप तो नजरे फेर नही लेते लेकिन आप तो ना उस दिन और ना ही आज ...।
शिला ये बोल कर शर्म से मुस्कराने लगी ।
कमलनाथ - हा हा सारा दोष तो हमी लोगो का है , आप लोग बड़ा दूध की धुली है , रिझाने का इतना सारा साधन लेके घूमती है और उपर से हमे ही दोषी कह रही है ।
शिला - कौन सा साधन हिहिहिही
कमलनाथ हस कर - यही जो है आपका , मतलब चलते फिरते इतना हिल्ता डूलता है कि किसी की भी नजर अटक जाये
शिला शर्म से लाल होकर - धत्त क्या आप भी चलिये बैठीये हिहिहिही
शिला ने वो बोरि आगे स्कूटी के खाली जगह पर रख दिया और दोनो बैठ कर निकल दिये ।
कमलनाथ इस बार पुरा का पुरा शिला से सट कर बैठा हुआ था उसका लण्ड शिला की गाड़ मे चुब रहा था । उसके हाथ शिला की जान्घो पर थे मगर इस बार कुर्ती के अंदर से ।
शिला समझ रही थी उसके एक चुंबन ने बहुत कुछ बदल दिया था , दोनो काफी ज्यादा खुल कर परिस्थतियो का मजा ले रहे थे ।
वो भी इस पल का मजा ले रही थी और कमलनाथ की उंगलिया अब उसके जान्घो को बड़ी बेफिकरि से सहला रही थी ।
हर हचके के साथ कमलनाथ एक हाथ से शिला का पेट पकड लेता था और उसको ज्यादा सम्भाल रहा था ।
धीरे धीरे वो हाथ भी दुपट्टे के निचे निचे चुचियो के करिब आ चुका था
शिला की सासे उखड़ रही थी और वो बहुत ज्यादा परेशान हो रही थी । उसे स्कूटी चलाने मे बहुत सम्स्या हो रही थी ।
कमलनाथ ने हाथ कभी कभी उसके छातियो को छू स्कते थे ऐसे ही उसने जोर का हार्न मारा और कमलनाथ का हाथ सरक गया ।
उसने सामने देखा तो कुछ दुर से एक साइकिल वाला आ रहा था ।
कमलनाथ समझ गया कि शिला ने उसे चेताया है , और जैसे ही साइकिल वाला निकल गया कमलनाथ के हाथ वापस उपर बढ़ने लगे ।
शिला मुस्कुरा उठी क्योकि वो दोनो अब मेन रोड पर गये थे ।
कमलनाथ ने अपने दोनो हाथ पीछे किये और सभ्यता दिखाते हुए पीछे भी हो गया ।
जल्द ही दोनो चमनपुरा चौराहे पर आ गये थे ।
स्कूटी खड़ी करके शिला ने उतर कर कमलनाथ को देखा और भी मुस्कुरा कर चली गयी ।

वही कमलनाथ उसके हिचकोले खाते चुतडो की वही खड़ा निहारता रहा और फिर बोरी लेके उपर छत पर चला गया ।
इधर सारे लोग आ चुके थे
दोपहर के 11 वज रहे थे और हवन शुरु हो गया ।
इधर कमलनाथ और शिला की आंख मिचौली जारी रही और दोनो मुस्कुरा रहे थे ।
इनसब से अलग निचे के फलोर पर सिर्फ रज्जो अकेली थी और वही किचन मे भी लगी हुई थी ।
वही अनुज की आंखे हर जगह उसी को खोजे जा रही थी ,
अनुज के लिए ये बहुत सुन्दर मौका था कि जब सारे लोग व्यस्त थे और वो अपनी मौसी के साथ थोडी बहुत मस्ती कर पाये ।
अनुज छत पर अपनी मौसी को खोजा और ना मिलने पर वो निचे आया तो देखा कि रज्जो किचन मे अकेली काम कर रही है और निचे कोई भी नही है ।
ऐसे मे अनुज ने लपक कर पीछे से अपनी मौसी को हग कर लिया और अपना लण्ड उसकी बड़ी सी गाड़ के गालो पर चुबोते हुए- आह कबसे खोज रहा हु आपको मौसी मै ।
रज्जो को समझते देर नही लगी कि अनुज उसे आखिर क्यू खोजेगा तो वो मुस्कुरा कर -हमम जान रही हु तू क्यू खोज रहा है मुझे ।
अनुज रज्जो की पीठ से अपना मुह लगा कर हौले से उसके पेट को सहलाते हुए - चलो ना मौसी मेरे रूम मे , प्लीज
रज्जो- क्या तु भी , देख नही रहा इतने मेहमान है और तु ।
अनुज - प्लीज ना मौसी , प्लीज
इससे पहले रज्जो कुछ बोलती तभी सीढियो से किसी के आने ही आहट हुई और वो झट से अनुज से अलग हो गयी ।
वो मुहल्ले की औरते थी जो हवन के लिए आई हुई थी अब प्रासाद लेके वापस जा रही थी
रज्जो ने थोडा सख्त रवैया अपनाया - देख नही रहा लोग आ जा रहे है और मुझे निचे रुक्ना जरुरी है
मौसी की कड़ा रुख देख कर अनुज का चेहरा उतर गया और वो बाहर जाने लगा
रज्जो उसके उदास चेहरे को देख कर मुस्कुराती हुई - अच्छा सुन ।
अनुज वैसे ही मुह लटकाये रज्जो की ओर पीठ किये ही - हमम बोलो !
रज्जो - आज रात
को मत सो जाना , कल की तरह
रज्जो की बात सुनते ही अनुज का मुरझाए गाल खिल उठे और भाग कर रज्जो से लिपट गया ।
रज्जो उसके सर मे हाथ फिराते हुए - मै तो कल रात में भो तेरा इन्तजार कर रही थी ,मगर तु आया ही नही
अनुज - सॉरी मौसी वो मै सो गया था
रज्जो हस कर - ठिक है अब जा और आज सो गया तो मुझे मत कहना ।
राज की जुबानी
पूजा समाप्त हुई और
धीरे धीरे सारे लोग घर के लिए निकल गये थे और बस मुख्य रिश्तेदार ही रुके थे
तभी मौसा जी ने मुझे बताया कि आज शिला बुआ का जन्मदिन है और क्यू ना उसकी तैयारी की जाये ।
मैने मौसा को हामी तो भर दी लेकिन ना जाने क्यू मुझे उनका उत्साहीपना देख कर थोडा शक लग रहा था ।
क्योकि अब तक तो मै समझ ही चुका था मौसा को जो आदमी अपनी बहन चोदने के लिए अपनी बीवी को अपने जीजा के सामने परोस सकता है उसका ऐसे ही शिला बुआ के प्रति इतनी उत्साही भावना दिखाना समान्य बात होने से रही
मै समझ गया कि मौसा की नजर बुआ पर है मगर सोचने वाली बात है कि क्या बुआ का भी कुछ रुझान है या नही ।
खैर मै बहुत खुश था कि मेरी सेक्सी चुदक्क्ड बुआ का जन्मदिवस था ।

मै भाग कर बुआ के पास गया और झुक कर उनकी कमर हाथ डाल कर पूरी ताकत से उठा कर हग करते हुए घूम गया और सबके सामने जोर से चिल्लाते हुए - हैप्पी बर्थडे बुआ
बुआ अचानक हुई हरकत से चौक गयी और चिल्लाती हुई मुझे निचे उतारने को कहने लगी और मै हस्ता हुआ उन्को निचे कर दिया
ऐसे मे उंहोने सबसे पहले तिरछे नय्नो से मौसा को मुसकराते हुए देखा ।
मै समझ गया कि कुछ ना कुछ दोनो के बीच मे खिचड़ी पक रही है जरुर ।
फिर क्या बारी बारी से सबने बुआ को विश किया ।
हर कोई बारी बारी से बुआ को विश करने लगा और इधर पापा ने चाचा को भी फोन करके सुचना दी
चाचा ने फोन बुआ को देने को कहा -
चाचा - हैप्पी बर्थडे दिदी
शिला हस कर - सारे लोग बस विश ही कर रहे हो किसी ने गिफ्ट नही दिया
चाचा - अरे दीदी आज आपको मै स्पेशल गिफ्ट दूँगा मेरी ओर से हिहिहिही
चाचा की बात सुनते ही बुआ के गाल लाल हो गये और मै भी समझ गया कि क्या गिफ्ट हो सकता था ।
इधर फिर पापा ने भी बुआ को रात मे गिफ्ट देने की बात कही जिसका मतलब मै और मम्मी साफ साफ समझ रहे थे ।
फिर क्या घर की बाकी महिलाओ ने मुझे घेर लिया कि मै बाजार से उनका गिफ्ट लेते आऊ
काफी चिल्लम-चिल्ली के बाद ये तय हुआ कि अभी खाना खा कर सारी महिला मंडली बाजार जायेगी और वही से जिसको बुआ को जो गिफ्ट देना है ले लेगी ।
ऐसे मे मौसा जी के चेहरे पर बेचैनी भरे भाव देखकर मै समझ गया कि वो भी कुछ ना कुछ बुआ को देना चाहते थे ,
मै - तब मौसा आप क्या दोगे बुआ को
मौसा - अरे बेटा देखते है बाजर मे क्या मिल सकता है ।
मै - हा हा आप भी चलियेगा ।
फिर क्या दो बजे तक सारे लोग खा पीकर तैयार होकर आ गये ।
जिसमे सोनल निशा , रीना भाभी , मौसी , चाची , मौसा , अनुज और राहुल थे ।
पापा मम्मी घर के कामो के लिए रुके थे वही शिला बुआ ने कल रात भर जागने और सुबह से भागा दौडी के कारण थोडा आराम करने के लिए रुक गयी ।
मै समझ गया कि पापा बुआ को गिफ्ट शायद इसी समय देने वाले थे ।
खैर हम सब निकल गये थे बाजार की ओर ।
जारी रहेगी























































