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अध्याय - 96
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"आपने बिल्कुल सही कहा ठाकुर साहब।" किशोरी लाल ने खुशी से मुस्कुराते हुए पिता जी से कहा____"छोटे कुंवर का ऐसा सोचना और इस गांव के लोगों के लिए ऐसा कार्य करना वाकई में बड़ी अच्छी बात है।"
"तो फिर ये तय रहा।" पिता जी ने कहा____"हम पंडित जी से कोई अच्छा सा मुहूर्त निकलवा कर इस कार्य को करवा देते हैं।"
थोड़ी देर और इसी संबंध में हमारी बातें हुईं उसके बाद मैं अपनी मोटर साईकिल ले कर खेतों की तरफ निकल गया। पिता जी काफी खुश और प्रभावित नज़र आए थे मुझे।
अब आगे....
साहूकार गौरी शंकर बाहर बैठक में बैठा हुआ था। उसके साथ रूपचंद्र और फूलवती भी थी। शाम हो चुकी थी। गौरी शंकर और रूपचंद्र खेतों से आने के बाद तथा हाथ पैर धोने के बाद चाय पीने बैठे हुए थे। पिछले कुछ समय से जो थोड़ा बहुत तनाव परिवार में बना हुआ था वो अब काफी हद तक मिट गया था। हालाकि इस बात को सबके लिए भूल पाना अब भी आसान न था कि दादा ठाकुर ने एक झटके में उनके परिवार के मर्दों और बच्चों को जान से मार डाला था। किंतु परिवार के मुखिया और सबसे बुजुर्ग चंद्रमणि के समझाने से अब हर कोई इस बात को समझ चुका था कि पिछली चीज़ों को ले कर बैठे रहने से अथवा किसी तरह का विकार मन में रखने से परिवार की स्थिति अच्छी होने की बजाय ख़राब ही होनी थी।
"क्या फिर तुम्हारी दादा ठाकुर से दुबारा भेंट हुई?" फूलवती ने गौरी शंकर से पूछा____"और क्या तुमने उसे ये बताया कि वो अपने जिस बेटे के साथ हमारी बेटी रूपा का ब्याह तय कर चुका है उसका वो बेटा दूसरे गांव के एक मामूली से किसान की बेटी से प्रेम करता है?"
"क्या फ़र्क पड़ता है इस बात से?" गौरी शंकर ने जैसे लापरवाही से कहा____"दादा ठाकुर ने वैभव के साथ रूपा के ब्याह को तय कर दिया है यही सबसे ज़्यादा अहम बात है। वैभव भले ही किसी किसान की लड़की से प्रेम करता हो लेकिन वो अपने पिता के फ़ैसले के खिलाफ़ नहीं जा सकता। वैसे भी उसने खुद भी तो कई बार कहा है कि वो रूपा से ब्याह करने को तैयार है। फिर आपको किस बात की फ़िक्र है?"
"हैरानी की बात है कि ऐसा तुम कह रहे हो?" फूलवती ने हैरानी ज़ाहिर करते हुए कहा____"जबकि तुम्हें इस बारे में गहराई से सोचना चाहिए।"
"अब सोचने के लिए आख़िर बचा ही क्या है भौजी?" गौरी शंकर ने कहा____"जब दोनों बाप बेटे ब्याह करने को बोल चुके हैं तो फिर आप ऐसा क्यों कह रही हैं?"
"मेरे ऐसा कहने की एक ठोस वजह हैं गौरी शंकर।" फूलवती ने ठोस लहजे से कहा____"और वो ये है कि वैभव के साथ हमारी बेटी रूपा का वैवाहिक जीवन तभी सफल और सुखमय हो सकता है जब उसके होने वाले पति के जीवन में किसी भी दूसरी लड़की अथवा औरत का स्थान न हो। खास कर उसका तो बिल्कुल भी नहीं जिससे वैभव खुद प्रेम करता हो। ज़रा सोचो कि इसके चलते हमारी बेटी के वैवाहिक जीवन में कितना बड़ा असर पड़ेगा। कहने के लिए तो रूपा हवेली की बहू बन जाएगी लेकिन एक पत्नी के रूप में क्या वो वैभव के साथ खुश रहेगी? क्या वैभव उसे सच्चे दिल से अपनी पत्नी मान कर उसे वो सब कुछ देगा जो उसे अपनी पत्नी को देना चाहिए? अरे! जो पति किसी दूसरी लड़की से प्रेम करता हो वो भला अपनी पत्नी को वैसा प्रेम कैसे देगा? नहीं गौरी, सच तो ये है कि ऐसी परिस्थिति में होगा ये कि हमारी बेटी उस हवेली में अपने पति से अपने प्रेम के लिए तरसती रहेगी। इसी लिए कह रही हूं कि तुम्हें इस बारे में दादा ठाकुर से बात कर लेनी चाहिए और उनसे इस बात का वचन लेना चाहिए कि वैभव के जीवन में रूपा के अलावा किसी भी दूसरी लड़की अथवा औरत का स्थान नहीं होगा। इतना ही नहीं बल्कि वैभव सच्चे दिल से रूपा को अपनी पत्नी मानते हुए उसे हर सुख देगा।"
फूलवती की लंबी चौड़ी बातें सुन कर गौरी शंकर कुछ बोल ना सका। उसके चेहरे पर सोचने वाले भाव उभर आए थे। यही हाल रूपचंद्र का भी था।
"बड़ी मां सही कह रही हैं काका।" रूपचंद्र बोल ही पड़ा____"आपको दादा ठाकुर से इस बारे में बात करना ही चाहिए। मैं भी ये बर्दास्त नहीं करूंगा कि ब्याह के बाद मेरी बहन को वैभव के किसी रवैए से दुख पहुंचे। वैसे मुझे तो अभी से ये प्रतीत हो रहा है कि ऐसा ही कुछ होगा क्योंकि जिस इंसान को मेरी बहन के समर्पण भाव और उसके प्रेम में किए गए त्याग का एहसास ही नहीं वो कैसे अपनी पत्नी के रूप में मेरी बहन को खुशियां दे सकेगा?"
"प्रेम बहुत अच्छा भी होता है और बहुत ख़राब भी।" फूलवती ने कहा____"वो अच्छा तब होता है जब वो उचित व्यक्ति से किया जाए और ख़राब तब होता है जब वो अनुचित व्यक्ति से किया जाए। वैभव रूपा से नहीं बल्कि उस मामूली से किसान की लड़की से प्रेम करता है। ज़ाहिर है उसका मन हर वक्त उसी के बारे में सोचेगा और हमारी रूपा की तरफ वो कभी ध्यान ही नहीं देगा। ऐसे में हमारी बेटी उस हवेली में बहू बन जाने के बाद भी दुखी ही रहेगी।"
"शायद आप ठीक कह रही हैं भौजी।" गौरी शंकर ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"ये प्रेम वाकई में बड़ा ख़राब भी होता है अगर अनुचित व्यक्ति से किया जाए तो। वैभव के बारे में हम सब अच्छी तरह से जानते हैं। वो कमबख़्त वो बला है जो अपने बाप से क्या बल्कि ऊपर वाले से भी नहीं डरता। आज भले ही वो सुधर गया है लेकिन प्रेम के मामले में वो किसी की नहीं सुनेगा। यकीनन ऐसे में उसके साथ हमारी बेटी का वैवाहिक जीवन बेहतर नहीं हो सकेगा। आप बिल्कुल ठीक कह रही हैं। मुझे दादा ठाकुर से इस बारे में बात करनी ही होगी।"
"तो फिर तुम्हें कल ही हवेली जा कर दादा ठाकुर से इस बारे में बात कर लेनी चाहिए।" फूलवती ने कहा____"प्रेम जैसे मामले में ज़्यादा देर करना बिल्कुल भी उचित नहीं है। हो सकता है कि उस लड़की से वैभव का ये प्रेम प्रसंग अभी ताज़ा ताज़ा ही हो, इस लिए अगर दादा ठाकुर द्वारा इस प्रेम प्रसंग पर अभी से विराम लगा दिया जाएगा तो शायद इसमें कोई समस्या नहीं होगी। किन्तु अगर ज़्यादा देर हुई तो ये समस्या गंभीर हो जाएगी।"
"सही कहा आपने।" गौरी शंकर ने सिर हिलाते हुए कहा____"इस मामले में देर करना ठीक नहीं होगा। इसके अलावा दादा ठाकुर से मैं अपने भी कुछ मुद्दों पर चर्चा कर लूंगा।"
"अपने कौन से मुद्दों पर चर्चा करोगे तुम?" फूलवती के माथे पर शिकन उभरी।
"हमने जहां पर आरती और रेखा का रिश्ता तय किया था वहां से कुछ दिन पहले एक ख़बर आई थी।" गौरी शंकर ने गंभीरता से कहा____"उन लोगों ने रिश्ता करने से इंकार कर दिया है।"
"क्या????" फूलवती का मुंह भाड़ की तरह खुल गया।
"हां भौजी।" गौरी शंकर एकाएक चिंतित भाव से कह उठा____"असल में दादा ठाकुर के साथ हमारा जो मामला हुआ था उसकी ख़बर दूर दूर तक फैल चुकी थी। उसी के चलते उन्होंने हमारे तय किए गए रिश्ते को करने से इंकार कर दिया है।"
"हाय राम!" फूलवती ने अपने भाड़ की तरह खुल गए मुंह को हथेली से बंद करते हुए कहा____"ये तो सच में बहुत बुरा हुआ लेकिन तुमने ये बात हमें बताई क्यों नहीं थी?"
"मैंने जान बूझ कर ही नहीं बताया था आप लोगों से।" गौरी शंकर ने हताश भाव से कहा____"असल में मैं आप सबको चिंता में नहीं डालना चाहता था।"
"तो अब क्या होगा फिर?" फूलवती ने चिंतित भाव से पूछा।
"मैंने पुरोहित जी को भी भेजा था वहां।" गौरी शंकर ने कहा____"लेकिन पुरोहित जी के समझाने पर भी बात नहीं बनी। उन्होंने साफ कह दिया है कि हमें ऐसे घर में अपने बेटों का रिश्ता करना ही नहीं है जिस घर के लोगों की मानसिकता इतनी निम्न दर्जे की हो।"
"सच ही कहा था उस दिन पिता जी ने।" फूलवती ने अपने ससुर चंद्रमणि की बातों को याद करते हुए कहा____"कि कोई हमारी बेटियों से ब्याह भी नहीं करेगा। हे प्रभु! अब क्या होगा? ये कैसी मुसीबत में डाल दिया है हमें?"
"फ़िक्र मत कीजिए भौजी।" गौरी शंकर ने कहा____"हमारी इस चिंता को अब दादा ठाकुर ही दूर कर सकते हैं। इसी लिए तो मैंने आपसे कहा है कि दादा ठाकुर से अपने भी कुछ मुद्दों पर चर्चा कर लूंगा। मुझे यकीन है कि दादा ठाकुर इस मामले में हमारी सहायता ज़रूर करेंगे।"
"ईश्वर करे ऐसा ही हो।" फूलवती ने जैसे बेबस भाव से कहा____"क्योंकि अगर ऐसा न हुआ तो हमारी बदनामी तो होगी ही किंतु साथ में ये बात भी चारो तरफ फ़ैल जाएगी जिससे हमारी बेटियों से कोई ब्याह ही नहीं करेगा।"
"सच में हमारी स्थिति बहुत दयनीय हो गई है भौजी।" गौरी शंकर ने कहा____"और अपनी इस दयनीय स्थिति के ज़िम्मेदार हम खुद ही हैं। काश! इतना दूर तक हमने पहले ही सोच लिया होता तो आज ना तो हमें ये दिन देखना पड़ता और ना ही हम सबकी ये दशा होती।"
गौरी शंकर की इस बात का फूलवती के पास कोई जवाब नहीं था। रूपचंद्र भी गंभीर चेहरा लिए बैठा रह गया था। कदाचित उसे भी शिद्दत से एहसास हो रहा था कि आज के समय में उसकी और उसके परिवार की हालत सच में कितनी गंभीर है।
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"ये तो सच में बहुत ही बड़ी चिंता की बात हो गई है वैभव।" रागिनी भाभी ने मेरी सारी बातें सुनने के बाद गंभीर भाव से कहा।
मैं भाभी के कमरे में था और उन्हें वो सब बातें बता चुका था जो आज सरोज से उसकी बेटी के संबंध में हुईं थी। मैंने भाभी से कुछ भी नहीं छुपाया था। ये सब बातें भाभी को बताने का मेरा यही मकसद था कि ऐसी परिस्थिति में वो या तो मेरा मार्गदर्शन करें या फिर मेरी मदद करें। मैं जानता था कि मां और पिता जी भाभी को बहुत मानते थे और मौजूदा समय में वो जिस स्थिति में थीं उसकी वजह से वो लोग उनकी कोई भी बात टाल नहीं सकते थे। यही सब सोच कर मैंने भाभी को सब कुछ बता दिया था जिसे सुनने के बाद वो एकदम से गंभीर हो गईं थी।
"मुझे समझ नहीं आ रहा भाभी कि अपनी इस समस्या को कैसे दूर करूं?" मैंने चिंतित भाव से कहा____"मैं अब ऐसा कोई भी काम नहीं करना चाहता जिससे आपको अथवा किसी को भी अच्छा न लगे। मैं चाहता हूं कि हवेली का हर सदस्य इस बात को समझे कि अनुराधा जैसी लड़की का मेरे जीवन में क्या महत्व है।"
"तुम अभी इस बारे में ये सब सोच कर खुद को हलकान मत करो वैभव।" भाभी ने मेरे कंधे को हल्के से दबा कर जैसे मुझे धीरज देते हुए कहा____"अभी इस सबके लिए बहुत समय बाकी है। मुझे पूरा यकीन है कि जब पिता जी को इस बारे में सब कुछ पता चलेगा तो वो तुम्हारी बातों को ज़रूर समझेंगे और अनुराधा के साथ तुम्हारे ब्याह की मंजूरी भी देंगे।"
"क्या सच में आपको लगता है कि वो इस बात को समझेंगे?" मैंने जैसे बेयकीनी से कहा____"नहीं भाभी, ये इतना आसान नहीं है। उन्होंने रूपा के साथ मेरा रिश्ता तय कर दिया है और गौरी शंकर को वचन भी दे चुके हैं कि अगले साल वो बरात ले कर उसके घर जाएंगे। क्या इसके बाद भी वो मेरे और अनुराधा के रिश्ते को स्वीकृति देंगे? क्या वो इस बात के लिए राज़ी होंगे कि मेरे जीवन में रूपा के अलावा भी अनुराधा के रूप में मेरी कोई दूसरी पत्नी भी हो?"
"बिल्कुल राज़ी होंगे वैभव।" भाभी ने मजबूती से कहा____"और उन्हें राज़ी होना ही पड़ेगा। उन्हें समझना होगा कि तुम अगर सुधर गए हो तो इसमें सिर्फ और सिर्फ अनुराधा जैसी लड़की का ही हाथ है। मैं खुद तुम्हारी पैरवी करूंगी।"
"ओह! भाभी क्या सच कह रही हैं आप?" मैं एकदम से खुश हो कर बोल पड़ा____"क्या सच में आप इस मामले में मेरी मदद करेंगी?"
"बिल्कुल करूंगी।" भाभी ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"अपने प्यारे से देवर के लिए मुझसे जो हो सकेगा करूंगी। ख़ास कर उस वैभव के लिए जो एक अच्छा इंसान बनने की जी तोड़ कोशिश कर रहा है। मैं ये बिल्कुल भी नहीं चाहूंगी कि सिर्फ इस वजह के चलते तुम अपना रास्ता भटक जाओ और फिर से पहले जैसे गंदे इंसान बन जाओ।"
"नहीं भाभी।" मैंने संजीदा हो कर कहा____"अब मैं वापस पहले जैसा नहीं बनूंगा। अनुराधा के ना मिलने से सिर्फ इतना ही होगा कि उसके बिना खुश नहीं रह पाऊंगा, बाकी रास्ता नहीं भटकूंगा। क्योंकि मैंने आपको अच्छा इंसान बनने का वचन दिया है। आपने मुझसे जो उम्मीद लगा रखी है उसे टूटने नहीं दूंगा, फिर भले ही इसके लिए मुझे चाहे कितने ही अजाब सहने पड़ें।"
"अजाब सहें तुम्हारे दुश्मन।" भाभी ने झट से मेरे दाएं गाल को सहलाते हुए स्नेह से कहा___"मैं अपने देवर को कोई अजाब नहीं सहने दूंगी। अगर वाकई में अनुराधा के मिलने से ही तुम्हें सच्ची खुशी मिलेगी तो वो तुम्हें ज़रूर मिलेगी। अगर अच्छा इंसान बनने का तुमने मुझे वचन दे रखा है तो आज मैं भी तुम्हें ये वचन देती हूं कि अनुराधा के साथ तुम्हारा ब्याह ज़रूर करवाऊंगी मैं।"
"ओह! भाभी। आपने मेरे लिए मुझको इतना बड़ा वचन दे दिया?" मैंने गदगद भाव से उनकी तरफ देखा____"आपके चरण कमल कहां हैं। मैं उन चरणों में अपना सिर रख देना चाहता हूं।"
"अरे! इसकी कोई ज़रूरत नहीं है।" भाभी ने जब देखा कि मैं सच में झुक कर उनके चरणों को छूने वाला हूं तो उन्होंने झट से पीछे हटते हुए किंतु मुस्कुराते हुए कहा____"मुझे अच्छी तरह पता है कि तुम मेरा कितना अधिक सम्मान करते हो और सच कहूं तो इस बात से मुझे हमेशा गर्व महसूस होता है। ख़ैर अब ये तो बताओ कि अपनी होने वाली दोनों बीवियों से मुझे कब मिलवाओगे?"
"अनुराधा से तो मैं आपको किसी भी वक्त मिलवा सकता हूं।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"लेकिन दूसरी वाली से मिलवाना शायद मेरे लिए मुश्किल है।"
"अरे! ऐसा क्यों भला?" भाभी ने कहा___"और ये तुम दूसरी वाली क्या बोल रहे हो? जैसे एक का नाम लिया है वैसे ही उसका भी नाम लो। माना कि अनुराधा से तुम प्रेम करते हो जिसके चलते तुम उसी में अपनी खुशी समझते हो लेकिन ये मत भूलो कि रूपा का भी तुम्हारे जीवन में उतना ही महत्व है जितना कि अनुराधा का। आख़िर वो तुमसे प्रेम करती है और इतना ही नहीं अपने प्रेम को साबित करने के लिए उसने बहुत कुछ किया है तुम्हारे लिए। तुम उसके साथ कोई भेदभाव कैसे कर सकते हो?"
"ग़लती हो गई भाभी।" मैंने फ़ौरन ही अपने दोनों कान पकड़ते हुए कहा____"अब से कभी उसके साथ कोई भेदभाव नहीं करूंगा।"
"अच्छा इंसान बनने की राह पर हो तो सबके लिए अच्छा सोचना भी पड़ेगा।" भाभी ने जैसे उपदेश देते हुए कहा____"तभी समझा जाएगा कि तुम सच में अच्छे इंसान हो।"
"समझ गया भाभी, समझ गया।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"अच्छा अब बताइए कब चल रही हैं मेरे साथ अपनी देवरानी से मिलने?"
"हांय...तुम तो एक ही पल में बेशर्म बन गए।" भाभी ने आंखें फाड़ कर मेरी तरफ देखा____"अरे! कुछ तो शर्म करो। अपनी इस भाभी का कुछ तो लिहाज करो।"
"ठीक है ग़लती हो गई।" मैंने कहा____"अब से ऐसा कुछ नहीं कहूंगा आपके सामने और हां अब आप कहिएगा भी नहीं कि मैं उनमें से किसी से आपको मिलवाऊं।"
कहने के साथ ही मैंने इस तरह मुंह फेर लिया जैसे कोई छोटा बच्चा रूठ जाने पर फेर लेता है। ये देख भाभी खिलखिला कर हंस पड़ीं। उनकी हंसी मेरे कानों में मंदिर की घंटियां बजने जैसी प्रतीत हुईं तो मुझे ये सोच कर अच्छा लगा कि चलो किसी बहाने भाभी को हंसी तो आई। मैं तो चाहता ही यही था कि वो अपना दर्द भूल कर हंसती मुस्कुराती रहें।
"अगर तुम ये सोचते हो कि मैं तुम्हें मनाऊंगी तो भूल जाओ।" भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा____"वैसे भी मेरे मनाने से तुम्हें वो खुशी नहीं मिलेगी जो एक प्रेमिका के मनाने पर मिलती है। इस लिए अगर खुद को मनवाना ही है तो अपनी अनुराधा के पास ही जाओ।"
"ये तो ग़लत बात है भाभी।" मैंने फ़ौरन ही उनकी तरफ पलट कर कहा____"उन दोनों से पहले मेरे जीवन में आपकी प्राथमिकता ज़्यादा है। मैं आपका देवर हूं और आपसे रूठने मनाने का पूरा हक़ है मेरा।"
"अच्छा जी।" भाभी ने हल्के से हंस कर कहा____"अगर ऐसी बात है तो फिर उन दोनों बेचारियों का क्या होगा? वो दोनों तो तुम्हें मनाने की आस लिए ही बैठी रह जाएंगी। क्या तुम उनके साथ इस तरह का अत्याचार करोगे?"
"उनको मुझसे जो चाहिए होगा वो उन्हें मिल जाएगा।" मैंने लापरवाही से कहा____"फिर भला कैसे उनके साथ अत्याचार होगा?"
"तुम ना अब पिटोगे मुझसे।" भाभी ने आश्चर्य से आंखें फैलाते हुए मुझे थप्पड़ दिखाया____"चलो जाओ यहां से बेशर्म। मुझे आराम करना है अब।"
भाभी का अचानक से इस तरह का बर्ताव देख मैं चौंका। मुझे समझ न आया कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा मुझसे? मैंने सोचा कि आख़िर मैंने ऐसा क्या कह दिया है उनसे? अगले कुछ ही पलों में मैं बुरी तरह चौंक पड़ा। अंजाने में मैंने उनसे ऐसी बात कह दी थी जिसमें एक अलग ही अर्थ छिपा हुआ था। मुझे अपने आप पर ये सोच कर गुस्सा आया कि मैं ऐसी बात कैसे बोल गया। मुझे बहुत शर्म आई। मैंने नज़र उठा कर भाभी की तरफ देखा तो उन्हें अपने पलंग पर बैठते पाया। उनसे कुछ कहने की हिम्मत न हुई मुझमें इस लिए चुपचाप उनके कमरे से बाहर निकल आया।
अपने कमरे में आ कर मैं पलंग पर लेट गया और भाभी से कही बात के बारे में सोचने लगा। क्या सोचा होगा भाभी ने मेरे बारे में कितना निर्लज्ज लड़का हूं मैं। मेरी नज़र में भाभी का मुकाम बहुत ऊंचा था और मैं उनका बेहद सम्मान करता था। इस तरह की द्विअर्थी बातें मैंने उनसे कभी नहीं की थीं। जाने क्यों मेरा मन एकाएक आत्मग्लानि से भर गया।
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"आपने बिल्कुल सही कहा ठाकुर साहब।" किशोरी लाल ने खुशी से मुस्कुराते हुए पिता जी से कहा____"छोटे कुंवर का ऐसा सोचना और इस गांव के लोगों के लिए ऐसा कार्य करना वाकई में बड़ी अच्छी बात है।"
"तो फिर ये तय रहा।" पिता जी ने कहा____"हम पंडित जी से कोई अच्छा सा मुहूर्त निकलवा कर इस कार्य को करवा देते हैं।"
थोड़ी देर और इसी संबंध में हमारी बातें हुईं उसके बाद मैं अपनी मोटर साईकिल ले कर खेतों की तरफ निकल गया। पिता जी काफी खुश और प्रभावित नज़र आए थे मुझे।
अब आगे....
साहूकार गौरी शंकर बाहर बैठक में बैठा हुआ था। उसके साथ रूपचंद्र और फूलवती भी थी। शाम हो चुकी थी। गौरी शंकर और रूपचंद्र खेतों से आने के बाद तथा हाथ पैर धोने के बाद चाय पीने बैठे हुए थे। पिछले कुछ समय से जो थोड़ा बहुत तनाव परिवार में बना हुआ था वो अब काफी हद तक मिट गया था। हालाकि इस बात को सबके लिए भूल पाना अब भी आसान न था कि दादा ठाकुर ने एक झटके में उनके परिवार के मर्दों और बच्चों को जान से मार डाला था। किंतु परिवार के मुखिया और सबसे बुजुर्ग चंद्रमणि के समझाने से अब हर कोई इस बात को समझ चुका था कि पिछली चीज़ों को ले कर बैठे रहने से अथवा किसी तरह का विकार मन में रखने से परिवार की स्थिति अच्छी होने की बजाय ख़राब ही होनी थी।
"क्या फिर तुम्हारी दादा ठाकुर से दुबारा भेंट हुई?" फूलवती ने गौरी शंकर से पूछा____"और क्या तुमने उसे ये बताया कि वो अपने जिस बेटे के साथ हमारी बेटी रूपा का ब्याह तय कर चुका है उसका वो बेटा दूसरे गांव के एक मामूली से किसान की बेटी से प्रेम करता है?"
"क्या फ़र्क पड़ता है इस बात से?" गौरी शंकर ने जैसे लापरवाही से कहा____"दादा ठाकुर ने वैभव के साथ रूपा के ब्याह को तय कर दिया है यही सबसे ज़्यादा अहम बात है। वैभव भले ही किसी किसान की लड़की से प्रेम करता हो लेकिन वो अपने पिता के फ़ैसले के खिलाफ़ नहीं जा सकता। वैसे भी उसने खुद भी तो कई बार कहा है कि वो रूपा से ब्याह करने को तैयार है। फिर आपको किस बात की फ़िक्र है?"
"हैरानी की बात है कि ऐसा तुम कह रहे हो?" फूलवती ने हैरानी ज़ाहिर करते हुए कहा____"जबकि तुम्हें इस बारे में गहराई से सोचना चाहिए।"
"अब सोचने के लिए आख़िर बचा ही क्या है भौजी?" गौरी शंकर ने कहा____"जब दोनों बाप बेटे ब्याह करने को बोल चुके हैं तो फिर आप ऐसा क्यों कह रही हैं?"
"मेरे ऐसा कहने की एक ठोस वजह हैं गौरी शंकर।" फूलवती ने ठोस लहजे से कहा____"और वो ये है कि वैभव के साथ हमारी बेटी रूपा का वैवाहिक जीवन तभी सफल और सुखमय हो सकता है जब उसके होने वाले पति के जीवन में किसी भी दूसरी लड़की अथवा औरत का स्थान न हो। खास कर उसका तो बिल्कुल भी नहीं जिससे वैभव खुद प्रेम करता हो। ज़रा सोचो कि इसके चलते हमारी बेटी के वैवाहिक जीवन में कितना बड़ा असर पड़ेगा। कहने के लिए तो रूपा हवेली की बहू बन जाएगी लेकिन एक पत्नी के रूप में क्या वो वैभव के साथ खुश रहेगी? क्या वैभव उसे सच्चे दिल से अपनी पत्नी मान कर उसे वो सब कुछ देगा जो उसे अपनी पत्नी को देना चाहिए? अरे! जो पति किसी दूसरी लड़की से प्रेम करता हो वो भला अपनी पत्नी को वैसा प्रेम कैसे देगा? नहीं गौरी, सच तो ये है कि ऐसी परिस्थिति में होगा ये कि हमारी बेटी उस हवेली में अपने पति से अपने प्रेम के लिए तरसती रहेगी। इसी लिए कह रही हूं कि तुम्हें इस बारे में दादा ठाकुर से बात कर लेनी चाहिए और उनसे इस बात का वचन लेना चाहिए कि वैभव के जीवन में रूपा के अलावा किसी भी दूसरी लड़की अथवा औरत का स्थान नहीं होगा। इतना ही नहीं बल्कि वैभव सच्चे दिल से रूपा को अपनी पत्नी मानते हुए उसे हर सुख देगा।"
फूलवती की लंबी चौड़ी बातें सुन कर गौरी शंकर कुछ बोल ना सका। उसके चेहरे पर सोचने वाले भाव उभर आए थे। यही हाल रूपचंद्र का भी था।
"बड़ी मां सही कह रही हैं काका।" रूपचंद्र बोल ही पड़ा____"आपको दादा ठाकुर से इस बारे में बात करना ही चाहिए। मैं भी ये बर्दास्त नहीं करूंगा कि ब्याह के बाद मेरी बहन को वैभव के किसी रवैए से दुख पहुंचे। वैसे मुझे तो अभी से ये प्रतीत हो रहा है कि ऐसा ही कुछ होगा क्योंकि जिस इंसान को मेरी बहन के समर्पण भाव और उसके प्रेम में किए गए त्याग का एहसास ही नहीं वो कैसे अपनी पत्नी के रूप में मेरी बहन को खुशियां दे सकेगा?"
"प्रेम बहुत अच्छा भी होता है और बहुत ख़राब भी।" फूलवती ने कहा____"वो अच्छा तब होता है जब वो उचित व्यक्ति से किया जाए और ख़राब तब होता है जब वो अनुचित व्यक्ति से किया जाए। वैभव रूपा से नहीं बल्कि उस मामूली से किसान की लड़की से प्रेम करता है। ज़ाहिर है उसका मन हर वक्त उसी के बारे में सोचेगा और हमारी रूपा की तरफ वो कभी ध्यान ही नहीं देगा। ऐसे में हमारी बेटी उस हवेली में बहू बन जाने के बाद भी दुखी ही रहेगी।"
"शायद आप ठीक कह रही हैं भौजी।" गौरी शंकर ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"ये प्रेम वाकई में बड़ा ख़राब भी होता है अगर अनुचित व्यक्ति से किया जाए तो। वैभव के बारे में हम सब अच्छी तरह से जानते हैं। वो कमबख़्त वो बला है जो अपने बाप से क्या बल्कि ऊपर वाले से भी नहीं डरता। आज भले ही वो सुधर गया है लेकिन प्रेम के मामले में वो किसी की नहीं सुनेगा। यकीनन ऐसे में उसके साथ हमारी बेटी का वैवाहिक जीवन बेहतर नहीं हो सकेगा। आप बिल्कुल ठीक कह रही हैं। मुझे दादा ठाकुर से इस बारे में बात करनी ही होगी।"
"तो फिर तुम्हें कल ही हवेली जा कर दादा ठाकुर से इस बारे में बात कर लेनी चाहिए।" फूलवती ने कहा____"प्रेम जैसे मामले में ज़्यादा देर करना बिल्कुल भी उचित नहीं है। हो सकता है कि उस लड़की से वैभव का ये प्रेम प्रसंग अभी ताज़ा ताज़ा ही हो, इस लिए अगर दादा ठाकुर द्वारा इस प्रेम प्रसंग पर अभी से विराम लगा दिया जाएगा तो शायद इसमें कोई समस्या नहीं होगी। किन्तु अगर ज़्यादा देर हुई तो ये समस्या गंभीर हो जाएगी।"
"सही कहा आपने।" गौरी शंकर ने सिर हिलाते हुए कहा____"इस मामले में देर करना ठीक नहीं होगा। इसके अलावा दादा ठाकुर से मैं अपने भी कुछ मुद्दों पर चर्चा कर लूंगा।"
"अपने कौन से मुद्दों पर चर्चा करोगे तुम?" फूलवती के माथे पर शिकन उभरी।
"हमने जहां पर आरती और रेखा का रिश्ता तय किया था वहां से कुछ दिन पहले एक ख़बर आई थी।" गौरी शंकर ने गंभीरता से कहा____"उन लोगों ने रिश्ता करने से इंकार कर दिया है।"
"क्या????" फूलवती का मुंह भाड़ की तरह खुल गया।
"हां भौजी।" गौरी शंकर एकाएक चिंतित भाव से कह उठा____"असल में दादा ठाकुर के साथ हमारा जो मामला हुआ था उसकी ख़बर दूर दूर तक फैल चुकी थी। उसी के चलते उन्होंने हमारे तय किए गए रिश्ते को करने से इंकार कर दिया है।"
"हाय राम!" फूलवती ने अपने भाड़ की तरह खुल गए मुंह को हथेली से बंद करते हुए कहा____"ये तो सच में बहुत बुरा हुआ लेकिन तुमने ये बात हमें बताई क्यों नहीं थी?"
"मैंने जान बूझ कर ही नहीं बताया था आप लोगों से।" गौरी शंकर ने हताश भाव से कहा____"असल में मैं आप सबको चिंता में नहीं डालना चाहता था।"
"तो अब क्या होगा फिर?" फूलवती ने चिंतित भाव से पूछा।
"मैंने पुरोहित जी को भी भेजा था वहां।" गौरी शंकर ने कहा____"लेकिन पुरोहित जी के समझाने पर भी बात नहीं बनी। उन्होंने साफ कह दिया है कि हमें ऐसे घर में अपने बेटों का रिश्ता करना ही नहीं है जिस घर के लोगों की मानसिकता इतनी निम्न दर्जे की हो।"
"सच ही कहा था उस दिन पिता जी ने।" फूलवती ने अपने ससुर चंद्रमणि की बातों को याद करते हुए कहा____"कि कोई हमारी बेटियों से ब्याह भी नहीं करेगा। हे प्रभु! अब क्या होगा? ये कैसी मुसीबत में डाल दिया है हमें?"
"फ़िक्र मत कीजिए भौजी।" गौरी शंकर ने कहा____"हमारी इस चिंता को अब दादा ठाकुर ही दूर कर सकते हैं। इसी लिए तो मैंने आपसे कहा है कि दादा ठाकुर से अपने भी कुछ मुद्दों पर चर्चा कर लूंगा। मुझे यकीन है कि दादा ठाकुर इस मामले में हमारी सहायता ज़रूर करेंगे।"
"ईश्वर करे ऐसा ही हो।" फूलवती ने जैसे बेबस भाव से कहा____"क्योंकि अगर ऐसा न हुआ तो हमारी बदनामी तो होगी ही किंतु साथ में ये बात भी चारो तरफ फ़ैल जाएगी जिससे हमारी बेटियों से कोई ब्याह ही नहीं करेगा।"
"सच में हमारी स्थिति बहुत दयनीय हो गई है भौजी।" गौरी शंकर ने कहा____"और अपनी इस दयनीय स्थिति के ज़िम्मेदार हम खुद ही हैं। काश! इतना दूर तक हमने पहले ही सोच लिया होता तो आज ना तो हमें ये दिन देखना पड़ता और ना ही हम सबकी ये दशा होती।"
गौरी शंकर की इस बात का फूलवती के पास कोई जवाब नहीं था। रूपचंद्र भी गंभीर चेहरा लिए बैठा रह गया था। कदाचित उसे भी शिद्दत से एहसास हो रहा था कि आज के समय में उसकी और उसके परिवार की हालत सच में कितनी गंभीर है।
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"ये तो सच में बहुत ही बड़ी चिंता की बात हो गई है वैभव।" रागिनी भाभी ने मेरी सारी बातें सुनने के बाद गंभीर भाव से कहा।
मैं भाभी के कमरे में था और उन्हें वो सब बातें बता चुका था जो आज सरोज से उसकी बेटी के संबंध में हुईं थी। मैंने भाभी से कुछ भी नहीं छुपाया था। ये सब बातें भाभी को बताने का मेरा यही मकसद था कि ऐसी परिस्थिति में वो या तो मेरा मार्गदर्शन करें या फिर मेरी मदद करें। मैं जानता था कि मां और पिता जी भाभी को बहुत मानते थे और मौजूदा समय में वो जिस स्थिति में थीं उसकी वजह से वो लोग उनकी कोई भी बात टाल नहीं सकते थे। यही सब सोच कर मैंने भाभी को सब कुछ बता दिया था जिसे सुनने के बाद वो एकदम से गंभीर हो गईं थी।
"मुझे समझ नहीं आ रहा भाभी कि अपनी इस समस्या को कैसे दूर करूं?" मैंने चिंतित भाव से कहा____"मैं अब ऐसा कोई भी काम नहीं करना चाहता जिससे आपको अथवा किसी को भी अच्छा न लगे। मैं चाहता हूं कि हवेली का हर सदस्य इस बात को समझे कि अनुराधा जैसी लड़की का मेरे जीवन में क्या महत्व है।"
"तुम अभी इस बारे में ये सब सोच कर खुद को हलकान मत करो वैभव।" भाभी ने मेरे कंधे को हल्के से दबा कर जैसे मुझे धीरज देते हुए कहा____"अभी इस सबके लिए बहुत समय बाकी है। मुझे पूरा यकीन है कि जब पिता जी को इस बारे में सब कुछ पता चलेगा तो वो तुम्हारी बातों को ज़रूर समझेंगे और अनुराधा के साथ तुम्हारे ब्याह की मंजूरी भी देंगे।"
"क्या सच में आपको लगता है कि वो इस बात को समझेंगे?" मैंने जैसे बेयकीनी से कहा____"नहीं भाभी, ये इतना आसान नहीं है। उन्होंने रूपा के साथ मेरा रिश्ता तय कर दिया है और गौरी शंकर को वचन भी दे चुके हैं कि अगले साल वो बरात ले कर उसके घर जाएंगे। क्या इसके बाद भी वो मेरे और अनुराधा के रिश्ते को स्वीकृति देंगे? क्या वो इस बात के लिए राज़ी होंगे कि मेरे जीवन में रूपा के अलावा भी अनुराधा के रूप में मेरी कोई दूसरी पत्नी भी हो?"
"बिल्कुल राज़ी होंगे वैभव।" भाभी ने मजबूती से कहा____"और उन्हें राज़ी होना ही पड़ेगा। उन्हें समझना होगा कि तुम अगर सुधर गए हो तो इसमें सिर्फ और सिर्फ अनुराधा जैसी लड़की का ही हाथ है। मैं खुद तुम्हारी पैरवी करूंगी।"
"ओह! भाभी क्या सच कह रही हैं आप?" मैं एकदम से खुश हो कर बोल पड़ा____"क्या सच में आप इस मामले में मेरी मदद करेंगी?"
"बिल्कुल करूंगी।" भाभी ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"अपने प्यारे से देवर के लिए मुझसे जो हो सकेगा करूंगी। ख़ास कर उस वैभव के लिए जो एक अच्छा इंसान बनने की जी तोड़ कोशिश कर रहा है। मैं ये बिल्कुल भी नहीं चाहूंगी कि सिर्फ इस वजह के चलते तुम अपना रास्ता भटक जाओ और फिर से पहले जैसे गंदे इंसान बन जाओ।"
"नहीं भाभी।" मैंने संजीदा हो कर कहा____"अब मैं वापस पहले जैसा नहीं बनूंगा। अनुराधा के ना मिलने से सिर्फ इतना ही होगा कि उसके बिना खुश नहीं रह पाऊंगा, बाकी रास्ता नहीं भटकूंगा। क्योंकि मैंने आपको अच्छा इंसान बनने का वचन दिया है। आपने मुझसे जो उम्मीद लगा रखी है उसे टूटने नहीं दूंगा, फिर भले ही इसके लिए मुझे चाहे कितने ही अजाब सहने पड़ें।"
"अजाब सहें तुम्हारे दुश्मन।" भाभी ने झट से मेरे दाएं गाल को सहलाते हुए स्नेह से कहा___"मैं अपने देवर को कोई अजाब नहीं सहने दूंगी। अगर वाकई में अनुराधा के मिलने से ही तुम्हें सच्ची खुशी मिलेगी तो वो तुम्हें ज़रूर मिलेगी। अगर अच्छा इंसान बनने का तुमने मुझे वचन दे रखा है तो आज मैं भी तुम्हें ये वचन देती हूं कि अनुराधा के साथ तुम्हारा ब्याह ज़रूर करवाऊंगी मैं।"
"ओह! भाभी। आपने मेरे लिए मुझको इतना बड़ा वचन दे दिया?" मैंने गदगद भाव से उनकी तरफ देखा____"आपके चरण कमल कहां हैं। मैं उन चरणों में अपना सिर रख देना चाहता हूं।"
"अरे! इसकी कोई ज़रूरत नहीं है।" भाभी ने जब देखा कि मैं सच में झुक कर उनके चरणों को छूने वाला हूं तो उन्होंने झट से पीछे हटते हुए किंतु मुस्कुराते हुए कहा____"मुझे अच्छी तरह पता है कि तुम मेरा कितना अधिक सम्मान करते हो और सच कहूं तो इस बात से मुझे हमेशा गर्व महसूस होता है। ख़ैर अब ये तो बताओ कि अपनी होने वाली दोनों बीवियों से मुझे कब मिलवाओगे?"
"अनुराधा से तो मैं आपको किसी भी वक्त मिलवा सकता हूं।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"लेकिन दूसरी वाली से मिलवाना शायद मेरे लिए मुश्किल है।"
"अरे! ऐसा क्यों भला?" भाभी ने कहा___"और ये तुम दूसरी वाली क्या बोल रहे हो? जैसे एक का नाम लिया है वैसे ही उसका भी नाम लो। माना कि अनुराधा से तुम प्रेम करते हो जिसके चलते तुम उसी में अपनी खुशी समझते हो लेकिन ये मत भूलो कि रूपा का भी तुम्हारे जीवन में उतना ही महत्व है जितना कि अनुराधा का। आख़िर वो तुमसे प्रेम करती है और इतना ही नहीं अपने प्रेम को साबित करने के लिए उसने बहुत कुछ किया है तुम्हारे लिए। तुम उसके साथ कोई भेदभाव कैसे कर सकते हो?"
"ग़लती हो गई भाभी।" मैंने फ़ौरन ही अपने दोनों कान पकड़ते हुए कहा____"अब से कभी उसके साथ कोई भेदभाव नहीं करूंगा।"
"अच्छा इंसान बनने की राह पर हो तो सबके लिए अच्छा सोचना भी पड़ेगा।" भाभी ने जैसे उपदेश देते हुए कहा____"तभी समझा जाएगा कि तुम सच में अच्छे इंसान हो।"
"समझ गया भाभी, समझ गया।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"अच्छा अब बताइए कब चल रही हैं मेरे साथ अपनी देवरानी से मिलने?"
"हांय...तुम तो एक ही पल में बेशर्म बन गए।" भाभी ने आंखें फाड़ कर मेरी तरफ देखा____"अरे! कुछ तो शर्म करो। अपनी इस भाभी का कुछ तो लिहाज करो।"
"ठीक है ग़लती हो गई।" मैंने कहा____"अब से ऐसा कुछ नहीं कहूंगा आपके सामने और हां अब आप कहिएगा भी नहीं कि मैं उनमें से किसी से आपको मिलवाऊं।"
कहने के साथ ही मैंने इस तरह मुंह फेर लिया जैसे कोई छोटा बच्चा रूठ जाने पर फेर लेता है। ये देख भाभी खिलखिला कर हंस पड़ीं। उनकी हंसी मेरे कानों में मंदिर की घंटियां बजने जैसी प्रतीत हुईं तो मुझे ये सोच कर अच्छा लगा कि चलो किसी बहाने भाभी को हंसी तो आई। मैं तो चाहता ही यही था कि वो अपना दर्द भूल कर हंसती मुस्कुराती रहें।
"अगर तुम ये सोचते हो कि मैं तुम्हें मनाऊंगी तो भूल जाओ।" भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा____"वैसे भी मेरे मनाने से तुम्हें वो खुशी नहीं मिलेगी जो एक प्रेमिका के मनाने पर मिलती है। इस लिए अगर खुद को मनवाना ही है तो अपनी अनुराधा के पास ही जाओ।"
"ये तो ग़लत बात है भाभी।" मैंने फ़ौरन ही उनकी तरफ पलट कर कहा____"उन दोनों से पहले मेरे जीवन में आपकी प्राथमिकता ज़्यादा है। मैं आपका देवर हूं और आपसे रूठने मनाने का पूरा हक़ है मेरा।"
"अच्छा जी।" भाभी ने हल्के से हंस कर कहा____"अगर ऐसी बात है तो फिर उन दोनों बेचारियों का क्या होगा? वो दोनों तो तुम्हें मनाने की आस लिए ही बैठी रह जाएंगी। क्या तुम उनके साथ इस तरह का अत्याचार करोगे?"
"उनको मुझसे जो चाहिए होगा वो उन्हें मिल जाएगा।" मैंने लापरवाही से कहा____"फिर भला कैसे उनके साथ अत्याचार होगा?"
"तुम ना अब पिटोगे मुझसे।" भाभी ने आश्चर्य से आंखें फैलाते हुए मुझे थप्पड़ दिखाया____"चलो जाओ यहां से बेशर्म। मुझे आराम करना है अब।"
भाभी का अचानक से इस तरह का बर्ताव देख मैं चौंका। मुझे समझ न आया कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा मुझसे? मैंने सोचा कि आख़िर मैंने ऐसा क्या कह दिया है उनसे? अगले कुछ ही पलों में मैं बुरी तरह चौंक पड़ा। अंजाने में मैंने उनसे ऐसी बात कह दी थी जिसमें एक अलग ही अर्थ छिपा हुआ था। मुझे अपने आप पर ये सोच कर गुस्सा आया कि मैं ऐसी बात कैसे बोल गया। मुझे बहुत शर्म आई। मैंने नज़र उठा कर भाभी की तरफ देखा तो उन्हें अपने पलंग पर बैठते पाया। उनसे कुछ कहने की हिम्मत न हुई मुझमें इस लिए चुपचाप उनके कमरे से बाहर निकल आया।
अपने कमरे में आ कर मैं पलंग पर लेट गया और भाभी से कही बात के बारे में सोचने लगा। क्या सोचा होगा भाभी ने मेरे बारे में कितना निर्लज्ज लड़का हूं मैं। मेरी नज़र में भाभी का मुकाम बहुत ऊंचा था और मैं उनका बेहद सम्मान करता था। इस तरह की द्विअर्थी बातें मैंने उनसे कभी नहीं की थीं। जाने क्यों मेरा मन एकाएक आत्मग्लानि से भर गया।
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