Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed) - Page 15 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Adultery ☆ प्यार का सबूत ☆ (Completed)

अध्याय - 96

━━━━━━༻♥༺━━━━━━


"आपने बिल्कुल सही कहा ठाकुर साहब।" किशोरी लाल ने खुशी से मुस्कुराते हुए पिता जी से कहा____"छोटे कुंवर का ऐसा सोचना और इस गांव के लोगों के लिए ऐसा कार्य करना वाकई में बड़ी अच्छी बात है।"

"तो फिर ये तय रहा।" पिता जी ने कहा____"हम पंडित जी से कोई अच्छा सा मुहूर्त निकलवा कर इस कार्य को करवा देते हैं।"

थोड़ी देर और इसी संबंध में हमारी बातें हुईं उसके बाद मैं अपनी मोटर साईकिल ले कर खेतों की तरफ निकल गया। पिता जी काफी खुश और प्रभावित नज़र आए थे मुझे।


अब आगे....

साहूकार गौरी शंकर बाहर बैठक में बैठा हुआ था। उसके साथ रूपचंद्र और फूलवती भी थी। शाम हो चुकी थी। गौरी शंकर और रूपचंद्र खेतों से आने के बाद तथा हाथ पैर धोने के बाद चाय पीने बैठे हुए थे। पिछले कुछ समय से जो थोड़ा बहुत तनाव परिवार में बना हुआ था वो अब काफी हद तक मिट गया था। हालाकि इस बात को सबके लिए भूल पाना अब भी आसान न था कि दादा ठाकुर ने एक झटके में उनके परिवार के मर्दों और बच्चों को जान से मार डाला था। किंतु परिवार के मुखिया और सबसे बुजुर्ग चंद्रमणि के समझाने से अब हर कोई इस बात को समझ चुका था कि पिछली चीज़ों को ले कर बैठे रहने से अथवा किसी तरह का विकार मन में रखने से परिवार की स्थिति अच्छी होने की बजाय ख़राब ही होनी थी।

"क्या फिर तुम्हारी दादा ठाकुर से दुबारा भेंट हुई?" फूलवती ने गौरी शंकर से पूछा____"और क्या तुमने उसे ये बताया कि वो अपने जिस बेटे के साथ हमारी बेटी रूपा का ब्याह तय कर चुका है उसका वो बेटा दूसरे गांव के एक मामूली से किसान की बेटी से प्रेम करता है?"

"क्या फ़र्क पड़ता है इस बात से?" गौरी शंकर ने जैसे लापरवाही से कहा____"दादा ठाकुर ने वैभव के साथ रूपा के ब्याह को तय कर दिया है यही सबसे ज़्यादा अहम बात है। वैभव भले ही किसी किसान की लड़की से प्रेम करता हो लेकिन वो अपने पिता के फ़ैसले के खिलाफ़ नहीं जा सकता। वैसे भी उसने खुद भी तो कई बार कहा है कि वो रूपा से ब्याह करने को तैयार है। फिर आपको किस बात की फ़िक्र है?"

"हैरानी की बात है कि ऐसा तुम कह रहे हो?" फूलवती ने हैरानी ज़ाहिर करते हुए कहा____"जबकि तुम्हें इस बारे में गहराई से सोचना चाहिए।"

"अब सोचने के लिए आख़िर बचा ही क्या है भौजी?" गौरी शंकर ने कहा____"जब दोनों बाप बेटे ब्याह करने को बोल चुके हैं तो फिर आप ऐसा क्यों कह रही हैं?"

"मेरे ऐसा कहने की एक ठोस वजह हैं गौरी शंकर।" फूलवती ने ठोस लहजे से कहा____"और वो ये है कि वैभव के साथ हमारी बेटी रूपा का वैवाहिक जीवन तभी सफल और सुखमय हो सकता है जब उसके होने वाले पति के जीवन में किसी भी दूसरी लड़की अथवा औरत का स्थान न हो। खास कर उसका तो बिल्कुल भी नहीं जिससे वैभव खुद प्रेम करता हो। ज़रा सोचो कि इसके चलते हमारी बेटी के वैवाहिक जीवन में कितना बड़ा असर पड़ेगा। कहने के लिए तो रूपा हवेली की बहू बन जाएगी लेकिन एक पत्नी के रूप में क्या वो वैभव के साथ खुश रहेगी? क्या वैभव उसे सच्चे दिल से अपनी पत्नी मान कर उसे वो सब कुछ देगा जो उसे अपनी पत्नी को देना चाहिए? अरे! जो पति किसी दूसरी लड़की से प्रेम करता हो वो भला अपनी पत्नी को वैसा प्रेम कैसे देगा? नहीं गौरी, सच तो ये है कि ऐसी परिस्थिति में होगा ये कि हमारी बेटी उस हवेली में अपने पति से अपने प्रेम के लिए तरसती रहेगी। इसी लिए कह रही हूं कि तुम्हें इस बारे में दादा ठाकुर से बात कर लेनी चाहिए और उनसे इस बात का वचन लेना चाहिए कि वैभव के जीवन में रूपा के अलावा किसी भी दूसरी लड़की अथवा औरत का स्थान नहीं होगा। इतना ही नहीं बल्कि वैभव सच्चे दिल से रूपा को अपनी पत्नी मानते हुए उसे हर सुख देगा।"

फूलवती की लंबी चौड़ी बातें सुन कर गौरी शंकर कुछ बोल ना सका। उसके चेहरे पर सोचने वाले भाव उभर आए थे। यही हाल रूपचंद्र का भी था।

"बड़ी मां सही कह रही हैं काका।" रूपचंद्र बोल ही पड़ा____"आपको दादा ठाकुर से इस बारे में बात करना ही चाहिए। मैं भी ये बर्दास्त नहीं करूंगा कि ब्याह के बाद मेरी बहन को वैभव के किसी रवैए से दुख पहुंचे। वैसे मुझे तो अभी से ये प्रतीत हो रहा है कि ऐसा ही कुछ होगा क्योंकि जिस इंसान को मेरी बहन के समर्पण भाव और उसके प्रेम में किए गए त्याग का एहसास ही नहीं वो कैसे अपनी पत्नी के रूप में मेरी बहन को खुशियां दे सकेगा?"

"प्रेम बहुत अच्छा भी होता है और बहुत ख़राब भी।" फूलवती ने कहा____"वो अच्छा तब होता है जब वो उचित व्यक्ति से किया जाए और ख़राब तब होता है जब वो अनुचित व्यक्ति से किया जाए। वैभव रूपा से नहीं बल्कि उस मामूली से किसान की लड़की से प्रेम करता है। ज़ाहिर है उसका मन हर वक्त उसी के बारे में सोचेगा और हमारी रूपा की तरफ वो कभी ध्यान ही नहीं देगा। ऐसे में हमारी बेटी उस हवेली में बहू बन जाने के बाद भी दुखी ही रहेगी।"

"शायद आप ठीक कह रही हैं भौजी।" गौरी शंकर ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"ये प्रेम वाकई में बड़ा ख़राब भी होता है अगर अनुचित व्यक्ति से किया जाए तो। वैभव के बारे में हम सब अच्छी तरह से जानते हैं। वो कमबख़्त वो बला है जो अपने बाप से क्या बल्कि ऊपर वाले से भी नहीं डरता। आज भले ही वो सुधर गया है लेकिन प्रेम के मामले में वो किसी की नहीं सुनेगा। यकीनन ऐसे में उसके साथ हमारी बेटी का वैवाहिक जीवन बेहतर नहीं हो सकेगा। आप बिल्कुल ठीक कह रही हैं। मुझे दादा ठाकुर से इस बारे में बात करनी ही होगी।"

"तो फिर तुम्हें कल ही हवेली जा कर दादा ठाकुर से इस बारे में बात कर लेनी चाहिए।" फूलवती ने कहा____"प्रेम जैसे मामले में ज़्यादा देर करना बिल्कुल भी उचित नहीं है। हो सकता है कि उस लड़की से वैभव का ये प्रेम प्रसंग अभी ताज़ा ताज़ा ही हो, इस लिए अगर दादा ठाकुर द्वारा इस प्रेम प्रसंग पर अभी से विराम लगा दिया जाएगा तो शायद इसमें कोई समस्या नहीं होगी। किन्तु अगर ज़्यादा देर हुई तो ये समस्या गंभीर हो जाएगी।"

"सही कहा आपने।" गौरी शंकर ने सिर हिलाते हुए कहा____"इस मामले में देर करना ठीक नहीं होगा। इसके अलावा दादा ठाकुर से मैं अपने भी कुछ मुद्दों पर चर्चा कर लूंगा।"

"अपने कौन से मुद्दों पर चर्चा करोगे तुम?" फूलवती के माथे पर शिकन उभरी।

"हमने जहां पर आरती और रेखा का रिश्ता तय किया था वहां से कुछ दिन पहले एक ख़बर आई थी।" गौरी शंकर ने गंभीरता से कहा____"उन लोगों ने रिश्ता करने से इंकार कर दिया है।"

"क्या????" फूलवती का मुंह भाड़ की तरह खुल गया।

"हां भौजी।" गौरी शंकर एकाएक चिंतित भाव से कह उठा____"असल में दादा ठाकुर के साथ हमारा जो मामला हुआ था उसकी ख़बर दूर दूर तक फैल चुकी थी। उसी के चलते उन्होंने हमारे तय किए गए रिश्ते को करने से इंकार कर दिया है।"

"हाय राम!" फूलवती ने अपने भाड़ की तरह खुल ग‌ए मुंह को हथेली से बंद करते हुए कहा____"ये तो सच में बहुत बुरा हुआ लेकिन तुमने ये बात हमें बताई क्यों नहीं थी?"

"मैंने जान बूझ कर ही नहीं बताया था आप लोगों से।" गौरी शंकर ने हताश भाव से कहा____"असल में मैं आप सबको चिंता में नहीं डालना चाहता था।"

"तो अब क्या होगा फिर?" फूलवती ने चिंतित भाव से पूछा।

"मैंने पुरोहित जी को भी भेजा था वहां।" गौरी शंकर ने कहा____"लेकिन पुरोहित जी के समझाने पर भी बात नहीं बनी। उन्होंने साफ कह दिया है कि हमें ऐसे घर में अपने बेटों का रिश्ता करना ही नहीं है जिस घर के लोगों की मानसिकता इतनी निम्न दर्जे की हो।"

"सच ही कहा था उस दिन पिता जी ने।" फूलवती ने अपने ससुर चंद्रमणि की बातों को याद करते हुए कहा____"कि कोई हमारी बेटियों से ब्याह भी नहीं करेगा। हे प्रभु! अब क्या होगा? ये कैसी मुसीबत में डाल दिया है हमें?"

"फ़िक्र मत कीजिए भौजी।" गौरी शंकर ने कहा____"हमारी इस चिंता को अब दादा ठाकुर ही दूर कर सकते हैं। इसी लिए तो मैंने आपसे कहा है कि दादा ठाकुर से अपने भी कुछ मुद्दों पर चर्चा कर लूंगा। मुझे यकीन है कि दादा ठाकुर इस मामले में हमारी सहायता ज़रूर करेंगे।"

"ईश्वर करे ऐसा ही हो।" फूलवती ने जैसे बेबस भाव से कहा____"क्योंकि अगर ऐसा न हुआ तो हमारी बदनामी तो होगी ही किंतु साथ में ये बात भी चारो तरफ फ़ैल जाएगी जिससे हमारी बेटियों से कोई ब्याह ही नहीं करेगा।"

"सच में हमारी स्थिति बहुत दयनीय हो गई है भौजी।" गौरी शंकर ने कहा____"और अपनी इस दयनीय स्थिति के ज़िम्मेदार हम खुद ही हैं। काश! इतना दूर तक हमने पहले ही सोच लिया होता तो आज ना तो हमें ये दिन देखना पड़ता और ना ही हम सबकी ये दशा होती।"

गौरी शंकर की इस बात का फूलवती के पास कोई जवाब नहीं था। रूपचंद्र भी गंभीर चेहरा लिए बैठा रह गया था। कदाचित उसे भी शिद्दत से एहसास हो रहा था कि आज के समय में उसकी और उसके परिवार की हालत सच में कितनी गंभीर है।

✮✮✮✮

"ये तो सच में बहुत ही बड़ी चिंता की बात हो गई है वैभव।" रागिनी भाभी ने मेरी सारी बातें सुनने के बाद गंभीर भाव से कहा।

मैं भाभी के कमरे में था और उन्हें वो सब बातें बता चुका था जो आज सरोज से उसकी बेटी के संबंध में हुईं थी। मैंने भाभी से कुछ भी नहीं छुपाया था। ये सब बातें भाभी को बताने का मेरा यही मकसद था कि ऐसी परिस्थिति में वो या तो मेरा मार्गदर्शन करें या फिर मेरी मदद करें। मैं जानता था कि मां और पिता जी भाभी को बहुत मानते थे और मौजूदा समय में वो जिस स्थिति में थीं उसकी वजह से वो लोग उनकी कोई भी बात टाल नहीं सकते थे। यही सब सोच कर मैंने भाभी को सब कुछ बता दिया था जिसे सुनने के बाद वो एकदम से गंभीर हो गईं थी।

"मुझे समझ नहीं आ रहा भाभी कि अपनी इस समस्या को कैसे दूर करूं?" मैंने चिंतित भाव से कहा____"मैं अब ऐसा कोई भी काम नहीं करना चाहता जिससे आपको अथवा किसी को भी अच्छा न लगे। मैं चाहता हूं कि हवेली का हर सदस्य इस बात को समझे कि अनुराधा जैसी लड़की का मेरे जीवन में क्या महत्व है।"

"तुम अभी इस बारे में ये सब सोच कर खुद को हलकान मत करो वैभव।" भाभी ने मेरे कंधे को हल्के से दबा कर जैसे मुझे धीरज देते हुए कहा____"अभी इस सबके लिए बहुत समय बाकी है। मुझे पूरा यकीन है कि जब पिता जी को इस बारे में सब कुछ पता चलेगा तो वो तुम्हारी बातों को ज़रूर समझेंगे और अनुराधा के साथ तुम्हारे ब्याह की मंजूरी भी देंगे।"

"क्या सच में आपको लगता है कि वो इस बात को समझेंगे?" मैंने जैसे बेयकीनी से कहा____"नहीं भाभी, ये इतना आसान नहीं है। उन्होंने रूपा के साथ मेरा रिश्ता तय कर दिया है और गौरी शंकर को वचन भी दे चुके हैं कि अगले साल वो बरात ले कर उसके घर जाएंगे। क्या इसके बाद भी वो मेरे और अनुराधा के रिश्ते को स्वीकृति देंगे? क्या वो इस बात के लिए राज़ी होंगे कि मेरे जीवन में रूपा के अलावा भी अनुराधा के रूप में मेरी कोई दूसरी पत्नी भी हो?"

"बिल्कुल राज़ी होंगे वैभव।" भाभी ने मजबूती से कहा____"और उन्हें राज़ी होना ही पड़ेगा। उन्हें समझना होगा कि तुम अगर सुधर गए हो तो इसमें सिर्फ और सिर्फ अनुराधा जैसी लड़की का ही हाथ है। मैं खुद तुम्हारी पैरवी करूंगी।"

"ओह! भाभी क्या सच कह रही हैं आप?" मैं एकदम से खुश हो कर बोल पड़ा____"क्या सच में आप इस मामले में मेरी मदद करेंगी?"

"बिल्कुल करूंगी।" भाभी ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"अपने प्यारे से देवर के लिए मुझसे जो हो सकेगा करूंगी। ख़ास कर उस वैभव के लिए जो एक अच्छा इंसान बनने की जी तोड़ कोशिश कर रहा है। मैं ये बिल्कुल भी नहीं चाहूंगी कि सिर्फ इस वजह के चलते तुम अपना रास्ता भटक जाओ और फिर से पहले जैसे गंदे इंसान बन जाओ।"

"नहीं भाभी।" मैंने संजीदा हो कर कहा____"अब मैं वापस पहले जैसा नहीं बनूंगा। अनुराधा के ना मिलने से सिर्फ इतना ही होगा कि उसके बिना खुश नहीं रह पाऊंगा, बाकी रास्ता नहीं भटकूंगा। क्योंकि मैंने आपको अच्छा इंसान बनने का वचन दिया है। आपने मुझसे जो उम्मीद लगा रखी है उसे टूटने नहीं दूंगा, फिर भले ही इसके लिए मुझे चाहे कितने ही अजाब सहने पड़ें।"

"अजाब सहें तुम्हारे दुश्मन।" भाभी ने झट से मेरे दाएं गाल को सहलाते हुए स्नेह से कहा___"मैं अपने देवर को कोई अजाब नहीं सहने दूंगी। अगर वाकई में अनुराधा के मिलने से ही तुम्हें सच्ची खुशी मिलेगी तो वो तुम्हें ज़रूर मिलेगी। अगर अच्छा इंसान बनने का तुमने मुझे वचन दे रखा है तो आज मैं भी तुम्हें ये वचन देती हूं कि अनुराधा के साथ तुम्हारा ब्याह ज़रूर करवाऊंगी मैं।"

"ओह! भाभी। आपने मेरे लिए मुझको इतना बड़ा वचन दे दिया?" मैंने गदगद भाव से उनकी तरफ देखा____"आपके चरण कमल कहां हैं। मैं उन चरणों में अपना सिर रख देना चाहता हूं।"

"अरे! इसकी कोई ज़रूरत नहीं है।" भाभी ने जब देखा कि मैं सच में झुक कर उनके चरणों को छूने वाला हूं तो उन्होंने झट से पीछे हटते हुए किंतु मुस्कुराते हुए कहा____"मुझे अच्छी तरह पता है कि तुम मेरा कितना अधिक सम्मान करते हो और सच कहूं तो इस बात से मुझे हमेशा गर्व महसूस होता है। ख़ैर अब ये तो बताओ कि अपनी होने वाली दोनों बीवियों से मुझे कब मिलवाओगे?"

"अनुराधा से तो मैं आपको किसी भी वक्त मिलवा सकता हूं।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"लेकिन दूसरी वाली से मिलवाना शायद मेरे लिए मुश्किल है।"

"अरे! ऐसा क्यों भला?" भाभी ने कहा___"और ये तुम दूसरी वाली क्या बोल रहे हो? जैसे एक का नाम लिया है वैसे ही उसका भी नाम लो। माना कि अनुराधा से तुम प्रेम करते हो जिसके चलते तुम उसी में अपनी खुशी समझते हो लेकिन ये मत भूलो कि रूपा का भी तुम्हारे जीवन में उतना ही महत्व है जितना कि अनुराधा का। आख़िर वो तुमसे प्रेम करती है और इतना ही नहीं अपने प्रेम को साबित करने के लिए उसने बहुत कुछ किया है तुम्हारे लिए। तुम उसके साथ कोई भेदभाव कैसे कर सकते हो?"

"ग़लती हो गई भाभी।" मैंने फ़ौरन ही अपने दोनों कान पकड़ते हुए कहा____"अब से कभी उसके साथ कोई भेदभाव नहीं करूंगा।"

"अच्छा इंसान बनने की राह पर हो तो सबके लिए अच्छा सोचना भी पड़ेगा।" भाभी ने जैसे उपदेश देते हुए कहा____"तभी समझा जाएगा कि तुम सच में अच्छे इंसान हो।"

"समझ गया भाभी, समझ गया।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"अच्छा अब बताइए कब चल रही हैं मेरे साथ अपनी देवरानी से मिलने?"

"हांय...तुम तो एक ही पल में बेशर्म बन गए।" भाभी ने आंखें फाड़ कर मेरी तरफ देखा____"अरे! कुछ तो शर्म करो। अपनी इस भाभी का कुछ तो लिहाज करो।"

"ठीक है ग़लती हो गई।" मैंने कहा____"अब से ऐसा कुछ नहीं कहूंगा आपके सामने और हां अब आप कहिएगा भी नहीं कि मैं उनमें से किसी से आपको मिलवाऊं।"

कहने के साथ ही मैंने इस तरह मुंह फेर लिया जैसे कोई छोटा बच्चा रूठ जाने पर फेर लेता है। ये देख भाभी खिलखिला कर हंस पड़ीं। उनकी हंसी मेरे कानों में मंदिर की घंटियां बजने जैसी प्रतीत हुईं तो मुझे ये सोच कर अच्छा लगा कि चलो किसी बहाने भाभी को हंसी तो आई। मैं तो चाहता ही यही था कि वो अपना दर्द भूल कर हंसती मुस्कुराती रहें।

"अगर तुम ये सोचते हो कि मैं तुम्हें मनाऊंगी तो भूल जाओ।" भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा____"वैसे भी मेरे मनाने से तुम्हें वो खुशी नहीं मिलेगी जो एक प्रेमिका के मनाने पर मिलती है। इस लिए अगर खुद को मनवाना ही है तो अपनी अनुराधा के पास ही जाओ।"

"ये तो ग़लत बात है भाभी।" मैंने फ़ौरन ही उनकी तरफ पलट कर कहा____"उन दोनों से पहले मेरे जीवन में आपकी प्राथमिकता ज़्यादा है। मैं आपका देवर हूं और आपसे रूठने मनाने का पूरा हक़ है मेरा।"

"अच्छा जी।" भाभी ने हल्के से हंस कर कहा____"अगर ऐसी बात है तो फिर उन दोनों बेचारियों का क्या होगा? वो दोनों तो तुम्हें मनाने की आस लिए ही बैठी रह जाएंगी। क्या तुम उनके साथ इस तरह का अत्याचार करोगे?"

"उनको मुझसे जो चाहिए होगा वो उन्हें मिल जाएगा।" मैंने लापरवाही से कहा____"फिर भला कैसे उनके साथ अत्याचार होगा?"

"तुम ना अब पिटोगे मुझसे।" भाभी ने आश्चर्य से आंखें फैलाते हुए मुझे थप्पड़ दिखाया____"चलो जाओ यहां से बेशर्म। मुझे आराम करना है अब।"

भाभी का अचानक से इस तरह का बर्ताव देख मैं चौंका। मुझे समझ न आया कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा मुझसे? मैंने सोचा कि आख़िर मैंने ऐसा क्या कह दिया है उनसे? अगले कुछ ही पलों में मैं बुरी तरह चौंक पड़ा। अंजाने में मैंने उनसे ऐसी बात कह दी थी जिसमें एक अलग ही अर्थ छिपा हुआ था। मुझे अपने आप पर ये सोच कर गुस्सा आया कि मैं ऐसी बात कैसे बोल गया। मुझे बहुत शर्म आई। मैंने नज़र उठा कर भाभी की तरफ देखा तो उन्हें अपने पलंग पर बैठते पाया। उनसे कुछ कहने की हिम्मत न हुई मुझमें इस लिए चुपचाप उनके कमरे से बाहर निकल आया।

अपने कमरे में आ कर मैं पलंग पर लेट गया और भाभी से कही बात के बारे में सोचने लगा। क्या सोचा होगा भाभी ने मेरे बारे में कितना निर्लज्ज लड़का हूं मैं। मेरी नज़र में भाभी का मुकाम बहुत ऊंचा था और मैं उनका बेहद सम्मान करता था। इस तरह की द्विअर्थी बातें मैंने उनसे कभी नहीं की थीं। जाने क्यों मेरा मन एकाएक आत्मग्लानि से भर गया।

━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━
 
अध्याय - 97

━━━━━━༻♥༺━━━━━━



अगले दस पंद्रह दिन ऐसे ही गुज़र गए। इस बीच पिता जी शहर गए थे जहां पर उन्होंने अपने किसी जान पहचान वाले से मुलाक़ात की और उन्हें बताया कि वो अपने भतीजों को यानि विभोर और अजीत को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजना चाहते हैं। पिता जी की इस बात से उस व्यक्ति ने पिता जी को बताया कि इसमें कोई समस्या की बात नहीं है, बस कुछ कागज़ी कार्यवाही करनी पड़ेगी।

उस व्यक्ति के दिशा निर्देश पर पिता जी सारी कागज़ी कार्यवाही संपन्न करने के काम पर लग गए। ऐसे कामों में वक्त लगना था किंतु पिता जी के लिए कोई समस्या नहीं थी क्योंकि उनकी पहुंच काफी ऊपर तक थी इस लिए कम समय में ही सारा काम हो गया। हवेली में अब विभोर और अजीत की विदेश भेजने की तैयारी होने लगी। विभोर और अजीत का विदेश जाने का मन तो नहीं था लेकिन चाची के समझाने पर आख़िर वो दोनों मान ही गए। मैंने भी दोनों को आश्वस्त किया कि उन्हें यहां किसी की फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं है। उनका काम सिर्फ इतना है कि वो दोनों हर चिंता से मुक्त हो कर विदेश में अच्छी तरह से अपनी शिक्षा ग्रहण करें।

आख़िर वो दिन आ ही गया जब विभोर और अजीत विदेश जाने लगे। दोनों अपने पिता को याद कर के बहुत रो रहे थे। उनके साथ चाची भी रो रहीं थी। हम सब भी अंदर से दुखी थे किंतु बात उनके उज्ज्वल भविष्य की थी इस लिए हम सभी को अपने आपको कठोर बनाना था। पिता जी जीप में दोनों को बैठा कर तथा अपने साथ कुछ हथियारबंद आदमियों को ले कर शहर के लिए रवाना हो गए। उस दिन हवेली में एकदम से सन्नाटा सा छा गया था। मां और भाभी मेनका चाची को सम्हालने में लगी हुईं थी। नए मुंशी किशोरी लाल की बीवी निर्मला भी वहीं थी, जबकि उसकी बेटी कजरी और कुसुम थोड़ी दूरी पर बैठी हुईं थी।

ऐसे ही दिन गुज़र गया और फिर शाम ढलते ढलते पिता जी शहर से वापस आ गए। उन्होंने सबको बताया कि दोनों बच्चे सकुशल हवाई जहाज में बैठ कर विदेश जा चुके हैं। विदेश में उनके रहने की तथा हर सुविधा संपन्न कराने की व्यवस्था पिता जी के उस परिचित को करनी थी। इसके लिए जितना भी खर्च लगने वाला था वो पिता जी ने दे दिया था उसे और साथ ही ये भी कह दिया था कि महीना पूरा होने से पहले ही वो आगे के खर्च के लिए पैसा भेजवा दिया करेंगे।

हमारे गांव से ही नहीं बल्कि आस पास गावों से भी कोई व्यक्ति अब तक उच्च शिक्षा के लिए विदेश नहीं गया था। ये हमारे लिए बड़े ही गर्व वाली बात थी। पिता जी को इस बात से बड़ा संतोष हुआ था कि उनके मरहूम छोटे भाई के दोनों बच्चों का भविष्य अब बेहतर बन जाएगा।

अगली सुबह नाश्ता करने के बाद पिता जी और मुंशी किशोरी लाल बैठक कक्ष में चले गए जबकि मैं खेतों की तरफ जाने की तैयारी करने लगा। इतने दिनों में मैंने महसूस किया था कि किशोरी लाल की बेटी कजरी कुछ अलग ही तरह से मुझसे बर्ताव करने लगी थी। मैं जब भी अपने कमरे में अकेले होता था तो वो किसी न किसी बहाने मेरे कमरे में आ धमकती थी। उसके बाद उसकी द्विअर्थी बातें शुरू हो जाती थीं जिसके चलते मैं असहज हो जाता था। अगर बात अच्छा इंसान बनने की न होती तो वो अब से पहले ही मेरे पलंग पर मेरे लंड की सवारी कर चुकी होती किंतु अब बात अलग थी। मैंने महसूस किया था कि पिछले कुछ दिनों से उसकी हिम्मत कुछ ज़्यादा ही बढ़ गई थी और मुझे डर था कि उसे अपनी इस हिम्मत के लिए मेरे द्वारा कोई बुरा ख़ामियाजा न भुगतना पड़ जाए। अगर ऐसा हुआ तो हवेली में एक बड़ा हंगामा हो जाना तय था।

मैं तैयार हो कर अपने कमरे से निकला और भाभी के कमरे की तरफ बढ़ चला। पिछले दिन मैंने भाभी से कहा था कि वो मेरे साथ खेतों पर चलेंगी और उन्हें मेरे साथ चलना ही पड़ेगा। काफी समय से वो बहाने बना रहीं थी। असल में भाभी को अपने साथ ले जाने के पीछे एक खास वजह भी थी।

बहरहाल मैं जैसे ही भाभी के कमरे की तरफ मुड़ने वाले गलियारे के पास पहुंचा तो देखा भाभी अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर रहीं थी। मुझ पर नज़र पड़ते ही वो हल्के से मुस्कुराईं। सफ़ेद साड़ी में वो अलग ही नज़र आती थीं जिसके चलते मेरे अंदर एक टीस सी उभर जाया करती थी।

"आख़िर अपनी बात मनवा ही ली तुमने मुझसे।" भाभी ने दरवाज़ा बंद कर के मेरी तरफ आते हुए कहा____"अगर पिता जी ने नाराज़गी ज़ाहिर की तो तुम्हारे साथ साथ मेरी भी ख़ैर नहीं होगी।"

"अरे! कोई कुछ नहीं कहेगा।" मैंने कहा____"मां तो कब से आपको मेरे साथ खेत घूमने जाने के लिए बोल रहीं थी लेकिन आप ही नखरे दिखा रहीं थी।"

"अच्छा बच्चू।" भाभी ने आंखें फैला कर मेरी तरफ देखा____"मैं नखरे दिखा रही थी सबको?"

"और नहीं तो क्या?" मैंने हल्के से हाथ झटकते हुए कहा____"इतने नखरे तो रूपा या अनुराधा ने भी कभी मुझे नहीं दिखाए जितना आप दिखाती हैं।"

"उन्होंने इस लिए नहीं दिखाया क्योंकि वो बेचारी तुमसे डरती हैं।" भाभी ने कहा____"जबकि मैं रत्ती भर भी नहीं डरती तुमसे।"

"हां ये भी सही कहा आपने।" मैंने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया____"और मैं चाहता भी नहीं हूं कि आप मुझसे डरें, बल्कि मैं तो ये चाहता हूं कि मेरी प्यारी भाभी हमेशा मेरी टांगें खींचें ताकि उन्हें खुशी मिले।"

"बहुत बातें बनाने लगे हो आज कल।" भाभी ने मुझे घूर कर देखा____"मां जी से शिकायत करनी पड़ेगी तुम्हारी।"

"अरे! मां को तकलीफ़ क्यों देंगी आप?" मैंने चौंक कर कहा____"अगर मुझसे कोई ग़लती हो जाए तो आप खुद मुझे डांट सकती हैं और हां पीट भी सकती हैं मुझे।"

"अच्छा सच में??" भाभी ने सीढ़ियों की तरफ बढ़ने से पहले मेरी तरफ हैरानी से देखा तो मैंने कहा____"हां सच में। आप मेरी भाभी हैं, मुझसे बड़ी हैं। इस लिए आपको पूरा हक़ है मुझे डांटने और पीटने का।"

"फिर तो ठीक है।" भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा____"अब जब मेरी दोनों देवरानियां आ जाएंगी तो उनके सामने ही तुम्हें डांटा करूंगी और तुम्हारी पिटाई भी किया करूंगी। बहुत मज़ा आएगा तब।"

"अरे! ये क्या कह रही हैं आप?" मैं उनकी बात से बुरी तरह चौंका____"मतलब आप उनके सामने मेरी इज्ज़त का कचरा करेंगी? ये तो ग़लत बात है भाभी। अपने भोले भाले और मासूम से देवर के साथ इतना बड़ा अत्याचार करेंगी आप?"

"तुम भोले भाले और मासूम?" भाभी जो आधी सीढियां उतर चुकी थीं मेरी बात सुनते ही एकदम पलट कर बोलीं____"कुछ तो शर्म करो। ये तो वैसी ही बात हो गई कि नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज करने चली।"

मैं भाभी की इस बात से अनायास ही मुस्कुरा उठा। इस वक्त भाभी से ऐसी बातें करने में जाने क्यों मुझे मज़ा आ रहा था। बहरहाल हम नीचे आ चुके थे इस लिए मैंने फिर कुछ नहीं कहा। आंगन से होते हुए हम दोनों जैसे ही दूसरी तरफ के बरामदे में पहुंचे तो मां और चाची ने हमें देखा।

"मां, मैं भाभी को खेतों पर घुमाने ले जा रहा हूं।" मैंने मां से कहा_____"आपको इनसे कोई काम तो नहीं है ना?"

"अरे! मुझे इससे कोई काम नहीं है।" मां ने झट से कहा____"तू ले जा इसे। मैं तो कब से कह रही हूं इसे कि वैभव के साथ घूम आया कर लेकिन ये मेरी सुने तब न।"

"आज इन्हें सुनना पड़ा मां।" मैंने इस तरह कहा जैसे मैंने बहुत बड़ा काम किया हो____"आख़िर मेरी बात टालने का साहस कौन कर सकता है यहां?"

"ज़्यादा बोलेगा तो टांगें तोड़ दूंगी तेरी।" मां ने आंख दिखाते हुए मुझसे कहा____"और हां, मेरी बेटी को अच्छे से खेत घुमाना और सम्हाल कर ले जाना।" कहने के साथ ही मां भाभी से मुखातिब हुईं____"अगर ये तुझे परेशान करे तो आ कर मुझसे बताना। मैं अच्छे से इसकी ख़बर लूंगी।"

मां की बात सुन कर भाभी के होठों पर हल्की सी मुस्कान उभर आई। मेनका चाची, कुसुम, निर्मला काकी और उसकी बेटी कजरी भी मुस्कुरा पड़ी।

"आप तो ऐसे बोल रहीं हैं जैसे मैं अपनी भाभी का जन्मजात शत्रु हूं जो इन्हें किसी तरह की तकलीफ़ पहुंचा दूंगा।" मैंने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा____"ये तो हद हो गई। मेरे जैसे मासूम लड़के के साथ इतना बड़ा अन्याय?"

मेरी बात सुनते ही कुसुम और कजरी खिलखिला कर हंसने लगीं। मेनका चाची और निर्मला काकी भी मुस्कुरा उठीं जबकि मां ने मुझे घूर कर देखा। इससे पहले कि मां मुझे कुछ कहतीं मैंने फ़ौरन ही भाभी को चलने का इशारा किया और खुद तेज़ी से आगे बढ़ गया।

बैठक के सामने से जैसे ही मैं गुज़रा तो मेरी नज़र बैठक कक्ष में बैठे गौरी शंकर पर पड़ गई। इतने दिनों बाद उसे यहां देख मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि ये यहां किस लिए आया होगा? ख़ैर मैंने इस बात पर ज़्यादा सोचना मुनासिब नहीं समझा और बाहर निकल गया।

मैं जीप ले कर जैसे ही मुख्य द्वार के सामने आया तो भाभी सीढ़ियों से उतरते हुए जीप के पास आ गईं और फिर मेरे बगल वाली सीट पर चढ़ कर बैठ गईं। उनके चेहरे पर अजीब से भाव थे। वो कुछ असहज सी प्रतीत हो रहीं थी। सफेद साड़ी से उन्होंने हल्का सा अपना चेहरा ढंक रखा था। ज़ाहिर है वो बैठक के सामने से गुज़र कर आईं थी जहां पर पिता जी और बाकी लोग बैठे हुए थे। उनके सामने वो अपना चेहरा उजागर नहीं कर सकतीं थी। ख़ैर उनके बैठते ही मैंने जीप को आगे बढ़ा दिया। महिंद्रा कमांडर वाली जीप जल्दी ही हाथी दरवाज़े को पार कर गई। कच्ची सड़क पर मैं आराम से ही जीप को दौड़ा रहा था ताकि भाभी को ज़्यादा तकलीफ़ ना हो। भाभी चुपचाप गांव का नज़ारा देखने लगीं थी।

✮✮✮✮

"अरे! ये हम किस तरफ जा रहे हैं?" गांव से दूर आने के बाद जैसे ही मैंने जीप को पगडंडी वाले रास्ते की तरफ मोड़ा तो भाभी ने सहसा चौंक कर मुझसे पूछा।

"हम सही रास्ते पर ही जा रहे हैं भाभी।" मैंने उनकी तरफ देखते हुए मुस्कुरा कर कहा____"वैसे आपकी जानकारी के लिए सिर्फ इतना ही बता सकता हूं कि मैं आपको आपके काम से ही कहीं ले जा रहा हूं।"

"क...क्या मतलब??" भाभी ने मेरी बात सुन कर हैरानी से मेरी तरफ देखा____"तुम मुझे मेरे ही काम से कहीं ले जा रहे हो? मेरा भला कहीं पर कौन सा काम है?"

"ज़्यादा मत सोचिए।" मैंने मन ही मन हंसते हुए कहा____"जल्दी ही आपको पता चल जाएगा।"

भाभी मेरी बात सुन कर अपलक मेरी तरफ देखने लगीं और साथ ही सोचने भी लगीं कि भला उनके ऐसे कौन से काम से मैं उन्हें ले जा रहा हूं। मैंने कनखियों से उनकी तरफ देखा तो पाया कि वो कुछ सोच रही हैं।

"ओह! अच्छा अब समझी मैं।" अचानक ही भाभी बड़े उत्साहित भाव से बोल पड़ीं____"मैं समझ गई कि तुम मुझे कहां लिए जा रहे हो लेकिन इसमें भला मेरा काम कहां हुआ? इसमें तो तुम्हारा अपना ही निजी काम है जिसे तुम्हारा स्वार्थ भी कहा जा सकता है।"

"अरे! ये आप क्या कह रही हैं?" मैंने हड़बड़ा कर उनकी तरफ देखा____"इसमें मेरा भला कौन सा निजी स्वार्थ है भाभी? आप ही ने तो कहा था कि मैं आपको उससे मिलवाऊँ।"

"अब बातें न बनाओ तुम।" भाभी ने सहसा घूरते हुए कहा____"इतनी भी बुद्धू नहीं हूं, सब समझती हूं मैं। मुझे तुमने माध्यम बनाया है जबकि सच ये है कि तुम खुद ही अपनी उस माशूका से मिलने के लिए मरे जा रहे थे।"

"नहीं भाभी ये सच नहीं है।" मैं एकदम से झेंपते हुए बोल पड़ा____"असल में आपको उससे मिलवाने का ख़याल अभी कुछ देर पहले ही मेरे ज़हन में आया था, वरना मैं तो आपको हमारे खेतों पर ही लिए जा रहा था।"

"अच्छा, क्या सच में?" भाभी ने अजीब भाव से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"पर तुम्हारे चेहरे के भाव तो यही बता रहे हैं कि तुम झूठ बोल रहे हो।"

"अब मैं आपको कैसे यकीन दिलाऊं?" मुझसे कुछ कहते ना बन पड़ा था। सच ही तो कह रहीं थी वो। मैं झूठ बोल कर अब बहाना ही तो बना रहा था। फिर भी खुद को सही ठहराने की कोशिश करते हुए कहा____"मेरा यकीन कीजिए भाभी। मैं सच में.....!"

"रहने दो।" भाभी ने बीच में ही मेरी बात काट दी____"अपने झूठ को छुपाने के लिए तुम चाहे जितने भी बहाने बना लो पर मैं यकीन करने वाली नहीं हूं। वैसे अगर तुम सच कबूल कर लोगे तो भला कौन सा गुनाह हो जाएगा तुमसे?"

भाभी की इस बात से मैं कुछ ना बोल सका। मेरे मन में ख़याल उभरा कि बात तो बिल्कुल ठीक ही है। मैं अगर सच कबूल कर लूंगा तो भला क्या हो जाएगा?

"अच्छा ठीक है।" फिर मैंने जैसे हथियार डालते हुए कहा____"मैं कबूल करता हूं कि मैं जान बूझ कर आपको उससे मिलवाने लिए जा रहा हूं। अब ठीक है ना?"

"आय हाय देखो तो।" भाभी ने मुझे छेड़ते हुए कहा____"देखो तो इन आशिक़ को। अपनी प्रेमिका से मिलने के लिए कैसे बहाने बना रहे हैं।"

"ये ग़लत बात है भाभी।" मैंने एकदम से झेंपते हुए कहा____"आप इस तरह से मेरी टांग नहीं खींच सकती।"

"क्यों नहीं खींच सकती भला?" भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा_____"भूलो मत, तुमने ही कहा था कि मैं तुम्हारी टांग भी खींच सकती हूं और तुम्हारी पिटाई भी कर सकती हूं। अब क्या तुम अपनी ही कही बात से मुकर जाओगे?"

"नहीं भाभी।" मैंने कहा____"मैं बिल्कुल भी मुकरने वाला नहीं हूं। ठीक है, आपको मेरी टांग ही खींचनी है तो जितना मर्ज़ी खींच लीजिए। बस आप इसी तरह हमेशा खुशी से मुस्कुराती रहें।"

मेरी बात सुनते ही भाभी के चेहरे के भाव बड़ी तेज़ी से बदले। वो मेरी तरफ अपलक देखने लगीं। उनकी आंखों में मेरे लिए अथाह स्नेह दिखाई देने लगा था।

"अच्छा अब ये तो बताइए कि वहां उससे मिलने पर उसके साथ क्या बात करने वाली हैं आप?" मैंने झट से माहौल को पहले जैसा बनाने की गरज से पूछा____"क्या उसके सामने भी आप मेरी टांग खींचेंगी?"

"अब ये तो परिस्थितियों पर निर्भर करता है वैभव।" भाभी ने इस बार सामान्य भाव से कहा____"मैं तो बस उस लड़की को देखना चाहती हूं जिसने तुम्हारे जैसे इंसान को बदल दिया है। मैं उसके सामने जा कर महसूस करना चाहती हूं कि उसमें ऐसी क्या ख़ास बात है?"

"क्या आपको लगता है कि एक मामूली से किसान की बेटी में कोई ख़ास बात होगी?" मैंने भाभी की तरफ देखते हुए कहा।

"बिल्कुल होगी।" भाभी ने झट से कहा____"जिसने ठाकुर वैभव सिंह जैसे महान चरित्र वाले लड़के की फितरत बदल दी उसमें ज़रूर ख़ास बात होगी। वो लड़की मामूली हो ही नहीं सकती जिसे वैभव जैसा व्यक्ति प्रेम करने लगा हो।"

मुझे समझ न आया कि भाभी की इन बातों पर क्या प्रतिक्रिया दूं अथवा क्या कहूं। जीप कच्ची पगडंडी में बढ़ी चली जा रही थी। मुरारी काका का घर नज़र आने लगा था। मैंने महसूस किया कि मेरा दिल एकाएक ही तेज़ी से धड़कने लगा था। ज़हन में सवाल उभरने लगे कि अनुराधा से मिलने के बाद भाभी क्या सोचेंगी अथवा वो उससे क्या बातें करेंगी? क्या अनुराधा मेरे साथ साथ भाभी को भी देख कर सहज महसूस करेगी?

कुछ ही देर में हम मुरारी काका के घर के सामने आ गए। मैंने जीप रोक कर उसका इंजिन बंद कर दिया। मैंने देखा घर का दरवाज़ा अंदर से बंद था। उधर भाभी अपनी तरफ के दरवाज़े से नीचे उतरीं तो उन्हें उतरता देख मैं भी धड़कते दिल से नीचे उतर आया।

"क्या यही उसका घर है?" जीप से उतरने के बाद भाभी ने बंद दरवाज़े की तरफ देखते हुए मुझसे पूछा तो मैंने हां में सिर हिला दिया। मेरे इशारा करने पर भाभी आगे बढ़ चलीं तो मैं भी उनके पीछे दरवाज़े की तरफ बढ़ चला। भाभी नज़र घुमा घुमा कर चारो तरफ देख रहीं थी।

अभी हम दरवाज़े के थोड़ा ही क़रीब पहुंचे थे कि तभी घर का दरवाज़ा एक झटके से खुला और खुले दरवाज़े के बीचो बीच जो शख्सियत नज़र आई उसे देख कर जैसे मेरी धड़कनें ही थम गईं। भाभी की नज़र भी उस पर पड़ चुकी थी। उन्होंने फ़ौरन ही पलट कर मेरी तरफ देखा और आंखों के इशारे से ही मुझसे पूछा कि क्या यही है वो? भाभी के इस तरह पूछने पर मैंने अपने धाड़ धाड़ बजते दिल के साथ पलकें झपका कर हां में जवाब दे दिया। उधर दरवाजे पर खड़ी अनुराधा की नज़र जैसे ही मुझ पर और मेरे साथ साथ भाभी पर पड़ी तो उसके चेहरे पर बड़े अजीब से भाव उभर आए।

✮✮✮✮

"ये क्या कह रहे हो तुम?" बैठक में गौरी शंकर की बातें सुनते ही दादा ठाकुर ने बड़े आश्चर्य के साथ कहा____"हमें तो यकीन ही नहीं हो रहा कि तुम जो कह रहे हो वो सच भी हो सकता है।"

"मैं तो इस बात से हैरान हूं ठाकुर साहब कि अपने बेटे के बारे में इतनी बड़ी बात आपको पता कैसे नहीं है?" गौरी शंकर ने कहा____"या फिर शायद आप अंजान बनने का दिखावा कर रहे हैं।"

"हमें इस बारे में थोड़ी बहुत जानकारी तो थी गौरी शंकर।" दादा ठाकुर ने गंभीर भाव से कहा____"लेकिन हमें ये नहीं पता था कि हमारा बेटा मुरारी की बेटी से प्रेम भी करता है। हमारे लिए तो ये बड़े ही आश्चर्य की बात है कि हमारा बेटा किसी लड़की से प्रेम भी कर सकता है। यकीन नहीं होता।"

"अगर आपको इस बात का यकीन नहीं हो रहा तो आप खुद वैभव से पूछ लीजिएगा।" गौरी शंकर ने दृढ़ता से कहा____"वैसे इतना तो आप भी समझते हैं कि आपका बेटा वैभव अब पहले जैसा नहीं रहा है। उसमें आए परिवर्तन को देख कर शुरू शुरू में हम सबके साथ साथ आप खुद भी तो हैरान हुए होंगे? उसके बाद से अब तक वो जो कुछ भी करता आया है वो भी हैरान कर देने वाला ही तो रहा है। अगर अब तक के उसके सारे कार्य सच हैं तो उसका किसी मुरारी की लड़की प्रेम करना भी सच ही है।"

गौरी शंकर जाने क्या क्या बोलता चला जा रहा था जबकि इधर दादा ठाकुर एकाएक ही जाने किस सोच में पड़ गए थे?

"क्या सोचने लगे ठाकुर साहब?" गौरी शंकर ने जैसे उन्हें वर्तमान में लाते हुए कहा____"अगर वाकई में आपका बेटा किसी लड़की से प्रेम करता है तो आप भी इस बात को अच्छे से समझ सकते हैं कि ऐसे में मेरी भतीजी के साथ उसका वैवाहिक जीवन कुछ ठीक नहीं होगा।"

"क्या मतलब है तुम्हारा?" दादा ठाकुर ने एकदम से चौंकते हुए कहा____"आख़िर क्या कहना चाहते हो तुम?"

"यही कि एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकतीं।" गौरी शंकर ने कहा____"अगर वैभव मुरारी की लड़की के साथ ही विवाह कर के खुश रह सकता है तो उसका विवाह उस लड़की से ही कर दीजिए। आपने मेरी भतीजी रूपा के बारे में इतना सोचा यही हमारे लिए बड़ी बात है किंतु ऐसे विवाह का क्या लाभ जिसमें मेरी भतीजी को खुशियां ही न मिल सकें।"

"नहीं गौरी शंकर।" दादा ठाकुर ने स्पष्ट भाव से कहा____"हमने तुम्हें वचन दिया है कि तुम्हारी भतीजी इस हवेली में बहू बन कर आएगी तो समझो वो आएगी। हमारे बेटे के साथ उसका विवाह ज़रूर होगा। रही बात उस लड़की से उसके प्रेम की तो इसके बारे में भी हम जल्द ही कोई फ़ैसला करेंगे।"

"छोटा मुंह बड़ी बात किंतु आपको मेरी सलाह है ठाकुर साहब कि ऐसा कोई भी फ़ैसला नहीं कीजिएगा जिससे आपके बेटे को धक्का लग जाए और वो अपने सही रास्ते पर चलते हुए अचानक पलट जाए।" गौरी शंकर ने कहा_____"ऊपर वाले की कृपा से उसमें इतना बढ़िया सुधार आया है तो उसे अपने हिसाब से चलने दीजिए। अगर आपने दो प्रेम करने वालों को जुदा करने का सोचा तो मुझे यकीन है कि इसका अंजाम अच्छा नहीं होगा।"

"हम ये सब समझते हैं गौरी शंकर।" दादा ठाकुर ने गभीरता से कहा____"किंतु ऐसा भी तो नहीं हो सकता कि तुम्हें दिया हुआ अपना वचन हम तोड़ दें। ख़ैर, तुम फ़िक्र मत करो। इस बात का यकीन करो कि तुम्हारी भतीजी इस हवेली की बहू ज़रूर बनेगी और उसका वैवाहिक जीवन भी खुशी से गुज़रेगा।"

"पर ये भला कैसे संभव है ठाकुर साहब?" गौरी शंकर ने बेयकीनी से कहा____"माना कि आपके कहने पर अथवा मजबूर करने पर वैभव मेरी भतीजी से विवाह कर लेगा लेकिन प्रेम तो वो किसी और से ही करता है ना? ऐसे में वो मेरी भतीजी को वैसा प्रेम और वैसा हक़ कैसे देगा जो उसे अपनी पत्नी के रूप में मेरी भतीजी को देना चाहिए?"

"हमने कहा न गौरी शंकर कि तुम इस बारे में ज़्यादा मत सोचो।" दादा ठाकुर ने ज़ोर देते हुए कहा_____"हम पर यकीन रखो। हम ऐसा हर्गिज़ नहीं होने देंगे जैसे कि तुम्हें फ़िक्र है।"

गौरी शंकर इस बारे में अभी कहना तो और भी बहुत कुछ चाहता था लेकिन फिर ये सोच कर उसने अपना इरादा बदल लिया कि ज़्यादा बहसबाजी करने से कहीं दादा ठाकुर उससे नाराज़ ना हो जाएं। वैसे भी अब वो दादा ठाकुर से किसी भी तरह का मन मुटाव नहीं होने देना चाहता था।

उसके बाद गौरी शंकर ने अपने उस मुद्दे की बात शुरू कर दी जो उसकी भतीजियों के शादी वाले रिश्ते से संबंधित थी। उसने दादा ठाकुर को अपनी सारी परेशानी बता दी और फिर उनसे आग्रह किया कि इस मामले में दादा ठाकुर उसकी सहायता करें।

"फ़िक्र मत करो गौरी शंकर।" सारी बातें सुनने के बाद दादा ठाकुर ने कहा____"हमने पहले भी तुमसे कहा था कि तुम्हारी बेटियों को हम अपनी बेटियां ही मानते हैं इस लिए उनकी ज़िम्मेदारी भी अब हमारी ही है। तुम अपनी दोनों भतीजियों के विवाह के बारे में किसी प्रकार की चिंता मत करो। जब उचित समय आएगा तो हम खुद तुम्हारे साथ चल कर इस रिश्ते की रजामंदी करवाएंगे।"

"आपका बहुत बहुत धन्यवाद ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने अधीरता से अपने हाथ जोड़ते हुए कहा____"आपके ऐसा कहने से सच में अब मैं चिंता से मुक्त हो गया हूं।"

थोड़ी देर और इसी संबंध में गौरी शंकर की दादा ठाकुर से बातें हुईं उसके बाद वो दादा ठाकुर को प्रणाम कर के अपने घर चला गया। उसके जाने के बाद दादा ठाकुर एक गहरी सोच में डूब गए। उनके ज़हन में जाने कैसे कैसे विचार उभरने लगे थे।

━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━
 
अध्याय - 98

━━━━━━༻♥༺━━━━━━



"कौन आया है अनू?" अनुराधा स्तब्ध सी खड़ी हमें देखे ही जा रही थी कि तभी अंदर से सरोज काकी की आवाज़ से वो चौंकी और हड़बड़ा कर दरवाज़े से एक तरफ हट गई।

इधर मुझे भी समझ नहीं आ रहा था कि ऐसी परिस्थिति में मैं क्या कहूं अथवा क्या करूं? उधर भाभी ख़ामोशी से एकटक अनुराधा को ही देखे जा रहीं थी। दूसरी तरफ अनुराधा अजीब सी हालत में कभी मेरी तरफ देखती तो कभी भाभी की तरफ। उसके चेहरे पर अजीब सी कसमकस तारी हो गई थी और साथ ही लाज की सुर्खी भी दिखने लगी थी। बार बार वो लाज के चलते अपनी नज़रें नीचे कर लेती थी। तभी उसके पीछे सरोज काकी आती हुई दिखी। शायद अनुराधा से कोई जवाब न पा कर वो खुद ही ये देखने के लिए दरवाज़े के पास आ गई थी कि कौन आया है?

"अरे! वैभव बेटा तुम..??" काकी की आवाज़ से मेरी और भाभी की तंद्रा टूटी तो हम दोनों ही चौंक पड़े। उधर काकी की नज़र जब भाभी पर पड़ी तो उसके चेहरे पर एकदम से हैरत के भाव उभर आए। फिर एकदम से सम्हल कर तथा बड़े ही आदर सम्मान के साथ बोली____"अरे! बहू रानी आप यहां? मुझ गरीब की कुटिया के द्वार पर आप आईं ये तो मेरे लिए बड़े ही सौभाग्य की बात है। आइए आइए...अंदर आइए बहू रानी, आप इस तरह बाहर क्यों खड़ी हैं? अनू...ओ अनू....अरे कहां खोई है तू? द्वार पर बहू रानी आईं हैं और तूने इन्हें अंदर आने तक को नहीं कहा? हे भगवान! कितनी बेसहूर लड़की है ये...जाने कब अकल आएगी इसे।"

सरोज मारे हड़बड़ाहट के जाने क्या क्या बोले जा रही थी जबकि उसकी इस हड़बड़ाहट और बौखलाहट पर भाभी के होठों पर हल्की सी मुस्कान उभर आई। उधर अनुराधा ने अपनी मां की डांट को सुन कर लाज और घबराहट के चलते अपना सिर झुका लिया था। अपने दोनों हाथों को आपस में मसलने लगी थी वो। इधर मेरी भी हालत कुछ ठीक नहीं थी। मेरी धड़कनें धाड़ धाड़ कर के बज रहीं थी और ज़हन में बड़े अजीब अजीब से ख़याल उभर रहे थे।

"अरे! क्यों डांट रही हैं आप इस मासूम को?" सरोज की बातें सुन कर भाभी ने मुस्कुराते हुए किंतु बड़े प्रेम भाव से कहा____"इसमें इसकी कोई ग़लती नहीं है। हमें यहां देख कर शायद इसे कुछ समझ ही नहीं आया होगा कि क्या करे? मैं इसकी हालत को बखूबी समझती हूं।"

कहने के साथ ही भाभी ने दरवाजे के अंदर क़दम रखा तो उनके पीछे मैं भी धड़कते दिल से अंदर की तरफ चल पड़ा। सरोज को कदाचित स्वप्न में भी उम्मीद नहीं थी कि मेरे साथ हवेली की बहू उसके घर में यूं अचानक आ टपकेंगी। यही वजह थी कि उसे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि वो उनका किस तरह से स्वागत करे? मैंने देखा वो कुछ ज़्यादा ही हड़बड़ाई और बौखलाई हुई नज़र आ रही थी। बरामदे में रखी चारपाई को जल्दी ही उसने आंगन में बिछा दिया और फिर भागते हुए वो अंदर कमरे में गई और फ़ौरन ही एक गद्दा ले आई जिसे उसने बड़े सलीके से चारपाई पर बिछा दिया। अनुराधा बरामदे के अंदर एक कोने में जा कर चुपचाप खड़ी हो गई थी। उसे देख कर ऐसा लग रहा था जैसे उसने कोई अपराध कर दिया हो जिसके बोझ तले दबी वो एक कोने में जा दुबकी थी।

"अरे! इस सबकी कोई ज़रूरत नहीं है मां जी।" भाभी ने सरोज को मां जी कहा तो वो एकदम से उछल पड़ी, इधर मैंने भी चौंक कर भाभी की तरफ देखा। जबकि भाभी ने सामान्य भाव से आगे कहा____"मैं कोई मेहमान नहीं हूं जिसके स्वागत के लिए आपको ये सब करना चाहिए। अरे! अनू की तरह मैं भी आपकी बेटी ही हूं तभी तो आपको मां जी कहा है। मेरे मां जी कहने पर आपको बुरा तो नहीं लगा न?"

"य...ये आप क्या कह रही हैं बहू रानी?" सरोज चकित भाव से बड़ी मुश्किल से बोल पाई____"मुझ जैसी एक मामूली औरत को आप मां कह रही हैं। हे भगवान! ये कैसी लीला है तेरी?"

"आप खुद को मामूली क्यों कह रही हैं मां जी?" भाभी ने आगे बढ़ कर सरोज के कंधे पर हाथ रखते हुए बड़े आदर भाव से कहा____"इस धरती पर कोई भी व्यक्ति मामूली नहीं होता। ईश्वर ने सबको समान रूप से बना कर इस धरती पर भेजा है।"

"पर हम तो मामूली ग़रीब लोग ही हैं न बहू रानी?" सरोज ने अपनी हालत को किसी तरह सम्हालते हुए कहा____"आपके सामने हमारी क्या औकात है भला?"

"जहां प्रेम होता है वहां औकात के कोई मायने नहीं होते मां जी।" भाभी ने कहा____"बल्कि मैं तो ये कहूंगी कि सबसे बड़ी औकात प्रेम की ही होती है। उसकी औकात के सामने बड़े से बड़े औकात वाले भी घुटने टेक देते हैं। ख़ैर मेरे देवर ने आप लोगों के बारे में मुझे सब कुछ बताया है और मैं इस बात से बेहद खुश हूं कि ऊपर वाले ने मेरे देवर को इस घर तक पहुंचाया। इस धरती में अगर ये घर न होता और इस घर में रहने वाले लोग न होते तो मेरे देवर का चरित्र कभी अच्छे चरित्र में न बदलता। ये सब प्रेम के चलते ही संभव हुआ है मां जी। जिस घर में प्रेम बसता हो मेरी नज़र में वही सबसे बड़ा औकात वाला है।"

सरोज को कुछ समझ न आया कि वो भाभी की बातों का क्या जवाब दे? उनकी बातों से उसे अब ये पता चल चुका था कि उन्हें मेरे और उसकी बेटी के संबंधों का पता चल चुका है। बरामदे में खड़ी अनुराधा भी भाभी की बातों को सुन रही थी। उसे देखने से ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसकी सांसें उसके हलक में आ कर अटकी हुई हैं। इधर मेरे अंदर भी अजीब सा झंझावात चालू था।

"चिंता मत कीजिए मां जी।" भाभी ने फिर से सरोज काकी के कंधे को हल्के से दबाते हुए कहा____"और मुझे यहां देख कर आपको घबराने की भी कोई ज़रूरत नहीं है। मैंने आपको मां जी इसी लिए कहा है क्योंकि अब आप मेरी मां ही हैं। वैभव ने जब मुझे अपने और अनुराधा के प्रेम संबंध के बारे में बताया तो पहले तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ लेकिन फिर ये सोच कर अत्यंत खुशी हुई कि मेरे देवर का प्रेम के चलते हृदय परिवर्तन हो गया जोकि मेरी नज़र में असंभव था। मैं उस लड़की को अपनी आंखों से देखने के लिए व्याकुल हो उठी थी जिसने वैभव के चरित्र को बदल कर उसके अंदर प्रेम जगा दिया और इतना ही नहीं उसे अच्छा इंसान बनने पर भी मजबूर कर दिया। आज यहां मैं उसी लड़की को देखने आई हूं।"

कहने के साथ ही भाभी ने गर्दन घुमा कर बरामदे में चुपचाप खड़ी अनुराधा की तरफ देखा जिससे वो एकदम से सिमट गई और सिर झुका लिया। मेरी धड़कनें एक बार फिर से तेज़ हो गईं थी। उधर सरोज काकी को जैसे अभी भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वो क्या कहे। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि वो जो देख सुन रही थी वो सच है या नहीं?

"क्या मैं अपनी छोटी बहन से अकेले में मिल सकती हूं मां जी?" भाभी ने सरोज से मुखातिब हो कर पूछा।

"हां...हां क्यों नहीं बहू रानी।" सरोज ने हड़बड़ा कर जल्दी से कहा।

"मैंने आपको मां जी कहा है।" भाभी ने कहा____"तो अब मैं आपकी बेटी हो गई हूं और बेटी को आप नहीं कहा जाता। अनुराधा क्योंकि उमर में मुझसे छोटी है इस लिए अब से वो आपकी छोटी बेटी है और मैं आपकी बड़ी बेटी। ठीक है ना?"

भाभी ने इतने प्यार और स्नेह से कहा कि सरोज काकी की आंखों से आंसू छलक पड़े। कुछ कहने की उसने कोशिश तो की लेकिन अल्फाज़ उसके होठों से बाहर न निकल सके। भाभी ने जब ये देखा तो उन्होंने मुस्कुराते हुए बड़े स्नेह के साथ अपने हाथों से उसके आंसू पोंछे।

"क्या बड़ी बेटी के मिलने की खुशी में आपकी आंखों से ये आंसू निकले हैं?" फिर उन्होंने सवालिया निगाहों से देखते हुए सरोज से पूछा तो सरोज ने अपने आंचल से अपने आंसू पोंछते हुए जल्दी से हां में सिर हिलाया। उसके होठ कांप रहे थे।

"फिर तो अच्छी बात है मां जी।" भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा____"अब मैं चाहती हूं कि आप अपनी इस बड़ी बेटी को एक बार अपने गले से भी लगा लें। बड़ी बेटी को भी तो अपनी मां से प्यार और स्नेह मिलना चाहिए, है ना?"

सरोज ने हां में सिर हिलाते हुए झट से भाभी को अपने गले से लगा लिया। एक बार फिर से उसकी आंखों से आंसू बह चले। इधर मैं ये सोच कर आश्चर्यचकित हो गया था कि भाभी ने कितनी आसानी से या फिर ये कहें की कितनी समझदारी से सरोज से अपना एक नया संबंध बना लिया था। मैं चकित तो था ही किंतु उनकी समझदारी और उनके प्रेम भाव को देख कर मंत्रमुग्ध भी हो गया था। मुझे एकदम से अपनी भाभी पर बड़ा ही गर्व महसूस हुआ। एकाएक उनकी किस्मत का ख़याल आते ही मेरे अंदर एक टीस सी उभरी जिसके चलते मुझे उनके लिए बड़ा ही दुख महसूस हुआ।

उधर भाभी कुछ देर तक सरोज के गले लगी रहीं फिर अलग हो कर उन्होंने एक बार फिर से सरोज के आंसू पोंछे और कहा____"अपनी इस बड़ी बेटी से वादा कीजिए कि अब से आप रोएंगी नहीं।"

"हां अब नहीं रोऊंगी मैं।" सरोज जबरन मुस्कुराते हुए बोली____"ऊपर वाले ने एक पल में जिसे इतना प्रेम करने वाली बेटी दे दी हो वो रोएगी क्यों? बल्कि वो तो ये सोच कर खुशी से फूली नहीं समाएगी कि उसे दुनिया की सबसे बड़ी खुशी मिल गई है।"

"मुझे भी तो एक मां मिल गई है।" भाभी ने उसी स्नेह के साथ कहा____"अच्छा अब आप वैभव के पास बैठ कर इससे बातें कीजिए। मैं भी अब अपनी छोटी बहन से अकेले में ढेर सारी बातें करने जा रही हूं।"

सरोज ने सिर हिला कर सहमति दी, जिसके बाद भाभी पलट कर अनुराधा की तरफ बढ़ चलीं। उधर अनुराधा ने जैसे ही भाभी को अपनी तरफ आते देखा तो वो और भी ज़्यादा लाज से सिमट गई और साथ ही असहज सी हो गई। ज़ाहिर है उसके अंदर अजीब सी घबराहट भर गई थी। उसकी ये हालत देख कर मुझे मन ही मन हंसी तो आई ही किंतु उस पर प्यार भी बहुत आया। आज काफी समय बाद उसे देख रहा था और सच कहूं तो अब मेरा बहुत जी कर रहा था कि उससे ढेर सारी बातें करूं। पहले की तरह उसे ठकुराईन कह कर छेड़ूं और उसे प्यार से अपने गले लगाऊं लेकिन शायद अभी इसके लिए मुझे इंतज़ार करना ही लिखा था।

भाभी अनुराधा के पास पहुंच चुकी थीं और उसे बड़े ध्यान से देखने लगीं थीं। उनके इस तरह देखने से अनुराधा और भी ज़्यादा छुईमुई नज़र आने लगी। ये देख भाभी बरबस ही मुस्कुरा उठीं। फिर उन्होंने अनुराधा से कुछ कहा जिससे अनुराधा ने सिर उठा कर उन्हें देखा और फिर वो सिर हिला कर अपने कमरे की तरफ बढ़ चली। उसके पीछे भाभी भी चल पड़ीं। इधर मेरी धड़कनें अब ये सोच कर तेज़ हो गईं कि अनुराधा के साथ अकेले में जाने भाभी क्या बातें करेंगी?

"हाय राम!" अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी काकी की आवाज़ से चौंका। उधर उसने मेरी तरफ देखते हुए लेकिन बौखलाए हुए लहजे से कहा____"अनू को अकल न होने की बात कह रही थी मैं और यहां तो मुझमें ही धेले भर की अकल नहीं है।"

"क्या हुआ काकी?" मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए पूछा____"ये क्या कह रही हो तुम?"

"सच ही तो कह रही हूं वैभव।" काकी ने एकाएक परेशान हो कर कहा____"मेरे घर में बहू रानी पहली बार आईं हैं और मैंने अभी तक उन्हें पानी तक नहीं पिलाया। हे भगवान! क्या सोच रही होंगी वो मेरे बारे में? हाय राम! कितनी नासमझ हूं मैं। उन्होंने मुझे अपनी मां तक बना लिया और मैंने उन्हें एक ग्लास पानी तक का नहीं पूछा।"

सरोज काकी की आंखें पलक झपकते ही छलक पड़ीं। ये देख मैं मुस्कुरा उठा। यकीनन इस वक्त वो इस बात के चलते खुद को दोषी मान रही थी और साथ ही उसे बहुत बुरा भी महसूस हो रहा था किंतु मैं समझ सकता था कि ऐसी परिस्थिति में उसे ऐसी औपचारिकता का ख़याल ही नहीं आया था।

"फ़िक्र मत करो काकी।" मैंने उसे आश्वस्त करने के इरादे से कहा____"इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है। वैसे भी मेरी भाभी इतनी अच्छी हैं कि वो इतनी मामूली सी बात के बारे में सोचती ही नहीं हैं।"

"वो सोचें या ना सोचें लेकिन मुझे तो सोचना चाहिए था ना वैभव?" सरोज काकी जैसे अपराध बोझ से दब सी गई थी इस लिए बोली____"मुझे तो अपना धर्म निभाना चाहिए था ना। ऊपर वाला मुझे माफ़ नहीं करेगा अब।"

"अरे! तुम बेकार में ही खुद को इतना कोस रही हो काकी।" मैंने कहा____"मैंने कहा न कि इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है।"

"ये सब तुम मेरा दिल रखने के लिए कह रहे हो वैभव।" काकी ने कहा____"जबकि मेरी अंतरात्मा तो चीख चीख कर मुझसे कह रही है कि मैंने ठीक नहीं किया है। उन्होंने मुझे मां कहा है और मैंने भी उन्हें अपनी बड़ी बेटी मान लिया है। हे भगवान! मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा कि इतने बड़े खानदान की बहू ने मुझ जैसी मामूली सी औरत को मां कहा है। ये सब मेरी बेटी के भाग्य से ही हुआ है। ये सब उसी के पूर्व जन्मों के अच्छे कर्मों के फल से हुआ है। मैं तो पापिन हूं। मैंने तो....मैंने तो तुम्हारे साथ...।"

कहने के साथ ही सरोज काकी झट से अपने मुख में हथेली रख कर फूट फूट कर रोने लगी। उसकी आख़िरी बात सुन कर मुझे एकदम से झटका लगा। ज़हन में वो यादें उभर आईं जो मैंने उसके साथ ग़लत कर्म कर के बना ली थीं। एकाएक ही इस बात के चलते मुझे बेहद आत्मग्लानि सी होने लगी। मैं उस वक्त को कोसने लगा जब मैंने सरोज के साथ उस तरह का ग़लत संबंध बनाया था। हालाकि इसमें सिर्फ मेरा ही बस कसूर नहीं था बल्कि सरोज का भी बराबर का दोष था किंतु आज के वक्त में उसकी वजह से हम दोनों ही उस ग़लत कर्म की वजह से खुद को कोस रहे थे और आत्मग्लानि में डूबे जा रहे थे। सरोज की बेटी से मैंने ब्याह की बात पक्की कर दी थी, उस नाते अब वो मेरी होने वाली सास थी जोकि यकीनन मां के समान ही होती है। ये ऐसी बात थी जो अब मेरे ज़मीर को भाले के जैसे चुभने लगी थी।

सरोज काकी फूट फूट कर रोए जा रही थी और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं कैसे उसे शांत कराऊं? सच कहूं तो उसके समीप जाने की हिम्मत ही न हुई मुझमें। एकदम से मुझे ये वक्त बड़ा ही अजीयत से भरा लगने लगा था जिसके पलक झपकते ही गुज़र जाने की मैं अब बस दुआ ही कर सकता था। ख़ैर कुछ ही देर में सरोज का रोना धीरे धीरे बंद हो गया जिससे मैंने राहत की सांस ली।

"हमारे बीच अतीत में जो कुछ हुआ है।" फिर उसने बिना मेरी तरफ देखे बेहद ही गंभीर भाव से कहा____"मैं चाहती हूं कि हम दोनों ही उसे एक बुरा सपना या बुरा हादसा समझ कर भूल जाएं।"

"तुम्हें ऐसा कहने की ज़रूरत नहीं है काकी।" मैंने भी संजीदा हो कर कहा____"मैं उस मनहूस घड़ी को खुद भी अपने ज़हन से निकाल देना चाहता हूं। वैसे सच कहूं तो मैं निकाल भी चुका हूं। मैं ऊपर वाले का शुक्र गुज़ार हूं कि उसने मुझे अनुराधा से मिलाया और मेरे दिल में उसके प्रति प्रेम पैदा किया जिसके चलते मैं ग़लत कर्मों को त्याग कर अब एक अच्छा इंसान बनने की राह पर चल पड़ा हूं। अब तो बस एक ही ख़्वाईश है कि अनुराधा हमेशा के लिए मेरी पत्नी बन कर मेरे जीवन में आ जाए और मैं उसके साथ एक खुशहाल जीवन गुज़ारने लगूं।"

"अपने साथ आज यहां बहू रानी को ला कर तुमने मुझे पूरी तरह से यकीन दिला दिया है कि तुमने मुझे जो वचन दिया है उसमें कोई फ़रेब नहीं है।" काकी ने कहा____"यकीन मानो उस दिन तुम्हारे वचन देने पर भी मुझे पूरी तरह तुम पर भरोसा नहीं हुआ था, लेकिन अब हो चुका है। अब मुझे पूरी तरह से इस बात का भरोसा हो गया है कि तुम मेरी बेटी के साथ किसी भी तरह का छल नहीं करना चाहते हो बल्कि सच में उसे अपनी पत्नी बनाना चाहते हो।"

"मैंने भाभी को अनुराधा के साथ अपने प्रेम संबंध के बारे सब कुछ बता दिया है।" मैंने सरोज की तरफ देखते हुए कहा____"और उनसे ये भी कह दिया है कि जिस लड़की की वजह से मेरे अंदर बदलाव आया है और जिससे मैं प्रेम करने लगा हूं उसी से ब्याह भी करूंगा। मेरी ये बात सुन कर भाभी ने हमारे रिश्ते को मंजूरी दे दी है। वो अनुराधा से मिलने के लिए व्याकुल थीं इस लिए मैं आज उन्हें यहां लाया हूं।"

"ये बहुत अच्छा किया तुमने बेटा।" काकी ने अधीरता से कहा____"मैंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरे इस घर में इतने बड़े खानदान की बहू अपने क़दम रखने खुद आएगी। अनू के बापू के जाने के बाद आज मैं पहली बार इतना खुश हुई हूं। तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद वैभव कि तुम बहू रानी को मेरे घर में ला कर मेरे साथ साथ मेरे इस घर को भी धन्य कर दिया है।"

"ये सब तो ठीक है काकी।" मैंने सहसा गंभीर हो कर कहा____"लेकिन एक ऐसी बात भी है जिसके बारे में मैं तुम्हें बता देना ज़रूरी समझता हूं।"

"क...कैसी बात बेटा?" काकी ने असमंजस जैसे भाव से मेरी तरफ देखा।

"वो बात बहुत ही गंभीर है काकी।" मैंने धड़कते दिल से सरोज की तरफ देखते हुए कहा____"हो सकता है कि उस बात को सुन कर तुम परेशान हो जाओ लेकिन पहले मेरी बात ध्यान से सुन लो।"

सरोज काकी मेरी ये बात सुन कर अजीब भाव से मेरी तरफ देखती रह गई। चेहरे पर कई तरह के भाव नाचते नज़र आए उसके। मैंने जब उसके चेहरे पर बात को सुनने की उत्सुकता को देखा तो गहरी सांस ली।

"बात दरअसल ये है कि मेरे पिता जी ने गांव के साहूकार हरि शंकर की बेटी से मेरे ब्याह की बात पक्की कर दी है।" फिर मैंने बेहद ही संतुलित भाव से कहा____"असल में ऐसा इस लिए हुआ कि साहूकार की लड़की मुझसे बहुत पहले से ही प्रेम करती आ रही है और कुछ महीने पहले जो हमारे साथ हादसे हुए थे उसमें उसने अपने ही परिवार के खिलाफ़ जा कर मेरी जान बचाने का कार्य भी किया था। अब जबकि साहूकारों से हमारे रिश्ते फिर से सुधर गए हैं तो आपसी रिश्तों को मजबूत करने के लिए उस लड़की के साथ पिता जी ने मेरा रिश्ता भी तय कर दिया। पिता जी को भी ये पता चल चुका है कि साहूकार की वो लड़की मुझसे प्रेम करती है और उसने प्रेम के चलते ही मेरी जान बचाने का काम किया था। ये सब जान कर पिता जी ने गौरी शंकर से उसकी भतीजी का हाथ अपनी बहू के रूप में मांग लिया है।"

"य....ये क्या कह रहे हो तुम?" सरोज काकी एकदम से चकित हो कर बोली____"हे भगवान! अब क्या होगा? तुम्हारे पिता जी ने खुद साहूकार की लड़की से तुम्हारा ब्याह तय कर दिया है तो अब तुम्हें उससे ब्याह करना ही पड़ेगा। ऐसे में फिर मेरी बेटी का क्या होगा....तुम्हारे वचन का क्या होगा?"

"मेरी पूरी बात तो सुनो काकी।" मैंने एकदम से ही चिंतित हो उठी काकी से कहा____"मैं जानता हूं कि इस बात के चलते मेरे सामने बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो गई है लेकिन यकीन करो, इसके बावजूद मैं अपना वचन निभाऊंगा और अनुराधा से ब्याह करूंगा।"

"म...मगर कैसे?" सरोज सहसा हताश भाव से बोल पड़ी____"भला अब ये कैसे संभव हो सकेगा वैभव? मैं तो पहले ही ये सोच कर चिंतित थी कि मुझ मामूली और ग़रीब औरत की बेटी से दादा ठाकुर अपने बेटे का ब्याह कभी करने का सोचेंगे तक नहीं। वो तो मैंने तुम पर और तुम्हारे वचन देने के चलते भरोसा कर लिया था। अब जबकि तुम्हारे पिता जी ने खुद ही साहूकार की लड़की से तुम्हारा ब्याह तय कर दिया है तो भला वो तुम्हारा ब्याह किसी और लड़की से कैसे करने का सोचेंगे? नहीं नहीं, अब ये मुमकिन नहीं है। मैं अच्छी तरह जानती हूं कि दादा ठाकुर के फ़ैसले के खिलाफ़ जा कर तुम मेरी बेटी से ब्याह नहीं कर सकते। हे ईश्वर! अब क्या होगा मेरी बेटी का?"

कहने के साथ ही सरोज काकी एकदम से हताश और दुखी हो गई। उसकी आंखों से आंसू बह चले। मैं समझ सकता था कि अपनी बेटी के उज्ज्वल भविष्य का सोच कर और साथ ही इतने बड़े खानदान की रानी ना बन पाने की बात सोच कर उसे अब बेहद दुख होने लगा था।

"अरे! तुम बेकार में ही हलकान हो रही हो काकी।" मैंने मजबूत लहजे से उसे समझाते हुए कहा____"तुम्हें ये सब सोच कर दुखी होने की कोई ज़रूरत नहीं है। हां मैं समझता हूं कि परिस्थितियां बेहद ही गंभीर हैं लेकिन तुम्हें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि मैं अनुराधा से प्रेम करता हूं। मैं ये कैसे सहन कर लूंगा कि जिससे मैं प्रेम करता हूं वो मेरे जीवन से हमेशा के लिए दूर हो जाए? नहीं काकी, ऐसा कभी नहीं होगा।"

"मुझे झूठी तसल्ली मत दो वैभव।" काकी ने दुखी भाव से कहा____"दूर दूर तक के लोग जानते हैं कि दादा ठाकुर ने एक बार जो फ़ैसला कर लिया फिर कोई उनके फ़ैसले के खिलाफ़ नहीं जा सकता। मैं ही मूर्ख थी जो उस दिन तुम्हारी बातों में आ गई और तुम्हारे साथ अपनी बेटी के रिश्ते की मंजूरी दे दी। मुझे ये नहीं भूलना चाहिए था कि मैं और मेरी बेटी क्या हैं और दादा ठाकुर के सामने हमारी औकात क्या है।"

"अपने आपको सम्हालो काकी और अपने दिमाग़ को थोड़ा शांत करो।" मैंने फिर से उसे समझाने के इरादे से कहा____"मैं भी ये मानता हूं कि दादा ठाकुर के फ़ैसले के खिलाफ़ कोई कुछ नहीं कर सकता लेकिन तुम ये क्यों भूल रही हो कि इस वक्त तुम्हारे घर में कौन मौजूद है?"

"क...क्या मतलब??" काकी एकदम से मूर्खों की तरह मुझे देखने लगी।

"इस वक्त तुम्हारे घर में दादा ठाकुर की बहू मौजूद है काकी।" मैंने ठोस लहजे में कहा____"और दादा ठाकुर की उस बहू को मेरा और अनुराधा का रिश्ता मंज़ूर है।"

"हां लेकिन बहू रानी भी तो दादा ठाकुर के फ़ैसले के खिलाफ़ नहीं जा सकतीं।" काकी ने अभी भी हताश भाव से कहा।

"ऐसा तुम सोचती हो काकी।" मैंने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"जबकि तुम्हें अभी ये पता ही नहीं है कि हवेली में भाभी की अहमियत क्या है। हां काकी, हवेली में भाभी को हर कोई बड़ा स्नेह देते हैं और उनकी हर खुशी का ख़याल रखते हैं। जब दादा ठाकुर को ये पता चलेगा कि उनकी बहू को तुम्हारी बेटी के साथ मेरा रिश्ता मंज़ूर है और वो चाहती हैं कि मेरा ब्याह अनुराधा से हो तो यकीन मानो दादा ठाकुर को उनकी खुशी के आगे झुकना पड़ जाएगा।"

"क....क्या तुम सच कह रहे हो?" काकी के चेहरे पर आश्चर्य के साथ साथ पहली बार राहत और खुशी के भाव उभरते नज़र आए।

"क्या तुम्हें लगता है कि ऐसी गंभीर परिस्थिति में मैं तुमसे झूठ बोलूंगा?" मैंने उसकी आंखों में देखते हुए कहा____"मैं तुमसे जो कुछ भी कह रहा हूं वो सोलह आने सच है काकी। भाभी को ये रिश्ता मंज़ूर है और वो इस बात से बेहद खुश भी हैं कि तुम्हारी बेटी ने उनके देवर को बदल कर एक अच्छा इंसान बनने पर मजबूर कर दिया है। उन्होंने मुझसे खुद कहा है कि वो इस रिश्ते के लिए मेरे साथ हैं और इतना ही नहीं वो अनुराधा से मेरा ब्याह करवाने के लिए खुद दादा ठाकुर से बात करेंगी।"

"अगर ऐसी बात है तो फिर ठीक है बेटा।" काकी ने राहत की गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन साहूकार की उस लड़की का क्या जिससे दादा ठाकुर ने तुम्हारा ब्याह तय कर दिया है? क्या वो उस लड़की से फिर तुम्हारा ब्याह नहीं करेंगे?"

"ऐसा नहीं है काकी।" मैंने ठंडी सांस खींचते हुए कहा____"दादा ठाकुर क्योंकि गौरी शंकर को वचन दे चुके हैं और वो खुद भी चाहते हैं कि जिस लड़की ने अपने प्रेम के चलते उनके बेटे की जान बचाई है वो उनकी बहू बने। मतलब कि उस लड़की से मेरा ब्याह होना पक्का है लेकिन उसके साथ साथ अनुराधा से भी मेरा ब्याह होगा ये भी पक्की बात है।"

"तुम्हारा मतलब है कि दो दो लड़कियों से ब्याह करोगे तुम?" सरोज काकी ने एकाएक आश्चर्य से देखा मेरी तरफ।

"शायद यही नियति में लिखा है काकी।" मैंने गंभीरता से कहा____"वैसे अगर गहराई से सोचा जाए तो ऐसा होना भी चाहिए। जैसे मैं अनुराधा से प्रेम करता हूं और चाहता हूं कि वो पत्नी बन कर हमेशा मेरे साथ रहे उसी तरह साहूकार की लड़की रूपा भी तो मुझसे प्रेम करती है। ज़ाहिर है उसके मन में भी यही हसरत होगी। तुम खुद सोचो काकी कि क्या ऐसी लड़की के प्रेम को मुझे ठुकरा देना चाहिए? क्या ऐसी लड़की को मुझे ठुकरा देना चाहिए जिसने अपने प्रेम के चलते अपना सब कुछ मुझे समर्पण कर दिया हो और इतना ही नहीं मेरी जान भी बचाई हो? अगर मैं ही न रहता इस दुनिया में तो क्या कोई कुछ कर लेता?"

"सही कह रहे हो तुम?" सरोज काकी ने गहरी सांस ली____"ऐसी लड़की को ठुकरा देना बिल्कुल भी अच्छा नहीं होगा। तुम्हारी बातें सुन कर तो मुझे भी अब ये लग रहा है कि तुम्हारे जीवन पर सबसे ज़्यादा हक़ उस लड़की का ही है। मैं तो अभी भी ये सोच के हैरत में पड़ जाती हूं कि मेरी बेटी ने तो ऐसा कुछ किया ही नहीं है जिसके चलते तुम उसे प्रेम करने लगे और उसे अपना बनाना चाहते हो।"

"ऐसा तुम्हें लगता है काकी।" मैं अनायास ही मुस्कुरा उठा____"जबकि सच तो ये है कि अनुराधा ने वो किया है जो अब से पहले कोई नहीं कर सका था। उसने मेरे जैसे इंसान का चरित्र बदल दिया है काकी। उसने मेरे जैसे इंसान को एक अच्छा इंसान बनने के लिए मजबूर कर दिया है। हालाकि मैं इसे मजबूर कर देना भी नहीं समझता क्योंकि मैं तो खुशी खुशी पूरी ईमानदारी से अपनी ज़िम्मेदारियां निभाने लगा हूं।"

मेरी बात सुन कर काकी अभी कुछ बोलने ही वाली थी कि तभी हमने देखा कि भाभी अनुराधा के कमरे से निकल कर हमारी तरफ ही आ रहीं थी। उनके पीछे अनुराधा भी थी जो सिर झुकाए और हल्की मुस्कान होठों पर सजाए चली आ रही थी। भाभी के चेहरे पर भी अलग ही तरह के खुशी के भाव नज़र आ रहे थे।

भाभी हमारे क़रीब आ कर काकी से जाने की इजाज़त मांगने लगीं तो काकी हड़बड़ाते हुए बोली कि ऐसे कैसे? अभी तो उसने उनका कोई स्वागत ही नहीं किया है। काकी के बहुत ज़ोर देने पर भाभी ने मुस्कुराते हुए सिर्फ इतना ही कहा कि वो किसी दिन फिर आएंगी और वैसे भी अब तो वो इस घर की बड़ी बेटी हैं इस लिए स्वागत करने की कोई ज़रूरत नहीं है। काकी जब इतने पर भी न मानी तो उन्होंने एक ग्लास पानी पिया और फिर मुझे इशारा कर दरवाज़े की तरफ बढ़ चलीं।

मैंने भाभी और काकी की नज़र बचा कर अनुराधा की तरफ देखा। जैसे ही हम दोनों की नज़रें मिलीं तो वो एकदम से शर्मा गई और अपनी नज़रें झुका ली। मैं उसकी यूं छुईमुई हो गई दशा को देख कर मुस्कुरा उठा और फिर ये सोच कर भाभी के पीछे चल पड़ा कि किसी दिन अकेले में तसल्ली से अपनी अनुराधा से मुलाक़ात करूंगा। कुछ ही देर में मैं भाभी को जीप में बैठाए वापस अपने गांव की तरफ चल पड़ा था।

━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━
 
अध्याय - 99

━━━━━━༻♥༺━━━━━━


मैंने भाभी और काकी की नज़र बचा कर अनुराधा की तरफ देखा। जैसे ही हम दोनों की नज़रें मिलीं तो वो एकदम से शर्मा गई और अपनी नज़रें झुका ली। मैं उसकी यूं छुईमुई हो गई दशा को देख कर मुस्कुरा उठा और फिर ये सोच कर भाभी के पीछे चल पड़ा कि किसी दिन अकेले में तसल्ली से अपनी अनुराधा से मुलाक़ात करूंगा। कुछ ही देर में मैं भाभी को जीप में बैठाए वापस अपने गांव की तरफ चल पड़ा था।

अब आगे....

"ये क्या कह रहे हैं आप?" कमरे में पलंग पर दादा ठाकुर के सामने बैठी सुगंधा देवी हैरत से बोल पड़ीं____"हमारा बेटा एक ऐसे मामूली से किसान की बेटी से प्रेम करता है जिसकी कुछ महीने पहले उसके ही भाई ने हत्या कर दी थी?"

"हमारे आदमियों के द्वारा हमें उसकी ख़बर मिलती रहती थी।" दादा ठाकुर ने कहा____"किंतु हमने ख़्वाब में भी ये कल्पना नहीं की थी कि वो मुरारी की लड़की से प्रेम भी करने लगेगा। आज गौरी शंकर से ही हमें ये सब बातें पता चली हैं।"

"अगर ये वाकई में सच है तो फिर ये काफी गंभीर बात हो गई है हमारे लिए।" सुगंधा देवी ने कहा____"हमें तो यकीन ही नहीं होता कि हमारा बेटा किसी लड़की से प्रेम कर सकता है। उसके बारे में तो अब तक हमने यही सुना था कि वो भी अपने दादा की तरह अय्याशियां करता है। ख़ैर, तो अब इस बारे में क्या सोचा है आपने और गौरी शंकर ने क्या कहा इस बारे में?"

दादा ठाकुर ने संक्षेप में सारी बातें बता दी जिसे सुन कर सुगंधा देवी ने कहा____"ठीक ही तो कह रहा था वो। भला कौन ऐसा बाप अथवा चाचा होगा जो ये जानते हुए भी अपनी बेटी का ब्याह हमारे बेटे से करने का सोचेगा कि वो किसी दूसरी लड़की से प्रेम करता है? उसका वो सब कहना पूरी तरह जायज़ है।"

"हां, और हम भी यही मानते हैं।" दादा ठाकुर ने कहा____"किंतु हमने उसे वचन दिया है कि अगले साल हम उसकी भतीजी को अपनी बहू बना कर हवेली ले आएंगे। उस लड़की ने अपने प्रेम के चलते क्या कुछ नहीं किया है वैभव के लिए। हमें उसके त्याग और बलिदान का बखूबी एहसास है इस लिए हम ये हर्गिज़ नहीं चाहेंगे कि उस मासूम और नेकदिल लड़की के साथ किसी भी तरह का कोई अन्याय हो।"

"तो फिर क्या करेंगे आप?" सुगंधा देवी की धड़कनें सहसा एक अंजाने भय की वजह से तेज़ हो गईं थी, बोलीं____"देखिए कोई ऐसा क़दम मत उठाइएगा जिसके चलते हालात बेहद नाज़ुक हो जाएं। बड़ी मुश्किल से हम सब उस सदमे से उबरे हैं इस लिए ऐसा कुछ भी मत कीजिएगा, हम आपके सामने हाथ जोड़ते हैं।"

सुगंधा देवी की बातें सुन कर दादा ठाकुर कुछ बोले नहीं किंतु किसी सोच में डूबे हुए ज़रूर नज़र आए। ये देख सुगंधा देवी की धड़कनें और भी तेज़ हो गईं। उनके अंदर एकदम से घबराहट भर गई थी।

"क...क्या सोच रहे हैं आप?" फिर उन्होंने दादा ठाकुर को देखते हुए बेचैन भाव से पूछा____"कोई कठोर क़दम उठाने के बारे में तो नहीं सोच रहे हैं ना आप? देखिए हम आपसे हाथ जोड़ कर प्रार्थना करते हैं कि ऐसा.....।"

"हम ऐसा कुछ भी नहीं सोच रहे हैं सुगंधा।" दादा ठाकुर ने उनकी बात को काट कर कहा____"बल्कि हम तो कुछ और ही सोचने लगे हैं।"

"क्या सोचने लगे हैं आप?" सुगंधा देवी ने मन ही मन राहत की सांस ली किंतु उत्सुकता के चलते पूछा_____"हमें भी तो बताइए कि आख़िर क्या चल रहा है आपके दिमाग़ में?"

"आपको याद है कुछ दिनों पहले हम कुल गुरु से मिलने गए थे?" दादा ठाकुर ने सुगंधा देवी की तरफ देखा।

"हां हां हमें अच्छी तरह याद है।" सुगंधा देवी ने झट से सिर हिलाते हुए कहा____"किंतु आपने हमारे पूछने पर भी हमें कुछ नहीं बताया था। आख़िर बात क्या है? अचानक से कुल गुरु से मिलने वाली बात का ज़िक्र क्यों करने लगे आप?"

"हम सबके साथ जो कुछ भी हुआ है उसके चलते हम सबकी दशा बेहद ही ख़राब हो गई थी।" दादा ठाकुर ने गहरी सांस ले कर कहा____"सच कहें तो अपने छोटे भाई और बेटे की मौत के बाद हमें कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि कैसे खुद को सम्हालें और अपने साथ साथ बाकी सबको भी। रातों को नींद नहीं आती थी। ऐसे ही एक रात हमें कुल गुरु का ख़याल आया। हमें एहसास हुआ कि ऐसी परिस्थिति में कुल गुरु ही हमें कोई रास्ता दिखा सकते हैं। उसके बाद हम अगली सुबह उनसे मिलने चले गए। गुरु जी के आश्रम में जब हम उनसे मिले और उन्हें सब कुछ बताया तो उन्हें भी बहुत तकलीफ़ हुई। जब वो अपने सभी शिष्यों से फारिग हुए तो वो हमें अपने निजी कक्ष में ले गए। वहां पर उन्होंने हमें बताया कि हमारे खानदान में ऐसा होना पहले से ही निर्धारित था।"

"ये क्या कह रहे हैं आप?" सुगंधा देवी खुद को बोलने से रोक न सकीं।

"हमने भी उनसे यही कहा था।" दादा ठाकुर ने कहा____"हमारे पूछने पर उन्होंने बताया कि शुरू में हमारे बड़े बेटे पर संकट था किंतु उसे बचाया जाना भी निर्धारित था, ये अलग बात है कि उस समय ऐसे हालात थे कि वो चाह कर भी कुछ न बता सके थे। बाद में जब उन्हें पता चला था कि हमने अपने बेटे को बचा लिया है तो उन्हें इस बात से खुशी हुई थी।"

"अगर उन्हें इतना ही कुछ पता था तो उन्होंने जगताप और हमारे बेटे की हत्या होने से रोकने के बारे में क्यों नहीं बताया था?" सुगंधा देवी ने सहसा नाराज़गी वाले भाव से कहा____"क्या इसके लिए भी वो कुछ करने में असमर्थ थे?"

"असमर्थ नहीं थे लेकिन उस समय वो अपने आश्रम में थे ही नहीं।" दादा ठाकुर ने कहा____"नियति के खेल बड़े ही अजीब होते हैं सुगंधा। होनी को कोई नहीं टाल सकता, खुद विधि का विधान बनाने वाला विधाता भी नहीं। उस समय कुल गुरु अपने कुछ शिष्यों के साथ अपने गुरु भाई से मिलने चले गए थे। उनके गुरु भाई अपना पार्थिव शरीर त्याग कर समाधि लेने वाले थे। अतः उनकी अंतिम घड़ी में वो उनसे मिलने गए थे। यही वजह थी कि वो यहां के हालातों से पूरी तरह बेख़बर थे। नियति का खेल ऐसे ही चलता है। होनी जब होती है तो वो सबसे पहले ऐसा चक्रव्यूह रच देती है कि कोई भी इंसान उसके चक्रव्यूह को भेद कर उसके मार्ग में अवरोध पैदा नहीं कर सकता। यही हमारे साथ हुआ है।"

"तो आप कुल गुरु से यही सब जानने गए थे?" सुगंधा देवी ने पूछा____"या कोई और भी वजह थी उनसे मिलने की?"

"जैसा कि हमने आपको बताया कि जिस तरह के हालातों में हम सब थे।" दादा ठाकुर ने कहा____"उससे निकलने का हमें कुल गुरु ही कोई रास्ता दिखा सकते थे। अतः जब हम उनसे अपनी हालत के बारे में बताया तो उन्होंने हमें तरह तरह की दार्शनिक बातों के द्वारा समझाया जिसके चलते यकीनन हमें बड़ी राहत महसूस हुई। उसके बाद जब हमने उनसे ये पूछा कि क्या अब आगे भी ऐसा कोई संकट हम सबके जीवन में आएगा तो उन्होंने हमें कुछ ऐसी बातें बताई जिन्हें सुन कर हम अवाक् रह गए थे।"

"ऐसा क्या बताया था उन्होंने आपसे?" सुगंधा देवी के माथे पर शिकन उभर आई।

"उन्होंने बताया कि इस तरह का संकट तो फिलहाल अब नहीं आएगा लेकिन आगे चल कर एक ऐसा समय भी आएगा जिसके चलते हम काफी विचलित हो सकते हैं।" दादा ठाकुर ने गंभीरता से कहा____"और अगर हमने विचलित हो कर कोई कठोर क़दम उठाया तो उसके नतीजे हम में से किसी के लिए भी ठीक नहीं होंगे।"

"आप क्या कह रहे हैं हमें कुछ समझ नहीं आ रहा।" सुगंधा देवी ने उलझन पूर्ण भाव से कहा____"कृपया साफ साफ बताइए कि आख़िर कुल गुरु ने किस बारे में आपसे ये सब कहा था?"

"हमारे बेटे वैभव के बारे में।" दादा ठाकुर ने स्पष्ट भाव से कहा_____"गुरु जी ने स्पष्ट रूप से हमें बताया था कि हमारे बेटे वैभव के जीवन में दो ऐसी औरतों का योग है जो आने वाले समय में उसकी पत्नियां बनेंगी।"

"हे भगवान! ये क्या कह रहे हैं आप?" सुगंधा देवी आश्चर्य से आंखें फैला कर बोलीं____"ऐसा कैसे हो सकता है भला?"

"ऐसा कैसे हो सकता है नहीं बल्कि ऐसा होने लगा है सुगंधा।" दादा ठाकुर ने कहा____"वर्तमान में ऐसा ही तो हो रहा है। जहां एक तरफ हमने अपने बेटे का ब्याह हरि शंकर की बेटी रूपा से तय किया है तो वहीं दूसरी तरफ हमें पता चलता है कि हमारा बेटा किसी दूसरी लड़की से प्रेम भी करता है। ज़ाहिर है कि जब वो उस लड़की से प्रेम करता है तो उसने उसको अपनी जीवन संगिनी बनाने के बारे में भी सोच रखा होगा। अब अगर हमने उसके प्रेम संबंध को मंजूरी दे कर उस लड़की से उसका ब्याह न किया तो यकीनन हमारा बेटा हमारे इस कार्य से नाखुश हो जाएगा और संभव है कि वो कोई ऐसा रास्ता अख़्तियार कर ले जिसके बारे में हम अभी सोच भी नहीं सकते।"

"ये तो सच में बड़ी गंभीर बात हो गई है।" सुगंधा देवी ने चकित भाव से कहा____"यानि कुल गुरु का कहना सच हो रहा है।"

"अगर गौरी शंकर की बातें सच हैं।" दादा ठाकुर ने कहा____"और हमारा बेटा वाकई में मुरारी की लड़की से प्रेम करता है तो यकीनन गुरु जी का कहना सच हो रहा है।"

"तो फिर अब आप क्या करेंगे?" सुगंधा देवी ने संदिग्ध भाव से दादा ठाकुर को देखते हुए पूछा____"क्या आप हमारे बेटे के प्रेम को मंजूरी दे कर गुरु जी की बात मानेंगे या फिर कोई कठोर क़दम उठाएंगे?"

"आपके क्या विचार हैं इस बारे में?" दादा ठाकुर ने जवाब देने की जगह उल्टा सवाल करते हुए पूछा____"क्या आपको अपने बेटे के जीवन में उसकी दो दो पत्नियां होने पर कोई एतराज़ है या फिर आप ऐसा खुशी खुशी मंज़ूर कर लेंगी?"

"अगर आप वाकई में हमारे विचारों के आधार पर ही फ़ैसला लेना चाहते हैं।" सुगंधा देवी ने संतुलित लहजे से कहा____"तो हमारे विचार यही हैं कि हमारा बेटा जो करना चाहता है उसे आप करने दें। अगर उसके भाग्य में दो दो पत्नियां ही लिखी हैं तो यही सही। हम तो बस यही चाहते हैं कि इस हवेली में रहने वालों के जीवन में अब कभी कोई दुख या संकट न आए बल्कि हर कोई खुशी से जिए। आपने हरि शंकर की बेटी से वैभव का रिश्ता तय कर दिया है तो बेशक उसका ब्याह उससे कीजिए लेकिन अगर हमारा बेटा मुरारी की बेटी से भी ब्याह करना चाहेगा तो आप उसकी भी खुशी खुशी मंजूरी दे दीजिएगा।"

"अगर आप भी यही चाहती हैं तो ठीक है फिर।" दादा ठाकुर ने गहरी सांस ली____"सच कहें तो हम भी सबको खुश ही देखना चाहते हैं। मुरारी की बेटी से हमारे बेटे की ब्याह के बारे में लोग क्या सोचेंगे इससे हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। हम सिर्फ ये चाहते हैं कि उस लड़की के प्रेम में पड़ कर हमारा बेटा रूपा के साथ किसी तरह का अन्याय अथवा पक्षपात न करे। हमें अक्सर वो रात याद आती है जब वो लड़की अपनी भाभी के साथ हमसे मिलने आई थी और हमें ये बताया था कि हमारे बेटे को कुछ लोग अगली सुबह जान से मारने के लिए चंदनपुर जाने वाले हैं। उस समय हमें उसकी वो बातें सुन कर थोड़ा अजीब तो ज़रूर लगा था लेकिन ये नहीं समझ पाए थे कि आख़िर उस लड़की को रात के वक्त हवेली आ कर हमें वो सब बताने की क्या ज़रूरत थी? आज जबकि हम सब कुछ जानते हैं तो यही सोचते हैं कि ऐसा उसने सिर्फ अपने प्रेम के चलते ही किया था। प्रेम करने वाला भला ये कैसे चाह सकता है कि कोई उसके चाहने वाले को किसी भी तरह का नुकसान पहुंचा दे?"

"सही कह रहे हैं आप?" सुगंधा देवी ने कहा____"सच में वो लड़की हमारे बेटे से बहुत प्रेम करती है। हमें आश्चर्य होता है कि इतना प्रेम करने वाली लड़की से हमारे बेटे को प्रेम कैसे न हुआ और हुआ भी तो ऐसी लड़की से जो एक मामूली से किसान की बेटी है। आख़िर उस लड़की में उसने ऐसा क्या देखा होगा जिसके चलते वो उसे प्रेम करने लगा?"

"इस बारे में हमें क्योंकि कोई जानकारी नहीं है सुगंधा।" दादा ठाकुर ने कहा____"इस लिए हम यही कह सकते कि उसने उसमें ऐसा क्या देखा होगा? जबकि गहराई से सोचें तो हमें एहसास होगा कि उस लड़की में कोई तो ऐसी बात यकीनन रही होगी जिसके चलते वैभव जैसे लड़के को उससे प्रेम हो गया? उसके जैसे चरित्र वाला लड़का अगर किसी लड़की से प्रेम कर बैठा है तो ये कोई मामूली बात नहीं है ठकुराईन। हमें पूरा यकीन है कि उस लड़की में कोई तो ख़ास बात ज़रूर होगी।"

"ख़ैर ये तो आने वाला समय ही बताएगा कि उसमें कौन सी ख़ास बात है।" सुगंधा देवी ने जैसे पहलू बदला_____"किंतु अब ये सोचने का विषय है कि गौरी शंकर इस सबके बाद क्या चाहता है?"

"इस संसार में किसी के चाहने से कहां कुछ होता है सुगंधा।" दादा ठाकुर ने कहा_____"हर इंसान को समझौता ही करना पड़ता है और फिर उस समझौते के साथ जीवन जीना पड़ता है। गौरी शंकर को अपनी भतीजी के प्रेम के साथ साथ हमारे बेटे के प्रेम को भी गहराई से समझना होगा। उसे समझना होगा कि पत्नी के रूप में उसकी भतीजी हमारे बेटे के साथ तभी खुश रह पाएगी जब उसकी तरह हमारे बेटे को भी उसका प्रेम मिल जाए। बाकी ऊपर वाले ने किसी के लिए क्या सोच रखा है ये तो वही जानता है।"

"ये सब तो ठीक है लेकिन सबकी खुशियों के बीच आप एक शख़्स की खुशियों को भूल रहे हैं।" सुगंधा देवी ने कहा____"आप हमारी बहू को भूल रहे हैं ठाकुर साहब। उस अभागन की खुशियों को भूल रहे हैं जिसका ईश्वर ने जीवन भर दुख में डूबे रहने का ही नसीब बना दिया है। क्या उसे देख कर आपके कलेजे में शूल नहीं चुभते?"

"चुभते हैं सुगंधा और बहुत ज़ोरों से चुभते हैं।" दादा ठाकुर ने संजीदा भाव से कहा____"जब भी उसे विधवा के लिबास में किसी मुरझाए हुए फूल की तरह देखते हैं तो बड़ी तकलीफ़ होती है हमें। हमारा बस चले तो पलक झपकते ही दुनिया भर की खुशियां उसके दामन में भर दें लेकिन क्या करें? कुछ भी तो हमारे हाथ में नहीं है।"

"ऐसा क्यों कह रहे हैं आप?" सुगंधा देवी ने कहा____"क्या कुल गुरु से आपने हमारी बहू के बारे में कुछ नहीं पूछा?"

"क्या आप ऐसा सोच सकती हैं कि हम उनसे अपनी बहू के बारे में पूछना भूल सकते थे?" दादा ठाकुर ने कहा____"नहीं सुगंधा, वो हमारी बहू ही नहीं बल्कि हमारी बेटी भी है। हमारी शान है, हमारा गुरूर है वो। कुल गुरु से हमने उसके बारे में भी पूछा था। जवाब में उन्होंने जो कुछ हमसे कहा उससे हम स्तब्ध रह गए थे।"

"क्या मतलब है आपका?" सुगंधा देवी ने एकाएक व्याकुल भाव भाव से पूछा____"ऐसा क्या कहा था गुरु जी ने आपसे?"

"पहले तो उन्होंने हमसे बहुत ही सरल शब्दों में पूछा था कि क्या हम चाहते हैं कि हमारी बहू हमेशा खुश रहे और हमेशा हमारे साथ ही रहे?" दादा ठाकुर ने कहा_____"जवाब में जब हमने हां कहा तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि हम उसका ब्याह अपने बेटे वैभव से कर दें।"

"क...क्या????" सुगंधा देवी उछल ही पड़ीं। फिर किसी तरह खुद को सम्हाल कर बोलीं____"य..ये क्या कह रहे हैं आप?"

"आपकी तरह हम भी उनकी बात सुन कर उछल पड़े थे।" दादा ठाकुर ने कहा____"हमने भी उनसे यही कहा था कि ये क्या कह रहे हैं वो? जवाब में उन्होंने कहा कि हमारी बहू सुहागन के रूप में तभी तो हमेशा हमारे साथ रह सकती है जब हम उसका ब्याह अपने बेटे वैभव से कर दें। अन्यथा अगर हम उसे फिर से सुहागन बनाने का सोच कर किसी दूसरे से उसका ब्याह करेंगे तो ऐसे में वो भला कैसे हमारे साथ हमारी बहू के रूप में रह सकती है?"

"हां ये तो सच कहा था उन्होंने।" सुगंधा देवी ने गहरी सांस छोड़ते हुए सिर हिलाया____"वाकई में सुहागन के रूप में हमारी बहू हमारे पास तभी तो रह सकती है जब उसका ब्याह हमारे ही बेटे से हो। बड़ी अजीब बात है, ऐसा तो हमने सोचा ही नहीं था।"

"हमने भी कहां सोचा था सुगंधा।" दादा ठाकुर ने कहा____"गुरु जी की बातों से ही हमारे अकल के पर्दे छंटे थे। काफी देर तक हम उनके सामने किंकर्तव्यविमूढ़ सी हालत में बैठे रह गए थे। फिर जब किसी तरह हमारी हालत सामान्य हुई तो हमने गुरु जी से पूछा कि क्या ऐसा संभव है तो उन्होंने कहा बिल्कुल संभव है लेकिन इसके लिए हमें बहुत ही समझदारी से काम लेना होगा।"

"हमारा तो ये सब सुन के सिर ही चकराने लगा है ठाकुर साहब।" सुगंधा देवी ने अपना माथा सहलाते हुए कहा____"तो क्या इसी लिए गुरु जी ने कहा था कि हमारे बेटे के जीवन में दो औरतें उसकी पत्नी के रूप में आएंगी?"

"हां शायद इसी लिए।" दादा ठाकुर ने सिर हिलाया____"उस दिन से हम अक्सर इस बारे में सोचते हैं और समझने की कोशिश करते हैं कि क्या वास्तव में हमें ऐसा करना चाहिए या नहीं?"

"क्या मतलब है आपका?" सुगंधा देवी ने हैरत से देखते हुए कहा____"क्या आप भाग्य बदल देने का सोच रहे हैं?"

"सीधी सी बात है ठकुराईन कि अगर हम अपनी बहू को एक सुहागन के रूप में हमेशा खुश देखना चाहते हैं तो हमें उसके लिए कुछ तो करना ही पड़ेगा।" दादा ठाकुर ने कहा____"रागिनी जैसी बहू अथवा बेटी हमें शायद ही कहीं मिले इस लिए अगर हम चाहते हैं कि ऐसी बहू हमेशा इस हवेली की शान ही बनी रहे तो हमें किसी तरह से उसका ब्याह वैभव से करवाना ही होगा।"

"लेकिन क्या ऐसा संभव है?" सुगंधा देवी ने बेयकीनी से देखा____"हमारा मतलब है कि क्या हमारी बहू अपने देवर से ब्याह करने के लिए राज़ी होगी? वो तो वैभव को अपना देवर ही नहीं बल्कि अपना छोटा भाई भी मानती है और हमारा बेटा भी तो उसकी बहुत इज्ज़त करता है। माना कि वो बुरे चरित्र का लड़का रहा है लेकिन हमें पूरा यकीन है कि उसने भूल कर भी अपनी भाभी के बारे में कभी ग़लत ख़याल अपने मन में नहीं लाया होगा। दूसरी बात, आप ही ने बताया कि वो मुरारी की लड़की से प्रेम करता है तो ऐसे में वो कैसे अपनी भाभी से ब्याह करने वाली बात को मंजूरी देगा? नहीं नहीं, हमें नहीं लगता कि ऐसा संभव होगा? एक पल के लिए मान लेते हैं कि हमारा बेटा इसके लिए राज़ी भी हो जाएगा लेकिन रागिनी...?? नहीं, वो कभी ऐसा करने के लिए राज़ी नहीं होगी। वैसे भी, गुरु जी ने दो ही औरतों को पत्नी के रूप में उसके जीवन में आने की बात कही थी तो वो दो औरतें वही हैं, यानि रूपा और मुरारी की वो लड़की।"

"आपने तो बिना कोशिश किए ही फ़ैसला कर लिया कि वो राज़ी नहीं होगी।" दादा ठाकुर ने कहा____"जबकि आपको बहाने से ही सही लेकिन उसके मन की टोह लेनी चाहिए और रही गुरु जी की कही ये बात कि दो ही औरतें उसकी पत्नी के रूप में आएंगी तो ये ज़रूरी नहीं है। हमारा मतलब है कि रागिनी बहू का ब्याह वैभव से कर देने के बात भी तो उन्होंने कुछ सोच कर ही कही होगी।"

"ये सब तो ठीक है लेकिन बहू के मन की टोह लेने की बात क्यों कह रहे हैं आप? क्या आपको उसके चरित्र पर संदेह है?" सुगंधा देवी ने बेयकीनी से कहा____"जबकि हमें तो अपनी बहू के चरित्र पर हद से ज़्यादा भरोसा है। हम अच्छी तरह जानते हैं कि हमारी बहू उत्तम चरित्र वाली महिला है।"

"आप भी हद करती हैं ठकुराईन।" दादा ठाकुर ने गहरी सांस ली____"आपने ये कैसे सोच लिया कि हमें अपनी बहू के चरित्र पर संदेह है? एक बात आप जान लीजिए कि अगर कोई गर्म तवे पर बैठ कर भी कहेगा कि हमारी बहू का चरित्र निम्न दर्जे का है तो हम उस पर यकीन नहीं करेंगे। बल्कि ऐसा कहने वाले को फ़ौरन ही मौत के घाट उतार देंगे। टोह लेने से हमारा मतलब सिर्फ यही था कि उसके मन में अपने देवर के प्रति अगर छोटे भाई वाली ही भावना है तो वो कितनी प्रबल है? हालाकि एक सच ये भी है कि किसी को छोटा भाई मान लेने से वो सचमुच का छोटा भाई नहीं बन जाता। वैभव सबसे पहले उसका देवर है और देवर से भाभी का ब्याह हो जाना कोई ऐसी बात नहीं है जो न्यायोचित अथवा तर्कसंगत न हो।"

"हम मान लेते हैं कि आपकी बातें अपनी जगह सही हैं।" सुगंधा देवी ने कहा____"लेकिन ये तो आप भी समझते ही होंगे कि हमारे बेटे वैभव से रागिनी बहू का ब्याह होना अथवा करवाना लगभग नामुमकिन बात है। एक तो रागिनी खुद इसके लिए राज़ी नहीं होगी दूसरे उसके अपने माता पिता भी इस रिश्ते के लिए मंजूरी नहीं दे सकते हैं।"

"हां, हम समझते हैं कि ऐसा होना आसान नहीं है।" दादा ठाकुर ने गहरी सांस ले कर सिर हिलाया____"लेकिन हम ये भी समझते हैं कि अगर हमें अपनी बहू का जीवन खुशियों से भरा हुआ देखना है तो उसके लिए ऐसा करना ही बेहतर होगा। ऐसा होना नामुमकिन ज़रूर है लेकिन हमें किसी भी तरह से अब इसे मुमकिन बनाना होगा। वैभव के जीवन में दो की जगह अगर तीन तीन पत्नियां हो जाएंगी तो कोई पहाड़ नहीं टूट जाएगा।"

"हमारे मन में एक और विचार उभर रहा है ठाकुर साहब।" सुगंधा देवी ने सहसा कुछ सोचते हुए कहा____"हम ये जो कुछ अपनी बहू के लिए करना चाहते हैं उसमें यकीनन हमें उसकी खुशियों का ही ख़याल है किंतु ये भी सच है कि इसमें हमारा भी तो अपना स्वार्थ है।"

"य...ये क्या कह रही हैं आप?" दादा ठाकुर के चेहरे पर हैरानी के भाव उभरे____"इसमें भला हमारा क्या स्वार्थ है?"

"इतना तो आप भी समझते हैं न कि रागिनी बहू हम सबकी नज़र में एक बहुत ही गुणवान स्त्री है जिसके चलते हम उसे इस हवेली की शान समझते हैं।" सुगंधा देवी ने जैसे भूमिका बनाते हुए कहा____"अब क्योंकि वो विधवा हो चुकी है इस लिए हम उसकी खुशियों के लिए फिर से उसका ब्याह कर देना चाहते हैं।"

"आख़िर आपके कहने का मतलब क्या है ठकुराईन?" दादा ठाकुर न चाहते हुए भी बीच में बोल पड़े____"हम उसे खुश देखना चाहते हैं तभी तो फिर से उसका ब्याह का करवा देना चाहते हैं।"

"बिल्कुल, लेकिन उसका ब्याह अपने बेटे से ही क्यों करवा देना चाहते हैं हम?" सुगंधा देवी ने जैसे तर्क़ किया____"क्या इसका एक मतलब ये नहीं है कि ऐसा हम अपने स्वार्थ के चलते ही करना चाहते हैं? ऐसा भी तो हो सकता है कि जब वो दुबारा अपने ब्याह होने की बात सुने तो उसके मन में कहीं और किसी दूसरे व्यक्ति से ब्याह करने की चाहत पैदा हो जाए। क्या ज़रूरी है कि वो फिर से उसी घर में बहू बन कर रहने की बात सोचे जिस घर में उसके पहले पति की ढेर सारी यादें मौजूद हों और इतना ही नहीं जिसे भरी जवानी में विधवा हो जाने का दुख सहन करना पड़ गया हो?"

सुगंधा देवी की ऐसी बातें सुन कर दादा ठाकुर फ़ौरन कुछ बोल ना सके। स्तब्ध से वो अपनी धर्म पत्नी के चेहरे की तरफ देखते रह गए। चेहरे पर सोचो के भाव उभर आए थे।

"क्या हुआ? क्या सोचने लगे आप?" दादा ठाकुर को ख़ामोश देख सुगंधा देवी ने कहा____"क्या हमने कुछ ग़लत कहा आपसे?"

"नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं है।" दादा ठाकुर ने जल्दी ही खुद को सम्हाला____"आपके जो कुछ भी कहा है वो बिल्कुल सच कहा है और आपकी बातें तर्कसंगत भी हैं। हमने तो इस तरीके से सोचा ही नहीं था। हमें खुशी के साथ साथ हैरानी भी हो रही है कि आपने इस तरीके से सोचा और हमारे सामने अपनी बात रखी। वाकई में ये भी सोचने वाली बात है कि अगर हमारी बहू को इस बारे में पता चला तो उसके मन में कहीं दूसरी जगह किसी दूसरे व्यक्ति से भी विवाह करने का ख़याल आ सकता है।"

"और अगर ऐसा हुआ।" सुगंधा देवी ने कहा____"तो सबसे बड़ा सवाल है कि क्या आप ऐसा होने देंगे?"

"क्यों नहीं होने देंगे हम?" दादा ठाकुर ने झट से कहा____"हम अपनी बहू को खुश देखना चाहते हैं इस लिए अगर उसे दूसरी जगह किसी दूसरे व्यक्ति से विवाह करने से ही खुशी प्राप्त होगी तो हम यकीनन उसकी खुशी के लिए उसे ऐसा करने देंगे। हां, इस बात का हमें दुख ज़रूर होगा कि हमने अपनी इतनी संस्कारवान सुशील और अच्छे चरित्र वाली बहू को खो दिया। वैसे हमें पूरा यकीन है कि हमारी बहू हमसे रिश्ता तोड़ कर कहीं नहीं जाएगी। वो भी तो समझती ही होगी कि हम सब उसे कितना स्नेह करते हैं और हम उसे इस हवेली की शान समझते हैं। क्या इतना जल्दी वो हमारा प्यार और स्नेह भुला कर हमें छोड़ कर चली जाएगी?"

"सही कह रहे हैं आप।" सुगंधा देवी ने गहरी सांस ली____"हमें भी इस बात का भरोसा है कि हमारी बहू हमारे प्रेम और स्नेह को ठुकरा कर कहीं नहीं जाएगी। ख़ैर छोड़िए इन बातों को। सब कुछ समय पर छोड़ दीजिए और ऊपर वाले से दुआ कीजिए कि सब कुछ अच्छा ही हो।"

सुगंधा देवी की इस बात पर दादा ठाकुर ने सिर हिलाया और फिर उन्होंने पलंग पर पूरी तरह लेट कर अपनी आंखें बंद कर लीं। कुछ पलों तक उनके चेहरे की तरफ देखते रहने के बाद सुगंधा देवी भी पलंग के एक छोर पर लेट गईं। दोनों ने ही अपनी अपनी आंखें बंद कर ली थीं किंतु ज़हन में विचारों का मंथन चालू था।

━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━
 
अध्याय - 100

━━━━━━༻♥༺━━━━━━



मैं और भाभी जीप में बैठे आगे बढ़े चले जा रहे थे। मैं धीमी गति से ही जीप चला रहा था। जब से भाभी जीप में बैठीं थी तब से वो ख़ामोश थीं और ख़यालों में खोई हुई थीं। मैं बार बार उनकी तरफ देख रहा था। वो कभी हौले से मुस्कुरा देती थीं तो कभी फिर कुछ सोचने लगती थीं। इधर मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। मैं उनसे जानना चाहता था कि आख़िर उन्होंने अनुराधा से क्या बातें की थीं?

"आख़िर कुछ तो बताइए भाभी।" जब मुझसे बिल्कुल ही न रहा गया तो मजबूर हो कर मैंने उनसे पूछा____"मैं काफी देर से देख रहा हूं कि आप जाने क्या सोच सोच कर बस मुस्कुराए जा रही हैं। मुझे भी तो कुछ बताइए। मैं जानना चाहता हूं कि आपने अनुराधा से क्या बातें की अकेले में?"

"आय हाय! देखो तो सबर ही नहीं हो रहा जनाब से।" भाभी ने एकदम से मुस्कुराते हुए मुझे छेड़ा____"वैसे क्या जानना चाहते हो तुम?"

"वही जो आपने अकेले में उससे बातें की हैं।" मैं उनके छेड़ने पर पहले तो झेंप गया था फिर मुस्कुराते हुए पूछा____"आख़िर कुछ तो बताइए। अकेले में ऐसी क्या बातें की हैं आपने?"

"अगर मैं ये कहूं कि वो सब बातें तुम्हें बताने लायक नहीं हैं तो?" भाभी ने मुस्कुराते हुए तिरछी नज़र से मुझे देखा____"तुम्हें तो पता ही होगा कि हम औरतों के बीच भी बहुत सी ऐसी बातें होती हैं जिन्हें मर्दों को नहीं बताई जा सकतीं।"

"ये बहुत ग़लत बात है भाभी।" मैंने बुरा सा मुंह बनाते हुए कहा____"आपको मुझे छेड़ना ही है तो बाद में छेड़ लीजिएगा लेकिन अभी बताइए ना कि आपने उससे क्या बातें की हैं? आपको अंदाज़ा भी नहीं है कि उतनी देर से सोच सोच कर मेरी क्या हालत हुई जा रही है?"

मेरी ये बात सुनते ही भाभी एकदम से खिलखिला कर हंसने लगीं। हंसने से उनके सच्चे मोतियों जैसे दांत चमकने लगे और उनकी मधुर आवाज़ फिज़ा में मीठा संगीत सा बजाने लगी। उन्हें हंसता देख मुझे बहुत अच्छा लगा। यही तो चाहता था मैं कि वो अपने सारे दुख दर्द भूल कर बस हंसती मुस्कुराती रहें।

"अच्छा एक काम करो।" फिर उन्होंने अपनी हंसी को रोकते हुए किंतु मुस्कुराते हुए ही कहा____"तुम अपनी अनुराधा से ही पूछ लेना कि हमारी आपस में क्या बातें हुईं थी?"

"बहुत ज़ालिम हैं आप, सच में।" मैंने फिर से बुरा सा मुंह बना कर कहा____"आज तक किसी लड़की अथवा औरत में इतनी हिम्मत नहीं हुई थी कि वो मुझे आपके जैसे इस तरह सताने का सोचे भी।"

"तुम ये भूल रहे हो वैभव कि मैं कौन हूं?" भाभी ने कहा____"आज तक तुम्हारे जीवन में जो भी लड़कियां अथवा औरतें आईं थी वो सब ग़ैर थीं और निम्न दर्जे की सोच रखने वाली थीं जबकि मैं तुम्हारी भाभी हूं। दादा ठाकुर की बहू हूं मैं। क्या तुम मेरी तुलना उन ग़ैर लड़कियों से कर रहे हो?"

"नहीं नहीं भाभी।" मैंने हड़बड़ा कर झट से कहा____"मैं आपकी तुलना किसी से भी करने के बारे में सोच तक नहीं सकता। मैंने तो ऐसा सिर्फ मज़ाक में कहा था वरना आप भी जानती हैं कि आपके प्रति मेरे मन में कितनी इज्ज़त है।"

"हां जानती हूं मैं।" भाभी ने सहसा गंभीर हो कर कहा____"और मुझे खुशी है कि तुम मेरे प्रति ऐसे भाव रखते हो। मुझे पता है कि तुम मेरे होठों पर मुस्कुराहट लाने के लिए नए नए तरीके अपनाते हो। सच कहूं तो मुझे तुम्हारा ऐसा करना अच्छा भी लगता है। मुझे गर्व महसूस होता है कि तुम्हारे जैसा लड़का मेरा देवर ही नहीं बल्कि मेरा छोटा भाई भी है। मेरे लिए सबसे ज़्यादा खुशी की बात ये है कि तुम खुद को बदल कर एक अच्छा इंसान बनने की राह पर चल रहे हो। तुम हमेशा एक अच्छे इंसान बने रहो यही मेरी तमन्ना है और इसी से मुझे खुशी महसूस होगी।"

"फ़िक्र मत कीजिए भाभी।" मैंने कहा____"मैं हमेशा आपकी उम्मीदों पर खरा उतरूंगा और आपकी खुशी का ख़याल रखूंगा।"

"और अनुराधा तथा रूपा की खुशी का ख़याल कौन रखेगा?" भाभी ने मुस्कुराते हुए मुझे फिर से छेड़ा_____"मत भूलो कि अगले साल दो दो बीवियों के बीच फंस जाने वाले हो तुम। फिर मैं भी देखूंगी कि दोनों की खुशियों का कितना ख़याल रख पाते हो तुम।"

"अरे! इसमें कौन सी बड़ी बात है भाभी।" मैंने बड़े गर्व से कहा____"इस मामले में तो मुझे बहुत लंबा तज़ुर्बा है। दोनों को एक साथ खुश रखने की क्षमता है मुझमें।"

"ज़्यादा उड़ो मत।" भाभी ने मुझे घूरते हुए कहा____"जिस दिन बीवियों के बीच हमेशा के लिए फंस जाओगे न तब समझ आएगा कि बाहर की औरतों को और अपनी बीवियों को खुश रखने में कितना फ़र्क होता है।"

"आप तो बेवजह ही डरा रही हैं मुझे।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"ये मत भूलिए कि आपके सामने ठाकुर वैभव सिंह बैठे हैं।"

"अच्छा जी ऐसा है क्या?" भाभी ने आंखें फैला कर मेरी तरफ देखा____"फिर तो अनुराधा से ब्याह करने के लिए तुम्हें अपनी इस भाभी की मदद की कोई ज़रूरत ही नहीं हो सकती, है ना?"

"य...ये आप क्या कह रही हैं भाभी?" मैं बुरी तरह हड़बड़ा गया, बोला____"आपकी मदद के बिना तो मेरी नैया पार ही नहीं हो सकती। कृपया ऐसी बातें न करें जिससे मेरी धड़कनें ही रुक जाएं।"

मेरी बात सुन कर भाभी एक बार फिर से खिलखिला कर हंस पड़ीं। इधर मैं अपना मुंह लटकाए रह गया। मेरी सारी अकड़ छू मंतर हो गई थी। उन्होंने मेरी कमज़ोर नस पर वार जो कर दिया था। ख़ैर मैं विषय को बदलने की गरज से उनसे फिर ये पूछने लगा कि उनकी अनुराधा से क्या बातें हुईं हैं लेकिन भाभी ने कुछ नहीं बताया मुझे। बस यही कहा कि मैं अगर इतना ही जानने के लिए उत्सुक हूं तो अनुराधा से ही पूछूं। भाभी मेरी हालत का पूरा लुत्फ़ उठा रहीं थी और ये बात मैं बखूबी समझता था। ख़ैर मुझे उनके न बताने से ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ रहा था, अलबत्ता इस बात की खुशी थी कि इस सफ़र में भाभी खुश थीं। ऐसी ही नोक झोंक भरी बातें करते हुए हम हवेली पहुंच गए।

✮✮✮✮

रूपचंद्र को अपने कमरे में दाखिल होता देख रूपा पहले तो चौंकी फिर सम्हल कर बैठ गई। आज काफी समय बाद उसके बड़े भाई ने उसके कमरे में क़दम रखा था। दोनों की उमर में सिर्फ डेढ़ साल का अंतर था। हालाकि दोनों को देखने से यही लगता था जैसे दोनों ही जुड़वा हों। एक वक्त था जब दोनों भाई बहन का आपस में बड़ा ही प्रेम और लगाव था।

बचपन से ही दोनों एक साथ खेल कूद कर बड़े हुए थे। बढ़ती उम्र के साथ जैसे जैसे दोनों में समझदारी आती गई वैसे वैसे दोनों एक दूसरे का छोटा बड़ा होने के नाते आदर और सम्मान करने लगे थे। रूपा वैसे भी एक लड़की थी इस लिए उसे अपनी मर्यादा में ही रहने की नसीहतें मिलती रहती थीं किंतु रूपचंद्र के मन में हमेशा से ही अपनी छोटी बहन रूपा के लिए विशेष लगाव और स्नेह था। फिर जब रूपचंद्र को अपनी बहन रूपा का वैभव के साथ बने संबंध का पता चला तो वो रूपा से बहुत नाराज़ हुआ। एक झटके में अपनी बहन से उसका बचपन का लगाव और स्नेह जाने कहां गायब हो गया और उसकी जगह नाराज़गी के साथ साथ गुस्सा भी भरता चला गया। उसे लगता था कि उसकी बहन ने वैभव के साथ ऐसा संबंध बना कर बहुत ही नीच और गिरा हुआ कार्य किया है और साथ ही खानदान की इज्ज़त को दाग़दार किया है। उसने ये समझने की कभी कोशिश ही नहीं की थी कि उसकी बहन ने अगर ऐसा किया था तो सिर्फ अपने प्रेम को साबित करने के चलते किया था।

आज मुद्दतों बाद रूपचंद्र को अपने कमरे में दाखिल होते देख रूपा चौंकी तो थी ही किंतु एक अपराध बोझ के चलते उसने अपना सिर भी झुका लिया था। ये अलग बात है कि अपने भाई के प्रति उसके मन में भी नाराज़गी और गुस्सा विद्यमान था। उधर रूपचंद्र कमरे में दाखिल हुआ और फिर अपनी बहन की तरफ ध्यान से देखने लगा। उसने देखा रूपा उसकी तरफ देखने से कतरा रही थी। ये देख उसके दिल में एक हूक सी उठी जिसके चलते कुछ पल के लिए उसके चेहरे पर वेदना के चिन्ह उभरते नज़र आए। उसने ख़ामोशी से पलट कर दरवाज़े को अंदर से कुंडी लगा कर बंद किया और फिर उसी ख़ामोशी के साथ पलंग के एक कोने में सिमटी बैठी रूपा की तरफ बढ़ चला। जल्दी ही वो उसके क़रीब पहुंच गया। कुछ पलों तक वो रूपा को निहारता रहा और फिर आहिस्ता से पलंग के किनारे बैठ गया।

"मैं जानता हूं कि तू अपने इस भाई से बहुत नाराज़ है।" फिर उसने अधीरता से उसकी तरफ देखते हुए कहा____"और नाराज़ होना भी चाहिए। मैंने कभी भी तुझे समझने की कोशिश नहीं की बल्कि ये कहूं तो ज़्यादा बेहतर होगा कि मैंने तुझे समझने के बारे में सोचा तक नहीं। तुझे कहने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि आज मुद्दतों बाद मुझे खुद ही ये एहसास हो रहा है कि मैंने अपनी उस बहन को कभी नहीं समझा जिसे कभी मैं बहुत प्रेम करता था और जो कभी मेरी धड़कन हुआ करती थी। मैंने हमेशा वैभव के साथ तेरे संबंध को ग़लत नज़रिए से सोचा और तेरे बारे में तरह तरह की ग़लत धारणाएं बनाता रहा। शायद यही वजह थी कि मेरे अंदर तेरे लिए नाराज़गी और गुस्सा हमेशा ही कायम रहा। जबकि मुझे समझना चाहिए था और सबसे बड़ी बात तुझ पर भरोसा करना चाहिए था। मुझे समझना चाहिए था कि जब किसी इंसान को किसी से प्रेम हो जाता है तो वो उसके लिए पूरी तरह समर्पित हो जाता है। वो अपना सब कुछ अपने प्रेम में न्यौछावर कर देता है, क्योंकि उसकी नज़र में उसका अपने आप पर कोई अधिकार ही नहीं रह जाता है। काश! इतनी सी बात मैं पहले ही समझ गया होता तो मैं तेरे बारे में कभी ग़लत न सोचता और ना ही तुझसे नाराज़ रहता। मुझे माफ़ कर दे मेरी बहन। मैं तेरा गुनहगार हूं। कई दिनों से तेरे पास आ कर तुझसे माफ़ी मांगना चाहता था मगर शर्मिंदगी के चलते हिम्मत ही नहीं होती थी। आज बहुत हिम्मत जुटा कर तेरे पास आया हूं। मैं जानता हूं कि मेरी मासूम बहन का दिल बहुत बड़ा है और वो अपने इस नासमझ भाई को झट से माफ़ कर देगी।"

"भ...भैया!!" रूपचंद्र की बात ख़त्म हुई ही थी कि रूपा एकदम से रोते हुए किसी बिजली की तरह आई और रूपचंद्र के गले से लिपट गई। उसकी आंखों से मोटे मोटे आंसुओं की धारा बहने लगी थी। रूपचंद्र खुद भी अपनी आंखें छलक पड़ने से रोक न सका। उसने रूपा को अपने सीने से इस तरह छुपका लिया जैसे कोई मां अपने छोटे से बच्चे को अपने सीने से छुपका लेती है।

"आह! आज मुद्दतों बाद तुझे अपने सीने से लगा कर तेरे इस भाई को बड़ा ही सुकून मिल रहा है रूपा।" रूपचंद्र ने रुंधे गले से कहा____"इतने समय से मेरा जलता हुआ हृदय एकदम से ठंडा पड़ गया सा महसूस हो रहा है।"

"मैं भी ऐसा ही महसूस कर रही हूं भैया।" रूपा ने सिसकते हुए कहा____"आप नहीं समझ सकते कि आज आपके इस तरह मुझे अपने सीने से लगा लेने से मेरी आत्मा पर से कितना बड़ा बोझ हट गया है। ऐसा लगता है जैसे मेरे अस्तित्व का फिर से एक नया जन्म हो गया है।"

"कुछ मत कह पगली।" रूपचंद्र ने बड़े स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा____"देर से ही सही मगर अब मैं तेरी भावनाओं को बखूबी समझ रहा हूं। मुझे एहसास हो गया है कि तूने अब तक किस अजीयत के साथ अपने दिन रात गुज़ारे हैं लेकिन अब से ऐसा नहीं होगा। तेरा ये भाई तुझे वचन देता है कि अब से तुझे कोई दुख नहीं सहना पड़ेगा। तेरे रास्ते की हर रुकावट को मैं दूर करूंगा और हर पल तेरे लिए दुआ करूंगा कि तू हमेशा खुश रहे। तुझे वो मिले जिसकी तूने ख़्वाईश की है।"

"ओह! भैया।" रूपा अपने भाई की बातें सुन कर और भी ज़्यादा ज़ोरों से उससे छुपक गई। उसकी आंखें फिर से मोटे मोटे आंसू बहाने लगीं।

रूपचंद्र ने उसे खुद से अलग किया और अपने हाथों से उसके आंसू पोंछने लगा। रोने की वजह से रूपा का खूबसूरत चेहरा बुरी तरह मलिन पड़ गया था। रूपचंद्र की आंखें भी भींगी हुईं थी जिन्हें उसने साफ करने की ज़रूरत नहीं समझी बल्कि जब रूपा ने देखा तो उसने ही अपने हाथों से उसकी भींगी आंखों को पोंछा। बंद कमरे में भाई बहन के इस अनोखे प्यार और स्नेह का एक अलग ही मंज़र नज़र आ रहा था इस वक्त।

"मुझसे वादा कर कि अब से तू आंसू नहीं बहाएगी।" रूपचंद्र ने रूपा की तरफ देखते हुए कहा____"तुझे जिस किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो तू मुझसे कहेगी। यूं समझ ले कि अब से तेरा ये भाई तेरी खुशी के लिए कुछ भी कर जाएगा।"

"आपने इतना कह दिया मेरे लिए यही बहुत है भैया।" रूपा ने अधीरता से कहा____"मुझे अपने सबसे ज़्यादा प्यार करने वाले भैया वापस मिल गए। मेरे लिए यही सबसे बड़ी खुशी की बात है।"

"तूने मुझे माफ़ तो कर दिया है ना?" रूपचंद्र ने उसकी आंखों में देखा।

"आपने ऐसा कुछ किया ही नहीं है जिसके लिए आपको मुझसे माफ़ी मांगनी पड़े।" रूपा ने बड़ी मासूमियत से कहा____"मेरा ख़याल है कि आपने वही किया है जो हर भाई उन हालातों में करता या सोचता।"

"नहीं रूपा।" रूपचंद्र ने सहसा खेद भरे भाव से कहा____"कम से कम तेरे बारे में मुझे ऐसा नहीं सोचना चाहिए था। मैं तुझे बचपन से जानता था। हम दोनों एक साथ खेल कूद कर बड़े हुए थे। मुझे अच्छी तरह पता है कि मेरी बहन के मन में भूल से भी कभी कोई ग़लत ख़याल नहीं आ सकता था। खोट तो मेरे मन में था मेरी बहना। मन तो मेरा ही मैला हो गया था जिसकी वजह से मैंने अपनी सबसे चहेती बहन के बारे में ग़लत सोचा और इतना ही नहीं जब तुझे सबसे ज़्यादा मेरी ज़रूरत थी तब मैं तेरे साथ न हो कर तेरे खिलाफ़ हो गया था।"

"भूल जाइए भैया।" रूपा ने बड़े स्नेह से रूपचंद्र का दायां गाल सहला कर कहा____"इस दुनिया में सबसे ग़लतियां होती हैं। अगर आपसे हुई हैं तो मुझसे भी तो हुई हैं। मैंने भी तो अपने खानदान और अपने परिवार की मान मर्यादा का ख़याल नहीं रखा था।"

"छोड़ ये सब बातें।" रूपचंद्र ने कहा____"मैं सब कुछ भूल जाना चाहता हूं। तू भी उस बुरे वक्त को भूल जा। अब तो बस खुशियां मनाने की बारी है। अरे! तेरी सबसे बड़ी ख़्वाईश पूरी होने वाली है। अगले साल हमेशा के लिए तुझे वो शख़्स मिल जाएगा जिसे तूने बेहद प्रेम किया है। चल अब इसी बात पर मुस्कुरा के तो दिखा दे मुझे।"

रूपचंद्र की ये शरारत भरी बात सुन कर रूपा एकदम से शर्मा गई और उसके गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होठों पर मुस्कान उभर आई। लेकिन अगले ही पल उसकी वो मुस्कान गायब हो गई और उसके चेहरे पर उदासी के बादल मंडराते नज़र आए। रूपचंद्र ने भी इस बात पर गौर किया।

"क्या हुआ?" फिर उसने फिक्रमंद हो कर उससे पूछा____"अचानक तेरे चेहरे पर ये उदासी क्यों छा गई है? बता मुझे, आख़िर तेरी इस उदासी की वजह क्या है?"

"कुछ नहीं भैया।" रूपा ने बात को टालने की गरज से कहा____"कोई ख़ास बात नहीं है।"

"तुझे बचपन से जानता हूं मैं।" रूपचंद्र ने कहा____"तेरी हर आदत से परिचित हूं मैं। इस लिए यकीन के साथ कह सकता हूं कि तेरी इस उदासी की वजह कोई मामूली बात नहीं है। तू मुझे बता सकती है रूपा। अपने इस भाई पर भरोसा रख, मैं तेरी हर परेशानी को दूर करने के लिए अपनी जान तक लगा दूंगा।"

"नहीं नहीं भैया।" रूपा ने घबरा कर झट से अपनी हथेली रूपचंद्र के मुख पर रख दी____"ऐसा कभी दुबारा मत कहिएगा। इस परिवार में अब सिर्फ आप ही तो बचे हैं, अगर आपको भी कुछ हो गया तो हम सब जीते जी मर जाएंगे। रही बात मेरी उदासी की तो आप चिंता मत कीजिए और यकीन कीजिए ये बस मामूली बात ही है। वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा।"

"अगर तू कहती है तो मान लेता हूं।" रूपचंद्र ने गहरी सांस ली, फिर सहसा मुस्कुराते हुए बोला____"अच्छा ये बता मेरे होने वाले जीजा श्री से मिलने का मन तो नहीं कर रहा न तेरा? देख अगर ऐसा है तो तू मुझे बेझिझक बता सकती है। मेरे रहते जीजा जी की तरफ जाने वाले तेरे रास्ते पर कोई रुकावट नहीं आएगी।"

"धत्त।" रूपा बुरी तरह शर्म से सिमट गई। उसे अपने भाई से ऐसी बात की ज़रा भी उम्मीद नहीं थी, बोली____"ये कैसी बातें कर रहे हैं आप?"

"अरे! इसमें ग़लत बात क्या है भला?" रूपचंद्र ने अपने कंधे उचकाते हुए कहा____"मैं तो अपनी प्यारी बहन की खुशी वाली बात ही कर रहा हूं। एक भाई होने के नाते ये मेरा फर्ज़ है कि मैं अपनी बहन की हर खुशी का ख़याल भी रखूं और उसे खुश भी रखूं। अब क्योंकि मुझे पता है कि आज के समय में अगर मेरी बहन की मुलाक़ात उसके होने वाले पतिदेव से हो जाए तो उसे कितनी बड़ी खुशी मिल जाएगी इसी लिए तो तुझसे वैसा कहा मैंने।"

"बहुत ख़राब हैं आप।" रूपा बुरी तरह शर्मा तो रही ही थी किंतु वो बौखला भी गई थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अपने भाई की बातों का वो क्या जवाब दे। हालाकि एक सच ये भी था कि अपने भाई से अपने होने वाले पतिदेव से मिलने की बात सुन कर उसके दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं थी और साथ ही उसके मन का मयूर नाचने लगा था।

"हद है भई।" रूपचंद्र ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"भलाई का तो ज़माना ही नहीं रहा अब। ठीक है फिर, अगर तू यही चाहती है तो यही सही। वैसे आज मैंने अपने होने वाले जीजा श्री से भी मिलने का सोचा हुआ था। सोचा था अपनी बहन की खुशी का ख़याल करते हुए उनसे तेरे मिलने का कोई बढ़िया सा जुगाड़ भी कर दूंगा मगर अब जब तेरी ही इच्छा नहीं है तो मैं उन्हें मना कर दूंगा।"

"न...न...नहीं तो।" रूपा बुरी तरह हड़बड़ा गई। बुरी तरह हकलाते हुए बोल पड़ी____"म..मेरा मतलब है कि......नहीं...आप....जाइए मुझे आपसे कोई बात ही नहीं करना।"

रूपा लाज के चलते खुल कर जब कुछ बोल ना पाई तो अंत में बुरा सा मुंह बना कर रूपचंद्र से रूठ गई। ये देख रूपचंद्र ठहाका लगा कर हंसने लगा। पूरे कमरे में उसकी हंसी गूंजने लगी। इधर उसे यूं हंसता देख रूपा ने और भी ज़्यादा मुंह बना लिया।

"अरे! अब क्या हुआ तुझे?" रूपचंद्र ने फौरन ही अपनी हंसी रोकते हुए उससे पूछा____"इस तरह मुंह क्यों बना लिया तूने?"

"मुझे आपसे कोई बात ही नहीं करना।" रूपा ने पूर्व की भांति ही रूठे हुए लहजे से कहा____"आप बहुत ख़राब हैं।"

"अरे! भला मैंने ऐसा क्या कर दिया?" रूपचंद्र ने मुस्कुराते हुए कहा____"मैं तो तेरी भलाई की बात ही कर रहा था। अब जब तुझे ही मंज़ूर नहीं है तो मैं क्या करूं भला?"

"सब कुछ जानते समझते हुए भी आप मुझसे ऐसी बात कर रहे हैं।" रूपा ने अपनी आंखें बंद कर के मानों एक ही सांस में कहा____"वैसे तो बड़ा कहते हैं कि आपको हर चीज़ का बखूबी एहसास है, फिर ये क्या है?"

"अरे! तो इसमें शर्माने वाली कौन सी बात है?" रूपचंद्र ने उसी मुस्कान के साथ कहा____"तुझे अगर जीजा श्री से मिलना ही है तो साफ साफ कह दे ना। मैं ख़ुद तुझे उन महापुरुष के पास ले जाऊंगा।"

"सच में बहुत ख़राब हैं आप।" रूपा का चेहरा लाजवश फिर से लाल सुर्ख पड़ गया, नज़रें झुकाए बोली____"आप ये क्यों नहीं समझते कि एक बहन अपने बड़े भाई से इस तरह की कोई बात नहीं कह सकती।"

"हां जानता हूं पागल।" रूपचंद्र ने कहा___"मैं तो बस तुझे छेड़ रहा था। तुझे इन सब बातों के लिए मुझसे शर्माने की कोई ज़रूरत नहीं है। तू मुझसे बेझिझक हो कर कुछ भी कह सकती है। मैं तो बस ये चाहता हूं कि मेरी बहन हर तरह से खुश रहे। और हां, मैं जानता हूं कि तू वैभव से मिलना चाहती है। उससे ढेर सारी बातें करना चाहती है। इसी लिए तो तुझसे कहा था मैंने कि मैं तेरी मुलाक़ात करवा दूंगा उससे।"

रूपचंद्र की बातें सुन कर रूपा बोली तो कुछ नहीं लेकिन खुशी के मारे उसके गले ज़रूर लग गई। रूपचंद्र ने मुस्कुराते हुए उसकी पीठ सहलाई और फिर उसे खुद से अलग कर के कहा____"फ़िक्र मत कर, जल्दी ही मैं तेरी ये इच्छा पूरी करूंगा। अब चल मुस्कुरा दे....।"

रूपा के चेहरे पर खुशी की चमक उभर आई और साथ ही उसके होठों पर मुस्कान भी उभर आई। ये देख रूपचंद्र ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा और फिर पलंग से नीचे उतर कर दरवाज़े की तरफ बढ़ गया। जैसे ही वो दरवाज़ा खोल कर बाहर गया तो रूपा झट से पलंग पर से उतर कर दरवाज़े के पास पहुंची। दरवाजे को उसने फ़ौरन ही बंद किया और फिर तेज़ी से पलंग पर आ कर पीठ के बल लेट गई। छत के कुंडे पर झूलते पंखे पर निगाहें जमाए वो जाने क्या क्या सोचते हुए मुस्कुराने लगी।

━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━
 
अध्याय - 101

━━━━━━༻♥༺━━━━━━



रूपा के चेहरे पर खुशी की चमक उभर आई और साथ ही उसके होठों पर मुस्कान भी उभर आई। ये देख रूपचंद्र ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा और फिर पलंग से नीचे उतर कर दरवाज़े की तरफ बढ़ गया। जैसे ही वो दरवाज़ा खोल कर बाहर गया तो रूपा झट से पलंग पर से उतर कर दरवाज़े के पास पहुंची। दरवाजे को उसने फ़ौरन ही बंद किया और फिर तेज़ी से पलंग पर आ कर पीठ के बल लेट गई। छत के कुंडे पर झूलते पंखे पर निगाहें जमाए वो जाने क्या क्या सोचते हुए मुस्कुराने लगी।

अब आगे....

हवेली पहुंचे तो पता चला पिता जी अपने नए मुंशी के साथ कहीं गए हुए हैं। इधर मां भाभी से पूछने लगीं कि उन्हें खेतों में घूमने पर कैसा लगा? जवाब में भाभी ने बड़ी ही सफाई से झूठ बोल कर जो कुछ उन्हें बताया उसे सुन कर मैं खुद भी मन ही मन चकित रह गया। अगर मां मुझसे पूछतीं तो यकीनन मुझसे जवाब देते ना बनता क्योंकि मैं भाभी को ले कर खेत गया ही नहीं था। ख़ैर मां के साथ साथ बाकी सब भी भाभी का खिला हुआ चेहरा देख कर खुश हो गए थे। मां ने भाभी को अपने कमरे में जा कर आराम करने को कहा तो वो चली गईं। मैं भी उनके पीछे चल पड़ा क्योंकि मुझे भी अपने कमरे में आराम करना था।

दूसरी तरफ आ कर जब मैं भाभी के पीछे पीछे सीढियां चढ़ने लगा तो भाभी ने सहसा पलट कर मुझसे कहा____"आज तुम्हारी वजह से मुझे मां जी से झूठ बोलना पड़ा। इस बात से मुझे बहुत बुरा महसूस हो रहा है।"

"आपको मां से झूठ बोलने की ज़रूरत ही नहीं थी।" मैंने अधीरता से कहा____"आप मां से सब कुछ सच सच बता देतीं। मां को तो वैसे भी एक दिन इस सच्चाई का पता चलना ही है कि मैं एक मामूली से किसान की बेटी से प्रेम करता हूं।"

"वो तो ठीक है लेकिन सच का पता सही वक्त पर चले तभी बेहतर परिणाम निकलते हैं।" भाभी ने कहा____"यही सोच कर मैंने मां जी से इस बारे में कुछ नहीं बताया। ख़ैर छोड़ो, जाओ तुम भी आराम करो अब।"

भाभी कहने के साथ ही वापस सीढियां चढ़ने लगीं। जल्दी ही हम दोनों ऊपर आ कर अपने अपने कमरे की तरफ बढ़ गए। सच कहूं तो आज मैं बड़ा खुश था। सिर्फ इस लिए ही नहीं कि मैंने भाभी को अनुराधा से मिलवाया था बल्कि इस लिए भी कि उन्हें अनुराधा का और मेरा रिश्ता मंज़ूर था और वो इस रिश्ते को अंजाम तक पहुंचाने में मेरा साथ देने को बोल चुकीं थी।

अपने कमरे में आ कर मैंने अपने कपड़े उतारे और फिर लुंगी लपेट कर पलंग पर लेट गया। ऊपर मैंने बनियान पहन रखा था। पलंग पर लेट कर मैं आंखें बंद किए आज घटित हुई बातों के बारे में सोच ही रहा था कि तभी मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे मेरे बेहद ही नज़दीक कोई खड़ा है। मैंने फ़ौरन ही अपनी आंखें खोल दी। नज़र पलंग के दाईं तरफ बिल्कुल मेरे चेहरे के क़रीब खड़ी नए मुंशी की बेटी कजरी पर पड़ी। वो मेरे चेहरे को बड़े ही गौर से देखने में लगी हुई थी और फिर जैसे ही उसने मुझे पट्ट से आंखें खोलते देखा तो बुरी तरह हड़बड़ा गई और साथ ही दो क़दम पीछे हट गई। उसके चेहरे पर कुछ पलों के लिए घबराहट के भाव उभरे थे किंतु जल्दी ही उसने खुद को सम्हाल कर अपने होठों पर मुस्कान सजा ली थी।

"ये क्या हरकत है?" मैं क्योंकि उसकी हरकतों और आदतों से आजिज़ आ गया था इस लिए फ़ौरन ही उठ कर थोड़ा सख़्त भाव से बोल पड़ा____"चोरी छुपे मेरे कमरे में आने का क्या मतलब है?"

"ज...जी?? ह...हमारा मतलब है कि ये आप क्या कह रहे हैं कुंवर जी?" कजरी हड़बड़ाते हुए बोली____"हम तो आपको ये कहने के लिए आपके कमरे में आए थे कि खाना खा लीजिए। नीचे सब आपका इंतज़ार कर रहे हैं।"

"उसके लिए तुम मुझे दरवाज़े से ही आवाज़ दे कर उठा सकती थी।" मैंने पहले की तरह ही सख़्त भाव से उसकी तरफ देखते हुए कहा____"चोरी छुपे इस तरह मेरे बिस्तर के इतने क़रीब आ कर क्यों खड़ी थी तुम?"

"अ...आप सो रहे थे न।" कजरी ने अपनी हालत को सम्हालते हुए कहा____"इस लिए हम सोच में पड़ गए थे कि आपको आवाज़ दे कर उठाएं या ना उठाएं? हमने सुना है कि सोते में अगर आपको कोई उठा देता है तो आप नाराज़ हो जाते हैं।"

मैं अच्छी तरह जानता था कि कजरी बहाने बना रही थी। वो खुद को निर्दोष साबित करने पर लगी हुई थी किंतु उसे सबक सिखाने का ये सही वक्त नहीं था इस लिए मैंने भी ज़्यादा उससे बात करना ठीक नहीं समझा। उसे जाने का बोल कर मैं वापस लेट गया। कजरी के जाने के बाद मैं कुछ देर तक उसके बारे में सोचता रहा और फिर उठ कर अपने कपड़े पहनने लगा। कुछ ही देर में मैं नीचे आ कर सबके साथ खाना खाने लगा। कजरी की वजह से मेरा मूड थोड़ा ख़राब हो गया था। मैं अच्छी तरह समझ गया था कि वो मुझसे क्या चाहती थी किंतु उसे इस बात का इल्म ही नहीं था कि वो किस आग से खेलने की तमन्ना कर बैठी थी।

गुज़रे हुए वक्त में मैं यकीनन एक बुरा इंसान था और लोग मुझे अय्याशियों के लिए जानते थे लेकिन आज के वक्त में मैं एक अच्छा इंसान बनने की राह पर था। मैंने अनुराधा को ही नहीं बल्कि अपनी भाभी को भी वचन दिया था कि अब से मैं एक अच्छा इंसान ही बनूंगा। कजरी की हरकतें उसके निम्न दर्जे के चरित्र का प्रमाण दे रहीं थी और ये मेरे लिए सहन करना ज़रा भी मुमकिन नहीं था। मैंने मन ही मन फ़ैसला किया कि उसके बारे में जल्द से जल्द कुछ करना ही होगा। बहरहाल खाना खाने के बाद मैंने अपने कमरे में लगभग एक घंटा आराम किया और फिर मोटर साइकिल ले कर खेतों की तरफ चला गया।

शाम तक मैं खेतों पर ही रहा। भुवन से मैं अक्सर राय परामर्श लेता रहता था और साथ ही पुराने मजदूरों से भी जिसके चलते मैं काफी कुछ सीख गया था और काफी कुछ समझने भी लगा था। इतने समय में मुझे ये समझ आया कि खेती बाड़ी के अलावा भी ज़मीनों पर कोई ऐसी चीज़ उगाई जाए जिससे कम समय में फसल तैयार हो और उसके द्वारा अच्छी खासी आय भी प्राप्त हो सके। ऐसा करने से मजदूरों को भी खाली नहीं बैठना पड़ेगा, क्योंकि खाली बैठने से उनका भी नुकसान होता था। आख़िर उन्हें तो उतनी ही आय प्राप्त होती थी जितने दिन वो मेहनत करते थे। यही सोच कर मैंने ये सब करने का सोचा था। भुवन के साथ साथ कुछ मजदूर लोग भी मेरी इस सोच से सहमत थे और खुश भी हुए थे। अतः मैंने ऐसा ही करने का सोच लिया और अगले ही दिन से कुछ मजदूरों को हमारी कुछ खाली पड़ी ज़मीन को अच्छे से तैयार करने का हुकुम दे दिया। मजदूर लोग दोगुने जोश के साथ काम करने के लिए तैयार हो गए थे। शाम को मैं वापस हवेली आ गया। आज काफी थक गया था अतः खाना खा कर और फिर अपने कमरे में जा कर पलंग पर लेट गया।

✮✮✮✮

उस वक्त रात के लगभग बारह बज रहे थे। आज आसमान साफ तो था किन्तु क्षितिज पर से चांद नदारद था। अनगिनत तारे ही अपनी टिमटिमाहट से धरती को रोशन करने की नाकाम कोशिशों में लगे थे। पूरा गांव सन्नाटे के आधीन था। घरों के अंदर लोग गहरी नींद में सोए हुए थे। बिजली हमेशा की तरह गुल थी इस लिए घरों की किसी भी खिड़की में रोशनी नज़र नहीं आ रही थी। पूरे गांव में गहन तो नहीं किंतु नीम अंधेरा ज़रूर विद्यमान था।

इसी नीम अंधेरे में सहसा चंद्रकांत के घर का दरवाज़ा खुला। अंदर छाए गहन अंधेरे से निकल कर बाहर नीम अंधेरे में किसी साए की तरह जो व्यक्ति नज़र आया वो चंद्रकांत था। नीम अंधेरे में उसके जिस्म पर मौजूद सफ़ेद कमीज धुंधली सी नज़र आई, अलबत्ता नीचे शायद उसने लुंगी लपेट रखी थी।

दरवाज़े से बाहर आ कर वो एकदम से ठिठक कर इधर उधर देखने लगा और फिर घर के बाएं तरफ चल पड़ा। कुछ ही पलों में वो उस जगह पहुंचा जहां पर कुछ दिन पहले उसने अपने बेटे रघुवीर की खून से लथपथ लाश पड़ी देखी थी। घर के तीन तरफ लकड़ी की बल्लियों द्वारा उसने क़रीब चार फुट ऊंची बाउंड्री बनवा रखी थी। बाएं तरफ उसी लकड़ी की बाउंड्री के क़रीब पहुंच कर वो रुक गया। कुछ पलों तक उसने नीम अंधेरे में इधर उधर देखा और फिर दोनों हाथों से अपनी लुंगी को जांघों तक उठा कर वो उसी जगह पर बैठता चला गया। कुछ ही पलों में ख़ामोश वातावरण में उसके पेशाब करने की मध्यम आवाज़ गूंजने लगी।

चंद्रकांत पेशाब करने के बाद उठा और अपनी लुंगी को जांघों से नीचे गिरा कर अपनी नंगी टांगों को ढंक लिया। चंद्रकांत को इस जगह पर आते ही अपने बेटे की याद आ जाती थी जिसके चलते वो बेहद दुखी हो जाया करता था। इस वक्त भी उसे अपने बेटे की याद आई तो वो दुखी हो गया। कुछ पलों तक दुखी अवस्था में जाने क्या सोचते हुए वो खड़ा रहा और फिर गहरी सांस ले कर वापस घर के दरवाज़े की तरफ भारी क़दमों से चल पड़ा।

अभी वो कुछ ही क़दम चला था कि सहसा गहन सन्नाटे में उसे किसी आहट का आभास हुआ जिसके चलते वो एकदम से अपनी जगह पर रुक गया। उसकी पहले से ही बढ़ी हुई धड़कनें अंजाने भय की वजह से एकदम से रुक गईं सी प्रतीत हुईं। हालाकि जल्दी ही उसने खुद को सम्हाल कर होश में ले आया। उसके कान किसी हिरण के जैसे किसी भी आहट को सुनने के लिए मानों खड़े हो गए थे। उसने महसूस किया कि अगले कुछ ही पलों में उसकी धड़कनें किसी हथौड़े की तरह उसकी पसलियों पर चोंट करने लगीं हैं।

जब कुछ देर तक उसे किसी आहट का आभास न हुआ तो वो इसे अपना वहम समझ कर हौले से आगे बढ़ चला। हालाकि उसके दोनों कान अब भी किसी भी प्रकार की आहट को सुनने के लिए मानों पूरी तरह तैयार थे। अभी वो अपने घर के दरवाज़े के बस थोड़ा ही क़रीब पहुंचा था कि सहसा फिर से आहट हुई और इस बार उसने आहट को साफ सुना। आहट उसके पीछे से आई थी। पलक झपकते ही इस एहसास के चलते उसके तिरपन कांप गए कि इस गहन सन्नाटे और अंधेरे में उसके क़रीब ही कहीं कोई मौजूद है।

बिजली की तरह ज़हन में उसे अपने बेटे के हत्यारे का ख़याल कौंध गया जिसके चलते उसके पूरे जिस्म में मौत की सिहरन सी दौड़ गई। कुछ पलों तक तो उसे समझ में ही न आया कि क्या करे किंतु तभी इस एहसास ने उसके जबड़े सख़्त कर दिए कि उसके बेटे का हत्यारा उसके आस पास ही मौजूद है। ये उसके लिए बहुत ही अच्छा मौका है अपने बेटे के हत्यारे से बदला लेने का। वो भी उस हरामजादे को वैसी ही मौत देगा जैसे उसने उसके बेटे को दी थी, बल्कि उससे भी ज़्यादा बद्तर मौत देगा वो उसे।

अगले कुछ ही पलों में बदले की भावना के चलते चंद्रकांत के अंदर आक्रोश, गुस्सा और नफ़रत ने अपना प्रबल रूप धारण कर लिया। अगले ही पल वो एक झटके से पलटा और उस दिशा की तरफ मुट्ठियां भींचे देखने लगा जिस तरफ से उसे आहट सुनाई दी थी। उससे कुछ ही क़दम की दूरी पर लकड़ी की बाउंड्री थी जो उसे धुंधली सी नज़र आ रही थी। चंद्रकांत बेख़ौफ हो कर तेज़ी से आगे बढ़ चला। बाउंड्री के क़रीब पहुंच कर वो रुका और आंखें फाड़ फाड़ कर देखने लगा किंतु एक तो उमर का तकाज़ा दूसरे नीम अंधेरा जिसके चलते उसे कोई नज़र न आया। चंद्रकांत सख़्त भाव लिए और मुट्ठियां भींचे चारो तरफ देखने लगा। सहसा तभी एक जगह पर उसकी निगाह ठहर गई। बाउंड्री के बीच लकड़ी के दरवाज़े के बगल में उसे कोई आकृति खड़ी हुई नज़र आई। उसने आंखें सिकोड़ कर उस आकृति को पहचानने की कोशिश की किंतु पहचान न सका।

चंद्रकांत बेख़ौफ हो कर एक झटके में उस आकृति की तरफ बढ़ चला। बदले की प्रबल भावना में डूबे चंद्रकांत को ये तक ख़याल नहीं रहा था कि इस वक्त वो निहत्था है और अगर सच में यहां पर उसके बेटे का हत्यारा मौजूद है तो वो निहत्था कैसे उसका सामना कर सकेगा? ख़ैर जल्दी ही वो उस आकृति के क़रीब पहुंच गया। क़रीब पहुंचने पर उसे नीम अंधेरे में साफ दिखा कि वो आकृति असल में किसी इंसानी साए की थी।

एक ऐसे साए की जिसके जिस्म का कोई भी अंग नज़र नहीं आ रहा था बल्कि उसके समूचे जिस्म पर सफ़ेद लिबास था। सिर से ले कर पांव तक वो सफ़ेद लिबास में खुद को छुपाए हुए था। उसके दोनों हाथ चंद्रकांत को नज़र ना आए। शायद उसने उन्हें अपने पीछे छुपा रखा था। उस सफ़ेद लिबास में छुपे साए को देख चंद्रकांत पलक झपकते ही बुत बन गया। समूचे जिस्म में डर की वजह से मौत की सिहरन दौड़ गई।

सहसा उसके ज़हन में एक ज़ोरदार धमाका सा हुआ। बिजली की तरह उसके ज़हन में पंचायत के दिन दादा ठाकुर द्वारा पूछी गई बात गूंज उठी। दादा ठाकुर ने उससे ही नहीं बल्कि गौरी शंकर से भी पूछा था कि क्या वो किसी सफ़ेदपोश को जानते हैं अथवा क्या उनका संबंध सफ़ेदपोश से है? उस दिन दादा ठाकुर के इन सवालों का जवाब ना गौरी शंकर के पास था और ना ही खुद उसके पास। दोनों ने सफ़ेदपोश के बारे में अपनी अनभिज्ञता ही ज़ाहिर की थी।

'तो क्या यही है वो सफ़ेदपोश?' गहन सोचों में डूब गए चंद्रकांत के ज़हन में ये सवाल उभरा____'क्या यही वो सफ़ेदपोश है जिसने दादा ठाकुर के अनुसार उनके बेटे वैभव को कई बार जान से मारने की कोशिश की थी?'

चंद्रकांत आश्चर्यजनक रूप से ख़ामोश हो गया था और जाने क्या क्या सोचे जा रहा था। उसे ये तक ख़याल नहीं रह गया था कि कुछ देर पहले वो किस तरह की भावना में डूबा हुआ उस आकृति की तरफ बढ़ा था। अचानक चंद्रकांत के मन में ख़याल उभरा कि क्या इस सफ़ेदपोश ने मेरे बेटे की हत्या की होगी? अगर हां तो क्यों? अगले ही पल उसने सोचा____'किन्तु इससे तो मेरी अथवा मेरे बेटे की कोई दुश्मनी ही नहीं थी। फिर भला ये क्यों मेरे बेटे की हत्या करेगा? बल्कि इसकी दुश्मनी तो दादा ठाकुर के बेटे वैभव से है। यकीनन वैभव ने इसकी भी बहन बेटी अथवा बीवी के साथ बलात्कार कर के इसके ऊपर अत्याचार किया होगा। तभी तो इसने कई बार वैभव को जान से मार देना चाहा था। वो तो उस हरामजादे की किस्मत ही अच्छी थी जो वो हर बार इससे बच गया था मगर कब तक बचेगा आख़िर?'

"लगता है मुझे अपने इतने क़रीब देख कर तू किसी और ही दुनिया में पहुंच गया है।" तभी सहसा सन्नाटे में सामने मौजूद सफ़ेदपोश की अजीब सी किन्तु धीमी आवाज़ गूंजी जिससे चंद्रकांत पलक झपकते ही सोचों के भंवर से बाहर आ गया। उसने हड़बड़ा कर सफ़ेदपोश की तरफ देखा।

"क...क...कौन हो तुम???" चंद्रकांत उसको पहचानते हुए भी मारे हड़बड़ाहट के पूछ बैठा____"और यहां किस लिए आए हो?"

"इस गांव की बड़ी बड़ी हस्तियां मुझे सफ़ेदपोश के नाम से जानती हैं।" सफ़ेदपोश ने अपनी अजीब सी आवाज़ में कहा____"और हां तू भी जानता है मुझे। मेरे सामने अंजान बनने की तेरी ये कोशिश बेकार है चंद्रकांत। रही बात मेरे यहां आने की तो ये समझ ले कि मौत नाम की बला कभी भी कहीं भी आ जा सकती है।"

सफ़ेदपोश की आवाज़ में और उसकी बातों में जाने ऐसा क्या था कि सुन कर चंद्रकांत के समूचे जिस्म में सर्द लहर दौड़ गई। उसने अपनी टांगें कांपती हुई महसूस की। चेहरा पलक झपकते ही पसीना छोड़ने लगा। उसके हलक से कोई आवाज़ न निकल सकी। सूख गए गले को उसने ज़बरदस्ती तर करने की कोशिश की और फिर पलक झपकते ही ख़राब हो गई अपनी हालत को काबू करने की कोशिश में लग गया।

"ल...लेकिन यहां क्यों आए हो तुम?" फिर उसने बड़ी मुश्किल से सफ़ेदपोश से पूछा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि सफ़ेदपोश उसके घर के बाहर क्यों आ गया था और अगर उससे ही मिलने आया था तो आख़िर वो क्या चाहता था उससे?

"लगता है अपने बेटे की मौत का ग़म बड़ा जल्दी भूल गया है तू।" सफ़ेदपोश ने ठंडे स्वर में कहा____"क्या तेरी रगों में दौड़ता हुआ लहू सच में पानी हो गया है चंद्रकांत?"

"न...नहीं तो।" चंद्रकांत अजीब भाव से बोल पड़ा____"कुछ भी नहीं भूला हूं मैं। अपने बेटे के हत्यारे को पाताल से भी खोज निकालूंगा और अपने बेटे की हत्या करने की उसे अपने हाथों से सज़ा दूंगा।"

"बहुत खूब।" सफ़ेदपोश अपनी अजीब सी आवाज़ में कह उठा____"बदला लेने के लिए सीने में कुछ ऐसी ही आग होनी चाहिए। वैसे क्या लगता है तुझे, तू या कोई भी तेरे बेटे के हत्यारे का पता लगा सकेगा?"

"क...क्या मतलब??" चंद्रकांत बुरी तरह चकरा गया, फिर जल्दी ही सम्हल कर बोला____"ऐसा क्यों कह रहे हो तुम?"

"वो इस लिए क्योंकि मैं अच्छी तरह जानता हूं कि तू क्या किसी के बाप के फ़रिश्ते भी उस शख़्स का पता नहीं लगा सकते जिसने तेरे बेटे की हत्या की है।" सफ़ेदपोश ने बड़े अजीब भाव से किंतु अपनी अजीब सी आवाज़ में कहा____"लेकिन मैं....मैं अच्छी तरह जानता हूं उसे। इसी वक्त तुझे बता सकता हूं कि तेरे बेटे का हत्यारा कौन है?"

"क....क्या????" चंद्रकांत बुरी तरह उछल पड़ा____"म...मेरा मतलब है कि क्या तुम सच कह रहे हो? क्या सच में तुम इसी वक्त मेरे बेटे के हत्यारे के बारे में बता सकते हो?"

"बेशक।" सफ़ेदपोश ने कहा____"मैं सब कुछ बता सकता हूं क्योंकि मैं फरिश्तों से भी ऊपर की चीज़ हूं। जो कोई नहीं कर सकता वो मैं कर सकता हूं।"

चंद्रकांत किसी बेजान पुतले की तरह आश्चर्य से आंखें फाड़े सफ़ेदपोश की धुंधली सी आकृति को देखता रह गया। सहसा उसके ज़हन में विस्फोट सा हुआ तो जैसे उसे होश आया। उसने अपने ज़हन को झटक कर सफ़ेदपोश की तरफ देखा। लकड़ी की बाउंड्री के उस पार वो सफ़ेद किंतु धुंधली सी आकृति के रूप ने नज़र आ रहा था। चंद्रकांत को ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वो सचमुच फ़रिश्तों से ऊपर की ही चीज़ है।

"म...मुझे बताओ।" चंद्रकांत एकदम से व्याकुल और पगलाए हुए अंदाज़ में बोल पड़ा____"मुझे जल्दी से बताओ कि वो हत्यारा कौन है जिसने मेरे इकलौते बेटे की हत्या कर के मेरे वंश का नाश कर दिया है? भगवान के लिए जल्दी से उस हत्यारे का नाम बता दो मुझे। मैं तुम्हारे पांव पड़ता हूं। बस एक बार उसका नाम बता दो, बदले में तुम मुझसे जो मांगोगे मैं बिना सोचे समझे तुम्हें दे दूंगा।"

"बदले में क्या कर सकता है तू मेरे लिए?" सामने खड़े सफ़ेदपोश ने कुछ पलों तक सोचने के बाद सर्द लहजे में उससे पूछा।

"जो भी तुम कहोगे...मैं करूंगा।" चंद्रकांत ने झट से कहा____"बस तुम मुझे मेरे बेटे के हत्यारे का नाम बता दो।"

"जिस तरह तू अपने बेटे के हत्यारे का नाम जानने के लिए मरा जा रहा है, सोच रहा हूं पहले तुझे उस हत्यारे का नाम ही बता दूं।" सफ़ेदपोश ने अजीब भाव से कहा____"लेकिन ये भी सोचता हूं कि अगर मैंने तुझे उसका नाम बता दिया और बाद में तू मेरे लिए कुछ भी करने से मुकर गया तो...??"

"नहीं नहीं, ऐसा कभी नहीं होगा।" चंद्रकांत ने हड़बड़ाते हुए झट से कहा____"मैं अपने मरे हुए बेटे की क़सम खा कर कहता हूं कि बाद में मैं किसी भी बात से नहीं मुकरूंगा। बल्कि वही करूंगा जो करने को तुम कहोगे।"

"ऐसा पहली बार ही हो रहा है कि मैं किसी से अपना काम करवाने से पहले सामने वाले पर भरोसा कर के खुद उसका भला करने जा रहा हूं।" सफ़ेदपोश ने अपनी अजीब आवाज़ में कहा____"मैं अभी इसी वक्त तुझे तेरे बेटे के हत्यारे का नाम बताए देता हूं किंतु एक बात तू अच्छी तरह समझ ले। अगर बाद में तू अपने वादे से मुकर कर मेरा कोई काम नहीं किया तो ये तेरे और तेरे परिवार के लिए बिल्कुल भी अच्छा नहीं होगा।"

"म...मेरा यकीन करो।" चंद्रकांत ने पूरी दृढ़ता से कहा____"मैं सच में वही करूंगा जो तुम कहोगे। अपने मरे हुए बेटे की क़सम खा चुका हूं मैं। क्या इतने पर भी तुम्हें मुझ पर यकीन नहीं है?"

"यकीन हो गया है तुझ पर तभी तो तुझसे अपना काम करवाने से पहले मैंने तेरा भला करने का सोच लिया है।" सफ़ेदपोश ने कहा____"लेकिन तुझे आगाह इस लिए किया है कि अगर तू बाद में अपने वादे से मुकर गया तो फिर अपने और अपने परिवार के बुरे अंजाम का ज़िम्मेदार तू ख़ुद ही होगा।"

कहने के साथ ही सफ़ेदपोश ने चंद्रकांत को अपना कान उसके क़रीब लाने को कहा तो चंद्रकांत पहले तो चौंका, फिर अपनी बढ़ी हुई धड़कनों के साथ आगे बढ़ा। उसने अपना एक कान सफ़ेदपोश की तरफ बढ़ाया तो सफ़ेदपोश आगे बढ़ कर उसके कान में काफी देर तक जाने क्या कहता रहा।

"उम्मीद है कि अब तू उस हत्यारे से अपने बेटे की हत्या का बदला ले कर अपने दिल की आग को ठंडा कर लेगा।" सफ़ेदपोश ने उसके कान से सफ़ेद नक़ाब में छुपा अपना मुंह हटा कर कहा____"और हां, तेरे पास समय बिल्कुल ही कम है। मैं कल रात किसी भी वक्त यहां पर आ सकता हूं और फिर तुझे अपना काम करने का हुकुम दे सकता हूं। अपना वादा तोड़ कर मेरा काम न करने की सूरत में क्या होगा इस बात को भूलना मत।"

कहने के साथ ही सफ़ेदपोश ने इधर उधर अपनी निगाह घुमाई और फिर पलट कर हवा के झोंके की तरह कुछ ही पलों में अंधेरे में ग़ायब हो गया। उसके ग़ायब होते ही चंद्रकांत को जैसे होश आया। अगले कुछ ही पलों में उसके अंदर एक ऐसी आग सुलग उठी जिससे उसके जबड़े कस गए और मुट्ठियां भिंच गईं। दिलो दिमाग़ में मचल उठी आंधी को लिए वो पलटा और घर के दरवाज़े की तरफ बढ़ता चला गया।

✮✮✮✮

सफ़ेदपोश अंधेरे में भी तेज़ी से एक तरफ को बढ़ता चला जा रहा था। कुछ ही दूरी पर आसमान से थोड़ा नीचे धुंधली सी आकृति के रूप में उसे पेड़ पौधे दिखने लगे थे। उसकी रफ़्तार और भी तेज़ हो गई। ज़ाहिर है वो अपनी मंजिल पर पहुंचने में देर नहीं करना चाहता था। ज़मीन पर तेज़ तेज़ पड़ते उसके क़दमों से ख़ामोश वातावरण में अजीब सी आवाज़ें पैदा हो रहीं थी। कुछ ही देर में उसे धुंधले नज़र आने वाले पेड़ पौधे थोड़ा स्पष्ट से नज़र आने लगे। तेज़ चलने की वजह से उसकी सांसें भारी हो गईं थी।

अभी वो उन पेड़ पौधों से थोड़ा इधर ही था कि तभी वो चौंका और साथ ही ठिठक भी गया। अपनी एड़ी पर फिरकिनी की मानिंद घूम कर उसने एक तरफ निगाह डाली तो नीम अंधेरे में उसे हिलते डुलते कुछ साए नज़र आए। ये देख वो फ़ौरन ही वापस घूमा और लगभग दौड़ते हुए उन पेड़ पौधों की तरफ भाग चला। उसने भागते हुए ही पलट कर देखा कि हिलते डुलते नज़र आने वाले वो साए भी बड़ी तेज़ी से उसकी तरफ दौड़ लगा चुके थे। सफ़ेदपोश जल्द ही पेड़ पौधों के पास पहुंच गया। यहां कई सारे पेड़ पौधे थे। ऐसा लगता था जैसे ये कोई बगीचा था। सफ़ेदपोश तेज़ी से ढेर सारे पेड़ पौधों के बीच घुसता चला गया। यहां की ज़मीन पर शायद पेड़ों के सूखे पत्ते मौजूद थे जिसकी वजह से सफ़ेदपोश द्वारा तेज़ तेज़ चलने से फर्र फर्र की आवाज़ें पैदा होने लगीं थी जो फिज़ा में छाए सन्नाटे में अजीब सा भय पैदा करने लगीं थी।

सफ़ेदपोश बगीचे के अंदर अभी कुछ ही दूर चला था कि तभी एक तरफ से कोई ज़ोर से चिल्लाया। कदाचित सूखे पत्तों से पैदा होने वाली आवाज़ों को सुन कर ही कोई चिल्लाया था और बोला था____"कौन है उधर?"

इस आवाज़ को सुन कर सफ़ेदपोश बुरी तरह हड़बड़ा गया। यकीनन वो घबरा भी गया होगा किंतु वो रुका नहीं बल्कि और भी तेज़ी से आगे की तरफ भागने लगा। तभी फिर से कोई ज़ोर से चिल्लाते हुए पुकारा। सफ़ेदपोश ने महसूस किया कि पुकारने वाला उसके पीछे ही भागता हुआ आने लगा है तो वो झटके से रुक गया। अपने एक हाथ को उसने सफ़ेद लबादे में कहीं घुसाया। कुछ ही पलों में उसका वो हाथ उसके लबादे से बाहर आ गया। अपनी जगह पर खड़े खड़े ही वो आहिस्ता से पलटा और अपने उस हाथ को हवा में उठा दिया। अगले ही पल ख़ामोश वातावरण में धांय की बड़ी तेज़ आवाज़ गूंज उठी। ऐसा लगा जैसे सन्नाटे में कोई धमाका हो गया हो। सफ़ेदपोश के हाथ में शायद रिवॉल्वर था जिससे उसने गोली चलाई थी। गोली चलते ही किसी की ज़ोरदार चीख़ फिज़ा में गूंज उठी और साथ ही सूखे पत्तों पर किसी के भरभरा कर गिरने की आवाज़ भी हुई।

सफ़ेदपोश ने झट से रिवॉल्वर को अपने सफ़ेद लबादे में ठूंसा और फिर वो वापस पलटा ही था कि तभी उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे कई सारे लोग बगीचे में दाखिल हो गए हैं क्योंकि ज़मीन पर पड़े सूखे पत्तों पर ढेर सारी आवाज़ें आने लगीं थी। ये महसूस करते ही सफ़ेदपोश तेज़ी से आगे की तरफ भागता चला गया और फिर अचानक ही अंधेरे में इस तरह ग़ायब हो गया जैसे उसका यहां कहीं कोई वजूद ही न हो।

━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━
 
अध्याय - 102

━━━━━━༻♥༺━━━━━━

सफ़ेदपोश ने झट से रिवॉल्वर को अपने सफ़ेद लबादे में ठूंसा और फिर वो वापस पलटा ही था कि तभी उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे कई सारे लोग बगीचे में दाखिल हो गए हैं क्योंकि ज़मीन पर पड़े सूखे पत्तों पर ढेर सारी आवाज़ें आने लगीं थी। ये महसूस करते ही सफ़ेदपोश तेज़ी से आगे की तरफ भागता चला गया और फिर अचानक ही अंधेरे में इस तरह ग़ायब हो गया जैसे उसका यहां कहीं कोई वजूद ही न हो।

अब आगे....

अगली सुबह मेरे कमरे का दरवाज़ा किसी ने ज़ोर ज़ोर से बजाया तो मेरी आंख झट से खुल गई और मैं एकदम से उछल कर उठ बैठा। दरवाज़ा बजने के साथ ही कोई आवाज़ भी दे रहा था मुझे। जैसे ही मेरा ज़हन सक्रिय हुआ तो मैं आवाज़ देने वाले को पहचान गया। वो कुसुम की आवाज़ थी। सुबह सुबह उसके द्वारा इस तरह दरवाज़ा बजाए जाने से और पुकारने से मैं एकदम से हड़बड़ा गया और साथ ही किसी अनिष्ट की आशंका से घबरा भी गया। मैं बिजली की सी तेज़ी से पलंग से नीचे कूदा। लुंगी मेरे बदन से अलग हो गई थी इस लिए फ़ौरन ही उसे पलंग से उठा कर लपेटा और फिर तेज़ी से दरवाज़े के पास पहुंच कर दरवाज़ा खोला।

"क्या हुआ?" बाहर कुसुम के साथ कजरी को खड़े देख मैंने अपनी बहन से पूछा____"इतनी ज़ोर ज़ोर से दरवाज़ा क्यों पीट रही थी तू?"

"गज़ब हो गया भैया।" कुसुम ने बौखलाए हुए अंदाज़ में कहा____"पूरे गांव में हंगामा मचा हुआ है। ताऊ जी हमारे न‌ए मुंशी जी के साथ वहीं गए हुए हैं।"

"ये क्या कह रही है तू?" मैं उसके मुख से हंगामे की बात सुन कर चौंक पड़ा____"आख़िर कैसा हंगामा मचा हुआ है गांव में?"

"अभी कुछ देर पहले ताऊ जी को हवेली के एक दरबान ने बताया कि हमारे पहले वाले मुंशी ने अपनी बहू को जान से मार डाला है।" कुसुम मानो एक ही सांस में बताती चली गई____"सुबह जब उसकी बीवी और बेटी को इस बात का पता चला तो उन दोनों की चीखें निकल गईं। उसके बाद उनकी चीखें रोने धोने में बदल गईं। आवाज़ें घर से बाहर निकलीं तो धीरे धीरे गांव के लोग चंद्रकांत के घर की तरफ दौड़ पड़े।"

कुसुम जाने क्या क्या बोले जा रही थी और इधर मेरा ज़हन जैसे एकदम कुंद सा पड़ गया था। कुसुम ने मुझे हिलाया तो मैं चौंका। मेरे लिए ये बड़े ही आश्चर्य की बात थी कि चंद्रकांत ने अपनी ही बहू की जान ले ली...मगर क्यों?

मैंने कुसुम को जाने को कहा और वापस कमरे में आ कर अपने कपड़े पहनने लगा। जल्दी ही तैयार हो कर मैं नीचे की तरफ भागा। मुझे अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि चंद्रकांत ने इतना बड़ा कांड कर दिया है। नीचे आया तो देखा मां, चाची, भाभी, निर्मला काकी आदि सब एक जगह बैठी बातें कर रहीं थी। मुझ पर नज़र पड़ते ही सब चुप हो गईं। मैं सबसे पहले गुसलखाने में गया और हाथ मुंह धो कर तथा मोटर साइकिल की चाभी ले कर बाहर निकल गया। कुछ ही देर में मैं अपनी मोटर साइकिल से चंद्रकांत के घर के पास पहुंच गया।

चंद्रकांत के घर के बाहर गांव के लोगों का हुजूम लगा था। वातावरण में औरतों के रोने धोने और चिल्लाने की आवाज़ें गूंज रहीं थी। भीड़ को चीरते हुए मैं जल्द ही चंद्रकांत के घर की चौगान में पहुंच गया जहां पर अपने नए मुंशी के साथ पिता जी और उधर गौरी शंकर अपने भतीजे रूपचंद्र के साथ खड़े दिखे। मैंने देखा घर के बाहर चंद्रकांत की बीवी और उसकी बेटी गला फाड़ फाड़ कर रोए जा रही थी और चंद्रकांत को जाने क्या क्या बोले जा रहीं थी। दोनों मां बेटी के कपड़े अस्त व्यस्त नज़र आ रहे थे। गांव की कुछ औरतें उन्हें सम्हालने में लगी हुईं थी। चंद्रकांत एक कोने में अपने हाथ में एक पुरानी सी तलवार लिए बैठा था। तलवार पूरी तरह खून से नहाई हुई थी। उसके चेहरे पर बड़ी ही सख़्ती के भाव मौजूद थे।

तभी चीख पुकार से गूंजते वातावरण में किसी वाहन की मध्यम आवाज़ आई तो भीड़ में खड़े लोग एक तरफ हटते चले गए। हम सबने पलट कर देखा। सड़क पर दो जीपें आ कर खड़ी हो गईं थी। आगे की जीप से ठाकुर महेंद्र सिंह उतरे, उनके साथ उनका छोटा भाई ज्ञानेंद्र और बाकी अन्य लोग। महेंद्र सिंह अपने छोटे भाई के साथ आगे बढ़ते हुए जल्द ही पिता जी के पास पहुंच गए।

"ये सब क्या है ठाकुर साहब?" इधर उधर निगाह घुमाते हुए महेंद्र सिंह ने पिता जी से पूछा____"कैसे हुआ ये सब?"

"हम भी अभी कुछ देर पहले ही यहां पहुंचे हैं मित्र।" पिता जी ने गंभीर भाव से कहा___"यहां का दृश्य देख कर हमने चंद्रकांत से इस सबके बारे में पूछा तो इसने बड़े ही अजीब तरीके से गला फाड़ कर बताया कि अपने हाथों से इसने अपने बेटे के हत्यारे को जान से मार डाला है।"

"य...ये क्या कह रहे हैं आप?" महेंद्र सिंह बुरी तरह चौंके____"चंद्रकांत ने अपने बेटे के हत्यारे को जान से मार डाला है? कौन था इसके बेटे का हत्यारा?"

"इसकी ख़ुद की बहू रजनी।" पिता जी ने कहा____"हमारे पूछने कर तो इसने यही बताया है, बाकी सारी बातें आप खुद ही पूछ लीजिए इससे। हमें तो यकीन ही नहीं हो रहा कि इसकी बहू अपने ही पति की हत्यारिन हो सकती है और इसने उसको अपने हाथों से जान से मार डाला।"

पिता जी की बातें सुन कर महेंद्र सिंह फ़ौरन कुछ बोल ना सके। उनके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे इस सबको वो हजम करने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं। हैरत के भाव लिए वो चंद्रकांत की तरफ बढ़े। चंद्रकांत पहले की ही भांति अपने हाथ में खून से सनी तलवार लिए बैठा था।

"ये सब क्या है चंद्रकांत?" महेंद्र सिंह ने उसके क़रीब पहुंचते ही सख़्त भाव से उससे पूछा____"तुमने अपने हाथों से अपनी ही बहू को जान से मार डाला?"

"हां ठाकुर साहब मैंने मार डाला उसे।" चंद्रकांत ने अजीब भाव से कहा____"उसने मेरे बेटे की हत्या की थी इस लिए रात को मैंने उसे अपनी इसी तलवार से काट कर मार डाला।"

"क...क्या???" महेंद्र सिंह आश्चर्य से चीख़ ही पड़े____"तुम्हें ये कैसे पता चला कि तुम्हारी बहू ने ही तुम्हारे बेटे की हत्या की है? आख़िर इतना बड़ा क़दम उठाने का साहस कैसे किया तुमने?"

"साहस.... हा हा हा...।" चंद्रकांत पागलों की तरह हंसा फिर अजीब भाव से बोला____"आप साहस की बात करते हैं ठाकुर साहब....अरे! जिस इंसान को पता चल जाए कि उसके इकलौते बेटे की हत्या करने वाली उसकी अपनी ही बहू है तो साहस के साथ साथ खून भी खौल उठता है। दिलो दिमाग़ में नफ़रत और गुस्से का भयंकर सैलाब आ जाता है। उस वक्त इंसान सारी दुनिया को आग लगा देने का साहस कर सकता है ठाकुर साहब। ये तो कुछ भी नहीं था मेरे लिए।"

"होश में रह कर बात करो चंद्रकांत।" महेंद्र सिंह गुस्से से गुर्राए____"तुम ये कैसे कह सकते हो कि तुम्हारे बेटे की हत्या तुम्हारी अपनी ही बहू ने की थी? आख़िर तुम्हें इस बात का पता कैसे चला?"

"आपने मेरे बेटे के हत्यारे का पता लगाने का मुझे आश्वासन दिया था ठाकुर साहब।" चंद्रकांत ने कहा____"मगर इतने दिन गुज़र जाने के बाद भी आप मेरे बेटे के हत्यारे का पता नहीं लगा सके और मैं हर रोज़ हर पल अपने बेटे की मौत के ग़म में झुलसता रहा। शायद मेरा ये दुख ऊपर वाले से देखा नहीं गया। तभी तो उसने एक ऐसे फ़रिश्ते को मेरे पास भेज दिया जिसने एक पल में मुझे मेरे बेटे के हत्यारे का पता ही नहीं बल्कि उसका नाम ही बता दिया।"

"क...क्या मतलब??" चंद्रकांत की इस बात को सुन कर महेंद्र सिंह के साथ साथ पिता जी और हम सब भी बुरी तरह चकरा गए। उधर महेंद्र सिंह ने पूछा____"किस फ़रिश्ते की बात कर रहे हो तुम और क्या बताया उसने तुम्हें?"

"नहीं....हर्गिज़ नहीं।" चंद्रकांत ने सख़्ती से अपने जबड़े भींच लिए, बोला____"मैं किसी को भी उस नेक फ़रिश्ते के बारे में नहीं बताऊंगा। उसने मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया है। उसने मेरे बेटे के हत्यारे के बारे में बता कर मुझे अपने अंदर की आग को ठंडा करने का अनोखा मौका दिया है।"

महेंद्र सिंह ही नहीं बल्कि वहां मौजूद लगभग हर कोई चंद्रकांत की बातें सुन कर आश्चर्यचकित रह गया था। ज़हन में बस एक ही ख़्याल उभरा कि शायद चंद्रकांत पागल हो गया है। जाने कैसी अजीब बातें कर रहा था वो। दूसरी तरफ उसकी बीवी और बेटी सिर पटक पटक कर रोए जा रहीं थी। वातावरण में एक अजीब सी सनसनी फैली हुई थी।

"हमारा ख़याल है कि इस वक्त चंद्रकांत की मानसिक अवस्था बिल्कुल भी ठीक नहीं है मित्र।" पिता जी ने महेंद्र सिंह के क़रीब आ कर गंभीरता से कहा____"इस लिए इस वक्त इससे कुछ भी पूछने का कोई फ़ायदा नहीं है। जब इसका दिमाग़ थोड़ा शांत हो जाएगा तभी इससे इस सबके बारे में पूछताछ करना उचित होगा।"

"शायद आप ठीक कह रहे हैं।" महेंद्र सिंह ने गहरी सांस ली____"इस वक्त ये सचमुच बहुत ही अजीब बातें कर रहा है और इसका बर्ताव भी कुछ ठीक नहीं लग रहा है। ख़ैर, आपका क्या विचार है अब? हमारा मतलब है कि चंद्रकांत ने अपनी बहू की हत्या कर दी है और ये बहुत बड़ा अपराध है। अतः इस अपराध के लिए क्या आप इसे सज़ा देने का सुझाव देना चाहेंगे?"

"जब तक इस मामले के बारे में ठीक से कुछ पता नहीं चलता।" पिता जी ने कहा____"तब तक इस बारे में किसी भी तरह का फ़ैसला लेना सही नहीं होगा। हमारा सुझाव यही है कि कुछ समय के लिए चंद्रकांत को उसके इस अपराध के लिए सज़ा देने का ख़याल सोचना ही नहीं चाहिए। किन्तु हां, तब तक हमें ये जानने और समझने का प्रयास ज़रूर करना चाहिए कि चंद्रकांत को आख़िर ये किसने बताया कि उसके बेटे का हत्यारा खुद उसकी ही बहू है?"

"बड़ी हैरत की बात है कि चंद्रकांत ने इतना बड़ा और संगीन क़दम उठा लिया।" महेंद्र सिंह ने कहा____"उसे देख कर यही लगता है कि जैसे उस पर पागलपन सवार है। इतना ही नहीं ऐसा भी प्रतीत होता है जैसे उसे इस बात की बेहद खुशी है कि उसने अपने बेटे के हत्यारे को जान से मार कर अपने बेटे की हत्या का बदला ले लिया है।"

"उसके इकलौते बेटे की हत्या हुई थी मित्र।" पिता जी ने कहा____"उसके बेटे को भी अभी कोई औलाद नहीं हुई थी। ज़ाहिर है रघुवीर की मौत के बाद चंद्रकांत की वंशबेल भी आगे नहीं बढ़ सकती है। ये ऐसी बातें हैं जिन्हें सोच सोच कर कोई भी इंसान चंद्रकांत जैसी मानसिकता में पहुंच सकता है। ख़ैर, चंद्रकांत के अनुसार उसे किसी फ़रिश्ते ने उसके बेटे के हत्यारे के बारे में बताया कि हत्यारा खुद उसकी ही बहू है। अब सवाल ये उठता है कि अगर ये सच है तो फिर चंद्रकांत की बहू ने अपने ही पति की हत्या किस वजह से की होगी? हालाकि हमें तो कहीं से भी ये नहीं लगता कि रजनी ने ऐसा किया होगा लेकिन मौजूदा परिस्थिति में उसकी मौत के बाद इस सवाल का उठना जायज़ ही है। चंद्रकांत ने भी तो अपनी बहू की जान लेने से पहले उससे ये पूछा होगा कि उसने अपने पति की हत्या क्यों की थी?"

"ये ऐसा मामला है ठाकुर साहब जिसने हमें एकदम से अवाक सा कर दिया है।" महेंद्र सिंह ने गहरी सांस ली____"हमें लगता है कि किसी ने भी ऐसा होने की कल्पना नहीं की रही होगी। ख़ैर ऊपर वाले की लीला वही जाने किंतु इस मामले में एक दो नहीं बल्कि ढेर सारे सवाल खड़े हो गए हैं। हम लोग चंद्रकांत की ऐसी मानसिकता के लिए उसे समय देने का सुझाव दे रहे थे जबकि ऐसा प्रतीत होता है कि ख़ुद हम लोगों को भी समय चाहिए। कमबख़्त ज़हन ने काम ही करना बंद कर दिया है।"

"सबका यही हाल है मित्र।" पिता जी ने कहा____"हमें लगता है कि इस बारे में ठंडे दिमाग़ से ही कुछ सोचा जा सकेगा। फिलहाल हमें ये सोचना है कि इस वक्त क्या करना चाहिए?"

"अभी तो चंद्रकांत की बहू के मृत शरीर को शमशान में ले जा कर उसका अंतिम संस्कार किया जाना चाहिए।" महेंद्र सिंह ने कहा____"ज़ाहिर है उसका अंतिम संस्कार अब चंद्रकांत ही करेगा। लाश जब तक यहां रहेगी तब तक घर की औरतों का रोना धोना लगा ही रहेगा। इस लिए बेहतर यही है कि लाश को यहां से शमशान भेजने की व्यवस्था की जाए।"

पिता जी भी महेंद्र सिंह की इस बात से सहमत थे इस लिए भीड़ में खड़े गांव वालों को बताया गया कि अभी फिलहाल अंतिम संस्कार की क्रिया की जाएगी, उसके बाद ही इस मामले में कोई फ़ैसला किया जाएगा। पिता जी के कहने पर गांव के कुछ लोग और कुछ औरतें चंद्रकांत के घर के अंदर गए। कुछ ही देर में लकड़ी की खाट पर रजनी की लाश को लिए कुछ लोग बाहर आ गए। महेंद्र सिंह के साथ पिता जी ने भी आगे बढ़ कर रजनी की लाश का मुआयना किया। उनके पीछे गौरी शंकर भी था। इधर मैं और रूपचन्द्र भी रजनी की लाश को देखने की उत्सुकता से आगे बढ़ चले थे।

रजनी की खून से लथपथ पड़ी लाश को देख कर एकदम से रूह थर्रा ग‌ई। बड़ी ही वीभत्स नज़र आ रही थी वो। चंद्रकांत ने वाकई में उसकी बड़ी बेरहमी से हत्या की थी। रजनी के पेट और सीने में बड़े गहरे ज़ख्म थे जहां से खून बहा था। उसके हाथों पर भी तलवार के गहरे चीरे लगे हुए थे और फिर सबसे भयानक था उसके गले का दृश्य। आधे से ज़्यादा गला कटा हुआ था। दूर से ही उसकी गर्दन एक तरफ को लुढ़की हुई नज़र आ रही थी। चेहरे पर दर्द और दहशत के भाव थे।

रजनी की भयानक लाश देख कर उबकाई सी आने लगी थी। रूपचंद्र जल्दी ही पीछे हट गया था। इधर गांव के लोग लाश को देखने के लिए मानों पागल हुए जा रहे थे किंतु हमारे आदमियों की वजह से कोई चंद्रकांत की चौगान के अंदर नहीं आ पा रहा था। कुछ देर बाद पिता जी और महेंद्र सिंह लाश से दूर हो गए। महेंद्र सिंह ने उन लोगों को इशारे से लाश को शमशान ले जाने को कह दिया।

क़रीब एक घंटे बाद शमशान में चंद्रकांत अपनी बहू की चिता को आग दे रहा था। पहले तो वो इसके लिए मान ही नहीं रहा था किंतु जब महेंद्र सिंह ने सख़्त भाव से समझाया तो उसे ये सब करना ही पड़ा। रजनी के मायके वाले भी आ ग‌ए थे जो रजनी की इस तरह हुई मौत से दहाड़ें मार कर रोए थे।

इधर चंद्रकान्त के चेहरे पर आश्चर्यजनक रूप से कोई दुख के भाव नहीं थे, बल्कि उसका चेहरा पत्थर की तरह सख़्त ही नज़र आ रहा था। सारा गांव चंद्रकांत के खेतों पर मौजूद था। चंद्रकांत की बीवी प्रभा और बेटी कोमल ढेर सारी औरतों से घिरी बैठी थीं। दोनों के चेहरे दुख और संताप से डूबे हुए थे।

रजनी का दाह संस्कार कर दिया गया। लोग धीरे धीरे वहां से जाने लगे। बाकी की क्रियाओं के लिए चंद्रकांत के कुछ चाहने वाले उसके साथ थे। महेंद्र सिंह के कहने पर पिता जी ने अपने कुछ आदमियों को गुप्त रूप से चंद्रकांत और उसके घर पर नज़र रखने के लिए लगा दिया था।

✮✮✮✮

पिता जी के आग्रह पर महेंद्र सिंह अपने छोटे भाई और बाकी लोगों के साथ हवेली आ गए थे। रूपचंद्र तो अपने घर चला गया था किंतु गौरी शंकर पिता जी के पीछे पीछे हमारी हवेली ही आ गया था। रजनी के अंतिम संस्कार के बाद जब हम सब हवेली पहुंचे थे तो लगभग दोपहर हो गई थी। अतः पिता जी के आदेश पर सबके लिए भोजन की जल्द ही व्यवस्था की गई। भोजन बनने के बाद सब लोगों ने साथ में ही भोजन किया और फिर सब बैठक में आ गए।

"क्या लगता है ठाकुर साहब आपको?" बैठक में एक कुर्सी पर बैठे महेंद्र सिंह ने पिता जी से मुखातिब हो कर कहा____"चंद्रकांत जिसे फ़रिश्ता बता रहा था वो कौन हो सकता है? इतना ही नहीं उसे कैसे पता था कि चंद्रकांत के बेटे का हत्यारा कोई और नहीं बल्कि उसकी बहू ही है?"

"इस बारे में तो बेहतर तरीके से चंद्रकांत ही बता सकता है मित्र।" पिता जी ने कहा____"मगर हम तो यही कहेंगे कि इस मामले में कोई न कोई भारी लोचा ज़रूर है।"

"कैसा लोचा?" महेंद्र सिंह के साथ साथ सभी के चेहरों पर चौंकने के भाव उभर आए, जबकि महेंद्र सिंह ने आगे कहा____"बात कुछ समझ नहीं आई आपकी?"

"पक्के तौर पर तो हम भी कुछ कह नहीं सकते मित्र।" पिता जी ने कहा____"किंतु जाने क्यों हमें ऐसा आभास हो रहा है कि चंद्रकांत ने कदाचित बहुत बड़ी ग़लतफहमी के चलते अपनी बहू को मार डाला है।"

"यानि आप ये कहना चाहते हैं कि चंद्रकांत जिसे अपना फ़रिश्ता बता रहा था उसने उसको ग़लत जानकारी दी?" महेंद्र सिंह ने हैरत से देखते हुए कहा____"और चंद्रकांत क्योंकि अपने बेटे के हत्यारे का पता लगाने के लिए पगलाया हुआ था इस लिए उसने उसके द्वारा पता चलते ही बिना कुछ सोचे समझे अपनी बहू को मार डाला?"

"बिल्कुल, हमें यही आभास हो रहा है।" पिता जी ने मजबूती से सिर हिलाते हुए कहा____"और अगर ये सच है तो यकीन मानिए किसी अज्ञात व्यक्ति ने बहुत ही ज़बरदस्त तरीके से चंद्रकांत के हाथों उसकी अपनी ही बहू की हत्या करवा दी है। आश्चर्य की बात ये भी कि चंद्रकांत को इस बात का लेश मात्र भी एहसास नहीं हो सका।"

"आख़िर किसने ऐसा गज़बनाक कांड चंद्रकांत के हाथों करवाया हो सकता है?" गौरी शंकर सवाल करने से खुद को रोक न सका____"और भला चंद्रकांत के अंदर ये कैसा पागलपन सवार था कि उसने एक अज्ञात व्यक्ति के कहने पर ये मान लिया कि उसकी बहू ने अपने ही पति की हत्या की है?"

"बात में काफी दम है।" महेंद्र सिंह ने सिर हिलाते हुए कहा____"यकीनन ये हैरतअंगेज बात है। जिसने भी चंद्रकांत के हाथों ये सब करवाया है वो कोई मामूली इंसान नहीं हो सकता।"

"बात तो ठीक है आपकी।" पिता जी ने कहा____"लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि इस वक्त हम सब इस मामले में सिर्फ अपने अपने कयास ही लगा रहे हैं। सच का पता तो चंद्रकांत से पूछताछ करने पर ही चलेगा। हो सकता है कि जिस बात को हम सब हजम नहीं कर पा रहे हैं वास्तव में वही सच हों।"

"क्या आप ये कहना चाहते हैं कि चंद्रकांत के बेटे की हत्या उसकी बहू ने ही की रही होगी?" महेंद्र सिंह ने हैरानी से देखते हुए कहा____"और जब चंद्रकांत को किसी अज्ञात व्यक्ति के द्वारा इसका पता चला तो उसने गुस्से में आ बबूला हो कर अपनी बहू को मार डाला?"

"बेशक ऐसा भी हो सकता है।" पिता जी ने कहा____"हमारे मामले के बाद आपको भी इस बात का पता हो ही गया है कि चंद्रकांत की बीवी और उसकी बहू का चरित्र कैसा था। बेशक उनके साथ हमारे बेटे का नाम जुड़ा था लेकिन सोचने वाली बात है कि ऐसी चरित्र की औरतों का संबंध क्या सिर्फ एक दो ही मर्दों तक सीमित रहा होगा?"

"आख़िर आप कहना क्या चाहते हैं ठाकुर साहब?" महेंद्र सिंह ने पूछा।

"हम सिर्फ चरित्र के आधार पर किसी चीज़ की संभावना पर प्रकाश डालने का प्रयास कर रहे हैं।" पिता जी ने संतुलित भाव से कहा____"हो सकता है कि रघुवीर की बीवी का कोई ऐसा राज़ रहा हो जिसका रघुवीर के सामने फ़ाश हो जाने का रजनी को डर रहा हो। या फिर ऐसा हो सकता है कि किसी ऐसे व्यक्ति ने रजनी को अपने ही पति की हत्या करने के लिए मजबूर कर दिया जो रघुवीर का दुश्मन था। उस व्यक्ति को रजनी के नाजायज़ संबंधों का पता रहा होगा जिसके आधार पर उसने रजनी को अपने ही पति की हत्या कर देने पर मजबूर कर दिया होगा।"

"पता नहीं क्या सही है और क्या झूठ।" महेंद्र सिंह ने गहरी सांस ली____"पिछले कुछ महीनों में हमने इस गांव में जो कुछ देखा और सुना है उससे हम वाकई में चकित रह गए हैं। इससे पहले हमने सपने में भी नहीं सोचा था कि आपके इस गांव में तथा आपके राज में ये सब देखने सुनने को मिलेगा। उस मामले से अभी पूरी तरह निपट भी नहीं पाए थे कि अब ये कांड हो गया यहां। समझ में नहीं आ रहा कि आख़िर ये सब कब बंद होगा?"

"इस धरती में जब तक लोग रहेंगे तब तक कुछ न कुछ होता ही रहेगा मित्र।" पिता जी ने कहा____"ख़ैर, हमारा ख़याल है कि अब हमें चंद्रकांत के यहां चलना चाहिए। ये जानना बहुत ही ज़रूरी है कि चंद्रकांत जिसे अपना फ़रिश्ता कह रहा था वो कौन है और उसने चंद्रकांत से ये क्यों कहा कि उसके बेटे की हत्या करने वाला कोई और नहीं बल्कि उसकी ही बहू है? एक बात और, हमें पूरा यकीन है कि इतनी बड़ी बात को चंद्रकांत ने इतनी आसानी से स्वीकार नहीं कर लिया होगा। यकीनन अज्ञात व्यक्ति ने उसे कुछ ऐसा बताया रहा होगा जिसके चलते चंद्रकांत ने ये मान लिया होगा कि हां उसकी बहू ने ही उसके बेटे की हत्या की है।"

"सही कह रहे हैं आप?" महेंद्र सिंह ने सिर हिलाते हुए कहा____"अब हमें भी आभास होने लगा है कि ये मामला उतना सीधा नहीं है जितना नज़र आ रहा है। यकीनन कोई बड़ी बात है। ख़ैर चलिए चंद्रकांत के घर चलते हैं।"

कहने के साथ ही महेंद्र सिंह कुर्सी से उठ कर खड़े हो गए। उनके उठते ही बाकी सब भी उठ गए। कुछ ही देर में एक एक कर के सब बैठक से निकल कर हवेली से बाहर की तरह बढ़ गए। सबके पीछे पीछे मैं भी चल पड़ा। मुझे भी ये जानने की बड़ी उत्सुकता थी कि आख़िर ये सब हुआ कैसे और वो कौन है जिसे चंद्रकांत ने अपना फ़रिश्ता कहा था?

━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━
 
अध्याय - 103

━━━━━━༻♥༺━━━━━━

"सही कह रहे हैं आप?" महेंद्र सिंह ने सिर हिलाते हुए कहा____"अब हमें भी आभास होने लगा है कि ये मामला उतना सीधा नहीं है जितना नज़र आ रहा है। यकीनन कोई बड़ी बात है। ख़ैर चलिए चंद्रकांत के घर चलते हैं।"

कहने के साथ ही महेंद्र सिंह कुर्सी से उठ कर खड़े हो गए। उनके उठते ही बाकी सब भी उठ गए। कुछ ही देर में एक एक कर के सब बैठक से निकल कर हवेली से बाहर की तरह बढ़ गए। सबके पीछे पीछे मैं भी चल पड़ा। मुझे भी ये जानने की बड़ी उत्सुकता थी कि आख़िर ये सब हुआ कैसे और वो कौन है जिसे चंद्रकांत ने अपना फ़रिश्ता कहा था?


अब आगे....

चंद्रकांत और उसके बेटे के ससुराल वाले पहले ही आ गए थे जिसके चलते काफी रोना धोना हुआ था उसके घर में। रघुवीर की ससुराल वाले तो आपे से बाहर भी हो ग‌ए थे जिसके चलते हंगामा होने वाला था मगर गांव वालों ने फ़ौरन ही सब सम्भाल लिया था।

हम सब जब वहां पहुंचे तो देखा कि गांव के कुछ बड़े बुजुर्ग लोग पहले से ही चंद्रकांत के घर में मौजूद थे। रघुवीर का साला और उसका ससुर बाहर ही एक तरफ गुमसुम से बैठे थे जबकि उनके साथ आई औरतें और लड़कियां घर के अंदर थीं। बहरहाल, पिता जी के साथ जब महेंद्र सिंह आदि लोगों का काफ़िला पहुंचा तो घर के बाहर ही सबके बैठने की व्यवस्था कर दी गई। आसमान में घने बादल छाए हुए थे जिसके चलते धूप नहीं थी और ठंडी हवाएं चल रहीं थी।

सब लोग बैठे हुए थे जबकि चंद्रकांत चेहरे पर अजीब सी सख़्ती धारण किए घर के बाहर दोनों तरफ बनी चबूतरेनुमा पट्टी पर बैठा था। वातावरण में अजीब सी ख़ामोशी छाई हुई थी। आगे की कार्यवाही अथवा पूछताछ के लिए महेंद्र सिंह ने औपचारिक रूप से सभी लोगों के सामने वार्तालाप शुरू किया और फिर मुद्दे की बात के लिए चंद्रकांत को अपने थोड़ा पास बुला लिया।

"हम उम्मीद करते हैं कि अब तुम्हारा दिलो दिमाग़ पहले से थोड़ा शांत और बेहतर हो गया होगा।" महेंद्र सिंह ने चंद्रकांत की तरफ देखते हुए कहा____"अतः अब हम ये उम्मीद करते हैं कि हम जो कुछ भी तुमसे पूछेंगे उसका तुम सही सही जवाब दोगे।"

कुछ घंटे लोगों के बीच रहने के चलते कदाचित चंद्रकांत की मनोदसा में थोड़ा परिवर्तन आ गया था। इस लिए महेंद्र सिंह की बात सुन कर उसने ख़ामोशी से ही हां में सिर हिला दिया था।

"बहुत बढ़िया।" महेंद्र सिंह ने कहा___"हमारा सबसे पहला सवाल ये है कि वो कौन था जिसने तुम्हें ये बताया कि तुम्हारे बेटे की हत्या किसी और ने नहीं बल्कि तुम्हारी अपनी ही बहू ने की थी?"

"कल रात की बात है।" चंद्रकांत ने सपाट लहजे से कहा____"शायद उस वक्त रात के बारह बजे रहे होंगे। मैं पेशाब करने के लिए घर से बाहर निकला था। पेशाब कर के वापस घर के अंदर जाने ही लगा था कि तभी अजीब सी आहट हुई जिसके चलते मैं रुक गया। पहले मुझे लगा कि शायद ये मेरा वहम है इस लिए ध्यान न दे कर मैंने फिर से अपने क़दम आगे बढ़ाए मगर तभी आहट फिर से हुई। इस बार की आहट से मैं समझ गया कि इसके पहले मुझे कोई वहम नहीं हुआ था। ख़ैर मैं ये देखने के लिए इधर उधर निगाह डालने लगा कि रात के इस वक्त आख़िर किस चीज़ से आहट हो रही है? मुझे याद आया कि ऐसी ही एक रात मेरे बेटे की किसी ने हत्या कर दी थी। मुझे एकदम से लगा जैसे उस वक्त भी वो हत्यारा मेरे आस पास मौजूद है। अंधेरा था इस लिए स्पष्ट कुछ दिख नहीं रहा था लेकिन जल्दी ही मेरी निगाह नीम अंधेरे में एक जगह खड़े एक साए पर पड़ गई।"

"साए पर??" महेंद्र सिंह पूछे बगैर न रह सके थे____"किसका साया था वो?"

"एक ऐसे रहस्यमय व्यक्ति का जिसके बारे में इसके पहले दादा ठाकुर ज़िक्र कर चुके थे।" चंद्रकांत ने पिता जी की तरफ देखते हुए कहा____"हां ठाकुर साहब, वो कोई और नहीं बल्कि वही सफ़ेदपोश व्यक्ति था जिसके बारे में आपने मुझसे और गौरी शंकर जी से पूछा था।"

चंद्रकांत की ये बात सुन कर पिता जी के साथ साथ बाकी सब लोग भी बुरी तरह चौंक पड़े थे। हैरत में डूबा चेहरा लिए सब एक दूसरे की तरफ देखने लगे थे। इधर मेरा भी वही हाल था। मैं भी सोच में पड़ गया था कि साला अब ये क्या चक्कर है? इतने समय से सफ़ेदपोश का कहीं कोई अता पता नहीं था और अब इस तरह से उसका पता चल रहा था। मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि चंद्रकांत के इस मामले में सफ़ेदपोश कहां से और कैसे आ गया?

"ये तुम क्या कह रहे हो चंद्रकांत?" पिता जी पूछने से खुद को रोक न सके____"पिछली रात तुमने जिस साए को देखा क्या वो सच में सफ़ेदपोश था? कहीं तुम्हें कोई वहम तो नहीं हुआ था?"

"वहम का सवाल ही नहीं उठता ठाकुर साहब।" चंद्रकांत ने पूरी मजबूती से कहा____"क्योंकि मैंने उसे बहुत क़रीब से और अपनी आंखों से देखा था। इतना ही नहीं काफी देर तक मेरी उससे बातें भी हुईं थी। वो वही था जिसके समूचे बदन पर सफ़ेद लिबास था।"

"बड़े आश्चर्य की बात है ये।" पिता जी बरबस ही कह उठे____"इतने समय से हम उस सफ़ेदपोश को तलाश कर रहे हैं किंतु उसका कहीं कोई सुराग़ नहीं मिल सका और तुम कह रहे हो कि तुमने उसे देखा है? उससे बातें भी की हैं?"

"यही सच है ठाकुर साहब।" चंद्रकांत ने दृढ़ता से कहा____"उसी ने मुझे बताया कि मेरे बेटे का हत्यारा मेरी अपनी ही बहू थी।"

"और उसके कहने से तुमने मान लिया?" महेंद्र सिंह ने हैरत से उसे देखा____"बड़े आश्चर्य की बात है कि तुमने एक ऐसे व्यक्ति की बात मान ली जो जाने कब से खुद को सबसे छुपाए फिर रहा है। इतना ही नहीं जो ठाकुर साहब के बेटे वैभव की जान का दुश्मन भी बना हुआ है। हमें बिल्कुल भी इस बात का यकीन नहीं हो रहा कि तुमने ऐसे व्यक्ति के कहने पर अपनी बहू को अपने बेटे की हत्यारिन मान लिया और फिर बदले की भावना के चलते उसे मार भी डाला।"

"बिल्कुल, हमारा भी यही कहना है।" पिता जी ने कहा____"लेकिन हम ये भी समझते हैं कि तुमने उस सफ़ेदपोश के कहने बस से ही अपनी बहू को हत्यारिन नहीं मान लिया होगा। यकीनन उसने तुम्हें कोई ऐसी वजह भी बताई होगी जिसके बाद तुम्हें अपनी बहू के हत्यारिन होने पर यकीन आ गया होगा। हम सब भी ये जानना चाहते हैं कि सफ़ेदपोश ने तुम्हें ऐसा क्या बताया था?"

"मैं हर बात किसी को बताना ज़रूरी नहीं समझता।" चंद्रकांत ने सख़्ती से जबड़े भींच कर कहा____"ये मेरा पारिवारिक और बेहद निजी मामला है।"

"जब किसी औरत को बेरहमी से मार डाला जाए तो मामला पारिवारिक अथवा निजी नहीं रह जाता चंद्रकांत।" महेंद्र सिंह ने कठोर भाव से कहा____"तुमने अपनी बहू को बेरहमी से मार डाला है, इस लिए अब तुम्हें बताना ही होगा कि इसके पीछे की असल वजह क्या है? परिवार का मामला चाहे जैसा भी हो लेकिन किसी की हत्या कर देने का हक़ किसी को भी नहीं है। तुमने अपनी बहू की हत्या की है और इस अपराध के लिए तुम्हें सज़ा भी मिलेगी।"

"हां तो दे दीजिए मुझे सज़ा।" चंद्रकांत पागलों की तरह चीख पड़ा____"चढ़ा दीजिए मुझे सूली पर। मेरे मर जाने से कम से कम दादा ठाकुर के कलेजे को शांति तो मिल जाएगी।"

"मादरचोद, क्या बोला तूने?" चंद्रकांत की बात से मुझे इतना गुस्सा आया कि मैं गुस्से में आग बबूला हो कर पलक झपकते ही उसके क़रीब पहुंच गया।

इससे पहले कि कोई कुछ कर पाता मैंने उसका गिरेबान पकड़ कर उठा लिया और फिर गुर्राते हुए कहा____"तू कौन सा दूध का धुला है जो हर बात में तू मेरे बाप पर उंगली कर के तंज़ कसने लगता है? तेरी सच्चाई ये है कि तू एक नामर्द है और तेरा बेटा तुझसे भी बड़ा नामर्द था। तेरे घर की औरतें तेरे सामने दूसरे मर्दों के साथ अपनी हवस मिटाती थीं और तुम दोनों बाप बेटे अपने उबलते खून को पानी से ठंडा करते थे।"

"ये क्या हिमाकत है??" पिता जी गुस्से से दहाड़ उठे।

उनके साथ साथ बाकी सब भी उछल कर खड़े हो गए थे। महेंद्र सिंह का छोटा भाई ज्ञानेंद्र सिंह लपक कर मेरे पास आया और मुझे पकड़ कर अपनी तरफ खींचने लगा मगर मैंने झटक दिया उसे। इस वक्त बड़ा तेज़ गुस्सा आया हुआ था मुझे। मेरे झटक देने पर ज्ञानेंद्र झोंक में पीछे जा कर गिरते गिरते बचा। इधर चंद्रकांत चेहरे पर दहशत के भाव लिए चिल्लाने लगा था। ज्ञानेंद्र सम्हल कर फिर से मुझे छुड़ाने के लिए मेरे क़रीब आया और इस बार वो मुझे पूरी ताक़त से खींच कर चंद्रकांत से दूर ले गया।

"तुम दोनो बाप बेटे जैसा हिजड़ा इस पूरी दुनिया में कहीं नहीं होगा।" मैं गुस्से चीखते हुए बोला____"साले नामर्द, अपनी औरतों को तो बस में कर नहीं सका और मर्द बनता है बेटीचोद।"

"तुम्हें इस हिमाकत की सख़्त से सख़्त सज़ा दी जाएगी।" पिता जी ने मेरी तरफ देखते हुए बेहद गुस्से में कहा____"इसी वक्त चले जाओ यहां से वरना हमसे बुरा कोई नहीं होगा।"

"बेशक सज़ा दे दीजिएगा पिता जी।" मैंने गुस्से से भभकते हुए खुद को एक झटके में ज्ञानेंद्र से छुड़ाया, फिर बोला____"लेकिन इस मादरचोद ने अगर दुबारा फिर से किसी बात पर आपकी तरफ उंगली उठाई तो इसकी ज़ुबान हलक से निकाल कर इसके हाथ में दे दूंगा।"

शोर शराबा सुन कर घर के अंदर से औरतें भाग कर बाहर आ गईं थी। बाहर मौजूद लोग भी तितर बितर हो कर दूर हट गए थे। सभी के चेहरों पर ख़ौफ के भाव उभर आए थे। उधर चंद्रकांत सहम कर घर के बाहर दोनों तरफ बनी पट्टी पर बैठ गया था। जूड़ी के मरीज़ की तरह थर थर कांपे जा रहा था वो।

"हमने कहा चले जाओ यहां से।" पिता जी इस बार गुस्से में दहाड़ ही उठे। पिता जी का गुस्सा देख महेंद्र सिंह ने अपने भाई को इशारा किया तो वो मुझे ले कर अपनी जीप की तरफ बढ़ चला।

"मुझे तुमसे ऐसी बेहूदा हरकत की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी वैभव।" रास्ते में ज्ञानेंद्र सिंह ने गंभीरता से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"सबके सामने तुम्हें ऐसे गंदे शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए था और ना ही उसे गालियां देनी चाहिए थी।"

"और उसे सबके सामने मेरे पिता पर तंज कसना चाहिए था, है ना?" मैंने तीखे भाव से ज्ञानेंद्र की तरफ देखा।

"तुम उस व्यक्ति के स्वभाव से अच्छी तरह परिचित हो।" ज्ञानेंद्र ने कहा____"पिछले कुछ समय में यहां जो कुछ हुआ है उससे हम सब भी इतना समझ चुके हैं कि कौन कैसा है। एक बात हमेशा याद रखो कि कीचड़ में अगर पत्थर मारोगे तो वो कीचड़ उल्टा तुम्हें ही गंदा करेगा, जबकि उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा। चंद्रकांत की दशा कीचड़ जैसी ही है।"

"मैं काफी समय से उसको बर्दास्त करता आ रहा था चाचू।" मैंने खीझते हुए कहा____"लेकिन आज सबके सामने जब उसने फिर से पिता जी पर तंज कसा तो मैं बर्दास्त नहीं कर सका। एक तो मादरचोद ने खुद अपनी ही बहू को मार डाला और ऊपर से अभी भी खुद को साधू महात्मा दर्शाने की कोशिश कर रहा है।"

"मूर्ख लोग ऐसे ही होते हैं वैभव।" ज्ञानेंद्र सिंह ने कहा____"समझदार लोग मूर्खों की बातों पर ध्यान नहीं देते। जैसे तुम्हारे पिता जी उसकी बातों को सुन कर धैर्य धारण किए रहते हैं वैसे ही तुम्हें भी करना चाहिए था।"

अब तक मेरा गुस्सा काफी हद तक ठंडा हो गया था इस लिए ज्ञानेंद्र सिंह की बातें अब मेरे ज़हन में आसानी से घुस रहीं थी। मुझे एहसास होने लगा था कि वाकई में मुझसे ग़लती हो गई है। मुझे सबके सामने इस तरह का तमाशा नहीं करना चाहिए था।

"मैंने सुना है कि तुम पहले से अब काफी बदल गए हो।" ज्ञानेंद्र सिंह ने मुझे ख़ामोश देखा तो इस बार बड़ी शालीनता से कहा____"और एक अच्छे इंसान की तरह अपनी हर ज़िम्मेदारियां निभा रहे हो। एक वक्त था जब हम लोग दादा ठाकुर के सामने तुम्हारा ज़िक्र करते थे तो अक्सर उनका चेहरा मायूस हो जाया करता था किंतु पिछले कुछ समय से हमने यही देखा है कि तुम्हारा ज़िक्र होने पर उनके चेहरे पर खुशी और गर्व के भाव आ जाते हैं। अगर एक पिता अपने बेटे के लिए खुशी और गर्व महसूस करने लगे तो इसका मतलब ये होता है कि उन्हें दुनिया की हर खुशी मिल चुकी है। यानि अब उन्हें किसी चीज़ की हसरत नहीं है। ख़ैर, मैं रिश्ते में तुम्हारा चाचू हूं लेकिन तुम मुझे अपना दोस्त भी मान सकते हो। एक दोस्त के नाते मैं तुमसे यही कहूंगा कि इतना कुछ होने के बाद अब तुम ही दादा ठाकुर की एक मात्र उम्मीद हो। तुम भले ही उनके बेटे हो लेकिन तुमसे कहीं ज़्यादा उनके बारे में हम जानते हैं। हमने बचपन से दादा ठाकुर को लोगों की खुशी के लिए संघर्ष करते देखा है। मेरे भैया हमेशा मुझसे कहा करते हैं कि मैं दादा ठाकुर की तरह बनूं और हमेशा उनके नक्शे क़दम पर चलूं। ज़ाहिर है मेरे भैया भी समझते हैं कि दादा ठाकुर कितने महान इंसान हैं। हम सब उनके नक्शे क़दम पर चलने की कोशिश भले ही करते हैं लेकिन उनके जैसा बनना बिल्कुल भी आसान नहीं है। फिर भी इतना तो कर ही सकते हैं कि हमारे आचरण से किसी का अहित न हो बल्कि सबका भला ही हो।"

"मैं समझ गया चाचू कि आप क्या कहना चाहते हैं।" मैंने अधीरता से कहा____"यकीन कीजिए मैं भी अब ऐसा ही इंसान बनने की कोशिश कर रहा हूं। मुझे एहसास है कि मैंने इसके पहले बहुत ग़लत कर्म किए थे जिसके चलते मेरे खानदान का नाम ख़राब हुआ और पिता जी को हमेशा मेरी वजह से शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी। अब सब कुछ भुला कर यही कोशिश कर रहा हूं कि मुझसे ग़लती से भी कोई ग़लत काम न हो।"

"बहुत बढ़िया।" ज्ञानेंद्र सिंह ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"और हां अपने गुस्से पर भी लगाम लगाए रखा करो। तुम्हारा गुस्सा दूर दूर तक मशहूर है। लोग तुम्हारे गुस्से से बहुत डरते हैं। इस लिए इस पर लगाम लगा के रखो।"

"कोशिश कर रहा हूं चाचू।" मैंने झेंपते हुए कहा____"मैंने काफी समय से किसी पर गुस्सा नहीं किया और ना ही किसी को बुरा भला कहा है। आज भी मैं गुस्सा ना होता अगर चंद्रकांत मेरे पिता जी पर तंज न कसता।"

"ख़ैर छोड़ो इस बात को।" ज्ञानेंद्र सिंह ने कहा____"देखो, हम हवेली पहुंच गए हैं। तुम जाओ आराम करो, मैं अब वापस जाऊंगा।"

हवेली के हाथी दरवाज़े के पास जीप रुकी तो मैं उतर गया। ज्ञानेंद्र सिंह ने जीप को वापस मोड़ा और फिर मेरी तरफ देखते हुए कहा____"मुझे पता है कि तुम हर जगह मशहूर हो लेकिन फिर भी एक नई पहचान के लिए लोगों से मिलना मिलाना बेहद ज़रूरी होता है। कभी समय निकाल कर आओ हमारे यहां।"

"बिल्कुल चाचू।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा___"मैं ज़रूर आऊंगा। आख़िर अब आप मेरे चाचू के साथ साथ दोस्त भी तो बन गए हैं।"

मेरी बात सुन कर ज्ञानेंद्र सिंह हल्के से हंसा और फिर जीप को आगे बढ़ा कर चला गया। उसके जाने के बाद मैं भी हवेली की तरफ पैदल चल पड़ा। ज्ञानेंद्र सिंह मुझे एक अच्छा इंसान प्रतीत हुआ था। वो विवाहित था किन्तु उम्र ज़्यादा नहीं हुई थी उसकी। शरीर काफी फिट था जिसके चलते उसकी उमर का पता नहीं चलता था। ख़ैर उसके बारे में सोचते हुए मैं कुछ ही देर में हवेली के अंदर दाखिल हो गया।

✮✮✮✮

मेरी वजह से जो हंगामा हुआ था उसे जल्द ही सम्हाल लिया गया था और अब सब कुछ ठीक था। पिता जी के चेहरे पर अभी भी नाराज़गी दिख रही थी। ज़ाहिर है मेरी वजह से उन्हें एक बार फिर से शर्मिंदगी हुई थी। किसी को भी मुझसे ऐसी हरकत की उम्मीद नहीं थी। ख़ैर जो होना था वो हो चुका था। महेंद्र सिंह ने चंद्रकांत को फिर से अपने सामने बुला लिया था। इस वक्त वो अजीब सा चेहरा लिए खड़ा था।

"ठाकुर साहब को बचपन से जानते हुए भी तुम इनके बारे में ऐसे ख़याल रखते हो जोकि हैरत की बात है।" महेंद्र सिंह ने उसकी तरफ देखते हुए कहा____"तुम्हारा जो भी मामला था उसे तुम दूसरे तरीके से भी बहुत अच्छी तरह सुलझा सकते थे। दूसरी बात ये भी है कि ग़लती सिर्फ ठाकुर साहब के बेटे की ही बस नहीं थी बल्कि तुम्हारे घर की औरतों की भी थी। तुमने अपने घर की औरतों को कुछ नहीं कहा और ना ही उनके ग़लत कर्मों के लिए उन्हें धिक्कारा। इसके बदले तुमने वो किया जो किसी भी हालत में नहीं करना चाहिए था। अगर तुम्हें पता चल ही गया था कि तुम्हारे घर के मामले में वैभव भी शामिल है तो तुम्हें सीधा ठाकुर साहब से इस बारे में बात करनी चाहिए थी। इसके बाद भी अगर कोई हल न निकलता तो तुम्हारा ऐसा क़दम उठाना जायज़ कहलाता लेकिन नहीं, तुमने वो किया जिसके चलते ना जाने कितने लोगों की जानें चली गईं।"

चंद्रकांत अपराध बोझ से सिर झुकाए खड़ा रहा। उससे कुछ बोला नहीं जा रहा था। चौगान में बैठे लोग सांसें रोके महेंद्र सिंह की बातें सुन रहे थे और साथ ही समझने की कोशिश कर रहे थे कि किसकी कहां ग़लती रही है?

"ख़ैर जो हो गया उसे तो अब लौटाया नहीं जा सकता।" महेंद्र सिंह ने गहरी सांस ली____"लेकिन ये जो तुमने किया है उसके लिए तुम्हें कोई माफ़ी नहीं मिल सकती। किंतु उससे पहले हम तुमसे ये जानना चाहते हैं कि सफ़ेदपोश ने तुम्हारी बहू के बारे में ऐसा क्या बताया था जिससे तुमने ये मान लिया कि तुम्हारी बहू ने ही रघुवीर की हत्या की है?"

"उसने मुझे बताया था कि मेरी बहू रजनी ने हाल ही में एक नए व्यक्ति से संबंध बना लिया था।" चंद्रकांत ने जबड़े भींच कर कहा____"वो व्यक्ति रजनी को हमेशा के लिए अपनी बना कर ले जाना चाहता था। रजनी भी इसके लिए तैयार थी। उस रात रजनी अपने उस नए आशिक़ के साथ भाग ही रही थी। उसने जब देखा कि मेरा बेटा गहरी नींद में सोया हुआ है तो वो चुपके से अपना ज़रूरी समान ले कर घर से बाहर निकल आई थी। घर के बाहर उसका आशिक़ पहले से ही उसका इंतज़ार कर रहा था। रजनी को बिल्कुल भी अंदेशा नहीं था कि ऐन वक्त पर मेरा बेटा उसके पीछे पीछे आ जाएगा। असल में मेरे बेटे को रात में पेशाब करने के लिए दो तीन बार बाहर जाना पड़ता था। उस रात भी वो पेशाब करने के लिए ही बाहर निकला था। कमरे में रजनी को न देख कर वो चौंका ज़रूर था किंतु उसने यही सोचा था कि शायद रजनी भी उसकी तरह बाहर लघुशंका करने गई होगी। ख़ैर जब मेरा बेटा बाहर आया तो उसने देखा कि उसकी बीवी अंधेरे में किसी के पास खड़ी थी और धीमी आवाज़ में बातें कर रही थी। रघुवीर फ़ौरन ही उसके क़रीब पहुंचा तो वो दोनों मेरे बेटे को देख कर बुरी तरह डर गए। इधर मेरा बेटा भी अपनी बीवी को रात के उस वक्त किसी गैर मर्द के साथ देख कर उछल पड़ा था। उसे समझने में देर न लगी कि रजनी अंधेरे में अपने आशिक़ के साथ क्या कर रही थी। मेरे बेटे को इतना गुस्सा आया कि उसने पहले तो रजनी को ज़ोर का धक्का दे कर दूर धकेला और फिर उसके आशिक़ को मारने लगा। रजनी इस सबसे बहुत ज़्यादा घबरा गई। उसे लगा कहीं बात ज़्यादा न बढ़ जाए और लोगों को पता न चल जाए। उधर मेरा बेटा उसके आशिक़ की धुनाई करने में लगा हुआ था। रजनी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे? तभी उसकी नज़र वहीं कुछ ही दूरी पर पड़ी कुल्हाड़ी पर पड़ी। उसने झट से उस कुल्हाड़ी को उठा लिया और रघुवीर के क़रीब आ कर उसे धमकाया कि वो उसके आशिक़ को छोड़ दे वरना वो उस कुल्हाड़ी से उसका खून कर देगी। रघुवीर को लगा था कि रजनी सिर्फ उसे धमका रही है इस लिए उसने उसे गंदी गाली दे कर फिर से धक्का दे दिया और उसके आशिक़ को मारने लगा। अब तक इस सबके चलते थोड़ा शोर होने लगा था जिससे रजनी और भी ज़्यादा घबरा उठी थी। वो क्योंकि अपने आशिक़ के साथ नई दुनिया बसा लेना चाहती थी इस लिए उसने समय न ख़राब करते हुए आगे बढ़ कर मेरे बेटे पर उस कुल्हाड़ी से वार कर दिया। कुल्हाड़ी का वार सीधा रघुवीर की गर्दन पर लग गया। ऐसा इत्तेफ़ाक से ही हुआ था। रजनी को भी ऐसी उम्मीद नहीं थी। रघुवीर लहरा कर वहीं ज़मीन पर गिर गया और दर्द से तड़पने लगा। कुछ ही देर में उसका जिस्म एकदम से शांत पड़ गया। मेरा बेटा मर चुका था। जब रजनी और उसके आशिक़ को इस बात का आभास हुआ तो दोनों ही सन्न रह गए। रजनी का आशिक़ मेरे बेटे के इस तरह मर जाने से इतना डर गया कि वो वहां से फ़ौरन ही भाग गया। इधर रजनी की भी हालत ख़राब हो गई थी। उसने अपने जाते हुए आशिक़ को पुकारना चाहा मगर किसी के सुन लेने के डर से वो उसे पुकार ना सकी किंतु इतना उसे ज़रूर समझ आ गया था कि उसके आशिक़ ने उसे ऐसे वक्त पर धोखा दे दिया है। रजनी से वो हो गया था जिसे उसने ख़्वाब में भी नहीं सोचा था। काफी देर तक वो मेरे बेटे की लाश के पास बैठी रोती रही। फिर जैसे ही उसे हालात की गंभीरता का एहसास हुआ तो वो सोचने लगी कि अब वो क्या करे? वो जानती थी कि उससे बहुत बड़ा कांड हो गया है और जब इस बात का पता घर वालों को चलेगा तो वो कोई जवाब नहीं दे पाएगी। उसने आनन फानन में खून से सनी उस कुल्हाड़ी को फेंका और फिर अपना हुलिया ठीक कर के घर के अंदर आ गई। अपने कमरे में आ कर वो सोचने लगी कि इस गंभीर मुसीबत से बचने के लिए वो क्या करे? सारी रात उसने सोचा लेकिन उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसे अपने धोखेबाज आशिक़ पर भी बहुत गुस्सा आ रहा था। उसी की वजह से उसने इतना बड़ा क़दम उठाया था। तभी उसे रूपचंद्र का ख़याल आया। रूपचंद्र ने उसे पिछली शाम रास्ते में रोका था और उसके साथ ज़ोर ज़बरदस्ती की थी जिसके जवाब में रजनी ने उसे खरी खोटी सुनाई थी। रजनी ने जब इस बारे में सोचा तो उसे अपने बचाव के लिए तरीका सूझ गया। सुबह जब हम सबको इस बात का पता चला तो हम सब रोने धोने लगे। रजनी भी हमारी तरह रोने धोने लगी थी। कुछ देर बाद उसने रोते हुए वही सब कहना शुरू कर दिया जो रात में उसने सोचा था। उसकी बात सुन कर मैं भी उसके फेर में आ गया था और फिर आगे क्या हुआ ये सब आप जानते ही हैं।"

इतना सब कुछ बताने के बाद चंद्रकांत चुप हुआ तो वातावरण में सन्नाटा सा छा गया। पिता जी के साथ साथ महेंद्र सिंह और बाकी सब भी चकित भाव से उसकी तरफ देखे जा रहे थे।

"तो उस सफ़ेदपोश ने तुम्हें ये सब बताया था जिसके बाद तुम्हें भी यकीन हो गया कि तुम्हारे बेटे की हत्या तुम्हारी बहू ने ही की है?" महेंद्र सिंह ने कहा____"अगर वाकई में ये सच है तो ये बड़े ही आश्चर्य की बात है कि अब तक हम में से किसी को इस बारे में पता तक नहीं चल सका। वैसे तुमने उस सफ़ेदपोश से पूछा नहीं कि उसे ये सब बातें कैसे पता थीं? आख़िर इतनी गहरी राज़ की बातें उसे कैसे पता चलीं? तुम्हारी बातें सुन कर तो ऐसा प्रतीत हुआ जैसे सफ़ेदपोश ने अपनी आंखों देखा हाल ही बताया था तुम्हें। अगर यही सच है तो सवाल उठता है कि उसने इस सबको रोका क्यों नहीं? क्यों अपनी आंखों के सामने तुम्हारे बेटे की हत्या हो जाने दी?"

चंद्रकांत, महेंद्र सिंह की ये बात सुन कर बड़े अजीब भाव से देखने लगा उन्हें। चेहरे पर कई तरह के भाव उभरते हुए नज़र आने लगे थे। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वो बड़ी तेज़ी से कुछ सोचने समझने की कोशिश कर रहा हो।

"उस सफ़ेदपोश से और क्या बातें हुईं थी तुम्हारी?" दादा ठाकुर ने कुछ सोचते हुए चंद्रकांत से पूछा____"हमारा मतलब है कि उस सफ़ेदपोश ने तुम्हारे बेटे के हत्यारे के बारे में तुम्हें बताया तो बदले में क्या उसने तुमसे कुछ नहीं चाहा?"

"चाहा है।" चंद्रकांत बड़ी अजीब दुविधा लिए बोला____"कल रात उसने कहा था कि बदले में मुझे भी वही करना होगा जो वो करने को कहेगा मुझसे।"

"अच्छा।" महेंद्र सिंह ने कहा____"और क्या कहा था उसने?"

"यही कि आज रात वो किसी भी वक्त मुझसे मिलने आ सकता है।" चंद्रकांत ने कहा____"शायद अब वो मुझे कोई काम सौंपेगा जिसे मुझे करना होगा। उसने मुझे धमकी भी दी थी कि अगर मैं अपने वादे से मुकर गया तो ये मेरे और मेरे परिवार के लिए अच्छा नहीं होगा।"

"बहुत खूब।" महेंद्र सिंह बोल पड़े____"फिर तो तुम्हें उसके लिए तैयार रहना चाहिए, है ना?"

चंद्रकांत अजीब सा मुंह बनाए खड़ा रह गया। उसके चेहरे से ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वो किसी द्वंद से जूझ रहा है।

"ठाकुर साहब क्या लगता है आपको?" महेंद्र सिंह सहसा दादा ठाकुर से मुखातिब हुए____"क्या आप भी वही सोच रहे हैं जो हम सोच रहे हैं?"

"हमें तो लगता है कि वो सफ़ेदपोश चंद्रकांत के साथ बड़ा ही हौलनाक खेल खेल गया है।" दादा ठाकुर ने कहा____"उसने चंद्रकांत को ऐसी कहानी सुनाई जिसे सच मान कर चंद्रकांत ने अपने हाथों अपनी ही बहू को बेटे की हत्यारिन मान कर मार डाला।"

"बिल्कुल सही कह रहे हैं आप।" महेंद्र सिंह ने कहा____"हमें भी यही लगता है। सफ़ेदपोश को चंद्रकांत की मनोदशा का भली भांति एहसास था जिसका उसने फ़ायदा उठाया और फिर उसने वो किया जो कोई सोच भी नहीं सकता था।"

"सोचने वाली बात है कि रघुवीर की हत्या हुए इतने दिन गुज़र गए हैं।" दादा ठाकुर ने कहा____"और अभी तक उस सफ़ेदपोश का कहीं अता पता नहीं था। अगर उसे चंद्रकांत से इतनी ही हमदर्दी थी तो उसने पहले ही चंद्रकांत के पास आ कर उसे ये क्यों नहीं बताया था कि उसके बेटे का हत्यारा कौन है? इतने दिनों तक किस बात का इंतज़ार कर रहा था वो? ख़ैर ये तो थी एक बात, दूसरी सोचने वाली बात ये है कि ये सब बताने के पीछे सफ़ेदपोश का मकसद क्या था? क्या ये कि अपने बेटे के हत्यारे के बारे में जान कर चंद्रकांत उसकी जान ही ले ले? अगर यही सच है तो फिर उसे चंद्रकांत का हमदर्द नहीं कहा जा सकता क्योंकि अपनी बहू की हत्या करने के बाद चंद्रकांत को कोई पुरस्कार तो नहीं मिलने वाला बल्कि सख़्त से सख़्त सज़ा ही मिलेगी।"

"सही कह रहे हैं आप।" महेंद्र सिंह ने सिर हिलाते हुए कहा____"चंद्रकांत ने जो किया है उसके लिए तो इसे यकीनन सज़ा ही मिलेगी लेकिन अभी ये भी देखना है कि आगे क्या होता है? हमारा मतलब है कि सफ़ेदपोश ने आज रात चंद्रकांत से मिलने को कहा है तो देखते हैं ऐसा होता है कि नहीं।"

चंद्रकांत सारी बातें सुन रहा था और अब उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे अभी रो देगा। बड़ी मुश्किल से खुद को रोके हुए था वो। चौगान में बैठे बाकी लोग सतब्ध से बैठे बातें सुन रहे थे।

"अगर आज रात वो सफ़ेदपोश सचमुच चंद्रकांत से मिलने आएगा तो यही समझा जाएगा कि उसकी बातों में अथवा ये कहें कि उसकी कहानी में कहीं न कहीं सच्चाई थी।" महेंद्र सिंह ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"और अगर वो नहीं आया तो स्पष्ट हो जाएगा कि वो चंद्रकांत के साथ बड़ा ही हैरतंगेज खेल खेल गया है।"

कहने के साथ ही महेंद्र सिंह चंद्रकांत से मुखातिब हुए____"आगे की कार्यवाही कल की जाएगी चंद्रकांत। आज रात हम भी ये देखना चाहते हैं कि तुम्हारा वो हमदर्द सफ़ेदपोश अपनी कसौटी पर कितना खरा उतरता है।"

"मुझे माफ़ कर दीजिए ठाकुर साहब।" महेंद्र सिंह कुर्सी से उठ कर अभी खड़े ही हुए थे कि तभी चंद्रकांत आर्तनाद सा करता हुआ उनके पैरों में लोट गया। ये देख उनके साथ साथ बाकी उपस्थित लोग भी चौंक पड़े। उधर चंद्रकांत रोते बिलखते हुए कहता चला गया____"मुझे माफ़ कर दीजिए। मुझे बड़ी शिद्दत से एहसास हो रहा है कि मुझसे बहुत बड़ा गुनाह हो गया है।"

"नहीं चंद्रकांत।" महेंद्र सिंह ने पीछे हटते हुए कहा____"तुमने जो किया है वो किसी भी सूरत में माफ़ी के लायक नहीं है। ख़ैर आज की कार्यवाही तो फिलहाल यहीं पर स्थगित कर दी गई है किंतु कल यहीं पर पंचायत लगेगी और इस मामले का फ़ैसला होगा। तब तक तुम भी देखो और हम भी देखते हैं कि तुम्हारा हमदर्द आज रात तुम्हारे लिए क्या सौगात ले कर आता है।"

━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━
 
अध्याय - 104

━━━━━━༻♥༺━━━━━━



"नहीं चंद्रकांत।" महेंद्र सिंह ने पीछे हटते हुए कहा____"तुमने जो किया है वो किसी भी सूरत में माफ़ी के लायक नहीं है। ख़ैर आज की कार्यवाही तो फिलहाल यहीं पर स्थगित कर दी गई है किंतु कल यहीं पर पंचायत लगेगी और इस मामले का फ़ैसला होगा। तब तक तुम भी देखो और हम भी देखते हैं कि तुम्हारा हमदर्द आज रात तुम्हारे लिए क्या सौगात ले कर आता है।"

अब आगे....

हवेली के अंदर आया तो देखा मां और भाभी निर्मला काकी के पास बैठी बातें कर रहीं थी। उनकी बातों का मुद्दा वही था जो आज चंद्रकांत के यहां घटित हुआ था। मेनका चाची नहीं थीं वहां पर। मेरे मन में ख़याल उभरा कि चलो कुछ देर चाची के पास बैठा जाए। वैसे भी उनके दोनों बेटे इस हवेली से ही नहीं बल्कि इस देश से ही बाहर थे। मैं ये सब सोच कर जैसे ही चाची के कमरे की तरफ बढ़ा तो मेरी नज़र रसोई से बाहर निकलती कुसुम पर पड़ गई। उसके हाथ में ट्रे था जिसमें चाय के कप रखे हुए थे।

"अरे! भैया आप आ गए?" मुझे देखते ही कुसुम ने मुस्कुराते हुए कहा____"बिल्कुल सही समय पर आए हैं आप? लीजिए आप भी चाय पी लीजिए।"

"वाह! क्या बात है।" मैंने खुशी से मुस्कुराते हुए कहा____"बहन हो तो मेरी लाडली कुसुम जैसी जिसे हर वक्त अपने इस भाई का ही ख़याल रहता है। ला दे, मुझे सच में इस वक्त चाय की ही ज़रूरत थी।"

मेरी बात सुन कर कुसुम मुस्कुराते हुए मेरे पास आई और ट्रे लिए हाथों को मेरी तरफ बढ़ा दिया जिससे मैंने एक कप उठा लिया। मां, भाभी और निर्मला काकी भी हमारी बातें सुन कर मुस्कुरा उठीं थी। मुझे चाय देने के बाद कुसुम ने उन्हें भी दिया और फिर वो ट्रे ले कर अपनी मां के कमरे की तरफ जाने लगी तो मैंने उसे रोक लिया।

"अरे! तू बैठ कर चाय पी।" मैंने उसकी तरफ बढ़ते हुए कहा____"और ये ट्रे मुझे दे। मैं अपनी प्यारी चाची से मिलने ही जा रहा हूं। आज अपने हाथों से उन्हें चाय भी से दूंगा।"

मेरी बात सुन कर कुसुम ने पहले तो हैरानी से मेरी तरफ देखा और फिर खुशी से ट्रे मुझे पकड़ा दिया। मैं जानता था कि मेरे इस कार्य से बाकी सब भी हैरान हुए थे क्योंकि आज से पहले ऐसे काम मैंने कभी नहीं किए थे। जब मैं अपना कप उस ट्रे में रख कर ट्रे को ले कर जाने लगा तो मां ने पीछे से कहा____"कुसुम ज़रा आंगन में जा कर देख, सूरज कौन सी दिशा में डूबने वाला है आज?"

मां की ये बात सुन कर सब हंसने लगे। इधर मैं भी मुस्कुरा उठा था। ख़ैर कुछ ही देर में मैं ट्रे लिए चाची के कमरे के दरवाज़े के पास पहुंच गया। दरवाज़ा हल्का खुला हुआ था लेकिन मैंने रुक कर बाहर से ही उन्हें आवाज़ लगाई तो अगले ही पल उनकी आवाज़ आई कि आ जाओ। मैं कमरे में दाखिल हुआ तो देखा चाची पलंग पर बैठने के बाद अपनी साड़ी सम्हालने में लगीं थी। मैंने जब उनके क़रीब पहुंच कर ट्रे को उनकी तरफ बढ़ाया तो वो हैरानी से मेरी तरफ देखने लगीं।

"क्या चाची आप भी मुझे ऐसे देखने लगीं?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"मैं जानता हूं कि ऐसा काम मैंने कभी नहीं किया है लेकिन इसका मतलब ये थोड़ी ना है कि आगे भी कभी नहीं कर सकता।"

"अरे! मैं तो चाहती हूं कि मेरा बेटा हर रोज़ ऐसे ऐसे काम करे जिससे इस खानदान का नाम रोशन हो।" मेनका चाची ने ट्रे से अपना कप उठाते हुए किंतु मुस्कुरा कर कहा____"लेकिन जाने क्यों मुझे कुछ और ही समझ आ रहा है।"

"मैं कुछ समझा नहीं चाची।" मैं पलंग पर ही उनके बगल से बैठते हुए बोला____"आपको क्या समझ आ रहा है?"

"यही कि अभी से ऐसे काम करने का अभ्यास करने का सोच लिया है तुमने।" चाची ने अर्थपूर्ण भाव से मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा____"अब तो सबको पता है कि अगले साल तुम्हारा ब्याह होगा और इस हवेली में मेरी एक नई बहू आ जाएगी। सुना है आज कल के पति लोग अपनी बीवी की सेवा करने लगे हैं।"

"ये आप क्या कह रही हैं चाची?" मैं उनकी बातों का मतलब समझते ही झेंप गया___"आप मेरे बारे में ऐसा सोचती हैं? आप तो जानती हैं कि आपका ये बेटा जोरू का गुलाम बनने वालों में से नहीं है।"

"अब ये तो अगले साल ही पता चलेगा वैभव बेटा।" चाची ने चाय का एक घूंघ पीने के बाद कहा____"प्रेम संबंध वाले ब्याह में ऐसा ही तो होता है। काश! हमारे ज़माने में भी ऐसा होता।"

"क्या बात करती हैं चाची।" मैंने इस बार चाची को छेड़ते हुए कहा____"चाचा जी के साथ आपका संबंध किसी प्रेमी प्रेमिका से कम थोड़े ना था। मैंने भी देखा था कि चाचा जी आपकी कितनी जी हुजूरी करते थे।"

"तो क्या उन्हें नहीं करना चाहिए था?" चाची ने हल्के से मुस्कुरा कहा____"हालाकि ज़्यादा कहां सुनते थे मेरी।"

"अरे! बिल्कुल करनी चाहिए थी उन्हें।" मैंने हाथ झटकते हुए कहा____"मेरी इतनी प्यारी और सुंदर चाची की जी हुजूरी करने से उनकी शान ही बढ़नी थी।"

"बस बस इतनी बातें मत बनाओ अब।" चाची ने झूठी नाराज़गी दिखाते हुए कहा____"और ये बताओ कि आज इतने दिनों बाद अपनी चाची से मिलने का ख़याल कैसे आया तुम्हें?"

"काम के चलते आज कल मुझे किसी से भी मिलने का समय नहीं मिल पाता।" मैंने खाली हो गए कप को ट्रे में रखते हुए कहा____"वरना मैं तो हर पल अपनी प्यारी सी चाची के पास ही बैठा रहूं। वैसे, आप इस वक्त लेटी क्यों थीं? आपकी तबीयत तो ठीक है ना चाची?"

"मेरी तबीयत ठीक है बेटा।" चाची ने कहा____"बस थोड़ा सिर दर्द कर रहा था इस लिए दीदी के पास से उठ कर यहां चली आई थी।"

"तो आपने सिर दर्द की कोई दवा ली या नहीं?" मैंने फिक्रमंदी से पूछा____"अगर ज़्यादा ही सिर दर्द हो रहा हो तो मुझे बताइए मैं वैद्य जी को ले आता हूं।"

"नहीं बेटा इसकी कोई ज़रूरत नहीं है।" चाची ने कहा____"असल में कल मैंने सिर के बाल धोए थे तो शायद उसी की वजह से शरद गरम हो गया है मुझे। दीदी ने दवा दी थी मुझे। उससे काफी राहत मिली है मुझे।"

"अगर ऐसा है तो फिर ठीक है।" मैंने राहत की सांस लेते हुए कहा____"अच्छा अब आप आराम कीजिए। मुझे भी अब खेतों की तरफ जाना है।"

"ठीक है बेटा।" चाची ने कहा____"सम्हल कर जाना और बच बचा के काम करना। जब से तुम अपनी ज़िम्मेदारियां निभाने लगे हो तब से हम सब बहुत खुश हैं। ईश्वर करे अब से हमेशा ऐसा ही हो और तुम अपने कार्य से सबको खुश रखो।"

"कोशिश तो यही है चाची।" मैंने कहा____"और जब तक आप सबका आशीर्वाद मेरे साथ है तब तक सब अच्छा ही होगा। अच्छा अब आप आराम कीजिए। मैं निकलता हूं....।"

कहने के साथ ही मैं ट्रे ले कर चाची के कमरे से बाहर आ गया। ट्रे कुसुम को पकड़ा कर मैं हवेली से बाहर निकल गया। कुछ ही देर में मैं अपनी मोटर साइकिल से खेतों की तरफ बढ़ा चला जा रहा था। चंद्रकांत के घर के पास पहुंचा तो देखा अभी भी वहां पर काफी लोग मौजूद थे किंतु मैं रुका नहीं बल्कि सीधा निकल गया। चंद्रकांत का अपनी ही बहू को अपने बेटे की हत्यारिन मान कर उसकी हत्या करना मेरे लिए जैसे पहेली सा बन गया था। वहीं दूसरी तरफ मैं ये भी सोच रहा था कि वो कौन होगा जिसे चंद्रकांत ने अपना फ़रिश्ता कहा था? मेरे मन में ख़याल उभरा कि अगर मैंने वो हरकत न की होती तो सबके साथ साथ मुझे भी इस मामले की सच्चाई पता चल गई होती। ख़ैर अभी भले ही मुझे पता नहीं है लेकिन बाद में तो मैं पता कर ही लूंगा। यही सोच कर मैंने मोटर साईकिल की रफ़्तार तेज़ कर दी।

✮✮✮✮

शाम को वापस जब हवेली पहुंचा तो मैं ये सोच कर थोड़ा डरा हुआ था कि कहीं पिता जी आज मुझ पर गुस्सा न करें। चंद्रकांत के घर में आज मैंने सबके सामने उसका गिरेबान पकड़ कर उसको उल्टा सीधा बोला था जिसके चलते पिता जी बेहद नाराज़ हुए थे मुझसे। उस समय तो उन्होंने मुझे ज़्यादा कुछ नहीं कहा था किंतु मैं जानता था कि हवेली में उनसे सामना होने पर निश्चित ही मुझे उनकी तगड़ी डांट सुनने को मिलेगी। ख़ैर इसी संदर्भ में कई तरह की बातें सोचते हुए मैं हवेली के अंदर पहुंच गया। बैठक में नए मुंशी के साथ पिता जी बैठे चाय पी रहे थे। मैं चुपचाप अंदर की तरफ निकल गया। हालाकि मैंने ये सोचा था कि पिता जी की जैसे ही मुझ पर नज़र पड़ेगी तो वो मुझे आवाज़ दे कर बुला लेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बहरहाल, मैं जानता था कि ये कुछ देर के लिए ही राहत वाली बात थी।

गुसलखाने में हाथ मुंह धो कर तथा अपने कमरे में दूसरे साफ़ कपड़े पहन कर मैं नीचे आ कर मां के पास बैठ गया। मैंने देखा मां और चाची के पास इस वक्त निर्मला काकी नहीं थी। भाभी, कुसुम और निर्मला की बेटी कजरी भी नहीं दिख रही थी। इधर जैसे ही मैं मां और चाची के पास आ के बैठा तो चाची ने कुसुम को ये कहते हुए आवाज़ दीं कि अपने प्यारे भैया के लिए चाय ले आ। जल्दी ही रसोई से कुसुम की आवाज़ आई।

"आज दोपहर में तू ऐसा क्या कर के आया था चंद्रकांत के घर से?" कुसुम जब मुझे चाय दे कर चली गई तो सहसा मां ने मेरी तरफ देखते हुए पूछा____"जिसके चलते हंगामा मच गया था वहां?"

"अरे! ऐसी कोई बात नहीं हुई थी मां।" मैं पहले तो मन ही मन चौंका फिर लापरवाही से बोला____"पर आपको ये किसने बताया?"

"तेरे पिता जी ने।" मां ने मुझे सख़्त नज़रों से घूरते हुए कहा____"बोल रहे थे समझा देना उसे। मुझे तो इस बारे में कुछ पता ही नहीं था। मेरे पूछने पर ही उन्होंने तेरी सारी करतूतें बताई थी। आख़िर क्यों ऐसे ऊटपटांग काम करता है तू?"

"मैं मानता हूं मां कि मुझे चंद्रकांत से उस लहजे में बात नहीं करनी चाहिए थी और ना ही उसको गाली देना चाहिए था।" मैंने कहा____"लेकिन उसे भी तो सोचना चाहिए था कि सबके सामने मेरे पिता जी पर उंगली नहीं करना चाहिए था उसे। आपको पता है, उस आदमी को आज भी अपनी ग़लतियों का एहसास नहीं है और हर बात पर हर बार पिता जी पर तंज कसता है। काफी दिनों से बर्दास्त कर रहा था मैं उसे। जब उसने अति ही कर दी तो मेरा भी सब्र टूट गया।"

"हां ठीक है लेकिन तू उसको साधारण तरीके से भी तो समझा सकता था।" मां ने कहा____"इस तरह सरे आम उसको गाली दे कर जलील करने की क्या ज़रूरत थी तुझे?"

"लातों वाले भूत साधारण भाषा में कही गई बातें नहीं समझते मां।" मैंने कहा____"उनको ऐसी ही भाषा समझ आती है और वो भी फ़ौरन। बाकी एक बात आप भी जान लीजिए कि अगर कोई भी मेरे माता पिता अथवा इस हवेली के किसी भी सदस्य के बारे में इस तरह का तंज कसेगा तो उसके साथ मैं इससे भी ज़्यादा बुरा सुलूक करूंगा। हां, जहां मैं ग़लत हूं तो उसके लिए खुशी से सज़ा भुगतने को भी तैयार हूं।"

"वैभव ने बिल्कुल ठीक किया है दीदी।" मेनका चाची ने मां से कहा____"उस नीच और नमकहराम इंसान के साथ यही सुलूक करना चाहिए था। अपने घर की औरतों पर तो बस न चला उसका और दूसरों पर खीचड़ उछालता फिरता है। उसने हमारे घर के लोगों की हत्या कर के हमें दुख दिया है तो उसके दुष्कर्मों की सज़ा उसे भी मिल गई। ऊपर वाले के घर देर है अंधेर नहीं। एक ही बेटा था ना उसके? देख लीजिए उसकी ही बीवी ने मार डाला अपने मरद को और चंद्रकांत का वंश ही नाश कर दिया। इसी को कहते हैं जैसी करनी वैसी भरनी।"

"ये आप क्या कह रही हैं चाची?" मैं हैरत से आंखें फाड़ कर एकदम से बोल पड़ा____"चंद्रकांत के बेटे की रजनी ने हत्या की थी?"

"मुझे भी दीदी से ही पता चला है वैभव।" चाची ने कहा____"और दीदी को जेठ जी से।"

"बड़े आश्चर्य की बात है ये।" मैं एकदम से स्तब्ध रह गया था, फिर बोला____"लेकिन रजनी ने ऐसा क्यों किया होगा? अपने ही पति की हत्या कैसे कर दी होगी उसने?"

"तेरे पिता जी बता रहे थे कि रजनी का किसी गैर मर्द से संबंध था।" मां ने कहा____"और वो उस गैर मर्द के साथ भाग जाना चाहती थी लेकिन दुर्भाग्य से उसके पति ने पकड़ लिया। रघुवीर और उस दूसरे व्यक्ति के बीच हाथा पाई होने लगी थी। रजनी इस सबसे डर गई थी। उसे लगा कहीं इस सबके चलते लोगों को पता न चल जाए और वो बदनाम न हो जाए। जब उसे कुछ न सूझा तो उसने कुल्हाड़ी से अपने पति को मार डाला। उसे लगा था कि ऐसा कर के वो यहां से भाग कर अपने आशिक के साथ हमेशा के लिए चली जाएगी मगर ऐसा नहीं हुआ। उसके आशिक ने जब देखा कि रजनी ने अपने ही पति को मार डाला है तो वो डर के मारे भाग गया। अपने आशिक को इस तरह भाग जाते देख रजनी को मानो लकवा ही मार गया था। जिसके भरोसे उसने अपने ही पति को मार डाला उसी ने उसे धोखा दे दिया। रजनी ने सोचा अब ऐसे में क्या करे वो? फिर उसके दिमाग में रूपचंद्र का ख़याल आया। उसके एक दिन पहले शाम को रूपचंद्र ने उसका रास्ता रोका था ना इस लिए रजनी ने रघुवीर की हत्या में उसे ही फंसा देने का सोच लिया। उसके बाद दूसरे दिन ऐसा ही हुआ।"

"ये तो गज़ब ही हो गया।" मैं आश्चर्यचकित हो कर बोल पड़ा____"मैं सोच भी नहीं सकता था कि रजनी ऐसा भी कर सकती है लेकिन ये कैसे पता चला कि रजनी ने ही रघुवीर की हत्या की थी? क्या चंद्रकांत ने खुद इस बात का पता लगा लिया था?"

"नहीं, ये सब बातें चंद्रकांत को किसी ने बताई थी।" मां ने कहा।

"क...किसने?" मैंने चकित भाव से पूछा____"इतनी बड़ी बात भला किसने बताई चंद्रकांत को?"

"सफ़ेदपोश ने।" मां ने ये कहा तो मैं बुरी तरह उछल पड़ा, मेरे हलक से अटकते हुए अल्फाज़ निकले____"स...स..फे..द...पोश ने????"

"हां।" मां ने बड़े आराम से कहा____"पंचायत में सबके सामने चंद्रकांत ने सबको यही बताया।"

सच तो ये था कि मैं चाय पीना भूल गया था। हलाकि कप में बस थोड़ी सी ही चाय रह गई थी लेकिन मां ने बातें ही ऐसी बताई थीं कि उसके बाद बाकी की चाय पीने का ख़याल ही नहीं आया था मुझे। मेरे ज़हन में सफ़ेदपोश ही उछल कूद मचाने लगा था। अगर मां की बातें सच थीं तो ये वाकई में बड़ी ही हैरतंगेज बात थी लेकिन जाने क्यों मुझे ऐसा भी महसूस हो रहा था कि इसमें अभी बहुत कुछ बाकी है। मैं समझ गया कि सारी वास्तविकता पिता जी से ही पता चलेगी। ये सोच कर मैंने फ़ौरन ही कप को एक तरफ रखा और एक झटके से उठ कर बाहर बैठक की तरफ बढ़ गया।

✮✮✮✮

"यकीन नहीं होता कि ऐसा भी हो सकता है।" बैठक में पिता जी की सारी बातें सुनने के बाद मैंने बेयकीनी से कहा____"मुझे तो ऐसा लगता है कि चंद्रकांत कोई बहुत गहरा षडयंत्र रच रहा है। हम सबसे बदला लेने के लिए वो इस हद तक गिर गया कि अपनी ही बहू को मार डाला।"

"नहीं तुम ग़लत समझ रहे हो।" पिता जी ने फ़ौरन ही इंकार में सिर हिलाते हुए कहा____"माना कि चंद्रकांत के अंदर हम सबके प्रति नफ़रत है और वो हमारा बहुत कुछ अहित चाहता है लेकिन इसके लिए वो अपने ही बेटे अथवा बहू की हत्या नहीं कर सकता। वो कोई छोटा सा अबोध बालक नहीं है जिसे इतना भी ज्ञान नहीं है कि ऐसे में उसका खुद का कितना बड़ा नुकसान हो जाएगा। हमारा ख़याल है कि उसकी बातों में कहीं न कहीं सच्चाई ज़रूर है।"

"किस बात की सच्चाई?" मैंने न समझने वाले भाव से पूछा____"क्या आप उसकी बातों पर यकीन कर के ये मान रहे हैं कि सफ़ेदपोश ने ही उसे सब कुछ बताया और उसी के चलते उसने अपनी बहू को मार डाला?"

"बिल्कुल।" पिता जी ने मजबूत लहजे में कहा____"अपने बेटे की हत्या हो जाने से वो ऐसी मानसिकता में पहुंच गया था कि वो हर वक्त अपने बेटे के हत्यारे के बारे में ही सोचता रहा होगा और जब सफ़ेदपोश ने उसे हत्यारे का नाम व हत्या करने का कारण बताया तो उसने अपने बेटे की हत्या का बदला ले लिया। सफ़ेदपोश ने उसको रजनी की हत्यारिन होने की जो कहानी बताई उस पर उसने इस लिए भी विश्वास कर लिया क्योंकि वो खुद अपनी बहू के चरित्र के बारे में पहले से अच्छी तरह जानता था। उसे पता था कि उसकी बहू ही नहीं बल्कि उसकी खुद ही पत्नी भी चरित्रहीन थीं। कहने का मतलब ये कि सफ़ेदपोश की बातों पर यकीन न करने की उसके पास कोई भी वजह नहीं थी और इसी लिए उसने अपनी बहू की हत्या करने में वक्त बर्बाद नहीं किया।"

"हो सकता है कि ऐसा ही हो पिता जी।" मैंने कुछ सोचते हुए कहा____"लेकिन इसके बावजूद इस मामले में मुझे कुछ और भी ऐसा महसूस हो रहा है जो फिलहाल अभी समझ में नहीं आ रहा। वैसे सोचने वाली बात है कि इतने समय से सफ़ेदपोश का कहीं कोई अता पता नहीं था और जब उसका पता चला तो ऐसे मामले के चलते। मुझे समझ नहीं आ रहा कि सफ़ेदपोश ने चंद्रकांत को उसके बेटे के हत्यारे का नाम बता कर किस मकसद से उपकार किया है? जबकि आप भी जानते हैं कि वो सिर्फ मेरी जान लेने पर आमादा था। एक बात और, उस समय पंचायत में आप चंद्रकांत और गौरी शंकर दोनों से ही ये पूछ रहे थे कि सफ़ेदपोश से उन दोनों का कोई संबंध है या नहीं अथवा वो सफ़ेदपोश को जानते हैं या नहीं....उस समय दोनों ने ही सफ़ेदपोश के बारे में अपनी अनभिज्ञता ही ज़ाहिर की थी। इस मामले के बाद हम ये भी नहीं कह सकते कि चंद्रकांत पहले से ही सफ़ेदपोश के बारे में जानता रहा होगा अथवा वो उससे मिला हुआ रहा होगा। क्योंकि अगर वो मिला हुआ होता तो ना तो उसके बेटे की हत्या हुई होती और ना ही उसे अपनी बहू की हत्या करनी पड़ती। ऐसे में सवाल उठता है कि चंद्रकांत के बेटे की हत्या के बाद सफ़ेदपोश का इस तरह से सामने आना आख़िर क्या साबित करता है?"

"तुम्हारी तरह हमारे भी ज़हन में इस तरह के विचार उभर चुके हैं।" पिता जी ने सहसा गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन इस बारे में हम अपनी पुख़्ता राय कल ही बनाएंगे। ऐसा इस लिए क्योंकि सफ़ेदपोश ने आज रात चंद्रकांत से मिलने को कहा था और अपने वादे के अनुसार चंद्रकांत को उसके कहे अनुसार कोई काम करना है। अब देखना ये है कि आज रात सफ़ेदपोश चंद्रकांत से मिलने आता है या नहीं। उसके आने अथवा न आने से ही हम किसी ठोस नतीजे पर पहुंचेंगे।"

"किस तरह के नतीजे की बात कर रहे हैं आप?" मैंने पिता जी की तरफ देखते हुए पूछा।

"तुम्हारे इस सवाल का जवाब अभी नहीं कल देंगे हम।" पिता जी ने निर्णायक भाव से कहा____"फिलहाल तुम जा सकते हो...और हां, आज जो तुमने चंद्रकांत के घर में उसके साथ हरकत की थी वैसी हरकत तुम्हारे द्वारा अब दुबारा न हो। अब तुम बच्चे नहीं रहे, बड़े हो गए हो इस लिए विवेक के साथ साथ सहनशीलता भी रखना सीखो।"

पिता जी की बात सुन कर मैंने ख़ामोशी से सिर हिलाया और फिर उठ कर बैठक से बाहर आ गया। रात का भोजन करने में अभी काफी समय था इस लिए मैं अपने कमरे में आराम करने का सोचा।

सीढ़ियों से ऊपर आया तो देखा रागिनी भाभी अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर के मेरी तरफ ही आ रहीं थी। बिजली नहीं थी किंतु लालटेन का धीमा प्रकाश था जिसमें उनका चेहरा साफ नज़र आया मुझे।

"क्या बात है।" मुझ पर नज़र पड़ते ही भाभी ने मुझे छेड़ा____"आज कल बड़ी तेज़ रफ़्तार में रहते हो देवर जी। आख़िर किस बात की इतनी जल्दी है? वैसे अगला साल आने में तो अभी बहुत समय बाकी है।"

"क्या भाभी आप तो जब देखो तभी मुझे छेड़ने लग जाती हैं।" मैंने हौले से झेंप कर कहा।

"अब तुमने मुझे छेड़ने की खुली छूट दे दी है तो उसका फ़ायदा तो उठाऊंगी ही मैं।" भाभी ने मुस्कुराते हुए कहा____"तुम्हें अगर कोई एतराज़ है तो बोल दो, नहीं छेडूंगी मैं।"

"मुझे कोई एतराज़ नहीं है।" मैंने कहा____"बल्कि मुझे भी अच्छा लगता है कि इसी बहाने आपको खुशी तो मिलती है।"

"हम्म्म।" भाभी ने कहा____"अच्छा तुम अपनी अनुराधा से मिले या नहीं?"

"कहां मिला भाभी।" मैंने एकदम से ठंडी आह भरते हुए कहा____"आप तो जानती हैं मुझ किसान आदमी के पास समय ही नहीं है किसी से मिलने मिलाने का।"

"अच्छा, किसान आदमी?" भाभी ने एकदम से आंखें फैला कर कहा____"तभी एक किसान की लड़की से प्रेम कर बैठे हो। वाह! क्या जोड़ी बनाई है तुमने...मानना पड़ेगा।"

साला, ये तो उल्टा हो गया। अपनी समझ में मैंने भाभी को छेड़ा था लेकिन उल्टा उन्होंने ऐसी बात कह दी कि मैं पलक झपकते ही निरुत्तर हो गया और गड़बड़ा भी गया। फ़ौरन कुछ कहते ना बना मुझसे। उधर भाभी मेरी हालत देख खिलखिला कर हंसने लगीं।

"माना कि तुम हर जगह मशहूर होगे।" भाभी ने सहसा बड़े गर्व से मुस्कुराते हुए कहा____"मगर ये मत भूलो कि मैं भी कम नहीं हूं। तुम्हारी भाभी हूं मैं और इस हवेली की बहू हूं।"

"बिल्कुल हैं भाभी।" मैंने सिर हिलाते हुए कहा____"आपको ये बताने की ज़रूरत नहीं है। दूसरी बात, मेरी नज़र में भी आपकी अहमियत बहुत ख़ास है और आपका मुकाम बहुत ऊंचा है।"

मेरी ये बात सुन कर भाभी इस बार कुछ बोलीं नहीं बल्कि एकटक मेरी तरफ देखने लगीं। उनकी आंखों में मेरे लिए स्नेह दिखा। सहसा वो आगे बढ़ीं और उसी स्नेह के साथ मेरे दाएं गाल को मुस्कुराते हुए हल्के से सहलाया।

"तुम्हारा मुकाम भी मेरी नज़र में बहुत ऊंचा है वैभव।" फिर उन्होंने थोड़ा गंभीर हो कर कहा____"और मेरी ख़्वाहिश है कि मेरा देवर एक अच्छे इंसान के रूप में हर किसी के दिल पर राज करे।"

"आपके आशीर्वाद से ऐसा ज़रूर होगा भाभी।" मैंने कहा____"मुझे यकीन है कि आपके रहते मैं कभी दुबारा ग़लत रास्ते पर नहीं जा सकूंगा।"

"ऐसा तो तुम मेरा दिल रखने के लिए कह रहे हो।" भाभी ने सहसा शरारत से मुस्कुराते हुए कहा____"वरना क्या मैं जानती नहीं हूं कि सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा तुम्हें किसके द्वारा मिली है, हां?"

"बेशक उसने मेरे चरित्र को बदला भाभी और मुझे शिद्दत से एहसास हुआ कि अब तक मैने जो भी किया था वो ग़लत था।" मैंने कहा____"लेकिन सही रास्ते पर चलने के लिए अगर आपने शुरुआत से ही बार बार मुझे ज़ोर नहीं दिया होता तो यकीन मानिए आज मैं इस तरह इस सफ़र पर नहीं चल रहा होता। ये सब आपके ही ज़ोर देने और मार्गदर्शन से हो सका है। तभी तो मैं ये कहता हूं कि आपका मुकाम बहुत ऊंचा है।"

"चलो अब ये बातें मत बनाओ तुम।" भाभी ने मुझे घूरते हुए कहा____"मेरी होने वाली देवरानी के उपकारों को नज़रंदाज़ करोगे तो मार खाओगे मुझसे। अच्छा अब जाओ आराम करो। कुछ देर में खाना बन जाएगा तो खा पी लेना और हां कल अपनी अनुराधा से भी मिल लेना। बेचारी अपने दिल की बातें तुमसे कहने के लिए तड़प रही है।"

"अच्छा ऐसा है क्या?" मैं एकदम से मुस्कुरा उठा, बोला____"अगर आप इतना ही ज़ोर दे रहीं हैं तो मिल लूंगा उससे।"

"अच्छा, जैसे अभी मैं न कहती तो तुम उससे मिलते ही नहीं, बड़े आए मिल लूंगा उससे कहने वाले।" भाभी ने पुनः घूरते हुए कहा____"एक और बात, थोड़ा सभ्य इंसानों जैसा व्यवहार करना उससे। अभी बहुत नादान और नासमझ है वो। ज़्यादा सताना नहीं उसे वरना तुम्हारे लिए ठीक नहीं होगा, सोच लेना।"

"अब ये क्या बात हुई?" मैंने हैरानी से उनकी तरफ देखते हुए कहा____"आप मेरी तरफ हैं या उसकी तरफ?"

"फिलहाल तो मैं तुम दोनों की ही तरफ हूं।" भाभी ने कहा____"क्योंकि तुम्हें भी पता है कि मेरे बिना तुम दोनों की नैया पार नहीं लगेगी। इस लिए ज़्यादा उड़ने की कोशिश मत करना। अब जाओ तुम, मैं भी नीचे जा रही हूं।"

कहने के साथ ही भाभी मेरी कोई बात सुने बिना ही सीढ़ियों पर उतरती चली गईं। उनके जाने के बाद मैं भी उनकी बातों के बारे में सोचते हुए और मुस्कुराते हुए अपने कमरे की तरफ चला गया।

━━━━✮━━━━━━━━━━━✮━━━━
 
Me also disappointed of you big bro, Pahle thik se comment padhna tha, fir sochna tha and then react karna tha...anyway thanks 🙏

Story ke adhuri rah jane ka dukh story likhne wale ko sabse zyada hota hai bhai, kyoki usne mehnat ki hoti hai. Apna keemti wakt story likhne me gawaya hota hai...apni personal life ki pareshaniyon ke bavjood usne imandari se update likhe hote hain...Khair chhodo
 
Back
Top