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- Dec 5, 2013
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अपडेट - 34 ~ इंटेंस रश
अब तक...
इधर काव्य फुल एक्ससिटेड आरोही के पीछे बैठ चुकी थी. दोनों hi बेहद hi ख़ूबसूरत ड्रेस पहनी हुई थी.
और गाडी में संग बैठ वो रवाना हो गयी.
पर उन्हें नहीं पता था...
की इस वक़्त उनके पीछे कौन आ रहा था.
अब आगे...
एक बेहद hi ख़ूबसूरत से शहर में इस वक़्त धेरर साड़ी झालरों अथवा अन्य प्रकार की लइटिंग्स से सारे घर, दुकाने एवम बिल्डिंग्स जगमगा रही थी. लाल, नीली, पीली न जाने कितने रंगो की लेद लाइट्स से आज हर्र एक घर सजा हुआ था.
दिवाली की इस रात में हर्र जगह खुशियों का माहौल था. और इस समय इसी शहर के एक बड़े से घर में एक औरत बेहद hi ख़ूबसूरत सी साड़ी पहने, थाल लिए, अपने घर में जगह जगह दिए रख रही थी.
होंठो पे मुस्कान सजाये वो गुनगुनाते हुए दियो से अपने घर को रौशन कर रही थी. तभी उसके पीछे से एक कमरे से अत्यंत hi सुन्दर सी लड़की, बड़ी hi आकर्षक सी ड्रेस पहने बाहर आयी और बोली,
"माँ?? टेरेस पे रख दिए आपने दिए?"
औरत : नहीं बीटा! तुम रख आओ. में नीचे रख रही हु.
लड़की : Okay!
और इतना बोल वो jhat-pat ऊपर चली गयी और कुछ देरर में hi दिए रख के नीचे भी आ गयी.
लड़की : हाश!! न जाने कितने दिनों बाद आज इतना फ्री टाइम मिला है फेस्टिवल सेलिब्रेट करने का, है न माँ? वर्ण ऐसा टाइट और बिजी सचेडूले था अपना.
औरत : एकदम सही कहा तुमने बीटा.
लड़की : अच्छा चलो! माँ! आओ बाहर चल के थोड़े पटाखे फोड़े. मेने कुछ खरीदे है.
औरत : क्या तू भी ये ले के बैठ गयी? अब उसमे मेरी क्या ज़रुरत!?
लड़की : वाह! एक तोह साल में एक बार दिवाली आती है. और अब उसमे भी पटाखे न फोड़े? और आप नहीं चलोगी तोह क्या में अकेली बेवकूफो टाइप फुलझड़ी लिए घूमूंगी क्या?
औरत (शिघ्स) : अच्छा बाबा! चल! तू maan'ne वाली तोह है नहीं?
लड़की : वही! हहै~ तोह पहले hi आ जाती...
औरत : हाँ हाँ मेरी माता... अब चल!
और दोनों माँ बेटी निकल के घर के बाहर आ गयी जहा कॉलोनी के सभी लोग बड़े hi धूम धाम से दिवाली मन रहे थे. बड़े जहा खड़े हो कर बात कर रहे थे, एक दूसरे को बधाईया दे रहे थे तोह वही बच्चे पटाखे फोड़ अपने hi आनंद में डूबे हुए थे.
इधर वो लड़की भी फुलझड़ी जलाते हुए अनार एवम चाकरी जला के अपनी माँ को भी आगे आके पटाखे फोड़ने के लिए मन रही थी और साथ hi साथ आस पड़ोस की लड़कियों से बातें भी कर रही थी.
पर उसकी माँ यानी की वो औरत एक मुस्कान लिए बस पीछे कड़ी होक hi सब देख रही थी. ज़मीन चाकरी, अनार से निकली चमकती हुई चिंगारिया उसकी आँखों में प्रतिबिंबित हो रही थी. भले hi आँखों का ध्यान उधर hi था...
पर...
उसके अंतर मैं का ध्यान कही और था...
और धीरे धीरे उसके होंठो से वो मुस्कान अपने आप गायब हो गयी.
'21 साल हो गए... न जाने...'
जब उस लड़की ने कुछ पल बाद पलट के अपनी माँ को देखा तोह उससे एक पल नहीं लगा ये jaan'ne में की उसकी माँ किसी चीज़ को लेकर परेशान है.
वो तुरंत सब कुछ चोरर अपनी माँ के पास आयी और बोली,
"आप परेशान लग रही हो माँ!"
औरत : H-Huh!? नहीं! कुछ भी तोह नहीं!?
लड़की (फ्रोंस) : कभी तोह शेयर कर लिया करो!? हँ!? ऐसी कौन सी बातें है जो सोचती रहती हो और खुद hi गहरे चिंतन में डूब जाती हो? क्या आपको मुझ पे ट्रस्ट नहीं है क्या? हँ?
औरत : एक झापड़ लगाउंगी ऐसी बातें बोली तोह. अपनी बेटी पे ट्रस्ट नहीं होगा तोह किसपे होगा भला?
लड़की : तोह फिर बताती क्यों नहीं की क्या सोचती रहती हो आप अक्सर?
औरत : बस... काम के बारे में बीटा.
लड़की : मुझे पता था आप यही बोलोगी. में चाहे जितनी बार पूछ लू, आपका जवाब यही रहता है. *शिघ्स* खर्र! अच्छा! चलिए अब... देखिये बगल वाली आंटी आपको पूछ रही है... आइये...
औरत : हम्म!
और वो दोनों बाहर निकल पड़ोसियों के साथ gap-shap में घुल मिल गयी.
***
वही यही मुंबई में इस समय भी कुछ ऐसा hi माहौल था.
Harsho-ullaas का महुअल.
और यहाँ भी एक फ्लैट के बाहर एक औरत अपने घर के द्वार के पास दो दिए रख रही थी.
ये और कोई नहीं, निधि hi थी, जो आज लाल रंग की साड़ी में इतनी आकर्षक और हसीं लग रही थी की अगल बगल वाले फ्लैट में रहने वाले लोग भी पलट पलट के देख रहे थे उससे.

आखिरी दिया रख वो उठी और थाल अंदर टेबल पे रख वो अपनी सैंडल्स pehn'ne लगी...
जब अंदर से उसकी लाड़ली जूही दौड़ते हुए बाहर आयी. उसके नन्हे हाथो में एक पैकेट था जिसमे कई सारे पटाखे रखे हुए थे.
जूही : ममममयीय! ममममयीय! चलो न जल्दी! चलो न...
वो ज़िद्द करते हुए निधि के हाथ पकड़ जब हिलाने लगी तोह अंदर से श्रेया जल्दबाज़ी में निकल के आयी,
श्रेया : अरे बाबा रुको न जूही! चल तोह रहे है. ओह गॉड! तुमने इधर से उधर कर के इतना पसीना निकलवा दिया मेरा. कही make-up न खराब हो जाए मेरा.
आज श्रेया भी बेहद सुन्दर लग रही थी. सफ़ेद और गोल्डन कलर की ड्रेस उसपे इतनी ज़्यादा जांच रही थी की उसकी एक hi झलक काफी थी लड़को को अपने ऊपर लट्टू करने के लिए.

श्रेया की बात पे ध्यान देते हुए, निधि जो वही बैठी थी बोल पड़ी,
निधि : हम्म? Anti-sweat वाले मेकअप भी आते है श्रेया.
श्रेया : I-I क्नोव... वो... वो ब्रांडेड वाले थोड़े महंगे आते है दी.
निधि : ओह्ह! M-Mein तुम्हारे लिए ले आउंगी श्री...
श्रेया : No No No No... It's... It's टोटली फाइन दी. में यही प्रेफर करती हु.
निधि : पर!?
श्रेया : मेने कहा न!? It's फाइन दी.
श्रेया इतना बोल अपना मुँह फेरर खुद के विचारो में डूब जाती है,
'दी कितनी प्यारी है. कितनी अच्छी है. शी कनौस की हमारी क्या कंडीशन है. स्टिल... वो चाहे मेरी हो या जूही या माँ डैड की नीड... सभी की नीड्स के बारे में कितना ध्यान रखती है. कभी वो अपने ऊपर ध्यान नहीं देती. न hi सोचती है अपने बारे में. यदि में उन्हें ये साड़ी दिलवाने न ले जाती और यहाँ न होती. तोह पक्के से दी ने अपने ऊपर एक रुपये तक न खर्च किया होता. शी... ी थिंक की अब में बोहत अच्छे से समझ गयी... की क्यों वीर यहाँ से चला गया.'
इधर निधि भी श्रेया की hi तरह अपने विचारो में खोयी हुई थी. और दोनों hi बहने अंदर से ग्लानि को महसूस कर रही थी.
'श्रेया के लिए में इतना भी नहीं कर सकती? ऑफ़ कोर्स में कर सकती हु. पर... मेरी बहिन... मेरी स्थिति देख जान बुझ के पीछे हट रही है. में जानती हु उससे कितना पसंद है make-up से लेके ड्रेसेस तक. सब कुछ ब्रांडेड. पर में ये भी जानती हु की... वो फ़ोन में बस इनकी पिक्स देखती रहती है. और कभी कभी जब मौका मिलता है तब अपने लिए कुछ खरीद लेती है. क्या में अपनी बहिन के लिए... इतना भी नहीं कर सकती? क्या वीर भी... इसलिए यहाँ से गया था? हाँ! में hi शायद... कपबले नहीं हु. में hi...'
वो अपने मैं से और सवाल करती पर तभी जूही की आवाज़ ने दोनों बहनो को होश में ला दिया,
"चलिए न मुम्ममइय्य्य!!! माआससीई!!"
और बस...
फिर क्या था. बच्चो की ज़िद्द के आगे पेरेंट्स हार मान hi जाते है अक्सर.
और यही हुआ. जूही के संग दोनों श्रेया और निधि नीचे आ गयी जहा उनकी सोसाइटी का कैंपस था. और सारे फ्लैट्स में रहने वाले लोग नीचे उतर कैंपस में hi दिवाली का लुत्फ़ ले रहे थे.
निधि भी एक पिलर के पास कड़ी श्रेया और जूही के हस्ते चेहरे देख उनमे खोयी हुई थी.
अचानक hi उसकी नज़र अपने फ़ोन पर गयी जो उसने अपने हाथो में लिया हुआ था, क्युकी अभी अभी उसका फ़ोन विबरते हुआ था.
मैसेज देखा तोह पाया की, उसमे लिखा हुआ था...
'हैप्पी दिवाली Ma'am!!'
और बस... उस एक मैसेज को देख. निधि के होंठो पे बिना उसके जाने hi मुस्कान आ गयी. अपने फ़ोन को कस के भींच उसने टाइप करना शुरू किया...
पर फिर...
उससे जैसे सूझा hi नहीं की क्या रिप्लाई दे. उसने फिरसे कीबोर्ड खोल चाट में कुछ टाइप करने का प्रयास किया... पर... फिर उसकी समझ में ना आया की भला कैसे वो कन्वर्सेशन आगे बढाए.
अंत में उसने 'हैप्पी दिवाली' लिख के बस सेंड कर दिया.
पर सेंड का बटन दबाते hi उससे जैसे अगले hi पल अपने ऊपर इतना गुस्सा आया और खुद को बेवक़ूफ़ भी बोलने लगी.
कारण था... उसका इतना सिंपल सा रिप्लाई भेजना.
'ुग्ग्ग्ठ!!! ये क्या भेज दिया मेने? No स्टीकर... No इमोजी... बस... एक हैप्पी दिवाली? वीर ने आलरेडी देख लिया है. विल हे रिप्लाई? वो मुझसे नाराज़ है. पर... में भी तोह उस से नाराज़ थी. बूत काम से काम... उस दिन के बाद भी... उसने मुझे मैसेज किया. मतलब... वो एकदम नाराज़ नहीं है.'
निधि बीच बीच में वीर की चाट बार बार खोल चेक करती की शायद वीर ने रिप्लाई किया हो कोई फिरसे.
पर...
उसका उसके बाद कोई रिप्लाई नहीं आया.
और पता नहीं क्यों...
ये छोटा सी बात निधि को कही न कही खटक रही थी.
***
मैसेज भेजने के बाद इधर वीर सोफे पे विराजमान था. आज उसने कुरता पायजामा पहना हुआ था जो उसपे बड़ा hi जांच रहा था.
रागिनी संग सुमन और बाकी सभी पूजा करने में व्यस्त थी. पर वीर बाहर hi बैठे अपने ख़ास लोगो को मैसेज कर रहा था.
निधि का रिप्लाई आया ज़रूर. पर बड़ा hi रुखा सा लगा वीर को वो रिप्लाई.
'शायद वो मुझसे अभी भी नाराज़ है.'
[Master! Aapne unko rulaaya. So obviously wo naraaz hai. You must cherish her. She's an angel. Ehehehe~]
'पारी का बेहेवियर न जाने क्यों... बड़ा hi ओड सा लग रहा है. क्या ये मेरा वहां है?? या फिर सही में...!? उस दिन भी... सुहाना जी को जब में रिंग देने गया था... तब भी...'
[Ahh!? W-W-Wha... What are you thinking master? Mein Pari hu aapki. Aapki pyaari Pari. Ehehe~]
'यह! राइट! तुम मेरी मैं की बातें सुन्न सकती हो. तोह मेरा मैं में सोचना hi बेकार है. में जो भी सोचूंगा... यू कैन हेअर आल.'
[R-Right!]
'सिवाए जब तुम स्लीप मोड में होती हो.'
[J-Jii master. Sleep mode me sirf mein deactivate hoti hu. Baaki system shut down nahi hota. Aap mujhse baatein nahi kar sakte. Na hi mein uss waqt aapke mann ki baatein sunn sakti hu.]
'हम्म! लगता है तुम्हारे बारे में मुझे तब hi सोचना पड़ेगा. जब तुम स्लीप मोड में रहोगी.'
[Ahhh!? K-Kya matlab aapka master? Aap mere baare me peeth peeche sochenge? A-Aisa kyu master? K-Kya mene kuch galti ki hai?]
'वाक़ई! में सही हु. पारी इस बेहवींग समूहत स्ट्रेंज...'
[Huh??? No no no no... Master! Mein aapki wahi Pari hu. Aapki pyaari Pari. Your one and only masterrrr.]
वीर एक आह भरते हुए वही बैठा रहा जब अचानक hi पारी ने उससे एक नया झटका दे दिया,
[Oh! I forgot!]
'हँ? क्या?'
[Wo... Wo... Pehle promise kariye aap chillaaoge nahi.]
'हम्म? K-Kya गड़बड़ करि हो अब तुम?'
[Wo Ahahaha~ actually ek in-built function aur unlock hua tha. But mein uski notification nahi de paayi thi. Kyuki already itni saari notification mene eksaath dii thi na... Ahahaha~ So... so... I forgot.]
'व्हाट थे...!?'
[No! Please! Gussa mat hona maasterrr! I love you so much! You love me too right? Pleaaase maaasterrr! Don't scold me. Okay!?]
'पारी का स्क्रू ढीला हो गया है क्या? व्हाट थे हेलल इस थिस? ऐसा तोह कभी बेहवे न करि ये? There's समथिंग रॉंग.'
[Noooo noooo nothing is wrong you stupid master. Ahhhhh!!!! I mean... My lovely master. Kuch bhi gadbad nahi hai. Haan toh mein in-built function ke baare me bataati hu.]
'???????'
[Wo actually... Past Illustration function is available now.]
'H-Huh?'
[In-built function : Past Illustration.
डिस्क्रिप्शन : यू कैन सी थे हिस्ट्री ऑफ़ अन्य पर्सन एंड क्नोव थेइर पास्ट, वन्स यू किल थम.]
डिस्क्रिप्शन पढ़ते hi वीर की आँखें हैरानी के मारे फटी की फटी रह गयी और वो अपनी जगह से हड़बड़ा के उठा खड़ा हुआ.
'Y-Ye...!? ये सब क्या है? परीई!?'
[Yes master. Yadi aap kisi ko maaroge. Toh... Aap uss shaks ka past dekh sakte ho. I mean... Past padh sakte ho. Details status window me likh ke aa jaengi.]
वीर स्तब्ध सा बस डिस्क्रिप्शन को hi देखे जा रहा था. ये सब कुछ जैसे उसके लिए हैंडल करने के लिए बोहत ज़्यादा था.
वो यदि किसी की हत्या करता है तोह उस शख्स का सारा अतीत अब पढ़ पाने में सक्षम हो चूका था वो.
ये किसी जादू से काम नहीं था उसके लिए.
पर उससे शायद अब एक बात दिमाग में डालनी पद सकती थी...
की यदि पारी है...
तोह मुमकिन है...
और अभी वो अपने शॉक से बाहर आ पाटा की तभी एक और आवाज़ ने उसके शॉक को अलग लेवल पे पहुचा दिया...
*डिंग*
[Mission : Save Kavya and Arohi before it gets too late.
Rewards : ?? Points.
Time Limit : 20 minutes.
Location : xxxxxxxx route to xxxxxxx road.
Mission Fail Penalty : 300 Points Deduction.]
'H-Huhhh?? कह दो की ये मज़ाक है.'
[...]
'डायमंत्र ित्तत्त!!'
वीर फिर न कुछ सोचा और वह रुका. उसने अगले hi पल अपनी बाइक निकाल के स्टार्ट की और तेज़्ज़ रफ़्तार में रेप्ट हुए बाइक भगाने लगा.
घर की पूजा और दिवाली चोरर वो यहाँ मिशन पूरा करने निकला था. एक ऐसा मिशन जिससे पढ़ने के बाद उसने एक सेकंड वास्ते करने का नहीं सोचा.
क्युकी वो जानता था. आरोही और काव्य किसी मुश्किल में पद गयी है. ऊपर से मिशन में इस बार पेनल्टी भी थी. वो भी 300 पॉइंट्स. साथ hi साथ टाइम लिमिट केवल 20 मिनट्स.
वो समझ गया था की सिचुएशन कितनी क्रिटिकल थी. वीर एक बात और जान गया था की यदि मिशंस में पेनल्टी दी है तोह मिशन फ़ैल होने पर केवल वही पेनल्टी hi उसपे लगेगी. वो पारी को नहीं खोयेगा.
पर यदि पेनल्टी मेंशनएड नहीं है. तोह इसका मतलब यही है की पेनल्टी पारी है. मिशन फ़ैल, यानी की पारी का उसके शरीर से निकल जाना.
वो गाडी भगाते हुए उसी रूट में जा रहा था जहा की डिटेल्स मिशन में मेंशनएड थी.
एक एक सेकंड उसके लिए कीमती था. उसके दिल की धड़कन इतनी तेज़्ज़ हो चुकी थी की रास्ते में फूट रहे पटाखों के बाद भी वो अपने सीने में हो रहे विब्रेशन्स को महसूस कर पा रहा था.
*बूम*
*वहुवुस्सष्ठ*
लोग तोह अपने आनंद में डूबे पटाखे फोड़ रहे थे पर वीर इधर...
बेचैनी के मारे मारा जा रहा था. उससे बाइक चलाने में भी दिक्कत जा रही थी. क्युकी कोई न कोई रास्ते में पटाखे फोड़ने आ hi जाता.
'दमन आईटी! दमन आईटी! वो दोनों इस रूट से क्यों आ रही है??'
उसने खीजते हुए गाडी को रेस दिया और तभी...
*रिंग रिंग*
उसका फ़ोन बज उठा...
एक सेकंड न गवाते हुए उसने अपने पायजामे के जेब से फ़ोन निकाला और बाइक चलाते hi अपने कंधे से फ़ोन कान में लगा लिया.
वीर : काव्याआ!???
काव्य : Bh-Bhaiyaaa...
वीर : काव्य... कहा हो तुम? क्या हुआ??
काव्य : भैया.... ोुछहहहह!!!
वीर : कवियययआआ!??
काव्य : डीईई... संभल के... डीई... वो... आ रहे है...
वीर : हेल्ल्लूओ? हलुओ!?? काआव्याआ!!?
काव्य : भैयाआ! में और दी... इधर... क्सक्सक्सक्सक्सक्स रोड से क्सक्सक्सक्सक्सक्सक्सक्स चौक की ऑर्डर जा रहे है. और पता नहीं... कुछ... कुछ दो बाइक वाले हमको फॉलो कर रहे है...
वीर : तुम... तुम बस आगे आती जाओ... में बाहर hi हु... और चौक पर पहुँच hi रहा हु. घबराओ नहीं... चौक के पास पुलिस थाना है. आती जाओ...
काव्य : भैयाआ... हमने... हमने गाडी रोक के एक अंकल आंटी से बताया था और कुछ देरर वही खड़े रहे... पर... जैसे hi थोड़ी देरर बाद हम वह से निकले... वो लोग फिरसे फॉलो करने लगे... भैया... मुझे... डर लग रहा है.
वीर : आरोही दी से कहो की वो बस गाडी चलाती रहे... और उनसे दुरी बना के रहे... में आ रहा हु बहिन... चिंता मत करररर...
काव्य : हेल्ल्लूओ??? भैयाआ... आपकी आवाज़ नहीं आ रही है... ठीक से... हलुओ??? हेल्ल्लूऊओ???
*कॉल एंड्स*
'फूऊऊऊक्ककककक!!!'
वीर घबराते हुए अक्सेलरेशन और बढ़ा दिया. अपनी बहिन की घबराई आवाज़ सुन्न वो अंदाजा लगा सकता था की उसकी बहिन कितना दर्री हुई थी.
काव्य ने जो सिचुएशन बतायी उसका अंदाजा वीर लगा चूका था की माजरा केसा था वह.
शायद कोई 2 बाइक्स में लोग थे जो काव्य और आरोही को पीछे से फॉलो कर रहे थे. और इस बात का आभास शायद आरोही और काव्य को हो गया था जिसके चलते वो बीच रास्ते में hi कही रुकी और कुछ घर के बाहर खड़े लोगो से बात कर उन्हें अपनी परेशानी बतायी.
ज़ाहिर सी बात है की तब वो बाइक वाले कही छुप गए होंगे. और जैसे hi आरोही और काव्य ने वह से चलना सही समझा तब उन् बाइक वालो ने वापस से उन्हें फॉलो करना शुरू कर दिया.
अब सवाल ये था की क्या वो नार्मल स्टॉकर्स थे? या फिर कोई और? और इसका जवाब भी वीर ने ढूंढ लिया था.
वो ये की ये कोई नार्मल स्टॉकर्स नहीं थे. यदि नार्मल स्टॉकर्स होते, तोह वीर को ये मिशन नहीं मिलता और इतनी हैवी पेनल्टी नहीं होती.
ज़रूर...
ज़रूर कुछ न कुछ गड़बड़ थी. और कुछ बोहत hi बुरा होने वाला था.
वीर चौक पहुँच चूका था. यहाँ काफी चहल पहल थी. पर काव्य और आरोही उससे कही नज़र ना आयी.
और जिस रूट से वो आ रही थी. वो आउटर एरिया था. इधर अँधेरा भी रहता था, स्ट्रीट लाइट्स जगह जगह नहीं थी. और रोड के एक साइड कुछ खुला इलाका था जहा पेड़ पौधे लगे हुए थे.
तोह वही रोड की दूसरी तरफ कुछ दुकाने थी पर वो दिवाली के चलते बंद हो चुकी थी.
वीर जानता था की इसी रूट से आरोही और काव्य आने वाली थी. पर...
उसके पास इंतज़ार करने का समय नहीं था.
उसने एक hi झटके में बाइक आगे बढ़ाते हुए उस मोड़ में दाल दी और स्पीड में भगाने लगा.
अँधेरे से भरी वो रोड वीर की गाडी की हेडलाइट से एकदम से जैसे रौशन हो गयी और उस पूरी सड़क में केवल उसकी hi बाइक के चलने की आवाज़ आ रही थी.
गियर बदल उसने और तेज़्ज़ गाडी भगायी की तभी उससे नज़र आया...
दूर से एक पीले रंग की बिंदु सी रौशनी...
जो हर्र एक सेकंड आकार में बड़ी होती जा रही थी.
और उससे समझने में देरर न लगी की ये...
आरोही और काव्य की गाडी थी.
वीर का चेहरा देखते hi काव्य के ासु जो उसने थाम रखे थे वो उसके गालो से बहने लगे और वो चिल्लाई...
"भाआयीयाआ!!!"
बिना समय गवाए वीर ने अपनी बाइक आरोही की स्कूटी के आगे ले जाते हुए बीच रास्ते में आधी कड़ी कर दी.
और वो बाइक से उतर फौरन hi काव्य के समीप आया.
"भैय्याअ!"
काव्य उतर वीर के गले से लग गयी. पर ये मिलान होना ज़्यादा देरर तक संभव न था.
क्युकी अगले hi पल दो और बाइक्स की आवाज़ उन् सभी के कानो में पड़ी.
अपने सीने से काव्य को लगाए वीर गुस्से से आने वाले लोगो को देखा.
हेडलाइट्स के चलते वो ठीक से उनका मुँह नहीं देख पा रहा था.
लेकिन उनके अगले बोल ने जैसे उससे सतर्क कर दिया.
"पकड़ पकड़... पकड़ अकेला है मादरचोद. पकड़ भागने न पाए..."
उनमे से एक बोलै...
कुल 4 लोगो थे. और ये देख वीर की आज पहली बार धड़कन इतनी तेज़्ज़ हो गयी.
उससे डर अपना नहीं था. डर था काव्य और आरोही का.
यदि गलती से भी उन्हें कुछ हो जाता तोह वो कभी भी खुद को माफ़ नहीं कर पाटा.
और अभी काव्य को अपनी बाहो में लिए जो राहत उससे मिल रही थी वो वीर अपने शब्दों में बया नहीं कर सकता था.
पर इसी राहत को... वो बनाये रखना चाहता था.
और उससे बनाये रखने के लिए...
वीर : अरूआहीईई!!
उसने तेज़्ज़ आवाज़ में पीछे कड़ी आरोही को चिल्लाया, जो उसकी आवाज़ सुन्न एक दम सिहर गयी.
कारण था वीर का उससे, उसके नाम से बुलाना.
जबकि वो वीर से एक साल बड़ी थी. और जितनी बार भी वीर उससे बुलाता था, दी कहके hi बुलाता था.
पर आज...
वीर की पीठ देख... वो वीर जो उन् अनजान आदमियों के सामने उसके और काव्य के लिए एक शील्ड बन्न के खड़ा हुआ था. आरोही अपने मैं में आ रहे विचारो को समझ नहीं पा रही थी.
वीर : ारूउहीईई!
एक बार फिर वो चिल्लाया...
और, आरोही का शरीर हिल उठा.
आरोही : हहहह!?
वीर : काव्य को यहाँ से लेके जाओ. भाभी के घर.... फौरन...
आरोही : P-Par!??
वीर : ी साइड गूऊऊ....
काव्य : भैयाआ!?? नूवो भैया... हम आप को अकेला चोरर के कही नहीं जाएंगे...
आरोही : T-Tum...
वीर : वो आ गए है... वे don't हैवे टाइम. Arohiiiiiiiiiii!!! जाआऊआ!!!
उसकी गरजती हुई आवाज़ सुन्न आरोही समझ चुकी थी की उसका यहाँ से जाना कितना ज़रूरी था.
अपना निचला होंठ दबाये वो अपनी असमर्थता व्यक्त कर... फौरन hi काव्य का हाथ थामी और उससे स्कूटी पे बैठा के खुद बैठ उसने स्कूटी चालु कर दी...
आरोही : Y-You... यू विल के बैक...
वो पीछे मुद वीर से बोली. जैसे वो पूछ नहीं बल्कि आर्डर दे रही थी की तुम्हे लौट के आना hi है. और वो भी जल्द hi.
वीर : हम्म!
वीर बिना पीछे मुड़े hi हामी भरा. और...
*वरूँऊऊम्मम्म*
अगले hi पल आरोही स्कूटी को भगा के उस सुनसान सी सड़क से चौक को ऑर्डर जाने लगी.
"भैयाआआआआ!!!!"
पीछे से काव्य की बेचैनी भरी पुकार वो सुन्न पा रहा था. पर...
इस वक़्त उसका पूरा फोकस सामने आये उन् 4 आदमियों पर था.
उसमे ज़्यादा कॉन्फिडेंस नहीं था की वो उन् 4 को हैंडल कर पाएगा. क्युकी...
एक के हाथ में एक लोहे का पाइप था और वही दूसरे के हाथ में लकड़ी की एक मोती स्टिक.
बाकी 2 निहत्ते थे पर...
आखिर थे तोह वो 4 बन्दे.
[Master!? Wo 4 hai. You must run.]
'नूवो! पारी! जितना हो सकेगा. I'll फाइट थम. समय आ गया है की में अपनी मार्टिकल आर्ट्स स्किल को इस्तेमाल कर के देखु.'
"धत्त्त बहनचोद लड़की भाग गयी. तुम दोनों... जाओ पीछा करो... जल्दी... आगे नहीं गयी होगी अभी ज़्यादा..."
उनमे से एक आदमी बोलै तोह दो निहत्ते आदमी एक बाइक पे सवार हुए और बाइक भगा के वो पीछा करने जा रहे थे.
पर...
आखिर निकलना तोह उन्हें वीर के बगल से hi था.
जैसे hi वो बाइक लेके उसके समीप आये...
वीर ने सीधा एक लात ड्राइवर के मुँह पे जड़ी जिसके चलते उनकी बाइक लड़खड़ाई और दोनों hi रोड के उस तरफ पेड़ पौधों वाली जगह में जा गिरे.
'ओह! ी फील स्ट्रांग...'
वो दोनों गालिया बकते हुए खड़े हुए और फिरसे बाइक चालु कर पीछा करने जा रहे थे.
वीर ये देख उन्हें झपटने के लिए हुआ पर...
वो ये कैसे भूल सकता था की पीछे भी 2 आदमी थे जो हथियार लिए थे और उसी की तरफ बढ़ रहे थे.
मजबूरन, उससे पीछे मुड़ना पड़ा और...
*वहुसस्ससहहहह*
एक ने उसके सर्र को एआईएम करके वो पाइप घुमाया पर वीर अपने रिफ्लेक्स के चलते तुरंत झुक गया.
अपनी फिस्ट को कस के उसका पिछले भाग वीर ने फिर सीधा उसके सर्र पर घुमाया और...
*पुऊववववव*
वो वार जाके सीधा उस आदमी के जबड़े से कनेक्ट हुआ और एक पल में hi वो 3-4 कदम दूर जा के धड़ाम से नीचे गिरा.
"मआदारचूडड़ड!!!"
दूसरा चिल्लाया और वीर की टांग पे उसने अपनी स्टिक घुमाई...
*वहूऊओऊस्ससष्ठ*
वीर ने डॉज किया पर...
*वहूउस्सस्सश्ह्ह्हह्ह*
एक बार फिर उसने अपनी स्टिक घुमाई जिससे वीर ने बरेली डॉज किया.
'थिस गाए.... टच!!!'
वीर उसपे पूरी तरह टूट पड़ता की तभी उससे सुनाई दिया,
*वरररओओओओओओओममम*
*वरूआउम्म्म्म्म"
उसने पलट के देखा तोह वो दो आदमी गाडी उठा के आरोही और काव्य का पीछे करने निकल चुके थे.
'फुकककक! आरोही! काव्य! यू मस्ट स्टे सेफ... चाहे कुछ भी हो जाए... Don't गेट सौगत.'
पर ये वक़्त... पीछे नहीं आगे ध्यान देने का ज़्यादा था. क्युकी अगले hi सेकंड...
"ले मदारचोड़ साली..."
उस आदमी ने स्टिक एक बार फिर वीर के सार की तरफ घुमाई और इस बार जैसे hi वीर ने पलट के वापस देखा तोह...
डॉज करने का टाइम नहीं था.
*थुड़*
अपने दोनों हाथो को क्ष की तरह बनाते हुए उसने स्टिक को रोका और कूद के पीछे हो गया.
'दम्मंन!!? तहत हुर्ट्स!'
"उठ बे... जल्दी उठ... साला भागने न पाए."
वीर उतना फ्लुइड्ली लड़ नहीं पा रहा था जितना वो लड़ सकता था. कारण था कुरता और पयजामा.
दूसरा आदमी भी उठ के आया और दोनों आदमी वीर पे टूट पड़े.
वो इधर से उधर हथियार चलाते पर वीर जैसे तैसे कर बच जाता. लेकिन थोड़े बोहत हिट्स उससे भी लग रहे थे.
पर ये ज़्यादा देरर तक नहीं था.
उसकी आँखों में मिटटी फेक पहले आदमी ने पीछे से वीर को डेडलॉक में फसाया और पाइप उसके गले पर टिका के उसकी सास रोकने की कोशिश करने लगा.
तोह वही दूसरा आदमी स्टिक लिए हस्ते हुए सामने से उसके क़रीब आने लगा.
और उसकी नज़र में...
वीर का पेट था जो बिलकुल अनप्रोटेक्टेड था. एक शॉट, और वीर धेरर.
उससे पता था स्टिक कहा मारनी है.
'डायमंत्र ितत्तत्त!! शीत्तट! ायर्घ्हहह!'
वीर चंगुल से छूटने का प्रयास hi कर रहा था.
इतने में उस आदमी ने अपनी स्टिक उठाया और वो मारने hi वाला था की तभी...
*थुड़*
अचानक hi वो अपने आप एकदम से नीचे गिर पड़ा.
'हँ???'
और जब सामने नज़र पड़ी... तोह...
एक युवक पीछे खड़ा हुआ था. जिसने पत्थर फेक उस आदमी के सर्र पे मार, उससे यु गिरा दिया.
पर वीर की नज़र जैसे hi उसपे पड़ी उसकी आँखें हैरत के मारे फैलती चली गयी...
वीर : ग... गोलूउउ!???
गोलू : हँ!?? अरे... T-Tum...!?
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आज के लिए इतना hi गाइस!
धन्यवाद!
नेक्स्ट अपडेट इस कहानी का अब तक का मोस्ट थ्रिलिंग अपडेट होने वाला है.
सो कीप सपोर्टिंग!
और लिखे करना न भूलना रे.
अब तक...
इधर काव्य फुल एक्ससिटेड आरोही के पीछे बैठ चुकी थी. दोनों hi बेहद hi ख़ूबसूरत ड्रेस पहनी हुई थी.
और गाडी में संग बैठ वो रवाना हो गयी.
पर उन्हें नहीं पता था...
की इस वक़्त उनके पीछे कौन आ रहा था.
अब आगे...
एक बेहद hi ख़ूबसूरत से शहर में इस वक़्त धेरर साड़ी झालरों अथवा अन्य प्रकार की लइटिंग्स से सारे घर, दुकाने एवम बिल्डिंग्स जगमगा रही थी. लाल, नीली, पीली न जाने कितने रंगो की लेद लाइट्स से आज हर्र एक घर सजा हुआ था.
दिवाली की इस रात में हर्र जगह खुशियों का माहौल था. और इस समय इसी शहर के एक बड़े से घर में एक औरत बेहद hi ख़ूबसूरत सी साड़ी पहने, थाल लिए, अपने घर में जगह जगह दिए रख रही थी.
होंठो पे मुस्कान सजाये वो गुनगुनाते हुए दियो से अपने घर को रौशन कर रही थी. तभी उसके पीछे से एक कमरे से अत्यंत hi सुन्दर सी लड़की, बड़ी hi आकर्षक सी ड्रेस पहने बाहर आयी और बोली,
"माँ?? टेरेस पे रख दिए आपने दिए?"
औरत : नहीं बीटा! तुम रख आओ. में नीचे रख रही हु.
लड़की : Okay!
और इतना बोल वो jhat-pat ऊपर चली गयी और कुछ देरर में hi दिए रख के नीचे भी आ गयी.
लड़की : हाश!! न जाने कितने दिनों बाद आज इतना फ्री टाइम मिला है फेस्टिवल सेलिब्रेट करने का, है न माँ? वर्ण ऐसा टाइट और बिजी सचेडूले था अपना.
औरत : एकदम सही कहा तुमने बीटा.
लड़की : अच्छा चलो! माँ! आओ बाहर चल के थोड़े पटाखे फोड़े. मेने कुछ खरीदे है.
औरत : क्या तू भी ये ले के बैठ गयी? अब उसमे मेरी क्या ज़रुरत!?
लड़की : वाह! एक तोह साल में एक बार दिवाली आती है. और अब उसमे भी पटाखे न फोड़े? और आप नहीं चलोगी तोह क्या में अकेली बेवकूफो टाइप फुलझड़ी लिए घूमूंगी क्या?
औरत (शिघ्स) : अच्छा बाबा! चल! तू maan'ne वाली तोह है नहीं?
लड़की : वही! हहै~ तोह पहले hi आ जाती...
औरत : हाँ हाँ मेरी माता... अब चल!
और दोनों माँ बेटी निकल के घर के बाहर आ गयी जहा कॉलोनी के सभी लोग बड़े hi धूम धाम से दिवाली मन रहे थे. बड़े जहा खड़े हो कर बात कर रहे थे, एक दूसरे को बधाईया दे रहे थे तोह वही बच्चे पटाखे फोड़ अपने hi आनंद में डूबे हुए थे.
इधर वो लड़की भी फुलझड़ी जलाते हुए अनार एवम चाकरी जला के अपनी माँ को भी आगे आके पटाखे फोड़ने के लिए मन रही थी और साथ hi साथ आस पड़ोस की लड़कियों से बातें भी कर रही थी.
पर उसकी माँ यानी की वो औरत एक मुस्कान लिए बस पीछे कड़ी होक hi सब देख रही थी. ज़मीन चाकरी, अनार से निकली चमकती हुई चिंगारिया उसकी आँखों में प्रतिबिंबित हो रही थी. भले hi आँखों का ध्यान उधर hi था...
पर...
उसके अंतर मैं का ध्यान कही और था...
और धीरे धीरे उसके होंठो से वो मुस्कान अपने आप गायब हो गयी.
'21 साल हो गए... न जाने...'
जब उस लड़की ने कुछ पल बाद पलट के अपनी माँ को देखा तोह उससे एक पल नहीं लगा ये jaan'ne में की उसकी माँ किसी चीज़ को लेकर परेशान है.
वो तुरंत सब कुछ चोरर अपनी माँ के पास आयी और बोली,
"आप परेशान लग रही हो माँ!"
औरत : H-Huh!? नहीं! कुछ भी तोह नहीं!?
लड़की (फ्रोंस) : कभी तोह शेयर कर लिया करो!? हँ!? ऐसी कौन सी बातें है जो सोचती रहती हो और खुद hi गहरे चिंतन में डूब जाती हो? क्या आपको मुझ पे ट्रस्ट नहीं है क्या? हँ?
औरत : एक झापड़ लगाउंगी ऐसी बातें बोली तोह. अपनी बेटी पे ट्रस्ट नहीं होगा तोह किसपे होगा भला?
लड़की : तोह फिर बताती क्यों नहीं की क्या सोचती रहती हो आप अक्सर?
औरत : बस... काम के बारे में बीटा.
लड़की : मुझे पता था आप यही बोलोगी. में चाहे जितनी बार पूछ लू, आपका जवाब यही रहता है. *शिघ्स* खर्र! अच्छा! चलिए अब... देखिये बगल वाली आंटी आपको पूछ रही है... आइये...
औरत : हम्म!
और वो दोनों बाहर निकल पड़ोसियों के साथ gap-shap में घुल मिल गयी.
***
वही यही मुंबई में इस समय भी कुछ ऐसा hi माहौल था.
Harsho-ullaas का महुअल.
और यहाँ भी एक फ्लैट के बाहर एक औरत अपने घर के द्वार के पास दो दिए रख रही थी.
ये और कोई नहीं, निधि hi थी, जो आज लाल रंग की साड़ी में इतनी आकर्षक और हसीं लग रही थी की अगल बगल वाले फ्लैट में रहने वाले लोग भी पलट पलट के देख रहे थे उससे.

आखिरी दिया रख वो उठी और थाल अंदर टेबल पे रख वो अपनी सैंडल्स pehn'ne लगी...
जब अंदर से उसकी लाड़ली जूही दौड़ते हुए बाहर आयी. उसके नन्हे हाथो में एक पैकेट था जिसमे कई सारे पटाखे रखे हुए थे.
जूही : ममममयीय! ममममयीय! चलो न जल्दी! चलो न...
वो ज़िद्द करते हुए निधि के हाथ पकड़ जब हिलाने लगी तोह अंदर से श्रेया जल्दबाज़ी में निकल के आयी,
श्रेया : अरे बाबा रुको न जूही! चल तोह रहे है. ओह गॉड! तुमने इधर से उधर कर के इतना पसीना निकलवा दिया मेरा. कही make-up न खराब हो जाए मेरा.
आज श्रेया भी बेहद सुन्दर लग रही थी. सफ़ेद और गोल्डन कलर की ड्रेस उसपे इतनी ज़्यादा जांच रही थी की उसकी एक hi झलक काफी थी लड़को को अपने ऊपर लट्टू करने के लिए.

श्रेया की बात पे ध्यान देते हुए, निधि जो वही बैठी थी बोल पड़ी,
निधि : हम्म? Anti-sweat वाले मेकअप भी आते है श्रेया.
श्रेया : I-I क्नोव... वो... वो ब्रांडेड वाले थोड़े महंगे आते है दी.
निधि : ओह्ह! M-Mein तुम्हारे लिए ले आउंगी श्री...
श्रेया : No No No No... It's... It's टोटली फाइन दी. में यही प्रेफर करती हु.
निधि : पर!?
श्रेया : मेने कहा न!? It's फाइन दी.
श्रेया इतना बोल अपना मुँह फेरर खुद के विचारो में डूब जाती है,
'दी कितनी प्यारी है. कितनी अच्छी है. शी कनौस की हमारी क्या कंडीशन है. स्टिल... वो चाहे मेरी हो या जूही या माँ डैड की नीड... सभी की नीड्स के बारे में कितना ध्यान रखती है. कभी वो अपने ऊपर ध्यान नहीं देती. न hi सोचती है अपने बारे में. यदि में उन्हें ये साड़ी दिलवाने न ले जाती और यहाँ न होती. तोह पक्के से दी ने अपने ऊपर एक रुपये तक न खर्च किया होता. शी... ी थिंक की अब में बोहत अच्छे से समझ गयी... की क्यों वीर यहाँ से चला गया.'
इधर निधि भी श्रेया की hi तरह अपने विचारो में खोयी हुई थी. और दोनों hi बहने अंदर से ग्लानि को महसूस कर रही थी.
'श्रेया के लिए में इतना भी नहीं कर सकती? ऑफ़ कोर्स में कर सकती हु. पर... मेरी बहिन... मेरी स्थिति देख जान बुझ के पीछे हट रही है. में जानती हु उससे कितना पसंद है make-up से लेके ड्रेसेस तक. सब कुछ ब्रांडेड. पर में ये भी जानती हु की... वो फ़ोन में बस इनकी पिक्स देखती रहती है. और कभी कभी जब मौका मिलता है तब अपने लिए कुछ खरीद लेती है. क्या में अपनी बहिन के लिए... इतना भी नहीं कर सकती? क्या वीर भी... इसलिए यहाँ से गया था? हाँ! में hi शायद... कपबले नहीं हु. में hi...'
वो अपने मैं से और सवाल करती पर तभी जूही की आवाज़ ने दोनों बहनो को होश में ला दिया,
"चलिए न मुम्ममइय्य्य!!! माआससीई!!"
और बस...
फिर क्या था. बच्चो की ज़िद्द के आगे पेरेंट्स हार मान hi जाते है अक्सर.
और यही हुआ. जूही के संग दोनों श्रेया और निधि नीचे आ गयी जहा उनकी सोसाइटी का कैंपस था. और सारे फ्लैट्स में रहने वाले लोग नीचे उतर कैंपस में hi दिवाली का लुत्फ़ ले रहे थे.
निधि भी एक पिलर के पास कड़ी श्रेया और जूही के हस्ते चेहरे देख उनमे खोयी हुई थी.
अचानक hi उसकी नज़र अपने फ़ोन पर गयी जो उसने अपने हाथो में लिया हुआ था, क्युकी अभी अभी उसका फ़ोन विबरते हुआ था.
मैसेज देखा तोह पाया की, उसमे लिखा हुआ था...
'हैप्पी दिवाली Ma'am!!'
और बस... उस एक मैसेज को देख. निधि के होंठो पे बिना उसके जाने hi मुस्कान आ गयी. अपने फ़ोन को कस के भींच उसने टाइप करना शुरू किया...
पर फिर...
उससे जैसे सूझा hi नहीं की क्या रिप्लाई दे. उसने फिरसे कीबोर्ड खोल चाट में कुछ टाइप करने का प्रयास किया... पर... फिर उसकी समझ में ना आया की भला कैसे वो कन्वर्सेशन आगे बढाए.
अंत में उसने 'हैप्पी दिवाली' लिख के बस सेंड कर दिया.
पर सेंड का बटन दबाते hi उससे जैसे अगले hi पल अपने ऊपर इतना गुस्सा आया और खुद को बेवक़ूफ़ भी बोलने लगी.
कारण था... उसका इतना सिंपल सा रिप्लाई भेजना.
'ुग्ग्ग्ठ!!! ये क्या भेज दिया मेने? No स्टीकर... No इमोजी... बस... एक हैप्पी दिवाली? वीर ने आलरेडी देख लिया है. विल हे रिप्लाई? वो मुझसे नाराज़ है. पर... में भी तोह उस से नाराज़ थी. बूत काम से काम... उस दिन के बाद भी... उसने मुझे मैसेज किया. मतलब... वो एकदम नाराज़ नहीं है.'
निधि बीच बीच में वीर की चाट बार बार खोल चेक करती की शायद वीर ने रिप्लाई किया हो कोई फिरसे.
पर...
उसका उसके बाद कोई रिप्लाई नहीं आया.
और पता नहीं क्यों...
ये छोटा सी बात निधि को कही न कही खटक रही थी.
***
मैसेज भेजने के बाद इधर वीर सोफे पे विराजमान था. आज उसने कुरता पायजामा पहना हुआ था जो उसपे बड़ा hi जांच रहा था.
रागिनी संग सुमन और बाकी सभी पूजा करने में व्यस्त थी. पर वीर बाहर hi बैठे अपने ख़ास लोगो को मैसेज कर रहा था.
निधि का रिप्लाई आया ज़रूर. पर बड़ा hi रुखा सा लगा वीर को वो रिप्लाई.
'शायद वो मुझसे अभी भी नाराज़ है.'
[Master! Aapne unko rulaaya. So obviously wo naraaz hai. You must cherish her. She's an angel. Ehehehe~]
'पारी का बेहेवियर न जाने क्यों... बड़ा hi ओड सा लग रहा है. क्या ये मेरा वहां है?? या फिर सही में...!? उस दिन भी... सुहाना जी को जब में रिंग देने गया था... तब भी...'
[Ahh!? W-W-Wha... What are you thinking master? Mein Pari hu aapki. Aapki pyaari Pari. Ehehe~]
'यह! राइट! तुम मेरी मैं की बातें सुन्न सकती हो. तोह मेरा मैं में सोचना hi बेकार है. में जो भी सोचूंगा... यू कैन हेअर आल.'
[R-Right!]
'सिवाए जब तुम स्लीप मोड में होती हो.'
[J-Jii master. Sleep mode me sirf mein deactivate hoti hu. Baaki system shut down nahi hota. Aap mujhse baatein nahi kar sakte. Na hi mein uss waqt aapke mann ki baatein sunn sakti hu.]
'हम्म! लगता है तुम्हारे बारे में मुझे तब hi सोचना पड़ेगा. जब तुम स्लीप मोड में रहोगी.'
[Ahhh!? K-Kya matlab aapka master? Aap mere baare me peeth peeche sochenge? A-Aisa kyu master? K-Kya mene kuch galti ki hai?]
'वाक़ई! में सही हु. पारी इस बेहवींग समूहत स्ट्रेंज...'
[Huh??? No no no no... Master! Mein aapki wahi Pari hu. Aapki pyaari Pari. Your one and only masterrrr.]
वीर एक आह भरते हुए वही बैठा रहा जब अचानक hi पारी ने उससे एक नया झटका दे दिया,
[Oh! I forgot!]
'हँ? क्या?'
[Wo... Wo... Pehle promise kariye aap chillaaoge nahi.]
'हम्म? K-Kya गड़बड़ करि हो अब तुम?'
[Wo Ahahaha~ actually ek in-built function aur unlock hua tha. But mein uski notification nahi de paayi thi. Kyuki already itni saari notification mene eksaath dii thi na... Ahahaha~ So... so... I forgot.]
'व्हाट थे...!?'
[No! Please! Gussa mat hona maasterrr! I love you so much! You love me too right? Pleaaase maaasterrr! Don't scold me. Okay!?]
'पारी का स्क्रू ढीला हो गया है क्या? व्हाट थे हेलल इस थिस? ऐसा तोह कभी बेहवे न करि ये? There's समथिंग रॉंग.'
[Noooo noooo nothing is wrong you stupid master. Ahhhhh!!!! I mean... My lovely master. Kuch bhi gadbad nahi hai. Haan toh mein in-built function ke baare me bataati hu.]
'???????'
[Wo actually... Past Illustration function is available now.]
'H-Huh?'
[In-built function : Past Illustration.
डिस्क्रिप्शन : यू कैन सी थे हिस्ट्री ऑफ़ अन्य पर्सन एंड क्नोव थेइर पास्ट, वन्स यू किल थम.]
डिस्क्रिप्शन पढ़ते hi वीर की आँखें हैरानी के मारे फटी की फटी रह गयी और वो अपनी जगह से हड़बड़ा के उठा खड़ा हुआ.
'Y-Ye...!? ये सब क्या है? परीई!?'
[Yes master. Yadi aap kisi ko maaroge. Toh... Aap uss shaks ka past dekh sakte ho. I mean... Past padh sakte ho. Details status window me likh ke aa jaengi.]
वीर स्तब्ध सा बस डिस्क्रिप्शन को hi देखे जा रहा था. ये सब कुछ जैसे उसके लिए हैंडल करने के लिए बोहत ज़्यादा था.
वो यदि किसी की हत्या करता है तोह उस शख्स का सारा अतीत अब पढ़ पाने में सक्षम हो चूका था वो.
ये किसी जादू से काम नहीं था उसके लिए.
पर उससे शायद अब एक बात दिमाग में डालनी पद सकती थी...
की यदि पारी है...
तोह मुमकिन है...
और अभी वो अपने शॉक से बाहर आ पाटा की तभी एक और आवाज़ ने उसके शॉक को अलग लेवल पे पहुचा दिया...
*डिंग*
[Mission : Save Kavya and Arohi before it gets too late.
Rewards : ?? Points.
Time Limit : 20 minutes.
Location : xxxxxxxx route to xxxxxxx road.
Mission Fail Penalty : 300 Points Deduction.]
'H-Huhhh?? कह दो की ये मज़ाक है.'
[...]
'डायमंत्र ित्तत्त!!'
वीर फिर न कुछ सोचा और वह रुका. उसने अगले hi पल अपनी बाइक निकाल के स्टार्ट की और तेज़्ज़ रफ़्तार में रेप्ट हुए बाइक भगाने लगा.
घर की पूजा और दिवाली चोरर वो यहाँ मिशन पूरा करने निकला था. एक ऐसा मिशन जिससे पढ़ने के बाद उसने एक सेकंड वास्ते करने का नहीं सोचा.
क्युकी वो जानता था. आरोही और काव्य किसी मुश्किल में पद गयी है. ऊपर से मिशन में इस बार पेनल्टी भी थी. वो भी 300 पॉइंट्स. साथ hi साथ टाइम लिमिट केवल 20 मिनट्स.
वो समझ गया था की सिचुएशन कितनी क्रिटिकल थी. वीर एक बात और जान गया था की यदि मिशंस में पेनल्टी दी है तोह मिशन फ़ैल होने पर केवल वही पेनल्टी hi उसपे लगेगी. वो पारी को नहीं खोयेगा.
पर यदि पेनल्टी मेंशनएड नहीं है. तोह इसका मतलब यही है की पेनल्टी पारी है. मिशन फ़ैल, यानी की पारी का उसके शरीर से निकल जाना.
वो गाडी भगाते हुए उसी रूट में जा रहा था जहा की डिटेल्स मिशन में मेंशनएड थी.
एक एक सेकंड उसके लिए कीमती था. उसके दिल की धड़कन इतनी तेज़्ज़ हो चुकी थी की रास्ते में फूट रहे पटाखों के बाद भी वो अपने सीने में हो रहे विब्रेशन्स को महसूस कर पा रहा था.
*बूम*
*वहुवुस्सष्ठ*
लोग तोह अपने आनंद में डूबे पटाखे फोड़ रहे थे पर वीर इधर...
बेचैनी के मारे मारा जा रहा था. उससे बाइक चलाने में भी दिक्कत जा रही थी. क्युकी कोई न कोई रास्ते में पटाखे फोड़ने आ hi जाता.
'दमन आईटी! दमन आईटी! वो दोनों इस रूट से क्यों आ रही है??'
उसने खीजते हुए गाडी को रेस दिया और तभी...
*रिंग रिंग*
उसका फ़ोन बज उठा...
एक सेकंड न गवाते हुए उसने अपने पायजामे के जेब से फ़ोन निकाला और बाइक चलाते hi अपने कंधे से फ़ोन कान में लगा लिया.
वीर : काव्याआ!???
काव्य : Bh-Bhaiyaaa...
वीर : काव्य... कहा हो तुम? क्या हुआ??
काव्य : भैया.... ोुछहहहह!!!
वीर : कवियययआआ!??
काव्य : डीईई... संभल के... डीई... वो... आ रहे है...
वीर : हेल्ल्लूओ? हलुओ!?? काआव्याआ!!?
काव्य : भैयाआ! में और दी... इधर... क्सक्सक्सक्सक्सक्स रोड से क्सक्सक्सक्सक्सक्सक्सक्स चौक की ऑर्डर जा रहे है. और पता नहीं... कुछ... कुछ दो बाइक वाले हमको फॉलो कर रहे है...
वीर : तुम... तुम बस आगे आती जाओ... में बाहर hi हु... और चौक पर पहुँच hi रहा हु. घबराओ नहीं... चौक के पास पुलिस थाना है. आती जाओ...
काव्य : भैयाआ... हमने... हमने गाडी रोक के एक अंकल आंटी से बताया था और कुछ देरर वही खड़े रहे... पर... जैसे hi थोड़ी देरर बाद हम वह से निकले... वो लोग फिरसे फॉलो करने लगे... भैया... मुझे... डर लग रहा है.
वीर : आरोही दी से कहो की वो बस गाडी चलाती रहे... और उनसे दुरी बना के रहे... में आ रहा हु बहिन... चिंता मत करररर...
काव्य : हेल्ल्लूओ??? भैयाआ... आपकी आवाज़ नहीं आ रही है... ठीक से... हलुओ??? हेल्ल्लूऊओ???
*कॉल एंड्स*
'फूऊऊऊक्ककककक!!!'
वीर घबराते हुए अक्सेलरेशन और बढ़ा दिया. अपनी बहिन की घबराई आवाज़ सुन्न वो अंदाजा लगा सकता था की उसकी बहिन कितना दर्री हुई थी.
काव्य ने जो सिचुएशन बतायी उसका अंदाजा वीर लगा चूका था की माजरा केसा था वह.
शायद कोई 2 बाइक्स में लोग थे जो काव्य और आरोही को पीछे से फॉलो कर रहे थे. और इस बात का आभास शायद आरोही और काव्य को हो गया था जिसके चलते वो बीच रास्ते में hi कही रुकी और कुछ घर के बाहर खड़े लोगो से बात कर उन्हें अपनी परेशानी बतायी.
ज़ाहिर सी बात है की तब वो बाइक वाले कही छुप गए होंगे. और जैसे hi आरोही और काव्य ने वह से चलना सही समझा तब उन् बाइक वालो ने वापस से उन्हें फॉलो करना शुरू कर दिया.
अब सवाल ये था की क्या वो नार्मल स्टॉकर्स थे? या फिर कोई और? और इसका जवाब भी वीर ने ढूंढ लिया था.
वो ये की ये कोई नार्मल स्टॉकर्स नहीं थे. यदि नार्मल स्टॉकर्स होते, तोह वीर को ये मिशन नहीं मिलता और इतनी हैवी पेनल्टी नहीं होती.
ज़रूर...
ज़रूर कुछ न कुछ गड़बड़ थी. और कुछ बोहत hi बुरा होने वाला था.
वीर चौक पहुँच चूका था. यहाँ काफी चहल पहल थी. पर काव्य और आरोही उससे कही नज़र ना आयी.
और जिस रूट से वो आ रही थी. वो आउटर एरिया था. इधर अँधेरा भी रहता था, स्ट्रीट लाइट्स जगह जगह नहीं थी. और रोड के एक साइड कुछ खुला इलाका था जहा पेड़ पौधे लगे हुए थे.
तोह वही रोड की दूसरी तरफ कुछ दुकाने थी पर वो दिवाली के चलते बंद हो चुकी थी.
वीर जानता था की इसी रूट से आरोही और काव्य आने वाली थी. पर...
उसके पास इंतज़ार करने का समय नहीं था.
उसने एक hi झटके में बाइक आगे बढ़ाते हुए उस मोड़ में दाल दी और स्पीड में भगाने लगा.
अँधेरे से भरी वो रोड वीर की गाडी की हेडलाइट से एकदम से जैसे रौशन हो गयी और उस पूरी सड़क में केवल उसकी hi बाइक के चलने की आवाज़ आ रही थी.
गियर बदल उसने और तेज़्ज़ गाडी भगायी की तभी उससे नज़र आया...
दूर से एक पीले रंग की बिंदु सी रौशनी...
जो हर्र एक सेकंड आकार में बड़ी होती जा रही थी.
और उससे समझने में देरर न लगी की ये...
आरोही और काव्य की गाडी थी.
वीर का चेहरा देखते hi काव्य के ासु जो उसने थाम रखे थे वो उसके गालो से बहने लगे और वो चिल्लाई...
"भाआयीयाआ!!!"
बिना समय गवाए वीर ने अपनी बाइक आरोही की स्कूटी के आगे ले जाते हुए बीच रास्ते में आधी कड़ी कर दी.
और वो बाइक से उतर फौरन hi काव्य के समीप आया.
"भैय्याअ!"
काव्य उतर वीर के गले से लग गयी. पर ये मिलान होना ज़्यादा देरर तक संभव न था.
क्युकी अगले hi पल दो और बाइक्स की आवाज़ उन् सभी के कानो में पड़ी.
अपने सीने से काव्य को लगाए वीर गुस्से से आने वाले लोगो को देखा.
हेडलाइट्स के चलते वो ठीक से उनका मुँह नहीं देख पा रहा था.
लेकिन उनके अगले बोल ने जैसे उससे सतर्क कर दिया.
"पकड़ पकड़... पकड़ अकेला है मादरचोद. पकड़ भागने न पाए..."
उनमे से एक बोलै...
कुल 4 लोगो थे. और ये देख वीर की आज पहली बार धड़कन इतनी तेज़्ज़ हो गयी.
उससे डर अपना नहीं था. डर था काव्य और आरोही का.
यदि गलती से भी उन्हें कुछ हो जाता तोह वो कभी भी खुद को माफ़ नहीं कर पाटा.
और अभी काव्य को अपनी बाहो में लिए जो राहत उससे मिल रही थी वो वीर अपने शब्दों में बया नहीं कर सकता था.
पर इसी राहत को... वो बनाये रखना चाहता था.
और उससे बनाये रखने के लिए...
वीर : अरूआहीईई!!
उसने तेज़्ज़ आवाज़ में पीछे कड़ी आरोही को चिल्लाया, जो उसकी आवाज़ सुन्न एक दम सिहर गयी.
कारण था वीर का उससे, उसके नाम से बुलाना.
जबकि वो वीर से एक साल बड़ी थी. और जितनी बार भी वीर उससे बुलाता था, दी कहके hi बुलाता था.
पर आज...
वीर की पीठ देख... वो वीर जो उन् अनजान आदमियों के सामने उसके और काव्य के लिए एक शील्ड बन्न के खड़ा हुआ था. आरोही अपने मैं में आ रहे विचारो को समझ नहीं पा रही थी.
वीर : ारूउहीईई!
एक बार फिर वो चिल्लाया...
और, आरोही का शरीर हिल उठा.
आरोही : हहहह!?
वीर : काव्य को यहाँ से लेके जाओ. भाभी के घर.... फौरन...
आरोही : P-Par!??
वीर : ी साइड गूऊऊ....
काव्य : भैयाआ!?? नूवो भैया... हम आप को अकेला चोरर के कही नहीं जाएंगे...
आरोही : T-Tum...
वीर : वो आ गए है... वे don't हैवे टाइम. Arohiiiiiiiiiii!!! जाआऊआ!!!
उसकी गरजती हुई आवाज़ सुन्न आरोही समझ चुकी थी की उसका यहाँ से जाना कितना ज़रूरी था.
अपना निचला होंठ दबाये वो अपनी असमर्थता व्यक्त कर... फौरन hi काव्य का हाथ थामी और उससे स्कूटी पे बैठा के खुद बैठ उसने स्कूटी चालु कर दी...
आरोही : Y-You... यू विल के बैक...
वो पीछे मुद वीर से बोली. जैसे वो पूछ नहीं बल्कि आर्डर दे रही थी की तुम्हे लौट के आना hi है. और वो भी जल्द hi.
वीर : हम्म!
वीर बिना पीछे मुड़े hi हामी भरा. और...
*वरूँऊऊम्मम्म*
अगले hi पल आरोही स्कूटी को भगा के उस सुनसान सी सड़क से चौक को ऑर्डर जाने लगी.
"भैयाआआआआ!!!!"
पीछे से काव्य की बेचैनी भरी पुकार वो सुन्न पा रहा था. पर...
इस वक़्त उसका पूरा फोकस सामने आये उन् 4 आदमियों पर था.
उसमे ज़्यादा कॉन्फिडेंस नहीं था की वो उन् 4 को हैंडल कर पाएगा. क्युकी...
एक के हाथ में एक लोहे का पाइप था और वही दूसरे के हाथ में लकड़ी की एक मोती स्टिक.
बाकी 2 निहत्ते थे पर...
आखिर थे तोह वो 4 बन्दे.
[Master!? Wo 4 hai. You must run.]
'नूवो! पारी! जितना हो सकेगा. I'll फाइट थम. समय आ गया है की में अपनी मार्टिकल आर्ट्स स्किल को इस्तेमाल कर के देखु.'
"धत्त्त बहनचोद लड़की भाग गयी. तुम दोनों... जाओ पीछा करो... जल्दी... आगे नहीं गयी होगी अभी ज़्यादा..."
उनमे से एक आदमी बोलै तोह दो निहत्ते आदमी एक बाइक पे सवार हुए और बाइक भगा के वो पीछा करने जा रहे थे.
पर...
आखिर निकलना तोह उन्हें वीर के बगल से hi था.
जैसे hi वो बाइक लेके उसके समीप आये...
वीर ने सीधा एक लात ड्राइवर के मुँह पे जड़ी जिसके चलते उनकी बाइक लड़खड़ाई और दोनों hi रोड के उस तरफ पेड़ पौधों वाली जगह में जा गिरे.
'ओह! ी फील स्ट्रांग...'
वो दोनों गालिया बकते हुए खड़े हुए और फिरसे बाइक चालु कर पीछा करने जा रहे थे.
वीर ये देख उन्हें झपटने के लिए हुआ पर...
वो ये कैसे भूल सकता था की पीछे भी 2 आदमी थे जो हथियार लिए थे और उसी की तरफ बढ़ रहे थे.
मजबूरन, उससे पीछे मुड़ना पड़ा और...
*वहुसस्ससहहहह*
एक ने उसके सर्र को एआईएम करके वो पाइप घुमाया पर वीर अपने रिफ्लेक्स के चलते तुरंत झुक गया.
अपनी फिस्ट को कस के उसका पिछले भाग वीर ने फिर सीधा उसके सर्र पर घुमाया और...
*पुऊववववव*
वो वार जाके सीधा उस आदमी के जबड़े से कनेक्ट हुआ और एक पल में hi वो 3-4 कदम दूर जा के धड़ाम से नीचे गिरा.
"मआदारचूडड़ड!!!"
दूसरा चिल्लाया और वीर की टांग पे उसने अपनी स्टिक घुमाई...
*वहूऊओऊस्ससष्ठ*
वीर ने डॉज किया पर...
*वहूउस्सस्सश्ह्ह्हह्ह*
एक बार फिर उसने अपनी स्टिक घुमाई जिससे वीर ने बरेली डॉज किया.
'थिस गाए.... टच!!!'
वीर उसपे पूरी तरह टूट पड़ता की तभी उससे सुनाई दिया,
*वरररओओओओओओओममम*
*वरूआउम्म्म्म्म"
उसने पलट के देखा तोह वो दो आदमी गाडी उठा के आरोही और काव्य का पीछे करने निकल चुके थे.
'फुकककक! आरोही! काव्य! यू मस्ट स्टे सेफ... चाहे कुछ भी हो जाए... Don't गेट सौगत.'
पर ये वक़्त... पीछे नहीं आगे ध्यान देने का ज़्यादा था. क्युकी अगले hi सेकंड...
"ले मदारचोड़ साली..."
उस आदमी ने स्टिक एक बार फिर वीर के सार की तरफ घुमाई और इस बार जैसे hi वीर ने पलट के वापस देखा तोह...
डॉज करने का टाइम नहीं था.
*थुड़*
अपने दोनों हाथो को क्ष की तरह बनाते हुए उसने स्टिक को रोका और कूद के पीछे हो गया.
'दम्मंन!!? तहत हुर्ट्स!'
"उठ बे... जल्दी उठ... साला भागने न पाए."
वीर उतना फ्लुइड्ली लड़ नहीं पा रहा था जितना वो लड़ सकता था. कारण था कुरता और पयजामा.
दूसरा आदमी भी उठ के आया और दोनों आदमी वीर पे टूट पड़े.
वो इधर से उधर हथियार चलाते पर वीर जैसे तैसे कर बच जाता. लेकिन थोड़े बोहत हिट्स उससे भी लग रहे थे.
पर ये ज़्यादा देरर तक नहीं था.
उसकी आँखों में मिटटी फेक पहले आदमी ने पीछे से वीर को डेडलॉक में फसाया और पाइप उसके गले पर टिका के उसकी सास रोकने की कोशिश करने लगा.
तोह वही दूसरा आदमी स्टिक लिए हस्ते हुए सामने से उसके क़रीब आने लगा.
और उसकी नज़र में...
वीर का पेट था जो बिलकुल अनप्रोटेक्टेड था. एक शॉट, और वीर धेरर.
उससे पता था स्टिक कहा मारनी है.
'डायमंत्र ितत्तत्त!! शीत्तट! ायर्घ्हहह!'
वीर चंगुल से छूटने का प्रयास hi कर रहा था.
इतने में उस आदमी ने अपनी स्टिक उठाया और वो मारने hi वाला था की तभी...
*थुड़*
अचानक hi वो अपने आप एकदम से नीचे गिर पड़ा.
'हँ???'
और जब सामने नज़र पड़ी... तोह...
एक युवक पीछे खड़ा हुआ था. जिसने पत्थर फेक उस आदमी के सर्र पे मार, उससे यु गिरा दिया.
पर वीर की नज़र जैसे hi उसपे पड़ी उसकी आँखें हैरत के मारे फैलती चली गयी...
वीर : ग... गोलूउउ!???
गोलू : हँ!?? अरे... T-Tum...!?
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आज के लिए इतना hi गाइस!
धन्यवाद!
नेक्स्ट अपडेट इस कहानी का अब तक का मोस्ट थ्रिलिंग अपडेट होने वाला है.
सो कीप सपोर्टिंग!
और लिखे करना न भूलना रे.
