अपडेट 172
सरलपुर
एक नयी सुबह थी पूरा घर सुबह के कामो में लगा हुआ था दोनों बहुएं रसोई में थी, रिमझिम पर देख रही थी की चंचल आज और दिनों की तुलना में गंभीर दिख रही थी और कुछ बोल नहीं रही थी, रिमझिम ने शुरू में तो ज़्यादा ध्यान नहीं दिया पर जब सुबह का खाना हो गया सभी अपने अपने काम पर निकल गए और घर पर सिर्फ चंचल और रिमझिम रह गए क्यूंकि आज चरण सिंह भी दुकान गए थे और ख़ुशी कॉलेज..
चंचल कपडे धो रही थी तो रिमझिम भी बाथरूम में आई और चंचल को अभी भी उसी गंभीर अवस्था में देखा तो उसका ध्यान खींचने के लिए उसे एक शरारत सूझी, क्यूंकि चंचल बाथरूम में बैठकर कपडे धो रही थी तो रिमझिम ने चुपके से अचानक से फव्वारा चला दिया और भरभरा के पानी चंचल पर गिरने लगा.
वहीं रिमझिम हँसते हुए बच्चों की तरह कूदने लगी, पर इस मज़ाक का असर जैसा रिमझिम ने सोचा था वैसा तो नहीं हुआ बल्कि चंचल बिलकुल गुस्से से आग बबूला हो गयी.
चंचल- रिमझिम ये क्या बदतमीज़ी है, पूरा भीगा दिया मुझे और खड़े खड़े हंस रही है.
रिमझिम तो चंचल का ये रूप देखकर दर hi गयी- जीजी वो मैं बस.
चंचल- क्या मैं वो बस तू अभी बच्ची नहीं है जो ये सब शरारतें करती फिर घर की बहु है कुछ ज़िम्मेदारी समझ.
रिमझिम - जीजी बस मज़ाक hi तो किआ है क्यों गुस्सा हो रही हो अगर तुम चाहो तो तुम पानी दाल लो मुझपर.
चंचल- मुझे कोई ज़रुरत नहीं है और तू तो रहने hi दे मुझसे बात hi मत कर..
ये कहकर चंचल बाथरूम से गुस्से में निकल गयी और रिमझिम बिलकुल हैरान कड़ी रह गयी क्यूंकि जबसे वो घर में ब्याह कर आई थी तबसे उसने हमेशा चंचल को हँसते मुस्कुराते hi देखा था ऊपर से उसनर रिमझिम को हमेशा अपनी छोटी बहन की तरह प्यार किया था पर आज उसका ये रूप देखकर तो रिमझिम बिलकुल हैरान रह गयी थी..
रिमझिम सोच में पद गयी की आखिर ये अचानक जीजी को हुआ क्या, रिमझिम पढ़ी लिखी थी वो इंसान को समझती थी उसे सोचने पर ये तो समझ गया की चंचल का गुस्सा शरारत की वजह से नहीं है बल्कि बात तो कुछ और है और उसे बात जननी होगी नहीं तो जीजी ऐसे hi गुस्से में रहेंगी.
इतना सोच के रिमझिम चंचल के कमरे में गयी तो देखा चंचल ने गीले कपडे उतर दिए थे और अभी दुसरे सूखे कपडे पहन रही थी अभी पेटीकोट और ब्लाउज में थी और ब्लाउज के हुक लगा रही थी... चंचल ने रिमझिम को आते देखा पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
रिम- वो जीजी मुझे
पर अब भी चंचल ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी बल्कि साड़ी उठाकर पहनने लगी.
रिमझिम ने जब ये देखा तो आगे आई और चंचल को वैसे hi पकड़ कर बिस्तर पर बैठा दिया.
चंचल- रिमझिम छोड़ मुझे..
रिम- नहीं जीजी पहले तुम मेरी बात सुनो गई
ये कहते हुए रिमझिम ने चंचल के हाथों से साड़ी लेकर अलग फ़ेंक दी...
चंचल- मुझे नहीं सुन्ना कुछ
रिम- क्या हुआ है क्यों गुस्से में हो इतनी.
Chanchal-tujhe नहीं पता तूने hi भिगाया मुझे अभी.
रिम- तुम उस पर गुस्सा नहीं हो, जीजी तुम्हे अपनी बड़ी बहन मानती हूँ मैं और तुम्हे समझती हूँ इतनी सी बात पर तुम मुझसे इतना गुस्सा तो नहीं हो सकती..
चंचल चुप रही..
रिम- जीजी अगर तुम भी मुझे कुछ अपना मानती हो तो बताओ क्या ये सच नहीं है.
चंचल अब क्या कहती और मन hi मन उसे भी बुरा लग रहा था रिमझिम पर गुस्सा करना और रिमझिम ने सही कहा था वो उसे सच में अपनी छोटी बहन मानती थी.
रिम- बताओ जीजी क्या सच में तुम उसी बात पर गुस्सा हो.
चंचल- नहीं मैं तुझपे गुस्सा नहीं हूँ.
चंचल ने नीचे देखते हुए कहा.
रिम- फिर क्या बात है जीजी कोई परेशानी है क्या?
चंचल- नहीं कोई परेशानी नहीं है.
रिम- जीजी ऐसे मत करो अब तुम मुझसे अपनी छोटी बहन से भी छिपाओगी.
चंचल- अरे कुछ नहीं है रिम्मी वो तेरे मतलब की बात नहीं है.
रिम- जो भी बात तुम्हे परेशां करे वो मेरे मतलब की है, अब बताओ.
चंचल- रहने दे न रिम्मी समझा कर.
रिम- ठीक है समझ गयी तुम मुझे अपना मानती hi नहीं हो, ठीक है.
ये कहकर रिमझिम उठकर जाने लगी, तो चंचल ने उसका हाथ पकड़ लिए.
चंचल- ऐसा नहीं है रिम्मी तुझे सच में अपनी बहन से बढ़कर मानती हूँ.
Rim-to फिर बटर में क्या दिक्कत हैक
चंचल- अरे वो बात hi ऐसी है समझ नहीं आ रहा .
रिम- जो भी बात है भरोसा करो और बताओ मुझे. भैया और तुम्हारे बारे में है.
चंचल- हम्म.
रिम- तो बताओ न जीजी बताओगी तभी तो कुछ समझ आएगा.
चंचल- पता नहीं बताना सही है भी की नहीं. और अगर तुझे पता चलेग तो तुझे भी बहुत अजीब लगेगा
रिम- छुपाना सही नहीं hai.batana सही है. और मुझे बताओ तो सही तभी तो जानूँगी की कैसा लगेगा मुझे.
चंचल- वो कल तेरे भैया और मैं वो कर रहे थे.
रिम- क्या कर रहे थे?
चंचल- अरे वही साथ में.
रिम- साथ में क्या.
Chanchal-pati पत्नी क्या करते हैं रात में.
रिम- चुदाई?
चंचल- बेशरम है तू बिलकुल.
रिम- अरे जीजी यहाँ तुम्हारे मेरे अलावा कोई और है नहीं तो किस्से शर्मा रही हो.
Chanchal-phir भी.
रिम- ाचा आगे बताओ
चंचल- हाँ तो करते हुए जब उनका पानी निकलने वाला था तो उन्होंने मेरी जगह किसी और औरत का नाम कहा.
रिम- ाचा बस इस बात से परेशां हो तुम.
रिमझिम ने मुस्कुराते हुए कहा.
चंचल- तुझे ये इतनी सी बात लगती है मेरा घर ख़राब हो रहा है.
रिम- अरे जीजी कुछ नहीं हो रहा शांत रहो तुम बेकार में इतना सोच रही हो..
चंचल- तुझे ये बात काम लग रही है क्या?
रिम- अरे जीजी इंसानो की आदत होती है ऐसी तुम बहुत भोली हो .
Chanchal-kya आदत होती है.
Rim-dekho दुनिया में कितने तरह की स्वादिष्ट स्वादिष्ट मिठाई और पकवान है तो भले hi इंसान एक को खाये पर उसका मन दूसरी मिठाई की और ललचाता hi है. तो ये आम बात है.
चंचल- ाचा आम बात है पर वो मिठाई हैं और यहाँ बात इंसानो की हो रही है.
रिम- ाचा पहले ये बताओ भैया ने नाम किसका लिया..
चंचल- वो मैं तुझे नहीं बता सकती.
रिम- क्यों नहीं बता सकती.
चंचल- नहीं वो सही नहीं होगा.
रिम- नाम तो बताना पड़ेगा जीजी पर उससे पहले तुम्हारी पहली परेशानी दूर करती हूँ.
चंचल- कैसे.
रिम- तुम्हारे देवर भी मुझे छोड़ते हुए अलग अलग औरतो के बारे में सोचते हैं.
चंचल- झूठ मत बोल देवर जी ऐसे नहीं हैं.
रिम- झूठ क्यों बोलूंगी मैं जीजी सच में तुम्हारी कसम.
चंचल- तो तुझे बुरा नहीं लगता ये गलत नहीं है.
रिम- नहीं बिलकुल बुरा नहीं लगता बल्कि मैं तो उनका साथ देती हूँ .
चंचल- कैसा साथ.
रिम- जिसके बारे में वो सोचते हैं मैं वो बनकर उनसे चुदवाती हूँ..
चंचल- क्या बोल रही है तू मुझे तो समझ नहीं आ रहा.
रिम- अरे जीजी सब समझ आ रहा है तुम्हे बस समझना नहीं छह रही.
चंचल- पर ऐसा क्यों क्या फायदा है इस सब का.
रिम- मैंने मिठाई वाली बात बताई न वही और जब मैं उनका साथ देती हूँ न तो जीजी और तगड़ी चुदाई करते हैं खुश कर देते हैं बिलकुल.
चंचल- पर ये तो गलत है न...
रिम- अरे जीजी गलत सही कुछ नहीं है सही है की पति को खुश रखना और पति को खुश तभी रख पाओगी जब वो तुम्हारे सामने खुला होगा.
चंचल- हाँ.
रिम- हाँ फिर तभी तो अगर पति की इच्छाओं को सही गलत में बाँटोगी तो कुछ hi दिनों में वो तुमसु खुलने की जगह बातें छुपाने लगेंगे और चिढ़ने ब्बि लगेगा.
चंचल- सही में.
रिम- और क्या इसलिए पत्नी की जगह एक अछि दोस्त बनो जिससे पति हर प्रकार की बात तुमसे खुल कर कह सके.. जैसे मुझसे ये कहते हैं.
चंचल- हाँ ये तो तू सही कह रही है. दोस्त बनना ज़रूरी है.
रिम- अब सही पकड़ी हो.
चंचल- हाँ मैं कोशिश करुँगी तेरे भैया की दोस्त बनने की.
रिम- तो अब बताओ भैया किसका नाम ले रहे थे तुम्हे छोड़ते हुए.
रिमझिम ने चंचल का हाथ पकड़ते हुए कहा..
चंचल- नहीं वो मैं नहीं बता सकती अजीब लगता है.
रिम- ओह्हो जीजी ये नहीं करो अब बतादो तुम्हे मेरी कसम.
चंचल- अरे तू समझती नहीं है बेकार में तू गलत सोचेगी.
रिम- अरे भरोसा करो जीजी मैं क्यों गलत सोचने लगी अब तुम बताओ.
चंचल- ओफ्फो तो सुन वो मेरे साथ करते हुए तेरा नाम ले रहे थे.
रिम- क्या सही में?
रिमझिम ने खिलखिलाते हुए कहा
चंचल- तुझे अजीब नहीं लग रहा.
रिम- नहीं अरे जीजी बिलकुल बुरा नहीं लग रहा.
चंचल- तू इनके बारे में गलत नहीं सोचेगी.
रिम- अरे नहीं जीजी और अब जब तुमने सच बताया है तो मैं भी बताऊँ की तुम्हारे देवर भी मुझे न जाने कितनी बार तुम्हे यानि अपनी भाभी बना कर छोड़ चुके हैं.
चंचल- क्याआ नहीं तू झूठ बोल रही hai.itne साल हो गए मुझे इस घर में पर आज तक उनकी कोई गलत नज़र नहीं देखि मैंने फिट ये कैसे.
रिम- जीजी ऐसे तो भैया की नज़र मैंने भी नहीं देखि फिर भी सोचते हैं न. तो इसमें गलत कुछ नहीं है, मन है मन में ख्याल तो आएंगे hi और सच कहूं तो तुम्हारा बदन hi ऐसा है की देखकर तुम्हारे देवर क्या ससुरजी भी तुम पर चढ़ जाएं.
ये कहकर रिम ने चंचल की कमर को दबा दिया.
Chanchal-hattt तू भी न कुछ भी बोलती है चंचल ने प्रतिक्रिया तो ये दी पर उसके सामने कल ससुरजी के साथ हुआ दृश्य याद आ गया और उसी बदन में सरसरी दौड़ गयी...
रिम- सही कह रही हूँ जीजी एक बार तुम्हारा बदन तो देखो कई बार औरत होकर मेरा इमां दोल जाता है तुम पर.
रिमझिम ने चंचल के गले में बाहें डालते हुए कहा.
चंचल- ाचा इस हिसाब से तो मुझसे पहले सब तुझे को.. मतलब तेरे साथ करना चाहेंगे. क्यूंकि तू मुझसे भी कहीं ज़्यादा सुन्दर है.
रिम- नहीं जीजी तुम ज़्यादा सुन्दर हो मर्दो को भरा हुआ बदन पसंद होता है जो की तुम्हारा है और जीजी यही तो बात है तुम्हारी खुद को रोकती बहुत हो थोड़ा खुलेगी तभी मज़ा आएगा.
चंचल- मैंने कहाँ रोका खुद को.
रिम- ाचा अभी छोड़ना बोलते बोलते रुक गयी.
चंचल- अरे वो सब गंदे बोल हैं ाचा नहीं लगता बोलना
रिम- हाय ढैय्या जीजी अगर ऐसी hi बन कर रहोगी तो अभी तो भैया नाम hi लेते हैं किसी और का फिर छोड़ के भी आ जायेंगे तुम ऐसे hi गन्दा गन्दा करती रहना.
चंचल- छी ये सब क्या बोल रही है तू.
रिम- सही बोल रही हु. जीजी मर्द को वही औरत खुश करती है जो हर तरह से खुल कर उसका साथ दे बिस्तर पर तो और ज़्यादा अगर वहां मर्द खुल गया तो तुमसे कभी कुछ नहीं छुपायेगा.
चंचल- शायद तू सही कह रही है पर कैसे खुलून मैं तेरे भैया के आगे.
रिम- भैया के आगे खुलने से पहले तुम्हे खुद के आगे खुलना होगा शर्म हाय को थोड़ा हटाना होगा.
Chanchal-khud के आगे पर कैसे?
रिम- ाचा जो मैं पूछूं उसका जवाब गंदे से गंदे शब्दों में देना ठीक है.
चंचल- ज़रूरी है क्या.
रिम- रहने दो जीजी तुम फिर
चंचल- ाचा ठीक है कोशिश करती हूँ तू पूछ.
रिम- तुम और भैया रात को क्या करते हो.
Chanchal-ahh हम्म सम्भोग.
रिम- जीजी गन्दा बोलना है
चंचल- छू चुदाई.
चंचल ने बोलकर मुँह छुपा लिया.
रिम- लो नयी दुल्हन मैं हूँ शर्मा तुम रही हो.
चंचल- तू तो बेशरम है,
रिम- तुम भी बन हो जीजी बड़ा मज़ा आता है.
चंचल- अब बना तो रही है तू.
Rim-are हाँ अब बताओ चुदाई कैसे होती है.
चंचल- ये तो तुझे पता है न वो उसमे डालकर.
रिम- नहीं गंदे शब्दों में.
चंचल ने एक गहरी साँस ली और बोली- जब च छूट में लुंदड़ दाल कर अंदर बहार करते हैं तो होती है चुदाई. अब ठीक है
रिम- हाँ जीजी ये हुई न बात शाबाश मन कर रहा है तुम्हें चूम लें
रिमझिम ने चंचल से चिपकते हुए उसे बाहों में लेते हुए कहा.
चंचल- धत्त्त नालायक.. बहुत हो गया मज़ाक .
रिम- ाचा जीजी जब पीछे से करते हैं तो उसे क्या कहते हैं.
चंचल- तू भी न अब शर्म आ रही है मुझे.
रिम- ाचा जब ये इतने बड़े बड़े गोल मटोल चूतड़ निकल के घूमती हो तब नहीं आयति शर्म.
रिमझिम ने चंचल को खड़ा करके उसके पेटीकोट के ऊपर से चूतड़ों को दबाते हुए बोलै.
चंचल- छोड़ न रिमझिम क्या कर रही है.
रिम- इन्हे क्या कहते हैं.
चंचल- इन्हे वो गांड.
रिम- भैया ने मरी है कभी तुम्हारी गांड.
रिमझिम ने पीछे से चंचल से चिपकते हुए कहा साथ hi अपने हाथों से उसके मांसल सपाट पेट को मसलने लगी...
चंचल- ओह्ह हाँ वो तो शादी के कुछ दिन बाद hi मार ली थी बड़े वो हैं तेरे भैया.
रिम- अरे इसमें वो क्या हैं जीजी जब गांड ऐसी होगी तो कोई मरे बिना छोड़ देगा.
रिमझिम लगातार चंचल के पेट को मसले जा रही थी साथ hi पीछे से अपनी छूट को चंचल के चूतड़ों पर घिस रही थी और उसकी इन हरकतों का असर अब चंचल के बदन पर भी पद रहा था उसे न जाने क्यों रिमझिम का यूँ छूना ाचा लग रहा था एक सिरहन उसके पूरे बदन में हो रही थी.
चंचल- ुहममम क्या बोलती है तू रिम्मी अब छोड़ मुझे..
रिम- छोड़ दूंगी जीजी पहले तुम्हे ठीक से खुलना तो सीखा दूँ
ये कहकर रिमझिम चंचल के कंधे को चूमने लगी.
चंचल- ओह्ह रिम्मी बससससस.
पर रिमझिम लगातार उसके कंधे और गले को चूमे जा रही थी साथ hi उसका हाथ लगातार उसके पेट और अब एक ब्लाउज के ऊपर छूछीयो पर भी आ गया था वहां चल रहे थे.
चंचल का तो अब होश खोने लगा था उसे ये सब गलत होक भी सही लग रहा था, उसका मन संस्कार कह रहे थे की गलत है पर उसका तन अलग hi भाषा बोल रहा था. व
वहीं रिमझिम तो भूखी शेरनी की तरह चंचल के बदन पर टूट पड़ी थी और बेतहाशा उसे चाट चूम रही थी कभी कंधे पर तो कभी गले पर और चूमते चूमते hi उसने चंचल को अपनी और घुमा लिया था और अब आगे उसके सीने को चूम रही थी जो भी हिस्सा ब्लाउज से बहार था रिमझिम उसे अपनी जीभ से चाटकर उसका स्वाद चख रही थी तो चंचल हर पल के साथ जैसे अपने आप को खोटी जा रही थी और अपने बदन को आँखें बंद किये रिमझिम को सौंपती जा रही थी..
चंचल को ऐसा एहसास कभी नहीं हुआ था एक औरत कभी इस तरह से उसके करीब नहीं आई थी उसके अनुसार तो औरत औरत तो ऐसा कुछ करते hi नहीं थे पर अभी रिमझिम कस होंठों को अपने सीने पर महसूस कर उसके सरे पिछले भ्रम टूट से रहे थे तभी उसे अचानक से एक खालीपन का एहसास हुआ उसने पाया की रिमझिम ने उसके सीने से अपने होंठों को हटा लिया है ये पल भर का खालीपन भी चंचल को ाचा नहीं लगा और वो आँखें खोलने hi वाली थी की अचानक उसे अपनर होंठों पर एक कोमल मीठा रसीला एहसास हुआ और अगले hi पल उस एहसास ने उसके होंठों को अपनर में समां लिया. जब तक चंचल समझती क्या हो रहा है तब तक तो रिमझिम उसके होंठों को चूसने भी लगी थी पर चंचल के लिए सबसे हैरानी की बात ये थी की विरोध करना तो छोडो वो उतनी hi आक्रामकता और जोश के साथ रिमझिम का साथ दे रही थी उसके होंठों को चूस रही थी..

दोनों बहुएं एक दुसरे के होंठों का रास पीने में लगी हुई थी, अगर कोई देखता तो कहता बहुएं हो तो ऐसी देवरानी जेठानी का प्यार अनोखा था.
चंचल खुद को भुला चुकी थी जैसे अब तक जीवन में जो उसने समाज के अनुसार अछि बातें सीखी थी वो इस कुछ पलों के चुम्बन के साथ उसके मन से मिटटी जा रही थी.. रिमझिम भी अब पूरे जोश में आ चुकी थी वैसे भी अपनी बहन जैसी जेठानी पर तो न जाने कब से उसका मन था आज उसके मन की इच्छा भी पूरी हो रही थी. इसी बीच आगे बढ़ाते हुए रिमझिम ने अपनी जीभ को भी चंचल के मुँह की सैर के लिए घुसा दिया.. पर अब चंचल तो जैसे बिलकुल खो चुकी थी उसे सब मंजूर था.
दोनों बहुएं आपस में जीभ लड़ा रही थी वहीं उनके होंठ आपस में गुथम गुथी कर रहे थे... चंचल के सुध खोने का फायदा रिमझिम पूरी तरह उठा रही थी और उसने चंचल के ब्लाउज के हुक खोलने शुरू कर दिए थे, और कुछ hi पलों में ब्लाउज के दोनों पैट अलग अलग थे, जिनके अलग होते hi रिमझिम ने बड़ी hi सावधानी से चंचल की ब्रा के दोनों कप जिन्होंने उसके नायब खजाने जैसी चूचियों को ढँक रखा था रिमझिम ने उन्हें नीचे कर दिया और दोनों छूछीयो को हाथों में भर लिया पर एक पल के लिए भी उसने अपने होंठों को चंचल के होंठों से अलग नहीं होने दिया...
चंचल उत्तेजना के सागर में बाह कर इतनी आगे आ चुकी थी की अब हर और उसे बस वासना का समुन्दर hi नज़र आ रहा था और कुछ नहीं, रिमझिम ने कुछ देर बाद चंचल के होंठों को छोड़ा तो चंचल बुरी तरह से हांफ रही थी रिमझिम ने उसे हांफता छोड़ा और अपने होंठों को चंचल की एक बड़ी सी छुच्छी पर रख दिया और चूसने लगी.
चंचल जिसकी सांसें थम hi पाई थी की एक बार फिर से उसकी आँखें बंद हो गयी सीना अकड़ गया... स्वतः hi चंचल के हाथ रिमझिम के सर पर आ गए और वो उसे अपनी चूचियों पर दबाने लगी रिमझिम भी पूरा मुँह खोल कर जितना हो सके उतना चंचल की छूछीयो को चूसने लगी...

चंचल- ओह्ह्ह्ह हांण ुहममम रिम्मी.
पहली बार किसी औरत के द्वारा ऐसा किये जाने का एहसास चंचल को पागल कर रहा था और वो औरत भी उसकी देवरानी थी...
रिमझिम चंचल की चूचियों के अकार और उनकी सुंदरता में डूब गयी थी और उन्हें पूरी लगन से चूस रही थी और उतना hi मज़ा चंचल को आ रहा था...
रिमझिम ने आगे चाल चली और चंचल की कमर पर बंधे उसके पेटीकोट के नाड़े की गाँठ खोल दी जिसके खुलते hi नाडा ढीला हो गया, रिमझिम धीरे धीरे बिना चंचल को एहसास दिलाये उसके पेटीकोट को नीचे सहलाने लगी सहलाते हुए उसे जैसे hi ये एहसास हुआ की चंचल ने अंदर कच्ची नहीं पहनी रिमझिम खुश हो गयी..
और चंचल का पेटीकोट उसने उसके घुटने तक सरका दिया अब चंचल लगभग नंगी थी, ब्लाउज खुला हुआ था चूचियां बहार थी पेटीकोट घुटनो से नीचे था ..
रिमझिम ने थोड़ी देर और छूछीयो को चूसा और फिर अपना चेहरा हटाया तो जैसे चंचल को ाचा नहीं लगा वो छह रही थी ये सिलसिला यूँ hi चलता रहे और रिमझिम उसकी चूचियां चूसती रहे...
इसीलिए जैसे hi रिमझिम ने उसकी चूचियों को छोड़ा उसकी आँखें खुल गयी और आँखें खोल कर देखा तो पाया की रिमझिम उसे hi देख रही थी उसके ऐसे देखने से चंचल शर्मा गयी..
उसने देखा रिमझिम अब धीरे धीरे नीचे की और बढ़ रही है पर लगातार उसकी आँखों में देख रही है पेट के ऊपर पहुँच कर बिना आँखों को हटाए रिमझिम ने जीभ निकली और चंचल की नाभि के ऊपर फिरै तो चंचल तो जैसे उछाल hi पड़ी पर रिमझिम शांत थी और लगातार उसकी आँखों में देख रही थी रिमझिम नाभि को चूमने के बाद और नीचे खिसकने लगी और उसके साथ hi चंचल की धड़कने बढ़ने लगी उसने देखा की उसकी कमर से पेटीकोट गायब है उसे पता भी नहीं चला, और वो नंगी है अपनी देवरानी के सामने आज से पहले पति के अलावा उसे इस हालत में किसी ने नहीं देखा था, और आज उसकी देवरानी देख भी रही थी और उसके बदन को भोग भी रही थी. चंचल इस ख्याल से hi बहुत उत्तेजित थी की उसकी छूट को उसकी देवरानी सामने से देख रही है इतने करीब से.
रिमझिम भी चंचल की छूट का गीलापन देख रही थी साथ hi एक नशीली गंध उसकी छूट से आ रही थी.
चंचल की नज़र रिमझिम से हैट नहीं रही थी की तभी रिमझिम ने कुछ ऐसा किया जिसकी उम्मीद चंचल को नहीं थी रिमझिम ने अपना चेहरा झुकाया और अपने होंठ चंचल की छूट से चिपका दिए इसके एहसास से hi चंचल के पूरा बदन में बिजली दौड़ गयी उसका बदन कंपनी लगा थरथराने लगा रिमझिम ने उसकी जांघों को कास के दबा लिया तब भी वो बुरी तरह से थरथरा रही थी..
रिमझिम को अपनी जीभ पर चंचल के रास का स्वाद महसूस हुआ चंचल झाड़ रही थी... रिमझिम अपनी जेठानी के रास को ख़ुशी ख़ुशी जातक रही थी.
चंचल को तो होश hi नहीं था की वो कहाँ है थोड़ी देर बाद वो शांत हुई उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके बदन में जान hi नहीं बची है बदन बिलकुल हल्का सा हो गया था... हलके से आँखें खोल कर देखा तो रिमझिम अब भी उसकी छूट चाट रही थी, चंचल को अपनी छूट में फिर से उत्तेजना का एहसास होने लगा उसकी प्यास अचानक फिर से बापिस आ गयी, पर इस बार वो होश में थी और उस एहसास को महसूस कर प् रही थी, उसके हाथ रिमझिम के सर के पीछे चले गए वो अब उसके सर को अपनी छूट में दबाते हुए अपनी छूट को उसके होंठों पर घिसने लगी.

ऐसी उत्तेजना ऐसा एहसास उसे आज तक नहीं हुआ था ऐसा आनंद उसने आज तक नहीं भोगा था जो रिमझिम उस दे रही थी... रिमझिम भी अपनी जेठानी की सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ रही थी.. और अपना सारा अनुभव और लगन उसकी छूट चाटने पर लगा रही थी. जिसका फल और उस फल का रास भी रिमझिम को मिल रहा था जो की चंचल की छूट से रास बनकर उसके मुँह में जा रहा था जिसे वो ख़ुशी ख़ुशी जातक रही थी. चंचल एक बार और रिमझिम के मुँह में झड़ी तो जाकर रिमझिम ने उसकी छूट से मुँह हटाया, चंचल के चेहरे पर संतुष्टि के भाव थे.
चंचल ने आँख खोल कर देखा तो पाया रिमझिम उसे hi देख रही थी और एक बड़ी सी मुस्कान के साथ, चेहरा पूरा रास से भीगा हुआ, चंचल को अपनी देवरानी पर बड़ा प्यार आया तो उसने उसे हाथ पकड़कर अपने पास खींच लिया और बेतहाशा उसके होंठों और चेहरे को चुमने लगी और तब तक चूमा जब तक चेहरा चाट कर साफ़ नहीं कर दिया. और फिर बड़े प्यार से उसे अपनी बाहों में लिटा लिए.
चंचल- ये सब क्या किआ तूने मेरे साथ रिम्मी लग रहा था आज मर hi जाउंगी.
रिम- अरे जीजी बस तुम्हे दिखा रही थी की सही गलत को छोड़के देखोगी तो कैसे कैसे मज़े हैं दुनिया में.
चंचल- हाँ रिइइइ ऐसा तो मुझे आज तक नहीं हुआ, मैंने तो कभी ये भी नहीं सोचा था की दो औरतें भी ऐसा कुछ करती होंगी वो तो तुझे और खुशी को..
इतना बोलते बोलते चंचल रुक गयी.
रिम- हम्म मुझे लगा hi था.
चंचल- क्या लगा था?
चंचल ने अनजान बनते हुय्र कहा.
रिम- यही की तुमने मुझे और ख़ुशी को साथ देख लिया है..
चंचल- अब तुझे पता है तो छुपा के क्या फायदा हाँ कल सुबह hi देखा था. वैसे कबसे चल रहा है ये सब.
रिम- ज़्यादा टाइम नहीं हुआ है जीजी बेचारी प्यासी है तुम्हारी ननद तो सोचा थोड़ा शांत कर दूँ.
चंचल- ाचा बहुत सोचती है तू सबके बारे में.
रिम- और क्या तुम्हारे बारे में सोचा तभी तो ये हुआ.
चंचल- रिम्मी तू बड़ी गन्दी है
Rim-kyun जीजी मैंने क्या किया.
चंचल- मुझे बिलकुल नंगा लिटा रखा है और खुद.
रिम- अरे बस इतनी सी बात.
ये कहकर रिमझिम उठी और अपने कपडे उतरने लगी चंचल उसे hi देखे जा रही थी ज्यों ज्यों रिमझिम नंगी हो रही थी त्यों त्यों चंचल की आँखें चौड़ी होती जा रही थी, रिमझिम के बदन को देख चंचल मन hi मन उसपर मोहित सी होने लगी उसके कामुक बदन का जादू चंचल पर भी चल रहा था, चंचल मन hi मन तारीफ करने से खुद को न रोक सकीय की सच में उसकी देवरानी का बदन ऐसा है की अचे अचे उसे देखकर अपने होश खो बैठें.
रिमझिम नंगी होकर फिर से चंचल की बाहों में आके लेट गयी चंचल के हाथ खुद बा खुद रिमझिम के बदन पर चलने लगे, उसको रिमझिम का बदन बहुत ाचा और कामुक लग रहा था पर फिर भी पहली बार की वजह से उसके मन में झिझक थी जिसे रिमझिम ने भांप लिया,
रिम- जीजी खुल के छुओ तुम्हारी देवरानी का hi बदन है..
रिमझिम से प्रोत्साहन मिलने पर चंचल को थोड़ा और हिम्मत मिली और वो हलके से रिमझिम की छूछीयो को पकड़ कर सहलाने लगी ..
हालाँकि रिमझिम की चूचियां उससे छोटी थी पर वैसे छोटी नहीं थी या हूँ कहें बिलकुल सही आकर की थी जैसे ाष्पका खरबूजा, ऊपर से कोमल पर सख्त छूने में ऐसा लग रहा था जैसे माखन को हाथ लगा रही हो...
चंचल का ये किसी औरत के बदन के साथ पहला अनुभव था उसके लिए सब नया नया hi था पर अछि बात ये थी की इस विषय की एक बड़ी अछि शिक्षिका उसे रिमझिम के रूप में मिली थी जो उसे सब कुछ सीखा कर hi मानेगी..
रिमझिम को अपनी चूचियों पर चंचल के हाथ का एहसास ाचा लग रहा था..
रिम- जीजी.
रिमझिम ने चंचल की आँखों में देखते हुए कहा.
चंचल- हम्म.
रिम- चूमो मुझे.
और चंचल तो जैसे इसी का इंतज़ार कर रही थी और तुरंत अपने होंठों को उसके होंठों से मिला दिया और पुराने प्रेमियों की तरह एक दुसरे को चूमने लगे.
चंचल का हाथ जो पहले हलके से रिमझिम की छूछीयो को सहला रहा था अब मसलने लगा.. हर बीतते पल के साथ चंचल की आक्रामकता भी बढ़ती जा रही थी... रिमझिम भी यही चाहती थी.. चंचल चूमते हुए पालक कर रिमझिम के ऊपर आ गयी और फिर उसके होंठों को छोड़ा और बदन को चूमने लगी सीने से होते हुए जल्दी hi चूचियों पर पहुंची और उन्हें चूसने लगी जिससे रिमझिम खुद को सिसकने से न रोक सकीय. छुछियां चूसते हुए चंचल खुद भी उत्तेजित होने लगी उसने कभी सोचा नहीं था की वो खुद किसी औरत के बदन को यूँ चूमेगी.. पर वो ऐसा कर रही थी और उसे ाचा लग रहा था... पर रिमझिम नीचे लेट कर भी खामोश रहने वाली कहाँ थी क्यूंकि चंचल रिमझिम के ऊपर बैठकर उसकी चुकी चूस रही थी तो उनकी छूट एक दुसरे के ऊपर hi थी इसी का फायदा उठाकर रिमझिम नीचे से कमर घुमा घुमा के अपनी छूट उसककी छूट पर घिस रही थी
ये एहसास चंचल को भी बड़ा भाया कुछ देर छूछीयो को अचे से चूसने के बाद चंचल भी अपनी कमर हिलाकर रिमझिम की छूट पर घिसने लगी... ये देखकर रिमझिम को ख़ुशी भी हुई साथ hi आनंद की प्राप्ति भी होने लगी.
चंचल का आत्मविश्वास हर पल के साथ बढ़ता जा रहा था और वो इस नयी दुनिया जिसके द्वार रिमझिम ने आज खोले थे उसके सरे सुख लेने का मन बना चुकी थी.. अपनी कमर हिलाते हुए वो अपनी छूट पर रिमझिम की छूट की रगड़ को महसूस कर पागल हुए जा रही थी.

वही हाल मज़े से रिमझिम का था... अब तो जैसे दोनों देवरानी जेठानी में गुथम गुथी होने लगी थी.. दोनों hi हार मानने वालो में से नहीं थी और एक कामुक कुश्ती दोनों hi बहुओं में हो रही थी...
छूट घिसाई का असर ये हुआ की दोनों ने एक बार फिर से पानी छोड़ दिया जहाँ नीचे के होंठ मिल कर पानी बहा रहे थे तो ऊपर के होंठ मिलकर एक दुसरे का रास पि रहे थे.
चंचल को तो जैसे आज एक नया जीवन मिल गया हो उसकी हालत ऐसी थी जैसे खिलोने की दुकान में एक बच्चे की उसकी देवरानी रिमझिम आज उसे कॉमर्स के ऐसे ऐसे स्वाद से से अवगत करा रही थी जिससे वो अब तक वंचित थी, झड़ने के बाद चंचल थोड़ी शांत हुई तो रिमझिम ने उसे कुछ देर बाद फिर से बाहों में भर लिया और इस बार पीछे से आगे हाथ लेजाकर उसकी छूट मसलने लगी, चंचल भी कुछ देर में दोबारा गरम हो गयी तो अपनी छूट को देवरानी से मसलवटे हुए उसकी जांघ पर घिसने लगी..

इस घिसैं घिसाई का एक बार फिर वही नतीजा हुआ और चंचल के छूट ने फिर से पानी छोड़ दिया उसे समझ नहीं आ रहा था की न जाने क्या जादू था रिमझिम में जो उसके छूने से चंचल की छूट झरने की तरह बार बार बहे जा रही थी...
खैर चंचल थक कर चूर हो चुकी थी पर इतनी नहीं की अपनी देवरानी की सेवा का क़र्ज़ न उतर सके इसलिए उसने रिमझिम को पीठ के बल लिटा दिया और अपना मुँह घुसा दिया उसकी टैंगो के बीच में सामने रिमझिम की सुन्दर रसीली छूट देखकर चंचल के मुँह में अपने आप पानी आ गया और उसने अपना मुँह उसकी छूट में घुसा दिया, वैसे तो वो समझ गयी थी क्या करना है बाकि कुछ टिप्पणियां रिमझिम ने देकर उसे छूट चाटने की कला सीखने में सहायता की साथ hi अभ्यास अपनी छूट पर करवा रही थी.
जो थोड़ी बहुत कमी अनुभव की थी वो चंचल अपने जोश से पूरा कर रही थी.. और रिमझिम की आँखों में देखते हुए उसकी छूट चाट रही थी

चंचल की जीभ का कमाल थोड़ी देर बाद hi दिखा जब रिमझिम का बदन कंपनी लगा और उसनर चंचल के सर को अपनी छूट पर दबाकर बिस्तर को मुठी में कास लिया और अपनी छूट का पानी अपनी जेठानी के मुँह में छोड़ दिया.
अब जाकर दोनों शांत हुई दोनों कुछ देर एक दुसरे से चिपक कर लेती रही, पर फिर दोपहर हो चुकी थी ख़ुशी के आने का समय हो गया था इसलिए उठकर तैयार हुई... दोनों hi जानती थी की आज के बाद दोनों का रिश्ता हमेशा हमेशा के लिए बदल गया था...
चोदामपुर
जहाँ सरल पुर में रिश्ते बदल रहे थे तो वहीं चोदामपुर में नए रिश्ते बनाने का प्रयास हो रहा था, आगे की कहानी आपके दोस्त कर्मा की ज़ुबानी.
डरावनी फिल्म की तीन टिकट लेली और हम घुस गए थिएटर में, अब एक तो डरावनी फिल्म ऊपर से छुट्टी का दिन था नहीं तो कुछ गिने चुने लोग hi थे उनमे से आधे तो हम जैसे hi थे तो फिल्म का बहाना कर भाभी चची या सहेली के साथ आये थे मज़े करने के लिए, अब हॉल खली था और हमारे साथ कड़ी दोनों सुन्दर अप्सराओं को एक नज़र देख कर टिकट काउंटर वाले भाई साब ने अपने दिमाग के समीकरण लगा कर हमें एक कोने वाली तीन टिकट बिना बोले hi दे दी थी, मन hi मन उनको दुआएं दी, और फिर हम तीनो अपनी सीट पर पहुंचे तो मेरी प्यारी नीतू ने एक और एहसान कर दिया मुझ पर की मुझे बीच में बिठा एक तरफ खुद बैठ गयी और एक तरफ तुम्हारी भाभी और हमारी जान अंजलि को बिठा दिया... परदे पर प्रचार आने शुरू हुए और मैंने साडी सीटों पर नज़र दौड़ाई तो पाया हमारी लाइन तो पूरी खली hi थी आगे पीछे कुछ लोग थे.
Neetu-Anjali डरेगी तो नहीं?
अंजलि- न तू अपना देख,
नीतू- और भैया तुम?
में- तेरे होते हुए मुझे किसी भूत से दर लग सकता है.
इस पर अंजलि की हंसी छूट गयी.
नीतू- ाचा मैं भूत हूँ.
में- मैंने ऐसा थोड़े hi कहा मैंने तो तुझे अपना बल बताया अपनी ताकत. अब जैसा जो समझे.
नीतू- तुझे बड़ी हंसी आ रही है अंजलि मेरे और भैया के बीच लड़ाई लगवाना चाहती है.
अंजलि- अरे मुझे कोई शौक नहीं तेरे और तेरे भैया के बीच लड़ाई लगाने का.
नीतू- हैं तो हैं मेरे भैया तेरे थोड़े hi हैं
अंजलि- हाँ मैं भी तो कह रही हूँ तेरे भैया हैं.
नीतू- फिर तेरे क्या हैं..
अंजलि- फिल्म चालू हो गयी है फिल्म देख बड़ा शौक़ था न डरावनी फिल्म देखने का..
नीतू- हाँ तो देख रही हूँ.
उनकी ऐसी मीठी नोकझोक देखकर ाचा लग रहा था.
खैर फिल्म शुरू हुई.. आधे पौने घंटे तो कुछ खास नहीं हुआ साला वही कहानी hi दिखते रहे और हम देखते रहे उसके बाद धीरे धीरे फिल्म डरावनी होनी शुरू हुई और मेरे बगल में बैठी दोनों सुंदरियों की सांसें तेज़ होने लगी...
अब बन तो दोनों hi बहादुर रही थी पर सच्चाई अब पता चलने वाली thi...kuch सन आये जो लगभग हर डरावनी फिल्म में होते हैं, चर्चारता दरवाज़ा, 12 बजते hi उल्लू निकलने वाली घडी और रात को नहाने का शौक़ रखने वाली एक अधनंगी कामुक सी स्त्री. पर उसके बाद तो फिल्म ने कुछ ऐसी दिशा पकड़ी जो की मैंने सोची नहीं थी मतलब फिल्म अच्छी थी एक डरावनी फिल्म का काम है लोगो को डरते हुए मनोरंजन करना और यही ये फिल्म कर रही थी पर फिल्म का तो ठीक था पर मेरे बगल में बैठी दोनों सुंदरियों की सांसें मुझे महसूस हो रही थी की तभी अचानक से फिल्म में एक चीख की आवाज़ आई और मेरे दोनों बाजुओं को दो दो हाथों ने कास लिया..
सीधा हाथ अंजलि ने कास के पकड़ा हुआ था और उल्टा नीतू ने..
मैं तो असमंजस में पद गया की ये क्या हुआ अब मैं क्या करूँ... खैर इतना hi हुआ था की आगे कुछ सोचता इंटरवल हो गया और लाइट जल गयी जिसके जलते hi अंजलि ने तो तुरंत मेरा हाथ छोड़ा और सीढ़ी होकर बैठ गयी पर बेचारी नीतू अब भी काँप रही थी मैंने उसे प्यार से आराम से पुछा तू ठीक है न तो बोली हाँ, पर दर बेचारी के चेहरे पर साफ़ दिखाई दे रहा था.
मैंने दोनों से पुछा कुछ खायेगी क्या तो दोनों ने hi मन कर दिया पर फिर भी मैं जाकर कोल्डड्रिंक ले आया और बापिस अपनी जगह पर बैठ गया,
अब तक नीतू भी बिलकुल सामान्य हो गयी थी पर एक चीज़ मुझे समझ आ गयी थी की बेचारी ने मेरे लिए कितना बड़ा बलिदान दिया था क्यूंकि उसे डरावनी फिल्मो से बहुत दर लगता था पर मेरे लिए बेचारी देख रही थी, मैंने सोचा इसका क़र्ज़ मैं ज़रूर चुकाऊंगा.
खैर कुछ देर बाद फिल्म शुरू हुई और डरावने दृश्यों का सिलसिला शुरू हो गया, नीतू ने तो पहले hi सावधानी बरतते हुए सीट के बेच में लगा डंडा ऊपर कर दिया था और मुझसे चिपक गयी थी.. और कुछ दृश्यों के बाद मेरी दूसरी तरफ भी यही हुआ अंजलि ने भी डंडा ऊपर कर दिया था पर वैसे चिपकी नहीं जैसे नीतू चिपकी थी पर हाँ मेरा बाजू कास के पकड़ा हुआ था,
मैंने मन में सोचा हाय ये है ज़िन्दगी दोनों हाथो में परियों जैसी सुन्दर लड़कियां... बस ये फिल्म यूँ चलती रहे...
हर डरावने दृश्य के बाद दोनों मुझसे और चिपक रही थी... अंजलि तो खिड़ को थोड़ा बहुत रोक भी रही थी पर नीतू तो बिलकुल मुझपर चढ़ी हुई hi थी मैंने उसको सहायता के लिए हाथ उसकी पथ से निकल कर पीछे को रख लिया था पर उसने वो अपनी कमर के पास लेकर एक हाथ से पकड़ लिया था, अंजलि अब भी मेरे एक हाथ पर चिपकी हुई thi...ab इटंर सही समय में बस एक hi चीज़ गलत थी वो ये हुआ था की दो दो सुंदरियों के इतनी करीब से सुगंध पाकर मेरा सांप फन उठा चूका था और पूरा तन के खड़ा था पर एक दिक्कत ये भी हुई की पहनी मैंने जीन्स थी जो की कासी होने के कारन मेरे सांप का फन दबा हुआ था और दर्द मुझे हो रहा था ऊपर से दोनों सुंदरियाँ चिपक रही थी तो लुंड और कड़क हो रहा था.
क्यूंकि डरावनी फिल्म थी तो स्क्रीन पर ज़्यादा तर अँधेरा hi था रात का दृश्य चल रहा था अब मुझे नहीं पता की दोनों एक दुसरे को देख प् रही थी की नहीं क्यूंकि मुझे भी थोड़ा बहुत hi नज़र आ रहा था..
नीतू तो हर दृश्य के बाद अपना चेहरा मेरे कंधे में छुपा लेती थी और मुझे उसकी गरम सांसें अपने कान और गले पर महसूस होती थी जिसका सीधा असर मेरी जीन्स के अंदर होता था... उसका एक हाथ उसकी कमर पर मेरे हाथ को पकडे था और दूसरा मेरे पेट पर था और हर डरावने दृस्य पर वो मेरी t-shirt को कसके पकड़ लेती थी...
वहीं अंजलि की चूचियों का एहसास भी मुझे अपनी बाजू पर हो रहा था, जो की आग में घी का काम कर रहा था, मेरा दर्द बढ़ता जा रहा था.. मन तो नहीं था की दो सुंदरियों को छोड़ के जॉन पर सोचा टॉयलेट जाने का बहाना करके लुंड को एडजस्ट कर आऊंगा, यही सोचकर मैंने सोचा की नीतू से बोलता हूँ तो मैंने नीतू के कान में कहने के लिए अपना चेहरा उसकी और किया और उसी वक़्त उसने डरके अपना चेहरे फिर से मेरी और घुमाया और हुआ ये की हम दोनों के होंठ आपस में टकरा गए उसके होंठों का एहसास पाते hi मेरे बदन में बिजली सी दौड़ गयी बिलकुल मुलायम रसीले होंठ जैसे रसमलाई.. अब जितनी हैरानी की बात ये मेरे लिए थी उतनी hi नीतू के लिए भी थी, खैर लगा की सब वहीं रुक गया है मुझे भी नहीं पता की क्यों मैं वहीं वैसे hi जैम गया और वो भी जैम सी गयी, हम दोनों के होंठ वैसे hi चिपके रहे कुछ देर फिर मेरे अंदर जी की ठरक जागने लगी पर अंदर एक ख्याल आया की बीटा जो दूसरी और बैठी है उसे तुम चाहते हो अगर उसने देख लिया या उसे खबर भी हुई तो चाहना तो दूर शकक तक नहीं देखेगी तुम्हारी.. पर दूसरी तरफ थी ठरक की इतने सुन्दर प्यारे होंठ सामने हैं ऐसे hi जाने दिया तो बेकार है ज़िन्दगी पर मुझे फिर भी समझ नहीं आ रहा था की नीतू क्यों रुकी हुई थी वो अपने होंठों को पीछे क्यों नहीं कर रही थी...
खैर अपने मन के द्वन्द पर आते हैं समझ नहीं आ रहा था क्या करें, फिर फैसला वही सोचकर लिया जो आज तक सरे लिए थे जो होगा देखा जायेगा और मैंने हलके से अपने होंठों से नीतू के होंठों को दबा के छोड़ दिया और फिर मैंने अपने होंठ पीछे खींच लिए और तुरंत चेहरा घुमाकर अंजलि की और देखा की कहीं उसने तो नहीं देखा पर नज़र भी आया और जैसे उसने मुझे पकड़ा हुआ था वैसे यही समझ आया की उसका ध्यान फिल्म पर hi है, पर मेरा ध्यान भाग रहा था कभी नीतू कभी अंजलि कभी अपनद लुंड के दर्द पर..
फिर सोचा ये सही नहीं किया कर्मा तूने नीतू न जाने क्या सोच रही होगी वो बेचारी मेरी प्रेम कहानी बनवाने के लिए इतनी म्हणत कर रही है और मैंने उसी पर ठरक दिखा दी भैया कहती है वो बेचारी को दर लगता है फिर भी डरावनी फिल्म देखि मेरे लिए नहीं कर्मा ये सही नहीं किया तूने मैंने सोचा नीतू से माफ़ी मांग लेता हूँ वो अछि है माफ़ कर देगी तो बात यहीं के यहीं ख़तम हो जाएगी...
मैंने बापिस नीतू की तरफ चेहरा किया और हलके से फुसफुसाया- नीतू संमंमं...
इतना कह पाया की मेरे होंठों को नीतू के होंठों ने जकड लिया और चूसने लगी मैं हैरान रह गया की ये अचानक हुआ क्या, नीतू लगातार मुझे चूमने लगी कुछ hi पालो में मैं भी स्वाभाविक है उसका साथ देने लगा उसके रसीले नरम होंठों को पीने लगा...
फिर अचानक मुझे और शायद उसे भी अंजलि का ख्याल आया और हम अलग हुए मैंने तुरंत पलट कर अंजलि की और देखा तो वो वैसे hi बैठी थी अब लग तो यही रहा था की उसने कुछ नहीं देखा, और उम्मीद भी यही थी की न देखा हो,
पर नीतू को न जाने क्या हुआ था मैंने चेहरा इधर कर लिया तो वो मेरे गले को चूमने लगी साथ hi उसका हाथ जो पेट पर था वो मेरे पेट और सीने पर घूमने लगा, वो लगातार मेरे गले और कान के पास के हिस्से को चूमने लगी और इधर मेरी हालत ख़राब होने लगी...
मेरे लुंड का दर्द से बुरा हाल था, की तभी उसका हाथ जो अब तक पेट और सीने पर था वो जांघ पर भी घूमा और लुंड के उभर से जा टकराया जिसके टकराते hi नीतू ने हाथ तुरंत बापिस हटा लिया, मैं तो अब सब छोड़ चूका था सोचा जब कुछ अपने वश में न हो तो फड़फड़ाने से ाचा है शांत रहना...
कुछ पल बाद नीतू का मेरे गले को चूमना दोबारा शुरू हुआ और इस बार हाथ भी सीधा लुंड से hi जा टकराया और हलके से वो पंत के ऊपर से hi उस पर हाथ फिरने लगी मैं तो मज़े से पागल सा होने लगा... मन किया की अभी लुंड बहार निकल कर इन दोनों को यहीं छोड़ने लागूं पर मन की बातें कभी न सुन्ना बाबू मन कभी कभी गांड फड़वा देता है. इसलिए मन को दबाया और बैठा रहा, फिल्म पर तो मेरा जरा भी ध्यान नहीं था, क्यूंकि अपनी फिल्म ज़्यादा दिलचस्प थी.
की तभी फ़ोन बजा किसी का और नीतू का हाथ लुंड से और होंठ गले से हैट गए ये उसी का फ़ोन था जो घर से आ रहा था फ़ोन देखकर बोली- घर से आ रहा है उनसे ये तो नहीं बोल सकती फिल्म देख रही हूँ क्या करूँ.
अंजलि- तो बहार जाकर बात करले न यहाँ तो आवाज़ आएगी
नीतू- चल मैं अकेले बहार नहीं जाने वाली भैया तुम चलो.
अंजलि- ाचा मैं यहाँ अकेली बैठूं फिर. तू जा न अकेले पहले तो बड़ी बहादुर बन रही थी.
में- ाचा ऐसा करते हैं तीनो चलते हैं.
अंजलि- हाँ सही है चलो.
हम तीनो निकल कर बहार आये आईआर नीतू ने बापिस अपनर घर फ़ोन किया और एक तरफ जाकर बात कार्नर लगी मैं और अंजलि एक जगह खड़े हो गए.
मैंने नीतू को देखा फ़ोन पर बात लरते हुए बिलकुल सामान्य लग रही थी क्यूंकि मैं अब भी उसकी हरकतों से हैरान था फिर बापिस अंजलि को देखा तो पाया की वो मुझे देख कर थोड़ा मुस्कुरा रही है.
मुझे समझ नहीं आया तो मैंने पुछा- क्या हुआ?
अंजलि- कुछ नहीं.
उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया.
में- नहीं कुछ बात तो है बताओ न.
Anjali-kuch नहीं
इटंर में नीतू भी आ गयी तो
अंजलि बोली - चल नीतू बाथरूम जाना है.
फिर मेरी और देख कर बोली- तुम भी बाथरूम चले जाओ तब तक.
इतना बोलकर वो और नीतू पलट कर जाने लगे पर पलटते हुए उसने पल भर के भी एक छोटे से हिस्से जितने समय के लिए अपनी नज़र नीचे करके देखा और चली गयी.
मैं कुछ देर यूँ hi बेवकूफों की तरह खड़ा सोचता रहा की साला ये लड़कियां बोलती क्या हैं चाहती क्या हैं समझ नहीं आता एक तो नीतू ने दिमाग घुमा दिय अब अंजलि पता नहीं क्यों मुस्कुरा रही थी और नीचे क्या देख कर गयी फिर नीचे नज़र डाली तो सब समझ आ गया साला पहली बार मिलने आये थे और उसमे ब्बि अपनी बेइज़्ज़ती करवा बैठे.
अंजलि का इशारा मेरे लुंड की और था जो उसने जीन्स में ठांस हुआ देखा hoga.jsne क्या सोच रही होगी मेरे बारे में.
मैं भी बाथरूम की तरफ जाते हुए ये सब सोच रहा था... कहाँ सोचा था लड़की पतियेंगे अब लड़की बेइज़्ज़ती और मारेगी.
खैर आगे क्या होता है ये सब अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत धन्यवाद्.