Incest Katha Chodampur Ki - Page 43 - SexBaba
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Incest Katha Chodampur Ki

नीलेश की सारी मलाई सभ्या की गांड में भर गई। सभ्या ढीली पड़कर उनके सीने पर गिर गई, दोनों हाँफ रहे थे, बदन पसीने से तर।

हॉल में तालियाँ और सीटियाँ बजने लगीं। सबकी आँखों में अभी भी गर्मी थी। सब जानते थे कि रात अभी बाकी थी।



अपडेट 264


सभ्या और नीलेश दोनों चरम सुख के बाद स्टेज पर ही कुछ पल एक-दूसरे से लिपटे रहे। सभ्या अभी भी उनके चौड़े सीने से सटी हुई थी। उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। नीलेश की एक बाँह उसके पेट पर थी और दूसरा हाथ प्यार से उसके पसीने से भीगे चूचों को सहला रहा था।

पूरे हॉल में ज़ोरदार तालियाँ, सीटियाँ और शरारती चीखें गूँज रही थीं। सबसे आगे पूर्वी, पल्ली, किरण और शशि सबसे ज़्यादा शोर मचा रही थीं — “वाह मामी-मामा”, “ये हुई ना बात!”, “पच्चीस साल बाद भी आग वैसी ही है!”

नीलेश ने धीरे से सभ्या के कान में फुसफुसाकर पूछा, “ठीक हो मेरी रानी?”

सभ्या ने शर्माते हुए मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। उसकी आवाज़ अभी भी थोड़ी काँप रही थी, “बहुत ठीक हूँ जी… बस टाँगें थर-थर कर रही हैं।”

नीलेश हल्के से हँसा। फिर उसे अपनी गोद में उठा लिया। सभ्या ने दोनों हाथ उसके गले में डाल दिए और सिर उसके कंधे पर रख दिया। नीलेश स्टेज से नीचे उतरा और हॉल के एक शांत कोने में ले जाकर उसे आराम से सोफे पर बिठा दिया। खुद भी उसके बगल में बैठ गया और उसे अपनी बाँहों में समेट लिया।

सभ्या ने उसकी छाती पर सिर रखते हुए धीरे से कहा, “आज तुमने मुझे सच में रानी वाली अनुभूति करा दी… इतने साल बाद भी तुम मुझे ऐसे पागल कर देते हो।”

नीलेश ने उसके माथे को चूमते हुए मुस्कुराकर जवाब दिया, “और तुम मुझे।

दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए कुछ पल चुपचाप बैठे रहे, उनकी आँखें अपने आस पास देखने लगी क्योंकि हॉल में मस्ती और कामुकता का शोर धीरे-धीरे और बढ़ता जा रहा था।





पंकज की आँखों के सामने जो दृश्य चल रहा था, वो बेहद स्वादिष्ट था, लेकिन उसकी जीभ पर जो स्वाद आ रहा था, वो उससे कहीं ज़्यादा लुभावना था।

पल्ली पूरी तरह नंगी उसके मुँह पर सवार थी। अपनी भरी-भरी चूचियों को दोनों हाथों से मसलते हुए वो अपने गोल चूतड़ों को पंकज के चेहरे पर रगड़ रही थी। पंकज की जीभ उसकी चूत के अंदर-बाहर घूम रही थी, कभी चूतड़ों के बीच गहरी चाट मार रही थी। पल्ली आहें भरती हुई अपने चूतड़ नचा रही थी, जैसे उसकी जीभ को अपने इशारों पर नचा रही हो।

उनके ठीक पीछे बिरजू ने पूर्वी को पूरी तरह नंगा कर दिया था। पूर्वी घोड़ी बनकर बैठी हुई थी और बिरजू का पूरा मुँह उसके चूतड़ों के बीच गड़ा हुआ था। वो अपनी चूत और गांड दोनों को बिरजू के चेहरे पर ज़ोर-ज़ोर से रगड़ रही थी।

“आह… चाट ऐसे ही… ओह बिरजू भेंचोद… आह… चाट ना!” पूर्वी कराहते हुए चिल्लाई।

बिरजू को और जोश की ज़रूरत ही नहीं थी। वो पूरे उत्साह से उसकी चूत चाट रहा था, जीभ अंदर तक घुसा रहा था, कभी गांड के छेद को चूस रहा था।

और ठीक उनके पीछे, गद्दे पर नीतू पूरी नंगी लेटी हुई थी। टांगें चौड़ी फैलाई हुईं। उसके ऊपर चरण सिंह थे, जिनका मोटा, कड़ा लंड नीतू की चूत में दनादन घुस-घुसकर निकल रहा था। हर धक्के पर नीतू का बदन हिल रहा था और वो बेसुध सी कराह रही थी।





चरण सिंह नीतू की चूत में लंड घुसाए हुए हाँफते हुए बोले, “ओह बिटिया… आह… आह… क्या नाम है तेरा? मैं तो भूल ही गया…”

नीतू कराहते हुए मुस्कुराई, अपनी कमर हिलाते हुए बोली, “ओह ताऊजी… आह… चूत में लंड घुसाए चोद रहे हो और नाम भी भूल गए?”

चरण सिंह ने एक जोरदार धक्का लगाते हुए हँसते हुए कहा, “अरे क्या करूँ बिटिया… आह… उमर हो चली है ना… दिमाग ठीक से काम ही नहीं करता अब।”

नीतू ने अपनी चूचियों को मसलते हुए शरारती आवाज़ में बोली, “दिमाग का पता नहीं ताऊजी… आह… ओह… लेकिन तुम्हारा लंड तो बहुत अच्छे से काम कर रहा है… आह… बहुत तेज़!”

चरण सिंह ने नीतू की चूचियों को जोर से पकड़कर धक्के लगाते हुए कहा, “अरे बिटिया… तेरे जैसी कमसिन कली सामने हो तो मुर्दे का लंड भी खड़ा हो जाता है… आह… ले… ले मेरी जान…”

उसी समय उनके ठीक पीछे, कुछ ही दूर गद्दे पर नीतू के पापा यानी दीन दयाल चाचा थे। उन्होंने अंजली की भाभी रानी को नीचे लिटा रखा था और पूरी मस्ती से उसकी गांड मार रहे थे। रानी के गोल चूतड़ उनके धक्कों से लहरा रहे थे और वो बेसुध होकर कराह रही थी।





दीनू हाँफते हुए रानी की गांड में लंड ठोकते हुए बोले, “आह… आह… बहू… कितनी मक्खन जैसी गरम और मुलायम गांड है तेरी… आह… पूरी तरह निगल रही है मेरे लंड को…”

रानी कराहते हुए अपने चूतड़ पीछे की ओर उठाते हुए बोली, “आह… चाचा जी… ओह… मेरे ठरकी चाचा… ऐसे ही मारो… मेरी गरम गांड फाड़ दो… आह… बहुत मज़ा आ रहा है…”

दीनू ने उसके चूतड़ों को कसकर पकड़ लिया और तेज़ धक्के लगाते हुए कहा, “आह… हाँ बहू… तेरा ठरकी चाचा ऐसे ही तेरी गांड मारेगा… जितनी बार तू बोले… आह… ले… ले मेरी जान…”

रानी अपनी गांड मरवाने में पूरी तरह व्यस्त थी, तभी उसका पति पीयूष भी खाली नहीं बैठा था। वो कुछ ही दूर मंजू ताई को चोद रहा था — जग्गू की माँ को, जो अपनी भरी-भरी चूचियों को हिलाते हुए कराह रही थीं।





मंजू ताई एक कोने में गद्दे पर चित लेटी हुई थीं। पीयूष उनके पीछे लेटा हुआ, अपनी कमर हिलाते हुए अपनी पूरी लंबाई उनकी चूत में घुसा रहा था।

मंजू ताई आहें भरते हुए बोलीं, “आह… बच्चा… ओह… ऐसे ही… आह… आह… अपनी ताई की चूत फाड़ दो… कितना अच्छा चोदता है तू… आह!”

पीयूष उनके भरे-भरे चूतड़ पकड़कर जोर-जोर से धक्के लगाते हुए हाँफा, “ओह ताई… तुम्हारी चूत कितनी गरम है… आह… बहुत मज़ा आ रहा है… आह… कितनी कसी हुई है…”

मंजू ताई ने अपनी चूचियों को मसलते हुए कराहकर कहा, “ओह बच्चा… हमें भी बहुत मज़ा आ रहा है… आह… आह… कितना मोटा और जवान लंड है तेरा… आह… चोद… चोद मुझे… जवान लंड का मज़ा ही कुछ और है… आह!”

तभी मंजू ताई ने एक ओर इशारा करते हुए शरारती मुस्कान के साथ कहा, “अरे ये लोग कितना शोर कर रहे हैं…”

उधर सोफे पर लाड़ो, किरण और प्रीती चुदाई का पूरा मज़ा ले रही थीं। किरण अपने जीजा रमन का लंड अपनी गांड में लेकर धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रही थी। उसके बगल में रमन की बहन खुशी सागर के लंड पर सवार होकर जोर-जोर से कूद रही थी। और किरण के दूसरी तरफ लाड़ो पीठ के बल लेटी हुई थी — उसकी गांड में कर्मा के फूफाजी सुजान सिंह अपना मोटा लंड घुसाए हुए पूरी ताकत से चोद रहे थे।





सुजान सिंह लाड़ो की कसी हुई गांड में लंड ठोकते हुए हाँफ रहे थे, “आह… आह… ओह बिटिया… इतनी कसी गांड आज तक नहीं मारी… ओह… पता है तू सबसे छोटी होगी जिसके साथ हम चुदाई कर रहे हैं…”

किरण रमन का लंड अपनी गांड में लेकर ऊपर-नीचे उछलते हुए बोली, “ओह फूफाजी… कहीं छोटी नहीं है… आह… हम दोनों ही बीस की हैं… आह… ये बस पतली है तो कम लगती है…”

लाड़ो ने शर्माते हुए लेकिन नखरे से कहा, “आह… ओह… देखो तो कितना बुरा लग गया… फूफाजी ने मुझे छोटी कह दिया…”

रमन नीचे से जोरदार धक्के लगाते हुए हँसकर बोला, “अरे भाई बुरा तो लगेगा ही… औरत जात अपनी उमर कभी बढ़ने देती ही नहीं…”

सागर खुशी की गांड में लंड घुसाए हुए मजे से बोला, “अरे ये दोनों ऐसी ही लड़ती रहती हैं जीजा… ओह भाभी… फिर से ऐसे ही घुमाओ न अपनी गांड… आह… बहुत मज़ा आ रहा है…”

रमन ने शरारत से पूछा, “और साले साहब… कैसा लग रहा है मेरी बहन को चोदकर?”

सागर हाँफते हुए बोला, “वैसा ही जीजा… जैसे तुम्हें मेरी बहन चोदकर लग रहा होगा… बस आपकी बहन थोड़ी ज़्यादा सुंदर है।”

किरण तुरंत बोली, “और तू बंदर है!”

खुशी हँसते हुए बीच में पड़ी, “अरे लड़ो मत दोनों… और सच में किरण, तू सबसे सुंदर है।”

खुशी ने आगे झुककर किरण के होंठ चूस लिए। दोनों एक पल को अलग हुईं, फिर फिर से एक-दूसरे के होंठों में खो गईं — गहरे, गीले चुंबन के साथ।

उधर लाड़ो सुजान सिंह के मोटे लंड पर चढ़कर तेज़-तेज़ चिल्ला रही थी, “ओह… ओह… फूफाजी… आह… आह… और तेज़… आह… फाड़ दो मेरी गांड…!”

लाड़ो की तेज़ चीखें पूरे हॉल में गूँज रही थीं। उसकी आवाज़ उसके भाई सरजू के कानों तक भी पहुँच रही थी, पर सरजू का पूरा ध्यान कहीं और था।

वो सुजान सिंह की पत्नी यानी सावित्री बुआ के पीछे लेटा हुआ था और उनके भरे-भरे, मांसल बदन को भोगते हुए पूरी ताकत से चोद रहा था। सरजू को हमेशा से बड़ी उम्र की, गुदगुदे और भारी बदन वाली औरतें बहुत पसंद थीं — और आज सावित्री बुआ का वो गरम, नरम बदन उसके आगे पूरी तरह बिछा हुआ था।





हर झटके पर सावित्री के भारी-भारी चूचे जोर-जोर से झूल रहे थे। उनका ब्लाउज़ अधखुला पड़ा था, जिसमें से दोनों चूचियाँ बाहर निकलकर नाच रही थीं। उनका गुदगुदा, भरा हुआ पेट सरजू के हर धक्के के साथ लहरा रहा था। सरजू गरम साँसें लेते हुए लगातार उनकी चूत में गहरे-गहरे धक्के लगा रहा था।

सावित्री आहें भरते हुए बोलीं, “आह… आह… सरजू लल्ला… आह… पहले तू जब छोटा था, हमारी गोद में खेला करता था… आह… आज अपनी बुआ को ही गोद में चोद रहा है… ओह… आह!”

सरजू ने उनकी कमर कसकर पकड़ ली और तेज़ी से ठोकते हुए हाँफा, “ओह बुआ… मैं तो कब से तैयार था तुम्हें गोद में खिलाने के लिए… आह… आज मौका मिला है… ओह… आज नहीं छोडूँगा तुम्हें…”

ये कहते हुए सरजू ने आगे झुककर सावित्री के होंठों को अपने होंठों में कैद कर लिया और पागलों की तरह चूसने लगा। दोनों के मुँह एक-दूसरे से चिपके हुए थे, जीभें आपस में लड़ रही थीं।

उनसे थोड़ी ही दूरी पर सावित्री के देवर, विनीत और पूर्वी के पापा प्रदीप फूफाजी थे जो हमारी प्यारी प्रेमा भाभी को चोद रहे थे। वो प्रेमा के ऊपर लेट कर और अपना लंबा, मोटा लंड धीरे-धीरे लेकिन बहुत कामुक तरीके से उनकी चूत में अंदर-बाहर कर रहे थे। प्रेमा कराहती हुई उनकी छाती से चिपकी हुई थी।



प्रदीप फूफाजी प्रेमा की चूत में लंड घुसाए हुए हाँफते हुए बोले, “ओह बहू… बड़ी रसीली है तू… आह… तेरी चूत में ऐसा मज़ा आ रहा है, पूछ मत…”

प्रेमा कराहते हुए उनकी कमर से चिपक गई, “ओह फूफाजी… आह… तुम्हारा लंड भी तो पूरी चूत भर रहा है… आह… बहुत मज़ा आ रहा है… ओह… और तेज़…”

जहाँ बहू और पत्नियाँ सब किसी न किसी से चुद रही थीं, वहीं राजपाल ताऊ भी पीछे कैसे रहते? उन्होंने रिमझिम की सास माधुरी को नीचे लिटा रखा था और अपनी कड़क लंड उनकी चूत में जोर-जोर से ठोक रहे थे।





माधुरी आहें भरते हुए बोलीं, “आह… आह… भाई साहब… ऐसे ही… आह… बहुत तगड़ा चोदते हो तुम… आह… आह!”

राजपाल उनके भरे-भरे चूतड़ पकड़कर धक्के लगाते हुए बोले, “आह… जब चुदवाने वाली इतनी गजब की हो तो… ओह… लंड अपने आप चलने लगता है भाभी जी…”

माधुरी ने अपनी टांगें और फैलाते हुए कराहा, “आह… कैसा जीवन है हमारा… आह… आज पहली बार मिले और… ओह… चुदवा लिया…”

राजपाल मुस्कुराते हुए तेज़ धक्का लगाते हुए बोले, “आह… ओह… तुम्हें ये सब पसंद नहीं है क्या?”

माधुरी ने आँखें बंद करके हाँफते हुए जवाब दिया, “आह… बिल्कुल पसंद है… आह… ये सब नहीं होता तो… आह… ये मज़ा कैसे मिलता… और तेज़… और तेज़ करो…”

राजपाल ने उनकी चूत में और गहरे धक्के लगाते हुए कहा, “बिल्कुल सही… आह… आह… अब खुलकर जीने में अलग ही मज़ा है…”

माधुरी आहें भरते हुए बोलीं, “ओह बिल्कुल भाई साहब… आह… आह… बच्चों के सामने कोई पर्दा नहीं, कुछ छुपाना नहीं… आह… मज़ा चौगुनी हो जाता है…”

राजपाल ने जोर का धक्का लगाते हुए हाँफकर कहा, “ओह भाभी जी… तुमने बिल्कुल सही कहा… आह… बच्चों के साथ चुदाई का मज़ा ही कुछ और होता है…”

राजपाल ने एक पल के लिए सिर घुमाकर एक ओर देखा।

वहाँ उनका बेटा जग्गू करवट पर लेटा था, और माधुरी की छोटी बहू — यानी हमारी प्यारी रिमझिम को चोद रहा था। जग्गू रिमझिम को पीछे से पकड़े हुए था और अपनी पूरी ताकत से उसके अंदर धक्के लगा रहा था। रिमझिम दोनों हाथों से सोफे को पकड़े हुए जोर-जोर से कराह रही थी।





जग्गू ने उसकी कमर को दोनों हाथों से पकड़ लिया और तेज़-तेज़ धक्के लगाने लगा।

जग्गू: “आह… रिमझिम दीदी… ये मोटी गांड… आह… देखते ही मेरा लंड खड़ा हो जाता था… आज इसे भी चोदूँगा… ओह… बोलो… मज़ा आ रहा है ना?”

रिमझिम ने सिर पीछे झुकाते हुए कराहकर कहा, “आह… हाँ… बहुत मज़ा आ रहा है… आह… पहली बार तेरे जवान लंड से चुद रही हूँ… ओह… और चोदो जग्गू… आह… अपनी रिमझिम दीदी की चूत फाड़ दो… आह… आह!”

जग्गू ने आगे झुककर रिमझिम की पीठ पर किस करते हुए फुसफुसाया, “दीदी… आज रात आज… जितनी बार मन करे चोदूँगा… तुम्हारी चूत, आह गांड… सब कुछ…”

रिमझिम मज़े से सिहर गई और अपनी गांड पीछे की ओर और धकेल कर जग्गू के धक्कों का जवाब देने लगी।

उनसे थोड़ी ही दूरी पर रिमझिम के जेठ थे। वो अपने छोटे भाई की पत्नी को जग्गू के साथ चुदते हुए देख रहे थे, लेकिन उनका ज़्यादातर ध्यान कहीं और था — गुंजन मामी के मादक, भरे-भरे बदन पर।

गुंजन मामी सोफे पर एक करवट लेकर लेटी हुई थीं। चेतन उनके पीछे चिपका हुआ था और अपनी पूरी लंबाई उनकी गीली, रस भरी चूत में धक्के लगा रहा था।





गुंजन आहें भरते हुए बोलीं, “ओह… आह… आह… दामाद जी… ऐसे ही… आह… आह… मज़ा लूटो अपनी मामी-सास की चूत का… ओह… बहुत अच्छा लग रहा है…”

चेतन उनके गुदगुदे चूतड़ पकड़कर तेज़ धक्के लगाते हुए हाँफते हुए बोला, “आह… मामी… आप बहुत सुंदर हो… आह… तुम्हारा बदन बिल्कुल मक्खन जैसा है… ओह… कितना नरम और गरम…”

गुंजन ने अपनी कमर हिलाते हुए शरारती आवाज़ में कहा, “सब तुम्हारे लिए ही है जमाई बाबू… ओह… तुम्हारा मूसल तो बहुत कड़क है… आह… ऐसे ही कूट दो हमारी ओखली… आह… आह… चटनी बना दो जमाई बाबू…!”

चेतन ने जोर का धक्का लगाकर हाँफते हुए बोला, “आह्ह्ह… मामी… चटनी बना के… आह… तुम्हारी ओखली में भर देंगे… ओह… इधर आओ…”

ये कहते हुए चेतन ने गुंजन का चेहरा अपनी तरफ घुमाया और उनके होंठों को पागलों की तरह चूसने लगा। दोनों के मुँह एक-दूसरे से चिपक गए, जीभें लड़ने लगीं।

जहाँ चेतन गुंजन मामी के साथ रिश्ता गहरा कर रहा था, वहीं उसकी पत्नी चंचल भी राजन चाचा के साथ व्यस्त थी। राजन चाचा ने चंचल को पीठ के बल लिटा रखा था। उसकी टांगें फैलाकर अपने कंधों पर रख ली थीं और दनादन अपना मोटा लंड उसकी चूत में पेल रहे थे।

चंचल के मुँह से लगातार बेसुध आहें निकल रही थीं — “आह… आह… आह… मामा जी… ओह… बहुत तेज़… आह… फाड़ दोगे मेरी चूत…”





राजन चंचल की चूत में लंड घुसाए हुए हाँफते हुए बोले, “आह… नहीं बिटिया… आह… ऐसे कैसे फाड़ देंगे… अह… इसे तो अभी बहुत चोदना है… ओह बिटिया… आह… बहुत सुंदर है तू…”

चंचल कराहते हुए अपनी कमर हिलाती हुई बोली, “आह्ह्ह्ह… मामा… ओह… मेरी सुंदरता की वजह से ही तो… आह्ह्ह्ह… इतनी मार पड़ रही है मेरी चूत को… ओह… आह्ह्ह्ह… कितना कड़क और मोटा लंड है तुम्हारा…”

राजन ने चंचल की भारी चूचियों को दोनों हाथों से थामकर जोर से दबाते हुए कहा, “बिटिया… ओह… तू सामने रहेगी तो ये हमेशा ही कड़क रहेगा… आह… ले… ले मेरी जान…”

राजन चंचल की चूत की पिटाई करते हुए उसकी चूचियों को मसल रहे थे, जबकि चंचल बेसुध होकर आहें भर रही थी।

वहीं उसके सीधे-सादे पिता उदयवीर स्टेज के एक कोने में रज्जो चाची को लिटाए हुए चोद रहे थे। वो अकेले नहीं थे। उनके बगल में ही विनीत था, जो सविता (अंजली की माँ) को आगे झुकाकर उनकी चूत में लंड ठोक रहा था।

उसी के बगल में प्रीती पूरी नंगी लेटी हुई थी। अनुज उसकी टांगों के बीच खड़ा होकर तेज़-तेज़ धक्के लगा रहा था। प्रीती के सिर के पास नानाजी थे, जो उसका सिर थामे हुए अपना लंड उसके मुँह में डाले हुए थे। प्रीती दोनों तरफ से चुदते हुए चूस रही थी।





नाना: ओह आह बहुत अच्छा चूसती है तू बिटिया आह तेरे जैसी नातिन बहू की सेवा आह पाकर मज़ा आ रहा है,

अनुज: आह्ह्ह्ह नाना आयेगी ही आह आखिर पसंद किसकी है,

ये सुनकर प्रीती के भरे हुए मुंह पर ही हल्की सी मुस्कान आई पर उसने लंड चूसना जारी रखा,

नाना: बदमाश कही का, हर बात पर अपनी तारीफ करता है,


जारी रहेगी
 
नीलेश की साड़ी मलाई सभ्य की गांड में भर गयी. सभ्य ढीली पढ़कर उनके सीने पर गिर गयी, दोनों हांफ रहे थे, बदन पसीने से तर.



हॉल में तालियां और सीटियां बजने लगी. सबकी आँखों में अभी भी गर्मी थी. सब जानते थे की रात अभी बाकी थी.



अपडेट 264


सभ्य और नीलेश दोनों चरम सुख के बाद स्टेज पर hi कुछ पल ek-dusre से लिपटे रहे. सभ्य अभी भी उनके चौड़े सीने से सटी हुई थी. उसकी सांसें तेज़ चल रही थी. नीलेश की एक ब्याह उसके पेट पर थी और दूसरा हाथ प्यार से उसके पसीने से भीगे चुचो को सेहला रहा था.

पूरे हॉल में zor-daar तालियां, सीटियां और शरारती चीखें गूँज रही थी. सबसे आगे पूर्वी, पल्ली, किरण और शशि सबसे ज़्यादा शोर मचा रही थी — “वह mami-mama”, “ये हुई न बात!”, “पच्चीस साल बाद भी आग वैसी hi है!”

नीलेश ने धीरे से सभ्य के कान में फ़ुरसफुसा कर पुछा, “ठीक हो मेरी रानी?”

सभ्य ने शर्माते हुए मुस्कुराते हुए सर हिलाया. उसकी आवाज़ अभी भी थोड़ी काँप रही थी, “बहुत ठीक हूँ जी… बस टाँगे thar-thar कर रही हैं.”

नीलेश हलके से हंसा. फिर उसे अपनी गॉड में उठा लिया. सभ्य ने दोनों हाथ उसके गले में दाल दिए और सर उसके कंधे पर रख दिया. नीलेश स्टेज से नीचे उतरा और हॉल के एक शांत कोने में ले जा कर उसे आराम से सोफे पर बिठा दिया. खुद भी उसके बगल में बैठ गया और उसे अपनी बाहों में समेत लिया.

सभ्य ने उसकी छाती पर सर रख ते हुए धीरे से कहा, “आज तुमने मुझे सच में रानी वाली अनुभूति करा दी… इतने साल बाद भी तुम मुझे ऐसे पागल कर देते हो.”

नीलेश ने उसके माथे को चूमते हुए मुस्कुराकर जवाब दिया, “और तुम मुझे.”

दोनों ek-dusre से लिपटे हुए कुछ पल चुपचाप बैठे रहे, उनकी आँखें अपने aas-paas देखने लगी क्यूंकि हॉल में मस्ती और कामुकता का शोर dheere-dheere और बढ़ता जा रहा था.

पंकज की आँखों के सामने जो दृश्य चल रहा था, वो बेहद स्वादिष्ट था, लेकिन उसकी जीभ पर जो स्वाद आ रहा था, वो उससे कहीं ज़्यादा लुभावना था.

पल्ली पूरी तरह नंगी उसके मुँह पर सवार थी. अपनी bhari-bhari चूचियों को दोनों हाथों से मसलते हुए वो अपने गोल चूतड़ों को पंकज के चेहरे पर रगड़ रही थी. पंकज की जीभ उसकी छूट के andar-bahar घूम रही थी, कभी चूतड़ों के बीच गहरी चाट मार रही थी. पल्ली आहें भर टी हुई अपने चूतड़ नचा रही थी, जैसे उसकी जीभ को अपने इशारों पर नचा रही हो.

उनके ठीक पीछे बिरजू ने पूर्वी को पूरी तरह नंगा कर दिया था. पूर्वी घोड़ी बन कर बैठी हुई थी और बिरजू का पूरा मुँह उसके चूतड़ों के बीच गदा हुआ था. वो अपनी छूट और गांड दोनों को बिरजू के चेहरे पर zor-zor से रगड़ रही थी.

“आह… चाट ऐसे hi… ओह बिरजू भेनचोद… आह… चाट न!” पूर्वी कराहते हुए चिल्लाई.

बिरजू को और जोश की ज़रूरत hi नहीं थी. वो पूरे उत्साह से उसकी छूट चाट रहा था, जीभ अंदर तक घुसा रहा था, कभी गांड के छेड़ को चूस रहा था.

और ठीक उनके पीछे, गद्दे पर नीतू पूरी नंगी लेती हुई थी. टाँगे चौड़ी फैलाई हुई. उसके ऊपर चरण सिंह थे, जिनका मोटा, कड़ा लुंड नीतू की छूट में दनादन ghus-ghus कर निकल रहा था. हर धक्के पर नीतू का बदन हिल रहा था और वो बेसुध सी कराह रही थी.

चरण सिंह नीतू की छूट में लुंड घुसाए हुए हांफ ते हुए बोले, “ओह बिटिया… आह… आह… क्या नाम है तेरा? मैं तो भूल hi गया…”

नीतू कराहते हुए मुस्कुरायी, अपनी कमर हिलाते हुए बोली, “ओह ताऊजी… आह… छूट में लुंड घुसाए छोड़ रहे हो और नाम भी भूल गए?”

चरण सिंह ने एक zor-daar धक्का लगते हुए हँसते हुए कहा, “अरे क्या करूँ बिटिया… आह… उम्र हो चली है न… दिमाग ठीक से काम hi नहीं करता अब.”

नीतू ने अपनी चूचियों को मसलते हुए शरारती आवाज़ में बोली, “दिमाग का पता नहीं ताऊजी… आह… ओह… लेकिन तुम्हारा लुंड तो बहुत अच्छे से काम कर रहा है… आह… बहुत तेज़!”

चरण सिंह ने नीतू की चूचियों को ज़ोर से पकड़ कर धक्के लगते हुए कहा, “अरे बिटिया… तेरे जैसी कमसीन काली सामने हो तो मुर्दे का लुंड भी खड़ा हो जाता है… आह… ले… ले मेरी जान…”

उसी समय उनके ठीक पीछे, कुछ hi दूर गद्दे पर नीतू के पापा यानि दीं दयाल चाचा थे. उन्होंने अंजलि की भाभी रानी को नीचे लिटा रखा था और पूरी मस्ती से उसकी गांड मार रहे थे. रानी के गोल चूतड़ उनके धक्कों से लहरा रहे थे और वो बेसुध होकर कराह रही थी.

दीनू हांफ ते हुए रानी की गांड में लुंड ठोकते हुए बोले, “आह… आह… बहु… कितनी माखन जैसी गरम और मुलायम गांड है तेरी… आह… पूरी तरह निगल रही है मेरे लुंड को…”

रानी कराहते हुए अपने चूतड़ पीछे की तरफ उठाते हुए बोली, “आह… चाचा जी… ओह… मेरे ठरकी चाचा… ऐसे hi मारो… मेरी गरम गांड फाड़ दो… आह… बहुत मज़ा आ रहा है…”

दीनू ने उसके चूतड़ों को कास कर पकड़ लिया और तेज़ धक्के लगते हुए कहा, “आह… हाँ बहु… तेरा ठरकी चाचा ऐसे hi तेरी गांड मरेगा… जितनी बार तू बोले… आह… ले… ले मेरी जान…”

रानी अपनी गांड मरवाने में पूरी तरह व्यस्त थी, तभी उसका पति पियूष भी खाली नहीं बैठा था. वो कुछ hi दूर मंजू तै को छोड़ रहा था — जग्गू की माँ को, जो अपनी bhari-bhari चूचियों को हिलाते हुए कराह रही थी.

मंजू तै एक कोने में गद्दे पर चित लेती हुई थी. पियूष उनके पीछे लेता हुआ, अपनी कमर हिलाते हुए अपनी पूरी लम्बाई उनकी छूट में घुसा रहा था.

मंजू तै आहें भरते हुए बोली, “आह… बच्चा… ओह… ऐसे hi… आह… आह… अपनी तै की छूट फाड़ दो… कितना अच्छा छोड़ता है तू… आह!”

पियूष उनके bhare-bhare चूतड़ पकड़ कर zor-zor से धक्के लगते हुए हांफा, “ओह तै… तुम्हारी छूट कितनी गरम है… आह… बहुत मज़ा आ रहा है… आह… कितनी कासी हुई है…”

मंजू तै ने अपनी चूचियों को मसलते हुए कराह कर कहा, “ओह बच्चा… हमें भी बहुत मज़ा आ रहा है… आह… आह… कितना मोटा और जवान लुंड है तेरा… आह… छोड़… छोड़ मुझे… जवान लुंड का मज़ा hi कुछ और है… आह!”

तभी मंजू तै ने एक और इशारा करते हुए शरारती मुस्कान के साथ कहा, “अरे ये लोग कितना शोर कर रहे हैं…”

उधर सोफे पर लाडो, किरण और प्रीती चुदाई का पूरा मज़ा ले रही थी. किरण अपने जीजा रमन का लुंड अपनी गांड में लेकर dheere-dheere upar-neeche हो रही थी. उसके बगल में रमन की बहिन ख़ुशी सागर के लुंड पर सवार होकर zor-zor से कूद रही थी. और किरण के दूसरी तरफ लाडो पीठ के बल लेती हुई थी — उसकी गांड में कर्मा के फूफा जी सूजन सिंह अपना मोटा लुंड घुसाए हुए पूरी ताकत से छोड़ रहे थे.

सूजन सिंह लाडो की कासी हुई गांड में लुंड ठोकते हुए हांफ रहे थे, “आह… आह… ओह बिटिया… इतनी कासी गांड आज तक नहीं मरी… ओह… पता है तू सबसे छोटी होगी जिसके साथ हम चुदाई कर रहे हैं…”

किरण रमन का लुंड अपनी गांड में लेकर upar-neeche उछालते हुए बोली, “ओह फूफा जी… कहीं छोटी नहीं है… आह… हम दोनों hi बीस की हैं… आह… ये बस पतली है तो काम लगती है…”

लाडो ने शर्माते हुए लेकिन नखरे से कहा, “आह… ओह… देखो तो कितना बुरा लग गया… फूफा जी ने मुझे छोटी कह दिया…”

रमन नीचे से zor-daar धक्के लगते हुए हंस कर बोलै, “अरे भाई बुरा तो लगेगा hi… औरत जाट अपनी उम्र कभी बढ़ने देती hi नहीं…”

सागर ख़ुशी की गांड में लुंड घुसाए हुए मज़े से बोलै, “अरे ये दोनों ऐसी hi लड़ती रहती हैं जीजा… ओह भाभी… फिर से ऐसे hi घुमाओ न अपनी गांड… आह… बहुत मज़ा आ रहा है…”

रमन ने शरारत से पुछा, “और साले साहब… कैसा लग रहा है मेरी बहिन को छोड़ कर?”

सागर हांफ ते हुए बोलै, “वैसा hi जीजा… जैसे तुम्हे मेरी बहिन छोड़ कर लग रहा होगा… बस आपकी बहिन थोड़ी ज़्यादा सुन्दर है.”

किरण तुरंत बोली, “और तू बन्दर है!”

ख़ुशी हँसते हुए बीच में पड़ी, “अरे लड़ो मत दोनों… और सच में किरण, तू सबसे सुन्दर है.”

ख़ुशी ने आगे झुक कर किरण के होठ चूस लिए. दोनों एक पल को अलग हुई, फिर फिर से ek-dusre के होठों में खो गयी — गहरे, गीले चुम्बन के साथ.

उधर लाडो सूजन सिंह के मोठे लुंड पर चढ़ कर tez-tez चिल्ला रही थी, “ओह… ओह… फूफा जी… आह… आह… और तेज़… आह… फाड़ दो मेरी गांड…!”

लाडो की तेज़ चीखें पूरे हॉल में गूँज रही थी. उसकी आवाज़ उसके भाई सरजू के कानों तक भी पहुँच रही थी, पर सरजू का पूरा ध्यान कहीं और था.

वो सूजन सिंह की पत्नी यानि सावित्री बुआ के पीछे लेता हुआ था और उनके bhare-bhare, मांसल बदन को भोगते हुए पूरी ताकत से छोड़ रहा था. सरजू को हमेशा से बड़ी उम्र की, गुदगुदे और भरी बदन वाली औरतें बहुत पसंद थी — और आज सावित्री बुआ का वो गरम, नरम बदन उसके आगे पूरी तरह बिछा हुआ था.

हर झटके पर सावित्री के bhari-bhari चूचे zor-zor से झूल रहे थे. उनका ब्लाउज अधखुला पड़ा था, जिसमें से दोनों चूचियां बहार निकल कर नाच रही थी. उनका गुदगुदा, भरा हुआ पेट सरजू के हर धक्के के साथ लहरा रहा था. सरजू गरम सांसें लेते हुए लगातार उनकी छूट में gehre-gehre धक्के लगा रहा था.

सावित्री आहें भरते हुए बोली, “आह… आह… सरजू लल्ला… आह… पहले तू जब छोटा था, हमारी गॉड में खेला करता था… आह… आज अपनी बुआ को hi गॉड में छोड़ रहा है… ओह… आह!”

सरजू ने उनकी कमर कास कर पकड़ ली और तेज़ से ठोकते हुए हांफा, “ओह बुआ… मैं तो कब से तैयार था तुम्हे गॉड में खिलने के लिए… आह… आज मौका मिला है… ओह… आज नहीं छोडूंगा तुम्हे…”

ये कह ते हुए सरजू ने आगे झुक कर सावित्री के होठों को अपने होठों में कैद कर लिया और पागलों की तरह चूसने लगा. दोनों के मुँह ek-dusre से चिपके हुए थे, जीभें आपस में लड़ रही थी.

उनसे थोड़ी hi दूरी पर सावित्री के देवर, विनीत और पूर्वी के पापा प्रदीप फूफा जी थे जो हमारी प्यारी प्रेमा भाभी को छोड़ रहे थे. वो प्रेमा के ऊपर लेट कर और अपना लम्बा, मोटा लुंड dheere-dheere लेकिन बहुत कामुक तरीके से उनकी छूट में andar-bahar कर रहे थे. प्रेमा कराह टी हुई उनकी छाती से चिपकी हुई थी.

प्रदीप फूफा जी प्रेमा की छूट में लुंड घुसाए हुए हांफ ते हुए बोले, “ओह बहु… बड़ी रसीली है तू… आह… तेरी छूट में ऐसा मज़ा आ रहा है, पूछ मत…”

प्रेमा कराह ते हुए उनकी कमर से चिपक गयी, “ओह फूफा जी… आह… तुम्हारा लुंड भी तो पूरी छूट भर रहा है… आह… बहुत मज़ा आ रहा है… ओह… और तेज़…”

जहां बहु और पत्नियां सब किसी न किसी से चुद रही थी, वहीँ राजपाल ताऊ भी पीछे कैसे रहते? उन्होंने रिमझिम की सास माधुरी को नीचे लिटा रखा था और अपनी कड़क लुंड उनकी छूट में zor-zor से थोक रहे थे.

माधुरी आहें भरते हुए बोली, “आह… आह… भाई साहब… ऐसे hi… आह… बहुत तगड़ा छोड़ते हो तुम… आह… आह!”

राजपाल उनके bhare-bhare चूतड़ पकड़ कर धक्के लगते हुए बोले, “आह… जब छुड़वाने वाली इतनी गज़ब की हो तो… ओह… लुंड आपने आप चलने लगता है भाभी जी…”

माधुरी ने अपनी टाँगे और फैलते हुए करहा, “आह… कैसा जीवन है हमारा… आह… आज पहली बार मिले और… ओह… छुड़वा लिया…”

राजपाल मुस्कुराते हुए तेज़ धक्का लगते हुए बोले, “आह… ओह… तुम्हे ये सब पसंद नहीं है क्या?”

माधुरी ने आँखें बंद करके हांफ ते हुए जवाब दिया, “आह… बिलकुल पसंद है… आह… ये सब नहीं होता तो… आह… ये मज़ा कैसे मिलता… और तेज़… और तेज़ करो…”

राजपाल ने उनकी छूट में और गहरे धक्के लगते हुए कहा, “बिलकुल सही… आह… आह… अब खुल कर जीने में अलग hi मज़ा है…”

माधुरी आहें भरते हुए बोली, “ओह बिलकुल भाई साहब… आह… आह… बच्चों के सामने कोई पर्दा नहीं, कुछ छुपाना नहीं… आह… मज़ा चौगुनी हो जाता है…”

राजपाल ने ज़ोर का धक्का लगते हुए हांफ कर कहा, “ओह भाभी जी… तुमने बिलकुल सही कहा… आह… आह… बच्चों के साथ चुदाई का मज़ा hi कुछ और होता है…”

राजपाल ने एक पल के लिए सर घुमा कर एक और देखा.

वहां उनका बीटा जग्गू करवट पर लेता था, और माधुरी की छोटी बहु — यानि हमारी प्यारी रिमझिम को छोड़ रहा था. जग्गू रिमझिम को पीछे से पकडे हुए था और अपनी पूरी ताकत से उसके अंदर धक्के लगा रहा था. रिमझिम दोनों हाथों से सोफे को पकडे हुए zor-zor से कराह रही थी.

जग्गू ने उसकी कमर को दोनों हाथों से पकड़ लिया और tez-tez धक्के लगाने लगा.

जग्गू: “आह… रिमझिम दीदी… ये मोती गांड… आह… देखते hi मेरा लुंड खड़ा हो जाता था… आज इसे भी छोडूंगा… ओह… बोलो… मज़ा आ रहा है न?”

रिमझिम ने सर पीछे झुकाते हुए कराह कर कहा, “आह… हाँ… बहुत मज़ा आ रहा है… आह… पहली बार तेरे जवान लुंड से चुद रही हूँ… ओह… और छोड़ो जग्गू… आह… अपनी रिमझिम दीदी की छूट फाड़ दो… आह… आह!”

जग्गू ने आगे झुक कर रिमझिम की पीठ पर किश करते हुए फ़ुरसफुसाया, “दीदी… आज रात आज… जितनी बार मन करे छोडूंगा… तुम्हारी छूट, आह गांड… सब कुछ…”

रिमझिम मज़े से सिहर गयी और अपनी गांड पीछे की तरफ और धकेल कर जग्गू के धक्कों का जवाब देने लगी.

उनसे थोड़ी hi दूरी पर रिमझिम के जेठ थे. वो अपने छोटे भाई की पत्नी को जग्गू के साथ चुड़ते हुए देख रहे थे, लेकिन उनका ज़्यादातर ध्यान कहीं और था — गुंजन ममी के मादक, bhare-bhare बदन पर.

गुंजन ममी सोफे पर एक करवट लेकर लेती हुई थी. चेतन उनके पीछे चिपका हुआ था और अपनी पूरी लम्बाई उनकी गीली, रास भरी छूट में धक्के लगा रहा था.

गुंजन आहें भरते हुए बोली, “ओह… आह… आह… दामाद जी… ऐसे hi… आह… आह… मज़ा लूटो अपनी mami-saas की छूट का… ओह… बहुत अच्छा लग रहा है…”

चेतन उनके गुदगुदे चूतड़ पकड़ कर तेज़ धक्के लगते हुए हांफ ते हुए बोलै, “आह… ममी… आप बहुत सुन्दर हो… आह… तुम्हारा बदन बिलकुल माखन जैसा है… ओह… कितना नरम और गरम…”

गुंजन ने अपनी कमर हिलाते हुए शरारती आवाज़ में कहा, “सब तुम्हारे लिए hi है जमाई बाबू… ओह… तुम्हारा मूसल तो बहुत कड़क है… आह… ऐसे hi कूट दो हमारी ओखली… आह… आह… चटनी बना दो जमाई बाबू…!”

चेतन ने ज़ोर का धक्का लगा कर हांफ ते हुए बोलै, “आह्हः… ममी… चटनी बना के… आह… तुम्हारी ओखली में भर देंगे… ओह… इधर आओ…”

ये कह ते हुए चेतन ने गुंजन का चेहरा अपनी तरफ घुमाया और उनके होठों को पागलों की तरह चूसने लगा. दोनों के मुँह ek-dusre से चिपक गए, जीभें लड़ने लगी.

जहां चेतन गुंजन ममी के साथ रिश्ता गहरा कर रहा था, वहीँ उसकी पत्नी चंचल भी राजन चाचा के साथ व्यस्त थी. राजन चाचा ने चंचल को पीठ के बल लिटा रखा था. उसकी टाँगे फैला कर अपने कन्धों पर रख ली थी और दनादन अपना मोटा लुंड उसकी छूट में पेल रहे थे.

चंचल के मुँह से लगातार बेसुध आहें निकल रही थी — “आह… आह… आह… मां जी… ओह… बहुत तेज़… आह… फाड़ डोज मेरी छूट…”

राजन चंचल की छूट में लुंड घुसाए हुए हांफ ते हुए बोले, “आह… नहीं बिटिया… आह… ऐसे कैसे फाड़ देंगे… यह… इसे तो अभी बहुत छोड़ना है… ओह बिटिया… आह… बहुत सुन्दर है तू…”

चंचल कराह ते हुए अपनी कमर हिलती हुई बोली, “आह्ह्ह्ह… मां… ओह… मेरी सुंदरता की वजह से hi तो… आह्ह्ह्ह… इतनी मार पद रही है मेरी छूट को… ओह… आह्ह्ह्ह… कितना कड़क और मोटा लुंड है तुम्हारा…”

राजन ने चंचल की भरी चूचियों को दोनों हाथों से थाम कर ज़ोर से दबाते हुए कहा, “बिटिया… ओह… तू सामने रहेगी तो ये हमेशा hi कड़क रहेगा… आह… ले… ले मेरी जान…”

राजन चंचल की छूट की पिटाई करते हुए उसकी चूचियों को मसल रहे थे, जबकि चंचल बेसुध होकर आहें भर रही थी.

वहीँ उसके seedhe-saade पिता उदयवीर स्टेज के एक कोने में रज्जो चची को लिटाये हुए छोड़ रहे थे. वो अकेला नहीं थे. उनके बगल में hi विनीत था, जो सविता (अंजलि की माँ) को आगे झुका कर उनकी छूट में लुंड थोक रहा था.

उसी के बगल में प्रीती पूरी नंगी लेती हुई थी. अनुज उसकी टांगों के बीच खड़ा होकर tez-tez धक्के लगा रहा था. प्रीती के सर के पास नानाजी थे, जो उसका सर थामे हुए अपना लुंड उसके मुँह में डाले हुए थे. प्रीती दोनों तरफ से चुड़ते हुए चूस रही थी.

नाना: ओह आह बहुत अच्छा चूसती है तू बिटिया आह तेरे जैसी नातिन बहु की सेवा आह प् कर मज़ा आ रहा है,

अनुज: आह्हः नाना आएगी hi आह आखिर पसंद किसकी है,

ये सुन कर प्रीती के भरे हुए मुँह पर hi हलकी सी मुस्कान आयी पर उसने लुंड चूसना जारी रखा,

नाना: बदमाश कही का, हर बात पर अपनी तारीफ करता है.



जारी रहेगी
 
नाना: ओह आह बहुत अच्छा चूसती है तू बिटिया आह तेरे जैसी नातिन बहू की सेवा आह पाकर मज़ा आ रहा है,

अनुज: आह्ह्ह्ह नाना आयेगी ही आह आखिर पसंद किसकी है,

ये सुनकर प्रीती के भरे हुए मुंह पर ही हल्की सी मुस्कान आई पर उसने लंड चूसना जारी रखा,

नाना: बदमाश कही का, हर बात पर अपनी तारीफ करता है,



अपडेट 265


नाना ने कुछ पल और अपनी होने वाली नातिन बहू से लंड चुसवाया और फिर खड़े हो कर इधर उधर देखा और एक ओर उनकी आँखें ठहरी तो उधर ही चल दिए, नाना चलते हुए सीधे अपनी बड़की बिटिया यानी सभ्या के पास पहुंच गए जहां पर नीलेश और सभ्या एक बार फिर से गर्म हो चुके थे और सभ्या धीरे धीरे नीलेश के लंड पर सवार हो कर उछल रही थी, नाना उनके पास पहुंचे और बोले: तुम लोग आज कोने में ही बैठो रहोगे अरे भाई आज तुम्हारा दिन है, मजे करो।

सभ्या: ऐसे ही सबको मज़ा करते देख बहुत मज़ा आ रहा है बाबा,

सभ्या नीलेश के लंड पर उछलते हुए बोली,

नीलेश: तुम्हें तो मज़ा आ रहा है न बाबा?

नीलेश ने अपनी पत्नी के चूतड़ों को मसलते हुए पूछा,

नाना नीचे उनके बगल में सोफे पर बैठते हुए बोले: हमें मज़ा क्यों नहीं आएगा, हमारे बच्चों को खुश देख कर इतना सुखी देख कर हमसे ज़्यादा मजे में और कोई नहीं।

सभ्या: थोड़ा सा मजा और करवाती हूं बाबा, ये कहते हुए सभ्या आगे को हुई और अपने होंठ नाना के होंठों से लगा दिए, वहीं उसका हाथ नाना के मोटे काले लंड पर चलने लगा,





अपनी सालगिरह पर अपने पति और अपने पिता से एक साथ आनंद लेते हुए सभ्या को सच में बहुत खुशी मिल रही थी,

नीलेश: आह बाबा अब तो तुम्हे और भी मज़ा आ रहा होगा,

नीलेश अपनी पत्नी को उसके पिता के साथ बांटते हुए बोले,

तभी सभ्या ने अपने पिता के होंठो को छोड़ा और बोली: अभी तो मज़ा शुरू है बाबा का,

ये कहते हुए वो नीचे झुक गई और अपने पिता के लंड को मुंह में भर लिया और पूरे जोश से चूसने लगी।

नाना: ओह बिटिया, तेरे जैसी बिटिया और जमाई बाबू जैसा दामाद हो तो हर आदमी मजे में ही रहेगा हमेशा,

नीलेश: अरे बाबा सिर्फ इसकी तारीफ़ करोगे तो शालू बुरा मान जाएगी।

नीलेश ने हंसते हुए बोला, तो नाना भी हंसने लगे,

नाना: अरे नहीं भाई हमारी दोनों बिटिया ही बहुत अच्छी है, वैसे भी उससे हमें बड़ा डर लगता है।

नीलेश: सबको लगता है बाबा, आह आह सबसे ज्यादा तो शैलेश बाबू को।

इस पर दोनों लोग हंसने लगे, वहीं सभ्या भी उनकी बातें सुनते हुए मन ही मन हंस रही थी क्योंकि मुंह में तो उसके पिता का लंड घुसा हुआ था,

अब जिससे ये लोग डरने की बात कर रहे थे वो अभी किसी को डरा नहीं रही थी बल्कि उल्टा मज़ा दे रही थी,





शालू एक ओर करवट लेकर लेटी थी और उसके पीछे पंकज और प्रीति के पिता यानी पूर्वी के ससुर जी प्रकाश थे जो अपने होने वाली समधन की गांड में धीरे धीरे लंड फंसा रहे थे,

प्रकाश: ओह ओह समधन जी आह बड़ी कसी हुई गांड है तुम्हारी,

शालू: तुम्हाराह लोड़ा भी आह बहुत सख्त है समधी जी, आह्ह्ह बिल्कुल बांस की तरह घुसता जा रहा है मेरी गांड में।

प्रकाश: समधन जी मेरा बस चले तो पूरा ही घुस जाऊं तुम्हारी इस मखमली गांड में, आह ये चूचियां ओह।

प्रकाश शालू की चूचियों को मसलते हुए बोले,

शालू: अरे समधी जी तुम भी ना, अह्ह्ह्ह।

प्रकाश: अह्ह्ह्ह सीईईईईई ओह्ह्ह्ह मेरी बेटी आह्ह्ह्ह बहुत भाग्यशाली है आह्ह्ह्ह जो उसे ऐसा ससुराल मिलेगा।

शालू: आह्ह्ह्ह हम भी है जो हमें ऐसे चुदक्कड़ समधी समधन मिलेंगे।

जहां प्रकाश शालू के साथ मिलकर आगे के रिश्तों के सपने संजोते हुए अपने रिश्ते गहरे कर रहे थे वहीं उनकी पत्नी रेनू भी रिश्ते बनाने में पीछे नहीं थी और शालू के पति शैलेश के साथ रिश्ते और मजबूत कर रही थी,





रेनू घोड़ी बनी हुई थी और हमारे शैलेश मौसा पीछे से गहरे और दमदार धक्के लगा कर रेनू की चूत में अपने लंड को अंदर तक घुसा कर अच्छे से परिचित करवा रहे थे,

रेनू: ओह्ह्ह्ह आह भाई साहब आह्ह्ह्ह आराम से आह्ह्ह्ह तुम तो आह्ह्ह्ह जान ही ले लोगे।

शैलेश: आह्ह्ह्ह तुम्हें देख कर आह्ह्ह्ह आराम ही तो नहीं आआआह्ह्ह रहा भाभी जी आह्ह्ह्ह।

रेनू: आह्ह्ह्ह भाई साहब आह बहुत मोटा और लंबा है तुम्हारा आह्ह्ह्ह।

शैलेश: आह्ह्ह्ह तुम्हारी चूत ही कितनी कसी हुई है भाभी जी आह्ह्ह्ह लंड तो मोटा लगेगा ही, आह्ह्ह्ह अभी तो तुम्हारी इस गांड की भी सैर करनी है,

शैलेश ने तेज धक्के लगाते हुए कहा तो रेनू का बदन हर धक्के पर सिहर रहा था,

उनसे थोड़ी दूर ही शैलेश मौसा के मित्र और समधी यानि महिपाल थे जिन्होंने की हमारी प्यारी ममता चाची को अपने ऊपर बिठा रखा था,





ममता चाची महिपाल का लंड अपनी चूत में लेकर उस पर उछल रही थी और उनके साथ उनकी मोटी चूचियां भी नाच रही थी,

महिपाल: ओह ओह ओह भाभी आह आह आह्ह्ह्ह मज़ा आआ रहा है आह्ह्ह्ह।

ममता: ओह्ह्ह्ह भाई साहब, अह्ह्ह्ह मुझे भी आह्ह्ह्ह बहुत मज़ा आ रहा है आह्ह्ह्ह।

महिपाल: आह्ह्ह्ह भाभी आह्ह्ह्ह सच कहूं तो आह्ह्ह्ह जब तुम्हे पहली बार देखा आह्ह्ह्ह था तो ही सोचा था कि तुम्हे चोदने में बहुत मज़ा आयेगा,

ममता: आह्ह्ह्ह फिर जैसा सोचा वैसा मज़ा आह रहा है कि नहीं आह्ह्ह्ह।

महिपाल: आह्ह्ह्ह उससे भी ज़्यादा भाभी अह्ह्ह्ह उससे भी ज़्यादा।

महिपाल नीचे से कमर उछलते हुए बोला।

दूसरी ओर हमारे प्यारे मामा यानी जमुना मामा भी अकेले नहीं थे, और हमारी प्यारी शशि बुआ की चूत में दनादन धक्के लगा रहे थे,





उन्होंने बुआ को खड़ा करके झुका रखा था और पीछे से अपना लंड घुसा कर उन्हें चोद रहे थे, बुआ के मुंह से लगातार आहें निकल रही थी।

शशि: आह ओह ओह ओह जमुना अह्ह्ह्ह बहुत मज़ा आ रहा है रे आह्ह्ह्ह बड़ा मस्त चोदता है तू,

जमुना: आह्ह्ह्ह जीजी तुम मानोगी नहीं अह्ह्ह्ह आज आह हमारी वर्षों की इच्छा पूरी हुई है,

शशि: अह्ह्ह्ह सीईईईईई कौनसी इच्छा?

जमुना: ओह्ह्ह्ह जब हम जीजी को छोड़ने आते थे आह्ह्ह्ह और तुम्हें देखते थे तो मन होता था अह्ह्ह्ह कि बस एक बार तुम्हार बदन मिल जाए चोदने को ओह्ह्ह्ह।

शशि: ओह्ह्ह्ह बड़ा छुपा रुस्तम निकला तू तो, आह्ह्ह्ह अपनी बहन के ससुराल में उसकी ननद पर नजर रखता था,

जमुना: अब जीजी तुम ओह्ह्ह्ह हो ही ऐसी कि नजर अह्ह्ह्ह हटती ही नहीं,

शशि: ओह्ह्ह्ह वैसे सच बताऊं तो अगर तू कोशिश करता तो काम बन सकता था तेरा आह्ह्ह्ह पर कोई बात नहीं तब नहीं तो अब सही,

जमुना: सच में जीजी आह्ह्ह्ह तुम मुझे चोदने देती? वैसे सही कहाअअअष्ह्ह़््ह तब नहीं तो अब सही, अह्ह्ह्ह मुझे तो ये सोच कर मज़ा आ रहा है,

शशि: क्या सोचकर आह

जमुना: आह्ह्ह्ह यही कि अब तक जीजा मेरी बहन चोदते थे आज मैं उनकी बहन चोद रहा हूं।

ये सुनकर शशि हंसने लगती है और जमुना भी।

दूसरी ओर एक कोने में हमारा हीरो कर्मा था जिसका लंड अभी चंचल की मां यानी बिमला की चूत में अंदर बाहर हो रहा था वहीं उनकी टांगों के बीच अंजली थी जो कि कर्मा की गोलियों को चूस रही थी





बिमला: ओह ओह ओह बच्चा तुम दोनों अह्ह्ह्ह बहुत अच्छे हो आह्ह्ह्ह

कर्मा: अच्छी तो तुम्हारी चूत है ताई आह्ह्ह्ह, कितनी गरम है आह्ह्ह्ह

अंजली: सच में और बहुत स्वादिष्ट भी लग रही है,

अंजली ने मुंह कर्मा की गोलियों से हटाते हुए कहा,

कर्मा: तुम्हें चखनी है ताई की चूत अंजली?

अंजली: अह्ह्ह्ह हां बिल्कुल,

ये कहते हुए अंजली ने कर्मा का लंड पकड़ कर बिमला की चूत से निकाल दिया और मुंह में भर लिया और कुछ पल चूसने के बाद उसके टोपे को बिमला की गांड के छेद पर लगा दिया, और कर्मा ने धक्का लगाकर उसे अंदर ठेल दिया, बिमला की अह्ह्ह्ह निकल गई, वहीं अंजली ने तुंरत अपना मुंह बिमला की चूत पर लगा दिया और चाटने लगी,

कर्मा बिमला की गांड मारने लगा, बिमला इस दोहरे मजे से मचलते हुए आहें भरने लगी।

कर्मा: आह ताई इतनी गरम चूत है तुम्हारी अह्ह्ह्ह गांव में कैसे शांत रह पाती हो, आह ताऊजी काफी पड़ते हैं?

बिमला: ओह्ह्ह्ह बच्चा आह्ह्ह्ह पहले तो काफी पड़ते थे पर अह्ह्ह्ह जबसे जीवन में आह्ह्ह्ह ये बदलाव आया तबसे इस मुई चूत की प्यास ही नहीं बुझती आह्ह्ह्ह।

कर्मा: फिर क्या करती हो?

बिमला: अह्ह्ह्ह एक बगल का छोकरा है वो चोद जाता है और एक दो खेत में काम करने वाले मजदूर हैं वो सेवा आह कर जाते हैं थोड़ी।

कर्मा: अह्ह्ह्ह सीईईईईई ताई सही है तो ये है तुम्हारी ख़ुशी का कारण।

बिमला: आह अब जो कहले लल्ला, अह्ह्ह्ह वैसे खुश तो तेरी मां लग रही है देख कितनी आह्ह्ह्ह और होना भी चाहिए इतना अच्छा परिवार है, और सालगिरह पर अपने पति और बाप के साथ है एक साथ।

बिमला ने इशारा करते हुए कहा तो कर्मा ने उस ओर देखा जहां सोफे पर उसकी मां उसके नाना और पापा से एक साथ चुद रही थी





नाना का लंड सभ्या की गांड में अंदर बाहर हो रहा था वहीं नीलेश का लंड उसके मुंह में था जिसे वो चूस रही थी,

कर्मा के चेहरे पर उन्हें देख कर मुस्कान आ गई, उसके धक्के पर लगातार बिमला की गांड में लग रहे थे,

अंजली बिमला की चूत को पूरी लगन से चाट रही थी और इस दोहरे हमले का असर बिमला पर ये हुआ कि वो जल्दी ही झड़ने लगी उसके झड़ते ही कर्मा ने उसकी गांड से लंड निकाला और अंजली को उसके ऊपर लिटा कर उसकी गांड में लंड घुसा दिया, अंजली कर्मा का लंड लेते ही आहे भरने लगी वहीं बिमला के मुंह के ऊपर अंजली की चूत थी जिसे वो चाटने लगी।

अंजली: ओह ओह आह ऐसे ही आह ताई आह्ह्ह्ह चाटो, ओह्ह्ह्ह बहुत मज़ा आ रहा है बाबू ओह गांड मारते रहो।

कर्मा: ओह मेरी जान तुम्हारी गांड मारने में हमेशा ही मुझे बहुत मज़ा आता है, आह्ह्ह्ह। आई लव यू मेरी रांड आह्ह्ह्ह।

अंजली: आई लव यू टू मेरे चोदू।

जहां इन दोनों प्रेमियों की प्यार और हवस भरी बातें चल रही थी तो वहीं बिमला दोनों के बीच थी उनकी सेवा कर रही थी, दूसरी ओर सभ्या नीलेश और नाना के बीच भी अब आसन बदल चुका था सभ्या जहां अपने पिता के लंड को अपनी चूत में लेकर बैठी थी वहीं उसके पति नीलेश उसकी गांड में लंड घुसा रहे थे





एक साथ दो लंबे और मोटे लंड लेकर सभ्या आहें भर रही थी और ये लंड उसके पति और पिता के थे ये अहसास उसे और आनंदित कर रहा था

नीलेश: आह आह आह आह आह बाबा का लंड चूत में होने से आज तो तेरी गांड और कसी हुई लग रही है मेरी रांड आह्ह्ह्ह,

सभ्या: आह आह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह कर्मा के पापा आह्ह्ह्ह ऐसे ही चोदो अपनी रांड को आह्ह्ह्ह बाबा और तेज धक्के लगाओ आह्ह्ह्ह फाड़ दो मेरे छेदों को आह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह।

नाना: आह्ह्ह्ह कहने की जरूरत नहीं है आह्ह्ह्ह बिटिया अह्ह्ह्ह तुझे देख कर रुका ही नहीं जा रहा आह्ह्ह्ह आज तुझे नहीं छोडूंगा, आह्ह्ह्ह।

पूरा फॉर्महाउस चुदाई की थापें और आहों से गूंज रहा था वो तो अच्छा था गांव से दूर था और जंगल के बीच नहीं तो इनकी आवाज़ें बाहर ज़रूर गई होती, देर रात तक चुदाई चलती रही और फिर लोग थक कर जिसको जहां जगह मिली वहां सो गए।

इसके आगे की कहानी हमारे दोस्त कर्मा की जुबानी सुनते हैं।

(कर्मा की जुबानी)

रात को अंजली और बिमला ताई को जी भर के चोदने के बाद और बिमला ताई को अपना रस पिलाने के बाद मैं दोनों से चिपक कर सो गया सुबह आस पास तेज बातों की आवाज़ से नींद खुली आंखें खोल कर देखा तो मैं अकेला ही सो रहा था अच्छे से आँखें खोलीं और इधर उधर देखा तो अधिकतर लोग उठ चुके थे कुछ बातें कर रहे थे कुछ चाय की चुस्कियां ले रहे थे, मैं भी उठ कर बैठ गया तो ममता चाची जो सबको चाय बांट रहीं थी उन्होंने मुझे भी चाय दी, मैं चाय का कप लेकर उठा और बाहर की ओर चल दिया,

हर तरफ लोग थे कोई कुछ कर रहे थे कोई कुछ फार्म हाउस की बाहर की दीवारें ऊंची थी और पेड़ों से ढंकी हुई भी थी तो किसी के बाहर से देखने की कोई चिंता नहीं थी बाकी पिछले 10 दिनों में हम लड़कों ने इसी पर काफी काम किया था जिससे फार्म हाउस की सेफ्टी और गोपनीयता बनी रहे, खूब हंसी मज़ाक का माहौल था, पेड़ों के नीचे ठंडी हवा में कुर्सियां लगा कर सब बड़े बैठे थे और साथ में चाय पकौड़े चल रहे थे, मैने भी सब से थोड़ी बहुत बात की कुछ लोग आज निकलने की बात कर रहे थे और पापा, राजन चाचा मौसा वगैरह सब लोग उनसे एक दिन और रुकने का आग्रह कर रहे थे, खासकर चरण सिंह और उदयवीर ताऊ क्योंकि दुकान आदि का काम था वहीं बड़े फूफाजी को भी दुकान खोलनी थी,

अपनी चाय निपटाने के बाद मैं अंदर की ओर चला सुबह के काम निपटाने के लिए लोग, ज़्यादा थे तो नीचे हॉल के बाथरूम पहले से बंद थे तो मैं अंदर एक कमरे की ओर चला वहां गेट खोल कर देखा तो बिस्तर पर बढ़िया सीन चल रहा था,





बिस्तर पर मेरी प्यारी छोटी बहन किरन थी जो कि अपनी होने वाली भाभी प्रीती के ऊपर चढ़ी हुई थी उर उसके नरम रसीले होंठों को चूस रही थी, प्रीति भी उसका पूरा साथ दे रही थी, दोनों के बदन पर छोटे छोटे शॉर्ट्स और टॉप थे उन दोनों को देख कर ही मेरा मन डोलने लगा, उन दोनों ने भी मेरी ओर देखा मैं दरवाज़ा खोल कर खड़ा था,

किरन: अरे भैया क्या है या तो अंदर आओ या बाहर जाओ देख नहीं रहे मेरा और प्रीति भाभी का ज़रूरी काम चल रहा है।

ये सुन प्रीती भी मुस्कुराई और मैं भी,

मैं: हां भाई करले तू अपना जरूरी काम जाता हूँ मैं। वैसे भी मैं बाथरूम के लिए आया था,

किरन: वो तो खाली नहीं है, फूफा हैं अंदर? नीतू दीदी के पापा।

मैं: अच्छा ठीक है तुम लोग करो अपना जरूरी काम

एक बार को तो मेरा मन हुआ उनके बीच घुस जाऊं पर खुद को थोड़ा सख्त लौंडा बनाते हुए मैं पीछे हट गया और दरवाज़ा बंद कर दिया, मैने सोचा कि लगता है ऊपर वाले कमरों में ही कोई खाली मिलेगा यहां तो सब भरे पड़े हैं, कमरे से बाहर आया और सीढ़ियों की ओर बढ़ ही रहा था कि हॉल में एक ओर से आती आवाज़ों से मेरा ध्यान उस ओर गया,





जहां मैने देखा रज्जो चाची झुकी हुई थी साड़ी कमर तक उठी है थी ब्लाउज़ के बस दो बटन लगे थे जिससे उनके आधे चूचे नजर आ रहे थे उसके नीचे मांसल नंगा पेट गोल गहरी नाभी, वहीं उनके पीछे कोई था जिसका चेहरा मुझे नजर नहीं आ रहा था जो उनको दनादन चोद रहा था और कुछ धक्को बाद ही चाची की एक तेज और लंबी चीख निकली, उनका बदन कांपने लगा उनकी चूत थर्राने लगी और वो झड़ने लगी, जब चाची झड़ गई तो जो भी उनके पीछे था उसने उनकी कमर को छोड़ा और चाची नीचे लेट गई, तब नज़र आया उनके पीछे विनीत था जो चाची को ऐसे चोद रहा था,

वो भी मुस्कुराते हुए और हांफते हुए नीचे बैठ गया और बोला: ओह आह मामी मज़ा आ गया न जाने कब से तुम्हे ऐसे चोदना चाहता था,

रज्जो: ओह लल्ला सच में मजा आ गया तुमने तो अंदर तक हिला कर रख दिया।

विनीत आगे होकर रज्जो चाची के होंठो को चूसने लगा, अरे मैं इनकी चुदाई में अपना काम तो भूल ही गया और मैं मुड़ कर ऊपर की ओर चल दिया, ऊपर पहुंचा भी नहीं था कि पहले से ही मुझे आवाज़ें आ रही थी और जिन्हें सुनकर कोई भी बता सकता था वो किस चीज की थी,

ऊपर पहुंच कर मैने देखा हॉल तो खाली था पर आवाज़ें कमरों से आ रही थी, मैने तुरंत आगे बढ़ कर पहला कमरे का गेट खोला तो सामने का नज़ारा कुछ ऐसा था,





मेरे सामने रिमझिम जीजी की सास माधुरी थीं उन्होंने एक नाईटी पहनी हुई थी जो सामने से खुली हुई थी और उनकी चूचियां पूरी नंगी बाहर थी, वो मेरी ओर मुंह किए हुए एक आदमी के लंड को अपनी गांड में लेकर उछल रही थी, इस आदमी का चेहरा भी मुझे नहीं दिख रहा था, पर इस बार मैने ज़्यादा देर सोचा नहीं और कमरे के अंदर आ गया मुझे देख माधुरी ताई मुस्कुराई और बोलीं: आह उठ गया लल्ला,

मैं: हां ताई बस बाथरूम जा रहा था

मैने आगे बढ़ते हुए कहा और मुझे उस आदमी का चेहरा भी नजर आ गया वो और कोई नहीं बल्कि मेरे नाना थे जिनके लंड पर माधुरी ताई कूद रही थीं।

नाना मुझे देख और मेरी बात सुन बोले: बेटा ये भी खाली नहीं है, इसमें मंजू नहा रही है,

मैं: कोई बात नहीं तुम लोग लगे रहो मैं दूसरे में चला जाता हूं, ये कहके मैं कमरे से निकल गया, और दूसरे कमरे में घुसा तो यहां भी मस्त नज़ारा था, दरवाज़े से थोड़ा आगे ही जमीन पर ही मेरी होने वाली भाभी खुशी पूरी नंगी लेटी थी





और उनके पैरों के बीच में मेरे मामा थे जो उनकी कसी हुई चूत में अपना लंड चला रहे थे, खुशी भाभी अपनी मस्त चूचियों को मसलते हुए आहें भर रहीं थी और चुदाई का मज़ा ले रही थी, वहीं मामा तो इतनी मस्त चूत पाकर बिल्कुल मज़े में थे

मामा: ओह ओह ओह खुशी बिटिया अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह बहुत सुंदर है तू, बड़ा मज़ा आ रहा है तुझे चोदने में, आह तेरी कसी हुई चूत को अपने लंड से भेदने में अह्ह्ह्ह।

मामा उत्तेजित होकर बोल रहे थे तो खुशी भी आहें भरते हुए उनका साथ दे रही थी,

खुशी: ओह मामा ओह्ह्ह्ह मुझे भी बहुत मज़ा आ रहा है आह्ह्ह्ह अरे कर्मा भैया आह्ह्ह आओ न आह्ह्ह्ह।

खुशी भाभी ने मुझे दरवाज़े पर खड़ा देख कर कहा,

मैं उन्हे देख कर रुक नहीं पाया और आगे बढ़ कर अंदर गया, और नीचे बैठ गया उन दोनों के बगल में और हाथ बढ़ा कर उनकी चूचियों को मसलने लगा,

खुशी: ओह्ह्ह अह्ह्ह्ह ऐसे ही आह्ह्ह्ह भैया,

मामा: बहुत मस्त बहू है न भांजे विनीत की, बिलकुल रबड़ी जैसी,

मामा उसकी चूत में धक्के लगाते हुए बोले,

मैं: हां मामा है तो सही,

मैने झुक कर बोला और खुशी के होंठों पर अपने होंठ मिला दिए और उसके रसीले होंठों को चूसने लगा, पागलों की तरह।

वो भी मेरा साथ देने लगी, इसी बीच कमरे के अंदर जो बाथरूम था उसका दरवाजा खुला, और मैने सिर उठा कर देखा तो वो चंचल दीदी थी जो ब्रा और पेटीकोट में खड़ी थी और मुझे देख मुस्कुराईं





चंचल: अरे तू कब आया?

मैं: बस अभी तुम कब से हो अंदर?

चंचल: मैं तो नहा चुकी तुझे जाना है तू चला जा,

मैं खड़ा हुआ और उनकी ओर बढ़ा, उनका भीगा बदन सिर्फ ब्रा और पेटीकोट में देख कर मेरा लंड बिलकुल तन कर खड़ा हो गया जो पहले से ही खुशी भाभी को चूमते ही फुदक रहा था,

मैं: मैं जाऊंगा तो पर पहले अपनी दीदी से तो मिल लूं।

चंचल: हां दीदी से मिलना तो रह ही गया न तेरा।

मैं: और क्या,

ये कहते हुए मैने उन्हें बाहों में भर लिया और बाथरूम के अंदर घुस गया और पीछे से उनसे चिपक गया, मेरा लंड उनके भरे हुए चूतड़ों में चुभने लगा,

चंचल: यहम्मम तू तो पहले से तैयार है,

मैं: तुम्हे देख कर कौन तैयार नहीं होगा,

जहां हमारी बातें हो रही थी वहीं मामा और खुशी भाभी की चुदाई लगातार जारी थी,

मैने चंचल दीदी के गले और गालों की चाटना शुरू कर दिया मेरे हाथ उनकी कमर और छाती को मसलने लगे जिससे उनकी ब्रा का एक स्ट्रैप सरक गया और उनकी एक चूची बाहर छलक पड़ी।





मैं पागलो की तरह उनके बदन को चाटते और मसलते हुए अपना लंड उनके चूतड़ों में पेटिकोट के ऊपर से ही घुसाने लगा,

चंचल: ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह सीईईईईई ओह्ह्ह्ह कर्माआआअष्हृह्ह्हः बहुत गरम है तू अह्ह्ह्ह।

मैं: ओह जीजी गरम तो तुम हो नहाने के बाद भी आह्ह्ह्ह कितनी गरम हो।

वहीं कमरे में खुशी भाभी की चीखें लगातार तेज होती जा रही थी क्योंकि मामा के धक्के भी उनकी चूत में तूफानी होते जा रहे थे,

खुशी: ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह सीईईईईई आह्ह्ह्ह ममाआआआआअ चोदो अह्ह्ह्हः ऐसे ही ओह्ह्ह फाड़ दो अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह

मामा: ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह बिटियाअअअअअयाछहभ्झ्झ्हः ओह मज़ाआअअह्ह आ गया अह्ह्ह्ह मैं झड़ने वाला हूं।

खुशी: ओह्ह्ह्ह मामा मैं अह्ह्ह भी आई ओह ओह ओह आआआआअअअह।

और फिर मामा ने कुछ करारे धक्के खुशी भाभी की चूत में लगाये और फिर झड़ने लगे खुशी भाभी का बदन भी अकड़ते हुए ढीला पड़ गया, दोनों ही झड़ कर शांत हो गए और वहीं लेट कर हांफने लगे,

मैं: दीदी आह्ह्ह्ह अब रुका नहीं जा रहा मुझे तुम्हारी गांड मारनी है,

चंचल: तो रुका क्यों है तू घुसा दे अपना मोटा लंड अपनी रंडी दीदी की गांड में और अच्छे से मार।

चंचल दीदी ने गरम होते हुए कहा और मेरे लिए इतना काफी था,



मैने उनका पेटीकोट पीछे से उठाया और उनके गीले चूतड़ों के बीच अपना लंड घुसा दिया जिसे उन्होंने अपने हाथ से पकड़कर अपनी गांड के छेद पर रखा और मैने धक्का लगाकर टोपा अंदर सरका दिया, हम दोनों के मुंह से आह निकल गई, मैं धीरे धीरे धक्के लगाते हुए अपने लंड को उनकी गांड में घुसाने लगा साथ ही उनका बदन चाटते हुए,

मामा और खुशी भाभी भी थोड़ी देर हांफने के बाद उठ कर बैठ गये थे, इतने में कमरे का दरवाज़ा खुला और बाहर मां थी जिन्होंने मामा और खुशी भाभी को देखा और बोली: जमुना तू अभी भी यहीं है कितनी देर पहले बोल था घर से आटे का कट्टा उठा ला।

मामा तुरंत उठे और बोले: अरे हां जीजी, वो खुशी बिटिया दिख गई तो ध्यान नहीं रहा अभी जाते हैं,

मामा फुर्ती से कमरे से बाहर निकल गए और हम लोग उन्हें देख हँस रहे थे, फिर मां बोली: खुशी बिटिया चल तू नाश्ता वगैरा कर ले इन लोगों का तो ये लगा रहेगा, चंचल और कर्मा तूम लोग भी जल्दी निपट कर आना।

चंचल: ओह्ह्ह्ह ठीक है मामी तुम चलो आह्ह्ह हम लोग आते हैं,

माँ खुशी भाभी के साथ निकल गईं, और मैं चंचल दीदी की गांड मारने में लगा रहा,

इधर मां जैसे ही खुशी के साथ कमरे से निकल कर हॉल की ओर बढ़ रही थीं अचानक किसी ने उन्हें पकड़ा और खींच लिया, मां गिरने को हुई तो उन्होंने कमरे के दरवाजे की दहलीज को पकड़ लिया और वहीं दो हाथ उनकी कमर पर कस गए, मां ने चेहरा घुमा कर देखने की कोशिश की और जैसे ही देख कर कुछ बोलना चाहा तब तक तो उनके होंठो को होंठों ने कस लिया था और चूसने लगे थे,





ये और कोई नहीं बल्कि हमारे प्यारे फूफाजी थे शशि बुआ के पति जो कि मां की कमर को मसलते हुए उनके होंठो को चूसने लगे,

मां भी उनका साथ दे रही थी, फूफाजी के हाथ उनकी कमर को मसल रहे थे, वहीं खुशी भाभी रुक कर अपने होने वाले ससुर को और मां को देख रही थी, कुछ देर बाद दोनों के होंठ अलग हुए तो मां बोली: तुमने तो बिल्कुल डरा ही दिया था,

फूफाजी: अरे अपनी सलहज को डराना दबाना तो चलता रहता है हमारा हक है ये तो।

मां: अरे जाओ बढ़े आये हक लेने वाले,

फूफाजी ने खुशी को कहा: बिटिया तू जा, अब तेरी मामी तो हक देके ही जाएगी।

खुशी अपने होने वाले ससुर की बात सुनकर मुस्कुराते हुए चली गई,वहीं फूफाजी मा के बदन को भोगने में लग गए,

अंदर मैंने चंचल जीजी को पूरा नंगा कर दिया था और वो अभी नीचे बैठ कर मेरा लंड चूसते हुए उस पर से अपनी गांड का स्वाद ले रही थी,





उनके गरम मुंह में लंड देकर मुझे भी बहुत मज़ा आ रहा था, बीच बीच में दूसरे लोग भी कमरे में आ रहे थे और जा रहे थे पर हमारी चुदाई लगातार चल रही थी, चंचल दीदी को जब मैने पहली बार देखा था तो कितनी सरल भोली भाली सी औरत लगती थी पर आज उनका पूरा रूप बदल चुका था, वैसे भोली भाली तो वो अब भी थी और बहुत प्यारी भी बस उनके अंदर की गर्मी अब बाहर निकल के आ चुकी थी और सब को ही बहुत भा रही थी।

मैं: आह्ह्ह्ह दीदी ओह्ह्ह्ह पूरा अंदर लो न आह्ह्ह्ह

चंचल: ओह्ह कितना लंबा है तेरा, उघहुह्ह्ह पूरा लिया ही नहीं जा रहा,

दीदी पूरी कोशिश कर रही थी मेरा लंड पूरा अपने मुंह में लेने की उनकी आँखों से आंसू निकल रहे थे मुझे उनकी भूख देख कर अच्छा लग रहा था,

वहीं बाहर फूफाजी ने मां की साड़ी का पल्लू नीचे सरका दिया था और अब खुद झुक कर मां के पेट को चाट रहे थे और चूम रहे थे साथ ही उनकी कमर और चूचियों को मसल रहे थे,





फूफाजी: ओह भाभी अह्ह्ह्ह क्या मलाई जैसा बदन है तुम्हारा आह्ह्ह्ह मन करता है पूरा चाट जाऊं,

मां: ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह सीईईईईई तो कौन रोक रहा है जमाई राजा ओह्ह्ह चाट जाओ नाह्ह।

फूफाजी: अब तो चाट ही जाऊंगा ओह्ह्ह, अह्ह्ह्ह

फूफाजी ने पकड़ कर मां का ब्लाउज़ उतार दिया और उनकी बड़ी बड़ी चूचियां बाहर निकाल ली और उन्हें पागलों की तरह बारी बारी से चूसने लगे,

इधर मैने चंचल दीदी को अब बाथरूम से निकाल कर बिस्तर पर लिटा लिया था और उनकी टांगों के बीच खड़ा होकर उनकी रसीली गरम चूत में लंड घुसा दिया और उन्हें चोद रहा था,

वो अपनी चूचियों को थामे आहें भर रही थी और मुझे और जोश दिला रही थीं





चंचल: ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह कर्माह्ह आह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह कितना लंबा है आह्ह्ह्ह अंदर तक जा रहा है आह्ह्ह ऐसे ही चोद अपनी रंडी प्यासी दीदी को ओह।

मैं: हां अहह मेरी प्यासी ओह्ह्ह्ह रंडी दीदी, अह्ह्ह्ह ले अपने भाई का लंड आह्ह्ह्ह अपनी गरम चूत में अह्ह्ह्ह, कितनी गरम चूत है तेरी ओह्ह्ह्ह।

चंचल: ओह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह तो इस गरम चूत की गर्मी मिटा दे अह्ह्ह आज दिखा दे मुझे तू कितना बड़ा भेंचोद है अह्ह्ह्ह चोद अपनी बहन को।

मैं: ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह साली रंडी कुतिया आह्ह्ह आज तुझे चोद चोद के तेरी चूत का भोसड़ा बना दूंगा रंडी की औलाद।

चंचल: आह हां हां बना दे आह आह्ह्ह्ह हाँ मैं हूं आह रंडी की औलाद अह्ह्ह्ह मेरी अह्ह्ह्ह मां रंड है आह्ह्ह्ह पूरे गांव के लंड लिए हैं कुतिया ने अपने भोसड़े में।

हम दोनों एक दूसरे को ऐसी बातें करते हुए और उकसा रहे थे, मैं उनकी कमर को थाम कर दनादन धक्के लगा रहा था दीदी की चूचियां लगातार नाच रही थीं।

बाहर फूफाजी भी मा की चूचियों को चूसने के बाद उनकी साड़ी और पेटीकोट को कमर तक उठाकर उनकी चूत चाट रहे थे और मां उनकी जीभ पर सिहर रही थी, फूफाजी के हाथ मां के चूतड़ों को कस रहे थे, फिर कुछ देर और चाटने के बाद वो खड़े हुए और मां को बिस्तर की ओर लेकर चल दिए,





फूफाजी: बहुत दिन हो गए भाभी तुम्हारी चूत की सैर किए हुए आह्ह्ह्ह अब रहा नहीं जाता,

मां: तो रहने को कह कौन रहा है जी भर के सैर कर लो।

फूफाजी ने अपने कपड़े उतारने शुरू कर दिए और पूरे नंगे होते हुए बोले: अह्ह्ह्ह भाभी देखो तो लंड कैसे तुम्हे देख कर ठुमके मार रहा है।

मां ने भी अपनी साड़ी और पेटीकोट उतार दिए और पूरी नंगी हो गई और बोली: अह्ह्ह्ह लाओ इसे मैं भी तो देखूं।

ये कहते हुए मां उनके आगे बैठ गई और फूफाजी के लंड को पकड़ कर उसके सिरे पर अपनी जीभ फिराई तो फूफाजी आहें भरने लगे, फिर मां ने उनके टॉप को मुंह में भर लिया और चूसने लगी, और फिर धीरे धीरे करके पूरा लंड चूसने और चाटने लगी।

फूफाजी: आह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह भाभीईईईई अह्ह्ह्ह बहुत मस्त चूसती हो तुम।

मां ने कुछ नहीं कहा और चूसने में लगी रही, फूफाजी आहें भरते रहे और फिर उनसे नहीं सहा गया तो उन्होंने मां को उठाया बिस्तर पर झुका दिया और पीछे से उनकी चूत में अपना लंड घुसा दिया और कमर थाम कर ताबड़तोड़ चोदने लगे,





फूफाजी: ओह्ह्ह अह्ह्ह्ह सीईईईईई ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह थोड़ा आह लेट हो गए अह्ह्ह्ह नहीं तो मैं ही ब्याह लेता तुम्हे भाभी अह्ह्ह्ह फिर मेरे साथ होती सालगिरह,

मां: अह्ह्ह्ह ब्याहने की क्या ज़रूरत है आह्ह्ह्ह पति वाले सारे सुख तो अह्ह्ह्ह मिल रहे हैं,

फूफाजी: अह्ह्ह्ह फिर भी अह्ह्ह्ह तुम्हे बीवी बना कर अह्ह्ह्ह चोदने का अपना अलग मज़ा आता आह्ह्ह्ह।

मां: आह्ह्ह्ह्ह तो अभी ले लो मज़ा आह्ह्ह्ह ऐसे ही चोदो अह्ह्ह्हः विनीत के पापा अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह।

फूफाजी: अह्ह्ह्ह मेरी रानी क्या मस्त चूत है तेरी अह्ह्ह्ह जितना चोदूं मन ही नहीं भरता,

मां: आह्ह्ह्ह अब तो आह इतने साल हो गए अह्ह्ह्ह अब तो मन भर गया होगा,

फूफाजी: अह्ह्ह्ह नहीं भरता मेरी जान अह्ह्ह्ह।

मां: तो चोदो अह्ह्ह्हः विनीत के पापा अह्ह्ह्ह अपनी बीवी को आह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह

मां और फूफाजी की ये रोलप्ले वाली चुदाई चल रही थी वहीं मैं दूसरी ओर चंचल दीदी के मुंह और चेहरे पर अपना रस छोड़ रहा था





मैं: आह दीदी मज़ा आ गया,

मैने हांफते हुए बोला तो दीदी ने भी मेरे लंड को ऊपर से नीचे अच्छे से चाटा और बोली: पर देख तूने मेरी क्या हालत की है नहाई थी मैं अभी अभी।

मैं: आ जाओ फिर से नहा लेते हैं,

चंचल: नहाना तो पड़ेगा ही चल।

जहां हम लोग नहाने के लिए फिर से बाथरूम में घुस जाते हैं वहीं फूफाजी भी थोड़ी देर बाद मां की चूत में झड़ रहे होते हैं और हांफते हुए उनके ऊपर लेट जाते हैं, जब मैं और चंचल दीदी नहा कर निकलते हैं कमरे से तभी देखते हैं कि मां भी अपनी साड़ी पहन रही थी और फूफाजी अपने कपड़े, मां मुझे देखती है और कहती है: कर्मा सुन बाकी कमरों में देख ले कोई रह गया हो नाश्ते के लिए तो नीचे ले आ।

फूफाजी: हमने तो सुबह सुबह ही रबड़ी खा ली।

फूफाजी मां को छेड़ते हुए कहते हैं,

मां: चलो तुम भी नीचे चलो और खिलाती हूं रबड़ी, आ जा चंचल बिटिया तू भी चल।

मां फूफाजी और चंचल दीदी के साथ नीचे चली जाती हैं और मैं दूसरे कमरों में देखने लगता हूं, पहले कमरे से बड़ी कामुक आवाजें आ रही थी मैं झांक कर देखता हूं तो उतना ही कामुक नज़ारा था





बिस्तर पर अंजली की भाभी रानी अपनी पीठ के बल लेटी हुई थी ब्लाउज खुला हुआ था साड़ी भी आधी खुली थी बस बदन से लिपटी हुई थी और उनकी टांगों के बीच पंकज जीजा थे जो उनकी जांघों को थाम कर दनादन धक्के लगा कर उन्हें चोद रहे थे और उनकी चूचियों को नचा रहे थे।

मैं: सुबह सुबह ही काम पर लग गए जीजाजी,

मैने कमरे में घुसते हुए कहा,

पंकज: आह अच्छा हमसे पहले तो तुम ओह्ह्ह लगे हुए थे चंचल भाभी के साथ तुम लोगो को देखकर हमारा भी मन हो गया,

रानी: ओह्ह्ह्ह हां मैं तो यहाँ अह्ह्ह बिस्तर झाड़ रही थी कि अह्ह्ह्ह सीईईईईई जीजाजी ने आअ कर मुझे ही बिस्तर पर बिछा अह्ह्ह दिया।

मैं: अरे कोई नहीं भाभी लगी रहो वैसे भी तुम्हारा बदन चुदवाते हुए बड़ा मस्त लगता है

मैने उनकी दोनों चुचियों को थामते हुए कहा,

रानी: और वैसे नहीं लगता, अह्ह्ह्ह

मैं: हर तरीके से माल हो भाभी तुम क्यों जीजा।

पंकज: अरे सही में यार देखते ही लंड खड़ा हो गया ऐसा माल,

मैं: अच्छा जब तुम दोनों लोगों का प्रोग्राम निपट जाए तो नीचे आ जाना नाश्ते के लिए।

जीजा: अह्ह्ह ठीक है।

मैं कमरे से निकल गया और दूसरे कमरे में घुस गया, जहां भी चुदाई का खेल चल रहा था, रिमझिम दीदी बिस्झुतर पर घोड़ी बन कर झुकी हुई थी और रानी का पति यानि पीयूष पीछे से उन्हें चोद रहा था,





दीदी के बदन पर सिर्फ उनका पेटीकोट था जो कमर पर इकठ्ठा हो रखा था, दोनों का बदन पसीने से गीला था हर धक्के पर रिमझिम दीदी की चूचियां लहरा रही थी,

पीयूष: ओह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह रिमझिम आह्ह्ह्ह मेरी जान ओह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह बड़ी मज़ेदार हो तुम।

रिमझिम: ओह अह्ह्ह्ह तुम भी अह्ह्ह्ह भैया अह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह सीईईईईई मजा आ रहा है ऐसे ही करते रहो।

पीयूष: अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह हां अब चाहूँ तो भी नहीं रुक पाऊंगा,

रिमझिम: नहीं रुकना आह्ह्ह्ह रुकना नहीं आह्ह्ह्ह नहीं तो गांड आह्ह्ह्ह फाड़ अह्ह्ह्ह दूंगी।

मैं उसी समय कमरे में घुसा और उनकी गाली सुनकर बोला: अरे वाह दीदी सुबह सुबह ही गरियाने लगीं।

रिमझिम: आह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह तेरा आह्ह्ह्ह साला अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह रुकने की बात कर रहा था।

पीयूष: अह्ह्ह्ह नहीं भाई कर्मा ओह्ह्ह्ह तेरी दीदी आह्ह्ह्ह मैं चाहूं तो भी नहीं आह्ह्ह्ह्ह रुक सकता।

मैं: अरे वो तुम लोग जानो पर जब रुक जाओ तो नाश्ते के लिए आ जाना मां ने बोला है।

मैं उन लोगों की छोड़ कर कमरे से निकल गया, अब अगले कमरे में बढ़ कर देखा तो पल्ली थी जो कि किसी आदमी के मुंह पर बैठी हुई अपनी चूत उसके चेहरे पर घिस रही थी





आदमी की जीभपर अपनी चूत घिसते हुए अपनी चूचियां मसलते हुए आहे भर रही थी,

पल्ली: आह्ह्ह्ह ताऊजी ओह्ह्ह्ह मज़ा आ रहा है अह्ह्ह्ह सीईईईईई

मैं आगे बढ़ा और झाँक कर देखा तो उसके चूतड़ों के नीचे मुझे प्रकाश ताऊजी दिखे, पंकज और प्रीती के पिता और पूर्वी दीदी के ससुर,

मैं: अरे तू ताऊजी के मुंह पर बैठी है उन्हें नाश्ता करवाना है।

मैने आगे बढ़ते हुए बिस्तर के पास आकर कहा तो उसने मुझे देखा और मुस्कुराते हुए बोली: अह्ह्ह्ह भैया मैं अह्ह्ह भी तो नाश्ता ही करवा रही हूं, क्यों ताऊजी कैसा है नाश्ता?

इस पर प्रकाश ताऊजी ने उसकी चूत से मुंह हटाया और बोले: बहुत स्वादिष्ट है बिटिया अह्ह्ह्ह ऐसा नाश्ता सबसे बढ़िया और अच्छा होता है,

कहते हुए उन्होंने बापिस मुंह पल्ली की चूत पर लगा लिया, मैने आगे झुक कर बारी बारी से उसकी चूचियों को कुछ पल के लिए चूसा फिर चुदाई के बाद नीचे आने के लिए बोल कर निकल गया, अगले कमरे में बिस्तर पर अनुज मेरी सासू मां सविता को जकड़ कर लेटा हुआ था





सासु मां की साड़ी कमर तक उठी हुई थी और अनुज उनके पीछे लेटकर उनकी गांड में लंड अंदर बाहर कर रहा था,

सविता: आह आह आह ओह्ह्ह्ह लल्ला ऐसे ही आह्ह्ह्ह करता रह।

अनुज: अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह मम्मी जी ओह्ह्ह्ह इतनी कसी गांड है तुम्हारी अह्ह्ह्ह।

मैं: होगी नहीं आखिर मेरी सासू मां हैं,

मैने कमरे में घुसते हुए हंसकर कहा,

अनुज: मेरी भी हैं, क्यों मम्मी जी,

सविता: हां मेरे लाल आह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह बिलकुल दोनों की हूं आह्ह्ह्ह।

मैं उनके पास बिस्तर पर झुका और मम्मी जी के नरम होंठो को चूसने लगा, अनुज बिना रुके उनकी गांड मार रहा था, कुछ पल बाद मैने उनके होंठो को छोड़ा और बोला: नाश्ते के लिए भी आना है नीचे मां बुला रही थी,

सविता: अह्ह्ह्ह हां लल्ला बस अह्ह्ह अभी आते हैं

इतने में मुझे बाहर से कुछ आवाजें आई तो मैने खिड़की से देखा और पाया कि बाहर बड़े फूफाजी ने मंजू ताई को पकड़ रखा था और उनकी चूचियों को मसलते हुए उनके होंठो को चूस रहे थे





मैंने उन्हें देख तो मम्मी जी और अनुज को बोल कर कमरे से बाहर निकल गया, और उनके सामने पहुंच गया,

मैं: अरे फूफाजी नीचे ही ले चलो ताई को नाश्ते के साथ इन्हें चूस लेना,

बड़े फूफाजी ने मेरी बात सुनी और बोले: ये भी ठीक कहा तूने, चलें सलहज?

मंजू ताई: चलो जीजा आज नाश्ते में तुम्हे चूत की चासनी चटाएंगी।

फूफाजी: अरे तुम जो चाटने को कह दो सलहज जी वही चाट लेंगे,

चलो फिर नीचे, दोनों हाथों में हाथ पकड़ कर प्रेमियों की तरह नीचे चल दिए।

हम सब लोग नीचे आए तो देखा काफी लोग नाश्ता कर रहे थे कुछ अंदर थे तो कुछ बाहर कुर्सियों पर, मैं भी पकोड़े की एक प्लेट और चाय लेकर बाहर चल दिया जहां सब बैठे थे, उन्हीं के बीच बैठ कर बातें करते हुए नाश्ता करने लगा कि इसी बीच रमन जीजा आए हाथ में फोन लिए थोड़े चिंतित लग रहे थे और सबसे बोले: अरे किसी ने न्यूज देखी क्या?

पापा: न्यूज क्यों क्या हुआ कोइ बड़ी खबर है क्या?

रमन जीजा के चेहरे के भाव देख पापा ने पूछा जो सबके मन का सवाल था,

रमन: वो थोड़ी बहुत खबरें आ रही थी न वायरस फैलने की उसके लिए सरकार ने लायकडाउन लगाया है।

मौसा: वो वायरस क्या नाम था कोरोना?

रमन: हां उसी की वजह से।

चरन सिंह: और ये लॉकडाउन का क्या मतलब है?

चेतन: मतलब कि ज़रूरी चीजों के अलावा सारी दुकानें बंद, दफ़्तर वगैरा सब बंद रहेंगे, स्कूल, कॉलेज, यातायात सब बंद।

महिपाल: लोगों की आवाजाही?

रमन: वो भी बंद सिर्फ बहुत जरूरी काम हो जैसे दवाई वगैरा से जुड़ा तो ही जा सकते हो,

राजन चाचा: अरे तेरी ये तो तगड़ा ही कांड हो गया,

चरन सिंह: मतलब हमारी दुकान भी बंद रहेगी?

चेतन: हां पापा,

इस खबर से सब लोगों में चिंता और सवालों की लहर फ़ैल गई कहीं न कहीं हर कोई इस बात से प्रभावित हो रहा था, हमारा भी स्कूल का काम रुक गया था, खैर काफी देर तक इसी बारे में बातें चलती रहीं औरतों में बात गई तो वो भी कुछ घबराई तो कुछ ने समझाया। मैने रमन जीजा से कहा कि एक बार हॉल में सबको बिठा कर अच्छे से समझा दो किसी के सवाल होंगे तो वो भी पूरे हो जाएंगे।

थोड़ी देर बाद सब हॉल में कुर्सियों पर बैठे थे, रमन जीजा सामने खड़े थे और सब को लॉकडाउन और कोरोना के बारे में समझा रहे थे, बीच बीच में जिसके जो समझ नहीं आ रहा था वो सवाल भी कर रहा था,

बड़े फूफाजी: अरे बेटा पर हम सब लोग घर कैसे जायेंगे?

रमन: वो ऐसी कोई चिंता वाली बात नहीं है मैं निकलवा सकता हूं धीरे धीरे करके सबको।

मैं: अरे फूफाजी पर ये सोचो कि घर पहुंचकर करोगे क्या?

चरन सिंह: हां ये सवाल भी सही है, अब तो दुकान भी नहीं खुलेंगी तो घर जाकर भी करेंगे क्या?

उदयवीर: पर घर खाली भी तो नहीं छोड़ सकते न.

काफी देर सवाल जवाब चलते रहे इसी बीच पापा खड़े हुए और बोले: देखो जो भी है हम सब लोग ही इससे कहीं न कहीं प्रभावित हैं पर अब अगर सरकार का फैसला है तो हमें इसे मानना पड़ेगा ही तो मेरा मानना है इसे समस्या के रूप में न लेकर एक मौके की तरह लेना चाहिए,

बिमला: मौका वो कैसे?

पापा: ये समझ लो बहन जी की ये सरकार की तरफ से हमें कुछ दिन छुट्टी मिली है।

महिपाल: बिल्कुल सही, परेशान होने से अच्छा है इस समय का सही से उपयोग किया जाए और आनंद लिया जाये।

पंकज: एक चीज और अच्छी है कि हम सब लोग साथ हैं अकेले इतना समय बिताना होता तो बोर होते समझ नहीं आता क्या करना है यहां सबके साथ हैं।

राजन चाचा: और अपने गांव में हैं न अनाज की, न सब्जी की न दूध घी की किसी चीज की कमी नहीं है,

रमन: गांव में होने का एक और फायदा है कि शहर में सख्ती ज़्यादा होती है तो वहां तो घर से निकलना भी मुश्किल हो जाता, लेकिन यहां गाँव में ऐसा कोई डर नहीं है, कभी कभार कोई अधिकारी चेकिंग के लिए आया तो आया नहीं तो नहीं आया, इसलिए आराम से रहो, घूमो।

मौसा: तो तय रहा जिसे जो भी फोन वगैरह करके थोड़ी बहुत व्यवस्था करनी है कर लो, अब सब लोग यहीं रहेंगे लॉकडाउन में।

इस बात पर सब खुश हो गये, लड़कियां तो खुशी से नाच रहीं थीं। जो शहर में रहते थे उनके लिए कोई परेशानी नहीं थी जिनके गांव में पशु थे उन्हें ही थोड़ी चिंता थी, जिसमें से उदयवीर ताऊ ने एक मज़दूर को फोन कर के बोल दिया था उनकी भैंसों और गाय की देख भाल के लिए, बाकी और कोई ऐसी गंभीर समस्या नहीं थी दोपहर होते होते सब निपट चुका था पापा के कहने पर मैं और बाकी लड़के मिलकर अनाज के कई बोरे, तेल, घी और भी ज़रूरत का सामान ले आये थे,

मामा राजन चाचा स्कूल से सीमेंट और ईंटे वगैरह भर लाये और उन्होंने अपनी कला दिखाते हुए जानवरों के लिए एक लंबी सी नांद बना दी, आज शाम को तो जानवरों को वहीं रखना था क्योंकि नंद सूखने में समय लगता, इसलिए तय हुआ कि कुछ कुछ लोग रात घरों में रुक जाएंगे। नाना, उदयवीर ताऊ बाग में रुकने के लिए बोले तो उनके साथ बड़ी बुआ और मंजू ताई चली गईं, वहीं मंजू ताई के घर पर बिमला ताई, बड़े फूफाजी और पल्ली रुके थे।

राजन चाचा के यहां माधुरी ताई, मौसा और ममता चाची थीं वहीं दीनू चाचा के घर रेनू चाची, पापा और फूफाजी रुके थे, हमारे घर पर मामा, रज्जो चाची, रानी भाभी और अनुज रूके बाकी सब लोग फॉर्महाउस पर थे, रात में जो जहाँ था उसने वहीं मज़े किये अपने साथी या साथियों के साथ, अगली सुबह सब फिर से फॉर्महाउस पर थे, जानवरों की भी व्यवस्था हो चुकी थी। बस आने वाले दिन कैसे बीतेंगे इसका इंतजार था,



जारी रहेगी।
 
नाना: ओह आह बहुत अच्छा चूसती है तू बिटिया आह तेरे जैसी नातिन बहु की सेवा आह पाकर मज़ा आ रहा है,



अनुज: आह्ह्ह्ह नाना आएगी hi आह आखिर पसंद किसकी है,

ये सुन कर प्रीती के भरे हुए मुँह पर hi हलकी सी मुस्कान आयी पर उसने लुंड चूसना जारी रखा,

नाना: बदमाश कही का, हर बात पर अपनी तारीफ़ करता है,



अपडेट 265


नाना ने कुछ पल और अपनी होने वाली नातिन बहु से लुंड चुसवाया और फिर खड़े हो कर इधर उधर देखा और एक और उनकी आँखें ठहरी तो उधर hi चल दिए, नाना चलते हुए सीधे अपनी बड़की बिटिया यानि सभ्य के पास पहुँच गए जहाँ पर नीलेश और सभ्य एक बार फिर से गर्म हो चुके थे और सभ्य धीरे धीरे नीलेश के लुंड पर सवार हो कर उछाल रही थी, नाना उनके पास पहुंचे और बोले: तुम लोग आज कोने में hi बैठो रहोगे अरे भाई आज तुम्हारा दिन है, मज़े करो.

सभ्य: ऐसे hi सबको मज़ा करते देख बहुत मज़ा आ रहा है बाबा,

सभ्य नीलेश के लुंड पर उछालते हुए बोली,

नीलेश: तुम्हें तो मज़ा आ रहा है न बाबा?

नीलेश ने अपनी पत्नी के चूतड़ों को मसलते हुए पूछा,

नाना नीचे उनके बगल में सोफे पर बैठते हुए बोले: हमें मज़ा क्यों नहीं आएगा, हमारे बच्चों को खुश देख कर इतना सुखी देख कर हमसे ज़्यादा मज़े में और कोई नहीं.

सभ्य: थोड़ा सा मज़ा और करवाती हूँ बाबा, ये कहते हुए सभ्य आगे को हुई और अपने होंठ नाना के होंठों से लगा दिए, वही उसका हाथ नाना के मोठे काले लुंड पर चलने लगा,

अपनी सालगिरह पर अपने पति और अपने पिता से एक साथ आनंद लेते हुए सभ्य को सच में बहुत ख़ुशी मिल रही थी,

नीलेश: आह बाबा अब तो तुम्हे और भी मज़ा आ रहा होगा,

नीलेश अपनी पत्नी को उसके पिता के साथ बांटते हुए बोले,

तभी सभ्य ने अपने पिता के होंठों को छोड़ा और बोली: अभी तो मज़ा शुरू है बाबा का,

ये कहते हुए वो नीचे झुक गयी और अपने पिता के लुंड को मुँह में भर लिया और पुरे जोश से चूसने लगी.

नाना: ओह बिटिया, तेरे जैसी बिटिया और जमाई बाबू जैसा दामाद हो तो हर आदमी मज़े में hi रहेगा हमेशा,

नीलेश: अरे बाबा सिर्फ इसकी तारीफ़ करोगे तो शालू बुरा मान जाएगी.

नीलेश ने हँसते हुए बोलै, तो नाना भी हंसने लगे,

नाना: अरे नहीं भाई हमारी दोनों बिटिया hi बहुत अच्छी है, वैसे भी उससे हमें बड़ा दर लगता है.

नीलेश: सबको लगता है बाबा, आह आह सबसे ज़्यादा तो शैलेश बाबू को.

इस पर दोनों लोग हंसने लगे, वही सभ्य भी उनकी बातें सुनते हुए मन hi मन हंस रही थी क्यूंकि मुँह में तो उसके पिता का लुंड घुसा हुआ था,

अब जिससे ये लोग डरने की बात कर रहे थे वो अभी किसी को डरा नहीं रही थी बल्कि उल्टा मज़ा दे रही थी,

शालू एक और करवट लेकर लेती थी और उसके पीछे पंकज और प्रीती के पिता यानि पूर्वी के ससुर जी प्रकाश थे जो अपने होने वाली संधान की गांड में धीरे धीरे लुंड फंसा रहे थे,

प्रकाश: ओह ओह संधान जी आह बड़ी कासी हुई गांड है तुम्हारी,

शालू: तुम्हारा लोढ़ा भी आह बहुत सख्त है समधी जी, आह्ह्ह्ह बिलकुल बांस की तरह घुसता जा रहा है मेरी गांड में.

प्रकाश: संधान जी मेरा बस चले तो पूरा hi घुस जाऊं तुम्हारी इस मखमली गांड में, आह ये चूचियां ओह.

प्रकाश शालू की चूचियों को मसलते हुए बोले,

शालू: अरे समधी जी तुम भी न, अह्ह्ह्हह.

प्रकाश: अह्ह्ह्हह सीईई ओह्ह्ह्हह मेरी बेटी आह्ह्ह्ह बहुत भाग्यशाली है आह्ह्ह्ह जो उसे ऐसा ससुराल मिलेगा.

शालू: आह्ह्ह्ह हम भी है जो हमें ऐसे चुड़क्कड़ समधी संधान मिलेंगे.

जहाँ प्रकाश शालू के साथ मिलकर आगे के रिश्तों के सपने संजोते हुए अपने रिश्ते गहरे कर रहे थे वही उनकी पत्नी रेनू भी रिश्ते बनाने में पीछे नहीं थी और शालू के पति शैलेश के साथ रिश्ते और मज़बूत कर रही थी,

रेनू घोड़ी बानी हुई थी और हमारे शैलेश मौसा पीछे से गहरे और दमदार धक्के लगा कर रेनू की छूट में अपने लुंड को अंदर तक घुसा कर अच्छे से परिचित करवा रहे थे,

रेनू: ओह्ह्ह्ह आह भाई साहब आह्ह्ह्ह आराम से आह्ह्ह्ह तुम तो आह्ह्ह्ह जान hi ले लोगे.

शैलेश: आह्ह्ह्ह तुम्हें देख कर आह्ह्ह्ह आराम hi तो नहीं आ आह्ह्ह्ह रहा भाभी जी आह्ह्ह्ह.

रेनू: आह्ह्ह्ह भाई साहब आह बहुत मोटा और लम्बा है तुम्हारा आह्ह्ह्ह.

शैलेश: आह्ह्ह्ह तुम्हारी छूट hi कितनी कासी हुई है भाभी जी आह्ह्ह्ह लुंड तो मोटा लगेगा hi, आह्ह्ह्ह अभी तो तुम्हारी इस गांड की भी सैर करनी है,

शैलेश ने तेज़ धक्के लगते हुए कहा तो रेनू का बदन हर धक्के पर सिहर रहा था,

उनसे थोड़ी दूर hi शैलेश मौसा के मित्र और समधी यानि महिपाल थे जिन्होंने की हमारी प्यारी ममता चची को अपने ऊपर बिठा रखा था,

ममता चची महिपाल का लुंड अपनी छूट में लेकर उस पर उछाल रही थी और उनके साथ उनकी मोती चूचियां भी नाच रही थी,

महिपाल: ओह ओह ओह भाभी आह आह आह्ह्ह्ह मज़ा आ रहा है आह्ह्ह्ह.

ममता: ओह्ह्ह्ह भाई साहब, अह्ह्ह्ह मुझे भी आह्ह्ह्ह बहुत मज़ा आ रहा है आह्ह्ह्ह.

महिपाल: आह्ह्ह्ह भाभी आह्ह्ह्ह सच कहूं तो आह्ह्ह्ह जब तुम्हे पहली बार देखा आह्ह्ह्ह था तो hi सोचा था की तुम्हे छोड़ने में बहुत मज़ा आएगा,

ममता: आह्ह्ह्ह फिर जैसा सोचा वैसा मज़ा आ रहा है की नहीं आह्ह्ह्ह.

महिपाल: आह्ह्ह्ह उससे भी ज़्यादा भाभी अह्ह्ह्ह उससे भी ज़्यादा.

महिपाल नीचे से कमर उछालते हुए बोलै.

दूसरी और हमारे प्यारे मां यानि जमुना मां भी अकेला नहीं थे, और हमारी प्यारी शशि बुआ की छूट में दनादन धक्के लगा रहे थे,

उन्होंने बुआ को खड़ा करके झुका रखा था और पीछे से अपना लुंड घुसा कर उन्हें छोड़ रहे थे, बुआ के मुँह से लगातार आहें निकल रही थी.

शशि: आह ओह ओह ओह जमुना अह्ह्ह्ह बहुत मज़ा आ रहा है रे आह्ह्ह्ह बड़ा मस्त छोड़ता है तू,

जमुना: आह्ह्ह्ह जीजी तुम मानोगी नहीं अह्ह्ह्ह आज आह हमारी वर्षों की इच्छा पूरी हुई है,

शशि: अह्ह्ह्ह सीईई कौनसी इच्छा?

जमुना: ओह्ह्ह्ह जब हम जीजी को छोड़ने आते थे आह्ह्ह्ह और तुम्हें देखते थे तो मन होता था अह्ह्ह्ह की बस एक बार तुम्हार बदन मिल जाए छोड़ने को ओह्ह्ह्ह.

शशि: ओह्ह्ह्ह बड़ा छुपा रुस्तम निकला तू तो, आह्ह्ह्ह अपनी बहिन के ससुराल में उसकी ननद पर नज़र रखता था,

जमुना: अब जीजी तुम ओह्ह्ह्ह हो hi ऐसी की नज़र अह्ह्ह्ह हटती hi नहीं,

शशि: ओह्ह्ह्ह वैसे सच बताऊँ तो अगर तू कोशिश करता तो काम बन सकता था तेरा आह्ह्ह्ह पर कोई बात नहीं तब नहीं तो अब सही,

जमुना: सच में जीजी आह्ह्ह्ह तुम मुझे छोड़ने देती? वैसे सही कहा तब नहीं तो अब सही, अह्ह्ह्ह मुझे तो ये सोच कर मज़ा आ रहा है,

शशि: क्या सोचकर आह

जमुना: आह्ह्ह्ह यही की अब तक जीजू मेरी बहिन छोड़ते थे आज मैं उनकी बहिन छोड़ रहा हूँ.

ये सुन कर शशि हंसने लगती है और जमुना भी.

दूसरी और एक कोने में हमारा hi हीरो कर्मा था जिसका लुंड अभी चंचल की माँ यानि बिमला की छूट में अंदर बहार हो रहा था वही उनकी टांगों के बीच अंजलि थी जो की कर्मा की गोलियों को चूस रही थी

बिमला: ओह ओह ओह बच्चा तुम दोनों अह्ह्ह्ह बहुत अच्छे हो आह्ह्ह्ह

कर्मा: अच्छी तो तुम्हारी छूट है तै आह्ह्ह्ह, कितनी गरम है आह्ह्ह्ह

अंजलि: सच में और बहुत स्वादिष्ट भी लग रही है,

अंजलि ने मुँह कर्मा की गोलियों से हटते हुए कहा,

कर्मा: तुम्हें चखनी है तै की छूट अंजलि?

अंजलि: अह्ह्ह्ह हाँ बिलकुल,

ये कहते हुए अंजलि ने कर्मा का लुंड पकड़ कर बिमला की छूट से निकाल दिया और मुँह में भर लिया और कुछ पल चूसने के बाद उसके टोपे को बिमला की गांड के छेड़ पर लगा दिया, और कर्मा ने धक्का लगा कर उसे अंदर तेल दिया, बिमला की अह्ह्ह्ह निकल गयी, वही अंजलि ने तुरंत अपना मुँह बिमला की छूट पर लगा दिया और चाटने लगी,

कर्मा बिमला की गांड मरने लगा, बिमला इस दोहरे मज़े से मचलते हुए आहें भरने लगी.

कर्मा: आह तै इतनी गरम छूट है तुम्हारी अह्ह्ह्ह गाओं में कैसे शांत रह पाती हो, आह ताऊजी काफी पड़ते हैं?

बिमला: ओह्ह्ह्ह बच्चा आह्ह्ह्ह पहले तो काफी पड़ते थे पर अह्ह्ह्ह जबसे जीवन में आह्ह्ह्ह ये बदलाव आया तबसे इस मुई छूट की प्यास hi नहीं बुझती आह्ह्ह्ह.

कर्मा: फिर क्या करती हो?

बिमला: अह्ह्ह्ह एक बगल का छोकरा है वो छोड़ जाता है और एक दो खेत में काम करने वाले मज़दूर हैं वो सेवा आह कर जाते हैं थोड़ी.

कर्मा: अह्ह्ह्ह सीईई तै सही है तो ये है तुम्हारी ख़ुशी का कारण.

बिमला: आह अब जो कहले लल्ला, अह्ह्ह्ह वैसे खुश तो तेरी माँ लग रही है देख कितनी आह्ह्ह्ह और होना भी चाहिए इतना अच्छा परिवार है, और सालगिरह पर अपने पति और बाप के साथ है एक साथ.

बिमला ने इशारा करते हुए कहा तो कर्मा ने उस और देखा जहाँ सोफे पर उसकी माँ उसके नाना और पापा से एक साथ चुद रही थी

नाना का लुंड सभ्य की गांड में अंदर बहार हो रहा था वही नीलेश का लुंड उसके मुँह में था जिसे वो चूस रही थी,

कर्मा के चेहरे पर उन्हें देख कर मुस्कान आ गयी, उसके धक्के पर लगातार बिमला की गांड में लग रहे थे,

अंजलि बिमला की छूट को पूरी लगन से चाट रही थी और इस दोहरे हमले का असर बिमला पर ये हुआ की वो जल्दी hi झड़ने लगी उसके झड़ते hi कर्मा ने उसकी गांड से लुंड निकाला और अंजलि को उसके ऊपर लिटा कर उसकी गांड में लुंड घुसा दिया, अंजलि कर्मा का लुंड लेते hi आहे भरने लगी वही बिमला के मुँह के ऊपर अंजलि की छूट थी जिसे वो चाटने लगी.

अंजलि: ओह ओह आह ऐसे hi आह तै आह्ह्ह्ह चाटो, ओह्ह्ह्ह बहुत मज़ा आ रहा है बाबू ओह गांड मरते रहो.

कर्मा: ओह मेरी जान तुम्हारी गांड मरने में हमेशा hi मुझे बहुत मज़ा आता है, आह्ह्ह्ह. ी लव यू मेरी रैंड आह्ह्ह्ह.

अंजलि: ी लव यू तू मेरे छोड़ू.

जहाँ इन दोनों प्रेमियों की प्यार और हवस भरी बातें चल रही थी तो वही बिमला दोनों के बीच थी उनकी सेवा कर रही थी, दूसरी और सभ्य नीलेश और नाना के बीच भी अब आसान बदल चूका था सभ्य जहाँ अपने पिता के लुंड को अपनी छूट में लेकर बैठी थी वही उसके पति नीलेश उसकी गांड में लुंड घुसा रहे थे

एक साथ दो लम्बे और मोठे लुंड लेकर सभ्य आहें भर रही थी और ये लुंड उसके पति और पिता के थे ये अहसास उसे और आनंदित कर रहा था

नीलेश: आह आह आह आह आह बाबा का लुंड छूट में होने से आज तो तेरी गांड और कासी हुई लग रही है मेरी रैंड आह्ह्ह्ह,

सभ्य: आह आह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह कर्मा के पापा आह्ह्ह्ह ऐसे hi छोड़ो अपनी रैंड को आह्ह्ह्ह बाबा और तेज़ धक्के लगाओ आह्ह्ह्ह फाड़ दो मेरे छेदों को आह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह.

नाना: आह्ह्ह्ह कहने की ज़रूरत नहीं है आह्ह्ह्ह बिटिया अह्ह्ह्ह तुझे देख कर रुका hi नहीं जा रहा आह्ह्ह्ह आज तुझे नहीं छोडूंगा, आह्ह्ह्ह.

पूरा फार्महाउस चुदाई की थापें और आहों से गूंज रहा था वो तो अच्छा था गाओं से दूर था और जंगल के बीच नहीं तो इनकी आवाज़ें बहार ज़रूर गयी होती, देर रात तक चुदाई चलती रही और फिर लोग थक कर जिसको जहाँ जगह मिली वहां सो गए.

इसके आगे की कहानी हमारे दोस्त कर्मा की ज़ुबानी सुनते हैं.

(कर्मा की ज़ुबानी)

रात को अंजलि और बिमला तै को जी भर के छोड़ने के बाद और बिमला तै को अपना रास पिलाने के बाद मैं दोनों से चिपक कर सो गया सुबह आस पास तेज़ बातों की आवाज़ से नींद खुली आँखें खोल कर देखा तो मैं अकेला hi सो रहा था अच्छे से आँखें खोली और इधर उधर देखा तो अधिकतर लोग उठ चुके थे कुछ बातें कर रहे थे कुछ चाय की चुस्किआन ले रहे थे, मैं भी उठ कर बैठ गया तो ममता चची जो सबको चाय बाँट रहीं थी उन्होंने मुझे भी चाय दी, मैं चाय का कप लेकर उठा और बहार की और चल दिया,

हर तरफ लोग थे कोई कुछ कर रहे थे कोई कुछ फार्महाउस की बहार की दीवारें ऊँची थी और पेड़ों से ढंकी हुई भी थी तो किसी के बहार से देखने की कोई चिंता नहीं थी बाकी पिछले 10 दिनों में हम लड़कों ने इसी पर काफी काम किया था जिससे फार्महाउस की सेफ्टी और गोपनीयता बानी रहे, खूब हंसी मज़ाक का माहौल था, पेड़ों के नीचे ठंडी हवा में कुर्सियां लगा कर सब बड़े बैठे थे और साथ में चाय पकोड़े चल रहे थे, मैंने भी सब से थोड़ी बहुत बात की कुछ लोग आज निकलने की बात कर रहे थे और पापा, राजन चाचा मौसा वगैरह सब लोग उनसे एक दिन और रुकने का आग्रह कर रहे थे, खासकर चरण सिंह और उदयवीर ताऊ क्यूंकि दूकान अदि का काम था वही बड़े फूफाजी को भी दूकान खोलनी थी,

अपनी चाय निपटने के बाद मैं अंदर की और चला सुबह के काम निपटने के लिए लोग, ज़्यादा थे तो नीचे हॉल के बाथरूम पहले से बंद थे तो मैं अंदर एक कमरे की और चला वहां गेट खोल कर देखा तो बिस्तर पर बढ़िया सन चल रहा था,

बिस्तर पर मेरी प्यारी छोटी बहिन किरण थी जो की अपनी होने वाली भाभी प्रीती के ऊपर चढ़ी हुई थी ुर उसके नरम रसीले होंठों को चूस रही थी, प्रीती भी उसका पूरा साथ दे रही थी, दोनों के बदन पर छोटे छोटे शॉर्ट्स और टॉप थे उन दोनों को देख कर hi मेरा मन डोलने लगा, उन दोनों ने भी मेरी और देखा मैं दरवाज़ा खोल कर खड़ा था,

किरण: अरे भैया क्या है या तो अंदर आओ या बहार जाओ देख नहीं रहे मेरा और प्रीती भाभी का ज़रूरी काम चल रहा है.

ये सुन प्रीती भी मुस्कुरायी और मैं भी,

मैं: हाँ भाई करले तू अपना ज़रूरी काम जाता हूँ मैं. वैसे भी मैं बाथरूम के लिए आया था,

किरण: वो तो खली नहीं है, फूफा हैं अंदर? नीतू दीदी के पापा.

मैं: अच्छा ठीक है तुम लोग करो अपना ज़रूरी काम

एक बार को तो मेरा मन हुआ उनके बीच घुस जाऊं पर खुद को थोड़ा सख्त लौंडा बनाते हुए मैं पीछे हैट गया और दरवाज़ा बंद कर दिया, मैंने सोचा की लगता है ऊपर वाले कमरों में hi कोई खली मिलेगा यहाँ तो सब भरे पड़े हैं, कमरे से बहार आया और सीढ़ियों की और बढ़ hi रहा था की हॉल में एक और से आती आवाज़ों से मेरा ध्यान उस और गया,

जहाँ मैंने देखा रज्जो चची झुकी हुई थी साडी कमर तक उठी है थी ब्लाउज़ के बस दो बटन लगे थे जिससे उनके आधे चुके नज़र आ रहे थे उसके नीचे मांसल नंगा पेट गोल गहरी नाभि, वही उनके पीछे कोई था जिसका चेहरा मुझे नज़र नहीं आ रहा था जो उनको दनादन छोड़ रहा था और कुछ धक्कों बाद hi चची की एक तेज़ और लम्बी चीख निकल गयी, उनका बदन कांपने लगा उनकी छूट थर्राने लगी और वो झड़ने लगी, जब चची झाड़ गयी तो जो भी उनके पीछे था उसने उनकी कमर को छोड़ा और चची नीचे लेट गयी, तब नज़र आया उनके पीछे विनीत था जो चची को ऐसे छोड़ रहा था,

वो भी मुस्कुराते हुए और हाँफते हुए नीचे बैठ गया और बोलै: ओह आह ममी मज़ा आ गया न जाने कब से तुम्हे ऐसे छोड़ना चाहता था,

रज्जो: ओह लल्ला सच में मज़ा आ गया तुमने तो अंदर तक हिला कर रख दिया.

विनीत आगे होकर रज्जो चची के होंठों को चूसने लगा, अरे मैं इनकी चुदाई में अपना काम तो भूल hi गया और मैं मुद कर ऊपर की और चल दिया, ऊपर पहुंचा भी नहीं था की पहले से hi मुझे आवाज़ें आ रही थी और जिन्हें सुन कर कोई भी बता सकता था वो किस चीज़ की थी,

ऊपर पहुँच कर मैंने देखा हॉल तो खली था पर आवाज़ें कमरों से आ रही थी, मैंने तुरंत आगे बढ़ कर पहला कमरे का गेट खोला तो सामने का नज़ारा कुछ ऐसा था,

मेरे सामने रिमझिम जीजी की सास माधुरी थी उन्होंने एक निघ्त्य पहनी हुई थी जो सामने से खुली हुई थी और उनकी चूचियां पूरी नंगी बहार थी, वो मेरी और मुँह किए हुए एक आदमी के लुंड को अपनी गांड में लेकर उछाल रही थी, इस आदमी का चेहरा भी मुझे नहीं दिख रहा था, पर इस बार मैंने ज़्यादा देर सोचा नहीं और कमरे के अंदर आ गया मुझे देख माधुरी तै मुस्कुरायी और बोली: आह उठ गया लल्ला,

मैं: हाँ तै बस बाथरूम जा रहा था

मैंने आगे बढ़ते हुए कहा और मुझे उस आदमी का चेहरा भी नज़र आ गया वो और कोई नहीं बल्कि मेरे नाना थे जिनके लुंड पर माधुरी तै कूद रही थी.

नाना मुझे देख और मेरी बात सुन बोले: बीटा ये भी खली नहीं है, इसमें मंजू नाहा रही है,

मैं: कोई बात नहीं तुम लोग लगे रहो मैं दूसरे में चला जाता हूँ, ये कहके मैं कमरे से निकल गया, और दूसरे कमरे में घुसा तो यहाँ भी मस्त नज़ारा था, दरवाज़े से थोड़ा आगे hi ज़मीन पर hi मेरी होने वाली भाभी ख़ुशी पूरी नंगी लेती थी

और उनके पैरों के बीच में मेरे मां थे जो उनकी कासी हुई छूट में अपना लुंड चला रहे थे, ख़ुशी भाभी अपनी मस्त चूचियों को मसलते हुए आहें भर रहीं थी और चुदाई का मज़ा ले रही थी, वही मां तो इतनी मस्त छूट पाकर बिलकुल मज़े में थे

मां: ओह ओह ओह ख़ुशी बिटिया अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह बहुत सुन्दर है तू, बड़ा मज़ा आ रहा है तुझे छोड़ने में, आह तेरी कासी हुई छूट को अपने लुंड से भेदने में अह्ह्ह्ह.

मां उत्तेजित होकर बोल रहे थे तो ख़ुशी भी आहें भरते हुए उनका साथ दे रही थी,

ख़ुशी: ओह मां ओह्ह्ह्ह मुझे भी बहुत मज़ा आ रहा है आह्ह्ह्ह अरे कर्मा भैया आह्ह्ह्ह आओ न आह्ह्ह्ह.

ख़ुशी भाभी ने मुझे दरवाज़े पर खड़ा देख कर कहा,

मैं उन्हें देख कर रुक नहीं पाया और आगे बढ़ कर अंदर गया, और नीचे बैठ गया उन दोनों के बगल में और हाथ बढ़ा कर उनकी चूचियों को मसलने लगा,

ख़ुशी: ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह ऐसे hi आह्ह्ह्ह भैया,

मां: बहुत मस्त बहु है न भांजे विनीत की, बिलकुल राबड़ी जैसी,

मां उसकी छूट में धक्के लगते हुए बोले,

मैं: हाँ मां है तो सही,

मैंने झुक कर बोलै और ख़ुशी के होंठों पर अपने होंठ मिला दिए और उसके रसीले होंठों को चूसने लगा, पागलों की तरह.

वो भी मेरा साथ देने लगी, इसी बीच कमरे के अंदर जो बाथरूम था उसका दरवाज़ा खुला, और मैंने सर उठा कर देखा तो वो चंचल दीदी थी जो ब्रा और पेटीकोट में कड़ी थी और मुझे देख मुस्कुरायी

चंचल: अरे तू कब आया?

मैं: बस अभी तुम कब से हो अंदर?

चंचल: मैं तो नाहा चुकी तुझे जाना है तू चला जा,

मैं खड़ा हुआ और उनकी और बढ़ा, उनका भीगा बदन सिर्फ ब्रा और पेटीकोट में देख कर मेरा लुंड बिलकुल तन कर खड़ा हो गया जो पहले से hi ख़ुशी भाभी को चूमते hi फुदक रहा था,

मैं: मैं जाऊँगा तो पर पहले अपनी दीदी से तो मिल लून.

चंचल: हाँ दीदी से मिलना तो रह hi गया न तेरा.

मैं: और क्या,

ये कहते हुए मैंने उन्हें बाहों में भर लिया और बाथरूम के अंदर घुस गया और पीछे से उनसे चिपक गया, मेरा लुंड उनके भरे हुए चूतड़ों में चुभने लगा,

चंचल: येहममम तू तो पहले से तैयार है,

मैं: तुम्हे देख कर कौन तैयार नहीं होगा,

जहाँ हमारी बातें हो रही थी वही मां और ख़ुशी भाभी की चुदाई लगातार जारी थी,

मैंने चंचल दीदी के गले और गालों की चाटना शुरू कर दिया मेरे हाथ उनकी कमर और छाती को मसलने लगे जिससे उनकी ब्रा का एक स्ट्राप सरक गया और उनकी एक चुकी बहार छलक पड़ी.

मैं पागलो की तरह उनके बदन को चाटते और मसलते हुए अपना लुंड उनके चूतड़ों में पेटीकोट के ऊपर से hi घुसाने लगा,

चंचल: ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह सीईई ओह्ह्ह्ह कर्माआ बहुत गरम है तू अह्ह्ह्ह.

मैं: ओह जीजी गरम तो तुम हो नहाने के बाद भी आह्ह्ह्ह कितनी गरम हो.

वही कमरे में ख़ुशी भाभी की चीखें लगातार तेज़ होती जा रही थी क्यूंकि मां के धक्के भी उनकी छूट में तूफानी होते जा रहे थे,

ख़ुशी: ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह सीईई आह्ह्ह्ह मामाआ छोड़ो अह्ह्ह्ह ऐसे hi ओह्ह्ह्ह फाड़ दो अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह

मां: ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह बिटियाआआअ ओह मज़ा आ गया अह्ह्ह्ह मैं झड़ने वाला हूँ.

ख़ुशी: ओह्ह्ह्ह मां मैं अह्ह्ह्ह भी आयी ओह ओह ओह आआआह.

और फिर मां ने कुछ करारे धक्के ख़ुशी भाभी की छूट में लगाए और फिर झड़ने लगे ख़ुशी भाभी का बदन भी अकड़ते हुए ढीला पद गया, दोनों hi झाड़ कर शांत हो गए और वही लेट कर हांफने लगे,

मैं: दीदी आह्ह्ह्ह अब रुका नहीं जा रहा मुझे तुम्हारी गांड मारनी है,

चंचल: तो रुका क्यों है तू घुसा दे अपना मोटा लुंड अपनी रंडी दीदी की गांड में और अच्छे से मार.

चंचल दीदी ने गरम होते हुए कहा और मेरे लिए इतना काफी था,

मैंने उनका पेटीकोट पीछे से उठाया और उनके गीले चूतड़ों के बीच अपना लुंड घुसा दिया जिसे उन्होंने अपने हाथ से पकड़कर अपनी गांड के छेड़ पर रखा और मैंने धक्का लगा कर टोपा अंदर सरका दिया, हम दोनों के मुँह से आह निकल गयी, मैं धीरे धीरे धक्के लगते हुए अपने लुंड को उनकी गांड में घुसाने लगा साथ hi उनका बदन चाटते हुए,

मां और ख़ुशी भाभी भी थोड़ी देर हांफने के बाद उठ कर बैठ गए थे, इतने में कमरे का दरवाज़ा खुला और बहार माँ थी जिन्होंने मां और ख़ुशी भाभी को देखा और बोली: जमुना तू अभी भी यहीं है कितनी देर पहले बोल था घर से आते का कट्टा उठा ला.

मां तुरंत उठे और बोले: अरे हाँ जीजी, वो ख़ुशी बिटिया दिख गयी तो ध्यान नहीं रहा अभी जाते हैं,

मां फुर्ती से कमरे से बहार निकल गए और हम लोग उन्हें देख हंस रहे थे, फिर माँ बोली: ख़ुशी बिटिया चल तू नाश्ता वगैरा कर ले इन लोगों का तो ये लगा रहेगा, चंचल और कर्मा तुम लोग भी जल्दी निपट कर आना.

चंचल: ओह्ह्ह्ह ठीक है ममी तुम चलो आह्ह्ह्ह हम लोग आते हैं,

माँ ख़ुशी भाभी के साथ निकल गयीं, और मैं चंचल दीदी की गांड मरने में लगा रहा,

इधर माँ जैसे hi ख़ुशी के साथ कमरे से निकल कर हॉल की और बढ़ रही थी अचानक किसी ने उन्हें पकड़ा और खींच लिया, माँ गिरने को हुई तो उन्होंने कमरे के दरवाज़े की दहलीज़ को पकड़ लिया और वही दो हाथ उनकी कमर पर कास गए, माँ ने चेहरा घुमा कर देखने की कोशिश की और जैसे hi देख कर कुछ बोलना चाहा तब तक तो उनके होंठों को होंठों ने कास लिया था और चूसने लगे थे,

ये और कोई नहीं बल्कि हमारे प्यारे फूफाजी थे शशि बुआ के पति जो की माँ की कमर को मसलते हुए उनके होंठों को चूसने लगे,

माँ भी उनका साथ दे रही थी, फूफाजी के हाथ उनकी कमर को मसल रहे थे, वही ख़ुशी भाभी रुक कर अपने होने वाले ससुर को और माँ को देख रही थी, कुछ देर बाद दोनों के होंठ अलग हुए तो माँ बोली: तुमने तो बिलकुल डरा hi दिया था,

फूफाजी: अरे अपनी सलहज को डरना दबाना तो चलता रहता है हमारा हक़ है ये तो.

माँ: अरे जाओ बढे आये हक़ लेने वाले,

फूफाजी ने ख़ुशी को कहा: बिटिया तू जा, अब तेरी ममी तो हक़ देके hi जाएगी.

ख़ुशी अपने होने वाले ससुर की बात सुनकर मुस्कुराते हुए चली गयी, वही फूफाजी माँ के बदन को भोगने में लग गए,

अंदर मैंने चंचल जीजी को पूरा नंगा कर दिया था और वो अभी नीचे बैठ कर मेरा लुंड चूसते हुए उस पर से अपनी गांड का स्वाद ले रही थी,

उनके गरम मुँह में लुंड देकर मुझे भी बहुत मज़ा आ रहा था, बीच बीच में दूसरे लोग भी कमरे में आ रहे थे और जा रहे थे पर हमारी चुदाई लगातार चल रही थी, चंचल दीदी को जब मैंने पहली बार देखा था तो कितनी सरल भोली भली सी औरत लगती थी पर आज उनका पूरा रूप बदल चूका था, वैसे भोली भली तो वो अब भी थी और बहुत प्यारी भी बस उनके अंदर की गर्मी अब बहार निकल के आ चुकी थी और सब को hi बहुत भ रही थी.

मैं: आह्ह्ह्ह दीदी ओह्ह्ह्ह पूरा अंदर लो न आह्ह्ह्ह

चंचल: ओह्ह्ह कितना लम्बा है तेरा, पूरा लिया hi नहीं जा रहा,

दीदी पूरी कोशिश कर रही थी मेरा लुंड पूरा अपने मुँह में लेने की उनकी आँखों से आंसू निकल रहे थे मुझे उनकी भूख देख कर अच्छा लग रहा था,

वही बहार फूफाजी ने माँ की साडी का पल्लू नीचे सरका दिया था और अब खुद झुक कर माँ के पेट को चाट रहे थे और चुम रहे थे साथ hi उनकी कमर और चूचियों को मसल रहे थे,

फूफाजी: ओह भाभी अह्ह्ह्ह क्या मलाई जैसा बदन है तुम्हारा आह्ह्ह्ह मन करता है पूरा चाट जाऊं,

माँ: ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह सीईई तो कौन रोक रहा है जमाई राजा ओह्ह्ह्ह चाट जाओ नाहः.

फूफाजी: अब तो चाट hi जाऊँगा ओह्ह्ह्ह, अह्ह्ह्ह

फूफाजी ने पकड़ कर माँ का ब्लाउज़ उतार दिया और उनकी बड़ी बड़ी चूचियां बहार निकाल ली और उन्हें पागलों की तरह बारी बारी से चूसने लगे,

इधर मैंने चंचल दीदी को अब बाथरूम से निकाल कर बिस्तर पर लिटा लिया था और उनकी टांगों के बीच खड़ा होकर उनकी रसीली गरम छूट में लुंड घुसा दिया और उन्हें छोड़ रहा था,

वो अपनी चूचियों को थामे आहें भर रही थी और मुझे और जोश दिला रही थी

चंचल: ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह करमाह आह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह कितना लम्बा है आह्ह्ह्ह अंदर तक जा रहा है आह्ह्ह्ह ऐसे hi छोड़ अपनी रंडी प्यासी दीदी को ओह.

मैं: हाँ अहह मेरी प्यासी ओह्ह्ह्ह रंडी दीदी, अह्ह्ह्ह ले अपने भाई का लुंड आह्ह्ह्ह अपनी गरम छूट में अह्ह्ह्ह, कितनी गरम छूट है तेरी ओह्ह्ह्ह.

चंचल: ओह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह तो इस गरम छूट की गर्मी मिटा दे अह्ह्ह्ह आज दिखा दे मुझे तू कितना बड़ा भेनचोद है अह्ह्ह्ह छोड़ अपनी बहिन को.

मैं: ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह साली रंडी कुटिया आह्ह्ह्ह आज तुझे छोड़ छोड़ के तेरी छूट का भोसड़ा बना दूंगा रंडी की औलाद.

चंचल: आह हाँ हाँ बना दे आह आह्ह्ह्ह हाँ मैं हूँ आह रंडी की औलाद अह्ह्ह्ह मेरी अह्ह्ह्ह माँ रैंड है आह्ह्ह्ह पुरे गाओं के लुंड लिए हैं कुटिया ने अपने भोसड़े में.

हम दोनों एक दूसरे को ऐसी बातें करते हुए और उकसा रहे थे, मैं उनकी कमर को थाम कर दनादन धक्के लगा रहा था दीदी की चूचियां लगातार नाच रही थी.

बहार फूफाजी भी माँ की चूचियों को चूसने के बाद उनकी साडी और पेटीकोट को कमर तक उठाकर उनकी छूट चाट रहे थे और माँ उनकी जीभ पर सिहर रही थी, फूफाजी के हाथ माँ के चूतड़ों को कास रहे थे, फिर कुछ देर और चाटने के बाद वो खड़े हुए और माँ को बिस्तर की और लेकर चल दिए,

फूफाजी: बहुत दिन हो गए भाभी तुम्हारी छूट की सैर किए हुए आह्ह्ह्ह अब रहा नहीं जाता,

माँ: तो रहने को कह कौन रहा है जी भर के सैर कर लो.

फूफाजी ने अपने कपडे उतारने शुरू कर दिए और पुरे नंगे होते हुए बोले: अह्ह्ह्ह भाभी देखो तो लुंड कैसे तुम्हे देख कर ठुमके मार रहा है.

माँ ने भी अपनी साडी और पेटीकोट उतार दिए और पूरी नंगी हो गयी और बोली: अह्ह्ह्ह लाओ इसे मैं भी तो देखूं.

ये कहते हुए माँ उनके आगे बैठ गयी और फूफाजी के लुंड को पकड़ कर उसके सिरे पर अपनी जीभ फिरै तो फूफाजी आहें भरने लगे, फिर माँ ने उनके टॉप को मुँह में भर लिया और चूसने लगी, और फिर धीरे धीरे करके पूरा लुंड चूसने और चाटने लगी.

फूफाजी: आह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह भाभीईई अह्ह्ह्ह बहुत मस्त चूसती हो तुम.

माँ ने कुछ नहीं कहा और चूसने में लगी रही, फूफाजी आहें भरते रहे और फिर उनसे नहीं सहा गया तो उन्होंने माँ को उठाया बिस्तर पर झुका दिया और पीछे से उनकी छूट में अपना लुंड घुसा दिया और कमर थाम कर ताबड़तोड़ छोड़ने लगे,

फूफाजी: ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह सीईई ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह थोड़ा आह लेट हो गए अह्ह्ह्ह नहीं तो मैं hi ब्याह लेता तुम्हे भाभी अह्ह्ह्ह फिर मेरे साथ होती सालगिरह,

माँ: अह्ह्ह्ह ब्याहने की क्या ज़रूरत है आह्ह्ह्ह पति वाले सारे सुख तो अह्ह्ह्ह मिल रहे हैं,

फूफाजी: अह्ह्ह्ह फिर भी अह्ह्ह्ह तुम्हे बीवी बना कर अह्ह्ह्ह छोड़ने का अपना अलग मज़ा आता आह्ह्ह्ह.

माँ: आह्ह्ह्ह तो अभी ले लो मज़ा आह्ह्ह्ह ऐसे hi छोड़ो अह्ह्ह्ह: विनीत के पापा अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह.

फूफाजी: अह्ह्ह्ह मेरी रानी क्या मस्त छूट है तेरी अह्ह्ह्ह जितना छोड़ू मन hi नहीं भरता,

माँ: आह्ह्ह्ह अब तो आह इतने साल हो गए अह्ह्ह्ह अब तो मन भर गया होगा,

फूफाजी: अह्ह्ह्ह नहीं भरता मेरी जान अह्ह्ह्ह.

माँ: तो छोड़ो अह्ह्ह्ह: विनीत के पापा अह्ह्ह्ह अपनी बीवी को आह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह

माँ और फूफाजी की ये रोलप्ले वाली चुदाई चल रही थी वही मैं दूसरी और चंचल दीदी के मुँह और चेहरे पर अपना रास छोड़ रहा था

मैं: आह दीदी मज़ा आ गया,

मैंने हाँफते हुए बोलै तो दीदी ने भी मेरे लुंड को ऊपर से नीचे अच्छे से छाता और बोली: पर देख तूने मेरी क्या हालत की है नहायी थी मैं अभी अभी.

मैं: आ जाओ फिर से नाहा लेते हैं,

चंचल: नहाना तो पड़ेगा hi चल.

जहाँ हम लोग नहाने के लिए फिर से बाथरूम में घुस जाते हैं वही फूफाजी भी थोड़ी देर बाद माँ की छूट में झाड़ रहे होते हैं और हाँफते हुए उनके ऊपर लेट जाते हैं, जब मैं और चंचल दीदी नाहा कर निकलते हैं कमरे से तभी देखते हैं की माँ भी अपनी साडी पेहेन रही थी और फूफाजी अपने कपडे, माँ मुझे देखती है और कहती है: कर्मा सुन बाकी कमरों में देख ले कोई रह गया हो नाश्ते के लिए तो नीचे ले आ.

फूफाजी: हमने तो सुबह सुबह hi राबड़ी खा ली.

फूफाजी माँ को छेड़ते हुए कहते हैं,

माँ: चलो तुम भी नीचे चलो और खिलाती हूँ राबड़ी, आ जा चंचल बिटिया तू भी चल.

माँ फूफाजी और चंचल दीदी के साथ नीचे चली जाती हैं और मैं दूसरे कमरों में देखने लगता हूँ, पहले कमरे से बड़ी कामुक आवाज़ें आ रही थी मैं झाँक कर देखता हूँ तो उतना hi कामुक नज़ारा था

बिस्तर पर अंजलि की भाभी रानी अपनी पीठ के बल लेती हुई थी ब्लाउज़ खुला हुआ था साडी भी आधी खुली थी बस बदन से लिपटी हुई थी और उनकी टांगों के बीच पंकज जीजाजी थे जो उनकी जांघों को थाम कर दनादन धक्के लगा कर उन्हें छोड़ रहे थे और उनकी चूचियों को नचा रहे थे.

मैं: सुबह सुबह hi काम पर लग गए जीजाजी,

मैंने कमरे में घुसते हुए कहा,

पंकज: आह अच्छा हमसे पहले तो तुम ओह्ह्ह्ह लगे हुए थे चंचल भाभी के साथ तुम लोगों को देखकर हमारा भी मन हो गया,

रानी: ओह्ह्ह्ह हाँ मैं तो यहाँ अह्ह्ह्ह बिस्तर झाड़ रही थी की अह्ह्ह्ह सीईई जीजाजी ने आ कर मुझे hi बिस्तर पर बिछा अह्ह्ह्ह दिया.

मैं: अरे कोई नहीं भाभी लगी रहो वैसे भी तुम्हारा बदन छुड़वाते हुए बड़ा मस्त लगता है

मैंने उनकी दोनों चूचियों को थामते हुए कहा,

रानी: और वैसे नहीं लगता, अह्ह्ह्ह

मैं: हर तरीके से माल हो भाभी तुम क्यों जीजा.

पंकज: अरे सही में यार देखते hi लुंड खड़ा हो गया ऐसा माल,

मैं: अच्छा जब तुम दोनों लोगों का प्रोग्राम निपट जाए तो नीचे आ जाना नाश्ते के लिए.

जीजा: अह्ह्ह्ह ठीक है.

मैं कमरे से निकल गया और दूसरे कमरे में घुस गया, जहाँ भी चुदाई का खेल चल रहा था, रिमझिम दीदी बिस्तर पर घोड़ी बन कर झुकी हुई थी और रानी का पति यानि पियूष पीछे से उन्हें छोड़ रहा था,

दीदी के बदन पर सिर्फ उनका पेटीकोट था जो कमर पर इकठ्ठा हो रखा था, दोनों का बदन पसीने से गीला था हर धक्के पर रिमझिम दीदी की चूचियां लहरा रही थी,

पियूष: ओह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह रिमझिम आह्ह्ह्ह मेरी जान ओह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह बड़ी मज़ेदार हो तुम.

रिमझिम: ओह अह्ह्ह्ह तुम भी अह्ह्ह्ह भैया अह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह सीईई मज़ा आ रहा है ऐसे hi करते रहो.

पियूष: अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह हाँ अब चहुँ तो भी नहीं रुक पाऊंगा,

रिमझिम: नहीं रुकना आह्ह्ह्ह रुकना नहीं आह्ह्ह्ह नहीं तो गांड अह्ह्ह्ह फाड़ अह्ह्ह्ह दूंगी.

मैं उसी समय कमरे में घुसा और उनकी गाली सुनकर बोलै: अरे वाह दीदी सुबह सुबह hi गरियाने लगी.

रिमझिम: आह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह तेरा आह्ह्ह्ह साला अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह रुकने की बात कर रहा था.

पियूष: अह्ह्ह्ह नहीं भाई कर्मा ओह्ह्ह्ह तेरी दीदी आह्ह्ह्ह मैं चहुँ तो भी नहीं आह्ह्ह्ह रुक सकता.

मैं: अरे वो तुम लोग जानो पर जब रुक जाओ तो नाश्ते के लिए आ जाना माँ ने बोलै है.

मैं उन लोगों की छोड़ कर कमरे से निकल गया, अब अगले कमरे में बढ़ कर देखा तो पल्ली थी जो की किसी आदमी के मुँह पर बैठी हुई अपनी छूट उसके चेहरे पर घिस रही थी

आदमी की जीभ पर अपनी छूट घिसते हुए अपनी चूचियों को मसलते हुए आहे भर रही थी,

पल्ली: आह्ह्ह्ह ताऊजी ओह्ह्ह्ह मज़ा आ रहा है अह्ह्ह्ह सीईई

मैं आगे बढ़ा और झाँक कर देखा तो उसके चूतड़ों के नीचे मुझे प्रकाश ताऊजी दिखे, पंकज और प्रीती के पिता और पूर्वी दीदी के ससुर,

मैं: अरे तू ताऊजी के मुँह पर बैठी है उन्हें नाश्ता करवाना है.

मैंने आगे बढ़ते हुए बिस्तर के पास आकर कहा तो उसने मुझे देखा और मुस्कुराते हुए बोली: अह्ह्ह्ह भैया मैं अह्ह्ह्ह भी तो नाश्ता hi करवा रही हूँ, क्यों ताऊजी कैसा है नाश्ता?

इस पर प्रकाश ताऊजी ने उसकी छूट से मुँह हटाया और बोले: बहुत स्वादिष्ट है बिटिया अह्ह्ह्ह ऐसा नाश्ता सबसे बढ़िया और अच्छा होता है,

कहते हुए उन्होंने बापिस मुँह पल्ली की छूट पर लगा लिया, मैंने आगे झुक कर बारी बारी से उसकी चूचियों को कुछ पल के लिए चूसा फिर चुदाई के बाद नीचे आने के लिए बोल कर निकल गया, अगले कमरे में बिस्तर पर अनुज मेरी सासु माँ सविता को जकड कर लेता हुआ था

सासु माँ की साडी कमर तक उठी हुई थी और अनुज उनके पीछे लेटकर उनकी गांड में लुंड अंदर बहार कर रहा था,

सविता: आह आह आह ओह्ह्ह्ह लल्ला ऐसे hi आह्ह्ह्ह करता रह.

अनुज: अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह मम्मी जी ओह्ह्ह्ह इतनी कासी गांड है तुम्हारी अह्ह्ह्ह.

मैं: होगी नहीं आखिर मेरी सासु माँ हैं,

मैंने कमरे में घुसते हुए हंसकर कहा,

अनुज: मेरी भी हैं, क्यों मम्मी जी,

सविता: हाँ मेरे लाल आह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह बिलकुल दोनों की हूँ आह्ह्ह्ह.

मैं उनके पास बिस्तर पर झुका और मम्मी जी के नरम होंठों को चूसने लगा, अनुज बिना रुके उनकी गांड मार रहा था, कुछ पल बाद मैंने उनके होंठों को छोड़ा और बोलै: नाश्ते के लिए भी आना है नीचे माँ बुला रही थी,

सविता: अह्ह्ह्ह हाँ लल्ला बस अह्ह्ह्ह अभी आते हैं

इतने में मुझे बहार से कुछ आवाज़ें आयी तो मैंने खिड़की से देखा और पाया की बहार बड़े फूफाजी ने मंजू तै को पकड़ रखा था और उनकी चूचियों को मसलते हुए उनके होंठों को चूस रहे थे

मैंने उन्हें देख तो मम्मी जी और अनुज को बोल कर कमरे से बहार निकल गया, और उनके सामने पहुँच गया,

मैं: अरे फूफाजी नीचे hi ले चलो तै को नाश्ते के साथ इन्हें चूस लेना,

बड़े फूफाजी ने मेरी बात सुनी और बोले: ये भी ठीक कहा तूने, चलें सलहज?

मंजू तै: चलो जीजा आज नाश्ते में तुम्हे छूट की चासनी चटाएंगी.

फूफाजी: अरे तुम जो चाटने को कह दो सलहज जी वही चाट लेंगे,

चलो फिर नीचे, दोनों हाथों में हाथ पकड़ कर प्रेमियों की तरह नीचे चल दिए.

हम सब लोग नीचे आये तो देखा काफी लोग नाश्ता कर रहे थे कुछ अंदर थे तो कुछ बहार कुर्सियों पर, मैं भी पकोड़े की एक प्लेट और चाय लेकर बहार चल दिया जहाँ सब बैठे थे, उन्ही के बीच बैठ कर बातें करते हुए नाश्ता करने लगा की इसी बीच रमन जीजा आये हाथ में फ़ोन लिए थोड़े चिंतित लग रहे थे और सबसे बोले: अरे किसी ने न्यूज़ देखि क्या?

पापा: न्यूज़ क्यों क्या हुआ कोई बड़ी खबर है क्या?

रमन जीजा के चेहरे के भाव देख पापा ने पूछा जो सबके मन का सवाल था,

रमन: वो थोड़ी बहुत ख़बरें आ रही थी न वायरस फैलने की उसके लिए सर्कार ने लोखड़ौन लगाया है.

मौसा: वो वायरस क्या नाम था कोरोना?

रमन: हाँ उसी की वजह से.

चरण सिंह: और ये लोखड़ौन का क्या मतलब है?

चेतन: मतलब की ज़रूरी चीज़ों के अलावा साड़ी दुकानें बंद, दफ्तर वगैरा सब बंद रहेंगे, स्कूल, कॉलेज, यातायात सब बंद.

महिपाल: लोगों की आवा जाहि?

रमन: वो भी बंद सिर्फ बहुत ज़रूरी काम हो जैसे दवाई वगैरा से जुड़ा तो hi जा सकते हो,

राजन चाचा: अरे तेरी ये तो तगड़ा hi काण्ड हो गया,

चरण सिंह: मतलब हमारी दूकान भी बंद रहेगी?

चेतन: हाँ पापा,

इस खबर से सब लोगों में चिंता और सवालों की लहार फ़ैल गयी कहीं न कहीं हर कोई इस बात से प्रभावित हो रहा था, हमारा भी स्कूल का काम रुक गया था, खैर काफी देर तक इसी बारे में बातें चलती रहीं औरतों में बात गयी तो वो भी कुछ घबराई तो कुछ ने समझाया. मैंने रमन जीजा से कहा की एक बार हॉल में सबको बिठा कर अच्छे से समझा दो किसी के सवाल होंगे तो वो भी पुरे हो जायेंगे.

थोड़ी देर बाद सब हॉल में कुर्सियों पर बैठे थे, रमन जीजा सामने खड़े थे और सब को लोखड़ौन और कोरोना के बारे में समझा रहे थे, बीच बीच में जिसके जो समझ नहीं आ रहा था वो सवाल भी कर रहा था,

बड़े फूफाजी: अरे बीटा पर हम सब लोग घर कैसे जाएंगे?

रमन: वो ऐसी कोई चिंता वाली बात नहीं है मैं निकलवा सकता हूँ धीरे धीरे करके सबको.

मैं: अरे फूफाजी पर ये सोचो की घर पहुंचकर करोगे क्या?

चरण सिंह: हाँ ये सवाल भी सही है, अब तो दूकान भी नहीं खुलेंगी तो घर जाकर भी करेंगे क्या?

उदयवीर: पर घर खली भी तो नहीं छोड़ सकते न.

काफी देर सवाल जवाब चलते रहे इसी बीच पापा खड़े हुए और बोले: देखो जो भी है हम सब लोग hi इससे कहीं न कहीं प्रभावित हैं पर अब अगर सर्कार का फैसला है तो हमें इसे मानना पड़ेगा hi तो मेरा मानना है इसे समस्या के रूप में न लेकर एक मौके की तरह लेना चाहिए,

बिमला: मौका वो कैसे?

पापा: ये समझ लो बहिन जी की ये सर्कार की तरफ से हमें कुछ दिन छुट्टी मिली है.

महिपाल: बिलकुल सही, परेशां होने से अच्छा है इस समय का सही से उपयोग किया जाए और आनंद लिया जाए.

पंकज: एक चीज़ और अच्छी है की हम सब लोग साथ हैं अकेला इतना समय बिताना होता तो बोर होते समझ नहीं आता क्या करना है यहाँ सबके साथ हैं.

राजन चाचा: और अपने गाओं में हैं न अनाज की, न सब्जी की न दूध घी की किसी चीज़ की कमी नहीं है,

रमन: गाओं में होने का एक और फायदा है की शहर में सख्ती ज़्यादा होती है तो वहां तो घर से निकलना भी मुश्किल हो जाता, लेकिन यहाँ गाँव में ऐसा कोई दर नहीं है, कभी कभार कोई अधिकारी चेकिंग के लिए आया तो आया नहीं तो नहीं आया, इसलिए आराम से रहो, घूमो.

मौसा: तो तय रहा जिसे जो भी फ़ोन वगैरह करके थोड़ी बहुत व्यवस्था करनी है कर लो, अब सब लोग यहीं रहेंगे लोखड़ौन में.

इस बात पर सब खुश हो गए, लड़कियां तो ख़ुशी से नाच रहीं थी. जो शहर में रहते थे उनके लिए कोई परेशानी नहीं थी जिनके गाँव में पशु थे उन्हें hi थोड़ी चिंता थी, जिसमें से उदयवीर ताऊ ने एक मज़दूर को फ़ोन कर के बोल दिया था उनकी भैंसों और गाय की देख भाल के लिए, बाकी और कोई ऐसी गंभीर समस्या नहीं थी दोपहर होते होते सब निपट चूका था पापा के कहने पर मैं और बाकी लड़के मिलकर अनाज के काई बोर, तेल, घी और भी ज़रूरत का सामन ले आये थे,

मां राजन चाचा स्कूल से सीमेंट और ईंटे वगैरह भर लाये और उन्होंने अपनी कला दिखते हुए जानवरों के लिए एक लम्बी सी नांद बना दी, आज शाम को तो जानवरों को वही रखना था क्यूंकि नन्द सूखने में समय लगता, इसलिए तय हुआ की कुछ कुछ लोग रात घर में रुक जाएंगे. नाना, उदयवीर ताऊ बाग़ में रुकने के लिए बोले तो उनके साथ बड़ी बुआ और मंजू तै चली गयीं, वही मंजू तै के घर पर बिमला तै, बड़े फूफाजी और पल्ली रुके थे.



राजन चाचा के यहाँ माधुरी तै, मौसा और ममता चची थी वही दिनु चाचा के घर रेनू चची, पापा और फूफाजी रुके थे, हमारे घर पर मां, रज्जो चची, रानी भाभी और अनुज रुके बाकी सब लोग फार्महाउस पर थे, रात में जो जहाँ था उसने वही मज़े किये अपने साथी या साथियों के साथ, अगली सुबह सब फिर से फार्महाउस पर थे, जानवरों की भी व्यवस्था हो चुकी थी. बस आने वाले दिन कैसे बीतेंगे इसका इंतज़ार था,

जारी रहेगी.
 
अपडेट 266


(कर्मा की जुबानी)

अगली सुबह नाश्ता निपटते ही मैं बाकी लड़कों के साथ काम पर लग गया। इतने सारे लोग यहाँ फंस गए थे, और कोई अंदाज़ा नहीं था कि ये लॉकडाउन कितने दिन चलेगा। खाने-पीने का सामान, बिस्तर-बिछौना, रसोई का सामान — सबकी जुगाड़ करनी थी। कमी तो कुछ नहीं थी, बस सब कुछ लाकर यहाँ सही जगह रखना था। हमने तुरंत काम शुरू कर दिया।

जब हम खाने-पीने के सामान में लगे थे, तब तक बड़े लोग पशुओं को फार्महाउस ले आए थे। उनकी हौदी तो हमने कल ही तैयार कर ली थी, ऊपर से अच्छा-खासा त्रिपाल भी डाल दिया था ताकि बारिश में भी जानवरों को तकलीफ न हो। रमन जीजा बाहर से बाकी ज़रूरी सामान ले आए — कुछ देखकर राजन चाचा और दीनू चाचा के चेहरे पर ऐसी चमक आ गई कि हम सब हँस पड़े बाकी सामान क्या था ये तो आप लोग समझ गए होंगे। शाम तक ज़्यादातर काम निपट चुका था।

मर्दों ने बाहर का सारा भारी काम संभाला — सामान ढोना, हौदी ठीक करना, सामान इधर इधर करना। वहीं औरतों ने रसोई को पूरी तरह से संभाल लिया। ममता चाची, गुंजन मामी, शालू मौसी और रज्जो चाची ने मिलकर बड़ा चूल्हा बनाया, रसोई व्यवस्थित की। लड़कियाँ — पूर्वी, रिमझिम, किरण, पल्ली, नीतू, लाड़ो — सबने अंदर बेडशीट बिछाईं, तकिए लगाए, कंबल-गद्दे व्यवस्थित किए। पूरा फार्महाउस अब एक बड़े संयुक्त परिवार का घर लगने लगा था।

शाम को सब थक चुके थे। हम बाहर पूल के किनारे गार्डन में बैठ गए। ठंडी-ठंडी शिकंजी के ग्लास हाथ में थे, हल्की हवा चल रही थी। तभी किरन और पल्ली उठकर खड़ी हो गईं। किरन ने मुस्कुराते हुए पर बुलंद आवाज़ में कहा, “सुनो सब लोग, आज शाम और रात को कोई चुदाई-वुदाई नहीं। आज की शाम सिर्फ बातों के लिए है। कभी-कभी इन छोटी-छोटी बातों में भी बहुत मज़ा आता है।”

पल्ली ने जोड़ दिया, “हाँ, इतने सारे लोग इकट्ठे हैं, सबको अच्छे से जानने-समझने का मौका तो मिलना चाहिए ना?”

अंजली तुरंत सहमत हो गई, “बात बिल्कुल सही है।”

माँ ने मुस्कुराते हुए कहा, “तो फिर वैसा ही करते हैं जैसा किरन और पल्ली कह रही हैं।”

एक-दो लड़कों ने हल्की-सी “आह ओह” की, लेकिन सब थके भी हुए थे और अंदर से राजी भी थे। सुझाव सबको पसंद आ गया।

देर रात तक बातें चलती रहीं। बचपन की यादें, पुरानी कहानियाँ, मजाक, हँसी, कुछ गाने भी बजाए गए। पूरा माहौल इतना हल्का और परिवार वाला था कि समय का पता ही नहीं चला। आखिरकार सब थककर अपने-अपने बिस्तर पर सो गए — अगले दिन के इंतज़ार में।

अगली सुबह आँख खुली तो काफी देर हो चुकी थी। कमरे में नरम सुनहरी धूप छनकर आ रही थी। शरीर अभी भी थका हुआ था, लेकिन मन में एक अलग ही उत्तेजना थी। उठकर सीधा बाथरूम में घुसा, अच्छे से फ्रेश हुआ — मुँह धोया, दाँत साफ किए, पूरा बदन पानी से तर कर लिया। तौलिए से शरीर पोंछते हुए बाहर निकला ही था कि रुक गया।

मेरा बिस्तर... पूरी तरह से भरा हुआ था।

अंजली, प्रीती और किरन — तीनों मेरे बिस्तर पर लेटी हुई थीं। एक-दूसरे से सटी हुई, चादर आधी खिसकी हुई, सुबह की हल्की धूप उनके नंगे पैरों और चेहरों पर खेल रही थी। अंजली बीच में थी, प्रीती उसकी बाईं तरफ और किरन दाईं तरफ। तीनों की आँखें मेरी तरफ थीं — किरन की आँखों में पुरानी वाली शरारत, अंजली की मुस्कान में छुपी हुई भूख, और प्रीती थोड़ी शर्माती हुई लेकिन उत्सुकता से भरी हुई।

मैं हँसते हुए बोला, “अरे तुम लोग कब आईं?”

किरन तुरंत बोली, “जब तुम हग रहे थे भैया तब ही।”

तीनों खिलखिलाकर हँस पड़ीं। उनकी हँसी कमरे में गूँज गई, इतनी मीठी और शरारती कि मैं भी हँस पड़ा।

मैंने किरन की तरफ देखा और आँखें तरेरीं, “हप्प बहुत बोलती है तू।”

किरन ने लापरवाही से कंधे उचकाए और बोली, “अरे हगने को हगना न बोलूं तो क्या बोलूं। तुमने पिछवाड़ा तो सही से धोया है ना।”

मैं मुस्कुराया, “हां धोया है तू देखेगी।”

किरन की आँखें चमक उठीं। उसने अपनी दोनों सहेलियों की तरफ देखा और बोली, “हां देखेंगे न।”

ये कह कर तीनों मुझ पर कूद पड़ीं।

पल भर में मेरे बदन से मेरा निक्कर और कच्छ दोनों खिंच चुके थे। मैं पूरा नंगा था। मैं पैर लटका कर बिस्तर पर बैठ गया और तीनों मेरे पैरों के बीच घुटनों पर बैठ गईं।

नज़ारा कुछ ऐसा था कि साँस अटक गई।

मेरा लंड अंजली के गरम, गीले मुंह में था। वो पूरी तल्लीनता से उसे चूस रही थी। किरन और प्रीती मेरी एक-एक गोली को चाट-चूस रही थीं। उनकी नरम जीभें, गर्म साँसें, थूक की चिकनाहट — सब कुछ एक साथ हो रहा था। मैं मज़े से मचल रहा था, आहें भर रहा था।





कभी तीनों एक साथ पूरे लंड पर अपनी जीभें फिरातीं, तो कभी टोपे को चाटते हुए एक दूसरे को चूम लेतीं। मेरा लंड बिल्कुल कड़क था और उनके थूक में चमक रहा था। फिर भी वो लोग मेरे लंड और गोलियों पर और थूक रही थीं और उसे चाट रही थीं।

फिर अचानक से कुछ ऐसा हुआ कि मैं बिल्कुल मचल उठा। किरन नीचे हुई और अपनी गर्म, नरम जीभ मेरी गांड पर फिराने लगी। मेरी बहन, मेरी छोटी सुंदर बहन मेरी गांड चाट रही थी। मैं पागलों की तरह तड़प रहा था। मेरा लंड प्रीती के मुंह में था और अंजली मेरी गोलियों को चाट रही थी।

और फिर बारी-बारी से तीनों ही अपनी-अपनी जगह आपस में बदल लेती थीं।

मैं पागल होता जा रहा था। वहीं वो तीनों आज पूरे मूड में थीं। तीनों ने मेरी गांड, लंड और गोलियों को तब तक चाटा और चूसा जब तक मैंने अपना रस उनके चेहरों पर नहीं छोड़ दिया।





गाढ़ा, गर्म रस उनके चेहरों पर, होंठों पर, नाक पर बिखर गया। वो लोग उसे भी एक दूसरे के चेहरों से चाटने लगीं।

मैं उन्हें देखते हुए हाँफते हुए बोला, “तुम लोगों ने तो सुबह सुबह ही सारी ताकत खींच ली मेरी।”

अंजली ने होंठ चाटते हुए कहा, “तो जाओ न नीचे नाश्ता बन गया है कर लो जाकर।”

मैंने पूछा, “तुम लोग नहीं करोगे?”

अंजली ने किरन और प्रीती की चूत पर हाथ रखते हुए कहा, “मेरा नाश्ता तो ये रहा।”

तीनों हंसने लगीं।

फिर अंजली किरन की ओर झुक गई और उसके होंठों को कामुक तरीके से चूसने लगी। वहीं प्रीती अंजली की गांड को जीभ से कुरेदने लगी।

मेरे लिए बड़ी दुविधा हो गई। पेट कह रहा था नीचे चल, लंड कह रहा था यहीं रुक जा। खैर आँखों और लंड की मर्ज़ी के आगे पेट की नहीं चली और मैं वापस बिस्तर की ओर मुड़ गया।

मैं प्रीती के पीछे गया। लंड जो झड़ने के बाद हल्का सा ढीला हुआ था, फिर से कड़क हो गया। मैंने उसे प्रीती की गांड के छेद पर रखा और अंदर घुसा दिया। प्रीती की आह निकल गई। मैं उसकी गांड मारने लगा। वहीं अंजली और किरन दोनों एक दूसरे को चूमने-चाटने में लगी हुई थीं।

मैं हाँफते हुए बोला, “अह्ह्ह प्रीती ओह्ह्ह्ह क्या किस्मत है मेरी आह्ह अपने छोटे भाई की पत्नी की गांड मार रहा हूं अह्ह्ह वो भी शादी से पहले ही।”

प्रीती के बोलने से पहले ही अंजली बोली, “ये तो सही कहा किस्मत तो है।”

किरन बोली, “आओ इन दोनों की किस्मत को और चमकाते हैं।”

ये कह कर दोनों भी हमारी ओर आ गईं। अंजली प्रीती के नीचे घुस कर उसकी चूत चाटने लगी तो किरन प्रीती की चूचियों को मसलते हुए उसके होंठों को चूसने लगी।

प्रीती इस तिहरे हमले से पागल होने लगी।

प्रीती: “ओह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह भैया, अह्ह्ह्ह अंजली दीदी किरन नन्ननन्नन ओह्ह्ह्ह बहुत मज़ा आ रहा है।”

मैं तेजी से उसकी गांड मारते हुए बोला, “मुझे भी बहुत मज़ा आ रहा है मेरी जान अह्ह्ह्ह क्या कसी हुई गांड है तेरी ओह्ह्ह्ह।”

इस तिहरे हमले का असर प्रीती पर ऐसा हुआ कि कुछ पल बाद ही वो अंजली के मुंह में झड़ने लगी और अंजली उसका सारा रस चासनी की तरह चाट गई।

उसके झड़ने के बाद मैंने उसकी गांड से लंड निकाला और उसे एक ओर लिटा दिया। वहीं अंजली और किरन मेरे लिए तैयार थीं। किरन ने अंजली को बिस्तर के किनारे लिटा दिया। अंजली ने भी अपनी टांगें पीछे मोड़ लीं जिससे उसकी गांड का छेद खुल कर सामने आ गया।

मैं उसके पैरों के बीच आया तो किरन ने मेरे लंड को मुंह में भरके चूसा, फिर उस पर थूक कर उसे अंजली की गांड के छेद पर लगा दिया और उसे अंदर घुसा दिया। मैं अंजली की गांड मारने लगा।





किरन भी कभी अंजली की चूचियों को चूसती, तो कभी मेरे पीछे आकर मेरी गांड चाटती, तो कभी मुझे चूमती। मैं लगातार अंजली की गांड मार रहा था।

किरन नीचे बैठ कर अपनी चूत में उंगली करते हुए बोली, “अह्ह्ह्ह भैया ऐसे ही मारो भाभी की गांड आह्ह्ह क्या चुदक्कड़ गंडमरी भाभी चुनी है मेरे लिए अह्ह्ह्ह मोटे मोटे लौड़े ऐसे ही ले लेती है गांड में।”

मैं अंजली की गांड में लंड चलाते हुए कहा, “अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह तुझे तो पसंद है न तेरी चुदक्कड़ गण्डमरी भाभी?”

अंजली हाँफते हुए बोली, “ओह्ह्ह्ह बाबू इसे तो आऊँगी ही आह्ह्ह्ह इसकी प्यासी चूत जो चूस चूस कर शांत करती रहती हूं।”

किरन बोली, “ओह्ह्ह्ह बिल्कुल सही अह्ह्ह्ह लाओ भैया भाभी की गांड का स्वाद चखाओ मुझे।”





मैंने उसकी बात समझी तो अपना लंड अंजली की गांड से निकाल कर किरन के मुंह में घुसा दिया। किरन ने चाटा और फिर चाट कर चूस कर वापस अंजली की गांड में घुसा दिया।

किरन झुक कर उसकी चूत चाटने लगी, और अंजली हम दोनों की वजह से आहें भरने लगी।

इतने में तब तक प्रीती उठ कर बाहर चली गई थी। कुछ देर बाद अनुज मेरे पीछे आया और बोला, “भैया मुझे भी भाभी की गांड मारने दो न।”

मैं बोला, “किरन की मार ले न।”

अनुज बोला, “इस बंदरिया की मैं नहीं मार रहा तुम ही मारो।”

किरन बोली, “अब तूने छुआ भी मुझे तो बताऊंगी कुत्ता कहीं का।”

अनुज ने उसकी ओर चुम्मे का इशारा कर उसे चिढ़ाया।

अंजली बोली, “अरे लड़ो मत, सुनो बाबू मुझे देवर से सेवा करवाने दो।”

मैं उसकी बात सुनकर उसके आगे से हटा। लंड “पॉप” की आवाज़ के साथ उसकी गांड से निकला। मैंने किरन को झुका कर उसकी गांड में लंड घुसा दिया और उसकी कमर थाम कर उसकी गांड मारने लगा।

उधर अनुज ने भी अंजली की गांड में उसी आसन में अपना लंड घुसा दिया था और तेजी से उसे आहें भरते हुए चोद रहा था।

अनुज बोला, “ओह्ह्ह भाभी ओह्ह्ह्ह आह्ह्ह्ह क्या मज़ेदार है तुम्हारी गांड आह मज़ा आ गया।”

इतने में पीछे से सागर भी आ गया और अनुज को अंजली की गांड मारते देख बोला, “अरे मुझे भाभी की गांड मारनी थी।”

अनुज बोला, “अब बाद में आना, यहां जगह नहीं है।”

सागर बोला, “अरे थोड़ा सा करने दे न।”

अनुज बोला, “जा न मैं नहीं करने दे रहा।”

सागर बोला, “देख लो भाभी इसे।”

अंजली बोली, “तुम लोग भी न कितना लड़ते हो।”

किरन बोली, “गधों से अह्ह्ह्ह और उम्मीद क्या कर सकते हैं भाभी।”

सागर बोली, “तू तो चुप ही रह ले।”

अंजली बोली, “सागर इधर आ कर बैठ मेरा मुंह खाली है।”

सागर ऊपर चढ़ा और अंजली के आगे बैठ गया। उसका लंड बिल्कुल कड़क था जिसे अंजली चूसने लगी।





किरन बोली, “देख लो भैया ये लोग भाभी को कितना परेशान करते हैं।”

मैं बोला, “अरे तू क्यों परेशान होती है ये लोग जाने और इनकी भाभी जानें।”

किरन बोली, “हां और क्या भाभी इन्हें सिर पर चढ़ा रही हैं किसी दिन उठा कर पटक भी देंगी तब मज़ा आयेगा।”

मैं बोला, “और हम लोग मजे से देखेंगे।”

हम मज़ाक करते हुए चुदाई कर रहे थे।

उधर अंजली भी अनुज और सागर को एक साथ खुश कर रही थी।

सागर बोला, “भाभी अब इससे बोलो न, कि गांड मारने दे।”

अंजली बोली, “अच्छा अनुज एक मिनट रुको।”

अनुज अंजली की गांड से लंड निकालता है और अंजली उठती है और उठ कर सागर के ऊपर आकर उसे पीछे लेटने को कहती है। सागर खुशी से लेट जाता है। फिर अंजली उसके ऊपर बैठती है उसका लंड अपनी गांड में लेकर। अंजली की पीठ सागर की ओर होती है। जैसे ही अंजली की गांड में सागर का लंड घुसता है सागर के मुंह से आह निकलती है। अंजली पीछे होकर अपने पैरों को फैला कर इशारा करती है अनुज को। अनुज समझ गया था कि उसे भाभी की दोहरी चुदाई करनी थी। सागर के साथ मिलकर वो अंजली के पैरों के बीच आकर जगह बनाता है और फिर अपना लंड पकड़ कर उसकी चूत पर लगाता है, पर अंजली उसका लंड पकड़ लेती है और नीचे खिसका कर गांड पर ही रख देती है और कहती है “घुसाओ अनुज”।

अनुज हैरान रह जाता है और कहता है, “नहीं भाभी लग जाएगी।”

अंजली बोली, “अरे कुछ नहीं होगा घुसाओ तो।”

अनुज अंजली के कहने पर अपना लंड सागर के लंड से घिसते हुए अंजली की कसी हुई गांड में घुसाने का प्रयास करता है।

सागर बोला, “अबे क्या कर रहा है।”

अंजली अपने दांतों को भींचते हुए उसे शांत रहने का इशारा करती है और कुछ पलों की मेहनत के बाद अनुज का लंड भी जगह बनाते हुए उसकी गांड में घुस जाता है और तीनों ही आहें भरने लगते हैं। मुझे और किरन को तो तब पता चलता है क्या हुआ।

किरन बोली, “अरे भाभी दोनों के एक साथ गांड में क्यों ले रही हो।”

मैं बोला, “हां निकालो लग जाएगी, ए तुम दोनों निकालो पीछे से।”

अंजली बोली, “आह्ह्ह्ह अरे नहीं मत निकालो करने दो आह्ह्ह्ह बाबू थोड़ा महसूस करने दो मुझे।”

मैं बोला, “दर्द होगा।”

अंजली बोली, “कुछ नहीं होगा, आह तुम दोनों रुके क्यों हो चोदो मुझे, तबसे मेरी गांड के पीछे थे।”

उन दोनों के लिए भी ये खास अनुभव था। पहली बार एक साथ एक गांड को चोद रहे थे तो दोनों धीरे-धीरे लय बनाकर अंजली की गांड मारने लगे। वहीं अंजली तो बहुत उत्तेजित हो रही थी और अपनी चूत मसलते हुए उन्हें और गांड मारने के लिए उकसा रही थी।





अंजली बोली, “आह्ह ऐसे ही ऐसे ही ओह्ह्ह मारो अपनी भाभी की गांड आह्ह्ह एक साथ ओह्ह्ह्ह मजा आ रहा है आह्ह रुकना मत।”

अनुज बोला, “ओह्ह भाभी चाह कर भी नहीं रुक पा रहा, ओह्ह्ह।”

सागर बोला, “मैं भी।”

मैंने किरण की गांड मारना जारी रखा। कुछ पल बाद ही अंजली झड़ने लगी। ये नया अनुभव उसके लिए काफी था। वो काँपते हुए झड़ने लगी और दोनों के लंड उसकी गांड से निकल गए।

वो झड़ने के बाद हांफते हुए बेजान हो कर लेट गई। वहीं अनुज और सागर हमारी ओर देखने लगे जिस पर किरन बोली, “मेरी तरफ कोई बढ़ मत जाना, दोनों के नुनु काट दूंगी।”

दोनों बेचारे उसकी धमकी से डरते हुए अपने नुनु की सुरक्षा के लिए कमरे से निकल गए।

कुछ पल बाद अंजली की आँखें खुलीं और मुस्कुराते हुए वो हमें देख रही थी।

किरन बोली, “रण्डी भाभी।”

अंजली बोली, “रंडी ननद।”

अंजली उठ कर हमारी ओर आई और किरन की चूत को मसलने लगी। बस इतना ही काफी था किरन को झड़ने के लिए। उसके झड़ने के बाद मैंने उसकी गांड से लंड निकाल लिया। मुझे झड़ने का मन नहीं था और मूत भी आ रहा था। मैं उतर कर बाथरूम की तरफ बढ़ा और मैंने सोचा कि जब सब इतना हो चुका था तो खुल कर ही क्यों न मजे ले। इसलिए मैं मुड़ गया। अंजली और किरन बिस्तर पर बैठ कर एक दूसरे को चूम रही थीं। मैंने उनके पास जाकर उनकी ओर लंड किया और अपने मूत की धार उन पर छोड़ दी। दोनों ही बिल्कुल भी नहीं सकुचाईं, और मेरे मूत से अपने चेहरों को भिगा लिया। कभी मूत में भीगते हुए एक दूसरे के होंठों को चूस रही थी।





इसके बाद हम तीनों लोग बाथरूम में घुस साथ में नहाए। बिस्तर को उठाकर भी धुलने के लिए डाल दिया।

हम तीनों बाथरूम से बाहर निकले तो बदन अभी भी नहाने की ताज़गी और गर्माहट से तर था। अंजली ने अपनी भीगी लटें मेरे कंधे पर डाल दीं और हँसते हुए बोली, “चलो, अब असली नाश्ता करते हैं।” किरन मेरी दूसरी बाँह थामे हुए थी, उसकी उँगलियाँ मेरी कमर पर खेल रही थीं। हम हॉल पार करते हुए रसोई की तरफ बढ़े।

रसोई का दरवाज़ा खुला था। अंदर से गरम तेल की खुशबू, चाय की महक और तवे पर कुछ सिकने की आवाज़ आ रही थी। मैंने झाँका तो नज़ारा देखकर ठिठक गया।

गुंजन मामी सिर्फ एक, पतला-सा एप्रन पहने खड़ी थीं। बस। एप्रन का ऊपरी हिस्सा उनके भारी, दूधिया चूचों को मुश्किल से संभाल पा रहा था — दोनों चूचे आधे-आधे बाहर झाँक रहे थे, निप्पल हल्के से उभरे हुए। नीचे कुछ नहीं था। उनकी चिकनी कमर, गोल-मटोल चूतड़ और मोटी टाँगें पूरी तरह नंगी थीं। वो चूल्हे पर पराठा सेंक रही थीं, कमर लचकाते हुए, जिससे उनका नंगा बदन हर हलचल के साथ हिल रहा था। एप्रन का फीता पीठ पर ढीला बँधा था, जिससे उनकी पूरी पीठ और गांड का ऊपरी हिस्सा साफ दिख रहा था।

मैं चुपके से पीछे पहुँचा और दोनों हाथों से उनकी कमर को जकड़ लिया। मामी चौंककर हँसी, “अरे...लल्ला... सुबह-सुबह ही शैतानी शुरू?”

मैंने अपना सीना उनकी नंगी पीठ से पूरी तरह सटा दिया। मेरी छाती उनके कंधों से रगड़ खा रही थी। दोनों हाथ ऊपर ले जाकर मैंने उनके भरे-भरे चूचों को एप्रन के अंदर से जोर-जोर से मसलना शुरू कर दिया। मेरी उँगलियाँ उनके निप्पलों को पकड़कर खींच रही थीं, दबा रही थीं। मामी की साँसें तुरंत तेज़ हो गईं। उन्होंने सिर पीछे झुकाकर मेरे कंधे पर टिका दिया और धीरे-धीरे कराहने लगीं, “आह्ह्ह... लल्ला... तुम चाय में उबाल आने से पहले मुझे गर्म कर दोगे... आह्ह... इतनी जोर से मत...”





मैंने उनका दायाँ चूचा और भी जोर से मसला, निप्पल को अँगूठे से रगड़ा और कान में फुसफुसाया, “तो मैं तुम्हे ही पी लूं मामी चाय की जगह”

मामी: अह्ह्ह्ह लल्ला

मामी की गांड मेरे लंड पर हिलने लगी। ठीक उसी वक्त पीछे से शालू मौसी चाय का ट्रे लेकर अंदर आईं। उन्होंने हमें देखा तो बोली, “अरे वाह! रसोई में मामी भांजे का प्रोग्राम शुरू हो गया? गुंजन, और चाय चढ़ाई है न और भी लोग रह गए हैं।

मामी: अभी चढ़ाती हूं जीजी, लल्ला थोड़ा छोड़ना तो।

मैंने मुस्कुराते हुए मामी के चूतड़ पर एक जोरदार थपकी मारी, उनके कान में “बाद में मिलते हैं” कहा और तुरंत पीछे हट गया। शालू मौसी ने ट्रे से एक कप चाय निकालकर मुझे थमा दिया। अंजली और किरन दोनों तो तब तक गायब हो चुकी थीं।

बाहर गार्डन में बड़ा चूल्हा जल रहा था। धुआँ हल्का-हल्का ऊपर उठ रहा था। मंजू ताई और सावित्री बुआ (बड़ी बुआ) दोनों वहाँ खड़ी थीं। मंजू ताई ने साड़ी का पल्लू कमर पर खोंस रखा था, ब्लाउज़ के ऊपर के तीन हुक खुले थे — उनके भारी, लटकते चूचे आधे बाहर निकले हुए थे, हर हिलने पर हिल रहे थे। सावित्री बुआ ने हल्का कुर्ता पहना था जो उनके गुदगुदे पेट और मोटे चूतड़ों पर तना हुआ था। दोनों पकौड़े तल रही थीं। तेल की छींटें उनके हाथों, गर्दन और चेहरों पर पड़ रही थीं।

मैं पास पहुँचा तो मंजू ताई ने एक गरम-गरम पकौड़ा उठाकर सीधा मेरे मुँह में ठूँस दिया, “ले बेटा, चख... अभी कढ़ाई से निकाला है।”

मैं: बहुत स्वाद है ताई तुम्हारी तरह

वो दोनों हंसने लगीं।”

मैं चाय का घूँट लेते हुए आगे बढ़ा।

फार्महाउस के बाहर की तरफ जाते हुए नज़ारा और भी मस्त था।

रज्जो चाची भैंस को नहला रही थीं। पानी का टब भरा हुआ था। लेकिन चाची पूरी नंगी थी उनके कपड़े नीचे पड़े थे उनके पीछे चेतन जीजा पूरी तरह नंगे खड़े थेखड़े-खड़े ही उनकी मोटी गांड में लंड घुसाए हुए जोर-जोर से धक्के लगा रहे थे।





हर धक्के पर रज्जो चाची का बदन आगे की तरफ झुक जाता था। उनके गोल-मटोल चूतड़ लहरा रहे थे। पानी की छप-छप की आवाज़ उनके कराहों के साथ मिल रही थी। चाची दोनों हाथों से भैंस के सिर को पकड़े हुए थीं ताकि वो हिले नहीं।

रज्जो चाची हाँफते हुए बोलीं, “आह्ह्ह... चेतन... आह्ह्ह... धीरे बेटा... भैंस डर जाएगी... ओह्ह्ह... गहरी मत मार... आह्ह्ह...”

चेतन जीजा पीछे से उनकी कमर कसकर पकड़े हुए तेज़ी से ठोक रहे थे, “आह्ह... मामी.. आपकी ये मक्खन वाली गांड... अह्ह्ह पूरे दिन चोदने का मन कर रहा है... ले... ले मेरी जान... कितनी कसी हुई है आज...”

रज्जो चाची की आहें पानी की छपाक के साथ गूँज रही थीं। भैंस बेचारी चुपचाप खड़ी थी, जैसे रोज़ का नजारा हो।

मैं चाय का आखिरी घूँट लेकर मुस्कुराया। वहीं गार्डन में ममता चाची की तेज़ हंसी गूंज रही थी मैने देखा तो पाया जग्गू मोटरसाइकल पर पूरा नंगा बैठा था और उसे चला रहा था वहीं ममता चाची भी पूरी नंगी उसके पीछे बैठ कर घूम रही थी और हंस रही थीं





उन्हें देख कर मुझे बहुत अच्छा लग रहा था सबको आस पास इतना खुश और आनंद में देख मन को बहुत ठंडक मिल रही थी, ये लॉकडाउन किसी भी कारण से लगा हो पर हम लोगों के लिए ये समय बहुत खास था, ये हम सब को साथ में ऐसे रहने और मजा लेने का मौका दे रहा था जो वैसे शायद मिलना मुश्किल था, ये ही जीवन था कोई रोक टोक नहीं, समाज का डर नहीं सिर्फ प्यार और आपस में हवस जो समाज के लिए भले ही खराब मानी जाती हो हमारे लिए अच्छी थी।

अगले दो तीन दिन ऐसे ही बीते पूरे चुदाई और मजे से भरपूर कुछ लोग नंगे ही रहते तो कुछ कपड़ों में हर कोई अपने अपने जीवन का भरपूर आनंद ले रहा था,





जग्गू का चंचल दीदी को पूल के किनारे लिटा कर चोदना हो,





या मेरा पीयूष का और पंकज जीजा का, खुशी भाभी, प्रेमा भाभी और माधुरी ताई को पूल में चोदते हुए रेस लगाना हो कि कौन चोदते हुए दूसरी ओर पहुँचेगा।

कहीं अनुज और प्रीती की प्रेम कहानी पनप रही थी,







तो कहीं मेरी सासू मां को मेरे मामा अपने लंड पर उछाल उछाल कर सैर करवा रहे थे,





कहीं पर हमारे बड़े फूफाजी अपनी होने वाली बहू यानी खुशी भाभी को साइकिल चलाना सिखा रहे थे,













कहीं पर जग्गू अनुज की सासू मां को ऐसे चोद रहा था जैसे बरसों से उनकी चाहत में बैठा हो







इसी तरह अगले 2-3 दिन खूब मस्ती और चुदाई में बीते, फिर चौथे दिन मैं, अंजली नीतू और रानी भाभी के साथ साथ एक दो लोग और बैठे थे तो नीतू बोली कि अब कुछ बोरिंग सा होने लगा है, कितनी चुदाई करें उसके अलावा कुछ है है ही नहीं करने को,

रानी भाभी: हाँ चुदाई में मजा तो है पर कुछ नयापन भी होना चाहिए हमें कुछ सोचना चाहिए।

खैर मैने भी सोचा ये लोग सही कह रहे हैं कुछ सोचना पड़ेगा, और सोचने के पहले मैने दोनों की एक एक बार गांड ज़रूर मारी फिर जाकर मेरे दिमाग ने काम किया और मैने फिर रात को सबके सामने बुला कर कहा कि अब से हम लोग हर रोज़ कुछ नया करेंगे, दिन भर चुदाई करने की जगह हम शाम को साथ में करेंगे।

इस पर पीयूष बोला: कर्मा इसमें नया क्या है वो तो हम लोग अब भी करते हैं रात में भी।

मैं: नया ये है कि अब काँट छांट वाली चुदाई होगी।

पूर्वी: मतलब?

मैं: मतलब ये कि हर रोज़ चुदाई की एक कैटेगरी बनाई जाएगी, सबको उसी के अनुसार चुदाई करनी होगी सबके साथ में। और मुकाबले होंगे जो जीतेंगे उन्हें इनाम मिलेगा।

चरण सिंह: चुदाई की प्रतियोगिता ये तो सुनने में मज़ेदार है।

कर्मा: सच में मज़ेदार है, तो कल दो बार चुदाई की प्रतियोगिता होंगी एक सुबह 11 बजे में शुरू होगी और दूसरी रात में इसी समय, अब सुनलो कल सुबह की प्रतियोगिता भाई बहन की होगी इसमें जितने भी भाई बहन होंगे वो शामिल हो सकते हैं।

पंकज: सिर्फ सगे भाई बहन।

मैं: नहीं जीजाजी, मुंह बोले भी या चाचा ताऊ कैसे भी बस रिश्ते में भाई बहन लगने चाहिए,

मामा: और जिसकी दो बहनें हो?

मैं: उसका दोगुना मज़ा।

पल्ली: पर जीत हार का फैसला कैसे होगा?

मैं: सब लोग एक साथ शुरू करेंगे चुदाई जो भी बहन भाई सबसे देर तक बिना झड़े रुक पाएंगे वो जीत जाएंगे, उन्हें नंबर वन भाई बहन का खिताब मिलेगा।

मेरी बात सुनकर लोगों में आपस मे बातें होने लगीं और लोग इसके लिए उत्साहित नज़र आ रहे थे,

इतने में चंचल दीदी बोली: अरे वो तो कल होगा कर्मा आज का क्या प्लान है वो तो बता।

इतने में नीतू और अंजली खड़ी हुई,

अंजली: वो मैं बताती हूँ,

मैं अंजली और नीतू की ओर देखने लगा क्योंकि मैं भी नहीं जानता था उसने क्या सोचा है,

नीतू ने इशारा किया तो किरन और लाडो जो कि दोनों पूरी नंगी थी एक एक कटोरा लेकर आई और खड़ी हो गईं।

नीतू: तुम सब को लाडो और किरन के पास जो कटोरे दिख रहे हैं उनमें पर्चियां जिनपर नाम लिखे हैं, एक कटोरे में आदमियों की और दूसरे में औरतों की, अब होगा ये कि अब दो पर्चियां औरतों के कटोरे से निकलेंगी और 10 आदमियों के से, जो दो औरतें होंगी उनको अकेले अकेले 5-5 आदमियों से चुदवाना होगा और वो भी तब तक जब तक पांचो आदमी झड़ न जायें, अकेले कोई मदद नहीं मिलेगी।

अंजली: दोनों औरतों में से जो पहले पांचों आदमियों को स्खलित कर देगी वो बनेगी आज रात की गैंगबैंग क्वीन, और जो औरत हारेगी उसे अगले एक दिन तक क्वीन की नौकरानी बन कर रहना पड़ेगा।

रिमझिम: इस बीच औरत खुद झड़ गई तो?

नीतू: उससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, काम है पांचो आदमियों का रस निकालना।

अंजली और नीतू का प्लान सुनकर तो मैं भी हैरान रह गया और बाकी सब भी, किसी भी चीज़ में जब प्रतिस्पर्धा आ जाती है तो उसका मजा ही बढ़ जाता है, और मेरी तरह बाकी सब को भी ये सुझाव बहुत पसंद आया था।

अंजली: सब तैयार हो इस खेल के लिए?

सबने गर्म जोशी से हां कहा, फिर किरन ने कटोरे को अच्छे से हिलाया ताकि पर्चियां अच्छे से मिक्स हो जाएं और फिर सबसे बड़े यानी नाना को मौका दिया गया कि वो दो पर्चियां निकाल कर दोनों औरतों कौन होंगी ये बतायें, नाना ने दो पर्चियां निकाली और किरण को दे दी, किरन ने पहली पर्ची खोली और पढ़ी और फिर सबको दिखाते हुए बोली पहली प्रतियोगी हैं मेरी प्यारी छोटी बुआ: शालू बुआ।

मौसी का नाम आते ही सब तालियां पीटने लगे वहीं मौसी भी शर्माते हुए खड़ी हुई, वो थोड़ी सी घबराई सी लग रही थी तो अंजली ने जाकर उन्हें गले लगाया और बोली: घबराओ मत मौसी पांच लंड मिलने वाले हैं अच्छे से निचोड़ लेना,

मौसी: बिलकुल बिटिया, अब तू देख मेरा जलवा

अंजली और मौसी दोनों साथ में हॉल के बीच आ गए,

नीतू: किरन बता मौसी का मुकाबला किससे है?

किरन ने दूसरी पर्ची पढ़ी और उस पर देखते हुए बोली: बुआ का सामना करेंगी हमारी रज्जो बुआ,

मतलब दूसरा नाम निकला रज्जो चाची का, अब दोनों ही प्रतियोगी एक से बढ़ कर एक थे, रज्जो चाची भी शर्माते हुए और सकुचाते हुए खड़ी हुई, उन्हें भी अंजली गले लगा कर लेकर आई,

नीतू: तो एक तरफ हैं मौसी, और एक तरफ हैं मेरी मम्मी, और ये दोनों ही लंड की प्यासी चुदक्कड़ रंडिया हैं तो मुकाबला तगड़ा होगा।

नीतू ने ये कहा तो सब हंसने लगे, इसी बीच पूर्वी दीदी ने पूछा कि जब इनकी चुदाई होगी तो बाकी सब क्या करेंगे,

अंजली: हम लोग दर्शक बनेंगे, चुम्मा चाटी और चूची दबाना चलेगा बस कोई दर्शक चुदाई नहीं करेगा।

मामा: लो भाई अब इसमें तो हमें भी रुकना पड़ेगा।

किरन: ये ही तो मज़ा है पापा।

नीतू: अब मम्मी और मौसी आदमियों के कटोरे से पांच पांच पर्चियां निकालेंगी, जो पर्चियां मम्मी निकालेंगी वो आदमी मौसी को चोदेंगे, और जो मौसी निकालेंगी वो मम्मी को।

पहले मौसी को मौका मिला तो उन्होंने पर्ची निकाली और बोली: प्रकाश भाई साहब,

यानि प्रीती और पंकज के पिता वो अपना नाम सुनकर उठे और हँसते मुस्कुराते हुए रज्जो चाची के पास जाकर खड़े हो गए,

फिर रज्जो चाची ने पर्ची निकाली और बोली: सुजान सिंह जीजाजी।

अपना नाम सुनकर बड़े फूफाजी खड़े हुए और मौसी के पास जाकर खड़े हो गये,

फिर मौसी ने एक पर्ची निकाली जिसमें चेतन जीजा का नाम था, चेतन जीजा भी तुरंत जाकर रज्जो चाची के पास खड़े हो गये, फिर रज्जो चाची ने पर्ची निकाली और उसमें चरण सिंह ताऊ का नाम है तो वो उठे और मौसी के पास आकर खड़े हो गये, अगली पर्ची मौसी ने निकाली उस पर पापा का नाम था पापा उठ कर रज्जो चाची के पास खड़े हो गये फिर रज्जो चाची ने निकाली जिस पर उदयवीर ताऊजी का नाम था, अगली पर्ची जो मौसी ने निकाली उस पर मामा का नाम था जो रज्जो चाची के पास खड़े हो गये, उसके बाद रज्जो चाची ने निकाली जिस पर उनके बेटे सरजू का नाम था, वो उठ कर मौसी के पास खड़ा हो गया मौसी ने अपनी आखिरी पर्ची निकाली जिस पर जग्गू का नाम था, वहीं रज्जो चाची ने अपनी आखिर पर्ची निकाली जिस पर मेरे ससुरजी महिपाल सिंह का नाम था।

जो लोग रज्जो चाची के पास खड़े थे और उन्हें चोदने वाले थे:- प्रकाश ताऊजी, चेतन जीजा, पापा, मामा, जग्गू

जो लोग मौसी के पास खड़े थे और उन्हें चोदने वाले थे: बड़े फूफाजी, चरण सिंह ताऊजी, उदयवीर ताऊजी, सरजू, महिपाल सिंह।

हम सब दर्शक लोग हॉल में घेरा बना कर बैठे थे और ये दोनों समूह अलग अलग होकर तैयार थे आज की प्रतियोगिता के लिए।



जारी रहेगी
 
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