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नीलेश की सारी मलाई सभ्या की गांड में भर गई। सभ्या ढीली पड़कर उनके सीने पर गिर गई, दोनों हाँफ रहे थे, बदन पसीने से तर।
हॉल में तालियाँ और सीटियाँ बजने लगीं। सबकी आँखों में अभी भी गर्मी थी। सब जानते थे कि रात अभी बाकी थी।
अपडेट 264
सभ्या और नीलेश दोनों चरम सुख के बाद स्टेज पर ही कुछ पल एक-दूसरे से लिपटे रहे। सभ्या अभी भी उनके चौड़े सीने से सटी हुई थी। उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। नीलेश की एक बाँह उसके पेट पर थी और दूसरा हाथ प्यार से उसके पसीने से भीगे चूचों को सहला रहा था।
पूरे हॉल में ज़ोरदार तालियाँ, सीटियाँ और शरारती चीखें गूँज रही थीं। सबसे आगे पूर्वी, पल्ली, किरण और शशि सबसे ज़्यादा शोर मचा रही थीं — “वाह मामी-मामा”, “ये हुई ना बात!”, “पच्चीस साल बाद भी आग वैसी ही है!”
नीलेश ने धीरे से सभ्या के कान में फुसफुसाकर पूछा, “ठीक हो मेरी रानी?”
सभ्या ने शर्माते हुए मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। उसकी आवाज़ अभी भी थोड़ी काँप रही थी, “बहुत ठीक हूँ जी… बस टाँगें थर-थर कर रही हैं।”
नीलेश हल्के से हँसा। फिर उसे अपनी गोद में उठा लिया। सभ्या ने दोनों हाथ उसके गले में डाल दिए और सिर उसके कंधे पर रख दिया। नीलेश स्टेज से नीचे उतरा और हॉल के एक शांत कोने में ले जाकर उसे आराम से सोफे पर बिठा दिया। खुद भी उसके बगल में बैठ गया और उसे अपनी बाँहों में समेट लिया।
सभ्या ने उसकी छाती पर सिर रखते हुए धीरे से कहा, “आज तुमने मुझे सच में रानी वाली अनुभूति करा दी… इतने साल बाद भी तुम मुझे ऐसे पागल कर देते हो।”
नीलेश ने उसके माथे को चूमते हुए मुस्कुराकर जवाब दिया, “और तुम मुझे।
दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए कुछ पल चुपचाप बैठे रहे, उनकी आँखें अपने आस पास देखने लगी क्योंकि हॉल में मस्ती और कामुकता का शोर धीरे-धीरे और बढ़ता जा रहा था।

पंकज की आँखों के सामने जो दृश्य चल रहा था, वो बेहद स्वादिष्ट था, लेकिन उसकी जीभ पर जो स्वाद आ रहा था, वो उससे कहीं ज़्यादा लुभावना था।
पल्ली पूरी तरह नंगी उसके मुँह पर सवार थी। अपनी भरी-भरी चूचियों को दोनों हाथों से मसलते हुए वो अपने गोल चूतड़ों को पंकज के चेहरे पर रगड़ रही थी। पंकज की जीभ उसकी चूत के अंदर-बाहर घूम रही थी, कभी चूतड़ों के बीच गहरी चाट मार रही थी। पल्ली आहें भरती हुई अपने चूतड़ नचा रही थी, जैसे उसकी जीभ को अपने इशारों पर नचा रही हो।
उनके ठीक पीछे बिरजू ने पूर्वी को पूरी तरह नंगा कर दिया था। पूर्वी घोड़ी बनकर बैठी हुई थी और बिरजू का पूरा मुँह उसके चूतड़ों के बीच गड़ा हुआ था। वो अपनी चूत और गांड दोनों को बिरजू के चेहरे पर ज़ोर-ज़ोर से रगड़ रही थी।
“आह… चाट ऐसे ही… ओह बिरजू भेंचोद… आह… चाट ना!” पूर्वी कराहते हुए चिल्लाई।
बिरजू को और जोश की ज़रूरत ही नहीं थी। वो पूरे उत्साह से उसकी चूत चाट रहा था, जीभ अंदर तक घुसा रहा था, कभी गांड के छेद को चूस रहा था।
और ठीक उनके पीछे, गद्दे पर नीतू पूरी नंगी लेटी हुई थी। टांगें चौड़ी फैलाई हुईं। उसके ऊपर चरण सिंह थे, जिनका मोटा, कड़ा लंड नीतू की चूत में दनादन घुस-घुसकर निकल रहा था। हर धक्के पर नीतू का बदन हिल रहा था और वो बेसुध सी कराह रही थी।

चरण सिंह नीतू की चूत में लंड घुसाए हुए हाँफते हुए बोले, “ओह बिटिया… आह… आह… क्या नाम है तेरा? मैं तो भूल ही गया…”
नीतू कराहते हुए मुस्कुराई, अपनी कमर हिलाते हुए बोली, “ओह ताऊजी… आह… चूत में लंड घुसाए चोद रहे हो और नाम भी भूल गए?”
चरण सिंह ने एक जोरदार धक्का लगाते हुए हँसते हुए कहा, “अरे क्या करूँ बिटिया… आह… उमर हो चली है ना… दिमाग ठीक से काम ही नहीं करता अब।”
नीतू ने अपनी चूचियों को मसलते हुए शरारती आवाज़ में बोली, “दिमाग का पता नहीं ताऊजी… आह… ओह… लेकिन तुम्हारा लंड तो बहुत अच्छे से काम कर रहा है… आह… बहुत तेज़!”
चरण सिंह ने नीतू की चूचियों को जोर से पकड़कर धक्के लगाते हुए कहा, “अरे बिटिया… तेरे जैसी कमसिन कली सामने हो तो मुर्दे का लंड भी खड़ा हो जाता है… आह… ले… ले मेरी जान…”
उसी समय उनके ठीक पीछे, कुछ ही दूर गद्दे पर नीतू के पापा यानी दीन दयाल चाचा थे। उन्होंने अंजली की भाभी रानी को नीचे लिटा रखा था और पूरी मस्ती से उसकी गांड मार रहे थे। रानी के गोल चूतड़ उनके धक्कों से लहरा रहे थे और वो बेसुध होकर कराह रही थी।

दीनू हाँफते हुए रानी की गांड में लंड ठोकते हुए बोले, “आह… आह… बहू… कितनी मक्खन जैसी गरम और मुलायम गांड है तेरी… आह… पूरी तरह निगल रही है मेरे लंड को…”
रानी कराहते हुए अपने चूतड़ पीछे की ओर उठाते हुए बोली, “आह… चाचा जी… ओह… मेरे ठरकी चाचा… ऐसे ही मारो… मेरी गरम गांड फाड़ दो… आह… बहुत मज़ा आ रहा है…”
दीनू ने उसके चूतड़ों को कसकर पकड़ लिया और तेज़ धक्के लगाते हुए कहा, “आह… हाँ बहू… तेरा ठरकी चाचा ऐसे ही तेरी गांड मारेगा… जितनी बार तू बोले… आह… ले… ले मेरी जान…”
रानी अपनी गांड मरवाने में पूरी तरह व्यस्त थी, तभी उसका पति पीयूष भी खाली नहीं बैठा था। वो कुछ ही दूर मंजू ताई को चोद रहा था — जग्गू की माँ को, जो अपनी भरी-भरी चूचियों को हिलाते हुए कराह रही थीं।

मंजू ताई एक कोने में गद्दे पर चित लेटी हुई थीं। पीयूष उनके पीछे लेटा हुआ, अपनी कमर हिलाते हुए अपनी पूरी लंबाई उनकी चूत में घुसा रहा था।
मंजू ताई आहें भरते हुए बोलीं, “आह… बच्चा… ओह… ऐसे ही… आह… आह… अपनी ताई की चूत फाड़ दो… कितना अच्छा चोदता है तू… आह!”
पीयूष उनके भरे-भरे चूतड़ पकड़कर जोर-जोर से धक्के लगाते हुए हाँफा, “ओह ताई… तुम्हारी चूत कितनी गरम है… आह… बहुत मज़ा आ रहा है… आह… कितनी कसी हुई है…”
मंजू ताई ने अपनी चूचियों को मसलते हुए कराहकर कहा, “ओह बच्चा… हमें भी बहुत मज़ा आ रहा है… आह… आह… कितना मोटा और जवान लंड है तेरा… आह… चोद… चोद मुझे… जवान लंड का मज़ा ही कुछ और है… आह!”
तभी मंजू ताई ने एक ओर इशारा करते हुए शरारती मुस्कान के साथ कहा, “अरे ये लोग कितना शोर कर रहे हैं…”
उधर सोफे पर लाड़ो, किरण और प्रीती चुदाई का पूरा मज़ा ले रही थीं। किरण अपने जीजा रमन का लंड अपनी गांड में लेकर धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रही थी। उसके बगल में रमन की बहन खुशी सागर के लंड पर सवार होकर जोर-जोर से कूद रही थी। और किरण के दूसरी तरफ लाड़ो पीठ के बल लेटी हुई थी — उसकी गांड में कर्मा के फूफाजी सुजान सिंह अपना मोटा लंड घुसाए हुए पूरी ताकत से चोद रहे थे।

सुजान सिंह लाड़ो की कसी हुई गांड में लंड ठोकते हुए हाँफ रहे थे, “आह… आह… ओह बिटिया… इतनी कसी गांड आज तक नहीं मारी… ओह… पता है तू सबसे छोटी होगी जिसके साथ हम चुदाई कर रहे हैं…”
किरण रमन का लंड अपनी गांड में लेकर ऊपर-नीचे उछलते हुए बोली, “ओह फूफाजी… कहीं छोटी नहीं है… आह… हम दोनों ही बीस की हैं… आह… ये बस पतली है तो कम लगती है…”
लाड़ो ने शर्माते हुए लेकिन नखरे से कहा, “आह… ओह… देखो तो कितना बुरा लग गया… फूफाजी ने मुझे छोटी कह दिया…”
रमन नीचे से जोरदार धक्के लगाते हुए हँसकर बोला, “अरे भाई बुरा तो लगेगा ही… औरत जात अपनी उमर कभी बढ़ने देती ही नहीं…”
सागर खुशी की गांड में लंड घुसाए हुए मजे से बोला, “अरे ये दोनों ऐसी ही लड़ती रहती हैं जीजा… ओह भाभी… फिर से ऐसे ही घुमाओ न अपनी गांड… आह… बहुत मज़ा आ रहा है…”
रमन ने शरारत से पूछा, “और साले साहब… कैसा लग रहा है मेरी बहन को चोदकर?”
सागर हाँफते हुए बोला, “वैसा ही जीजा… जैसे तुम्हें मेरी बहन चोदकर लग रहा होगा… बस आपकी बहन थोड़ी ज़्यादा सुंदर है।”
किरण तुरंत बोली, “और तू बंदर है!”
खुशी हँसते हुए बीच में पड़ी, “अरे लड़ो मत दोनों… और सच में किरण, तू सबसे सुंदर है।”
खुशी ने आगे झुककर किरण के होंठ चूस लिए। दोनों एक पल को अलग हुईं, फिर फिर से एक-दूसरे के होंठों में खो गईं — गहरे, गीले चुंबन के साथ।
उधर लाड़ो सुजान सिंह के मोटे लंड पर चढ़कर तेज़-तेज़ चिल्ला रही थी, “ओह… ओह… फूफाजी… आह… आह… और तेज़… आह… फाड़ दो मेरी गांड…!”
लाड़ो की तेज़ चीखें पूरे हॉल में गूँज रही थीं। उसकी आवाज़ उसके भाई सरजू के कानों तक भी पहुँच रही थी, पर सरजू का पूरा ध्यान कहीं और था।
वो सुजान सिंह की पत्नी यानी सावित्री बुआ के पीछे लेटा हुआ था और उनके भरे-भरे, मांसल बदन को भोगते हुए पूरी ताकत से चोद रहा था। सरजू को हमेशा से बड़ी उम्र की, गुदगुदे और भारी बदन वाली औरतें बहुत पसंद थीं — और आज सावित्री बुआ का वो गरम, नरम बदन उसके आगे पूरी तरह बिछा हुआ था।

हर झटके पर सावित्री के भारी-भारी चूचे जोर-जोर से झूल रहे थे। उनका ब्लाउज़ अधखुला पड़ा था, जिसमें से दोनों चूचियाँ बाहर निकलकर नाच रही थीं। उनका गुदगुदा, भरा हुआ पेट सरजू के हर धक्के के साथ लहरा रहा था। सरजू गरम साँसें लेते हुए लगातार उनकी चूत में गहरे-गहरे धक्के लगा रहा था।
सावित्री आहें भरते हुए बोलीं, “आह… आह… सरजू लल्ला… आह… पहले तू जब छोटा था, हमारी गोद में खेला करता था… आह… आज अपनी बुआ को ही गोद में चोद रहा है… ओह… आह!”
सरजू ने उनकी कमर कसकर पकड़ ली और तेज़ी से ठोकते हुए हाँफा, “ओह बुआ… मैं तो कब से तैयार था तुम्हें गोद में खिलाने के लिए… आह… आज मौका मिला है… ओह… आज नहीं छोडूँगा तुम्हें…”
ये कहते हुए सरजू ने आगे झुककर सावित्री के होंठों को अपने होंठों में कैद कर लिया और पागलों की तरह चूसने लगा। दोनों के मुँह एक-दूसरे से चिपके हुए थे, जीभें आपस में लड़ रही थीं।
उनसे थोड़ी ही दूरी पर सावित्री के देवर, विनीत और पूर्वी के पापा प्रदीप फूफाजी थे जो हमारी प्यारी प्रेमा भाभी को चोद रहे थे। वो प्रेमा के ऊपर लेट कर और अपना लंबा, मोटा लंड धीरे-धीरे लेकिन बहुत कामुक तरीके से उनकी चूत में अंदर-बाहर कर रहे थे। प्रेमा कराहती हुई उनकी छाती से चिपकी हुई थी।
प्रदीप फूफाजी प्रेमा की चूत में लंड घुसाए हुए हाँफते हुए बोले, “ओह बहू… बड़ी रसीली है तू… आह… तेरी चूत में ऐसा मज़ा आ रहा है, पूछ मत…”
प्रेमा कराहते हुए उनकी कमर से चिपक गई, “ओह फूफाजी… आह… तुम्हारा लंड भी तो पूरी चूत भर रहा है… आह… बहुत मज़ा आ रहा है… ओह… और तेज़…”
जहाँ बहू और पत्नियाँ सब किसी न किसी से चुद रही थीं, वहीं राजपाल ताऊ भी पीछे कैसे रहते? उन्होंने रिमझिम की सास माधुरी को नीचे लिटा रखा था और अपनी कड़क लंड उनकी चूत में जोर-जोर से ठोक रहे थे।

माधुरी आहें भरते हुए बोलीं, “आह… आह… भाई साहब… ऐसे ही… आह… बहुत तगड़ा चोदते हो तुम… आह… आह!”
राजपाल उनके भरे-भरे चूतड़ पकड़कर धक्के लगाते हुए बोले, “आह… जब चुदवाने वाली इतनी गजब की हो तो… ओह… लंड अपने आप चलने लगता है भाभी जी…”
माधुरी ने अपनी टांगें और फैलाते हुए कराहा, “आह… कैसा जीवन है हमारा… आह… आज पहली बार मिले और… ओह… चुदवा लिया…”
राजपाल मुस्कुराते हुए तेज़ धक्का लगाते हुए बोले, “आह… ओह… तुम्हें ये सब पसंद नहीं है क्या?”
माधुरी ने आँखें बंद करके हाँफते हुए जवाब दिया, “आह… बिल्कुल पसंद है… आह… ये सब नहीं होता तो… आह… ये मज़ा कैसे मिलता… और तेज़… और तेज़ करो…”
राजपाल ने उनकी चूत में और गहरे धक्के लगाते हुए कहा, “बिल्कुल सही… आह… आह… अब खुलकर जीने में अलग ही मज़ा है…”
माधुरी आहें भरते हुए बोलीं, “ओह बिल्कुल भाई साहब… आह… आह… बच्चों के सामने कोई पर्दा नहीं, कुछ छुपाना नहीं… आह… मज़ा चौगुनी हो जाता है…”
राजपाल ने जोर का धक्का लगाते हुए हाँफकर कहा, “ओह भाभी जी… तुमने बिल्कुल सही कहा… आह… बच्चों के साथ चुदाई का मज़ा ही कुछ और होता है…”
राजपाल ने एक पल के लिए सिर घुमाकर एक ओर देखा।
वहाँ उनका बेटा जग्गू करवट पर लेटा था, और माधुरी की छोटी बहू — यानी हमारी प्यारी रिमझिम को चोद रहा था। जग्गू रिमझिम को पीछे से पकड़े हुए था और अपनी पूरी ताकत से उसके अंदर धक्के लगा रहा था। रिमझिम दोनों हाथों से सोफे को पकड़े हुए जोर-जोर से कराह रही थी।

जग्गू ने उसकी कमर को दोनों हाथों से पकड़ लिया और तेज़-तेज़ धक्के लगाने लगा।
जग्गू: “आह… रिमझिम दीदी… ये मोटी गांड… आह… देखते ही मेरा लंड खड़ा हो जाता था… आज इसे भी चोदूँगा… ओह… बोलो… मज़ा आ रहा है ना?”
रिमझिम ने सिर पीछे झुकाते हुए कराहकर कहा, “आह… हाँ… बहुत मज़ा आ रहा है… आह… पहली बार तेरे जवान लंड से चुद रही हूँ… ओह… और चोदो जग्गू… आह… अपनी रिमझिम दीदी की चूत फाड़ दो… आह… आह!”
जग्गू ने आगे झुककर रिमझिम की पीठ पर किस करते हुए फुसफुसाया, “दीदी… आज रात आज… जितनी बार मन करे चोदूँगा… तुम्हारी चूत, आह गांड… सब कुछ…”
रिमझिम मज़े से सिहर गई और अपनी गांड पीछे की ओर और धकेल कर जग्गू के धक्कों का जवाब देने लगी।
उनसे थोड़ी ही दूरी पर रिमझिम के जेठ थे। वो अपने छोटे भाई की पत्नी को जग्गू के साथ चुदते हुए देख रहे थे, लेकिन उनका ज़्यादातर ध्यान कहीं और था — गुंजन मामी के मादक, भरे-भरे बदन पर।
गुंजन मामी सोफे पर एक करवट लेकर लेटी हुई थीं। चेतन उनके पीछे चिपका हुआ था और अपनी पूरी लंबाई उनकी गीली, रस भरी चूत में धक्के लगा रहा था।

गुंजन आहें भरते हुए बोलीं, “ओह… आह… आह… दामाद जी… ऐसे ही… आह… आह… मज़ा लूटो अपनी मामी-सास की चूत का… ओह… बहुत अच्छा लग रहा है…”
चेतन उनके गुदगुदे चूतड़ पकड़कर तेज़ धक्के लगाते हुए हाँफते हुए बोला, “आह… मामी… आप बहुत सुंदर हो… आह… तुम्हारा बदन बिल्कुल मक्खन जैसा है… ओह… कितना नरम और गरम…”
गुंजन ने अपनी कमर हिलाते हुए शरारती आवाज़ में कहा, “सब तुम्हारे लिए ही है जमाई बाबू… ओह… तुम्हारा मूसल तो बहुत कड़क है… आह… ऐसे ही कूट दो हमारी ओखली… आह… आह… चटनी बना दो जमाई बाबू…!”
चेतन ने जोर का धक्का लगाकर हाँफते हुए बोला, “आह्ह्ह… मामी… चटनी बना के… आह… तुम्हारी ओखली में भर देंगे… ओह… इधर आओ…”
ये कहते हुए चेतन ने गुंजन का चेहरा अपनी तरफ घुमाया और उनके होंठों को पागलों की तरह चूसने लगा। दोनों के मुँह एक-दूसरे से चिपक गए, जीभें लड़ने लगीं।
जहाँ चेतन गुंजन मामी के साथ रिश्ता गहरा कर रहा था, वहीं उसकी पत्नी चंचल भी राजन चाचा के साथ व्यस्त थी। राजन चाचा ने चंचल को पीठ के बल लिटा रखा था। उसकी टांगें फैलाकर अपने कंधों पर रख ली थीं और दनादन अपना मोटा लंड उसकी चूत में पेल रहे थे।
चंचल के मुँह से लगातार बेसुध आहें निकल रही थीं — “आह… आह… आह… मामा जी… ओह… बहुत तेज़… आह… फाड़ दोगे मेरी चूत…”

राजन चंचल की चूत में लंड घुसाए हुए हाँफते हुए बोले, “आह… नहीं बिटिया… आह… ऐसे कैसे फाड़ देंगे… अह… इसे तो अभी बहुत चोदना है… ओह बिटिया… आह… बहुत सुंदर है तू…”
चंचल कराहते हुए अपनी कमर हिलाती हुई बोली, “आह्ह्ह्ह… मामा… ओह… मेरी सुंदरता की वजह से ही तो… आह्ह्ह्ह… इतनी मार पड़ रही है मेरी चूत को… ओह… आह्ह्ह्ह… कितना कड़क और मोटा लंड है तुम्हारा…”
राजन ने चंचल की भारी चूचियों को दोनों हाथों से थामकर जोर से दबाते हुए कहा, “बिटिया… ओह… तू सामने रहेगी तो ये हमेशा ही कड़क रहेगा… आह… ले… ले मेरी जान…”
राजन चंचल की चूत की पिटाई करते हुए उसकी चूचियों को मसल रहे थे, जबकि चंचल बेसुध होकर आहें भर रही थी।
वहीं उसके सीधे-सादे पिता उदयवीर स्टेज के एक कोने में रज्जो चाची को लिटाए हुए चोद रहे थे। वो अकेले नहीं थे। उनके बगल में ही विनीत था, जो सविता (अंजली की माँ) को आगे झुकाकर उनकी चूत में लंड ठोक रहा था।
उसी के बगल में प्रीती पूरी नंगी लेटी हुई थी। अनुज उसकी टांगों के बीच खड़ा होकर तेज़-तेज़ धक्के लगा रहा था। प्रीती के सिर के पास नानाजी थे, जो उसका सिर थामे हुए अपना लंड उसके मुँह में डाले हुए थे। प्रीती दोनों तरफ से चुदते हुए चूस रही थी।

नाना: ओह आह बहुत अच्छा चूसती है तू बिटिया आह तेरे जैसी नातिन बहू की सेवा आह पाकर मज़ा आ रहा है,
अनुज: आह्ह्ह्ह नाना आयेगी ही आह आखिर पसंद किसकी है,
ये सुनकर प्रीती के भरे हुए मुंह पर ही हल्की सी मुस्कान आई पर उसने लंड चूसना जारी रखा,
नाना: बदमाश कही का, हर बात पर अपनी तारीफ करता है,
जारी रहेगी
हॉल में तालियाँ और सीटियाँ बजने लगीं। सबकी आँखों में अभी भी गर्मी थी। सब जानते थे कि रात अभी बाकी थी।
अपडेट 264
सभ्या और नीलेश दोनों चरम सुख के बाद स्टेज पर ही कुछ पल एक-दूसरे से लिपटे रहे। सभ्या अभी भी उनके चौड़े सीने से सटी हुई थी। उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं। नीलेश की एक बाँह उसके पेट पर थी और दूसरा हाथ प्यार से उसके पसीने से भीगे चूचों को सहला रहा था।
पूरे हॉल में ज़ोरदार तालियाँ, सीटियाँ और शरारती चीखें गूँज रही थीं। सबसे आगे पूर्वी, पल्ली, किरण और शशि सबसे ज़्यादा शोर मचा रही थीं — “वाह मामी-मामा”, “ये हुई ना बात!”, “पच्चीस साल बाद भी आग वैसी ही है!”
नीलेश ने धीरे से सभ्या के कान में फुसफुसाकर पूछा, “ठीक हो मेरी रानी?”
सभ्या ने शर्माते हुए मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। उसकी आवाज़ अभी भी थोड़ी काँप रही थी, “बहुत ठीक हूँ जी… बस टाँगें थर-थर कर रही हैं।”
नीलेश हल्के से हँसा। फिर उसे अपनी गोद में उठा लिया। सभ्या ने दोनों हाथ उसके गले में डाल दिए और सिर उसके कंधे पर रख दिया। नीलेश स्टेज से नीचे उतरा और हॉल के एक शांत कोने में ले जाकर उसे आराम से सोफे पर बिठा दिया। खुद भी उसके बगल में बैठ गया और उसे अपनी बाँहों में समेट लिया।
सभ्या ने उसकी छाती पर सिर रखते हुए धीरे से कहा, “आज तुमने मुझे सच में रानी वाली अनुभूति करा दी… इतने साल बाद भी तुम मुझे ऐसे पागल कर देते हो।”
नीलेश ने उसके माथे को चूमते हुए मुस्कुराकर जवाब दिया, “और तुम मुझे।
दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए कुछ पल चुपचाप बैठे रहे, उनकी आँखें अपने आस पास देखने लगी क्योंकि हॉल में मस्ती और कामुकता का शोर धीरे-धीरे और बढ़ता जा रहा था।

पंकज की आँखों के सामने जो दृश्य चल रहा था, वो बेहद स्वादिष्ट था, लेकिन उसकी जीभ पर जो स्वाद आ रहा था, वो उससे कहीं ज़्यादा लुभावना था।
पल्ली पूरी तरह नंगी उसके मुँह पर सवार थी। अपनी भरी-भरी चूचियों को दोनों हाथों से मसलते हुए वो अपने गोल चूतड़ों को पंकज के चेहरे पर रगड़ रही थी। पंकज की जीभ उसकी चूत के अंदर-बाहर घूम रही थी, कभी चूतड़ों के बीच गहरी चाट मार रही थी। पल्ली आहें भरती हुई अपने चूतड़ नचा रही थी, जैसे उसकी जीभ को अपने इशारों पर नचा रही हो।
उनके ठीक पीछे बिरजू ने पूर्वी को पूरी तरह नंगा कर दिया था। पूर्वी घोड़ी बनकर बैठी हुई थी और बिरजू का पूरा मुँह उसके चूतड़ों के बीच गड़ा हुआ था। वो अपनी चूत और गांड दोनों को बिरजू के चेहरे पर ज़ोर-ज़ोर से रगड़ रही थी।
“आह… चाट ऐसे ही… ओह बिरजू भेंचोद… आह… चाट ना!” पूर्वी कराहते हुए चिल्लाई।
बिरजू को और जोश की ज़रूरत ही नहीं थी। वो पूरे उत्साह से उसकी चूत चाट रहा था, जीभ अंदर तक घुसा रहा था, कभी गांड के छेद को चूस रहा था।
और ठीक उनके पीछे, गद्दे पर नीतू पूरी नंगी लेटी हुई थी। टांगें चौड़ी फैलाई हुईं। उसके ऊपर चरण सिंह थे, जिनका मोटा, कड़ा लंड नीतू की चूत में दनादन घुस-घुसकर निकल रहा था। हर धक्के पर नीतू का बदन हिल रहा था और वो बेसुध सी कराह रही थी।

चरण सिंह नीतू की चूत में लंड घुसाए हुए हाँफते हुए बोले, “ओह बिटिया… आह… आह… क्या नाम है तेरा? मैं तो भूल ही गया…”
नीतू कराहते हुए मुस्कुराई, अपनी कमर हिलाते हुए बोली, “ओह ताऊजी… आह… चूत में लंड घुसाए चोद रहे हो और नाम भी भूल गए?”
चरण सिंह ने एक जोरदार धक्का लगाते हुए हँसते हुए कहा, “अरे क्या करूँ बिटिया… आह… उमर हो चली है ना… दिमाग ठीक से काम ही नहीं करता अब।”
नीतू ने अपनी चूचियों को मसलते हुए शरारती आवाज़ में बोली, “दिमाग का पता नहीं ताऊजी… आह… ओह… लेकिन तुम्हारा लंड तो बहुत अच्छे से काम कर रहा है… आह… बहुत तेज़!”
चरण सिंह ने नीतू की चूचियों को जोर से पकड़कर धक्के लगाते हुए कहा, “अरे बिटिया… तेरे जैसी कमसिन कली सामने हो तो मुर्दे का लंड भी खड़ा हो जाता है… आह… ले… ले मेरी जान…”
उसी समय उनके ठीक पीछे, कुछ ही दूर गद्दे पर नीतू के पापा यानी दीन दयाल चाचा थे। उन्होंने अंजली की भाभी रानी को नीचे लिटा रखा था और पूरी मस्ती से उसकी गांड मार रहे थे। रानी के गोल चूतड़ उनके धक्कों से लहरा रहे थे और वो बेसुध होकर कराह रही थी।

दीनू हाँफते हुए रानी की गांड में लंड ठोकते हुए बोले, “आह… आह… बहू… कितनी मक्खन जैसी गरम और मुलायम गांड है तेरी… आह… पूरी तरह निगल रही है मेरे लंड को…”
रानी कराहते हुए अपने चूतड़ पीछे की ओर उठाते हुए बोली, “आह… चाचा जी… ओह… मेरे ठरकी चाचा… ऐसे ही मारो… मेरी गरम गांड फाड़ दो… आह… बहुत मज़ा आ रहा है…”
दीनू ने उसके चूतड़ों को कसकर पकड़ लिया और तेज़ धक्के लगाते हुए कहा, “आह… हाँ बहू… तेरा ठरकी चाचा ऐसे ही तेरी गांड मारेगा… जितनी बार तू बोले… आह… ले… ले मेरी जान…”
रानी अपनी गांड मरवाने में पूरी तरह व्यस्त थी, तभी उसका पति पीयूष भी खाली नहीं बैठा था। वो कुछ ही दूर मंजू ताई को चोद रहा था — जग्गू की माँ को, जो अपनी भरी-भरी चूचियों को हिलाते हुए कराह रही थीं।

मंजू ताई एक कोने में गद्दे पर चित लेटी हुई थीं। पीयूष उनके पीछे लेटा हुआ, अपनी कमर हिलाते हुए अपनी पूरी लंबाई उनकी चूत में घुसा रहा था।
मंजू ताई आहें भरते हुए बोलीं, “आह… बच्चा… ओह… ऐसे ही… आह… आह… अपनी ताई की चूत फाड़ दो… कितना अच्छा चोदता है तू… आह!”
पीयूष उनके भरे-भरे चूतड़ पकड़कर जोर-जोर से धक्के लगाते हुए हाँफा, “ओह ताई… तुम्हारी चूत कितनी गरम है… आह… बहुत मज़ा आ रहा है… आह… कितनी कसी हुई है…”
मंजू ताई ने अपनी चूचियों को मसलते हुए कराहकर कहा, “ओह बच्चा… हमें भी बहुत मज़ा आ रहा है… आह… आह… कितना मोटा और जवान लंड है तेरा… आह… चोद… चोद मुझे… जवान लंड का मज़ा ही कुछ और है… आह!”
तभी मंजू ताई ने एक ओर इशारा करते हुए शरारती मुस्कान के साथ कहा, “अरे ये लोग कितना शोर कर रहे हैं…”
उधर सोफे पर लाड़ो, किरण और प्रीती चुदाई का पूरा मज़ा ले रही थीं। किरण अपने जीजा रमन का लंड अपनी गांड में लेकर धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रही थी। उसके बगल में रमन की बहन खुशी सागर के लंड पर सवार होकर जोर-जोर से कूद रही थी। और किरण के दूसरी तरफ लाड़ो पीठ के बल लेटी हुई थी — उसकी गांड में कर्मा के फूफाजी सुजान सिंह अपना मोटा लंड घुसाए हुए पूरी ताकत से चोद रहे थे।

सुजान सिंह लाड़ो की कसी हुई गांड में लंड ठोकते हुए हाँफ रहे थे, “आह… आह… ओह बिटिया… इतनी कसी गांड आज तक नहीं मारी… ओह… पता है तू सबसे छोटी होगी जिसके साथ हम चुदाई कर रहे हैं…”
किरण रमन का लंड अपनी गांड में लेकर ऊपर-नीचे उछलते हुए बोली, “ओह फूफाजी… कहीं छोटी नहीं है… आह… हम दोनों ही बीस की हैं… आह… ये बस पतली है तो कम लगती है…”
लाड़ो ने शर्माते हुए लेकिन नखरे से कहा, “आह… ओह… देखो तो कितना बुरा लग गया… फूफाजी ने मुझे छोटी कह दिया…”
रमन नीचे से जोरदार धक्के लगाते हुए हँसकर बोला, “अरे भाई बुरा तो लगेगा ही… औरत जात अपनी उमर कभी बढ़ने देती ही नहीं…”
सागर खुशी की गांड में लंड घुसाए हुए मजे से बोला, “अरे ये दोनों ऐसी ही लड़ती रहती हैं जीजा… ओह भाभी… फिर से ऐसे ही घुमाओ न अपनी गांड… आह… बहुत मज़ा आ रहा है…”
रमन ने शरारत से पूछा, “और साले साहब… कैसा लग रहा है मेरी बहन को चोदकर?”
सागर हाँफते हुए बोला, “वैसा ही जीजा… जैसे तुम्हें मेरी बहन चोदकर लग रहा होगा… बस आपकी बहन थोड़ी ज़्यादा सुंदर है।”
किरण तुरंत बोली, “और तू बंदर है!”
खुशी हँसते हुए बीच में पड़ी, “अरे लड़ो मत दोनों… और सच में किरण, तू सबसे सुंदर है।”
खुशी ने आगे झुककर किरण के होंठ चूस लिए। दोनों एक पल को अलग हुईं, फिर फिर से एक-दूसरे के होंठों में खो गईं — गहरे, गीले चुंबन के साथ।
उधर लाड़ो सुजान सिंह के मोटे लंड पर चढ़कर तेज़-तेज़ चिल्ला रही थी, “ओह… ओह… फूफाजी… आह… आह… और तेज़… आह… फाड़ दो मेरी गांड…!”
लाड़ो की तेज़ चीखें पूरे हॉल में गूँज रही थीं। उसकी आवाज़ उसके भाई सरजू के कानों तक भी पहुँच रही थी, पर सरजू का पूरा ध्यान कहीं और था।
वो सुजान सिंह की पत्नी यानी सावित्री बुआ के पीछे लेटा हुआ था और उनके भरे-भरे, मांसल बदन को भोगते हुए पूरी ताकत से चोद रहा था। सरजू को हमेशा से बड़ी उम्र की, गुदगुदे और भारी बदन वाली औरतें बहुत पसंद थीं — और आज सावित्री बुआ का वो गरम, नरम बदन उसके आगे पूरी तरह बिछा हुआ था।

हर झटके पर सावित्री के भारी-भारी चूचे जोर-जोर से झूल रहे थे। उनका ब्लाउज़ अधखुला पड़ा था, जिसमें से दोनों चूचियाँ बाहर निकलकर नाच रही थीं। उनका गुदगुदा, भरा हुआ पेट सरजू के हर धक्के के साथ लहरा रहा था। सरजू गरम साँसें लेते हुए लगातार उनकी चूत में गहरे-गहरे धक्के लगा रहा था।
सावित्री आहें भरते हुए बोलीं, “आह… आह… सरजू लल्ला… आह… पहले तू जब छोटा था, हमारी गोद में खेला करता था… आह… आज अपनी बुआ को ही गोद में चोद रहा है… ओह… आह!”
सरजू ने उनकी कमर कसकर पकड़ ली और तेज़ी से ठोकते हुए हाँफा, “ओह बुआ… मैं तो कब से तैयार था तुम्हें गोद में खिलाने के लिए… आह… आज मौका मिला है… ओह… आज नहीं छोडूँगा तुम्हें…”
ये कहते हुए सरजू ने आगे झुककर सावित्री के होंठों को अपने होंठों में कैद कर लिया और पागलों की तरह चूसने लगा। दोनों के मुँह एक-दूसरे से चिपके हुए थे, जीभें आपस में लड़ रही थीं।
उनसे थोड़ी ही दूरी पर सावित्री के देवर, विनीत और पूर्वी के पापा प्रदीप फूफाजी थे जो हमारी प्यारी प्रेमा भाभी को चोद रहे थे। वो प्रेमा के ऊपर लेट कर और अपना लंबा, मोटा लंड धीरे-धीरे लेकिन बहुत कामुक तरीके से उनकी चूत में अंदर-बाहर कर रहे थे। प्रेमा कराहती हुई उनकी छाती से चिपकी हुई थी।

प्रदीप फूफाजी प्रेमा की चूत में लंड घुसाए हुए हाँफते हुए बोले, “ओह बहू… बड़ी रसीली है तू… आह… तेरी चूत में ऐसा मज़ा आ रहा है, पूछ मत…”
प्रेमा कराहते हुए उनकी कमर से चिपक गई, “ओह फूफाजी… आह… तुम्हारा लंड भी तो पूरी चूत भर रहा है… आह… बहुत मज़ा आ रहा है… ओह… और तेज़…”
जहाँ बहू और पत्नियाँ सब किसी न किसी से चुद रही थीं, वहीं राजपाल ताऊ भी पीछे कैसे रहते? उन्होंने रिमझिम की सास माधुरी को नीचे लिटा रखा था और अपनी कड़क लंड उनकी चूत में जोर-जोर से ठोक रहे थे।

माधुरी आहें भरते हुए बोलीं, “आह… आह… भाई साहब… ऐसे ही… आह… बहुत तगड़ा चोदते हो तुम… आह… आह!”
राजपाल उनके भरे-भरे चूतड़ पकड़कर धक्के लगाते हुए बोले, “आह… जब चुदवाने वाली इतनी गजब की हो तो… ओह… लंड अपने आप चलने लगता है भाभी जी…”
माधुरी ने अपनी टांगें और फैलाते हुए कराहा, “आह… कैसा जीवन है हमारा… आह… आज पहली बार मिले और… ओह… चुदवा लिया…”
राजपाल मुस्कुराते हुए तेज़ धक्का लगाते हुए बोले, “आह… ओह… तुम्हें ये सब पसंद नहीं है क्या?”
माधुरी ने आँखें बंद करके हाँफते हुए जवाब दिया, “आह… बिल्कुल पसंद है… आह… ये सब नहीं होता तो… आह… ये मज़ा कैसे मिलता… और तेज़… और तेज़ करो…”
राजपाल ने उनकी चूत में और गहरे धक्के लगाते हुए कहा, “बिल्कुल सही… आह… आह… अब खुलकर जीने में अलग ही मज़ा है…”
माधुरी आहें भरते हुए बोलीं, “ओह बिल्कुल भाई साहब… आह… आह… बच्चों के सामने कोई पर्दा नहीं, कुछ छुपाना नहीं… आह… मज़ा चौगुनी हो जाता है…”
राजपाल ने जोर का धक्का लगाते हुए हाँफकर कहा, “ओह भाभी जी… तुमने बिल्कुल सही कहा… आह… बच्चों के साथ चुदाई का मज़ा ही कुछ और होता है…”
राजपाल ने एक पल के लिए सिर घुमाकर एक ओर देखा।
वहाँ उनका बेटा जग्गू करवट पर लेटा था, और माधुरी की छोटी बहू — यानी हमारी प्यारी रिमझिम को चोद रहा था। जग्गू रिमझिम को पीछे से पकड़े हुए था और अपनी पूरी ताकत से उसके अंदर धक्के लगा रहा था। रिमझिम दोनों हाथों से सोफे को पकड़े हुए जोर-जोर से कराह रही थी।

जग्गू ने उसकी कमर को दोनों हाथों से पकड़ लिया और तेज़-तेज़ धक्के लगाने लगा।
जग्गू: “आह… रिमझिम दीदी… ये मोटी गांड… आह… देखते ही मेरा लंड खड़ा हो जाता था… आज इसे भी चोदूँगा… ओह… बोलो… मज़ा आ रहा है ना?”
रिमझिम ने सिर पीछे झुकाते हुए कराहकर कहा, “आह… हाँ… बहुत मज़ा आ रहा है… आह… पहली बार तेरे जवान लंड से चुद रही हूँ… ओह… और चोदो जग्गू… आह… अपनी रिमझिम दीदी की चूत फाड़ दो… आह… आह!”
जग्गू ने आगे झुककर रिमझिम की पीठ पर किस करते हुए फुसफुसाया, “दीदी… आज रात आज… जितनी बार मन करे चोदूँगा… तुम्हारी चूत, आह गांड… सब कुछ…”
रिमझिम मज़े से सिहर गई और अपनी गांड पीछे की ओर और धकेल कर जग्गू के धक्कों का जवाब देने लगी।
उनसे थोड़ी ही दूरी पर रिमझिम के जेठ थे। वो अपने छोटे भाई की पत्नी को जग्गू के साथ चुदते हुए देख रहे थे, लेकिन उनका ज़्यादातर ध्यान कहीं और था — गुंजन मामी के मादक, भरे-भरे बदन पर।
गुंजन मामी सोफे पर एक करवट लेकर लेटी हुई थीं। चेतन उनके पीछे चिपका हुआ था और अपनी पूरी लंबाई उनकी गीली, रस भरी चूत में धक्के लगा रहा था।

गुंजन आहें भरते हुए बोलीं, “ओह… आह… आह… दामाद जी… ऐसे ही… आह… आह… मज़ा लूटो अपनी मामी-सास की चूत का… ओह… बहुत अच्छा लग रहा है…”
चेतन उनके गुदगुदे चूतड़ पकड़कर तेज़ धक्के लगाते हुए हाँफते हुए बोला, “आह… मामी… आप बहुत सुंदर हो… आह… तुम्हारा बदन बिल्कुल मक्खन जैसा है… ओह… कितना नरम और गरम…”
गुंजन ने अपनी कमर हिलाते हुए शरारती आवाज़ में कहा, “सब तुम्हारे लिए ही है जमाई बाबू… ओह… तुम्हारा मूसल तो बहुत कड़क है… आह… ऐसे ही कूट दो हमारी ओखली… आह… आह… चटनी बना दो जमाई बाबू…!”
चेतन ने जोर का धक्का लगाकर हाँफते हुए बोला, “आह्ह्ह… मामी… चटनी बना के… आह… तुम्हारी ओखली में भर देंगे… ओह… इधर आओ…”
ये कहते हुए चेतन ने गुंजन का चेहरा अपनी तरफ घुमाया और उनके होंठों को पागलों की तरह चूसने लगा। दोनों के मुँह एक-दूसरे से चिपक गए, जीभें लड़ने लगीं।
जहाँ चेतन गुंजन मामी के साथ रिश्ता गहरा कर रहा था, वहीं उसकी पत्नी चंचल भी राजन चाचा के साथ व्यस्त थी। राजन चाचा ने चंचल को पीठ के बल लिटा रखा था। उसकी टांगें फैलाकर अपने कंधों पर रख ली थीं और दनादन अपना मोटा लंड उसकी चूत में पेल रहे थे।
चंचल के मुँह से लगातार बेसुध आहें निकल रही थीं — “आह… आह… आह… मामा जी… ओह… बहुत तेज़… आह… फाड़ दोगे मेरी चूत…”

राजन चंचल की चूत में लंड घुसाए हुए हाँफते हुए बोले, “आह… नहीं बिटिया… आह… ऐसे कैसे फाड़ देंगे… अह… इसे तो अभी बहुत चोदना है… ओह बिटिया… आह… बहुत सुंदर है तू…”
चंचल कराहते हुए अपनी कमर हिलाती हुई बोली, “आह्ह्ह्ह… मामा… ओह… मेरी सुंदरता की वजह से ही तो… आह्ह्ह्ह… इतनी मार पड़ रही है मेरी चूत को… ओह… आह्ह्ह्ह… कितना कड़क और मोटा लंड है तुम्हारा…”
राजन ने चंचल की भारी चूचियों को दोनों हाथों से थामकर जोर से दबाते हुए कहा, “बिटिया… ओह… तू सामने रहेगी तो ये हमेशा ही कड़क रहेगा… आह… ले… ले मेरी जान…”
राजन चंचल की चूत की पिटाई करते हुए उसकी चूचियों को मसल रहे थे, जबकि चंचल बेसुध होकर आहें भर रही थी।
वहीं उसके सीधे-सादे पिता उदयवीर स्टेज के एक कोने में रज्जो चाची को लिटाए हुए चोद रहे थे। वो अकेले नहीं थे। उनके बगल में ही विनीत था, जो सविता (अंजली की माँ) को आगे झुकाकर उनकी चूत में लंड ठोक रहा था।
उसी के बगल में प्रीती पूरी नंगी लेटी हुई थी। अनुज उसकी टांगों के बीच खड़ा होकर तेज़-तेज़ धक्के लगा रहा था। प्रीती के सिर के पास नानाजी थे, जो उसका सिर थामे हुए अपना लंड उसके मुँह में डाले हुए थे। प्रीती दोनों तरफ से चुदते हुए चूस रही थी।

नाना: ओह आह बहुत अच्छा चूसती है तू बिटिया आह तेरे जैसी नातिन बहू की सेवा आह पाकर मज़ा आ रहा है,
अनुज: आह्ह्ह्ह नाना आयेगी ही आह आखिर पसंद किसकी है,
ये सुनकर प्रीती के भरे हुए मुंह पर ही हल्की सी मुस्कान आई पर उसने लंड चूसना जारी रखा,
नाना: बदमाश कही का, हर बात पर अपनी तारीफ करता है,
जारी रहेगी














































